हिन्दुस्तान अखबार के घोटाले की पुलिस जांच शुरू, शोभना भरतिया और शशिशेखर हो सकते हैं गिरफ्तार

मुंगेर (बिहार) : पत्रकारिता के छात्रों को ‘सत्य के संधान’ का लेक्चर देने वाले शशि शेखर अपने अखबार के ही एक घोटाल में आरोपी हैं. सुप्रीम कोर्ट के 11 जुलाई 2018 के आदेश के आलोक में मुंगेर के पुलिस अधीक्षक गौरव मंगला ने दैनिक हिन्दुस्तान के फर्जी संस्करण और 200 करोड़ रुपए के सरकारी विज्ञापन घोटाले की जांच शुरू कर दी है. इसमें शशि शेखर के अलावा अखबार मालकिन शोभना भरतिया, अक्कू श्रीवास्तव, बिनोद बंधु, अमित चोपड़ा भी आरोपी हैं. Continue reading

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पत्रकारिता के नए छात्रों को ‘सत्य के संधान’ का लेक्चर दे आए शशिशेखर!

आजकल के दौर में मुख्यधारा के संपादक, अखबार और चैनल सत्य की कतई पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं. वे झूठ की, सत्ता की, कारपोरेट की, लालच की, अवसरवादिता की, जन विरोध की पत्रकारिता कर रहे हैं. बिड़ला खानदान के अखबार हिंदुस्तान के समूह संपादक हैं शशि शेखर. अंबानी के चैनल न्यूज18इंडिया के एंकर हैं सुमित अवस्थी. Continue reading

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बहुत बड़े ‘खिलाड़ी’ शशि शेखर को पत्रकार नवीन कुमार ने दिखाया भरपूर आइना! (पढ़िए पत्र)

आदरणीय शशि शेखर जी,

नमस्कार,

बहुत तकलीफ के साथ यह पत्र लिख रहा हूं। पता नहीं यह आपतक पहुंचेगा या नहीं। पहुंचेगा तो तवज्जो देंगे या नहीं। बड़े संपादक तुच्छ बातों को महत्त्व नहीं दे। तब भी लिख रहा हूं क्योंकि यह वर्ग सत्ता का नहीं विचार सत्ता का प्रश्न है। एक जिम्मेदार पाठक के तौर पर यह लिखना मेरा दायित्व है। जब संपादक अपने अखबारों को डेरे में बदलने लगें और तथ्यों के साथ डेरा प्रमुख की तरह खेलने लगें तो पत्रकारिता की हालत पंचकुला जैसी हो जाती है और पाठक प्रमुख के पालित सेवादारों के पैरों के नीचे पड़ा होता है।

कल का आपका अखबार पढ़ा। जिसके आप प्रधान संपादक हैं। रविवासरीय हिंदुस्तान। कई अखबार लेता हूं लेकिन एक आदत सी है कि हिंदी के अखबार सबसे पहले पढ़ता हूं। पहली लीड थी – बाबा के बॉडीगार्ड की गोली से भड़की हिंसा, छह पुलिसकर्मी और दो निजी सुरक्षाकर्मियों पर देशद्रोह का केस। मुझे अजीब लगा। एक दिन पहले खट्टर सरकार के ठप पड़ जाने की सारी तस्वीरें पूरा देश देख चुका था। साफ था कि हिंसा भड़की नहीं हैं भड़कने दी गई है। खबर से ऐसा लगा कि अखबार ने सरकार को साफ बचा लेने की नीयत से पूरी खबर लिखी है। कई घटनाएं ऐसी होती हैं संपादक जी, जो संपादकीय विश्वसनीयता के चीथड़े उड़ाकर रख देती हैं। 32 हत्याओं और 200 से ज्यादा घायलों पर एक अखबार सत्य को जब परास्त करने की कोशिश करता है तो तथ्य की लाश पहले ही बिछ जाती है। लेकिन अब यह इतना साधारण सिद्धांत नहीं रहा।

मैंने फिर बाकी के अखबार पढ़े। इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदू, नवभारत टाइम्स, भास्कर और आप ही के अखबार का सहोदर हिंदुस्तान टाइम्स। पढ़कर एक अजीब सी विरक्ति से मन उचट गया। एक तो खबरें ऐसी थी और दूसरे मैंने अपने प्रिय अखबार को सत्ता के तल्ले के नीचे कराहते देखा था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा था – “प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री हैं, बीजेपी के नहीं। कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है।” आपने कभी सुना है किसी अदालत ने किसी प्रधानंत्री पर ऐसा अविश्वास जताया हो? उसकी जवाबदेही को ऐसे चिन्हित किया हो? उसकी क्षमताओं को लेकर इस कदर आहत महसूस किया हो? अपने सीने पर हाथ रखकर खुद से पूछिए शशि जी आपने कभी सुना है ऐसा कि अदालत को याद दिलाना पड़े आप देश के प्रधानमंत्री हैं पार्टी के नहीं? सुना है तो इस पत्र को यहीं स्थगित समझें और नहीं तो एक पाठक की तकलीफ को समझने की कोशिश करें। सारे अखबारों को लगा कि यह खबर है सिवाए दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स के। आपके निबंध दोनों ही अखबारों में छपते रहते हैं। फिलहाल सिर्फ दैनिक हिंदुस्तान की बात क्योंकि पहली भाषा हिंदी होने के कारण उससे जुड़ाव ज्यादा है।

मुझे लगा कि अंदर के पन्ने में कहीं छोटी सी खबर होगी जरूर। इतनी महत्त्वपूर्ण खबर को 30 पन्ने के अखबार से उड़ाने के लिए जिगर चाहिए। कोई संपादक इतना निर्लज्ज और निष्ठुर नहीं हो सकता कि वो प्रधानमंत्री को पार्टी का प्रधानमंत्री कहे जाने पर एक भी कॉलम की जगह न दे। और सच में आप साहसी निकले। आपने सच में प्रधानमंत्री पर अदालत की टिप्पणियों को पाठकों की नजर से बचा लिया था। फिर मुझे हंसी आ गई। टिटिहरी के बारे में छात्र जीवन के किस्से की याद आ गई। आपने भी सुना होगा। टिटिहरी जब सोती है तो पैरों को आसमान की तरफ उठाकर रखती है। उसे लगता है कि आसमान को उसी ने थाम रखा है नहीं तो वो गिर जाएगा और सृष्टि खत्म हो जाएगी।

आपके मन में कहीं न कहीं ये जरूर रहा होगा कि अगर हिंदुस्तान खबर उड़ा देगा तो किसी को पता नहीं चलेगा और शहंशाह की नजरों में आपका नंबर बढ़ जाएगा। हर गुनहगार को चोरी करते हुए यही लगता है। वो चाहे शहर का चोर हो या खबर का। नंबर बढ़ने वाली बात इसलिए कहनी पड़ रही है कि चौदहवें पन्ने पर ही सही आपने मुख्यमंत्री खट्टर पर अदालत की टिप्पणियों को तो जगह दी है लेकिन उसी टिप्पणी में नत्थी प्रधानमंत्री के गिरेबान को साफ बचा लिया है। इसलिए आप इस छूट के पात्र नहीं हैं कि रिपोर्टर ने खबर छोड़ दी या डेस्क वाले से भूल हो गई है। वैसे भी अदालत की खबर आपने एजेंसी से ली है और एजेंसी ने पूरी खबर दी थी। वैसे भी प्रधानमंत्री पर इतनी बड़ी टिप्पणी को ड्रॉप करने का फैसला प्रधान संपादक से नीचे का मुलाजिम नहीं ले सकता।

आप तो जादूगर निकले शशि जी। सधा हुआ मंतरमार। हमने देखा है कि जादूगर नजरों के सामने से ताजमहल गायब कर देता है। कुतुबमीनार गायब कर देता है। और तो और हंसता-खेलता बच्चा गायब कर देता है। आप खबर गायब कर देते हैं। लेकिन पत्रकारिता के इस अपराध को जादू करना एक और अपराध हो जाएगा। इसे होशियारी कहते हैं। लेकिन हर जादू के बाद का सच ये है कि मतिभ्रम स्थायी नहीं होता। सूचना के अतिरेक और रफ्तार के दौर में यह मान लेना ही विचित्र लगता है कि अगर वो तथ्य को छिपा ले जाएगा तो वह जनता तक नहीं पहुंचेगा। मैंने जानबूझकर जनता शब्द का इस्तेमाल किया है पाठक का नहीं। क्योंकि इस फूहड़ मजाक के जरिए आपने एक खास प्रजाति की राजनीति की अनुयायी जनता को ही संबोधित किया था वर्ना पाठकों के विश्वास की फिक्र किसी को इस कदर बेईमान हो जाने की छूट नहीं देती।

जब मुझे लोग बताते थे कि आज का संपादक रहते हुए बाबरी मस्जिद को गिराने के समय आज अखबार में कैसे-कैसे जादू किए थे तो लगता था आप कच्चे रहे होंगे। तजुर्बे के अभाव में आपके भीतर का सवर्ण हिंदू फुफकार मार उठा होगा। लेकिन अब लगता है कि आप कच्चे नहीं मंजे हुए थे। आप तो बरसों से अपनी लाइन पर चल रहे हैं। वो तो हम हैं जो अभी भी अखबार को अखबार और संपादक को संपादक माने बैठे हैं। प्रधानमंत्री पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की टिप्पणी को गोल करके मेरे जैसे लाखों पाठकों की बची-खुची धारणाओं को ध्वस्त कर दिया है।

एक अखबार का खाप में बदल जाना खराब लगता है शशि जी। इससे भी खराब लगता है किसी संपादक का उस खाप का नंबरदार बन जाना। हम सब सत्य के साथ खड़े रहने के साहस के दुर्भिक्ष के दौर में जी रहे हैं। ऐसे में एक और संपादक का बेपर्दा हो जाना हमारी तरह के आशावादी लोगों के लिए एक और सदमा है। इस अपराध के लिए पाठकों से माफी मांगकर आप इस विश्वास की रक्षा कर सकते हैं लेकिन क्या एक बड़े अखबार का संपादक होने का दंभ और प्रधानमंत्री की नजरों से उतार दिए जाने का भय आपको ऐसा करने देगा?

आज से दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स बंद कर रहा हूं। जानता हूं कि लाखों प्रतियों के प्रसार से एक प्रति का कम हो जाना राई बराबर भी महत्त्व नहीं रखता लेकिन पत्रकारिता के खापों को अपने ड्राइंग रूम में जानते-बूझते सजाकर रख भी तो नहीं सकता। सवाल केवल राम रहीम के डेरे का नहीं है। पत्रकारिता के डेरों और खापों का भी है। अफसोस, राम रहीम के डेरे के आतंक ने 32 नहीं 33 लाशें गिराई हैं। 33वीं लाश का नाम ‘हिंदुस्तान’ है।

आपका,

एक सुधी पाठक

नवीन कुमार

लेखक नवीन कुमार आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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यह शख्स जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया!

Deshpal Singh Panwar : अगर ये खबर सच है कि हिंदुस्तान टाइम्स समूह को मुकेश अंबानी खरीद रहे हैं तो तय है कि अच्छे दिन (स्टाफ के लिए पीएम के वादे जैसे) आने वाले हैं। वैसे इतिहास खुद को दोहराता है… कानाफूसी के मुताबिक एक शख्स जो इस समूह के हिंदी अखबार में चोटी पर है वो जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया।

बनारस के ‘आज’ से लेकर जागरण के आगरा संस्करण का किस्सा हो या फिर वो अखबार जिसके मालिकों की एकता की मिसाल दी जाती थी और एक दिन ऐसा आया कि भाई-भाई अलग हो गए, बंटवारा हो गया, पत्रकारिता के लिए सबसे दुखद दिन था वो, कम से कम हम जैसों के लिए। अगर ये बात सच है तो इतने पर भी इनको चैन पड़ जाता तो खैरियत थी, एक भाई को केस तक में उलझवा दिया, उसके बाद जो हुआ वो भगवान ना करे किसी के साथ हो, वो सब जानते हैं…लिखते हुए भी दुख होता है..

अब अगर हिंदुस्तान समूह के बिकने की बात है तो कानाफूसी के मुताबिक इस हाऊस को भी लगा ही दिया ठिकाने। अगला नंबर मुकेश अंबानी का होगा अगर उन्होंने इन्हें रखा तो, वैसे ये जुगाड़ कर लेंगे, पीएम की तरह बोलने की ही तो खाते हैं.दुख किसी के बिकने और खुशी किसी के खरीदने की नहीं है हां स्टाफ का कुछ बुरा ना हो बस यही ख्वाहिश है। वेज बोरड की वजह से बिक रहा है ये मैं मानने को तैयार नहीं हूं। जो हो अच्छा हो..

कई अखबारों में संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार देशपाल सिंह पंवार की फेसबुक वॉल से.

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दगे हुए सांड़ों की दिलचस्प दास्तान : शशि शेखर महोदय के लेखों में थरथराहट काफी होती है…

अनेहस शाश्वत

आज यशवंत सिंह के इस भड़ास बक्से में आप सबके लिए कुछ हास्य का आइटम पेश करूंगा। पेशेवर पत्रकारिता को जब एक तरह से तिलांजलि दी थी तो सोचा था कि इस बाबत कभी कुछ लिखूं पढ़ूंगा नहीं, और न ही इस बाबत किसी से कुछ शिकायत करूंगा। क्योंकि इस पेशे में आने का निर्णय और फिर इसे छोड़ने का निर्णय भी मेरा ही था। इस पेश से जुड़े किसी भी आदमी ने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि आओ और न ही यह कहा कि इसे छोड़ दो, लेकिन बीस वर्ष की अवधि कम नहीं होती और इस अवधि में मुझे भी कुछ मजेदार अनुभव हुए। कई साथियों ने कहा कि इस बाबत भी कुछ लिख दो। कड़वे अनुभवों का जिक्र बेकार है क्योंकि वे निरर्थक हैं और एकाध कमीने सम्पादकों के सम्पादनकाल में ही हुए। मजेदार अनुभव काफी हैं जिनमें से कुछ का जिक्र मैं करूंगा।

तो साहब मास्टर की औलाद हूं, और परिवार में पुश्तों से लोगों ने या तो वकालत की या फिर सरकारी नौकरी। इसलिए हिन्दी पत्रकारिता के बारे में मेरा ज्ञान शून्य था। उस जमाने में हिन्दी पत्रकारिता एक बंद सा पेशा था। जिसके बारे में आमजन को कुछ खास अनुभव नहीं था, इसलिए फीडबैक लेना सम्भव भी नहीं था। बाहर की दुनिया में जो छनकर आता था वह ये कि सम्पादकगण बहुत विद्वान होते हैं और जुझारू पत्रकार जनहित में जान देने पर आमादा रहते हैं। हालांकि बाद में अनुभव से पता चला कि पत्रकारों-सम्पादकों की दीनदशा आमजन से छिपाने के लिए उनके सामने सायास यह गढ़ी हुई छवि पेश की जाती थी। कम से कम हिंदी पत्रकारिता का यही सच है।

बहरहाल इसी फीडबैक के साथ दैनिक जागरण लखनऊ में तीन चार महीने के अपरेन्टिसशिप के बाद अमर उजाला मेरठ में पक्की नौकरी मिल गयी। जहां तनख्वाह जागरण के 700/-रूपये महीने से कहीं ज्यादा थी। सो लखनऊ का मोह छोड़ मेरठ चला गया। अब नौकरी भी चल रही थी और चीजों को आब्जर्व भी कर रहा था। मुझे लगता था कि अमर उजाला कुल मिलाकर एक ठीक अखबार था। उस पिछड़े इलाके में सामान्य पढ़े लिखे पत्रकारों की मदद से एक अच्छा अखबार निकल रहा था। लेकिन वहां पर भी एक मजेदार प्रहसन रोज होता था। सबसे पहले जब डाक एडीशन का फर्स्ट पेज छपकर बाहर आता था तो डाक इन्चार्ज और सिटी इन्चार्ज कहते थे कि प्रथम पृष्ठ का इन्चार्ज मूर्ख है और उसकी मूर्खता को मालिक पता नहीं क्यों झेल रहे हैं। इसने प्रथम पृष्ठ का सत्यानाश कर दिया। 

इसी तरह डाक एडीशन के लिए प्रथम पृष्ठ प्रभारी और सिटी इन्चार्ज कहते थे कि डाक इन्चार्ज अज्ञानी हैं और मालिक दयावश इसके अज्ञान को बर्दाश्त कर रहे हैं। वर्ना डाक एडीशन को तो इसने कूड़ाघर बना ही रखा है। सिटी एडीशन के लिए डाक और प्रथम पृष्ठ प्रभारी का मानना था कि अल्पज्ञानी और बड़बोले सिटी इन्चार्ज ने सिटी पेजेज को नष्ट कर दिया है। जो मालिक को दिखाई नहीं दे रहा है। अब मैं सोचूं कि यार अखबार तो कुल मिलाकर ठीक ही ठाक है और अगर ये तीनों इसे नष्ट कर रहे हैं तो मालिक कोई एक्शन क्यों नहीं लेता है। वह तो कालांतर में बाद में समझ में आया कि सभी पत्रकारों का मानना होता है कि उनके अलावा बाकी पत्रकार मूर्ख हैं और यह उनका दुर्भाग्य है कि मूर्ख ही अच्छे पदों पर बैठकर संस्थान का सत्यानाश कर रहे हैं।

ऐसे ही मजेदार अनुभवों के बीच दिन कट रहे थे कि मेरे एक भांजे ने कहा मामा मुझे भी पत्रकार बनवा दो। बहरहाल किस्सा कोताह यह कि मैंने उसे एक बड़े अखबार का ग्रामीण संवाददाता बनवा दिया। तीन-चार महीने बाद मुझे वह फिर मिला। मैने पूछा बेटा काम कैसा चल रहा है? उस हंसोड़ बालक ने कहा कि मामा मैने पत्रकारिता छोड़ दी है क्योंकि ग्रामीण पत्रकारिता का मतलब होता है सांड़रूपी पत्रकार को अखबार के नाम से दागकर छोड़ दिया जाता है कि जाओ चरो खाओ, जो मेरे बस का नहीं है। मजे की बात यह कि दो दशक बीते आज भी अखबार हो या टीवी चैनल ग्रामीण इलाकों में पत्रकाररूपी दगे सांड़ ही घूम रहे हैं। हालांकि सच यह भी है कि सारे कष्टों के बावजूद ये दगे सांड़ कभी-कभी बहुत शानदार खबरें देते हैं, जिनका क्रेडिट दफ्तरों में बैठे मोटाये सांड़ उठा ले जाते हैं।

खैर यह सब तो चल ही रहा था अब सम्पादकों के भी मजेदार अनुभव होने लगे थे। सहज, खासे पढ़े लिखे और सामान्य व्यवहार वाले सम्पादक हिन्दी पत्रकारिता में कम ही होते हैं। अधिकांश ‘यूनीक केस’ होते हैं। अशांत और षड्यंत्रकारी माहौल शायद उन्हें ऐसा बना देता हो जब मैं हिंदुस्तान में था तो प्रधान सम्पादक मृणाल पाण्डेय थीं। उनके लेख निहायत प्रांजल भाषा में लिखे जाते थे लेकिन कुल मिलाकर वे उपदेशपरक और निरर्थक होते थे अब भी ऐसा ही है। अब चूंकि वे सम्पादक थीं तो उन्होंने अपने पाठकों को यह बताना भी मुनासिब समझा कि वे पुश्तैनी साहित्यकार हैं। उनकी मां और नानी खासी बड़ी लेखिकायें थीं। अब बेचारे उस समय के हिन्दुस्तान के पाठकों की यह मजबूरी थी कि वे तीनों महान साहित्यकारों के बारे में न चाहते हुए भी उनके वृत्तांत जाने। सो साहब पाठकों ने मजबूरी में ही सही वह सारा वृत्तांत पढ़ा ही होगा।

कुछ पुरखों का पुरुषार्थ और कुछ खासे सम्पन्न बड़ी बहन और बड़े भाई की कृपा मेरे दिन बगैर कुछ खास किये भी बड़े आराम से कटते हैं। ऐसे में टाइम पास के लिए कई अखबार देखता हूं। कारण इससे सस्ता टाइम पास सम्भव भी नहीं। सो सम्पादकों के आलेख अब भी पढ़ता हूं। शशि शेखर महोदय के लेखों में थरथराहट काफी होती है। किसी घटना को अंजाम देने वाले पात्र घटना के समय उत्साह या आशंका से जितना थरथराते होंगे उससे कुछ ज्यादा ही उत्साह या आशंका से शशि शेखर अपने लेखों में थरथराते हैं। अपने लेखों में ही एकाधिक बात उन्होंने जिकर किया है कि न्यूज रूम में किसी घटना की जानकारी होते ही वह किस तरह से चीखने-चिल्लाने लगे। दैनिक जागरण के मालिक कम सम्पादक भी अपवाद नहीं हैं, वे समस्त विषयों के ज्ञाता हैं और आधिकारिक भाव से वे हर विषय पर कलम चलाते हैं। आश्चर्य है उन्हें अभी तक क्यों विश्वविद्यालयों ने मानद डॉक्ट्रेट की उपाधि नहीं दी।

सच यह है कि अधिकांश सम्पादकों के लेख उपदेशपरक और उबाऊ होते हैं। उनमें विषयों का विस्तार भी नहीं होता। क्योंकि वे सामान्य पढ़े लिखे हैं। ऐसे में उपदेशपरक लेख लिखना कहीं अधिक आसान होता है। मजे की बात यह भी कि उनके उपदेश उसी अखबार में छपते हैं जिसमें वे फिलहाल होते हैं। उनके जाने के बाद वह संस्थान उनके उपदेशों से लाभान्वित होने से कतई इनकार कर देता है। कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि इन पर उपदेश कुशल बहुतेरे सम्पादकों को अगर मोहल्ले स्तर की भी जमीनी सच्चाइयों से रूबरू होना पड़े और ठीक करने की जिम्मेदारी दी जाये तो ये भाग खड़े होंगे। लेकिन अपने लेखों में वे किसी को भी हिकारत की भावना से उपदेश दे डालते हैं।

और अंत में, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चतुर्वेदी का अनुभव बताना अप्रासंगिक नहीं होगा। चतुर्वेदी जी ने अपना कैरियर आज अखबार से शुरू किया था जिसकी महानता के बारे में आज भी तमाम झूठे सच्चे किस्से सुनाये जाते हैं। मैने चतुर्वेदी जी से पूछा कि महोदय आपने तो हिंदी पत्रकारिता के तथाकथित स्वर्ण युग में शुरुआत की थी और वह भी ‘आज’ अखबार जैसे स्वर्ण महल में रहकर, आपका क्या कहना है? चतुर्वेदी जी भले आदमी हैं। उन्होंने कहा- हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग कभी नहीं था, खुद को भ्रम में रखने के लिए हम लोगों ने सायास यह मानक गढ़ा है।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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लड़ाई ऐसे नहीं लड़ी जाती शशि शेखर जी

पटना में अपने संवाददाता की हत्या के बाद दैनिक हिन्दुस्तान अपने संवाददाता के साथ है, यह बड़ी बात है। मुझे नहीं पता पीड़ित संवादादाता हिन्दुस्तान के पेरॉल पर थे या स्ट्रिंगर। लेकिन इतिहास गवाह है, हिन्दी अखबार का संवाददाता मरता है तो वह स्ट्रिंगर ही होता है। मरने के बाद उसका संस्थान उससे पल्ला झाड़ लेता है। हिन्दुस्तान ने ऐसा नहीं किया बहुत बड़ी बात बात है। इसके लिए पूरे संस्थान की प्रशंसा की जानी चाहिए। पर संपादक जी एक दिन बाद जगे और लिख रहे हैं हम लड़ेंगे क्योंकि जरूरत है। बहुत ही लिजलिजा है।

इससे अच्छा संदेश तो पटना की टीम ने हत्या के बाद जो एडिशन निकाला उससे दे दिया था। कहने की जरूरत नहीं है, लाजवाब निकाला। लड़ने का तेवर वहां दिख रहा था। आपका लिखा तो औपचारिकता है। नौकरी बजाना है, शर्मनाक है। आपका लिखा पढ़कर मुझे याद आया जब इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल के दौरान जनसत्ता के तीन लोग घायल हुए थे तो इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन के साथ जनसत्ता ने क्या रुख अपनाया था और क्या तेवर था।

ठीक है, वह झगड़ा हड़ताल को लेकर था लेकिन एक्सप्रेस मैनेजमेंट उसे सरकार से लड़ाई के रूप में ले रहा था और वैसे ही तेवर थे। आप लड़ेंगे क्योंकि जरूरत है जमा नहीं। जरूरत तो बहुत पहले से है। आप अभी जगें हैं और नीन्द में ही लग रहे हैं। पाठकों के लिए मैं अपनी अप्रकाशित पुस्तक से एक्सप्रेस मैनेजमेंट की घोषणा और प्रभाष जी का लिखा पेश कर रहा हूं। यह बताने के लिए कि लड़ा कैसे जाता है। प्लेसमेंट के लिहाज से ही देखें तो पेज वन बॉटम हार्ड न्यूज नहीं होता है। प्लेसमेंट ही बहुत कुछ कह रहा है।

प्रबंधन की घोषणा 

दो दिसंबर 1987 को जारी कंपनी प्रबंधन की घोषणा के बारे में जनसत्ता ने लिखा था, “प्रबंधन ने जनसत्ता के बहादुर पत्रकारों पर कायराना हमले की निन्दा की है। प्रबंधन ने कहा है कि जनसत्ता के प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह और महादेव चौहान पर टीएम नागराजन के गुंडों ने हमला किया। नागराजन गुंडों और कुछ बाहरी राजनैतिक ताकतों की मदद से इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता के दिल्ली के संस्करणों को बंद कराने पर तुले थे। दिल्ली दफ्तर के बहादुर साथियों ने उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया। जनसत्ता के ये तीन साथी भी इन्हीं में से थे। जनसत्ता और एक्सप्रेस को निकालने के संकल्प के साथ जुटे इन युवकों की कोशिशों से दोनों अखबार निकले पर गुंडे नहीं चाहते थे कि अखबार हॉकरों तक पहुंच पाए। जब तक प्रदीप कुमार सिंह, संजय सिंह और महादेव चौहान जैसे लोग रहेंगे जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस को निकलने से कोई नहीं रोक सकता। 

प्रबंधन को इन बहादुर साथियों पर हुए हमले से गहरी ठेस पहुंची है। वह इन युवकों के साहस के सामने श्रद्धा से सिर झुकाता है क्योंकि वे खतरे से आमने सामने मुकाबला करते हुए घायल हुए हैं ना कि उससे कतराते हुए। हमले में पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल, मनोज चतुर्वेदी और अजय शर्मा भी घायल हुए हैं। ये युवक दिन भर की मेहनत को अखबार विक्रेताओं तक पहुंचाने की गारंटी करने का असाधारण काम कर रहे थे। वह अखबार पहुंचाने वाली गाड़ियों की पहरेदारी कर रहे थे। प्रबंधन की घोषणा में कहा गया है कि वह सच्चाई के हक में इन साथियों के समर्थन की कोई भरपाई नहीं कर सकता लेकिन कृतज्ञता के एक छोटे से प्रतीक के रूप में प्रबंधन ने प्रदीप कुमार सिंह, संजय सिंह और महादेव चौहान के लिए 10,001 रुपए प्रत्येक और मनोज चतुर्वेदी, शंभूनाथ शुक्ल और अजय शर्मा के लिए 2001 रुपए प्रत्येक की कृतज्ञता राशि की घोषणा की है। (इस घोषणा के साथ हमले की खबर जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंशियल एक्सप्रेस – तीनों में प्रमुखता से छपी थी।)

प्रभाष जोशी ने लिखा था 

3 दिसंबर 1987 के जनसत्ता में पहले पेज पर छपी खबर के साथ प्रभाष जोशी का विशेष आलेख भी था। “तेजाब से बची आंखें”, शीर्षक से उन्होंने लिखा था, “एक्सप्रेस बिल्डिंग के कोने में लगे तंबू से कुछ थके लोग नारे लगा रहे हैं – मजदूर, मजदूर भाई-भाई और मजदूर एकता जिन्दाबाद। इन्हीं में से तीन-चार लोगों ने परसों रात जनसत्ता के उन आठ साथियों पर गुंडों से तेजाब, पत्थरों, लाठियों और सरियों से हमला करवाया जो प्रसार विभाग के मजदूरों की रक्षा में अपने दफ्तर से प्रताप भवन जाकर लौट रहे थे। इन उप संपादकों और संवाददाताओं से प्रसार विभाग के साथियों ने संरक्षण मांगा था क्योंकि हिंसा आतंक और सरकारी मदद से “हड़ताल” करने वाले मजदूर नेताओं ने अखबार न बंटने देने की धमकी दे रखी थी। लेकिन जनसत्ता के ये साथी अड़तालीस दिन बाद निकले अपने अखबार को पाठकों तक पहुंचाना चाहते थे। टाइम्स बिल्डिंग के सामने कोई पंद्रह-बीस लोगों ने उनपर घात लगाकर हमला किया। तेजाब से अपनी आंखें बचाकर भागते साथियों में से ट्रेनी उपसंपादक संजय सिंह गिर गया। उस लड़के को इन “हड़ताल बहादुरों” ने इतना पीटा कि सिर पर दर्जन भर टांके आए। 

इस हमले के डेढ़ घंटे बाद आए एसीपी वीरेन्द्र सिंह ने वहां तैनात बीसियों पुलिस वालों से यह नहीं पूछा कि उनके होते हुए हमला कैसे हुआ और हमलावर क्यों नहीं पकड़े गए। उन्होंने कहा कि इन जर्नलिस्टों को रात में वहां जाने की क्या जरूरत थी? दरियागंज पुलिस ने कहा कि ये पत्रकार चाय पीने निकले थे और हड़तालियों के तंबू के सामने से गुजरे इसलिए झगड़ा हो गया। लेकिन एसीपी वीरेन्द्र सिंह की सीख और पुलिस की गलतबयानी का क्या गिला? जिस बिल्डिंग के सामने इन पत्रकारों पर हमला हुआ वहां से निकलने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वनामधन्य संपादक गिरिलाल जैन से कोई पूछे तो वे भी कहेंगे कि पत्रकारों को अखबार निकालने की जरूरत क्या थी? हड़ताल है अपने घर में बैठो। पत्रकार का आखिर क्या रोल है? क्या वह अंगरक्षक है जो अखबार लादने वालों के साथ जाए? उसका काम गुंडों से मजदूरों को पिटते देखना है और जब उसके खुद के साथ ही कोई बदसलूकी हो तो अपने अखबार में हड़ताल करवा के दूसरे दिन संपादकीय लिखना है। पत्रकार पर्यवेक्षक है जबतक उसकी कार रोककर पुलिस आईडेंटिटी कार्ड न मांगे। अगर पुलिस ऐसा कर दे तो पत्रकार को तथ्यों से आंख मूंदकर लिखने की आजादी है लेकिन यह भी तभी तक जब तक सरकार न रोके। 

ऐसे गिरिलाल जैन सब तरफ हैं इसलिए 28 अक्तबूर को अपना अखबार निकालने की एक्सप्रेस के लोगों की कोशिश पर जमीन आसमान एक कर देने वाले वाले आज चुप हैं। वे दबी जुबान से इसकी निन्दा भी नहीं करते हैं क्योंकि जैसा कि दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट की एक बैठक में कोई महासंघ के किसी अध्यक्ष संतोष कुमार ने कहा था, ‘हड़तालों में तो ऐसी हिंसा होती ही है।’ यूनियन हिंसा हिंसा न भवति! जनसत्ता के सोलह पत्रकार साथी यूनियन नेताओं के बताने पर गुंडों से पिट चुके हैं। न पुलिस ने कुछ किया है न पत्रकारों के वाचाल संघों ने। भले ही लोकतंत्र हो, सरकार की थोपी गई हड़ताल को तोड़ने और अखबार निकालने की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। संजय सिंह, प्रदीप सिंह, महादेव चौहान और मंगलेश डबराल ने अपने खून से यह कीमत चुका दी है और अभी किसी का भी उत्साह चुका नहीं हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया था कि एक्सप्रेस बिल्डिंग से 50 मीटर दूर तक धरना देना वालों को पहुंचाया जाए। उन्हें नहीं हटाया गया। पुलिस को एक्सप्रेस के लोगों के आने-जाने की सुरक्षा करने को कोर्ट ने कहा था। और बिल्डिंग के बाहर बीसियों पुलिस वालों के बावजूद तंबू से निकले लोगों ने हमला करवा दिया और वापस आकर सो गए लेकिन पुलिस ने नहीं देखा। जब घायल पत्रकार पानी के लिए चिल्लाते एक्सप्रेस भवन में भागे आए और उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया गया तब भी पुलिस को कुछ मालूम नहीं हुआ। जब एक्सप्रेस के लोग हल्ला करते हुए पुलिस के पीछे पड़े तो किसी अफसर ने पूछा – कहां हुआ हमला, क्यों हल्ला मचा रहे हो ! मौके पर तैनात दरियागंज के थानेदार कालिया को जीप में सोते हुए से मैंने जब जगाया तो हमला हुए को आधा घंटा हो गया था। इसके बाद से रक्षा में तैनात पुलिस लगातार शिकायत करती रही कि पत्रकारों को बाहर जाने की क्या जरूरत थी और जाना ही था तो बता कर क्यों नहीं गए? सोने वालों और हमला होते हुए न देखने वालों को बताने से फायदा? पुलिस की पहरेदारी और वफादार प्रेस की पहरेदारी में कोई फर्क नहीं है। संजय सिंह, प्रदीप सिंह और महादेव चौहान भगवान की कृपा मानो कि मुंह पर फेंके गए तेजाब से तुम्हारी आंखें बच गईं। यही आंखें तुम्हे अपनी पत्रकारिता की सच्चाई दिखाएंगी।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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प्रधान संपादक शशिशेखर चतुर्वेदी जी, आपका रिपोर्टर दरअसल निकम्मा और मुफ्तखोर है

Dilip C Mandal : शशिशेखर चतुर्वेदी जी, आप दैनिक हिंदुस्तान अखबार के प्रधान संपादक हैं. आपके अखबार में यह खबर छपी है कि रोहित वेमुला से जुड़े दस्तावेज आंदोलनकारी बेच रहे हैं. एजेंसी की इस खबर को आपके संपादकों ने छापा है. BHU के प्रोफेसर Chauthi Ram Yadav ने इस ओर ध्यान दिलाया.

आप खबर देखिए. एक रिपोर्टर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी जाता है. उसे रोहित से संबंधित दस्तावेज चाहिए. उससे 70 पेज की फोटोकॉपी के 70 रुपये लिए जाते हैं. रिपोर्टर की आदत दक्षिणा लेने की रही होगी. मुफ्तखोरी संस्कार में रही होगी. फोटोकॉपी के पैसे लेने पर नाराज होकर खबर लिख दी और आपने मजे लेकर छाप दी. मुफ्त में क्यों चाहिए दस्तावेज?

रोहित से जुड़ा हर डॉक्यूमेंट सोशल मीडिया पर है. ऐसा कौन सा खुफिया दस्तावेज है जो रिपोर्टर खरीद रहा है? और फिर उस कीमती दस्तावेज के आधार पर उसने खबर क्यों नहीं लिखी? रिपोर्टर दरअसल निकम्मा और मुफ्तखोर है. उसे इकट्ठा 70 पेज मुफ्त में चाहिए. रिपोर्टर 70 पेज लेकर गया, और पांच लाइन की खबर लिखी कि 70 रुपये खर्च हो गए. आपको क्या लगता है कि सोशल मीडिया के जागरूक जमाने में यह खेल चल जायेगा? Kuffir Nalgundwar ने सही किताब निकाली है. मीडिया की अंतड़ियों तक में जातिवाद समाया हुआ है. Hatred in the belly. तस्वीर में उसी किताब को पढ़ता रोहित.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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अपनी नौकरी बचाने के लिए शशि शेखर नीचता पर उतर आये हैं

रमन सिंह : हिन्दुस्तान में साइन कराने का सिलसिला शुरू… अपनी नौकरी बचाने के लिए शशि शेखर नीचता पर उतार आये है. इसी का नतीजा है कि इन दिनों हिन्दुस्तान अखबार में कर्मचारियों से दूसरे विभाग में तबादले के कागज पर साइन कराने का दौर शुरू हो गया है. दिल्ली में तो खुद शशि शेखर जी साइन करा रहे हैं. साइन नहीँ करने वालों को निकालने की धमकी भी दी जा रही है.  मजीठिया से घबराया हिन्दुस्तान फिलहाल जिस कागज पर साइन करा रहा है उसमें भी कई फर्जीवाड़ा है. इसलिए नीचे के फोटो को आप ध्यान से पढ़िए. दो फोटो हैं, दोनों को ध्यान से देखिए. कई फर्जीवाड़े समझ में आएंगे. 

दोनों फोटो को आप अगर ध्यान से देखेंगे तो उसमें शशि शेखर का हस्ताक्षर अलग अलग है. अब आप पता लगाइये कि कौन सही है. दूसरा फर्जीवाड़ा ये है कि लैटर 29 मई 2015 को जारी हुआ है और लोगोँ से साइन सितम्बर में कराया जा रहा है. तीसरा फर्जीवाड़ा- जिस कागज पर साइन करा कर कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार से हटा कर इंटरनेट डिवीज़न में डाला जा रहा है उसका वितीय वर्ष 2014-15 है जबकि कागज 29 मई 2015 को जारी हुआ है.

फेसबुक पर सक्रिय किन्हीं रमन सिंह के वॉल से.

वो कौन सी दो तस्वीरें हैं जिनको ध्यान से देखने पर कई किस्म का फर्जीवाड़ा नजर आता है. उन दोनों तस्वीरों को देखने के लिए नीचे लिख कर आ रहे 2 या Next पर क्लिक कर दें>>

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हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स में हाहाकार, वेज बोर्ड नहीं चाहिए वाले फार्म पर प्रबंधन जबरन करा रहा हस्ताक्षर

इस वक्त हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान अखबार के दफ्तरों में हाहाकार मचा हुआ है. नोएडा और दिल्ली से आ रही खबरों के मुताबिक दोनों अखबारों के कर्मियों से एक फार्म पर जबरन साइन कराया जा रहा है जिस पर लिखा हुआ है कि हमें मजीठिया वेज बोर्ड से अधिक वेतन मिलता है इसलिए हम मजीठिया वेज बोर्ड के लाभ नहीं लेना चाहते. सूत्रों के मुताबिक जो लोग फार्म पर साइन करने से मना कर रहे हैं उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है.

जानकारी के अनुसार हिन्दुस्तान हिंदी के नोएडा आफिस में एच.आर. की ओर से सभी लोगों से उस रजिस्टर पर जबरन  साइन करवाए जा रहे हैं जिस पर उन्होंने लिखा है कि हमें मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं चाहिए और हम सब अभी मिल रही तनख्वाह से संतुष्ट हैं. इस तरह साइन कराया जाना न सिर्फ गैरकानूनी है बल्कि अमानवीय भी है. इसी तरह Hindustan Times Delhi के employees को भी sign करने के लिए फोर्स किया जा रहा है. भड़ास के पास आई एक सूचना यूं है: ”As I aware just a few minutes ago that the management of HT is forcing  his employees to sign a paper on which a matter is written means that The Employees of HT is satisfy with their salary and they do not want Wage Board (Majithiya). If any employee will refuse to sign …he has to leave his job. In this move a team of three person is working … 1. HR Head–Mr. Gautam 2. Chief Editor–Mr. Shashi Shekhar 3. Sr. Resident Editor—Mr. Sudhanshu Srivastava. Pls scroll this news on your portal asap so that no one can do injustice with the employees of HT and other media organizations.”

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हिंदुस्तान अख़बार में आज सुबह से ही जबरन दस्तखत कराने की गहमागहमी चल रही है

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शोभना भरतिया की धोखाधड़ी जायज बताने के लिए राजीव वर्मा ने ‘प्रोजेक्ट बटरफ्लाई’ के नाम पर कर्मियों का किया ब्रेन वॉश

मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अच्छी खासी सेलरी न देनी पड़े, कम पैसे में मीडियाकर्मियों का शोषण जारी रहे, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मनमर्जी-मनमानी चलाई जा सके, इस उद्देश्य से अंग्रेजी और हिंदी अखबारों हिदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान की मालकिन शोभना भरतिया ने अपने अखबारों के मीडियाकर्मियों को रातोंरात इंटरनेट कंपनी का इंप्लाई बना दिया और जबरन साइन करने के लिए मजबूर किया गया. मरता क्या न करता की तर्ज पर सभी ने साइन तो कर दिए लेकिन हर एक मीडियाकर्मी के दिल में यह सवाल उठने लगा कि आखिर हमारी मालकिन इतनी चीटर, फ्रॉड और बेशर्म क्यों है… आखिर हमारे संपादक इतने बेजुबान क्यों हैं… आखिर हमारे देश में कानून और न्याय की इज्जत क्यों नहीं है?

ऐसे सवालों से दो-चार हो रहे हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स के मीडियाकर्मियों को पिछले दिनों एक आंतरिक मेल मिला. यह मेल सीईओ राजीव वर्मा की तरफ से भेजा गया. मेल हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में था ताकि हर एक का ब्रेन वाश ठीक से किया जा सके. पूरी मेल में कहीं भी मजीठिया वेज बोर्ड का हवाला नहीं था. कहीं भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने को लेकर जिक्र नहीं था, कहीं भी कर्मियों से जबरन नई कंपनी में शिफ्ट कराए जाने के लिए कराए गए हस्ताक्षर को लेकर उल्लेख नहीं था. बस, सुहाने सपने दिखाए गए, प्रोजेक्ट बटरफ्लाई का हवाला दिया गया और सबको बातों में उलझाने की कोशिश की गई है. नीचे राजीव वर्मा के हिंदी अंग्रेजी के मेल के पहले वो दस्तावेज दे रहे हैं जिसके जरिए एचटी व हिंदुस्तान के मैनेजमेंट ने अपने कर्मियों को नए टर्म कंडीशन के पेपर पर साइन कराकर रातोंरात नई कंपनी में ट्रांसफर कर डाला ताकि मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी देने की स्थिति ही न आए.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

प्रोजेक्ट बटरफ्लाई

People Communication

प्रिय साथियों

साल 2015 एचटी मीडिया के लिए बहुत अहम है और मैं आपको बताना चाहूंगा कि ऐसा क्यों है। हम आए दिन सुनते हैं कि मीडिया जगत तेजी से बदल रहा है। स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्शन की संख्या पूरे भारत में बढ़ रही है। सोशल मीडिया वेबसाइट और तेजी से उभरते ऑनलाइन ब्रांड खबरों केपारंपरिक स्रोतों की जगह ले रहे हैं। पाठक खबरें पढ़ने और सूचनाएं साझा करने के लिए नए मंच कीओर रुख कर रहे हैं।
 
कई प्रकाशन कंपनियां इन बदलावों को लेकर चिंतित हैं। वे इन्हें सालों से चले आ रहे काम के तौर-तरीकों और आय के स्त्रोतों के लिए खतरा मान रही हैं। लेकिन एचटी मीडिया में हम इन बदलावों कोखतरे नहीं, मौके के तौर पर देख रहे हैं। आसपास हो रहे बदलावों को समझते हुए और उनके हिसाब सेढलते हुए हमने खबर, मनोरंजन व शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत कारोबार खड़ा किया है। आने वाले दिनों मेंमीडिया जगत में संभावित अन्य बड़े बदलावों को देखते हुए हमने न्यूज तंत्र में बेहद अहम औरमहत्वाकांक्षी परिवर्तन लाने की भी पहल की है। इसके तहत डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म, पाठकों कीपसंद, खबरों के बदलते अंदाज और आय के स्रोत को हमारे काम में शामिल किया जाएगा। हम अपनेपाठकों को हर उस मंच पर न्यूज सामग्री उपलब्ध कराएंगे, जो उनके लिए मायने रखती है।
 
इस दिशा में ‘प्रोजेक्ट बटरफ्लाई’ के रूप में हमने पहला कदम बढ़ा दिया है। जैसा कि आप में से कईलोग जानते हैं कि यह प्रोजेक्ट ‘न्यूजरूम’ पर केंद्रित है। इसका मकसद एचटी हाउस की पहली मंजिलका पुनर्निमाण है, जिससे हमारी तीनों संपादकीय टीमें (हिन्दुस्तान टाइम्स, मिंट और हिन्दुस्तान)एक छत के नीचे आ जाएंगी। उन्हें बेहतर तकनीकी सेवाओं और वीडियो सुविधाओं के अलावाकामकाज का ज्यादा मुखर व पारदर्शी माहौल भी मिलेगा। हम उम्मीद करते हैं कि यह न्यूजरूमअपनी तरह का सबसे आधुनिक और सुविधाजनक न्यूजरूम होगा। इससे उन बदलावों को गतिमिलेगी, जिनके लिए हम पिछले एक दशक से प्रयासरत हैं।
 
‘प्रोजेक्ट बटरफ्लाई’ के तहत हम एचटी मीडिया को इटली के आईडॉस मीडिया की ओर से विकसितमजबूत कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम ‘मेथॉड’ में ढालने जा रहे हैं। हम अपनी तीनों संपादकीय टीमों (हिन्दुस्तान टाइम्स, हिन्दुस्तान और मिंट) के डिजिटल ढांचे को नया कलेवर देने जा रहे हैं। हम जोबदलाव कर रहे हैं, उससे हमारी प्रिंट और ऑनलाइन टीमें समग्र रूप से काम कर सकेंगी। इससे हमेंरियल टाइम में खबरें मुहैया कराने की पाठकों की बढ़ती मांग पर खरा उतरने में मदद मिलेगी।
 
नए सिस्टम का प्रभावशाली इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए एचटी मीडिया अपनी कार्य प्रणाली मेंमूलभूत बदलाव करेगा। इसके लिए एक ओर जहां नए पद गठित किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफपुराने पदों के लिए नई जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं। सभी बदलावों को अमल में लाने के लिएव्यापक ट्रेनिंग कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।
 
एक मजबूत और प्रभावशाली न्यूज सिस्टम से न सिर्फ हमारी वेबसाइट और तेजी से उभरते मोबाइलउत्पादों के प्रदर्शन में सुधार आएगा, बल्कि पाठक संख्या व आय में इजाफे के नए मौके भी मिलेंगे।साथ ही डिजिटल उपभोक्ताओं की पसंद-नापसंद को देखते हुए हमें अपने प्रिंट संस्करणों के कंटेंट औरडिजाइन को बेहतर बनाने में भी आसानी होगी।
 
यकीनन, हम सब जानते हैं कि तितलियों के जीवन की शुरुआत छोटे से कैटरपिलर के संघर्ष से होतीहै। यह प्रोजेक्ट भी पूरे संस्थान के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा, क्योंकि इसके तहत हम अतीत केसर्वश्रेष्ठ और भविष्य की नई संभावनों को संजोने का प्रयास करेंगे। लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि हमइसके नतीजों पर बेहद गौरवांवित महसूस करेंगे।
 
मैं एचटी मीडिया को ज्यादा आकर्षक, प्रासंगिक और समृद्ध बनाने के इस सफर से जुड़ने के लिए आपसभी का आह्वान करता हूं। समय के साथ तकनीक, मंच, चैनल, पाठक और हमारे प्रतिद्वंद्वी बदलसकते हैं। लेकिन हमारे पांच मूल्य-मंत्र : साहस, सतत सुधार, जनप्रतिबद्धता, जिम्मेदारी और सशक्तिकरण कभी नहीं बदलेंगे। इन्हीं मूल्यों के साथ हम रोज हमारे पाठकों को सर्वश्रेष्ठ सामग्री देनेऔर कुछ नया परोसने के इरादे से काम पर आते हैं। यह एक जुनून है, जो कभी नहीं बदलेगा।
 
आइए, तेजी से डिजिटल होती दुनिया ने हमें जो मौके दिए हैं, उन्हें अपनाकर 2015 को एचटी मीडियाके लिए बदलाव का साल बनाएं।
 
शुभकामनाओं के साथ
 
राजीव वर्मा​

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Project Butterfly

People Communication

Dear Colleagues,

2015 is a very big year for HT Media, and I want to tell you why. We all hear the drumbeat, louder and louder each day: the world of media is changing. Smartphones and data connections are proliferating across India; social media platforms and upstart brands are displacing storied mastheads; audiences are demanding radically different ways of interacting with news and information. Many publishers are deeply anxious about these changes, seeing them as a threat to long established ways of working, and to revenue streams that they view as theirs by right.
 
At HT Media, we are looking at these changes as an opportunity, rather than a threat. We have already built strong news, entertainment and education businesses by understanding and adapting to the shifting landscape around us. As a more profound set of changes confronts, we plan to do the same — starting with an ambitious and aggressive transformation of our news operations to put digital platforms, audience habits, content and revenue at the heart of everything we do. We will serve our audience on every platform that matters to them.
 
The first major step is already underway, in the form of Project Butterfly. As many of you are aware, this is a project focused on the newsroom. Its outward expression is the renovation of the first floor at HT House, which will now become the integrated hub of our editorial operations — with Hindustan Times, Mint, and Hindustan sharing one space, with state-of-the-art networks and video facilities, and with a much more transparent, open working environment. We expect it to be the finest facility of its kind in the region, and that it will catalyse the changes we have been seeking for almost a decade.
 
To that end, we are moving Hindustan Times onto a powerful content management system built by Milan, Italy-based Eidos Media – Methode. We are overhauling our digital infrastructure across all news operations – Hindustan Times, Hindustan and Mint. The capabilities we are building will enable us to adopt a fully integrated print and digital approach to our work, instead of keeping our legacy and online teams separate. This approach will prepare us properly to face the accelerated demands of real-time news consumption.
 
And to make sure the technology is effectively used, HT will be undertaking a fundamental realignment of its working practices. New roles are being created, old ones are being redesigned and a massive training programme is being put in place to support these changes.
 
A stronger, more efficient news operation won’t just boost the performance of our website and fast-improving mobile products – although those are very important goals.  It will enable us to take advantage of emerging opportunities to grow revenue and deepen our relationship with the audiences that matter most to us. It will also underpin a more rigorously designed and managed print portfolio, with content that is more dynamic and more responsive to the insights that we are able to gather by understanding the behaviour of our digital audiences.
 
Of course, as everyone knows, butterflies begin life as caterpillars.
 
This project will challenge the whole organisation deeply, as we seek to preserve the best of the past and embrace the possibilities of the future, but I am confident that we will all be proud of the results. I am counting on each one of you to join me in the journey, and the creation of a more vibrant, relevant, prosperous HT Media.
 
Technology, platforms, channels, people and our competitors may change with time, as they must. However, what will not change are our enduring values of courage, continuous self renewal, people centricity, responsibility and empowerment. With these enduring values we come to work each day to help our audience and try and make a difference. This is one quest that will never change.
 
Let’s make 2015 a year of transformation of our enterprise by embracing the opportunities brought to us by a fast-digitalising world.
 
With Best Wishes
 
Rajiv Verma  


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शोभना भरतिया और शशि शेखर को शर्म मगर आती

नहीं… देखिए इनका कुकर्म…

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मजीठिया वेज बोर्ड संघर्ष : शोभना भरतिया और शशि शेखर को शर्म मगर नहीं आती… देखिए इनका कुकर्म…

हिंदुस्तान अखबार और हिंदुस्तान टाइम्स अखबार की मालकिन हैं शोभना भरतिया. सांसद भी हैं. बिड़ला खानदान की हैं. पैसे के प्रति इनकी भूख ऐसी है कि नियम-कानून तोड़कर और सुप्रीम कोर्ट को धता बताकर कमाने पर उतारू हैं. उनके इस काम में सहयोगी बने हैं स्वनामधन्य संपादक शशि शेखर. उनकी चुप्पी देखने लायक हैं. लंबी लंबी नैतिक बातें लिखने वाले शशि शेखर अपने घर में लगी आग पर चुप्पी क्यों साधे हैं और आंख क्यों बंद किए हुए हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए. आखिर वो कौन सी मजबूरी है जिसके कारण वह अपने संस्थान के मीडियाकर्मियों का रातोंरात पद व कंपनी जबरन बदले जाने पर शांत बने हुए हैं.

शोभना भरतिया अपने इंप्लाइज की पद व कंपनी इसलिए बदल रही हैं ताकि मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उन्हें सेलरी न देनी पड़े. पर कुछ हिंदुस्तानियों ने तय किया है कि वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाएंगे. इन लोगों ने इस दिशा में पहला कदम भड़ास को सारे डाक्यूमेंट्स भेजकर उठाया है. जो दस्तावेज यहां दिए गए हैं, उसे आप ध्यान से देखिए और पढ़िए. दूसरों की आवाज उठाने वाले पत्रकारों के साथ रातोंरात कितना बड़ा छल हो जाता है लेकिन वे चुप्पी साधे रहने को मजबूर रहते हैं.

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि हिन्दुस्तान अखबार ने अपने एडिटोरियल के लोगों के पदनाम और कंपनी के नाम बदल दिए हैं. सूत्रों के मुताबिक ये संपादकीयकर्मी 28 अप्रैल 2015 को समस्त गलत व झूठे दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में दे देंगे. बताते चलें कि शोभना भरतिया और शशि शेखर दस्तावेजों में हेरफेर करके फर्जी तरीके से सैकड़ों करोड़ रुपये का सरकारी विज्ञापन छापने और इसका पेमेंट लेने के मामले के आरोपी भी हैं जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है.  

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हिंदी का ये कौन बड़ा अखबार है जो पहले कांग्रेस का चाटुकार था, आज भाजपा का चाटुकार है

Umesh Chaturvedi : हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक बदलाव का दौर चल रहा है..यह बदलाव अंदर से है या सिर्फ दिखावे का..इसे तय पाठक ही करेंगे..हिंदी का एक बड़ा अखबार है..16 मई 2014 से पहले तक पूरे दस साल तक उसके बीजेपी बीट रिपोर्टर का एक ही काम होता था..बीजेपी की आलोचना करना..बीजेपी से जुड़ी रूटीन खबरें नहीं करना..

यह ऐसी सच्चाई है, जो अखबार के हालिया अतीत के पन्नों में दर्ज है..तब वहां के लेखों में चाहें वह लेख संपादक ने लिखे हों या किसी और ने..सिर्फ कांग्रेस की प्रशंसा ही होती थी..तब कुछ सुधीजनों को वह पत्र कांग्रेस का मुखपत्र जैसा लगता था..लेकिन 16 मई 2014 के बाद हालात बदल गए हैं..अब उस अखबार में मोदी जी का गुणगान हो रहा है..बीजेपी की सकारात्मक खबरें छप रही हैं..सवाल यह है कि पत्र का 16 मई के पहले का रूख सही था या अब का स्टैंड जेनुइन है..आप विचार करें.

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

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शशि शेखर ने हिंदी हिंदुस्तान के बेजुबान कर्मियों को जानवरों की तरह हांककर नोएडा ले जाने का ठेका लिया था!

शशि शेखर ने हिंदुस्तान को गर्त में डुबोने के एक बडे़ रोडमैप के तहत हिंदुस्तान का कार्यालय एचटी बिल्डिंग कनाट प्लेस से नोएडा के सैक्टर 63 में सूनसान तबेले जैसे इलाके में पहुंचा दिया। यहां आकर शशिशेखर व उनके दो- तीन तलवे चाटने वालों को छोड़कर सभी परेशान हैं।  कुछ ही माह पहले हिंदुस्तान के साथ ही एचटी अंग्रेजी के पूरी संपादकीय टीम को नोएडा भेजने का फरमान जारी हुआ था लेकिन  एचटी इंग्लिश स्टाफ ने एक जुट होकर शोभना भरतिया के मैनेजरों को आंखे दिखाई और सामूहिक इस्तीफों की चेतावनी दी तो उन्हे नोएडा भेजने का फैसला वापस ले लिया गया।

लेकिन हिंदी हिंदुस्तान में जब शशि शेखर जैसा शोभना भरतिया के मैनेजरों की गुलामी करने वाला संपादक बैठा हो तो मुखालफत करता भी कौन। शशि शेखर ने हिंदी हिंदुस्तान में काम करने वाले सभी वाले बेजुबान लोगों को जानवरों की तरह हांककर नोएडा ले जाने का ठेका ले लिया। इस कदम से सबसे ज्यादा वे लोग परेशान हैं जिनके लिए नौएडा पहुंचने में तीन- तीन हावर्स लग जाते हैं। नोएडा में संपादकीय विभाग के बैठने की व्यवस्था को  इस ढंग से शक्ल दी गई है जैसे कि यह जगह सुकून व स्वतंत्रता से काम करने वाले पत्रकारों के लिए नहीं बल्कि गुलामों को काला पानी की सजा हो।

शीशे के भीतर केबिन से हॉल में हर किसी पर शशि शेखर व उनके दरवारियों की  कड़ी निगाहें रहती है। अलग से खुफिया कैमरों के जरिए पता लगाया जाता है कि कौन किससे गप करता है। चमचों को छोड़कर जिनका कोई मायबाप नहीं है, उनकी शामत है।  आए दिन जूनियर स्टाफ की टेबिल पर जाकर रैगिंग के अंदाज में हड़काना और जो सामने पड़े उसकी बेइज्जती किए बिना शशिशेखर को चैन नहीं पड़ता।  हर टेबिल पर अपने कुछ चमचों से स्टाफ की जासूसी करवाने से शशि शेखर बाज नही आते। यानी कौन किससे बात कर रहा है इसका हिसाब रखना और स्टाफ को पूरे आठ हावर्स अपनी सीट से न हिलने देने के शशि शेखर के आदेश से संपादकीय टीम के सिर से पानी गुजर रहा है। अगर किसी अखबार का संपादक ही खुद इतनी ओछी हरकतें अपने साथ काम करने वाले कामगारों के साथ करता है तो फिर हिंदी पत्रकारिता के इससे और बुरे दिन क्या हो सकते हैं। कहा जाता है कि आज हिंदी में कोई स्वाभीमानी व आदर्श संपादक इसीलिए नहीं है कि उनकी जगह शशि शेखर जैसे बात बात पर गुंडई व मां बहिन की गाली से बात करने वाले तथाकथित संपादकों ने ले ली है। काश हिंदी दिवस पर हिंदी पत्रकारिता के अवमूल्यन करने वाले तथाकथित सपादकों के आचरण पर भी सार्वजनिक बहस होती।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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