सड़क हादसे में सुदर्शन न्यूज़ के गेस्ट कोआर्डिनेटर और एसाइनमेंट हेड विवेक चौधरी का निधन

सुदर्शन न्यूज़ के गेस्ट कोआर्डिनेटर और एसाइनमेंट हेड विवेक चौधरी के निधन होने की सूचना मिली है. विवेक पिछले कई सालों से अलग-अलग न्यूज़ चैनलो में अपनी सेवायें दे चुके है. वे श्री न्यूज़, चैनल वन न्यूज़, साधना न्यूज़ आदि चैनलों में गेस्ट कोआर्डिनेटर के तौर पर काम कर चुके हैं. बताया जाता है कि कल रात विवेक का निधन एक सड़क दुर्घटना में हो गया.

विवेक की बीती देर रात तकरीबन 11:30 बजे मौत हुई. वे अपनी मोटरसायकल से जा रहे थे तभी अज्ञात वाहन ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया. विवेक के आकस्मिक निधन से सुदर्शन न्यूज़ परिवार में मातम का माहौल है. उनके अचानक चले जाने से उनके जानने वाले स्तब्ध हैं. उनका अंतिम संस्कार आज शाम तीन बजे दिल्ली के निगम बोध घाट पर किया गया.

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‘पत्रिका’ के स्टेट एडिटर अरूण चौहान दुर्घटना में बाल बाल बचे

इंदौर । आज उज्जैन में क्षिप्रा स्नान व महाकाल दर्शन कर वापस इंदौर लौटते समय साँवेर के पास सड़क दुर्घटना मे “पत्रिका” MP-CG के “राज्य संपादक” श्री अरुण चौहान बाल बाल बच गए। खुद गाड़ी ड्राइव कर रहे श्री चौहान सड़क पर अचानक कार के सामने आ गये श्वान को बचाने के चक्कर मे संतुलन खो बैठे तथा कार डिवायडर से टकराते हुवे सड़क से नीचे उतरकर 3 से 4 पलटी खा गयी।

महाकाल की कृपा से सलामत कार से बाहर निकले श्री चौहान को देखकर वहाँ लोगों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। बाम्बे अस्पताल में प्राथमिक उपचार कराकर अरूण चौहान वापस घन्टे भर बाद ही दिनचर्या मे लग गए। दुर्घटनाग्रस्त कार को देखकर ऐसा लगता है की इसमे शायद ही कोई बचा होगा। लेकिन यह महाकाल का चमत्कार ही था। मप्र में स्वस्थ पत्रकारिता की पहचान अरूण चौहान जी सदैव स्वस्थ रहें, ऐसी कामना है।

भोपाल से रवीन्द्र जैन की रिपोर्ट.

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हस्तक्षेप डाट काम के संपादक अमलेंदु की चोटें गंभीर, हाथ में क्रैक और कंधे पर जख्म

-पलाश विश्वास-

हमारे लिए बुरी खबर है कि हस्तक्षेप के संपादक अमलेंदु को सड़क दुर्घटना में चोट कुछ ज्यादा आयी है। आटो के उलट जाने से उनके दाएं हाथ में क्रैक आ गया है और इसके अलावा उन्हें कंधे पर भी चोटें आयी है। भड़ास के दबंग यशवंत सिंह ने यह खबर लगाकर साबित किया है कि वे भी वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर हमारे साथ हैं। हम तमाम दूसरे साथियों से भी साझा मोर्चे की उम्मीद है ताकि हम वक्त की चुनौतियों के मुकाबले डटकर खडे हो और हालात के खिलाप जीत भी हमारी हो। हमारी लड़ाई जीतने की लड़ाई है। हारने की नहीं।

हम उनके आभारी हैं, जिनने सहयोग का वादा किया है या जो अब भी हमारे साथ हैं।लेकिन जुबानी जमाखर्च से काम चलने वाला नहीं है, जिससे जो संभव है, वह कम स कम उतना करें तो गाड़ी बढ़ेगी वरना फुलस्टाप है। मीडिया में पिछले 36 साल कतक नौकरी करने के अनुभव और लगातार भोगे हुए यथार्थ के मुताबिक हम यकीनन यह दावा कर सकते हैं कि भड़ास की वजह से ही मीडिया में काम कर रहे पत्रकार और गैर पत्रकारों की समस्याओं पर फोकस बना है और बाकी दूसरे पोर्टल मीडिया केंद्रित शुरु होने की वजह से मीडिया की खबरें किसी भी कीमत पर दबी नहीं रह सकती।

यह मोर्चाबंदी यकीनन पत्रकारों और गैर पत्रकारों के हक हकूक के बंद दरवाजे खोलती हैं। हमारे लिए यही महत्वपूरण है और यशवंत की बाकी गतिविधियों को हम नजरअंदाज भी कर सकते हैं। पत्रकारिता का यह मोर्चा यशवंत ने खोला और अपनी सीमाओं में काफी हद तक उसका नेतृत्व भी किया, इसके महत्व को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह आत्मघाती होगा। ऐसे सभी प्रयासों में हम शामिल हैं बिना शर्त।

हमें बडा़ झटका इसलिए लगा है कि हम बहुत जल्द कम स कम गुरमुखी, बांग्ला और मराठी में हस्तक्षेप का विस्तार करना चाहते थे। क्योंकि जनसुनवाई कहीं नहीं हो रही है और जनसरोकार की सूचनाएं और खबरें आ नहीं रही हैं। भड़ास अपना काम कर रहा है और हमारा सोरकार बाकी मुद्दों को संबोधित करना है।इसके लिए पूंजी के वर्चस्व को तोड़ बिना काम नहीं चलेगा और बाजार के नियम तोड़कर हमें कारपोरेट मीडिया के मुकाबले खड़ा होना होगा।

इसकी निश्चित योजना हमारे पास है और हम यकीनन उस पर अमल करेंगे। फिलहाल हफ्तेभर से लेकर चार हफ्ते तक हस्तक्षेप बाधित रहेगा और कोई फौरी बंदोबस्त संभव नहीं है। क्योंकि लेआउट, संपादन और समाग्री के साथ लेकर तात्कालिक बंदोबस्त बतौर पर कोई छेड़छाड़ की कीमत पर कहीं से भी अपडेट कर लेने का विकल्प हम सोच नहीं रहे हैं। क्योंकि हस्तक्षेप के तेवर और परिप्रेक्ष्य में कोई फेरबदल मंजूर नहीं है।

लेखकों और मित्रों से निवेदन है कि अमलेंदु के मोर्चे पर लौटने से पहले वे अपनी सामग्री मुझे भेज दें ताकि उन्हें अपने ब्लागों में डालकर रियल टाइम कवरेज का सिलसिला हम बनाये रख सकें और हस्तक्षेप का अपडेट शुरु होने पर जरुरी सामग्री वहां पोस्ट कर सकें। पाठकों और मित्रों से निवेदन है पिछले पांच सालों से हम लागातार हस्तक्षेप कर रहे हैं तो हस्तक्षेप पर पिछले पांच साल के तमाम मुद्दों पर महत्वपूर्ण सामग्री मौजूद है। कृपया उसे पढे़ और अपनी राय दें।

इसके अलावा आपसे गुजारिश है कि महत्वपूर्ण और प्रासंगिक लिंक भी आप विभिन्न प्लेटफार्म पर शेयर करते रहें ताकि अपडेट न होने की हालत में भी हस्तक्षेप की निरंतरता बनी रहेगी। इसके लिए आपके सहयोग की आवश्यकता है। उम्मीद हैं कि जो लोग हमारे साथ हैं, उन्हें इस दौरान हस्तक्षेप अपडेट न होने का मतलब भी समझ में आयेगा और वे जो भी जरूरी होगा, हमारी अपील और गुहार के बिना अवश्य करेंगे, जो वे अभी तक करना जरूरी नहीं मान सके हैं।

मैं बहुत जल्द सड़क पर आ रहा हूं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मेरी कोई महत्वाकांक्षा देश, आंदोलन या संगठन का नेतृत्व करने की है। हमने बेहतरीन कारपोरेट पेशेवर पत्रिकारिता में 36 साल गुजार दिये, तो इस अनुभव के आधार पर सत्तर के दशक से लगातार लघु पत्रिका आंदोलन और फिर वैकल्पिक मीडिया मुहिम से जुड़े रहने के कारण हमारी पुरजोर कोशिश रहेगी कि हर कीमत पर यह सिलसिला न केवल बना रहे बल्कि हम अपनी ताकत और संसाधन लगाकर आनंद स्वरुप वर्मा और पंकज बिष्ट जैसे लोगों की अगुवाई में कारपोरेट मडिया के मुकाबले जनता का वैकल्पिक मीडिया का निर्माण हर भारतीय भाषा में जरूर करें।

हम चाहेंगे कि जन प्रतिबद्ध युवा पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनआंदोलन के साथियों को भी हम इस मीडिया के लिए बाकायदा प्रशिक्षित करें और जिन साथियों के लिए कारपोरेट मीडिया में कोई जगह नहीं है,उनकी प्रतिबद्धता के मद्देनजर उनकी प्रतिभा का समुचित प्रयोग के लिए,उनकी अभिव्यक्ति के मौके के लिए वैकल्पिर अवसर और रोजगार दोनों पैदा करें। इसकी योजना भी हमारे पास है।

बहरहाल मेरे पास अब हासिल करने या खोने के लिए कुछ नहीं है। नये सिरे से बेरोजगार होने की वजह से निजी समस्याओं से भी जूझकर जिंदा रहने की चुनौती मुँह बांए खड़ी है। फिर भी वैकल्पिक मीडिया हमारे लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। आप साथ हों या न हों, आप मदद करें या न करें-यह हमारा मिशन है। इस मिशन में शामिल होने के लिए हम सभी का खुल्ला आवाहन करते हैं। हम बार बार कह रहे हैं कि पूंजी के अबाध वर्चस्व और रंगभेदी मनुस्मृति ग्लोबल अश्वमेध में तमाम माध्यम और विधायें और मातृभाषा तक बेदखल हैं।

ऐसे हालात में हमें नये माध्यम,नई विधाएं और भाषाएं गढ़नी होगी अगर हम इस जनसंहारी समय के मुकाबले खड़ा होने की हिम्मत करते हैं। सत्ता निरंकुश है और पूंजी भी निरंकुश है। ऐसे अभूतपूर्व संकट में पूरे देश को साथ लिये बिना हम खडे़ तक नहीं हो सकते। इस जनसंहारी समय पर हम किसी एक संगठन या एक विचारधारा के दम पर कोई प्रतिरोध खड़ा ही नहीं कर सकते।इकलौते किसी संगठन से भी काम नहीं चलने वाला है बल्कि जनता के हक में, समता और न्याय के लिए, अमन चैन, बहुलता, विविधता, मनुष्यता, सभ्यता और नागरिक मनवाधिकारों के लिए मुकम्मल संघीय साझा मोर्चा जरूरी है।

बिना मोर्चाबंदी के हम जी भी नहीं सकते हैं। सारी राजनीति जनता के खिलाफ है तो मीडिया भी जनता के खिलाफ है। राजनीति लड़ाई, सामाजिक आंदोलन औरमुक्तबाजारी अर्थ व्यवस्था में बेदखल होती बहुसंख्य जनगण की जल जंगल जमीन आजीविका और नागरिक, मानवाधिकार की लड़ाई वैकल्पिक मीडिया के बिना सिरे से असंभव है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हम हर उस व्यक्ति या समूह के साथ साझा मोर्चा बाने चाहेंगे जो फासीवाद के राजकाज के खिलाफ कहीं न कहीं जनता के मोर्चे पर हैं। हम आपको यकीन दिलाना चाहते हैं कि हम आखिरकार कामयाब होंगे क्योंकि हमारा मिशन अपरिहार्य है और उसमें निर्णायक जीत के बिना हम न मनुष्यता, न सभ्यता और न इस पृथ्वी की रक्षा कर सकते हैं।

संकट अभूतपूर्व है तो यह मित्रों और शत्रुओं की पहचान करके आगे बढ़ते जाने की चुनौती है।जिनका हाथ हमारे हाथ में न हो,उनसे बहुत देर तक अब मित्रता भी जैसे संभव नहीं है वैसे ही नये जनप्रतिबद्ध मित्रों के बढ़ते हुए हाथ का हमें बेसब्र इंतजार है। “हस्तक्षेप” पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि सेहस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।

लेखक पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उन्हें लेख भेजने, हस्तक्षेप के संचालन हेतु मदद देने और अन्य किसी मकसद से संपर्क palashbiswaskl@gmail.com के जरिए किया जा सकता.

मूल खबर….

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हस्तक्षेप डाट काम के संपादक अमलेंदु उपाध्याय सड़क दुर्घटना में घायल

कल शाम दिल्ली में हस्तक्षेप के संपादक अमलेंदु उपाध्याय एक भयंकर दुर्घटना में बाल बल बच गये हैं। वे जिस आटो से घर लौट रहे थे, वह एक बस से टकरा गया। आटो उलट जाने से अमलेंदु और दो साथियों को चोटें आयीं। अमलेंदु के दाएं हाथ में काफी चोटे आयी हैं। उनके दुर्घटनाग्रस्त होने से हस्तक्षेप डाट काम के संचालन पर असर पड़ रहा है और साइट अपडेट नहीं हो पा रही है क्योंकि हस्तक्षेप अपडेट करने के लिए कोई दूसरा नहीं है। ऐसे समय में यह हमारे लिए भारी झटका है। उम्मीद है कि जल्द से जल्द वे काम पर लौटने की हालत में होंगे।

हम कितने अकेले और बेबस हैं, यह इसका नमूना है। ‘समयांतर’ पंकज बिष्ट जी की जिद पर अभी नियमित है तो समकालीन तीसरी दुनिया के लिए भी हम साधन जुटा नहीं पा रहे हैं। एक के बाद एक मोर्चा हमारा टूट रहा है और हम अपने किले बचाने की कोशिश में लगे नहीं है। सत्तर के दशक से पंकज बिष्ट और आनंद स्वरुप वर्मा की अगुवाई में हम लगातार जो वैकल्पिक मीडिया बनाने की मुहिम में लगे हैं, अपने ही लोगों का साथ न मिलने से उसका डेरा डंडा उखड़ने लगा है। एक एक करके पोर्टल बंद होते जा रहे हैं।

भड़ास को यशवंत अकेले दम चला रहे हैं और वह मीडिया की समस्याओं से अब भी जूझ रहा है। पिछले पांच साल से कुछ दोस्तों की मदद से हस्तक्षेप नियमित निकल रहा है और हम उसे राष्ट्रव्यापी जनसुनवाई मंच में बदलने की कोशिश में लगे हैं। अमलेंदु हमारे युवा सिपाहसालार हैं और विपरीत परिस्थितियों में उसने मोर्चा जमाये रखा है। मित्रों से निवेदन है कि हालात को समझें और जरुरी कदम उठायें ताकि हमारी आवाज बंद न हों।

हस्तक्षेप.कॉम कुछ संजीदा पत्रकारों का प्रयास है। काफी लम्बे समय से महसूस किया जा रहा था कि तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है और मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है, उसकी प्रासंगिकता अगर समाप्त नहीं भी हो रही है तो कम तो होती ही जा रही है। तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया या तो पूंजीपतियों का माउथपीस बन कर रह गया है या फिर सरकार का।

आज हाशिए पर धकेल दिए गए आम आदमी की आवाज इस मीडिया की चिन्ता नहीं हैं, बल्कि इसकी चिन्ता में राखी का स्वयंवर, राहुल महाजन की शादी, राजू श्रीवास्तव की फूहड़ कॉमेडी और सचिन तेन्दुलकर के चौके छक्के शामिल हैं। कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याएं अब मीडिया की सुर्खी नहीं नहीं रहीं, हां ‘पीपली लाइव’ का मज़ा जरूर मीडिया ले रहा है। और तो और अब तो विपक्ष के बड़े नेता लालकृष्ण अडवाणी के बयान भी अखबारों के आखरी पन्ने पर स्थान पा रहे हैं।

ऐसे में जरूरत है एक वैकल्पिक मीडिया की। लेकिन महसूस किया जा रहा है कि जो वैकल्पिक मीडिया आ रहा है उनमें से कुछ की बात छोड़ दी जाए तो बहुत स्वस्थ बहस वह भी नहीं दे पा रहे हैं। अधिकांश या तो किसी राजनैतिक दल की छत्र छाया में पनप रहे हैं या फिर अपने विरोधियों को निपटाने के लिए एक मंच तैयार कर रहे हैं। इसलिए हमने महसूस किया कि क्यों न एक नया मंच बनाया जाए जहां स्वस्थ बहस की परंपरा बने और ऐसी खबरें पाठकों तक पहुचाई जा सकें जिन्हें या तो राष्ट्रीय मीडिया अपने पूंजीगत स्वार्थ या फिर वैचारिक आग्रह या फिर सरकार के डर से नहीं पहुचाता है।

ऐसा नहीं है कि हमें कोई भ्रम हो कि हम कोई नई क्रांति करने जा रहे हैं और पत्रकारिता की दशा और दिशा बदल डालेंगे। लेकिन एक प्रयास तो किया ही जा सकता है कि उनकी खबरें भी स्पेस पाएं जो मीडिया के लिए खबर नहीं बनते। ऐसा भी नहीं है कि हमारे वैचारिक आग्रह और दुराग्रह नहीं हैं, लेकिन हम एक वादा जरूर करते हैं कि खबरों के साथ अन्याय नहीं करेंगे। मुक्तिबोध ने कहा था ‘तय करो कि किस ओर हो तुम’। हमें अपना लक्ष्य मालूम है और हम यह भी जानते हैं कि वैश्वीकृत होती और तथाकथित आर्थिक उदारीकरण की इस दुनिया में हमारा रास्ता क्या है? इसलिए अगर कुछ लोगों को लगे कि हम निष्पक्ष नहीं हैं तो हमें आपत्ति नहीं है।

हम यह भी बखूबी जानते हैं कि पोर्टल चलाना कोई हंसी मजाक नहीं है और जब तक कि पीछे कोई काली पूंजी न हो अथवा जिंदा रहने के लिए आपके आर्थिक रिश्ते मजबूत न हों, या फिर आजीविका के आपके साधनों से अतिरिक्त बचत न हो, तो टिकना आसान नहीं है। लेकिन मित्रों के सहयोग से रास्ता पार होगा ही! आशा है आपका सहयोग मिलेगा। हमारा प्रयास होगा कि हम ऐसे पत्रकारों को स्थान दें जो अच्छा काम तो कर रहे हैं लेकिन किसी गॉडफादर के अभाव में अच्छा स्पेस नहीं पा रहे हैं। हम जनोपयोगी और सरोकारों से जुड़े लोगों और संगठनों की विज्ञप्तियों को भी स्थान देंगे. यदि आप हस्तक्षेप.कॉम की आर्थिक सहायता करना चाहते हैं तो amalendu.upadhyay@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

लेखक पलाश विश्वास जनसत्ता, कोलकाता में लंबे समय से वरिष्ठ पद पर कार्यरत जनसरोकारी पत्रकार हैं.

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हरदा रेल हादसा प्राकृतिक था तो पुल-पटरियां भगवान ही बचाए

एक ओर मीडिया की आंखों से देश को दिखाया जा रहा एक लाख करोड़ की बुलेट ट्रेन का सपना। दूसरी ओर एक ही रात में दो दो ट्रेन हादसे, दर्जनों लोगों की मौत। अंग्रेजों के ज़माने के रेलवे पुल, जर्जर पटरियां और लचर परिचालन। इतने बड़े देश के रेलवे की गिनती दुनिया की सबसे घटिया रेल व्यवस्था में। रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा कह रहे हैं कि हरदा ट्रेन हादसा प्राकृतिक था। ये तो वही बात हुई कि प्राकृतिक आपदा है तो पुल और पटरियां भगवान ने बनाई थीं, वही जाने ? रेल मंत्रालय बुलेट ट्रेन चलायेगा हवा में।

म.प्र. में हरदा के नजदीक कामायनी और जनता एक्सप्रेस की दुर्घटना प्राकृतिक है। दो ट्रेनों की सोलह बोगियां नदी में गिरी हैं और रेलवे कह रहा है कि सिर्फ 25 लोग ही मारे गए हैं. मीडिया भी 35 मौतें सुना रहा है। कयास लगाइए कि मुम्बई से बनारस और पटना से मुम्बई जा रही ट्रेनों के जनरल कोच में कितने लोग होते हैं। उनका आंकड़ा तो खुद रेलवे के पास भी नहीं। एक कोच में कम से कम 400 के लगभग लोग होते हैं। जिनका आरक्षण टिकट, सिर्फ उनकी ही गिनती। मनोज सिन्हा और सुरेश प्रभु जैसे लोगों से जनता को कोई उम्मीद नहीं। सारे देश को कूड़ा घर बना डाला है अन्धविश्वासियों और ढोंगियों ने। 

अगर मीडिया चाह जाता तो हरदा रेल हादसे को लेकर, रेलवे के लिए स्पष्टीकरण मुश्किल हो जाता। रेलवे प्रशासन को जवाब देना होगा कि आखिर एक ही ट्रैक पर दो रेलें कैसे डीरेल हो सकती हैं। सीधी सी बात है कि अगर कामायनी एक्सप्रेस, ट्रैक धंस जाने के कारण डीरेल हो चुकी थी, तो रात में उस ट्रैक पर रेल दौड़ाने की अनुमति कैसे दी गई, जिससे उसी ट्रैक पर, लगभग उसी जगह के आस-पास दूसरी रेल भी, लगभग उसी कारण से थोड़ी देर बाद पटरी से उतर गई? साफ है कि डीरेल होने की सूचना के बाद भी उसी ट्रैक पर असावधानी के कारण एक और रेल दौड़ रही थी।

रेल दुर्घटना पर सीपीआई (एम) मध्यप्रदेश राज्य समिति ने अफ़सोस और शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि हादसे के बाद ट्वीट कर प्रकृति पर दोष मढ़ा जा चुका है । अब खबरों की बाढ़ आने वाली है जिन के ऊपर नेताओं के रंगीन फ़ोटो तैरेंगे, उतरायेंगे । तीन चार दिन में धीरे धीरे मरने वालों की संख्या सामने आएगी । कुछ के नाम आएंगे, अनेक बेनाम ही रह जाएंगे । ताज्जुब नहीं कि बहुतेक गिनती में ही शुमार न हो पाएं । ज्यादा मौतें बेचैनी पैदा करती हैं, अच्छे दिनों की चुगली खाती हैं, सो क्या जरूरी है कि सारी लाशें गिनी और बतायी जाएँ । इसके बाद एक धमाकेदार घोषणा के साथ एक जांच आयोग का गठन किया जाएगा । एक दो लाइन मैन, दो पीडब्लूआई निलंबित होंगे और इतिहास के भीषणतम रेल हादसों में से एक इतिहास के कूड़ेदान में दफ़्न कर दिया जाएगा । अगले हादसे के इन्तजार में ! न पहली बार पानी बरसा है, न पहली बार कोई रेलगाड़ी इस पुलिया से गुजरी है । जानलेवा पुलिया नहीं थी, जानलेवा हैं वे नीतियां जो पिछले 20 साल से हर रेल बजट में गाड़ियों की संख्या में बढ़ोत्तरी के एलान के साथ ही रेल कर्मचारियों की संख्या घटाने का प्रबंध करती हैं । मालभाड़े की कमाई पर उत्फुल्लित होती हैं, रेलपथ के रखरखाव के खर्च के मामले में मुट्ठी बाँध लेती हैं । हर तीन महीने में बिना बताये किराया बढ़ा देती हैं मगर तीन तीन साल में एक बार भी पुलियों और रेल ट्रैक की दुरुस्ती का इंतजाम नहीं करती ।

रेल विभाग के आंकड़ों को ही देखें तो यह हरदा हादसे की पटकथा लिखने वाला, जानलेवा किन्तु कमाई की चतुराई से भरा अर्थशास्त्र सामने आ जाता है । 2004-05/2010-11 के पांच वर्षों में कुल रोलिंग स्टॉक 267109 से बढ़कर 298307 हो गया । कुल यात्री संख्या 537 करोड़ 80 लाख से बढ़कर 765 करोड़ 10 लाख हो गयी । यात्रियों द्वारा की जाने वाली यात्रा दूरी 575702 मिलियन किमी से छलांग मार कर बढ़ी और 978509 मिलियन किमी हो गयी ।(1 मिलियन=10 लाख) । मगर ठीक इसी दौरान कर्मचारियों की संख्या पूरे एक लाख कम हुयी ।14 लाख 24 हजार से 13 लाख 28 हजार रह गयी । अगले 5 साल में यह अनुपात और अधिक तेजी से बिगड़ा है । इस में भी आनुपातिक रूप से ज्यादा कमी ऑपरेशनल और फील्ड स्टाफ की हुयी । यह कोई विशेषज्ञ विश्लेषण नहीं है, आम जन की निगाह से सरसरी विवेचना है । थोड़ी और तफ़सील में जाएंगे तो पता चलेगा कि इस उदारीकरण के पूरे काल में सर्वाधिक कटौती रेल पटरियों और मार्ग के रखरखाव की मदों में हुयी है । जो बात अर्थशास्त्र के मामले में निरक्षर व्यक्ति भी समझ सकता है वह सत्ताधीशों की समझ में क्यों नहीं आती ? इसलिए कि उनके पैमाने बदल चुके हैं ।

व्यक्ति और जीवन की बजाय मुनाफा और रोकड़ प्राथमिकता पर आ जाती है तो उपलब्धियां जीडीपी आंकड़ों की मीनारों की ऊंचाइयों में नापी जाती हैं । वे मीनारें कितनी लाशों के ढेर पर खड़ी हैं, इसे फिजूल की बात और कालातीत हो गयी समझदारी करार दिया जाता है । हरदा में कितने मरे ? यह सवाल हल करना है तो पहले यह पूछना होगा कि क्यों मरे ? मृतकों के आश्रितों को पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए । रेल मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए । मगर इसीके साथ फ़ौरन से पेश्तर इन जानलेवा नीतियों को उलट कर उन्हें मुनाफे के बर्फीले पानी से बाहर लाकर जीवन की धूप दिखाई जानी चाहिए । विश्वबैंक का त्रिपुण्ड धारे, आई एम् ऍफ़ का जनेऊ पहने, श्राद्द् और तेरहवीं के गिद्दभोजों से तोंद फुलाये राजनेता ऐसा खुदबखुद करेंगे, यह उम्मीद कुछ ज्यादा होगी । 

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Mumbai scribe dies 25 days after constable’s son knocked him down

A-53-year-old journalist died last morning from the injuries that he had sustained from a hit-and-run incident involving a bike driven by a constable’s son, in Mira Road on May 4. Harshad Patel was a resident of Mira Road, and a journalist with Mumbai-based Gujarati newspaper Janmabhoomi. On that fateful day, Patel was walking back home on 90 Feet Road in Mira Road when the speeding bike slammed into him. The rider of the bike (MH- 04-CX-4977) was a constable’s son, identified as Sagar Rajaram Inchnade (22). His father, Rajaram Inchnade, is attached to the main police control room.

Police said the accused, who was also injured in the accident, dumped the bike and fled the spot after the incident. Meanwhile, a passer-by admitted the badly injured Patel to Wockhardt Hospital in Mira Road. There were two operations conducted on him, but Patel’s condition remained critical. Later, he was moved to Cooper Hospital.

The father of the accused, Rajaram Inchnade, had told the Mira Road police that his son had not reached home after the incident and promised that he would present Sagar in front of the police for the arrest whenever he could. After 25 days of fighting for his life, Patel died at 9.15 am yesterday at Cooper Hospital. After a post-mortem, police handed over the scribe’s body to the family.

Senior Inspector Dhanaji Shirsagar of Mira Road police station said, “We arrested the accused Sagar after this incident and released him on bail. We added a Section 304 (culpable homicide not amounting to murder) of the IPC, after the death of Patel, and we’ve also booked him for rash driving.”

A distraught family Patel’s son Vaibhav said, “We came to know about the incident late night on May 4. My father regularly came home at 1.30 am, but on that day, he had not reached till 2 am. We were continuously trying to call him and, suddenly, one person told us that my dad had been admitted to hospital. We then rushed there.”

He added, “We didn’t even the see the face of the accused. Earlier, we had information that the accused Sagar had run away from the spot. But we also received information that Sagar himself had admitted my father… it’s still unclear. Bikers are very rash in Mira Road. We are very sure that this youth was riding his bike too fast and this caused the accident. The accused should be punished.”

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यमुना एक्सप्रेस-वे पर दो कार हादसों में 6 मीडियाकर्मियों ने दम तोड़ा

मथुरा/दिल्ली : यमुना एक्सप्रेस-वे पर बीते आठ घंटों के बीच हुए दो सड़क हादसों में छह मीडियाकर्मियों की मौत हो गई और तीन घायल हो गए। इन छह में से चार मीडियाकर्मी हिंदुस्तान टाइम्स में सरकुलेशन विभाग में थे। दूसरे हादसे में जिन दो मीडियाकर्मियों की मौत हुई वे एक न्यूज चैनल के पत्रकार थे।

पुलिस के मुताबिक रविवार रात एक्सप्रेस वे पर सुरीर क्षेत्र में पत्रकारों की गाड़ी विपरीत दिशा से आ रही एक अन्य कार से भिड़ जाने के बाद डिवाइडर से टकराती हुई सड़क की दूसरी ओर चली गई। घटना में दिल्ली निवासी एवं हिंदुस्तान टाइम्स अखबार के सरकुलेशन विभाग में कार्यरत रहे एग्जीक्यूटिव दिव्यांशु (30), मनोज कुमार (27), नकुल शुक्ला (33) और जोनल मैनेजर उमेश कुमार सिंह (35) की मौके पर ही मृत्यु हो गई। हादसे में तीन लोग घायल हो गए। 

दूसरी दुर्घटना सोमवार सुबह हुई। एक न्यूज चैनल में कार्यरत मुंबई के दो पत्रकार इस हादसे में चल बसे। बताया जाता है कि चांदपुर खुर्द गांव के निकट आगरा की ओर जा रही उनकी कार सड़क किनारे खड़े एक ट्रक से जा भिड़ी। हादसे में पत्रकार विकास सिंह (40) और मिनाग सालोकर (28) ने दम तोड़ दिया।

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यमुना एक्सप्रेसवे पर टायर फटने से एचटी के चार मीडियाकर्मियों की मौत

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यमुना एक्सप्रेसवे पर टायर फटने से एचटी के चार मीडियाकर्मियों की मौत

बेहद दुखद खबर यमुना एक्सप्रेसवे से आ रही है. यमुना एक्सप्रेस वे पर भीषण हादसे में चार मीडियाकर्मियों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गयी और तीन लोग घायल हो गये. घायलों को उपचार के लिए भर्ती कराया गया है. दिल्ली से आगरा जा रहे चार लोग मथुरा में यमुना एक्सप्रेस वे पर हादसे का शिकार हो गये. दो कारों की टक्कर में चारों लोगों की मौत हो गई जबकि तीन लोग घायल हैं.

मृतकों के नाम दिव्यांशु निवासी लक्ष्मीनगर दिल्ली, उमेश सिंह निवासी मयूर विहार (मूल निवासी बलिया), नकुल शुक्ला और मनोज कुमार. ये लोग हिंदुस्तान टाइम्स दिल्ली के मीडियाकर्मी हैं. चारों सरकुलेशन डिपार्टमेंट में कार्यरत थे. उमेश सिंह हिंदुस्तान टाइम्स के जोनल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. नकुल, मनोज और दिव्यांशु एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत थे. हादसा मथुरा के पास हुआ. दिल्ली से आगरा जा रही स्विफ्ट कार (डीएल 9 सी क्यूएस 1379) बेकाबू होकर पलट गई. इसमें सवार चारों मीडियाकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए. अस्पताल तक लाने से पहले इन सभी ने एक-एक कर दम तोड़ दिया. इनकी कार एक दूसरी कार से टकरा गई थी. दूसरी कार में सवार तीन लोग घायल हो गए. बताया जा रहा है कि ये हादसा भी टायर फटने के कारण हुआ. पिछले कुछ दिनों में ही इस एक्सप्रेसवे पर एक डीएसपी, दो पुलिसकर्मियों समेत एक दर्जन से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है. बीती रात चार मीडियाकर्मियों की मौत के बाद अब इसे लोग यमराज-वे मानने लगे हैं.

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दैनिक जागरण बरेली के सिटी चीफ ज्ञानेंद्र सिंह ट्रेन से गिरकर घायल

बरेली से एक दुखद खबर है कि दैनिक जागरण बरेली में सिटी इंचार्ज की कुर्सी संभाल रहे ज्ञानेंद्र सिंह ट्रेन से गिरकर घायल हो गए। ज्ञानेंद्र को बरेली के सिद्धि विनायक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। ज्ञानेंद्र इलाहाबाद अपने घर गए थे। वापसी में ट्रेन से उतरते वक्त गिर पड़े और घायल हो गए। कुछ लोगों का कहना है कि वह चलती ट्रेन से उतरने लगे जिसके कारण गिर पड़े।

वहीं कुछ लोग कह रहे हैं कि बरेली में उतरना भूल जाने के कारण जब ट्रेन काफी आगे बढ़ गई तो वो उतरने की कोशिश में कूद पड़े इसलिए जख्मी हो गए। वहीं कुछ लोग यह कह रहे हैं कि ट्रेन से बरेली उतरना भूल गए जिसके कारण बरेली से 30 किमी आगे उन्होंने चेन खींचने का प्रयास किया लेकिन ट्रेन नहीं रुकी तो वो कूद पड़े. जैसे-तैसे मीरगंज के जागरण इंचार्ज ओंकार ने उन्हें बरेली लाकर अस्पताल में भर्ती कराया. वहीं कुछ लोग ज्ञानेंद्र के शराब पिए होने की चर्चा भी कर रहे हैं. फिलहाल इस मामले को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं.

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विनोबा आश्रम की छात्रा के साथ रेप हुआ था लेकिन ताकतवर शख्स ने दुर्घटना का रूप दे दिया!

शाहजहांपुर। चार वर्ष पूर्व बंडा थाना इलाके में मिली लडकी की अर्धनग्‍न लाश की शिनाख्‍त शाहजहांपुर के विनोबा आश्रम में रहकर पढाई करने वाली रन्‍जना के रूप में हुई थी। उस वक्‍त पीएम रिपोर्ट में रन्‍जना की मौत का कारण दुर्घटना आया था। लेकिन अब मामले में कुछ और ही निकलकर सामने आ रहा है। यह दुर्घटना नहीं बलात्‍कार था। यह खुलासा किसी और का नहीं बल्कि विनोबा आश्रम में काम करने वाले एक कर्मचारी का है।

उसके अनुसार जिस दिन उस लड़की की मौत हुई थी उस समय वह वहीं पर मौजूद था। गवाह के मुताबिक वह चार साल से बहुत परेशान हैं क्योकि उस लडकी की रुह उसको परेशान कर रही है। वह बार-बार उससे न्‍याय की गुहार लगा रही है। गवाह के मुताबिक उसके भीतर  एक डर बैठ चुका है कि यह खुलासा करने के बाद कहीं उसे आरोपी मरवा न दें। लेकिन इसके बाद भी वह सच बोलना चाहता है. उसने बताया कि जिस दिन उस लडकी की मौत हुई थी उस दिन रमेश भैया का पूरा परिवार फर्रुखाबाद में शादी में गया हुआ था. उसी दिन उनका खास व्‍यक्ति आया जो कि काफी दिन से इस लड़की के साथ छेड़खानी कर रहा था। लडकी ने कई बार अपनी माँ को रो-रो कर अपनी आपबीती बताई थी। उस दिन भी वह व्‍‍यक्ति अपने दोस्तों के साथ आश्रम पर आया और उसने लड़की को अकेला पाकर उसके साथ रेप किया और अपने दोस्तों के आगे परोसने की भी कोशिश की। जब लडकी घबडाकर भागी तो वह छत से नीचे गिर गयी और उसकी मौत हो गयी।

वह व्‍यक्ति ने उसको अपनी गाडी में डाल कर पांच जनवरी 2010 को बंडा थाना क्षेत्र के ग्राम सिकरहना-मानपुर मार्ग के समीप मानपुर पिपरिया निवासी विश्राम के गेंहू के खेत में फ़ेंक दिया और वापस आने पर गाडी का भी एक्सीडेंट हो गया। उस गाडी को भी गायब करवा दिया गया था। गॉव वालो ने जब लड़की का अर्द्धनग्न शव देखा तो शव को देखते ही लोगों ने अंदाजा लगाया कि लड़की की रेप के बाद हत्या की गई है। शव की पहचान नहीं हो पाई तो पुलिस ने अज्ञात में ही शव को पीएम के लिए भिजवा दिया। अगले दिन पोस्टमार्टम हाउस पर शव की शिनाख्त विनोबा सेवा आश्रम की छात्रा रंजना के रूप में हुई थी। वह आश्रम में ही हास्टल में रहकर आश्रम द्वारा संचालित स्कूल में पढ़ाई करती थी। वह नवीं कक्षा की छात्रा थी। रंजना पलिया खीरी अंतर्गत ग्राम चंदनचौकी निवासी दरोगा सिंह की बेटी थी। शव की शिनाख्त से विनोबा आश्रम में हड़कंप मच गया। गवाह का कहना है कि यदि जिले का कोई प्रशासनिक अधिकारी इस मामले को रीओपन कर सके तो वह सरकारी गवाह बनकर सारी सच्चाई न्यायालय को दे सकता है इसके लिए उसको पूरी सुरक्षा चाहिए।

पीएम रिपोर्ट में लडकी की मौत का कारण एक्सीडेंट बताया गया था यह बात सही है क्योकि लडकी की मौत छत से गिरने के कारण हुई थी। लेकिन उसमे लडकी की उम्र भी महज 14 वर्ष ही दशाई गई थी। जबकि गवाह ने यह भी बताया कि लडकी की उम्र उस वक्‍त करीब 19 वर्ष थी। आश्रम के एक खास ने पूरे मामले को मैनेज कर पचा लिया। इसके लिए उसे काफी रकम भी खर्च करनी पडी थी।

राजू मिश्रा की रिपोर्ट.

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सड़क हादसे में मेरठ के कई मीडियाकर्मी घायल

मेरठ से जानकारी मिली है कि हिंदुस्तान अखबार के सिटी डेस्क इंचार्ज नीरज श्रीवास्तव, डिजाइनर गौरव सक्सेना, उनकी पत्नी और बच्चा एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गए हैं. एक अन्य हादसे में डिजायनर अजय के हाथ में फ्रैक्चर हुआ है.

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सड़क हादसे में कन्नौज के पत्रकार अर्पित पाल की मौत

कन्नौज। स्वतंत्र भारत के युवा पत्रकार अर्पित पाल की सड़क हादसे में उस समय मौत हो गई, जब वह बीते 19 नवम्बर को शाम अपनी बहन के यहां बाइक से जा रहे थे। पत्रकारों ने शोक संवेदना व्यक्त तक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से अधिक से अधिक आर्थिक सहायता देने की मांग की है।

बीते 19 नवम्बर को अर्पित बाइक से तिर्वा पहुंचा। यहां से अपनी बहन के यहां जाने के लिए बेला रोड़ पर पहुंचते ही बलनपुर के निकट वाहन ने टक्कर मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। अंतिम संस्कार महादेवी घाट पर किया गया। इस मौके पर अनूप शुक्ल, शैलेन्द्र सिंह चौहान, विकास अवस्थी, अजय मिश्र, अजय द्विवेदी, विजय प्रताप सिंह, योगेन्द्र बघेल, रविनंदन मिश्र, अनुज राज दीक्षित, अमित कुशवाहा, रवि द्विवेदी समेत कई पत्रकारों ने शोक जताया। और पीडि़त परिवार के लिए सरकार से आर्थिक सहायता मांगी है।

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जी न्यूज संवाददाता शिवम भट्ट की हरियाणा में सड़क हादसे में मौत

एक दुखद खबर हरियाणा से है. जी न्यूज संवाददाता शिवम भट्ट का सड़क हादसे में निधन हो गया है. वे हिसार में रामपाल प्रकरण कवर करने गए हुए थे. सड़क हादसे में जयवीर रावत और रोहित खन्ना घायल हुए हैं. हादसा कैथल के पास हुआ. हादस आज यानि 20 नवंबर की सुबह हुआ. शिवम की उम्र लगभग 24 साल थी. शिवम कई दिनों से हिसार के बबराला में रामपाल प्रकरण को कवर कर रहे थे. कल रात रामपाल की गिरफ्तारी के बाद जी न्यूज की टीम वापस चंडीगढ़ जाने के लिए निकली.

शिवम भट्ट के साथ रिपोर्टर रोहित खन्ना और कैमरापरसन जयवीर भी थे. रोहित व जयवीर को काफी चाटें आई हैं. शिवम भट्ट की मौके पर ही मौत हो गई. शिवम भट्ट जी मीडिया के साथ 3 फरवरी 2014 को जुड़े थे और पंजाब, हिमाचल, हरियाणा के लिए चंडीगढ़ में कार्यरत थे. शिवम भट्ट के निधन पर इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन (इम्वा) के पदाधिकारियों ने दुख व्यक्त किया है. इम्वा की तरफ से केन्द्र सरकार और राज्य सरकार से मांग की गई है कि शिवम भट्ट के परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए.

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पैर गंवा चुकी स्नेहिल की चैनल से बातचीत चल रही है

Vineet Kumar : स्नेहिल से मेरी बात हुई. उन्हें इस वक्त हमारी जरूरत नहीं है..लिखने से लेकर बाकी चीजों की भी. वो अब इस संबंध में कोई बात नहीं करना चाहती. उनका कहना है कि चैनल से इस संबंध में बातचीत चल रही है. हमारी प्राथमिकता स्नेहिल की जिंदगी और उसके प्रति उत्साह बनाए रखना पहले है जो कि सचमुच एक चुनौती भरा काम है..लिहाजा, हम इस मामले को तूल देकर उनके हिसाब से शायद नुकसान ही करेंगे. रही बात चैनल की तो हम किसी की आइडी, ज्वाइनिंग लेटर की कॉपी जबरदस्ती साझा करने नहीं कह सकते.

यकीन मानिए, आप सोशल मीडिया पर लिखते हुए जितना सीखते हैं, उतना आप किसी चैनल या अखबार के लिए काम करते हुए भी शायद सीख पाएं..यहां जो भी सोर्स, तथ्य औऱ बातें जुटाते हैं, सब अपनी क्रेडिबिलिटी पर, ब्रांड का असर नहीं होता..इस पूरे प्रकरण में फिर भी सोशल मीडिया ने अपना असर दिखा दिया.. मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि पब्लिक डोमेन में स्नेहिल की इच्छा के विरुद्ध वो सारी चीजें शामिल करुं. मैं किसी अखबार या चैनल के लिए स्टोरी नहीं कर रहा था कि किसी हाल में उनकी निजता, सुविधा को नजरअंदाज करते हुए सार्वजनिक कर दूं..अपनी क्रेडिबिलिटी मद्धिम होने की शर्त पर भी इसे सहेजना मेरी पहली प्राथमिकता है..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Chandan Srivastava : स्नेहल वघेला के साथ हुए हादसे के बारे में जो मित्र न जानते हों उन्हें बता दूं. स्नेहल जिया न्यूज की पत्रकार थीं. स्नेहल वाघेला के पांव दफ्तर के काम से जाते हुए ट्रेन के सफर के दौरान दुर्घटनावश कट गए. लेकिन चैनल ने कोई सुध न ली. इस बारे में सोशल मीडिया में जब चैनल की फजीहत शुरू हुई तो चैनल का मैनेजमेंट सामने आया और दो टूक कह दिया कि स्नेहल उनके यहां कभी कोई पत्रकार थी ही नहीं. यह पहली बार नहीं. जिस दिन, जिस पल से पत्रकारिता में कदम रखा है, उस दिन से यही देखता आ रहा हूं कि किसी पत्रकार के साथ दुर्घटना हुई, खबर को लेकर विवाद हुआ या रुकी सेलरी का कोई मामला हुआ, संस्थानों का फटाक से बयान आता है, अमुक पत्रकार तो हमारे संस्थान में है ही नहीं.

मुजफ्फरनगर दंगे को कवर करते हुए राजेश मारे गए, क्या किया आईबीएन7 ने? उससे तो सरकारें भली जिन्होंने 2-4 लाख की मदद कर दी उनके परिवार को. ये बुरा दौर है पत्रकारों का, हर लिहाज से बहुत बुरा. Yashwant जैसे लोग जब इसी बुराई को सामने लाने लगते हैं तो जेल भिजवा दिए जाते हैं. इसलिए दोस्तों इस बुरे और घटिया दौर में आपको ही एक दूसरे का सहारा बनना है. विचार कीजिए कि फिलहाल हम स्नेहल के लिए क्या कर सकते हैं? Surendra Grover सर या यशवंत भाई को बताईये, कुछ ऐसा तरीका कि स्नेहल को संघर्ष का मजबूत सहारा मिल सके.

पत्रकार चंदन श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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मीडिया में सरोकार, जज्बे और जज्बात के जितने शब्द-एक्सप्रेशन हैं, सबके सब सिर्फ प्रोमो-विज्ञापन के काम लाए जाते हैं

Vineet Kumar : जिया न्यूज की मीडियाकर्मी स्नेहल वाघेला के बारे में जानते हैं आप? 27 साल की स्नेहल अपने चैनल जिया न्यूज जिसकी पंचलाइन है- जर्नलिज्म इन एक्शन, के लिए अपने दोनों पैर गंवा चुकी है. पिछले दिनों जिया चैनल के लिए मेहसाना (अहमदाबाद) रेलवे स्टेशन पर रिपोर्टिंग करते हुए स्नेहल फिसलकर पटरियों पर गिर पड़ी और उनके दोनों पैर इस तरह से जख्मी हुए कि आखिर में काटने पड़ गए. अब वो चल-फिर नहीं सकती.

पैर की स्थिति से आप बाकी खुद भी अंदाजा लगा सकते हैं. पिछले चार महीने से वो घर पर है और इलाज में लाखों रुपये खर्च हो गए हैं. लेकिन चैनल ने इसमे अभी तक एक रुपये की मदद नहीं की. रेलवे तो टाल-मटोल करता ही आया है. आप कुछ मत कीजिए, जिया न्यूज की वेबसाइट पर जाइए. आप देखेंगे कि स्नेहल की तरह ही एक महिला पत्रकार जमीन पर लेटकर पीटीसी कर रही है. चारों तरफ का महौला ऐसा है कि कोई आतंकवादी घटनास्थल के बीच से की जा रही रिपोर्टिंग है. ब्लैक एंड व्हाइट इस तस्वीर पर बड़ी सी स्टिगर चिपकाई गई है जिस पर लिखा है- जर्नलिज्म इन एक्शन.

कहने की जरूरत नहीं कि मीडिया में सरोकार, जज्बे और जज्बात के जितने शब्द और एक्सप्रेशन हैं, सबके सब सिर्फ प्रोमो और विज्ञापन के काम लाए जाते हैं..असल में कहीं कुछ नहीं होता, उसके लिए भी नहीं जो इसे प्रोड्यूसर करता है. मैंने पहले भी कहा था, फिर दोहरा रहा हूं- मीडिया में सबसे गई गुजरी हालत है तो उन मीडियाकर्मियों की जो इस इन्डस्ट्री के लिए खबर जैसे प्रोडक्ट तो तैयार करते हैं लेकिन उनकी जिंदगी इनमे शामिल नहीं होती..स्नेहा की स्टोरी आपने कितने चैनलों पर देखी?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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शूट के दौरान जिया न्यूज की पत्रकार स्नेहल पटरियों पर गिरीं, दोनों पैर कटे, चैनल की तरफ से कोई मदद नहीं

कल एक फेसबुक मित्र से हाय हैलो हुयी. पहले वो रियल4न्यूज मे काम करती थीं. उसके बाद कल हालचाल पूछा तो पता चला कि जिया न्यूज में है. मैंने पूछा किस स्टोरी पर क़ाम चल रहा है तो बोलीं- फिलहाल रेस्ट पर हूं. मैंने कहा- कब तक. बोलीं- पता नही. मजाक में मैंने कहा- आफिसियल हालीडे. वो बोलीं- नो. मैंने कहा- शादी या प्रेग्नेन्सी. बोलीं- नहीं. फिर दिलचस्पी ली. एक और कयास लगाया की शूट के दौरान घायल? उसने कहा- हां.

मैंने कहा कब तक बेड रेस्ट. बोलीं- उम्र भर. माथा ठनका और सीरियसली पूछा तो पता चला की मेहसाना (अहमदाबाद) में ट्रेन पर शूट के दौरान पटरियों पर गिर गयीं थीं और दोनों टांगें कट गयी. चार महीने से घर पर हैं. सात-आठ लाख रुपये खर्च हो चुके हैं मगर आज तक आफिस ने एक रुपया नहीं दिया. रेलवे प्रशासन भी टाल मटोल कर रहा है. मां-बाप की इकलौती सहारा हैं इसलिये कुछ लिख पढ़ कर काम चला रही हैं.

समाचार चैनल से पंगा नही ले रहीं कि शायद उन चैनल वालों का दिल पसीज जाय. रातों को दर्द के मारे सो नहीं पातीं. ये खबर क्या किसी ने किसी समाचार पत्र या चैनल में पढ़ा / सुना है? क्या दूसरों के लिये न्याय का भोंपू बजाने वाला हमारा किन्नर समाज इस दिशा में कुछ कर सकता है? युवा पत्रकार की उम्र महज 27 साल है और नाम उसकी सहमति से उजागर कर रहा हूं. उनका नाम है Snehal Vaghela. मित्रों, अगर कुछ मदद हो सकती है हक की लडाई में तो साथ जरूर दें. मैं आर्थिक मदद की अपील करके अपने धंधे को और उनके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता.

सिद्धार्थ झा के फेसबुक वॉल से.

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कानपुर के अस्पताल ने आरोपी को बचाने के लिए एक्सरे और सीटी स्कैन से पांच फ्रैक्चर गायब करा दिए

जय प्रकाश त्रिपाठी : आज इतना बड़ा छल हुआ। हैरत और तनाव से रात भर नींद नहीं आई। क्या चिकित्सा जगत में अब ऐसा भी होने लगा! घटना के दिन तीस सितंबर को जिस अस्पताल (गुरु तेगबहादुर अस्पताल) में पत्नी को भरती कराया था, उसने सुनियोजित तरीके से एक्सरे और सीटी स्कैन में पांच फ्रैक्चर इसलिए गायब करा दिये कि आरोपी उसके समुदाय का है। उसके अस्पताल में भर्ती के समय सिर्फ तीन फ्रैक्चर बताये गये थे।

आज अन्यत्र दोबारा एक्सरे कराने पर पांच अन्य फ्रैक्चर का पता चला। घुटना भी टूट चुका है। आरोपी एक समुदाय विशेष के संपन्न परिवार का है। उसके समर्थक पुलिस, प्रशासन, मीडिया पर दबाव बना रहे हैं कि कार्रवाई न हो, न कम्पंसेशन देना पड़े। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? एक तो आठ फ्रैक्चर हो जाने से पत्नी की दुर्दशा, दूसरे आरोपियों की ऐसी घिनौनी हरकतें…

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हादसा और प्यार : अपनी मुश्किल घड़ी में मित्र परिवार के शब्दों से अपेक्षाधिक संबल मिला, जिनसे इस मंच पर आज तक कभी संवाद न हो सका था, उनसे भी आश्वास्त हो लेने का इस घटना के कारण ही सही, सुअवसर मिला, पूरे मित्र परिवार के लिए एक बार पुनः हार्दिक कृतज्ञता… पहले दिन घटना की सूचना देने के बाद मुझे लगा था कि पत्नी पूर्ण स्वस्थ हो जाने पर ही पुनः यहां उपस्थित हो सकूंगा लेकिन आप मित्रों, शुभचिंतकों की सहानुभूति, यहां बार बार खींच ले आ रही है। पत्नी की सेवा-सुश्रुषा, देखभाल से कुछ पल का समय चुराकर मित्रों के संग-साथ हो ले रहा हूं। यह सोचते हुए कि दुनिया में कितना गम (दुख) है, अपना तो कितना कम है….. मेरे घर आते-जाते रहे मित्रगण मेरी पत्नी के स्वभाव से पूर्ण परिचित हैं। वह सब काम छोड़ कर उनके उपस्थित हो जाते ही उनकी अगवानी, आवभगत में डूब जाती रही हैं। दुर्घटना से सबसे ज्यादा कष्ट उन्हें हुआ है। वे घटना के बाद से लगातार फोन संपर्क में है। प्रतिदिन कुशलता की कामना के साथ मेरा संबल संभाले हुए है।

इस मंच पर आत्मीय हुए कई-एक वरिष्ठ शुभचिंतक एवं मित्र भी मेरी स्थितियों से अत्यंत दुखी-द्रवित हुए, मेरा असमय यथासंभव साझा किया, उनका पुनः-पुनः आभार….. उम्मीद है, इस दुखद समय से उबरने में कम से कम डेढ़-दो माह लग जाने हैं, अभी कच्चा प्लास्टर चढ़ा है दोनो पैरों और दायें हाथ में, एक्सरे-सिटी स्कैन में एक पैर के निचले हिस्से की हड्डियां चूर-चूर हो जाने से नौ अक्तूबर को ऑपरेशन, फिर एक पैर और हाथ पर पक्का प्लास्टर होना है, उसके बाद 45 दिन और… इस हादसे से जो एक सबसे महत्वपूर्ण संदेश मुझे मिला कि फेसबुक का मित्र परिवार सुख में संबल बने-न-बने, दुख में ऐसा कोई नहीं, कहीं नहीं मेरा….आभार

अमर उजाला, कानपुर में सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार जय प्रकाश त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

Ranjana Tripathi : 56 साल की एक औरत हर शाम घर से बाहर निकलती है 1.5 लीटर दूध लेने के लिए. 20 मिनट के भीतर उसका आना-जाना दोनों हो जाता. इतनी ही देर में कुछ लापरवाह मां-बाप की 10-12 साल की औलादें स्कूटर लेकर चलती सड़क पर दौड़ाते हैं और एक बेकसूर औरत के दोनों पैर और एक हाथ तोड़ देते हैं. घसीटते हुए उस औरत को बहुत दूर तक ले जाते हैं. वो औरत जान भी नहीं पाती कि उसके साथ यह सब क्या हो रहा है. उसकी आंखों का चश्मा कहीं गिरता, बालों का क्लिप कहीं… दूध का डिब्बा कहीं… यह औरत कोई और नहीं मेरी मां है. दो दिन पहले हुए इस सड़क दुर्घटना में मेरी मां अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी कुछ करने लायक नहीं बची हैं. ना तो हिल पा रही हैं और न ही करवट ले पा रही हैं. मेरी मां को इतना दर्द हो रहा है कि वह जब मुझसे बात कर रही हैं रोने लग रही हैं. उनकी रोती हुई आवाज़ मुझमें बेचैनी पैदा कर रही है. मैं उनके आंसू बरदाश्त नहीं कर पा रही हूं. मेरा हर पल कैसे बीत रहा है यह मैं ही जानती हूं. दो रातों से मुझे नींद नहीं आयी है… क्या खाया- क्या पीया कुछ याद नहीं… नहाना-कपड़े बदलना-बाल बनाना सब भूल गयी हूं…

मेरी मां बहुत ही अच्छी और सच्ची महिला हैं. मैंने उनकी ज़बान से कभी किसी के लिए अपशब्द नहीं सुने. वो किसी को गाली नहीं देतीं, किसी का बुरा नहीं सोचतीं. उन्होंने अपनी सारी उम्र कमरे की दिवारों के भीतर अपने चार बच्चों और पति के लिए गुज़ार दी. उनकी कोई नींद नहीं और न ही कोई भूख न कोई हंसी और न ही कोई दुख… उनका सुख-दुख हंसना रोना भोजन-उपवास सब उनके बच्चे और पति हैं. घर में चाहे कितने भी लोग आ जायें, मां सबका पेट भरकर भेजती हैं. नजाने कितने लोगों ने उनके हाथों से बने खाने का स्वाद चखा है. कहने का मतलब की एक ऐसी मां जैसा कि मां को होना चाहिए. किताबों वाली मां… कहानियों वाली मां… ऊपर से नीचे तक प्रेम छलकाती मां और बच्चों के दुखों में पल्लू भीगाती मां… उनकी सुबह दोपहर शाम रात सब रसोईं में चूल्हे के सामने ही होते है. समुंदर, पहाड़, जंगल, जगमगाती रोशनी के शहर देखना तो अब तक उनके लिए किसी स्वप्न जैसा है. इस महीने की चौदह तारीख को मेरे पास आनेवाली थीं. पहली बार हवाई यात्रा करने जा रही थीं, मन में बहुत उत्साह था बैंग्लोर आने का. लेकिन क्या पता था कि इस तरह कोई बदहवाश 12 साल का बच्चा मेरी मां से मेरे मिलन को दुख-दर्द-तकलीफ में बदल देगा.

अपनी मां से बहुत दूर रहती हूं, लेकिन हर पल मेरा मन उनके पास रहता है. हर पल उन्हें सोचती हूं… जब उन्हें सोचती हूं, तब वो मुझे एक ही रूप में नज़र आती हैं- ऊपर से नीचे तक पसीने से भीगी अपने भारी शरीर के साथ रसोईं में कुछ पकाती या फिर पिताजी के लिए हाथ में चाय का कप लिए खड़ी मेरी मां. लेकिन दो दिनों से उन्हें इस तरह नहीं सोच पा रही हूं. दो दिनों से गल्ती से अगर नींद आ जा रही है, तो जागते ही मां का खयाल कौंध जा रहा है. मां दर्द में है यह सोच कर मेरा रोम-रोम दुख जा रहा. मां के शरीर के साथ मानों उन बच्चों ने मेरे बदन को भी सड़क पर रौंद दिया है.

इस देश में बच्चा पैदा होते ही हवाई जहाज चलाने लग जाता है. यहां किसी काम के लिए कोई उम्र तय नहीं है. ऐसे मां-बाप अपने बच्चों के स्कूटर उड़ाने पर गर्व महसूस करते हैं. कानपुर-लखनऊ-आगरा-मेरठ जैसे शहरों में तो बच्चे कार तक दौड़ाते हैं. सिग्नल तोड़कर निकल भी जाते हैं… बगल में खड़े पुलिस वाले भईया सुरती पीटते रहते हैं. एक समझदार बालिग लड़का रोड पर फिर भी सहूलियत से स्कूटर-गाड़ी चलाता है, लेकिन कम उम्र के बच्चे चलाते नहीं उड़ाते हैं… हाथ में मानों अल्लादीन का चिराग आ गया हो… जितना घिसना है एक ही बार में घिस लो… फिर घिसने को नहीं मिलेगा. बद्ददिमाग बच्चों और अशिक्षित-गैरज़िदम्मेदार अभिभावकों की वजह से ही सड़क पर दुर्घटनाएं होती हैं और इन्हें ही ध्यान में रखकर सड़क का सही तरह से इस्तेमाल होने के कुछ नियम- कायदे- कानून बनाये गये हैं. लेकिन, इसका पालन बहुत ही कम लोग करते हैं. छोटे शहरों में तो अराजकता छायी हुई है.

उन 10-12 साल के बच्चों और उनके मां-बाप के लिए मेरे मन में बहुत गुस्सा है… मैं रो रही हूं. मन अंदर से बहुत बहुत बहुत गुस्से में है. किसी का कुछ नहीं जाता. मेरी मां तो महीनों के लिए बिस्तर पर चली गयी. मां को दु:ख है इस बात का कि वो पिताजी के लिए हर घंटे चाय नहीं बना पायेंगी.. उनकी दवाईयां सही समय पर नहीं दे पायेंगी… उनके खाने-पीने का ध्यान नहीं रख पायें और मुझे दु:ख है कि मैं अब लंबे समय तक उनके पायल छनकते पैरों की आवाज़ नहीं सुन पाऊंगी, जो कानपुर में बजते थे और मुझे बैंगलोर में सुनाई पड़ते थे.

लोगों को बच्चे पालने नहीं आते. कैसे बच्चे कंट्रोल से बाहर हो जाते हैं कि चाभी उठाते हैं और स्कूटर सड़क पर दौड़ाने लगते हैं. मेरा भाई 21 साल का हो गया है आज तक उसने बाईक नहीं चलाई. उसे बाईक-कार दोनों चलाने आते हैं, लेकिन मेरे पिताजी उसे अभी कुछ चलाने नहीं देते. आजकल के लड़के बाईक चलाते नहीं अंधों की तरह उड़ाते हैं. मैं महान नहीं हूं और न ही बनना चाहती हूं. गलत काम का फल भी तुरंत मिलना चाहिए. ऐसे बच्चों या अभिभावकों को सजा कैसे मिले? इनका क्या किया जाना चाहिए? कृपया आप सब मार्गदर्शन करें और पोस्ट को लाईक न करें.

वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश त्रिपाठी की पुत्री और लेखिका रंजना त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

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जोधपुर के पत्रकार बाबू भाई सड़क हादसे में घायल

जोधपुर। बीती रात सड़क हादसे में जोधपुर के वरिष्ठ पत्रकार इन्द्रसिंह उर्फ बाबू भाई गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें इलाज के लिए मथुरादास माथुर अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। सोमवार दोपहर तक उन्हें होश नहीं आया था। प्राप्त जानकारी के अनुसार पत्रकार इन्द्रसिंह रविवार रात को अपनी मोटर साइकिल पर घर की तरफ जा रहे थे उसी दौरान शनिश्चरजी के थान के पास कोई अज्ञात वाहन उन्हें टक्कर मारकर फरार हो गया।

हादसे में इन्द्रसिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल महात्मा गांधी अस्पताल ले जाया गया। सिर में गहरी चोट लगने के कारण उन्हें मथुरादास माथुर अस्पताल रेफर कर दिया। घटना के बाद से ही इन्द्रसिंह को होश नहीं आया। घटना की सूचना मिलते ही शहर के प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया से जुड़े कई पत्रकार, फोटोग्राफर अस्पताल पहुंचे। उन्होंने इन्द्रसिंह की सार-संभाल की। इन्द्रसिंह वर्तमान में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान खोज खबर में सेवाएं दे रहे हैं।

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स्‍कार्पियो की टक्‍कर से पत्रकार सूदनाथ मौर्य की मौत

चंदौली जिले से खबर है कि पत्रकार सूदनार्थ मौर्य की हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. वे 48 वर्ष के थे. श्री मौर्य पायनियर अखबार से जुड़े हुए थे. हादसा मुगलसराय कोतवाली क्षेत्र के मवई कलां गांव में हुआ. पुलिस ने उनके शव को कब्‍जे में लेकर पोस्‍टमार्टम के लिए भेज दिया है. उनका अंतिम संस्‍कार उनके गांव के पास गंगा तट पर स्थित घाट पर ही किया जाएगा.

जानकारी के अनुसार मूल रूप से मुगलसराय कोतवाली क्षेत्र के मवई कला गांव निवासी पत्रकार सूदनाथ मौर्य मंगलवार की सुबह सात बजे गांव के सामने स्थित चाय की दुकान पर बैठकर चाय पी रहे थे. इसी बीच बगल के गांव का एक व्‍यक्ति स्‍कार्पियो वाहन चलाना सीख रहा था. अचानक उसने वाहन की स्‍पीड बढ़ाते हुए सूदनाथ मौर्य को धक्‍का मार दिया. सूदनाथ जिस चौकी पर बैठे उसके समेत सामने की दीवाल में बुरी तरह टकरा गए.

बुरी तरह घायल सूदनाथ को उसी स्‍कार्पियो से पहले दुलहीपुर के एक अस्‍पताल ले जाया गया, जहां डाक्‍टर ने जवाब दे दिया. इसके बाद उन्‍हें बनारस सिंह मेडिकल रिसर्च ले जाया गया. डाक्‍टरों ने जांच के बाद उन्‍हें मृत घोषित कर दिया. इसके बाद उनके शव को मुगलसराय कोतवाली पुलिस अपने कब्‍जे में ले लिया तथा अन्‍त्‍य परीक्षण के लिए जिला चिकित्‍सालय चंदौली भेज दिया.

आरोपी के खिलाफ संबंधित धारा में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. आरोपी पुलिस की पकड़ से अभी बाहर है. दुर्घटना करने वाले वाहन को पुलिस ने अपने कब्‍जे में ले लिया है. सूदनाथ मौर्य के निधन पर जिला भर के पत्रकारों ने शोक जताया है. शोक जताने वालों में समर बहादुर यादव, देवजीत भौमिक, घनश्‍याम पांडेय, सुनील सिंह, प्रदीप शर्मा, सरदार महेंद्र सिंह, राजेंद्र प्रकाश यादव, महेंद्र प्रजापति, रौशन सिंह, आसाराम, अमरेंद्र सिंह समेत तमाम पत्रकार शामिल हैं.

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