निष्ठुर एचटी प्रबंधन ने नहीं दिया मृतक मीडियाकर्मी के परिजनों का पता, अब कौन देगा कंधा!

नई दिल्ली। अपने धरनारत कर्मी की मौत के बाद भी निष्ठुर हिन्दुस्तान प्रबंधन का दिल नहीं पिघला और उसने दिल्ली पुलिस को मृतक रविन्द्र ठाकुर के परिजनों के गांव का पता नहीं दिया। इससे रविन्द्र को अपनों का कंधा मिलने की उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है।

न्याय के लिए संघर्षरत रविन्द्र के साथियों का आरोप है कि संस्थान के गेट के बाहर ही आंदोलनरत अपने एक कर्मी की मौत से भी प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और उसने प्रेस परिसर में शुक्रवार को आई दिल्ली पुलिस को रविन्द्र के गांव का पता मुहैया नहीं कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन के पास रविन्द्र का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, उसने जानबूझकर बाराखंभा पुलिस को एड्रेस नहीं दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए भर्ती होने वाले कर्मी का HR पूरा रिकॉर्ड रखता है। उस रिकॉर्ड में कर्मी का स्थायी पता यानि गांव का पता भी सौ प्रतिशत दर्ज किया जाता है। रविन्द्र के पिता रंगीला सिंह भी हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे। ऐसे में उनके गांव का पता न होने का तर्क बेमानी है। रंगीला सिंह भी इसी संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत थे, जबकि रविन्द्र डिस्पैच में।

रविन्द्र के साथियों ने बताया कि रविन्द्र अपने बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। बस इतना ही पता है कि वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का रहनेवाला है और उसका घर पंजाब सीमा पर पड़ता है। वह दिल्ली में अपने पिता, भाई-भाभी आदि के साथ 118/1, सराय रोहिल्ला, कच्चा मोतीबाग में रहता था। कई साल पहले उसका परिवार उस मकान को बेचकर कहीं और शिफ्ट हो गया था। रविन्द्र की मौत के बाद जब उनके पड़ोसियों से संपर्क किया तो वे उनके परिजनों के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए। उनका कहना था कि वे कहां शिफ्ट हुए, उसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है। रविन्द्र के परिजनों ने शिफ्ट होने के बाद से आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। रविन्द्र के संघर्षरत साथियों का कहना है प्रबंधन के असहयोग के चलते कहीं हमारा साथी अंतिम समय में अपने परिजनों के कंधों से महरूम ना हो जाए।

उन्होंने देश के सभी न्यायप्रिय और जागरूक नागरिको से रविन्द्र के परिजनों का पता लगाने के लिए इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर और फारवर्ड करने की अपील की। उनका कहना है कि अखबार कर्मी के दुःखदर्द को कोई भी मीडिया हाउस जगह नहीँ देता, ऐसे में देश की जनता ही उनकी उम्मीद और सहारा है। यदि किसी को भी रविन्द्र के परिजनों के बारे कुछ भी जानकारी मिले तो उनके इन साथियों को सूचना देने का कष्ट करें…
अखिलेश राय – 9873892581
महेश राय – 9213760508
आरएस नेगी – 9990886337

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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बॉबी घोष के जाने के बाद सुकुमार रंगनाथन बनाए गए एचटी के नए एडिटर इन चीफ

बॉबी घोष के हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से अलग हो जाने के बाद सुकुमार रंगनाथन को नया एडिटर इन चीफ बनाया गया है. एस रंगनाथन अब तक इसी समूह के बिजनेस अखबार ‘मिंट’ के एडिटर के रूप में कार्य कर रहे थे. चेयरपर्सन शोभना भरतिया ने एक मेल के जरिए इसकी जानकारी सभी एचटी कर्मियों को दी. मेल में कहा गया है कि हिन्दुस्तान टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ के रूप में 48 वर्षीय सुकुमार रंगनाथन की नियुक्ति की गई है और वह एचटी के सभी प्रिंट व डिजिटल ऑपरेशंस की जिम्मेदारी संभालेंगे. मिंट से पहले रंगनाथन बिज़नेस टुडे मैग्जीन के मैनेजिंग एडिटर थे.

शोभना भरतिया का आंतरिक ई-मेल इस प्रकार है–

Dear Colleagues,

I am delighted to announce the appointment of Sukumar Ranganathan, 48, as the Editor-in-chief of Hindustan Times. He will oversee all the print and digital operations of HT and report to me.

Sukumar, who has post graduate degrees in Mathematics and Business Administration and has a graduate degree in Chemical Engineering, has been Editor of Mint, of which he was a co-founder, since late 2008. In his time as editor, Mint has become the most respected and awarded newsroom in the country, winning seven Society of Publishers of Asia awards, and 10 Ramnath Goenka awards. He joined HT Media in 2006 as part of the founding team of Mint. He has previously worked at the India Today Group and The Hindu Business Line.

Sukumar will also take over the leadership of the HT digital newsroom on 23 October.

Bobby, who has, in the short span of 14 months, managed to transform the HT digital newsroom into a truly integrated one, producing high-quality content, will be with the company till 31 October.

The company will shortly make an announcement on the editorial leadership of Mint.

Regards

Shobhana Bhartia

Chairperson and Group Editorial Director

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मजीठिया मामले मे चल रही सुनवाई से भाग खड़ा हुआ एचटी मैनेजमेंट

एचटी ग्रुप मामले को लटकाने के लिए हाईकोर्ट पहुंचा

पटना : हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप में मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किए जाने तथा ग्रेच्युटी के कैलकुलेशन मे भारी गड़बड़ी की शिकायत को लेकर पटना डीएलसी के यहां अलग-अलग दो चरणों मे सुनवाई हुई। 9 सितम्बर को सबसे पहले 11 बजे दिन से ग्रेच्यूटी को लेकर पहली सुनवाई थी मगर मैनेजमेंट भाग खड़ा हुआ। उसके अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने लिखित सूचना दी कि प्रबंधन ने इस मामले को लेकर पटना उच्च न्यायालय में एक रिट दायर की है, इसलिए इस पर सुनवाई रोकी जाय।

11 पत्रकार और गैर पत्रकारों द्वारा दायर मुख्य शिकायतकर्ता होने के नाते मैं दिनेश कुमार सिंह ने जब प्रबंधन के एडवोकेट से पूछा कि अभी सुनवाई शुरू नहीं हुई और आपने कोई जवाब तक फाईल नही किया फिर किस आदेश के खिलाफ कोर्ट गये? कोर्ट का कोई स्टे आर्डर है? तब उन्होंने कहा- नहीं। प्रबंधन के एडवोकेट से यह पूछा गया कि आप किसके एडवोकेट हैं तो उन्होंने कहा कि प्रबंधन की ओर से। फिर पूछा गया कि वकालतनामा कहां है। यहां पार्टी एचटी के चेयरपर्सन शोभना भरतिया हैं, उनके हस्ताक्षर के साथ वकालतनामा के साथ आइए। उन्होंने कहा कि अगली सुनवाई में वे शोभना भरतिया के वकालतनामा के साथ आएंगे, साथ ही कोर्ट का स्टे नहीं ला सके तो सुनवाई अगली तिथि 7 अक्टूबर को जवाब और उसके तमाम कंपलायन्स के साथ आएंगे।

यह विदित है की ग्रेच्यूटी के कैलकुलेशन के लिए उन्हें मजीठिया का फिटमेन्ट चार्ट देना होगा और इसमें गड़बड़ी और किसी तरह की हेराफेरी की सजा बहुत ही सख्त है। साफ है शोभना भरतिया को जेल जाना भी पड़ सकता है। उसी दिन दूसरी सुनवाई पुनः दो बजे से शुरू हुई और प्रबंधन ने यहीं से रटे हुए तोते की तरह बात शुरू की। प्रबंधन ने कहा कि यूनियन को हम नहीं मानते हैं। डीएलसी ने कहा कि इस मामले का निष्पादन हो चुका है, ऐसे में आप पुरानी बातों में समय जाया नहीं कर सकते।

पुनः वही सवाल उठा। शोभना भरतिया मुख्य आरोपी हैं इसलिए आरोपी के बचाव में यदि आप आते हैं तो उनका वकालतनामा साथ लाइए। प्रबंधन के एडवोकेट ने कहा कि वे शोभना भरतिया का वकालतनामा 20 सितम्बर तक जमा करा देंगे। उसके बाद सुनवाई की तिथि तय हो जाएगी। इस बार एचटी ग्रुप के बेतुके तर्क के लिए मशहूर एचआर निदेशक राकेश गौतम कहीं नजर नहीं आए।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट.

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हिंदुस्तान टाइम्स अखबार के प्रधान संपादक बॉबी घोष ने इस्तीफा दिया

हिंदुस्तान टाइम्स समूह से बड़ी खबर आ रही है। एचटी अखबार के प्रधान संपादक बॉबी घोष ने इस्तीफा दे दिया है। प्रबंधन ने उनका त्यागपत्र कुबूल कर लिया है। इस बात की जानकारी ग्रुप की चेयरपर्सन शोभना भरतिया ने एक आंतरिक ई-मेल के जरिए अपने सभी मीडियाकर्मियों को दी। वैसे कहा ये जा रहा है कि घोष कुछ निजी कार्यों की वजह से न्यूयॉर्क वापस लौट रहे हैं। लेकिन बताया जाता है कि घोष के सत्ता विरोधी पत्रकारीय तेवर को एचटी मैनेजमेंट पचा न पाया और उन्हें अलविदा कह दिया। फिलहाल शोभना भरतिया का आंतरिक ई-मेल पढ़िए…

Dear All,

I am deeply disappointed to share the news that Bobby Ghosh will be returning to New York, for personal reasons. 

Bobby has only been with HT Digital Streams Ltd. for 14 months, but in that time he has engineered a dramatic transformation of our various news products. This is reflected not only in our traffic numbers, but in the sheer ambition of our journalism. Under his leadership, HT Newsroom has pursued bold ideas and has addressed some of the most pressing issues of our time. We have come to be recognized as the place for journalistic innovation and enterprise. 

We will miss him, but I am confident that the newsroom leadership team he has nurtured will more than live up to the challenge. 

At my request, Bobby has agreed to stay on for a while, to help in the transition and complete some projects he has already launched. 

There will be time for proper farewells. For now, please join me in wishing Bobby the best in his next adventures. 

Shobhana Bhartia

Chairperson

HT Media 

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एचटी ग्रुप का एचआर डायरेक्टर मजीठिया वेज बोर्ड मामले में डीएलसी के सामने ये क्या बोल गया!

दिनांक 21 अगस्त को मजीठिया वेज लागू करने के सवाल पर बिहार में दो जगहों सुनवाई हुई। फार्म सी के साथ दिए गए क्लेम पर सुनवाई राज्य सरकार के डिप्टी सेक्रेटरी अमरेन्द्र मिश्र ने की। फरवरी में दिए गए आवेदन पर सुनवाई की शुरुआत करने में 5 महीने लग गये। सुप्रीम कोर्ट की मोनेटरिन्ग होने के बाद भी गति नौ दिन चले ढाई कोस की तरह धीमी रही। दूसरा मजीठिया मामलों मे कंप्लेन केस, गलत बयानी और दमनात्मक कार्रवाई पर डीएलसी पटना के यहां सुनवाई थी। दोनों जगहों पर एचटी के एचआर डायरेक्टर राकेश गौतम खुद उपस्थित हुए और बेहूदगी व मूर्खता की सारी सीमा लांघ दी।

एचटी की ओर से हर समय यह कहा जाता रहा कि जवाब देने के लिए समय चाहिए। राकेश गौतम ने खुद जब उपस्थित हुए तो बोले- ”कैसा जवाब? किस कानून के तहत आप (डीएलसी) जवाब मांग रहे हैं? किस कानून के तहत वर्कर्स की ओर से वकील रखे गए हैं?”

राकेश गौतम की ओर से हो रही बेहूदगी के चलते डीएलसी ने कहा कि आप पूरी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल कैसे उठा सकते हैं? डीएलसी ने कहा कि आगे से आप ले-मैन की तरह नहीं बल्कि अपने वकील के साथ आएं।

एचआर डायरेक्टर देश की समस्त कानूनी प्रक्रिया को चुनौती देता रहा। वकील रखने का अधिकार मैनेजमेंट को है, कामगार या पत्रकार को नहीं, ऐसा जताता रहा। यूनियन पर सवाल उठाता रहा। कामगार के वकील और ग्रुप के ऑथराइजेशन पर सवाल उठाता रहा। वो बोलता रहा- ‘वकील किस कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हैं, इसका जवाब चाहिए।’

उसकी मंशा महज इतना जरूर दिख रही थी कि उसे कोई एक आदेश चाहिए था जिस पर वह कोर्ट का स्टे आर्डर लगा सके। कुछ दलाल कोर्ट से काले पैसे की जोड़ पर स्टे आर्डर ला देने का ठेका जो ले रखे हैं।

राकेश गौतम हिन्दुस्तान के संपादक शशि शेखर सहित पूरे लाव लश्कर के साथ 20 अगस्त को ही आ गये थे। पैसा और पैरवी का नंगा नाच रविवार की रात से चलता रहा। पिछले सप्ताह एचटी ग्रुप के सीईओ राजीव वर्मा और संपादक शशि शेखर आदि पटना आकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर श्रम विभाग के ईमानदार अधिकारियों को हटाने का गुहार लगाकर गए थे। सुनते हैं प्रेस में दलाली करने वाले एक खास एजेंट पत्रकार के जरिए पैसे का जमकर वितरण हुआ। वह पैसा जगह पर पहुंचा या नहीं, यह अलग बात है क्योंकि यह एजेंट मिथिला का नामी चोर है।

कल मिलाकर राकेश गौतम संस्थान की नाक पटना से कटा कर गये ही, साथ ही यह बता गए कि अयोग्य प्रबंधन किस तरह लूट मचाकर संस्थान को दिवालिया करने पर उतारू है। अब अगली सुनवाई 4 सितम्बर को श्रम विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी के यहां तथा 9 सितम्बर को डीएलसी के यहां होगी।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट.

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महाभ्रष्टाचारी अरुण मिश्रा ने हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतिया को भेज दिया लीगल नोटिस!

उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन (यूपीएसआईडीसी) के विवादित चीफ इंजीनियर अरुण मिश्रा ने हिंदुस्तान टाइम्स अखबार को लीगल नोटिस भेज दिया है. हिंदुस्तान टाइम्स में कानपुर डेटलाइन से रिपोर्टर हैदर नकवी ने एक रिपोर्ट छापी कि कैसे एक लाख रुपये महीने तनख्वाह पाने वाला एक बाबू (यानि अरुण मिश्रा) देश के शीर्षस्थ वकीलों को अपना मुकदमा लड़ने के लिए हायर करने की क्षमता रखता है. ये शीर्षस्थ वकील हैं सोली सोराबजी, हरीश साल्वे, मुकुल रोहतगी और अन्य.

एचटी में प्रकाशित खबर का शीर्षक यूं है : ”UP babu accused of corruption has Rs 1L pay, hires top lawyers Rohatgi, Sorabjee”

ज्ञात हो कि अरुण मिश्रा को सीबीआई ने 2011 में गिरफ्तार किया था. उस पर 65 से ज्यादा फर्जी बैंक एकाउंट संचालित करने का आरोप था. ऐसा माना जा रहा है कि उसने ब्लैक मनी को ह्वाइट करने के मकसद से विभिन्न शहरों के कई बैंकों में फर्जी बैंक एकाउंट खुलवा रखे थे. आय से अधिक संपत्ति के आरोपी अरुण मिश्रा जब तनख्वाह ही महीने का एक लाख रुपये पाता है तो वह कैसे इतने महंगे वकीलों को फीस देता होगा. इन वकीलों के बारे में सब जानते हैं कि ये एक एक सुनवाई के दौरान उपस्थित होने के लाखों रुपये लेते हैं.  अरुण मिश्रा के खिलाफ ढेर सारे केस हाई कोर्ट और सु्पीम कोर्ट में चल रहे हैं.

अरुण मिश्रा अपने को बचाने के लिए इन टाप वकीलों की सेवाएं ले रहा है. लेकिन इस सेवा लेने से एक सवाल खड़ा हो गया है कि वह इन्हें पैसा कहां से देता होगा? क्या अरुण मिश्रा से केंद्रीय एजेंसियों को यह नहीं पूछना चाहिए कि आखिर वह इतने बड़े बड़े वकीलों को प्रत्येक पेशी पर लाखों रुपये कहां से देता है? ज्ञात हो कि 2011 में सीबीआई ने अरुण मिश्रा को दिल्ली के पृथ्वीराज रोड और देहरादून में संपत्तियों को जब्त किया था. पृथ्वीराज रोड वाली लुटियन जोन इलाके की अकेली प्रापर्टी की कीमत करीब 300 करोड़ रुपये से ज्यादा है. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि यह महाभ्रष्टाचारी अरुण मिश्रा कहां से अपने टाप लेवल के वकीलों को फीस देता होगा. पहले हिंदुस्तान टाइम्स में छपी पूरी खबर पढ़िए… उसके ठीक बाद अरुण मिश्रा द्वारा अखबार को भेजे गए लीगल नोटिस को बांचिए…


एचटी में छपी मूल खबर….

UP babu accused of corruption has Rs 1L pay, hires top lawyers Rohatgi, Sorabjee

A bevy of legal luminaries have appeared multiple times in the Supreme Court and the Allahabad high court individually over the past three years to defend Arun Mishra, chief engineer with the UPSIDC.

Haidar Naqvi

Kanpur, Hindustan Times

What do India’s top lawyers — Soli Sorabjee, Harish Salve, Mukul Rohatgi and others — have in common? They have all defended a mid-level bureaucrat in Uttar Pradesh who is accused of amassing disproportionate assets worth crores and running scores of fake bank accounts.

A bevy of legal luminaries have appeared multiple times in the Supreme Court and the Allahabad high court individually over the past three years to defend Arun Mishra, chief engineer with the UP State Industrial Development Corporation (UPSIDC).

The unusual part — Mishra draws a monthly salary of just over Rs 1 lakh while it is understood that the lawyers often charge a fee ranging between five and twenty lakh per day. Despite repeated attempts, Mishra was not available for comment. A peon at his office said he wasn’t available and it wasn’t clear when he would arrive. The CBI arrested him in 2011 for allegedly operating 65 fake bank accounts with the Punjab National Bank, Dehradun, where he is supposed to have parked black money.

In 2011 also, the Enforcement Directorate (ED) seized his properties on Prithviraj Road in Delhi’s Lutyens Zone, and Dehradun. The Prithviraj Road property, apparently bought in the name of a company called Ajanta Merchants, where his wife and father are listed as directors, is alone worth an estimated Rs 300 crore.

Among his other alleged properties the ED is investigating, are 60 acres of land in UPSIDC Industrial Park on Kursi Road in Barabanki and the Asia School of Engineering and Management on another 52 acres of land. Court records show he and his family have two palatial houses in upscale Gomti Nagar of Lucknow, five properties in Dehradun and 100 acres of land in Barabanki. After the CBI investigation into the Dehradun fake accounts case, the SIT filed an FIR against Mishra over his alleged disproportionate assets in 2011 and the probe is ongoing.

The bureaucrat also faced charges in the 2007 Tronica City scam in Ghaziabad, where officers allegedly gave away more than 400 plots at throwaway prices. Mishra had joined UPSIDC as assistant engineer in 1986 and became chief engineer in 2002 — superseding many others — at a time he held the coveted charge of managing director of the corporation.

In the high court, he was defended by Shanti Bhushan, who apparently would fly down to Allahabad whenever there was a hearing, sources said. Soli Sorabjee, Harish Salve, Abhishek Manu Singhvi, Gopal Subramaniam, Nageshwar Rao, Shanti Bhushan argued against his dismissal, at different stages, in the Supreme Court, which stayed the high court’s order. Mishra rejoined as UPSIDC chief engineer within a month, in September 2014.

Rohatgi, now the country’s attorney general, appeared for Mishra in the SC in the case related to the CBI probe against him. In 2016 Mishra was deprived of his powers as UPSIDC chief engineer and was restricted to oversee development work in nine revenue divisions. He then hired Kapil Sibal to fight his case in the SC.

Salman Khurshid appeared for Mishra in the SC in a case wherein the Allahabad HC had passed different orders relating to his alleged forged mark sheets and engineering degrees.

TAINTED TRACK RECORD

-Arun Mishra, chief engineer with the UP State Industrial Development Corporation, was arrested by the CBI in 2011 for allegedly operating 65 fake bank accounts with the Punjab National Bank, Dehradun, where he is supposed to have parked black money.

-The same year, the Enforcement Directorate seized his properties on Prithviraj Road in Delhi’s Lutyens Zone and Dehradun.

-After the CBI investigation into the Dehradun fake accounts case, the SIT filed an FIR against Mishra over his alleged disproportionate assets in 2011 and the probe is ongoing. The bureaucrat also faced charges in the 2007 Tronica City scam in Ghaziabad where officers allegedly gave away more than 400 plots at throwaway prices.

-In August 2014, Mishra was dismissed from UPSIDC on the orders of Allahabad high court for getting his job on forged degrees. But he moved the Supreme Court challenging the high court’s decision.


अरुण मिश्रा की तरफ से एचटी की मालकिन शोभना भरतिया को संबोधित कर भेजा गया लीगल नोटिस यूं है….

Dated May 13th 2017

Ms Shobhana Bhartia

Chairperson Editorial Director

HT Media Limited

Hindustand Times House

18-20, Kasturba Gandhi Marg

New Delhi 110001, India


अरुण मिश्र की पूरी कुंडली जानने पहचानने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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हिंदुस्तान, आगरा के 11 कर्मियों ने मांगा मजीठिया, श्रम विभाग ने प्रबंधन को लगाई कड़ी फटकार

20 मार्च और 22 मार्च को श्रम विभाग में हुई सुनवाई… हिंदुस्तान अखबार को चलाने वाली कंपनी को बुधवार को एक और तगड़े झटके का सामना करना पड़ा। हिन्दुस्तान की आगरा यूनिट में 11 मीडिया कर्मचारियों ने मजीठिया वेतन की सिफारिशें लागू करने की मांग की तो कंपनी ने कुछ को बाहर का रास्ता दिखाया तो कई के खिलाफ शोषण और प्रताड़ना का अभियान-सा छेड़ दिया। इससे दुखी कर्मचारियों ने श्रम विभाग की ओर रुख किया तो उन्हें बुधवार को बड़ी राहत मिली।

सोमवार को अपर श्रम आयुक्त प्रतिभा तिवारी के सामने दोनों पार्टियां उपस्थित हुईं। कंपनी प्रबंधन की ओर से बड़े अधिकारी आशीष मित्तल उपस्थित हुए। वहीं कर्मचारियों की तरफ से 11 मीडिया कर्मी अपने वकील शरद शुक्ला के साथ मौजूद रहे। गौरतलब है कि शरद शुक्ला यूपी के श्रम मामलों के काफी जानकार अधिवक्ता हैं।

कार्यवाही शुरू हुई तो कंपनी के अधिकारी आशीष मित्तल ने कई कुतर्क पेश किये। लेकिन जानकार अधिवक्ता शरद शुक्ला ने मित्तल के बड़े-बड़े दावों को आधारहीन और फर्जी साबित कर दिया। सुनवाई के दूसरे दिन कंपनी के तर्कों को फर्जी मानते हुए श्रम अधिकारी ने आरसी जारी करने का फैसला सुरक्षित रख लिया। आगरा में 11 कर्मचारियों के लिए कंपनी की ओर से करीब 4 करोड़ की देनदारी बन रही है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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‘हिंदुस्तान’ अखबार से 6 करोड़ वसूलने के लखनऊ के अतिरिक्त श्रमायुक्त के आदेश की कापी को पढ़िए

लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को क़रीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है. लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एमके पाण्डेय ने 6 मार्च को हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए ज़िलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है. इस बाबत खबर तो भड़ास4मीडिया पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है लेकिन आज हम यहां आदेश की पूरी कापी दे रहे हैं… नीचे आर्डर कापी का पहला पेज है….

पेज वन..

अगले पेज को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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कर्मचारी एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड के, वेतन अभी भी दे रही एचएमवीएल

कई कर्मचारियों से त्यागपत्र लेने के बाद भी नहीं दिया गया पुराना बकाया… शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले अखबार हिन्दुस्तान से खबर आ रही है कि यहां कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से इस्तीफा दिलाकर नयी कंपनी में भले ही ज्वाईन करा लिया गया है मगर पटना सहित कई जगह रिजाईन लेने के बाद भी कई कर्मचारियों को उनका पुराना हिसाब नहीं दिया गया है। यही नहीं, हिंदुस्तान अखबार की कंपनी का नाम कल तक हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड था मगर अब एक नयी कंपनी खोलकर अखबार प्रबंधन ने उसका नाम रख दिया एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड। इस नई कंपनी में जबरिया कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से त्यागपत्र दिलाकर 1 जनवरी 2017 से ज्वाईन करा दिया गया है।

पटना से तो ये भी खबर आ रही है कि यहां कई कर्मचारियों से त्याग पत्र लेने के बाद भी उनका पुराना हिसाब एक भी पैसे का नहीं दिया गया। इसके बाद कर्मचारियों को संदेह हो रहा है कि उनकी पुरानी कंपनी का ग्रैच्युटी और फंड के पैसे क्यों नहीं दिये गये जबकि नियमानुसार कर्मचारी अगर त्यागपत्र देता है तो उसे उसके काम के साल के ग्रैच्युटी का भुगतान कंपनी करती है। फिर कंपनी ने ऐसा क्यों नही किया। यही नहीं हिन्दुस्तान के कुछ कर्मचारियों ने सूचना दी है कि कर्मचारियों का ट्रांसफर हिन्दुस्तान मल्टीमीडिया से नयी कंपनी में कर दिया गया है मगर वेतन अब भी पुरानी कंपनी से ही आ रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि दोनों कंपनी एक ही हैं और सिर्फ मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर देने से बचने के लिए नई कंपनी बना ली गयी है क्योंकि माह जनवरी और फरवरी का जो वेतन नई कंपनी के कर्मचारियों के बैंक खाते में आया है, वह एचएमवीएल की ओर से देना बैंक के मैसेज में दशार्या गया है। जाहिर है कि नई कंपनी सिर्फ कागजों में बना ली गई और सारे दायित्व व देनदारियां एचएमवीएल ही वहन करती रहेगी। ये सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और श्रम न्यायालय को धोखा देने के लिए हिन्दुस्तान के प्रबंधन ने रास्ता निकाला है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेज बोर्ड से घबड़ाये हिन्दुस्तान प्रबंधन ने कर्मचारियों से लिया त्यागपत्र

एक नयी कंपनी एच टी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड में कराया गया ज्वाईन

देश के प्रतिष्ठित अखबार हिन्दुस्तान से खबर आ रही है कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अवमानना मामले से घबड़ाये प्रबंधन ने संपादकीय विभाग में कुछ संपादक लेबल के या पुराने लोगों को छोड़कर बाकी सभी से त्यागपत्र ले लिया है और इन सभी को एक नयी कंपनी एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड में ज्वाईन करा दिया गया है। साथ ही जितने भी हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग के कर्मचारी हैं, अधिकांश से जबरी इस्तीफे पर साईन करा लिया गया है।

पहले इस कंपनी का नाम हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड था मगर अब एक नयी कंपनी खोलकर अखबार प्रबंधन ने उसका नाम रख दिया एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड। इस नई कंपनी में जबरिया कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से त्यागपत्र दिलाकर ज्वाईन करा दिया गया है। पता चला है कि दिल्ली, नोएडा, पटना, बनारस, कानपुर, लखनऊ सभी जगह यह कार्रवाई की गई है। इन सभी जगहोंसे खबर आ रही है कि पुरानी कंपनी में अब सिर्फ उन्ही लोगों को रखा गया है जो बहुत पुराने थे। बाकी सभी को नयी कंपनी में ज्वाईन करा दिया गया है। कर्मचारी भी बेचारे कंपनी प्रबंधन के दबाव में साईन करने को मजबूर हो गये।

सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि पुरानी कंपनी का जहां पटना में पता अशोक सिनेमा है वहीं नयी कंपनी का कागज पर कुछ और पता है, मगर काम पुराने पते पर ही हो रहा है। सूत्र तो यहां तक बता रहे हैं कि हिन्दुस्तान प्रबंधन ने एक नया तरकीब खोजा है और वह ये है कि वह यह साबित करना चाहती है कि वह डिजिटल कंपनी से खबरें खरीद रही है और उस डिजिटल कंपनी के कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आते क्योंकि अभी तक वेब और टीवी के कर्मियों को वेज बोर्ड के दायरे में रखा ही नहीं गया है। मजीठिया वेज बोर्ड सिर्फ प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों पर लागू होता है। इस हिंदुस्तान प्रबंधन एक तीर से दो निशाने साध रहा है। नई नियुक्ति करके वह खर्चे बचा रहा है। साथ ही वेज बोर्ड के दायरे से भी कर्मचारियों को बाहर रखने की तरकीब निकाली है।

इस नई डिजिटल कंपनी एच टी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड से खरीदी गयी खबर को एच टी मीडिया वेंचर में मौजूद सात या आठ कर्मचारी ही बना रहे हैं। कंपनी ने जिन लोगों से इस्तीफे पर साईन कराया है उनको मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं दिया। सीधे सीधे कहें तो जिन कर्मचारियों ने इस कागजात पर साईन किया है उनका हाथ कंपनी ने काट लिया है। हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स के कई एडिशनों से ऐसी ही खबरें आ रही हैं जिससे यहां कर्मचारियों में हड़ंकप का माहौल है। हालांकि कानून के कई जानकारों का कहना है कि इसका भी तोड़ है और जल्द ही इस बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी। 

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन रिलायंस से डील को लेकर अपना पक्ष क्यों नहीं रख रहा?

शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिंदुस्तान टाइम्स के मिंट और दिल्ली एडिशन के रिलायंस के मुकेश अम्बानी को बेचे जाने से सम्बंधित डील को लेकर तरह तरह की चर्चाएं हैं. हर कोई ये जानना चाहता है कि क्या वाकई हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन और रिलायंस के बीच कोई डील हुयी है? हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन इस पर कुछ बोल नहीं रहा है और ना ही अपना पक्ष रख रहा है। ना ही इस खबर का खंडन किया जा रहा है। यानि कुछ न कुछ तो शोभना भरतिया और रिलायंस के बीच खिचड़ी पकी है।

हिंदुस्तान के एक संपादक ने अपना पक्ष एक ह्वाट्स ग्रुप में रखा भी लेकिन सिर्फ इस मुद्दे पर कि पांच हजार करोड़ में नहीं बिका यह समूह। आप भी पढ़िए इनका पक्ष…

”हिंदुस्तान टाइम्स मीडिया ग्रुप (एचटी मीडिया और एचएमवीएल) दोनों करीब 65 हजार करोड़ की कंपनियां हैं। इसकी ब्रांड वैल्यु देश के किसी भी मीडिया हाउस के मुकाबले सबसे ज्यादा है। इंटरनेशनल मार्केट में भी एचटी ग्रुप की अच्छी पकड़ है हर साल का रेवेन्यू भी बेहतरीन है। शेयर वैल्यु भी अच्छी है। एचटी मीडिया में मार्केट कैपिटल 1972.54 करोड़ और सालाना रेवेन्यु 2497.73 करोड़ तथा शेयर 85.25 रुपये है। एचएमवीएल में मार्केट कैपिटल 2,007.32 करोड़, रेवेन्यु 926.48 करोड़ सालाना और शेयर 276.90 रुपये है। ऐसी कंपनी क्या 5 हजार करोड़ रुपये में बेची जा सकती है? झूठा प्रचार करने वालों पर तरस आती है।”

धन्यवाद संपादकजी, आपने अपनी बात तो रखी। ये सही बात हो सकती है तो हिंदुस्तान टाइम्स या आप साफ़ साफ़ क्यों नहीं लिखते कि हिंदुस्तान टाइम्स नहीं बिका है और ये खबर पूरी तरह गलत है। या ये क्यों नहीं बताते कि हिंदुस्तान टाइम्स अगर बिका है तो कितने में बिका है। क्या क्या बेचा गया है। सिर्फ प्रिंट राइट्स बिके हैं या कैपिटल भी बिका है। साथ ही हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन अगर अपना ये भी पक्ष रख देता कि हिंदुस्तान टाइम्स बिका है या हिंदुस्तान हिंदी भी और कितने एडिशन बेचे गए हैं तो बात साफ हो जाती।

अगर कुछ एडिशन बेचे गए हैं तो कहां कहां के एडिशन बेचे गये हैं। ये सारी सच्चाई तो हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन ही जानता है और देश के अपने करोड़ो पाठकों और हजारों कर्मियों तक ये सच्चाई हिंदुस्तान टाइम्स ही पहुंचा पायेगा। उम्मीद है हिंदुस्तान टाइम्स इस पर अपना पक्ष रखेगा ताकि भ्रम की स्थिति दूर हो।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
मुंबई
9322411335
shashikantsingh2@gmail.com

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यह शख्स जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया!

Deshpal Singh Panwar : अगर ये खबर सच है कि हिंदुस्तान टाइम्स समूह को मुकेश अंबानी खरीद रहे हैं तो तय है कि अच्छे दिन (स्टाफ के लिए पीएम के वादे जैसे) आने वाले हैं। वैसे इतिहास खुद को दोहराता है… कानाफूसी के मुताबिक एक शख्स जो इस समूह के हिंदी अखबार में चोटी पर है वो जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया।

बनारस के ‘आज’ से लेकर जागरण के आगरा संस्करण का किस्सा हो या फिर वो अखबार जिसके मालिकों की एकता की मिसाल दी जाती थी और एक दिन ऐसा आया कि भाई-भाई अलग हो गए, बंटवारा हो गया, पत्रकारिता के लिए सबसे दुखद दिन था वो, कम से कम हम जैसों के लिए। अगर ये बात सच है तो इतने पर भी इनको चैन पड़ जाता तो खैरियत थी, एक भाई को केस तक में उलझवा दिया, उसके बाद जो हुआ वो भगवान ना करे किसी के साथ हो, वो सब जानते हैं…लिखते हुए भी दुख होता है..

अब अगर हिंदुस्तान समूह के बिकने की बात है तो कानाफूसी के मुताबिक इस हाऊस को भी लगा ही दिया ठिकाने। अगला नंबर मुकेश अंबानी का होगा अगर उन्होंने इन्हें रखा तो, वैसे ये जुगाड़ कर लेंगे, पीएम की तरह बोलने की ही तो खाते हैं.दुख किसी के बिकने और खुशी किसी के खरीदने की नहीं है हां स्टाफ का कुछ बुरा ना हो बस यही ख्वाहिश है। वेज बोरड की वजह से बिक रहा है ये मैं मानने को तैयार नहीं हूं। जो हो अच्छा हो..

कई अखबारों में संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार देशपाल सिंह पंवार की फेसबुक वॉल से.

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मुंबई के बाद अब दिल्ली एचटी को भी रिलायंस को बेचे जाने की चर्चा

देश भर के मीडियामालिकों में हड़कंप, कहीं मुफ्त में ना अखबार बांटने लगे रिलायंस…

देश के सबसे बड़े उद्योगपति रिलायंस वाले मुकेश अंबानी द्वारा मुंबई में एचटी ग्रुप के अखबार मिन्ट और फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स खरीदने की चर्चा के बाद अब यह चर्चा भी आज तेजी से देश भर के मीडियाजगत में फैली है कि मुकेश अंबानी ने दिल्ली में भी हिन्दुस्तान टाईम्स के संस्करण को खरीद लिया है। हालांकि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। हिन्दुस्तान टाईम्स के दिल्ली संस्करण में कर्मचारियों के बीच आज इस बात की चर्चा तेजी से फैली कि रिलायंस प्रबंधन और हिन्दुस्तान टाईम्स प्रबंधन के बीच कोलकाता में इस खरीदारी को लेकर बातचीत हुयी जो लगभग सफल रही और जल्द ही हिन्दुस्तान टाईम्स पर रिलायंस का कब्जा होगा।

रिलायंस के प्रिंट मीडिया में आने और हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की चर्चा के बाद आज देश भर के नामी गिरामी अखबार मालिकों में हड़कंप मच गया। सभी बड़े अखबार मालिकों में इस बात का डर सताने लगा है कि कहीं जिस तरह रिलायंस ने जियो को लांच कर लोगों को मुफ्त में मोबाईल सेवा प्रदान कर दिया या रिलायंस के आने के बाद जिस तरह मोबाईल फोन जगत में रिलायंस का सस्ते दर का मोबाईल छा गया कहीं इसी तरह प्रिंट मीडिया में भी आने के बाद रिलायंस लोगों को मुफ्त अखबार ना बांटने लगे। ऐसे में तो पूरा प्रिंट मीडिया का बाजार उसके कब्जे में चला जायेगा।

यही नहीं सबसे ज्यादा खौफजदा टाईम्स समूह है। उसे लग रहा है कि अगर रिलायंस हिन्दुस्तान टाईम्स को मुफ्त में बांटने लगेगा या कोई लुभावना स्कीम लेकर आ गया तो उसके सबसे ज्यादा ग्राहक टूटेंगे और उसके व्यापार पर जबरदस्त असर पड़ेगा। आज देश भर के मीडियाकर्मियों में रिलायंस द्वारा मुंबई में मिंट तथा फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की खबर पर जमकर चर्चा हुयी।

कुछ लोगों ने जहां इस फैसले को खुशी भरा बताया वहीं कुछ इस बात से भी परेशान थे कि इस खरीदारी में क्या हिंदी वाले हिन्दुस्तान समाचार पत्र के संस्करण भी खरीदे गये हैं। फिलहाल हिन्दुस्तान के किसी भी संस्करण के रिलायंस द्वारा खरीदे जाने की कोई जानकारी नहीं मिली है। रिलायंस के प्रिंट मीडिया जगत में आने से छोटे और मझोले अखबार मालिकों में भी भय का माहौल है। उनको लग रहा है कि रिलायंस उनके बाजार को भी नुकसान पहुंचायेगा। फिलहाल माना जा रहा है कि रिलायंस जल्द ही अपना पूरा पत्ता हिन्दुस्तान टाईम्स को लेकर खोलेगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्स्पर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५


पत्रकार Praveen Dixit ने इस प्रकरण के बारे में एफबी पर जो कमेंट किया है, वह इस प्रकार है…

”The silent deal… Last week, HT chairperson Shobhana Bhartiya met up with Reliance supreme Mukesh Ambani. The idea was to sell Mint and eventually, the flagship, Hindustan Times. The second meeting between the merchant bankers in faraway Kolkata and the deal further cemented for Mint. Mint staffers in Mumbai have already moved into the office of CNBCNews18, some fired. This budget, the First Post and CNBC feeds went to Mint Live, an indication that things were working out to mutual benefit.”


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