राजस्थान : मजीठिया संघर्ष में कूदे कौंसिल ऑफ जर्नलिस्ट्स अध्यक्ष

राजस्थान में मजीठिया वेज बोर्ड के लिए संघर्ष कर रहे अखबारों के पत्रकारो के साथ कौंसिल ऑफ जर्नलिस्ट्स ने भी संघर्ष का ऐलान कर दिया है. जयपुर में मंगलवार को कौंसिल ऑफ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष और टीवी पत्रकार अनिल त्रिवेदी के नेतृत्व में पत्रकारो का प्रतिनिधिमंडल श्रम आयुक्त राजस्थान रजत मिश्रा से मिला और उन्हे 4 पेज का ज्ञापन सौंपा. 

अनिल त्रिवेदी ने बताया कि कौंसिल ऑफ जर्नलिस्ट्स की कार्यकारिणी ने निर्णय लेकर उन्हें अधिकृत किया है कि वे राजस्थान में मजीठिया वेज बोर्ड के लिए संघर्ष कर रहे दैनिक भास्कर , राजस्थान पत्रिका के पत्रकारों  के साथ मिलकर श्रम विभाग राजस्थान सरकार और अखबारों पर दबाव बनाएं. 

ज्ञापन में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार पत्रकारों को वेतन का लाभ देने और सर्वोच्च न्यायालय के 28 अप्रैल 2015 के आदेश की पालना की मांग की गई है. त्रिवेदी ने श्रम आयुक्त को आगाह करते हुए कहा कि  भारतीय श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम की धारा 17 बी  के तहत  अखबारों के कार्यालयों में जाकर पत्रकारों को मिल रहे वेतन की जांच करें. ज्ञापन में श्रम विभाग की सहायता के लिए अखबार दफ्तरों से पूछे जाने वालों सवालों की प्रश्नावली भी सौंपी गई. 

17 वर्षों से पत्रकारिता में अपनी सेवाएं दे रहे और जी ओ न्यूज चैनल के समाचार निदेशक अनिल त्रिवेदी हाल ही में कौंसिल ऑफ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं. त्रिवेदी राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ में प्रदेश सचिव के पद पर सफलतापूर्वक जिम्मेदारी निभा चुके हैं.

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अजमेर ‘पत्रिका’ में अहंकारी संपादक का आतंक, दुखद रवैये से स्टॉफ परेशान

राजस्थान पत्रिका अजमेर में जब से उपेंद्र शर्मा को संपादक बनाया गया है, स्टाफ पर मुसीबत टूट पड़ी है। जूनियर रिपोर्टर से सीधे संपादक की कुर्सी पर बैठे उपेंद्र शर्मा किसी को कुछ नहीं समझ रहे। उनसे पहले यहां ज्ञानेश उपाध्याय जैसे धीर-गंभीर और विद्वान संपादक थे। उपाध्याय ने अपने छोटे से कार्यकाल में सभी को मान-सम्मान दिया। लेकिन उपेंद्र शर्मा तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। 

वो आए दिन डेस्क या रिपोर्टिंग के किसी भी साथी को बिना बात प्रताडि़त करते रहते हैं। जो उनकी तानाशाही का विरोध करते हैं, उसके वो साइड लाइन कर देते हैं। उन्होंने सबसे पहले हिन्दी के विद्वान और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र गुप्ता को शिकार बनाया। गुप्ता ने उनकी बचकानी बातों का विरोध किया तो उनका अजमेर से हुबली तबादला करवाकर अन्य कर्मचारियों के खौफ पैदा कर दिया। ये करके उनका अन्य कर्मचारियों को साफ मैसेज था कि जो मुझसे टकराएगा वो यहां नहीं रह पाएगा। 

उनको दूसरा शिकार बने युवा और उत्साही रिपोर्टर भूपेंद्र सिंह। विद्युत निगम और राजस्व मंडल की राज्य स्तरीय विभाग पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले भूपेंद्र सिंह अपनी सपाट बयानी के लिए विख्यात है, लेकिन उनकी ईमानदारी और काबिलियत के कारण तमात संपादकों ने उनका सम्मान किया। मगर उपेंद्र शर्मा ने आते ही उन्हें प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। बताते हैं कि उपेंद्र और भूपेंद्र दोनों जयपुर में रिपोर्टिंग करते थे। उसी दौरान किसी मशले पर दोनों के बीच कहासुनी हुई थी, उसका खामियाजा अब उसे भुगतना पड़ रहा है। 

पिछले दिनों उपेंद्र शर्मा ने भूपेंद्र सिंह का तबादला नागौर जिले के कुचामन ब्यूरो में कर दिया। इससे भूपेंद्र सिंह परेशान हो गए। वे पत्नी और तीन साल के बेटे के साथ अजमेर में रहते हैं और उन्होंने कुछ दिन पहले ही अजमेर के एक स्कूल में बेटे को एडमिशन कराया था। तबादले से परेशान भूपेंद्र सिंह गुहार करने उपेंद्र शर्मा के पास पहुंचे और कहा कि उनकी पत्नी और बेटा अकेले अजमेर में नहीं रह पाएंगे। अभी उन्होंने २० हजार रुपए एडमिशन पर खर्च किए हैं। ऐसे में वे परिवार को कुचामन भी नहीं ले जा सकते। तमाम मिन्नतों के बावजूद संपादक ने उनकी गुहार नहीं मानी। आखिरकार हताश और परेशान भूपेंद्र सिंह ने जयपुर जाकर गु्रप एडिटर भुवनेश जैन के सामने मसले को रखा और अपनी परेशानी बताई। इस पर उनका तबादला रोक दिया गया। इससे संपादक उपेंद्र शर्मा और खफा हो गए। उन्होंने भूपेंद्र सिंह को रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्क पर लगा दिया। 

संपादकीय विभाग के अन्य लोग भी संपादक के तुगलकी फैसलों और व्यवहार से परेशान है। एक परेशान डेस्ककर्मी ने बताया कि संपादक उपेंद्र शर्मा रोज शाम को कुछ रिपोर्टरों को बुलाकार अपना दरबार लगाते हैं और करीब एक घंटा अपनी जयपुर की रिपोर्टिंग को लेकर शेखी बगारते हैं। मबजूरी में रिपोर्टरों को उनकी तारीफों के पुल बांधने पड़ते हैँ। उसके बाद उपेंद्र शर्मा डिनर करने घर चले जाते हैं, फिर राते तो दस बजे वापस ऑफिस आते हैं। आते ही थोड़ी देर बाद दो रिपार्टरों के साथ टहलने निकल जाते हैं। उनकी इन हरकतों से रिपोर्टरों के कामकाज पर प्रभाव पड़ रहा है और अक्सर डेस्क को खबरों लेट मिल रही है, इससे इसलिए एडिशन भी समय से नहीं छूट रहा है। संपादक चटौरेपन को लेकर भी स्टाफ परेशान है। वो आए दिन किसी ना किसी से दावत की फरमाइश भी कर बैठते हैं। अब बेचारे पत्रकार को जैसे-तैसे उनकी फरमाइश पूरी करनी पड़ती है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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Rajasthan Government Appoints 39 Special Labour Inspectors to Enquire the Majithia Status

Ram P. Yadav (Secy. IFWJ) : After Delhi and Madhya Pradesh, the Rajasthan Government has appointed the Special Labour Inspectors in compliance with the direction of the Hon’ble Supreme Court of India. The Government has appointed 39 Labour Inspectors of different ranks under Section 17B of the Working Journalists Act.

All Additional Labour Commissioners, all Joint Labour Commissioners, all Deputy Labour Commissioners and all Labour Welfare Officers posted at the headquarters in Jaipur have been tasked to monitor the marathon exercise of investigation about the status of the implantation of the Majithia Award. In a significant development, the State Government has appointed one Labour Inspector for each district of the state. We take this opportunity to compliment the State government.

This order for the appointment the officials has been passed by the Hon’ble Governor of Rajasthan and released by Shri Dhan Raj Sharma, the Additional Labour Commissioner and Ex-Officio Joint Secretary to the Administration.

There is no doubt that the proprietors of the newspapers who have been dodging the implementation of all previous Wage Boards will not find any escape route this time. 

However, it is doubted that the managements may cook up fake balance sheet or the number of employees. The newspapers from Rajasthan particularly Rajasthan Patrika and Dainik Bhaskar are notorious for circumventing the laws.

Right from the time the employees of the Rajasthan Patrika and Dainik Bhaskar have filed their Contempt Petitions vide nos. 572/2014, 103/2015, 105/2015, 283/2015, 101/2015, 104/2015, 106/2015, 107/2015, 286/2015 through Advocate Parmanand Pandey, the owners of newspapers have resorted to large-scale victimization of employees. It may sound strange but it is a fact that both the newspapers have arbitrarily terminated the services of many journalists and non-journalists. It is the height of the shamelessness on the part of the newspaper proprietors that they have not observed even the semblance of the basic principles of natural justice while terminating the employees. 

It is shocking that some of the employees who have been working as clerks are some other capacity have been transferred to far of places like Kottayam, Thiruananthpuram, Jagdalpur and Ranchi etc. where these newspapers even do not have any offices.

An employee of Bhilwara has been transferred to Dhanbad, which amply demonstrates the perversion and the malafide of the proprietors towards their own employees who have given the best of their life for the progress of the newspaper.

It is expected that these Special Inspectors, particularly the top officials of the Labour Department, will take care of artifice and ingenuity of the proprietors, out to frustrate their very exercise, they are going to undertake.  If the proprietors of the newspapers are not caught and fittingly punished; then there will be no hope for justice for employees. Therefore, to maintain the faith in justice, fair play and administrative capacity of the Government, the Labour Officials will have to play the role with all sincerity. This will certainly restore the confidence of the employees and will prove a deterrent for the violators of the law.

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एक और खैरलांजी : दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा राजस्थान का नागौर जिला

राजस्थान की राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर  जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है. विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है ,उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है ,यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है .ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है .क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है ? वैसे तो असम्भव है ,लेकिन यह संभव हो रही है ,यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से …

नागौर जिले के बसवानी गाँव में पिछले महीने ही एक दलित परिवार के झौपड़े में दबंग जाटों ने आग लगा दी ,जिससे एक बुजुर्ग दलित महिला वहीँ जल कर राख हो गयी और दो अन्य लोग बुरी तरह से जल गए ,जिन्हें जोधपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया ,इसी जिले के लंगोड़ गाँव में एक दलित को जिंदा दफनाने का मामला सामने आया है.मुंडासर में एक दलित औरत को घसीट कर ट्रेक्टर के गर्म सायलेंसर से दागा गया और हिरडोदा गाँव में एक दलित दुल्हे को घोड़ी पर से नीचे पटक कर जान से मरने की कोशिश की गयी .राजस्थान का यह जाटलेंड जिस तरह की अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहा है ,उसके समक्ष तो खाप पंचायतों के तुगलकी फ़रमान भी कहीं नहीं टिकते है ,ऐसा लगता है कि इस इलाके में कानून का राज नहीं ,बल्कि जाट नामक किसी कबीले का कबीलाई कानून चलता है,जिसमे भीड़ का हुकुम ही न्याय है और आवारा भीड़ द्वारा किये गए कृत्य ही विधान है .

नागौर जिले की तहसील मेड़ता सिटी का निकटवर्ती गाँव है डांगावास ,जहाँ पर 150 दलित परिवार निवास करते है और यहाँ 1600 परिवार जाट समुदाय के है ,तहसील मुख्यालय से मात्र 2 किलोमीटर दुरी पर स्थित है डांगावास ,..जी हाँ ,यह वही डांगावास गाँव है ,जहाँ पिछले एक साल में  चार दलित हत्याकांड हो चुके है ,जिसमे सबसे भयानक हाल ही में हुआ है. एक साल पहले यहाँ के दबंग जाटों ने मोहन लाल मेघवाल के निर्दोष बेटे की जान ले ली थी ,मामला गाँव में ही ख़त्म कर दिया गया ,उसके बाद 6 माह पहले मदन पुत्र गबरू मेघवाल के पाँव तोड़ दिये गए ,4 माह पहले सम्पत मेघवाल को जान से ख़त्म कर दिया गया ,इन सभी घटनाओं को आपसी समझाईश अथवा डरा धमका कर रफा दफा कर दिया गया .पुलिस ने भी कोई कार्यवाही नहीं की .

स्थानीय दलितों का कहना है कि बसवानी में दलित महिला को जिंदा जलाने के आरोपी पकडे नहीं गए और शेष जगहों की गंभीर घटनाओं में भी कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुयी क्योंकि सभी घटनाओं के मुख्य आरोपी प्रभावशाली जाट समुदाय के लोग है .यहाँ पर थानेदार भी उनके है ,तहसीलदार भी उनके ही और राजनेता भी उन्हीं की कौम के है ,फिर किसकी बिसात जो वे जाटों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाये ? इस तरह मिलीभगत से बर्षों से दमन का यह चक्र जारी है ,कोई आवाज़ नहीं उठा सकता है ,अगर भूले भटके प्रतिरोध की आवाज़ उठ भी जाती है तो उसे खामोश कर दिया जाता है .

एक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राजस्थान काश्तकारी कानून की धारा 42 (बी ) के होते हुए भी जिले में दलितों की हजारों बीघा जमीन पर दबंग जाट समुदाय के भूमाफियाओं ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है.यह कब्जे फर्जी गिरवी करारों,झूठे बेचाननामों और धौंस पट्टी के चलते किये गए है ,जब भी कोई दलित अपने भूमि अधिकार की मांग करता है ,तो दबंगों की दबंगई पूरी नंगई के साथ शुरू हो जाती है.ऐसा ही एक जमीन का मसला दलित अत्याचारों के लिए बदनाम डांगावास गाँव में विगत 30 वर्षों से कोर्ट में जेरे ट्रायल था ,हुआ यह कि बस्ता राम नामक मेघवाल दलित की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन कभी मात्र 1500 रूपये में इस शर्त पर गिरवी रखी गयी कि चिमना राम जाट उसमे से फसल लेगा और मूल रकम का ब्याज़ नहीं लिया जायेगा ,बाद में जब भी दलित बस्ता राम सक्षम होगा तो वह अपनी जमीन गिरवी से छुडवा लेगा .बस्ताराम जब इस स्थिति में आया कि वह मूल रकम दे कर अपनी जमीन छुडवा सकें ,तब तक चिमना राम जाट तथा उसके पुत्रों ओमाराम और काना राम के मन में लालच आ गया,जमीन कीमती हो गयी ,उन्होंने जमीन हड़पने की सोच ली और दलितों को जमीन लौटने से मना कर दिया .पहले दलितों ने याचना की ,फिर प्रेम से गाँव के सामने अपना दुखड़ा रखा ,मगर जिद्दी जाट परिवार नहीं माना ,मजबूरन दलित बस्ता राम को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी .करीब तीस साल पहले मामला मेड़ता कोर्ट में पंहुचा ,बस्ताराम तो न्याय मिलने से पहले ही गुजर गया ,बाद में उसके दत्तक पुत्र रतनाराम ने जमीन की यह जंग जारी रखी और अपने पक्ष में फैसला प्राप्त कर लिया .वर्ष 2006 में उक्त भूमि का नामान्तरकरण रतना राम के नाम पर दर्ज हो गया तथा हाल ही में में कोर्ट का फैसला भी दलित खातेदार रतना राम के पक्ष में आ गया .इसके बाद रतना राम अपनी जमीन पर एक पक्का मकान और एक कच्चा झौपडा बना कर परिवार सहित रहने लग गया ,लेकिन इसी बीच 21 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के पुत्र कानाराम तथा ओमाराम ने इस जमीन पर जबरदस्ती तालाब खोदना शुरू कर दिया और खेजड़ी के वृक्ष काट लिये.रत्ना राम ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाई तो जाट परिवार के लोगों ने ना केवल उसे जातिगत रूप से अपमानित किया बल्कि उसे तथा उसके परिवार को जान से मार देने कि धमकी भी दी गयी .मजबूरन दलित रतना राम मेड़ता थाने पंहुचा और जाटों के खिलाफ रिपोर्ट दे कर कार्यवाही की मांग की.मगर थानेदार जी चूँकि जाट समुदाय से ताल्लुक रखते है सो उन्होंने रतनाराम की शिकयत पर कोई कार्यवाही नहीं की ,दोनों पक्षों के मध्य कुछ ना कुछ चलता रहा .

12 मई को जाटों ने एक पंचायत डांगावास में बुलाने का निश्चय किया ,मगर रतना राम और उसके भाई पांचाराम के गाँव में नहीं होने के कारण यह स्थगित कर दी गयी ,बाद में 14 मई को फिर से जाट पंचायत बैठी ,इस बार आर पार का फैसला करना ही पंचायत का उद्देश्य था ,अंततः एकतरफा फ़रमान जारी हुआ  कि दलितों को किसी भी कीमत पर उस जमीन से खदेड़ना है  ,चाहे जान देनी पड़े या लेनी पड़े ,दूसरी तरफ पंचायत होने की सुचना पा कर दलित अपने को बुलाये जाने का इंतजार करते हुये अपने खेत पर स्थित मकान पर ही मौजूद रहे ,अचानक उन्होंने देखा कि सैंकड़ों की तादाद में जाट लोग हाथों में लाठियां ,लौहे के सरिये और बंदूके लिये वहां आ धमके है और मुट्ठी भर दलितों को चारों तरफ से घेर कर मारने लगे ,उन्होंने साथ लाये ट्रेक्टरों से मकान तोडना भी चालू कर दिया .

लाठियों और सरियों से जब दलितों को मारा जा रहा था ,इसी दौरान किसी ने रतनाराम मेघवाल के बेटे मुन्नाराम को निशाना बना कर  फ़ायर कर दिया ,लेकिन उसी वक्त किसी और ने मुन्ना राम के सिर के पीछे की और लोहे के सरिये से भी वार कर दिया ,जिससे मुन्नाराम  गिर पड़ा और गोली रामपाल गोस्वामी को जा कर लग गयी ,जो कि जाटों की भीड़ के साथ ही आया हुआ था .गोस्वामी की बेवजह हत्या के बाद जाट और भी उग्र हो गये ,उन्होंने मानवता की सारी हदें पार करते हए वहां मौजूद दलितों का निर्मम नरसंहार करना शुरू कर दिया.

ट्रेक्टर जो कि खेतों में चलते है और फसलों को बोने के काम आते है ,वे निरीह ,निहत्थे दलितों पर चलने लगे ,पूरी बेरहमी से जाट समुदाय की यह भीड़ दलितों को कुचल रही थी ,तीन दलितों को ट्रेक्टरों से कुचल कुचल कर वहीँ मार डाला गया .इन बेमौत मारे गए दलितों में श्रमिक नेता पोकर राम भी था ,जो उस दिन अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए अपने भाई गणपत मेघवाल के साथ वहां आया हुआ था .जालिमों ने पोकरराम के साथ बहुत बुरा सलूक किया ,उस पर ट्रेक्टर चढाने के बाद उसका लिंग नोंच लिया गया तथा आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल कर ऑंखें फोड़ दी गयी .महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी और उनके गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गयी .तीन लोग मारे गए ,14 लोगों के हाथ पांव तोड़ दिये गए ,एक ट्रेक्टर ट्रोली तथा चार मोटर साईकलें जला कर राख कर दी गयी ,एक पक्का मकान जमींदोज कर दिया गया और कच्चे झौपड़े को आग के हवाले कर दिया गया .जो भी समान वहां था ,जालिम उसे लूट ले गए .इस तरह तकरीबन एक घंटा मौत के तांडव चलता रहा ,लेकिन मात्र 4 किलोमीटर दूरी पर मौजूद पुलिस सब कुछ घटित हो जाने के बाद पंहुची और घायलों को अस्पताल पंहुचाने के लिए एम्बुलेंस बुलवाई  ,जिसे भी रोकने की कोशिश जाटों की उग्र भीड़ ने की ,इतना ही नहीं बल्कि जब गंभीर घायलों को मेड़ता के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां भी पुलिस तथा प्रशासन की मौजूदगी में ही धावा बोलकर बचे हुए दलितों को भी खत्म करने की कोशिश की गयी .

ऐसी दरिंदगी जो कि वास्तव में एक पूर्वनियोजित नरसंहार ही था ,इसे नागौर की पुलिस और प्रशासन जमीन के विवाद में दो पक्षों की ख़ूनी जंग करार दे कर दलित अत्याचार की इतनी गंभीर और लौमहर्षक  वारदात को कमतर करने की कोशिश कर रही है .पुलिस ने दलितों की और से अर्जुन राम के बयान के आधार पर एक कमजोर सी एफआईआर दर्ज की है ,जिसमे पोकरराम के साथ की गयी इतनी अमानवीय क्रूरता का कोई ज़िक्र तक नहीं है और ना ही महिलाओं के साथ हुयी भयावह यौन हिंसा के बारे में एक भी शब्द लिखा गया है. सब कुछ पूर्वनियोजित था ,भीड़ को इकट्टा करने से लेकर रामपाल गोस्वामी को गोली मारने तक की पूरी पटकथा पहले से ही तैयार थी ,ताकि उसकी आड़ में दलितों का समूल नाश किया जा सके . कुछ हद तक वो यह करने में कामयाब भी रहे ,उन्होंने बोलने वाले और संघर्ष कर सकने वाले समझदार घर के मुखिया दलितों को मौके पर ही मार डाला . बाकी बचे हुए तमाम दलित स्त्री पुरुषों के हाथ और पांव तोड़ दिये जो ज़िन्दगी भर अपाहिज़ की भांति जीने को अभिशप्त रहेंगे ,दलित महिलाओं ने जो सहा वह तो बर्दाश्त के बाहर है तथा उसकी बात करना ही पीड़ाजनक है ,इनमे से कुछ अपने शेष जीवन में सामान्य दाम्पत्य जीवन जीने के काबिल भी नहीं रही ,इससे भी भयानक साज़िश यह है कि अगर ये लोग किसी तरह जिंदा बच कर हिम्मत करके वापस डांगावास लौट भी गये तो रामपाल गोस्वामी की हत्या का मुकदमा उनकी प्रतीक्षा कर रहा है ,यानि कि बाकी बचा जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा ,अब आप ही सोचिये ये दलित कभी वापस उस जमीन पर जा पाएंगे .क्या इनको जीते जी कभी न्याय हासिल हो पायेगा ? आज के हालात में तो यह असंभव नज़र आता है .

कुछ दलित एवं मानव अधिकार जन संगठन इस नरसंहार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे है ,मगर उनकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी यह एक प्रश्न है .सूबे की भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है ,कोई  भी ज़िम्मेदार सरकार का नुमाइंदा घटना के चौथे दिन तक ना तो डांगावास पंहुचा था और ना ही घायलों की कुशलक्षेम जानने आया .अब जबकि मामले ने तूल पकड़ लिया है तब सरकार की नींद खुली है ,फिर भी मात्र पांच किलोमीटर दूर रहने वाला स्थानीय भाजपा विधायक सुखराम आज तक अपने ही समुदाय के लोगों के दुःख को जानने नहीं पंहुचा .नागौर जिले में एक जाति का जातीय आतंकवाद इस कदर हावी है कि कोई भी उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता है .दूसरी और जाट समुदाय के छात्र नेता ,कथित समाजसेवक और छुटभैये नेता इस हत्याकाण्ड के लिए एक दुसरे को सोशल मीडिया पर बधाईयाँ दे रहे है तथा कह रहे है कि आरक्षण तथा अजा जजा कानून की वजह से सिर पर चढ़ गए इन दलितों को औकात बतानी जरुरी थी ,वीर तेज़पुत्रों ने दलित पुरुषों को कुचल कुचल कर मारा तथा उनके आँखों में जलती लकड़ियाँ घुसेडी और उनकी नीच औरतों को रगड़ रगड़ कर मारा तथा ऐसी हालत की कि वे भविष्य में कोई और दलित पैदा ही नहीं कर सकें .इन अपमानजनक टिप्पणियों के बारे में मेड़ता थाने में दलित समुदाय की तरफ से एफ आई आर भी दर्ज करवाई गयी है ,जिस पर कार्यवाही का इंतजार है.

अगर डांगावास नरसंहार की निष्पक्ष जाँच करवानी है तो इस पूरे मामले को सी बी आई को सौपना होगा ,क्योंकि अभी तक तो जाँच अधिकारी भी जाट लगा कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि वह कितनी संवेदनहीन है ,आखिर जिन  अधिकारियों के सामने जाटों ने यह तांडव किया और उसकी इसमें मूक सहमति रही ,जिसने दलितों की कमजोर एफ आई आर दर्ज की और दलितों को फ़साने के लिए जवाबी मामला दर्ज किया तथा पोस्टमार्टम से लेकर मेडिकल रिपोर्ट्स तक सब मैनेज किया  ,उन्हीं लोगों के हाथ में जाँच दे कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया कि उनकी नज़र में भी दलितों की औकात कितनी है .

इतना सब कुछ होने के बाद भी दलित ख़ामोश है ,यह आश्चर्यजनक बात है .कहीं कोई भी हलचल नहीं है ,मेघसेनाएं ,दलित पैंथर्स ,दलित सेनाएं ,मेघवाल महासभाएं सब कौनसे दड़बे में छुपी हुयी है ? अगर इस नरसंहार पर भी दलित संगठन नहीं बोले तब तो कल हर बस्ती में डांगावास होगा ,हर घर आग के हवाले होगा ,हर दलित कुचला जायेगा और हर दलित स्त्री यौन हिंसा की शिकार होगी ,हर गाँव बथानी टोला होगा ,कुम्हेर होगा ,लक्ष्मणपुर बाथे और भगाना होगा .इस कांड की भयावहता और वहशीपन देख कर पूंछने का मन करता है कि क्या यह एक और खैरलांजी नहीं है ? अगर हाँ तो हमारी मरी हुयी चेतना कब पुनर्जीवित होगी या हम मुर्दा कौमों की भांति रहेंगे अथवा जिंदा लाशें बन कर धरती का बोझ बने रहेंगे .अगर हम दर्द से भरी इस दुनिया को बदल देना चाहते है तो हमें सडकों पर उतरना होगा और तब तक चिल्लाना होगा जब तक कि डांगावास के अपराधियों को सजा नहीं मिल जाये और एक एक पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाये ,उस दिन के इंतजार में हमें रोज़ रोज़ लड़ना है ,कदम कदम पर लड़ना है और हर दिन मरना है ,ताकि हमारी भावी पीढियां आराम से ,सम्मान और स्वाभिमान से जी सके .

राजस्थान में दलित-आदिवासी और घुमन्तु समुदाय के प्रश्नों पर संघर्षरत लेखक भंवर मेघवंशी से संपर्क : 9460325948, ईमेल : bhanwarmeghwanshi@gmail.com

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राजस्थान में दैनिक नवज्‍योति ने एरियर बांटना शुरू किया

राजस्‍थान के पांच शहरों जयपुर, अजमेर, कोटा, जोधपुर और उदयपुर से प्रकाशित दैनिक नवज्‍योति समाचार पत्र ने अपने कर्मचारियों को पिछला बकाया एरियर की राशि का भुगतान करना शुरू कर दिया है। प्रबंधकों और कर्मचारियों के बीच हुए समझौते के अनुसार एरियर का भुगतान चार किश्‍तों में किया जाना है। 

राजस्‍थान में दैनिक नवज्‍योति एक मात्र समाचार पत्र है, जिसने अपने कर्मचारियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतन देना शुरू किया है। सभी स्‍थाई कर्मचारियों का एक अप्रैल से नए वेतनमान के अनुसार वेतन दिया जा रहा है। दूसरी ओर राजस्‍थान पत्रिका और दैनिक भास्‍कर के प्रबंधक अभी भी मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू करने में आना कानी कर रहे हैं। आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान की मांग करने वाले कर्मचारियों को दोनों बड़े समाचार पत्रों के प्रबंधक या तो नौकरी से निकाल रहे हैं या दूसरे राज्‍यों में सैकड़ों किलोमीटर दूर बदलियां कर रहे हैं। राजस्‍थान सरकार इस तरफ कोई ध्‍यान नहीं दे रही है। 

यह सूचना एलएल शर्मा ने मुहैया कराई है. एलएल शर्मा से llsharma65@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है 

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बिना धूप, बिना छाया के भास्कर की माया, झूठी खबर से हरियाणा में खूब भद्द पिटी

एक समय हरियाणा में दैनिक भास्कर की अपनी अलग पहचान थी। सच्ची व विश्वसनीय खबरों के लिए भास्कर का नाम लिया जाता था। परन्तु मीडिया संस्थानों से थोक के भाव निकले पत्रकारों के रूप में सस्ते मजदूर मिलने से भास्कर ने अपनी विश्वसनीयता भी खो दी है।

…और ये रही वो खबर

पिछले दिनों राजस्थान के एक अखबार में समाचार प्रकाशित हुआ था कि इस बार मात्र 188 दिन स्कूल लगेगा। वह समाचार स्कूलों से संबंधित होने के चलते हरियाणा के कुछ अध्यापकों के व्हाट्सएप ग्रुप व फेसबुक पर घूमने लगा। रोहतक भास्कर के एक पत्रकार ने शायद उस समाचार को व्हाट्सएप या फेसबुक पर देख लिया होगा। उसने बिना सोचे समझे उस समाचार को उठाकर रोहतक डेटलाइन से भास्कर के पाठकों के लिए परोस दिया। उसने बाकायदा रोहतक के जिला शिक्षा अधिकारी का वर्जन भी दिखा दिया। जिला शिक्षा अधिकारी रोहतक सत्यवती नंदल की तरफ से स्पष्टीकरण भी आ गया है कि उन्होंने ऐसी कोई खबर नहीं दी। ये खुद पत्रकार ने अपनी तरफ से लगाईं है।

यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि पत्रकार को यह भी नहीं पता, हरियाणा व राजस्थान के शिक्षा विभाग व स्कूलों के सिस्टम में कितना अंतर है। हरियाणा में जहां 1 अप्रैल से नया सत्र शुरू हो जाता है वहीं राजस्थान में मई में नया सत्र शुरू होता है। परन्तु पत्रकार ने इसकी कोई परवाह नहीं की और राजस्थान वाली खबर में बिना कोई बदलाव किए ज्यों का त्यों परोस दिया। डेस्क पर बैठे लोगों व अन्य वरिष्ठ लोगों ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। हर वर्ष हरियाणा के स्कूलों में ग्रीष्मकालीन अवकाश 1 जून से शुरू होते हैं, लेकिन राजस्थान के समाचार में 16 मई से अवकाश होना बताया गया था, इसलिए समाचार की कापी करते समय रोहतक वाले पत्रकार ने हरियाणा में भी 16 मई  से अवकाश बता दिया। 

इस समाचार के प्रकाशित होने के बाद हरियाणा में शिक्षा विभाग के अध्यापकों व छात्रों के बीच यह समाचार आग की तरह फैल गया। सभी अध्यापक जहां अपने आला अधिकारियों से जल्दी अवकाश होने की पुष्टि करने की कोशिश करने लगे, वहीं स्कूली छात्रों ने अध्यापकों के सामने सवालों की झड़ी लगा दी। इस बारे में जब रोहतक भास्कर के पत्रकारों से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने साफ कह दिया कि उनके संज्ञान में ऐसा कोई समाचार नहीं है तथा उन्हें अवकाश की पुष्टि अपने अफसरों व बोर्ड से करनी चाहिए। अगर अफसरों से ही पुष्टि करनी होती तो प्रकाशित समाचारों की क्या अहमियत रह जाएगी। 

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मजीठिया पर आरपार की लड़ाई, राजस्थान के पत्रकार भी एकजुट

जयपुर : चर्च रोड स्थित कुमारानन्द हॉल में रविवार को दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ़ इंडिया व पूरे राजस्थान राज्य के पत्रकार एवं गैर-पत्रकार कर्मचारी पहली बार एकसाथ एकत्रित हुए और मजीठिया के अनुसार वेतनमान के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया। 

माननीय सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अवमाननना के 51  प्रतिनिधियों, अनेक यूनियन के नेताओं तथा विभिन्न सस्ंथानो के कर्मचरियों  की और से लड़ रहे अधिवक्ताओं के  एकसाथ मंच पर आने से मजीठिया की लड़ाई और मजबूत हुई है। पत्रकारों मैं ऐसी एकता पहले कभी नहीं देखी गयी उन्होंने एक साथ एक सुर मैं कहा की हम चाहे कुछ भी हो जाये अख़बार मालिक कितनी भी ओछी हरकतों पर उतर आयें लेकिन हम सब एक होकर मजीठिया की इस लड़ाई को अंजाम तक ले जाकर रहेंगे । चाहे हम प्रताड़ित हों, चाहे निलंबित हों या फिर निष्कासित कर दिए जायें, हर हाल मैं मजीठिया के अनुसार वेतन लेकर  रहेंगे । हम सब एक साथ रहकर यह लड़ाई लड़ेंगे । 

इस मंच पर सुप्रीम कोर्ट के कई सीनियर अधिवक्ताओं ने कर्मचारियों को अख़बार मालिकों व उनके चमचों से सतर्क रहने के लिए कहा तथा सबको एक जुट होकर लड़ाई लड़ने पर जोर दिया, तथा मजीठिया की लड़ाई के लिए आगे की रणनीति तय की गयी ।  उन्होंने कहा कि यह उन लोगों के लिए भी सुनहरा मौका है जिन्होंने नौकरी के दबाव में आकर मजीठिया  के अनुसार वेतन न चाहने वाले बिना डेट वाले कागजों पर पहले ही साइन कर दिए हों। उनको करना यह है कि वे लेबर इंस्पेक्टर या लेबर कमिश्नर को लिखित मैं सूचित करें कि हमे मजीठिया के अनुसार वेतन अभी तक नहीं मिला है तथा नौकरी से निकालने की धमकी देकर हमसे साइन करवा लिए हैं, जो निराधार है। हमारे द्वारा अस्वीकार है व इसकी सही रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट मैं पेश करें। 

यह तय मानिये कि यदि आप सच्चाई के साथ हैं तो आपका हक़ आपसे कोई भी नहीं छीन सकता, बस कलम उठाएं और लेबर इंस्पेक्टर को सच्चाई से लिखित में अवगत कराएं। उसको भी अपनी नौकरी प्यारी है। अपने बच्चों से प्यार है। वह किसी भी कीमत पर सुप्रीम कोर्ट को गलत रिपोर्ट पेश नहीं कर सकता । 

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –  

The enthusiasm among the newspaper employees of Rajasthan for the Majithia Wage Awards is seen to be believed. Yesterday i.e. on 3rd May more than four hundred employees of the newspapers assembled in a hall of Jaipur and resolved to fight with rock like unity for their legitimate rights. Consequent upon the directions of the Hon’ble Supreme Court of India on 28th April 2015 to all state governments for appointing the Labour Inspectors to find out as to how many newspapers have implemented the Majithia Wage Boards recommendations till date, IFWJ Secretary General and Supreme Court advocate Parmanand Pandey and the Senior Advocate Collin Gonsalves have decided to undertake the country wide tour to remove the doubts of the employees and galvanize them to lock the bulls of industry by their horns.

IFWJ’s Secretary General has been flooded with invitations from hundreds of employees of different newspapers across the country to visit to their publication centres. Employees are asking to guide them as to how to handle the misinformation and shenanigans of the newspaper employers, which they will employ to fudge the report.

On May 1 Shri Pandey, and Senior Advocate Shri Colin Gonsalves and the undersigned addressed the meeting of the newspaper employees of NOIDA and exhorted them to show the exemplary courage and tell the labour inspectors that they have been coerced to sign on the papers of the employers, which says that they are not interested in the wage board awards but are satisfied with the present wage structure. Shri Pandey and Gonsalves asked the employees not to be deterred with threats or inducements of the employers. Labour Inspectors must also be warned for not coming under any pressure of the employers because they have to directly report to the Supreme Court.

The old timers of the newspaper industry in Jaipur say that they have not witnessed any meeting of this scale of the newspaper employees in the past. It was unprecedented by all means. The crowd was spilling over the hall and ever body heard both Advocates with rapt attention for nearly three hours. IFWJ vice-president Satya Pareek, its state unit president J.N. Jaiman remained present in the meeting all through. Shri Upendra Singh Rathore also came from Jaisalmer to lend his support to employees. Shri Amit Mishra, Sanjay Saini, senior journalists V.K. Pathak, Pradeep Gaur, Devendra Garg, Rakesh Sharma, Rakesh Verma, Vijay Morya and others ensured that the message must go across to one and all. Newspaper proprietors got trembled with roaring success of the meeting. The meeting was held in two sessions. In the first session both advocates spoke at length and then the question-answer session followed.

It is regrettable indeed that the proprietors have gone on the spree of repression after the employees demanded for the implementation of the Majithia Wage Awards. Two newspapers of Rajasthan i.e. Rajasthan Patrika and Dainik Bhaskar, which claim to have the largest circulation in the state or proving to the worst exploiters. The despicable conduct of lalas of both newspapers has touched its nadir. Employees are transferred, suspended and harassed in every conceivable manner. Both of them are brazenly violating the labour laws and the shameless government and its officials are watching the sordid drama with perverted pleasure. The state government has totally failed to rein in the intoxicated and power drunk employers. The proprietors of Rajasthan Patrika and Dainik Bhaskar have become the law and unto themselves and are busy in land grabbing, extortion and blackmailing. Shri Pandey and Shri Gonsalves condemned this attitude of the government which is dancing to the tunes of the newspapers barons.

Most of the employees of Dainik Bhaskar and Rajasthan Patrika have filed their petitions in the Supreme Court through Shri Parmanand Pandey. Advocate Pandey said the employees that they should rise above the egoist bickering for benefit of employees. The Journalist Trade Unions have unfortunately got frozen into time warp and that is why they have been marginalized and lost all contacts with new generation of journalists. Shri Pandey asked journalists to unionize for ensuring the protection of their rights. The Press Club of Jaipur which should have been the hub and the centre of agitational activities has virtually become a cesspool of corruption and politicking.

Shri Pandey and Shri Gonsalves have assured the employees that they would extend all possible help to ensure their victory in the Supreme Court. Those employees who have been victimized by the employers will get full justice and the proprietors will have to take them back on duty with full back wages and all consequential benefits. The undersigned promised them in preparing the fitment of wage scales.

IFWJ will soon send a circular to all its state units to prevail upon the Labour Officials not to tinker with the actual fact finding reports of the Labour Inspectors, otherwise they would have face the cost and consequences of their own making.

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मजीठिया : राजस्थान में भी बजा बिगुल, राज्यपाल-मुख्यमंत्री को दिया ज्ञापन

पहली मई मज़दूर दिवस पर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने के लिए राजस्थान ने बिगुल बजा दिया है। शुक्रवार को जयपुर में नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट (इंडिया ) और जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ़ राजस्थान (जार ) ने राज्यपाल कल्याण सिंह और मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे को ज्ञापन दिया।

जार की सभी जिला इकाइयों ने पूरे 33 ज़िलों में जिला कलेक्टर्स को मुख्यमंत्री के नाम ये ज्ञापन सौपे है। उनसे सुप्रीम कोर्ट के 28 अप्रैल 15 के फैसले को  लागू कराने का अनुरोध किया। इसके अनुसार ईमानदार लेबर इंस्पेक्टर की जल्दी से जल्दी नियुक्ति करने, मीडिया संस्थानों को पाबंद करें की केस का निपटारा होने तक पत्रकारों का तबादला नही किया जाए , उन्हें प्रताडित नहीं करने  की मांग की। 
नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट (इंडिया )  की तरफ से ये ज्ञापन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ललित शर्मा और जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ़ राजस्थान (जार )  की तरफ से प्रदेशाध्यक्ष नीरज गुप्ता ने दिया। 
3 को जयपुर में राज्य स्तरीय सभा 
मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने और  आगे की रणनीति बनाने के लिए 3 मई को दिन में 12. 30 बजे पिंकसिटी प्रेस क्लब में राज्य स्तरीय सभा बुलाई गई है। इसमें  राज्य के सभी पत्रकारो को आमंत्रित किया गया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट में  पत्रकारो की पैरवी कर रहे सीनियर एडवोकेट परमानन्द पाण्डेय आएंगे। वे पत्रकारो की आशंकाओ के जवाब भी देंगे।

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कर्मचारी कोई भी हो, अस्थाई नहीं हो सकता : राजस्थान हाईकोर्ट

जयपुर : कर्मचारियों के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण एवं स्वागत योग्य आदेश जारी किया है। माननीय न्यायालय का कहना है कि यदि राज्य सरकार ने उसे वेतन दिया है तो वो उसका कर्मचारी हुआ। संविदा या कोई दूसरा नाम देकर उसे अस्थाई करार नहीं दिया जा सकता। यदि यह आदेश एप्लिकेबल हुआ तो देश भर में कोई भी कर्मचारी अस्थाई नहीं रहेगा। 

राजस्थान हाईकोर्ट ने अस्थाई कर्मचारियों के बारे में महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए कहा है कि राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत पदों के लिए नियमित भर्ती प्रक्रिया अपनाते हुए चयनित कर्मचारियों के नियुक्ति आदेश में केवल संविदा पर लिख देने से वे अस्थाई नहीं हो जाते।

ऐसे कर्मचारियों को प्रतिमाह फिक्स सैलेरी देना व उनकी सेवाओं को नियमित नहीं करना असवैंधानिक नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के कर्नाटक बनाम उमादेवी मामले में पारित अंतिम निर्णय का पालन करना सरकार के लिए ओब्लिगेशन है। इसलिए याचिकाकर्ता सहित उसके समान अन्य को तीन माह में सरकार नियमित करे। यह आदेश वरिष्ठ न्यायाधीश गोपाल कृष्ण व्यास ने याचिकाकर्ता बीकानेर निवासी यशवंत सिंह कि ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।

भड़ास राजस्थान के एफबी वॉल से

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काश पूरा देश बीकानेर हो जाता

मरहूम शायर अज़ीज़ आज़ाद ने एक बार कहा था “मेरा दावा है सब ज़हर उतर जायेगा, सिर्फ़ इक बार मेरे शहर में रहकर देखो” या अल्फ़ाज़ उस शहर-ए-तहज़ीब की हक़ीक़त बयाँ करते हैं जिसे ये संसार बीकानेर के नाम से जानता है और जो देश  सीमावर्ती इलाक़ों में एक है. रेगिस्तान की रेत के बीच क़रीब 528 सालों बसे बीकानेर की स्थापना राव बीकाजी ने अक्षय द्वितीया को की थी.

इसके बसाये जाने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है.दरअसल राव बीकाजी जोधपुर रियासत के राजकुमार थे और अपने आप में एक बड़ी हैसियत रखने वाले लोगों में थे. एक दिन किसी काम के लिए जल्दी करने के कारण उनकी भाभी ने उनसे मज़ाक़ कर लिया कि देवरजी इतनी जल्दी में हो, क्या कोई नया शहर बसाना है. बस यही बात उनके दिल में बैठ गयी और उसी वक़्त राव बीकाजी जोधपुर से अपना क़ाफ़िला लेकर जांगल प्रदेश की और रवाना हो गए. उस समय बीकानेर नाम की कोई रियासत नहीं थी. जहाँ आज बीकानेर बसा हुआ है वह जांगल प्रदेश का हिस्सा भर था और यहाँ भाटियों की हुकूमत थी. जब राव बीकाजी वहाँ पहुंचे तो उनका सामना उस समय के एक जागीरदार से हुआ, जिसका नाम नेर था. उसने ये शर्त रख दी कि नए शहर के नाम में उसका ज़िक्र भी आना चाहिए और राव बीका और नेर के नामो को मिलाकर बीकानेर नाम का नया शहर बसाया गया.

इस शहर पर शुरू से ही राजपूत राजाओं की हुकूमत रही जिन्होंने समय समय पर अपनी कुशलता को साबित किया। लेकिन उन सब में महाराजा गंगा सिंह का नाम आज भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है. महाराजा गंगा सिंह जहाँ  कुशल शासक के रूप में अपनी पहचान रखते थे, वहीं समय से आगे सोचने की योग्यता भी रखते थे. यही कारण था की अंग्रेज़ों की हुकूमत के दौरान उनकी पहुँच महारानी विक्टोरिया तक थी और विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें ब्रिटिश-भारतीय सेनाओं के कमान्डर-इन-चीफ़ को ज़िम्मेदारी सौंपी गयी जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया। गंगा सिंह के समय में बीकानेर एक विकसित रियासत था और जो सुविधाएं दूसरी रियासतों ने कभी देखी नहीं थीं, वे भी बीकानेर में आम लोगों को उपलब्ध थी. बिजली, रेल, हवाई जहाज़ और टेलीफ़ोन की उपलब्धता करवाने वाली रियासत बीकानेर ही थी. यहाँ का पीबीएम अस्पताल देश के बेहतरीन अस्पतालों में शुमार होता था.

लेकिन आज़ादी के बाद बीकानेर शहर से सभी सरकारों ने सौतेला  व्यवहार किया और विकास के नाम पर बीकानेर दूसरे सभी शहरों से पीछे रह गया. यहाँ के लोग विकास को तरस गए और अब तक पिछड़ेपन के आलम में ही जीने को मजबूर हैं. बीकानेर का रेलवे वर्कशॉप किसी ज़माने में जहाँ 17000 कर्मचारियों की क्षमता रखता था वहीं अब 1000 कर्मचारी भी नहीं बचे हैं. बीकानेर में पर्यटन की भरपूर सम्भावनाएं होते हुए भी सरकार ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया जिसका नतीजा यह है की निजी स्तरों पर किये जाने वाले प्रयासों से ही दुनियाँ बीकानेर को देख पाती है.

उद्योगों की यहाँ खूब सम्भावनाएं होने के बावजूद किसी भी सरकार की नज़र-ए-इनायत यहाँ नहीं हुई और सारे प्रोजेक्ट्स दूसरे शहरों को मिलते रहे. इसका एक कारण यहाँ का शिथिल नेतृत्व भी रहा जिसने कभी बीकानेर के लिए अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं की. मंदिरों और महलों के इस शहर के लोग विकास का सपना अभी देख ही रहे हैं.

पूरी दुनियाँ को रसगुल्ले की मिठास और भुजिया पापड़ के चटख़ारों का एहसास करवाने वाला बीकानेर जहाँ आधुनिक विकास के नाम पर पिछड़ा हुआ है वहीं कला और संस्कृति के नाम पर बहुत ही मालामाल है. बीकानेर की उस्ता कला पूरी दुनियां में विख्यात है. ऊँट की ख़ाल पर की जाने वाली चित्रकारी हो या पत्थरों पर खूबसूरत नक़्क़ाशी हो, पूरी दुनियां यहाँ के कलाकारों के सामने नतमस्तक होती है. मरहूम हाजी ज़हूरदीन उस्ता।मरहूम अलादीन उस्ता और मुहम्मद हनीफ़ उस्ता ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अपना हुनर  दुनिया से मनवाया है.

संगीत के क्षेत्र की बात करें तो मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई ने मांड को दुनिया में स्थापित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और भारत की सरकार ने उन्हें सलाम करते हुए पद्मश्री के सम्मान से नवाज़ा. संगीत की इस विरासत को आगे बढ़ाने में भी बहुत से नाम हैं जिनमें पाकीज़ा फिल्म के संगीतकार ग़ुलाम मुहम्मद और हालिया नौजवान गायक राजा हसन प्रमुख हैं. पंडित भारत व्यास ने गीतकार के रूप में अपनी ख़ास पहचान बनाकर बीकानेर को गौरवान्वित किया।

साहित्य का क्षेत्र तो बीकानेर के लोगों को सलाम करता नज़र आता है. उर्दू हो या हिंदी या फिर राजस्थानी। बीकानेर के साहित्यकारों का लम्बा सिलसिला है. हिंदी की बात करें तो स्व. हरीश भादाणी, यादवेन्द्र शर्मा “चन्द्र”, नन्द किशोर आचार्य, भवानी शंकर शर्मा “विनोद”, डॉ. बुलाकी शर्मा और भी न जाने कितने नाम हैं, जिन्होंने हिंदी भाषा को समृद्ध करने में अपना योगदान दिया है. उर्दू जुबां का ज़िक्र करें तो मरहूम मुहम्मद उस्मान “आरिफ़” दीवान चन्द “दीवां” मुहम्मद हनीफ “शमीम” मरहूम ग़ाज़ी बीकानेरी,रासिख़ न जाने कितने ऐसे अदीब हैं जिन्होंने अपनी क़लम के ज़रिये उर्दू अदब की शमाँ जलाकर बीकानेर का नाम रोशन किया है और ये सिलसिला अब तक जारी है.

तहज़ीब के मामले में बीकानेर सबसे हटकर है. यहाँ के लोग जहाँ खाने पीने के शौक़ीन हैं वहीं इन्सानियत उनके लिए सबसे बड़ा मज़हब है. कोटगेट पर बानी हज़रत हाजी बलवान शाह पीर की दरगाह पर हाज़री देने से पहले यहाँ के लोग अपनी दुकाने नहीं खोलते। बाद फिर से हाज़री होती है. इनमें से नब्बे फ़ीसद लोग धर्म को मानने वाले हैं वहीं लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर हो या नागणेचेजी का मंदिर हो. फूल बेचने वाले सभी लोग मुस्लिम हैं. यहाँ के मोहल्ले भी एक आपस में एक दूसरे से लगे हुए हैं जहाँ दोनों मज़हबों के लोग साथ बैठकर मुहब्बत के नग़मे गाते नज़र आते हैं. किसी के रास्ता पूछ लेने पर साथ जाकर बताकर आना यहाँ के लोगों की आदत में शामिल है.

वहीं सुबह सुबह कचौड़ियों और समोसों के साथ रसगुल्लों और घेवरों  आनन्द लेना भी प्रिय शग़ल है. तहज़ीब इस तरह बरक़रार है कि अयोध्या आन्दोलन के दौरान देश भर में दंगे हो जाने पर भी यहाँ के लोग साथ बैठकर एक दूसरे के यहाँ खा-पी रहे थे. तत्कालीन प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यहाँ का भाईचारा देखकर कहा था “काश पूरा देश बीकानेर हो जाता”। ऐसा निराला शहर बीकानेर अक्षय द्वितीया को अपना स्थापना दिवस मनाता है और अक्षय तृतीया के दिन भी पतंगबाज़ी कर शहर के स्थापक राव बीकाजी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है. अक्षय द्वितीया के दिन जहाँ जगह जगह आयोजन होते हैं वहीं अक्षय तृतीया को पूरा शहर अपनी अपनी छतों पर चढ़ जाता है और शुरू होता है पतंगबाज़ी का दौर जो बोई काटा है-बोई मारा है कि आवाज़ों के साथ रात तक जारी रहता है. हालांकि अक्षय तृतीया जहाँ पतंगबाज़ी के लिए मशहूर है और बीकानेर में इस जश्न को देखने बाहर से भी लोग आते हैं वहीं विवाहों के लिए भी इस दिन को बड़ा शुभ माना गया है. इस दिन शहर में हज़ारों शादियां होती हैं और पतंगबाज़ी के बाद लोग शादियों की दावतों का लुत्फ़ भी लेते नज़र आते हैं. किसी ज़माने में ये दिन बाल विवाह के लिए भी जाना जाता था लेकिन बीकानेर अब इस कुप्रथा को छोड़ इक्कीस वीं सदी में दाखिल हो चुका है. अब बाल विवाह कहीं भी होता नज़र नहीं आता. ऐसा है दुनियां का निराला शहर बीकानेर जहाँ की सरज़मीं प्यार और मुहब्बत के नग़मे गाकर पूरी दुनियां को अमन का पैग़ाम देती है.

लेखक नासिर ज़ैदी, ब्यूरो चीफ़, ए-वन टीवी, बीकानेर का संपर्क नंबर : 9460355786 

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शिक्षण संस्थानों में डिग्रियों के फर्जीवाड़े का धंधा

हाल ही में राजस्थान में एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा किए गए बड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया। जोधपुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की ओर से जारी की गईं 25 हजार से अधिक डिग्रियां और अंक तालिकाएं फर्जी पाई गईं। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने फर्जी डिग्री के मामले में जोधपुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के चेयरमैन कमल मेहता को गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले सिक्किम में भी एक निजी विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और मालिक को जेल की हवा खानी पड़ी थी। हिमाचल की भी एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी द्वारा इसी तरह डिग्रियां बांटी जा रही थीं। आज देश भर में कई निजी शिक्षा संस्थानों द्वारा फर्जी डिग्री देने का धंधा जोरों पर चल रहा है। शिक्षा एक मजाक बन चुकी है। लोग परीक्षा पुस्तिकाएं घर पहुंचा दे रहे हैं। दलाली का धंधा जोरों पर है।

पुरानी तिथियों में भी डिग्रियां बांटी जा रही हैं। लेकिन उस पर सरकार की ओर से कोई प्रभावी कार्यवाही होती नहीं दिखाई देती। हाल ही में बिहार और उत्तरप्रदेश के विद्यालयों में नक़ल की बानगी हम देख ही चुके हैं। जब उदारीकरण की अवधारणा और निजीकरण के दबाव के फलस्वरूप उच्च शिक्षा को सरकार ने अपने संरक्षण से मुक्त कर देने का गुरु मंत्र दे दिया, तो बिना कुछ बेहतर सोचे समझे, व्यवहारिक दृष्टि के आभाव में निजीकरण के उस रास्ते को अपना लिया गया जो शिक्षा को मुनाफे के धंधे में बदलता था। लिहाजा बेतहाशा निजी विश्वविद्यालय कुकुरमुत्ते की तरह उगने-फैलने लगे। अनेक ऐसे व्यापारी और नेताओं ने विश्वविद्यालय खोल लिए जिन्हें अपनी काली कमाई को सफेद करना था। ध्यातव्य है कि पिछली सदी के अंतिम वर्षों में छत्तीसगढ़ में निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ आ गई। निजी विश्वविद्यालयों का खुलना गलत नहीं है, लेकिन उनका नियमन तो अवश्य होना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ। वह तो भला हो  प्रोफेसर यशपाल का, जो वे फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में गए और बड़ी मुश्किल से उन पर रोक लग पाई। खैर उसके बाद थोड़ा नियमन हुआ। लेकिन जब ज्ञान आयोग ने कहा कि देश को 1,500 विश्वविद्यालयों की जरूरत है, तो एक बार फिर निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों की बाढ़ आने लगी। इससे पहले कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में तकनीकी और मेडिकल शिक्षा का व्यवसाय खूब फला फूला। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज धड़ाधड़ खुलने लगे।

आज देश में जितने सेकेंडरी स्कूल नहीं हैं उतने इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। मैनेजमेंट शिक्षा का भी यही हाल है। आज उच्च शिक्षा एक भारी उद्योग बन गया है। अब भी देश में कुल 450 ही विश्वविद्यालय हैं। जिनमें कई बिलकुल स्तरहीन हैं। यद्दपि चीन या अन्य विकसित देशों की तुलना में यह संख्या कहीं कम है। इसलिए यह उचित है कि उच्च शिक्षा का विस्तार जरूर हो, लेकिन सोच-समझकर हो और कमसकम एक स्तर तो कायम रहे। अब स्थिति  है कि तमाम महानगरों के आसपास उच्च शिक्षा एक बड़े उद्योग के रूप में विकसित हो गई है। दिल्ली या उसके आसपास इन संस्थानों की इतनी भरमार है कि दिल्ली से निकलने वाली हर सड़क पर पच्चीस-पचास कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं। तकनीकी संस्थानों का तो कोई हिसाब ही नहीं है। विचित्र स्थिति यह है कि ऐसे संस्थान भी विकसित शहरी क्षेत्रों के करीब ही खुलते हैं। अब उत्तराखंड में देहरादून और हरिद्वार के आसपास ज्यादातर विश्वविद्यालय और निजी संस्थान हैं। दूर दर्ज के पहाड़ी इलाके ऐसे संस्थानों से वंचित हैं। माना यह जाता है कि पूंजी की भी अपनी एक सामाजिक जिम्मेदारी होती है, पर निजी विश्वविद्यालयों के रूप में उग आई ज्यादातर दुकानें असल में आम जनता को लूटने के अड्डे बन गई हैं। अब वास्तविकता यह है कि ये लोग सिर्फ पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं की भीड़ भर खड़ी करने में सहायक हो रहे हैं रोजगार दिला पाना इनके वश में नहीं हैं।

पिछले दिनों ब्रिटेन से एक अच्छी व बहुत उत्साहवर्धक खबर थी। वहां के कुछ प्राध्यापकों ने यह फैसला किया कि वे मिल-जुलकर एक ऐसा विश्वविद्यालय खोलेंगे, जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाएगी। वे लोग भी हमारी-आपकी तरह महंगी होती जा रही उच्च शिक्षा से दुखी थे, लिहाजा 40 अध्यापकों ने यह फैसला किया कि वे मुफ्त विश्वविद्यालय खोलेंगे और उसमें वॉलंटियर बनकर बिना मेहनताने के पढ़ाएंगे। अभी इस विश्वविद्यालय के छात्रों को डिग्री नहीं मिलेगी, लेकिन उन्हें स्नातक, परास्नातक और डॉक्टरेट स्तर की एकदम वैसी ही शिक्षा दी जाएगी, जैसी कि ब्रिटेन के आला दर्जे के संस्थानों में दी जाती है। उनकी इस मुहिम से जुड़ने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। यह विचार केवल ब्रिटेन के कुछ अध्यापकों के मन में आया हो, ऐसा नहीं है। ऐसी ही एक मुहिम वड़ोदरा जिले के एक अविकसित आदिवासी इलाके में प्रादेशिक सरकार के तमाम दुर्भावों के वावजूद प्रोफेसर गणेश देवी ने चलाई थी। आज वह एक स्थायी महत्त्व की संस्था बन चुकी है। जिस तरह से दुनिया भर में शिक्षा महज व्यवसाय या  ‘पण्य  वस्तु’ (कमोडिटी)  बन गई है, उसने यह चिंता पैदा कर दी है कि आने वाली पीढ़ियों का आखिर  क्या होगा?  क्या शिक्षा सचमुच गरीब की पहुंच से बहुत दूर छिटक जाएगी जैसे कि लक्षण अब स्पष्ट नजर आने लगे हैं। भारत ही नहीं, यूरोप-अमेरिका में भी यह आम धारणा है कि उच्च शिक्षा महंगी हो रही है। वहां शिक्षा-ऋण बेतहाशा बढ़ रहा है। बैंकों पर भरी बोझ है। उसकी वसूली दिन-प्रतिदिन मुश्किल होती जा रही है। कमसकम भारत में यह नौबत अभी नहीं आई है। इस तरह मुक्त मंडी की अवधारणा भी धराशायी हो रही है।

सपना यह था कि मुक्त मंडी यानी बाजारवाद में सब कुछ बाजार की शक्तियां नियंत्रित करेंगी। जिसके पास प्रतिभा होगी, वह आगे बढ़ेगा और प्रतिभाहीन व्यक्ति पिछड़ता जाएगा, भले ही वह कितना ही अमीर क्यों न हो। लेकिन हो इसके उलट रहा है। जिसके पास धन है, पूंजी है, वह पढ़ रहा है और आगे बढ़ रहा है। बाकी लोग वंचित रहे जा रहे हैं, भले ही वे कितने ही प्रतिभावान क्यों न हों। इस व्यवस्था में भी प्रतिभाएं उसी तरह से वंचना की शिकार हैं जैसे कि इससे पहले गत शती के नौवें दशक तक की व्यवस्था में थीं। उसमें  धन का ऐसा नंगा नाच नहीं था। लेकिन यह शिक्षा आज पूरी तरह, नए सिरे से संपन्न और विपन्न वर्ग पैदा कर रही है। अंततः अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी यह कहना पड़ा कि ‘मेरा सपना है कि हर नागरिक को विश्वस्तरीय शिक्षा उपलब्ध हो। यदि यह एक काम भी हम कर पाए तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।’ ऐसे ही मकसद से वर्ष 2009 में अमेरिका के कैलिफोर्निया नगर में पीपुल्स यूनिवर्सिटी नाम से एक मुफ्त ऑनलाइन यूनिवर्सिटी शुरू की गई। इस यूनिवर्सिटी में छात्रों से कोई ट्यूशन फीस नहीं ली जाती, सिर्फ पाठ्य सामग्री की लागत भर ली जाती है। यहां पाठ्य सामग्री का स्तर तो ऊंचा है, लेकिन क्लास रूम जैसा अनुभव नहीं। यहां भी प्राध्यापक लोग स्वयंसेवक ही हैं, यानी जो लोग बिना मेहनताने के पढ़ाना चाहते हैं, वे ही यहां सेवा दे रहे हैं। यह एक अच्छी बात यह है कि उन्हें ऐसे अध्यापक मिल पा रहे हैं। असल में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो घोर पूंजीवाद के  इस युग में भी मुफ्त सेवा देने को तत्पर हैं। ऐसे लोगों की दुनिया में सचमुच कमी नहीं है, जो परोपकार के भाव से अपना ज्ञान और अनुभव बांटना चाहते हैं। इसलिए यदि आप किसी नेक काम के लिए पवित्र भाव से आगे बढ़ते हैं, तो लोग आपकी मदद के लिए स्वत: आगे आ जाते हैं। आखिर पंडित मदनमोहन मालवीय ने गुलामी के उस दौर में चंदे से एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खड़ा किया ही। आजादी से पहले ही गुरुकुल कांगड़ी बना, डीएवी आंदोलन खड़ा हुआ। ये सभी संस्थाएं शिक्षा को रोजगार के अतिरिक्त मनुष्य के चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम भी मानती थीं। उसे बहुत निम्नस्तर का व्यापारिक कारोबार नहीं। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद उच्च शिक्षा को घोर उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। स्कूली शिक्षा में तो कुछ प्रयोग हुए भी, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कोई उद्देश्यपरक महत्त्व का काम नहीं हुआ। दरअसल हम पूरी तरह सरकार पर निर्भर हो गए। हमने यह समझ लिया कि सरकार ही हमारी भाग्य विधाता है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। इसलिए सरकार ने जो चाहा जैसा चाहा किया और फिर बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिमी पूंजीवादी प्रभाव के फलस्वरूप शिक्षा को बाजारू रूप दे डाला गया। सरकार ने अपनी जिम्मेदारी कमाऊ पूतों को सौंप दी बिना किसी अंकुश या नियमन के। 

बहरहाल सरकार के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। एक तो शिक्षा को अनाप-शनाप ढंग से महंगे होने से रोकने की, और दूसरी, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने की। सरकार को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि ज्यादातर निजी विश्वविद्यालयों का ध्येय मुनाफा कमाना है। वे ऐसी ही जगह विश्वविद्यालय खोलना चाहते हैं, जहां के लोगों के पास खर्च करने को पर्याप्त पैसा हो। वे गरीब-गुरबों, गांव-देहातों या दूर-दराज के लोगों के लिए विश्वविद्यालय नहीं बनाना चाहते। जो लोग पहले से ही धनी हैं, ये उन्हीं के बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। इसलिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी खाई पैदा हो गई है।  अगर इस खाई को पाटना है और वाकई हर नागरिक को समान उच्च शिक्षा उपलब्ध करानी है तो सरकार को कुछ गंभीर कदम उठाने होंगे। इसके लिए शिक्षाविदों और अध्यापकों को भी सामने आना होगा। शिक्षा को महज मुनाफे का धंधा समझने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। सरकार यह समझती है और कहीं न कहीं इस मुनाफे के खेल में वह भी शामिल है। विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भी दरवाजे अब खुल चुके हैं। स्वदेशी और राष्ट्रवाद का राग अलापने वाले लोगों को भी इससे कोई गुरेज नहीं है। उनके लिए विदेशी निवेश, विकास की परम अवस्था है। लेकिन समस्या यह है कि यदि देशी विश्वविद्यालयों को संभालना ही इतना मुश्किल है, तो ऐसी परिस्थितियों में विदेशी विश्वविद्यालयों को संभालना कितना मुश्किल होगा। क्योंकि हमारे यहां भ्रष्ट व्यवस्था है और सबकुछ चलता है। अतः यह उचित वक्त है जब सरकार को भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस समस्या को सुलझाना चाहिए और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव की नीतियों का सख्ती से नियमन किया जाना चाहिए।

शैलेन्द्र चौहान संपर्क : 7727936225

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राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष मेघवाल ने प्रेस कांफ्रेंस में बांटे गिफ्ट वॉउचर, कई पत्रकारों ने ठुकराया तो सफाई देने लगे !!

भीलवाड़ा (राजस्थान) : यहां प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल की प्रेस कांफ्रेंस में पिछले दिनो गिफ्ट वॉउचर बांटे गए। मेघवाल का कहना है कि ‘मैंने स्वेच्छा से पत्रकार साथियों को गिफ्ट वॉउचर दिए हैं, इस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।’

रविवार को यहां सर्किट हाउस में मेघवाल पत्रकारों से रू-ब-रू हुए थे। इसमें पत्रकारों को पेन-डायरी के साथ एक-एक हजार रुपए के गिफ्ट वाउचर दिए गए। एक पत्रकार ने मेघवाल के सामने ही वाउचर दिए जाने को लेकर कड़ी आपत्ति प्रकट की तो मेघवाल ने उसे यह कहते हुए हंसी में टाल दिया कि आप सब अपने हैं, मैं अपनी इच्छा से ये तोहफा दे रहा हूं।

उस समय प्रेस कांफ्रेंस में करीब सौ पत्रकार मौजूद थे। राजस्थान पत्रिका के संवाददाता और फोटोग्राफर समेत कई पत्रकारों ने विधानसभा अध्यक्ष मेघवाल से गिफ्ट वॉउचर लेने से साफ मना कर दिया। ये घटना इन दिनो पूरे राजस्थान के मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है।  

इस पर सवालिया कटाक्ष करते हुए पत्रकार मनीष शुक्ला अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं – ” स्वेच्छा… लेने वाले की या देने वाले की? ‘फिक्र खबर की थी, जिक्र खबर का था, फिर अखबारों ने दम क्यूं तोड़ा? फिक्र कलम की थी, जिक्र कलम का था, फिर स्याही ने दम क्यूं तोड़ा? फिक्र पाठक की थी, जिक्र पाठक का था, फिर प़त्रकारिता ने दम क्यूं तोड़ा? ”

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वसुन्धरा राजे ने किया ज़ी राजस्थान न्यूज चैनल के लोगो का अनावरण

जयपुर : मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे ने सोमवार को अपने आवास पर ज़ी मीडिया समूह के प्रादेशिक न्यूज चैनल ज़ी राजस्थान न्यूज के लोगो का अनावरण किया। मुख्यमंत्री ने चैनल की री-लॉन्चिग भी की। इस मौके पर ग्रुप के सीईओ भास्कर दास और चैनल के स्टेट हैड पुरुषोत्तम वैष्णव भी मौजूद रहे।

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कमल शर्मा को मिला ‘माणक अलंकरण’ पुरस्कार

पत्रकारिता के क्षेत्र में राजस्थान का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘माणक अलंकरण’ जन टीवी के कार्टूनिस्ट कमल शर्मा को प्रदान किया गया है। कमल शर्मा को कार्टूनिस्ट की श्रेणी में विशिष्ट पुरस्कार के लिए पिछले वर्ष चयनित किया गया था। जोधपुर में गांधी जयंती पर 32वां माणक अलंकरण समारोह आयोजित किया गया। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, हरिदेव जोशी, पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति सनी सेबिस्टियन, सांसद गजेंद्र सिंह, जसवंत सिंह विश्नोई ने पुरस्कार प्रदान किए। गौरतलब है कि कमल शर्मा पिछले बारह सालों से बतौर कार्टूनिस्ट कार्य कर रहे हैं।

 

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मोदी जी, राजस्थान में शराब के नाम पर खरबों रुपये की इस काली कमाई को कौन डकार रहा है? (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : मोदी जी बताओ, उगाही का ये पैसा आप खा रहे हो या वसुंधरा राजे सिंधिया को खाने दे रहे हो… ये तो सच है कि भाजपा शासित केंद्र और राज्य में से कोई एक इस खरबों रुपये के शराब घोटाले का पैसा रोजाना डकार रहा है….  राजस्थान में भाजपा की सरकार है. केंद्र में भाजपा की सरकार है. तो फिर माउंट आबू से लेकर राजस्थान के विभिन्न शहरों में शराब बिक्री के दौरान आम जन से खरबों रुपयों की प्रतिदिन अवैध उगाही का पैसा कहां जा रहा है, कौन खा रहा है. मोदी जी कहते हैं कि न खाउंगा और न खाने दूंगा. पर राजस्थान में घटित हो रहे ‘शराब स्कैंडल’ को देखकर लगता है कि भाजपा के बड़े नेता, भाजपा शासित राजस्थान राज्य के नेता, मंत्री, अफसर जमकर उगाही का पैसा खा रहे हैं.

माउंट आबू में शराब की किसी भी दुकान पर जाइएगा. आपको 165 रुपये एमआरपी वाले पव्वे को खरीदने पर दो सौ रुपये देने होंगे और अगर आपने 35 रुपये एक्स्ट्रा लिए जाने पर सवाल किया तो कह दिया जाएगा कि लेना है तो लो वरना जाओ.  असल में माउंट आबू दौरे के दौरान जब फिश वर्ल्ड के मालिक द्वारा की जा रही लूट का स्टिंग https://www.youtube.com/watch?v=y90o7jyTiVY यूट्यूब-फेसबुक पर डाला तो राजस्थान के एक साथी ने फोन कर कहा कि आप माउंट आबू में बीयर, दारू के नाम पर हो रही खरबों रुपये की खुलेआम लूट को भी तो देखिए. तब मैं चल पड़ा एक शराब की दुकान की तरफ. सिमरन आफ वोदका का क्वाटर यानि पव्वा मांगा. दाम पूछा तो उसने बताया दो सौ रुपये. बोतल पर देखा तो एमआरपी 165 लिखा हुआ था. फिर शुरू हुई दुकानदार से बातचीत.

वीडियो को देखिए कि कैसे दुकानदार से मेरी बहस हो रही है. इतने आत्मविश्वास से खुली लूट करने वाले दुकानदारों की पीठ पर नेताओं, मंत्रियों, अफसरों का पूरा पूरा हाथ है. ऐसे में पूछना पड़ेगा कि मोदी जी, रोजाना घटित हो रहे खरबों रुपये के इस शराब घोटाले का पैसा कौन खा रहा है और किसे खाने दिया जा रहा है? सोचिए, यही सब अगर किसी आम आदमी पार्टी द्वारा शासित राज्य में हो रहा होता तो करप्ट और बिकाऊ मीडिया नैतिकता के इतने बड़े बड़े सवाल उठाकर विधवा विलाप शुरू कर देता कि पक्का केजरीवाल या उनके नेता को इस्तीफा देना पड़ जाता. लेकिन अगर घोटाला भाजपा या सपा या बसपा या कांग्रेस करे और मीडिया को भरपूर ओबलाइज करे तो ‘ये सब चलता है’ की तर्ज पर मीडिया वाले चुप्पी साध लेते हैं.  देखें स्टिंग…

mount abu ke lutere (2) : Modi ji, ye ugaahi ka paisa kaun kha raha hai?

http://goo.gl/NWkUFN

Yashwant Singh : माउंट आबू के लुटेरों पर जल्द ही एक स्टोरी लिखता हूँ। पर्यटन के लिए कहीं भी जाएँ तो सावधान रहें। पग-पग पे पैसा लूटने वाले विविध भेष में मौजूद रहते हैं। फिश वर्ल्ड के बाहर डालफिन की फोटो चस्पा है, लेकिन टिकेट लेकर अन्दर जाइए तो बित्ता भर से बड़ी कोई मछली नहीं मिलेगी। ऐसे दर्जनों किस्से हैं। एक्सपोज करना ज़रूरी है। इसीलिए एक दुकानदार का स्टिंग किया.. देखें जरा आप भी..

mount abu ke lutere (1) Fish World ke naam pe dhokhadhadi

http://goo.gl/JkiJrb

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. फेसबुक पर यशवंत के पेज से जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :

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