सेल्फी की चाहत में मौत को गले लगाते युवा

आजकल सेल्फी युवाओं की मौत का सबब बनती जा रही है। महाराष्ट्र के नागपुर में एक बार फिर सेल्फी की चाहत ने आठ युवा दोस्तों की जान लेकर उनके परिवार में ऐसा अंधकार किया कि अब वहां उजाले की किरणें कभी नजर नहीं आयेंगी। लोग कहीं घूमने जाएं या फिर रेस्तरां में खाना खाने बैठें, सेल्फी लेना नहीं भूलते। फिर चाहे उस तस्वीर को दोबारा जिंदगी में कभी देखें भी नहीं। खास कर युवाओं के स्मार्टफोन सेल्फी वाली तस्वीरों से भरे रहते हैं। फोन को हाथ में लिए कैमरे की ओर मुस्कुराते हुए पोज देते समय किसी के ध्यान में नहीं आता कि यह आखिरी मुस्कराहट हो सकती है। दुनिया भर में सेल्फी के चक्कर में 150 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।

फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप जैसी सोशल नेटवर्किंग की चकाचैंध ने पूरे विश्व में अपने पैर पसार लिये हैं। सोशल मीडिया एक तरफ युवाओं के लिये वरदान साबित हो रही है तो दूसरी तरफ अपने को अलग दिखाने की चाहत और जुनून में युवाओं के लिये मौत का सबब बनती जा रही है। जिसमें शेयर, लाइक, कमेंट की चाहत में युवा सेल्फी लेने के चक्कर में मौत के कुऐं में कूदकर अपनी जान गंवा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के आधे-अधूरे आंकड़ों को मानें तो सेल्फी की चाहत में पूरे विश्व में साल 2014 से लेकर सितंबर 2016 के बीच 127 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। जिसमें अकेले भारत में 76 मौतें हुईं, जो कुल विश्व में हुई मौतों का 60 प्रतिशत से अधिक है।

सेल्फी की यह संस्कृति दुनिया भर में तेजी से एक सनक का रूप लेती जा रही है। एक ऐसी सनक जिसके चलते लोग अपनी जान तक गँवा रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सेल्फी की इस सनक का असर लोगों के रिश्तों पर भी पड़ रहा है। सेल्फी से जुड़ी मौतों के कुछ प्रकरण इस प्रकार हैं- चलती ट्रेन के सामने सेल्फी लेना, नदी के बीच में नाव पर सेल्फी लेना, पहाड़ी पर सेल्फी लेना और ऊँची इमारत पर चढ़कर सेल्फी लेना इत्यादि। सेल्फी की यह सनक दुनिया भर में तमाम युवाओं को कुण्ठा और हीन भावना का शिकार भी बना रही है।

सेल्फी से होने वाली मौतों में भारत के बाद दूसरा स्थान पाकिस्तान का है। दिल्ली के सरकारी विश्वविद्यालय आईआईआईटी और अमरीका की कार्नेजिया मेलन यूनिवर्सिटी ने इस बाबत संयुक्त शोध किया। जिसमें अबतक भारत में 76, पाकिस्तान में 09 और अमरीका में कुल 08 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। वर्ष 2014 में 15 मौतें हुई थीं। साल 2006 में आंकड़ा 39 तक पहुंचा। इसके बाद साल 2016 में 73 लोगों की मृत्यु सेल्फी के कारण हुई। इनमें में रुस, फिलिपींस और स्पेन के लोग भी शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार मृत लोगों ने ज्यादातर पहाडियों व ज्यादा ऊंचाई वाली लोकेशन पर चढ़कर सेल्फी लेने की कोशिश की थी। इस प्रयास में वो पांव फिसलने से नीचे गिर गए। उनकी तुरंत मौत हुई। ये सभी लोकेशन बेहद आकर्षक थी। इसके अलावा नदी व समुद्र में सेल्फी क्लिक करने से भी जानें गईं।

पुरुषों की तुलना में महिलाएं सेल्फी की अधिक दीवानी हैं। हालांकि जिनकी मुत्यु हुई उनमें पुरुष ज्यादा हैं। 75.5 फीसदी पुरुषों की मौत हुई। इनकी उम्र 24 साल से कम थी। ये सभी फेसबुक व ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तस्वीरें अपोलड करने के लिए सेल्फी खींच रहे थे। रिपोर्ट के अनुसा साल 2015 में 2400 करोड़ सेल्फी की तस्वीरें गूगल पर अपलोड की गई थीं।

वैसे तो अधिकांश युवाओं में मोबाइल से सेल्फी में लेने का उनके शौक सिर चढ़ गया है। जिसमें बीते दिनों महाराष्ट्र के नागपुर में नौका सवार 8 दोस्तों की सेल्फी के चक्कर में मौत हो गई। मोबाइल से खतरनाक स्थानों पर सेल्फी लेने और मोबाइल की लीड कान में लगाकर गाने सुनते हुए रेलवे ट्रैक पार करने में हुई युवाओं की मौत की घटनाओं से अन्य युवाओं को सावधान होने और सबक लेने की आवश्यकता है। क्योंकि यह शौक उनकी जान का दुश्मन बनता जा रहा है। कान में लीड लगाकर गाने सुनते हुए रेलवे ट्रैक पार करते हुए बीते पांच साल में करीब 14 युवा अपनी जान गवां चुके हैं। जबकि अरावली पहाड़ी में बनी कृत्रिम झीलों में मौजमस्ती की नियत से नहाने की वजह से बीते दस साल में करीब चालीस युवा अपनी जान से हाथ धो बैठे।

मनोचिकित्सक मोबाइल उपयोग की अधिकता को एक मनोरोग बताते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. टीआर जाजोर बताते हैं कि भले ही सेल्फी अभी तक डब्ल्यूएचओ की आईसीडी में अभी शामिल नहीं है, लेकिन यह एक मनोरोग मान लिया गया है। पहले कुछ लोग अपनी परछाई से डर कर जान गवां बैठते थे, यह भी एक मनोरोग था, इसी प्रकार सबसे अलग दिखने की चाह में खतरनाक स्थानों से सेल्फी लेना भी इसी प्रकार का एक मनोरोग है। मनोचिकित्सक डॉ. टीआर जाजोर बताते हैं कि अक्सर जब युवक और युवतियां अपने दोस्तों के साथ होते हैं तब वो खतरनाक जगहों से सेल्फी लेने का खतरा अधिक मोल लेते हैं। चाहे वो झील हो, पहाड़ हो, नदी हो, झरने हो या फिर कोई ऊंचाई वाली जगह हो। ऐसे में सेल्फी लेने के चक्कर में छोटी सी लापरवाही

अब तक भारत में सेल्फी की चाहत में घटी प्रमुख घटनाओं पर नजर डालें तो तेलंगाना के वारंगल में अपने दोस्त को बचाने गए 5 छात्र पानी की चपेट में आ गए और उनकी जान चली गई। इस दर्दनाक हादसे के बाद रेस्क्यू कर रहे गोताखोरों ने सभी 5 छात्रों का शव झील से बाहर निकाले। जिसमें धर्मसागर झील के पास इंजीनियरिंग की तीसरे वर्ष की पढ़ाई कर रहे छात्रों का समूह घूमने गया था। वहां पहुंचते ही झील में रम्या नाम की एक छात्रा चट्टान पर जाकर सेल्फी लेने लगी तभी अचानक से उसका संतुलन बिगड़ गया और वह झील में डूबने लगी। जिसे देख उसके 5 दोस्तों ने पानी में छलांग लगा दी। लेकिन पानी के तेज बहाव के चलते सभी 5 छात्रों की मौत हो गई हालाकि रम्या को सुरक्षित बचा लिया गया। इसी तरह सेल्फी लेते हुए उत्तर प्रदेश के कानपुर में 7 छात्रों की मौत हो गई।

इसी तरह यमुनानगर क्षेत्र में एक युवक स्टंट करते हुए ट्रेन के सामने सेल्फी लेना चाहता था कि उत्तर प्रदेश से अमृतसर जा रही शताब्दी ट्रेन के आगे भागते हुए दो युवक ट्रेन की चपेट में आ गए। दोनों युवकों की मौके पर ही मौत हो गई। पाकिस्तान में सेल्फी लेने के दौरान एक 11 साल की बच्ची की मौत हो गयी. बचाने की कोशिश में मां बाप की भी जान गयी। इसी तरह पिकनिक मनाने के लिए मुबंई में विरार के राजौड़ी बीच पर गए सात युवाओं में से चार युवकों की समुद्र में डूबने से मौत हो गई। वे समुद्र में की तेज लहरों में सेल्फी लेने की कोशिश करने के दौरान बह गए थे। इसी तरह की दर्जनों घटनाऐं हैं जब किसी ने पहाड़ से किसी ने समुद्र में तो किसी ने झील और नदी तो कभी ट्रेन के आगे सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान गंवाई। और उनकी यह सेल्फी की सनक अंतिम साबित हुई। वहीं उनके परिवारों के लिये जीवनभर अंधकार का कारण बन गई। जो सिलसिला आज भी नागपुर की घटना के रूप में सामने आया है। युवाओं से यही अपेक्षा है कि वह सेल्फी की चाहत में अपनी जिंदगी को दांव पर ना लगाएं।

सेल्फी लेते समय यह रखें सावधानी
-खतरनाक स्थानों पर सेल्फी लेने का जोखिम न उठाएं।
-झील, स्वीमिंगपूल, पहाड़, ट्रेन, चलती बस, कार, जहाज, ऊंची बिल्ड़िंग, रफ्तार, जैसे खतरनाक स्थानों से बचें।
-दोस्तों के बीच अव्वल दिखाने की होड़ छोड़ें।
-चिकित्सकों के मुताबिक अधिक सेल्फी लेने से चेहरे पर छुर्रिया जल्दी आती हैं।

प्रस्तुति- मफतलाल अग्रवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता
मथुरा
mafatlalmathura@gmail.com

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मोदी के हाथों पुरस्कार लेने से मना करने वाले पत्रकार अक्षय मुकुल से सेल्फी पत्रकारों को शायद कुछ शर्म आए

Sanjay Kumar Singh : सुधीर चौधरी को रामनाथ गोयनका पुरस्कार देकर एक्सप्रेस के कर्ता-धर्ताओं ने रामनाथ गोयनका, उनके नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार और पत्रकारिता का जो अपमान किया था उसकी भरपाई पत्रकार और लेखक अक्षय मुकुल को उनकी किताब ‘गीता प्रेस एंड मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया’ को गोयनका देकर पूरी कर दी। रही-सही कसर अक्षय मुकुल ने नरेंद्र मोदी के हाथों पुरस्कार लेने से मना करके पूरी कर दी।

मुझे नहीं पता यह सब अपने आप हो गया या योजनाबद्ध था। अपने आप हो गया तो मुझे लगता है पत्रकारिता देश में अपने रंग-रूप में अभी कुछ समय और रहेगी। अगर योजना के तहत है जो एक्सप्रेस प्रबंधन बधाई का पात्र है। वह माने या न माने, मेरी बधाई स्वीकार करे या न करे। अक्षय मुकुल ने झुकने के लिए कहने पर रेंगने वालों के बीच तनकर खड़े होने और अपनी बात साफ शब्दों में कहने का साहस किया। अपनी किताब के जरिए ही नहीं, नरेन्द्र मोदी के साथ फ्रेम में आने से मना करके भी। सेल्फी पत्रकारों को शायद कुछ शर्म आए। इसके लिए अक्षय मुकुल की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।

शानदार, जोरदार अक्षय मुकुल !!

Virendra Yadav : पत्रकार अक्षय मुकुल ने नरेन्द्र मोदी के हाथों से पुरस्कार लेने से इनकार किया. मुकुल का कहना है कि- ‘मोदी और मैं एक साथ एक फ्रेम में मौजूद होने के विचार के साथ जीवन नहीं बिता सकता.’ अक्षय मुकुल का अभिनन्दन. प्रतिरोध का बेहतरीन और अनुकरणीय उदाहरण.

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण ने कब्जाई व्यापारी की करोड़ो की जमीन, कोर्ट में केस दर्ज

बुलंदशहर की जिलाधिकारी बी. चन्द्रकला के संग जबरन सेल्फी प्रकरण के बाद आरोपी की वकालत में फँसे दैनिक जागरण का नया फर्जीवाड़ा सामने आया है। बी0 चंद्रकला को उनके माता-पिता द्वारा परिवार की सम्पत्ति बँटवारे में मिले एक फ्लैट और तेलंगाना के नक्सल प्रभावित रंगारेड्डी जिले में कृषि योग्य कुछ ज़मीन पर सवाल खड़े करने वाला दैनिक जागरण खुद भूमाफिया है। समाचार-पत्र की आड़ में सरकारी सिस्टम पर हेकड़ी जमाकर दैनिक जागरण ने काली कमाई और अवैध जमीनों की खरीद का एक बड़ा साम्राज्य देश में खड़ा किया है। ताज़ा मामला राजधानी लखनऊ का है। आपको बताते हैं कैसे जागरण ने 50 करोड़ की ज़मीन को फर्जीवाड़ा करके कब्जा रखा है।

लखनऊ में फ़ैज़ाबाद रोड नेशनल हाइवे पर एक गाँव बसा हुआ है…नाम है अनोरा। अनोरा गाँव में दैनिक जागरण ने रोड से लगी हुई करोड़ो रूपये कीमत की सात बीघा जमीन कब्जा कर रखी है। जबकि इस जमीन का मालिकाना हक लखनऊ के जाने-माने व्यापारी रामशंकर वर्मा/जितिन वर्मा का है। दैनिक जागरण की नजर कई बरसों से वर्मा परिवार की जमीन पर थी। लिहाजा लखनऊ में फर्जी दस्तावेज़ के जरिये ज़मीन हड़पने की योजना बनाई गयी।

इस फर्जीवाड़े में नटवरलाल अशोक पाठक भी शामिल है जो लखनऊ का कुख्यात औऱ घोषित भूमाफिया है। अशोक पाठक हाल ही में एक फ्राड के मामले में जेल काटकर लौटा है। रामशंकर वर्मा और जतिन वर्मा को पता ही नहीं कब दैनिक जागरण वालों ने अशोक पाठक को उप-निबंधक कार्यालय में खड़ा करके वर्मा परिवार की पूरी सात बीघा जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली और पुलिस में अपने रसूखों के चलते वर्मा परिवार की जमीन पर कब्जा भी कर लिया।

दैनिक जागरण की करतूतों का कालाचिठ्ठा जब वर्मा परिवार ने समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता के सामने रखा और सारी हकीकत बयान की तो सरकार भी दैनिक जागरण की इस करतूत पर हैरान रह गयी। कोई अखबार समूह भला फर्जीवाड़ा और हथकंडे अपनाकर कैसे किसी की जमीन हड़प सकता है। रामशंकर वर्मा और जतिन वर्मा ने अपनी जमीन बचाने के लिए फौरन कोर्ट का सहारा लिया और अदालत में दैनिक जागरण के खिलाफ धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा करके रजिस्ट्री कराये गये बैनामा के निरस्तीकरण के लिए केस दर्ज कर दिया है।

दैनिक जागरण द्वारा फर्जी बैनामे के आधार पर तहसीलदार की अदालत में दायर अमलदरामत का वाद खारिज कर दिया गया है और जमीन को वर्मा परिवार के नाम अभिलेखों में अंकित कर दिया गया है। दैनिक जागरण द्वारा कब्जाई गयी जमीन पर मालिकों के गुंडे और असामाजिक तत्वों को जमावड़ा रहता है जो जमीन पर अभी भी कब्जा किये हुए है। दैनिक जागरण द्वारा अपने गुंडों और रसूखदार लोगो के जरिये अब वर्मा परिवार पर इस बात का दबाब बनाया जा रहा है कि वह कौड़ियों के भाव में अपनी जमीन छोड़ दें। लेकिन वर्मा परिवार किसी भी सूरत में अपनी बेशकीमती जमीन छोड़ने को तैयार नही है। खुद को प्रतिष्ठित और दुनियां का सबसे ज्यादा प्रसारित प्रतिष्ठित अखबार कहने वाला दैनिक जागरण अब जमीन डकारने के लिए गुंडई पर उतारू है। पहले वर्मा परिवार की जमीन पर फर्जीवाड़े से कब्जा किया और अब जमीन न छोड़ने को लेकर जागरण गुंडागर्दी कर रहा है।

हकीकत ये है कि लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर दैनिक जागरण के मालिक पूरे देश में इस तरह के कारनामों को अंजाम दे रहे है। इन्हें फोकट का माल चाहिए और इसके लिए अखबार के नाम की आड़ में पुलिस-प्रशासन पर दबाब बनाकर ये लोग किसी की भी जमीनें हथिया लेते है। दैनिक जागरण अखबार चोरी, बेईमानी और सीनाजोरी का अड्डा बन चुका है। दैनिक जागरण खुद, चोर, भ्रष्ट और बेईमान है। खुद तो पत्रकारिता की आड़ में आपराधिक कृत्य करते है औऱ दूसरों के ऊपर उँगलियां उठाते है। आज जरूरत है दैनिक जागरण को ये अच्छे से जानने की कि अगर दूसरों के लिए गड्डा खोदोगे तो खुद ही उसमें जमीदोंज हो जाओगे और अगर आसमान की ओर थूकने की जुर्रत की तो तुम्हारा ही मुँह मैला हो जायेगा।

दैनिक जागरण के संस्थापकों ने जिस जोश और जुनून और मिशन के लिए इस अखबार को अपने खून-पसीने से सींचा, उनके वारिस आज भूमाफियाओं के साथ मिलकर जमीन कब्जाने जैसी गलीच हरकतें कर रहे है। सवाल ये है कि इस अखबार समूह को आखिर कौन बचा रहा है इनके आपराधिक कृत्यों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नही होती। रामशंकर वर्मा औऱ जतिन वर्मा ने इस मामले में सरकार से दखल की अपील की है और अनुरोध किया है कि सरकार उनकी जमीन दैनिक जागरण के कब्जे से मुक्त कराये…जिससे अखिलेश यादव की सरकार पर व्यापारियों का भरोसा कायम रह सके।

श्री रामशंकर लखनऊ में जाने-माने व्यापारी हैं। उनसे संपर्क करके कोई भी पूरी जानकारी हासिल कर सकता है.

लखनऊ से गीत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: singhgeetsingh66@gmail.com

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जागरण की ये खबर मर्यादा की कौन सी सीमा में है?

Sanjaya Kumar Singh : बुलंदशहर के सेल्फी मामले में सच चाहे जो हो, मामला डीएम बनाम दैनिक जागरण हो गया है। मोटा-मोटी मामला ये है कि डीएम के साथ किसी ने सेल्फी लेने की कोशिश की तो डीएम ने एतराज किया और सेल्फी लेने वाले के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाकर उसे जेल भेज दिया। इस बारे में पूछने के लिए जागरण के संवाददाता ने डीएम को फोन किया तो उन्होंने कथित रूप से आपा खो दिया और “डीएम मर्यादा की सारी सीमा भूल गईं”।

ऑडियो मैंने भी सुना है पर मुझे नहीं लगता कि डीएम पर जो आरोप है वह निष्पक्ष या पूर्वग्रह से प्रेरित नहीं हैं। फिर यहां मुद्दा वह नहीं है। डीएम की कथित नाराजगी के बाद बुलंदशहर में जागरण कार्यालय के बाहर दो ट्रक कूड़ा फिंकवा दिया गया जिसके बारे में जागरण की खबर पढ़कर लगता है कि आरोप एक पक्षीय है और कबर में गंभीरता नहीं है। बहुत ही चलताऊ अंदाज में लिखी खबर का स्क्रीन शॉट देखिए। हालांकि, दैनिक जागरण को वैसे भी गंभीर या अच्छी तरह लिखी खबरों के लिए नहीं जाना जाता है पर जब वह खुद एक पक्ष है तो थोड़ी गंभीरता और संयम दिखाना बनता है।

मीडिया को मौका मिले तो न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का मौका नहीं चूकता पर अदालतों में अगर किसी का किसी मामले से जुड़ाव हो तो वह मामले से खुद को अलग कर लेता है। पर मीडिया में ऐसा कोई रिवाज नहीं है। उल्टे ऐसे मामलों में मीडिया वाले यह मान लेते हैं कि उन्हें जो जी में आए – लिखने की आजादी है। जागरण के साइट की खबर पढ़िए – ऊपर लिखा गया है कि कूड़ा सुबह सात बजे फेंका गया नीचे वह देर रात हो गया है। सुबह सात बजे और देर रात – में बहुत फर्क है और दोनों सही नहीं हो सकता। दो ट्रक दो बार में फेंके गए हैं तो बताया जाना चाहिए और यह भी कि फोन देर रात किए गए या सुबह सात बजे और फिर कितनी देर इंतजार करने के बाद जागरण वालों ने अपनी व्यवस्था की। यह सब न बताकर मौके पर मौजूद अनाम लोगों और “कई समाजसेवियों” के हवाले से अखबार ने अपनी बात लिखी है और चूंकि बार-बार फोन करने पर भी पालिका कर्मी कूड़ा उठाने नहीं पहुंचे इसलिए मान लिया गया है कि, “कूड़ा डीएम के इशारे पर फेंका गया है”।

यही नहीं, तमाम टीवी चैनल भी बुलंदशहर पहुंचने लगे हैं जबकि मीडिया का ही मामला होने के नाते लिखा जाना चाहिए था कि फंला टीवी चैनल के अमुक रिपोर्टर और कैमरा मैन आ चुके हैं और अमुक आने वाले हैं। अगर ऐसा ही था तो नैतिकता का तकाजा है कि अखबार इस बारे में खुद खबर नहीं लिखता पर इस एकतरफा और डीएम “मर्यादा की सारी सीमा भूल गईं” बताने वाली खबर में जागरण को खुद मर्यादा में रहने की जरूरत नहीं समझ में आई। जागरण ने सिर्फ तस्वीर लगा दी होती और लिखता कि यह कूड़ा इतने बजे ऐसे लोग या इस गाड़ी से इतने लोग डाल गए तो बात बन जाती, पाठकों को सूचना मिल जाती और अखबार भी मर्यादा नहीं तोड़ता। पर दूसरों को सीख देना हमेशा आसान होता है। अनाम कर्मचारियों ने दबी जुबान से जो बताया वह शीर्षक बन गया। मैं यह नहीं कह रहा कि खबर गलत है। मेरा कहना है कि खबर सही हो तो भी पक्षपातपूर्ण लग रही है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


पूरे मामले को समझने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें…

जागरण ने जो कूड़ा देश में फैलाया है उसके सामने यह कूड़ा कुछ भी नहीं

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आओ बेटा दैनिक जागरण, अब दिखाओ जलवा, एक महिला डीएम ने चेहरे पर कूड़ा पोत तुम्हारी औकात दुनिया को दिखा दी

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दैनिक जागरण की कुत्सित मानसिकता पर बुलंदशहर के सफाईकर्मियों का प्रहार, आफिस को कचरे से पाटा (देखें वीडियो)

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जबरन सेल्फी लेने वाले मनचले को जेल भिजवाने वाली डीएम चंद्रकला के पीछे क्यों पड़ा है दैनिक जागरण?

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सेल्फी प्रकरण पर जागरण के रिपोर्टर का सवाल सुनते ही आगबबूला हुई बुलंदशहर की डीएम, मां-बहन कह कह के जमकर हड़काया, सुनें यह टेप

 

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आओ बेटा दैनिक जागरण, अब दिखाओ जलवा, एक महिला डीएम ने चेहरे पर कूड़ा पोत तुम्हारी औकात दुनिया को दिखा दी

Yashwant Singh : आओ बेटा दैनिक जागरण. अब दिखाओ अपना जलवा. पेड न्यूज की सबसे बड़े सौदागरी के जरिए तोंद फुला कर खुद को पूरे देश का महाबाप समझने वाले तुम ब्लैकमेलरों में कितनी हिम्मत होती है, इसका समय समय पर आकलन होता रहता है… जब कानपुर में आईपीएस प्रेम प्रकाश ने तुम महाठगों के पूरे खानदान को रात में ठोंका था और जीप में ठेलकर थाने ले जाकर हवालात में डाल दिया था… तब भी तुम लोगों की औकात जगजाहिर हो गई थी और कथित पत्रकारिता व पावर की ताकत उड़नछू हो गई थी..

मायावती और मुलायम ने भी अपने अपने तरीके से एक-एक बार तुम लोगों की जबरदस्त ठुकाई की थी, तब भी तुम लोगों ने उनके कदमों पर लोट चाट कर उन्हें पटा लिया था और अपनी खाल बचा ली थी… पर गीदड़ अपनी प्रवृत्ति से बाज नहीं आता… पैसा और पावर के मेल से ज्यों थोड़ी चर्बी चढ़ी नहीं कि भों भों खो खो शुरू… दैनिक जागरण नोएडा के सैकड़ों मीडियाकर्मियों का हक मार कर उन्हें नौकरी से बर्खास्त करने वाले जागरण के मैनेजमेंट को इन गरीबों की आह लगी है. बुलंदशहर की डीएम चंद्रकला ने अब तुम्हारी औकात बता दी है… पूरे देश में दैनिक जागरण की थू थू हो रही है. करो मनमर्जी और बताओ खुद को सारे देश का बाप… औकात है तो उखाड़ कर कुछ दिखा दो डीएम का…

बहुत सही किया चंद्रकला ने… इन करप्ट, कारपोरेट और परम हरामी बिकाऊ मीडिया का यही इलाज है.. एक एक को ठोकों… एक एक को लखेदो… अपन को प्रेस व्रेस के फ्रीडम से कोई लेना देना नहीं क्योंकि अगर प्रेस का फ्रीडम इसी को कहते हैं जो इस देश में चल रहा है तो ऐसे सारे प्रेस और इसके सिर पर गड़े फ्रीडम के झंडे को उखाड़ कर गंगा में बहा देना चाहिए… जै जै..

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: 9999330099

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दैनिक जागरण की कुत्सित मानसिकता पर बुलंदशहर के सफाईकर्मियों का प्रहार, आफिस को कचरे से पाटा (देखें वीडियो)

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जबरन सेल्फी लेने वाले मनचले को जेल भिजवाने वाली डीएम चंद्रकला के पीछे क्यों पड़ा है दैनिक जागरण?

 

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दैनिक जागरण की कुत्सित मानसिकता पर बुलंदशहर के सफाईकर्मियों का प्रहार, आफिस को कचरे से पाटा (देखें वीडियो)

बुलंदशहर में डीएम संग जबरन सेल्फी खिचाने वाले आरोपी की वकालत करने वाले दैनिक जागरण को अब समाज के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पिछले 5 दिनों से महिला विरोधी मानसिकता से की जा रही पत्रकारिता पर जिले के सफाईकर्मियों ने प्रहार कर दिया है। महिला सम्मान की इज्जत उतारने वाले दैनिक जागरण का आफिस कूड़े से पाट दिया गया है और सफाईकर्मियों ने ऐलान किया है कि अगर अपनी बदतमीजियां जागरण ने बंद नही की तो पूरे शहर का कचरा जागरण के आफिस पर डाला जायेगा।

आज सुबह दैनिक जागरण के चॉदपुर क्रासिंग पर स्थित आफिस के बाहर कई ट्राली कचरा भरा हुआ मिला। आफिस के बाहर के रास्ते में इतनी भी गुन्जाइश नही बची थी कि कोई दूसरी ओर जा सके। दैनिक जागरण के पत्रकारों ने अधिकारियों को जब इस बाबत बताया तो नगरपालिका के सफाईकर्मियों ने वहाँ से कूड़ा हटाने से मना कर दिया। साथ ही अफसरों को चेतावनी दी है कि पत्रकारिता की आड़ में छुपे ऐसी मानसिकता वाले अपराधियों का वह खुलकर विरोध करेंगे।

आज दोपहर को सफाईकर्मी इस बाबत सिटी मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपेगे। ज्ञापन में यह अल्टीमेटम भी जारी किया जा रहा है कि अगर दैनिक जागरण के पत्रकारों ने अपनी दिमागी सोच नहीं बदली तो अंजाम और बुरा होगा। सफाईकर्मियों ने शहर में हड़ताल करने और पूरे शहर का कूड़ा जागरण के आफिस में भरने की धमकी भी दी है।

ज्ञातव्य है कि पिछले कई दिनों से सेल्फी प्रकरण में दैनिक जागरण द्वारा सामाजिक सरोकारों को दरकिनार करके महिला सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले आरोपी के पक्ष में पत्रकारिता की जा रही है। जागरण की इस हरकत का पूरे समाज में विरोध हो रहा है। पेड न्यूज का सबसे बड़ा सौदागर दैनिक जागरण वैसे तो बड़े नेताओं और बड़े अफसरों के तलवे चाटता है लेकिन बुलंदशहर की महिला डीएम को कमजोर समझकर जो पीत पत्रकारिता शुरू की, उसका खामियाजा उसे अब खुद भुगतना पड़ रहा है।

दैनिक जागरण के बुलंदशहर आफिस को कूड़े से पाटे जाने का वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: https://youtu.be/kYVgY4D7qzc


पूरा मामला जानने के लिए इसे भी पढ़ें:

जबरन सेल्फी लेने वाले मनचले को जेल भिजवाने वाली डीएम चंद्रकला के पीछे क्यों पड़ा है दैनिक जागरण?

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जबरन सेल्फी लेने वाले मनचले को जेल भिजवाने वाली डीएम चंद्रकला के पीछे क्यों पड़ा है दैनिक जागरण?

बी. चंद्रकला (जिलाधिकारी, बुलंदशहर)

नीचे चार आडियो टेप हैं. ये टेप करीब तीन महीने पहले सामने आये थे. बुलंदशहर के करोड़ों रुपये के आईटीआई परीक्षा घोटाले से संबंधित इन टेपों के जरिए पता चला कि इस पूरे घोटाले में दैनिक जागरण, बुलंदशहर के ब्यूरो चीफ सुमन करन भी किसी न किसी रूप में संलिप्त हैं. जागरण प्रबंधन ने सब कुछ जानकर भी अपने दागी ब्यूरो चीफ को पद से नहीं हटाया. बुलंदशहर की जिलाधिकारी बी. चंद्रकला ने जब अपने संग जबरन सेल्फी लेने वाले एक मनचले युवक को जेल भिजवाया तो जागरण के इसी दागी पत्रकार ने उनसे जले पर नमक छिड़कने वाले अंदाज में सवाल पूछा जिसके बाद चंद्रकला ने भी पत्रकार को कायदे से समझाया.

आप सोच सकते हैं कि इस पुरुष प्रधान देश में जब एक डीएम महिला के साथ जबरन सेल्फी लेते हुए अभद्रता की कोशिश हो सकती है तो आम महिलाओं की क्या स्थिति होगी. किसी के जख्मों पर अगर नमक डाला जाये तो कैसा महसूस होता है. जाहिर है दर्द ही होता. लोकतन्त्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया माध्यम के प्रतिनिधि ने बुलंदशहर की जिलाधिकारी बी. चन्द्रकला से उनकी पीड़ा को इसी मानसिकता से जानने की कोशिश की जिसके बाद चन्द्रकला ने उस व्यक्ति को हकीकत का आईना दिखाया. सोशल मीडिया पर इस बातचीत से संबंधित ऑडियो के वायरल होने के बाद बुलंदशहर की महिलाओं ने जिलाधिकारी के इस स्वाभिमानी व सख्त रवैये की सराहना की और बताया कि पत्रकार हो या समाज का कोई वर्ग उन्हें अबला न समझे.


बुलंदशहर के आईटीआई परीक्षा घोटाले से संबंधित कुछ टेप जिसमें दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ का नाम आया था….

टेप नंबर एक

टेप नंबर दो

टेप नंबर तीन

टेब नंबर चार


कुछ महीने पहले की याद कीजिए. ये वही देश है जिसने निर्भया के हत्यारे एक नाबालिग को कानून से इतर फांसी की सजा की मांग की थी. महिलाओं की सुरक्षा की मांग के सामने सरकार झुकी और कानून में बदलाव हुआ. जाहिर है निर्भया के लिए हुए आंदोलन में मीडिया की बड़ी भूमिका थी. लेकिन बुलंदशहर में डीएम बी. चन्द्रकला के सेल्फी मामले में मीडिया के एक वर्ग का मापदंड बदल दिया गया. मीडिया माध्यम ने बहस छेड़ी कि महिला डीएम की सेल्फी लेने वाले युवक को उसकी अभद्रता के बाद भी माफ कर दिया जाना चाहिए था. घटना के एक दिन बाद इस मीडिया माध्यम के प्रतिनिधि ने डीएम की उस बातचीत को निजता कानून का उल्लंघन करते हुए न केवल रिकॉर्ड किया, बल्कि उसे सार्वजनिक भी कर दिया. बी. चन्द्रकला ने मीडिया माध्यम को करारा जबाब देते हुए बताया है कि महिलाओं की संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए.

दरअसल, डीएम बी. चन्द्रकला के साथ हुई यह घटना 1 फरवरी की शाम की है और जागरण के रिपोर्टर से बातचीत वाला ऑडियो उसके करीब 24 घंटे बाद रिकॉर्ड की गयी है. जिलाधिकारी के जिस जवाब को मीडिया माध्यम में छापने के लिए उन्हें फोन किया गया, उसका उन्होंने जिक्र तक अगले दिन की खबर में नहीं किया. शहर की महिलाओं का कहना है कि मीडिया माध्यम आधी आबादी की आवाज दबाने का काम कर रहा है. जिलाधिकारी ने अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए बिल्कुल ठीक जवाब दिया है. अब अगर कोई इसे तूल देता है तो ये देश के चौथे स्तंभ का दुर्भाग्य है. 

सभी लोग यह सवाल करें कि बुलंदशहर की डीएम बी चन्द्रकला के साथ जबरन सेल्फ़ी लेने वाले को सज़ा देने पर हंगामा क्यों? अब कुछ बात बयानबाजियों पर. पता चला है कि राकेश टिकैत जी ने भी डीएम के खिलाफ बयान दिया है. उनसे ऐसी हल्की बात की उम्मीद नहीं थी. आज स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत की याद आ गयी. वो लड़कियों और महिलाओं की कितनी इज़्ज़त करते थे. क्या अब मेरठ मुज़फ्फरनगर की माता बहनों की जबरदस्ती सेल्फ़ी खींची जाने लगेंगी और पेपरों में छपने लगेंगी? लोग खुश होकर चटखारे लेकर फोटो देखेंगे और खबर पढ़ेंगे तो अच्छा लगेगा?

‘लेडी सिंघम’ कहलाने वाली डीएम बी चन्द्रकला के बारे में जिन्हें नहीं पता वे फिर से जान लें. एक ऐसी शख्सियत जो प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सालों से लड़ती चली आ रही हैं. मात्र 23 साल की उम्र में राजस्थान से अपने करियर की शुरुआत करने वाली डीएम चन्द्रकला जहाँ गयीं वहां लोगों के दिल में बस गयी, महिला सशक्तीकरण की चर्चा आज उनका नाम लिए अधूरी मानी जाएगी. देश के दस साहसी अधिकारियों की लिस्ट में उनका नाम आना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है.

खैर कहते हैं जब कोई ईमानदार कोतवाल चार्ज लेता है तो इलाके के सभी चोर डर कर मौसेरे भाई हो जाते हैं. यह केस भी कुछ ऐसा है. बुलंदशहर एक एक गाँव में जब विकास की योजनाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी, तब फ़राज़ नाम का एक मनचला सभा के बीच में ही घुस कर डीएम के साथ बदतमीज़ी की और जबरदस्ती सेल्फ़ी लेने की कोशिश करने लगा. वो पहले भी एक कार्यक्रम के दौरान डीएम साहिबा के साथ सेल्फ़ी की मांग कर चुका था, तब चन्द्रकला ने उसे तस्वीर लेने का मौका दे दिया था. पर इस बार जब एक महत्वपूर्ण सभा के दौरान उसने ऐसा करना चाहा तब पुलिस ने फ़ौरन उसकी इस हरकत को देख शांतिभंग के आरोप में उसे अंदर कर दिया. हालांकि वह अगले ही दिन जमानत पर बरी हो गया, पर राजनीतिक उद्देश्य से इस मामले को मीडिया के कुछ लोगों ने बेशर्मी से पेश किया.

देश के एक बड़े मीडिया ग्रुप दैनिक जागरण के एक पत्रकार मनोज झा लिखते हैं- ‘शौक ही तो था, पूरा कर लेने देना चाहिए था’. ये शब्द क्या किसी पत्रकार के हैं? एक महिला के साथ जबरदस्ती सेल्फ़ी लेने को शौक बताने वाले पत्रकार यहीं नहीं रुके. इस खबर की हेडलाइन में वो लिखते हैं- ‘अब लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगा है’. बाल की खाल खींचने वाले ऐसे ही लोग ऐसे मनचलों को बढ़ावा देते हैं. जब इंटरलॉक टाइल्स से बनी घटिया सड़क पर चन्द्रकला ने ठेकेदार समेत सभी अधिकारियों को फटकार लगाई थी तब ये कहाँ थे? जब क्लीन-यूपी अभियान के तहत उन्होंने लगातार 36 घंटे सफाई करने का कीर्तिमान बनाया था तब ये कहाँ थे?

भारत पितृसत्तात्मक समाज के लिए जाना जाता है और आज भी कुछ लोग इस सोच से उबर नहीं पाये हैं. आशा करते हैं कि भगवान उन्हें जल्दी ही सद्बुद्धि देगा और वो बेवजह चन्द्रकला जैसी निर्भीक डीएम का विरोध बंद करेंगे. कानून सबके लिए एक है और अनुशासन सबके लिए जरूरी. हिंदुस्तान की समस्त जागरूक जनता डीएम बी चंद्रकला के साथ है और उनसे ऐसे ही निर्भीकता से काम करते रहने की उम्मीद रखता है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सेल्फी प्रकरण पर जागरण के रिपोर्टर का सवाल सुनते ही आगबबूला हुई बुलंदशहर की डीएम, मां-बहन कह कह के जमकर हड़काया, सुनें यह टेप

बुलंदशहर में एक डीएम हैं. चंद्रकला नाम से. उनके साथ एक लड़के ने सेल्फी ली, बिना उनकी सहमति. इससे नाराज डीएम ने उस युवक को जेल भिजवा दिया. इस प्रकरण पर जब दैनिक जागरण के रिपोर्टर ने डीएम से पूरा घटनाक्रम जानना चाहा, डीएम का पक्ष जानना चाहा तो डीएम साहिबा इस कदर आग बबूला हुईं कि जागरण के रिपोर्टर को उसकी मां बहन का हवाला दे दे कर जमकर हड़काया.

पूरा टेप सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=6L2etDR3Rxk


इस प्रकरण को दूसरा पक्ष जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें…

जबरन सेल्फी लेने वाले मनचले को जेल भिजवाने वाली डीएम चंद्रकला के पीछे क्यों पड़ा है दैनिक जागरण?

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मीडिया वाली बाई

1975 से 1977 तक देश में आपात-काल था ! “दबंग” इंदिरा गांधी ने पत्रकारों को झुकने को कहा था , कुछ रेंगने लगे, कुछ झुके और कुछ टूटने के बावजूद झुकने से इंकार कर बैठे ! 2014 का नज़ारा कुछ अलग है ! भाजपा और आर.एस.एस. के नरेंद्र नरेंद्र मोदी और उनकी टीम दबंगई की जगह भय और अर्थ के ज़रिये कूटनीतिक रवैया अपना रही है ! ये टीम धौंस और धंधे की मज़बूरी को बख़ूबी कैश कराना जानती है ! परदे के पीछे की धौंस और पत्रकारिता का लेबल लगाकर धंधा करना, मोदी-राज में यही दो वज़ह है जो पत्रकार की खाल में (द) लाल पैदा कर रही है ! बारीक़ी से नज़र डालें, तो अब पत्रकार की जगह ज़्यादातर मैनेजर्स नियुक्त किये जा रहे हैं ! बड़े चैनल्स की सम्पादकीय कही जाने टीम पर गौर-फ़रमाएंगें तो पायेंगें कि  निम्नतम-स्तर के ज़्यादातर पत्रकार और उम्दा कहे जा सकने वाले ये एजेंट ही सम्पादकीय लीडर बने फिर रहे हैं ! पत्रकारों की क़ौम को ही ख़त्म कर देने पर आमादा मोदी और उनकी टीम ने पत्रकारिता में शेष के नाम पर कुछ अवशेष छोड़ देने का बीड़ा उठाया है और इसे साकार कर के ही छोड़ने पर तुली है ! शर्म आती है ! मोदी और उनकी टीम को भले ही ना आये ! और आयेगी भी क्यों ? यही तो चाहत है !

कुछ दिनों पहले की बात है , जब, प्रधानमंत्री की पार्टी में सैकड़ों पत्रकार पहुंचे ! पर इनमें से ज़्यादातर पत्रकारों का व्यवहार कुछ ऐसा मानो, चापलूसी-पसंद गुरूजी को उन्हीं के अंदाज़ में दक्षिणा देना ! नरेंद्र मोदी जितनी तेज़ी से सत्ता में छाते जा रहे हैं, उसी तेज़ी से मीडिया का पतन हो रहा है ! मीडिया चौथा-खंबा ना बनकर, धंधा होता जा रहा है ! ख़ास-तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ! मोदी का लगातार गुणगान और उन्हें हीरो बनाने वाले चैनल्स को चलाने वालों की नब्ज़, मोदी और उनकी टीम ने पकड़ लिया है ! “गन्दा है पर धंधा है” वाले दुनिया के सबसे पुराने पेशे और पेशेवर के समानांतर , आज का ज़्यादातर मीडिया और मीडिया-पर्सन आ खड़ा हुआ है ! यही सबसे “गन्दा” काम है, जो नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने कर दिखलाया है ! कम लोगों को मालूम है कि मेन-स्ट्रीम मीडिया और सोशल-मीडिया में जो भी लोग प्रो-मोदी कैम्पेन चला रहे हैं, उन्हें सत्ता की तरफ़ से अघोषित लाभ मिल रहा है ! कई ऐसे छुटभैये चैनल्स हैं, जिनके पास अपने कर्मचारियों को  ठीक-ठाक सैलरी देने की भी औकात नहीं मगर ये चैनल्स करोड़ों रुपये डिस्ट्रिब्यूशन पर लगा रहे हैं ! इन चैनल्स के मालिकों की निजी दौलत में इज़ाफ़ा हो रहा है ! कौन दे रहा है, इन्हें इतनी दौलत ?

ये सब कैसे हो रहा है , इसे समझा जा सकता है ! गुजरात और महाराष्ट्र के कनेक्शन से कई मीडिया-मालिकों को मोदी या भाजपा के राष्ट्रीय या क्षेत्रीय नेताओं को प्रमुखता से कवरेज देने की एवज़ में बेतहाशा लाभ मिल रहा है ! देखा जाए तो सत्ता भोगने के लिहाज़ से, ये मोदी के अनुकूल है लेकिन चौथे खंबे के (वर्चुअल) ख़ौफ़ को ज़मींदोज़ करने की दिशा में एक खतरनाक कदम !  बड़े कहे जाने वाले न्यूज़ चैनल्स, “आज-तक”–“इंडिया टी.वी”.–“ज़ी-न्यूज़”–“आई.बी.एन7”, “टाइम्स-नाउ”, “ए.बी.पी.न्यूज़” तो अघोषित तौर पर कांग्रेस विरोधी और मोदी व् भाजपा के माउथ-पीस के रूप में उभरे हैं और लगातार प्रो-मोदी बीट पर काम कर रहे हैं !  प्रिंट का बड़ा अख़बार “द टाइम्स ऑफ इंडिया” तो कांग्रेस-विरोधी उसी समय से हो चुका है जब इनके मालिकान पर “इलज़ाम” लगे थे ! 

पत्रकारिता और बाई के कोठे का अंतर धुंधलाता जा रहा है ! इलाके के नए दरोगा की “दहशत” ही कुछ ऐसी है कि, चाहे नयी-नवेली बाई हो या धंधे की पुरानी “मौसी”, हर कोई डरता है ! धंधे में कुछ धौंस का शिकार हैं तो कुछ पैसे में मदहोश! आज-कल इस गली की रौनक एक राजा बढ़ा रहा है ! ऐसा राजा, जिसका वादा  इस मंडी में लगने वाली बोली से कई गुना ज़्यादा ! ज़ाहिर है, मंडी में हुनर दिखलाने वालों के पैरों  में बंधे घुँघरू खनखना रहे है और ज़ुबा एहसानमंद !  दिल चीज़ क्या है, आप मेरी जान लीजिये

नीरज वर्मा के ब्लाग ‘लीक से हटकर’ से साभार. 

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चम्पादक कथा : विकास की सेल्फी : डांडिया टीवी के चम्पादक हनुमानी मुद्रा में उनके चरणों में बैठे थे….

Mayank Saxena : माननीय ने तय किया था कि जिस चौथे खम्भे की रंगाई पुताई कर के उसका हुलिया ही बदल देने में उन्होंने (उनके प्रायोजकों ने) करोड़ों खर्च किए थे, उनसे भी मिल लेंगे। माननीय को देश का सबसे बड़ा वक्ता (भाषणबाज़) बनना था और वो चाहते थे कि वो हर कहीं से भाषण देते हुए, हर कहीं दिखाई दे। वो बचपन से ही वक्ता बनना चाहते थे, बनिए के यहां तेल भी लेने जाते थे तो भाषण कर के मुफ्त में ले आते थे, मतलब वो मुफ्त दे कर हाथ जोड़ लेता था कि भाई और ग्राहक भी हैं, तुम दो घेटे से बिज़नेस मॉडल पर बोल रहे हो, यहां बिज़नेस ठप हुआ जा रहा है। तो सबसे बड़ा वक्ता बनने का सपना इसी चौथे खम्भे ने पूरा किया था, क्योंकि खम्भे पर सैकड़ों टीवी लगे थे और वो हर वक्त माननीय को ही प्रसारित करते थे।

अंततः माननीय ने ‘हमलावरों’ के बनवाए एक लाल पत्थर के किले और दुनिया में ‘शांति’ लाने के लिए ‘सैनिक मदद भिजवाने’ वाले दफ्तर में भी भाषण दे डाला था। लेकिन खम्भे के मजदूर उनसे नाराज़ थे कि खम्भे का फ़ायदा उठा लिया पर खम्भे का हाल भी न लिया। दरअसल चौथे खम्भे का इस्तेमाल अभी खत्म नहीं हुआ था, अभी तो शुरु हुआ था। और खम्भा भी अपनी नक्काशी कराए जाने के इंतज़ार में टीवी फुंक जाने तक उन्हें चलाने को तैयार था। सबसे पहले आंसू वाला गीला भाषण हुआ और फिर सूखे, थोड़े गीले और पपड़ीदार हर तरह के भाषण हुए, लेकिन माननीय खम्भे का हाल लेने भी नहीं आए।

यहां तक कि खम्भे के आगे बाड़ लगा दी गई। खम्भा और मजदूर नाराज़ थे लेकिन जानते थे कि माननीय नाराज़ हो गए तो खम्भा और रंग दोनों उखाड़ दिए जाएंगे। खम्भा था जो जनता को रोशनी देने के लिए, लेकिन खम्भे के मजदूरों की नीयत खास बनने की थी। खास मतलब कि वो जो रोशनी दे या न दे, ख़ुद जगमगाता रहे। ऐसे में खम्भे ने शिकायत करनी शुरु की, कि भई हमने तो आपको अपने ऊपर चढ़ा कर आपकी लम्बाई बढ़ा दी, आपके सिवा किसी और को दिखाया ही नहीं, देश में तानाशाही तक का समर्थन कर दिया और आप हो कि….लोकतंत्र को ही खत्म कर रहे हो… तो पहले भाषण के 5 महीने बाद माननीय ने कहा कि वो खम्भे का हाल लेंगे। अब आप कहेंगे कि चम्पादक कहां गया, तो जनाब ये जो डी न्यूज़ चैनल के बाहर एक कार और एक ओबी वैन खड़ी है, उसे ग़ौर से देखिए।

कार में एक ‘डम्बवाद’दाता बैठा है, जो अपनी गर्लफ्रैंड से बतिया रहा है…

डम्बवाददाता – जानू…कहो तो तुम्हारे लिए एक ऑटोग्राफ ले आऊं माननीय का…?

(उधर से जो कहा जा रहा है, उसका सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है…)

डम्बवाददाता – अब तुम्हें कैसे ले जा सकता हूं…जानती हो माननीय की सुरक्षा दुनिया में सबसे कड़ी है…

डम्बवाददाता – देखो तुम्हारे लिए तस्वीर पर ऑटोग्राफ ले आऊंगा…

डम्बवाददाता – अच्छा कोशिश करूंगा कि तुमको उनके हस्ताक्षर वाली चिट्ठी आ जाए…

डम्बवाददाता – ओह्हो…झिलायंस में नौकरी के लिए भी गिड़गिड़ा लूंगा…लेकिन इतनी बात करने को तो मिले…

डम्बवाददाता – अरे पहचानते थे…अब तो चुनाव हो गए…वो प्रधान वक्ता भी बन गए…अब पता नहीं पहचानेंगे या नहीं…

डम्बवाददाता – अच्छा ठीक है…उनसे बात हुई तो कहूंगा कि किसी एक भाषण में तुम्हारा नाम ले दें…उनको क्या है…दिन में चालीस भाषण तो दे ही देते हैं…कहीं न कहीं ले लेंगे नाम…अब ये मत कहना कि तुम्हारे नाम पर भी कोई योजना शुरु कर दें…

डम्बवाददाता – क्या तुम्हारी मम्मी के नाम पर…

डम्बवाददाता – रुको यार…चम्पादक जी का फोन आ रहा है…अब पता नहीं क्या हो गया…?

(डम्बवाददाता फोन काट कर चम्पादक को कॉल लगाता है)

चम्पादक डी न्यूज़ – कहां हो…

डम्बवाददाता – सर, गाड़ी में बैठा हूं…ओबी में तेल पड़ रहा है….

चम्पादक डी न्यूज़ – रुको तुम रहने दो…माननीय की प्रेस मीट में मैं जा रहा हूं…

डम्बवाददाता – सर लेकिन मैं जा रहा हूं न…इनविटेशन भी मेरे नाम का है…

चम्पादक डी न्यूज़ – लेकिन चम्पादक कौन है?

डम्बवाददाता – सर…लेकिन

चम्पादक डी न्यूज़ – अरे…24 घंटे उनको दिखाने का फैसला कौन लेता है…किसकी मर्ज़ी से हर बुलेटिन की शुरुआत उनके चेहरे से होती है…किसकी मर्ज़ी से न्यूज़रूम में उनकी तस्वीर टांगी गई है…किसकी मर्ज़ी से चैनल के लोगो तक में उनकी तस्वीर लगाने की चर्चा हो रही है?

डम्बवाददाता – सर…ये सब आपकी मर्ज़ी से तो नहीं हो रहा है…ये तो ऊपर वाले की मर्ज़ी है…विज्ञापन तो वही देता है…और सैलरी भी…

चम्पादक डी न्यूज़ (खिसियाते हुए) – फिर भी…उनका इंटरव्यू किसने किया था?

डम्बवाददाता – सर, इंटरव्यू के लिए सेटिंग किसने की थी?

चम्पादक डी न्यूज़ – तो उनकी पार्टी के नेताओं की पैनल में खुशामद कौन करता था?

डम्बवाददाता – तो सर…चुनाव में उनका विज्ञापन कौन लाया था?

चम्पादक डी न्यूज़ (डर जाता है) – अच्छा चलो…दोनों साथ ही चलते हैं…

डम्बवाददाता – लेकिन सर…वहां सवाल मैं पूछूंगा…

चम्पादक डी न्यूज़ – सवाल? माननीय तो साक्षात जवाब हैं…हा हा हा…रुको मैं आ रहा हूं…और आज इंडिका से मत जाओ भाई…मालिकान ने बड़ी गाड़ी से जाने को कहा है…

डम्बवाददाता – सर, सोचा तो ये ही था कि सरकार आते ही बड़ी गाड़ी भी आ जाएगी लेकिन…

चम्पादक डी न्यूज़ – आज उसी का जुगाड़ करना है…चलो तैयार रहो…

(गाड़ी चल देती है…इस एक दृश्य को आप थोड़ा बहुत हेरफेर कर के लगभग सभी चैनल्स का सीन मान सकते हैं…)

उसी समय उसी सड़क से एक और गाड़ी जा रही है, जिसके अंदर मीनिया न्यूज़ के चम्पादक काला चश्मा लगाए बैठे हैं, चम्पादक जी पहले ‘डम्बवाद’दाता थे और देश की नई पीढ़ी के ज़्यादातर डम्बवाददाताओं ने इन्हीं को प्रेरणास्रोत मान कर, ‘डम्बवाद’ का रास्ता अपनाया। ‘डम्बवाद’ देश की पत्रकारिता में आदर्शवाद के प्रतिरोध के आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था और अब देश में डम्बवादी पतितकारिता ही पत्रकारिता की मुख्यधारा मानी जाती है। चम्पादक जी पिछले कुछ साल से चम्पादक के तौर पर डम्बवाददाता की ज़िम्मेदारी को कुशलता से निभाते आए हैं कि जनता को पता ही नहीं है कि वो दोनों में से कौन हैं। क्लीन शेव से हल्की दाढ़ी और फूल-पत्ती वाली शर्ट से एक्ज़ीक्यूटव सूट के दौर तक माइक इनके साथ वैसे ही रहा है, अब तो ऐसा लगता है कि माइक इनके शरीर का हिस्सा है। जानने वाले बताते हैं कि वो सोते, खाते और नित्यक्रिया के समय भी माइक पकड़े रहते हैं, माइक नहीं होता है तो हाथ में माइक रहने का अभिनय करते हुए बात करते हैं। इनके मशहूर अनुयायियों में हिमेश रेशमिया भी हैं। तो गाड़ी आगे चलती है…

मीनिया न्यूज़ चम्पादक – अरे ड्राइवर… क्या नाम है तुम्हारा… ज़रा गाड़ी किनारे लगाओ पान की दुकान पर…

(गाड़ी रुकते ही पानवाला दौड़ कर चम्पादक जी के हाथ में राजश्री पकड़ा देता है, राजश्री क्या है, ये जानने के लिए सम्पर्क करें पान की दुकान पर, चम्पादक जी राजश्री का पैकेट फाड़ कर उसमें जर्दा मिलाते हैं और मुंह को हुआं-हुआं करने के अंदाज़ में ऊपर उठाते ही हैं कि सामने से डी न्यूज़ के चम्पादक गाड़ी में जाते दिखते हैं…)

मीनिया न्यूज़ चम्पादक – अबे राजिंदर…जल्दी गाड़ी भगा…

(ऐसे मौके पर ड्राइवर का नाम याद आ जाना स्वाभाविक है…)

कैमरामैन टिल्टअप नेगी – क्या हुआ सर…अभी तो देर है…

मीनिया न्यूज़ चम्पादक – अबे वो देखो अधीरवा जा रहा है…साला जल्दी पहुंच कर सबसे आगे की सीट ले लेगा…माननीय के बगल वाली…अबे अपन तो पुराने स्वयंसेवक रहे हैं…माइक के अलावा बस निकर ही थी जो हमेशा पहने रहे…प्रेस कांफ्रेंस में जाते थे तो बाकी लोग जॉकी की अंडरवियर उघाड़े रहते थे…हमारे तो चेहरे पे ही निकर दिखती थी…सबसे आगे तो अपन बैठेंगे…

टिल्ट अप नेगी – सर…हां…आगे से सवाल भी पहले पूछ सकते हैं…

मीनिया न्यूज़ चम्पादक – सवाल…हा हा हा… माननीय सवाल नहीं सुनते… जवाब देते हैं… साक्षात उत्तर रूप हैं…

गाड़ी चलती है, स्पीड ब्रेकर आते ही माननीय के मुंह के अंदर जर्दे से प्रतिक्रिया कर रहे राजश्री की पीक उनके होठों के किनारे छलक आती है, ठीक जैसे पत्रकारों के सवालों में उनकी समझ) इधर ऐसी ही और कई गाड़ियां सड़कों पर एक दूसरे से रेस कर रही थी, माननीय ने पांच महीने में पहली बार मिलने जो बुलाया था। ज़ाहिर है अब अगला मौका शायद पांच साल बाद ही आता। गाड़ियों और उनमें बैठे लोगों के नाम चैनलों के नाम के हिसाब से आप तय कर सकते हैं।

इधर एल सी डी टीवी के दफ्तर में चम्पादक कुर्सी पर उकड़ू बैठे थे, सामने 1 दर्जन टीवी स्क्रीन थी, ये मॉनीटर करने के लिए कि कौन सा चैनल क्या चला रहा है। लेकिन पिछले 8 महीने से 1 को छोड़ कर बाकी सारी टीवी स्क्रीन बंद कर दी गई थी। एडमिन और प्रबंधन का तर्क था कि सारे चैनल जब माननीय को ही दिखा रहे हैं तो कोई भी एक देख लो, बिजली बचेगी और कॉस्ट कटिंग भी नहीं कहलाएगी। एल सी डी टी वी के चम्पादक औऱ चैनल को भी पहले साम्यवाद और फिर अवसरवाद का अनुयायी माना जाता था, हालांकि चम्पादक जो पहले काडर हुआ करते थे और कैम्पस में लाल झंडा ले कर नाचते थे, अब कहते थे कि वो वाम के नहीं, अवाम के अनुयायी हैं।

ग़ौरतलब बात यह है कि पिछले 8 महीने से उनके चैनल ने भी माननीय को इतना दिखाया था, जितना कि सेट मैक्स पर सूर्यवंशम नहीं दिखाई जाती है। पर चम्पादक जी के अंदर का जीव अभी जीवित था, इसलिए उन्होंने तय किया था कि वो माननीय की प्रेस मीटिंग में नहीं जाएंगे। अंदर से उनको डर था कि माननीय अपने खिलाफ की गई रिपोर्टिंग पर उन से मौज ले सकते हैं, या कहीं उन्हें देखते ही माननीय को पुरानी रंजिश याद न आ जाए। लेकिन ऊपर से उन्होंने सबसे ये ही कहा था कि वो माननीय के नैतिक सैद्धांतिक विरोध में नहीं जा रहे हैं।

उकड़ू बैठे चम्पादक जी के हाथ में एक डम्बवाददाता चाय देता हुआ बोला, डम्बवाददाता – सर, आप नहीं गए…

चम्पादक एल सी डी टीवी – नहीं… अपना माइकेश कुमार गया है न…

डम्बवाददाता – सर, आपको जाना चाहिए…

चम्पादक एल सी डी टीवी – तुम तो जानते हो…अपना छत्तीस का आंकड़ा है…

डम्बवाददाता – अब कैसा आंकड़ा सर…अब तो उनके पास बहुमत का आंकड़ा है…देश के माननीय हैं…अब क्या दुश्मनी…आपकी नाराज़गी व्यक्ति से है…विरोध व्यक्ति से है…देश से थोड़े ही…लोगों ने चुना है…

चम्पादक एल सी डी टीवी – वो तो ठीक है लेकिन उनको भी अच्छा नहीं लगेगा…

डम्बवाददाता – लगेगा सर…प्रवक्ता जी बता रहे थे कि आपका हाल चाल पूछ रहे थे…

(चम्पादक एल सी डी टीवी कुर्सी पर ही उकड़ू से खड़े हो जाते हैं…ऊपर से ही पूछते हें)

चम्पादक एल सी डी टीवी – सच कह रहे हो…

डम्बवाददाता – जी सर, आपकी तारीफ कर रहे थे कि कर्मठ और ईमानदार आदमी हैं, इनको तो पीएमओ में होना चाहिए…

चम्पादक एल सी डी टीवी – मतलब लोग ठीक कहते हैं…ये आदमी वाकई बदल गया है…ख़ैर लेकिन अब तो देर हो जाएगी…

डम्बवाददाता – आप तो हर प्रेस कांफ्रेंस में देर से ही पहुंचते थे सर…दफ्तर भी तो…

चम्पादक एल सी डी टीवी – हां ये भी है…ओए मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो…

डम्बवाददाता – सर बाहर गाड़ी तैयार है…

चम्पादक एल सी डी टीवी – ओह…ठीक है मैं चलता हूं…चैनल तो वैसे भी मेरी मर्ज़ी के बिना ही चल रहा है…

डम्बवाददाता – सर….चप्पल तो पहन लीजिए….

(लेकिन तब तक चम्पादक एल सी डी टीवी कार में बैठ कर फुर्र हो चुके हैं और सोच रहे हैं कि आज माननीय को ख़तरनाक सवाल पूछ कर ध्वस्त कर दूंगा।)

उधर सारे चैनलों पर सुबह से सिर्फ एक ही ख़बर है, आज चम्पादकों से मिलेंगे माननीय…माननीय और मीडिया का मिलन (जो कि साल भर पहले ही हो गया था)

…देश का नेता कैसा हो (डांडिया टीवी)…

माननीय की मीडिया मस्ती…

मजदूरों से मिलेगा मालिक…

मीडिया और माननीय बदलेंगे देश…

मीडिया की जीत…

इस तरह की हेडलाइन्स…क्रोमा और ब्रेकिंग के साथ चैनल देश की सेवा में जुटे हैं। ऐसा आत्मविश्वास कि देश ये ही बदलेंगे, शहीदों ने केवल ड्रामा किया था। एक एंकर तो एक रात पहले से ही लगातार चिल्ला रहा है, हालांकि वो हर रात चिल्लाता है पर इस बार तो ख़रज के सुर भी बिल्कुल सटीक हैं। प्रेस मीटिंग शुरु हो गई है, राष्ट्रगान के बाद माननीय पधारते हैं और उनको देख कर सारे चम्पादक और डम्बवाददाता उठ कर तन कर खड़े हो जाते हैं…वो भी जो राष्ट्रदान में या तो फोन पर थे या ऊंघ रहे थे। माननीय मुस्कुरा कर हाथ जोड़ते हैं और बैठने का इशारा करते हैं।

चाय नाश्ता आने लगता है लेकिन पहली बार पतितकारों की दृष्टि नाश्ते पर नहीं बल्कि माननीय के आभामयी मुखमंडल की ओर है। चम्पादक एल सी डी टीवी सबसे पहला सवाल पूछना चाहते हैं लेकिन तब तक माननीय जवाब देना शुरु कर चुके हैं। माननीय बोलते जाते हैं…बोलते जाते हैं…चम्पादक हाथ जोड़ कर ऐसे बैठे हैं जैसे सत्यनारायण की कथा चल रही हो और माननीय की जिव्हा पर तो साक्षात सरस्वती विराजमान है। जी हां, वही सरस्वती, जिसे चम्पादक जी कब का हिंडन में प्रवाहित कर आए हैं…लेकिन वो हैरान हैं कि सरस्वती और लक्ष्मी का ये कैसा डेडली कॉम्बिनेशन है।

प्रेस मीटिंग के तीन घंटे के समय में लगभग नारको टेस्ट की सी स्थिति में चम्पादक और डम्बवाददाता बैठे रहते हैं और माननीय 2 घंटे और 55 मिनट बोलते हैं।

माननीय – मैं आपका आभारी हूं… (चम्पादक बेहोश होना शुरू होते हैं)

माननीय – आप लोगों का समर्थन चाहिए…

चम्पादक डांडिया टीवी – अरे सर…घर की ही बात है…

माननीय – हम देश बदल देंगे…

चम्पादक मीनिया न्यूज़ – जैसे हम ने पत्रकारिता बदल दी सर…

माननीय – देश की सेवा करनी है…

माननीय – देश महान है…संस्कृति महान है…गुरुजी ने कहा था….

माननीय – भारतवर्ष की लाखों साल पुरानी परम्परा…

माननीय – पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब…

माननीय – मीडिया हमारी दोस्त है…

चम्पादक डी न्यूज़ – इतनी हमारी औकात कहां सर….

माननीय – देखिए देश की कई समस्याएं हैं…

माननीय – पिछली सरकार में…

माननीय – देश में हिंसा नहीं होनी चाहिए…

माननीय – मित्रों…मित्रों…मित्रों…

माननीय – देखिए आप सब माइक फेंक दीजिए…झाड़ू ले लीजिए…

माननीय – काला धन…सॉरी…गड़ब-गड़ब-गड़ब

माननीय – विकास… परम्परा… विकास… संस्कृति… विकास… भारतवर्ष… विकास… ऋषि-मुनि… विकास… कारपोरेट… विकास… डिज़ाइनर कुर्ते… विकास… झाड़ू…. विकास… गंगा… विकास… कश्मीर… विकास… सेनाएं… विकास… देख लेंगे… विकास… गुरु जी… विकास… नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे… विकास… अम्बानी… विकास… अदानी… विकास… येदियुरप्पा… विकास… पाकिस्तानी एजेंट… विकास… ट्वीट… ट्वीट… ट्वीट… विकास… फेसबुक… विकास… बुलेट… ट्रेन… विकास… अमेरिका… विकास… एनआरआई… विकास… आतंकवाद…. विकास… दीवाली…

(अंत में माननीय घड़ी देखते हैं…5 मिनट का समय बचा है)

माननीय – अब आप लोग कुछ पूछना चाहें तो…

माननीय – एक मिनट…अरे कुछ खाइए तो…आप लोग तो…

माननीय – अरे मीनिया न्यूज़ वाले चम्पादक जी…और घर पर सब कैसे हैं…क्या हाल चाल हैं आपके…

चम्पादक मीनिया न्यूज़ (कुर्सी से मेज़ तक लोट पोट हो जाते हैं) सर…बस आप की दुआ है…क्या कहें… (पैर पटक कर खुश होने लगते हैं…कोट पर चाय गिरा लेते हैं…उधर मीनिया न्यूज़ पर ब्रेकिंग फ्लैश होती है..) “माननीय ने पूछा चम्पादक जी का हाल चाल….माननीय ने चम्पादक जी को पहचाना…माननीय विकास…देश…चम्पादक…विकास…मीडिया…विकास….@#$%”)

इधर चम्पादक एल सी डी टीवी फिर से सवाल पूछने के लिए आगे बढ़ते ही हैं कि डी न्यूज़ के चम्पादक लगभग हिस्टीरिया की हालत में भागते हुए माननीय की ओर बढ़ते हैं….माननीय उठ कर खड़े हो रहे हैं…चम्पादक जी के पैर में डांडिया टीवी के चम्पादक पैर अड़ाते हैं और वो सीधे साष्टांग दंडवत की स्थिति में माननीय के पैरों में गिर जाते हैं….

माननीय – अरे नहीं नहीं…अभी तो शुरुआत है…आप अभी से पैरों में गिर गए…

चम्पादक डी न्यूज़ – अरे नहीं…वो तो परम्परा… विकास… संस्कृति… विकास… ऋषि-मुनि… विकास…

माननीय – ठीक है…ठीक है…ये तो मेरा ही भाषण है…

चम्पादक डी न्यूज़ – सर, वो क्या है आपके साथ एक तस्वीर खिंचवानी है…

माननीय – देखिए अगली बार मिलते हैं तो…

चम्पादक डी न्यूज़ – सर… वो दफ्तर में लगानी है… न्यूज़रूम में… कई सारे वामपंथी भरे हैं… थोड़ा ख़ौफ़ तो पैदा हो…

माननीय – ठीक है…ठीक है…लेकिन कैमरा…

चम्पादक डी न्यूज़ – अरे सर…आप तो ख़ुद सेल्फी के एक्सपर्ट हैं… कैमरा क्यों… एक सेल्फी ले लेते हैं…

और इससे पहले कि माननीय एक शब्द कहें, चम्पादक जी एक सेल्फी लेते हैं…और उनके सेल्फी लेने से पहले ही डी न्यूज़ ब्रेकिंग चला रहा है…

“माननीय के चरणों तक पहुंचा डी न्यूज़”

“भारतीय संस्कृति का बढ़ा मान”

“डी न्यूज़ चम्पादक का माननीय को दंडवत्”

“माननीय ने खिंचवाई डी न्यूज़ चम्पादक के साथ सेल्फी”

“विकास की सेल्फी में माननीय”

“डी न्यूज़ की एक्सक्लूसिव सेल्फी”

तब तक माननीय को अपने पैरों में गुदगुदी से महसूस होती है…वो नीचे देखते हैं तो डांडिया टीवी के चम्पादक, हनुमानी मुद्रा में उनके चरणों में बैठे थे।

माननीय – अरे कर्मा जी…ये क्या कर रहे हैं…आप तो पुराने स्वयंसेवक हैं…

कर्मा जी – सर…आपके फीते खुल गए थे…सोचा कि बांध दूं…आप तो व्यस्त थे…मुंह के बल गिर जाते तो…

माननीय – चलिए अच्छा किया…मैं भी कम-पानी जी के फीते बांध कर बोर हो गया हूं…आज किसी ने मेरे ही बांध दिए… तो आपको डांडिया टीवी भी लिए चलते हैं…

एंकर – और डांडिया टीवी ने रचा इतिहास…माननीय के खुले फीते बांध कर…कर्मा जी ने उनको गिरने से बचाया…और ख़ुद गिरते ही चले गए…माननीय के जूतों के साथ कर्मा जी की एक्सक्लूसिव तस्वीरें आपको हम दिखा रहे हैं…ये देखिए ये लाल गोले में हैं माननीय के जूते…काले रंग के जूते…और ये छोटे गोले में कर्मा जी के हाथ…और ये तीर दिखा रहा है…उन फीतों को, जिनको बांधा गया…ये एक्सक्लूसिव तस्वीरें आप देख रहे हैं सिर्फ डांडिया टीवी पर….

चम्पादक एल सी डी टीवी बाहर निकल रहे थे…खिसियाए से…उनका डम्बवाददाता उनके पास पहुंचा माइकेश कुमार – क्या हुआ सर…तबीयत ठीक नहीं है क्या…

चम्पादक एल सी डी टीवी – नहीं यार एक सवाल भी न पूछ सका…

माइकेश – हा हा हा…माननीय से सवाल…ये प्रेस मीटिंग थी सर…जैसे इलेक्शन मीटिंग होती है…बोर्ड मीटिंग होती है…

चम्पादक एल सी डी टीवी – मतलब…

माइकेश – मतलब सर…मीटिंग में सवाल नहीं पूछे जाते…एडीटोरियल मीटिंग में आप किसी को सवाल पूछने देते हैं क्या…

चम्पादक एल सी डी टीवी – मतलब…

माइकेश – आप क्या कहते हैं वहां…सवाल मत पूछो…जो कहा जा रहा है..वो करो…

चम्पादक एल सी डी टीवी – तो…

माइकेश – तो ये भी वही था…सवाल मत पूछो…जो कहा जा रहा है करो…

चम्पादक एल सी डी टीवी – तो क्या करें…

माइकेश – सबसे पहले तो माइक और कलम को फेंक दीजए…और फिर झाड़ू उठा लीजिए…

चम्पादक एल सी डी टीवी – मतलब?

माइकेश – मतलब पत्रकारिता और विचारधारा पर झाड़ू फिराइए…

चम्पादक एल सी डी टीवी – यार…एक सवाल पूछ लेता तो…

माइकेश – सवाल तो नहीं ही पूछ पाते…इससे अच्छा था कि एक सेल्फी ही खिंचा लेते…उस पर ही एक आधे घंटे का शो प्लान हो जाता…मुझे लगा कि आप कर लेगें सो मैंने नहीं खिंचाई…

चम्पादक एल सी डी टीवी – यार लोकतंत्र में सवाल और असहमति तो होंगे न…

माइकेश – सर…ये लोकतंत्र वोट वाला है…बहुसंख्यक का लोकतंत्र…और ये तो एक तरह की राजशाही ही है…बल्कि तानाशाही…बहुसंख्यक बोले तो वोट डाल पाने वालों का बहुमत…लोकतंत्र…आप क्या इसे वाकई लोकतंत्र समझते हैं…मुझे लगा था कि आप बहुत पढ़े लिखे हैं…

चम्पादक एल सी डी टीवी – लेकिन रेल किराया देखो…महंगाई…एक सवाल तो बनता था न…

माइकेश – आपको इससे क्या…आप न तो रेल से सफर करते हैं और न आप को महंगाई से दिक्कत है…सर ये लोकतंत्र वो वाला नहीं है…इस में मामला अलग है…ये मध्य वर्ग और उच्च वर्ग का लोकतंत्र है जो अपने फायदे के लिए सरकार बनाता है…गरीब और अमीर के फायदे अलग हैं सो लोकतंत्र अलग है…

चम्पादक एल सी डी टीवी – लेकिन बेसिक नीड्स…

माइकेश – वो भी अलग हैं…जैसे आपकी नीड है कि एक और फ्लैट…और मेरी बच्चे का एडमिशन…हैं न अलग अलग…आप सेल्फी ले लेते तो राइम टाइम बन जाता…

चम्पादक जी दुखी होते हुए कार की ओर जा रहे हैं, सेल्फी लेने वाले फेसबुक पर बधाईयां गिन रहे हैं, चम्पादक जी सोच रहे हैं कि न तो सेल्फी ही ली…न सवाल ही पूछा…मैं यहां आया ही क्यों…आप अगर चम्पादक हैं तो ये सवाल खुद से मत पूछिएगा, नौकरी नहीं कर पाएंगे…बस अगली बार सेल्फी लेने की कोशिश कीजिएगा…वरना फ्लैट, गाड़ी और क्रेडिट कार्ड की किश्तें आपके घर को विदर्भ बना देंगी…

(इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बंध नहीं है और अगर है तो ये उसकी ख़ुद की ज़िम्मेदारी है। व्यंग्य है, अन्यथा ही लें।)”

लेखक मयंक सक्सेना पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

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मोदी दिवाली मिलन वीडियो देखिए और लार टपकाने वाले पत्रकारों के नाम बताइए

Abhishek Srivastava : आज मैंने प्रधानजी का दिवाली मंगल मिलन वाला पूरा वीडियो तसल्‍लीबख्‍श देखा। एक नहीं, कई बार देखा। करीब पौन घंटे के वीडियो में कुछ जाने-माने लोग हैं, कुछ पहचाने हुए हैं जिनके नाम नहीं पता और अधिकतर अनजान हैं। दो-एक मित्र भी हैं संयोग से। उन्‍हें शायद न पता हो कि उनकी रेंगती हुई बेचैनी एएनआइ के कैमरों में कैद हो गई है। जो भ्रष्‍ट हैं, उनसे क्‍या गिला! जो धवल हैं, अपने किसिम के हैं, वे भी लटपटा रहे थे प्रधानजी के इर्द-गिर्द। ऐसा क्‍यों हुआ? क्‍या कोई मनोवैज्ञानिक दबाव था उनके ऊपर?

बुलाया गया है तो बेशक जाते, एक बार मिल भी लेते, लेकिन एक बार मिलने के बाद फ्रेम में लगातार कैद छटपटाहट किसलिए? कुछ लोग हंस तक नहीं पा रहे सहजता से। एक परिचित मैडम अमित शाह के सामने लटपटा रही थीं। जब वे इग्‍नोर कर के आगे बढ़ गए तो दांत चियार कर किसी को खोजने लगीं। एक सज्‍जन मौका निकालकर प्रधानजी के पैर छू लिए। प्रधानजी ने भाव नहीं दिया तो अंत तक उचकते रहे। प्रधानजी के गाड़ी में बैठने के बाद एक मिला किसी कैमरावाले से रिरिया रहा था कि भइया तुमने मेरी जो फोटो खींची है वो दे दो। उससे कुछ मिनट पहले ज़ी बिज़नेस पर उछलकूद करने वाला एक मध्‍यम कद का चम्‍पक जाने किस डील के चक्‍कर में पीयूष गोयल को पकड़कर किसी फाइलवाले से मिलवाने बाहर फांदते हुए आया था।

मुझे लगता है कि मीडिया मिलन समारोह के उस वीडियो का पर्याप्‍त फॉरेन्सिक परीक्षण जनता की प्रयोगशाला में होना अभी बाकी है। जो कोई मित्र वहां लार टपकाते चेहरों को पहचानते हों, वे गुज़ारिश है कि नाम सार्वजनिक करें। दिक्‍कत हो तो इनबॉक्‍स करें। विशेष आग्रह भाई Yashwant Singh और Vineet Kumar से है। 25 अक्‍टूबर, 2014 के समारोह की नामवाची मीमांसा बेहद आवश्‍यक है। मदद करें। लिंक दे रहा हूं…

http://youtu.be/gXppwNEotUg

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.

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पत्रकारिता के ‘सेल्फी कुमारों’ पर मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान की भी पड़ गई नजर, आप भी देखें

इन दिनों ‘सेल्फी पत्रकारिता’ का चलन है. सत्ता-सिस्टम जहां दिखे, वहां पत्रकार-संपादक लोग ‘सेल्फी कुमार’ बनकर सेल्फी बनाने उतारने लगते हैं. नरेंद्र मोदी ने मीडिया को बातचीत के लिए दिवाली मिलन के बहाने बुलाया तो पत्रकार लोग मोदी का भाषण चुपचाप सुनने के बाद मोदी से मिलने करने लगे और सेल्फियां बनाने लगे. यह प्रकरण चर्चा का विषय बना और सबने ‘सेल्फी कुमारों’ की निंदा, आलोचना की. कोई मुद्दा अगर जनमानस के बीच आ जाए तो भला कार्टूनिस्ट उससे कैसे बेखबर रह सकते हैं. जाने माने कार्टूनिस्ट इरफान की भी नजर इन ‘सेल्फी कुमारों’ पर पड़ गई तो उन्होंने पूरे वाकये पर कुछ कार्टून बना डाले.

जल में रहकर मगर से बैर न करने की कहावत कही जाती है लेकिन इरफान ने मीडिया के मांद में हाथ डालने से परहेज नहीं किया. इरफान की इसी जनपक्षधरता और पैनी नजर के कारण कई मीडिया हाउस और कई ‘सेल्फी कुमार’ टाइप मालिक व संपादक उन्हें फूटी आंखों पसंद नहीं करते. पर इरफान भी इसकी परवाह न करते हुए अपना काम जारी रखते हैं. इरफान के कार्टूनिस्ट जनसत्ता अखबार में लगातार छपते रहते हैं और कुछ न्यूज चैनलों पर भी इरफान का काम गाहे-बगाहे दिखता रहता है. तो लीजिए, आप भी मीडिया के सेल्फी कुमारों पर बनाए गए इरफान के कार्टूनों का आनंद लीजिए.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


और, ये कार्टूनिस्ट गोपाल का एक कार्टून…

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मोदी मिलन पर बीबीसी में पत्रकार सौतिक बिस्वास की आंखो देखी रिपोर्ट पढ़िए- ”बुलाया था बात करने, पर सुनना पड़ा भाषण”

बीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास को भी मोदी दिवाली मिलन कार्यक्रम में बुलाया गया था. सौतिक ने आंखों दिखी लिखा है बीबीसी की वेबसाइट पर. इस राइटअप की काफी चर्चा है क्योंकि अब ज्यादातर लोग कहने लगे हैं कि मोदी के सामने पत्रकारों ने अपनी शालीनता खो दी और मोदी का एकतरफा भाषण सुनकर, सेल्फी बनाकर लौट आए. लीजिए सौतिक बिस्वास का लिखा पढ़िए….

 

बुलाया था बात करने, पर सुनना पड़ा भाषण

सौतिक बिस्वास, बीबीसी संवाददाता

नई दिल्ली : मई में ऐतिहासिक चुनावी जीत के बाद नरेंद्र मोदी की मीडिया से मुलाक़ात कई वजहों से दिलचस्प रही. पहली बात, कुछ चुनिंदा पत्रकारों को शुक्रवार को टेक्स्ट मैसेज मिला, जिसमें कहा गया था कि यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री के साथ एक ‘अनौपचारिक बातचीत’ रहेगा. बाद में पूछताछ करने पर पता चला कि दिवाली के मौके पर एक अनौपचारिक मुलाक़ात होगी. हमें बीजेपी के अशोक रोड कार्यालय पर सुबह पौने ग्यारह बजे पहुंचने को कहा गया. अंततः एक प्रफुल्लित वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया, मोदी ने फ़ैसला कर लिया है कि अब कुछ आराम से मीडिया से बात की जाए.

जब मैं कड़ी सुरक्षा वाले स्थान पर पहुंचा तो यह साफ़ हो गया कि यह कोई ‘अनौपचारिक बातचीत’ नहीं होने जा रही थी, बल्कि एक बड़े शामियाने के नीचे औपचारिक समारोह होने जा रहा है. दो टीवी स्क्रीन और उनके पीछे लगे मोदी और अमित शाह के लैमिनेटेड पोस्टर के आगे कई खाली कुर्सियां रख दी गई थीं. बहुत सारे पत्रकार और टीवी टीमों को निमंत्रित किया गया था. वे सफ़ेद कपड़े वाली टेबल के चारों ओर बैठ गए थे और मोदी का इंतज़ार कर रहे थे. तो यह तुरंत साफ हो गया था कि यह प्रधानमंत्री के साथ ‘अनौपचारिक बातचीत’ नहीं होने जा रही थी. इसके बजाय मोदी अपने अंदाज़ में इसे संबोधित करने वाले थे. और उन्होंने किया. वह क़रीब दोपहर में पहुंचे और पत्रकारों को संबोधित करना शुरू कर दिया.

इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान की बात की, जो उनके दिल के नज़दीक है. उन्होंने इस पर लिखने के लिए पत्रकारों और स्तंभकारों की प्रशंसा की और कहा कि अभियान पर विस्तृत समाचार दरअसल ‘एक अच्छा उदाहरण है कि पत्रकारिता एक रचनात्मक भूमिका अदा कर रही है’. पत्रकारों ने शांति से सुना. मोदी ने कहा, “आपने अपनी कलम को एक झाड़ू में बदल दिया.”

ठसाठस भरे टेंट में पत्रकारों के लिए प्रधानमंत्री का संबोधन सुनना अनोखा लग रहा था. इनमें से बहुतों ने एक भी ढंग की ख़बर स्वच्छ भारत अभियान पर नहीं लिखी थी, लेकिन उन्हें जन स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रभावों पर उपदेश दिया जा रहा था. तो प्रधानमंत्री मोदी, अपने माहौल में एक बार फिर से आदेशात्मक थे. निस्संदेह कोई सवाल नहीं पूछा गया.

दस मिनट के भाषण के बाद मोदी भीड़ में शामिल हो गए, पत्रकारों से घुलते-मिलते हुए और तो और सेल्फ़ी के आग्रहों पर उपकृत करते हुए. पीछे सरकार के कुछ वरिष्ठ मंत्री, जिनमें राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली- जो कुछ देर के लिए आए थे. वो ख़बरों के भूखे पत्रकारों से काले धन के अभियान पर, मोदी की जल्द ही होने वाली विदेश यात्रों पर, ऊर्जा संकट पर और बर्दवान में बम विस्फोट पर कहीं सार्थक चर्चा कर रहे थे.

इससे पहले मंच पर प्रधानमंत्री ने याद किया कि कभी पार्टी कार्यकर्ता के रूप में वह प्रेस कांफ्रेस में कैसे पत्रकार के बैठने का इंतज़ाम किया करते थे और वहां पत्रकारों से आसानी से मिल लिया करते थे. उत्साह से उन्होंने कहा कि वो भी दिन थे जब वह मीडिया के साथ अपने संबंध मज़बूत करने के तरीक़े ढूंढा करते थे. पता नहीं इससे उनका क्या मतलब था लेकिन मुझे यह शनिवार सुबह का सबसे मज़ेदार बयान लगा.

क्या वह सचमुच प्रेस मीट करने को तैयार थे जहां वह सारे सवाल सुनते और खुलकर उनके जवाब देते? या वह मीडिया से बचते रहेंगे और मुख्यतः सोशल मीडिया और अपने सिंहासन पर ही निर्भर रहेंगे- जहां से वह बोलें और दूसरे सुनें. मोदी मीडिया से बातचीत करने और खुलने के रास्ते पर आधे बढ़ गए थे. अब भी उन्हें पत्रकारों से खुलकर बात करने के लिए लंबा रास्ता तय करना है. ऐसे व्यक्ति के लिए, जो चाहता हो कि पूरी तरह उसके संदेशों पर नियंत्रण रहे, यह आसान नहीं होगा.

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ये देखिए… बरखा दत्त भी नरेंद्र मोदी की छतरी तले कल की चाय पार्टी में…

Dayanand Pandey : अब यह देखिए… एक साथ सेक्यूलर राजनीति और नीरा राडिया दोनों की पैरोकारी करने और तमाम-तमाम चीज़ें साधने वाली चिर कुंवारी बरखा दत्त भी नरेंद्र मोदी की छतरी तले कल की चाय पार्टी में, नरेंद्र मोदी का लुत्फ़ लेती हुई। पावर ब्रोकर कही जाने वाली यह वही बरखा दत्त हैं जो कभी मनमोहन सिंह सरकार के समय प्रधानमंत्री की शपथ के पहले ही ए राजा जैसों को कम्यूनिकेशन मिनिस्ट्री का पोर्टफोलियो मिलने का आश्वासन देती फ़ोन टेप पर पकड़ी गई थीं।

 

इनकी पावर ब्रोकरी और सेक्यूलरिज्म के किस्से अनेक हैं। एनडीटीवी में इनका जो जलवा है, सो तो है ही, तुर्रा यह कि पद्मश्री का खिताब भी है इनके पास। सोचिए कि कभी मेरे साथ भी यह रिपोर्टिंग कर चुकी हैं, जैसे कि कभी राजीव शुक्ल और हम साथ काम कर चुके हैं। लेकिन देखिए राजीव शुक्ला और बरखा दत्त को और हमको भी। हां, हमने पावर ब्रोकरी जो नहीं की। नफ़रत रही और कि है इस कला और इस फ़ितरत से। सिर्फ़ लिखने पढ़ने पर यकीन किया और कि करते हैं। शमशेर लिख ही गए हैं कि, ऐसे वैसे लोग कैसे कैसे हो गए / कैसे कैसे लोग ऐसे वैसे हो गए। तो क्या वैसे ही? फोकट में?

लखनऊ के पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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किसी पत्रकार ने कोई सवाल नहीं पूछा, सब के सब हिहियाते हुए सेल्फी लेते रहे…

Dayanadn Pandey : लोकतंत्र क्या ऐसे ही चलेगा या कायम रहेगा, इस बेरीढ़ और बेजुबान प्रेस के भरोसे?  कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले ही कहा था कि प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब व्यवसाय की स्वतंत्रता है। और कार्ल मार्क्स ने यह बात कोई भारत के प्रसंग में नहीं, समूची दुनिया के मद्देनज़र कही थी। रही बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तो यह सिर्फ़ एक झुनझुना भर है जिसे मित्र लोग अपनी सुविधा से बजाते रहते हैं। कभी तसलीमा नसरीन के लिए तो कभी सलमान रश्दी तो कभी हुसेन के लिए। कभी किसी फ़िल्म-विल्म के लिए। या ऐसे ही किसी खांसी-जुकाम के लिए। और प्रेस? अब तो प्रेस मतलब चारण और भाट ही है। कुत्ता आदि विशेषण भी बुरा नहीं है।

नरेंद्र मोदी की आज की चाय पार्टी में यह रंग और चटक हुआ है। सोचिए कि किसी एक पत्रकार ने कोई एक सवाल भी क्यों नहीं पूछा? सब के सब हिहियाते हुए सेल्फी लेते रहे, तमाम कैमरों और उन की रोशनी के बावजूद। मोदी ने सिर्फ़ इतना भर कह दिया कि कभी हम यहां आप लोगों के लिए कुर्सी लगाते थे! बस सब के सब झूम गए। गलगल हो गए। काला धन, मंहगाई, भ्रष्टाचार, महाराष्ट्र का मुख्य मंत्री, दिल्ली में चुनाव की जगह उपचुनाव क्यों, मुख्य सूचना आयुक्त और सतर्कता निदेशक की खाली कुर्सियां, लोकपाल, चीन, पाकिस्तान, अमरीका, जापान, भूटान, नेपाल की यात्रा आदि के तमाम मसले जैसे चाय की प्याली और सेल्फी में ऐसे गुम हो गए गोया ये लोग पत्रकार नहीं स्कूली बच्चे हों और स्कूल में कोई सिने कलाकार आ गया हो! मोदी की डिप्लोमेसी और प्रबंधन अपनी जगह था और इन पत्रकारों का बेरीढ़ और बेजुबान होना, अपनी जगह। लोकतंत्र क्या ऐसे ही चलेगा या कायम रहेगा, इस बेरीढ़ और बेजुबान प्रेस के भरोसे?

लखनऊ के पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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पारदर्शिता का जमाना : संपादकों की पीठ पर मोदी का हाथ और मोदी की पीठ पर अंबानी का…

Om Thanvi : यह पारदर्शिता का जमाना है साहब। पत्रकार नेताओं के प्रति अपनी आसक्ति नहीं छुपाते, नेता पूंजीपतियों के प्रति। इनको उनका हाथ अपने सर पर चाहिए, उनको उनका हाथ अपने काँधे पर।

Amit Bhaskar : ये निहायती शर्म से डूब मरने वाली बात है की देश के प्रधानमन्त्री का ऑफिस अम्बानी और उनकी धर्मपत्नी के बातों को वाक्य दर वाक्य ट्वीट कर रहा है। PMO क्या पागल हो गया है? अगर मोदी साहब को अम्बानी परिवार से इतना ही लगाव है तो आप चमचागिरी अपने नरेद्र मोदी वाले ट्वीटर हैंडल से करें। PMO का मतलब है प्रधानमंत्री ऑफिस और ये किसी के बाप की जागीर नहीं है.. ये देश को समर्पित है… ये आपके निजी पसंद के लोगों के बातों को लिखने का पेज 3 नहीं है। लगता है आप प्रधानमंत्री बन गए लेकिन अब तक भाषण देने के भूत को अपने भीतर से निकाला नहीं है। कुछ काम भी कर लो… गौड़ा साहब से ही पूछ लो, कहाँ से पैसे आ गए। अब प्रधानमंत्री हो आप भाई साहब। लानत है।

Dilip Khan : नए निज़ाम में अंबानी की चौड़ाई इतनी बढ़ गई है कि अब नीता अंबानी के कार्यक्रमों की घोषणा पीएमओ करता है. ‘नीता अंबानी विल स्पीक, वॉच’..ऐसा लग रहा है जैसे वही प्रधानमंत्री हो. बेशर्मी की हद है.  निजी रिश्ते रहे किसी उद्योगपति के साथ…इससे पहले भी रहे हैं. देश के हर प्रधानमंत्री के चार पांच आका उद्योगपति रहे हैं, लेकिन पीएमओ अंबानी के भाषण की सूचना दे…ये तो शर्मनाक है.

Usha Dubey : इस फोटो को देखने के बाद किसका खून गर्म नही होगा कि यह देश का p.m है या देश की जनता के साथ मजाक..??

हितेन्द्र अनंत : “कर लो PMO मुट्ठी में”

नवनीत चतुर्वेदी : (दृश्य एक) मित्रों !!!! नीता मुकेश अम्बानी से मेरा बहुत पुराना रिश्ता है… मुकेश भाई का हाथ भी हमारी पीठ पर है. प्रधानमंत्री कार्यालय के ट्वीट नीता अम्बानी की नजर में पेश है… (दृश्य दो) एक सजायाफ्ता चीफ एडिटर ज़ी न्यूज़ सुधीर चौधरी के साथ. भाइयो-बहनों! मैं गुजराती हूँ, बिज़नेस के गुण मेरी नस नस में है… मुझे पता है पीआर प्रबंधन, मीडिया मैनेजमेंट, अम्बानी-अडानी को कैसे सेट किया जाता है… अभी कल की ही बात है… जिन लोगों के लिये मैं कभी कुर्सियां लगाता था मित्रों… मैंने कल उन्हें घिघियाने और एक सेल्फ़ी के लिये मजबूर कर दिया… साले बड़े धुरंधर पत्रकार संपादक बना करते थे… किसी को चीन, पाकिस्तान, पेट्रोल, डीजल, स्वास्थ्य, कालाधन, हमारे वादे, दिल्ली चुनाव, महाराष्ट्र का सीन, महंगाई कुछ भी पूछने का मौका तक नहीं दिया!!!

Sharad Shrivastav : अंत मे सरकार ने अंबानी भाई की गैस के दाम बढ़ा ही दिये। काफी लोग खुश हैं की यूपीए वाले 8 डालर कर रहे थे, लेकिन देश भक्त मोदी सरकार ने 5.61 डालर ही किए। मोदी जी ने वादा भी किया था, देश नहीं बिकने दूँगा। पर साहब ये दाम डालर मे क्यों हैं। रिलायंस देश की कंपनी है, गैस देश के समुद्र से ही निकाली जा रही है। और बेची भी देश मे ही जा रही है। जब पहली बार गैस के दाम फिक्स हुए थे तब भी डालर मे थे, और रुपया रहा होगा 35-40 के आस पास। गैस के दाम डालर मे तो कई सालो तक वही रहे, लेकिन रुपए मे डबल हो गए। जरा सी होशियारी और अंबानी भाई ने बिना कुछ किए धरे अपना प्रॉफ़िट डबल कर लिया। आज भी भले रेट अंबानी की मांग से कम हों, लेकिन डालर की वजह से भविष्य मे उसे फायदा होता ही रहेगा। आखिर मोदी जी डालर को रुपए के 40 के भाव थोड़े ही करने जा रहे हैं। और वैसे तो आप जानते नहीं होंगे लेकिन मालूम कीजिएगा गैस की अन्तराष्ट्रिय कीमतें 3.67 डालर हैं। अपने देश मे गैस निकलाना बहुत महंगा है। गैस ही निकलती है। पता नहीं क्यों पर ऐसा लगता है की सरकार कोई भी हो जब ये बड़े लोग आते हैं तो उनके सामने रेड कार्पेट ( कपड़े) बिछा कर ( उतार कर) स्वागत करने को तैयार रहती हैं।

फेसबुक से.

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पत्रकारिता का सबसे यादगार दिन… काश मैं भी एक सेल्फी खिंचवा पाता…

Harsh Kumar : दोस्तों, प्रधानमंत्री की पत्रकारों के साथ मुलाकात की खबर सुर्खियों में है। जहां एक ओर पत्रकार इस बात से प्रफुल्लित नजर आ रहे हैं कि पीएम के साथ कुछ समय बिताने का अवसर उन्हें मिल गया वहीं कुछ लोग इसका बड़े ही नकारात्मक तरीके से आकलन करने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ साथियों ने इसे पत्रकारिता के लिए काला दिन और न जाने क्या-क्या कह डाला है। मैं इस बारे में ये कहना चाहूंगा कि काश मुझे भी अपने देश के पीएम से मिलने का मौका मिल गया होता आज। पर कोई बात नहीं, कम से कम मुझे आज के वाकये के बाद ये दिलासा तो मिला कि देश के पीएम से कभी न कभी तो मिला जा सकता है। नहीं तो अब तक इस देश के पीएम आम आदमी की पहुंच से तो दूर थे ही बल्कि खास लोग भी आसानी से नहीं मिल पाते थे।

नरेंद्र मोदी ने अपनी रीच को बढ़ाने के लिहाज से ही सही लेकिन कम से कम एक आत्मीयता का परिचय तो दिया ही। खुद मेरे पत्रकार साथी सुनील पांडेय का मोदी के साथ फोटो देख में गदगद हो गया। दरअसल पत्रकारों के दिमाग में नकारात्मक विचार इस कदर भर चुके हैं कि हम हमेशा हर मौके को निगेटिव नजरिये से ही देखते हैं। क्या हमारी बिरादरी को वो ही राजनेता पसंद है जो मुंह पर तमाचा मारकर बात करे। या फिर कुछ भी खिलाफ लिख देने पर जेल में बंद करा दे? हम ओबामा से मिलने का लालयित रहेंगे, लेकिन अगर हमारे ही पीएम हम से मिल रहे हैं तो हमें वो हजम नहीं होता। मुझे याद है पिछले पीएम मनमोहन सिंह की अंतिम पीसी। उसमें मनीष तिवारी संचालन को बैठे थे और पत्रकारों की लिस्ट बनाकर बैठे थे कि कौन-कौन सवाल पूछेगा। जाहिर चंद गिने-चुने नाम ही थे। इसके अलावा ये भी तिवारी ने कहा था कि अपना परिचय देने के लिए सीट से खड़े हो जाएं ताकि मैं आपको पहचान सकूं। क्या हम इसी व्यवहार के लिए बने हैं?

अरविंद केजरीवाल जैसे नेता को हमने बनाया और जब दिल्ली का चुनाव केजरी जीत गए तो कहने लगे कि मीडिया बिका हुआ है। अंबानी ने खरीद लिया है। मैंने अपने कुछ चैनलों में कार्य कर रहे पत्रकारों को कहा भी था कि मान जाओ केजरी के पीछे इतना मत भागो, एक दिन ये ही तुम पर उंगली उठाएंगे। वही हुआ। जब तक केजरी एंड पार्टी को लाइव दिखाया जाता रहा तो मीडिया अच्छा था लेकिन जैसे ही दिल्ली की कुर्सी छोड़कर भागने के लिए मीडिया ने उन्हें निशाना बनाया तो सब बेईमान हो गए? मेरा ये मानना है कि आज का दिन पत्रकारिता का सबसे यादगार दिन है जब देश का प्रधानमंत्री खुद बिना किसी झिझक के मंच से उतरकर आप से मिल रहा है और सेल्फी खिंचवा रहा है। काश मैं भी आज एक सेल्फी खिंचवा पाता।

लेखक हर्ष कुमार दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे अखबारों में काम कर चुके हैं. इन दिनों दिल्ली में नवोदय टाइम्स अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

पीएम-जर्नो सेल्फी प्रकरण पर कई अन्य कनिष्ठ-वरिष्ठ पत्रकारों की फेसबुकी टिप्पणियां यूं हैं…

Chandan Srivastava : पीएम के साथ पत्रकारों/संपादकों की ‘सेल्फी’ (लगे हाथ यह शब्द भी प्रसिद्धि पा गया) का विरोध करने वाले कितनी क्रांतिकारी प्रोफाइल हैं, जिनके एलबम में किसी शख्सियत के साथ एक भी सेल्फी न हो? आप जाते हैं मात्र साक्षात्कार लेने लेकिन सेल्फी लेना नहीं भूलते। और तो और जो डीम-एसपी के साथ दांत चियारे फोटो लगाते हैं, वे भी पत्रकारिता की गिरावट पर चिंतित हैं। रही बात सवाल-जवाब की तो जहां तक मुझे जानकारी है वह औपचारिक प्रेस वार्ता नहीं थी। हां प्रेस वार्ता के लिए निवेदन किया जा सकता था। इसमें भी कोई शक नहीं कि पत्रकार से गया-गुजरा, आत्म सम्मान विहीन दूसरा प्राणी धरती पर नहीं। लेकिन महोदय फिलहाल आपको गम-ए-पत्रकारिता नहीं, दहशत-ए-मोदी सता रहा है।

लखनऊ के पत्रकार चंदन श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

Vineet Kumar : मीडिया में आप अगर नौकरी मांगने जायेंगे तो अमूमन आपसे ये नहीं पूछा जायेगा कि आपने क्या-क्या पढ़ा है,किसके बारे में क्या जानते हो? आपसे पूछा जायेगा- आपको कौन-कौन जानते हैं पर्सनली? कई बार यहाँ तक पूछ लेंगे- आप अमर सिंह को फोन लगाकर बात कर सकते हो ? मतलब आपकी नेटवर्किंग कितनी है? दूसरा सवाल थोड़ा दायें-बांये करके कि आप और क्या कर सकते हो? आप बच्चा टाइप से बताने लगोगे- पैकेज बना लेता हूँ, इनपुट,आउटपुट का काम..ब्ला-ब्ला..जबकि वो जानना चाहते हैं इस मीडिया संस्थान के लिये बाहर से कितना माल ला सकते हो? ऐसे में सुधीर चौधरी से लेकर दीपक चौरसिया जैसे इस धंधे के बुढाठ लोग दांत चियारकर देश के प्रधान पीआर प्रक्टिसनर के साथ सेल्फी ले रहे हैं, उनके हाल पूछे जाने पर दुनिया के आगे नगाड़े पीट रहे हैं तो इसमें गलत क्या है ? वो दरअसल उन हजारों मीडिया छात्रों के आगे बेंचमार्क बना रहे हैं कि तुम्हें मेरी तरह देश का प्रधान पीआरओ जानता है या नहीं? अगर नहीं, तो पत्रकारिता की डिग्री की बत्ती बनाकर संध्यावंदन करो.. ( तस्वीर साभार- bhadas4media)

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मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपलोग सुधीर चौधरी जैसे दागदार संपादक के देश के प्रधान सेवक के साथ दांत चियारकर सेल्फी लेने और थै-थै करके ट्वीट किये जाने पर इतने हलकान हो रहे हैं ? मेरे ख्याल से मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्भा है, जैसी मान्यताओं से मोह छूटा नहीं है. ऐसे में तो वो कल को भारतेंदु की प्रतिमा के आगे शेल्फी लेकर ट्वीट कर देंगे तो आप उन्हें गरीबों-वंचितों और हाशिये के समाज का पत्रकार मान लेंगें..हद है. ये बात समझने में भी दिक्कत है कि जिसका मालिक खुलेआम चुनाव में उस पार्टी की रैली में जाकर वोट देने की बात कर रहा हो, जिससे अच्छे दिन आने हैं, हरियाणा चुनाव के कितने दिन हुये…अब उस पार्टी के अवतारी पुरुष खुद मालिक के कर्मचारी के आगे अवतरित हो तो वो क्या उनसे ये सवाल करेगा कि आपने देश में अघोषित आपातकाल कैसे विकसित किया या फिर लहालोट होकर, मुंह बिदोरकर सेल्फी लेगा..टीवी लागत का माध्यम है, वो मैनेज नहीं होगा, प्रधान सेवक के सहोदर अर्थात मैनेजमेंट और बिज़नस की भाषा नहीं समझेगा तो क्या आपकी भाषा समझकर सड़क पर उतर आयेगा..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Kumar Sauvir : देश के सारे लब्ध-प्रतिष्ठ पत्रकारों-संपादकों ने साबित कर दिया है कि पतन का पैमाना क्या हो सकता है। पैमाना है:- वे खुद। अब देखिये ना कि किस तरह इन लोगों ने सार्वजनिक तौर पर अपने-अपने पायजामों का नाड़ा खुलेआम खोल दिया। किसी ने बेहद तेज़, किसी ने पूरी विश्वसनीयता के साथ तो किसी ने सबसे आगे बढ़ कर। 

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

Sandip Naik : झाडू बनाकर कलम को जगह बता दी है और स्पष्ट है कि झाडू कितनी भी अच्छी हो उसकी कीमत और जगह कितनी और कहाँ है। गणेश शंकर विद्यार्थी और तिलक होते तो क्या वे लेते सेल्फी ??? बेशर्मी की हद तो यह है कि अपमान सहने के बाद भी निठल्ले सम्पादक सेल्फी में व्यस्त है। अभी कुछ दिन पहले ही लिखा था मैंने कि कुछ लोगो के लिए पत्रकारिता लायसेंसशुदा वेश्यावृत्ति का व्यवसाय है। बंद कर दो अखबार और बन जाओ भांड चारण वैसे भी बचा क्या है अब !!! सच साबित हो गया सब कल।

सोशल एक्टिविस्ट संदीप नाईक के फेसबुक वॉल से.

Praveen Mishra : ये है इस देश के महान पत्रकार श्री सुधीर चौधरी जो की जी न्यूज़ में नौकर है। इनकी विशेषता है ये है की कुछ महीनो पहले ये हवालात में रह कर आये थे। आपने टी वी चेनलो पर एक पांच सितारा होटल में स्टिंग ऑपरेशन देखा होगा जिसमे ये नवीन जिंदल की कोयले की खदानों की खबरों को दबाने के लिए १०० करोड़ मांगते हुए दिखाई दे रहे थे। आज ये महाशय प्रधानमंत्री की चाय पार्टी में शामिल थे और उनके साथ अपने ” मोबाइल ” से ” सेल्फ़ी” के जरिये अपना फोटो ले रहे थे। ब्लैकमेलिंग का इनका केस अभी कोर्ट में विचाराधीन है। मुझे आस्चर्य होता है की प्रधानमंत्री जैसा व्यक्ति इस उठाईगीरे / ब्लैकमेलर पत्रकार के साथ हंस कर मुस्कराकर फोटो खिचवा रहे है। प्रधानमंत्री जी आप इस पद की गरिमा को क्यों गिरा रहे है केवल ईसलिये की ये ” चारण भाट ” पत्रकार २४ घंटे जी न्यूज़ पर आपकी चरण वंदना करते है। प्रधानमंत्री जी आपने सविंधान की शपथ ली है यदि आप इस तरह अपने हितो के लिए इन चाटुकारो के साथ फोटो खिंचवाएंगे तो ये पद निस्पक्ष कैसे रह पायेगा?

जन पत्रकार प्रवीण मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

Vinod Singh : दंतचियार मीडिया क्या खाके मोदी का विरोध करेगी? जो चाय के बुलावे पर ही लोटपोट हुई जा रही हो। मठाधीश मोदी के साथ एक अदद सेल्फी के लिए जिस तरह ठेलमठेली की गई, वह मीडिया की औकात बताने के लिए काफी है। बंद कमरों में चरणरज लेने की बातें दबी जुबान से सुनने को मिल ही जाती हैं, लेकिन सरेआम नजारा कम ही देखने को मिलता है। अच्छा हुआ कि आज पूरा देश इसका गवाह बना। जिस सच के हथियार (कैमरा) से आप दूसरों को नंगा करते हो, आज उसी हथियार ने आपको भी नंगा कर दिया। जियो कर्णधारों, आपको शत् शत् नमन। आप जैसे लोगों के लिए ही कभी किसी ने लिखा था…. अब तो दरवाजे से अपने नाम की तख्ती उतार, लफ्ज नंगे हो गए, शोहरत बेमानी हो गई।

दिल्ली के पत्रकार विनोद सिंह के फेसबुक वॉल से.

Shakil Ahmed Khan : क्या भारत में सचमुच कोई चौथा स्तम्भ है भी ? क्योंकि पत्रकारिता मिशन होती है सच तक पहुँचने का जूनून होता है उसका एक पेशेवर अंदाज़ होता है, कलम झाड़ू बन जाए और लोकतंत्र की गंद बुहार दे या पत्रकार कुत्ता बन जाए और लोकतंत्र की पहरेदारी करे दोनों ही सूरतें वन्दनीय है, पर आज अधिकाँश पत्रकार दलाल हैं और पत्रकारिता उनके हाथ में ख़ंजर है ,जो उन्होंने लोकतंत्र की पीठ पर घोंप दिया है.

जन पत्रकार शकील अहमद खान के फेसबुक वॉल से.

Awadhesh Kumar : जब ऐसे लोग भी क्षुब्ध हो जाएं… शांत और संतुलित रहने वाले जाने माने पत्रकार और राज्य सभा टीवी में कार्यरत अरविन्द कुमार सिंह की टिप्पणियों में पीड़ाजनक क्षोभ दिखने लगे तो यह इस बात का प्रमाण माना जाएगा कि स्थिति किस सीमा तक बिगड़ गई है। पहले उन्होंने चार पंक्ति की एक छोटी टिप्पणी टीवी पर आने वाले बहसकर्ताओं पर लिखी। उसके बाद कल प्रधानमंत्री के पत्रकारों से दीपावली मिलन के दौरान पैदा हुए दृश्य पर आक्रोश व्यक्त किया। वस्तुतः जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ सेल्फी या फोटो खिंचवाने की होड़ लगी थी वैसा दृश्य पत्रकार सम्मेलनों में इसके पहले कभी नहीं देखा गया। एकदम अशालीन और चिंताजनक दृश्य था। अरविन्द कुमार सिंह सत्ता के, राजनीतिक बदलाव के, बदलाव लाने वाले अनेक नेताओं के करीब रहे हैं, साथ ही कुछ वास्तविक आंदोलनों के गवाह और उनके नेताओं से गहरा जुड़ाव रहा है। वास्तविक आंदोलन आज की कुछ एनजीओ मार्का हल्लाबोल नहीं। उनका हस्र भी उन्होंने देखा है। आज भी इन दोनों धाराओं के उस समय के लोगों से उनका संबंध हैं। अरविन्द जी की तरह कुछ ऐसे बड़े पत्रकार हैं जो अपने अनुभव के कारण सामान्यतः यथास्थितिवाद के विरुद्ध आक्रामक नहीं होते, और हवा में नहीं बहते, क्योंकि उनने बहुत कुछ देखा है और उनका अपना नजरिया है। पर अब वे भी क्षुब्ध होकर विद्रोही स्वर अपना रहे हैं तो जाहिर है, पत्रकारिता की दुनिया में वैसा भी हो रहा है, जो नहीं होना चाहिए, वैसे लोग भी निर्णायक स्तर पर हैं जिन्हें वहां नहीं होना चाहिए….वैसे चेहरे भी दिख रहे हैं जिनको नहीं दिखना चाहिए…..। यानी कुल मिलाकर भविष्य के लिए एकदम चिंताजनक स्थिति।

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

Chanchal : कल मेला था. उभयलिंगियों की. भीड़ लगी थी, फोटो खिंचवा रहे थे. ताकि जब कभी भी शर्मिन्दा होने का मन करे, कपड़े से बाहर निकल कर सड़क पर टहलने का मन करे तो अपनी इस तस्वीर को देख लें. और फिर उसे चौपत कर गोलार्ध के बीच सुरक्षित रख दें कि आनेवाली पीढियां यह जान सकें कि हमारे पुरखे कितने लिजलिजे थे कि बगैर रीढ़ के भी चलते फिरते थे और फोटो तक खिचवा लेते थे. (शुक्रिया यशवंत भाई)

पत्रकार, स्तंभकार, कलाकार, रंगकर्मी और नेता चंचल के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर….

ब्रेकिंग न्यूज… सुधीर चौधरी की सेल्फी… ब्रेकिंग न्यूज… दीपक चौरसिया का हालचाल …

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ब्रेकिंग न्यूज… सुधीर चौधरी की सेल्फी… ब्रेकिंग न्यूज… दीपक चौरसिया का हालचाल …

मैं आज के दिन को मीडिया के लिहाज से शर्मनाक दिन कहूंगा. पत्रकारिता के छात्रों को कभी पढ़ाया जाएगा कि 25 अक्टूबर 2014 के दिन एक बार फिर भारतीय राजनीति के आगे पत्रकारिता चरणों में लोट गई. धनिकों की सत्ता भारी पड़ गई जनता की आवाज पर. कभी इंदिरा ने भय और आतंक के बल पर मीडिया को रेंगने को मजबूर कर दिया था. आज मोदी ने अपनी ‘रणनीति’ के दम पर मीडिया को छिछोरा साबित कर दिया. दिवाली मिलन के बहाने मीडिया के मालिकों, संपादकों और रिपोर्टरों के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देश, विदेश, समाज और नीतियों पर कोई बातचीत नहीं हुई. सिर्फ मोदी बोले. कलम को झाड़ू में तब्दील हो जाने की बात कही. और, फिर सबसे मिलने लगे. जिन मसलों, मुद्दों, नारों, आश्वासनों, बातों, घोषणापत्रों, दावों के नाम पर सत्ता में आए उसमें से किसी एक पर भी कोई बात नहीं की.

सुधीर चौधरी सेल्फी बनाने लगे. दीपक चौरसिया हालचाल बतियाने लगे. रिपोर्टरों में तो जैसे होड़ मच गई सेल्फी बनाने और फोटो खिंचाने की. इस पूरी कवायद के दौरान कोई पत्रकार ऐसा नहीं निकला जिसने मोदी से जनता का पत्रकार बनकर जनहित-देशहित के मुद्दों पर सवाल कर सके. सब गदगद थे. सब पीएम के बगल में होने की तस्वीर के लिए मचल रहे थे. जिनकी सेल्फी बन गई, उन्होंने शायद पत्रकारिता का आठवां द्वार भेद लिया था. जिनकी नहीं बन पाई, वो थोड़े फ्रस्ट्रेट से दिखे. जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, एक बार भी पूरी मीडिया के सामने नहीं आए और न ही सवाल जवाब का दौर किया. शायद इससे पोल खुलने, ब्रांडिंग खराब होने का डर था. इसीलिए नया तरीका निकाला गया. ओबलाइज करने का. पीएम के साथ फोटो खिंचाने भर से ओबलाइज हो जाने वाली भारतीय मीडिया और भारतीय पत्रकार शायद यह आज न सोच पाएं कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर डाला लेकिन उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा.

जी न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने पीएम के साथ सेल्फी बनाई. इंडिया न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया का प्रधानमंत्री ने हालचाल पूछा. महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली से कराह रही देश की जनता का हालचाल यहां से गायब था. दिवाली की पूर्व संध्या पर सुसाइड करने वाले विदर्भ के छह किसानों की भयानक ‘सेल्फी’ किसी के सामने नहीं थी. सबके सब प्रधानमंत्री से मिलने मात्र से ही मुस्करा-इतरा रहे थे, खुद को धन्य समझ रहे थे.

रजत शर्माओं और संजय गुप्ताओं जैसे मीडिया मालिकों के लिए पत्रकारिता पहले से ही मोदी परस्ती रही है, आज भी है, कल भी रहेगी. इनके यहां काम करने वालों से हम उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वो कोई सवाल करेंगे. खासकर तब जब ये और इन जैसे मीडिया मालिक खुद उपस्थित रहे हों आयोजन में. सुभाष चंद्राओं ने तो पहले ही भाजपा का दामन थाम रखा है और अपने चैनल को मोदी मय बनाकर पार्टी परस्त राष्ट्रीय पत्रकारिता का नया माडल पेश किया है. अंबानियों के आईबीएन7 और ईटीवी जैसे न्यूज चैनलों के संपादकों से सत्ता से इतर की पत्रकारिता की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते हैं. कुल मिलाकर पहले से ही कारपोरेट, सत्ता, पावर ब्रोकरों और राजनेताओं की गोद में जा बैठी बड़ी पूंजी की पत्रकारिता ने आज के दिन पूरी तरह से खुद को नंगा करके दिखा दिया कि पत्रकारिता मतलब सालाना टर्नओवर को बढ़ाना है और इसके लिए बेहद जरूरी है कि सत्ता और सिस्टम को पटाना है. होड़ इस बात में थी कि मोदी ने किसको कितना वक्त दिया. मोदी ने कहा कि हम आगे भी इसी तरह मिलते जुलते रहेंगे. तस्वीर साफ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कभी कोई कड़ा बड़ा सवाल नहीं पूछा जा सकेगा. वो जो तय करेंगे, वही हर जगह दिखेगा, हर जगह छपेगा. वो जो इवेंट प्लान करेंगे, वही देश का मेगा इवेंट होगा, बाकी कुछ नहीं.

ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरियों और फिक्सर पत्रकार दीपक चौरसियाओं से हमें आपको पहले भी उम्मीद न थी कि ये जन हित के लिए पत्रकारिता करेंगे. दुखद ये है कि पत्रकारिता की पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने इन्हीं निगेटिव ट्रेंड्स को अपना सुपर आदर्श मान लिया है और ऐसा करने बनने की ओर तेजी से अग्रसर हैं. यह खतरनाक ट्रेंड बता रहा है कि अब मीडिया में भी दो तरह की मीडिया है. एक दलाल उर्फ पेड उर्फ कार्पोरेट उर्फ करप्ट मीडिया और दूसरा गरीब उर्फ जनता का मीडिया. ये जनता का मीडिया ही न्यू मीडिया और असली मीडिया है. जैसे सिनेमा के बड़े परदे के जरिए आप देश से महंगाई भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते, उसी तरह टीवी के छोटे परदे के जरिए अब आप किसी बदलाव या खुलासे या जन पत्रकारिता का स्वाद नहीं चख सकते. दैत्याकार अखबारों जो देश के सैकड़ों जगहों से एक साथ छपते हैं, उनसे भी आप पूंजी परस्ती से इतर किसी रीयल जर्नलिज्म की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इनके बड़े हित बड़े नेताओं और बड़े सत्ताधारियों से बंधे-बिंधे हैं. दैनिक जागरण वाले अपने मालिकों को राज्यसभा में भेजने के लिए अखबार गिरवी रख देते हैं तो दैनिक भास्कर वाले कोल ब्लाक व पावर प्रोजेक्ट पाने के लिए सत्ताओं से डील कर अखबार उनके हवाले कर देते हैं.

ऐसे खतरनाक और मुश्किल दौर में न्यू मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. न्यू वेब में वेब मीडिया शामिल है. सोशल मीडिया समाहित है. न्यूज पोर्टल और ब्लाग भी हैं. मोबाइल भी इसी का हिस्सा है. इन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी. कार्पोरेट मीडिया, जिसका दूसरा नाम अब करप्ट मीडिया या पेड मीडिया हो गया है, इसको एक्सपोज करते रहना होगा. साथ ही, देश के सामने खड़े असल मुद्दों पर जनता की तरफ से बोलना लिखना पड़ेगा. अब पत्रकारिता को तथाकथित महान पत्रकारों-संपादकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. ये सब बिक चुके हैं. ये सब चारण हो गए हैं. ये सब कंपनी की लायजनिंग फिट रखने और बिजनेस बढ़ाने के प्रतिनिधि हो गए हैं. इतिहास बताता है कि इंदिरा ने मीडिया से झुकने को कहा था तो मीडिया वाले रेंगेने लगे थे. अब कहा जाएगा कि मोदी ने मीडिया को मिलन के बहाने संवाद के लिए कहा तो मीडिया वाले सेल्फी बनाने में जुट गए.

फेसबुक पर वरिष्ठ और युवा कई जनपक्षधर पत्रकार साथियों ने मीडिया की इस घिनौनी और चीप हरकत का तीखा विरोध किया है. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक Om Thanvi लिखते हैं :  ”जियो मेरे पत्रकार शेरो! क्या इज्जत कमाई है, क्या सेल्फियाँ चटकाई हैं!

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dhananjay Singh बताते हैं एक किस्सा : ”एस.सहाय जी स्टेट्समैन के संपादक हुआ करते थे,उनके पास इंदिरा जी के यहाँ से कोई आया सूट का कपड़ा लेकर की खास आपके लिए प्रधानमंत्री ने भेजा है,साथ में टेलर का पता भी था.उन्होंने धन्यवाद के साथ उसे लौटा दिया.कुछ समय बाद प्रधानमंत्री ने बंगले पर संपादकों को डिनर दिया.सहाय जी के अलावा बाकी सभी क्रांतिकारी संपादक एक जैसे सूट में थे…सब एक दूसरे की तरफ फटी आँखों से देखने लगे … इंदिरा जी का अलग ही स्टाइल था……. समय बदला है अब तो खुद ही सब दंडवत हुए जा रहे हैं….. हाँ सहाय जी के घर रघु राय की उतारी एक तस्वीर दिखती थी की संसद की सीढ़ियों के पास एक भिखारी कटोरा लेकर खड़ा है (शायद तब सिक्योरिटी इतनी नहीं रही होगी)………… सहाय जी के पास अंतिम समय में खटारा फिएट थी और वो अपने बच्चों के लिए भी ‘कुछ भी’ छोड़ कर नहीं गए.

कई मीडिया हाउसों में काम कर चुके आध्यात्मिक पत्रकार Mukesh Yadav लिखते हैं: ”सवाल पूछने की बजाय पीएम साब के साथ सेल्फी लेने के लिए पत्रकारों, संपादकों में होड़ मची है!! शर्मनाक! धिक्कार! निराशा हुई! सवाल के लिए किसकी आज्ञा चाहिए जनाब?

सोशल एक्टिविस्ट और युवा पत्रकार Mohammad Anas कहते हैं: ”लोकतंत्र में संवाद कभी एक तरफा नहीं होता। एक ही आदमी बोले बाकि सब सुने। साफ दिख गया लोकशाही का तानाशाही में कन्वर्जन। मनमोहन ने एक बार संपादकों को बुलाया था, सवाल जवाब हुए थे। कुछ चटुकारों और दलालों ने पत्रकारिता को भक्तिकाल की कविता बना डाला है। वरना करप्टों, झूठों और जनविरोधियों के लिए पत्रकार आज भी खौफ़ का दूसरा नाम है।

कई अखबारों में काम कर चुके जोशीले पत्रकार Rahul Pandey सोशल मीडिया पर लिखते हैं :

आज पत्रकारों के सेल्‍फी समारोह के बाद पि‍छले साल का कहा मौजूं है… आप भी गौर फरमाएं

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।

करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।

वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार Vinod Sharma लिखते हैं : ”Facebook flooded with selfies of media persons with our PM. A day to rejoice? Or reflect?

कई अखबारों में काम कर चुके पत्रकार Ashish Maharishi लिखते हैं :  ”हे मेरे देश के महान न्‍यूज चैनलों और उसके कथित संपादकों, प्रधानमंत्री ने आपको झुकने के लिए कहा तो आप रेंगने लगे। क्‍या देश में मोदी के अलावा कोई न्‍यूज नहीं है। ये पब्‍लिक है, सब जानती है…हमें पता है कि मोदी की न्‍यूज के बदले आपको क्‍या मिला है….

वरिष्ठ पत्रकार Arun Khare लिखते हैं :  ”मीडिया ने कलम को झाड़ू में बदल दिया –मोदी । मोदी जी आपने इस सच से इतनी जल्दी परदा क्यों उठा दिया । कुछ दिन तो मुगालते में रहने देते देश को।

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dharmendra Gupta लिखते हैं : ”जिस तरह से मीडिया के चम्पादक आज मोदी के साथ सेल्फी खिंचवा कर के उस को ब्रेकिंग न्यूज बना रहे है उस से लगता है की अब लड़ाई भ्रष्ट राजनीतिको के साथ भ्रस्ट मीडिया के खिलाफ भी लड़नी होगी.

संपादक और साहित्यकार गिरीश पंकज इन हालात पर एक कविता कुछ यूं लिखते हैं :

पत्रकारिता का सेल्फ़ीकरण
———–
कई बार सोचता हूँ
बिलकुल सही समय पर
मर गए पत्रकारिता के पुरोधा,
नहीं रहे तिलक और गांधी,
नहीं रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर
गणेश शंकर विद्यार्थी भी
हो गए शहीद
राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी
का भी हो गया अवसान।
आज ये ज़िंदा होते तो
खुद पर ही शर्मिन्दा होते
पत्रकारिता की झुकी कमर
और लिजलिजी काया देख कर
शोक मनाते
शायद जीते जी मर जाते
सुना है कि दिल्ली में
‘सेल्फिश’ पत्रकारिता अब
‘सेल्फ़ी ‘ तक आ गयी है
हमारी खुदगर्ज़ी
हमको ही खा गयी है

जो भक्त लोग हैं, उन्हें मोदी की हर स्टाइल पसंद है. वे मोदी की कभी बुराई नहीं करते और मीडिया की कभी तारीफ नहीं करते. इन्हें ऐसी ही चारण मीडिया चाहिए, जिसे गरिया सकें, दुत्कार सकें और लालच का टुकड़ा फेंक कर अपने अनुकूल बना सकें. सवाल उन लोगों का है जो आम जन के प्रतिनिधि के बतौर मीडिया में आए हैं. जिन्होंने पत्रकारिता के नियम-कानून पढ़े हैं और मीडिया की गरिमा को पूरे जीवन ध्यान में रखकर पत्रकारिता की. क्या ये लोग इस हालात पर बोलेंगे या मीडिया बाजार के खरबों के मार्केट में अपना निजी शेयर तलाशने के वास्ते रणनीतिक चुप्पी साधे रहेंगे. दोस्तों, जब-जब सत्ता सिस्टम के लालचों या भयों के कारण मीडिया मौन हुई या पथ से विचलित हुई, तब तब देश में हाहाकार मचा और जनता बेहाल हुई. आज फिर वही दौर दिख रहा है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सब वह कहें, वह बोलें जो अपनी आत्मा कहती है. अन्यथा रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं क्योंकि पैसा तो दोनों से ही मिलता है और दोनों ही धंधा है. असल बात विचार, सरोकार, तेवर, नजरिया, आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान है. जिस दिन आपने खुद को बाजार और पूंजी के हवाले कर दिया, उस दिन आत्मा तो मर ही गई. फिर आप खुद की लाश ढोकर भले इनसे उनसे मिलते रहें, यहां वहां टहलते रहें, पर कहा यही जाएगा कि ”मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामजादे किस्म के दलाल हैं, पत्रकारिता में तो आप सिर्फ इसलिए हैं ताकि आप अपनी हरमजदई और दलाली को धार दे सकें”.

शायद मैं कुछ ज्यादा भावुक और आवेश में हो रहा हूं. लेकिन यह भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को पत्रकारिता में ले आई. ये भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को कारपोरेट और करप्ट मीडिया में देर तक टिका नहीं पाई. यह भावुकता और आवेश ही तो http://Bhadas4Media.com जैसा बेबाक पोर्टल शुरू करने को मजबूर कर गया और इस न्यू मीडिया के मंच के जरिए सच को पूरे ताकत और पूरे जोर के साथ सच कहने को बाध्य करता रहा जिसके नतीजतन अपन को और अपन जैसों को जेल थाना पुलिस कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाने पड़े और अब भी यह सब क्रम जारी है. शरीर एक बार ही ठंढा होता है. जब सांसें थम जाती हैं. उसके पहले अगर न भावुकता है और न ही आवेश तो समझो जीते जी शरीर ठंढा हो गया और मर गए. मुझे याद आ रहे हैं पत्रकार जरनैल सिंह. सिख हत्याकांड को लेकर सवाल-जवाब के क्रम में जब तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने लीपापोती भरा बयान दिया तो तुरंत जूता उछाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. जरनैल सिंह अब किसी दैनिक जागरण जैसे धंधेबाज अखबार के मोहताज नहीं हैं. उनकी अपनी एक शख्सियत है. उन्होंने किताब लिखी, चुनाव लड़े, दुनिया भर में घूमे और सम्मान पाया. मतलब साफ है कि जब हम अपने दिल की बात सुनते हैं और उसके हिसाब से करते हैं तो भले तात्कालिक हालात मुश्किल नजर आए, पर आगे आपकी अपनी एक दुनिया, अपना व्यक्तित्व और अपनी विचारधारा होती है.

करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकार की लंबाई चौड़ाई सिर्फ टीवी स्क्रीन तक पर ही दिखती है. उसके बाहर वह लोगों के दिलों में बौना है. लोगों के दिलों से गायब है. उनका कोई नामलेवा नहीं है. अरबों खरबों कमा चुके पत्रकारों से हम पत्रकारिता की उम्मीद नहीं कर सकते और यह नाउम्मीदी आज पूरी तरह दिखी मोदी के मीडिया से दिवाली मिलन समारोह में. बड़ी पूंजी वाली करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के बैनर तले कलम-मुंह चला रहे पत्रकारों से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपनी लंबी-चौड़ी सेलरी को त्यागने का मोह खत्म कर सके. इसी कारण इनकी ‘सेल्फी पत्रकारिता’ आज दिखी मोदी के मीडिया मिलन समारोह में.

आज राजनीति जीत गई और मीडिया हार गया. आज पीआर एजेंसीज का दिमाग सफल रहा और पत्रकारिता के धुरंधर बौने नजर आए. आइए, मीडिया के आज के काले दिन पर हम सब शोक मनाएं और कुछ मिनट का मौन रखकर दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों की मर चुकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे दें.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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