दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ एक्शन लेने / मुकदमा लिखने में यूपी के आईएएस-आईपीएस अफसरों के हाथ-पैर कांपते हैं!

कार्रवाई तो दूर, एसएसपी ऑफिस में गायब हो जाता है डीएम का पत्र!

नोएडा : डीएम ऑफिस से एसएसपी कैंप कार्यालय की दूरी कुल 10 कदम होगी। लेकिन इस दूरी तक डीएम की चिट्ठी पहुंचना तो दूर, दो बार गायब हो चुकी है। यह तो एक उदाहरण मात्र है। इसी प्रकार गौतमबुद्धनगर के न जाने कितने फरियादी आए दिन पुलिस से निराश हो रहे होंगे। इस उदाहरण से यह भी पता चलता है कि किस प्रकार पुलिस अधिकारी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को फेल करने में लगे हैं।

दैनिक जागरण के मुख्‍य उपसंपादक श्रीकांत सिंह ने 24 फरवरी 2015 को नोएडा के सेक्‍टर-26 स्थित वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के कैंप कार्यालय में दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक डॉक्‍टर प्रीतेंद्र सिंह ने मामले की जांच का आदेश दिया था और उस समय के दैनिक जागरण के एचआर मैनेजर श्री रमेश कुमावत को बुलाकर पूछताछ की गई थी। उसके बाद मामला ठंडे बस्‍ते में चला गया।

तीन एसएसपी आए और गए, लेकिन मामला ठंडे बस्‍ते में ही पड़ा रहा। जबकि तत्कालीन दूसरे अधिकारी कहते रहे- ”दैनिक जागरण के खिलाफ कार्रवाई करने की मेरी औकात नहीं है। आप अदालत जाएं, तभी मामला दर्ज हो सकता है।” अंत में थक हारकर उन्‍होंने तत्कालीन जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश भी दिया। लेकिन एसएसपी आफिस में बताया गया कि वहां ऐसा कोई पत्र मिला ही नहीं है।

पिछले 21 अप्रैल को उन्‍होंने दोबारा जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की और उनसे फिर पत्र (डिस्‍पैच नंबर-3004/एचडी 4117-21-04-17) लिखवाया। इस बार उन्‍होंने पत्र की फोटो कॉपी भी ले ली। जैसी कि आशंका थी, जिलाधिकारी का पत्र न मिलने की बात दोबारा बता दी गई। उस पत्र को यहां अपलोड भी किया जा रहा है।

इससे पहले भी उन्‍होंने तत्कालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से मेल के जरिये संपर्क किया था, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन उस समय भी अधिकारियों ने आदेश को ठंडे बस्‍ते में डाल दिया था। इसके अलावा आरटीआई के जरिये भी उन्‍होंने एफआईआर की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी थी, जिसका गोलमोल जवाब दे दिया गया था।

अब हालत यह है कि गूगल करेंगे तो वहां आपको गौतमबुद्धनबर के एसएसपी का कोई फोन नंबर नहीं मिलेगा। इस हाल में आखिर अपराध पर नियंत्रण कैसे और क्‍यों हो पाएगा। पुलिस अधिकारी इसी तरह से अन्‍यायी दैनिक जागरण प्रबंधन के अपराधों को इग्‍नोर करेंगे तो वह माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश कैसे मानेगा और अपने कर्मचारियों को प्रताडि़त करने से कैसे बाज आएगा। इस मुद्दे पर जनमत तैयार न किया गया और उसे मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के समक्ष न रखा गया तो आम जनता इसी प्रकार उत्‍पीड़न और अन्‍याय झेलने को बाध्‍य होगी।

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क्या संजय गुप्ता की टांग टूट गई है?

Shrikant Singh : दैनिक जागरण के कर्मचारियों की बददुआ का असर देखिए.. सुना है कि संजय गुप्‍ता का पैर टूट गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि इस पर दुखी हुआ जाए या खुश। हां चिंता जरूर हो रही है कि वह अपने पैरों पर चल कर जेल कैसे जा पाएंगे। शायद भगवान उनका साथ अब छोड़ने लगे हैं। दरअसल, जो मालिक अपने आश्रित कर्मचारियों का हक मारता है, उसकी यही दशा होती है। शनि महाराज ऐसे लोगों से तत्‍काल नाराज हो जाते हैं और पहले अपना प्रभाव पैर पर ही दिखाते हैं। शनि का प्रतिकूल प्रभाव दूर करने के लिए पैदल चलना जरूरी होता है, लेकिन शनि महाराज कोई बुड़बक थोड़े ही हैं। शायद इसीलिए वह पहला प्रहार पैरों पर ही करते हैं। सही गाना है-पैर ही जब साथ न दें तो मुसाफिर क्‍या करे।

शनि महाराज का अगला प्रहार धन और संपदा पर होता है। क्‍योंकि कोई व्‍यक्ति जिस धन और संपदा के घमंड में चूर हो जाता है और उसका इस्‍तेमाल अन्‍याय के लिए करने लगता है तो शनि महाराज वह धन संपदा ही छीन लेते हैं। शनि महाराज को दंडाधिकारी माना जाता है। एक ऐसी अदालत जहां संजय गुप्‍ता जैसे लोगों के दंद-फंद काम नहीं आते हैं। हालांकि शनि महाराज एकायक दंड नहीं देते हैं। पहले वह चेताते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्‍यायाधीश चेता रहे हैं और संजय गुप्‍ता सीधा रास्‍ता न चलकर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं।

आपको याद होगा कि संजय गुप्‍ता कश्‍मीर की बाढ़ में फंस गए थे और भगवान से जीवन की भीख मांग रहे थे। भगवान ने उन्‍हें जीवन तो दे दिया, लेकिन उन्‍होंने मजीठिया नहीं दिया, जिसके चक्‍कर में एक कर्मचारी को अपना जीवन गंवाना पड़ा। यह मामला तूल पकड़ने लगा है और 22 फरवरी को उसे सुप्रीम कोर्ट में उठाया जा रहा है। केस नंबर है-109। हरपाल सिंह व अन्‍य बनाम संजय गुप्‍ता व अन्‍य। संजय गुप्‍ता जी अभी भी समय है और संभल जाइए। न्‍याय की राह पर आ जाइए। वर्ना-सबकुछ लुटा के होश में आए तो क्‍या हुआ।

जो व्‍यक्ति शनि के प्रभाव में होता है, उसका साथ देने वाले की भी दुर्दशा होने लगती है। उसका उदाहरण हैं हमारे विश्‍व प्रसिद्ध पीएम नरेंद्र मोदी। संजय गुप्‍ता का साथ क्‍या दे दिए, बेचारे केंद्र की सत्‍ता हथियाने के बाद दिल्‍ली से हारना शुरू किए तो बिहार तक हारते चले गए। दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान बराक ओबामा भी उनके किसी काम नहीं आ सके। इसी को कहते हैं-देवता-पित्‍तर सब झूठा। जब परमेश्‍वर रूठा। मोदी जी अब मुसीबत जी बन कर रह गए हैं। जेएनयू, जाट आरक्ष्‍ण की आग, विरोध और विद्रोह की आग। आग से कितना बचेंगे मोदी जी। गर्मी आ रही है और आग बहुत गरम होती है। उससे भी ज्‍यादा गरम होती है गरीब के पेट की आग। वह गरीब हो ही नहीं, सारी कायनात को जलाकर भस्‍म कर देती है। इसलिए मोदी जी गरीब पत्रकारों के पेट की आग को पहचानें। वह आपकी ही ओर बढ़ रही है। आप भी-सबकुछ जलाके होश में आएं तो क्‍या हुआ। जय हिंद। जय भारत।

दैनिक जागरण नोएडा में मुख्य उपसंपादक पद पर कार्यरत रहे पत्रकार श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नरेंद्र मोदी की शह पाकर दैनिक जागरण के मालिक और सीईओ संजय गुप्‍ता अपराध की राह पर निकल पड़े हैं!

Fourth Pillar : अपराधियों, घोटालेबाजों और तस्‍करों को संरक्षण दे रहे हैं संजय गुप्‍ता… वाहन पर प्रेस लिखा देख कर पुलिस वाले सम्‍मान में वाहन को नहीं रोकते और उसकी जांच करना पत्रकारिता का अपमान समझते हैं। उन्‍हें लगता है कि इस वाहन में कोई गणेश शंकर विद्यार्थी बैठा होगा। पहले कमोवेश यह बात सही भी रही होगी, लेकिन सावधान। दैनिक जागरण के प्रेस लिखे वाहन में कोई अपराधी, घोटालेबाज अथवा तस्‍कर भी हो सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शह पाकर दैनिक जागरण के मालिक और सीईओ संजय गुप्‍ता अपराध की राह पर निकल पड़े हैं और वह अपराधियों, घोटालेबाजों और तस्‍करों को संरक्षण देने लगे हैं। मजीठिया मामले में उन पर हजारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस तो कर ही रखा है, उनकी कंपनी जागरण प्रकाशन लिमिटेड के प्रबंधकों पर हमला कराने और छिनैती कराने के मामले की जांच नोएडा, गौतमबुद्ध नगर के वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में लंबित है। वह अखबार के प्रभाव का इस्‍तेमाल कर पुलिस, प्रशासन और यहां तक कि व्‍यवस्‍थापिका की आंखों में धूल झोंक रहे हैं।

उनके भ्रमजाल में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी फंस गए हैं, जिससे अपराध की ताकत दिनोंदिन बढ़ रही है। मोदी जी को इसकी कीमत दिल्‍ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के रूप में चुकानी पड़ी है। खैर, मोदी जी को समझ कब आएगी, यह भगवान जानें, लेकिन जाने-अनजाने मोदी जी देश के एक बहुत बड़े अपराधी का साथ दे रहे हैं, जिसके हाथ मजीठिया लाभार्थी अतुल के खून से रंगे हैं।

संजय गुप्‍ता के दूसरे अपराधों की बात करें तो दैनिक जागरण की जम्‍मू यूनिट का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। वहां के जीएम और संपादक का एक नजदीकी व्‍यक्ति जिसे दैनिक जागरण में नौकरी दी गई, ड्रग तस्‍करी में पकड़ा गया। बताया जाता है कि जम्‍मू यूनिट की एक महिला कर्मचारी का भाई है वह तस्‍कर। महिला कर्मचारी के साथ जम्‍मू के संपादक के अंतरंग रिश्‍ते बताए जाते हैं। संपादक पहले उस तस्‍कर को पुलिस से बचाता रहा, लेकिन जम्‍मू में आतंकियों की घुसपैठ बढ़ने पर पुलिस सख्‍त हुई और संपादक अपने चहेते तस्‍कर को पुलिस के शिकंजे से नहीं बचा पाया।

संजय गुप्‍ता के अपराधों की कड़ी में आइए कानपुर यूनिट चलते हैं, जहां कई फर्जी कंपनियां बनाकर कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान से वंचित किया जा रहा है। इस काम को अंजाम देने में दैनिक जागरण का आज्ञाकारी डाइरेक्‍टर सतीश मिश्रा लगा हुआ है। मीठा बोलने वाला सतीश मिश्रा कर्मचारियों को एनआरएचम घोटाले में झोंकता रहा है। इस क्रम में दैनिक जागरण के कुछ बंदे देश के इस बड़े घोटाले में फंस भी चुके हैं। याद रहे, यदि आप दैनिक जागरण पढ़ते हैं अथवा उसे विज्ञापन देते हैं तो जाने-अनजाने आप देश के एक सबल अपराधी संजय गुप्‍ता और उसके चचा महेंद्र मोहन गुप्‍ता को समाज विरोधी काम करने की संजीवनी दे रहे हैं। आप दैनिक जागरण अखबार को बाइकाट करेंगे तो उसके कर्मचारी अतुल सक्‍सेना की आत्‍मा को शांति मिलेगी।

दैनिक जागरण में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत सिंह द्वारा संचालित फेसबुक पेज फोर्थ पिलर से साभार.

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संजय गुप्ता यानि स्वतंत्रता का दुश्मन

Shrikant Singh : देश के इस दुश्‍मन को अच्‍छी तरह पहचान लें… दोस्‍तो, देश के दुश्‍मनों से लड़ने से कहीं ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण उन्‍हें पहचानना है। सीमापार के दुश्‍मनों से कहीं अधिक खतरनाक दुश्‍मन देश के अंदर हैं। आप उन्‍हें पहचान गए तो समझिए हमारी जीत पक्‍की। हम आपका ध्‍यान देश के एक ऐसे दुश्‍मन की ओर दिलाना चाहते हैं, जो पुलिस, प्रशासन, देश की न्‍यायपालिका और यहां तक कि देश की व्‍यवस्‍था तक को प्रभावित कर अपनी मुनाफाखोरी के जरिये इस देश को लूट रहा है। आप पहचान गए होंगे। हम दैनिक जागरण प्रबंधन की बात कर रहे हैं। आज 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। इस दिन एक वाकया याद आ रहा है।

पहले दैनिक जागरण में स्‍वतंत्रता दिवस को सेलीब्रेट किया जाता था, लेकिन अब 26 जनवरी को सेलीब्रेट किया जाता है। इसके पीछे जन्‍मजात महान पत्रकार संजय गुप्‍ता ने तर्क दिया था कि अब इस देश को स्‍वतंत्रता की जरूरत नहीं है। अब जरूरत है तो नियमों पर चलने की। चूंकि 26 जनवरी को भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया था, इसलिए उन्‍होंने इसे नियमों का दिवस मानकर सेलीब्रेट कराना शुरू करा दिया। अब इंसान हर चीज को अपने फायदे के लिए किस प्रकार परिभाषित कर लेता है, उसका उदाहरण संजय गुप्‍ता से बड़ा और कौन हो सकता है। उन्‍होंने स्‍वतंत्रता का अर्थ अपने कर्मचारियों की स्‍वतंत्रता से लगाया और अपने मैनेजर, संपादक से लेकर चपरासी तक की स्‍वतंत्रता छीननी शुरू कर दी।

नियमों का अर्थ उनकी नजर में संविधान के नियम नहीं, बल्कि दैनिक जागरण प्रबंधन की ओर से थोपे जाने वाले संविधान विरोधी नियम थे। अब अपने चापलूसों के साथ बैठकर वह जो नियम बना देते हैं, उसका पालन करना दैनिक जागरण परिवार के हर सदस्‍य की मजबूरी बन जाता है। जो इस मजबूरी को ढोने से तोबा करने को मजबूर हो जाता है, उसे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है। इसके भुक्‍तभोगी दैनिक जागरण के तमाम कर्मचारी हैं, जिनमें से सैकड़ों संघर्ष के लिए सड़क पर उतर आए हैं। राहत की बात यह है कि कल उत्‍तर प्रदेश सरकार ने एक हेल्‍पलाइन जारी की, जहां शिकायत कर आप दैनिक जागरण प्रबंधन को यह बता सकते हैं कि साहब नियम यह नहीं यह है। मेरी इस देश के पाठकों, विज्ञापनदाताओं और अभिकर्ताओं से गुजारिश है कि देश के इस दुश्‍मन को जितनी जल्‍दी हो सके सबक सिखाएं। नहीं तो बहुत देर हो जाएगी और यह मुनाफाखोर इस देश को पूरी तरह से लूट चुका होगा। अपना खयाल रखें। आज का दिन आपके लिए शुभ हो। गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई।

दैनिक जागरण में मुख्य उपसंपादक पद पर कार्यरत क्रांतिकारी पत्रकार श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जागरण प्रबंधन चाहता है किसी तरह पुराने कर्मचारियों से निजात मिल जाए!

Shrikant Singh :  जंग ‘जागरण’ ने शुरू की, समापन हम करेंगे… मित्रों, आज कल मैं फेसबुक पर दैनिक जागरण प्रबंधन की हरकतों के बारे में कुछ नहीं लिख रहा हूं। इस पर कुछ मित्रों ने शिकायत भी की है। क्‍या करूं, आप तो जानते ही हैं-सबसे बड़ा रुपैया। ऐसा न होता तो जागरण प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता क्‍यों बताता। तमाम कर्मचारियों को बेवजह क्‍यों परेशान करता। कभी कचहरी का भी मुंह न देखने वाले लोग सुप्रीम कोर्ट में दस्‍तक क्‍यों देते। बेजुबान लोग क्रांतिकारी क्‍यों बन जाते।

सन्‍नाटे को चीरते हुए जो आवाज उठी है, वह कोई निष्‍कर्ष निकाले बगैर शांत नहीं हो सकती। जब आपने तय ही कर लिया है, गलत को गलत ही कहेंगे, चाहे वह दैनिक जागरण प्रबंधन ही क्‍यों न हो तो आपकी आवाज को समूची समष्टि सुन रही है। उसे वह भी सुनाई दे रहा है, जो दैनिक जागरण प्रबंधन अपनी हरकतों से कहना चाहता है और वह भी जो कर्मचारियों के विद्रोह से पैदा हुआ है। विद्रोह की आग में बड़े-बड़े साम्राज्‍य तबाह हो गए, तो दैनिक जागरण प्रबंधन की क्‍या औकात है। अदालतों में दैनिक जागरण प्रबंधन के पास बकलोली करने के सिवा कुछ नहीं बचा है। और अदालतें लंबे समय तक बकलोली बर्दाश्‍त नहीं करतीं। करना भी नहीं चाहिए। गलती से यदि ऐसा हुआ, तो सारी व्‍यवस्‍था तहस-नहस हो जाएगी। अराजकता फैल जाएगी। और अराजकता सहने की कूबत न तो सरकार में है और न ही दैनिक जागरण प्रबंधन में। शायद इसीलिए दैनिक जागरण प्रबंधन समय-समय पर रंग बदलता रहता है।

दैनिक जागरण प्रबंधन चाहता है कि किसी तरह पुराने कर्मचारियों से निजात मिल जाए, लेकिन उसे उस प्रवृत्ति से निजात कभी नहीं मिलेगी, जो कर्मचारियों में पैदा हो गई है। बगावत का संदेश सूक्ष्‍म रूप से कई पीढि़यों तक पहुंच गया है। इन पीढि़यों में टकराव तय है। एक पीढ़ी होगी शोषकों की तो दूसरी शोषितों की। यह दुर्भावना पहले जागरण प्रबंधन ने ही पैदा की है। मतलब फर्स्‍ट अटैक के लिए जिम्‍मेवार वही है। हम तो जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं। आपको बता दें कि प्रत्‍येक क्रिया की जो विपरीत प्रतिक्रिया होती है, वह क्रिया से अधिक संवेगवान होती है। ठीक उसी प्रकार जैसे दवा तो धीरे-धीरे काम करती है, लेकिन जब वह रिएक्‍शन करती है तो तेजी से बहुत कुछ नस्‍ट कर देती है। तो यह समझ लीजिए कि दैनिक जागरण प्रबंधन तेजी से नस्‍ट होने के लिए ईंधन खुद जुटा रहा है और ऐसा ईंधन जिस पर पेट्रोल-डीजल की तरह महंगाई की मार नहीं पड़नी है। बस। अभी मुझे कुछ जरूरी लिखना है, जिसका मिलेगा रुपैया।

दैनिक जागरण में वरिष्ठ पद पर कार्यरत और मजीठिया वेज बोर्ड के आंदोलन को लीड करने वालों में से एक श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक जागरण नोएडा के प्रबंधकों ने गायब कराया डेढ़ लाख रुपये का सामान!

मजीठिया मंच : दैनिक जागरण में चमचागीरी का आसान सा तरीका है मजीठिया वेतनमान का विरोध करो। इसी तरीके को अपना कर कई चमचे प्रबंधन के खास बन गए हैं और दैनिक जागरण को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। प्रबंधन उन्‍हें ऐसा करने के लिए मौन सहमति दे रहा है। ताजा मामले की बात करें, तो हाल ही में प्रसार व्‍यवस्‍थापक कप्‍तान ने अखबार वेंडरों को बांटने के लिए डेढ़ लाख रुपये का सामान एक वाहन में लोड करके सोनीपत भेज दिया।

सोनीपत के एजेंट सैनी ने सामान यह कहकर लेने से इनकार कर दिया कि वह वेंडरों को गिफ्ट दीपावली से ठीक पहले बांटेंगे। उन्‍होंने सामान नोएडा वापस ले जाने के लिए कहा तो वाहन वाला सामान वापसी का भाड़ा मांगने लगा। यह जानकारी ट्रांसपोर्ट का काम काज देख रहे व्‍यक्ति को दी गई। उसने भाड़ा देने की बात मान ली और सामान नोएडा के लिए रवाना कर दिया गया। इसी बीच सर्कुलेशन मैनेजर के मन में यह बात आई कि क्‍यों न इस माल को खुर्दबुर्द कर दिया जाए। कप्‍तान के इशारे पर सामान खोड़ा के एक मकान में उतार दिया गया। वाहन चालक और दूसरे लोगों ने इस हरकत का विरोध किया तो जानकारी एक प्रबंधक को दी गई। फिर भी सामान नोएडा नहीं पहुंचा। सूत्र बता रहे हैं कि मैनेजर भी इन्‍हीं लोगों के साथ मिला हुआ है।

बता दें कि अब दैनिक जागरण में अयोग्‍य लोगों की टीम हावी है, जो मजीठिया विरोध के नाम पर दैनिक जागरण की गुणवत्‍ता लगातार गिरा रही है। यही वजह है कि अखबार की प्रसार संख्‍या दिनोंदिन गिर रही है। इसी पर नियंत्रण पाने के लिए प्रबंधन गिफ्ट का लालच देकर पाठकों को बांधे रखने का उपक्रम कर रहा है, लेकिन कंपनी के तथाकथित चमचे प्रबंधन की इस योजना को भी पलीता लगाने में लगे हैं। देखना यह होगा कि सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्‍तव कोई कार्रवाई करते हैं या वह भी चमचों को बहती गंगा में हाथ धोने देते हैं। इससे पहले भी प्रसार विभाग के घपले सामने आते रहे हैं। जम्‍मू, पंजाब और हरियाणा में गिफ्ट कूपन के नाम पर पाठकों को बेवकूफ बनाया जाता है। गिफ्ट महाप्रबंधकों के चहेते झाड़ ले जाते हैं और पाठक कूपन भर कर मूर्ख बन जाता है।

फेसबुक पर पत्रकार श्रीकांत सिंह द्वारा संचालित ‘मजीठिया मंच’ पेज से साभार.

उपरोक्त स्टेटस पर Rakesh Pandey की त्वरित टिप्पणी यूं है: ”जागरण के मालिकों के पास विज्ञापन से आई कमाई के नोट गिनने से फुर्सत नहीं है सरकुलेशन मैनेजर काकस बना कर संस्थान को चूना लगाने में जुटे है रोजाना हजारों कापियां रद्दी के भाव बिकवाकर मालिकों को झूठी सेल रिपोर्ट भेजी जा रही है सरकुलेशन का नेशनल हेड भी इसमें शामिल हो सकता है।”

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सुप्रीम कोर्ट ने मीडियाकर्मियों को दिया गलती सुधारने का एक विशेष मौका

दबाव, जबर्दस्‍ती, अज्ञानता, भय, मजबूरी या कंफर्ट जोन में रहने की आदत। जो भी कहें, दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने एक गलती तो कर ही दी है कि 20-जे के तहत कंपनी को सुप्रीम कोर्ट में फायदा उठाने का मौका दे दिया है। अब जब लोग ताल ठोंक कर सुप्रीम कोर्ट पहुंच ही गए हैं तो अदालत ने उन्‍हें अपनी गलती सुधारने का एक विशेष मौका दे दिया है। 

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, राज्‍य सरकारें एक विशेष श्रम अधिकारी की नियुक्ति करेंगी, जो यह रिपोर्ट देगा कि संस्‍थान ने मजीठिया वेतनमान लागू किया है या नहीं। अब कर्मचारियों को करना यह होगा कि विशेष श्रम अधिकारी को शपथपूर्वक बताएं कि उनके साथ कंपनी ने धोखा किया है। 20-जे तभी लागू माना जाता है, जब उनका वेतन मजीठिया वेतनमान से अधिक हो। ऐसा दैनिक जागरण के कुछ गिने-चुने लोगों के ही साथ है। इसलिए अधिकांश कर्मचारी एकजुटता के साथ सादे कागज पर हस्‍ताक्षर करने की अपनी गलती सुधार सकते हैं। 

दिखानी होगी एकजुटता 

दैनिक जागरण प्रबंधन ने कर्मचारियों की एकजुटता तोड़ने के लिए एक जेबी यूनियन बनवा दी, लेकिन समय पर उसका भंडाफोड़ हो गया। आज सुप्रीम कोर्ट में उस यूनियन के कई पदाधिकारी मिले और उन्‍होंने यूनियन से अपना कोई संबंध न होने की बात बताई और कहा, अब अनिश्चितकालीन हड़ताल होगी। उनकी बात से साफ हो गया कि दैनिक जागरण प्रबंधन किस प्रकार की कुत्सित चाल चल रहा है। अब कर्मचारियों को फिर से एकजुट करने के प्रयास किए जा रहे हैं। जिन लोगों ने कर्मचारियों को भ्रमित कर रखा था, वे आठ पास ले गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में नजर नहीं आए। इसलिए अब यह आवश्‍यक हो गया है कि कर्मचारी इस बात को समझें कि उनका हित कहां और कैसे हो सकता है। असली लड़ाई तो अब शुरू हुई है, मजीठिया वेतनमान लागू कराने की।

करना क्‍या होगा

आने वाले दिनों में बैठकों के जरिये कर्मचारियों को जागरूक किया जाएगा कि किस प्रकार वे अपना मजीठिया वेतनमान निकलवा सकते हैं और सक्रियता दिखा कर सही रिपोर्ट प्रदेश सरकार तक पहुंचाने में कामयाब हो सकते हैं। इस बीच दैनिक जागरण प्रबंधन और भी कई चालें चल सकता है। उससे कर्मचारियों को सतर्क रहना होगा और मजीठिया वेतनमान लागू कराने के अभियान में शामिल होना होगा। अभियान की जानकारी समय-समय पर कर्मचारियों को दी जाती रहेगी। इसलिए जागरूक रहें, सतर्क रहें, अपडेट रहें। आपका भविष्‍य शुभ हो।

वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत सिंह के एफबी वॉल से

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पीड़ित पत्रकारों का साथ दूंगा, मीडिया घरानों की नाराजगी की परवाह नहीं : केजरीवाल

दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल को मजीठिया वेतनमान दिलाने का आश्‍वासन देकर एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह अलग किस्‍म के राजनेता हैं। वह शोषित, पीड़ित और प्रताड़ित वर्ग के हितों की रक्षा करने के लिए बने हैं। इसके लिए उन्‍हें बड़े-बड़े मीडिया घरानों की नाराजगी तक की कोई परवाह नहीं है। शुक्रवार को दिल्‍ली सचिवालय में मुलाकात के दौरान उन्‍होंने कहा, ”हम जनता के वोट से जीत कर आए हैं। इसलिए हम मालिकान के साथ नहीं, पीडि़त पत्रकारों के साथ खड़े हैं।”

इन पत्रकारों की समस्‍याओं के समाधान के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हैं। उनके साथ उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया और दिल्‍ली सरकार के कई अधिकारी भी उपस्थित थे। प्रतिनिधिमंडल में शामिल पत्रकारों ने अपनी समस्‍याओं से संबंधित एक ज्ञापन मुख्‍यमंत्री को सौंपा। उसके बाद मजीठिया मामले का अध्‍ययन कर रहे अधिकारी कपिल सिंह ने पत्रकारों की समस्‍याओं को नोट किया और पत्रकारों के साथ उस पर विस्‍तार से चर्चा भी की।

अरविंद केजरीवाल से मिलकर लौटे दैनिक जागरण नोएडा के चीफ सब एडिटर श्रीकांत सिंह की रिपोर्ट.


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पत्रकार ने जीएम / एडिटर को पत्र लिखा- आपकी एक छोटी-सी हरकत औद्योगिक अशांति पैदा कर सकती है, जो संस्थान पर बहुत भारी पड़ेगी

श्री अभि‍मन्यु शर्मा जी,

महाप्रबंधक / संपादक

दैनिक जागरण, जम्मू।

महोदय,

मुझे आज फोन पर सूचना मिली है कि मेरे 50 हजार रुपये के लोन के संदर्भ में आप गारंटी लेने वाले मेरे सहयोगियों को प्रताडि़त कर रहे हैं। आपने उनसे यह झूठ भी बोला है कि लोन के संदर्भ में मुझे नोटिस जारी हो चुका है, जबकि उस संदर्भ में मुझे कोई नोटिस नहीं मिला है। इस संदर्भ में आपका ध्यान निम्न बातो पर दिलाना चाहता हूं।

(पत्र लेखक पत्रकार श्रीकांत सिंह की फाइल फोटो)

 

1- मेरे लगभग 25 अर्जित अवकाश बाकी हैं, लेकिन सूचित करने के बावजूद आपने मेरा फरवरी माह का वेतन जारी नहीं किया, जबकि संस्थान में आपके संबंधी बिना सूचित किए गायब रहते हैं फिर भी आप उनका पूरा वेतन जारी कर देते हैं। संस्थान ने आपको इतनी पावर दी है तो उसका दुरुपयोग आप क्यों कर रहे हैं। इसका जवाब आपको आदरणीय प्रधान संपादक संजय गुप्त जी को देना होगा।

2- लोन के नियमानुसार गारंटी देने वाले कर्मचारी के वेतन से कटौती तभी की जा सकती है, जब लोन लेने वाले कर्मचारी ने या तो नौकरी छोड़ दी है या उसे निकाल दिया गया हो। मान्यवर, आपको अभी यह भी पता नहीं है कि न तो मैंने नौकरी छोड़ी है और न ही मुझे निकाला गया है। जबकि आपको मेल से यह सूचित कर चुका हूं कि किस वजह से मुझे नोएडा में रुकना पड़ा है। दूसरी बात यह कि गारंटी लेने वाले कर्मचारी के वेतन से कटौती तभी की जा सकती है, जब एक वर्ष में लोन की अदायगी न की गई हो। आप हमें यह बताएं कि आप जनहित जागरण छापने वाले अखबार के संपादक हैं या किसी चिटफंड कंपनी के रिकवरी एजेंट। क्यों न मैं संस्थान की अनयिमितताओं को सेवी में ले जाऊं, जहां आप से सवाल जवाब किया जाए।

3- आपकी हरकतों से यह साफ पता चल रहा है कि आप माननीय सुप्रीम कोर्ट का अपमान करने पर उतारू हैं। आप तुरंत यह बताएं कि क्यों न आपके खि‍लाफ एक शि‍कायत माननीय सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाई जाए।

4- अंतिम बात आपको यह बतानी है कि दैनिक जागरण के हजारों कर्मचारी माननीय सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मामला दर्ज करा चुके हैं और वे राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट भी हो चुके हैं। कई श्रमिक यूनियनों ने हमारा समर्थन किया है। आपकी एक छोटी सी हरकत औद्योगिक अशांति पैदा कर सकती है, जो संस्थान पर बहुत भारी पड़ेगी। उसके लिए सिर्फ और सिर्फ आप जिम्मेवार होंगे। कल ही मैं इस मुद्दे को यूनियन नेताओं के समक्ष रखूंगा। आप तुरंत जवाब दें अन्यथा आप जानें और आपका काम जाने।

धन्यवाद। कुछ बुरा लगा हो तो उसे अन्यथा न लें। मैं आपको धमका नहीं रहा हूं, सूचित भर कर रहा हूं। मुझे भरोसा है कि आपका विवेक अवश्य जागेगा।

श्रीकांत सिंह
मुख्य उपसंपादक
संपादकीय विभाग
दैनिक जागरण

दैनिक जागरण में कार्यरत Shrikant Singh के फेसबुक वॉल से.  

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देखते हैं, ‘मजीठिया’ से बचने को किस हद तक गिरता है जागरण

चलो करते हैं न्याय की बात। दैनिक जागरण का कार्मिक प्रबंधक रमेश कुमार कुमावत खुद प्रताड़ना का शि‍कार हो रहा है। यह मैं नहीं कह रहा हूं, ये साक्षात माननीय कुमावत जी के ही वचन हैं। मैं नोएडा के सेक्टर-छह स्थि‍त कार्यालय में पुलिस अधि‍कारियों से मिलने गया था कि वहां रमेश कुमार कुमावत जी से मुलाकात हो गई। वह मुझसे कहने लगे-भइया मुझे क्यों फंसा दिया।

मैंने कहा-मैं क्यों फंसाऊंगा कुमावत जी। आप तो खुद फंसते जा रहे हैं। जब घटना वाले दिन पुलिस पीसीआर आई तो आपने पुलिस को जांच में सहयोग ही नहीं किया। दूसरी बात यह कि डीएलसी की जांच में भी आपने जिन लोगों को गवाह बनाया है, वे तो मौके पर थे ही नहीं। उनमें से कोई अवकाश पर था तो कोई बरेली में। मेरे स्मार्ट फोन से लिए गए फोटोग्राफ में भी आपके गवाह नजर नहीं आ रहे हैं। आप इस तरह से फर्जीवाड़ा करेंगे तो फंसेंगे ही। इस पर कुमावत जी ने जो बात कही, उसे जानकर आप दंग रह जाएंगे।

कहा, मैंने डीएलसी की जांच में कोई बयान नहीं दिया है। डीएलसी के यहां जो बयान गया है, उसे डीएलसी से सांठगांठ कर दैनिक जागरण प्रबंधन के किसी अधि‍कारी ने मेरे नाम से दर्ज कराया है। मैंने कुमावत जी के प्रति सहानुभूति जताई और कहा, खुराफातियों के नाम छिपा कर तो आप अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। इस पर कुमावत जी ने कहा, क्या करूं, मुझे नौकरी जो करनी है। आप पर जो हमला कराया गया, उसमें विजय सेंगर का हाथ है।

मैंने कुमावत साहब का बयान अपने स्मार्ट फोन में रिकार्ड कर लिया है, ताकि वह समय आने पर नजीर बने, लेकिन इससे साफ हो गया है कि दैनिक जागरण प्रबंधन मजीठिया वेतनमान देने से बचने और कर्मचारियों को परेशान करने के लिए किस हद तक गिर सकता है। खैर, इस मामले में पुलिस की जांच रिपोर्ट आनी बाकी है। देखते हैं-क्या होता है। 

दैनिक जागरण में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से

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प्रदीप श्रीवास्तव और विनोद शील का विरोध करने के कारण मैं निशीकांत ठाकुर का चहेता बन गया

: दैनिक जागरण के चिंटू, मिंटू और चिंदीचोर : अवधी की एक कहावत है-केका कही छोटी जनी, केका कही बड़ी जनी। घरा लै गईं दूनौ जनी। अर्थात किसे छोटी बहू कहूं और किसे बड़ी बहू कहूं। घर तो दोनों बहुओं ने बर्बाद किया है। यह बात दैनिक जागरण पर सटीक बैठती है। 1995 की बात है, जब टीवी चैनलों की धूम मची थी। अखबार इस बात से डर गए थे कि कहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया उन्हें निगल न जाए। ऐसे समय में मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया से काम छोड़ कर दैनिक जागरण में नौकरी के लिए आ गया था।

ज्वाइनिंग का पहला दिन था। नोएडा के सेक्टर-8 वाले कार्यालय में गेट पर एक सज्जन मिले। उन्होंने कहा, भाई आज ही ज्वाइन कर रहे हो। मैंने हां में सिर हिला दिया। उन्होंने कहा, मत ज्वाइन करो। यहां तो बिहार के लोगों का बोलबाला है। बड़ा दुख पाओगे। इसे मैंने चुनौती के रूप में लिया और मन ही मन में तय किया कि इस संस्थान में कम से कम एक दशक बिताऊंगा। इससे पूर्व मैं किसी भी संस्थान में कुछ महीनों से ज्यादा नहीं टिका था। शायद मेरे संकल्प का ही असर है कि इस समय दैनिक जागरण में मेरे दो दशक पूरे हो रहे हैं।

संस्थान के अंदर कुछ ही दिनों बाद पता चल गया कि यहां तो प्रदीप श्रीवास्तव की तूती बोलती है, जो उस समय समाचार संपादक हुआ करते थे। यह अलग बात है कि कुछ वर्षों बाद निशीकांत ठाकुर अनाड़ी से खि‍लाड़ी और फिर खि‍लाडि़यों के खि‍लाड़ी बन चुके थे। प्रदीप श्रीवास्तव और विनोद शील का विरोध करने के कारण मैं कब निशीकांत ठाकुर का चहेता बन गया, मुझे पता तक नहीं चला। मुझे निशीकांत ठाकुर ने तो कभी कोई कष्ट नहीं दिया, लेकिन उनके आदमियों के कारण समय-समय पर मेरा दम जरूर घुटा है। इस घुटन का मेरे पास ठीक उसी तरह कोई जवाब नहीं था, जैसे निशीकांत ठाकुर का संस्थान में कोई जवाब नहीं था। अगर किसी ने जवाब देने का प्रयास भी किया तो वह तत्काल वीरगति को प्राप्त हो गया। 

निशीकांत ठाकुर पर आरोप लगते रहे हैं कि वह आदमी तो कम दाम में लाते हैं, लेकिन वे होते हैं दो कौड़ी के। यह अलग बात है कि निशीकांत ठाकुर ऐसे काबिल लोगों का सम्मान करते रहे, जो उनके आदमियों को खींच खांच कर चला देते थे। फिर भी यह विडंबना तो रही ही कि फोन का बिल पाने के लिए निशीकांत ठाकुर का आदमी होना अनिवार्य था। मेरी और निशीकांत ठाकुर की दोस्ती दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली ही थी। इसलिए मुझे आज तक संस्थान से फोन का बिल नहीं मिला। यह अलग बात है कि मैंने अपने मारुति वैन के ड्राइवर को भी फोन दे रखा था।

खैर, निशीकांत ठाकुर का दौर पूरा हुआ और कमान आ गई विष्णु त्रिपाठी के हाथ में। उन्होंने जो बैठकें लीं, उनसे ऐसा लगा, जैसे पत्रकारिता का नया दौर आने वाला है, जिसमें राजा भोज की प्रजा के समान सभी काबिल होंगे और लोगों को अपनी योग्यता का फल मिलेगा। लेकिन यह क्या, चिंटू, मिंटू और चिंदी चोरों की ऐसी भीड़ लगी कि निशीकांत ठाकुर द्वारा एकत्र किए गए रत्नों की वाट लग गई। 

अब आप यह गर्व से कह सकते हैं कि दैनिक जागरण पूरी तरह से प्रतिभा शून्य हो रहा है। काबिल और नाकाबिल लोगों की जो कॉकटेल निशीकांत ठाकुर ने बनाई थी, उसे साफ कर विष्णु त्रिपाठी ने चिंटू, मिंटू और चिंदी चोरों का ऐसा विलयन बनाया है, जो पूरी तरह से नीट है। उसमें आप को प्रतिभा की कोई मिलावट नहीं मिलेगी। उन्होंने ऐसी बाड़ तैयार कर दी है, जो खुद फसल उजाड़ रही है।

दैनिक जागरण में कार्यरत चीफ सब एडिटर श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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पत्रकार श्रीकांत सिंह ने जागरण वालों पर यूं मारी पिचकारी, देखें वीडियो

दैनिक जागरण नोएडा से जुड़े हुए वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत सिंह काफी समय से बगावती मूड में हैं. इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना एरियर व सेलरी पाने के लिए मुहिम छेड़ रखी है. साथ ही दर्जनों कर्मचारियों को इस मुहिम से जोड़ रखा है. पिछले दिनों नाराज प्रबंधन ने श्रीकांत का तबादला जम्मू कर दिया. बाद में वे नोएडा बुलाए गए लेकिन उन्हें आफिस में नहीं घुसने दिया गया. साथ ही जागरण के गार्डों ने उनसे मारपीट व छिनैती की. इस पूरे मामले को लेकर वे लेबर आफिस गए लेकिन उनका आरोप है कि अफसर ने सेटिंग करके रिपोर्ट जागरण के पक्ष में दे दी है.

श्रीकांत सिंह ने पूरे मामले को लेकर होली के दिन जागरण पर पिचकारी मारी है. अपने क्रिएटिव अंदाज में उन्होंने विजुवल्स के साथ होरी गीत को यूट्यूब पर लोड किया है. उनके होरी गीत की एक बानगी देखिए…

संजय गुप्ता का दिल भर आया
विष्णु त्रिपाठी देखो मुंहकी खाया
ओम वर्मा हड़के
रंग बरसे
भीगे कर्मचारी
रंग बरसे

पूरे वीडियो को देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=_NfFADVM9zQ

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जागरण के पत्रकार ने नोएडा के उप श्रमायुक्त की श्रम सचिव और श्रमायुक्त से की लिखित शिकायत

मजीठिया मामले में अपने को पूरी तरह से घ‍िरा पाकर दैनिक जागरण प्रबंधन इतना बौखला गया है कि अब वह हमला कराने, घूसखोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने पर उतर आया है। इस बात के संकेत उस जांच रिपोर्ट से मिल रहे हैं, जिसके लिए जागरण के पत्रकार श्रीकांत सिंह ने उप श्रम आयुक्त को प्रार्थना पत्र दिया था। जांच के लिए पिछले 21 फरवरी 2015 को श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी राधे श्याम सिंह भेजे गए थे। यह अफसर इतना घूसखोर निकला कि उसने पूरी जांच रिपोर्ट ही फर्जी तथ्यों के आधार पर बना दी। उसने जांच रिपोर्ट में बतौर गवाह जिन लोगों के नाम शामिल किए हैं, उनमें से कोई भी घटना के मौके पर मौजूद नहीं था।

इस बात के पुख्ता प्रमाण श्रीकांत सिंह के पास हैं, क्योंकि उन्होंने मौके की फोटोग्राफी भी अपने स्मार्ट फोन से कर ली थी। इन गवाहों में दो लोग तो घटना के दिन बरेली में थे और एक सहयोगी अवकाश पर थे। नोएडा के उप श्रम आयुक्त कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोगों में रोष व्याप्त है क्योंकि इसी विभाग पर सताए जा रहे श्रमिकों को राहत पहुंचाने की जिम्मेवारी होती है। यह जानकारी सीबीआई को भी दे दी गई है। अब देखना यह है कि इन भ्रष्ट अफसरों पर कब और कहां से कार्रवाई होती है। श्रम आयुक्त से जो श‍िकायत की गई है, वह मूल रूप में नीचे दी जा रही है। श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी की जांच रिपोर्ट आप खुद देखें, सच का पता अपने आप चल जाएगा। 

सेवा में,
श्रम आयुक्त महोदय
विषय : दैनिक जागरण प्रबंधन के इशारे पर मुझे नौकरी से निकाले जाने की साजिश की गलत जांच रिपोर्ट देने के बारे में
मान्यवर,

निवेदन है कि मैं पिछले 20 वर्षों से दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट में कार्य कर रहा हूं और इस समय मुख्य उपसंपादक के पद पर कार्यरत हूं। मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार वेतन देने से बचने और इस संदर्भ में माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुला उल्लंघन करने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन मुझे नौकरी से निकालने की साजिश रच रहा है। इस संदर्भ में मैंने जब नोएडा के उप श्रम आयुक्त कार्यालय में अर्जी दी तो उसकी गलत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। जब मैंने जांच रिपोर्ट पर एतराज जताया तो मुझे उप श्रम आयुक्त कार्यालय में अपमानित किया गया। इसलिए मजबूर होकर मुझे आपको आवेदन देना पड़ रहा है। आशा है मेरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की अनुकंपा करेंगे। मामला इस प्रकार है-

1-28 दिसंबर 2013 को मेरा तबादला जम्मू कर दिया गया, लेकिन मेरे तबादले की कोई सूचना अथवा डाटा जम्मू नहीं भेजा गया और उसके लिए मुझे अप्रैल 2014 तक परेशान किया गया। इस दौरान मुझे कोई वेतन नहीं दिया गया, जिससे मेरी माली हालत बहुत खराब हो गई। परिवार और सामान के साथ जम्मू जाने के लिए मुझे न तो कोई खर्च दिया गया और न ही कोई पदोन्नति अथवा वेतन बढ़ोतरी दी गई। ऐसी हालत में परिवार के साथ जम्मू स्थानांतरित होना संभव नहीं था। मुझे इस समय मात्र 25 हजार रुपये वेतन दिया जा रहा है, जिसमें जम्मू का 10 हजार रुपये खर्च और बढ़ गया। मुझे इस आश्वासन के साथ जम्मू भेजा गया कि मेरी माली हालत सुधारने के लिए क्षतिपूर्ति की जाएगी, जिस पर आज तक कोई विचार नहीं किया गया।

2-नोएडा कार्यालय के इशारे पर मुझे जम्मू कार्यालय में उठवा लेने की धमकी दी गई और मुझे अशुद्ध पानी पीने के लिए मजबूर किया गया। मेरी तबीयत खराब होने लगी तो मैंने पानी की शुद्धता पर सवाल उठाया। इस पर वहां के महाप्रबंधक ने मुझे धमकाया और पानी के मामले में माफीनामा लिखवा लिया। यह बात मैंने नोएडा कार्यालय को बताई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस बात की जांच जम्मू कार्यालय के कर्मचारियों और मेरी मेडिकल जांच रिपोर्ट से की जा सकती है।

3-इसी बीच 7 फरवरी 2015 को जागरण प्रबंधन की प्रताड़ना के विरोध में नोएडा कार्यालय के कर्मचारियों ने काम बंद हड़ताल कर दी। हड़ताल वापस लेने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच समझौता हुआ। समझौते के तहत प्रताडि़त करने के लिए हाल में किए गए तबादले वापस लिए जाने थे। उसी के तहत मुझे 10 फरवरी 2015 को बातचीत के लिए बुलाया गया था। जब मैं कार्यालय में प्रवेश करने लगा तो गार्डों से मुझ पर हमला करा दिया गया और मेरी जेब से 36 हजार रुपये निकाल लिए गए। मैंने मौके पर पुलिस पीसीआर वैन बुला ली, लेकिन गार्डों ने कार्यालय का गेट अंदर से बंद कर लिया और पुलिस को जांच में कोई सहयोग नहीं दिया गया।

4-मेरे आवेदन पर उप श्रम आयुक्त कार्यालय, नोएडा से 21 फरवरी 2015 को श्रम प्रवर्तन अफसर राधे श्याम सिंह को जांच के लिए भेजा गया, लेकिन उन्होंने ठीक से पूछताछ किए बगैर दैनिक जागरण प्रबंधन को क्लीन चिट दे दी और मेरी समस्या पर कोई विचार नहीं किया। मैंने दैनिक जागरण, नोएडा के महाप्रबंधक श्री नीतेंद्र श्रीवास्तव और कार्मिक प्रबंधक श्री रमेश कुमार कुमावत को मेल भेज कर अपने पक्ष से अवगत कराया, लेकिन मुझे न तो मेल का कोई जवाब दिया गया और न ही मुझे कार्यालय में प्रवेश करने दिया जा रहा है। इस प्रकार मुझे गैरहाजिर दिखा कर और वेतन से वंचित रखकर दैनिक जागरण प्रबंधन मुझे नौकरी से निकालने की साजिश रच रहा है।

भवदीय
श्रीकांत सिंह
मुख्य उपसंपादक
संपादकीय विभाग, दैनिक जागरण  
नोएडा

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मजीठिया संघर्ष : जागरण प्रबंधन ने तबादला किया तो श्रीकांत ने मैनेजमेंट को भेजा नोटिस

दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय से जम्मू स्थानांतरित मुख्य उपसंपादक श्रीकांत सिंह ने जागरण प्रबंधन को दिया नोटिस. कार्मिक प्रबंधक रमेश कुमार कुमावत ने श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी राधे श्याम सिंह को दिए थे भ्रामक, गुमराह करने वाले और अपूर्ण बयान. जागरण प्रबंधन की दुर्भावनापूर्ण नीतियों के कारण श्रीकांत सिंह को ड्यूटी करने में पहुंचाई जा रही है बाधा. प्रबंधन की हठधर्मिता के विरोध में श्रीकांत सिंह लेंगे अदालत की शरण. पढ़ें, नोटिस में क्या लिखा गया है… 

From: shrikant@jmu.jagran.com

To: rkumawat@nda.jagran.com

CC: sanjaygupta@jagran.com,  neetendra@jagran.com,  vishnu@jagran.com,  abhimanyu@jmu.jagran.com,  personnel@jmu.jagran.com,  prashant@jmu.jagran.com,  dilip@jmu.jagran.com,  sudhirjha@jmu.jagran.com,  om@jmu.jagran.com,  yogita@jmu.jagran.com,  rakesh@jmu.jagran.com,  akhilesh@jmu.jagran.com

Subject: Notice

श्री रमेश कुमार कुमावत जी

कार्मिक प्रबंधक, दैनिक जागरण

डी-210,11, सेक्टर-63, नोएडा।

मान्यवर,

दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय में आपके निर्देश पर मुझ पर हमला कराए जाने के संदर्भ में मुझे श्रम प्रवर्तन अधि‍कारी श्री राधेश्याम सिंह की जांच रिपोर्ट मिली है। उसमें आपके द्वारा दिए गए बयान भ्रामक और अपूर्ण हैं। आपने यह बताया ही नहीं है कि दैनिक जागरण के नोएडा कार्यालय में मेरे प्रवेश पर रोक किसने और क्यों लगाई है। आपने अधि‍कारी को बताया है कि मेरा तबादला दो वर्ष पूर्व किया गया और प्रतिष्ठान द्वारा स्थानांतरण रोके जाने संबंधी निर्देश से मैं आच्छादित नहीं हूं। आपका यह बयान भी असत्य, भ्रामक और गुमराह करने वाला है। मुझे तबादले का पत्र 28 दिसंबर 2013 को दिया गया, लेकिन आपकी लापरवाही, ढुलमुल रवैया और स्थानांतरण संबंधी डाटा समय पर जम्मू कार्यालय न भेजे जाने के कारण मैं वर्ष 2014 में जम्मू कार्यालय में ज्वाइन कर सका। इस आधार पर अभी मेरे तबादले के एक वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं। दूसरी बात यह कि प्रधान संपादक आदरणीय संजय गुप्त और महाप्रबंधक श्री नीतेंद्र श्रीवास्तव के निर्देशों का संदर्भ लें तो उससे यह कतई पुष्ट नहीं होता है कि मैं तबादला वापसी संबंधी निर्देशों से आच्छादित नहीं हूं। इस प्रकार आपके बयान मेरे प्रति आपकी दुर्भावना पुष्ट करते हैं।

पुन: बताना चाहता हूं किे जम्मू कार्यालय में मुझे तरह-तरह से प्रताडि़त किया गया और धमकाया गया, जिसके बारे में प्रबंधन को समय-समय पर अवगत कराता रहा हूं, लेकिन मेरी प्रताड़ना को रोकने के लिए प्रबंधन ने कोई कदम नहीं उठया। प्रताड़ना के कारण ही जम्मू में मेरा स्वास्थ्य बुरी तरह से खराब हो गया, जिसकी मेडिकल जांच रिपोर्ट मैंने दैनिक जागरण के नोएडा और जम्मू कार्यालय के प्रबंधन को उपलब्ध करा दी है। प्रबंधन की दुर्भावनापूर्ण नीतियों के कारण इस समय मैं ड्यूटी नहीं कर पा रहा हूं। इसलिए यह मेल मिलने के 24 घंटों के भीतर मुझे मेरे सवालों का जवाब दें और नोएडा कार्यालय में मेरी ज्वाइनिंग संबंधी मेल जारी करें, नहीं तो मेरा एक भी दिन का वेतन काटा गया तो मैं संपूर्ण क्षतिपूर्ति हासिल करने के लिए अदालत की शरण लेने को मजबूर हो जाऊंगा।

भवदीय

श्रीकांत सिंह
मुख्य उपसंपादक
संपादकीय विभाग, दैनिक जागरण

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