आपा खो बैठे कृष्णमाचारी श्रीकांत ने मीडियावालों से कहा- ‘शट अप’

मुंबई : एशिया कप के लिए भारतीय टीम की घोषणा के बाद राष्ट्रीय चयनकर्ता प्रमुख कृष्णमाचारी श्रीकांत मीडिया के सवालों पर भड़ककर अपना आपा खो बैठे और बोल बैठे…'शट अप'। श्रीकांत पत्रकारों से बातचीत में भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे में निराशाजनक प्रदर्शन का बचाव कर रहे थे जिससे उन पर एक के बाद एक सवालों का बाउंसर फेंके जा रहे थे। चयनकर्ता प्रमुख के सामने टीवी चैनलों के कैमरे और माइक्रोफोन लगे हुए थे। उनके चारों तरफ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडियाकर्मी खड़े थे।

श्रीकांत ने एशिया कप के लिए घोषित टीम के खिलाड़ियों के नाम गिनने शुरू किए और फिर कहा कि वीरेन्द्र सहवाग और जहीर खान को अनफिट होने के कारण एशिया कप से विश्राम दिया गया है। इसके बाद सहवाग को लेकर सवाल बार-बार उछलते रहे। श्रीकांत ने दोहराया ..सहवाग चोटिल हैं। यह एक ईमानदार सच्चाई है। मैं आपकों कोई कारण नहीं बता रहा हूं। यह फिजियोयेरिपिस्ट की मेडिकल रिपोर्ट है जो बोर्ड के पास आई है। रिपोर्ट का कहना है कि सहवाग और जहीर को चोटों के कारण विश्राम की जरूरत है।

श्रीकांत ने कहा कि और अटकलबाजियां लगाने का कोई औचित्य नहीं है वैसे कोई भी किसी बात पर अटकलबाजी लगा सकता है। फिजियोथेरेपिस्ट समय-समय पर फिटनेस टेस्ट लेते रहते हैं और यह फैसला इसी रिपोर्ट के आधार पर किया गया है। ये सब बातें आपकों दिखाई नहीं जा सकती हैं क्योंकि यह आंतरिक मामला है। सवाल फिर भी जारी रहे और श्रीकांत अब उखड़ चुके थे। उन्होंने कहा कि वह एक ही सवाल का जवाब अलग-अलग तरह से नहीं दे सकते।

श्रीकांत के बिल्कुल साथ खड़े एक टीवी रिपोर्टर ने जब उनसे पूछ डाला कि यदि सहवाग की फिटनेस पर कोई संदेह है तो उन्हें वापस क्यों नहीं बुला लिया जाता? इस बार तो चयनकर्ता प्रमुख अपना आपा खो बैठे। उन्होंने कहा – ..बॉस. यू जस्ट शट अप नाऊ। आप अब मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकते। हम फिटनेस के बारे में बात कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि आप क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं। यदि आप मुझ पर गुगलियां फेंकेगे तो मुझे भी गुस्सा आएगा। चयनकर्ता प्रमुख ने कहा मैं जानता हूं कि मुझे क्या कहना है। हम सीधी बात कर रहे हैं। श्रीकांत ने फिर हिन्दी में कहा यदि आप मुझ पर सवाल उठाने की कोशिश करेंगे तो क्या आपको लगता है कि मैं चुप रहूंगा।.. श्रीकांत ने फिर संभलते हुए कहा कि उन्हें विश्वास है कि टीम इंडिया दौरे का समापन सुखद अंदाज में करेगी।

एक चपरासी से तीन सौ करोड़ के मालिक कैसे बने कृपाशंकर?

मुंबई। मुंबई के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह पर कानूनी शिकंजा कसने लगा है। अवैध रूप से सम्पत्ति बनाने और लाखों करोड़ों रुपये की हेराफेरी के मामले में उनके व उनके कुनबे के खिलाफ मामला दर्ज किया है। हालांकि जब मुंबई पुलिस कृपाशंकर सिंह से पूछताछ करने उनके घर पहुंची तो वो गायब मिले। उनके घर के पीछे से धुआं जरूर निकलता नजर आया। आईबीएन7 ने जब पड़ताल की तो वहां कागजात जलते नजर आए। कई कागजात पर कृपाशंकर सिंह का नाम लिखा था।

मुंबई के निर्मल नगर थाने में कृपाशंकर सिंह समेत उनके परिवार के छह सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इसमें कृपा की पत्नी मालती सिंह, बेटा नरेंद्र सिंह, बहू अंकिता, बेटी सुनीता और दामाद विजय शामिल हैं। इन पर धारा 120बी यानी साजिश रचने, धारा 13 यानी भ्रष्टाचार, धारा 420 यानी धोखाधड़ी समेत, फर्जीवाड़ा करने जैसे मामले भी दर्ज किए गए हैं। दरअसल बॉम्बे हाईकोर्ट ने कृपाशंकर सिंह की तकरीबन 300 करोड़ की संपत्ति जब्त कर दी है। साथ ही मुंबई पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच रिपोर्ट देने को कहा है। इस आदेश के बाद कृपाशंकर सिंह से कांग्रेस के मुंबई अध्यक्ष का पद छीन लिया गया था। लेकिन एफआईआर के बाद अब उनपर मुसीबतों का नया पहाड़ टूट सकता है।

गौरतलब है कि एक सामान्य चपरासी से लेकर महाराष्ट्र कांग्रेस में दबदबा बनाने वाले कृपाशंकर सिंह का सफर किसी फिल्म सरीखा है। वो 1998 तक अपने परिवार में कमाने वाले एकलौते सदस्य थे। 1999 में विधायक बनने के बाद उनकी आय प्रति महीना 45,000 ही हुई लेकिन 1999 से लेकर 2009 तक उन्होंने एक दर्जन से भी ज्यादा जमीन, फ्लैट और अन्य अचल संपत्ति खरीदी। तकरीबन 320 करोड़ की ये जायदाद उनके और उनके रिश्तेदारों के नाम पर है। इसमें उनकी पत्नी और बेटी भी शामिल हैं जिनकी आय का कोई स्रोत नहीं है। कृपाशंकर सिंह पर दर्ज किए गए इस मामले की सबसे बड़ी वजह हैं वो 1 करोड़ 75 लाख रुपए जो उनके बेटे नरेंद्र और उनकी पत्नी के अकाउंट में आए। आरोप है कि ये पैसे जेल में बैठे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मघु कोड़ा ने हवाला के तौर पर ट्रांसफर किए गए थे।

आरोपों के मुताबिक 2008-09 में कृपाशंकर सिंह की पत्नी मालती देवी और उनके पुत्र नरेंद्र के अलग-अलग बैंक अकाउंट्स में 65 करोड़ रुपए डिपॉजिट हुए और ट्रांसफर भी हुए जिनकी कोई जानकारी मुहैया नहीं कराई गई और एंटी करप्शन विभाग ने इन लेनदेन पर सवाल खडे़ किए हैं। मार्च 2008-09 में ही टेलीकॉम घोटाले में फंसे शाहिद बलवा की कम्पनी डीबी रियल्टी से 4.5 करोड रुपए कृपाशंकर सिंह के बेटे और उनकी पत्नी के एकाउंट में ट्रांसफर हुए। हालांकि कृपाशंकर सिंह और उनके बेटे नरेंद्र ने सफाई दी कि ये पैसे उन्होंने किसी प्रोजेक्ट में इस्तेमाल के लिए लिए थे। बाद में इसे वापस भी किया था। लेकिन ये प्रोजेक्ट क्या था इस बारे में उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी है।

मालूम हो कि 2009 में असेबंली इलेक्शन में कृपाशंकर सिंह कालिना से जीते लेकिन उनके चुनावी हलफनामें में उन चार संपत्तियों और उत्तरप्रदेश की उस जमीन का जिक्र बिल्कुल नहीं था जो उन्होंने भारी भरकम रकम देकर खरीदी है। ऐसे दर्जनों सवाल हैं जिनका सामना कृपाशंकर सिंह को देना है। कृपाशंकर सिंह के खिलाफ तीन एजेंसियां सीबीआई, ईडी और मुंबई पुलिस ने जांच कर अपनी रिपोर्ट बॉम्बे हाईकोर्ट को सौंपी है। मुंबई पुलिस को इसी रिपोर्ट के आधार पर जांच करनी है। मुंबई पुलिस को 19 अप्रैल को अपनी कार्रवाई और जांच की रिपोर्ट बॉम्बे हाईकोर्ट को सौंपनी है।

साभार : आईबीएन7 न्यूज चैनल

आईपीएस अमिताभ को सरकारी कमरा मिला, वापस काम पर लौटे

लखनऊ : आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को आज रूल्स एंड मैनुअल कार्यालय में एक स्वतंत्र सरकारी कमरा आवंटित कर दिया गया. इसके बाद अमिताभ ने आज ही कार्यालय जा कर अपना कार्य करना प्रारम्भ भी कर दिया. उन्होंने 24 फरवरी को अतुल, डीजीपी, उत्तर प्रदेश तथा ओपी दीक्षित, डीजी, रूल्स एंड मैनुअल को बताया था कि वे कोई सरकारी कमरा नहीं होने के नाते 2 फरवरी से ही बाहर लान में बैठ कर काम कर रहे. अतः या तो उन्हें सरकारी कामकाज के लिए नियमानुसार एक स्वतंत्र कमरा दिया जाए अथवा 28 फरवरी से वे सरकारी कमरे की व्यवस्था होने तक अवकाश पर रहेंगे.

इसके बाद कोई कार्यवाही नहीं होने पर वे 28 फरवरी से अवकाश पर चले गए थे. आज 29 फरवरी को उन्हें ओपी दीक्षित का यह आदेश मिल गया कि अब उन्हें एक स्वतंत्र कमरा दिया जाता है. रूल्स एंड मैनुअल कार्यालय के दूसरे एसपी राहुल अस्थाना को उसी कार्यालय में पुलिस अधीक्षक, मानवाधिकार का खाली चल रहा कक्ष आवंटित कर दिया गया है. इस तरह वह काम जो एक महीने पहले हो जाना चाहिए था, अब अमिताभ द्वारा छुट्टी पर चले जाने के बाद हुआ है.

आईओबी का 52 करोड़ न चुकाने वाले मतंग सिंह और उनकी कंपनी को रिकवरी की नोटिस

अक्‍सर विवादों में रहने वाले मतंग सिंह और उनका चैनल एक बार फिर सुर्खियों में है. हमार टीवी एवं पॉजिटिव मीडिया ग्रुप द्वारा इंडियन ओवरसीज बैंक का करोड़ों रुपया का लोन न चुकाने पर बैंक ने रिकवरी नोटिस जारी किया है. नवभारत टाइम्‍स में बुधवार को प्रकाशित नोटिस में कंपनी पर 52,39,78,370 रुपये की देनदारी बताई गई है. नोटिस में बैंक ने स्‍पष्‍ट लिखा है कि अगर अस्‍सी दिनों के भीतर हमार टीवी और पॉजिटिव मीडिया ने उक्‍त पैसा बैंक को वापस नहीं किया तो उस की प्रॉपर्टी बैंक की हो जाएगी.

बैंक ने नोटिस में लिखा है कि नोएडा के सेक्‍टर चार स्थित प्‍लाट नम्‍बर ए 30 का 610322 वर्ग फीट की सम्‍पत्ति को उसने टेकओवर कर लिया है, लिहाजा किसी भी प्रकार का वित्‍तीय लेन-देन इस प्रॉपर्टी पर नहीं की जा सकती है. नोटिस के अनुसार यदि मतंग सिंह की कंपनी ने ये पैसा बैंक को वापस नहीं लौटाया तो कंपनी इस सम्‍पत्ति को टेकओवर करके इसकी नीलामी करके अपना पैसा वसूल करेगी. उल्‍लेखनीय है कि हमार टीवी के प्‍लाट ए 29 के मालिक भी मतंग सिंह और उनकी कंपनी है, जिसमें महिलाओं के चैनल फोकस टीवी का ऑफिस है. अगर बैंक ने हमार टीवी की सम्‍पत्ति को टेक ओवर कर लिया तो मतंग सिंह के लिए नोएडा में बैठने के लिए जगह नहीं रह जाएगी, क्‍योंकि उनका आफिस हमार टीवी वाले बिल्डिंग में ही है.

विवादों के पर्याय बन चुके मतंग सिंह इस नोटिस के बाद एक बार फिर चर्चा में आ चुके हैं. इससे पहले भी कई बार उनकी स्थिति हास्‍यास्‍पद हो चुकी है. कुछ महीने पहले कांग्रेस में उनकी वापसी को लेकर भी अच्‍छा खासा नौटंकी हुआ था. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की मौजूदगी में उन्‍हें कांग्रेस में शामिल करने का ऐलान किया गया था तो अगले ही दिन कांग्रेस प्रवक्‍ता मनीष तिवारी ने उनके कांग्रेस में शामिल होने का खंडन कर दिया. इसको लेकर भी मतंग सिंह की काफी छीछालेदर हुई थी. हमार टीवी हड़ताल तथा पीएफ का पैसा न जमा करने को लेकर भी चर्चाओं में रहा है. अब अगर बैंक उनकी प्रॉपर्टी पर कब्‍जा जमाकर उसे नीलाम करता है तो उनकी बची खुची इज्‍जत भी चली जाएगी.

हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले की गूंज विधान परिषद तक पहुंची, वकीलों पर खतरा बढ़ा

मुंगेर। हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड के दौ सौ करोड़ के कथित विज्ञापन घोटाले के मामले की गूंज अब मुंगेर से पटना के विधान परिषद तक पहुंच गईं है। कांग्रेस की विधान परिषद सदस्या ज्योति ने बिहार विधान सभा के प्रथम दिन दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में महामहिम राज्यपाल देवानन्द कुंवर के अभिभाषण के समय मासिक पत्रिका डेमोक्रेटिक मिशन की प्रतियां लहराईं। कांग्रेस की विधान परिषद सदस्या ज्योति ने सदन से बाहर आने के बाद इस संवाददाता को मोबाइल पर बताया कि उन्होंने सदन में पत्रिका की प्रतियां लहराईं और सरकार से पूरे घोटाले में उच्चस्तरीय जांच और दोषियों के विरुद्ध काररवाई की मांग की है।

डेमोक्रेटिक मिशन ने जनवरी-फरवरी, 2012 के अपने कवर पृष्ठ पर मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष सह संपादकीय निदेशक शोभना भरतीया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर भी छापी है। शोभना भरतीया की तस्वीर के नीचे शीर्षक है : ‘‘हिन्दुस्तान : बिड़ला घराने का दूसरा चेहरा।'' मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर के नीचे छपा है :‘‘भ्रष्टाचार का जहर पीते नीलकंठ नीतीश कुमार।‘‘ मासिक पत्रिका डेमोक्रेटिक मिशन के अन्दर पृष्ठ पर विस्तृत रिपोर्ट शोभना भरतीया की तस्वीर के साथ छपी हैं। खबर का शीर्षक अन्दर के पृष्ठ परहै : ‘‘दैनिक हिन्दुस्तान के घोटालेबाज संचालक : 200 करोड़ का विज्ञापन घोटाला।‘‘

इस मासिक पत्रिका में छपी खबर मुंगेर मुख्यालय के कोतवाली थाना में दर्ज प्राथमिकी, जिसका केस नं0-445/2011 है, पर आधारित है। पुलिस थाना में सामाजिक कार्यकर्ता मंटू शर्मा के लिखित बयान पर जो प्राथमिकी दर्ज की गई है, उस प्राथमिकी में पुलिस ने दैनिक हिन्दुस्तान छापने वाली कंपनी मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष शोभना भरतीया, प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और स्थानीय संपादक बिनोद बंधु को भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8बी, 14 और 15 के तहत नामजद अभियुक्त बनाया है।

इस पत्रिका ने यह भी उजागर किया है कि किस प्रकार देश के इस मीडिया हाउस ने बिना रजिस्‍ट्रेशन कराए दस से अधिक वर्षों तक दैनिक हिन्दुस्तान का मुंगेर संस्करण को अवैध ढंग से प्रकाशित किया और करता आ रहा है। इसके माध्‍यम से केन्द्र सरकार और राज्य सरकार का विज्ञापन छापकर सरकार को लगभग दो सौ करोड़ का चूना लगाया है। मीडिया हाउस ने दबाव बनाना शुरू किया। पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर सूचनादाता मंटू शर्मा ने बताया कि इस मीडिया हाउस के आरोपीगण दबंग और शक्तिशाली उद्योगपति हैं। ऐसी संभावना है कि नामजद अभियुक्तों के इशारे पर मेरे और मेरे टीम के सहयोगियों क्रमशः अशोक कुमार (अधिवक्ता), काशी प्रसाद (अधिवक्ता), श्रीकृष्ण प्रसाद (अधिवक्ता) और अजय तारा (अधिवक्ता) के विरुद्ध बदले की भावना से प्रेरित होकर जानमाल को क्षति पहुंचाने की कार्रवाई या फर्जी मुकदमे में फंसाने की कार्रवाई हो सकती है। पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप में यह भी शिकायत की गई है कि इस मीडिया हाउस के मुंगेर जिले के तथाकथित पत्रकारों की भूमिका संदिग्ध हो गई है और मुंगेर हिन्दुस्तान कार्यालय के कथित प्रभारी संतोष सहाय ने उन पर दबाव बनाने का असफल प्रयास किया है।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. श्रीकृष्‍ण प्रसाद से संपर्क मोबाईल नं.- 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.

मायावती को जिताने के लिए लिए कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंकी

: बसपाई हराने में जुटे : मायावती को तीसरी बार विधान सभा में पहुंचाने के लिए इस बार कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी है। राहुल गांधी, जितिन प्रसाद, जफर अली नकवी सहित आधा दर्जन कांग्रेसी स्टार प्रचारक मायावती को जिताने के लिए रैली तक कर चुके हैं। मायावती का कड़ा मुकाबला भाजपा की मंजू त्यागी और सपा के राम शरण से है। मायावती इससे पूर्व पहली बार 1996 में और दूसरी बार 2002 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर विधान सभा में पहुंची थीं, लेकिन इस बार के चुनाव में वह कांग्रेस की उम्मीदवार हैं। बसपा ने मायावती को हराने के लिए श्रीपाल को मैदान में उतारा है।

लखीमपुर-खीरी जिले की श्रीनगर विधान सभा क्षेत्र से वैसे तो मायावती के विरुद्ध 15 उम्मीदवार हैं, परंतु इस सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र से उनका त्रिकोणीय मुकाबला भाजपा की दलित मंजू त्यागी और सपा के राम शरण से है। 2007 में इस सीट से सपा के डाक्टर एआर उस्मानी जीते थे, तब यह सामान्य सीट थी। नए परिसीमन में यह सीट सुरक्षित हो जाने के कारण मायावती ने बसपा से नाता तोड़कर कांग्रेस का टिकट ले लिया है।

वास्तव में मायावती, बसपा सुप्रीमो मायावती के मंत्रिमंडल में (11 अक्टूबर 2002 से 29 अगस्त 2003 तक) महिला कल्याण राज्यमंत्री रह चुकी हैं। अक्टूबर 1996 के विधान सभा चुनाव में मायावती को बसपा ने टिकट देकर लखीमपुर जिले की श्रीनगर (सामान्य सीट) से चुनाव लड़ाकर जिताया था। अनुसूचित जाति (पासी) की इंटर पास मायावती के पति रामेश्वर प्रसाद खीरी जिले के काशीनगर इलाके के रहने वाले हैं। वे सरकारी सेवा से अवकाश मुक्त हुए हैं। मायावती के दो पुत्र और एक पुत्री हैं। मायावती का बैडमिंटन प्रिय खेल है। पहली बार विधान सभा में वे सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम समिति (1997-99), अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा विमुक्त जातियों संबंधी संयुक्त समिति (1999-2001) की सदस्या तथा दूसरी बार 2002 में विधायक बनने पर वे प्रतिनिहित विधायन समिति (2002-2003) की सभापति रहीं। मायावती मंत्रिमंडल में मायावती को 11 अक्टूबर 2002 को महिला कल्याण राज्‍यमंत्री बनाया गया। उसी समय मायावती अपने नाम को लेकर सुर्खियों में आईं।

दरअसल, बसपा सुप्रीमो मायावती को यह बात पसंद नहीं थी कि उनके सामने विधान सभा में कोई दूसरी दलित मायावती बैठे, लिहाजा उन्होंने अपनी पार्टी की विधायक मायावती पर दबाव डाला कि वे अपना नाम परिवर्तित कर लें। पार्टी मुखिया की आज्ञा का पालन करते हुए बसपा विधायक मायावती ने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया कि सदन के अभिलेखों में उनका नाम मायावती की जगह माया प्रसाद कर दिया जाए। इसी के बाद वह मायावती से माया प्रसाद हो गईं। यह और बात है कि हाईस्कूल के प्रमाण-पत्र और अन्य अभिलेखों में अभी भी उनका नाम मायावती ही है। वर्ष 2007 के विधान सभा चुनाव में मायावती तीसरी बार श्रीनगर से बसपा प्रत्याशी बनीं। उनका मुकाबला सपा के आरए उस्मानी से हुआ। माया को करीब साढे़ पांच हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इससे पूर्व 2002 में वे सपा के ही धीरेन्द्र बहादुर सिंह को 4462 मतों से हराकर दूसरी बार विधान सभा पहुंची थीं। दिलचस्पप बात यह है कि सामान्य निर्वाचन क्षेत्र से किसी दलित महिला के दूसरी बार जीतने का यह एक रिकार्ड था।

इस बार के चुनाव में मुख्यमंत्री मायावती ने मायावती को टिकट नहीं दिया तो कांग्रेस ने उन्हें अपने पाले में कर लिया। मायावती के भाग्य से इस बार नए परिसीमन में श्रीनगर की यह सीट सुरक्षित (अनुसूचित जाति) हो गई। अब मायावती को यहां से जिताने में कांग्रेस ने पूरी ताकत लगा रखी है। कांग्रेस के जाने-माने मुस्लिम चेहरे और साफ-सुथरी छवि वाले लखीमपुर खीरी के सांसद जफर अली नकवी को इस बार पार्टी की गुटबंदी के चलते तथा जितिन प्रसाद के इशारे पर चुनाव प्रचार अभियान समिति से दूर रखा गया। अपनी इस उपेक्षा से दुखी नकवी ने अपने संसदीय क्षेत्र की श्रीनगर विधान सभा से मायावती को जिताने में पूरी ताकत लगा रखी है। नकवी के चलते क्षेत्र का मुस्लिम एकजुट हो गया है। नकवी कहते हैं, ‘माया की जीत मेरी प्रतिष्ठा का सवाल बना गया है। हम यहां से उन्हें जरूर जिताएंगे।’’ वैसे मायावती ने पूर्व की तरह इस बार भी अपना नामांकन मायावती के नाम से ही किया है, लेकिन उनका प्रचार कांग्रेसी माया प्रसाद के नाम से कर रहे हैं। कांग्रेसी नेताओं को प्रचार के दौरान ‘‘मायावती को जिताओ’’ कहना थोड़ा असहज लग रहा है। इस सबके बावजूद क्षेत्र में मायावती की फिजा अच्छी है। पुराने बसपाई भी चाहते हैं कि विधान सभा में बहनजी के सामने मायावती जाकर बैठें और इस बार वे विधान सभा अभिलेखों में अपना नाम मायावती ही रखें।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

नईदुनिया, ग्‍वालियर से चंद्रवेश, अर्पण एवं गोपाल का इस्‍तीफा

नईदुनिया, ग्‍वालियर से खबर है कि यहां से तीन लोगों ने इस्‍तीफा का नोटिस दे दिया है. वे लोग लीव पर चल रहे हैं. नईदुनिया प्रबंधन जिस तरह से अस्‍पष्‍ट नीति के साथ अपने कर्मचारियों से व्‍यवहार कर रहा है उससे इस अखबार के सभी यूनिटों में नाराजगी है. दिल्‍ली में दस लोगों की छंटनी करने के बाद अखबार ग्‍वालियर से भी तीन लोगों का पत्‍ता साफ कर दिया है. हालांकि कहा जा रहा है कि तीनों लोगों ने प्रबंधन के चिरकुटई वाले रवैये के चलते खुद इस्‍तीफा दे दिया है.

ग्‍वालियर से जिन लोगों ने इस्‍तीफा दिया है, उसमें चंद्रवेश पांडेय, अर्पण राउत और गोपाल त्‍यागी शामिल हैं. पिछले दिनों ही चंद्रवेश पांडेय को सेंट्रल डेस्‍क का इंचार्ज बनाया गया था. अर्पण को क्राइम से हटाकर पेज सेटिंग की जिम्‍मेदारी एवं गोपाल को डेस्‍क की जिम्‍मेदारी सौंपी गई थी. प्रबंधन ने ऐसा जानबूझकर किया था ताकि ये लोग परेशान हों, पर इन लोगों ने परेशान होने की बजाय इस्‍तीफा दे दिया. हालांकि दूसरी तरह यह भी कहा जा रहा है कि प्रबंधन ने इन लोगों से इस्‍तीफा मांग लिया था. बताया जा रहा है संपादक के पर कतरने की भी तैयारी प्रबंधन कर रहा है. अगले कुछ दिनों में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

नेटवर्क10 में बसंत निगम साइडलाइन, सारे अधिकार अशोक पांडेय को मिले

नेटवर्क10 से खबर है कि चैनल की लांचिंग को साकार रुप देने वाले सीईओ बसंत निगम को प्रबंधन ने साइड लाइन कर दिया है. उनके सारे अधिकार चैनल के एक्‍जीक्‍यू‍टिव एडिटर अशोक पाण्‍डेय को सौंप दिया गया है. अशोक पांडेय को बसंत निगम ही लेकर आए थे. पर अशोक पांडेय बसंत निगम पर भारी पड़ गए. इसके पहले भी बसंत निगम अपनों से धोखा खा चुके हैं. इसके चलते ही पिछली बार चैनल की लांचिंग लटक गई थी.

बसंत निगम एवं अशोक पांडेय के नेतृत्‍व में चैनल की लांचिंग तो हो गई, पर इसके साथ राजनीति भी शुरू हो गई. बताया जा रहा है कि नाराज बसंत निगम छुट्टी पर चले गए हैं. उनका मोबाइल भी स्‍वीच ऑफ बता रहा है. हालांकि अभी तकनीकी रूप से वे चैनल से अब भी जुड़े हुए हैं. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने उनसे हिमाचल में चैनल लांच करने की तैयारी करने को कहा है यानी एक तरह से घोषित रूप से उन्‍हें देहरादून में चैनल के मामलों से दूर कर दिया गया है. कहा जा रहा है कि उनके पास जितने अधिकार थे, प्रबंधन ने अशोक पांडेय को सौंप दिया है. यानी बसंत निगम को बिना अधिकार का राजा बना दिया गया है. 

गौरतलब है कि बसंत निगम नेटवर्क10 के शुरुआती प्रोजेक्‍ट से लेकर लांचिंग तक से जुड़े रहे हैं. बीच में कई विवादों के बाद भी उन्‍होंने प्रबंधन का साथ नहीं छोड़ा. पर प्रबंधन ने चैनल लांचिंग के बाद उनका साथ छोड़ दिया है. बताया जा रहा है कि अभी चैनल के अंदर राजनीति और तेज होने का अनुमान है. बसंत निगम का अगला कदम क्‍या होगा इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. वे चैनल से जुड़े रहेंगे या कोई और ठिकाना तलाशेंगे अभी कहना मुश्किल है, पर यह तो तय है कि नेटवर्क10 में राजनीति तेज होने वाली है. गौरतलब है कि अभी चैनल को लांच हुए एक महीना दस दिन ही हुआ है और उठा-पटक का दौर शुरू हो गया है. कहा जा रहा है‍ कि आगे कई और मोहरें फेंटे जाएंगे और कुछ विकेट भी गिरेंगे.

दैनिक प्रभात से मुकेश गुप्‍ता एवं जागरण से नीरज सिंह का इस्‍तीफा

दैनिक प्रभात, मेरठ से खबर है कि मुकेश गुप्‍ता ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर बिजनेस हेड के रूप में जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. सूत्र बताते हैं कि मूल रूप से संपादकीय के आदमी रहे मुकेश गुप्‍ता ने अंदरूनी राज‍नीति से परेशान होकर इस्‍तीफा दिया है. वे दस महीने पहले ही द ट्रिब्‍यून से दैनिक प्रभात आए थे. बताया जा रहा है कि संपादक के रवैये से कई लोग परेशान हैं. कई और लोग निकट भविष्‍य में इस्‍तीफा दे सकते हैं.

बताया जा रहा है कि वैकल्पिक व्‍यवस्‍था न होने तक मुकेश को कार्यभार संभालने को कहा गया है. वे फिर से दैनिक ट्रिब्‍यून से जुड़ गए हैं. पिछले ढाई दशकों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय मुकेश गुप्‍ता इसके पहले मेरठ समाचार, इनदिनों, जनसंदेश गुडगांव, वीर अर्जुन जैसे अखबारों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनकी गिनती मेरठ के जाने-माने पत्रकारों में की जाती है. 

दैनिक जागरण, बदायूं से खबर है कि नीरज सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर क्राइम रिपोर्टिंग कर रहे थे. खबर है कि नीरज अपनी नई पारी अमर उजाला, बरेली के साथ शुरू करने जा रहे हैं. वहां भी इन्‍हें क्राइम की जिम्‍मेदारी सौंपी जाएगी. नीरज इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

उदयपुर के वरिष्‍ठ पत्रकार सुखदेव प्रसाद मनेरिया का निधन

उदयपुर के वरिष्‍ठ पत्रकार एवं पॉलिटिक्‍स समाचार पत्र के संपादक सुखदेव प्रसाद मनेरिया का मंगलवार की रात निधन हो गया. वे 79 साल के थे. वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे. उनकी पत्‍नी का निधन पहले ही हो गया था. वे अपने पीछे चार पुत्र एवं चार पुत्रियों का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं. बुधवार को उनका अंतिम संस्‍कार उदयपुर में ही अशोक नगर श्‍मशान घाट पर कर दिया गया. मुखाग्नि उनके पुत्र सुरेश मनेरिया ने दी. इस दौरान काफी संख्‍या में पत्रकार एवं गणमान्‍य लोग मौजूद रहे. पत्रकार परिषद, उदयपुर के अध्‍यक्ष जयप्रकाश माली समेत तमाम लोगों ने मनेरिया के निधन पर गहरा शोक जताया है.

मीडिया पर नियंत्रण चाहती है बिहार सरकार

बिहार में छह वर्षों से सुशासन के नाम पर सत्ता चला रही एनडीए पर इन दिनों मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर दबाव बन गया है। काटजू के बयान पर विधानसभा के दोनों सदनों में विपक्ष ने न सिर्फ जमकर हंगामा किया बल्कि बहिष्कार भी किया। सत्ता पक्ष को यह समझ नहीं आ रहा कि इस सवाल का जवाब कैसे दे? इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य में मीडिया अगर सत्ता पक्ष के अघोषित कर्फ्यू में भले न हो मगर बड़े घराने सत्ता का चरण वंदन करने में जी जान से लगे हैं।

लगे भी क्यों न, हर वर्ष करोड़ों का विज्ञापन जो लेना है। विज्ञापन लेने की होड़ में इन मीडिया घरानों ने आमजन के हित को त्याग दिया है। मंत्रियों व कुछ छुटभैये अधिकारियों के खिलाफ खबरें तो छाप दी जाती हैं, मगर जब बात मुख्यमंत्री और सरकार के आला हुक्‍मरानों की आती है तो खबरनवीसों के तेवर बदल जाते हैं। पिछले वर्ष फारबिसगंज में हुई पुलिस फायरिंग इसका जीवंत उदाहरण है। उस घटना ने भले ही राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हो मगर राज्य में उसकी रिर्पोटिंग किस तरह से हुई सब जानते हैं। आज भी कोई बड़ा मीडिया समूह इसकी चर्चा नहीं करता। घटना के समय सरकार ने बयान दिया था कि 6 महीने के अंदर मामले की न्यायिक जांच करा कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कारवाई होगी। मगर क्या कारवाई की गई है, सब जानते हैं।

शराब घोटाले पर एक अखबार (दैनिक जागरण) का विज्ञापन दस दिनों तक बंद कर दिया गया था। यह अलग बात है कि उक्त घोटाले की चर्चा करने वाले पत्रकार ने भी खबर जदयू के एक बड़े नेता के इशारे पर ही छापी थी। खबर छापने के पीछे मंशा कोई भी हो मगर इतना सत्य है कि उसके बाद सरकार ने अखबार का विज्ञापन रोक कर यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार विरोधी खबरों को प्राथमिकता दी तो खैर नहीं। उसके बाद अखबार के तेवर को सब देख सकते हैं। बड़े अखबारों को सरकार का वंदन करने को मजबूर करने के लिए ही 2007-08 में विज्ञापन नीति तक को संशोधित किया गया ताकि विज्ञापन का पूरा लाभ सिर्फ बड़े मीडिया घरानों को दिया जाए।

राज्य में इस समय सैकड़ों छोटे-बड़े समाचार घराने हैं। पूर्ववर्ती सरकार द्वारा भारत सरकार की मीडिया नीति के अनुरूप सभी को विज्ञापन दिया जाता था। पूर्ववर्ती सरकार भी विज्ञापन से उपकृत करने में कुछ घरानों को प्राथमिकता जरूर देती थी, मगर अन्य की अनदेखी नहीं की जाती थी। वर्तमान सरकार ने तो नियमावली में संशोधन कर ऐसे नियम बना डाले जिससे छोटे एवं मध्यम श्रेणी के पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन न मिले ताकि वे जीवित न रह पाएं। दरअसल ये छोटे पत्र-पत्रिकाएं ही सरकार विरोधी खबरों को प्राथमिकता देती हैं। इसी कारण इन पर अंकुश लगाने का ऐसा तरीका निकाला गया ताकि ‘न रहे बांस और न बजे बांसुरी।’ अब आप ही बताएं कि है न राज्य में सुशासन और मीडिया स्वतंत्र?

कल सुशील कुमार मोदी ने काटजू की मंशा पर सवाल जरूर खड़ा कर दिया मगर वे अपने सरकार द्वारा बनाई गई भेदभाव पूर्ण विज्ञापन नीति 2008 को पढ़ना भूल गए हैं। इतिहास गवाह है कि हमारे देश की आजादी से लेकर तमाम छोटे-बड़े आंदोलनों को लघु एवं मध्यम श्रेणी के पत्र-पत्रिकाओं ने ही हवा दी है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय बड़े मीडिया घरानों की भूमिका जग जाहिर है। महात्मा गांधी से लेकर बाल गंगाधर तिलक तक छोटे-छोटे अखबार निकाल कर अंग्रेजों का विरोध करते थे। मगर राज्य सरकार नहीं चाहती कि राज्य में छोटे व मंझोले अखबार फलें-फूलें। राज्य सरकार जानती है कि अगर इन छोटे व मध्यम श्रेणी के भाषाई व क्षेत्रीय अखबारों को फलने-फूलने का मौका दे दिया तो फिर सरकार विरोधी खबरों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाएगा।

बड़े घरानों की पांच-सात अखबारें ही राज्य में स्थित हैं जबकि छोटे-बड़े अखबारों की संख्या सैकड़ों है। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि पांच-सात को विज्ञापन का लोभ दिखा वश में करना आसान है न कि सैकड़ों को। काटजू साहब एवं मीडिया की स्वतंत्रता के पक्षधरों को बिहार सरकार की विज्ञापन नीति जरूर पढ़ कर उस पर टिप्पणी करनी चाहिए। विज्ञापन नीति से साफ हो जाएगा कि राज्य में मीडिया पर कैसे शासन कर रही है सरकार। (http://prdbihar.gov.in/images/stories/policy/advertisement_policy_2007_en.pdf) सरकार की इस नीति से क्या उसका तानाशाही रवैया साफ नहीं होता? क्या भेदभाव पूर्ण शासन व्यवस्था को सुशासन कहेंगे? क्या सरकार ईमानदारी से इन सवालों का जवाब देगी?

लेखक राजीव रंजन चौबे वरिष्‍ठ पत्रकार तथा पटना से प्रकाशित सांध्‍य दैनिक सांध्‍य प्रवक्‍ता खबर के संपादक हैं. आईआईएमसी पास आउट राजीव से संपर्क उनके ईमेल editor@sandhyapravakta.com के जरिए किया जा सकता है. 

पुलिस का काम अब कानून व्यवस्था ही होगा, जाँच और मुक़दमे कोई और चलाएगा

नई दिल्ली : अपराध की जांच और अभियुक्तों पर मुक़दमा चलाने की प्रक्रिया में बहुत बड़े परिवर्तन की संभावना है. केंद्र सरकार ने तय किया है कि अब अपराध की जांच करने वाले लोग जांच करके मामले को मुक़दमा चलाने वाले विभाग को सौंप देंगे. अब पुलिस वाले केवल कानून वयवस्था देखेंगे और अपराध की जांच और अभियोजन के लिए अलग विभाग बनाया जायेगा. राज्य सकारों से केंद्र सरकार इस सम्बन्ध में लगातार संपर्क में है. गृह मंत्रालय ने कहा है कि इस सुधार के लिए विधि आयोग से अनुरोध किया किया गया है कि वह जल्द से जल्द  प्रक्रिया को दुरुस्त करने के लिए अपने सुझाव दे. सरकार का दावा है कि ऐसा होने के बाद इंसाफ़ मिलने में होने वाली देरी को बहुत ही कम किया जा सकेगा.

केंद्र सरकार क्रिनिनल प्रोसीजर कोड में परिवर्तन की बात बहुत दिनों से कर रही है. इस सन्दर्भ में २०१० में एक बिल भी संसद में लाया गया था, जिसे गृह मंत्रालय का काम देखने वाली संसद की स्थायी समिति को विचार करने के लिए भेज दिया गया था, स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अपराधिक न्याय की प्रक्रिया की बड़े पैमाने पर समीक्षा की जानी चाहिए और उस बात को ध्यान में रखते हुए संसद में एक नया बिल लाना चाहिए. केंद्र सरकार की मंशा है कि आपराधिक न्याय से सम्बंधित सभी कानूनों की समीक्षा की जानी चाहिए. भारतीय दंड संहिता, साक्ष्य अधिनियम, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड सहित सभी कानूनों में बदलाव की ज़रूरत है. अपराध और न्याय के प्रशासन के बारे में विधि आयोग की सिफारिशें अभी नहीं मिली हैं. 

अपने मंत्रालय से सम्बद्ध संसद सदस्यों की सलाहकार समिति के बैठक के बाद गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बताया कि केंद्र सरकार की इच्छा है कि समय के साथ साथ तकनीक की प्रगति के सन्दर्भ में भी साक्ष्य अधिनियम में बदलाव की ज़रुरत है. इस ज़रुरत को ध्यान में रख कर ही अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में सन २००० में गृह मंत्रालय ने आपराधिक न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया. इस कमेटी से केंद्र सरकार ने सुझाव मांगे थे. कमेटी ने मार्च २००३ में रिपोर्ट दे दिया था. अपराध की जांच और उस से समबन्धित विषय राज्य सरकारों के अधीन होते हैं, इसलिए इन सिफारिशों पर राज्य सरकारों की मर्जी के बिना कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता था. इसीलिए कमेटी की रिपोर्ट को राज्य सरकारों के पास भेज दिया गया था. विधि आयोग की १९७वीं रिपोर्ट भी मिल चुकी है. केंद्र सरकार ने इस रिपर्ट पर भी राज्यों से उनकी राय माँगी है.

विधि आयोग ने अपराध के प्रशासन की दिशा में बड़े बदलाव की बात की है. सुझाव दिया है कि अपराध की जांच के काम को पुलिस के मौजूदा ढाँचे से बिल्‍कुल अलग कर दिया जाना चाहिए. कानून व्यवस्था संभालने में ही पुलिस का सारा समय लग जाता है इसलिए अपराध की जांच का काम एक अलग विभाग को दे दिया जाना चाहिए. यह भी पुलिस की तरह का विभाग होगा लेकिन इस विभाग के काम का दायरा तब शुरू होगा, जब अपराध हो चुका होगा. अपराध को होने से रोकना और चौकसी रखना शुद्ध रूप से पुलिस के हाथ में होना चाहिए. जांच के काम में सुधार के लिए भी बहुत सारे तरीके सुझाए गए हैं. इन सुझावों में यह भी बताया गया है कि फर्जी मुक़दमे दर्ज करवाने वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा जनसंदेश टाइम्‍स के रोविंग एडिटर हैं.

टीआरपी के लिए रचा गया पत्रकार की पिटाई का खेल : ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल में एक बांग्‍ला चैनल को तृणमूल कार्यर्ताओं द्वारा पीटे जाने को मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने सुनियोजित साजिश करार देते हुए टीआरपी के लिए रचा गया खेल करार दिया. सुश्री बनर्जी ने कहा कि यह सारा खेल सरकार और उनके कार्यकर्ताओं को बदनाम करने के लिए रचा गया है. उल्‍लेखनीय है कि एक चैनल के पत्रकार पार्थ प्रतिम घोष ने आरोप लगाया था कि एक समाचार कवरेज के दौरान तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उनपर हमला किया तथा पीटा.

दूसरी तरह पश्चिम बंगाल के ज्‍वाइंट पुलिस कमिश्‍नर जावेद शमीम ने स्‍वीकार किया है कि इस संबंध में तीन मामले दर्ज किए गए हैं. शमीम के अनुसार एक बंगाली दैनिक के दो फोटोग्राफरों और चैनल रिपोर्टर को पिटाई से चोटें आई हैं. चैनल पत्रकार घोष ने बताया कि उन पर यह हमला जावदपुर एरिया में उस समय किया गया जब वे तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (माले) के स्‍थानीय कार्यालय पर कब्‍जा करने की वीडियो बना रहे थे. यह कार्यालय पूर्व मुख्‍यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का मुख्‍य चुनाव कार्यालय भी रहा है. घोष के अनुसार उनकी अपील के बावजूद तृणमूल कार्यकर्ता उन्‍हें पीटने लगे. विपक्ष ने इस घटना की कड़ी आलोचना करते हुए इस फासीवादी तथा लोकतंत्र के चौथे स्‍तम्‍भ पर हमला बताया है.

नीतीश के चम्‍मचे पत्रकारों को रास नहीं आया काटजू का बयान

पटना विश्वविद्यालय के सीनेट हाल में सेवानिवृत न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू -जो भारतीय प्रेस परिषद् के प्रमुख भी हैं- के साथ शुक्रवार को जो हुआ, उससे एक बात सिद्ध हो गयी है कि बिहार अभी लाठी-तंत्र से मुक्त नहीं हो पाया है. अंतर इतना है कि पहले लोग लाठीवाले को दूर से पहचान लेते थे, पर अब लाठीवाले को पहचानना मुश्किल है -मसलन वे कभी शिक्षक के रूप में मिलेंगे, तो कभी फेसबुक जैसे साइटस पर प्रवचन… देते अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते बुद्धिजीवी.

आखिर क्या कह दिया न्यायमूर्ति काटजू ने? उन्होंने कहा कि मुझे पता चला है कि बिहार में मीडिया पर एक अघोषित बैन लगा हुआ है, हालाँकि मैंने स्वयं इन तथ्यों को जांचा नहीं है. बस फिर क्या था प्रतिष्ठित पटना महाविद्यालय के प्राचार्य आपे से बाहर हो गए. गुरु तो गुरु उनके कुछ चेले ने भी दबंगई दिखानी शुरू कर दी. इत्तेफाक से प्राचार्य महोदय की पत्नी जद (यू) की विधायक हैं. खैर न्यायमूर्ति काटजू पर इन नौटंकियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने अपनी पूरी बात कह डाली. इस घटना के बाद जहाँ सत्तारूढ़ दलों के नेताओं ने खुद को अपने घरों में व्यस्त रखना मुनासिब समझा, विरोधी पार्टी के नेतागण और बुद्धिजीवी लोग फेसबुक पर लगे रहे -पूरी घटना का छीछालेदर करने में. नतीजा अगले दिन आया -जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस प्रकरण पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया और लालू प्रसाद ने न्यायमूर्ति काटजू को बिहार बुलाकर सम्मानित करने की घोषणा कर डाली.

अब रही बात बिहार में मीडिया पर एक अघोषित बैन लगने की -तो ये बड़ा ही संवेदनशील मामला है और इतनी बड़ी बात पर या तो नीतीशजी ही बोल सकते हैं या फिर भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख (क्योंकि यह एक संवैधानिक स्वायत्तशासी संगठन है, जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने व उसे बनाए रखने, जन अभिरूचि का उच्च मानक सुनिश्चित करने से और नागरिकों के अधिकारों व दायित्वों के प्रति उचित भावना उत्पन्न करने का दायित्व निबाहता है). परिषद मूलतः अपनी जाँच समितियों के माध्यम से अपना कार्य करती है तथा पत्रकारिता नियमों के उल्लंघन के लिए प्रेस के विरूद्ध अथवा प्राधिकारियों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के लिए ब्रेक्स से प्राप्त शिकायतों पर निर्णय देती है.

हास्यास्पद बात यह है कि इस पूरे प्रकरण पर किसी बड़े पत्रकार ने अपनी राय नहीं रखी. उनकी जगह तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अपनी भड़ास निकालनी शुरू कर दी. पटना में तो ऐसे बुद्धिजीवियों का बोनाफाइड ग्रुप है -जो अपनी आधी समझदारी के आवरण में सरकार के समर्थन में पूरा प्रचार करती है. यहाँ कहने को तो समस्याओं का मंथन होता है, पर सरकार की गलत नीतियों का विरोध नहीं होता. 'नीतीश कुमार मनुष्य नहीं देवता हैं' या 'नीतीशजी को भारत-रत्न दो' जैसे नारे भी यहाँ मिलते हैं. यानी ये ग्रुप आक्रामक आलोचकों को बहलाने-बरगलाने का काम करते हैं. और तो और -एक महाशय ने तो भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख के प्रति कहा कि भाषण देने से पहले उन्हें तथ्यों की पड़ताल कर लेनी चाहिए थी.

ऐसे भाई लोग नीतीशजी की आलोचना का जवाब भी कुछ यूं देते है -लालू के राज से तो बेहतर है नीतीश का राज. उनको शायद ये भी ज्ञात नहीं है कि भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख ने भी कल ये बयान दिया था. पर नीतीशजी की चमचागिरी में उनको ठीक से सुनायी भी तो नहीं देता. अब बिहार में मीडिया पर एक अघोषित बैन की बात! इससे पहले कि बेताल डाल पर भाग जाये – मेरा उत्तर होगा – शत-प्रतिशत बैन. और मेरी इस मान्यता को रिजर्व बैंक का कोई अधिकारी या फिर औद्योगिक समूह का कोई आला अधिकारी खंडित नहीं कर सकता.

लेखक संजीव झा लम्‍बे समय तक टाइम्‍स ऑफ इंडिया से जुड़े रहे हैं. फिलवक्‍त स्‍वतंत्र पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

चैनल के संपादक ने लाइव प्रोग्राम में घोषित की अपनी सम्‍पत्ति और देनदारियां

हाल में लांच हुए कन्‍नड न्‍यूज चैनल पब्लिक टीवी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एचआर रंगनाथ ने अपनी सम्‍पत्ति की चैनल पर लाइव घोषणा करके तमाम संपादकों और बड़े पत्रकारों पर सवाल खड़ा कर दिया है. रंगनाथ की पहल ने तमाम वरिष्‍ठ पत्रकारों पर भी अपनी सम्‍पत्ति घोषणा करने का नैतिक दबाव बना दिया है. पब्लिक टीवी के एक लाइव प्रोग्राम में रंगनाथ के साथ बैठे उनके टैक्‍स कंसलटेंट विजय राजेश ने उनकी सम्‍पत्तियों की सूची पढ़ी.

न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस के पूर्व संपादक और दैनिक कन्‍नड़ प्रभा के मालिक रंगनाथ तथा सुवर्ण न्‍यूज चैनल के राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि वे हर साल अपनी सम्‍पत्तियों तथा देनदारियों की सूचना अपने प्रोपराइटर्स को उपलब्‍ध कराते रहे हैं, लेकिन अब वे अपनी सम्‍पत्ति तथा देनदारियों की सूची सार्वजनिक कर रहे हैं. रंगनाथ ने कहा कि अगर घोषित किए गए सूची से कुछ भी ज्‍यादा निकलता है तो उस सम्पत्ति को नीलाम या उसका सार्वजनिक इस्‍तेमाल किया जा सकता है.  

रंगनाथ के कंसलटेंट विजय राजेश द्वारा एचआर रंगनाथ की घोषित की गई सम्‍पत्तियों का विवरण :

– रंगनाथ की मां द्वारा उपहार में दिया गया अरकालगुड (हसन) में स्थित चार गुंटा जमीन।
– वर्ष 1991-92 में मैसूर में 13,980 वर्ग फीट का एक प्लाट लिया।
– वर्ष 2002-03 में बंगलुरू में 30×40 एरिया में मकान बनवाया।
– वर्ष 2005 में लोन पर हुंडई एसेंट कार खरीदा।
– वर्ष 2009 में एक होंडा एक्टिवा स्कूटर लिया।
– वर्ष 2011 में 1975 माडल की एक सेकेंड हैंड जीप खरीदा।
– मांइडट्री में 11000, रिलाइंस इंडस्ट्री में 12 और कैरान में 15 शेयर हैं।
– पत्नी के पास कुल 250 ग्राम सोना है जिसमें 100 ग्राम शादी के समय गिफ्ट मिला था और बाकी पिछले बीस वर्षों में खरीदा गया है।

नईदुनिया में छंटनी जारी, अब जेएनई कृष्‍णा सिंह, शाहीना नूर एवं लक्ष्‍मी नारायण की बारी

नईदुनिया, दिल्‍ली से खबर है कि तीन और लोगों को बलि का बकरा बनाया गया है. अब जिस तरह से छंटनी की जा रही है, उससे लोगों में खासी नाराजगी है. अब कर्मचारी आलोक मेहता के हिप्‍पोक्रेसी पर भी उंगली उठाने लगे हैं. इस बार जिन तीन लोगों को शिकार बनाया गया है. उसमें वरिष्‍ठ पत्रकार एवं ज्‍वाइनंट न्‍यूज एडिटर कृष्‍णा सिंह, सब एडिटर लक्ष्‍मीनारायण एवं सब एडिटर शाहीना नूर शामिल हैं. लक्ष्‍मी एवं शाहीना फीचर डेस्‍क पर कार्यरत थे.

सूत्र बता रहे हैं कि ज्‍वाइंट न्‍यूज एडिटर कृष्‍णा सिंह बहुत ही सुलझे हुए तथा कंपनी के प्रति लॉयल पत्रकार हैं. उनसे इस्‍तीफा मांगा जाना सबसे निराशाजनक है. कर्मचारियों का कहना है कि आलोक मेहता अपने लखटकियां मित्रों तथा दरबारियों को बचाने के लिए छोटे-छोटे सेलरी वालों को निशाना बना रहा है. कर्मचारी तो यहां तक कह रहे हैं कि ये लिस्‍ट प्रबंधन की तरफ से नहीं आई है बल्कि आलोक मेहता ने ही यह लिस्‍ट इंदौर भेजी है. इस छंटनी में मैनेजमेंट की नहीं बल्कि आलोक मेहता की भूमिका है.

कर्मचारियों का कहना है कि अगर अखबार डूब रहा है तो प्रबंधन तथा आलोक मेहता को चाहिए कि उन लोगों को हटाएं जो लाखों की सेलरी लेकर कंपनी को कोई योगदान नहीं दे रहे हैं. कभी कभार एकाध खबरें देकर ये लोग लाखों पा रहे हैं, जबकि कुछ हजारों में काम करने वाले तथा सबसे ज्‍यादा मेहनत करने वाले लोगों को आलोक मेहता अपना निशाना बना रहे हैं. कम से कम अनूप भटनागर, केएन सिंह और कृष्‍णा सिंह जैसे सीनियर एवं सीं‍सियर पत्रकारों के साथ तो ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था. खासकर अनूप भटनागर के साथ जिस तरह का व्‍यवहार किया गया वो कहीं से भी उचित नहीं था.

कर्मचारियों का कहना है कि कुछ हजार पाने वालों को निकालकर आलोक मेहता एवं प्रबंधन कितना बचा लेगा. संपादकजी अगर मधुसूदन आनंद, मानसी, विनोद अग्निहोत्री जैसे कुछ लोगों को निकाल देता तो इससे ज्‍यादा क‍ी बचत होती, जो अखबार का काम करने की बजाय टीवी पर ज्ञान बांटते नजर आते हैं. पर आलोक मेहता इन लोगों को ही बचाने के लिए दूसरे लोगों या काम करने वाले असली लोगों की बलि ले रहे हैं. पिछले तीन दिनों में दस लोगों की छंटनी के बाद कार्यालय में तनाव के साथ अविश्‍वास का माहौल भी है. सभी लोग सहमे हुए हैं कि पता नहीं किस की बलि चढ़ जाए.

महिलाकर्मी से छेड़खानी करने वाले माई एफएम के सीईओ हरीश भाटिया गिरफ्तार,‍ रिहा

भास्कर समूह से एक बड़ी खबर है. इस ग्रुप के सिनर्जी मीडिया इं‍टरटेनमेंट के रेडियो 94.3 माई एफएम के सीईओ हरीश भाटिया को पुलिस ने एक वरिष्‍ठ महिलाकर्मी के साथ छेड़छाड़ के मामले में गिरफ्तार कर लिया. हालांकि बाद में उन्‍हें जमानत पर रिहा कर दिया गया. उक्‍त महिला अधिकारी ने दिसम्‍बर महीने में नई दिल्‍ली के चितरंजन पार्क थाने में शिकायत दर्ज कराई  थी.

हरीश भाटिया सिनर्जी मीडिया इंटरटेनमेंट में पहले सीओओ के पद पर कार्यरत थे. हरीश को अप्रैल 2010 में प्रमोट करके सीईओ बनाया गया. हरीश के नेतृत्‍व में ही माई एफएम की 2007 में लांचिंग हुई थी. बताया जा रहा है कि उक्‍त महिलाकर्मी के साथ यह छेड़खानी पिछले साल राजस्‍थान के दौरे पर की गई थी. सूत्रों बताते हैं कि वरिष्‍ठ महिलाकर्मी ने पुलिस में जाने से पहले प्रबंधन समेत कई जगहों पर शिकायत भेजी लेकिन कहीं सुनवाई न होने के बाद उन्‍होंने पुलिस का सहारा लिया.

उक्‍त महिलाकर्मी ने लिखित शिकायत महिला आयोग के पास भी भेजा था पर आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया. इसके बाद उन्‍होंने मजबूरी में हाईकोर्ट में याचिका दायर की और पुलिस में एफआईआर दर्ज करने के लिए शिकायत दी. भास्‍कर के लोग भी इस प्रकरण को दबाने तथा एफएम के सीईओ को बचाने में लगे थे, परन्‍तु कोर्ट के दबाव में पुलिस को हरीश भाटिया को गिरफ्तार करना पड़ा. हालांकि बाद में उन्‍हें जमानत दे दी गई. पुलिस का कहना है कि छेड़खानी जमानती अपराध है, इसलिए उन्‍हें जमानत पर छोड़ दिया गया.

क्‍या इस चरण में सोलह की संख्‍या पार कर जाएंगे मुस्लिम विधायक?

लखनऊ। सातवें चरण के दस जिलों की 60 विधानसभा सीटों से क्या इस बार मुस्लिम विधायकों की संख्या बढ़ेगी? यह सवाल राजनीतिक हलके में इस समय चर्चा में है। 2007 के चुनाव में इन दस जिलों से 16 मुस्लिम विधायक चुनकर आये थे। इनमें सर्वाधिक चार मुरादाबाद से थे। पीलीभीत और बिजनौर से तीन-तीन, रामपुर और बरेली से दो-दो, बदायूं और खीरी से एक-एक मुस्लिम उम्मीदवार चुने गये थे। इस बार 16 की संख्या को बढ़ाने के लिए बसपा ने 24, सपा ने 25, कांग्रेस ने 18, रालोद ने तीन मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। और तो और भाजपा भी बदायूं की सहसवान सीट से शकील अहमद सैफी को मजबूती से लड़ा रही है।

रामपुर, मुरादाबाद, पीलीभीत, बिजनौर, जेपीनगर, बदायूं, और बरेली मुस्लिम बाहुल्य जिले हैं। जहां की मुस्लिम आबादी 22 से 42 प्रतिशत तक हैं। इस चरण की 60 सीटों पर खड़े 962  उम्मीदवारों में मुस्लिम प्रत्याशियों की कुल संख्या 131 है। जिनमें 27 महिलाएं हैं। इस चरण में सपा के मुस्लिम चेहरे आजम खां (रामपुर), लोकदल के शहनवाज राणा (बिजनौर) और हाजी आजम कुरैशी (संभल), कांग्रेस से रामपुर के नवाब खानदान के नावेद मियां (स्वांर टाडा), बसपा से अरशद खां (बरखेड़ा) की प्रतिष्ठा दांव पर है।

रामपुर से आजम खां को इस बार हराने के लिए लोकमंच के अमर सिंह और जयाप्रदा ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा रखी है। वे रेशमा अफरोज (लोकमंच) को दरवाजे-दरवाजे ले जाकर जीत सुनिश्चित कराने में लगे हैं। रामपुर का नवाबी खानदान भी आजम की रास्ता रोकने की पूरी तैयारी में है। कांग्रेस ने आजम के खिलाफ डा. तनवीर को मैदान में उतार रखा है। भाजपा के बड़े मुस्लिम चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी रामपुर में कैम्प कर अपने उम्मीदवार जागेश्वर दयाल दीक्षित को जिताने में लगे हैं। आजम चारों तरफ से घिरे हुए हैं। यही वजह है कि वे अपना क्षेत्र छोड़कर कम जगह ही प्रचार के लिए जा सके हैं।

कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशियों की इस चरण में काफी फजीहत होने के आसार हैं। पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी के चलते तथा जितिन प्रसाद के इशारे पर हाईकमान ने जाने-माने मुस्लिम चेहरे तथा लखीमपुर के सांसद जफर अली नकवी की उपेक्षा कर उन्हें चुनाव प्रचार में साथ नहीं लिया। नतीजतन शाहजहांपुर, लखीमपुर और बरेली का मुस्लिम मतदाता कांग्रेस से नाराज हैं। नकवी अपनी उपेक्षा से दुखी होकर घर बैठ गये हैं। सपा के सर्वाधिक 25 उम्मीदवारों में युसूफ अंसारी, शमीमुल हक (मुरादाबाद और देहात), फिजाउल चौधरी (कांठ), हाजी रिजवान अहमद (कुंदरकी), हाजी मोहम्मद इरफान (बिलारी), इकबाल महमूद (संभल), महबूब अली (अमरोहा), अशफाक खान (नौगावां), कमाल अख्तर (हसनपुर) नसीर खां (चमरव्वा), गफूर इन्जीनियर (स्वार टांडा), तनवीर खां (शाहजहांपुर), अनवर अली (तिलहर), आबिद रजा (बदायूं), शेरवाज पठान (चांदपुर), मो. शाहिद (नजीबाबाद), कफील अंसारी (बड़ापुर), कुतुबुद्दीन अंसारी (नूरपुर), फहीम साबिर (बरेली कैन्ट), अताउर्रहमान (बहेड़ी), हाजी जाहिद गुड्डू (मीरगंज), हाजी रियाज अहमद (पीलीभीत), आरए उस्मानी (निघासन) और इमरान (मोहम्मदी) हैं।

बसपा के 24 मुस्लिम प्रत्याशियों में हाजी नासिर कुरैशी (मुरादाबाद देहात), हाजी इलियास (ठाकुरद्वारा), रिजवान अहमद (कांठ), जुबैर (कुंदरकी), हाजी छिछा (संभल), अकीलुर्रहमान (असमौली), शाहिद प्रधान (अमरोहा), युसूफ अली( चमरव्वा), अजीम खान (स्वार टांडा), मो. असलम खां (शाहजहांपुर), रिजवान अली (ददरौल), हाजी बिट्टन (बिल्सी), मीर हाजी अली (सहसवान), काजी रिजवान (शेखूपुर), महमूद अहमद (बिजनौर), इकबाल (चांदपुर), तसलीम अहमद (नजीबाबाद), मो0 गाजी (बढ़ापुर), हाजी उस्‍मान अंसारी (नूरपुर), अनीस बेग (बरेली शहर), अखलाक अहमद (भोजीपुरा), अंजुम रशीद (बहेड़ी), साजिद अली (आंवला), अरशद खां (बरखेड़ा) है।

कांग्रेस ने जिन 18 मुस्लिम चेहरों को इस चरण में चुनावी दंगल में उतार रखा है। उनमें इफ्तेखार अंसारी (मुरादाबाद देहात), नवाब जान (ठाकुर द्वारा), मोहम्मद उल्ला (कांठ), सौलत अली (कुंदरकी), असरार अहमद (असमोली), मुन्ना अकील (अमरोहा), डा. तनवीर अहमद (रामपुर), मुतीउररहमान (चमरव्वा), नबाब काजिम अली (स्वार टाडा), फैजान अली खां (शाहजहांपुर), फकरे आलम शोबी (बदायूं), अनवर जमील (धामपुर), हुसैन अंसारी (बढ़ापुर), नबाब मुजाहिद खां (बरेली शहर), अलाउद्दीन खान (बिथरी चेनपुर), सलीम अख्तर (बहेड़ी), अनीस अहमद उर्फ फूलबाबू (बीसलपुर) और अशफाक उल्ला (मोहम्मदी) से उम्‍मीदवार हैं।

बिजनौर जिले की नजीबाबाद सीट से कांग्रेस, बसपा और सपा ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें अबरार आलम, तसलीम अहमद और शाहिद अली है। इसी जिले की बढ़ापुर सीट से खड़े 24 उम्मीदवारों में सात मुस्लिम हैं। सपा, बसपा और कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशियों के अलावा नवभारत निर्माण पार्टी का उम्मीदवार भी मुसलमान है। कांग्रेस (रालोद), सपा और बसपा ने जिन-जिन क्षेत्रों में अपने मुस्लिम उम्मीदवार आमने-सामने किए हैं। उनमें मुरादाबाद की कांठ, मुरादाबाद ग्रामीण, कुंदरकी, सम्भल, स्वार टांडा, रामपुर की चमरव्वा, बहेड़ी और शाहजहांपुर है। शाहजहांपुर में 23 प्रत्याशियों में आठ मुस्लिम है, जिनमें सपा के तनवीर खान, कांग्रेस के नवाब फैजन अली खान, बसपा के मोहम्मद असलम खां, सीपीआई के मोहम्मद सलीम, उलेमा काउन्सिल के अबरार मंसूरी, सोशलिस्ट पार्टी के इमरान और वंचित समाज पार्टी के मोहम्मद शाहिद मुख्य है। इन सबके बीच भाजपा के पूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक सुरेश कुमार खन्ना सातवीं बार विधानसभा पहुंचने की कोशिश में हैं। 2007 में जीते जिन मुस्लिम विधायकों की प्रतिष्ठा इस चरण में दांव पर हैं, उनमें मोहम्मद गाजी, शाहनवाज राणा, इकबाल, अकीलुर्रहमान, इकबाल मसूद, नवाब काजिम अली, मोहम्मद आजम खां, रियाज अहमद, अरशदखां, अनीस अहमद खां और डा. आरए उस्मानी मुख्य हैं।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

जस्टिस काटजू के अपमान से बिहारी पत्रकार नाराज, घटना को शर्मनाक बताया

२४ फरवरी २०१२ को बिहार के पटना विश्वविद्यालय के द्वारा आयोजित सेमिनार में भारतीय प्रेस परिषद के माननीय अध्यक्ष न्‍यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू के वक्तव्य के दौरान सत्तारूढ़ दल की विधायक के प्राचार्य-पति के द्वारा असभ्य तरीके से रोकने की कोशिश गौरवशाली बिहार की गरिमा के विरुद्ध है. पटना विश्वविद्यालय की अंगीभूत इकाई पटना कॉलेज के प्राचार्य लालकेश्वर सिंह के द्वारा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति-राज्यपाल, कुलपति की उपस्थिति में न्यायमूर्ति काटजू को जोर आवाज़ में रोकने से मना करने की कोशिश लोकतान्त्रिक और संवैधानिक गरिमा के विरुद्ध है.

बिहार के इतिहास में यह शर्मनाक घटना है, जब प्रदेश के गौरवशाली विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय के मुख्य अतिथि को विश्वविद्यालय के एक प्राचार्य के अशोभनीय आचरण का सामना करना पड़ा हो. यह घटना इस तथ्य को उजागर करता है कि अगर बिहार में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष बोलने की आज़ादी नहीं रखते हैं तो आम आदमी और मीडिया को अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता प्राप्त है. भारतीय प्रेस परिषद के न्यायमूर्ति अध्यक्ष के अपमान की घटना को नीतीश सरकार के द्वारा गंभीरता से नहीं लेना और दोषी प्राचार्य के विरुद्ध कार्रवाई की बजाय उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और शिवानन्द तिवारी नामक सत्ताधारी सांसद के द्वारा न्यायमूर्ति काटजू के विरुद्ध बदले की भाषा में की जा रही बयानबाजी, आपत्तिजनक और निंदनीय है.

जाँच का विषय है कि २५ फरवरी २०१२ को पटना विश्वविद्यालय में आइसा के छात्र नेताओं पर हुई बमबाजी के तार क्या न्यायमूर्ति काटजू का अपमान करनेवाले प्राचार्य से जुड़े हैं? देश के तमाम पत्रकार संगठनों, वरिष्ठ पत्रकारों, न्यायप्रिय बुद्धिजीवियों को इस घटना को गंभीरता से लेना चाहिए. भारतीय प्रेस परिषद पत्रकारिता को दिशा-निर्देश देनेवाली देश की सर्वोच्च शक्तिशाली संवैधानिक संस्था है. बिहार में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष को बोलने से रोकने की कोशिश संपूर्ण पत्रकारिता बिरादरी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास रखनेवाले नागरिक समूह का अपमान है.

तमाम पत्रकारों ने बिहार के कुलाधिपति सह राज्यपाल से उनकी उपस्थिति में घटित अशोभनीय घटना के दोषी प्राचार्य के विरुद्ध तत्काल सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए बिहार के उपमुख्यमंत्री और सांसद के बयानों की भर्त्सना करते हैं. भारतीय प्रेस परिषद ने बिहार की सत्तापरस्त पत्रकारिता की भूमिका की पड़ताल करने के लिए जाँच-कमिटी गठित की है. भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह बड़ी घटना है, जब किसी खास मीडिया समूह की बजाय संपूर्ण प्रदेश की पत्रकारिता की पड़ताल करने के लिए एक संवैधानिक जाँच आयोग का गठन किया गया हो. भारतीय प्रेस परिषद के इस कदम का हम स्वागत करते हैं.

पुष्पराज (जनांदोलनों के पत्रकार और नंदीग्राम डायरी के लेखक), अमरनाथ (वरिष्ठ पत्रकार), गोपाल कृष्णा (पत्रकार, पर्यावरणविद), हसन इमाम (सचिव, प्रेरणा एवं वरिष्ठ रंगकर्मी), चिन्मयानन्द (पत्रकार), राजेंद्र राजन (महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार), शशिसागर (पत्रकार), डॉ. मीरा दत्ता (संपादक, तलाश), गुलरेज शहजाद (शायर), रेसू वर्मा (पत्रकार), कृष्णा (हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी), निर्भय दिव्यांशु (पत्रकार), इरफ़ान (अध्यक्ष हॉकर फेडरेशन बिहार), डॉ. नंदकिशोर नंदन (कवि), विनिताभ (कवि), निवेदिता (वरिष्ठ पत्रकार), संतोष सारंग (पत्रकार), रंजीव (नदी -पानी विशेषज्ञ), संजीव शांति मेहता (फिल्म निर्माता), दीनानाथ सुमित्र (कवि), सुनीता (शोधार्थी पत्रकार), रविन्द्र भारती (कवि), स्वतंत्र मिश्र (पत्रकार), हसन इमाम (सचिव, प्रेरणा एवं वरिष्ठ रंगकर्मी), रंजीत (पत्रकार), राघव शरण शर्मा (वरिष्ठ लेखक) ने काटजू के बयान का स्‍वागत तथा प्राचार्य के आचरण की निंदा की है।

स्टार सीजे चैनल ने मुझे लूट लिया, उदय शंकर जी कुछ करो

स्टार सीजे अलाइव चैनल लोगों के साथ ठगी का खेल खेल रहा है और इस बात का गवाह मैं खुद बना हूं। मैंने स्टार सीजे अलाइव चैनल से एक कैनन का प्रिंटर मंगाया था और प्रिंटर बाकायदा आ भी गया, लेकिन मैंने जब प्रिंटर का डिब्बा खोल कर देखा तो ना तो उसमें डाटा केबल निकली, ना ही पॉवर कोर्ड और ना ही कार्टरेज, मेरे होश उड़े तो मैंने तुरंत चैनल के हेल्पलाइन नंबर पर फोन लगाया और वहां फोन उठाने वाले भाई साहब ने मुझसे कहा कि सर बस आप दो दिन इंतज़ार कर लीजिये आपकी पूरी मदद की जाएगी और कंपलेन रजिस्टर कर ली गई है। आपके पास जल्द से जल्द फोन आ जाएगा।

प्रिंटर की डिलीवरी मुझे 20 फरवरी को की गई थी और शिकायत करने के बाद मुझसे कहा गया कि 22 तारीख तक आपकी समस्या का समाधान निकल जाएगा, लेकिन 22 फरवरी तक मेरे पास कोई फोन नहीं आया, तो मैंने 23 फरवरी की दोपहर एक बार फिर से फोन किया और बताया कि मुझे प्रिंटर के साथ डाटा केबल, पॉवर कोर्ड और कार्टरेज नहीं मिली तो वहां फोन उठाने वाली मैडम ने कहा कि बिल्कुल सर आपकी शिकायत हमारे पास दर्ज है और जल्द से जल्द आपके पास फोन आ जाएगा, बस आप थोड़ा इंतज़ार और कर लीजिए। मैंने फोन रख दिया और फिर कुछ दिन इंतज़ार किया लेकिन आज तक मेरे पास जब कोई फोन नहीं आया तो मैंने फिर से एक बार हेल्पलाइन नंबर पर फोन किया और वहां जिन भाई साहब ने मेरा फोन उठाया उन्होंने मेरी सारी बातें सुनने के बाद ये कहा कि सर क्या मैं आपकी कॉल कुछ पलों के लिए होल्ड पर रख सकता हूं, मैने पूछा क्यों भाई तो उसने कहा कि सर ताकि मैं आपकी पूरी तरह मदद कर पाऊं। मैंने कहा ठीक है भाई रख दो होल्ड पर लेकिन मेरा फोन करीब 20 मिनट तक होल्ड पर रहा, जिसके बाद भाई साहब ने कॉल अनहोल्ड की और मुझसे कहा कि सर आप इंतज़ार कर लीजिए आपके पास फोन आ जाएगा, इसके अलावा मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता।

मेरे पांव से ज़मीन खिसक गई और मैंने तुनकते हुए फोन काट दिया। अब बताइए यशवंत जी क्या स्टार सीजे चैनल चलाने वालों को इस तरह का व्यवहार करना चाहिए। अब कोई न्यूज़ चैनल या मेरा खुद का चैनल तो इसकी खबर प्रसारित करने से रहा, लेकिन ऐसे में मैं क्या करूं मेरा प्रिंटर तो पिछले 10 दिनों से बेकार पड़ा है। प्रिंटर मंगाया इसलिए था क्योंकि जहां मैं रहता हूं वहां आस पास कोई प्रिंट निकालने की सुविधा नहीं थी, लेकिन 10 दिनों से ये प्रिंटर बेकार ही रखा है। मुझे जानकारी पूरी नहीं है लेकिन अगर इस चैनल की ज़िम्मेदारी भी उदय शंकर जी के पास है तो उन तक ये बात ज़रुर पहुंचनी चाहिए और खासतौर से कॉल सेंटर में बैठे उन लोगों को लताड़ ज़रुर पड़नी चाहिए जो किसी परेशान व्यक्ति की परेशानी का समाधान तो क्या करें उसकी कॉल होल्ड पर डाल देते हैं और नतीजा कुछ निकलता नहीं है।

वीर चौहान

veer.chauhan78@gmail.com

द ट्रिब्‍यून के पत्रकार सुभाष शर्मा के निधन पर प्रो. धूमल ने जताया शोक

शिमला : हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने कुल्लू से द ट्रिब्यून के संवाददाता सुभाष शर्मा के असामायिक एवं दुःखद निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। श्री सुभाष शर्मा का संक्षिप्त बीमारी के बाद चंडीगढ़ में निधन हो गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि श्री सुभाष शर्मा काफी लम्बे समय से पत्रकारिता के व्यवसाय से जुड़े थे और वे सही मायनों में सच्चे पत्रकार थे। प्रो. धूमल ने परमपिता परमात्मा से दिवंगत आत्मा की शांति और शोक संतप्त परिवार को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है।

शिमला से बिजेंदर शर्मा की रिपोर्ट.

Fourth Estate under four politicians of Bihar : How similar, how different

Patna : What upsets the Nitish government most is the Press Council of India chief, Markandey Katju’s remarks that there was no Press censorship during the Lalu regime. As an arch-rival it was natural that the NDA government was not going to give any credit whatsoever to the Lalu-Rabri regime.

But Markandey Katju may not be alone in holding such view. There are even many ardent fans of Nitish Kumar and not just his opponents––his own party ministers, legislators, office-bearers––who do not approve the way the Press is being treated by him in Bihar.

However, this does not mean that everything was hunky-dory in Bihar in the past so far Press is concern. No doubt Emergency was a dark chapter in country’s history, yet it is also true that efforts were made to control, manage, gag and allure the Press even after that.

When the then chief minister Dr Jagannath Mishra tried to bring in the Press Bill in early 1980s he was stoutly opposed by the journalists. The state government had to drop the idea. But the Press was then only confined to a handful of Hindi, English and Urdu newspapers. There was no electronic channel, not even Doordarshan, no internet and no other means to get information. BBC radio service was a possible alternative.

So the government’s criticism was limited to the print media, whose circulation was small. Yet Dr Mishra almost went on to  legislate a Draconian law, which suggest how intolerant he was towards criticism. The Lalu era was too long to be clubbed into one. Initially, Lalu Yadav was least bothered about the post-Mandal “upper caste media”.  He used to think that more the media writes against him the more strong politically he would be. Once Lalu told an English journalist that write as much as you can against him, but do not forget to carry his photo, as his supporters would love to see it.

However gradually, as most rulers, the then chief minister too started managing the Hindi media. However, he was least concerned about the English newspapers as he was aware that his supporters do not read them. So while the English Press carried a relentless campaign against him, especially during the fodder scam days, the Hindi Press was somewhat guarded in criticism for obvious reasons. Bihar had not so many Hindi dailies then as now.

Yet there is a difference. During the Lalu years the opposition parties and civil society groups used to get due coverage in the media, which is hardly possible now. The private electronic channels came much later. Though they were mostly critical of Lalu Yadav, who was by then neck deep in trouble over the fodder scam, yet he knew its importance. He would especially invite cameramen and correspondents of the private channels to give bytes and interviews. Since there was a large number of takers of his rustic one-liners all over the country and some people still crazy to see him on the screens he fully exploited this opportunity for his own end.

But then Lalu as the railway minister was quite a different man. True he initiated several big and small projects for Bihar, yet like his predecessors Ram Vilas Paswan and Nitish Kumar, he fully used the print media. The phenomenon of big newspaper advertisements for the dailies of Bihar for the inauguration of projects––big or small––which started during the tenure of Ram Vilas (as the railway minister) continued during Lalu’s year in the Rail Bhawan too.

Like Lalu, the LJP leader Ram Vilas Paswan, too tried to project himself as the leader of poor masses. But, while Lalu initially paid least attention to the Press, Ram Vilas took full help of media to cultivate his image.

Not just as the railway minister in the Deve Gowda and Inder Kumar Gujral governments in mid-1990s, but even as the telecommunication minister in the Vajpayee government he would give huge advertisements to newspapers of Bihar. Ram Vilas tried to make friends in the media by making a large number of journalists of the state member of telephone users consultative committee and thus offered them free phone connections.

The move paid. Media in Bihar started calling him Ram ‘Vikas’ (Development) Paswan. However, the Press showed their ‘ingratitude’ when he quit the Vajpayee government in 2002 and joined hands with Lalu Yadav during the 2004 parliamentary election. The same media now started calling him Ram ‘Vinash’ (Destruction) Paswan, even though he became the minister of Steel and Fertilizers in the UPA-I.

The problem with the Nitish regime is that it has adopted a new strategy to deal with the Press. Besides, by the time Nitish Kumar came to power in Bihar in November 2005 the country had been undergoing information explosion. The print media got expanded with many newspapers having their edition from cities other than Patna. Quite a few regional television channels came up. News-portals are not only confined to English, but the state has a couple of Hindi news-portals too.

So gagging the Press today is not so easy a task as it is made out to be. While the Nitish Kumar government is busy alluring and silencing the print media with the help of advertisements it is unable to do the same with electronic media and news-portals. The present chief minister is image conscious and, unlike Lalu Yadav, has a very good following among the educated middle class and upper castes.

Journalists consider individual cases of assault as occupational hazards and this had happened even in the past, that is, during the regimes of Lalu Yadav, Dr Mishra or anyone else. Even during the nine months of President’s Rule in 2005 there were cases of individual attack on them. 

What is disturbing now is the organized way in which the state machinery is getting journalists sacked or transferred at the drop of a hat if they dare to write anything against the state government. Unlike in the past, today when a journalist is targeted it does not make any news. So when a murderous assault was made on Amarnath Tewary, the Assistant Editor of English daily, The Pioneer, on Jan 27 last by a BJP leader, her son and henchmen in Patna newspapers did not dare to report it.

Even when journalists met in Patna and passed a resolution demanding action against the accused the print media gave no coverage. Those who attended that meeting to show solidarity to Tewary failed to get this very news published in their own respective dailies. A delegation of journalists, who wanted to call on the chief minister, did not get time though they made repeated attempt to meet him. It was after that the Press Council of India chairman, Markandey Katju, was approached. Courtesy : Bihar Times

बिना जांच रिपोर्ट के किसी निष्‍कर्ष पर न पहुंचे जस्टिस काटजू : रविशंकर

नई दिल्ली। भाजपा ने प्रेस परिषद के अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू की बिहार सरकार के खिलाफ टिप्पणियों पर आपत्तिजताते हुए उन्हें संयमित भाषा इस्तेमाल करने और पद की मर्यादा बनाए रखने की सलाह दी है। काटजू ने हाल में बिहार में प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए थे। पार्टी महासचिव एवं मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि काटजू को नतीजे पर पहुंचने से पहले अपनी टीम की रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए।

प्रसाद ने कहा कि भाजपा प्रेस परिषद का सम्मान करती है। हमने भी प्रेस की आजादी की लड़ाई लड़ी है। काटजू को समझाना चाहिए कि प्रेस परिषद के अध्यक्ष का पद गरिमामय है, जिसके साथ काफी संवेदनाएं भी जुड़ी हैं। बिहार सरकार के बारे में उनकी टिप्पणियां उचित नहीं है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में वहां की सरकार के कामकाज की देश-विदेश में सराहना हो रही है। तमाम मीडिया चैनलों एवं संगठनों ने नीतीश को सर्वोत्ताम मुख्यमंत्री घोषित किया है।

प्रसाद ने कहा कि काटजू ने जब इस मामले में खुद की एक जांच समिति बनाई है, तो उसकी रिपोर्ट का भी इंतजार करना चाहिए। इसके पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर बिहार सरकार के खिलाफ कोई शिकायत है तो वह प्रायोजित भी हो सकती है। साभार : जागरण

आखिर उत्‍तराखंड के सीएम खंडूड़ी इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं!

दिल्ली में उत्तराखंड की एक बेटी के साथ एक ऐसा हादसा हुआ जो अपनी जमीन से उखड़े लोगों की त्रासदी है. कुछ दिन पूर्व 18 साल की किरण नेगी को उसके आफिस से लौटते समय  कुछ गुंडों ने अगवा कर लिया और चार दिन बाद उसकी लाश पड़ी मिली. किरण का दोष सिर्फ इतना था कि उसने मोहल्ले के एक गुंडे को कुछ दिन पूर्व उस पर फब्ती कसने पर डपट दिया था. बस गुंडे ने यही गांठ बाँध लिया और होनहार किरण की दुराचार के बाद हत्या कर डाली.

इस घटना से दिल्ली का पूरा उत्तराखंड समाज हिल गया. किरण अपने परिवार की एक मात्र कमाऊ सदस्य थी और उसी पर पूरा परिवार निर्भर था. उत्तराखंड के तमाम प्रवासी संगठनों ने इस घटना का अपने-अपने स्तर से विरोध किया और पीड़ित परिवार के साथ अपनी हमदर्दी दिखाई. दो दिन पूर्व किरण के दुखी पिता को उत्तराखंड के कुछ सामाजिक संगठनों से जुड़े़ लोग उत्तराखंड के मुख्यमंत्री खंडूड़ी के पास ले गए. वे चाहते थे कि वे अपना एक पत्र दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को लिखें ताकि गरीब पीड़ित परिवार को कुछ मदद मिल सके, पर उन लोगों को तब बेहद धक्का लगा जब खंडूड़ी ने शीला को इस प्रकार का पत्र लिखने से साफ़ इनकार कर लिया. आखिर इस इनकार के पीछे खंडूड़ी की क्या सोच रही होगी. यह समझ परे है?

वैसे देखा जाए तो इन सारी बातों के लिए राज नेता ही परोक्ष रूप से जिम्मेदार हैं, क्योकि वे लोगों के लिए उनके घर में रोजगार की व्यवस्था नहीं कर पाते जिसके लिए लोगों को रोजी- रोटी के लिए पहाड़ से उखड़ना पड़ता है. खैर.. उत्तराखंड की सडकों में… राज्य के लिए खंडूड़ी है.. जरूरी…. के बैनरों पर लाखों खर्च करने वाले खंडूड़ी यदि थोड़े भी संवेदनशील होते तो उन्हें तुरंत मुख्यमंत्री राहत कोष से नेगी परिवार को मदद कर देनी चाहिए थी. पर मदद तो दूर वे कागज़ के एक टुकडे पर दो शब्द शीला दीक्षित को भी नहीं लिख सके.

दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चेन्नई में बैंक डकैती मामले में मारे गए बिहारी युवकों की सही जांच के लिए पूरा अभियान छेड़ दिया था. वैसे भी गत वर्ष पंजाब में भी कुछ बिहारी मजदूरों के खिलाफ हुए अत्याचार के खिलाफ नीतीश ने अपने आला अधिकारी पंजाब में तैनात कर दिए थे. खंडूड़ी की ईमानदारी के हम भी समर्थक हैं, पर उनका यह कृत्य एक संवेदनशील मुख्यमंत्री वाला कभी नहीं कहा जा सकता. वह एक अच्छे फ़ौजी अफसर रहे हैं, पर उत्तराखंड को एक ऐसे संवेदनशील मुख्यमंत्री की जरूरत है जिसकी आँखों में गरीब की परेशानी को देखकर आंसू आये.. न कि ऐसा मुख्यमंत्री हो जो सभी को एक ही डंडे से हांकने का प्रयास करे.

लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

रवींद्र शाह से जुड़ी यादों की यात्रा : इंदौर-दिल्ली वाया हरसूद

: स्मृति-शेष : कुदरत को ही मंजूर नहीं था कि यह शख्स चैन से बैठे! : उत्तर प्रदेश के चुनावी कवरेज में उस दिन मैं मैनपुरी में था। शिवरात्रि का दिन था। व्रत रखा था। मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई से लौटते हुए ड्राइवर से मैंने कहा कि किसी शिव मंदिर ले चले। प्राचीन भीमसेन मंदिर में गया। लौटकर गाड़ी में बैठा ही था कि इंदौर से एक मित्र का फोन आया। शाम करीब साढ़े पांच का वक्त था। सूचना दी कि रवींद्र शाह का एक्सीडेंट हो गया है। जरा पता करो मामला क्या है? मैंने दिल्ली में धीरेंद्र पुंडीर को फोन लगाया। बिजी मिला। दूसरा नंबर डायल करता इसके पहले ही दो एसएमएस आ गए। इससे बुरी खबर कोई हो नहीं सकती थी कि रवींद्र शाह इंदौर से भोपाल के बीच एक सड़क हादसे में दुर्घटना स्थल पर ही मौत की नींद सो गए। यह लिखते हुए अब तक भी यकीन नहीं आ रहा है कि रवींद्रजी नहीं रहे।

हादसे के चार दिन पहले ही फोन पर बात हुई थी। उत्तर प्रदेश की अपडेट उन्होंने ली थी। इंदौर जाने के बारे में बताया था। यह भी तय हुआ था कि अगर कवरेज के दौरान मैं बदायूं और संभल के आगे आता हूं तो एक दिन गाजियाबाद भी पहुंचूंगा। वहीं मुलाकात करेंगे। रह-रहकर उनका चेहरा मेरी आंखों में कौंध रहा है। मैं अपने मोबाइल को बार-बार देख रहा हूं। लग रहा है कि अभी फोन बजेगा। रवींद्रजी की आवाज सुनाई देगी। हकीकत यह है कि उनकी आवाज अब कभी सुनाई नहीं देगी। 17 साल के रिश्तों की अनगिनत यादें ताजा हो रही हैं। इस दरम्यान वे जैसे थे, वैसे ही रहे। सदाबहार। सुदर्शन। सक्रिय। खुशमिजाज। तरोताजा।

1993। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के दूसरे बैच से पास होकर निकला था। इंदौर का नईदुनिया भोपाल में दैनिक नईदुनिया के नाम से छपने लगा था। यह मेरे पत्रकारीय सफर का पहला पड़ाव था। नईदुनिया इंदौर से भूपेंद्र चतुर्वेदी तब स्वदेश में कार्यकारी संपादक बनकर आए थे। हम प्रेस कॉम्पलैक्स के नीलम रेस्टॉरेंट में अक्सर मिलते थे। भूपेंद्रजी ने मुझे इंदौर धकेला। कहते थे कि अगर इस लाइन में गंभीरता से आए हो तो नईदुनिया जरूर जाओ। नईदुनिया की छवि तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसी थी। मैं सोचता था कि मुझ जैसे नौसिखिए को वहां कहां गुंजाइश होगी। पहले कुछ साल रियाज करें। फिर वहां जाएं। लेकिन भूपेंद्रजी ने मेरा इंदौर का टिकट कटाकर ही दम लिया। इंदौर मेरे लिए अजनबी शहर था। उन्होंने मुझे रवींद्रजी से मिलने को कहा, जो तब नईदुनिया को छोड़कर 'दी फ्री प्रेस' के पहले संपादक हो चुके थे। उनसे पहला सामना वहीं हुआ। जुलाई 1994। वे उसी लुक में हमारी आखिरी मुलाकात तक बने रहे। एक बार पत्रकारिता विवि के जनसंपर्क विभाग की प्रमुख देवेंदर कौर उप्पल ने किसी समारोह में कहा था कि रवींद्र को वे बरसों से ऐसा ही देख रही हैं। सदाबहार। वे वाकई सदाबहार थे।

इंदौर में जब मैं उनसे मिला, तब तक 'दी फ्री प्रेस' के अंदरुनी हाल अच्छे नहीं रहे होंगे। मैं रवींद्रजी के भरोसे दैनिक नईदुनिया में कभी न लौटने की कसम खाकर निकला था। गलत मुहूर्त रहा होगा। फ्री प्रेस में मंगल प्रवेश पर ग्रहण लग गया। तीन-चार दिन उनके दफ्तर गया। उन्हें भी अहसास था कि बंदा उनके भरोसे सड़क पर है। मैं भी समझ गया कि माजरा गड़बड़ है। न मैंने पूछा कि कब ज्वाइन करूं। न उन्होंने कहा कि यार गलत आ गए। अनादिकाल से मेरी पीढिय़ों में कोई मीडिया में रहा नहीं था, सो यहां की सुनिश्चित अनिश्चितताओं का कोई अनुभव नहीं था। वे हर मुलाकात में मुझे उत्साहित करते। कहते कि कोई रास्ता निकालते हैं।

नईदुनिया के दफ्तर बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग की ओर आखिरी धक्का उन्होंने दिया। इससे पहले कि वहां चयन होता, दैनिक भास्कर में मुझे चुन लिया गया। तब श्रवण गर्ग स्थानीय संपादक थे। रवींद्रजी ने ही मुझे उनके पास भेजा था। डूबते को ताकत से उभरते भास्कर में यह बड़ा सहारा था। मुझे बिजनेस पेज पर काम मिला, जिसमें मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं थी। एकाध महीने बाद ही नईदुनिया से बुलावा आ गया। मैं बुरे वक्त में सहारा देने वाले श्रवणजी को नाराज छोड़कर भारी मन से नईदुनिया में ज्वाइन हो गया। रवींद्रजी ने भी राहत की सांस ली। सीख दी कि जल्दबाजी में फैसले मत करना। डटकर काम करना। नईदुनिया की लाइब्रेरी से रिश्ता बनाना।

'दी फ्री प्रेस' एक उम्दा अखबार था। लोगों को इसे मालवे का जनसत्ता कहते सुना। लेकिन अक्सर अच्छी चीजों की उम्र लंबी नहीं होती। मुझे याद नहीं यह अखबार कब बंद हुआ। रवींद्रजी भी इंदौर में नहीं रहे। न ही मेरा उनसे कोई संपर्क रहा। वे मुझे एक किनारे पहुंचाकर अपने लिए दूसरे किनारे की तलाश में निकल गए। जब वे वेबदुनिया के संपादक होकर आए तो कभी-कभार किसी कार्यक्रम में उनसे आमना-सामना होने लगा। मुस्कराकर पूछते, 'कैसा चल रहा है?' हमने उनमें कोई बदलाव नहीं देखा। पहनावे के प्रति बेपरवाह रहने वाले पत्रकारों से अलग रवींद्रजी की खास पसंद उनके आकर्षक लिबास से भी झलकती थी। उम्र का असर करीने से सजी दाढ़ी में कभी झांकते नहीं देखा।

2002। साल के आखिर में एक दिन वेबदुनिया से उनके जाने की सूचना मिली। वे फिर एक नए किनारे की तलाश में इंदौर से निकल गए। अब की बार दिल्ली। सहारा समय न्यूज चैनल में उनके होने की खबर तब हुई, जब एक साल के भीतर मुकेश कुमारजी ने मुझे भी मध्यप्रदेश चैनल के लिए चुना। रवींद्रजी इनपुट हेड थे। वे नोएडा दफ्तर में। हम इंदौर ब्यूरो में। उनका घर इंदौर में ही था। अक्सर आते। हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। साथ काम करने का यह पहला अनुभव था। चैनल सितंबर 2003 में लांच हुआ। ऑन एयर होने के पहले लाइव प्रसारण के एक ट्रायल में रीगल चौराहे पर ओबी वैन, कैमरा, लाइट्स के बीच प्रकाश हिंदुस्तानी और रवींद्र शाह सितारों की तरह घिरे थे। 24 घंटे के पहले सेटेलाइट रीजनल न्यूज चैनल से दर्शकों का यह पहला परिचय था। नौ साल नईदुनिया में गुजारने के बाद मेरे लिए भी यह एक और नईदुनिया थी, जहां लिखना कम और दिखना ज्यादा था।

2004। दिग्विजयसिंह की दस साल की कांग्रेस सरकार को उमा भारती ने उखाड़ फेंका था। चुनाव से बड़े इम्तहान में आने की बारी अब उमा भारती की थी। एक हजार मेगावॉट बिजली की इंदिरा सागर परियोजना में बांध अपनी पूरी ऊंचाई तक बनकर तैयार था। तीस जून हरसूद शहर के खात्मे की तारीख तय कर दी गई थी। चैनल ने इस डूब को टेलीविजन पर लाइव प्रसारित करने की योजना बनाई।
रवींद्रजी दी फ्रीप्रेस के दिनों में सरदार सरोवर इलाके पर कई चर्चित रिपोर्टिंग करा चुके थे। चैनल हेड मुकेश कुमार भी मध्यप्रदेश मूल के ही हैं। मुझे हरसूद जाने का हुक्म हुआ। नोएडा से भुवनेश सेंगर आए। एक ओबी वैन समेत तीन कैमरा यूनिट हरसूद के इलाके में घूमने लगीं। देश ने पहली बार करीब डेढ़ महीने तक एक शहर के डूबने की दास्तान को टीवी पर लाइव देखा।

हरसूद से लौटकर मैं सो नहीं पाया। यह एक तकलीफदेह अनुभव था। हम हजारों परेशानहाल परिवारों को बुरे हाल में छोड़कर लौटे थे। हम उनकी आखिरी शवयात्राओं और शादियों में शामिल हुए। हमने पीढिय़ों से साथ रहते आए संयुक्त परिवारों को तिनका-तिनका बिखरते देखा। सरकारी तंत्र की बेरहमी। उजड़ते औरतों-बच्चों की बेबसी। जड़ों से कटने की पीड़ा। यह बलि विकास की खातिर थी। हरसूद के हजारों किरदारों के चेहरे। मैं मूलत: प्रिंट मीडिया का हूं। मैं जानता था कि टीवी का यह कवरेज ज्यादा दिनों तक लोगों को याद नहीं रहेगा। ऐसे हालातों में रिपोर्टिंग के मौके बार-बार नहीं आते। एक
बार रवींद्रजी इंदौर आए तो मैंने कुछ लिखने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह काम फौरन कर देना चाहिए। ब्यूरो प्रमुख प्रकाश हिंदुस्तानी ने मेरा शेड्यूल कुछ ऐसा तय किया कि मैं बिना अवकाश लिए हरसूद के डूबने की दास्तान इत्मीनान से लिख सकूं।

ढाई महीने में डायरी की शक्ल में लिखा एक दस्तावेज लेकर मैं दिल्ली गया। रवींद्रजी ने मुझे चार बड़े प्रकाशकों का रास्ता बता दिया। मैं सबके पास गया। हरसूद की स्क्रिप्ट दिखाई। ज्ञानपीठ प्रकाशन में तब प्रभाकर श्रोत्रिय थे। नया ज्ञानोदय के एक अंक में वे इस किताब के कुछ अंश से कवर स्टोरी छाप चुके थे। मैं उनसे भी मिला। सबने इसे पसंद तो किया, लेकिन छापने के नाम पर हाथ खड़े किए। समस्या यह थी कि यह न तो कहानी थी, न कविता, न उपन्यास। यह साहित्य की किसी श्रेणी में नहीं थी। इसे पढ़ता कौन? किसी ने कहा कि स्क्रिप्ट दे जाइए, विचार करेंगे। नवंबर 2004 में मुझ जैसे नए नवेले लेखक की शर्त यह थी कि यह किताब हर हाल में जून 2005 के पहले छपकर बाजार में आनी चाहिए, क्योंकि हरसूद के विस्थापन का सिलसिला खत्म नहीं हुआ था।

आखिरकर मैं राजकमल प्रकाशन के एमडी अशोक महेश्वरी से मिला। रवींद्रजी उन्हें इस किताब के बारे में बता चुके थे। उन्होंने तीन दिन के भीतर तय किया कि किताब राजकमल से आएगी और मेरी शर्त के मुताबिक जून के पहले आएगी। एग्रीमेंट साइन होते वक्त रवींद्रजी नोएडा से आए। मुझे बधाई दी। राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशन पूर्व की औपचारिकताओं के लिए स्क्रिप्ट की एडिटिंग का काम रवींद्रजी को ही सौंपा। मैं इंदौर लौटकर अपने काम में लग गया। होली की छुट्टियों में जब रवींद्रजी इंदौर आए तो एक दोपहर मुझे फोन किया। बोले कि तुरंत नीचे आओ। इंदौर में एबी रोड पर इंडस्ट्री-हाऊस के छठवें माले पर स्थित चैनल के ऑफिस से उतरकर मैं बाहर आया। वे कार में बैठे थे। एक बड़ा सा लिफाफा मुझे दिया। मैंने पूछा कि क्या है? वे बोले कि खोलकर देखो। तुम्हारे काम की चीज है। मैंने बेसब्री से खोला। हरसूद 30 जून की पांच कॉपियां मेरे हाथ में थीं। वे बधाई देकर चले गए। कहा कि अपन फोन पर बात करते हैं।

मैं ऑफिस में लौटा। घंटों तक किताब को उलट-पलटकर देखता रहा। मेरे पैर जमीन पर नहीं थे। हरसूद का कवरेज आंखों में जिंदा हो उठा था। वह अमानवीय विस्थापन दस्तावेज में दर्ज हो चुका था। मेरे लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव था। अगले तीन महीनों में दिल्ली में दो आयोजन हुए। एक में कमलेश्वर, प्रभाष जोशी, सुरेंद्र मोहन, राहुल देव, अजय उपाध्याय, आनंद प्रधान, वर्तिका नंदा समेत मीडिया की कई हस्तियों ने शिरकत की। किताब पर बोला। लिखा। अननिगत अखबारों और पत्रिकाओं में समीक्षाएं छपीं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने इस पर नाटक लिखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र अवार्ड के लिए चयन हुआ। मैं देश के करीब एक दर्जन विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में इस कवरेज पर बोलने के लिए बुलाया गया। हरसूद वालों की आखिरी आवाज इस किताब में हमेशा के लिए कैद चुकी थी। उनका विस्थापन गुमनाम नहीं हुआ था।

30 जून 2005 को हरसूद के हजारों विस्थापित नागरिकों ने अपने शहर की पहली बरसी मनाने का फैसला लिया। खंडहरों में तब्दील हो चुके हरसूद में इस किताब को बाकायदा दफनाने का निर्णय हुआ। रवींद्र शाह दिल्ली से रामबहादुर राय, राहुल देव समेत मीडिया और पर्यावरण से जुड़े कई कार्यकर्ताओं के साथ हरसूद आए। गीतकार विट्ठलभाई पटेल पहुंचे। 1984 में जिस जगह हरसूद को बचाने का संकल्प स्तंभ मेधा पाटकर की ऐतिहासिक रैली में स्थापित किया गया था, उसके बगल में यह किताब एक ताबूत में रखकर दफना दी गई। मैं एक बार फिर हरसूद में कवरेज के लिए मौजूद था। हम विस्थापन को साल भर से कवर कर ही रहे थे। इस बीच चैनल प्रमुख मुकेश कुमार सहारा समय को अलविदा कह चुके थे। किताब के संपादन में रवींद्रजी ने कुछ हिस्सों पर कैंची चलाई थी। इसमें
कई ऐसे नाम शामिल थे, जिन्होंने हरसूद के लाइव कवरेज में कई स्तरों पर योगदान दिया था। मैं उनसे कभी पूछ नहीं पाया कि इतनी सख्त एडिटिंग की जरूरत क्या थी?

धीरे-धीरे सहारा समय की ओपनिंग टीम के ज्यादातर खिलाड़ी बाहर जाते गए। मैं भी मार्च 2006 में दैनिक भास्कर में आ गया। रवींद्रजी कुछ समय जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में रहकर एस-वन चैनल में चले गए। फिर आजाद न्यूज चैनल। आउटलुक हिंदी में एसोसिएट एडिटर बने तो सालों बाद कुछ सुकून में देखे गए। मैं दो साल पहले भास्कर के नेशनल न्यूज रूम में आने के बाद कई दफा स्टोरी के लिए दिल्ली गया। सफदरजंग में गेस्ट हाऊस के पास ही उनका दफ्तर था। हम रात को घंटा-आधा घंटा टहलते। स्टोरीज के बारे में सुनाते। किताबों पर बात करते। इंदौर की यादें ताजा करते। अन्ना के आंदोलन के समय अगस्त में रामलीला मैदान गया। एक दिन अन्ना की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। हम साथ ही गए। लोधी रोड के इंडो-इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक सेमिनार में हमारे भाषण एक ही सत्र में थे।

रिश्तों के लिहाज से रवींद्रजी का भरोसा भीड़ में नहीं था। बहुत थोड़े लोग ही उनके इनर-सर्कल में रहे। उन्होंने चेले नहीं दोस्त बनाए। नए साथियों को वक्त-जरूरत मौके दिए। मौके नहीं दे पाए तो हौसला दिया। अच्छे पत्रकार बहुत हैं। वे अच्छे इंसान भी हों, यह बिल्कुल जरूरी नहीं। रवींद्रजी उस दुर्लभ प्रजाति के पत्रकार थे, जो अच्छे इंसान पहले थे। उनकी बातचीत के विषयों में कवरेज, स्टोरी, किताबें और शख्सियतें ज्यादा हुआ करती थीं। निराशा और नकारात्मकता के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी। दस सालों के दरम्यान वे दिल्ली की भीड़ में चुपचाप अपनी जगह बनाते हुए कई उतार-चढ़ावों से होकर गुजरे। मुश्किल दौर में भी मैंने उन्हें कभी हताश और उतरी शक्ल में नहीं देखा। वे हमेशा ही ऊर्जा से भरे और तरोताजा रहे। धार्मिक कर्मकांड, पूजा, कर्मफल की अवधारणा और ज्योतिष में उनका भरोसा नहीं था। न ही जिज्ञासा। लेकिन कभी इन चीजों की निंदा या आलोचना नहीं की। मीडिया की उस बिरादरी में वे कभी नहीं रहे, जो फायदों के जायज-नाजायज टुकड़ों की खातिर सरकारी दरवाजों के आगे दुम हिलाती है। ऐसे मुनाफामार लोगों से उनकी कुंडली कभी नहीं मिली।

मैं दावे से कह सकता हूं कि वे पाक दामन से पत्रकारिता में रहे। चैन से बैठना उनकी फितरत नहीं थी। इसलिए बार-बार ठिकाने बदले। अपनी जड़ें पत्रकारिता के सिवा कहीं नहीं फैलाईं। न किसी शहर में। न किसी संस्थान में। हर जगह शून्य से शुरू किया। उनका भरोसा शुरुआत में था, शिखरों में नहीं। वे उन पत्रकारों में से थे, जो खुद को कई बार शून्य तक लेकर गए। फिर शुरू हुए। एक हद तक आगे गए। फिर दूसरे शून्य तलाशे। जोखिम लेने की आदत सी बन गई थी। इसलिए जब आउटलुक में गए तो मैंने उन्हें ज्ञापन सौंपा कि बेहतर होगा कि धूनी रमा लीजिए। भटके बहुत। सत्य की अनुभूति अब यहीं कीजिए। वे बहुत खुश थे। चैनलों में चिल्लपों ज्यादा है। नए चैनलों में जरूरत से ज्यादा। एस-वन और आजाद में उनकी शांति भंग ही रही। सफदरजंग के नए दफ्तर में वे समाधि के भाव से स्टोरी में जुटे दिखाई दिए। शायद कुदरत को ही यह मंजूर नहीं था कि यह शख्स चैन से बैठे।

पत्रकारीय जीवन के अनुभवों पर उनका एकमात्र आलेख दो साल पहले माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि के दस्तावेज में छपा-'क्या भूलूं क्या याद करूं।' तब वे आजाद न्यूज चैनल में संपादक थे। इसमें उन्होंने लिखा कि रज्जू बाबू हिंदी पत्रकारिता का अश्वमेध करना चाहते थे। लेकिन नवभारत टाइम्स के माध्यम से प्रयास करने के बावजूद सफल नहीं हुए। यह काम दरअसल किसी ने किया तो वे सुधीरजी हैं। दैनिक भास्कर के प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल। जयपुर इस अश्वमेध का आरंभ बिंदु माना जाना चाहिए। रवींद्रजी का यह आलेख उनके 25 सालों सालों की पत्रकारिता के साक्षी पांच शहरों के सफरनामे पर केंद्रित है। इसमें पत्रकारिता में तेजी से आए बदलावों और उनके साथ उनके हमकदम होने की शानदार झलक है।

उत्तर प्रदेश की 40 दिन की यात्रा से लौटकर इंदौर गया। रवींद्रजी के घर। उनकी बुजुर्ग मां से मिला, जिनकी सेहत देखने के लिए वे दिल्ली से आए थे। बच्चों से मिला, जिनसे वे बेइंतहा प्यार करते थे। तीन पुलिया के उस घर में पहले रवींद्रजी की मौजूदगी में ही आता रहा। इस दफा गुलाब के फूलों की माला में उनका मुस्कराता हुआ चेहरा सामने पाया। मुझे फिर यकीन नहीं आया कि यह सच है। इंदौर में उन्होंने कई साल गुजारे थे। कुछ मित्रों ने शिकायत की कि इंदौर के अखबारों ने सड़क हादसे की खबर तक उनकी मृत्यु को सीमित रखा। सिर्फ प्रवीण शर्मा ने हैलो हिंदुस्तान में उन्हें अलग से याद किया। भुवनेश सेंगर ने दिल्ली से फोन पर बताया कि नोएडा की श्रद्धांजलि सभा में उन्हें याद करने कई लोग इकट्ठा हुए। मध्यप्रदेश के अखबारों में जगह भले ही कम हो, रवींद्रजी दोस्तों के दिलों में ज्यादा बड़ी जगह रखते हैं। यह अखबार से ज्यादा स्थाई और शाश्वत है। अगर मैनपुरी में उनकी मौत की मनहूस खबर न आई होती तो मुमकिन है कि मैं संभल से एकाध दिन का वक्त निकालकर गाजियाबाद में इंदिरापुरम् के उनके घर जरूर जाता। हम नोएडा से होकर ही दिल्ली साथ जाते। वे फिर किसी किताब का जिक्र करते या किसी स्टोरी पर बात करते। मैं जानता हूं कि अब यह बात कभी नहीं होगी!

सहारा-समय के नोएडा परिसर में 'हरसूद 30 जून' का लोकार्पण समारोह।

इंदौर प्रेस क्लब में हरसूद के विस्थापन पर आयोजित चर्चा में।

हरसूद की पहली बरसी पर आए राहुलदेव, रामशरण जोशी, विट्ठलभाई पटेल के साथ रवींद्रजी।

लेखक विजय मनोहर तिवारी दैनिक भास्कर से जुड़े पत्रकार हैं. उनसे संपर्क vijaye9@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

मीडिया महिलाओं के मामले में रिपोर्टिंग करते समय संयम बरते : काटजू

चेन्नई : भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने मंगलवार को मीडिया को महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध खासकर बलात्कार की रिपोर्टिंग करते समय संयम बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि यदि पीडि़ता का नाम प्रकाशित होता है, तो उसकी शादी की संभावना प्रभावित होगी। काटजू ने कहा, 'बलात्कार के मामले में महिला का नाम प्रकाशित नहीं करना चाहिए, खासकर तब जब वह अविवाहित हैं क्योंकि ऐसे में उसकी शादी की संभावना पर बुरा असर पड़ता है। मीडिया को उसकी शादी की संभावना को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।'

उन्होंने कहा कि यदि आप खबर देते हैं कि महिला के साथ बलात्कार हुआ, ये हुआ, वो हुआ, तब लोग उससे शादी करना पसंद नहीं कर सकते हैं। आंध्र प्रदेश की एक महिला ने शिकायत की थी कि उसके साथ बलात्कार होने के बाद टीवी चैनलों पर उसका नाम प्रसारित किया और अखबारों में उसका नाम प्रकाशित किया गया। काटजू ने प्रतिवादी से पूछा कि आपने उसका नाम क्यों प्रकाशित किया। आपको बिल्कुल परवाह नहीं है। आप चीजों को बस सनसनीखेज बनाना चाहते हैं। परिषद ने प्रतिवादी से महीने भर के अंदर जवाब मांगा।

विधानसभा स्पीकर बोलता है- मीडिया मेरे कंट्रोल में है… कश्मीर में पत्रकारों की ‘आज़ादी’ की लड़ाई

भारत प्रशासित कश्मीर में पत्रकारों ने उन पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों के खिलाफ एक विरोध मुहिम जारी की है. उनका कहना है कि उन्हें मंत्रियों के भ्रष्टाचार से जुड़ी ख़बरें सामने लाने से रोका जा रहा है. इस बीच भारतीय प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष ने इस मामले में जांच की मांग की है. सैंकड़ों पत्रकारों ने विधानसभा के बाहर एक धरना दिया. दरअसल स्पीकर मुहम्मद अकबर लोन के एक ‘आपत्तिजनक’ बयान दिए जाने से घाटी के पत्रकार काफी नाराज़ हैं.

स्थानीय पत्रकार तरुण उपाध्याय ने कहा, “स्पीकर ने कहा कि प्रेस का नियंत्रण उनके हाथों में है और पत्रकारों को अपनी ख़बर के सूत्रों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए.” पत्रकारों की मांग है कि स्पीकर अपना बयान वापस लें और इस वक्तव्य को विधानसभा के रिकॉर्ड से मिटाया जाए. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पत्रकारों को शांत करने की कोशिश की, लेकिन उनकी कोशिशें नाकाम रहीं.

पत्रकारों का कहना है कि जब तक स्पीकर अपना बयान वापस नहीं लेते, वे विधानसभा का बहिष्कार जारी रखेंगें. विश्लेषकों का कहना है कि स्पीकर का ये कहना कि हर खबर के पीछे के सूत्र को सार्वजनिक किया जाए, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ है. ग़ौरतलब है कि भारत प्रशासित कश्मीर में पत्रकारों पर पिछले कई सालों से कई प्रतिबंध लगाए जाते रहे हैं. भारतीय प्रेस काउंसिल ने ये मुद्दा कई बार अंतरराष्ट्रीय गुटों के समक्ष उठाया है. इसके अलावा इंटरनेश्नल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने भी इस मुसले पर चिंता जताई है.

जम्मू से बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर की रिपोर्ट.

'मीडिया मेरे कंट्रोल में, सूत्रों की देनी ही होगी जानकारी…' और मचा बवाल

जम्मू. विधानसभा स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन ने कहा कि ‘मीडिया मेरे कंट्रोल में है। समाचार पत्रों में छपी स्टोरी के सूत्रों की जानकारी सदन को देनी होगी। स्पीकर द्वारा यह बात कहने पर प्रेस गैलरी में मौजूद मीडिया कर्मियों ने सोमवार को सदन की कार्यवाही की रिपोर्टिग का बहिष्कार किया। सेंट्रल हाल के बाहर धरने पर बैठे मीडिया कर्मियों ने मांग की कि जब तक स्पीकर अपने ये शब्द वापस नहीं लेते तब तक बहिष्कार जारी रहेगा। विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती भी मीडिया के समर्थन में आ गई। महबूबा ने कहा कि जब तक मीडिया का बहिष्कार समाप्त नहीं होगा तब तक पीडीपी भी सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करेगी। इसके साथ ही इस विषय पर स्थगन प्रस्ताव भी लाएगी। स्पीकर लोन के रूख के चलते मीडिया कर्मी इससे पहले भी सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर चुके हैं। तब स्पीकर को मीडिया से माफी मांगनी पड़ी थी।

स्पीकर ने सोमवार को कार्यवाही के दौरान इन शब्दों को इस्तेमाल तब किया जब स्वास्थ्य मंत्री शाम लाल शर्मा ने उनके तथा विभाग के खिलाफ एक समाचार पत्र में छपी स्टोरी का मामला सदन में उठाया। शाम ने समाचार पत्र के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। शाम ने इस स्टोरी पर समाचार पत्र से जबाव लेने की अपील स्पीकर से की। शर्मा का साथ देने के लिए पीएचई मंत्री ताज मोहयुद्दीन भी खड़े हो गए। इस पर स्पीकर ने कहा कि इस मामले पर बाद में अपना निर्णय देंगे और मीडिया को भी निर्देश जारी करेंगे।

इस पर पीडीपी के निजामुद्दीन बट ने कहा कि इस मामले को विधानसभा में नहीं उठाया जा सकता। इसकी शिकायत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को की जानी चाहिए। इस पर स्पीकर ने कहा,‘ मीडिया मेरे अधीन है और उन्हें अपने सूत्रों की जानकारी देनी ही होगी।’ बाद में स्पीकर ने कहा कि मीडिया सदन के अधीन है। इस पर प्रेस गैलरी में मौजूद रिपोर्टर विरोध स्वरूप बाहर आ गए। कार्यवाही से स्पीकर के शब्दों को हटाने की मांग करते हुए विधानसभा परिसर के बाहर धरने पर बैठ गए।मीडिया ने मंगलवार को भी बहिष्कार जारी रखने की बात कही है। पीडीपी अध्यक्ष ने भी मीडिया के बहिष्कार तक पीडीपी द्वारा सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करने की घोषणा पत्रकार वार्ता में कही। इसके बाद हुई पार्टी की बैठक में मंगलवार को इसी विषय पर स्थगन प्रस्ताव लाने का फैसला किया।

स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन का मीडिया के साथ विवाद पहले भी हो चुका है। गठबंधन सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले बजट सत्र के दौरान वर्ष 2009 में भी उनके व्यवहार के चलते मीडिया ने कार्यवाही की रिपोर्टिग का बहिष्कार किया।उस समय विपक्ष के नेता महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा से वाक आउट किया था। इस पर मीडिया कर्मी महबूबा की प्रतिक्रिया लेने के लिए मीडिया गैलरी से बाहर चले गए। बाहर गए रिपोर्टरों को प्रेस गैलरी में न आने देने के निर्देश जारी कर दिए। बाद में मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार ने मध्यस्थता की थी।उस समय स्पीकर ने विधानसभा परिसर में प्रेस वार्ता कर अपनी गलती मानी थी। और मीडिया को रिपोर्टिग करने को कहा था।

मिन्नते हुईं बेकार, मीडिया ने नहीं सुनी उनकी गुहार!

जम्मू. विधानसभा स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन द्वारा मीडिया के खिलाफ की गई टिप्पणी के विरोध में सदन की कार्यवाही की रिपोर्टिग का बहिष्कार दूसरे दिन भी जारी रहा। स्पीकर ने सोमवार को कहा था कि मीडिया उनके कंट्रोल में है। मंगलवार को विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही सभी मीडियाकर्मी कार्यवाही से स्पीकर के शब्दों को हटाने की मांग करते हुए विधानसभा परिसर के बाहर धरने पर बैठ गए।

मुख्यमंत्री के सलाहकार देवेंद्र राणा, सीपीआई के विधायक मोहम्मद युसुफ तारीगामी ने धरने पर बैठे पत्रकारों को बहिष्कार समाप्त करने की अपील की। लेकिन उनकी अपील को नकार दिया गया। इसके बाद संसदीय कार्य एवं कानून मंत्री अली मोहम्मद सागर, पैंथर्स पार्टी के विधायक हर्ष देव सिंह भी पत्रकारों को मनाने के लिए आए। उन्होंने बताया कि स्पीकर इस मामले को सुलझाने के लिए तैयार हैं। इसके बाद मुख्यमंत्री के सलाहकार मुबारक गुल, सूचना निदेशक फारूक रेंजू तथा विधानसभा के सचिव मोहम्मद रमजान ने आकर बताया कि स्पीकर पत्रकारों के साथ दोपहर दो बजे बैठक करना चाहते हैं। लेकिन स्पीकर ने दो बजे बैठक नहीं की। इसके बाद मीडियाकर्मियों की प्रेस क्लब में बैठक हुई। इसमें फैसला किया गया कि बुधवार को भी बहिष्कार जारी रहेगा।

एडिटर्स एंड जर्नलिस्ट काउंसिल का पुनर्गठित : एडिटर्स एंड जर्नलिस्ट काउंसिल राजौरी का पुनर्गठन किया गया है। प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडियाकर्मियों की बैठक में सभी ने सर्वसम्मति से श्याम सूद को दोबारा से प्रधान चुना। इसके बाद प्रधान 31 सदस्यीय समिति का गठन किया। शक्ति शर्मा को काउंसिल का महासचिव, शफकत वानी व जब्बार चौधरी को वरिष्ठ उपप्रधान, इमरान कय्यूम को उपप्रधान बनाया गया। सूद ने सभी को भरोसा दिलाया कि मीडियाकर्मियों के हितों के लिए वो संघर्ष करते रहेंगे।

पीसीआई को अवगत करवाएंगे पत्रकार

पत्रकारों का कहना है कि स्पीकर का यह कथन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के उल्ल्घंन के साथ पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर भी हमला है। पत्रकारों ने कहा कि उनका टकराव विधायिका के साथ नहीं है। वे स्पीकर की कुर्सी की पूरी तरह इज्जत करते है लेकिन इसके साथ ही प्रेस की स्वतंत्रता के साथ समझौता भी नहीं चाहते। इस पूरे प्रकरण की जानकारी प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया को भी भेजने का भी फैसला किया गया। पीडीपी के विधायक निजामुद्दीन बट ने कहा कि पीडीपी मीडिया के साथ है।

(उपरोक्त दोनों खबरें दैनिक भास्कर से साभार)

जाना तो हमको पहले था रवि

: स्मृति शेष : रवि (रवि पंत) से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी, जब हिंदुस्तान मेरठ से नया संस्करण निकलने जा रहा था। उनका परिचय मुझे अपने एक विश्वस्त सहयोगी द्वारा एक होनहार विनम्र और मेहनती ‘लड़के’ के बतौर दिया गया था, जो सही ब्रेक मिलने पर काफी आगे जा सकता था। दरमियाने कद और दुबली पतली काठी के उस युवा के चेहरे पर, जो मुझसे मिलने आया, एक सौम्य आत्मविश्वास था। उसकी छोटी छोटी आंखों में बुद्धि की दीप्ति थी। बिना किसी ज्वालामुखी जोश, या ‘मैंने आपको या शिवानी जी को बचपन से सराहा है’ सरीखा वाक्य बोले, उन्होंने अपना परिचय नपे तुले शब्दों में दिया।

साक्षात्कार खत्म होने तक अपनी कुशाग्रता और पूछे गए विषयों की जानकारी से हम सबको इतना प्रभावित किया कि उन्हें मेरठ संस्करण का प्रभारी बनाने की तुरंत शुरुआत कर दी गई। कुछेक विघ्नसंतोषी लोगों ने यह ‘इंपल्सिव’ फैसला लेने का हल्का प्रतिवाद किया भी, किंतु तब तक मैं और कुछ न भी हो, पच्चीस बरस में हिंदी पत्रकारिता की उन गलियों, तहखानों और चोर दरवाजों से राजनीतिक नसेनियों के सहारे आ घुसे कंकड़ों और मेधा तथा ईमानदारी के ताप से परिपक्व हुए हीरों के बीच परख करने में समर्थ थी।

मेरी यह आस्था रवि ने नहीं झुठलाई। फिर कुछ समय बाद दूसरे उथल पुथल भरे प्रभार को उसे सौंपा गया, इस बार बनारस। ‘परिवार को वहां ले जाना होगा। बीच टर्म में बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान से या और कोई तकलीफ होगी तो बताइयेगा, मैंने कहा तो रवि का हस्बेबामूल उत्तर था, नहीं, मैं मैनेज कर लूंगा। वहां भी पूरी गरिमा और निष्ठा से उसने काफी कठिन परिस्थितियों में काम जमाया। गो मुझे उनके त्वरित उत्थान से अकारण हो रहे दफ्तरी भितरघात और ‘पहाड़ी बिरादरी’ के अतिरिक्त रूप से उभर रहे कर्मियों के नाम पर कुछ ईर्ष्यालु गुमनाम पत्रों के बंटवार की खबरें मिलती रहती थीं, पर न कभी उन्होंने उसकी शिकायत की और न ही मैंने जवाब तलब किया। बच्चे उनके मेधावी थे और उनका स्कूली पढ़ाई में रमना और अखबार में आती बेहतरी रवि के लिए सुख का एक अनवरत स्रोत था। रवि को मैंने साप्ताहिक संपादकीय लिखने को कहा और उनका सुघड़ गंभीर लेखन मेरे मन में उनके प्रति और अधिक आदर जगा गया।

इसी बीच मैंने अखबार से अवकाश लेने का फैसला ले लिया। जब अपने वरिष्ठ सहयोगियों को मैंने सूचित किया तो रवि (जो संयोगवश शहर में थे) ही इकलौते व्यक्ति थे, जिनकी प्रतिक्रिया थी, आपने अकारण नहीं, कुछ सोच कर ही किया होगा। रवि से इसके बाद भी संपर्क बना रहा। त्योहार पर, नए साल पर तो कभी कोई आलेख पढ़ने के बाद। संक्षिप्त सा वार्तालाप, पर उनके मन का सच्चा स्नेह छलकता रहता। आप ठीक तो हैं ना? तबीयत? तभी पता चला वे खुद काफी बीमार हैं। फोन लगाया, तो लगा आवाज बदलने लगी है। बताया गया तालू में कुछ पेशियों को लकवा मार गया है। डॉक्टर कहते हैं धीमे धीमे ठीक हो जाएगा। पर पापशंकी मन में जाने क्यों धुकपुकी होती रही कहीं यह किसी बड़े कष्ट की शुरुआत तो नहीं? एकाध बार कहने की कोशिश भी की, पर भैय्या अपने स्वास्थ्य का खयाल रखना से अधिक न मैं कह सकी,  न हां हां दीदी सब ठीक है से अधिक वे। और अब वे नहीं रहे। जाना तो हमको पहले था रवि और यह लेख हमारे बारे में तुमको लिखना था। ईश्वर जहां भी तुम हो, तुम्हारी उस नेक, अजातशत्रु सहज आत्मा को शांति दे।

लेखिका मृणाल पांडे वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

मीडिया हेड पद से स्वतंत्र मिश्रा की विदाई, वंदना भार्गव को मिला चार्ज

सहारा मीडिया के मीडिया हेड पद से स्वतंत्र मिश्रा की विदाई हो गई है. तमाम तरह के विवादों, आरोपों से घिरे रहे स्वतंत्र मिश्रा की जगह वंदना भार्गव को चार्ज दिया गया है. इस तरह से उपेंद्र राय को फ्रंट फुट पर फिर खेलने की संभावनाओं का फिलहाल अंत हो गया है. इस बड़े बदलाव के बारे में सहारा में आदेश जारी हो चुका है और महत्वपूर्ण सेंटरों पर चस्पा कर दिया गया है. स्वतंत्र मिश्रा सहारा मीडिया में बने रहेंगे लेकिन निर्णय लेने का सारा काम उनसे छीन लिया गया है.

पिछले कुछ महीनों से ये कयास लगाया जाने लगा था कि स्वतंत्र मिश्रा मीडिया हेड के पद से जा सकते हैं. हथियारों की तस्करी से लेकर करोड़ों की प्रापर्टी बनाने तक का प्रकरण सामने आने के बाद स्वतंत्र मिश्रा की छवि एक विवादास्पद व्यक्ति की बन गई थी.  बताया जाता है कि ताजे फेरबदल के तहत स्वतंत्र मिश्रा का पर कतरते हुए उन्हें अब एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर वंदना भार्गव को रिपोर्ट करने के लिए कहा गया है. अभी तक स्वतंत्र मिश्रा सीधे सहाराश्री सुब्रत राय को रिपोर्ट कर रहे थे. वंदना भागर्व सहारा के लखनऊ मुख्यालय में बैठती हैं और आंतरिक विंग एमसीसी को हेड करती हैं. एमसीसी सहारा के सभी वेंचर की कंट्रोलिंग शाखा के तौर पर काम करता है, जिसमें मीडिया भी शामिल है. ताजे फेरबदल के बाद एक तरह से मीडिया का सारा काम सीधे वंदना भार्गव के कंट्रोल में कर दिया गया है.

सहारा में मैनेजमेंट के जो शीर्ष पद हैं उसमें सबसे पहले आता है बोर्ड ऑफ डायरेक्टर जिसमें सहाराश्री सुब्रत राय, उनकी पत्नी, भाई और ओपी श्रीवास्तव शामिल हैं. उसके बाद एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर वर्कर आते हैं जिनमें सहारा श्री के दोनों बेटे सीमांतो रॉय व सुशांतो राय के अलावा रविशंकर, रोमी दत्त, विवेक कुमार, एके श्रीवास्तव, डीके श्रीवास्तव, अनुपम प्रकाश, एआर चौधरी व वंदना भार्गव हैं.

टीवी टुडे ग्रुप के साथ तीन वरिष्‍ठ लोग जुड़े

टीवी टुडे से खबर है कि तीन वरिष्‍ठ लोगों ने इस ग्रुप को ज्‍वाइन किया है. विक्रम दास जीएम के रूप में टीवी टुडे ज्‍वाइन किया है. ये ग्रुप के चैनलों का इंटरनेशनल डिस्‍ट्रीब्‍यूशन का काम देखेंगे. राहुल कुमार शा टीवी टुडे समूह के अंग्रेजी चैनल हेडलाइंस टुडे से जुड़े हैं. इन्‍हें वाइस प्रेसिडेंट (एड सेल्‍स) बनाया गया है. ये चैनल के राजस्‍व की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. देवलीना मजूमदार ने एचआर विभाग में ज्‍वाइन किया है. वे एचआर में जनरल मैनेजर होंगी. इन सभी लोगों की रिपोर्टिंग टीवी टुडे के सीईओ जॉय चक्रवर्ती को होगी.

फर्जीवाड़ा : कहां से निकलता है उत्‍कल मेल का रांची संस्‍करण

रांची : झारखंड में अंधेरगर्दी है. समाचार पत्र-पत्रिकाओं के नाम पर यहां कागजों पर करोडों का वारा-न्यारा किया जा रहा है. यहां एक मामले की चर्चा की जा रही है. जो इस संदर्भ की एक कड़ी मात्र है. ओडिसा राज्य में एक समाचार पत्र है. इस पत्र का नाम है उत्कल-मेल. उत्कल मेल के सर्वेसर्वा हैं- पीतवास मिश्र. इस समाचार पत्र का मूल निवास राऊरकेला बताया जाता है. वैसे इस पत्र का प्रकाशन ओडिसा के राऊरकेला सहित भुवनेश्वर, छत्‍तीसगढ में रायपुर, झारखंड में रांची और जमशेदपुर तथा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से करने का दावा किया जाता है.

उत्कल मेल के ओडिसा में उडिया तथा हिंदी तथा बाकी स्थानों पर हिंदी में प्रकाशित होने की बात कही जाती है. समाचार पत्र के मालिक, संपादक, प्रकाशक मुद्रक पीतवास मिश्र को इस फील्ड में महारथ हासिल है. उन्होंने अपने सभी संस्करणों के डीएवीपी दर ले रखें हैं. वैसे उत्कल मेल का केवल राऊरकेला इंडस्ट्रीयल एरिया में ही प्रिंटिंग मशीन होने की बात कही गयी है. अब कहानी झारखंड में उत्कल मेल की. राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र में बतौर वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत शरण रांची से सेवा दे रहे थे. अब वे इस समाचार पत्र में नहीं हैं. पटना के रहने वाले प्रशांत को विरासत में पत्रकारिता मिली है. रांची में कुछ वर्षों तक पत्रकारिता करते यह जगह उन्हें रास आ गयी लेकिन राष्ट्रीय सहारा को प्रशांत शरण रास नहीं आये. उन्हें हटा दिया गया.

जब वे बेरोगार हो गये. उन्होंने दूसरी जगह तलाशनी शुरु की. उत्कल मेल पर उनकी निगाहें टिकी. पत्र के मालिक पीतवास मिश्र से संपर्क कर उन्हें न सिर्फ समाचार पत्र का फाइनेंसर (लातेहार के पांडे जी) उपलब्‍ध करवा दिया बल्कि प्रशांत शरण ने दौड-धूप कर पटना के संबंधों का लाभ उठा कर उत्कल मेल को गृह विभाग झारखंड सरकार से राज्य सरकार की स्वीकृत पत्र-पत्रिकाओं की सूची में डलवा दिया. झारखंड की राजधानी रांची से यह मंशा सफल नहीं हुई लेकिन जमशेदपुर संस्करण को प्रशांत लाभ दिलाने में सफल हो गये. बात यहीं नहीं खत्म हुई. प्रशांत ने सोचा चलो बेरोजगारी खत्म हुई परंतु ऐसा नहीं हुआ. फाइनेंसर पांडे जी और पीतवास मिश्र ने प्रशांत शरण को काम निकलने के बाद दूध में गिरी मक्खी की तरह फेंक दिया. प्रशांत का तिलमिलाना लाजिमी था. अभी वे एक नई पत्रिका झारखंड 30 दिन निकाल रहे हैं. इस मैग्जिन में उन्होंने उत्कल मेल पर स्टोरी लिखी है. उसे आपको भी भेज रहा हूं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

फोटो जर्नलिस्‍ट सुबीर दा ने बंद कर दी बड़बोले दिग्विजय सिंह की बोलती

लखनऊ। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव दिग्विजय सिंह के बोल के आगे सबके बोल बेकार हैं, अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आपका नजरिया सोमवार को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में उनकी प्रेसवार्ता में जो कुछ हुआ, उसका हाल जानने के बाद बदल जाएगा। चुनावी मौसम में पत्रकारों की जिस तरह संख्या बढ़ जाती है, उसी तरह आज टीवी चैनलों की तादाद में कई गुना इजाफा हो जाता है।

बड़े नेताओं की प्रेसवार्ता का लाइव प्रसारण के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया के ओवी वैन के साथ कैमरों की भी भरमार रहती है। ऐसे माहौल के बीच आमतौर पर सभी दलों में प्रेसवार्ता होती है, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं का नखरे कुछ अलग रहते हैं। सोमवार को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व प्रांतीय प्रभारी दिग्विजय सिंह की प्रेसवार्ता को कवर करने प्रिंट मीडिया के फोटोग्राफर भी दर्जन संख्या में उनके हाव-भाव को कैमरे में कैद करने के लिए पहुंचे थे।

मीडिया रूम में आने के बाद दिग्विजय सिंह ने दो मिनट का समय प्रिंट फोटोग्राफरों को देते हुए बोले, ‘अच्छा आप लोग अब चलिए’ एक बार उनकी आवाज पर जब प्रिंट के फोटोग्राफरों  ध्यान नहीं दिया तो फिर बोले, ‘चलिए-चलिए’। चुनाव के मौसम में कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद सहित कई बड़े नेताओं के साथ दिग्विजय सिंह के मुंह से चलिए-चलिए का डायलॉग सुनने के बाद फोटोग्राफर उनके ऊपर भडक़ उठे। द हिंदू के वरिष्ठ फोटोजर्नलिस्ट सुबीर दा दिग्विजय सिंह को अंगुली दिखाते हुए बोले जब यह सलूक करना है तो प्रेसवार्ता में क्यों बुलाते हैं।

इस पर झेंपते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि मुझे कोई दिक्कत नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों को दिक्कत है। दिग्विजय सिंह अपनी बात में इलेक्ट्रानिक मीडिया के कैमरामैनों से हां में हां करवाने में जुट गए। खैर पांच मिनट तक प्रेस फोटोग्राफर और दिग्विजय के बीच इस मुद्दे को लेकर कहासुनी होती रही। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दो नेता जब फोटोग्राफरों को समझाने आए तो उनको भी डांट कर किनारे कर दिया गया। पांच मिनट तक कहासुनी के बाद प्रेस फोटोग्राफर वहां से चले गए। दिग्विजय सिंह को देखकर पूरे घटनाक्रम के दौरान ऐसा लगा जैसे उनकी बोलती बंद हो गई। दिग्विजय सिंह के चलिए-चलिए के अंदाज पर नाराजगी जाहिर करने वालों में सुबीर दा के साथ प्रमोद शर्मा, मो. अशफाक, मो. अतहर, रितेश यादव, सुशील सहाय सहित कई लोग थे।

रोमिंग जर्नलिस्‍ट के फेसबुक वाल से साभार.

जनसंदेश टाइम्‍स के सेंट्रलाइज संचालन के लिए एमडी सेक्रेट्रिएट गठित

जनसंदेश टाइम्‍स से खबर है कि अब यहां पूरा कारपोरेट कल्‍चर लागू होने जा रहा है. अखबार का हेड ऑफिस लखनऊ होगा. यहीं से सारी चीजें नियंत्रित की जाएंगी. इसके लिए एक एमडी सेक्रेट्रिएट का गठन किया गया है. अखबार के समस्‍त ऑपरेशन के लिए एमडी सेक्रेट्रिएट ही जिम्‍मेदार होगा. इस टीम में एमडी अनुज पोद्दार, सीजीएम अनिल पाण्‍डेय, कारपोरेट एडिटर संजय तिवारी और एचआर हेड रिया चक्रवर्ती शामिल हैं.

बताया जा रहा है कि अखबार को पूर्ण रूप से कारपोरेट कल्‍चर में ढालने के लिए यह निर्णय लिया गया है. खबर है कि प्रबंधन की व्‍यवस्‍था को सेंट्रलाइज करने के लिए इस योजना को लागू किया जा रहा है ताकि यूनिटों में आने वाली दिक्‍कतों से तत्‍काल निपटा जा सके. मैनेजमेंट लेबल पर अनुज पोद्दार एवं अनिल पाण्‍डेय की महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी होगी, पर कंटेंट के मामले को लेकर पूरा हस्‍तक्षेप कारपोरेट एडिटर संजय तिवारी का रहेगा. बताया जा रहा है कि संजय तिवारी अखबार को अलग पहचान देने की कोशिशों में जुटे हुए हैं. ह्यूमन रिसोर्सेज से जुड़ी कठिनाइयों को रिया चकवर्ती हल करेंगी.

राष्‍ट्रीय सहारा के वरिष्‍ठ पत्रकार दीपचंद पाण्‍डेय का निधन

कानपुर। राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार दीपचंद पाण्डेय का सोमवार की शाम लखनऊ में निधन हो गया. श्री पाण्डेय ने संवाददाता के रूप में अपना कैरियर वर्ष 1992 में राष्ट्रीय सहारा कानपुर संस्करण के आरम्भ होने के साथ शुरू किया था. तब से इसी अखबार के साथ जुड़े रहे. पिछले दो सालों से वह मुंह के कैंसर से पीडि़त थे. इस दौरान उनका इलाज मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल कैंसर हास्‍पीटल में भी चला.

पिछले महीने उनकी तबीयत ज्‍यादा खराब हो गई थी, जिसके बाद उन्‍हें इलाज के लिए लखनऊ ले जाया गया था. लखनऊ में ही इलाज के दौरान उनका निधन हो गया. दीपचंद का पार्थिव शरीर लखनऊ से उनके कानपुर में हालसी रोड बादशाही नाका स्थित उनके आवास पर लाया गया, जहां लोगों के दर्शन के लिए रखा गया. आज उनका अंतिम संस्‍कार भगवत दास घाट पर किया गया. वे अपने पीछे पत्‍नी और दो पुत्र एवं एक पुत्री छोड़ गए हैं. उनके निधन से पूरा कानपुर के मीडिया जगत में शोक की लहर दौड़ गई है.

नईदुनिया से भाषा सिंह, दिनेश अग्रहरि और अमित का इस्‍तीफा

नईदुनिया, दिल्‍ली में इस समय हलचल मची हुई है. छंटनी के चलते कार्यालय के तनाव फैला हुआ है. खबर है कि तीन और लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि प्रबंधन ने छंटनी के तहत इन लोगों से इस्‍तीफा मांग लिया है. जिन लोगों के संबंध नईदुनिया से समाप्‍त हुए हैं, उनमें रोविंग एडिटर भाषा सिंह, वरिष्‍ठ पत्रकार दिनेश अग्रहरि तथा स्‍पोर्टस डेस्‍क पर कार्यरत अमित शामिल हैं. बताया जा रहा है कि इन लोगों के अलावा भी कई अन्‍य लोगों से जल्‍द ही इस्‍तीफा मांगा जा सकता है.

उल्‍लेखनीय है कि तमाम तरह की चर्चा-कुचर्चा के बीच चल रहे नईदुनिया में उथलपुथल मचा हुआ है. तीन-चार दिन पूर्व ही प्रबंधन ने डिप्‍टी आरई केएन सिंह, वरिष्‍ठ पत्रकार अनूप भटनागर, संजय त्रिपाठी एवं एक फोटोग्राफर से इस्‍तीफा मांग लिया था. हालांकि इन लोगों से इस्‍तीफा मांगे जाने के बाद से ही कार्यालय में तनाव का माहौल पसरा हुआ है. अब भाषा सिंह, दिनेश अग्रहरि और अमित के इस्‍तीफो ने घी में आग का काम किया है. बताया जा रहा है कि कुछ नाराज लोग स्‍वयं इस्‍तीफा दे सकते हैं.

दूसरी तरफ बताया जा रहा है कि दिल्‍ली से आधा से ज्‍यादा लोगों की छंटनी की जानी है. संपादक आलोक मेहता की सहमति के बाद ही यह छंटनी की लिस्‍ट हेड आफिस द्वारा तैयार की गई है. उन्‍होंने बड़ी सेलरी पाने वाले अपने खास लोगों को बचा लिया है, इसलिए आलोक मेहता के खिलाफ भी अन्‍य कर्मचारियों में गुस्‍सा है. कर्मचारियों का कहना है कि वे अपने संस्‍थानों से आलोक मेहता के विश्‍वास पर ही तो नईदुनिया आए थे, लिहाजा उन्‍हें से छंटनी पर कुछ बोलना चाहिए पर वे चुप हैं.

प्रबंधन धीरे-धीरे छंटनी के कार्य को अंजाम दे रहा है ताकि बवाल न हो सके. तीन-चाल लोगों के स्‍लाट में छंटनी की जा रही है. हालांकि छंटनी करते समय प्रबंधन पूरी तरह संवेदनहीन बना हुआ है, जिन लोगों ने कंपनी के लिए अपना सब कुछ दिया, ऐसे लोगों को एक झटके में बाहर कर दिया जा रहा है. जो लोग संपादक आलोक मेहता के खास है या उनके नजदीकी हैं वे लोग बचे हुए हैं. हालांकि नईदुनिया के भविष्‍य को लेकर चल रहे कयासों में वे लोग भी परेशान हैं. 

चैनल के पत्रकार को तृणमूल कार्यकर्ताओं ने पीटा

कोलकाता। कोलकाता के जाधवपुर क्षेत्र में सतारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने कथित तौर पर बंगाल के एक प्रमुख समाचार चैनल के एक पत्रकार की पिटाई कर दी। पत्रकार पार्थ प्रतिम घोष ने कहा कि उसे उस वक्त पीटा गया जब वह मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के एक स्थानीय दफ्तर में तोड़फोड़ का वीडियो बनाने की कोशिश कर रहा था।

घोष ने बताया, "जिस वक्त मैं मौके पर पहुंचा तो तृणमूल समर्थकों ने मुझे वीडियो बनाने से मना किया। तभी उनमें से कुछ लोगों ने मुझे गालियां देना शुरू कर दिया। जब मैंने उन्हें ऐसा करने से मना किया, तो उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया।" पुलिस संयुक्त आयुक्त (मुख्यालय) जावेद शमीम ने कहा कि पुलिस मामले की जांच कर रही है।  उन्होंने  बताया, "मुझे इस घटना की जानकारी है। घोष को शिकायत दर्ज कराने दीजिए, हम मामले की जांच करेंगे।"साभार : देशबंधु

गीताश्री के “सपनों की मंडी” का पुस्तक मेले में लोकार्पण

"सपनों की मंडी" ये किताब महज यातनाओं की कहानी न होकर एक ऐसी सच्ची किताब है जो उम्मीद जगाती है, इस किताब को हालांकि अभी मैं पूरी तरह से नहीं पढ़ पायी हूँ, पर मैं  इसके सृजन की प्रक्रिया को जानती हूँ इसलिए मुझे विश्वास है कि मानव तस्करी के विषय पर शोध करने वालों के लिए ये किताब भविष्य में वरदान साबित होगी।" इन शब्दों के साथ बीएजी नेटवर्क की प्रबंध निदेशक और वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा प्रसाद ने गीताश्री लिखित पुस्तक, 'सपनों की मंडी' का लोकार्पण किया।

दिल्ली के प्रगति मैदान में विगत २५ फरवरी से चल रहे अंतर्राष्ट्रीय किताब मेले में आज वाणी प्रकाशन के स्टाल पर मानव तस्करी पर आधारित, गीताश्री लिखित पुस्तक "सपनों की मंडी" का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के साथ साथ प्रदीप सौरभ, महेश भारद्वाज, अजय नावरिया, पंकज मिश्र जैसे साहित्य जगत से जुड़े लोग भी मौजूद थे। वाणी प्रकाशन की निदेशक, अदिति महेश्वरी ने मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि मानव तस्करी पर लिखी गयी इस किताब में उन लड़कियों कि चीखें हैं, जो ठगी और बेच गयीं। ये किताब न सिर्फ उन लोगों को मिली यातना बताती है बल्कि समाज से बेदखल उन लड़कियों कि जिंदगियों में आ रही उम्मीद कि किरण से भी रु-ब-रु कराती है।"

किताब की लेखिका गीताश्री ने इस किताब के लिखे जाने को उस पीड़ा से मुक्ति बताया जो उन भुक्तभोगी लड़कियों से मिलकर उनकी यातनाओं की कहानी सुनने के बाद मिली। एक फेलोशिप के विषय के तौर पर शुरू किये गए शोध से गीताश्री का जुड़ाव इस कदर हुआ कि रह रहकर अवचेतन में वो लडकियां घूमती रहीं। गीताश्री आगे बताती हैं, "मुझे मुक्ति का मार्ग किताब लेखन में ही दिखा क्यूंकि मानव तस्करी पर लिखा तो काफी कुछ गया पर आदिवासी अंचल की ठगी और बेची जा रही इन लड़कियों की चीख लेखकों तक नहीं पहुँच पायी थी।"

ज्ञातव्य हो कि "सपनों की मंडी" से पहले भी गीताश्री कि महिला विमर्श पर लिखी चार पुस्तकें बाज़ार में आ चुकी हैं1 इस पुस्तक के आमुख में चर्चित लेखिका तसलीमाँ नसरीन ने लिखा है कि "मानव तस्करी से जुडी घटनाओं और जिंदगियों का किताब में किया गया मार्मिक वर्णन झकझोरने वाला है। मानव तस्करी पर ये किताब काफी संवेदनशील ढंग से गंभीर चिंतन के बाद लिखी गयी है।"

यूपी चुनावों में भारी मतदान से सभी दलों में घबराहट

उत्तर प्रदेश में अभी तक पांच चरणों के संम्पन्न हुए चुनावों में भारी मतदान के समाचारों से न केवल सभी आश्चर्यचकित हैं बल्कि राजनैतिक दलों में भीतरखाने हड़कंप सा मच गया है. विशेषकर बसपा और कांग्रेस में, जिन्हें यहाँ होने वाली पराजय पर वर्तमान और भविष्य में बहुत कुछ खोना पड़ेगा. एक और जहाँ बसपा की मायावती को चुनाव हारने पर राज्य की सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा वहीँ कांग्रेस के महासचिव की प्रतिष्ठा व भविष्य भी दांव पर है. इतना ही नहीं प्रदेश के विधान सभा के चुनावोंपरांत यही विधायक राज्यसभा के होने वाले द्विवार्षिक चुनावों के लिए उत्तर प्रदेश से राज्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन करेंगे.

कांग्रेस को आशा है कि राज्यसभा में उनके सदस्यों की संख्या में बढ़ोत्‍तरी उत्तर प्रदेश से हो सकती है, जिनके बलबूते पर वह लोकसभा व राज्यसभा में लंबित पड़े कई महत्वपूर्ण बिलों को पास करवा सकेगी. यदि इस चुनाव में २००७ के चुनावों से अधिक संख्या में सीटें नहीं जीती कांग्रेस ने तो इस पराजय का सारा ठीकरा राहुल पर ही फोड़ा जायेगा. जहाँ तक सपा का प्रश्न है, तो सपा की न तो वहां सरकार है और न ही राष्ट्रीय परिपेक्ष्‍य में उसे कोई विशेष हानि का सामना ही करना पड़ेगा. हाँ, यदि भाजपा का प्रदर्शन पहले से अच्छा नहीं रहा तो इस वर्ष के अंत तक होने वाले हिमाचल सहित कुछ अन्य राज्यों के चुनावों में भाजपा को तो हानि की आशंका हो सकती है परन्तु उत्तर प्रदेश तक सीमित क्षेत्रीय दल सपा को तो कतई नहीं. जहाँ तक पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और अमर सिंह का ताल्लुक है, तो यह दोनों नेता भाजपा और सपा से अपनी खुन्नस मिटाने के लिए ही चुनाव में उतरे हैं और यदि इन दोनों को एक-एक सीट भी मिल जाये तो बहुत अचरज की बात होगी.

हाँ, एक दल अवश्य ही ऐसा है जिसको किसी भी प्रकार की हानि का अंदेशा नहीं है और हर दृष्टि से लाभ ही लाभ है. वह हैं केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री चौधरी अजीत सिंह का राष्ट्रीय लोक दल, जिसका वजूद केवल प्रदेश के जाट बहुल पश्चिम उत्तर प्रदेश में ही है. बिना किसी विचारधारा के, मात्र अपने लाभ-हानि के लिए समय-समय पर विभिन्न दलों से समझौता और फिर उसे तोड़ने के लिए प्रसिद्ध राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से समझौता करके अपने लिए मंत्री पद तो सुनिश्चित कर ही लिया है. प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो वहां भी कुछ मंत्री पद हासिल कर लेंगे, अन्यथा उनका अपना मंत्रीपद तो सुरक्षित ही है.

अभी तक के पांच चरणों के चुनावों में हुए भारी मतदान का कारण जानने को सभी उत्सुक हैं, वहीँ चुनाव लड़ रहे राजनीतिक दलों और तमाम अन्य विशेषज्ञों की राय भी अलग-अलग है. वास्तविकता का पता तो ६ मार्च को मतगणना के पश्चात ही चलेगा. सात चरणों में संपन्न होने वाले प्रदेश के चुनावों में अभी तक के पांच चरणों में ६० प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है जबकि इसके ठीक विपरीत पूर्व के चुनावों में ५० प्रतिशत से कम मतदान होता रहा है. आम तौर से यह धारणा है कि यदि कोई विशेष लहर पक्ष या विपक्ष में न चल रही हो तो अधिक मतदान को सत्तारूढ़ दल के विरोध का कारण माना जाता है, जिसके चलते उसकी पराजय निश्चित होती है. सत्तारूढ़ दल बसपा सहित सभी दल इस भारी मतदान को अपने-अपने पक्ष में बता रहे हैं. लेकिन यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो ऐसी अवस्था में किस-किस दल का गठबंधन हो सकता है इसकी भी सम्भावना अभी से तलाशी जा रही है.

यूँ तो सभी दल अपने बहुमत का दावा कर रहे हैं और सतही तौर से कोई भी किसी के साथ गठबंधन के लिए राजी नहीं दिखता, परन्तु सूत्र बता रहे हैं कि भीतरखाने सभी दल ऐसी संभावनाओं की तलाश में लगे हैं. अपनी फजीहत से बचने के लिए कांग्रेस मायावती की बसपा और भाजपा से कभी समझौता नहीं करेगी. हाँ, आवश्यकता पड़ने पर यदि मायावती को कांग्रेस का समर्थन मिलता है तो मायावती को कोई गुरेज नहीं होगा, वैसे ऐसी सम्भावना बहुत ही क्षीण है. इसी प्रकार समाजवादी और बसपा की दूरियां बरकरार रहेंगी. जबकि समाजवादी और कांग्रेस व समाजवादी और भाजपा में समझौते की किरण दिखाई देती है, जबकि ये सभी दल न समर्थन देने और न लेने की बात करते आये हैं. अब एक प्रचंड सम्भावना दिखाई देती है भाजपा और बसपा में. अतीत के कटु अनुभव के कारण वैसे ये इतना आसान लगता तो नहीं परन्तु कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की निगाहें २०१४ के लोकसभा के चुनावों पर लगी हैं और बड़ा राज्य और लोकसभा की अधिक सीटें होने के कारण यही राज्य केंद्र में सरकार बनाने का मार्ग सुनिश्चित करता है. यह बात दोनों ही दल भली-भांति समझते है.

वैसे दो चरणों के चुनाव अभी होने बाकी हैं और मतगणना के पश्चात ही स्थिति स्पष्ट हो पायेगी. विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा को समझना होगा कि राहुल को गुस्सैल युवानेता प्रदर्शित कर उसके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ रही कांग्रेस मात्र प्रदेश में सरकार बनाने के लिए संघर्षरत नहीं है. उसकी तो निगाहें अर्जुन की तरह लक्ष्य २०१४ पर हैं. इतना तो कांग्रेस भी जानती है कि वर्तमान में वहाँ उनकी सरकार बनना बहुत कठिन है. इसीलिए कांग्रेस अभी तो उत्तर प्रदेश में २२ वर्षों से खिसके अपने जनाधार को पुनः एकत्रित कर २०१४ के समर के लिए पूर्वाभ्यास कर रही है.

यह दावा तो नहीं किया जा सकता परन्तु परिस्थितियां कुछ ऐसी ही बन रही हैं कि उत्तर प्रदेश में किसी भी दल को बहुमत न मिलने की स्थिति में भाजपा + सपा, भाजपा + बसपा या कांग्रेस + सपा में ही समझौते और अन्दर से या बाहर से समर्थन देकर सरकार बनाने की संभावनाएं दिखाई देती हैं. जहाँ तक चुनाव के दौरान दिए गए वक्तव्यों, जिसमें किसी को न तो समर्थन देने और न ही किसी से समर्थन लेने के दावों का सवाल है, तो चुनाव पूर्व किये वादों का चुनाव संपन्न हो जाने के बाद कोई अर्थ नहीं रह जाता है. वैसे भी इन राजनैतिक दलों और इनके नेताओं के तरकश में अपनी बात को तर्कसंगत बताने के लिए, लोकतंत्र की रक्षा के लिए, गरीब प्रदेश को पुनः एक चुनाव से बचाने के लिए या फिर सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए या गुंडों-भ्रष्टाचारियों को सरकार बनाने से रोकने के लिए जैसे बहुत से तर्क मौजूद हैं. इतना ही नहीं कह कर मुकर जाना या मीडिया पर दोष मढ़ देना इनकी पुरानी आदत है. जनता के कर्तव्‍यों की इतिश्री तो बस मतदान तक ही सीमित है. उसके पश्चात राजनैतिक दल क्या करेंगे किसके साथ मिलकर सरकार बनायेंगे, इन सब बातों से जनता को कोई सरोकार नहीं होना चाहिए उसे तो मात्र मूकदर्शक ही बने रहना है अगले पाँच वर्षों तक.

लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्‍ताहिक अमर ज्‍वाला के संपादक हैं.

अगले महीने लांच होगा श्रीएस7 न्‍यूज चैनल

रीजनल चैनलों की भीड़ में जल्‍द ही एक रीजनल चैनल लांच होने जा रहा है. फिलहाल चैनल के लांचिंग की डेट तय नहीं की गई है, परन्‍तु माना जा रहा है कि यह चैनल अगले महीने के पहले सप्‍ताह तक लांच हो सकता है. चैनल टेस्‍ट रन पर चल रहा है. इसका मुख्‍य फोकस यूपी होगा. प्रबंधन बाद में इसका विस्‍तान करने की योजना पर काम करेगा. इस चैनल के हेड की जिम्‍मेदारी सच्चिदानंद द्विवेदी को सौंपी गई है.

सच्चिदानंद द्विवेदी जनसंदेश न्‍यूज, इंडिया न्‍यूज जैसे चैनलों में काम कर चुके हैं. लाइव इंडिया से आए आरपीएन मिश्रा को यहां प्रोग्रामिंग हेड बनाया गया है. अतुल दयाल इनपुट हेड तथा अजय झा इनपुट का काम देख रहे हैं. इस ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डाइरेक्‍टर मनोज द्विवेदी हैं. यह ग्रुप फिलहाल श्री टाइम्‍स का लखनऊ से प्रकाशन कर रहा है. एस7 चैनल कुछ समय पहले रायबरेली से प्रसारित हो रहा था, जिसे हाई कोर्ट के आदेश के बाद बंद कर दिया गया था. बाद में इसे श्रीएस7 चैनल बना दिया गया.

एस7 के बारे में जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

हाई कोर्ट के आदेश के बाद अवैध तरीके से संचालित एस7 चैनल बंद

सरकारी कमरा नहीं मिलने पर आईपीएस अमिताभ आज से अवकाश पर

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने 24 फरवरी को अतुल, डीजीपी, उत्तर प्रदेश तथा ओपी दीक्षित, डीजी, रूल्स एंड मैनुअल को बताया था कि वे 02 फरवरी से ही कोई सरकारी कमरा नहीं होने के नाते बाहर लान में बैठ कर काम कर रहे हैं. अतः या तो उन्हें सरकारी कामकाज के लिए नियमानुसार एक स्वतंत्र कमरा दिया जाए अथवा 28 फरवरी से वे सरकारी कमरे की व्यवस्था होने तक अवकाश पर रहेंगे.

ठाकुर ने कहा कि उन्होंने 02 फरवरी को ही अतुल और ओपी दीक्षित को यह बताया था कि ओपी दीक्षित खुद इस कार्यालय में नहीं बैठते पर उन्होंने एक सरकारी कमरा अपने नाम पर बंद करा रखा है. कोई अन्य कमरा नहीं होने के कारण वे कार्यालय के बाहर लान में बैठ कर अपना सरकारी काम कर रहे हैं. जब इस पत्र के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई है तो ठाकुर ने आज 28 फरवरी से अवकाश ले लिया है. उन्होंने यह साफ़ कहा है कि उन्हें इस समय ना तो अवकाश की जरूरत है और ना ही वे यह अवकाश अपनी मर्जी से ले रहे हैं. वे यह अवकाश इसीलिए लेने को बाध्य हुए हैं क्योंकि उन्हें बार-बार एक सरकारी कमरा मांगने के बाद भी नहीं दिया गया. उन्होंने इस स्थिति के लिए उत्तरदायित्व निर्धारण करने के लिए भी कहा है.

सड़क हादसे में मरने वाली फरदीन खान की मौसी हैं या बहन?

पता नहीं आज कल के पत्रकारों को क्या हो गया है। खबरों पर पूरा काम नहीं करते हैं। कल हुए सड़क हादसे में मरने वाली फरदीन खान की मौसी हैं या बहन? इसको लेकर आम पाठक कन्‍फ्यूज है। कोई अख़बार फरदीन की मौसी बता रहा है तो कोई बहन। विश्व का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला हिंदी अख़बार दैनिक जागरण इस खबर में मृतका को फरदीन खान की बहन बता रहा है, जबकि हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर उसे फरदीन की मौसी बता रहे हैं। वहीं नवभारत टाइम्स भी उसे बहन बता रहा है। अब पाठक किस पर यकीन करे, उसे समझ में नहीं आ रहा है।

नीचे जागरण और दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित खबरों के कुछ अंश:


हादसे में फरदीन खान की बहन की मौत

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता : राजधानी में रफ्तार का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। रविवार देर रात दक्षिण दिल्ली के अगस्त क्रांति मार्ग पर तेज रफ्तार स्विफ्ट डिजायर कार ने होंडा सिटी को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी। कारों की भिड़ंत से होंडा सिटी (आगे की कार) में सवार सोनिया सेठिया व स्विफ्ट डिजायर (पीछे की कार) को चला रहे मोहन कुमार की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे में मोहन कुमार के बेटे अजय व होंडा सिटी में बैठे दो चालक घायल हो गए। तीनों को एम्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। अजय की हालत गंभीर बनी हुई है। सोनिया सेठिया फिल्म अभिनेता फरदीन खान की बहन थीं।

दो कारों की टक्कर में अभिनेता फरदीन खान की मौसी की मौत

नई दिल्ली. भास्‍कर : रविवार रात दक्षिण दिल्ली के अगस्त क्रांति मार्ग पर सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम के पास दो कारों की टक्कर में बॉलीवुड फिल्म स्टार फरदीन खान की मौसी व एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई।


एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अमर उजाला ने अपने पांच मैनेजरों को कलस्‍टर हेड बनाया

अमर उजाला प्रबंधन ने ग्रुप के बिजनेस मोर्चे के और मजबूत बनाने के लिए कलस्‍टर हेड का नया पद सृजित किया है. अभी पांच मैनेजरों की नियुक्ति कलस्‍टर हेड के रूप में की गई है. इन कलस्‍टर हेडों के जिम्‍मे एक से अधिक यूनिट की जिम्‍मेदारी होगी. सूत्रों का कहना है कि जिन पांच लोगों को कलस्‍टर हेड बनाया गया है इसके लिए आतंरिक मेल जारी कर दिया गया है. मेल में इन यूनिटों और मैनेजरों को इसके बारे में सूचना दी गई है.

जिन लोगों को कलस्‍टर हेड बनाया गया है, उसमें शलभ राय, मोहित शर्मा, विनीत तिवारी, अनिल शर्मा और डी सिंह शामिल हैं. शलभ राय को नोएडा, मेरठ और देहरादून, मोहित शर्मा को हरियाणा, चंडीगढ़, जम्‍मू एवं धर्मशाला, विनीत तिवारी को लखनऊ और गोरखपुर, अनिल शर्मा को आगरा, अलीगढ़ एवं झांसी तथा डी सिंह को बरेली, हल्‍दवानी और मुरादाबाद यूनिट का कलस्‍टर हेड बनाया गया है. अभी कुछ और कलस्‍टर हेड बनाए जाएंगे. अभी बनारस, इलाहाबाद जैसे यूनिटों के लिए किसी की तैनाती नहीं की गई है. बताया जा रहा है कि इसके माध्‍यम से संस्‍थान की वित्‍तीय स्थिति को और अधिक मजबूत बनाए जाने की योजना है.

SP Govt. will not dismantle parks created by BSP: Akhilesh Yadav

: We will not require the support of Cong to form the Govt : New Delhi: Samajwadi Party leader Akhilesh Yadav made it clear that Netaji ( read Mulayam Singh Yadav) to be the Chief Minister of Uttar Pradesh as his party is getting clear cut majority in the forthcoming UP assembly elections. In an interview with Ms. Anurradha Prasad, Editor-in-chief of News 24 channel for her weekly show 'Aamne Samne', SP leader expressed his confidence that they will form the government at their own. SP will not require the support of any part to form the government.

Replying to a question in respect of party Chief Minister candidate, the young MP said that Netaji would become the Chief Minister. It may be recalled that there were reports that if Samajwadi Party gets majority in the forthcoming state assembly elections then Akhilesh Yadav may become the Chief Minister.

'Are your going to take the support of Congress in order to form the government ?’ Confident personified Akhilesh Yadav said they would not require the support of any party as Samajwadi Party will get clear cut majority. ‘Will your government dismantle various parks created by the BSP government?’, Akhilesh Yadav said, “ They would not dismantle those parks. However, they would build hospitals and colleges inside the open space of those parks.”

Replying a question in respect of his comparison with Congress leader Rahul Gandhi, Akhilesh Yadav only said, “ We are not into comparison game. It is the media which is comparing us.” Despite being provoked to react on Amar Singh's reported comment against Samajwadi Party leaders, Akhilesh Yadav said, " Amar Singh was my uncle and will remain as my uncle. I will not say anything against him".  Press Statement

हिंदू बनकर अपनी जान बचाई थी बीबीसी पत्रकार रेहान फजल ने

दस साल पहले गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना को कवर करने गए बीबीसी संवाददाता रेहान फज़ल को किस तरह दंगाईयों की भीड़ का सामना करना पड़ा और किस तरह उन्होंने अपनी जान बचाई। सुनिए उनकी ज़ुबानी। 27 फ़रवरी 2002 की अलसाई दोपहर। मेरी छुट्टी है और मैं घर पर अधलेटा एक किताब पढ़ रहा हूँ। अचानक दफ़्तर से एक फ़ोन आता है। मेरी संपादक लाइन पर हैं। 'अहमदाबाद से 150 किलोमीटर दूर गोधरा में कुछ लोगों ने एक ट्रेन जला दी है और करीब 55 लोग जल कर मर गए हैं।' मुझे निर्देश मिलता है कि मुझे तुरंत वहाँ के लिए निकलना है। मैं अपना सामान रखता हूँ और टैक्सी से हवाई अड्डे के लिए निकल पड़ता हूँ।

हवाई अड्डे के पास भारी ट्रैफ़िक जाम है। अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई का काफ़िला निकल रहा है। मैं देर से हवाई अड्डे पहुँचता हूँ। जहाज़ अभी उड़ा नहीं हैं लेकिन मुझे उस पर बैठने नहीं दिया जाता। मेरे लाख कहने पर भी वह नहीं मानते। हाँ यह ज़रूर कहते हैं कि हम आपके लिए कल सुबह की फ़्लाइट बुक कर सकते हैं। अगले दिन मैं सुबह आठ बजे अहमदाबाद पहुँचता हूँ। अपना सामान होटल में रख कर मैं अपने कॉलेज के एक दोस्त से मिलने जाता हूँ जो गुजरात का एक बड़ा पुलिस अधिकारी है। वह मेरे लिए एक कार का इंतज़ाम करता है और हम गोधरा के लिए निकल पड़ते हैं।

मैं देखता हूँ कि प्रमुख चौराहों पर लोग धरने पर बैठे हुए हैं। मेरा मन करता है कि मैं इनसे बात करूँ। लेकिन फिर सोचता हूँ पहले शहर से तो बाहर निकलूँ। अभी मिनट भर भी नहीं बीता है कि मुझे दूर से करीब 200 लोगों की भीड़ दिखाई देती है। उनके हाथों में जलती हुई मशालें हैं। वे नारे लगाते हुए वाहनों को रोक रहे हैं। जैसे ही हमारी कार रुकती है हमें करीब 50 लोग घेर लेते हैं। मैं उनसे कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन मेरा ड्राइवर इशारे से मुझे चुप रहने के लिए कहता है। वह उनसे गुजराती में कहता है कि हम बीबीसी से हैं और गोधरा में हुए हमले की रिपोर्टिंग करने वहाँ जा रहे हैं। काफ़ी हील हुज्जत के बाद हमें आगे बढ़ने दिया जाता है। डकोर में भी यही हालात हैं। इस बार हमें पुलिस रोकती है। वह हमें आगे जाने की अनुमति देने से साफ़ इनकार कर देती है। मेरा ड्राइवर गाड़ी को बैक करता है और गोधरा जाने का एक दूसरा रास्ता पकड़ लेता है। जल्दी ही हम बालासिनोर पहुँच जाते है जहाँ एक और शोर मचाती भीड़ हमें रोकती है। जैसे ही हमारी कार रुकती है वे हमारी तरफ़ बढ़ते हैं। कई लोग चिल्ला कर कहते हैं,'अपना आइडेन्टिटी कार्ड दिखाओ।'

मैं अपनी आँख के कोने से देखता हूँ मेरे पीछे वाली कार से एक व्यक्ति को कार से उतार कर उस पर छुरों से लगातार वार किया जा रहा है। वह ख़ून से सना हुआ ज़मीन पर गिरा हुआ है और अपने हाथों से अपने पेट को बचाने की कोशिश कर रहा है। उत्तेजित लोग फिर चिल्लाते हैं, 'आइडेन्टिटी कार्ड कहाँ है?' मैं झिझकते हुए अपना कार्ड निकालता हूँ और लगभग उनकी आँख से चिपका देता हूँ। मैंने अगूँठे से अंग्रेज़ी में लिखा अपना मुस्लिम नाम छिपा रखा है। हमारी आँखें मिलती हैं। वह दोबारा मेरे परिचय पत्र की तरफ़ देखता है। शायद वह अंग्रेज़ी नही जानता। तभी उन लोगों के बीच बहस छिड़ जाती है। एक आदमी कार का दरवाज़ा खोल कर उसमें बैठ जाता है और मुझे आदेश देता है कि मैं उसका इंटरव्यू रिकार्ड करूँ। मैं उसके आदेश का पालन करता हूँ। वह टेप पर बाक़ायदा एक भाषण देता है कि मुसलमानों को इस दुनिया में रहने का क्यों हक नहीं है। अंतत: वह कार से उतरता है और उसके आगे जलता हुआ टायर हटाता है।

कांपते हाथ : मैं पसीने से भीगा हुआ हूँ। मेरे हाथ काँप रहे है। अब मेरे सामने बड़ी दुविधा है। क्या मैं गोधरा के लिए आगे बढ़ूँ जहाँ का माहौल इससे भी ज़्यादा ख़राब हो सकता है या फिर वापस अहमदाबाद लौट जाऊँ जहाँ कम से कम होटल में तो मैं सुरक्षित रह सकता हूँ। लेकिन मेरे अंदर का पत्रकार कहता है कि आगे बढ़ो। जो होगा देखा जाएगा। सड़कों पर बहुत कम वाहन दौड़ रहे हैं। कुछ घरों में आग लगी हुई है और वहाँ से गहरा धुआं निकल रहा है। चारों तरफ़ एक अजीब सा सन्नाटा है। मैं सीधा उस स्टेशन पर पहुँचता हूँ, जहाँ ट्रेन पर आग लगाई गई थी। पुलिस के अलावा वहाँ पर एक भी इंसान नहीं हैं। चारों तरफ़ पत्थर बिखरे पड़े हैं। एक पुलिस वाला मुझसे उस जगह को तुरंत छोड़ देने के लिए कहता है।

मैं पंचमहल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राजू भार्गव से मिलने उनके दफ़्तर पहुँचता हूँ। वह मुझे बताते हैं कि किस तरह 7 बजकर 43 मिनट पर जब साबरमती एक्सप्रेस चार घंटे देरी से गोधरा पहुँची, तो उसके डिब्बों में आग लगाई गई। वह यह भी कहते हैं कि हमलावरों को गिरफ़्तार कर लिया गया है और पुलिसिया ज़ुबान में स्थिति अब नियंत्रण में है। मेरा इरादा गोधरा में रात बिताने का है लेकिन मेरा ड्राइवर अड़ जाता है। उसका कहना है कि यहाँ हालात ओर बिगड़ने वाले हैं। इसलिए वापस अहमदाबाद चलिए।

टायर में पंक्चर : हम अपनी वापसी यात्रा पर निकल पड़ते हैं। अभी दस किलोमीटर ही आगे बढ़े हैं कि हम देखते हैं कि एक भीड़ कुछ घरों को आग लगा रही है। मैं अपने ड्राइवर से कहता हूँ, स्पीड बढ़ाओ। तेज़… और तेज़! वह कोशिश भी करता है लेकिन तभी हमारी कार के पिछले पहिए में पंक्चर हो जाता है। ड्राइवर आनन फानन में टायर बदलता है और हम आगे बढ़ निकलते हैं। हम मुश्किल से दस किलोमीटर ही और आगे बढ़े होंगे कि हमारी कार फिर लहराने लगती है। इस बार आगे के पहिए में पंक्चर है। हम बीच सड़क पर खड़े हुए हैं।।।। बिल्कुल अकेले। हमारे पास अब कोई अतिरिक्त टायर भी नहीं है। ड्राइवर नज़दीक के एक घर का दरवाज़ा खटखटाता है। दरवाज़ा खुलने पर वह उनसे विनती करता है कि वह अपना स्कूटर कुछ देर के लिए उसे दे दें ताकि वह आगे जा कर पंक्चर टायर को बनवा सके।

क्रेडिट कार्ड ने जान बचाई : जैसे ही वह स्कूटर पर टायर लेकर निकलता है, मैं देखता हूँ कि एक भीड़ हमारी कार की तरफ़ बढ़ रही है। मैं तुरंत अपना परिचय पत्र, क्रेडिट कार्ड और विज़िटिंग कार्ड कार की कार्पेट के नीचे छिपा देता हूँ। यह महज़ संयोग है कि मेरी पत्नी का क्रेडिट कार्ड मेरे बटुए में है। मैं उसे अपने हाथ में ले लेता हूँ।

माथे पर पीली पट्टी बाँधे हुए एक आदमी मुझसे पूछता है क्या मैं मुसलमान हूँ। मैं न में सिर हिला देता हूँ। मेरे पूरे जिस्म से पसीना बह निकला है। दिल बुरी तरह से धड़क रहा है। वह मेरा परिचय पत्र माँगता है। मैं काँपते हाथों से अपनी पत्नी का क्रेडिट कार्ड आगे कर देता हूँ। उस पर नाम लिखा है रितु राजपूत। वह इसे रितिक पढ़ता है। अपने साथियों से चिल्ला कर कहता है, 'इसका नाम रितिक है। हिंदू है… हिंदू है… इसे जाने दो।'! इस बीच मेरा ड्राइवर लौट आया है। वह इंजन स्टार्ट करता है और हम अहमदाबाद के लिए निकल पड़ते हैं बिना यह जाने कि वह भी सुबह से ही इस शताब्दी के संभवत: सबसे भीषण दंगों का शिकार हो चुका है। साभार : भास्‍कर

आज से इंदौर में नहीं दिखेंगे रीजनल एवं नेशनल न्‍यूज चैनल

आज यानी मंगलवार से इंदौर के लोग अपने केबल नेटवर्क पर न्‍यूज चैनल नहीं देख पाएंगे. क्‍योंकि इंदौर के केबल ऑपरेटर सांकेतिक हड़ताल करने जा रहे हैं. ये सांकेतिक हड़ताल सरकार के लिए चेतावनी है. इसके बाद भी अगर सरकार ने केबल ऑपरेटरों की मांग पर ध्‍यान नहीं दिया तो पांच मार्च से केबल टीवी का प्रसारण पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा और छह मार्च से केबल ऑपरेटर आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे. यह सारा बवाल राज्‍य सरकार द्वारा टैक्‍स बढ़ाए जाने के चलते हो रहा है.

सरकार द्वारा टैक्‍स बढ़ाने के बाद मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (एमएसओ) स्थानीय ऑपरेटर्स पर टैक्स वसूली का दबाव बना रहे हैं. इसके चलते शहर के 450 से ज्यादा केबल ऑपरेटर्स ने रीजनल और नेशनल न्यूज चैनल्स का प्रसारण बंद करने की तैयारी कर ली है. इस संदर्भ में बीते गुरुवार को 200 से ज्यादा लोकल ऑपरेटर्स संभागायुक्त से मिल कर अपनी परेशानी बता चुके हैं. नियामक आयोग ने 3 से 5 फीसदी तक टैक्‍स वृद्धि का प्रावधान दिया है लेकिन शासन 20 फीसदी टैक्‍स की वसूली करने पर अड़ा हुआ है.

केबल ऑपरेटर इसे सरकार की साजिश मान रहे हैं. इन लोगों का आरोप है कि सरकार केबल व्‍यवसाय को पूरी तरह चौपट करने के लिए ही टैक्‍स में बढ़ोत्‍तरी की है. कुछ केबल ऑपरेटर से इसे बड़ी साजिश भी बता रहे हैं. उनका कहना है कि तमाम डीटीएच कंपनियों से मिलकर सरकार इस तरह माहौल बना रही है कि केबल ऑपरेटर पूरी तरह तबाह हो जाएं और डीटीएच कंपनियों को इसका लाभ मिल सके. लोग केबल की बजाय डीटीएच खरीदने लगें. अभी इंदौर एवं मध्‍य के अन्‍य जिलों में शासन द्वारा प्रति कनेक्‍शन 20 रुपये की वसूली की जा रही है. टैक्‍स को 20 प्रतिशत कर दिए जाने के बाद यह विभिन्‍न जगहों पर बढ़कर 40 से 60 रुपये तक हो जाएगा.

एमएसओ का कहना है कि इसमें भी पांच लाख से कम टर्न ओवर वाले केबल ऑपरेटरों को टैक्‍स से छूट है, इस स्थिति में तकनीकी दिक्‍कतें और अधिक बढ़ जाएंगी. पांच लाख से कम टर्न ओवर वाला ऑपरेटर तो अपने ग्राहकों का किराया बिना बढ़ाए केबल दिखा सकेगा, जबकि पांच लाख से ज्‍यादा टर्न ओवर वालों को मजबूरन उपभोक्‍ताओं पर पैसा बढ़ाने का दबाव डालना पड़ेगा. केबल ऑपरेटर यूनियन के कोआर्डिनेटर आनंद प्रकाश गुप्‍ता कहते हैं कि अब इस स्थिति में मुश्किल ये हो जाएगी कि दो मोहल्‍लों में दो तरह से पैसा वसूली करना पड़ेगा. पांच लाख से कम टर्न ओवर वाले ऑपरेटर का उपभोक्‍ता तो उतने पैसे में टीवी देखेगा पर पांच लाख से ज्‍यादा टर्नओवर वाले उपभोक्‍ता को चालीस से साठ रुपया अधिक देना होगा. तो समझा जा सकता है कि केलब ऑपरेटरों को कितनी मुश्किल आने वाली है. 

आनंद गुप्‍ता कहते हैं कि फिर केबल उपभोक्‍ता हर महीने ढाई सौ रुपये क्‍यों खर्च करेगा. वो 160 रुपये महीने पर डीटीएच क्‍यों नहीं देखेगा. श्री गुप्‍ता कहत हैं कि वैसे भी केबल ऑपरेटर्स को तार एवं कर्मचारी का भी अतिरिक्‍त खर्च हर माह उठाना पड़ता है. इस स्थिति में टैक्‍स में बढ़ोत्‍तरी तो इस व्‍यवसाय की कमर तोड़कर रख देगा. वे सीधा आरोप लगाते हैं कि ये सरकार की साजिश है ताकि लोग केबल से चैनल देखना छोड़कर डीटीएच देखना शुरू कर दें. ये भी कहते हैं जाहिर है कि उपभोक्‍ता भी कम पैसे वाला सुविधा ही लेना चाहेगा. इस स्थिति‍ में केबल ऑपरेटर व्‍यवसाय पूरी तरह ठप हो जाएगा.

बताया जा रहा है कि सरकार ने चैनल को विलासिता मनोरंजन तथा आमोद प्रमोद टैक्‍स के दायरे में शामिल किया है. आनंद कहते हैं कि यह आम लोगों का साधन है, आप गरीबों की झोपड़ी में भी टीवी चलता देख सकते हैं. उनको चैनल बदलते देख सकते हैं. फिर यह विलासिता का साधन कहां हुआ. आनंद बताते हैं कि 2014 तक सब कुछ डिजिटिलाइजेशन होना है. इस स्थिति में हर घर में एक डीवी सेट बॉक्‍स देना होगा. इसके लिए हमें उपभोक्‍ता से केवल 999 रुपये लेना है. ये भी रिफंडेबल है जबकि इस बॉक्‍स की कीमत केबल ऑपरेटरों को डेढ़ से दो हजार रुपये के बीच बैठेगी. हमें आगे इतनी मुश्किल आने वाली है, उस पर राज्‍य सरकार का टैक्‍स बढ़ाने का फैसला इस धंधे को पूरी तरह चौपट कर देगा.

इंदौर के केबल ऑपरेटर एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि 28 फरवरी से वे रिजनल तथा नेशनल न्‍यूज चैनल बंद कर देंगे. यह हड़ताल फिलहाल सांकेतिक होगा. अगर इसे बाद भी सरकार ने इस तरफ ध्‍यान नहीं दिया तो वे पांच मार्च तो केबल टीवी का पूरा प्रसारण ठप कर देंगे और अगले दिया यानी छह मार्च से वे आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे. बताया जा रहा है कि इसके लिए पूरा राज्‍य के केबल ऑपरेटरों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

जीएनएन में हड़ताल स्‍थगित, कर्मचारियों ने तीन दिन का समय दिया

चिटफंडिया चैनल जीएनएन न्‍यूज से खबर है कि पीसीआर तथा कैमरा सेक्‍शन का हड़ताल खतम हो गया है. प्रबंधन के सेलरी तीन दिन के अंदर देने के आश्‍वासन के बाद इन कर्मचारियों ने सोमवार की रात लगभग नौ बजे से काम करना शुरू कर दिया है. बताया जा रहा है कि चैनल प्रबंधन अपने कर्मचारियों को सेलरी दो तरीकों से देता है. कुछ लोगों की सेलरी उनके एकाउंट में आती है तो कुछ लोगों को कैश दिया जाता है.

खबर है कि हड़ताली कर्मचारियों के दबाव में प्रबंधन ने जब कैश में सेलरी पाने वाले लोगों को पैसा पेमेंट कर दिया तब जाकर पीसीआर और कैमरा सेक्‍शन के लोग काम पर लौटे. बताया जा रहा है कि अंदरूनी तौर पर हड़ताली टेक्निकल कर्मचारियों को एडिटोरियल टीम का भी सहयोग मिल रहा है. प्रबंधन ने आश्‍वासन दिया है कि तीन दिन के भीतर सभी की सेलरी उनके एकाउंट में पहुंच जाएगी. इसके बाद ही सभी कर्मचारी काम पर लौटे.

बताया जा रहा है कि प्रबंधन पर पूरा दबाव बना हुआ है. कर्मचारी भी चेतावनी दे चुके हैं कि अगर तीन दिन के भीतर सेलरी नहीं मिली तो फिर उन्‍हें हड़ताल पर जाने से कोई नहीं रोक सकता है. उल्‍लेखनीय है कि सोमवार को टेक्निकल कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने के चलते शाम पांच बजे का बु‍लेटिन प्रसारित नहीं हो सका था तथा साढ़े छह बजे होने वाला पैनल डिस्‍कशन भी नहीं हो सका था. प्रबंधन को एमसीआर से बुलेटिन चलाना पड़ा था. 

जम्‍मू कश्‍मीर की मीडिया पर है स्‍पीकर का कंट्रोल!

जम्मू : विधानसभा स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन ने कहा कि ‘मीडिया मेरे कंट्रोल में है। समाचार पत्रों में छपी स्टोरी के सूत्रों की जानकारी सदन को देनी होगी। स्पीकर द्वारा यह बात कहने पर प्रेस गैलरी में मौजूद मीडिया कर्मियों ने सोमवार को सदन की कार्यवाही की रिपोर्टिग का बहिष्कार किया। सेंट्रल हाल के बाहर धरने पर बैठे मीडिया कर्मियों ने मांग की कि जब तक स्पीकर अपने ये शब्द वापस नहीं लेते तब तक बहिष्कार जारी रहेगा। विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती भी मीडिया के समर्थन में आ गई। महबूबा ने कहा कि जब तक मीडिया का बहिष्कार समाप्त नहीं होगा तब तक पीडीपी भी सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करेगी।

इसके साथ ही इस विषय पर स्थगन प्रस्ताव भी लाएगी। स्पीकर लोन के रूख के चलते मीडिया कर्मी इससे पहले भी सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर चुके हैं। तब स्पीकर को मीडिया से माफी मांगनी पड़ी थी। स्पीकर ने सोमवार को कार्यवाही के दौरान इन शब्दों को इस्तेमाल तब किया जब स्वास्थ्य मंत्री शाम लाल शर्मा ने उनके तथा विभाग के खिलाफ एक समाचार पत्र में छपी स्टोरी का मामला सदन में उठाया। शाम ने समाचार पत्र के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। शाम ने इस स्टोरी पर समाचार पत्र से जबाव लेने की अपील स्पीकर से की।

शर्मा का साथ देने के लिए पीएचई मंत्री ताज मोहयुद्दीन भी खड़े हो गए। इस पर स्पीकर ने कहा कि इस मामले पर बाद में अपना निर्णय देंगे और मीडिया को भी निर्देश जारी करेंगे। इस पर पीडीपी के निजामुद्दीन बट ने कहा कि इस मामले को विधानसभा में नहीं उठाया जा सकता। इसकी शिकायत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को की जानी चाहिए। इस पर स्पीकर ने कहा,‘ मीडिया मेरे अधीन है और उन्हें अपने सूत्रों की जानकारी देनी ही होगी।’

बाद में स्पीकर ने कहा कि मीडिया सदन के अधीन है। इस पर प्रेस गैलरी में मौजूद रिपोर्टर विरोध स्वरूप बाहर आ गए। कार्यवाही से स्पीकर के शब्दों को हटाने की मांग करते हुए विधानसभा परिसर के बाहर धरने पर बैठ गए।मीडिया ने मंगलवार को भी बहिष्कार जारी रखने की बात कही है। पीडीपी अध्यक्ष ने भी मीडिया के बहिष्कार तक पीडीपी द्वारा सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करने की घोषणा पत्रकार वार्ता में कही। इसके बाद हुई पार्टी की बैठक में मंगलवार को इसी विषय पर स्थगन प्रस्ताव लाने का फैसला किया।

स्पीकर मोहम्मद अकबर लोन का मीडिया के साथ विवाद पहले भी हो चुका है। गठबंधन सरकार के सत्ता में आने के बाद पहले बजट सत्र के दौरान वर्ष 2009 में भी उनके व्यवहार के चलते मीडिया ने कार्यवाही की रिपोर्टिग का बहिष्कार किया।उस समय विपक्ष के नेता महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा से वाक आउट किया था। इस पर मीडिया कर्मी महबूबा की प्रतिक्रिया लेने के लिए मीडिया गैलरी से बाहर चले गए। बाहर गए रिपोर्टरों को प्रेस गैलरी में न आने देने के निर्देश जारी कर दिए। बाद में मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार ने मध्यस्थता की थी।उस समय स्पीकर ने विधानसभा परिसर में प्रेस वार्ता कर अपनी गलती मानी थी। और मीडिया को रिपोर्टिग करने को कहा था। साभार : भास्‍कर

अपनी आखें दान कर गए बनारस के वरिष्‍ठ पत्रकार लक्ष्‍मीनाथ संड

वाराणसी। बनारस के वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीनाथ संड का सोमवार की रात दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. वह 69 साल के थे. 24 फरवरी को संड को सीने में तकलीफ के बाद अलईपुर स्थित एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था. तबीयत में कुछ सुधार होने के बाद उन्‍हें अगले दिन घर वापस लाया गया था. रविवार की रात फिर से उन्‍हें दिल का दौरा पड़ा. अभी लोग उन्‍हें इलाज के लिए ले जाने की तैयारी ही कर रहे थे कि उनका निधन हो गया.

संड अपने पीछे पत्‍नी और एक बेटी और दो बेटों का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं. उनका अंतिम संस्‍कार सोमवार को मणिकर्णिका घाट पर किया गया. उनको मुखाग्नि बड़े बेटे रवींद्र ने दी. संड की इच्‍छा के अनुसार उनके आंखों को दान कर दिया गया. 1962 में दैनिक आज से पत्रकारिता शुरू करने वाले संड लम्‍बे समय तक इस अखबार से जुड़े रहे. जब बनारस में दैनिक जागरण ने कदम रखा तो संड इस अखबार से जुड़ गए और 2001 में रिटायरमेंट तक इसी अखबार से जुड़े रहे.

काटजू के बयान पर बिहार विधानसभा में हंगामा, तीन सदस्‍यीय कमेटी गठित

बिहार में प्रेस की आजादी पर प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष मार्केडेय काटजू की तीखी टिप्पणी के मामले पर सोमवार को विधानसभा में भी जमकर हंगामा हुआ। प्रश्नकाल आरंभ होते ही विपक्ष ने इस मुद्दे पर सदन में नारेबाजी शुरू कर दी। नारेबाजी के बाद विपक्ष ने सदन का बहिष्कार भी कर दिया। इस मसले पर विपक्ष ने कार्यस्थगन का प्रस्ताव भी दिया जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने अवैधानिक बताते हुए नामंजूर कर दिया। शून्यकाल में भी इस मसले पर जमकर शोर हुआ।

विपक्ष काटजू के बयान से पूरी तरह सहमत दिखा। नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा कि काटजू के वक्तव्य पर जिस तरह से उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने टिप्पणी की है वह अनुचित और अपमानजनक है। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस पर कहा कि जिस तरह से प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष श्री काटजू वक्तव्य दे रहे हैं वैसी स्थिति में केंद्र सरकार को इस पर विचार करना चाहिए कि ऐसे लोगों को इस तरह के पद पर रखा जाना चाहिए या नहीं। विपक्ष ने इस मसले पर ध्यानाकर्षण के समय भी सदन का बहिष्कार किया। इस दौरान भी काफी हंगामा हुआ।

शून्यकाल में भी इस मामले को उठाया गया। इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी ने जब उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के नाम के साथ अपनी बात कही तो उप मुख्यमंत्री श्री मोदी ने कहा कि-यह तो मीडिया को तय करना है कि वह स्वतंत्र है कि नहीं? चार आदमी ने श्री काटजू को ब्रीफ कर दिया तो क्या उसके आधार पर वह टिप्पणी कर देंगे। दरअसल श्री काटजू अलग-अलग राज्यों में पहुंचकर इस तरह की टिप्पणी करते रहे हैं। महाराष्ट्र में गये तो वहां कह दिया कि महाराष्ट्र की सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए। गया में उन्होंने यह कहा कि बिहार सरकार को सबक सीखा देंगे। ऐसी बात तो विपक्ष भी नहीं करता है। कौन लोग हैं जो उन्हें बरगला रहे हैं। इस तरह के बयान देने से पहले पूरी तरह जांच करनी चाहिए।

संसदीय कार्य मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि विपक्ष को इस मुद्दे को सदन में लाने से पहले से ठीक से पढ़ना चाहिए था। सरकार ने ऐसा कोई कानून तो बनाया नहीं है जो मीडिया पर बंदिश की बात करता हो। आखिर सरकार ने मीडिया पर कौन सा बंदिश लगा रखा है। श्री काटजू ने खुद कहा है कि वह बिहार में मीडिया की स्वतंत्रता की जांच कराएंगे। पहले जांच रिपोर्ट तो आ जाये। श्री यादव ने कहा नेता प्रतिपक्ष संवैधानिक पद पर बैठे लोगों के बारे में मर्यादा के साथ टिप्पणी करने की बात कही है जबकि राज्यपाल के अभिभाषण के बाद विपक्ष के कुछ सदस्यों ने राज्यपाल को सत्ताधारी दल का एजेंट कहा। इसको लेकर भी सरकार और विपक्ष में खूब हंगामा हुआ। एक दूसरे पर आरोप लगाए गए।

उल्‍लेखनीय है कि पटना में शुक्रवार को एक समरोह में काटजू ने कहा था कि बिहार में प्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है। अगर यहां कोई सरकार या सरकारी अधिकारी के खिलाफ लिख दे तो उसे परेशान किया जाता है। उन्होंने कहा था कि लालू के शासन काल से बिहार में विधि-व्यवस्था की स्थिति में सुधार जरूर हुआ है परंतु प्रेस की आजादी कम हो गई है। काटजू ने कहा था कि लालू के शासनकाल में यहां प्रेस आजादी के साथ काम करता था, परन्‍तु अब स्थितियां बदल गई हैं। अब सरकार के खिलाफ खबर लिखने पर पत्रकारों की नौकरी पर बन आती है। इधर, बिहार में पत्रकारिता की स्‍वतंत्रता की जांच के लिए तीन सदस्‍यीय कमेटी का गठन कर दिया गया है।

विकीलीक्‍स ने खोला स्‍ट्राटफॉर का पोल, भोपाल कांड की दोषी डाउ से बताए संबंध

लंदन : सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करने वाली स्वीडिश वेबसाइट विकिलीक्स ने अमेरिका स्थित निजी खुफिया एजेंसी स्ट्राटफॉर के पचास लाख से अधिक गोपनीय ई-मेल को सार्वजनिक करना प्रारंभ कर दिया है। मेल में भारत में भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कंपनी डाउ केमिकल्स के एजेंसी से संबंध बताए गए हैं। विकिलीक्स द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, ये ई-मेल जुलाई, 2004 से दिसंबर, 2011 के बीच के हैं। इससे इस खुफिया एजेंसी के मुखबिरों, वेतन भुगतान के तरीकों, काले धन को सफेद बनाने के तरीकों समेत कई जानकारियों का पता चल सकेगा।

यही नहीं ई-मेल से यह भी पता चलेगा कि एजेंसी अपने कॉरपोरेट और सरकारी ग्राहकों के लिए लोगों को किस प्रकार निशाना बनाती है। विकिलीक्स का दावा है कि उसके पास इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि इस खुफिया एजेंसी के कई बड़ी कंपनियों के साथ गुप्त संबंध हैं। इनमें भोपाल त्रासदी के लिए जिम्मेदार डाउ केमिकल्स और लॉकहीड मार्टिन जैसी नामी गिरामी कंपनियां शामिल हैं। इसके अलावा अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग, अमेरिकी नौसेना और रक्षा खुफिया एजेंसी के साथ भी संबंध हैं। विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे इस समय ब्रिटेन में हैं और स्वीडन प्रत्यर्पित किए जाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वह स्वीडन में बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामले में पूछताछ के लिए वांछित हैं।

विकिलीक्स कई बार आशंका जाहिर कर चुका है कि यदि असांजे को स्वीडन प्रत्यर्पित किया गया तो उन्हें शीघ्र ही अमेरिका को सौंप दिया जाएगा। विकिलीक्स की ओर से इराक और अफगानिस्तान से संबंधित हजारों गोपनीय कूटनीतिक संदेश सार्वजनिक करने से अमेरिका की काफी किरकिरी हुई थी। स्ट्राटफॉर का संक्षिप्त परिचय स्ट्राटफॉर की स्थापना वर्ष 1996 में जॉर्ज फ्रीडमैन द्वारा की गई थी। यह एजेंसी खुद को शुल्क आधारित भू राजनीतिक जानकारी देने वाली संस्था बताती है। टेक्सास स्थित इस एजेंसी के अनुसार सूचनाएं एकत्रित करने के लिए वह परंपरागत तरीकों के बजाए अपने वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से खुफिया तरीकों को अपनाती है। एजेंसी

ना‍बालिक छात्रा से रेप करने वाले में मॉस काम का छात्र भी शामिल

: पांचों को 14 दिन के हिरासत में भेजा गया : नई दिल्ली : नोएडा में एक स्कूली छात्रा के साथ गैंग रेप के मामले में सभी पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. इन आरोपियों में से एक मास कॉम का छात्र भी है. पुलिस ने चार आरोपियों को रविवार को ही गिरफ्तार कर लिया था. सोमवार को पांचवां आरोपी भी पुलिस के हत्‍थे चढ़ गया. पांचों को कोर्ट में पेश कियो गया, जहां न्‍यायालय ने सभी को 14 दिन के रिमांड पर भेज दिया. दूसरी ओर सोमवार को महिला आयोग ने पुलिस के जरिए पीड़ित लड़की का नाम उजागर करने पर नोएडा के पुलिस, इलाके के आईजी और उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को नोटिस भेजा है.

गौरतल‍ब है कि सेक्टर 40 में रहने वाली दसवीं कक्षा की छात्रा जब सेक्टर 12 में अपने पिता की दुकान पर गई थी. छात्रा के पिता का इलेक्ट्रिकल सामान का कारोबार है. शुक्रवार शाम वो अपने पिता के पास दुकान पर सामान खरीदने के लिए पैसे लेने गई थी. उस समय पैसा मौजूद न होने पर पिता ने उसे कुछ समय बाद पैसा लेने की बात कही, जिसके बाद नावालिग छात्रा अपनी एक सहेली के साथ सेक्टर-12 स्थित प्रियदर्शनी पार्क में घूमने चली गई. पार्क में उसकी राहुल हिमांशु एवं सुनील से मुलाकात हुई. पुलिस के मुताबिक इन युवकों से छात्रा का पहले से ही जान पहचान थी. पीड़िता के मुताबिक आरोपी युवक उसे पार्टी के बहाने लेकर गिझोड़ गांव स्थित एक घर पहुंचे. वहां घर में पहले से नीरज एवं सौरभ नाम के युवक मौजूद थे. वहां आरोपियों ने पार्टी के बहाने अपने शराब पी एवं छात्रा को भी जबरन शराब पिला दी.

पुलिस का कहना है कि शराब पीने के बाद आरोपी उसे ( यूपी 16 जेड 0028 ) आईटेन गाड़ी से लेकर सेक्टर-53 स्थित कृष्णा होटल के पास पहुंचे. आरोपियों ने रात में होटल के पीछे गाड़ी लगाकर उसके साथ बारी-बारी से दुष्कर्म किया. इस दौराप छात्रा के शरीर पर काफी खरोच के निशान आ गए एवं उसकी कमर पर चोटें आईं. रात करीब 9 बजे आरोपी उसे कार से लेकर प्रियदर्शनी पार्क पहुंचे एवं गाड़ी से बाहर निकाल दिया. आरोपियों ने जाते-जाते छात्रा को धमकी भी दे गए कि अगर इस संबंध में किसी भी प्रकार की जानकारी अपने परिजनों को दी तो उन्‍हें जान से मार दिया जाएगा तथा उनकी अश्‍लील वीडियो क्लिप इंटरनेट पर लोड कर दिया जाएगा.

आरोपियों से मुक्त होने के बाद देर रात छात्रा घर पहुंची एवं आप बीती सुनाई. वारदात की जानकारी होने पर परिजनों इस संबंध में छानबीन की एवं अगले दिन वारदात की जानकारी सेक्‍टर 24 कोतवाली पुलिस को दी. पुलिस ने इस मामले में चार युवकों राहुल, सुनील, हिमांशु और सौरभ को रविवार को ही गिरफ्तार कर‍ लिया था. नीरज फरार चल रहा था, जिसे सोमवार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पांचों की पेशी न्‍यायालय में की गई, जहां पांचों को चौदह दिन की न्‍यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. एक आरोपी हिमांशु मॉस कॉम का छात्र है.

इंडिया न्‍यूज को मिला फास्‍टेस्‍ट ग्रोइंग मीडिया वर्टिकल अवार्ड

एमिटी इंटरनेशनल स्‍कूल और एमिटी ग्‍लोबल बिजनेस स्‍कूल आयोजित एक कार्यक्रम में इंडिया न्‍यूज ग्रुप को फास्‍टेस्‍ट ग्रोइंग मीडिया वर्टिकल अवार्ड से सम्‍मानित किया गया. इंडिया न्‍यूज की तरफ से यह अवार्ड ग्रुप सीईओ राकेश शर्मा ने ग्रहण किया. एमिटी इंटरनेशनल की ओर से हर साल आयोजित होने वाले तीन दिवसीय कार्यक्रम में अपने अपने क्षेत्रों में बेहतर करने वाले ग्रुपों को सम्‍मानित किया जाता है.

हिंदी मीडिया के क्षेत्र में इंडिया न्‍यूज ग्रुप को चुना गया था. इसके अलावा अंग्रेजी मीडिया में सीएनएन आईबीएन, गेल, इंस्‍टीट्यूट ऑफ रुरल मैनेजमेंट समेत कई समूहों को सम्‍मानित किया गया. पुरस्‍कार ग्रहण करने के दौरान इंडिया न्‍यूज के सीईओ राकेश शर्मा ने कहा कि उनका चैनल तथा टीम मीडिया के क्षेत्र में और बेहतर करने का प्रयास करेंगे. इस मौके पर एमिटी के वाइस चांसलर गुरिंदर सिंह समेत सभी समूहों के वरिष्‍ठ अधिकारी और छात्र मौजूद रहे. प्रेस रिलीज

मैगजीन एनसीआर लुक लांच, रामवीर सिंह बने संपादक

हरियाणा के पलवल जिले से एक नई मैगजीन लांच की गई है. एनसीआर लुक नामक इस मैगजीन के संपादक रामवीर सिंह हैं. इनपुट हेड उदय शंकर खावरे को बनाया गया है. फीचर हेड शिखा शर्मा हैं जबकि बिजनेस की जिम्‍मेदारी दीपक सिंह देखेंगे. मैगजीन को जल्‍द ही बड़े पैमाने पर विस्‍तारित किया जाएगा.

मैगजीन को यूपी, बिहार, झारखंड, एमपी, राजस्‍थान, छत्‍तीसगढ़, उत्‍तराखंड समेत कई हिंदी भाषा राज्‍यों में लांच किया जाएगा. मैगजीन पूर्ण रूप से पॉलिटिकल होगा. इसमें हरियाणा, यूपी, झारखंड, बिहार, राजस्‍थान के राजनीतिक उठापटक की खबरें प्रकाशित की जाएंगी. इसके अलावा भी इसमें काफी कुछ होगा.

गोण्‍डा में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के अध्‍यक्ष बने कैलाश वर्मा, जानकी शरण महामंत्री

गोण्डा। उप्र0 श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिला तथा तहसील कार्यकारिणी का द्विवार्षिक चुनाव सिंचाई विभाग सभागार में सम्पन्न हुआ, जिसमें भारी मतों के अन्तर से कैलाश वर्मा जिलाध्यक्ष तथा जानकी शरण द्विवेदी महामंत्री निर्वाचित घोषित किए गए। चुनाव अधिकारी कमर अब्बास ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि यूनियन के जिला कार्यकारिणी तथा सभी चार तहसील इकाइयों के लिए चुनाव सम्पन्न हुआ। जिला कार्यकारिणी के लिए 159 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। गुप्त मतदान प्रक्रिया के तहत कराए गए मतदान में जिलाध्यक्ष पद के प्रत्याशी कैलाश वर्मा (प्रसार भारती/पायनियर) को 124 मत मिले। उनके निकटतम प्रतिद्वन्दी शिव प्रताप शुक्ला (राष्ट्रीय सहारा) को 28 तथा अम्बिकेश्वर पाण्डेय (जी न्यूज) को 06 मत मिले। एक मत अवैध पाया गया।

इसी प्रकार महामंत्री पद के लिए जानकी शरण द्विवेदी (पीटीआई/जनसत्ता) ने 130 मत पाकर अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी एआर उस्मानी को 111 मतों से पराजित किया। उस्मानी को केवल 19 मतों पर संतोष करना पड़ा। 10 मत अवैध पाए गए। जिला उपाध्यक्ष के दो पदों पर तीन प्रत्याशी मैदान में थे। इसमें सर्वाधिक 116 मत पाकर संजय तिवारी (हिन्दुस्तान) तथा 100 मत पाकर सत्य गोपाल तिवारी (राष्ट्रीय सहारा) निर्वाचित घोषित किए गए। अशोक सिंह (दैनिक जागरण) 65 मत पाकर पराजित हो गए। एक मत अवैध रहा। इसके साथ ही मनोज श्रीवास्तव (अमर उजाला) व धीरेन्द्र सिंह (पायनियर हिन्दी) संयुक्त मंत्री तथा उमेश प्रताप मिश्र (पायनियर) निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए।

इसी प्रकार तहसील तरबगंज में अध्यक्ष मत के लिए हुए मतदान में कुल 64 सदस्यों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जिसमें 49 मत पाकर राकेश सिंह (हिन्दुस्तान) ने अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी प्रदीप गुप्ता (आश्चर्य चकित) को भारी मतों के अन्तर से पराजित किया। तरबगंज तहसील के अन्य सभी पदों पर निर्विरोध निर्वाचन सम्पन्न हुआ, जिसमें उपाध्यक्ष पद पर विजय कुमार शुक्ला (दैनिक जागरण), मंत्री पद पर रघुबर दयाल तिवारी (राष्ट्रीय सहारा), संयुक्त मंत्री पद पर संजय प्रजापति (आज) व कोषाध्यक्ष पद पर गनी मोहम्मद (दैनिक जागरण) निर्वाचित घोषित किए गए।

गोण्डा सदर तहसील में अरविन्द शुक्ला (हिन्दुस्तान) अध्यक्ष, कृष्ण कुमार यादव (स्वतंत्र भारत) मंत्री व हनीफ सिद्दीकी (हिन्दुस्तान) निर्विरोध कोषाध्यक्ष निर्वाचित घोषित किए गए। कर्नलगंज तहसील में श्याम प्रकाश तिवारी (पायनियर) अध्यक्ष, लखन लाल शुक्ल (पायनियर) उपाध्यक्ष, चन्द्र प्रकाश तिवारी (हिन्दुस्तान) मंत्री, श्रीनाथ रस्तोगी (राष्ट्रीय सहारा) संयुक्त मंत्री तथा सूर्य प्रकाश शुक्ला (दैनिक जागरण) निर्विरोध कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुए। मनकापुर तहसील में दिनेश पाण्डेय (हिन्दुस्तान) निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित घोषित किए गए। तहसील कार्यसमिति में रिक्त पदों पर शीघ्र ही मनोनयन की कार्यवाही पूरी की जाएगी। इस अवसर पर पत्रकार टीपी सिंह, अकील सिद्दीकी, अंचल, अनुराग, रमन, इस्लाम, अजीज, मोहसिन, ननकू, जुबेर सहित सैकड़ों पत्रकार मौजूद रहे।

दैनिक जागरण से धानिश का इस्‍तीफा, मुकुल लोकमत से जुड़े

दैनिक जागरण, सिलीगुड़ी से खबर है कि धानिश श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सिटी डेस्‍क प्रभारी थे. मूल रूप से लखनऊ के रहने वाले धानिश ने प्रबंधन को दिए गए इस्‍तीफे का कारण व्‍यक्तिगत बताया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. धानिश इसके पहले डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट, बीओटू न्‍यूज चैनल, राहत टाइम्‍स, लखनऊ लीड समेत कई अखबारों और चैनलों में काम कर चुके हैं.

लोकमत, लखनऊ से खबर है कि एमडी आनंद वर्धन सिंह ने मुकुल त्रिपाठी को इंचार्ज बना दिया है. बताया जा रहा है कि समझौत बिना पैसे के हुआ है. बताया जा रहा है कि अब अखबार का सारा ध्‍यान उन खबरों पर लग गया है, जहां से संभावनाएं हैं. सिटी रिपोर्टनों को भी ऐसी खबरों के लिए टाइट किया जा रहा है. खबर है कि गंभीर पत्रकारिता करने वाले लोग फ्रस्‍टेट होकर दूसरा रास्‍ता तलाशने लगे हैं और आई कार्ड पाने वालों की जमात जुट रही है.

पहली बार ऐसा लग रहा कि सबसे बेकार और घटिया फील्ड है मीडिया

तीन सालों में पहली बार ऐसा लगा कि सबसे बेकार और सबसे घटिया फील्ड मीडिया है. करियर के लिहाज से, क्या मैं सही हूं? कैमरों की चकाचौंध और ग्लैमर के पीछे की सच्चाई अगर मीडिया में आने से पहले लोग जान जाए तो मेरा दावा हैं कि 95 फीसदी छात्र जो मीडिया इंडस्ट्री में करियर बनाना चाहते हैं, वह अपना इरादा बदल लेंगे. सिर्फ वही आएंगे जिनका कोई गॉडफादर पहले से इस क्षेत्र में किसी बड़े ओहदे पर है.

हालांकि संघर्ष हर क्षेत्र में हैं लेकिन संघर्ष के बाद हर क्षेत्र मे एक मुकाम दिखता हैं. करियर बनता है. लेकिन यहां हालात बिलकुल अलग हैं. यहाँ हालत ये है कि 10-15 सालों से इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी नौकरी के चक्कर में न्यूज चैनलों और अखबारों के दफ्तरों के चक्कर लगाते नजर आते हैं. फिर अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि नए लोगों का क्या हाल होता है. कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया भ्रष्टाचार के मामले में आज सांसद और नेताओं से भी दो कदम आगे है. हालांकि अभी भी कुछ लोग ईमानदार हैं और ईमानदारी, मेहनत और टैलेंट की कद्र करते हैं, जिसकी बदौलत हम जैसे अनाथों (जिनका मिडीया में कोई गॉडफादर नहीं है) को ब्रेक मिल जाता हैं. अगर कोई सर्वेक्षण कराया जाए तो पता चलेगा कि अन्य सेक्टर की अपेक्षा सबसे ज्यादा हताश और सबसे ज्यादा असुरक्षित अपनी नौकरी को लेकर मीडिया प्रोफेशनल हैं. हकीकत ये है कि बड़े चैनलों और अखबारों को छोड़ दें तो लगभग सभी मीडिया हाउस के कर्मचारियों मे बदलते माहौल के हिसाब से घनघोर निराशा और हताशा बढ़ते जा रही है.

मीडिया को देश का चौथा स्तंभ माना जाता था. “था” इसलिए कि अब यह कोई स्तंभ नहीं रहा. ये एक आम आदमी भी जानता है. यहां सबको अपनी नौकरी प्यारी है. चाहे वह चैनल हेड हो या मामूली कर्मचारी. वही खबर चलेगी जो मैनेजमेंट चाहता है. इसलिए सरोकारी पत्रकारिता तो बहूत दूर की कौड़ी हो गई हैं. क्यों विनोद दुआ, रवीश कुमार, दीपक चौरसिया, आशुतोष, संदीप, अर्नव गोस्वामी या राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों की तरह आज के दौर के पत्रकार वो मुकाम हासिल नहीं कर पाए जो इन लोगों ने कर लिया. क्या हिन्दुस्तान में टैलेंट की कमी हो गई हैं, जो अब कुछ गिने-चुने पत्रकारों को छोड़कर कोई ऐसा चेहरा सामने नहीं आ रहा. टैलेंट की कमी आज भी नहीं हैं लेकिन नए टैलेंट को वो मौका नहीं मिल रहा जिसकी बदौलत वे अपनी चमक बिखेर सके. आज नौकरी सिर्फ उनलोगों की सुरक्षित है जो चापलूसी में माहिर हैं या फिर जो इंडस्ट्री में किसी तरह बहुत दिनों से जमे हुए हैं.

देश मे शिक्षा का व्यवसायीकरण शुरु होते ही मीडिया संस्थानों और कॉलेजों की बाढ़ आ गई. इस तरह से प्रचारित किया जा रहा हैं कि एडमिशन से पहले ही छात्र को लगने लगता हैं कि वह पत्रकार बन गया. लेकिन असल कहानी तो तब शुरु होती हैं जब उसको काम के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है. हिन्दुस्तान में हर साल लगभग 18 हजार छात्र पास आउट करते हैं, जिनमे 20 फीसदी तो उसी साल अपना प्रोफेशन बदल देते हैं, क्योंकि अगर कोई माई-बाप हैं इस क्षेत्र में तब तो नौकरी पक्की समझो या आपकी किस्मत सही हुई और कोई सज्जन मिल गया तो आपका कल्याण हो जाएगा. जैसा मेरा हुआ. वरना 2 सालों की पढ़ाई और पैसा दोनों बेकार और किसी दूसरे फील्ड में नौकरी करने को मजबूर होना पड़ता. मुझे बखूबी याद है, हमारे बैच के कई लोग नौकरी ना मिलने से अपना प्रोफेशन ही बदल दिया या फिर 1 साल तक इंटर्नशीप करने के बाद अब जाकर उन्हें ब्रेक मिला है. इसलिए मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं.

हकीकत यह हैं ब्रेक मिलने के बाद भी 95 फीसदी नौजवान पत्रकारों को आगे कोई भविष्य नजर नहीं आता. अपने से बड़े और अनुभवी लोगों की बेचैनी और असहजता देखकर कभी-कभी मैं भी हताश हो जाता हूं और मेरे जैसे कितने लोग हैं, जिनको ये लगता हैं कि मीडिया में आने का उनका फैसला शायद उनकी जिंदगी का सबसे गलत फैसला हैं, क्योंकि 5-6 साल तक इस प्रोफेशन में काम करने के बाद आप मजबूर हो जाते हैं यहां रुकने को. प्रोफेशन बदल नहीं सकते, जो बदल लेते हैं वो पहले से बेहतर महसूस करते हैं. नए और अनाथ लोगों के लिए बडे़ चैनलों और अखबारों मे नौकरी करना तो कभी ना सच होने वाला सपने जैसा है. इसलिए लोग वहां जाने का प्रयास भी नहीं करते. लेकिन उससे भी टेढ़ी खीर अब नए चैनल और अखबारों में नौकरी पाना हो गया है.

पिछले दो सालों में जितने नए चैनल और अखबार आए हैं, उनकी हालत ये हैं कि चैनल शुरु होने से पहले ही वहां के मठाधीश अपने करीबियों को लेकर आते हैं फिर उनके करीबी अपने चाहने वालों को काम दिलाते हैं. अगर आपको कोई नहीं जानता तो आपका सीवी कूड़ेदान में फेंक दिया जाएगा, ये हाल सिर्फ नए चैनलों का हीं नहीं है बल्कि अखबारों का भी है. जब मीडिया हाउसों का ये हाल हैं तो पुराने प्रतिष्ठित और बड़े संस्थानो का खयाल तो सपने मे भी नहीं आता और अगर इस तरह से भर्तियाँ होंगी, फिर कहां से रवीश और जिनका जिक्र मैंने उपर किया हैं, वैसे पत्रकार सामने आएंगे. कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि टैलेंट की कद्र ना के बराबर हैं. संस्थान शुरु होने से पहले ही मालिकों से मिलकर उसे चलाने का ठेका ले लिया जाता हैं और फिर अपने करीबियों को मनमानी रकम पर नौकरी देकर खुद भी 1-2 साल या उससे भी कम समय में पैसे बनाकर निकल लेते हैं, उनके बाद जो नया बॉस आता हैं वह पुराने कामचोर और चापलूसों के साथ-साथ कुछ मेहनती ईमानदार लोगों को भी संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं.

मुझे याद है कैसे हमारे ऑफिस में एक अनुभवी और मेहनती सीनियर परेशान होकर बोले थे कि अब तो कहीं और नौकरी भी नहीं मिलने वाली और यहां नौकरी बचाना मुश्किल है, वो सिर्फ इसलिए परेशान थे क्योंकि हमारे बॉस बदल गए थे, सीनियर लोगों को जूनियर से ज्यादा हताशा और निराशा हैं. अगर कोई व्यक्ति आज 10-15 साल किसी और क्षेत्र मे काम कर ले तो अच्छा पैसा अच्छा मुकाम हासिल कर ही लेगा अगर उसमें काबिलीयत होगी, लेकिन यहां तो उम्र के आखिरी पड़ाव तक लोगों मे नौकरी के प्रति असुरक्षा की भावना बनी रहती है. कुछ हद तक नए पत्रकारों को सोशल मीडिया ने सहारा दिया हैं, जिसकी वजह से उनको अपने प्रोफेशन में नौकरी मिल रही है. लेकिन उससे हालत में कोई खास बदलाव नहीं आया है. क्या भारतीय मीडिया कि यह तस्वीर कभी बदलेगी?

लेखक धीरेंद्र अस्‍थाना युवा पत्रकार हैं तथा लखनऊ में लोकमत से जुड़े हुए हैं.

अमर उजाला, देहरादून से राजीव, सरोज एवं अरविंद का तबादला, जितेंद्र भी लिस्‍ट में

अमर उजाला, देहरादून से खबर है कि तीन लोगों का तबादला दूसरे यूनिटों में कर दिया गया है, जबकि चीफ रिपोर्टर रहे जितेंद्र अंथवार का तबादला भी जल्‍द ही किया जाने वाला है. बताया जा रहा है कि देहरादून में सीनियर सब एडिटर के पोस्‍ट पर तैनात राजीव रंजन को तथा रिपोर्टर सरोज कुमार को प्रबंधन ने गोरखपुर भेज दिया है. वहीं हरिद्वार में तैनात सीनियर रिपोर्टर अरविंद सिंह को बरेली भेज दिया गया है. पिछले दिन चीफ रिपोर्टर के पद से हटाए गए जितेंद्र अंथवार का भी शीघ्र तबादला किया जाने वाला है.

सूत्र बताते हैं कि प्रबंधन यह सारी कवायद देहरादून में सरप्‍लस कर्मचारियों के हो जाने के चलते कर रहा है. गोरखपुर युनिट में संजय तिवारी एवं जितेंद्र पाण्‍डेय के चले जाने के बाद से स्‍टाफ की कमी हो गई थी, जिसके चलते इन दोनों लोगों को वहां भेजा गया है.

वेतन के लिए जीएनएन न्‍यूज में हड़ताल, नहीं रोल हुआ पांच बजे का बुलेटिन

जीएनएन न्‍यूज से खबर है कि वहां स्‍ट्राइक हो गया है. चिटफंडियों की इस कंपनी में कर्मचारियों को जनवरी माह का वेतन नहीं मिला है. वेतन कब तक आएगा इसकी भी जानकारी देने वाला कोई नहीं लिहाजा नाराज पीसीआर तथा कैमरा सेक्‍शन के लोग स्‍ट्राइक पर चले गए हैं, जिसके चलते पांच बजे का बुलेटिन रोल नहीं हुआ. चैनल लूप पर चल रहा है. राजस्‍थान में कई चिटफंड कंपनियों पर छापेमारी के बाद से ही जीएनएन न्‍यूज एवं जीएनएन भक्ति की हालत खराब चल रही है. जीएम जगजीत सिंह अरोड़ा भी बुलेटिन को रोल नहीं करा सके.

जानकारी के अनुसार पिछले काफी समय से जीएनएन में काम कर रहे कर्मचारियों की सेलरी कई दिन लेट आ रही थी. इस बार भी जनवरी की सेलरी अब तक नहीं आई है जबकि फरवरी बीतने जा रहा है. आगे कई त्‍योहार भी आने वाले हैं. आश्‍वासनों के सहारे कर्मचारियों को टाला जा रहा था. चैनल की खराब वित्‍तीय हालत को संभालने के लिए जगजीत सिंह अरोड़ा को जीएम बनाकर लाया गया था, पर उनके आने के साथ ही हड़ताल भी शुरू हो गई. चैनल पर अब पुरानी बुलेटिनों को चंक करके चलाया जा रहा है. साढ़े छह बजे होने वाला डिस्‍कशन पैनल के कार्यक्रम को भी रद्द कर दिया गया है.

कर्मचारी अपनी सेलरी दिए जाने की मांग पर अड़े हैं. बताया जा रहा है कि चैनल के हेड के रूप में काम देखने वाले महरुफ रजा गायब हैं. आज वो आफिस नहीं आए. फोन पर ही उन्‍होंने बुलेटिन चलाने के लिए कहा पर किसी भी कर्मचारी ने रजा की बात नहीं सुनी. बताया जा रहा है कि जगजीत सिंह अरोड़ा ने भी कर्मचारियों को समझाने का प्रयास किया तथा आश्‍वासन दिया कि दो-तीन दिन में सेलरी आ जाएगी पर कर्मचारी मानने को तैयार नहीं हैं. प्रबंधन परेशान हैं. खबर दिए जाने तक आगे के कार्यक्रम सुचारू रूप से चलाने की कोशिशें जारी थीं, परन्‍तु बात नहीं बन पाई है. कर्मचारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.

उल्‍लेखनीय है कि चिटफंडियों का यह चैनल लांचिंग से पहले से ही विवादों में रहा है. कम समय में ही इस चैनल में कई सीईओ, मैनेजर और हेड बदले जा चुके हैं. सबसे दिलचस्‍प तथ्‍य यह है कि कहीं भी दिखाई न पड़ने वाले इस चैनल को दो-तीन दिन पूर्व बेस्‍ट डिस्‍ट्रीब्‍यूशन का पुरस्‍कार मिला था. स्‍टार न्‍यूज, आजतक, आईबीएन7, इंडिया टीवी जैसे चैनलों को पीछे छोड़ते हुए इस चैनल ने यह अवार्ड जीता था. आसानी से पता लगाया जा सकता है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले पुरस्‍कार भी किस तरह से सेटिंग-गेटिंग करके पाए जाते हैं. 

दिल्‍ली पुलिस ने एनबीएसए से टीवी चैनलों के खिलाफ शिकायत की

नयी दिल्लीः राष्ट्रीय राजधानी में एक इस्राइली राजनयिक की कार पर हुए आतंकवादी हमले की मीडिया कवरेज से परेशान दिल्ली पुलिस ने ‘समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण’ एनबीएसए से शिकायत कर टीवी चैनलों को ‘असत्यापित और अपुष्ट’ सूचना प्रसारित करने से रोकने को कहा है. पुलिस ने किसी विशेष समाचार का जिक्र तो नहीं किया लेकिन उस वक्त और दोबारा इलेक्टानिक मीडिया के संवाददाताओं से अनुरोध किया कि वे आतंकवादी घटनाओं से जुड़े ममाले में कोई असत्यापित और अपुष्ट खबर प्रसारित नहीं करें.

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एवं अतिरिक्त उपायुक्त राजन भगत ने एनबीएसए अध्यक्ष न्यायमूर्ति जेएस वर्मा को लिखे पत्र में कहा है, ..लेकिन इसे अनसुना कर दिया गया. वहीं, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि उन्हें एनबीएसए से जवाब मिल चुका है, जिसमें कहा गया है इसे सभी सदस्य चैनलों को वितरित कर दिया गया है. प्रधानमंत्री आवास के पास 13 फ़रवरी को कार बम हमले की मीडिया कवरेज के मद्देनजर यह पत्र लिखा गया. गौरतलब है कि पिछले हफ्ते लिखे गए पत्र में भगत ने दावा किया था कि अधिकृत अधिकारी से सत्यापित कराए बिना गैर आधि‍कारिक और अपुष्ट खबरों का प्रसारण लोगों को सिर्फ़ गलत सूचना प्रदान करता है और उनके मन में भ्रम पैदा करता है. पत्र में कहा गया है कि यह जांच की प्रक्रिया को गंभीर रूप से बाधित भी करता है.

मीडियाकर्मी अक्सर शिकायत करते हैं कि पुलिस इस तरह की घटनाओं के बारे में पर्याप्त सूचना यह कहते हुए मुहैया नहीं कराती है कि इससे जांच कार्य पर असर पड़ेगा. साल की शुरूआत में दिल्ली पुलिस प्रमुख बीके गुप्ता ने कहा था कि किसी संदिग्ध के गिरफ्तार होने के बारे में खबर यदि लीक नहीं हुई होती तो वे इंडियन मुजाहिदीन के साथ शामिल कुछ और लोगों को गिरफ्तार कर लेते. उन्होंने कहा कि यदि वे आतंकवादी मामलों में सूचना साझा करते हैं तो वे सभी संदिग्धों को पकड़ने में सक्षम नहीं होंगे. साभार : प्रभात खबर

हाथरस में एएसपी ने सिपाही को थप्‍पड़ मारा, पुलिसवालों ने एएसपी को पीटा, बवाल

: खबर दिए जाने तक हालात बेकाबू : हाथरस में एक पुलिसकर्मी के साथ पुलिसिया व्‍यवहार दिखाना एएसपी को महंगा पड़ गया. एएसपी की थप्‍पड़ से गुस्‍साएं पुलिसकर्मियों ने एएसपी को भी पीट दिया. इसके बाद पुलिसकर्मियों ने जमकर बवाल काटा, तोड़फोड़ की तथा डीएम-एसपी पर कुर्सी फेंका. कई पत्रकार व प्रेस फोटोग्राफर भी पीटे गए. कैमरे भी टूटे. डीएम के आश्‍वासन के बाद भी पुलिस वाले शांत होने को तैयार नहीं थे. उन्‍होंने आगरा रोड पर जाम लगा दिया था. दोपहर तक हालात बेकाबू थे.

बताया जा रहा है कि छठे चरण के मतदान के लिए मतदानकर्मियों की रवानगी के समय एएसपी अशोक कुमार ने एक पुलिसवाले को किसी बात को लेकर चमाचा जड़ दिया. जिस पुलिसकर्मी को थप्‍पड़ मारा गया वह पूर्वांचल के किस जिले से मतदान कराने के लिए आया था. इसके बाद पूर्वांचल से आये पुलिस फोर्स ने पहले एएसपी को धुना उसके बाद उपद्रव शुरू कर दिया. एएसपी की बदतमीजी पूरे सिस्‍टम पर भारी पड़ने लगी. नाराज पुलिसकर्मियों ने मैदान में लगा टेंट-तंबू उखाड़कर फेंक दिया. कुर्सियों से डीएम-एसपी पर भी हमला किया गया. प्रशासन की ओर से वीडियोग्राफी कर रहे वीडियोग्राफर का कैमरा तोड़ दिया गया. घटना कवर कर रहे पत्रकारों को भी पीटा गया. फोटोग्राफरों के कैमरे भी तोड़ दिए गए.

पूरा पुलिस विभाग खबर दिए जाने तक मानने को तैयार नहीं है. डीएम सुहाल एलवाई और एसपी चंद्रप्रकाश मौके पर जमे हुए हैं. अराजकता पर काबू पाने के लिए अर्द्धसैनिक बलों की भी मदद ली जा रही है. पर अब तक हालात काबू में नहीं आए हैं. डीएम सुहाल एलवाई ने माइक पर उपद्रव कर रहे पुलिसकर्मियों से माफी मांगी और आश्‍वासन दिया कि दोषी एएसपी के खिलाफ तहरीर तैयार करा ली गई है. उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाई जाएगी. विभागीय कार्रवाई के लिए शासन को लिखा जाएगा, पर पुलिसकर्मी एएसपी के बर्खास्‍तगी की मांग कर रहे थे. उससे कम कुछ भी मानने को तैयार नहीं हैं.

बताया जा रहा है कि नाराज पुलिसकर्मियों ने आगरा रोड पर जाम लगा दिया है. कुछ देर तक उन्‍होंने पुलिस पर पथराव भी किया. हालांकि एक अधिकारी से इस तरह के सड़क छाप व्‍यवहार की उम्‍मीद नहीं की जाती, पर जिस तरीके का व्‍यवहार अशोक कुमार ने किया उससे अपने अधिकारियों के व्‍यवहार को लेकर काफी पहले से सुलग रहे पुलिसकर्मियों को उद्देलित करने का ही काम किया. पुलिस कल्‍याण एसोसिएशन के अध्‍यक्ष सुबोध यादव ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि एक अधिकारी वर्दी में थप्‍पड़ मार रहे हैं इसकी जितनी निंदा की जाए कम है. उन्‍होंने कहा कि अगर तत्‍काल इस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती है तो वे आमरण अनशन पर बैठेंगे. चुनाव आयोग से भी इसकी शिकायत करेंगे. सुबोध ने कहा कि पुलिसकर्मियों को अनुसाशन का पाठ सिखाने वाले अधिकारियों को पहले खुद अनुशासन सीखना चाहिए.

एनजीओ संचालिका से उगाही करने वाले दो फर्जी पत्रकार गिरफ्तार

पूर्वी दिल्ली। करावलनगर इलाके में खुद को क्राइम रिपोर्टर बताकर एक महिला से जबरन उगाही करने के मामले में पुलिस ने महिला समेत दो फर्जी पत्रकारों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी के दौरान फर्जी पत्रकारों के पास से उगाही के दस हजार रुपए, मिनी लैपटाप, एक हाथ घड़ी, राष्ट्र की आवाज-आज तक का आईडी कार्ड, विजिटिंग कार्ड, मोबाइल व सरकारी विभाग की टेलीफोन डायरी भी बरामद हुई है।

इस बाबत उत्तर पूर्वी जिला पुलिस बीके सिंह ने बताया कि वेस्ट करावलनगर निवासी कौशल्या ने गत 24 फरवरी को शिकायत दी थी महिला समेत दो लोग उन्हें खुद को क्राइम रिपरेटर बताकर जबरन पैसे की मांग कर रहे हैं। पैसे नहीं देने धमकी दे रहे थे। उनका कहना था कि पैसे नही दिए तो एनजीओ चलने नहीं देंगे। कौशल्या जीवन अनमोल नशा मुक्ति केन्द्र नामक एनजीओ चलाती है। महिला का कहना था कि 23 फरवरी को दो पत्रकार आए और उससे पचास हजार रुपेए की मांग की। जिसके बाद चालीस हजार रुपए में मामला तय हुआ। कौशल्या उन्हें दस हजार रुपए दे चुकी थी। डीसीपी ने बताया कि सूचना के आधार पर एएसआई अशोक व सिपाही योगेंद्र ने अपने आप को क्राइम रिपरेटर बताने वाले को गिरफ्तार कर लिया। दोनों की पहचान मिथुन सिंह राजपूत (24) और गुरशरण कौर (37) के रूप में की गई। पुलिस को उनके पास से दस हजार रुपए भी बरामद हुए। पुलिस का कहना है कि इसके पहले भी दोनों ने उगाही करते रहे हैं। साभार : सहारा

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा आईएएनएस के राजनीतिक संपादक जार्ज जोसेफ का निधन

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार एवं समाचार एजेंसी आईएएनएस के राजनीतिक सम्पादक जार्ज जोसेफ का दिल का दौरा पड़ने से सोमवार को निधन हो गया। वह 57 वर्ष के थे। रविवार रात को दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया। ऑपरेशन के बाद उनकी हालत में कुछ सुधार भी हुआ। लेकिन रात में उनकी स्थिति खराब हो गई। जोसेफ के परिवार में पत्नी एवं एक पुत्री हैं। इनकी पत्‍नी आशा खोसा भी सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं।

जोसेफ ने अपने करियर की शुरुआत 1980 में समाचार पत्र 'नेशनल हेराल्ड' के साथ की थी। इसके बाद दौरान वह 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के साथ जयपुर में जुड़े। आतंकवाद के दौर में वे श्रीनगर में 'इंडियन एक्सप्रेस' को अपनी सेवाएं दी। जोसेफ 2010 में आईएएनएस से जुड़े तब से वहीं थे। जार्ज का पार्थिव शरीर लोगों के दर्शन के लिए दिल्‍ली स्थित केरला हाउस में रखा गया है। जार्ज को कल सुबह की फ्लाइट से उनके पैतृक गांव ले जाया जाएगा। जहां पर उनका धार्मिक विधि से अंतिम संस्‍कार किया जाएगा।

एजेंसी के प्रधान सम्पादक तरुण बसु ने अपने शोक संदेश में कहा कि जार्ज एक ईमानदार एवं शांत स्वभाव वाले पत्रकार थे। हाल ही में कुछ साथी पत्रकारों के साथ वह उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार को कवर करने गए थे। ऐसे में कहा जा सकता है कि उन्होंने राजनीतिक रिपोर्ट और साक्षात्कार लिखते हुए दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें निश्चित तौर पर याद किया जाएगा। उनके निधन पर जार्ज के खास सहयोगी वरिष्‍ठ पत्रकार शकील ने भी गहरा दुख जताया है। शकील ने आतंकवाद के दौर में जार्ज की पत्रकारिता को याद करते हुए कहा कि जार्ज का जाना पत्रकारिता के लिए बड़ी क्षति है। 

टीवी टुडे से इस्‍तीफा देकर लाइफ ओके में क्रिएटिव हेड बनेंगे शैलेंद्र झा

टीवी टुडे से खबर है कि टुडे मीडिया इंस्‍टीट्यूट के हेड के रूप में कार्यरत शैलेंद्र झा अब नई पारी शुरू करने जा रहे हैं. शैलेंद्र किएटिव हेड के रूप में लाइफ ओके चैनल ज्‍वाइन करने जा रहे हैं. शैलेंद्र को इंटरटेनमेंट चैनलों में काम करने का लम्‍बा अनुभव रहा है. डीयू से स्‍नातक शैलेंद्र जनरल इंटरटेनमेंट में यूटीवी, बी4यू, स्‍टार प्‍लस तथा अधिकारी ब्रदर्स के इंटरटेनमेंट चैनलों के साथ काम कर चुके हैं. करियर के शुरुआत कई साल शैलेंद्र इंटरटेनमेंट चैनलों से ही जुड़े रहे.

सन 2003 में वे आजतक पहुंचे तथा कई पदों पर महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारियां निभाईं. तेज के हेड भी रहे. आजतक की रिलांचिंग से भी जुड़े रहे. कुछ समय पहले ही उन्‍हें टुडे ग्रुप के मीडिया इंस्‍टीट्यूट का हेड बनाया गया था. शैलेंद्र स्टार प्‍लस और बी4यू के साथ कई फिक्शन सीरियल से बतौर क्रिएटिव प्रोड्यूसर जुड़े रहे. शैलेंद्र ने क्षितिज नाम से एक फीचर फिल्म भी बनाई. यूटीवी में दो साल के भीतर ही 10 प्रोग्राम लॉन्च कराने का श्रेय भी शैलेंद्र के पास है. शैलेंद्र एक पाकिस्‍तानी चैनल में भी कंसल्‍टेंट की जिम्‍मेदारी निभा चुके हैं. मीडिया इंस्‍टीट्यूट का हेड बनने से पूर्व से आजतक के आउटपुट हेड थे. सुप्रिय प्रसाद के आजतक ज्‍वाइन करने के बाद शैलेंद्र को मीडिया इंस्‍टीट्यूट का हेड बना दिया गया था.

योगी आदित्‍यनाथ ने मंदिर में बुलाकर जितेंद्र पाण्‍डेय की ऐसी की तैसी की

: कानाफूसी : गोरखपुर जनसंदेश टाइम्‍स से दो खबरें हैं. पहली यह कि पिछले दिनों योगी आदित्‍य नाथ के खिलाफ खबर लिखने वाले स्‍टेट करेस्‍पांडेंट जितेंद्र पाण्‍डेय अब डरे हुए हैं. बताया जा रहा है कि यह खबर कुछ प्रायोजित किस्‍म की थी. समाचार प्रकाशित होने के बाद योगी ने जितेंद्र को मंदिर बुलाया था. मंदिर में योगी ने जितेंद्र की जमकर ऐसी की तैसी की. अनुज पोद्दार के बारे भी जमकर अपशब्‍द कहे. खबर लिखने का प्रमाण भी मांगा. बेचारे जितेंद्र कुछ बोल नहीं पाए बताया जा रहा है कि इस घटना के बाद से जितेंद्र सहमे हुए हैं. 

दूसरी खबर है कि जनसंदेश टाइम्‍स के ऑफिस में कारपोरेट एडिटर संजय तिवारी से स्‍टाफ के लोगों ने मारपीट करने की कोशिश की. बताया जा रहा है कि इस समय अखबार में शैलेंद्र मणि त्रिपाठी तथा संजय तिवारी के बीच शीतयुद्ध चल रहा है. पिछले दिनों सभी कर्मचारियों की चौथाई सेलरी भी रोक ली गई थी. बताया जा रहा है कि इसी से नाराज कुछ कर्मचारी संजय तिवारी से हाथापाई करने की कोशिश भी की. पर वे आफिस से बच के निकलने में कामयाब रहे. हालांकि इस दौरान उनका कुर्ता फट गया. बताया जा रहा है कि ए‍हतियात बरते हुए प्रबंधन ने उन्‍हें कार्यालय जाने से मना कर दिया है. वहीं कुछ का कहना हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था. संजय तिवारी गोरखपुर ऑफिस नहीं बल्कि लखनऊ आफिस बैठ रहे हैं. यह अफवाह अंदरूनी राजनीति का हिस्‍सा है.

पत्रकार देवेश समेत कई लोगों राजधानी रत्‍न पुरस्‍कार

खबरों का सफर और नेशन केयर की ओर से स्वामी रामकृष्ण परमहंस जयंती के अवसर पर दिल्ली के गोल मार्केट में स्थित मुक्तधारा ऑडिटोरियम में सांस्कृतिक संध्या और सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि पूर्व चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति, सात राज्यों में राज्यपाल रह चुके भीष्म नारायण सिंह और मध्य प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉ. भाई महावीर ने अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए चिकित्सक, शिक्षक, पत्रकार और समाज सेवियों को राजधानी रत्न पुरस्कारों से सम्मानित किया।

एटूजे़ड न्यूज़ चैनल के प्राइम एंकर देवेश के वशिष्ठ को राजधानी रत्न के साथ साथ पत्रकार प्रभाकर सम्मान दिया गया। देवेश जनमत/लाइव इंडिया, इंडिया न्यूज, तहलका, ईटीवी और वीओआई में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इसके साथ साथ वैष्णव जन नाम की एक मैगजीन के भी संपादक हैं। इसके अलावा राम मनोहर लोहिया अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सच्चिदानन्द यादव, शिक्षक डॉ. टीपी सिंह, डॉ एसपी सिंह, डॉ. सीमा बजाज, श्रीमति अनुराधा गुप्ता, पत्रकार कविलाश मिश्र, पुलिस अधिकारी ब्रजेश कुमार मिश्र, साहित्यकार नन्दाबल्लभ पालीवाल उत्तराखंडी और अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच संस्था को भी राजधानी रत्न से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन वरिष्ठ पत्रकार रामानुज सिंह सुंदरम ने किया। प्रेस रिलीज

पीपुल्‍स समाचार के ब्‍यूरोचीफ खुद कमाए-खाएं और प्रबंधन को भी खिलाएं

: कानाफूसी : ग्‍वालियर से खबर है महंगाई की मार में पिस रहे पीपुल्स समाचार की। यहां की मालकिन तीन दिनों के लिए ग्वालियर में थीं। ग्वालियर यात्रा के दौरान उन्होंने जो फैसले लिए और सुनाए वह साफ कर गए कि पीपुल्स प्रबंधन में अब और अधिक घाटा सहने की ताकत नहीं है। जो फैसला उन्होंने सुनाया है उसके अनुसार पीपुल्स के ग्वालियर संस्करण से जुड़े सभी ब्‍यूरो को अब सेलरी मोड से निकालकर कमीशन मोड में डाल दिया गया है। यानी ब्‍यूरो चलाने के लिए प्रबंधन कुछ नहीं देगा। आप कमाओ-आप खाओ और पीपुल्स का पेट भरो।

ब्‍यूरो चीफों से कह दिया गया है कि आप जितना बिजनेस लाएंगे, उसका कमीशन आपको मिलेगा। यही आपकी सैलरी और यही आपका आफिस खर्चा होगा। मंजूर हो तो हां करो, वरना नमस्कार करो। चूंकि ग्वालियर से चिटफंडिया भाग चुके हैं। उनके अखबारों के दफ्तरों में प्रशासन के ताले लटके हुए हैं। चिटफंडियों के न्यूज चैनल की नस भी प्रशासन ने बंद कर रखी है। सैकड़ों पत्रकार सड़क पर हैं। ऐसे में नईदुनिया और पीपुल्स में नया फरमान सुनने वाले पत्रकारों को समझ में नहीं आ रहा है कि वे कौन सा कदम उठाएं और किस राह पर जाएं।

ग्‍वालियर से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. कानाफूसी कैटगरी के राइटअप सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होती हैं जिसमें सच्चाई संभव भी है और नहीं भी. इसलिए तथ्यों पर भरोसा करने से पहले एक बार अपने स्तर से भी जांच पड़ताल कर लें. अगर उपरोक्त उल्लखित तथ्यों में कोई कमी बेसी नजर आए तो नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

यूपी में कहीं उल्‍टी न पड़ जाए कांग्रेस की राष्‍ट्रपति शासन वाली चाल

उत्‍तर प्रदेश में पांचवें चरण के मतदान के बाद केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने राष्ट्रपति शासन सम्बन्धी जो बयान दिया, उसको सिर्फ कोरी धमकी मानना बुद्धिमत्‍ता नहीं कही जा सकती। इसके पीछे अवश्य एक गहरी राजनैतिक साजिश है। अगर कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली पर आप नज़र डाले तो साफ़ तौर पर पाएंगे कि राहुल गाँधी जो कहना चाहते हैं वो खुद न कह कर किसी दूसरे बड़े नेता से कहलवा कर जनता का मूड मिजाज़ भापने की कोशिश करते हैं। बाटला हाउस पर दिग्विजय सिंह से एक बयान दिलवाते हैं और जब विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया देखते हैं तो चिदंबरम से दूसरा बयान दिलवा देते हैं। अल्पसंख्यक आरक्षण को मुस्लिम आरक्षण बता कर सलमान खुर्शीद के माध्यम से प्रचार करवाते हैं। चुनाव आयोग से मोर्चा  खुलवाते हैं और मामला तूल पकड़ता देख उनसे माफ़ी मंगवाकर दूसरे मंत्री को आगे करके वही बयान दिलवा देते हैं।

इसी तरह से राष्ट्रपति शासन सम्बन्धी बयान भी पहले उन्होंने दिग्विजय सिंह से दिलवाया और और यह देख कर कि जनता पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है बल्कि जनता और भी ज्यादा मुखर होकर वोटिंग कर रही है, तो एक बार फिर केंद्रीय मंत्री को आगे कर खेल-खेल में जनता को चेतावनी दिलवा दी। राहुल गाँधी इस बात को बहुत अच्छे तरीके से जानते हैं कि अपनी ताकत को एक करोड़ गुना भी अधिक लगा कर वे उत्तर प्रदेश में सत्ता के नजदीक नहीं पहुंच सकते और इस बात को खुद अपने मुंह से बनारस में राहुल ने स्वीकार भी किया  कि इस चुनाव में पार्टी खड़ी हो जाएगी। ऐसे (खुद खड़े हो कर बताया) इसके बाद हम काम करेंगे। क्या काम करेंगे और किस चीज पर काम करेंगे ये तो उस समय नहीं बताया लेकिन राजनीति की थोड़ी भी समझ रखने वाले जान गये कि राहुल का इशारा २०१४ लोक सभा चुनाव की तरफ है। मतलब साफ़ है कि राहुल वर्तमान चुनाव हम खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे क़ी तर्ज़ पर लड़ रहे हैं।

जितना बड़ा सत्य यह है कि मतदान प्रतिशत में जबरदस्त इजाफा हुआ है उतना ही बड़ा सत्य यह है कि किसी भी पार्टी को २००७ क़ी भांति स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार बहुत कम हैं, ऐसे में विधायकों क़ी खरीद-फरोख्त को रोकने के नाम पर राष्ट्रपति शासन लगाना आसान हो जायेगा और जनता को भी अटपटा नहीं लगेगा, क्योंकि बार-बार बयान दिलवा कर उसको अभी से अभ्यस्त बनाया जा रहा है। यदि ६ मार्च को राष्ट्रपति शासन क़ी सम्भावनायें उभरती हैं तो राहुल गाँधी को अपरोक्ष रूप से अगले एक साल तक अपनी काबिलियत दिखाने का मौका मिल जायेगा। राजभवन के माध्यम से कांग्रेस क़ी समानांतर सत्ता का एक वर्ष खुद को दूसरे से बेहतर बताने में गुजरेगा। इस पूरी पटकथा के एक महत्वपूर्ण किरदार होंगे महामहिम राज्‍यपाल उत्तर प्रदेश, जिनका कार्य काल अप्रैल में समाप्त हो रहा है और निश्चित रूप से कांग्रेस उनके स्थान पर गाँधी परिवार के किसी खास राजनैतिक शख्शियत को, जैसे शिवराज पाटिल को इस पद पर बैठा सकती है, जिसके माध्यम से उसके अपने राजनैतिक एजेंडे को पूरा किया जा सके और फिर एक वर्ष बाद यानी क़ी मई २०१३ के बाद २०१४ के लोकसभा चुनाव सामने होंगे, जिसमे मंच से अबकी बार राहुल गाँधी पूछेंगे कि बताओ भैया पिछले एक साल में तुम्हारे प्रदेश में कितने घोटाले हुए? कि भैया बताओ पिछले एक साल में तुम्हारे प्रदेश में कितने सीएसओ मार डाले गये? बताओ भैया किसी पार्टी के गुंडों की गुंडई चली? बताओ भैया किसी ने मंदिर मस्जिद के नाम पर राजनीति करने कि कोशिश क़ी, नहीं ना तो फिर लाओ न कांग्रेस को।

उस समय क्या होगा ये कोई नहीं बता सकता, शायद बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आन्दोलन की कुंद पड़ चुकी आग और भाजपा में हर बड़े नेता के प्रधानमन्त्री बनने की ख्वाहिश की नकारात्मकता का सकारात्मक असर राहुल के पक्ष में पड़ जाये और शायद नहीं भी, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि २०१४ में जो होगा वो होगा, अभी २०१२ का क्या होगा? क्या  मतदाताओं के जोश का कुछ भी परिणाम नहीं निकलेगा, तो मित्रों इतना समझ लीजिये कि ये भी हो सकता है कि कांग्रेस के युवराज का अपरोक्ष बयान उनके गले की हड्डी भी बन जाये  और आगे आने वाले दो चरणों में मतदाता और भी ज्यादा उत्साह से मतदान करे, जो किसी एक पार्टी के पक्ष में चला जाये और युवराज की मंशा धरी की धरी रह जाये। अभी तो इंतज़ार है ६ मार्च का, जब सबकी किस्मत का जादुई पिटारा खुलेगा। अब इस पिटारे से क्या निकलेगा निःसंदेह किसी के लिए होली की गुझिया की मिठास तो किसी के लिए आखत पर पड़ने वाली मार। तब तक सपा और बसपा की धुक-धुक जरुर बढ़ी रहेगी क्योंकि बाकी दलों के पास खोने को कुछ भी नहीं है, पर इनके पास तो सत्‍ता पाने की संभावना है।

लेखक क्रांति किशोर मिश्र यूपी में सुदर्शन चैनल के ब्‍यूरो प्रमुख हैं.

धन्य है जागरण, कीड़े मारने की दवा खाने से बेहोशी आएगी या होश आएगा?

देश का नंबर एक अखबार का तगमा रखने वाला दैनिक जागरण भले ही ख़बरों के चुस्त और दुरस्त परोसने के दंभ भरता है, लेकिन अखबार के दफ्तर के भीतर बैठे पत्रकार इस दंभ को चकनाचूर करने में तनिक भी देर नहीं लगाते हैं. जागरण डॉट कॉम अब नए कलेवर में लांच हुआ है तो गलतियां भी नए कलेवर की ही हो रही हैं. ऐसा ही हाल 23 फरवरी की सुबह देखने को मिला, जब दैनिक जागरण लोगों के हाथ में गया और लोगों ने देखा कि कीड़ों की दवाई से भी तबीयत दुरस्त हो जाती है यानी होश आ जाता है. तो लोग भी एक बारगी सोचने पर मजबूर हो गए कि रिपोर्टर ने क्या एक्सक्लूसिव स्टोरी निकाली है.

खबर देखकर सभी चौंक गए, हेडिंग में स्पस्ट रूप से लिखा हुआ था कि किसी बच्चे ने कीडे़ मारने की दाव खायी और उसे होश आ गया, लेकिन खबर पढ़ी तो लगा कि उपसंपादक महोदय या फिर उसके ऊपर जांच पड़ताल करने वाले लोग आँख मूँद कर ही बैठे हुए थे. खबर में कहीं भी दवा से किसी मरीज के ठीक होने का जिक्र नहीं था. उसमें लिखा था कि दावा खाकर उसके साइड इफेक्ट से बच्चा बीमार हो गया. फिर उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया. दिल्ली एडिसन के बॉटम में लगी एक खबर कीड़े मारने की दवा खाकर बीमार बच्चे को आ गया होश को देखकर आप भी सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि ख़बरों के संपादन करने का जागरण में क्या हाल है. जबकि राष्‍ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान ने भी ये स्टोरी कवर की है. वहां कोई भी त्रुटी नहीं है. उसने दवा से बच्चे के बीमार होने की ही बात कही है. नीचे जागरण की खबर.


                कीड़े मारने की दवा खाकर बीमार बच्चे को आ गया होश

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता : पेट में पल रहे कीड़े मारने की दवा के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही डिवार्मिग प्रोग्राम सातवीं कक्षा के प्रशांत कि लिए भारी पड़ गया। दवा का साइड इफेक्ट वह बर्दास्त नहीं कर सका और तबियत इतनी बिगड़ गई कि बेहोशी में चला गया। इसकी वजह से उसे एक मामूली अटैक भी आया। आनन फानन में पहले उसे संजय गांधी अस्पताल में भर्ती किया गया, लेकिन हालत में सुधार नहीं होने पर जीबी पंत अस्पताल रेफर किया गया जहां अब वह होश में हैं। उसके पिता का आरोप है कि उसकी तबियत दवा खाने के बाद ही बिगड़ी है।

नांगलोई स्थित दिल्ली सरकार के सवरेदय स्कूल में पढ़ने वाला प्रशांत मंगलवार को डिवार्मिग दवा खिलाई गई। जिससे वह बीमार पड़ गया। इस बारे में दिल्ली सरकार की डिवार्मिग प्रोग्राम की नोडल अधिकारी डॉ. योगिता शर्मा ने बताया कि दवा की वजह से मरीज को ‘इनफैक’ अटैक आया। यह तब होता है जब मरीज दिल से कमजोर हो। इसमें दिमाग में हल्का असर पड़ता है। मरीज की एमआरआइ और इको किया गया है। घबराने की कोई बात नहीं है। हालांकि बताया जा रहा है कि मंगलवार की सुबह से ही प्रशांत की तबियत खराब थी और उसे हल्का बुखार था। इसके लिए उसे दवा भी दी गई थी।

इस बारे में दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सचिव अंशु प्रकाश ने कहा कि डिवार्मिग का असर होता है, इसलिए हमने पहले से ही सभी स्कूलों को इस बारे में तैयार रहने की सलाह दी थी और अस्पतालों को भी निर्देश दिया था। अभी तक कई बच्चों में ऐसी शिकायत आई है, जिसे इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। हालांकि प्रशांत के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। इस बारे में प्रशांत कि पिता राजेश चौधरी ने कहा कि मंगलवार को जब प्रशांत आया तो उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही थी, उसे बार-बार चक्कर आ रहा था और सिर दर्द की शिकायत कर रहा था। बाद में वह बेहोश हो गया। इस के बाद हम उसे संजय गांधी अस्पताल लेकर गए जहां डॉक्टर ने इलाज के बाद जीबी पंत अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। अब वह होश में है और बात भी कर रहा है।


एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

रवींद्र शाह के कारण मैं पत्रकारिता में हूं : दीपक चौरसिया

: रवींद्र शाह श्रद्धांजलि सभा : नोएडा के अग्रवाल सभा भवन में रवींद्र शाह जी को श्रद्धांजलि देने के लिए श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कई गणमान्य पत्रकारों ने शाह साहब के साथ अपने निजी अनुभवों को साझा करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। सबसे पहले डॉ प्रवीण तिवारी ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी… अपने निजी अनुभवों को साझा किया और इस भवन में मौजूद तमाम पत्रकारों को शाह साहब की असली विरासत और व्यक्तित्व का अहम हिस्सा बनाया। यहां मौजूद हर शख्स को ये एक निजी क्षति महसूस हो रही थी।

न्यूज एक्सप्रेस के दिनेश कांडपाल कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। वो एस1 न्यूज चैनल में शाह साब के साथ काम भी कर चुके थे। उन्होंने शाह साहब की नेतृत्व क्षमता पर रौशनी डालते हुए एस1 के कठिन समय में उनके साहस और नेतृत्व शैली के बारे में जानकारी दी। सभा में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग भी मौजूद थे। उन्होंने रवींद्र शाह की पत्रकारिता को नजदीक से देखा था और इंदौर के ही होने के नाते उनके कई निजी अनुभव भी उनके साथ रहे थे। गर्ग साहब ने लोगों से मिलते जुलते रहना और हमेशा कुछ नया और बेहतर करने को लेकर व्याकुल रहना शाह के बेहतर पत्रकार होने के पीछे की वजह बताया।

स्टार न्यूज के दीपक चौरसिया भी यहां मौजूद थे। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत का श्रेय शाह साहब को दिया। उन्होंने बताया कि इंदौर में नई दुनिया में जब रवींद्र शाह थे तो उन्होंने पहला आलेख उन्हें एसाइन किया और वह प्रकाशित हुआ। इस तरह पत्रकारिता में आने का मार्ग प्रशस्त हुआ। दीपक ने रवींद्र शाह के नाम को अमर रखने के लिए कोई बड़ा प्रयास जल्दी करने का आश्वासन भी दिया। दीपक के लिए ये एक निजी क्षति है और वो इससे बेहद भावुक दिखे।  

भड़ास4मीडिया से जुड़े पत्रकार यशवंत सिंह ने रवींद्र शाह के कठोर बॉस की छवि पर प्रकाश डाला। यशवंत ने पत्रकारों की नई पौध की बेहतर ट्रेनिंग के लिए उनके व्यक्तित्व के इस पहलू को सराहा। इस सभा में ऐसे कई युवा पत्रकार भी मौजूद थे जिनके पत्रकारिता जीवन की शुरुआत शाह साहब के मार्गदर्शन में हुई थी। यशवंत ने कहा कि पिछले साल होली में आलोक तोमर गुजर गए और इस बार होली के आसपास ही रवींद्र शाह का असामयिक निधन हुआ। इन दोनों लोगों से बहुत कुछ जानने सीखने को मिला। दोनों लोगों की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए जरूर कुछ किया जाना चाहिए।

आज तक चैनल के धीरेंन्द्र पुँढीर और भुवनेश सेंगर के अलावा एनडीटीवी के अखिलेश शर्मा ने भी रवींद्र शाह के साथ उनके जीवन के अनुभवों को साझा किया। धीरेंद्र ने एक बड़े भाई सदृश शाह साहब के साथ जीवन के अनुभव बांटे तो भुवनेश ने हरसूद की पत्रकारिता के दस्तावेजीकरण को रवींद्र शाह के पत्रकारिता जीवन का एक अहम योगदान दिया। अखिलेश ने दीपक चौरसिया की तरह अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत के लिए शाह साहब को श्रेय दिया तो साथ पत्रकारिता में उनकी दी गई सीख को भी साझा किया।  वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह ने मी़डिया छात्रों को पढ़ाते हुए शाह साहब के द्वारा ब्रॉ़डकास्ट जर्नलिज्म को समझाने में उनकी मदद का जिक्र किया और साथ ही कुछ निजी अनुभवों को भी साझा किया। रवींद्र शाह के बारे में अपने अनुभव व अपनी बातें रखते हुए शेष नारायण भावुक हो उठे।

आनंद तिवारी और अमित तिवारी ने इसे एक निजी क्षति बताते हुए शाह साहब के जाने को अपने जीवन की अपूर्णनीय क्षति बताया। अमित ने कहा दिल्ली में जबसे आया तीन चीजें हमसा साथ रहीं। यहां की भागदौड़ की जिंदगी, ढेर सारा तनाव और उनसे लड़ने के लिए रवींद्र शाह का साथ। भागदौड़ और तनाव तो अब भी है लेकिन शाह साहब नहीं रहे। आजाद न्यूज के अमित शर्मा ने भी यहां अपने अनुभव साझा किए।

आशुतोष भाटिया लंबे समय से रवींद्र शाह के साथ जुड़े हुए थे यहां उनके बारे में बात करते हुए वो बहुत भावुक हो गए। कुछ ऐसे ही अंदाज में दुर्गानाथ स्वर्णकार ने उन्हे याद करते हुए कहा की अब भी विश्वास करना मुश्किल है कि वो हमारे बीच नहीं रहे।  वरिष्ठ पत्रकार गोविंद सिंह और एक समय रवींद्र शाह को अपने चैनल एस 1 की जिम्मेदारी सौंपने वाले विजय दीक्षित ने आखिर में अपनी बात रखते हुए इस सभा का समापन किया। आयोजन में दर्जनों पत्रकार मौजूद थे।

स्टार न्यूज के जाने-माने एंकर और पत्रकार दीपक चौरसिया (बिलकुल बाएं) भी आयोजन में पहुंचे.

रवींद्र शाह जी के बारे में अपने संस्मरण सुनाते वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग.

दिल्ली के तकरीबन हर चैनल अखबार से लोग श्रद्धांजलि सभा में शिरकत करने पहुंचे.

कई घंटे तक लोग आते रहे और पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि सभा में शिरकत कर विचारों को सुनते रहे.

श्रद्धांजलि सभा में चिंतनमग्न मुद्रा में भास्कर समूह के ग्रुप एडिटर श्रवण गर्ग.

पुष्पांजलि अर्पित करते लाइव इंडिया के प्राइम टाइम एंकर डा. प्रवीण तिवारी

छठे चरण में कम से कम आधा दर्जन विधायकों की हार निश्चित

पांचवें चरण का मतदान सम्पन्न होने के साथ ही विभिन्न दलों के सेनापतियों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना ‘लंगर’ डाल दिया है। छठे चरण में 13 जिलों के दो करोड़ दस लाख मतदाता अपने लिए 68 विधायक चुनेंगे। इसके साथ ही 49 उन विधायकों का ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी पुनः लिखा जाएगा, जिन्होंने 2007 के विधान सभा चुनाव में जीत का परचम फहराया था। इसमें से कितने पास और कितने फेल होते हैं इसका पता 6 मार्च को मतगणना वाले दिन चलेगा, लेकिन इतना तय हो गया है कि कम से कम करीब आधा दर्जन विधायकों को हर हाल में हार का सामना करना पडे़गा। ऐसा कई विधान सभा क्षेत्रों में दो-दो विधायकों के आमने-सामने आने से हुआ है। यह हालात परिसीमन के बाद बने हैं। अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कई विधायकों ने अपना विधानसभा क्षेत्र बदल दिया है। विधायकों के आमने-सामने होने से कई सीटों पर मुकाबला काफी रोचक हो गया है।

एक सीट पर दो विधायकों के आमने-सामने होने से जिन दिग्गज नेताओं और विधायकों पर हार की तलवार लटक रही है, उसमे बसपा सरकार में मंत्री और विधायक रामवीर उपाध्याय, चंन्द्रवीर सिंह, लखीराम नागर, धर्मसिंह सैनी, हाजी अलीम (सभी बसपा) के अलावा रालोद के हाजी याकूब, सपा के शाहिद मंजूर, कांग्रेस के इमरान मसूद, भाजपा के वीरेन्द्र सिरोही और तृणमूल कांग्रेस के श्याम सुंदर आदि हैं। जिन प्रमुख सीटों पर विधायक के सामने विधायक है उसमें हाथरस की सिंकदराराऊ, मेरठ की सरधना और किठौर, सहारनपुर की नकुड़, बुलंदशहर की बुलंदशहर विधान सीट तथा मथुरा की मांठ विधान सभा क्षेत्र शामिल है। मांठ में मुकाबला एक विधायक और सांसद जयंत चौधरी के बीच सिमटा हुआ है।

जो खास विधायक आमने-सामने हैं उसमें सिकंदराराऊ (हाथरस) से बसपा के कद्दावर नेता और विधायक रामवीर उपाध्याय का मुकाबला समाजवादी पार्टी के विधायक यशपाल सिंह चौहान से है। यशपाल भाजपा के टिकट से 2007 में जीते थे लेकिन भाजपा से नाखुश होकर उन्होंने हाल में ही सपा का न केवल दामन पकड़ा था, बल्कि टिकट हासिल करने में भी सफल रहे थे। इसी प्रकार सरधना (मेरठ) से बसपा विधायक चन्द्रवीर सिंह का मुकाबला हाजी याकूब से है, जो राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। 2007 का चुनाव हाजी अपनी पार्टी ‘उत्तर प्रदेश युनाइटेड डेमोक्रेटिव फ्रेट’ से जीते थे। बाद में हाजी साहब ने अपनी पार्टी का बसपा में विलय कर लिया था, लेकिन वह वहां स्थायी ठिकाना नहीं बना सके और 2012 आते-आते हालात कुछ ऐसे बन गए कि उन्हें बसपा से नाता तोड़कर रालोद के बैनर तले चुनाव लड़ना पड़ रहा है। 2007 में उन्होंने अपने फ्रंट का बसपा में विलय किया था तो इस बार उनका फ्रंट रालोद के साथ चला गया।

किठौर (मेरठ) में बसपा विधायक लखीराम नागर का मुकाबला सपा विधायक शाहिद मंजूर से है। नकुड़ (सहारनपुर) से बसपा सरकार में मंत्री रहे धर्म सिंह सैनी का मुकाबला कांग्रेस के इमरान मसूद से हो रहा है। पिछली बार इमरान निर्दलीय जीते थे। बुलंदशहर शहर से बसपा के हाजी अलीम का मुकाबला भाजपा के वीरेन्द्र शाही से है। 2007 में मांठ (मथुरा) से अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस से चुनाव जीते विधायक श्याम सुंदर शर्मा ने चुनाव जीतने के बाद बसपा का दामन थाम लिया था, लेकिन जब वहां से वह टिकट हासिल नहीं कर पाए तो तृणमूल कांग्रेस से चुनावी मैदान में कूद पड़े। उनके लिए जीत आसान नहीं लग रही है। शर्मा जी के सामने रालोद के सांसद जयंत चौधरी डटे हैं। उक्त विधायकों के अलावा अपने जमाने के चर्चित रिटायर्ड आईएएस हरदेव सिंह उर्फ बाबा भी एतमादपुर (आगरा) से रालोद के टिकट से अपनी किस्मत अजमा रहे हैं। उनका मुकाबला बसपा विधायक धर्म पाल सिंह से है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

असम में सरकार रिपोर्टरों को देगी लोगो, गैर पत्रकार वाहनों पर नहीं लिख सकेंगे प्रेस

गुवाहाटी : असम से प्रकाशित होने वाले अखबारों के मालिक, संपादक और मीडिया हाऊसों में काम करने वाले गैर पत्रकार अब अपनी गाड़ियों पर प्रेस नहीं लिख पाएंगे। गत विधानसभा चुनाव से पहले कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को लैपटाप का तोहफा देने वाली असम की सरकार अब रिपोर्टरों को लोगो देने जा रही है ताकि उस लोगो को वे अपनी गाड़ी पर चिपका कर रिपोर्टर होने की पहचान आसानी से दे सकें और सुरक्षा कर्मी उन्हें असली रिपोर्टर जान कर जांच-पड़ताल न करे अथवा सुरक्षित जगहों में प्रवेश करने दे।

सरकार यह कवायद असम पुलिस के सुझाव पर करने जा रही है। पुलिस लंबे समय से शिकायत कर रही थी कि कुछ असामाजिक तत्व अपनी गाड़ियों पर प्रेस लिखवा कर सुरक्षाकर्मियों को चकमा देते हैं। और इतना ही नहीं पेपर बेचने वाला, प्रिंटिंग प्रेसों में काम करने वाले और यहां तक की मीडिया हाऊसों में काम करने वालों के रिश्‍तेदार भी प्रेस लिख कर सड़कों पर उतरते हैं और वे अनेकों बार पुलिस को प्रेस से होने का धौंस दिखा कर निकल जाते हैं। पुलिस के अधिकारियों ने बताया कि राज्य का सूचना विभाग एक विशेष लोगो तैयार कर रहा है जो सिर्फ रिपोर्टरों को दिया जाएगा। उनका कहना था कि जल्द ही सभी मीडिया हाऊसों को अपने रिपोर्टरों की सूची देने के लिए कहा जाएगा ताकि अप्रैल महीने तक उन्हें लोगो मुहैया कराया जा सके।

गुवाहाटी से नीरजझा की रिपोर्ट.

गोवा में अपनी ही बिछाई जाल में फंसी कांग्रेस, साख दांव पर

गोवा को भगवान परशुराम की धरती कहा गया है. पौराणिक कथाओं के अनुसार परशुराम ने समुद्र में तीर मार कर इस जगह को अलग कर दिया था. कालांतर में ये शिलाहर, कदम्बा, बहमनी, आदिलशाह और उसके बाद करीब ४५० वर्षों तक पुर्तगालिओं  के अधीन रहा. सन १९६३ में गोवा, दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जाना गया. यहाँ पर पहली बार विधान सभा चुनाव उसी साल हुआ. महाराष्ट्र गोमान्तक पार्टी के दयानंद बंदोड़कर राज्य के पहले मुख्य मंत्री बने और उनकी अगुआई में पार्टी ने सन १९६४, १९६७ और १९७२ का चुनाव जीता. बंदोड़कर अपने मृत्यु पर्यंत यहाँ के मुख्यय मंत्री बने रहे. उनका देहांत १९७३ में हुआ और फिर उनकी पुत्री शशिकला काकोडकर मुख्यमंत्री बनी और सन १९७९ तक उनका शासन रहा.

उसी साल पहली बार इस केंद्र शासित प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया गया. सन १९७९ के दिसंबर में हुए चुनाव में पहली बार महाराष्ट्र गोमान्‍ताक पार्टी को करारा झटका लगा, जब कांग्रेस पार्टी जीत कर आई और सत्तरी रजवाड़े के प्रताप सिंह राने १९८५ में मुख्य मंत्री बने. इनका शासन १९९० तक रहा. ३० मई १९८७ को गोवा को स्वतंत्र राज्य का दर्ज़ा मिला. मगर तब से लेकर कई सालों तक गोवा राजनितिक अस्थिरता का केंद्र रहा. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कई सन १९९० से २००५ के बीच में १५ मुख्यमंत्री बदले गए, जिनमें प्रताप सिंह राणे से लेकर, चर्चिल अलेमाओ, डॉ. लुईस प्रोटो बर्बोसा, रवि नायक, डॉ. विल्फ्रेड डिसूजा, लुज़िनो फलेरियो और फ्रांसिस्को सरदिन्हा के नाम शामिल हैं.

भारतीय जन्नत पार्टी गोवा में पहली बार सत्ता में सन २००० में आई. आईआईटी मुंबई से शिक्षा प्राप्त मनोहर पर्रीकर मुख्यमंत्री बने और उनका शासन पांच साल से कुछ कम समय तक रहा. जनवरी २००५ में उनकी सरकार अल्पमत में आ गयी, जब उनकी पार्टी के चार विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया. पर्रीकर विधानसभा पटल पर अपना बहुमत साबित करने में असफल रहे और राज्य में कुछ समय के लिए फिर से राष्ट्रपति शासन लगा दिया. मगर जून २००५ में विपक्ष ने नेता प्रताप सिंह राणे फिर से मुख्य मंत्री बने और इस तरह अब तक वो ६ बार राज्य के मुख्यमंत्री पद पर रह चुके हैं. सन २००७ के आम चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पायी. कांग्रेस पार्टी को १७ सस्तें मिली जब कि भारतीय जनता पार्टी १४ सीटें ही बटोर पायी. राष्‍ट्रीय कांग्रेस पार्टी को ३ सीट मिली. एक ज़माने से राज करती चली आई महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी सिर्फ २ सीटें ही जीत पाई, जबकि चर्चिल अलेमाओ का गोवा बचाओ फ्रंट २ सीट ले गया. यूजीडीपी को सिर्फ एक सीट मिली जब कि एक निर्दलीय उम्मीदवार जीता. काफी जद्दो-जहद के बाद दिगंबर कामत ४० सीटों वाले सदन में अपना बहुमत साबित कर मुख्यमंत्री बने.

इस बार गोवा के चुनावी मैदान में कुल २१५ उम्मीदवार खड़े हैं. मगर अब तक के रुझान से साफ़ ज़ाहिर है कई सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को अपनी ज़मीन बचाना बहुत ही मुश्किल होगा. इसके कई कारण है. ये सही है कि मुख्यमंत्री दिगंबर कामत अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे और कांग्रेसी नेतागण हर बार यही दोहराते हैं कि इतने सालों बाद कम से कम गोवा में एक स्थिर सरकार तो थी. मगर सच ये है कि उनका प्रशासन बहुत ही लचर रहा और गठबंधन दल का हर मंत्री मनमानी करता रहा, चाहे वो बाबुश मोंसेरात हों या फिर अलेमाओ बंधू या फिर कोई और. दिगंबर कामत को अपनी कुर्सी बचाने की पड़ी रही और इसीक्रम में गोवा कानून-व्यवस्था से लेकर और कई जगहों पर फिसड्डी बन गया. सैलानियों का स्वर्ग कहा जाने वाला गोवा इस दौरान, ड्रग और माफिया का अड्डा बन गया, दूसरी तरफ खनन माफिया से लेकर कसीनो माफिया तक अपनी मनमानी करते रहे और सरकार आँखे मूंदे रही.

गोवा के प्रभारी कांग्रेस महासचिव बीके हरी प्रसाद भी घटक दल के बेलगाम मंत्रियों पर अंकुश लगाने में नाकामयाब रहे. उसके बाद जगमीत सिंह बरार को राज्य का प्रभारी बना दिया गया. शुरू में उन्होंने भी कई डींग-पैतरे दिखाए मगर कुछ ही महीनों के भीतर वो भी अलेमाओ और राणे के कुनबे में समा बैठे. ज़ाहिर है, राज्य की चरमराती कानून-व्यवस्था, शिक्षण माध्यम वाले बिल पर विवाद, कानकोण में गिरि जनों पर हुए अत्याचार से लेकर ऐसे और कई मुद्दे हैं, जिसके मद्देनज़र राज्य से बहुत से मतदाता कांग्रेस से अपना मुंह मोड़ सकते हैं. उसपर से तुर्रा ये कि टिकट बांटने में और भी अंधेरगर्दी हो गयी. आस्कर फर्नांडिस की अध्यक्षता में ४० सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची तीन खेप में आई. इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में और भी रोष फैल गया. कुल मिला कर ये हुआ कि कई जगहों पर पार्टी के कर्मठ और पुराने कार्यकर्ताओं की जगह परिवारवाद को प्राथमिकता दी गयी और अंजाम ये हुआ कि आज कांग्रेस पार्टी को कम से कम १० जगहोंपर बागी उम्मीदवारों से लोहा लेना पड़ रहा है.

इस बार कांग्रेस पार्टी राज्य की ४० सीटों में से ३३ पर चुनाव लड़ रही है जब कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को ७ सीटें दी गयी है. पिछले चुनाव में राकपा को ३ सीटें मिली थी. मगर इसबार इसकी स्थिति थोड़ी पतली लग रही है और अगर स्थानीय राजनितिक पंडितों की माने तो शायद इसबार राकपा को एक या दो सीटों से ही संतोष करना पड़ सकता है. दूसरी तरफ कांग्रेस खेमे में पहली २२ सीटों की जारी लिस्ट में १२ सीटें परिवारवाद की भेट चढ़ गया. इसकी सब से बड़ी मिसाल थी संत क्रूज़ विधान सभा क्षेत्र से ४ बार विधायक रह चुकी विक्टोरिया फफ्नान्दिस, जिनका टिकट काट कर बाबुश मोंसेरात को दे दिया गया. इसके पीछे की गणित ये है कि अब तक मोंसेरात तलेगाओ से लड़ते थे. मगर गोवा के नए रीजनल प्लान के तहत करीब ५० लाख वर्ग मीटर ज़मीन को आवास क्षेत्र में लाने की योजना है और बाबुश वैसे भी गोवा के भू-माफिया के पुराने चहेते रहे हैं. इसलिए कांग्रेस के कर्णधारों ने उनकी ही जमकर वकालत की और टिकट देने में कामयाब रहे. उधर कुपित विक्टोरिया ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर अपने पुत्र रुडोल्फ फर्नांडिस को मैदान में उतार दिया. अब ये कहा जा रहा है कि विक्टोरिया कम से कम कांग्रेस को ३ विधान सभा क्षेत्रों में नुकसान पहुंचा सकती है. कांग्रेस की दूसरी लिस्ट में ७ नाम जारी किये गए जिसमें भाजपा से टूट कर आये दो विधायकों को भी टिकट दिया गया.

मगर सब से ज्यादा खींचतान बाकी के ४ सीटों को लेकर हुई और एक बार फिर ये साबित हो गया कि कांग्रेस पार्टी फिर अपनी ही बिछाई जाल में फंस गयी है. इसमें सबसे पहला बिंदु रहा मुर्मुगाओ सीट जिसमें सैफुल्लाह खान और युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सल्कल्प अमोनकर के बीच झगड़ा था. कांग्रेस आला कमान वहां पर एक मुसलमान को टिकट देना चाहती थी, क्यों कि गोवा के चाणक्य कहे जाने वाले विजय सरदेसाई को फतोर्दा से टिकट देने की बात चल रही थी. राहुल गाँधी की टीम ने वर्तमान युवा कांग्रेस की अध्यक्ष प्रतिमा कुटिन्हो को फतोर्दा से टिकट देने का ऐलान कर और मुसीबत खड़ी कर दी. मगर गोवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और दिगंबर कामत के चहेते संकल्प ने आखिर में मुर्मुगाओ से बाजी मार ली. फतोर्दा से सबसे दबंग कहे जाने वाले उम्मीदवार विजय सरदेसाई ने अहमद पटेल से लेकर सैम पित्रोदा के दरबार की भी कई बार प्रदक्षिणा कर डाली और दिगंबर कामत ने तो भरी सभा में यहाँ तक कह दिया कि किसमें हिम्मत है कि सरदेसाई का टिकट काट दे? मगर अंततः सरदेसाई मुगालते में मारे गए और उनकी जगह एक के शेख को फतोर्दा से टिकट दी गयी. विजय सरदेसाई अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में हैं और कहा जा रहा है कि वो अपने अपमान का बदला कांग्रेस को कम से कम ४ सीटों पर हरा कर ही लेंगे. फतोर्दा में तो कांग्रेस हारेगी ही, दिगंबर कामत के लिए भी सरदेसाई खासी मुसीबत मडगाव में बन सकते हैं क्यों कि भले ही मोती दोंगोर के मुसलमान दिगंबर को बाबा कहते हों, मगर सरदेसाई का दबदबा वहां पर भी कुछ कम नहीं है.

प्रदेश कांग्रेस प्रमुख सुभाष शिरोडकर की हालत थोड़ी ठीक है क्यों कि वहां पर भाजपा के विधायक और कभी शिरोडकर के सहायक रहे महादेव नाइक को अपनी ही पार्टी के बागी विश्वास प्रभुदेसाई से लोहा लेना पड़ रहा है. और जगहों पर कांग्रेस की हालत बहुत ठीक नहीं कही जा सकती है क्यों कि नए कार्यकारी अध्यक्ष फ्रांसिस्को सरदिन्हा इस बात को खुद मानते हैं कि पार्टी को परिवारवाद महंगा पड़ सकता है क्यों कि गोवा की जनता ऐसे हालत से तंग आ चुकी है. मगर जगमीत सिंह बरार और आस्कार फर्नांडिस आज भी ताल ठोंक कर कहते हैं कि कांग्रेस अकेले ही २५ सीट ले आयेगी. उनकी गणित और अर्थशास्त्र का आधार तो वे ही जाने मगर वो इस बात को भूल जाते हैं कि पिछली सरकार में साथ में रही महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी ने इस बार कांग्रस का साथ क्यों छोड़ दिया. इस चुनाव में एमजीपी भाजपा के साथ है और वो कम से कम ५ सीटें जीत लेने की स्थिति में है.

इस बार प्रणब मुखर्जी के बदले आस्कार फर्नांडिस और उनकी पत्नी ब्लोसम फर्नांडिस ने पणजी में कांग्रेस पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया. मगर उसमें भी भयानक गलती हो गई. कुशासन और भ्रष्टाचार को ढंकने के उत्साह में घोषणा पत्र में उस नेउरा गाँव में भी पुल बनाने की बात कही गयी जहाँ कोई नदी है ही नहीं. पार्टी ने गोवा वासियों को १५० यूनिट तक मुफ्त बिजली देने की घोषणा की है और गोवा को झुग्गी-झोपड़ियों से भी मुक्त करने की बात की है. मगर आज की सच्चाई यही है कि गोवा में कांग्रेस को शायद पराजय का मुंह देखना पड़े क्यों कि ज़मीनी हालत उसके खिलाफ है. एक तो पार्टी के बीच अंदरूनी कलह, दूसरा परिवारवाद के प्रति जन आक्रोश और तीसरा विगत पांच वर्षों में कांग्रेस का ढुलमुल और लचर प्रशासन शायद गोवा की जनता को कांग्रेस से मुंह मोड़ लेले को मजबूर करेगा.

ऐसे में अगर पार्टी को १६ सीटें भी मिल गयी तो वो एक बार फिर से सरकार बनाने का दावा पेश करेगी. अब देखना है कि ३ मार्च को जनता का ऊँट किस करवट बैठता है मगर अब तक के रुझान और जन मानस का रुख देख कर तो यही लगता है कि शायद वो १३ से १४ सीटों पर ही सिमट जाए. कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी ने एक बार फिर से गोवा के मतदाताओं से पार्टी को वापस सत्ता में लाने की पुरजोर अपील तो की मगर कई कार्यकर्ताओं के चेहरे इस बात को भली-भांति दर्शा रहे थे कई वो खुश नहीं हैं. यही हाल पार्टी के चुनाव मैनेजरों का और पार्टी के पर्यवेक्षकों का हैं, जिनको दिगंबर कामत सरकार के खिलाफ शिकवे-शिकायतों का पुलिंदा ही मिल रहा है.

लेखक अजय एन झा वरिष्‍ठ पत्रकार और समालोचक हैं. ये हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, आजतक, डीडी न्‍यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्‍ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क ajayjha30@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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भाजपा पहुंच सकती है सत्‍ता के नजदीक, पर बागियों ने पैदा की बेचैनी

‘हिंद युग्म’ आज करेगा चार पुस्तकों का विमोचन और लगेगा ब्लॉगरों का मेला

हिंद-युग्म विगत छः वर्षों से इंटरनेट के माध्यम से हिंदी भाषा-साहित्य का प्रचार-प्रसार कर रहा है। समय-समय पर हिंद-युग्म ने अपनी यात्रा में कई मील के पत्थर गाड़े हैं। 2008 से हिंद-युग्म नई दिल्ली में आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेला में भी शिरकत करता रहा है। 2010 के विश्व पुस्तक मेला से हिंद-युग्म ने अपने प्रकाशन की शुरुआत की थी जो कि अब बहुत विस्तार पा चुका है। हिंद-युग्म से प्रत्येक माह कई सारी पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। हिंद-युग्म अपनी प्रकाशन की गुणवत्ता के लिए भी विख्यात है।

यह लगभग सभी को पता है कि 20वाँ विश्व पुस्तक मेला नई दिल्ली के प्रगति मैदान में 25 फरवरी से 4 मार्च 2012 के दरम्यान लग रहा है। यहाँ हिंद-युग्म का अपना स्टॉल भी है (हॉल नं 11 में स्टॉल नं 59)। प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी हिंद-युग्म साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजित कर रहा है। हिंद-युग्म 27 फरवरी 2012 को विश्व पुस्तक मेला में एक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है जिसमें हिंद-युग्म से प्रकाशित नवीनतम पुस्तकों का विमोचन होगा तथा इंटरनेट माध्यम के बरक्स पुस्तकों की उपादेयता पर संगोष्ठी होगी। हिंद-युग्म ने इस कार्यक्रम को 'ब्लॉगर मेला' का नाम दिया है।

कार्यक्रम की संक्षिप्त रूपरेखाः

पुस्तकों का लोकार्पण

जुगलबंदी (युगल काव्य-संग्रह, कवि-दंपति- विजेंद्र एस विज, संगीता मनराल)

क्षितिजा (कविता-संग्रह, कवयित्री- अंजु अनु चौधरी)

दर्द की महक (कविता-संग्रह, कवयित्री- हरकीरत हीर)

शब्दों की तलाश में (कविता-संग्रह, कवि- मुकेश कुमार तिवारी)

आमंत्रित अतिथिः

यशवंत सिंह, प्रख्यात ब्लॉगर एवं भड़ास फॉर मीडिया डॉट के संपादक

इमरोज, प्रख्यात चित्रकार

उद्‍भ्रांत, प्रख्यात साहित्यकार

रामकुमार कृषक, वरिष्ठ कवि एवं जनवादी पत्रिका 'अलाव' के संपादक

विजय शंकर, वरिष्ठ कवि-लेखक एवं 'क' पत्रिका के संपादक

विचार-बिंदु- ब्लॉग के बरक्स पुस्तकें

स्थानः सम्मेलन कक्ष (Conference Room No.) 2, हॉल नं- 6, पहली मंजिल

20वाँ विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान, नई दिल्ली (यह हॉल गेट नं 2 के नजदीक है, इसके सामने ही भैरव मंदिर मार्ग वाली पार्किंग है)

समयः शाम 5:00 बजे से 8 बजे तक

दिनांकः 27 फरवरी 2012

प्रेस विज्ञप्ति

राजनाथ सिंह सूर्य और दयानंद पाण्‍डेय का एक दूसरे को आईना दिखाने का काम अंजाम तक पहुंचना चाहिए

इन दिनों भड़ास को दयानंद पाण्डेय के उद्वेलित उद्वेलनों ने बहुत आप्लावित कर रखा है. इसका प्रारम्भ एक साक्षात्कार से हुआ जो डॉ. मुकेश मिश्रा ने इसी भड़ास के लिए किया. “सीएम के दबाव में मैनेजमेंट ने ट्रांसफर किया तो इस्तीफा दे मारा” शीर्षक से छपा यह साक्षात्कार अच्छा था, सुरुचिपूर्ण और प्यारा. कहीं से भी उसमे कड़वाहट, गर्माहट, आहट, तिक्तता या रिक्तता नज़र नहीं आ रहा था. तब तक जब तक उसमें दयानन्द पाण्डेय नहीं कूदे. मैं “कूदना” शब्द का प्रयोग इसीलिए कर रहा हूँ क्योंकि कई लोग यह मान सकते हैं और शायद सोचते हों कि जब इंटरव्यू राजनाथ सिंह ‘सूर्य’ का था तो इस प्रसंग में दयानंद पाण्डेय का भला क्या काम था?

यह कुछ ऐसा ही हुआ कि कथा महाभारत की चल रही हो और अचानक से रामायण के कुछ पात्र उसमें प्रवेश कर कथा की गति को किसी और ही दिशा में मोड़ दें. कुछ उसी तरह जैसे वर्तमान में भड़ास पर प्रकरण राजनाथ सिंह सूर्य बनाम दयानंद पाण्डेय का चल रहा है और मैं उसमे बीच में कूदने की कोशिश कर रहा हूँ. लेकिन शायद एक हक दयानंद पाण्डेय को भी था राजनाथ सिंह सूर्य के इंटरव्यू के सन्दर्भ में टिप्पणी करने का और एक हक मुझे भी है इस चल रहे द्वंद्व में निर्द्वन्द्व भाव से अवतरित होने का. वह हक है सार्वजनिक जीवन के आयामों का.

यदि राजनाथ सिंह सूर्य ने अपना एक इंटरव्यू भड़ास पर प्रकाशित होने के लिए मुकेश मिश्रा को दिया तो उन्हें यह बखूबी ज्ञात था कि यह अब उनका निजी मामला नहीं रह गया. जब बात एक सार्वजनिक मंच पर आएगी, जब आम आदमी इन बातों को पढ़ेगा तो वह इसे अपनी दृष्टि, अपनी निगाह, अपने परिदृश्य, अपनी पृष्ठभूमि, अपने विचारधारा के दृष्टिगत देखेगा और परखेगा. वह इन्ही बातों के अनुरूप अपना एक निष्कर्ष भी निकालेगा और शायद उसी के आधार पर अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया भी करेगा. तात्पर्य यह कि जब भी किसी भी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक मंच से कोई बात कही जायेगी तो कहने वाले व्यक्ति को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अपनी बात कहने के साथ ही उसने सर्व-साधारण को उस पर क्रिया-प्रतिक्रिया और टीका-टिप्पणी का पूरा अधिकार दे दिया.

इसी प्रकार से जैसे ही कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर गया, वह यह अधिकार खो बैठता है कि अपने आप को लोगों की निगाह से एकदम परे रख सके. जब आप जनता की निगाह में हैं तो तमाम आँखों की रोशनी तो आप पर पड़ेगी ही. मैं यह भी दावे से कह सकता हूँ कि राजनीति, पत्रकारिता, समाज सेवा आदि ऐसे प्रोफेशन हैं जिन्हें बड़े आराम से सार्वजनिक जीवन का हिस्सा माना जा सकता है. पुलिस की नौकरी भी. इसीलिए यदि एक पुलिस अधिकारी के रूप में, एक एसपी या डीआईजी के रूप में अमिताभ ठाकुर की कोई बुराई होती है, अमिताभ ठाकुर पर कोई प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं होती हैं तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि जनता को, जनता के नुमाइंदों को, जनता की आँख-कान के रूप में मीडिया को अमिताभ ठाकुर के कार्य और आचरण पर टीका-टिप्पणी करने का पूरा अख्तियार है. मुझे इस बात से नाराज़ हो जाने अथवा उसे बुरा मानने का शायद कोई उचित कारण नहीं है. हाँ, साथ ही मुझे यह भी अधिकार है कि मैं अपने पक्ष की बात उसी शिद्दत से अपने शब्दों अथवा अपने कृत्यों से सामने रखूं. यह नियम राजनाथ सिंह सूर्य पर भी उतना ही लागू है जितना दयानंद पाण्डेय, मुकेश मिश्रा, अमिताभ ठाकुर, मनोज दुबे या किसी और पर.

इसके साथ एक और बात मैं कहना चाहूँगा कि मेरी दृष्टि में सार्वजनिक टिप्पणी के प्रति हम सबों को अपना नजरिया कुछ बदलना भी पड़ेगा. इस सम्बन्ध में मैं कुछ बातों पर विशेष बल दूँगा. एक तो यह कि मैं किसी को इसीलिए अपना शत्रु नहीं मानने लगूं क्योंकि उसने मुझ पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी कर दी. जब मैं सार्वजनिक जीवन में हूँ तो मुझे अच्छा-बुरा दोनों समान रूप से स्वीकार करना होगा. दूसरी बात यह कि मुझे इस बात से कतराना नहीं चाहिए कि यदि मुझ पर कोई आक्षेप लगे हैं तो मुझे चुप रहना चाहिए. मेरा यह मानना है कि यदि सामने वाले को आरोप लगाने का अधिकार है तो मुझे अपना पक्ष रखने, अपना बचाव या आक्रमण करने का भी उतना ही अधिकार है, शायद मेरा कर्तव्य भी. मैं हमेशा से यही मानता हूँ कि ऐसे समय में चुप वही लोग हो जाया करते हैं, जिनके पास शायद कहने कोई कुछ नहीं होता और छिपाने को बहुत कुछ.

मुझ पर तुम एक हज़ार आरोप लगाओ, मैं एक हज़ार आरोपों का उत्तर दूँगा, यदि मुझे तुम्हारा बर्ताव कुछ व्यक्तिगत द्वेषभाव से ग्रस्त लगेगा तो मैं तुम पर दोहरी गति से हमला भी करूँगा. यह तो हुआ वीरोचित गुण. लेकिन यह देना कि अब मैं उस आदमी की बात का क्या उत्तर दूँ या मैं इसका उत्तर देना उचित नहीं समझता, मेरे जैसे आदमी के मन में ऐसी बातें कहने वाले व्यक्ति के प्रति कुछ शंका ही पैदा करता है. हमारा देश तो होली खेलने वाला देश है, आपस के गुण-दोष का भी सार्वाजनिक रूप से होली खेला जाना चाहिए. हममे से कोई भगवान नहीं है. मैं जानता हूँ कि मैंने अब तक के चालीस से ऊपर वर्षों के जीवन में इतने अधिक पाप कर दिये हैं कि यदि वास्तव में हमारे धर्मग्रंथों की तर्ज़ पर संताप और पाप की सजा के प्रावधान हुआ करें तो मैं शायद चालीस करोड़ जन्मों को यही सब करता रह जाऊँगा. मैं यह भी जानता हूँ कि बहुत सारे लोगों की दशा मुझे शायद कई गुणा बुरी ही बैठे. ऐसे में हमें अपने आरोपों को सुनना, उनका उत्तर देना और उनका मुकाबला करना एक आवश्यक आवश्यकता प्रतीत होता है. यह नियम हम सबो पर सामान भाव से लागू होता है.

एक बात और कहना चाहूँगा. मैं यह नहीं मानता कि अतीत की भूलों को भूले-बीसरे यादों की तर्ज़ पर किसी कोने में समेट देना चाहिए. मेरा यह मानना है कि हर जीवन का सिंहावलोकन होना चाहिए, उनके जीवनकाल में भी, उनके चले जाने के बाद भी. लेकिन इसके साथ टीका-टिप्पणी करने वाले व्यक्ति को दो बातें कभी नहीं भूलनी चाहिए- एक तो उसे अपनी टिप्पणियों के दौरान शिष्टता और सौम्यता के भावों को कभी नहीं छोडना चाहिए क्योंकि ये मानव समाज के अनिवार्य अंग हैं. दूसरा यह कि समस्त टिप्पणियाँ सत्यपरक और प्रामाणिक होनी चाहिए. मात्र व्यक्तिगत द्वेषभाव से ग्रस्त हो कर हमें किसी को लांछित नहीं करना चाहिए. ऐसा करने वाला व्यक्ति दूसरे का तो कम नुकसान करता है, अपना स्वयं अहित ज्यादा करता है क्योंकि इससे उसकी क्रेडिबिलिटी पर भारी धक्का लगता है- हमेशा, हमेशा के लिए.

इन बुनियादी संदेशों को प्रस्तुत करने के पीछे संकेत दोनों महायोद्धाओं राजनाथ सिंह सूर्य और दयानंद पाण्डेय से यह निवेदन करना था कि जो परस्पर एक-दूसरे को आईना दिखाने का सिलसिला शुरू हुआ है, उसे बीच रास्ते नहीं छोड़ कर गंतव्य तक पहुंचाना शायद देश और समाज के हित में ही होगा. दोनों ने अपने वक्तव्यों में तमाम छिटपुट तथ्य बिखेरे हैं पर अभी बहुत कुछ इनमें छिपा पड़ा है जिनका उजागर होना उचित ही होगा, अनुचित नहीं. भ्रम का बना रहना हमेशा ही सत्य के परिलक्षित हो जाने से ज्यादा नुकसानदेह होता है, यदि सत्य उतना कड़वा ना हो तो.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के वरिष्‍ठ आईपीएस अधिकारी हैं तथा इन दिनों रूल्‍स एवं मैनुअल्‍स विभाग में एसएसपी के रूप में कार्यरत हैं.

इस पूरे मामले के बारे में जानने के लिए नीचे दि गए लिंकों पर क्लिक करें –

नतिनी पूछे नानी से नानी चलबू गौने!

भावी पीढ़ी के लिए नासूर न बन जाए दयानंद पांडेय जैसे भड़ासियों का ‘राखी सावंत स्टाइल

निष्ठा, नैतिकता, चरित्र, शुचिता… सब बातें हैं बातों का क्या!

धुर विरोधियों ने भी मेरी निष्ठा, नैतिकता, चरित्र पर अंगुली नहीं उठाई : राजनाथ 'सूर्य'

'दयानंद पांडेय और राजनाथ सिंह सूर्य के आपसी विवाद को तूल न दें'

राजनाथ सिंह को खुली चुनौती दे रहा हूं कि मेरे खिलाफ़ आरोप सार्वजनिक करें!

दयानंद को निकाल दिया था, इसलिए वे भड़ास निकाल रहे : राजनाथ सिंह सूर्य

मार्निंग वाक या पत्रकारिता के नहीं, दलाली के चैंपियन हैं राजनाथ सिंह सूर्य

सीएम के दबाव में मैनेजमेंट ने ट्रांसफर किया तो इस्तीफा दे मारा

हादसे में जागरण के पत्रकार के भाई की मौत

 जालंधर : 'दैनिक जागरण' के पत्रकार जगदीश कुमार के छोटे भाई हरीश कुमार उर्फ काला की शनिवार रात सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। हरीश कुमार अपने पड़ोसी के किसी विवाद में उनकी मदद करने के लिए छोटा अली मोहल्ला स्थित घर से गांव लिद्दड़ा को रवाना हुए थे। वह एक्टिवा पर अभी गांव के गेट के करीब पहुंचे ही थे कि एक टेंपो के साथ एक्टिवा की भिडंत हो गई। हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोटें आई और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।

हरीश कुमार की पत्नी रजनी के अलावा दो बेटियां शाइना व हरसिमरन हैं। हरनामदासपुरा श्मशानघाट में रविवार को उनका अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि छोटे भाई राकेश कुमार ने दी। इस अवसर पर उनके पिता कुलदीप लाल, भाई राज कमल के अलावा पार्षद रजिंदर बेरी, मां भगवती सेवा समिति के प्रधान रमेश सहगल, डा. हरप्रीत सिंह, डा. आईपी सिंह सेठी, डा. आशु चोपड़ा, भाजपा नेता वरिंदर शर्मा, दर्शन कपूर, नरिंदर खोसला, सुभाष चन्द्र, विनोद कुमार व विभिन्न संस्थाओं के अलावा जागरण परिवार के सदस्य मौजूद थे। मुख्य महाप्रबंधक व स्थानीय संपादक निशिकान्त ठाकुर ने शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है। हरीश कुमार का रस्म चौथा मंगलवार सुबह 8.30 बजे हरनामदासपुरा श्मशानघाट में संपन्न होगा। साभार : जागरण

न्‍यूज इंटरनेशनल ने लांच किया ‘द सन ऑन सनडे’

दुनिया के सबसे बड़े मीडिया उद्योगपतियों में से एक रूपर्ट मर्डोक की कंपनी न्यूज़ इंटरनेशनल ने रविवार को ब्रिटेन में एक नया अखबार 'द सन ऑन सनडे' प्रकाशित करना शुरु किया है. इससे पहले यही कंपनी न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड नाम से रविवार को एक अखबार प्रकाशित करती थी लेकिन फोन टैप करने के मामले में फंसने के बाद इस अखबार को बंद करने की घोषणा कर दी गई थी.

इस कांड में अखबार के कई पूर्व और वर्तमान संवाददाताओं और अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था.मर्डोक ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नया अखबार भी न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के जैसा सफल होगा. द सन ऑन सनडे के पहले संस्करण के एक संपादकीय में लिखा गया कि पाठक पत्रकारों पर सभ्याचार के नियम पालन करने का भरोसा कर सकते हैं.बीबीसी  साभार :

बिना मेरी राय लिए उस छद्म पत्रकार के पत्र को आपने कैसे छाप दिया

आदरणीय यशवंत जी…. आपको लेकर मेरे दिमाग में एक अच्छी तस्वीर हैं…. ऐसी तस्वीर जिस पर कोई दाग नहीं है…. ऐसा इंसान जिसपर मीडिया मानुषों के बारे में सही गलत लिखने की हिम्मत है….. एक ऐसा मंच जिस पर दुखी आत्मा अपनी भड़ास निकालता है…. इन्हीं खासियतों की वजह से मैं भड़ास फार मीडिया का बहुत बड़ा फैन हूँ……. इस नाते मेरा आपकी साइट पर टिपण्णी करने का हक है…… और ये हक तब और हो जाता है जब आपकी साइट पर लिखे एक लेख में मुझे भी एक किरदार बना दिया जाता है…… बगैर मेरा पक्ष जाने……..

दरअसल आपने IBN 7 के जयशंकर से जुडी एक खबर छापी है…. जिसे रांची के ही एक वरिष्ठ पत्रकार ने भेजा है……. ऐसा आपने लिखा है…… और ये सच भी है क्योंकि मीलों दूर बैठे आपको कैसे पता कि रांची में फलां पत्रकार का फलां मामला है….. खैर उस महाशय को भगवान अकल दे…. लेकिन उस महाशय को मैं इतना जरूर कहना चाहूँगा कि छुप कर वार करने वाला कायर कहलाता है….. उनकी बातों में सच्चाई है तो फिर उन्हें अपने नाम के साथ लेख लिखना चाहिए था….. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया…. उन्हें मैं जानता हूँ…… वो ऐसा कर भी नहीं सकते….. क्योंकि दिमागी तौर पर वो दिवालिया हैं…

और अब शिकवा शिकायत जनाब यशवंत जी आपसे….. चूँकि आप भी एक पत्रकार हैं… तो आपको ये अंदाज़ा जरुर होगा कि जब कोई मामला हो तो दोनों पक्षों कि बात कही जाय….जब तक कि आप का इसमें निजी हित ना हो……और निजी हित पीत-पत्रकारिता कहलाता है…जहां तक मैं समझता हूँ आपको ना मुझसे और ना ही जयशंकर से कोई दुश्मनी होगी तो फिर आपसे ये पीत-पत्रकारिता कैसे हो गई महाशय…….

बिना मेरी राय जाने आपने उस छदम पत्रकार के पत्र को छाप दिया ….और इसी कारण लेख में कई त्रुटियाँ  हैं….जैसे जयशंकर कभी PTN न्यूज़ में कैमरामैन नहीं थे…..वह वहाँ भी रिपोर्टर थे और यहाँ भी करेस्पोंडेंट हैं…जबकि मैं NDTV को झारखण्ड में हे़ड करता हूं…  लेख में इस बात का भी जिक्र है कि चैनल ने हम बिहारियों को जगह भरने के लिए रख लिया……लेकिन सच बिलकुल अलग है…..चैनल में कोई भी मेरे परिवार या जान पहचान का नहीं है….मैं जो हूँ अपनी मेहनत और लगन के बलबूते हूँ……और इस पर मुझे गर्व है….

एक बात और कि जो पत्रकार साहब ने लेख आपको भेजा है वो भी दरअसल बिहार से सम्बन्ध रखते हैं…..और अगर उक्त वरिष्ठ पत्रकार के चाल चलन और चरित्र पर लिखा जाये तो एक किताब भी छप सकता है. आप खुद आकर इस बात की तस्दीक कर सकते हैं ..लेकिन मैं इन साहब पर कीचड़ उछालकर अपना कपड़ा दागदार नहीं करना चाहता.  अब आखिर में यही गुजारिश है आपसे कि मैंने जिन जिन बिन्दुओं को उठाया है उस पर आप आगे से ध्यान देंगे….. जिससे भड़ास की विश्वसनीयता बनी रहे……

एक बात और कहूँगा कि ऐसी परिपाटी का विरोध होना चाहिए क्योंकि आज मेरा और जयशंकर का नाम विवादों में है कल किसी और का, परसों किसी और का …..क्योंकि महाशय गला फाड़ प्रतियोगिता में हम पत्रकारों में एकता नहीं है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ.. और यह स्वाभाविक भी है. लेकिन सिर्फ इस कारण से अपनी बिरादरी का सार्वजनिक छिछालेदर हो ये ठीक नहीं है…….आशा है आप मेरी भावनाओं को अपने दिल और साईट पर जगह देंगे……..

हरिवंश शर्मा

एनडीटीवी

रांची


मूल खबर को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…  http://bhadas4media.com/article-comment/2810——-7—-.html

फ़तेह बहादुर पर जज नियुक्ति पत्र देने के लिए लाखों रुपये घूस मांगने का आरोप

: जज बनने के लिए मैं भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लूंगी – गगनगीत कौर :  नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव कुंवर फ़तेह बहादुर पर उच्च न्यायिक सेवा चयन प्रक्रिया में एक महिला अभ्यर्थी से परीक्षा परिणाम के बाद लाखों रुपये घूस मांगे जाने के गंभीर आरोप लगे हैं. इस पर पारदर्शिता के क्षेत्र में कार्यरत लखनऊ स्थित नेशनल आरटीआई फोरम द्वारा प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की सहायक महाधिवक्ता रह चुकीं गगन गीत कौर के अनुसार वर्ष 2009 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद के सामान्य वर्ग की कुल 24 सीटों की रिक्ति निकली.

इनमें पांच सीटों पर महिलाओं की नियुक्ति होनी थी. गगन गीत कौर साक्षात्कार तक पहुंचीं और नियमानुसार उनका चयन होना चाहिए था. कुछ प्रक्रियात्मक गड़बड़ियों से उनका नाम 12 जनवरी, 2010 के परिणाम में छूट गया. बाद में उनके प्रार्थना पत्र पर विचार करने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के चयन और नियुक्ति रजिस्ट्रार राजीव कुमार त्रिपाठी ने कुंवर फतेह बहादुर, प्रमुख सचुव, नियुक्ति को 1 सितंबर, 2010 और 5 मई, 2011 को पत्र लिखकर गगन गीत की नियुक्ति करने के निर्देश दिये. पत्र में यह भी लिखा था कि सरकार की तरफ से कौर की नियुक्ति का आदेश जारी किया जाए और इसकी एक प्रति इलाहाबाद उच्च न्यायालय को जल्द से जल्द भेजी जाए.

आरोप है कि नियुक्ति विभाग मामले को टालता रहा और सुनील कुमार (अनु सचिव, नियुक्ति विभाग) ने नियुक्ति पत्र जारी करने के बदले गगन गीत से कुंवर फ़तेह बहादुर के नाम पर लाखों रुपये की मांग की. गगन गीत ने इसकी शिकायत 31 मई, 2011 को भारत के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में की. गगन गीत का आरोप है कि पैसा नहीं दे पाने के कारण उनका नियुक्ति पत्र नहीं जारी किया गया और नियुक्ति विभाग ने इस पर कुछ गैरवाजिब आपत्तियां लगाईं. जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 13 जुलाई, 2011 को एक बार फिर पत्र लिख कर नियुक्ति विभाग को इनको नियुक्ति पत्र देने के आदेश दिये तो आरोप है कि कुंवर फतेह बहादुर की तरफ से नियुक्ति विभाग के संयुक्त सचिव योगेश्वर राम मिश्रा ने पैसे मांगे.

गगन गीत के अनुसार योगेश्वर राम ने फतेह बहादुर के लिए वित्तीय सहयोग की मांग की और कहा कि नियुक्ति पत्र इसके बाद ही जारी हो सकेगा. अंत में गगनगीत ने इस भ्रष्टाचार से तंग हो कर 23 जनवरी, 2012 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखकर अपनी सीट सरेंडर कर दी है और कहा कि वह जज बनने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लेंगी. नेशनल आरटीआई फोरम का कहना है कि उच्च न्यायिक सेवा में ऐसा आरोप लगना बहुत गंभीर मामला है. फोरम की कन्वेनर डॉ नूतन ठाकुर ने इस मामले में मुख्य सचिव को 25 फरवरी 2012 को पत्र लिख कर उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है.

पत्रिका प्रबंधन की तानाशाही, दिल्ली ब्यूरो के रिपोर्टरों को बर्खास्त किया

पत्रिका प्रबंधन की तानाशाही का एक अनोखा मामला सामने आया है. अखबार ने अपने दिल्ली ब्यूरो में कार्य कर रहे पत्रकार अजयभान, राकेश शुक्ला और मनोज कुमार को आनन-फानन में बर्खास्त कर दिया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पिछले दिनों पत्रिका के युवा मालिक निहार कोठारी ने एक मीटिंग कर इन रिपोर्टरों से दो टूक यह कहा कि वह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार को ‘अस्थिर’ करें. उससे संबंधित ऐसे-ऐसे मुद्दे खोज कर लायें जिससे वह दोनों सरकार हिल जाये.

बताया जाता है उन सभी संवाददाताओं ने इस तरह सुपारी ले कर कम करने में असमर्थता जताई और कहा कि ऐसा करना न ही संभव है और न ही पेशेवर दृष्टिकोण से उचित. सभी रिपोर्टरों ने एक सुर से ये कहा कि जैसी परिस्थिति पत्रिका प्रबंधन द्वारा उत्पन्न की गयी है उसमें अब तो उन सबके लिए सामान्य खबर जुटाना भी मुश्किल हो रहा है. हर नेता उन्हें संदेह की दृष्टि से देखता है. कोई उन लोगों से बात तक करना गंवारा नहीं करता. ऐसे में आखिर खबर कहाँ से खोज कर लाएं वे? इस बात पर निहार कोठारी ने उन सभी से इस्तीफा मांग लिया और कहा कि अब वे ऐसे रिपोर्टरों को रखेंगे जो ऐसा काम कर सके.

उल्लेखनीय है कि पत्रिका प्रबंधन और छत्तीसगढ़ सरकार में कुछ दिनों से ठन सी गयी है. कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री के संबंध में एक खबर चलाने के कारण एक क्षेत्रीय चैनल और इस अखबार की काफी आलोचना हुई थी. चैनल ने सरेआम खेद व्यक्त कर मामले को रफा-दफा किया वहीं पत्रिका द्वारा अपनी खबर पर डटे रहने के बाद सरकार ने इस अखबार पर मानहानि का मुकदमा दायर किया है जो विचाराधीन है. जवाबी कारवाई में पत्रिका ने प्रेस काउंसिल में शिकायत दर्ज की है जिस पर प्रदेश शासन को नोटिस इशू किया गया है. इसी संबंध में भाजपा से जुड़े एक पत्रकार पंकज झा ने भी प्रेस काउंसिल को पत्रिका की शिकायत डाक से भेज़ते हुए तथ्यवार ‘पत्रिका’ की कारगुजारियों का ब्योरा परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू को भेजा है. पत्र में घटनाक्रम का जिक्र करते हुए इस अखबार पर टाइम्स नाउ मामले में चैनल पर कोर्ट द्वारा लगाए गए भारी जुर्माने जैसी कारवाई ‘पत्रिका प्रबंधन’ पर भी किये जाने की मांग की गयी है.

काटजू के बयान पर बिहार में बवाल, नीतीश चुप, पत्रकार आपस में बंटे

पटना। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने कहा है कि बिहार में नीतीश सरकार द्वारा प्रेस की आजादी पर अंकुश और स्वतंत्रता के उल्लंघन मामलों की जाच तीन सदस्यीय समिति करेगी। काटजू ने कहा कि पत्रकार राजीव रंजन नाग, अरुण कुमार और कल्याण बरुआ की सदस्यता वाली एक उपसमिति बिहार आकर जांच करेगी। यह समिति सरकार के खिलाफ लिखी जा रही खबरों के बाद अखबारों और पत्रिकाओं के पत्रकारों की प्रताड़ना और उन पर हमले के आरोपों की जाच करेगी।

उन्होंने कहा कि यह उपसमिति सभी आरोपों की जांच करेगी। इसमें सरकार के निर्देश पर समाचार पत्र मालिकों के दबाव में पत्रकारों के तबादले, प्रताड़ना के आरोप भी शामिल है। बिहार में पत्रकारों पर हुए हमलों की भी विस्तार से जाच की जाएगी। प्रेस परिषद अध्यक्ष के बयान से राज्य सरकार आक्रोशित है। भाजपा नेता और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी तथा जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने काटजू को आडे़ हाथ लिया है। हालाकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस विषय में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

मोदी ने कहा कि काटजू ने राजनीति से प्रेरित बयान दिया है। गरिमापूर्ण पद पर रहते हुए काटजू को ऐसे बयान से बचना चाहिए। ऐसा बयान देना है तो सक्रिय राजनीति में उतरना चाहिए। तिवारी ने कहा कि काटजू ने अखबारों की सुर्खियां बनने के लिए नीतीश सरकार के खिलाफ यह बयान दिया है। भारतीय प्रेस परिषद अध्यक्ष के बयान को लेकर विपक्षी दलों को भी नीतीश सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल गया। राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे ने आरोप लगाया कि बिहार में मीडिया की स्वतंत्रता का गला घौंटा जा रहा है। काटजू के बयान से राजद के आरोप सच साबित हुए हैं।

उन्होंने कहा कि काटजू ने जो कहा है वह बिल्कुल सच है। राजद की पूर्व की सरकारों के कार्यकाल में भी बिहार में पत्रकारों की आजादी का अतिक्रमण नहीं किया गया जितना आज हो रहा है। बिहार प्रदेश कांग्रेस ने भी कहा कि राज्य में सरकार ने प्रेस से बोलने का अधिकार छीन लिया है। भाकपा माले के राज्य सचिव नंदकिशोर प्रसाद ने आरोप लगाया कि नीतीश सरकार के कार्यकाल में मीडिया बुरे दौर से गुजर रहा है। प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू की टिप्पणी को लेकर अलग-अलग राय सामने आई है। राज्य के कुछ वरिष्ठ पत्रकार काटजू के बयान से इत्तेफाक नहीं रखते तो कुछ के मुताबिक उनका बयान हकीकत के आस-पास है। जाने-माने पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने कहा कि काटजू का बयान विवादास्पद है। उन्होंने कहा कि वह अपनी जानकारी पर बोल रहे हैं और उन्होंने इसकी जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम भी बनाई है।

उन्होंने कहा कि हकीकत का पता न होने पर उन्हें बयान देने से बचना चाहिए था। उन्होंने कहा कि वह इस मामले पर अब जांच के बाद ही बोलेंगे। काटजू के बयान को जल्दबाजी में दिया गया बयान बताते हुए किशोर ने कहा कि बिना जांच के किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है। बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते है, 'काटजू के बयान में गलत क्या है? बिहार के आम से लेकर खास यानी हर तरह के लोग यह जानते है कि सरकार यहां प्रेस का कैसे उपयोग कर रही है। आज सभी लोग जानते हैं कि यहां के प्रेस सत्ता पक्ष के गुणगान में लगे है।

उन्होंने कह कि वह जब काटजू पटना में एक समारोह के दौरान प्रेस की आजादी पर बोल रहे थे तो कुछ लोगों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया था। जिससे वहां मौजूद लोग भड़क गए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि यहां क्या स्थिति है। बिहार टाइम्स के संपादक अजय कुमार ने काटजू के बयान को हकीकत के करीब बताते हुए कहा कि यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि आज पूरे देश में काटजू के बयान की खबरें छप रही है या दिखाई जा रही है। परंतु स्थानीय अखबारों ने इस खबर को कम महत्वपूर्ण मानते हुए उसे कम स्थान दिया है।

उन्होंने कहा कि काटजू को बिहार की हकीकत मालूम हो गई है। वह अध्यक्ष जैसे बड़े ओहदे पर है और प्रेस की आजादी दिलाना उनका अधिकार है। कुमार कहते है कि अगर सत्ता पक्ष के लोगों की खबरें सही तरीके से नहीं छपती है तो उन अखबारों का सरकारी वज्ञापन बंद हो जाता है। उधर, राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने काटजू के बयान को चर्चा में आने के लिए दिया गया बयान बताया। उन्होंने कहा कि काटजू आजकल किसी भी राज्य में जाकर विवादास्पद बयान देकर चर्चा में आना चाहते है। अगर उन्हें चर्चा में ही आना है तो राजनीति में आना चाहिए।

ज्ञात हो कि काटजू ने शनिवार को गया में पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा था कि बिहार में प्रेस आजाद नहीं है। पत्रकारों का स्वतंत्रता के साथ खबर लिखना संवैधानिक अधिकार है, लेकिन बिहार में पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से समाचार लिखने पर सरकार उन्हें परेशान करती है। उन्होंने कहा कि सरकार संविधान के अधीन है। इससे पहले, पटना में शुक्रवार को एक समरोह में काटजू ने कहा था कि उन्हें जो जानकारी मिली है वह प्रेस के लिए अच्छी नहीं है। अगर यहां कोई सरकार या सरकारी अधिकारी के खिलाफ लिख दे तो उसे परेशान किया जाता है। उन्होंने कहा कि लालू के शासनकाल की तुलना में बिहार में विधि-व्यवस्था की स्थिति में सुधार जरूर हुआ है। लेकिन प्रेस की आजादी में कमी आई है। साभार : जागरण

चीफ रिपोर्टर ने पैंट उतार कर चीफ सब एडिटर को दिखाया, दोनों सस्‍पेंड

: घटना दैनिक भास्‍कर, रांची कार्यालय की : दैनिक भास्‍कर, रांची से खबर है कि चीफ सब एडिटर मारूति पाण्‍डेय तथा चीफ रिपोर्टर अमरकांत को क्रमश: आठ एवं दस दिन के लिए सस्‍पेंड कर दिया गया है. ये लोग कार्यालय तो आएंगे लेकिन ना तो इनसे काम लिया जाएगा और ना ही इनकी हाजिरी बनेगी. हालांकि जिस तरह की हरकत न्‍यूज रूम में हुई है वह बहुत ही शर्मनाक है. तारीफ करनी होगी स्‍टेट हेड ओम गौड़ की जिन्‍होंने इतनी गलत हरकत के बाद भी संवेदनशीलता दिखाते हुए इन लोगों को सस्‍पेंड किया. अन्‍यथा इनलोगों का कारनामा बर्खास्‍त किए जाने योग्‍य है.

बताया जा रहा है कि रांची में दो-तीन दिन पूर्व दो हत्‍याएं हुई थीं. उसके विरोध में दो दिनों तक रांची बंद था. चीफ रिपोर्टर अमरकांत ने चेंबर ऑफ कामर्स के हवाले से एक खबर लिखी कि बंद से एक हजार करोड़ का नुकसान. इस खबर पर चीफ सब एडिटर मारूति पाण्‍डेय ने आपत्ति जताई तथा शनिवार की शाम को चीफ रिपोर्टर अमरकांत को अपने मोबाइल से कॉल किया. अमरकांत ने उनका मोबाइल पिक नहीं किया. खबर है कि तीन-चार मिनट बाद जब अमरकांत वापस आए तो मारूति पाण्‍डेय उनसे उलझ गए तथा कहा कि आपने फोन क्‍यों नहीं उठाया.

इस पर चीफ रिपोर्टर अमरकांत ने सफाई देते हुए कहा कि मैं शौचालय गया था इस वजह से फोन नहीं उठा पाया. मारूति भड़क गए और अमरकांत पर झूठ बोलने का आरोप लगाने लगे. इस बात को लेकर अमरकांत और मारूति में बहस होने लगी. बताया जा रहा है कि इसी दौरान अमरकांत ने अपनी पैंट उतार दी (हालांकि इनर वियर के उतारे जाने की बात भी कही जा रही है) और कहा कि देखो अभी तक सब कुछ गीला है. अमरकांत की इस हरकत से कार्यालय के कई लोग सन्‍न रह गए.

बताया जा रहा है कि कुछ महिलाकर्मी भी आसपास मौजूद थीं. उनलोगों ने अपनी आंखें बंद कर ली. इसको लेकर काफी देर तक हंगामा हुआ. मामला प्रबंधन तक पहुंचा. इस घटना की जानकारी मिलने के बाद स्‍टेट हेड ओम गौड़ बुरी तरह कुपित हुए. उन्‍होंने तत्‍काल दोनों वरिष्‍ठ पत्रकारों की हरकत पर जमकर डांट लगाई. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने पत्रकारों की इस हरकत पर निकाले जाने की चेतावनी तक दे दी, फिर संवेदनशीलता दिखाते हुए अमरकांत को दस दिन तथा मारूति पाण्‍डेय को आठ दिन के लिए सस्‍पेंड कर दिया. बताया जा रहा है कि ओम गौड़ इस घटना से खासे आहत हैं. 

चीफ सब एडिटर मारूति इसके पहले भी चर्चा में रह चुके हैं. वे कुछ दिनों पूर्व कार्यालय के नाइट गार्ड के साथ भी अपने साथियों के साथ मिलकर मारपीट कर चुके हैं. उसी बिल्डिंग में चलने वाले छात्रों के साथ भी उनका संघर्ष हो चुका है. इसको लेकर छात्रों का एक गुट दैनिक भास्‍कर के कार्यालय में भी घुस गया था. बताया जा रहा है कि सस्‍पेंशन के दौरान दोनों लोगों को कार्यालय आना पड़ेगा पर बिदाउट वर्क एवं सेलरी. इन लोगों के संस्‍पेंशन की खबर नोटिस बोर्ड पर भी चस्‍पा कर दी गई है.

नतिनी पूछे नानी से नानी चलबू गौने!

: लिखने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है! : मेरे बारे में जो भी कुछ बटोरा है, मनोज जी, प्लीज़ उसे सार्वजनिक करें! : यशवंत जी, यह मनोज दुबे कौन हैं? या तो वह बहुत नादान हैं, या बहुत मासूम! या फिर बहुत बडे टट्टू! जो राजनाथ सिंह सूर्य और उन के जैसों दलालों भडुओं की पैरोकारी पर उतर आए हैं! और मुझे बिन मांगे ढेर सारी सलाह दिए जा रहे हैं। न सिर्फ़ सलाह दिए जा रहे हैं मुझे बल्कि मेरे बारे में ऐसी कई बातों को जानने का दावा भी किए जा रहे हैं और बता रहे हैं कि वह बातें यहां लिखने लायक नहीं हैं। लगे हाथ फ़तवा भी जारी किए जा रहे हैं कि मैं और मेरी भड़ास भावी पीढ़ी के लिए नासूर भी बन सकती हैं। राखी सावंत स्टाइल का नासूर बता रहे हैं। अजब है!

भोजपुरी की एक कहावत याद आ रही है, नतिनी पूछे नानी से नानी चलबू गौने! मनोज दूबे कुछ वैसे ही सवाल पूछ रहे हैं। जैसे किसी समय राजनाथ सिंह एक लेख में मेला घुमनी का व्यौरा एक बार परोसते हुए पूछ रहे थे। याद तो होगा ही राजनाथ जी आप को? कि अपनी मेला घूमनी को भी भूल गए आप? मैं तो नहीं भूला हूं। क्या करूं? उपन्यासकार जो ठहरा! दिक्कत यही हो गई इस बार कि आप का पाला एक उपन्यासकार से पड़ गया है। अपने किसी चमचे या मातहत से नहीं। और उपन्यासकार की नज़र ठीक वैसे ही होती है जैसे किसी घायल नागिन की आंख। कि एक बार जो आंख में समा गया तो समा गया। जीवन भर भूलने वाला/वाली नहीं। ध्यान दीजिएगा मनोज जी आप भी।

मैं ने तो राजनाथ सिंह को भी खुली चुनौती दी थी कि मेरे बारे में जो भी आरोप हों सार्वजनिक करें। और इन मनोज दुबे को भी खुली चुनौती दे रहा हूं कि मेरे बारे में जो भी आरोप आप ने बटोरे हैं तुरंत से तुरंत उसे सार्वजनिक करें। यहां तो यशवंत जी आप को बताऊं कि मैं यह बिलकुल नहीं कहता कि मैं बहुत बड़ा धर्मात्मा हूं, पर यह दावा तो कर ही सकता हूं और वह भी छाती ठोंक कर ब्राह्मण होते हुए भी बिलकुल ठाकुरों की तरह कि कभी कोई पाप नहीं किया है, कोई दलाली या भडुवई नहीं की है। पत्रकारिता के नाम पर कोई दुकान नहीं खोली है। यहां तो पहला काम भी लिखना है और आखिरी काम भी लिखना है। मन्ना डे का गाया एक गाना है : हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है! मुश्किल के दिनों में गाता भी था कभी, अभी भी जब कभी मुश्किल आती है तो कभी-कभी गाता हूं बतर्ज़ मन्ना डे कि लिखने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है!

यशवंत जी, कभी बात हो तो मनोज दुबे से तो उन्हें बता दीजिएगा कि जितना मैं ने अब तक लिखा है ना, उतना उन के गुरु राजनाथ सिंह सूर्य या उन के जैसे लोग या उन का कोई शिष्य उस की नकल भी लिखने बैठेगा न तो पसीना चू जाएगा। और मनोज दुबे जैसे डीटीपी आपरेटर उसे टाइप करते-करते थक जाएंगे। क्यों मनोज दुबे जी आप जनसत्ता एक्सप्रेस या आई नेक्स्ट में डीटीपी आपरेटर ही तो रहे हैं न? घबराइए नहीं डीटीपी आपरेटर होना कोई गुनाह या पाप नहीं है। कोई कभी भी तरक्की कर के आगे बढ़ सकता है। मैं ने तो एक ऐसे संपादक अरविंद कुमार के साथ भी काम किया है जो कभी बाल श्रमिक थे, आज उन्हें शब्दाचार्य कहते हिंदी जगत थकता नहीं है। उन्हों ने थिसारस जैसा अनमोल काम जो किया है। और कि हिंदी जगत कभी भी अरविंद कुमार का उपकार भूल भी नहीं पाएगा। पर मनोज दूबे आप और आप के राजनाथ सिंह जैसे लोग थिसारस के कंसेप्ट से शायद ही वाकिफ़ हों। साक्षर जो ठहरे।

खैर, मैं ने अरविंद कुमार पर भी लिखा है, क्या कभी पढा आप ने? अरविंद कुमार भी मेरे संपादक रहे हैं। सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में। मैं ने तो सहाराश्री के बारे में भी लिखा है, अदम गोंडवी के बाबत लिखे एक लेख में। इसी भडास पर। असल में मनोज दुबे आप ने एक आरोप यह लगाया है कि मैं ने जिस भी किसी के साथ काम किया उस के खिलाफ़ लिख दिया। शायद आप ने मेरा लिखा सिर्फ़ राजनाथ या उन के जैसे लोगों के बारे में ही पढा है। अच्छा राजीव शुक्ला के बारे में भी मैं ने लिखा है, पढा आप ने या आप के गुरु ने? [दलाली के बाबत राजीव शुक्ला बीस ठहरते हैं राजनाथ के आगे। कहूं कि राजनाथ के बाप ठहरते हैं। राजनाथ के बाद राजीव आए राज्यसभा में। और देखिए मंत्री भी बन गए। लखनऊ के उसी पार्क रोड से राजीव शुक्ला ने भी बरास्ता पत्रकारिता में पांव पसारे थे, जिस पार्क रोड से राजनाथ ने भी पांव पसारे थे। दोनों पत्रकार। और दोनों ही के साथ मुझे काम करने का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ। पर राजीव शुक्ला आज संसदीय कार्य राज्य मंत्री हैं। अच्छा मनोज दुबे जी आप कभी राजनाथ जी से पूछिएगा कि राज्यसभा में उन्हों ने कभी ऐसा कोई मामला उठाया हो जो लोग याद रख सकें। या फिर वही कभी उसे बडे फ़ख्र से बता सकें कि हां, मैं ने यह मामला कभी राज्यसभा में उठाया था! खबर तो ऐसी कभी उन्हों ने खैर कभी लिखी ही नहीं जिस के बारे में वह सर उठा कर कह सकें कि हां, मैं ने यह खबर भी लिखी थी।]

खैर, अरविंद कुमार पर तो मैं ने लिखा ही है, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर,रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, कन्हैयालाल नंदन, प्रभाष जोशी, अदम गोंडवी,  वीरेंद्र सिंह, आलोक तोमर सहित और भी तमाम लोगों पर लिखा है। यह सब भी कभी पढ़ लीजिएगा। आप की राय अगर दूसरे के निर्देश पर नहीं बनती होगी और कि अपने विवेक से चलते होंगे तो ज़रुर बदल जाएगी, मेरे बारे में। रघुवीर सहाय और कमलेश्वर को छोड़ कर बाकी जितने लोगों का नाम लिया है अभी मैं ने सब के बारे में इसी भड़ास पर आप को मिल जाएगा। इस में अरविंद कुमार, प्रभाष जोशी, वीरेंद्र सिंह के संपादकत्व में मैं ने नौकरी भी की है। इसी स्वतंत्र भारत में वीरेंद्र सिंह जैसे पढे़-लिखे मर्द आदमी को भी बतौर संपादक देखा है, जिया है। बल्कि कहते हुए अच्छा लगता है कि मुझे दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ वीरेंद्र सिंह जी ही ले आए थे। जिस वीर बहादुर सिंह की दिन रात चापलूसी करते नहीं अघाते थे राजनाथ सिंह और झूठा ही उन्हें अपना सहपाठी बताते फिरते हैं उसी मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह का डिनर का न्यौता ठुकराते मैं ने वीरेंद्र सिंह को देखा है। यह उन के संपादक का गर्व था। और कि अधिकार भी।

वह वीरेंद्र सिंह जो लैम्ब्रेटा स्कूटर से चलते थे और उस पर प्रेस भी नहीं लिखते थे। और जानकारियां तो अदभुत! जिस भी विषय पर उन से बात करिए, हमेशा तैयार। उन के समय में स्वतंत्र भारत सवा लाख से अधिक बिकता था, इसी लखनऊ में। यह १९८५ की बात है। आगे-पीछे कोई अखबार नहीं था तब स्वतंत्र भारत के। लेकिन दुर्भाग्य देखिए स्वतंत्र भारत का कि इसी अखबार में शिव सिंह सरोज और राजनाथ सिंह जैसे दलाल और भडुए लोग भी संपादक बन गए। जिन की योग्यता और कद एक ज़िला संवाददाता से ज़्यादा का नहीं रहा, लिखने-पढ़ने के मामले में। पर किस्मत का पट्टा लिखवा कर लाए थे यह लोग कि संपादक बनेंगे, सो बन गए। पर यह लोग संपादक पद की गरिमा क्या होती है, यह भी नहीं ही जानते थे, बल्कि उसे धो-पोंछ कर गोमती में क्या हैदर कैनाल नाले में बहा आए।

रही बात घनश्याम पंकज की तो उन की भाषा पर, उन की समझ पर, उन की दृष्टि पर तो मैं आज भी मोहित हूं। उन का संपादक रुप तो बहुत ही उज्जवल है और चमकदार भी। स्वतंत्र भारत को नया लोक, नया लुक देते हुए  उस की गुणवत्ता को जैसा पंकज जी ने निखारा, किसी और ने नहीं। जिस को सरोज जी और राजनाथ जी जैसे लोग नष्ट कर बैठे थे। पंकज जी के इस योगदान को कोई कैसे भुला सकता है भला? पर स्वतंत्र भारत की बरबादी में वह भी एक कारण जाने-अनजाने बन गए, इस का बहुत अफ़सोस भी है। मनोज दुबे, आप ने सुभाष राय का भी इस लेख में ज़िक्र किया है, यह ज़िक्र यहां ज़रा नहीं बहुत अटपटा है। सुभाष राय जैसे संपादक पढे-लिखों में शुमार होते हैं। दलालों और भडुओं में नहीं। उन पर ऐसा दाग नहीं है। वह एक संवेदनशील कवि भी हैं। उन की चर्चा जो मैं ने की थी कभी अपने लिखे में तो वह लेखकीय अस्मिता के ही तहत। किसी और अर्थ में नहीं। और वह उन की कोई नौकरी वाली मजबूरी भी रही हो सकती है।


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भावी पीढ़ी के लिए नासूर न बन जाए दयानंद पांडेय जैसे भड़ासियों का ‘राखी सावंत स्टाइल

निष्ठा, नैतिकता, चरित्र, शुचिता… सब बातें हैं बातों का क्या!

धुर विरोधियों ने भी मेरी निष्ठा, नैतिकता, चरित्र पर अंगुली नहीं उठाई : राजनाथ 'सूर्य'

'दयानंद पांडेय और राजनाथ सिंह सूर्य के आपसी विवाद को तूल न दें'

राजनाथ सिंह को खुली चुनौती दे रहा हूं कि मेरे खिलाफ़ आरोप सार्वजनिक करें!

दयानंद को निकाल दिया था, इसलिए वे भड़ास निकाल रहे : राजनाथ सिंह सूर्य

मार्निंग वाक या पत्रकारिता के नहीं, दलाली के चैंपियन हैं राजनाथ सिंह सूर्य

सीएम के दबाव में मैनेजमेंट ने ट्रांसफर किया तो इस्तीफा दे मारा


मनोज दुबे, आप ने बताया है कि आज मैं भी कहीं संपादक हो सकता था। क्या कह रहे हैं आप भाई? मैं या मेरे जैसा व्यक्ति आज कहीं संपादक भी हो सकता है? कोई पढने-लिखने वाला व्यक्ति आज की तारीख में और संपादक? क्या चाहते हैं? कि सड़क पर आ जाऊं? कि आप ने जो तरकीब बताई है कि 'मार्निंग वाक' करूं। मतलब दलाल भडुआ बन जाऊं? ए भाई इतना बुरा भी मत सोचिए मेरे बारे में। मतभेद ही रखिए तो ठीक। रंजिश पर मत आइए। मुझे लिखने-पढ़ने के ही काम में लगे रहने दीजिए और आजीविका के लिए मुझे छोटी-मोटी नौकरी ही करते रहने दीजिए न! आखिर बाल-बच्चेदार आदमी हूं। इतनी रियायत तो बरतिए ही ना! अपने गुरु राजनाथ सिंह की तरह मत पेश आइए। कि नौकरी ही खा जाने की तरकीब लगा जाइए। और अब तो मैं भी नौकरी कैसे की जाती है, और कि कैसे बचाई जाती है, इतने धक्के खाने के बाद तो जान ही गया हूं भाई! बावजूद इस सब के ऐसे में वो एक शेर याद आता है कि रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ/ आ फिर से मुझे छोड के जाने के लिए आ।

तो मनोज दुबे जी प्लीज़ जो भी कुछ मेरे बारे में आप ने बटोरा है न प्लीज़ उसे सार्वजनिक रुप से साझा करिए ना! आखिर मैं भी तो जो दूसरों को दर्पण दिखाने में लगा हूं इन दिनों, देखूं तो सही कि मनोज दुबे जी के दर्पण में मैं कैसा हूं? यह ज़रुरी है, बहुत ज़रुरी है। प्लीज़ खुलासा करें। क्यों कि मैं भी जानता तो हूं ही कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। चाहे वह कैसा भी हो। मुझे बहुत खुशी होगी। अंजुम रहबर का एक नहीं दो शेर इस वक्त एक साथ याद आ रहा है। एक तो यह कि : आईने पर इल्ज़ाम लागाना फ़िजूल है/ सच मान लीजिए चेहरे पर धूल है। और दूसरा शेर है कि : जिन के आंगन में अमीरी का शज़र लगता है/ उन का हर ऐब भी ज़माने को हुनर लगता है। तो मनोज जी आप को राजनाथ सिंह सूर्य की दलाली भी हुनर लगती है और मेरा लिखना-पढना भी ऐब लगता है तो इस में कुसूर मेरा नहीं, आप का भी नहीं ज़माने के दस्तूर का है! आप क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता! आमीन! बस मेरे बारे में जो भी कुछ आप ने बटोरा है ना प्लीज़ उस को सार्वजनिक रुप से साझा करिए। इतनी तो कृपा आप मेरे ऊपर करेंगे ही ऐसा मुझे विश्वास है।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

नई दुनिया से केएन सिंह, अनूप भटनागर, संजय त्रिपाठी समेत चार लोग देंगे इस्‍तीफा

नईदुनिया, दिल्‍ली से खबर है कि चार लोगों को इस्‍तीफा देने का फरमान सुना दिया गया है. प्रबंधन इस कदर बौखलाहट में है कि उसे कुछ सूझ नहीं रहा है. प्रबंधन के इस फैसले से पत्रकारों पर क्‍या बितेगी उससे उसका कोई सरोकार नहीं है. शायद ऐसे ही नासमझ और असंवेदनशील मैनेजमेंट के चलते कंपनी इस हाल में पहुंची है. बताया जा रहा है कि डिप्‍टी आरई केएन सिंह, सीनियर लीगल रिपोर्टर अनूप भटनागर, सब एडिटर संजय त्रिपाठी एवं फोटोग्राफर एम यादव को इस्‍तीफा देने के लिए कहा गया है.

गंभीर बात यह है कि अनूप भटनागर किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं. उनके लिए नौकरी का होना बहुत जरूरी है, उसके बाद भी प्रबंधन बिल्‍कुल असंवेदनशील तरीके से इनसे इस्‍तीफा मांग लिया है. अनूप की गिनती दिल्‍ली के जाने माने पत्रकारों में होती है. वे इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पर प्रबंधन का यह रवैया अनूप के अलावा उनके शुभचिंतकों के लिए भी कचोटने वाला है.

वरिष्‍ठ पत्रकार केएन सिंह की गिनती राष्‍ट्रीय स्‍तर के पढ़ने-लिखने वाले पत्रकारों में की जाती है. इनसे किसी भी विषय पर कभी भी चर्चा की जा सकती है. केएन सिंह नईदुनिया ज्‍वाइन करने से पहले न्‍यूज चैनल हमार टीवी में चीफ कॉपी एडिटर और प्रोग्रामिंग हेड थे. केएन सिंह मुख्‍य धारा की पत्रकारिता में पिछले कई दशक से सक्रिय हैं. प्रिंट और इलेक्‍टॉनिक दोनों माध्‍यमों पर समान पकड़ रखने वाले नरेन्‍द्र सिंह प्रथम प्रवक्‍ता के फाउंडर एडिटर हैं. इंडिया न्‍यूज में वे कार्यकारी संपादक के रूप में भी वे लंबी पारी खेल चुके हैं. हिन्‍दी दैनिक राष्‍ट्रीय सहारा, अमर उजाला में वरिष्‍ठ पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. केके बिड़ला फाउंडेशन फैलोशिप एवं आईआईई अमेरिकी फैलोशिप भी प्राप्‍त हो चुका है. इनकी एक किताब 'बिहार में निजी सेना का उदभव और विकास' छप चुकी है जबकि 'कवर स्‍टोरी' शीघ्र आने वाली है. नरेन्‍द्र सिंह मोतीलाल बोर और अर्जुन सिंह के मुख्‍यमंत्रित्‍व काल में उनके मीडिया सलाहकार भी रह चुके हैं.

संजय त्रिपाठी भी कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं. अब ये लोग इस्‍तीफा देने के बाद अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है, पर प्रबंधन के इस फैसले से अन्‍य सहकर्मी भी नाराज तथा टेंशन में हैं. हर कोई चिंतित है कि कहीं अगला नम्‍बर उसी का ना आ जाए. कुल मिलाकर नईदुनिया, दिल्‍ली के अंदर की स्थिति अत्‍यन्‍त ही तनावपूर्ण है. यहां काम करने वाले बाकी लोग अपने भविष्‍य के बारे में सोचकर परेशान हैं.

अश्लीलता के बाजार को बढ़ावा दे रहे हैं एमजे अकबर और दिलीप मंडल

: दबे पांव नहीं, खुलेआम घुसाया घरों में पोर्न : ‘केवल वयस्कों के लिए’’ घोषित करो पत्रिका : ‘‘दबे पांव आपके घर में घुसा पोर्न’’ आवरण कथा और तस्वीर छापकर ( इंडिया टुडे, 23-29 फरवरी 2012) पत्रिका ने यह साबित कर दिया है कि इसका मकसद सिर्फ और सिर्फ अश्लीलता परोसकर बाजार में अपने को कायम रखना भर है। एमजे अकबर जैसे संपादक और हाल ही में दिलीप मंडल द्वारा पत्रिका का संपादक बनने के बावजूद यह स्पष्ट है कि सब अश्लीलता को ही बाजार और पाठकों की पसंद (जबरदस्ती) मानते हुए खामोश हैं। शायद यह पत्रिका के दिवालियेपन की निशानी भी झलकाती है।

लेकिन ऐसी तस्वीरें छापने से पहले यकीनन पत्रिका को खुद को ‘‘केवल वयस्कों के लिए’’ घोषित कर देना चाहिए। क्योंकि अमूनन घर के सभी लोगों द्वारा पढ़ी जाने वाली यह पत्रिका इस बार यह न सिर्फ बच्चों के सामने रखने के लायक नहीं है, बल्कि इसे आम भारतीय घरों में आप बड़े बुजुर्गों के सामने भी नहीं रख पाएंगें। मतलब कि यह सिर्फ निजी तौर पर इस्तेमाल की जा सकेगी! विषय पर लिखी गई सामग्री की बात जाने दें। यह तो पत्रकारिता के हिसाब से खबर है, (हांलांकि इस खबर का कोई सरोकार नजर नहीं आता) लेकिन ऐसी तस्वीरें छापने की क्या जरूरत? यह कह सकते हैं कि सनी लियोन तो महीनों राष्ट्रीय चैनल पर दिखाई दी हैं। लेकिन देखने वाले जानते हैं कि वहां भी सनी ऐसी वेशभूषा में नहीं दिखीं।

और ऐसा करके पत्रिका ने जिस कहानी को परोसा है उसे ही पुरजोर बढ़ावा दे रहा है। यानी खासकर बच्चों में पोर्न के प्रति उत्कंठा जगाना। यही नहीं पत्रिका ने कहां कहां चीजें उपलब्ध हैं सारी जानकारी भी जुटा दी है। वैसे यह सर्वविदित तथ्य है कि हमेशा से ही व्यस्क लोगों का पोर्न के प्रति रुझान रहा है और वे इसे देखते रहे हैं। घरों में एक परिवार में हर माता-पिता अपने बहू-बेटे या फिर घर में रहने वाले किसी भी दम्पति या (इसके उलट) के बारे में जानते हैं कि बंद कमरे में क्या होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे इसकी सार्वजनिक चर्चा करते हों? खबर के नाम पर पत्र-पत्रिकाएं और इस बार इंडिया टुडे ने जो किया है वह कुछ ऐसा ही है।

पत्रिका के लिए वैसे यह कोई नई बात नहीं है। खबर या सर्वे के नाम पर अश्लीलता परोसने का काम वह अक्सर ही करता रहा है। सर्वेक्षणों के बहाने अश्लीलता परोसने का कोई मौका नहीं चूके देश के कई प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और आमजनों की पत्रिका। वैसे भी पत्रिका ने ‘पोर्न बाजार की काली कहानी’ शीर्षक से इस इंडस्ट्री की वही पुरानी और बार-बार दोहराने वाली कहानी छाप कर यह साबित कर दिया है कि वह नई बोतल में पुरानी शराब ही पेश कर रही है। इसे क्या कहें? खबरों का अभाव, वैचारिक दारिद्रता, विचारों-विश्लेषणों का अभाव, या फिर प्रकाशकों- संपादकों की संकीर्ण होती यह सोच कि पाठकों को सिर्फ और सिर्फ अश्लीलता के माध्यम से ही खींचा जा सकता है। या फिर बाजारवाद इतना हावी है और आपको ऐसा लगता है कि सिर्फ अश्लीलता से ही पत्रिकाएं बिकेंगी। और आपको सिर्फ बेचने से ही मतलब है तो फिर क्यों न ‘केवल व्यस्कों के लिए’ पत्रिकाएं निकाली- छापी जाएं? एक पारिवारिक पत्रिका नहीं।

इंडिया टुडे, आउटलुक जैसी पत्रिकाएं पारिवारिक हैं (अब तक तो लोग यही मानते हैं)। लेकिन पिछले कई वर्षों के कई अंक किसी भी मायनों में सबके बीच घर की मेज या विद्यार्थियों के स्टडी टेबल पर रखने लायक नहीं थे। शहरी पुरुषों की नजर में कैटरीना कैफ की सेक्स अपील का प्रतिशत बताने के लिए पेड़ों के पीछे जोड़े को प्रेमरत दिखाने का क्या मतलब? या फिर यौन सर्वेक्षण विशेषांक के आवरण पर लगभग पोर्नग्राफी वाली तस्वीर जरूरी है। यानि जान-बूझकर बेमतलब ही परोसी गई अश्ललीता। चर्चा में आने के लिए! माना चर्चा में आए भी। लेकिन क्या यह जरूरी-उचित है? या पाठकों को सचमुच खींचने में सफल रहे आप- यह तो पत्रों को सोचना ही पड़ेगा।

लेखिका लीना मीडिया मोरचा की संपादक हैं.

कमलेश कसोटे एवं राजेंद्र नायक दैनिक भास्‍कर से जुड़े

कमलेश कसोटे के बारे में खबर है कि उन्‍होंने एक बार फिर दैनिक भास्‍कर में वापसी कर ली है. उन्‍होंने अजमेर संस्‍करण में सीनियर करेस्‍पांडेंट के पद पर ज्‍वाइन किया है. कमलेश इसके पहले भी भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पिछले दिनों वो दैनिक नवज्‍योति को अपनी सेवाएं दे रहे थे. कमलेश इसके पहले पत्रिका और इंडिया टुडे को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

प्रतापगढ़ से खबर है कि राजेंद्र नायक ने दैनिक भास्‍कर के संवाददाता के रूप में ज्‍वाइन किया है. प्रतापगढ़ में अब तक सेवारत नरपत सिंह को उदयपुर भेजे जाने की संभावना है.

झारखंड के रामगढ़ जिले से खबर है कि आरएस प्रसाद मुन्‍ना दैनिक भास्‍कर से जुड़ सकते हैं. गौरतलब है कि भास्‍कर प्रबंधन ने रामगढ़ के अपने ब्‍यूरोचीफ को किन्‍हीं आरोपों के चलते कार्यमुक्‍त कर दिया है, तभी से यह पद खाली चल रहा है.

आई नेक्‍स्‍ट से शमिष्‍ठा शर्मा का इस्‍तीफा

आई नेक्‍स्‍ट, लखनऊ से खबर है कि संपादक शर्मिष्‍ठा शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि आई नेक्‍स्‍ट के सीओओ आलोक सांवल से कुछ विवाद हो जाने के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है. शर्मिष्‍ठा के पास लखनऊ के अलावा आई नेक्‍स्‍ट के सभी एडिशनों के सुपरविजन का दायित्‍व था. बताया जा रहा है कि आलोक सांवल एवं शर्मिष्‍ठा के बीच किसी बात को लेकर बहस हो गई थी. काफी समय से इन दोनों लोगों के बीच तनाव चल रहा था. खबर है कि आखिरकार शर्मिष्‍ठा ने प्रबंधन को अपना इस्‍तीफा सौंप दिया है. इस संदर्भ में शर्मिष्‍ठा शर्मा से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया, वहीं आलोक सांवल अस्‍पताल में होने की वजह बताकर बात करने में असमर्थता जताई.

आखिर हम क्‍यों करें अपने मत का प्रयोग?

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान नेताओं के भाषणों और अपने-अपने वादों तथा उनके समीकरणों से ज्यादा शोर अगर किसी बात का था तो वह शोर मतदान करने के लिए होने वाली जागरूकता का ही था. तमाम होर्डिंग्स, बैनर-पोस्टर, टीवी चैनलों तथा जिलों-जिलों, कस्बों-कस्बों में मतदान जागरूकता रैलियां और अभियान चलाये गए. सरकारी गैर सरकारी तथा प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के हर समूहों द्वारा इस मतदान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जा रहा था. लगातार चल रहे इन कार्यक्रमों के द्वारा ऐसा महसूस कराया जा रहा था, जैसे अगर आपने मतदान नहीं किया तो कोई बहुत बड़ा पाप कर देंगे या अपना अधिकार खो देंगे.

मतदान कराने के लिए इतनी सक्रियता का दिखाई देना एक तरफ तो अच्छा लगता है. परन्तु दूसरी तरफ यह बिलकुल ऐसा लगता है जैसे हम बाजार में खड़े हैं और कम्पनी अपने उत्पाद को बेचने के लिए अपनी ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है. आखिर क्या हो गया जो चुनाव आयोग जिसका काम निष्पक्ष चुनाव करना है वह और पक्षपात से भरी सारी पार्टियां एकदम से मतदान कराने के लिए कमर कसकर तैयार हो गईं. सारे दलों के एक साथ एक सुर से चुनाव आयोग के साथ मिलकर खड़े होने की स्थिति बिलकुल वैसे ही लगती है कि जब बाजार में ग्राहक आये ही ना और दुकानें खुली हुई हों, इसीलिए उस समय संतुलन के लिए सारे व्यवसाई एकजुट होकर ग्राहक को बाजार में लाने के लिए हर सुविधा देने को तैयार हों, और ग्राहक के लिए सारी सुविधा दे रहे हों.

इन सारे अभियानों के साथ ऐसा भी नहीं है कि चुनाव आयोग ने सारी तैयारी पूरी कर रखी हो और देश के हर कोने में सबको मतदाता पहचान कार्ड मिल गए हों और सही मिल गए हों. दूसरों की बात क्या कहें अभी तक हमें खुद अपना मतदाता पहचान पत्र नहीं मिला है, जबकि कई बार कोशिश कर चुका हूँ, कुछ ना कुछ गलतियाँ मिल ही जाती हैं. इसी तरह लाखों लोग ऐसे हैं जो या वोटर लिस्ट में मरे दर्शाये गए हैं जबकि उनकी आत्मा सदेह पोलिंग बूथ पर टहलती मिली, इसी प्रकार का एक उदाहरण चर्चित हुआ जब वाराणसी के कैंट विधानसभा के प्रत्याशी अफलातून के प्रस्तावक जब वोट डालने गए तो वह ही वोटर लिस्ट में मृत मिले, जबकि वह सदेह पोलिंग एजेंट थे. ऐसी तमाम गड़बडियों को किनारे करते हुए बस हर तरफ एक ही शोर कि आपने मतदान किया, आपने वोट दिया. इस तरह की जल्दबाजी यह सोचने पर मजबूर करती है ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों इतना प्रचार किया जा रहा है?

चुनावों में जो भी दल मैदान में उतरे हैं उनमे चाहें सपा हो बसपा हो भाजपा या कांग्रेस हो हर दल ने कभी ना कभी सरकार बनाई है या सरकार में शामिल रहा है, और साथ ही हमेशा से कई चुनाव क्षेत्रों से उनके लोग सांसद या विधायक रहे हैं. इसी के साथ राजनीति के जड़ में घुस चुका भ्रष्टाचार, गुंडई, काला धन जैसे मुद्दों का कीड़ा सब में वही छेद छोटे या बड़े आकार में कर चुका है. यहाँ आकार से मतलब उनकी संख्या के अनुसार आकार से है. अब जब राजनीति के परिदृश्य में यही कलाकार हैं जो सब के सब अंदर से खोखले हैं और मजे की बात यह है कि जनता में चुनाव लड़ने सम्बन्धी कोई जागरूकता नहीं है. यानी किसी भी ऐसे प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता है जिसको ईमानदार या शरीफ कहा जाए. ऐसे में केवल मतदाता को जागरूक करने से क्या हो जायेगा? जागरूकता के नारे में साफ़ कहा जाता है कि आप अपने मत का प्रयोग कीजिये नहीं तो गलत आदमी चुन लिया जाएगा. अब इस सारे कार्यक्रमों में यह नहीं बताया जाता है कि जब सब गलत है तो फिर वोट करने का क्या मकसद रह जाएगा और क्यों मजबूरी है कि गलत लोगों में से कम गलत को चुना जाए. वोटर जागरूकता अभियान से कभी-कभी मन में यह ख्याल आता है कि अगर कभी चुनना पड़े तो भांग, धतूरे, सिगरेट, तम्बाकू, शराब, ड्रग्स में से कौन सा नशा “अच्छा नशा है” इसका चुनाव कैसे करूँगा.

खैर हम तो मानते हैं कि यह सब जागरूकता अभियान क्यों हुए इसके कारण तलाशने के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कारण आसानी के साथ ही दिख जाता है. देखा जाए तो इस बार के चुनावों में कांग्रेस मजबूत होकर अपने लिए मतदाता तलाश रही तो सपा कांग्रेस के बढ़ने से बने कारण से अपने परम्परागत वोट बैंक घटने पर परेशान है. वहीँ बीजेपी के मुख्य वोट बैंक माने जाने वाले सवर्ण मतदाता का बहुत कम संख्या में घर से निकलना और खास तौर पर सवर्ण महिला मतदाताओं को घर से न निकलना बड़ी चिंता का विषय है, जबकि सवर्ण मतदाता के पास कांग्रेस का विकल्प है. मायावती जो सबसे सुरक्षित होकर अपने कैडर के वोट बैंक के सहारे हमेशा आगे बढ़ती है उन्हें भी अन्य जातियों का सहयोग तो चाहिए ही होगा. अब अगर ऐसी ही परिस्थितियाँ सामने हो तो उस समय सारे दल जो राजनीति के दलदल में सरकार का पुल बनाकर उस पार जाना चाहते हैं उन्हें दलदल भरने के लिए वोट चाहिए और चूँकि सबके दलदल का आकार एक ही बराबर हैं, तो जाहिर सी बात है कि मतदाताओं या गड्ढे में गिरने वालों की संख्या तो चाहिए ही होगी. अब इसी संख्या की तलाश में हर पार्टी नए मतदाताओं को बढ़ाना चाह रही तो इसी अंदरखाने में मची राजनैतिक एकजुटता के लिए ही तमाम मतदाता जागरूकता अभियान चल रहे हैं और लोगों को वोट डालने के बारे में बताया जा रहा है. जैसा की प्रचलित में इन अभियानों में वोट ना डालने को बड़े गुनाह के रूप में दर्शाने की छुपी कोशिश हो रही है.

परन्तु विचारों के अनुसार ही माने तो अगर कोई भी व्यक्ति वोट नहीं डालता है तो यह लोकतंत्र के प्रति कैसे गलत हो जाएगा. जिस राजनैतिक व्यस्वथा सोच की जगह सत्ता हावी है. ऐसी व्यवस्था जहाँ प्रत्याशी घोषित करने से पहले कोई भी पार्टी जो बड़ी जनहितैषी बनती है, वह कभी किसी जनता से नहीं पूछती है कि बताओ इसे तुम्हारा प्रतिनिधि बना रहे हैं, यह बनने लायक है भी या नहीं. यानी कोई प्रत्याशी तय करने का तरीका नहीं है. बस चार लोगों को थोप दिया गया और चुनने के लिए जबरदस्ती धकेला जाने लगा. तो भाई इसी पर हमारा यह सवाल है. आखिर क्यों प्रयोग करूँ अपने मत? अगर हमारा अधिकार तो हमें ही सोचकर प्रयोग करने दीजिए? सोचिये हो सकता है यही सवाल सबके मन में भी कहीं ना खिन्‍न तो उठ ही रहा होगा.

लेखक हरिशंकर शाही बहराइच के युवा पत्रकार हैं. 

राजस्‍थान पत्रिका में संपादक की डांट-फटकार से बेहोश हुआ रिपोर्टर

राजस्थान पत्रिका, कोटा में स्थानीय संपादक जिनेश जैन की डांट-फटकार से एक वरिष्ठ रिपोर्टर बेहोश हो गया। उसे कोटा के एमबीएस अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहां गुरुवार को भी वह भर्ती है। राजस्थान पत्रिका में मंगलवार रात को संपादक जिनेश जैन ने वरिष्ठ रिपोर्टर जग्गोसिंह धाकड़ को बुरी तरह से फटकारा और रात को साढे़ तीन बजे तक घर नहीं जाने दिया। बुधवार सुबह दुबारा फोन पर डांट फटकार के बाद जब जग्गोसिंह बुधवार सुबह कार्यालय में आया तो डर के कारण उसके हाथ पैर थर-थर कांप रहे थे।

उसे नौकरी से निकालने की धमकी दी जा रही थी। कुछ देर ऑफिस में बैठने के बाद वह चक्कर खाकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। साथी रिपोर्टर उसे उठा कर कोटा के महाराव भीम सिंह अस्पताल में ले गए। जहां एक घंटे बाद उसे होश तो आ गया। बाद में यह खबर जंगल में आग की तरह सारे शहर में फैल गई कि संपादक के दिए तनाव से एक रिपोर्टर की यह हालत हो गई। कोटा में जिनेश जैन को जब से संपादक बनाया है तब से वो सभी से बेहद बदतमीजी से बात करते है। संपादकीय विभाग के कर्मचारियों को बुरी तरह से डांटने के साथ मां- बहन की गालियां भी बकते हैं। रोजाना संपादकीय विभाग के लोगों को नौकरी से निकालने औत तबादला कराने की धमकी दी जा रही है। पूरे दफ्तर का माहौल ही नरकीय हो गया है। अंदरखाने की बात यह है कि पत्रिका में ऐसा व्यवहार जानबूझ कर कराया जा रहा है। पहले पत्रिका ने नौकरी से निकालने के लिए अपने कर्मचारियों को दूर-दूर तबादले करा दिए, तब भी किसी ने नौकरी नहीं छोड़ी तो अब सभी को प्रताडि़त कराया जा रहा है। जिससे लोग नौकरी छोड़ कर चले जाएं। बाउ साहब कुलिश जी के अखबार में इतना होने लगेगा, किसी ने सोचा था क्या?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

चुनावी बयार : शुरू हुए दर्जनों अखबार, कंटेट भगवान भरोसे, आप भी देखिए गलती

उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के एक वर्ष पहले से लेकर अब तक पूरे प्रदेश में दर्जनों की संख्या में समाचार पत्र व खबरिया चैनलों की शुरुआत हुई है। इनमें क्या लिखा जा रहा है या क्या दिखाया जा रहा है, इससे न तो रिर्पोटिंग टीम से मतलब है न ही संपादकीय टीम से मतलब है। मतलब सिर्फ चुनाव के समय नेताजी के या फिर पार्टी के विज्ञापनों से है। यदि हम प्रदेश की राजधानी लखनऊ की बात करें तो इस चुनावी माहौल में लगभग आधा दर्जन समाचार पत्र या तो नये शुरू हुये या साप्ताहिक से दैनिक हुये हैं।

इसी प्रकार एक-दो खबरिया चैनलों की शुरुआत भी हुई है। लेकिन इन सब में जो कन्टेंट आ रहा है यदि हम उसकी बात करें तो हेडलाइन कुछ, इन्ट्रो कुछ, फोटो किसी की, कैप्शन में किसी का नाम। इसके अलावा जब खबरें न मिलें तो गूगल बाबा का सहारा तो है ही, यह तो हाल है समाचार पत्रों का। समाचार चैनलों की बात की जाये तो उनके एंकर तो मासा अल्ला ही हैं। विजुअल कहीं का खबर कहीं की, नेता कोई उसका नाम व पद कुछ और। ऐसे ही तमाम गलतियां इस चुनावी समर में मीडिया में समर के दौरान देखने को मिल रही हैं।

अब यदि दिनांक 23 फरवरी की बात की जाये तो लखनऊ से पिछले माह शुरू हुये अखबार श्रीटाइम्स हिन्दी दैनिक में पढ़ने का और देखने को क्या मिला इसके बारे में मैं आपको बताता हूं। इस समाचार पत्र के पेज संख्या 13 में ''यूपी की मुख्यमंत्री की चाहत है पत्थर और पार्क : सुषमा'' शीर्षक से लगे समाचार में बात सुषमा स्वराज व मायावती की है, पर उसमें फोटो उमा भारती की है, समाचार पढ़ने के बाद मुझे तो यह नहीं समझ आ रहा कि खबर में उमा भारती जी का कहीं नामों निशान नहीं है, लेकिन फोटो लगी है। यह गलती किसकी है मुझ इससे नहीं मतलब है, लेकिन समाचार संपादक जी का ध्यान किस न्यूज पर था यह तो वही बता सकते हैं.

कानपुर से लकी श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

गैस एजेंसी संचालक ने कर डाली आईबीएन7 के जयशंकर की शिकायत

रांची : एक बात नये राज्य झारखंड के बारे में बड़ी शिद्दत से कही जाती है और वह बात है पूर्ववर्ती बिहार (झारखंड जिसका एक हिस्सा था, अब अलग राज्य) के कतिपय लोगों ने इस इलाके को बड़े घाव दिये हैं। यह अब नासूर बन गया है। बिहार में पटना के श्रीकांत प्रत्युष एक बड़े मीडिया मानुस हैं। जी न्यूज से अपनी पहचान बनाने वाले श्रीकांत प्रत्युष को झारखंड की राजधानी रांची से दैनिक हिन्दी समाचार पत्र सन्मार्ग का प्रकाशन प्रारम्भ कराने का श्रेय जाता है।

उन्होंने यहां एक स्थानीय केबल न्यूज नेटवर्क पीटीएन शुरू कराया था। उस वक्त वह पटना से एक युवक जयशंकर को भी यहां लेकर आये थे। जयशंकर इस नेटवर्क का कैमरामैन था। पीटीएन कुछ दिन चलकर बंद हो गया। झारखंड नया राज्य है और इसकी राजधानी रांची में सभी बड़े राष्‍ट्रीय चैनल के प्रतिनिधि भी हैं। नाम बड़े और दर्शन छोटे के तर्ज पर इन तथाकथित चैनलों ने नाम के लिए आदमी रख लिये हैं। कैमरामैन ऑलराउंड प्रदर्शन करते हैं जिसमें दो नाम का जिक्र यहां किया जा रहा है। एक तो जयशंकर। जो अभी आईबीएन7 का वीडियो जर्नलिस्ट है। दूसरा हरिवश शर्मा, जो एनडीटीवी के लिए काम करता है।

जयशंकर युवा है। गुस्सैल भी। लड़ने-भिड़ने में उसका कोई सानी नहीं। चैलन के वरिष्‍ठजनों को वह पलभर में अपमानित कर देता है। लेकिन इस बार आईबीएन7 के जयशंकर बुरे फंसे। हुआ यह कि जयशंकर घरेलू गैस कनेक्शन के लिए संबंधित गैस एजेंसी के दफ्तर गये। उससे गैस संचालक (इंन्द्रप्रस्थ गैस एजेंसी) रवि भट्ट ने आवश्‍यक कागजात मांगे। कमी-बेसी पर बात बढ़ गयी। आरोप है कि गैस संचालक को जयशंकर ने काफी जलील किया। रांची के डीसी तक को फोन कर दिया। फिर गैस संचालक भी रेस हो गया। अंततः समझौता वार्ता हुई। हमेशा की तरह मीडिया के लोग एकाध जयशंकर और ज्यादातर गैस एजेंसी के पक्ष में बात करने लगे। जयशंकर और गैस संचालक में बात बनती नजर आ रही थी कि एक चैनल के वरिष्‍ठ संवाददाता ने जयशंकर के मुख्यालय का टेलीफोन नम्‍बर गैस एजेंसी के मालिक को दे दिया और उसने वहां फोन भी कर दिया। आईबीएन7 के प्रतिनिधि ने उसके साथ क्या किया है इसका सविस्तार बखान किया। इस बात की जानकारी वीडियो जर्नालिस्ट को मिली है और वह बौखला उठा है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कुछ पैसे ज्यादा दीजिए और पंजाब केसरी के ब्यूरो चीफ बनिए

आगरा: सेवा में संपादक जी आप को एक मेल भेज रहा हूँ. मैं चाहूँगा कि आप उसे अपने पोर्टल पर अवश्य प्रकाशित करें. पंजाब केसरी, दिल्ली और बाजारू लोगों की इमेज में कोई ज्‍यादा फर्क नहीं है. यही कारण हैं कि आयेदिन पंजाब केसरी के ब्यूरो आगरा में बदल दिए जाते हैं. हालात यह हैं कि जिस तरह से पैसे के बल पर कुछ लोग कोई काम करने को तैयार हो जाते हैं ठीक उसी तरह से पंजाब केसरी, दिल्ली भी चंद रुपयों की खातिर आगरा का ब्यूरो किसी को भी बना देता हैं, फिर चांहे वह पत्रकारिता से जुड़ा हो या नहीं.

अभी हाल में ही पंजाब केसरी, दिल्ली ने सुधीर भारद्वाज को अपना आगरा ब्यूरो बनाया हैं, जिसका पत्रकारिता से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं हैं. वर्तमान में आगरा ऑफिस की स्थिति यह हैं कि वह सुधीर भारद्वाज का ऑफिस हैं इसलिए वहां कई काम हो रहे हैं. आए दिन गलत कामों का अड्डा बन गया है पंजाब केसरी का आगरा आफिस. ऐसा भी नहीं है कि इससे पंजाब केसरी दिल्ली के शीर्ष स्तर के अधिकारी व स्वयं अश्वनी कुमार चोपड़ा नहीं जानते, लेकिन वह भी सब जानकार अनजान बने हुए हैं, क्योंकि बड़ा-बड़ा लेख प्रतिदिन पहले पन्ने पर लिखने वाले श्री अश्वनी कुमार चोपड़ा अपने ब्यूरो के लिए कुछ भी खर्चा नहीं देते हैं. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में पंजाब केसरी, दिल्ली के अधिकांश ब्यूरो पत्रकारिता के अलावा दूसरे कामों में व्‍यस्‍त हैं. यहां पत्रकारिता के पेशे को बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी जाती है. 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

Gagging Katju only confirms situation in Bihar

Patna : What happened in the Wheeler Senate Hall of Patna University on Friday morning only confirmed how intolerant those close to powers that be in Bihar are. That the Principal of one of the most premier colleges of the state, which entered its 150th year only last month behaved like this before an esteemed chief guest just because he is the husband of a ruling Janata Dal (United) MLA only speaks how bad the situation is in Bihar.

Though Justice Katju repeatedly said that what he is saying is based on what he had heard here, yet the way the Principal of Patna College, Lal Keshwar Prasad Singh, started shouting only speaks volume about the real picture in the state. BiharTimes, and a couple of other mediahouses––none from print media––have been highlighting these facts since long. BiharTimes, in an exclusive report last year exposed how over Rs 28 crores was spent on advertisements to the print media in one year. What is strange is that a large amount of that money went to many vernacular dailies, which only exist on paper.

As the Chairman of the Press Council of India, Justice (Retired) Markanda Katju, has every right to speak. Prof Lal Keshwar Singh could have raised his points after his speech was over. But he chose to shout down the renowned jurist who hit back by stating that “you can not cow me down. If you have your point come out logically and explain it. You can not ask anyone to stop speaking.”

But the state government machinery seems to have learnt no lesson. A local Hindi channel on Friday evening invited a senior journalist to come over to speak in a panel discussion on the issue at 9:00 PM on Friday programme. Suddenly a phone call came late in the evening to that particular journalist informing him that the programme had been cancelled. What actually transpired in between could only be guessed.

Though some electronic media did highlight Justice Katju’s speech and the drama which followed it is to be seen how the print media publish the news. Only last month when the Assistant Editor of The Pioneer, Amarnath Tewary, was assaulted by a woman BJP leader and her son but the local media virtually blacked out the news though some national dailies and BBC extensively covered the incident.

साभार : BiharTimes.com

वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद भारद्वाज मामले में हाई कोर्ट ने मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया

आगरा। डेढ़ साल की जाद्दोजहद के बाद दैनिक जागरण के पूर्व डिप्टी न्यूज एडिटर विनोद भारद्वाज को हाईकोर्ट की दखलंदाजी और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बाद न्याय पाने का रास्ता प्रशस्त हो गया है। दैनिक जागरण कार्यालय में दवा के नाम पर उन्हें खतरनाक नारकोटिक्स पिलाने की साजिश में अदालत ने हत्या के प्रयास, मेंटल डिस आर्डर में पहुंचाने और आपराधिक साजिश रचने का मुकदमा दर्ज करने के थाना छत्ता को ओदश जारी कर दिये हैं।

उल्लेखनीय है कि 18 नवंबर 2010 को तत्कालीन पुलिस महानिदेशदक करमवीर सिंह ने इस साजिश के खुलासे की जिम्मेदारी आई.जी. एस.टी.एफ. को सौंपी थी। एस.टी.एफ. के सी.ओ. नित्यानंद राय ने छह माह के अंतराल में दो बार आगरा आकर जांच की, लेकिन जागरण प्रबंधन के दबाव के चलते कोई कार्रवाई नहीं की जा रही थी। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव ने भी दो बार जांच कर कार्रवाई के ओदश दिये, लेकिन जागरण प्रबंधन का दबाव पुलिस पर इस कदर हावी था कि वे घटना की एफ.आई.आर. तक दर्ज करने को तैयार नहीं थे। आगरा के डी.आई.जी. एफ.आई.आर. दर्ज करने के आदेश देने के बाद जब बैकफुट पर चले गये और एफ.आई.आर. दर्ज कराने में असफल हो गये तो विनोद भारद्वाज ने अदालत की शरण ली। इस दौरान डी.आई.जी. ने एस.पी. (अपराध) को जांच सौंपकर एक बार फिर जांच की नौटंकी शुरू करा दी थी। इसी कारण विनोद भारद्वाज को अदालत की शरण में जाना पड़ा।

स्थानीय ए.सी.जे.एम कोर्ट ने भी एफ.आई.आर. दर्ज न कराके कम्पलेंट केस चलाने के निर्देश दिये तो विनोद भारद्वाज ने हाईकोर्ट में रीट दाखिल की। हाईकोर्ट ने स्थानीय अदालत के आदेश को गैरकानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया और एफ.आई.आर. के दिशा-निर्देश दिये। हाईकोर्ट के दिशा-निर्देश पर अंततः ए.सी.जे.एम. कोर्ट ने थाना छत्ता को मुकदमा दर्जकर विवेचना के निर्देश जारी कर दिये जो कि थाना छत्ता को प्राप्त हो चुके हैं। ये देखना दिलचस्प होगा कि मीडिया जगत का ये शर्मनाक आपराधिक मामला अब आगे क्या रूप लेगा। विनोद भारद्वाज इस बात पर पूरी तरह दृढ़ हैं कि न्याय पाने के लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक भी जाना पड़ा तो वे सुप्रीम कोर्ट भी जायेंगे। पत्रकारिता जगत में ये मामला नवंबर 2010 से चर्चा का विषय बना हुआ है। असल में दैनिक जागरण के उच्च प्रबंधन ने भी विनोद भारद्वाज पर पुलिस कार्रवाई न करने का दबाव बनाया था, जिस मामले से उन्होंने इन्कार कर दिया था और उन्हें सशर्त इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा था। नीचे सीएम और डीआईजी को भेजा गया पत्र। 



सेवामें,
मुख्यमंत्री  
उत्तर प्रदेश

सब्जेक्ट- मेरी हत्या के प्रयास और मुझे मेंटल डिसऑर्डर में पहुंचाने जैसे गंभीर अपराध की जांच को एसटीएफ द्वारा दबा दिए जाने तथा कोई कार्रवाई न किए जाने के संबंध में।

महोदया,

त्वरित आवश्‍यक कार्रवाई हेतु निवेदन है कि उपरोक्त सब्जेक्ट में डीजीपी करमवीर सिंह ने कठोर और गंभीर कदम उठाते हुए मेरे प्रार्थना-पत्र की जांच आईजी एसटीएफ सुबेश कुमार सिंह को अपने कार्यालय में बुलाकर एसटीएफ लखनउ से कराए जाने के निर्देश मेरी मौजूदगी में 18 नवम्बर, 2010 को दिए थे। आईजी ने अपने एसएसपी को निर्देश देकर इस मामले की जांच एसटीएफ के सीओ नित्यानंद राय को सौंपी थी।

तमाम दस्तावेजी साक्ष्य देने के बावजूद सीओ नित्यानंद राय मेरे प्रार्थना-पत्र, आदेशों और साक्ष्यों को पांच माह से दबाकर बैठे हैं। उन्होंने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। इस कारण 28 दिसम्बर को मैं पुनः डीजीपी से मिला और उन्‍हें बताया कि आईजी सुबेश कुमार सिंह आगरा में एसएसपी रह चुके हैं, उनके साजिशकर्तां से पारिवारिक संबंध हैं। सीओ नित्यांदन राय भी आगरा में सीओ हरी पर्वत रह चुके हैं। इसी कारण मेरी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

डीजीपी ने मेरी शिकायत की गंभीरता को समझते हुए सीओ नित्यानंद राय और सीओ अरविंद चतुर्वेदी को अगले दिन 29 दिसम्बर को सवेरे साढ़े दस बजे तलब कर लिया और अपने कार्यालय में ही मेरी सीओ राय से एक घंटे बात करवाई; उन्होनें स्वयं भी जांच की प्रगति और आगे की कार्रवाई के संबंध में मेरे सामने ही सीओ राय से बात की; इतना सब होने के बाद भी सीओ नित्यानंद राय ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की है। मैंने सीओ को अपने ईलाज के पेपर्स के साथ ही छह चश्‍मदीद गवाहों के शपथ-पत्रों की प्रमाणित छाया प्रतियां भी उनको दी थीं; इसके बावजूद सीओ नित्यानंद राय ने आज तक कुछ नहीं किया, क्योंकि इनके अपराधियों और साजिशकर्ताओं से सीधे संबंध हैं।

मैं दैनिक जागरण आगरा में डिप्टी न्‍यूज एडिटर के पद पर इस माह तक रहा हूं। मैंने लगभग 24 साल तक दैनिक जागरण आगरा में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। इस घटना का आपराधिक स्थल दैनिक जागरण कार्यालय है और साजिश के तार दैनिक जागरण प्रबंधन से जुड़े हैं। दवा के नाम पर मुझे नारकोटिक्स पिलवाकर मेंटल डिसऑर्डर में ले जाने की साजिश में महत्वपूर्ण और ताकतवर लोगों का हाथ है। इसलिए तमाम सबूतों के बावजूद आज तक डॉक्टर और दवा के नाम पर नारकोटिक पदार्थ मिलाकर देने वाली डॉक्टर की पत्नी के खिलाफ एफआरआई तक दर्ज नहीं की गई है। इनको अरेस्ट करते ही आपराधिक साजिश के पीछे मौजूद असली चेहरे बेनकाब हो जाएंगे।

इस संबंध में मेरे तार्किक प्रश्‍न ये हैं कि –
1- आज तक सीओ नित्यानंद राय घटना स्थल दैनिक जागरण कार्यालय आगरा क्यों नहीं गए?
2- मेरे द्वारा उन्हें दिए गए दैनिक जागरण के छह कर्मियों के शपथ पत्र मिलने पर भी उन्होंने आज तक गवाहों के बयान क्यों नहीं लिए?
3- नारकोटिक पदार्थ पीने से मेंटल डिसऑर्डर में मेरा ईलाज करने वाले नर्सिंग होम के डॉक्टरों के बयान आज तक क्यों दर्ज नहीं किए गए?
4- नामजद करने और सबूत देने पर भी डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर तो दूर उसके बयान तक एसटीएफ ने क्यों नहीं लिए?
5- आखिर वे कौन ताकतवर साजिशकर्ता हैं, जिनके प्रभाव और दबाव ने डीजीपी कर्मवीर सिंह के आदेश-निर्देश भी बौने कर दिए?

उपोक्त परिस्थितियों में प्रार्थी ने दैनिक जागरण प्रबंधन को सशर्त इस्तीफा दिया, जिसे प्रबंधन ने लिखित में गैरकानूनी ढंग से तत्काल स्वीकार कर लिया। इस इस्तीफे को स्वीकार कर प्रबंधन ने लिखित रूप यह मान लिया है कि उनके कार्यालय में आपराधिक साजिश हुई हैं। उनकी साजिश में लिप्त होने का यह सबसे बड़ा दस्तावेजी सबूत है। आरंभिक रूप से डॉक्टर के विरूद्ध साफतौर पर भादवि की धारा 276 का मामला बनता है, जो कि गैर जमानती संज्ञेय अपराध है। अभी डॉक्टर के खिलाफ ही कार्रवाई नहीं हो सकी है, तो एसटीएफ साजिशकर्ताओं के खिलाफ कया कर पाएगी?

मेरा आपसे अनुरोध है कि मेरी शिकायत पर आईजी और एसएसपी एसटीएफ से जवाब तलब करने की कृपा करें और सीओ नित्यानंद राय की मनमानी के इतने सबूत हैं कि उन्हें तत्काल बिना उनका जवाब सुने पहले निलंबित किया जाना चाहिए। ये सभी अधिकारी एसटीएफ जैसी महत्वपूर्ण जांच और एक्‍शन फोर्स के हैं। अतः इनके खिलाफ तो और त्वरित और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह भी अनुरोध है कि मेरे सशर्त इस्तीफे की स्वीकृति की जांच उच्च अधिकारियों की टीम बना कर कराई जाए और इसके लिए एक निगरानी समिति भी गठित की जाए। ये जांच खुद को देश नंबर वन मीडिया हाउस कहने वाले समाचार पत्र दैनिक जागरण प्रबंधन के गैरकानूनी आपराधिक कृत्य की है। अतः उनकी ताकत के महत्व को नजरअंदाज न किया जाए अन्यथा ये जांच भी प्रभावित हो जाएगी।

नोटः- विलम्ब से दिया गया न्याय, न्याय को नकारने अर्थात अन्याय के समान होता है। पहले से ही एसटीएफ पांच माह तक इस मामले को दबाए रखकर अपराधियों को सबूत मिटाने और खुद को बचाने के भरपूर मौके दे चुकी है। अतः अब इस मामले की त्वरित और तेजी से जांच करवाने के लिए सीनियर आईपीएस अधिकारी की नियुक्ति करने की कृपा करें, यही न्याय संगत होगा।

दिनांक – 27 अप्रैल 2011

सादर 

विनोद भारद्वाज

पूर्व डीएनई

दैनिक जागरण, आगरा


सेवा में
डी आई जी आगरा

महोदय,

सूचनार्थ और आवश्‍यक कार्रवाई हेतु निवेदन है कि मेरे द्वारा डाक्टर राज परमार के विरुद्ध दी गई तहरीर पर लगभग तेरह माह बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं किया जा रहा है। जबकि मैं स्वयं 17 अगस्त, 19 अगस्त और 20 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से आपसे मिला था। मैंने तीनों ही बार घटना से संबन्धित सारे तथ्य और सबूत आपके सामने रखे थे। आपने मुझसे सहमत होने के बाद 20 नवंबर को मेरे ही सामने एस पी (अपराध) को मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज कराने की अनुशंसा करने का निर्देश दिया था।

21 नवंबर को इंस्पेक्टर न्यू आगरा तहरीर पर मुझसे हस्ताक्षर कराकर ले गए थे और मुझसे कहा था कि कल आप थाने से अपनी एफआईआर की कॉपी ले लेना। 24 नवंबर को इंस्पेक्टर न्यू आगरा ने मुझे बताया कि आपकी तहरीर के अनुसार घटना स्थल थाना छत्ता क्षेत्र के अंतर्गत आता है। डीआईजी साहब ने निर्देश दिया है कि आप न्यू आगरा थाने में मुकदमा दर्ज न करें और तहरीर थाना छत्ता भेज दें, अब यह मुकदमा थाना छत्ता में ही लिखा जाएगा। जब मैं थाना छत्ता में जाकर एसओ छत्ता आर के शर्मा से मिला तो उन्होंने मुझे यह कहते हुए टाल दिया कि आप मुझे एक-दो दिन का समय दीजिए, मैं एक-दो दिन में जांच करके यह मुकदमा दर्ज कर लूंगा।

24 नवंबर के बाद से अब तक मेरी कई बार एसओ छत्ता से बात हुई है, लेकिन वे हर बार कोई न कोई बहानेबाजी करके मुझे टालते चले आ रहे हैं। इस दौरान मैंने आपसे भी मोबाइल फोन पर एसओ छत्ता द्वारा रिपोर्ट दर्ज न करने और बार-बार टालने की शिकायत भी की थी। आपने मुझे आश्‍वस्‍त किया था कि मैं एसओ छत्ता से बात कर रहा हूं, आपका मुकदमा हर हाल में लिखा जाएगा। आज 6 दिसम्बर तक भी एसओ छत्ता ने मेरी रिपोर्ट दर्ज नहीं की है।

इस संबंध में मुझे आपसे अनुरोध करना है कि प्रदेश के डीजीपी से लेकर थाने तक के अधिकारियों को अपराध की पूरी जानकारी होने के बावजूद इतने दिन बाद भी मेरी तहरीर को तरह-तरह के बहाने बनाकर जांच के नाम पर लम्बित रखा जा रहा है, लेकिन उस पर रिपोर्ट दर्ज करने से बचा जा रहा है। मैं विनम्रतापूर्वक आपसे पूछना चाहता हूं कि पुलिस मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने से क्यों कतरा रही है। मुकदमा दर्ज कराना मेरा अधिकार है और उस पर एफआर लगाना, चार्जशीट लगाना या एक्सपंज करना पुलिस का अधिकार है, फिर आखिरकार मेरी रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की जा रही है। क्या मैं यह मान लूं कि समूचा पुलिस तंत्र मेरे मुकदमे के आरोपियों और साजिशकर्ताओं के आगे बौना हो गया है या फिर उनसे मिला हुआ है। पुलिस आखिर मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने से इनकार कैसे कर सकती है। रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की जा रही है। इस से बचा जा रहा है, घोर आश्‍चर्य है कि सीनियर आईपीएस अफसर भी मेरे मामले में मुझे न्याय देना तो दूर, आज तक मुकदमा भी दर्ज नहीं करा पा रहे हैं। क्या अब मैं यह मान लूं कि मुझे मुकदमा दर्ज कराने और उसकी जांच किसी दूसरी एजेंसी से कराने के लिए भी हाईकोर्ट की शरण में जाना पडे़गा। अगर मेरे जैसे सीनियर जर्नलिस्ट को मुकदमा दर्ज कराने के लिए इतने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं तो फिर एक आम आदमी का तो इस प्रदेश में बस भगवान ही मालिक हो सकता है।

मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी शिकायत की गम्भीरता को आप समझेंगे और मुझे जांच में न्याय मिले या न मिले लेकिन आप कम से कम मेरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज कराने की जहमत जरूर उठायेंगे।

दिनांक  06-12-201

भवदीय

विनोद भारद्वाज

पुत्र स्व श्री राजेन्द्र प्रसाद

निवासी 11-शारदा विहार,

दयाल बाग आगरा



इस मामले के बारे में और ज्‍यादा जानने के लिए नीचे दिए गए लिंकों पर क्लिक करिए –

जागरण में ये भी होने लगा, डीएनई की जान लेने की कोशिश

विष्णुजी, आप खुद को महान सिद्ध करने के लिए दूसरों को नाकारा घोषित करने के आदी हो चुके हैं

'हत्या हुई तो जिम्मेदार सरोज अवस्थी, आनंद शर्मा व विष्णु त्रिपाठी होंगे'

एसटीएफ ने जागरण के पूर्व डीएनई की जान लेने की कोशिश की जांच शुरू की

आजम खान ने मीडिया के बारे में क्या कहा, देखें वीडियो

आजम खान मीडिया के बारे में क्या राय रखते हैं, इस वीडियो को देखकर जाना जा सकता है. चुनावी दौर में एक जगह अपने भाषण में आजम ने मीडिया पर भड़ास निकाली. वीडियो देखने के लिए क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/577/–media-world/azam-ne-kaha-ki-mulk-ki-ghatiya-media.html

”भाई को बहुत मारा और मुझे जनता टीवी की शिकायत वापस लेने को कहा”

दोस्तों नमस्कार, आप सभी के आशीर्वाद से मैं बच गया. अब मैं आप को अपनी आप बीती बताता हूं कि जनता टीवी ने मेरे साथ क्या-क्या खेल खेला. दोस्तों मैंने सिर्फ जनता टीवी से अपने काम के पैसे मांगे, मगर जनता टीवी के मालिक गुरबिंदर व उनके तेजतर्रार इंप्लाई थानेश्वर ने मुझे इतना मजबूर कर दिया कि मैं आत्‍म हत्या कर लूं. जनता टीवी के मालिक गुरबिंदर ने १ जनवरी को सीआईए २ को मेरे घर भेजा, जो मेरे भाई पवन जोगी को जबरदस्‍ती उठा कर ले गए और ३ जनवरी को मेरे भाई के खिलाफ चोरी का मुकदमा कर दिया.

मेरे भाई को बहुत मारा और मुझे मजबूर किया कि मैं जनता टीवी के खिलाफ दी गई शिकायतों को वापस ले लूं. शिकायत वापस लेने को कहने के साथ १ लाख की मांग की. मैंने हाई कोर्ट में केस डाल दिया तो फिर मुझे एनकाउंटर की धमकियां मिलने लगीं. मैंने मजबूर होकर हालत के सामने घुटने टेक दिए और आत्‍महत्या करने की कोशिश की मगर आप लोगों के प्यार ने मुझे नया जीवन दिया. फिर मैंने करनाल सीआईए २ के इंचार्ज मनोज वर्मा की एक लाख रुपये की मांग करते हुए रिकोर्डिंग की. कानून तथा रिकार्डिंग का सहारा ले कर उन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की मगर कहीं कुछ नहीं हुआ. उस के बाद मैंने मानव अधिकार आयोग की शरण ली, जिसमें जनता टीवी व अन्य के खिलाफ केस रजिस्टर हो गया है.

केस रजिस्‍टर होने के बाद खुद को फंसता देख जनता टीवी व तेजतर्रार थानेश्वर ने दिल्ली से आरपीएफ को भेज कर मेरे पिता जिनकी उम्र ६४ साल है, के खिलाफ भी रेल लाइन चोरी का झूठा मुकदमा दर्ज कर दिया. अब फिर कोई नया हथकंडा आजमाने की कोशिश कर रहे हैं. आज मुझे धमकी मिली है कि अब वे मुझे भी किसी केस में फंसवाएंगे. पता नहीं जनता टीवी और कितना नीचे जाएगा. आप अब देखना जनता टीवी क्‍या-क्‍या खेल खेलता है.

आपका अपना

मयंक जोगी

8295556660

‘हिमाचल आजकल’ न्यूज बुलेटिन का आज से आगाज़

'हिमाचल आजकल'' न्यूज़ बुलेटिन का आज से आगाज़ हो रहा है। आज 25 फरवरी से दिशा चैनल पर रात 9 बजे हिमाचल की खबरों का पहला प्रसारण होगा। ''हिमाचल आजकल' में हिमाचल की हर वो छोटी बड़ी खबर दिखाई जाएगी जिसका सरोकार आमजन से है। खबरों पर पकड़ मजबूत करने के लिए हिमाचल के चप्पे-चप्पे पर संवाददाताओं का नेटवर्क खड़ा किया जा चुका है जो राज्य के हर इलाके की खबर पहुंचा रहे हैं। पहली मार्च से इसी चैनल पर खबरों की कवरेज को और बढ़ाकर दो न्यूज़ बुलेटिन किए जाएंगे।

पंद्रह मार्च से सुबह 9 बजे, दोहपर 3 बजे और रात 9 बजे तीन बुलेटिन दिशा चैनल पर प्रसारित किए जाएंगे। दिशा चैनल डिश टीवी-757, एयरटेल डिजिटल-689, वीडियोकॉन डी2एच- चैनल नंबर- 685 और टाटा स्काई चैनल नंबर- 184 पर भी उपलब्ध है। आप इसका लाइव प्रसारण देख सकते है www.tvunetworks.com पर। हिमाचल आजकल के प्रधान संपादक कृष्ण भानु को पत्रकारिता का लम्बा अनुभव है और 32 सालों से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। उनके अनुसार हिमाचल आजकल ने संबंधित विभाग में लाइसेंस के लिए अप्लाई कर दिया है। उम्मीद है कि साल 2012 में न्यूज चैनल के तौर पर लाइसेंस प्राप्त कर 24X7 के रूप में प्रदेश वासियों के सामने होगा और राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल का प्रतिनिधित्व करेगा। प्रेस विज्ञप्ति

महिला आईपीएस का थप्पड़ और सरेआम इज्जत उतारने वाली व्यवस्था

सवाल थप्पड़ का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें एक संभ्रांत महिला या पुरूष की सरेआम इज्जत उतार ली जाती है. वैसे ये काम अपराधी और असामाजिक तबका तो गाहे-ब-गाहे करता ही रहता है लेकिन कानून व्यवस्था की लगाम जिन हाथों में हो वही बहक जाए तो फिर आम जनता क्या करे? जी हां आप ठीक समझ रहे हैं, यहां बात हो रही है पटना के सिटी एसपी किम की. इस नौजवान महिला एसपी ने पटना के कंकड़बाग की एक महिला को जो थप्पड़ जड़ा उसने इन दिनों बिहार का सियासी माहौल गर्मा दिया है.

विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया है और विधान सभा में इसके विरोध में धरना-प्रदर्शन हो रहा है. कोई सिटी एसपी के निलंबन की मांग कर रहा है तो कोई उन्हें बर्खास्त करने की. हां इस बीच कुछ ऐसी भी बातें हुई है जो लीक से हटकर है. सबसे अहम बात ये हुई है कि सत्ता संभालने के बाद पुलिसिया ज्यादती की किसी घटना को लेकर पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री ने सदन में माफी मांगी.

माफी की इस अपील के साथ ही लोगों के जेहन में ये सवाल उठ रहा है कि पुलिसिया ज्यादती की कई घटनाएं सूबे में हुईं जो इससे कहीं ज्यादा संगीन थीं लेकिन तब तो मुख्यमंत्री ने माफी नहीं मांगी, फिर इस बार ऐसा क्या हुआ जो वो हाथ जोड़ रहे हैं? लोगों को फारबिसगंज में पुलिस की गोली से एक बच्चे सहित चार लोगों के मारे जाने की घटना याद है. बिहार के कई जिलों में पुलिस कस्टडी में हुई मौतों की घटना भी याद है.

नालंदा में पुलिस वालों ने आम लोगों को किस तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा ये भी याद है. इसके साथ ही पुलिस के और भी कई कारनामे याद है जिसने प्रशासन औऱ सरकार को कटघरे में खड़ा किया लेकिन किसी भी मामले में नीतीश कुमार ने माफी नहीं मांगी. हर बार बस यही कहा कि कानून अपना काम करेगा. ये पहली बार है कि पुलिस के जनविरोधी रवैये के आरोप पर नीतीश कुमार ने जांच की बात के साथ माफी मांगी है. बहरहाल नीतीश कुमार क्यों मांफी मांग रहे हैं इसकी जांच का जिम्मा हम आप पर छोड़ते हैं और आपको बताते हैं वो दूसरी बात जो लंबे अरसे बाद हुई है.

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की नीतीश कुमार की मांग में सुर मिलाने के बाद ये पहला मौका है जब किसी मसले पर बड़े भाई ने छोटे भाई की लाइन ली है. बिहार में विपक्ष का अकेला चेहरा लालू यादव ने भी कहा है कि किम को माफ कर देना चाहिए. लालू महिला एसपी के कम अनुभव का हवाला देते हैं. हां उनका ये कहना जरूर है कि सिटी एसपी को माफी मांगनी चाहिए.

अब सवाल है कि छोटे भाई और बड़े भाई दोनों की अपील के बाद क्या बिहार की जनता पटना की सिटी एसपी को माफ कर देगी? कायदा ये कहता है कि अगर गलती हुई है तो उसकी सजा मिलनी चाहिए फिर चाहे वो कोई भी हो (जैसा कि नीतीश कहते आए है) लेकिन मुख्यमंत्री ही माफ करने की अपील करें तो फिर क्या कायदा और क्या कानून!  वैसे हम ये सवाल अपने सुधी पाठकों पर छोड़ते हैं कि वो पुलिसिया ज्यादती को माफ करती है या नहीं.

लेखक श्याम किशोर का यह लिखा राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है.

आईपीएस किम और उनके चांटे के बारे में ज्यादा जानने व तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें… http://www.bhadas4media.com/article-comment/2790-2012-02-24-17-52-58.html

भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर आठ लोग नया सवेरा से जुड़े

दैनिक भास्‍कर, लुधियाना से खबर है कि कई लोगों ने इस्‍तीफा देकर अपनी नई पारी दैनिक सवेरा के साथ शुरू की है. चीफ रिपोर्टर नीरज मैनरा, क्राइम रिपोर्टर तरसेम दियोगण, राजेश भट्ट, दीपक सैलोपाल, चीफ फोटोग्राफर कुलदीप काला एवं फोटोग्राफर रमेश वर्मा शामिल हैं. इन सभी लोगों ने नया सवेरा ज्‍वाइन किया है. बिजनेस भास्‍कर, पटियाला में कार्यरत सीनियर रिपोर्टर नरेश बातिश ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. इन्‍होंने भी अपनी नई पारी नया सवेरा के साथ शुरू की है. नरेश बातिश सीनियर रिपोर्टर के रूप में नया सवेरा से जुड़े हैं.

नया सवेरा, पटियाला की कमान नवनीत छिब्‍बर को सौंपी गई है. नवनीत भी भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर आए हैं. नवनीत दैनिक भास्‍कर, लुधियाना की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. वे डेस्‍क तथा रिपोर्टिंग दोनों में माहिर माने जाते हैं. गौरतलब है कि इसके पहले चार लोगों ने बठिंडा में भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर नया सवेरा का दामन थामा था.

रवींद्र शाह को श्रद्धांजलि देने के लिए कल एक बजे नोएडा सेक्‍टर 24 पहुंचे

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं आउटलुक हिंदी के एसोसिएट एडिटर रहे रवींद्र शाह श्रद्धांजलि देने के लिए नोएडा में एक सभा का आयोजन किया गया है. गौरतलब है कि एमपी में हुए एक सड़क हादसे में रवींद्र शाह की मौत हो गई थी. उनका अंतिम संस्‍कार भोपाल के मालवा क्षेत्र में स्थित मुक्तिधाम में किया गया था. उनको मुखाग्नि उनके पुत्र देवाशीष ने दी थी. रवींद्र शाह की आत्‍मा की शांति के लिए नोएडा के सेक्‍टर 24 में स्थित अग्रवाल सभा भवन में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है. अग्रवाल भवन इस्‍कान टेम्‍पल के बगल में स्थित है. यह कार्यक्रम रविवार यानी 26 फरवरी को दोपहर एक बजे से शुरू होगा. उन्‍हें श्रद्धांजलि देने वाले सभी लोग यहां पहुंच सकते हैं. 

एनआरएचएम घोटाला : सीबीआई का छापा जारी, दैनिक जागरण के निदेशक वीरेंद्र कुमार के पुत्र के यहां भी छापेमारी

लखनऊ। एनआरएचएम घोटाले में शनिवार को लगातार दूसरे दिन भी सीबीआई की छापेमारी जारी है. शनिवार को सीबीआई ने बनारस, मेरठ और लखनऊ सहित 12 शहरों में संबंधित विभाग के दफ्तरों और अधिकारियों के ठिकानों पर छापेमारी की जो अब भी जारी है. गौरतलब है कि शुक्रवार को भी सीबीआई ने इस घोटाले में एक साथ 22 जिलों के 35 ठिकानों पर छापेमारी की थी। एनआरएचएम से जुड़े छह हत्‍या, आत्‍महत्‍या तथा दुर्घटनाओं की भेंट चढ़ चुके हैं.

बताया जा रहा है कि सीबीआई टीम ने शुक्रवार को छापामारी के दौरान मोहर, सीडी, फर्जी बिल के अलावा और कई दस्‍तावेज बरामद किए. सीबीआई टीम आज यूपी के अलावा बिहार में भी छापेमारी की है. लखनऊ में तीन सीएमओ के ठिकानों पर छापेमारी की गई है. यहां से महत्‍वपूर्ण सरकार दस्‍तावेज एवं कम्‍प्‍यूटर का हार्ड डिस्‍क कब्‍जे में लिया गया है. आज कुल 23 ठिकानों पर छापेमारी चल रही है. जिन शहरों में छापेमारी की गई है उनमें मेरठ, गाजियाबाद, कानपुर, वाराणसी और गोरखपुर शामिल हैं.

बनारस में सीबीआई टीम ने दैनिक जागरण के निदेशक और स्‍थानीय संपादक वीरेंद्र कुमार के डा. पुत्र हेमंत गुप्‍ता के क्लिनीक पर भी छापेमारी की है. सुबह तड़के पहुंची टीम कई जानकारियां लेने के बाद निकल गई. अब यह छापेमारी किसलिए की गई है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. पर माना जा रहा है कि मानवेंद्र चड्ढा के कनेक्‍शन के चलते ही यह छापेमारी हुई है. सीबीआई टीम इस समय डा. केएन तिवारी के यहां छापेमारी कर रही है. सभी जगहों से सबूत खंगाले जा रहे हैं.

उल्‍लेखनीय है कि अब तक सीबीआई की टीम ने एनआरएचएम घोटाले में बारह प्राथमिकी दर्ज करा चुकी है. चार नए प्राथमिकी तो कल के छापेमारी के बाद दर्ज कराए गए हैं. संभावना जताई जा रही है कि कुछ और रिपोर्ट भी आज दर्ज कराए जा सकते हैं. सूत्रों का कहना है कि सीबीआई की यह छापेमारी कल भी जारी रह सकती है.

उपजा के परिचय पत्र के नाम पर देवरिया में धोखाधड़ी का खेल

देवरिया। देवरिया में कुछ पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन, लखनऊ के नाम पर परिचय पत्र जारी कर धन उगाही करने का खेल धड़ल्ले से शुरू कर दिया है। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है। जानकारी के अनुसार विमल त्रिपाठी पुत्र श्री सत्येन्द्र नाथ तिवारी निवासी निकट मुख्य डाकघर, सिविल लाईन्स, कचहरी रोड देवरिया, जो खुद को उक्त जर्नलिस्ट एसोसियेशन का जिला अध्यक्ष/महामंत्री बताते हैं, ने एक ऐसे व्यक्ति, जिसका पत्रकारिता से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है, को उक्त पत्रकार संगठन का सदस्य बनाकर परिचय पत्र जारी करने के सम्बन्ध में एक बड़ा षणयन्त्र रच डाला है।

बताया जाता है कि भानु प्रताप तिवारी निवासी मकान नम्बर 505/1, संकट मोचन नगर, भीखमपुर रोड, देवरिया को किसी छोटे मोटे अखबार का नहीं बल्कि प्रेस ट्रस्ट आफ इण्डिया न्यूज एजेन्सी एवं नई दुनिया जैसे राष्ट्रीय एवं बड़े अखबार का पत्रकार घोषित करते हुए उ0 प्र0 जर्नलिस्ट एसोसिऐशन, 31 बी, दारूलशफा, लखनऊ का परिचय पत्र जारी करने हेतु फार्म भरवा लिया गया था। लेकिन संयोगवश इसका भण्डाफोड़ उस समय हो गया जब संगठन का उक्त फार्म ही किसी तरह से एक पत्रकार के हाथ लग गया। बताया जाता है कि जिला अध्यक्ष कहे जाने वाले श्री त्रिपाठी ने संगठन का सदस्य बनाने एवं परिचय पत्र देने के नाम पर हजारों वसूलने के साथ ही दर्जनों फार्म अपने पास जमा कर रखा है।

इस बारे में उ0 प्र0 जर्नलिस्ट एसोसिएशन के गोरखपुर मण्डल के प्रभारी कहे जाने वाले मारकण्डेय मिश्र ने कहा कि जिला प्रभारी द्वारा गलती की गई है जिसके लिए कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बताया जाता है कि श्री विमल त्रिपाठी एवं उनके सगे छोटे भाई निर्मल त्रिपाठी, जो अपने को कई अखबारों का पत्रकार बताते हैं, के खिलाफ सलेमपुर पुलिस थाना कोतवाली में न्यायालय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट देवरिया के आदेश पर धारा 323, 504, 506, 394 आईपीसी के तहत आपराधिक मुकदमा भी दर्ज है। जिसमें पुलिस की जांच चल रही है।

फिलहाल पत्रकार संगठन के नाम पर अवैध वसूली किये जाने एवं फर्जी परिचय पत्र दिलाने के इस सम्बन्ध में आवश्‍यक कार्रवाई हेतु उ0 प्र0 जर्नलिस्ट एसोसिएशन लखनऊ के साथ ही साथ पुलिस से भी शिकायत की गई है। अब देखना है कि एसोसिएशन और पुलिस इस मामले में क्‍या कदम उठाती हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कांग्रेस प्रत्‍याशी ने नगमा से की छेड़खानी, मंच छोड़ कर गईं

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजनौर के बरहापुर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी ने अभिनेत्री और पार्टी की स्टार प्रचारक नगमा के साथ आपत्तिजनक हरकतें की जिससे वे नाराज होकर मंच छोड़कर चली गयीं। घटना पिछले बुधवार की है। बरहापुर से कांग्रेस प्रत्याशी हुसैन अहमद अंसारी ने सुश्री नगमा को माला पहनाते वक्त उनके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की। नगमा ने उनका हाथ झटक दिया। हुसैन अंसारी यहीं नहीं रुके और नगमा की आंख और जुल्फों की तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिये।

मंच पर कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी भी मौजूद थे। हुसैन अंसारी ने शेर – 'कौन सा गम जो ये हाल बना रखा है/ ना मेक अप है ना बालों को सजा रखा है/ खामोखां छेड़ती रहती हैं रुखसारों को' सुनान शुरू किया तो नगमा ने मंच से ही कहा भी कि ये क्‍या बकवास कर रहे हैं तो हुसैन अंसारी ने कहा कि वे बकवास नहीं कर रहे हैं। उनके समझाने से भी कांग्रेस प्रत्याशी नहीं माने और नगमा की सुन्दरता का गुणगान करते रहे। स्थिति यहां तक पहुंची की नाराज नगमा मंच छोड़कर चली गयीं।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नगमा के बचाव में आयी है। भाजपा ने कांग्रेस प्रत्याशी की इस हरकत पर सवाल उठाये हैं और पार्टी महासचिव राहुल गांधी से ऐसे प्रत्याशी के खिलाफ कार्रवाई की अपेक्षा की है। प्रदेश भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने आज यहां सवाल उठाया कि स्वच्छता का दावा करने वाली कांग्रेस ने ऐसे प्रत्याशी को चुनाव में टिकट कैसे दे दिया। कम से कम एक महिला के साथ ऐसे व्यवहार पर गांधी को कार्रवाई करनी चाहिए। नीचे वीडियो भी देख सकते हैं।

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=1Odnsc7Ah3I

निर्दलीयों के लिए अब आसान नहीं है यूपी विधान सभा की राह

लखनऊ: अपनी शख्सियत के दम पर कभी 74 निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनावी बाजी मारकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में रिकॉर्ड कायम किया था, लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की बढ़ती पैठ के चलते बदली परिस्थितियों में निर्दलीय सूरमाओं के लिए जीत दर्ज करना आसान नहीं रह गया है. अपने दम पर मैदान जीतना आसान न होता देख इस चुनाव में निर्दलीय सूरमाओं में से कुछ बड़े राजनीतिक दलों में शामिल होने या उनका समर्थन पाने में सफल रहे तो कुछ ने किसी छोटे राजनीतिक दल का दामन थाम लिया.

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में कुल 2582 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे थे जिनमें से केवल नौ सूरमाओं रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, अखिलेश सिंह, इमरान मसूद, अजय राय, राम प्रकाश यादव, विनोद कुमार, अशोक यादव, यशपाल सिंह रावत और मुख्तार अंसारी ने जीत दर्ज की थी. इस विधानसभा चुनाव में सिर्फ अपनी शख्सियत और लोकप्रियता के भरोसे चुनाव जीतना आसान न होता देख विधायक अजय राय और विधायक इमरान मसूद ने इस बार कांग्रेस से टिकट का जुगाड़ कर लिया तो विधायक अशोक यादव ने जनता दल (युनाइटेड) का दामन थाम लिया.

विधायक अखिलेश सिंह नवगठित पीस पार्टी और मुख्तार अंसारी नवगठित कौमी एकता दल से चुनाव मैदान में हैं. वहीं, राजा भैया और विनोद कुमार चुनाव मैदान में तो निर्दलीय उम्मीदवार हैं लेकिन उन्हें सपा का समर्थन प्राप्त है. एक समय था जब निर्दलीय उम्मीदवार अपनी लोकप्रियता और शख्सियत की बदौलत बड़ी राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवारों को हराकर बड़ी तादाद में विधानसभा पहुंचते थे. मौजूदा विधानसभा चुनाव में ऐसे ही 1780 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों की कामयाबी के लिहाज से 1957,1962, 1967, 1985 और 1989 के चुनाव काफी अहम रहे. इन चुनावों में क्रमश: 74, 31, 37, 30 और 40 निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी. जानकारों का कहना है कि 1989 के बाद राजनीतिक दलों के प्रति जनता की प्रतिबद्धता बढ़ी, जिस कारण निर्दलीयों के लिए विधानसभा पहुंचना मुश्किल होने लगा. (एजेंसी)

जगजीत सिंह बने जीएनएन चैनल में जीएम, चिटफंड कंपनी जीएन गोल्‍ड पर छापेमारी

जीएन ग्रुप से खबर है कि इस ग्रुप के चैनल जीएनएन में जगजीत सिंह ने जनरल मैनेजर के पद पर ज्‍वाइन किया है. बताया जा रहा है कि जगजीत सिंह को चैनल को परेशानियों से निकालने के लिए लाया गया है. चैनल ट्रेनियों के सहारे संचालित हो रहा है. सीईओ राघवेश अस्‍थाना, एचआर हेड वेंकट शर्मा तथा चैनल हेड अमिताभ भट्टाचार्या के छोड़ जाने के बाद कोई भी वरिष्‍ठ पत्रकार इस चैनल से नहीं जुड़ा. बताया जा रहा है कि चिटफंडियों के इस चैनल से सीनियर पत्रकार जुड़ने में दिलचस्‍पी नहीं दिखा रहे हैं.

बताया जा रहा है कि जगजीत सिंह को इसलिए लाया गया है ताकि वे चैनल को पटरी पर ला सकें. खबर है कि जीएन ग्रुप का प्रबंधन जीएन गोल्‍ड पर छापेमारी से परेशान है. बताया जा रहा है कि चिटफ‍ंडिया कंपनी जीएन गोल्‍ड के कई ठिकानों पर छापेमारी की गई है. जीएन ग्रुप से जुड़े लोग इसकी पुष्टि तो करते हैं, पर छापे के बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दे रहे हैं. उल्‍लेखनीय है कि जीएन गोल्‍ड पर पिछले साल दिसम्‍बर में भी चित्‍तौड़गढ़ में धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया था.

पुलिस ने जीएन गोल्‍ड के खिलाफ आईपीसी की धारा 406, 420 व इनामी चिट व धन परिचालन स्‍कीम (पाबंदी) अधिनियम 1978 की धारा 3, 4, 5 व 6 के तहत मामला दर्ज किया था. पुलिस ने इस मामले में एक व्‍यक्ति को गिरफ्तार भी किया था. बताया जा रहा है कि राजस्‍थान और देश भर में चलाए जा रहे चिटफंडियों के खिलाफ अभियान के तहत यह छापेमारी की गई है. इसके चलते ही कंपनी में हड़कम्‍प मचा हुआ है. चैनल भी बुरे दौर से गुजर रहा है. बताया जा रहा है कि इसी पूरे मामले को ठीक से सेट करने के लिए जगजीत सिंह को लाया गया है.

आजतक नम्‍बर एक पर कायम, स्‍टार न्‍यूज ने इंडिया टीवी को नीचे ढकेला

टैम ने सातवें सप्‍ताह की टीआरपी घोषित कर दी है. इस सप्‍ताह कुछ बदलाव देखने को मिले हैं. आजतक लगातार नम्‍बर एक की पायदान पर मजबूती से खड़ा है, लेकिन सांप-बिच्‍छुओं वाला टीवी दूसरे स्‍थान से खिसक कर तीसरे स्‍थान पर पहुंच गया है. उसे यह झटका स्‍टार न्‍यूज ने दिया है. स्‍टार अब दूसरे स्‍थान पर आ गया है. सबसे बुरी स्थिति एनडीटीवी की हुई है. एनडीटीवी खिसक कर आठवें स्‍थान पर पहुंच गया है.

न्‍यूज24 भी चौथे स्‍थान पर है. उसने आईबीएन7 को पीछे छोड़ा है. टॉप बारह में इस बार डीडी भी पहुंच गया है. उसने सीएनईबी, इंडिया न्‍यूज और लाइव इंडिया को पीछे छोड़ा है. ग्‍यारहवें नम्‍बर पर न्‍यूज एक्‍सप्रेस है. समय सातवें स्‍थान पर पहुंच गया है. नीचे सातवें सप्‍ताह की टीआरपी. 

स्रोत- टैम (अवधि : 12 फरवरी से 18 फरवरी तक)  सातवां सप्‍ताह

आजतक – 17.4, स्टार न्यूज़ – 13.6, इंडिया टीवी – 13, ज़ी न्यूज़ – 9.2, न्यूज़24 – 8.7, आईबीएन7 – 7.5, समय – 7.1, एनडीटीवी इंडिया – 6.5, तेज – 4.5, पी7 न्यूज़ – 4.2, न्यूज़ एक्सप्रेस – 3.5, डीडी न्‍यूज – 2.1.

जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में तबादले के जरिए छंटनी की तैयारी

जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में हंगामा ही हंगामा है. अभी चौथाई सेलरी रोके जाने का मामला ठण्‍डा नहीं पड़ा है कि पत्रकारों को निकाले जाने और तबादला किए जाने की योजनाएं तैयार की जाने लगी हैं. मामला यहां भी काम का कम इगो का ज्‍यादा है. शैलेंद्र मणि त्रिपाठी और एमडी अनुज पोद्दार के बीच इगो का मामला फंस गया है. जिस हनक के साथ शैलेंद्र मणि जागरण छोड़कर आए थे, उतनी ही मुश्किल अब उनके सामने आने लगी है. पर इस लड़ाई के बीच फंस गए हैं बेचारे छोटे-मोटे कर्मचारी.

सूत्रों का कहना है कि जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर में लगभग 170 लोग शामिल हैं. इनमें ब्‍यूरो के लोगों की भी संख्‍या जुड़ी बताई जा रही है. सूत्र बताते हैं कि सीजीएम अनिल पाण्‍डेय एवं अनुज पोद्दार ने शैलेंद्र मणि को काट छांट कर इस लिस्‍ट को 110 से 120 तक लाने का फरमान सुना दिया है. यानी इतने लोगों से कंपनी को मुक्ति दिलाई जाए. पर अब बताया जा रहा है कि इन लोगों को सीधे न निकालकर तबादला योजना के तहत निकाले जाने की रणनीति तैयार की जा रही है. खबर है कि अनुज पोद्दार के निर्देशन में कारपोरेट एडिटर संजय तिवारी तबादले की लिस्‍ट तैयार कर रहे हैं.

बताया जा रहा है कि इन लोगों का तबादला अख्‍ाबार के दूसरे यूनिटों में किए जाने की रणनीति तैयार की गई है ताकि जिनको ज्‍वाइन करना हो करें और जिनको छोड़ना है, खुद ही छोड़ जाए. इस स्थिति में सबसे परेशानी उन लोगों के साथ है, जो जागरण या अन्‍य दूसरे अखबारों को छोड़कर जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़े थे. उनके लिए स्थिति न तो घर की रह गई है और ना ही घाट की. एक तो बड़े ब्रांड को छोड़कर आए दूसरे यहां भी पेट पर लात पड़ने वाली स्थिति दिखने लगी है. इसमें सबसे ज्‍यादा निशाने पर शैलेंद्र मणि के चहेते कहे जाने वाले लोग हैं. बताया जा रहा है कि इन खास लोगों को ही तितर-बितर करने की योजना है ताकि शैलेंद्र मणि को कमजोर किया जा सके.

पर प्रबंधन के लोग इस शह-मात के खेल में भूल गए हैं कि कुछ हजार पाने वाले रिपोर्टरों या सब एडिटरों का क्‍या होगा. अगर प्रबंधन को यही करना था तो पहले ही एक संख्‍या निर्धारित कर दिया जाना चाहिए था, पर तब तो प्रबंधन ने जागरण को धूल-धूसरित करने की योजना तैयार की, अब जो इन लोगों पर विश्‍वास करके आ गए उनके साथ छल किए जाने की योजना बनाई जा रही है. इसमें सबसे ज्‍यादा परेशान छोटी सेलरी वाले स्ट्रिंगर और रिपोर्टर हैं कि अगर यहां पेट पर लात पड़ी तो वो आगे कहां जाएंगे. जागरण तो उन्‍हें वापस लेने से रहा अन्‍य अखबारों में भी इतनी जगह नहीं होगी कि सबको तत्‍काल नौकरी मिल जाए.

प्रज्ञा में हंगामा खतम, कर्मियों को चेक मिलने के साथ चैनल भी खतम

सेंचुरी कम्‍युनिकेशन ने फाइनली प्रज्ञा चैनल पर ताला लगा दिया है. कल दिन भर चले हाइपर ड्राम में साम-दाम-दंड-भेद सबका इस्‍तेमाल कर प्रबंधन ने अपने तरीके से मामले को सुलटा लिया. सभी कर्मचारियों को एक महीने सत्रह दिन का पोस्‍ट डेट का चेक देकर विदा कर दिया गया. हालांकि इस दौरान काफी हंगामा हुआ पर कर्मचारियों में मौजूद विभीषणों के बल पर प्रबंधन के लोग मामला सलटाने में सफल रहे.

प्रज्ञा चैनल के आफिस में कल दिन भर गरमागरमी का माहौल रहा. महुआ ग्रुप के सीईओ भूपेंद्र नारायण सिंह भूप्‍पी और ग्रुप हेड राणा यशवंत सिंह मामले को सुलझाने की कोशिश सुबह से ही शुरू कर दी थी, पर मामला बन नहीं पाया. बीच में भूप्‍पी में झूठ-सच बोलकर भी मामले को सुलटाना चाहा पर कर्मचारी नहीं माने, उन्‍हें धौंस भी दिखाया गया पर वे झुकने को तैयार नहीं थे. इसके बाद विभिषण की तलाश हुई. बताया जा रहा है कि स्‍टूडियो का एक कर्मचारी विभीषण बना और कर्मचारियों में फूट डालना शुरू किया. बताया जा रहा है कि उसने कहा जो मिल रहा है, ले लो, नहीं तो यह भी नहीं मिलेगा. इसी तरह की बातें कर वो धरनारत कर्मचारियों को मानसिक तौर पर तोड़ने लगा.

बताया जा रहा है कि कर्मचारी फरवरी माह तथा मार्च माह का पूरा सेलरी चाहते थे. वो भी करेंट डेट के चेक से, परन्‍तु प्रबंधन उन्‍हें करेंट डेट में चेक देने को तैयार नहीं था. मालकिन मौके पर ही नहीं गईं. बताया जा रहा है कि वो इंडिया वाले पुराने आफिस में बैठी रहीं और उनके सिपहसलार मामले को समझाते रहे. प्रबंधन ने कर्मचारियों को फरवरी का पूरा तथा मार्च का सत्रह दिन का वेतन देने को कहा, पर कर्मचारी तैयार नहीं हुए. तब भूप्‍पी ने वादा किया कि वो मीना तिवारी से कह कर तेरह दिन का भी दिलवा देंगे, पर बात नहीं बनने पर इन लोगों ने भेद वाला हथियार अपनाया और आखिर में सफल भी रहे.

कर्मचारियों को फरवरी माह का पूरा सेलरी 10 मार्च के डेट का तथा मार्च के सत्रह दिन की सेलरी दस अप्रैल के डेट का दिया गया. बताया जा रहा है कि जिस कर्मचारी ने विभीषण वाली भूमिका निभाई थी, उसे इस महीने की सेलरी के अलावा तीन महीने की अतिरिक्‍त सेलरी भी प्रदान की गई. बताया जा रहा है कि इस हंगामे के दौरान यह बात साफ हो गया कि महुआ ग्रुप घाटे में चल रहा है. एक कर्मचारी ने बताया कि दो दिन पहले कंपनी को फायदे में बताने वाले भूप्‍पी ने पैसा देने वाले दिन स्‍वीकार किया कि कंपनी की हालत खस्‍ता है. इसलिए वो और पैसे नहीं दे या दिलवा सकते हैं. इसके साथ ही प्रज्ञा टीवी पर फाइनली ताला लग गया.

हिंदुस्‍तान ने मुरादाबाद में अपना एडिशन लांच किया

एचएमवीएल ने हिंदुस्‍तान के मुरादाबाद संस्‍करण की लांचिंग कर दी. यह यूपी में हिंदुस्‍तान का दसवां तथा देश का 18वां संस्‍करण है. दिल्‍ली रोड स्थिति मधुरम हेरिटेज के मैदान में अखबार का लांचिंग समारोह हुआ. अखबार की लांचिंग किसी नेता या नामचीन व्‍यक्ति से नहीं कराया गया बल्कि हर बार की तरह इस बार भी कई क्षेत्रों में अव्‍वल एवं मेघावी छात्र अवनीश कुमार, शिवम वार्ष्‍णेय, मयंक कुमार, रूचिका, नैंसी व हर्षित ने अखबार की लांचिंग की.

एचएमवीएल के एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर विनॉय राय चौधरी, सीईओ अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, स्‍थानीय संपादक मनीष मिश्र की मौजूदगी में दीप जलाकर छात्र-छात्राओं ने अखबार को लांच किया. मुरादाबाद एडिशन की लांचिंग एक लाख दस हजार कापियों के साथ की गई है. विनॉय राय चौधरी ने कंपनी की उप‍‍लब्धियों की जानकारी दी. प्रधान संपादक शशि शेखर ने कहा कि मुरादाबाद से मेरा पुराना रिश्‍ता रहा है. हिंदुस्‍तान के साथ यहां बदलाव की शुरुआत हो रही है और इस बदलाव के लिए हमें आप लोगों का साथ चाहिए होगा.

सीईओ अमित चोपड़ा का कहना है कि हम लोगों ने 2005 में विस्तार की जो बयार शुरू की थी वह अब यूपी और उत्तराखंड में लगभग पूरी हो चुकी है. अब हम लोग आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से धनी एरिया के पाठकों के सामने मौजूद होंगे. हिन्दुस्तान पाठकों की उम्मीदों पर खरा उतरेगा. अतिथियों का स्वागत करते हुए संपादकीय प्रभारी मनीष मिश्र ने कहा कि मुरादाबाद संस्करण के प्रकाशन से पहले शहर की जरूरतों को हिन्दुस्तान ने जाना-समझा है. मुरादाबाद के विकास के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इस पर मंथन भी किया गया है और हम इस पर पूरी तरह खरा उतरने की कोशिश करेंगे.

मुरादाबाद यूनिट के हेड योगेंद्र सिंह ने सभी लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदुस्‍तान सभी लोगों का साथी, हमसफर साबित होगा. हम यहां के लोगों की अपनी आवाज बनकर दिखाएंगे. इस मौके पर हिन्दुस्तान के एक्जीक्यूटिव एडिटर सुधांशु श्रीवास्तव, वरिष्ठ स्थानीय संपादक केके उपाध्याय, नेशनल सेल्स हेड विजय सिंह, पश्चिमी यूपी के बिजनेस हेड अजय अरोड़ा, बरेली यूनिट के महाप्रबंधन सम्राट नायक, बरेली के संपादक आशीष व्‍यास समेत कई लोग मौजूद रहे.

राजस्थान उर्दू अकादमी के अध्यक्ष ने अपने पिता को सर्वोच्च सम्मान दिलाया!

Prem Chand Gandhi : अगर आप किसी अकदमी के अध्‍यक्ष हैं तो अपने पिताजी को सर्वोच्‍च सम्‍मान दिला सकते हैं। यह कमाल किया है राजस्‍थान उर्दू अकादमी के अध्‍यक्ष हबीबुर्रहमान नियाजी ने। उनके पिता महबूबुर्रहमान नियाजी को उनकी मजहबी किताब के लिए अकादमी का प्रतिष्ठित महमूद शिरानी अवार्ड देने की घोषणा की गई है। राजस्‍थान में साहित्‍य-संस्‍कृति का ऐसा बेहाल इतिहास में कभी देखने को नहीं मिला…

        Dush Yant congrats for this historical development ! We all are proud of it ! 😉 we must consider it as respect to elders.. Hahaha

        Rakesh B. Bhargava bat apane apno ki hai

        Manik Ji wah

        Prem Chand Gandhi हां दुष्‍यंत जी, बुजुर्गों का सिर्फ उम्र और संबंधों के कारण सम्‍मान करने की परंपरा का सूत्रपात पिछले दिनों राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी ने शुरु किया था। देखिये परंपरा कहां तक जाती है।

        Hari Jaipur kash mera beta bhi kuch ban jaaye dua karo prem bhai

        Vivek Nirala wah!jugad kijiye mere kahin hone ka shayad Mahakavi Nirala ko maranoparant koi PURASHKAR mil jaye.

        Akbar Rizvi shocking

        Saddiq Ahmed like this

        Rakesh Kumar shameful

        Ramakant Roy मत कहिये नहीं तो साम्प्रदायिकता की चर्चा होने लगेगी और आप सांप्रदायिक कहे jayenge…

        Gyanesh Upadhyay jab jod-tod hi sabse mahatwpurn ho jaye jo yahi hoga. phir bhi yah janana jaroori hai ki kaun kitna imandar hai aur kiske prati imandar hai? doosri baat, imandar hone ki jaroorat hai aur beimani par kewal rone aur halla machane se kaam nahin chalega.kuch pukhta kijiye.

        Vinod Bhaskar आप कहते हैं ऐसा देखने को नहीं मिला. तब आप पुरस्कारों के बारे में कुछ नहीं जानते. सच ये है कि सरे नहीं तो ९९.९९ पुरस्कार अपनों को ही दिए जाते हैं या वहां दिए जाते हैं जहाँ कोई स्वार्थ साधता हो. यहाँ तक कि नोबल प्राइज़ भी इसी में आते हैं. यही कारन है कि भारत में ही देखें तो शांति पुरस्कार गाँधी को नहीं मिलता मदर टेरेसा को मिल जाता है. नोबल कि अंदरूनी राजनीती पर इरविंग वैलेस ने एक पूरी पुस्तक लिखी है, पढ़ लीजिए.

        Atul Pandey ये है हमारे देश की गन्दी परम्परा जिसके सहारे हम झूठ की उंगली पकड़ कर आगे बढने की असफल कोशिश कर रहे हैँ लेकीन कब तक

        Atul Pandey ये है हमारे देश की गन्दी परम्परा जिसके सहारे हम झूठ की उंगली पकड़ कर आगे बढने की असफल कोशिश कर रहे हैँ लेकीन कब तक

        Rajendra Bora Itihaas aise hi banate aur bigadte hain.

        Mukesh Popli प्रेम जी, आप जैसा सीधे इंसान मैंने बहुत कम देखे हैं, राजनीति और स्‍वार्थपने की बेहूदा मिसालें सिर्फ और सिर्फ साहित्‍य क्षेत्र में ही मिलती हैं, आप तो पुरस्‍कारों की बात कर रहे हैं, न जाने कितनी मौलिक रचनाएं इधर-उधर का हेर-फेर कर दूसरे नामों से भी प्रकाशित हो जाती हैं और लेखक टापता रह जाता है। अधिकतर समूह चमचों की रचनाएं प्रकाशित करते हैं क्‍योंकि वह किसी प्रतिष्ठित का चमचा है,। आप दिल से मत लगाइए और अपना काम करते जाइए।

        Prabhakar Chaube aisa kamaal kai rajyo me hua hai

        Basant Vyas प्रेम जी, आप भी प्रेम जी, आप भी पुरस्कार के पीछे पड़े हैं.
        उन किताबो की भी कुछ बात करो जिनका रोज
        लोकार्परण हो रहा है ओर वो बाज़ार मैं कॅन्ही नज़र
        नही आती. आप भी उनकी फेस बुक पर जम कर
        तारीफ करते हैं.पुरस्कार मिलने से कम से कम किताबो
        की चर्चा तो हो जाती है घर मे रेवड़ी बाटने का रिवाज़
        भारत मैं पुराना है. राजनीति मैं तो ही रहा है फिर साहित्य
        इससे अछूता क्यो रहे. आज के ज़माने मे बेटा बाप को कुछ
        देदे तो भय्या बहुत बड़ी बात है. समझो बेटा बहुत लायक है.

        Basant Jaitly बाज़ार में ढूँढने से सब नज़र आता है, मिलता है. यह बात अलग है कि किताब ढूँढने में वो लगन नहीं है जो हम एक टीशर्ट ढूँढने में भी दिखा देते हैं.इस युग में जब यू -निवार्सिटी, कॉलेज और स्कूल के अधिकाँश मास्टर ही किताबें / पत्रिकाएं नहीं पढ़ रहे तो अन्य से तो उम्मीद ही क्या राखी जाए ? ढूँढने की बात तो छोडिये यह बताएं कि पुस्तकों के लोकार्पण पर जाने वाले लोगों में से भी कितने उस पुस्तक को खरीदते हैं ?अगर ऐसा है तो पुस्तक को दोष क्यों दिया जाए ? किसी का गर किसी पुस्तक से अपरिचय है तो उसे मात्र इसीलिये खारिज नहीं किया जा सकता कि कोई उससे अपरिचित है.कम से कम लोग इस चर्चा से उसके बारे में कुछ जान तो पाते हैं और कुछ मेरे जैसे मूर्ख भी हैं जो उसे ढूंढते हैं ,पढते हैं और अपनी राय बनाते हैं. रही बात पुरस्कार की तो यदि पिता के लेखन की वस्तुतः अनदेखी हुई है, यदि वह स्तरीय है और किसी अन्य कारण से बाहर रखा गया है तो मेरे विचार से पुत्र द्वारा यह काम किया जाना कतई गलत नहीं है.

        Sankalp Sharma Kamanwala Ye thread hi aisa hai Gandhi ji … is par baat shuru hogi to bahut door tak jaayegi aur haath men kuch nahin lagega…
        waise Habib ur rahman niyazi sahab FB par hain kya???

        Shiv Shambhu Sharma कोइ कुछ भी कहे कुछ भी करे
        किसकी कहाँ कैसी गलती है
        यहाँ तो बाजार मे,चिकनी चमेली ही चलती है ।

        Priyanka Singh hmmm

        Govind Mathur ये जानना भी जरूरी है कि क्या सम्मान केवल पिता होने के कारण ही दिया गया है या साहित्यिक अवदान के कारण. वैसे पिता का सम्मान करना अच्छी बात है ? बेटा ही सम्मान नहीं करेगा तो कौन करेगा ?

        Basant Vyas जेटली साहिब, आपके यूनिवर्सिटी के बुक वर्ल्ड
        पर ही कितनी लोकार्पण वाली पुस्तके हैं. हम
        तो कॉसिश करके हार गये. आप बता दीजिए कहाँ
        मिलेगी. यदि आप मेरी बात करे तो जहाँ मैं बुलाया
        गया हूँ उनकी पुस्तके मेरे पास हैं. अश्विन शर्मा की
        अभी हाल ही मे हुए लोकार्पण की दोनो पुस्तके मेरे
        पास हैं. पुस्तक विक्रेता भी पूरे कमर्शियल हैं ओर उनसे
        ज़्यादा पुस्तक प्रकाशक हैं जो लेखक की किताब अपनी शर्तो
        पर छापते है उनके भी गुरु साहित्य के पी. आर. ओ हैं जो लेखक.
        को इस भरम मे रखते हैं की आपकी पुस्तक सरकारी vacnalay
        मे लगवा देगे. हमारे यॅन्हा लेखक की दशा उस मजदूर जैसी
        है जिसे लिखने के चार आने मिलते हैं ओर छापने वाले को
        बारह आने. वंदना शर्मा ओर लीना महलोट्रा अच्छा लिख रही
        हैं मगर इनका कलाम आवाम तक भी सही तरीके से पहुचना bhi
        चाहिए. इस सम्बन्द मे मेरे योग्य सेवा हो तो बताए.

        Basant Vyas गोविंद जी आपकी बात सही है की बेटा ही बाप
        का सम्मान नही करेगा तो कोन करेगा, मगर उसके
        लिए जा निसार अख़्हत्तर होना ज़रूरी है जिनके बेटे
        जावेद अख़्हत्तर हैं. पाव उसी के छूने चाहिए जो उसके
        लायक हो. पुरषकार का यही पॅमाना है तो साहू शांति
        प्रसाद जैन को ज्ञान पीठ कभी का मिल गया होता.

        Basant Jaitly मैंने पहले ही कहा कि मास्टर ही नहीं पढते, ९५ प्रतिशत छात्र भी पास बुक्स ही पढ़ रहे हैं.बुक वर्ल्ड में सारी पुस्तकें नहीं हो सकतीं हालाकि उन्होंने मुझे अनेक पुस्तकें न होने पर भी अलग से मंगाकर उपलब्ध कराई हैं.सारी पुस्तकें कहीं भी नहीं हो सकतीं.लेकिन ऐसा मेरे साथ नहीं हुआ कि मैंने कोई पुस्तक खोजी और मुझे कहीं नहीं मिली. यह अलग बात है कि कई बार नेट से मंगानी पडी. कई पुरानी पुस्तकें पी.डी.एफ. में नेट से डाउनलोड करनी पड़ीं लेकिन ९० प्रतिशत से अधिक किताबें मिलीं. यह बात अलग है कि लेखक किसके शिकार हैं.खास तौर पर मेरे जैसे कविता लिखने वाले को तो प्रकाशक ही मिल जाए तो बहुत है. अक्सर लेखक को चार आने तो छोडिये धेला भी नहीं मिलता. मैं पुस्तक खरीदने के सन्दर्भ में आपकी नहीं सामान्य लोगों की बात कर रहा था और मैं जानता हूँ कि मैं गलत नहीं हूँ. रही कविता की बात तो आम आदमी की कविता में रूचि वैसे भी कम रही है तो कवि कोई भी हो वह अवाम तक मुश्किल ही पहुंचता है भले ही उसे जनकवि का तमगा क्यों ना दे दिया जाए. ज़रूरी नहीं कि आप भी ऐसा ही सोचते हों कविता के मामले में.अंत में मेरे सहनाम मित्र मैं नहीं जानता कि आप क्या सेवा कर सकते हैं या किस सेवा की बात कर रहे हैं.अगर जान सकूं तो ठीक रहेगा.

        Prem Chand Gandhi इस मसले पर एक स्‍पष्‍टीकरण जरूरी है और वो यह कि पुरस्‍कृत पिताजी मजहबी किताबों के लेखक के रूप में जाने जाते हैं, साहित्‍यकार के तौर पर नहीं।… पुरस्‍कारों की सारी राजनीति से मैं भी उतना ही परिचित हूं जितने बाकी रचनाकार। खुद भी एकाधिक बार निर्णायक रह चुका हूं। लेकिन मेरे कहने का मूल मंतव्‍य यह था कि यह जो प्रक्रिया चल रही है, वह कहां जाकर समाप्‍त होगी… बिना गवर्निंग कौंसिल के पुरस्‍कारों की घोषणाएं हो रही हैं। जिन्‍हें दो साल पहले पुरस्‍कार घोषित किये गये, उन्‍हें अब तक पुरस्‍कृत नहीं किया गया। ऊपर से आनन-फानन में अमृत पुरस्‍कारों की वर्षा होती है। ऐसा लगता है कि नियम, कायदे, नैतिकता सब कुछ ताक पर रख दिए गए हैं। सब अपनी मर्जी के मालिक बने हुए हैं। यह किस लोकतांत्रिक समाज की कला-संस्‍कृति है।

        Ashutosh Joshi मुखोटा धम्भ बन स्वयं अकड़ा
        हुआ आहत विस्वास स्वयं श्रीहत पासो से
        कहू इसको नहीं धोखा
        नहीं युग को जगाऊ क्या
        बताओ चुप रहू केसे !!

        Basant Jaitly अगर ऐसा है तो यह पुरस्कार नितांत अनुचित है. वैसे मुझे भी पुरस्कारों पर भरोसा नहीं है और इसकी राजनीति से भी मैं परिचित हूँ. एक बात और कह दूं — हालाकि मुझे कोई पुरस्का कभी मिलने की संभावना नहीं है लेकिन यह मैं तय कर चुका हूँ कि यदि जीवन में कोई अवसर आया तो कोई भी सरकारी पुरस्कार मैं नहीं स्वीकार करूँगा लेकिन खुदा गंजे को नाखून देगा तभी तो ऐसा होगा.

        Abhishek Goswami लोकतन्त्र मे विश्वास रखने वाला तथाकथित प्रगतिवादी वामपंथी समुदाय भी इस 'फेवरिस्म' (पक्षवादिता) से अछूता नहीं है। ……अफसोस…..चहुंओर घटाटोप है।

        Basant Jaitly अछूता कोई नहीं है यही अधिक कष्ट की बात है.

        Basant Vyas जेटली साहिब, मेरे योग्य सेवा का अर्थ सिर्फ़
        ये था की नये लेखको की रचनाओ कोजनता तक किस तरहा
        पहुचाया जाए. आप जानते हैं मैं कुछ हद तक भगवान की दया
        से इसके योग्ग हूँ की साहित्य की लेखन मे ना सही ओर तरीके
        से तो सेवा कर ही सकता हूँ.

        Basant Jaitly अरे बाबा, मेरे जानने का क्या ? मैं तो चाहता था कि दूसरे भी जानें इसलिए उकसा रहा था कि कुछ अतिरिक्त बोलो तो मेरे अलावा दूसरे भी जान लें. अब सब तक तो मेरी पहुँच नहीं है ना तो इसके लिए फेसबुक सही माध्यम है. लेकिन तुम भी पक्के हो ना मेरे उकसाने से भी उकसे नहीं. ठीक है अब मुझे ही तुमसे कुछ सेवा लेनी होगी दूसरों के फायदे के लिए. ज़रूरत पडने पर पकड़ लूँगा.अपनी बात याद रखना और भूलना चाहोगे तो अब भूलने नहीं दूंगा. तुम भी मुझे जानते हो एक लंबे अरसे से 🙂

        Aar Ravi बेट्टा न मारी लूंगटी, बाप गोलंदाज…बाबाजी धूणी तपो हो ? कहो, भाया काय जाणै है …बाबाजी बछड़ा घेरो .. कह बाबा जी , बछड़ा घेरता तो स्यामी क्यूं होता..

        Basant Vyas रवि जी, आपको शायद मालूम नही है की जेटली साहिब
        से मेरा बहुत पुराना परिचय है व मेरा निक नेम बाबा है
        अधिकांश लोग मुझे बाबा के नाम से ही बुलाते हैं. इसलिए
        उन्होने बाबा के नाम से सम्भोधित किया है. बाबा नाम मे मैं
        भी ज़्यादा आत्मीयता महसूस करता हूँ.

        DrSagar Jnu dukhad……………

        Govind Mathur यदि पिता का कोई साहित्यिक योगदान नहीं है तो ये बिल्कुल गलत निर्णय है , इसका विरोध होना चाहिए . @ बसंत & बसंत , जिन लोगों कि पढ़ने में रुचि होती है वह किताबें ढूंढ लेता है. सभी प्रकाशित किताबें न तो पढ़ी जा सकती है और न ही पढ़ने योग्य होती है.

        Basant Jaitly ‎@Govind Mathur — maine bhi to yahi kaha hai govind ki agar padhanee ho to pustak mil hi jaati hai lekin har pustak ko na to dhoondhane ki zaroorat hai aur na padhne ki lekin jahaan tak lokaarpan ka svaal hai to main aise kaaryakram me jaata hi nahin jahaan mujhe pustak khareedni na ho 🙂

        Anju Sharma सचमुच पुरस्कार तो अंधे की रेवड़ी हो गए हैं……

        Durgaprasad Agrawal बात पुरस्कार से शुरू होकर पुस्तक तक पहुंच गई. यह भी अच्छा ही हुआ. Basant Vyas जी, यह एक कड़वी सच्चाई है कि हिंदी में किताबें कम बिकती हैं. एक दुश्चक्र बन गया है कि कम सुलभ होती हैं और कम बिकती हैं. अगर हम लोग ज़्यादा खरीदने लगेंगे तो मिलने भी लगेंगी. Basant Jaitly जी ने सही कहा है कि जितनी मेहनत हम टीशर्ट तलाश करने में करते हैं, उतनी किताब तलाश करने में नहीं. वैसे मेरा तो अनुभव यही रहा है कि जिस किताब को मैंने पढ़ना या खरीदना चाहा है वह मुझे मिल गई है. इधर फ्लिपकार्ट वगैरह से भी काफी सुगमता हो गई है. Premchand Gandhi ने जो कहा है वह अगर सही है (और कोई वजह नहीं है कि वे सही न कहें) तो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. अच्छा हो वे महबूबुर्रहमान साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर थोड़ा विस्तार से लिखें.

        Shastri Kosalendradas Dekhte chalo kya kya hota hai!!!!!

        Prem Chand Gandhi एक बात मैं फिर साफ कर देना चाहता हूं कि मेरा इस मसले से कोई व्‍यक्तिगत लेना-देना नहीं है। लेकिन एक लेखक होने के नाते ऐसे सरकारी सांस्‍कृतिक निर्णयों पर प्रश्‍न और बहस करने का जो लोकतांत्रिक अधिकार है उसी के तहत अपनी बात कह रहा हूं। मैं दोनों पिता-पुत्र से अपरिचित हूं। मुझे तो उर्दू के लेखक-मित्रों ने ही सारा सच बताया है और कहा है कि अकादमी अध्‍यक्ष के पिताजी दीनी-मजहबी किताबें लिखते रहे हैं। … बात संबंधों की नहीं, बात यह है कि बिना गवर्निंग कौंसिल के प्रदेश में अकादमियां अपनी मनमानी कर रही हैं। पहले जब बिना अध्‍यक्षों के अकादमियां चल रहीं थीं तो अकादमी का प्रशासनिक ढांचा अपने मन से काम कर रहा था। अब जब अकादमियों में अध्‍यक्ष आ गये हैं तो वे अपनी मरजी का राज चला रहे हैं। … एक अध्‍यक्ष ने तो उम्र को ही सम्‍मान का आधार मानकर अपने मनचाहे बुजुर्गों को मुख्‍यमंती से सम्‍मानित करवा दिया… जबकि उसी अकादमी में दो साल से पुरस्‍कृत लेखक अब तक सम्‍मान की बाट जोह रहे हैं। … उर्दू अकादमी ने बिना गवर्निंग बॉडी के पुरस्‍कार घोषित कर दिये हैं, जिसमें सबसे हास्‍यास्‍पद बात सब जान ही गये हैं। …. ऐसा लगता है कि प्रदेश में कला'संस्‍कृति के नाम पर ऐसी मनमर्जी का राज है कि गोविंदा की फिल्‍म का गाना याद आ रहा है…. मैं चाहे ये करुं…मैं चाहे वो करुं…मेरी मरजी… एक 'अ-शोक-ग्रस्‍त सरकार' में आखिर यही होना था कला-संस्‍कृति का हश्र…. दुखद है लेकिन सत्‍य है….

        Basant Jaitly मैं सहमत हूँ और जानता हूँ कि आपको ही नहीं हममे से किसी को भी कोई व्यक्तिगत विद्वेष नहीं है इन सज्जन के साथ. हम इन्हें जानते तक नहीं हैं लेकिन अगर कुछ गलत लगता है तो उसके बारे में बोलना गलत नहीं है और न हो सकता है.

        Kavita Vachaknavee छोटी से छोटी स्थानीय और संकायीय प्रतियोगिता तक में यह नियम सबसे पहले लिखा होता आया है कि संस्था से जुड़े अथवा उनके परिवारीजन इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते। हम तो यही जानते आए हैं।

        श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी Shame on an individual as well as on the system

        Prem Chand Gandhi ‎Kavita Vachaknavee जी, लेकिन जब कोई यह तय ही कर ले कि अंतत: पुरस्‍कार यहीं दिया जाना है तो सारे नियम-कायदे ताक पर रख दिये जाते हैं।…

        Basant Vyas अग्रवाल साहिब, किताबे कॅन्हा तलाश करे. टी शर्ट तो
        हर मोल मे मिल जाती है, मगर नये लेखको की पुस्तके
        हर कोई रखता भी नही. सबसे पहले ये पूछता है की प्रकाशक
        का नाम बताइए. सर, वैसे भी कविताये लोग कम पढ़ते हैं.
        जितने भी पुस्तक मेले होते हैं उनमे जॉब ओरियेनटेड ,व
        कंप्यूटर आदि पर ज़्यादा किताबे होती हैं. नये पुस्तक प्रेमिओ
        मे अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ने वाले अधिक हैं. वो शिव खेड़ा, चेतन भगत
        अरुंधती राय को ज़्यादा अहमियत देते हैं. ये सब देख कर प्रकाशक
        घाटे का सोदा क्यो करेगा. कविताए तो अब सिर्फ़ पुरस्कारो के लिए
        रह गई हैं.

        Prem Chand Gandhi बाबा, बात इतनी आसानी से टालने वाली भी नहीं कि प्रकाशक विक्रेता पर मामला टरका दिया जाए… हिंदी के अधिकांश प्रकाशक झूठ बोलते हैं… उनकी कविता की किताब की चो हजारों प्रतियां बिक जाएं, वो कवि को बताते तक नहीं कि किताब कहां खरीदी गई है।

        Basant Jaitly कविताये लोग कम पढ़ते हैं. नये पुस्तक प्रेमिओ
        मे अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ने वाले अधिक हैं. वो शिव खेड़ा, चेतन भगत
        अरुंधती राय को ज़्यादा अहमियत देते हैं — इन दोनों बातों से मैं सहमत हूँ, जयपुर के पुस्तक मेला भी एक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं हैं यह भी सही है लेकिन यह भी सही है कि बहुतेरे लोग पुस्तक ढूंढ ही लेते हैं. यह लगन भी कम है, कम होती जा रही है.अब मेरी बात भी कुछ तो मानने लायक है बाबा.

        Prem Chand Gandhi अब तो दोनों बाबाओं की माननी होगी…

        Shrawan Kumar पुरस्कृत पुस्तक का नाम भी तो होगा बिना पढ़े निष्कर्ष कैसे दिया जाए

        Basant Jaitly यह भी सही है कि प्रकाशक कविता कि किताबें बेच लेते हैं.हाँ, छापने में नाटक करते हैं ताकि पैसा कवि दे, उनसे मांगे नहीं.

        Basant Vyas प्रेम जी, आपने जो कहा वही बात मैं कह रहा हूँ
        प्रकाशक ही लेखको के माइ बाप हो रहे हैं. बाढ़ ही
        खेत को खाये तो आप ओर हम क्या कर सकते हैं
        लेखक तो सिर्फ़ लिख सकते हैं मार्केटिंग उनके बस की
        बात नही है. इस विशय पर सब को संगठित हो कर
        विचार करना चाहिए. लेखको के शोषण पर लगाम लगनी
        आवश्यक है.

        Basant Jaitly ऐसा करो कि एक सहकारी प्रकाशन संस्था बना डालो- कष्ट यही है कि कहीं उसका हश्र भी राजेन्द्र यादव के अक्षर प्रकाशन सा ना हो जाए लेकिन अगर कुछ करना है तो जोखिम भी लेना ही होगा.

        Basant Vyas जैटली साहिब,लॉटरी पाने के लिये टिकट तो खरीदना
        ही होगा. हज़ारो मील का सफ़र तय करने के लिए
        एक कदम तो उठाना ही पड़ता है मुझे लगता है की प्रेम जी
        भी ये सब पढ़ कर थक गये होगे इसलिये इस बहस को
        यही विराम देना चाहिए.

        Yash Goyal wait you will see another "jodi breaker" of father and son in one of the academies. I keep finger crossed.

        Basant Jaitly मैं कोशिश करने के पक्ष में हूँ. लेकिन शायद बहस वाकई ज्यादा लंबी हो गयी है इसलिए मिलकर कुछ सोचते हैं. यह विशवास है कि प्रेम जी भी हमसे बाहर नहीं रह सकते.

        Prem Chand Gandhi मैं कहां बाहर हूं… लेकिन लेखकों को संगठित करना सबसे मुश्किल काम है… पाठकों को संगठित करा जाये तो मामला बन सकता है… साहित्‍य को बाजार से मुक्‍त करने की कोशिश हो… लेखक खुद जब पैसे देकर किताब छपवा सकते हैं तो अपना ही प्रकाशन क्‍यों ना करे… विक्रेता को किताब दे, बिकने पर पैसे ले… लेकिन मुफ्त में किसी को ना दे…

        Manoj Pandey पितर ऋण भी कोई चीज होती है भाई

प्रेमचंद गांधी के फेसबुक वॉल से साभार

यूपी की रहने वाली आईपीएस किम के चांटे के कारण बिहार के सीएम हैं चर्चा में

ये हैं बिहार की राजधानी पटना में तैनात एसपी सिटी किम. इन्होंने एक ऐसा झन्नाटेदार चांटा मारा कि मुख्यमंत्री को उनकी तरफ से माफी मांगनी पड़ी. मुख्यमंत्री ने कहा कि यंग हैं, गलती हो जाती है. किम के चांटे के चलते बिहार में लगातार दूसरे दिन विधानमंडल में इस प्रकरण की गूंज सुनाई दी. बुधवार को विधान परिषद में मुख्यमंत्री द्वारा माफी मांगने के बाद गुरुवार को विधान सभा में विपक्षी राजद सदस्यों ने मुख्यमंत्री के इस कदम की कड़ी निंदा की. शून्यकाल में राजद सदस्यों ने खड़े होकर अपना विरोध प्रदर्शित करते हुए शोर-शराबा भी किया.

विपक्ष के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा कि लोकतंत्र में एक्जीक्यूटिव हेड अपने अधीनस्थ के किसी करतूत के लिए माफी मांगे इससे ज्यादा शर्मनाक बात कुछ नहीं हो सकती. इससे लोकतांत्रिक आस्था कमजोर होगी. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने अफसर के लिए बिहार की जनता से माफी मांगी. लेकिन फारबिसगंज, नूरसराय जैसी घटनाओं के लिए माफी नहीं मांगी. मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी में पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव ने मोर्चा संभालते हुए कहा कि एक राज्य का मुख्यमंत्री एक गरीब महिला के गाल के चाटे पर दर्द की माफी मांगता है तो इतने संवेदनशील मुख्यमंत्री की बात पर विपक्ष ऐतराज कर रहा है.

विधानसभा में अपराह्न् राज्यपाल के अभिभाषण पर सरकार का जवाब रखते हुए मुख्यमंत्री ने विपक्ष के ऐतराज का जवाब दिया. उन्होंने कहा- मैं स्वीकार भी करता हूं तो उसका मजाक उड़ाया जाता है. पूरे बिहार में बात-बात पर रोड जाम करने की परिपाटी बढ़ी है. विधि-व्यवस्था संधारण की जिम्मेवारी जिन पर हैं वे भी किसी हाड़-मांस के बने होते हैं. उन्हें तत्काल एक्शन लेना होता है.

कंकड़बाग में गड्ढे में करंट से दो की मौत