खुद को पत्रकार बताने में अब ज़बान लड़खड़ाने लगती है!

यूं तो दोस्तों और हमउम्र के जानने वालों के ज़रिए जब यह सवाल पूछा जाता है कि ‘क्या करते हो’ तो मज़दूरी करते हैं जैसे तमाम हल्के जवाबों से उनके सवालों को टाल देता हूं। लेकिन यही सवाल कोई बड़ा (उम्र में), रिश्तेदार, घर में आए मेहमान करते हैं तो ज़बान लड़खड़ाने लगती है, यह …

हिंदी पत्रकारिता का हाल : तीन बैंकों के विलय की खबर सिंगल कॉलम में सिमट गयी!

Girish Malviya : तीन बैंकों के आपसी विलय की इतनी बड़ी खबर भी कल देश का सबसे बड़ा अखबार कहे जाने वाले दैनिक भास्कर के दूसरे फ्रंट पेज के छोटे से सिंगल कॉलम में सिमट गयी. यह दिखाता है कि देश मे हिंदी पत्रकारिता किस गर्त में जा रही है. बहरहाल कल मर्जर के इस …

नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर उपजा ने मनाया समारोह, पत्रकारिता की जीवंतता पर छिड़ी बहस

लखनऊ। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया जगत, खासकर अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों का आह्वान किया है कि वे अच्छी खबरें लिखकर समाज में सकारात्मक सोच पैदा करें। माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया काउंसिल की पुरजोर वकालत की। पाण्डेय रविवार को राजधानी में राष्ट्रीय प्रेस दिवस समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इसका आयोजन उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) और इसकी स्थानीय इकाई ‘लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन’ ने संयुक्त रूप से किया था।

हिंदी का संपादक एक रोता हुआ जीव है, जिसके जीवन का लक्ष्य अपनी नौकरी बचाना है

भारत यूरोप नहीं है, अमेरिका भी नहीं है. यहां अखबार अभी भी बढ़ रहे हैं, और यह सिलसिला रुक जाए, इसका फिलहाल कोई कारण नहीं है. इंटरनेट पर हिंदी आई ही है और अगर सब कुछ ठीक रहा तो भारत में इंटरनेट हर मुट्ठी तक नहीं भी तो ज्यादातर मुट्ठियों तक पहुंच ही जाएगा और साथ में हिंदी भी इसकी सवारी करेगी. टीवी भी भारत में बढ़ता मीडियम है. और फिर यह टेक्नोलॉजी का बाजार है. यहां कारज धीरे होत है टाइप कुछ नहीं होता. अगर सारे कोऑर्डिनेट्स सही हैं, तो एक का सौ और सौ का लाख होने में समय नहीं लगता. कुल मिलाकर प्रिंट, टीवी और वेब पर न्यूज मीडियम की हालत ठीक है. बढ़ता बाजार है. मांग बनी हुई है. समस्या बाजार में नहीं है.