हिंदी पत्रकारिता का हाल : तीन बैंकों के विलय की खबर सिंगल कॉलम में सिमट गयी!

Girish Malviya : तीन बैंकों के आपसी विलय की इतनी बड़ी खबर भी कल देश का सबसे बड़ा अखबार कहे जाने वाले दैनिक भास्कर के दूसरे फ्रंट पेज के छोटे से सिंगल कॉलम में सिमट गयी. यह दिखाता है कि देश मे हिंदी पत्रकारिता किस गर्त में जा रही है. बहरहाल कल मर्जर के इस फैसले से बैंक ऑफ बड़ौदा के शेयरो में गिरावट से निवेशकों को 6 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. Continue reading

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नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर उपजा ने मनाया समारोह, पत्रकारिता की जीवंतता पर छिड़ी बहस

लखनऊ। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया जगत, खासकर अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों का आह्वान किया है कि वे अच्छी खबरें लिखकर समाज में सकारात्मक सोच पैदा करें। माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया काउंसिल की पुरजोर वकालत की। पाण्डेय रविवार को राजधानी में राष्ट्रीय प्रेस दिवस समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इसका आयोजन उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) और इसकी स्थानीय इकाई ‘लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन’ ने संयुक्त रूप से किया था।

शीघ्र ही राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त होने जा रहे प्रदेश के वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी, भारतीय प्रेस काउंसिल के सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी, राज्य के सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के लखनऊ ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी, पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना, ‘उपजा’ के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित, महामंत्री रमेश चन्द्र जैन आदि ने निडर एवं फ्री प्रेस की महत्ता पर अपने गम्भीर विचार रखे और प्रेस की मजबूती तथा स्वतंत्रता के अलावा पत्रकारों के आर्थिक हितों व उनकी सुरक्षा पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ल ने किया।

सप्रू मार्ग स्थित उद्यान विभाग सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करने वाले उप्र विधानसभा के अध्यक्ष पाण्डेय ने अपने सारगर्भित सम्बोधन में कहा कि लोकतंत्र में ‘पब्लिक ओपिनियन’ का बहुत महत्व होता है। इस प्रणाली में विशेष रूप से प्रिण्ट मीडिया जनता की राय बनता है। लिहाजा उसके पत्रकारों को चाहे वे संवाददाता हों, अथवा डेस्क पर कार्यरत सम्पादक, उन्हें बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि उनकी लिखी और सम्पादित खबरें सनद व दस्तावेज बन जाती हैं जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग तो अपने समाचार प्रस्तुत करने के बाद उसे हटा भी लेते हैं।

पाण्डेय ने कहा कि खबरों, पत्रकारों और मीडिया मालिकों पर भी अंकुश रखने तथा उन्हें मार्गदर्शित करने के लिए प्रेस परिषद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है किन्तु इसका विस्तार किया जाना चाहिए ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा खबरिया चैनल भी इसकी परिधि में आ सकें। इस सम्बन्ध में उन्होंने मीडिया काउंसिल बनाये जाने की पुरजोर वकालत की। उन्होने कहा कि एसोसिएशन के माध्यम से मीडिया काउंसिल के गठन के लिए एक प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार के पास भेजना चाहिए।

इसके साथ ही पाण्डेय ने, जिनकी समाज में एक समाजवादी ‘एक्टिविस्ट’ के रूप में अहम भूमिका रही है, पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा बढाये जाने की जरूरत पर बल दिया। विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पाण्डेय ने पूर्व में एक बार  विधानसभा में  पत्रकारों के लिए पेश पेंशन विधेयक के  पूर्ववर्ती एक सरकार द्वारा वापस ले लेने पर अफसोस जताते हुए कहा कि पत्रकारों के लिए सरकार को कुछ अलग से देने के लिए सोचना चाहिए । पाण्डेय ने कहा कि समाज के सजग प्रहरी के नाते मीडिया के लोग खुद अपने लिए आचार संहिता बनाएं, साथ ही अपने कर्त्तव्यों को सही ढंग से समाज के व्यापक हित में निभाएं।

उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद के अध्यक्ष जावेद उस्मानी ने (जिन्हें शीघ्र राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालना है) इस अवसर पर अत्यन्त विस्तार से पत्रकारिता के स्वरूप व इसकी महत्ता की विवेचना की। उस्मानी ने कहा कि मीडिया सर्चलाइट के समान है। स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग, घटक तथा कडी है। यह सूरज की रोशनी की मानिन्द ‘समाज के अंधेरे’ में पहुंचकर उसके सभी विकारों को खत्म कर सकता है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मीडिया और सूचना के अधिकार अधिनियम का उपयोग लोकतंत्र में शासन-प्रशासन तथा प्रणाली की खामियों को दुरुस्त करने में करें।

राज्य के मुख्य सचिव रह चुके उस्मानी ने कहा कि अच्छे पत्रकारों को चाहिए कि वे अपनी बौद्धिकता तथा साधनों का इस्तेमाल उन लोगों के विरुद्ध करें जो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए समाज तथा जन के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रेस की भूमिका समाज हितैषी बातों तथा सुझावों को नीति निर्माताओं तक पहुंचाना और उनकी पैरोकारी करना होनी चाहिए। प्रेस के लोग शासन के कार्यों की सही मॉनिटरिंग करें। इस मौके पर  उस्मानी ने उपस्थित पत्रकार-समुदाय को आश्वस्त किया कि मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालने पर वे देखेंगे की जनता को सूचनाएं मिलने में कहां अवरोध हैं और उन्हें यथासम्भव दूर करने की कोशिश करेंगे।

एनयूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके व प्रेस काउंसिल के नव मनोनीत सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी ने अपने सम्बोधन में पत्रकारों के संकल्प तथा विजन पर जोर दिया, साथ ही कहा कि केवल लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता सम्भव हैय लिहाजा प्रेसकर्मियों, कर्मचारियों और नियोक्ताओं में बेहतर समझ होनी चाहिए। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे छद्म जीवन का मोह न रखें, और अपने कार्यों को विश्वास व समझ के साथ पूरा करें तभी प्रेस काउंसिल बनाने का लक्ष्य पूरा होगा और इसे सशक्त बनाया जा सकेगा।

सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार ने सूचना के अधिकार अधिनियम को पत्रकारों के लिए ब्रम्हास्त्र बताया और इसके उपयोग से हो रहे नित खुलासों के प्रति सन्तोष प्रकट किया है। उन्होने कहा कि आरटीआई के प्रयोग से पत्रकार पारदर्शी शासन व्यवस्था कायम करने की दिशा में काम कर सकता है। स्वदेश कुमार ने सोशल मीडिया, प्रिण्ट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दायित्व की चर्चा करते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सक्रियता ने अखबारों पर दबाव बढा दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के व्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने समाज को दिशा तथा निर्देशन में मीडिया की अहमियत को रूपांकित करते हुए लोकतंत्र में इसकी भूमिका पर जोर दिया एवं यह भी कहा कि मीडिया और इसके लोग भी अपने गिरेबान में झांकें।  वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का कहना था कि समय तथा समाज में तेजी से बदलाव के साथ पत्रकारिता में भी जबर्दस्त गिरावट आयी है। आवश्यक है कि पत्रकार नैतिक मूल्यों पर ध्यान दें। वीरेन्द्र सक्सेना ने समूची मीडिया में बढते व्यवसायीकरण को चिन्ताजनक बताया तथा कहा कि इससे पत्रकार जगत को भारी क्षति हो रही है। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने मीडिया पर शासन प्रशासन तथा मीडिया पर कारपोरेट घरानों के बढते प्रभुत्च वर चिंता व्यक्त की। महामंत्री रमेश चन्द्र जैन ने कहा कि प्रेस काउंसिल के दायरे में अभी सिर्फ प्रिण्ट मीडिया है, इसके स्वरूप में परिवर्तन कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसकी परिधि में ले आया जाना चाहिए।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों माता प्रसाद पाण्डेय,जावेद उस्मानी, प्रज्ञानन्द चैधरी , स्वदेश कुमार व विधानसभा के  प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को अंगवस्त्रम और प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया।  इसके पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि व अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस मौके पर षेयसी पावगी ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन एलजेए के महामंत्री के0के0वर्मा ने किया। इस अवसर पर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों सर्वश्री पी.के. राय, पी.बी. वर्मा, डॉ. प्रभाकर शुक्ल, सुनील पावगी, प्रदेश उपाध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह, वीर विक्रमबहादुर मिश्र, कोषाध्यक्ष प्रदीप कुमार शर्मा , मंत्री सुनील त्रिवेदी, एलजेए के उपाध्यक्ष भारतसिंह, सुशील सहाय, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, एस0बी0सिंह, विकास श्रीवास्तव कोषाध्यक्ष  मंगल सिंह और समेत अनेक गणमान्य लोगों के आलावा प्रदेश के विभिन्न जिलों से आये पत्रकार इस समारोह में बडी तादाद में जिलों से वाराणसी से अनिल अग्रवाल,आगरा से अशोक अग्निहोत्री ,पंकज सचदेवा,राजीव सक्सेना,सुभाष जैन,सुल्तानपुर से अरूण जायसवाल,शहजहांपुर से सरदारशर्मा, जरीफ मलिक, राजबहादुर, बराबकी से सलीम और फरहत भाई, प्रतापगढ से सन्तोष गंगवार हरीश सैनी आदि उपस्थित रहे।        
प्रेस रिलीज    

अरविन्द शुक्ला
अध्यक्ष
लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन

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हिंदी का संपादक एक रोता हुआ जीव है, जिसके जीवन का लक्ष्य अपनी नौकरी बचाना है

भारत यूरोप नहीं है, अमेरिका भी नहीं है. यहां अखबार अभी भी बढ़ रहे हैं, और यह सिलसिला रुक जाए, इसका फिलहाल कोई कारण नहीं है. इंटरनेट पर हिंदी आई ही है और अगर सब कुछ ठीक रहा तो भारत में इंटरनेट हर मुट्ठी तक नहीं भी तो ज्यादातर मुट्ठियों तक पहुंच ही जाएगा और साथ में हिंदी भी इसकी सवारी करेगी. टीवी भी भारत में बढ़ता मीडियम है. और फिर यह टेक्नोलॉजी का बाजार है. यहां कारज धीरे होत है टाइप कुछ नहीं होता. अगर सारे कोऑर्डिनेट्स सही हैं, तो एक का सौ और सौ का लाख होने में समय नहीं लगता. कुल मिलाकर प्रिंट, टीवी और वेब पर न्यूज मीडियम की हालत ठीक है. बढ़ता बाजार है. मांग बनी हुई है. समस्या बाजार में नहीं है. 

तो फिर हिंदी का संपादक आज ढंग का प्रोडक्ट क्यों नहीं दे पा रहा है? इंग्लिश के मीडिया प्रोडक्ट के सामने उसका प्रोडक्ट निस्तेज क्यों है? रेवेन्यू मॉडल कमजोर क्यों है? संपादक मीडिया मालिकों से यह क्यों नहीं कह पा रहा है कि मैं जागरण या भास्कर या अमर उजाला या हिंदुस्तान को देश का सबसे असरदार अखबार बना दूंगा. हिंदी का कोई संपादक यह क्लेम क्यों नहीं करता कि हमारे पास सबसे ज्यादा खबरें और सबसे ज्यादा तस्वीरें हैं और सबसे सघन स्ट्रिंगर नेटवर्क है, इसलिए मैं इंटरनेट पर अपने ब्रांड को टाइम्स ऑफ इंडिया से बड़ा और पॉपुलर न्यूज ब्रांड बना दूंगा? कॉमस्कोर पर टाइम्स ऑफ इंडिया से आगे जाने का सपना देखने में वह डरता क्यों है? हिंदी के टीवी चैनल देखकर ऐसा क्यों लगता है कि उन्हें संपादक और पत्रकार नहीं, जोकरों और विदूषकों की टोली चला रही है. इनमें से किसी को भी हिंदी के पाठक की समझदारी का भरोसा क्यों नहीं है? खबरों के नाम पर भंड़ैती और तमाशा हावी क्यों है?  कोई संपादक मालिक को यह क्यों नहीं कह रहा है कि मैं ‘समाचार’ दिखाकर आपको नंबर दूंगा.

हाल की हिंदी फिल्मों में पत्रकार को अगर लगातार जोकर और मूर्ख की तरह दर्शाया जा रहा है, तो यह किसके प्रताप से हुआ है? पत्रकार समाज में अगर अब प्रतिष्ठित आदमी नहीं रहा, और पत्रकारिता अगर प्रतिष्ठित पेशा नहीं है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या कोई सब-एडिटर या रिपोर्टर या ट्रेनी?

वैसे क्या है हिंदी का संपादक? वह करता क्या है और क्यों करता है? दरअसल, वह एक रोता हुआ भयभीत प्राणी है, जिसे अपने काम और अपनी क्षमता और हुनर के अलावा, हर चीज से शिकायत है. वह बस किसी तरह अखबार या चैनल या साइट चलाता रहेगा. कभी कभार मैनेजमेंट के कहने पर कुछ लॉन्च कर देगा. हमेशा कम लोगों के होने और टैलेंटेड मैनपावर की कमी का रोना रोएगा. कभी कहेगा कि मालिक करने नहीं देता. जबकि मालिक बेचारा इंतजार कर रहा है कि संपादक कोई अच्छा आइडिया लेकर तो आए.

हिंदी का संपादक कभी भी नए प्रयोग नहीं करेगा. नए रेवेन्यू स्ट्रीम खोलने की बात भी नहीं करेगा. कहेगा कि यह तो मैनेजरों का काम है. जबकि उसके दब्बूपने की असली वजह यह है कि वह डरता है. कुछ गलत हो गया तो? नौकरी चली गई तो? वह हमेशा अपनी और प्रोडक्ट की कमियों के लिए नीचे के किसी को या कई लोगों को दोषी ठहराकर अपनी पोजिशन बचाने के लिए तत्पर नजर आएगा. वह गैर-पत्रकारीय तरीके से मालिकों के लिए उपयोगी बनकर या चापलूसी करके नौकरी बचाने की कोशिश करेगा. 

वह हमेशा अपना गिरोह बनाने की कोशिश करेगा. संपादकी के पहले छह महीने मालिक को यह कहेगा कि पुराने लोगों से काम ले कर देखते हैं. फिर कहेगा, इनसे काम नहीं बनेगा. छह महीने-एक साल में पुराने के बदले नए लोग लाएगा. अपनी जाति, रिश्तेदारी, इलाके से लोग लाएगा. फिर उन्हें काम करने का मौका देने के नाम पर साल दो साल निकालेगा और फिर भी बात नहीं बनी तो और प्रपंच करके टिकने की कोशिश करेगा या निकाला जाएगा. वह बी है इसलिए सी कटेगरी के लोगों को लाएगा. क्योंकि वह खुद ए नहीं है, इसलिए ए प्लस को कभी नहीं लाएगा. एवरेज टैलेंट वालों के बीच वह खुद को आश्वस्त महसूस करेगा. उसके रोजमर्रा के जीवन में मिलने वाले 90 फीसदी से ज्यादा लोग पत्रकार ही होंगे, जिनके बीच वह खुद को अच्छा फील करेगा. वह रेवेन्यू बढ़ाने की नहीं, खर्चा घटाने की सोचेगा. टॉप लाइन ठीक किए बगैर, बॉटम लाइन सुधारने के लिए कभी रिपोर्टिंग का खर्चा घटाएगा, तो कभी मैनपावर कट करेगा, तो कभी सुविधाओं में कटोती करेगा, तो कभी लोगों की सैलरी घटाएगा.

जब मालिक व्यूअरशिप और रीडरशिप के लिए दबाव बढ़ाएगा, तो प्रोडक्ट में गंदगी फैला देगा. वेबसाइट है तो पोर्न और सेमीपोर्न परोस देगा. चटपटे के नाम पर कूड़ा बिखेर देगा. टीवी पर है तो नागिन का बदला और कातिल हसीना टाइप कुछ कर लेगा या स्वर्ग के लिए सीढी लगा देगा. लाफ्टर चैलेंज के शॉर्ट कट में घुस जाएगा. न्यूज के नाम पर तमाशा करने लगेगा. जब इस वजह से प्रोडक्ट की ब्रांडिंग खराब होगी और विज्ञापन का रेवेन्यू प्रभावित होगा, तो अपना हाथ झाड़कर खड़ा हो जाएगा.

हिंदी का संपादक बौद्धिक आलस्य करेगा, अच्छा केंटेंट नहीं जुटाएगा और कहेगा कि हिंदी का रीडर और व्यूअर तो कोई अच्छी चीज पसंद ही नहीं करता. अपने बौद्धिक आलस्य का ठीकरा वह अंग्रेजी वर्चस्व के सिर पर फोड़ देगा. कहेगा कि सारी गड़बड़ी इसलिए है क्योंकि अंग्रेजी हावी है.

हिंदी का संपादक अपना स्किल सेट बेहतर करने की कोशिश नहीं करेगा. वह अपनी क्षमताओं को ब्रांच आउट नहीं करेगा. अगर वह नौकरी पर नहीं होगा, तो फिर कुछ भी नहीं रह जाएगा और मर जाएगा. वह पढ़ाई नहीं करेगा. रिसर्च नहीं करेगा. विज्ञापन की कॉपी लिखने की तमीज नहीं सिखेगा. वह पढ़ाने का हुनर नहीं सिखेगा. वह यूजीसी-नेट और पीएचडी के बारे में सोचेगा तक नहीं. वह सीरियल की स्क्रिप्ट या किताब लिखने को कोशिश नहीं करेगा. अनुवाद करना उसके वश में नहीं है, और इसे सीखने की कोशिश भी नहीं करेगा. डॉक्यूमेंट्री बनाना भी ऐसा ही मामला है, जिससे जाहिर है उसका कोई वास्ता नहीं होगा. इंग्लिश के कई संपादकों की तरह कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन में जाने का हुनर भी हासिल नहीं करेगा. प्रिंट में है तो प्रिंट में और टीवी पर है तो टीवी में ही उलझा रहेगा. दूसरे मीडियम में हाथ आजमाने का जोखिम नहीं लेगा. भाषा के मामले में भी हिंदी से शुरू और हिंदी में खत्म की स्थिति में रहेगा. वह टीम को ट्रेनिंग दिए जाने और खुद ट्रेनिंग लेने, दोनों का विरोध करेगा. पान-दुकानदार की तरह हर चीज पर उसकी एक राय जरूर होगी लेकिन वह देश-दुनिया के किसी भी विषय का एक्सपर्ट नहीं होगा.

दूसरे विषय का एक्सपर्ट होना तो छोड़िए, हिंदी का संपादक अक्सर अपने प्रोफेशन की बुनियादी बातों से भी अनजान होगा. मिसाल के तौर पर, उसे नहीं मालूम होगा कि उसके काम की संवैधानिक, कानूनी और नियम संबंधी मर्यादाएं क्या हैं. वह कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ, आईपीसी, लॉ ऑफ डिफेमेशन, रूल्स ऑफ पार्लियामेंट्री प्रिविलेज, आईटी एक्ट, केबल एक्ट, प्रेस कौंसिल के मीडिया नॉर्म इनमें से किसी भी बात का जानकार नहीं होगा और न ही अपनी टीम को इनकी ट्रेनिंग दिए जाने की व्यवस्था करेगा. इसके लिए कोई वर्कशॉप आयोजित करना उसकी कल्पना से बाहर की चीज होगी. संपादन संबंधी गलतियों को वह आसानी से विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता करार दे सकता है. कानूनी झमेले में कभी मामला फंसा, तो किसी रिपोर्टर या डेस्क के किसी कर्मचारी के नाम उसका दोष मढ़कर वह खुद को बचा लेने की कोशिश करेगा. या फिर मामले को मैनेज करने में जुट जाएगा. रिपोर्टर या डेस्क जो कुछ अच्छा करेगा, उसका श्रेय संपादक ले लेगा, लेकिन गलती उसकी कभी नहीं होगी. उसने न कभी कोई गलती की है, न कोई गलती करेगा.  

वह जब तक संपादक है, तब तक है, और जब वह नौकरी में नहीं है, तो कुछ नहीं है. वह संपादक के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि उसने कुछ और सीखने की कभी कोई कोशिश की ही नहीं है.  

तो क्या हमेशा ऐसा ही रहेगा? इस स्थिति को बदलने के दो उपाय हैं, जिसके बारे में मीडिया मालिकों को सोचना चाहिए. अगर वे चाहते हैं कि संपादक प्रयोग करें, नया सोचें, प्रोडक्ट के लिए वैल्यू क्रिएट करें, नए रेवेन्यू मॉडल बनाएं, तो पहले तो उन लोगों से बचें, जिनके लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ आलेख लिखना, मंत्री के साथ दौरे करना और गिरोहबाजी-गोष्ठीबाजी करना है. संपादकों का कंपनी के राजस्व से, रेवेन्यू मॉडल से, सर्कूलेशन और व्यूअरशिप से तथा प्रोडक्ट के प्रभाव से…इन सबसे वास्ता है. एवरेज और मंदबुद्धि संपादकों को रास्ता दिखाना जरूरी है. मैनेजमेंट को संपादकों के टार्गेट फिक्स करने चाहिए और ये टार्गेट आलेख-विश्लेषण लिखने या चेहरा पोतकर एंकरिंग करने से आगे और चीजों के बारे में भी होने चाहिए. 

दूसरा उपाय, संपादकों की सैलरी इतनी बढ़ाई जाए कि अगर वह दो साल नौकरी कर ले, तो उसमें दो साल नौकरी न करके जीने का साहस और सुविधा हो. नौकरी बचाने के लिए डरा हुआ संपादक न तो पत्रकारिता के लिए अच्छा है और न ही मीडिया इंडस्ट्री के लिए. ऐसा डरा हुआ संपादक मालिकों के लिए किसी काम का नहीं है. अपने नीचे काम करने वालों के लिए तो ऐसे संपादकों से बुरा और कुछ नहीं हो सकता, जो अपनी नौकरी बचाने के लिए दूसरों की जान लेने को हमेशा तैयार बैठा है. ऐसा संपादक पाठकों और दर्शकों के लिए भी बेकार है.

दिलीप मंडल, इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर, इकोनॉमिक टाइम्स हिंदी ऑनलाइन के संपादक तथा सीएनबीसी आवाज चैनल के एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूशर रहे. लगभग एक दर्जन मीडिया संस्थानों में काम का अनुभव. मीडिया शिक्षण, रिसर्च और पुस्तक लेखन में सक्रिय. सूचना और प्रसारण मंत्रालय और प्रेस कौंसिल द्वारा सम्मानित. संपर्क: dilipcmandal@gmail.com

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