पूर्व आईएएस और भाजपा नेता सूर्य प्रताप सिंह अबकी ‘नोटा’ का सोटा चलवाएंगे, सोशल मीडिया पर बना रहे माहौल

बोले- ‘नोटा’ का विरोध करने वाले किसी पार्टी विशेष की IT सेल के पालतू शिकारी हैं… ये दिनभर यही काम करते हैं, सावधान रहें इनसे!

Surya Pratap Singh : ग़ुलाम न बनों, अपनी शक्ति का एहसास कराओ…. NOTA का सोटा चलाओ… सावधान! झूठ बोलने/धोखा देने वालों ने अपने आईटी सेल के Paid Workers (शिकारी-कुत्तों) के माध्यम से सोशल मीडिया पर NOTA का विरोध किया जा रहा है….. NOTA के सोशल मीडिया पर विरोध के लिए करोड़ों रुपए ख़र्च किए जा रहे हैं। कोई भी राजनीतिक दल किसी बड़े ‘जन-वर्ग’ को अपना ‘ग़ुलाम’ वोट बैंक समझकर जूते की नौंक पर नहीं रख सकता …. Continue reading

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सीनियर आईएएस ने कहा- भारत की न्यायिक व्यवस्था में आज कांति का दिन

Surya Pratap Singh : भारत की न्यायिक व्यवस्था में क्रांति का दिन! न्यायपालिका में भ्रष्टाचार/प्रशासनिक अनियमितताओँ के विरुद्ध अंदर से उठी आवाज़-सुप्रीम कोर्ट के 4 अत्यंत ईमानदार छवि के वरिष्ठ जजों ने आज एक अभूतपूर्व/क्रांतिकारी क़दम उठाते हुए, न्यायपालिका में क्या चल रहा है, के विषय में जाता दिया कि लोकतंत्र में लोगों को यह सब जानने का हक़ है। लोकतंत्र में संविधान सर्वोच्च है और संविधान के आरम्भ में ही PREAMBLE में लिखा है.. WE THE PROPLE OF INDIA …. SOLEMNLY RESOLVED शब्दों से पता चलता है कि संविधान में भी समस्त शक्ति ‘लोगों’ में ही निहित है।

कार्यपालिका/नौकरशाही व विधायिका/नेता/मंत्रीयों के भ्रष्टाचार की बात तो एक आम है लेकिन एक सर्वे के अनुसार भारत के 45% लोग यह मानते है कि न्यायपालिका में भी व्यापक भ्रष्टाचार है। 2014 में सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व जज ने कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के 3 पूर्व मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। 2010 में एक पूर्व क़ानून मंत्री ने कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व 16 मुख्य न्यायाधीशों में से 8 मुख्य न्यायाधीश ‘भ्रष्ट’ थे।

2007 के एक सर्वे के अनुसार 59% पक्षकारों ने वक़ील के माध्यम से , 5% लोगों ने सीधे तथा 30% कोर्ट के बाबुओं के माध्यम से अपने पक्ष में निर्णय कराने के लिए रिश्वत दी। CBI ने एक भ्रष्ट न्यायाधीश को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ़्तारी तक हो चुकी है। इस देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले न्यायाधीश Justice CS Karnan को दुर्भाग्यवश जेल जाना पड़ा था।

इस देश में highcourt व supreme court के जजों की नियुक्ति में भाई भतीजावाद का बोलबाला रहा है। इलाहाबाद में जाकर देखो कि कितने जजों के बेटे जज बने हैं। देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आज क्रांति का समय आ गया है। लोग मानते है कि आज देश में कोई भी राजनीतिक दल ईमानदार नहीं है, सब भ्रष्टाचार के चंदे से चलते हैं…. सभी सत्ताधीश/मंत्री बनकर देश को लूटते हैं।

आज 4 न्यायाधीशों की प्रेस कॉन्फ़्रेन्स ने इस क्रांति का आग़ाज़ कर दिया है… यह अभूतपूर्व घटना है। यह समय है कि जब सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट/लोअर कोर्ट्स के सभी भ्रष्ट जजों का सफ़ाया किया जाए…. यह लोकतंत्र के लिए अति आवश्यक है। न्यायपालिका ही लोकतंत्र का ऐसा सर्वोच्च ज़िम्मेदार स्तम्भ है कि जो दोनो विधायिका व कार्यपालिका के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकती है। यदि न्यायपालिका ही भ्रष्ट होगी तो यह कार्य कैसे सम्भव हो पाएगा।

आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध आग़ाज़ का दिन है जिसका सबको स्वागत करना चाहिए। हम आप लोग व मीडिया ‘अवमानना’ के डर से न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को उजागर नहीं कर पाते हैं। आज न्यायपालिका के अंदर से स्वमँ उसके अपने अंदर व्याप्त अनियमितताओं/भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठी है, इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इस चारों ईमानदार ‘जजों’ की आवाज़ का समर्थन किया जाना चाहिए और भ्रष्ट जजों के विरुद्ध ‘IMPEACHMENT’ की कार्यवाही कर सारी दुनिया में संदेश देना चाहिए कि भारत की न्यायिक व्यवस्था (Judicial System) ‘Transparent’ है और लोकतंत्र की रक्षा करने में समर्थ है।

क्या मेरा यह लेख ‘Contempt of Court’ की श्रेणी में आता है ? यदि हाँ, तो मैं जेल जाने को तैयार हूँ।

जय हिंद-जय भारत !!

सीनियर आईएएस रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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सरकारी आवासों पर कब्जा के मामले में यूपी के नेताओं और पत्रकारों की नैतिकता तेल लेने चली जाती है!

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश में EX-CM अर्थात पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा बड़े-२ सरकारी आवासों पर क़ब्ज़ा….. क्या हटना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे अवैधानिक व जनता के पैसे का नेताओं द्वारा दुरुपयोग बता कर दो माह में ख़ाली करने के निर्देश दिए थे….. परंतु यूपी की अखिलेश यादव सरकार ने इस आदेश को scuttle कर अर्थात ठेंगा दिखा कर एक बिल के माध्यम से पूर्व मुख्यमंत्रियों के इस क़ब्ज़े को बरक़रार रखने का काम किया।

चूंकि पिता-पुत्र दोनों को अलग-२ सरकारी आवासों पर क़ब्ज़ा करना था। यद्यपि अपने मुख्यमंत्री काल में वह अपने पिता के आवास में ही रहते थे। रु. २.३७ करोड़ पब्लिक पैसा अपने बंगले की साजसज्जा में ख़र्च कर दिया। मायावती ने तो कई बंगलों व गन्ना आयुक्त कार्यालय को अपने बंगले में सम्मिलित कर लिया और साजसज्जा में करोड़ों रुपए ख़र्च किए। अन्य किसी पूर्व मुख्यमंत्री ने शायद ही ऐसे राजनीति में ‘नैतिकता’ की धज्जियाँ उड़ायी हों।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की फिर दुबारा से बड़ी गम्भीरता से लिया है। इस प्रकार उ.प्र. में अपने कार्यकाल में ही मुख्यमंत्रीगण लाखों / करोड़ों जनता का पैसा ख़र्च कर अपने भावी सरकारी बंगलों की साजसज्जा करते रहे हैं। कई-२ बंगालों / सरकारी बिल्डिंगों को मिलकर अपना बंगला तैयार करते रहे हैं…… और फिर नाम मात्र के किराए पर जीवन पर्यन्त रखते हैं। प्रदेश में करोड़ों ग़रीब एक अदद छोटे से मकान के लिए जीवन भर संघर्ष करते हैं। लखनऊ में पार्टी ऑफ़िस व ट्रस्ट्स के नाम पर आवंटित सरकारी आवास/बिल्डिंग पर नेताओं ने क़ब्ज़ा किया हुआ है। रिटायर हुए पत्रकार भी सरकारी आवासों पर क़ाबिज़ हैं जबकि उन्हें LDA से सस्ती ज़मीन मकान बनाने के लिए दी गयी है।

दक्षिण भारत के राज्यों में यह परम्परा नहीं है। केवल feudal राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश आदि में ही यह क़ब्ज़े किए गए हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, मायावती, राजनाथ सिंह, एन डी तिवारी, कल्याण सिंह और राम नरेश यादव के नाम कई-२ बंगले मिलाकर बनाए गए आवास आवंटित हैं…. जबकि इनके व इनके परिवारों के नाम एक नहीं कई-२ प्राइवट मकान लखनऊ या अन्य शहरों में विद्यमान हैं….

क्या इन नेताओं का अपने राजनीतिक जीवन में नैतिकता का यह कोई उदाहरण है…. क्या महात्मा गांधी, सरदार पटेल , लोहिया, अम्बेडकर जैसे लोगों ने ऐसा कोई अनैतिक आचरण किया ….? क्या उन्होंने अपने परिवारों के लिए कभी कुछ ऐसा किया ? उत्तर प्रदेश में श्री राम प्रकाश गुप्ता एक ऐसे ईमानदार मुख्यमंत्री हुए, जिन्होंने इतना बड़ा सरकारी बंगला लेने से इंकार कर दिया…….KUDOS TO HIM ! आप बताएँगे कि क्या ये बंगले व सरकारी सम्पत्ति ख़ाली होनी चाहिए या नहीं ? क्या पब्लिक लाइफ़ में यह अनैतिक आचरण की श्रेणी में नहीं आता है? “MORALITY AND ETHICS IN PUBLIC LIFE DEMANDS THAT THESE POLITICIANS SHOULD VOLUNTARILY VACATE THESE BUNGALOWS FORTHWITH.”

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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प्रियंका की किताब का खुलासा, बाबा रामदेव इन तीन हत्याओं के कारण बन पाए टाइकून!

Surya Pratap Singh :  एक बाबा के ‘फ़र्श से अर्श’ तक की कहानी के पीछे तीन हत्याओं / मौत के हादसे क्या कहते हैं? अमेरिका में पढ़ी-लिखी प्रसिद्ध लेखिका प्रियंका पाठक-नारायण ने आज देश के प्रसिद्ध योगगुरु व अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति, बाबा रामदेव की साइकिल से चवनप्रास बेचने से आज के एक व्यावसायिक योगगुरु बनने तक की कथा अपनी किताब में Crisp facts / प्रमाणों सहित लिखी है। इस पुस्तक में बाबा की आलोचना ही नहीं लिखी अपितु सभी उपलब्धियों के पहलुओं को भी Investigative Biography के रूप में लिखा है।

इस पुस्तक में सभी तथ्य बड़े सशक्त ढंग से लिखे है , कुछ भी ऐसा नहीं लगता जिसे बकवास कहकर दरकिनार कर दिया जाए, प्रथम धृष्टता ऐसा भी नहीं लगता कि यह किसी मल्टीनैशनल द्वारा प्रायोजित किताब है। वैसे बाबा रामदेव ने कोर्ट के injunction order से प्रकाशक को यह स्थगन दिलवाया हुआ है कि अब इस पुस्तक की कोई नई कॉपी न छापी जाए। ज़रूरी नहीं कि इस पुस्तक में सभी बातों पर विश्वास किया जाए, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बाबा रामदेव का क़द बहुत बड़ा है और राजनीतिक/ सामाजिक रसूक़ भी बहुत बड़ा है, अतः जनमानस को उनके बारे में जानने की उत्सुकता होना स्वाभाविक है। प्रियंका पाठक नारायण की किताब का नाम है- “Godman to Tycoon : The Untold Story of Baba Ramdev”

इस किताब में तीन हत्याओँ/ मौतों का विस्तार से परिस्थितियों व शंकाओं का प्रमाण सहित ज़िक्र किया है:

१- बाबा रामदेव के ७७ वर्षीय गुरु शंकरदेव का ग़ायब होने से पूर्व बाबा रामदेव का एक माह तक विदेश में चले जाना। दिव्य योगपीठ ट्रस्ट की सभी सम्पत्ति शंकरदेव के नाम थी, जी अब बाबा रामदेव के पास है। (CBI की जाँच अत्यंत मद्धम गति से जारी है)

२- बाबा रामदेव को आयुर्वेद दवाओं का लाइसेंस देने वाले स्वामी योगानंद की वर्ष २००५ में रहस्मयी हत्या।

३- बाबा रामदेव के स्वदेशी आंदोलन के पथ प्रदर्शक राजीव दीक्षित की वर्ष २०१० में संदिग्ध मौत।

मैं इस किताब का प्रचार नहीं कर रहा… लेकिन इसको पढ़कर आपको कुछ शंकाओं का निराकरण तो अवश्य होगा कि कैसे योग ने राम कृष्ण यादव को बना दिया बाबा रामदेव… धर्म के नाम पर तेज़ी बढ़े बाबा के व्यापार पर ED/IMCOME TAX की भी नज़र है।

गुरु शंकरदेव की रहस्यमयी गुमशुदी के साथ-अन्य दो हत्याओं/मौतों को भी CBI के दायरे में लाना उपयुक्त होगा ….. राम रहीम पर आए कोर्ट के निर्णय से आम लोगों को अन्य ढोंगी बाबाओं पर भी सिकंजा कसने का विश्वास जगा है। CBI को उक्त जाँच में भी शीघ्रता कर दूध का दूध व पानी का पानी अवश्य करना चाहिए … वैसे उ.प्र. मी भी नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे में बाबा को 455 एकड़ भूमि अखिलेश यादव ने दी थी, उसकी जाँच भी ज़रूरी है।

नोट: कुछ लोगों ने मुझे फ़ोन कर यह आगाह किया है / चेतावनी दी है कि बाबा रामदेव के बारे में और न लिखें, क्यों कि इनके पास धनबल के साथ अन्य सभी बल हैं। सभी बड़ी मीडिया कम्पनीओँ को इतने विज्ञापन/ धन बाबा रामदेव से मिलते हैं कि कोई उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं करता।

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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पूर्व आईएएस ने गोरखपुर त्रासदी का ‘अखिलेश यादव’ कनेक्शन बताया

Surya Pratap Singh : गोरखपुर त्रासदी का ‘अखिलेश यादव’ कनेक्शन… अब यह साफ़ हो गया है कि ‘ऑक्सिजन’ की कमी से 48 घंटे में 30 मासूमों की मृत्यु हुई…. यह भी सही है कि दुःख की घड़ी में सरकार के किसी भी प्रतिनिधि को बिना जाँच पूर्ण हुए ‘अधिकारियों’ के बहकाबे पर यह नहीं कहना चाहिए था कि बच्चों की मौत ऑक्सिजन की कमी से नहीं हुई.. इस बयानों ने पीड़ित परिवारों का अवसाद को कम नहीं, अपितु और बढ़ा दिया। साथ ही इस ‘बालसंहार’ के तीन खलनायक- प्राचार्य आर. के. मिश्रा / उनकी पत्नी, डॉ. कफ़ील खान व ऑक्सिजन सप्लाई कर्ता पुष्पा सेल्स के मालिक मनीष भंडारी है, यह भी लगभग स्पष्ट हो चुका है।

अब जानिए इन तीनों खलनायकों का ‘अखिलेश यादव’ कनेक्शन। डॉ. आर. के. मिश्रा की प्राचार्य पद पर नियुक्ति/ प्रोन्नति व डॉ. कफ़ील खान की नियुक्ति वर्ष 2015 में आज़म ख़ान की सिफ़ारिश पर अखिलेश यादव ने ही की थी। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफ़ील खान की पत्नी एक दाँतो की डॉक्टर है और चलाती है ‘बच्चों का नर्सिंग होम’…. वस्तुतः बालरोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफ़ील ही नियम विरुद्ध इस नर्सिंग होम को भी संचालित करता है और इसमें BRD अस्पताल से चोरी गया वेंटिलेटर भी लगा रखा है। कफ़ील खान सरकारी अस्पताल को अपने नर्सिंग होम में मरीज़ पहुँचाने का प्लेटफ़ॉर्म के रूप में इस्तेमाल करता था। डॉक्टर आर. के. मिश्रा प्राचार्य व डॉक्टर कफ़ील खान की दुरभि संधि थी……दोनों मिलकर सभी ख़रीदारी करते थे।

अब बताता हूँ कि पुष्पा सेल्स के मालिक कौन हैं ..उत्तराखंड निवासी मनीष सिंह भंडारी पुत्र श्री चंद्रशेखर सिंह भंडारी, अखिलेश यादव की पत्नी के रिश्तेदार हैं और मज़े की बात है कि यह फ़र्म BRD अस्पताल के साथ-२ प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेज व अस्पतालों में ‘लिक्विड ऑक्सिजन’ अपने एकाधिकार के साथ सप्लाई करती है, जब कि इस फ़र्म की कोई मैन्युफ़ैक्चरिंग सुविधा/फ़ैक्टरी नहीं है…. ये एक ट्रेडर/दलाल है जो अन्य मैन्युफ़ैक्चरिंग कम्पनीयों से ख़रीद कर लिक्विड ऑक्सिजन सप्लाई करती है। सरकार यदि सीधे ऑक्सिजन बनाने वाली कम्पनी से लिक्विड ऑक्सिजन ले तो खाफ़ी सस्ती पड़ेगी …. लेकिन ऐसा केवल कमिशन के चक्कर में नहीं किया जाता है। यह भी बता दूँ कि पुष्पा सेल्स के जिस लम्बित भुगतान को समय से न देने की बात की जा रही है। यह भुगतान भी पिछले साल ‘अखिलेश यादव’ के कार्यकाल का है।

प्रदेश में सरकारी अस्पतालों व मेडिकल कालेजों की ख़स्ता हालत जे लिए ‘अखिलेश यादव’ व ‘मायावती’ भी बराबर के ज़िम्मेदार हैं… यद्यपि अब इनको ठीक करने के ज़िम्मेदारी से वर्तमान सरकार बच नहीं सकती। अखिलेश सरकार में भी प्रत्येक वर्ष अगस्त माह में encephalitis से ४००-५०० बच्चों की मृत्यु होती रही है अतः अखिलेश यादव यदि आज बड़ी-२ बातें करे, तो इसे अपने निक्कमेपन को छुपाना व बेशर्मी ही कही जाएगी।

CM योगी कर्मशील हैं अतः पूर्व वर्षों के हालत के क्रम में स्वमँ BRD मेडिकल कॉलेज दिनांक ९ अगस्त, २०१७ को गए थे, लेकिन शासन/प्रशासन के अधिकारियों ने सही बात उनके सामने नहीं रखी कि ऑक्सिजन की कमी है या पैसा चाहिये… मुख्यमंत्री का स्वमँ अस्पताल जाकर समीक्षा करना दर्शाता है कि वे encephalitis से होने वाली सम्भावित बाल मौतों को रोकने के प्रति गम्भीर थे जबकि अखिलेश यादव अपने कार्यकाल में कभी इस अस्पताल में encephalitis के बचाव के लिए समीक्षा करने नहीं पहुँचे…. इनके पाँच वर्ष के कार्यकल में encephalitis से लगभग ५,००० बच्चों की मौत हुई थी।

मुझे लगता है कि स्थानीय व शासन में बैठे अधिकारियों की लापरवाही व मंत्रियों की असंवेदनशील बयानबाज़ी ने सरकार की किरकिरी करायी…. और कर्मयोगी CM योगी के लिए असमंजसता/ Embarrassment की स्थिति पैदा कर दिया। मैं CM योगी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, केवल अपना independent मत व्यक्त कर रहा हूँ…. बाक़ी आप जो समझें। अतः पूर्व CM अखिलेश यादव द्वारा अब कुछ अनाप-सनाप कहने और दोषारोपण करने से पूर्व अपने गरेबान में झाँकने की अधिक ज़रूरत है। इस प्रदेश के बीमार ‘चिकित्सा’ व्यवस्था के लिए अखिलेश यादव ही ज़्यादा दोषी है और ऊपर लिखित 3 खलनायकों की ‘तिगड़ी’ का भी सीधा सम्बन्ध अखिलेश यादव से है। जय हिंद-जय भारत !!

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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‘चड्ढा-खंडेलवाल-अग्रवाल’ माफ़िया सिंडिकेट को ध्वस्त कर पाएंगे सीएम योगी?

Surya Pratap Singh :  उ. प्र. में भ्रष्टाचार की ‘झनक़-झनक़ पायल बाजे’ की धुन में फँसी बच्चों की ‘किताबें/यूनिफोर्म’ व ‘पंजीरी’! उत्तर प्रदेश के प्राइमरी स्कूलों में अभी तक न तो किताबें और न ही यूनीफ़ॉर्म पहुँची…. ४ माह हो गए सत्र शुरू हुए। पंजीरी ख़रीद में ज़्यादा रुचि! क्या करें दृढसंकल्पित CM योगी? बड़ी चुनौती? प्राइमरी स्कूलों की हालात पहले से ख़स्ता थे… सबको भरोसा था कि नयी सरकार के आने से हालात बदलेगें लेकिन सब ढाक के तीन पात….

किताबों के अभाव में प्राइमरी स्कूलों में बच्चे पुराने छात्रों से उधार की किताबों से काम चला रहे हैं। वह भी ३ में से केवल १ छात्र के पास ही ये पुरानी किताबें हैं…. क्या बेसिक शिक्षा मंत्री जी को स्कूलों में जाकर देखने की फ़ुरसत नहीं है? पुष्ठाहार विभाग जिसमें पंजीरी माफ़िया पॉंटी चड्ढा ‘पंजीरी’ सप्लाई करता है, यह विभाग भी इन्ही मंत्री जी के पास है….शायद मंत्री जी पंजीरी की सप्लाई की व्यवस्था में ज़्यादा व्यस्त हैं या फिर किताबों व यूनीफ़ॉर्म ख़रीद का टेंडर किसी ‘जुगाड़बाज़ी’ में फँसा है…..आख़िर बड़ा बजट जो ढहरा। 

प्राइमरी स्कूलों में ७०% बच्चें हिंदी भी ठीक से नहीं पढ़ पाते …. अंग्रेज़ी की तो बात ही छोड़िए।  शिक्षामित्रों की हड़ताल व बवाल अलग से सारी व्यवस्था की चौपट किए है।  शिक्षा विभाग का इस वर्ष का बजट रु. १९,४४४ करोड़ का है , फिर भी किताब व यूनीफ़ॉर्म के नाम पर सब कुछ सिफ़र है। पिछले वर्ष भी प्रदेश में ३०% बच्चों को किताबें नहीं मिल पायीं थी।  CM योगी का यह कहना सर्वथा उचित है कि मंत्रियों व अधिकारियों को अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाना चाहिए, लेकिन पहले इस स्कूलों के हालात तो ठीक हों।

प्राइमरी स्कूलों में वास्तविक dropout दर ५५% से अधिक है …. जब मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं और शिक्षा का स्तर इतना बुरा है, शिक्षकों को पढ़ाना आती ही नहीं, तो कौन धनाढ़्य  अधिकारी/मंत्री भेजे अपने बच्चों को यहाँ पढ़ने।  सर्वशिक्षा अभियान का भी रु. ५,००० करोड़ प्रति वर्ष से अधिक का बजट अलग से है…. लेकिन कहाँ जाता है, ये सब पैसा? जनपदों में शिक्षा विभाग के कार्यालय भ्रष्टाचार के अड्डे माने जाते हैं…. कब दूर होगा इनका भ्रष्टाचार ? CM योगी के समक्ष बड़ी चुनौती है।

पंजीरी का ठेका रु. १०,००० करोड़ का है, इसी लिए इसमें शायद मंत्री जी का ज़्यादा समय जा रहा है, शराब व पंजीरी माफ़िया पॉंटी चड्ढा जिस पर पूर्व अखिलेश सरकार मेहरबान थी, उसी को अग्रिम आदेश तक पंजीरी का ठेका इन्ही मंत्री जी ने बढ़ा दिया गया है। ज्ञात हुआ है कि पॉंटी चड्ढा ग्रूप ने बरेली की संघ से जुड़े ‘खंडेलवाल-अग्रवाल’ जी को पार्ट्नर बनाकर/पटाकर यह कामयाबी हासिल की है….. संगठन के बहुत बड़े पदाधिकारी के रिश्तेदार हैं , ये खंडेलवाल -अग्रवाल जी। वैसे ईमानदार CM योगी ने कहा था कि माफ़िया पॉंटी चड्ढा ग्रूप का प्रदेश से सफ़ाया किया जाएगा….देखते हैं कि इतने दबाव में भला ये कैसे कर पाते हैं, अपनी धुन के पक्के योगी जी ?

आप जानते ही होंगे, जाति कोटे से बनी इन मंत्री जी को? किताब/ यूनीफ़ॉर्म माफ़िया व पंजीरी माफ़िया के चक्कर में फँसी हैं, ये बेचारी …..लेकिन अबोध बच्चों की ‘शिक्षा’ व स्वास्थ्य (कुपोषण को रोकने के लिए पंजीरी) के साथ तो खिलवाड़ कल भी हो रहा था और आज भी, तो बदला क्या ? शायद अभी तक कुछ ख़ास नहीं, सिवाय बड़ी-२ बातों के …… अरे भाई धैर्य रखिये…ज़रा भ्रष्टाचार की ‘झनक़-२ पायल बाजे’ की धुन का मज़ा लीजिए।

चारा भी क्या है?
क्या CM योगी को फ़ेल कराने की साज़िश तो नहीं चल रही? मंत्री अधिकारी काम नहीं कर रहे!  एक अनुमान के अनुसार पिछले १५ वर्षों में रु. ४२,००० करोड़ डकारे जा चुके है इस ‘चड्ढा-खंडेलवाल-अग्रवाल’ माफ़िया सिंडिकेट ने? पंजीरी घोटाले की CBI जाँच का वादा किया था CM योगी ने….. इस जाँच में प्राइमरी स्कूलों के लिए किताब व यूनीफ़ॉर्म ख़रीद को भी शामिल किया जाना चाहिए।”

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे और इन दिनों भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी में ‘ईमानदार’ मुख्यमंत्री के मुफ़्तख़ोर ‘भ्रष्ट’ मंत्री!

Surya Pratap Singh : उ.प्र. में ‘ईमानदार’ मुख्यमंत्री के मुफ़्तख़ोर ‘भ्रष्ट’ मंत्री…. उत्तर प्रदेश में कुछ भ्रष्ट मंत्रियों के स्टाफ़ व आगंतुकों के खाने-पीने व रहने के ख़र्चे कौन उठाता है ? यह एक गोपनीय जाँच का विषय है, इंटेलिजेन्स एकत्र की जानी चाहिए। आप जान कर हैरान हो जाएँगे कि सड़क निर्माण से जुड़े दो विभागों में से अपेक्षाकृत ‘छोटे बजट’ वाले विभाग के मंत्री के ५०-६० स्टाफ़ के रहने/खाने व प्रति दिन आने वाले सैकड़ों आगंतुकों की आवभगत का लगभग रु. १० लाख प्रति माह ख़र्चे कौन उठाता है… विभागीय अधिकारी ‘लूटे’ हुए कमिशन से यह ख़र्चा उठाते हैं।

इस बेशर्मी भरे ‘अनैतिक’ दायित्व के लिए मंत्री महोदय के यहाँ इस विभाग के महाभ्रष्ट दाग़ी, परंतु इस मंत्री के अति प्रिय मुख्य अभियंता ने एक जे.ई. (Junior Engineer) को बंगले व ऑफ़िस पर अटैच कर दिया गया है …ख़र्चों का बोझ उठाने का पूरा जिम्मा उसे दिया गया है ….इस JE की पोस्टिंग काग़ज़ पर कहीं और है और ये महाशय रहते है इस चोर मंत्री के बंगले पर या फिर ऑफ़िस में…….मंत्री जी ने इस JE को ‘खतिरदारी’ के एवज़ में अधिक बजट आवंटन का आश्वासन भी दिया है।

अभी तक अतिरिक्त बजट आवंटन न मिलने व जेब से ख़र्चा अधिक होने के कारण यह JE घूम-२ कर यह कहानी सबको बताता फिर रहा है …. अब यह JE, भ्रष्ट मंत्री से पीछा छुटाना चाहता है। इसकी पुष्टि इस मंत्री के जनपद से आने वाले सत्तापक्ष के एक सांसद ने भी की है। उन्होंने यहाँ तक बताया कि इस विभाग का अपने हिस्से का कमिशन भ्रष्ट मंत्री जी ने ५% बढ़ा दिया है….इस महाभ्रष्ट मंत्री ने गड्ढामुक्त सड़कों के कार्य में भी ख़ूब मलाई चाटी और कार्य भी पूरा नहीं किया… सरकार की छिछालेदर भी कराई गयी।

क्या इस भ्रष्ट मंत्री को जाँच करा के तत्काल बर्खास्त कर CM योगी अपनी भ्रष्टाचार के प्रति अपनी ‘Zero Tolerance’ की नीति का संदेश देना चाहेंगे? ज्ञात रहे कि इस भ्रष्ट मंत्री के पक्ष में एक बहुत ‘बड़े’ केंद्रीय मंत्री का संरक्षण कहीं बाधा न बन जाए? इस मंत्री द्वारा अपने पद से बर्ख़ास्तगी के डर से ट्विटर पर लिखकर PM मोदी से मिलने का समय माँगा है। इन महोदय को कोई बताए कि PM से ट्विटर पर समय नहीं माँगा जाता है, इसका एक प्रोटोकोल होता है।

यह मंत्री गुंडे भी पालता है …. मेरे घर पर दूसरा हमला हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। मेरी उक्त सूचना सत्यता पर आधारित है। यदि मंत्री जी मेरे विरुद्ध मानहानि का मुक़दमा करें, तो स्वागत है। मैं JE के नाम का ख़ुलासा और साक्ष्यों का रिकॉर्डेड वर्ज़न पेश कर दूँगा।

चर्चित आईएएस अधिकारी रहे और अब भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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आईएएस से वीआरएस लेकर भाजपा नेता बने सूर्य प्रताप सिंह ने उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को ‘झुट्ठा’ करार दिया

Surya Pratap Singh : यूपी की 63% सड़कें गड्ढामुक्त का भी सच जानना है तो ….केवल एक सड़क ही देख लो, जिसका सीधा सम्बन्ध दो VIP क्षेत्रों से है …. क्यों शर्म नहीं आती, झूठ बोलने में? लोक निर्माण विभाग के मंत्री और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के लोकसभा की सड़क जो प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र की ‘बनारस-इलाहाबाद’ लिंक मार्ग है, को ही देख लो… स्थानीय लगभग 100 से गाँवो के लिये यह लिंक रोड मुख्यमार्ग है।

यह मार्ग इलाहाबाद शहर से फाफामऊ होते हुए सहसों को जोड़ता है यहाँ सड़क के नाम पर महज गड्ढे ही दिखाई देते हैं सड़क पर बोल्डर पड़े है। इसी मार्ग के ‘चकिया’ गाँव के लोगो से पूछ कर सच्चाई पता चल जाएगी कि इस मार्ग पर आये दिन कितनी दुर्घटना होती रहती हैं? और कितने लोगो की मौत अब तक हो चुकी हैं?

पूरे प्रदेश में किसी भी जिले में जाकर देख लो …. गड्ढे मुक्ति के नाम पर खानापूरी ही हुई है ….सभी जिलों की सड़कों में अभी भी गड्ढे ही गड्ढे हैं ….यूपी की 63% सड़कें गड्ढामुक्त की बात भी सच नहीं लगती… काग़ज़ी आँकड़े हैं, सब। पीडबल्यूडी विभाग में आज भी अखिलेश के प्रिय दाग़ी अधिकारी इस सरकार को भी भा रहे हैं तो यही हश्र होगा…..क्या PWD विभाग में कमिशनखोरी रुक गयी?

प्रदेश में सड़कें गड्ढा मुक्त तो नहीं हुई परंतु इंजिनीयर्स / अफ़सर / नेताओं के घरों के गड्ढे ज़रूर भर गए होंगे ….जो भी गड्ढे भरे हैं, उनकी पोल बरसात के बाद तो खुल ही जाएगी….. बिना सोचे विचारे, बड़बोलेपन में की गयी घोषणा से सरकार को श्रेय कम….किरकिरी ज़्यादा हुई !!!

नोट : लोकतंत्र में सभी नागरिकों का फ़र्ज़ है कि नेताओं के झूँट को उजागर करें ताकि सरकारें मिथ्या आँकडे प्रस्तुत कर प्रायोजित प्रचार कर लोगों को भ्रमित न कर सकें। यह कोई नेगेटिव सोच नहीं है। लोकतंत्र में अंध भक्ति ठीक नहीं, आलोचना/समालोचना भी सच सामने लाने के लिए अतिआवश्यक है …ऐसा मेरा मानना है। ऐसा करने पर मेरे व आपके घरों पर गुंडे/माफ़िया के हमले हो सकते हैं… by the way, मेरे घर पर हमला करने वालों का अभी तक कोई सुराग़ नहीं है…

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सड़कों के ‘गड्ढे’ में खड़ी योगी सरकार…गड्ढामुक्ति अभियान गया ‘गड्ढे’ में! सीएम योगी ने माना कि ‘गड्ढामुक्ति’ अभियान धनाभाव के कारण १५ जून तक पूरा नहीं हो पाएगा….बिना पूर्व प्लानिंग के अति उत्साह में वादे व संकल्प करने का हश्र यही होता है….. प्रदेश की सड़कों में से २०-२५ % सड़कें ऐसी है, जो इतनी जीर्णछिर्ण है कि उनको गड्ढामुक्त नहीं अपितु पुनर्निर्माण ही कराना पड़ेगा…पहले सभी सड़कों की मौक़े पर स्थिति का पूर्व सर्वेक्षण होना चाहिए और प्लान कर धन की व्यवस्था की जाती और फिर घोषणा होती तो ऐसी ‘वादे/घोषणा’ के झूँट के कलंक से बचा जा सकता था। यह सरकार के सलाहकारों व सरकार की अनुभवहीनता दर्शाता है।

प्रदेश को गड्ढा मुक्त करने के लिए कुल रु. ४,५०० करोड़ की आवश्यकता थी और आवश्यकता का १/३ भाग ही अर्थात रु.१,५०० करोड़ ही उपलब्ध हो पाया…. पूर्वांचल व बुंदेलखंड की सड़कों का तो बुरा हाल है ही, प्रदेश के अन्य भागों में भी कमोवेश यही स्थिति है। आधी अधूरी या बिना तैयारी के घोषणा करने से सरकार की किरकिरी होती है और इक़बाल भी कम होता है…. वैसे CM योगी से अधिक पीडबल्यूडी मंत्री की ज़्यादा किरकिरी हुई है। यह टीमवर्क का अभाव भी दर्शाता है…. नौकरशाहों व इंजिनीयर्स की भी नाकामी है। वित्त विभाग व मुख्यसचिव को तो धनाभाव की स्थिति पूर्व ज्ञान होगा ही और इस अभियान की समय-२ पर समीक्षा भी कर रहे होंगे, उन्हें सीएम योगी को अवगत कराके समयसीमा बढ़वानी चाहिए थी ….क्या यह CM योगी को असफल कराने साज़िश तो नहीं…..अनियंत्रित क़ानून व्यवस्था पर टीका टिप्पणी हो ही रही है, अब विकास के वादों को भी झूँठा सिद्ध करने की कवायत है….. किसानों का क़र्ज़ माफ़ी भी अभी तक पूर्णतः हवा हवाई ही है ….यदि योगी जी कड़क हैं, सरकार ढीलीढाली क्यों…. क्यों नौकरशाही नियंत्रण में नहीं आ रही….क्यों योगी जी के मंत्रिमंडल में टीमवर्क का अभाव लगता है ….क्यों पुलिस बात नहीं सुन रही…क्यों यथोचित परिणाम निर्धारित समय सीमा में नहीं आ रही ..,.क्यों भ्रष्टाचार के मामलों में जाँच नहीं की जा रही ? क्या सरकार रिमोट कंट्रोल से चल रही है ? CM योगी की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं, फिर भी परिणाम क्यों नहीं आ पा रहे?

मैंने वाराणसी जनपद के अपने भ्रमण के बाद २० अप्रेल की अपनी पोस्ट में अपने अनुभव के आधार लिख दिया था कि…..योगी सरकार द्वारा दी गयी ‘डेडलाइन’ १५ जून तक गड्ढा-मुक्त हो नहीं पाएंगी वाराणसी/काशी की सड़कें, यही हाल मैंने बरेली,बदायूँ और संभल जनपदों के भ्रमण के मैंने देखा था ….मेरा दावा तथ्यों पर आधारित था…..योगी सरकार में एक तो टीमवर्क व अनुभव का अभाव है और ऊपर से भ्रष्ट अधिकारियों/इंजीनियर्स की सरकार के प्रति आधी-अधूरी प्रतिबद्धताएँ है, तो ऐसी किरकिरी आज नहीं कल भी देखने को मिलेगी…… क्या सरकार के सलाहकार दिल्ली से सरकार चला रहे हैं या लखनऊ में कहीं बैठे हैं ?…..सब कुछ ठीक नहीं चल रहा, कुछ तो गड़बड़ है।

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से. ज्ञात हो कि सूर्य प्रताप ने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भाजपा ज्वाइन कर भाजपा नेता के रूप में सक्रिय कार्य किया और इन दिनों भाजपा सरकारों के चाल चलन की बेबाक समीक्षा के लिए चर्चित हैं.

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योगी राज को आइना दिखाने वाले पूर्व आईएएस और भाजपा नेता सूर्य प्रताप सिंह के घर पर भगवाधारी गुंडों का हमला!

Surya Pratap Singh : मुझे मार के क्या मिलेगा, किसी को! कल रात मेरे घर पर हथियारधारी गुंडों ने दो बार धावा बोला… शराब के नशे में धुत्त भगवा गमछाधारी, राइफ़ल व बंदूक़ों के साथ, अराजक तत्वों ने रात १०.३० बजे और फिर रात १.३० बजे हमला करने की कोशिश की। पुलिस के उच्च अधिकारियों ने भी फ़ोन नहीं उठाये। पूर्व सरकार में ये होता तो मुझे दुःख नहीं होता। वर्तमान सरकार को बनवाने में कहीं न कहीं हम सब का भी role है। दुःख इस बात का है कि योगी सरकार में भी मेरे जैसे पूर्व आईएएस अधिकारी के साथ यह सब हो रहा है।

२९ मई को एक माफ़िया, गौरव उपाध्याय, पूर्व विधायक (शिव सेना) व हिंदू युवा महासभा के स्वमभु अध्यक्ष की ‘बाहुबली’ लिखी गाड़ियों के मैंने फ़ोटो लिए थे। उनके गुर्गों ने मेरी गाड़ी रोक कर फ़ोटो खिंचने पर आपत्ति की थी और आक्रोश जताया था। क्या इन लोगों का हाथ है ? या फिर जिन भ्रष्ट अधिकारियों/ नेताओं/इंजिनीयर्स/माफ़िया के घोटाले, मैंने उठाए हैं,उनका हाथ है? ये तो पुलिस जाँच से ही पता चलेगा। मैंने FIR दर्ज करा दी है।

क्या सच का साथ देना …..भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाना कोई अपराध है ? क्या जिस की लाठी उसकी भैंस वाली बात ही चलेगी उ.प्र. में, चाहे कोई भी सरकार आ जाए ?
ठीक है, यदि मुझे मार के भृष्टाचारियों का काम चल जाता है, तो मार लो ! मेरे बच्चे/परिवार को ऊपर वाला देख लेगा।

भाजपा नेता और पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

नीचे सूर्य प्रताप सिंह की वो पोस्ट्स हैं जिनके जरिए उन्होंने योगी राज को आइना दिखाने की कोशिश की…

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यूपी के दाग़ी मुख्य सचिव राहुल भटनागर को क्यों दिया गया बदनामी भरा ‘शुगर डैडी’ का Title, आइए जानें

Surya Pratap Singh : उ.प्र. में क्या निजी चीनी मिलों के ‘एजेंट’ हैं ‘शुगर डैडी’….. कब योगी जी की ‘वक्र’ दृष्टि पड़ेगी इन महाशय पर?  दाग़ी मुख्य सचिव, राहुल भटनागर को क्यों दिया गया बदनामी भरा ‘शुगर डैडी’ का Title….क्या लम्बे समय से वित्त के साथ-२ गन्ना विभाग के प्रमुख सचिव की कुर्सी पर विराजमान रहे ‘शुगर डैडी’ सशक्त शुगर लॉबी का लाड़ला है….. हो भी क्यों न…इन्होंने गन्ना किसानों को रु. 2,016 करोड़ का जो चूना लगाकर चीनी मिलों को सीधा लाभ जो पहुँचाया है….किसानों को देय गन्ना मूल्य पर रु. 2,016 का ब्याज एक झटके में माफ़ कर दिया….. चीनी मिलों पर इस रहमत के लिए कितना माल ‘शुगर डैडी’ की जेब में गया और कितना अखिलेश यादव की, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन इसे समझना काफ़ी आसान है। हाईकोर्ट ने ‘शुगर डैडी’ को न केवल कोर्ट में तलब कर फटकार लगाई अपितु ‘किसान विरोधी’ होने का तमग़ा देकर तीखी टिप्पणी भी की……

उच्च न्यायालय ने सरकार के इस ‘किसान विरोधी’ निर्णय पर रोक लगाने के साथ ही चार माह में मामले को निस्तारित करने के निर्देश भी दिए थे, लेकिन शुगर डैडी इसे दबा कर बैठ गए। दो माह बीत जाने के बावजूद ‘शुगर डैडी’ ने CM योगी को अंधेरे में रखकर इस फ़ाइल को दबा दिया…CM योगी किस दबाव में ये सब बर्दाश्त कर रहे है , समझ से परे है। वैसे चीनी मिलों के करोड़पति मालिकान सभी सत्ताधिशों के नज़दीक हो ही जाते हैं। शराब व पंजीरी माफ़िया पॉंटी चड्ढा ग्रूप भी ‘शुगर डैडी’ के बड़ा नज़दीक बताया जाता है।

शुगर डैडी के नाम से कुख्यात मुख्य सचिव के कई अन्य कारनामों से जहां गन्ना किसानों में जबरदस्त रोष है…ठगा महसूस कर रहे हैं गन्ना किसान..इन्होंने पेराई सत्र 2012-13 और 2013-14 का 1306 करोड़ रुपए और फिर अक्टूबर 2016 में 2014-15 का 710 करोड़ रुपए का मिलों द्वारा किसानों को देय ब्याज माफ कर किसानों का ख़ूब ख़ून चूसा… मुख्य सचिव पद के इतिहास में यह पहला मौक़ा है जब कोई मुख्य सचिव अपने पद के साथ-२ प्रमुख सचिव, गन्ना विभाग का पद भी हथियाए हुए है….क्या लालच है कि राहुल भटनागर, प्रमुख सचिव गन्ना विभाग का पद नहीं छोड़ पा रहे हैं……. न अपनी और न सरकार की बदनामी की महोदय को कोई चिंता नहीं है।

कोई IAS/IPS अधिकारी जब न्याय की कुर्सी पर बैठता है तो उसकी कोई जाति या धर्म नहीं होनी चाहिए, उन्हें यही ट्रेनिंग दी जाती है लेकिन आज लोग ख़ूब चटकारे लेकर बात कर रहे है कि मुख्य सचिव, राहुल भटनागर , CM योगी जी की आँख में भी धूल झोंक कर हाल में हुए IAS/IPS अधिकारियों के ट्रान्स्फ़र में मलाईदार पदों पर अपने कई ‘स्वजातीय’ अधिकारियों को तैनात कराने में सफल रहे …. यदि सही है, तो शर्मनाक है एक उच्च IAS अधिकारी का इस प्रकार का जातिवाद…. क्या फ़र्क़ रह गया अखिलेश यादव/मुलायम व एक IAS में…

आज प्रदेश में अस्पतालों का बुरा हाल है..शिक्षा व्यवस्था चौपट है… गन्ना किसान ही क्या सभी किसान/मज़दूर परेशान हैं…. भर्तियाँ बंद हैं… बेरोज़गारी मुँहबायें खड़ी है…. सड़के टूटी हैं….भ्रष्टाचार का बोलबाला है ….क़ानून व्यवस्था का बुरा हाल है.. एक मुख्य सचिव इस सबके के लिए सीधे जिम्मेदार होता है…. प्रदेश में ढीला ढाला प्रशासन भी ‘शुगर डैडी’ की हो देन है….अखिलेश सरकार के नॉएडा/इक्स्प्रेस्वे/एलडीए/जीडीए में मचे भ्रष्टाचार व भ्रष्ट अधिकारियों को भी बचाए है, शुगर डैडी… भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह को भी इन्हि के नेतृत्व में बचाया था।

प्रमुख सचिव, ग्रह के जाने के बाद अब अखिलेश की लम्बी ‘नाक के बाल’ व अपने से कई वरिष्ठ IAS अधिकारियों को धक्का मार कुर्सी पर बैठे ‘कम्बल ओढ़कर घी पीने वाले’ दाग़ी मुख्य सचिव, राहुल भटनागर उर्फ़ ‘शुगर डैडी’ के जाने का इंतज़ार है , उत्तर प्रदेश के जनमानस को …..एक ईमानदार, कर्मशील मुख्यसचिव चाहिए इस प्रदेश को जो भाजपा के ‘सबका साथ-सबका विकास’ के agenda को गति प्रदान कर सके …..

क्या मैंने ग़लत कहा, मित्रों? सुना है कि ‘शुगर डैडी’ को शुगर लॉबी के साथ-२,LDA में कार्यरत बड़े बिल्डर व भाजपा के एक स्वजातीय बड़े नेता, ओम् ..ॐ का भी संरक्षण भी है….कैसे अपनी धुन के पक्के योगी जी पार पाएँगे उत्तर प्रदेश के ऐसे नौकरशाहों से, देखना रुचिक़र होगा !!!

यूपी कैडर के सीनियर आईएएस रहे और फिलवक्त भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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योगी सरकार में चोर उच्चके, जुगाड़ू और ढीलेढाले अफसरों की बल्लेबल्ले!

Surya Pratap Singh : योगी सरकार में एक तो इतने विलम्ब से, २ माह बाद प्रमुख सचिव स्तर के ट्रान्स्फ़र हुए, लेकिन सब ढाक-के-तीनपात …. सब गुड़गोबार …..चोर उच्चके, जुगाड़ू, ढीलेढाले लोग़ों की बल्लेबल्ले….! सरकार ने किए अनेक IAS के ‘उल्ज़लुल’ ट्रान्स्फ़र…. पता नहीं कौन ‘कटियाज्ञानी’ ऐसा परामर्श दे रहा है इस सरकार को कि संवेदनशील पदों पर ईमानदार कर्मशील अधिकारी पोस्ट नहीं कर पा रही। सम्भवतः कोई चांडाल-चौकड़ी योगी सरकार की ‘अनुभवहीनता’ का नाजायज़ फ़ायदा उठाकर इसे फ़ेल कराने की शाज़िश रच रही है!

योगी सरकार अति त्वरित गति से काम करना चाहती है, लेकिन सरकार काम वाले विभागों में अच्छे ट्रैक रिकोर्ड वाले कर्मशील ईमानदार अधिकारी नहीं तैनात कर पा रही है …. जुगाड़बाज़ी का जलवा आज भी क़ायम है। पता नहीं कौन ‘ग़लत-सलत’ परामर्श देकर व्यवस्था को सुधारने नहीं दे रहा …. इस सरकार का तो अब भगवान ही मालिक है। चोर उच्चके लोग अभी भी PWD जैसे विभाग में बने रहेंगे, शायद वहाँ के मंत्री जी को ऐसे ही लोग ज़्यादा सूट करते हों… गृह (Home) जैसे संवेदनशील विभाग में aggressive approach वाले गतिशील अधिकारी की आवश्यकता थी, जो तेज़ी से गिरती क़ानून व्यवस्था को संभाल सके…पता नहीं क्यों गृह विभाग को ऐसा अधिकारी नहीं मिल पाया।

लोग कह रहे हैं कि जो अधिकारी चिकित्सा विभाग में कुछ नहीं कर पाया और जिसपर पूर्व मंत्री-पुत्र के साथ संलिप्तता के दाग़ भी लगे थे, वह भला गृह विभाग कैसे संभाल पाएगा…मेरी समझ से भी बाहर है। मुख्य सचिव के पास से गन्ना विभाग क्यों नहीं हटाया गया ? शायद ‘शुगर डैडी’ इस पद को स्वमँ छोड़ना नहीं चाहते। वैसे भी अब नये मुख्य सचिव को लाने की तैयारी होनी चाहिए, ताकि ढीलेढाले प्रशासन को गतिशील बनाया जा सके….CAG ने वर्तमान मुख्य सचिव के प्रमुख सचिव, वित्त विभाग के कार्यकाल में ख़राब/ढुलमुल वित्तीय प्रबंध पर बड़ी ही adverse टिप्पणी की है।

आवास विभाग में भी एक सफल ट्रेक रिकोर्ड के ईमानदार कर्मशील व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो विकास प्राधिकरणों के भ्रष्टाचार पर चाबुक चला सके …. अफ़सोस कि यह नहीं हो पाया। जिस प्रमुख सचिव को एक विभाग में असफलता भ्रष्टाचार के कारण हटाया गया हो, तो उसे शिक्षा या PWD जैसे महत्वपूर्ण विभाग में पुनः क्यों तैनात किया गया/ बना रहने दिया गया ? समझ से बाहर है।

ऐसा लगता है कि अपनी धुन के पक्के योगी जी को काम करने का फ़्री हैंड नहीं मिल रहा है या फिर किन्हीं चाटुकार ‘स्वार्थी’ तत्वों की चांडाल चौकड़ी योगी जी पर हावी हो गयी है…यह तो इन स्थानंतरणों से तय दिखता है।

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ऐ मेरी सरकार! शौक-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर और संभाल ले अपने गिरते इक़बाल को! मथुरा की दिन दहाड़े हुई लूट व हत्या की घटना ने उ.प्र. सरकार को हिला कर रख दिया है…सरकार को जवाब देते नहीं बन रहा ! प्रदेश में बदमाशों के होशले बुलंद हैं…व्यापारी वर्ग उद्वेलित है….प्रदेश की पुलिस/प्रशासनिक व्यवस्था चौपट नज़र आ रही है !! बनारस, गोरखपुर व मथुरा में व्यापारियों की लूट व हत्याओं से प्रदेश के व्यापारियों में दहशत का माहौल व्याप्त हो गया है। ताबड़तोड़ हत्याएँ, बलात्कार, लूट की घटनाओं ने योगी सरकार को परेशान कर दिया है। आज दो माह के बाद अखिलेश के क़रीबी प्रमुख सचिव (ग्रह), देवाशीष पंडा को बमुश्किल हटा पाए…..पूर्व सरकार के प्रिय दाग़ी उच्च अधिकारियों/ प्रमुख सचिवों ने CM योगी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं… आवास व पीडबल्यूडी के प्रमुख सचिव के पद पर सीबीआई की जाँच में फँसे एक दाग़ी आईएएस को रखना पता नहीं क्या मजबूरी बनी है ….चीनी मिल मालिकों को करोड़ों रु. का लाभ देने के कारण ‘शुगर डैडी’ के नाम से मशहूर मुख्य सचिव सहित बिजली, माध्यमिक शिक्षा, ट्रान्स्पोर्ट, चिकित्सा, परिवहन सभी विभागों में पूर्व सरकार के दाग़ी उच्च अधिकारी पंजे गढ़ाए बैठे हैं, सबने अपने-२ आकाओँ को भाजपा/आरएसएस में पकड़ लिया हैं। इस सब दागियों को समय रहते नहीं हटाया गया तो क़ानून व्यवस्था जैसा ही ख़ामियाज़ा इन विभागों के कार्यों मे भी भुगतना पड़ेगा। योगी जी शायद अब तक जान गए होंगे कि पिछले १० वर्षों में उत्तर प्रदेश की नौकरशाही highly politicised हो चुकी है। इन जुगाड़ू, भ्रष्ट नौकरशाहों को तत्काल हटाएँ, देर होने पर सरकार के तेज़ी से गिरते इक़बाल को बचाना मुश्किल हो जाएगा….सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया? लगता है कि या तो योगी जी को कार्य करने का फ़्री हैंड नहीं दिया जा रहा या फिर जो सलाह दी जा रही है वह अपरिपक्व / फूहड़ / समझ से परे है …प्रशासनिक अनुभव की कमी राजनीतिक सत्ताधीशों के कार्य में आड़े आ रही है….. १५ दिन के हनीमून ख़त्म होते ही, सरकार में बदहवासी की स्थिति लगती है। मंत्रीगणों को नौकरशाह टहला रहे हैं और चाटुकारिता चरम पर है…. मंत्रीगणों के भ्रष्टाचार की ख़बरें भी आने लगी हैं। इसी माह की १२ तारीख़ में मैंने एक उप मुख्यमंत्री को रु. २ करोड़ से अधिक क़ीमत की Jaguar (F-Type) कार में कानपुर जाते देखा था …. उसपर A/F लिखा था….मैं तो यह देख कर हिल गया था…. यह अच्छा संकेत नहीं है।  CM योगी के सत्ता के १५ दिन तक तो अपराधियों में सन्नाटा रहा था… फिर बड़ी तेज़ी से अपराधियों व नौकरशाहों के मन का डर निकाल गया …. याद हो कि योगी जी ने कहा था कि ‘अपराधी या तो प्रदेश छोड़ दें या फिर जेल की सलाखों के पीछे जाने को तैयार हो जायें’…. लेकिन ऐसा हुआ नहीं… अपराधियों का जेल की सलाखों के पीछे जाना तो दूर, ऐसे अपराधियों को अभी तक चिन्हित भी नहीं किया जा सका है…. कोई भी अपराधी या भूमाफ़िया रासुका/गेंगेस्टर ऐक्ट में जेल नहीं गया… सरकार के ‘कथनी व करनी’ के अंतर ने अपराधियों के मन से डर निकाल दिया और उन्होंने दिन दहाड़े मथुरा जैसा कांड कर दिया ….हद तो तब हो गयी, जब आज एक IAS अधिकारी का शव लखनऊ के वीआईपी गेस्ट हाउस के पास पड़ा मिला.. ऐ मेरी सरकार ! शौक-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर और संभाल ले गिरते इक़बाल को ….

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क्या योगी राज में कानून व्यवस्था बेपटरी हुई? मात्र दो माह में ही आशा व निराशा के बीच हिचकोले खाता जनमानस ….! बेख़ौफ़ हुए बदमाश !! कल मथुरा में दिन दहाड़े २० नक़ाबपॉशों के सवर्ण २ व्यवसायियों की हत्या व ४ करोड़ की लूट को अंजाम दिया…. गत माह PM मोदी के बनारस में १० करोड़ की डकैती.. मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के गोरखपुर में एक सर्राफा व्यापारी को दिनदहाड़े जिन्दा जला दिया गया… रेल मंत्री मनोज सिन्हा के गाजीपुर में वीआईपी ट्रेन राजधानी एक्सप्रेस लूट ली गई…. दिनदहाड़े आगरा में एसओजी के सिपाही की हत्या …प्रतापगढ़ में एक सिपाही की हत्या….फिरोजाबाद में खनन माफिया द्वारा एक सिपाही की हत्या… क्या मुख्य मंत्री की नीयत और क्षमता की अग्नि परीक्षा ले रही है बेपटरी होती कानून व्यवस्था और बेलगाम, बेख़ौफ़ अपराधी ? क्या उम्मीद की जानी चाहिए कि धुन के पक्के योगी आदित्य नाथ इस अग्निपरीक्षा में खुद को खरा साबित कर पाएँगे? पुलिस की इस सरकार के प्रति तो प्रतिबद्धतायों पर तो पहले ही प्रश्न चिन्ह था ही, कहीं योगी जी को भ्रमित कर प्रदेश के उच्च नौकरशाहों ने पूर्व सरकारों के कई वफ़ादार दाग़ी छवि वाले आयुक्त/डीएम/SSP तो तैनात नहीं करा लिए ? लोग बता रहे हैं कि सत्ताधीश राजनीतिज्ञों की प्रशासनिक अनुभवहीनता का लाभ उठाकर ‘दो’ बड़े नौकरशाहों ने अपनी पसंद के जनपदों में पुलिस व प्रशासनिक तैनात करा लिए….. मंत्री/विधायकों की एक न चली..पूर्व सरकार के वफ़ादार उच्च नौकरशाह आज भी चाटुकारिता के बल पर टिके हैं…कहीं ये सब योगी सरकार को बट्टा तो नहीं लगा रहे? उत्तर प्रदेश के पिछले कई चुनावों में मूल भूत समस्यायें -बेरोज़गारी,ग़रीबी,किसान/मज़दूरों की बदहाली,ख़स्ता हाल उद्योग आदि हाशिये पर होती हैं नकारात्मक प्रचार फलक पर होता है। कभी सूबे को गुंडा राज से मुक्त कराने का भरोसा देकर सपा को बेदखल कर बसपा सत्ता पर काबिज होती है तो कभी गुंडाराज से मुक्ति के मुद्दे पर ही बसपा को अवाम बाहर का रास्ता दिखाते हुए सपा को सूबे की कमान सौंपती देती है। 2017 में भी इतिहास ने खुद को दोहराया, भाजपा का फोकस सूबे में सपा के कथित गुंडा राज पर था। प्रधानमंत्री से लेकर छुटभैय्ये नेता तक सूबे में राम राज लाने का राग अलापते रहे। अखिलेश सरकार के कामों की हार हुई और भाजपा को बड़े अरमानों से सत्ता सौंप दी…… और मात्र २ माह में ही जनमानस आशा व निराशा के बीच झूलने को मजबूर है….

यूपी कैडर के सीनियर आईएएस रहे और अब भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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योगी आदित्यनाथ फेल होते जा रहे हैं!

Surya Pratap Singh : CM योगी में तो है दम …पर अपराध क्यों नहीं हुए कम ……कहीं सीएम योगी को फ़ेल कराने की साज़िश तो नहीं!! कहीं अखिलेश की तरह फेल तो नहीं हो रहे सीएम योगी, अपराध पर मायावती की तरह डंका क्यों नहीं बजा पा रहे….!! गत अप्रैल माह में प्रति दिन 13 बलात्कार, 14 हत्याएँ, 15 लूट व 1 डकैती ने अखिलेश सरकार के भी रिकोर्ड भी तोड़ दिये हैं…… देखें आंकड़े…

पूर्व सीएम अखिलेश यादव की तरह सीएम योगी आदित्यनाथ भी फेल होते जा रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो यूपी सरकार को तगड़ा झटका लग सकता है। सीएम योगी ने 100 दिन पूरा होने पर सरकार का रिपोर्ट कार्ड जारी करने की बात कही है, लेकिन वर्तमान में जो स्थिति है, उससे सीएम योगी की परेशानी बढ़ सकती है।

यूपी में ताबड़तोड़ अपराध हो रहे हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी ने क्राइम को लेकर सपा सरकार पर जम कर हमला बोला था और जब यूपी में बीजेपी की सरकार बन गयी है तो भी अपराध नियंत्रण करने में पुलिस फेल साबित हो रही है।

अपराधियों पर सरकार का खौफ नहीं दिख रहा है। रेप, हत्या, लूट, डकैती आदि की वारदाते थमने का नाम नहीं ले रही है। यूपी में जब बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला था तो जनता के एक बड़े वर्ग को लगा था कि अब प्रदेश में शांति आ जायेगी। क्राइम कंट्रोल नहीं होने से लोगों का यह विश्वास अब टूटता जा रहा है।

यूपी में वर्ष 2007 से 2012 तक बसपा की सरकार थी और तत्कालीन सीएम मायावती के खौफ का असर यह था कि पुलिस अपराधियों पर क़हर बनकर टूट पड़ती थी। बड़े बदमाशों को काउंटर में मार गिराया जाता था और काफी अपराधियों को जेल भेजा था, जिसके बाद कुछ समय के लिए अपराध पर नियंत्रण हुआ था।

आखिरकार क्यों नहीं हो रहा क्राइम कंट्रोल ?

पुलिस की अक्षमता/राजनीतिकरण व पूर्व सरकारों के प्रिय उच्च अधिकारियों पर निर्भरता/अधूरी प्रतिबद्धत्ता : सपा सरकार पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगता था लेकिन अफ़सोस कि अब बीजेपी की सरकार बन गयी है फिर भी अपराध नियंत्रण क्यों नहीं हो रहा है। इसका बड़ा कारण पुलिस की अक्षमता व राजनैतिकरण तो है ही,साथ ही शासन स्तर पर पूर्व दो सरकारों के प्रिय जुगाड़ू भ्रष्ट निकम्मे अधिकारियों का यथावत बने रहना भी है….इन अधिकारियों की जनमानस में ख़राब छवि है और इनकी वर्तमान सरकार के प्रति आधी अधूरी प्रतिबद्धताएँ भी मुख्य कारण है। ४५० IAS/IPS के इतने बड़े केडर में से २०-२५ मुख्य संवेदनशील पदों के लिए ये सरकार कर्मशील निष्ठावान अधिकारी तैनात नहीं कर पा रही है।

तेज़ तर्रार पुलिस अधिकारी साइड लाइन हैं: पुलिस का सूचना तंत्र कमजोर हो चुका है। अमिताभ ठाकुर जैसे तेज तर्रार पुलिस वालों को साइड लाइन कर दिया गया है। सेटिंग वालों को जिलों/थानों की कमान सौंपी गयी है, जिसका असर व्यवस्था पर पड़ रहा है। खुलासे की बात तो दूर है जेल से छूटे बदमाश की सही लोकेशन तक पुलिस के पास नहीं है इसलिए भी अपराध नियंत्रित नहीं हो रहा है….

पुलिस का गिरता मनोबल :

मायावती काल में पुलिस अपराधियों पर टूट पड़ती थी, वह क्षमता/साहस पुलिस में नहीं दिखायी नहीं दे रहा। सहारनपुर व गोरखपुर में भाजपा सांसद/विधायक द्वारा उच्च पुलिस अधिकारियों के साथ की गयी अभद्रता व कार्य में हस्तक्षेप और उनपर कोई क़ानूनी कार्यवाही न करने देना जैसी घटनाओं ने पुलिस का मनोबल तोड़ा है।

अमनमणि फ़ैक्टर :

अपराध और अपराध‌ियों से दूरी बनाए रखने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आद‌ित्यनाथ से इतनी भारी भूल होगी, इसका अंदाजा भी न था….बाहुबली अमर मणि का बेटा अपनी पत्नी का हत्यारा अमनमणि को मंच पर बुलाना, गुलदस्ता लेना, पैर छूने पर आशीर्वाद देना जनमानस को नागवार गुज़रा…..इसके पहले सीएम योगी आदित्यनाथ जब पहली बार 25 मार्च को गोरखपुर आए थे तो अमन मणि और उनके पिता बाहुबली पूर्व मंत्री अमर मणि त्रिपाठी के नाम के पोस्टर गोरखपुर की हर सड़कों पर योगी के स्वागत में लगे थे। इस प्रकार के प्रकरण अपराधियों को सरकार में संरक्षण देने व कथनी-करनी में अंतर को दर्शाता है और पुलिस/प्रशासन में ग़लत संदेश प्रेषित करता है।

मंत्रियों की अनुभवहीनता व सुर्ख़ियो में बने रहने की लालसा :

खुर्रांट अनुभवी अधिकारियों द्वारा काम न करके मंत्रियों को मूर्ख बनाया जा रहा है। चमचागिरी का बोलबाला है। असली सघन समीक्षा न कर, टीवी पर आने के लिए बेवजह दिखावे के लिए छापेमारी की जा रही है…. इस तरह की छापेमारी से कोई सुधार भी नहीं हो रहा है। ज़्यादातर मंत्री busy without real business भागदौड़ कर रहे हैं।

प्राइम पोस्टिंग वाले विभागों में अखिलेश/मायावती के वफ़ादार अधिकारियों जमे बैठे हैं। सबसे आश्चर्य जनक बात तो यह कि हाल में पोस्ट हुए IAS/IPS में अखिलेश के प्रिय “दो” शीर्ष पर बैठे उच्च अधिकारियों की ही चली…. कई जाति आधारित पोस्टिंग भी हुईं। मंत्रियों/विधायकों व यहाँ तक मुख्यमंत्री तक को अंधेरे में रखकर कई अखिलेश व मायावती के प्रिय अधिकारी कमिशनर/डीएम/पुलिस अधीक्षक तक बना दिए गए। यहाँ तक कि कई शराब माफ़िया पॉंटी चड्ढा के प्रिय IAS भी अच्छी पोस्टिंग पा गए। कहीं सीएम योगी को फ़ेल कराने की साज़िश तो नहीं हो रही!

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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बसपा की तेज़ी से घटती हैसियत से उपजी ‘असुरक्षा’ ने एक अति-अक्रोशित दबंग दलित संगठन को जन्म दे दिया

Surya Pratap Singh : आज के उत्तर प्रदेश में ‘सुगबुगाहट’ से ‘सुलगाहट’ तक की नयी दास्ताँ….पश्चिमी उ.प्र. में जातीय संघर्ष से उपजा दलित ‘उग्रवाद’ …65,000 युवाओं की हथियार धारी अति-उग्र, उपद्रवी ‘भीम-सेना’ का जन्म ……’भीम आर्मी भारत एकता मिशन (BABA Mission)!!! मुज़फ़्फ़रनगर दंग़ो के बाद से धार्मिक उन्माद व जातीय हिंसा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है ….इसमें वोटों की राजनीति हमेशा आग में घी का काम करती रही है…

आज सहारनपुर, जातीय (ठाकुर-दलित) हिंसा से जल रहा है … उन्मादी ‘भीम सेना’ के सैनिक पुलिस को दौड़ा-२ कर पीट रहे है.. ठाकुर जाति भी संगठित हो भीम सेना के उपद्रव का विरोध कर रही है ….. ‘भीम सेना’ द्वारा एक ठाकुर युवा की हत्या व ‘महाराणा प्रताप भवन’ पर हमले/तोड़फोड़ से ठाकुरों में बदले की भावना उद्वेलित हो रही है। दलितों की अति-उग्र ‘भीम सेना’ बसपा समर्थित व ‘असंगठित’ ठाकुर वर्ग अधिकांश भाजपा समर्थित है…..अतः इस जातीय हिंसा में कहीं-न-कहीं राजनीति तो है…

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूर्व सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति ने हिंदूवर्ग में आक्रोश व असुरक्षा का भाव पैदा हुआ और यही मुज़फ़्फ़रनगर दंग़ो का कारण भी बना ………और पिछले कुछ वर्षों से पश्चिमी उ.प्र. में बसपा की तेज़ी से घटती हैसियत से उपजीं ‘असुरक्षा’ ने एक अति-अक्रोशित दबंग दलित संगठन को जन्म दे दिया, जिसका नाम है ‘भीम सेना’….. दलित बाहुल्य गाँवों में इस संगठन ने गहरी पैंठ बनायी है ….65,000 दलित उग्र-युवा इस सेना में भर्ती हैं ….हथियार/डंडों/बर्छों से लेस…इस सेना की बढ़ती शक्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके सैनिकों ने हाल के सहारनपुर जातीय संघर्ष में पुलिस को दौड़ा-२ कर पीटा है….. दलित बाहुल्य गाँवों में पुलिस का घुसना मुश्किल हो गया है…..

भाजपा संसाद राघव लखनपाल ने आंबेडकर शोभा यात्रा को लीड किया जिसपर 20अप्रैल को सड़क दुधली गांव में बवाल हुआ और फिर SSP बंगले पर तोड़फोड़ हुई। तब दलित-मुस्लिम संघर्ष बनकर सामने आया था। आज महाराणा प्रताप जयंती के विरोध में ठाकुर-दलित संघर्ष सामने है। शायद राजनीतिक मनसा तो हिंदू-मुस्लिम कराने की थी परंतु दाँव उलटा पड़ा और हो गया ठाकुर-दलित संघर्ष …. अब स्थानीय ‘राजनीतिज्ञों’ को तो निगलते बन रहा है और न उगलते…..

वैसे भी राजनीतिक उद्देश्य का चोला ओढ़े जातीय व धार्मिक सेनाओं/वाहिनियों/स्वंभु रक्षक़ों का युग चल रहा है… पुलिस/प्रशासन के लिए एक अलग चुनौती बन गयी हैं ये सब …. जातीय संघर्ष हिंदू धर्म के लिए भी चुनौती बन गया है…कैसे सभी जातियों को सद्भाव बना हिंदू धर्म एक छतरी के नीचे रहे,यह बड़ी चुनौती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल 6.3 करोड़ की आबादी में 73.47% हिंदू व 24.98% मुस्लिम हैं। वर्तमान जातीय संघर्ष के क्रम में 40 लाख राजपूत 1 करोड़ जाट व 12 लाख दलित जनसंख्या है। जाट व राजपूतों दोनों का ही दलितों से वैमनस्य रहता है। इस क्षेत्र में जाट-दलित संघर्ष की कहानी बहुत पुरानी है….पूरे देश में सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण का भी पुराना इतिहास तो है ही। यह बात अलग है कि ‘आरक्षण’ नामक तथाकथित व्याधि ने इस शोषण की आर्थिक दिशा ही बदल दी है……

मायावती काल में ‘SC/ST Act’ के अंतर्गत बड़े पैमाने पर जाट/ठाकुर/यादवों/पंडितों पर मुक़दमे दर्ज हुए और सवर्ण युवा/वृद्ध ज़ैल गए …. महिलाओं तक भी गिरफ़्तार हुईं, यह सब भी सवर्ण-दलित द्वेष का कारण बना।

ज्ञात हो कि नक्सली हिंसा भी ग़रीबी से उपजीं अंतरजातिय/जनजातीय संघर्ष से ही आरम्भ हुआ था , जो आज एक अपने तरह का आतंकवाद बन चुका है। डर है कि कहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी वर्तमान जातीय संघर्ष नव-आतंकवाद यानी ‘जातीय आतंकवाद’ को जन्म न दे दे ….. पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्या बढ़ते ‘धार्मिक-उन्माद’ व ‘जातीय-हिंसा’ से ‘उपद्रवी क्षेत्र’ तो नहीं बनता जा रहा है ? संभालो…. जल्दी करो, कही देर न हो जाए !!!

जय हिंद-जय भारत!

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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नेताजी के बेटे-बहू का कान्हा-उपवन यानि एक सरकारी मान्यता प्राप्त सरकारी भूमि पर मुलायम परिवार का प्रत्यक्ष क़ब्ज़ा!

Surya Pratap Singh : मुलायम के बेटे-बहू का कान्हा-उपवन : देखिए कैसे हथियाई गयी बेशक़ीमती 54 एकड़ सरकारी ज़मीन! मुलायम की छोटी बहू के बुलावे पर कान्हा उपवन गौशाला देखने गए CM योगी….उन्हें ये नहीं बताया गया कि ये नगर निगम की ज़मीन पर सपा सरकार द्वारा कराया गया क़ब्ज़ा है… मुलायम के बेटे-बहू का नगर निगम लखनऊ की 54 एकड़ हथिया ली गयी है। यह भूमि नगर निगम का स्वामित्व है परंतु क़ब्ज़ा मुलायम के बेटे व बहू का है।

नगर निगम ने इस ‘Animal Shelter’ का निर्माण लावारिस पशुओँ को रखने के किए किया गया था। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने 7 अगस्त, 2010 को इसका उद्घाटन किया था। अखिलेश सरकार ने बिना किसी विज्ञापन निकले यह Animal shelter मुलायम के बेटे-बहू के ‘जीव अश्रालय’ नामक NGO को 54 एकड़ ज़मीन व बिल्डिंग long-term lease पर आज़म ख़ान के निर्देश पर नगर विकास विभाग द्वारा दे दी गयी। इस ज़मीन पर खेतीबाड़ी होती है व animal food बनाने का प्लांट लगा है। शानदार बिल्डिंग बनी हैं। एक अस्पताल है।

कुछ लावारिस पशु भी रखे जाते हैं परंतु यह कोई गोशाला नहीं है। जिस दिन मुख्यमंत्री गए थे उससे ४-५ दिन पूर्व से कुछ गायों को लाकर रख दिया गया था। यह ज़मीन ऐन नगर निगम कभी वापिस नहीं ले सकता। शहर के महँगे भाग सरोजिनी नगर में स्थित है। इस भूमि की क़ीमत रु.1500 करोड़ से अधिक है। वास्तव में यह एक सरकारी मान्यता प्राप्त सरकारी भूमि पर ‘मुलायम परिवार’ का प्रत्यक्ष क़ब्ज़ा है।

इसके क़ब्ज़े को कभी न हटाया जा सके, शायद इसी लिए मुख्यमंत्री को dark में रखकर भ्रमण कराया गया। नगर निगम को इस भूमि की lease निरस्त कर open विज्ञापन जारी करना चाहिए ….. यह भ्रष्टाचार है मेरे भाई! इस फ़ार्म हाउस के शानदार फ़ोटो देखकर आप भी नहीं कह सकते कि यहां कोई गौशाला है।

चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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बसपा व सपा दोनों सरकार की आंखों का तारा था यूपी का सबसे बड़ा लुटेरा पॉन्टी चड्ढा!

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश में 21 चीनी मिलों की बिक्री का खेल… शराब किंग, बिल्डर्स, फिल्म प्रोड्यूसर, खनन माफिया आदि के नाम से विभूषित गुरदीपसिंह उर्फ पॉन्टी चड्ढाक व उसके भाई हरदीप की दिल्ली के छतरपुर फार्म हाउस में निर्मम हत्या की खबर से उत्तरप्रदेश के राजनीतिक / नौकरशाही के गलियारों में सन्नाटा छा गया था …..पोंटी के पास बड़े-2 नेताओं व नौकरशाहों के पैसे जो फंसे थे।

पॉन्टी चड्ढा शरू से ही मुलायम सिंह यादव और फिर अखिलेश यादव के नजदीक रहे, किन्तु पिछली बसपा सरकार के दौरान वे सत्ता की आखों के तारे रहे। उन्हें राज्य में शराब सिंडीकेट का एकछत्र कारोबार करने की छूट भी बसपा सरकार में मिली, जो सपा सरकार में जारी रही। बसपा सरकार ने राज्य की 21 चीनी मिलें उन्हें कौड़ियों के भाव थमा दी। बसपा व सपा सरकारों में राज्य के खनन के पट्टे भी पॉन्टी चड्ढा के हाथों आ गए। मिड डे मील के वितरण में भी उनका एकछत्र राज्य चला है, जो आज तक जारी है। सपा सरकार ने तो शराब व पंजरी का व्यवसाय आने वाले तीन वर्षों के लिए चड्ढा ग्रुप को सौंप दिया है।

पॉन्टी को सिर्फ बसपा सरकार ने तो हाथों हाथ लिया ही, समाजवादी पार्टी की सरकार ने भी बसपा सरकार की आबकारी नीति ही जारी रखी। राज्य की चीनी मिलों को बेचने के बसपा सरकार के फैसले को भी सपा सरकार ने नहीं पलटा। यह जरूर था कि पिछले दिनों अखिलेश यादव सरकार ने चीनी मिलों की बिक्री की लोकायुक्त से जांच कराने का निर्णय लिया था, जिसे बाद में बस्ता बंद कर दिया गया।

समाजवादी पार्टी की सरकार के बाल एवं पुष्टाहार विभाग में मिड डे मील योजना के तहत वितरित किए जाने वाले खाद्यन्न का ठेका भी बसपा की तर्ज पर पॉन्टी चड्ढा की फर्म को देने का निर्णय विभाग ने लिया जो आज तक जारी है।

समाजवादी पार्टी के विधायक शारदा प्रताप शुक्ल ने विभाग के टेंडर प्रक्रिया की सीबीआई से जांच कराने की मांग मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से की थी जिसे अखिलेश यादव ने दरकिनार कर दिया।

पॉन्टी को सबसे बड़ा फायदा राज्य की 21 चीनी मिलों की नीलामी के दौरान हुआ। बसपा सरकार ने निर्धारित ‘विनिवेश प्रक्रिया’ का उल्लंघन कर राज्य की 21 चीनी मिलों को कौड़ियों के दाम शराब किंगपॉन्टी चड्ढाव को बेचे जाने का निर्णय लिया था। उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को बेचे जाने से पहले बसपा की सरकार के मंत्रिमंडल अथवा मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीडी) ने विनिवेश पर अपना कोई निर्णय ही नहीं दिया था|

उल्लेखनीय है कि पूर्ववर्ती बसपा सरकार ने विनिवेश प्रक्रिया के दौरान ‘मंत्रिमंडलीय उप समिति’ (सीसीडी) का गठन ही नहीं किया था। कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट (सीजीडी) ने सीधे तौर पर निर्णय हेतु राज्य मंत्रिमंडल को अनुशंसित किया था। राज्य की चीनी मिलों को बेचने के निर्णय पर मंत्रिमंडल/विनिवेश पर मंत्रिमंडल समिति (सीसीडी) का गठन न कर तत्कालीन कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने स्वयं ही चीनी मिलों को बेचने का फैसला कर डाला था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने जून 2007 में UTTAR PRADESH STATE SUGAR CORPORATION LIMITED की मिलों का निजीकरण/विक्रय करने का निर्णय लिया था। यूपीएसएससीएल की 10 संचालित मिलों एवं 11 बंद मिलों का विक्रय जुलाई 2010 से अक्टूबर 2010 और जनवरी 2011 से मार्च 2011 के दौरान किया गया था।

उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली बसपा की सरकार के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की 21 चीनी मिलों के डिस इन्वेस्टमेंट के नाम पर मिलों की बिक्री में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और घोटाले की पुष्टि हुई थी। कैग की रिपोर्ट में 1179.84 करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन की जानकारी सामने आई है। इसी रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि हुई थी कि मायावती के करीबी मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी तथा मनपसंद भ्रष्ट व ताकतवर अधिकारी कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने शराब कारोबारी गुरदीप सिंह उर्फ पॉन्टी चड्ढा को चीनी मिलों को न केवल अंडरवैल्यू कर बेची बल्कि नीलामी प्रक्रिया के दौरान ही उसे सरकारी वित्तीय बोली पहले ही बता दी।

नियंत्रक-महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि प्रदेश की चीनी मिलों को एक ही कारोबारी पोंटी चड्ढा को औने-पौने दामों पर बेच दिया गया। इतना ही नहीं, नीलामी प्रक्रिया के दौरान भी कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई बल्कि बोलीदाता को सरकार ने सरकारी वित्तीय बोली पहले ही बता दी थी।

उस वक्त चीनी मिलों की इस नीलामी प्रक्रिया को लेकर खूब हल्ला मचा था, लेकिन मायावती ने किसी बात पर ध्यान नहीं दिया। विपक्ष और चीनी मिल कर्मचारी संघ और किसान संगठन इस मामले को उच्च न्यायालय तक लेकर गए थे। इसके बाद यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। अखिलेश सरकार ने मामले की जांच लोकायुक्त से कराने का निर्णय लिया था जिसे बाद में रफादफा कर दिया गया।

मालूम हो कि प्रदेश सरकार की 11 चीनी मिलें चालू हालत में थी जैसे -बिजनौर, बुलंदशहर, चांदपुर, जरवल रोड, खड्डा, रोहना कलां, सहारनपुर, सकौती, टांडा, सिसवां बाजार, मोहद्दीनपुर तथा बेतालपुर, बाराबंकी, बरेली, भटनी, देवरिया, चेतौनी, गुघली, लक्ष्मीगंज, रामकोला, शाहगंज और हरदोई में थीं, आदि में सरकार ने घाटा दर्शाकर उन्हें भी खुर्द-बुर्द कर दिया। कैग की रिपोर्ट में इंडियन पोटाश लि. को छोड़कर वेव इंडस्ट्रीज लिमिटेड, पीबीएस फूड प्रालि, नम्रता मार्केटिंग प्रालि, नीलगिरी फूड प्रोडक्ट लि., एसआर बिल्डकॉम प्रालि, त्रिकाल फूड एंड एग्रो प्रोडक्ट लि. और सभी कंपनियां पोंटी चड्ढा की बताई जाती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जब सरकार ने चीनी मिलें बेचने के लिए अधिसूचना जारी की तो बिड़ला, डालमिया, सिंबोली, धामपुर शुगर और मोदी जैसे बड़े लोगों ने नीलामी प्रक्रिया में रुचि ली थी, किन्तु बाद में वे किनारे हो लिए…कर दिए गए। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सत्ता संभालते ही चीनी मिलों को बेचे जाने से संबंधित फाइलें तलब की थीं। विनिवेश, कसंल्टेंसी मॉनिटरिंग और परामर्शी मूल्यांकन के लिए जिन आईएएस अधिकारियों की समिति इन चीनीं मिलों को बेचने के लिए बनी थी, उनकी भूमिका की भी जांच हुई….दोष भी सिद्ध हुआ परन्तु कोई कार्यवाही नहीं हुई । पिबाद में मामले को ठन्डे बस्ते तलने के उद्देश्य से तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चीनी मिलें बेचे जाने की लोकायुक्त से जांच कराने का निर्णय लिया था।

सीबीआई उत्तरप्रदेश में पहले से ही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले की जांच कर रही है। इस घोटाले में आईएएस अधिकारी प्रदीप शुक्ला और परिवार कल्याण मंत्री बाबूसिंह कुषवाहा जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं। भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक ने चीनी मिल बिक्री घोटाले पर अपनी रिपोर्ट राज्य की प्रमुख सचिव वित्त को भेजकर घोटालों की हकीकत बताकर उत्तरप्रदेश सरकार से तथ्यों की पुष्टि करने को कहा था, जिसे दबा दिया गया था।

लोकायुक्त द्वारा तथ्यों की पुष्टि होते ही घोटाले में शामिल में मायावती, शशांक शेखर, तत्कालीन मुख्य सचिव अतुल गुप्ता, आई.ए.एस. अधिकार जे. एन, चैम्बर, नेतराम, मुलायम सिंह यादव के खिलाफ राज्य सरकार ने कार्यवाही करने का मन बना लिया था। इसी बीच पॉन्टी चड्ढा की हत्या से मामले ने नया मोड़ ले लिया ….अखिलेश यादव ने बाद में तत्कालीन लोकायुक्त मेहरोत्रा की मिलीभगत से मामले को रफादफा करा दिया| आज वर्तमान सरकार ने जांच करने का मन बनाया है| यह मामला इतना बड़ा है कि इसे स्थानीय एजेंसी द्वारा जांच करना संभव नहीं है ….सीबीआई जांच ही एक मात्र विकल्प है|

चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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यादव सिंह को बहाल कर प्रमोशन देने वाले भ्रष्टाचारी आईएएस रमा रमण का बाल भी बांका नहीं हुआ

Surya Pratap Singh :   ‘भ्रष्टाचारों’ पर मज़े की बात… नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे अथॉरिटिज़…. वर्तमान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए किए जा रहे ‘अश्वमेघ यज्ञ’ के असली (भ्रष्ट) घोड़ों को कौन पकड़ेगा… इन घोड़ों ने प्रदेश की अस्मिता को रौंदा है…. जेल की ऊँची दीवारें व बेड़ियाँ प्रतिक्षरत हैं…… सीबीआइ की गिरफ्त में भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह इन दिनों सीबीआइ का मुजरिम हैं और जेल में निरुद्ध हैं। जिस रमा रमण आईएएस ने यादव सिंह का निलम्बन बहाल किया और प्बिना डिग्री प्रोन्नति देकर तीनों नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा यमुना एक्सप्रेस अथारिटी में इंजीनियर-इन-चीफ़ बनाया, उसका बाल भी बाँका नहीं।

सीबीआई की जाँच के अंतर्गत यादव सिंह द्वारा सम्पादित 229 अनुबंधों लागत रु. 433 करोड़ के स्वीकृति/ अधिकार प्रतिनिधायन किसने किया? रामा रमण ने ….यह महाशय इतना बड़ा मैनेजर निकला कि उच्च न्यायालय व सीबीआई को ऐसे मैनेज किया है कि वह न केवल जेल से बाहर है अपितु वर्तमान सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों को भी मैनज करने की जुगत लगा रहा है ताकि पिछली सपा-बसपा सरकारों की तरह इस सरकार में भी नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे में क़ाबिज़ रह सके।

यादव सिंह पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा यमुना एक्सप्रेस अथारिटी में तैनाती के दौरान अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप हैं। उसने विभिन्न प्रोजेक्ट्स के 229 अनुबंधों पर 433 करोड़ का कार्य संपादित करवाया, जिसमे बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी होने का इल्जाम लगा है… 1.5 किलो हीरों का मालिक है ये… इसका असली मुलाजिम अर्थात यादव सिंह को सभी अधिकार देने वाला स्वीकृतिकर्ता तो रामा रमण ही है …इसके अलावा बिना टेंडर प्लॉट आवंटन, बिल्डर्ज़ जो नॉएडा इक्स्टेन्शन में दिए लाभ, ब्याज/दंड माफ़ी, नक़्शा पारित करने की अनिमितताएँ, ठेका/टेंडर के घपले, IAS फ़ार्म घोटाला, निर्माण कार्य घोटाले तमाम मामले तभी सामने आएँगे जब नॉएडा के मठाधीश ‘रमा रमण’ को वहाँ से रुख़सत किया जाएगा….

यादव सिंह प्रकरण में सीबीआई द्वारा इन बिंदुओं पर जांच आवश्यक है:

– विभिन्न स्तरों पर यादव की पदोन्नतियों में निर्धारित प्रक्रिया व मापदंडों का पालन हुआ है या नहीं।

– विनिर्माण से संबंधित दिए गए ठेकों में निर्धारित प्रक्रिया और मापदंडो का अनुपालन हुआ या नहीं।

– नॉएडा के अन्य बड़े भ्रष्टाचार और वहाँ तैनात रहे आईएएस अधिकारियों के आचरण की जांच।

नयी सरकार के लिए पिछली दो सरकारों में भ्रष्टाचार के प्रतीक मठाधीश १५ अधिकारियों को तत्काल हटा कर उनकी जाँच आवश्यक है …

वरिष्ठ और चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की फेसबुक वॉल से.

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यूपी में भ्रष्ट नौकरशाहों का गैंग भाजपा राज में भी मलाई चाटने-चटाने के लिए तैयार : सूर्य प्रताप सिंह

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश की ‘नौकरशाही के भ्रष्ट चेहरे’ अपनी पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने में लगे! उत्तर प्रदेश में कुछ नौकरशाहों की ‘भ्रष्ट लेकिन धनाढ़्य’ गैंग (CAUCUS) की आज ये हिम्मत / हस्ती है कि दिल्ली से लेकर नागपुर तक अपने पसंद के मुख्यमंत्री व मंत्री बनवाने के किए पैरवी में लगे हैं…. पिछली दो सरकारों में जिस नौकरशाह गैंग की तूती बोलती थी वे ‘पैसे व रसूक़’ के बल पर ‘मलाई चाटने व चटाने’ के लिए फिर से तैयार हैं…

सम्भावित नामों में १-२ चेहरे इसी गैंग की पसंद है…. इस गैंग के दो सदस्य उत्तर प्रदेश में शपथ ग्रहण समारोह की व्यवस्था में भी लगे व भाजपा नेताओं की चमचागिरी करते समारोह स्थल पर देखे गए… मित्रों, शायद आप में से कुछ लोग जिन्हें इस गैंग की ताक़त का अहसास नहीं है, मेरी बात पर विश्वास नहीं कर रहे…. विश्वास करें! मेरी जानकारी अत्यंत सटीक है …

उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री का चयन ‘नौकरशाही की चयन समिति’ ने किया…. नाम लगभग तय! उ० प्र० के मुख्यमंत्री के चयन में उत्तर प्रदेश के दिल्ली में तैनात ३ बड़े अधिकारियों की अहम भूमिका मानी जा रही है …लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का मतलब अब जनता की पसंद नहीं बल्कि जो नौकरशाही को पसंद हो, वही भविष्य में बनेगा उ०प्र० का मुख्यमंत्री….इन ३ नौकरशाहों में से दो के उ० प्र० की पूर्व की दो सरकारों (सपा व बसपा) में नॉएडा में तैनात रहे बड़े अधिकारियों (जिन्होंने भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह को बचाया है) व उत्तर प्रदेश के पूर्व सरकार के महा बदनाम बड़े लंबे-२ से भ्रष्ट IAS से भी गरमा-गरम सम्बंध बताए जा रहे हैं….

इन नौकरशाहों की टोली ने CM पद के कई ‘लोकप्रिय’ दावेदारों की छुट्टी करा दी….. तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा ….शायद इनमें से कई के साथ इन भ्रष्ट नौकरशाहों की दाल नहीं गलती…. अब ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उ०प्र० का आने वाला मुख्यमंत्री Proxy CM सिद्ध न हो…..

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे और अब भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

सूर्य प्रताप का लिखा ये भी पढ़ें…

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यूपी में इस वक्त प्रशासन नाम की चीज नहीं है, नकल माफिया कर रहे नंगा नाच : आईएएस सूर्यप्रताप सिंह

Surya Pratap Singh : उत्तर प्रदेश में नक़ल माफ़िया का नंगा नाँच…. नयी सरकार की ‘ट्रैंज़िशन-अवधि’ में उ० प्र० में प्रशासन नाम की चीज़ नहीं है…. भारी ‘जनादेश’ देकर भी नक़ल माफ़िया के सामने जनता बेबसी से ‘कौन होगा मुख्यमंत्री’ के खेल का मंचन देख रही है… नक़ल के लिए कुख्यात कौशाम्बी, इलाहाबाद में यूपी बोर्ड परीक्षा में धुंआधार नकल, यहां इमला बोलकर लिखाया गया एक-एक उत्तर… नीचे देख सकते हैं प्रमाण के तौर पर संबंधित वीडियो…

नकल के लिए बदनाम कौशांबी जिले मे इस बार 112 परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं। जिला प्रशासन ने नकल विहीन परीक्षा करने का दिखावे पूर्ण दावा किया था लेकिन उसके दावे की हवा पहले दिन ही निकल गई। जिले के विभिन्न परीक्षा केंद्रों पर जमकर नकल हुई। कक्ष निरीक्षक कहीं इमला बोलकर नकल कराते दिखे तो कहीं परीक्षार्थी की कापी भी लिखते दिखाई दिये। कहने को नकल रोकने के लिए सचल दस्ते परीक्षा केंद्रों तक पहुंचे। सचल दल मे शामिल लोग महज खाना पूर्ति करके वापस लौट जाते रहे। जिला प्रशासन के दावों की पोल खोलने के लिए मीडिया के कैमरों मे कैद तस्वीरे हकीकत को बयां करने के लिए बहुत हैं। निम्न दो वीडियो देखें तो माजरा समझ में आ जाएगा ….

https://youtu.be/0vaUptWANMw

https://youtu.be/8rUviGRU4Ow

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आज आरंभ हुई उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल का बोलबाला….. नयी सरकार के संकल्प को चुनौती! आपको याद हो की गोण्डा की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में व्याप्त नक़ल के अभिशाप के मुद्दे को उठाया था …इस वर्ष भी मैंने अपना नक़ल के विरुद्ध ‘सविनय सुचिशिक्षा अभियान’ यानि ‘नक़ल रोको अभियान’ चलाने का संकल्प लिया है…

मैं कल अलीगढ़ में आपने ‘नक़ल रोको अभियान’ के सम्बंध में गया था और अपने इस अभियान को इस वर्ष भी निजी प्रयासों के रूप में चालू रखने के लिए वालंटीर्स के साथ कार्ययोजना बनायी गयी…. आज इस अभियान के तहत मेरठ, ग़ाज़ियाबाद, व हापुड़ जनपदों का भ्रमण पर हूँ। ज्ञात हुआ कि अलीगढ़ के नक़ल के लिए कुख्यात वीआईपी तहसील “अतरोली” में खुले आम सामूहिक नक़ल हुई। जब कि मेरे अभियान के अलीगढ़ में शुरुआत पर अलीगढ़ के अख़बारों के प्रतिनिधियों के पूछे जाने पर राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह ने कल ही कहा था कि ‘अतरोली इस वर्ष अपने ऊपर से नक़ल के दाग़ की नहीं लगने देगा’…..परंतु आज यह सत्य साबित नहीं हुआ और अतरोली में धड़ल्ले से सामूहिक नक़ल हुई।

ज्ञात हो कि बोर्ड परीक्षा में पैसे देकर नक़ल से बोर्ड परीक्षा पास करने अतरोली में मिज़ोरम, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर तक के बच्चे आते हैं। नयी सरकार के लिए बोर्ड की परीक्षाओं में नक़ल रोकना बड़ी चुनौती बनेगी….. प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा विभाग के रूप में मैंने परीक्षा केंद्रों पर CCTV कैमरा लगाने व नक़ल रोकने जे किए छात्रों, अभिववकों, अध्यापकों, प्रबंधकों की हर मंडल में बैठकें कर नक़ल के विरुद्ध अभियान चलाया था…. मात्र ३ महीने में ही सपा सरकार ने मेरा ट्रान्स्फ़र कर दिया था….. मैंने २५५ परीक्षा केंद्रों को ब्लैकलिस्ट किया था जिन्हें सपा सरकार ने मेरे ट्रान्स्फ़र के बाद बहाल कर दिया था। यदि नक़ल रोकने के लिए आने वाली सरकार नक़ल रोकने जे किए मेरे अनुभव का लाभ उठाना चाहती है तो युवाओं के जीवन जे हित में, मैं सहर्ष अपना योगदान देने के किए तैयार हूँ…..

यूपी कैडर के चर्चित आईएएस रहे और इन दिनों भाजपा नेता के रूप में सक्रिय सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने अखिलेश यादव के संरक्षण में हुए एक बड़े घोटाले का किया भंडाफोड़

Surya Pratap Singh : उद्योग मंत्री/ मुख्य मंत्री के संरक्षण में उत्तर प्रदेश में UPSIDC बना एक घोटालों का अड्डा…. मुख्यमंत्री/उद्योग मंत्री अखिलेश की नाक के नीचे UPSIDC में रु. २०,००० करोड़ का भूमि घोटाला हुआ हैं….मनमाने ढंग से साक्षात्कार के माध्यम से भू आवंटन किया गया है …. साक्षात्कार का मतलब रिश्वत की सौदागिरी !!!
मुख्यमंत्री/ उद्योग मंत्री अखिलेश यादव ने अपने मित्र के नाम पर ‘स्टील प्लांट’ लगाने के लिए UPSIDC के सिकंदराबाद औद्योगिक क्षेत्र में 111 ऐक़ड भूमि बिना किसी टेंडर पर वर्ष २०१३-२०१४ में औने-पौने मूल्य/बहुत सस्ते में वर्ष २०१४ में आवंटित की गयी है ….. जिसकी जाँच आने वाली सरकार क्या जाँच कराएगी ? मेरे इस सम्बंध में निम्न प्रश्न हैं:

1. क्या इस भूमि के आवंटन से पूर्व क्या कोई स्कीम निकाली गयी थी …विज्ञापन दिया गया था या नहीं? यदि नहीं तो क्यों? किसके अलिखित निर्देश पर यह भूमि आवंटित की गयी ?

2. क्या कोई open auction के लिए टेंडर निकला गया था। यदि नहीं, तो क्यों?

3. भूमि का क्या कोई रिज़र्व प्राइस रखा गया था ? यदि नहीं तो क्यों? यदि रिज़र्व प्राइस रखा गया था तो इसका आधार क्या था ?

4. क्या कलेक्टर द्वारा निर्धारित मूल्य पर या मार्केटिंग प्राइस पर आवंटन किया गया था?

5. आवंटन से पूर्व किस स्तर से स्वीकृति ली गयी। क्या मंत्री परिषद का अनुमोदन किया गया था ? यदि नहीं तो क्यों? आवंटन आदेश पर किसके हस्ताक्षर हैं?

6. आवंटन के लिए क्या कोई कमेटी बनायी गयी थी और उसके सदस्य कौन-२ थे ?

7. कितना नुक़सान UPSIDC को हुआ? इसका ज़िम्मेदार कौन?

इसी प्रकार दूसरा बड़ा घोटाला मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कहने पर ‘भसीन ग्रूप’ को Grand Venezia/Grand Venice Mall के लिए 10.5 ऐक़ड़ इंडस्ट्रीयल भूमि को वर्ष २०१४ में commercial में परिवर्तित करके भूमि आवंटन किया गया है। इस १.५ million sq. mt. में बन रहे मॉल के लिए निर्माण कार्य/नक़्शा पारित करने में बड़ा घुटाला हुआ है ..यह मॉल UPSIDC area near Kasna Site IV, Greater Noida में स्थित है। इसके कई फ़्लोर मुख्यमंत्री, उनके मित्रों व कई नौकरशाहों ने अपने नाम आवंटित कराए हैं। इस के sales rate Rs. १५,०००- २०,००० per sq ft. है। इसकी उच्च स्तरीय जाँच में सब सामने आ जाएगा। इस सम्बंध में निम्न प्रश्न हैं:

1. Industrial area में भू उपयोग परिवर्तन कर भसीन ग्रूप की दी गयी १०.५ ऐक़ड भूमि का land use change कर commercial किन परिस्थितियों में किया गया?

2. आवंटन का आधार क्या था? किस स्तर का अनुमोदन लिया गया? क्या मंत्री परिषद का अनुमोदन लिया गया?

3. इस १०.५ acre भूमि का open auction क्यों नहीं किया गया? नियमों का उल्लंघन कर इंडस्ट्रीयल भूमि का commercial स्वरूप क्यों किया गया? नियम विरुद्ध 40 लाख sq.ft. buildup किस दबाव में स्वीकृत कर दिया गया….

4. कितने नेताओं व IAS अधिकारियों के व उनके परिवारों के नाम कितने floors आवंटित हैं ? नेता-नौकरशाह-रियल इस्टेट माफ़िया का गठजोड़ का नमूना है, यह मॉल।

5. नॉएडा क्षेत्र से मिले होने के कारण इस भूमि के मूल्य व नॉएडा अथॉरिटी द्वारा सेक्टर-१८ में आवंटित भूमि के मूल्य में कितना अंतर था और क्यों?

6. कन्स्ट्रक्शन area में कितनी अतिरिक्त छूट दी गयी व कितनी बार नक़्शे व भू उपयोग परिवर्तनों में छूट दी गयी?

7. २० फ़्लोर कन्स्ट्रक्शन की अनुमति किन नियमों के तहत दी गयी है।

UPSIDC में भ्रष्ट इंजीनियरों की फ़ौज है जिनके ख़िलाफ़ CBI तक की जाँच चल रही है … जेल तक जा चुके हैं… ED द्वारा प्रापर्टी भी जप्त की गयी है फिर भी ये भ्रष्ट इंजीनियर प्रमोशन देकर joint MD तक बना दिए गए, सभी अधिकार MD लोगों ने प्रतिनिधायित कर दिए गए…. हाई कोर्ट व सप्रीम कोर्ट के अनेक आदेशों को ठेंगा दिखाया गया है। IAS ऑफ़िसर तक निलम्बित हुये हैं… लेकिन मुख्यमंत्री जो स्वमं उद्योग मंत्री है ने आँखे बंद कर रखी हैं… आख़िर क्यों ?

Troinka सिटी ग़ाज़ियाबाद में भी बड़े पैमाने पर भू आवंटन व land use change पैसे लेकर किए गए हैं। planstic city औरैया, कन्नौज में स्थापित फ़ूड पार्क, Trans-Ganga कानपुर , theme पॉर्क आगरा व इलाहबाद में नव स्थापित इंडस्ट्रीयल पार्क में निर्माण व भू आवंटन में भी घोटाले की पटकथा रची गयी है। सड़के व अन्य निर्माण एक ही स्थान पर बिना काम किए भुगतान प्राप्त किए गए….UPSIDC के प्रदेश सभी industrial areas में भूमि आवंटन व लैंड यूज़ परिवर्तन में घोटाले हुए हैं… क्या-२ बताऊँ?

अतः मैं माँग करता हूँ कि UPSIDC के उक्त घोटालों की CBI से जाँच करायी जाए ….. नेता-आईएएस अधिकारियों-इंजीनियरस-Real Estate माफ़िया के घोटाले की उच्च स्तरीय जाँच कराना आने वाली सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी….देखते हैं क्या आने वाली सरकार इन घोटालों की जाँच कराती या नहीं…. या फिर बातें है बातों का क्या ..वाली कहावत चरितार्थ होती है ….उत्तर प्रदेश में बड़े-२ घोटाले मुख्यमंत्रियों के संरक्षण में होते रहे हैं न कोई जाँच हुई और न कोई अभी जेल गया …. ये जनता के साथ विश्वासघात है, कोरा विश्वासघात…..

यूपी के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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‘विषबाण’ अखबार के कार्यक्रम में आईएएस सूर्यप्रताप बोले- नौकरशाही गुलाम हो गई है खादी की

मथुरा । विषबाण साप्ताहिक अखबार के तृतीय स्थापना दिवस एवं व्यापारिक समाचार पत्र व्यापार मार्केट के शुभारम्भ के मोके पर आयोजित समारोह में कई रंग बरसे। आयोजन में जहाँ में मीडिया एवं जनसेवा के क्षेत्र में नाम कमाने वाले बुद्धीजीवियों ने समसामयिक विषयों पर अपने विचार रखें वहीं कार्यक्रम समापन से पूर्व कवियों ने ओज और हास्य का मिश्रण प्रस्तुत कर समां बांध दिया। कार्यक्रम के मध्य में आयोजित जादूगर अशोक ने अपने हैरतअंगेज जादूगरी से उपस्थितजनों का भरपूर मंनोरंजन कर यादगार शाम बना दी। आयोजन में उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस और शासन में चर्चित प्रमुख सचिव डॉ सूर्यप्रताप सिंह विशेष आकर्षण का केन्द्र रहे। फेसबुक जैसी शोसल साईटस पर जुड़े हुये जनपद से बाहर के प्रशेसक भी उन्हें देखने सुनने के लिये कार्यक्रम में शामिल हुये। 

वर्तमान में सहिष्णुता को लेकर पूरे देश में चल रही बहस के सन्दर्भ में आयोजित बौद्धिक विमर्श में ‘सहिष्णुताः लोक, तन्त्र एवं राजनीति’ विषय पर गम्भीर चिंतन हुआ। दिल्ली से आये इण्डिया संवाद के कार्यकारी सम्पादक अरूण कुमार त्रिपाठी ने देश में असहिष्णुता की वृद्धि से सहमति जताते हुये कहा कि अब लोगों में अपनी आलोचना सुनने का धैर्य नहीं रह गया है। छोटी से छोटी बात पर लोग इतने उग्र हो जाते हैं कि अमर्यादित टिप्पणी कर देते हैं, उसके बाद फिर वह सामने वाले पर तब तक हावी रहते हैं जब तक कि वह या तो माफी ना मांग ले या फिर उस बहस से हट ना जाये।

उन्होंने कहा कि स्वस्थ लोकतन्त्र के लिये स्वस्थ बहस का होना आवश्यक है। लोकतन्त्र का मतलब ही सभी के विचारों को सुनना समझना और स्थान देना है। देश में धर्म और जाति को लेकर लोगों के मतभेदों पर उन्होंने कहा कि कट्टरता किसी भी सूरत में घातक है। अगर कोई शरियत या मनुस्मृति के नियमानुसार आज के समाज को चलाना चाहते हों तो समाज में कट्टरता पैदा होगी। समाज की गति कट्टरता नहीं उदारता की ओर रहती है और जनहित में इसी की आज जरूरत है। उन्होंने कहा कि कलमुर्गी और इखलाख की हत्याओं से संसार में जो सन्देश जाता है उससे भारत की छवि को नुकसान पहुंचता है। लोगों के इस रवैये के लिये तन्त्र और राजनीति की असहिष्णुता जिम्मेदार है। पहले के समाज में निर्भीकता और निष्पक्षता से कबीर को अपनी बात रखने की स्वतन्त्रता थी लेकिन आज अगर कबीर अपनी बात कहते तो उनकी हत्या हो जाती।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि यूपी के चर्चित आईएएस और प्रमुख सचिव सूर्यप्रताप सिंह ने कहा कि आज नौकरशाही खादी की गुलाम हो गयी है जिससे जनता को न्याय के लिये नेताओं की चौखटों पर जाने पर मजबूर होना पड़ता है। प्रदेश की राजनीति पर बोलते हुये उन्होंने कहा कि आज यूपी परिवारों में बंटा हुआ है। यहां जनता की नहीं, राजीनितिक परिवारों की आवाज को सुना जाता है। उन्होंने ‘नेता लोगों कुर्सी छोड़ो, जनता आती है’’ का नारा देते हुये कहा कि वह मुख्यमंत्री बनने नहीं, बनाने के लिये निकले हैं। श्री सिंह ने बुन्देलखण्ड पर बोलते हुये कहा कि 57 प्रतिशत लोग भुखमरी के शिकार हैं, वहीं प्रदेश के नेता महोत्सव में मग्न हैं। उन्होंने राजनैतिक पार्टियों पर प्रहार करते हुये कहा कि वोटों की राजनीति के चलते कोई भी दल अपने वायदों को नहीं निभाता है। पिछले 68 सालों में यूपी की जनता को कुछ नहीं मिला। बीजेपी, बसपा और सपा सरकार बनने पर आरक्षण को लेकर किये अपने वायदों को ठण्डे बस्ते में डाल देती है। प्रदेश में सरकारी नौकरी में जाति विषेष की भर्ती को लेकर उन्होंने कहा कि 27 में 21 प्रतिशत तो यादव जाति को लिया गया है वहीं 6 प्रतिशत अन्य 233 जाति के लोगों को भर्ती किया। उन्होंने कहा कि भारत में जातियों को तोड़ नहीं सकते लेकिन जातियों का राजनैतिक रूप से प्रयोग गलत है। उन्होंने कहा कि देश में परिवर्तन लाने के लिये जनता को सत्ता अपने हाथ में लेनी होगी।

इससे पूर्व प्रमुख साहित्यकार मोहनस्वरूप भाटिया, भारतीय व्यापार मण्डल के वरिष्ठ राष्ट्रिय उपाध्यक्ष रविकान्त गर्ग, प्रमुख समाजसेवी गजेन्द्र शर्मा, कोसी नगरपालिकाध्यक्ष भगवत प्रसाद रूहेला ने कहा कि असहिष्णुता के नाम पर देश का माहोल खराब किया जा रहा है। जिस देश में बच्चों को चीटीं को भी मारने से रोका जाता हो वहां इस तरह की बातें व्यवहारिक नहीं कही जा सकती। इस अवसर पर समाजसेवा के क्षेत्र में पं. गजेन्द्र शर्मा, उमेश चन्द्र गर्ग, साहित्य के क्षेत्र में डॉ0 धर्मराज, प्रमुख सामाजिक क्रान्तिकारी राजीव दीक्षित को मरणोपरान्त उनके पिता राधेश्याम दीक्षित एवं माताजी मिथलेश दीक्षित को समाजसेविका लीलावती स्मृति सम्मान से प्रमुख सचिव द्वारा सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में प्रमुख कवि ओमपाल सिंह निडर, मनवीर मधुर, सबरस मुरसानी, रामबाबू सिकरवार, सुश्री दिव्या ज्योति, प्रभात परवाना, अमित शर्मा, अनुपम गोतम ने काव्यपाठ कर जमकर तालियॉं बटोरीं।

मसानी स्थित अग्रवाटिका में उक्त कार्यक्रम का प्रारम्भ जादूगर आकाश के शो से हुआ। जादूगर ने मुंह से बड़ी संख्या में ब्लेड निकालने जैसे विभिन्न कारनामों से लागों को अचंभित कर दिया। अपने शो में उसने मुख्य सचिव को भी जादू से चकित कर दिया। सभी के सामने आईएएस एस.पी.सिंह से अपने लिये प्रशस्तिपत्र लिखवाया, गवाही में तीन अन्य अतिथियों के हस्ताक्षर लिये। बाद में जब इस प्रशस्ति पत्र को पढ़ा गया तो उसमें मुख्य सचिव की सारी सम्पत्ति जादूगर ने अपने नाम करवा ली थी। यह देखकर सदन में मौजूद लोग ठहाका मारने पर विवश हो गये।

कार्यक्रम में बसेरा ग्रुप के चेयरमेन रामकिशन अग्रवाल, उद्योग व्यापार मण्डल (कंछल गुट) के प्रदेश मंत्री कंचन लाल अग्रवाल, जिलाध्यक्ष राजकुमार गोयल, ईंट भट्टा एशोसिएशन ठाकुर संजीव सिंह, प्रदीप राजपूत एडवोकेट, मनोज शर्मा एडवोकेट, वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र चतुर्वेदी, मदनगोपाल शर्मा, हरेन्द्र चौधरी, मोहन श्याम शर्मा, धमेन्द्र चतुर्वेदी, विवके दत्त मधुरिया, विपिन सिंह, मातुल शर्मा, नरेन्द्र एम. चतुर्वेदी,  सी.के. उपमन्यु, मोरध्वज अग्रवाल, लोकेन्द्र वर्मा, जगदीश वर्मा ‘समन्दर’, के.के. गर्ग, कपिल शर्मा, दीपक गोस्वामी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम संयोजक मफतलाल अग्रवाल ने अतिथियों का स्वागत कर स्मृति चिन्ह भेंट किया। कार्यक्रम का संचालन अनुपम गोतम, प्रदीप राजपूत एवं मनवीर मधुर ने संयुक्तरूप से किया।

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यूपी के जंगलराज की नई कहानी : अमिताभ, जया और अभिषेक बच्चन को यूपी सरकार हर माह देगी डेढ़ लाख रुपये!

Surya Pratap Singh IAS : अमिताभ बच्चन, जया व अभिषेक को यूपी सरकार देगी 50,000 रुपये की पेंशन… यानि इस परिवार को हर महीने डेढ़ लाख रुपये… पेंशन के नाम पर…क्या मजाक है…. मुख्यमंत्री के गाँव ‘सैफई’ के प्रधान दर्शन सिंह यादव को भी इस वर्ष यश भारती पुरस्कार मिला है… उसके प्रभाव ने यह निर्णय करा दिया… सरकारी खजाने का मज़ाक बना कर रख दिया है.. लुटाओ, जितना लुटा सकते हो… चुनाव तक…

खास बात यह है कि जिस राज्य की प्रति व्यक्ति सालाना आय केवल 40,000 रुपये है वह यश भारती सम्मान पाने वालों को 50,000 रुपये मासिक पेंशन के तौर पर देने जा रहा है… वह भी तब जब कि सम्मान पाने वालों में ज्यादातर लोग बेहद संपन्न आर्थिक वर्ग से ताल्लुक रखते हैं.. मौजूदा समय में जहां स्वतंत्रता सेनानियों (साथ में, उनकी पत्नी या पति) को 20,129 रुपये मासिक पेंशन के तौर पर मिलते हैं, भारत सरकार की एक योजना के मुताबिक ऐसे बूढ़े और गरीब कलाकारों को जिन्होंने कम-से-कम 10 साल अपनी कला के दम पर आजीविका चलाई हो, 2,000 रुपये की मासिक पेंशन मिलती है… उ.प्र. के यश भारती व पदम् पुरुष्कार विजेताओं को पचास हजार रुपये प्रति माह पेंशन देना अकल्पनीय है. सैफई के प्रधान ने कराया यह निर्णय… इसके लिए सरकारी खजाना फिर लुटा… साहित्य, साहित्यकारों व पुरस्कारों का वोट के लिए ऐसा राजनीतिकरण कभी किसी ने नहीं देखा होगा.

जनहित के मुद्दों पर लड़ने वाले उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.

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वाह रे यूपी की अखिलेश सरकार : बागी सूर्य प्रताप सिंह की जगह दागी प्रदीप शुक्ला… यही है समाजवाद!

Kumar Sauvir : हैल्लो हैल्लो..  हेलो माइक टेस्टिंग हेलो… जी अब ठीक है। शुरू करूँ? … ओके. तो सुनिए… नमस्कारररररर… यह रेडियो यूपी है। अब आप उत्तर प्रदेश से जुडी अहम् खबरें सुन रहे हैं। सरकार ने यूपी में अरबों-खरबों के सरकारी घोटालों के मामले में साढ़े 3 साल तक डासना जेल में बंद रहे वरिष्ठ आईएएस अफसर को सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो का डीजी और प्रमुख सचिव की कुर्सी सौंप दी है। जबकि सरकारी घोटालों और भारी षडयंत्रो का भंडाफोड़ करने वाले जुझारू वरिष्ठतम आईएएस अफसर सूर्य प्रताप सिंह की कुर्सी छीन कर उन्हें बेआबरू करके बेकार ढक्कन की तरह सड़क पर फेंक दिया है। यूपी सरकार और उसका कामकाज पूरी सक्रियता, ईमानदारी और जान प्रतिबद्धता के साथ जी-जान के साथ प्रदेश के सर्वांगीण विकास में जुटी हुई है। समाचार समाप्त हुए। (लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.)

Surya Pratap Singh : लो हम सड़क पर आ गए! अखबारों से ज्ञात हुआ कि आज मेरा स्थानांतरण कर ‘प्रतीक्षा’ में रख दिया गया | किसी विभाग से किसी प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को हटाकर ‘प्रतीक्षा’ में तभी डाला जाना चाहिए, जब उस विभाग में कोई ‘घुटाला’ या कदाचार किया गया हो, तथा उस अधिकारी को निष्पक्ष जांच हेतु हटाना जरूरी हो | मैंने तो ऐसा अपनी समझ से कुछ नहीं किया| अब मुख्य सचिव के समकक्ष वरिष्ट आईएएस अधिकारी, अर्थात मैं, बिना कुर्सी-मेज व् अनुमन्य न्यूनतम सुविधाओं का पात्र भी नहीं रहा और सडक पर पैदल कर दिया गया, चलो …..व्यवस्था के अहंकार की जीत हुई | ज्ञात हुआ है कि लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव की ‘अहंकारी व बलशाली’ इच्छा के सामने सारी व्यवस्था ‘नतमस्तक’ है, ‘हुजुरेवाला’ चाहते है कि मुझे तत्काल सड़क पर पैदल किया जाये, निलंबित कर तरह-२ से अपमानित किया जाये, दोषारोपित किया जाए, कलंकित कर ‘सबक’ सिखाया जाये | जन-उत्पीडन और कदाचार के खिलाफ कोई आवाज न उठे | व्यवस्था को लगता है कि जब बाकि नौकरशाह ‘जी हजुरी’ कर सकतें है तो हम जैसे लोग क्यों नहीं, हमारी मजाल क्या है ? मैंने तो नौकरी छोड़ने (VRS) की इच्छा भी व्यक्त का दी, अब बचा क्या है ? ये मेरा कोई दाब नहीं …मैं व्यवस्था से अलग होकर जन-पीड़ा से जुड़ना चाहता हूँ और प्रभावी ढंग से जनता की बात उठाना चाहता हूँ ..इसमें भी क्या कोई बुराई है…मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं…मेरे लिए ‘रोजी-रोटी’ का सवाल नहीं है .. ? अब क्या विकल्प है ?…..या तो मेरे VRS के प्रस्ताव को स्वीकार किया जाये या अस्वीकार, यदि कोई कार्यवाही लंबित है तो मुझे न बता कर अख़बारों के माध्यम से क्यों सूचित किया जा रहा है, मुझे नोटिस/जांच के बारे में कागजात/नोटिस उपलब्ध कराये जाएँ ताकि मैं उसका जबाब देकर न्याय पा सकूँ या फिर मैं अपने ‘अकारण उत्पीडन’ के खिलाफ माननीय न्यायलय की शरण में जा सकूँ | क्या इस सब का उदेश्य क्या केवल मेरे VRS को सेवा निबृति तक लटकाए रखने का है ?… ताकि मैं व्यवस्था से बाहर जा कर जन-सामान्य की समस्याओं को और प्रभावी ढंग से न उठा सकूँ…मेरी आवाज को दबाये रखा जाये.. ? आज कई परामर्श स्वरुप चेतावनी/धमकी प्राप्त हुईं, लगता है कि क्या अब प्रदेश ही छोड़ना पड़ जायेगा….या फिर छुपे-छुपे फिरना पड़ेगा..अंग्रेजी उपनिवेशवाद की याद आती है…आपातकाल जैसा लगता है… | वाह री ! उत्तर प्रदेश की ‘लोकतांत्रिक’ व्यवस्था, जंहा लोकतंत्र के ‘सारे स्तम्भ’ बाहर से बातें तो बड़ी-२ करतें है परन्तु ऊपर सब मिलकर (निजी स्वर्थार्थ घाल-मेल कर) गरीब, पीड़ित जनता के लिए स्थापित ‘व्यवस्था’ का शोषण करते हैं….. मौज मानते है… | यह व्यवस्था केवल ‘Hands-in-Glove’ नहीं अपितु ‘Greesy Hands-in-Glove’ लगती है, जिसमे Greese अर्थात मलाई का सब कुछ खेल लगता है ….. चाटो मलाई…मक्खन…. बाकि सब ढक्कन …….. चलो …अब ‘जातिवादी’ …….अनिल यादव जैसे अहंकारी मौज मनाये, हंसें हमारी विवशता पर ….. हम तो आ गए सड़क पर …..औकात दिखा दी हमें …हमारी…. बड़े वरिष्ट आईएएस अधिकारी बने फिरते थे हम … ….अब आया न ऊंट …’शक्तिशाली (कु) व्यवस्था’ के पहाड़ के नीचे…कंहा गयी जनता की आवाज….कंहा गयी जनसमस्याए.. अनिल यादव ने सारी व्यवस्था को रोंद डाला …हर आवाज को कुचल डाला …आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे के ‘मिट्टी भराव’ में अब दब जाएँगी विरोध की सभी आवाजें…और उसके ऊपर उड़ेंगे ‘(कु)-व्यवस्था’ के पंख लगे ‘फाइटर प्लेन’ के छदम सपने.. …किसानों के मुआवजे की बात बेमानी हो जाएगी….नक़ल माफिया …भूमाफिया ..खनन माफिया….’जातिवाद’ ….क्षेत्रवाद….परिवारबाद….जीतेगा …..हारेगी जन-सामान्य की आवाज….हारेगी ‘माताओं-बहनों, गरीबों की चीत्कार… जीतेगा वलात्कारी का दुस्साहस …. | वाह री ….वर्तमान व्यवस्था…कंही आंसू पोंछने को भी हाथ नहीं उठ रहे… कंही जश्न ऐसा कि थिरकने से फुर्सत ही नहीं …… लो चलो हम सड़क पर आ गए…… कबीर का यह कथन अच्छा लगता है …कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सब की खैर….. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर!! (यूपी के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.)

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जंगलराज से दुखी यूपी के एक वरिष्ठ आईएएस ने वीआरएस लेने के लिए लिखा मार्मिक पत्र

Surya Pratap Singh : मित्रों. आज दिनांक 23/07/2015, मेरे जीवन का महत्वपूर्ण दिन है. जिस सेवा को पाने के लिए वर्षों तपस्या करनी पड़ती है, उससे मैंने स्वैच्छिक सेवा निवृति लेने का निर्णय लिया है. उक्त आशय हेतु अपनी पूरी व्यथा व वेदना निम्न पत्र, जो आज मैंने मुख्य सचिव महोदय को भेजा है, में लिख दी है. आप इस पत्र को पढ़ें और मेरे निर्णय को स्वीकार कर, मेरी हौसलाअफजाई करें, ऐसा मेरा निवेदन है. अब इस प्रदेश में निष्ठा से काम करना हर किसी के बस की बात नहीं. अतः अब मुझे शांति से सेवानिवृत होने का मन है. जीवन के बचे क्षण जनसामान्य के रूप में उन्मुख भाव से जी कर उसकी पीड़ा का स्वमं अनुभव करना चाहता हूँ. या फिर जैसी मेरी नियति ऊपरवाले ने लिखी हो, उसे सहर्ष स्वीकार करूँगा. सेवा निवृति के स्वीकृति आदेश तक मैं अपने वर्तमान पद यथावत कार्य करता रहूँगा. आप के लिए व समाज के लिए लड़ाई जारी रहेगी. मित्रों, दोस्ती की वास्तविक परीक्षा अब होगी.

आपका,
भवदीय
डॉ. सूर्य प्रताप सिंह

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मूल पत्र निम्नवत है :
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पत्रांक ७५४ /प्र०स० / सा०उ०वि० /२०१५ लखनऊ दिनांक २३ जुलाई, २०१५

प्रेषक:
डॉ.सूर्य प्रताप सिंह, आई.ए.एस.
प्रमुख सचिव, सार्वजनिक उद्यम विभाग ,उत्तर प्रदेश शासन

सेवा में:
श्री आलोक रंजन, आई.ए.एस.
मुख्य सचिव, उ.प्र. शासन, लखनऊ

आदरणीय महोदय:
विषय: अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु सह रिटायरमेंट लाभ) नियमावली(यथा संशोधित), नियम १६(२)/ सुसंगत नियम के तहत स्वैछिक सेवानिबृति हेतु आवेदन/नोटिस

निवेदन है कि मैं वर्ष १९८२ में भारत की एक ऐसी सेवा, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में आया, जिसपर न केवल इस सेवा के अधिकारियों का समस्त परिवार, कुनवा और गाँव/शहर गर्व करता था, अपितु इस सेवा को ब्रिटिश औपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद सम्पूर्ण भारत के जनसामान्य ने भी सम्मान और आशा की द्रष्टि से देखा था, आज की परिस्थिति बदल सी गयी है| एक आईएएस जब किसी जिले का जिलाधिकारी यानी कलेक्टर बनकर पदस्थ होता था, उसका अत्यधिक सम्मान होता था, वह पूरी ईमानदारी, कार्यकुशलता, संवेदनशीलता, मेहनत और लगन के साथ काम करके जिले का कायापलट करने का जजवा रखता था, आज की परिस्थिति कुछ और ही नज़र आती है |

होता यह है कि अगर कोई अधिकारी निष्ठा व कर्मठता का परिचय देना आरंभ करता है तो स्थानीय राजनैतिक लोग उसे सही रास्ते पर चलने नहीं देते, स्वार्थपर्तावश या कार्यकर्ताओं के बहाने राह में रोड़ा अटकाते हैं । जरा-जरा सी बात पर शिकायतों के माध्यम से उस अधिकारी के सिर पर निलंबन या स्थानांतरण की तलवार लटकना आम बात है। अगर किसी अफसर ने जनप्रतिनिधि, यहाँ तक कि सत्तारूढ़ दल के ‘छूट भैया नेता’ की भी सही-गलत बात नहीं मानी, बस हो जाती हैं उनकी नजरें तिरछी। यही कारण है कि आज अफसरों ने भी अपने आप को राजनेताओं की मंशा के अनुरूप ही ढालने में भलाई समझी है, और बहती गंगा में हाथ धोने को ही अपनी कार्यशैली का अंग बना लिया। इससे दो काम तो हो गए – ‘राजनैतिक आका’ खुश हुये और अपना ‘व्यक्तिगत’ स्वार्थ भी पूरा हो गया, परन्तु पिसता रह गया, अभागा जन-सामान्य…… वह दर्द व् पीड़ा से कराह रहा है- वलात्कार, चोरी, दबंगई, रंगबाजी, भू-माफिया आदि सामाजिक उलझनों के सामने रोज-रोज बेबश होता है, कोसता है अपने अस्तित्व को |

सत्तर के दशक तक की समाप्ति तक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को बड़े ही सम्मान के साथ देखा जाता था। तब तक अधिकारियों को भय होता था कि अगर उन्होंने किसी से भी रिश्वत ली या कदाचार किया तो समाज उन्हें हेय दृष्टि से देखेगा। शनैः शनैः वह डर ख़त्म हो गया; नौकरशाह, मीडिया और राजनेताओं के गठजोड़ ने समूची व्यवस्था को ही पंगु बना डाला है। आज भी काफी बड़ी संख्या में अधिकारीगण कर्त्व्यनिष्ट बनकर काम करना चाहतें है, परन्तु ऐसे सब आज हासिये पर है, और ‘दागी’ और ‘मेनेजर टाइप’ के अफसर, चाहे कोई भी पार्टी सत्ता रूढ़ हो, केन्द्रीय भूमिका में बने रहतें है | मैं तीनो अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवायों अर्थात भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा(आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफएस) में रहा हूँ, मैं इस सेवाओं का बहुत सम्मान करता हूँ, परन्तु तीनो सेवाओं में आज ‘पद का लालच’, ‘आत्म-सम्मान’ से ऊपर हो गया है | भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) ने अपनी दो सहयोगी सेवाओं, भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफएस), के प्रति सेवा-सम्बन्धी मामलों में बड़े भाई के रूप में ‘उदार व संरक्षक’ की भूमिका नहीं निभाई और उन्हें निराश किया, जिसके कारण इस तीनो सेवाओं में एकजुटता का आभाव बढता गया, परिणाम स्वरुप जनहित उपेक्षित होता गया, ‘स्वार्थी व् कुटिल तत्वों’ ने राजनीति की आड़ में इन अखिल भारतीय सेवाओं की आपसी फूट का खूब लाभ उठाया और अपने स्वार्थों की पूर्ति की|

भारत के संसदीय लोकतंत्र में प्रशासन को चलाने की जिम्मेदारी में कार्यकारी निर्णयों, जिनको जनसेवकों द्वारा कार्यान्वित किया जाना था, में राजनैतिज्ञो का हस्तक्षेप बढता गया और नौकरशाही का गिरता मनोबल व् बढती स्वार्थपरता ने प्रशासनिक व्यवस्था को पंगू बना कर रख दिया है, यही कारण है कि आज उ.प्र. जैसे राज्य में ‘पदानुक्रमित प्रणाली’ (Hierarchy) ध्वस्त हो चुकी है, वरिष्ट अधिकारी संरक्षक की भूमिका में असहाय व् विवश से लगते हैं, अधीन अधिकारियों को छोटी-मोटी गलती पर बुलाकर समझाने की प्रथा समाप्त हो गयी है, इस लिए इस प्रकार की त्रुटियों पर समझाने के बजाए ‘राजनैतिक आक़ाओं’ की ‘हाँ-में-हाँ’ मिला कर ट्रान्सफर या निलंबन कर दिया जाता है; ‘आका खुश तो सब अच्छा’ को नियति मानकर अपने पद पर लम्बे समय तक टिके रहने को ‘सफलता’ का आधार मान लिया गया है | भारत सरकार (DOPT) के निर्देश पर तीनो अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारीयों के लिए बनाये गए ‘सिविल सर्विसेज बोर्ड’ उ.प्र. में लगभग मृत प्राय है, जिसका उदेश्य इन सेवाओं के अधिकारियों को राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने तथा कम से कम दो वर्ष का एक स्थान पर कार्यकाल सुनिश्चित करने का था, परन्तु आज उलटी व्यवस्था है , अधिकारिओं को सार्वजनिक रूप से ताली बजवाने की शेखी में इस बोर्ड के अनुमोदन के बिना ही मौखिक ट्रान्सफर कर दिया जाता है, तथा बोर्ड के सदस्य ‘कटपुतली’ की तरह बाद में हस्ताक्षर करते रहतें है |
उत्तर प्रदेश जैसे आर्थिक, सामाजिक व् राजनैतिक रूप से ‘पिछड़े’ राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था की स्थिति आज भयावय है | यंहा ‘नौकरशाही’ का बहुत बड़ा वर्ग ‘जाति’ तथा ‘राजनैतिक’ विचारधारा के आधार पर बट गया है | ‘सत्ता’ परिवर्तन से पूर्व ही यह पता होता है कि कौन नौकरशाह सत्ता के शीर्ष वाले किस-किस पद पर आसीन होगा| यंहा तक सुनने में आता है कि मलाईदार उच्च पदों के लिए बोली लगायी जाती है | उत्तर प्रदेश में पिछले १०-१५ सालों में गिरती प्रशासनिक व्यवस्था को मैंने खुली आखो से देखा है, मेरे अध्धयन अवकाश पर जाने से पूर्व तथा वापिसी के वर्षों (२००४-२०१३) के बीच इतना बड़ा अंतर देखने को मिला कि मैं हतप्रद हूँ, सन २००० के बाद से गिरावट आना शुरू हुई और आज शायद चरम पर है | आज प्रति सप्ताह लगभग २-दर्ज़न आईएएस/आईपीएस/आईएफएस अधिकारियों के ट्रान्सफर हो रहे है, PCS/PPS/अन्य कैडर के अधिकारियों के ट्रांस्फर्स की तो कुछ पूछो ही नहीं, पिछले १५ सालों में देश में कुल २०० आईएएस/आईपीएस/आईएफएस अधिकारियों का निलंबन हुआ, जिसमे से १०५ केवल उत्तर प्रदेश से है | विभागों में मंत्रीगण का एक ही काम रह गया है, पैसे लेकर अफसरों/कर्मचारियों का ट्रान्सफर करना, मैंने पिछले २ वर्ष में किसी अपने मंत्री को कभी विभागी बजट या योजनाओं की समीक्षा करने की पहल करते नहीं देखा |

जिलाधिकारियों/ मंडलायुक्तों/उच्च पुलिस अधिकारियों का सार्वजनिक रूप से अपमान आम बात हो गयी है | नौकरशाही का मनोबल गिरा हुआ है, किसी पद पर अत्यन्त अल्प-कार्यकाल होने के कारण अधिकारियों को अपनी कार्यछमता दिखाने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है | पुलिसकर्मीयों के बिल्ले नोंचने, वर्दी फाड़ने, अभियांताओं व अधीन अधिकारियों के साथ मारपिट व् धमकाने की घटनाएँ आम हो गयी है | सरकारी कार्यों में ‘टेंडर’ प्रणाली मात्र कागजी खाना पूरी रह गयी है, जिसे विभागीय मंत्री काम देना चाहतें है, टेंडर की कागजी खाना पूरी करके, दे दिया जाता है | जन-सामान्य की FIR तक लिखी नहीं जाती, साधारण से साधारण कार्य भी बिना सिफारिश के नहीं हो पाता | शिक्षक तथा कर्मचारीवर्ग की मांगे बिना आन्दोलन के सुनी नहीं जाती, यह आलम पहले ऐसा न था | गुणवत्ता/वरिष्टता से इतर, जाति आधारित ट्रान्सफरों, प्रोन्नतियों व भर्तियों से कर्मचारियों/अभ्यर्थियों का मानोबल टूट रहा है, अविश्वास व् हीनभावना पीड़ा दे रही है | मैंने स्वमं पिछले २ वर्षों में ७ विभागों में अपनी अदला-बदली देखी है | प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारियों के ट्रान्सफर कभी इतनी जल्दी-जल्दी नहीं होते थे, जिसका प्रभाव नीतिगत निर्णयों की सततता पर पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन शायद किसी को इस बात की परवाह नहीं है |

प्राशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे ‘राजनैतिकगणों’ में ५४% अपराधिक प्रष्टभूमि तथा बहुत कम पढ़े लिखे होने के कारण ‘नीतिगत’ निर्णयों में उनकी सक्रिय भागीदारी लगभग नगण्य है, वे स्वार्थपरता के वशीभूत निर्णय लेने में ज्यादा रूचि दिखातें है, उन्हें प्रमुख सचिव/जनसेवक का परामर्श हितकर नहीं लगता, जिसने ऐसी व्यवस्था को जन्म दिया कि नौकरशाह और राजनेता ने गठजोड़ कर लिया और जिस प्रसाशनिक व्यवस्था की परिकल्पना ‘लौह पुरूष’ सरदार बल्लभ भाई पटेल ने की थी, को ध्वस्त कर नयी ‘निजी स्वार्थ सर्वोपरि, जन-हित गर्त में गया’ की ‘अव्यवस्था’ में परिवर्तित कर दिया, मीडिया ने भी सजग प्रहरी की भूमिका न निभाकर, इस गठजोड़ से हाथ मिला लिया और छला कौन गया ….. प्रेमचंद के गोदान का ‘होरी’ यानि कि जन-मानस | आज जब मैं मीडिया में सार्वजनिक मुद्दों पर राजनेतायों या पार्टी छुटभैया को बहस करते तथा अपनी-अपनी पार्टियों का बचाव करने हेतु कुतर्क व अनाप-सनाप बातें करते सुनता हूँ…. तो हँसना आता है उनकी उथली–खोखली, झूटे सपने दिखाने वाली बातों पर… और रोना आता है लोकतंत्र के भविष्य पर | चुनावो में पैसे तथा प्रचार-विज्ञापनों पर खर्चा कंहा से आता है …कोई हिसाब देने को तैयार नहीं | उ.प्र. में आज कलेक्टर को जनपद में शराब की बिक्री में बृधि के लिए कहा जा रहा है यानि कि ‘शराब सिंडिकेट’ की मदद के लिए शासनादेश निकाला जा रहा है …..वाह! वाह! क्या बात है … ऐसा लग रहा है कि ‘शराब सिंडिकेट’ के घर पर ही शासनादेश का ड्राफ्ट तैयार किया गया हो |

आज उत्तर प्रदेश में रोजाना लगभग ८ वलात्कार तथा ११ हत्याएं हो रही है | गत वर्ष ४०,००० से अधिक ‘हिंसक-अपराध’ हुए | २,००० से अधिक वलात्कार तथा ५,००० से अधिक हत्याएं हुईं | देश में सबसे असुरक्षित १० स्थानों (हत्या व वलात्कार के कारण) में से ५ उत्तर प्रदेश में है| पुलिस थानों में एक वर्ग विशेष के दरोगाओं की तैनाती की बात से पुलिस में जनसामान्य का विश्वास डगमगाया है, कानून व्यवस्था के लिए पुलिस-प्रशासन का तटस्थ होना व दिखना अति आवश्यक है, ऐसा आभास होना कि पुलिस केवल सत्ता पक्ष के लिए है, अत्यन्त गैर-पेशेवर धारणा है और यही हो रहा है आज के उत्तर प्रदेश में | महिलायों के प्रति संवेदनशीलता की बातें खूब होती है, परन्तु वास्तविकता इसके इतर है …..जन प्रतिनिधियों द्वारा ऐसी बातें…” लड़कों-बच्चों से अक्सवर गलतियां हो जाती हैं ” आदि के कारण जाति विशेष के दरोगा अब थानों में पत्रकार की माँ तक तो हबिश का शिकार बनाने और असफल होने पर जलाकर मारने से भी नहीं चूकते …कारण ऊपर बचाने वाले जो बैठें है …आरोप के अनुसार ‘जाति-विशेष’ के प्रभावशाली मंत्री के इशारे पर पत्रकार को जलाकर मारने से भी कोई गुरेज नहीं हुआ …गिरफ्तारी तो होगी नहीं और न आज तक हुई | लेखपाल, अमीन, बाबू की तो बिसात ही क्या…. मंत्रीगण व उनके गुर्गे ARTO तक को पिट रहें है, कपडे फाड़ रहे है, ‘कानून का राज्य’ बेमानी धारणा बन कर रह गयी है, ऊपर से यह ‘ सफ़ेद-झूट’ भी कहा जाता है कि उ.प्र. में अन्य राज्यों से बहतर कानून व्यवस्था है |

आज कुछ अधिकारीगण अपने कर्तव्य के बशीभूत यदि कुछ जनहित के अति-आवश्यक मुद्दे उठातें है, तो कभी यह जानने का प्रयास किया जाना चाहिएकि कारण क्या है ? जनसेवक को जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशील होना क्या आचार संहिता का उल्लंघन है? मैंने जनमानस की मौन स्वीकृति के वशीभूत होकर, सामाजिक व्यवस्था के दर्द व असंतोष को एक जन-सेवक के रूप में जन-हित में उठाया | मैं, सामान्यतः व्यक्तिगत या संस्थागत आलोचना से बचता रहा हूँ | अब तक निम्न मुख्य सार्वजनिक मुद्दे ‘जनहित’ में उठायें है, जिन पर व्यापक जन समर्थन मिला है :

1. प्रदेश में ‘बोर्ड परीक्षायों’ में व्याप्त ‘नक़ल’ का मुद्दा: “नकल रोको अभियान’ चलाया | उ.प्र. में शिक्षा का गिरता स्तर का मुद्दा उठाया |
2. आजीवन दुर्धर्ष संघर्ष से जूझते किसानो की इस वर्ष हुई ओलाब्रष्टि में रु.७,५०० करोड़ की अवितरित क्षतिपूर्ति व् किसानो के आत्महत्या का मुदा उठाया, गत वर्ष सुखा राहत का रु. ४९० करोड़ का वितरण न होना तथा गन्ना किसानो का रु. ११,००० करोड़ का लंबित भुगतान आदि के सभी मुद्दे ‘किसान-हित’ व ‘जन-हित’ में उठाये गए |
3. प्रदेश में बिजली मूल्य में ७०% जनविरोधी बृद्धि:, बिजली विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार व VIP जनपदों में बिजली चोरी की खुली छूट का मुद्दा उठाया |
4. लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव के भ्रष्टाचार, जातिवाद, कदाचार का मुद्दा तथा अन्य भर्ती आयोगों जैसे अधीनस्थ चयन आयोग, माध्यमिक चयन आयोग, में एक ही जाति के अध्यक्ष व हो रही नियम विरुद्ध व्यापक भर्तियाँ/भ्रष्टाचार के आरोप/मुद्दे उठाये तथा समर्थन किया | वेरोजगारी तथा युवायों में सरकारी भर्ती में घुटालों, जाति आधारित भर्ती, पिछड़ा जातियों के २७% कोटा के विरुद्ध २१% तक एक ही जाति के लोगो की भर्ती और वह भी क्षेत्र विशेष के लोगो की, से बढता आक्रोश का मुद्दा उठाया | उ.प्र. लोक सेवा आयोग का कारनामा कि यूपी में बने ८६ एसडीएम में से ५६ एक ही जाति के बने, का मुद्दा उठाया ।
5. शाहजहांपुर में श्री जगेन्द्र सिंह पत्रकार को सत्ता पक्ष के प्रभावशाली नेता वर्ग द्वारा जलाकर मारने, व बाराबंकी में पत्रकार की माँ के साथ दरोगा द्वारा वलात्कार का प्रयास तथा जलाकर मारने का मुद्दा, जिनमे अभी तक कोई गिरफ्तारी/कारवाही नहीं हुई, को प्रभावी ढंग से उठाया |
6. आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (लागत:रु.१५,००० करोड़) पर छ: “शक की सुईयां” उठाई- जिसमें इस परियोजना के केवल ४-५ जनपदों ,एक VIP गाँव व भूमाफिया/रियल एस्टेट एज़ेट्स के लाभार्थ उदेश्य को उजागार किया गया |
7. उ.प्र. में सड़कों की खस्ता हालत और रु.१५,००० करोड़ से केवल २३२ गाँव (आवादी लगभग ८०,०००) और ५ जनपदों, मुख रूप से एक वीआईपी जनपद व गाँव को लाभान्वित करने की योजना (आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे) तथा भूमाफियाओं को लाभ पहुचने के उद्देश्य का मुद्दा उठाया | ऐसे हाईवे प्रदेश के १लाख ७ हज़ार गाँव तथा २० करोड़ की सम्पूर्ण आवादी को क्यों नहीं ? आदि का मुद्दा उठाया | उपरोक्त धनराशि के १/५ अंश से ही प्रदेश की अधिकांश सड़कें ठीक हो सकती थी, यह एक एकतरफा प्राथमिकता (lopsided priority) का द्रष्टान्त लगता है |
8. उत्तर प्रदेश में जब तक नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा/UPSIDC को राजनेतायों व अफसरशाही की चारागाह बनाये रखा जायेगा तथा उत्तर प्रदेश में उद्योगों का शोषण बंद नहीं होगा, नवीन निवेश के MOU तो खूब पूर्व में भी हुए है और आगे भी प्रचार के वास्ते मुर्ख बनाने के लिए होते रहेंगे, परन्तु निवेश नहीं आ सकता | हाँ, यादव सिंह जैसे नव धनाड्य जरूर पैदा होते रहेंगे और स्वार्थी राजनीतिज्ञों का संरक्षण भी पाते रहेंगे, निष्ठावान अधिकारी/कर्मचारी ठिकाने लगते रहेंगे..अन्यायपूर्ण ढंग से प्रताड़ित होते रहेंगे..परन्तु निवेश नहीं आएगा |
9. यमुना एक्सप्रेसवे में रु.१,८६,००० करोड़ का सरकार/नॉएडा को नुकशान हुआ, कैग की रिपोर्ट विधमान है, परन्तु कुछ प्रभावशाली राजनेताओं व नौकरशाहों के फंसे होने के कारण पिछले कई वर्षों से बिना उचित जांच के यह गंभीर प्रकरण लंबित है,जिसकी सीबीआई जांच के मांग की शिकायत भी अनिस्तारित है, का मुद्दा उठाया |
10. 10. शुगर कारपोरेशन की १० चीनी मिलों को, औने-पौने दामों में भूमाफिया व् बिल्डर्स को बेच दिया गया, यंहा तक कि रु.४००-५०० करोड़ की परिसम्पतियों- मशीनरी, बिल्डिंग , भूमि तथा चीनी का स्टॉक आदि को मात्र रु. १०-३० करोड़ में ही निजी स्वार्थवश बेच दिया गया, एक-एक चीनी मिल में १५०-२०० बीघा जमीन शहरी क्षेत्र से सटी थी, कैग की रिपोर्ट पर सीबीआई से जांच की मांग की गयी थी, का मुद्दा उठाया गया |

इस प्रकार के मुद्दे सरकार की आलोचना नहीं, अपितु सहयोगार्थ उठाये गए है | उपरोक्त मुद्दों पर विचार विमर्श होना चाहिए और समाधान निकाला जाना चाहिए, ताकि पीड़ित जनता को राहत मिल सके न कि इन महत्पूर्ण मुद्दे को उठाने वाले जनसेवकों को प्रताड़ित करने का तथा सबक सिखाने का प्रयास किया जाये …यह न्यायपूर्ण व्यवस्था नहीं होगी |

उत्तर प्रदेश का आज का राजनैतिक एवं प्रशासनिक परिवेश ‘सर्वजन-हिताय, सर्वजन-सुखाय’ से इतर ‘निजि-हिताय, निजि-सुखाय’ की ओर ज्यादा अग्रसर होता लग रहा है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है | लोकतंत्र की परिभाषा के अनुसार यह “जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है”। भारत एक समतावादी-उदार लोक तंत्र है, जिसके चरित्रगत लक्षणों में व्यक्ति व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक व आर्थिक समानता, मानवधिकारों की रक्षा, धर्म निरपेक्षता, जन-धन की सुरक्षा (विशेष रूप से महिला/बच्चों की सुरक्षा) और सामाजिक-न्याय जैसी अवधारणाओं का प्रमुख स्थान रहा है, मुझे यह सब आज के उत्तर प्रदेश में होता नहीं लगता । डॉ. राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था कि ‘जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं’, परन्तु उत्तर प्रदेश की जनता पिछले कई वर्षों से यंहा यही सहने के लिए विवश है …..कुपित है….आक्रोशित है …परन्तु कुटिल जातिवादी …परिवारवादी …छद्म धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था न उसे जीने देती है और न ही मरने | आत्महत्या करके भी कुछ नहीं मिलता …ओलाब्रुष्टि के दौरान सैकड़ों किसानो ने हाल ही में ही जान से हाथ धोये…आत्महत्याएं की …..परिवारों ने खूब रोया चिल्लाया …फिर भी किसी का मन नहीं पसीजा .. पूरा मुआवजा आज तक नहीं मिला | विरोध करने वालों को डर है कि कंही जलाकर न मार डालें जांए क्यों कि….. ‘आज के उत्तरप्रदेश’ में सबक सिखाने का यही नया चलन है…..नयी न्यायिक व्यवस्था है …यंहा कोर्ट-कचहरी की जरूरत नहीं…विरोध के दंड की सजा की नयी परिभाषा लिखी गयी है… हमारे प्यारे उत्तर प्रदेश …क्या उत्तम प्रदेश की ओर अग्रसर है …या वोट बैंक के लिए तुष्टिकरण के वशीभूत …बेपरवाह प्रशासनिक व्यवस्था …खाली खजाना …बिगडती कानून व्यवस्था …यौनाचार से महिला बच्चो की चीत्कार … जलाकर मारने की क्रूर ‘नयी दंड व्यवस्था’ ….. …जातिवाद…क्षेत्रवाद ….छदम धर्मनिरपेक्षता … ने क्या इसे उल्टा-पुल्टा प्रदेश नहीं बना दिया है?….. सर जी, आप ही बताईये | अब इस प्रदेश में निष्ठा से काम करना हर किसी के बस की बात नहीं…अतः अब मुझे शांति से सेवा निबृत होने का मन है..जीवन के बचे क्षण जनसामान्य के रूप में उन्मुख भाव से जी कर उसकी पीड़ा का स्वमं अनुभव करना चाहता हूँ..या फिर जैसी मेरी नियति ऊपरवाले ने लिखी हो ..उसे स्वीकार करूँगा | मैं उन सभी का आभारी हूँ जो मुझे प्यार करते है ..और उनका भी जो नहीं… | कुछ लोग मेरे दिमाग का स्क्रू ढीला बताते है …मैं उनका भी आभार व्यक्त करता हूँ क्यों कि जन सामान्य तो मुझे फेसबुक पर कह रही है कि मेरी भांति उन्हें भी अपने दिमाग का स्क्रू ढीला कराना है….अतः ऐसा होना शायद गर्व की बात है | वैसे भी कुछ लोग मानते है कि शोषक-समाज के कुछ क्रूर वर्गों की करतूतों व हथकण्डों का पर्दाफाश के लिए शायद दिमाग का कुछ स्क्रू ढीला होना जरूरी है |

उपरोक्त व्यथित हृदय की वेदना के वशीभूत मैं निवेदन करता हूँ कि मुझे अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु सह रिटायरमेंट लाभ) नियमावली(यथा संशोधित), नियम १६(२)/ सुसंगत नियम के तहत स्वैछिक सेवानिबृति दे दी जाये | मैं अत्यन्त आभारी होऊंगा | यदि इस पत्र में मुझसे कोई त्रुटि या अशिष्टता हो गयी हो तो मैं माफ़ी चाहता हूँ| आपका हृदय बड़ा है, आप मुझे अवश्य कृतार्थ करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है |
ससम्मान
भवदीय
(डॉ. सूर्य प्रताप सिंह)


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इंस्पेक्टर हजरतगंज बोले- आईपीएस अमिताभ ठाकुर को मुलायम सिंह यादव ने धमकी दी, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई, प्रार्थनापत्र खारिज

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रामगोपाल यादव बोले- आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के दिमाग का स्क्रू ढीला!

Yashwant Singh : मुलायम ने आईपीएस Amitabh Thakur को सीधे फोन कर हड़काया तो रामगोपाल ने आईएएस Surya Pratap Singh के दिमाग का स्क्रू ढीला बताया. रामगोपाल ने सूर्य प्रताप सिंह के बारे में शर्मनाक बयान मीडिया के सामने दिया है, ऐसा यह वीडियो देखकर लगता है.

सपा के इन दिग्गज नेताओं को प्रदेश में किसी अन्य आईपीएस और आईएएस से दिक्कत नहीं है. सिर्फ अमिताभ ठाकुर और सूर्य प्रताप सिंह आंखों में चुभ रहे हैं. आपको भी वजह पता है. रामगोपाल का आईएएस सूर्य प्रताप के बारे में बयान किसी चैनल पर नहीं चला और न ही किसी अखबार में छपा है. इसलिए आप लोग इसे देखिए व दूसरों को दिखाइए. लिंक ये है: goo.gl/BERVUM

आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के बारे में आप ज्यादा नहीं जानते हों तो इस वीडियो को देख सुन लीजिए, खुद समझ आ जाएगा कि ये अफसर कितना बेबाक और कितना जनपक्षधर है: goo.gl/3EXxVS

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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बीबीसी के अनुसार आईपीएस अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी शीघ्र संभव!

Surya Pratap Singh : सुनो सर जी, ऐसा क्यों हो रहा है? बीबीसी के अनुसार- बलात्कार के आरोप में अमिताभ ठाकुर की शीघ्र गिरफ़्तारी संभव… क्या उ.प्र. में ‘आंख के बदले आंख’ यानि ‘प्रतिशोध का कानून’ (The Law of Retaliation)” लागू !!! अब उ.प्र. होगा ‘आँख रहित व दांत रहित’ प्रदेश!!! इस uncivilized सिधान्त को लातिनी भाषा में Lex Talionis कहते है, यानि ‘मौत के बदले मौत व आँख के बदले आँख ‘ की सजा| यह ‘प्रतिशोधात्मक दण्ड प्रणाली’ , प्राचीन समय में अल्प विकसित सभ्यताओं के युग की पहचान थी|

प्राचीन सभ्यताओं का यह कानून ‘बेबीलोन कानून’ (Babylonian Law) के रूप में भी बाद में प्रचलित हुआ , जिसमे यदि गलती से भी या दुर्घटनावश किसी का हाथ या पैर छतिग्रस्त हो जाये तो ‘पीड़ित-व्यक्ति’ को यह हक ही नहीं, बल्कि यह करना ही पड़ता था कि उसे न चाहते हुए भी ‘दोषी-व्यक्ति’ का हाथ या पैर काटना ही पड़ता था… कोई चॉइस नहीं थी| महिलाओं के लिए तो बहुत कड़े गुलामियत भरे कानून थे| भारत में भी ‘सामंती’ युग में ऐसी व्यवस्था व दृष्टांत सुनने को मिलते थे|

इस्लामी शरीयत कानून के “नाम” पर आज भी कुछ देशों में कुछ ‘तत्वों’ द्वारा “एक आंख के लिए आंख” का दंड दिया गया,के उधारण मिल जातें है , जो यदपि बहुत कम, इक्का-दुक्का ही हैं| रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष करने वाले मार्टिन लूथर किंग (Martin Luther King, Jr.) ने कहा था “आंख के लिए आँख” का बर्बर कानून हर किसी को अंधा छोड़ देता है, जो नितांत अमानवीय था। यह कानून सारी दुनिया को अँधा बनाने में सक्षम था| यह ‘अंधा’ कानून नहीं बल्कि ‘ मनोरोगियों या कर्म व बुद्धि से अन्धो का अँधा कानून’ था|

जैसे-जैसे सभ्यताओं का विकास होता गया, इस बर्बर कानून का त्याग होता रगया…क्यों कि ‘आंख के बदले आंख ‘ यानि इस प्रतिशोध के कानून ने सामाजिक ताने-बाने को धीरे धीरे छिन्न-भिन्न कर दिया| आज के युग में “Rule of Law” या ‘Natural Justice’ का सिधान्त स्थापित किया गया और लिखित नैसर्गिक न्यायसंगत कानून बनाये गए| परन्तु यह क्या?…… उत्तर प्रदेश में ….यंहा क्या ….आंख के बदले आंख….दांत के बदले दांत….प्रतिशोध का कानून… फिर लागू हुआ है ……जिसमे नैसर्गिक न्याय का कोई स्थान नहीं….

….मेरा एक मित्र कह रहा था …लगता है कि उ.प्र. में एक बार फिर से “An Eye for an Eye, A tooth for a tooth” यानि “आंख के लिए आंख, दांत के लिए दांत” का सामंती कानून लागू करने का प्रयास हो रहा है. ….. जो सारे प्रदेश को अँधा ….व दांत रहित ….न बना दे ……ऐसी आशंका हो रही है…. बीबीसी के अनुसार- अमिताभ ठाकुर की शीघ्र गिरफ़्तारी संभव है …..लखनऊ पुलिस अधीक्षक ने बीबीसी को बताया, “महिला के कलमबंद बयान दर्ज किए जाएंगे और मेडिकल कराया जाएगा.” उन्होंने कहा, “आरोपों की सत्यता की जाँच के बाद अमिताभ ठाकुर को गिरफ़्तार भी किया जा सकता है.”

आवाहन! आवाहन!…… आओ कुछ विचारें ……कुछ करें…. कुछ सुधारें….. कुछ सुधरें .. प्रथम दिवस ..काफी कुछ मीडिया …. और राजनैतिक संगठन …लगभग मौन…..बड़ी बड़ी बातें..खाली पीली….व्यक्तिगत-सम्बंधनों व प्रलोभनों आदि .. के बोझ तले…दवा-पिसा सा लग रहा है ….सब कुछ …..हां सब कुछ.

यूपी कैडर के सीनियर आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.


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किसान खुदकुशी मामले में आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने बाराबंकी के डीएम के बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार दिया

Surya Pratap Singh : बाराबंकी में सत्ता की चौखट पर आशाराम ने फ़ासी लगाई. बैंकों और सूदखोरों के तगादे से त्रस्त किसान आशाराम ने शनिवार देर रात बाराबंकी में डीएम आवास के सामने पेड़ से फांसी लगाकर जान दे दी. रविवार सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले लोगों व एडीएम पीपी पॉल ने पुलिस को सूचना दी. आशाराम ने डीएम के नाम संबोधित दो पेज के सूइसाइड नोट में सूदखोरों के दबाव की बात लिखने के साथ ही सीएम से अपने अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह भी किया है.

किसान के सुइसाइड नोट का कुछ अंश इस प्रकार है:  “कुछ पैसे मैंने विजय यादव से लिए थे, इस पर उन्होंने मेरी जमीन का इकरारनामा करवा लिया। यह पैसा सुरेश चन्द्र मिश्रा ने विजय को दे दिया है। सुरेश चन्द्र मिश्रा अब पैसा चाहते हैं। न दे पाने पर मुझे अपनी जमीन का बैनामा करना पड़ेगा। मैं अब जीना नहीं चाहता हूं।”

डीएम का गैर जिम्मेदाराना बयानः ”किसान आशाराम शराबी था।”

प्रश्न: यदि शराबी था तो कर्जदार मान कर आत्महत्या का आधार देकर शासन से मुआवजा क्यों माँगा?

प्रदेश की सच्चाई:

1. वर्तमान ओला ब्रष्टि से उ. प्र. में ३०० से ज्यादा किसानो की मौत हो चुकी है. अभी तक रु. 7 लाख प्रति किसान को दिए जाने के वादे के विरुद्ध एक भी किसान को मुआवजा नहीं.

2. वे कहते हैं कि किसी किसान ने ओला ब्रष्टि के नुकसान से आत्महत्या नहीं की. क्या उसे शौक था ऐसा करने का.

3. 89% किसान ऐसे हैं जो साहूकार, बैंक या अन्य संस्थायों के कर्ज से दबा है. राहत के कोई उपाय नहीं किये गए. बैंक और साहूकार का कर्जा माफ़ नहीं. केवल फसली ऋण ही defer किया गया.

4. रु. 4500 करोड़ के नुकसान के सापेक्ष, किसानों को मुआवजे के नाम पर ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ वह भी आधा अधूरा.

5. 75-80% आबादी रोजी रोटी के लिए खेती पर निर्भर है, ऐसी खेती का धंधा जो इतना जोखिम भरा है, छोटे किसानों को फसल बीमा सुरक्षा क्यों नहीं. जो भी बीमा सुरक्षा है वह केवल बड़े किसानों के लिए है, जिन्होंने KKC (किसान क्रेडिट कार्ड) बनवा रखा है.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.


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यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने लोकतंत्र और चोरतंत्र के बीच अंतर समझाया

Surya Pratap Singh : लोकतंत्र (DEMOCRACY) और चोर-तंत्र (KLEPTOCRACY) का रोचक अंतर… लोकतंत्र का सीधा मतलब है – लोगों के लिए, लोगों के द्वारा, लोगों की सरकार है. लोगों के लिए सरकार का मतलब: सरकार का एकमात्र उद्देश्य जनसामान्य की प्राथमिकताएं व आकांक्षाओं को पूरा करना. लोगों के द्वारा सरकार का मतलब: सरकार लोगों के द्वारा चुनी जाये तथा चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हो. लोगों की सरकार का मतलब: सरकार में मंत्री गण या चलाने वाले सही मायने में लोगो के बीच से हों- जनता सच्चे व् ईमानदार व्यक्ति को ही अपना मंत्री देखना चाहती है जो सद्चरित्र भी हों.

चोर-तंत्र या कुलीन-तंत्र का मतलब है: लोकतंत्र की आड़ में सत्ता ऐसे लोगो के हाथ में चली जाये जो राज्य के प्राकृतिक संसाधनों (बालू, खनन, कोयला आदि) तथा राजकीय कोष जनता के हित में न उपयोग करके निजी हित को सर्वोपरि मान कर खर्च करे. इसमें परिवारवाद, जातिवाद, भाई भातीजावाद, क्षेत्रवाद व राजनैतिक तथा प्रशासनिक अधिकारियों की दुरभि संधि जैसे दोष साधारणतया प्रभावी होतें है. सभी निर्णय इन्ही दोषों के अधीन होते हैं. सत्ता में स्थित लोगों द्वारा सार्वजनिक धन के स्वार्थीपूर्ण दुर्विनियोजन, धोखाधड़ी,भ्रष्टाचार प्रणालीगत गंभीर समस्या बन जाती है, और जनभावनायों का अपमान होता है. इस व्यवस्था से अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है तथा नागरिक अधिकारों का हनन आम बात हो जाती है. लेकिन ये सब होता है लोकतंत्र की आड़ में ही. यानि बाहर से लोकतंत्र तथा अन्दर से चोर-तंत्र का दंश. सत्ता कुछ मुठ्ठी भर राजनेताओं व प्रशासकों या उनके पारिवारिक सदस्यों तक सिमट कर रह जाती है.

आप निर्णय करें कि आज की स्थिति क्या है?

यदि आज महात्मा गाँधी होते तो, अश्रु नयन के साथ दुखी होते.
आज के परिवेश में गाँधी की विरासत के निम्न पहलू केवल हमारे लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं.
पहला – अन्यायपूर्ण क़ानूनों या सत्तावादी सरकारों का अहिंसक विरोध
दूसरा – दो धर्मों के बीच आपसी समझ को बढ़ावा और धार्मिक सहिष्णुता
तीसरा – एक ऐसा आर्थिक ढाँचा जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ ना करे
चौथा- सार्वजनिक बहस में शालीनता और सार्वजनिक लेन-देन में व्यक्तिगत पारदर्शिता
पांच – जाति और लैंगिक समानता
गाँधी जी ने क्या सोचा था किआज हम कंहा पहुच गए? – आकंठ हिंसा, दुराचार,भ्रस्टाचार, जातिवाद ,परिवारवाद आदि आदि……क्या नहीं है आज|
महात्मा गाँधी ने राजनीतिक जीवन में सदाचार, सच्चाई और ईमानदारी पर ज़ोर दिया था| उन्होंने ग़रीब तबक़े के विकास को सच्चा विकास कहा, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जातिवाद और हिंसा से दूर रहने का सबक़ सिखाया.
आज यंहां राजनीतिक जीवन में ईमानदारी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती. विकास हो रहा है लेकिन ग़रीबों और पिछड़ों का नहीं बल्कि महानगरों में रहने वाले मध्यवर्गीय और उच्चवर्गीय लोगों का. हिंसा, भ्रष्टाचार और जातिवाद हमारी बड़ी समस्याएँ हैं. नैतिकता और आदर्श आज सिर्फ़ एक कहानी बन कर रह गए हैं.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.

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