मीडिया की मदद से गरीब महिला के आंसू पहुंचे योगी तक, एसपी को पड़ी फटकार…देखें वीडियो

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत सिद्धार्थ नगर पहुंचे. जनसभा को सम्बोधित करने के दौरान पंडाल की भीड़ में बैठी एक गरीब महिला लगातार तख्ती लहराती रही. मीडिया के कैमरे जब महिला के इर्दगिर्द नजर आने लगे तो धीरे धीरे अफरातफरी सी मचने लगी. अव्यवस्था के बीच मुख्यमंत्री को अपना संबोधन बीच में ही रोकना पड़ा. Continue reading

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योगी राज में युवा उद्यमी के संघर्ष को मिली जीत, करप्ट अफसरों का गिरोह हारा

Ashwini Kumar Srivastava : योगी राज में देर तो है….अंधेर नहीं! क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ मेरे जीवन का अब तक का सबसे बेहतरीन तोहफा लेकर आये हैं…और वह है, सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार में फंसकर ढाई बरस की भयंकर देरी से तकरीबन दम ही तोड़ चुके हमारे आवासीय प्रोजेक्ट की मंजूरी। ईश्वर की कॄपा से अब हमारे मार्ग की हर वह बाधा दूर हो चुकी है, जिनसे घिर कर हम न जाने कितनी मुश्किलों में आन फंसे थे। हालांकि शासन को भी सुनवाई आदि प्रक्रिया में लगभग ढाई महीने का समय जरूर लगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के शिकायत तंत्र ने अंतत: मुझे न्याय दिलवा ही दिया। ढाई बरस से जिस फ़ाइल को सरकारी तंत्र में बैठे एक भ्रष्ट अफसर ने बिना किसी की परवाह किये रोक रखा था, उसे आखिरकार मजबूर होकर, बेमन से और बिना एक भी दमड़ी की घूस लिए ही मंजूर करके मुझे देना ही पड़ गया।

मेरे द्वारा की गई इस अफसर की शिकायत को पीएमओ और चीफ मिनिस्टर आफिस ने सही पाते हुए मेरे हक में यह फैसला दिया है….और वह भी बिना किसी सोर्स सिफारिश के या बिना एक भी पैसे की घूस दिए हुए ही। इसलिए अब मैं अपनी ही कही हुई बात में सुधार करते हुए यह स्पष्ट कर रहा हूँ कि योगी राज में देर तो है, पर अंधेर नहीं….कम से कम मेरे लिए तो अब नहीं है। जिस तरह मैंने एक आम नागरिक की ही तरह अपने हक की यह लड़ाई लड़ी थी और केंद्र व राज्य सरकार के सुनवाई तंत्र ने उस पर मुझे न्याय दिलवाया है, उससे मुझे अब यह उम्मीद जग गयी है कि कोई भी व्यक्ति इस सरकार में भ्रष्टाचार या किसी भी अन्य अन्याय आदि के खिलाफ बिना किसी हिचक और भय के लड़ाई लड़ सकता है।

इस लड़ाई में खुल कर मेरा साथ देने वाले Bhadas4media के Yashwant Singh का तो मैं दिल से बहुत ज्यादा आभारी हूँ। जिस समाज में ज्यादातर लोग खुद के खिलाफ हुए अन्याय या भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं खड़े हो पाते, उस समाज में यशवंत जी जैसे लोग भी हैं, इस पर मुझे आज भी यकीन ही नहीं होता…लेकिन यह मैंने न सिर्फ अपने मामले में बल्कि हमेशा देखा है कि यशवंत जी मेरे जैसे न जाने कितने अंजान लोगों के साथ अन्याय के खिलाफ जंग में एक ऐसा बिगुल बनकर बनकर साथ खड़े हो जाते हैं, जिससे हर अन्यायी की रूह तक कांप जाती होगी।

इस कामयाबी तक पहुंचने में मेरे माता-पिता का आशीर्वाद तो हमेशा ही निस्वार्थ रूप से मेरे साथ रहा है लेकिन एक और शख्सियत ऐसी हैं, जिनके आशीर्वाद के बिना मेरा यहाँ तक पहुंच पाना नामुमकिन था। वह हैं डीएवी के पूर्व प्रॉक्टर और लखनऊ के बेहद सम्मानित व रसूखदार इंसान श्री राम शंकर तिवारी ‘दादा’। वैसे तो उनका सहयोग व आशीर्वाद बचपन से ही मुझे हमेशा ही मिलता आया है। लेकिन नौकरी छोड़कर रियल एस्टेट में उतरने के बाद अगर मैं कहीं कुछ भी हासिल कर पाया हूँ तो वह सिर्फ दादा की ही बदौलत है।
जापान में रह रहे मेरे बड़े भाई को उनकी बहुत छोटी सी उम्र से ही ‘दादा’, उनकी पत्नी, जिन्हें हम बुआ जी कहते हैं, और उनके समूचे परिवार ने हमेशा पुत्रवत स्नेह दिया है। भैया की ही वजह से दादा व उनके परिवार ने मुझे भी हमेशा अपने परिवार का ही एक अंग माना है। दादा का जिक्र मैंने इससे पहले कभी नहीं किया क्योंकि ऐसा करके मैं कभी भी यह एहसास नहीं दिलाना चाहता हूँ कि उन्होंने अब तक जो भी मेरे लिए किया, उसका ऋण मैं सिर्फ धन्यवाद कहकर या आभार जताकर ही चुका दूंगा।

दरअसल, माता-पिता और भाई-बहनों यानी अपने परिवार के बाद दादा के ही एहसानों का ही ऐसा ऋण मुझपर चढ़ गया है, जो मैं शायद कभी चुका ही न पाऊं। बहरहाल, मुझ पर अपनत्व की बारिश करने वाले और दिल से मेरा भला सोचने वाले हर उस शख्स का मैं शुक्रगुजार हूं, जो मुझसे दूर है या मेरे कहीं आस-पास ही है। मैं जानता हूँ कि खुशी की इस घड़ी में सबका नाम लेकर आभार व्यक्त कर पाना अभी संभव नहीं है लेकिन जुबां पर नाम भले ही न आ पाया हो लेकिन मेरा अजीज और खैरख्वाह हर इंसान हमेशा मेरे दिल में बसता है…और सबको पता है कि मैं दिल से जिसको मानता हूँ, उसका जिक्र सबके सामने करूँ न करूँ, उसे हमेशा सर माथे पर ही बिठाकर रखता हूँ। ईश्वर की अनुकंपा, परिजनों व मित्रों समेत आप सबका स्नेह और बड़ों का आशीर्वाद मुझ पर हमेशा यूँ ही बना रहे, बस यही कामना करता भी रहता हूँ।

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. अश्विनी दिल्ली में नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे बड़े अखबारों में लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद कई साल से यूपी की राजधानी लखनऊ में बतौर रीयल इस्टेट उद्यमी सक्रिय हैं.

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रिश्वत के लिए फाइल पर कुंडली मार कर बैठ जाता है ये अफसर, कंप्लेन पर पीएमओ भी सक्रिय

Ashwini Kumar Srivastava : 2018 की तरफ बढ़ते हुए मुझे एक बेहद बड़ी खुशखबरी यह मिल रही है कि भ्रष्टाचार और एक भ्रष्टाचारी अफसर एसपी सिंह के खिलाफ चल रही मेरी लड़ाई को खुद प्रधानमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय ने संज्ञान में ले लिया है। दोनों ही जगहों से बाकायदा मेरी शिकायत पर न सिर्फ ताबड़तोड़ जांच आरंभ हो गई है बल्कि मेरी वह सितंबर में की गई सबसे पहली शिकायत को भी पीएमओ ने दोबारा जीवित करवा दिया है, जिसे इस भ्रष्टाचारी अफसर एसपी सिंह ने न जाने कैसे सांठ-गांठ करके निस्तारित करवा दिया था।

और, कार्यवाही की यह सारी सूचनाएं मुझे खुद पीएमओ और मुख्यमंत्री कार्यालय के शिकायत तंत्र द्वारा ही देखने के लिए पोर्टल व मोबाइल एप पर मुहैया भी करा दी गयी हैं।
यही नहीं, सूत्रों की मदद से सुनने में तो यहां तक भी आ रहा है कि ढाई बरस से लटकी हमारी फ़ाइल पर अपनी मुहर लगाते हुए हमारे प्रोजेक्ट की मंजूरी का पत्र भी संभवतः आज या कल तक शासन स्तर से ही हमें दे दिया जाएगा।

उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकार अपने ही तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार से निपटने में इसी तरह भविष्य में भी हर आम आदमी का साथ देती रहेगी। मैंने भी इस लड़ाई को एक आम आदमी की ही तरह लड़ा है…प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के शिकायती तंत्र का ही इस्तेमाल किया, न किसी भाजपा नेता, विधायक, सांसद, मंत्री या अफसर के सामने जाकर सोर्स सिफारिश की और न ही उसी भ्रष्टाचारी अफसर के सामने घुटने टेक कर उसे भारी घूस देकर अपना प्रोजेक्ट कराने का रास्ता अपनाया। जबकि मुझे भिड़ने की बजाय ऐसा ही करने की कई लोगों ने सलाह भी दी।

मुझे पूरा यकीन है कि मेरी ही तरह अगर हर आदमी भ्रष्टाचारी और भ्रष्टाचार के सामने डट कर खड़ा हो जाये और घूस देने से मना कर दे…तो देर से ही सही लेकिन उसे जीत हासिल होकर रहेगी। बहरहाल, 2018 में एक अच्छी दिशा में और बेहतरीन खबर के साथ कदम रखते हुए मैं आभारी हूँ, उन सभी का, जिन्होंने हर सुख-दुख में मेरा दिल से साथ दिया है।

मेरी इस लड़ाई में भी कई लोग खुल कर मेरे साथ भी आये। उनमें सबसे ऊपर नाम Bhadas4media वाले औघड़ बाबा यानी Yashwant Singh का भी है। जो हर उस लड़ाई में खुद ही प्रकट हो जाते हैं, जो अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही होती है। उनकी शर्त बस इतनी ही होती है, जो इस बार उन्होंने लखनऊ में साथ जमी एक महफ़िल में खुद ही बताई थी कि जिसकी लड़ाई है, उसे अपना भय छोड़कर खुलकर एक बहादुर इंसान की तरह सामने आना होगा। क्योंकि कई बार उन्हें ऐसे लोगों के लिए भी कोर्ट, कचहरी या पुलिस का सामना करना पड़ चुका है, जो खुद डर कर दुबके रहते हैं, और यशवन्त जी को अपनी लड़ाई में सूली पर चढ़वा देते हैं।

काश, हम सभी के भीतर ऐसे ही एक बेबाक और निर्भीक यशवन्त का जन्म हो जाये और हम सभी गूंगे-बहरों की तरह भ्रष्टाचार और अन्याय को सहकर मुर्दे बने रहने की बजाय यशवन्त जी की तरह भड़ास निकाल कर इस दुनिया को ही बदल कर रख दें…

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. अश्विनी दिल्ली में नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे बड़े अखबारों में लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद कई साल से यूपी की राजधानी लखनऊ में बतौर रीयल इस्टेट उद्यमी सक्रिय हैं.

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एफआईआर दर्ज न होने से परेशान यूपी के एक मान्यता प्राप्त पत्रकार ने भेजी भड़ास को चिट्ठी

अर्जुन द्विवेदी ने भड़ास4मीडिया को एक पत्र भेजकर एक एफआईआर दर्ज कराने के बाबत किए जा रहे अपने संघर्ष का उल्लेख किया है और अपनी जान-माल के नुकसान की आशंका जाहिर की है. अर्जुन द्विवेदी यूपी के राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं. अर्जुन से संपर्क editorsristimail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. पढ़िए भड़ास के नाम आई अर्जुन की चिट्ठी…

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लो जी, सुदर्शन न्यूज वाले सुरेश चह्वाणके भी कर आए योगीजी का इंटरव्यू!

Ashwini Sharma : योगी जी आपसे ये उम्मीद नहीं थी… आप इस बात का तो ख्याल रखें कि आपका साक्षात्कार कौन कर रहा है… क्या आप नहीं जानते कि सुदर्शन न्यूज चैनल के मालिक सुरेश चव्हाण पर रेप का आरोप है… महिलाओं को जाल में फांसने वाले और खुद को देशभक्त बताने वाले सुरेश ने चैनल के दफ्तर में ही एक खुफिया बेडरूम तक बना रखा था.. योगी जी अब सीएम हैं और इस पद पर रहते हुए उन्हें कम से ऐसे लोगों से दूरी बनानी चाहिए..

लखनऊ से संचालित भारत समाचार न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार अश्विनी शर्मा की एफबी वॉल से.

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अपराधी को हिरासत से भगाने वाली गाजीपुर पुलिस ने निर्दोष बुजुर्ग का मोबाइल फोन छीन लिया!

Yashwant Singh : ग़ज़ब है यूपी का हाल। अपराधी भाग गया हिरासत से तो खिसियानी पुलिस अब बुजुर्ग और निर्दोष को कर रही परेशान। मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह का फोन ग़ाज़ीपुर की नन्दगंज थाने की पुलिस ने छीना। बिना कोई लिखा पढ़ी किए ले गए। अब बोल रहे फोन हिरासत में लिया है। शर्मनाम है यह सब। जो पुलिस वाले नशे में होकर अपराधी को भगाने के जिम्मेदार हैं, उनको तो अरेस्ट किया नहीं होगा, एक बुजुर्ग को ज़रूर घर से उठा ले गए और फोन छीन लिया। चाचाजी फिलहाल लौट आए हैं, लेकिन फोन पुलिस ने रख लिया। यही है मोदी-योगी राज का स्मार्ट और डिजिटल इंडिया। राह चलते आदमी का फोन पुलिस छीन ले जाए और पूछने पर कहे कि फोन हिरासत में लिया है। माने बिना लिखा पढ़ी किसी का भी फोन छीनकर हिरासत में लेने का अधिकार है पुलिस को? यूपी की पुलिस कभी न सुधरेगी।

चाचा का मोबाइल पुलिस वालों ने लौटा दिया. गाजीपुर के एसपी का फोन आया था. पर सवाल ये है कि क्या पुलिस होने का मतलब यही होता है कि आप किसी भी सीनियर सिटीजन को उठा लो और फिर उनको यहां-वहां घुमाने के बाद छोड़ते हुए फोन छीन लो. जब फोन के बारे में पूछा जाए तो कह दीजिए कि फोन हिरासत में है. बिना लिखत पढ़त आपका फोन कैसे ले सकते हैं पुलिसवाले? डिजिटल इंडिया के इन दिनों में जब फोन आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है, आपकी वर्चुवल / आनलाइन पर्सनाल्टी की तरह है मोबाइल फोन, इसमें सारे मेल, सारे पेमेंट डिटेल्स, सारे कार्ड्स, सारे सोशल मीडिया साइट्स, सारे कांटैक्ट्स, सारे आफिसियल और परसनल डिटेल्स होते हैं तो आप पुलिस वाले इन्हें यूं ही छीन कर कैसे ले जा सकते हो और और पूछने पर तपाक से कैसे कह दोगे कि फोन आपका हिरासत में लिया गया है? मने कुछ भी कर दोगे और कुछ भी कह दोगे? कोई नियम-कानून आपके लिए नहीं है? अपराधी आप पुलिस वाले खुद ही हिरासत से भगा दीजिए और इसका बदला किन्हीं दूसरे निर्दोषों से लीजिए?

गाजीपुर के पुलिस कप्तान सोमेन वर्मा को मुझे यह समझा पाने में काफी मुश्किल हुई कि आपका थानेदार किसी का फोन यूं ही कैसे छीन कर ले जा सकता है? आपको किसी आदमी पर शक है, उसकी बातचीत या उसके मैसेजेज पर शक है तो आप उसके फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा लो, सीडीआर निकलवा लो, सारे मैसेज पता करवा लो, सारे फोन सुन लिया करो… चलो ये सब ठीक, देश हित का मामला है, अपराध खोलने का मामला है, अपराधी पकड़ने का मामला है, कर लो ये सब, चुपचाप. लेकिन आप किसी का फोन कैसे छीन लेंगे? और, पूछने पर कहेंगे, पूरी दबंगई-थेथरई से, कि हम फोन चेक कर रहे हैं? ऐसे कैसे फोन छीनकर चेक कर सकते हैं आप लोग? आपने अगर फोन छीनकर आपके लोगों ने इसी फोन से अपराधियों को फोन कर दिया, इसी फोन से अपराधियों को मैसेज कर दिया और फिर बाद में यह कह कर फोन वाले को फंसा दिया कि इस फोन से तो अपराधियों को काल किया गया है, मैसेज किया गया है तो फिर हो गया काम… इस तरह से आप लोग किसी भी निर्दोष को फंसा सकते हैं.

देश में अभी निजता की बहस चल ही रही है. किसी के फोन में देखना तक अनैतिक होता है. किसी के फोन को बिना पूछे उठाना गलत माना जाता है. आप पुलिस वाले तो किसी दूसरे का पूरा का पूरा फोन ही छीन लेते हो? ये इस लोकतंत्र में किस किस्म का निजता का अधिकार है? या फिर ये निजता का अधिकार सिर्फ बड़े शहरों के बड़े लोगों के लिए है?

ट्विटर पर यूपी पुलिस, डीजीपी, सीएम योगी आदि को टैग करते हुए जब मैंने ट्वीट किया और कई साथियों ने इस ट्वीट पर यूपी पुलिस व गाजीपुर पुलिस से जवाब मांगा तो गाजीपुर पुलिस सक्रिय हो गई. रात में ही चाचा का फोन नंदगंज थाने से शहर कोतवाली मंगवा लिया गया और मुझे इत्तला किया गया कि फोन आ चुका है, किसी को भेज कर मंगवा लें. मेरे अनुरोध करने पर शहर में रहने वाले साथी Sujeet Singh Prince और Rupendra Rinku भाई रात करीब एक बजे गाजीपुर कोतवाली जाकर चाचा का फोन ले आए.

सवाल ये भी है कि क्या हम आप अगर ट्विटर और एफबी पर सक्रिय हैं, तभी जिंदा रहेंगे, वरना पुलिस आपके साथ कोई भी सलूक कर जाएगी? ऐसा देश मत बनाइए भाइयों जहां किसी निर्दोष और किसी आम नागरिक का जीना मुहाल हो जाए. क्या फरक है सपा की अखिलेश सरकार और भाजपा की योगी सरकार में? वही पुलिस उत्पीड़न, वही अराजकता, वही जंगलराज. जिसका जो जी कर रहा है, वह उसे धड़ल्ले से कर रहा है, बिना सही गलत सोचे.

हमारे गांव का एक अपराधी गाजीपुर शहर में पुलिस हिरासत से फरार हो गया. बताया जाता है कि पुलिस वाले जमकर पीने खाने में मगन थे और उसी बीच वह भाग निकला. जो पुलिस वाले उसे पेशी पर लाए थे, उन्हें करीब दो घंटे बाद पता चला कि पंछी तो उड़ चला. मुझे नहीं मालूम गाजीपुर के पुलिस कप्तान ने इन लापरवाह, काहिल और भ्रष्ट पुलिस वालों को गिरफ्तार कराया या नहीं, जो अपराधी को भगाने के दोषी हैं. इन पुलिस वालों ने कितने पैसे लेकर अपराधी को भगाया, इसे जांच का विषय बनाया या नहीं, मुझे नहीं मालूम. पर पुलिस विभाग शातिर अपराधी के भाग जाने के बाद उसे खोजने-पकड़ने के चक्कर में अब उन निर्दोषों को परेशान करने लगा जिनका इस शख्स से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं.

खिसियानी बिल्ली खंभो नोचे के क्रम में पुलिस वाले भागे हुए अपराधी को पकड़ने के नाम पर मेरे गांव पहुंचे और मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह को उठा ले गए. वे उन्हें गाजीपुर शहर उनके बड़े वाले पुत्र यानि मेरे कजन के घर पर ले गए. उनका बड़ा पुत्र गांव छोड़कर गाजीपुर शहर में गांव की किचकिच / राजनीति से बचने के लिए सपरिवार किराये पर रहने लगा. वहां जब उनका बड़ा बेटा नहीं मिला तो पुलिस वाले चाचा को छोड़ तो दिए पर जाते-जाते उनका फोन ले गए. उस फोन को ले जाकर उन्होंने उसमें सेव सभी नामों पर मिस काल मारने लगे. जिसका भी पलट कर फोन आए, उससे फोन पर ही पूछताछ करने लगते.

अरे भाई गाजीपुर पुलिस! आजकल की पुलिसिंग बहुत एडवांस है. कहां बाबा आदम के जमाने के इन तौर-तरीकों / टोटकों में अटके पड़े हो और अपनी कीमती उर्जा यूं ही खर्च कर रहे हो. आजकल अव्वल तो शातिर अपराधी फोन पर बात नहीं करते. दूसरे, पुलिस के लोग अब तकनीकी रूप से काफी ट्रेंड किए जाने लगे हैं ताकि वे सारे आयाम को समझ कर अपराधी को बिना भनक लगे दबोच सकें. साइबर अपराध बढ़े हैं और इसी कारण इसको हैंडल करने के लिए ट्रेंड पुलिस वालों की भी संख्या बढ़ाई जा रही है. पर यूपी में लगता है कि पुलिस अब भी बाहुबल और बकैती को ही अपराध खोलने का सबसे बड़ा माध्यम मानती है.

भाई एडवोकेट Prateek Chaudhary की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने लिखा है कि अलीगढ़ में एक थाने में एक लड़की को 12 दिन तक लगातार गैर-कानूनी रूप से रखा गया. उस पर शायद अपनी भाभी की हत्या का आरोप था. जब हो-हल्ला हुआ तो उसे 12 दिन के बाद जेल भेजा गया. बताइए भला. एक लड़की को आप 12 दिन तक हवालात में रखते हो! ये कहां का नियम कानून है. आप रिमांड पर लो. पूछताछ करो. पर ये क्या कि न कोर्ट में पेश करेंगे न जेल भेजेंगे, बस हवालात में रखे रहेंगे! वो भी एक लड़की को! क्या इन्हीं हालात में (गाजीपुर में मेरे चाचाजी वाले मामले और अलीगढ़ में लड़की वाले मामले में) पुलिस वाले उगाही और बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं करते?

योगी सरकार को यूपी में पुलिसिंग दुरुस्त करने के लिए बहुत सख्त कदम उठाने की जरूरत है अन्यथा सरकार बदलने के बावजूद जनता के कष्ट कम न हो सकेंगे. अखिलेश यादव के राज में जो जंगलराज था, वही हालात आज भी जमीन पर है. खासकर छोटे और पिछड़े जिलों में तो पुलिस विभाग का बुरा हाल है. वहां पुलिस का मतलब ही होता है गरीबों को प्रताड़ित और शोषित करने वाले. निर्दोष जनता से बदतमीजी करने के आरोपी / दोषी पुलिस वालों को बिना देर किए सस्पेंड-बर्खास्त करने में कतई हिचकने-झिझकने की जरूरत नहीं. शायद तभी ये सुधर सकें.

मेरे चाचा के फोन छीने जाने वाले मामले में डॉ Avinash Singh Gautam और Avanindr Singh Aman समेत ढेरों साथियों ने ट्विटर पर तुरंत सक्रियता दिखाई, इसके लिए इन सभी का दिल से आभार.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : 9999330099 या yashwant@bhadas4media.com

गाजीपुर पुलिस का हाल जानने के लिए इसे भी पढ़ें…

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गोरखपुर मेडिकल कालेज में 30 बच्चों की मौत नहीं हुई है, ये साफ-साफ हत्या की श्रेणी में है!

Anand Sharma : सरकार ने लखनऊ से पूरा फण्ड भेजा फिर ऑक्सीजन का भुगतान क्यों नही हुआ? कमीशन का खेल है, दवाओं का स्टॉक भी चेक कर लें योगीजी… उनके आने के बाद रिश्वतें और कमीशन बढ़ गया है। अधिकारी और कर्मचारी उन्हें बालक समझते हैं जो कॉस्मेटिक बदलाव में खुश है। विधायकों को नकारा बना दिया गया है कार्यकर्ता की कोई सुनता नही। सच्चाई की ज़मीन से कतई कटी हुई है योगी सरकार। गिरफ्तार कीजिये मेडिकल कॉलेज प्रशासन को और इरादतन हत्या की धाराएं लगाइए, कठोरतम कदम न उठा सकें तो सार्वजनिक जीवन से हट जाएं योगीजी।

Utkarsh Sinha : गोरखपुर मेडिकल कालेज में 30 बच्चों की मौत नहीं, ये साफ-साफ हत्या की श्रेणी में है। कमीशन खोरी का जाल नहीं टूटा न ही लालफीताशाही खत्म हुई। योगी ने 2 दिन पहले ही दौरा किया था। उन्होंने वही देखा जो भ्रष्ट प्रशासन ने दिखाया। वो काला सच मुख्यमंत्री नही देख पाए जिसे मिटाने के लिए जनता ने उन पर भरोसा किया था। वे नही देख पाए कि ऑक्सीजन का पेमेंट महीनों से बकाया है। वे नहीं देख पाए कि महज 36 घंटे बाद ही ऑक्सीजन खत्म होने वाली है। वे भरोसा दिलाते रहे, वादा करते रहे और कमीशनबाजी के खेल ने यमराज को न्योता दे दिया। मुझे न तो शर्म आ रही है न ही गुस्सा। बस बेबसी के आंसू अपना रास्ता खोज चुके है।

Amitaabh Srivastava : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से पांच दिन में 60 बच्चों की मौत एक आपराधिक कृत्य है। हत्या है यह। प्रदेश की बीजेपी सरकार और प्रशासन सीधे तौर पर जवाबदेह है। लेकिन सरकार है कि मदरसों की निगरानी में व्यस्त है।

Deshpal Singh Panwar : योगी जी जब आप सीएम बने थे तो यकीन मानिए भाजपा का राज अाने से ज्यादा अापका सीएम बनना अच्छा लगा था लेकिन ये सब हो क्या रहा है..केवल 60 लाख की देनदारी के चलते आपके राज में आपके घर में 30 बच्चों की मौत हो जाएगी और अाप देखते रहेंगे, जांच कराएंगे या फिर एेसे लोगों को सूली पर चढ़ाएंगे..मैं फिर कहता हूं कि लोकतंत्र अराजकता की जननी है..एेसे मामलों में जांच,अदालतों से अागे जाकर कोई फैसला होना चाहिए वरना यूं ही मौत होंगी, मुआवजा बंटेगा और राजनीति के गलियारों में एक दूजे के कपड़े उतारे जाएंगे पर कभी जनता को ये अहसास नहीं होगा कि हां ये सरकारें उसकी हैं और उसके लिए हैं….कुछ करिए योगी जी वरना इस्तीफा देकर वापस गायों के बीच रहिए क्योंकि ये राजनीति कम से कम आपके बस का रोग नहीं..एक दिन आपके अपने ही आपको इस्तीफा देने पर विवश करेंगे ये तय है…..

Chandan Pandey : गोरखपुर के अस्पताल में पिछले पाँच दिनों में साठ बच्चे मारे गए। लेकिन दोषी ऑक्सीजन सप्लायर कंपनी नहीं है, क्योंकि सत्तर लाख बकाए के बाद वो कंपनी ऑक्सीजन क्यों सप्लाई करती? और उत्तर प्रदेश की सरकार! वो तो माशाअल्लाह दोषी हो ही नहीं सकती, क्योंकि उसने स्वास्थ्य का ठेका थोड़े न लिया है। दोषी है वो माता पिता जिनके बच्चे अब नहीं रहे। दोषी वो बच्चे हैं जिनकी वजह से राज्य सरकार बदनाम हो रही है। दोषी हैं हम सब। आखिर ये सत्तर लाख का पाँच महीने का बकाया सरकार को मालूम थोड़े न रहा होगा! बेचारी, सरकार।

राजीव राय : मुंबई की एक बड़ी सोसायटी में 6 करोड़ के फ्लैट में रहने वाली अकेली मां (जिसका बेटा विदेश में रहता था) भूख से मर गयी. बिहार के बक्सर का एक आईएएस अधिकारी (जिसकी पत्नी और एक तीन महीने की बेटी थी) उसने गाजियाबाद में खुदकुशी कर ली. यूपी के गोरखपुर में एक मेडिकल कॉलेज में 70 लाख का बकाया होने की वजह से आक्सीजन की सप्लाई रोक दी गई जिसकी वजह से तकरीबन 30 छोटे बच्चों की दम घुटने से मौत हो गई. आपको इस्लाम, हिंदुत्व और मुसलमान की पड़ी है, यहां पूरी इंसानियत खतरे में पड़ी है, संवेदना सरेआम दम तोड़ रही है, रिश्ते लावारिस हो रहे हैं लेकिन फर्क किसे पड़ता है जनाब, मुर्दों के शहर में सन्नाटा तो आम बात है.

सौजन्य : फेसबुक

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एवार्ड लेते समय यशवंत ने योगी के कान में क्या कहा, देखें वीडियो

योगी के हाथों पुरस्कार लेने पर वामपंथी खेमे के कुछ पत्रकारों द्वारा विरोध किए जाने का यशवंत ने कुछ यूं दिया विस्तार से जवाब…

Yashwant Singh : लोकमत अखबार के यूपी के संपादक आनंदवर्द्धन जी का एक दिन फोन आया. बोले- ”हर साल की तरह इस बार भी लोकमत सम्मान का आयोजन करने जा रहे हैं हम लोग. हमारी जूरी ने ‘जनक सम्मान’ के लिए आपको चुना है क्योंकि भड़ास4मीडिया एक बिलकुल अनोखा प्रयोग है, मीडिया वालों की खबर लेने-देने के वास्ते जो भड़ास4मीडिया की शुरुआत हुई है, उसके लिए आप सम्मान योग्य हैं.”

ऐसे तारीफ भरे शब्दों को सुनने के दौरान मेरी हालत कैसे रिएक्ट करूं टाइप हो जाती है. आनंद वर्द्धन जी से मैंने वादा किया कि आऊंगा आपके सम्मान समारोह में. उनने आने जाने का जहाज का टिकट मेल करा दिया.

जबसे लखनऊ में नई सरकार आई, एक बार भी मेरा लखनऊ जाना न हुआ. एकाध मेरे निजी-पारिवारिक काम थे, जिसके लिए लखनऊ जाना था, पर टलता जा रहा था. जहाज का टिकट मिलने के बाद लखनऊ का दौरा मेरा पक्का हो गया. एक पंथ दो काज.

लखनऊ से पत्रकारिता और शराबखोरी, दोनों ही क्षेत्रों में करियर की शुरुआत की थी. इसलिए इस जगह से मेरा लगाव कुछ ज्यादा है. बड़ा अपनापा सा लगता है लखनऊ से. प्रेस क्लब में जुए की सजी हुई टेबल, चारबाग में देर रात तक दारू की उपलब्धता, खाने को किसिम किसिम का स्वाद, घूमने भटकने को ढेर सारी जगहें. इसी कारण दस जून के सम्मान समारोह के लिए लखनऊ 7 जून को ही पहुंच गया.

कार्यक्रम के दिन नियत समय पर संगीत नाटक अकादमी में हाजिरी दी. आयोजकों ने मंच पर बैठने के लिए बुलाया तो वहां चला गया, अन्य पुरस्कारार्थियों के साथ. योगी बाबा आए और एक एक कर सबको पुरस्कार थमाने लगे. मैं तय करके आया था कि योगी से रुबरु होने के इन चंद सेकेंड्स में मुझे उनसे क्या कह देना है. मेरी बारी आई तो पहुंचते ही योगी जी से कहने लगा- ”शाहजहांपुर वाले जगेंद्र सिंह हत्याकांड में कुछ नहीं हुआ. हत्यारे आजाद हैं और पीड़ित का परिवार धमकी व प्रलोभन के कारण चुप है. इसे संज्ञान लीजिए. ”

मैं कहता रहा और योगी बाबा पुरस्कार देने वाली मुद्रा में मुस्कराते हुए मुझे देखते सुनते रहे. इस दौरान लोकमत यूपी के संपादक आनंदवर्द्धन जी भी मौजूद थे. योगी तक अपनी बात पहुंचाते हुए पुरस्कार सम्मान लेते फोटो खिंचाने के बाद वापस अपनी सीट पर आ गया. मुझे संतोष था मैंने यूपी के पत्रकारों के माथे पर पुती गहरी कालिख को मिटाने हेतु एक कदम चल सका. मुझे संतोष था एवार्ड समारोह में सीएम के होने का लाभ उठाते हुए उनका ध्यान पत्रकारों के एक बड़े मामले की ओर खींचने का. मुझे संतोष था जिस जगेंद्र हत्याकांड के कारण हम लोगों ने सपा को वोट न देने की अपील की थी, उस मुहिम को नई सरकार में आगे बढ़ा पाने का.

कार्यक्रम खत्म होते ही कई साथियों ने मुझसे मिलकर और कुछ ने फोन करके पूछा कि मैं योगी जी के कान में क्या कह रहा था? मैंने सभी को बताया कि जगेंद्र हत्याकांड में इंसाफ न होने की बात बताई योगी जी को.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.. इस वीडियो में पुरस्कार लेते वक्त यशवंत लगातार योगी से कुछ कह रहे हैं और तब योगी जी सहमति में सिर हिलाते दिख रहे हैं…

https://www.youtube.com/watch?v=y9AS48U_WcY

योगी के हाथों पुरस्कार लेने के बाद कुछ कामरेड लोगों के बिफरने का मुझे अंदाजा था. पर हमने कब परवाह की है जमाने की. जो करना है, वह करके रहता हूं, गलत या सही. इंडियन एक्सप्रेस के कार्यक्रम में मोदी बतौर प्रधानमंत्री जाते हैं. लोकमत के कार्यक्रम में योगी बतौर मुख्यमंत्री जाते हैं. आप हम कुर्सी का सम्मान करते हैं, व्यक्ति का नहीं. वैसे भी मेरे जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए हर नेता एक सरीखा होता है. मैं मोदी और मनमोहन, योगी और मुलायम में बहुत ज्यादा फरक नहीं कर पाता. आप अगर कर पाते हैं तो आप महान हैं और आप का राशि कुंडली में राजनीति सर्वोच्च स्थान पर है. पर जब मैं गौर से देखता हूं तो सत्ता तंत्र का चरित्र हमेशा एक सा दिखता है. बस थोड़ा बहुत हेरफेर होता है. केवल चेहरे और व्यक्ति बदल जाते हैं. पार्टियों के नाम बदल जाते हैं. सत्ता के चलने का अंदाज वही रहता है. हां, हमारी जातीय क्षेत्रीय धार्मिक पृष्ठभूमि की वजह से सत्ता तात्कालिक तौर पर कभी करीब तो कभी दूर लग सकती है.

आपकी रुचि अगर राजनीति में है तो आप जिंदाबाद मुर्दाबाद करते रहिए, इनके उनके या मेरे पक्ष विपक्ष में खड़े रहिए. लेकिन मुझे राजनीति में कतई रुचि नहीं. इसलिए मेरे सामने एवार्ड देने वाला कोई योगी हो या कोई मुलायम या कोई मनमोहन, मुझे कोई फरक नहीं पड़ता.

विचारधाराएं इस दुनिया में दम तोड़ रही हैं, काफी समय से. तकनालजी और बाजार ने बहुत कुछ बदलने को मजबूर किया है. विचारधाराओं के जरिए औसत दिमाग से नीचे के लोगों को बरगलाया भरमाया जाता है या फिर लूट में शामिल होने का प्रलोभन देकर इरादतन मिलाया जाता है. विचारधाराओं के नाम पर अब केवल भीड़ की गोलबंदी की कवायद की जाती है ताकि लोकतंत्र में ज्यादा वोट पाने के नाटक को जस्टीफाई करते हुए सत्ता शीर्ष पर कब्जा जमाया जा सके. मुझे तो कई दफे ये चुनाव ही ढेर सारी समस्याओं की जड़ लगने लगे हैं. भीड़ हमेशा मूर्खतापूर्ण सोच रखती है और ऐसी ही सोच से उपजे नेता कहां से तार्किक और वैज्ञानिक विचार वाले होंगे. भीड़ हमेशा अपने जैसा मूर्ख व्यक्ति नेता के रूप में खोजती है और नेता हमेशा एक भीड़ की तलाश में रहता है, जो किसी एक नारे या एक बोली से सक्रिय हो जाए. भीड़ और भेड़ में ज्यादा फरक नहीं है. भेड़चाल ही है लोकतंत्र.

इन सम्मान समारोहों और वैचारिक विमर्श जैसे कार्यक्रमों में शिरकत करना मेरे लिए भड़ास4मीडिया की ब्रांडिंग का एक मौका होता है, साथ ही उन सभी वेब पत्रकारों के माथे पर जीत व गर्व की एक लकीर दर्ज कराना होता है जो अपने-अपने मीडिया हाउसों से लड़कर अपने दम पर अपनी वेबसाइटों वेब चैनलों ब्लागों सोशल मीडिया जैसे उपक्रमों के माध्यम से साहसपूर्ण पहल करते हुए पत्रकारिता को करप्ट व कारपोरेट महासागर में विलीन होने से बचाए हुए हैं.

भड़ास4मीडिया डाट काम की शुरुआत के वक्त मठाधीश टाइप पत्रकार लोग वेबसाइटों और ब्लागों को हिकारत भरी नजर से देखते थे और इसको संचालित करने वालों को छोटा पत्रकार / हारा हुआ पत्रकार / मुख्यधारा से तड़ीपार पत्रकार मानते बोलते थे. लेकिन बीते नौ साल में तस्वीर पलट गई है. मठाधीश लोग या तो नष्ट हो गए, या कर दिए गए या चुप्पी साधे नौकरी बजा रहे हैं और भड़ास4मीडिया टाइप पोर्टल के संचालक सत्ता शीर्षक की छाती पर अपनी धमक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं.

नौ वर्षों में हर किस्म के अनुभव से रुबरू हुआ. हर किस्म के लोगों से पाला पड़ा. अपने और पराये लोगों को नजदीक से महसूस किया. इस सबसे मेरी मानसिक बुनावट में काफी कुछ बदलाव आया. सैद्धांतिक ज्ञान में बहुत कुछ नए अध्याय जुड़े और कई सारे चैप्टर डिलीट हुए. हम लोग तभी से मानते थे कि सारी मीडिया नष्ट हो जाएगी, ये डिजिटल ही बचा रहेगा. यही कारण है कि हम भड़ास वालों ने एक भी मैग्जीन या अखबार न शुरू किया. क्योंकि तय कर रखा था कि युद्ध डिजिटली ही लड़ेंगे.

इस भड़ास4मीडिया ने मुझे धरती से आसमान तक की यात्रा कराई, अनुभव समझ संवेदना सामाजिकता के लेवल पर. और, इसी ने इन यात्राओं के जरिए एक आंतरिक, आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत कराई. कह सकता हूं कि मैं भड़ास में एक क्लर्क से ज्यादा कुछ नहीं हूं. कह सकता हूं कि प्रकृति ने मुझे जरूर कुछ अदभुत अनुभव करने और जीने के लिए भेजा है, जो कर रहा हूं, जो जी रहा हूं. मैं अब चीजों को अच्छे या बुरे के फ्रेेम में नहीं देखता न ग्रहण करता. इसे संपूर्णता के भाव से देखता, भोगता और महसूस करता हूं. अच्छा मेरा है तो बुरा भी मेरा है. सब मेरा है और कुछ भी मेरा नहीं है.

काफी समय से मैंने महत्वाकाक्षाएं-इच्छाएं पालने और योजनाएं बनाने का काम छोड़ दिया है. तत्क्षण में जीने का आदी हो गया हूं. देर तक और दूर तक का प्लानिंग न के बराबर है. अतीत में बिलकुल नहीं जाता. भविष्य के लिए परेशान नहीं क्योंकि न कोई महत्वाकांक्षा है और न कोई योजना. इसलिए मुझे जो कुछ मिल जाता है, जो कुछ मेरे संग हो जाता है, अच्छा बुरा, उसे सब ईश्वरीय नियोजन / प्रकृति की देन मानकर ग्रहण कर लेता हूं.

ये मजेदार नहीं है कि पिछली सरकार जब यूपी में आई थी, नई नई, अखिलेश यादव के नेतृत्व में तो मुझे शुरुआती तीन महीने के भीतर, शायद मई लास्ट का समय था, अरेस्ट करके जेल भेज दिया गया और कई मीडिया हाउसों ने फिर ताबड़तोड़ मुकदमें लिखवाए, सत्ता सिस्टम से दबाव बनवाकर घरों आफिसों पर छापे डलवाए. मुझे जेल भेजे जाने के बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को अरेस्ट कर जेल में भिजवाया गया क्योंकि सबकी चिंता थी कि आखिर यशवंत के जेल जाने के बाद भड़ास कैसे चल रहा है. जेल के अधिकारियों को फोन कर जेल के अंदर प्रताड़ित करने के लिए उकसाया गया. पर प्रकृति ने मेरे लिए कुछ और प्लान कर रखा था. जेल मेरे लिए जानेमन जगह सिद्ध हुई. वहां से निकला तो ‘जानेमन जेल’ किताब की रचना हुई.

और, अब ये जो नई सरकार आई है, यूपी में, योगी के नेतृत्व में, तो इसके मुखिया योगी ने बतौर सीएम अपने कार्यकाल के तीन महीने के भीतर ही मुझे अपने हाथों सम्मानित किया. माध्यम भले बना लोकमत अखबार. माध्यम भले ही बने आनंदवर्द्धन जी.

न जेल जाने की योजना मैंने बनाई थी और न सम्मान पाने की. दोनों ही चरम विपरीत स्थितियों को खुद आना था, खुद होना था. मेरे को तो बस दोनों ही हालात में आनंद की अनूभित करनी थी जो की. दोनों ही प्रकरणों में मुझे सकारात्मक और सहज रहना था, जो रहा. इन दोनों के लिए ही मुझे नेचर / परम / अदृश्य / सृष्टि को धन्यवाद कहना था, कृतज्ञ होना था, जो मेरे को निमित्त बनाए हुए जाने क्या क्या खेल तमाशा रचे हुए है. .

जो लोग विचारधाराओं के चश्मे से अब भी चलते हैं, और इसी आधार पर अगर हमको आपको कोसते हैं, तो ध्यान से देखिएगा, उनके जीवन में कोई न कोई फांस, द्वंद्व, दुख, गुलामी, वासना, उत्तेजना, घृणा, अवसाद, ब्रेन वाश आदि में से कुछ न कुछ भयंकर है जो उन्हें एक खास स्टाइल में जीने सोचने को मजबूर किए रहता है. बहुत मुश्किल होता है एक खास किस्म की स्कूलिंग और खास किस्म से तैयार किए गए दिमाग से उबरते हुए सहज मौलिक शांत सुंदर दिमाग की तरफ बढ़ पाना.

जो लोग गब्बर के डकैत गिरोह के इमानदार खजांची बन गुलामी का जीवन काट रहे हैं वे अगर दूसरों को इमानदारी का पाठ पढ़ाने लगें तो क्या कहिएगा. उनसे क्या पूछिएगा कि आप अच्छा खासा नक्सल वाला जीवन जी रहे थे, उधरे जंगल में शहीद हो गए होते तो ढेर सारे नौजवान लौंडों को प्रेरणा मिली होती नक्सलाइट बनने के वास्ते. पर आप तो भाग आए जान बचाकर दिल्ली और यहां पाल लिए हैं टाइम्स आफ इंडिया वालों की बिल्ली. सो, सौ सौ चूहे खाने के बाद हज की ओर काहें जा रहे हैं महाराज.

खैर.

अब अपने पास दूसरों की आलोचना के लिए ज्यादा वक्त नहीं रहता, इसीलिए यहीं बात समाप्त कर रहा हूं और उम्मीद करता हूं उन तक बात पहुंच गई होगी. मनुष्य को इस या उस खांचे में देखने वाले लोग ज्यादा बड़े फासिस्ट हैं. इन्हें एक बार फिर ब्रह्मांड विज्ञान जीवन की क्लासेज में दाखिला लेकर सिर्फ इस या उस खांचे की जगह संपूर्ण जीवन जीव सुर लाय ताल को समझना बूझना चाहिए. मने नौकरी करते करते एकदम्मे गड़बड़ा गए हों तो होलटाइमर वाला काम शुरू कर दीजिए क्योंकि कामरेड वाली पार्टियों में अच्छे कामरेडों का बड़ा अकाल है. पर ये न करेंगे क्योंकि आप मूलत: अवसरवादी और बकचोद हैं. जीवन एक पूंजीपति की सेवा करते गुजार दी और गरीब लौंडों से नक्सली बनने की इच्छा पाले रहेंगे. धत तेरी हिप्पोक्रेसी की.

मुझे तो अब किसी हत्यारे में भी कोई अपराधी नहीं दिखता. बस यही सोचता हूं कि नेचर ने इसे इस काम के लिए क्यों प्रोग्राम किया हुआ है? मैं हत्यारे के भीतर रुह बनकर प्रवेश कर जाना चाहता हूं और उसकी तरह सोचते हुए जानना चाहता हूं कि आखिर एक हत्यारे को आनंद कब आता है, दुख कब होता है, डर कब लगता है और वह रोता कब है. मुझे मुश्किल और उलझे हुए लोग ज्यादा संभावना से भरे लगते हैं. जो पीएफ सीएल डीए की गणना करता हुए इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग के बीच आते जाते जीवन के दिन वर्ष खर्च कर रहे हैं, उनमें क्या नया दिखेगा, उनमें क्या मौलिक दिखेगा. वह एक घटिया मास्टर की तरह रटी रटाई पुरानी पर्ची को पढ़ कर सिलेबस पूरा जान मान लिया करेंगे.

सीएम योगी के हाथों एवार्ड लेते हुए पहली फोटो डाली तो उसमें पांच दास के बीच निगेटिव कमेंट्स हैं. मेरे खयाल से इतना जेनुइन है. जो हार्डकोर कामरेड हैं और उसी शब्दावली के बीच जीवन जीते गुजारते हैं, उन्हें कष्ट तो होना ही चाहिए, योगी या मोदी के हाथों एवार्ड लेते देखकर, वह भी किसी पूर्व कामरेड को. और, मुझे लगता है कि ये जरूरी भी था. आप अगर मुझे किसी खांचे सांच में बांधकर देखते हैं, देखते थे, तो गलत थे. आप अपना जीवन और अपना खांचा दुरुस्त रखिए. मेरी चिंता छोड़ दीजिए. मैं एक जीवन में सौ किस्म का जीवन जीता हूं, अराजक, अवसरवादी, वामपंथी, दक्षिणपंथी, साहित्यिक, आध्यात्मिक, अभिनेता, गायक, कुक, ड्राइवर, माली, खिलाड़ी, साधक, घुमक्कड़, प्रेमी, अभिभावक, लीडर, विद्रोही, गरीब, अमीर, अभद्र, अशिष्ट, शराबी, कबाबी, क्रूर…. और, किसी क्षण मैं इनमें से कुछ भी नहीं होता हूं, इस देह से परे होता हूं.

क्या करिएगा, कैसे किसी खोल में हमको भरिएगा. पर असल में जिन लोगों का काम ही सिर्फ खोल में भरना है, वो तो भरेंगे. आप भले न भराएं, लेकिन वो खोल खांचे में जबरन आपको भरेंगे. इसलिए इनकी भराई की परवाह न करिए, उन्हें अपना काम करने दीजिए और हमें अपना. क्या कहेंगे लोग, सबसे बड़ा रोग… वाला नारा यूं ही नहीं दिया गया है. आप जब भी कुछ करेंगे तो उसके सहज स्वाभाविक दस विरोधी और दस प्रशंसक पैदा हो जाएंगे. यह प्रकृति का विभिन्नता का सिद्धांत है. यह जो प्रकृति प्रदत्त बहुलता, विविधता और अनेकता है, यही सबसे खास चीज है जो हमें आपको अलग अलग चश्मे, अलग अलग अनुभव जन्य सिद्धांत थमाए रहती है और सबके जरिए अलग अलग किस्म का तमाशा बनाए रहती है. तो इसका मौज लेना है और मस्त रहना है.

जिन्हें सीएम योगी के हाथों जनक सम्मान से मुझे सम्मानित किया जाना अच्छा लगा, उन्हें नमस्ते प्रणाम. जिन्हें यह अच्छा नहीं लगा, उन्हें प्यार भरा सलाम. मैं उचक कर न सेल्फी लेने गया और न मैंने कोई निजी काम बताया. मैं लपलपाया भी नहीं. मैं एक बड़े मुद्दे, जगेंद्र हत्याकांड का जिक्र कर सीएम का ध्यान खींचने की कोशिश की. मैं सीएम के हाथों सम्मान पाकर न गर्व से भरा हूं और न योगी के सीएम होने और इनके हाथों सम्मानित होने से किसी अवसाद या दुविधा में पड़ा. मैं तब भी मस्त था, आज भी मस्त हूं. मेरे पास इतना सोचने के लिए वक्त नहीं होता क्योंकि मेरे स्वभाव में दुनियादारी, चुगलखोरी, रणनीति, साजिश, प्रोपेगंडा आदि के लिए कोई जगह है ही नहीं. इसी दुनिया में सब कुछ हर क्षण है. आप जिस दृष्टि और सोच से देखेंगे, दुनिया और लोग वैसे ही दिखेंगे. किसी रोज चश्मा हटाकर और दिल दिमाग खोलकर एक एक चीजों को देखिए और उसे चूमिए.

लखनऊ यात्रा के दौरान खूब आनंद आया. बहुत सारे नए पुराने पत्रकारों साथियों से मिलना हुआ. हर दिन हर शाम हर रात जै जै रही… आप सभी चाहने वालों को ढेर सारा प्यार प्यार और प्यार… सभी आलोचक चश्मेधारी दिग्गजों का भी हूं दिल से शुक्रगुजार …. 😀 आलोचक न होते तो ये पोस्ट न लिखता… इसलिए समझ लीजिए… चैलेंज, आलोचना, सवाल ही आपको बड़ा होने, क्रिएट करने, रचने के मौके मुहैया कराते हैं…. इसकी अगली स्टेज ये है कि न तारीफ से प्रसन्न होने वाला हूं और न आलोचना पर भौहें तानने वाला… अब इस अगली अवस्था में पहुंंचने ही वाला हूं… फिर मैं खुद कहूंगा आप सबों के साथ…

मार मार पापी यशवंत को… अरे उसी भड़ास वाले को ही… 🙂

जैजै

भड़ास के संपादक यशवंत के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Shrimaan एक साँस में पढ़ गया, दिल को सुकून आया कि आँच अभी भी बाक़ी है, सब कुछ बर्बाद नहीं हुआ है। आप जैसे और तो अब दिखते नहीं पर आप जुटे रहिएगा। आप ने मेरे जैसे कई लोगों को फिर से उम्मीद दिखाई है। कोशिश कीजिएगा कि आप ऐसे ही रहें।

Dinker Srivastava ग़जब…..धोते पछारते आपकी यूँ ही गुजरती रहे…..लोग जलते रहें आप जलाए रखें उनकी भी और मशाल भी…..बात थोड़ा लंबी सरक गई लेकिन मौक़े और समय के मुताबिक कही गयी…अच्छा बहुत अच्छा…..शुभकामनाएं

Divakar Singh अभी और ऊंचाइयां पानी हैं. आध्यत्मिक और व्यावसायिक दोनों.

Arun Sathi कामरेडों का हाजमा ही ख़राब है….इसीलिए हाशिये पे है…आप बिंदास है

Yogesh Bhatt कुछ लाइन याद हो आई हैं..जिसकी जैसी नजर उसने वैसा समझा मुझे

Vishal Ojha चलो भाई अब आनंद लो सब चीजों का..और हाँ कभी याद भी कर लिया करो

Sushil Dubey उस दिन 1 पैग का क्या हुआ बाबा,,,

Rohit Bisht बधाई, खरी कहने और सुनने का माद्दा बना रहे,बचा रहे यही शुभकामनाएँ

Rajshekhar Vyas Aap sachmuch videh Janak ho rahe hain ! Hardik badhai

Sangam Pandey क्या कहने….
”मुझे तो कई दफे ये चुनाव ही ढेर सारी समस्याओं की जड़ लगने लगे हैं. भीड़ हमेशा मूर्खतापूर्ण सोच रखती है और ऐसी ही सोच से उपजे नेता कहां से तार्किक और वैज्ञानिक विचार वाले होंगे. भीड़ हमेशा अपने जैसा मूर्ख व्यक्ति नेता के रूप में खोजती है और नेता हमेशा एक भीड़ की तलाश में रहता है, जो किसी एक नारे या एक बोली से सक्रिय हो जाए. भीड़ और भेड़ में ज्यादा फरक नहीं है. भेड़चाल ही है लोकतंत्र”

Ganesh Dubey Sahaj पूर्वांचल के खून में है साफगोई।। साधुवाद।।

Sunayan Chaturvedi भड़ास पुरुष की जय।

Sanjeev Kumar Badhai. Aapko janta bahut pahle se tha. Lakin is post ko padhne ke bad aapke vyaktitva ke bare me kuchh aur janne ko mila.

Anand Kumar हर कोई यशवंत नहीं बनता।

Dilip Clerk आप इस सम्मान के योग्य है दादा मैं भी भड़ास एक मुहिम

Sanjaya Kumar Singh बधाई। पुरस्कार के लिए और जोरदार लिखने के लिए भी।

Surendra Trivedi यशवंत जी, आपने तो सब कुछ लिख डाला। खैर, उम्मीद है कि आप बहुत आगे जाओगे।

Ramesh Chandra Rai देखो यशवंत तुम जो भी पोस्ट करो उससे मेरा कोई मतलब नहीं है। पूरे पत्रकारिता के जीवनकाल में मैं बहुत खुश था कि एक पत्रकार अपनी सुख सुविधा छोड़कर लड़ रहा है। तुम इसके लिए जेल यात्रा भी किए। मैं तुम पर गर्व करता था। लोगों को बताता था कि एक होनहार पत्रकार अपने कैरियर को दांव पर लगा दिया। सम्मान मिलने से सबसे अधिक खुश हूं लेकिन योगी के हाथ लेने से मुझे दुख हुआ। तुम मेरी भावना समझ गए होंगे। बाकी बात मिलोगे तो होगी। फिर भी तुम मेरे अनुज हो इसलिए मैं तुम्हें बधाई दे रहा हूँ।

Pradeep Surin कंटेंट पर ध्यान दीजिए। इतना लंबा नहीं चल पाएगा। बाकी बधाई हो आपको। 🙂

डॉ. अजित हार्दिक बधाई सर।आप अपने किस्म के अनूठे और अकेले पत्रकार है

Shrikant Asthana Should I say anything? You’ve risen above these things! Keep it up. Live happily as free as you feel right at any given moment.

Vivek Garg आपको आज तक नहीं पढ़ा और नहीं सुना, बस विकास अग्रवाल जी आपको यहाँ विजिट किये | फेसबुक पर साइड कॉलम में फ्रेंड्स की activity दिख जाती है | हम भी आपके पेज पर आ गए| आपको अवार्ड मिला ख़ुशी हुयी लेकिन में आपको यह बधाई आपकी लेखनी को दे रहा हूँ जो आपने इतना सटीक और स्वच्छ अक्षरों में बात को इतनी सरलता से लिखा ,आप भी मेरी तरह अपनी भावनाऔ का पूरा सम्मान करते हुए पूरी बात लिखते हैं , यह नहीं सोचते की पढने वाला निबंध समझ कर सो तो नहीं जाएगा | Such a confidence is necessary to remain alive within bowl(India) of so many school of thoughts whether needed or not in present time period . आपसे बहुत कुछ सिखने को मिलेगा | आपको अपना डिजिटल गुरु मित्र कह सकता हूँ , हिंदी बचपन से जानता हूँ , कई सालो से लिख रहा हूँ लेकिन वो पैनापन नहीं आया | आपको साधुवाद

Ajay Rai यंशवत हमारे साथ आपने गरीबो के बीच काम भी किया लेकिन दुख हुआ योगी के हाथो पुरस्कार लेने पर इस समय जब छात्र नौजवान योगी जी के कारण दमन का सामना कर रहे हो सफाइ जो दे !

Devendra Verma मोदी की भांड मीडिया तो सबने देखी अब योगी की जातिवादी और चापलूस मीडिया के दिन भी बहुरने लगे,

Arvind Singh सर आपको और आपकी पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई

Govind Badone शानदार, बेबाक।

Rajesh Rai आप ने तो पूरी गीता को आत्मसात कर लिया है ।

A.P. Soni Akash बधाई भड़ासी भाई यशवंत जी

Ram Ashrey Yadav भाई यशवंत जी लेख में आपने गज़ब की भड़ास निकाली है, बधाई!

Bhawna Vardan बधाई बधाई बधाई ….और आपकी इस पोस्ट के लिए तो क्या कहूँ …..नि:शब्द हूँ …हमेशा की तरह

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मुख्यमंत्री योगी ने भड़ास संपादक यशवंत समेत 18 विभूतियों को किया सम्मानित (देखें तस्वीरें)

लखनऊ : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संगीत नाटक अकादमी में एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। कार्यक्रम का शुभारम्भ अपरान्ह 3 बजे गोमती नगर, विपिन खण्ड स्थित संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में दीप प्रज्वलन से हुआ। इस अवसर पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने 15 विभिन्न श्रेणियों में उत्कृष्ट योगदान के लिए 18 विभूतियों को सम्मानित किया। इस साल का जनक सम्मान भड़ास के संपादक यशवंत सिंह को दिया गया। शक्ति सम्मान स्टार आरटीआई कार्यकर्ता सिद्धार्थ नारायण को दिया गया।

यह सम्मान शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, दिव्यांग, हस्तशिल्प, कला एवं संस्कृति, क्रीड़ा, कृषि, महिला, व्यवसाय, साहित्य, प्रशासन, क़ानून, जनसंचार, सार्वजनिक जीवन की श्रेणियों में प्रदान किया जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ विशेष व्यक्तियों को जूरी अवार्ड से सम्मानित किया जाता है। इस अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री ने सम्मान पाने वाली विभूतियों को बधाई दी तथा लोकमत सम्मान की सराहना की। उन्होने कहा समाज जब किसी को सम्मानित करता है तो एक नई संस्कृति का जन्म होता है। प्रमुख वक्ताओं में प्रथम पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त श्री वजाहत हबीबुल्ला, वरिष्ठ वैज्ञानिक श्री पी.के. सेठ, जनरल आर.पी. शाही, सेवानिवृत्त, श्री ए.के. सिंह आदि शामिल रहे।

कुछ विशेष व्यक्तियों को दिए जाने वाले अवार्ड में भड़ास के संस्थापक और संपादक श्री यशवंत सिंह को जनक सम्मान, श्रीमती सुष्मीता मुखर्जी को अभिव्यक्ति सम्मान और श्री सिद्धार्थ नरायण को शक्ति सम्मान सहित जूरी अवार्ड से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा नवाजा गया। लोकमत सम्मान की विभिन्न श्रेणियों में शिक्षा में श्री शोभीलाल गुप्ता, कुशीनगर, स्वास्थ्य में डा. आर. एन. सिंह, गोरखपुर, पर्यावरण में श्री शैलेन्द्र सिंह, लखनऊ, दिव्यांग में श्री अबू हुबैदा, व आवा आशा स्कूल दोनो लखनऊ, हस्तशिल्प में मो. दिलशाद, सहारनपुर, कला एवं संस्कृति में सुश्री अंकिता बाजपेई, लखनऊ, क्रीड़ा में  अशोक कुमार सिंह, नई दिल्ली, कृषि में श्री प्रार्थ त्रिपाठी, गोण्डा, महिला में सुश्री आसमा परवीन, कुशीनगर, व्यापार में श्रीमती किरन चौपडा, लखनऊ, साहित्य में श्रीमती नीरजा हेमेन्द्र, लखनऊ, प्रशासन में श्रीमती सुतापा सान्याल, लखनऊ, जनसंचार में उत्कर्ष चतुर्वेदी, लखनऊ, सार्वजनिक जीवन में डा. बलमीत कौर, बहराइच को सम्मानित किया गया।

इस कार्यक्रम में भारत के पहले मुख्य केन्द्रीय सूचना आयुक्त श्री वज़हात हबीबउल्लाह ने अपने विचार एवं आर0टी0आई0 की महत्वता पर बात की। कार्यक्रम में प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री, राज्य सूचना आयुक्त व गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहें। स्टार एक्टिविस्ट सिद्धार्थ नारायण ने अपने कुछ केसों के बारे में बताया, जिनमें से 2015 में हुये आगरा चर्च हमला, शक्तिमान घोडा व भ्रष्टाचार एवं सार्वजनिक जीवन प्रमुख थे। इस अवसर पर उन्होंने अपने सम्मान को उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के साथ बांटने की बात कही और राज्य एवं केन्द्र के सभी सूचना आयुक्तों को तहें दिल से धन्यवाद एवं अपना आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी पहली आरटीआई याचिका अपनी मां के पेंशन के पैसे से दायर की थी और उस पैसे में इतनी बरकत थी कि आज उन्हें इतना बड़ा सम्मान मिल रहा है। सिद्धार्थ ने कहा कि ‘‘जिन हाथों ने मुझे इस काबिल बनाया, मैं उन्हीं हाथों में मैं मुख्यमंत्री से सम्मानित होने के बाद अपना ये सम्मान दूंगा।’’

इस कार्यक्रम में  प्रथम पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त श्री वजाहत हबीबुल्ला ने कहा कि सिद्धार्थ को न्याय एवं अधिकार की बहुत ही गहन जानकारी है एवं वह किसी में कोई भेदभाव नहीं करते। मेरी कोर्ट में उन्होंने हाशिये पर खड़े गरीब से गरीब तबके को न्याय दिलाने का यथावत प्रयास किया है। साथ ही में उसी न्याय और अधिकार की भावना के साथ उन्होंने एक रियासत की रानी की प्रतिष्ठा भी बचायी है। इस अवसर पर हर्षवर्धन फाउन्डेशन का शुभारम्भ भी माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के कर कमलों द्वारा किया गया।

इस आयोजन के बारे में वायस आफ लखनऊ अखबार में छपी खबर यूं है….

ठीक से पढ़ने के लिए इस न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें….

यशवंत को सम्मानित किए जाने से संबंधित खबर का नेशनल वायस न्यूज चैनल पर प्रमुखता से प्रसारण किया गया…

आयोजन की कुछ अन्य तस्वीरें….

हर्षवर्द्धन फाउंडेशन का उदघाटन करते सीएम योगी आदित्यनाथ… साथ में हैं लोकमत अखबार के संपादक आनंदवर्द्धन सिंह.

लोकमत अखबार के संपादक और लोकमत सम्मान के आयोजक आनंदवर्द्धन सिंह ने सीएम योगी को प्रतीक चिन्ह भेंट किया.

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धर्मपथ से राजपथ पर हठयोगी

पंचूर से गोरक्षपीठ तक का सफर अजय कुमार विष्ट का योगी आदित्यनाथ में कायांतर और परिवर्तन का सफर है। एक गृहस्थोन्मुख जीवन का, संन्यासी जीवन पथ का वरण, और इस वरण के साथ ही, जीवन की कठोरतम और असाध्य जीवन शैली और साधना पद्धति का भी वरण। नाथ पंथियों के आदि अराध्य गुरू शिव और उनकी शिष्य परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ और गुरू गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) सरीखे महायोगी हुए हैं। जिन्होंने अपने तप,जप,योग और हठयोग की कठोर साधना से जीवन के यथार्थ और गूढ़ता के मर्म को समझा है, और जीवन के उद्देश्य व उसके सारभूत तत्वों की विशद मीमांसा की है। गुरू गोरखनाथ से गोरक्षपीठ, गोरखपुर जिला और इसी परंपरा से जुडा नेपाल का गोरखा जिला, देश और दुनिया के नाथपंथियों के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल है। शस्त्र और शास्त्र में निपुण संतों की यह परंपरा मानव जन्म और मृत्यु ही नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रहमाण्ड के शाश्वत सत्य और तत्वज्ञान के गहरे रहस्यों का भी भेद किया है।

कहा जाता है कि राजनीति दीर्घकालिक धर्म है, और धर्म अल्पकालिक राजनीति। जिस देश में राजनीति और धर्म का चोली दामन का संबंध रहा हो। जहां मठों, मंदिरों और अखाड़ों से देश और राज्यों की नीति पोषित और प्रभावित होती रही है, कभी उसी राजनीति ने इन धार्मिक प्रतिष्ठानों के धर्मक्षेत्र को भी प्रभावित किया है। अर्थात् आदिम काल से ही धर्म और राजनीति का गहरा अंतर्संबंध रहा है। और दोनों संस्थाएं एक दूसरे को हमेशा से नियंत्रित और पोषित करती रहीं हैं।

समय की रेखा पर जैसे जैसे आदिम मनुष्य, सभ्यता की नई-नई कहानी लिखता गया, वह एक सभ्य और सुन्दर समाज का हिस्सा बनता गया। धर्म उसे जीवन जीने की कला, आचरण-व्यवहार का तरीका सिखाता गया और वह उससे दीक्षित होता गया। उसके धर्म का आचरण, सार्वजनिक न होकर निजी आचरण था। जो उसकी मान्यताओं और परम्पराओं ने उसे सिखाया था। यही कारण है कि धरती के किसी भी टुकड़े पर आबाद जिन्दगी, अपने पुरातन मान्यताओं, परम्पराओं और धर्म से ही नियंत्रित होती है। ‘धर्म’, जिसे धारण किया जा सके, जीवन में सुगमता और जन-कल्याण की भावना पैदा किया जा सके।

‘सियासत’ भी एक धर्म है। जो राजा अपने राज्य की नीति के अनुरूप आचारण नहीं करता, वह धर्म का निर्वहन नहीं कर सकता है। धर्म और सियासत का अंतिम उद्देश्य जन-कल्याण ही होता। यही धर्म जब अपने रास्ते से भटक जाता है, तो समाज को दिशा नहीं दे पाता है, बल्कि स्वयं दिशाहीन हो जाता है। वहीं सियासत का लक्ष्य, जब जन-कल्याण से हटकर सत्ता को साध लेना, बना जाता है तो सियासत भी ‘जन’ से दूर हो जाती है और समाज को विनाश के रास्ते पर ले जाती है।

इस देश में मठों और मंदिरों की पुरातन परंपरा रही है। यहां आस्था इतनी, कि पत्थर भी पूजा जाता है। कृषि और ऋषि के देश में तक्षशिला और नालंदा जैसा विश्वविद्यालय हमारे ज्ञान-विज्ञान और धर्म के गौरवशाली परम्परा के जीवंत प्रतीक रहे हैं। चाणक्य जैसे विद्वान, जहाँ आचार्य (प्रोफेसर) थे, जिन्हें निजी धर्म से लेकर राजधर्म की परिभाषाएं और नीतियों का विराट अनुभव था। राजधर्म की स्थापना के लिए तो उन्होंने ‘नन्दवंश’ के साम्राज्य की जड़ें उखाड़ फेंकी, और धर्म से राजनीति को नई दिशा दी थी।

विदेशी विद्वान मार्क्स ने जिस धर्म को अफीम का नशा कहा था, वह नशा आज भी जन की नसों में तैर रहा है, और उसके मानस को नियंत्रित व प्रभावित भी कर रहा है। यही कारण है कि आज भी, मठों से सियासत संचालित हो रही है और सियासत से मठ। ‘योगी’ जिस परंपरा से दीक्षित हैं, वहां हठयोग का विशेष महत्व है। योग से हठयोग की ओर बढ़ते योगी को नाथपंथ या गोरक्षपीठ की सदियों पुरानी मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार दीक्षित और शिक्षित होना पडा है। भगवा भेष और कान में कुण्डल पहना संन्यासी जब गोरक्षपीठ का महन्त या पीठाधीश्वर बनता है, तो उसे सबसे पहले निज माया-मोह का त्याग और परिजनों का पिण्डदान करना पडता है।

गोरक्षपीठ का सत्ता-सियासत के साथ कदम ताल मिलाने की पुरातन परंपरा रही है। योगी आदित्यनाथ को नई पहचान और नाम देने वाले उनके गुरूदेव और गोरक्षपीठ के पूर्व महन्त अवैद्यनाथ का भी सत्ता और सियासत से गहरा रिश्ता रहा है। स्वयं कभी भाजपा के शिखरपुरूष और सर्वमान्य नेता रहे अटल बिहारी बाजपेयी और नानाजी देशमुख से इस मठ के गहरे रिश्ते थें। पहली बार गोरखपुर लोकसभा सीट से ‘हिन्दूमहासभा’ के बैनर तले चुनकर देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुँचे अवैद्यनाथ कुल चार बार सांसद रहे, और इसी जनपद के मानीराम विधान सभा सीट से चार बार विधायक।

हिन्दुत्व और उसकी रहबरी की पुरातन प्रयोगशाला गोरक्षपीठ ने, रामजन्मभूमि मन्दिर आन्दोलन में जो महती भूमिका का निर्वहन किया था, वह अवैद्यनाथ के सियासी चढ़ान का टर्निंग प्वांइट था। ऊँच-नीच और छुआ-छूत जैसी हिन्दू धर्म की सामाजिक कुरीतियों को तोड़ने के लिए स्वयं अवैद्यनाथ ने कभी काशी के डोमराजा के घर भोग तक लगाया था। अवैद्यनाथ से पहले भी इस मठ के महंत दीग्विजय नाथ ने हिन्दू महासभा से जुड़कर हिन्दुत्व की पैरोकारी की और उसके विस्तार और संस्कार के लिए जीवन होम कर दिया। मेवाड़ के महाराणा प्रताप के कुलवंश के एक अबोध बालक से गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर तक का सफर दीग्विजय नाथ के त्याग और समाज के प्रति समर्पण का महान उदाहरण है।

मठ की महान परंपराओं और हिन्दुत्व के संस्कारों से अभिसिंचित आदित्यनाथ ने जब गोरक्षपीठ के नये महाराज की जिम्मेदारी ली तो उनके पास मठ की परंपराओं और संघर्षों का एक लम्बा इतिहास और भूगोल था। साथ ही अवैद्यनाथ जैसा धार्मिक और सियासी अनुभव से पका हुआ गुरू महाराज। जिन्होंने एक बालक को सियासी और धार्मिक रूप से दीक्षित कर अपना उत्तराधिकारी बना दिया। यही कारण है कि सन्-1998 में भारतीय संसद में सबसे कम उम्र के सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ ने प्रवेश किया।

कट्टर हिन्दुत्व की छवि में ढला योगी का व्यक्तित्व कब गोरखपुर की सरहदों को पार कर समूचे पूर्वी अंचल में विस्तार ले लिया, यह स्वयं आदित्यनाथ को भी पता नहीं चला। और जब पता चला तो वह न केवल भाजपा के बड़े नेता बन चुके थे, बल्कि संघ के भी दुलारे हो चुके थे। जिनमें संघ कल का अपना नेता देख रहा था और है, जो उसके एजेंडे और सोच का, ना केवल विस्तार कर सकता है बल्कि उसकी दूरगामी सियासत और सामाजिक परियोजनाओं को भी, उसके (संघ के) सांचे में ढाल कर उत्तर प्रदेश की सियासी प्रयोगशाला की सरहदों से निकाल राष्ट्रीय फलक तक विस्तार दे सकता है। क्योंकि संघ अपनी सियासी संधान के लिए हमेशा नेतृत्व की नई नर्सरी तैयार करता है। और देश के सबसे बड़े सूबे में फिलहाल उसका प्रयोग सफल  है। उसका यह दिखना, कितना वास्तविक है, और कितना आभासी है । यह तो आने वाला वक़्त बताएगा। फिलहाल एक हठयोगी का राजयोग चल रहा है, और इस राजयोग में योगी नई लकीरें खींचते दिखाई दे रहें हैं। जो विपक्ष समेत भाजपा और इसके नये शिखरपुरूषों के लिए चिंता की नई लकीरे खींच रहा हैं।

लेखक अरविन्द कुमार सिंह शार्प रिपोर्टर मैग्जीन के संपादक हैं. उनसे संपर्क 09451827982 के जरिए किया जा सकता है.

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नाथ योगी संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ के बारे में ओशो क्या कहते हैं, जानिए

ओपिनियन पोस्ट मैग्जीन ने इस बार गुरु गोरखनाथ के बारे में ओशो के विचार को प्रकाशित किया है. असल में योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का सीएम बन जाने के बाद से अचानक नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ चर्चा में आ गए हैं. गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बहाने नाथ संप्रदाय और गुरु गोरखनाथ को लेकर जो चर्चा चल पड़ी है, उसी बीच जाने माने चिंतक ओशो के गोरखनाथ के बारे में विचार / लेख को ढूंढ निकाल कर प्रकाशित कर देना एक बढ़िया कदम है.

ओशो ने अपने जीवन में ढेर सारे गुरुओं, संप्रदायों, फकीरों, संतों के बारे में लिखा है उनमें गुरु गोरखनाथ भी हैं. यहां तक कि टॉप टेन की ओशो की सूची में गुरु गोरखनाथ भी हैं. ओशो ने दस की सूची को कसते-कसते आखिर में जिन चार को भारतीय मानस के कालजयी निर्धारक माना है, वो हैं कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध और गोरखनाथ. तो, पहले ओपिनियन पोस्ट को धन्यवाद कि उसने बेहद मौके से एक पठनीय आर्टकिल प्रकाशित किया. दूसरा यह कि आप सभी को इस आलेख को पढ़ना चाहिए. नीचे ओपिनियन पोस्ट में कवर स्टोरी के रूप में प्रकाशित आर्टकिल के तीनों पेज हैं. एक-एक पेज पर क्लिक कर पेज को एक्सपैंड करें और अच्छे से पढ़ें. -संपादक, भड़ास4मीडिया

 

 

 

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योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने से होने वाले एक बड़े फायदे के बारे में बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : योगी आदित्यनाथ के सीएम बन जाने से एक बड़ा फायदा ये है कि यूपी के सीएम को अब अपने परिवार के लोगों के लिए सांसदी, मंत्रालय, ठेका, उगाही आदि के लिए प्रयास नहीं करना होगा. मुलायम और अखिलेश के सीएम वाले कार्यकाल में इनके कुनबे के जितने लोग सांसद विधायक बने, जितने लोग मंत्री बने, जितने लोग ठेका पट्टी से जमकर लूटे, जितने लोग ट्रांसफर पोस्टिंग से ठूंस कर कमाए यानि इन लोगों ने अपने कार्यकाल में अपने और अपने कुनबे के जरिए जितना माल दूहा, इकट्ठा किया-कराया है, अगर वो सब जब्त कर मेरे पूर्वी उत्तर प्रदेश इलाके के हर घर के प्रत्येक सदस्य के बीच वितरित कर दिया जाए तो हर एक को कम से कम एक-एक लाख रुपया मिल जाएगा…

(….मुलायम सिंह जी जाने क्या मोदी के कान में फूंक चुके हैं, शपथ ग्रहण के दिन और आज अपर्णा प्रतीक खुद अपने पैरों से चलकर योगी जी से मिल आए हैं… ऐसे में धन की जब्ती तो छोड़िए, इस कुनबे के काम और आय की जांच भी होगी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता…)

योगी संन्यासी हैं और दीक्षा लेने के बाद से अपने परिवार से दूर हैं. इसलिए वो पूरी तरह प्रदेश के विकास के लिए काम करने में मन लगाएंगे, ये उम्मीद करता हूं. पिछले दस वर्षों में जिस कदर अंध लूट, तुष्टीकरण, उगाही, जंगलराज का दौर चला, उससे निजात पाने में वक्त तो लगता है… बूचड़खाने हों, लेकिन लाइसेंसी हों… सड़क पर नौजवान चलें लेकिन लड़कियों की तरफ निगाह न करें… ये दो अच्छे काम कर रहे हैं योगी जी.. साइड इफेक्ट हर काम के होते हैं.. जो अफसर इंप्लीमेंटेशन में गड़बड़ करें उन्हें भी दौड़ा कर दंड दो लेकिन सैद्धांतिक रूप से दोनों फैसले ठीक हैं… मेरी सबसे ज्यादा उत्सुकता किसानों की कर्ज माफी वाले वादे की है. अगर योगी जी ये वाला काम भी कर दें तो उत्तर प्रदेश के किसानों के मुर्झाए चेहरों पर लाली लौट आएगी… जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

यशवंत का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

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सीएम योगी ने आईपीएस हिमांशु कुमार को निलंबित कर दिया

यूपी के युवा आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार को पुलिस विभाग के अंदर की पोल खोलना महंगा पड़ गया. उन्हें मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने निलंबित कर दिया है. कहा जा रहा है कि इस कदम के बाद यूपी को एक नया अमिताभ ठाकुर मिल गया है, हिमांशु कुमार के रूप में, बशर्ते हिमांशु कुमार अपनी लड़ाई पूरे जोश और दम के साथ लड़ सकें. संभव ये भी है कि वे मामले को रफादफा करा कर फिर से बहाल हो सकते हैं. हालांकि हिमांशु ने सस्पेंड होेने के बाद ट्विटर पर लिखा है कि सत्य की जीत होती है. यानि उन्होंने इरादे जता दिए हैं कि वे झुकेंगे नहीं.

आईपीएस हिमांशु कुमार ने यूपी में नई सरकार बनने के बाद आरोप लगाया था कि पुराने पुलिस अफसर नई सरकार को खुश करने के लिए अचानक यूटर्न ले चुके हैं और एक जाति विशेष के पुलिस कर्मियों को दंडि़त कर रहे हैं. नेशनल वायस चैनल के एडिटर इन चीफ बृजेश मिश्रा ने हिमांशु कुमार से लंबी बातचीत की और उसका प्रसारण नेशनल वायस चैनल पर किया. इस बातचीत में हिमांशु ने खुलकर पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार के बारे में बताया.

योगी आदित्‍य नाथ के नेतृत्‍व में भाजपा की सरकार बनने के बाद एक आईपीएस अधिकारी हिमांशु ने डीजीपी पर जाति विशेष के अधिकारियों को ‘सजा’ देने का आरोप लगाया. जब मीडिया में उनके ट्वीट की चर्चा शुरू हुई तो सफाई देते हुए कहा कि लोगों ने गलत मतलब निकाला. यूपी कैडर के 2010 बैच के आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार फिरोजाबाद के एसपी थे. बयानों के बाद में उन्हें डीजी आफिस अटैच कर दिया गया. उन्‍होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘कुछ वरिष्‍ठ अधिकारियों में उन सभी पुलिस कर्मचारियों को सस्‍पेंड / लाइन हाजिर करने की जल्‍दी है जिनके नाम में ‘यादव’ है.’

वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश मिश्रा ने रिपोर्ट दी कि ‘नोएडा और गाजियाबाद में 90 सिपाहियों को लाइन हाजिर कर दिया गया है।’ मिश्रा के मुताबिक इन्‍हें ‘कारखास’ कहते हैं और आईपीएस-नेता मिलकर इनसे वसूली कराते थे।’ इसी ट्वीट पर हिमांशु ने जवाब देते हुए पूछा कि ‘आखिर डीजीपी ने मेरे द्वारा बिसरख नोएडा में फाइल की गई एफआईआर की सही से जांच कराने की इजाजत क्‍यों नहीं दी? आखिर डीजीपी कार्यालय अफसरों को जाति के नाम पर लोगों को परेशान करने के लिए मजबूर क्‍यों कर रहा है?’

यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार बिहार के मोतिहारी के रहने वाले हैं. हिमांशु पर उनकी पत्नी प्रिया सिंह ने पटना के महिला थाने में दहेज प्रताड़ना और मानसिक शोषण करने का आरोप लगाया था. इनकी पत्नी प्रिया सिंह पटना की रहने वाली है. इन दोनों की 2014 में शादी हुई थी. लेकिन शादी के कुछ दिनों के बाद ही प्रिया ने मार्च 2015 में हिमांशु पर दहेज प्रताड़ना और मानसिक रूप से शोषण करने का आरोप लगाया था.

कोर्ट ने इनकी इस मामले में अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया था. पटना हाई कोर्ट की ओर से यूपी सरकार को हिमांशु के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए थे लेकिन, यूपी की अखिलेश सरकार लगातार हिमांशु को बचाती रही, ऐसा आरोप है. इस मामले पर आईपीएस हिमांशु ने ट्वीट कर बताया था कि उनकी पत्नी 10 करोड़ रुपए के लिए ब्लैकमेल कर रही हैं.

हिमांशु ने यूपी में योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद पुलिस विभाग में हुए तबादले पर प्रश्न उठाया था. यूपी की योगी सरकार द्वारा सस्पेंड किए जाने के बाद हिमांशु ने अपने ट्वविटर अकाउंट पर लिखा-सत्य की जीत होती है. 2010 बैच के आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार फिलहाल डीजी ऑफिस से जुड़े हुए हैं. कुछ दिन पहले ही एसपी फिरोजाबाद के पद से इनका ट्रांसफर डीजी ऑफिस में कर दिया गया था. यूपी पुलिस का कहना है कि हिमांशु को अनुशासनहीनता के लिए सस्पेंड किया गया है.

आईपीएस हिमांशु कुमार और नेशनल वायस चैनल के एडिटर इन चीफ के बीच की बातचीत सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=wF1993jy7AI&t=352s

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लक्ष्मीकांत वाजपेयी चुनाव भले हार गये हों लेकिन वह भी लाल बत्ती के हकदार थे

योगी मंत्रिमंडल गठन में कुछ ऐसे चेहरे छूट भी गये जिनके पास किसी बड़े नेता की सिफारिश नहीं थी

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अपने मंत्रियों को विभाग बांट कर पहला पड़ाव पार कर लिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि विभाग बंटने के बाद योगी के मंत्रियों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के अलावा न तो कुछं दिखाई देगा और न कुछ सुनाई। योगी सरकार के पास न तो ‘हनीमून’ मनाने का समय है और न ही अपने कर्तव्यों को सच्ची निष्ठा के साथ निर्वाहन न करने की कोई गुंजाइश शेष है। सीएम योगी से लेकर पीएम मोदी तक की निगांहबानी में इन मंत्रियों को जनता की कसौटी पर खरा उतरना होगा। दो वर्षो के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव के समयं उनके (यूपी के मंत्रियों) काम से ही मोदी की जीत-हार का फैसला होना है।

पहले लोकसभा चुनाव और अब उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में शानदार जीत का सबसे बड़ा श्रेय मोदी और अमित शाह को ही जाता है, जिसे मोदी-शाह जोड़ी कभी गवांना नहीं चाहेंगे। यूपी की जनता ने बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव में 80 में से 73 सीटें और विधान सभा चुनाव में 403 में से 325 सीटों पर प्रचंड बहुमत से जीत दिलाई। मोदी इस रिकार्ड को 2019 में भी बरकरार रखना चाहते हैं इसके लिये वह एड़ी-चोटी का जोर भी लगा रहे हैं।   

शायद इसी लिये योगी के मंत्रिमंडल का ‘गुलदस्ता’ काफी सोचने-विचारने के बाद बेहद सलीके से सजाया गया है। अपवाद को छोड़कर नये और उर्जावान नेताओं को योगी मंत्रिमंडल में ज्यादा तवज्जों दी गई हे। कोशिश यह भी की गई कि योगी मंत्रिमंडल का गठन विवादों से बचकर किया जाये। इसी लिये कुछ पुराने चेहरों को किनारे कर दिया गया तो कई नये चेहरे आगे आ गये। मंत्रिमंडल विस्तार में इस बात का भी ध्यान रखा गया कि कहीं गैरों (चुनाव से कुछ माह पूर्व बीजेपी ज्वांइन करने वाले नेताओ) पर करम करने के चक्कर में अपनों (लम्बे समय से बीजेपी के लिये संघर्ष करने वालों) पर सितम न हो जाये।

इसे आसान शब्दों में कहा जाये तो मोदी और योगी ने मंत्रिमंडल विस्तार में दलबदलुओं से अधिक तरजीह पार्टी के पुराने वफादारों को दी। तमाम महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी बीजेपी के संघर्ष के समय के साथियों के हिस्से में आई, लेकिन एक हकीकत यह भी है मंत्रिमंडल गठन में कुछ ऐसे चेहरे छूट भी गये जिनके पास किसी बड़े नेता की सिफारिश नहीं थी। यही वजह थी लखनऊ मध्य और पश्चिम के पांच बार के विधायक सुरेश श्रीवास्तव जैसे पुराने नेता खाली हाथ ही रह गये।

इसी प्रकार बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी चुनाव भले हार गये हों, लेकिन वह भी लाल बत्ती के हकदार थे। तमाम नेता पुत्र योगी कैबिनेट में स्थान पा गये, आशुतोष टंडन को महत्वपूर्ण विभाग मिलने की एक वजह उनके पिता लालजी टंडन है। टंडन यूपी में मंत्री रह चुके हैं और उनके पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी से काफी घनिष्ट संबंध थे। राज्यमंत्रियों में पहली बार की विधायक अर्चना पांडेय को खनन, आबकारी, मद्यनिषेध तो संदीप सिंह को बेसिक, माध्यमिक, उच्च प्राविधिक एंव चिकित्सा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग सौंपने के पीछे भी इनके परिवार की पृष्ठभूमि बड़ी वजह बताई जाती है। अर्चना पार्टी के बड़े नेता रहे स्व.रामप्रकाश त्रिपाठी की पुत्री है तो संदीप सिंह कल्याण सिंह के पौत्र है। सुरेश पासी को आवास एवं व्यावसायिक शिक्षा देने के पीछे केंद्रीय मंत्री स्मृमि ईरानी की भूमिका मानी जा रही है, लेकिन गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह इस मामले में पिछड़ गये। यही स्थिति कमोवेश कई और जिलों में भी देखने को मिली।

ऐसे नेताओं का निराश होना लाजिमी है, जिन्हें मंत्री पद नहीं मिल पाने से अधिक दुख इस बात का है कि उनकी पार्टी के प्रति निष्ठा दलबदलुओं के सामने तार-तार हो गई। वैसे, कहने वाले यह भी कहते हैं कि इसमें योगी की कोई गलती नहीं है है। सब जानते हैं कि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका मंत्रियों के विभाग तय करने में काफी महत्वपूर्ण रही थी। 47 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री को छोड़ दे, तो 46 में 34 चेहरें ऐसे है जो पहली बार मंत्री ही नहीं बने है इनमें से कई तो पहली बार के विधायक भी है।

बात दूसरे दलों से आये नेताओं को लाल बत्ती दिये जाने की कि जाये तो ऐसा लगता है कि इन नेताओं को लाल बत्ती तो मिल गई, लेकिन आलाकमान का विश्वास जीतने में इन लोंगो को समय लगेगा। दलबदलू नेताओं को जो विभाग बांटे गये हैं,वह किसी भी दृष्टि से उनकी पूर्व की हैसियत के अनुसार नहीं हैं। बसपा सरकार में नेता प्रतिपक्ष रहे स्वामी प्रसाद मौर्य को श्रम एंव सेवायोजना तथा नगरीय रोजगार विभाग दिया गया है।

स्वामी की हैसियत को देखते हुए उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि उनके नेताजी को पीडब्ल्यूडी, सिंचाई जैसा कोई विभाग दिया जाएंगे। कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी को महिला कल्याण, परिवार मातृ एंव शिशु कल्याण और पर्यटन विभाग दिया गया है। डा0 रीता के विभागों को जरूर अहम माना जा रहा है। इसी तरह सपा व बसपा में रहे चुके सांसद एसपी सिंह बघेल को पुशपालन,बसपा छोड़कर आए सांसद और मौजूदा विधायक बृजेश पाठक को विधि एवं अतिरिक्त न्याय, अतिरिक्त ऊर्जा स्त्रोत एंव राजनीतिक पेशन विभाग दिया बया हैं। बृजेश के समर्थक भी जनता सें जुड़े अहम महकमे की उम्मीद लगाए बैठे थे।

माया सरकार में कृषि मंत्री रहे लक्ष्मीनारायण चौधरी को दुग्ध विकास विभाग मिला है। उन्हें धर्मार्थ कार्य, संस्कृति और अल्पसंख्यक कल्याण महकमें की जिम्मेदार भी मिली है जहां करने के लिये बहुत कुछ नहीं है। 2015 में भाजपा में शामिल हुए दारा सिंह चौहान को वन, पर्यावरण जंतु उद्यान विभाग पर ही संतोष करना पड़ा है। नंद कुमार नंदी को स्टांप तथा न्यायालय शुल्क, पंजीयन एंव नागरिक उड्डयन विभाग आवांटित किया गया है जो उनकी पसंद का नहीं बताया जाता है। इसी तरह बसपा छोड़कर आये स्वतंत्र प्रभार के मंत्री अनिल राजभर को सैनिक कल्याण, खाद्य प्रसंस्करण, होमगार्ड्स, प्रांतीय रक्षक दल और नागरिक सुरक्षा विभाग मिला है। उक्त विभाग सीधे तौर पर आम जनता से जुड़े विभाग नही है।

बात सीएम योगी की कि जाये तो उनके पास गृह, आवास, राजस्व खाद्य एवं रसद, नागरिक आपूर्ति जैसे करीब तीन दर्जन महत्वपूर्ण विभागों में कई सरकारों में विवादों को जन्म देने और सरकारों की छवि पर असर डालने वाले खनन जैसे विभाग भी रहेंगे। काफी सोचने-विचारने के बाद मुख्यमंत्री ने इन्हें अपने पास रखना ही बेहतर समझा। खाद्य-रसद विभाग को अपने पास रख सीएम योगी अपने प्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सूबे में गरीबों को सस्ता अनाज न मिल पाने की चिंता को दूर करने की कोशिश करेंगे।

लब्बोलुआब यह है कि भले ही नये-नवेले चेहरों सिद्धार्थ नाथ सिंह, श्रीकांत शर्मा, आशुतोष टंडन, मुकुट बिहारी वर्मा, स्वाति सिंह, संदीप सिंह व अनुपमा जायसवाल जो कभी मंत्री नही रहे, को महत्वपूर्ण विभाग दिए गए है और इनमें कोई किसी बड़े नेता का रिश्तेदार है तो किसी पर लंबे समय से पार्टी का कोई बड़ा नेता मेहरबान दिखता रहा है, लेकिन सब कुछ ठोक बजाकर किया गया है।

ऐसा लग रहा है बीजेपी आलाकमान युवा नेताओं पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों सौंप कर भविष्य के लिए बड़े नेताओं की नई पौध खड़ी करना चाहती है। इसी लिये नए चेहरों को अपने जौहर दिखाने का पूरा मौका दिया गया है। नये चेहरों को आगे करने का फायदा यह भी रहेगा कि बीजेपी सरकार की पुरानी वाली इमेज भी धुल जायेगी। नये चेहरों को तवज्जो मिलने का प्रभाव दिखाई भी पड़ रहा है। मोदी के स्वच्छता अभियान, भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टालरेंस, कानून व्यवस्था पर शिकंजा,कसता नजर आने भी लगा है।कई ऐसे महत्वपूर्ण फैसले शुरूआती दिनों में ले लिये गये जिन्हें पूर्व की सरकारें वोट बैंक के चलते लेने में कतराती थीं। 

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर न लिखें, यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप मुद्दा है : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर मत लिखिए. यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप का ही मुद्दा है. जमीन पर लोग इसे बहुत जरूरी बता रहे हैं. कई लोगों की बात सुन कर और कई लोगों से बात करने के बाद लिख रहा हूं. आप आजादी, स्वतंत्रता, प्रेम आदि का राग अलापते रहिए लेकिन जमीन पर लोग शोहदों के आतंक से त्रस्त थे. मैं भी आप की ही तरह सोच रहा था कि रोमियो स्क्वाड के जरिए यूपी पुलिस बच्चों को परेशान कर रही है.

पर लोग कह रहे हैं कि परेशान वे बच्चे हो रहे हैं जो सुबह शाम लड़कियों के कालेज स्कूल और उनके निकलने के रास्ते पर तैनात रहते थे और पीछा किया करते थे. रही बात पार्कों बागों आदि में बैठने वाले जोड़ों की तो किसी भी अभियान में दस पंद्रह परसेंट जेनुइन लोग तो चपेट में आते ही हैं.. वो कहते हैं न गेहूं के साथ घुन का पिस जाना. सो, हे साथियों दोस्तों, अब थोड़ा प्रैक्टिकल होकर जमीनी हालात को समझ बूझ के लिखा करिए. सिर्फ घर से आफिस और आफिस से घर, इस दरम्यान पूरे वक्त फेसबुक पर वैचारिक लेखन से रियल्टी / अंडर करंट को नहीं पकड़ पाएंगे.

ठीक यही मामला बूचड़खाने का भी है. शहरी / रियाइशी इलाके में बहते खून, भयंकर बदबू से त्रस्त लोगों को लग रहा है कि बहुत सही हो रहा है… ध्यान रखिए, मुसलमान कतई भाजपा के वोट बैंक नहीं हैं. सपा राज में मुसलमान पूरी तरह सत्ता संरक्षण में पल बढ़ रहे थे और ढेर सारे वैध अवैध काम कर रहे थे, जिसमें छेड़खानी से लेकर अवैध बूचड़खाना संचालन तक है. अब इन पर गाज गिर रही तो हिंदू खुश हैं.

मुझे मुस्लिम हिंदू की भाषा में इसलिए बात करनी पड़ रही है क्योंकि ग्राउंड लेवल का सच यह हो चुका है और इसे सच बनाने में बड़ा रोल सपा बसपा कांग्रेस जैसी पार्टियों का है. मेरा बस इतना कहना है कि योगी के आने के बाद तुरंत हाय हाय करने की जगह तीन महीने तक का वेट करिए… देखिए, भांपिए.. घूमिए, फीडबैक लीजिए… फिर लिखिए… वरना एक बार फिर झटका खाएंगे… जितना बिना वजह भाजपा और योगी का विरोध करेंगे, उतना ही आप उन्हें मजबूत करेंगे…

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Kumar Rahman यशवंत जी, बरेली में शोहदों के डर से एक बच्ची के माता-पिता ने गांव छो़ड़ दिया है… इसकी वजह से उस नवीं कक्षा का छात्रा की पढ़ाई भी छूट गई है…. शाम छह बजे LIVE TODAY न्यूज चैनल पर बरेली से यह रिपोर्ट देखी जा सकती है…

Shivmangal Singh भाई साहब यूपी में ये समस्या कैंसर की तरह है हज़ारों बच्चियां स्कूल छोड़ रहीं हैं up में ऐसा लगने लगा था की बेटी का बाप होना अपराध है मुजफ्फरनगर के दंगों के पीछे छेड़खानी ही थी वहां लफंगों में दहशत होना जरुरी है

Deepak Thakur सटीक विश्लेषण। कुछ यही हालत पटना जैसे शहरों का भी है। पढने वाली बेटियों को काफी परेशानी हो रही है।

Kamta Prasad लगता है मैं भी कायदे से सोचने लगा हूँ तभी आपकी बातें पल्ले पड़ने लगी हैं, कल की भड़ास की रिपोर्ट भी ठीक ही थी कि कानून का दुरुपयोग भी होता है।

Vivek Singh बिलकुल सही बात। इलाहाबाद याद ही होगा किस तरह शाम को महिला छात्रावास के बाहर लल्ला चुंगी पर भीड़ लगती थी। वहां जो होता था वो यही सब था।

Anil Maheshwari Efforts to contain eve teasing (sexual harassment) are being viewed with suspicion but it intriguing that Anti Romeo Squad in UP is “moral policing” & Pink Squad in Kerala is progressive. She squads are also in Hyderabad for the same job. When Rajnath Singh, as UP Minister for Education tried to check copying in examination by making copying cognizable offence, the left/liberal forces in Delhi too opposed the move of Raj Nath Singh saying that a girl of 14 years, caught copying will also be put behind the bars. The result was under the pressure of the party leaders, having entrenched interest in copying and making copying as a source of livelihood compelled the Kalyan Singh government to withdraw the order. The result is before us. No value of UP degrees and certificates in the Job market.

Singhasan Chauhan बिलकुल सही और इसमें सज्जन लोगों को तो कोई परेशानी ही नहीं है परेशानी तो उनके लिए है जो आवारागर्दी करते हैं और रह चलती लड़कियों, औरतों के ऊपर फब्तियां कसते हैं इनका इलाज तो होना ही चाहिए| मैं किसी परती विशेष का समर्थक नहीं हूँ मगर सही काम की हमेशा तारीफ होनी चाहिए चाहे वो किसी भी परती या धर्म से हो.

Ravindra Singh Basera Dev पिछले साल दिसंबर में दिल्ली से देहरादून जा रहा था। रास्ते में बस की खिड़की से बाहर झांक रहा था तो क्या देखता हूं कि मेरठ के किसी स्कूल की छुट्टी हो रही थी। लड़कियों का स्कूल था, कतार बना कर लड़कियां घर को लौट रहीं थी। कुछ लड़कों को सड़क किनारे लड़कियों की कतार में से किसी को खोजते देखा, सोचा कि शायद किसी खास लड़की का इंतजार हो, और मैं अपने लड़कपन के दिन याद करते हुए मन ही मन मुस्कुरा दिया। लेकिन बस के जरा आगे बढने पर दृश्य बड़ा विचलित करने वाला था, लड़के बाइक लेकर एक्सेलेटर दबा, बार बार लडकियों की कतार के चक्कर काट रहे थे, लडकियों की कतार के ठीक बगल में, बीच-बीच में किनारे खड़े दोस्तों का झुंड बनाकर लड़के, छेड़ाखानी करते, हाथ खींचते और लड़कियों को झुंड में घेरने की कोशिश करते दिख रहे थे। चूंकि यह छुट्टी का समय था तो बस के थोड़ा और आगे बढने पर देखा कि, और भी कई स्कूलों की छुट्टी उसी समय हो रही थी। और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था यह देख कर कि सभी जगह वही पहले स्कूल के जैसे हालात थे। यह सब शहर के बीचों बीच चल रहा था, लोग आ जा रहे थे, सब सामान्य कामकाज की भांति चल रहा था। और लड़कों के गिरोह किसी संगठित गैंग की तरह जहां तहां लड़कियों से यूँ ही पेश आते दिखे। इसे पश्चिमी उप्र के शहरों और कस्बों की Teen Age संस्कृति के रूप में आप समझ सकते हैं। लेकिन आज जब योगी सरकार के Anti Romeo Squad के गठन का समाचार सुना तो एक-बारगी लगा कि बड़ा प्रतिगामी कदम है, प्यार पे पहरा बिठाने का Frustrated बजरंगी Lumpens का संघी Vigilante Justice वाला Agenda जैसी कि छवि, लिबरल- लेफ्टिस्ट मीडिया वाले इस कदम की आम जनता विशेषकर मध्यम वर्ग के युवाओं के मन में बना रहे हैं। मुझे फिर अचानक, मेरठ शहर का वह स्कूल से लौटती लड़कियों से Road Romeos के दुर्व्यवहार का दृश्य याद आ गया और मुझे Anti Romeo Squad का मतलब समझ में आ गया, और यह भी कि क्यों इस कदम को इतनी तत्परता से योगी सरकार ने उठाया है।

Suresh Gandhi बिलकुल सही कहा आपने विरोध सिर्फ सपाई व काग्रेसी बलात्कारी कर रहे है सच तो यह है इनके खिलाफ ही रपट दर्ज करनी चाहिए क्योंकि वोट खातिर बलात्कारियों चोर उचक्को भ्रष्टाचारियों चापलूसो व डकैतों को सपोर्ट करना इनका सगल बन गया है

Ravi Prakash Singh यशवंत जी किसी गर्ल होस्टल के बहार जब लडकिया सब्जी फल खरीदती है तो उस फल की साइज सोहदे(रोमियो) पूछते है कल से नजर नहीं आये ।

Nitin Thakur किसी को मैंने जवाब दिया था.. उसका अंश है- मैं आपसे ये कहूंगा कि मैं नहीं जानता कि आप योगी से कितने परिचित हैं और कितने नहीं। कम से कम मैं उनसे और उनके विचार से ठीक ठीक परिचित हूं। कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि उसे शासन में कॉलेज की लड़कियों के साथ शोहदे बद्तमीज़ी करें। शोहदे किसी के सगे नहीं होते और कोई उन्हें नहीं पालता। ये हिंदू और मुसलमान दोनों होते हैं और जाति भी हर तरह की होती है। शासन के पास पहले से पुलिस है। पुलिस ने पहले से ही महिलाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर दिए हैं। मेरे अपने शहर में लड़कियों के कॉलेज के बाहर बसपा और सपा दोनों सरकारों के दौरान मैंने पुलिस जीप को खड़े पाया है। दूसरे कॉलेजों के आसपास भी हमेशा इस तरह के अभियान चलते ही रहे हैं। ये अलग से जो एंटी रोमियो वाला ड्रामा है वो किस एक समुदाय विशेष के खिलाफ चलाया जा रहा है वो मैं तो जानता ही हूं और जिन्होंने योगी को सुना है उन्हें भी मालूम ही है। ये स्क्वैड दरअसल लव जिहादी खोज रही है। चूंकि चुनावी प्रचार में ये बात ज़ोर से कहकर वोट आए तो योगी ने कही भी जिसकी मैं तारीफ करता हूं… लेकिन अब यही बात शासन में बैठकर योगी बोल नहीं पाएंगे। वैसे भी घर बैठकर आपने कैसे तय कर लिया कि ये स्क्वैड अपराधी को ही धरेगा? इसमें वही पुलिसवाले काम करेंगे जो आम तौर पर किसी को भी उठाकर टॉर्चर करने के लिए बदनाम हैं। अब क्योंकि ये स्क्वैड अधेड़ उम्र के लोगों और लड़कियों के परिवार को ठीक लग रहा है तो वो असल बात मिस कर रहे हैं पर जो लोग योगी एंड टीम की बातें लगातार सुनते और समझते आ रहे हैं वो जानते हैं कि महिला सुरक्षा के नाम पर दरअसल क्या रोकने की कोशिश हो रही है? और रोकने की क्या.. वो खतरा तो खुद हिंदूवादियों ने चिल्ला-चिल्लाकर खड़ा किया और अब उस आभासी खतरे के खिलाफ एक स्क्वैड भी खड़ा किया है। तालियां बजाइए कि घर में तालिबान हुआ है। जो काम बजरंग दल और शिवसेना के ज़िम्मे था वो अब यूपी पुलिस से कराइए। छेड़छाड़ या किसी और तरह के अपराध की रोकथाम से भला किसको इनकार होगा मगर उसके नाम पर शुरू हुई मोरल पुलिसिंग को आप एक हद के आगे बढ़ने से रोक नहीं सकेंगें। जिस दिन वो आपके घर पहुंचेगी तो आप वैसे ही पोस्ट लिखेंगे जैसे नोटबंदी में घाटा होने पर सरकार के खिलाफ लिखने लगे थे। तब तक आप सरकार के साथ हैं क्योंकि आप नोटबंदी से पहले बहुत मसलों पर भी थे और अब ज़रा सा उबरते ही फिर किसी भी तरह से कदमताल करने लगे हैं। शुभकामनाएं।

Arun Yadav तब राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर द गाल फ्रांस का राष्ट्रपति बना था। छात्र, मजदूर और लेखकों का आंदोलन उफान पर था तथा प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यॉ-पाल सार्त्र ने इनका नेतृत्व संभाला। द गाल को सलाह दी गई कि सार्त्र को गिरफ्तार किया जाए। समझदार राष्ट्रपति द गाल ने कहा कि सार्त्र की गिरफ्तारी पूरे फ्रांस की गिरफ्तारी होगी, ऐसा नहीं होगा। सत्ता द्वारा साहित्य को दिया गया यह बहुत बड़ा सम्मान था। राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर सत्ता पर काबिज होनेवाले सत्तासीनों को द गाल से सबक लेना चाहिए और देश में दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्याएँ बंद होनी चाहिए।

Bijendra K Singh दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पीता है… लेकिन यशवंत जी ने जमीन की बात की है… सच्चाई भी है… ईव टीसिंग भी सच्चाई है… लव जिहाद भी… BBC की तो पूरी डॉक्युमेंट्री है… जै जै, अब सिटियाबाज लौंडो की खैर नहीं है, वाकई लोग योगी के इस कदम को उपयोगी बताते हुए सराह रहे हैं।

Shrikant Asthana आपसे सहमत हूं। मुद्दे से भी बहुत असहमत नहीं हूं कि शोहदे-लफंगे समस्या हैं पर सारे लड़के-लड़कियां तो लफंगे नहीं हैं! जिस तरह से इस मसले का इम्प्लीमेंटेशन हो रहा है वह बहुत खतरनाक है। भाई-बहन भी एक साथ निकलते हुए डर रहे हों तो उस स्थिति को सहज या अच्छा तो कतई नहीं माना जा सकता।

Arvind Kumar ये वो लडके है जिनके लिए मुलायम सिंह यादव जी ने कहा था कि लडके हैं गलती हो जाती है

Nagendra Singh हर बात का विरोध ठीक नही सही को सही और गलत को गलत कहने दम होनाचाहिए।

Shanu Shrivastava आप हमेशा बेबाक और सच ही क्यों लिखते हैं सर। सैलूट। वैसे लिखते रहिये। कुछ लोग ही तो हैं जो आज भी भीड़ का हिस्सा नही बने।

Shambhunath Nath सोलह आना ग्राउंड रिपोर्ट।

पंकज कुमार झा सुंदर … अब तक का सबसे बेसी समझदार पोस्ट.

Nakul Chaturvedi ये हुई न बात..

Anshuman Shukl एक दम सही लिखे हो। हद दर्जे की बदतमीजी हो रही थी और किसी का डर भी नहीं था। अब डर तो होगा।

अवधेश पाण्डेय 🙂 Sir… aapke charan kahan hain….

Shivmangal Singh साहब बच्चियों के उत्पीड़न की पराकाष्ठा हो गयी थी

Michal Chandan बेहतरीन आंकलन है आपका।

Arun Khare सौ टका सही

Purushottam Asnora सोलह आने सच.

Ranjeet Chaudhary Sahi tarkaaa

Vibhuti Narain Chaturvedi सत्य वचन । # Yashwant Singh

Sneha Mishra true sir

Abhay Ashish Jain Aap ki baat mai dum hai

Awadhesh K. Yadav सही पकड़े है।

Prakash Singh Yahi sach hai …

Harsh Kumar आप तो ऐसे ना थे?

Taukir Alam Sahi bat

Vishal Ojha ये सही ठोके आप

Raghab Jha बिल्कुल सही।

Mayank Pandey Pahlee bar samajhdaari ki baat… Jai jai

प्रयाग पाण्डे सौ आना सच।

Ashok Aggarwal दमदार

Anupam Srivastava first time your bhadas on right dirction

Amit Singh सत्य वचन।

Kamlesh Kumar O Positive ज बात खरी खरी जानेमन कहीन

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सीएम आदित्यनाथ योगी के इस फैसले का वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने किया स्वागत

Om Thanvi : लाल बत्ती से परहेज़ के बाद योगी आदित्यनाथ का पान मसाले, सुरती-ज़र्दा थूक कर दीवारें रंगने के ख़िलाफ़ किया गया फ़ैसला मुझे सही लगा। हालाँकि इस क़िस्म के शौक़ दफ़्तर में पूरे न करने का निर्देश उन्होंने शास्त्री भवन (एनेक्सी) के मामले में ही दिया है, जहाँ मुख्यमंत्री का अपना कार्यालय है। पर यह मुमानियत – धूम्रपान निषेध की तरह – प्रदेश के तमाम सरकारी दफ़्तरों, सार्वजनिक स्थलों पर भी लागू हो जानी चाहिए।

कहा जा सकता है कि पान चबाना, सुरती-गुटका खाना किसी का निजी मामला है। लेकिन इनसे सार्वजनिक स्थल गंदे होते हैं। गंदगी से बीमारी फैलती है। दीवारों और अन्य स्थलों का रखरखाव भी सरकारी ख़र्च पर ही होता है। ज़ाहिर है, निजी शौक़ के चलते बोझ समाज के स्वास्थ्य और जेब पर पड़ता है। सार्वजनिक स्थल पर सिगरेट पर प्रतिबंध भी आख़िर इसीलिए लगाया गया था कि इससे दूसरों का स्वास्थ्य और हमारा पर्यावरण प्रभावित होता है।

इतना ही नहीं मेरा मानना रहा है कि पान-गुटका-सिगरेट का सेवन कर लोक-व्यवहार (पब्लिक डीलिंग) करने में उस शख़्स के प्रति अवज्ञा या असम्मान का भाव भी झलकता है, जिससे सेवन करने वाला मुख़ातिब होता है। इसलिए बड़े अफ़सरों के सामने तो सरकारी कर्मचारी इनका त्याग कर लेते हैं, बाक़ी हरदम खाना-थूकना-फूंकना क़ायम रहता है।
बूचड़खाने या श्मसान-क़ब्रिस्तान को छोड़ योगी अगर साझा हित के कामों पर ध्यान दें तो लोग शायद उनके विभिन्न विवादास्पद वीडियो पर कम ध्यान देंगे। रिश्वतखोरी, शासन में जातिवाद और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग (मसलन वाहनों का निजी कामों में इस्तेमाल, जो बहुत आम है) को रोकना उनकी बड़ी प्राथमिकता हो सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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ये योगी एक दिन प्रधानमंत्री बनेगा!

कल्याण सिंह और योगी आदित्यनाथ में गजब की समानता… दोनों कट्टर हिंदूवादी… दोनों देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री बने… मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी ने आदित्यनाथ योगी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाकर अपने ही पैरो में कुल्हाड़ी मार ली है। योगी आदित्यनाथ खांटी हिंदुत्ववादी चेहरा हैं और शायद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री कल्याण सिंह के बाद वे ही भारत के हिन्दू ह्रदय सम्राट बनते जा रहे हैं। इतिहास गवाह हैं कि बहुसंख्यक हिन्दुओं के इस देश में जब जब कोई नेता हिंदुत्ववादी लहर में उभर कर आया है तब तब उसने इस देश के शीर्ष सिंघासन यानि प्रधामनंत्री के पद को खतरा पैदा कर दिया है।

एक समय था जब अटल बिहारी बाजपेयी पहली बार १९९६ में १३ दिन के लिए इस देश के प्रधानमंत्री बने थे और उसी समय इस देश में मंदिर आंदोलन अपने चरम पर चल रहा था। ये १९९२ के बाद का वो वक्त था जब अयोध्या की बाबरी मस्जिद विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने के बाद कल्याण सिंह की छवि पूरे देश में  एक हिन्दू ह्रदय सम्राट की बनती जा रही थी। १९९८-९९ में जब अटल बिहारी बाजपेयी दूसरी बार १३ महीने के लिए प्रधान मंत्री रहे उसी समय कल्याण सिंह भी उनके समकालीन दूसरी बार २१ सितंबर १९९७ से १२ नवम्बर १९९९ तक २ वर्ष ५२ दिन के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे। उस समय कल्याण सिंह की पूरे भारत में एक कट्टर हिंदूवादी नेता की उभरती हुई छवि को देखकर अटल बिहारी बाजपेयी शायद यह भांप गए थे कि कल्याण सिंह की यह बढ़ती हुई लोकप्रियता इस देश में उनका विकल्प बन सकती हैं। बस उसी समय से कल्याण सिंह के पर कतरना शुरू करवा दिया गया था और उसका हश्र यह हुआ कि बीजेपी में एक सोची समझी रणनीति के तहत कल्याण सिंह को किनारे लगाने का काम शुरू कर दिया गया था।

कल्याण सिंह उस समय इतने लोक प्रिय थे कि वे देश के प्रधान मंत्री बन सकते थे लेकिन ये हो न सका। इसी तरह से मोदी जो गुजरात के मुख्य मंत्री रहते कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि रखते थे और जैसे ही प्रधान मंत्री बने उनकी हिंदुत्व की धार कम हो गयी और वे एक वृहद केनवास में सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित हुए। आज उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ की वही छवि है जो किसी समय कल्याण सिंह की हुआ करती थी। आज राजनैतिक दृष्टि से नरेंद्र मोदी को योगी आदित्य नाथ से ठीक वही खतरा है जो कभी अटल बिहारी बाजपेयी को कल्याण सिंह से हुआ करता था। कल्याण सिंह भले ही आज अधिक उम्र के कारण नेपथ्य में चले गए हों और वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल रहते हुए अपने राजनीतिक जीवन का अस्त देख रहे हों परंतु योगी आज हिंदुत्व के उगते हुए सूरज की तरह हैं और उनकी उम्र भी बहुत कम हैं।

उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के बाद योगी का सबसे बड़ा इम्तहान यह होगा कि क्या वे अपनी कट्टर हिंदूवादी छवि को कायम रखते हुए सबका साथ सबका विकास के मोदी मंत्र को सिद्ध कर पाएंगे? यदि योगी अपने ५ साल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में सफल होते हैं तो उनका अगला दावा निश्चित रूप के इस देश के प्रधानमंत्री का हो सकता हैं। न जाने क्यों योगी के विजन को देखकर कई बार ऐसा लगता है कि एक दिन ये योगी इस देश का प्रधानमन्त्री बनेगा। जिस प्रकार से इस देश का प्रधानमन्त्री बनने से पहले मोदी ने जुगरात को हिंदुत्व की लेबोरेट्री बनाया था और उसी प्रयोगशाला में हिंदुत्व के जटिल प्रयोग से भारत का प्रधान मंत्री निकला, ठीक उसी प्रकार से लगता है योगी भी उत्तर प्रदेश को हिंदुत्व की एक लेबोरेट्री बनाने जा रहे हैं और बहुत मुमकिन है कि वाया हिंदुत्व की प्रयोगशाला योगी भी एक दिन इस देश के प्रधानमन्त्री बनें। आपकी क्या राय है?

लेखक राकेश भदौरिया यूपी के एटा जिले के पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ९४५६०३७३४६ या rakesh.etah@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

एक पक्ष यह भी…

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योगी आदित्यनाथ की फर्जी अश्लील तस्वीरें वायरल कराई जा रही (देखें वीडियो)

आगरा : आदित्यनाथ योगी के यूपी का मुख्यमंत्री बनने के बाद शरारती तत्व हुए सक्रिय…. सोशल साइट पर डाली संत योगी की आपत्तिजनक तस्वीरें… विश्व हिन्दू परिषद में आक्रोश… सूबे में कई वर्षों के बाद भाजपा ने प्रचण्ड बहुमत में सरकार बनाई है। पहली बार यूपी का नेतृव संत करेगा। इसी से बौखलाए शरारती तत्व फर्जी तस्वीरें वायरल करा के योगी जी को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं। मामला ताजनगरी आगरा का है।

‘अफवाह’ नाम एक फेसबुक ग्रुप पर योगी जी की अश्लील तस्वीर पोस्ट की गई। इसे आगरा विश्व हिन्दू परिषद के लोगों ने देखा तो आक्रोश व्याप्त हो गया। विश्व हिन्दू परिषद ने डीजीपी कार्यलय को ट्वीट कर मामले की जानकारी दी। पुलिस जब एक्टिव नहीं हुई तो विश्व हिन्दू परिषद के सदस्य शुभम सोनी ने एसएसपी से मुलाकात की और शरारती तत्वों को जेल भेजने की मांग की।

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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योगी के रूप में हिन्दू राज लौटने से कबीलाई नृत्य कर रहे सवर्णों, जरा ये भी सुनो

Ashwini Kumar Srivastava : हिन्दू राज की आड़ लेकर ऊंच-नीच, छुआ-छूत वाली वर्णव्यवस्था को लाकर भारत को तलवारों/तीरों और राजा-सामंतों के युग सरीखी मानसिकता में वापस ले जाने में लगे बुद्धिमानों… क्या तुम्हें यह भी पता है कि नासा के जरिये अमेरिका इन दिनों बहुत ही जोरों शोरों से इस संसार में सबसे तेज चलने वाले प्रकाश यानी लाइट से भी तेज गति से चलने वाले रॉकेट बनाने में जुटा हुआ है?

वार्प इंजन की मदद से चलने वाले इस राकेट से स्पेस-टाइम में हलचल पैदा करके अमेरिका अब इंसानी सभ्यता के सामने खड़ी सबसे बड़ी रुकावट को आइंस्टाइन के सापेक्षवाद के सिद्धान्त के जरिये दूर करने में लगा हुआ है। इससे पहले भी जब हम जातीय अहंकार और भेदभाव में डूबकर तीर-तलवार में ही अपनी वीरता और धार्मिक ग्रंथों में विज्ञान खोजने में लगे थे तो पश्चिमी-इस्लामी सभ्यता तोप-बंदूकें लाकर हमें कीड़े मकोड़ों की तरह कुचलने और गुलाम बनाने में कामयाब रही थी।

आज जब हमारा इसरो दुनिया के बाकी देशों से मुकाबले में आगे चल रहा है तो हम अपने ही इतिहास में दफ़न अपने जातीय अहंकार की कब्रें खोदकर हिन्दू गौरव के कागजी महल बनाने में लगे हुए हैं… क्षत्रिय राज करेगा, ब्राह्मण पुरोहिती करेगा, कायस्थ प्रशासनिक लिखापढ़ी करेगा, पिछड़ा वर्ग खेती करेगा, वैश्य व्यापार करेगा, शूद्र सेवा करेगा… तो नासा या इसरो जैसे वैज्ञानिक कहाँ से लाओगे? आज हमारे इसरो में क्या सिर्फ ब्राह्मण, कायस्थ ही वैज्ञानिक हैं? वहां मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पिछड़ा, दलित सभी मौजूद हैं… और जो सवर्ण हैं भी, वे धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर या गुरुकुल से नहीं निकले हैं। उन्होंने भी वही पढ़ाई पढ़ी है, जिसको पढ़कर बाकी सभी जाति-धर्म के लोग उनके जैसे काबिल वैज्ञानिक बने हैं।

योगी के रूप में हिन्दू राज लौटने से कबीलाई नृत्य कर रहे सवर्णों को क्या यह नहीं पता है कि क्षत्रिय के डीएनए में अगर राज करना लिखा भी हो तो क्या यह जितनी आसानी से यूपी में सत्ता पा गए, क्या उतनी ही आसानी से दुनियाभर के बेमिसाल वैज्ञानिकों और उनकी बेजोड़ वैज्ञानिक खोजों-हथियारों से लैस अमेरिका-चीन जैसी ताकतवर फौजों के सैनिकों के सामने ये क्षत्रिय क्या सिर्फ अपनी जाति बताकर ही युद्ध जीत लेंगे?

बाकी जातियों को कायर, सेवक, पुरोहित बनाकर या करार देकर महज क्षत्रियों के प्राचीन युद्ध कौशल के भरोसे दुनिया से मुकाबला करके क्या हम फिर उसी तरह गुलाम नहीं हो जायेंगे, जैसे कि हजारों बरस से पहले भी रह चुके हैं?

दुनिया आगे बढ़ रही है। पश्चिमी सभ्यता का हर देश, हर समाज अपने यहाँ बराबरी ला रहा है। हालांकि उनके यहाँ कभी भी हमारे यहाँ जैसे वर्ण व्यवस्था का शोषणकारी सिस्टम रहा भी नहीं। फिर भी वे अपने यहाँ हर किसी को समान अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, सबको न्याय, संसाधनों का समान बंटवारा, राजनीति-प्रशासन-सेना-पुलिस में बराबरी की भागीदारी दे रहे हैं… कोई वर्ग, क्षेत्र या समूह अगर उनके विकास के कार्यक्रम से छूट जाता है तो वे एड़ी-चोटी का जोर लगाकर उन्हें अपने बराबर लाते हैं।

यहां तो सरकार ही इस लालच में बन रही है कि हमारी जाति सबसे आगे निकल जाए। हमारी जाति ही सब कुछ ज्यादा से ज्यादा हड़प ले।

जिस समाज में बराबरी नहीं होती, और ज्यादा से ज्यादा संसाधन हड़पने की लूट होती है, वह समाज इसी तरह अतीत के पन्नों में जीता है… और गुलाम होकर या लड़ झगड़ कर ख़त्म हो जाता है। जबकि बराबरी वाले समाज पश्चिमी समाज की ही तरह आकाश-पाताल-जमीन-अंतरिक्ष-समुद्र… हर कहीं अपना कब्जा कर लेते हैं…तभी तो दुनिया का हर देश आज पश्चिमी सभ्यता के ही दिए अविष्कारों-उपकरणों, राजनीतिक- वैज्ञानिक सिद्धान्तों के नक़्शे कदम पर चलने को मजबूर है।

इतना कुछ करने के बाद भी आज भी पश्चिमी सभ्यता दुनिया को हर रोज चौंकाने में लगी है। फिलहाल वार्प इंजन के जरिये लाइट से भी तेज रफ़्तार पाने की कोशिश करने में अगर अमेरिका को कामयाबी मिल गयी तो इसके सैनिक-असैनिक नतीजे कल्पना से परे होंगे।

पलक झपकते ही का मुहावरा फिर अमेरिका विकास और विनाश, दोनों में ही चरितार्थ करने में सक्षम हो जाएगा।

सकारात्मक पहलू देखें तो सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात तो यह होगी कि अंतरिक्ष में भी इंसानी सभ्यता वहां भी जा सकेगी, जहाँ जा पाना मौजूद तकनीक की सीमाओं के कारण सैकड़ों बरसों में ही संभव हो पाता।

मसलन, हमारे सौरमंडल के सबसे नजदीकी तारा मंडल अल्फ़ा सेंटोरी, जो कि 4.3 प्रकाश वर्ष दूर है, वहां भी इस इंजन के जरिये महज दो हफ्ते में ही पहुंचा जा सकता है। हमारे सूर्य, बुध, शुक्र, बृहस्पति तो फिर कुछ मिनटों की ही दूरी पर रह जाएंगे।

चलिये हटाइये, इस फ़ालतू की बात को… आप तो यह बताइये कि योगी के राज में हिन्दू राज तो आ गया… अब सवर्णों के दिन बहुरेंगे या नहीं? म्लेच्छ-शूद्र तो अब फिर से औकात में आ ही जायेंगे… है न? तो फिर लगाइये नारा… योगी योगी योगी

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लखनऊ के पत्रकार कबाब और रोगन जोश खाते थे इसलिए पांच कालीदास मार्ग का शुद्धीकरण जरूरी!

Ambrish Kumar : लोगों को पता नहीं होगा अखिलेश यादव पांच कालीदास में नहीं रहते थे. मायावती रहती थीं. पर दोनों के दौर में पत्रकारों के चक्कर में प्रेस कांफ्रेंस के बाद खाने में कई बार कबाब से लेकर रोगन जोश तक परोसा जाता था. ऐसे में किसी संन्यासी के प्रवेश से पहले शुद्धिकरण तो जरूरी है. शम्भुनाथ शुक्ल का सुझाव भी ठीक है कि आसपास के सभी रिहाइसी इलाकों को गोबर और गोमूत्र से शुद्ध किया जाना चाहिए. वैसे सारे अतिथि गृह भी इसमें शामिल किये जाएं.

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Amitaabh Srivastava मांसाहार के बाद शुद्धिकरण वाले तर्क से तो चौक अमीनाबाद नखास और अकबरी गेट जैसी जगहों पर गंगाजल के टैंकर रोज़ाना भिजवाने पड़ेंगे कई महीनों तक। हालांकि मुख्यमंत्री जी के निवास से ये सब दूर हैं लेकिन फिर भी माहौल में शुद्धता, साफ सफाई तो रहनी ही चाहिए। टुंडे कबाबी के यहां अब शायद करमकल्ले की टिकिया मिलने लगे शुद्धिकरण के inagural offer के तौर पर।

Pavan Kumar Yadav Sir JI a Jo bjp ke lakho karykarta hai Jo meet bhakosate hai kya unka bhi shudhi karan hoga

Ambrish Kumar व्यापक शुद्धिकरण कार्यक्रम हेतु मीडिया के वरिष्ठ पत्रकारों की मदद ली जानी चाहिए Shambhunath Nath

Shambhunath Nath अब अपन तो अदना-से पत्रकार। न लीपने के न पोतने के। और यूँ भी मैं तो प्याज़-लाहशुन तक नहीं खाता सो अपन क्या कहें।

Ambrish Kumar आप संपादक रहे हैं, इस समय तो गोरखपुर के स्टिंगर भी प्रभावशाली माने जा रहे हैं. अपने वाले ने भी पूछा था- भाई साहब,महाराज से कुछ कहना हो तो बताएं. दस साल से ज्यादा का साथ है.

Amitaabh Srivastava लखनऊ के खान पान में तो वैसे भी इस तरह के व्यंजनों का चलन रहा है जो होते शाकाहारी हैं लेकिन उनका ज़ायका मांसाहार को भी मात करता है. मिसाल के तौर पर ज़मीकंद और कटहल के कबाब – कई बार गोश्त से फर्क बताना मुश्किल हो सकता है. अब्दुल हलीम शहर की किताब ‘गुजिश्ता लखनऊ’ में लखनऊ के दिलचस्प खान पान का विस्तार से ज़िक्र मिलता है. राज्य सरकार के संस्कृति विभाग को नयी सरकार और उसके मुखिया को ये सब भी बताना चाहिए. आखिरकार संस्कृति कुल मिला कर राजनीति का ही हिस्सा है.

Deepu Naseer मुलायम शाकाहारी हैं, अखिलेश भी हैं क्या? अटल जी नॉनवेज के शौक़ीन थे, मोदी शाक़ाहारी हैं.. 7RCR का शुद्धिकरण हुआ था क्या?

Shriram Sen घृणा पाप से करो पापी से नही

Sushil Kaul आपने जानकारी दी तो पता चला कि बहन मायावती जी पांच कालीदास मार्ग में रहतीं, हम भी जब अपने नये मकान मे हमने भी वही किया था, जो योगी जी कर रहे, आपकी जानकारी से शुद्धीकरण का महत्त्व अब समझ आ रहा है। हाँ एक बात है, पत्रकार जो शाकाहारी के साथ-साथ मांसाहारी हैं, उनके लिए अलग भवन की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

Santosh Singh भाई उनका घर है जो मर्जी करें दूसरों को क्या?

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नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने लिए एक भस्मासुर चुन लिया है : दयानंद पांडेय

Dayanand Pandey : जो लोग महंथ आदित्यनाथ को जानते हैं , वह जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपने लिए एक भस्मासुर चुन लिया है।

Nadim S. Akhter : उमा भारती से योगी आदित्यनाथ की तुलना ठीक नहीं। उमा जी बीजेपी की त्रिमूर्ति की प्रिय थीं, मंदिर आंदोलन से जुड़ी थीं और तब बीजेपी सत्ता में आने के लिए संघर्ष कर रही थी। उनका बीजेपी से रूठने-मनाने का दिल वाला रिश्ता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने चरम पर आसीन आडवाणी जी का सार्वजनिक तिरस्कार किया, बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, अपनी जिद में थका देने वाली पदयात्रा की, फिर पार्टी में लौटीं और आज केंद्र में मंत्री हैं।

योगी आदित्यनाथ दूसरी मिट्टी के बने हैं। उमा जी का युग और था, ये युग कुछ और है। और मुझे ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव से अच्छा यूपी चला के दिखा देंगे। मुज़फ्फरनगर अखिलेश की सरपरस्ती में ही हुआ था और बाबरी मस्जिद कांग्रेसी नरसिम्हा राव के शासन में गिराई गई थी।

Yusuf Ansari : योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया जाना चुनावी नतीजों के बाद दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में कही गई बाते से मेल नहीं खाता। प्रधानमंत्री ने कहा था जब पेड़ फलदार हो जाता है तो वो झुक जाता है। अब भाजपा के नरम होने का वक्त आ गया है। लगता है कि 325 फूल खिलने के बाद पेड़ और तन कर खड़ा हो गया है। इसका दूसरा पहलू ये है कि मोदी ने दूर की कौड़ी चली है।

योगी अगर सत्ता से बाहर रहते तो अपने हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर आए दिन बवाल मचा सकते थे। लिहाज़ा मोदी ने योगी को सत्ता की कमान देकर इस फायर ब्रांड नेता को संविधान और कानून के दायरे में बांध दिया है। मोदी ने योगी को “सबका साथ, सबका विकास” का अपना एजेंडा लागू करके दिखाने की बड़ी चुनौती दे दी है। देश का प्रधानमंत्री हो या प्रदेश का मुख्यमंत्री काम सभी को संविधान के दायरे में ही रह कर करना है। लिहाजा योगी के मुख्यमंत्री बनने पर किसी को डरना चाहिए।

अभी तो योगी को नेता चुना गया है। अभी तो शपथ होगी। सरकरी का एजेंडा सामने आएगा। तब कहीं जाकर पता चलेगा कि मोदी के चहेते योगी सचमुच विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे या फिर सांप्रदायिक ताक़ते विकास के चोले में छिप कर यूपी को ठीक उसी तरह विनाश के रास्ते पर ले जाएंगी जैसे तालिबानी सोच ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद करके दिया है। आखिर मोदी जी ने खुद कहा है कि सरकार बनती भले ही बहुमत से हो लेकिन चलती सर्वमत से है। ये देखना दिलचस्प होगा कि प्रचंड बहुमत वाली इस सरकार के फायरब्रांड मुखिया सर्वमत कैसे बनाते है।

पत्रकार त्रयी दयानंद पांडेय, नदीम एस. अख्तर और युसूफ अंसारी की एफबी वॉल से.

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पत्रकार पुष्य मित्र ने योगी आदित्यनाथ की तुलना शहाबुद्दीन से कर डाली

Pushya Mitra : दिलचस्प है कि कुछ महीने पहले कुछ लोग शहाबुद्दीन की तारीफ जिस अंदाज में करते थे, आज कुछ दूसरे लोग योगी आदित्यनाथ की तारीफ उसी अंदाज में कर रहे हैं। गुंडई से किसी को परहेज नहीं है, बस गुंडा अपना होना चाहिये।

बिहार में प्रभात खबर अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार पुष्य मित्र के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Chitra Agrawal : आप शहाबुद्दीन और आदित्यनाथ की तुलना कैसे कर सकते हैं? और गुंडा जैसे शब्द? दोनों में कोई समानता, कोई तुलना नहीं। हां हिन्दुत्ववाद के मुद्दे पर आप उसे नापसंद कर सकते हैं लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि उन्हें शहाबुद्दीन के साथ खड़ा कर दिया जाए। शहाबुद्दीन के कारनामों के बारे में तो खुद आपने इतना लिखा है लेकिन योगी आदित्यनाथ का एक भी ऐसा काम नहीं है। हां यह ज़रूर है कि वो अपने फायरी विचारों के कारण कट्टरवादी नेता समझे जाते हैं लेकिन आजतक एक भी दंगे करवाने, लोगों के साथ बुरा करने या किसी क्राइम में .योगी आदित्यनाथ का नाम नहीं आया है… और गुंडा अपना होना चाहिए…कैसी भाषा है यह? सच में… क्या आपको ऐसा वाकई लगता है…। दरअसल दूसरों के विचारों, पसंद, नापसंद के प्रति खुलापन होना चाहिए। आप के विचार आपके अपने हैं लेकिन दूसरों के भी अपने स्वतंत्र विचार हैं, अगर उनका आपसे इत्तिफाक नहीं है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप उसे जज कर सकते हैं या उसकी पसंद को गुंडे का नाम दे सकते हैं।

Pushya Mitra मेरी नजर में दोनों गुंडे हैं। इनका देश में और मानवता की भावना में कोई भरोसा नहीं है।

Chitra Agrawal फिर आपमें और उन न्यूज़ चैनल के अन्य पत्रकारों में क्या फर्क है जो अपनी राय के आधार पर लोगों को जज करते हैं और बिना सही बात जाने उनको प्री कन्सीव्ड नोशन्स के आधार पर कतारों में खड़ा कर देते हैं।

Pushya Mitra आप सोच सकती हैं। मगर मेरे लिये अपना सच ही महत्वपूर्ण है। मैं गलत को गलत कहना कभी नहीं छोड़ूंगा

Chitra Agrawal एक बात और जैसा कि आपने खुद अपनी पोस्ट में मोदी जी के लिए लिखा था कि जब तक मोदी के विरोधी रहेंगे वो और मज़बूत, और ज्यादा मज़बूत होंगे, ज़रा सोचिए अब वैसा ही कुछ आप योगी आदित्यनाथ के साथ कर रहे हैं। लोग उन्हें जितना नीचे गिराएंगे, दरअसल में उनकी छवि उतनी ही करिश्माई बनेगी।

Pushya Mitra इस चक्कर में मैं एक दंगाई मानसिकता के व्यक्ति का समर्थन नहीं कर सकता।

Jai Kumar Singh पुष्य मित्रा जी आपके शब्दों में अजीब सी बू आती है! एक पत्रकार के लिए अशोभनीय है। योगी आदित्यनाथ जी को जनता ने बहुमत से चुनाव किया है। आपकी गाली योगी के लिए नहीं वरन जनता को है। खास विचारधारा के साथ पत्रकारिता छोड़ दें। धन्यवाद!

हिमांशु कुमार घिल्डियाल ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी पूर्वाग्रही पत्रकार ही पत्रकारिता को बदनाम करते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया के आने के बाद इनकी प्रासांगिकता और विश्वसनीयता ही ख़त्म हो गई है तथा इन पर आम आदमी भरोसा ही नहीं कर पाता है। ये सही खबर को छुपा कर, छापने की कीमत मांग कर,तोड़ मरोड़ कर तथा एक निश्चित एजेंडे पर चलकर अपने ऐशो आराम का सामान जुटाते हैं। अब तक की सभी सरकारों ने इस तथाकथित चौथे स्तम्भ को रीढ़ विहीन कर दिया है।

Ajay KS पुष्यमित्र जी आज आपका पाला पक्के टाइप के भक्तों से पड़ा है। बिरहिनि के खोंता में हाथ दाल दिए हैं।  फिर भी डंटे रहिये ।

Sumit Choudhary आपको योगी को समझने के लिए गोरखपुर जाना पड़ेगा। कहीं आप भी योगी को वैसा ही तो नहीं समझ रहे जैसा मोदी को गुजरात दंगे के बाद समझा गया था।

Anand Sharma कहीँ आप त्वरित अतिवादी प्रतिक्रिया तो नहीँ दे रहे शाहाबुद्दीन और योगी को एक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा कर……मैं योगी को सम्पूर्णता से जानना चाहता हूँ

Pushya Mitra आप एक बुरे व्यक्ति में अच्छाई तलाशना चाह रहे हैं। आप योगी को इसलिये मौका देना चाहते हैं क्योंकि अगर वह बुरा भी हुआ तो आपका हमारा नुकसान नहीं करेगा।

Jai Kumar Singh क्या बुराई है बतायें। हिंदू होना गुनाह है और हिंदुत्व की बातें अपराध है ? उन्होंने कब और कहां दूसरे धर्म के लोगों को गाली दी है?

Praveen Jha योगी-ओवैसी का भेद निकालिए। शहाबुद्दीन जी तो जेल में ही रहते हैं।

Pushya Mitra मैं साम्राज्य के मामले में कह रहा हूँ। बाकी योगी की तुलना छोटे ओबैसी से हो सकती है। बड़ा भाई पढ़ा-लिखा समझदार है।

Praveen Jha यह अवश्यंभावी था। इसमें बित्ता भी शक नहीं था। पाँच बार लगातार सांसद रहे। यूपी में उनसे बड़े कद का कोई नेता नहीं। हिंदुत्व एजेंडा के पूरे भारतवर्ष में सबसे बड़े नेता हैं योगी (आडवाणी जी और मोदीजी के बाद)। इतनी बड़ी बहुमत में किसी ऐरू-गैरू के चुनाव का मतलब ही नहीं।  बाकी, योगीजी का एक और पहलू है, उस पर फिर कभी। वो मुलायम जी के खास रहे हैं, और बैकग्राउंड इमेज अलग रखी है। बड़े टैक्टिकल आदमी हैं। मुझे पक्का यकीन था, उनके नतीजे के बाद वाले दो मिनट के भाषण से ही।

Shubam Kuamar Rai योगी और शहाबुद्यीन की तुलना करना मानसिक दिवालीएपन की निशानी है

Dharmendra Pandey योगी जनता की चुनी हुई सरकार के सदस्य और जननेता हैं तथा लोकतंत्र की अपनी मर्यादा है। शहाबुद्दीन अदालत द्वारा दोष सिद्ध व्यक्ति हैं पर योगी के साथ ऐसा कुछ नहीं है।  दोष देने वाले तो उच्चतम न्यायालय द्वारा बरी मोदी को भी बहुत कुछ कहते हैं पर एक पत्रकार की हैसियत से बस इतना ही कहना चाहूंगा कि जब तक व्यक्ति न्यायपालिका द्वारा दोषी न पाया जाए तब तक खुद ही व्यक्तिगत आकलन के आधार पर कोई कटु शब्द प्रयोग न करें। यही नियम राष्ट्रदोह के आरोप में गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति पर भी लागू होता है, जबकि उस गुनाह पर खिलाफ का अदालती फैसला न आया हो।

Indu Bhushan शाहबुद्दीन से योगी की तुलना करके आपने हाईट ही कर दिया। योगी पर आज आपका लगातार कई पोस्ट पढ़कर आपकी मानसिक स्थिति के बारे में ही सोचता रहा हूँ। सर पानी पीजिये और आराम कीजिये।

Abhay Dubey तिहाड की बैरक और लखनऊ की गद्दी मे कुछ तो अंतर होगा?

Satyendra Singh आपके तर्क के हिसाब से भगवान श्री राम भी और देश के सीमा प्रहरी या सैनिक भी “गुंडो” की श्रेणी मे आयेंगे, क्योकि वे भी नर संहारक हैं! धन्य हैं आपकी मानसिकता और पत्रकारिता ।

Naresh Jha बेटा बिहार में रहते रहते लालू वाला बुद्धि हो गया है का। कुछ दिन आराम क्यों नहीं कर लेते। पत्रकार का कमी है क्या। एक से एक नमूने हैं।

Girish Pandey आप जैसे गंभीर आदमी को सुनी सनाई बात पर टिप्पड़ी नही करनी चाहिए।

Navin Kr Roy आप पत्रकार हो सकते हो पर यह जरूरी नही कि आप बुद्धिजीवी भी हो। जैसे कोई डिग्रीधारी हो सकता है,पर जरूरी नही कि शिक्षित भी हो। पता नहीं क्यों अधिकाँश पत्रकार अपने आप को राष्ट्रीय कर्णधार क्यों समझने लगते हैं। अखबारों में खबर लिखो भाई, तुम्हारी सोच और ज्ञान की सीमा इससे अधिक नही है। जैसे ही तुमने शहाबुद्दीन से योगी जी की तुलना की, वैसे ही तुम्हारे ज्ञान की सीमा का पता चल गया।

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योगी आदित्यनाथ को उदय प्रकाश की कई कहानियां और कविताएं याद हैं!

Satyendra PS : महंत आदित्यनाथ। शपथ ग्रहण के बाद यूपी के मुख्यमंत्री हो जाएंगे। यूपी के मुख्यमंत्री से मतलब मिनी प्रधानमंत्री। नरेंद्र मोदी द्वारा महंत को मुख्यमंत्री बनाना वास्तव में बहुत साहसिक कार्य है। इस साहस के लिए कॉमरेड मोदी को लाल सलाम। आदित्यनाथ उस दौर के हैं जो पीढ़ी Uday Prakash की पीली छतरी वाली लड़की पढ़कर बढ़ रही थी। मेरे लिए तो खुशी की बात है कि आदित्यनाथ भी उदय प्रकाश के न सिर्फ अच्छे पाठक रहे हैं, बल्कि उनको कई कहानियां और कविताएं याद थीं। साथ ही यह भी खुशी है कि लंबे समय से शीर्ष राजनीति से वंचित गोरखपुर को फिर एक शीर्ष नेता मिला है। उम्मीद की जाए कि उस इलाके की तकदीर और तस्वीर बदलेगी।

उदय प्रकाश जब गोरखपुर में अपने रिश्तेदार की याद में आयोजित कार्यक्रम में गए थे और आदित्यनाथ के साथ मंच साझा किया था तो उस समय बड़ा बवाल हुआ था। आदित्यनाथ ने उदय प्रकाश की कहानियों व कविताओं का कई मौकों पर उल्लेख किया। इसके चलते उदय प्रकाश को दक्षिणपंथी और जाने क्या क्या घोषित किया गया था। कथित और असली तमाम मतलब ढाई सौ से ऊपर वामपंथियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था कि उन्होंने कैसे योगी के साथ मंच साझा किया? उदय प्रकाश को खूब गरियाया गया…

है न मजेदार!!

महंत आदित्यनाथ को दक्खिन टोले के धुर आलोचक की ओर से ढेरों शुभकामनाएं। उम्मीद है कि वह पूर्वांचल की गरीबी मिटाने और पूरे प्रदेश को एक बेहतर मुकाम देने में सफल होंगे और भाजपा को मिले प्रचंड जनादेश का लाभ उठाते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे।

बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी, दिल्ली में कार्यरत पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Saurabh Pandey उसी ‘बदनामी’ के कारण सम्मान वापसी का कु/सु चक्र रचा और चला गया था। उसे भी नयनतारा हथिया ली थी..

Satyendra PS जिन लोगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाए थे, वह साहित्य क्षेत्र की एक गिरोह है. उनको कोई गलतफहमी नहीं थी. उदय़ जी ने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी लौटाया तब भी बाकायदा इस गिरोह के कुछ सदस्यों ने अभियान चलाता था। लेकिन जो लोग गिरोहबंदी से हटकर उदय जी को व्यक्तिगत जानते हैं, वह उनकी भावनाओं को समझते हैं.

Saurabh Pandey सम्मान लौटाने वाले पहले लेखक कवि उदय प्रकाश ही थे। चाहे जिस नाम से लौटाए हों। वो योगी के साथ मंच साझा करने का प्रायश्चित ही था। बाद में ये दूसरे रूप में प्रचार पा गया

Satyendra PS मुझे उस समय का आपका स्टैंड नहीं पता था Saurabh Pandey जी। अभी भी मैं गैर साहित्यिक आदमी हूं. साहित्य थोड़ा बहुत समझ मे आ भी जाए तो कविता फविता तो बिल्कुल समझ में नहीं आती है। बकिया हमें आज तक समझ में न आया कि उदय जी का अपने रिश्तेदार की बरखी में जाना बुरा था, या योगी आदित्यनाथ वहां आए थे, वह बुरा था। या आदित्यनाथ का उदय प्रकाश के लेखन का प्रशंसक होना वामपंथी बंधुओं को नागवार गुजरा था. साहित्यकार और वामपंथी लोगों को दर्द किधर से उठा था. यह आज तक समझ में न आया.

Satyendra PS मने हम अपने वामपंथी साथियों से जानना चाहेंगे कि पुरस्कार लौटाना अगर उदय जी का प्रायश्चित था तो वह पूरी तरह पाप मुक्त हुए हैं या उनको काशी ले जाया जाए। अब वामपंथी भाइयों के इतना चिढ़ने और दक्खिन टोला वाले भाइयो के उदय प्रकाश का प्रशंसक होने से कुछ कुछ हम्मै भी संदेह होता है. दक्खिन टोला वाले तमाम लोग उदय प्रकाश की कहानियों के प्रशंसक हैं. एक रोज मैंने कहा कि आप अपने किताब के पहले पेज पर डिस्क्लेमर छपवाइए कि दक्खिन टोले वाले लोग इस किताब को न पढ़ें, लेकिन उदय जी कहते हैं कि किसी को पढ़ने से रोकना कहां का न्याव है.

Amit Pandey वो सिर्फ लेखक हैं। कोई भी पंथी नहीं हैं।

Satyendra PS मुझे भी कुछ ऐसा लगता है अमित जी. लेकिन साहित्यकार लोग जब कुछ कुछ कहते हैं तो कुछ कुछ गड़बड़ लगने लगता है अचानक. और आप शायद इससे वाकिफ नहीं हैं. आदित्यनाथ से मंच साझा करने के कारण उनके खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया गया। उसके कई साल बाद जब उन्होंने कलबुर्गी की हत्या के विरोध में पुरस्कार लौटाने की घोषणा की तो वामपंथी भाई लोगों ने नए सिरे से अभियान चलाया कि आदित्यनाथ के साथ बैठक र उन्होंने जो पाप किया था, पुरस्कार लौटाकर उसका प्रायश्चित कर रहे हैं.

Shashi Bhooshan आप पत्रकार हैं। भूत भले न जानें भविष्य बेहतर समझते हैं। अब सम्मान के लायक अवस्था में भी पहुँच चुके हैं। लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है आपने यह संस्मरण लिखकर अच्छा नहीं किया। या पता नहीं आपने यह संस्मरण लिखने का इंतज़ार ही किया हो। कुछ भी हो सकता है। आज आदमी अपनी विवेचना के साथ कहीं तक जा सकता है।

Bhoot Nath भाय जी योगी से नाल जोड़नी है तो सीधे जोड़िये. उदय को बहाना मत बनाइये. बाकी आपने यह मजेदार कहा कि योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद हैं? किसने बताया योगी ने? गजब है भई. वैसे देश में बढ़ती सांप्रदायिकता व फासीवाद के लिए चिंतित उदय जी ने कुछ लिखा की नहीं योगी भाई के सीएम बनने पर!

Satyendra PS महंत आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना यूपी के इतिहास की एक अनोखी परिघटना है Shashi Bhooshan ji. उदय जी का उनके साथ मंच साझा करने के बाद उठे तूफान को भी अनोखा माना जा सकता है। वह क्यों हुआ कैसे हुआ किसने किया कैसे गिरोहबंदी हुई सब कुछ अजीब था। उस पर चर्चा एक स्वाभाविक सी बात है।

Satyendra PS योगी को उदय प्रकाश की कहानियां याद थीं, यह लिखा मैंने Bhoot Nath ji. अब का पता नहीं। यह उन दिनों छपी खबरों से और अपने वामपंथी साथियों की सुलगन से पता चला था, वरना आदित्यनाथ को मैं साइंस का विद्यार्थी ही मानता था जो कुसंगत में पड़ गया हो। मेरा ऑब्जर्वेशन रहा है कि साइंस स्ट्रीम वाले कट्टर होते हैं चाहे वह वामी हो या दक्खिन टोले का। नाल जोड़ने वाली बात आपने बहुत महत्त्वपूर्ण कही। गोरखपुर में मैंने बमुश्किल 6 माह काम किया है और उस दौरान 10 मुलाकातें हुई होंगी। वो भी प्रोफेशनल। दिल्ली में आने के बाद मैं अपने काम में लग गया। वो अपने काम में लगे ही थे। दूसरे तरीके से जरूर नाल जुड़ा हुआ है। गोरखपुर में मेरे 90% रिश्तेदार, परिजन आदित्यनाथ से जुड़े हैं। सब अब बम बम हैं। उस साइड से मैं चाहकर भी कभी नाल तोड़ न पाया!

Satyendra PS हम तो यही उम्मीद करेंगे कि वो अच्छा काम करें। बाकिया नरेंद्र मोदी ने 3 साल में फेंकने के अलावा देश में कुछ भी नही किया। उनके 5 काम भी नही गिनाए जा सकते जो उनकी सरकार के हों और उसका कोई इम्पैक्ट देश या पब्लिक पर सकारात्म क पड़ा हो। बनारस वाले 3 साल से काशी को क्योटो बनने के इन्तजार में हैं। हां, गोरखपुर वालों को उम्मीद है। महज डेढ़ साल के लिए गोरखपुर से वीर बहादुर सिंह सीएम बने थे और उतने ही समय में गोरखपुर जितना चमका था उतना ही आज भी चमक रहा है। कुछ चमक नष्ट भी हुई है। रामगढ़ ताल, नेहरू पार्क, तारा मंडल, इंदिरा पार्क जो भी खूबसूरत दिखे वह सिंह की योजनाएं थीं। हम तो उम्मीद करेंगे कि आदित्यनाथ गोरखपुर मंडल को टूरिस्ट हब के रूप में डेवलप करें जिसमे देशी विदेशी पर्यटक गोरखपुर में ठहरें। वहां रामगढ़ ताल में दिन भर बोटिंग, उसके अगले बगल विकसित दिव्य मार्केट में लोकल शॉपिंग करें। बखिरा झील में एक दिन प्रवासी पक्षियों को देखने में बिताने के साथ नौकायन और बोट में कुछ नाइट स्टे टाइप करें। वहां से लुम्बिनी घूमने जाएं। लुम्बिनी से पोखरा नेपाल के हिल स्टेशन का आनन्द लें। और गोरखपुर लौटकर आएं तो बुद्ध स्थल कुशीनगर में एक दिन बिताकर घर के लिए फ्लाइट पकड़ें। यह पूरी तरह 5 दिन का पॅकेज हो सकता है जो गोरखपुर मंडल की तस्वीर बदल देगा। यह इंफ्रा डेवलप में महज 6 महीने लगेंगे। साथ ही गोरखपुर के लिए अब सस्ती विमान सेवा भी शुरू हो जाएगी जिससे आफ सीजन में फ्लाइट से हम लोग भी घर जा सकेंगे। रेल तो प्रभु जी खा ही गए 2 साल में। हम तो अच्छे की ही उम्मीद करेंगे। हेल्थ, एजुकेशन में भी बहुत कुछ साल भर में करके पूर्वांचल को डेवलपमेंट मॉडल बनाया जा सकता है।

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योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है!

Abhishek Srivastava : अब योगी के बारे में कुछ बातें। मैं मानता हूं कि योगी आदित्‍यनाथ भाजपा के लिए बिलकुल सही चुनाव हैं। योगी को चुनकर भाजपा ने जनादेश को सम्‍मान दिया है। भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिहाज से भी यह उपयुक्‍त चुनाव है। तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं योगी के चयन को लेकर आ रही हैं। कई जगह पढ़ा कि कुछ लोगों के मुताबिक वे भाजपा के लिए भस्‍मासुर साबित होंगे। ऐसे लोग योगी को जानने का दावा करते हैं। मुझे लगता है अभी वह वक्‍त नहीं आया कि हम योगी की तरफ़ खड़े होकर उनके चुनाव का विश्‍लेषण करें।

मेरा मानना है कि अब भी मोदी, आरएसएस और भाजपा की ओर खड़े रह कर ही योगी पर बात होनी चाहिए। जो लोग मोदी को जानते हैं, वे यह चूक न करें कि भस्‍मासुर वाली बात मोदी खुद समझ नहीं रहे होंगे। आखिर मोदी जैसा ताकतवर नेता अपने लिए भस्‍मासुर को क्‍यों खड़ा करेगा भला? मामला यह है ही नहीं। जबरन दोनों के बीच अंतर्विरोध को दिखाकर खामख़याली न पालिए। फि़लहाल, मोदी, योगी, संघ और भाजपा के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। हां, आखिरी वक्‍त में मनोज सिन्‍हा का नाम क्‍यों और कैसे कटा, उस पर बात बेशक की जानी चाहिए।

मोदीजी का तात्‍कालिक एजेंडा यह है कि 2019 तक अबकी मिले हिंदू वोटों को कंसोलिडेट रखा जाए और कोई नुकसान न होने पाए। केशव मौर्या और शर्मा इसमें सहायक होंगे। दीर्घकालिक एजेंडा मेरी समझ से दक्षिणपंथी राजनीति का एक लंबा खिलाड़ी तैयार करना है जो 2024 में मोदीजी का उपयुक्‍त उत्‍तराधिकारी बन सके। मोदीजी जानते हैं कि वे बालासाहेब ठाकरे नहीं हो सकते। अगर वैसा बनने की कोशिश करेंगे तो जो इमारत खड़ी कर रहे हैं वह उनके बाद ढह जाएगी। योगी इस लिहाज से मोदी के सक्‍सेसर हैं और योगी खुद इस बात को समझते होंगे।

इसीलिए योगी गरम दिमाग से कोई काम नहीं करेंगे, मुझे भरोसा है। वे मोदी के विकास और न्‍यू इंडिया के आड़े कम से कम 2019 तक नहीं आएंगे क्‍योंकि इसी में उनकी भी भलाई है। हां, योगी के सामने एक चुनौती अवश्‍य होगी- गोरखनाथ मठ की समावेशी परंपरा के साथ हिंदुत्‍व की राजनीति का संतुलन बैठाना। मुझे लगता है कि अगर योगी का सामाजिक काम पहले की तरह चलता रहा, तो वे बड़ी आसानी से एक राज्‍य के प्रमुख के बतौर और एक मठ के महंत के बतौर अपनी दो अलहदा भूमिकाओं को खे ले जाएंगे। मुझे फिलहाल कहीं कोई लोचा नज़र नहीं आ रहा है योगी के चुनाव में। यह नरम हिंदू वोटरों को कट्टर हिंदुत्‍व समर्थक बनाकर एकजुट करने का एजेंडा है। योगी का आना हिंदुओं में लिबरल स्‍पेस का जाना है। असल लड़ाई यहां है। बशर्ते कोई लड़ सके।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Akhilesh Singh योगी ..मोदी-2.0 होंगे…जैसे मोदी ..अटल-2.0 हुए थे …और वैसा ही गुणात्मक कंटिनुअम भी होगा …

विभांशु केशव इस मुद्दे पर लड़ेंगे तो जो कट्टर हो चुके हैं वो और कट्टर होते जायेंगे और फेसबुक व्हाट्स एप पर दौड़ने वाले मन्त्रों के सहारे दूसरों को भी कट्टर बनाते जायेंगे। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने जो वादे किए हैं उन पर लड़ाई हो सकती है तब शायद जनता भी साथ खड़ी हो। जनता और कुछ विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त युवाओं के वैचारिक स्तर का पता लगा लेना चाहिये

Abhishek Srivastava फ़ोन पर बात करेंगे। यहाँ समझाने में बहुत लिखना पड़ेगा।

Majid Ali Khan अभिषेक जी क्या हिंदुत्व की संतृप्ति के लिए अहमदाबाद को दोहराए जाने की संभावना उत्तर प्रदेश में कहीं नज़र आ रही है या नहीं कुछ रौशनी डालें, यानी मुसलमानों का कुछ दिन खुलकर कत्लेआम हो और हिंदुत्ववादी वोटर संतुष्ट हो जाए और अपने आप को विजयी समझ कर शांति से रहता रहे

Abhishek Srivastava कुछ भी हो सकता है होने को तो, लेकिन हमें ऐसा लगता नहीं है कि कुछ दुर्दांत होगा। मने लगने का मामला है। अगर ज़रूरत लगेगी उन्हें तो उसे वे पूरी करेंगे। चूंकि ऐसा कुछ किये बगैर ही प्रचंड बहुमत है, तो हिन्दू वोटर आलरेडी संतुष्ट है। योगी के cm बनने से अब वो चैन की नींद सोयेगा की रामराज आ गया।

Poojāditya Nāth मुझे लगता है कि बाबा को साल भर में निपटा दिया जाएगा। मतलब राजनीतिक अंत हो जाएगा ताकि ये ज़्यादा फड़फड़ाए नहीं।

Abhishek Srivastava बाबा कौन है अगर आप समझते हैं तो ऐसा नहीं कहेंगे।

Akhilesh Pratap Singh सही है….लेकिन योगी के आने से पहले हिंदुओं में लिबरल स्पेस का घटना शुरू हो चुका है और केवल गोरखनाथ मठ की छवि की बात करें तो उसकी कथित लिबरल छवि की पोल अवैद्यनाथ के जमाने में ही खुल चुकी थी….बाकी ” समाजसेवी और शिक्षा प्रेमी ” तो मुख्तार अंसारी भी हैं और रघुराज प्रताप सिंह भी…..यह बात बिल्कुल सही है कि मोदी और योगी में अंतर्विरोध खोजना बेमतलब है……

Abhishek Srivastava मामला मठ की छवि का उतना नहीं है जितना मठ की परंपरा और छवि के बीच टकराव का है। हम मठ की परंपरा पर ज़ोर दें तो छवि बिगाड़ने वालों को नंगा कर सकते हैं, साथ ही हिंदू लिबरल स्‍पेस को भी बचा सकते हैं। दिक्‍कत यह है कि इस एंगिल से बात करने को कोई तैयार नहीं।

Akhilesh Pratap Singh अब कहां परंपरा…अब तो हिंदू का मतलब बीजेपी-आरएसएस समर्थक कमोबेश मान लिया गया है…यही बिल्ला हटाए न हट रहा….जबकि हिंदू वह है नहीं, जिसका ढोल पीट रहे हैं सब लोग…बहुत विनम्रता और धीरज की जरूरत है मनाने के लिए और मानने के लिए….लेकिन शोर इतना है और हर तरफ से शोर है कि हिंदू के बारे में बात करना बीजेपी के बारे में बात करना मान लिया जा रहा है…..डेडली साउंड मिक्सिंग

Abhishek Srivastava यह बिल्‍ला हटाने के लिए काम कौन कर रहा है? एक नाम गिनवाइए। दरअसल बुनियादी लड़ाई यहां है जहां से आप संघ को नाथ सकते हैं, लेकिन हमारे यहां लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से ही परहेज है तो अल्‍ला खैर करे।

Akhilesh Pratap Singh लड़ने वालों को हिंदू और धर्म से परहेज है … 🙂

Abhishek Srivastava मजाक नहीं कर रहे, सीरियस हैं। क्‍यों नहीं कोई जाकर बताता जनता को कि हिंदू नाम की चिडि़या वेदों में नहीं है। कहीं नहीं है। जो है सनातन है। इनके हिंदुत्‍व के बरक्‍स सनातन धर्म को खड़ा करिए फिर देखिए कैसी हवा निकलती है।

Akhilesh Pratap Singh मजाक नहीं कर रहा….आप ठीक कह रहे हैं…लेकिन यह ऐसा प्रोजेकट है, जिसके लिए अपार धीरज की जरूरत है…चुनावी चिंता के पार जाने वाली नजर की…गांधी…गांधी…गांधी

Jaya Nigam योगी, मोदी के सक्सेसर हैं, 2024 के लिये, यह कैसे ?

Abhishek Srivastava वो ऐसे कि ऐसे के पीछे ऐसा ही होता है।

Shashank Dwivedi मनोज सिन्हा का पत्ता क्यों कटा?

Abhishek Srivastava राजनाथ सिंह से पूछिए

K Kumar योगी से योगी उनके समर्थक रोटी कपड़ा और मकान से पहले मंदिर की उम्मीद कर रहे हैं दादा। ऐसे में यदि योगी मोदी की राजनीति करेंगे तो उनका बेस खिसकेगा और योगी, योगी की राजनीति करते हैं तो मोदी धराशायी हो सकते हैं। बस अपना एक यह भी थीसिस है।

अभिषेक श्रीवास्तव का लिखा यह भी पढ़ सकते हैं….

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अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा : अभिषेक श्रीवास्तव

Abhishek Srivastava : ‘उत्‍सव के नाम पर उपद्रव नहीं होना चाहिए’ – बतौर भावी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ का यह पहला निर्देश प्रशासन के लिए आया है। रामगोपाल वर्मा की फिल्‍म ‘रक्‍तचरित्र-1’ का आखिरी सीक्‍वेंस याद करिए जब मुख्‍यमंत्री बनने के बाद रवि ने सभी बाहुबलियों को अपने घर खाने पर बुलाकर ज्ञान दिया था कि जंगल का राजा केवल एक होता है और राजा चूंकि वो है, इसलिए बाकी जानवर अब हुंकारना बंद कर दें। इस हिसाब से सोचिए तो उम्‍मीद बनती है कि अगला निर्देश मुख्‍यमंत्री पद पर शपथ ग्रहण के बाद उन लोगों के लिए आएगा जो प्रशासन को अपनी जेब में रखने का शौक पालते हैं यानी गुंडे, बदमाश और माफिया।

उत्‍तर प्रदेश नाम के जंगल में अब पशुता केंद्रीकृत होगी। इससे आम आदमी को थो़ड़ा राहत बेशक़ मिलेगी। गुजरात के सूरत में कुछ साल रहकर आया मेरा साला कल बता रहा था कि वहां अपराध, छिनैती, गुंडई बिलकुल गायब है और जनता चैन से रहती है। अपने काम से काम रखती है। यूपी की राजनीतिक सत्‍ता में धर्म और बाहुबल का यह विलय यूपी को गुजरात बनाएगा। यह एक भी मुसलमान को टिकट दिए बगैर केवल हिंदू वोटों से बहुमत की सरकार बनाने का स्‍वाभाविक विस्‍तार है। योगी अगर कुछ न करें, तो भी उनका नाम और चेहरा काफ़ी होगा। अनुशासन के मामले में लखनऊ का सचिवालय अब गोरखनाथ मठ की फ्रेंचाइज़ी बन जाएगा।

योगी एक साथ तीन चीज़ों की नुमाइंदगी करेंगे- राज्‍य के राजपूत-भूमिहार नेतृत्‍व बहुल धार्मिक मठों की; मज़बूत स्‍टेट की; और वर्ण व्‍यवस्‍था के मुताबिक रक्षक-धर्म की (आंतरिक और बाहरी खतरों से)। सवाल है कि विरोधी दल इस स्थिति से कैसे निपटेंगे? अगर जनता को ताकतवर स्‍टेट, योद्धा जाति से आने वाला सिपहसालार और धार्मिक मठों का रहनुमा तीनों चीज़ें एक पैकेज डील में मिल रही हैं, तो जनता स्‍टेट को कमज़ोर करने वालों को चारा क्‍यों डालेगी? कांग्रेस, सपा, बसपा, वाम, लिबरल, नागरिक समाज, एनजीओ, समाजवादी- किसी के पास इस फॉर्मूले की काट हो तो बताए।

तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म ले लिया है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

Punya Prasun Bajpai : शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग…. ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है। ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है। ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है। ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है। ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है। ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे।

यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया। लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था। संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी। तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी।

संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता। लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कहीं ना कहीं संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया।

ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा। अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उन पर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेंगे।

इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेंगे कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नहीं सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिंदू है तो फिर उसके पिछडे़पन का इलाज कैसे होगा। तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था। यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरिये उभारा जायेगा।

जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है। एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी। 50 के दशक में तो गोरखपुर मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया। लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई।

यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में बदल दिया है उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा। तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी। लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा, इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी।

आजतक में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की एफबी वॉल से.

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ये योगी जो आज यूपी के CM बने हुए हैं, ये ‘आपकी’ ही देन हैं, प्रभु! : अभिषेक उपाध्याय

Abhishek Upadhyay : योगी आदित्यनाथ को शपथ लेने से पहले इस देश के कथित सेक्युलरों का, कथित बुद्धिजीवियों का जमकर शुक्रिया अदा करना चाहिए। ये है प्रतिक्रियावाद की ताकत। योगी क्यों CM बने? पांच बार से गोरखपुर का सांसद होने के बावजूद गोरखपुर बुरी तरह खस्ताहाल है। गोरखपुर की सड़कें……. हे राम….। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली….. सब का सब भगवान भरोसे। राप्ती की बाढ़ आज भी पूर्वांचल का काल है। हर साल सैकड़ों नौनिहाल इंसेफेलाइटिस यानि मस्तिष्क ज्वर के चलते अकाल मौत मर जाते हैं। हर साल……..। फिर भी, न कोई शोर। न कोई सुनवाई। न कोई इलाज।

पर अचरज की बात है कि इन आधारों पर कभी योगी का मूल्यांकन किया ही नहीं गया। इन सेक्युलरों की नज़र में योगी का मतलब सिर्फ हिन्दू…हिन्दू…और हिन्दू है। साल दर साल योगी के नाम पर सिर्फ हिन्दू…हिन्दू…हिन्दू… का हव्वा खड़ा करते इन “पुरूस्कार वापसी टाइप” बुद्धिजीवियों ने योगी को देश के सबसे बड़े हिन्दू हृदय सम्राट की कतार में खड़ा कर दिया। योगी ने असल जिंदगी में एक चींटी भी न मारी होगी पर इन महान आत्माओं ने उन्हें मुसलमानों के खिलाफ सबसे बड़ा खतरा साबित कर दिया। योगी के ख़िलाफ़ तमाम बातों के बीच ये एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि गोरखनाथ मंदिर के चिकित्सालय में सस्ते पैसों पर इलाज कराने वालों में अच्छी खासी संख्या मुसलमानो की भी है। पर ये बात कहते हुए सेक्युलरों की जीभ जल जाएगी क्योंकि फिर हिन्दू-मुसलमान का गणित कहां सेट होगा? फिर योगी को सबसे बड़ा खतरा कैसे बताया जाएगा?

तो ये योगी जो आज यूपी के CM बने हुए हैं, ये आपकी ही देन हैं, प्रभु। आपने ही इनका कद इतना बड़ा, इतना विकराल बना दिया है। आपने ही इन्हें हिन्दू हृदय का ऐसा सम्राट बना दिया है कि हिन्दू अपनी रोजमर्रा की सारी तक़लीफ़ें, सारा दर्द, सारी वादाखिलाफी भूलकर भी अपने “मसीहा” के नाम पर हिंदुत्व की मुहर मार आता है। आपको मुबारक हो आपका बनाया ये CM। आज दोपहर इनका शपथ ग्रहण है। वक़्त निकालकर चले आइयेगा। थोड़ी तालियों पर आपका भी हक़ बनता है हुजूर!

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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योग शरीर की यात्रा करके समाधि तक जाता है… (साक्षात्कार : योगी अरुण तिवारी)

यूं तो भारत और योग का संबंध हज़ारों साल से भी ज़्यादा पुराना है। लेकिन हाल के कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता तथा स्‍वीकार्यता तेज़ी से बढ़ी है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि पुरातन प्रयासों के समानान्तर आज भी भारतीय ज्ञान की वर्षा सम्पूर्ण विश्व-जगत में हो रही है, भले ही औसतन उसका प्रतिशत कम हो किन्तु निःसंदेह रूप से हमारे योगियों, ज्ञानियों, ऋषियों और महात्माओं के द्वारा आज भी उसके पोषण के प्रयास निरन्तर जारी रहते हैं। ऐसे ही प्रयासों में लगातार ख़ुद को समर्पित करने वाले हैं योग व समाज-सेवा के क्षेत्र में भारत के राष्ट्रपति व देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित योगी अरुण तिवारी जिन्होने भारत के अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया के अनेक देशों जैसे श्रीलंका, यूरोप, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, लुथवेनिया, अमेरिका और कनाडा आदि में योग-सुधार कार्यक्रम के माध्यम से हज़ारों लोगों तक योग को सही रूप में पहुँचाया है। योग को लेकर दुनिया भर में उनके प्रयासों की पड़ताल कर रहे हैं अमित राजपूत

सवाल- आप योग में पार्श्व कुण्डलिनी योग के स्वामी हैं। योग के छः प्रमुख आयामों राजयोग या आष्टांग योग, हठयोग, लययोग, ज्ञानयोग, कर्म योग और भक्ति योग में से पार्श्व कुण्डलिनी योग किसके अंतर्गत समाहित है?

जवाब- आपने जो योग की अलग-अलग विधाएं बतायी हैं, उनसे भिन्न है कुण्डलनी योग। इसके भी कई योग-गुरू हुए हैं जो अपनी अलग-अलग विधाओं के ज्ञान से लोगों को कुण्डलिनी योग का ज्ञान अनुभव कराने के लिए आगे आये हैं। लेकिन जो पार्श्व कुण्डलिनी योग है, एक जैन मत के अनुसार भगवान पार्श्वनाथ ने कुण्डलिनी योग के द्वारा ही निर्वाण प्राप्त किया, तब से इस कुण्डलिनी योग को हम पार्श्व कुण्डलिनी योग के नाम से जानते आ रहे हैं जिसे हमारे पूज्य गुरुदेव महाराज आचार्य श्री रूपचंद्र जी महाराज ने आध्यात्मिक रुप से निखारा है और इसे हम मिलकर जन-जन तक पहँचा रहे हैं।

सवाल- योग की क्रियाओं के नाम यथा पशुवत आसन, वस्तुवत आसन, प्रकृति आसन, अंग एवं अंगमुद्रासन और योगीनाम आसन उनको वेशभूषित करने के लिए रखे गए हैं या फिर कोई और कारण हैं?

जवाब- ये प्रश्न हमारे सामने बहुत बार आता है और सबसे पहला प्रश्न आता है कि आसन कितने हैं, तो मैं यही कहता हूँ कि यदि आप हज़ार-दस हज़ार यानी संख्या में अगर देखें तो ये संख्या में नहीं हैं, क्योंकि हमारे ऋषियों-मुनियों ने पशुओं को देखा तो उनकी मुद्राओं को, उनके आसनों को मानव शरीर में उतारने की कोशिश की। मान लीजिए मोर को कुछ क्रियाएं करते देखा तो उन्होने इससे मयूर आसन की धारणा ली। किसी कीड़े को देखा, जैसे सांप को ही ले लीजिए वो कोई आसन बना रहा है तो उसकी क्रियाओं को देखकर सर्पासन या भुजंगासन की धारणा मिली। फिर उसको हमारे ऋषियों ने धारण कर शरीर में ढालने की कोशिश की। ऐसे ही वृक्षों के नाम पर आसनों के नाम पड़े, वस्तुओं के नाम पर नाम पड़े, जैसे धनुरासन। ऐसे ही तमाम मुद्राओं और बिम्बों को समझकर और चिन्तन के बाद उससे होने वाले लाभ को समझकर बड़े वैज्ञानिक रूप से शोधपरक ढंग से इनके नामकरण किए गए हैं।

इनके प्रमाण समझिए, जैसे मयूर है वो सांप को भी पचा लेता है, विष को भी पचा लेता है। तो उस आसन को करने से उसी की तरह हम शक्तिवान भी हो जाते हैं। हमारी पाचक क्षमता बढ़ जाती है। बाद में जब शोध हुआ तो ये साबित भी हुआ कि मयूरासन करने से सबसे ज़्यादा प्रभाव पेट पर पड़ता है। इसे करने से हमारे पेट के अन्दर जो ऑर्गन्स हैं वो सब स्वस्थ हो जाते हैं। मयूर आसन करने से हमारा फेफड़ा बहुत मज़बूत हो जाता है, इससे हमारी पाचक क्षमता बढ़ जाती है। तो हमारे योग ऋषियों ने कहा कि मयूर आसन करने वाला व्यक्ति कुछ भी पचा सकता है, यहां तक कि यदि कोई साधना करे तो वह विष को भी पचा सकता है। इसी तरह भुजंग की आयु का कुछ पता नहीं है, हज़ारों साल तक सांप जीता है। तो भुजंग आसन करने की कोशिश ऋषियों-मुनियों ने की और उसको साधा। और फिर जो परिणाम सामने आया वह यह कि आपकी आयु लम्बी होगी क्योंकि भुजंग आसन करने वाले का हृदय, फेफड़ा और मस्तिष्क इतना मज़बूत हो जाता है कि वह शक्तिशाली अनुभव करता है।

सवाल- भारतीय योग को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलते हुए आरम्भिक विश्व योग दिवस को आप किस रूप में देखते हैं?

जवाब- हमारे योग-इतिहास के लिए बड़े गौरव का प्रश्न हैं। ये हमारे देश के गौरव का विषय हैं। मुझे ख़ुद अपने आप पर ख़ुशी होती है, गर्व होता है कि सन् 2013 में मैने संयुक्त राष्ट्र संघ में पूरे एक घण्टे का योगाभ्यास और व्याख्यान किया जहाँ लगभग 40-45 राष्ट्राध्यक्ष भी उपस्थित थे। योग को लेकर यह यूएनओ के इतिहास में पहली बार था। तभी मैने देखा कि उन दिनों योग को लेकर यूएनओ में भी एक हवा थी और इसी बीच भारत से प्रधानमंत्री मोदी जी का प्रस्ताव आया जिसे सभी ने सहर्ष स्वीकार किया और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रुप में हर भारतीय को गौरवान्वित होने का मौका मिला। और इसके साथ ही एक बात यह भी है कि पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में योग को पेटेण्ट कराने की होड़ में लगे हुए लोगों के गाल पर ये एक तमाचा भी सिद्ध हुआ। अब पूरी दुनिया में एकमत से यह स्वीकार्यता अवश्य बनेगी कि योग भारत की आत्मा की प्रबलता है। 

सवाल- आपके अनुभवों के आधार पर हमें दुनिया के दूसरे देशों के लोगों की दृष्टि में बताएं कि वह योग को किस तरह से देखते हैं और हमारी दृष्टि उनसे किस तरह भिन्न है?

जवाब- सबसे बड़ा अन्तर है सोच का। यहाँ हम जिसेको भी बोलते हैं कि आप आसन कीजिए और इससे आपको फ़ायदा होगा तो उसमें प्रश्न नहीं आता कि क्यूँ फ़ायदा होगा, कैसे होगा, कितनी देर में होगा और क्या-क्या नहीं करना चाहिए। भेंड़चाल है। अग़र हमने दो हज़ार लोगों को यहाँ योग कराया तो उसमें प्रश्न करने वाले सिर्फ़ दस लोग होंगे। वहीं दूसरे देशों में हमने देखा कि दो हज़ार लोगों में ही लगभग अठारह सौ लोग प्रश्न पूछने वाले वहां हैं। अगर मैने वहाँ हार्ट के लिए योग बताया तो लोग पूछते हैं कि मुझे बैक-पेन है तो क्या मैं हार्ट का योग करूँ? यहाँ ऐसा नहीं है, किसी को हार्ट-पेन है तो वह पूँछेगा नहीं। वहाँ लोग प्रत्येक आसन का आधार जानना चाहते हैं, लोग तभी कोई योग करते हैं जब वो लगभग उसके वैज्ञानिक पक्ष को समझते है। इसके अलावा पश्चिमी देशों में लोग पैदल चलनें में भी सहज हैं। लोग दस किलोमीटर तक पैदल ही चले जाते हैं, जोकि हमारे यहां पहले होता था लेकिन अब भारत में लोगों ने पैदल चलना कम कर दिया है।

सवाल- योग को आध्यात्म से जोड़कर देखना कितना उचित होगा?

जवाब- देखिए, वास्तव में योग आध्यात्म के बिना सिद्ध नहीं होता है। इसलिए योग आध्यात्मिक ही है, आसन एक पड़ाव है। यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और फिर समाधि ये योग के चरण हैं। जिन्होंने भी योग प्रस्तुत किया सब समाधि तक अपनी बात को ले गए। तो योग शरीर की यात्रा करके समाधि तक जाता है। सबसे पहले है आचरण इसलिए यम की स्थापना हुयी। फिर नियम में व्रत को धारण करना है, जिससे हमारी दिनचर्या दुरुस्त रहे। इसी तरह आसन से हम अपने तन-मन को साधते हैं। फिर इसी तरह हम क्रमशः प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान के माध्यम से समाधि में विलीन होते हैं। तो ये सब पड़ाव पार कर पाना बिना आध्यात्म के सम्भव ही नहीं है। तभी हमें आत्मबोध हो पाता है। पूरी दुनिया में लोगों ने माना है कि आध्यात्म के बिना न मन में शान्ति हो सकती है और न हमें लक्ष्य का पता चल सकता है। इसीलिए सभी धर्मों और संप्रदायों ने आध्यात्म को स्वीकार किया है जिसे वास्तविक मायने में योग ने पूर्ण किया हु्आ है। आप देखिए, योग ने हमें जो दिया है वह एक सम्प्रदाय-मुक्त योग दिया है। योग भारतीय-संस्कृति का हो सकता है किसी धर्म का नहीं और इतनी स्वच्छंदता आध्यात्म के अलावा पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं और नहीं है।

सवाल- आज लोगों में योग की उपयोगिता के प्रति नज़रिया क्या है? क्या वो कुछ बदल गया है?

जवाब- योग का जो नज़रिया है वह अभी सिर्फ स्वास्थ्य तक रह गया है। पहले योग साधना-परक होता था। आज योग के नाम पर एक तरह से जैसे व्यापार सा हो रहा है और दिखावापन आ रहा है। पहले एक गुरू एक शिष्य को योग सिखाता था। अभी गुरू नहीं सिखा रहा है, एक व्यापारी योग को बेंच रहा है, बाँट रहा है और बाज़ार में दूसरे ख़रीददार उसे ख़रीद भी रहे हैं। पैसे देकर योग हो रहे हैं, जिनमें गुणवत्ता भी नहीं है। लोग दिखावेपन में भूल गए हैं कि योग से शरीर ही नहीं जीवन भी सधता है। आसन का अर्थ मात्र शरीर को तोड़ना-मरोड़ना ही नहीं है, इससे हमारी चिति भी स्वस्थ होती है। आज योग के क्रम बदल गए हैं। निःसंदेह योग के प्रति लोगों का नज़रिया बदला है। मै तो यही कहूँगा कि आज यह दिशाहीन हो रहा है। इसलिए हमें इसके प्रसार के साथ-साथ योग के सही प्रचार की ओर भी ध्यान देना होगा।

सवाल- पश्चिमी देशों से 1990 में योग का विकसित रूप भारत आया, जिसे पॉवर-योग कहा गया। यह योग हर योगगुरु अपने मुताबिक कराता है। इसे आप कितना उपयोगी मानते हैं?

जवाब- (थोड़ा सोचकर)  देखिए, पॉवर-योग भी होता है और एक हॉट-योग भी होता है। पॉवर-योग से मतलब है हमारा जो हठ योग है। वास्तव में पॉवर-योग आष्टांग-योग का ही एक प्रकार है। और हॉट-योग जो है वह बंद कमरे में तक़रीबन चालीस डिग्री सेण्टीग्रेट के तापमान में, जहाँ सांस लेना भी दुर्लभ है वहां किया जात है। पश्चिमी देशों में योग को इंट्रेस्टिंग बनाने के प्रयास के चलते ये सब विकृतियां आयी हैं। जब ये इंट्रेस्टिंग होता गया तो युवाओं को बड़ा आकर्षित करने लगा। हॉट-योग करेंगे तो पसीना निकलेगा यही उन युवाओं की धारणा रहती है। योग से आन्तरिक शान्ति प्राप्त करना है, रोग-मुक्त होना है ये सब सरोकार उनसे छूटते जा रहे हैं। सही मायने में इसके कोई लाभ नहीं हैं। ये तनिक भी उपयोगी नहीं हैं। ऐसे ही तमाम योग हैं- ड्रामा-योग होता है। पिलाटे-योग होता है और हास्य-योग भी होता है। सच में इन्हें योग कहना ही व्यर्थ है, योग से तो तन के साथ-साथ मन, समाज, राष्ट्र और समस्त विश्व स्वस्थ होता है।

सवाल- छोटे बच्चों के प्रति योग को लेकर तमाम भ्रांतियाँ रहती है। बच्चे कितने साल की अवस्था से योग का आरम्भ कर सकते हैं?

जवाब- जैसे ही बच्चा जन्म लेता है, किलकारी भरता है तो वह सबसे पहले ब्रीदिंग ही करता है। वह हाथ-पैर हिलाता है तो कभी अंगूठे को चूसता है, यानी वह अपने और माँ के वियोग के तुरन्त बाद ही योग से जुड़ जाता है। थोड़ा बड़े होने पर उनको खिंचाव के आसन और स्थिरता वाले आसन जैसे- वृक्षासन, एकपादासन आदि करवाएं। बच्चे लम्बी-गहरी साँसें लें और कठिन आसनों को थोड़ा हड्डियाँ मज़बूत होने के बाद करें। ऐसे आसनों से हल्की उम्र में थोड़ा बचना चाहिए, पाँच साल तक तो रुकें ही। मयूरासन न करें, भुजंग आसन आदि से बचें।

सवाल- जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है। उस परम्परा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य में आपके क्या प्रयास हैं?

जवाब- जैसे पार्श्व कुण्डलिनी योग की विधा को लोग नहीं जानते थे, जबकि यह विधा बहुत वैज्ञानिक है। अमेरिका के अस्पतालों में वहां के डॉक्टरों के साथ मिलकर हम ख़ासकर कैंसर के मरीजों पर इसका शोध कर रहे हैं। हमें बहुत अच्छे इसके परिणाम मिल रहे हैं। इसके साथ-साथ अन्य विधाओं को भी हम साथ लेकर उसमें भी शोध कर रहे हैं। अग़र ग़लत रूप में कहीं कोई ग़लत नाम में योग का प्रसार-प्रचार हो रहा है तो हमारा उन पर भी ध्यान हैं क्योंकि अग़र इनका मूल रूप लोगों तक नहीं पहुँचेगा तो हम जैसे योगियों का रहना ही व्यर्थ है। और ये सुधार ही इन ऋषियों-मुनियों के पदचिन्हों पर चलना, उनकी परम्परा को आगे बढ़ाने में और उन्हें बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इसके अलावा मेरा व्यक्तिगत प्रयास सेना के जवानों को योग का प्रशिक्षण देना है। मै अब तक अपने भारत देश के दस हज़ार जवानों को योग का प्रशिक्षण देकर स्वयं गौरव का अनुभव कर रहा हूँ और मैं मानता हूँ कि इससे मेरा एक योगी होना सिद्ध हो गया।

सवाल- आप अपनी प्रसिद्धि को किस रूप में स्वीकारोक्ति देंगे- भारतीय योगगुरू के रूप में, विश्व प्रसिद्ध युवा योगी के रूप में अथवा एक एनआरआई योगी के रूप में?

जवाब- (मुस्कुराते हुए) एनआरआई नहीं..। मैं हमेशा और कभी भी ये बात कहूँगा तो यही कहूँगा कि मैं एक भारतीय योगाचार्य ही हूँ। गुरू के आदेश और अपनी परम्परा के वशीभूत होकर मैं विश्व के दूसरे हिस्सों में योग पर शोध, उसको सही रूप में पहुँचाने के अपने प्रयासों और योग के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हूँ। इसके पीछे हमारे ऋषियों-मुनियों का अनुकरण, मेरे गुरू का आशीर्वाद, मेरे बड़े भाई श्री अवधेश तिवारी का स्नेहिल सहयोग और मेरे सभी भारतीयों की प्रेरणा सदा अपने साथ लिये रहता हूँ।

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