न्यूज चैनल पर ऑन एयर हुआ पोर्न वीडियो, अंजान बना रहा एंकर

ग्रीक टेलीविजन दर्शक उस वक्त आश्चर्यचकित रह गए, जब उन्हें एक स्थानीय चैनल पर न्यूज बुलेटिन के दौरान पोर्न वीडियो दिखाई दी। यह शर्मनाक घटना बीते मंगलवार रन टीवी प्रसारण के दौरान हुई। बुलेटिन के दौरान प्रस्तुतकर्ता जब देश की ताजा घटनाओं की जानकारी दे रहा था, उस दौरान न्यूज रीडर के पीछे लगी स्क्रीन पर पोर्न फिल्म चल रही थी।

स्थानीय दर्शकों के अनुसार, न्यूज चैनल में दिखाई दे रहे सेक्स सीन्स उसी संस्थान के दूसरे चैनल ईटी1 पर दिखाई जा रही फिल्म के थे, जो कि ग़लती से न्यूज रीडर के पीछे स्थित मॉनीटर पर डिस्प्ले कर दिए गए। कुछ ही देर में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इस घटना का वीडियो और तस्वीरें वायरल हो गईं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह था कि इस पूरे वाकये के दौरान न्यूज रीडर पोर्न वीडियो से अंजान था। (भास्‍कर)

सैयद अहमद मेहंदी बने लखनऊ हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार

लखनऊ। उच्च न्यायालय में अपनी ईमानदार छवि से पहचाने जाने वाले तेज तर्रार सैयद अहमद मेहंदी लखनऊ बेंच में रजिस्ट्रार नियुक्त किये गये हैं। श्री मेहंदी की नियुक्ति से उच्च न्यायालय के कर्मचारियों के साथ वकीलों में भी खुशी की लहर दौड़ गयी। मालूम हो कि फैजाबाद के निवासी सैयद अहमद मेहंदी ने साकेत डिग्री कालेज के साथ शिया डिग्री कालेज लखनऊ से एलएलबी किया था। आईएस मेन भी क्वालीफाइ कर चुके थे।

उच्च न्यायालय इलाहाबाद से उन्होंने नौकरी की शुरुआत की थी। तेज तर्रार अहमद मेहंदी दूरदर्शन और आकाशवाणी से भी जुड़े हुए हैं। कई इण्टरव्यू में सफलता हासिल करने के बाद आज हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार पद पर उनकी नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गयी। श्री मेहंदी को हाईकोर्ट के दस्तावेज रखने का और उनको संकलित कर म्यूजियम बनाने का एक नया तर्जुबा उनकी तरक्की का सबब बना। मिलनसार तबियत के श्री मेहंदी अपनी ईमानदारी और मिलनसारी से मेहंदी साहब के नाम से जाने जाते हैं। लेकिन उनका मीडिया से जुड़ाव आज भी टूटा नहीं है। वह उनका शौक आज भी दूरदर्शन पर उर्दू न्यूज रीडर की हैसियत से टीवी की स्क्रीन पर छाया रहता है। आज दिन भर मेहंदी साहब को मुबारकबाद देने वालों का ताता लगा रहा। फोन पर फोन आते रहे मेहंदी साहब सबको मुबारकबाद का जवाब यह कहकर देते रहे कि यह सब आप लोगों की दुवाओं का नतीजा है।

पत्रकार रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

दूसरे माध्‍यम से आजीविका कमाकर ही हो सकती है निष्‍पक्ष पत्रकारिता : अनिल यादव

मुगलसराय : पत्रकारिता दिवस पर ग्रामीण पत्रकार एसोसियेशन, मुग़लसराय इकाई द्वारा ''पत्रकारिता व पत्रकारों का विकास'' विषयक संगोष्ठी का आयोजन नगर के एक लान में आयोजित की गयी। जिसमें मुख्य वक्ता ग्रापए के पूर्व जिलाध्यक्ष डा. अनिल यादव, जिलाध्यक्ष तारकेश्वर सिंह व उपजा के जिलाध्यक्ष विनय वर्मा रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता नगर अध्यक्ष संजय अग्रवाल व संचालन जिला महामंत्री कमलेश तिवारी ने किया।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पत्रकार अनिल यादव ने कहा कि आज हमें पत्रकार होने पर गर्व महसूस होना चाहिए। पत्रकारिता स्वसुखान्त का विषय है, आज पत्रकारों को पत्रकारिता के साथ साथ अपनी आजीविका के लिए अन्य कार्य भी करना चाहिए तभी पत्रकारिता में निष्पक्षता बनी रह सकती है। वहीं उपजा के जिलाध्यक्ष विनय वर्मा ने पत्रकारिता में तेजी से आ रही तकनिकी विकास पर जोर देते हुवे कहा कि हमें खुद को तकनीक से जोड़ना होगा अन्यथा हम पीछे रह जायेंगे।

वक्ताओं की कड़ी में ग्रापए जिलाध्यक्ष तारकेश्वर सिंह ने कहा कि चंदौली में पत्रकार अभी संसाधन के मामले में बहुत पिछड़े हैं क्योंकि इनके पास न तो कोई कोष है और न ही कोई भवन, जहाँ बैठ कर वह अपनी परिस्थितियों पर विचार विमर्श कर सकें। उपजा के नगर उपाध्यक्ष महेन्द्र प्रजापति ने तेजी से हो रहे विकास के दौर में पत्रकारिता के गिरते ग्राफ पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन बनती जा रही है। लेकिन आज प्रोफेशन के साथ इसमें मिशन का होना काफी हद तक जरूरी है, तभी पत्रकारिता की साख बच पायेगी वर्ना वो दिन दूर नहीं जब पत्रकारिता से पत्रकार का सम्बन्ध नाम मात्र का रह जायेगा।

संगोष्ठी में सर्वश्री कृष्ण कान्त गुप्ता, राजीव कुमार, धर्म प्रकाश शर्मा, ज्ञान प्रकाश दुबे, सरदार कमलजीत सिंह, मनोहर गुप्ता, नन्द लाल, फैयाज अंसारी, अखिलेश सिंह, ललित शंकर पाण्डेय, शमशेर चौधरी, जुबेर अहमद, भागवत नारायण चौरसिया मौजूद रहे।

टीवी ने भले ही खबरों की पहल छीन ली हो लेकिन नेटवर्क में अखबार आज भी आगे हैं : शंभूनाथ

बिजनौर : उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने पत्रकारिता दिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया. बिजनौर के ऐजाज अली हाल में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता नरेन्द्र मारवाड़ी व संचालन संयुक्त रूप से वसीम अख्तर, ज्योति लाल शर्मा ने किया. इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित व युवा पत्रकारों को पुरस्कृत किया गया. कर्यक्रम के मुख्य अतिथि जाने माने पत्रकार शम्भूनाथ शुक्ल रहे. जिलाधिकारी अजय दीप सिंह बतौर अतिथि शामिल हुए.

पत्रकारिता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार शम्भू नाथ शुक्ल ने कहा वर्तमान ने भले ही टीवी ने खबरों की पहल अखबारों से छीन ली हो लेकिन नेटवर्क में आज भी अख़बार ही आगे हैं. टीवी डिबेट करा सकता है, लेकिन विश्लेषण अख़बार ही कर सकता है. उन्होंने सोशल मीडिया पर अंकुश की वकालत करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर पाठक सीधे कमेन्ट करता है और सीधे जुड़ता है, जिसमें सीधी प्रतिक्रिया ठीक नहीं है. इस मौके पर जिलाधिकारी अजय दीप सिंह ने कहा कि पत्रकार मूल भावना को न त्यागे, समाज को दिशा देने में लेखनी का प्रयोग करे, जिससे समाज को नई दिशा मिल सके.

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार गौरी शंकर सुकोमल, जय नारायण अरुण, रामकुमार आर्य, वीरेश बल, शिवकुमार शर्मा, ब्रजराज शर्मा, विश्वामित्र शर्मा को उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किया गया. पत्रकारिता दिवस पर आयोजित समारोह को गौरी शंकर सुकोमल, ब्रजराज शर्मा, राजीव अग्रवाल, दिवाकर झा, वीरेश बल, राजीव अग्रवाल, शिवकुमार शर्मा, कुलदीप सिंह, विजय गंभीर, मुनीश त्यागी, वीपी गुप्ता, नाहिद फातिमा, पालिका अध्यक्ष फरीद अहमद, सपा जिलाध्यक्ष राशिद हुसैन, रिजवान खान ने संबोधित किया.

कार्यक्रम में युवा पत्रकारों को भी पुरस्कृत किया गया. दिवाकर झा, भूपेन्द्र शर्मा, पवन शर्मा, राजीव कुमार, अजित सिंह, अनुज चौधरी, जितेन्द्र शर्मा, जमील अहमद खान, राजकुमार, जहीर अहमद, नाहिद फातिमा, कांता प्रसाद पुष्पक, विनीत चौधरी साजन शामिल हैं. कार्यक्रम के अंत में यूनियन के महामंत्री वसीम अख्तर ने सभी का आभार व्यक्त किया.

पत्रकारों की भीड़ में अब आसिम दा जैसे लोग नहीं होते!

Shambhunath Shukla : 1983 में मैं दिल्ली आया जनसत्ता में उप संपादक बनकर। तब मुझे यहां प्रभाष जी ने संपादकीय पेज पर रखा। इसकी रिपोर्टिंग सीधे उन्हीं के पास थी। आईटीओ स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग में घुसते ही रिशेप्शन के बगल से एक गलियारा था जिसके बाएं किनारे पर हाल बने थे, जिसमें डेस्क व रिपोर्टिंग थी तथा दायीं तरफ केबिन बने थे। दायीं तरफ दो बड़े केबिन थे जिनकी खिड़कियां सड़क की तरफ खुलती थीं।

पहला केबिन प्रभाष जी का तथा दूसरा इंडियन एक्सप्रेस के चीफ एडिटर जार्ज वर्गीज का था। केबिन के बाहर प्रभाष जी के पीए रामबाबू तथा उनकी बगल में जार्ज साहब के पीए बैठा करते थे। इनके पीछे फिर दो केबिन बने थे जिनमें से एक में जनसत्ता के तीनों सहायक संपादक बनवारी जी, हरिशंकर व्यास जी तथा सतीश झा बैठते थे। दूसरे केबिन मैं और एक्सप्रेस के एक सहायक संपादक आसिम दा तथा कार्टूनिस्ट रविशंकर बैठते थे। आसिम और रविशंकर को हिंदी नहीं आती थी। ये दोनों बोल तो लेते थे पर पढ़ या लिख नहीं पाते थे। एक बंगाली और दूसरा केरल का। आसिम दा साहित्यप्रेमी थे। उन्होंने मुझे थोड़ी-थोड़ी बांग्ला और मैंने उन्हें कामचलाऊ हिंदी सिखाई।

लेकिन आसिम दा ने एक बड़ा काम किया बांग्ला के सब जाने माने लेखकों की कृतियों से मेरा परिचय कराया। तारा शंकर वंद्योपाध्याय से लेकर सुनील गांगुली तक। वे ढूंढ़-ढूंढ़ कर मेरे लिए बांग्ला उपन्यासों के हिंदी अनुवाद लाकर देते थे। लेकिन दिक्कत यह थी कि मैं उन्हें हिंदी लेखकों की कृतियों के बांग्ला अनुवाद नहीं दे पाता था। इसलिए अक्सर मुझे हिंदी के नामचीन साहित्यकारों की कृतियां उन्हें पढ़कर सुनानी पड़ती थीं। उनके लिए मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के आठों खंड ले आया। उनमें से अधिकांश मैंने पहले नहीं पढ़े थे। आसिम दा हिंदी उपन्यासों तथा कहानी संग्रह लाने के लिए पैसे स्वयं देते थे। निराला से लेकर कमलेश्वर तक के सारा साहित्य मैंने उन्हें लाकर दिया। बदले में आसिम दा ने मुझे एक बड़ी ही खूबसूरत किताब का हिंदी अनुवाद लाकर दिया।

विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय का आरण्यक अनुवादक थे हंसकुमार तिवारी। अद्भुत किताब है। प्रकृति के प्रति लगाव मेरा उसी किताब को पढ़कर बढ़ा। आसिम दा कभी-कभी बांग्ला में भी उसे पढ़कर सुनाते तो वे ऐसे डूब जाते जैसे कहानी नायक की बजाय वे खुद बिहार के उस घने जंगली इलाके को देख रहे हैं, जहां नायक मैनेजर बनकर जाता है और सारा जंगल किसानों को बेचकर जब कलकत्ता लौटता है तो कहता है सब कुछ पीछे छूट गया लवलौटिया बैहार का वह जंगल और उसके फूल, गंध तथा निस्तब्धता। कोसी नदी के पार के उस जंगल की ऐसी कथा है यह उपन्यास कि बिना वहां जाए सिर्फ पढ़कर ही आप कोसी के उन जंगलों की सैर कर सकते हैं।

ऐसे ही नहीं बांग्ला के उपन्यासों के आगे अंग्रेजी उपन्यास भी फीके हैं यहां तक कि मोटे-मोटे पुथन्नों में लिखे गए रूसी तथा ग्रीक पुराणनुमा आख्यान भी। आसिम दा पहले कभी इंडियन एक्सप्रेस के विशेष संवाददाता हुआ करते थे लेकिन बाद में उनकी आंखें कुछ खराब हो गईं तो संपादक ने उन्हें संपादकीय पेज पर लगा दिया था। आसिम दा की उम्र काफी हो चली थी मुझसे करीब २५ साल बड़े रहे होंगे। बाद में वे रिटायर हो गए। शादी की नहीं थी अपने भाई के साथ रहते थे। फिर वे कहां गए कुछ पता नहीं लेकिन आसिम दा सदैव याद आते रहेंगे।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

अमित को फंसाए जाने के विरोध में अनशन पर बैठे झांसी के पत्रकार

: ना‍बालिग लड़कियों के दुपट्टा खींचने के आरोपी दारोगा को निलंबित करने की मांग : झाँसी में इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार को फर्जी मामले में जेल भेजे जाने के विरोध में पत्रकार अनिश्चित कालीन अनशन पर बैठ गए हैं। जनपद के पत्रकार इलाईट चौहराहे पर अनशन पर बैठ हुए हैं.

पत्रकारों का आरोप है कि दारोगा जेपी यादव ने कुछ महीनों पर कोतवाली में दो नाबालिग लड़कियों का दुपट्टा खीचा था और यह खबर प्रसारित होने के बाद से वह पत्रकारों से खुन्नस रखता था। इसके बाद भी जब पत्रकारों ने दारोगा के खिलाफ खबर बंद नहीं किया तो उसने पत्रकार अमित श्रीवास्तव पर फर्जी मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया।

जबकि दुपट्टा उतारने और नाबालिग लडकियों से अश्लील व्यवहार करने के आरोपी दरोगा जेपी यादव पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। पत्रकारों का कहना है कि यह अनशन तब तक जारी रहेगा जब तक आरोपी दारोगा जेपी यादव को निलंबित नहीं कर दिया जाता।

डायबेटिक अखबारनवीसों का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा

Ghanshyam Srivastava : सन् २००० में जब मैंने हिन्दुस्तान अखबार, रांची में ज्वायन किया था, तब हमें कंपनी की ओर से वर्किंग आवर में तीन बार चाय मिलती थी। कैंटीन वाला थाली में चाय की कप सजा कर लाता था। उनमें पांच फीसदी फीकी चाय, बाकी मीठी चाय होती थी। २०११ आते-आते यह अनुपात ६०-४० का हो गया। मतलब १०० प्याली में से साठ मीठी, चालीस फीकी। मैंने देखा किस तेजी से डायबेटिक अखबारनवीसों का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही गया। आदमी उतने ही लेकिन फीकी प्यालियों की संख्या बढ़ती गयी।

कमोबेश अन्य कई संस्थानों के मित्र भी इन आंकड़ों की तसदीक करते हैं। क्या कामकाजी लोगों की जीवनशैली में आये बदलावों की वजह से चुपचाप पांव पसारती इस सुरसा के बारे में कम से कम हमारे मीडिया के मित्र सोचते हैं। मेरी चिंता इस बात को लेकर ज्यादा है कि हमारे प्रोफेशन में मुफ्त की पार्टी और दारू की बोतलों का स्कोप कुछ ज्यादा ही है और हमारे मीडिया के बंधु इन मुफ्त की पार्टियों को अपना अधिकार भी समझते हैं। बताइए, मेरी चिंता वाजिब है कि नहीं?

पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

रायपुर का अखबारी हाल देखकर लगा जैसे मौत के नाच में भी बिरादरान बाजार का खयाल रखते हों

Om Thanvi : नक्सली / माओवादी हमले को लेकर रायपुर में स्थानीय स्तर पर जो रिपोर्टिंग हुई, उसमें बहुत-सी पतंगबाजी से आगे कुछ नहीं थी। कहीं कोई स्रोत नहीं। फिर भी जानकारी इस तरह, जैसे गोलीबारी के वक्त रिपोर्टर किसी पेड़ पर बैठा घटनास्थल को निहार रहा था। एक खबर का अंश देखिए — "गोलीबारी में घायल हो गए विद्याचरण शुक्ल को लेकर नक्सलियों को अपने कमांडर से डांट भी खानी पड़ गई।" इसी तरह और भी कई बातें, जिनका कहीं कोई स्रोत नहीं मिलेगा।

सबसे बुरी बात लगी क्षत-विक्षत तस्वीरों का रंगीन प्रदर्शन। तस्वीरों को लेकर पत्रकारिता में एक मर्यादा बरती जाती रही है, खासकर खून-खराबे की तस्वीरों के मामले में। उन्हें ज्यादा महत्त्व देकर नहीं छापा जाता, आकार और कई दफा तस्वीर को भी धुंधला दिया जाता है। माओवादियों की हिंसा से किसे सहानुभूति हो सकती है (खूनखराबे के बीच चीयर्स के समानार्थी ढूंढ़ने वाले सम्प्रदाय को छोड़कर); लेकिन रायपुर का अखबारी हाल देखकर लगा जैसे मौत के नाच में भी बिरादरान बाजार का खयाल रखते हों। पत्रकारिता में मानवीय संवेदन क्या ऐसी नाजुक घड़ियों में भी हवा होने लगा?

जाने-माने पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

जो खुद को मार्क्सवादी कहलाने को बेताब हैं वे ‘तख़्त’ पर और जो इनसे इनकार कर रहे हैं उनके लिए ‘तख्ता’

Virendra Yadav : ये मार्क्सवाद भी क्या अजीब शै है! अब देखिये कि मनसे (शिवसेना का नया अवतार) का एक कारकून कहता है कि मैं मार्क्सवादी हूँ क्योंकि कवितायेँ लिखता हूँ… डीपीटी (एनसीपी) कहते हैं कि मैं तो प्रचंड के सम्मान में भोज ही देता हूँ तो तो मार्क्सवादी हूँ ही. अशोक वाजपेयी प्रचंड को गुलदस्ता भेंट करते हैं इसलिए वे तो हुए ही. सलवाजुडूम कीर्ति के विश्वरंजन मार्क्सवादी न होते तो फैज़ पर आयोजन ही क्यों करवाते!

'सत्ता' संपादक के तो पिता ही मार्क्सवादी रहे हैं फिर उनके मार्क्सवादी होने में क्या शक ?…पकिस्तान के तो सारे फ़ौजी अफसर मार्क्सवादी हैं क्योंकि वे फैज़ के तराने 'हम देखेंगें' को झूम के सुनते है… लेकिन विनायक सेन कहते हैं कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ… अरुंधती राय भी खुद को मार्क्सवादी नहीं कहतीं. सीमा आजाद, सोनी सोरी, शीतल साठे, सुधीर धावले सहित हजारों दलित व आदिवासी कहते हैं कि न तो हम मार्क्सवादी हैं न माओवादी फिर भी वे देशद्रोही करार कर जेल भेज दिए जाते हैं…. या, रब यह कैसा दौर है कि जो खुद को मार्क्सवादी कहलाने को बेताब हैं वे 'तख़्त' पर और जो इनसे इनकार कर रहे हैं उनके लिए 'तख्ता'.

जाने-माने समालोचक और साहित्यकार वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

बलरामपुर प्रेस क्‍लब की प्रथम स्‍मारिका विमोचित

बलरामपुर। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर गुरूवार को यूपी प्रेस क्लब बलरामपुर की ओर से वर्तमान परिदृश्य में मीडिया की भूमिका विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान क्लब की ओर से प्रकाशित प्रथम स्मारिका का विमोचन भी हुआ। स्थानीय तहसील सभागार में आयोजित गोष्ठी का सुभारम्भ मुख्य अतिथि सीडीओ राकेश मिश्र, विशिष्ट अतिथि सीओ सिटी श्रीश्चन्द्र व प्रख्यात समाजसेवी आजाद सिंह एवं कार्यक्रम अध्यक्ष एमएलके महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ0 ओपी मिश्र नें माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण करके किया।

इसके पश्चात् क्लब के अध्यक्ष अम्बरीश तिवारी व पूर्व अध्यक्ष देवेन्द्र प्रताप सिंह नें अतिथियों का स्वागत किया। सीडीओ राकेश मिश्र व कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य डॉ0 ओपी मिश्र ने वर्तमान समय में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए सभी पत्रकारों को हिन्दी पत्रकारिता दिवस की बधाई दी। विशिष्ट अतिथि सीओ श्रीश्चन्द्र, समाजसेवी आजाद सिंह, बीएसए एसएन चौरसिया, डीएसटीओ राजेश सिंह, सपा जिलाध्यक्ष ओंकार नाथ पटेल, जिला बार संघ अध्यक्ष कुलदीप सिंह व पीस पार्टी के जिलाध्यक्ष शाबान अली सहित कई वरिष्ठ पत्रकारो ने अपने विचार व्यक्त किये।

कार्यक्रम के मध्य पिछले चार वर्षों की स्मृतियों को सजोने के लिए क्लब की ओर से प्रकाशित प्रथम स्मारिका का भी विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। इस दौरान जहाँ क्लब की ओर से स्मृति चिन्ह देकर अतिथियों का स्वागत किया गया वहीं सम्पादकीय समिति के सदस्य विश्वमोहन, टीबी लाल, सुरेश मिश्रा, सर्वेश कुमार सिंह, अमरेन्द्र कृष्ण त्रिपाठी, इमामुद्दीन, आफाक अहमद खान व उमेश तिवारी को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन वर्षकार सिंह कलहंस ने किया। अतिथियों के प्रति आभार क्लब के सचिव व स्मारिका के प्रकाशक देवेन्द्र कुमार चौहान ने व्यक्त किया।

इस अवसर पर पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कुसुम चौहान, डॉ. अरूण सिंह, कमलेश्वर सिंह, मसीह खाँ, आशुतोष मिश्र मेहंदी अब्बास रिजवी, सलीम सिद्दीकी, आनन्द तिवारी, राम कुमार मिश्रा, सत्य प्रकाश शुक्ल, अखिलेश्वर, जेपी सिंह, संतोष शुक्ला, केएल यादव, आनन्द मिश्र, गजेन्द्र पाण्डेय, एलजे सिंह, रमेश चन्द्र त्रिपाठी व डॉ0 मधुकर सिंह सहित कई वरिष्ठ पत्रकार, अधिवक्ता व नगर के गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

बांझ अदालतें

मैं 2004 से एक बुजुर्ग महिला का मुकदमा लड़ रहा हूँ। उनके पति ने अपने पुश्तैनी मकान में रहते हुए एक और मकान बनाया था। उसे एक फर्म को किराए पर दे दिया। फिर फर्म के एक पार्टनर के भतीजे ने उसी नाम से एक फर्म और रजिस्टर करवा ली। मूल फर्म तो शहर से कारोबार समेट कर चल दी और भतीजा उस मकान में पुरानी फर्म का साइन बोर्ड लगा कर नई फर्म का कारोबार करता रहा।

महिला ने मकान खाली करने को कहा तो भतीजे ने खाली करने से मना कर दिया। महिला की उम्र 73 वर्ष की थी और बीमार रहती थी तो उस ने अपने बेटे को मुख्तार आम बनाया हुआ था वही मुकदमे को देखता था। मुकदमे में 2010 में निर्णय हुआ और मकान खाली करने का निर्णय हो गया। तब तक महिला की उम्र अस्सी के करीब हो गई।

उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ नागरिकों के मुकदमे वरीयता से निपटाने का स्थाई निर्देश दे रखा है लेकिन इसके बावजूद प्रक्रिया की तलवार का लाभ उठाने में कोई भी वकील नहीं चूकता। पेशी पर कोई न कोई बिना किसी आधार के कोई न कोई आवेदन प्रस्तुत होता।  मैं तुरन्त उसी वक्त उस उत्तर देता। तब भी बहस के लिए अगली तिथि दे दी जाती। आदेश होने पर उच्च न्यायालय में उस की रिट कर दी जाती। इसी तरह तीन वर्ष गुजर गए।

महिला का पुत्र नरेश इतना मेहनती कि वह हर पेशी के पहले मेरे दफ्तर आता मुकदमें की तैयारी करवाता और पेशी के दिन सुबह अदालत खुलते ही अदालत में उपस्थित रहता। आज उसी मुकदमे में पेशी थी और हम सोचते थे कि आज बहस सुन ली जाएगी। मुझे कल रात देर तक नींद नहीं आई। सुबह उठा तो निद्रालू था। मैं प्रातः भ्रमण निरस्त कर एक घंटा और सोया। फिर भी तैयार होते होते मुझे देरी हो गई।  मैं नौ बजे अदालत पहुँचा और जाते ही अपने सहायकों और क्लर्क से पूछा कि नरेशआया क्या? लेकिन उन्हों ने मना कर दिया। मुझे आश्चर्य था कि आज उस का फोन भी न आया, जब कि वह इतनी देर में तो चार बार मुझे फोन कर चुका होता। मैं ने तुरंत उसे फोन किया। फोन उस की बेटी ने उठाया। मैं ने पूछा नरेश कहाँ है। बेटी ने पूछा – आप कौन अंकल? मैं ने अपना नाम बताया तो वह तुरन्त पहचान गई और रुआँसी आवाज में बोली कि पापा जी को तो कल रात हार्ट अटैक हुआ और वे नहीं रहे।

मैं जब अदालत के इजलास में पहुँचा तो आज विपक्षी और उन के वकील पहले से उपस्थित थे। जब कि आज से पहले कभी भी वे अदालत द्वारा तीन चार बार पुकारे जाने पर भी नहीं आते थे। मैं ने अदालत को कहा कि बहस सुन ली जाए। तब विपक्षी ने तुरन्त कहा कि आज बहस कैसे होगी नरेश का तो कल रात देहान्त हो गया है। मैं ने उन्हें कहा कि नरेश इस प्रकरण में पक्षकार नहीं है उस की मृत्यु से यह मुकदमा प्रभावित नहीं होता इस कारण से बहस सुन ली जाए। लेकिन न्यायाधीश ने कहा कि केवल कल कल ही न्यायालय और खुले हैं उस के बाद एक माह के लिए अवकाश हो जाएगा। मैं निर्णय नहीं लिखा सकूंगा। इस लिए जुलाई में ही रख लेते हैं।  

मैंने विपक्षी उन के वकीलों को उन के द्वारा मेरी पक्षकार के पुत्र की मृत्यु के आधार पर पेशी बदलने पर बहुत लताड़ा लेकिन वे अप्रभावित रहे। न्यायालय को भी कहा कि वह प्रथम दृष्टया बेबुनियाद आवेदनों की सुनवाई के लिए भी समय देता है जिस के नतीजे में मुकदमों का निस्तारण नहीं होता और न्यायार्थी इसी तरह न्यायालयों के चक्कर काटते काटते दुनिया छोड़ जाते हैं। लेकिन न तो इस का प्रतिपक्षी और उन के वकीलों पर इस का कोई असर था और न ही अदालत पर। मुकदमे में दो माह आगे की पेशी दे दी गई।   

आज से 34 बरस पहले जब मैं वकालत के पेशे में आया था तो सोचा था मेरा पेशा उन लोगों को न्याय दिलाने में मदद करने का है जो समाज के अन्याय से त्रस्त हैं। जब भी मैं किसी व्यक्ति को अपनी मदद से न्याय प्राप्त करने में सफल होते देखता तो प्रसन्न हो जाता था। लेकिन इन 34 बरसों में न्याय की यह दुनिया इतनी बदल चुकी है कि अदालतों पर काम का चार गुना बोझा है। कोई न्यायाधीश न्याय करना भी चाहे तो समय पर नहीं कर सकता। जब वह कर पाता है तब तक न्यायार्थी

दिनेशराय द्विवेदी
दिनेशराय द्विवेदी
दुनिया छोड़ चुका होता है या फिर उस की कमर टूट चुकी होती है। अब तो एक नए न्यायार्थी के मेरे पास आते ही यह सोचना पड़ता है कि इसे क्या कहा जाए। मैं आकलन करता हूँ तो अधिकांश मामलों में पाता हूँ कि न्याय प्राप्त करने में इसे जितने कष्ट न्यायार्थी को उठाने पड़ेंगे उस से तो अच्छा यह है कि वह इन बांझ अदालतों से न्याय की आस ही न लगाए।     

लेखक दिनेशराय द्विवेदी वर्ष 1978 से वकालत के पेशे में हैं. साहित्य, कानून, समाज, पठन, सामाजिक संगठन, लेखन, साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि है. उनका यह लिखा उनके ब्लाग अनवरत से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

नभाटा ने इवेंट का विरोध किया और टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने तवज्‍जो दी

: टाइम्स समूह के प्रकाशनों की विपरीत राय का एक और उदाहरण : भड़ास पर “क्‍या टाइम्‍स समूह में सचमुच ऐसा ही होता है” पढ़कर धर्मयुग से प्रभात खबर, नवभारत टाइम्स, पटना, ब्रिटिश उच्चायोग, नई दिल्ली, नवभारत टाइम्स, जयपुर (स्थानीय संपादक) होते हुए दैनिक हिन्दुस्तान, पटना से रिटायर होकर रांची में रह रहे विजय भास्कर की पुस्तक की याद आई। “बिहार में पत्रकारिता का इतिहास” नामक उनकी पुस्तक प्रभात प्रकाशन से इसी साल आई है। इसमें बिहार के साथ-साथ झारखंड की पत्रकारिता के इतिहास का अच्छा वर्णन है।

नवभारत टाइम्स का जब पटना से प्रकाशन शुरू हुआ था जो विजय भास्कर प्रभात खबर छोड़कर नवभारत टाइम्स से जुड़ गए थे। और पुस्तक में पटना से नवभारत टाइम्स शुरू होने से बंद होने तक की घटनाओं का जिक्र है। कुछ अंश यहां पेश कर रहा हूं। सबसे पहले, “क्‍या टाइम्‍स समूह में सचमुच ऐसा ही होता है” से संबंधित है।    

पुस्तक के 19वें अध्याय “दिग्गजों का शंखनाद” में विजय जी ने लिखा है, “नवभारत टाइम्स पटना के पहले संपादक बने दीना नाथ मिश्र जो इससे पूर्व नवभारत टाइम्स, जयपुर में समाचार संपादक थे। टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना के संपादक बने जनक सिंह। दीनानाथ मिश्र ने अपने अखबार में कई एक्टिविस्टों को भी जगह दी। फ्रेजर रोड के ऑफिस में टाइम्स के अन्य संस्थानों की तरह एक ही फ्लोर पर दोनों अखबारों संपादकीय के कार्यालय थे। वरिष्ठ कर्मियों में यहां अरुण रंजन, विजय भास्कर, सुकांत नागार्जुन और इंद्रजीत ने ज्वायन किया। श्रीचंद, मिथिलेश, नीलाभ मिश्र, इंदु भारती, किरण शाहीन, वेद वाजपेयी जैसी कई प्रतिभाओं ने अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया। मणिमाला, नवेन्दु, किरण आदि ऐसे रिपोर्टर थे जिन्होंने अपनी काबिलियत की छाप छोड़ी। ‘ऐक्टिविज्म’ का हाल ये था कि शायद पहली बार जब ‘मिस पटना’ का आयोजन हुआ तब नभाटा की किरण शाहीन और दूसरे नभाटाकर्मियों ने जमकर इसका प्रतिरोध किया और ये प्रतिरोध एक समय पर पूरे शहर का प्रतिरोध बन गया। दूसरी ओर, टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस इवेंट को तवज्जो दी और इसे अच्छी तरह कवर भी किया। दोनों अखबार अपनी एक स्वतंत्र और अलग पहचान बना रहे थे।”

नवभारत टाइम्स का प्रकाशन बिहार (पटना) से क्यों शुरू किया गया। इससे संबंधित दिलचस्प जानकारी पुस्तक के इसी अध्याय में है। विजय जी ने लिखा है, “1986 में पटना से नवभारत टाइम्स शुरू होने से पहले कई दिनों तक कार्यशाला चली थी। उस कार्यशाला में टाइम्स ऑफ इंडिया, नई दिल्ली के महाप्रबंधक बलजीत कपूर से जब यह पूछा गया कि आपने बिहार क्यों आना चाहा? तो उन्होंने एक छोटी सी घटना का जिक्र किया, 6-7 साल पहले की बात होगी। मैं दिल्ली से हावड़ा जाते हुए पटना जंक्शन पर उतरा और एएच व्हीलर के स्टॉल की ओर बढ़ गया (उस समय टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाशन रेलवे स्टॉलों पर बड़ी जरूरत हुआ करते थे। उनके प्रकाशन हर सेक्टर का प्रतिनिधित्व करते थे) मैं अपनी कुछ सेल्स की जानकारी के लिहाज से पत्रिकाओं का उलट पलट कर देख रहा था। एक आदमी जो थोड़े मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटा था, मेरी ओर बढ़ता दिखा तो मैं अपनी जगह से थोड़ा और खिसक गया क्योंकि मुझे लगा कि वह मुझसे कुछ पैसे मांगेगा। पर मेरी ओर देखे बिना वह आगे बढ़ा और अपनी धोती की गांठ से अठन्नी निकालकर उसने स्टॉल वाले को दिया और कहा कि एक दिनमान दीजिए। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए अवाक कर देने वाला क्षण था और तभी मैंने सोच लिया था जहां ऐसे लोग खरीद कर पत्रिकाएं पढ़ सकते हैं वहां किसी न किसी दिन तो हमें आना ही है।”

पुस्तक में अगर टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के बिहार आने और उसकी स्वतंत्र पत्रकारिता का जिक्र है तो 15वें अध्याय “धनबाद पत्रकार उत्पीड़न कांड” में नवभारत टाइम्स के कार्यालय संवाददाता अशोक वर्मा की पिटाई और उसके संबंधित घटना का पूरा विवरण विस्तार से दिया गया है और यह भी कि इस मामले में नवभारत टाइम्स के पटना संवाददाता उर्मिलेश और रविवार के पटना संवाददाता जयशंकर गुप्त धनबाद गए थे और उपायुक्त से मिलकर अशोक वर्मा को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। यह अलग बात है कि प्रशासन ने इसपर ध्यान नहीं दिया और अशोक वर्मा को धनबाद छोड़ना पड़ा था। पत्रकारों के खिलाफ मनमानी करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई आदि। इसी क्रम में बिहार के उस समय के मुख्यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र के मशहूर बिहार प्रेस बिल का भी जिक्र है।

कुल मिलाकर, बिहार में पत्रकारिता का इतिहास पिछले 20-25 वर्ष के इतिहास का भी बयान करता है जो दिलचस्प होने के साथ-साथ पत्रकारिता, प्रकाशन और पत्रकारों में हो रहे बदलावों का भी आकलन करता है। चूंकि लेखक इसी अवधि में पत्रकारिता में रहे हैं और बड़े पदों पर रहे हैं इसलिए जानकारियां सही और अधिकृत किस्म की हैं और जहां जरूरत पड़ी है, उन्होंने दूसरे जानकारों का भी सहयोग लिया है।

बिहार (और झारखंड) की पत्रकारिता की चर्चा प्रभात खबर की चर्चा के बगैर अधूरी होगी। लेखक प्रभात खबर की शुरुआती टीम में थे और सब कुछ को काफी करीब से देखा और वर्णन किया है। प्रभात खबर के संस्थापक, संपादक और स्वामियों में से एक एसएन विनोद से भड़ास4 मीडिया की बातचीत के एक अंश को भी पुस्तक में साभार उद्धृत किया गया है।

संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्व-उद्यमी हैं. वे लंबे समय तक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जनसत्ता में वरिष्ठ पद पर रहे. उसके बाद उन्होंने अनुवाद की अपनी कंपनी प्रारंभ किया और लंबे समय से स्व-रोजगार के जरिए दिल्ली-एनसीआर में शान से रह रहे हैं. वे समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर बेबाक लेखन अखबारों, वेब, ब्लाग आदि पर करते रहते हैं. उनसे संपर्क  anuvaadmail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. संजयजी  www.prachaarak.com नामक वेबसाइट का संचालन भी करते हैं.

जब अन्याय और अत्याचार चरम पर पहुंचता है तो नक्सलवाद जन्मता है!

छत्तीसगढ में नक्सलियों के हमले में अनेक निर्दोष लोगों सहित वरिष्ठ कॉंग्रेसी नेताओं के मारे जाने के बाद देशभर में एक बार फिर से नक्सलवाद को लेकर गरमागर्म चर्चा जारी है। यह अलग बात है कि नक्सलवादियों द्वारा पिछले कई वर्षों से लगातार निर्दोष लोगों की हत्याएँ की जाती रही हैं, लेकिन इस बारे में छोटी-मोटी खबर छपकर रह जाती हैं। हाल ही में छत्तीसगढ में नक्सलियों द्वारा किये गये कत्लेआम से सारे देश में दहशत का माहौल है, जिस पर समाचार-पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशियल मीडिया में अनेक दृष्टिकोणों से चर्चा-परिचर्चा और बहस-मुबाहिसे लगातार जारी हैं। कोई नक्सलियों को उड़ा देने की बात कर रहा है तो कोई नक्सलवाद के लिये सरकार की कुनीतियों को जिम्मेदार बतला रहा है।

इसके साथ-साथ घटना के तीन दिन बाद इस बारे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी की ओर से मीडिया को जारी प्रेस नोट में स्वीकारा गया है कि 'दमन की नीतियों’ को लागू करने के लिए हमने कॉंग्रेस के बड़े नेताओं को निशाने पर लिया है। लेकिन साथ ही हमले में कॉंग्रेस के छोटे कार्यकर्ताओं और गाड़ियों के ड्राइवरों व खलासियों के मारे जाने पर खेद भी जताया। माओवादी संगठन की ओर से जारी चार पेज के प्रेस नोट में कहा गया है, 'दमन की नीतियों को लागू करने में कॉंग्रेस और बीजेपी समान रूप से जिम्मेदार रही हैं और इसलिए कॉंग्रेस के बड़े नेताओं पर हमला किया।’

कॉंग्रेस के बड़े नेताओं को मारे जाने को सही ठहराते हुए गुड्सा उसेंडी ने कहा, 'राज्य के गृहमंत्री रह चुके छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल जनता पर दमनचक्र चलाने में आगे रहे थे। उन्हीं के समय में ही बस्तर इलाके में पहली बार अर्द्ध-सैनिक बलों की तैनाती की गई थी। यह भी किसी से छिपी हुई बात नहीं कि लंबे समय तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहकर गृह विभाग समेत अनेक अहम मंत्रालयों को संभालने वाले कॉंग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल भी आम जनता के दुश्मन हैं, जिन्होंने साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपति और जमींदारों के वफादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियों को बनाने और लागू करने में सक्रिय भागीदारी निभाई।’

उसेंडी ने कहा कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और कॉंग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के बीच नक्सवादियों के मामले में तालमेल का उदाहरण सिर्फ इस बात से ही समझा जा सकता है कि मीडिया में कर्मा को रमन मंत्रिमंडल का 16वां मंत्री कहा जाने लगा था। सलवा जुडूम की चर्चा करते हुए प्रेस नोट में कहा गया है कि 'बस्तर में जो तबाही मची, क्रूरता बरती गई, इतिहास में ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे।’ प्रेस नोट में आरोप है कि कर्मा का परिवार भूस्वामी होने के साथ-साथ आदिवासियों का अमानवीय शोषक और उत्पीड़क रहा है।

बयान में साफ शब्दों में आरोप लगाया गया है कि सलवा जुडूम के दौरान सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। उसेंडी का कहना है कि इस कार्रवाई के जरिए एक हजार से ज्यादा आदिवासियों की मौत का बदला लिया गया है, जिनकी सलवा जुडूम के गुंडों और सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों हत्या हुई थी।

इस बयान ने प्रशासन और सरकार के साथ-साथ भाजपा एवं कॉंग्रेसी राजनेताओं की मिलीभगत की हकीकत भी सामने ला दी है। संकेत बहुत साफ हैं कि यदि सरकार या प्रशासन इंसाफ के बजाय दमन की नीतियों को अपनाएंगे तो नतीजे ऐसे ही सामने आयेंगे। इसलिये केवल नक्सलवादियों के मामले में ही नहीं, बल्कि हर एक क्षेत्र में सरकार और प्रशासन के लिये यह घटना एक सबक की तरह है। जिससे सीखना चाहिये कि लगातार अन्याय को सहना किसी भी समूह के लिये असंभव है। जब अन्याय और अत्याचार चर्म पर पहुँच जाते हैं तो फिर इस प्रकार के अमानवीय दृश्य नजर आते हैं।

हमें नहीं भूलना चाहिये कि महाराष्ट्र के एक गांव में एक आततायी द्वारा कई दर्जन महिलाओं के साथ जबरन बलात्कार किया जाता रहा। पुलिस कुछ करने के बजाय बलात्कारी का समर्थन करती रही। अन्तत: एक दिन सारे गॉंव की महिलाओं ने मिलकर उस बलात्कारी को पीट-पीट कर मार डाला। इस प्रकार की घटनाएँ आये दिन अनेक क्षेत्रों में सामने आती रहती हैं। इसी प्रकार की अनेकों घटनाओं को एक साथ मिला दिया जाये या बहुत सारे लोगों के सामूहिक और लम्बे अन्याय और अत्याचार को एक करके देखें और उसके सामूहिक विरोध की तस्वीर बनाएं तो स्वत: ही नक्सवाद नजर आने लगेगा।

दु:ख तो ये है कि नक्सलवाद और नक्सवादियों का क्रूर चेहरा तो मीडिया की आँखों से सबको नजर आता है, लेकिन दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों और मजलूमों के साथ हजारों सालों से लागातार जारी शोषण और भेदभाव न तो मीडिया के लिये प्राथमिकता सूची में है और न हीं आम जनता के लिये ऐसे विषय रोचक हैं। सनसनी पैदा करने वाली बातें और घटनाएँ सबकों चौंकाती हैं। इसलिये शहीद-ए-आजम भगत सिंह से लेकर आज के नक्सलवादी और आतंकवादी सनसनी पैदा करके अपनी समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये बड़ी घटनाओं को जन्म देते रहे हैं। ये अलग बात है कि आज के आतंकी और नक्सलवादी भगत सिंह जैसा देशभक्ति का जज्बा नहीं रखते।

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीना 'निरंकुश होम्योपैथ चिकित्सक हैं. फेमली काउंसलर हैं. प्रेसपालिका (पाक्षिक) के संपादक हैं. नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास). संगठित षड़यंत्र के चलते जिला जज ने इन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई. चार वर्ष से अधिक समय चार-जेलों में व्यतीत किया. हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त/निर्दोष ठहराया। संपर्क- 085619-55619, 098285-02666

पत्रकारिता दिवस पर सम्‍मानित किए गए वयोवृद्ध पत्रकार गिरिजा शंकर शुक्‍ल

बाराबंकी। हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर गुरुवार को जिले के वयोवृद्ध पत्रकार गिरिजा शंकर शुक्ल को पत्रकारों द्वारा सम्मानित किया गया और इस सम्मान के दौरान श्री शुक्ल ने जिले की पत्रकारिता से जुड़े संस्मरणों से पत्रकारों को रूबरू कराया।

जिले से 1920 में पहला हिन्दी सप्ताहिक देशबन्धु प्रकाशित हुआ जिसके सम्पादक पण्डित बद्री प्रसाद शुक्ल थे और यह अखबार छह माह तक चला और उसके बाद अंग्रेजी शासकों द्वारा इसे जब्त कर लिया गया। जिले में हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत 1920 में शुरू हुई थी। 1948 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. चन्द्रभूषण शुक्ला द्वारा मातृभूमि हिन्दी सप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया गया और जो कुछ वर्षों तक चलने के बाद बंद हो गया।

वरिष्ठ पत्रकार गिरिजाशंकर शुक्ल ने 1952 में विश्ववाणी हिन्दी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया जो लम्बे समय तक लोगों को पठनीय सामग्री उपलब्ध कराता रहा। पं गिरिजाशंकर शुक्ल का जन्म 1928 में हुआ था। आज वह 86 वर्ष के है। श्री शुक्ल को सम्मानित करने वालों में रिजवान मुस्तफा, प्रदीप सारंग, कृष्ण कुमार द्विवेदी राजू भैया, हरि प्रसाद वर्मा, सरवर अली, आरबी सिंह, दीपक मिश्रा, अतुल वर्मा, अरूण कुमार प्रमुख रूप से शामिल थे।

राजीव शुक्ला की ‘मैनेजरी’ गड़बड़ाई, मंत्री पद छिनेगा!

राजीव शुक्ला से कांग्रेस आलाकमान आईपीएल विवाद के चलते नाराज़ है जिसकी वजह से उन्हें संसदीय कार्य राज्यमंत्री के पद से हटाया जा सकता है. अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ के हवाले से खबर है कि स्पॉट फिक्सिंग के मामले को लेकर राहुल गांधी और सोनिया गांधी राजीव शुक्ला से नाराज़ हैं. वहीं दूसरी और राजीव शुक्ला ने सफाई देते हुए कहा कि इंडियन प्रीमियर लीग में स्पॉट फिक्सिंग और अन्य विवादों के चलते वह दोबारा इस पद को स्वीकार नहीं करेंगे.

स्पॉट फिक्सिंग प्रकरण और आईपीएल से जुड़े अन्य विवादों से निराश राजीव शुक्ला ने कहा कि वह दोबारा इस पद को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हैं. शुक्ला ने बुधवार को कहा कि उनका कार्यकाल शुरुआत में एक साल के लिए था जिसका प्रत्येक वर्ष नवीनीकरण किया जाना था.  उन्होंने कहा, ‘‘मुझे बीसीसीआई में किसी पद की लालसा नहीं है, मेरा काम मैचों का आयोजन था और मैच काफी अच्छी तरह आयोजित हुए. विवादों के बावजूद स्टेडियम खचाखच भरे थे.’’

सूत्रों के मुताबिक आईपीएल में चल रहे स्पॉट फिक्सिंग विवाद के कारण संसदीय कार्यमंत्री और आईपीएल के चैयरमैन राजीव शुक्ला मुश्किल में पड़ सकते हैं. आनेवाले समय में उनपर गाज गिर सकती है. सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस विवाद से नाखुश है और आने वाले समय में केन्द्रीय मंत्री राजीव शुक्ला से उनकी कुर्सी छीनी जा सकती है. गौरतलब है कि राजीव शुक्ल आईपीएल के चैयरमैन हैं और स्पॉट फिक्सिंग मामले के चलते उनकी पार्टी की छवि पर असर पड़ रहा है.

श्रीनिवासन होंगे सरकारी कोप के शिकार, राजीव शुक्ला की दिक्कतें बढ़ने लगी

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के प्रमुख एन. श्रीनिवासन अब किसी वक्त केंद्र सरकार के कुछ ‘बड़ों’ की नाराजगी का शिकार बन सकते हैं। आईपीएल मैचों में स्पॉट फिक्सिंग के मुद्दे पर विवाद बढ़ गया है। फिक्सिंग के चक्कर में श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन्न शिकंजे में पहले ही आ गए हैं। गिरफ्तारी के बाद वे इन दिनों पुलिस रिमांड में हैं।

पूछताछ के दौरान ‘दामाद जी’ ने क्रिकेट सट्टेबाजी को लेकर कई बड़े खुलासे कर दिए हैं। उन्होंने यह राज भी उगल दिया है कि वे चेन्नई आईपीएल टीम की अंदरूनी रणनीति को मुकाबले के पहले ही सट्टेबाजों तक पहुंचा देते थे। इसी में करोड़ों रुपए का खेल चुटकी बजाते हो जाता था। स्पॉट फिक्सिंग के चक्कर में श्रीशांत सहित कई क्रिकेटर जांच घेरे में आ चुके हैं। मयप्पन्न के चक्कर में फिक्सिंग की ‘पाप’ कथा में श्रीनिवासन भी एक किरदार बन गए हैं। ऐसे में, उन पर बीसीसीआई की कुर्सी छोड़ने का दबाव बढ़ा है। फिर भी, वे लगातार अड़ियल रुख अपनाए हुए हैं।

आईपीएल सीजन-6 के मैच पिछले दिनों ही पूरे हुए हैं। लेकिन, ये सभी मैच शक के घेरे में आ गए हैं। चर्चा तो यहां तक हो रही है कि आईपीएल-4 और आईपीएल-5 के ज्यादातर मैच फिक्सिंग के शिकार बने थे। इनमें कई खिलाड़ियों की हिस्सेदारी भी रही है। इसी लिए मांग हो रही है कि क्रिकेट की इस ‘पाप’ कथा की मुकम्मल जांच सीबीआई से कराई जाए। ऐसी सूरत में ही पता चल पाएगा कि भारतीय क्रिकेट किस हद तक फिक्सिंग की बीमारी का शिकार हो चुका है? मयप्पन्न की गिरफ्तारी मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने की है। मयप्पन्न, चेन्नई सुपर किंग्स आईपीएल टीम के मालिकों में से एक हैं। इस टीम में श्रीनिवासन की कंपनी ‘इंडिया सीमेंट लिमेटेड’ की भी बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में, श्रीनिवासन की भूमिका भी घेरे में है। आरोप है कि उन्होंने ‘दामाद जी’ को फायदा पहुंचाने के लिए बीसीसीआई के तमाम नियमों में फेरबदल भी कराए हैं।

इन्हीं आरोपों को लेकर उनके इस्तीफे की मांग ने अब जोर पकड़ लिया है। पहले तो श्रीनिवासन लगातार यही तर्क दे रहे थे कि बीसीसीआई का पूरा विश्वास उनमें बना हुआ है। ऐसे में, वे किसी बाहरी दबाव में नहीं आने वाले। शुरुआती दौर में बीसीसीआई के राजीव शुक्ला और अरुण जेटली जैसे दिग्गजों ने खुलकर श्रीनिवासन के पक्ष में पैरवी भी की थी। लेकिन, जब श्रीनिवासन फिक्सिंग के दलदल में ज्यादा फंसते नजर आए, तो बीसीसीआई के अंदर भी दरार पड़नी शुरू हुई। मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के प्रमुख एवं केंद्रीय राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खुलकर श्रीनिवासन से इस्तीफे की मांग की थी। सिंधिया की पहल पर श्रीनिवासन ने ठेंगा दिखाने की कोशिश की थी।

इस बीच फिक्सिंग के मामले की पड़ताल के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे केंद्र सरकार की छवि पर भी आंच आती नजर आई। क्योंकि, मुंबई और दिल्ली पुलिस की जांच में यह खुलासा हुआ कि केंद्र सरकार में ऊंची पहुंच के चलते क्रिकेट में फिक्सिंग का गोरखधंधा सालों से फला-फूला है। लेकिन, कोई इसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पाया। क्योंकि, कई प्रदेशों की क्रिकेट एसोसिएशन के प्रमुख दिग्गज नेता हैं। कुछ कांग्रेस के हैं, तो कुछ भाजपा के भी हैं। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार वैसे भी कई घोटालों की चर्चा से बदनाम होती आ रही है। ऐसे में, रणनीतिकार नहीं चाहते कि क्रिकेट की कलंक कथा भी सरकार की किसी भूमिका से जुड़ जाए। क्योंकि, देश के करोड़ों-करोड़ लोग क्रिकेट के दीवाने हैं। उन्हें स्पॉट फिक्सिंग के खुलासे से धक्का लगा है। ऐसे में, सरकार जल्द से जल्द यह संदेश देना चाहती है कि वह सट्टेबाजों को कोई रियायत नहीं देने जा रही। भले, उनकी राजनीतिक पहुंच कितनी ही बड़ी हो?

स्पॉट फिक्सिंग के मामले में नामी क्रिकेटर श्रीशांत के अलावा राजस्थान रॉयल्स आईपीएल टीम के दो अन्य खिलाड़ी अंकित चव्हाण और अजित चंदीला भी गिरफ्तार हो चुके हैं। इनसे लगातार पूछताछ हो रही है। इसी सिलसिले में फिल्म   अभिनेता विंदु दारा सिंह से भी पूछताछ हो रही है। वे भी गिरफ्तार हो चुके हैं। विंदु ने पुलिस के सामने कई अहम खुलासे किए हैं। जानकारी दी है कि सालों से आईपीएल मैचों में स्पॉट फिक्सिंग का गोरखधंधा चल रहा था। इसके तार दुबई और कराची में बैठे ‘अंडरवर्ल्ड’ तक फैले हैं। क्रिकेटरों को लुभाने के लिए मोटी रकम के साथ सुरा और सुंदरियों का भी जमकर इस्तेमाल किया जाता रहा है। पुलिस को यह जानकारी भी मिल गई है कि इस खेल में बॉलीवुड के कुछ और लोग भी शामिल रहे हैं।

चेन्नई आईपीएल टीम के मालिक मयप्पन्न के पूरे ‘खेल’ में श्रीनिवासन को कोई जानकारी न रही हो, इस पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा है। आईपीएल के कमिश्नर राजीव शुक्ला ने भी अब अपनी रणनीति बदल दी है। वे कह रहे हैं कि मामले की जांच तक श्रीनिवासन को बीसीसीआई के कामकाज से दूर रहना चाहिए। बीसीसीआई के उपाध्यक्ष एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने भी श्रीनिवासन को इस्तीफा देने के लिए राजी करने की कोशिश की थी। लेकिन, श्रीनिवासन नहीं माने। बीसीसीआई के पूर्व प्रमुख एवं वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने भी श्रीनिवासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने कह दिया है कि श्रीनिवासन को दामाद की गिरफ्तारी के तुरंत बाद इस्तीफा दे देना चाहिए था। उनके अड़ियलपन से बीसीसीआई की साख काफी गिर रही है। जिस तरह से आईपीएल मैच शक के घेरे में आ गए हैं, ऐेसे में जरूरी है कि सभी मैचों की पड़ताल सीबीआई से कराई जाए।

हालांकि, बीसीसीआई ने स्पॉट फिक्सिंग के मामले की पड़ताल के लिए एक तीन सदस्यीय जांच समिति बना दी है। इसके दो सदस्य हाईकोर्ट के रिटायर जज हैं। श्रीनिवासन, यही तर्क दे रहे हैं कि पड़ताल के मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है। ऐसे में, जांच रिपोर्ट आने के पहले वे इस्तीफा क्यों दें? जांच समिति में हाईकोर्ट के जो रिटायर जज शामिल किए गए हैं, उन दोनों का ताल्लुक तमिलनाडु से है। ऐसे में, जांच समिति की निष्पक्षता पर भी कई सवाल खड़े किए जाने लगे हैं।

जदयू के प्रमुख शरद यादव पहले से ही कहते आए हैं कि गोरखधंधे वाले इस आईपीएल पर ही प्रतिबंध लगाना जरूरी हो गया है। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि क्या श्रीनिवासन सरकार से भी बड़े हो गए हैं? श्रीनिवासन के मामले में कांग्रेस नेतृत्व ने भी खुलकर अपनी नाराजगी के तेवर दिखा दिए हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने भी कह दिया है कि श्रीनिवासन को इस्तीफा देना चाहिए। क्योंकि, सवाल क्रिकेट की साख का है। केंद्रीय मंत्री हरीश रावत ने इस बात पर हैरानी जताई है कि शक सुई इतनी घूमने के बावजूद श्रीनिवासन अपनी कुर्सी पर कैसे बने हुए हैं? जब कांग्रेस नेतृत्व ने नाराजगी के तेवर दिखाए, तो कई राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशनों ने श्रीनिवासन से इस्तीफा मांगना शुरू किया है। गोवा क्रिकेट एसोसिएशन के वी पी शेखर कहते हैं कि श्रीनिवासन के तर्कों में दम नहीं है। उनके रुख से बीसीसीआई की साख कमजोर हो रही है। त्रिपुरा क्रिकेट एसोसिएशन के महासचिव अरविंदम गांगुली ने भी कहा है कि श्रीनिवासन अपनी कुर्सी के चक्कर में क्रिकेट को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं। बीसीसीआई के कई पूर्व पदाधिकारियों ने भी श्रीनिवासन के खिलाफ हल्ला बोलना शुरू कर दिया है।

इस विवाद के चलते आईपीएल कमिश्नर राजीव शुक्ला की दिक्कतें भी बढ़ने लगी हैं। क्रिकेट से जुड़े कई विशेषज्ञों ने कहना शुरू कर दिया है कि आईपीएल कमिश्नर राजीव शुक्ला को नैतिक आधार पर खुद इस्तीफा दे देना चाहिए। परेशान होकर शुक्ला ने कह दिया है कि वे आगे से आईपीएल की कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहेंगे। बीसीसीआई सूत्रों के अनुसार, जल्द ही श्रीनिवासन को बाहर करने के लिए एक कार्य योजना तैयार की जा रही है। यदि श्रीनिवासन ने अपना फैसला नहीं बदला, तो उनकी कंपनी ‘इंडिया सीमेंट लिमेटेड’ भी दिक्कत में पड़ सकती है। उल्लेखनीय है कि श्रीनिवासन इस बड़ी कंपनी के प्रबंध निदेशक हैं। सरकार की नाराजगी उनके ‘कारोबार’ के लिए महंगी पड़ सकती है। अब देखना है कि इन संकेतों के बावजूद श्रीनिवासन क्या करते हैं?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

कम से कम आप तो वादा कर लें कि आज से तंबाकू का सेवन नहीं

दोस्तों, आज विश्व तम्बाकू निषेध दिवस है. हम इस तथ्य  के प्रत्यक्ष साक्षी है कि तम्बाकू हमारे स्वाथ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है. हमारे घर-परिवारों में जो भाई-बहिन या बुजुर्ग इस बुरी  लत के लती हैं वे या तो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो चुके हैं या फिर उनके आने वाले कल के लिए रोग उन्हें दस्तक दे रहे हैं. ये लत ऐसी है कि जिसे लग जाती है उसका पीछा फिर शरीर के साथ ही छूट पाता है. इस के इस्तेमाल से कैंसर, दांतों के रोग, मानसिक रोग अदि घातक रोग होना लाज़मी है. जो लोग तम्बाकू खाते हैं उनका या तो मुंह कम खुल पाता है या गालों के भीतरी सतह पर सफ़ेद दाग पड़ना और बीडी-सिगरेट के प्रयोग से फेफड़ों का कम काम कर पाना जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है. डाक्टरों द्वारा कहा तो यहां तक जाता है कि कैंसर के चालीस प्रतिशत रोगी तम्बाकू के कारण होते हैं.

इन गंभीर प्रभावों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 83 देशों ने इसके प्रयोग पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया है. क्या हमारी सरकार भारत को चौरासीवां देश घोषित नहीं कर सकती है जहां तम्बाकू और इसके उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबन्ध घोषित हो. पर वह ऐसा क्यों करें, उसे तो इसमें आनंद आता है कि पब्लिक ज्यादा से ज्यादा कष्ट सहे, वरना सरकार इसके उत्पादन (खेती) पर ही रोक क्यों नहीं लगा देती है जिससे न बांस रहेगा और न बांसुरी बजेगी. पर अगर ऐसा हुआ तो उसकी जेबें भरने के लिए नोट कहाँ से आयेंगे, पैसा पेड़ों पर तो लगता नहीं है (बकौल PM). उसे तो जनता की जान की कीमत पर ही उगाया जा सकता है.   

जो उत्पाद इतना घातक है, उसके सम्बन्ध में तो मेरा तो यहाँ तक कहना है कि अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर ही इसका उत्पादन निषेध होना चाहिए. यदि इसके उत्पादन से जेबें भरने के लिए कमाई के आलावा कोई लाभ हो तो उसे मैं जानना चाहता हूँ, जिसके आधार पर सरकार इसके उत्पादन पर रोक नहीं लगा रही है. भाई-बहिनों और मेरे बुजुर्गों, आप बुद्धि का प्रयोग करें और इस तम्बाकू के सेवन से किसी भी तरह पीछा छुड़ा लें, वरना यह आपका पीछा मौत को आपके निकट लाकर ही छोड़ेगी.

Mahesh Saxena

mahesh.swaroop@gmail.com

जनसंदेश टाइम्‍स, संतकबीर नगर के ब्‍यूरो प्रभारी बने राजकुमार तिवारी

: कौशलेंद्र को नहीं मिला पांच माह का वेतन : जयप्रकाश लंबी छुट्टी पर गए : जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर यूनिट के संतकबीरनगर जिले में हर माह ब्‍यूरो प्रभारी बदलने का खेल चल रहा है। अप्रैल माह में गोरखपुर यूनिट में कार्यरत मुकेश पाण्डेय को यहां का ब्‍यूरो प्रभारी बनाया गया था। लेकिन कार्यालय में बिजली और इंटरनेट की व्यवस्था नहीं थी। जिसको ठीक करने के लिए वह प्रबंधन पर बराबर दबाव बना रहे थे, लेकिन व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ। वहीं लगातार विज्ञापन का दबाव दिया जा रहा था। इससे खिन्न होकर उन्होंने अखबार से ही इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद संपादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने अखबार के लांचिंग के समय संतकबीरनगर जिले में सेकेण्डमैन रहे राजकुमार तिवारी को ब्‍यूरो प्रभारी बना दिया है, जो कार्यभार मिलते ही अपने पास से आफिस में इंटरनेट और बिजली के लिए इन्वर्टर की व्यवस्था करा चुके हैं। लेकिन यहां पर स्टाफ की कमी की परेशानी सामने खड़ा हो चुकी है। पहले से ही यहां पर टू प्लस वन का स्टाफ कार्य कर रहा था। लांचिंग के समय ब्‍यूरो प्रभारी रहे जयप्रकाश ओझा के बारे में बताया जा रहा है, कि वह संपादक के व्यवहार के चलते लंबी छुट्टी पर चले गए हैं। वहीं यहां पर कार्यरत एक और रिपोर्टर कौशलेन्द्र कुमार राय के बारे में बताया जा रहा है कि पिछले पांच माह से उनको वेतन नहीं दिया गया है। इससे वह खासे नाराज चल रहे हैं।

कहा तो जा रहा है कि वेतन की मांग को लेकर वह संपादक को अब तक आधा दर्जन मेल भी कर चुके हैं। लेकिन संपादक ने उनके मेल का भी कोई जवाब नहीं दिया। सूत्र बता रहे हैं कि कौशलेन्द्र कुमार राय ने नए ब्‍यूरो प्रभारी को बता दिया है कि यदि शीघ्र ही वेतन नहीं मिला तो कामकाज ठप कर देंगे। वहीं कौशलेन्द्र कुमार राय के इस निर्णय से नए ब्‍यूरो प्रभारी के सामने खबरों को लेकर ही संकट खड़ा हो सकता है। क्योंकि अगले माह में ही अखबार प्रबंधन की तरफ से वेतन के लिए विज्ञापन का दबाव बनाएगा। तो उसे पूरा करने के लिए स्टाफ की जरूरत ही पड़ेगी। यह कैसे पूरा होगा वह तो आने वाला समय ही बताएगा।

अजीत सिंह का जन जन जागरण से इस्‍तीफा, हिंदुस्‍तान में सफी आजमी का तबादला

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भापोल से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र जन जन जागरण में शुरुआत से काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अजीत सिंह ने जन जन जागरण को अलविदा कह दिया है। अजीत सिंह की गिनती प्रदेश के वरिष्ठ और योग्य पत्रकारों में की जाती है। इसके पहले वे दैनिक भाष्कर, दैनिक जागरण और पत्रिका तथा पीपुल्स समाचार, प्रभात खबर में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं।

बताया जाता है कि अजीत सिंह अपने काम और सिद्धांतों से किसी प्रकार का समझौता करना पसंद नहीं करते हैं। वे काफी दिनों अखबार में प्रबंधन के हस्तक्षेप के चलते खुद को असहज महसूस कर रहे थे, लेकिन मालिक के स्वभाव और संबंधों के कारण कोई निर्णय नहीं ले पा रहे थे, लेकिन अंतत: उन्होंने जन जन जागरण को अलविदा कह दिया।

हिंदुस्‍तान, गोरखपुर से खबर है कि सफी आजमी का तबादला लखनऊ के लिए कर दिया गया है। सफी सिटी इंचार्ज के रूप में कार्यरत थे। वे लंबे समय से हिंदस्‍तान से जुड़े हुए हैं। उन्‍हें लखनऊ में कौन सी जिम्‍मेदारी दी जाएगी इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है।

बिहार में हम पत्रकारों के मेन एडिटर तो आप ही हैं ना!

हिंदुस्‍तान से जुड़े कार्टूनिस्‍ट पवन हजारों-लाखों लोगों के फेवरेट हैं, लिहाजा उन्‍हें सिर्फ अपना फेवरेट बताना नाइंसाफी होगी. पवन अक्‍सर अपने कार्टूनों के सहारे इतनी बड़ी बातें कह जाते हैं, जिनको कहने की हिम्‍मत कलम से लिखने वाले सिपाहियों में नहीं होती है. बिहार में लंबे अरसे से सीएम नीतीश कुमार की भूमिका पर उंगली उठती रही है कि वे तमाम बड़े अखबारों को सरकार विज्ञापनों के जरिए नियंत्रित करते रहे हैं.

जो पत्रकार उन्‍हें पसंद नहीं आता उसे संस्‍थान से बाहर भी करवा देते हैं, इस तरह के तमाम आरोप भी नीतीश पर लगते रहते हैं. इन्‍हीं आरोपों, सच्‍चाइयों और गाशिपों को ध्‍यान में रखते हुए पवन ने बहुत ही बढि़या कार्टून बनाया है. आप भी देखिए, पढि़ए, आनंद लीजिए और पवन को बधाई दीजिए.

सुब्रत रॉय के विरोध के बाद भी श्रीनिवासन ने अपनाया अडि़यल रवैया

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के विवादित अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन अब खुलकर अड़ियल रवैया अपना रहे हैं। तमाम दबावों के बावजूद वे अपनी कुर्सी थामकर बैठे हुए हैं। अब यह संदेह बढ़ चला है कि क्रिकेट में स्पॉट फिक्सिंग का मायाजाल आईपीएल के कुछ मैचों तक ही सीमित नहीं रहा। इस गंदे खेल की जड़ें बहुत गहरी लगती हैं। स्पॉट फिक्सिंग के मामले में चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक गुरुनाथ मयप्पन्न पूरी तौर पर शक के घेरे में आ चुके हैं।

24 मई को उनकी गिरफ्तारी भी हो चुकी है। पूछताछ के दौरान मयप्पन्न ने मैच फिक्सिंग के मामले में कई खुलासे भी किए हैं। मयप्पन्न, बीसीसीआई के प्रमुख श्रीनिवासन के दामाद हैं। आरोप है कि वे क्रिकेट मैच की अंदरूनी रणनीति की जानकारी सट्टेबाजों को दे देते थे, ताकि करोड़ों रुपए की कमाई हो सके। स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में राजस्थान रॉयल्स आईपीएल टीम के एस. श्रीशांत सहित तीन खिलाड़ी धरे गए हैं। इस मामले में करीब दो दर्जन सट्टेबाज भी गिरफ्त में आ चुके हैं। सट्टेबाजी के इस नापाक खेल में मयप्पन्न की बड़ी भूमिका रही है। इसी से श्रीनिवासन के इस्तीफे का दबाव कई दिनों से है। लेकिन, श्रीनिवासन अपनी कुर्सी से हटने को तैयार नहीं हैं। जबकि, क्रिकेट के नामी प्रमोटर और सहारा कंपनी के प्रमुख सुब्रत रॉय सहारा, श्रीनिवासन के खिलाफ खुलकर सामने आ चुके हैं।

सुब्रत रॉय ने कह दिया है कि श्रीनिवासन की भूमिका के चलते भारतीय क्रिकेट की साख गिर रही है। इसके विरोध में उन्होंने क्रिकेट की स्पांसरशिप से हाथ खींच लेने की भी धमकी दी है। श्रीनिवासन के इस्तीफे के लिए बीसीसीआई के सदस्य एवं केंद्रीय राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी खुली पहल कर दी थी। अब केंद्रीय मंत्री एवं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार ने भी श्रीनिवासन के खिलाफ हुंकार भर दी है। चौतरफा घिर जाने के बाद भी श्रीनिवासन कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जिस क्रिकेट के लिए देश के करोड़ों लोग दिन-रात दीवाने रहते हों, उसका शीर्ष प्रबंधन यदि इतनी बेशर्मी के लिए तैयार है, तो सोचना होगा कि ‘बीमारी’ कहीं ज्यादा गंभीर है। महज, श्रीनिवासन की ‘सफाई’ से ही रोग दूर नहीं होने वाला।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

गिरते सर्कुलेशन से परेशान जागरण को वेंडिंग मशीनों का सहारा

जागरण प्रबंधन अपने समूह के प्रकाशनों की लगतार घटती संख्‍या से बुरी तरह परेशान है. पिछले आईआरएस सर्वे में जागरण समूह के दो अखबारों के तीन लाख के आसपास पाठक कम हो गए थे. यह समूह लगातार अपने पाठकों को खोता जा रहा है. इस स्थिति से निपटने के लिए जागरण प्रबंधन वैकल्पिक उपायों के जरिए अखबार का सर्कुलेशन बढ़ाने की कवायद कर रहा है. लंबे अरसे से जागरण समूह अपने हॉकरों का कमीशन भी सीमित कर रखा है, जिसके चलते भी उसके अखबार रद्दी बनते रहते हैं.

हाल में झांसी में भी दैनिक जागरण झांसी में भी इसी तरह की स्थिति से जूझ रहा है. हॉकरों के हड़ताल का असर अखबार के सर्कुलेशन पर पड़ रहा है. इन्‍हीं सब परेशानियों को देखते हुए जागरण समूह अब अपने अखबारों को वेंडिंग मशीन के जरिए बेचने का फैसला किया है. प्रबंधन ने इसकी शुरुआत वाराणसी, मेरठ, लखनऊ समेत कई जगहों से किया है. वेंडिंग मशीन में जागरण समूह का प्रत्‍येक प्रकाशन उपलब्‍ध रहेगा. लोग पैसे डालकर मनचाहा प्रोडक्‍ट ले सकते हैं.   

हालांकि जो शुरुआती रूझान हैं उसे उत्‍साहजनक नहीं बताया जा रहा है. जागरण समूह ने इस वेंडिंग मशीन को अत्‍याधुनिक तरीके से बनवाया है, जिससे यह इस समूह का प्रोडक्‍ट लेने के बाद बाकी पैसे वापस कर दे, लेकिन अब तक इन मशीनों को लोगों का रिस्‍पांस नहीं मिल पाया है. गौरतलब है कि पिछले आईआरएस में दैनिक जागरण समूह से 1,04,000 पाठक तथा इसी समूह के अखबार नईदुनिया से 1,95,000 पाठक कम हुए हैं. इसके बाद से ही प्रबंधन परेशान है. समूह की लगातार घटती साख ने भी प्रबंधन के माथे पर बल डाल दिया है. 

सूत्रों का कहना है कि जागरण समूह के अन्‍य प्रकाशनों से भी पाठकों का मोहभंग होता जा रहा है. इसी समूह के बाइलिंगुअल अखबार आई नेक्‍स्‍ट अब तक कोई खास मुकाम नहीं बना पाया है. पाठक इस अखबार को पढ़ना ही नहीं चाहते, और जिस वर्ग को ध्‍यान रखकर इसकी लांचिंग की गई है वो इस खिचड़ी अखबार पर हाथ भी धरना पसंद नहीं करता. लिहाजा प्रबंधन तमाम जगहों पर इसे दैनिक जागरण के साथ काम्‍बो के रूप में बेचता है. उसके बावजूद कहीं भी आई नेक्‍स्‍ट को बेहतर रिस्‍पांस नहीं मिलता दिखता है.

इन परेशानियों से उबरने के लिए जागरण ही जागरण समूह अब मशीनों का सहारा ले रहा है. आदमियों पर से जागरण समूह का विश्‍वास उठा है या जागरण समूह पर से आदमियों का विश्‍वास उठा है, यह तो चर्चा का विषय है लेकिन कारण चाहे जो हो अब जागरण का विश्‍वास मशीनों पर जरूर बढ़ गया है. इसी का परिणाम है कि वेंडिंग मशीनों के सहारे अखबार की खपत बढ़ाने की योजना शुरू की गई है. अब इस मशीनों का कितना असर होगा यह तो आगामी इंडियन रीडरशिप सर्वे से ही पता चल पाएगा. 

तारकेश्‍वर सिंह बने ग्रापए जिलाध्‍यक्ष, कमलेश तिवारी महामंत्री

चंदौली : ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिला इकाई का चुनाव 25 मई को बबुरी स्थित अशोक इंटर कालेज के प्रांगण में हुई, जिसमें ग्रापए के जिला पदाधिकारियों का चयन किया गया. चुनाव मुख्य अतिथि ग्रापए के प्रदेश संगठन मंत्री महेन्द्र प्रताप सिंह की देखरेख में संपन्न हुआ. एसोसिएशन के सदस्यों ने सर्वसहमति से तारकेश्वर सिंह को जिलाध्यक्ष व कमलेश तिवारी को जिला महामंत्री मनोनीत किया गया. 

जबकि जिला इकाई कार्यकारिणी के अन्य पदाधिकारियों में उपाध्यक्ष पद पर कृष्ण कान्त गुप्ता, सत्यमूर्ति ओझा, विजय विश्वकर्मा, जेपी रावत, कोषाध्यक्ष -बिहारी लाल जायसवाल, संगठन मंत्री-प्रेम शंकर त्रिपाठी, मंत्री -रामजी प्रसाद भैरव, आलोक सिंह, रतीश कुमार व मिडिया प्रभारी -संतोष खरवार को मनोनीत किया गया। कार्यक्रम के दौरान सभी सदस्यों व पदाधिकारियों ने संगठन के संस्थापक स्व. बालेश्वर जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान करुणा पति त्रिपाठी, मिथिलेश दुबे, डा. देवेन्द्र यादव, गौरव श्रीवास्तव, राम नगीना सिंह, संजय अग्रवाल, डा. राजेंद्र सिंह, सूर्य मुनि तिवारी, सत्य प्रकाश त्रिपाठी, नन्द लाल ''नंदू'' उपस्थित रहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता शीतला राय व संचालन कमलेश तिवारी ने किया.

हिंदुस्‍तान टाइम्‍स से जीएम निरंजन प्रकाश का इस्‍तीफा, टाटा सर्विसेज से जुड़े

हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, दिल्‍ली से खबर है कि निरंजन प्रकाश ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर स्‍ट्रैटेजिक मार्केटिंग में जीएम के पद पर कार्यरत थे. निरंजन पांच सालों से एचटी के साथ जुड़े हुए थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी टाटा सर्विसेज में रिसर्च कंसल्टिंग में प्रैक्टिस कंसल्‍टेंट के पद पर ज्‍वाइन किया है. वे टाटा मैनेजमेंट ट्रेनिंग सेंटर, पुणे में अपनी जिम्‍मेदारी संभालेंगे.

एचटी ज्‍वाइन करने वे स्‍टार टीवी के साथ जुड़े हुए थे. उन्‍होंने अपने करियर के शुरुआत में उन्होंने ई-सिटी वेंचर्स (एस्सेल समूह), सीएनबीसी टीवी18 और द टाइम्स ऑफ इंडिया को अपनी सेवाएं दी हैं. उन्होंने सिम्बायोसिस सोसायटी और वेलिंगकर शिक्षा एवं अन्य के दायरे के तहत संस्थानों में कई शैक्षणिक कार्यों का भी प्रतिनिधित्व किया है. इसके अलावा भी वे कई संस्‍थानों से जुड़े रहे हैं.

गौरांग महाप्रभुओं के विरोध में एक संपादकीय लिखकर अखबार और संपादक दोनों महान हो जाते थे

हिंदी पत्रकारिता दिवस की आज फेसबुक पर चर्चा जोरों पर है। जुगल किशोर जी को याद किया जा रहा है। गांधी जी को महान पत्रकार बताया गया। तकनीकी विकास पर गर्व व्यक्त किया गया और मिशन बनाए रखने की अपील हुई। इन तमाम तथ्यों से स्वयं को संबद्ध करते हुए कहना चाहता हूं कि तब के दौर में पत्रकारिता सिर्फ गौरांग महाप्रभुओं के विरोध पर टिकी थी। उनके विरोध में एक संपादकीय लिखकर अखबार और संपादक दोनों महान हो जाया करते थे।

आज का दौर बहुत चुनौती और जोखिम भरा लगता है। पत्रकारिता में महान कहलाने का जमाना अब लद गया है। अब पैकेज को महान बनाने का दौर है। इसके लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। सूचनाओं के हमले के इस दौर में पत्रकार को बहुत अपडेट रहना होता है। अखबार समाज जीवन के हर क्षेत्र को समेटे हुए हैं। ऐसे में पत्रकार को भी विषय और क्षेत्र विशेष की विशेषज्ञता हासिल करने की चुनौती रहती है। प्रसार की गलाकाट व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता में खबर ब्रेक करने की मारामारी और विश्वसनीयता की चुनौती गजब है। अब आपकी एक खोजी रपट पहले तो अखबार के नीति नियंताओं के गर्भ में रहती है। उस दौर की प्रसव पीड़ा पत्रकार को झेलनी पड़ती है। यदि खबर जन्म ले ले और उसकी कुंडली के योग से विज्ञापन पर बाधा आ जाए तो नौकरी का संकट भी आ सकता है।

आज के संपादक उसी सत्य का संधान करते हैं, जिससे उनके हितों पर आंच न आए। संपादक भी कठपुतली है। उसे कोई तो वह रिपोर्टर को नचाता है। इन सब से अलग आंचलिक पत्रकार सबसे अधिक कठिनाइयों के दौर में रात-दिन जूझ रहे हैं। वेतन और सुविधाएं नाममात्र की, ऊपर से ग्राम प्रधान की तरह कभी भी उसका बस्ता जमा करा लिया जाता है पर सुदूर ग्रामीण अंचल की खबर ब्रेक वही करता है जिसका श्रेय बाद में मुख्यालय के तेज तर्रार खबर फ्राई करने में माहिर पत्रकार ले लेते हैं। सत्ता, अफसर, नेता, माफिया, दलाल, कमीशनखोर और इन सबके पालतू छुटभइयों से हर पल पत्रकार को बच कर रहना होता है। ऐसे में मुझे लगता है कि तमाम बुराइयों के बाद भी आज की हिंदी पत्रकारिता महान है।

वरिष्‍ठ पत्रकार जीतेंद्र दीक्षित एफबी वॉल से साभार.

साकेत राजन ने विद्याचरण शुक्‍ल के हाथों पत्रकारिता की डिग्री लेने से इनकार कर दिया था

क्‍या आपने साकेत राजन का नाम सुना है? आज पत्रकारिता दिवस पर उन्‍हें याद करना बहुत मौजूं है। साकेत राजन उर्फ कॉमरेड प्रेम- जिन्‍होंने अस्‍सी के दशक में IIMC से पत्रकारिता की पढ़ाई की और दीक्षांत समारोह में इमरजेंसी के लिए कुख्‍यात उन्‍हीं विद्याचरण शुक्‍ल के हाथों डिग्री लेने से इनकार कर दिया जो आज मेदांता अस्‍पताल में मौत से जूझ रहे हैं.

उन्‍हें 6 फरवरी 2005 को धोखे से मार दिया गया था। IIMC Alumni Association से तो खैर क्‍या ही उम्‍मीद की जाए, लेकिन जिन्‍हें अब भी एक्टिविज्‍म और पत्रकारिता से न्‍यूनतम सरोकार बचा है, वे साकेत राजन के बारे में जानने, उनका लिखा पढ़ने और ज्‍यादा जानकारी जुटाने का प्रयास करेंगे, ऐसी आशा है।

वरिष्‍ठ पत्रकार पाणिनि आनंद के एफबी वॉल से.

जागरण, महाराजगंज से महेंद्र का तबादला, विश्‍व दीपक को प्रभार

दैनिक जागरण, महाराजगंज से खबर है कि महेंद्र त्रिपाठी का तबादला गोरखपुर के लिए कर दिया गया है. वे यहां पर जिला प्रभारी के रूप में कार्यरत थे. बताया जा रहा है कि प्रबंधन को इनके खिलाफ कई शिकायतें मिली थीं, जिसके बाद प्रबंधन ने महेंद्र को गोरखपुर बुला लिया. इनकी जगह फिलहाल किसी को नियुक्‍त नहीं किया गया है. फरेंदा तहसील के प्रभारी विश्‍व दीपक मिश्रा को फिलहाल जिम्‍मेदारी सौंपनी की बात आ रही है.

बताया जा रहा है कि महेंद्र को जब से बागड़ोर दी गई है जब से लेकर अब तक दैनिक जागरण के सर्कुलेशन में गिरावट देखी जाती रही है. इनके कार्यकाल में ही अमर उजाला महाराजगंज में नम्‍बर एक बन गया. दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान के सर्कुलेशन में भी महज कुछ सौ प्रतियों का फासला रह गया है. जिस प्रकार से महेन्द्रा ने अपने कार्यकाल मे सीमावर्ती ग्रामीण पत्रकारों के साथ व्यवहार किया उसकी चर्चा हर जगह हुआ करती है. मामला बरगद्‌वा का रहा हो या रतनपुर का सभी मामले मे इनकी खूब किरकिरी हुई थी. अब जबकि बतौर नये प्रभारी के तौर पर काम देख रहे विश्‍व दीपक से प्रबंधन को काफी उम्मीदे हैं.

महाराजगंज से अरुण कुमार वर्मा की रिपोर्ट.

फिर टूटेगा चकराता रोड, एमडीडीए व सरकार पर भी उठे सवाल

 देहरादून : एक लम्बे अर्से से चकराता रोड़ प्रयोग का प्रतीक बनी हुई है। पिछले वर्ष भाजपा सरकार के कार्यकाल में चकराता रोड़ का ‘बोटलनेक’ खोला गया। इससे आम जनता को निश्चित रूप से राहत मिली है पर शासन प्रशासन का जो रवैया रहा है उससे व्यापारी अब तक नहीं उबर पाये हैं। जिन व्यापारियों को एमडीडीए कम्पलैक घंटाघर में दुकानें मिली भी हैं, वह अब तक अपना कारोबार वहां नहीं शुरू कर पाये हैं। इससे पहले उनके कारोबार पर गाज गिरी थी और अब तक उनका कारोबार पुराने स्तर पर नहीं पहुंच पाया है।

आज भी अध टूटी दुकानें तथा मकान इस बात का संकेत देते है कि उनके साथ कहीं न कहीं अन्याय हुआ है। अब एक बार फिर चकराता रोड़ टूटने जा रही है। एमडीडीए चकराता रोड़ की भूमिका अधिगृहण करेगा और पीपीपी मोड़ पर इसी रोड को विकसित करेगा। सूत्रों की माने तो पीपीपी मोड़ पर इस रोड़ का विकास कार्य उसी फार्म को दिया जा रहा है। जिसने सिडकुल की जमीन खरीदी थी। सरकार पर आरोप था कि सरकार ने मानकों को ताक पर रखकर फार्म को यह जमीन आबंटन करायी थी। अब इस मसले पर हाईकोर्ट भी आ गया है।

हाईकोर्ट ने एमडीडीए को दस दिन में चकराता रोड को लेकर प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं। सीमित समय को देखते हुए मंगलवार को एमडीडीए में चकराता रोड़ के लिए भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव तैयार करने पर आम राय बनी। एमडीडीए उपाध्यक्ष आर मीनाक्षी सुंदरम ने दो जून तक ड्रांइग, डिजाइन, मुआवजा, पैकेज भू-अधिग्रहण प्रस्ताव, योजना की लागत का खाका तैयार करने के निर्देश दिए। उपाध्यक्ष ने बताया कि योजना का पूरा खाका तय समय के भीतर सरकार के समक्ष भी रख दिया जाएगा।

एमडीडीए के सचिव वंशीधर तिवारी का कहना है कि प्राधिकरण चकाराता रोड़ के विकास के लिए कृत संकल्प है हम चाहते है कि चकाराता रोड का निर्माण ऐसा किया जाए कि बाहर से आने वाला व्यक्ति यहां कि भव्यता दिव्यता से प्रभावित हो तभी प्राधिकरण के कामों को प्रभावी ढंग से देखेंगे। श्री तिवारी का कहना है कि इसके लिए एक फार्म को टेंडर दिया जा रहा हैं। विकास का काम उक्त फार्म पीपीपी मोड़ पर करायेगी। उन्होंने संवाददाता द्वारा पूछे गये सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उनका कहना था कि इस आशय की जानकारी उच्च अधिकारी ही दे सकते हैं।

सरकार द्वारा इस मामले पर काफी तेजी दिखायी जा रही है। इसका पता एमडीडीए के कामों से लगता है। सूत्रों की माने तो दिल्ली मुम्बई तथा अन्य क्षेत्रों में जहां पर किसी बाजार या क्षेत्रों का अधिग्रहण किया जाता है वहां जो निर्माण किया जाता है, उसमें पहले दो मंजिल भवन स्वामी या दुकान स्वामी को दिये जाते हैं ऊपर के दो मंजिल विकास कर्ता फार्म को दिये जाते हैं, लेकिन यहां स्थिति अलग बतायी जाती है। कहा जा रहा है कि दो मंजिले भवन स्वामी को दी जायेगी और तीन मंजिल विकासकर्ता को दी जायेगी। इससे भवन स्वामियों के अधिकारों का हनन हो रहा है। चकराता रोड़ के व्यापारियों ने अपने अधिकारों के लिए एक समिति का निर्माण किया। पिछले दिनों इस समिति के बैठक में सरकार के रवैये पर रोष जताया गया।

समिति के पदाधिकारी राजेश गोयल का कहना था कि शासन जानबूझकर व्यापारियों को परेशान कर रहा है, जिसका परिणाम उसे भुगतना ही होगा। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक होगा कि भाजपा के कार्यकाल में चकराता रोड़ टूटा था। व्यापारियों के नाराजगी ने उसे सत्ता से हटा दिया। व्यापारियों के नाराजगी का प्रभाव राजपुर, रायपुर तथा धर्मपुर विधानसभा सीटों पर पड़ा भाजपा इसी से हार गयी। जिसका कारण यह रहा कि भाजपा मात्र 30 सीटों पर सिमट गई और कांग्रेस 31 सीटें जीती। यदि व्यापारी नाराज न होता तो भाजपा के हाथ 33 सीटें आती और प्रदेश में उसकी सरकार होती। इस बार कांग्रेस ने व्यापारियों को परेशान करने का काम किया है। व्यापारियों की नाराजगी कांग्रेस को भी भुगतनी पड़ सकती हैं हालांकि सरकार का प्रयास है कि किसी तरह यह काम उपसंस्था को दिया जाए जैसा सरकार चाहती है। लेकिन जनता की नाराजगी और शासन की कारस्तानी का परिणाम क्या होगा। यह समय बतायेगा।

देहरादून से राम प्रताम मिश्र 'साकेती' की रिपोर्ट. 

जनसंदेश न्यूज चैनल का शटर गिरा!

चर्चा है कि जनसंदेश न्यूज चैनल का शटर गिर चुका है. सौ से ज्यादा लोगों की छंटनी हो चुकी है. इस चैनल में बस इसके हेड सैयदेन जैदी और दो-चार अन्य मीडियाकर्मी बचे हैं, और ये भी नौकरी ढूंढने में लगे हुए हैं. बताया जा रहा है कि चैनल को फिर से लाने की बात कही जा रही है, पर यह सब आश्वासन के सिवा कुछ भी नहीं. जनसंदेश न्यूज चैनल का बीच में नाम बदल दिया गया था. फिर भी चैनल नहीं चढ़ा क्योंकि काम पहले जैसा ही होता रहा.

जनसंदेश न्यूज चैनल में पत्रकारिता कम, ओबलाइज करने का धंधा ज्यादा किया जाता रहा. इस कारण न तो यह चैनल कंटेंट के कारण चर्चा में आ सका और न ही भरपूर धंधा पा सका. माया मिली न राम वाली स्थिति में चैनल बना रहा और अब अपनी गति को प्राप्त हो गया है. अभी उन लोगों के नाम नहीं मालूम हो सके हैं जिनकी छंटनी की गई है. अगर आपको इस चैनल को लेकर कुछ कहना, बताना, जानकारी देना हो तो भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

दैनिक जागरण, पटियाला के संपादक ने बोला जातिसूचक शब्‍द, बजरंग दल ने घेरा कार्यालय

सादर नमस्ते जी, आज 28 May 2013 पटियाला पंजाब में दैनिक जागरण, पटियाला के इंचार्ज निश्चल भटनागर का बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने जुलूस निकाल दिया. असल में निश्चल भटनागर जबसे पटियाला में आये हैं तबसे अपनी बदतमीजी की वजह से पटियाला शहर में काफी नाम कमा चुके हैं.

असल में कल शाम 27 मई को बजरंग दल के कार्यकर्ता अपना प्रेस नोट लेकर जैसे ही दैनिक जागरण के दफ्तर में पहुंचे महाशय निश्चल भटनागर जी अपनी असल आदत पर सवार होकर नेताओं को जातिसूचक शब्द बोल गए. आज पटियाला में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने चरणजीत चौहान पंजाब उपाध्यक्ष के नेतृत्‍व में दैनिक जागरण के दफ्तर का घेराव कर दिया और पटियाला के एसएसपी को निश्चल के खिलाफ जातिसूचक शबद बोलने का मामला दर्ज करवाने की शिकायत की।

आपका शुभचिंतक

चरणजीत चौहान
Ph.09417720022

‘आनंदलोक’ और ‘रोबबार’ का संपादक घोड़े बेचकर सो गया, अब उन्‍हें कोई आवाज न दे!

महज उनचास साल की आयु में हाल के वर्षों में बंगाल के सबसे सक्रिय और सबसे चर्चित फिल्मकार ऋतुपर्णों घोष गहरी नींद में चले गये। मृत्यु के बाद उनके मुखमंडल में इतनी शांति है जैसे इतनी ज्यादा कर्मव्यस्तता के बाद वे घोड़े बेचकर सो रहे हों और किसी की जुर्रत नहीं है कि उनको पुकारे भी। अब जब तक यह लेख प्रकाशित होगा, उनकी अंत्येष्टि हो चुकी होगी। अभी बंगाल या भारत के दिग्गज फिल्मकारों से ऋतुपर्णों की तुलना करने का शायद वक्त नहीं है, लेकिन कुछ लोग उन्हें ऋत्विक घटक के उत्तराधिकारी भी बताने लगे हैं।

ऐसा करके वे ऋतुपर्णो के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले ऋतु दा कोलकाता में जन्में थे और कोलकाता में ही उन्होंने आखिरी सांस ली! वह कोलकाता में ही पले-बढ़े और उन्होंने साउथ प्वाइंट हाई स्कूल से पढ़ाई की। उनका सुबह 7.30 बजे निधन हुआ। जानकारी मिली है कि सेक्स चेंज ऑपरेशन के बाद उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी। परिजनों के अनुसार नींद में ही उनकी मौत हो गई थी। कहा जा रहा है कि अग्नाशय की बीमारी की वजह से नींद में ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे बचने के लिए कुछ भर नहीं कर सके।

वो इस समय सत्यनेशी व्योमकेश बख्शी नाम की फ़िल्म बना रहे थे। व्योमकेश एक जासूसी चरित्र हैं जिस पर पूर्व में धारावाहिक बन चुका है लेकिन इस विषय पर ऋतुपर्णो से एक अलग फिल्म की उम्मीद की जा रही थी। अभी उन्होंने परसो ही अपनी ताजा फिल्म `चित्रांगदा' की शूटिंग पूरी की। यह बंगाल से बाहर बाकी भारत में बहुत कम लोगों को मालूम है कि ऋतुपर्णो एक बेहतरीन सफल फिल्मकार के साथ ही एक बेहतरीन संपादक भी थे। आनंदबाजार पत्रिका समूह के `आनंदलोक' से लंबे समय तक जुड़े रहने के बाद वे प्रतिदिन जैसे सामान्य अखबार की रविवारी पत्रिका `रोबबार' का जिस कुशलता से संपादन करे रहे, अपनी तमाम व्यस्तताओं के मध्य, उसकी तुलना भारतीय फिल्मों में अपर्णा सेन से ही की जा सकती है।

गिरीश कर्नाड भी बेहतरीन लेखक हैं, लेकिन वे लगातार किसी व्यवसायिक पत्रिका का संपादन करते रहे हैं, ऐसा हमें नहीं मालूम। हम `प्रतिदिन' के पाठक नहीं रहे, लेकिन वर्षों से रविवार के दिन प्रतिदिन लेते रहे सिर्फ `रोबबार' पढ़ने के लिए और वह भी `देश' बंद करके, क्योंकि सागरमय घोष के बाद 'देश' का स्तर ही नहीं रहा कोई। रविवारी में ऋतुपर्णों का संपादकीय स्तंभ `फर्स्ट पर्सन' बेहद पठनीय रहा है। दरअसल, उनकी लेखकीय क्षमता ही उन्हें एक बाहतरीन फिल्मकार बनाती रही। ऋत्विक घटक और सत्यजीत रे भी अपनी लेखकीय प्रतिभा के बल पर अलग से पहचाने जाते हैं।

कोलकाता में होने के बावजूद ऋतुपर्णो से हमारी मुलाकात हुई नहीं कभी। इन दिनों कालेज के दिनों की तरह फिल्में देखने की भी फुरसत और मौके नहीं होते। लेकिन संयोगवश दो एक को छोड़कर हमने ऋतुपर्णो की तमाम फिल्में देख ली हैं। जबकि गौतम घोष और बुद्धदेव की फिल्में भी हम लोग वक्त निकालकर देख नहीं पाते। सत्यजीत रे, मृणाल सेन और ऋत्विक की फिल्में टीवी पर अगर न दिखायी जायें, तो उनकी फिल्में भी देखने को न मिले। यही ऋतुपर्णो की खासियत है। हम ही क्या, बंगाल में विरले लोग ही होंगे जो ऋतुपर्णो की फिल्में देखते न हों! उनकी फिल्में व्यवसायिक रुप से सफल हैं लेकिन आप उन्हें विशुद्ध व्यवसायिक या कला फिल्म कह नहीं सकते। वे कोई ऋषिकेश मुखर्जी भी नहीं हैं।

उनकी फिल्मों जैसे `चोखेर बाली' के फिल्मांकन को लेकर तमाम बहस की गुंजाइश है, `अंतर्महल' को लेकर भी और हालिया `नौकाडूबी' के निष्पादन को लेकर भी। पर इन फिल्मों की आप उपेक्षा कर ही नहीं सकते। ऋतुपर्णों घोष को उनका प्रोफेशन विरासत में मिला क्योंकि उनके पिता खुद भी डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर थे। उनकी मां भी फिल्मों से जुड़ी हुई थीं। घोष ने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापन फिल्मों से की थी। अपने 19 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने 19 फिल्मों का निर्देशन, 3 फिल्मों में अभिनय किया। उन्हें 12 राष्ट्रीय पुरस्कारों सहित कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया।

घोष की पहली फिल्म 'हिरेर आंग्टी' थी, जो उन्होंने बच्चों के लिए बनाई थी। उनकी 'दाहन उस्ताब', 'चोखेर बाली', 'दोसर', 'रेनकोट', 'द लास्ट लीयर', 'सब चरित्रो काल्पोनिक' और 'अबोहोमन' को राष्ट्रीय पुरस्कार और आलोचकों की सराहना मिली। `दहन' हो या `किंग लियर', `रेनकोट' हो या `सनग्लास' या फिर `आवहमान' या `चित्रांगदा' या `उनीशे अप्रैल', उनकी फिल्में मुकम्मल बयान हुआ करती हैं, जिनसे आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। वे बांग्ला शाकाहारी फिल्मों को बालिग बनाने में क्लासिक साहित्य का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूके। रवींद्र साहित्य की उन्होंने सेल्युलाइड में उत्तर आधुनिक व्याख्या की, जिसकी आजतक किसी ने हिम्मत तक नहीं की।

रवींद्र साहित्य और रवींद्र संगीत भारतीय फिल्मों में बहुत लंबे अरसे से हैं, लेकिन रवींद्र की छाया से निकालकर रवींद्र को सिनेमा की भाषा में अभिव्यक्त करने का दुस्साहस सिर्फ ऋतुपर्णो ने ही किया। इस लिहाज से `चोखेर बाली', `नौकाडूबी' और `चित्रांगदा' जैसी फिल्मों का महत्व कुछ अलग ही है। ब्रांडेड चेहरों को किरदार में बदलने का दुस्साहस भी ऋतुपर्णों की निर्देशकीय दक्षता को रेखांकित करती है। ऐश्वर्य हो या ऋतुपर्णा या फिर अमिताभ बच्चन या अपने अजय देवगण, सबकी शारीरिक भाषा ऋतुपर्णो की फिल्मों में बदल बदली सी नजर आती है। अपर्णा सेन जैसी दक्ष निर्देशक अभिनेत्री को `उनीशे अप्रैल' में जिस कायदे से उन्होंने देवश्री के मुकाबले फेस टू फेस पेश करके मां बेटी के रिश्ते को एक नया आयाम दिया, वह उनकी निर्देशकीय प्रतिभा की उपलब्धि है।

`बाड़ीवाली' की किरण खेर अभूतपूर्व है तो `नौकाडूबी' की रिया सेन ने सबको हैरत में डाल दिया। `दोसर' में कोंकणा का तेवर कभी भुलाया ही नहीं जा सकता। `दहन' में इंद्राणी हाल्दार और ऋतुपर्णा के ट्रीटमंट एक अद्भुत किस्म की निरपेक्षता है। श्याम बेनेगल की फिल्मों मे स्मिता और शबाना के सहअस्तित्व जैसा ही है कलाकारों के प्रति उनका निर्देशकीय दृष्टिकोण। वे सत्यजीत रे की चारुलता की छवि को तोड़ने की भी हिम्मत कर सकते थे। बड़े निर्देशकों सत्यजीत से लेकर अदूर गोवपाल कृष्णन और श्याम बेनेगल तक ने अपने किरदार चुनने में ब्रांडेड चेहरे से परहेज किया है। लेकिन `चोखेर बालि' से लेकर `दोसर' तक उन्होंने अलग अलग किरदार में प्रसेनजीत को जैसे कामयाबी के साथ ढाला है और `सब चरित्र काल्पनिक' जैसी फिल्म में विपाशा के जैसे पेश किया है, उसकी कोई भी तारीफ पर्याप्त नहीं है।

यह सही है कि सत्यजीत रे की फिल्मों में भी सौमित्र चटर्जी बार बार रिपीट हुए हैं, माधवी मुखर्जी भी उनकी फिल्मों से उभरी। लेकिन वे प्रसेनजीत की तरह स्टार नहीं थे। शर्मिला टैगोर को रे ने ही पहचान दी, पर उनके स्टार बन जाने के बाद उन्हें फिर यथेष्ट मौका ही नहीं दिया, ऐसा शर्मिला की शिकायत रही है। रे ने उत्तम कुमार को `नायक' में जरूर पेश किया। लेकिन उन्हें रिपीट करने से परहेज करते रहे। बांग्ला की सबसे बड़ी अभिनेत्री सुचित्रा सेन को तो मृणाल सेन, ऋत्विक घटक से लेकर सत्यजीत रे ने भी कोई मौका नहीं दिया। लेकिन ऋतुपर्णों की फिल्मों में अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्य, प्रीति जिंटा, विपाशा बसु, जैकी श्राफ, प्रसेनजीत जैसे स्टार हमेशा रहे हैं।

दरअसल, स्टारकास्ट के साथ अच्छी फिल्म के निर्माण के जरिये ही सिनेमाहल से दूर हुए बंगाली दर्शकों को सिनेमाहाल तक खींच लाने में कामयाब हुए ऋतुपर्णो। उनके बाद कौशिक गांगुली से लेकर अनिरुद्ध तक एक के बाद एक निर्देशक इसी राह पर चलने लगे तो बांग्ला फिल्म उद्योग का कायाकल्प ही हो गया। बारह राष्ट्रीय पुरस्कारों वाले किसी निर्देशक की अगर इंडस्ट्री की आबोहवा बदल देने का श्रेय जाता है, तो यह भी भारतीय फिल्म उद्योग के लिए एक अजीब सा संयोग कहा जाना चाहिए।

ऋतुपर्णों घोष के साथ 'मेमरीज़ इन मार्च' में काम कर चुकी अभिनेत्री दीप्ति नवल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा "अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर इतना सहज मैंने किसी को नहीं देखा। उसने मुझे बताया था कि एक बार अभिषेक बच्चन ने उसे ऋतु दा नहीं ऋतु दी कहा और ये बताते हुए उसकी आंखों में चमक थी।" दीप्ति कहती हैं कि ऋतुपर्णो की मृत्यु सिर्फ बंगाली सिनेमा नहीं राष्ट्रीय सिनेमा के लिए बहुत बड़ी सदमा है क्योंकि वो एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के फिल्मकार थे।

अपनी बात पूरी करते हुए दीप्ति ने कहा "ऋतु अपनी समलैंगिकता को लेकर कतई शर्मिंदा नहीं थे. वो एक पुरुष के शरीर में महिला थे और उन्होंने तय किया था कि वो समलैंगिक विषयों को अपनी फिल्मों में उठाते रहेंगे।" बीबीसी के मुताबिक चाहे हिंदी फ़िल्म रेनकोट में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन से संवेदनशील अभिनय करवाना हो या फिर बांग्ला और हिंदी में चोखेर बाली हो। ऋतुपर्णो ने न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया बल्कि समलैंगिक मुद्दों को भी वो उठाते रहे।

ऋतुपर्णो की फिल्मों में समलैंगिक विषयों का काफी संजीदा तरीके से चित्रण हुआ है। उनकी आखिरी फिल्म चित्रांगदा थी जो हाल ही में मुबंई में हुए क्वीयर (समलैंगिक) फिल्म महोत्सव की क्लोज़िग फिल्म थी। इस फेस्टिवल के निर्देशक श्रीधर रंगायन ने बीबीसी को बताया "हमने एक ऐसा निर्देशक खोया है जो समलैंगिक विषयों पर खुलकर,बिना डरे और बेहद ही संजीदगी से फिल्में बनाता था।" सर्वश्रेष्ठ अंग्रेज़ी फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली फिल्म 'मेमरीज़ इन मार्च' भी समलैंगिक विषय पर बनाई गई थी जिसमें ऋतुपर्णो के अभिनय को काफी सराहा गया था।

लेखक पलाश विश्वास पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

अरुणा राय ने छोड़ा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद

नई दिल्ली. सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) से इस्तीफा दे दिया है. राय महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत न्यूनतम मजदूरी के बारे में परिषद की सलाह न माने जाने से नाराज़ थीं इसीलिए उन्होंने अपना कार्यकाल नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया है.

अरुणा ऱॉय ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस बाबत पत्र लिख कर आग्रह किया था कि उन्हें एनएसी में एक और कार्यकाल देने पर विचार नहीं किया जाना चाहिए जिसे उनके द्वारा मान लिया गया. अरुणा राय का मौजूदा कार्यकाल 31 मई को समाप्त हो रहा है.

सोनिया गांधी को लिखे अपने पत्र में रॉय ने मनरेगा के बारे में लिखा है कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रधानमंत्री ने मनरेगा कामगारों को न्यूनतम मजदूरी भुगतान करने की एनएसी की अनुशंसा खारिज कर दी और साथ ही कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस आदेश का खिलाफ अपील करने का फैसला लिया जिसके अनुसार मनरेगा कामगारों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान किया जाना चाहिए.

अरुणा ने यह भी कहा है कि बेशक मनरेगा ग्रामीण गरीबों के जीवन स्तर में सुधार लाने में योगदान दिया है, लेकिन इसका सही क्रियान्वय अब भी एक चुनौती बना हुआ है. इसके अलावा उन्होंने विश्वास दिलाया है कि वे बाहर रह कर भी एनएसी के सामाजिक क्षेत्रों के अभियानों को अपना समर्थन देंगी.

Over 260 mn victims of caste-based discrimination : UN

More than 260 million people across the world are still victims of human rights abuses due to caste-based discrimination, a group of independent experts appointed by the UN warned today and asked South Asian countries to strengthen legislation to protect them.

"Caste-based discrimination remains widespread and deeply rooted, its victims face structural discrimination, marginalisation and systematic exclusion, and the level of impunity is very high," the group of experts noted.

"This form of discrimination entails gross and wide-ranging human rights abuses, including brutal forms of violence." People who are considered of low caste in South Asia are known as 'Dalits' or 'untouchables'.

In many countries, they face marginalisation, social and economic exclusion, segregation in housing, limited access to basic services, including water and sanitation and employment, and work in conditions similar to slavery.

The experts said that Dalit women and girls are particularly vulnerable and face multiple forms of discrimination and violence, including sexual abuse. Children are also at high risk of being sold and sexually exploited.

Two years ago, Nepal adopted the 'Caste-based Discrimination and Untouchability Bill', a landmark law that protects the rights of Dalits. More recently, the British Government decided in April that the Equality Act would cover caste discrimination to protect Dalits in Diaspora communities.

While these are positive steps to eliminate caste-based discrimination, the experts expressed concern about a serious lack of implementation in countries where legislation already exists, and called for an effective application of laws, policies and programme to protect those affected by this type of discrimination.

"We urge other caste-affected States to adopt legislation to prevent caste-based discrimination and violence and punish perpetrators of such crimes, and call on world governments to endorse and implement the UN Principles and Guidelines for the

effective elimination of discrimination based on work and descent," the experts said. "Political leadership, targeted action and adequate resources should be devoted to resolving the long-standing problems; discrimination and exclusion faced by Dalits and similarly affected communities in the world.

"The experts also expressed their hope that the post-2015 development agenda will include specific goals for the advancement of Dalits, stressing that caste-based discrimination is a major structural factor underlying poverty.

"Their specific needs require tailored action to lift them out of poverty and close the inequality gap between them and the rest of society," they said. "No one should be stigmatised; no one should be considered 'untouchable'.

"Among the experts voicing their concerns include those dealing with minority issues; violence against women; contemporary forms of slavery; and racism. Independent experts are appointed by the Geneva-based UN Human Rights Council and work in an unpaid capacity. (PTI)

On NHRC recommendations UP govt. relents and pays compensation for land

New Delhi : In a land mark case (order) ,the National Human Rights Commission not only recommended payment of proper compensation as per the law to a woman whose land was used by the PWD but also ensured that an amount of Rs 9 lakh 10 thousand was paid to her at the market rate by the Uttar Pradesh government.

Triveni Devi Chauhan of Village Kabarai, District Mahoba, UP was struggling to get compensation since 2006 for her four bighas of land used by the PWD to construct a road, but was not heard by the concerned authorities. Police also did not register her complaint against the PWD. She got a ray of hope when on 26 June, 2011, Dr Lenin of PVCHR lodged a complaint in the NHRC seeking justice for the victim of PWD and police apathy.

Pursuant to the directions of the Commission, the SP in his report confirmed that 0.90 acre of land owned by Triveni Devi in Village Kabrai was used by the PWD while constructing a road. The report also said that the issue concerned the PWD and not the police department.

The Superintending Engineer stated in his report that a 3,600 km. long by-pass road, connecting NH No. 86 and NH No. 76 was constructed by the PWD in the year 2007. During the construction, no farmer raised any objection. A 'Chak Road' already existed on the way but at some places private land was used. However, there was no provision for paying any compensation to any farmer.

The Commission, on consideration of facts placed before it on record, observed that admittedly some land belonging to the complainant was used by the PWD in construction of the road. Hence, she should have been given the compensation as per law. Accordingly, the Chief Secretary, UP was directed to submit a report in the matter.

It was not before three reminders to the Chief Secretary, including one final, that the Special Secretary, PWD, UP Government, Lucknow, sent a report that after receiving a cheque for Rs. 9,10,000/- as sale consideration, Triveni Devi executed sale deed of the land in favour of the Government of UP through Executive Engineer, Mahoba. The copies of the reports of other officers and a copy of the registered sale deed were also sent to the Commission as proof of justice done in her case. साभार : पीवीसीएचआर

इंडिया टुडे में असिस्‍टेंट एडिटर बने सौरभ द्विवेदी

दैनिक भास्‍कर, लुधियाना से इस्‍तीफा देने वाले सौरभ द्विवेदी अपनी नई पारी की शुरुआत इंडिया टुडे समूह से की है. उन्‍होंने इंडिया टुडे पत्रिका में असिस्‍टेंट एडिटर के पद पर ज्‍वाइन किया है. उन्‍होंने 27 मई से अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है. आईआईएमसी टॉपर सौरभ ने अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत ट्रेनी के रूप में स्‍टार न्‍यूज से की थी. इसके बाद वे लाइव इंडिया के लिए भी रिपोर्टिंग किया. लाइव इंडिया से इस्‍तीफा देने के बाद वे नवभारत टाइम्‍स से जुड़ गए.

वे नवभारत टाइम्‍स में संडे स्‍पेशल की जिम्‍मेदारी लंबे समय तक संभालते रहे हैं. नवभारत टाइम्‍स से इस्‍तीफा देने के बाद वे न्‍यूज एडिटर बनकर दैनिक भास्‍कर, चंडीगढ़ से जुड़ गए. वहां पर दैनिक भास्‍कर का सिटी लाइव सौरभ द्विवेदी के नेतृत्‍व में ही लांच हुआ. पिछले साल जुलाई में प्रबंधन ने सौरभ को सिटी एडिटर बनाकर लुधियाना भेज दिया था. एक महीने पहले इन्‍होंने भास्‍कर से इस्‍तीफा दे दिया था, तब चर्चा थी कि वे लखनऊ में नवभारत टाइम्‍स से जुड़ेंगे. लेकिन सौरभ ने सारी चर्चाओं को विराम देते हुए इंडिया टुडे के साथ अपनी नई पारी शुरू की है.

दक्षिण मुंबई और दबंग दुनिया ने दिया हमारा महानगर को झटका

मुंबई में लंबे समय से प्रकाशित हो रहे हमारा महानगर की स्थिति खराब हो गई है. इसी महीने शुरू हुए अखबार दक्षिण मुंबई और जल्‍द लांच होने जा रहे दबंग दुनिया ने हमारा महानगर को जोरदार झटका दिया है. हमारा महानगर से कार्यकारी संपादक सुधांशु झा समेत दो लोग दक्षिण मुंबई से जुड़ गए हैं. अभी अखबार इस झटके से उबरा ही नहीं था कि लगभग 8 अन्‍य कर्मचारी दबंग दुनिया और दक्षिण मुंबई से जुड़ने जा रहे हैं. 

उल्‍लेखनीय है कि मुंबई से प्रकाशित हमारा महानगर यहां के प्रमुख अखबारों में शामिल है. जिस तरह से इस अखबार का सर्कुलेशन बढ़ रहा था उससे लग रहा था कि नवभारत को भी पीछे करके नम्‍बर दो का अखबार बन जाएगा, लेकिन इन झटकों ने हमारा महानगर की राह मुश्किल कर दी है. अब अखबार की स्थिति उल्‍टी होने लगी है. बताया जा रहा है कि अखबार के मालिकान ही इसके संचालन में ज्‍यादा दिलचस्‍पी नहीं ले रहे हैं, उनकी ज्‍यादा दिलचस्‍पी राजनीति में है, लिहाजा अखबार पर प्रभाव पड़ रहा है.

बताया जा रहा है कि पिछले दिनों यहां हुए इंक्रीमेंट से भी नाराजगी है. वेतनवृद्धि में पार्शियालिटी की गई है. नए लोगों के वेतन में चार से पांच हजार रुपये की वृद्धि की गई है तो पुराने लोगों को इसका आधा या आधे से भी कम बढ़ोत्‍तरी दी गई है. बताया जा रहा है कि इंक्रीमेंट के चलते पत्रकार ज्‍यादा नाराज हैं और मौका मिलते ही दूसरे अखबारों में चले जा रहे हैं. संभावना है कि जून में कुछ और लोग दक्षिण मुंबई और दबंग दुनिया चले जाएंगे. इन लोगों की बातचीत फाइनल हो चुकी है.

शगुन से एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर अवतंस चित्रांश का इस्‍तीफा

देश के पहले मेट्रीमोनियल चैनल शगुन से खबर आ रही है कि अवतंस चित्रांश ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. अवतंस इसके पहले खबर भारती के साथ आउटपुट हेड के रूप में कार्यरत थे और वहीं से इस्‍तीफा देकर सगुन पहुंचे थे. इनके इस्‍तीफा देने के कारणों का पता नहीं चल पाया है.

अवतंस आजतक, इंडिया टीवी, सहारा समय जैसे चैनलों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे सोनी टीवी पर प्रसारित क्राइम पेट्रोल की टीम से भी जुड़े रहे हैं. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

ईटीवी पर ऐसी ऐसी ब्रेकिंग चलाते हैं कि हंसी आने लगती है…

Harsh Vardhan Pande : मूर्धन्य पत्रकार जगदीश चन्द्रा की जन सरोकारी पत्रकारिता पर मैं फिदा हूँ। ब्रेकिंग चलाने का अगर उनको उस्ताद कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं …. ईटीवी पर ऐसी ऐसी ब्रेकिंग चलाते हैं कि हंसी आने लगती है… पिछले दिनों उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी की उजबेकिस्तान यात्रा के दौरान जगदीश चंद्रा ने पूछा सवाल- आपकी उजबेक यात्रा का मकसद क्या है? तो मुस्कुराने लगे हामिद अंसारी …

यही नहीं हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन जब ईरान से वापस लौट आते हैं तो जगदीश चन्द्रा अपने चैनल में एक हफ्ते बाद खबर चलाते हैं- ''ईरान में मनमोहन ……जगदीश चंद्रा के साथ विमान में''.

ओबामा को अगर शांति का नोबल मिल सकता है तो भला हमारे मूर्धन्य पत्रकार जगदीश चंद्रा को विशेष विमान से ब्रेकिंग कराने के लिए नोबल पुरुस्कार क्यों नहीं? मुझे लगता है पूरी पत्रकार बिरादरी ने विशेष विमान से ब्रेकिंग करने के लिए जगदीश चंद्रा को नोबल पुरस्कार देने के लिए एक जनांदोलन करना चाहिए…
 
Abhishek Shukla : aap jis channel ki bat kar rahe hi us channel ki ek breaking sarkar hila deti hai
 
Harsh Vardhan Pande : ABHISHEK SHUKLA –जगदीश चंद्रा आजकल ईटीवी में खबरों के नाम पर किस तरह की चाटुकारिता कर रहे है शायद आप इससे वाकिफ नहीं हैं … विज्ञापनों के लिए वह हर सरकार के सामने नतमस्तक हैं …. सरकार के खिलाफ नहीं जा सकते हैं … मीडिया मैनेजमेंट के उस्ताद हैं … स्ट्रिंगरो से ब्लैकमेलिंग करवाने से भी पीछे नहीं हैं …. ई टी वी का स्तर दिनों दिन गिर रहा है … टी आर पी लुढक रही है फिर भी अपने को नम्बर १ बता रहे हैं …..
 
Abhishek Shukla : apki kuch bato se sahmat hua ja sakta hi. apki soch etv ke hit me hi. lakin apne jo jan andolan chalane ki bat kahi. mujhe lagta hi ye andolan pure media jagat ke liye chalana chahiye.

Abhishek Shukla etv to fir bhi kuch mamlo me thik hi
 
Maneesh Tiwari यार हर्ष बाबू दरअसल जगदीश चन्द्रा का ईटीवी को इतना योगदान है कि उन्होने रामूजी के घाटे में चल रहे उपक्रमों को फायदे में पहुँचाया …अब दुधारू गाय की लात सहने वाली कहावत तो तुमने सुनी ही होगी ….
 
Neha Pant ETV m ab pahli jaisi baat nahi rahi…….

पत्रकार हर्ष वर्द्धन पांडे के फेसबुक वॉल से.

सरकारें बिलकुल नहीं चाहतीं कि लोग पढ़ें

Dayanand Pandey : बीते 19 मई को दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदी प्रकाशक संघ के वार्षिक सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि जाना हुआ। इस सम्मेलन में मैं ने लेखक-पाठक-प्रकाशक संबंध ख्त्म होते जाने की चिंता जताई और कहा कि अगर सवा अरब के देश में कोई प्रकाशक हिंदी में कुछ सौ या हज़ार किताबें छापता है तो यह सिर्फ़ और सिर्फ़ शर्म का विषय है। चेतन भगत अगर सालाना सात करोड़ रुपए की रायल्टी अंगरेजी में लिख कर ले लेते हैं और एक हिंदी का प्रकाशक इतने का सालाना व्यवसाय भी नहीं कर पाता तो यह बड़ी चिंता का विषय है।

पाठकों को कैसे जोड़ा जाए इस पर सोचना बहुत ज़रुरी है। क्यों कि इस वक्त ज़मीनी सचाई यह है कि हिंदी दुनिया के बाज़ार में सब से ज़्यादा बोली और जानी जाने वली भाषा है। और कोई भी भाषा बनती है बाज़ार और रोजगार से। प्रकाशक सरकारी खरीद के अफ़ीम से बाहर निकलें और पाठकों से सीधे जुड़ें। तभी हिंदी के पाठक-लेखक और प्रकाशक के संबंध पुनर्जीवित होंगे। क्यों कि कोई भी व्यवसाय सिर्फ़ सरकारी खरीद के भरोसे ज़िंदा नही रह सकता।

वैसे भी सरकारें बिलकुल नहीं चाहतीं कि लोग पढ़ें। क्यों कि अगर पढ़ेंगे तो सोचेंगे। और सोचेंगे तो सरकार के खिलाफ़ ही सोचेंगे। व्यवस्था के खिलाफ़ ही सोचेंगे। खुशी की बात है कि प्रकाशक दोस्तों ने मेरी इन बातों से न सिर्फ़ सहमति जताई बल्कि तालियां भी बजाईं और इस बारे में नए प्रयास शुरु करने का भरोसा भी दिलाया। इस लिए भी कि वह खुद कटते जा रहे पाठकों की समस्या से से चिंतित दिखे। देखिए कि आगे क्या होता है। बातें और भी बहुत हुईं। फ़िलहाल उस मौके की कुछ फ़ोटुएं यहां हाजिर कर रहा हूं जो मुझे आज ही मिली हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं उपन्‍यासकार दयानंद पांडेय के एफबी वॉल से साभार.

बनारस के मूर्धन्‍य पत्रकार मनोहर खाडिलकर का निधन

वाराणसी : मूर्धन्य पत्रकार और काशी पत्रकार संघ के मानद सदस्य मनोहर खाडिलकर का आज सुबह मुंबई में निधन हो गया। सूत्रों ने बताया कि 75 वर्षीय खाडिलकर पिछले कुछ दिनों से फेंफड़े में संक्रमण से पीड़ित थे। उनके परिवार में पत्नी, एक पुत्र व दो पुत्रियां हैं।

हिन्दी, अंग्रेजी और मराठी में बेहतरीन पकड़ रखने वाले खाडिलकर कई अखबारों से जुड़े रहे हैं। मुंबई में ही खाडिलकर का अंतिम संस्कार किया गया। उन्हें मुखाग्नि उनके पुत्र मनोज ने दी। (भाषा)

ख़बर है कि शुक्ला जी के फिरे दिन वापस फिर गए हैं

Mayank Saxena : ख़बर है कि शुक्ला जी के फिरे दिन वापस फिर गए हैं…और वो वहीं लौट सकते हैं जहां दिन फिरने से पहले थे…हालांकि शुक्ला जी का फिरने का इतिहास रहा है…कभी उनके दिन फिरे थे तो वो बड़े पत्रकार हो गए थे…उसके बाद दिन फिरे तो शादी करवा दी गई…दिन और फिर गए तो सांसद बने…लेकिन जब जब दिन वापस फिरे से शुक्ला जी मुसीबत में आते रहे…लेकिन बॉलीवुड और क्रिकेट के सबसे काले राज़ जानने के बावजूद किसी स्कैंडल में बड़े बड़े उन पर आंच नहीं ला पाए…

न जाने किसका किसका इन्वेस्टमेंट शुक्ला जी ले आए लेकिन फंसे नहीं…लेकिन बेड़ागर्क हो इन नासपीटे लौंडों का…साले ठीक से खेलना नहीं सीख पाए थे और फिक्सिंग शुरु कर दी…अब शुक्ला जी के दिन फिर कर अबाउट टर्न लेने को हैं…ख़बर है कि मैडम जी और बेबी उनसे नाराज़ हो गए हैं…लाल बत्ती छिन सकती है…वैसे भी मंत्रालय को वक्त कहां दे पाते हैं शुक्ला जी…कभी क्रिकेट तो कभी बॉलीवुड…बाकी बचे समय में एक आध लेख लिख लेते हैं…संसदीय कार्य होता नहीं क्योंकि सदन चलता ही नहीं है…तो अब कहा जा रहा है कि शुक्ला जी के दिन उल्टा फिर सकते हैं..और बयानों और मुद्दों से फिरते रहे शुक्ला जी, एक बार फिर…चलते फिरते दिखाई दे सकते हैं…

हालांकि शुक्ला जी के साथ प्लस प्वाइंट ये है कि उन्होंने कभी किसी से सम्बंध नहीं बिगाड़े…न सपा से…न बीजेपी से…न बीएसपी से…और न वाम पार्टियों से…हालांकि ससुराली भगवा वाले हैं…सो आस वहां से भी लग सकती है कि यहां नहीं तो वहां सही…पर सवाल ये है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि शुक्ला जी सबकी नज़रों में अच्छा बनने के चक्कर में सबके बुरे बन गए हों…ख़ैर शुक्ला जी तो शुक्ला जी हैं…अमर सिंह का अपग्रेडेड वर्ज़न हैं…देखिए इससे भी निकल ही आएंगे और एएनआई की बाइट उनके अपने चैनल पर चल रही होगी…शुक्ला जी इस स्टेटस पर ध्यान मत दीजिए…देखिए कि कैसे टोपी फिराई जा सकती है…कुछ तो करना ही होगा…वरना आपके यहां चले न चले बाकी जगह तो ब्रेकिंग चलेगी ही न…

युवा पत्रकार मयंक सक्‍सेना के एफबी वॉल से साभार.

न्‍यू मीडिया के दौर में भी प्रिंट मीडिया की स्वीकार्यता बढ़ी : अरविंद सिंह

जौनपुर: राज्य सभा चैनल के नेशनल ब्यूरो चीफ अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि हमेशा से समाज को दिशा देती चली आ रही प्रिंट मीडिया की स्वीकार्यता संचार युग में भी बढ़ी है। हालांकि समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी गिरावट आई है। यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं है। इसे रोकने के लिए वरिष्ठ पत्रकारों को आगे आना होगा। वे नई पौध को व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर उन्हें कुशल पत्रकार बना सकते हैं। वे गुरुवार को कलेक्ट्रेट स्थित संघ भवन में जौनपुर पत्रकार संघ द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।

उन्होंने ग्रामीण पत्रकार को पत्रकारिता की रीढ़ बताते हुए कहा कि शिक्षण संस्थानों में पत्रकारिता का इतिहास बताया जा सकता है लेकिन हिंदी पत्रकारिता की जमीन गांवों को नजदीक से जानकर ही तैयार की जा सकती है। समाचारों के 'लोकलाइजेशन' को गलत बताते हुए कहा कि अति आंचलिकता से बचकर ही हम जरूरी समाचार पाठकों तक पहुंचा सकेंगे। श्री सिंह ने हिंदी पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल बताते हुए कहा कि जो समस्याएं व कमियां हैं उसे परस्पर संवाद कर दूर करने का प्रयास होना चाहिए।

विशिष्ट अतिथि उत्तर प्रदेश पत्रकार मान्यता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने कहा कि हम पत्रकारों के सम्मान व सुविधा के लिए संघर्षरत हैं। राज्य मुख्यालय पर वरिष्ठ पत्रकारों को मान्यता व न्यूनतम सुविधाएं मुहैया करा पाने में सफलता मिली है। ऐसी ही व्यवस्था मण्डल व जिला मुख्यालयों तक हो इसका प्रयास जारी है। श्री तिवारी ने कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हिंदी पत्रकारिता से जुड़े लोगों की राह में तमाम मुश्किलें हैं। जहां तक गिरावट की बात है तो हिंदी पत्रकारिता में अभी भी अपेक्षाकृत काफी गनीमत है।

विशिष्ट अतिथि बीएचयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कांग्रेसी नेता चंचल कुमार सिंह ने हिंदी पत्रकारिता जगत में व्याप्त खामियों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण सुनाते हुए चार-पांच दशक पूर्व व आज की पत्रकारिता में आए उतार-चढ़ाव का विस्तार से जिक्र किया। इसके पूर्व हिंदी पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान देने वाले वरिष्ठ पत्रकार चंद्रेश मिश्रा, विनय कुमार गुप्त, कन्हैयालाल गोप, हरिश्चंद्र श्रीवास्तव, गौरीशंकर त्रिपाठी को जौनपुर पत्रकार संघ द्वारा स्मृति चिह्न व अंग वस्त्रम देकर सम्मानित किया गया।

अतिथियों का स्वागत करते हुए संगठन के जिलाध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह ने हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं का विस्तार से वर्णन करते हुए उनका ध्यान आकृष्ट कराया। उन्होंने पत्रकारों को भी एक आचार संहिता के तहत कार्य करने का सुझाव दिया। वरिष्ठ पत्रकार लोलारक दूबे, राजेंद्र सिंह ने मुख्य अतिथि को स्मृति चिह्न व अंग वस्त्रम प्रदान कर सम्मानित किया। मनोज वत्स ने अभिनंदन पत्र पढ़ा। कपिलदेव मौर्य, आईबी सिंह, त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, शशिमोहन सिंह क्षेम, अखिलेश तिवारी 'अकेला', राजेश गुप्ता, आरिफ हुसैनी, मो.अब्बास, रितुराज सिंह, राजेश श्रीवास्तव आदि ने माल्यार्पण कर स्वागत किया। बड़ी तादाद में ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकार भी मौजूद रहे। अध्यक्षता पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद, संचालन मधुकर तिवारी व आभार ज्ञापन कमर हसनैन दीपू ने किया। (जागरण)

एसपी ने पत्रकारों के कैमरे जब्‍त किए, जेल में बंद करने की धमकी दी

जगदलपुर : दरभा में नक्सल हमले की जांच के लिये पहुंची एनआईए की टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे पत्रकारों और फोटोग्राफरों के कैमरे पुलिस ने जप्त कर लिये. जिले के एसपी अभिषेक शांडिल्य ने पत्रकारों को जेल में बंद करने की भी धमकी दी. इधर एनआईए की टीम सबूतों के नष्ट हो जाने की आशंका से परेशान है.

दरभा घाटी में नक्सल हमले के बाद मीडिया और दूसरे लोगों के आने-जाने का रेला लगे रहने से सबूत नष्ट होने की आशंका को लेकर केंद्र सरकार फिक्रमंद है. केंद्र की ओर से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से फोन पर बात कर इस बात की चिंता जताई गई है. बताया गया कि कांग्रेस नेताओं के काफिले पर गोलीबारी से पहले नक्सलियों ने विस्फोट भी किया था. इससे सड़क पर एक बड़ा गड्ढ़ा हो गया था. लेकिन मार्ग से आने-जाने में वाहनों को दिक्कत बताकर गड्ढ़े को पाट दिया गया. एनआईए ने भी इस पर नाराजगी जताई.

दरभा घाटी में कांग्रेस नेतओं के काफिले पर नक्सलियों द्वारा किए गए हमले में 29 लोग मारे गए हैं. केंद्र सरकार ने इसकी जांच का जिम्मा राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी को सौंपा है. एनआईए की टीम जांच करने के लिए वहां पहुंच गई है. गोलीबारी और विस्फोट में कई वाहनों के परखच्चे उड़ गए थे. इसी तरह मानव अंग भी इधर-उधर बिखरे पड़े थे. लेकिन मीडिया और दूसरे लोगों के आने-जाने से हमले के सबूत धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं. केंद्र सरकार ने इस पर चिंता जताते हुए कहा है कि सबूत नष्ट होने से जांच पर असर पड़ेगा. केंद्र सरकार की ओर से मुख्यमंत्री से भी इस बारे में चिंता जताई गई है.

इधर गुरुवार को एनआईए की टीम जांच के लिए सुकमा पहुंची. टीम एसपी दफ्तर पहुंचकर घटना से जुड़े दस्तावेज हासिल कर रही थी. वहां पर मीडिया के लोग भी पहुंच गए और फोटोग्राफ्स लेने लगे. बताया गया कि मीडिया के लोग जांच दल की कार्रवाई को दूर से ही कवर कर रहे थे. इस दौरान वहां एसपी अभिषेक शांडिल्य पहुंचे और कैमरे जब्त कर लिए. उन्होंने पत्रकारों को जेल में बंद करने की भी धमकी दी. घटना के बाद पत्रकारों में काफी आक्रोश है. श्रमजीवी पत्रकार संघ ने घटना की जानकारी मुख्य सचिव कार्यालय भेजी है. साथ ही डीजीपी के नाम ज्ञापन भी सौंपा है. (छख)

क्‍या निशीथ जोशी पर रुद्रेश के ये आरोप सही हैं या साजिश?

अमर उजाला, नोएडा में जूनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत रुद्रेश सिंह ने बनारस के पूर्व संपादक निशीथ जोशी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. रुद्रेश ने यह आरोप अपना तबादला वाराणसी से नोएडा होने तथा ज्‍वाइन करके वापस बनारस आने के बाद लगाए हैं. अब ये आरोप कितने सही हैं और कितने गलत हैं यह तो जांच का विषय है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि कहीं यह निशीथ जोशी के खिलाफ कोई साजिश तो नहीं है. सवाल दोनों तरफ से खुले हुए हैं कि इस मामले में सही कौन है और गलत कौन है? आप भी पढि़ए रुद्रेश का पत्र… 

आदरणीय श्री राजुल माहेश्‍वरी जी,
प्रबंध निदेशक, अमर उजाला,

सुना था किसी संस्‍थान का मालिक भगवान स्‍वरूप होता है। कुछ इसी आशा और विश्‍वास से आपके बनारस यूनिट में तैनात एक छोटे पद का कर्मचारी अपनी समस्‍याओं को लिख रहा है, जिससे उसे न्‍याय मिल सके। मामला आपके निर्वतमान संपादक श्री निशीथ जोशी से जुड़ा है जो सहारा और माया पत्रिका में आरोपित होकर निकाले जाने के बाद आपके संस्‍थान में काम कर रहे हैं। ज्ञात हो कि अप्रैल माह में वाराणसी के सोनारपुरा स्थित एक विधवा बंगाली महिला के मकान पर काशीवास की इच्‍छा से श्रीजोशी ने अमर उजाला में खबर छापकर कब्‍जा करने का प्रयास किया। इसके लिए बनारस में तैनात क्राइम रिपोर्टर अजीत सिंह ने भरपूर सहयोग किया। जब सहयोग की इच्‍छा रुद्रेश सिंह से जाहिर की गयी तो उन्‍होंने साफ इनकार कर दिया। इस पर उन्‍हें अंजाम भुगतने की चेतावनी दी गयी। अपने नौ माह के कार्यकाल में श्री जोशी ने कर्मचारियों को आपस में लड़ाने की कवायद की, अखबार के हित में कुछ भी नहीं किया।

एक अन्‍य प्रकरण में सनबीम ग्रुप के चेयरमैन दीपक मधोक के स्‍कूल के खिलाफ खबरों को प्रकाशित कर उन्‍हें भी अरदब में लेने का प्रयास किया गया, लेकिन ऊंची रसूख का होने के चलते मधोक पर जोशी की दाल नहीं गली और 23 अप्रैल को बनारस यूनिट में मधोक के साथ घंटों मीटिंग के बाद फैसला हुआ कि मधोक के खिलाफ अब कोई खबर नहीं छपेगी। इसका निर्देश मीटिंग सभी रिपोर्टरों को दिया गया। इसके अलावा बनारस में एक पेट्रोल पंप पर कुछ अनबन होने के बाद श्री जोशी ने लगभग एक पखवारे तक पेट्रोल डीलरों के खिलाफ खबर छपवायी। अंतत: एसोसिएशन के लोग चांदपुर कार्यालय में जाकर माफी मांगी उसके बाद खिलाफ में खबरों का सिलसिला रुका। ऐसे तमाम नजीर हैं, जिसपर एक दागी संपादक ने कवायद कर अपने हित के अखबारी मानदंडों की बलि दी।

अत: आपसे निवेदन है कि इस प्रकरण में आपके संस्‍थान के एक छोटे से कर्मचारी की बलि दी जा रही है, जिसका इंप्‍लाई कोड vn/684 और नोयडा में hq/2823 है। पैसे की किल्‍लत और सेम सेलरी पर गुजारा करने पर असमर्थ ये कर्मचारी 24 जून को 25 दिन नौकरी करने के बाद बनारस के लिए विदा हो गया। इस दौरान एचआर वैभव वशिष्‍ठ ने इस्‍तीफा लिखवाने का पुरजोर प्रयास किया। और कहा कि मैं ये लिखूं कि मैं अपने परिवारिक कारणों से संस्‍थान छोड़ रहा हैं। अपके कर्मचारी ने साफतौर मना कर दिया तो सैलरी एडवांस के नाम पर सादे पेपर पर हस्‍ताक्षर कराया गया, उसका क्‍या प्रयोग किया जायेगा पता नहीं। अत: आपसे निवेदन है कि इस प्रकरण की जांच कराकर न्‍याय करें, जिससे अखबार की गरिमा बनी रहे।

रुद्रेश सिंह
अमर उजाला

क्‍या एक दिन के अवकाश से बदल जाएगा पुलिस का व्‍यवहार?

क्‍या एक दिन की साप्‍ताहिक अवकाश और कार्यशाला पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार ला सकती है. आजकल इसी बात को लेकर लखनऊ में खासा चर्चा है. लखनऊ में पुलिसकर्मियों के व्‍यवहार तथा कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए यह प्रयोग होने जा रहा है ताकि साल के सभी दिन काम करने वाले पुलिसकर्मियों को तनाव से मुक्ति मिल सके. और वे बेहतर काम करने के साथ बेहतर व्‍यवहार भी करें. इसकी शुरुआत लखनऊ के गोमतीनगर थाने से होगी.

पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है. पुलिस के व्‍यवहार में सुधार लाने के लिए कर्मियों को ट्रेनिंग एवं कार्यशाला के जरिए प्रशिक्षित किए जाने की भी योजना लागू की जा रही है. इस योजना के अंतर्गत बड़े जिलों को तीन लाख, मझोले जिलों को दो लाख तथा छोटे जिलों को एक लाख रुपये दिए जा रहे हैं ताकि वहां पुलिस के लिए कार्यशालाओं का आयोजन कर उन्‍हें अच्‍छे व्‍यवहार की ट्रेनिंग दिलाई जा सके.

इसी कड़ी में लखनऊ में अब पुलिसकर्मियों को अवकाश दिए जाने की तैयारी चल रही है. सरकारी तथा गैरसरकारी कार्यालयों में अधिकारी से लेकर चपरासी तक को साप्‍ताहिक अवकाश मिलता है, लेकिन पुलिस वाले इससे वंचित रहते हैं. वे हमेशा ड्यूटी पर रहते हैं. वे पर्व-त्‍योहारों पर भी अपने परिवारों से दूर रहे हैं, लिहाजा वे तनाव की स्थिति में पहुंच जाते हैं. काम का बोझ उनके काम के तरीके और व्‍यवहार पर भी असर डालता है. इसलिए अब सप्‍ताह में एक दिन अवकाश दिया जाएगा.

इस योजना की शुरुआत पायलट प्रोजेक्‍ट के तौर पर गोमतीनगर थाने से एक जून से होने जा रही है. यहां तैनात सभी पुलिसवालों को सप्‍ताह में एक दिन अवकाश दिया जाएगा. अगर यह योजना सफल रही तो इसे अन्‍य थानों उसके बाद जिलों में लागू किया जाएगा. अक्सर सड़कों पर पुलिस वालों को मारपीट करते या फिर जनता से उलझते देखा जाता है. कभी-कभी तो वर्दी वाले आपस में ही उलझ पड़ते हैं. हालांकि इन सबके बाद भी एक बड़ा सवाल यह है कि हराम की चीजें और पैसे खाने की आदती हो चुकी यूपी पुलिस क्‍या एक अवकाश और ट्रेनिंग से सचमुच बदल जाएगी?

अपनी ही नातिन को गर्भवती कर हत्‍या करने वाले ‘भैया राजा’ को उम्र कैद

भोपाल। पिछले साढ़े 4 साल से सुर्खियों में रहे वसुंधरा हत्याकांड में आरोपी पूर्व विधायक और मध्यप्रदेश के बाहुबली नेताओं में शुमार अशोक वीर विक्रम सिंह उर्फ भैया राजा को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। इस मामले में तीन अन्य आरोपियों पंकज शुक्ला, भैया राजा के नौकर अभिमन्यु और ड्राइवर हल्के उर्फ भूपेंद्र को भी उम्र कैद की सजा सुनाई गई है। कोर्ट ने भैया राजा की भतीजी रमती बाई और नेहा को बाल संरक्षण गृह भेजने के आदेश दिए हैं।

उल्लेखनीय है 11 दिसंबर 2009 को मिसरोद इलाके के गुडारी घाट में फैशन डिजाइनिंग की छात्रा वसुंधरा की लाश मिली थी। पुलिस ने इस मामले में 18 मार्च 2010 को जिला अदालत में चालान पेश किया था। वसुंधरा की मां भारती ने कोर्ट को बताया था कि उनकी बेटी पर भैया राजा की बुरी नजर थी। इसे देखते हुए उन्होंने वसुंधरा को भोपाल पढ़ने भेजा था। भैया राजा पर आरोप था कि उन्होंने वसुंधरा के साथ जबर्दस्ती संबंध बनाए और इंदौर में उसका गर्भपात भी कराया।

एडीजे संजीव कालगांवकर की कोर्ट ने सुबह 11.30 बजे ये सजा सुनाई। रिंपी उर्फ रोहिणी को साक्ष्यों के अभाव में दोष मुक्त कर दिया गया। बहुचर्चित वसुंधरा हत्याकांड में कोर्ट के फैसले के मद्देनजर गुरुवार सुबह से ही कोर्ट परिसर को छावनी बना दिया गया था। यहां हर आने जाने वाले की तलाशी ली जा रही थी। जिस कोर्ट में फैसला सुनाया जा रहा था, वहां पूरे गलियारे में किसी को नहीं जाने दिया जा रहा था। जैसे ही मजिस्ट्रेट ने भैया राजा व अन्य अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, भैया राजा मायूस हो गए। कोर्ट रूम के बाहर बैठे उनके परिजन भी निराश हो गए। वे देर तक रोते रहे।

हालांकि जब भैया राजा कोर्ट रूम से बाहर आए तो उनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखी। वे हाथ उठाकर अपने समर्थकों का इस्तकबाल करते देखे गए। फैसले के तुरंत बाद भैया राजा की पत्नी व भाजपा विधायक आशारानी सिंह भी कोर्ट से बाहर निकल गई। उन्होंने इस दौरान मीडिया से भी बातचीत करने से इंकार कर दिया। (भास्‍कर)

आजतक टॉप पर, इंडिया टीवी की दुर्गति जारी

21वें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. आजतक फिर से नम्‍बर एक पर काबिज है. 18वें सप्‍ताह में आजतक दूसरे नम्‍बर पर चला गया था, लेकिन उसके बाद मजबूती से वापसी करते हुए इस चैनल ने दुनिया डूबाने वाले इंडिया टीवी को डूबाकर तीसरे नम्‍बर पर कर दिया था. इंडिया टीवी इस झटके से अब तक उबर नहीं पाया है. वो एबीपी न्‍यूज से पिछड़कर तीसरे स्‍थान पर बना हुआ है. पिछले सप्‍ताह भी इंडिया टीवी तीसरे नम्‍बर पर था. भूत-प्रेत, स्‍वर्ग-सीढ़ी भी इस चैनल के काम नहीं आ रहे हैं. सबसे दिलचस्‍प तथ्‍य यह है कि जब जब टैम के आंकड़ों पर सवाल उठते हैं इंडिया टीवी की टीआरपी गिर जाती है.

जी न्‍यूज आंशिक नुकसान के बाद भी चौथे स्‍थान पर कायम है. इसके बाद न्‍यूज 24, एनडीटीवी और आईबीएन7 का नम्‍बर है. आईबीएन को इस सप्‍ताह झटका लगा है तो डीडी न्‍यूज को इस बार बढ़त मिली है. इंडिया न्‍यूज को इस बार भी नुकसान हुआ है. दीपक चौरसिया के आने के बाद से जिस तरीके से चैनल ने टीआरपी में छलांग लगाई थी, अब उसी रफ्तार से नीचे की तरफ जा रहा है. पी7 इस बार इंडिया न्‍यूज के बिल्‍कुल नजदीक पहुंच गया है. पी7 तेज के साथ संयुक्‍त रूप से दसवें स्‍थान पर काबिज हैं. इसके बाद लाइव इंडिया और सहारा समय का नम्‍बर है. नीचे इक्‍कीसवें सप्‍ताह की टीआरपी….

WK 21 2013, (0600-2400)

Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak – 19.1 up 0.4

ABP News – 16.2 dn 0.1

India TV – 15.2 up 1.2

ZN – 11.0 dn 0.4

News 24 – 7.6 dn 0.1

NDTV – 7.1 up 0.2

IBN7 – 5.8 dn 0.8

DD News – 5.2 up 1.5

India news – 3.9 dn 0.8

P7 news – 3.7 dn 0.8

Tez – 3.7 up 0.5

Live India – 1.8 up 0.3

Samay – 1.6 dn 0.8

राजुल माहेश्‍वरी से रुद्रेश ने कहा – न्‍याय नहीं मिला तो कर लूंगा आत्‍महत्‍या!

ऐसा लग रहा है कि अमर उजाला को भी दैनिक जागरण वाली बीमारी लगती जा रही है. जागरण में परिपाटी रही है कि अगर आपने अपने किसी सीनियर की गलतियों के खिलाफ आवाज उठाई तो बिना कोई सुनवाई हुए आपको बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है. शायद इसके पीछे कारण यह माना जाता है कि जागरण में कार्ड रुपी दाग देकर पत्रकारों को सांड़ की तरह छोड़ दिया जाता है कि जमकर चरो और खाओ और हमको भी खिलाओ, जो भी इन सांड़ों की खिलाफत या शिकायत करता है, जागरण के काजी शिकायतकर्ता को ही बलि का बकरा बना डालते हैं.

ऐसा ही एक वाकया अमर उजाला, नोएडा में देखने को मिल रहा है. जबकि अमर उजाला में कम से कम कर्मचारी स्‍तर पर इस तरह का शोषण पहले कभी नहीं रहा है. बताया जा रहा है कि अपने वरिष्‍ठ के गुस्‍से के शिकार बने पत्रकार ने अमर उजाला के सीएमडी राजुल माहेश्‍वरी को बता दिया है कि अगर उसे न्‍याय नहीं मिला तो वो आत्‍महत्‍या कर लेगा. पत्रकार के इस रूप को देखकर सीएमडी ने उसके साथ पूरी तरह न्‍याय करने की बात कही है. इसके बाद से ही अमर उजाला में हड़कम्‍प मचा हुआ है.

सूत्रों का कहना है कि अमर उजाला, बनारस में जूनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत रुद्रेश सिंह का तबादला पिछले दिनों नोएडा के लिए कर दिया गया था. इस तबादले के पीछे खबर आ रही है कि पूर्व संपादक निथीश जोशी का किसी मामले में विरोध करने के सजा के तौर पर रुद्रेश को नोएडा भेजा गया. हालांकि रुद्रेश को अपने तबादले की जानकारी एक मई को निथिश जोशी ने उस समय दी जब वे अपना चार्ज नए संपादक अजीत वडनेरकर को दे रहे थे. रुद्रेश को यह भी जानकारी दी गई कि नोएडा में उनके वेतन भत्‍ते में बढ़ोत्‍तरी की जाएगी.

इतना सब होने पर रुद्रेश ने तीन मई को नोएडा में ज्‍वाइन भी कर लिया. रुद्रेश काम्‍पैक्‍ट के संपादक मनोज मिश्र को रिपोर्टिंग कर रहे थे. बताया जा रहा है कि 23 मई को नोएडा में एचआर ने रुद्रेश को बुलाकर स्‍पष्‍ट किया कि नोएडा में आपको सेम सैलरी और सेम कंडीशन में बुलाया गया है. इस जानकारी के बाद रुद्रेश ठगे से रह गए. इस दौरान उन्‍होंने कई हजार रुपये नई व्‍यवस्‍था करने में खर्च किए. बताया जा रहा है कि एचआर से जानकारी मिलने के बाद रुद्रेश अगले दिन बनारस लौट आए. इसकी सूचना भी उन्‍होंने अपने वरिष्‍ठों को दे दी.

बताया जा रहा है कि इसके बाद रुद्रेश ने कंपनी के सीएमडी राजुल माहेश्‍वरी को फोन पर सारी बातें बताईं, साथ ही यह भी कहा कि अगर उन्‍हें न्‍याय नहीं मिला तो वे आत्‍महत्‍या कर लेंगे. सूत्रों का कहना है कि राजुल ने रुद्रेश को ऐसा कोई कदम न उठाने की बात कही है साथ ही आश्‍वासन दिया है कि उनके साथ कंपनी पूरा न्‍याय करेगी. उन्‍होंने एचआर हेड वैभव वशिष्‍ठ को पूरे मामले से अवगत कराकर रुद्रेश को न्‍याय दिलाने की बात कही है. अब देखना है कि रूद्रेश के साथ अमर उजाला अपने पुराने स्‍टाइल में न्‍याय करती है या फिर जागरण की तर्ज पर रुद्रेश को ही कंपनी से लेफ्ट-राइट या तेज चल करा देती है.

नक्सल समस्या : आधे-अधूरे संकल्प का दुष्चक्र

बस्तर (छत्तीसगढ़) की जीरम घाटी में हुए भयानक नक्सली हमले के बाद एक बार फिर हुंकार भरी जा रही है कि अब हिंसक नक्सलियों का सफाया कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार के आला हुक्मरान तरह-तरह के लोक लुभावन संकल्प जताते दिखाई पड़ रहे हैं। केंद्रीय सुरक्षा बलों ने बस्तर में हमलावरों की तलाश में एक सघन ‘सर्च आपरेशन’ भी शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एक बार फिर भरोसा दे रहे हैं कि अब सरकार नक्सल समस्या के निपटारे के लिए नए सिरे से निर्णायक पहल शुरू करेगी। ताकि, आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भी विकास की रोशनी जमकर फैल सके।

सरकारी कारिंदों ने नक्सली प्रभाव वाले इलाकों में विकास की गंगा बहाने के लिए एक बार फिर बढ़-चढ़कर लफ्फाजी करने की होड़ लगा दी है। यह भी कहा जा रहा है कि हिंसक नक्सलियों को निपटाने के लिए केंद्र से ज्यादा ‘फौज-फाटा’ लगाया जाएगा। क्योंकि, इन लोगों ने राजनीतिक काफिलों पर घातक हमले शुरू कर दिए हैं। इन्हें बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

याद कीजिए, अप्रैल 2010 में छत्तीसगढ़ के ही दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के एक कैंप में हमला बोला था। इसमें एक साथ 76 जवानों की मौत हो गई थी। इनके आधुनिक हथियार भी नक्सली लूट ले गए थे। इस हमले ने राजसत्ता को सीधे-सीधे एक बड़ी चुनौती दे दी थी। इस दौर में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने संकल्प जताया था कि सुरक्षा बल अब निर्णायक अभियान को पूरा करके ही दम लेंगे। गृह मंत्रालय के आलाधिकारियों ने जानकारी दी थी कि नक्सल विरोधी कारगर अभियान के लिए छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, आंध्र, महाराष्ट्र, झारखंड व मध्य प्रदेश में एकीकृत आपरेशन शुरू किया जाएगा। ताकि, नक्सली दल राज्यों की सीमा की बदली के बावजूद सुरक्षित बच नहीं पाएं।

लेकिन, सरकार का कोई जिम्मेदार शख्स यह सफाई देने को तैयार नहीं है कि आखिर इस तरह के सरकारी संकल्प हर बार आधे-अधूरे क्यों रह जाते हैं? दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ पर बड़ा हमला ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ के खिलाफ दबाव बनाने के लिए ही किया था। इस नक्सल विरोधी कारगर आपरेशन की वजह से कई राज्यों में नक्सली बड़े दबाव में आते जा रहे थे। पश्चिम बंगाल और विदर्भ के इलाके में कई जगह ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ की चपेट में कुछ निर्दोष आदिवासी भी आ गए थे। इसके बाद इस आपरेशन को लेकर कई विवाद शुरू हुए। खास तौर पर तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ के खिलाफ केंद्र पर दबाव बनाया था।

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर इलाके में नक्सलियों की पकड़ काफी मजबूत रही है। लेकिन, चिदंबरम की पहल पर इस क्षेत्र में ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ जोर-शोर से शुरू हुआ था। इसके दबाव में नक्सलियों ने अपनी हिंसक गतिविधियां बढ़ा दी थीं। इस दौर में ममता बनर्जी का रुख नक्सलियों के प्रति कुछ नरम था, ऐसे में उन्होंने यूपीए सरकार पर दबाव बढ़ाया था। यह दबाव इसलिए भी कारगर हुआ था, क्योंकि इस अवधि में तृणमूल कांग्रेस यूपीए सरकार का अहम हिस्सा थी। माना जा रहा है कांग्रेस नेतृत्व ने राजनीतिक समीकरणों का लिहाज करके ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ की रफ्तार धीमी कराई थी।
वामदलों के कई सदस्यों ने संसद में यह सवाल लगातार उठाया है कि सरकार नक्सल समस्या का हल महज सैन्य बलों के जरिए कैसे ढूंढ़ रही है? जबकि, हकीकत यही है कि देश के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में ही नक्सलवाद का ज्यादा प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में, जरूरी है कि सरकारी तंत्र, यह पता करे कि आखिर स्थानीय वंचित वर्ग नक्सलवाद के प्रति आकर्षित क्यों होता है? केंद्र सरकार ने इन इलाकों के विकास के लिए तमाम योजनाएं बनाईं, लेकिन ज्यादा कुछ नहीं हो पाया। क्योंकि, कई राज्यों में केंद्र और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल के बजाए खींचतान की ही स्थिति बनी रही।

अब केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रभारी सुशील कुमार शिंदे हैं। वे पिछले दिनों यह दावा कर रहे थे कि केंद्रीय नक्सल विरोधी अभियानों के चलते तेजी से स्थिति में सुधार आ रहा है। नक्सल प्रभाव वाले इलाकों में कमी आ रही है। इसके लिए वे अपने मंत्रालय की कार्यकुशलता को शाबासी देते नजर आ रहे थे। लेकिन, मंत्री जी जब यह ‘सुहावनी’ तस्वीर पेश कर रहे थे, तो वे कई जमीनी सच्चाईयों को छिपाने की कोशिश जरूर कर रहे थे। वे मीडिया को यह साफ-साफ नहीं बता पाए कि ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ जैसे अभियानों का फलित क्या रहा है? क्या यह सच्चाई नहीं है कि पिछले सालों में राजनीतिक दबावों के चलते इन अभियानों की रफ्तार थामी गई है?

केंद्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने पिछले दिनों यह स्वीकार किया था कि कई राज्यों में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल की कमी से आदिवासी कल्याण की परियोजनाएं ठीक से लागू नहीं हो पाईं। यदि नक्सली इलाकों में स्थानीय प्रशासन का पक्का संकल्प होता, तो कुछ बाधाओं के बावजूद विकास परियोजनाएं ठीक से लागू हो पातीं। छत्तीसगढ़, ओडिशा व झारखंड में तमाम सरकारी दबावों के बावजूद नक्सली आतंक बढ़ा है। इसकी वजह से सड़क, अस्पताल व बिजली जैसी तमाम परियोजनाएं आदिवासी गांवों तक नहीं पहुंच पाई हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह तो खुलकर आरोप लगा चुके हैं कि उनके यहां राजनीतिक कारणों से केंद्र ने पूरा सहयोग नहीं किया। जबकि, दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी यह कहने में नहीं चूकते कि आदिवासी इलाके के विकास के लिए जो पैसा दिल्ली से आता है, उसे रमन सिंह सरकार दूसरे मदों में लगा देती है। इसकी वजह से ही राज्य में नक्सलवाद की समस्या विकट हो चली है।

25 मई को जीरम घाटी में जो नक्सली हमला हुआ, उसमें कांग्रेस के 16 लोग मारे गए हैं। इनमें प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और चर्चित कांग्रेसी महेंद्र कर्मा भी थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं बुजुर्ग नेता विद्या चरण शुक्ला इस हमले में गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इस हमले में 30 लोगों की मौत हुई है। दरअसल, सुकमा से कांग्रेस की ‘परिवर्तन रैली’ का काफिला जगदलपुर की तरफ लौट रहा था। घात लगाकर बैठे नक्सलियों के एक बड़े समूह ने कारों के काफिले पर हमला बोल दिया था। इसको लेकर अब भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों की जंग शुरू हो गई है। इसी साल राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं। सो, चुनावी सियासत का यह एक नया मुद्दा मिल गया है।

कांग्रेस नेतृत्व अपने नेताओं की ‘कुर्बानी’ के जरिए अपना वोट बैंक बढ़ाने की जुगाड़ में है। पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी खुलकर कह रहे हैं कि इस हमले के पीछे कहीं न कहीं सरकार के लोगों की भी साजिश रही है। कांग्रेस की इस सियासत पर भाजपा नेतृत्व ‘हाय-हाय’ करने लगा है। मुख्यमंत्री रमन सिंह, कांग्रेस के तमाम आरोपों से झल्लाकर कह रहे हैं कि कम से कम लाशों के ऊपर तो सियासत न की जाए। एक तरफ वोट बैंक की रणनीति के दांव-पेंच हैं, तो दूसरी तरफ दोनों सरकारें फिर से नक्सलियों के सफाए के लिए कई आपरेशन चलवाने के संकल्प जता रही हैं। लेकिन, राज व्यवस्था के संचालक नक्सली समस्या की मूल जड़ की तलाश में नहीं जाना चाहते। सभी इस हकीकत को जानते हैं कि नक्सलवाद कोई सामान्य कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है। जब तक आदिवासी और वंचित वर्गों के खिलाफ नाइंसाफी का भाव रहेगा, तब तक नक्सलवाद की जड़ें पनपती रहेंगी। इसे आप गोली-बारूद की ताकत से थाम नहीं सकते। यदि ऐसा हो पाता, तो देश के करीब 200 जिलों में नक्सलवाद के हिंसक डैने इतने नहीं फैल गए होते!

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

स्‍टार प्‍लस नम्‍बर वन, 12 सप्‍ताह बाद कलर्स पहुंचा दूसरे नम्‍बर पर

12 सप्‍ताह के लंबे अंतराल के बाद कलर्स टीवी ने दो पोजिशन पर वापसी की है. वो जी टीवी के साथ संयुक्‍त रूप से दूसरे स्‍थान पर बना हुआ है. जनरल इंटरटनेमेंट चैनलों की कटेगरी में स्‍टार प्‍लस 21वें सप्‍ताह भी नम्‍बर वन बना हुआ है. आईपीएल के ऑफिसियल ब्राडकास्‍टर सोनी मैक्‍स और सोनी सिक्‍स को इस सप्‍ताह नुकसान हुआ है. टैम रेटिंग के अनुसार सीएस 4प्‍लस में स्‍टार प्‍लस दूसरे नम्‍बर पर मौजूद चैनलों से बड़ी बढ़त ले ली है.

सोनी टीवी चौथे स्‍थान पर बना हुआ है. सब टीवी पांचवें तथा लाइफ ओके छठे नम्‍बर पर बना हुआ है. इस सप्‍ताह स्‍टार प्‍लस 4 रेटिंग प्‍वाइंट जोड़कर 238 जीआरपी के साथ पहले स्‍थान पर है. पिछले सप्‍ताह इसकी जीआरपी 234 थी. कलर्स बाहर सप्‍ताह बाद दूसरे स्‍थान पर पहुंचा है. 10 अंकों के साथ कलर्स 184 जीआरपी पर पहुंच गया है. पिछले सप्‍ताह इसकी जीआरपी 174 थी. कलर्स के साथ जी टीवी भी संयुक्‍त रूप से दूसरे पोजिशन पर है. जी के भी 184 जीआरपी हैं. पिछले सप्‍ताह भी जी टीवी की जीआरपी इतनी ही थी.

चौथे नम्‍बर मौजूद सोनी टीवी को तीन अंकों का नुकसान हुआ है. पिछले सप्‍ताह में 152 जीआरपी था जो इस सप्‍ताह घटकर 149 पर पहुंच गया है. सब टीवी को इस सप्‍ताह मामूली अंकों का लाभ हुआ है. 135 जीआरपी के साथ सब टीवी पांचवें स्‍थान पर मौजूद है. पिछले सप्‍ताह सब टीवी की जीआरपी 132 थी. लाइफ ओके चैनल इस सप्‍ताह 8 अंकों की बढ़त के साथ सब टीवी के नजदीक पहुंच गया है. लाइफ ओके 130 जीआरपी के साथ छठे स्‍थान पर मौजूद है. पिछले सप्‍ताह इसकी जीआरपी 122 थी.

यूपी में ईटीवी, जी न्‍यूज एवं समाचार प्‍लस के बीच कड़ा मुकाबला

यूपी के रीजनल चैनलों की 21वें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. यूपी में तीन चैनलों के बीच जमकर प्रतिस्‍पर्धा हो रही है. पिछले सप्‍ताह नम्‍बर एक पर रहा जी न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड अब दूसरे नम्‍बर पर पहुंच गया है. वहीं ईटीवी ने एक बार फिर पहले स्‍थान पर कब्‍जा कर लिया है. 18वें सप्‍ताह में दूसरे नम्‍बर रहा समाचार प्‍लस आंशिक नुकसान के साथ तीसरे स्‍थान पर आ गया है. ईटीवी, जी न्‍यूज और समाचार प्‍लस के बीच पिछले कुछ सप्‍ताह में जोरदार मुकाबला चल रहा है.

सहारा यूपी-उत्‍तराखंड, श्री न्यूज एवं साधना जैसे चैनल काफी पीछे हैं. इंडिया न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड की स्थिति खराब है. नीचे यूपी के रीजनल चैनलों की टीआरपी…

ETV – 5.4

ZEE NEWS – 4.73

SAMACHAR PLUS – 3.0

SAHARA – 1.79

SHRI – 1.02

SADHANA – 0.86

INDIA NEWS – 0.51

हिंदुस्‍तान में भी बंटने लगा इंक्रीमेंट और प्रमोशन लेटर

दैनिक जागरण के बाद अब हिंदुस्‍तान में भी इंक्रीमेंट और प्रमोशन का लिस्‍ट जारी होने लगा है. संभावना है कि सभी यूनिटों तक अगले महीने की दस तारीख तक सभी को इंक्रीमेंट तथा प्रमोशन लेटर पहुंच जाएगा. फिलहाल अभी दिल्‍ली में इंक्रीमेंट एवं प्रमोशन लेटर बंटने की शुरुआत हुई है. शुरुआती खबरों से पता चल रहा है कि इंक्रीमेंट और प्रमोशन लोगों को संतुष्‍ट कर पाने में बहुत समक्ष नहीं है. हालांकि अभी तो शुरुआत है, पूरी स्थिति अन्‍य यूनिटों को लेटर पहुंच जाने के बाद पता चलेगी.

सूत्र बता रहे हैं कि हिंदुस्‍तान के अन्‍य यूनिटों को इंक्रीमेंट लेटर डिस्‍पैच किए जा रहे हैं. दिल्‍ली से जो पहली सूचना आ रही है उसके अनुसार कार्यकारी संपादक सुधांशु श्रीवास्‍तव की भतीजी व्‍योमा श्रीवास्‍तव को प्रमोट करके सीनियर कॉपी एडिटर बना दिया गया है.

मीडिया तो अब काले धन की गोद में बैठी है

मीडिया के बाबत कुछ कहते हुए अब हिचक होती है। अब कुछ कहते हुए कलेजा कांपता है। पर सच है तो कहना भी ज़रुरी है। इस की तफ़सील बहुत सारी हैं पर जो एक लाइन में कहना हो तो कहूंगा कि मीडिया अब काले धन की गोद में बैठी है। मीडिया मतलब अखबार, चैनल, सिनेमा सभी। काले धन की जैसे हर जगह बाढ आ गई सी है।

धरती बदली, पानी बदला, वायुमंडल बदला और यह मीडिया भी। पर्यावरण संतुलन सब का ही बिगड़ा है। पर इन सब की तुलना में मीडिया का पर्यावरण संतुलन बेहिसाब बिगड़ा है। कार्बन इतना इकट्ठा हो गया है कि मीडिया की सांस बची भी है कि नहीं कहना मुश्किल है। आक्सीजन समाप्त है यह भी तय है। इसी लिए मीडिया के सरोकार भी समाप्त हैं। सामाजिक सरोकार की जगह अब सिनेमाई सरोकार मीडिया में घर कर गए हैं। मीडिया में अब क्रिकेट, अपराध और राजनीति की छौंक के साथ सिनेमाई सरोकार की जुगलबंदी अपने चरम पर है।

हद तो यह है कि जो काम मीडिया को करना चाहिए था, अखबारों और खबरिया चैनलों को व्यापक तौर पर करना चाहिए था, वह काम अब मनोरंजन की दुनिया के आमिर खान कर रहे हैं, बरास्ता सत्यमेव जयते। हालां कि वह भी अंगुली कटवा कर शहीद बनने का ही उपक्रम कर रहे हैं। एक नई दुकान चला रहे हैं। लोग भूल गए हैं कि कि कभी यही काम दूरदर्शन पर एक समय कमलेश्वर अपने परिक्रमा कार्यक्रम के तहत बडी शिद्दत और तल्खी से कर गए हैं। लेकिन तब दूरदर्शन की या चैनलों की इतनी पैठ और पहुंच नहीं थी। फिर इसी काम को एक समय दूरदर्शन पर ही मन्नू भंडारी की स्क्रिप्ट पर बासु चटर्जी ने रजनी धारावाहिक नाम से किया। जिस में विजय तेंदुलकर की बेटी प्रिया तेंदुलकर आमिर खान वाली भूमिका में कहीं ज़्यादा तल्ख ढंग से समस्याओं को ले कर उपस्थित होती थीं। बाद के दिनों में मेट्रो दूरदर्शन पर एक समय विनोद दुआ परख पर ऐसे ही विषयों को ले कर थोडी मुलायमियत के साथ आते रहे थे।

खबरिया चैनलों का तब न ज़माना था, न ऐसा आतंक। पर अपनी सीमाओं में सही लोग सरोकार से मुठभेड़ करते दिखते थे। हां, यह ज़रूर है कि आमिर खान की तरह कार्यक्रमों की इस तरह पैकेजिंग या मार्केटिंग कर करोड़ों रुपए कमाने की ललक में शायद नहीं ही थे यह लोग। आप जानते ही हैं कि प्रति एपिसोड आमिर खान तीन करोड़ लेते हैं सत्यमेव जयते कहने के लिए। अभी तक सब को करोड़पति बनने का सपना बेचने के लिए अमिताभ बच्चन प्रति एपीसोड डेढ़ करोड़ रुपया लेते रहे हैं। खैर। कुछ दूसरे मसलों पर ही सही एन. डी. टी.वी पर कभी-कभार रवीश कुमार भी जब-तब एक रिपोर्ट ले कर उपस्थित होते रहते हैं। जिस में कभी-कभार सरोकार झलक जाता है।

समूचे देश में शिक्षा और चिकित्सा आम आदमी से कैसे तो दूर हो गए हैं कि एक ईमानदार आदमी न तो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकता है न अच्छी चिकित्सा पा सकता है। शिक्षा के नाम पर स्कूल और कालेज तथा चिकित्सा के नाम पर बडे या छोटे अस्पताल लूट के सब से बडे अड्डे बन गए हैं। पर किसी मीडिया या सरकार के पास इस की कोई कैफ़ियत या विरोध है भला? बल्कि इस लूट के अड्डों को यह सब मिल कर सुरक्षा देने में लग गए हैं।

एक समय मीडिया को प्रेस नाम से जाना जाता था। यह शब्द अंग्रेजी से आया था। हुआ यह कि पहले छपाई की जो प्रक्रिया थी वह दबा कर ही होती थी। मतलब प्रेस कर के। तो मान लिया गया कि प्रेस का काम दबाव बनाना है। और फिर प्रेस नाम देखते ही देखते लोकप्रिय हो गया। अंगरेजी, हिंदी हर कहीं प्रेस शब्द पॉपुलर हो गया। लेकिन बाद के दिनों मे मीडियम बढ़ते गए। लेखन, थिएटर, संगीत, पेंटिंग आदि माध्यम तो पहले ही से थे पर यह प्रेस के लिए नहीं वरन कला आदि के नाम पर जीवित थे। खैर, अखबार से बात आगे बढ़ी। रेडियो आ गया। सिनेमा आ गया। फिर टी.वी आ गया। अब वेब मीडिया भी आ गया है। इस  वेब मीडिया के भी कई-कई रुप हो गए हैं। पोर्टल, वेबसाइट, ब्लाग, आर्कुट, फ़ेसबुक, ट्विटर आदि-इत्यादि। किस्सा कोताह यह कि अब प्रेस मीडिया के रुप में हमारे सामने उपस्थित है। और उस के 'प्रेस' का मिजाज और रंग अब उलटा हो चला है। पहले मीडिया लोगों पर दबाव बनाने के लिए जाना जाता था, अब मीडिया को हम विभिन्न दबाव में काम करते हुए देखते हैं। और उस के काम का जो हासिल है वह भी अब किस खाते में रखा जाए यह भी एक यक्ष प्रश्न है। अखबारों और चैनलों में काम करने की नित नई तकनीक ईजाद होती जा रही हैं। काम बहुत आसान होता जा रहा है। पर सामाजिक सरोकार शून्य हो गया है।

हमारे देश में एक-दो बहुत बड़े भ्रम हैं। जैसे कि हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। जब कि नहीं है। कम से कम संवैधानिक हिसाब से तो बिलकुल नहीं। हमारे पास खेल से लगायत, पशु-पक्षी तक राष्ट्रीय हैं पर कोई एक राष्ट्रीय भाषा नहीं है। जाने कैसे कभी मैथिली शरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर या सोहनलाल द्विवेदी तक को राष्ट्रकवि का दर्जा दिया गया था। खैर इसी तरह का एक और बहुत बड़ा भ्रम है कि प्रेस हमारा चौथा स्तंभ है। जब कि सच यही है कि हमारे संविधान में किसी चौथा स्तंभ की कल्पना तक नहीं है। सिर्फ़ तीन ही स्तंभ हैं। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। बस। चौथा खंभा तो बस एक कल्पना भर है। और  सचाई यह है कि प्रेस हमारे यहां चौथा खंभा के नाम पर पहले भी पूंजीपतियों का खंभा था और आज भी पूंजीपतियों का ही खंभा है। हां, पहले कम से कम यह ज़रुर था कि जैसे आज प्रेस के नाम पर अखबार या चैनल दुकान बन गए हैं, कारपोरेट हाऊस या उस के प्रवक्ता बन गए हैं, यह पहले के दिनों में नहीं था। पहले भी अखबार पूंजीपति ही निकालते थे पर कुछ सरोकार, कुछ नैतिकता आदि के पाठ हाथी के दांत के तौर पर ही सही थे।

पहले भी पूंजीपति अखबार को अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए ही निकालते थे, धर्मखाते में नहीं। पर आज? आज तो हालत यह है कि एक से एक लुच्चे, गिरहकट, माफ़िया, बिल्डर आदि भी अखबार निकाल रहे हैं, चैनल चला रहे हैं और एक से एक मेधावी पत्रकार वहां कहांरों की तरह पानी भर रहे हैं या उन के लायजनिंग की डोली उठा रहे हैं। और सेबी से लगायत, चुनाव आयोग और प्रेस कौंसिल तक पेड न्यूज़ की बरसात पर नख-दंत-विहीन चिंता की झड़ी लगा चुके हैं। पर हालात मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की सरीखी हो गई है। नौबत यह आ गई है कि अखबार या चैनल अब काला धन को सफ़ेद करने के सब से बड़े औज़ार के रुप में हमारे समाज में उपस्थित हुए हैं। और इन काले धन के सौदागरों के सामने पत्रकार कहे जाने पालतू बन गए हैं। पालतू बन कर कुत्तों की वफ़ादारी को भी मात दिए हुए हैं यह पत्रकार कहे जाने वाले लोग। संपादक नाम की संस्था समाप्त हो चुकी है। सब से बुरी स्थिति तो पत्रकारिता पढ़ रहे विद्यार्थियों की है। पाठ्यक्रम में उन्हें गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, पराड़कर, रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर आदि सरीखों की बात पढ़ाई जाती है और जब वह पत्रकारिता करने आते हैं तो गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी या पराड़कर, जोशी या माथुर जैसों की जगह राजीव शुक्ला, रजत शर्मा, बरखा दत्त, प्रभु चावला आदि जैसों से मुलाकात होती है और उन के जैसे बनने की तमन्ना दिल में जागने लगती है। अंतत: ज़्यादातर फ़्रस्ट्रेशन के शिकार होते है। बिलकुल फ़िल्मों की तरह। कि बनने जाते हैं हीरो और एक्स्ट्रा बन कर रह जाते हैं। सो इन में भी ज़्यादातर पत्रकारिता छोड़ कर किसी और रोजगार में जाने को विवश हो जाते हैं।

सोचिए कि नोएडा में देश के ज़्यादातर न्यूज़ चैनलों के दफ़्तर-स्टूडियो हैं। ढेर सारे अखबारों के दफ़्तर भी। पर एक समय इसी नोएडा में निठारी कांड हुआ था। लगातार दो साल तक बच्चे गायब होते रहे। अखबारों में, पुलिस में केस दर्ज होने के बाद छिटपुट छोटी-छोटी खबरें भी यदा- कदा उन की गुमशुदगी की छपती रहीं। पर लगातार बच्चे गायब होने के बावजूद किसी अखबार या चैनल ने इस खबर की पड़ताल करने की ज़रुरत नहीं समझी। इस लिए कि यहां से गरीबों के बच्चे गायब हो रहे थे और इन्हें पकी-पकाई खबर कोई फ़ीड नहीं कर रहा था। जब बच्चों के कंकाल मिलने शुरु हुए तब इस सो काल्ड मीडिया की नींद टूटी और यह बात खबर बनी। लेकिन तब तक जाने कितने घरों के चिराग और लाज उजड़ चुके थे। सोचिए कि समय रहते यह मीडिया अगर जाग गया होता तो कितने लाडले और बेटियां बच गई होतीं।

अभी बहुत दिन नहीं हुए कामनवेल्थ गेम में घपलों की फ़ेहरिस्त जाने हम लोगों को। ऐन दिल्ली की नाक के नीचे यह सब होता रहा, पर मीडिया के कान में जूं नहीं रेंगा। देश की लाज जाते-जाते बची। लेकिन यह घपले क्या समय रहते सामने आए? नहीं और बिलकुल नहीं। वह तो टाइम्स आफ़ इंडिया के व्यावसायिक हित सामने आ गए और सुरेश कलमाडी के हितों से टकरा गए। टाइम्स ग्रुप को कामनवेल्थ गेम की पब्लिसिटी का ठेका चाहिए था। कलमाडी ने आदतन सुविधा शुल्क मांग लिया और कुछ ज़्यादा ही मांग लिया। बात नहीं बनी। और टाइम्स ग्रुप नहा धो कर कलमाडी के पीछे पड़ गया।  तो धीरे-धीरे सभी मीडिया को आना पड़ा। कलई खुल गई। नहीं अगर कलमाडी जो टाइम्स ग्रुप से बिना सुविधा शुल्क लिए उसे पब्लिसिटी का ठेका जो दे ही दिए होते तो क्या तब भी कामनवेल्थ घोटाला सामने आ पाया होता भला? कहना कठिन है। तिस पर तुर्रा देखिए कि अब कलमाडी ज़मानत पर जेल से बाहर हैं और ओलंपिक में जाने की दहाड़ ही नहीं मार रहे, खेल मंत्री की टोका-टाकी से भड़क कर अदालत की अवमानना की दुहाई दे कर खेल मंत्री माकन का इस्तीफ़ा भी मांग रहे हैं। और यह बेशर्म मीडिया उन का यह बयान तो दिखाता है पर कलमाडी से प्रति-प्रश्न करने की हैसियत में भी नहीं है। यह कौन सा मीडिया है?

दरअसल इस मीडिया को व्यावसायिकता के फ़न ने डस लिया है। चहुं ओर बस पैसा और पैकेज की होड़ मची है। मीडिया घरानों ने सामाजिक सरोकार की खबरों को जिस तरह रौंदा है और राजनीतिक और अफ़सरशाही के भ्रष्टाचार को जिस तरह परदेदारी की गिरह में बांधा है, वह किसी भी स्वस्थ समाज को अस्वस्थ बना देने, उसे मार डालने के लिए काफी है। यह जो चौतरफ़ा भ्रष्टाचार की विष-बेल लहलहा रही है तो यह आज की कारपोरेट मीडिया का ही कमाल है। नहीं इतने सारे अखबारों और चैनलों की भीड़ के बावजूद यह कैसे हो जाता है कि नीरा राडिया जैसी विष-कन्या न सिर्फ़ राजनीतिक हलकों, कारपोरेट हलकों में अपनी तूती बजाती फिरती है बल्कि मीडिया को भी कुत्ता बना कर लगातार पुचकारती फिरती है। प्रभा दत्त जैसी बहादुर पत्रकार की बेटी बरखा दत्त को भी दलाली की सिरमौर बना देती है। वह बरखा दत्त जिस की मां प्रभा दत्त खतरों से खेल कर 1971 के युद्ध में जा कर युद्ध की खबरें भेजती है।

संपादक मना करता है युद्ध की रिपोर्ट पर जाने के लिए तो वह छुट्टी ले कर मोर्चे पर पहुंच जाती है रिपोर्ट करने। उसी प्रभा दत्त की बेटी बरखा भी कारगिल मोर्चे पर जा कर तोपों की गड़गड़ाहट के बीच बंकर में बैठ कर रिपोर्ट करती है और पद्मश्री का खिताब भी पाती है। पर जब नीरा राडिया के राडार पर बरखा दत्त आ जाती है तो बस मत पूछिए। वह शपथ के पहले ही मंत्रियों को उन का पोर्टफ़ोलियो भी बताने लग जाती है। इनकम टैक्स विभाग नीरा राडिया का फ़ोन टेप करता है देशद्रोह की शक में तो मामले कई और भी सामने आ जाते हैं। इनकम टैक्स विभाग बाकायदा प्रेस कांफ़्रेंस कर इस पूरे टेप के मायाजाल को अधिकृत रुप से जारी कर देता है। पर यह टेप किसी भी अखबार, किसी भी चैनल पर एक लाइन की खबर नहीं बनता। सब के सब जैसे आंख मूंद कर यह पूरी खबर पी जाते हैं। सब के अपने-अपने हित हैं। कोई अपने हितों से आखिर टकराए भी कैसे? तो यह क्या है? वेब मीडिया नीरा राडिया के टेप से भर जाता है पर मेन मीडिया कान में तेल डाले पड़ा रहता है। वो तो जब सुब्रमण्यम स्वामी इस मामले को ले कर सुप्रीम कोर्ट में सक्रिय होते हैं और सुप्रीम कोर्ट ए राजा आदि को जेल भेजती है तब मीडिया को लगता है कि कुछ हो गया है। कर्नाटक में, झारखंड में या कहीं भी लाखों करोड़ के घपले भी मीडिया को नहीं दिखते।

इन दिनों हो क्या गया है कि जब तक कोई अदालत या कोई जांच एजेंसी जब तक मीडिया को ब्रीफ़ न करे कोई घोटाला या मामला तब तक मीडिया के लिए कोई खबर नहीं होती। हालत यह है कि मीडिया अपने मालिकों के दबाव में है और मीडिया मालिक सरकारों के दबाव में हैं। जो मीडिया कभी सिस्टम पर दबाव बनाने के लिए मशहूर था, अब वही खुद सिस्टम के दबाव में है। नतीज़ा सामने है। राजनीति और पतित हो गई है, अदालतें बेलगाम हो गई हैं, अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और गरीब होता जाने के लिए दिन-ब-दिन अभिशप्त हो गया है। लगता ही नहीं कि हम किसी लोकतंत्रीय देश या संसदीय गरिमा के तहत जी रहे हैं। जिस की लाठी, उस की भैंस का माहौल बन गया है। लगता ही नहीं कि कानून और संविधान के राज में हम जी रहे हैं। संविधान और कानून तो अब जैसे सिर्फ़ मूर्खों और निर्बल के लिए ही रह गए हैं। देश अब चला रहे हैं माफ़िया, धनपशु और धर्म के ठेकेदार। अंबानी, मित्तल और टाटा की नीतियों से चल रहा यह देश जैसे उन और उन जैसों को और-और अमीर बनाने के लिए ही बना है। लोग भूखों मर रहे हैं तो उन की बला से, अनाज सड़ रहा है तो उन की बला से। मंहगाई बेलगाम हो गई है तो उन की बला से। उन को तो बस अपनी पूंजी और एकाधिपत्य के बढते जाने से ही मतलब है। और जो यह सब स्वच्छंद रुप से चल रहा है तो सिर्फ़ इस लिए कि मीडिया गुलाम हो गई है, माफ़िया की गोद में बैठ गई है। काले धन ने उसे डस लिया है। मीडिया में जो ज़रा भी रीढ़ शेष रही होती तो यह सब कुछ ऐसे और इस तरह तो नहीं ही होता।

मीडिया क्या है?

जैसे कोई हाथी हो और उस पर अंकुश हो। बस मीडिया व्यवस्था का वही अंकुश है। अंकुश है कि हाथी यानी व्यवस्था, यह सिस्टम मदमस्त न हो, अराजक न हो कि अपने ही लोगों को कुचल डाले। शीशा दिखाता रहे कि चेहरा काला है कि साफ। अब इसी भूमिका से मीडिया विरत है। इसी लिए अराजकता और दमन का माहौल हमारे सामने उपस्थित है। सिस्टम और सरकारों को मीडिया का यह रुप शूट करता है। कि उन के गलत को गलत न कहे मीडिया। इस बदलते दौर में शक्ति पुरुष कहिए, सत्ता पुरुष कहिए, ने मीडिया की भूमिका को राजा का बाजा बजा में सीमित कर दिया है। मीडिया की भूमिका अब बस राजा का बाजा बजाने, उन का गुण-गान करने तक सीमित कर दी गई है। वह चाहे उद्योग के राजा हों, राजनीति के राजा हों, क्रिकेट के राजा हों, सिनेमा के राजा हों, धर्म के राजा हों, योग के राजा हों, प्रशासन के राजा हों या किसी और फ़ील्ड के राजा। मीडिया को तो बस उन का गुण-गान करते हुए उन का बाजा बजाना ही है। वह चाहे दस-बीस लाख रुपया वेतन पा रहे हों, चाहे एक हज़ार रुपए वेतन पा रहे हों। काम सब का एक ही है। इसी लिए भ्रष्टाचार की खबरें दब जाती हैं। आती भी हैं कभी-कभार तो ऐसे जैसे कहीं दुर्घटना की खबर हो, दस मरे, बीस घायल के अंदाज़ में। बस बात खत्म। किसी दारोगा या एस.डी.एम के खिलाफ़ भी अब अखबारों में खबर छापने की कूवत नहीं रह गई है। अगर गलती से किसी खबर पर एक दारोगा भी सस्पेंड हो जाता है तो दिन भर ‘खबर का असर’ की पट्टी लहराती रहती है।

अखबारों में भी यही आलम है। मंहगाई पर यह चैनल इस अंदाज़ में बात करते हैं गोया पिकनिक डिसकस कर रहे हों। अखबारों में भी मंहगाई की चर्चा ऐसे मिलती है गोया मोहल्ले की नाली जाम हो गई हो। कहीं भी मंहगाई के खिलाफ़ धावा या मुहिम नहीं दीखती। मंहगाई न हो गई हो लतीफ़ा हो गई हो। सरकार तो जब करेगी तब करेगी पर चैनल वाले साल भर पहले ही से पेट्रोल के सौ रुपए लीटर तक पहुंचने की हुंकार भर रहे हैं और अखबार वाले दुहरा रहे हैं। बताइए कि सात-आठ साल पहले भूसा आटा के दाम पर पहुंच गया, आटा दाल के दाम पर और दाल काजू-बादाम के भाव पहुंच गई। काजू-बादाम सोने के भाव पर और सोना हीरे के भाव पर पहुंच गया। सब्जियों में आग लग गई। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री हर बार चार छ महीने में दाम के गिर जाने के अश्वासन पर आश्वासन देते रहे, पर दाम नीचे नहीं आए, ऊपर और ऊपर होते गए हैं। उलटे दूसरी तरफ़ कृषि मंत्री दूध से चीनी तक के दामों के बढ़ने से पहले ही अब इस के दाम बढ़ेंगे का ऐलान करते रहे। तो क्या कोई किसान या कोई दूधिया बहुत अमीर हो गया – इन अनाज, सब्जी, दूध के दाम बढ़ने से? हां, बिचौलिए ज़रुर अमीर हो गए। हां, किसानों की आत्महत्या की संख्या ज़रुर बढ़ती जा रही है। जनता टैक्स के बोझ से बेदम है और सरकार भ्रष्टाचार के बोझ से। और मीडिया है कि लाफ़्टर चैलेंज के बोझ से खिलखिला रहा है।

लिखते रहें अदम गोंडवी जैसे शायर कि, 'सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं,  दिल पर रख कर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है !…….. पर यह न्यूज़ चैनल तो कामेडी सर्कस दिखा कर आप को हंसाएंगे ही। बताइए भला कि लाइसेंस है न्यूज़ चैनल का पर काम एंटरटेनमेंट चैनल का। न्यूज़ की जगह धारावाहिकों और फ़िल्मों का प्रमोशन, कैटरीना-सलमान के झगड़े, राखी सावंत के नखरे और बदतमीजियां दिखाने में, अमिताभ बच्चन या सचिन तेंदुलकर सरीखों के खांसने-छींकने की खबरों से लदे यह चैनल, सांप बिच्छू की शादी, कुत्ते और लड़की के फेरे, अपराध की खबरों का नाट्य रुपांतरण दिखाने वाले यह चैनल और अखबार समाज को कहां से कहां ले जा रहे हैं? क्यों नहीं इन चैनलों को लाइसेंस देने वाला सूचना प्रसारण मंत्रालय इस पर गौर करता? कि इन के पास न्यूज़ के अलावा सब कुछ है। पर नहीं है तो बस न्यूज़ नहीं है। आधी रात के बाद न्यूज़ के नाम पर फ़र्जी सामानों के अंध्विश्वासी विज्ञापन कथा के कलेवर में कैसे दिखाते हैं यह सारे के सारे चैनल? और जनता को कैसे तो लूटते हैं? कैसे तो रातो-रात निर्मल बाबा से लगायत, आसाराम बापू, स्वामी रामदेव जैसे लोगों की दुकान खडा कर इन्हें सेलीब्रेटी बना देते हैं? बताइए कि जब पूर्व राष्ट्रपति कलाम की तलाशी होती है अमरीकी एयरपोर्ट पर तो संक्षिप्त सी खबर आती है। लेकिन दो कौडी के एक एक्टर शाहरुख खान की वही तलाशी होती है तो जैसे चैनलों पर तूफ़ान बरपा हो जाता है। दिन भर वही खबर चलती रहती है। सचिन तेंदुलकर एक घर खरीदते हैं, उसे बनवाते हैं, अंबानी घर बनवाते हैं, अपनी पत्नी को जन्म-दिन पर जहाज भेंट करते हैं तो क्या यह आधा घंटा का कैप्सूल है इन न्यूज़ चैनलों को दिन भर दिखाने का? यह खबर है? सदी के महानायक बीमार हैं, या कहीं छीक-खांस रहे हैं, यह खबर है? दिन भर दिखाने के लिए? और यह जो ज्योतिष लोग बैठे हैं दुकान खोले? चैनलों के नाम पर जनता को छलते हुए? है किसी की नज़र इस पर?

अखबारों की गति और बुरी है। पैसा दे कर कोई कैसी भी न्यूज़ या विज्ञापन छपवा सकता है और जनता की आंख में धूल झोंक सकता है। है कोई नीति नियंता? कोई नियामक? प्रभाष जोशी पेड न्यूज़ के खिलाफ़ बोलते-बोलते पस्त हो गए। पर यह बेशर्म अखबार मालिकान पूरी बेशर्मी से उन की बात पर मुसकुराते रहे। अंतत: वह विदा हो गए। अब पेड न्यूज़ के खिलाफ़ कोई हल्ला बोलने वाला भी नहीं रहा। तमाम बयान आए, कमेटियां बनीं पर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात। और अब तो पेड न्यूज़ बारहो महीने का खेल हो गया है। यह नहीं कि सिर्फ़ चुनाव के समय और सिर्फ़ राजनीतिक खबरों के ही बाबत। इस वक्त अगर किसी को कोई धोखाधड़ी करनी है तो वह मीडिया के कंधे पर ही बैठ कर करता है। वह चाहे धार्मिक धोखाधड़ी हो, राजनीतिक धोखाधड़ी या औद्योगिक धोखाधड़ी, सिनेमाई धोखाधड़ी या छोटी-मोटी धोखाधड़ी, सब कुछ मीडिया के ही कंधे पर बैठ कर संभव है। गोया मीडिया न हो धोखाधड़ी का प्लेटफ़ार्म हो, धोखाधड़ी का एयरपोर्ट हो, लाइसेंस हो धोखाधड़ी का। जिस की चौखट पर मत्था टेकते ही सारे काम हो जाते हैं। पब्लिसिटी से लगायत पर्देदारी तक के।

मीडिया का यह कौन सा चेहरा है?

गणेश शंकर विद्यार्थी जैसों की आहुति, शहादत क्या इन्हीं दिनों के लिए थी? ऐसा ही समाज रचने के लिए थी? कि काले धन की गोद में बैठ कर अपने सरोकार भूल जाएं? बताइए कि फ़ाइनेंशियल मामलों के दर्जनों चैनल और अखबार हैं। पर कंपनियां देश का कैसे और कितना गुड़-गोबर कर रही हैं है किसी के पास इस का हिसाब या रिपोर्ट? किस लिए छपते हैं यह फ़ाइनेंशियल अखबार और किस लिए चलते हैं यह फ़ाइनेंशियल चैनल? सिर्फ़ कंपनियों का गुड-गुड दिखाने के लिए? गरीब जनता का पैसा कंपनियों के शेयर और म्युचुअल फंड में डुबोने भर के लिए? क्या ये अखबार और चैनल सिर्फ़ चारा हैं इन कंपनियों की तरफ़ से और निवेशक सिर्फ़ फंसने वाली मछली? बताइए कि सत्यम जैसी कंपनियां रातों-रात डूब जाती हैं दीवालिया हो जाती हैं और इन फ़ाइनेंशियल कहे जाने वाले चैनल और अखबार में इस के पहले एक लाइन की खबर भी नहीं होती? सरकार कुछ नहीं जानती? एयर कंपनियां सरकारी हों या प्राइवेट रोज गोता खा रही हैं, इन अखबारों या चैनलों के पास है कोई रिपोर्ट कि क्यों गोता खा रही हैं? पेट्रोल के करोडों-करोड रुपए बकाया हैं सरकार पर। सरकार के पास है कोई ह्वाइट पेपर इस मसले पर? या कोई इस की मांग कर रहा है? तो किस लिए निकल रहे हैं यह अखबार, यह चैनल? समझना बहुत आसान है। पर कोई क्यों नहीं सोचना चाहता?

यह जो एक सेज़ की बीमारी चली है देश में उद्योगपतियों की सेहत को दिन दूना, रात चौगुना बनाने के लिए इस पर कुछ मेधा पाटकर टाइप एक्टिविस्टों को छोड दें तो इस की किसी मीडिया, किसी राजनीतिक दल या सरकार या किसी अदालत को है किसी किसिम की चिंता? नक्सलवादी हिंसा से निपटने में सरकार जितना पैसा खर्च करती है, उस का एक हिस्सा भी जो वहां के विकास पर खर्च कर देती सरकार तो वहां मासूम लोगों की खून की नदियां नहीं बहतीं। लेकिन इस बारे में भी हमारी मीडिया नि:शब्द है। यह और ऐसे तमाम मामलों में मीडिया गांधी के बंदर बन जाती है। न कुछ देखती है, न कुछ सुनती है, न कुछ बोलती है।

हां, इधर एक नए मीडिया का आगमन हुआ है। वेब मीडिया का। जिस की धड़कन में अभी सामाजिक सरोकार की हलकी सी ही सही धड़कन सुनाई देती है। कम से कम दो मामले अभी बिलकुल ताज़े हैं। जिन की लड़ाई लड़ कर इस वेब मीडिया ने फ़तह हासिल की है। वह भी सोशल साइट फ़ेसबुक के ज़रिए। एक अभिषेक मनु सिंघवी के मामले पर और दूसरे, निर्मल बाबा के मामले पर। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने न सिर्फ़ इन मामलों पर गांधी के बंदर की भूमिका निभाई बल्कि निर्मल बाबा को तो चैनलों ने ही पैदा किया। बरास्ता विज्ञापन। जैसे कभी आसाराम बापू और रामदेव या जाने किन-किन बाबाओं को खड़ा किया बरास्ता विज्ञापन। बताइए कि अब विज्ञापन तय कर रहे हैं कि हमारे सेलेब्रेटी कौन होंगे? अखबार और चैनल मालिकों की दलील है कि विज्ञापन ही उन का आक्सीजन हैं। विज्ञापन न हों तो उन का चलना मुश्किल है। यह कुतर्क उन का गले नहीं उतरता। पर उन से अब कोई सरकार या कोई एजेंसी या अदालत यह पूछ्ने वाली नहीं है कि ठीक है अगर विज्ञापन ही इतना ज़रुरी है तो बिना खबर के सिर्फ़ विज्ञापन ही छापें और दिखाएं। औकात मालूम हो जाएगी। हकीकत तो यही है कि लोग अखबार या कोई न्यूज़ चैनल खबर के लिए देखते-पढ़ते हैं, विज्ञापन के लिए नहीं। विज्ञापन भी एक ज़रुरी तत्व है, पर इतना भी ज़रुरी नहीं है कि आप पेड न्यूज़ पर उतर आएं, काले धन की गोद में बैठ जाएं। सरकार के पालतू कुत्ते बन जाएं। यह तो मुर्गी मार कर सोने के अंडे पाने वाली चालाकी हो गई। जो अंतत: मीडिया नाम की कोई चिड़िया भी थी के नाम से इसे इतिहास में दफ़न करने वाली कार्रवाई है। इसे जितनी जल्दी संभव बने सब को मिल कर इस बीमारी से छुट्टी लेनी ही होगी।

वास्तव में यह दौर मज़दूर विरोधी दौर है, लोकतंत्र के नाम पर हिप्पोक्रेसी का दौर है, ट्रेड यूनियन समाप्त हैं, पूंजीपतियों के मनमानेपन की कोई इंतिहा नहीं है। सब को वायस देने वाले पत्रकार अब खुद वायसलेस हैं। बताइए कि इतने सारे हाहाकारी चैनलों और अखबारों के बावजूद घोटालों पर घोटालों की जैसे बरसात है। पर किसी चैनल या अखबार में खबर जब मामला अदालत या सी.बी.आई जैसी किसी एजेंसी के ब्रीफ़िंग के बाद ही आधी-अधूरी सी क्यों आती है? पहले क्यों नहीं आ पाती? सलमान खान की माशूकाओं, उन की मारपीट की सुर्खियां बनाने वाले इस मीडिया जगत में आज भी कोयला घोटाले के बाबत एक भी खोजी खबर क्यों नहीं है?

मुझे याद है कि 1984 में हिंदुस्तान अखबार में बाज़ार भाव के पन्ने पर एक सिंगिल कालम खबर छपी थी सेना में जासूसी को ले कर। खबर दिल्ली के अखबार में छपी थी। पर लारकिंस बंधु की गिरफ़्तारी लखनऊ के लारेंस टैरेस से सुबह सात बजे तक उसी दिन हो गई थी। यह खबर लिखने वाले रिपोर्टर एस.पी. सिंह से इस बारे में जब पूछा गया कि खबर इतनी छोटी सी क्यों लिखी? तो वह तफ़सील में आ गए। और बताया कि पहले तो वह यह खबर लिखने को ही तैयार नहीं थे। पर सेना में उन के एक मित्र ने जब बहुत ज़ोर दिया तब उन्हों ने प्रमाण मांग कर खबर से कतराने की कोशिश की। लेकिन मित्र ने कहा कि चलो प्रमाण देने के लिए मुझे भी देशद्रोह करना पडे़गा, पर एक बडे़ देशद्रोह को रोकने के लिए मैं छोटा देशद्रोह करने को तैयार हूं। मित्र ने उन्हें सारे प्रमाण दे दिए। अब एस.पी. सिंह की आंखें चौधिया गईं। खैर बहुत सोच-समझ कर खबर लिखी। अब समाचार संपादक ने खबर रोक ली। खबर की संवेदनशीलता का तर्क दे कर। पर मित्र के दबाव के चलते वह समाचार संपादक के पीछे पडे़ रहे और बताया कि सारे प्रमाण उन के पास हैं। कोई पंद्रह-बीस दिन तक यह खबर इधर-उधर होती रही। और अंतत: कट-पिट कर वह खबर बाज़ार भाव के पन्ने पर उपेक्षित ढंग से एक पैरा ही छप पाई। पर यह एक पैरे की खबर भी आग लगा गई। और बड़े-बड़े लोग इस में झुलस गए। इंदिरा गांधी के बहुत करीबी रहे मुहम्मद युनूस तक लपेटे में आ गए। और उन्हें कोई राहत अंतत: मिली नहीं।

एस.पी.सिंह को इस का मलाल तो था कि खबर देर से, गलत जगह और बहुत छोटी छपी। पर वह इस बात से भी गदगद थे कि उन की खबर पर समाचार संपादक ने विश्वास किया और कि देश एक बडे़ खतरे से बच गया। मित्र की लाज भी रह गई। अब न एस.पी. सिंह जैसे रिपोर्टर हैं न वैसे अखबार। नहीं इसी हिंदुस्तान टाइम्स में जब खुशवंत सिंह संपादक बन कर आए तो के.के बिरला के साथ पहली मीटिंग में उन्हों ने कुछ मनपसंद लोगों को रखने और कुछ फ़ालतू लोगों को हटाने की बात कही। तो के.के. बिरला ने खुशवंत सिंह से साफ कहा कि रखने को आप चाहे जैसे और जितने लोग रख लीजिए पर हटाया एक नहीं जाएगा। यह बात खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा में बड़ी साफगोई से लिखी है। और अब उसी हिंदुस्तान टाइम्स में क्या-क्या नहीं हो रहा है, लोगों को हटाने के लिए? हिंदुस्तान हो या कोई और जगह, हर कहीं अब एक जैसी स्थिति है। हर कहीं विसात ही बदल गई है। सरोकार ही सूख गए हैं।

एक समय मीडिया को वाच डाग कहा जाता था, अब यह वाच डाग कहां है? क्या सिर्फ़ डाग बन कर ही नहीं रह गया है? इस वाच डाग को आखिर डाग में तब्दील किया किस ने? आखिर डाग बनाया किस ने? स्पष्ट है कि संपादक नाम के प्राणी ने। मालिकों के आगे दुम हिलाने के क्रम में इतना पतन हो गया इस प्राणी का कि अब संपादक नाम की संस्था ही समाप्त हो गई। बताइए कि इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार एक बे सिर पांव की खबर छाप देता है कि जनरल वी के सिंह दिल्ली पर कब्ज़ा करना चाहते थे और यह सारे चैनल बुद्धि-विवेक ताक पर रख कर दिन भर सेना की गश्त दिखा कर पूरे देश में पेनिक क्रिएट कर देते हैं। पर नीरा राडिया का टेप नहीं दिखा या सुना पाते! उत्तर प्रदेश जैसे कई और प्रदेशों में एनआरएचएम घोटाले के तहत करोड़ों की दवा खरीद कागज़ पर हो जाती है, आपरेशन थिएटर कागज़ पर ही बन जाते हैं, भुगतान हो जाता है, हत्याएं हो जाती हैं, पर इस बारे में कहीं कोई खबर पहले नहीं मिलती। मिलती है, जब सीबीआई या अदालत कुछ बताती या किसी को जेल भेजती है। यह क्या है?

तो जब आप देश की खबरों को, सरोकार की खबरों को व्यवस्था विरोध के खाने में डाल कर व्यवस्था के आगे दुम हिलाएंगे तो कोई एक एक्का-दुक्का खड़ा होगा इस के प्रतिरोध में और कि वह जो आप की तरह दुम नहीं हिलाएगा तो आप उस का गला दबा देंगे? हो तो यही गया है आज की तारीख में। पिछले दस-बारह वर्षों में जो भूत-प्रेत और कुत्तों-बिल्लियों, अंध विश्‍वास और अपराध की बेवकूफ़ी की खबरों से, दलाली की खबरों से समाज को जिस तरह बरगलाया गया है, जिस तरह समाज की प्राथमिकताओं को नष्ट किया गया है, खोखला किया गया है वह हैरतंगेज़ है। यकीन मानिए कि अगर मीडिया इस कदर भड़ुआ और दलाल न हुई होती तो इस कदर मंहगाई और भ्रष्टाचार से कराह नहीं रहा होता यह देश। राजनीतिक पार्टियां इतना पतित नहीं हुई होतीं। मीडिया के बदचलन होने से इस देश के अगुआ और उन का समाज बदचलनी की डगर पर चल पड़ा। जनता कीड़ा-मकोड़ा बन कर यह सब देखने और भुगतने के लिए अभिशप्त हो गई। अब बताइए कि एक औसत सी फ़िल्म आती है और मीडिया को पैसे खिला कर महान फ़िल्म बन जाती है। ऐसा इंद्रधनुष रच दिया जाता है गोया इस से अच्छी फ़िल्म न हुई, न होगी। अब लगभग हर महीने किसी न किसी फ़िल्म को यह तमगा मिल ही जाता है। विज्ञापनों का ऐसा कालाबाज़ार पहले मैं ने नहीं देखा।

यह मीडिया है कि भस्मासुर है?

नहीं बताइए कि मनरेगा से भी कम मज़दूरी में, एक रिक्शा वाले से भी कम मेहनताने में काम कर रहे मीडिया-जनों की वायस आखिर है कोई उठाने वाला भला? मणिसाना की सिफ़ारिशें तक लागू करवा पाने में सरकारी मशीनरी का तेल निकल जाता है और लागू नहीं हो पाता। किसानों के हित में भी न्यूनतम मूल्य सरकार निर्धारित करती है उन की उपज के लिए। पर मीडियाजनों के लिए न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं तय कर पाती यह सरकार या व्यवस्था। और ये मालिकान। मीडिया के नाम पर समाज के लिए जो लाक्षागृह रोज ही क्या हर क्षण बनाने में यह मीडिया अनवरत युद्धरत हैं। जो लगे हुए हैं फ़र्जी और अंधविश्वासी खबरों की खेप-दर-खेप ले कर, सांप और कुत्तों का व्याह आदि दिखा कर, अपराधों का नाट्य-रुपांतरण दिखा कर, अब यह देखिए और वह देखिए चिल्ला-चिल्ला कर, चीख-चीख कर, गोया दर्शक अंधे और बहरे हों, दो लाइन की खबर दो घंटे में किसी मदारी की तरह मजमा बांध कर खबरें दिखाने का जो टोटका इज़ाद किया है न और इस की आड़ में सरोकार की खबरों को मार दिया है, भ्रष्टाचार की खबरों को दफ़न किया है न, तिस पर फ़र्जी स्टिंग की खेती भी हरी की है न, इन सब अपराधों की ज़मानत इस मीडिया को कोई  समाज कैसे और क्यों देगा?  मीडिया का भी आखिर एक पर्यावरण होता है। क्या इस नष्ट होते जा रहे पर्यावरण को भी बचाने की ज़रुरत नहीं है? है और बिलकुल है। कारपोरेट और पूंजीवादी पत्रकारिता के खिलाफ़ पूरी ताकत से आज की तारीख में खडा होने की ज़रुरत है। प्रतिरोध की जो पत्रकारिता है उसे फिर से ज़िंदा करने की ज़रुरत है, डायल्यूट करने की नहीं।

अब तो हालत यहां तक आ गई है कि अखबार मालिक और उस का सो काल्ड प्रबंधन संपादकों और संवाददाताओं से अब खबर नहीं बिजनेस डिसकस करते हैं। सब को बिजनेस टारगेट देते हैं। मतलब विज्ञापन का टारगेट। अजीब गोरखधंधा है। विज्ञापन के नाम पर सरकारी खजाना लूट लेने की जैसे होड मची हुई है अखबारों और चैनलों के बीच। अखबार अब चुनावों में ही नहीं बाकी दिनों में भी खबरों का रेट कार्ड छाप कर खबरें वसूल रहे हैं। खबरों के नाम पर पैसे वसूल रहे हैं। बदनाम बेचारे छोटे-मोटे संवाददाता हो रहे हैं। चैनलों तक में यही हाल है। व्यूरो नीलाम हो रहे हैं। वेतन तो नहीं ही मिलता सेक्यूरिटी मनी लाखों में जमा होती है। तब परिचय पत्र जारी होता है। मौखिक संदेश होता है कि खुद भी खाओ और हमें भी खिलाओ। और खा पी कर मूस की तरह मुटा कर यह अखबार या चैनल कब फ़रार हो जाएं कोई नहीं जानता। तो पत्रकारिता ऐसे हो रही है। संवाद सूत्रों की हालत और पतली है। दलितों और बंधुआ मज़दूरों से भी ज़्यादा शोषण इन का इतनी तरह से होता है कि बयान करना मुश्किल है। यह सिक्योरिटी मनी भी जमा करने की हैसियत में नहीं होते तो इन्हें परिचय-पत्र भी नहीं मिलता। कोई विवादास्पद स्थिति आ जाती है तो संबंधित संस्थान पल्ला झाड लेता है और बता देता है कि उस से उस का कोई मतलब नहीं है। और वह फर्जी पत्रकार घोषित हो जाता है। अगर हाथ पांव मज़बूत नहीं हैं तो हवालात और जेल भी हो जाती है। इन दिनों ऐसी खबरों की भरमार है समूचे देश में। राजेश विद्रोही का एक शेर है कि, 'बहुत महीन है अखबार का मुलाजिम भी/ खुद खबर है पर दूसरों की लिखता है।'

दरअसल पत्रकारिता के प्रोडक्ट में तब्दील होते जाने की यह यातना है। यह सब जो जल्दी नहीं रोका गया तो जानिए कि पानी नहीं मिलेगा। इस पतन को पाताल का पता भी नहीं मिलेगा। वास्तव में भड़ुआगिरी वाली पत्रकारिता की नींव इमरजेंसी में ही पड़ गई थी। बहुत कम कुलदीप नैय्यर तब खड़े हो पाए थे। पर सोचिए कि अगर रामनाथ गोयनका न चाहते तो कुलदीप नैय्यर क्या कर लेते? स्पष्ट है कि अगर अखबार या चैनल मालिक न चाहे तो सारी अभिव्यक्ति और उसके खतरे किसी पटवारी के खसरे खतौनी में बिला जाते हैं। जब जनता पार्टी की सरकार आई तो तबके सूचना प्रसारण मंत्री आडवाणी ने बयान दिया था कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में पत्रकारों से बैठने को कहा, पर वह तो लेट गए! पर दिक्कत यह थी कि जनता पार्टी सरकार भी पत्रकारों को लिटाने से बाज़ नहीं आई।
टाइम्स आफ़ इंडिया की एक कहानी की पत्रिका थी 'सारिका'।

कमलेश्वर जी उस के संपादक थे। सारिका कहानी की पत्रिका थी, राजनीति से उस का कोई सरोकार नहीं था। पर कहानियों का चूंकि समाज से सरोकार होता है और समाज बिना राजनीति के चलता नहीं सो, कमलेश्वर की 'सारिका' के भी सरोकार में तब राजनीति समा गई। इस राजनीति की कोख में भी कारण एक कहानी बनी। कहानी थी आलमशाह खान की 'किराए की कोख'। डा. सुब्रहमण्यम स्वामी ने इस का विरोध किया कि यह 'किराए की कोख' देने वाली औरत हिदू ही क्यों है? इस के पहले भी डा. स्वामी और कमलेश्वर की भिड़ंत हो चुकी थी एक बार। उपन्यास 'काली आंधी' को ले कर। स्वामी ने कमलेश्वर को बधाई दी थी कि 'काली आंधी' में उन्हों ने इंदिरा गांधी का बहुत अच्छा चरित्र चित्रण किया है। कमलेश्वर ने उन्हें सूचित किया कि उन के उपन्यास में वह जिसे इंदिरा गांधी समझ रहे हैं, दरअसल वह विजयाराजे सिंधिया हैं। स्वामी भड़क गए थे। फिर बात 'किराए की कोख' पर उलझी। बात बढ़ती गई। जनता पार्टी की सरकार आ गई। टकराव बढ़ता गया। मैनेजमेंट का दबाव भी। कमलेश्वर ने 'सारिका' के एक संपादकीय में साफ़ लिखा कि यह देश किसी एक मोरार जी देसाई, किसी एक चरण सिंह, किसी एक जगजीवन राम भर का नहीं है। सारिका छप गई। पर यह अंक बाज़ार में नहीं आया। सारिका बंबई से दिल्ली आ गई। बाद में कमलेश्वर की सारिका से भी विदाई हो गई। यह एक लंबी कथा है। पर कमलेश्वर तब नहीं झुके। यह भी एक तथ्य है।

कमलेश्वर को यह संपादकीय पढ़ाने के लिए एक नई पत्रिका निकालनी पड़ी।कथा-यात्रा। खैर, बात आगे बढ़ी। बाद के दिनों में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। चुनाव में पूरे देश में इंदिरा लहर ही नहीं, आंधी चली। पर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उन के मैनेजरों यथा अरूण नेहरू जैसों को फिर भी यकीन नहीं था अमेठी की जनता पर। बूथ कैपचरिंग पर यकीन था। करवाया भी। यह चुनाव कवर करने लखनऊ से भी कुछ पत्रकार गए थे। आज से अजय कुमार, जागरण से वीरेंद्र सक्सेना और पायनियर से विजय शर्मा। बूथ कैपचरिंग की रिपोर्ट करने के चक्कर में सभी पिटे। फ़ोटोग्राफ़र के कैमरे से रील निकाल ली गई। वगैरह-वगैरह। जो-जो होता है ऐसे मौकों पर वह सब हुआ। हालांकि फ़ोटोग्राफ़र ने पहले ही तड़ लिया था कि रील निकाली जा सकती है। कैमरा छीना जा सकता है। सो वह फ़ोटो खींचते जाते थे और रील झाड़ियों में फेंकते जाते थे। और अंतत: हुआ वही। पिटाई-सिटाई के बाद उन्हों ने रील बटोर लिया। आए सभी लखनऊ। पिटने का एहसास बड़ी खबर पा लेने के गुमान में धुल गया था। पर जब अपने-अपने आफ़िस पहुंचे ये पत्रकार सीना फ़ुलाए तो वहां भी उन की धुलाई हो गई। डांटा गया कि आप लोग वहां खबर कवर करने गए थे कि झगड़ा करने? असल में तब तक सभी अखबारों के दफ़्तर में अरूण नेहरू का धमकी भरा फ़ोन आ चुका था। सभी लोगों को कहा गया कि बूथ कैपचरिंग भूल जाइए, प्लेन-सी खबर लिखिए। 'आज' अखबार के अजय कुमार तब लगभग रोते हुए बताते थे कि अमेठी में पिटने का बिलकुल मलाल नहीं था। दिल में तसल्ली थी कि पिटे तो क्या, खबर तो है! पर जब दफ़्तर में भी आ कर डांट खानी पड़ी तो हम टूट गए।

बाद में जनसत्ता के तब के संवाददाता जयप्रकाश शाही को उस फ़ोटोग्राफ़र ने बताया कि उस के पास फ़ोटो है। शाही ने फ़ोटो ली और खबर लिखी। छपी भी तब जनसत्ता में। पर बाद में वह फ़ोटोग्राफ़र, साफ़ कहूं तो बिक गए। और बता दिया कि वह फ़ोटो फ़र्ज़ी है और ऐसी कोई फ़ोटो उन्हों ने नहीं खींची। खैर। बोफ़ोर्स की याद है आप सब को? तब जिस तरह कुछ अखबार मालिकों ने लगभग पार्टी बंदी कर अखबारों का इस्तेमाल किया, यह भी याद है ना? फिर तो अखबारों को हथियार बना लिया गया। जब जिस की सत्ता तब तिस के अखबार।

2 जून 1995 को लखनऊ में मुलायम सिंह ने सुबह-सुबह जिस तरह अपने गुंडों को मायावती पर हमले के लिए भेजा था, मुख्यमंत्री रहते हुए भी, वह तो अश्लील था ही, अपने पत्रकारों ने उस से भी ज़्यादा अश्लीलता बरती। पी.टी.आई ने इतनी बड़ी घटना को सिर्फ़ दो टेक में निपटा दिया तो टाइम्स आफ़ इंडिया ने शार्ट डी.सी. अंडरप्ले कर के दिया। बाद में इस के कारणों की पड़ताल की तब के जनसत्ता के संवाददाता हेमंत शर्मा ने। तो पाया कि ऐसा इस लिए हुआ क्यों कि पी.टी.आई के व्यूरो चीफ़ खान और टाइम्स के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने मुलायम शासनकाल में विवेकाधीन कोष से लाखों रुपए खाए हुए थे। तमाम और पत्रकारों ने भी लाखों रुपए खाए थे। और वो जो कहते हैं कि राजा का बाजा बजा! तो भैय्या लोगों ने राजा का बाजा बजाया। आज भी बजा रहे हैं। खैर, हेमंत शर्मा ने जब इस बाबत खबर लिखी तो टाइम्स आफ़ इंडिया के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने हेमंत को नौकरी ले लेने की धमकी दी। पर न हेमंत बदले न बाजा बजाने वाले। आज भी बजा रहे हैं। बस राजा बदलते रहते है, भय्या लोग बाजा बजाते रहते हैं।

सो राजा लोगों का दिमाग खराब हो जाता है। अब जैसे अखबार या चैनल प्रोड्क्ट में तब्दील हैं, वैसे ही अपने नेता भी राजा में तब्दील हैं। सामंती आचरण में लथ-पथ हैं। वो चाहे ममता बनर्जी ही क्यों न हों? ममता बनर्जी को कोई यह बताने वाला नहीं है कि सिर्फ़ हवाई चप्पल और सूती साड़ी पहनने या कुछ कविताएं या लेख लिखने, कुछ इंटेलेक्चुअल्स के साथ बैठ लेने भर से या गरीबों की बात या मुद्दे भर उठा लेने से कोई प्रजातांत्रिक नहीं हो जाता, जब तक वह व्यवहार में भी न दिखे। नहीं तो वज़ह क्या है कि दबे कुचलों की बात करने वाले तमाम नेता आज सरेआम तानाशाही और सामंती रौबदाब में आकंठ डूबते-उतराते दिखते हैं। वह चाहे ममता बनर्जी हों, मायावती हों, जयललिता हों, करूणानिधि हों, लालू या मुलायम, पासवान हों। शालीनता या शिष्टता से जैसे इन सबका कोई सरोकार ही नहीं दीखता!

तो शायद इसलिए कि भडुआगिरी में न्यस्त हमारी पत्रकारिता राजा का बाजा बजाने में न्यस्त भी है और ध्वस्त भी। हमारी एक समस्या यह भी है कि हम पैकेजिंग में सजी दुकानों में पत्रकारिता नाम के आदर्श का खिलौना ढूंढ रहे हैं। जब कि हम जानते हैं कि यह नहीं होना है अब किसी भी सूरत में। पर हमारी ज़िद है कि – मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों। किसी बंधु को मिले यह चंद्र खिलौना तो भैय्या हमें भी बताना। दूध भात लेकर आ जाऊंगा। अभी और अभी तो बस राजा का बाजा बजा!

और कि इस आंच में पत्रकारों का जीते जी मर जाना, कैरियर का मर जाना, इस की यातना, इस की मार को हम में से बहुतेरे जानते हैं। कह नहीं पाते, कहते नहीं। दोनों बातें हैं। लेकिन हैं कौन लोग जो यह यातना की पोटली हमें थमा देते हैं कि लो और भुगतो। क्या सिर्फ़ अखबार मालिक और पूंजीपति? जी नहीं। यह दीमक हमारे भीतर से ही निकलते हैं। ये कुकुरमुत्ते हमारे ही घूरे से निकलते हैं और गुलाब बन कर इतराने लगते हैं। और अचानक एक दिन ये इतने बडे़ हो जाते हैं कि हमारे दैनंदिन जीवन में हमारे लिए रश्क का सबब बन बैठते हैं। हमारे भाग्य विधाता बन जाते हैं।
ज़्यादा नहीं एक दशक पहले अखबारों में डी.टी.पी. आपरेटर हुआ करते थे। कहां गए अब? अब सब-एडीटर कंपोज भी कर रहा है, पेज़ भी बना रहा है। अखबारों से भाषा का स्वाद बिसर गया तो क्या हुआ? गलतियां हो रही हैं, खबर कहीं से कहीं कट पेस्ट हुई जा रही है तो पूछता कौन है? अखबार मालिक का तो पैसा बच गया न ! चार आदमी के काम को एक आदमी कर रहा है। और क्या चाहिए? अखबार नष्ट हो रहा है तो क्या हुआ?

अखबार में विज्ञापन कम हो रहा था, तो यह ऐडवोटोरियल की बुद्धि अखबार मालिकों को किसने दी? फिर खुल्लमखुल्ला पैसे ले कर खबरें छापने का पैकेज भी किस ने बताया अखबार मालिकों को? मंदी नहीं थी अखबारों में फिर भी मंदी के नाम पर आप के पैसे कम करने, और जो आप भन्नाएं तो आप को ट्रांसफ़र करने या निकाल देने की बुद्धि भी किसने दी अखबार मालिकों को?

अरे भाई, अभी भी नहीं समझे आप? आप जान भी नहीं पाए? अच्छा जब हमारी सेलरी लाखों में पहुंची, लग्ज़री कारों में हम चलने लगे, आकाशीय उड़ानें भरने लगे बातों में भी और यात्राओं में भी। और ये देखिए आप तो हमारे पैर भी छूने लगे, हमारे तलवे भी चाटने लगे और फिर भी नहीं जान पाए? अभी भी नहीं जान पाए? अरे मेरे भाइयों, हमी ने दी। ये तमाम संवाद सूत्रों की फ़ौज़ भी हमीं ने खड़ी की। अब हम भी क्या करें, हमारे ऊपर भी प्रबंधन का दबाव था, है ही, लगातार। तो भैया हम बन गए बडे़ वाले अल्सेसियन और आप को बना दिया गलियों वाला कुता। बंधुआ कुत्ता। जो भूंक भी नहीं सकता। भूख लगने पर। खुद बधिया बने तो आप को भी बंधुआ बनाया।

बहुत हो गई भूल भूलैया। आइए कुछ वाकए भी याद कर लें। शुरुआती दिनों के। अब तो स्वतंत्र भारत और पायनियर बरबाद अखबारों में शुमार हैं। और कि अलग-अलग हैं। पहले के दिनों में पायनियर लिमिटेड के अखबार थे ये दोनों। जयपुरिया परिवार का स्वामित्व था। और कि कहने में अच्छा लगता है कि तब यह दोनों अखबार उत्तर प्रदेश के सबसे बडे़ अखबार के रूप मे शुमार थे। हर लिहाज़ से। सर्कुलेशन में तो थे ही, बेस्ट पे मास्टर भी थे। पालेकर, बछावत लागू थे। बिना किसी इफ़-बट के। लखनऊ और बनारस से दोनों अखबार छपते थे। बाद में मुरादाबाद और कानपुर से भी छपे। तो कानपुर स्वतंत्र भारत में सत्यप्रकाश त्रिपाठी आए। कानपुर के ही रहने वाले थे। कानपुर जागरण से जनसत्ता, दिल्ली गए थे। वाया जनसत्ता स्वतंत्र भारत कानपुर आए रेज़ीडेंट एडीटर बन कर। लखनऊ और बनारस में वेज़बोर्ड के हिसाब से सब को वेतन मिलता था। पर सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने यहां नई कंपनी बनाने की तज़वीज़ दी जयपुरिया को। ज्ञानोदय प्रकाशन। और सहयोगियों को कंसोलिडेटेड वेतन पर रखा। किसी को वेतनमान नहीं। तब पालेकर का ज़माना था। तो जितना लखनऊ में एक सब एडीटर को मिलता था लगभग उसी के आस-पास वहां भी मिला। पर पी.एफ़, ग्रेच्युटी आदि सुविधाओं से वंचित। जल्दी ही बछावत लागू हो गया। अब कानपुर के सहयोगियों का हक मारा गया। बेचारे बहुत पीछे रह गए। औने-पौने में। खुद जयपुरिया को यह बुद्धि देने वाले सत्यप्रकाश त्रिपाठी भी लखनऊ के चीफ़ सब से भी कम वेतन पर हो गए। साथ में वह जनसत्ता से अमित प्रकाश सिंह को भी ले आए थे समाचार संपादक बना कर। सब से पहले उन का ही मोहभंग हुआ। वह जनसत्ता से अपना वेतन जोड़ते, नफ़ा नुकसान जोड़ते और सत्यप्रकाश त्रिपाठी की ऐसी तैसी करते। वह जल्दी ही वापस जनसत्ता चले गए। कुछ और साथी भी इधर उधर हो गए। बाद के दिनों में स्वतंत्र भारत पर थापर ग्रुप का स्वामित्व हो गया। अंतत: सत्यप्रकाश त्रिपाठी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हालांकि उन्हों ने प्रबंधन के आगे लेटने की इक्सरसाइज़ भी बहुत की। पर बात बनी नहीं।

जाते समय एक बार वह लखनऊ आए और वह भी अपना पी.एफ़ ग्रेच्युटी वगैरह अमित प्रकाश सिंह की तरह जनसत्ता से तुलनात्मक ढंग से जोड़ने लगे और कहने लगे कि मेरा तो इतना नुकसान हो गया। जब यह बात उन्हों ने कई बार दुहराई तो मुझ से रहा नहीं गया। उन से पूछा कि यह बताइए कि जयपुरिया को यह बुद्धि किस ने दी थी? और फिर आप सिर्फ़ अपने को ही क्यों जोड़ रहे हैं? अपने उन साथियों को क्यों भूल जा रहे है? आप ने तो संपादक बनने की साध पूरी कर ली, पर वह सब बिचारे? उन का क्या कुसूर था? उन सब को जिन को आप ने छला? और तो और एक गलत परंपरा की शुरुआत कर दी सो अलग!

वह चुप रह गए।

सत्यप्रकाश त्रिपाठी का अंतर्विरोध देखिए कि वह कई बार प्रभाष जोशी बनने का स्वांग करते। जोशी जी की ही तरह लिखने की कोशिश करते। फ्रंट पेज़ एडीटॊरियल लिखने का जैसे उन्हें मीनिया सा था। भले ही कानपुर रेलवे स्टेशन की गंदगी पर वह लिख रहे हों पर जोशी जी की तरह उस में 'अपन' शब्द ज़रूर ठोंक देते। जब कि कानपुर का 'अपन' शब्द से कोई लेना-देना नहीं था। वह तो जोशी जी के मध्य प्रदेश से आता है। उन के इस फ़्रंट पेज़ एडीटोरियल मीनिया पर लखनऊ के साक्षर संपादक राजनाथ सिंह जो तब लायजनिंग की काबिलियत पर संपादक बनवाए गए थे, एक जातिवादी मुख्यमंत्री की सिफ़ारिश पर, अक्सर उन्हें नोटिस भेज देते थे। अंतत: वह एडीटोरियल की जगह बाटम लिखने लगे। खैर, जोशी जी बनने का मीनिया पालने वाले सत्यप्रकाश त्रिपाठी जोशी जी की उदारता नहीं सीख पाए, न उन के जैसा कद बना पाए| पर हां, जयपुरिया की आंखों में चढ़ने के लिए अपने साथियों का अहित ज़रूर कर गए। अपना तो कर ही गए। जोशी जी ने गोयनका की आंखों में चढ़ने के लिए सहयोगियों का कभी वेतन नहीं कम किया। हां, एक बार अपना बढ़ा हुआ वेतन, सुनता हूं कि ज़रूर लेने से इंकार किया।

यहीं कमलेश्वर भी याद आ रहे हैं। एक संस्थान में एक महाप्रबंधक ने उन से कुछ सहयोगियों को हटाने के लिए कहा। पर कमलेश्वर जी टाल गए। पर जब दुबारा उस महाप्रबंधक ने सहयोगियों को फिर से हटाने के लिए कहा तो कमलेश्वर जी ने खुद इस्तीफ़ा दे दिया। पर सहयोगियों पर आंच नहीं आने दी। पर बाद में स्थितियां बद से बदतर हो गईं। रक्षक ही भक्षक बनने लगे। पत्रकारों के एक मसीहा हुए हैं सुरेंद्र प्रताप सिंह। रविवार के उन के कार्यकाल पर तो उन्हें जितना सलाम किया जाए, कम है। पर नवभारत टाइम्स में उन्हों ने क्या-क्या किया? विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वान को उन्हों ने सहयोगियों को भड़का-भड़का कर गालियां दिलवाईं। उन को वह प्रधान संपादक स्वीकार ही नहीं पाए। चलिए आगे सुनिए। समीर जैन को खुश करने के लिए उसी नवभारत टाइम्स में इन्हीं सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पंद्रह सौ से दो हज़ार रुपए में स्ट्रिंगर रखे, खबर लिखने के लिए। तब जब वहां विशेष संवाददाता को उस समय दो हज़ार रुपए कनवेंस एलाऊंस मिलता था। वरिष्ठों की खबरें काट-काट कर फेंक देते, उन्हें अपमानित करते, इन स्ट्रिंगर्स की खबर उछाल कर छापते। इन्हीं उठापटक और राजनीति में नवभारत टाइम्स लखनऊ बंद हो गया। और भी ऐसे कई काम इन एस.पी. ने किए जो सहयोगियों के हित में नहीं थे। लेकिन वह लगातार करते रहे। और अंतत: जब अपने पर बन आई तो उसी टाइम्स प्रबंधन के खिलाफ संसद में सवाल उठवाने लग गए। यह वही सुरेंद्र प्रताप सिंह थे जिन का प्रताप उन दिनों इतना था कि वह अकसर दिल्ली से लखनऊ सिर्फ़ शराब पीने आते थे राजकीय विमान से। रात नौ बजे आते और बारह बजे तक लौट भी जाते। 45 मिनट की फ़्लाइट होती थी। और तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से दोस्ती भी निभ जाती थी। वे दिन मंडल की पैरोकारी के दिन थे उन के। सो चांदी कट रही थी। और गरीबों की बात भी हो रही थी। वाया राजकीय विमान और शराब। और कि देखिए न, उन के चेले भी आजकल क्या-क्या नहीं कर रहे हैं?

खैर, चाहे पत्रकारों के मसीहा एस.पी. हों या छुट्भैय्या सत्यप्रकाश त्रिपाठी हों, इन प्रजातियों की अखबार मालिकानों को सहयोगियों के हितों के खिलाफ बुद्धि देने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अनुपात वही यहां भी है जो देश में गरीबों और अमीरों के बीच है। जैसे देश के ज़्यादतर लोग बीस रुपए भी नहीं कमा पाते रोज और खरबपतियों की संख्या बढती जाती है। ठीक वैसे ही संवाद सूत्रों की संख्या बढ़ती जाती है और दूसरी तरफ अपने अल्सेसियंस की भी। नहीं समझे? अरे बुद्धि देने वालों की भाई!

और यह बेचारे संवाद सूत्र अपनी यातना कथा में भी कुछ अपने मसीहा टाइप लोगों के चरणों में गिरे पड़े रहते हैं। कि जाने कब उद्धार हो जाए। पर उद्धार नहीं होता, निकाल दिए जाते हैं। सो यातना, कर्ज़ और अपमान का ग्राफ़ ज़रुर बढ़ जाता है। यह संवाद सूत्र बेचारे नहीं जान पाते कि उन के  यह सभी छुटभय्या मसीहा भी उन्हीं बुद्धि देने वालों की कतार में हैं। यहीं धूमिल याद आ रहे हैं:

एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी सेंकता है
एक तीसरा आदमी और है
जो इस रोटी से खेलता है
मैं पूछ्ता हूं
यह तीसरा आदमी कौन है
मेरे देश की संसद मौन है

तो  ज़रूरत वास्तव में इस तीसरे आदमी के शिनाख्त की है। पलायन की नहीं। देखिए अब यहीं देवेंद्र कुमार भी याद आ रहे हैं। उन की एक लंबी कविता है- बहस ज़रूरी है। उस में एक जगह वह लिखते हैं

रानी पद्मावती का इतिहास तुम ने सुना होगा
बीस हज़ार रानियों के साथ जल कर मरने के बजाय
जो वह लड़ कर मरी होती
तो शायद तुम्हारा और देश का इतिहास.
कुछ और होता

हम असल में इतिहास से सबक नही लेते, गलती हमारी है। नतीज़ा सामने है। कभी हम  बता कर मरते हैं तो कभी  खामोश। जैसे हम अभिशप्त हो गए हैं। बीवी-बच्चों को लावारिस छोड़ जाने के लिए। अपनी ज़िंदगी होम कर पूंजीपतियों और भडुओं की तिजोरी भर जाने के लिए। ये पद्मश्री, पद्मभूषण का खिताब ले कर भोगेंगे, हम गांव मे गोबर बटोरने चले जाएंगे। हमारे कुछ मित्र जब बहुत परेशान होते हैं तो कहने लगते हैं कि गांव चले जाएंगे। हमारे गांव में तो गोबर भी अब नहीं है, काछने के लिए। हल बैल की खेती ही खतम हुए ज़माना हो गया। किराए का ट्रैक्टर आ कर जोत देता है, किराए का ही कंबाइन आ कर काट देता है। तो गोबर कहां से रहेगा? हां गांव में गरीबी है, पट्टीदारी है और माफ़ करें दुरूपयोग की हद पार करते हुए हरिजन ऐक्ट भी है। गरज यह कि जितने फन उतनी फ़ुंफकारें ! इतने साल बधिया बन कर व्यर्थ की ही सही पत्रकारिता कर, शहर में रहने के बाद अब गांव में? कैसे रहेंगे गांव में भी ? बिजली के अभाव में, मच्छर के प्रभाव में। और फिर जो गांव वाले अज्ञेय जी की कविता में प्रतिप्रश्न कर बैठें –

सर्प तुम नगर में गए भी नहीं
न ही सीखा तुमने वहां बसना
फिर कहां से तुम ने विष पाया
और कहां से सीखा डंसना

और मेरे गांव में तो नहीं पर पास के एक गांव में दो साल पहले एक आदमी मुंबई में राज ठाकरे के गुंडों से पिट कर गांव की शरण में वापस आ गया। यहां भी गांव वालों ने उसे ताने दे दे कर आज़िज़ कर दिया। अपनों के ही ताने सुन-सुन कर वह बेचारा एक दिन, एक पेड़ से लटका मिला।

तो मेरे भाई  ज़रा गांव भी बच कर जाइएगा। ठीक है कि आज की पत्रकारिता में कुछ नहीं धरा है। जो भी कुछ है, अब वह सिर्फ़ और सिर्फ़ भडुओं के लिए है। अब उन्हीं के लिए रह गई है पत्रकारिता। अब तो कोई गिरहकट भी अखबार या चैनल चला दे रहा है और एक से एक मेधावी, एक से एक जीनियस वहां पानी भर रहे हैं। एक मास्टर भी बेहतर है आज के किसी पत्रकार से। नौकरी के लिहाज़ से। मनरेगा मज़दूर भी।

कब किस की नौकरी चली जाए, कोई नहीं जानता। हर कोई अपनी-अपनी बचाने में लगा है। इसी यातना में जी रहा है। सुविधाओं और ज़रूरतों ने आदमी को कायर और नपुंसक बना दिया है। पत्रकारिता के ग्लैमर का अजगर बडे़-बडे़ प्रतिभावानों को डंस चुका है। किस्से एक नहीं, अनेक हैं।

एक हैं डा. चमनलाल। आज कल जे.एन. यू. में पढ़ाते हैं। हिंदी के आलोचक भी हैं। अनुवाद के लिए भी जाने जाते हैं। पहले मुंबई और तब की बंबई में एक बैंक में हिंदी अधिकारी थे। दिल्ली से जनसत्ता अखबार जब शुरू हुआ 1983 में तब वह भी लालायित हुए पत्रकार बनने के लिए। बडी चिट्ठियां लिखीं उन्हों ने प्रभाष जोशी जी को कि आप के साथ काम करना चाहता हूं। एक बार जोशी जी ने उन्हें जवाब में लिख दिया कि आइए बात करते हैं। चमनलाल इस चिट्ठी को ही आफ़र लेटर मान कर सर पर पांव रख कर दिल्ली आ गए। जोशी जी ने अपनी रवायत के मुताबिक उन का टेस्ट लिया। टेस्ट के बाद उन्हें बताया कि आप तो हमारे अखबार के लायक नहीं हैं। अब चमनलाल के पैर के नीचे की ज़मीन खिसक गई। बोले कि मैं तो बैंक की नौकरी से इस्तीफ़ा दे आया हूं। जोशी जी फिर भी नहीं पिघले। बोले, आप इस अखबार में चल ही नहीं सकते। बहुत हाय-तौबा और हाथ पैर-जोड़ने पर जोशी जी ने उन्हें अप्रेंटिस रख लिया और कहा कि जल्दी ही कहीं और नौकरी ढूंढ लीजिएगा। बैंक की नौकरी में चमनलाल तब ढाई हज़ार रुपए से अधिक पाते थे। जनसत्ता में छ सौ रुपए पर काम करने लगे। बस उन्हों ने आत्महत्या भर नहीं किया, बाकी सब करम हो गए उन के। उन दिनों को देख कर, उनकी यातना को देख कर डर लगता था। आखिर बाल-बच्चेदार आदमी थे। पढे़-लिखे थे। अपने को संभाल ले गए। जल्दी ही पंजाब यूनिवर्सिटी की वांट निकली। अप्लाई किया। खुशकिस्मत थे, नौकरी पा गए। हिंदी के लेक्चरर हो गए। पर सभी तो चमनलाल की तरह खुशकिस्मत नहीं होते न! जाने कितने चमनलाल पत्रकारिता की अनारकली बना कर दीवारों में चुन दिए गए पर अपने सलीम को, अपनी पत्रकारिता के सलीम को, अपनी पत्रकारिता की अनारकली को नहीं पाए तो नहीं पाए। कभी पत्रकारिता के द्रोणाचार्यों ने उन के अंगूठे काट लिए तो कभी शकुनियों ने उन्हें नंगा करवा दिया अपने दुर्योधनों, दुशासनों से। पत्रकारिता के भडुवों के बुलडोजरों ने तो जैसे संहार ही कर दिया।  पहले देखता था कि किसी सरकारी दफ़्तर का कोई बाबू, कोई दारोगा या कोई और, रिश्वतखोरी या किसी और ज़ुर्म में नौकरी से हाथ धो बैठता था तो आ कर पत्रकार बन जाता था। फिर धीरे-धीरे पत्रकारों का बाप बन जाता था।

पर अब?

अब देखता हूं कि कोई कई कत्ल, कई अपहरण कर पैसे कमा कर बिल्डर बन जाता है, शराब माफ़िया बन जाता है, मंत्री-मुख्यमंत्री बन जाता है, और जब ज़्यादा अघा जाता है तो एक अखबार, एक चैनल भी खोल लेता है। और एक से एक मेधावी, एक से एक प्रतिभाशाली उनके चाकर बन जाते हैं, भडुवे बन जाते हैं। उन के पैर छूने लग जाते हैं। हमारा एक नया समाज रच जाते हैं। हमें समझाने लायक, हमें डिक्टेट करने लायक बन जाते हैं। बाज़ार की धुरी और समाज की धड़कन बनने बनाने के पितामह बन जाते हैं।
साहिर लुधियानवी के शब्दों में इन हालातों का रोना रोने का मन करता है :

बात निकली तो हर एक बात पर रोना आया
कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया

यहीं शकील बदायूंनी भी याद आ रहे हैं:

पायल के गमों का इल्म नहीं, झंकार की बातें करते हैं
दो कदम कभी जो चले नहीं रफ़्तार की बातें करते हैं।

जानिए कि कोई पूंजीपति, कोई प्रबंधन आप को कुछ भी कहलवा-सुनवा सकता है क्यों कि उस के हाथ में बाज़ार है, बाज़ार की ताकत है। सो रास्ता बदल लेने में ही भलाई है क्यों कि अब कोई किसी को बचाने वाला नहीं है, बिखरने से बचा कर सहेजने-संवारने वाला नहीं है।  समय रहते नींद टूट जाए तो अच्छा है। हम जैसे लोगों की नींद टूटी तो बहुत देर हो चुकी थी। प्रोड्क्ट की आंधी में बह-बिला गए। बाकी जो बचा भडुए-दलाल गड़प गए। आप बच सकें तो बचिए।

लखनऊ में एक पत्रकार थे, जयप्रकाश शाही। जीनियस थे। पत्रकारिता में उन के साथ ही हम भी बडे़ हुए थे। एक समय लखनऊ की रिपोर्टिंग उन के बिना अधूरी कही जाती थी। पर सिस्टम ने बाद में उन्हें भी बिगाड़ दिया। क्या से क्या बना दिया। एक अखबार में वह ब्यूरो चीफ़ थे। कहते हुए तकलीफ़ होती है कि बाद में उसी अखबार में वह लखनऊ में भी नहीं, गोरखपुर में जो उन का गृहनगर था  स्ट्रिंगर बनने को भी अभिशप्त हुए और बाद के दिनों में अपनी ही टीम के जूनियरों का मातहत होने को भी वह मज़बूर किए गए। अब वह नहीं हैं इस दुनिया में पर तब वह टूट कर कहते थे कि यार अगर कथकली या भरतनाट्यम भी किए होते तो दस-बीस साल में देश में नाम कमा लिए होते। हमारे सामने ही एस.डी.एम. देखते देखते कलक्टर हो गया, चीफ़ सेक्रेट्री भी हो गया, सी.ओ. आज एस.पी. बन गया, डी.आई.जी. आई. जी. से आज डी.जी.पी. हो गया, फलनवा गिरहकटी करते-करते मिनिस्टर बन गया और हम देखिए ब्यूरो चीफ़ से स्ट्रिंगर हो गए।

बताऊं  कि आज आलोक मेहता, मधुसुदन आनंद, रामकृपाल सिंह, कमर वहीद नकवी वगैरह को ज़्यादातर लोग जानते हैं। पर उन्हीं के बैच के लोग और उन से सीनियर लोग और भी हैं। उसी टाइम्स आफ़ इंडिया ट्रेनी स्कीम के जो आज भी मामूली वेतन पर काम कर रहे हैं।

क्यों?

क्यों कि वह बाज़ार को साधने में पारंगत नहीं हुए। एथिक्स और अपने काम के बल पर वह आगे बढ़ना चाहते थे। कुछ दिन बढे़ भी। पर कहा न कि प्रोडक्ट की आंधी आ गई। भडुओं का बुलडोज़र आ गया। वगैरह-वगैरह। तो वह लोग इस के मलबे में दब गए। बताना ज़रा क्या ज़्यादा तकलीफ़देह है कि लखनऊ में एक अखबार ऐसा भी है जहां लोग बीस साल पहले पांच सात हज़ार रुपए की नौकरी करते थे बडे़ ठाट से। और आज भी, बीस साल बाद भी वहीं नौकरी कर रहे हैं पांच हज़ार रुपए की, बहुत डर-डर कर, बंधुओं जैसी कि कहीं कल को निकाल न दिए जाएं?

और मैं जानता हूं कि देश में ऐसे और भी बहुतेरे अखबार हैं। हमारी दिल्ली में भी। अब इस के बाद भी कुछ कहना बाकी रह गया हो मित्रों तो बताइएगा, और भी कह दूंगा। पर कहानी खत्म नहीं होगी। वैसे भी बात बहुत लंबी हो गई है। सो अभी बात खत्म करते हैं। यह चर्चा फिर कभी फिर होगी। तब और आगे की बात होगी।अभी तो बतर्ज़ मुक्तिबोध यही कहूंगा कि, 'मर गया देश, जीवित रहे तुम !' आमीन!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

हो सकता है कल राहुल गांधी लिख दें कि – ”कहां हैं संविधान और कोर्ट बनाने वाले…”

Yashwant Singh : राहुल गांधी फेसबुक पर लिखते हैं- ''कहां हैं ह्यूमन राइट्स इंडस्ट्री चलाने वाले…'' कल को वो लिख सकते हैं- ''कहां हैं समानता और बराबरी का ठेका लेने वाले… '' हो सकता है वो परसों के दिन लिख दें कि– '' कहां हैं संविधान और कोर्ट बनाने वाले….''

मैं जो कहना चाह रहा वो ये कि ह्यूमन राइट्स, समानता, आजादी, बराबरी जैसी बुनियादी चीजें किसी की दुकान नहीं, किसी की इंडस्ट्री नहीं, किसी का ठेका नहीं बल्कि ये मनुष्यों के हजारों साल के संघर्ष का नतीजा है… हजारों लाखों करोड़ों लोगों ने कुर्बानी देकर ये अधिकार हासिल किया है जिसे आज हम इंज्वाय करते हुए सहज सरल तरीके से जी पाते हैं, बोल पाते हैं, लिख पाते हैं…

राहुल गांधी से कहना चाहूंगा कि आपके गृह मंत्रालय वालों ने यानि आपकी ही सरकार के लोगों ने महेंद्र कर्मा को जेड प्लस सेक्युरिटी देने की फाइल चार साल से लटका रखी थी… महेंद्र कर्मा नक्सली इलाके में ही रहते थे, वहीं से चुनाव लड़ते थे, वहां रहकर वह नक्सलियों से खुलेआम टकराहट मोल लिए थे… अगर आपको इतनी ही महेंद्र कर्मा की चिंता थी तो क्यों नहीं उनके जेड प्लस के अप्लीकेशन को पास कर दिया और सुरक्षा दिला दी ताकि नक्सली उनकी हत्या नहीं कर पाते… पर आप तो रामगोपाल यादव को जेड प्लस की सुरक्षा दिलाएंगे जिन्हें किसी से कोई खतरा ही नहीं है…

राहुल गांधी, अगर आपकी सहमति से यह फेसबुक स्टेटस अपलोड किया गया है, तो मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं कि राजनीति, मनुष्य, संवेदना और सरोकार को सीखना अभी बाकी है… आप सच में मेच्योर नहीं हैं… अगर ह्यूमन राइट्स को लेकर इतनी घटिया सोच व भाषा का आप इस्तेमाल कर सकते हैं तो समझा जा सकता है कि जब आप खुद पीएम कभी बन गए तो ह्यूमन राइट्स के प्रति किस तरह का एक्शन रिएक्शन आप करेंगे…

मुझे कभी कभी लगता है कि इस देश का भगवान ही मालिक है… वंशवाद के कारण देश प्रदेश की राजनीति नेता पुत्रों के हाथ में चली गई है… ये नेता पुत्र जैसा सोचते हैं, वैसा ही देश प्रदेश बनाएंगे और इनके कंधे पर सवार होकर कारपोरेट मलाई खाएगा… जनता के पाले में सिर्फ और सिर्फ अत्याचार व आंसू रहेंगे…

कल तक आम जन मारे जाते रहे नक्सली इलाकों में तब राहुल गांधी के बोल नहीं फूटे, लेकिन अब जब नेता मारे जाने लगे हैं तो वो बौखला कर ह्यूमन राइट्स वालों पर निशाना साध रहे हैं…

राहुल जी, ह्यूमन राइट्स के लिए महात्मा गांधी से लेकर नेल्सन मंडेला और राजीव गांधी तक ने काम किया है… तो क्या, इन्हें ह्यूमन राइट का इंडस्ट्री चलाने वाला मान लिया जाए? राहुल जी, सोच बदलिए, क्योंकि वक्त बदल गया है. ट्रांसपैरेंट रहिए और सहज रहिए. ओवर स्मार्ट बनने में लेने के देने पड़ जाएंगे क्योंकि पब्लिक सब जानती है. आप उस देश के युवा नेता हैं और भावी पीएम हैं जिसमें सैकड़ों भाषाएं, संस्कृतियां, सोच और सभ्यताएं हैं… आपको अपनी सोच इतनी उदात्त बना लेनी चाहिए कि हर एक को यह भरोसा दे सकें कि उनका भला होगा…. कम से कम इस देश की जनता को यह तसल्ली व भरोसा तो मिलना ही चाहिए कि अगर उनके मानवाधिकार का पुलिस, सिस्टम, नक्सली, इंडस्ट्रलिस्ट, डकैत, नेता, बाहुबली हनन करते हैं तो उन्हें न्याय मिलेगा और न्याय दिलाने के लिए आपको खुद भी मानवाधिकारवादी बनना पड़ सकता है…

अन्यथा, अगर आप सोच नहीं बदल पाए तो कल को आप सुप्रीम कोर्ट की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठा सकते हैं…

फिलहाल तो आज मैं आप यानि Rahul Gandhi को मानवाधिकार के प्रति घटिया भाषा और सोच के कारण शेम शेम कहता हूं…

मुझे मालूम है, आप सरकार हैं, आप राजकुमार हैं, आप देश के पहले नौजवान हैं, इसलिए पता नहीं आपको मेरे इस लिखे पर कितना गुस्सा आ जाए और बदले में जाने क्या क्या दंड मुझे दिलवा दें, लेकिन तब भी मैं कहना चाहूंगा कि मानवाधिकार के प्रति आपकी सोच व भाषा बड़ी घटिया है. मानवाधिकार के फील्ड में कुछ धंधेबाज हैं, पर वो तो हर फील्ड में हैं, नेतागिरी में तो सबसे ज्यादा धंधेबाज हैं, मीडिया में तो हर दूसरा मीडियावाला दलाल है, कोर्ट में भी खूब करप्शन है, तो इससे क्या हम सारे इंस्टीट्यूशन्स को निगेट कर देंगे?

राहुल जी, आप कृपया फिर सोचिएगा, और अपनी भाषा को चेंज करिएगा… हम इंतजार करेंगे.

राहुल गांधी का फेसबुक अपडेट यह है..

Rahul Gandhi
2 hours ago via Mobile
Where is the Human Rights industry now?

Women Maoists stabbed Congress leader
Mahendra Karma 78 times.
For anti-Maoist crusader and Congress
veteran Mahendra Karma, the last few
minutes of his life must have been
excruciatingly tortuous: a handful of
hardened female combatants took turns to
stab him 78 times, making sure they inflicted
maximum pain before he met his end.
— with Rahul Gandhi.

Madan Bhurle Sahi hai boss..

Shravan Kumar Shukla जिसे अपने राइट्स के बारे में न पता हो वह ह्यूमन राइट्स की बात कर भी कैसे सकता है?.. जी हां! आप सही सोच रहे हैं.. मैं 'राहुल' के ही बारे में बोल रहा हूं……..!!!

Shravan Kumar Shukla पूरी तरह सहमत हूँ आपसे! बहुत कुछ सीखने की जरुरत है. एक बात याद आ गई.. . इन्ही की तरह एक और नेता पुत्र हैं.. अखिलेश यादव.. जो ३९ वर्ष के होकर उत्तर प्रदेश के मुखियां है.. रोते-गाते फिर भी काम चला ही रहे हैं.. इस उम्र में उनके 3 बच्चे हैं.. लेकिन राहुल? अरे राहुल तो 44 का होकर भी बच्चा ही है अभी..! अगर जानकारी न हो तो ऐसे बयान देना ही नहीं चाहिए था..

Subhash Gupta mujhe maloom hai,,,,,,,,ap sarkaar hain,,rajkumar hain,,,,is desh k pahle navjawan hain……………very nice line sir..

पंकज कुमार झा अगर राहुल ने ऐसा कहा है तो पहली बार उनके परिपक्वता की दाद देता हूँ. सच में मानव अधिकार आज की तारीख का सबसे घृणित उद्योग है. इस नाम पर दलाली करने वाले सभी लोग किसी भड़ुवे से भी ज्यादा घृणित हैं.

Shravan Kumar Shukla पूरी तरह सहमत हूँ आपसे!

आशीष कुमार 'अंशु' Yashwant Singhbhai vinamra nivedan hai, aap status fir se padhe ..yah manvadhikar kee baat karne walon ke liy naheen hai, yah hai so called 'human right industry' chalane walon ke liy….
jinake liy manvadhikar ek dookan hai….aur kuchh naheen …

Dinesh Choudhary कल एनडीटीवी पर प्रो. हरगोपाल को भूतपूर्व शिवसैनिक व वर्तमान कांग्रेसी नेता ने लगभग चिल्लाते हुए कहा कि आपको शर्म आनी चाहिये। प्रो. साहब का दोष केवल इतना था कि उन्होंने विकास के वर्तमान माडल में आदिवासियों को शामिल करने की बात कही। दूसरे शब्दों में जयराम रमेश भी तो यही बात कर रहे हैं। जो हिंसक हैं उनसे सरकार चाहे जैसे निपटे। पर डर ये है कि हालिया घटना के बहाने कुछ इस तरह का दमन चक्र न चलया जाए जिसमें निर्दोष आदिवासी-ग्रामीण लोग पिसने लगें। कारपारेट संचालित मीडिया इसी बात के लिये उकसा रहा है व मानवाधिकारों को कोसने की नीति क्या इसी काम के लिये जमीन तैयार करने का पूर्वाभ्यास है?

Yashwant Singh पंकज कुमार झा… सच में अगर सबसे बड़ा घृणित उद्योग है तो वो नेतागिरी है और नेताओं की दलाली करने वाले लोग भड़ुवे से भी ज्यादा घृणित है… आप इसे मानेंगे या नहीं??

Yashwant Singh आशीष कुमार अंशु जी.. आप भी ध्यान से पढ़िए… यह पूरे मानवाधिकार जमात के लिए है और उसे बेहद घटिया व निकृष्ट भाषा से नवाजा है राहुल ने… और, इस पूरे प्रकरण में मानवाधिकार का मसला आया कहां से… अगर आया है तो राहुल बताएं कि उनकी कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा के मानवाधिकार की अनदेखी क्यों की… यानि कर्मा जी नक्सलियों के निशाने पर थे तो उन्हें जेड प्लस दिए जाने के आवेदन को अभी तक क्यों लटकाए रखा.. जब कर्मा मार दिए गए तब जाकर उनके बेटे व परिजन को जेड प्लस की सेक्युरिटी दी गई है.. यह काम पहले ना करके खुद राहुल व कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा के मानवाधिकार का हनन किया यानि जिसे घोषित तौर पर जान का खतरा था और उसे मजबूत से मजबूत सुरक्षा दी जानी चाहिए थी, उसे इन कांग्रेसियों ने मरने के लिए छोड़ रखा था.. और जब कर्मा जी मार दिए गए तो ये कांग्रेस मानवाधिकार आंदोलन को गालियां दे रहे हैं, तंज कर रहे हैं, आक्षेप कर रहे हैं…

Shravan Kumar Shukla सहमत हूँ! वैसे भी कर्मा पर ४ असफल हमले हो चुके था.. पिछले वर्ष भी उनकी गाड़ी उड़ा दी गई थी.. लेकिन वो बच गए.. गाड़ी १५ फुट दूर जाकर गिरी.! ओसे इन्होने जो शब्द इस्तेमाल किये हैं वह इनकी दादी जी के आखिरी वक्त की गवाही देते हैं.! वैसे इंदिरा शुरू में काफी अच्छी थी, लेकिन सत्ता के नशे में चूर होने के बाद बहक गई.! यह अभी से उड रहे हैं..! वैसे मानवाधिकार को यह कैसे समझ सकते हैं? जब खुद इनके और इनके दोस्तों के ऊपर रेप और रेप के बाद पूरे परिवार को गायब कर देने का मामला चल रहा है.. इससे ज्यादा घटियापना और क्या हो सकता है?

Ajit Kumar yashwant ji thik kah rahey hai yah kadwa sach hai isliye nahi hazam ho raha hoga ………………………..

पंकज कुमार झा लाख बुरी है नेतागिरी की दुनिया फिर भी जीने के काबिल है यशवंत भाई. इसी नेतागिरी के कारण आप भी सुकून से अपनी असहमति दर्ज करा पा रहे हैं और इसी नेतागिरी उद्योग के कारण हम सब भी कहीं न कहीं अपनी तमाम असहमतियों के बावजूद ज़िंदा हैं. आपके विचारों का दूकान लगाने वाले लोग कैसे हैं यह आपसे ज्यादा अच्छी तरह मुझे आपकी जेल यात्रा के दौरान पता चला था. मुझे भरोसा था कि जेल से निकलने के बाद इस व्यभिचारी विचार के बारे में पुनर्विचार करेंगे जो सिवा छल-प्रपंच और धोखा के कुछ भी नहीं सिखाता. लेकिन आपका भोलापन अभी तक कायम है शायद.

Ajit Kumar jha sahab apki baat mai sahmat hu lekin is jahan me kuchh hi aise log hai jis per yashwant ji ne tippani ki hai bahut se achhey log bhi hai…………

Yashwant Singh पंकज कुमार झा जी, मैं आपके भोलेपन पर मुग्ध हूं जो परम हरामी राजनीति के प्रति अब भी साफ्ट कार्नर अपनाए हुए है… मानवाधिकार किसी कम्युनिस्ट या किसी भाजपा की बपौती नहीं है, पहली बात तो ये आप समझ लीजिए. आप लोगों के साथ दिक्कत ये है कि मानवाधिकार शब्द आते ही आप मान लेते हो कि ये कम्युनिस्ट पार्टी का हार्डकोर आदमी होगा तभी ये मानवाधिकार मानवाधिकार कह रहा है.. मेरे भाई, मानवाधिकार बहुत पुरानी और बहुत महान चीज है और ये जन जन की चीज है.. याद करिए वो दौर जब युद्ध के दिनों में शाम होते ही दोनों ओर की सेनाएं एक दूजे पर हमला नहीं करती थीं और कई बार एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होती थीं और सुबह होते ही रणभेरी बजते ही एक दूसरे पर हमला बोल दिया करती थी… तो वो उस जमाने का मानवाधिकार था.. भाई, जैसे हम आजादी, बराबरी, समानता, न्याय की बात करते हैं, उसी तरह हमें मानवाधिकार को भी लेना चाहिए.. कल को आपके घर में किसी के साथ कोई घटिया कृत्य हो जाए यानि उस मानव के अधिकार का हनन हो जाए तो क्या उसके हक के लिए आप लड़ेंगे नहीं? पंकज जी, कुछ लोगों की गंदगी के कारण किसी पूरे इंस्टीट्यूशन को खारिज मत करिए… और, मुझे तो सच में लगता है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों इस मसले पर कि जनता का कोई अधिकार ही नहीं होना चाहिए, एक हैं… इसीलिए ये मानवाधिकार की बात से घबड़ाते हैं क्योंकि भाजपा व कांग्रेस की नीतियों से आम आदमी का नहीं बल्कि कारपोरेट का भला होता है और जब कारपोरेट का भला हो तब कैसा मावाधिकार… !!!! पंकज जी, आपकी सोच घटिया हो, यह तो मैं बर्दाश्त कर सकता हूं पर राहुल गांधी का स्तर भी आप जैसा हो, यह ठीक नहीं क्योंकि राहुल तो भावी पीएम हैं भई, उन्हें देश चलाने का काम कभी दुर्भाग्य से जनता ने वोटों के जरिए दे दिया तो वो क्या करेंगे… !!!!

आशीष कुमार 'अंशु' Yashwant Singh: bhai aapki is baat par poori sahmati hai,
''राहुल बताएं कि उनकी कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा के मानवाधिकार की अनदेखी क्यों की… यानि कर्मा जी नक्सलियों के निशाने पर थे तो उन्हें जेड प्लस दिए जाने के आवेदन को अभी तक क्यों लटकाए रखा.. जब कर्मा मार दिए गए तब जाकर उनके बेटे व परिजन को जेड प्लस की सेक्युरिटी दी गई है.. यह काम पहले ना करके खुद राहुल व कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा के मानवाधिकार का हनन किया यानि जिसे घोषित तौर पर जान का खतरा था और उसे मजबूत से मजबूत सुरक्षा दी जानी चाहिए थी, उसे इन कांग्रेसियों ने मरने के लिए छोड़ रखा था.. और जब कर्मा जी मार दिए गए तो ये कांग्रेस मानवाधिकार आंदोलन को गालियां दे रहे हैं, तंज कर रहे हैं, आक्षेप कर रहे हैं…''

rahul gandhi likhte hauin –
''Where is the Human Rights industry now?'',
industry is arth men jab itani berahmi se hatya kee gai, 50 se adhik chakoo ke war aur 50 se adhik goliya maari gai unhen fir bhee so called human right activist ise aadiwasi vs state kee ladai batane men juti hui hai….yah sharmnak hai…
maowadi kabhee honge lekin aaj ve aadivasiyon ke paryayvachi naheen hain. yah aap bhee jante hain kee dandkarany men kis tarah ke samajhaute maowadiyon ne kiy hain…

Robin Rastogi Yash ji ki bat se shmat hun. Desh ki rajneeti v ptrkarita aa gulam hai. Jis traha humara desh gulam tha. Desh ko azad kraya kirantikariyo ne orr aaj na jane koun?? Desh ke hal burai hai. Pr jo hua voo nandniya hai.

पंकज कुमार झा यशवंत भाई, आपने न राहुल की टिप्पणियों पर गौर किया न ही मेरे जबाब पर. यहाँ वास्तविक मानवाधिकार पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है. आपने शायद गौर नहीं किया कि इस पुनीत नाम पर चलाये जा रहे वामपंथी उद्योग पर सवाल है. इसीलिए जब भी आतंक के सन्दर्भ में मानवाधिकार …See More

संजय कुमार मिश्र मैं पूछता हूं कहां हैं कोयला खदानों की लूट मचाने वाले इस निर्लज्‍ज हिंसा की एक अप्रत्‍यक्ष तार इससे भी जुडती है राहुल बाबा इस त्रासद घटना में उसे दबाने का प्रयास न करें…….

Alam Shabbir rahul is best and rest is fake

Prathak Batohi बेहद सटीक सधा हुआ

Sanjeev Kumar mujhe mere ek friend ne bataya tha ,,jo D U me rahul jee ke sath padhta tha…unki tab bhi koi student wali harkat na hua kerti thi..beer wine se grast hoker aate the apne gard ke sath..shayad tab se he wo amnweye harkaton ke aadi hai?

Sanjay Kumar neeman or jayaj bat hai babu

यशवंत सिंह के एफबी वॉल से साभार.

अब रियलटी शो में लगेगी कौमार्य की बोली!

आमतौर पर रियलटी शो में प्रतिभागी करोड़पति बनते है, कुछ शादी करते हैं तो कुछ हिम्मतवाले साबित होते हैं। लेकिन रियलटी शो में कौमार्य की बोली लगने की घोषणा ने लोगों को चौंका दिया है। जी हां, ऑस्ट्रेलियाई फिल्ममेकर जस्टिन सिसले, 'वर्जिन वांटेड' नाम का रियलिटी शो चलाने पर विचार कर रहे हैं। इस रियलटी शो में अपना कौमार्य नीलाम करने को इच्छुक लोग शुमार होंगे और टीवी पर ही उनके कौमार्य की नीलामी होगी।

सिसले वही फिल्ममेकर हैं जिन्होंने कैटरीना मिग्लोरिनी नामक छात्रा द्वारा ऑनलाइन कौमार्य की बोली और बोली जीतने वाले के साथ बिताए कैटरीना के पलों से संबंधित डाक्यूमेंट्री बनाई थी। हालांकि कौमार्य की बोली से जुड़ा ये रियलटी शो कानूनी, सामाजिक और नैतिक मान्यताओं पर कितना खरा उतरता है ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि इसे बनाने का विचार करके सिसले ने सनसनी फैला दी है।

हफपोस्ट से बातचीत में सिसले ने बताया कि मिग्लोरिनी की डॉक्यूमेंट्री बनाने के बाद दुनियाभर से उन्हें करीब 500 वीडियो मिले हैं। इन वीडियों में लोगों ने खुद को नीलाम करने की ख्वाहिश जताई है और कारण भी बताया है कि क्यों उन्हें इस शो के लिए चुना जाना चाहिए। सिसले का दावा ‌है कि उनके शो में कुछ ऐसा है जिससे किसी महिला के वर्जिन होने का आकलन ‌किया जा सकता है। सिसले के इस बयान से एक तरफ डॉक्टरों ने नाराजगी जताई है वहीं दूसरी ओर सामाजिक मोर्चे पर सिसले के फंसने की संभावना बढ़ गई है। सबसे खास बात, कानूनविदों का कहना है कि अपने इस शो की वजह से सिसले सेक्स ट्रै‌फकिंक के मामले में भी फंस सकते हैं। (अमर उजाला)

झांसी में हॉकरों ने दैनिक जागरण का सर्कुलेशन किया ठप

: जन जन जागरण को मिल रहा है सर्वाधिक फायदा : झांसी से खबर है कि चार दिन से दैनिक जागरण अखबार लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है. इसकी वजह बताई जा रही है हॉकरों की कमीशन बढ़ाने जाने को लेकर की जा रही हड़ताल. जागरण समूह खुद तो जमकर पैसा पीट रहा है लेकिन हॉकरों का पैसा बढ़ाने के लिए इसके पास धन की कमी है. कमीशन बढ़ाए जाने को लेकर दैनिक जागरण अखबार के मालिक व हॉकरों के मध्य विवाद की स्थिति पैदा हो गई है, जिससे नाराज हॉकरों ने अखबार उठाना बंद कर दिया है. परिणाम यह है कि अखबार लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है. सर्कुलेशन गिरने से अखबार रद्दी बनकर रह गया है.

हॉकरों के हड़ताल के चलते चार दिन से अखबार की बिक्री बहुत कम हो गई है. दैनिक जागरण के सर्कुलेशन गिरने का फायदा सबसे ज्‍यादा जन जन जागरण को मिल रहा है. अन्‍य अखबारों की भी सेलिंग बढ़ी है. दैनिक जागरण प्रबंधन खुद का स्‍टाल लगाकर अखबार बेचने का काम कर रहा है लेकिन लोग स्‍टाल तक नहीं पहुंच रहे हैं. अब दैनिक जागरण अखबार की भरपाई जन-जन जागरण द्वारा की जा रही है. चार दिन में हालात यह हो गए हैं कि जहां-जहां दैनिक जागरण अखबार जाता था, वहां अब जन-जन जागरण अखबार जा रहा है. लोगों ने यह तक कह दिया है कि अब हमारे घरों पर दैनिक जागरण मत डालना.

दैनिक जागरण के घटने का फायदा उठाने में जन जन जागरण वाले लगातार जुटे हुए हैं. दैनिक जागरण न बंटने से अखबार के मालिक व प्रबंध पूरे तरह से घबरा गए हैं, यहां मालिक झुकने को तैयार नहीं है तो वहीं हॉकरों ने भी अपने हथियार डालने से मना कर दिया है. हॉकरों चंद पैसे का कमीशन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, जिसको दैनिक जागरण के मालिक ने सिरे से खारिज कर दिया है. अन्य अखबारों के मालिकों ने हॉकरों का समर्थन करते हुए कमीशन बढ़ा दिया है, लेकिन दैनिक जागरण कमीशन बढ़ाने को तैयार नहीं है. नम्बर वन की हुंकार भरने वाला दैनिक जागरण अखबार झांसी में रद्दी बनता जा रहा है.

दैनिक जागरण ने झांसी के सदर बाजार, सीपरी बाजार, शहर में पचकुईयां चौराहा, बड़ा बाजार, रामलीला मंच, प्रेमनगर में थाने के पास, नगरा हाट का मैदान, गढिय़ा फाटक, आवास विकास में आरोग्य सदन, ग्वालियर रोड, इलाईट चौराहा, दैनिक कार्यालय कार्यालय गेट, मेडिकल कॉलेज गेट नं. 1 व मिशन कम्पाउण्ड में काउंटर बनाए हैं, लेकिन उसका कोई खास फायदा नहीं मिल रहा है. दैनिक जागरण ने विज्ञापन निकालकर लोगों को एजेंट के रूप में अखबार से जुड़ने का निमंत्रण दिया है. साथ ही अपने पाठकों के लिए भी कुछ संदेश प्रकाशित किया है, लेकिन इसका कहीं कोई असर नहीं दिख रहा है.

समय के साथ बदल गया मीडिया का चरित्र : यशवंत

आज की मीडिया स्टिंग आपरेशन कर बड़े बड़े घोटाले उजागर कर रहा है. बैंकों द्वारा काले धन को सफेद करने के गोरखधंधे को भी मीडिया ने उजागर किया. यह राष्‍ट्रद्रोह का कार्य था. आज का युवा सर पर कफन बांध मीडिया में कार्य कर रहा है. बदलते जमाने के साथ ही मीडिया का चरित्र भी बदल गया है. राजनेता और नौकरशाही की भ्रष्‍टाचारी में पत्रकार भी शामिल होने लगे हैं. भ्रष्‍टाचार की खबरों को रोक लिया जाता है, खबरों को रोकना भी एक तरह से पेड न्‍यूज है.

यह बात भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक यशवंत सिंह ने बुधवार को चैंबर ऑफ कामर्स बोंबे बाजार में आयोजित यूपी जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन द्वारा पत्रकारिता दिवस पर आयोजित सम्‍मेलन व संगोष्‍ठी में कही. वरिष्‍ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने कहा कि हवाला को मीडिया ने ही उजागर किया. जापान और कोरिया के प्रधानमंत्री मीडिया के कारण जेल गए. भारत में भी कई मंत्रियों को मीडिया ने जेल भिजवाने का कार्य किया है. समय के साथ ही आज की मीडिया की नैतिकता व मर्यादाएं बदल रही हैं. समय के साथ अब मीडिया खबर छिपाने लगा है, पहले उजागर करता था. विज्ञापन और पत्रकारिता में अंतर है. औद्योगिक क्रांति सबसे पहले मीडिया के जरिए आई. आर्थिक घोटालों में नेताओं के साथ अब पत्रकारों का नाम भी सामने आ रहे हैं. इसके बावजूद मीडिया में 100 में से 95 पत्रकार ईमानदार हैं.

जिला पंचायत अध्‍यक्ष मनिंद्रपाल सिंह ने कहा कि पत्रकारों का शोषण हो रहा है, सुविधाएं कम कर कांट्रैक्‍ट पर रखा जा रहा है. मीडिया शोषण की बात उठाता है, लेकिन सबसे ज्‍यादा शोषित मीडिया के लोग हैं. पत्रकारिता के बिना देश चलना संभव नहीं है. मेयर हरिकांत अहलूवालिया ने कहा कि देश और समाज में क्‍या हो रहा है इसकी जानकारी मीडिया से ही आम जनता को मिलती है. कार्यक्रम में सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने कहा कि आज पत्रकार का जीवन सुरक्षित नहीं है, यदि पत्रकार का जीवन सुरक्षित नहीं होगा तो अच्‍छी पत्रकारिता नहीं होगी. हिंदी पत्रकारिता भारत की आवाज है. कार्यक्रम में अतिथियों को एसोसिएशन द्वारा सम्‍मानित किया गया. अध्‍यक्षता यूपी जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन जिलाध्‍यक्ष पवन मित्‍तल ने व संचालन राजकुमार ने किया. (साभार : जनवाणी)

समाचार प्‍लस के साथ तेरह लोगों ने शुरू की नई पारी

समाचार प्‍लस से खबर है कि एक दर्जन से ज्‍यादा लोगों ने अपनी नई पारी शुरू की है. इनमें नौ वीडियो एडिटर तथा चार कैमरामैन शामिल हैं. जिन लोगों ने वीडियो एडिटर के रूप में अपनी नई पारी शुरू की है उनमें असीम खान, प्रदीप कुमार, गोपाल कृष्‍ण पाल, राजीव कुमार, शोएब खान, राकेश कुमार, गौरव गुलाटी, नरेंद्र शर्मा और अजहर अख्‍तर शामिल हैं. जबकि धर्मेद्र कुमार, सोनू पवार, सुनील कुमार एवं अविनाश चौधरी ने कैमरामैन के पद पर ज्‍वाइन किया है.

इसमें कई लोग साधना न्‍यूज, कई जनसंदेश चैनल से आए हैं. गौरतलब है कि ये सभी नियुक्तियां राजस्‍थान चैनल के लिए की गई हैं, जो जल्‍द ही लांच होने जा रहा है.

खुले आसमान में चलती है साइकिल वाले गुरु जी की क्‍लास

लग जाती है, गुरु जी की कक्षा कभी भी, कही भी, मकसद सिर्फ शिक्षा। गरीबों को निःशुल्क शिक्षा देने वाले साइकिल शिक्षक का एक ही संदेश है, शिक्षा में क्रान्ति लाना। फर्रूखाबाद के एक गांव से करीब 18 वर्ष पहले राजधानी आए आदित्य का केवल एक ही मकसद रहा है कि गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले और उनके मन से अंग्रेजी का डर खत्म हो। झुग्गी -झोपड़ियों के बच्चे संकोचवश स्कूल जाने से कतराते हैं ,उन बच्चों के घर तक आदित्य की ‘‘पाठशाला’’ पहुंची।

शुरू में आदित्य ने अपने खर्चे निकालने के लिए कुछ टयूशन लिए। लेकिन उन्हें लगा वह इस में फंसकर गरीब बच्चों की पूरी मदद नहीं कर पा रहे, तो नौकरी छोड़कर खुद को सिर्फ इस मुहिम के लिए समर्पित कर दिया और इस मुहिम को लोगों की खूब सराहना भी मिली। आदित्य की इस नेक मुहिम से प्रभावित होकर कुछ युवा भी साथ जुडकर काम करना चाहते हैं, लेकिन आदित्य की माली हालत देखकर वे इससे जुड़ने से कतराने लगे हैं क्योकि गुरु जी, खाने को मोहताज, शहर में किराये के मकान में रह पाना संभव नहीं हो पा रहा है। जबकि छात्रों को स्कूलों तक लाने के लिए केन्द्र और प्रदेश सरकारें अरबों रुपये खर्च कर रही है। वही दूसरी तरफ बच्चों तक खुद चलकर पहुँचने वाली ‘‘पाठशाला’’ का अस्तित्व खतरे में है।

समाज निर्माण जज्बे के मिसाल बन चुके आदित्य बिल्कुल ही साधनहीन है। इसलिए निर्धन असहाय बच्चों के लिए कापी/किताबें भी नहीं खरीद पाते है। ट्यूशन पढ़ाने वाले आदित्य को जो भी पैसा मिलता है उसे गरीब बच्चों की पढ़ाई पर ही खर्च करते हैं। कभी-कभी मलिन बस्तियों के निर्बल बच्चों को एकत्रित करने के लिए इनकों खाने-पीने के सामान को खरीदकर बच्चों को बांटना पड़ता है। वे कहते हैं कि, सरकार या समाज के लोग भले ही उनकी मदद के लिए आगे आएं या न आएं लेकिन मरते दम तक गरीब बच्चों को शिक्षित करते रहेंगे। और गरीब बच्चों को आगे बढ़ाने के अपने सपने को, मैं ऐसे नहीं टूटने दूंगा। गरीबी में ही सही, मेरा संघर्ष जारी है और आगे भी जारी रहेगा। हाँ, यह जरूर है कि लोगों का सहयोग मिल गया तो यह कारवां दूर तक जायेगा। ये कहते हैं कि शिक्षा का अधिकार। और राष्ट्रीय शिक्षा तब तक सफल नहीं हो सकती, जब तक बेरोजगारी-निरक्षरता को दूर नहीं किया जाता। विचारणीय है जो लोग झोपडपट्टी में रहते हैं और कूड़ा बीनने का कार्य- करते हैं वे अपने बच्चों को पढ़ने कैसे भेजें? आदित्य इसी मुददे को उठाने में लगे हुए हैं और इन्हें विश्वास है कि वे एक दिन इसे पूरा करेंगे।

बेशक भारत जैसे देश में साक्षरता दर बढ़ाने के लिए बहुत मेहनत किए जाने की जरूरत है। क्योंकि जब तक देश में एक भी व्यक्ति निरक्षर है, तब तक न तो आजादी के कुछ मायने रहते हैं और न ही खुशहाली के, भले ही विकास की दर कितनी भी हो। निरक्षरता के चलते ये सब बेमानी हो जाती है। क्योंकि निरक्षर व्यक्ति का हक कोई और ही मार लेता है। आज ‘‘राइट-टू-एजूकेशन, जैसे कानूनों को धरातल पर उतारे जाने की बड़ी शिद्दत के साथ महसूस की जानी चाहिए। आदित्य का वाकया भी दिलचस्प है, ट्यूशन के दौरान गुरु जी को इस बात का एहसास हुआ कि हिन्दी मीडियम के बच्चे जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती वो अपने आपको इंग्लिश बोलने वालों के बीच हीन पाते हैं। गुरु जी ने बताया कि एक दिन को टयूशन पढ़ाकर निकल रहे थे, तभी एक झोपड़ी में रहने वाले बच्चे को, एक लड़के ने अंग्रेजी में डपट कर सड़कछाप, बोला। बस उसके बाद से उनके मन में आया कि वो अब इन सड़क छाप बच्चों को ही अंग्रेजी ज्ञान देंगे। उन्होंने बताया कि उनके पास कक्षा चलाने के लिए कोई जगह नहीं थी। साइकिल से वो चलते थे। इस लिए अपनी साइकिल पर ही कक्षा लगाने का निणर्य लिया। आदित्य गरीब, निराश्रित, बेघर, मलिन बस्तियों के बच्चों को प्रशिक्षण देते हैं। उनका उद्देश्‍य उन गरीब लोगो को ‘‘मुफ्त’’ शिक्षा देना है जो आर्थिक तंगी के कारण शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं।

आज के दौर में बिना कम्प्यूटर और इंग्लिश सीखे आगे बढ़ना और अच्छी नौकरी मिलना असंभव सा हो गया है अगर समाज में खड़ा होना है तो अंग्रेजी शिक्षा कपड़ों की तरह ही अनिवार्य उपकरण हो चुकी है। आदित्य कहते हैं कि जब मैंने अंग्रेजी ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने की सोची तो सबसे पहले मेरे दिमाग में सडक पर रहने वाले ये लोग ही थे। फिर मैं भी आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं था। इसलिए मैंने साइकिल की मदद से सड़क पर ही कक्षाएं लगाने की शुरुआत कर दी। वो निर्धन बच्चों को ज्ञान देकर उन्हें कुछ काबिल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। बल्कि वे चाहते हैं कि निर्धन, असहाय बच्चों को निःशुल्क कम्प्यूटर भी सीखने को मिले। लेकिन उनके पास इतना धन नहीं है कि वे कम्प्यूटर का खर्च वहन कर सके। आदित्य की माने तो हर बच्चे को शिक्षा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है, शिक्षा में अमीर-गरीब का भेद खत्म होना चाहिए। अमीर घर के बच्चे बड़े निजी स्कूलों में पढते हैं। तो एक गरीब घर के बच्चे के लिए स्कूली शिक्षा पाना भी टेढी खीर साबित होता है। विकास के रास्ते पर एक साथ आगे बढ़ने के लिए इस अमीर शिक्षा और गरीब शिक्षा के भेद को मिटाने की जरूरत है। क्योंकि शिक्षा ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है।

आदित्य से दो टूक

– नौकरी क्यों नहीं की?

— कई जगह इंटरव्यू दिये। बात नहीं बनी और ग्रामीण परिवेश के साथ कुछ अन्य दिक्कतें कारण बनीं।

– टयूशन क्यों शुरू किए?

— मकान का किराया और रोजमर्रा की जरूरत के लिए पैसे तो चाहिए।

– शादी क्यों नहीं की?

— गरीबी आड़े आ गयी। और अपने लक्ष्य से डगमगाना नहीं चाहता था।

– आपकी शैक्षिक योग्यता?

— बी.एस.सी.बाँयोलाँजी।

– रूटीन?

— सुबह अपने खर्च के लिए टयूशन, पूरे दिन निःशुल्क साइकिल क्लास।

– किस बात का मलाल?

— आई.ए.एस. का सपना संजोया था।

– काम तो बहुत कठिन है?

— लगन, हो तो कठिन काम भी आसान लगने लगता है।

– क्लासेस सड़क पर ही क्यों?

— गरीब और पिछड़े बच्चों को स्कूल की राह दिखाना है मकसद।

– सड़क किनारे ऐसा भीड़ वाला काम करने में काफी अड़चन आती होगी?

– इस बात का तर्जुबा हो गया है कि उन्हें अपनी क्लास किस समय और कहाँ लगानी चाहिए।

– कैमरा अपने साथ क्यों रखते हैं?

— तमाम जरूरी चीजों को रिकार्ड कर, उनका पढ़ाई में इस्तेमाल करते हैं।

– अंग्रेजी पढ़ाने का तरीका?

— बेसिक ग्रामर से शुरुआत करके उच्चारण पर विशेष ध्यान। मैंने ग्रामर पर 24 किताबें भी लिखी हैं। इनकी मदद से ही पढ़ाता हूँ।

– आपका लक्ष्य क्या है?

— जन-जन को शिक्षित करना, न अंगूठा लगाओ, न अनपढ़ कहलाओ।

– सपना क्या है?

— निराश्रित, बेघर, सड़कछाप, असहाय बच्चों के लिए एवं पिछडी जातियों की शिक्षा हेतु झोपडपट्टी, मलिन बस्तियों में हमारी साइकिल पहुंचे।

– अपडेट कैसे रहते हैं?

— अंग्रेजी में अपने स्तर से नवीनतम जानकारी और ट्रेड पर नजर रखना फिर अखबार तो है ही।

– भविष्य के बारे में?

— यही काम आगे बढ़ाना है। बस यही मेरी जीत और जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई है।

– क्या आप महान हैं?

— यह मेरा नशा है, मगर समाज और राष्ट्र के हित में है तो ठीक ही है।

– जीवन में सच क्या है?

— मौत तो होनी ही है।

– झूठ क्या है?

— मैं अमर हूँ। हमेशा मुझे यही रहना है।

– जीवन का अर्थ?

— संसार में जियो, संसार आप में न जीने लगे।  

निराश्रित, बेघर, असहाय बच्चों का गुरु है ये साइकिल वाला : ज्ञात हो, स्कूल न जा सकने वाले बच्चों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, आदित्य कुमार। जनपद फर्रूखाबाद के मूल निवासी पिछले 18 सालों से लखनऊ के निशातगंज में रहते हैं, इनके पिता श्री भूपनरायन पेशे से मजदूरी करते थे। आदित्य एक अत्यन्त ही पिछड़े अविकसित गाँव सलेमपुर के एक झोपड़ी में जन्म होने के उपरान्त भी समाज के समस्त जाति, धर्म, के निर्धन बच्चों को जीवन भर मुफ्त पढ़ाने का भागीरथी संकल्प लिये निःस्वार्थ भाव से मलिन बस्तियों में जाकर शिक्षित करने में लगे हुए हैं। इस शिक्षक ने आज हमारे बाजारवादी भावना से ग्रसित समाज के सामने जो मिसाल कायम कर रखी है उसे शायद ही कोई भुला सके। आदित्य बच्चों के बीच- अंग्रेजी टीचर, गरीबों के शिक्षक, साइकिल वाले गुरु जी, के नाम से जाने जाते है। क्योंकि उनकी ‘‘पाठशाला’’ साइकिल के जरिए चलती है।

बकौल आदित्य मैंने जब होश सम्भाला, तभी से काम करके पढ़ाई करता था, दिन में मजदूरी करता और रात में पढ़ता था, 1995 में मैंने कानपुर विश्वविद्यालय से बायोलोजी में बी.एस.सी. किया। मैं आई.ए.एस. आफिसर बनना चाहता था। लेकिन गरीबी ने मेरे उस सपने पर ग्रहण लगा दिया। फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और उन बच्चों को पढ़ाने लगा, जिन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वह कभी पढ़ पायेंगे। आदित्य बताते हैं कि मैंने अपना बचपन उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रूखाबाद, एक बस्ती सलेमपुर में गुजारा है। जहाँ मेरे बाबू जी तपती जमीन पर नंगे पांव मजदूरी का काम करते थे, कभी काम मिलता कभी नही, माँ थी- कि बाबू का हाथ बंटाने की कोशिश में जुटी रहती थी। इतने पर भी दो जून की रोटी का ही जुगाड़ हो पाता था। ऐसे में उनसे पढ़ाई या फीस की उम्मीद, मैं भला कैसे करता, तब मैंने सोचा था कुछ ऐसा करूंगा कि कोई बच्चा इन हालातों के चलते अनपढ़ न रह जाये। आदित्य ने यह करने से पहले भी खासी मेहनत मजदूरी की है।

हरियाणा में नगर निगम चुनाव : मतदान केंद्र में मीडिया की इंट्री पर बैन

हिसार में 2 जून को होने वाले नगर निगम चुनाव में पहली बार मतदान केंद्रों पर मीडिया की इंट्री पर पाबंदी रहेगी. इतना ही नहीं चुनाव कवरेज के लिए पास भी केवल मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों को ही जारी किए जाएंगे. इस निर्णय के बाद मतदान के दिन मीडियाकर्मी अब मतदान केंद्र के अंदर होने वाली किसी भी प्रकार की गतिविधियों से अंजान रहेंगे. उन्‍हें केंद्र के आसपास की कवरेज पर ही निर्भर रहना होगा. पत्रकारों को पास जारी नहीं किए जाने का निर्णय मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त धर्मबीर सिंह ने लिया है.

पत्रकार वार्ता में धर्मबीर सिंह ने स्‍पष्‍ट कर दिया कि मीडिया को मतदान केंद्रों के अंदर जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी. हां, मतदान केंद्रों के आसपास कवरेज करने पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा. उन्‍होंने कहा कि पास भी हरियाणा सरकार से मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों को ही जारी किए जाएंगे. लेकिन इन्‍हें भी बूथ के अंदर जाने की अनुमति नहीं रहेगी. उन्‍होंने कहा कि जिला प्रशासन अपने स्‍तर से पत्रकारों को पास जारी कर सकता है.

उल्‍लेखनीय है कि हरियाणा में दो जून को सात नगर निगम के लिए चुनाव हो रहे हैं. इससे पूर्व मीडिया की मतदान केंद्र में वोटिंग करते हुए मतदाता के फोटो को छोड़कर हर प्रकार की गतिविधि पर नजर होती थी, यानी की कवरेज के लिए स्पेशल पास जारी किए जाते रहे थे. मतगणना केंद्रों के लिए भी अलग से पास जारी किए जाते थे. मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा मतदान के दौरान मतगणना केंद्र में मीडिया की नो इंट्री वाला ब्यान पत्रकार वार्ता के बाद भी चर्चा का विषय बना रहा.

प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ऋतुपर्णो घोष का निधन

कोलकाता: बांग्ला फिल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक ऋतुपर्णो घोष का गुरुवार सुबह करीब साढ़े सात बजे कोलकाता में हार्ट अटैक से निधन हो गया। कुल 12 नेशनल अवॉर्ड जीत चुके ऋतुपर्णो घोष की उम्र महज 49 वर्ष की थी। पिछले साल उन्हें 'अबोहोमन' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुआ था। उन्होंने 1992 से फिल्मी पारी की शुरुआत की थी और 'हीरेर आंग्ती' नामक बांग्ला बाल फिल्म बनाई थी।

हिन्दी के दर्शक उन्हें अजय देवगन और ऐश्वर्या राय अभिनीत 'रेनकोट' के लिए जानते हैं। ऐश्वर्या राय के साथ उनकी फिल्में चोखेर बाली (2003) काफी चर्चित रही थीं। नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स विजेता घोष को फिल्म निर्माण की सीख घर से ही मिली थी। उनके पिता डॉक्युमेंट्री फिल्म मेकर थे। घोष ने करियर की शुरुआत बच्चों के लिए फिल्म बनाने के साथ की।

नो टीवी डे, इ का है बे

: मुंबई में एक जून को हिंदुस्‍तान टाइम्‍स कर रहा है आयोजित : हमारे इनबॉक्स में मेलर आते रहते हैं। इसके ज़रिये लोग अपने कबाड़ टीवी कार्यक्रमों या ग़ैर मीडिया इवेंट की जानकारी देते रहते हैं। मेलर सबसे अनुपयोगी प्रचार तंत्र है और संचार क्षेत्र मे लगे लोगों को व्यक्तिगत रूप से भेजा जाता है। ख़ैर मुद्दा ये नहीं है।

तो क्या है। वो ये है कि हिंदुस्तान टाइम्स एक नया डे निकाल लाया है। नो टीवी डे। टीवी कम देखिये या मत देखिये की वकालत तो मैं भी करता रहा हूँ। ट्विटर के उन दिनों में और टीवी शो के दौरान भी। किसी ने सुना नहीं वर्ना तो जो है वो चली जाती। ख़ैर। टीवी सचमुच तंग करने लगा है। मैं तो पूरे महीने में इतना कम देखता हूँ कि आप यक़ीन नहीं करेंगे। तो मेलर के अनुसार हिन्दुस्तान टाइम्स एक जून को मुंबई में नो टीवी डे मनवा रहा है। मनाया जाना ठीक नहीं क्योंकि ऐसे इवेंट हम मानते नहीं बल्कि तरह तरह के प्रलोभनों के ज़रिये हमसे मनवाया जाता है।

तो फ़्री के पास मिलेंगे और कई लोग यूँ भी जमा होंगे और नो टीवी डे मनवा दिया जाएगा। अच्छा क़दम है। टीवी में रहते हुए फ़ुल सपोर्ट। एक दिन नो पेपर डे भी मनवाया जाना चाहिए जिसमें हम पेपर के टायलेट पेपर बन जाने से मुक्ति का आह्वान कर सके। कूड़ा पढ़ने से अच्छा है शहर को देखो। टीवी के कारण हमारी शाम खराब हो रही है वैसे ही पेपर के कारण सुबह। अखबार में आधा घंटा लगाने से अच्छा है टहल आइये। पेपर में भी बुराई है। वहां कोई दैनिक स्वर्ण युग नहीं छप रहा है। तुलनात्मक रूप से ज़रूर पेपर टीवी से बेहतर है। ख़ैर। ये तीसरा ख़ैर है।

शहर तो देखना ही चाहिए। फादर्स मदर्स डे फ्रैंड्स डे बिना बाप माँ दोस्त से मिले ही मनायें जा रहे थे क्या। लल्लुओं बिना इनसे मिले कार्ड किसको दे रहे थे? पड़ोसी के डैडी को? अब टीवी बंद कर इन तीनों से मिलने का डे आ रहा है। नो टीवी डे।  इसदिन टीवी बंद कर आप मुंबई देखने के लिए घरों से निकलवाये जायेंगे तभी तो मनवाये जायेंगे। देख लीजिये कि एक जून को पूरी मुंबई टीवी बंद कर बाहर न निकल आए। फिर उसके बाद एक दिन कोई पेपर नो मुंबई डे मनवायेगा। शहर में न निकलने के लिए पास देगा कहेगा कि घर पर रहें और शहर को बचायें। नो मम्मी डे, नो हब्बी डे, नो वाइफी डे नो जीजू डे का भी स्कोप खुल रहा है। फ़्री का पास मिले तभी मनवाना वर्ना एकादशी द्वादशी क्या कम है हमारे पास। लेकिन एक बात तो है शहर में यूँ ही घूमना चाहिए। ज़रूरी है।

रवीश कुमार एनडीटीवी के प्राइम टाइम एंकर और वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. टीवी में पत्रकारिता करते हुए भी सरोकार से जुड़े रहते हैं. इनका यह लेख उनके ब्‍लॉक कस्‍बा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

नंगे पैर गांव-गिरांव की सेवा करने वाले पत्रकारों की कमी नहीं, पर इन्हें पूछता कौन है?

अनेक दिवस-दिवसों की तरह 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस सिर्फ एक कर्मकांड नहीं है। साल-दर-साल अपने पेशे यानी पत्रकारिता को कसौटी पर कसने, मूल्यांकन करने और आत्म-निरीक्षण का यह दिन हमें अपनी परंपरा के प्रति जागृत करता है और आगे का रास्ता भी तय करने का अवसर देता है।

साल 1826 की 30 मई को कलकत्ते (अब कोलकाता) की आमड़ातल्ला गली के एक कोने से प्रकाशित अल्पजीवी पत्र उदन्त मार्तण्ड ने इतिहास रचा था। मुफलिसी में भी अपने पत्रकारीय जज्बे को जिंदा रखने वाले इसके संपादक युगल किशोर सुकुल को 187 साल बाद याद करके भारतीय पत्रकारिता की संघर्षशीलता का रोमांच कौंध उठता है।

थोड़ा पीछे देखें, तो ‘संघर्ष’ भारतीय पत्रकारिता की नियति प्रतीत होता है और आज भी वह इस पेशे का प्रेरणा-बिंदु या थाती है। पत्रकारिता के पौधे को सींचने वाली ‘कंपनी’ के मुलाजिम जेम्स आगस्टस हिक्की (भारत के पहले समाचार पत्र के संपादक) को ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश निकाला दे दिया। कोलकाता के ही राजा राममोहन राय को अपने समाचार-पत्रों को सुधारवादी आंदोलनों का हथियार बनाने के लिए कट्टरपंथियों की तीखी आलोचनाएं व प्रहार झेलने पड़े। कोलकाता में ही बड़ा बाजार और दूसरे बाजारों में दुकान-दुकान, घर-घर जाकर सेठों को अपना अखबार ‘बांच’ (पढ़) कर सुनाने और बदले में चार-छह पैसा पाकर अखबार चलाने वाले उचित वक्ता के संपादक दुर्गाप्रसाद मिश्र का संघर्ष कम ही लोगों को ज्ञात होगा। घोर मुफलिसी में काशी की गंदी अंधेरी कोठरी में ‘स्वनामधन्य- संपादकाचार्य’ पराड़करजी के आखिरी दिनों की कहानी और भी सिहरन भरी है।

वर्तमान दौर भी कम उद्वेलित नहीं करता। समूचे विश्व में पत्रकारिता आज भी संघर्ष और जज्बे का पेशा है। मिशन से प्रोफेशन और फिर ‘बिजनेस’ की बातें बहुत होती रही हैं, पर वास्तविकता से परे पत्रकारिता का कोई भी विमर्श कुछ भी अर्थ नहीं रखता। पहले मानते थे कि ललाट (मस्तक) पर टीका, धोती-कुरता, अंग-वस्त्रम् के बिना संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का काम नहीं हो सकता। वक्त बदल चुका है। कुछ वैसी ही धारणा पत्रकारिता की ‘संघर्षशीलता’ को लेकर भी रही। बढ़ी हुई दाढ़ी, कुरता, कंधे पर बगल में टंगा थैला, फटी-पुरानी चप्पलें, बिवाई वाले पांव व वाचलता यानी किसी भी विषय पर कुछ भी उल्टी-सीधी क्रांतिकारी बयानबाजी- ये सभी एक पत्रकार को रूपायित करते थे। लेकिन आज के व्यावसायिक दौर में पत्रकारिता की कार्यशैली काफी कुछ बदल चुकी है। उसका स्वरूप निरंतर बदल रहा है।

बदलाव के इस दौर में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ का जुमला उछालकर पत्रकार और पत्रकारिता के स्वरूप और दायित्वों को समेटना बेमानी है। मेरी दृष्टि में ‘मिशन’ से ‘प्रोफेशन’ के दौर में पहुंची पत्रकारिता के लिए व्यावसायिक नैतिकता (प्रोफेशनल एथिक्स) का महत्व सबसे ऊपर है। इसके बावजूद समूचा परिदृश्य निराशापूर्ण है। कितना भी प्रोफेशनलिज्म हो, पत्रकारिता का मूलमंत्र या पत्रकारिता की आत्मा ‘मिशन’ ही है और  वही रहेगी। तभी तो देश के लगभग 37,000 से ज्यादा स्ट्रिंगर और अल्पकालिक संवाददाता-पत्रकार पत्रकारिता की सेवा में जुटे हुए हैं। मोटी तनख्वाह या तनख्वाह न पाने वालों का असली मानदेय ‘मिशन’ की पूर्ति से मिलने वाला संतोष ही है। आखिर अपना कैमरा संभाले कमर तक पानी में घुसकर या नक्सलियों के ‘डेन’ (अड्डों) में जाकर कवरेज करने वाले किस पत्रकार की भरपायी की जाती है? या फिर आतंक के महासागर पाकिस्तान में मीडिया के लिए समाचार या कंटेंट जुटाने-लाने के लिए अपनी जान गंवा देने वाले, सिर कटा लेने वाले डैनियल पर्लो को भला कितना वेतन मिलता है?

यह सच है कि आज के बाजारीकरण के दौर में पत्रकारिता का काम बदला है। ‘मीडिया कर्म’ को या पत्रकार को जर्नलिस्ट नहीं, ‘कंटेंट प्रोवाइडर’ माना जाने लगा है। फिर भी भारतीय पत्रकारिता की मूलधारा इस बाजारीकरण की आंच से नहीं पिघली। उसमें जोखिम झेलने का जज्बा बरकरार है। आज पत्रकारिता के कामकाज की दशाएं बदली हैं। एक पत्रकार को जीविका के लिए पूरा साधन न मिले, तो वह देश-दुनिया की चिंता क्या करेगा? फिर भी दूसरे पेशों में यह स्थिति पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से काफी अच्छी है। चीन के ‘नंगे पैर डॉक्टर’ वाले प्रयोग का हमारी पत्रकारिता में एक अलग समर्पित रूप मिलता है।

नंगे पैर गांव-गिरांव की सेवा करने वाले पत्रकारों की यहां कमी नहीं, पर इन्हें पूछता कौन है? वह दौर-ए-गुलामी था, यह दौर-ए-गुलामां है- पत्रकारिता के संघर्ष की इससे दो दिशाएं साफ होती हैं। तब ‘मिशन’ था अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का और अब दौर है आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक दासता से मुक्ति का। इसी ‘मुक्ति’ की चाहत के साथ समर्पित भाव से काम करने वाले दुनिया के 29 देशों में 141 पत्रकारों ने अपनी जानें गंवा दीं। आंकड़े देखें, तो सीरिया पत्रकारों व पत्रकारिता के लिए सबसे खतरनाक देश है। भारतीय पत्रकारिता के बारे में भी कहा गया- ‘तलवार की धार पे धावनो है’- पत्रकारिता तलवार की धार पर दौड़ने के समान है। सचमुच इन 141 पत्रकारों ने सिर्फ एक वर्ष 2012 में ऐसा कर दिखाया। इनके जज्बे को भी सलाम करने का मौका है- पत्रकारिता दिवस।

हाल ही में मैं अंडमान निकोबार में था। वहां की सेलुलर जेल में ही हजारों भारतीयों ने कालापानी की सजा काटी थी।  उस जेल की काल कोठरियों से अंग्रेज हुक्मरानों को दहला देने वाली ‘वंदे मातरम’ की जो आवाजें गूंजती थीं, उनमें बहुत से स्वर पत्रकारों-संपादकों के भी थे। जेल के फांसी घर में लटकते तीन फंदों पर कितने पत्रकार-संपादक झूल गए थे, लोगों को यह पता भी नहीं। इस विषय पर पत्रकारिता विश्वविद्यालयों और विभागों में शोधकार्य की आवश्यकता पर केंद्र सरकार-राज्य सरकारों को ध्यान देना चाहिए। उन पत्रकारों के संघर्ष और बलिदान को यह नमन-श्रद्धांजलि होगी।

आज इसी के साथ स्वंतत्र पत्रकारिता के नाम पर मीडिया में, खासकर कुछ ब्लॉग लिखने-चलाने वाले स्वार्थी ब्लैकमेलरों के विरुद्ध समाज और खुद मीडिया की मुहिम जरूरी है। तभी तो भाषा, संदर्भ और विषय की जानकारी न रखने वाले, कहीं काम न पा सके लोगों के पत्रकारिता में घुस आने पर देश के जिम्मेदार लोगों की चिंता का हल ढूंढ़ा जा सकेगा।

तिलक, गांधी और भगत सिंह सहित आजादी के दौर के प्राय: सभी क्रांतिकारियों-राजनेताओं ने मिशन के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया। वह भी भाषायी पत्रकारिता, खासकर हिंदी पत्रकारिता का, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सके। आज पत्रकारिता में इस मिशन या समर्पण को बनाए रखने के लिए समाज के सहारे और व्यापक समर्थन की जरूरत है।

लेखक राम मोहन पाठक पत्रकारिता के शिक्षक हैं. इनका लेख हिंदुस्‍तान में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार.

”कमलेश, कुलदीप, ओम थानवी के बाद अब फेसबुक के पण्डों के निशाने पर हैं अशोक वाजपेयी”

Om Thanvi : कमलेश, कुलदीप कुमार, ओम थानवी, प्रताप राव कदम के बाद अब फेसबुक के पण्डों के निशाने पर हैं प्रतिष्ठित कवि अशोक वाजपेयी। कोसा जा रहा है कि वे मुंबई में एक दक्षिणपंथी मंच पर एकल कविता-पाठ करने क्यों गए थे? एक पण्डे ने इस पाठ के लिए उनकी "सख्त भर्त्सना" भी कर दी है!

जरा पण्डों से पूछा जाय कि फेसबुक पर वे जो स्टेटस लगाते हैं, क्या उन्हें पढ़ने वाले हर शख्स की विचारधारा उन्हें मालूम है? अगर उनका स्टेटस या विचार कोई भी पढ़ सकता है, तो अशोक वाजपेयी की कविता हर कोई क्यों नहीं सुन सकता? कभी-कभी लोकतंत्र की बात करने वाले लोग जाने किस किस्म के लोकतांत्रिक आचरण की बात करते हैं, जिसमें कवि पहले कविता सुनने वालों की विचारधारा मालूम करे?

दक्षिणपंथियों से मेरी जरा सहानुभूति नहीं, न उनकी विचारधारा का मैं लिहाज करता हूं; पर कविता सुनने के उनके अधिकार को चुनौती देना निहायत तानाशाही का फतवा है। यह एक तरह का फासीवाद है, जिसमें जातिवाद और छुआछूत को विचारधारा का जामा पहनाया जा रहा है।

जैसे कविता की किताब पढ़ने का अधिकार सबको होता है, मंच से कविता सुनाना भी कविता का प्रकाश फैलाना है। ठीक वैसे ही जैसे कवि द्वारा अपने काव्य-संकलन को प्रकाशित करना। कौन कविता किसके कान में पड़ने के योग्य है और किसके नहीं – क्या इसे पहले तय किया जा सकता है? वह भी वैचारिक पूर्वग्रहों के आधार पर?

स्वप्निल कुमार ये तालिबान बनाकर छोड़ेंगे.

Dhiraj Bhardwaj पता नहीं लोग फेसबुकी पण्डों को इतनी माइलेज क्यों दे रहे हैं..

Bharat Tiwari ये हल्युसिनेशन के घोर लक्षण हैं

Vaibhav Mani Tripathi विचार आदमी के लिए है की आदमी विचार के लिए?

Zubair Shahid taras aata hai aise logo par jo purvagarah se grasit hai. ek kavi ko he kyo sabko ajaadi hai bolne ki, wakai me yd log barbad karne par tule huye hai.

Cine Manthan गांधी को बचाना पडेगा चोट से अगला निशाना वे भी हो सकते हैं| उन्होंने तो बचपन में बीते ऐसे प्रसंग ही लिख दिए हैं आत्मकथ्य में कि वे गाँव के बुरी आदतों वाले लड़कों के साथ इसलिए रहे कि उन्हें सुधार सकें|

Dhiraj Bhardwaj उन फेसबुकी पण्डों का वजूद तब तक ही है, जब आप उन्हें नोटिस करने के लिये पोस्ट और कमेंट लिख रहे हैं.

Shayak Alok keep rockkin ! .. जरुरी हस्तक्षेप आपका ..

Devesh Rajeev Tripathi Itni ''Potash'' Laate Kaha Se Hain….?

Pravesh Shukla चलो माना ऐ अजनबी खूबियाँ मुझमें नहीं,
मगर कुछ तो है जरुर जो तू सिर्फ मुझे,
नज़रअंदाज़ करता है!!

Binit Kumar बहुत पहले स्टारलिन ने कहा था कि हथियार कहां से आता है ये मतलब नहीं है यह किसके खिलाफ इस्तमाल हो रहा है यह् ज्यादा महत्वपूर्ण है

Cine Manthan क्या ये स्वयम्भू फतवेबाज वामपंथी दलों की भर्त्सना कर चुके हैं क्योंकि इन्होने अपनी घोर विरोधी दक्षिणपंथी भाजपा के साथ मिलकर वी.पी.सिंह की सरकार बनवाई थी और तकरीबन डेढ़ साल चलवाई भी और हरेक मंगल को वी.पी सिंह के यहाँ डिनर टेबल भी भगवाधारियों और तिलकधारियों के साथ सांझी की|

Rashmi Chaturvedi ये समाज में बढ़ती असहिष्णुता के लक्षण है|

Cine Manthan कवि के बाद रवि का भी नंबर लग सकता है कि वह दक्षिणपंथियों के आँगन में किरणे क्यों बिखेरता है?

Pratyush Pushkar इस मामले में जब एक कवि/साहित्यकार दूसरे का नहीं हो पाता है तो आप कहाँ किसी पण्डे से उम्मीद रखते है ! दूसरों की की गयी हर गोष्ठी से दिक्कत है पहले वाले को यहाँ, और नुख्स खोजे जाते है, कवितायों से लेकर मंच तक में ! बहुत क्षोभ है और नया ही जुड़ा हूँ पर देखा है यह क्षोभ ! दुखद! साहित्या को किसी भी सीमा में बाँधने की बात गलत ही है !! संगठन से लेकर आइडियोलॉजी तक !!

Bharat Tiwari अजब तबका है ये … दया आती है इनपर … खुद चैन नहीं तो दूसरे को चैन से ना रहने दो … क्या इस दुनिया में कोई ऐसी भी बात है? जिस पर इनकी अपनी राय ना हो और जिसे वो हर दूसरे पर ना थोपें … वैसे सुनता कोई नहीं इनकी (प्रीमियर लीग के मेम्बरान को छोड़ दें तो) लेकिन फिर भी बक-बक बक-बक … जी मैं लेखक हूँ – सबसे बड़ा … जी मैं संपादक हूँ – सबसे बड़ा … जी मैं इतिहास का सबसे बड़ा ज्ञाता हूँ … कूक मंडूक ……… फलां को लाइसेंस से दिया – अब ये नए युग का सबसे बड़ा अ.ब.स.द. है … यहाँ सब कुछ ना कुछ हैं … और सबके पास अपने अपने दिमाग भी हैं …

Raj Ke Geet ओम जी, ये नोट पढ़कर अच्छा लगा। लगा की कोई प्रतिबद्ध है मॉडरेशन के लिए, समन्वयता के लिए ..हम ही हम है तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो। अलग विचार, अलग बिम्ब, आवश्यक है सभी चीजों के लिए। कविता तब तक बनी रहेगी जब तक मतभेदों के साथ आदर भाव से रहने की संभावना जीवित रहेगी ..सहमत

Ankit Muttrija सर,दक्षिणपंथी विचारधारा मुझे भी फूंटी आँख नहीं सुहाती ना ही दक्षिणपंथियों की बातें|पर सोचिये यदि इसी रवैए से हरेक विचारधारा का शख्स अपने-अपने खेमों में विभाजित हो कर एक दूसरें का बहिष्कार करें तो क्या होगा ?मैं पहले स्वयं नास्तिक होने के नाते भी आस्तिकों की आस्था का सम्मान करता था आज भी करता हूं पर कभी-कभी अतार्किक हो कर बहुत ज्यादा उग्र हो जाता था पर अब मेरा सोच यह है कि यदि हम दूर से ही उन चीज़ों का बहिष्कार कर देंगे जिन्हें हम नापसंद करते हैं तो बदलाव करना संभव ही नहीं|अंतत:उन्हीं लोगों के बीच जा कर हमें अपनी बात रखनी होगी जिनकी विचारधारा हमें पसंद नहीं|इसलिए किसी विचारधारा के अनुयायी को भी इतना कट्टर नहीं होना चाहिए कि सामने वाला आपसे बात तक करने से हिचके|यदि,दक्षिणपंथी मंच से भी कवि महोदय कुछ ऐसी बात कह जाए जो उस विचारधारा को कुछ समझा पाए तो इससे बेहतर क्या होगा|

Basant Jaitly मै स्वयं इस मामले में किसी किस्म के विभाजन का समर्थन नहीं करता.

Ankit Muttrija और कोई भी इंसान बुरा नहीं होता | विचारधारा तो सामाजिक परिवेश से बनती हैं|विचारधारा नहीं पसंद तो उसका विरोध कीजिए लोकतांत्रिक तरीके से पर इंसान से घृणा न कीजिए चाहे वो जो कोई भी क्यों ना हो |बल्कि,उनके प्रति सहानुभूति रखिए.. उनके लिए कुछ कर सकेंगे ऐसा कुछ कीजिए.. ना कि उनका बहिष्कार ही कर दीजिए|

N V Upadhyay Upadhyay shradhe ,thanwi ji,"aek kahaawat hai, 'janhaa naa pahunche 'ravi' wahaan pahunche kawi ! To fir aapatti ki koi baat nahi ! Samaa lochnaa , me bhi aapatti ki koi baat nahi ! Aapatti wahnaa pe waajib hogi janhaa hinsak maawo waadi ke pachh me koi 'Thakur suhaati' kaa 'wesh' dhaaran kar le ! Maawo waadiyon ki mahimaa mandan ki paraakaasthtaa koi saahityakaar naa karen !" Jai hind ! Jai bhaarat !!!

Vivek Shrivastava Ye tao balki aur jyAada achchi baat hai ki Aap un vyaltiyon ke samkash apne vichaar rakhe jo aap se sahmat nahi ya ve dusri vichaar dhaata ke hoon

Amitabha Pande Why are ideological debates in the Hindi world so far behind the rest of the world ?

हितेन्द्र अनंत लाल तालिबान

Smita Vajpayee Lal taliban… Sahi hai !

Harish Sharma abhivaykti ke khatre uthane hee parege ,torne hee hoge math aur gharr sab ……

Rajeev Ranjan Upadhyay jay ho

Girijesh Vashistha हिंदी कविता से कुछ ज्यादा ही विवाद नहीं जुड़ते रहते । काम जितना हो कहा है उससे ज्यादा झगड़े है. क्यों ?

Sudha Singh ji ye log bahut kunthit vyakti hain ………….yah anargal pralaap hi unki ideantity hai ………..varna unka naam bhi log na jaanein …………..

Vimal Chandra Pandey श्रीमान ओम थानवी साहब, आप समझदार व्यक्ति हैं, इस मुआमले को वस्तुनिष्ठ न बनाते हुए थोड़ा खोल कर इस तरह कहा जाए कि एक कविता पाठ होता है जिसे एक ऐसा व्यक्ति आयोजित करा रहा है जो हिंदी भाषियों का घोर और हिंसक विरोध करने वाली पार्टी 'महाराष्ट्र नव निर्माण सेना' यानि मनसे का उपाध्यक्ष है तो एक हिंदी कवि को इस आयोजन में जाना चाहिए या इसका बहिष्कार करना चाहिए ? क्या यह इतना छोटा सा मामला है कि सिर्फ 'एक दक्षिणपंथी मंच' कह कर छुट्टी पायी जा सकती है ? ऊपर कमेन्ट करने वाले बहुत से दोस्तों को शायद पता नहीं कि वह दक्षिणपंथी मंच मनसे का प्रदान किया हुआ था, वही मनसे जिसने रेहड़ी लगाने वालों और टैक्सी चलने वालों हिंदी भाषियों को खदेड़ खदेड़ कर महाराष्ट्र से बहार किया था, क्या एक हिंदी कवि को इस पर कोई स्टैंड नहीं लेना चाहिए ? क्या कविता पढ़ना इतनी महत्त्वपूर्ण बात है कि मंच का ध्यान ही न दिया जाए ?

Anju Mishra rachna to vo ha jo man ko chhu le. jaise tulasidas ki manas. kavita samaj ko disha deti ha .jan jan me jivan milyon ka sanchar karti hai . isliye kavi aur kavita ko sankuchit karna uchit nahi.

Satyam Shree fir itni preshani ki kya bat hai thanvi sahab sabse badi bat to ye hai ki aap so called elite logo ki gud khaye gulgullo se parhej wali bimari se pidit hain wrna dakshinpanth koi deshdroh ya samaj virodhi karm nahi hai wrna dakshin panthi kahne walo ko jwab dene ya spastikaran dene ki jururat to ni thi yahi sb apke ideolical opponent ko hausla badhane ko kafi hota hai.

Mahendra Prasad Kushwaha बिलकुल सही कह रहे हैं सर…

महाभूत 'चन्दन राय' कवि अशोक वाजपेयी। .. !

आम आदमी बिना टोपी Vimal Chandra Pandey जी से सहमत , सिर्फ दक्षिण पन्थी कहने से बात साफ़ नहीं हो रही थी

Madhu Arora थान्‍वीजी, नमस्‍ते। यह हिन्‍दी साहित्‍य का संक्रमण काल चल रहा है। हर कोई वार कर रहा है। कविता दिल से निकले भाव होते हैं अब उन्‍हें भी विभाजित करके पढ़ा जाये। अजीब मसला है।

Anurag Chaturvedi विमल चंद पांडे@ की बात में दम है.अशोक जी तो शिव सेना के विरोधी थे.

Purnima Awasthi pande ka funda…………sunday ho ya monday ..roz maaro ande…. kya wo kisi bhi kism ki ,ratti bhar bhi tavajjo ke laayak hain?…..

Shanti Prasad Bissa SUCH,LIKE

Prakash Khatri kuchh log fitratana selected audience hi pasand karte hein…kewal wohi log hon jinke saamne kavita parosi ja sake.

शरद श्रीवास्तव आपके पांडे जी ने कभी भी ये नहीं कहा की दक्षिण पंथियो को कविता न सुनाओ। उन्होने वाम या दक्षिण पंथ केलोगों को कविता सुनाने या न सुनाने को लेकर कोई बात नहीं कही बल्कि जैसा विमल जी ने कहा की उन्होने मंच का प्रश्न उठाया था। उन्होने मनसे का मंच इस्तेमाल किए जाने पर वाजपेई जी की आलोचना और भर्त्स्ना की। आपने तोड़ मरोड़ कर बात को पेश करने में वाकई अपना जलवा दिखा दिया।

Ramji Tiwari Vimal ठीक कह रहे हैं | आप हमसे और विमल से अधिक 'मनसे' को जानते हैं | उनके कुकृत्यों से परिचित हैं | मसला यह नहीं था , कि वहां श्रोता कौन था और कौन नहीं | निश्चित रूप से यह तय भी नहीं किया जा सकता | लेकिन उस कार्यक्रम का आयोजक कौन था , यह तो मसला है ही |

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey अशोक वाजपेयीजी का कहना है कि उन्हें वरिष्ठ कवि जगदम्बाप्रसाद दिक्षित ने आमंत्रित किया था।

Om Thanvi Ramji Tiwari आयोजक क्या मनसे था? अशोकजी के अनुसार सौ से ज्यादा लोग कविता सुनने को आए थे, क्या वे मनसे कार्यकर्ता थे?

Vimal Chandra Pandey माफ कीजियेगा ओम जी लेकिन अशोक जी कविता के कोई नए रंगरूट नहीं हैं कि उन्हें कोई आयोजित करेगा तो वह बिना आयोजक के बारे में प्रॉपर जानकारी लिए वहाँ कविता पाठ के लिए चले जायेंगे. स्पष्ट कर दूं कि मुझे अलग विचारधारा वाले कवियों या रचनाकारों के साथ संवाद करने से कोई ऐतराज़ नहीं है लेकिन आयोजक जब कोई हिंदी विरोधी (और विरोध भी हिंसक) मंच हो तो कम से कम एक हिंदी कवि के वहाँ जाकर कविता पढ़ने को मैं तो बहुत अशुभ संकेत मानता हूँ

Vimal Chandra Pandey नहीं, वे मनसे कार्यकर्ता क्योंकर होंगे लेकिन ज़ाहिर है मनसे की गतिविधियों से उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा. समर्पित कार्यकर्ता और विरोधी के बीच एक और कड़ी भी तो होती है जो भले कार्यकर्ता न हो, समर्थक होती है.

Ankit Muttrija क्या वहां पर कवि महोदय उस बीमार इंसान की शर्तों पर गए थे ? क्या वहां वह इन शर्तों पर गए थे कि कविता पाठ मराठी में होगा ?गड़बड़ तब थी जब वह वहां उन्हीं की शर्तों पर जाते|वहां जा कर हिंदी में कविता पाठ किया क्षेत्रवाद के ज़हर को इससें करारा तमाचा क्या होगा ?आप देखते है कि कवि ने वहां कविता पाठ क्यों किया मैं देखता हूं जो इंसान भाषा,क्षेत्र के नाम पर ज़हर फैलाता रहा उसी को हिंदी कविता पाठ करवाना पड़ा तो ये उसकी हार हैं|भाषा बनाम भाषा नहीं उस बीमार व्यक्ति की जो चाहता ही क्षेत्रवादी अस्मिता के नाम पर लोगों को बाँटना हैं |

Anurag Chaturvedi थानवी जी@जगदम्बाप्रसाद जी वर्षों तक सामना में कॉलम लिखते थे.मुर्दाघर उपन्यास के बाद उन्होंने सामना से जुड़ना किस लिए पसंद किया यह रहस्य है.

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey छोटे-छोटे तीर हैं, और कुछ नहीं। असल निशाना बोधिसत्त्व हैं, जिन्होंने पहले ऐसी ही टिप्पणी दूसरों पर कर दी थी। अब उन्हें हड़काने के चक्कर में वाजपेयी, विष्णु खरे, व्योमेश शुक्ल, प्रतापराव कदम आदि कई निशाने … उस बहस में एक आलोचक तो सीआइए को भी ले आए!!

Rakesh Achal एक निरर्थक बहस को ज़िंदा रखने से क्या हासिल है महामहिमो

Vimal Chandra Pandey क्षमा करें Om जी लेकिन आप ऐसी निर्णयात्मक टिप्पणियाँ देंगे तो बहस का कोई औचित्य नहीं. मुझे बोधिसत्त्व जी से कोई समस्या नहीं है कि मैं उन्हें निशाना बनाऊँ. मुंबई में जितने भी साहित्यिक कार्यक्रम हम लोगों ने किये, बोधि जी को आमंत्रित किया और वह सहृदयता से अक्सर आये भी. एक लाइन की बात यह है कि एक हिंदी विरोधी मंच पर एक हिंदी के कवि का कविता पढ़ना दुर्भाग्यपूर्ण है और इसकी निंदा की जानी चाहिए कम से कम उन व्यक्तियों द्वारा जो मनसे की उत्तर भारतीयों के खिलाफ़ की गयी हिंसात्मक कार्यवाहियों को गलत मानते हैं. अब इसके बाद इसे सही ठहराने के लिए कुतर्क तो सैकड़ों दिए जा सकते हैं

Vimal Chandra Pandey Ankit Muttrija: आपकी बात से मैं ज़रूर सहमत होता अगर अशोक जी किसी मराठी के कविता पाठ में जाकर हिंदी की कविता पढ़ आते लेकिन मित्र वह हिंदी का कार्यक्रम था और मनसे के उपाध्यक्ष बाकायदा हिंदी में कवितायेँ लिखते हैं और स्वयं को प्रगतिशील भी कहते हैं जिस तरह राज ठाकरे की लाइब्रेरी में हिंदी की ढेर सारी किताबें दिखाई देती हैं

Vimal Chandra Pandey Madhu Arora जी, कविता को बिना किसी विचार के सिर्फ दिल से निकला भाव बताने वाली परिभाषा के हिसाब से तो नरेन्द्र मोदी की कवितायेँ भी उल्लेखनीय होनी चाहियें, आपको पता ही होगा उन्होंने इधर कुछ कवितायेँ लिखी हैं

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey नरेन्द्र मोदी की कविताएँ कविताएँ ही नहीं हैं, मैंने पढ़ी हैं; अटलबिहारी वाजपेयी की भी ख़राब होती थीं। अच्छी कविता होती तो मुझे उसे अच्छा मानने में कोई गुरेज नहीं होता (फासिस्ट एज़रा पाउंड को महँ कवि मानने से इनकार कौन करता है?)

Vivek Shrivastava Hindi ke lekhak Mohalla sanskarti ko ab tak jeevt rakhe hain…….duniyaa ko gyaan baat te hain par khud tu-tu, main-main se baaz nahi aate……bhai rachnaakaar hain tao rachiye….. par ninda se bacho…

Om Thanvi Anurag Chaturvedi आम आदमी बिना टोपी Vimal Chandra Pandey इस प्रकरण में कवि वागीश सारस्वत, जिनकी राजनीतिक आस्थाओं को घेर कर संस्था 'परचम' और अशोक वाजपेयी तक को लपेट लिया गया, उन Vageesh Saraswat का यह बयान सामने आया है: – "परचम" एक प्रगतिशील सोच की सामाजिक व साहित्यिक संस्था है। श्री जगदम्बा प्रसाद दीक्षित इस संस्था के अध्यक्ष है तथा गोपाल शर्मा इस संस्था के सचिव है। "परचम" से जितने भी लोग जुड़े हैं उन सबका मार्क्सवाद से गहरा संबंध रहा है। इस संस्था ने पूरे सोच-विचार के बाद ही श्री अशोक वाजपेयी के एकल काव्य पाठ का आयोजन किया। … जिनकी विचारधारा में दूसरों को सुनने का संयम भी न हो, वह फ़ासिस्ट होता है। … मेरे साहित्य पर, मेरे विचार पर, मेरे बयान पर, मेरी किसी किताब पर साहित्यिक मित्रों ने उंगली उठाकर यह कहा होता कि वागीश सारस्वत प्रगतिशील नहीं है, तब तो बात समझ में आती। अभी भी समय है। मैं चुनौती देता हूं, मेरे साहित्य को कठघरे में खड़ा करके दिखाएं। अगर मेरी रचना दक्षिणपंथी है, तो मैं लिखना छोड़ दूंगा। साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल होना बंद कर दूंगा। … मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता आप चाहे तो मुझे फासीवादी कहे या साहित्यिक सक्रियता के अपराध में मुझे फांसी पर लटका दें। मैं अपनी प्रगतिशीलता का परचम लहराता रहूंगा। अगर हो सके तो अशोक वाजपेयी के इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर उन्हें कठघरे में खड़ा न करें। अशोक वाजपेयी की कविता पर बात करनी हो तो जरूर की जाय। हम अशोक वाजपेयी को प्रगतिशील मानते हैं। भले ही धुर वामपंथी उन्हें प्रतिगामी साहित्यकार कहते रहें।"

Rakesh Achal hahahahahaमोदी के बारे में मुझे नहीं पता,लेकिन अटल जी के साथ मैंने कविता सत्संग किया है,वे कम से कम छंद शास्त्र का अनुशरण करना तो जानते हैं ,उनकी कविताओं में एक अर्थ है ,तुकान्त है

Ashutosh Tiwari bilkul pando ka yh pakch fasist h..

Satyawan Daulatpur प्रगतिशीलता न हुई कोई वैदिक ऋचा हो गई जो विजातीयोँ के कान में पड़ जाने से अशुद्ध हो जायेगी !!

Bhuvan Sharma विमल जी यह तो उनका साहस कहिए या फिर हौसला कि वह हिंदी विरोधी मंच पर एक हिंदी की कविता पढ़ आए, इससे हमारी राष्ट्रभाषा का भला ही हुआ, कुछ बुरा हुआ तो बताईए? और रही बात विरोध की तो विरोध के पीछे सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है…. यह आप भी अच्छी तरह से जानते हैं.. और एक कवि जब कभी कविता पाठ करता है तो वह राजनीति नहीं करता बल्कि निष्पक्षतः अपने मन के भावों और विचारों को भाषा के माध्यम से श्रोताओं तक पहुंचाता है..

Rakesh Achal प्रगतिशीलता न वेदिक ऋचा है न ही छुईमुई ,सो बेफिक्र रहिये ये इतनी जल्दी न अपावन होगी और न ही कुम्हालाएगी,जो इसे लेकर चिंतित हैं वे आराम करें

Bodhi Sattva इन्हीं वागीश सारस्वत के साथ कुछ समयपूर्व एक पूरा बहु दिवसीय सान्निध्य गुजार चुके हैं वे ही लोग। उस बात के खुलासे पर तब कैसे खूंखार हुए थे। यहाँ देखें। http://www.facebook.com/photo.php?fbid=4559871597999&set=a.1540536436507.2070517.1327802261&type=3&theater

Vimal Chandra Pandey Om Thanvi: अगर आप ये मानते हैं कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में हिंसा करता रहा हो और बयान जारी करके कह दे कि मैं गाँधीवादी हूँ तो सारी समस्या खत्म हो जाती है फिर अब क्या कहा जाए.

शरद श्रीवास्तव वागीश सरस्वत जी का साहित्य प्रगतिशील है, पर वह खुद एक दक्षिण पंथी दल के उपाध्यक्ष हैं। क्या ये मुमकिन है की आपकी कविता आपके विचार आपके कर्मों से मेल ना खाते हों

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey निर्णयात्मक टिप्पणी? कौन निर्णयात्मक टिप्पणियां देते हैं, यह आपको पता है; Pankaj Chaturvedi तो वहां यह साफ़ कह भी आए थे, उन्हें पूछिए।

Rakesh Achal लो ,मै तो चला इस मुबाहिसे के बाहर

Bodhi Sattva और यह दूसरा संदर्भ आजकल सात महीने वाले भाई साहब और भैया, यानी महान जनवादी राजेश जोशी जी का है।इसे भी देखें। http://www.facebook.com/photo.php?fbid=4560212686526&set=a.1540536436507.2070517.1327802261&type=1&theater

Vimal Chandra Pandey भुवन जी क्या वोट बैंक, एक गुस्सा है जो हिंदीभाषियों के भीतर है. अशोक बाजपेयी अपने कविता कर्म में शोषितों दलितों और वंचितों के साथ खड़े रहे हैं, उनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी

Om Thanvi Bhuvan Sharma हिंदी विरोधी मंच कहना क्या ठीक होगा जब आयोजक भी हिंदी के कवि थे और श्रोता भी!

Rasbihari Pandey जगदम्बा
दीक्षित अशोक वाज्पेयी और उनकी कविताओ को सख्त नापसन्द करते है,वे उस दिन
शहर मे थे भी नही,उन्से आप बात कर सकते है-०९६१९७९८५३८

Bhuvan Sharma Om Thanvi जी बिलकुल नहीं, तब तो यह और भी सौभाग्य की बात है

Rasbihari Pandey Jagdamba Dixit ka mobile no.–09619798538

Om Thanvi Vimal Chandra Pandey तो भाईजान, इसी तरह, पंडों के बयान पर हम कैसे एतबार कर लें? उनके कहने पर अशोक वाजपेयी और विष्णु खरे को प्रगतिविरोधी, शमशेर सम्मान के संस्थापक प्रतापराव कदम और ओम थानवी को यह सम्मान दे देने वाले निर्णायकों ज्ञानरंजन, राजेंद्र शर्मा, विष्णु नागर और लीलाधर मंडलोई (उस बहस में उजागर हुए नाम) को विवेकहीन, कमलेश को सीआइए का एजेंट, कुलदीप कुमार को सौदेबाज समीक्षक, बोधिसत्त्व को षड़यंत्रकारी, व्योमेश शुक्ल को लालची मान लें?

Eskay Sharma यदि एक हिन्दी कवि, हिन्दी विरोध के गढ़ मे जाकर कविता पाठ कर आता है तो यह तो गौरव की बात होनी चाहिए….आपकी उपस्थिति वहीं अधिक प्रासंगिक है जहाँ आपका विरोध है….अपने घर मे तो सभी शेर हैं.

Bodhi Sattva फिर नरेश सक्सेना जी को अब तक क्यों छोड़ा हुआ है। प्रतापराव कदम की आलोचना जिन वजहों से हो रही है तो नरेश जी की भी होनी चाहिए। और अनेक शमशेर सम्मान से सम्मानित कवियों लेखकों की भी आलोचना होनी चाहिए। प्रतापराव कदम ने एक शानदार सम्मान की स्थापना की है। उसका एक गौरवशाली इतिहास बन चुका है। कहीं उस इतिहास को अपने गुट तक दबाए-बनाए रखने के लिए यह सब बेचैनी तो नहीं।

Onkareshwar Pandey Mindless allegation… Meaningless discussion…

Bhuvan Sharma विमल जी वोट बैंक कोई गुस्सा नहीं बल्कि यह तो तुच्छ राजनीति करने का साधन है, जिसे हिंदी भाषी कभी नहीं करता बल्कि सियासी गलियारों में बैठे वो नेता करते हैं जिन्हें येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करनी होती है फिर इसके लिए उन्हें भाषा के नाम पर अराजकता ही क्यों न फैलानी पड़े.. यह तो एक सार्वभौमिक सच है.. और रही बात शोषितों, दलितों पर कविता करने की तो यह सामाजिक काम है.. जो काबिल-ए-तारीफ है..

Radheyshyam Singh Yaha to dakshinpanthi aur pagalpanthi me bhed karna hi muskil hai.

Vimal Chandra Pandey Om जी यह तो ज़बरदस्ती बहस को दूसरी दिशा में मोड़ने वाली बात है, आप हिंदीभाषियों का हिंसक विरोध करने वाली मनसे पर कोई बात नहीं कर रहे हैं और अन्य नामों को लाकर इस कविता पाठ को बहुत प्रगतिशील बताने की कवायद कर रहे हैं. आप किसी के किसी बयान पर ऐतबार मत करिये लेकिन जब वागीश जी का यह बयान आप पढ़ रहे थे तो आपके मन में यह नहीं उठा कि अगर उनकी कविता प्रगतिशील है और वह मार्क्सवाद से जुड़ाव महसूस करते हैं तो उस फासीवादी पार्टी से त्यागपत्र उनका कवि क्यों नहीं दे देता ? अगर नहीं उठा तो मैं अब कुछ नहीं कहना चाहता. इसे मेरा अंतिम कमेन्ट समझा जाए, मैंने अपनी बातें कह दी हैं.

Bhuvan Sharma विमल जी सारी बाते एक तरफ और यह बताईए कि क्या कविता विरोध की राजनीति का पर्याय है या फिर बन सकती है???

पंकज कुमार मिश्र ऐसी सोँच तो बिल्कुल अप्रासंगिक है। कवि अपने श्रोताओँ की विचारधारा से अनभिज्ञ होता है,और अपने कविता पाठ से दूसरोँ को प्रभावित करता है। सच तो यह है कि खुद को महिमामंडित करने के लिये लोग कुछ भी कर सकते हैँ।

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.

सुल्‍तानपुर में ब्‍लाक प्रमुख ने पत्रकार को सरेआम पीटा, एनसीआर दर्ज

सुल्तानपुर : सपा के शासनकाल में पत्रकारों पर हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पत्रकारों को कभी नेता पीट रहे हैं तो कभी पुलिस वाले। सुल्‍तानपुर में भी कानून व्यवस्था का मखौल उड़ाते हुए चांदा थाना क्षेत्र के महारानी पश्चिम गांव में मंगलवार की रात ब्लाक प्रमुख ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक पत्रकार को जमकर पीटा। देर रात थाने में दोनों पक्षों की ओर से पुलिस ने तहरीर दी गई। पुलिस ने पत्रकार की तरफ से एफआईआर दर्ज करने की बजाय दोनों तरफ से एनसीआर दर्ज कर ली। ब्लाक प्रमुख बचाव में हर तरह के हथकंडे अपना रहा है। संभव है पत्रकार को न्‍याय न मिले।

घटना मंगलवार की देर रात की है। चांदा थाना क्षेत्र के महारानी पश्चिम गांव में आयोजित एक मांगलिक कार्यक्रम में पत्रकार रामप्रकाश मिश्र मौजूद थे। उसी दौरान चांदा ब्लाक प्रमुख आनंद मिश्र भी अपने साथियों सहित वहां आ पहुंचा। रामप्रकाश को देखते ही वह उनसे उलझ गया। पत्रकार जब तक कुछ समझता प्रमुख अपने साथियों के साथ उस पर टूट पड़ा। हल्ला-गुहार मचने पर लोग दौड़े तब रामप्रकाश ने भागकर जान बचाई।

किसी तरह समझा बुझाकर प्रमुख को लोगों ने शांत कराया। पत्रकार ने देर रात अपने ऊपर हुए हमले की शिकायत थाने में दी। बताते हैं कि थाने में ब्लाक प्रमुख की ओर से तहरीर आ गई है। इस पर पुलिस ने दोनों ओर से एनसीआर कायम कर लिया है। एसओ चांदा वीपी सिंह का कहना है कि दोनों ओर से एनसीआर दर्ज है। मामले की जांच की जा रही है। जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। उधर, सीओ अर्चना सिंह ने बताया कि उन्हें संपूर्ण मामले की जानकारी है। मामले में निष्पक्ष कार्रवाई होगी। हालांकि, पुलिस का रवैया देखकर नहीं लग रहा है कि पीडि़त पत्रकार को न्‍याय मिल पाएगा।

आरटीआई के दायरे में आता है सहारा समूह?

मुंबई। सहारा ग्रुप की दो कंपनियों द्वारा गलत तरीके अपना कर फंड जुटाए जाने के लंबे समय से चल रहे मामलों के मद्देनजर लोग सेबी से इस ग्रुप के बारे में तरह-तरह के सवाल पूछने लगे हैं। सेबी से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत इसी तरह का एक सवाल किया गया है कि क्या लखनऊ का यह ग्रुप आरटीआई के दायरे में आता है?

इस मामले में आरटीआई के तहत किए गए आवेदन को जब सेबी ने खारिज कर दिया, तो ऐप्लिकेंट ने एपेलेट अथॉरिटी से संपर्क किया। हालांकि, वहां भी यह ऐप्लिकेशन खारिज हो गई। मार्केट रेग्युलेटर सेबी, सहारा ग्रुप के साथ उसकी दो कंपनियों द्वारा जुटाई गई 24,000 करोड़ रुपए की राशि को निवेशकों को वापस कराने के मामले में लंबे समय से उलझा हुआ है।

सेबी फिलहाल असल इन्वेस्टर्स की पुष्टि कर उन्हें फंड वापस करने में जुटा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, सहारा द्वारा रीपेमेंट के लिए सेबी के पास जमा कराए गए 5,120 करोड़ रुपए के फंड से अभी असल निवेशकों को पैसा लौटाने का काम चल रहा है। इधर, सहारा ने दावा किया है कि वह इन दो कंपनियों के बॉन्ड होल्डर्स को 20,000 करोड़ रुपए से अधिक का फंड लौटा चुका है। उसका दावा है कि अब उसकी बाकी देनदारी उसके द्वारा जमा कराई गई कुल 5,120 करोड़ रुपए के फंड से कम ही बैठती है।

इस बीच, सेबी को 14 मार्च को किसी शख्स ने आरटीआई ऐप्लिकेशन भेजी। इसमें पूछा गया था कि क्या सहारा इंडिया परिवार आरटीआई ऐक्ट के तहत आता है या नहीं? हालांकि, मार्केट रेग्युलेटर सेबी ने 5 अप्रैल को अपने जवाब में कहा कि सेबी के पास भेजी गई ऐप्लिकेशन में दिए गए सवाल के बारे में कोई इंफर्मेशन नहीं है। इसके बाद सवाल करने वाले ने इस महीने की शुरुआत में सेबी के एपेलेट अथॉरिटी के यहां याचिका दाखिल की। इसमें भी यही जानकारी मांगी गई थी। (भाषा)

‘टैबलेट’ लौटाकर सरकार को ही ‘दर्द’ दे दिया ‘चुनिंदा’ पत्रकारों ने

सपा शासनकाल में केवल पत्रकारों का उत्‍पीड़न ही नहीं बढ़ा है बल्कि अंग्रेजों की तरह पत्रकारों के बीच फूट डालने की कवायद भी की जा रही है. पर कई सवालों के घेरे में खड़ी पत्रकारिता के दौर में कुछ पत्रकारों ने इस कवायद को ऐसा जोरदार तमाचा मारा है, जिसका दर्द सरकार और उनके कारिंदों को लंबे समय तक होता रहेगा. खबर यह है कि सूचना विभाग के कुछ अधिकारियों ने चोरी छुपे लखनऊ के कुछ चुने हुए पत्रकारों को खुश करने के लिए किताबों-डायरियों के साथ सैमसंग का टैबलेट गिफ्ट में भिजवाया.

शायद अधिकारियों को यह भान रहा होगा कि सब कुछ बिकने के दौर में इन चुनिंदा पत्रकारों का ईमान भी इस सैम'संग' टैबलेट के बदले सरकार के 'संग' हो जाएगा. शुरुआत कुछ अच्‍छी भी रही, कई चापलूस टाइप, चम्‍मच टाइप पत्रकार सैम'संग' टैबलेट मिलते ही सरकार और सरकारी अधिकारियों 'संग' हो लिए. वे अधिकारियों के साथ सत्‍'संग' भी करने लगे. इन दो कौड़ी के पत्रकारों के चलते सरकारी कारिंदों का मनोबल भी बढ़ गया. इसके बाद इन लोगों ने आईबीएन7 के ब्‍यूरोचीफ शलभमणि त्रिपाठी, आईबीएन7 के पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी, बिजनेस स्‍टैंडर्ड के स्‍टेट चीफ एवं मान्‍यता प्राप्‍त समिति के सचिव सिद्धार्थ कलहंस, पी7 न्‍यूज के ब्‍यूरोचीफ ज्ञानेंद्र शुक्‍ला, इंडिया न्‍यूज के ब्‍यूरो चीफ श्रेय शुक्‍ल, वरिष्‍ठ पत्रकार सत्‍यवीर सिंह को भी कुछ किताबों के साथ टैबलेट गिफ्ट में भिजवाया.

परन्‍तु इन लोगों के यहां भेजा गया सैम'संग' टैबलेट ने सूचना विभाग के अधिकारियों के रंग में 'भंग' डाल दिया. ये सभी पत्रकार 'संग' तो हुए नहीं उल्‍टा 'टैबलेट' ने ही अधिकारियों को 'दर्द' दे दिया. हुआ यह कि सभी पत्रकार सरकार और अधिकारियों की नीयत को भांपते हुए टैबलेट रखने की बजाय ससम्‍मान वापस भिजवा दिया. इन पत्रकारों के पास अधिकारियों की दाल तो नहीं 'गली', पर उनके इस 'टैबलेट' वितरण प्रोग्राम का शोर जरूर 'गली-गली' हो गया. वैसे बताया जा रहा है कि सरकार के इस सैम'संग' टैबलेट 'संग' न होने और पत्रकारिता का सिर ऊंचा करने का मौका शलभमणि त्रिपाठी की पहल पर मिला.

खबर है कि जब सूचना विभाग के अधिकारियों ने सभी पत्रकारों के घर टैबलेट भिजवाया, उस वक्‍त शलभमणि त्रिपाठी सपरिवार शहर के बाहर थे. वापस आने पर जब उन्‍हें इस बात की जानकारी हुई साथ ही ये भी प‍ता चला कि यह चुनिंदा पत्रकारों को देकर खुश किया जा रहा है तो उन्‍होंने तत्‍काल सभी साथियों से सलाह मशविरा किया. इसके बाद सभी ने निर्णय लिया कि बिना किसी नीति के टैबलेट वितरण कर सरकार पत्रकारों के ईमान का सौदा कर रही है, साथ ही अन्‍य पत्रकार भाइयों के साथ अन्‍याय भी कर रही है, लिहाजा सभी लोगों ने एक साथ सैमसंग टैबलेट लौटा कर ऐसा करने वाले अधिकारियों के मुंह पर जोरदार तमाचा जड़ दिया.        

सूत्र बता रहे हैं कि प्‍यार भरे तमाचे से सरकारी अधिकारियों के गाल अभी तक दर्द कर रहे हैं. साथ ही टैबलेट वापस लौटाने वाले पत्रकार तमाम लोगों की नजरों में हीरो भी बन गए हैं. वहीं दूसरी तरफ 'टैबलेट' गटकने वाले तथाकथित पत्रकारों के नामों पर थू-थू हो रही है. पीठ पीछे गालियां भी पड़ रही हैं. लखनऊ के कई पत्रकारों का कहना है कि यहां सवाल नैतिकता का नहीं है. राजस्‍थान, असम समेत तमाम राज्‍यों पत्रकारों को लैपटॉप और अन्‍य चीजें बांटी गई हैं, परन्‍तु उसके लिए बकायदा सूचना जारी की गई है, क्राइटिरिया तय किया गया है. अगर पत्रकारों को सरकार सुविधा देती है तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन अगर कोई चीज चुनिंदा लोगों को और चोरी-छिपे दिया जा रहा है तो यह गलत है और इसका विरोध किया जाना चाहिए. जिन पत्रकारों ने 'टैलबेट' लौटा कर सरकार को 'दर्द' दिया है वे अपने तमाम साथियों की नजरों में पत्रकारिता के 'मर्द' बन गए हैं. 

बिल गेट्स के सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों से की धक्‍का मुक्‍की

नई दिल्ली। पिछले माह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और वित्त मंत्री अमित मित्रा के साथ हुई बदसलूकी के बाद योजना आयोग का दफ्तर एक बार फिर हंगामे का गवाह बना। बुधवार को योजना भवन आए अमेरिकी व्यवसायी बिल गेट्स के सुरक्षाकर्मियों ने यहां पत्रकारों के साथ धक्कामुक्की की।

इससे पहले योजना भवन में तैनात सीआइएसएफ कर्मियों ने गेट्स के आगमन के समय एक बजे से काफी पहले ही पत्रकारों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। मान्यताप्राप्त मीडियाकर्मियों को भी अंदर जाने की इजाजत नहीं मिली। जैसे ही माइक्रोसाफ्ट कंपनी के संस्थापक गेट्स योजना भवन के गेट से अंदर जाने लगे, उनके निजी सुरक्षाकर्मियों ने एक फोटोग्राफर को धक्का दे दिया। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के साथ मुलाकात के बाद गेट्स जब वापस लौटे तो फिर मीडिया ने उनसे बातचीत करनी चाही, लेकिन उनके निजी गार्डो ने पत्रकारों को पीछे धकेल दिया।

इससे नाराज मीडियाकर्मी भी गेट्स के सुरक्षाकर्मियों से भिड़ गए। बाद में मीडियाकर्मियों ने योजना भवन में प्रवेश पर पाबंदी को लेकर विरोध भी जताया। वहां चुस्त-सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह था कि आयोग के प्रवक्ता एनएन कौल को भी दस मिनट तक लॉबी में इंतजार करना पड़ा। योजना भवन की सुरक्षा का जिम्मा संभाले सीआइएसएफ के कमांडिंग अफसर भवन गजेंदर सिंह ने सफाई दी कि ऊपर से मिले आदेशों के मुताबिक मीडिया को अंदर जाने की इजाजत नहीं दी गई। हालांकि, वह इसका कोई लिखित प्रमाण पेश नहीं कर सके। (जागरण)

अमर उजाला में मदन को देहरादून और विपिन को मेरठ भेजा गया

अमर उजाला, हल्द्वानी यूनिट में तैनात डिप्टी न्यूज एडिटर मदन गौड़ का देहरादून तबादला हो गया है. मदन गौड़ पिछले १५ सालों से अधिक समय से हल्द्वानी में तैनात थे. एक जून को देहरादून में उन्हें ज्वाइन करना है. मदन गौड़ सिटी इंचार्ज के रूप में हल्द्वानी में अमर उजाला देख रहे थे. मदन को बिपिन बनियाल की जगह देहरादून लाया जा रहा है. विपिन अमर उजाला, देहरादून में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे, जिनका तबादला मेरठ के लिए कर दिया गया है.

बताया जा रहा है कि विपिन मेरठ जाने के इच्‍छुक नहीं है. वहीं मदन गौड़ के तबादले के बाद स्थानीय सम्पादक सुनील शाह ने निशांत खनी को सिटी इंचार्ज की जिम्मेदारी सौंपी है. निशांत खनी अमर उजाला हल्द्वानी में सीनियर रिपोटर्र हैं. हालाँकि मदन गौड़ के तबादले से पहले दिल्ली से डिप्टी न्यूज एडिटर अनूप बाजपेयी ने हल्द्वानी यूनिट में ज्वाइन किया है. अनूप बाजपेयी फिलहाल को-आर्डिनेशन रहे हैं. अमर उजाला हल्द्वानी सिटी रिपोर्टिंग की टीम अब पूरी तरह युवा पत्रकारों के हाथों में आ गयी है.

जनसंदेश टाइम्‍स, इलाहाबाद : एक खबर हो रही है दो दिन प्रकाशित

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस यूनिट से जुड़े जिलों में अखबार भगवान भरोसे ही चल रहा है. बनारस यूनिट से संबद्ध इलाहाबाद में खबरों का टोटा है या फिर अयोग्‍य लोगों की ज्‍यादा भर्ती हो गई है, कारण चाहे जो भी हो यहां एक ही खबर दो दिन लगाया जा रहा है. पहले दिन जो खबर सिंगल कॉलम में छपती है, अगले ही दिन वह खबर तीसरे पेज की लीड बन जाती है. जनसंदेश टाइम्‍स, इलाहाबाद में 28 मई को पेज नम्‍बर तीन पर सिंगल कॉलम में खबर छपती है 'चुभती जलती गर्मी का आया मौसम'.

इस के ठीक अगले अंक यानी 29 मई को एक और खबर छपती है, जिसका शीर्षक है – 'हवा में नमी : चुभती जलती गर्मी का मौसम आया'. टॉप में पहले दिन वाली खबर का ही दुहराव है. आप भी देखिए नीचे दोनों खबरें…

28 मई को प्रकाशित खबर
29 मई को अखबार में प्रकाशित खबर

हिंदुस्‍थान समाचार प्रवर समिति गठित, संजय बने अध्‍यक्ष

देहरादून। समाजसेवी एवं पत्रकारिता को दिशा देने वाले संगठन हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति की प्रादेशिक प्रवर समिति का गठन किया गया है। श्री लक्ष्मी नारायण भाला, डा. हरीश, लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल की उपस्थिति में जिस कार्यकारिणी की घोषणा की गई, उसमें संजय जैन को अध्यक्ष, विमल कुमार को समिति उपाध्यक्ष समाजसेवी व एवं चिकित्सक डा. बिनोद मित्तल को समिति का सचिव बनाया गया है। 

हिन्दी साहित्व समिति के अध्यक्ष विजय स्नेही को सह सचिव, आजाद सिंह रावत को कोषाध्यक्ष, धीरेन्द्र प्रताप सिंह को संगठन सचिव बनाया गया तथा राजेश तिवारी को कार्यकारिणी में शामिल किया गया है। इस अवसर पर अर्थ उपसमिति में विजय खंडेलवाल को संयोजक तथा अनिल मारवाह को सदस्य बनाया गया गया है। प्रकाशन समिति का संयोजक रामप्रताप मिश्र को बनाया गया है।

कैसे लगा कि भारत में भगवान को मानने वाले कम हो रहे हैं?

एक बेहद अविश्वसनीय खबर पढ़ने को मिली। मुझे इस सर्वे पर शंका हो रही है। आइए पहले खबर पढ़िए- ''भारतीयों की धर्म में दिलचस्पी घट रही है। कई लोगों का भगवान में यक़ीन नहीं है और वो ख़ुद को धार्मिक नहीं मानते। हालांकि ख़ुद को पूरी तरह नास्तिक कहने वालों की तादाद में गिरावट आई है। ग्लोबल इंडेक्स ऑफ़ रिलीजियॉसिटी एंड अथीज़्म की ताज़ा रिपोर्ट से ये जानकारी सामने आई है।''

आपने खबर पढ़ी। जहां तक मुझे पता है भारत में धर्म में दिलचस्पी बढ़ी है। लोग योग और आध्यात्मिक गतिविधियों मे ज्यादा रुचि ले रहे हैं। आप पूछेंगे कि इसका प्रमाण क्या है? आप पिछले साल की तुलना में भारत के तमाम प्रसिद्ध मंदिरों में जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या का पता लगा लीजिए। आपको पता चल जाएगा कि भारत में लोगों की धर्म में दिलचस्पी घट रही है या बढ़ रही है। मुझे पक्का यकीन है कि ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। अध्यात्म के प्रति, ध्यान (मेडिटेशन) के प्रति लोगों में उत्सुकता बढ़ रही है। आप सभी ध्यान केंद्रों, संस्थानों में जा कर पता लगाइए।

भारत गांवों का देश है। आप गांवों में जाइए। वहां सर्वे कीजिए। मुझे नहीं पता ग्लोबल इंडेक्स ऑफ़ रिलीजियॉसिटी एंड अथीज़्म के लोग भारत के गांवों में गए थे या नहीं। लेकिन मुझे इस पर कतई विश्वास नहीं हो रहा है कि भारत के लोगों की भगवान में दिलचस्पी घट रही है। भाई, इस तरह का सर्वे आपने क्यों कराया? क्या आप नास्तिकता का झंडा गाड़ना चाहते हैं? आपको कैसे लगा कि भारत में भगवान को मानने वाले कम हो रहे हैं? अब हम किसी भी सर्वे को आंख मूंद कर स्वीकार नहीं करेंगे।

एक बार खबर आती है कि चाकलेट खाने वालों का स्वास्थ्य उत्तम रहता है। तो कुछ दिनों बाद खबर आती है कि चाकलेट में अमुक तत्व यह रोग बढ़ाता है। कभी खबर आती है कि काफी पीने से यह फायदा होता है तो कभी खबर आती है कि काफी पीने से यह नुकसान होता है। मुझे तो लगता है कि सर्वे कराने वाले खुद कनफ्यूज हैं। समग्र भारत के विचार अचानक किसी सर्वे में पता चल जाए, यह मुझे संभव नहीं लगता। बहरहाल मुझे अपने विचार रखने की पूरी आजादी है। और मैं किसी हालत मे इस सर्वे को मान नहीं सकता। पूरे भारत का सर्वे इतना आसान नहीं है भाई।

लेखक विनय बिहारी सिंह पश्चिम बंगाल के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क ई मेल vinaybiharisingh@gmail.com के जरिए की जा सकती है.

एनबीटी ने लखनऊ में शुरू किया धुंआधार प्रचार, कई बड़े अखबार हिले

नबाबों की नगरी लखनऊ में अगले कुछ महीनों में जबर्दस्‍त अखबारी लड़ाई छिड़ने वाली है. इसकी शुरुआत हो चुकी है. अगले दो महीनों के भीतर टाइम्‍स समूह का अखबार नवभारत टाइम्‍स लखनऊ एडिशन के साथ यूपी में दुबारा अपने कदम रखने जा रहा है. इसके लिए धुंआधार प्रचार भी शुरू हो गया है. लखनऊ के चप्‍पे-चप्‍पे पर नवभारत टाइम्‍स के होर्डिंग नजर आने लगे हैं. नवभारत टाइम्‍स के आने की खबर के बाद से सारे अखबारों का प्रबंधन परेशान है, लेकिन दैनिक जागरण के होश सबसे ज्‍यादा उड़े हुए हैं.

इसके पीछे दो कारण बताए जा रहे हैं. पहला कारण यह माना जा रहा है कि नवभारत टाइम्‍स के आने से सबसे ज्‍यादा असर दैनिक जागरण के सर्कुलेशन पर ही पड़ेगा. दूसरा कारण कभी जागरण के पर्याय माने जाने वाले नदीम जैसे वरिष्‍ठ साथी के नवभारत टाइम्‍स के पाले में चले जाने के चलते है. नदीम ने दो दशक जागरण के साथ गुजारे हैं. उन्‍हें दैनिक जागरण के कार्य प्रणाली से लेकर स्‍ट्रेटजी तक का एबीसीडी पूरी तरह पता है, लिहाजा सबसे ज्‍यादा डर भी इसी अखबार के प्रबंधन को है.

नवभारत टाइम्‍स के आने के पहले ही लखनऊ के तमाम अखबार पाठकों को लुभाने के लिए कई ईनामी योजनाएं शुरू कर चुके हैं. हिंदुस्‍तान, राष्‍ट्रीय सहारा ने पाठकों के लिए ईनामी कूपन की शुरुआत की है. वहीं दैनिक जागरण ने चार पेज का जागरण सिटी लांच किया है. जागरण सिटी का प्रचार प्रसार भी जोर शोर से चल रहा है. लखनऊ में प्रबंधन ने जगह जगह जागरण सिटी के होर्डिंग लगवाने के साथ ही एफएम पर भी धुंआधार प्रचार करवा रहा है.

नवभारत टाइम्‍स लखनऊ में पूरी स्‍ट्रेटजी के साथ कदम रखने को तैयार है. संभावना जताई जा रही है कि यहां जमे जमाए अखबारों से कई लोगों को प्रबंधन अपने साथ जोड़ेगा. नवभारत टाइम्‍स ने लखनऊ के पाठकों के लिए पचास रुपये में ही पांच महीने का सब्‍सक्रिप्‍शन शुरू करने वाला है, लिहाजा अन्‍य अखबार प्रबंधन के माथे पर पसीना है. यानी नवभारत टाइम्‍स शुरुआत के पांच महीने पाठकों को दस रुपये महीने में अखबार उपलब्‍ध कराने की तैयारी कर रखा है. अब देखना है कि एनबीटी के कदम लखनऊ के किन किन जमे जमाए अखबारों को रौंदते हैं. 

पाकिस्‍तान में क्राइम रिपोर्टर की गोली मारकर हत्‍या

A Pakistani newspaper reporter was shot dead on Friday (24 May) apparently for helping police in an investigation, reports the Karachi-based Express Tribune. Police said Ahmed Ali Joiya – who freelanced for several local papers and magazines – had been assisting officers while working on a crime story.

The police, based in the Bahawalnagar district of the Punjab province, said that 25-year-old Joiya had received threats from a criminal for reporting on his activities. Joiya was shot in the street, and two vendors were also injured in the attack.

SP govt quietly drops Samsung tab at doorstep of scribes

The UP govenment has another freebie — this time for journalists. It is going about quietly distributing Samsung tablets to select journalists, without citing the purpose of the gift, or the criteria for the selection for beneficiaries.

The journalists have been offered the Samsung tablet, along with books on Kumbh Mela, a book, Lohia ke Lenin, written by PWD Minister Shivpal Singh Yadav on his elder brother and SP president Mulayam Singh Yadav, and a set of two pens. The package is being personally delivered by senior officials of the UP Information Department at the doorstep of the journalists.

Incidentally, Chief Minister Akhilesh Yadav is the Information Minister. Officials of the Information Department refused to talk about the matter, saying it was a sensitive issue. However, many journalists have chosen to return the gift.

A journalist, who was offered a tablet three days ago, said: "You suddenly get this call from a deputy director in the Information Department, who says he is standing outside your residence, and has to communicate something from the Chief Minister. When you meet him, he offers you a bag carrying books along with the tablet."

He said the Samsung Tab 2 he was offered had a price tag of Rs 16,820. Hemant Tiwari, president of the UP Accredited Correspondents' Committee, said, "We neither demanded it nor are in favour of any such freebie. The very procedure being followed by the state government raises doubts, as they are doing it selectively without any clear-cut policy or prior announcement. It sets a wrong precedent at all levels."

Siddharth Kalhans, general secretary of the committee, said that other state governments have announced schemes for journalists but they have done it openly and not in a clandestine manner.

"They have not clarified the policy, reasons, or even justification for such distribution. No one knows how many people have been selected, how have they been selected. It is only after the arrival of a senior official of the UP government at their doors that people realise what they are being offered. We have decided to oppose such dole," said kalhans.

Pranshu Mishra, a journalist from the electronic media who was also offered the tablet, said, “I returned it because it is against our policy. Moreover, when asked under what policy the tablet was being offered, the government official had no answer. If they want to help journalists, they can come out with a policy. Those who need it would avail it and those who do not want would not avail it, but distributing freebies in this manner is not acceptable."

Shalabh Mani Tripathi, another journalist, said, "I was on tour when this packet from the Information Department landed at my residence. No one knew what was inside it. When I returned and opened it, I saw that along with the books there was a tablet inside as well. Since there was an Information Department logo on the packet, I called up the senior officials who told me that it was a small gift from the government. I have since returned it.''  (IE)

मुंहलगे पत्रकारों को लैपटॉप बांट रहे हैं यूपी सरकार के बड़े अफसर

Kumar Sauvir : सूचना विभाग का अंधा अफसर बांटे रेवड़ी, अपने-अपने लोगों को दे, और दूध फड़वाये पत्रकार-बिरादरी का। खबर है कि अपने-अपने मुंहलगे पत्रकारों को लैपटॉप बांट रहे हैं यूपी सरकार के बड़े अफसर। जी हां, उप्र के सूचना विभाग के अफसरों ने अपने-अपने लोगों को उपकृत करने का चुपचाप रेवडि़यों बांटने का तरीका खोज लिया है।

मकसद है, अपने-अपने पाले गये पत्रकारों को मलाई का दोना-भर मलाई चटवा दिया जाए। पैसा है सरकारी खजाने का, और मौज ले रहे हैं सूचना विभाग के चंद अफसर और चंद पत्रकार। खबर है कि सूचना विभाग के अफसरों ने प्रदेश के मान्‍यता-प्राप्‍त पत्रकारों में दो-फाड़ करने की कवायद छेड़ दी है।

ताजा मामला है लैपटॅप-टैबलेट बांटने का। दरअसल, मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश के छात्रों को लैपटॉप-टैबलेट बांटने की योजना बनायी थी, इसके तहत प्रदेश भर के प्रमुख जिलों में जाकर अखिलेश बाकायदा जलसा के तौर पर छात्रों को लैपटॉप-टैबलेट बांटने निकले हैं। ताकि छात्रों को शिक्षा के इस नये तरीके से अवगत करते हुए इन छात्रों के हाथों में नयी टेक्‍नॉलॉजी सौंपी जा सके। इसी बहाने अखिलेश का जन-सम्‍पर्क अभियान भी जोरों से चल रहा है।

लेकिन इसी बीच प्रदेश सरकार के सूचना विभाग ने भी पत्रकारों को भी उपकृत करने का मूड बना लिया और सरकारी खजाने से एक बड़ी रकम बेहतरीन किस्‍म के लैपटॉप-टैबलेट पत्रकारों में बांटने का अभियान छेड़ा। लेकिन खबर है कि इसमें अफसरों ने एक नया खेल शुरू कर दिया है। बताते हैं कि इन अफसरों ने अपने चंद मुंहलगे पत्रकारों को विश्‍वास में ले लिया और अपने पाले वाले पत्रकारों को चुपचाप यह लैपटॉप-टैबलेट बांटने का गुपचुप अभियान शुरू कर दिया। तरीका यह रहा कि पहले ऐसे पत्रकार को फोन बुलाकर उसके घर अफसर जाएगा और उसे मुख्‍यमंत्री, कुम्‍भ वगैरह परचों से भरा एक आकर्षक डब्‍बा थमाते हुए साथ में यह लैपटॉप-टैबलेट का बैग भी थमा दिया जाएगा।

लेकिन झन्‍नाटेदार खबर तो यह है कि कई पत्रकारों ने ऐसे प्रस्‍ताव को बहुत रूखाई से ठुकरा दिया है। उनका साफ जवाब रहा था कि प्रदेश के मान्‍यता प्राप्‍त और गैर मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों के साथ यह अफसर बंटवारा की नीति अपना रहे हैं, जोकि इस पत्रकार बिरादरी के लिए बेहद घातक साबित होगी। सूचना विभाग को अगर ऐसी सुविधा देनी ही है, तो उसे बिना किसी भेदभाव के मुहैया कराना चाहिए। दरअसल, यह अफसरों की नायाब योजना कोई पुरानी नहीं है। मायावती सरकार के दौरान भी ऐसे ही कुछ अफसरों ने पत्रकारों के बीच तरीका तजबीज किया था। बहरहाल, अब पत्रकारों में नाराजगी इस बात पर है कि किन पत्रकारों के इशारे पर सूचना विभाग के अफसर यह विभेदीकरण वाली नीति अपना रहे हैं। और यह अक्‍लमंदी किस-किस अफसरों के भेजे में घुसेड़ी गयी है और क्‍यों।

वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार सौवीर के एफबी वॉल से साभार.

हिमाचल आजकल चैनल के खिलाफ चेक बाउंस का मामला कोर्ट में

बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश के शिमला से प्रसारित होने वाले हिमाचल आजकल चैनल प्रबंधन के खिलाफ चेक बाउंस का मुकदमा बिलासपुर की सीजेएम कोर्ट में दाखिल किया गया है, जिसकी सुनवाई 30 मई को निर्धारित की गई है। याचिकाकर्ता द्धारा इससे पहले चैनल प्रबंधन के मैनेजिंग डायरैक्टर राजेश्‍वर सभ्रबाल को लीगल नोटिस भेजा गया था, जिसे प्रबंधन ने लेने से इन्कार कर दिया। जिसके बाद मामला कोर्ट में चला गया है।

याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में बताया है कि हिमाचल आजकल चैनल द्धारा उसे बतौर रिपोर्टर 250 रुपये प्रति न्यूज स्टोरी की दर से भुगतान किये जाने के अनुबंध पर रखा था और जिसके लिये चैनल प्रबंधन की ओर से ओएसडी ओशिमा भागचंटा द्धारा बाकायदा नियुक्ति पत्र भी जारी किया हुआ है। कंपनी ने आठ हजार रुपयों का भुगतान पंजाब नेशनल बैंक के चैक के माध्यम से किया था जो कि खाते में राशि न होने की वजह से बाउंस हो गया है।

याचिकाकर्ता द्धारा कोर्ट को बताया गया है कि प्रबधंन ने चेक देने के बाद भी भुगतान करने के लिये टाल मटोल का रवैया जारी रखा, जिसके बाद उन्हें मजबूरन कोर्ट की शरण में जाना पडा। उधर, सीजेएम कोर्ट बिलासपुर में चेक बाउंस का मुकदमा दाखिल करते हुये 30 मई को सुनवाई तय कर दी है।

करोड़ों की जमीन आधी कीमत पर सौरव गांगुली को!

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मां माटी मानुष की सरकार की भूमि नीति की वजह से राज्य में औद्योगीकरण खटाई में है। पर राजारहाट जैसे बेशकीमती पाश इलाके में भारतीय टीम के पूर्व कप्तान को राज्य सरकार आधी कीमत पर जमीन दे रही है। सौरभ गांगुली को राजारहाट में स्कूल खोलने के लिए 10 करोड़ 98 लाख कीमत की जमीन 55 पीसदी छूट के साथ दी जा रही है। एक मुश्‍त करीब छह करोड़ की छूट के लिए हालांकि राज्य सरकार ने शर्त यह लगायी है कि इस स्कूल में गरीब बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें सुरक्षित रहेंगी। इसके अलावा इन बच्चों से कोई फीस नहीं लेनी है।

अब सवाल है कि क्या राज्य सरकार दूसरे निजी शिक्षा संस्थानों के लिए भी यह नीति लागू करेगी? लेकिन सबसे खास बात तो यह है कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत पहले से यह प्रावधान लागू है और किसी भी शिक्षा संस्थान के लिए अनिवार्य शर्त है। फिर आधी कीमत पर सौरभ को जमीन देने के लिए इस शर्त का हवाला क्यों दे रही है राज्य सरकार? सौरभ गांगुली इस वक्त विदेश यात्रा पर हैं और इस सिलसिले में उनकी प्रतिक्रिया मालूम नहीं हो सकी है। मालूम हो कि पिछले 5 फरवरी को राज्य सरकार ने बिना टेंडर सौरभ गांगुली को राजारहाट में दो एकड़ यानी 120 कट्ठा जमीन देने का फैसला कर चुकी थी। अब यह जमीन आधी कीमत पर दे देने का फैसला भी हो गया।

वाममोर्चा सरकार ने साल्ट लेक के सीए ब्लाक में सौरभ गांगुली को स्कूल खोलने के लिए मुफ्त जमीन दी थी। तब सौरभ मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और अशोक भट्टाचार्य के करीबी माने जाते थे। तब 63 कट्ठा जमीन की कीमत बतौर राज्य सरकार को मात्र 63 लाख रुपये दिये थे सौरभ ने। लेकिन इस सौदे के खिलाफ मुकदमा हुआ और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक ममता बनर्जी की सरकार ने 2011 में सत्ता में आने के बाद सौरभ से यह जमीन वापस ले ली। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्‍तान सौरव गांगुली ने जो जमीन स्‍कूल खोलने के लिए ली थी, उसके आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। कोर्ट ने गांगुली को निर्देश दिये कि वो यह जमीन पश्चिम बंगाल सरकार को वापस लौटा दें। इस आदेश में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सौरव गांगुली को कम दाम पर दी गई जमीन का आवंटन रद्द कर दिया गया। कोर्ट का कहना है कि आवंटन के लिए हेरफेर किया गया है। साथ ही नियमों का उल्‍लंघन किया गया है। इस आवंटन पर एक मानवाधिकार संगठन ने पहले हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। वहां हारने के बाद सुप्रीम कोर्ट में यह मामला गया था।

समझा जाता है कि इसी के एवज में सौरभ को राजारहाट में आधी कीमत पर जमीन दी जा रही है। कुछ दिनों पहले राइटर्स में हाजिर होकर रियायती दाम पर राजारहाट में जमीन देने का आवेदन किया था सौरभ ने, जिसे फौरन मंजूर कर लिया गया! सिलीगुड़ी में भी माटीगाड़ा उत्तरायन से सटे हिमाचल विहार में पूर्व क्रिकेटर सौरभ गांगुली की ओर से एक इंटरनेशनल स्कूल की स्थापना की जाएगी। सिलीगुड़ी- जलपाईगुड़ी विकास प्राधिकरण (एसजेडीए) की ओर से मिली 2.3 एकड़ भूमि पर सौरभ गांगुली ने बहुत पहले ही स्कूल स्थापना की घोषणा थी लेकिन मौके पर कोई काम नहीं किया गया। इस बीच जमीन देखने एवं नए सिरे से प्लाट पर प्लान बनाने पहुंचे सौरभ! सौरभ ने कहा कि यहां नर्सरी से लेकर कक्षा 12 वीं तक आइसीएसई के अंर्तगत पढ़ाई के लिए विसन इंटरनेशनल स्कूल की स्थापना की जाएगी। उन्होंने कहा कि यहां पढ़ाई के साथ साथ स्पो‌र्ट्स के लिए भी अलग व्यवस्था होगी। यहां क्रिकेट ही नहीं, अन्य खेलों को भी विद्यार्थियों के बीच बढ़ावा दिया जाएगा। स्कूल बनने की संभावना के बारे में उन्होंने कहा कि प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, फिलहाल कोई तय समय सीमा नहीं है। एक के बाद एक कार्य पूरा किया जा रहा है।

दीदी सादगी का अवतार हैं, इसमें शायद ही दो राय हो। लेकिन ग्लैमर के पीछे वे किसी भी फर्राटा दौड़ाक को पछाड़ देंगी। बाजार का प्रबल विरोध करने के वावजूद बाजार के देव देवियों को अपने अगल बगल रखना उनकी आदत हो गयी है। कोषागार का बहुत सारा पैसा इन दिग्गजों को पुरस्कार और सम्मान देने में खर्च होता है। परिवर्तनपंथी तमाम बुद्धिजीवियों को उन्होंने न्यारा वारा कर दिया है। अभी पिछले दिनों दिग्गज फिल्म अदाकारा सुचित्रा सेन को पश्चिम बंगाल के सर्वोच्च सम्मान बंग विभूषण से सम्मानित किया गया। हालांकि वह पुरस्कार लेने के लिए मंच पर मौजूद नहीं थीं। वह लंबे समय से आम लोगों की नजरों से दूर हैं। 81 साल की अदाकारा की ओर से उनकी बेटी मुनमुन सेन और नातिन राइमा सेन ने इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को एक समारोह में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से ग्रहण किया। प्रदेश सरकार ने पिछले साल अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को सम्मानित करने के लिए इस पुरस्कार की स्थापना की थी, जिसमें एक स्मृति चिन्ह और 2 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी जाती है। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली, ओलंपियन पी.के बनर्जी एवं चुनी गोस्वामी, अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती डांसर थंकामणि कुट्टी और उद्योगपति बी.के बिड़ला समेत 24 हस्तियों को 20 मई को भी बंग विभूषण से सम्मानित किया गया। इसी तरह दीदी ने सुपरस्टार शाहरुख खान को बंगाल के ब्रांड एंबेसेडर बनाया हुआ है।  

सौरभ गांगुली दक्षिण कोलकाता में बेहला के निवासी हैं, जो दीदी के चुनाव क्षेत्र के अंतर्गत है। फिल्म अभिनेत्री सुचित्रा सेन से आम बंगालियों का जो रोमांटिक लगाव है, उसी तरह की दीवानगी सौरभ गांगुली को लेकर भी है। लेकिन सौरभ हमेशा वाम मोर्चा के नजदीक रहे हैं। उन्हें बंगाल क्रिकेट एसोसिएसन का अध्यक्ष बनाये जाने की भी तैयारी है। जगमोहन डालमिया की वे पहली पसंद बताये जाते हैं। बंगविभूषण खिताब से नवाजने के बाद दादा को अपने पाले में लाने के लिए दांव लगाया है दीदी ने।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

लादेन को अमेरिका ने नहीं मारा, उसने खुद को बम से उड़ाया!

वॉशिंगटन : अमेरिका आज भी अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मारने की वाहवाही लूटता है। लेकिन अब एक नई जानकारी के मुताबिक ओसामा को अमेरिका ने नहीं बल्कि ओसामा ने खुद को मार लिया था यानी खुद के हाथों खुदकुशी कर ली थी।

ओसामा के पूर्व बॉडीगार्ड ने दावा किया है कि ओसामा ने खुद को अपने ही हाथों मार लिया था। बॉडीगार्ड के मुताबिक ओसामा बिन लादेन को अमरीकी नेवी सील्स नहीं मारा था, बल्कि उसने खुद को बम से उड़ा लिया था। ओसामा के इस पूर्व बॉडीगार्ड के दावे पर कितनी सच्‍चाई है, यह बात या तो वह ही जानते हैं या फिर अमेरिका।

लादेन के पूर्व बॉडीगार्ड नबील नईम अब्‍दुल फतेह ने कहा कि जिस वक्‍त ओसामा की मौत हुई, उस वक्‍त वह व‍हां मौजूद नहीं था। हालांकि ओसामा के विरोधियों का मनाना है कि उसके समर्थक जानबूझ कर ऐसी बातें फैलाते है और पूर्व बॉडीगार्ड के दावे में कोई भी सच्‍चाई नहीं है। ओसामा बिन लादेन को पाकिस्‍तान के ऐबटाबाद में 2 मई, 2011 को अमेरिकी सील कमांडरों की कार्रवाई में मारा गया था।

एक अखबार को दिए इंटरव्यू में नईम ने कहा कि ओसामा को समुद्र में दफनाने की बात हजम नहीं होती। उसने आरोप लगाया कि इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा झूठ बोल रहे हैं। नईम ने यह भी कहा कि ओसामा 10 साल से विस्फोटकों से लदा बेल्ट पहन रहा था और पकड़े जाने के डर से उसने खुद को उस फिदाईन बेल्ट से उड़ा लिया। (जी)

दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय कर रहा है राजभाषा अधिनियम की खुली अवहेलना!

महामहिम राष्ट्रपति महोदय, राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली, मान्यवर, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा राजभाषा अधिनियम की खुली अवहेलना।

मान्यवर को ज्ञात ही है कि राजभाषा अधिनियम ,1963 की धारा 3(3) के अनुसार समस्त संकल्प, कार्यालय टिप्पण, साधारण आदेश, नियम, अधिसूचना, प्रशासनिक/अन्य प्रतिवेदन या प्रेस विज्ञप्ति, संसद के समक्ष रखे जाने वाले प्रशासनिक/अन्य प्रतिवेदन और राजकीय कागज-पत्र अंग्रेजी व हिंदी दोनों भाषाओँ में होने चाहिए| अधिनियम की वास्तविक व भावनात्मक अनुपालना में, समस्त कार्य – वितीय, प्रशासनिक, अर्ध-न्यायिक आदि – हिंदी भाषा में संपन्न किये जाने चाहिए|  

संविधान के अनुच्छेद 351 में प्रावधान है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाये, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके| संविधान के अनुच्छेद 344 (6) के अनुसार, अनुच्छेद 343 में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति खंड 5 में निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात उस सम्पूर्ण प्रतिवेदन के या उसके किसी भाग के अनुसार निदेश दे सकेगा|

संसदीय राजभाषा समिति की संस्तुति संख्या 44 को स्वीकार करने वाले आपके आदेश को प्रसारित करते हुए राजभाषा विभाग के (राजपत्र में प्रकाशित)  पत्रांक I/20012/07/2005-रा.भा.(नीति-1) दिनांक 02.07.2008 में कहा गया है, “जब भी कोई मंत्रालय/विभाग या उसका कोई कार्यालय या उपक्रम अपनी वेबसाइट तैयार करे तो वह अनिवार्य रूप से द्विभाषी तैयार किया जाए| जिस कार्यालय का वेबसाइट केवल अंग्रेजी में है उसे द्विभाषी बनाए जाने की कार्यवाही की जाए|”  

संसदीय राजभाषा समिति की रिपोर्ट खंड 5 में की गयी निम्न संस्तुतियों को राष्ट्रपति महोदय द्वारा  पर्याप्त समय पहले, राज पत्र में प्रकाशित  पत्रांक I/20012/4/92- रा.भा.(नीति-1)  दिनांक 24.11.1998 से, ही स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है| संस्तुति संख्या (16)-उच्च न्यायालयों के निर्णय, डिक्रियों व आदेशों में राज्य की राज भाषा अथवा हिंदी का प्रयोग किया जाना चाहिए| किन्तु दिल्ली उच्च न्यायालय ने  अभी तक उक्त कानूनी आदेशों की अनुपालना की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है|

इस प्रसंग में मैंने पूर्व में दिनांक 09.12.12 को निवेदन किया था जिस पर राजभाषा विभाग ने अपने पत्रांक 12019/17/2010- राभा (शि) दिनांक 03.04.13  द्वारा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, दिल्ली उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय आदि से अपेक्षा की थी कि आपके आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित की जाए| राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने (संलाग्नानुसार) सकारात्मक दिशा में कार्य प्रारम्भ कर दिया है तथा उच्चतम न्यायालय ने ( संलाग्नानुसार) इस विषय पर विचारण प्रारम्भ कर दिया है किन्तु दुर्भाग्यवश दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा आपके गौरवशाली कार्यालय के उक्त आदेशों की बारबार उन्मुक्त अवहेलना एक गंभीर विषय है|  दिल्ली उच्च न्यायालय के महापंजीयक ने राजभाषा विभाग के पत्रांक 12019/17/2010- राभा (शि) दिनांक 03.04.13 पर कोई कार्यवाही किये बिना ही उसे दिनांक 23.04.13 को (संलग्नानुसार) नत्थीबद्ध कर दिया है|

बड़ी विडम्बना है कि जिन लोक सेवकों को जनता के धन पर कानून की अनुपालना के लिए नियुक्त किया जाता है वे स्वयं कानून और आपके आदेशों का बेहिचक निस्संकोच उल्लंघन व उपहास कर रहे हैं  व स्वयम को ही कानून समझने की गंभीर भूल कर रहे हैं| वे पद और शक्ति के मद में चूर तथा अहम भाव से गंभीर रूप से ग्रसित हैं| इस प्रकार के चरित्र वाले अयोग्य व्यक्ति को गरिमामयी न्यायिक पद पर नियुक्त करने में आपके कार्यालय ने निश्चित ही भूल की है|

अत: अब आपसे विनम्र अनुरोध है कि राजभाषा कानून सम्बंधित प्रावधानों को दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रभावी ढंग से लागू करवाया जाये और अवज्ञाकारी व हठधर्मी कार्मिक के विरुद्ध उचित अनुशासनिक कार्यवाही भी की जाये ताकि कानून का राज बना रह सके और जनता को यह सन्देश नहीं जाए कि कानून तो मात्र कमजोरों को पीसने के लिए बनाए जाते हैं|

संलग्न वेबपेज से आपको ज्ञात होगा कि जब केलिफोर्निया (अमेरिका) के न्यायालय अपनी वेबसाइट को हिंदी भाषा में अनुदित कर उपलब्ध करवा सकते हैं तो फिर भारतीय न्यायालयों को  हिंदी भाषा के प्रयोग से क्या और क्यों परहेज है| इस प्रसंग में आप द्वारा की गयी कार्यवाही से अवगत करावें तो मुझे प्रसन्नता होगी|

सादर,

दिनांक: 29/05/2013                                                                   भवदीय    
                                                                                      

                                                                                           मनीराम शर्मा
                                                                                              अभिभाषक

                                                                                    रोडवेज डिपो के पीछे नकुल निवास,
                                                                                           सरदारशहर जिला चुरू (राज)
                                                                                        ईमेल: maniramsharma@gmail.com

बिना अनुमति के चैनल का प्रसारण करने वाले दो लोगों पर मामला दर्ज

रेवाड़ी : पायरेसी रोकने के लिए गठित की गई दिल्ली की एक एजेंसी ने सोमवार को शहर के दो केबल कार्यालय पर छापामारी कर बिना अनुमति के चैनल का प्रसारण करने पर शहर थाना पुलिस में दो केबल आपरेटर के खिलाफ मामला दर्ज कराया है।

दिल्ली के दरियागंज स्थित एक्सजेड प्रोब एंड पायरेसी सोल्यूशन एजेंसी को शिकायत मिली थी कि रेवाड़ी में बिना अनुमति के केबल आपरेटरों द्वारा चैनलों का प्रसारण किया जा रहा है। सोमवार को कंपनी अधिकारी पुनीत धींगड़ा की ओर से दो केबल आपरेटर कार्यालयों पर छापामार कार्रवाई की गई।

कार्रवाई के दौरान बिना अनुमति के कुछ चैनलों का प्रसारण करते पाए जाने पर एजेंसी ने शहर थाना पुलिस में नरेद्र केबल नेटवर्क व बालाजी केबल नेटवर्क के खिलाफ कापीराइट एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है। (जागरण)

पत्रकारों को अभिव्‍यक्ति के खतरे तो उठाने ही होंगे!

आम तौर पर यूनियनों का मतलब चंदाखोरी ही नहीं होता है। पर यह बात सौ आना सच नहीं है। यूनियनों के गठन का उद्देश्य वैचारिक एवं सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से भी जुड़ा होता है और होना चाहिए।  मेरी समझ से यूनियनों के गठन के मुद्दे को व्यापक परिपेक्ष्य में देखे जाने की दरकार है। यह निर्विवाद सत्य है कि खुली अर्थ व्यवस्था के मौजूदा दौर ने पत्रकार यूनियन ही नहीं सभी ट्रेड यूनियनों को हाशिये में धकेल दिया है। इनमें पत्रकारों की ट्रेड यूनियनों की हालत सबसे ज्यादा ख़राब है।

मेरी  समझ से इसकी दो वजहें हैं। पहला – पत्रकार यूनियनों का दलाल नेतृत्व। दूसरी वजह खुद पत्रकार साथी स्वयं हैं। हमारा मानना है कि सभी समाचार समूहों में काम कर रहे पत्रकार और गैर पत्रकार विशुद्ध रूप से "श्रमजीवी" हैं। पर इनमें से ज्यादातर पत्रकारों को अपने को "श्रमजीवी" कहने और कहलाने में शर्म महसूस होती है। माना कि अधिकांश समाचार समूह श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों की एकजुटता के पक्षधर नहीं हैं। समाचार समूहों को श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों का एका और उनकी यूनियनें कतई रास नहीं आती हैं। "किसी यूनियन के सदस्य नहीं बनना" अब ज्यादातर समाचार – पत्रों में नियुक्ति पाने की पहली शर्त होती है।

पत्रकार यूनियनों को आए रोज जी भरकर गरियाने वाले कुछ नामचीन बड़े पत्रकार भी गाहे – बगाहे मौका आने पर पत्रकार यूनियनों की उर्जा का इस्तेमाल करने से चूकते नहीं हैं। भले ही ज्यादातर समाचार – पत्रों की नीति यूनियन विरोधी हो। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अभिव्यक्ति और समाजोन्मुख जनपक्षीय पत्रकारिता की प्रबल पक्षधर पत्रकार अपने खुद के और व्यापक समाज के हित में यूनियनों से न जुड़ें। आज हालत यह है कि असल श्रमजीवी पत्रकार व्यक्तिगत और पेशेगत वजहों के चलते यूनियनों से जुड़ने को तैयार नहीं हैं। असल और पेशेवर पत्रकार यूनियन से नहीं जुड़ते तो उनकी जगह दूसरी प्रजाति के पत्रकारों से भर जाती है। जिनका लक्ष्य, समूची पत्रकार बिरादरी या पत्रकारीय पेशे के व्यापक हितों के बजाय निजी स्वार्थ सिद्धि ज्यादा होता है। नतीजन एक मेहनतकश और ईमानदार पत्रकार के मानस में यूनियनों के प्रति घृणा घर कर जाती है। इसका एक ही ईलाज है कि पत्रकारीय पेशे के प्रति ईमानदार और दृष्टिवान पत्रकार आगे आयें। पत्रकार यूनियनों में कुंडली मारे दलालों को बहार का रास्ता दिखाएँ। आज असल पत्रकार के बौद्धिक श्रम, उर्जा और पत्रकारीय आभा को दूसरे लोग सरे बाजार बेचने में संलग्न हैं। असल पत्रकार दूर खड़ा अपनी बौद्धिक सम्पत्ति की खुली लूट का मूक दर्शक बना हुआ है। गलती किसकी है?

हम पिछले कई सालों से पेशेवर असल पत्रकार साथियों को एकजुट करने की कोशिशों में लगे हैं। पर सब बेकार। लोकतंत्र में यूनियनें तो रहेंगी ही। भले ही उनका संचालन कोई करे। आवश्यकता है – असल पत्रकारों के आगे आकर पत्रकार यूनियनों का नेतृत्व संभालने की। जिम्मेदारी से बचकर काम चलने वाला नहीं। पत्रकार यूनियनों में कुंडली जमाये दलाल नेतृत्व के चक्रव्यहू को नेस्तनाबूद करने की आवश्कता है। उन्हें गरियाने से ही काम चलने वाला नहीं है। अभिव्यक्ति के खतरे तो उठाने ही होंगे।

लेखक प्रयाग पांडेय उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

ठाकरे के नाम पर रखा गया वानखेड़े मीडिया बॉक्स का नाम

मुंबई : वानखेड़े स्टेडियम के मीडिया बाक्स का नाम शिवसेना के पूर्व सुप्रीमो स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे के नाम पर रखा जाएगा। मुंबई क्रिकेट संघ ( एमसीए ) ने इसकी घोषणा की। एमसीए के संयुक्त सचिव डा. पी वी शेट्टी ने कहा, ‘मैं और एमसीए अध्यक्ष (रवि सावंत ) मीडिया बाक्स का नाम बालासाहेब ठाकरे के नाम पर रखने के लिये अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने के लिये शिव सेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मिले।

उन्होंने हमारा आभार व्यक्त किया और प्रस्ताव पर स्वीकृति दी। ’ एमसीए की प्रबंध समिति पहले ही इस बारे में फैसला कर चुकी थी। (एजेंसी)

सेना की गोली से हुई थी इतालवी पत्रकार की मौत

बैंकाक। थाईलैंड में साल 2010 में लाल शर्ट प्रदर्शनकारियों पर हुई सेना की कार्रवाई को कवर करते समय मारे गए इतालवी फोटो पत्रकार फैबियो पोलेघी की मौत एक सैनिक की बंदूक से चली गोली से हुई थी। अभियोजन पक्ष के वकील कैरम पोथकलाग ने कहा कि अदालत ने आज दिए अपने फैसले में कहा कि फैबियो की मौत एक सैनिक की गोली से हुई थी।

अदालत ने यह भी कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अभिजित विजयजीव और उपप्रधानमंत्री सुथव थगसुबन द्वारा दिए गए आदेश ही फैबियो की मौत का कारण बने। उन्होंने कहा कि यह साफ हो गया है कि फैबियो के शव से मिली गोली थाई सेना के इस्तेमाल में आई गोलियों से पूरी तरह मिलान खाती है। हम इस फैसले से संतुष्ट हैं। उन्होंने बताया कि अब वह विशेष जांच विभाग से विजयजीव और थगसुबन पर मुकदमा चलाने के लिए कहेंगे। विजयजीव इस समय विपक्ष के नेता हैं। (वार्ता)

बढ़ गई ‘लाल गलियारे’ की धमक

छत्तीसगढ़ के दरभा इलाके में नक्सलियों ने बड़ा हमला बोलकर जता दिया है कि सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद उनके हौसले बुलंद बने हुए हैं। इस बार जिस तरह से सशस्त्र नक्सलियों ने कांग्रेस के काफिले को निशाना बनाया, इससे उनकी रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाई पड़ा है।

अभी तक वे चुन-चुनकर लोगों पर अपना निशाना साधते थे। लेकिन, अब उन्होंने राजनीतिक रैलियों में सीधे-सीधे धावा बोलने की रणनीति अपना ली है। इसके जरिए वे मुख्य राजनीतिक दलों को भी सीधे-सीधे चुनौती देने लगे हैं। हमले के बाद उन्होंने बस्तर क्षेत्र में स्थानीय जनता को खबरदार किया है कि वह भाजपा की विकास यात्राओं और कांग्रेस की परिवर्तन रैलियों में हिस्सा न ले। वरना, वे मौत के जोखिम से गुजरेंगे। पहली बार माओवादियों ने राजनीतिक गतिविधियों के खिलाफ खुला हल्ला बोला है। इसके बाद केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार की राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ गई हैं।

इस ठौर में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकार अपनी ज्यादा ऊर्जा नक्सलियों से निपटने के बजाए, अपने वोट बैंक को मजबूत करने में लगा रहे हैं। हालांकि, दोनों दलों की तरफ से औपचारिक बयानबाजी यही हुई कि सुकमा जिले में हुए नक्सली हमले के मामले में दलीय राजनीति न की जाए। उल्लेखनीय है कि 25 मई को सुकमा से रैली करने के बाद कांग्रेस का काफिला जगदलपुर के लिए वापस लौट रहा था। शाम को करीब 4 बजे जगदलपुर से करीब 40 किमी पहले दरभा क्षेत्र के जीरम घाटी में नक्सलियों ने औचक हमला बोला था। उन्होंने सड़क में विस्फोटक लगाकर आगे वाले वाहन को उड़ा दिया था। विस्फोट इतना भयानक था कि इसकी चपेट में आने वाली कार के परखच्चे उड़ गए थे। इसमें बैठे सभी छह लोग मारे गए। विस्फोट के स्थल पर करीब 6 फुट का गहरा गड्ढा बन गया।
    
लैंड माइंस के इस विस्फोट के बाद जब 50-60 कारों वाला काफिला थमा, तो पास की पहाड़ियों में घात लगाए बैठे नक्सलियों ने फायरिंग झोंक दी थी। इन लोगों को खास तौर पर कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और वरिष्ठ कांग्रेसी महेंद्र कर्मा की तलाश थी। ये लोग चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे थे कि पटेल और कर्मा कहां हैं? जब कई लोगों की फायरिंग से जान चली गई, तो कर्मा ने खुद हाथ उठाकर समर्पण कर दिया था। नंदकुमार पटेल को उनके बेटे सहित हमलावरों ने अगवा कर लिया था। करीब 400 मीटर जंगल में अंदर ले जाकर इनकी हत्या कर दी गई। महेंद्र कर्मा, बहुचर्चित ‘सलवा जुडूम’ अभियान के जनक समझे जाते हैं। 2005 में यह अभियान शुरू किया गया था। इसके जरिए आदिवासी गांवों को हथियार दिलाकर इन्हें नक्सलियों से मुकाबले के लिए तैयार किया गया। इस चक्कर में आदिवासियों के 500 से ज्यादा गांव खाली करा लिए गए थे। गांव वालों को कैंपों में रख दिया गया था। ‘सलवा जुडूम’ का आशय ‘पीस मार्च’ से है। लेकिन, यह योजना शुरू से ही विवादों में रही है।
     
मानवाधिकार संगठनों ने यह सवाल उठाया कि सरकार की मिलीभगत से आदिवासी युवाओं को ‘सलवा जुडूम’ के नाम पर बलि का बकरा बनाया जा रहा है। इससे खीझकर नक्सलियों ने कई बार ‘सलवा जुडूम’ के खिलाफ बड़े अभियान चलाए। बाद में, इस अभियान को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई थी। अदालत ने इस अभियान को गैर-कानूनी करार कर दिया था। अदालत के इस फरमान के बाद भी महेंद्र कर्मा जैसे लोग इस अभियान की पैरवी करते रहे। क्योंकि, राज्य की रमन सिंह सरकार का भी इसे समर्थन रहा है। कांग्रेस के नेता भी अंदर ही अंदर इस अभियान को हवा देते रहे हैं। नक्सली रणनीतिकार मानते रहे हैं कि इस अभियान के जरिए भाजपा और कांग्रेस वाले आदिवासियों में ही फूट डालने की राजनीति कर रहे हैं। जबकि, नक्सली तो मुख्य तौर पर आदिवासियों के बुनियादी हकों की ही लड़ाई लड़ रहे हैं।

नक्सलियों के तमाम दबाव के बावजूद महेंद्र कर्मा ने अपना अभियान जारी रखा। ऐसे में, उन पर कई बार जानलेवा हमले हो चुके थे। लेकिन, पहले वे किसी न किसी तरह बच जाते रहे। लेकिन, दरभा घाटी में नक्सलियों ने उनसे बदला ले ही लिया। हमलावरों का गुस्सा इतना था कि उन्होंने कर्मा के शव को गोलियों   से छलनी कर दिया था। नंद कुमार पटेल काफी प्रभावशाली नेता रहे हैं। माओवादियों की तमाम धमकियों के बाद भी वे परिवर्तन यात्राओं का राजनीतिक अभियान जोर-शोर से चला रहे थे। कांग्रेसी अजित जोगी की सरकार में पटेल गृह राज्य मंत्री थे। इस दौर में राज्य सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाए थे। इसमें तमाम नक्सली ‘मुठभेड़ों’ में मारे गए थे। नक्सली रणनीतिकार इस अभियान के लिए पटेल को ज्यादा जिम्मेदार मानते रहे हैं। ऐसे में, वे लंबे समय से पटेल पर निशाना लगाए थे।
    
जीरम घाटी के हमले में 30 लोग मारे गए हैं। जबकि, दो दर्जन से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ला (84) भी हमले की चपेट में आ गए थे। वे गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में जीवन-मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। इस हादसे में कांग्रेस के राज्य स्तर के नेतृत्व को खासा नुकसान हुआ है। क्योंकि, नंद कुमार पटेल कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जाते रहे हैं। इसके बाद दावेदारी आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा की रही है। लेकिन, दोनों हमले में मारे गए। कई सक्रिय कार्यकर्ता भी मार दिए गए हैं। इससे पार्टी के लोगों में बड़ी दहशत पैदा हो गई है। अहम सवाल है कि इस भयानक हमले के बाद पार्टी के कार्यकर्ता कैसे दूर-दराज के इलाकों में प्रचार अभियान के लिए निकल पाने की हिम्मत करेंगे? हमले के बाद नक्सली कमांडरों ने ऐलान किया है कि वे आगे भी भाजपा और कांग्रेस दोनों के राजनीतिक अभियानों को रोकने के लिए हमले करेंगे। उल्लेखनीय है कि इसी साल राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं।

नक्सलियों के (दंडकारण्य जोनल कमेटी) एक कमांडर ने मीडिया को लिखित सूचना देकर जानकारी दी है कि जीरम घाटी के हमले में उनके खास निशाने पर नंद कुमार पटेल और महेंद्र कर्मा ही थे। नक्सलियों की तरफ से स्थानीय लोगों को कांग्रेस और भाजपा की रैलियों में हिस्सेदारी न लेने के लिए खबरदार किया गया है। कहा गया है कि भाजपा वाले विकास यात्रा के नाम पर ‘विनाश यात्राएं’ निकाल रहे हैं। क्योंकि, रमन सिंह सरकार के दौर में आदिवासियों के बुनियादी हक सबसे ज्यादा छीने गए हैं। नक्सली नेताओं ने नक्सल विरोधी सुरक्षा बलों के अभियान तुरंत रोकने की भी मांग की है।
नक्सलियों के इन तेवरों के बाद केंद्र सरकार की भी चुनौती बढ़ गई है। हमले के बाद सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री भी छत्तीसगढ़ का दौरा कर चुके हैं।

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने रायपुर में राजनीतिक संकल्प जताया है कि राज्य में उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो महज दो सालों के अंदर ही हिंसक नक्सलवादियों को पूरी तौर पर काबू में कर लिया जाएगा। इसी के साथ आदिवासी इलाकों के विकास के लिए खास परियोजनाएं शुरू की जाएंगी। नक्सली हमले के बाद राज्य में तीन दिन का राजकीय शोक भी रखा गया। लेकिन, कांग्रेस और भाजपा के लोगों ने इस शोककाल में भी दलीय राजनीति का ‘कीचड़’ एक-दूसरे पर फेंकना शुरू कर दिया था। वरिष्ठ कांग्रेसी एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने कह दिया है कि यदि रमन सिंह सरकार ने अपनी रैलियों की ही तरह कांग्रेस की रैली में सुरक्षा प्रबंध कराए होते, तो इतना बड़ा हमला नहीं हो सकता था। जबकि भाजपा के नेता, राज्य में बढ़ रही नक्सली हिंसा के लिए कांगेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नीतियों को कोस रहे हैं।

अब यह बहस शुरू हुई है कि क्या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को काबू में लाने के लिए सैन्य विकल्प की जरूरत है? पहले भी इस मुद्दे पर लंबा वाद-विवाद हो चुका है। इस पचड़े को समझकर केंद्र सरकार ने कह दिया है कि फिलहाल, नक्सलियों के खिलाफ सैन्य विकल्प का कोई प्रस्ताव उसके पास विचाराधीन नहीं है। 22 मई को ही यूपीए सरकार ने चार साल का अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद एक ‘रिपोर्ट कार्ड’ जारी किया था। इसमें भी दावा किया गया कि केंद्र सरकार के नक्सल विरोधी अभियानों के चलते स्थिति में काफी सुधार हुआ है। इसकी वजह से 2009 के मुकाबले नक्सल ताकत लगातार कमजोर पड़ी है।

गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, 2009 में 2258 नक्सली हमले हुए थे। जबकि, 2012 में इनकी संख्या घटकर महज 1412 रह गई। केंद्रीय गृह सचिव आर के सिंह दावा कर चुके हैं कि नक्सल अभियान में यह सफलता ‘आॅपरेशन ग्रीन हंट’ जैसे अभियानों के चलते मिली है। वे गिनाते हैं कि बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश व झारखंड में नक्सलियों की हालत काफी कमजोर हुई है। यह जरूर है कि ओडिशा और छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की ताकत ज्यादा कमजोर नहीं पड़ी। वे दोनों राज्यों में ज्यादा आक्रामक भी हो गए हैं। कांग्रेस के नेता इस असफलता की जिम्मेदारी इन राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों पर डाल रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह खुलकर कह चुके हैं कि जिन राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें हैं, वहीं पर नक्सली आंदोलन ज्यादा फल-फूल रहा है। ऐसे में, कई सवाल जरूर उठ रहे हैं, जिनका जवाब देश को मिलना चाहिए।

राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के पूर्व निदेशक वेद मरवाह कहते हैं कि सरकारी आंकड़े अपनी जगह हैं, यह तो बहस का विषय है कि इनमें कितनी वास्तविकता है? लेकिन, जमीनी सच्चाई तो यही है कि नौ राज्यों के 173 जिलों में नक्सलियों का प्रभाव बना हुआ है। कई इलाकों में इनकी समानांतर   सरकारें चल रही हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्थिति चिंताजनक है। नक्सली आंदोलन अब तीसरे चरण में पहुंच गया है। पहले ये लोग बड़े भू-पतियों और धनवानों की हत्या करते थे। दूसरे दौर में, ये सुरक्षा बलों पर निशाना साधते थे। लेकिन, अब तीसरे दौर में ये लोग राजनीतिक दलों के अभियानों पर सीधा हमला बोलने लगे हैं। यह बेहद खतरनाक स्थिति है। इसको कमतर नहीं आंकना चाहिए। खास तौर पर ओडिशा, छत्तीसगढ़ व झारखंड के जंगलों में ये लोग गोरिल्ला युद्ध के जरिए सुरक्षा बलों को भी बड़ी चुनौती दे रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि इनके खिलाफ कारगर रणनीति बनाई जाए। यदि वोट बैंक की राजनीति इसी तरह से हावी रही, तो शायद ही कारगर रणनीति बन पाए?

6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) के ताड़मेटला में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर बड़ा हमला बोला था। इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। दरअसल, नक्सलवादियों ने यह बड़ा हमला ‘आॅपरेशन ग्रीन हंट’ के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया था। सीआरपीएफ के कैंप पर हमले के बाद छत्तीसगढ़ में ‘ग्रीन हंट आपरेशन’ थाम लिया गया था। जो कि दोबारा कभी भी सक्रिय रूप से शुरू नहीं हो पाया। माना जा रहा है कि इस लचर सरकारी रणनीति से नक्सलियों का हौसला और बढ़ा है। इसके पहले नक्सलियों ने सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का दिन-दहाड़े अपहरण कर लिया था। जब सरकार ने नक्सलियों की कई मांगे मान ली थीं, तभी अगवा कलेक्टर मुक्त हो पाए थे।

गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, छत्तीसगढ़ के जंगलों में करीब 10 हजार सशस्त्र नक्सली सक्रिय हैं। ये लोग पड़ोस के आंध्र और ओडिशा में आवाजाही करते रहते हैं। कई मौकों पर तीनों राज्यों के नक्सली कमांडर साझा रणनीति बना लेते हैं। दावा किया जा रहा है कि दरभा क्षेत्र में हुए नक्सली हमले में आंध्र क्षेत्र के एक नक्सली कमांडर की खास भूमिका रही है। लंबे समय से नक्सलियों के ‘लाल गलियारे’ की चर्चा रही है। दरअसल, नक्सलवादी आंदोलन पश्चिम बंगाल से बढ़कर बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश तक अपने पैर पसारते गया है। इसी क्षेत्र को ‘लाल गलियारे’ का नाम दिया गया।

नक्सलियों के प्रभाव वाले इलाकों में भी सामाजिक काम करने वाले स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि नक्सली आंदोलन कोई सामान्य कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है। यदि सरकार वंचित वर्गों और आदिवासी इलाकों में इंसाफ दे और लोगों के बुनियादी हक दे, तो नक्सलियों का सामाजिक आधार अपने आप कमजोर हो जाएगा। लेकिन, सरकार दूर-दराज के इलाकों में विकास के काम नहीं करती। केवल, सरकारी घोषणाएं होती रहती हैं। ऐसे में, केवल गोली-बारूद के जरिए इस समस्या का निराकरण नहीं हो सकता। कई इलाकों में नक्सलियों के नाम पर गरीब आदिवासियों को सताया जाता है। इससे भी समस्या जटिल हुई है। जरूरत इस बात की है कि सरकार, गरीब आदिवासियों के उत्थान पर ज्यादा ऊर्जा लगाए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। इसी की वजह से यह समस्या लगातार जटिल होती जा रही है। दरभा क्षेत्र में हुए हमले से सरकार को सबक सीखने की जरूरत है। केवल, गोली का मुकाबला गोली से करने की रणनीति नहीं चलेगी।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

महाराष्‍ट्र में पांच महीने में 35 पत्रकारों पर हुआ हमला, सरकार बेफिक्र

मराठवाड़ा स्थित माजलगांव में एक और पत्रकार पर हमला हुआ. बीड शहर से प्रकाशित होनेवाले हिंदू जागृती के मांजलगाव के रिपोर्टर ने अपने अखबार में गोविंदपुर के सरपंच के पति मोहन गायकवाड़ पर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके घर बांधने की खबर छापी थी. इस खबर के साथ घटनास्थल के तस्वीरें और डाक्यूमेंट भी प्रकाशित किया गया था. इस तरह अपना पोल खुलने से नाराज होकर गायकवाड़ ने रिपोर्टर बालासाहब अड़ागले पर जानलेवा हमला किया.

हमले मे अड़गले के सिर पर भारी चोट आयी है. उन्हें मांजलगाव के सरकारी हस्पताल मे भर्ती किया गया है. अड़ागले ने मांजलगाव पुलिस को अपनी शिकायत दे दी है. दो दिन पहले ही मांजलगाव के और एक पत्रकार सुभाष नाकलगावकर पर भी हमला किया गया था. 2013 के पहले पांच महीने में पत्रकारों के उपर हुआ यह 35वां हमला है. महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी संघर्ष समिति के अध्यक्ष एस.एम.देशमुख ने इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है. पत्रकार संरक्षण कानून बनाने की मांग की सरकार लगातार अनदेखी कर रही है इससे हमलेवारों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं. इसके कारण पत्रकारों पर हमला करने वालों के हौसले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. देशमुख ने कहा है कि पत्रकारों पर होने वाले हमलों की जिम्‍मेदार सरकार है.

ACC सीमेंट कंपनी ने किया करोड़ों का फर्जीवाड़ा

प्रदेश में एसीसी कम्पनी द्वारा बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। कम्पनी ने अपने ही डीलरों को करोड़ों का चूना लगाकर धोखबाजी की। बस्ती सहित गोरखपुर के दर्जनों डीलरों ने एसीसी कम्पनी को कोर्ट के जरिये लीगल नोटिस जारी किया है और अब कम्पनी पर धोखेबाजी का केस करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। बस्ती के एक डीलर सत्य प्रकाश जायसवाल और गोरखपुर के डीलर राजेश बंका ने एसीसी कम्पनी पर आरोप लगाया कि कम्पनी पीडी और लक्ष्‍य स्कीम के नाम पर लाखों का गबन कर उनके साथ धोखा की है।

कम्पनी ने उन्हें अधिक से अधिक सीमेन्ट बेचने का दबाव बनाया और कहा कि उनका जो डीलर ज्यादा सीमेन्ट बेचेगा उसे प्वाईन्टस दिये जायेंगे। प्वाईन्टस के आधार पर डीलरों को ईनाम दिया जायेगा। कंपनी ने इस स्कीम के तहत ईनाम में मोटरसाईकिल, कार, फ्रीज, कूलर, टीवी और मोबाइल रखा। कई दिनों तक डीलरों ने इस स्कीम का लाभ पाने के लिये कंपनी का ज्यादे से ज्यादा सीमेन्ट बेचा और जब डीलरों ने कंपनी से प्वाइन्टस के आधार पर ईनाम मांगा तो एसीसी कंपनी तानाशाही रवैया दिखाते हुये डीलरों से अनुबंध ही खत्म कर दिया। ए

सीसी कंपनी ने वाकायदा वेबसाइट बना कर लक्ष्‍य और पीडी स्कीम के जरिये डीलरों को ठग रहे थे। कंपनी की यह स्कीम पूरे प्रदेश में लागू है और अमूमन डीलरों को कंपनी इस स्कीम का कोई भी बेनिफिट नहीं दे रही है। एसीसी कपंनी पर आरोप लगाते हुये बस्ती के डीलर सत्यप्रकाश का लगभग 16 लाख और गोखरपुर के राजेश बंका का लगभग 40 लाख की धोखाधड़ी की है। इस तरह से संतकबीरनगर सहित बस्ती के दर्जनों डीलरों के साथ कंपनी ने स्कीम के नाम लाखों का और पूरे प्रदेश में करोड़ों का गबन कर डाला। इस मामले में एसीसी कपंनी की लोकल आफिस के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गई तो कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं था।

बस्‍ती से सतीश श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

कैलाश दत्‍त एवं अशोक मंगुटकर दबंग दुनिया से जुड़े

मेट्रो सेवन डेज के मुद्रक प्रकाशक कैलाश दत्‍त ने अपनी नई पारी दबंग दुनिया के साथ शुरू की है. उन्‍हें अखबार में प्रशासकीय प्रबंधक के पद पर लाया गया है. इनके साथ अशोक मंगुटकर ने भी दबंग दुनिया ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें अखबार में प्रसार प्रबंधक बनाया गया है. दोनों लोग इसके पहले भी कई संस्‍थानों में काम कर चुके हैं. दोनों लोग यूनिट हेड एवं संपादक नीलकंठ पारटकर को रिपोर्ट करेंगे.

चचेरी बहन को नौकरी दिलाने के बहाने लाया और करने लगा रेप

नई दिल्‍ली : पहले अपनी चचेरी बहन को नौकरी का झांसा देकर झारखंड के गुमला से दिल्ली लेकर आया, काम तो दिलाया लेकिन दोस्त के साथ मिलकर उसका रेप करने लगा। पीड़ित किशोरी किसी तरह उसके चुंगल से भाग निकली। सोमवार रात कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन स्थित हनुमान मंदिर के पास बेहोशी की हालत में मिली। पुलिस पूछताछ में उसने इस बात का खुलासा किया। मेडिकल जांच में दुष्कर्म की पुष्टि हो गई है।

जांच में यह भी पता चला है कि गुमला में किशोरी के अपहरण का मामला दर्ज है। दिल्ली पुलिस ने इसकी जानकारी गुमला पुलिस को दे दी है। पुलिस ने बताया कि पीड़ित किशोरी ने पुलिस को दिए बयान में कहा है कि वह मूलत: झारखंड के गुमला की रहने वाली है। उसका चचेरा भाई व उसका एक दोस्त 10 दिन पहले नौकरी दिलाने के बहाने उसे दिल्ली लाए। उन्होंने प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए पटेल नगर में रहने वाले एक व्यवसायी के यहां उसकी नौकरी लगवा दी। बीच-बीच में चचेरा भाई उसे लेकर अपने घर आता था, जहां दोस्त के साथ मिलकर उससे दुष्कर्म करता था।

पुलिस ने बताया कि किशोरी को आरोपी के घर का पता नहीं मालूम। उनकी प्रताड़ना से तंग आकर वह सोमवार को घर से भाग गई और कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर पहुंचकर बेहोश हो गई। पुलिस आरोपी युवकों की तलाश कर रही है। इस मामले में प्‍लसेमेंट एजेंसी के लोगों से भी पूछताछ की जाएगी।

महेंद्र कर्मा पर महिला नक्‍सलियों ने किया 78 बार चाकुओं से वार

रायपुर : छत्तीसगढ़ के सुकमा के नक्सली हमले में मारे गए कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा पर महिला नक्सलियों ने 78 बार चाकुओं से वार किया था. टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर छपी है कि हमले वाले दिन वहां मौजूद दो लोगों ने सीआरपीएफ को ये जानकारी दी है. चश्मदीदों के मुताबिक नक्सली कर्मा पर ऐसे हमला कर रहे थे जैसे कि निजी दुश्मनी निकाल रहे हों.

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक महेंद्र कर्मा को मारने से पहले नक्सलियों ने उनसे आखिरी इच्छा भी पूछी थी. कर्मा से पूछा गया…कि वो मरने से पहले खाना पसंद करेंगे या नए कपड़े पहनना. कर्मा चुप रहे तो एक महिला नक्सली ने उनकी पीठ में गोली मार दी. ग़ौरतलब है कि महेंद्र कर्मा नक्सलियों के खिलाफ लड़ने वाली प्राइवेट आर्मी के संस्थापक थे और नक्सली उन्हें अपना कट्टर दुश्मन समझते थे.

बीते शनिवार को नक्सलियों ने सुकमा में कांग्रेस के काफिले पर हमला किया था जिसमें महेंद्र कर्मा समेत 29 लोग मारे गए थे.इस नक्सली हमले की जांच एनआईए कर रही है, लेकिन इस बीच सरकार ने इसकी न्यायिक जांच के लिए आयोग का गठन कर दिया है. हाईकोर्ट के जज प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता वाला न्यायिक आयोग इस नक्सली हमले की जांच करेगा. आयोग तीन महीने में रिपोर्ट देगा. (एबीपी)

‘इप्टानामा’ के प्रथम वार्षिकांक का दो जगहों से हुआ लोकार्पण

भारतीय जन नाट्य संघ की वेब-पत्रिका 'इप्टानामा' के प्रथम वार्षिकांक का लोकार्पण जन संस्कृति दिवस के अवसर पर 25 मई 13 को एक साथ दो स्थानों पर किया गया। नयी दिल्ली के हिंदी भवन में जन संस्कृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में पत्रिका का लोकार्पण विश्वनाथ  त्रिपाठी, जितेन्द्र रघुवंशी, जया राय व अमिताभ पांडेय ने किया। इससे पूर्व इप्टा की संस्थापक सदस्या कामरेड सरला शर्मा का उनके घर में ही जाकर सम्मान किया गया। 93 वर्षीया कामरेड सरला शर्मा ने मुंबई में 25 मई 1943 को इप्टा के स्थापना सम्मेलन में दिल्ली की प्रतिनिधि सदस्या के रूप में भागीदारी की थी।

उधर भिलाई में जन संस्कृति दिवस के अवसर पर 20 दिवसीय बाल रंग शिविर के समापन समारोह में 'इप्टानामा' का लोकार्पण लेखक के सुधाकरन ने किया। इस अवसर पर इप्टा की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य सुभाष मिश्र, वरिष्ठ रंगकर्मी सुदीप्तो चक्रवर्ती व विजय दलवी तथा भिलाई इप्टा के सहयोगी वी.के. मोहम्मद भी मौजूद थे। भिलाई इप्टा के बाल कलाकारों ने इस अवसर पर जनगीत, नाटक व नृत्य का मनमोहक प्रदर्शन किया।

'इप्टानामा' की मुद्रित प्रति में कुल 252 पृष्ठ हैं, जिसे 6 खण्डों में बांटा गया है। 'दस्तावेज' खण्ड में कैफी आजमी, राजेन्द्र रघुवंशी व बलराज साहनी के लेख हैं। 'समाज व संस्कृति' खण्ड में इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष रणबीर सिंह  तथा जयप्रकाश व अजय आठले को पढ़ा जा सकता है। आमने-सामने खण्ड में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी व इप्टा के महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी के अत्यंत उपयोगी साक्षात्कार हैं। 'रंगकर्म व मीडिया' खण्ड में पुंजप्रकाश व संजय पराते के विचारों को पढ़ा जा सकता है। 'संगे-मील' खण्ड में ए.के. हंगल, चित्तप्रसाद, सुनील जाना, बलराज साहनी व कामतानाथ पर क्रमश: रमेश राजहंस, अशोक भौमिक, विनीत तिवारी, रश्मी दोराईस्वामी व राकेश के संस्मरणों को पढ़ा जा सकता है। इसी खण्ड में कुछ अन्य विभूतियों का -जिनकी जन्मशती मनायी जा रही है-  स्मरण किया गया है। इनमें हेमांग बिस्वास, हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, सआदत हसन मंटो, विष्णु प्रभाकर, अली सरदार जाफरी, अश्क, मख्दूम आदि के नाम शामिल हैं।

आयोजन की कठिनाइयों तथा अनुदान की विवशता व शर्तों के बहाने सांस्कृतिक राजनीति की चर्चा करते हुए उषा आठले व हनुमंत किशोर के लेख 'अनुदान और आयोजन' खण्ड में देखे जा सकते हैं। अंतिम खण्ड में विविध विषयों को समाहित करते हुए प्रगतिशील आंदोलन के 75 बरस पर शकील सिद्दीकी, रंगकर्म के प्रयोग पर प्रोबीर गुहा तथा जोहरा सहगल की आत्मथा 'करीब से' पर  नासिर अहमद सिकंदर की पुस्तक चर्चा को जगह दी गयी है। आखिर में छत्तीसगढ के सुविख्यात नाट्य रचनाकार प्रेम साइमन का नाट्य आलेख 'अरण्य-गाथा' है, जो रंगकर्मियों व नाटक मंडलियों के लिये अत्यंत उपयोगी साबित हो सकता है। किताब का संपादन दिनेश चौधरी ने किया है।

इसमें भी मेरे “अलोकतांत्रिक” होने का सुराग मिल गया है : ओम थानवी

Om Thanvi : मुझे नहीं समझ पड़ता कि अगर मेरी वाल पर आ-आकर कोई मेरा और आपका वक्त बरबाद करे और मैं उससे हाथ जोड़ लूं — यानी ब्लॉक कर दूं — तो इसमें आपत्तिजनक क्या है? कुछ फेसबुकिया शोहदों को इसमें भी मेरे "अलोकतांत्रिक" होने का सुराग मिल गया है और फतवाते फिर रहे हैं। हालांकि उनमें ब्लॉक होने का सौभाग्य प्राप्त करने वालों की संख्या अभी दर्जन भर ही होगी, लेकिन सुना है उन वीरों ने मिलकर एक मंडली (प्रीमियर लीग) बना ली है।

लगता है उन्हें लोकतंत्र का मतलब नहीं पता। क्या ब्लॉक कर मैंने किसी का मताधिकार छीन लिया है? या फेसबुक पर ही किसी के आने-जाने पर रोक लगवा दी है (जो मैं कर नहीं सकता!)? मेरी वाल पर किसी की गतिविधि मुझे अशोभनीय लगे तो उसके जारी रहने का फैसला मैं करूंगा या कोई और? किसी के आंगन में जाना और मनचाही हरकतें करते रहना क्या आगंतुक को शोभा देता है? लोकतंत्र का तर्क ऐसी हरकतें करने वाले अवांछित मेहमानों की भला क्या मदद कर सकता है?

'फ़िराक़' साहब का शेर याद आयाः

जो हमको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं?

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.

क्‍या टाइम्‍स समूह में सचमुच ऐसा ही होता है?

टाइम्‍स समूह अपनी स्‍थापना के 175 साल पूरे कर रहा है. इस मौके पर टाइम्‍स ऑफ इंडिया के संपादकीय पर सौबिक चक्रवर्ती और कौशिक मुरली ने एक लेख लिखकर बताया है कि किस तरह टाइम्‍स समूह में संघीय व्‍यवस्‍था लागू है. कभी स्थिति इस तरह की होती है कि टाइम्‍स ऑफ इंडिया जो खबर प्रकाशित करता है तो इसी समूह का अखबार नवभारत टाइम्‍स इसके ठीक विपरीत खबर प्रकाशित कर देता है. वहीं मुंबई मिरर की स्‍टोरी बिल्‍कुल भिन्‍न होती है.

लेख के जरिए यह बताया गया है कि टाइम्‍स समूह में प्रत्‍येक समूह को अपने तरीके से काम करने की आजादी है. टाइम्‍स ऑफ इंडिया में प्रकाशित लेख…


Federalism: The BCCL bedrock

The Times of India is celebrating its 175th year. This is an extraordinary statistic — few brands, and even fewer media brands, stand the test of time and market for so long and so successfully. In fact, all Bennett Coleman's brands including TOI, are leaders in their respective target markets. How did TOI, and the other newspapers, TV, radio and internet brands of a 175-year-old group turn into leaders? Anyone expecting a long, complicated, indeterminate answer will be disappointed. There's a simple answer, a one-word answer, in fact: Federalism.

Bennett Coleman & Co Ltd, the company whose flagship brand is TOI, has federalism in its DNA. It is federal by nature, by instinct. That means, in terms of operational philosophy, BCCL's many publications and divisions are free to do what they want, and the federal authority (the management) encourages diversity that is truly unparalleled.

The advantage this confers over a model that emphasises "a house line or view" is this: A federal company structure allows all its publications to evolve, in different ways, with different views, approaches, at different paces, and in response to different challenges and consumer needs. A centralised authority works on the principle that it knows best, that all constituent units must receive their wisdom from one authority, that there is one view. This limits every publication's ability to be unique and different, and change and cater to their relevant readers.

BCCL, in contrast, believes that all its brands, including TOI, across various platforms need only to subscribe to a few overarching principles defining the federation. Break no laws. Don't secede. Otherwise, they are the masters of their domain, encouraged to carve out their own distinct identity and never required to follow one centrally determined line. Their freedom of thought and action is unlimited.

To illustrate, if TOI were to be considered the main BCCL publication, many times the Navbharat Times' coverage may be opposite of TOI's. The entire format and design of city-specific local newspapers like Mumbai Mirror will always be different from that of TOI's, TOI Crest will have a different style of journalism to TOI's and NBT is sometimes found to be running editorials with a headline that proudly proclaims "TOI ke virudh"! In fact, much to the consternation of many, Times Now anchors are seen fulminating against Pakistan, sometimes on the same day as TOI carries the Aman ki Asha campaign! Essentially, then, all newspapers within the group have the freedom to have entirely opposing viewpoints — unparalleled pluralism — on the same topic.

BCCL's federalism allows it to set in place a dispassionate creative process. Each unit is free to function on its own without having to constantly look over its shoulder or second-guess 'central' decision-makers or the house line. There is only one master — the reader or consumer. This allows units to react with speed and seize unexpected opportunities as they see fit. This makes the sum of many publications bigger than the sum of their parts.

Federalism for BCCL is not a matter of expediency. Federalism defines BCCL in the sense that the inspiration comes from a civilisational Indian trait. Our philosophy is derived from our respect for individual autonomy and creativity, and draws deeply from the Indian philosophy of anekantwad — the appreciation that truth is a land that can be approached from multiple paths.

Long before India was a nation-state, it was a collection of independent kingdoms and many peoples with their unique language, traditions and cuisines. However, a certain tolerance for one another existed because of the overarching cohesive force of a similar set of principles and beliefs. Therefore, a federal structure — along with a certain unity founded on respect of each other despite the many diversities — thrived even before the audacious experiment that is modern India was born. In a sense, then, federalism has long been a part of the value system of most Indians, so it should come as no surprise that BCCL takes to it so readily. So behind that remarkable statistic, that TOI, the world's largest English language newspaper, is 175 years old — is a really simple but deeply Indian philosophy.

Federalism in this Indian tradition is, therefore, a balance between two conflicting forces that always apply to any collective human endeavour — authority and liberty. Neither can exist on its own, both need to feed off each other, and they always challenge each other. Progress is a tug of war between authority and liberty. Federalism provides for the best solution to this conflict because, while there's an authority, the powers of that authority are limited by liberty and those powers diminish as the collective grows.

BCCL's federalism is, then, ultimately a reflection of its deep faith in liberty. Any collective needs an authority to stay together, but all constituents need liberty and freedom of thought and action if they and the collective are to evolve and flourish. A federal structure allows evolutionary dynamism; it frees all constituents from unitary determinism, the defining attribute of a centralised structure.

The word federalism derives from the Latin word foedus, meaning pact, compact or treaty. BCCL is a compact — and agreement that its many units, including its flagship brand, TOI, will chart their own destinies while remaining a part of the collective.

If there are scores of media units in the BCCL federal structure and if all of them have the liberty to take their own approach and the freedom to differ with each other, which of the many BCCL units are best described as embodying the BCCL belief system? The correct answer is, all of them.

मध्‍य प्रदेश में पत्रिका के पांच साल पूरे, दो नए एडिशन लांच करने की तैयारी

राजस्‍थान पत्रिका को मध्‍य प्रदेश में पांच साल पूरे हो गए हैं. 2008 में भोपाल एडिशन के साथ मध्‍य प्रदेश में कदम रखने वाला यह अखबार अब राज्‍य का प्रमुख अखबार बन चुका है. राज्‍य में अखबार नौ एडिशन प्रकाशित कर रहा है, जिसमें भोपाल, जबलपुर, होशंगाबाद, इंदौर, उज्‍जैन, रतलाम, खंडवा, सतना और ग्‍वालियर शामिल हैं. पत्रिका प्रबंधन जल्‍द ही मध्‍य प्रदेश से दो और एडिशन लांच करने की तैयारी कर रहा है.

यह अखबार एमपी के अलावा छत्‍तीसगढ़, राजस्‍थान, कर्नाटक, गुजरात और तमिलनाडु से भी प्रकाशित हो रहा है. नीचे अफाक्‍स में प्रकाशित खबर..


Five years ago, Rajasthan Patrika made its entry in Madhya Pradesh with the name Patrika. The Hindi newspaper is celebrating its fifth foundation day in Bhopal with a slew of activities.

Patrika entered MP in 2008, with its first edition in Bhopal. Today it has nine editions in the state including Bhopal, Hoshangabad, Indore, Ujjain, Ratlam, Khandwa, Jabalpur, Satna and Gwalior. The group plans to launch two more editions in MP. Patrika entered Chhattisgarh in 2010 and currently has three editions there. It also plans to start an edition in Jagdalpur.

The anniversary celebration activities kick-started on May 25, the day the foundation stone of Patrika was laid in MP. Patrika rolled out the celebration in Bhopal with Sarva Dharm Sabha, inviting gurus from various religions including Hinduism, Islam, Sikhism and Christianity. The religious gathering is a part of the newspaper's annual affair, conducted once every year on its foundation day. This was followed by a blood donation camp that marked the first of a series of similar camps in various parts of the city. The office building wore a new look with lights and décor.

On June 1-5, an activity van will traverse the streets of Bhopal, spreading the message of saving the environment. Various activities are being organised around the van. Also, a painting competition is being organised on World Environment Day (June 4) for individuals in the age group of 7 to 20 years. About 1,000 participants are expected to take part in it. Taking its Save the Environment theme forward, on June 5, a seminar will be organised, where speakers from the field of environment will deliver lectures.

The initiative will also invite public participation, encouraging people to share details of their contribution towards environmental causes in categories such as industries, residential and organisation. The entries will be exhibited in the closing ceremony and the three best entries in each category will win prizes.At the agent level, accidental insurance coverage is being distributed to the newspaper hawkers by Patrika.

The celebration is also supported by readers' engagement initiatives through stories, poems, painting, cartoons and shayari, with gifts for all participants. In an official communiqué, Arvind Kalia, vice-president, marketing, Patrika Group, says, "Patrika's presence in MP was both timely and relevant. In just three years, Patrika became the No. 1 Hindi newspaper in MP as certified by ABC, (July-December, 2012). Today, Patrika is the only newspaper coming from a single corporate house providing single solution for MP, covering both East and West MP."

For the record, the Patrika Group publishes the Hindi daily, Rajasthan Patrika and is a 55-year-old company that started as an evening newspaper. Apart from Madhya Pradesh, it is also present in Gujarat, Karnataka, Tamil Nadu and Rajasthan.

राजस्‍थान में रीजनल चैनल लांच करेगा जी न्‍यूज, तैयारियां अंतिम दौर में

राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश तथा छत्‍तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों को देखते हुए कई चैनल इन राज्‍यों में लांच होने की तैयारी कर रहे हैं. राजस्‍थान में समाचार प्‍लस के अलावा जी न्‍यूज भी चैनल लांच करने जा रहा है. जी न्‍यूज गोयल ग्रुप से अलग होने के बाद पहले एमपी-सीजी में चैनल लांच किया अब उसकी तैयारी राजस्‍थान के लिए चल रही है. संभावना है कि अगले एक पखवाड़े में जी न्‍यूज राजस्‍थान में अपना रीजनल चैनल लांच कर देगा.

जी न्यूज के राजस्थान चैनल को ऑन एयर करने की तैयारी जोर शोर से चल रही है. पिछले कुछ रोज में कई लोगों को जी न्यूज के एचआर डिपार्टमेंट से कॉल कर ज्वानिंग की तारीख बता दी गई है. बताया जा रहा है कि इंडिया न्यूज के रीजनल चैनल से राम मोहन शर्मा और चैनल वन से एक फीमेल एंकर का सलेक्शन हो गया है. माना जा रहा है कि अगर सब कुछ तय समय पर हुआ तो अगले करीब 15 दिनों के भीतर चैनल को ऑन एयर कर दिया जाएगा. 

चैनल के लिए सलेक्ट हुए लोगों के नाम करीब दस दिन पहले ही फाइनल हो गए थे. कहा जा रहा है कि चैनल के लाइसेंस को लेकर आई खामियों की वजह से कॉल करने में देरी की गई. इसके पीछे भी वजह ये बताई जा रही है कि दो संपादकों के फंसने के बाद जी ग्रुप ने काफी नुकसान उठाया है, अब चैनल प्रबंधन किसी को भी एक दिन मुफ्त में तनख्वाह नहीं देना चाहता है. यही वजह रही है कि जब राजस्थान चैनल लाने की तैयारियां पूरी हुई तभी लोगों को कॉल की गई. इससे पहले भी एमपी-छत्तीसगढ चैनल लॉन्च करते वक्त भी लोगों को उस वक्त बुलाया गया था जब चैनल की सभी तैयारियां करीब करीब पूरी हो चुकी थी.

रेप के प्रयास के आरोप में आजतक का पत्रकार अरेस्‍ट

झांसी। मंगलवार दोपहर घर में घुसकर महिला से छेड़छाड़ करने, कपड़े फाड़कर फोटो खींचने व बलात्कार का प्रयास करने के आरोप में आजतक चैनल के पत्रकार को कोतवाली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट ने उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया।

कोतवाली प्रभारी जेपी यादव ने बताया कि छनियापुरा व हाल में अमान का बगीचा बड़ागांव गेट बाहर निवासी कुसुम रायकवार ने 27 जुलाई 2012 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि ससुराल के पास रहने वाला आजतक टीवी चैनल का पत्रकार अमित श्रीवास्तव उर्फ उल्ली उसका उत्पीड़न कर रहा है। घर से निकलवाने के बाद बदनाम करने की धमकी दे रहा है।

महिला ने आरोप लगाया था कि 27 जुलाई की दोपहर करीब 2.50 बजे अमित घर पर आया और जोर जबरदस्ती करने की कोशिश की। अभद्रता करने के दौरान कपड़े फाड़ दिए और मोबाइल से फोटो खींच ली। बाद में आरोपी ने पति को मरवाने की धमकी दी। थानाध्यक्ष ने बताया कि इस मामले में सीजेएम कोर्ट ने 31 जुलाई 2013 को गैर गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। मुखबिर की सूचना पर विवेचक राजेंद्र सिंह ने आरोपी को एसएसपी कार्यालय से कुछ दूरी पर गिरफ्तार कर लिया।

हालांकि इस मामले को लेकर शुरू से ही विवाद रहा है। पहले भी पुलिस पर आरोप लगते रहे हैं कि वह अपनी निजी खुन्‍नस निकालने के लिए अमित के खिलाफ आनन फानन में बिना तथ्‍यों की जांच किए मामला दर्ज कर लिया था। वैसे भी सपा के यूपी की सत्‍ता में आने के बाद से पत्रकारों पर पुलिसिया आतंक काफी बढ़ा है। फर्जी मामलों में फंसाए जाने से लेकर मारपीट तक की घटनाएं अखिलेश सरकार में लगातार बढ़ती जा रही हैं।


इन मामलों के बारे में पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें – यूपी में एक और पत्रकार पुलिसिया उत्‍पीड़न का शिकार

आजतक के रिपोर्टर अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज

एपी न्‍यूज एजेंसी के पत्रकारों के फोन किए गए टेप

वॉशिंगटन : अमेरिका में सरकार द्वारा न्यूज मीडिया पर चोरी-छिपे निगाह रखने का मामला सामने आया है। अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने न्यूज एजेंसी असोसिएटेड प्रेस (एपी) से जुडे़ जर्नलिस्टों के दो महीने के टेलिफोन रेकॉर्डों को गुपचुप तरीके से हासिल किया। न्यूज एजेंसी ने इस कदम को जबर्दस्त और अभूतपूर्व दखलअंदाजी बताया है।

गौरतलब है कि अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट अल कायदा की एक नाकाम साजिश के बारे में गोपनीय सूचना की जानकारी के लिए जांच कर रहा है। जांच पिछले एक साल से चल रही है और इसी सिलसिले में उसने एपी के गोपनीय फोन रेकॉर्ड्स हासिल किए।

उधर, एपी का आरोप है कि डिपार्टमेंट ने जो रेकॉर्ड गुपचुप तरीके से हासिल किए हैं उनमें से ज्यादातर आउटगोइंग कॉल्स के हैं। ये रेकॉर्ड खास तौर पर उसके न्यू यॉर्क और वॉशिंगटन सहित अन्य दफ्तरों के कई रिपोर्टरों और एडिटर्स के हैं। इन रेकॉर्ड्स में मोबाइल फोन की और घर की फोन लाइनें भी शामिल हैं। न्यूज एजेंसी ने डिपार्टमेंट से इस कदम को लेकर सफाई मांगी है और सभी टेलिफोन रेकॉर्ड्स को वापस करने और उसकी कॉपी को खत्म करने की बात कही है। (पीटीआई)

टीवी टुडे नेटवर्क का शुद्ध लाभ घटा

TV Today Network has dipped 7% to Rs 79 on reporting 13% year-on-year (yoy) drop in its standalone net profit at Rs 6.36 crore for the fourth quarter ended March 31, 2013 due to lower operational income. The company engaged in news broadcasting business had reported a profit of Rs 7.33 crore in a year ago quarter.

Total income from operations declined 5% to Rs 84.27 crore on yoy basis, while total expenditure almost unchanged at Rs 78 crore over the previous year quarter, TV Today Network said in a statement. The stock opened at Rs 81 and hit a low of Rs 78.55 on BSE. A combined around 46,000 shares have changed hands on the counter till 0935 hours on BSE and NSE. (बीएस)

राजनीति समाज सेवा का अच्‍छा मंच : रामेंद्र त्रिपाठी

देवरिया। समाजवादी पार्टी से आगामी लोकसभा के लिए देवरिया संसदीय क्षेत्र के लिए घोषित किए गए प्रत्याशी पूर्व आईएएस रामेन्द्र त्रिपाठी का कहना है कि राजनीति रिटायर्ड अधिकारियों के लिए समाज सेवा का एक अच्छा मंच है। उनका मानना है कि राजनीति में जो भी विसंगितियां व्याप्त है उसे दूर करने में रिटायर्ड आईएएस या आईपीएस अधिकारी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

श्री त्रिपाठी शनिवार को पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देवरिया से मैं नहीं वरन मुलायम सिंह चुनाव लड़ रहे हैं क्योंकि समाजवादी पार्टी वन मैन कैडर की पार्टी है। इसके पूर्व लखनऊ से देवरिया पहुंचने पर समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा श्री त्रिपाठी का कई स्थानों पर फूल मालाओं से स्वागत किया गया।

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

जब तक समाज में बंटवारा है, तब तक साहित्य में भी बंटवारा रहेगा

: दलित बहुजन साहित्य पर राष्ट्रीय सेमिनार : बारा चकिया (मुजफ्फरपुर, बिहार )। देश भर के जाने-माने दलित साहित्यकारों और विद्वानों ने दलित बहुजन साहित्य के सामाजिक सरोकारों पर खुलकर चर्चा की।

बी.आर.अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय के शिवदेनी राम अयोध्या प्रसाद महाविद्यालय, बारा चकिया में यूजीसी द्वारा सम्पोषित दलित बहुजन साहित्य पर राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन में क्षेत्र के सांसद राधामोहन सिंह, सुपरिचित लेखिका और चिंतक रमणिका गुप्ता, दलित साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय, डा. श्यौराज सिंह बेचैन, बुद्धशरण हंस, पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव, डा. राजेन्द्र प्र. सिंह, डा. ललन प्र. सिंह, प्रो. रमा शंकर आर्य, बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव, आकाशवाणी पटना के समाचार संपादक डा. संजय कुमार आदि विद्वान मौजूद थे एवं समापन विधायक श्री कृष्णनन्दन पासवान ने किया। 

24 और 25 मई को सेमिनार के विभिन्न सत्रों में ‘अभिजन बनाम बहुजन साहित्य’, दलित साहित्य के प्रेरणा-स्रोतः फूले, अम्बेडकर, पेरियार, शाहूजी महाराज, अछूतानन्द, चोखामेला, घासीराम आदि, दलित रचनाओं, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक में चित्रित यथार्थ, दलित साहित्य में स्त्री बलात्कार का समाजशास्त्र, पुरुष निर्मित स्त्री छविया- स्वकीया, परकीया, वेश्या और रखैल, सावित्रीबाई, ताराबाई शिंदे, फातिमा शेख, महिला आरक्षण और बहुजन स्त्रिया, दलित साहित्य और मीडियाः जाति, अपराध और भ्रष्टाचार, बहुसंस्कृति और दलित साहित्यः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम बहुसंस्कृतिवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद और आनन्दवाद, स्वान्तः सुखाय का शांतिपाठ बनाम आम आदमी इत्यादि विषयों पर चर्चा हुई।

इस अवसर पर डा. हरिनारायण ठाकुर की पुस्तक ‘दलित साहित्य का समाजशास्त्र’, डा. मनोरंजन सिंह की पुस्तक ‘प्रेमचंद के साहित्य में राष्ट्रीयता’ और शोध-स्मारिका ‘संकल्प’ का लोकार्पण किया गया। सांसद राधामोहन सिंह ने दलित और पिछड़ों के साहित्य को केन्द्र में आने की प्रशंसा की और इसे समय की मांग बताया। बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव ने भारत में जाति व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए दलित साहित्य को समय की मांग बताया। विश्वविद्यालय के दूरस्थ शिक्षा केन्द्र के निदेशक डा. कुमार गणेश ने वाल्मीकि और व्यास को भारत के पहले दलित कवि के रूप में चित्रित किया।

बहुजन साहित्य पर बोलते हुए रमणिका गुप्ता ने कहा-‘अभिजन समाज के लोगों ने समाज को बांट के रखा है। जब तक समाज में बंटवारा है, तब तक साहित्य में भी बंटवारा रहेगा। इसी बंटवारे के कारण दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य, स्त्री साहित्य, ओबीसी साहित्य आदि का जन्म हुआ है, जिसका दायरा बहुत बड़ा है और यह पूरी मानवता का साहित्य है। इसने साहित्य के सामने लम्बी रेखा खींचकर तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य (अभिजन साहित्य) को छोटा कर दिया है।

दलित साहित्य पर प्रकाश डालते हुए मोहनदास नैमिशराय ने कहा कि यद्यपि फूले ने स्त्रियों को भी शूद्रातिशूद्र की श्रेणी में गिना था, किन्तु मेरी दृष्टि में सभी स्त्रियों को दलित नहीं माना जा सकता। जो स्त्रियाँ अपने फैसले स्वयं लेती हैं, वे दलित नहीं हैं। दूसरी बात स्त्रियाँ भी जाति निरपेक्ष नहीं होती। दलित साहित्य शुद्ध रूप से अम्बेडकरी विचारधारा पर आधारित साहित्य है, इसमें गाँधी की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। यदि ओबीसी साहित्य गाँधी और बाबा साहब को लेकर कोई सकारात्मक सैद्धांतिकी खड़ा कर सके, तो उसका स्वागत है। दलित साहित्य दलितो द्वारा लिखा गया मानवता का साहित्य है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के वरीय प्रोफेसर डा. श्यौराज सिंह बेचैन ने ‘दलित साहित्य कौन लिख सकता है’ विषय पर बोलते हुए कहा कि कोई अभिजात्य यह क्यों दावा करता है कि वह दलित साहित्य लिख सकता है, जबकि स्वानुभूति और सहानुभूति जनित साहित्य में पर्याप्त अन्तर है। गैर-दलित साहित्यकारों द्वारा लिखा गया दलित विषयक साहित्य दोहरे चरित्र का साहित्य है।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए दलित साहित्य के प्रथम कहानीकार बुद्धशरण हंस ने कहा कि आज जब दलित अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का बयान कर रहे हैं, तो अभिजात्य वर्ग के लोग इसे भूल जाने की बात करते हैं। मैं कहता हूँ भूलने का माहौल तो पैदा करो, आखिर दुख के दिनों को कौन याद करना चाहता है। दलित उत्पीडन और अत्याचार तो आज भी जारी है। पटना विवि के दलित विचारक प्रो. रमा शंकर आर्य ने दलित साहित्य के प्रेरणा-स्रोत के रूप में महात्मा फूले और बाबा साहब डा. अम्बेडकर के विचार-दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डाला। शोधार्थियों और वक्ताओं ने सावित्रीबाई, शहूजी महाराज, पेरियार, घासीराम और चोखामेला के जीवन पर भी प्रकाश डाला।

ओबीसी साहित्य पर बोलते हुए सासाराम से आये सुपरिचित भाषाविद् डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि कामगार किसान, कारीगर, मजदूर और पशुपालकों का साहित्य ही ओबीसी साहित्य है। यदि भारतेन्दु से लेकर प्रसाद, रेणु और आज के ओबीसी कवि साहित्यकारों तक के विपुल साहित्य का अध्ययन किया जाये, तो उनका अन्तिम निष्कर्ष और चिन्तन ब्राह्मणवाद का विरोधा करता है। ओबीसी साहित्य का दायरा बड़ा है और हिन्दी साहित्य के सभी कालखण्डों में इसकी पहचान की जा सकती है।

ओबीसी साहित्य की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आरा से आये डा. ललन प्रसाद सिंह ने कहा कि 5042 जातियों वाले साहित्य को ही हम ओबीसी साहित्य कहेंगे। संस्कृत में वैदिक साहित्य एवं लौकिक साहित्य के दो विभाजन है। वैदिक साहित्य ब्राह्मणों का है, जबकि लौकिक साहित्य (प्राकृत और अपभ्रंश सहित) ओबीसी का है। अभिजन साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र से कबीर और रेणु के साहित्य का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। ओबीसी साहित्य जातिवाद और वर्णवाद का विरोध करता है। प्राचीन मगध साम्राज्य का सम्पूर्ण साहित्य ओबीसी साहित्य है। मौर्यों के बाद अभिजनों ने भारत की एकता छिन्न-भिन्न कर दी।

दलित साहित्य और मीडिया पर विचार रखते हुए आकाशवाणी पटना के समाचार संपादक डा. संजय कुमार ने कहा कि जब मीडिया में दलित है ही नहीं, तो दलित साहित्य को जगह कौन देगा? मीडिया या तो दलित इश्यू उठाता ही नहीं, या उठाता भी है, तो दलितों की गलत तस्वीर पेश करके। हारकर दलितों ने अपना वैकल्पिक मीडिया खड़ा कर लिया है। फारवर्ड प्रेस, बयान, अपेक्षा, युद्धरत आम आदमी, दलित साहित्य, बहुजन इंडिया सहित आज दलित-पिछड़ों के दर्जनों दैनिक, मासिक, पाक्षिक, त्रौमासिक और वार्षिक पत्र-पत्रिकाएँ हैं। कई इलेक्ट्रानिक चैनेल है। इनकी संख्या और बढ़ेगी। मीडिया में दलितों की उपेक्षा के कारण ही ऐसा हुआ है।

बहुसंस्कृति और दलित साहित्य पर बोलते हुए समारोह के आयोजक और सुपरिचित लेखक हरिनारायण ठाकुर ने कहा कि भारत संस्कृति नहीं, संस्कृतियों का देश है। यहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा चल ही नहीं सकती। क्योंकि भारत सहित दुनिया का कोई देश आज राष्ट्र नहीं है। एक भाषा, एक साहित्य, एक संस्कृति, एक धर्म, एक आचार-विचार की सोच ने इस देश का बहुत नुकसान किया है। अनेकता में एकता का आकर्षक नारा तो दिया गया, किन्तु व्यवहार में सभी धर्मों, वर्गों, भाषा और संस्कृतियों का आदर नहीं किया गया। फलतः अनेक भाषा और संस्कृतियाँ मरती चली गयी। अनेक जातियाँ और समूह हाशिये पर चले गये। दलित, आदिवासी, स्त्री, अल्पसंख्यक और अब ओबीसी साहित्य इन्हीं हाशिये के लोगों का साहित्य है।

यौन हिंसा और बलात्कार, वेश्या, रखैल और काल गर्ल पर मोहनदास नैमिशराय, रमणिका गुप्ता, प्रो. अर्चना वर्मा, प्रो. सुनीता गुप्ता, प्रो. पूनम सिंह, डा. पुष्पा गुप्ता आदि ने विचार रखे। बलात्कार के मनो-सामाजिक पहलुओं की खोज की गयी और इसके समाधान की आवश्यकता बताई गयी। भारत में अधिकतर दलित-पिछड़ी औरतें ही इन घटनाओं और परिस्थितियों की शिकार होती हैं। सेमिनार के सत्रों का सफल संचालन डा. अरुण कुमार एवं संयोजन डा. मनोरंजन सिंह ने किया।

सेमिनार के अंतिम दिन सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये- 1. विगत दस वर्षों से बी.आर.अम्बेडकर बिहार विवि के स्नातकोत्तर कक्षाओं में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाये जा रहे ‘दलित साहित्य’ को हाल ही में ‘वैकल्पिक विषय’ के खाते में डाल दिया गया है। इसे फिर से अनिवार्य विषय बनाया जाये। 2. देश के सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में ‘दलित सहित्य’ को अनिवार्य विषय बनाया जाये। 3. यूजीसी ‘नेट’ की तरह देश के तमाम विश्वविद्यालयों की शोधापूर्व परीक्षाओं में दलित-पिछड़ों को प्राप्तांक में ग्रेस एवं सीटों में आरक्षण दिया जाये। 4. देश के तमाम कल्याण छात्रावासों के नाम डा. अम्बेडकर और बिरसा मुंडा के नाम पर रखा जाये। 5. विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभागों में नियुक्ति एवं स्थानान्तरण में सरकारी आरक्षण के अनुरूप ‘पोस्ट-रोस्टर’ लागू किया जाये। 6. कुलपतियों, प्रतिकुलपतियों, कुलसचिवों की नियुक्ति में दलित-पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किया जाये। 7. दलित और बहुजन साहित्य और मीडिया के लेखन और प्रकाशन को प्रोत्साहित करने के लिए लेखक/ संपादक और पत्रकारों को सरकारी अनुदान दिये जायें। 8. आदिवासी अस्मिता की रक्षा की जाये। 8. इन प्रस्तावों को यूजीसी, एच.आर.डी. भारत सरकार, प्रांतीय सरकार, विश्वविद्यालय के माननीय कुलाधिपति एवं कुलपतियों को सूचनार्थै एवं आवश्यक कार्यार्थ प्रेषित किया जाये। (प्रेस रिलीज)

देखने गया था एमएस धोनी का घर, बन गया विजिलेंस का अधिकारी!

क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के एक प्रशंसक को अपने दीवानगी की कीमत जेल जाकर उस वक्त चुकानी पड़ी जब घर लौटते वक्त उसके पास पैसे कम पड़ गए। ट्रेन के टीटीई आजाद ने युवक पर आरोप लगाया है कि उक्त युवक खुद को रेलवे के सतर्कता विभाग (विजिलेंस) का अधिकारी बता कर वसूली कर रहा था जबकि युवक सारे आरोपों को निराधार बता रहा है। आरोपी युवक धर्मेन्द्र ने बताया कि वह दिल्ली का रहने वाला है और एमबीए की पढ़ाई भी कर रहा है, साथ ही वह क्रिकेट स्टार महेन्द्र सिंह धोनी का प्रशंसक भी है। और इसी जूनून में वह धोनी के घर को देखने रांची जा पहुंचा।

युवक ने घर तो देख लिया लेकिन लौटते वक्त उसके पास पैसे कम पड़ और वह सामान्य टिकट लेकर गरीब रथ एक्सप्रेस के एसी कोच में चढ़ गया। टिकट बनवाने को लेकर टीटीई से अनबन हुई और मुग़लसराय पहुंचने पर उसे यह कह कर जीआरपी के हवाले कर दिया कि वो खुद को विजिलेंस का अधिकारी बता रहा था। फिलहाल जीआरपी ने मामला दर्ज कर छानबीन शुरू कर दिया है। गौरतलब है की ट्रेन में टीटीई द्वारा यात्रियों से दुर्व्यवहार की घटनाएं आम हो गयी हैं। कभी यात्रियों को डरा धमका कर पैसा छीनना तो कभी उनके साथ मारपीट कर प्रताड़ित करना। ऐसा नहीं है कि रेल के अधिकारी यह सब कुछ नहीं जानते हैं, क्योंकि यात्रियों की शिकायत पर मार पीट कर पैसा छीनने के मामले में अभी हाल ही में मुग़लसराय के कुछ टीटी को जीआरपी ने अरेस्‍ट किया था।  

सबसे रोचक मामला अभी हाल में सामने आया था जिसमें एक सीनियर टीसी को पूर्वोत्तर संपर्क क्रान्ति एक्स की जनरल बोगी में वसूली का विरोध कर रहे यात्रियों ने धुनाई कर दी थी, जिसमें टीटीई लामबंद होकर काम काज ठप कर दिए थे और उक्त ट्रेन को एस्कार्ट कर रहे आरपीऍफ़ के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज कराया था। बावजूद इसके महकमा इनके व्यवहार को सुधारने की दिशा में बिलकुल संवेदनहीन है। रेलवे का दावा है कि यात्री सम्मानित अतिथि हैं …अब सवाल यह उठता है कि सम्मानित अतिथि के साथ इस तरह का व्यवहार क्या रेलवे को शोभा देता है।

मुगलसराय से महेंद्र प्रजापति की रिपोर्ट.

नारद जयंती पर लखनऊ के कई पत्रकार हुए सम्‍मानित

विश्व संवाद केन्द्र लखनऊ एवं हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को हिन्दी संस्थान के यशपाल सभागार में आद्य पत्रकार देवर्षि नारद जयंती एवं पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बतौर मुख्यवक्ता हिमालय परिवार, भारत तिब्बत सहयोग मंच एवं मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक इन्द्रेश कुमार उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में लखनऊ के महापौर डा. दिनेश शर्मा और विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वरूप के संपादक व पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना तथा पीटीआई के ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर कार्य करने वाले चुनिंदा पत्रकारों को प्रशस्ति पत्र, अंगवस्त्रम् एवं स्मृति चिन्ह आदि प्रदान कर सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले पत्रकारों में पायनियर हिन्दी दैनिक के हरी राम मिश्र, राष्ट्रीय सहारा के चीफ फोटोग्राफर संजय त्रिपाठी, नव जीवन के पूर्व संपादक रूद्र नाथ पाण्डेय, कैनविज टाइम्स की सुश्री रीतेश सिंह, जन संदेश टाइम्स के शिव शंकर गोस्वामी, दैनिक प्रभात के राकेश मिश्र, संपादक के नाम पत्र लेखन के लिए हरिश्चन्द्र धानुक, सोशल मीडिया से पवन कुमार अवस्थी आदि के नाम शामिल हैं।

इस अवसर पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कार्यक्रम के मुख्यवक्ता इन्द्रेश कुमार ने कहा कि देवर्षि नारद पुरातन युग के एक ऐसे पत्रकार थे जो राम और रावण दोनों के ही सामने सच को सही रूप में प्रस्तुत कर पाने में पूर्णतः सक्षम थे। आज के पत्रकारों को उनसे प्रेरणा लेकर सच की ज्वाला को हमेशा प्रज्ज्वलित रखना होगा। उन्होंने कहा कि समाज में आज भी ऐसे तमाम पत्रकार हैं, जो अत्यन्त विषम पस्थिति में कार्य करते हुए भी सच्चाई की राह से कभी डिगते नहीं। उन्होंने कहा कि देश की अनेक ज्वलंत समस्याओं का समाधान नारद रूपी सत्य को उद्घाटित करने वाले पत्रकार ही कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि चीन हमारे मातृभूमि पर उन्नीस किलोमीटर अन्दर आकर मात्र तीन किलोमीटर हट जाता है और हमारी सरकार इस पर ही संतुष्ट हो जाती है। ऐसी स्थिति में पत्रकारिता ही सच का आईना दिखा पाने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि माँ और मातृभूमि से समझौता करनेवाला कभी सपूत नहीं हो सकता इसलिए हमें हमेशा अपनी मातृभूमि के लिए जीना होगा।

श्री इन्द्रेश ने कहा कि जिस देश के लोगों ने नारी के अपमान पर लंका में लाशें बिछा दी थी आज उसी देश में हमारी बहन बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने चुनौती देते हुए कि माले गांव विस्फोट जांच के मामले में हर पल रंग बदलने वाली सरकार देश के किसी भी स्थान पर सारी जांच एजेंसियों को बुलाये और मुझे भी बुलाकर देश की मीडिया के सामने सवाल-जवाब कराये। इस अवसर पर पीटीआई के ब्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज व सरकार के बीच में पत्रकार एक महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन दुर्भाग्य से लोकतंत्र का चौथा खंभा आज दरकने लगा है।

राष्ट्रीय स्वरूप के संपादक वीरेन्द्र सक्सेना ने कहा कि इस चुनौतीपूर्ण माहौल में पत्रकार को अब अपनी भूमिका के लिए नये उपाय तलाशने होंगे। उन्होंने कहा कि हम हताश जरूर हैं परन्तु निराश नहीं। कार्यक्रम में पथ संकेत के संपादक गंगा सिंह, राष्ट्रधर्म के संपादक आनन्द मिश्र अभय, लोक सम्मान के राम शरण, सेवा संवाद से प्रभात कुमार अवस्थी, सेवा चेतना से डा.विजय कर्ण, विश्व संवाद केन्द्र पत्रिका के संपादक नरेन्द्र भदौरिया, कामधेनु कृपा से डा. राजेश दुबे, विश्व आयुर्वेद परिषद के संपादक डा. सत्येन्द्र मिश्र एवं सैन्य संदेश के संपादक कर्नल देवेन्द्र प्रताप सिंह को भी सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर कलाकुंज मासिक पत्रिका के संपादक योगेन्द्र नाथ योगी, राष्ट्रधर्म के संपादक आनन्द मिश्र अभय, विश्व संवाद पत्रिका के संपादक नरेन्द्र भदौरिया, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड के प्रचार प्रमुख कृपाशंकर, लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के निदेशक अशोक सिन्हा, विश्व संवाद केन्द्र के प्रमुख राजेन्द्र, एअर मार्शल बाजपेई प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

यूपी में आईजी कार्मिक तनूजा श्रीवास्तव पर सूचना आयोग ने पच्चीस हजार रुपये का दंड लगाया

मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह पंकज ने आईजी कार्मिक तनूजा श्रीवास्तव पर 25,000 हज़ार रूपए का अर्थ दंड लगाया है. पंकज ने यह आदेश आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को जानबूझ कर सूचना नहीं देने के मद्देनज़र लगाया. ठाकुर ने सितम्बर 2012 में अपने काव्य संकलन “आत्मादर्श” के सम्बन्ध में डीजीपी कार्यालय से कुछ सूचनाएँ मांगी थी. लगातार सूचना नहीं मिलने पर मुख्य सूचना आयुक्त ने पिछली सुनवाई 02 अप्रैल को सूचना धारक आईजी कार्मिक को उपस्थित हो कर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिये थे.

आज श्रीवास्तव आयोग के सामने उपस्थित नहीं हुईं और उन्होंने यह कह कर सूचना दिये जाने से मना कर दिया कि शासन के स्तर से निर्णय होने के बाद ही उन्हें सूचना दी जा सकती है. पंकज ने इस उत्तर को पूरी तरह गलत पाया क्योंकि ठाकुर ने डीजीपी कार्यालय की पत्रावली के अभिलेख मांगे थे जिनका शासन के निर्णय से कोई वास्ता नहीं है और उन्होंने श्रीवास्तव पर पच्चीस हज़ार का दंड लगाया.
 

पेड न्‍यूज : दैनिक भास्कर और पंजाब केसरी ने पत्रकारों के हाथ में थमाया कटोरा!

: रिपोर्टर तो रिपोर्टर संपादक भी भीख मांगने उतरे, रात में होती है सेटिंग : हरियाणा में नगर निगम चुनाव क्या आए अखबारों की पौं बारह हो गई है। गंदा है पर धंधा है, धंधा करने के लिए टारगेट फिक्स हो चुके हैं। अभी तक ईमानदारी का चोला ओढ़ कर पत्रकारिता की दुहाई देने वाला दैनिक भास्कर भी अब पंजाब केसरी के पदचिन्हों पर चलने लगा है। पेड न्यूज पर चुनाव आयोग के डंडे ने तो पेड न्यूज तो रोक दी और नहीं भी रोकी। इस डंडे से भी बच जाएं और धंधा भी हो जाए।

इसके लिए संपादकों ने एक ऐसा तरीका निकाला कि नैतिकता चली गई भाड़ में। प्रत्याशियों की खबरें अब न्यूज के रूप में छप रही हैं न तो उन पर विज्ञापन लिखा है और न ही वे एड की फार्मेट में हैं। पॉलीटिकल बीट देख रहे पत्रकार सीधे संपादक के कांटेक्ट में हैं और संपादक मालिकों के कांटेक्ट में। दिन के समय पत्रकार खबरें छोड़ कर प्रत्याशियों की दरों पर जाकर फिक्सिंग करने में जुटे हैं। हजारों की नहीं लाखों में बात होती है। रात को संपादकों का खेल शुरू होता है। प्रत्याशियों के पीए और खासमखास रात के समय संपादकों के केबिन में जोड़ तोड़ करते देखे जा सकते हैं। दैनिक भास्कर के अम्बाला के संपादक ने हदें इस कदर लांघ दी हैं कि हर रिपोर्टर और फोटोग्राफर, स्ट्रिंगरों को कड़ी हिदायत दे रखी है कि पार्टी को उससे सीधे मिलवाया जाए। नहीं मिलवाओगे तो खबर नहीं छपेगी।

ये महाशय दिन में खद्दरधारियों की चौखट पर नजर आते हैं और शाम होते ही केबिन में सेटिंग करते हैं। बताते हैं कि इन भाई साहब ने मालिकों को टारगेट बता दिया है कि 50 लाख कमा कर देंगे। इन श्रीमान ने प्रत्याशियों के लिए अपने तक सीधी पहुंच का एक ओर तरीका निकाला है ये महाशय एक कॉलम लिख रहे हैं जिसमें इनका नाम जाता है। बाकी  चुनाव की किसी भी खबर में किसी अन्य रिपोर्टर का नाम देना ये अपने धंधे में अडंगा समझते हैं। अब तक लड्डू बांटने, तौलने, भाषण बाजी से गुरेज कर अपनी पाक साफ रहने की दुहाई देने वाले भास्कर के अम्बाला संपादक अब लड्डू की खबरें स्वयं लिखवाते हैं। कुछ पत्रकारों ने इन खबरों को चुनाव आयोग के ध्यानार्थ लाया है। आप भी देखिए पंजाब केसरी और दैनिक भास्कर की न्यूज की आड़ में पेड न्यूज की तिकड़म।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.