जब पत्रकारिता में सरोकार छीजते चले जा रहे थे, नीलाभ ने सरोकार भरी पत्रकारिता की : ओम थानवी

Om Thanvi : सुबह की किरण में आज उजाला नहीं। अलस्सबह मित्रवर अपूर्वानंद ने चेन्नई से सूचित किया कि नीलाभ मिश्र नहीं रहे। वे अपोलो अस्पताल में चिकित्सा के लिए भरती थे। पर कुछ रोज़ से हताशा भरे संकेत मिलने लगे थे। इसके बावजूद सुबह उनके निधन की ख़बर किसी सदमे की तरह ही मिली। नीलाभ कम बोलने वाले पत्रकार थे, सौम्य और सदा मंद मुस्कान से दीप्त। लेकिन उनका काम बहुत बोलता था। जब पत्रकारिता में सरोकार छीजते चले जा रहे थे, नीलाभ ने सरोकार भरी पत्रकारिता की। आउटलुक हिंदी को उन्होंने ढुलमुल शक्ल से उबारते हुए जुझारू तेवर दिया। साहित्य-संस्कृति से भी उनका अनुराग गहरा था, जो कम पत्रकारों में दिखाई देता है। पिछले साल उन्होंने नेशनल हेरल्ड के प्रधान सम्पादक का ज़िम्मा संभाला था। सीमाओं के बावजूद वहाँ भी उन्होंने कई अनुष्ठान अंजाम दिए। उनकी साथी-संगिनी कविता श्रीवास्तव के दुख का अंदाज़ा मैं लगा सकता हूँ। वे नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाली दबंग महिला है। नीलाभ का जाना उन्हें सबसे ज़्यादा तकलीफ़ देगा। पर उनका संघर्ष इससे विचलित न होगा। नीलाभ नहीं होंगे, पर स्मृति की भी अपनी ताक़त होती है।

Gurdeep Singh Sappal :  I knew Neelabh Ji for past seven-eight years. Soft spoken, articulate and clear headed, he was one of the finest gentlemen I have come across in our media circles. His was a sane, firm voice in the cacophony of deafening noise that has now begun to characterise Delhi media. Today, as I get the news of his sad demise, I look back and recall our conversations and quiet relationship. His last assignment as the Editor of relaunched National Herald was indeed a challenging one and I am reminded of his speech at the launch of commemorative edition of the paper in Bangalore last year. Short and crisp, the speech defined the Man, his thought process and his mastery over words, philosophy, literature and conceptual clarity. We all will miss you Neelabh ji. (Neelabh Mishra, Editor-in-Chief of National Herald and earlier, Outlook Hindi passed away today morning.)

Jaishankar Gupta : अत्यंत दुखद। इलाहाबाद पहुंचने के थोड़ी ही देर बाद मित्र ओम थानवी जी की फेसबुक वाल से अशुभ सूचना मिली जिसने अंदर से हिला दिया। लंबे समय से बीमार चल रहे मित्र, वरिष्ठ पत्रकार नीलाभ मिश्र नहीं रहे। जीवन और मृत्यु के संघर्ष में मृत्यु ने उन्हें पछाड़ दिया। अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। अस्सी के दशक में बिहार, पटना प्रवास के दिनों से ही, जब हम रविवार और वह नवभारत टाइम्स के साथ थे, हम अच्छे और अभिन्न मित्र रहे हैं। नीलाभ के जयपुर प्रवास के दौरान भी हम जब भी वहां इंडिया टुडे के प्रतिनिधि के बतौर वहां जाते, एक दो शामें हमारी एक साथ जरूर बीततीं। यहां दिल्ली में भी मिलना जुलना होता ही था। आज के इस दौर में जब नीलाभ जैसे लोगों की सख्त जरूरत है, वह हम सबको छोड़कर चले गये। उनके साथ जुड़ी स्मृतियों को प्रणाम।

Nirala Bidesia : ओह। दुखद। सुबह सुबह बुरी खबर। पत्रकारिता में नीलाभ जी की पहचान आउटलुक के पूर्व सम्पादक या नेशनल हेराल्ड के वर्तमान संपादक भर नही थी। विषयों की गहरी समझ थी, व्यवहार में गजब की सहजता थी और सरोकार का दायरा व्यापक था। इसकी एक वजह उनका प्रजापति मिश्र के परिवार से भी होना था। प्रजापति मिश्र की चर्चा हमलोग कम करते हैं। चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में भी उन पर कम ही बात हुई। नीलाभ जी से हुई कुछ मुलाकातों की स्मृतियां उभर रही हैं। नमन नीलाभ जी।

Yashwant Singh : ये फरवरी महीना तो बड़ा मनहूस बीत रहा भाई. कल Vinod Mishra की मुख कैंसर के कारण मौत की खबर आई… आज जाने माने वरिष्ठ पत्रकार Neelabh Mishra की लीवर सिरोसिस के कारण निधन की खबर मिली. पता नहीं, पर लगता है जैसे मौत एक ही है, हमने बस उसे नाम अलग अलग रंग का दे रखा है, कैंसर, लीवर, दुर्घटना… एक चील है जो हम सब के उपर मंडराती रहती है… जाने किस पर कब झपट्टा मार दे…इसलिए हर पल को जी लीजिए.. जाने कब नंबर लग जाए… नीलाभ भाई, आप अपनी धुन इस्टाइल के मालिक थे… सरल सहज के साथ साथ अदभुत प्रतिभावान.. बेहद जमीनी आदमी… जर्नलिज्म को एक्टिविजम के साथ जीने वाले बहुत कम लोग होते हैं जिनमें एक नीलाभ जी थे…उनसे कुछ समारोहों में मुलाकातें हैं.. फोन पर कई दफे बातचीत होती थी… कभी न लगा कि उन्हें अहंकार ने तनिक भी छू रखा हो… सबसे मुस्कराते हुए मिलते… चेन्नई में लीवर के इलाज की खबर हम लोगों ने प्रकाशित की…तब लगा था ठीक होकर वे आ जाएंगे… पर इतनी जल्दी ये मनहूस खबर मिलेगी.. बिलकुल जेहन के किसी कोने में ये बात न थी… श्रद्धांजलि ब्रदर…

सौजन्य : फेसबुक

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इमरजेंसी के दौरान जेल जाने वाले सीतापुर के वरिष्ठ पत्रकार कामरेड डॉ. गंगाराम मिश्र का निधन

सीतापुर से केके सिंह सेंगर की रिपोर्ट

सीतापुर (यूपी) : सीतापुर जिले के मिशनरी पत्रकार कहे जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार व देशदीप समाचार पत्र के संपादक कामरेड डॉ. गंगाराम मिश्र नहीं अब  रहे। वह 87 वर्ष के थे। आपातकाल (इमरजेंसी) के दौरान मीसा कानून में वे जेल भी गए थे। राजनीतिक क्षेत्र में भी उनकी सभी दलों में जबरदस्त पकड़ थी। शनिवार की रात हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। रविवार को  उनका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ। वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

वह लोकदल से विधानसभा का चुनाव सीतापुर के लहरपुर विधान सभा क्षेत्र से लड़े। इसके अलावा उन्होंने नवजीवन हिन्दी दैनिक समाचारपत्र व बीबीसी न्यूज से भी जुड़कर काम किया। 1984 में सिधौली ब्लाक के ग्राम मोहिद्दीपूर में 23 लोगों की हुई सामूहिक नरसंहार की रिपोर्टिंग उनकी खासी चर्चित हुई रही थी। उनकी रिपोर्टिंग का आलम यह था कि बड़े-बड़े लोग गंगाराम जी से खौफ खाते थे। वह सीतापुर जनपद की सिधौली तहसील के ग्राम हीरपुर के निवासी थे। वह जब खाना खाने बैठते तो रिकार्ड तोड़ खाना खाते। खाना परोसने वाला परेशान हो जाता। मिठाई खाते तो वह भी जी भरकर खाते। केला खाने की कोई शर्त लगाता तो देखते – देखते वे कई दर्जन केले खा जाते। किस्से सुनाने बैठते तो सुनने वाले थक जाते।

नगर पंचायत सिधौली के प्रथम चेयरमैन डॉ. अवधेश श्रीवास्तव द्वारा कराए जाने वाले ‘महामूर्ख सम्मेलन आयोजन’ के वे संस्थापक मूर्खाधिराज थे। अपने जूतों को वे अपने सर के ऊपर रख लेते। और कहते एक जैसे दिन किसी के नहीं रहते। कभी जो पैरों तले होता है, एक दिन वह सिर पर भी तो हो सकता है।

यायावर, घुम्मकड़ व फक्कड़ पत्रकार गंगाराम मिश्र जी के राजनीतिक रिश्ते खांटी समाजवादी मुलायम सिंह यादव से लेकर जिले के सभी नेताओं से भी गहरे थे। डॉ. अम्मार रिजवी, राजा साहब महमूदाबाद , राजनेता डॉ. श्याम किशोर मिश्र, पूर्व केंद्रीय मंत्री रामलाल राही आदि से उनके मधुर रिश्ते रहे। वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। लेकिन कढ़े बहुत ज्यादा थे। यदि उन्होंने गांव-गिरांव को छोड़कर राजधानी की पत्रकारिता की होती तो नि:संदेह वे शिखर पर होते। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव जब मुख्यधारा की राजनीति में थे। तब वे उनके सामान्य बुलावे पर उनकी बेटी की शादी में शामिल हुए थे।  87 वर्षीय गंगाराम जी लोकतंत्र सेनानी व होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में भी पर्याप्त लोकप्रिय संघर्षशील व्यक्ति थे।

सिधौली तहसील के पत्रकार व साहित्यकार अनुराग आग्नेय बताते हैं कि उनकी बुलंद आवाज़ में कविता सुनना हमें हमेशा याद रहेगा। शनिवार की रात को उनका देहांत हो गया । दो दिन पूर्व वे बड़े ही जोशोखरोश के साथ मिले थे। मुझसे बोले, कि अनुराग तुम मेरे कुल के हो, पत्रकारिता को वे कुल के रूप में गिनते थे। बड़े भरे मन से उन्होंने कहा था कि भैया पत्रकारिता की अब जनाजा उठ गया है। आग्नेय, कोई दूसरा काम करो इससे भला होने वाला नहीं है। वे बताते कि मैं क्या काम करूँ? लेकिन मैं जल्दबाजी में था, उनकी पूरी बात तक नहीं सुन सका।

इस बीच मीडिया मंच रामकोट की ओर से गंगासागर तीर्थ परिसर में एक शोक सभा आयोजित कर वरिष्ठ पत्रकार डा. गंगाराम मिश्र के निधन पर गहरी शोक संवेदना प्रकट की गई। शोक सभा में पत्रकार मंगल प्रसाद बाजपेयी, शमी अहमद, विश्वनाथ अवस्थी, के के सिंह सेंगर, रियासत अली सिद्दीकी, मोहम्मद रियाज सिद्दीकी, पंकज कश्यप, विवेक सिंह भदौरिया, संतोष कुमार, अमरेंद्र यादव, राज सिंह, नीरज यादव आदि शोक सभा में शामिल हुए।

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चचा रजनीकर नहीं रहे, पार्थिव शरीर मेडिकल कालेज को सुपुर्द

Ajay Gupta : अशोक रजनीकर पत्रकारिता के क्षेत्र के एक सुविख्यात नाम रहे हैं. 78 साल की उम्र में एक लंबी बीमारी के बाद शुक्रवार को लखनऊ में उनका निधन हो गया. उनकी पत्नी नसीमा रजनीकर ने मेडिकल कालेज को उनकी इच्छा अनुरूप उनका देह दान कर दिया. जरूरतमंद को उनका कार्निया लगाकर उसके जीवन में रोशनी भर दी. नेशनल हेरल्ड ग्रुप के नवजीवन, जागरण, पाटलीपुत्र टाइम्स जैसे दर्जनों अखबारों को अपनी सेवाएं दीं. बीमार होने से वह दैनिक राष्ट्रीय सहारा में संपादकीय लिखते रहे. वह आजीवन कम्युनिस्ट विचारधारा के वाहक रहे. हिंदू मुस्लिम एकता के कट्टर हिमायती रहे. रिश्ते में अशोक रजनीकर जी मेरे मामाजी थे. पत्रकारिता इन्होंने ही मुझे सिखायी थी. नवजीवन में नौकरी भी दिलायी थी. आगरा, लखनऊ, पटना इनके पत्रकारिता का क्षेत्र रहा. पटना में हिंदुस्तान, पाटलीपुत्र में सहायक संपादक रहे. राष्ट्रीय सहारा में संपादकीय प्रमुख थे. व्यंग्य लेखन में निपुण थे. देश के प्रमुख अखबारों में हर विषय पर उनके लेख छपते रहे हैं.

अशोक रजनीकर जी.

Aaku Srivastava : दुखद। चचा रजनीकर नहीं रहे। सत्तर – अस्सी – नब्बे के दशक में लखनऊ में पत्रकारों के बीच लोकप्रिय। वह काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। अस्सी वर्षीय श्री अशोक रजनीकर दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, प्रदीप आदि अखबारों से जुड़े रहे। रजनीकरजी ने काफी समय पहले ही अपना देहदान मेडिकल कालेज को कर दिया था इसलिए उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उनका पार्थिव शरीर मेडिकल कालेज को सुपुर्द कर दिया जाएगा। श्रद्धांजलि।

Bipendra Kumar : अकु जी की पोस्ट से दुखद खबर मिली कि चचा रजनीकर यानी अशोक रजनीकर नहीं रहे। खबर मिलते ही पाटलिपुत्र टाइम्स के दिनों की उनसे जुड़ी यादें ताजा हो गई। “आपकी खबर समय पर नहीं आयी डाक्टर साहब। अब इसे लेने में अखबार लेट हो जाएगा, इसलिए खबर आज नहीं जा पाएगी।” अखबार मालिक से फोन पर इस अंदाज में बात करने का माद्दा रखने वाले बेखौफ समाचार संपादक थे चचा। याद करने पर लगता है हम आज कहाँ से कहाँ पहुंच गए हैं। चचा ने शरीरदान का वादा कर दुनिया को अलविदा कहा है। इस कारण उनका शरीर मेडिकल कॉलेज को सौंप दिया जाएगा। नमन चचा रजनीकर को…

Nagendra Pratap : लो पढ़ लो इस कलमकार की देह… चचा रजनीकर अगर आज कहीं मिल जाते तो उनका कोई भी चाहने वाला, कम से कम मैं तो उनसे यही पूछता कि चचा तुम्हारी इस काया को पढ़ने में चिकित्सा विज्ञानियों और उनके छात्रों को इतने पेंचों से गुजरना होगा कि वे कन्फ्यूज हो जाएंगे कि वे किसी इंसान की देह पढ़ रहे हैं या 21वीं सदी की कोई कम्पयूटर-नुमा मशीन। चचा ऐसे ही थे। उनकी दुबली-पतली काया में विद्रोह की ऐसी आग थी जिसने बहुतों को ऊर्जा दी। हमने साथ में काम तो कुछ ही साल किया लेकिन कह सकता हूं कि ‘दोस्ती’ बहुत लंबी थी। चचा शायद अकेले ऐसे इंसान जिनके साथ बातचीत में उम्र कभी आड़े ही नहीं आई। बिना देखे कोई वार्तालाप सुनता तो मान ही नहीं सकता था कि दो पीढ़ियां भी इस तरह संवाद कर सकती हैं।

माधवकांत मिश्र जी की पहल पर चचा के साथ ही लखनऊ में ‘दैनिक जागरण’ छोड़कर एक ‘अप्रत्याशित गंतव्य’ पटना की ओर चले थे हम चार लोग। यानी अशोक रजनीकर, ज्ञानेन्द्र नाथ, सुकीर्ति श्रीवास्तव और मैं। कहना न होगा कि यह अदभुत अनुभव था। हम सब के जीवन का टर्निंग प्वाइंट। रजनीकरजी जागरण के बाद ‘अमृत प्रभात’ जा चुके थे और वहीं से पटना के लिए चले थे। 1 जनवरी 1985 को ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ की अद्भुत अनुभव वाली लांचिंग, फिर ‘प्रदीप’ में कुछ वक्त बिताते हुए 1986 में पटना से ही ‘हिन्दुस्तान’ की शानदार लांचिंग। रजनीकर जी की इस सब में बड़ी भूमिका थी। वह समाचार संपादक थे। दो-तीन साल बाद ही वे पटना छोड़कर न चाहते हुए भी लखनऊ में ‘स्वतंत्र भारत’ आ गए और फिर ‘राष्ट्रीय सहारा’ उनके सांध्यकाल तक उनका ठिकाना रहा। इधर बीते कुछ महीनों में उनकी याद कई बार आई। प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव के साथ उनके घर भी जाना तय हुआ लेकिन यह हो न सका। चचा से अब मुलाकात नहीं होगी। लेकिन चचा का होना इस रूप में भी हमारे साथ होगा कि उनकी देह लखनऊ के किंग जार्ज चिकित्सा महाविद्यालय में कहीं सुरक्षित है। कोई है जो अब भी उनसे पढ़ रहा है। कुछ सीख रहा है। आप कलमकार तो शानदार थे ही। इंसान उससे भी शानदार थे। आपका जाना जिंदादिली का दूर चले जाना है। अंतिम प्रणाम चचा अशोक रजनीकर।

Amitaabh Srivastava :  अशोक रजनीकर जी के निधन की ख़बर ने बहुत उदास कर दिया है। बहुत सी यादें जुड़ी हैं उनके साथ। एक झटके में उन यादों की कड़ियाँ जैसे आँख के आगे खुलती चली गईं। सहारा के न्यूज़रूम से लेकर नोएडा के सेक्टर 11 के मकान नंबर w-108 में बिताये तमाम दिलचस्प लम्हों और लखनऊ के राजाजीपुरम में उनके घर पर हुई बैठकी की ढेरों घटनाएँ , बातें हैं जो याद आ रही हैं। मैं , मनोज, राजेश चतुर्वेदी, अवधेश बजाज और चचा रजनीकर सहारा के उन दिनों में ख़बरों पर चर्चाओं और दफ़्तरी गपशप के अलावा मस्तियों और उदासियों में भी साझेदार हुआ करते थे जिनका दायरा कभी निजी होता था तो कभी देश-दुनिया से जुड़ा हुआ। मनोज पहले ही चुका है। चचा भी चले गये। उम्र, अनुभव और क़ाबिलियत की सीनियरिटी को दरकिनार करके चचा रजनीकर जिस तरह दोस्ताना अंदाज़ में युवा पत्रकारों से घुलते-मिलते थे, उसकी कल्पना भी आज के दौर में असंभव है जहाँ ‘डेमोक्रेटिक न्यूज़रूम’ की ब्रांडिंग के बावजूद सीनियर की बात ही दैवीय आकाशवाणी की तरह अकाट्य हो गई है। अमां यार चाय पिलाओ, सिगरेट पिलाओ गुरू, खाओ, खिलाओ, यारबाज़ी, छोकरा-छोकरा की मौजमस्ती के बीच ऐसे लिखो, ये पढ़ो वग़ैरह भी चलता रहता था उनकी बातों में। मुझे याद है एक बार अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद के सिलसिले में उन्होंने died in penury को ‘पेन्युरी में मरे’ लिखे जाने की एक घटना का ज़िक्र किया और फिर आदतन लखनउवा लहजे में गरियाते हुए ठठाकर हंस पड़े थे। रजनीकर जी का मुझ पर बड़ा स्नेह रहा। पिताजी के भी परिचित थे। दोनों बुज़ुर्गों को लखनऊ के जुबली कालेज से लेकर यूनिवर्सिटी के अपने दौर की बातें करते देखा है। चचा के स्कूटर पर काज़मैन और चौपटियां की गलियों की वो घुमक़्कड़ी यादगार है। विचारों से वामपंथी थे। अंतरधार्मिक विवाह किया था। मिज़ाज के फक्कड़ और मुँहफट। अपनी देह तक दान कर गये। अब ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं। चचा, मुझे गढ़ने में आपकी भी हिस्सेदारी रही है। नम आँखों से आपको अंतिम प्रणाम।

सौजन्य : फेसबुक

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फक्कड़ और घुमन्तू पत्रकारिता के झंडाबरदार अम्बरीश दादा खुद में एक संस्था थे

घुमंतू की डायरी अब बंद हो गयी क्योंकि इसे लिखने वाला फक्कड़ पत्रकार 19 जनवरी-2018 की रात ना जाने कब दुनिया छोड़ गया। दिल में यह हसरत लिये कि अभी बहुत कुछ लिखना-पढ़ना है। पत्रकारिता के फकीर अम्बरीश शुक्ल का हम सब को यूं छोडकर चले जाना बहुत खल गया। हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के शहर कानपुर में 35 साल से अधिक (मेरी अल्प जानकारी के मुताबिक) वक्त से फक्कड़ और घुमन्तू पत्रकारिता के  झण्डाबरदार अम्बरीश दादा, चलते फिरते खुद में एक संस्था थे।

उन्हें किसी एक संस्थान में बांधना ठीक न होगा। नवभारत टाइम्स के सांध्य संस्करण से शुरू हुआ खांटी पत्रकारिता का यह सफर राष्ट्रीय सहारा तक जारी रहा। बीच में स्वतंत्र भारत के कार्यकारी स्थानीय संपादक, इंडिया टुडे में धारदार लेखन, समाचार ए़जेंसी  हिन्दुस्तान समाचार जैसे अनेक पड़ाव भी इस सफर के साक्षी बने। संघर्ष भी उन्हें डिगा नहीं पाया। कनपुरियापन और ठेठ मारक पत्रकारिता दोनों उनके अमोघ अस्त्र रहे। अड्डेबाजी, घण्टाघर की बैठकी तो मौत ही रोक पायी। दुनिया से विदा लेने से एक दिन पहले तक घण्टाघर गए। गली नुक्कड़ चौपाल में चाय लड़ाई।

उनकी अंतिम यात्रा में उनके समकक्ष लोगों के साथ साथ हमारे जैसे उनके अनुजवत भी शरीक थे। अभी 15 दिन पहले ही कुमार भाई (वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण कुमार त्रिपाठी) को मिले तो अपने विनोदी स्वभाव के मुताबिक कुमार भाई ने पूछ लिया अंतिम इच्छा तो बताअो गुरू…तपाक से बोल पड़े बस इच्छा यही कि जाते जाते किसी को बल्ली करके जाएं और हंस पड़े। उधर अम्बरीश जी चिरशैया पर लेटे थे, इधर कुमार भाई यह प्रसंग सुनाकर भावुक हो पड़े। वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट श्याम गुप्ता ने एक और संस्मरण छेड़ा जो अम्बरीश दादा की दिलेरी का परिचायक  था। बात मुलायम सिंह के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल की है, मुलायम सिंह कानपुर के दौरे पर आए थे, स्वदेशी हाउस (कमिश्नर का दफ्तर) में प्रेस कान्फ्रेंस थी। 

अम्बरीश जी के तीखे सवालों से मुलायम सिंह तिलमिला गए….पूछा पंडित जी किस अखबार में हो? अम्बरीश जी का जवाब था…अखबार तो बदलते रहते हैं नेता जी, नाम अम्बरीश शुक्ल है, फिलहाल तो एक घण्टे तक स्वतंत्र भारत में हूँ।

अम्बरीश जी का यह अन्दाज युवा पत्रकारों के लिए अंदाज-ए-बयां बना। अम्बरीश जी के साथ वर्षों तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेश त्रिवदी, अोम चौहान, प्रमेन्द्र साहू और वरिष्ठ पत्रकार अंजनी निगम जी जैसे कई साथियों ने इसकी तस्दीक भी की और कई ऐसे संस्मरण भी सुनाए जो उनके फफ्कड़पन, दिलेरी और बिना लागडाट के सिर्फ और सिर्फ पत्रकारिता के लिए उनके समर्पण की पुष्टि भी करते हैं। यूं भी कह सकते हैं कि अम्बरीश दादा एक पत्रकार थे और पत्रकारिता ही ओढ़ते और बिछाते थे।

वरिष्ठ पत्रकार दुर्गेन्द चौहान की फेसबुक वॉल से।

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दैनिक जागरण और हिंदुस्तान अखबारों के संपादक रहे शशांक शेखर त्रिपाठी का निधन

Onkareshwar Pandey : वरिष्ठ पत्रकार शशांक शेखर त्रिपाठी का असमय चले जाना कचोट रहा है। साथियों ने खबर दी है कि वे गुरुवार को लखनऊ मे अपने घर के बाथरूम में फिसलकर गिर गए थे। अस्पताल में तीन दिनों तक मौत से जंग लड़ने के बाद आखिरकार वे उस सफर पर चल पड़े, जहाँ से कोई वापस नहीं आता। हिंदी पट्टी के प्रखर पत्रकार शेखर त्रिपाठी दैनिक जागरण के संपादक थे। वे राष्ट्रीय सहारा दिल्ली और अन्य कई अखबारों में भी रहे। मेरे अच्छे मित्र थे। बेहतरीन इंसान। मुश्किलों में दोस्तों की आगे बढ़ कर मदद करने वाले । ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करें और उनके परिवार को यह दुख सहने की शक्ति।

Zafar Irshad : दैनिक जागरण के पूर्व संपादक शशांक शेखर त्रिपाठी जी नही रहे.यारों के यार हमेशा मुस्कुराते रहने वाले.एक बार उनके ऑफिस पहुंचा मैं उनसे मिलने शाम को..उन्होंने मेरी गाड़ी अपने ऑफिस में खड़ी करवाई और अपनी कार से लेकर निकल पड़े लखनऊ की सड़कों पर, रात भर खूब खिलाया पिलाया..2 बजे मुझे छोड़ा फिर सुबह 5 बजे मैं कानपुर वापिस गया..बहुत याद आएंगे त्रिपाठी सर जी. Love you हमेशा..

Hafeez Kidwai :  कितना आसान है RIP लिखना,कितना मुश्किल है किसी के न होने को बर्दाश्त करना।क़ाबिल और मशहूर सम्पादक शशांक शेखर त्रिपाठी टहलते घूमते चले गए।उर्दू पर उनसे वह बहस और इंक़िलाब अख़बार में मेरे न जाने की उनकी ख़ुशी, दोनों मनो मिटटी में दब चुकी है। आज जब उनके न रहने का दुःखद समाचार मिला,लगा की दूर कहीं घूमने ही तो गए होंगे,लौटेंगे तो मिलेंगे वरना जहाँ होंगे जाकर मिल लिया जाएगा। अब ज़्यादातर लोग साथ के जा ही तो रहें हैं।उम्र नही बल्कि मिजाज़ की वजह से साथ के लोग।परसों जोशी जी और आज त्रिपाठी भाई इनकी क्या क्या बातें याद करें।बस इतना ही की आज आप जहाँ हैं कल वहीं आकर मिलते हैं, वहाँ का आप बताइयेगा,यहाँ का हम बताएँगे….बेचैनी है, बेहद

Utkarsh Sinha : शेखर सर, यानी शशांक शेखर त्रिपाठी । हिंदी पत्रकारिता में सीखाने वाले कुछ चुनिंदा लोगो में से एक थे। अनुजवत स्नेह मिला आपसे । स्मृतियां हमेशा जिंदा रहेंगी सर। श्रद्धांजलि…

वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पांडेय, ज़फर इरशाद, हफीज किदवई और उत्कर्ष सिन्हा की एफबी वॉल से.

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वरिष्ठ पत्रकार श्री सत्येंद्र आर शुक्ल (92) नहीं रहे

Sarvesh Kumar Singh : दुखद समाचार। वरिष्ठ पत्रकार श्री सत्येंद्र आर शुक्ल (92) नहीं रहे। 13 अक्टूबर को शाम 5 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। मेरे मित्र राजीव शुक्ला के पिता NUJI और UPJA के संस्थापक सदस्य थे। भगवान उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करे। विनम्र श्रद्धांजलि। शनिवार की अपरान्ह भैंसाकुण्ड श्मसान घाट पर उनकी अन्त्येष्टि की गई। उनके ज्येष्ठ पुत्र राजीव शुक्ल ने मुखाग्नि दी। इस दौरान राजधानी के अनेक पत्रकार और उनके परिवारीजन मौजूद थे।

स्व. शुक्ल राजधानी के वरिष्ठतम पत्रकार थे। उन्होंने लखनऊ के अलावा जयपुर, चण्डीगढ़, आगरा और कानपुर में भी पत्रकारिता की। वह पत्रकार संगठन नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स इण्डिया और उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के संस्थापक सदस्य थे। स्व शुक्ल की जन्म इटावा जिला के अजीतमल में 22 जुलाई 1927 को हुआ था। आपकी स्कूली शिक्षा गांव में ही हुई। तत्पश्चात आपने आगरा, कानपुर में शिक्षा ग्रहण की। आपने पढाई के दौरान छात्र कांग्रेस का भी नेतृत्व किया तथा आप आजादी के आन्दोलन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फोज को भी सहयोग प्रदान करते थे।

शुक्ल ने आगरा के उजाला, कानपुर में दैनिक जागरण, लखनऊ, जयपुर, चण्डीगढ़ और शिमला मेंं हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए पत्रकारिता की। इसके अलावा आप हिन्दुस्थान स्टैंडर्ड से भी लम्बे समय तक जुड़े रहे। आपने लखनऊ से हिन्द आब्जर्वर नामक समाचार पत्र का भी प्रकाशन किया शुक्ल ने स्कूली शिक्षा के साथ ही पत्रकारिता की शुरुआत कर दी थी। आपने 1945 में आगरा से प्रकाशित उजाला हिन्दी दैनिक समाचार पत्र मे उप सम्पादक के रूप में कार्य आरम्भ किया। तदुपरान्त आप 1947 में कानपुर में दैनिक जागरण के उप सम्पादक नियुक्त हुए। आपने हिन्दुस्थान स्टैंडर्ड, हिन्दुस्तान टाइम्स में विशेष संवाददाता और ब्यूरो प्रमुख के रूप में कानपुर, चण्डीगढ़, शिमला, जयपुर और लखनऊ में पत्रकारिता के लिए अतुलनीय योगदान दिया। आपने राजधानी लखनऊ से हिन्द आब्जर्वर नामक समाचार पत्र का भी प्रकाशन किया।

स्व. शुक्ल प्रेस कर्मचारियों और श्रमजीवी पत्रकारों के अधिकारों के लिए भी सदैव तत्पर और संघर्षरत रहे। आपने कानपुर में पत्रकारिता के दौरान कानपुर पत्रकार संघ की सदस्यता ग्रहण की। कानपुर पत्रकार संघ के सदस्य के रूप में आप भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ (आईएफडब्लजे) के सदस्य रहे। तदुपरान्त वैचारिक मतभेद होने के कारण आपने 1965 में उ.प्र.जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन की नींव डाली। उपजा की स्थापना के लिए आयोजित औपचारिक बैठक आपने अपने निवास पर ही आयोजित करायी। तदुपरान्त 16 मार्च 1966 को ट्रेड यूनियन एक्ट के अन्तर्गत उपजा का पंजीकरण कराया गया। आप उपजा के संस्थापक सदस्य होने के साथ-साथ पत्रकारों की राष्ट्रीय संस्था नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इण्डिया) के भी संस्थापक सदस्य हैं। 23 जनवरी सन् 1972 को एनयूजे की दिल्ली में हुई स्थापना के समय गठित पहली राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आपको उपाध्यक्ष चुना गया था।

पत्रकार सर्वेश कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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मौत का दर्शन सुनाते इस आईएएस अफसर ने दे ही दी अपनी जान (देखें वीडियो)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं. Continue reading

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मनोज भी दरवीश ही की तरह कैंसर में गिरफ़्तार होकर चल बसे!

Asad Zaidi : मनोज पटेल का अचानक चले जाना अच्छा नहीं लग रहा है। हिन्दी में दुनिया भर की समकालीन कविता के अनुवाद की जो रिवायत अभी बन रही है, वह उसके बनाने वालों में एक थे। वह कविता के अत्यंत ज़हीन पाठक थे, नफ़ीस समझ रखते थे, और उनकी पसन्द का दायरा व्यापक था।

कल से कई बार ख़याल अाया कि उनके ब्लॉग ‘पढ़ते-पढ़ते‘ (http://padhte-padhte.blogspot.in/) का, जिसने अपनी तरह से लोगों को प्रभावित और शिक्षित किया, अब क्या होगा। उनके दोस्तों से अपील है कि ब्लॉग की सारी सामग्री को व्यवस्थित रूप से डाउनलोड करके सुरक्षित कर लें। 30 मार्च 2012 को उन्होंने महमूद दरवीश की एक कविता का अनुवाद अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया था, जिसमें ये पंक्तियाँ थीं :

मौत को भी अचानक होता है प्यार, मेरी तरह
और मेरी तरह मौत को भी पसंद नहीं इंतज़ार

मनोज भी दरवीश ही की तरह कैंसर में गिरफ़्तार होकर चल बसे। अलविदा!

साहित्यकार और पत्रकार असद जैदी की एफबी वॉल से.

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बेहतरीन अनुवादक और ब्लागर मनोज पटेल नहीं रहे

Amitaabh Srivastava : बेहतरीन अनुवादक, ब्लॉगर, फेसबुक मित्र मनोज पटेल का यूँ अचानक चले जाना! क्या कहें सिवाय इसके कि जीवन बहुत अनिश्चित है, समय बहुत क्रूर. पुस्तक मेले की मुलाकात याद आयी और मन भर आया. हम जैसों के लिए तो उनके अनुवाद एक नयी दुनिया की खिड़कियों का काम करते थे. उनका ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते पढ़कर ही कई नामों से परिचय हुआ था. बहुत अफ़सोस है मन में, बड़ा मनहूस दिन रहा आज. विनम्र श्रद्धांजलि

Gopal Rathi : दुखभरी खबर… हमारे फेसबुक मित्र द्वय शायर अमर नदीम साहब और दुनिया भर की कविताओं को हिंदी में अनुवादित करने वाले युवा कवि मनोज पटेल के दुखद निधन की खबर अभी अभी फेसबुक के माध्यम से मिली l अपने अपने क्षेत्र की इन सिद्धहस्त हस्तियों का फेसबुक पर हमारा मित्र होना हमारा सौभाग्य रहा l उनसे कभी नही मिला लेकिन उनके जाने पर दुख और वियोग की अनुभूति हो रही है l दोनों मित्रों को लाल सलाम l

Anil Janvijay : दुनिया भर के कवियों की कविताओं को हिन्दी में लाने वाले युवा कवि मनोज पटेल नहीं रहे। बेहद दुख हो रहा है। दिल रो रहा है।

Mridula Shukla : असमय चले जाना एक विलक्षण मनुष्य का, आत्मीय मित्र का शुभकामना लेने की हालत में नहीं हूँ मित्रों। विदा मनोज पटेल।

Arun Dev : मनोज पटेल ने वेब पर साहित्य को अपने परिश्रम और सुरुचि से समृद्ध किया है. वह इस तरह कैसे जा सकते हैं. उन्हें तो अभी बहुत कुछ करना था. समालोचन की तरफ से विनम्र श्रद्धासुमन.

Hemant Krishna : अपने अनुज मनोज पटेल नहीं रहे। ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ थम गया हो। आंखें अश्रुपूरित हो गई हैं। अपूरणीय क्षति। भगवान उनकी आत्मा को शांति और परिवार को सहन शक्ति प्रदान करे।

Pallavi Trivedi : जिस ब्लॉग को पढ़कर विश्व कविता से पहचान कायम हुई और साथ ही Manoj Patel से भी। यूं उनका अचानक चले जाना स्तब्ध कर गया। अब तक यकीन न हो रहा कि मनोज पटेल अब नहीं हैं। उनके ब्लॉग के रूप में वे हमेशा रहेंगे। हम जब भी ब्लॉग पर जाएंगे,वे वहीं मिलेंगे। विदा दोस्त … बहुत याद आओगे।

Ghanshyam Bharti : साहित्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र और जिले की माटी के लाल मनोज पटेल का चुपके से जाना वास्तव में आत्मिक रूप से झकझोर देने वाली एक बड़ी घटना है। ऐसे में उस्ताद शायर मरहूम इरफान जलालपुरी की यह पंक्तियां बरबस ही याद आ रही हैं — “ओढ़कर मिट्टी की चादर बेनिशां हो जाएंगे, एक दिन आएगा हम भी दास्तां हो जाएंगे”

Hafeez kidwai : कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ…न मिलते है, न साथ चाय पीते हैं, न लड़ते हैं, न बहस होती है यहाँ तक बात भी तो नही होती है।फिर जब वह चले जाते हैं तो ज़िन्दगी में खालीपन सा क्यों आ जाता है। ऐसा कैसे लगता है की दिल के अंदर कोई फाँस सी लग गई हो। फेसबुक पर ऊपर नीचे ऊँगली चलाते कितने दोस्त पन्नों की तरह पलटते जाते हैं। कितनों के नाम तो कितनों की तस्वीर तो कितनों के अल्फ़ाज़ ज़बरदस्ती दिमाग में पालथी मारकर बैठ जाते हैं। जब यह उठकर जाने लगते हैं तो इनकी होशियारी तो देखिये, पूरा दिल ओ दिमाग साथ ले जाने लगते हैं। जाते जाते सूखी आँखों को लबालब भरे तालाब में बदल यह पलट कर भी नही देखते। मनोज पटेल चुपके से चले गए। सच कहें जो उनके अल्फाज़ो की चादर ओढ़ रात में सोया था, लगा कोई एक झटके में छीन ले गया। यह भी कितना अजीब है की बिला ज़रूरत वह चादर खुद बखुद उढ़ गई और खुद बखुद उड़ भी गई। मगर जब यह चादर हटी तो लगा की बचा ही क्या है अब हमारे पास। अजब दर्द के मारे हम, पता नही कहाँ से मनोज पटेल के अल्फ़ाज़ टकरा गए और हमारे इर्द गिर्द फैल गए, क्या पता की रात की एक करवट से यह लफ़्ज़ टूट जाएँगे और इनके टूटने की आवाज़ भी न सुनाई देगी। आज मनोज ने दिल को ऐसा झटका दिया है कि मेरे पास आने वाले अल्फ़ाज़ मुँह बाए खड़े हैं और कह रहें हैं कि अगर तुम ज़िंदा रहो तो चौखट पर आएं वरना कहो तो यहीं से अलविदा। पता नहीं, मैं कुछ कह नहीं सकता, जब तक मैं मनोज को अलविदा बोलकर आता हूँ तब तक मेरा इंतज़ार करना.

सौजन्य : फेसबुक

मनोज पटेल के नीचे दिए गए ब्लाग पर जाकर आप उनकी अनूदित रचनाओं को पढ़-जान सकते हैं :

‘पढ़ते-पढ़ते’ ब्लाग : मनोज पटेल

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नवगछिया के वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार झा उर्फ सुनील झा नहीं रहे

शुक्रवार को चार बजे सुबह पटना के आईजीआईएमएस में ली अंतिम सांस… बिहार के भागलपुर जिले के बिहपुर के दयालपुर ग्राम के निवासी सुनील कुमार झा का शुक्रवार को पटना के आईजीआईएमएस में इलाज के दौरान निधन हो गया. वे कैंसर से पीड़ित थे. कुछ दिनों पूर्व जब उन्हें परेशानी हुई तो उन्हें इलाज के लिए भागलपुर के जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया था. उन्होंने अन्न जल लेना पूरी तरह से बंद कर दिया था.

भागलपुर में सुधार नहीं होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान रेफर किया गया. लेकिन यहां भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ. शुक्रवार को सुबह चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके पार्थिव शरीर को दोपहर बाद तक उनके पैतृक आवास पर लाया गया. शनिवार को उनका दाह संस्कार किया गया. सुनील कुमार झा उर्फ सुनील दा करीब 25 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय थे. उन्होंने पटना व भागलपुर से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान, नई बात और दैनिक भास्कर में बिहपुर से कार्य किया. वे बिहपुर के पहले पत्रकार थे.

वे नवगछिया व्यवहार न्यायालय में अधिवक्ता भी थे. उनके निधन पर बड़े भाई विनोद कुमार, दिलीप कुमार झा, गोपी कृष्ण झा, मां गायत्री देवी गहरे सदमे में हैं. सुनील झा बेबाक और स्पष्टवादी पत्रकार के रूप में पूरे नवगछिया अनुमंडल में जाने जाते थे. वे प्रखर वक्ता भी थे. किसी मंच से उनका संबोधन श्रोताओं को ताली बजाने को मजबूर कर देता था. सुनील झा का स्कूली जीवन तुलसीपुर हाई स्कूल में बीता. वे यहां छात्रावास में रह कर पढ़ाई करते थे. फिर उन्होंने अंग्रेजी भाषा से एमए किया और एलएलबी भी किया. सुनील झा के निधन पर नवगछिया अनुमंडल के पत्रकार शोक संतप्त हैं. पत्रकारों ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया है.

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