न्यूज एजेंसी IANS ने नरेंद्र मोदी को ‘बकचोद’ लिख दिया, ब्यूरो चीफ समेत कइयों की नौकरी गई

एक बड़ी खबर ‘आईएएएनएस’ से आ रही है. IANS न्यूज़ एजेंसी है जिससे ख़बर तथा सूचना चैनल एवं अख़बार लिया करते हैं. आईएएनएस से रिलीज की गई एक खबर में प्रधानमंत्री के नाम के आगे ‘बकचोद’ लिख दिया गया. आईएएनएस की यह न्यूज फीड जब कई मीडिया हाउसेज तक पहुंची तो बवाल मच गया. समाचार एजेंसी आईएएनएस से खबरें लेने वाले ढेर सारे मीडिया संस्थानों ने इस न्यूज को यूं ही चला भी दिया.

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आपके पत्रकार ने मेरे खिलाफ खबर प्रकाशित करने से पूर्व मेरा पक्ष क्यों नहीं लिया?

सेवा में,
समूह संपादक महोदय,
राजस्थान पत्रिका
विषय- राजस्थान पत्रिका के पत्रकार द्वारा पेड न्यूज प्रकाशित करने व जबरन धमकाने बाबत्।
महोदय,

मैं राजस्थान पत्रिका जैसे विश्वसनीय समाचार पत्र का पिछले करीब 15 सालों से नियमित पाठक रहा हूं। क्योंकि यह अखबार अब तक प्रमाणों के आधार पर खबर प्रकाशित करने के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन आज मेरे से संबंधित एक खबर प्रकाशित होने पर ऐसा महसूस हुआ कि यह भ्रम मात्र है। आपके समूह के पत्रकार पेड न्यूज प्रकाशित करने में विश्वास रख रहे है। महोदय, मैं भारतीय सेना से सेवानिवृत्त कर्मचारी हूं।

मैं आपका ध्यान राजस्थान पत्रिका कोटा संस्करण में दिनांकर 10 अक्टूबर को पृष्ठ संख्या 5 सिटीजन पर सबसे उपर की ओर ‘चुंगी नाके की जगह पर खड़ा हो गया मकान’ शीर्षक से प्रकाशित खबर की ओर दिलाना चाहूंगा। महोदय, क्या मैं जान सकता हूं कि आपके पत्रकार रणजीत सिंह सोलंकी ने इस खबर को प्रकाशित करने से पूर्व मेरा पक्ष क्यों नहीं लिया गया? इस एकतरफा खबर को किस आधार पर प्रकाशित किया गया? जबकि इस जमीन से जुड़े समस्त दस्तावेज मेरे पास सुरक्षित है।

क्या किसी भी तरह की विवादित खबर को एकतरफा प्रकाशित करना पत्रकारिता के नियमों के खिलाफ नहीं है? पत्रकार सोलंकी कोटा में बीजेपी बीट देखते हैं जबकि उन्हें आपके प्रबंधन ने ग्रामीण एडिशन का इंचार्ज बनाया हुआ है। जोकि स्थानीय भूमाफियाओं के साथ मिलकर इस तरह की खबरें प्रकाशित कर रहा है। वे काफी लंबे समय से बीजेपी बीट देख रहे हैं और अब निगम देखने लगे हैं, जहां भी बीजेपी के जनप्रतिनिधियों का बोलबाला है, जिनकी मिलीभगत से ऐसी खबरें प्रकाशित की जा रही है।

अब इस खबर की वजह से मुझे मानसिक प्रताड़ना उठानी पड़ रही है और इसके आधार पर स्थानीय निकाय यदि कोई कार्यवाही करता है तो इसका आर्थिक नुकसान भी मुझे वहन करना पड़ेगा। क्या आप इसकी भरपाई कर पाएंगे?  मैं आपके स्थानीय संपादक विजय चौधरी से मिलने गया था, लेकिन उन्होने भी त्वरित कार्रवाई करने की जगह दस्तावेज अपने पास रख लिए और खंडन प्रकाशित करने का आश्वासन दिया। जबकि आपका समाचार पत्र समूह खंडन प्रकाशित करने की नीति रखता ही नहीं है। बावजूद इसके यह आश्वासन मुझे दिया गया। अब मुझे यह बताइए कि इस एकतरफा खबर के लिए न्याय पाने के लिए मैं कहां जाउं? मैं बाहर नौकरी करता हूं और घर पर वृ़द्ध माता-पिता अकेले रहते हैं।

महोदय, मैं भारतीय सेना से सेवानिवृत्त कर्मचारी हूं। कोटा में रावतभाटा रोड़ पर गोदवरी धाम के सामने निवास करता हू। खबर में जिस चुंगी नाके शब्द का प्रयोग किया गया है, वह सर्वथा गलत है। क्योंकि चुंगी नाका तो वर्ष 1991 में सड़क के चौड़ीकरण में मर्ज हो चुका है। शेष जमीन को हमने उसके मालिक से खरीदा था। जिसके क्रय संबंधी समस्त दस्तावेज, मौका नक्शा एवं अन्य दस्तावेज हमारे पास मौजूद हैै। बावजूद इसके किस आधार पर मेरे निर्माण कार्य का फोटो प्रकाशित कर चुंगी नाके पर अतिक्रमण बताया जा रहा है?
आपसे नम्र निवेदन है कि इस मामले में आप संबंधित पत्रकार के खिलाफ कठोर कार्यवाही करते हुए समस्या का निदान कराएं जोकि इस खबर के प्रकाशित होने से पैदा हुई है। अन्यथा मुझे आपके प्रतिष्ठित समाचार पत्र के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। क्योंकि इससे मुझे काफी परेशानी हुई है।  यदि इसी तरह आपके पत्रकार पेड न्यूज प्रकाशित करते रहे और संपादक आंखें बंद कर जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहे तो बहुत जल्द इस प्रतिष्ठित समाचार समूह की साख गिर जाएगी जिसके जिम्मेदार आपके कर्मचारी ही होंगे।

प्रार्थी

ओमप्रकाश राजपुोहित,

निवासीः गोदावरी धाम के सामने, कोटा                   

प्रतिलिपि-
संपादकः भुवनेश जैन
राज्य संपादकः हरीश पाराशर
जोनल हैडः अमित वाजपेयी

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हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबारों में गल्तियों की भरमार

बड़े अखबारों में गल्तियां छपने से लाखों पाठकों का जायका बिगड़ता है. हिंदुस्तान मेरठ संस्करण में पेज नंबर छह पर 28 अक्टूबर को गलत हेडिंग छप गई. इसी तरह दैनिक जागरण में गलत तथ्य छपे हैं. देखें दोनों अखबारों की कटिंग…

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‘समाचार प्लस’ चैनल का दिवालियापन : अमित शाह की रैली में मुलायम सिंह यादव को पहुंचा दिया!

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड केंद्रित रीजनल न्यूज चैनल ‘समाचार प्लस’ की कोई क्रेडिबिल्टी नहीं रह गई है. यह ओछी और घटिया पत्रकारिता पर उतर आया है. ऐसी ऐसी खबरें यह चैनल दिखा रहा है कि लोग माथा पकड़ ले रहे हैं. इस चैनल ने अपने यहां लिख दिया कि अमित शाह की रैली में मुलायम सिंह यादव पहुंच गए. बताइए भला, क्या यह संभव है कि भाजपा नेता अमित शाह की रैली में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव पहुंच जाएं?

पिछले दिनों अमित शाह जब भाजपा की इटावा रैली में शामिल होने के लिए रैली स्थल नुमाइश पंडाल पहुंचे तो समाचार प्लस चैनल ने ब्रेकिंग न्यूज चलाया और यह भी लिखा कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी हुए शामिल. यकीन न आ रहा हो तो देखिए ये वीडियो : https://youtu.be/fkybMjoD6W8

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

इसे भी सुनें :

Ufff इतना घटिया कोई कैसे बोल सकता है अपने शहीद जवानों के बारे में!

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हे कमाल खान जी, संविधान में ‘दफा’ नहीं होती बल्कि अनुच्छेद यानि Article होता है

Chandan Srivastava : अभी कैंटीन में देखा एनडीटीवी चैनल पर आ रहा था कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्यपाल से मिलने पहुंचे जिसके बारे में विस्तृत जानकारी चैनल के पत्रकार कमाल खान लाइव दे रहे थे। उन्होंने बताया कि मिलने की वजह हाईकोर्ट का कल का आदेश हो सकता है जिसमें कहा गया है कि प्रदेश में क्यों न “दफा 156” के तहत राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी जाए।

जहां तक मुझे जानकारी है कमाल खान यूपी में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन वरिष्ठ पत्रकार महोदय को कोई बता दे कि पहली बात संविधान में ‘दफा’ नहीं होती बल्कि अनुच्छेद यानि Article होता है। दूसरी बात अनुच्छेद- 156 राज्यपाल के पदावधि यानि Term of office of Governor के सम्बंध में है। राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था अनुच्छेद- 356 में है। धत् तेरे की। इन पत्रकारों पर हमें जानकारियां देने का दारोमदार है।

लखनऊ के वकील और पत्रकार चंदन श्रीवास्तव की इस एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं :

Mahendra Yadav कुछ पत्रकारों ने अपनी ब्रांडिंग इतनी जोरदार की है कि अब वो कूड़ा करकट कुछ भी फैलाएं, लोग वाह वाह करने लगते हैं। कमाल भी ऐसे ही हैं।

Vivek Singh संयोग से मैं भी टीवी के पास बैठा था.. एक बार 156 कहा था दूसरी बार 356 ही कहा था। शायद त्रुटि हो गई हो। वैसे पत्रकार से गलती पर कोई आश्चर्य नहीं होता मुझे।

Anil Dwivedi चन्दन भाई, दिक्कत यही है कि ज्यादातर पत्रकार अपडेट नही रहते।

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‘नवोदय टाइम्स’ का यह ब्लंडर सोशल मीडिया पर हुआ वायरल, लोगों ने खूब लिए मजे

दिल्ली से एक अखबार निकलता है, नवोदय टाइम्स. यह पंजाब केसरी वालों के खानदान के दूसरे धड़े का है. 11 जुलाई के अखबार में दिल्ली सरकार के पूर्व प्रिंसिपल सेक्रेटरी राजेंद्र कुमार से जुड़ी खबर में फोटो फिल्म अभिनेता स्वर्गीय राजेंद्र कुमार का लगा दिया गया है. इस गड़बड़ी को सोशल मीडिया पर लोगों ने चटखारे लेकर एक दूसरे के साथ शेयर किया. आप भी देखिए नवोदय टाइम्स का यह हाल….

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वाह रे ‘आज’ : शशि शेखर ने क्या कहा और अखबार ने क्या छाप दिया!

वाराणसी। हिन्दुस्तान अखबार के प्रधान संपादक ने 27 अप्रैल को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने उद्बोधन में राष्ट्रपति को ही दिवंगत बता दिया! ये मैं नहीं, बनारस में सबसे पुराने अखबार ‘आज’ में छपी रिपोर्टिंग तो यही कहती है. हैरत की बात तो यह है कि यह वही आज अखबार है, शशि शेखर ने जिस अखबार से अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की. इतना ही नहीं, लम्बे समय तक इस अखबार से जुड़े रहने वाले शशिशेखर आज अखबार के आगरा संस्करण के स्थानीय संपादक भी रहे।

उसी अखबार ने अपने 28 अ्रपैल बनारस संस्करण के पृष्ठ संख्या 5 पर छपे 5 कालम के समाचार में शीर्षक ‘स्वच्छता को व्यावहारिक जीवन में लागू करने की जरूरत’ में शशि शेखर के सार गर्भित विचार को कुछ यूं शब्दों में ढाला– ‘‘विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार श्री शशि शेखर ने कहा कि दो अक्टूबर 2014 को बापू के जन्म दिन पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने 2017 में बापू की 150वीं जयन्ती से पूर्व पूरे देश को स्वच्छ बनाने का आग्रह न केवल हमारे राष्ट्रपति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है बल्कि जनमानस में स्वछता को व्यक्तिगत आदत से बढ़कर इसे सामाजिक आदत में बदलना है।’’

इतना ही नहीं, इन्हीं पंक्तियों को आगे के पैरा में आज अखबार ने दोबारा छाप कर संपादन कला का बेहतर नमूना पेश किया है। गौर से देखने पर पता चलता है कि पूरा समाचार ही त्रुटिपूर्ण है। गौर करने की बात तो ये है कि यह वही आज अखबार है जिसने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में कई महत्वपूर्ण शब्द दिये हैं, जो आज भी प्रचलन में है। यह भी उल्लेखनीय है कि जिस अखबार को पढ़कर कई अहिन्दी भाषियों ने हिन्दी को सीखा आज उसी अखबार के संपादकीय विभाग की कार्यशैली को देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। और हो भी क्यों न, जिस अखबार के स्वंयभू संपादकाचार्य शार्दुल विक्रम गुप्त गर्व से यह यह कहते फिरते हैं, मैं चाहूं तो किसी रिक्शे वाले को भी संपादक बना सकता हूं, तो उस अखबार का यही हश्र होना तय है।

लेखक आर.राजीवन बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 07800644067 के जरिए किया जा सकता है.

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लगभग सारे चैनल झूठी खबर परोसते रहे, भला हो अखबारों का जिनने ये झूठ नहीं छापा

: इलेक्ट्रानिक मीडिया को शर्म क्यों नहीं आती? :  जल्द खबर देने और ब्रेकिंग न्यूज चलाने की अंधी होड मीडिया को सच से दूर कर रही है। ये बात छोटे और नये चैनलों की नहीं है। देश के प्रमुख टी.वी. चैनल भी झूठी और बेसिर-पैर की खबरें चलाने लगे हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के सच से दूर होने और झूठी खबरें प्रसारित करने का एक बड़ा प्रमाण 21 अप्रैल को मिला। उत्तराखंड हाई कोर्ट की डिवीजन बैंच के आदेश के हवाले से देश के लगभग सभी न्यूज चैनल बड़े जोर शोर के साथ झूठी खबर चलाते रहे।

इन चैनलों पर हाई कोर्ट के हवाले से 21 अप्रैल को दोपहर बाद से खबर प्रसारित होने लगी थी कि कांग्रेस के बागी विधायकों की सदस्यता खत्म कर दी गई। एक दो बार नहीं, बल्कि देर रात तक लगभग सारे चैनल इस झूठ को सच बता कर अपने दर्शकों को गुमराह करते रहे। भला हो अखबारों का… उन्होंने ये झूठ नहीं छापा।

हाई कोर्ट डिवीजन बैंच के फैसले की जानकारी देने के लिए जिन सरकारी और निजी वकीलों ने मीडिया को बाइट दी, उनमें से किसी में ऐसा उल्लेख नहीं था कि बागी विधायकों के बारे में डिवीजन बैंच ने फैसला सुना दिया है। इस अदालत में बागी विधायकों का मामला चल ही नहीं रहा था। मीडिया के धुरंधर कहे जाने वाले लोगों के ज्ञान पर आश्चर्य होता है कि जिस अदालत में बागी विधायकों का मामला नहीं चल रहा है, हाई कोर्ट की ऐसी डिवीजन बैंच के निर्णय में बागी विधायकों के बारे में आदेश देने की बात जोड़ दी गई।

दरअसल, कांग्रेस के बागी विधायकों का मामला नैनीताल हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति यू.सी. ध्यानी की अदालत में चल रहा है और मीडिया दूसरी अदालत (हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली डिवीजन बैंच) के आदेश की रिपोर्टिंग कर रहा था। जिस अदालत में किसी खास मामले पर सुनवाई ही नहीं हो रही है, वह उस मामले में कोई आदेश कैसे दे सकती है? यह सीधी सी बात इलेक्ट्रानिक मीडिया के जिम्मेदार लोगों की समझ में क्यों नहीं आई? इसका जवाब देने का साहस वे शायद ही कभी कर पाएं।

ये और ज्यादा शर्मनाक स्थिति है कि लगातार कई घंटे झूठी खबर दिखाने के बाद टी.वी. चैनलों ने अपने दर्शकों से माफी भी नहीं मांगी। इतनी बड़ी गलती के बाद माफी मांगना तो बनता ही था। कई बुलेटिनों में माफी मांगते हुए दर्शकों को सही स्थिति की जानकारी दी जाती, तो लगता कि मीडिया के तथाकथित जिम्मेदार लोगों की आंखों में शर्म हया जैसा कुछ बचा है। पता नहीं क्यों, मुझे आज भी लगता है कि ये महज एक गलती ही थी, किसी को नुकसान या किसी को फायदा पहुंचाने की बदनीयती से झूठ को सच बनाकर नहीं परोसा गया? भगवान से प्रार्थना है कि यही सच निकले।

लेखक सुभाष गुप्ता उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षक-विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क sg2300@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

प्रो. सुभाष गुप्ता का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं….

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दैनिक जागरण ने इलाहाबाद के पूर्व मेयर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह को जीते जी मार दिया

दैनिक जागरण महान अखबार है. यहां कभी मायावती के लिए गंदी गंदी गालियां छप जाया करती हैं तो कभी जिंदा लोगों को मरा घोषित कर दिया जाता है. ताजा मामला इलाहाबाद एडिशन का है. कल दैनिक जागरण इलाहाबाद में पेज नंबर नौ पर एक छोटी सी खबर छपी है जिसमें बताया गया है कि पूर्व मेयर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह के निधन के बाद कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष निर्मल खत्री ने उनके घर पहुंचे और उन्होंने वहां शोक संतप्त परिवार को सांत्वाना दी.

अखबार में यह खबर पढ़कर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह के होश उड़ गए. लोग उनके मरने की खबर जब पढ़े तो उनके घर पहुंच गए लेकिन हवां देखा कि चौधरी साहब तो जिंदा हैं और जागरण को पानी पी पी कर कोस रहे हैं. पता चला कि चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह की चाची जी का तेरह दिनों पहले निधन हुआ था और तेरहवीं में शामिल होने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष निर्मल खत्री आए थे. इस संबंध में कांग्रेसियों ने प्रेस रिलीज भेजी कि कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष निर्मल खत्री ने पूर्व मेयर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह की चाची जी के निधन पर तेरहवीं में शामिल होने उनके घर पहुंचे और शोक संतप्त परिवार को सांत्वना दी.

लेकिन इस प्रेस रिलीज को विद्वान दैनिक जागरण वालों ने कुछ ऐसा एडिट किया को चाची को गायब करके डायरेक्ट पूर्व मेयर साहब को ही मार डाला. कांग्रेस बेचारे हाय मार डाला हाय मार डाला कह कर भले अपना सिर धुनते रहें लेकिन दैनिक जागरण वाले तो अपना कर्म कर के आगे बढ़ चले हैं, कोई जिए मरे उनकी बला से.

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Blunder by HT : Mitali is not the only women gallantry awardee…

Dear Mr Singh,

Hope you doing well!

This mail is in regards to the misinterpretation of facts by HT which has defamed an army officer (Capt CR Leena) from being the first Indian lady to get a gallantry award in the Indian Army.

I came to know about this blunder by HT when i met Major Sanjay Dhadhwal, office manager for an MNC in India and also  defamed officer’s husband. He showed me the article written by Bhadra Sinha of Hindustan times on oct 16th 2015 stating “Lt Col Mitali Madhumita is the Army’s only woman gallantry awardee in the country”.  If going according to facts she is not the only women gallantry awardee in our country in-fact she is second to Capt (Miss)C R Leena.

Mails have been already sent to HT and also to the journalist seeking corrigendum but they are not replying back. I would be highly obliged if you can be of any help in this matter.

I am attaching with mails the link of the article by HT and some facts, which proves that Capt C R Leena was felicitated with the award before Lt Col Mitali.

Hope you will be help the officer in getting back her pride.

Thanks and Regards,

Darshan Pandey

dp1495@gmail.com

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शर्मनाक : गायकी के उस्ताद अहमद हुसैन और मुहम्मद हुसैन को दैनिक जागरण ने पाकिस्तानी फ़नकार बताया!

शर्म से डूब मरने की बात है। हिंदी के सबसे बड़े अख़बार होने का दावा करने वाले दैनिक जागरण ने जयपुर की माटी में खिलकर, गायकी के उस्ताद बने अहमद हुसैन और मुहम्मद हुसैन को पाकिस्तानी फ़नकार बताया है। यह हाल है पराड़कर जी के शहर वाराणसी की पत्रकारिता का। नाक़ाबिले माफ़ी यह है ग़लती, क्योंकि सवाल किसी वर्तनीदोष या छपाई का नहीं है..इन उस्ताद भाइयों के परिचय में कुछ जोड़ा गया है यानी संपादनकला का परिचय दिया गया है…!

वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं>

Latif Kirmani पंकज जी, दरअसल आजकल के कथित बड़े अख़बारों के बड़े पत्रकार भारतीय मुसलमान नेताओं और कलाकारों के नाम और परिचय से वाकिफ नहीं है या होना नहीं चाहते। नवभारत टाइम्स जैसे अख़बार में जब जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्लाह बुखारी के देहांत की खबर छपी तो तस्वीर उनके बेटे अहमद बुखारी की लगा दी थी बाद में सहयोगी अखबार सांध्य टाइम्स में गलती के लिए खेद प्रकट किया गया। इसी तरह और भी उदाहरण है। जबसे ग़ुलाम अली का शो रद्द हुआ है तबसे पत्रकारों के दिमाग़ में हर मुसलमान फनकार पाकिस्तानी नज़र आता है…भाई हिंदी के पत्रकारों से अनुरोध करूँगा कि वो मुस्लिम फनकारों और नेताओं के बारें में जानकारी के लिए भी अध्ययन कर लिया करें…

Bhim Prakash जब मैंने पहली दफा इनकी ग़जल सुनी तो लगा ये एक ही गा रहे हैं फिर पता चला कि ये तो दो गा रहे हैं।कमाल की ताजगी है इनकी गायकी में।जो इनकी भारतीयता पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं वो सबसे पहले खुद को जान लें फिर दूसरों से कहें।

Abdulwali Shabi इनको हर मुसलमान पाकिस्तानी नज़र आता है.

Aziz Waqaar Khan और आज तीन दिन हो गए इन्होंने अभी तक माफ़ी नही मांगी ।।

Prafulla Prabhakar जागरण के सम्पादक शायद उत्तर प्रदेश से बाहर की कोई जानकारी नहीं रखते….

Jawed Mohd इनको हर मुसलमान पाकिस्तानी नज़र आता है.

Tanweer Farooque यह आजकी नई युग की पत्रकारिता है जहाँ खबर कि गहराई से दुर दुर तक का कोई वास्ता नही है बस छापते जाओ। और इस देश को बाँटते जाओ।

Uttam Singh पत्रकारिता का स्तर दिनों दिन गिरता जा रहा है चाहे वह प्रिन्ट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया. कमरे में बैठ कर पत्रकारिता की जायेगी तो यही तो मिलेगा. जनाब, यह तो ग़नीमत है, ये लोग तो ये भी लिख सकते थे कि दो ‘पाक आतंकवादी’ ग़ज़ल भी गाते हैं.

Sayed Wajih Ul Haque हम तो दैनिक जागरण की मानसिकता को रोज़ झेलते हैं , कुत्सित मानसिकता के साथ पत्रकारिता होती है।

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‘दैनिक भास्कर’ ने जिन्दा थानेदार को मार डाला!

हत्या बेलसर ओपी प्रभारी की हुई खबर छपी लालगंज थानाध्यक्ष की

अपने को देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 होने का दावा करने वाला ‘दैनिक भास्कर’ के पटना संस्करण ने पाठकों को अचंभित कर देने वाली एक खबर छापी है। 19 नवम्बर को प्रकाशित यह खबर भास्कर के पहले पन्ने पर सेकेंड लीड खबर है। बुधवार को वैशाली के लालगंज में उपद्रवियों के हमले में बेलसर के ओपी प्रभारी अजीत कुमार की हत्या कर दी गई थी पर ‘दैनिक भास्कर’ ने गुरुवार को अपने प्रकाशित खबर में जो हेडिंग ‘लालगंज के थानाध्यक्ष को उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।’

यह खबर अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने वाला है। गौरतलब है कि फिलवक्त लालगंज के थानाध्यक्ष सुमन कुमार हैं जो सही सलामत हैं पर देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 होने का दावा करने वाले इस अखबार ने एक जिन्दा थानेदार को मृत घोषित कर दिया। लालगंज के थानाध्यक्ष सुमन कुमार को जानने वाले व उनके परचितों ने जब इस अखबार को पढ़ा तो सभी विचलित हो गए। ऐसे विचलितों के फोन से सलामत सुमन कुमार सुबह से ही परेशान हैं।

पटना के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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आई नेक्स्ट अखबार ने मृतक को गवाही देने पहुंचा दिया कोर्ट!

आजकल आई नेक्स्ट आगरा में ख़बरों पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है. खबरों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. तथ्यों में अभाव में खबरें हास्यास्पद साबित हो रही हैं. ऐसी ही एक खबर के कारण प्रेस काउंसिल आफ इंडिया से धिक्कार योग्य घोषित किए जा चुके एडिटोरियल हेड सचिन वासवानी की अकर्मण्यता की वजह से डेस्क का स्टाफ लापरवाह बना रहता है.

पिछले कुछ दिनों से फ्रंट पेज देख रहे गौरव लहरी बीमारी की वजह से छुट्टी पर हैं. अब सारा काम डेस्क इंचार्ज राजीव अग्निहोत्री और एडिटोरियल हेड सचिन वासवानी ने अपने हाथ में ले लिया है. उसी का परिणाम है कि 17 नवंबर के फ्रंट पेज पर हद दर्जे की गलती की गई है.

‘बुलेटप्रूफ जैकेट पहन दीवानी पहुंचा हेमनदास’ हेडिंग से न्यूज़ छापी गई है. जबकि हेमनदास का मर्डर नवंबर 2014 में हो गया था. हेमनदास का बेटा महेश 16 नवंबर को गवाही देने कोर्ट गया था. लेकिन आई नेक्स्ट ने मृतक हेमनदास को ही गवाही देने कोर्ट पहुंचा दिया. अब इस गलती पर आई नेक्स्ट के एडिटोरियल हेड को जबाव देते नहीं बन रहा है.

प्रतिमा भार्गव के केस के कारण प्रेस काउंसिल समेत पूरे देश भर की निंदा और किरकिरी झेल रहे सचिन वासवानी दरअसल कानपुर के एक अधिकारी के चहेते होने के कारण अपनी हिटलरशाही ऑफिस में चला रहे हैं. चर्चा है कि सिटी इंचार्ज मेघ सिंह यादव से भी उनकी आजकल पटरी नहीं खा रही है. लेकिन कानपुर मुख्यालय से वासवानी की तगड़ी सेटिंग के कारण उनका बाल तक बांका नहीं हो रहा है.

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आईबीएन7 ने अमित शाह को उप राष्ट्रपति घोषित कर दिया!

हमारे हिंदी न्यूज चैनल जो न कर दिखाएं, वो कम है. आईबीएन7 न्यूज चैनल ने कल चैनल पर अमित शाह को उपराष्ट्रपति घोषित कर दिया. ऐसा चैनल की स्क्रीन पर चलने वाली पट्टी पर लिखाा हुआ आया जिसे एक सुधी दर्शक ने पकड़ लिया और मोबाइल से फोटो खींचकर भड़ास के पास भेज दिया. देखें आप भी उस तस्वीर को. नीचे की तस्वीर में बिलकुल नीचे लिखा हुआ है- ‘कार्यक्रम में उप राष्ट्रपति अमित शाह भी पहुंचे’.

क्या चैनल वालों को नरेंद्र मोदी और अमित शाह का ऐसा फोबिया हो गया है कि वो हर पद के साथ इन्हीं का नाम जोड़ दे रहे हैं? या यह सिर्फ एक मानवीय चूक भर है? जो भी हो, कम से कम अंबानी के चैनल में ऐसी गल्ती तो नहीं जानी चाहिए जहां लाखों के पैकेज लेकर सैकड़ों लोग कुर्सियां तोड़ रहे हैं.

अगर आप भी न्यूज चैनलों या अखबारों में जाने वाली गल्तियों को देख-पढ़ परेशान होते हैं तो उसे मोबाइल से फोटो खींच कर भड़ास तक भेज दें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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Shame on you TOI its NIT (An Institute of National Importance), not NIIT

 

Since the time I remember, one thing that comes to my mind is the newspaper vendor flinging Times of India at the main gate of my house. I was an avid reader of prominent national daily, The Times of India. The exclusive coverage of issues of national importance always fascinated me. The idea of switching loyalty to any other national daily didn’t even cross my mind. I would have labelled that an exceedingly absurd thought. Today, in the hustle and bustle of college life, I somehow carve out time to login Times Of India on my laptop and go through the electronic version of it. It was my love for Times Of India that drove me crazy.

One fine morning on 27th September 2015, I was reading TOI’s article on “Single Test for IITs”. The issue was of special interest to me because I had also gone through the competitive engineering exams last year. The crux of the article was that the government is mulling over the idea of common entrance test for IITs and NIITs. Surprised…? Same was my reaction when I read this line. A literate Indian can easily figure out by virtue of his common sense that the government wants to table the proposal of a common examination for IITs and NITs. Sadly, third largest newspaper daily, The Times Of India, doesn’t even know the difference between NITs and NIITs, let alone the claim of being the trendsetter that adheres to the highest standards of journalism. The error was not at a single place. TOI has committed this gaffe three times in an article of barely 400 words. The word NIT did not even feature in the article. They have simply assumed that NIITs are equivalent to NITs.

As a responsible citizen of India, let me clearly draw a line between the NITs and NIITs so that heedless Indians and Times Of India don’t make a blunder in future. NITs are institutes that are funded by the central government of India. They are “Institutes of National Importance” declared by the Ministry of Human Resources and Development. To name a few, courses like Computer Engineering, Mechanical Engineering, and Electrical Engineering are dealt with here. The courses in NITs are accredited by National Board of Accreditation. The labs here are funded by World Bank. The students here belong to top 0.5 percentile of India. The teachers in NITs are globally acclaimed. On the other hand, NIIT is a private computer institute for training people so that software firms can hire them. Here only courses such as Java, C# are offered. Even though both institutes are differentiated by a letter “I” there is a world of difference between them.

Times of India should realise that NITs feature in the best colleges of India. I hold no grudges against NIIT, but it is unethical to link two institutes of completely different stature. Indian society believes that IITs are the only premier institutes of India. Times of India has unfortunately contributed to this myth. If professionals working in Times of India don’t know this, it would be a crime to expect a positive response from 13.5 million readers of Times Of India. NITians have proved that this notion is wide of the mark. NITians are at par with the society labelled prodigious IITians. NITians fetch placements in the elite companies of the world. Many of them are successful entrepreneurs. There is only one NIT in a state and a student is expected to burn the midnight oil to get into it. Combating for a seat in it takes a toll on the mental level of a student. In return, NIT is compared with nascent NIIT which is an insult to NITs and the setup which is more than half a decade old.

So, as a NIT student from the platform of “Proud To Be An NITian” on the behalf  of NIT fraternity comprising of 50000 students presently studying in them and thousands who have passed in the last 50 years, I would request you to not use this in future. Confusion between NIT and NIIT just shows your utter ignorance about technical education institutes in India. Had Times Of India added the letter “I” in IIT and printing it as IIIT, massive protests would have erupted. The Times Group would have tendered an apology. But no outrage was observed after TOI committed this blunder. It doesn’t give Times Of India a leeway. We expect an apology from the Times Group. It would, in fact, be a step by TOI towards regaining the confidence in NITians and its readers. (साभार- ptbn.org)

ptbn.org में प्रकाशित श्याम कौशिक की रिपोर्ट.

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धन्य है अमर उजाला का ज्ञान : हाथापाई का अंग्रेजी अनुवाद ‘ब्लो जॉब’!

अमर उजाला ने इंग्लिश में लिखा- हिमाचल विधानसभा में ‘मुख मैथुन’. सोशल मीडिया पर उस वक्त हिंदी अखबार ‘अमर उजाला’ की जमकर फजीहत हुई, जब उसकी एक रिपोर्ट का इंग्लिश टाइटल अनर्थ करता दिखा। अंग्रेजी में टाइटल था- ‘Blow job in Himachal Vidhansabha’. लोग इस बात को लेकर मजे लेते नजर आए। गौरतलब है कि blow job का अर्थ ‘मुख मैथुन’ होता है। तो इस हिसाब से इस टाइटल का मतलब बना- हिमाचल विधानसभा में मुख मैथुन. shabdkosh.com पर blow job का अर्थ कोई भी देख सकता है।

जाहिर है, यह ऐसी गलती है, जो इंग्लिश के कम ज्ञान की वजह से हुई है। शायद अमर उजाला में काम करने वाले किसी सब एडिटर ने ”हिमाचल विधानसभा में हाथापाई’ का इंग्लिश टाइटल देना चाहा होगा। ऐसे में उसने गूगल ट्रांसलेट की मदद ली, जिसने हाथापाई की इंग्लिश blow job कर दी। गूगल ट्रांसलेट से आप इसका अर्थ देख सकते हैं।

गौरतलब है कि अभी गूगल का हिंदी ट्रांसलेट विकास के चरण में है और इस पर भरोसा नहीं किया जाता। पहले भी कई बार अजीब और आपत्तिजनक अनुवाद के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में यह मानवीय भूल की वजह से अमर उजाला को थोड़ी असहज स्थिति का सामना जरूर करना पड़ा है। ऐसी गलती किसी से भी हो सकती है; हमसे भी। मगर उम्मीद है कि इस घटना से सबक लेते हुए आगे ऑनलाइन मीडिया पोर्टल ही नहीं, अन्य लोग भी गूगल ट्रांसलेट इस्तेमाल करते वक्त सावधानी बरतेंगे।

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थोड़ी अंग्रेजी भी पढ़ लिए होते भड़ासी… इन घसियारों को कौन लाया पत्रकारिता में…

Anuranjan Jha : थोड़ी अंग्रेजी भी पढ़ लिए होते भड़ासी… कुछ दिन पहले मुंबई में अर्णब गोस्वामी ने एक तेज गति Lamborghini कार की शिकायत झट से पुलिस से की और पुलिस ने तत्परता दिखाकर उस कार चालक को रोक लिया ….. इस खबर को एक भड़ासी वेबसाइट ने कुछ इस तरह छापा है – ”तेज गति कार चलाकर फंसे अर्णब गोस्वामी”.

और, यह आलम तब है जब मूल खबर अंग्रेजी में सब कुछ साफ बयान कर रही है और वहां छपी भी है….

शर्मनाक …. इन घसियारों को कौन लाया पत्रकारिता में…

पत्रकार अनुरंजन झा के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर जिस पर उपरोक्त टिप्पणी अनुरंजन झा ने की है, पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

तेज गति कार चलाकर फंसे अर्णब गोस्वामी! (देखें तस्वीरें)

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वीके सिंह पर बड़ा सवाल पूछने वाला एबीपी न्यूज खुद सवालों के घेरे में घिरा

फेसबुक और ट्विटर पर एबीपी न्यूज की तरफ से एक बड़ा सवाल पूछा गया है. लेकिन जो सवाल है, वह खुद सवाल के घेरे में है. वजह है पूछे गए सवाल के वाक्य संरचना में गलती. एक छोटी-सी गलती के कारण अर्थ का अनर्थ हो रहा है. लोग मजे ले लेकर इसे शेयर कर रहे हैं. इस तरह एबीपी न्यूज ने जो सवाल पूछा, वह तो गौण हो गया. प्रमुख हो गया एबीपी न्यूज द्वारा की गई गलती.

इसलिए हे कारपोरेट और करप्ट मीडिया वालों, सावधान होकर काम करो… सोशल मीडिया वाले पैनी नजर गड़ाए हैं. उधर गलती हुई नहीं कि इधर गर्दन दबोचने की तैयारी शुरू. इसे कहते हैं शेर को मिला सवा शेर. फेसबुक पर DrAnil Tyagi एबीपी न्यूज की पोस्ट शेयर करते और चैनल द्वारा लिखे गए गलत वाक्य को उद्धृत करते हुए स्टेटस अपडेट करते हैं: ” साले अनपढ… हिन्दी लिखनी आती नहीं… लिखा है: ”जनरल वी के सिंह सरकार क्यों में हैं”. हिन्दी चैनल चलाते हैं… और नीच भी कितने हैं कि गाली खाये बिना चैन से नहीं बैठ सकते. ‪#‎presstitutes‬ ”. एक अन्य सज्जन Ajay Mishra लिखते हैं: ” सही हिंदी तो लिख पहले.”

 

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अखबार के कुछ ऐसे शीर्षक जिनमें वर्तनी और व्याकरण की दृष्टि से अनेक ग़लतियां…

LN Shital : मित्रो, निम्नलिखित शीर्षक एक ही अखबार के कुछ ऐसे शीर्षक हैं, जिनमें वर्तनी और व्याकरण की दृष्टि से अनेक ग़लतियाँ हैं। यदि मेरे हिन्दी-प्रेमी मित्रों की इच्छा हो तो, मैं उन ग़लतियों को उजागर करने का प्रयास करूँ।

‘नकली नोट के सौदागरों पर देशद्रोह का केस’
‘डेढ़ माह में पुलिस ने नकली करेंसी के साथ दो गिरोह के सात सदस्यों को किया था गिरफ्तार’
नकली ‘नोट’ की जगह नकली ‘नोटों’ होना चाहिए, क्योंकि नोट एक नहीं, अनेक हैं। इसी तरह ‘दो गिरोह’ की जगह ‘दो गिरोहों’ होना चाहिए, ‘गिरोह’ एक नहीं, दो हैं।

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‘दुनियाभर में ईंधन की कीमतें घटी, लेकिन…’
कीमतें ‘घटी’ नहीं, कीमतें ‘घटीं’ होना चाहिए, क्योंकि यहाँ संज्ञा (कीमत) बहुवचन में है, और बहुवचन संज्ञा के साथ क्रिया भी बहुवचन में ही होनी चाहिए।

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‘सिर्फ वह ही नकारात्मक खबर, जो आपको जानना जरूरी है’
‘वह ही’ की जगह ‘वही’ और ‘जो’ की जगह ‘जिसे’ होना चाहिए। वैसे, ज़्यादा सही वाक्य है – सिर्फ़ वही नकारात्मक ख़बर, जिसे जानना आपके लिए ज़रूरी है

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‘कारोबारी की हत्या कर फरार है आरोपी’
इस शीर्षक में बेहद गम्भीर ग़लती है। यहाँ, शीर्षक देने वाले ने घोषित कर दिया है कि फरार होने वाले ने ही हत्या की है; और जब फरार होने वाले ने ही हत्या की है तो वह हत्यारा कहलायेगा न कि ‘आरोपी’। शीर्षक देने वाले उप सम्पादक को मालूम होना चाहिए कि, जिस व्यक्ति पर आरोप होता है, वह ‘आरोपित’ कहलाता है’ न कि ‘आरोपी’। जब पुलिस आरोपित के ख़िलाफ़ अदालत में अभियोग-पत्र या चार्जशीट दाखिल कर देती है, तो उसे अभियुक्त कहा जाता है; और जब अदालत उस अभियुक्त को दोषी करार दे देती है, तो उसे अपराधी कहा जाता है। उस उपसम्पादक को यह भी मालूम होना चाहिए कि अभी अख़बारों को यह न्यायिक अधिकार नहीं मिला है कि वे किसी न्यायिक फैसले के बगैर किसी को भी हत्यारा बता सकें।

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‘ईंट ढोई, चौकीदारी की, अब मैं हूँ आईटी इंस्पेक्टर…थैंक्यू अखबार’
‘ईंट ढोई’ नहीं’ ‘ईंटें ढोयीं’ होना चाहिए। मेरे भाई उप सम्पादकजी, वह केवल एक ईंट ढोकर आईटी इंस्पेक्टर नहीं बन गया। अँगरेज़ी में दो शब्द हैं – ‘Thank you’. इन्हें देवनागरी में लिखा जाना चाहिए – ‘थैंक यू’। इस लिए ‘थैंक्यू’ लिखना पूर्णतः ग़लत है बाबू।

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‘एजेंसियां जैसे दलों की सरकारें’
ऐसा कौन माई का लाल है, जो इस शीर्षक का मतलब समझा सके? और, जिस शीर्षक का मतलब समझाने के लिए ‘माई के लाल’ की खोज होने लगे, तो उस शीर्षक देने वाले ‘विद्वान्’ को आप क्या कहेंगे?

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‘एलपीजी नंबर लिंक कराने की डेडलाइन कल ख़त्म’
इस शीर्षक से लगता है कि शीर्षक देने वाला हमें बता रहा है कि डेडलाइन ‘बीते हुए कल’ (yesterday) ख़त्म हो चुकी है, जबकि ऐसा है नहीं। डेडलाइन तो आने वाले कल (tomorrow) को ख़त्म होनी है।
इसी पेज पर एक अन्य ख़बर है – बिजली के नए इंफ्रास्ट्रक्चर का काम कल होगा ख़त्म
मेरे भाई उप सम्पादक जी! क्यों ऐसी बेवकूफ़ाना अराजकता फैला रहे हैं?

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‘पेंशनर्स को बैंक में जमा कराना होगा पैन नंबर’
शीर्षक-दाता को मालूम हो कि full form of ‘PAN’ is – ‘Permanent Account Number’. इस लिए यहाँ ‘पैन’ के साथ ‘नंबर’ लिखने के ज़रूरत नहीं है।

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पीडब्ल्यूडी और नगर निगम तालमेल से करे काम
यहाँ ‘करे’ की जगह ‘करें’ होना चाहिए। क्योंकि संज्ञाएँ(पीडब्ल्यूडी और नगर निगम) दो हैं, इस लिए क्रिया भी बहुवचन में होनी चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल के फेसबुक वॉल से.

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भारत की पहली महिला आईपीएस प्रकरण, ‘गूगल’ और खुद के ‘अल्प-ज्ञान’ पर शर्मिंदा हूं

: ‘गूगल’ भी हमारे ‘ज्ञान’ के रहम-ओ-करम पर हंसता-सिसकता है साहब! :

सवाल- भारत की पहली महिला आईपीएस कौन थी?

जबाब- ‘किरन बेदी’…..भारत सहित दुनिया भर में अबतक खिंचा चला आ रहा था…..

‘बिलकुल सही जबाब….’

लेकिन अब इस सवाल का सही जबाब ‘किरन बेदी’ गलत साबित होगा। सही जबाब होगा…मरहूम सुरजीत कौर।

हां, शर्मिंदा हूं मैं….

स्कूल में मास्साब (टीचर) से लेकर दादा-दादी, नाना-नानी और पापा-मम्मी। सब-के-सब का ज्ञान कमोबेश एक समान। मतलब नौनिहालों और देश का कथित सुनहरा भविष्य अब तक अंधेरे की कोठरी में कैद था। ज्ञान के ‘अंधत्व’ में जब सब अंधे हुए, तो फिर मुझे यह मानने में भला क्यों, और कैसी गुरेज-शर्म, कि मैं भी बाकियों के ज्ञान की ‘रौ’ में तर-ब-तर था। हां, बस फर्क है, तो इतना कि अब बाकियों के ज्ञान की राहें किधर का रुख करेंगीं, पता नहीं….मैंने कान पकड़ के तौबा कर ली, और खुद को इस घिनौने मुद्दे पर सुधार लिया है।

साथ ही अब यह भी नहीं चलेगा…कि किरन बेदी पहली महिला आईपीएस थीं…। “अच्छा हुआ देर-आयद-दुरुस्त-आयद। सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो, भूला नहीं कहा जाता।” ऐसे और न जाने इनसे मिलते-जुलते और तमाम जुमले मैं अपने ‘कमजोर-ज्ञान’ की गर्दन सलामत रखने के लिए कह-सुना सकता हूं। या यूं कहूं कि, यह सब मैं अपने अल्पज्ञान के चलते खुद की छीछालेदर बचाने के लिए कह सकता हूं। लेकिन आईंदा, या आने वाली पीढ़ियों में अब किरन बेदी, भारत की ‘पहली महिला आईपीएस’ कभी नहीं कही, लिख-सुनी जायेंगीं। हमारी आने वाली पीढ़ियां अगर किरन बेदी को भारत की पहली महिला आईपीएस बतायेंगी/ कहेंगीं, तो उनका जबाब अब ‘गलत’ होगा।

बेबाक किरन बेदी की चुप्पी का रहस्य

किरन बेदी भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी नहीं थीं। इसके लिए हमारे बुजुर्गों से लेकर स्वंय मैं या सरकारी हुक्मरान जितने जिम्मेदार हैं या थे, उससे ज्यादा जिम्मेदारी तो किरन बेदी की है। जो अब तक खुद को ‘देश की पहली महिला आईपीएस कहलवाकर’ जिगर चौड़ा करके, कई मर्द और मर्दानी (महिला) आईपीएसों का ‘हलक’ सुखाये हुए थीं। माना कि ‘गूगल’ का ज्ञान ‘जीरो’ था। पूरे देश का ज्ञान कम था। सरकारी हुक्मरान आंख मूंदकर बैठे हुए थे। ऐसे में सवाल यह पैदा होता है, कि किरन बेदी सच्चाई पर ‘चुप्पी’ क्यों साधे रहीं? एक महिला आईपीएस होने के दिन या फिर उसके बाद किरन बेदी को तो शत-प्रतिशत पता था कि, वो मोहतरमा देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी तो कतई नहीं हैं। फिर भी मैडम किस “खुशफहमी” में “खामोश” रहीं….और आखिर क्यों?  छोड़िये किरन बेदी को….जो चर्चा के काबिल नहीं, उस पर इतनी ही सिर-फुटव्वल बहुतेरी है।

वेद मारवाह की ‘स्व-मुंहबंदी’ के कई मायने

आईये अब घेर-घार के लाते हैं वेद मारवाह को। मारवाह भारत के पूर्व आईपीएस हैं। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर रहे हैं। कई राज्यों के गवर्नर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में अक्सर “दबे-पांव” चहल-कदमी करते  पुराने ‘क्राइम-रिपोर्टरों’ की आंखों के रास्ते कभी-कभार पहचान लिये जाते हैं।  मारवाह साहब ने अपनी छवि एक सुलझे हुए पुलिस अधिकारी की ‘चमका’ रखी है। इसके बाद भी वे किरन बेदी के देश की दूसरी महिला आईपीएस होने के ‘झंझट’ पर अपने होंठ बंद किये बैठे हैं। आज से नहीं। कई दशक से। आखिर क्यों?

अगर सरकारी दस्तावेजों में मौजूद ‘सबूतों से सिर-फुटव्वल या  माथापच्ची की जाये, तो वहां पंजाब कॉडर की सुरजीत कौर (1956) का नाम पहली भारतीय महिला आईपीएस अधिकारी के रुप में दर्ज है। सुरजीत कौर का 1957 में एक सड़क हादसे में निधन हो गया था। आईपीएस से जुड़े अगर दस्तावेज ‘दुरुस्त’ हैं, तो सुरजीत कौर तो वेद मारवाह के ही बैच की आईपीएस थीं। वेद मारवाह की कथित चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। एक आईपीएस के बाबत पूरे देश का ज्ञान अल्प था या हो सकता है, लेकिन वेद मारवाह और किरन बेदी यह कैसे भूल गये या भूल गईं, कि भारत की पहली महिला आईपीएस किरन बेदी नहीं, सुरजीत कौर थीं?

कहां हैं दिल्ली की “क्राइम-रिपोर्टरी” के कथित मठाधीश?

देश की राजधानी में करीब 24 साल क्राइम-रिपोर्टरी के दौरान मैंने किरन बेदी को काफी कुछ समझने की कोशिश की। तमाम मर्तबा उनसे मिलने का मौका मिला। कई बार सोचता था या यूं कहूं कि मुझे लगता था, किरन बेदी से चतुर या यूं कहूं कि काबिल या तेज-तरार्र दूसरी महिला आईपीएस नहीं होगी। मैं इनसे ज्यादा मेहनतकश किसी दूसरी महिला आईपीएस को मानने को तैयार नहीं था। किरन बेदी की असलियत और अपने ज्ञान के चक्षु (नेत्र) अब जब खुले हैं, तो अहसास हुआ कि गुरु, किरन बेदी से ज्यादा समझदार तो हम ही थे…मगर किरन बेदी को लेकर मेरे मन में बैठी तमाम गफलतों और अल्पज्ञान ने और किरन बेदी ने, मुझे तो क्या अच्छे-अच्छे क्राइम रिपोर्टरी के तमाम धुरंधर-महाऱथियों को भी उनकी ‘जनरल-नॉलिज’ के मामले में धूल फंकवा दी…हंस-हंसकर…जो वर्षों तक क्राइम-रिपोर्टरी करते रहे। कहां हैं इस वक्त बीते कल की दिल्ली में क्राइम-रिपोर्टरी के वो कथित वरिष्ठ  क्राइम रिपोर्टर, जो एक जमाने में आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू) स्थित किरन बेदी से मिलने के बाद पीएचक्यू की सीढ़ियां उतरते हुए सिपाही-हवलदार से आंख मिलाने में भी अपनी ‘तौहीनी’ समझते थे? जबकि तमाम-उम्र दिल्ली में क्राइम रिपोर्टरी करने के बाद ‘बिचारे-वरिष्ठ जत्थेदार क्राइम-रिपोर्टर’ यह पता नहीं कर पाये कि, किरन बेदी नहीं, सुरजीत कौर थीं, भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी।

गूगल के अधकचरे ज्ञान पर जरूरी है ‘विधवा-विलाप’

आईये अब दुनिया के सबसे बड़े सर्च-इंजन ‘गूगल’ के ज्ञान पर भी ‘विधवा-विलाप’ करके दो आंसू बहा लें। ताकि आने वाली पीढ़ियां गूगल के अंधे ज्ञान पर आंख मूंदकर विश्वास न करें। गूगल सर्च करिये तो, उस पर भारत की पहली महिला आईपीएस सुरजीत कौर का नाम इस समय तक नजर नहीं आ रहा है। मतलब गूगल भी धुप्पल में अपने ज्ञान की कच्ची ‘काबिलियत’ भारत में, भारत वालों से ही लेकर बांट रहा है। अगर गूगल की अपनी कोई रिसर्च उच्च-कोटि की होती, तो उस पर सर्च करने के पर पहली भारतीय महिला आईपीएस की जगह किरन बेदी नहीं, मरहूम सुरजीत कौर का नाम लिखकर सामने आता। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां ‘गूगल’ के अधकचरे ज्ञान का शिकार होने से बच जातीं।

किरन से लकेर ‘क्रेन-बेदी’ तक की ‘झूठी’ कहानी का सच

किरन बेदी के आजाद भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी न होने का भांडा फूट चुका है। ऐसे में किरन बेदी की ‘क्रेन-बेदी’ वाली छवि भी चूर हो गयी है। सच यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की अंबेस्डर कार का कनाट प्लेस में चालान काटकर उसे क्रेन से उठवाने वाली, किरन बेदी नहीं थीं। यह सब काम तो किया था, उस समय के दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के सब-इंस्पेक्टर निर्मल सिंह ने। बाद में निर्मल सिंह सहायक पुलिस आयुक्त पद से दिल्ली पुलिस से रिटायर हुए थे।

लेखक SANJEEV CHAUHAN वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09811118895 या patrakar1111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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लखनऊ में भास्कर डिजिटल ने दिन भर चलाई गलत खबर, अज्ञानी भास्कर वालों ने ट्वीट को कोहली का बता दिया

लखनऊ।। भास्कर डिजिटल में हर दिन गलत खबर चलाने का नया कीर्तिमान बना रहा है। यहां खबर क्या होती है, यह तय करने वाले मुकेश कुमार उर्फ गजेंद्र अहम के शिकार हो गए हैं। वह अन्य छोटे पोर्टलों को दो कौड़ी का पोर्टल बताते हैं। भड़ास पर खबर देखकर भी नाक सिकोड़ने लगते हैं, लेकिन आजकल क्या हो रहा है, यह उनको दिखाई नहीं दे रहा है।

हफ्ते भर पहले यानि बीते शुक्रवार को यूपी विधानसभा की वोटिंग के दौरान भास्कर ने मुख्यमंत्री से ही वोट डलवाकर दिन भर खबर चलाई। लेकिन हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री खुद विधानपरिषद के सदस्य हैं वह वोट नहीं डाल सकते, लेकिन भास्कर ने खबर चलाई की मुख्यमंत्री ने डाला वोट। स्क्रीनशाट उपर देखिए।

एक भास्करकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


दैनिक भास्कर की खबर है कि कोहली ने लिंक ट्वीट की जिसमें धोनी पर आरोप हैं। बहुत ही गैर जिम्मेदराना रिपोर्ट… सनसनीखेज और पूर्णतया झूठी रिपोर्ट। दैनिक भास्कर को नहीं पता कि कोई भी यूजर ट्विटर पे कुछ भी नाम रख सकता है। किसी ने कोहली के ट्विटर हैंडल को अपना नाम रख के ट्वीट कर दिया। नोटिफिकेशन हमेशा नाम से आता है।

Dainik Bhaskar’s pathetic Reporting. They Dont know difference between name as handle and real handle

#BoycottBhaskar

https://twitter.com/cric_SKB/status/559245765525008384

Suresh Kumar Bijarniya
eerskb@gmail.com


भास्कर अपने पहले पेज पर नं 1 अख़बार होने का तो रोज दावा करता है। पर शायद पढ़ने वालों को बेवकूफ समझता है। 19 जनवरी से भास्कर ने ‘नो निगेटिव न्यूज हर सोमवार’ का अभियान शुरु किया है। फ्रंट पेज पर बड़े विज्ञापन के साथ दावा किया है कि ‘आप विश्व के पहले ऐसे पाठक होंगे जिनके सप्ताह की शुरुआत होगी नो निगेटिव सोमवार से’। यह बात हालिया या शुरु से भास्कर से जुड़े पाठकों ने शायद हजम कर ली हो। पर यह बहुत बड़ा झूठ है। इंदौर के बाशिंदे जो बरसों से नईदुनिया और भास्कर दोनों ही पढ़ते आ रहे हैं, वे जानते हैं कि यह पहल नई नहीं है। बरसों पहले भास्कर का प्रतिद्वन्द्वी अखबार नईदुनिया ‘सकारात्मक सोमवार’ शुरु करके बंद भी कर चुका है। नईदुनिया ने 1 जनवरी 2007, जो संयोग से सोमवार का दिन था, ‘सकारात्मक सोमवार’ की शुरुआत की थी, जिसमें सोमवार के दिन पहले पेज पर कोई नकारात्मक खबर नहीं होती थी। नईदुनिया के संपादकीय में ऐसी सकारात्मक पहल के ‘विश्व में पहला’ होने का कोई दावा नहीं किया गया था। पर धृष्टता देखिए कि भास्कर ने नईदुनिया की पहल और संपादकीय नोट की शब्दश: नकल को अपनी अक्ल होने का दावा किया। और तो और अपनी इस पहल को ‘विश्व में पहला’ होने का दावा कितनी बेहयाई से किया। भास्कर के कर्ता-धर्ताओं की स्मृति यदि इतनी कमजोर है, तो अखबार का तो भगवान ही मालिक है। पाठकों के साथ-साथ अब बॉलीवुड सितारों को भी बरगलाकर इस अभियान से जोड़ा जा रहा है। आज आमिर खान जी से साथ एक बड़ा विज्ञापन फिर छापा है। भास्कर नं. 1 होने का दावा चाहे किसी भी आधार पर करे, नं. 1 झूठा उसने खुद को साबित कर दिया है।

इंदौर से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दूरदर्शन की नजर में अब भी प्रधानमंत्री के पद पर मनमोहन सिंह हैं (देखें वीडियो)

दूरदर्शन न्यूज वाले सुधरने का नाम नहीं ले रहे. अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारतीय दौरे के दौरान लाइव प्रसारण में दूरदर्शन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बोल दिया गया. यह काम किसी और ने नहीं बल्कि यहां के वरिष्ठ एंकर अशोक श्रीवास्तव ने किया. सोशल मीडिया पर डीडी न्यूज की इस गलती का वीडियो वायरल हो चुका है.

डीडी न्यूज में लगातार गल्तियां हो रही हैं लेकिन कोई इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है. कुछेक मामलों में कार्रवाई तो हुई लेकिन अंततः नतीजा सिफर रहा. आप भी देखिए कि एंकर महोदय बोलते बोलते प्रधानमंत्री मनमोहन बोल गए. संबंधित वीडियो का लिंक यूं है….

https://www.youtube.com/watch?v=fYPu6H4TyyU


इन ताजातरीन वीडियोज को भी देख सकते हैं….

प्रिंटिंग प्रेस : मशीन और इंसान के काम की शुद्धता में फर्क बताइए
https://www.youtube.com/watch?v=bmcFPDnPA44

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डीएम साब सोते रहे, मंत्री जी भाषण देते रहे
https://www.youtube.com/watch?v=QRVxOXWp__4

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जी संगम के प्रतिनिधि ने हत्यारोपी को ‘साहब’ कहा
https://www.youtube.com/watch?v=OKwtz3bqhK0

 

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डीडी न्यूज वालों की जय हो, अबकी मोदी बंदर कथा

डीडी न्यूज वाले लगातार गलती पर गलती करते जा रहे हैं. ताजा मामला भी ट्वीट से जुड़ा है. डीडी न्यूज की तरफ से ट्वीट किया गया- “A man dressed as Santa Claus feeds monkeys ahead of Christmas”. लेकिन इस कैप्शन के साथ जो तस्वीर लगाई गई उसमें नरेंद्र मोदी बैठक की अध्यक्षता कर रहे हैं और बैठक में Amit Shah, Arun Jaitley, Sushma Swaraj और Rajnath Singh हैं. लोग सोच में पड़ गए कि आखिर इस तस्वीर में क्या मोदी सांता हैं और बंदर बाकी लोग?

खैर, डीडी न्यूज वालों को गलती का एहसास हुआ तो तुरंत इस ट्वीट को डिलीट मार दिया. साथ ही एक खेद प्रकाश भी प्रकाशित किया, कुछ यूं:  “An unrelated picture was inadverently placed by side of the China zoo story. We have removed the tweet.”

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दैनिक भास्कर : राजस्थान में अखबार ने मृत्यु के शोक संदेश पर दे दी बधाई!

राजस्थान का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करने वाला दैनिक भास्कर अब भगवान भरोसे ही चल रहा है। अखबार के हर संस्करण में खबरों में तो खामियों की भरमार है ही, मगर अब तो विज्ञापनों में भी ये लोग कुछ भी छाप दे रहे हैं। ताजा मामला भास्कर के चितौड़गढ़ संस्करण का है जिसमें 11 दिसंबर को चितौड़गढ़ भास्कर में पेज नंबर 2 पर एक शोक संदेश का विज्ञापन छपा था।

इस विज्ञापन में श्री एम.एल.मेहता जी के आकस्मिक निधन पर उनके परिवारजनों ने श्रद्धांजलि संबंधी मैटर छपवाया था और वह छपा भी, मगर ज्यों ही विज्ञापन की हैडिंग पर जायें तो सिर चकरा जाये। जिस व्यक्ति का आकस्मिक निधन हुआ है और परिवारजनों ने उन्हे श्रद्धांजलि दी है, उसे भास्कर वालों ने हार्दिक बधाई दे दी। इस विज्ञापन से तो मानों यूं लग रहा है जैसे श्री मेहता के जाने से उनके परिवारजनों को खुशी हुई हो और इसी खुशी के मारे उन्होंने अखबार में हार्दिक बधाई का विज्ञापन बुक करवाया हो…. हद हो गई ये तो यार….

राजस्थान से आर.पी. की रिपोर्ट.

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जिंदल के चैनल ‘फोकस’ ने राहुल गांधी को बीजेपी उपाध्यक्ष घोषित किया

लाइव इंडिया नामक न्यूज चैनल अपने मालिक के घर के पार्टी फंक्शन को लाइव प्रसारित करने के कारण बदनाम है तो फोकस नामक चैनल नवीन जिंदल के निजी खेल, समारोह, चुनाव आदि को दिन भर लाइव दिखाने के लिए कुख्यात हो चुका है. इसी जिंदल के फोकस नामक चैनल ने अब तो राहुल गांधी को भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष घोषित कर दिया है. इतनी बड़ी गलती फोकस टीवी पर लाइव चली लेकिन किसी वरिष्ठ पत्रकार की नजर इस पर नहीं पड़ी.

लाखों रुपये सेलरी लेने वाले नामधारी पत्रकारों ने भी मान लिया है कि फोकस तो जिंदल के जिद पर चल रहा है इसलिए यहां पत्रकारिता करने या पढ़ने-लिखने से कोई मतलब नहीं है, सो जो कुछ चैनल पर चल दिख रहा है, उसे चलने दिखने दो. पर दर्शकों के पास कई आंख नाक कान होते हैं. भड़ास के पास कई दर्शकों ने मेल करके फोकस टीवी की गलती को मय तस्वीर भेजा है जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

कहीं ऐसा तो नहीं कि आजकल टीवी चैनल वाले बीजेपी से इतने अधिक प्रभावित हैं कि चैनलों ने राहुल गांधी तक को भी बीजेपी का उपाध्यक्ष दिखाना शुरू कर दिया है. पिछले दिनों राहुल गांधी ने झारखंड में एक चुनावी रैली को संबोधित किया था लेकिन कांग्रेसी सांसद रहे और इन दिनों परेशान घूम रहे नवीन जिंदल के चैनल फोकस टीवी ने राहुल गांधी का परिचय बीजेपी उपाध्यक्ष के रूप में करा दिया. अब सवाल ये है कि जिस पार्टी से नवीन जिंदल संबंध रखते हैं अगर उसी पार्टी के मालिक का नाम ही सही नहीं दिखा सकते हैं तो इस चैनल में काम करने वाले लोग किसी काम के नहीं हैं.

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टाइम्स आफ इंडिया के पत्रकारों का गणित ज्ञान कमजोर, मोदी के गुणगान में आंख मूंद छाप दे रहे हैं कुछ भी

Abhishek Srivastava : ये है टाइम्‍स ऑफ इंडिया की खबर, जो वैसे तो कई अख़बारों में छपी है लेकिन जस यहां है तस कहीं नहीं है। खबर का शीर्षक देखें और पूरी खबर पढ़ें। इसके मुताबिक प्रधानजी बनारस में रोहनिया के जिस गांव को गोद लेने वाले हैं, उसने  ‘450’  साल पहले औरंगज़ेब की फौज को हराकर भगा दिया था। औरंगज़ेब 1618 में पैदा हुआ था यानी आज से 396 साल पहले, लेकिन टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने 450 साल पहले बनारस पर उसका हमला करवा दिया है।

खबर के भीतर “nearly 450 years” भी आसपास नहीं बैठता।  दिलचस्‍प यह है कि इसी परिवार के दूसरे अखबार इकनॉमिक टाइम्‍स में संबंधित ख़बर में औरंगज़ेब का संदर्भ गायब है। Dilip Khan ठीक कहते हैं कि पत्रकारों को थोड़ा-बहुत गणित का ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है। The Times of India की खबर का शीर्षक है- ”450 years ago, Modi village stopped Aurangzeb’s army

टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने औरंगज़ेब का हमला बनारस पर 450 साल पहले करवाया तो हिंदी का पतरकार कैसे पीछे रहता। ये देखिए, दैनिक जागरण ने ”प्रधानजी के गांव” पर सीधे अकबर का ही हमला करवा दिया है। दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर का शीर्षक है: ”कभी अकबर को दी मात, आज खुद वक्त से हारा”।

मीडिया विश्लेषक और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से अंकित अग्रवाल का कमेंट इस प्रकार है…

Ankit Agrawal : इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक संघ 2002 से ही इस गाँव का विकास कर रहा है और वो मोदी द्वारा इसे हथिया लिया जाने से खुश नहीं है। वैसे इस गाँव से जुडा एक रोचक तथ्य ये भी है की यहाँ एक भी मुस्लिम नहीं है ऐसा एक स्वयंसेवक ने बड़े उत्साह के साथ पत्रकार को बताया। ये सिम्बोलिज्म कितना भयावह है!

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‘प्रभात खबर’ ने लालू यादव को राबड़ी देवी और राबड़ी देवी को लालू यादव बना दिया!

प्रभात खबर का एक और कारनामा… इसने रातोंरात अपने अखबार में लालू यादव को राबड़ी देवी और राबड़ी देवी को लालू यादव घोषित कर दिया…. ऐसा विज्ञापन में किया गया है. न्यूट्रल पब्लिशिंग हाउस नामक कंपनी प्रभात खबर अखबार का प्रकाशन करती है.  कभी ‘अखबार नहीं आंदोलन’ और आज के दिनों में ‘बिहार जागे…देश आगे’ स्लोगन देकर यह अखबार बेचा जाता है. इस हिन्दी दैनिक ‘प्रभात खबर’ के बिहार संस्करण में विज्ञापन के नाम पर एक और कारनामा सामने आया है.  ‘प्रभात खबर’ के गया एडीशन में एक विज्ञापन छपा जो काफी चौकाने वाला है.

गया जिला के राजद उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार द्वारा छठ पर्व के मौके पर दिए गए एक शुभकामना संदेश में राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद की तस्वीर के नीचे उनका नाम राबड़ी देवी लिखा गया है जबकि पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की तस्वीर के नीचे उनका नाम लालू यादव लिखा गया है. ऐसा नहीं कि इस विज्ञापन का आकार इतना छोटा है कि संपादकीय या विज्ञापन विभाग की नजर इस पर नहीं पड़ी हो. पर ‘पैसे के लिए कुछ भी करेंगे’ की कहावत को चरितार्थ कर रहा ‘प्रभात खबर’ में वह सब मुमकिन दिख रहा है जो आम लोगों को नामुमकिन दिखता है. 

गौरतलब है कि इस अखबार के पटना संस्करण में पिछले दिनों बिहार के कभी मोस्ट वांटेड रहे और कुछ दिन पूर्व ही जेल से जमानत पर रिहा हुए फतुहा के कल्याणपुर गांव निवासी कुख्यात अपराधी टुनटुन यादव का छठ पर्व के मौके पर एक बड़ा सा शुभकामना संदेश छपा था जिससे इस अखबार की पूरे बिहार में काफी किरकिरी हुई. इसके बावजूद न तो इस अखबार का प्रबंधन चेता न ही ही इसका विज्ञापन विभाग.

पटना के पत्रकार विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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लीड खबर का शीर्षक गड़बड़ होने से पूरा अख़बार पिटा नज़र आने लगता है

भड़ास पर नवभारत टाइम्स मुंबई में दशहरा की तैयारी की फोटो खबर में बुराई पर अच्छाई की जीत की जगह अच्छाई पर बुराई की जीत की खबर पढ़ी।

ये चूक पत्रकार साथियों से अक्सर होती है। अभी तक के पत्रकारिता जीवन में मैंने कई बार इस तरह की गड़बड़ी देखी है। कुछ साल पहले अमर उजाला मेरठ में एक साथी से यह गलती हो गई थी। तब संपादक शशिशेखर जी थे। नवभारत टाइम्स की खबर में तो फोटो के साथ दी गई पंक्तियों में दशहरा से कुछ पहले यह गड़बड़ हुई है, लेकिन अमर उजाला में ठीक दशहरा के अगले दिन सुबह को जब लोगों ने अखबार खोला तो सिटी के पेज पर लीड खबर का शीर्षक लगा था- अच्छाई पर बुराई की विजय।

केवल एक शीर्षक के कारण सारा अखबार पिटा नजर आने लगा। पूरा दिन खराब हो गया। मैं डेस्क इंचार्ज था, लेकिन मेरा दशहरा के दिन ऑफ पड़ गया था। मैं तो बच गया, लेकिन फिर भी दशहरा के अगले दिन शाम को शशिशेखर जी के सामने पूरी डेस्क के साथ मुझे भी बहुत शर्मिंदा होना पड़ा।

मैं पत्रकार साथियों को आगाह करना चाहता हूं कि यह गलती अभी कई बार और हो सकती है और किसी से भी हो सकती है। इसीलिए खासकर दशहरा के आसपास जब भी बुराई पर अच्छाई की जीत लिखें तो एक बार शीर्षक को बोलकर जरूर दोहरा लें। एक-एक शब्द को रुक-रुककर पढ़ें। बु रा ई प र अ च् छा ई की जी त। इससे गलती पकड़ में आ जाती है। यह नियम अन्य खबरों के शीर्षक लगाते समय भी अपनाएं। बहुत थोड़ा सा समय लगेगा, मगर कभी गलती नहीं होगी।

दरअसल भाषा में अच्छाई का अ, बुराई के ब से पहले आता है। बोलने में भी सब अच्छा-बुरा ही कहते हैं। कोई भी बुरा-अच्छा नहीं कहता, इसलिए दशहरा से जुड़े इस वाक्य में पत्रकार साथी जल्दी-जल्दी में अच्छाई को ही पहले लिख जाते हैं और बुराई को बाद में।

 

लव कुमार सिंह
पत्रकार, लेखक
शास्त्रीनगर, मेरठ

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