इंडिया न्यूज़ के एडिटर इन चीफ (निवर्तमान!) दीपक चौरसिया के ‘न्यूज़सेंस’ को देश को जानना चाहिए

जेएनयू की ख़बर के साथ इंडिया न्‍यूज़ में शीर्ष स्‍तर पर क्या और कैसे खिलवाड़ किया गया… 17 फरवरी की रात इंडिया न्यूज में क्‍या हुआ था… इसके बारे में खुलकर विस्तार से इंडिया न्‍यूज़ में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके प्रतिभाशाली पत्रकार अमित कुमार ने अपने फेसबुक वॉल पर लिख कर बताया है जो इस प्रकार है…

Amit Kumar

इंडिया न्यूज़ के एडिटर इन चीफ (निवर्तमान!) दीपक चौरसिया के ‘न्यूज़सेंस’ को देश को जानना चाहिए, क्योंकि उनके करोड़ों प्रशंसक और लाखों आलोचक हैं, इसलिए ये आंखोंदेखी उन सबके लिए है जिनके लिए आज भी दीपक चौरसिया की बड़ी अहमियत हैं, 500 और 1000 के पुराने नोट की तरह जो अभी आउटडेटेड नहीं हुए हैं। परदे के पीछे के सच की पहली कड़ी आपके सामने है…

तारीख – 17 फरवरी 2016…रात करीब 8 बजकर 22 मिनट।

इंडिया न्यूज़ पर जेएनयू और कन्हैया विवाद पर टुनाइट विद दीपक चौरसिया में बहस हो रही थी। पहला ब्रेक लेने का वक्त हो चला था तभी दीपक चौरसिया ने सबको चौंका दिया। उन्होंने ब्रेक से लौटने पर एक ऐसा वीडियो दिखाने की बात कही, जिसमें कन्हैया देशविरोधी नारेबाजी करता नजर आ रहा है।

एडिटर इन चीफ के इस एलान पर आउटपुट डेस्क पर मौजूद लोग हैरान रह गए। दरअसल तब तक ऐसा कोई वीडियो डेस्क के किसी सदस्य की जानकारी में नहीं था जिसमें कन्हैया खुद देशविरोधी नारेबाजी लगाता दिख रहा हो। इसलिए चौंकना लाजिमी था।

अगर वाकई ऐसा वीडियो होता तो ये बहुत बड़ी खबर थी। न्यूज़रूम में मौजूद लोगों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा… एक दूसरे से पूछा – ऐसा कुछ है क्या?

मैंने टुनाइट विद दीपक चौरसिया का इंट्रो पैकेज लिखने वाले अपने मित्र प्रोड्यूसर से पूछा- आखिर ऐसा कौन सा वीडियो आया है? उन्होंने कहा- मुझे कुछ नहीं पता दीपकजी ने ये बात क्यों कही? ये वही जानें।

अब फिर चौंकने की बारी थी।

उस वक्त आउटपुट और शिफ्ट की कमान संभाल रहे अजय आज़ाद भौचक्के थे। उन्होंने असाइनमेंट से पूछा- क्या आपकी तरफ से ऐसा कोई वीडियो जारी किया गया है जिसमें कन्हैया खुद देशविरोधी नारेबाजी कर रहा है? जवाब ना में था।

अब सवाल ये था कि ब्रेक के बाद जिस वीडियो को दिखाने की बात दीपकजी कह गए, वो है कहां? किसने दिया, दीपकजी ने उसे कहां देखा? उनसे ये किसने कहा कि इसमें कन्हैया देशविरोधी नारेबाजी करता नजर आ रहा है? वक्त कम था और उलझन बढ़ती जा रही थी। इसी बीच अजय आज़ाद तेजी से पीसीआर पहुंचे।

उन्होंने वहां मौजूद टुनाइट विद दीपक के मुख्य प्रोड्यूसर गिरिजेश मिश्रा से पूछा कि ऐसा कोई वीडियो है क्या? गिरिजेश मिश्रा का जवाब था कि सर ने खुद अनाउंस किया है… जो वीडियो अभी विजुअल के रूप में चल रहा है उसे ही चलाने को कहा है। इसी में वो कंटेट है, इसी पर बहस को आगे बढ़ाना है।

अजयजी ने पूछा- क्या उसमें कन्हैया देशविरोधी नारेबाजी लगाता दिख रहा है? गिरिजेश मिश्रा ने कहा- सर ने खुद ही तय किया है तो सोच समझकर ही किया होगा। अजय आज़ाद निरूत्तर थे। फैसला एडिटर इन चीफ ने खुद किया है तो कोई क्या बोले? लेकिन आशंका कायम थी… वे वहां से मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत के केबिन में पहुंचे। पता नहीं वहां क्या बात हुई… अजय आज़ाद न्यूज़रूम में वापस अपनी सीट पर आ गए।

कुछ मिनट के लिए शांति छा गई। सभी भ्रम में थे कि आखिर दीपक चौरसिया ने इतनी बड़ी बात किस आधार पर कह दी? वो लौटकर ऐसा क्या दिखाने वाले हैं जो उनके सिवाय किसी और को नहीं पता?

तभी टुनाइट विद दीपक चौरसिया का ब्रेक खत्म हुआ। दीपक लौटे… इस बार उनके तेवर पहले से जुदा थे। आवाज़ ऊंची थी, तल्खी बढ़़ी हुई थी, ऐसा लग रहा था जैसे देश के सबसे बड़े गद्दार को उन्होंने रंगे हाथों पकड़ लिया है और अब उसका पर्दाफाश किए बिना दम नहीं लेंगे। पूरे डेस्क की नज़र टीवी स्क्रीन पर थी… एडिटर इन चीफ के कद को देखते हुए भरोसा था कि दीपक चौरसिया के ‘क्रांतिकारी न्यूज़सेंस’ ने कुछ ऐसी खबर पकड़ी है जैसा देश में कोई नहीं कर पाया।

लेकिन ये क्या… यहां तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली हालत हो गई।

दरअसल ब्रेक से पहले की बहस के दौरान जो वीडियो डिस्कशन के दौरान विजुअल के रूप में चल रहा था… और जिसका इस्तेमाल इंट्रो पैकेज में भी हुआ था, उसे ही दीपक चौरसिया ने पूरे एंबिएंस के साथ सुनाने को कहा था।

इसमें कन्हैया नारेबाजी करता दिख रहा था, लेकिन आवाज बस इतनी सुनाई दे रही थी कि – ‘हमें चाहिए आज़ादी, हम लेके रहेंगे आज़ादी’। लेकिन दीपक चौरसिया ने दावा किया कि देश में पहली बार हम वो वीडियो दिखा रहे हैं जिसमें कन्हैया देशविरोधी नारेबाजी करता दिख रहा है और उसके साथ उमर खालिद भी खड़ा है।

तस्वीरों में वाकई कन्हैया और उमर खालिद नारेबाजी करते दिख रहे थे लेकिन इसमें कहीं भी देशविरोधी नारेबाजी नहीं थी। उस वीडियो में ऐसा कुछ नहीं था, लेकिन दीपक चौरसिया ने जैसे तय कर लिया था कि आज कन्हैया को गद्दार ठहराकर ही दम लेना है।

कहते हैं एक झूठ को सौ बार दोहराया जाए तो वो सच लगने लगता है। शायद दीपक चौरसिया के दिमाग में यही फॉर्मूला रहा हो। अगर ऐसा नहीं होता तो एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ की जिम्मेदारी संभाल रहा ये शख्स ऐसी हरकत कतई नहीं करता।

दीपक तथ्य से सत्य की तरफ जाते लेकिन उनका इससे कोई वास्ता नहीं दिख रहा था।

तभी एक खास बात हुई। दीपक जी के साथ डिस्कशन में चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत भी शामिल हो गए। दीपक चौरसिया अपने अंदाज में चीख-चीखकर कन्हैया और उमर खालिद को देशद्रोही नारेबाजी का आरोपी साबित करने में जुटे थे। वीडियो को इसका पक्का सबूत बता रहे थे।

राणा यशवंत के शब्दों में थोड़ा सा अंतर था। दृष्टिकोण कुछ अलग था। उन्होंने बीच का रास्ता अख्तियार करते हुए कहा कि दोनों का एक साथ मिलकर आजादी के नारे लगाने का मतलब देश का विरोध ही लगता है। इसका संदर्भ इसी तरफ इशारा करता है।

दोनों की सोच में फर्क बहुत महीन था और इस शोरगुल में दर्शकों के लिए इसे समझना नामुमकिन था।

अब तक 8 बजकर 50 मिनट का वक्त हो चला था। अमूमन इसके आसपास टुनाइट विद दीपक चौरसिया को खत्म करने का वक्त होता है, लेकिन दीपक ने डिस्कशन को आगे बढ़ाने का एलान किया।

मैंने इस बीच अजय आज़ाद से कई बार कहा कि बॉस गलत रास्ते पर हैं। उन्हें रोकिए। ये सही नहीं। आखिर किसी पर भी देशविरोध से बड़ा इल्ज़ाम क्या हो सकता है? और ये आरोप बिना सबूत के लगाए जा रहे हैं, वो भी एक जिम्मेदार चैनल ऐसा कर रहा है, राष्ट्रीय चैनल ऐसा कर रहा है, खुद एडिटर इन चीफ फ्लोर पर मौजूद हैं और उनके जरिए ये आधारहीन बात दर्शकों तक पहुंच रही है।

मैंने बार-बार कहा कि जिस वीडियो के आधार पर ये कहा जा रहा है उसमें ऐसा कुछ सुनाई नहीं दे रहा। रोकिए प्लीज। अजय आज़ाद ने इसके बाद कुछ एसएमएस किया… ह्वाट्स एप किया। शायद अपनी बात दीपकजी तक पहुंचाई।

अब सामने जो कुछ हो रहा था उसे रोकने में हम जैसे लोग लाचार हो चुके थे। किसी चैनल का एडिटर इन चीफ ही जब अपुष्ट तथ्यों के आधार पर ऐसी बातें कर रहा हो तो क्या किया जा सकता था?

अब रात दस बजने में कुछ ही वक्त बचा था… मन बेहद क्षुब्ध था… बावजूद इसके मैंने अपने शो ‘अंदर की बात’ की तैयारी पूरी कर ली थी। मैने अजयजी से पूछा – क्या दीपकजी ‘अंदर की बात’ को एंकर करेंगे? उन्होंने थोड़ी देर में बताया- नहीं, यही शो आगे बढ़ेगा। दीपकजी का फैसला है।

इशारा साफ था कि एडिटर इन चीफ ने ये तय कर लिया था कि मैं जो कर रहा हूं… सही कर रहा हूं।

ये शो रात करीब 10 बजकर 20 मिनट तक चला और इस दौरान दीपक चौरसिया बार-बार दोहराते रहे कि हमने देश को आज वो सच दिखाया है जो अब तक किसी ने नहीं दिखाया था। इस बीच दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी का फोनो भी लिया गया जिसमें उसने कहा कि अगर वाकई इस वीडियो में कन्हैया और उमर खालिद खुलकर देशविरोधी नारे लगा रहे हैं तो ये वीडियो हमें दीजिए।

लेकिन सच तो कुछ और था। दीपक चौरसिया का देश के लाखों दर्शकों के सामने किया गया दावा, दावा नहीं छलावा था।

सच तो ये था कि इंडिया न्यू़ज़ 14 फरवरी 2013 को अपनी लॉंचिंग के बाद के 3 सालों में तब तक ऐसी आधारहीन, तथ्यहीन और चरित्रहीन पत्रकारिता पर कभी नहीं उतरा था जैसी पत्रकारिता उसने 17 फरवरी 2016 की रात 8-30 से 10-20 के बीच की। और दुर्भाग्य की बात ये कि ऐसा किसी और ने नहीं, चैनल के एडिटर इन चीफ ने किया।

डेस्क पर मौजूद इंटर्न और ट्रेनी पत्रकार तक कह रहे थे कि ये सही नहीं है… दीपकजी जो कह रहे हैं वैसा वीडियो में कुछ दिख नहीं रहा, सुनाई नहीं दे रहा। 20 से 25 साल के इन बच्चों को भी समझ में आ रहा था कि ये पत्रकारिता नहीं है। लेकिन पतवार थामने वाला मांझी ही जब नाव को मझधार में ले जाने पर आमादा हो, तो कोई कहकर भी क्या कर लेगा?

शो खत्म हो चुका था। जैसे ही दीपक चौरसिया न्यूजरूम में पहुंचे, कुछ सहयोगियों ने उनकी तारीफों के पुल बांध दिए। इसी बीच मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत मुझे सामने दिखे। मेरे उनसे स्नेह और अधिकार के संबंध रहे हैं, इसलिए मैंने आते ही कहा- सर प्लीज जरा यहां बैठिए। उन्होंने कहा- बोलो बेटा! मैंने कहा- ये क्या चला सर…?

राणा यशवंत ने कहा- ‘बताओ ऐसा क्या हुआ’ ?

मैंने कहा- सर, हमने जो वीडियो दिखाया और उसे आधार बनाकर दो घंटे की बहस के दौरान जो भी बातें कही गईंं, क्या उसका कोई मेल है? क्या कन्हैया कहीं भी देशविरोधी नारे लगाता दिख रहा है?

राणाजी ने कहा- नहीं, इसका संदर्भ समझो। देखो, कन्हैया पहली बार इस वीडियो में उमर खालिद के साथ नारेबाजी करता दिख रहा है, वही उमर खालिद जिसने खुलकर कश्मीर की आजादी के नारे लगाए थे। तो इसका मतलब और क्या हो सकता है?

इसी बीच दीपक चौरसिया हम दोनों के पास पहुंचे। राणाजी से पूछा- क्या बात हो रही है? राणाजी ने कहा- अमित कह रहा है कि जो हमने दिखाया वो पूरी तरह सही नहीं था।

दीपकजी थोड़े हैरान लेकिन संयत अंदाज में मेरी तरफ मुड़े, उन्होंने कहा- बताओ गलत क्या था? मैंने कहा कि वीडियो में कन्हैया कहीं भी देशविरोधी नारे लगाता नहीं दिख रहा। दीपकजी ने कहा- स्थितियों को देखो… वो उमर खालिद के साथ खड़ा होकर आजादी के नारे लगा रहा है… आखिर वो कौन सी आज़ादी की बात कर रहा था? अब इस पर और चर्चा की गुंजाइश नहीं थी।

लेकिन दीपकजी के इस सवाल का थोड़ी ही देर में जबर्दस्त जवाब मिलने वाला था जिसका तब तक किसी को अंदाजा नहीं था।

तभी न्यूज़रूम के दूसरे हिस्से से आवाज़ आई- सर-सर, एबीपी न्यूज़ देखिए।

दीपक चौरसिया वहां से चंद कदम की दूरी पर थे। वे टीवी के पास पहुंचे और एबीपी न्यूज़ देखने लगे। एबीपी न्यूज़ कन्हैया कुमार और उमर खालिद की नारेबाजी का वही वीडियो दिखा रहा था जिस पर दीपक चौरसिया ने थोड़ी देर पहले देश का सबसे बड़ा खुलासा करने का दावा किया था लेकिन एबीपी का वीडियो बिल्कुल अलग सच बयान कर रहा था। ये आधा-अधूरा, बिना किसी तैयारी और बिना किसी सोच-विचार के दर्शकों के सामने रखा गया वीडियो नहीं था।

इस एक वीडियो ने दीपक चौरसिया की पोल खोल दी। पत्रकारिता के लिए जरूरी गंभीरता और जिम्मेदारी के उनके दावे की बखिया उधेड़ दी।

दीपक चौरसिया ने ‘हमें चाहिए आज़ादी, हम लेके रहेंगे आज़ादी’ की नारेबाजी वाला हिस्सा दिखाकर दावा किया था कि ये देशविरोधी नारेबाजी है लेकिन एबीपी न्यूज़ कन्हैया की पूरी नारेबाजी को दिखा रहा था जिसमें वो ‘हमें चाहिए आज़ादी, जातिवाद से आज़ादी, सामंतवाद से आज़ादी, पूंजीवाद से आज़ादी’ जैसे नारे लगा रहा था।

तब रात 10 बजकर 35 मिनट हो रहे थे। अब दीपक चौरसिया के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। काटो तो खून नहीं। नेशनल न्यूज़ चैनल का ये एडिटर इन चीफ जैसे रोने को था… गला भर्राया हुआ था, आंखों में आंसू थे। इसलिए नहीं कि गलती पर पछतावा था, इसलिए क्योंकि साहब रंगेहाथ पकड़े गए थे। एबीपी न्यूज़ अपने इस पूर्व पत्रकार की कलई खोलने पर उतारू था… तीन साल में 100 से भी ज्यादा लोगों की टीम ने दिन रात की मेहनत और ईमानदारी से जो साख बनाई थी, खुद एडिटर इऩ चीफ ने एक झटके में उसकी मिट्टी पलीद कर दी थी।

एबीपी न्यूज़ दीपक चौरसिया का बिना नाम लिए उनके हर शब्द को झूठा साबित कर रहा था, तस्वीरें दिखा रहा था, समझा रहा था कि एक नेशनल न्यूज़ चैनल आपको गलत खबर दिखा रहा है, झूठी बातें बता रहा है। गुमराह कर रहा है, सच देखना है तो यहां देखिए। इंडिया न्यूज़ के लिए ये चीरहरण से कम शर्मनाक बात नहीं थी। बेचैन दीपक कभी इधर जाते, कभी उधर, तभी उन्होंने बड़ा आदेश दिया- आदेश था कि ‘टुनाइट विद दीपक’ की आज की बहस को यूट्यूब से हटा दिया जाए।

कहते हैं सांच को आंच नहीं होती। अगर वाकई दीपकजी ने सही किया था तो सवाल ये है कि यूट्यूब पर डाले गए पूरे शो को हटा क्यों लिया गया? आखिर किस बात का डर था? जिस आधे-अधूरे वीडियो के दम पर दीपक ने दो घंटे तक बहस की, अब उन्होंने अपने करीबियों को उस शख्स की तलाश करने को कहा जिसने इस वीडियो को टुनाइट विद दीपक चौरसिया के इंट्रो पैकेज में इस्तेमाल किया था और जिसे देखकर उन्हें इतनी बड़ी बहस करने का महान आइडिया आया था।

इसी बीच चैनल के मालिक कार्तिकेय शर्मा का मैसेज आया। संदेश शायद सवाल की शक्ल में था- ‘ये क्या हो रहा है?

अगली कड़ी में आपको बताऊंगा कि कार्तिकेय शर्मा के सवाल का जवाब देने में दीपक चौरसिया के पसीने क्यों छूटने लगे। अपने गिरेबान बचाने के लिए उन्होंने बलि के बकरे की तलाश में क्या-क्या किया और इसमें आखिरकार कैसे नाकाम रहे?

उसी दिन रात 11 बजे ‘गर्दन बचानेवाले वीडियो का सच’ नाम से एक शो किया गया। इसका मकसद एबीपी न्यूज की तरफ से लगाए गए आरोपों पर सफाई देना था, लेकिन इस शो की दीपक ने खुद एंकरिंग क्यों नहीं की?

अगली कड़ी का इंतज़ार करें…

पत्रकार अमित कुमार की एफबी वॉल से.

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ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा #ArrestCHORasia : टीआरपी के लिए झूठी-फर्जी खबरें दिखाने वाले दीपक चौरसिया की गिरफ्तारी की मांग

नई दिल्ली । इंडिया न्यूज नामक चैनल का संपादक दीपक चौरसिया इन दिनों सोशल मीडिया के निशाने पर है। इस टीआरपीबाज और बाजारू संपादक की गिरफ्तारी की मांग उठ रही है। टीवी पत्रकार दीपक चौ‍रसिया रविवार को अचानक सोशल मीडिया के निशाने पर आ गए हैं जिसके कारण रविवार को Twitter पर #ArrestCHORasia ट्रेंड करने लगा।

ज्‍यादातर ट्वीट्स में दीपक को झूठी खबरें दिखाकर लोगों को गुमराह करने वाला पत्रकार बताया गया है। लोगों का आरोप है कि दीपक चौरसिया ने अपने चैनल पर टीआरपी के लिए कई झूठी और फर्जी खबरें दिखाईं। सोशल मीडिया पर दिल्‍ली पुलिस को टैग कर लोग चौरसिया को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं।

ट्विटर पर जाकर ट्रेंड कर रहे ‘अरेस्टचोरसिया’ हैशटैग के रिजल्ट देखने पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करें: #ArrestCHORasia

इस बीच, प्रतिष्ठित अखबार जनसत्ता की वेबसाइट पर भी दीपक चौरसिया के गिरफ्तार किए जाने संबंधी सोशल मीडिया पर उठी मांग से संबंधित खबर का प्रकाशन कर दिया गया है. देखें स्क्रीनशॉट…

दीपक चौरसिया की गिरफ्तारी की मांग से संबंधित नीचे कुछ ट्वीट दिए जा रहे हैं….

In a Major Development, Various Organisations DEMAND #ArrestCHORasia ASAP as Patna Court issues Non-bailable warrant
-Nirmala Pandey ‏@nirmpandey

Is Deepak Chaurasia above all law & order just bcoz he is a mediaperson?
-bani singh @SinghhhBani

Dear Police, #ArrestCHORasia to restore people’s faith in you. Non-bailable warrants are serious!
-racy motwani @racymotwani

Believe me, Chaurasia never went to any war site. He stood in his studios & did fake reporting. #ArrestCHORasia
-Lakshmi @omji01

He is a journalist, a degenerated jornalist. #ArrestCHORasia for denigrating the standards of journalism. pic.twitter.com/O4OLH5f2wn
-Jyoti Gambhir @jyotigambhir1

कुछ अन्य ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट देखें….


दीपक चौरसिया के रंग-ढंग जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करते जाइए :

राम जेठमलानी ने दीपक चौरसिया को भगाया!

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ब्रेकिंग न्यूज… सुधीर चौधरी की सेल्फी… ब्रेकिंग न्यूज… दीपक चौरसिया का हालचाल …

मैं आज के दिन को मीडिया के लिहाज से शर्मनाक दिन कहूंगा. पत्रकारिता के छात्रों को कभी पढ़ाया जाएगा कि 25 अक्टूबर 2014 के दिन एक बार फिर भारतीय राजनीति के आगे पत्रकारिता चरणों में लोट गई. धनिकों की सत्ता भारी पड़ गई जनता की आवाज पर. कभी इंदिरा ने भय और आतंक के बल पर मीडिया को रेंगने को मजबूर कर दिया था. आज मोदी ने अपनी ‘रणनीति’ के दम पर मीडिया को छिछोरा साबित कर दिया. दिवाली मिलन के बहाने मीडिया के मालिकों, संपादकों और रिपोर्टरों के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देश, विदेश, समाज और नीतियों पर कोई बातचीत नहीं हुई. सिर्फ मोदी बोले. कलम को झाड़ू में तब्दील हो जाने की बात कही. और, फिर सबसे मिलने लगे. जिन मसलों, मुद्दों, नारों, आश्वासनों, बातों, घोषणापत्रों, दावों के नाम पर सत्ता में आए उसमें से किसी एक पर भी कोई बात नहीं की.

सुधीर चौधरी सेल्फी बनाने लगे. दीपक चौरसिया हालचाल बतियाने लगे. रिपोर्टरों में तो जैसे होड़ मच गई सेल्फी बनाने और फोटो खिंचाने की. इस पूरी कवायद के दौरान कोई पत्रकार ऐसा नहीं निकला जिसने मोदी से जनता का पत्रकार बनकर जनहित-देशहित के मुद्दों पर सवाल कर सके. सब गदगद थे. सब पीएम के बगल में होने की तस्वीर के लिए मचल रहे थे. जिनकी सेल्फी बन गई, उन्होंने शायद पत्रकारिता का आठवां द्वार भेद लिया था. जिनकी नहीं बन पाई, वो थोड़े फ्रस्ट्रेट से दिखे. जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, एक बार भी पूरी मीडिया के सामने नहीं आए और न ही सवाल जवाब का दौर किया. शायद इससे पोल खुलने, ब्रांडिंग खराब होने का डर था. इसीलिए नया तरीका निकाला गया. ओबलाइज करने का. पीएम के साथ फोटो खिंचाने भर से ओबलाइज हो जाने वाली भारतीय मीडिया और भारतीय पत्रकार शायद यह आज न सोच पाएं कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर डाला लेकिन उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा.

जी न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने पीएम के साथ सेल्फी बनाई. इंडिया न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया का प्रधानमंत्री ने हालचाल पूछा. महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली से कराह रही देश की जनता का हालचाल यहां से गायब था. दिवाली की पूर्व संध्या पर सुसाइड करने वाले विदर्भ के छह किसानों की भयानक ‘सेल्फी’ किसी के सामने नहीं थी. सबके सब प्रधानमंत्री से मिलने मात्र से ही मुस्करा-इतरा रहे थे, खुद को धन्य समझ रहे थे.

रजत शर्माओं और संजय गुप्ताओं जैसे मीडिया मालिकों के लिए पत्रकारिता पहले से ही मोदी परस्ती रही है, आज भी है, कल भी रहेगी. इनके यहां काम करने वालों से हम उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वो कोई सवाल करेंगे. खासकर तब जब ये और इन जैसे मीडिया मालिक खुद उपस्थित रहे हों आयोजन में. सुभाष चंद्राओं ने तो पहले ही भाजपा का दामन थाम रखा है और अपने चैनल को मोदी मय बनाकर पार्टी परस्त राष्ट्रीय पत्रकारिता का नया माडल पेश किया है. अंबानियों के आईबीएन7 और ईटीवी जैसे न्यूज चैनलों के संपादकों से सत्ता से इतर की पत्रकारिता की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते हैं. कुल मिलाकर पहले से ही कारपोरेट, सत्ता, पावर ब्रोकरों और राजनेताओं की गोद में जा बैठी बड़ी पूंजी की पत्रकारिता ने आज के दिन पूरी तरह से खुद को नंगा करके दिखा दिया कि पत्रकारिता मतलब सालाना टर्नओवर को बढ़ाना है और इसके लिए बेहद जरूरी है कि सत्ता और सिस्टम को पटाना है. होड़ इस बात में थी कि मोदी ने किसको कितना वक्त दिया. मोदी ने कहा कि हम आगे भी इसी तरह मिलते जुलते रहेंगे. तस्वीर साफ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कभी कोई कड़ा बड़ा सवाल नहीं पूछा जा सकेगा. वो जो तय करेंगे, वही हर जगह दिखेगा, हर जगह छपेगा. वो जो इवेंट प्लान करेंगे, वही देश का मेगा इवेंट होगा, बाकी कुछ नहीं.

ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरियों और फिक्सर पत्रकार दीपक चौरसियाओं से हमें आपको पहले भी उम्मीद न थी कि ये जन हित के लिए पत्रकारिता करेंगे. दुखद ये है कि पत्रकारिता की पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने इन्हीं निगेटिव ट्रेंड्स को अपना सुपर आदर्श मान लिया है और ऐसा करने बनने की ओर तेजी से अग्रसर हैं. यह खतरनाक ट्रेंड बता रहा है कि अब मीडिया में भी दो तरह की मीडिया है. एक दलाल उर्फ पेड उर्फ कार्पोरेट उर्फ करप्ट मीडिया और दूसरा गरीब उर्फ जनता का मीडिया. ये जनता का मीडिया ही न्यू मीडिया और असली मीडिया है. जैसे सिनेमा के बड़े परदे के जरिए आप देश से महंगाई भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते, उसी तरह टीवी के छोटे परदे के जरिए अब आप किसी बदलाव या खुलासे या जन पत्रकारिता का स्वाद नहीं चख सकते. दैत्याकार अखबारों जो देश के सैकड़ों जगहों से एक साथ छपते हैं, उनसे भी आप पूंजी परस्ती से इतर किसी रीयल जर्नलिज्म की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इनके बड़े हित बड़े नेताओं और बड़े सत्ताधारियों से बंधे-बिंधे हैं. दैनिक जागरण वाले अपने मालिकों को राज्यसभा में भेजने के लिए अखबार गिरवी रख देते हैं तो दैनिक भास्कर वाले कोल ब्लाक व पावर प्रोजेक्ट पाने के लिए सत्ताओं से डील कर अखबार उनके हवाले कर देते हैं.

ऐसे खतरनाक और मुश्किल दौर में न्यू मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. न्यू वेब में वेब मीडिया शामिल है. सोशल मीडिया समाहित है. न्यूज पोर्टल और ब्लाग भी हैं. मोबाइल भी इसी का हिस्सा है. इन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी. कार्पोरेट मीडिया, जिसका दूसरा नाम अब करप्ट मीडिया या पेड मीडिया हो गया है, इसको एक्सपोज करते रहना होगा. साथ ही, देश के सामने खड़े असल मुद्दों पर जनता की तरफ से बोलना लिखना पड़ेगा. अब पत्रकारिता को तथाकथित महान पत्रकारों-संपादकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. ये सब बिक चुके हैं. ये सब चारण हो गए हैं. ये सब कंपनी की लायजनिंग फिट रखने और बिजनेस बढ़ाने के प्रतिनिधि हो गए हैं. इतिहास बताता है कि इंदिरा ने मीडिया से झुकने को कहा था तो मीडिया वाले रेंगेने लगे थे. अब कहा जाएगा कि मोदी ने मीडिया को मिलन के बहाने संवाद के लिए कहा तो मीडिया वाले सेल्फी बनाने में जुट गए.

फेसबुक पर वरिष्ठ और युवा कई जनपक्षधर पत्रकार साथियों ने मीडिया की इस घिनौनी और चीप हरकत का तीखा विरोध किया है. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक Om Thanvi लिखते हैं :  ”जियो मेरे पत्रकार शेरो! क्या इज्जत कमाई है, क्या सेल्फियाँ चटकाई हैं!

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dhananjay Singh बताते हैं एक किस्सा : ”एस.सहाय जी स्टेट्समैन के संपादक हुआ करते थे,उनके पास इंदिरा जी के यहाँ से कोई आया सूट का कपड़ा लेकर की खास आपके लिए प्रधानमंत्री ने भेजा है,साथ में टेलर का पता भी था.उन्होंने धन्यवाद के साथ उसे लौटा दिया.कुछ समय बाद प्रधानमंत्री ने बंगले पर संपादकों को डिनर दिया.सहाय जी के अलावा बाकी सभी क्रांतिकारी संपादक एक जैसे सूट में थे…सब एक दूसरे की तरफ फटी आँखों से देखने लगे … इंदिरा जी का अलग ही स्टाइल था……. समय बदला है अब तो खुद ही सब दंडवत हुए जा रहे हैं….. हाँ सहाय जी के घर रघु राय की उतारी एक तस्वीर दिखती थी की संसद की सीढ़ियों के पास एक भिखारी कटोरा लेकर खड़ा है (शायद तब सिक्योरिटी इतनी नहीं रही होगी)………… सहाय जी के पास अंतिम समय में खटारा फिएट थी और वो अपने बच्चों के लिए भी ‘कुछ भी’ छोड़ कर नहीं गए.

कई मीडिया हाउसों में काम कर चुके आध्यात्मिक पत्रकार Mukesh Yadav लिखते हैं: ”सवाल पूछने की बजाय पीएम साब के साथ सेल्फी लेने के लिए पत्रकारों, संपादकों में होड़ मची है!! शर्मनाक! धिक्कार! निराशा हुई! सवाल के लिए किसकी आज्ञा चाहिए जनाब?

सोशल एक्टिविस्ट और युवा पत्रकार Mohammad Anas कहते हैं: ”लोकतंत्र में संवाद कभी एक तरफा नहीं होता। एक ही आदमी बोले बाकि सब सुने। साफ दिख गया लोकशाही का तानाशाही में कन्वर्जन। मनमोहन ने एक बार संपादकों को बुलाया था, सवाल जवाब हुए थे। कुछ चटुकारों और दलालों ने पत्रकारिता को भक्तिकाल की कविता बना डाला है। वरना करप्टों, झूठों और जनविरोधियों के लिए पत्रकार आज भी खौफ़ का दूसरा नाम है।

कई अखबारों में काम कर चुके जोशीले पत्रकार Rahul Pandey सोशल मीडिया पर लिखते हैं :

आज पत्रकारों के सेल्‍फी समारोह के बाद पि‍छले साल का कहा मौजूं है… आप भी गौर फरमाएं

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।

करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।

वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार Vinod Sharma लिखते हैं : ”Facebook flooded with selfies of media persons with our PM. A day to rejoice? Or reflect?

कई अखबारों में काम कर चुके पत्रकार Ashish Maharishi लिखते हैं :  ”हे मेरे देश के महान न्‍यूज चैनलों और उसके कथित संपादकों, प्रधानमंत्री ने आपको झुकने के लिए कहा तो आप रेंगने लगे। क्‍या देश में मोदी के अलावा कोई न्‍यूज नहीं है। ये पब्‍लिक है, सब जानती है…हमें पता है कि मोदी की न्‍यूज के बदले आपको क्‍या मिला है….

वरिष्ठ पत्रकार Arun Khare लिखते हैं :  ”मीडिया ने कलम को झाड़ू में बदल दिया –मोदी । मोदी जी आपने इस सच से इतनी जल्दी परदा क्यों उठा दिया । कुछ दिन तो मुगालते में रहने देते देश को।

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dharmendra Gupta लिखते हैं : ”जिस तरह से मीडिया के चम्पादक आज मोदी के साथ सेल्फी खिंचवा कर के उस को ब्रेकिंग न्यूज बना रहे है उस से लगता है की अब लड़ाई भ्रष्ट राजनीतिको के साथ भ्रस्ट मीडिया के खिलाफ भी लड़नी होगी.

संपादक और साहित्यकार गिरीश पंकज इन हालात पर एक कविता कुछ यूं लिखते हैं :

पत्रकारिता का सेल्फ़ीकरण
———–
कई बार सोचता हूँ
बिलकुल सही समय पर
मर गए पत्रकारिता के पुरोधा,
नहीं रहे तिलक और गांधी,
नहीं रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर
गणेश शंकर विद्यार्थी भी
हो गए शहीद
राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी
का भी हो गया अवसान।
आज ये ज़िंदा होते तो
खुद पर ही शर्मिन्दा होते
पत्रकारिता की झुकी कमर
और लिजलिजी काया देख कर
शोक मनाते
शायद जीते जी मर जाते
सुना है कि दिल्ली में
‘सेल्फिश’ पत्रकारिता अब
‘सेल्फ़ी ‘ तक आ गयी है
हमारी खुदगर्ज़ी
हमको ही खा गयी है

जो भक्त लोग हैं, उन्हें मोदी की हर स्टाइल पसंद है. वे मोदी की कभी बुराई नहीं करते और मीडिया की कभी तारीफ नहीं करते. इन्हें ऐसी ही चारण मीडिया चाहिए, जिसे गरिया सकें, दुत्कार सकें और लालच का टुकड़ा फेंक कर अपने अनुकूल बना सकें. सवाल उन लोगों का है जो आम जन के प्रतिनिधि के बतौर मीडिया में आए हैं. जिन्होंने पत्रकारिता के नियम-कानून पढ़े हैं और मीडिया की गरिमा को पूरे जीवन ध्यान में रखकर पत्रकारिता की. क्या ये लोग इस हालात पर बोलेंगे या मीडिया बाजार के खरबों के मार्केट में अपना निजी शेयर तलाशने के वास्ते रणनीतिक चुप्पी साधे रहेंगे. दोस्तों, जब-जब सत्ता सिस्टम के लालचों या भयों के कारण मीडिया मौन हुई या पथ से विचलित हुई, तब तब देश में हाहाकार मचा और जनता बेहाल हुई. आज फिर वही दौर दिख रहा है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सब वह कहें, वह बोलें जो अपनी आत्मा कहती है. अन्यथा रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं क्योंकि पैसा तो दोनों से ही मिलता है और दोनों ही धंधा है. असल बात विचार, सरोकार, तेवर, नजरिया, आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान है. जिस दिन आपने खुद को बाजार और पूंजी के हवाले कर दिया, उस दिन आत्मा तो मर ही गई. फिर आप खुद की लाश ढोकर भले इनसे उनसे मिलते रहें, यहां वहां टहलते रहें, पर कहा यही जाएगा कि ”मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामजादे किस्म के दलाल हैं, पत्रकारिता में तो आप सिर्फ इसलिए हैं ताकि आप अपनी हरमजदई और दलाली को धार दे सकें”.

शायद मैं कुछ ज्यादा भावुक और आवेश में हो रहा हूं. लेकिन यह भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को पत्रकारिता में ले आई. ये भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को कारपोरेट और करप्ट मीडिया में देर तक टिका नहीं पाई. यह भावुकता और आवेश ही तो http://Bhadas4Media.com जैसा बेबाक पोर्टल शुरू करने को मजबूर कर गया और इस न्यू मीडिया के मंच के जरिए सच को पूरे ताकत और पूरे जोर के साथ सच कहने को बाध्य करता रहा जिसके नतीजतन अपन को और अपन जैसों को जेल थाना पुलिस कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाने पड़े और अब भी यह सब क्रम जारी है. शरीर एक बार ही ठंढा होता है. जब सांसें थम जाती हैं. उसके पहले अगर न भावुकता है और न ही आवेश तो समझो जीते जी शरीर ठंढा हो गया और मर गए. मुझे याद आ रहे हैं पत्रकार जरनैल सिंह. सिख हत्याकांड को लेकर सवाल-जवाब के क्रम में जब तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने लीपापोती भरा बयान दिया तो तुरंत जूता उछाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. जरनैल सिंह अब किसी दैनिक जागरण जैसे धंधेबाज अखबार के मोहताज नहीं हैं. उनकी अपनी एक शख्सियत है. उन्होंने किताब लिखी, चुनाव लड़े, दुनिया भर में घूमे और सम्मान पाया. मतलब साफ है कि जब हम अपने दिल की बात सुनते हैं और उसके हिसाब से करते हैं तो भले तात्कालिक हालात मुश्किल नजर आए, पर आगे आपकी अपनी एक दुनिया, अपना व्यक्तित्व और अपनी विचारधारा होती है.

करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकार की लंबाई चौड़ाई सिर्फ टीवी स्क्रीन तक पर ही दिखती है. उसके बाहर वह लोगों के दिलों में बौना है. लोगों के दिलों से गायब है. उनका कोई नामलेवा नहीं है. अरबों खरबों कमा चुके पत्रकारों से हम पत्रकारिता की उम्मीद नहीं कर सकते और यह नाउम्मीदी आज पूरी तरह दिखी मोदी के मीडिया से दिवाली मिलन समारोह में. बड़ी पूंजी वाली करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के बैनर तले कलम-मुंह चला रहे पत्रकारों से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपनी लंबी-चौड़ी सेलरी को त्यागने का मोह खत्म कर सके. इसी कारण इनकी ‘सेल्फी पत्रकारिता’ आज दिखी मोदी के मीडिया मिलन समारोह में.

आज राजनीति जीत गई और मीडिया हार गया. आज पीआर एजेंसीज का दिमाग सफल रहा और पत्रकारिता के धुरंधर बौने नजर आए. आइए, मीडिया के आज के काले दिन पर हम सब शोक मनाएं और कुछ मिनट का मौन रखकर दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों की मर चुकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे दें.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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आसाराम मामले में हाई कोर्ट ने दीपक चौरसिया की ज़मानत अर्जी खारिज की

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एक आपराधिक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंडिया न्यूज टीवी चैनल के एडिटर-इन-चीफ दीपक चौरसिया की ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी है। चौरसिया व अन्य पर आसाराम बापू के विषय में आपत्तिजनक कार्यक्रम प्रसारित करने का आरोप है।

इस संबंध में चौरसिया तथा अन्य के विरुद्ध आईपीसी की धारा 469, 471, 120B, आईटी एक्ट की धारा 67B और पाक्सो एक्ट की धारा 13C के अंतर्गत मुक़दमा दर्ज किया गया था। चौरसिया पर आरोप है कि उन्होने आसाराम बापू से संबंधित कुछ दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की और उन्हे अपने चैनल के शो ‘सलाखें’ में दिखाया।

चौरसिया तथा अन्य पर आसाराम से संबंधित कुछ आपत्तिजनक क्लिपिंग भी दिखाने का आरोप है जो कि आईपीसी के साथ ही आईटी एक्ट और पाक्सो के अंतर्गत अपराध है।

हाई कोर्ट ने ज़मानत अर्जी खारिज करते हुए पुलिस को मामले की जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। पुलिस चौरसिया को इस मामले में गिरफ्तार भी कर सकती है।

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