जी न्यूज करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है

Sheel Shukla : ज़ी न्यूज़ से एक सवाल… आपको को कैसा लग रहा है जब आप अपनी बेइज्जती खुद ही कर रहे हैं? आजकल ज़ी न्यूज़ पर राम मंदिर निर्माण के सन्दर्भ में एक कार्यक्रम चल रहा है “ग्रेट डिबेट शो”. इसमें आम जनता के साथ कुछ राम मंदिर समर्थित राजनेता एवं कुछ राम मंदिर विरोधी राजनेता के साथ साथ प्रतीकात्मक तौर कोई व्यक्ति श्री रामचंद्र भगवान कोई सीता तो कोई हनुमान बनकर बैठा है। करोड़ों लोगो की श्रद्धा के ये भगवन बोलते भी हैं।

जब कोई राम मंदिर विरोधी नेता मंदिर निर्माण का विरोध करता है तो ये भगवन श्री राम याचना एवं शिकायत भरे स्वर में कहते हैं कि आप लोग तो अच्छे घरों में रहते हैं और मैं तो अभी तक टाट पट्टी की चादरों में ही बैठा हूँ। जब राम जी की बात को कोई विरोधी नेता जैसे ही दरकिनार करता है तब तक सीता जी अपना त्याग बताने लगती हैं और मंदिर क्यों बने, इसका तर्क भी देती हैं।

इतने बड़े राष्ट्रीय समाचार चैनल ज़ी न्यूज़ को क्या इतनी भी समझ नहीं है कि वो क्या कर रहे हैं? अरे भगवान राम को इससे क्या कि आप उनकी मूर्ति को टाट पट्टी में रख कर पूजा करें या फिर आलीशान भव्य मंदिर में। ये कितने शर्म की बात है कि क्या हमारे भगवन खुद आकर अपना मंदिर मांगेंगे? या भगवान राम की आड़ में मंदिर समर्थक भगवान राम के नाम पर मंदिर बनाने की याचना करेंगे ?

ज़ी न्यूज़! मत लाइए भगवन राम, सीता, हनुमान को इस लड़ाई में, मंदिर बने या न बने… इससे हमारे भगवन पर कोई असर नहीं है… वो सर्व व्यापी हैं, सर्व शक्तिमान हैं। मंदिर तो सिर्फ हमारी आस्था का प्रतीक है। मंदिर बने अच्छी बात है, लेकिन भगवन श्री राम सीता एवं हनुमान की भावनात्मक नीलामी बंद हो। ये करोड़ो हिन्दुओ की शान के खिलाफ है!

दैनिक समाचार पत्र विजडम इंडिया के संपादक शील शुक्ला की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिंदू धर्म में सम्मान नहीं मिला तो बन गए बौद्ध… देखें वीडियो….

कपिल वस्तु घूम आया. वहां बौद्ध स्तूप के सामने बैठे भिक्छुओं ने साफ-साफ कहा कि वे हिंदू धर्म इसलिए छोड़ दिए क्योंकि वहां उन्हें सम्मान नहीं मिल रहा था. इनकी बातें आंखें खोलने वाली हैं.  देखें वीडियो….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिंदू राजाओं पर विजय के प्रतीक के रूप में निर्मित है कुतुब मीनार! (देखें वीडियो)

कुतुब मीनार भारत में दक्षिण दिल्ली शहर के महरौली में स्थित है. यह ईंट से बनी विश्व की सबसे ऊंची मीनार है. इसकी ऊँचाई 72.5 मीटर (237.86 फीट) और व्यास 14.3 मीटर है जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) हो जाता है. इसमें 379 सीढियां हैं. कहा जाता है कि दिल्‍ली के अंतिम हिन्‍दू शासक की हार के तत्‍काल बाद 1193 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार को बनवाया. कुतुब मीनार पुरातन दिल्ली शहर, ढिल्लिका के प्राचीन किले लालकोट के अवशेषों पर बनी है. ढिल्लिका अन्तिम हिन्दू राजाओं तोमर और चौहान की राजधानी थी.

इस मीनार के निर्माण उद्देश्य के बारे में कहा जाता है कि यह कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद से अजान देने, निरीक्षण एवं सुरक्षा करने या इस्लाम की दिल्ली पर विजय के प्रतीक रूप में बनी. कुछ पुरातत्व शास्त्रियों का मत है कि इसका नाम प्रथम तुर्की सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर पडा. वहीं कुछ यह मानते हैं कि इसका नाम बग़दाद के प्रसिद्ध सन्त कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर है, जो भारत में वास करने आये थे. इल्तुतमिश उनका बहुत आदर करता था, इसलिये कुतुब मीनार को यह नाम दिया गया.

इसके शिलालेख के अनुसार, इसकी मरम्मत फ़िरोज शाह तुगलक ने (1351–88) और सिकंदर लोधी ने (1489–1517) करवाई. मेजर आर.स्मिथ ने इसका जीर्णोद्धार 1829 में करवाया था. मीनार के निकट भारत की पहली क्‍वातुल-इस्‍लाम मस्जिद है. कहा जाता है कि यह 27 हिन्‍दू मंदिरों को तोड़कर इसके अवशेषों से निर्मित की गई है. इस मस्जिद के प्रांगण में एक 7 मीटर ऊँचा लौह-स्‍तंभ है. यह कहा जाता है कि यदि आप इसके पीछे पीठ लगाकर इसे घेराबंद करते हो जो आपकी इच्‍छा होगी पूरी हो जाएगी.

कुतुबमीनार का निर्माण विवादपूर्ण है. कुछ मानते हैं कि इसे विजय की मीनार के रूप में भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत के रूप में देखा जाता है. कुछ मानते हैं कि इसका निर्माण मुअज्जिन के लिए अजान देने के लिए किया गया है. अफ़गानिस्तान में स्थित, जाम की मीनार से प्रेरित एवं उससे आगे निकलने की इच्छा से, दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, ने कुतुब मीनार का निर्माण सन 1193 में आरम्भ करवाया. मीनार के चारों ओर बने अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनमें से अनेक इसके निर्माण काल सन 1193 या पूर्व के हैं. यह परिसर यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में स्वीकृत किया गया है.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=dREDn-zicZ8

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिन्दू और मुसलमान दोनों पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव आज तक सहला रहे हैं

किसी व्यक्ति परिवार या समाज में कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं कि वे सब कई पीढियों तक उस घटना से प्रभावित होते रहते हैं। ये प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। ऐसी ही एक घटना है सन १७६१ में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। इस लड़ाई के बारे में जानने से पहले लड़ाई क्यों हुई, यह जानना दिलचस्प होगा। इतिहास की एक धारा के मुताबिक उत्तर भारत में अंतिम महान हिन्दू सम्राट हर्ष वर्धन और दक्षिण भारत में रायरायान कृष्णदेव राय थे। मुस्लिम आक्रांताओं के हमले भारत पर आठवीं-नवीं शताब्दी से ही शुरू हो गए थे। लेकिन ११वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ ही भारत में उनके साम्राज्य की शुरूआत हो गई।

मुस्लिम राजा जब आए तो निरूसन्देह उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए। लेकिन ऐबक के दामाद और दूसरे सम्राट इल्तुतमिश के साथ ही मुस्लिम आक्रमणकारी राजाओं ने यहां की हिन्दू बाहुल प्रजा के साथ मेल मिलाप शुरू कर दिया और कोशिश की कि हिन्दुओं की भावनाएं आहत नही हों। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही गई और १८वीं-१९वीं शताब्दी तक हिन्दू-मुसलमान खिचड़ी के दानों की तरह आपस में मिल गए।

लेकिन इस प्रवृत्ति के अपवाद भी रहे और वर्चस्व की लड़ाई में कई बार धर्म को भी हथियार बनाया गया। साथ ही यह भी हुआ शासक मुस्लिम वर्ग के विरुद्ध एक स्वाभाविक नाराजगी यहां के पुराने प्रभुवर्ग हिन्दुओं में बनी रही। यही नाराजगी औरंगजेब के शासन के बाद बहुविध तरीके से सामने आई। मुगलों के जमाने तक भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार मुख्यतरू खेती ही था। कई वजहों से, जिनको गिनाना यहां अप्रासंगिक है, शाहजहां के अंतिम दिनों में खेती के संकट के दिन शुरू हो गए। कोढ़ में खाज यह भी हुआ कि औरंगजेब ने अपनी साम्राज्य लिप्सा में इस संकट को न केवल उत्तर भारत वरन दक्षिण भारत में भी बढ़ा दिया।

परिणाम स्वरूप पहला विद्रोह खेतिहर जाट बिरादरी ने किया। जिसका नेतृत्व गोकुल जाट ने किया। विद्रोही भविष्य में भी सिर न उठा पाएं इसलिए औरंगजेब ने गोकुल जाट को बड़ी कठोर पीड़ादायी सार्वजनिक मौत दी। लेकिन जब जीवन का आधार ही नष्टड्ढ हो रहा हो तो मौत का खौफ नहीं रह जाता। परिणाम स्वरूप ज्यादातर खेतिहर जातियां देश भर में मुगल शासन के खिलाफ उठ खड़ी हुईं। जिनमें सबसे ज्यादा सफल रहे जाट और मराठे। इस बगावत के तार्किक परिणाम स्वरूप मराठा क्षत्रपति शिवाजी और राजा सूरजमल जाट शासकों के रूप में सामने आए। महाराजा रणजीत सिंह को भी एक हद तक इसी श्रेणी में रख सकते हैं।

इन सबमें भी सबसे पहले व सबसे अधिक सफलता मराठों को मिली। हालाकि इसके लिए उन्होंने बड़ी कीमत भी चुकाई। शिवाजी जिन्दगी भी औरंगजेब से लड़े। उनके पुत्र सम्भाजी को भी औरंगजेब ने मार डाला और पौत्र साहू को अपने यहां नजरबंद कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने साहू को सशर्त रिहा कर दिया और उन्होंने पूना पहुंचकर क्षिन्न भिन्न और विखंडित मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। शिवाजी के बाद किसी केन्द्रित नेतृत्व के अभाव में मराठा साम्राज्य एक ढीला ढाला सा संगठन था। जिसमें सिंधिया, होलकर और गायकवाड़ समेत पांच बड़े घराने थे जो लगभग स्वतंत्र थे।

इन सब को एकत्रित कर अपने प्रधानमंत्री पेशवा, जो ब्राह्मण थे, की मदद से साहू ने मराठा साम्राज्य को मुगलों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश शुरू की। मुगलों के खिलाफ अपने संघर्ष को न्यायोचित, प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए जब ब्राह्मड्ढण पेशवा बाजीराव ने हिन्दू स्वराज की बात की तो उसका जनमानस पर खासा असर पड़ा। बाजीराव बड़े योद्धा थे, उन्होंने मराठा साम्राज्य को लगभग आधे हिन्दुस्तान में प्रभावी बना दिया। लेकिन मराठा शासक एक काम नहीं कर पाए। जो जगहें उन्होंने जीती वहां पर प्रभावी शासनतंत्र स्थापित कर वे जनता के प्रिय नहीं बन सके। दूसरे उस समय मराठों से इतर जो दूसरी ताकतें सक्रिय थीं उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाकर भारत सम्राट मुगल ही बने रहे।

इन्हीं सब परिस्थितियों में अपने अंतकाल में साहू जी ने घोषणा की कि उनके बाद मराठा साम्राज्य के अधिपति पेशवा ही होंगे। और मराठा क्षत्रप पेशवा के अधीन मराठा शासन को विस्तार देकर मुगलों को अपदस्थ करेंगे। इस तरह साहू राजा की मृत्यु के बाद खेतिहर जाति मराठों के साम्राज्य के अधिपति ब्राह्मड्ढण पेशवा हो गए। मुगल साम्राज्य भी उस समय लग रहा था कि अस्त होने वाला ही है, बस एक सांघातिक धक्के की जरूरत है। साथ ही उस समय की अराजकता से फायदा उठाकर साहसी और लूटमार करने वाले शासक और लुटेरे भी सिर उठाने लगे थे।

ऐसा ही एक शासक था अफगानिस्तान का अहमद शाह अब्दाली। वह लूटमार के इरादे से कई बार भारत आ चुका था। लेकिन ऐसा नहीं था कि वह महमूद गजनवी की तरह केवल लुटेरा ही था। वह एक कूटनीतिक शासक भी था। ऐसे में कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों के साथ उसके मित्रता के संबंध थे। ऐसी स्थिति में १७६१ में जब एक बार फिर अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया तो उसका सामना न ही भारत सम्राट मुगलों ने किया और न ही किसी और क्षत्रप ने। पेशवा के अधीन मराठों ने रणनीति बनाई कि अगर अब्दाली का सामना कर उसे हरा देते हैं तो फिर स्वाभाविक रूप से जो परिस्थितियां बनेंगी उनमें मुगलों को सांघातिक धक्का देने में पेशवा सफल रहेंगे। साथ ही हिन्दू स्वराज का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा।

इस सोच के तहत पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली और पेशवा की सेनाओं ने युद्ध का फैसला किया। मराठों ने निरूसन्देह बहुत अच्छी सेना सजाई और वह जीत के प्रति इतने अधिक अश्वस्त थे कि इस लड़ाई में पहली बार मराठा सरदारों की पत्नियां और परिवारीजन भी उनके साथ आए कि लड़ाई जीतने के बाद उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा करने के बाद तब पूना वापस जाएंगे। लेकिन मराठों के शत्रुओं ने भी इस लड़ाई में अवसर देखा। उन्होंने अब्दाली की सहायता की। उनमें से कई आमने-सामने मराठों से संघर्ष का सामर्थ्य नहीं रखते थे। इसलिए सोचा कि अब्दाली जीता तो अफगानिस्तान लौट जाएगा और मराठों को नष्ट कर देगा साथ ही वे स्थानीय राजा मराठों के प्रकट शत्रु भी नहीं बनेंगे। इसी पृष्ठड्ढभूमि में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई और अपराजेय मराठा सेना बुरी तरह हारी, इस हद तक कि लड़ाई में तत्कालीन पेशवा के भाई व बेटे भी मारे गए।

अब परिदृश्य बदल गया था। सांघातिक धक्का मुगलों के बजाय मराठों को लग चुका था। साथ ही प्लासी और बक्सर की लड़ाईयां जीतकर अब अंग्रेज भारत के अधिपति बनने की ओर अग्रसर थे। मुगलों का गौरव और पेशवा का हिन्दू स्वराज का सपना चकनाचूर हो चुका था। अब शासन अंग्रेजों को करना था और जाहिर है कि उनकी अपनी प्राथमिकताएं थी। गौर से देखें तो तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू और मुसलमान दोनों आज तक पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव सहला रहे हैं। लेकिन काल की गति निराली है। कई बार मनुष्य की सोच काल की गति के सामने धराशायी हो जाती है। फिर भी दोनों अपनी फितरत से बाज नहीं आते।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

अनेहस शाश्वत का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यूपी की चुनावी तैयारियों का हिस्सा न बन जायें isis के हरामखोर!

ये तो नही पता कि isis के लोगों का धर्म क्या है… किसी को तो छोड़ दो isis के हरामखोरों…

हाँलाकि उनके संगठन के नाम में ‘इस्लाम’ नाम का शब्द जुड़ा है, जैसा कि मथुरा के कंस रामवृक्ष ने नेता जी सुभाषचंद्र बोस जी की आजाद हिन्द फौज के नाम से दहशतगर्दो का कुनबा तैयार करने की गुस्ताखी की थी। पर हाँ इस बात में कोई दो राय नही है कि इन्सानियत के दुश्मन इन वहशी दरिन्दों ने अब तक सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। आकड़े बताते है कि इन हरामखोरों (Isis) ने  ईसाइयों, यहूदियो, कुर्दों, यजीदियों इत्यादि से ज्यादा जान-माल का नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। यही नहीं, मुसलमानो के धार्मिक स्थल (मुख्य तीर्थ स्थल भी) तोड़ना isis का मुख्य लक्ष्य है।

भारतीय मुसलमानों शुक्र करो कि तुम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी और महात्मा बुद्ध के संस्कारों वाले देश भारत मे महफूज हो। तुम आजादी और सहयोग के साथ अपने धार्मिक फरीजे अदा करते हो और इस देश मे तम्हारे करोड़ों धार्मिक स्थल ( औसतन हर दो किलो मीटर के दायरे मे एक मस्जिद या दूसरे धार्मिक स्थल) है। यहाँ कोई Isis तुम पर जुल्म नहीं ढा सकता।

और हाँ, एक बात ध्यान से सुन लो मुसलमान भाईयो।

आत्म रक्षा के लिये…युद्ध कौशल मे दक्ष होने के लिये ..हथियार चलाना सीखने के लिये जो कभी-कभी प्रशिक्षण शिविर लगते है, उस पर तुम लोग आइन्दा कभी ऐतराज का हल्ला मत मचाना। तुम्हारे ये भाई ही isis को कुत्तों की मौत मारेंगे और उनसे तम्हारी जान बचायेंगे।

वैसे इन सुअरो (Isis) की मजाल नहीं है कि वो हमारे देश भारत की तरफ नजर उठाकर भी देखें।

लेकिन हाँ, हम बहुत मुतमईन (निश्चित) होकर भी नहीं बैठना चाहिए है।

यूपी का चुनाव नजदीक है। अपनी हारी हुई बाजी जीतने के प्रयासों में हो सकता है उनका यहाँ छोटा-मोटा टूर लगवाने के लिये कोई TA-DA भिजवा दे।

इन दरिन्दो के अमानवीय कृत्यों से जिनका लाभ होता होगा वैसी तमाम शैतानी शक्तियाँ ही इन शैतानों की आर्थिक सहायता करती ही होगी। तबाही मचाने की सुपारी से ही तो ये वित्त पोषित होते होगे।

आप सब तो समझदार हो.. जानते हो.. इस किस्म की. अमानवीय नापाक हरकतों वाली घटनाओं के माहौल में कहाँ-कहाँ, किसका-किसका, कब-कब और किस मौके पर किस किस्म का  फायदा होता है।

लेखक नवेद शिकोगह लखनऊ के युवा और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क उनकी मेल आईडी Navedshikoh84@gmail.com या उनके मोबाइल नंबर 08090180256 / 09369670660 से किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

किसी हिंदू की मौत पर ‘RIP’ लिखना गलत, जानिए क्या कहा जाना चाहिए

Sarjana Sharama : What is Rest in Peace ( ‪#‎RIP‬) ये “रिप-रिप-रिप-रिप” क्या है? आजकल देखने में आया है कि किसी मृतात्मा के प्रति RIP लिखने का “फैशन” चल पड़ा है, ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि कान्वेंटी दुष्प्रचार तथा विदेशियों की नकल के कारण हमारे युवाओं को धर्म की मूल अवधारणाएँ या तो पता ही नहीं हैं, अथवा विकृत हो चुकी हैं… RIP शब्द का अर्थ होता है “Rest in Peace” (शान्ति से आराम करो), यह शब्द उनके लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें कब्र में दफनाया गया हो, क्योंकि ईसाई अथवा मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार जब कभी “जजमेंट डे” अथवा “क़यामत का दिन” आएगा, उस दिन कब्र में पड़े ये सभी मुर्दे पुनर्जीवित हो जाएँगे…

अतः उनके लिए कहा गया है, कि उस क़यामत के दिन के इंतज़ार में “शान्ति से आराम करो” ! लेकिन हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है, हिन्दू शरीर को जला दिया जाता है, अतः उसके “Rest in Peace” का सवाल ही नहीं उठता ! हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु होते ही आत्मा निकलकर किसी दूसरे नए जीव/ काया/शरीर/नवजात में प्रवेश कर जाती है… उस आत्मा को अगली यात्रा हेतु गति प्रदान करने के लिए ही श्राद्धकर्म की परंपरा निर्वहन एवं शान्तिपाठ आयोजित किए जाते हैं !

अतःकिसी हिन्दू मृतात्मा हेतु “विनम्र श्रद्धांजलि”, “श्रद्धांजलि”, “आत्मा को सदगति प्रदान करें” ” भगवान् , आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे ” जैसे वाक्य विन्यास लिखे जाने चाहिए, जबकि किसी मुस्लिम अथवा ईसाई मित्र के परिजनों की मृत्यु पर उनके लिए RIP लिखा जा सकता है… होता यह है कि श्रद्धांजलि देते समय भी “शॉर्टकट अपनाने की आदत से हममें से कई मित्र हिन्दूमृत्यु पर भी “RIP” ठोंक आते हैं… यह विशुद्ध “अज्ञान और जल्दबाजी” है, इसके अलावा कुछ नहीं…

अतः कोशिश करें कि भविष्य में यह गलती ना हो, एवं हम लोग *”दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि”* प्रदान करें… ना कि उसे ~RIP~ करें !

पत्रकार सर्जना शर्मा की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आजतक में कार्यरत शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर और शादाब मुज्तबा की फेसबुक पर क्यों हो रही है तारीफ, आप भी पढ़िए

Vikas Mishra : मेरे दफ्तर में शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर, शादाब मुज्तबा हैं, उच्च पदों पर हैं ये लोग, बेहद जहीन। जानते हैं कि इनमें एक समानता क्या है, इन सभी की एक ही संतान है और वो भी बेटी। वजह क्या है, वजह है इनकी तालीम, इनकी शिक्षा। क्योंकि इन्हें पता है कि जिस संतान के दुनिया में आने के ये जरिया बने हैं, उसके पालन-पोषण में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। इन्हें नहीं रटाना है कम संतान-सुखी इंसान।

मेरे गांव में मेरे हमउम्र दयाराम के आठ बच्चे हैं। मेरे खुद दो सगे भाई और तीन बहनें हैं। मेरे लखनऊ के एक साथी पत्रकार के 11 मामा और चार मौसियां हैं। सुभाष चंद्र बोस अपने पिता की नौवीं संतान थे। इसके बाद भी प्रोडक्शन जारी था, 14 भाई बहन थे। तो दूसरे की संतानों की तादाद गिनने से पहले जरा अपना भी इतिहास देख लेना चाहिए। अभी हाल में मैंने एक चुटकुला पढ़ा था कि एक कलेक्टर साहब गांव में नसबंदी के लाभ बताने पहुंचे थे। एक ग्रामीण ने पूछा-साहब आपने नसबंदी करवाई है? साहब बोले-नहीं, हम पढ़े-लिखे हैं। ग्रामीण बोला-तो साहब हमें भी पढ़ाओ-लिखाओ, नसबंदी करवाने क्यों आ गए।

फेसबुक पर लिखने वाले तमाम लोग विद्वान हैं, जानकार हैं, लेकिन अपनी विद्या का इस्तेमाल नफरत फैलाने में ज्यादा कर रहे हैं। हिंदू हो या मुस्लिम, दोनों समुदाय की मूल समस्या है शिक्षा। जो पढ़कर आगे बढ़ गए, वो भी शिक्षा के लिए प्रेरित नहीं करते, बल्कि अपने ही समुदाय के उन लोगों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें अक्षर ज्ञान हो गया है और जो सोशल मीडिया पर फेंका उनका कचरा उठाकर अपने दिमाग में डालने के लिए अभिशप्त हैं। दो समुदाय जो इंसानियत के तकाजे से एक-दूसरे के करीब आ सकते हैं, उन्हें बरबस ये दूर करना चाहते हैं। मुस्लिम समुदाय के अच्छे लिखने वाले अपने ही सहधर्मियों को बरगला रहे हैं। उनके अपने घर में अपनी बेटी तो डॉक्टरी-इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। लेकिन फेसबुक पर वो ‘मोदी की डियर’ पर मौज ले रहे हैं।

कोई मुस्लिम अगर इस्लाम या कट्टरता के खिलाफ अगर कोई पोस्ट लिखता है तो उसमें कमेंट करने वालों में हिंदू लोगों की भरमार होती है, जो उस पोस्ट का स्वागत करते नजर आते हैं। उस पोस्ट के कमेंट्स में मुस्लिमों की तादाद भी होती है। या तो वो अपने उस साथी को गालियां दे रहे होते हैं या फिर कुछ ऐसे भी होते हैं जो पोस्ट का समर्थन कर रहे होते हैं। ठीक इसी तरह, जब कोई हिंदू कट्टर हिंदुत्व और धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास के विरोध में कुछ लिखता है तो उस पोस्ट पर मुस्लिम साथियों के कमेंट थोड़े से आते हैं, अगर पोस्ट पब्लिक है तो फिर उस पर हिंदू धर्म वालों की गालियां पड़नी तय है। मेरी फ्रेंडलिस्ट में भी ऐसे साथी हैं, जिनमें से कुछ कभी परशुराम के भक्त बन जाते हैं, तो कभी देखते ही शेयर करें वाली तस्वीरें भेजते हैं, बेवजह मोदी-मोदी करते रहते हैं।

व्हाट्सएप के ग्रुप में तो कई मूर्खतापूर्ण मैसेज चलते रहते हैं। और हां, फेसबुक पर कई मुस्लिम मित्र जान बूझकर बड़े शातिराना तरीके से पोस्ट लिखते हैं। आरएसएस पर हमला करने की आड़ में हिंदुओं की ‘बहन-महतारी’ करते हैं। कई लोग मुझसे फोन करके कह चुके हैं कि ये आदमी आपकी फ्रेंडलिस्ट में क्यों है ? दरअसल ऐसी पोस्ट का अंजाम क्या होता है, मैं बताता हूं। उसमें एक मुसलमान लिखता है, बाकी मुसलमान पढ़ते हैं, वाह-वाह करते हैं, कई हिंदू पढ़कर कुढ़कर रह जाते हैं, कुछ से रहा नहीं जाता तो पोस्ट पर पहुंचकर तर्क-वितर्क करना शुरू करते हैं, तो वहीं कुछ सीधे ‘मां-बहन’ पर उतारू होते हैं। ‘मां-बहन’ करने वाले दोनों तरफ हैं। कोई डायरेक्ट परखनली से पैदा नहीं हुआ है, सबके घर में मां-बहन हैं।

दरअसल सोशल मीडिया को कई लोग अपने अपने तरीके से यूज कर रहे हैं। असली मुद्दे पर कोई आना नहीं चाहता। अपने मजहब वाले सही बात नहीं सिखा रहे हैं, सिर्फ डरा रहे हैं। दूसरे मजहब वालों से वो सीखना-पढ़ना चाहेंगे नहीं। खासतौर पर ये मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ ज्यादा हो रहा है, यही वजह है कि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मुसलमान उनका सर्वमान्य नेता नहीं बन पाया। क्षेत्रीय स्तर पर आजम, ओवैसी उभरे, लेकिन इन्होंने भी तो मुसलमानों का सिर्फ इस्तेमाल ही किया है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के एफबी वॉल से यह मैटर कापी कर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पैगम्बर के घर पर बुलडोजर क्यों चला?

अभी हाल में सऊदी अरब का दौरा करके लौटे हैं। सुना है उन्होंने अरब के बादशाह सलमान बिन अब्दुल अजीज को एक गजब का तोहफा दिया। वह केरल में दुनिया में अरब के बाहर बनी दुनिया की पहली मस्जिद की प्रतिकृति थी। इस मस्जिद को केरल के एक हिंदू राजा ने मुहम्मद साहेब के जीवनकाल में ही 629 ईसवी में बनवाया था। 14वीं सदी में मशहूर यात्री इब्नाबतूता वहां गया था और उसने लिखा कि मुसलमान वहां कितने सम्मानित हैं।

इस तोहफे को पाकर अरब के शाह कितने खुश हुए होंगे इसका अंदाजा मैं कतई नहीं लगा सकता। क्योंकि पिछले कुछ सालों में सऊदी सरकार ने वह तमाम ऐतिहासिक निशानियां मिटा दीं जो पैगम्बर मुहम्मद साहेब से जुड़ी थीं। मेरे एक मित्र पिछले साल हज से लौटे तो वह बहुत दुखी थे। उन्होंने बताया जहां कल तक पैगम्बर साहब के शुरूआती साथियों की कब्रें थीं वे अब नजर नहीं आतीं। कई ऐतिहासिक मस्जिदें जिन्हें हम पवित्र मानते थे वहां अब बिजनेस सेंटर या शाही परिवार का महल नजर आता है। कहीं-कहीं तो इन प्राचीन इमारतों को तोड़ कर भव्य पार्किंग बना दी गई।

राम का जन्म अयोध्या में हुआ इसके अब तक कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं क्योंकि यह हजारों साल पुरानी घटना है जिसके प्रमाण मिल पाना तकरीबन नामुकिन है। लेकिन मक्का में हजरत मोहम्मद पैगम्बर साहब का जन्म जिस घर में हुआ उसके तमाम पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं। क्योंकि यह घटना बहुत पुरानी नहीं। मोहम्मद साहेब का जन्म 570 ईसवी में हुआ था। इसमें कोई विवाद भी नहीं है। बाद में उसे लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया गया था। उस घर को गिरा दिया गया।

हजरत के दौर की कई मस्जिदें और इमारतें मक्का में अभी दो चार साल पहले तक मौजूद थीं जिन पर अरब के बादशाह ने बुलडोजर चला कर जमींदोज कर दिया। इसमें पैगम्बर की पहली नेकदिल बेगम खदीजा का घर भी शामिल था। इसमें इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर का घर भी शामिल है जहां आज होटल हिलटन खड़ा है। जिस ऊंची पहाड़ी की चोटी “फारान” से हजरत मोहम्मद साहब ने अपने पैगम्बर होने की घोषणा की थी, आज वहां सऊदी शाह ने अपना आलीशान महल बनवा दिया है। मक्का से लौटे अपने दोस्त की इस बात पर मुझे यकीन नहीं हुआ। मैंने अपने दूसरे हिन्दुस्तानी मुस्लिम दोस्तों से इस बारे में पूछा तो जैसी की उम्मीद थी उनका कहना था कि ये गप्प है बकवास है। मैंने नेट खंखाला तो उसमें इस तरह की कई सूचनाएं थीं। फिर भी मुझे यकीन नहीं हुआ तो मैंने सऊदी में रहने वाले अपने दोस्त रेहान भाई को फोन लगाया। उन्होंने मुझसे कहा ये सच है। मेरा दिल बैठ गया।

नेट पर ही मैंने सऊदी सरकार का इस पर बयान पढ़ा कि पैगम्बर साहब का मकान इन भव्य इमारतों के पास पार्किंग के स्थान में अवरोध पैदा करता था। इस मकान के कारण रास्ता तंग हो गया और वाहनों के आने-जाने में लगातार बाधा होती थी। इसलिए इस घर को ध्वस्त करना जरूरी हो गया था। हैरत की बात है कि पैगम्बर साहब का घर तोड़ते वक्त विरोध की एक भी आवाज दुनिया के किसी कोने से नहीं सुनाई दी। इस्लामिक जगत में ऐसी चुप्पी और खामोशी अजब है। मैंने अपने एक मुसलमान दोस्त से पूछा तो उनका जवाब था-किस मुसलमान में हिम्मत है कि वह अरब के शाह के खिलाफ आवाज उठाए। जो उठाएगा वह दोजख में जाएगा। उसकी आने वाली नस्लों का हज पर जाना बंद हो जाएगा। फिर आगे वह बोले कि वैसे इसमें गलत क्या है? पैगम्बर का पुश्तैनी घर, उनकी बेगमों के घर, पुरानी मस्जिदें, ये सब इमारतें हाजियों की सुविधा के लिए गिराई गईं। इस्लाम प्रतीक पूजा की इजाजत नहीं देता। हम मुसलमानों की श्रद्धा हज यात्रा में है प्रतीकों में नहीं।

मैंने सिर्फ तर्क के लिए कहा-फिर बाबरी मस्जिद के ढहाने पर पूरी दुनिया का इस्लाम नाराज क्यों है? उसके नाम पर क्यों दंगे हुए? कुछ उन्मादियों की हरकत के बदले सड़क पर दोनों तरफ के लोगों के खून क्यों बहाए गए? (हालांकि निजी तौर पर उसके ढहाए जाने को गैर अखलकी कदम मानता हूं क्योंकि हमारा संविधान इसकी इजाजत नहीं देता) वे जवाब नहीं दे पाए। मैं अपने अन्य मुस्लिम और कम्युनिस्ट दोस्तों से इस सवाल का जवाब मांगता हूं। इस्लाम की निशानियां मिटाने का विरोध क्यों नहीं होना चाहिए? अरब के ऐसे शाह का हाथ क्यों चूमा जाए जिसने इन पवित्र स्‍थानों को नेस्तानबूद कर दिया? उम्मीद है मुझे तर्कपूर्ण जवाब मिलेगा।

लेखक दयाशंकर शुक्ल सागर अमर उजाला अखबार के शिमला संस्करण के स्थानीय संपादक हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

द हिंदू के संपादक पद से मालिनी पार्थसारिथी का इस्तीफा, सुरेश नंबठ को अंतरिम प्रभार

इस प्रकरण के बारे में द हिंदू अखबार में छपी खबर इस प्रकार है>

Resignation of Editor & interim arrangements in place

Malini Parthasarathy has resigned as Editor of The Hindu with immediate effect. Suresh Nambath, National Editor, The Hindu, has been entrusted with the responsibility of managing the news and editorial operations of The Hindu until a new Editor is appointed.

The KSL Board has placed on record its appreciation of the contribution of Malini Parthasarathy as Editor of The Hindu. She will continue as a Wholetime Director of Kasturi & Sons Ltd.

N. Ram

Chairman of Kasturi & Sons Limited & Publisher of The Hindu

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

धार्मिक जनगणना के डाटा पर टीओआई और द हिंदू के इन शीर्षकों को गौर से पढ़िए

See how two of India’s leading newspapers have today reported the same data (of the latest Census)

Nadim S. Akhter : इसे देखिए, पढ़िए और समझिए. देश के दो प्रतिष्ठित अखबारों निष्ठा. किसकी निष्ठा पत्रकारिता के साथ है और किसकी चमचई में घुली जा रही है, खबर की हेडिंग पढ़ के समझा जा सकता है. मैंने कल ही फेसबुक की अपनी पोस्ट में लिखा था कि अलग-अलग चम्पादक, माफ कीजिए सम्पादक धार्मिक जनगणना के इस डाटा का अपने अपने हिसाब से इंटरप्रिटेशन करेंगे. आज फेसबुक पर एक ही खबर के दो एंगल, बिलकुल जुदा एंगल तैरता हुआ देखा तो आपसे साझा कर रहा हूं.

एक The Times of India नामक का देश का सबसे बड़ा अखबार है तो एक The Hindu नाम का प्रतिष्ठित अखबार. चूंकि टाइम्स ग्रुप में 6 साल नौकरी की है. Times Building में ही तो पता है कि वहां हेडिंग लगाने में कितनी मेहनत होती है. कितना इस पे विचारा और सोचा जाता है. नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी पत्रकार इसमें involve होते हैं. और अंत में हेडिंग सम्पादक-मुख्य सम्पादक को भी बताई जाती है. सो benefit of doubt के आधार पर Times of India को ये छूट नहीं दी जा सकती कि news editor या page one incharge यानी night editor टाइप की कोई चीज ने ये किया हो और ऊपर के लोगों को इसके बारे में पता ही ना हो. वो भी तब, जब अंग्रेजी वाले अखबार यानी Times of India पर विनीत जैन और समीर जैन की सीधी नजर होती है. मैं ये नहीं कह रहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडिंग गलत है. बस अखबार ने सरकारी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से कर दिया है.

The Hindu अखबार ने उसी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से किया है लेकिन हेडिंग पढ़कर पाठकों को लगेगा कि दोनों अखबार परस्पर विरोधाभासी हैं. कोई एक अखबार गलत सूचना दे रहा है. लेकिन ऐसा है नहीं. यही तो डाटा इंटरप्रिटेशन का कमाल है. चुनाव के वक्त ऐसे ही थोड़े सेफोलॉजिस्ट बैठकर मनमाफिक पार्टी को टीवी पर जितवा देते हैं. सब डाटा का ही तो कमाल होता है. अपने हिसाब से रिजल्ट निकाल लो. बहरहाल. पत्रकारिता के छात्रों के लिए ये खबर और दोनों अखबारों की हेडिंग एक केस स्टडी है. और भारतीय लोकतंत्र तथा चौथे खंभे के लिए आईना. अब ये आप है कि आप इन दोनों में से कौन सा अखबार रोज पढ़ना चाहेंगे. क्योंकि -दैनिक जागरण- पढ़ने वालों को -हिन्दुस्तान- अखबार रास नहीं आएगा. मेरी खुशकिस्मती कि मैंने इन दोनों अखबारी ग्रुप में भी काम किया है. घोषित तौर पर कुछ नहीं होता, बहुत कुछ अघोषित होता है.

Nietzsche ने सच ही कहा है- “There are no facts, only interpretations!”

कुछ समझे !!! लोकतंत्र का चौथा खंभा डोल रहा है. मन डोले-तन डोले. और धन तो सबकुछ डोलावे रे. पैसा खुदा तो नहीं पर उससे कम भी नहीं. जूदेव बाबू यूं ही नहीं कहे थे ये बात. अखबारों और टीवी चैनलों का अर्थशास्त्र समझे बिना पत्रकारिता के चौथे स्तम्भ की हकीकत कहां समझ पाएंगे आप !!! मैं ये नहीं कह रहा कि सबकुछ गंदा है, पर जो कुछ बचा है, उतना ही बचा रह जाए आगे तो ये इस लोकतंत्र के लिए शुभ होगा. जय हो!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

एक खास धार्मिक समुदाय की सकल जनसंख्या विकास दर 24 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत से भी 7 फीसद ज्यादा है

xxx

भारतीयों में भगवान-अल्ला के भरोसे अधिकाधिक बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति कम हो रही है

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडिया भी उसकी अंगुलियों पर नाच रहा

यह ‘सुपर पंच’ है! ‘मैं हिंदुओं को मारने आया था… मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है…!’ तमाम खबरों के माथे पर बैठे इस हेडिंग ने एक झटके में वह काम कर दिया, जो पिछले कई दिनों से लगातार कभी अचानक कलाम की मौत का संयोग तो उसके बरक्स सचेतन कभी याकूब को फांसी, कभी डीएनए तो कभी पोर्न जैसे शिगूफ़ों की कूथम-कुत्था नहीं कर पा रही थी…! अब ललित-गेट क्या था… व्यापमं का व्यापक घोटाला क्या था… जाति जनगणना का सवाल कहां गया… इन सब सवालों को गहरी नींद में सुला दिया जा चुका है…!

मुद्दों के शतरंज पर खेलना है तो आरएसएस-भाजपा के बरक्स जितनी भी ताकतें हैं, उन्हें अभी बहुत सीखना है! आरएसएस-भाजपा अपने विरोधियों को बच्चा समझ कर उनके साथ खेल रही है और उसके विरोधियों के साथ मीडिया भी उसकी अंगुलियों पर नाच रहा है!

कोई उपाय नहीं है। आप कह के देखिए कि इस कथित पकड़े गए आतंकवादी ने जो बयान दिया है, वह शक करने लायक है… वह दोनों में से किसी भी पक्ष की ओर से प्लांटेड हो सकता है…, आपको सीधे-सीधे ‘हिंदू विरोधी’ घोषित किया जाएगा और अगर आप कथित मुख्यधारा की राजनीति से परहेज नहीं करते तो आप अपना मुंह बचाते फिरेंगे। कर लीजिए सामना इस आरोप का कि ‘आप हिंदू विरोधी’ हैं। कोई भी प्रशिक्षित ‘मुसलमान’ आतंकवादी इतना अधकचरा नहीं होगा कि वह पकड़े जाने के बाद यह कहेगा कि ‘मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है…!’ अगर उसने ऐसा अपनी मर्जी से कहा है तो दो ही बातें होंगी- पहली, कि बेशक उसका दिमाग थोड़ा गड़बड़ होगा! अगर नहीं तो दूसरी कि यह सबूत है कि धार्मिकता के हथियार से किस हद तक दिमाग को नफरत और जहर से भर दिया जा सकता है। 

इस बयान के वीडियो में पीछे की साजिशों को अगर छोड़ भी दें तो राष्ट्रवाद की बेमानी दीवानगी के बरक्स यह धर्म के जहर से तैयार हुआ दिमाग है, जो खुद को गुलाम बनाने वालों के इशारों पर नाचते हुए एक गलीज मौत मरने को तैयार होकर कहता है कि ‘मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है!’

असल में यह मुद्दों के शतरंज पर उन बाकी तमाम मुद्दों से ध्यान भटकाने की चाल है, जो फिलहाल कामयाब हुई है। अब देखना यह है कि इसका जोर धीमा पड़ते ही अगला कौन-सा मुद्दा हवा में उछाले जाने को तैयार रखा गया है। लेकिन एक बात तय है कि मुद्दों के मैदान में पेवेलियन में बैठा ‘सट्टेबाज’ अपने राज के मुद्दे फेंकता है और मैदान में मौजूद खिलाड़ी उसी मुद्दे को फुटबॉल की तरह खेलने लगते हैं। वह सट्टेबाज बस थोड़े अंतराल पर सीटी बजाता रहता है।

अरविंद शेष के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

शामली में बजरंगदल के गुंड़ों द्वारा मुस्लिम युवक की पिटाई!

लखनऊ । रिहाई मचं ने जिला शामली में रियाज नाम के नौजवान को बजरंगदल के गुंडों द्वारा गोकशी के फर्जी आरोप में पुलिस की मौजूदगी में दो घंटे तक पूरे शहर में घुमा-घुमाकर बेल्ट, लात-घूंसों से पीटने को पूरे शहर को फिर से सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंकने की ताजा कोशिश बताया है। वहीं मुजफ्फरनगर में शहर कोतवाली बड़कली में गोविंद नाम के दलित युवक को पीटने, मुंह में पेशाब पिलाने और हाथों में कील ठोकने की घटना को सरकार की संरक्षण में सामंती उत्पीड़न बताया है।

मंच ने चेतावनी दी है कि अगर कल तक शामली शहर के पूरे पुलिस अमले को निलंबित नहीं किया गया, बजरंगदल के गुंडों को गिरफ्तार नहीं किया गया और बेगुनाह रियाज को रिहा नहीं किया गया तो कल 28 जून रविवार, शाम 4 बजे जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा, लखनऊ में प्रदर्शन के साथ ही पूरे शहर में इन घटनाओं पर नुक्कड़ सभाएं करके भाजपा और सपा के इस साम्प्रदायिक गठजोड़ को बेनकाब किया जाएगा। संगठन ने मिर्जापुर के निवासी पत्रकार अनुज शुक्ला के घर पर सपा विधायक के गुंडा तत्वों और पुलिस के सहयोग से दबंगों द्वारा जमीन कब्जा करने और घर पर आगजनी की कोशिश को प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ सपाई गुंडाराज का एक और उदाहरण बताया है।

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि शामली में जिस तरह बेगुनाह मुस्लिम नौजवान रियाज को पूरे दो घंटे तक बजरंगदल के गुंडे पुलिस की मौजूदगी में पीटते रहे उससे स्पष्ट हो गया है कि अगस्त-सितंबर 2013 की तरह पश्चिमी यूपी को सपा और भाजपा एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंकने की चुनावी तैयारी में जुट गई हैं। जिसकी पुष्टि इससे भी हो जाती है कि इस पूरे मामले पर शामली शहर के सीओ निशांत शर्मा ने बजरंगदल के गुंडा तत्वों के खिलाफ यह कहते हुए कार्रवाई करने से इंकार कर दिया है कि बजरंगदल के लोगों ने रियाज को पीटकर अच्छा किया है।

पुलिस का बजरंगदल के प्रति नरम रुख इससे भी पता चलता है कि घटना के दो दिन बाद उसने रियाज को पीटने वाले बजरंगदल के नेताओं विवेक पे्रमी, अनुज बंसल, संदीप गर्ग, आशु नामदेव, दीपू गिरी, सचिन गर्ग पर धारा 147, 323, 404 जैसी मामूली धाराएं लगाई हैं जबकि रियाज को बंधक बनाकर पीटे जाने के आपराधिक कृत्य का वीडियो भी वाइरल हो चुका है पर पुलिस ने उसके खिलाफ 342 और 353 ए जैसी ऐसे अपराध के लिए उपयुक्त धाराएं नहीं लगाई और न ही उन्हें गिरफ्तार तक किया गया।

रिहाई मंच नेता राजीव यादव ने कहा कि शामली में पुलिस ने जिस तरह से बजरंगदल को सरंक्षण देकर एक मुस्लिम युवक को पीटने और सांप्रदायिक आधार पर पूरे शहर में पूरे मुस्लिम समुदाय को गालियां देने की खुली छूट दी वहीं रियाज को थाने पकड़कर ले जाने के बाद एक गाय के बछड़े को शामली पुलिस ने प्रबंध कर झूठा केस तैयार किया वह यूपी पुलिस द्वारा सांप्रदायिकता फैलाने की प्रतिबद्धता की मिसाल है। जबकि रियाज को पीटे जाने का वीडियो जो वायरल हो चुका है उसमें कहीं पर भी कोई गाय या गाय का बछड़ा नहीं है। उन्होंने कहा कि पूरा पुलिसिया अमला बजरंगदल में तब्दील हो गया है। जिससे मुसलमानों, दलितों और अमन पसंद जनता में दहशत का माहौल
है।

मुजफ्फरनगर के शहर कोतवाली के बडि़कली में गोविन्द नाम के युवक को जिस तरह से पीट-पीटकर, हाथों में कील और मुंह में पेशाब करने की घटना सामने आई है वह यह साबित करती है कि सपा अपने गुंडा तत्वों को खुली छूट देकर जाति हिंसा और सांप्रदायिक हिंसा की दहशत का माहौल बना रही है। इस छूट का नतीजा पिछले दिनों मुरादाबाद में भी दिखा जब एक बीजेपी पार्षद ने हिंदू इलाके के मुस्लिम परिवार को मुहल्ले में नहीं रहने देने की धमकी दी और यहां तक कहा कि अगर मुसलमान यहां रहता है तो वे उन पर गोलियां बरसवा देंगे। पुलिस ने मुस्लिम परिवार को सुरक्षा मुहैया कराने के बजाए भाजपा नेता के दबाव में मुस्लिम परिवार के घर पर ही ताला बंद कर दिया है।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
(प्रवक्ता, रिहाई मंच)
09415254919

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

औवेसी बंधुओं की एमआईएम ने यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी फायदा पहुंचाने की कवायद शुरू कर दी!

Saleem Akhter Siddiqui :  औवेसी बंधुओं की एमआईएम उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। इस सिलसिले में उसके जिला स्तरीय नेता जगह-जगह सभाएं कर रहे हैं। कल ऐसी ही एक सभा में जाने का इत्तेफाक हुआ। वक्ताओं की उम्र 20 से 25 साल के बीच थी। उनका अंदाज-बयां सुनकर तोगड़ियाओं, साध्वियों, साक्षियों और भागवतों की याद आ गई।

अगर एमआईएम के नेता यह सोच रहे हैं कि हिंदूवादी नेताओं की शैली अपनाकर वह उत्तर प्रदेश में अपनी पैठ बना लेंगे, तो गलत सोच रहे हैं। ‘एक मुसलमान सौ पर भारी है’। या ‘हिंदुस्तान उनके बाप का नहीं है’ जैसे जुमलों से सिवाय भाजपा का हित करने से कुछ नहीं होगा। बोलने का सलीका सबसे पहले आना चाहिए। जोशीली तकरीरें करके तालियां हासिल की जा सकती हैं, वोट नहीं। महज मुसलमानों की राजनीति करके कहीं नहीं पहुंच पाएंगे। दो-चार सीटें निकाल लेंगे, तो पहाड़ नहीं तोड़ देंगे। हां, भाजपा को भारी फायदा पहुंचा देंगे।

मेरठ के पत्रकार और ब्लागर सलीम अख्तर सिद्दीकी के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उमेश उपाध्याय कल तक पर्दे के पीछे से रोल निभा रहे थे, अब सामने आ गए हैं

S.a. Naqvi : सीएनएन-आइबीएन नेटवर्क 18 के प्रेसिडेंट उमेश उपाध्‍याय तो शायद दिल्ली भजपा के प्रदेश अद्यक्ष सतीश उपाध्याय के भाई और मुकेश अम्बानी के मुलाज़िम हैं. कभी खबरदार करने वाले आईबीएन की चाल ही अब बदल गई है. उमेश कल तक पर्दे के पीछे से अपना किरदार अदा कर रहे थे, आज सामने आये तो चौंकने वाली बात नहीं. वंदना शिवा का इस मंच पर पहुंचना भी नहीं चौंकाता. एक पुरानी देसी कहावत है “कुछ लोगों के फितरत होती है जहाँ देखा तवा-परात वहीं गुज़ारी सारी रात” यानी सेल्फ स्टाइल्ड स्वम्भू मौका परस्त कभी भी और कहीं भी दिख सकते हैं. उनकी उपस्थति कभी चौंकाती नहीं.

वंदना शिवा जी कल तक कहाँ थी और आज कहाँ, यह कोई मायने नही रखता. भारत के इंटेलीजेंस ब्योरो (आईबी) ने देश को जिन कुछ “स्वयं सेवी संगठनों” की सूची सरकार को दी है जिन्होंने “एफसीआरए” के द्वारा विदेशों से धन इकट्ठा कर लूटा है उस काली सूची में वंदना शिवा का नाम भी है. पीएमओ ने मंत्रालयों को चिट्ठी लिख कर इनके खिलाफ कार्यवाही की सिफारिश की है. अगर “बबम-बम बोल” कहने पर मुसीबत का भार कुछ कम हो जाए और आगे रोटिया भी करारी सिंक जाए तब यह सब करने से फर्क क्या पड़ता है. वैसे भी यह कौन सा धर्मार्थ का काम कर रहे थे. गरीब – मासूम – भोले भाले एक्टिविस्टों के जज्बात से खेल कर अपनी कैपसिटी बिल्डिंग का ही तो काम कर रहे थे. अकूत चल-अचल सम्पतियों के मालिक मौसम के हिसाब से कपड़ों की तरह जहाँ देखा “फंड” वैसा ही मुद्रा बदला. अब तो किसी को रिझाने के लिए सिर्फ “हिन्दू” मात्र कहने या फिर तिलक-टीका या भगवा पहनने या फिर माला धारण कर ही कायनात को खुश किया जा सकता तो ऐसा करने में बुरा भी क्या है. जनाब भी तो इसी रास्ते चल रहे हैं. हम तो यही कहेंगे भाइयों, जरा जागते रहो, यह रात बहुत ही काली है.

एस. ए. नकवी ने उपरोक्त टिप्पणी फेसबुक पर प्रकाशित की है.

मूल पोस्ट….

विश्‍व हिंदू कांग्रेस के कुछ माननीय वक्‍ताओं में अंबानी के पत्रकार उमेश उपाध्याय भी!

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

विश्‍व हिंदू कांग्रेस के कुछ माननीय वक्‍ताओं में अंबानी के पत्रकार उमेश उपाध्याय भी!

Abhishek Srivastava :  आपने आखिरी वक्‍त में मुसलमां होना सुना होगा। अब पहली ही घड़ी में हिंदू होने वालों को भी देख लें। इसरो के पूर्व अध्‍यक्ष माधवन नायर, सीबीएसई के चेयरमैन विनीत जोशी, सीएनएन-आइबीएन नेटवर्क 18 के प्रेसिडेंट उमेश उपाध्‍याय, फिल्‍मकार प्रियदर्शन, स्पिक-मैके के संस्‍थापक किरन सेठ, पर्यावरणविद् वंदना शिवा, अर्थशास्‍त्री बिबेक देबरॉय और सुरजीत भल्‍ला समेत आइआइटी और आइआइएम के प्रेोफेसरों की लंबी कतार है जिन्‍होंने अपने ‘हिंदू’ होने की घोषणा कर दी है, जबकि ”हिंदू राष्‍ट्र” का दबाव अभी इतना नहीं है। ये तमाम लोग परसों संपन्‍न हुई तीन दिवसीय विश्‍व हिंदू कांग्रेस में वक्‍ता रहे।

इस देश की मानव संसाधन मंत्री तो एक कम पढ़ी-लिखी सामान्‍य सी अभिनेत्री हैं जिनका ज्‍योतिषी के पास और विश्‍व हिंदू कांग्रेस में जाना फिर भी ”निजी कर्म” माना जा सकता है। हम इस पर नेगोशिएट कर लेंगे, लेकिन क्‍या करें उनका जो ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों के जानकार लोग हैं? उनकी हिंदू अस्मिता क्‍यों उबाल मार रही है? बुद्धिजीवियों में वंदना शिवा अकेली नहीं हैं जो चौंकाती हें। पिछले साल की विश्‍व हिंदू कॉन्‍फ्रेंस की सूची देखिए, जीएम फसलों पर काम करने वाली जीन कैम्‍पेन की मुखिया सुमन सहाय ने भी वहां वक्‍तव्‍य दिया था।

दो दिन से स्‍मृति ईरानी के पीछे पड़ा मीडिया क्‍या इन नामों पर कुछ बोलेगा? नेता और मंत्री तो आते-जाते रहते हैं, उनकी बहुत चिंता नहीं। इस देश का कथित ‘इंटेलिजेंसिया’ जो हिंदू हुआ जा रहा है, वह कहीं ज्‍यादा बड़ा खतरा है। करोड़ों बच्‍चों का भविष्‍य तय करने वाले सीबीएसई के चेयरमैन को हटाने की मांग क्‍यों नहीं की जानी चाहिए?

युवा मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी की तरह मुलायम ने भी मुस्लिम विहीन गांव गोद लिया!

लखनऊ : मुलायम सिहं यादव द्वारा आजमगढ़ के मुस्लिम आबादी विहीन तमौली गांव को गोद लिए जाने पर रिहाई मंच ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि मुलायम सिंह भी मोदी की राह पर चल रहे है। मंच ने आरोप लगाते हुए कहा कि आरएसएस के सर्वे के आधार पर मोदी ने जिस तरह से वाराणसी के मुस्लिम आबादी विहीन जयापुर गांव को गोद लिया ठीक उसी सर्वे पर मुलायम ने भी मुस्लिम विहीन आबादी वाले गांव को ही चुना।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि सपा मुखिया और आजमगढ़ से सांसद मुलायम सिंह यादव द्वारा सांसद आदर्श योजना के तहत गोद लिए गांव तमौली में कुल 3632 लोगों की आबादी है, लेकिन इसमें एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता है। जबकि मुलायम सिंह यादव अपने को धर्मनिरपेक्ष और मुसलमानों के विकास के लिए समर्पित होने का दावा करते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों आए एक सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि भाजपा सांसदों ने संघ परिवार के सर्वे के आधार पर ऐसे ही गांव को गोद लिया है जिसमें मुस्लिम बिल्कुल नहीं हैं। ऐसे में मुलायम सिंह यादव द्वारा भी मुस्लिम विहीन गांव को गोद लेने से स्पष्ट हो जाता है कि मुलायम सिंह भी मोदी और आरएसएस की राह पर चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुलायम सिंह को अब छुप कर संघ परिवार का एजेंडा लागू करने के बजाए संघ परिवार द्वारा मुस्लिम विहीन गांवों के चयन वाले सर्वे को खुद जारी कर के एक बार में ही अपने धर्मनिरपेक्ष होने के भ्रम को तोड़ देना चाहिए।

मुस्लिम आबादी विहीन तमौली गांव को गोद लेने को मुलायम सिंह द्वारा अपने 75वें जन्मदिन पर संघ परिवार को तौफा देना बताते हुए रिहाई मंच आजमगढ़ के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि मुलायम सिंह को जवाब देना चाहिए कि संघ परिवार के सर्वे पर गांव को गोद लेकर वो क्या आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना जो मुसलमानों से उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन लेने और विकास की सरकारी योजनाओं से उन्हें अलग रखने की घोषणा करता है, उससे सहमत हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम विहीन गांव को गोद लेकर मुलायम ने साबित कर दिया है कि वह अकारण ही आडवानी की तारीफ नहीं करते हैं और उनकी मंशा भी पूरी तरह से संघ परिवार के सांप्रदायिक एजेण्डे को लागू करना है। जिस तरह से मुलायम सिंह ने मुस्लिम आबादी विहीन गांव को चुना है, उससे साफ है कि अगर सपा अपने विकास का खाका पेश करेगी तो ऐसी अल्पसंख्यक विरोधी उसकी और बहुत से योजनाएं जनता के सामने आ जाएंगी और उसका रहा सहा पोल भी खुल जाएगा। सपा सरकार ने गांवों का कैसे विकास किया है उसे हम सबने मुजफ्फरनगर-शामली में हुई सांप्रदायिक हिंसा में देख चुके हैं जहां दर्जनों गांव से मुस्लिमों की आबादी को पलायन करना पड़ा है। क्योंकि उन्हें इस बात का पूरा भरोसा था कि सपा सरकार उनकी महिलाओं-बच्चों के जीवन की रक्षा नहीं कर सकती।

रिहाई मंच के नेता राजीव यादव ने कहा कि आजमगढ़ के जिस गांव तमौली को गोद लिया गया है वह आजमगढ़ शहर से मात्र पांच किलोमीटर दूर है और आजमगढ़ के सैकड़ों पिछड़े गांवों से ज्यादा विकसित है। गौरतलब है कि तमौली गांव कभी भी पिछड़ेपन के कारण चर्चा में नहीं रहा है बल्कि पिछले कुछ सालों में अपराधिक गतिविधियों से जुड़े कुछ लोगों के कथित एनकाउंटर के कारण सुर्खियों में रहा है। जिससे उपजे सपा सरकार के प्रति नाराजगी को संतुलित करने की यह कोशिश मात्र है। यानी विकास के नाम पर मुलायम सिंह आपाराधिक तत्वों के हितों को साधने का काम कर रहे हैं, जैसा कि उन्होंने सपा के शुरुआती दिनों में रमाकांत यादव, दुर्गा यादव, उमाकांत यादव, अंगद यादव जैसे आपराधिक छवि के नेताओं को सामाजिक न्याय के नाम पर पाला पोस कर किया था, जिसने रमाकांत जैसे साम्प्रदायिक तत्वों को जन्म दिया। जिसके चलते इस पूरे इलाके में आतंक का माहौल कायम हुआ जो जातीय और सांप्रदायिक तनाव में भी विकसित हुआ। उन्होंने कहा कि सपा के मुख्य जनाधार यादवों को समझ लेना चाहिए कि मुलायम तमौली गांव को विकास के लिए नहीं बल्कि अपनी जातीय आपराधिक राजनीति को साधने के लिए कर रहे हैं जिसका नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ेगा।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता रिहाई मंच
09415254919

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या हिंदू ब्राह्मणों ने भी कर्बला की लड़ाई में हिस्सा लिया था ?

हिंदुस्तान के सभी धर्मों में हज़रत इमाम हुसैन से अकीदत और प्यार की परंपरा रही है. घटना कर्बला के महान त्रासदी ने उदारवादी मानव समाज हर दौर में प्रभावित किया है. यही कारण है कि भारतीय समाज में शहीद मानवता हज़रत इमाम हुसैन की याद न केवल मुस्लिम समाज में रही है बल्कि ग़ैर मुस्लिम समाज में मानवता के उस महान नेता की स्मृति बड़ी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है. भारतीय सभ्यता जिसने हमेशा मज़लूमों का साथ दिया है घटना कर्बला के महान त्रासदी से प्रभावित हुए बगैर ना रह सकी. भारतीय इज़ादारी एक व्यक्तिगत स्थिति रखता है, जो सांस्कृतिक परंपरा न केवल मुसलमानों में स्थापित है बल्कि हिन्दो हज़रात भी इसमें भाग लेते हैं. भारतीय पूर्व राजवाड़ों में हिन्दो हज़रात यहाँ इमाम हुसैन से अकीदत की ऐतिहासिक परंपरा मिलती हैं जिसमें राजस्थान, ग्वालियर “मध्य प्रदेश”, बंगाल मुख्य है.

हिंदुओं में एक परिवार या समुदाय हुसैनी ब्राह्मण भी कहलाता है. प्रसिद्ध लेखक इंतजार हुसैन अपने अंग्रेजी स्तंभ Brahmans in Karbala में लिखते हैं कि वह पहले हुसैनी ब्राह्मण केवल हिंदू कहानी (Legend) ही समझते थे इसलिए उन्होंने अपने प्रवास दिल्ली में किसी महफ़िल में भाषण करते हुए इस बात को झुठला दिया. वहीं महफ़िल में एक महिला प्रोफेसर नूनीका दत्त उठी और उन्होंने कहा कि वह खुद हुसैनी ब्राह्मण और उनके परिवार से संबंध रखती है. इंतजार हुसैन ने नूनीका दत्त से पूछा कि मानो आप लोग मुसलमान हो गए हैं. उन्होंने कहा कि कभी नहीं. हम हिंदू ब्राह्मण ही हैं मगर हुसैनी होने के नाते हम मंदिरों आदि में नहीं जाते न दूसरी हिन्दवानह संस्कार खेलते हैं और यह कि वह मुहर्रम के दिनों में शहीदों की याद भी मनाते हैं.

प्रसिद्ध ज़माने फिल्म अभिनेता, हर दिल अज़ीज़ सामाजिक सेवक और लोकप्रिय राजनीतिक नेता स्वर्गीय सुनील दत्त अपने हुसैनी ब्राह्मण कहते थे. रसूल छोटे नवासे इमाम हुसैन इतिहास मानवता पहला और शायद आखिरी बच्चा है जो जन्म पर परिवार रोया. रसूल खुद रोए जब जिब्राईल अमीन इमाम हुसैन का जन्म पर बधाई के साथ यह बताया कि उस बच्चे को कर्बला के मैदान में तीन दिन का भूखा प्यासा अपने 71 साथियों के साथ शहीद हो जाएगा और इस परिवार की महिलाएं और बच्चे कैद कर दरबदर फिराए जाएंगे. जैसा कहा गया सुनील दत्त अपने हुसैनी ब्राह्मण कहते थे. उनका कहना था कि हमारे पूर्वजों की संतान नहीं थी. रसूल के समझजज़ों को सुनकर वह उनके पास पहुंचे तो इमाम हुसैन खेल रहे थे. रसूल ने कहा कि आप उनके लिए प्रार्थना करो. हुसैन ने अपने नन्हे हाथ ऊंचा किया और प्रार्थना की और उनके बच्चों हुई. तभी से लोग अपने हुसैनी ब्राह्मण कहने लगे.

हुसैनी ब्राह्मण दरदना भट्टाचार्य के वंशज थे. उनमें आत्माभिमान, बहादुरी, और रहमत कोट कोट कर भरी थी. कहा जाता है कि कर्बला में हुसैन की शहादत की खबर सुनी तो हुसैनी ब्राह्मण 700 ई. में इराक पहुंचे और इमाम हुसैन का बदला लेकर लौटे. याद रहे कि कर्बला की घटना 680 ई. में हुआ था. इस्लाम का संबंध बहुत पुराना है. रसूल बड़े नवासे इमाम हसन के समय से ही अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते केरल की बनदगाह आते. ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती जो ख्वाजा अजमेर के नाम से प्रसिद्ध हैं अजमेर आए. यह इमाम हुसैन के परिवार से थे और हिंदुस्तान आने पर धार्मिक रवादाती लोगो कहलाए. आज भी उनके मजार पर हर धर्म के मानने वाले आते हैं. उनके मंदिर के अध्यक्ष दरवाजे पर फारसी भाषा में लिखे गए उनके चारों मसरावं में इमाम हुसैन की महानता और उनके उद्देश्य की ऊंचाई बड़े आम समझ शब्दों में इस प्रकार समझाया है

झांसी की रानी महारानी लक्ष्मी बाई को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से असाधारण आस्था थी. प्रोफेसर रफ़ेिह शबनम ने अपनी पुस्तक ‘भारत में शिया और ताजिया दारी ” मैं झांसी की रानी के संबंध में लिखा है कि” यौमे आशूरा और मुहर्रम के महीने में लक्ष्मी बाई बड़े आस्था के साथ मानती थी और इस महीने में वे कोई भी ख़ुशी वाले काम नहीं करती थी

मुंशी जवालह प्रसाद अख्तर लिखते हैं कि” राज्य अवध में इमाम हुसैन की सेना के सेनापति और वाहक हज़रत अब्बास के नाम का पहला झंडा अवध की धरती से से उठा जिस के उठाने का श्रेय मुगल सेना के एक राजपूत सरदार धरम सिंह को जाता है . .लखनऊ के प्रसिद्ध रौज़ा” काज़मैन” एक ऐसे हिंदू श्रद्धालु जगन्नाथ अग्रवाल ने बनवाया था. इसी तरह राजा झा लाल रौज़ा आज भी लखनऊ के ठाकुर गंज मुहल्ले में स्थित है

समकालीन प्रख्यात पत्रकार जमनादास अख्तर कहते हैं कि” मेरा संबंध मवहयालयों की दत्त जाति से है और हमें हुसैनी ब्राह्मण कहा जाता है. ाशोरह को हम शोक मनाते हैं. कम से कम मेरे परिवार में उस दिन खाना नहीं खाया है. श्रीनगर के इमामबाड़े में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का मुंए मुबारक मौजूद है जो काबुल से लाया गया है. एक हुसैनी ब्राह्मण उसे सौ साल पहले काबुल से लाया था.”

प्रेमचंद का प्रसिद्ध नाटक ‘कर्बला’ सही और गलत से पर्दा उठाता है. इसी तरह उर्दू साहित्य में ऐसे हिंदू कवियों की संख्या कुछ कम नहीं जो अपनी रचनाओ में कर्बला के बारे में जिक्र न किया हो ऐसे सक्षम ज़करशिरा बीजापुर के रामारा?, बी दास मुंशी चखनो लाल दलगीर, राजा बलवान सिंह, लाला राम परशादबशर, दिया किशन री्षान, राजा उल्फत राय, कंवर धनपत राय, खनोलाल जार, दलोराम कौसर, नानक लखनवी, मिनी लाल जवान, रूप कुमारी, ीोगीनदरपाल साबरजूश मलेशानी, मुंशी गोपीनाथ शांति, चकबसत, बावा कृष्ण मगमोम, कंवर महेंद्र सिंह बेदी सहर, कृष्ण बिहारी, डॉ. धर्मेंद्र नाथ, माथरलिखनवी, महीनदरसनघ अश्क, बाँगेश तिवारी, गुलज़ार देहलवी, भवन मरवहवी आदि ने इमाम हुसैन की अक़ीदत में बहुत से कविताये लिखी है जिस में उन का अक़ीदा झलकता है.

. सरदार धरम सिंह संबंध सिख धर्म था और वे सख्ती से गुरू नानक की शिक्षाओं का पालन करते थे, उन्होंने कई बार हज़रत इमाम हुसैन के हवाले से बात करते हुए गुरू नानक का अपने मुरीद के साथ होने विला संवाद दोहराया जो बाबा गुरु नानक ने मुरीद कहा कि हजरत इमाम हुसैन का गम मनाया करो, जब मुरीद ने अनिच्छा का प्रदर्शन किया तो गुरू नानक ने कहा कि हुसैन मुसलमानों के ही नहीं विवेक वालों के गुरु हैं, इसलिए उनका शोक मनाना हर इंसान पर लाज़िम है. अवध राज्य में लखनऊ की ताजियादारी विशेष महत्व मिली है. मुहर्रम के मजलसों और जलूसों में में हिंदुओं की भागीदारी भारतीय साझा संस्कृति का एक नमूना है और हिन्दू – मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने में अहम रोल अदा करता है.

लेखक अफ़ज़ल ख़ान शारजाह (यूएई) में कार्यरत हैं. कसौटी टीवी से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क kasautitv@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कुछ ईसाइयों ने कुछ कुत्सित हिंदुओं के साथ मिल कर दुर्गा को ‘वेश्या’ साबित करने की कोशिश की है

( File Photo Samarendra Singh )

Samarendra Singh : इन दिनों मेरे पास कुछ ई-मेल आ रहे हैं महिसासुर के बलिदान को लेकर। यह किसी दंगाई की सोच रही होगी जिसे लगता होगा कि वह इतिहास दुरुस्त कर देगा। ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोग अयोध्या में इतिहास दुरुस्त करना चाहते हैं। अरे भई अब तक कोई ऐसा क्रांतिकारी पैदा ही नहीं हुआ जो अतीत को करेक्ट कर सके। फिर यह तो अतीत भी नहीं … अतीत का एक धार्मिक मिथक है। मैं इस दंगाई सोच का विरोध करता हूं और उन तमाम क्रांतिकारियों से अपील करता हूं कि मुझे ई-मेल नहीं भेजा करें। मुझे शांति से जीने दें। इस ई-मेल में संविधान का हवाला दिया गया है। तो क्या संविधान यह इजाजत देता है कि कोई मूर्ख किसी के भगवान या खुदा का अपमान करे? क्या यह अधिकार मुझे है कि किसी दिन मैं किसी भी धर्म के नायक को अपराधी करार देते हुए उसके विरोधियों को खुदा घोषित कर दूं?

Samarendra Singh : इस देश में छिछोरों की कोई कमी नहीं है. दंगाई की भी कोई कमी नहीं है. लेकिन यहां एक तबका ऐसा है जो दंगाइयों से भी ज्यादा घिनौना है. यह तबका बौद्धिक खोल में छिपा रहता है. इसका काम है वह आधार तैयार करना जिससे दंगा हो. यह तबका बडे़ ही महीन तरीके से धर्मनिरपेक्षता का खून करता है और अपनी अय्याशियों का सामान इकट्ठा करता है. ऐसा ही एक तबका इन दिनों फॉरवर्ड प्रेस नाम की किसी कुत्सित संस्था से जुड़ा हुआ है. यह फॉरवर्ड प्रेस किसका है? यह फॉरवर्ड प्रेस एक ईसाई का है. एक ईसाई व्यक्ति और संस्था का हिंदू देवी देवताओं से क्या लगाव हो सकता है? यह सवाल करने पर सारी तस्वीर साफ हो जाती है.

इस संस्था के पास कुछ खास किस्म के बुद्धिजीवियों ने (जो दरअसल बेहद क्रूर और शातिर किस्म के व्यक्ति हैं) अपना जमीर गिरवी रख दिया है. लेकिन जमीर गिरवी रखना और निजी लाभ के लिए दंगा भड़काने की साजिश रचना दोनों दो बाते हैं. इन बुद्धिजीवियों ने जमीर गिरवी रखने के साथ दंगा भड़काना भी शुरू कर दिया है. मतलब यह सारे बुद्धिजीवी जिन्होंने उस ई-मेल पर अपने हस्ताक्षर किया है या फिर अपना समर्थन दिया है वह सब मेरी नजर में गुजरात के दंगाइयों की तरह ही घृणित, क्रूर और वहशी हैं. और जिस तरह का वह लेख है, जिसमें हिंदू धर्म की “शक्ति” को अपमानित किया है और महिषासुर के जांघों पर बैठा दिखाया गया है और “वेश्या” बताया गया है … उससे यह जाहिर होता कि यह सब बीमार मानसिकता वाले व्यक्ति हैं… जिन्हें संविधान का जरा भी इल्म नहीं है. इन्हें तो यह भी इल्म नहीं कि यह इतिहास और धार्मिक मिथकों को बदलने की जिस परंपरा की नींव डाल रहे हैं उसके कितने खतरनाक नतीजे निकलेंगे.

जिस तरह कुछ ईसाइयों ने कुछ कुत्सित हिंदुओं के साथ मिल कर दुर्गा को “वेश्या” साबित करने की कोशिश की है और उस प्रकरण के समर्थन वाले पत्र पर कुछ मुसलमानों ने भी दस्तखत किए हैं… उसी तरह भविष्य में कोई हिंदू या मुसलमान ईसा मसीह या फिर कोई हिंदू और ईसाई पैगंबर मोहम्मद के बारे में इसी तरह ओछी और घृणित बातें लिख सकता है!! तब भी क्या वह संविधान के दायरे में लिखी गई बात होगी?? इसलिए आज जो कोई भी इस प्रकरण में फॉरवर्ड प्रेस का समर्थन कर रहा है, वह मेरी नजर में दंगाइयों से ज्यादा घृणित है. मैं उन सब पर लानत भेजता हूं. और उनमें से कुछ जो मेरी फ्रेंड लिस्ट में थे आज उन्हें इस हक से बेदखल करता हूं.

एनडीटीवी में काम कर चुके पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: