इंडिया टीवी के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने राजदीप, रवीश, अभिसार से लेकर पुण्य प्रसून तक को यूं पानी पी-पी कर गरियाया, पढ़ें

Abhishek Upadhyay

सारे दौलतमंद पत्रकार आज दहाड़ें मारकर रो रहे हैं। राजदीप सरदेसाई। सागरिका घोष। कमर वाहिद नक़वी। रवीश कुमार उर्फ रवीश पांडे। ओम थानवी। इनमें से सबकी आमदनी 30 फीसदी की सर्वोच्च आयकर सीमा के पार है। क्या कभी आपने इन्हें किसी स्ट्रिंगर के निकाले जाने पर आंसू बहाते देखा है? कभी किसी आम पत्रकार के निकाले जाने पर इन्होंने छाती पीटी है? Continue reading

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आज़म खान की वक़्फ़ लूट का पर्दाफाश करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने सीबीआई जांच आदेश के बाद नए खुलासे किए

अभिषेक उपाध्याय

Abhishek Upadhyay : आज़म खान के मामले में सीबीआई जांच के आदेश हो गए। करीब दो माह पहले तीन किस्तों में आज़म खान की वक़्फ़ लूट का पर्दाफाश किया था। आज़म बुरी तरह बौखला गए थे। पूरे रामपुर में इंडिया टीवी के पोस्टर लगाकर गालियां दीं। प्रेस कॉन्फेंस कर धमकी दी। आज़म के ख़िलाफ़ जो मामले सामने आए थे, उनका शिकार मुसलमान ही थे। वही मुसलमान जिनकी मसीहाई का दावाकर आज़म सालों साल सत्ता की मलाई खाते रहे।

सबूतों समेत एक से बढ़कर एक गम्भीर आरोप। गरीब मुसलमानों की जमीनें हड़प कर। उन्हें रातों रात धक्के मारकर। बेघर कर। यतीमखाने की सम्पत्ति नेस्तनाबूद कर। कब्रिस्तान से कब्रें खुदवाकर उसकी मिट्टी से अपनी अली जौहर यूनिवर्सिटी की सड़कें पटवाकर। आज़म ने अपने ऐशो आराम का साम्राज्य खड़ा किया था।

आलम ये था कि 50 करोड़ की वक़्फ़ सम्पत्ति आज़म की बीबी के ट्रस्ट के नाम सिर्फ एक रुपये के किराए में हड़प ली गई। जिन गरीबों को बेघरकर ज़मीने हथियाई गईं, उन्हें घरों से अपने बर्तन तक निकालने की मोहलत नही दी गयी। उनके बच्चे कड़कड़ाती ठंड में ठिठुरते रह गए। आगरा, इलाहाबाद, बरेली, लखनऊ, रामपुर एक के बाद दूसरे शहरों में अरबों की वक़्फ़ प्रॉपर्टी की लूट हुई। जिसने विरोध किया उसे पुलिस के दम पर अंदर कर दिया गया।

आज़म के इस कहर से कोई नही बचा। न शिया। न सुन्नी। शिया, सुन्नी दोनों ही वक़्फ़ बोर्ड के भीतर सम्पत्तियों की लूट का नंगा नाच हुआ। पुलिस, प्रशासन से उगाहीकर अली जौहर यूनिवर्सिटी की नींव मजबूत की गई। जगह जगह ज़मीन रजिस्ट्रियों पर आज़म की पत्नी और बेटे की तस्वीरें मिलीं।

आज भी मेरे मोबाइल की contact list में उन मुसलमानों के नम्बर भरे पड़े हैं जो आज़म की दबंगई और ज़मीन लूट के आगे हाथ जोड़कर बेबस हैं। ये एक उदाहरण है कौम की बात करने वालों की कथित मसीहाई का। ऐसी मसीहाई जो अपनी ही क़ौम को सताकर उसकी तकलीफों की ईंट से अपने ऐशो आराम का महल खड़े करने के काम आती है। पर ये भी सच है कि आहों का असर ज़रूर होता है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि सीबीआई जांच में इन बेसहारा, गरीब आहों को इंसाफ़ मिले और हर बात में आंख मूंदकर क़ौम का झुनझुना बजाने वालों की आंख खुले।

इंडिया टीवी के तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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आज 17 मई, आज अनुराग तिवारी का जन्मदिन… लेकिन यह युवा आईएएस नहीं रहा… अलविदा दोस्त

Abhishek Upadhyay : आज अनुराग का जन्मदिन है। सुबह से सोच रहा था, कि अब फोन मिलाऊं। अच्छा नहा लूं। फिर मिलाता हूं। पूजा रह गई है। वो करके तफ्सील से बात करूंगा। जब तक मोबाइल हाथ में उठाया, 9.45 हो चुके थे। टीवी चल रही थी। अब तक लखनऊ में एक आईएएस की मौत की खबर ब्रेकिंग न्यूज बनकर चलना शुरू हो चुकी थी। मैं पागलों की तरह चैनल बदल रहा था। गलत खबरें भी चल जाती हैं, कभी-कभी। मगर हर चैनल पर वही खबर। कर्नाटक काडर का आईएएस अधिकारी अनुराग तिवारी।

मेरा बचपन का दोस्त। मेरे ही चैनल पर उसके न होने की खबर। हम दोनो का जन्मदिन एक दिन के फासले पर होता है। कुछ दिन पहले ही बात हुई थी। आईएएस एकेडमी मसूरी में था। मुझसे बोला कि 16 मई को तुझे फोन करूंगा और कमीने 17 को तुम याद कर लेना। इतनी प्यार भरी चासनी में घोलकर वो “कमीने” बोलता था कि लगता था इस एक लफ्ज के बगैर ये दोस्ती ही अधूरी है। 16 को उसका फोन नही आया। 17 को मैं फोन कर सकूं, इसकी खातिर बहुत कम वक्त दिया उसने। अभी पूरा दिन पड़ा है और मैं हाथों में मोबाइल लिए उसका नंबर देखे जा रहा हूं। ये फोन अब किसको करूं?

कर्नाटक में बीदर जिले का डीसी (डिप्टी कमिश्नर)/कलेक्टर था अनुराग। 36 साल के इस युवा आईएएस ने सूखे से बुरी तरह प्रभावित बीदर की तस्वीर बदलकर रख दी थी। कुएं/तालाब/बावड़ी की सफाई से लेकर टैकरों से पानी पहुंचाने तक, इस लड़के ने बीदर को उम्मीद की नई शक्ल दे दी थी। पूरे कर्नाटक में बीदर मॉडल की चर्चा थी। अनुराग अक्सर फोन करता और कहता, “कमीने, ये जो सेंसेशन जर्नलिज्म करते रहते हो, कभी इधर भी आओ, देखो जमीन पर कितना अच्छा काम रहो रहा है।”

मेरे एक से जवाब, “बहुत जल्दी आउंगा मेरे भाई, बहुत सी बातें करनी है तुझसे” को सुनकर वो पहले 20-25 प्यार भरी गालियां बकता फिर बोलता, “सुन बे, माल्या के बारे में बड़ी टाप की खबर है यहां, पर साले पहले आना होगा, फिर बताउंगा।” हम दोनो देर तक हंसते रहते। मसूरी में जब बात हुई तो उसने पहली बार पत्नी से अलगाव की बात बताई। मैने जैसे ही पूछा कि पर हुुआ क्या, वो फिर शुरू हो गया, “अबे ये जिंदगी है, सुख-दुख लगे रहते हैं, तुम मसूरी आ जाओ। गजब का मौसम है, इस समय। आओ, बेटा, जमकर घूमाता हूं तुम्हें।” उसने बात टाल दी। मैने फिर कुछ नही पूछा।

अनुराग तिवारी (फाइल फोटो)

उसने मुझे बताया था कि कुछ दिन बाद मसूरी से लखनऊ जाना है, तो दिल्ली होते हुए जाएगा। दिल्ली में मिलना तय हुआ था। आज 17 मई है। अनुराग तिवारी का जन्मदिन। बहराइच में सेंवेंथ डे स्कूल में हॉफ पैंट पहनकर पढ़ने जाता अनुराग। महाराज सिंह इंटर कालेज के मैदान में फुटबाल खेलने के दौरान, अचानक घूमकर आई क्रिकेट की लेदर वाली बाल की चोट से सन्न हो चुके मेरे सिर को देर तक गोद मे लेकर बैठा अनुराग। दीप यज्ञ में साथ-साथ गांठ जोड़कर बैठता अनुराग। एक के बाद दूसरी तस्वीरें।

लखनऊ पुलिस का इंवेस्टीगेशन जो भी कहे, जिस अनुराग को मैं जानता हूं, वो कभी भी किसी डिप्रेशन या तनाव से नहीं हार सकता। जबरदस्त इच्छाशक्ति और खुशनुमापन था मेरे दोस्त में। ये जिंदगी बड़ी अतार्किक होती है। कब तक है और कब नही, ये भी मालूम नही होता। हम सब उसी सफर के यात्री हैं जिसे वो समय से पहले पूरा कर गया। ये 17 मई ठहर गई है। ये अब कभी आगे नही बढ़ेगी। जन्मदिन की मुबारकबाद का लफ्ज मेरे होठों पर अटका हुआ है, ये भी यहीं अटका रहेगा। गति की इस दुनिया में ठहराव का भी एक निर्मम सच होता है। बेहद ही निर्मम। अलविदा दोस्त।

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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इंडिया टीवी के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के नाम खुला ख़त…

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी


प्रिय अभिषेक उपाध्याय

बीते एक हफ्ते में आपने फेसबुक पर जो कुंठा ज़ाहिर की है, उससे अब घिन आने लगी है। सुना है आपने खाना-पीना छोड़ दिया है। खुद को संभालिये, आप ‘वो’ नहीं बन सकते इस सच को जितनी जल्दी स्वीकार लेंगे आपको आराम हो जाएगा। लकीर को मिटाकर बड़ा नहीं बन सकते आप, आपको बड़ी लकीर खींचना सीखना होगा, अपने सीनियर्स से सीखिये उन पर कीचड़ मत उछालिये। हालांकि इस मामले में आपकी चुस्ती देखकर मुझे अच्छा भी लग रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे ‘स्वर्ग की सीढ़ियां’, ‘नाग-नागिन का डांस’ और ‘क्या एलियंस गाय का दूध पीते हैं’ जैसी स्टोरीज़ में अब आपकी दिलचस्पी कम हो गई है। ये अच्छा संकेत है, मुबारकबाद।

आपकी हालिया पोस्ट पढ़कर महसूस हो रहा है जैसे पत्रकारिता की दुनिया में एक नए नारीवादी पत्रकार ने जन्म लिया है, जो महिला के एक आरोप भर से इतना आहत है कि खाना पीना छोड़ दिया है, सड़क पर बदहवास होकर दाएं-बाएं भाग रहा है, लेकिन फिर मैं ये सोचकर उदास हो जाता हूं कि काश ये क्रांति की ज्वाला थोड़ा पहले जल गई होती तो उस दोपहर आपको प्रेस क्लब में आपके आका रजत शर्मा के लिए किसी बाउंसर की तरह बर्ताव करते न देखता, जिन पर और जिनकी पत्नी पर इंडिया टीवी की एंकर ने गंभीर आरोप लगाए थे।

आरोप भी वही थे जो अब आपको ना काबिले बर्दाश्त लग रहे हैं। वो एंकर मेरी सहकर्मी भी रह चुकी हैं इसलिए मैं समझता हूं कि वो किस पीड़ा से गुज़री थीं जब उन्होंने फेसबुक पर अपना सुसाइड नोट लगाया था। इंडिया टीवी पर तब उस ख़बर के न चलने पर आपने छाती नहीं पीटी थी। काश आपका नारीवाद तब अपने मालिक के नमक का हक अदा करने न गया होता तो कितना अच्छा होता, वैसे मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं आप नारीवाद के झंडाबरदार के तौर पर अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं तो कराइये लेकिन उससे पहले अपने अंदर के जातिवाद के मैल को साफ कीजिए। आपकी हालिया पोस्ट में आप रवीश कुमार को ये कहकर टारगेट कर रहे हैं कि वो रवीश पांडेय है तो पांडेय क्यों नहीं लगाते? पढ़ाई-लिखाई सब बेच खाई है क्या? ये भी कोई गुनाह है?

मेरा दरख्वास्त है आपसे कि फैज़, दुष्यंत कुमार और बाबा नागर्जुन का नाम बार-बार लेने से परहेज़ कीजिए उनकी आत्माएं तड़पती होंगी। ओम थान्वी जैसे वरिष्ठ पत्रकार के शरीर का मज़ाक उड़ाते हुए उन्हें थुलथुल थान्वी लिखते हुए आपको शर्म आई होगी या नहीं, इस पर अलग से बात की जा सकती है लेकिन हां, कभी अकेले में आइने के सामने खड़े होकर खुद से पूछिएगा कि जिस पत्रकारिता के उसूलों की फिक्र में आप दुबले हुए जा रहे हैं वो तब कहां गए थे जब क़मर वहीद नकवी साहब ने आपके संस्थान से इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि आप प्रधानमंत्री का पेड इंटरव्यू चला रहे थे? तब वो मशालें कहां छुपा दी थी आपने जिन्हें अब झाड़-पोंछ कर सुलगा रहे हैं।

मैं मानता हूं आपके लिए नौकरी बड़ी चीज़ है, घर-परिवार की ज़िम्मेदारी है, मकान की किश्तें हैं, बच्चों की स्कूल फीस है लेकिन फिर भी आपको इतनी हिम्मत तो दिखानी चाहिए थी कि एक बार अपने मालिक से पूछते “सर, आपको ‘कला और साहित्य’ में पद्म भूषण तो मिला है लेकिन कला-साहित्य में आपका क्या योगदान है?” मानता हूं डर लगता होगा आपको, लेकिन सारी दिलेरी सिर्फ अपनी कुंठा निकालने के लिए दिखाना ग़लत है, धोखेबाज़ी है। आपकी घटिया और दो कोड़ी की फूहड़ कविताएं अक्सर फेसबुक पर देखते हुए नज़रअंदाज़ करता था लेकिन अब आप पोस्ट से भी गंदगी फैला रहे हैं इसलिए लिखना पड़ा। उम्मीद है आप खाना-पीना वापस खाना शुरू कर देंगे, इतनी नाराज़गी ठीक नहीं है।

अपना ख्याल रखें
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

विभिन्न टीवी चैनलों में काम कर चुके जमशेद कमर सिद्दीक़ी फिलहाल ‘गाँव कनेक्शन’ में स्पेशल कॉरसपोंडेट हैं। वो रेड एफएम के लिए कहानियां भी लिखते हैं। इनसे jamshed@gaonconnection.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो क्या अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे?

Abhishek Upadhyay : ये अखबार वाले भी न। ये भी नही समझते एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के प्रताप को। अब कल मैंने जो लिखने से मना किया था। आज वही छाप दिए। दंग हूँ मैं आज का टाइम्स ऑफ़ इंडिया पढ़कर। ये तो खबर छाप दिए है बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष और बिहार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के बेहद करीबी ब्रजेश पांडेय सेक्स स्कैंडेल में फंसे। पद से इस्तीफ़ा दिए। रेप के साथ-साथ पॉस्को (बच्चों का शोषण वाली धारा) भी लगा। हाँ हाँ वही। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय (उफ़ ये आदत), माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के सगे बड़े भाई ब्रजेश पांडेय।

अरे टाइम्स ऑफ़ इंडिया वालों, तुम्हारी मति मारी गई है। अभी रवीश कुमार ने इस मामले में चुप्पी तोड़ी नही और तुम ख़बर छाप दिए। अरे रवीश कुमार चुप हैं, इसका मतलब कि वो दलित लड़की झूठी है। मतलब कि वो साजिश कर रही है। जो आरोप लगा दी है। और बिहार पुलिस की सीबीसीआईडी भी वाकई में पगलाए गई है जो अपनी जांच में प्रथम दृष्टया आरोप सही पाय रही है। सुन लो, ऐ दुनिया वालों, सूली पर टांग दो ऐसी दलित लड़कियों को जो रवीश कुमार के भाई पर। जो रवीश कुमार के परिवार पर। कोई आरोप लगा दें। अब बताओ इतनी बड़ी बात हुई है। बिहार कांग्रेस का प्रदेश उपाध्यक्ष दलित बच्ची के यौन शोषण में फंसा है। सेक्स रैकेट का मामला अलग है। पॉस्को अलग लगा है। बिहार पुलिस तलाश रही है। वो फरार अलग है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया से लेकर आजतक चैनल तक। सब अब तक इस ख़बर पर आए चुके हैं। छाप रहे हैं। दिखाए रहे हैं। पर रवीश पांडेय…. उफ़…. रवीश कुमार चुप हैं। अरे, भाई लोगों कोई तो वजह होगी। समझो इस बात को।

झूठी होगी वो दलित की बिटिया। नही तो अभी तक कोट टाई पहनकर शमशेर, बाबा नागार्जुन और गोरख पांडेय की एक दुई क्रांतिकारी कविता पढ़ते हुए रवीश कुमार आ गए होते 2जी में फंसी एनडीटीवी की स्क्रीन पर। और चीख चीखकर अपने भाई ब्रजेश पांडेय से सवाल कर रहे होते। धोय रहे होते पटना पुलिस को। कि ऐसी कौन सी जगह छुप गया है ब्रजेश पांडेय कि अब तक उसे गिरफ्तार भी न कर पाय रही है। सुन लो ए दलित लड़कियों! जब तक रवीश कुमार से नैतिकता का सर्टिफिकेट न मिल जाए, तुम सब अनैतिक हो। झूठी हो। साज़िश करने वाली हो। सुधारो अपने आप को। माफ़ी मांगो तुरन्त। ब्रजेश पांडेय से। रवीश पांडेय से। माफ़ कीजियेगा, रवीश कुमार से।

कल से ही रवीश पांडेय के भक्त हमको गालियां दिए पड़े हैं। पूछ रहे हैं कि तुम इंडिया टीवी से हो। जलते होगे एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय से। अरे मोरे भाई, हम इलाहाबाद से हैं। इलाहाबादी हैं। इसी यूनिवर्सिटी का लहू बहता है हमारी धमनियों में। हम न जलते हैं। न डरते हैं। न किसी नाम से आतंकित होते हैं। न किसी पद से प्रभावित होते हैं। हम तो बस सिविल लाइन्स के सुभाष चौराहे पर एक कुल्हड़ वाली चाय पकड़कर बैठ जाते हैं, वहीं की फुटपाथों पर। पाश को पढ़ते हुए। पाश को गाते हुए –

“हमारे लहू को आदत है
मौसम नहीं देखता, महफ़िल नहीं देखता
ज़िन्दगी के जश्न शुरू कर लेता है
सूली के गीत छेड़ लेता है
शब्द हैं की पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं
लहू है की तब भी गाता है।”
जय हिंद

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चलो आज सीधा सीधा लिख मारते हैं। सुनो वामपंथ की लंपट औलादों। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय का भाई ब्रजेश पांडे बलात्कार और सेक्स रैकेट में फंसा है। तो लड़की का चरित्र बताए रहे हो। ये समझा रहे हो कि ओरिजिनल एफआईआर में उसका नाम नही था। बाद में सामने आया। तुमने आसाराम के बेटे नारायण साई का नाम सुना है। वो जिस मामले में साल 2013 में गिरफ्तार हुआ। वो साल 2002 से 2005 के बीच का मामला था। न यक़ीन हो तो सूरत की पीड़ित महिला के आरोप की एफआईआर निकलवा कर देख लो। पूरे 8 साल बाद की शिकायत थी। फिर भी हुई गिरफ्तारी। नारायण साईं आज भी जेल में है। सूरत की। वो भी राजनीति में दिलचस्पी रखता है। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, अरे हाँ भाई, रवीश कुमार के भाई ब्रजेश पांडे की तरह। चुनाव भी लड़ चुका है। फिर भी मुझे उससे कोई सहानुभूति नही। ऐसे 1000 उदाहरण हैं। गिनवाऊंगा तो बगैर क्लोरोफॉर्म सुंघाए बेहोश हो जाओगे।

किसी वामपंथ के जले हुए बुरादे पर बलात्कार का आरोप लगेगा तो मानक बदल जाएंगे तुम्हारे। तब लड़की का चरित्र बताने की औकात पर उतर आओगे। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, हाँ हाँ वही, ‘बागों में बहार’ वाले रवीश कुमार, के सगे बड़े भाई बृजेश पांडे पर बलात्कार और सेक्स रैकेट का संगीन आरोप लगा है। वो भी एक नाबालिग दलित लड़की ने लगाया है। तो तुम उस दलित लड़की के चरित्र का सर्टिफिकेट जारी किए दे रहे हो। कि वो चरित्रहीन है। रवीश पांडे का भाई मजबूरी में कुर्सी छोड़ने से पहले। बिहार कांग्रेस का प्रदेश उपाध्यक्ष था। तुम तो खा गए होते अभी तक, अगर ऐसे ही कोई बीएसपी का प्रदेश उपाध्यक्ष फंसा होता। कोई समाजवादी पार्टी। या फिर कांग्रेस का ही ऐसा नेता फंसा होता। बशर्ते वो तुम्हारी बिरादरी के ही किसी कॉमरेड का भाई न होता। और बीजेपी का फंस जाता तो फिर तो तुम्हारे थुलथुल थानवी जी ‘हम्मा-हम्मा’ गाते हुए अब ले शकीरा वाला डांस शुरू कर दिए होते। लिख लिखकर, पन्ने के पन्ने। स्याही के मुंह से कालिख का आखिरी निवाला तक छीन लिए होते। अमां, कौन सी प्रयोगशाला में तैयार होता है खालिस दोगलेपन का ये दीन ईमान। थोड़ा हमे भी बताए देओ।

ऐसे ही खुर्शीद अनवर का केस हुआ था। साहब पर नार्थ-ईस्ट की एक लड़की से बलात्कार का आरोप था। अनवर साहब जेएनयू के निवासी थे। फिर क्या था। रुसी वोदका के कांच में धंसे सारे के सारे वामपंथी। उस बेचारी नार्थ ईस्ट की लड़की की इज्ज़त आबरू का कीमा बनाने पर उतर आए थे। एक से बढ़कर एक बड़े नाम। स्वनाम धन्य वामपंथी। बड़ी-बड़ी स्त्री अधिकार समर्थक वामपंथी महिलाएं। सब मिलकर उस बेचारी लड़की पर पिल पड़े थे। वो स्टोरी मैंने की थी। बड़े गर्व के साथ लिख रहा हूँ। उस केस में पुलिस की एफआईआर थी। लड़की की शिकायत थी। मेरे पास पीड़िता का इंटरव्यू था। राष्ट्रीय महिला आयोग की चिट्ठी थी। आरोपी खुर्शीद अनवर के अपने ही एनजीओ की कई महिला पदाधिकारियों की उनके खिलाफ इसी मामले में लिखी ईमेल थी। ये सब हमने चलाया। खुर्शीद का वो इंटरव्यू भी जिसमें वो सीधी चुनौती दे रहे थे कि पीड़ित लड़की में दम हो तो सामने आए। शिकायत करे। वो सामना करेंगे। लड़की आगे आई। शिकायत भी की। पर खुर्शीद अनवर सामना करने के बजाए छत से कूद गए।

भाई साहब, ये पूरी की पूरी वामपंथी लॉबी जान लेने पर आमादा हो गई। कई वामपंथी वोदका में डूबे पत्रकार ‘केजीबी’ की मार्फत पीछे लगा दिए गए। जेएनयू को राष्ट्रीय शोक में डूबो दिया गया। शोर इतना बढ़ा कि दिल्ली पुलिस की एक स्पेशल टीम नार्थ ईस्ट रवाना की गई। ये केंद्र में यूपीए के दिन थे। वरना तो पूरी की पूरी सरकार हिला दी जाती। मैं आज भी उस नार्थ ईस्ट की लड़की की हिम्मत की दाद देता हूँ। तमाम धमकियां और बर्बाद कर देने की वामपंथी चेतावनियों को नज़रंदाज़ करती हुई वो दिल्ली पुलिस की टीम के साथ मजिस्ट्रेट के आगे पहुंची और सेक्शन 164 crpc के तहत कलमबंद बयान दर्ज कराया कि खुर्शीद अनवर ने उसके साथ न सिर्फ रेप किया, उसे sodomise भी किया। एक झटके में सारे वामपंथी मेढ़क बिलों में घुस गए। हालांकि टर्र टर्र अभी तक जारी है। उस बिना बाप की लड़की की आंखो में जो धन्यवाद का भाव देखा वो आज भी धमनियों में शक्ति बनकर दौड़ता है। इस हद तक कमीनापन देख चुका हूँ इंसानियत के इन वामपंथी बलात्कारियों का।

और हाँ। डिबेट का रुख काहे ज़बरदस्ती मोड़ रहे हो? ये कह कौन रहा है कि एनडीटीवी वाले रवीश पांडे इस बात से दोषी हो जाते हैं कि सगा बड़ा भाई बलात्कार और सेक्स रैकेट के आरोप में फंसा है? कौन कह रहा है ई? हाँ। ज़बरदस्ती बात का रुख मोड़ रहे हो ताकि मुद्दे से ध्यान हट जाए। मुद्दा ये कि दोहरा चरित्र काहे दिखाए रहे हो अब? आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे। और कोई गैर हुआ तो चला चलाकर स्क्रीन काली कर दोगे?

सुनो, बड़ी बात लिखने जा रहा हूँ अब। अपने भाई के ख़िलाफ़ ई सब चलाने का साहस बड़े बड़ों में न होता है। सब जानते हैं। बात सिर्फ इतनी है कि ये जो नैतिकता का रामनामी ओढ़कर सन्त बने बैठे हो, इसे अब उतार दो। तीन घण्टे पूरे होय चुके हैं। पिक्चर ओवर हो गई है। अब ई मेकअप उतार दो। नही तो किसी रोज़ चेहरे में केमिकल रिएक्शन होय जाएगा।

और हाँ, मेरी वॉल पर आए के चिल्ल-पों करने वाले रवीश पांडे के चेलों, सुनो। हम किसी ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी पत्रकार से कहीं ज़्यादा इज़्ज़त ज़िले के स्ट्रिंगर की करते हैं। जो दिन रात कड़ी धूप में पसीना बहाकर, धूल धक्का खाकर टीवी चैनल में खबर पहुंचाता है। इस देश के टीवी चैनलों का 70 फीसदी कंटेंट ऐसे ही गुमनाम स्ट्रिंगरों के भरोसे चलता है। न यक़ीन हो तो सर्वे कराए के देख लो। तुम जैसे ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी इन्हीं की उगाई खेती पर लच्छेदार भाषा की कटाई करके चले आते हो और बदले में वाह-वाही लूटकर अपने-अपने एयर कंडिशन्ड बंगलों में दफ़न हो जाते हो। तुम हमे न समझाओ सेलिब्रिटी का मतलब। हम अभी अभी अपने चैनल के इलाहाबादी सेलिब्रिटी से मिलकर लौटे हैं।

इंडिया टीवी में कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

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ज़बरदस्ती में भाई लोग एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय के पीछे पड़ गए हैं!

Abhishek Upadhyay : ज़बरदस्ती में भाई लोग एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय के पीछे पड़ गए हैं। अरे भई, हाँ। रवीश कुमार। अब खानदानी नाम रवीश पांडेय है तो क्या हुआ? सेक्युलर हैं। सर्वहारा समाज के प्रतिनिधि हैं। रवीश कुमार ही सूट करता है। अब क्या हो गया जो इन्ही रवीश पांडेय, माफ़ कीजिएगा रवीश कुमार के बड़े भाई ब्रजेश पांडेय बलात्कार के मुकदमे में हैं।

पीड़ित भी कौन? एक दलित लड़की! वो भी नाबालिग? ज़िला मोतिहारी। बिहार। सेक्स रैकेट चलाने का मामला अलग से है! पर इसमें रवीश कुमार का करें?

अब ठीक है, माना कि आसाराम से लेकर स्वामी नित्यानन्द तक ऐसे ही मामलों पर बड़ा शोर मचाए रहे वो। गर्दा झाड़े पड़े थे। तब पीड़ित के साथ खड़े थे। रोज़ ही जलते सवालों की बौछार। स्टूडियो न हुआ था। आग का मैदान हो गया था तब। पर भूलो मत। भाई की बात है। आपस में भले लड़ लें। बाहर सब एक हैं। जब बाहर से विपत्ति आई तो युधिष्ठिर ने कहा था- “वयम पंचादि शतकम।” हम एक सौ पांच हैं। कौरव-पांडव सब एक। अब धर्मराज युधिष्ठिर की भी न सुने रवीश!!!

एक बात और सुन लो। रवीश कुमार का भाई तो बलात्कारी हो ही नही सकता। ऊपरवाले की फैक्ट्री में कुछ लोगों के चूतड़ों पर नैतिकता का सर्टिफिकेट चिपकाकर। बाकायदा लाल स्याही से ठप्पा मारकर। फिर उन्हें नीचे भेजा जाता है। ऐसे हैं रवीश कुमार। अगर वो अपने भाई के खिलाफ कुछ भी लिख बोल नही रहे हैं तो सीधा मतलब यही है कि भाई दूध का धुला होगा। वो भी अमूल ब्रांड। फुल क्रीम मिल्क का। तुम समझे कि नही? ये पुलिस। ये थाना। ये कानून। वो दलित लड़की। वो महिला पुलिस इंस्पेक्टर जिसने जांच की और इनके भाई का नाम शामिल पाया। सब के सब बिके हुए हैं। सब झूठे हैं। फ्रॉड हैं।

ब्रजेश पांडेय से बड़ा बेदाग़ कौन होगा? उन पर रवीश पांडेय, अरे माफ़ कीजियेगा, रवीश कुमार का हाथ है। मेरी नज़र में ये भाजपाइयों या फिर संघ की साज़िश हो सकती है। Yes, रवीश कुमार के भाई कांग्रेसी नेता हैं। पिछला चुनाव मोतिहारी से लड़े थे। हार गए। सोनिया जी भी आई थीं। रवीश कुमार के भाई हैं। बड़े भाई। जलवा है। किसी ने राजनीतिक साज़िश कर दी होगी!!

अब ये कौन सी बात हुई कि बिहार में तो नितीश कुमार की पुलिस है? भाई साज़िश मत करो रवीश कुमार के खिलाफ। कौन हैं ये नितीश कुमार। बोलो। कौन हैं? अबे, ये बीजेपी के एजेंट हैं। और क्या! रवीश कुमार के ख़िलाफ़ जो भी एक लफ्ज़ बोलेगा, वो बीजेपी का ही एजेंट होगा। जाओ, निकलवाए लो उस दलित लड़की की भी जनम कुंडली। बाप नही तो दादा। दादा नही तो परदादा। या उनके भी दादे। कोई न कोई बीजेपी से सटा रहा होगा। अब बीजेपी तब नही थी तो क्या हुआ!! तुम निकलवाए लो कुंडली। सावरकर और गोलवलकर के साथ कभी घूमे होंगें। इनके दादे-परदादे।

ये वही कम्युनल लोग हैं जो कहते हैं कि रवीश कुमार 2जी मामले में फंसी एनडीटीवी से मिली मोटी तनख्वाह डकारकर रोज़य ईमानदारी का प्रवचन देते हैं। अरे भइया, एनडीटीवी में 2जी मामले के चार्जशीटेड आरोपी टी.आनदकृष्णन ने कई सौ करोड़ का निवेश कर रखा है!!! तो क्या हुआ? कौन सी बिजली गिर गई? रवीश कुमार को इसमें से क्या मिला जा रहा है। हर महीने 5-6 लाख की तनख्वाहै तो मिल रही होगी। और का? अब अगर बगैर रिजर्व बैंक की इजाज़त से। चोरी छिपे। विदेश में बनी अपनी सहयोगी कम्पनियों मे कई सौ करोड़ की रकम डालकर। एनडीटीवी बैठ गई है। तो रवीश कुमार को पर्दे पर ईमानदारी की बात करने से काहे रोक रहे हो? अब वो अगर कुछ और नाही कर पाए रहे हैं। परिवार चलाना है। सो नौकरी भी नाहि छोड़ पाए रहे हैं। तो का ईमानदारी की बात भी न करें। उन्हें कुछ तो करने दो भाई लोगों।

बड़ी गाड़ी। बड़ा बंगला। मोतिहारी में अलग। पटना में अलग। ग़ाज़ियाबाद और कहां कहां!! तो का हुआ? अब ये सोचो कि एयरकंडिशन ज़िन्दगी में रहकर भी कोई। टीवी के पर्दे पर सही। मेहनतकश मजदूर के पसीने के बारे में सोच लेता है। मामूली बात है???

तो भइया, हम तो इस लड़ाई में रवीश पांडेय, उफ़ ये ज़ुबान, फिर से माफ़ी, रवीश कुमार के साथ हैं। आप भी साथ आओ। चलो नया नारा गढ़ते हैं-

“ब्रजेश पांडेय को बचाना है

और

उस दलित लड़की को

झूठा साबित करके दिखाना है।”

अब ये कौन साला आ गया है जो तेज़ आवाज़ में लाउडस्पीकर पर बल्ली सिंह चीमा की कविता बजाए जा रहा है? रवीश कुमार को सुनाए जा रहा है-

“तय करो किस और हो तुम
आदमी के पक्ष में हो
या फिर कि आदमखोर हो तुम।”

भगाओ…मारो….साले को… चुप कराओ… यहां नैतिकता का इकलौता ठेकेदार पत्रकार जीवित है!!! वो भी नही देखा जा रहा है इनसे!!!!

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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दैनिक भास्कर में पूरे तीन दशक से अधिक की सेवा के बाद राजाराम जी रिटायर हो गए

Abhishek Upadhyay : राजाराम जी आज रिटायर हो गए। दैनिक भास्कर में पूरे तीन दशक से अधिक की सेवा के बाद। ये तक़दीर ही थी कि मैं, Pankaj Pandey और Pradeep Surin, हम तीनो आज शाम मैसूर कैफ़े में साथ-साथ कॉफ़ी पीकर निकले ही थे। कि सुरीन ने ज़िक्र किया -“आज राजा राम जी का रिटायरमेंट है।”  हम तीनों ही अनायास आईएनएस स्थित भास्कर के ऑफिस की ओर चल पड़े। कभी हम तीनों साथ-साथ इसी अख़बार में थे। आईएनएस के भास्कर ऑफिस का दरवाज़ा खोलते ही राजाराम जी नज़र आए। सभी के बीच बैठे अपने पुराने सालों को याद कर रहे थे। हमे देखते ही एक एक के गले से लिपट गए। एक पल में एक सदी जी लेना जैसा कुछ सामने था। राजाराम जी साल 1987 से लगातार संसद जा रहे हैं। मैं साल 2012 में पहली बार रेगुलर रिपोर्टिंग के लिए संसद गया।

राजाराम जी मुझे रोज़ ही मिल जाते। हाथों में पार्लियामेंट्री सवाल जवाब के मोटे कागज़ात उठाये। इन्हें वे रोज़ ही पार्लियामेंट से ऑफिस ले जाते थे। न जाने क्या आत्मीयता थी कि जब भी मिलते, यूँ लगता कि सालों से जानता हूँ। दिल के रिश्तों की महक ही अलग होती है। शायद मेरी आँखों में उन्हें दीखता था कि इस पार्लियामेंट के बारे में मैं कुछ भी नही जानता। ईमान और तज़ुर्बे की आंच में पकी आँखें बेहद सच्ची और साफ़ होती हैं। ‘भइया, ये वाली नींबू की चाय ज़रूर पीजियेगा, बहुत अच्छी होती है।” “कभी भूख लगे तो उस वाली कैंटीन में खाना खाइएगा।” ये भी बताते, ” अरे यहां क्या कर रहे हैं, आज राज्यसभा में आपके मंत्रालय की रिपोर्ट पेश हुई, उस कमरे से मिल जायेगी। एक कॉपी मेरे भी पास है।” आज राजाराम जी बोल रहे थे। पिछले 30 सालों में इस एक शख्स ने कितनो को क्या क्या दिया। वक़्त मेरी आँखों के आगे किसी चलचित्र की तरह घूम रहा था।

एक शख्स जिसका एडिटोरियल से बस इतना ही वास्ता रहा कि वो पूरी नौकरी अपने कंधों पर ‘एडिटोरियल दस्तावेज़’ ढोता रहा। आज जब बोल रहा था, तो मैं स्तब्ध था। “इस रिपोर्टर को ये खबर बताई, उस राज्य की विधानसभा में हंगामा हुआ। उसे वो खबर बताई, उस राज्य की असेम्बली में बवाल हो गया।” ये कोई दावे नही थे। एक भीतर तक झकझोर देने वाली हक़ीक़त थी, जिसके हामी भरने वाले एक नही अनेक थे।

“मुझे सबसे अच्छे संपादक अलोक मेहता लगे। सुख-दुःख पूछते रहते थे। मदद करते थे। हरीश गुप्ता से मेरा झगड़ा हुआ। बड़ा अजीब नेचर था उनका। पर एक बात बोलूं, वो आदमी खबरों का मास्टर था। फोन पर ही पूरी खबर लिखवा देता था।” उस दौर में जब हम लोग ‘समालोचना’ शब्द भूल चुके हैं। या तो सिर्फ तारीफें करते हैं। या सिर्फ गरियाते हैं। राजाराम जी, उस संपादक के एक पहलू विशेष की खुलकर तारीफ़ कर रहे थे, जिसमे उनके सम्बन्ध उतने अच्छे नही रहे।

“एक किताब लिखना चाहता हूँ मैं। अपने इस पूरे जीवन पर। कभी न कभी लिखूंगा। एक साल। दो साल। तीन साल। कितना भी लगे। पर लिखूंगा ज़रूर।” मैं उस किताब की प्रस्तावना उनकी बूढ़ी आँखों में पढ़ रहा था। जिसकी पहली ही लाइन मोहब्बत और ममत्व की स्याही से पगी हुई थी। “अभी घर नही बैठना चाहता मैं। कुछ भी मिल जाए। पैसे की बात नही। बस काम करना चाहता हूँ। रोज़ कुछ नई जानकारी मिलती है। नए-नए लोग मिलते हैं। सही भी और गलत भी। अगर मेरे लायक कहीं कुछ भी होगा। तो आप लोग ज़रूर देखिएगा। उनकी आँखें एक एक कर हम सभी की ओर घूम गईं।” उनके रिटायरमेंट की कचौड़ी और मिठाई अब भी ज़बान पर रखी हुई है।

निकलते वक़्त एक बार फिर से गले मिले। घर के बूढ़े बरगद की तरह। नई फूटी कोपलों को अपनी ममत्वभरी छाँह में समेटे हुए। उनसे विदा लेकर अब वापिस ऑफिस के रास्ते में हूँ। कानो में बार बार कुछ शब्द गूँज रहे हैं- “मैं अभी घर नही बैठना चाहता। कुछ होगा तो बताइयेगा।” दुआ है और कोशिश भी कि ये ‘कुछ’ जल्द ही सामने आए। राजाराम जी जैसे लोग कभी रिटायर नही होते। उन्हें कभी रिटायर होना भी नही चाहिए।

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Pradeep Surin ऑफिस में घुसते ही राजाराम जी के बोलने से पहले ही उन्हें प्रणाम बोलता रहा हूं. कई बार सिर्फ नज़रों नज़रों में ही बातचीत होती थी. आज जब वे अपने तर्जुबे को साझा कर रहे थे तो मुस्कुरा रहे थे. पर शायद पहली बार राजाराम जी की आंखें और गला होंठो का साथ नहीं दे रहे थे. बहुत ही भावुक लम्हा था… संसद के चाय स्टॉल में सबसे ज्यादा उन्हीं की कमी खलेगी… !!!

Pankaj Pandey अभिषेक भाई राजाराम जी के लिए संबोधन ही उनके प्रति सबके आदर को दर्शाता है। शायद ही कोई हो जिसके मुंह से कभी बिना जी लगाये राजाराम निकला हो। भास्कर के सारे पुराने दिग्गजों का इतिहास कितनी बार उन्होंने सुनाया। जब भी मैं ऑफिस पहुँचता था हँसते हुए मेरे पास पहुँच जाते थे चाय का कप और पानी लेकर। साथ में कैसे हैं सर। कभी अपसेट देखा तो तुरंत भांप जाते थे। उन्हें आभास भर हो जाए कौन नाराजगी की वजह है उसका सारा चिटठा मेरे सामने खोलने लग जाते। अरे सर इनका क्या है। ये तो ऐसे ही हैं। बस एक मुस्कान से ही सामना चाहिए था उन्हें। दुःख दर्द जानना, समझना, साझेदार बनना उनकी आदत में शुमार था। कभी खुद भी किसी परेशानी से दो चार हुए तो सीधे मेरे पास चले आते थे। पांडेय जी एक बात कहनी है आपसे। हां राजाराम जी बताइये न। और बस तुरंत मन की बात। मैं भी कहता था अरे कोई बात नही आप चिंता मत कीजिये। कभी कोई हिसाब किताब नहीं। आत्मीयता बेहिसाब ही होती है। यही भाव था कि आज जैसे सुना लगा ही नहीं कि मैं तो दो साल पहले भास्कर छोड़ आया हूँ तुरंत चला गया अभिषेक भाई के साथ उनके विदाई समारोह में। सुरीन धन्यवाद तुमने बताया। संतोष जी ने खड़े होकर हमारा स्वागत करते हुए हमारी झिझक मिटा दी कि अब हम इस ऑफिस का हिस्सा नहीं हैं। सुरीन तो तैयार ही बैठा था। मीनाक्षी जी,गणेश अन्य सभी साथी सबको धन्यवाद। राजाराम जी आपका तो गले लगने का अंदाज कैसे मानस पटल से हटेगा। बहुत शुभकामनायें। आपकी स्वस्थ मंगलकारी यात्रा के अगले पड़ाव के लिए।

Qamer Baig कलमकार कभी रिटायर्ड नहीं होते पहले पत्रकार फिर कहानीकार ,रचना कार ,इतिहास कार उनकी लिखने की कला में और निखार आता रहता है और अगर कोई आप जैसा साहित्यकार हो शब्दों से खेलने वाला तो फिर सोने पर सुहागा हो जाता है ऐसे लोग फील्ड छोड़ देते हैं लेकिन उनके सोर्स वैसे ही रहते हैं और उनका अनुभव आगे जा कर उनकी लिखी किताबो में नजर आता है. मुझे आज भी याद है की आप उस समय ibn7 छोड़ कर मुम्बई टीवी 9 ज्वाइन किये थे फिर आप ने वंहा से वापस आ कर भास्कर ज्वाइन किया था मैं दिल्ली आया था आप की ऑफिस भी गया आप मिले नहीं और बड़ी मुश्किल से आप का नम्बर लेकर बात भी हुई फिर मुलाकात भी हुई थी खड़े खड़े मिले और चाय भी नहीं पिलाये थे शायद उस समय आप बीजी थे किसी कहानी की तलाश में जाने की तैयारी थी । मैं उस समय न्यूज़ चॅनेल में काम की तलाश में आया था आप से भी कहा था कुछ होगा तो बताइयेगा आज तक किसी भी दोस्त या किसी अपनों ने भी कोई भी मदद नहीं की खुद के अनुभव और काबिलियत पर काम भी मिला और एक अलग मुकाम भी हासिल किया बस येही कहूँगा की दोस्तों का साथ और गुरु का आशीर्वाद बना रहे ।

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कालों की दुनिया में पहुंचे पत्रकार अभिषेक उपाध्याय गिन रहे गोरों की तादाद…!

अभिषेक उपाध्याय

…काले गोरे के भेद के चलते गांधी को इसी प्लेटफार्म पर फेंक दिया गया था…. तब से अब तक वक़्त पूरे 360 डिग्री पर घूम चुका है… इतिहास एक बार फिर मेरी नज़रों के सामने था…. ”जिसको भी दबाओगे। कुचलोगे। दुत्कारोगे। एक रोज़ पलटकर लौटेगा। हुकूमत तो उसकी भी आएगी। यही प्रकृति का न्याय है। यही मेरा प्रतिशोध है।”

Abhishek Upadhyay : ये प्रिटोरिया की यूनियन बिल्डिंग थी। साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति का सरकारी ऑफिस। किसी ने इतिहास की प्लास्टिक सर्जरी कर दी हो जैसे। एकदम नई शक़्ल। मैं इस राष्ट्रपति भवन में खड़े एक एक शख़्स को लगभग घूरने की हालत में देखे जा रहा था। अविश्वास! घोर अविश्वास! कुछ सच ऐसे ही होते हैं। नंगी आँखों से देखकर भी यक़ीन नही होता। हर तरफ़ काले लोग। राष्ट्रपति के गार्ड्स। प्रेसिडेंसियल बैंड। राष्ट्रपति का पर्सनल स्टाफ़। साउथ अफ्रीकन आर्मी। साउथ अफ्रीकन ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन। यानि यहां का सरकारी मीडिया। स्कैनर और मेटल डिटेक्टर पर तैनात सुरक्षा कर्मी। 90 से 95 फीसदी तक। काले ही लोग।

कहीं-कहीं कोई गोरी शक़्ल दिख जाती। तो ऐसा लगता। मानो अरहर के खेत में। किसी ने थोड़ी सी पालक बो दी है। जो है भी। और नही भी है।

‘इन्होंने सब काले भर लिए हैं। ये अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस का नए किस्म का रंगभेद है।’

ये जोहानसबर्ग में अरसे से काम कर रहा एक भारतीय था। जो उस वक़्त यूनियन बिल्डिंग में ही मौजूद था। मुझसे ये बातें कहते हुए। उसके चेहरे पर। हिकारत की लकीरें साफ़ नज़र आ रही थीं। मगर मेरे भीतर कोई चीख रहा था। प्रतिशोध है ये! प्रतिशोध! इतिहास का। एक भीषण प्रतिशोध! गांधी को। धक्के मारकर। स्टेशन पर फ़ेंक दिया। मंडेला को। पूरे 27 साल। जेल में। लगभग चुनवा ही डाला। दिनों नही। सालों नही। शताब्दियों तक। कालों को। रंगभेद के सिलबट्टे पर पीसकर रखा। उसी दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति के ऑफिस में। मुझे गोरी चमड़ी ढूंढें नही मिल रही थी। प्रतिशोध नही तो और क्या था ये?

“Madam! Please, just a minute. Will take a very brief interview.”

ये साउथ अफ्रीका की विदेश मंत्री मायते माशाबानी थीं। डिज़ाइनदार बॉर्डर वाली धानी रंग की साड़ी पहने। बस कुछ ही मिनट पहले, पीएम मोदी ने साउथ अफ्रीका को धन्यवाद दिया था। NSG की दावेदारी में समर्थन की खातिर। मेरा कैमरामैन राजीव मुझसे थोड़ी दूरी पर था। मुझ तक आने में उसे तकरीबन तीन से चार मिनट लगे होंगे। इस बीच मैं इन्हें रोकने की जद्दोजहद में लग गया था।

“Madam, Pl wait for a minute!”

मैं उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया था। दाहिनी तरफ कमरे की दीवार। बायीं तरफ कुर्सियां। बीच में संकरा सा रास्ता। वो उधर से ही निकल रही थीं। मैं इस चार मिनट में कम से कम आठ बार उनसे “Just wait a minute, madam” कह चुका था।”

“Your one minute is really very long. Jaldi keejiye.” वे मुस्कुराईं। और मुझे उन्हें रोकने का एक सूत्र और मिल गया।

“You just said, ‘Jaldi keejiye’. It means you know hindi. Let’s talk in Hindi” इस बार वे खिलखिलाकर हंसी।

“I was High commissioner in India for 6 years. Namaste. Dhanyawad. Know only this hindi” उनके चेहरे पर हंसी की बर्फ़ सी पिघल रही थी। अब तक राजीव पहुंच चुका था। इंटरव्यू लेते हुए NSG, Terrorism, China, Pakistan जैसे उठापटक वाले मसले खत्म हुए। तो मेरी ज़ुबान से निकला-

“And about Mahatma Gandhi……”

सवाल हवा में टँगा रह गया। उन्होंने पूरा सुना ही नही और बोलना शुरू कर दिया।

“Gandhi…He fought for us…..for our freedom…..our right….he was our father….” वे बोले जा रही थीं। मुझे हॉल की दीवारों पर कोई परछाई सी तैरती दिखाई दी। कोई अनजानी सी आकृति। शायद टोह लेने आई थी। काले आज इतने ताकतवर हो चुके हैं! मुझे लगा वो आकृति दीवार से उतरना चाहती है। इस यथार्थ को छूकर देखना चाहती है। सब सच ही तो है न! कहीं कोई तिलिस्म तो नही!

डरबन। प्रिटोरिया। जोहानसबर्ग। हर तरफ। मैं इसी पहेली से जूझ रहा था। टैक्सियों के ड्राइवर काले। होटलों का स्टाफ़ काला। रेस्तरां के मालिक। बैरे काले। जोहान्सबर्ग का एक प्रतिष्ठित अखबार समूह हैं। सन्डे टाइम्स। उसके दफ्तर गया। वहां के अधिकतर पत्रकार काले। हमे एक एडवाइजरी भेजी गई थी। जोहानसबर्ग और डरबन में बेहद ऊंचे क्राइम रेट को लेकर आगाह किया गया था। सतर्क रहने की ताकीद की गयी थी। यहां आकर मालूम पड़ा कि क्राइम के इस सिंडिकेट में भी इन्हीं काले भाइयों का जलवा है। अजीब पागलपन सवार हो चुका था। मैं अब गोरों की गिनती करने पर उतर आया था। कहाँ कितने गोरे मिले। कितने छूटे।

मैं अब जोहान्सबर्ग से डरबन के रास्ते में हूँ। टैक्सी हायर की है। ड्राइवर का नाम हुली सान है। 23-24 साल का दुबला-पतला लड़का। हाँ, ये भी काला ही है। रास्ते में फिलियास नाम के एक टाउन में हम रुके हैं। पानी की जो बोतल खरीदी है, वो मुझसे खुल नही रही है।

“San, Can you help me.”

“Oh, Yes.” वो बोतल की तरफ लपका। अगले ही क्षण सान उस बोतल को मुँह में डालता है। बोतल का ऊपर वाला नुकीला ढक्कन बाहर। पानी का रिसना शुरू। बूँद-बूँद पानी मेरे हलक में उतर रहा है। गला कुछ ज़्यादा ही साफ़ लग रहा है। कोई गाँठ गल गई शायद। सान ने गाड़ी की स्पीड 140 पर कर दी है। सुबह-सुबह पीटर मैरिटसबर्ग रेलवे स्टेशन पहुंचना है। 1893 में। गांधी को। काले गोरे के भेद के चलते। इसी प्लेटफार्म पर फेंक दिया गया था। तब से अब तक। वक़्त। पूरे 360 डिग्री पर घूम चुका है। इतिहास एक बार फिर मेरी नज़रों के सामने था-

“जिसको भी दबाओगे। कुचलोगे। दुत्कारोगे। एक रोज़ पलटकर लौटेगा। हुकूमत तो उसकी भी आएगी। यही प्रकृति का न्याय है। यही मेरा प्रतिशोध है।”

हमारी कार पीटर मैरिटसबर्ग रेलवे स्टेशन पहुंच चुकी थी। वेटिंग रूम के ठीक सामने गांधी की प्रतिमा लगी हुई थी। धूप की उठती-गिरती किरणों के बीच मुझे गांधी का चेहरा बड़ा गोरा सा नज़र आ रहा था! क्या ये भी इतिहास का प्रतिशोध था? उधेड़बुन कायम है।

टीवी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से. अभिषेक इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं और चैनल के घुमंतू पत्रकार हैं.

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अदभुत हैं मायावती!

Abhishek Upadhyay : अदभुत हैं मायावती। बिजली की तेज़ी से फैसले लेती हैं। जिससे दुश्मनी ली। उसे खुद ही ठीक कर दिया। क्या स्वामी प्रसाद मौर्या। कौन बाबू सिंह कुशवाहा। कोई आहरी-बाहरी मदद नही। कोई ईआर/पीआर फर्म नही। कोई कॉर्पोरेट लॉबिस्ट साथ नही। किसी ईके/पीके (प्रशांत किशोर) की भी ज़रूरत नही। राजनीति रिश्ते बनाने का खेल है। मैंने मायावती के तौर पर पहला ऐसा राजनीतिज्ञ देखा है जो बिगड़े रिश्तों का मुंह हमेशा उल्टा ही रखता है। कभी कोई समझौता नही। मुलायम से दुश्मनी है तो खुलकर है। क्या मजाल कि नेता जी संसद में बहन जी से आँख भी मिला लें।

राजा भैया को ठोंका तो ऐसा ठोंका कि ज़ख्म आज भी बिलबिलाते हैं। मायावती का राज आते ही राजा भैया जाने किस अज्ञात गुफ़ा में गुम हो जाते हैं। चूं तक नही निकलती मुँह से। उमाकान्त यादव, रमाकांत यादव, धनञ्जय सिंह, उख्तार-मुख्तार, डीपी/अतीक़ सब के सब। या तो घुटने टेक शरणागत हो जाते हैं। या फिर इनके घुटनो पर लकड़ी की इतनी खपच्चियां बाँध दी जाती हैं। कि चलने से पहले कम से कम दो बार अपना घुटना ज़रूर मॉनिटर करते हैं। ददुआ और ठोकिया जिस दिन से मायावती की आँख में चुभना शुरू हुए। उनकी डकैतगिरी के टायर में पूरे 36 इंच का कीला भोंक दिया गया। सारी हवा निकाल दी गई। मायावती की सरकार आते ही दोनो को “परमानेंटली” ठोंक दिया गया। उसी यूपी पुलिस ने ठोंका जो कल तक उनके आगे अनऑफिसियल सलाम ठोंकती थी।

कोई इनेमा/सिनेमा का चेहरा नही चाहिए मायावती को। अपने घर बैठें अमिताभ बच्चन। यहां तो बस एक ही सुपरस्टार है। मायावती खुद। उनके डंडे का खौफ कानून-व्यवस्था की पीठ पर गज़ब के सीमेंट की चिनाई करता है। ये पीठ अक्सर सीधी ही मिलती है। इसमें दो राय नही कि मायावती पर करप्शन के बेहद संगीन इलज़ाम हैं। कोई अँधा ही होगा जो इस फ्रंट पर उन्हें डिफेंड करे। मैं तो सिर्फ मायावती की फैसले लेने की ताक़त और उनके ‘पर्सनालिटी कल्ट’ का ज़िक्र कर रहा हूँ। मेरी नज़र में इसका कोई तोड़ नही है। कोई मुक़ाबला ही नहीं।

इंडिया टीवी में कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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NDTV के परम पवित्र मालिकों से तो लाख गुना बेहतर है ज़ी ग्रुप के मालिक डॉ सुभाष चन्द्रा!

Abhishek Upadhyay : ज़ी ग्रुप के मालिक डॉ सुभाष चन्द्रा राज्य सभा पहुंच गए। बीजेपी के समर्थन से। तो क्या हुआ? लॉयल्टी है तो खुलेआम है। इसमें छिपाना क्या! NDTV के परम पवित्र मालिकों से तो लाख गुना बेहतर है ये। आप 2G केस के चार्जशीटेड आरोपी की कंपनी से साझेदारी करो। आप विदेशों में अंधाधुंध कम्पनियां खोलकर भारत में उस कमाई का हिसाब ही न दो। आप आरबीआई के निर्देशों की ऐसी की तैसी कर दो। आपकी मरी हुई दुकान के शेयर आसमान छूती बोलियों में खरीद लिए जाएँ और कोई एजेंसी आपसे सवाल तक न पूछे? कि भइया! ये चमत्कार हुआ कैसे?

आप माल्या के साथ “Good times” का सुहाना सफ़र भी कर लो। नीरा राडिया से भी सट लो। सारे करम कर लो। पर आपके सारे ख़ून माफ़! क्यों? इसीलिए न कि आप 10 जनपथ के चरणों में नतमस्तक हो! इसीलिए न कि कांग्रेस ऑफिस की ईंटों में ही आपको अपना काबा और काशी नज़र आता है। राजनीतिक सरपरस्ती के इस सुख के आगे तो राज्य सभा जाना बहुत छोटी बात है। फिर किस दौर में नही रही है ये लॉयलिटी। बस हिम्मत रखो खुशवंत सिंह की तरह सच क़ुबूल करने की। महान लेखक खुशवंत सिंह ने खुद ही ज़ाहिर कर दिया था कि वे संजय गांधी की सिफारिश पर हिन्दुस्तान टाइम्स के एडिटर बने थे। इससे उनकी महानता घट नही गई।

राजीव शुक्ला ने ‘रविवार’ मैगज़ीन में राजा मांडा वीपी सिंह की ऐसी की तैसी की। तो की। खुलकर राजीव गांधी का साथ दिया। सन्तोष भारती, उदयन शर्मा, एमजे अकबर, दीनानाथ मिश्र, चन्दन मित्रा, शाहिद सिद्दीकी राजनीतिक पार्टियों के साथ आए। तो खुलकर आए। ये लुकाछिपी का खेल क्यूं? ये पूरा लेख इस मसले पर लिखा ही नही है कि पत्रकार का राजनीति में आना सही है या ग़लत। सही गलत की परिभाषाएं वैसे भी अपनी समझ में नही आतीं। सबके अपने-अपने सत्य होते हैं। यहां तो मुद्दा सिर्फ इतना है कि गुरू अगर खेलना है तो खुलकर खेलो। नकाब पहनकर मैच नही खेले जाते। फाउल हो जाएगा एक दिन!

इंडिया टीवी में कार्यरत पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए पत्रकार विवेक सत्य मित्रम का लंबा कमेंट पढ़िए….

Vivek Satya Mitram : कमाल करते हो अभिषेक। अबे डर नहीं लगता क्या तुम्हें? पानी में रहकर मगर से बैर! सच कहूं तो तुम कालिदास से कम नहीं हो। कौन नहीं जानता कि आजकल मीडिया खासकर टीवी न्यूज़ इंडस्ट्री में नौकरियां पाना, उन्हें बचाकर रखना, सिर्फ और सिर्फ पीआर/ गुटबंदी/ गिरोह बाज़ी/ चमचागिरी और मक्खबाज़ी के दम पर होता है? वो तो तुम कर नहीं पाए कभी और अब बची खुची गुंजाइश खुल्लमखुल्ला गरिया कर खत्म कर रहे हो। किस मिट्टी के बने हो भाई? कितनी ही बार तो महसूस किया होगा तुमने कि तुम्हारे टैलेंट/ तुम्हारे काम और तुम्हारे अनुभव की कद्र की वजह से नौकरियां नहीं मिलती। फिर भी दिमाग ठिकाने न आया। जानते नहीं क्या तुम, किस पत्रकार को किसकी सिफारिश पर कहां नौकरी मिल गई? किस पत्रकार ने सिर्फ नौकरी बचाकर रखने के लिए किस हद तक अपनी अंतरआत्मा गिरवी रख दी? किस पत्रकार को उसका बॉस रात दिन कुत्तों की तरह ट्रीट करता है, फिर भी वो चूं नहीं करता? किस पत्रकार ने अपनी राजनीतिक निष्ठा को इनकैश करके क्या-क्या पा लिया, हासिल कर लिया? किस पत्रकार ने लेफ्ट से राइट और राइट से लेफ्ट होने में रत्ती भर वक्त नहीं गंवाया जब मामला बेहतर अवसर का आया तो? किस पत्रकार को किस मीडिया हाउस में किस पार्टी के इशारे पर अहम पद मिला? कौन से पत्रकार की किस पार्टी के साथ क्रांतिकारी सांठ-गांठ है? किस पत्रकार ने किसके स्पांसरशिप पर फॉरेन यात्रा की? किस पत्रकार को किस राजनेता की अनुकंपा से जनसत्ता अपार्टमेंट में मकान मिला? किस पत्रकार को किस पार्टी में रसूख की वजह से फिल्म सिटी में कौड़ियों के भाव ज़मीन मिली? किस पत्रकार को अपने संस्थान से इतर भी सैलरी मिलती है? अबे सब तो जानते हो। फिर भी लिखते हो ये सब।

डरो बे, नहीं तो नौकरी चली जाएगी। तुम ये भी तो जानते हो कि कितना छोटा कुंआं है ये मीडिया, जहां सब आपस में मिले हुए हैं। तुम्हारा मन नहीं करता क्या इतने महान चैनल में नौकरी करने का जहां दुनिया के सबसे महानतम पत्रकार इतने सालों से नौकरी बजा रहे हैं? वैसे भी कौन मानेगा अभिषेक उपाध्याय की बात कि रवीश कुमार जैसा क्रांतिकारी पत्रकार चोट्टों के चैनल में काम करता है। खैर, ये भी मुमकिन है कि न मालूम हो उन्हें ये सब, बड़े मासूम हैं। पर तुम नहीं सुधरे तो बड़ी दिक्कत हो जाएगी। ना तो कोई सियासी रिश्ता बना पाए तुम कभी, राजस्थान में रहे तो वसुंधरा की ऐसी तैसी करके रख दी, यूपी में मायावती की बैंड बजा के रखी, गुजरात गए तो मोदी के फाइव स्टार फास्ट की हवा निकाल दी। कब सुधरोगे? तुम्हारा तो कोई गॉडफादर तक नहीं मीडिया में। फिर कहां से आती है हिम्मत सच बोलने की, इतना करारा लिखने की? जिस दौर में लोग महज़ नौकरी के लिए नींद में सपने देखते हुए भी सावधानी रखते हैं कि सब सधा रहे, उसी दौर में तुम बिना परवाह खुल्लमखुल्ला लिखने का दुस्साहस करते हो। लोग तुम्हें पक्का पागल समझते होंगे। तुम्हें फर्क नहीं पड़ता क्या? सुधर जाओ, तुम भी तो बाप हो किसी के, तुम्हें डर क्यों नहीं लगता जैसा हज़ारों पत्रकारों को लगता है जो रोज़ मां-बहन की गालियां खाकर, अपना आत्म सम्मान, अपना ईमान गिरवी रखकर इसलिए नौकरी बचाके रखते हैं क्योंकि महीने के आखिर में सैलरी की दरकार होती है। ऐसा भी क्या कि अपने ही बिरादरी के खिलाफ़ लिखो? थोड़ा प्रैक्टिकल बनो यार, तुम तो खामखा दिल पर ले लेते हो! नौकरी के बारे में सोचो, वही आखिरी सच है!

वैसे एक बात बोलूं दोस्त, मज़ा आ गया, फ़क्र है कि तुम मेरे दोस्त हो! ईश्वर ऐसा कलेजा सबको दे। मुझे याद आ गया इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का अभिषेक, जो तुम्हारे अंदर आज भी बाक़ी है। और ये बात मामूली नहीं! बधाई कि तुम वो दिखा सकने कि हिम्मत रखते हो जो तुम हो वरना लोग तो यहां नक़ाबों को अपना वजूद समझ बैठे हैं। तुम्हें नहीं मालूम, इस बेफिक्री में तुम्हें जो कुछ हासिल है, वो अहसास लोगों के नसीब में नहीं। यूं ही रहना, वरना कम से कम मैं तो तुम्हें माफ़ नहीं करूंगा।

Abhishek Upadhyay : मेरे दोस्त Vivek Satya Mitram, अपनी ताऱीफ सुनने से बड़ा सुख और क्या है। ये जानते हुए भी कि आप राई-रत्ती भर भी उस तारीफ को deserve नही करते। तुमने NDTV जैसों की शान में गुस्ताख़ी की धूल उड़ाते मेरे लिखे को शेयर करते हुए मेरे बारे में ही इतना लिख दिया। ये जानते हुए भी कि इसे शेयर करना अपनी आत्म-मुग्धता की खोखली तलवार को धार देने से अधिक और कुछ न होगा। बावजूद इसे शेयर कर अपनी वॉल पर तुम्हारे प्यार की खुशबू बिखरा रहा हूँ। रही बात डर की तो वो लगता है, पर ज़्यादा नही। बहुत पहले संजय दत्त को एक फ़िल्म में बोलते हुए सुना था–“ब्रेन ट्यूमर हो जाने के बाद मौत का डर खत्म हो जाता है।” कुछ कुछ वैसी ही स्थिति है 🙂

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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने पाकिस्तान जाने से पहले और लौटने के बाद क्या लिखा, आप भी पढ़िए…

पाकिस्तान से लौटने के बाद…

Abhishek Upadhyay : पाकिस्तान-जैसा मैंने देखा… दुश्मन देश? ये पाकिस्तान है। शाम ने अपनी छत डाल दी है। रौशनी धीरे-धीरे मद्धिम हो रही है। मेरा एक पैर बड़े सींकचों वाले लोहे के गेट के इस पार है। दूसरा उस पार। मैं एक ही वक़्त में। एक ही साथ। दो मुल्कों की ज़मीन पर खड़ा हूँ। वाघा बॉर्डर इन दो कदमो के बीच फंस गया है कहीं। आज महसूस कर रहा हूँ कि दो कदमो का फ़ासला भी कितना लम्बा होता है। नक्शे बदल जाते हैं। और शायद तक़दीर भी। सामने क़ायदे आज़म की तस्वीर है। यूँ फ़ोटो फ्रेम में जड़ी हुई। मानो इतिहास की ईंटों ने तवारीख़ मुंजमिद कर दी हो। ठीक ऊपर लहराता हुआ झंडा। चाँद-तारे का निशान। कत्थई-लाल सी ईंटों पर। सुनहरे पीले अक्षरों में लिखा। पाकिस्तान।

मेरी आँखें चकरी की तरह घूम रही हैं। एक एक मंज़र की रील सी उतारता जा रहा हूँ। पाकिस्तानी रेंजर्स अगल-बगल घूम रहे हैं। इमिग्रेशन पार कर लिया है। लाहौर सामने है। ठीक मेरी नज़र के सामने। झुकी हुई कमर लिए। बीते वक़्त की लाठी पर टिका हुआ। जी में आया, पूछूँ- ‘कैसे मिजाज़ हैं हुज़ूर। अपने देव साहब वाला गवर्नमेंट कॉलेज ठीक चल रहा है न! और वो मंटो की कब्र। बहुत किस्मत वाले हो जनाब। तुम्हारी ही ज़मीन पर बनी है वो कब्र। जहां सोया हुआ एक शख़्स अब भी यही सोचता होगा। बड़ा अफ़साना निगार कौन है? वो? या फिर ख़ुदा?। मुझे लाहौर के चेहरे की झुर्रियों में एक तस्वीर सी उभरती नज़र आती है। पहचानता सा हूँ। कौन है ये? मंटो!!!

‘सहाफी (पत्रकार) हो क्या?’ एक कड़कती सी आवाज़ कानो में गिरती है। एकदम से ज़मीन पर लौटता हूँ मैँ। ‘जी, सहाफी हूँ।’ जवाब सुनते ही अगला सवाल-‘हिंदुस्तान से आए हो।’ मैं एकदम स्वचालित मोड में हूँ। ‘जी, जनाब। हिंदुस्तान से ही।’ मुझे बुरी तरह घूरती वे आँखें आगे की ओर निकल जाती हैं। पीछे हरे-सफेद रंग में डूबा चांद-तारे के निशान वाला एक गेट बंद हो जाता है। अब कोई अवरोध नही। कोई और रोक नही। लाहौर का टैक्सी स्टैंड आ चुका है। एक लम्बी चिकचिक। ड्राइवरों के दो गुटों में लगभग मार-पीट की नौबत। मैं अब सहाफी से ‘सवारी’ में तब्दील हो चुका हूँ। लाहौर से इस्लामाबाद की मलाईदार सवारी।

आखिरकार बात बन गई। और अब टोयोटा की XLI लाहौर की सड़कों पर दौड़ रही है। बादामी बाग़। आज़ादी चौक। मैं इलाकों के नाम रट रहा हूँ। पुराने ज़माने के पक्की ईंटों वाले मकान। प्लास्टर का कहीं निशान नही। उर्दू में लिखे बिल बोर्ड। हरे रंगों में डूबे दुकानों के शटर। संकरी। बेतरतीब सी गलियाँ। बांस के खपच्चों पर लटके हुए पाकिस्तानी झंडे। उन पर चढ़ी हुई मैल की चादर। एक जगह खड़े-खड़े थक से चुके PSO (Pakistan state oil) के पेट्रोल पंप। धूल। मिटटी। गर्द में नहाया शहर। कानो में पड़ती अजान की आवाज़। मगरिब की नमाज़ का वक़्त हो चला है।

अचानक कार एक राइट टर्न लेती है। और फिर तस्वीर ही बदल जाती है। कार अब M2 पर दौड़ रही है। ये मोटर वे है। लाहौर से सीधे इस्लामाबाद को जोड़ता 375 किलोमीटर का पाक नेशनल हाइवे। एशिया के सबसे महंगे हाइवे में एक। नवाज़ शरीफ की पहली वज़ारत में तसव्वुर किया गया। शानदार। ज़बरदस्त। कार ने गज़ब की स्पीड पकड़ ली है। मैंने अपनी साइड का शीशा उतारा। ऊपर की ओर झांककर देखा। कोई हेलीकॉप्टर तो नही उड़ रहा? ये कार जिसका पीछा कर रही हो!

‘साजन मेरा उस पार है/मिलने को दिल बेकरार है।’ ड्राइवर ने पेन ड्राइव लगाकर आवाज़ तेज़ कर दी। इस पाकिस्तानी ड्राइवर की पेन ड्राइव के सारे गाने हिन्दुस्तानी थे। गाड़ी चलाते हुए वो झूमता जा रहा था। ‘जिनकी चाहत में अंखिया तरसी हैं/जिनसे मिलने को बरसों बरसी हैं।’ पीछे की सीट पर बैठे-बैठे ही मैने सामने लगे मिरर में उसकी आँखें देखीं। कोई तरस थी क्या? बिछोह का कोई अनजाना सा दर्द? या कुछ ज़्यादा ही सोचने लगा हूँ मैं? न जाने कब आँख लग गयी। लाहौर बीत चुका है। असगर वज़ाहत की आवाज़ मेरी नींद में दाख़िल हो चुकी है। पूछ रही है- ‘जिन लाहौर नही वेख्या?’ अरे, लाहौर देखे बगैर ही निकल गए? अब इसे क्या बताऊँ? कैसे समझाऊं? इन तीन दिनो के वीज़े में कहां-कहां जाऊं?

आँख खुली है अब। सामने एक बोर्ड दीख रहा है। ऊपर लिखा है इस्लामाबाद। नीचे रावलपिंडी। ड्राइवर परेशान है। अगला कट इस्लामाबाद को जाएगा। पर अगर वो मिस हो गया तो…? फिर तो सीधे पेशावर निकल जाएंगे। बार-बार गुज़ारिश कर रहा है-‘ जनाब! बोर्ड पढ़ते रहिएगा।’ अगला लेफ्ट टर्न रावलपिंडी/इस्लामाबाद जा रहा है। हम उसमे उतर गए।

इस्लामाबाद का ब्लू एरिया। हम यहीं ठहरे हैं। मेरा साथी कैमरामैन प्रमोद सकलानी होटल के काउंटर पर दाखिले की औपचारिकतायें पूरी कर रहा है। और मैं….? थोड़ी दूरी पर खड़ा होकर रिसेप्शन काउंटर के ठीक अपोजिट की कुर्सी पर बैठे एक शख्स को नज़र बचाकर देखे जा रहा हूँ। आसमानी रंग का पठानी सूट। कन्धे से झूलती काली सदरी। ज़मीन पर उगी हरी दूब सी नरम दाढ़ी। ये शख्स होटल के एक सीनियर स्टाफ़ से हमारे ही बारे में बातें कर रहा है। कुछ आवाज़ें मेरे कानो में गिरती हैं। पहली बार ISI के किसी नुमाइंदे को सामने से देखा है।

रात बीत चुकी है। सुबह का वक़्त। धुंध की पहली परत छंटने के साथ ही मैं इस्लामाबाद की आबपारा मार्किट में हूँ। गरम-गरम पूड़ी। हलवा। नहारी। ‘हिंदुस्तान से आए हैं जनाब?’ मेरे हाथों में इंडिया टीवी का माइक देखकर उस दुकानदार ने पूछ ही लिया। ‘जी, बस नसीब में लिखा था, आपसे मिलना।’ इस छोटे से जवाब ने उसके होठों पर मुस्कुराहट बिखेर दी। ‘जनाब, आइये पहले कुछ खा लीजिए। आप हमारे मेहमान हैं।’ मैं हैरान हूँ। किसकी मेहमानवाज़ी क़ुबूल करूं? एक साथ तीन दुकान वाले मुझे अपनी ओर खींच रहे हैं। इनके लिए मैं ‘कस्टमर’ नही, मेहमान हूँ। कैमरा ऑन है। सवाल पता नही क्या पूछता हूँ। जवाब मिलता है – ‘जनाब, आप पहले ये बताएं कि आप हमारे मुल्क के साथ क्रिकेट क्यूँ नही खेलते? बात फैलने लगी है। दहशतगर्दी और दाउद से लेकर रॉ और क्रिकेट तक।’ मुझे कोई डर नही महसूस हो रहा। ख़ौफ़ का कोई निशान नही। जो भी मिल रहा है। घुल-मिल सा जा रहा है। दुश्मनी कहां है? तवे पर सिक रहे गर्म पराठे की महक मेरी नाक में घुसती जा रही है। ‘हलवा तो खाते जाएँ जनाब।’ बहुत तीखापन सुन रखा है, यहां के बारे में। बड़ी कड़वाहट सुनी है। पर ये हलवा……..वाकई बहुत मीठा है।

‘सही है। सही है।’ ये इस्लामाबाद की क्राउन कैब सर्विस का हमारा ड्राइवर है। अलादिता। ये उसका तकिया कलाम है, ‘सही है।’ हर बात की शुरुआत में, ‘सही है।’ एक बार इससे बातें करते हुए मेरे मुंह से निकलता है, ‘यार कितना बड़ा गधा हूँ मैं, डायरी होटल में ही भूल आया।’ तुरन्त ही इसके मुंह से निकलता है-‘सही है। सही है।’ मैंने एक उड़ती नज़र उसके चेहरे पर डालता हूँ और फिर सामने लटके शीशे में अपना चेहरा देखता हूँ। भीतर से कोई आवाज़ आती है। ‘सही तो है बे। ठीक कह रहा है ये। यही हो तुम। सही है। सही है।’ मेरी इस्लामाबाद की पूरी रिपोर्टिंग इसी अजनबी ड्राइवर के सहारे हो रही है। मैं कहता हूँ, किसी मदरसे जाना है। ये ले जाता है। फिर कहता हूँ। क्रिकेट खेलते लड़के चाहिए। ये ले जाता है। क्यूँ? क्या इसके भी पैसे दिए हैं मैंने? क्या किसी ने कोई सिफारिश की है मेरी? कोई जवाब नही मिलता मुझे। बस एक दूर तक पीछा करती आवाज़ महसूस होती है -‘ सही है। सही है।’

कैसा शहर है ये। जो भी मिलता है। हमसाया सा हो जाता है। ये इस्लामाबाद क्लब ग्राउंड में क्रिकेट खेल रहा अब्दुल मेरे आगे अड़ क्यूँ गया है? ‘ऐसे नही चलेगा। आप मेहमान हैं। पहले चलिए हमारी चाय पीजिए। ये इंटरव्यू-विंटरव्यू होता रहेगा।’ कैसे समझाऊं इसे? क्या ये न्यूज़ चैनलों की असाइनमेंट डेस्क को नही जानता है? क्या इसे उनकी ‘डेडलाइन’ का अंदाज़ा है? क्या ये ‘असाइनमेंट डेस्क’ से बिल्कुल ख़ौफ़ज़दा नही है? ‘अरे जनाब, आपकी असाइनमेंट डेस्क की ऐसी की तैसी। चलिए पहले हमारे साथ चाय पीजिए।’ ये कौन बोल रहा है? अब्दुल तो चुप है। फिर कौन है ये? अपने आप से कितनी बातें करने लगा हूँ मैं!

ये इस्लामाबाद के F74 इलाके के जामिया कासमिया मदरसे के तालिब और मौलाना मुझे घेरकर क्यूँ खड़े हो गए हैं? स्टील की छोटी सी केटली सामने है। इसे ‘चेनक’ कहते हैं यहां। चेनक की गरमा गरम चाय। मैं पाकिस्तान के मदरसों पर स्टोरी करने यहां आया हूँ। मगर यहां भी…….। चेनक से गरमागरम चाय कप में गिर रही है। ‘अरे, ऐसे नही चलेगा। एक चाय और लें आप।’ कोई सिलसिला है क्या? मेहमान नवाज़ी के सिरे जुड़ते हैं क्या? एक कोने से दूसरे कोने तक। मौलाना अब्दुल करीम आ चुके हैं। मदरसे के हाफ़िज़ वही हैं। स्टोरी पूरी कर ली है। रुखसती का वक़्त है। मगर वे हाथ पकड़ लेते हैं- ‘आज न जाएँ आप। आज यहीं रुकें। हमारे पास। हमे भी मौका दें, मेहमान नवाज़ी का।’ कहां हैं चाचा जवाहरलाल नेहरू? कहां हैं क़ायदे आज़म मोहम्मद अली ज़िन्ना? राज़ करने के लिए मुल्क बांट दिया! जाने किससे बड़बड़ा रहा था मैं? कोई सुन भी रहा है मेरी?

इस्लामाबाद का सेंटोरिअस मॉल। फैसल बैंक। सितारा बाज़ार। F6 मरकज। जिन्ना सुपर मार्केट। सब के सब खींच रहे हैं मुझे। कोई पुरानी पहचान लगती है। कभी पहले भी आया हूँ क्या? याद नही पड़ता। ये रात भी बीत गयी है। आज वीजे का आख़िरी दिन है। 3.30 बजे दोपहर को वाघा बॉर्डर बंद हो जाता है। उससे पहले ही हिंदुस्तान में दाखिल होना है। कार एक बार फिर से मोटर वे पर सरपट भाग रही है। इस्लामाबाद छूट गया है। लाहौर छूट रहा है। वाघा सामने है। घड़ी 3 बजकर 20 मिनट बजा रही है। और मैं बॉर्डर पर खड़ा ठिठक गया हूँ। पीछे मुड़कर देख रहा हूँ। गेट पर खड़ा पाकिस्तान रेंजर का जवान एकटक मुझे देख रहा है। गेट के उस पार से आवाज़ आ रही है-‘ जल्दी आइये इधर।’ बीएसएफ का एक जवान जल्दी इधर आने के इशारे कर रहा है। गेट के पार बस इंतज़ार में खड़ी है। मैं ‘दुश्मन देश’ की सरहद छोड़ आया हूँ। मैं दुश्मनी की सारी गिरहें (गांठें) खोल आया हूँ।

पाकिस्तान जाने के पहले…

Abhishek Upadhyay : पहली बार पाकिस्तान। कई मुल्क जा चुका हूं, पर कभी कुछ नही सोचा। पर आज..। बहुत कुछ है सोचने को। बहुत कुछ…। हालांकि ये भी सच है कि अब जा रहा हूं तो वे वजहें बेहद कम रह गई हैं, जो मुझे बेतरह खींचती हैं। अब तो वे चंद ही गिने चुने लोग होंगे, जिनसे तकरीबन रोज़ ही ख्वाबों में गुफ्तगू हो जाती है। न परवीन आपा रहीं। न फैज़ साहब। फराज़ साहब भी गुज़र गए। दिल में कितनी तमन्ना थी कि काश कभी मिलूं तो पूछूं? फराज़ साहब, आखिर कैसे लिखते हैं इतनी प्यारी इतनी खूबसूरत गज़ल-

‘सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।’
आखिर कहां से आता है ये हुनर कि कह सकें?
‘सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं।’

अब तो मंटो की रफ़ाकत भी किसे नसीब होगी? हां, इतना जरूर जानता हू्ं कि उसकी कब्र में खुदा से भी बड़ा अफसानानिगार पैर पसार कर सोया हुआ है। मल्लिका-ए-गज़ल फरीदा खानम हैं। लाहौर में रहती भी हैं। उधर से गुज़रूंगा भी। मगर कहां मिलना हो पाएगा? सहाफियत की मज़ीद मसरूफियतो में ये मौका भी कहां मयस्सर होगा! हबीब जालिब को मैं इंकलाबी अदब के सबसे बड़े नामों में शुमार करता हूं। जितना पढ़ा लिखा है, उसमे्ं बस दो ही नाम समझ में आते हैं। या तो हबीब जालिब, या फिर पाश। दिन में कितनी ही दफा जुबां पर तैर जाती है जालिब साहब की ये लाइनें- ‘ऐसे दस्तूर को/सुब्हे बेनूर को/मैं नही मानता/मैं नही मानता/मैं नही मानता।’ हबीब जालिब भी अब बस किताबों में बाकी हैं।

मगर फिर भी। इसके बाद भी। बहुत कुछ है। जो उस जम़ीन के हिस्से है। नफरत की हवाओं के आगे भी। बहुत कुछ रह जाता है। बहुत कुछ बच जाता है। उम्मीद है, कि सियासत की गर्म हवाओं के बीच उस ‘कुछ’ से भी वास्ता जरूर होगा। ये मंज़र भी देखकर लौटू्ंगा। शुक्रिया पाकिस्तान, देर रात सही, वीज़ा देने के लिए।

अभिषेक उपाध्याय इंडिया टीवी में एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) के पद पर कार्यरत हैं.

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ये तो फिल्म है पूरी की पूरी… ‘सेल्फी विद पीएम’… इस पर काम होना चाहिए

ये तो फिल्म है पूरी की पूरी। ‘सेल्फी विद पीएम।’ इस पर काम होना चाहिए। एक लाइट कॉमेडी फिल्म। पत्रकारों की आपस में तकरार। एडिटर और रिपोर्टर के बीच का फसाद। पहली सेल्फी किसकी? हो सके तो मारम मार। जमकर जूतम पैजार। एसपीजी और यहां तक कि एनएसए पर भी पत्रकारों के ‘सेल्फी जुनून’ का आतंक। एक रात पहले पीएमओ में आपात बैठक। मुद्दा ये कि पीएम को पत्रकारों से महफूज कैसे रखा जाए। पीएम इन डैंजर! इतनी सटकर सेल्फी ली जाएगी तो फिर तो ‘सिक्योरिटी ब्रीच’ हो गया न। आईबी और रॉ का भी इनपुट देना। फिर नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में इसी ‘सेल्फी’ का जलवा।

सेल्फी दिखाकर अधिकारियों को धमकी- ‘गुरू, संभलकर रहो, वरना देख लेओ ई मोबाइल में का है!’ सेल्फी लेने में नाकाम रहने वाले पत्रकार की माशूका का उसे सरेआम तमाचा जड़ देना- ‘नामर्द हो तुम साले, मेरी खातिर एक सेल्फी नही ले पाए। गेट आउट फ्रॉम माय लाइफ। उस कलमुंही रीना के ब्वॉय फ्रेंड को देखो। कितने करीब से सेल्फी ली है। मुझे तब से एटीट्यूड दिखाए जा रही है, साली। डूब मरो तुम।’ उस नाकाम आशिक पत्रकार का डूबने की खातिर बेहद तेजी से आईटीओ से लक्ष्मी नगर के बीच के यमुना ब्रिज की ओर जाना। मगर छलांग लगाने से पहले ही कानों में पड़ती वीआईपी गाड़ियों के काफिले के हूटर की आवाज़। -‘अरे साला, ये तो पीएम का कारकेड है।’ और यमुना के पुल की रेलिंग से ही हाथों में मोबाइल लेकर झटपट में एक और सेल्फी। ‘सेल्फी विद पीएम कारकेड’। ख्वाबों के झरोखों में उभरती पाकिस्तानी गायक अताउल्ला खान की शक्ल। बैकग्राउंड में बजता म्यूज़िक -‘तू नही तो तेरी याद सही’- खुदकुशी का प्रोग्राम कैंसिल। इसी सेल्फी के सहारे माशूका को मनाने की एक कोशिश और।

पीएम की अगली प्रेस मीट के लिए पीएमओ में पहले से ही ‘सेल्फी आवेदनो’ की बाढ़। First come,First serve का सिद्धांत लागू करने के लिए जंतर-मंतर पर आंदोलन। ‘सर, इस बार पहली सेल्फी हमारी ही होनी चाहिए। आपने पिछले दिनो जैसा-जैसा बताया, वैसा ही छापा। अब इतना तो बनता ही है सर’- पत्रकारों का पीएम के मीडिया एडवाइज़र पर हल्ला बोल। पीएम की उस प्रेस मीट में मौजूद कैबिनेट स्तर के दो तीन मंत्रियों की जबरदस्त चिढ़। ‘साला, हममे क्या कमी है, जो हमारे साथ कोई सेल्फी नही लेता।’ अगले दिन से मंत्रियों के पीए के पास ‘स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन’। जो भी पत्रकार इंटरव्यू के लिए आए, उससे साफ बोल दो- ‘पहले सेल्फी ले साथ में, फिर बात करेंगे। चूतिया समझा है क्या हमको? सेल्फी पीएम के साथ और इंटरव्यू हमसे।’

अगर फिल्म को थोड़ा थ्रिलर लुक देना हो तो ‘सेल्फी बम’ के आइडिया का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। कि पाकिस्तान में आईएसआई ने भारतीय पीएम के सेल्फी जुनून को देखते हुए नया आइडिया इज़ाद किया। सेल्फी बम का। लश्कर से जुड़ी हुई दो बेहद ही खूबसूरत हसीनाओं को पत्रकार की शक्ल में नेपाल बार्डर के रास्ते भारत में घुसा दिया गया है। ये दोनो ही सेल्फी के बहाने पीएम के करीब जाने की तैयारी में हैं। मगर किसी सनी देवल टाइप के एनएसजी कमांडों को समय रहते ये खबर मिल जाती है। और फिर शुरू होता है, ‘आपरेशन सेल्फी किलिंग।’ बेहद ही गुप्त, खुफिया आपरेशन। जिसकी डिटेल सिर्फ दो लोगों के पास है। एक इस देश के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर। और दूसरा मैं यानि अभिषेक उपाध्याय। बस अब इससे ज़्यादा नही लिखूंगा। नहीं तो आइडिया चोरी हो जाएगा। बड़ा कॉपीराइट का संकट है इन दिनो 🙂

कई न्यूज चैनलों में काम कर चुके और इन दिनों इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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संभव है इन बड़े पत्रकार साहब का इंद्राणी को लेकर भी कोई क्रश रहा हो!

Abhishek Upadhyay : दो कौड़ी की कहानी बनाई है मुंबई पुलिस ने। इंद्राणी मुखर्जी को जबरदस्ती बलि का बकरा बनाने पर तुली हुई है। या यूं कह लें कि बुरी तरह आमादा है। नतीजा “फिक्स” कर लिया गया है। पहले से ही। पुलिस कमिश्नर मारिया साहब खुद खार पुलिस स्टेशन पर डटे हुए हैं। मुझे याद नही पड़ता कि इससे पहले किसी पुलिस कमिश्नर को थाने में जाकर इंटरोगेशन करते कब देखा गया? घंटों पूछताछ कर रहे हैं साहब। पता नहीं बीच में कोल्ड ड्रिंक्स या कुछ स्नैक्स वगैरह लेते होंगे या वो भी नही। पता नहीं किन भारी भरकम नामों की बचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है? अब सवाल है ये? लोकतंत्र में सवाल तो किया ही जा सकता है।

पहली नजर में ही 24 कैरेट का बोगस केस है ये। सिर्फ और सिर्फ “कनफेशन” यानि कबूलनामे पर टिकाया गया। इंद्राणी ने यह कबूल लिया। उसके पूर्व पति संजीव खन्ना ने वो कबूल लिया। ड्राइवर श्याम राय तो कबूल करने के लिए ही पैदा हुआ था। उसके बाप ने उसका नाम कुबूल राय क्यों नही रखा, इसी बात पर हैरान हूं मैं। साढ़े तीन साल बाद क्राइम सीन ENACT कराया जा रहा है। शीना वोरा के कंकाल के जितने हिस्से मिले थे, उनसे डीएनए और जेंडर दोनो ही टेस्ट मुमकिन नहीं थे। अब रातों रात कंकाल का बड़ा हिस्सा बरामद हो गया है। मानो किसी ज्योतिषी ने मुंबई पुलिस की कुंडली बांचकर बता दिया हो। पीटर मुखर्जी न हुए सरकारी दामाद हुए। राजा हरिश्चंद की औलाद हुए। कभी वे शीना को अपनी बीबी की बहन मान लेते हैं। कभी बेटी। कभी बीबी इंद्राणी पर इस कदर यकीन करते हैं कि बेटे राहुल मुखर्जी का कहा मानने से इंकार कर देते हैं। कभी बीबी पर इस कदर अविश्वास हो जाता है कि उसे थाने में देखने तक नही जाते। एक सबूत नही है पुलिस के पास इस बात का कि इंद्राणी ने शीना को मारा।

गोया आप कबूलनामे को सबूत मानने की गुस्ताखी न कीजिएगा। हमारे देश की पुलिस इतनी हुनरमंद है कि बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन का नाम भी किसी आरोपी के कुबूलनामे में डलवा सकती है। उनका गाजियाबाद के रीजनल पासपोर्ट आफिस से तैयार अमेरिकी पासपोर्ट भी बरामद करवा सकती है। महाराष्ट्र के नासिक के पास ही पड़ता है मालेगांव। 2006 में बम धमाके हुए थे वहां। 37 लोग मरे थे। 125 घायल हुए थे। इसी तरह का इंवेस्टीगेशन शुरू हुआ था। कुबूलनामा दर कुबूलनामा। अखबारों और चैनलों की हेडलाइंस भी इसी तरह थीं। 8 सितंबर को धमाके हुए। 10 सितंबर को ही चैनलों पर पुलिस के हवाले से चलना शुरू हो गया। साइकिल बरामद। साइकिल का मालिक भी बरामद। इसी साइकिल पर बम प्लांट किए गए। धड़ाधड़ कुबूलनामे गिरने शुरू हुए। अक्टूबर आते आते अखबारों के पन्नों पर सारी तस्वीर साफ थी। सिमी कार्यकर्ता। नूर उल हूड़ा। महाराष्ट्र एटीएस शताब्दी ट्रेन की रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। अगला नाम शब्बीर बैटरीवाला। ये तो गजब आदमी निकला। साला, लश्करे ए तैयबा का खूंखार आपरेटिव। पाकिस्तान से रिश्ते। मकोका। ये..। वो…। केस साल्व। सब साले गिरफ्तार। बाद में मालूम हुआ कि इनमें से एक भी आरोपी केस में शामिल नही थे। पूरे पांच साल बाद 2011 में जाकर सब बाहर आए। ये तो सिर्फ एक एक्जांपिल है। कोर्ट दर कोर्ट कंफेशन की दुरभि संधि में सजाकर परोसे गए मामलों की भरमार है। ये एक हाइप्रोफाइल केस है। तो हम इतनी चर्चा भी कर रहे हैं। वरना तो कोई झांकने भी नही जाता।

दरअसल कंफेशन पुलिस का एक गेम है। बेहद ही खतरनाक और खूंरेजी गेम। यहां जितने भी पुलिस की थ्योरी पर धर्म की मानिंद यकीन करने वाले लोग हैं, इन सभी को महज 2 घंटे के लिए अगर पुलिस कस्टडी में भेज दिया, ये सब के सब तोते की तरह कबूल लेंगे कि इंद्राणी मुखर्जी ने जब शीना का गला दबाया तो उस वक्त शीना के पैर हमने ही दबोच रखे थे, ताकि वो हिल डुल न सके। गलती हो गई साहब। रुपए का लालच था। उसी में आ गए।

माना कि इंद्राणी मुखर्जी एक ग्लैमरस महिला है। उसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। वो तीन शादी करे। पांच करे। या 15 कर ले। न मैं इसे सही ठहरा रहा हूं। और न ही गलत। उसका जाती मामला है ये। अधिकतर वही हायतौबा कर रहे हैं जो इसलिए ईमानदार हैं कि कभी बेईमानी का मौका नही मिला। और खुदा न खास्ता कभी मिल भी गया तो समाज में इज्जत जाने के डर ने ईमानदार रहने पर मजबूर कर दिया। एक स्वनाम धन्य बड़े पत्रकार जिन्हें इंद्राणी मुखर्जी ने ठोकर मार कर INX मीडिया से बाहर फेंक दिया था, एक नई थ्योरी लेकर आ गए। बड़े पत्रकार साहब का खुलासा। शीना इंद्राणी के सौतेले बाप की पैदाइश है। उपेंद्र बोरा। इंद्राणी का सौतेला बाप है। कुछ ही देर में उनकी इस थ्योरी की धज्जियां उड़ गईं। 24 कैरेट का एक और झूठ। सगे पिता को सौतेला पिता बताया गया। उसे अपनी ही बेटी का रेपिस्ट करार दिया गया। उफ !!! ये वही पत्रकार साहब हैं, जिनकी रंगीनियों के किस्से पूरे मीडिया जगत में मशहूर हैं। जिसने भी इनके पुराने अखबार में काम किया हो, उससे पूछ लीजिए। अब ये भी उतर आए इंद्राणी के चरित्र का सर्टिफिकेट देने के लिए। कोई भरोसा नही कि इन बड़े पत्रकार साहब का इंद्राणी को लेकर भी कोई क्रश रहा हो। हमने सुना है कि बहुत जल्दी ही ये क्रश के शिकार हो जाते हैं 🙂

पुलिस कमिश्नर साहब, ये सभी जानते हैं कि असली खेल तो पैसों का है। INX MEDIA की पचास फीसदी की हिस्सेदारी। पीटर और इंद्राणी मुखर्जी के नाम। 700 से 750 करोड़ का मलाईदार इंवेस्टमेंट। इसमें से कितना वाकई इंवेस्ट हुआ और कितना परिवार के पास सेफ हाथों में सौंप दिया गया। मुद्दा तो यही है न। सवाल ये है कि अब इस मुद्दे को “साल्व” करने के लिए “सॉफ्ट टारगेट” कौन है? सॉफ्ट टारगेट जिसका गला दबोच लो और वो आह भी न कर पाए। और अगर न दबोचो तो अपने हक का हिस्सा लेने की खातिर दूसरे हिस्सेदारों की नाक में दम कर दे। इतना दम तो है ही न उस महिला में। सो उसको उठा लिया और कबूलनामे के फंदे से दबोच दिया उसका गला। हूजूर, असली नाम कब सामने लाओगे? आकाओं से इस कदर घबराए हुए हो?

अभी इंद्राणी के मुंह खोलने का इंतज़ार है। क्लाइमेक्स तो अभी बाकी ही है। न तो शीना को मोबाइल ही बरामद हुआ। न कपड़े। न कार। न कोई दूसरा साजो सामान। ब्रीफकेस मिला तो वो भी पीटर के गैराज में। मगर पीटर साहब बेहद सच्चे इंसान हैं, Neeraj भाई। उनके खिलाफ कुछ लिखना तो कुफ्र होगा। सच, झूठ क्या है, इसे समझ पाना हमेशा आसान नही होता। मगर कुछ बातें बेहद ही लाजिकल तरीके से समझ आ जाती हैं। जैसे कि मुंबई पुलिस का इंवेस्टिगेशन बेहद ही लाजिकल तरीके से समझ में आ रहा है कि पूरी तरह से फर्जी है। पुलिस की थ्योरियां ऐसी ही होती हैं। जितना वो समझाना चाहती है, उतना ही पेश करती है। चू्ंकि पूरा इंवेस्टिगेशन उसके हाथ होता है, हमारे पास सिवाय यकीन करने के कोई चारा नही होता। मगर ट्रायल में आते ही इन थ्योंरियों की धज्जियां उड़ना शुरू हो जाती हैं। आरूषि के मामले में भी यही हुआ था। जब जिस पर जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया। हम यकीन करते गए। बाद में तो ये हालत आ गई कि इस कत्ल के इतने आरोपी हो गए कि उनमे आपस में ही कंपटीशन शुरू हो गया कि मैने नही इसने मारा…. 🙂

इंडिया टीवी में कार्यरत पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने बताई पंकज श्रीवास्तव टाइप क्रांतिकारियों की असलियत, आप भी पढ़ें….

(अभिषेक उपाध्याय)


Abhishek Upadhyay : बहुत शानदार काम किया। Well done Sumit Awasthi! Well done! सालों से सत्ता की चाटुकारिता करके नौकरी बचाने वाले नाकाबिल, अकर्मण्यों को आखिर रास्ता दिखा ही दिया। उस दिन की दोपहर मैं आईबीएन 7 के दफ्तर के बाहर ही था जब एक एक करके करीब 365 या उससे भी अधिक लोगों को आईबीएन नेटवर्क से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। चैनल के अंबानी के हाथों में चले जाने के बावजूद बेहद ही मोटी सैलरी लेकर चैनल का खूंटा पकड़कर जमे हुए उस वक्त के क्रांतिकारी मैनेजिंग एडिटर खुद अपने कर कमलों से इस काम को अंजाम दे रहे थे। एक एक को लिफाफे पकड़ाए जा रहे थे।

मैं उस वक्त उज्जवल गांगुली से मिलने वहां गया था। आईबीएन 7 के कैमरा मैन उज्जवल गांगुली उर्फ दादा उर्फ ददवा मेरे बेहद ही अज़ीज़ मित्र हैं और वो भी उस लिस्ट में शामिल थे जो उस वक्त अंबानी के चैनल में शीर्ष पर बैठी क्रांतिकारियों की पौध ने अपने हाथों से तैयार की थी और जिसमें बेहद कम सैलरी पर सुबह से लेकर रात तक चैनल के वास्ते खटने वाले “बेचारे” पत्रकारों की भीड़ थी। अधिकतर वही निकाले वही गए जिनकी सैलरी कम थी, जो किसी मैनेजिंग एडिटर के “लॉयल” नही थे, जो चाटुकार नही थे, जो काम के अलावा किसी दूसरे मजहब के अनुयायी नही थे। बाकी वामपंथ के नाम पर दिन रात भकर-भौं करने वाले, लाखों की सैलरी उठाकर, मंहगी गाड़ियों से आफिस पहुंचकर आफिस में सिर्फ बौद्धिक उल्टियां करने वाले, रात को वोदका पीकर और केंटुकी फ्राइड का चिकन भकोसकर सर्वहारा के नाम पर लगभग आत्महत्या की स्थिति तक व्यथित हो जाने वाले, हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के बेटे अनुराग धूमल का अनंत प्रशस्ति गान करके, हिमाचल में शानदार होटल का लाइसेंस हथियाकर पत्रकारिता की दुकान सजाने वाले, सब के सब सुरक्षित थे। पूरा का पूरा “गैंग” सुरक्षित था। वेल डन सुमित अवस्थी! ये तो नैचुरल जस्टिस हुआ न! पोएटिक जस्टिस है ये तो! ये तो एक दिन होना ही था। अच्छा हुआ, ये आपके कर कमलों से हुआ। इतिहास याद रखेगा आपके इस योगदान को।

अच्छा! ये भी अदभुत है। क्रांतिकारिता की नई फैक्ट्री खुली है ये। चैनल को अंबानी खरीद ले। कोई फर्क नही। मोटी सैलरी उठाते रहो। बिना काम के ऐश करते रहो। चैनल में केजरीवाल का बैंड अरसे से बज रहा हो। कोई फर्क नही। बिग एम की तरह बजते रहो, बजाते रहो। सत्ता के तलुवे चाटते रहो। चैनल पर मोदी गान हो रहा है। होने दो। चैनल से भोले भाले मासूम कर्मी लात मारकर निकाले जा रहे हैं। पियो वोदका। और वोदका पीकर रात के 2.30 से 3.00 के बीच में, (जब पिशाब महसूस होने पर उठने का जी करे), तान लो मुठ्ठियां और कर दो मूत्र विसर्जन। मगर जब निज़ाम बदल जाए और नए संपादक से मामला “सेट” न हो जाए और जब ये तय हो जाए कि अब कटनी तय है तो उसी शाम एक मैसेज भेजो और खुद के क्रांतिकारी होने का मैग्नाकार्टा पेश कर दो। दरअसल ये सब मनुष्य नही, बल्कि प्रवृत्तियां हैं। कुंठा के मानस पुत्र हैं ये। इलाहाबादी हूं, इसलिए जब भी कुछ लिखता हूं, दुष्यंत कुमार अपने आप सामने खड़े हो जाते हैं। दुष्यंत ने ऐसी ही कुंठित प्रवृत्तियों के बारे में ये कहते हुए आगाह किया है कि-

“ये कुंठा का पुत्र
अभागा, मंगलनाशक
इसे उठाकर जो पालेगा
इसके हित जो कष्ट सहेगा
बुरा करेगा
प्राप्त सत्य के लिए
महाभारत का जब जब युद्ध छिड़ेगा
ये कुंठा का पुत्र हमेशा
कौरव दल की ओर रहेगा
और लड़ेगा।“

अव्वल तो इस बात के ही खिलाफ हूं कि जब समय खुद ही इन कुंठा पुत्रों को इनकी नियति की ओर भेज ही रहा है तो क्यों इस पर कलम तोड़ी जाए। मगर कल से आज तक कथित बड़े पत्रकारों के बीच जिस तरह का विधवा विलाप देख रहा हूं, लगा कि ऐसे तो नही चलने वाला है। ऐसे रो रही हैं कार्पोरेट पत्रकारिता के पैसो से अपनी अंटी गरम करके बौद्धिक उल्टियां करने वाली ये अतृप्त आत्माएं मानो गयी रात ही इनका सुहाग उजड़ गया हो। इस दौर में ये बहुत जरूरी है कि इस तरह के नकाबपोशों की पहचान हो। उसी कार्पोरेट पत्रकारिता के प्लेटफार्म से लाखों की सैलरी हर महीने उठाकर, और कार में फुल एसी चलाकर दफ्तर पहुंचने वाली ये आत्माएं रात ढ़लते ही हाथों को रगड़ते हुए बहुत कुछ टटोलती नजर आती हैं। बारी बारी से मंडी सज जाती हैं।

पहले चैनल पर मोदी का करिश्मा बेचो, स्वच्छ भारत अभियान बेचो। अपने मालिक के स्वच्छ भारत अभियान के ब्रैंड एंबैसडर होने की खबर बेचो। हाथो को टटोलो और उसे रगड़ते हुए कार्पोरेट पत्रकारिता का हर खंबा बेच डालो। और फिर रात ढलते ही, वोदका गटको और फिर शुरू हो जाओ। अबकी बारी फेस बुक पर आओ और गरीबों की भूख बेचो। विदर्भ के किसानो की आह बेचो। बुदेंलखंड के किसानो की आत्महत्या बेचो। आंसू बहाओ पत्रकारिता के पतन पर। रोओ कार्पोरेट पत्रकारिता के अंजाम पर। गरीबों, फटहालों की बदहाली की स्याही अपनी कलम में उड़ेलकर उसकी कूची बनाओ और फिर अपनी बौद्धिक छवि चमकाओ। सेमिनारों में जाओ। पोस्टर लगाओ। क्रांतिकारी बनो और इंटरव्यू को भी क्रांतिकारी बनाओ। मुझे लगता नही कि पत्रकारिता के दोगलेपन का इससे बड़ा भी कोई उदाहरण होगा।

आज रो रही हैं ये सारी की सारी पत्रकारिता की भोथरी तलवारें। कोई फर्क नही पड़ता कि जिस छत के नीचे आप काम कर रहे हों, जिस छत के एकाउंट सेक्शन से लाखों की सैलरी लेकर अपनी जेब गर्म कर रहे हों, उस छत के बारे में राम जेठमलानी से लेकर सुब्रहमण्यम स्वामी तक सभी खुले मंच पर ब्लैक मनी के घालमेल की कहानी बयां कर रहे हैं। वो भी एक नही दर्जनो बार। मय सबूत समेत। यहां तक इस मामले की आंच पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम तक पहुंच चुकी है। मगर आरोपों में घिरी इसी छत से लाखों की सैलरी और छप्पर फाड़ सुविधाएं उठाकर शुचिता और शुद्धता की बात करने वालों का विधवा विलाप यहां से भी सुनाई दे रहा है। यहां भी आईबीएन में हुई इस घटना की बाबत चुप्पी तोड़ने और साथ देने की हुंकार भरी जा रही है। खुद अपने ही संस्थान से कितने लोग और कितनी ही बार बिना किसी कसूर के छंटनी के नाम पर निकाल दिए गए, मगर ये बौद्धिक आत्माएं जोंक की तरह अपनी कुर्सी से चिपकी रहीं। मालूम पड़ा कि उस दौरान सांस की रफ्तार भी थोड़ी धीमी कर दी थी कि कहीं सांस की आवाज को लोग आह समझ बैठें और नौकरी पर खतरा आ जाए। यहां भी ग्रेटर कैलाश की सड़कों पर सरपट रफ्तार से बड़ी कार दौड़ाते हुए फेस बुक पर गरीबों का दर्द शरीर से मवाद की तरह बह निकलता है। ये सबकी सब दोगली आत्माएं ऐसा लगता है कि जैसे धर्मवीर भारती के अंधायुग के अश्वात्थामा से प्रेरित हों—
अंधा युग में अश्वत्थामा कहता है..

“मैं यह तुम्हारा अश्वत्थामा
कायर अश्वत्थामा
शेष हूँ अभी तक
जैसे रोगी मुर्दे के
मुख में शेष रहता है
गन्दा कफ
बासी थूक
शेष हूँ अभी तक मैं..।”

वक्त बहुत निर्मम होता है। उसे आप अपने बौद्धिक आतंकवाद का शिकार नही बना सकते। वो जब पहचान लिखता है तो अश्वत्थामा की तरह से ही लिखता है। दरअसल ये सुविधाभोगी वामपंथियों की पौध है, जिनका ईमान इस तरह फुसफुसा और लिसलिसा है कि एक बार इनकी नौकरी पर आंच आने की नौबत हो, और अगर चरणों पर लोटने से भी रास्ता निकल जाए तो उसके लिए भी तैयार रहेंगे, ये भाई लोग। और जब सारे ही रास्ते बंद हो जाएँ तो एकाएक इनके भीतर का क्रांतिकारी सांप फन काढ़कर खड़ा हो जाएगा, मुठ्ठियां तानने की धमकियां देता हुए, हाथ रगड़ रगड़कर हवा में अपने ही चरित्र के वजन को टटोलता हुआ, ग्रेटर कैलाश की सड़कों पर कार के भीतर फुल एसी की मस्ती या फिर ब्लोअर के मस्ताने टंपरेचर में गुलाम अली को सुनते हुए, सोशल मीडिया पर रोता हुआ, गरीबों की आह महसूस करता हुआ। अगर इन कथित क्रांतिकारी पत्रकारों को दिसंबर-जनवरी की बस एक रात के लिए भारी कोहरे और नम जमीन के चारों और तने मुज़फ्फरनगर के दंगापीडि़तों या फिर कश्मीर के सैलाब पीड़ितों के एक चादर वाले फटे-चिथड़े टेंट में छोड़ दो, तो उसी रात इन्हें उल्टी और दस्त दोनो एक साथ हो जाएगा। इन्हें मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों के दर्द की बाबत भी फेसबुक पर कलम तोड़ने से पहले फुल स्पीड का ब्लोअर, रम के कुछ पैग और बंद गले का ओवरकोट चाहिए होगा, क्योंकि उसके बगैर तो उंगलियों से लेकर संवेदना तक सभी कुूछ जम जाएगा। खालिस बर्फ की तरह। आईबीएन 7 के स्टेट करेस्पांडेंट रहे और अपने बेहद अज़ीज़ गुरू सत्यवीर सिंह जो खुद इसी छंटनी का शिकार हुए थे, ने उसी दिन मुझे रात में फोन करके बोला था कि गुरु देखो आशुतोष ने अंबानी का बूट पहनकर हम सब के पेट पर लात मार दी। सत्यवीर सर, आज मैं कह रहा हूं कि, ये वक्त है। वक्त। ये पूरा का पूरा 360 डिग्री का राउंड लेता है, ये। ये एक चक्की है गुरू। चक्की। पिंसेगे तो सारे ही। कोई कल पिस गया। कोई आज पिस रहा है, और किसी की बारी आने ही वाली है।

दरअसल आज तो इनकी बात का दिन ही नही है। आज तो बात होनी चाहिए उन 365 कर्मचारियों की जो मोटी सैलरी पाकर बॉस की चाटुकारिता करने वाली इन्हीं कुंठित ताकतों की भेंट चढ़ गए। इनको इनकी नौकरी वापस होनी चाहिए। ये वे लोग हैं जो 15 हजार से लेकर 30 हजार महीने की सैलरी पर अपने परिवार का पेट पालते हैं। कुछ कुछ इससे भी कम पाते थे। बहुतों के बच्चों का स्कूल छिन गया। बहुतों के घर टूट गए। बहुत आज की तारीख में फ्री लांसिंस करके दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। ये सब एक बड़ी कार्पोरेट साजिश की भेंट चढ़ गए और जिनके साजिशकर्ता आज एमपी से लेकर एमएलए बनने की जुगत में उन्हीं कार्पोरेट ताकतों को गरिया रहे हैं जिनकी रोटी खाकर अपने खून का रंग लाल से नीला कर लिया है। पर इनकी बात तो आज होती ही नही है। सुमित अवस्थी, अगर कचरा साफ करने की इस प्रक्रिया से जो धनराशि बचे, उससे कुछ ऐसे ही मेहतनकश मगर अभागे (अभागे इसलिए क्योंकि ये किसी मैनेजिंग एडिटर के नजदीकी नही हो सके) लोगों को आप नौकरी दे सकोगे तो इतिहास और भी बेहतर शक्ल में याद रखेगा आपको। फिलहाल Keep up. As of now you are the instrument of poetic justice!

अभिषेक उपाध्याय तेजतर्रार पत्रकार हैं. अमर उजाला से लेकर इंडिया टीवी तक की यात्रा में कई चैनलों अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे. अभिषेक अपनी खोजी पत्रकारिता और विशेष खबरों के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Yashwant Singh पंकज श्रीवास्तव नामक हिप्पोक्रेट पत्रकार की अवसरवादी फ़िक्सर क्रांतिकारिता पर एक और पोल खोलक पोस्ट। निर्दोष किस्म के मूर्ख, भावुक, अति उत्साही और कार्यकर्ता मानसिकता वाले कामरेडों अब तो आँख खोलो….

Vikas Mishra इसे कहते हैं जिगर… जो अभिषेक तुमने दिखाया है। सच कहा और डंके की चोट पर सच कहा।

Sandeep K. Mishra ..कईयों के कंठ इस इंतजार में अभी भी सूख रहे होंगे कि कब तलवार-ए-सुलेमानी से उनका सामना होगा।। हालांकि साहब मीडिया हित में कई चैनलों में ऐसे अभियान की जरूरत है।। जहां सेटिंग वाले डिस्को और काम वाले खिसको जैसे हालात से दो-चार हैं।।।।।

Vishal Singh लिखने के लिए साहस होना चाहिए.. आपको साहस को सलाम…

Rashid Rumi Well done Abhishek sir.pahle Well done sumit awasthi dekga to laga k aap sumit ki tarif kar rahe ho k usne pankaj ko nikala. Magar pura padha to dil khush ho gaya. Journalists ko ye corporate wale tawayef bana k rakha haia.. we r not doing what we taught in journalism. Weal should stand against it.

Suneel Mishra Vo sadak par bhagne vale patrkaro ka support kar rate hai, aur daru peeke baudhik pelne vale editors ko aaina dikha rahe hai. Nice post Abhishek Upadhyay bhai.

Anoop Tripathi बहुत खूबसूरत सच और जवाब दिया आपने

Imran Siddiqui Patrakarita ke naam par dalali ki dukan chala rahe hain. Inka zameer mar chuka hai. Abhishek bhai apne accha jawab diya hai. Hope the situation will b change one day.

Rajshree Singh I remember ….apne kaha tha ki aap IAS nahi banna chahte…kyu ap kishi ke dabav me kaam nahi karna chahte the….kya kahi azadi nahi hai sach bolne aur likhne ki

Abhishek Upadhyay Rajshree Singh पत्रकार बनने के अपने फैसले से बेहद ही खुश हूं जिंदगी में बहुत कम ही ऐसे फैसले हैं जिनके बारे में सोचकर अच्छा लगता है। ये उनमें से एक है। रही बात सच बोलने की आजादी की तो वो हर जगह है और कहीं नहीं है। हम सब अपनी अपनी सीमाओं में इसी आजादी को explore करते हैं। जो जितना अधिक explore कर लेता या सकता है, वो उतना ही जयी होता है।

Riyaz Hashmi धो डाला भाई, ये है खरी खरी।

Ashish Chaubey क्या करेंगे भईया ये लडाई ही चाटुकारिता बनाम पत्रकरिता की हो गई है…. जिसमें चाटुकारिता चरम पर है…. दलालों ने पत्रकारिता को नेपत्य में ढकेल देने की मानों कसम खा ली हो… लेकिन पत्रकारिता को दबा पाना इतना आसान भी नहीं जितना इन दलालों लगता है….

Latikesh Sharma आप ने जो लिखा है उसे जानते सभी है , लेकिन उसे लिखने के लिए दम चाहिये। आप में दम है और आप ने लिखा भी है , इसलिए आप के साहस को सलाम !

Baljeet Singh Adv अभिषेक आपको शायद याद होगा, बहराइच जनपद में लोकरीति दैनिक हुआ करता था, उसके हम लोगों ने बन्द कर दिया। कारण यह है कि चाटुकारिता वाली पत्रकारिता नहीं हो पायी और लोकरीति को बन्द करना पड़ गया। वर्तमान समय में नेता, अभिनेता और अधिकारियों को अपने मतलब की खबर छापने/दिखाने वाले ही पसन्द है, शेष उनके दुश्मन।

Rahul Ojha बहुत सुन्दर भाई क्या लिखा है पूरे कपडे उतार लिया आशुतोष के मज़ा आ गया ।

Rishi Raj दिक्कत यही है कि हमने अपने ही कौम के बीच खाई बना दी है ।आपसी रंजिश को कभी न कभी तो त्यागना होगा वरना बजते रहिये या फिर भजते रहिये सरकार

Rinku Chatterjee स्नेही अनुज आज दी को तुम्हारा मस्तक चूमने का मन हो रहा है। मेरे आशीर्वाद से उठे हाथ को अपने सर पे महसूस करो। मुझे नाज़ है तुम पे।

Krishna Dev क्या लिखते हो मित्र, ग़ज़ब ।

Kishor Joshi एकदम सटीक आभिषेक जी!!! कहते हैं ना कि- जब शहादत कला बन जाती है, तो शहीदों पे बड़ी हंसी आती है।

Rajanish Pandey “देखे है बहुत बाते बनाने वाले ,बाते वाले जनाब काम किधर करते” यही हाल था जनाब ‘ग्राउंड जीरो’ का।।

Ajay Pandey अभिषेक Boss आपसे शब्दश: सहमत हूं, खून का रंग कभी पानी नहीँ होता है, इंसान की मजबूरियां, गरीबी और लाचारी उसे पानी पर जीने को मज़बूर कर देती है। जिसके मन में दूसरे के लिए पीड़ा हो उसे मैं आम इंसान नहीं मानता हूं, आपके लिए दुआओं के हज़ारों हाथ उठेंगे।

Divakar Mishra Poori kadvi sachayi nikal kar rakh diye Abhishek Upadhyay jo shayad mere jaise bahut so log nahi jante the. Very well done..

आशुतोष बाजपेयी Bhai..kya badhia likhte ho! Maza aa gaya,, aapke jaise kuch log na ho to patrkarita se kab ka bharosa uth gaya hota

Abhishek Katiyar Sir.. Pahali bar maine itna lamba content read kiya hai kisi bhi post ka.. really aap bahut umda likhte hai.. itna bewak bilkul clear and i wish ke aapka ye outspoken attitude hamesha bana rahe.. U r simply superb Sir.. Heads off to you

Sudhanshu Tripathi शब्दशः सत्य कहा अभिषेक भाई। वक्त 360 डिग्री राउण्ड लेता है। सभी को इन्तहान देना पड़ता है। आज नहीं तो कल नम्बर तो सभी का आता है।

Abhishek Yadav Kya baat hai sirji, aapne to kaynaat hi dikha do aaj kal ki.

Alok Bhardwaj Es bat ko uchit forum me uthaya jaye maine pankaj ji bhi post padi thi …….bahut badi safai ki jarurat hi media me..nahi ek din aisa hoga jaise europe me church ki bhumika thi waise hi media khaskar e media ki yaha hogi

Abhishek Upadhyay दरअसल ये किसी सिद्धांत विद्धांत की लड़ाई नही, बल्कि खालिस सेटिंग गेटिंग की लड़ाई है जिसे बौद्धिकता की चासनी से सानकर सुशोभित कर दिया गया है, महज क्षुद्र स्वार्थ की खातिर।

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आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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शुक्ला मेरी जान, ….उस दिन तुम्हारा ये दोस्त पत्रकारिता छोड़कर तुम्हारे वास्ते प्रेस कांफ्रेस कर रहा होगा

( File Photo Abhishek Upadhyay )


Abhishek Upadhyay : आज बहुत कुछ याद आ रहा है। अजीब सा लम्हा है ये। अभी अभी इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया के कुछ आर्टिकल हाथ लगे। मेरे अज़ीज़ दोस्त राकेश शुक्ला ने क्या कर दिखाया है………. खुशी की लहर मेरे अंदाजे बयां की राह में खड़ी हो जा रही है। राकेश शुक्ला, इस कदर मेरी जिंदगी में शामिल हैं कि उनके बारे में लिखने का मतलब है अपनी ही जिंदगी को अपने ही हाथों बेपर्दा करते जाना। रिस्क है ये। ये रिस्क फिर भी झेल लिया जाएगा पर शुक्ला के बारे में न लिखने का रिस्क…इसे कैसे झेला जाएगा।

राकेश शुक्ला। मेरे अज़ीज़ दोस्त। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, नवीन निश्चल, स्मिता पाटिल, शत्रुघन सिन्हा, शबाना आजमी और अदूर गोपालाकृष्णनन सरीखे भारतीय सिनेमा के मील का पत्थर माने जाने वाले नामो को पैदा करने वाला देश का सबसे प्रतिष्ठित फिल्म इंस्टीट्यूट- फिल्म एंड टेलीवीजन एकेडमी पुणे। शुक्ला इसी इंस्टीट्यूट के डायरेक्शन विधा के अंतिम वर्ष के विद्यार्थी हैं। अब इसके आगे मैं एक सांस में लिखता जा रहा हूं क्योंकि दूसरी सांस और उसकी बाद की सांसों का हक मेरे और शुक्ला के माजी यानि अतीत यानि गुजरी जिंदगी पर होगा। शुक्ला की डायरेक्ट की हुई फिल्म “तपिश” का बीजिंग फिल्म अकेडमी के 13 वें इंटरनेशनल स्टूडेंट फिल्म फेस्टिवल में चयन हुआ है। इतना ही नही बल्कि शुक्ला की डायरेक्टेड “डंकी फेयर” नाम की फिल्म 44 वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के इंडियन पैनोरमा सेक्शन में चयनित होकर झंडे गाड़ चुकी है। डंकी फेयर को बेस्ट सिनेमैटोग्राफी का अवार्ड मिला है। 2013 के पहले नेशनल स्टूडेंट फिल्म अवार्ड में इस फिल्म को “स्पेशल मेंशन” मिला है। शुक्ला की कामयाबी की दास्तान का अगला परचम है एशिया लिवलीहुड डाक्युमेंट्री फेस्टिवल 2013 जहां शुक्ला की निर्देशित फिल्म को बेस्ट स्टूडेंट डाक्यूमेंट्री अवार्ड मिला है।

अब सोचिए शुक्ला जैसा डाउन टू अर्थ इंसान कहां मिलेगा। इतना कुछ हो गया और शुक्ला जो मुझसे अक्सर मोदी से लेकर ओबामा, मगल ग्रह से लेकर जुपिटर और चाचा चौधरी से लेकर हालीवुड के आल टाइम ग्रेट अल पचीनो तक की बातें करता रहता है, इस बात का जिक्र ही नही किया। मुझे इंटरनेट पर शुक्ला को सर्च करते हुए और इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया को पढ़ते हुए शुक्ला की इन उपलब्धियों की जानकारी मिली।

ये यूपी के बहराइच जिले की बात है। आज से 25 साल शुरू हुआ एक सिलसिला। तब हम और शुक्ला दोनो ही बहराइच की सड़कों पर नेकर में घूमते थे। एक दिन मैं बहराइच की कचेहरी रोड पर खड़ा मोची से अपनी चप्पल सिलवा रहा था। तभी अचानक मैने एक उत्साह में गरजती आवाज सुनी- ‘उपधिया…अरे उपधिया..इधर देखो..इधर।’ शुक्ला जब मुझसे खुश होते हैं तो मुझे उपधिया बुलाते हैं और जब आग बबूला तो ‘सुनो बे अभिषेक उपाध्याय।’ मैने पलटकर देखा शुक्ला हाथ में एक फार्म लिए लहराते हुए चले आ रहे थे। शुक्ला पूरा का पूरा एक आंदोलन करके लौटे थे। पंजाब नेशनल बैंक से छात्रवृत्ति का एक फार्म हासिल करने गए शुक्ला को वहां अच्छी खासी लाइन मिली। शुक्ला ने देखा कि वो तो लाइन में हैं मगर बैंक के कर्मचारी अपने परिचितों को लाइन से अलग बुलाकर फार्म की सप्लाई किए जा रहे हैं। शुक्ला के उमर की एक लड़की काउंटर पर बैठे बैंक कर्मी से इस अन्याय के खिलाफ उलझ रही थी। अब पता नही शुक्ला के जेहन में इंसाफ की खातिर लडने का जज्बा पैदा हुआ या फिर उस हम उम्र लड़की की खातिर लड़ने को……….शुक्ला काउंटर पर पहुंच गए और बवाल काटना शुरू कर दिया।

बैंक कर्मी अब तक बुरी तरह भड़क चुका था। उसने शुक्ला और उस शुक्ला की हम उम्र लड़की दोनो को ही फार्म देने से मना कर दिया। अगले ही पल शुक्ला जमीन पर पालथी मारकर बैठे थे। अपने चश्मे को दो बार पोंछकर फिर से आंख में लगाते हुए और गले में पसीना पोछने की खातिर लटकाए खद्दर के दुपट्टे को एकाएक आंदोलन के हथियार की शक्ल देकर हवा मे लहराते हुए। शुक्ला ने पंजाब नेशनल बैंक की पान की पीकों से ढकी-पुती उसी फर्श पर बैठकर आमरण अनशन का ऐलान कर दिया। बैंक में एकाएक भूचाल सा आ गया। किसी को उम्मीद न थी कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। लाइन तितर बितर हो गई। सारे आवेदक शुक्ला के साथ इस 15 मिनट के आमरण अनशन में शरीक हो गए। शुक्ला की वो हम उम्र लड़की शुक्ला के ठीक बगल में बैठकर शुक्ला के लगाए नारों को दोहराने लगी। बमुश्किल 5 मिनट बीते थे कि बैंक का मैनेजर मिग 29 लड़ाकू विमान की रफ्तार से भागता हुआ मौके पर पहुंचा और शुक्ला के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। शुक्ला की विजय हो चुकी थी। ये तय हुआ कि अब किसी को भी लाइन से हटकर फार्म नही मिलेगा। बैंक में लगी ये लाइन इस कदर लंबी थी कि शुक्ला का नंबर करीब 45-50 एप्लीकेंट्स के बाद था। शुक्ला उस हम उमर लड़की के सपोर्ट में लड़ी गई सत्य और इंसाफ की इस लड़ाई को जीतकर बडे शान से उठे और सीधा मैनेजर के कंधे पर हाथ रख दिया। -“सुनो मैनेजर साहब, अब क्या हमे भी लाइन में लगना होगा”- शुक्ला का मैनेजर से यह पहला सवाल था। मैनेजर अपने सर को पांव पर रखते हुए और पैर का बचा खुचा हिस्सा सर पर रखते हुए तेजी से काउंटर की ओर भागा। अगले ही क्षण उसके हाथों से होता हुआ छात्रवृत्ति का फार्म शुक्ला के हाथों में था। उस समय तक शुक्ला की विजय का उस बैंक परिसर में इस कदर रौब गालिब हो चुका था कि आवेदकों की भीड़ ने इस वाकए को गणतंत्र दिवस के मौके पर शुक्ला को उनकी अभूतपूर्व बहादुरी की एवज में मिले परमवीर चक्र अवार्ड के तौर पर देखा और शुक्ला को ससम्मान वहां से जाने दिया।

मेरे ज़ेहन में शुक्ला की क्रांतिकारी शख्सियत का ये पहला हस्ताक्षर था। इसके बाद कितने ही ऐसे मौके आए जब मैने शुक्ला कभी अपनी तो कभी उधार की कलम से क्रांति का इतिहास उलटते और भूगोल बदलते देखा। अगली जगह थी बहराइच का कलेक्ट्रेट यानि डीएम आफिस। शुक्ला इस समय तक बहराइच के किसान डिग्री कालेज में बीएससी साइंस के प्रथम वर्ष में दाखिल हो चुके थे। ये छात्र आंदोलनो के चरम का दौर था। रोज ही फीस घटाने की मांग को लेकर आंदोलन होते थे और ये आंदोलन तब तक चलते थे जब तक कि छात्र संघ चुनाव संपन्न नही हो जाते। चुनाव संपन्न होते ही फीस वापसी के संघर्ष से थके हारे छात्र नेता अगले छात्र संघ चुनावों की घोषणा तक जिले के सही विकास की खातिर सड़क और पुल निर्माण ठेकों को अधिक से अधिक संख्या में हासिल करने में जुट जाते थे। जिले के हित को छात्र हितों के उपर वरीयता देते हुए फीस वापसी का आंदोलन लंबे समय के लिए मुल्तवी कर दिया जाता था। ऐसे ही एक फीस वापसी आंदोलन में मैने शुक्ला को बहराइच के जिला कलेक्ट्रेट आफिस में लकड़ी के एक कामचलाऊ मंच से छात्रों को संबोधित करते पाया। सामने सैकड़ों छात्रों की भीड़ थी। डीएम आफिस के ठीक सामने हो रहे इस प्रदर्शन के कारण ही भारी संख्या में पुलिस बल भी तैनात था। छात्र बेहद उत्तेजित थे। छात्रों की बढ़ती उत्तेजना और पुलिस बल की बढ़ती तादात के चलते ही शायद इस मंच से छात्र नेताओ ने तौबा कर ली थी। एक भी छात्र नेता मौके पर नही पहुंचा। अस्थायी व्यवस्था के तौर पर शुक्ला को ही मंच संभालने और छात्र उर्जा के गुब्बारे को लगातार फुलाते जाने की जिम्मेदारी दे दी गई थी। शुक्ला मंच से दहाड़ रहे थे। छात्रों को भगत सिंह से शुरू होकर फिदेल कास्त्रो तक के बलिदान की याद दिलाई जा रही थी। ये अलग बाद थी कि क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो उस वक्त तक जीवित थे। अचनाक शुक्ला का ध्यान लगातार बढ़ती पुलिस फौज की ओर गया। शुक्ला एकाएक दहाड़े- ‘दोस्तो, इन कुत्ते के पिल्लों से मत डरना। ये हमारी एकता का बाल भी बांका नही कर सकते।’ – अचानक शुक्ला ने देखा कि पुलिस वालों के हाथ लाठियों पर कस चुके हैं और एक सीओ लेवल का अधिकारी उन्हें कुछ निर्देश दे रहा है। शुक्ला खतरा भांप चुके थे। इससे पहले कि पुलिस एक कदम आगे बढ़ती, शुक्ला फिर गरजे। -‘दोस्तों, मगर हमे ये नही भूलना चाहिए, ये हमारी पुलिस खुद इसी सिस्टम की सताई हुई है। ये सब हमारे भाई हैं। हमारे दोस्त हैं। चलिए मेरे साथ नारा लगाइए- ये अंदर की बात है।’ शुक्ला के इतना कहते ही भीड़ से आवाज आई- ‘पुलिस हमारे साथ है।’ शुक्ला ने एक झटके में आंदोलन का नारा बदल दिया। फिर तो अगले 10 मिनट तक एक ही नारा गूंजता रहा- ‘ये अंदर की बात है/ पुलिस हमारे साथ है।’ पुलिस वाले अब चार पांच कदम पीछे हट चुके थे। शुक्ला ने इधर- उधर देखा और फिर दहाड़े- ‘…और अब इस सिलसिले को बढ़ाने के लिए मैं आमंत्रण दे रहा हूं हमारे भाई….को कि वे आएं और अपनी बात रखें।’ शुक्ला ने आनन फानन में मंच दूसरे वक्ताओं को सौंपा और अगले 15 मिनट में हम और शुक्ला महसी बस अड्डे के एकदम कोने वाले चाट के ठेले पर फुल्कियां उड़ा रहे थे। हमेशा की तरह शुक्ला ने सिर्फ इसलिए मुझे ही पेमेंट करने को कहा कि कहीं मेरी भावनाओं को ठेस न पहुंचे।

शुक्ला और हम उन दिनो अक्सर उन सार्वजनिक समारोहों में मिलते थे जहां एक लंबे व्याख्यान, काव्य पाठ या फिर सरकारी भाषण के बाद चाय नाश्ते और कभी कभी लजीज खाने का मुफ्त इंतजाम होता था। खाने पीने की चीजें एक कोने में ले जाकर, बेहद ही गंभीर मुद्रा में खाते हुए हम और शुक्ला उन दिनो अक्सर देश और समाज में बड़े बदलाव लाने की बातें किया करते थे। शायद इन्हीं बातों का असर था कि एक दिन शुक्ला ने मुझे केडीसी के मैदान में बुलाया और एक नए राष्ट्रीय मंच के गठन की जानकारी दी। इस मंच का नाम था- राष्ट्रीय नव निर्माण मंच। शुक्ला ने शायद उसी दिन सवेरे-सवेरे नाश्ता करने के तुरंत बाद इसका गठन किया था। शुक्ला इस मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और मुझे राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया। तय हुआ कि भगत सिंह की शहादत से लेकर आजाद हिंद फौज के गठन तक के हर महत्वपूर्ण दिवस पर ये मंच बड़े बड़े कार्यक्रम आयोजित करेगा और शिरकत करने वालों से क्रांति करने और सशस्त्र विद्रोह कर केंद्र की सत्ता उलट देने की अपील की जाएगी। हमारा पहला और एकलौता टारगेट था, केंद्र की सत्ता पर कब्जा करना और वो भी बंदूक के दम पर। चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। माओ की मौत (साल 1976) के 15 साल बाद हम और शुक्ला माओ के सपने को सच करने में जुटे थे। इस मंच के गठन के ठीक बाद जो पहला दिवस हमारी नजरों के सामने आया वो विश्व स्तनपान दिवस था। शुक्ला मेरे पास आए और बोले कि उपधिया ऐसा है कि ये स्तनपान दिवस बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ जेहाद का पहला सुनहरा मौका है। ये साली कंपनियां बच्चों को डब्बे का दूध पिलाती हैं और मां के मातृत्व और उसके दूध के पोषण से अलग करती हैं। ये हमारी दुश्मन हैं। मैने पूरी शिद्दत से शुक्ला की हां में हां मिलाई और ये तय हुआ कि बहराइच के घंटाघर पर इस विश्व स्तनपान दिवस का आयोजन होगा और इसी दिन इसी घंटाघर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ जेहाद का एलान कर दिया जाएगा। ये भी तय हुआ कि अगर व्यवस्था ने हमारा विरोध किया तो उसे करारा जवाब देने के लिए कोई न कोई असलहा भी हम साथ ले चलेंगे। ये मुकर्रर होने के बाद के अगले 48 घंटो तक हम और शुक्ला दोनो ही असलहे के नाम पर साथ ले चलने के लिए देशी कट्टा तलाशते रहे, मगर हमारी किस्मत कि वो भी हमे नही मिला।

खैर विश्व स्तनपान दिवस आ गया और शुक्ला घंटाघर की चहारदिवारी पर थे। चिलचिलाती धूप थी। दोपहर के 2 बज रहे थे। दरअसल शाम को हमारे ट्यूशन होते थे और सुबह स्कूल इसलिए दोपहर का समय क्रांति के लिए मुकर्रर किया गया था। शुक्ला के सामने दर्शकों के तौर पर रिक्शावालों की कतारें लगी हुई थीं जो दोपहर की धूप से बचने के लिए घंटाघर की चहारदीवारी के भीतर अपने अपने मुंह पर गमछा डालकर सो रहे थे। शुक्ला ने बोलना शुरू किया- “जिस माई के लाल ने अपनी मां का दूध पिया है, वो मेरा भाषण जरूर सुनेगा।” शुक्ला ने अभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ गरजना शुरू ही किया था कि एकाएक एक साथ कई चीखती हुई आवाजें हमारे और शुक्ला के कानो में पड़ीं- ‘उतर बे…. मार साले को… ये कौन साला चहारदीवारी पर चढ़ गया है…’ एक बार तो हमे लगा कि इस माओवादी क्रांति को दबाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से बीएसएफ या सीआरपीफ की टुकड़ी भेज दी गई है और ये उसी की ललकार है। मगर हमने जब होश संभाला तो देखा कि सारे के सारे रिक्शे वाले एक सुर में हमे गरिया रहे थे। ‘भगाओ सालों को…सोने नही दे रहे हैं…मार सालों को….।’ अगले ही झटके में शुक्ला चहारदीवारी कूदकर और मैं चहारदीवारी से सटे खंबे को पकड़कर नीचे उतर कर भगे वहां से। खुदा झूठ न बोलाए, उस दिन अगर कोई हमारी और शुक्ला की रफ्तार का आकलन कर लेता तो जैमेका का 100 मीटर का विश्व चैंपियन उसेन बोल्ट भी पानी मांग जाता। क्या भागे थे हम और शुक्ला, उस दिन। मैं तो फिर भी घर पहुंचकर बिस्तर पर लेट गया, मुझे बाद में मालूम पड़ा कि शुक्ला कई दिनों तक अपने कमरे में ही दौड़ता रहा। ये क्रांति की दौड़ थी। जेहाद की दौड़। व्यवस्था के खिलाफ। केंद्र की सत्ता के खिलाफ। आज वक्त हमारे खिलाफ था। मगर हौसले फिर भी साथ थे।

शुक्ला तुम्हें मैं कितना याद करूं। किस किस तरह से याद करूं। समझ में नही आ रहा है। शुक्ला और हम इलाहाबाद भी एक साथ ही पहुंचे। मैने बीकाम में एडमिशन लिया और शुक्ला ने इलाहाबाद आकर सीधे सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू कर दी। यहां भी हम रोज ही मिलते और क्रांति की बातें करते। शुक्ला बहुत ही अच्छा लिखता है। मुझे अब भी याद है कि शुक्ला ने एक कहानी लिखी थी- ‘वो एक शाम’। इस कहानी को सुनते हुए इलाहाबाद के इंग्लिश डिपार्टमेंट के हमारे अजीज प्रोफेसर सचिन तिवारी भावुक हो गए थे। शुक्ला की ये पहली कहानी थी।

शुक्ला मेरे आमरण अनशन में भी साथ था। ये बात है साल 2002 की। उस साल मैने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लॉ का इंटरेंस एक्जाम दिया था। मगर हुआ यूं कि कांपियां जांचते हुए उत्तर पुस्तिकाओं के सेट बदल गए और हम जैसे कितने ही विद्यार्थी फेल करार दिए गए। हमने विरोध करने का फैसला लिया। मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति कार्यालय के बाहर आमरण अनशन पर बैठ गया। शुक्ला, अनूप, केबी, गौतम, संदीप, मृत्युंजय, सुजीत उर्फ सैम जैसे कितने ही साथी मेरे साथ थे। इलाहाबाद युनिवर्सिटी के एएन झा और जीएन झा से लेकर ताराचंद, हालैंड हाल, डायमंड जुबली, हिंदू हास्टल सरीखे कितने ही छात्रावासों के छात्र हमारे साथ थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति आफिस के आगे छात्रों की भारी भीड़ थी जो अगले 72 घंटो तक काबिज रही। इस दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर जिला प्रशासन तक कितने ही अधिकारी मुझे अनशन से उठाने के लिए मनाने आए, पर हमने आपसी सहमति से ऐसा करने से इंकार कर दिया जब तक कि कापियों को दोबारा जांचने की हमारी मांग मंजूर न हो जाए। मुझे अच्छी तरह याद है कि इसी बीच समाजवादी पार्टी के एक ताकतवर एमपी जो मेरे इलाहाबाद के जमाने से ही मेरे अच्छे परिचित हैं, अपने समर्थक छात्रों की भीड़ के साथ वहां पहुंचे। एमपी महोदय उस वक्त विश्वविद्यालय के छात्र हुआ करते थे और उनके चाचा यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री। उनका अपना ही जलवा था। वो अनशन स्थल पर आए और मुझसे बोले- ‘अभिषेक हम तुम्हारे साथ हैं। अब से यहां हमारे समर्थक भी मौजूद रहेंगे, जब तक कोई फैसला नही हो जाता।’

इस वक्त तक अनशन को 48 घंटे बीत चुके थे और कमजोरी के निशान मेरे जेहन पर हावी होने लगे थे। इससे पहले कि मैं कोई जवाब दे पाता, शुक्ला ने माइक संभाल लिया और दहाड़ते हुए बोले- ‘अभिषेक उपाध्याय के इस मंच पर कोई राजनीति का कीड़ा नही आएगा। निकाल बाहर करो इनको। ये हमारे आंदोलन को हाइजैक करने आए हैं।’ इसके बाद शुक्ला ने आवाज दी- ‘आवाज दो’ —छात्र चिल्लाए- ‘हम एक हैं।’ शुक्ला ने अगला नारा लगाया- ‘हर जोर जुल्म के टक्कर में’- छात्र फिर गरजे- ‘संघर्ष हमारा नारा है।’ जब तक नारों का ये शोर थमा, एमपी महोदय सीन से जा चुके थे। इस घटना के लिए एमपी महोदय काफी वक्त तक मुझसे नाराज रहे पर मैं हमेशा से ये मानता रहा कि शुक्ला का ये हस्तक्षेप हमारे आंदोलन का टर्निंग प्वाइंट था। अगर उस दिन हम अपना मंच किसी राजनीतिक व्यक्ति के हवाले कर देते तो अगले कुछ घंटों में ही हमारे आंदोलन की हवा निकलनी तय थी। शुक्ला का एक एक फैसला इस आंदोलन की जान था। जब 72 घंटे बीतने को आए और डाक्टर ने मुझे चेक करके बताया कि यूरिन में क्रीटनेन का लेवल बढ़ता ही जा रहा है, शुक्ला ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोले- ‘उपधिया चिंता न करो। तुम्हें कुछ न होगा, ये लड़ाई हम ही जीतेंगे।’ और वही हुआ। विश्वविद्यालय प्रशासन को हमारी बात माननी पड़ी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार लॉ एक्जाम का पूरा रिजल्ट बदला गया। कापियां फिर से चेक हुई। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी गलती लिखित तौर पर मानी। टाइम्स से लेकर पायनियर और हिंदुस्तान से लेकर जागरण तक हर अखबार के पन्नों में हमारे आंदोलन की तस्वीरें और खबरें थीं। इसके कई दिनो बाद मनमोहन तिराहे पर आइसक्रीम खाते हुए मुझे और शुक्ला को लगा कि एक बार फिर से बंदूक की नोक से सत्ता हासिल करने के अपने पुराने संकल्प को हवा दी जाए, मगर आइसक्रीम खतम होते होते ये ख्वाब भी पिघल गया और हम अपने अपने कमरो की ओर लौट लिए।

शुक्ला बेहद जुनूनी किस्म की शख्सियत हैं। एक बार इसी जूनून में शुक्ला ने कम से कम एक दर्जन चप्पलें मेरे उपर बरसा दीं थीं। हुआ यूं कि एक शाम मैं शुक्ला के अल्लापुर स्थित किराए के कमरे पहुंचा। शुक्ला इस वक्त तक बेहद ही सीरियस तौर पर आईएएस की तैयारी में जुट चुके थे। मैने कमरे में घुसते ही आव देखा न ताव, सीधे शुक्ला के आगे एक बेहद ही आकर्षक पेशकश रख दी। -‘शुक्ला चलो पैलेस सिनेमा का कल सुबह वाला शो देख आते हैं। सुबह का एडल्ट वाला शो है शुक्ला और सुना है, बोका फिल्म लगी है।’ बोका फिल्म का नाम सुनते ही शुक्ला ने अपनी चप्पल निकाली और दनादन एक के बाद एक दर्जन भर चप्पलें मुझ पर बरसा दीं। मैं हक्का बक्का सा चप्पलें खाता हुए, शुक्ला से बार बार एक ही सवाल पूछता रहा कि अमां शुक्ला बात का है। मार काहे रहे हो…। तभी मैने पलटकर देखा कि शुक्ला के कमरे में सामने की तरफ उनका छोटा भाई टेबल लैंप की आड़ में मुंह छिपाए खिखिया रहा था। मुझे उस वक्त तक बिल्कुल भी ख्याल न था कि शुक्ला के कमरे में उनका छोटा भाई भी बैठा है। शुक्ला ने हफ्ते भर के लिए मुझे अपनी जिंदगी से बेदखल कर दिया। उनकी नाराजगी इस बात से बिल्कुल न थी कि मैने एडल्ट फिल्म बोका देखने की पेशकश क्यों की। नाराजगी इस बात से थी कि जाने अनजाने में ये पेशकश उनके छोटे भाई के सामने हो गई। मैंने शुक्ला को कई बार समझाने की कोशिश थी कि शुक्ला ई हमसे अनजाने में होइ गवा। मगर शुक्ला इसे हमेशा अपने खिलाफ की गई साजिश करार देते रहे।

शुक्ला इलाहाबाद छोड़कर दिल्ली आए तब तक मैं भी आइबीएन 7 चैनल में दिल्ली पहुंच चुका था। शुक्ला का अपनी प्रतिभा से जेएनयू के फारसी सब्जेक्ट में दाखिला हुआ। मुखर्जी नगर का शुक्ला का कमरा हमारी चहल पहल से अक्सर आबाद रहता था। मुझे अच्छी तरह ख्याल है कि शुक्ला ने कितनी ही बार मुझे अपने हाथों का लज़ीज़ खाना खिलाया। ये अलग बात है कि लगभग हर बार शुक्ला ने मुझे अपने तौर तरीके सुधारने और उनके साथ तहजीब से पेश न आने के चलते बुरी तरह जलील भी किया। मगर शुक्ला के लजीज खाने के आगे मैं अक्सर इस जलालत को भूल जाता था। ये दास्तां बहुत लंबी हुई जाती है। इसे अब यहीं रोकूंगा क्योंकि वो फैज़ ने लिखा है न कि तुझसे भी दिलफरेब हैं गम रोज़गार के। और भी बहुत से काम करने को हैं। मगर इसे खत्म करने से पहले अगर शुक्ला के प्रेम पर चर्चा न करूं तो ये इस दास्तां के साथ बड़ी नाइंसाफी होगी। अब ये भी एक संयोग ही था कि शुक्ला जिस लड़की को दस साल तक टूटकर चाहते रहे, वो लड़की इन दस सालों में शुक्ला के वजूद से ही नावाकिफ रही। शुक्ला उस लड़की को जानते थे और वो लड़की मुझे जानती थी। उलझन ये थी कि गोया उस लड़की को शुक्ला से वाकिफ कराने की कोशिश में वो मुझसे अच्छी तरह वाकिफ हुई जा रही थी। आखिर एक दिन मैंने हिम्मत की इंतिहा पार करते हुए शुक्ला को किसी बहाने से उसके घर बुला लिया। घर के ड्राइंग रुम में कुल जमा तीन शख्स। शुक्ला, मैं और वो। यहां भी अजीब समीकरण था। शुक्ला उसे देखे जा रहे थे, वो मुझे और मैं अपने नसीब को। पूरे एक घंटे तक हम बैठे रहे। इस दौरान दो बार पार्ले जी बिस्कुट और इतने ही बार पड़ोस की साइकिल रिपेयरिंग के बगल वाली दुकान से लाई गई दालमोट की नमकीन वाली प्लेटें आ चुकी थीं। मगर शुक्ला ने एक नजर भी पार्ले जी और दालमोट की ओर न देखा। शुक्ला का इक्वेशन बहुत क्लियर था। पार्ले जी और दालमोट को देखने के लिए नजरें नीचीं करनी पड़ेंगी और इस तरह से 10 सालों के इंतजार के बाद मिले इन अनमोल लम्हों में से कुछ का कत्ल हो जाएगा। खैर मैं शुक्ला को मिलाकर बाहर ले आया। इसके बाद के अगले तीन सालों तक जब तक कि उस लड़की की शादी नही हो गई, यही सिलसिला बदस्तूर कायम रहा कि शुक्ला उसे जानते रहे और वो मुझे जानती रही। मुझे कभी कभी लगता है कि शुक्ला ने इस बात के लिए मुझे कभी माफ नहीं किया। आज भी जब मैं शुक्ला को गुस्से में बोलते सुनता हूं- “सुन बे अभिषेक उपाध्याय”- तो मेरी नजरों के आगे उस लड़की का चेहरा झूल जाता है। मुझे हमेशा एक ही ख्याल आता है कि वो लड़की ऊपर कहीं बैठी हुई शुक्ला के गुस्से की आग में लगातार घी का विसर्जन कर रही है। शुक्ला उसे नहीं देख पा रहे हैं, मगर मैं उसे देख रहा हूं।

शुक्ला मेरे दोस्त। मेरी जान। अगर कुछ ज्यादा या कम लिख दिया हो तो बुरा मत मानना। तुम्हें दिल से प्यार करता हूं इसलिए दिल से इतना कुछ लिख दिया। तुम आगे बढ़ो। ऊंचाइयों का क्षितिज छू लो। मेरी दुआ है और दिली तमन्ना भी कि एक दिन विश्व का सबसे बड़ा अकेडमी अवार्ड तुम्हारे ही हाथों में होगा और उस दिन तुम्हारा ये दोस्त पत्रकारिता छोड़कर तुम्हारे वास्ते प्रेस कांफ्रेस कर रहा होगा।

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत युवा और तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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