यशवंत की कुछ एफबी पोस्ट्स : चींटी-केंचुआ युद्ध, दक्षिण का पंथ, मार्क्स का बर्थडे और उदय प्रकाश से पहली मुलाकात

Yashwant Singh : आज मैं और Pratyush Pushkar जी दिल्ली के हौज खास विलेज इलाके में स्थित डिअर पार्क में यूं ही दोपहर के वक्त टहल रहे थे. बाद में एक बेंच पर बैठकर सुस्ताते हुए आपस में प्रकृति अध्यात्म ब्रह्मांड आदि की बातें कर रहे थे. तभी नीचे अपने पैर के पास देखा तो एक बिल में से निकल रहे केंचुए को चींटियों ने दौड़ा दौड़ा कर काटना शुरू किया और केंचुआ दर्द के मारे बिलबिलाता हुआ लगा.

मैंने फौरन मोबाइल कैमरा आन किया और पूरे युद्ध को रिकार्ड करना शुरू किया. क्या ऐसा लगता नहीं कि ये जो नेचर है, प्रकृति है इसने हर तरफ हर वक्त प्रेम के साथ साथ युद्ध भी थोप रखा है, या यूं कहिए प्रेम के साथ-साथ युद्ध को भी सृजित कर रखा है. हर कोई एक दूसरे का शिकार है, भोजन है. डिअर पार्क की झील के बारे में प्रत्यूष पुष्कर बता रहे थे कि जो पंछी मर झील में गिरते हैं उन्हें मछलियां खाती हैं और जब मछलियां मर कर सतह पर आती हैं तो ये पंछी खा जाते हैं. ये अजीब है न दुनिया. जितना समझना शुरू कीजिए, उतना ही अज्ञान बढ़ता जाएगा. इस नेचर के नेचर में क्या डामिनेट करता है, प्रेम या युद्ध? मेरे खयाल से दोनों अलग नहीं है. इनमें अदभुत एकता है. केंचुआ-चींटी युद्ध का वीडियो देखें :

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क्या यशवंत दक्षिणपंथी हो गया है? ये सवाल करते हुए एक मेरे प्यारे मित्र मेरे पास आए. उनने सवाल करने से पहले ही बोल दिया कि पूरा रिकार्ड करूंगा. मैंने कहा- ”मेरे पास और क्या है जनपक्षधर जीवन के सिवा.” उनकी पूरी बातचीत इस इंटरव्यू में देख सकते हैं. देखें वीडियो :

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महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा. हालांकि यह जानता हूं कि आजकल विचारधाराएं नहीं बल्कि तकनालजी दुनिया को बदलने का काम कर रही है, फिर भी मार्क्स ने जो हाशिए पर पड़े आदमी की तरफ खड़ा होकर संपूर्ण चिंतन, उपक्रम संचालित करने की जो दृष्टि दी वह अदभुत है.

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You might be surprised to know that a spot on the surface of the Earth is moving at 1675 km/h or 465 meters/second. That’s 1,040 miles/hour. Just think, for every second, you’re moving almost half a kilometer through space, and you don’t even feel it.

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भड़ास4मीडिया इसी 17 मई को 9 साल का हो जाएगा. 17 मई 2008 को यह डोमेन नेम बुक हुआ था. जिस तरह पशु प्राणियों वनस्पतियों मनुष्यों आदि की एक एवरेज उम्र होती है, उसी तरह की उम्र वेबसाइटों-ब्लागों अचेतन चीजों की भी होती है, खासतौर पर उन उपक्रमों का जो वनमैन आर्मी के बतौर संचालित होते हैं, किसी मिशन-जुनून से संचालित किए जाते हैं. भड़ास के इस नौवें जन्मदिन पर कब और कैसा प्रोग्राम किया जाएगा, यह तय तो अभी नहीं किया है लेकिन कार्यक्रम होगा, ये तय है. मीडिया के कुछ उन साथियों को भी सम्मानित करना है जो लीक से हटकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने साहस का परिचय देते हुए प्रबंधन को चुनौती दी, कंटेंट के लिए काम किया, सरोकार को जिंदा रखा. आप लोग भी इस काम के लिए उचित नाम सजेस्ट करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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आजकल उन कुछ लोगों से मिल रहा हूँ जिनसे रूबरू बैठने बतियाने की हसरत ज़माने से थी। जिनको पढ़ पढ़ के बड़ा हुआ, जिनको हीरो की तरह प्रेम किया, उनसे आज दोपहर से मुखातिब होने का मौका मिला है।

इन्हें शानदार कवि कहूं या अदभुत कथाकार-उपन्यासकार या ग़ज़ब इंसान। इन्हें भारत का नाम विदेशों में रोशन करने वाला अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व कहूं। वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ तब पढ़ा था मैंने जब फुल कामरेड हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुवेशन करने के बाद जब बीएचयू बतौर होलटाइमर कामरेड के रूप में पहुंचा तो Uday Prakash जी की लिखी पहली कहानी पढ़ने के बाद उनकी कई कहानियां-रचनाएं पढ़ गया, फिर खोजता पढ़ता ही गया। ये लिविंग लीजेंड हैं, भारतीय साहित्य जगत के। इनसे मिलवाने के माध्यम बने पत्रकार भाई Satyendra PS जी। चीयर्स 🙂 (photo credit : भाभी कुमकुम सिंह जी)

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आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे का गाजीपुर में जो सम्मान समारोह आयोजित किया गया, उसमें सबसे मजेदार पार्ट था ट्वंटी ट्वंटी के अंदाज में फटाफट सवाल जवाब. कई सवालों पर उन्हें नो कमेंट कहना पड़ा. उस आयोजन की पूरी रिपोर्ट कई वेबसाइटों, अखबारों, चैनलों पर आई लेकिन अभी तक भड़ास पर कुछ भी अपलोड नहीं किया गया. जल्द ही पूरी रिपोर्ट भड़ास पर आएगी और यह भी बताया जाएगा कि आखिर भड़ास ने इस आईपीएस को सम्मानित करने का फैसला क्यों किया. फिलहाल यह वीडियो देखें. शायद कुछ जवाब आपको मिल जाए. वीडियो में खास बात यह है कि आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे पूरी ईमानदारी से बेलौस सब कुछ बता गए. इस दौरान कुछ यूं लगे जैसे यह शख्स हमारे आपके बीच का ही है. उनकी खासियत भी यही है. वह सबसे पहले आम जन के अधिकारी हैं. इसी कारण उन्हें खुद के लिए उर्जा आम जन के लिए काम करने से मिलती है. आगे और भी वीडियो अपलोड किए जाएंगे. फिलहाल इसे देखें…

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ट्रेवल ब्लॉगर Yashwant Singh Bhandari पर दिल्ली पुलिस के जवानों ने बोला धावा। लाल किले की बाहर से तस्वीर ले रहे थे। एक डॉक्यूमेंट्री के लिए दूर से खड़े होकर लाल किले के आउटर साइड को शूट कर रहे थे। जवानों ने धावा बोलकर न सिर्फ पीटा बल्कि पैसे भी छीन लिए। जब उन्होंने मुझे कॉल किया मदद के लिए तो मैंने 100 नंबर डायल करने की सलाह दी। इस बीच पुलिस वाले भड़क गए और भंडारी की पिटाई करने लगे। किसी तरह वो जान बचाकर भागे। पर्यटन को ऐसे ही बढ़ावा देगी राजनाथ की दिल्ली पुलिस! हम सभी को इस घटना की निंदा करनी चाहिए और दोषी पुलिसवालों को बर्खास्त करने की मांग रखनी चाहिए।

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मोदी जी लग रहा है नाक कटवा देंगे. भक्त बेहद निराश हैं. मोदी जी में अचानक मनमोहन सिंह नजर आने लगे हैं जो न कुछ करता है न बोलता है. इतना कुछ देश विरोधी हो रहा है. कैंची की तरह चलने वाली जुबानें खामोश हैं. पाकिस्तान से लेकर नक्सलवाद तक, कश्मीर से लेकर महंगाई तक, सब कुछ भयंकर उठान पर है. लोग तो कहने लगे हैं कि जब देश चाय वाले के हवाले कर देंगे तो यही सब होगा. कुछ कर डालिए मोदी जी, आपसे भक्तों की पुकार आह्वान सुन सुन कर मेरी भुजाएं फड़कने लगी हैं. अब ऐसे में कैसे चुप रह सकते हैं. जरूर आप कोई नई योजना बना रहे होंगे. न भी बना रहे होंगे तो चैनल वाले अपने तीसरे आंख से योजना की भनक लगा लेंगे और आपके इंप्लीमेंट करने से पहले ही ‘दुश्मनों’ को मारे काटे गिराते जाते हुए दिखा देंगे और भक्त समेत पूरा देश एक बार फिर मोदीजीकीजैजै करने लगेगा… आंय.. मुझे कुछ आवाजें धांय धूंय धड़ाम की सुनाई पड़ने लगी हैं, वाया रजत शर्मा के इंडिया टीवी… कई अन्य चैनलों के एंकर भी तोप और राइफल तानने लगे हैं अपने अपने स्टूडियो में… आप आनंद से सोइए, मीडिया वाले आपका काम कर ही डालेंगे… आइए हम सब बोलें भामाकीजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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रवीश कुमार की भड़ास से क्यों फटती है?

रवीश कुमार की भड़ास से क्यों फटती है? इसलिए फटती है क्योंकि उसके मालिक प्रणय राय की काली करतूत को भड़ास गाहे बगाहे खोलता रहता है. उसके मालिक के प्रगतिशील खोल में छिपे भ्रष्टाचारी चेहरे को नंगा करता रहता है. जाहिर है, रवीश कुमार भी नौकर है. सो, वह खुद के मीडिया हाउस की पोल खोलने वाली वेबसाइट का जिक्र भला कैसे कर सकता है. दूसरे मीडिया हाउसों पर उंगली उठाने वाले और उन्हें पानी पी-पी कर गरियाने  वाले रवीश कुमार की हिप्पोक्रेसी की हकीकत यही है कि वह करप्शन में आकंठ डूबे अपने मीडिया समूह एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी पर कुछ नहीं बोल सकता.

यही नहीं, एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी का पर्दाफाश करने वालों तक का आन स्क्रीन नाम भी नहीं ले सकता. वह अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की बेबाकी का खूब वर्णन करेगा लेकिन भारत के वे पत्रकार कतई नहीं दिखेंगे जो एनडीटीवी की नंगई व करप्शन की कहानी का पर्दाफाश करते रहते हैं. रवीश कुमार चाहे जितना आजाद खयाल और बेबाक पत्रकार बने लेकिन सच यही है कि वह एक अव्वल दर्जे का हिप्पोक्रेट है और उसे एड़ा बनकर पेड़ा खाने की रणनीति इंप्लीमेंट करने की शैली अच्छी तरह से आती है. वह खुद को भाजपाइयों से पीड़ित बता बताकर गैर-भाजपाइयों की निगाह में खुदा बनने की लंबे समय से कोशिश करने लगा है, और बनने भी लगा है.

अंधों के बीच काना राजा बना रवीश कुमार यह कभी नहीं बताएगा कि किस तरह प्रणय राय और चिदंबरम ने मिलकर एक साहसी आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को इसलिए जबरन पागल घोषित कराकर पागलखाने में डलवाया क्योंकि उसने प्रणय राय-चिदंबरम की ब्लैकमनी की लंबी कहानी पर काम किया और ढेर सारे तथ्य इकट्ठा कर एनडीटीवी को नोटिस भेजने की जुर्रत की. इस पूरे घटनाक्रम को भड़ास ने प्रमुखता से और लगातार छापा. यही वजह है कि कल

प्रेस फ्रीडम डे पर प्राइम टाइम के दौरान रवीश कुमार ने मीडिया को एक बीट मानकर इससे संबंधित खबरें छापने बताने वाली कई वेबसाइटों का जिक्र किया और उनके संचालकों का बयान दिखाया लेकिन वह भड़ास का नाम जान बूझकर गटक गया क्योंकि अगर वह भड़ास का नाम ले लेता तो प्रणय राय उसकी नौकरी ले लेता. यह सबको पता हो गया है कि किस तरह खांग्रेसी सरकार के कार्यकाल में प्रगतिशील माने जाने वाले मीडिया मालिक प्रणय राय ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर 2जी स्कैम के धन को ठिकाने लगाने के लिए दुनिया भर में चैनल खोल डाले और इस तरह काले धन को ह्वाइट करके भारत लाने में कामयाब हो पाए. 

कल प्राइम टाइम में रवीश कुमार मीडिया की आजादी पर लेक्चर पेल रहा था, ढेर सारे पत्रकारों का वक्तव्य सुना रहा था,  कई दोयम किस्म की छायावादी मीडिया वेबसाइटों का उल्लेख करते हुए उनके संचालकों का बयान दिखा रहा था तो बिलकुल साफ साफ भड़ास4मीडिया डॉट कॉम का उल्लेख छुपा गया. हां, उसने अपने खास चिंटू विनीत कुमार का बार-बार बयान-भाषण-लेक्चर सुनवाया जो दूसरे मीडिया हाउसों को गरियाने के बहाने जनता को भी उपदेश दे रहा था. ये वही चिंटू विनीत कुमार है जो हर वक्त रवीश कुमार की जय जय करते हुए लेख फोटो सोशल मीडिया पर लिखता छापता रहता है. तू मुझे पंत कह, मैं तुझे निराला के अंदाज में रवीश कुमार अपने उन खास लोगों को ही प्राइम टाइम में आने को एलाउ करता है जिसके बारे में उसे पता है कि वह उनके चेले हैं और चेले बने रहेंगे, साथ ही गाहे बगाहे रवीशकुमारकीजैजै करते हुए लेख आदि लिखा करेंगे.

हां, खुद को निष्कच्छ दिखाने को एक किसी भाजपाई या संघी का बयान भी दिखा देता है ताकि उस पर उंगली न उठ सके. रवीश कुमार असल में हमारे दौर के न्यूज चैलनों की पत्रकारिता का एक ऐसा आदर्श तलछट है जिसे नौकरी और सरोकार के बीच झूलते रहते हुए खुद को महान दिखाने बताने में महारत हासिल है. अगर सच में रवीश कुमार के भीतर एक सच्चा और सरोकारी पत्रकार है तो वह जरूर एनडीटीवी ग्रुप की ब्लैकमनी की कहानी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम के दौरान दिखाएगा और अगर प्रणय राय राधिका राय आदि मना करता है तो इस्तीफा उनके मुंह पर मार कर आजाद पत्रकारिता करते हुए बाकी पत्रकारों के लिए राह प्रशस्त करेगा. मगर पता है ऐसा वह नहीं करेगा क्योंकि उसे लाखों रुपये महीने चाहिए जो फिलहाल तो सिर्फ एनडीटीवी दे सकता है इसलिए उसे एनडीटीवी और इसके मालिकों के तलवे चाटते हुए, इन्हें बचाते हुए ही शेष क्रांतिकारी पत्रकारिता करनी है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Ghanshyam Dubey यशवन्त आप गलत है। इस समय लगता है की आप पर कोई “सवारी” आ गयी है। अकेले रवीश ही बचे हैं, पत्रकारिता के घुप अंधेरे मे टिमटिमाती रोशनी बन कर। यदि यह भी या इस जैसी कुछ ही और तो सब खत। हो जायेगा! पूरी ईमानदारी से किसी एक मीडिया (इलेक्ट्रानिक) समूह वह भी हिन्दी का नाम बता दीजिये, जिसे आप के आदर्शों के रूप मे माँन लिया जाये। एक नौकरी करने वाले पूरे देश के चैनलों मे सिर्फ 6 नाम बता दीजिए, जिसे आदरह मानक मान लिया जाये। सार राष्ट्रीय चैनलों को तो देख ही रहे है की किस गिरावट और तलवाचाटू भंगिमा के हो गए हैं! उन्हें देख कर नया गधा हुआ शब्द ” प्रेस्टीटूट ” बहुत छोटा पड़ेगा। राजनैतिक खबरों मे भी और देश के सामान्य से सामान्य आदमी की रोज रोज की जिंदगी मे उतरने वाली पीड़ा, उसकी मार, कहां जाएं, किस्से कहैं की अंधे गलियारों मे एक बची खुची संकरी गली अब भी बची है रबीश और NDTV के जरिये। स्वीकार न करिये तो “गाली” तो कम से कम मत ही दीजिये। जरूर आप कि या आपके तथाकथित किसी अपने की कोई नस कहीं दे दब गयी सी लगती है! या आपके अहं को कहीं से किसी भी तरह का धक्का सा लगा है! किसी को भी किसी भी तरह के कदाचार पर पथर फेकने का अधिकार नहीं है, जो खुद नैतिक रूप से भी किसी भी तरह का कदाचारी न रहा हो या हो! आप पत्रिकारिता ही नहीं, जिंदगी की किताब के ही पढ़े लिखे आदमी हैं। फक्कड़ भी हैं और मुँहफट भी। लेकिन यह मुहफटई जरा कुछ जँची नहीं! चिंतन कीजियेगा। यह गुजारिश है, क्योंकि न मैं रबीश हूँ और न ही भड़ासी यशवन्त!!
Yashwant Singh जो भी बड़े न्यूज चैनल और बड़े अखबार हैं, उसमें से ज्यादातार, इनक्लूडिंग एनडीटीवी, सब के सब पैसे उगाहने, काला धन को ह्वाइट करने के अड्डे बन गए हैं. ये राजनीति की तरह ही हम लोगों को वैचारिक आधार पर बांट कर अपनी दर्शक संख्या बनाए बचाए हुए हैं. सारी बड़ी व सच्ची खबरें अब मोबाइल पर मिल जाया करती हैं. इन ब्लैकमेलरों के अड्डों पर बुलडोजर चलवा देना चाहिए जो न कानून मानते हैं न संविधान न कोर्ट. मजीठिया वेज बोर्ड का मामला आपके सामने है. एनडीटीवी पर रवीश का जो एक घंटा का प्रलाप चलता है, उससे बहुत अच्छा लोग सोशल मीडिया पर लिखते हैं और आप भी पढ़ते हैं. सवाल उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का होता है. एनडीटीवी समेत ज्यादातर चैलन वही दिन भर की रुटीन खबर दिखाते रहते हैं. आपको कोई एनडीटीवी का ऐसा स्टिंग साल दो साल का याद है जिसमें सत्ता प्रतिष्ठान का कई बड़ा करप्शन सामने लाया गया हो? केवल बकचोदी करते रहना ही अगर न्यूज चैनल होना है तो इन न्यूज चैनलों की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है.. एनडीटीवी ने किस तरह 2जी स्कैम में चिदंबरम से गठजोड़ किया, इस करप्शन को ढंकने के लिए एक आईआरएस अधिकारी को पागलखाने भिजवा दिया… इन कड़ियों को जब आप जोड़ेंगे और पढ़ेंगे तो आपको एनडीटीवी व रवीश कुमार से घृणा हो जाएगी भाई.

Kumar Narendra Singh Lekin jail men to aap gaye the, Raveesh nahin.

Yashwant Singh जो आजाद होकर सच लिखेगा, किसी का भी सच, तो उसे सब मिल कर मार डालने की कोशिश तो करते ही हैं. मेरी जेल यात्रा ने असल में भारतीय मीडिया की असहिष्णुता को ही प्रदर्शित करता है कि कैसे ये मीडिया हाउसेज लोकतंत्र की दिन रात बात करते रहते हैं लेकिन खुद अपने सेटअप में बेहद अलोकतांत्रिक और असहिष्णु होते हैं. इसी कारण ये अपनी आलोचना पर बेहद कटखौने हो जाते हैं और आलोचना करने वाले को निपटाने के लिए हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल करने लगते हैं.

Kumar Narendra Singh Aapki mansikta bhi koi alag nahin hai. Aap kya hain, mujhe mat bstaiye. Sabko pata hai ki aap kitne nishpakh hain.

Yashwant Singh आजकल आप किसके नौकर हैं कुमार नरेंद्र साहब? नौकर टाइप पत्रकार कब भला आजाद पत्रकारों को महान माने? और,कब भला उनकी आजादी-निष्पक्षता उन्हें रास आई? आप सही जा रहे हो गुरु… निकालो भड़ास… आप तो जानते ही हैं कि भड़ास पर हम लोग अपने खिलाफ भी छापते हैं. आप पूरी भड़ास निकालिए, मुझे भी गरियाए और मेल कर दीजिए bhadas4media@gmail.com पर. आपकी भड़ास को भड़ास पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा. हम लोगों को ये कतई मुगलता नहीं कि हम कोई महान पत्रकार हैं. हम लोग बस कथित महान पत्रकारों की महानता की सच्चाई की पड़ताल कर लेते हैं बस, और तब वैसे ही मिर्ची लगती है उनके चिंटूओं को जैसे आपको लगी. आपकी सोच समझ की सीमा बस इसी से सामने आ जाती है कि आप पत्रकार के जेल जाने को घटिया बात मानते हो. 🙂 लगे रहिए बंधु…

Vishnu Gupt प्रणव रॉय टूटपूंजियां पत्रकार से कैसे बना एनडीटीवी मीडिया उद्योग का मालिक? ये लिंक पढ़िए.. https://www.bhadas4media.com/tv/11178-pranav-roy-katha

Singhasan Chauhan Yashwant Singh बिल्कुल यही होता है यसवंत जी जो सच्चाई को सामने लाना चाहता है उसके किसी गलत इल्जाम में फंसा दिया जाता है जैसे की मेरे साथ हुआ मैंने SDM की शिकायत की तो मेरे पिताजी के नाम से जुरमाना का नोटिस भेज दिया जिसे bhadas4media पर आपने छापा भी था|

Kumar Narendra Singh Aap koi patrakarita ki raksha ke liye jail nahin gaye the. Waise abhi kisi ka naukar nahinn hun…..jaroorat ho to bataiyega. Aapka kaise chalta hai. Aap apne ko mahan hi kahalwana chahte hain, varna mujhe naukar type kahne ka kya arth hai. Lagta hai, aap mere baare men kuchh nahin jante, tabhi to aap kah rahe hain humen aapki aazadi raas nahin aayee. Aapke post par yah meri pahli aur ekmatra tippani hai, jabki aap kafi varshon se aazad hain. Yadi aapki aazadi khalti, to bahut pahle tippani ki hoti. Bhasha bhi maryadit ho to behtar hai. Main bhi aapki tarah bhasha likh sakta hun. Main aapse yada rang men rahta hun….han, aapki tarah main apani prashashti gaan karne ka sadi nahin. Koi naukari ho to bataiye, gyan mat deejiye.

Yashwant Singh जिस दिन नौकरी ढूंढने का धंधा बंद कर देंगे, मनुष्य बन जाएंगे. बाकी आप वरिष्ठ हैं. मैं न नौकरी काफी बरसों से ढूंढता हूं न इस काम में मदद देता हूं. कोशिश करिए नई तकनीक को समझने की, वेब ब्लाग यूट्यूब से अच्छा पैसा कमाया जा सकता है. सीखना चाहें तो आपको फ्री में सिखा सकता हूं ताकि आप भी आजाद पत्रकार के रूप में जीने का लुत्फ उठा सकें.

Sanjaya Kumar Singh आपकी बात सही है। सहमत भी हो सकता हूं। पर मुद्दा यह है कि ऐसा करके एनडीटीवी से अलग होना या प्राइमटाइम की धार या स्वतंत्रता कम करना कोई अक्लमंदी नहीं होगी। कार्यक्रम चलता रहे और चलाने का मौका मिलता रहे तो बहुत कुछ किया जा सकता है। आप जो कह रहे हैं वह करके वीरता पुरस्कार के अलावा कुछ मिलने वाला नहीं है (हालांकि उसपर भी शक है)। और कितने ही वीरता पुरस्कार प्राप्त लोग कुछ कर नहीं पा रहे हैं। रवीश जो कर रहे हैं वह बेमिसाल है। रही बात एनडीटीवी के भ्रष्टाचार की तो – पूरी भाजपा उसे क्यों बख्श दे रही है? याद है बाबा रामदेव सलवार कमीज पहनकर भागे थे कि बचे रहेंगे तभी कुछ काम कर पाएंगे और अब हम लोगों के प्रधानसेवक को राष्टऋषि बना दे रहे हैं।

Yashwant Singh आप तो भड़ास के प्रोग्राम में आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को सुने थे. वहां मौजूद लोगों के रोंगटे खड़े हो गए थे. बाकी, मैंने कहा न कि अंधों में काना राजा. ऐसे मीडिया हाउसेज को बंद हो जाना चाहिए जो प्रगतिशीलता-सरोकार की आड़ में ब्लैकमनी को ह्वाइट करते कराते हैं. अगर एक घंटे का लेक्चर पेलना ही पत्रकारिता है तो रवीश कुमार को इस्तीफा देकर अपना यूट्यूब चैनल खोल लेना चाहिए ताकि वह वहां एनडीटीवी की भी असलियत बता सकें, ताकि उनकी निष्कच्छ आत्मा और सरोकारी समझ उन्हें अपराधग्रोस्त न कर सके. फिलहाल तो ऐड़ा बनकर पेड़ा खाने का एनडीटीवी – रवीश कुमार का अंदाज बढ़िया है जी 🙂

Divakar Singh एक मुद्दे पर गलती की है तो आलोचना होनी चाहिए। बाकी जगह अच्छा काम किया है तो ताली बजनी चाहिए। व्यक्ति या संस्थान विशेष के प्रति आसक्ति ठीक नही है।

Sandeep Verma भाजपा कहाँ बख्श रही है. उसकी विश्वनीयता खत्म करने के लिए भड़ास जैसे साधनों का उपयोग कर तो रही है.

Yashwant Singh सही पकड़े हैं 🙂 वैसे, जिनका चश्मा सिर्फ वाम या दक्षिण का या दलित या सवर्ण का बना हो वो इससे परे कोई विश्लेषण कर भी नहीं सकते…

Swami Nandan सौ आने सही यह रंगा सियार है अपने आप को ऐसा शो करता है जैसे इससे बड़ा ज्ञानी और साफ सुथरा कोई हइए नही है । साबधान यह देश मे एक ऐसी विचाधारा का बीज बो रहा है जो आई एस आई एस से भी ज्यादा खतरनाक है

सुभाष सिंह सुमन ये वही विनीत कुमार हैं क्या भैया जो रवीश की तर्ज पर लप्रेक जैसा कोई किताब लिखे हैं। गजब की गिरोहबाजी है भैया।

Yashwant Singh बिलकुल वही है वही है वही है 🙂 यह पूरा वाला चिंटू है रवीश का.

Prafulla Nayak शब्द शब्द नंगा करते।

Divakar Singh सबसे लोकप्रिय मीडिया न्यूज़ पोर्टल के बारे में न दिखाकर रवीश ने एक बार फिर अपने आप को हिप्पोक्रेट साबित कर दिया।

Prakash Govind क्या उलजलूल चण्डूखाने की उड़ा रहे हैं? लगता है भक्तों से अब फटने लगी है, इसीलिए उन्हें खुश करने को कचरा फैला दिया। सूरज पे मत थूकिए, खुद पे ही गिरेगा..

Yashwant Singh सूरज बाबा, सॉरी रवीश कुमार की जय 🙂 बस खुश

Prakash Govind पत्रकारिता जगत में एक मात्र बन्दा कुछ कायदे की बात करता है,,, वो भी आपको सहन नहीं हो रहा

Yashwant Singh रवीश के पक्ष में भड़ास पर जितना छपा है, उतना कहीं नहीं छपा होगा, पिछले आठ साल में. तो क्या, उनकी बुराई न छपी जाए, अगर बुराई है तो? मुझे भक्त टाइप आत्माएं अच्छी नहीं लगतीं जो या तो अंध समर्थन करती हैं या अंध विरोध. डेमोक्रेटिक होकर जीना चाहिए. उनकी अच्छाई को सलाम है, बुराई को शेम शेम है.

Pawas Sinha #SurajBaba kitne journalist ko jante ho jo Ravish ko certificate de rahe ho thora apne kholi se bahar niklo tb pata chalega duniya mein kyaa chal raha hain..

S.K. Misra जलन की दुर्गंध आ रही है,

Yashwant Singh जलन बहुत ही मानवीय स्वभाव है. अगर है तो इसको प्रकट कर देना चाहिए ताकि इसकी दुर्गंध दूर दूर तक जावे…:)

Pawas Sinha Ravish kumar ke chelo kabhi ravish se ye bataya ki uska bhai bihar se Congress ke ticket se election ladd chuka hain ek aam aadmi ko kaise mila congress se ticket na hiee wo chota sa neta thaa direct MLA ka ticket aurr usii ke bhai red light area ka owner bhii nikal aurr rahi baat NDTV kr owner ki baat to google bata dega wo kitne jada scams mein raha hain aurr kis political family se hain.. Chalo Baccho ab class khatam jaoo NDTV dekho..

Vinay Oswal यशवंत भाई, मैं भी जब से मेरी जानकारी में एनडीटीवी के प्रणव राय और चिदंबरम के बेटे का मामला आया है, रवीश के बारे में बहुत कुछ सोचता रहा हूँ। फिर सोंचता हूँ कि कुछ तो आधार चाहिए जीवनयापन का। पर ये संगती गले नहीं उतरती।

Dhirendra Giri एक समय मै भी उनको बहुत मानता था। यथार्त यही है वामपंथी और संघ विरोधी लोगो ने उसे फेसबुक पर प्रमोट किया है और ज्यादा, like ,कमेंट और अटेंशन चाहने वाले फेसबुकिया लेखकों और विचारकों ने इस हवा में बहकर उसको सर पर बिठा दिया। गांव गलियों और मुहल्लों में वह आज भी कोई कद नही रखता। यह फेसबुक के नशेड़ियों के बिच ही क्रन्तिकारी है।

Sandeep Verma टू जी घोटाले का लाखो करोड़ वापस लाने वाले अपनी बोलती बंद किये है . कम से कम नोटबंदी पर कितना नोट वापस आया यह तो बता देते . मगर यह प्रश्न तो पत्रकारिता से सम्बन्ध रखता ही नहीं है

Yashwant Singh कुछ काम आप भी कर लीजिए क्योंकि पत्रकार हर शख्स होता है. क्या आपको एनडीटीवी का माइक आईडी चाहिए पत्रकार बनने के लिए? संदीप भाई, सवालात्मक आत्मा लिए आप भटकिए, आपका अंदाज मुझे अच्छा लगता है. 🙂

Sandeep Verma मुझे जीटीवी का माईक बनने में ज्यादा रूचि है . उधर की पोल खोलने का ईरादा है

Yashwant Singh यही तो बात है. जी टीवी और एनडीटीवी जैसे चिरकुट संस्थानों से मुक्त रहिए, जो विचारधारा यानि वाम दक्षिण के जरिए खुद तो दबा कर पैसे कमा रहे हैं और हम आप इधर या उधर खड़े होकर लड़ रहे हैं. ये बड़े बड़े घराने असल में अब उगाही और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं. पत्रकारिता बस इसलिए की जा रही है ताकि मीडिया का आवरण बना बचा रहे और वो इसका आनंद मजा लेते रहें.

Deepak Pandey भड़ास जैसा बेबाक कोई मीडिया हाउस नहीं।

Dhruv Rautela दमदार… बेदाग… आपको जरूरत क्या उसके प्राइम टाइम में जिक्र की दादा

Tarun Kumar Tarun खंड-खंड पाखंड का नाम है रवीश… नासमझों और पाखंडियों ने मान रखा है जिसे ईश! प्रणव, बरखा की दलाली जिसे दिखती नहीं है… राडिया का टेप जिसे क्राति गान लगता हो.. अपने भाई की दलाली यौनलीला पर जिसकी कलम खामोश हॊ… लालू जैसे लुटेरे परिवारवादी को जो सामाजिक न्याय का चेहरा मानता है… वगैरह वगैरह.. वह आज क्रांतिकारी पत्रकारिता का चेहरा है! वह विधवा विलापी व मनोरोगी पत्रकारिता के शिखर पुरूष बनने की जुगाड़ू राह पर हैं। एनजीओधर्मी और अभिव्यक्ति ब्रांड फर्जी प्रगतिशीलता उन्हे खूब पसंद कर रही है।

Manish Kumar यशवंत भाई प्राइम टाइम में रवीश जी ने आपका नाम नहीं लिया। भाईसाहब मीडिया की निष्पक्षता आप भी बता दो क्या है, कम से कम रवीश कुमार एक कौने में बैठे कुछ तो काम कर रहे हैं अब आप भी मोदी भक्तों को तरह उन्हें गरियाने लग गए। भाई इस मीडिया में कौन कितना दूध का धुला है ये लगभग सभी जानते हैं। कम से कम आप जैसे लोगों से ऐसी उम्मीद नहीं होती। आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव जी के साथ हम लोगों को संवेदनाएं हैं। अब अडानी अम्बानी की कंपनियों में लाखो लोग काम कर रहे हैं उनमें बहुत से ईमानदार भी होंगे तो क्या वो अडानी अम्बानी के दाग अपने ऊपर ले रहे हैं?

Yashwant Singh गरियाने का राइट केवल भक्तों के पास थोड़ी है है 🙂 रवीश के बारे में दर्जनों या सैकड़ों अच्छे लेख कमेंट भड़ास पर पिछले आठ सालों से हैं. लेकिन एक बार गरियाया तो रवीश भक्तों की सुलग गई? 🙂 थोड़ा डेमोक्रेटिक आप लोग भी हो जाइए और हर चीज को दिल पर मत लगाइए. मजा भी लिया करिए. 😀

Manish Kumar आपकी हर पोस्ट पढता आया हूँ भाई और व्हाट्सएप पर भी आपके मैसेज आते हैं आज तभी तो शॉक्ड हुआ कि आ आप इतने रॉक क्यों हुए जा रहे हैं, और रही बात मज़े की तो मेरा थोड़ा वॉल देख लीजिए वहां सारे मज़े लिखे हैं। 🙂 आपके हर कदम के लिए शुभकामनाएं

Gireesh Pandey ये रविश कुमार वही है ना जिसका भाई बिहार congress का ब्लात्कारी नेता है

Yashwant Singh वही है वही है वही है 🙂

Madan Tiwary वह जलनखोर भी है, नहीं चाहता है मीडिया के क्षेत्र में कोई निष्पक्ष, बेबाक बोलने वाले का नाम हो।

Ashok Anurag प्रणय रॉय ने एक डॉक्यूमेंट्री का मुझसे काम करवा कर मेरी मज़दूरी 25000/₹ नही दी, चोर है और इसकी रेड डॉट कंपनी के सभी स्टाफ जिसने काम लिया लेकिन मेरा पैसा नही दिया सभी कमीने कुत्ते हैं..

Manmohan Shrivastava पत्रकारिता की काली छाया है रविश। दोगला और गद्दार।

इन्हें भी पढ़ें और एनडीटीवी की हकीकत जानें….

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Goibibo Car Service Fail : दो घंटे तक नहीं आई कार, अब दे रहे रिफंड का लॉलीपाप

Yashwant Singh : पिछले कुछ समय में तकनीक ने लोगों का जीवन काफी आसान किया है. ब्ला ब्ला के जरिए कार शेयरिंग, ओयो के जरिए होटल, ओला-उबेर के जरिए रेंट पर कार आदि के विकल्प शुरू हुए. इनके एप्प इंस्टाल करिए स्मार्टफोन में और हो जाइए शुरू. गोइबिबो नामक कंपनी ने जो होटल दिलाने के लिए काम करती है, पिछले दिनों रेंट पर कार की सर्विस शुरू की. मैंने पिछले दिनों कार बुक किया. तय समय से करीब दो घंटे तक कार नहीं आई.

कार के ड्राइवर का पहले तो फोन स्विच आफ / नॉट रीचेबल बताता रहा. बाद में जब उसके मालिक से और फिर ड्राइवर से बात हुई तो पता चला कि कार तो अभी करीब चालीस किलोमीटर दूर है. यानि उसके आने में अभी दो घंटे की देर है. ऐसे में तुरंत दूसरी टैक्सी किया. फिलहाल गोइबिबो वाले रिफंड आदि के लालीपाप दे रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आप जब किसी के कीमती वक्त को इस तरह नष्ट करते हैं तो उसकी भरपाई सिर्फ रिफंड से नहीं हो सकती.

मुझे तो पहली ही कार बुकिंग के बाद समझ में आ गया कि गोइबिबो ने कार सर्विस में गलत पांव डाल दिया है, उनकी यह सेवा तो पूरी तरह फेल है. उन्हें सिर्फ होटल किराए पर उठाकर उससे मिलने वाली दलाली से काम चलाना चाहिए. पढ़िए वो चिट्ठी जो गोइबिबो वालों ने मुझे भेजी है….

Dear Yashwant,

Greetings from GoIbibo.com! This is in reference to your query related to a bad experience with the Car owner. Please accept our sincere apology for your experience with this Car owner, we strongly discourage this sort of a behavior. We feel sad for the inconvenience you had with the car owner today, we have advised the Car owner to not to conduct themselves in the same manner again. We take users feedback very seriously and the points that you had mentioned on your discussion with us have been passed to the department that will act on it.

Being a Car sharing platform that focuses on connecting Car owners with users this is the best we can do. As discussed on the phone call, we have initiated full refund against this booking, which will reflect in your paid account within 5-14 working days. Further, we also request you to rate the car owner on GoCars app and mention your experience, this will enable other users to judge the quality of service offered by car owner.

Please feel free to reply in case of any query. We are grateful for the pleasure of serving you and meeting your travel needs.

Regards,
Sujeet Kumar rai
GoCare Support
24×7 Customer Service Number: 09213025552 / 1-860-2-585858

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : ह्वाट्सएप 9999330099

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