अपनी भाषाई सभ्यता को बाकी लोगों पर थोपना IIMC के प्रोफेसरों से सीखें

पत्रकारिता के क्षेत्र में चोटी का संस्थान माने जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान में इन दिनों प्लेसमेंट हो रहे हैं. यूं तो संस्थान अपने विवरणिका में 100 फीसदी प्लेसमेंट का दावा नहीं करता फिर भी कंपनियां आती हैं और विद्यार्थियों को अपने यहां नौकरी देती हैं. यहां कई भाषाओं, मसलन उर्दू,मलयालम, मराठी (संभवतः पिछले साल या इस साल से शुरू हुआ है या होगा), उड़िया अंग्रेजी, हिन्दी की पढ़ाई होती है. इसके साथ विज्ञापन और रेडियो टीवी के विभाग हैं.

हर साल कोई ना कोई नया हंगामा होता है. सो इस बार भी हो रहा है. इसमें गलती विद्यार्थियों की नहीं है. गलती उन लोगों की है जो प्लेसमेंट सेल के हेड होते हैं. मसलन कभी श्रीमती सुरभी दहिया जी तो कभी रिंकू पेगू जी. अपनी भाषाई सभ्यता को बाकी लोगों पर थोपना हो तो ईस्ट इंडिया कंपनी से नहीं IIMC के प्रोफेसरों से सीखना चाहिए.

आप उस कंपनी की परीक्षा में नहीं बैठ सकते (ऐसी पुष्ट-अपुष्ट जानकारी है. विद्यार्थियों और प्रोफेसरों के इनकार करने पर बदल सकती है.) जिस विभाग के आप छात्र नहीं हैं. मसलन विज्ञापन के प्लेसमेंट कंपनी में हिन्दी और रेडियो टीवी विभाग के लोगों को नहीं बैठने दिया गया. छात्रों ने एक पत्र लिखा है.

हिन्दी का इतना बड़ा बाजार होने पर भी अगर विद्यार्थियों को विज्ञापन विभाग की परीक्षाओं में बैठना पड़ रहा है तो यह भी अपने आप में एक चोटी के संस्थान लिए शर्म की बात है, वो भी तब जबकि संस्थान के महानिदेशक श्री केजी सुरेश जी खुद DD समेत कई संस्थानों में काम कर चुके हैं.

खैर, अभी तो बात सिर्फ विज्ञापन विभाग की है. दावा कर रहा हूं जो सच होगा भी कि रेडियो और टीवी की प्लेसमेंट परीक्षाओं में भी ऐसी कारगुजारियां होंगी. IIMC में प्लेसमेंट उसी दिन संपन्न मान लिया जाता है जब विज्ञापन और कुछ एक अन्य विभागों में छात्रों की नियुक्तियां अथवा इंटर्नशिप की व्यवस्था संपन्न हो जाती है.

हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों को RTV से जुड़ी क्लासेज में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. इक्विपमेंट नहीं दिलाए जाते. यह सब तब है जबकि IIMC एक स्वायत्त संस्थान हैं. (समझ रहे हैं ना जो बीते दिनों 60 संस्थाओं के साथ किया गया है. फायदा नुकसान यहीं देख लें.)

अंग्रेजी में पीपीटी मुहैया करा देने वाले प्रोफेसर, आपसी लड़ाई (मसलन नेताओं और राजनीतिक दलों से संस्थागत करीबी, HOD और DG के पद के लिए ) में बिजी रहते हैं. लेकिन किसी के पास इतना वक्त नहीं होता कि कोई नौकरियों पर ध्यान दे ले. सबके बहुत संपर्क है. इतना की एक बार में मेरे सरीखे शख्स का गूगल कॉन्टैक्ट भर जाए (अगर ऐसा होता हो तो) लेकिन सब संपर्क नौकरी के नाम पर ना जाने कहां गायब हो जाते हैं.

क्लास में लेक्चर के समय विद्यार्थी अक्सर (मैंने सुना है) प्रोफेसर का इतिहास सुनते रह जाते हैं. फिर प्लेसमेंट के समय खुद इतिहास होकर रह जाते हैं. बेहतर हो कि आने वाली बैच यह सोच कर बिल्कुल ना आए कि उसे यहां से नौकरी मिलेगी. प्रोफेसर लोगों की आपसी खींचतान, EG0 (काम शुरू करे 6 सेकेंड में) और DG की लफ्फाजियों के चलते विद्यार्थियों का जीवन चौपट होता है.

मेरी राय है कि संस्थान इस साल जारी किए जा रहे विवरणिका में यह स्पष्ट कर दे कि हम नौकरी नहीं दे सकते. हम अभी आपसी लड़ाई, खींचतान और EGO में बिजी हैं. जब खुद इन सबसे मुक्त हो जाएंगे तो आपकी चर्चा करेंगे.

विभागों में प्रोफेसर नहीं हैं. जो बाहर से पढ़ाने आते हैं उनका भी मानदेय का बिल देख कर साहबान-मालिकान भड़क जाते हैं. मिड टर्म में एक हिन्दी विभाग के एक शिक्षक का कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने वाले हैं ऐसी खबर है. हो सकता है कोई अपना बेरोजगार बैठा हो.

फिलहाल इस प्लेसमेंट में अब तक जो कारगुजारियां हुई हैं उन पर रोक लगाया जाए और फेयर प्लेसमेंट कराया जाए. बाद बाकी मुझे उनकी बड़ी चिंता हो रही है जो ‘हंगामा नहीं नौकरी चाहिए’ का पोस्टर पीठ पर टांगे घूम रहे थे.

सादर

राहुल सांकृत्यायन

युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार राहुल सांकृत्यायन की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार और सुप्रिय प्रसाद वाले बैच के iimc स्टूडेंट्स का मिलन समारोह (देखें तस्वीरें)

Vikas Mishra : 6 अगस्त को हर साल की तरह इस साल भी हम दोस्त मिले। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में हम लोग पहली बार अगस्त 1994 में मिले थे। सारे संगी आज 40 साल की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन जब मिलते हैं तो फिर उम्र 22-23 साल पीछे चली जाती है। शेरो-शायरी, गाने बजाने के बीच चुटुकले और चुटकियों की बारिश में हर चेहरा खिला मिलता है और ठहाकों से पूरी महफिल गूंज उठती है।

इस बार के मिलन समारोह में खास बात ये थी कि अमरेंद्र किशोर का जन्मदिन था। इस आयोजन में सबसे प्रमुख भूमिका हमेशा की तरह राजीव रंजन की रही। जिसने दोस्तों को जुटाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। अमरेंद्र उसके साथ रहा, कदम दर कदम। हर बार की तरह इस बार भी अमृता का कैमरा चमकता रहा। सबको पता था कि अमृता का कैमरा आएगा, फिर तो किसी ने ज्यादा तस्वीरें खींचने की कोशिश भी नहीं की।

इस बार हमारे कई मित्र नहीं आ पाए, एक तो रक्षा बंधन का त्योहार, ऊपर से उनकी कोई विवशता। खैर, अगली बार फिर मिलेंगे। ये हमारे लिए गौरव की बात है कि हमारे बैच के सभी मित्र जहां हैं, झंडे गाड़े हुए हैं। देश के नंबर वन चैनल आजतक के संपादक सुप्रिय प्रसाद हमारे बैच के हैं तो नंबर वन अखबार के मेरठ संस्करण के संपादक मुकेश सिंह भी इसी बैच के हैं।

अमरेंद्र, उत्पल, संगीता, रवीश कुमार, नलिन, अमृता, सतीश, अमन, रत्नेश, दो दो राजीव, सरोज, शालिनी, शिव कहां तक नाम गिनाएं, हमारे बैच के जितने भी मित्र हैं, सभी बैच का नाम चमचमाए हुए हैं, लेकिन जब हम मिलते हैं तो कौन कहां है, ये भूल जाते हैं, ऐसा ही तो हुआ 8 की रात। ये मेरे लिए बहुत आत्मीय पल रहे हैं, जिन्हें मैं अपने फेसबुक के मित्रों के साथ बांट रहा हूं। फोटो स्लाइड शो के लिए नीचे क्लिक करें :

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान हास्टल वार्डन के प्रशासनिक दायित्व से मुक्त

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन यानि आईआईएमसी में इन दिनों महानिदेशक केजी सुरेश के चमड़े का सिक्का चल रहा है. शिक्षकों से उनकी सीधी भिड़ंत है लेकिन सत्ता शह के बल पर वह लगातार अपनी मनमानी चलाते जा रहे हैं. ताजी सूचना के मुताबिक प्रोफेसर आनंद प्रधान को हॉस्टल वॉर्डन के प्रशासनिक कार्यों के दायित्व से मुक्त कर दिया गया है. चौदह वर्षों से आईआईएमसी से जुड़े और छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय आनंद प्रधान फिलवक्त बतौर एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं.

आनंद प्रधान ने सात शिक्षकों के साथ मिलकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव को पत्र भेजकर केजी सुरेश की मनमानी का जिक्र किया था जिससे सुरेश नाराज हो गए. प्रधान ने यह भी कहा था कि केजी सुरेश ने मीडिया में जो बयान दिया उससे उनका अपमान हुआ और प्रतिष्‍ठा को ठेस पहुंची. शिक्षकों ने पत्र में केजी सुरेश पर एक पक्षीय और अपारदर्शी प्रशासन चलाने का आरोप लगाया. उधर, केजी सुरेश ने सारे आरोपों का सिरे से खंडन किया.

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संघ के कार्यक्रम में IIMC की रहस्यमयी सहभागिता का पर्दाफाश RTI से हुआ

दिनांक 5 अप्रैल 2017 को आरएसएस के थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन ने “Communicating India” विषय पर एक कांफ्रेंस कराया। इस कांफ्रेंस में कैबिनेट मंत्री वैंकेया नायडू, डॉ जीतेन्द्र सिंह आदि बड़ी हस्तियां सम्मिलित हुई थी। उस कांफ्रेंस के विभिन्न प्रचार सामग्रियों में IIMC का ऑफ़िसियल लोगो (चिह्न) लगाकर, IIMC को in association with बताया गया था।

5 अप्रैल को शाम जब हमें इस कार्यक्रम की सूचना लगी, तो हम RTV विभाग के छात्र अंकित और साकेत तुरंत डीजी साहब के ऑफिस गए। उस समय डीजी साहब चैम्बर में मौजूद नहीं थे, लेकिन उनके पीए K M Sharma सर मिले, जिन्होंने इस कांफ्रेंस के बारे में पूछे जाने पर अनभिज्ञता जाहिर कर दी। संयोगवश उसी समय वहां पर IIMC की डीन ऑफ़ स्टूडेंट्स सुरभि दहिया मैम भी मिली, उन्होंने भी सीधे- सीधे इस कांफ्रेंस के बारे में अनभिज्ञता जाहिर कर दी।

तत्पश्चात हम तुरंत एडीजी सर से मिलने उनके ऑफिस गए। जहां उनके पीए गोपाल जी को हमने इस कांफ्रेंस के बारे में बताते हुए सर से मिलने के लिए बोला, लेकिन गोपाल जी ख़ुद ही एडीजी सर के पास गए और चैम्बर से निकलकर हमें यह सूचना दी कि इस कांफ्रेंस के बारे में वह (एडीजी) भी अनभिज्ञ हैं। कुछ दिन बाद हमने पड़ताल की, तो विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन के ऑफ़िसियल वेबसाइट और कुछ अन्य लोगों के ट्विटर और फ़ेसबुक पोस्ट से हमें जानकारी लगी कि हमारे डीजी साहब स्वयं उस कांफ्रेंस में मौजूद थे, जिससे संबंधित फ़ोटोग्राफ़ और वीडियो हमने फ़ेसबुक पर पब्लिकली पोस्ट और शेयर किया था।

इस कांफ्रेंस में VIF के साथ IIMC भी सहभागी था, इसकी पुष्टि प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने अपने ऑफ़िसियल ख़बर से कर दी है। कुछ और मीडिया वाले जैसे APN News ने भी इसकी पुष्टि की थी। मैंने (अंकित) डीजी साहब को इस कांफ्रेंस को लेकर विभिन्न भ्रामक स्थितियों के लिए एक ईमेल भी किया था और साथ ही साथ संस्थान में एक आरटीआई (RTI) भी फ़ाइल किया था। जब 10 अप्रैल को हम (रोहिन, आर्य भारत, साकेत, अंकित) छात्र डीजी साहब से उनके ऑफ़िस में मिले तो उन्होंने बोला कि कांफ्रेंस के बारे में ईमेल से जवाब न देकर आरटीआई से जवाब दे दिया जाएगा।

आरटीआई में इस कांफ्रेंस से मुख्यतः 3 सवाल थे-

1. विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन ने 5 अप्रैल 2017 को IIMC का ऑफिशियल लोगो लगाते हुए तथा IIMC को in association with बताते हुए, ‘Communicating India’ विषय पर जो कांफ्रेंस कराया था, उसके बारे में क्या IIMC प्रशासन को जानकारी थी या नहीं?

2. यदि IIMC प्रशासन को इस कांफ्रेंस के बारे में जानकारी थी, तो IIMC को उस फ़ाउंडेशन के साथ कांफ्रेंस के लिए ‘in association with’ होने की अनुमति किस सक्षम प्राधिकारी (competent authority) के द्वारा दी गई थी? प्राधिकारी का नाम व पद (Name & Post) बताने की कृपा करें।

3. यदि कांफ्रेंस को लेकर कोई अनुमति दी गई थी, तो उस अनुमति पत्र की छायाप्रति देने की कृपा करें।

ये मिला आरटीआई (RTI) से जवाब….

प्रश्न संख्या “1- 3” के बारे में संस्थान के रिकॉर्ड के अनुसार इस तरह की सूचना उपलब्ध नहीं है।

हम छात्रों की इस विषय पर यह सोच उभर कर सामने आती है कि —

1. यह कैसे संभव है कि IIMC किसी दूसरे फ़ाउंडेशन, NGO या संस्था के साथ कोई कांफ्रेंस या सेमिनार सहभागी होकर करती है और इसके बारे में कोई रिकॉर्ड ही इसके पास नहीं होता है। वो भी उस कांफ्रेंस में जिसमें कैबिनेट मिनिस्टर वैंकेया नायडू और जीतेन्द्र सिंह जैसे लोग शामिल होते हैं।

2. यह कैसे संभव है कि जिस कांफ्रेंस में IIMC सहभागी थी और इसके (IIMC) डीजी ख़ुद मौजूद होकर मंचासीन थे, उस कांफ्रेंस के बारे में IIMC के रिकॉर्ड में कोई सूचना ही नहीं है।

3. यह कैसे संभव है कि IIMC के डीजी जिस कांफ्रेंस में गए, उस कांफ्रेंस के बारे में IIMC के एडीजी, DSW और ख़ुद उनके पीए को सूचना नहीं हो।

4. यह कैसे संभव है कि IIMC ने VIF के साथ सहभागी होकर ‘Communicating India’ जैसे शैक्षणिक विषय पर कांफ्रेंस में भाग लिया हो, जिसकी पुष्टि PIB (Press Information Bureau) जैसे सरकारी भोंपू ने भी कर दी हो, से संबंधित रिकॉर्ड IIMC के पास मौजूद ही न हो। तब तो IIMC और PIB दोनों में से कोई एक ही सही हो सकता है। संयोग से दोनों ही सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं, अब सही- ग़लत का फ़ैसला मंत्रालय ही कर सकता है।

इस मुद्दे में एक मज़ेदार और साथ ही गंभीर विषय सामने आया है। वो है IIMC के लोगो (चिह्न) को लेकर। विवेकानंद फ़ाउंडेशन ने उस कांफ्रेंस में IIMC को ‘in association with’ दिखाते हुए, IIMC का ऑफिशियल लोगो भी यूज़ किया था। जब हमने इस कांफ्रेंस में IIMC के रहस्यमयी सहभागिता को लेकर सवाल खड़ा किया था, तो हमने यह भी सवाल उठाया था कि क्या उस फ़ाउंडेशन ने IIMC के ऑफिशियल लोगो को कांफ्रेंस से संबंधित अपने विभिन्न प्रचार सामग्री पर यूज़ करते समय IIMC प्रशासन से अनुमति ली थी या नहीं।

इसी दौरान हमने आरटीआई में IIMC प्रशासन से यह सवाल भी पूछा कि IIMC अपने जिस लोगो (चिह्न) को प्रॉस्पेक्टस, मुख्य भवन एवं तमाम दस्तावेजों पर प्रयोग में लाती है, क्या वह…

1. भारत में स्थापित किसी विधिक प्राधिकारी (Legal authority) या विधिक संस्था के समक्ष रजिस्ट्रीकृत है? या भारत के किसी विधिक अधिनियम (Legal Act) के तहत कभी रजिस्टर्ड हुआ है?

2. यदि IIMC का लोगो (चिह्न) रजिस्टर्ड है, तो उसके रजिस्ट्रेशन प्रमाण- पत्र की छायाप्रति उपलब्ध कराइए।

RTI से ये मिला जवाब…..

IIMC प्रशासन को लोगो (चिह्न) के पंजीकरण के बारे में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।

हम छात्र यह सोचते हैं कि IIMC प्रशासन थोड़ा सतर्क होकर अपने आफ़िशियल लोगो (चिह्न) के पंजीकरण के बारे में सूचना उपलब्ध कर ले, नहीं तो समाज में तमाम फ़र्ज़ी संगठन और व्यक्ति मौजूद हैं जो इस लोगो (चिह्न) के मिसयूज़ के ज़रिए IIMC का गुडविल ख़राब कर सकते हैं।

I love IIMC, लेकिन दो निवेदन है…

1. एक तो सीधे- सीधे कांफ्रेंस में IIMC के रहस्यमयी सहभागिता को लेकर ज़िम्मेदार लोगों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो।

2. दूसरा IIMC के ऑफ़िसियल लोगो (चिह्न), यदि रजिस्टर्ड नहीं है तो इसे तुरंत रजिस्टर्ड कराया जाय।

अंकित कुमार सिंह
Radio tv journalism
IIMC, Delhi
mob.n. 9205800380
mail ankit.deaddiction@gmail.com

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छात्र द्वारा महानिदेशक को लिखे गए पत्र से आईआईएमसी फिर सुर्खियों में, आप भी पढ़ें

पिछले कुछ महीनों से भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) लगातार कई वजहों से खबरों में है. इन दिनों संस्थान के एक छात्र द्वारा महानिदेशक को लिखा गया एक पत्र चर्चा का विषय बना हुआ है. पूरा पत्र इस प्रकार है…

सेवा में,
श्री के जी सुरेश जी
महानिदेशक,
भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
विषय: संस्थान में व्याप्त असीमित गुंडागर्दी के संदर्भ में

श्रीमान महोदय,

प्रार्थी आशुतोष कुमार राय, हिंदी पत्रकारिता का विद्यार्थी हूँ| महोदय मैं एक सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूँ| यहां से मिली कर्तव्य और ईमानदारी को बचाये रखने के लिए प्रतिबद्ध हूँ| श्रीमान  मध्यम वर्गीय परिवार के ताने-बाने ने मेरे अंदर स्वाभिमान भी कूट-कूट कर भरा है| मेरी यह कोशिश भी रहती है कि खुद को इस प्रकार बना सकूं जिससे मेरे अभिभावक मुझ पर फक्र महसूस कर सकें| महोदय मैं एक विद्यार्थी हूँ और बहस के साथ विचारों के आदान-प्रदान के हरेक माध्यमों में गहरी आस्था रखता हूँ| गाँधी के आदर्शों पर खड़ी की गयी लोकतंत्र के संसद और बाबा साहब के संविधान को अपना धर्म और धर्मग्रंथ मानता हूँ| यह मेरे लिए गीता और कुरान से सर्वोपर है क्योंकि संविधान ने मुझे सबके समान बताया है और अभिव्यक्ति और आलोचना करने की स्वतंत्रता दी है| व्यक्ति से लेकर शासन-प्रशासन की निरंकुशता पर सवाल उठाना हरेक प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थी का आवश्यक लक्षण है| बात जब पत्रकारिता के विद्यार्थी की हो तो यह उसका लक्षण नहीं परम कर्तव्य है.

महोदय लेकिन अब यह कर्तव्य का निर्वहन कुछेक लोगों के लिए गले की हड्डी बनती हुई नजर आ रही| हमारे द्वारा लिखे गए  लेखों पर वह गुंडों की तरह संस्थान परिसर में मारपीट की धमकी और गाली-गलौज करते हैं| गाय को माँ कहने  वाले राघवेंद्र सैनी (हिंदी पत्रकारिता) और मुदित शर्मा (हिंदी पत्रकारिता) हमें माँ-बहन की गालियां देते हुए हाथापाई पर उतर आते हैं| साथ ही साथ आरएसएस के साथ अपने दिव्य संबंधों का हवाला देते हुए आप के संरक्षण का गुणगान करते हैं| उनको लेकर यह मेरी व्यक्तिगत शिकायत नहीं है |आये दिन वह यह अव्यवहारिक दुस्साहसिक कार्य को अंजाम देते हैं|यह देखा भी गया है की प्रशासन की तरफ से भी इनकी सक्रियता का बकायदे सहयोग लिया जाता है| ताज़ा उदाहरण है विवेकानंद फाउंडेशन और भारतीय जनसंचार संस्थान के सहयोग से कराया गया ‘कम्युनिकेटिंग इंडिया’ सेमिनार जिसमें इन दो चार लोगों की उपस्थिती पर हमने सवाल उठाये थे| हमारा सवाल था की जब दो सौ से भी ज्यादा विद्यार्थी संस्थान में मौजूद हैं फिर यहीं गिने-चुने ही लोग हर सेमिनार को किसकी अनुमति से अटेंड करते हैं| इस सवाल से तिलमिलाए विशेषकर इन दो लोगों ने मुझसे निपटने की धमकी दी|

इनकी धमकियों में जो गुंडई का पुट था वह कुछ ऐसा था की पहले तो यह पुस्तकालय के बाहर हमारे साथी अंकित कुमार सिंह से हाथापाई और फिर बाद में मारपीट की धमकी दी, साथ ही साथ उनके फेसबुक पोस्ट को हटाने की मांग की| चूंकि पोस्ट को मैंने भी सराहा था इसलिए उसके अगले दिन मुझको भी ”अगला नजीब” बनाने की चेतावनी दी| मुदित शर्मा और राघवेंद्र सैनी ने गाली देते हुए संस्थान से बाहर मेरी औकात बताने के लिए अपनी बात रखी जिसको मैं सिर्फ त्वरित उत्साह का परिणाम नहीं मानता|

महोदय मैं एक निर्भीक विद्यार्थी हूँ जो कहीं से भी इस संस्थान और भारतीय लोकतंत्र केलिए अपराध की श्रेणी में नहीं आता| इस स्थिति में अगर मेरे साथ कोई भी दुर्घटना घटित होती है तो इसके लिए सीधे तौर पर संस्थान प्रशासन जिम्मेदार होगा| साथ ही साथ मैं यह जानना भी चाह रहा की जिस तरह से इनको हमारे ऊपर वरीयता दी जा रही इसके पीछे के मुख्य कारण क्या है? क्या सच में इनको असीमित छूट दी जा चुकी है क्योंकि न तो पिछली शिकायतों पर कोई कारावाई होती है न ही इनको कोई सजा होती है| महोदय सरकारी और गैर सरकारी हरेक सेमिनारों में आपके साथ इनकी खिलखिलाती तस्वीरें सोशल मीडिया पर बकायदे प्रकाशित और सम्पादित होती रहती है, इसलिए आपकी घनिष्टता को लेकर एक आश्चर्यजनक आश्वस्ति जेहन में उतरती है|

महोदय आर टी वी विभाग के वैभव ने भी मुदित की शिकायत की थी जिसमें मुदित ने वैभव को हॉस्टल में आकर मारने की धमकी दी थी |इस पर अनुशासनात्मक कारावाई का आज तक इंतज़ार है| मैं इंतज़ार का धीरज नहीं रख पाऊंगा| मैं चाहता हूँ की आप इन पर अनुशासनात्मक कारावाई करें| यह कार्यवाई निष्पक्ष रूप से हो इसके लिए दोनों लोगों को तत्काल प्रभाव  निलंबित कर जाँच होने तक संस्थान से बाहर रखा जाय| मैं संस्थान से उम्मीद रखता हूँ की मेरी शिकायत पर तत्काल प्रभाव से कार्यवाई की जायेगी अन्यथा मुझे सुचना प्रसारण मंत्रालय का दरवाजा खटखटाना होगा | अगर मेरी बातों को वहां भी अनसुना किया जायेगा तो अंततः मुझे संस्थान परिसर में भूख़ हड़ताल पर जाना पड़ेगा |

प्रार्थी
आशुतोष कुमार राय
हिंदी पत्रकारिता
९५४०४१५४७२

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