क्या अब किसी भी डेमोक्रेटिक-सेक्युलर समाज में इस्लाम को accomodate करने की जगह नहीं है?

Rajeev Mishra : किसी भी डेमोक्रेटिक सेक्युलर समाज में इस्लाम को accomodate करने की जगह नहीं है… क्यों? जानने के लिए इतिहास का यह सबक फिर से पढ़ें. मूर्तिभंजक इस्लामिक समाज का एक बहुत बड़ा विरोधाभास है – ईरान में तेरहवीं शताब्दी के एक यहूदी विद्वान् राशिद-उद-दिन की एक विशालकाय मूर्ति. राशिद-उद-दिन ने मंगोल सभ्यता का इतिहास लिखा, और उनका अपना जीवन काल समकालीन इतिहास की एक कहानी बताता है जो भारत के लिए एक बहुत जरुरी सबक है.

मंगोलों ने चंगेज़ खान के समय पूरे एशिया से लेकर यूरोप तक अपना दबदबा बनाया, और मध्य पूर्व एशिया में अपना शासन कायम किया. मंगोल मुख्यतः तांत्रिक धर्म (मंत्रायण) का पालन करते थे जो मूलतः भारत से निकल कर तिब्बत, चीन, जापान और पूरे मध्य एशिया में फैला था. मगोलों ने विश्व का पहला सच्चा धर्म निरपेक्ष राज्य बनाया (भारत के Pseudo Secular राजनीतिक तंत्र जैसा नहीं), जहाँ सभी धर्मों के लोगों को न सिर्फ अपना धर्म मानने की आज़ादी थी, बल्कि सबके बीच स्वस्थ संवाद स्थापित करने का प्रयत्न किया गया. मंगोलों की इस धार्मिक उदारता का सनातन धर्मियों, मंगोल-तुर्क के अदि सभ्यता के लोगों और यहूदियों ने स्वागत किया. इसाई इसके बारे में मिला जुला भाव रखते थे, जबकि मध्य-पूर्व के मुस्लिम इनसे बहुत घृणा करते थे.

इस दौरान चंगेज़ खान के वंशज (परपोते) आरगुन खान ने एक यहूदी डॉक्टर शाद-उद-दौला को अपना वजीर बनाया. शाद-उद-दौला बहुत कुशल और प्रतिभावान था. उसके समय में आरगुन खान ने बगदाद और तिबरिज़ में कई मंदिर बनवाए और मक्का पर कब्ज़ा करने की योजना बनायीं. उसी समय आरगुन खान बुरी तरह बीमार पड़ा, और मौका देख कर मुस्लिमों ने शाद-उद-दौला की हत्या कर दी. शाद-उद-दौला ने अपने समय में अन्य कई यहूदियों को प्रशासन में स्थान दिया था, उन्ही में से एक थे राशिद-उद-दीन, जो बाद में आरगुन खान के उत्तराधिकारी महमूद गजान के वजीर बने.

आरगुन की मृत्यु के बाद मुस्लिम और मंगोलों के बीच लगातार संघर्ष चला, और मुस्लिमों ने मंगोल अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए बाज़ार को नकली नोटों और सिक्कों से भर दिया – यह तरकीब जो आज भी भारत के विरुद्ध प्रयोग की जा रही है.

गजान खान के समय राशिद-उद-दीन ने स्थिति को अंततः नियंत्रण में लिया, अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाया, टैक्स-सुधार किये, और समृद्धि वापस लौटी. लेकिन मुस्लिमों से संघर्ष चलता रहा और और मुसलमान लगातार गजान खान पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाये रहे. अन्तः में स्थिति को शांत करने के लिए गजान खान और राशिद-उद-दीन ने ऊपरी तौर पर इस्लाम स्वीकार कर लिया, और गजान को अमीर-उल-मोमिन घोषित किया गया. अब मुसलमान गजान खान पर दबाव बनाने लगे की वह मंदिरों, चर्चों, और सिनागोग (यहूदि धर्म स्थल) को तोड़े और दूसरे लोगों को भी इस्लाम स्वीकार करने को बाध्य करे.

राशिद-उद-दीन के वजीर रहते गजान खान, और उसके भाई ओल्जितु का शासन लगभग शांति और स्थिरता से गुजर गया. राशिद स्वयं को अरस्तु और गजान को अपना Alexander कहता था. राशिद ने दुनिया के कोने कोने से धर्म-गुरुओं और विद्वानों को बगदाद के दरबार में जगह दी. हालाँकि इस्लामिक गुट ने राशिद-उद-दीन पर लगातार आरोप लगाया कि उसने अपना मूल यहूदी धर्म अभी भी नहीं छोड़ा था.

फिर इल्खानेत वंश के तेरहवें राजा ओल्जितु (धर्म परिवर्तन के बाद मोहम्मद खुदाबन्द) की मृत्यु के बाद इस्लामिक गुट का पूरा नियंत्रण हो गया. राशिद-उद-दीन पर ओल्जितु की हत्या का आरोप लगाया गया और छुप कर अन्दर ही अन्दर यहूदी धर्म से सहानुभूति रखने का आरोप लगाया गया. उसे कैद कर लिया गया, उसकी आँखों के सामने उसके बेटे का सर काट दिया गया. फिर राशिद का सर काट कर उसके कटे सर को तिबरिज़ की सडकों पर घुमाया गया. इतने से ही राशिद-उद-दीन के प्रति उनकी घृणा ख़त्म नहीं हुई. पंद्रहवीं शताब्दी में तैमुर-लंग के बेटे मिरान शाह ने राशिद-उद-दीन की कब्र खुदवा कर उसकी सर कटी लाश पास के यहूदी कब्रिस्तान में फिंकवा दी.

यह था सेक्युलरिज्म का अंत और इस्लाम के प्रति नरम रवैया रखने का परिणाम.

हमारे लिए इस कहानी से यही शिक्षा है की एक धर्म निरपेक्ष राज्य इस्लाम का सामना नहीं कर सकता है. अगर एक सेक्युलर राज्य की सीमाओं के बीच बड़ी मुस्लिम संख्या रहेगी तो धीरे-धीरे ये लोग शासन तंत्र पर हावी हो ही जायेंगे. आज हमारे जो नेता इफ्तार पार्टियों में हरी पगड़ी और गोल टोपी लगाये घूम रहे हैं, कल उन्हें कलमा पढना होगा और सुन्नत करवानी होगी. फिर उन्हें अपने भाई बंधुओं पर तलवार उठाने को कहा जायेगा, और अंत में उनका और उनके बच्चों का वही हाल होगा जो राशिद-उद-दीन का हुआ.
क्या मुलायम सिंह यादव की आँख के आगे यही मुल्ले एक दिन अखिलेश सिंह का सर नहीं काटेंगे? पर इन हिन्दुओं को यह कौन समझाये…..

लंदन निवासी और भाजपा की विचारधारा से जुड़े राजीव मिश्रा की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Criminal case against I & B ministry

Today i have filed a criminal complaint (pfa) with the 8th ACCM, Bangalore  on the following subject: The removal of the words ‘secularism’ and ‘socialism’ from the Preamble of the Constitution of India in the official advertisement of DAVP, Ministry of I & B, Govt. of India on Republic Day of 2015 was not only a brazen attack on the esteem and integrity of the Constitution of India but also a clear violation of the criminal law provision of Section 2 of the Prevention of Insult to National Honour Act, 1971.

Siddharth Sharma

aamaadmisid@gmail.com

IN THE COURT OF THE VIII ADDITIONAL CHIEF METROPOLITAN MAGISTRATE, BANGALORE CITY  AT BANGALORE

P.C.R. NO. _             of 2015

Between:
Sri  SIDDHARTH SHARMA
S/o. Late Sita Sharan Sharma
Address : Lok Swaraj Manch
‘Ramjai’ # 2, 2nd Cross Chanakya Street,
Akkamma Block, Dinnur, RT Nagar
Bangalore 560032                                    …COMPLAINANT

And:
Sri BIMAL JULKA
Secretary to Govt. of India
Ministry of Information and Broadcasting   
Shastri Bhawan, New Delhi-1110001               
…ACCUSED No.1

Sri K. GANESAN
Director General of Advertising and Visual Publicity
DAVP, 5th Floor, Soochana Bhawan, Phase IV,
CGO Complex, Lodhi Road, New Delhi- 110003       
…ACCUSED No.2

* * *
UNDER SECTIONS 190 AND 200  OF THE CODE OF CRIMINAL PROCEDURE , r/w Section 156 (3), CRPC, the complainant above named  most humbly submits as follows:
That the addresses of the parties to these proceedings for the purpose of service of process of this Hon’ble Court are as shown in the cause title. The Complainant may also be served through his advocate Sri NITIN.R, whose full office address is given hereinbelow. That the complainant is the National Convenor, Lok Swaraj Manch (LSM) founded by Gandhiji’s associate, Prof Thakur Das Bang. LSM is a pan-India institution of individuals who strongly advocate transition to participatory democracy.   He is also the Vice-President, Anuvrat Mahasamiti, an international institution of Moral Values, a founder-member of Pragatisheel Bramha Samaj, a forum of intellectuals, one of the Founder Members of the Aam Aadmi Party. He is also the Vice- President, Bharatiya Sanskriti Vidyapith, a 50 year old education institution, a Co-Promoter of Citizens’ Forum Against Corruption, Karnataka’s citizen anti-corruption initiative and a Former Hon. Secretary, Gandhi Peace Foundation, Bangalore. He was also an active volunteer in the Jan Lokpal movement by India Against Corruption (IAC) led by Sri Anna Hazareji.

The complainant humbly submits that the accused have violated the Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 on account of deliberate and brazen publication of advertisement on Republic Day this year in all major National and Vernacular newspapers in the country. A copy of one such original advertisement that appeared in the popular Kannada daily, Vijaya Karnataka dated 26/1/2015 is herewith produced as DOCUMENT no.1. The same advertisement is freely available online and a copy of the internet edition also is herewith produced as DOCUMENT no.2.

The news paper advertisement was/is in gross contempt of the Constitution of India inasmuch as it depicts the Preamble of the Constitution as stating that India is only a, ‘SOVEREIGN DEMOCRATIC REPUBLIC’, even though the Preamble unequivocally and explicitly states in bold that India is a ‘SOVEREIGN SOCIALIST DEMOCRATIC REPUBLIC’. The Preamble is not only applicable and binding on the ordinary citizens of India but also upon the Functionaries/Public Servants working within the government system.

The ultimate arbiter of the Constitution of India viz., the Honourable Supreme Court of India has categorically held that the Preamble is an integral part of the Constitution and not a separate text in itself.

The Supreme Court in Kesavananda Bharti (AIR 1973 SC 1461) stated as follows:
“Reference to the debates of the Constituent Assembly shows that there was considerable discussion in the said Assembly on the provisions of the Preamble. A number of amendments were moved and were rejected. A motion was thereafter adopted by the Constituent Assembly that “the Preamble stands part of the Constitution” (see Constituent Assembly debates, Vol. X, p. 429-456). There is, therefore, positive evidence to establish that the Preamble is a part of the Indian Constitution”.

In S R Bommai case(AIR 1994 SC 1918)  SC held: “The preamble of the Constitution is an integral part of the Constitution.”

This position has been upheld by the Supreme Court even after the coming into force of 42nd amendment to the Constitution of India. The said 42nd amendment has not only stood the test of time but also the final scrutiny of the Supreme Court of India and it is not open either to the ordinary citizens or the public functionaries such as accused herein to rely on any other text of the Constitution of India (including the Preamble) than the text which binds one and all, as on date.

The Complainant further submits that both Secularism and Socialism have been treated as part of the basic structure as reflected in preamble of our Constitution and therefore neither the Preamble nor the concepts of Secularism and Socialism are open to semantical debates or whimsical interpretations by anyone including those mighty in the bureaucracy.

The Supreme Court in D S Nakara case((1983) I SCC 305) has settled that: “The principal aim of a socialist State is to eliminate inequality in income and status and standards of life. The basic framework of socialism is to provide a decent standard of life to the working people and especially provide security from cradle to grave… It was such a socialist State which the Preamble directs the centers of power Legislative Executive and Judiciary-to strive to set up” and in Minerva Mills Ltd. case (AIR 1980 SC 1789) This is not mere semantics. The edifice of our Constitution is built upon the concepts crystallised in the Preamble. We resolved to constitute ourselves into a Socialist State which carried with it the obligation to secure to our people justice-social, economic and political. We, therefore, put Part IV into our Constitution containing directive principles of State policy which specify the socialistic goal to be achieved.” And in Praveenbhai Togadia case ((2004) 4 SCC 684) it was held: “Secularism has come to be treated as a part of fundamental law, and an unalienable segment of the basic structure of the country’s political system.”

The offence committed hereinabove is grave in nature apart from being offensive to the sensibilities of the concerned citizens of this country such as the complainant who hold the Constitution of India in high esteem and who are fearful of the country turning into a theocratic state.

The said commission of offence has not been in order to discharge any public duty for citizens but is patently offensive. Hence, there is no legal-technical bar to entertain this complaint.

Furthermore, the complainant humbly submits that some of the Cabinet Ministers and the Minister of Information and Broadcasting (I & B) of Govt. of India have justified the exclusion of the words, secularism and socialism from the Preamble of the Constitution, going by the reports in the responsible sections of the media.  Hence, it requires to be investigated by the jurisdictional Police whether the advertisement was brought out on the formal directions of the political executive viz., the Minster for I & B etc. of the Government of India, in which case such persons shall also be equally culpable. The internet copy of a newspaper report dated 28/1/2015 quoting a Cabinet Minister, as above-said, is herewith produced as DOCUMENT no.3.    

The above said offence has been committed in multiple jurisdictions in the country. This court also enjoys the jurisdiction to entertain this complainant and take cognizance of the offence mention herein since one such publication/distribution of defiling of Constitution of India happened through the advertisement by Directorate of Advertising and Visual Publicity of the Ministry of Information and Broadcasting, GoI, in the issue of ‘VIJAYA KARNATAKA’ dated 26.01.2015, which was received and read by the complainant,  his family and friends on the same day, in his above-mentioned address, which falls within the territorial limits where this Hon’ble Court can exercise the powers under law.

The acts and omissions of the accused herein are not civil wrongs but constitute deliberate omission and commission that attract the mischief that Section 2 of the Prevention of Insult to National Honour Act, 1971 seeks to curtail.   

PRAYER
WHEREFORE, the Complainant in the above case most humbly prays this Hon’ble Court be pleased to refer the matter for investigation or secure the presence of the accused, as may be deemed fit, and deal with them in accordance with law, in the ends of justice.

ADVOCATE FOR COMPLAINANT             
COMPLAINANT
Address:

VERIFICATION
I, Siddharth Sharma, the complainant in the above matter, do hereby state on verification that, the statements made from para 1 to 14 of the memorandum of complaint are all true to the best of my knowledge, information and belief.

Place: Bangalore

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Secular राजदीप सरदेसाई को Communal मनोहर पर्रिकर पर प्यार आ गया!

Dilip C Mandal : सेकुलर और कम्युनल में क्या रखा है? राजदीप सरदेसाई कट्टर Secular गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB) हैं और मनोहर पर्रिकर कट्टर Communal गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB). और फिर प्राइड यानी गर्व का क्या है? हो जाता है. राजदीप को पर्रिकर और प्रभु पर गर्व हो जाता है. सारस्वत को सारस्वत पर गर्व हो जाता है. सेकुलर को कम्युनल पर दुलार आ जाता है. वैसे, अलग से लिखने की क्या जरूरत है कि दोनों टैलेंटेड हैं. वह तो स्वयंसिद्ध है. राजदीप भी कोई कम टैलेंटेड नहीं हैं.

सेकुलर को
कम्युनल पर
प्यार आ गया
प्राइड आ गया.

प्यार शाश्वत है,
प्यार सारस्वत है.

xxx

दो चीज़ों का डर नहीं होना चाहिए। एक तो कि कोई हैक कर लेगा। तो क्या? फिर से बना लेंगे और 10 दिन में पढ़ने वाले भी आ जाएँगे। दूसरा डर कि धार्मिक आस्था को चोट वाला कोई मुक़दमा हो गया तो? एक तो होगा नहीं। कौन अपने धार्मिक ग्रंथों की क़ानूनी पड़ताल कराके उनकी फ़ज़ीहत करना चाहेगा? मुक़दमा हुआ तो हम इस बारे में पढ़ेंगे बहुत और बताएँगे भी बहुत। दूसरे, इस धारा में सज़ा होती नहीं। मैंने कभी सुना नहीं। मुझे करेक्ट कीजिए। तो मस्त रहिए। टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र को थैंक यू कहिए। इतने साल में न मेरा हैक हुआ न किसी ने मुक़दमा किया।

xxx

मनुस्मृति और तमाम स्मृतियों के हिसाब से गोडसे जी को तो क्या, उनकी बिरादरी में किसी को भी बड़े से बड़े अपराध के लिए फाँसी नहीं हो सकती थी। मैकॉले जी ने भारत में पहली बार IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना दिया। क़ानून की नज़र में सब बराबर हो गए। समान अपराध के लिए समान दंड लागू हो गया। तो गोडसे जी को फाँसी हो गई मैकॉले जी के विधान से। इसलिए भी मैकॉले जी भारत में विलेन माने जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: