आईएएस अफसर की बेटी ने भास्कर वालों के मॉल में बने चेंजिंग रूम से हिडन कैमरा पकड़ा

Praveen Khariwal : भोपाल। डीबी सिटी मॉल के United Colors of Benetton शोरुम में चैंजिंग रूम में मोबाइल कैमरा फिट करने वाले आरोपी ने पुलिस को बताया है कि मॉल के कई शोरूमों में हिडन कैमरे लगे हैं और लड़कियों की वीडियो बनाई जाती है। उसने बताया कि उसने भी कई लड़कियों के वीडियो बनाए हैं। बता दें कि मप्र के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की बेटी ने ट्रायल रूम में लगा कैमरा पकड़ा था। उसके बाद यह मामला सामने आया और आरोपी को गिरफ्तर किया गया।

पुलिस पूछताछ में आरोपी रघु ने मॉल के विभिन्न दुकानों के ट्रायल रुम में महिलाओं के वीडियो बनाने के बारे में कई सनसनी खेज खुलासे किए हैं। आरोपी रघुनाथ ने पुलिस को बताया कि डीबी मॉल के दूसरे शोरुम के सेल्समेन भी ट्रायल रूम में युवतियों के इस तर के वीडियो बनाते हैं। आरोपी के इस खुलासे से पुलिस सकते में है। पुलिस का मानना है कि ट्रायल रूम में वीडियोग्राफी एक रैकेट की तरह आपरेट हो रही है।

इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण खारीवाल की एफबी वॉल से.

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आहत पत्रकार ने नौकरी छोड़कर दैनिक भास्कर के मालिकान और संपादक पर किया मानहानि का केस

दैनिक भास्कर की एक खबर से मर्माहत झारखंड के गिरिडीह जिले के प्रतिष्ठित अधिवक्ता अजय कुमार सिन्हा ने अखबार के मालिक रमेश चंद्र अग्रवाल समेत स्टेट हेड ओम गौड़ और धनबाद यूनिट के प्रभारी स्थानीय संपादक राकेश पाठक पर मानहानि का केस किया है। मालूम हो कि 23 अप्रैल 2016 को एक खबर में अधिवक्ता को आरोपी लिखा गया था। किसी मामले में उनके घर पुलिस गयी थी, मगर खबर में श्री सिन्हा को आरोपी बताया गया था।

इस खबर के छपने पर अखबार के विधि संवाददाता और अधिवक्ता अंजनी कुमार सिन्हा (अजय कुमार सिन्हा के छोटे भाई) ने अखबार को बाय बाय बोल दिया। खबर से पूरा परिवार इतना मर्माहत हुआ कि अखबार को लीगल नोटिस भेजा गया था। मगर, अखबार प्रबंधन ने कोई पहल नहीं की तो आखिरकार 31 मई को दैनिक भास्कर प्रबंधन पर गिरिडीह मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में केस दर्ज किया।

क्या थी खबर?

मालूम हो कि कोई शरारती तत्व भास्कर के विधि संवाददाता अंजनी सिन्हा, उनके भाई अधिवक्ता अजय कुमार सिन्हा के नाम से पिछले एक साल से फर्जी धमकी भरी चिट्ठियां हाई प्रोफाइल लोगों को भेजा करता था। इसी तरह की एक चिट्ठी में एयरपोर्ट और पटना जंक्शन व विधानसभा अध्यक्ष को उड़ाने की धमकी दी गयी थी। इस चिट्ठी में निवेदक की जगह विधि संवाददाता अंजनी सिन्हा, उनके भाई अधिवक्ता अजय कुमार सिन्हा का नाम था।

दोनों भाईयों को चिट्ठी में नक्सली संगठन भाकपा माओवादी का लीडर लिखा गया था। इस चिट्ठी पर सच्चाई जांचने पहुंची पुलिस वाली खबर में सभी अखबारों ने विधि संवाददाता अंजनी सिन्हा, उनके भाई अधिवक्ता अजय कुमार सिन्हा का पक्ष भी लिया था। गया पुलिस को गिरिडीह पुलिस से ये जानकारी मिली कि इस परिवार को कुछ शरारती लोग पिछले एक साल से फर्जी चिट्ठी भेज कर परेशान कर रहे हैं। जबकि खुद विधि संवाददाता अंजनी सिन्हा के अखबार में जो खबर छपी उसमें उनका या उनके भाई अधिवक्ता अजय कुमार सिन्हा का पक्ष नहीं लिया गया। साथ ही उन्हें आरोपी बताया गया। इसी बात से सिन्हा परिवार नाराज था और अखबार प्रबंधन के खिलाफ केस किया गया।

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चपरासियों से इस्तीफे साइन कराए भास्कर ने

अपने आपको देश का सबसे बड़ा अखबार बताने वाला दैनिक भास्कर भी मजीठिया आयोग से घबराने लगा है। पहले उसने सभी कर्मचारियों से सामूहिक इस्तीफे लिए। कोर्ट ने इसे नामंजूर कर दिया और कहा कि कुछ भी कर लो लेकिन मजीठिया देना पड़ेगा।

अब भास्कर ने वही गलती दोहराते हुए ग्रुप के सभी चपरासियों से इस्तीफे पर साइन करवा लिया है। कुछ चपरासी तो ऐसे हैं जो पिछले 25-30 साल से नौकरी कर रहे हैं। सावधान हो जाइए, अब अगली बारी एडिटोरियल की हो सकती है या प्रोडक्शन पर भी गाज गिर सकती है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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भास्कर समूह की कंपनी डीबी कॉर्प का चौथे तिमाही में आय 6% बढ़कर 526 करोड़ हो गया

नई दिल्ली। डीबी कॉर्प की चौथे क्वार्टर में कंसोलिडेटेड आय पिछले साल के मुकाबले 6.3 फीसदी बढ़ कर 526 करोड़ रुपए रही है। पिछले साल इसी अवधि में कुल आय 495 करोड़ रुपए रही थी। वहीं पूरे साल के लिए कुल आय 2009 करोड़ रुपए से बढ़कर 2051 करोड़ रुपए रही है।

वहीं, पिछले साल के मुकाबले नेट प्रॉफिट 63.9 करोड़ रुपए से बढ़ कर 64.2 करोड़ रुपए रहा है। हालांकि पूरे साल के लिए नेट प्रॉफिट 316 करोड़ रुपए से घट कर 296 करोड़ रुपए रहा है। चौथे क्वार्टर के दौरान कंपनी के कुल खर्च 390 करोड़ रुपए से बढ़ कर 422 करोड़ रुपए रहे हैं। वहीं अन्य आय 9.7 करोड़ रुपए से बढ़ कर 12.1 करोड़ रुपए रही है।

कंपनी की न्यूजपेपर सेग्मेंट से आय 448 करोड़ रुपए से बढ़ कर 470 करोड़ रुपए रही है। वहीं, रेडियो सेग्मेंट से आय 26.6 करोड़ से बढ़कर 29.7 करोड़ रुपए रही है। डिजिटल कारोबार से आय 8.9 करोड़ से बढ़ कर 11.9 करोड़ रुपए रही है।कंपनी बोर्ड ने शेयर धारकों को 4.25 रुपए प्रति शेयर के डिविडेंड का ऐलान किया है। 

नतीजों के बाद डीबी कॉर्प के एमडी सुधीर अग्रवाल ने कहा कि चौथे क्वार्टर के नतीजे रीडर्स और एडवरटाइजर्स के साथ कंपनी के मजबूत संबंधों को दिखाते हैं। उन्होने कहा कि कंपनी ने ग्रोथ बेहतर करने के लिए कई पहल की है। उनके मुताबिक रेडियो और डिजिटल सेग्मेंट में डेवलपमेंट को लेकर वे काफी सकारात्मक हैं, इन सेग्मेंट में ग्रोथ की काफी गुंजाइश है और ये सेग्मेंट सही दिशा में बढ़ रहे हैं। उन्होने कहा कि भारतीय प्रिंट मीडिया में काफी क्षमता है और उम्मीद है कि कंपनी इंडस्ट्री में बेहतर स्थिति पर होने की वजह से आने वाले अवसरों का पूरा फायदा उठाएगी। (साभार- मनी भास्कर)

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दैनिक भास्कर को गुमराह करने की सजा, सुरजीत दादा का इंदौर ट्रांसफर

पिछले दिनों दैनिक भास्कर लुधियाना के खिलाफ और यहां कार्यरत कर्मचारी प्रीतपाल सिंह संधू के पक्ष में ट्रिब्यूनल कोर्ट द्वारा दिए फैसले में नया मोड़ आया है। सूत्रों के अनुसार जिस सुरजीत दादा के कारण कंपनी को इतनी फजीहत सहनी पड़ी है, उसे मैनेजमेंट ने इंदौर ऑफिस ट्रांसफर कर दिया है। वहां सुरजीत दादा को फिलहाल कोई बड़ा काम नहीं दिया गया। इससे पहले वह अपने आप को पंजाब का क्रिएटिव हेड मानकर लगभग दस साल से अपनी मनमानी चलाता रहा है। अपने भाईयों और रिश्तेदारों को दैनिक भास्कर में भर्ती करवाकर उन्हें मोटी तनख्वाहें दिलाईं।

सीनियर ग्राफिक डिजाइनर प्रीतपाल सिंह संधू का चार साल पहले प्रबंध को लिखा पत्र भी हमें मिला है जिसमें उन्होंने सुरजीत दादा की करतूत प्रबंधन को बताने की कोशिश की थी। लेकिन दादा प्रबंधन की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब रहा और प्रीतपाल जैसे कर्मचारियों को तंग करता रहा। सूत्रों के अनुसार सुरजीत दादा का इतनी देर बचने का कारण तब के स्टेट एडीटर कमलेश सिंह थे क्योंकि सुरजीत दादा खुद को उनका करीबी मानता था जिस कारण वह सुरजीत को बचाते रहे।

प्रीतपाल सिंह संधू द्वारा भास्कर के मैनेजिंग डायरेक्टर को लिखा गया पत्र पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें….

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कोर्ट में भास्कर प्रबंधन को मिली करारी हार, मीडियाकर्मी के हक में आया फैसला, नौकरी बहाल करने के आदेश

दैनिक भास्कर लुधियाना से सूचना आ रही है कि यहां के एक सीनियर डिजाइनर के हक में इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल कोर्ट ने फैसला दिया है. फैसले में कहा गया है कि डिजायनर की नौकरी बहाल की जाए और इतनी देर से हैरसमेंट के एवज में हर्जाना भी अदा किया जाए। सूचना के अनुसार लुधियाना के एक सीनियर डिजाइनर को डिजाइनिंग हेड सुरजीत दादा ने रंजिश के कारण बिना किसी वजह ऑफिस में उसकी एंट्री बंद करा दी थी।

इसके खिलाफ डिजाइनर ने केस दायर किया था। इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल ने भास्कर प्रबंधन को नोटिस भेजा। अब जाकर फैसला मीडियाकर्मी के हक में आया है। जब यह मामला शुरू हुआ था तो पीड़ित डिजाइनर ने सभी अधिकारियों को अपने साथ हो रही ज्यादती के बारे में बताया था, लेकिन किसी ने कोई सुनवाई नहीं की। डिजायनर का नाम प्रीतपाल सिंह संधू है। लेबर कोर्ट में चली पूरी कार्रवाई में भास्कर मैनेजमेंट की तरफ से कोई नहीं आया। डिजायनर प्रीतपाल सिंह संधू ने अपने केस के लिए अपने पक्ष में सारे कागजात और सुबूत कोर्ट को मुहैया कराए। इस आधार पर कोर्ट ने प्रीतपाल की नौकरी बहाल किए जाने और मुआवजा देने का आदेश दिया।

दैनिक भास्कर लुधियाना के एक सीनियर डिजाइनर सुरजीत दादा के कारण कई बार भास्कर मैनेजमेंट बदनाम हुआ है लेकिन वह जाने किन वजहों से भास्कर में बने हुए हैं। सुरजीत पर यह आरोप भी लगातार लगते रहे हैं कि उन्होंने दैनिक भास्कर में भाई भतीजावाद को बढ़ावा दिया। सुरजीत के अंडर में ही उनके छोटे भाई भी काम कर रहे हैं। उनके विभाग में काम करने वाले कई दूसरे कर्मचारी भी उनके रिश्तेदार हैं। पहले जब यह बात उठी थी तो भास्कर के लोकल मैनेजमेंट ने सुरजीत को बचाने के लिए उनके भाइयों की बदली दूसरी यूनिटों में कर दी थी। कहा जाता है कि सुरजीत ने अपने भाइयों को भास्कर में ज्यादा सेलरी पर ज्वॉइन करवाकर यहीं पर काम सिखाया।

फैसले की कापी देखने पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें…

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भास्कर वालों ने महिला के मरने पर उसे चरित्रहीन लिख दिया, परिजनों ने ठोंका संपादकों पर मुकदमा

अखबार वाले किस कदर संवेदनहीन होते जा रहे हैं, इसके उदाहरण तो आए दिन मिलते रहते हैं लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा में एक ऐसा मामला हुआ है जिसे सुनकर पूरे पत्रकार समुदाय का सिर शर्म से झुक जाता है. दैनिक भास्कर वालों ने एक महिला के मरने के बाद उसे चरित्रहीन और व्यभिचारी बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा. इससे नाराज परिजनों ने अखबार के संपादकों पर मुकदमा ठोंका है और कड़ी से कड़ी कार्रवाई की अपील की है.

परिजनों ने भीलवाड़ा एडिशन के पत्रकारों ओम प्रकाश शर्मा, संजय शर्मा और श्यामलाल शर्मा के खिलाफ भीलवाड़ा स्थित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद दायर किया है जिसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया है. शिकायत की इस कापी को हम नीचे दे रहे हैं, जिसे पढ़कर पूरे प्रकरण को समझा जा सकता है.


आईनेक्स्ट वालों ने समाजसेविका पर किस तरह लांछन लगाया और समाजसेविका ने कैसे आई-नेक्स्ट वालों को सबक सिखाया, जानने के लिए नीचे क्लिक करें >

समाज सेविका ने आई-नेक्स्ट वालों को सबक सिखाया

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पंजाब में डीआईजी ने दैनिक भास्कर के खिलाफ क्रिमिनल केस किया

पंजाब से खबर है कि डीआईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह ने अपनी छवि धूमिल किए जाने और गलत खबरें छापने को लेकर दैनिक भास्कर अखबार के खिलाफ क्रिमिनल केस दायर किया है. इस बारे में विस्तार से खबर पंजाब के एक स्थानीय अखबार में छपि है, जिसकी कटिंग नीचे दी जा रही है. अगर पढ़ने में दिक्कत हो तो न्यूज कटिंग के उपर क्लिक कर दें…

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भास्कर समूह का नया अंग्रेजी दैनिक ‘डीबी पोस्ट’ लांच

भास्कर समूह ने अपना नया अंग्रेजी अखबार लांच किया है. भोपाल में लांच इस अखबार का नाम डीबी पोस्ट है. अखबार की प्रिंट लाइन में मुद्रक के रूप में नाम मनीष शर्मा और संपादक के रूप में नाम श्याम पारेख का जा रहा है. भोपाल में स्थानीय संपादक अंकित शुक्ला हैं. अखबार कुल दस पन्ने का है जिसे आनलाइन भी पढ़ा जा सकता है. इ-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: 

http://epaper.dbpost.com

अखबार की लांचिंग के मौके पर डीबी पोस्ट के पहले पन्ने पर भास्कर समूह की कंपनी डीबी कार्प के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल का पाठकों के नाम संपादकीय छपा है. इसकी कटिंग पढ़ने के लिए नीचे दिया जा रहा है…

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अजमेर में भास्कर और पत्रिका ने दाम बढ़ाया तो अखबार वितरकों ने शुरू किया बहिष्कार, नवज्योति की बल्ले बल्ले

अजमेर में दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने एक राय होकर विगत 22 फरवरी को अचानक अखबार की कीमत 4.50 रुपए प्रति कॉपी कर दी। उस दिन तो हॉकर ने अखबार उठा लिया लेकिन अगले दिन उन्होंने बढ़ी कीमत वापस लेने की मांग करते हुए अखबार उठाने से मना कर दिया। उस दिन से वे लगातार दोनों अखबारों का बहिष्कार कर रहे हैं। इससे अखबार प्रबंधन में हड़कम्प मचा हुआ है।

प्रबंधन बढ़ी कीमत वापस लेने और हॉकर्स का कमीशन बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। अखबार नहीं उठने से परेशान प्रबंधन ने 10000 रुपए वेतन पर नए हॉकर्स की भर्ती शुरू कर दी है। साथ ही तांगों-जीपों में स्टाफ से अखबार बिकवाया जा रहा है। रातभर काम करने के बाद स्टाफ को सुबह गली-गली भटककर अखबार बांटने को कहा गया है। मगर ऐसा हो नहीं रहा। पांच-छह दिन से शहर में भास्कर-पत्रिका की कॉपियां देखने को नहीं मिल रही है। जाहिर है जो थोड़ी-बहुत कॉपी छापी जा रही है, वह भी रद्दी हो रही है।

दैनिक नवज्योति की पौ-बारह

हॉकर द्वारा भास्कर-पत्रिका का बहिष्कार करने का सीधा फायदा दैनिक नवज्योति को मिल रहा है। शहर में नवज्योति की रिकार्ड तोड़ कॉपियां बिक रही हैं। नवज्योति आजादी पूर्व से निकलने वाला राजस्थान प्रदेश का एकमात्र अखबार है।

अजमेर में भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव पर हमला

अजमेर। भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव गोविंद सिंह जादम पर शुक्रवार देरशाम अज्ञात नकाबपोश हमलावरों ने जानलेवा हमला कर दिया। रामगंज थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर हमलावरों की तलाश शुरू कर दी है। इस हमले को हॉकरों की हड़ताल से जोडक़र देखा जा रहा है। इससे माहौल गरमाने की आशंका है।

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भास्कर ग्रुप ‘डीबी पोस्ट’ नाम से लांच करने जा रहा अंग्रेजी अखबार, अंकित शुक्ला बने संपादक

एक बड़ी खबर भास्कर समूह से आ रही है. कई प्रयोगों के लिए मशहूर यह ग्रुप अब खुद का अंग्रेजी अखबार लांच करने जा रहा है. शुरुआत भोपाल से की जा रही है. अखबार का नाम ‘डीबी पोस्ट’ रखा गया है. इसके संपादक अंकित शुक्ला बनाए गए हैं जो पहले दैनिक भास्कर चंडीगढ़ के संपादक हुआ करते थे. अंकित कानपुर के रहने वाले हैं और इसी शहर में टाइम्स आफ इंडिया से करियर की शुरुआत करने के बाद आई-नेक्स्ट की लांचिंग टीम के हिस्से बने. वे आई-नेक्स्ट में बतौर सिटी चीफ कार्यरत थे.

सूत्रों के मुताबिक डीबी पोस्ट नामक अंग्रेजी अखबार इसी माह के लास्ट में या मार्च के फर्स्ट वीक में लांच किया जाएगा. इसके लिए नियुक्तियां अंतिम चरण में हैं और कई किस्म की तैयारियां जारी हैं. बताया जा रहा है कि यह अखबार ब्राडशीट होगा. भोपाल में अखबार के रिस्पांस को देखने के बाद इसे दूसरे शहरों में लांच किया जाएगा. माना जा रहा है कि भास्कर समूह ने नए नाम से नया अखबार वह भी अंग्रेजी में लांच करके एक तरह से दुस्साहस किया है.

दैनिक जागरण जैसे समूह ने भी अपना खुद का अंग्रेजी अखबार नए टाइटिल से लांच करने की जगह चलते हुए अंग्रजी अखबार मिड डे को खरीदा. भोपाल में पहले ले ही अंग्रेजी के कई बड़े अखबार जमे हुए हैं. भास्कर को अपने अंग्रेजी अखबार को मार्केट दिलाने के लिए इन जमे जमाए अखबारों से लड़ना पड़ेगा. ऐसे में मुकाबला मुश्किल रहेगा. कुल मिलाकर हिंदी मीडिया जगत की निगाह इस समय भास्कर के नए प्रयोग पर टिकी हुई है.

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क्या वाकई दैनिक भास्कर दुनिया का चौथा सबसे ज्यादा प्रसार वाला अखबार है?

दैनिक भास्कर ने 4 जनवरी को पहले पेज पर मत्थे के नीचे बड़ी खबर छाप कर खुद के विश्व का चौथा सबसे ज्यादा प्रसार वाला अखबार होने का दावा ठोंक दिया है। अखबार ने दुनियाभर मे सबसे ज्यादा बिकने वाले पाँच अखबारों की सूची प्रकाशित की है जिसमे तीन अखबार जापान के और एक-एक अमेरिका और भारत का है। चूंकि दावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है इसलिए वर्ल्ड एसोसियशन ऑफ न्यूज़पेपर्स एंड न्यूज़ पब्लिशर्स नामक संस्था की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। खबर में दोहराया गया है एबीसी की जनवरी-जून, 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक भास्कर लगातार तीसरी बार देश का सर्वाधिक प्रसार वाला दैनिक बना हुआ है।

इसके उलट रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज़ पेपर्स इन इंडिया की वर्ष-2014-2015 की रिपोर्ट जनसत्ता ने प्रेस ट्रस्ट के हवाले से 30 दिसंबर को छापी है। यह कहती है कि देश का सर्वाधिक प्रसार वाला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका है। इसके बाद हिंदुस्तान टाइम्स और पंजाब केसरी को दूसरे और तीसरे स्थान पर रखा गया है। यहाँ सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब भास्कर देश के सर्वाधिक प्रसार वाले तीन अखबारों मे ही शामिल नहीं है तो बिक्री के मामले मे विश्व के पाँच बड़े अखबारों मे शुमार कैसे हो सकता है..? अब या तो भारत सरकार की रिपोर्ट गलत है या फिर दैनिक भास्कर का दावा खोखला है..! उधर दैनिक भास्कर, भोपाल की प्रिंटलाईन से पिछले पाँच दिनो से समाचार चयन के लिए जिम्मेदार संपादक का नाम ही गायब है, जबकि पीआरबी एक्ट के तहत ऐसा करना अनिवार्य है।

भोपाल से श्रीप्रकाश दीक्षित की रिपोर्ट.

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भास्कर डाट काम ने नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजित डोभाल का झूठा इंटरव्यू छापा

भास्कर डाट काम की जिस खबर पर बवाल मचा है, उसके बारे में कुछ तथ्य साझा करना चाहता हूं. भास्कर डाट काम ने नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर अजित डोभाल का झूठा इंटरव्यू छापा था. जिसका डोभाल ने तत्काल  खंडन कर दिया लेकिन भास्कर बेशर्मी से इंटरव्यू को अभी तक चलाये जा रहा है. कोई भी हिंदी मीडिया को गंभीरता से नहीं लेता उसका ये फायदा उठाते हैं. अगर यह इंटरव्यू किसी अंग्रेजी अखबार की साइट पर होता तो अब तक बवाल मच गया होता.

हकीकत यह है कि डोभाल साहब से कुछ मिनट की अनौपचारिक बातचीत में इस संवाददाता रोहिताश्व मिश्र ने सहमे अंदाज के एक दो सवाल पूछे उसके बाद पूरा इंटरव्यू मनगढ़ंत लिख के चला दिया. डोभाल साहब ने इस पर कारर्वाई करने को कहा है. इससे पहले भी यह संवाददाता पाकिस्तान जाकर दाउद के घर से खबर करने का झूठा दावा कर चुका है जबकि यह आज तक इंडिया से बाहर नहीं गया.

उस वक्त उसने जो खबर की थी वह कई महीने पहले एक्सप्रेस व हिंदू में छप चुकी थी. इंटरव्यू पढ़कर देखिये. क्या एनएसए इस भाषा में बात करता है. यह दसवीं पास पत्रकार की भाषा है. इस पत्रकार से ज्यादा तरस तो इस अखबार के मालिकों व संपादकों पर आता है जो ऐसे चोर व फर्जी पत्रकारों को अपने यहां जगह दिये हैं. इतना ही नहीं, एनएसए के खंडन के बाद उसे गाड़ी व सुरक्षा भी भास्कर प्रबंधन ने मुहैया करायी है. जय हो.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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भास्कर कोई छोटा-मोटा अखबार नहीं, नया भी नहीं, फिर यह क्या और क्यों कर रहा है…

: यह कैसी पत्रकारिता : दैनिक भास्कर कोई छोटा-मोटा अखबार नहीं है। नया भी नहीं है। फिर यह क्या और क्यों कर रहा है। मीडिया के कॉरपोरेटीकरण में इस बात का कोई मतलब नहीं है कि संपादक कौन है या अखबार किसका है। मतलब ब्रांड का है और ब्रांड की ऐसी फजीहत। वह भी तब जब आसानी से स्थिति सुधारी और अपने अनुकूल की जा सकती है। इसके बावजूद अगर ब्रांड नाम की फजीहत हो रही है तो उद्देश्य बड़े होंगे या ब्रांड खोखला है। अभी मैं इस बाबत कुछ कह नहीं सकता और यही मानकर चल रहा हूं कि अखबार चलाने वालों को जो परिपक्वता और सूझ-बूझ दिखाना चाहिए वह कहीं नहीं दिख रहा है।

देश में पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों की जो स्थिति और स्तर है उसके मद्देनजर संभावना इस बात की भी है कि मीडिया मालिकों को यह मुगालता हो जाए कि हमारे कर्मचारी जब प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी खिंचवाते हैं तो एसपी की क्या औकात। पर यह सब ठीक नहीं है और निरंकुशता थोड़ी देर चल जाए, चलती नहीं रह सकती है। आप जानते होंगे कि दैनिक भास्कर ने एक ऐसी खबर प्रकाशित की जो सांप्रदायिक सौहार्द के लिहाज से संवेदनशील थी और निश्चित रूप से खबर को प्रकाशित करने में संपादकीय विवेक का उपयोग नहीं किया गया था।

अव्वल तो वह खबर वैसे जानी ही नहीं चाहिए थी जैसे गई और अगर जानी ही थी तो उसे खबर के बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप आरोपी के पक्ष के साथ लगाया जाना चाहिए था। इससे खबर संतुलित भी हो जाती। खबर में लिखा है कि एसपी ने कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी। अगर ऐसा था तो इंतजार किया जाना चाहिए था पर जल्दी या पहले खबर देने की प्रतिस्पर्धा के लिहाज से इंतजार संभव नहीं था तो भी दूसरे पक्ष का बयान तो होना ही चाहिए था। खबर जिस ढंग से छपी वह निश्चित रूप से आपत्तिजनक है और सोशल मीडिया पर उसका विरोध होना था, हुआ। इसके बाद हो सकता है एसपी पर कार्रवाई के लिए दबाव भी बना हो।

मैंने भी इस खबर पर प्रतिक्रिया में यही लिखा था कि अगर किसी के घर पर पाकिस्तानी झंडा फहराए जाने पर एतराज था या यह खबर थी तो जिसने लगाया था उससे बात की जानी चाहिए थी और तब खबर लिखना चाहिए था। बात की जाती तो पता चल जाता कि रिपोर्टर और फोटोग्राफर जिसे पाकिस्तानी झंडा समझ रहे थे वह पाकिस्तानी नहीं है, कुछ और है। दूसरे झंडा फहराने वाले का पक्ष जाता तो खबर संतुलित हो जाती है। पर ऐसा नहीं किया गया और अगर यह मान लिया जाए कि खबर छापने के पीछे कोई गलत भावना नहीं थी तो भी लापरवाही साफ दिखाई दे रही है और खबर छापने से पहले इस बात की परवाह नहीं की गई कि खबर छपने से सांप्रदयिक सौहार्द बिगड़ सकता है – और ऐसा करना अपराध है। मैंने लिखा था यह मामला दंगा भड़काने या सांप्रदायिक सद्भाव खराब करने की कोशिश में आएगा। भारत में कोई मीडिया से पंगा नहीं लेता वरना एफआईआर होनी चाहिए।

एफआईआर इसलिए भी होनी चाहिए थी कि पहली नजर में यह मामला चूक का नहीं था। पुलिस जांच का इंतजार किया जाता या झंडा फहराने वाले या मुसलिम समुदाय के किसी व्यक्ति से पक्ष जानने की कोशिश की गई होती तो मामला स्पष्ट हो जाता है। जरा सी बुद्धि लगाई जाती तो समझ में आता कि आज के सहिष्णु बताए जा रहे माहौल में कौन मुसलमान हिम्मत करेगा अपने घर पर पाकिस्तान का झंडा लगाने का या ऐसा करके पंगा करना चाहेगा। फिर भी लगा था तो कोई कारण होगा। उसे पता किया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि अति उत्साह में पहले गलतिया नहीं हुई हैं और जो हुई हैं वे पत्रकारों को मालूम ना हो। जैसे, उपराष्ट्रपति योग समारोह में नहीं गए थे तो कारण था – पर इंतजार नहीं करके जल्दबाजी में किया गया ट्वीट वापस लेना पड़ा था। ऐसे और भी मामले हैं। कार्रवाई किसी मामले में नहीं हुई।

दौसा के इस मामले में एफआईआर तो अखबार के संपादक और मुद्रक के खिलाफ भी होनी चाहिए और कार्रवाई कायदे से उनके खिलाफ भी होनी चाहिए। क्योंकि छोटी मछलियों के खिलाफ कार्रवाई मामले की लीपापोती भर है समस्या का निदान नहीं। अपराध रोकने का उपाय नहीं। अखबार में अगर नालायक, अक्षम या गैर जिम्मेदार लोग हैं तो ऐसा होगा ही। और भविष्य में इस और दूसरे अखबार में ऐसा न हो इसलिए संपादक और मुद्रक को गिरफ्तार किया जाना चाहिए कार्रवाई उनके खिलाफ भी होनी चाहिए। असली जिम्मेदारी उनकी ही होती है। हो सकता है एसपी ने मामले को स्थानीय स्तर का ही माना हो और ज्यादा तूल न देने के लिए नीचे के लोगों को गिरफ्तार किया हो। अखबार इतने पर संभलने और गलती मानने की बजाय दंबई दिखा रहा है। एसपी को धमकाने की ही कोशिश नहीं कर रहा है उनपर आरोप लगा रहा है और बातें छिपा रहा है।

अखबार ने जो खबर छोपी उसका शीर्षक है, “एसपी का गुंडाराज, चार बजे एफआईआर, डेढ़ घंटे बाद ही पत्रकार गिरफ्तार”। अव्वल तो यह प्रशंसनीय है कि आरोप लगने पर डेढ़ घंटे में ही दौसा जैसे शहर में भास्कर के पत्रकार जैसी प्रभावशाली हस्ती को गिरफ्तार कर लिया गया पर अखबार इसे गुंडाराज बता रहा है जबकि खुद गुंडई कर रहा है। अखबार ने आगे लिखा है, “दौसा में पुलिस अधीक्षक योगेश यादव के गुंडाराज के आगे जनता बेबस नजर रही है। अब तो शहर में हालात यह हो गए कि मामलों में बिना जांच के ही एसपी के हुक्म से पुलिस निर्दोष लोगों को गिरफ्तार करने लगी है। शहर में बढ़ रहे अपराधों पर अंकुश लगाने में नाकाम एसपी के खिलाफ जब भास्कर ने लगातार खबरें प्रकाशित की तो बौखलाए एसपी ने पत्रकार भुवनेश यादव को ही गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तारी से पहले एसपी के निर्देश पर शुक्रवार शाम चार बजे पत्रकार के खिलाफ साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगा मामला दर्ज किया गया। मामला दर्ज होने के महज डेढ़ घंटे बाद ही करीब साढे़ पांच बजे पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया। वह भी तब जब पत्रकार यादव सूचनाएं एकत्र करने के लिए एसपी ऑफिस गए थे।” यह सरासर बदमाशी है और अखबार या खबर देने के अधिकार का दुरुपयोग। कायदे से अखबार को गलती स्वीकार कर माफी मांगनी चाहिए पर वह उल्टे धौंस जमा रहा है।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम करने के बाद इन दिनों सेल्फ इंप्लायड के बतौर अनुवाद का काम संगठित तौर पर करते हैं. संजय से संपर्क anuvaadmail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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दैनिक भास्कर को घुटने टेकने पड़े, माफीनामा प्रकाशित किया

Mohammad Anas :   हजरात हजरात .. दैनिक भास्कर वालों ने आज दौसा मामलें में माफ़ी मांग ली. और इसी के साथ सांप्रदायिक, जातिवादी, कट्टरपंथी मीडिया घराने को टेकने पड़े घुटने. मैंने पहले ही दिन कहा था जनता इस लोकतंत्र में सबसे बड़ी होती है. करोड़ो/अरबों रुपये के भास्कर का नकली दंभ, अकड़ ढीली करने के लिए दौसा के एसपी योगेश यादव को बेहद शुक्रिया. योगेश जी से बात हुई थी मेरी, मैंने कहा था उनसे कि चढ़ कर रहिएगा, दबाव बनेगा लेकिन वो कोहरे की तरह हट जाएगा.

उन्होंने कहा कि कानून ही डर जाए तो अपराधी बेलगाम हो जाते हैं. मैं डरने वाला नहीं.

तो भास्कर वालों, अपने पत्रकार की जमानत की फ़िक्र करो. न्यायिक हिरासत में जा चुका है. भेजो वकील. और, भविष्य में दुबारा ऐसी गलती न करना. चलो, अब मामला ख़त्म मेरी तरफ से.

विशेष- कार्यकारी संपादक मुकेश माथुर और नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक ने न तो कभी बाइक चोरी की है न तो चेन स्नैचिंग की है. मुकेश जी तो बहुत प्यारे इंसान हैं और कल्पेश जी भी. मुकेश जी से जब बात हुई मेरी तो उन्होंने यही कहा मुझसे, ‘अनस जी मैं बाइक चोर नहीं हूँ.’ ऐसे में उन पर यह आरोप लगाने का कोई औचित्य नहीं. यदि भास्कर परिवार को इस आरोप से पीड़ा पहुंची हो तो खेद व्यक्त करता हूं.

धन्यवाद!

युवा पत्रकार मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक भास्कर ने आग लगाने का पूरा इंतज़ाम किया, लेकिन दादरी इस देश का अपवाद है, दौसा मुख्यधारा है

Dilip C Mandal : भारत में पत्रकारिता, किसी अबोध बच्चे के, हाथों की, जूजी है। (कवि धूमिल से प्रेरित, संग्रह- संसद से सड़क तक) । दैनिक भास्कर ने 17 दिसंबर की डेटलाइन से एक फड़कती हुई, सनसनीख़ेज़ खबर छापी। राजस्थान के दौसा शहर में एक घर की छत पर पाकिस्तानी झंडा। पत्रकार ने इस बारे में पुलिस कप्तान को बताया तो उन्होंने कह दिया गंभीर मामला है। बस बन गई खबर। अब आप तस्वीर देखिए। इस इस्लामी धार्मिक झंडे को देश में कौन नहीं जानता? हर धार्मिक मौक़े पर दुनिया भर के मुसलमान इसे घरों और धार्मिक स्थलों पर लगाते हैं। किसी को कभी दिक़्क़त नहीं हुई।

लेकिन पत्रकार नाम का अबोध बच्चा उत्तेजित हो गया। पत्रकार अगर अबोध बच्चा है, तो घर के मालिक से पूछ सकता था। चाहता तो मोबाइल से फोटो खींचकर पुलिस को दिखा सकता था। Google पर पाकिस्तानी झंडे की तस्वीर से मिला कर देख सकता था। लेकिन इतनी मशक़्क़त कौन करे? अपनी अक़्ल के हिसाब से पत्रकार तो सर्वज्ञानी होता है। यही उसकी ट्रेनिंग है। रिपोर्टर ने खबर दी, डेस्क ने ले ली और संपादक ने छाप दी। किसी को कुछ भी नहीं खटका।

भोलापन कहिए या शरारत कि खबर के साथ मोहल्ले का नाम और घर के मालिक का नाम भी छाप दिया। यानी अपनी तरफ़ से आग लगाने का पूरा इंतज़ाम। लेकिन ख़ैरियत है कि दादरी इस देश का अपवाद है और दौसा मुख्यधारा है। इस खबर के बावजूद शहर में अमन चैन है और यह खबर स्टेटस लिखे जाते समय भी भास्कर की वेब साइट पर मौजूद है। 1990 के दौर में ऐसी आग लगाऊ खबरों की वजह से दंगे हो जाते थे और लोग मारे जाते थे। संपादकों ने उस दौर में खूब ख़ून बहाया।

Facebook समेत सोशल मीडिया ने इस मामले में पत्रकारों की दंगाई ताक़त को अब कम कर दिया है। दौसा को लेकर भी सोशल मीडिया ने शानदार भूमिका निभाई। बधाई। अबोध पत्रकारों और बाल संपादकों के लिए मैं नई दिल्ली के पाकिस्तानी हाई कमीशन में लगा पाकिस्तान का झंडा लगा रहा हूँ। देख लो, ऐसा होता है। पेशे की संवेदनशीलता को देखते हुए आवश्यक हो गया है कि हर संपादक और पत्रकार अपने जीवन में कम से कम एक बार ही सही, लेकिन प्रेस कौंसिल की उस गाइडलाइन को पढ़े, जो सांप्रदायिकता से जुड़ी खबरों के बारे में जारी की गई है और प्रेस कौंसिल की वेब साइट पर मौजूद है।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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भास्कर की झूठी खबर से दंगा होते-होते बचा, सोशल मीडिया पर कल्पेश याज्ञनिक की थू-थू

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उन्माद फैलाने में भास्कर का रिपोर्टर गिरफ्तार, प्रबंधन को लगी मिर्ची, एसपी को दबाव में लेने की कोशिश

Mohammad Anas : इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि गैरज़िम्मेदार पत्रकारिता और भड़काऊ लेख पर भास्कर की गर्दन दबोची गई है। शर्म करो भास्कर। ब्रांड को तगड़ा झटका लगा है। एसपी योगेश यादव को दैनिक भास्कर कर रहा है ब्लैकमेल। अख़बार की ताक़त दिखाने की कोशिश। एसपी के खिलाफ ख़बर लिख कर दबाव बनाने की कोशिश। आज भास्कर अपने दलालों के साथ सीएम शिवराज से मुलाकात करेगा। हम सब एसपी योगेश यादव के साथ हैं। उन्होंने कानूनी दायरे में रह कर उचित कार्यवाई की है। यदि उनका ट्रांसफर या कुछ और किया जाएगा तो ठीक नहीं होगा। कुल मिलाकर दंगा भड़काने की दैनिक भास्कर की साज़िश हो गई है बेनक़ाब, जिसके बाद भास्कर प्रबंधन खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर अब एसपी को निशाना बना कर दबाव में लेने की कोशिश कर रहा है।

 

 

हां, यह भी सुन लो भास्कर वालों। तुम अपने अख़बार से बदनाम करोगे तो हम तुम्हें सोशल मीडिया पर कहीं का नहीं छोड़ेंगे। छीछालेदर कर देंगे। मध्य प्रदेश और राजस्थान के मीडिया दफ्तरों में कल शाम से जो सबसे ज्यादा चर्चा में बात रही वो है,’क्या कल्पेश याग्निक ने सच में चेन स्नैचिंग की है।’ ‘क्या मुकेश माथुर सच में बाइक चोरी के आरोप में दो महीने की सज़ा काट चुका है।’ मीडिया साथियों ने चाय की चुस्कियों के बीच दिन भर इस बात पर मौज लिया। धन्यवाद फेसबुक। ये भी एक तरीका है, यदि अख़बार और संपादक को लगता है कि उन्होंने दौसा में कोई गलत काम नहीं किया है तो हमें भी लग रहा है कि हमने कुछ गलत नहीं लिखा। शोषितों का दर्द है, महसूस शायद ऐसे ही हो।

 

Rishi Kumar Singh : दौसा में भास्कर के रिपोर्टर ने ईद मिलादुननबी के झंडे को पाकिस्तानी झंडा बता दिया। इससे याद आया कि क्यों पिछली मुलाकात में कुछ लोग दावा कर रहे थे कि बहराइच के फलां मुस्लिम बाहुल्य मोहल्ले में पाकिस्तानी झंडा लहराया जाता है। हालांकि उस वक्त मुझे ऐसी किसी गफलत का अंदाजा नहीं हुआ था, क्योंकि वे इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए थे कि क्या आपने खुद अपनी आंखों से देखा है या किसी की कही दोहरा रहे हैं। जाहिर है कि उन्होंने खुद ऐसा कुछ नहीं देखा था या कहें कि कभी ऐसे मोहल्लों से गुजरे भी न थे। यह सांप्रदायिक विभाजन के साथ संवाद व भरोसे के घटने व अफवाह व आशंका की बढ़ोतरी का भी संकेत है। वैसे दौसा का मामला उन सभी पत्रकारों के लिए सबक है, जो खबर करते समय भक्त शिरोमणि बन जाते हैं।

Sabyasachi Sen : पत्रकारिता के नाम पर जहर फैलाने वाले दैनिक भास्कर के नेशनल संपादक कल्पेश याग्निक को इस्तीफा देकर किसी सनातन संस्था टाईप कट्टरपंथी समुह ज्वॉइन कर लेना चाहिऐ। इस तस्वीर को पाकिस्तानी झंडा बनाने के साथ साथ गृहस्वामी का नाम पता छाप कर दादरी जैसे घटना को दोहराने की कोशिश करने वाले पर सख्त कारवाई की जानी चाहिए। भारतीय मीडिया कल्पेश याग्निक जैसे असमाजिक तत्वो से भड़ा पड़ा है, ऐसे तत्वो और ऐसे अखबारो का सार्वजनिक बहिष्कार हमसब को करना होगा। ये सिर्फ मुसलमानो का ही नही हर जिम्मेदार नागरिक का है जो इस देश मे शांति से जीना चाहता है। किसी भी न्यूज पर प्रतिक्रया देने से पहले उसकी विश्वसनीयता को अच्छी तरह से परख लेना चाहिए।

पत्रकार मोहम्मद अनस, ऋषि कुमार सिंह और सब्यसाची सेन के फेसबुक वॉल से.

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भास्कर की झूठी खबर से दंगा होते-होते बचा, सोशल मीडिया पर कल्पेश याज्ञनिक की थू-थू

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भास्कर ने आग लगाने का पूरा इंतज़ाम किया, लेकिन दादरी इस देश का अपवाद है, दौसा मुख्यधारा

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भास्कर की झूठी खबर से दंगा होते-होते बचा, सोशल मीडिया पर कल्पेश याज्ञनिक की थू-थू

 

 

Mohammad Anas : सेवा में,
कल्पेश याग्निक,
नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

श्रीमान,

जैसा कि कुछ लोगों ने मुझे बताया कि आप दैनिक भास्कर नाम के हिंदी अखबार के नेशनल एडिटर भी हैं तो मुझे आश्चर्य हुआ कि आप एक साथ दो काम कैसे कर लेते हैं. पहला काम ये कि अपने अखबार के माध्यम से इस्लाम और मुस्लिम विरोध की मुहीम चलवाते हैं और दूसरा काम सम्पादक जैसा निरपेक्ष और सम्मानित पद पर बने हुए हैं. यह दोनों तो अपने आप में ही विपरीत लगते हैं. या तो आप अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति घृणा ही करें और उसे फैलाएं या फिर सम्पादक पद से इस्तीफा दे कर सनातन संस्था जैसे कट्टर प्रवृत्ति के लोगों की कलम की स्याही ही बने रहें.

महोदय, यह जोधपुर शहर दैनिक भास्कर के अखबार की क्लिप है. जिसमें एक मुसलमान के घर पर ईद मिलादुननबी के अवसर पर होने वाले जश्न की तैयारियों के तहत इस्लामी झंडा लगाया गया है जिसे आपने अपने पत्रकारों और संपादकों के जरिये पाकिस्तानी बता कर न सिर्फ जोधपुर के मुसलमानों बल्कि पूरे देश के मुसलमानों की देश के प्रति निष्ठा,सेवा भाव एवं प्रेम पर न सिर्फ संदेह पैदा करने का काम किया है बल्कि अपमानित करने का घृणित कार्य भी किया है.

कल्पेश याग्निक जी, आप और आपका अखबार मुसलमानों से इतनी नफरत करता है की उसे उसके उत्सवों और खुशियों, उसकी पहचान, प्रतिष्ठा, सम्मान की ज़रा भी फ़िक्र नहीं. आपका अखबार है या फिर सनातन संस्था का जहर बुझा पत्र जिसमें नफरत की खेती की जाती है.

 

यह आपको पाकिस्तान का झंडा दिखाई दे रहा है? मुझे पता है आपके ऊपर और नेशनल न्यूज़ रूम के संपादकों पर इसका कुछ असर नहीं पड़ेगा लेकिन इतनी बेईमानी और नफरत के साथ कैसे नींद आती है आप लोगों को. इतनी लुच्चई और लफंगई के बाद भी आप लोगों को पत्रकार कैसे मान लिया जाता है. ऐसी नफरत की कमाई से अपने बच्चों को क्या खिला रहे हैं, कभी सोचा है? वो बच्चे इंसानी गोश्त और लहू का नाश्ता कर रहे हैं और आप उनको ख़ुशी ख़ुशी खिला रहे हैं. आप लोग जिस हवा में सांस ले रहे हैं वो हवा नहीं है ,वो तो आपके द्वारा उड़ाई गयी नफरतों से भरी अफवाहें हैं जिसके असर से रातों की नींद गायब रहती है और आपको लगता है की आप मज़े से सो रहे हैं.

चूँकि, किसी अदालत या कानून में फंसने लायक आप लोगों की गर्दन नहीं है इसलिए मैं आपके जमीर को ललकार रहा हूँ. जिस असाध्य रोग की चपेट में आप सब हैं उसका इलाज ऐसे ही होता है. यह पाकिस्तान का झंडा है कल्पेश याग्निक और उसके संपादकों? इतनी समझ आज तक नहीं हासिल कर सके, अरे जिन मुसलमानों के बीच सैकड़ों साल से रह रहे हो, उनकी पहचान, उनकी तहजीब से इतने कटे हो और दावा करते हो की पत्रकार हो. आप लोग तो दंगाई हैं, बिल्कुल वैसे दंगाई जो तलवार और पेट्रोल से महिलाओं /बच्चों /बूढ़ों का क़त्ल करते हैं. आपकी कलम और आपकी तस्वीरें हिन्दुस्तान का मुस्तकबिल बिगाड़ रही हैं.

कल्पेश याग्निक, शर्म आनी चाहिए आपको. एक समुदाय के खिलाफ समाज में नफरत फैलाते हुए लेकिन आपको क्यों आएगी ? आपने तो उसी दिन सब कुछ बेच दिया था जिस दिन दैनिक भास्कर के सम्पादक बन कर कुर्सी संभाली थी. कल्पेश याग्निक, इतनी नफरत बटोर कर कहाँ खर्च करते हो ? कितना फायदा होता है इंसानों के बीच मन मुटाव बढ़ा कर, क्या उस फायदे से कुछ हासिल भी हो रहा है? नहीं मिलेगा कुछ, बता रहा हूं.

कल्पेश याग्निक, ऐसे लाखों-करोड़ों झंडे भारत में मुसलमानों के घरों पर लगे हुए हैं. इतने परचम लहरा रहे हैं कि सबकी तस्वीर छापते छापते बुढ़ापा आ जाएगा तब भी नहीं ख़त्म होगी कहानी. सिर्फ एक घर नहीं है कल्पेश, पूरे हिन्दोस्तान में कई करोड़ घर हैं. आपकी माने तो वे सारे मुसलमान पाकिस्तानी हुए. तो भेज दो हमें पाकिस्तान कल्पेश याग्निक. बताओ कब और कैसे भेज रहे हो.

मैं तुम्हें और तुम्हारी राजस्थान दैनिक भास्कर टीम को दंगाई कहता हूं. मैं तुम्हें कट्टरता का दलाल कहता हूं. मैं तुम सबको मुल्क के अमन चैन से खिलवाड़ करने वाला कहता हूँ. असल में तुम्हारी एक गैंग है, जिसमें समाज का सुख चैन छिनने वाले डकैत काम करते हैं.

लगाओ देशद्रोह की धारा मुझ पर.

 

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दादरी में अख़लाक की हत्या करने के लिए भीड़ को मंदिर के लाउडस्पीकर से आवाज़ देकर इकट्ठा किया गया था। आरोप था गाय का गोश्त फ्रिज में रखा गया है। जांच में यह आरोप झूठा पाया गया। दौसा, राजस्थान में एक घर पर लगे ईद मिलादुननबी के जश्न वाले हरे झंडे को दैनिक भास्कर ने पाकिस्तानी झंडा कहते हुए राजस्थान एडिशन में अफवाह फैलाई है। अख़बार के नेशनल एडिटर कल्पेश याज्ञनिक समेत राजस्थान डेस्क के हेड और दौसा के इंचार्ज़, कॉपी एडिटर और रिपोर्टर पर दंगा भड़काने के लिए झूठी अफवाह फैला कर समाज में नफरत का कारोबार करने का केस दर्ज किया जाना चाहिए। दादरी और दौसा की दोनों घटनाओं में कोई अंतर नहीं है। दादरी में हत्या हो गई थी, दौसा में हत्याकांड का पूरा प्लान कल्पेश याज्ञनिक और उसके लोगों ने तैयार कर लिया था। बस कामयाबी हाथ नहीं लगी। दैनिक भास्कर का बहिष्कार करें।

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राजस्थान में दैनिक भास्कार द्वारा मुसलामानों के खिलाफ समाज में विद्वेष फैलाने के मकसद से एक फर्जी और भड़काऊ ख़बर लिखी गई. दैनिक भास्कर के नेशनल हेड कल्पेश याग्निक के इशारों पर राजस्थान के दौसा एडिशन में स्थानीय सम्पादक, कॉपी एडिटर और रिपोर्टर तथा फोटोग्राफर की मिली जुली साज़िश को सोच समझ कर अंजाम तक पहुंचाया गया. दौसा से शुरू हुआ प्रोपगंडा पूरे राजस्थान के दैनिक भास्कर एडिशन में पब्लिश किया गया. हजरत मुहम्मद के जन्मदिवस के अवसर पर ईद मिलादुन्नबी के तहत मुसलमान अपने घरों पर हरे रंग का झंडा लगाते हैं. इस झंडे को दैनिक भास्कर ने पाकिस्तानी झंडा बताते हुए पुलिस से कार्यवाई की मांग कर डाली. तो कल्पेश याग्निक और उसके डकैत देश भर के करोड़ों मुसलमानों को जेल भेजना चाहते हैं. जयपुर के कुछ लोग आई जी से मिल कर दैनिक भास्कर के खिलाफ ज्ञापन दे चुके हैं. कार्यवाई न होने तक प्रदर्शन होते रहेंगे. देश भर में भास्कर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की ख़बर मिल रही है. राजस्थान के जोधपुर में इस अखबार को जलाया जाएगा.

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इस्लामी झंडे को पाकिस्तानी झंडा बता कर सांप्रदायिकता फैलाने वाले दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक और राजस्थान दैनिक भास्कर के कार्यकारी संपादक मुकेश मधुर के खिलाफ तब तक लिखते रहिए जब तक ये अख़बार के माध्यम से अपमानित करने वाली अफवाह पर माफी न मांग लें। ईद मिलादुननबी के जश्न पर घरों पर लगने वाले हरे रंग के झंडे को पाकिस्तानी बता कर न सिर्फ एक मुस्लिम परिवार की सुरक्षा और भरोसे के साथ खिलवाड़ किया गया है बल्कि देश भर के मुसलमानों को अपमानित किया गया है।

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ये रहा वो दंगाई कार्यकारी संपादक और उसकी पूरी टीम जिसने राजस्थान के दौसा के एक घर पर लगे हरे रंग के झंडे जिसमें चाँद तारा बना हुआ था को पाकिस्तानी झंडा बता कर पूरे राजस्थान में प्रचारित करने का अपराधिक कार्य किया है। इसका नाम है Mukesh Mathur. बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के बाद भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक ने आज के अख़बारों में पूरा मामला पुलिस के कंधे पर डाल खुद को बचाने जैसी स्टोरी लगाई है। हमारी मांग है कि मुकेश माथुर के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाई की जाए और संपादक जैसे महत्वपूर्ण पद से हटाया जाए। मुकेश माथुर के फेसबुक वॉल पर इस्लाम विरोधी कुप्रचार सामाग्री की भरमार है और हाल ही में उसने शाहरुख खान द्वारा दिए गए असहिष्णुता सम्बंधित बयान पर शाहरूख की आलोचना करती हुई पोस्ट लगाई है। ऐसे पूर्वाग्रही और दंगाई प्रवृत्ति के व्यक्ति ही बेहतर समाज और खुशहाल राष्ट्र निर्माण की राह में सबसे बड़े बाधक के रूम में गिने जाते हैं।

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दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक, राजस्थान दैनिक भास्कर के सम्पादक लक्ष्मी प्रसाद पंत, कार्यकारी सम्पादक मुकेश मधुर ने आज अपने अखबार में फर्जी अफवाह फैलाने और मुसलमानों को बदनाम करने की ख़बर वापस ले ली है. भास्कर ने राजस्थान में हिन्दू और मुसलमान दंगा करवाने की साज़िश के तहत जानबूझ कर ईद मिलादुन्नबी के जश्न के तौर पर एक घर पर लगे हरे रंग के झंडे को पाकिस्तानी बता कर अपमानित करने का काम किया था. भास्कर ने मकान मालिक का नाम भी छापा, जो प्रथम दृष्टया मानहानि और सुरक्षा को ख़तरे में डालने का मामला बनता है. मुस्लिम परिवार को पाकिस्तानी कहना और उसके मुखिया का नाम छाप कर उसकी सुरक्षा को खतरे में डालना, एक मुसलमान के प्रति अन्य समुदाय में यह भ्रम पैदा करवाना की वह पाकिस्तान समर्थक है, एक मुसलमान को समाज से अलग थलग करने की यह कोई अंजाने में लिखी गई ख़बर नहीं है. स्थानीय सम्पादक मुकेश मधुर और नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक को शर्म आनी चाहिए. उनका भेद खुल गया है.

माखनलाल विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई किए और आजकल सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यकों के हितों को लेकर सक्रिय मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से

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‘दैनिक भास्कर’ ने जिन्दा थानेदार को मार डाला!

हत्या बेलसर ओपी प्रभारी की हुई खबर छपी लालगंज थानाध्यक्ष की

अपने को देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 होने का दावा करने वाला ‘दैनिक भास्कर’ के पटना संस्करण ने पाठकों को अचंभित कर देने वाली एक खबर छापी है। 19 नवम्बर को प्रकाशित यह खबर भास्कर के पहले पन्ने पर सेकेंड लीड खबर है। बुधवार को वैशाली के लालगंज में उपद्रवियों के हमले में बेलसर के ओपी प्रभारी अजीत कुमार की हत्या कर दी गई थी पर ‘दैनिक भास्कर’ ने गुरुवार को अपने प्रकाशित खबर में जो हेडिंग ‘लालगंज के थानाध्यक्ष को उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।’

यह खबर अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने वाला है। गौरतलब है कि फिलवक्त लालगंज के थानाध्यक्ष सुमन कुमार हैं जो सही सलामत हैं पर देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 होने का दावा करने वाले इस अखबार ने एक जिन्दा थानेदार को मृत घोषित कर दिया। लालगंज के थानाध्यक्ष सुमन कुमार को जानने वाले व उनके परचितों ने जब इस अखबार को पढ़ा तो सभी विचलित हो गए। ऐसे विचलितों के फोन से सलामत सुमन कुमार सुबह से ही परेशान हैं।

पटना के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार… पढ़िए एक युवा ने क्यों कर लिया सुसाइड

Vinod Sirohi : जरूर शेयर करें —मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार — आप पर कोई बंदिश नहीं है आप इस मैसेज को बिना पढ़े डिलीट कर सकते हैं। अगर आप पढ़ना चाहें तो पूरा पढ़ें और पढ़ने के बाद 5 लोगों को जरूर भेजें।

मेरा नाम राहुल है। मैं हरियाणा के सोनीपत जिले के गोहाना का रहने वाला हूँ। आप भी मेरी तरह इंसान हैं लेकिन आप में और मुझमें फर्क ये है कि आप जिन्दा हैं और मैंने 19 अगस्त, 2015 को रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

चौकिये मत, नीचे पढ़िये।

मेरा परिवार गरीबी से जूझ रहा था। एक दिन मैंने एक हिन्दी के अख़बार में (अपने आप को हिन्दी जगत का प्रमुख अखबार बताने वाला ) मोबाईल टावर लगाने सम्बन्धी विज्ञापन पढ़ा। इसमें 45 लाख एडवांस, 50 हजार रूपये महीना किराया तथा 20 हजार रूपये प्रतिमाह की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी देने की बात कही थी। मैनें दिये गये नम्बर पर फोन किया तो उन्होंने हमारे प्लाट का पता ले लिया जहाँ मैं टावर लगवाना चाहता था। अगले दिन उन्होंने मुझे फोन करके मुबारकबाद दी और कहा कि मेरा प्लाट टावर लगने के लिए पास हो गया है। उन्होंने मुझे रजिस्ट्रेशन फ़ीस के तौर पर 1550 रूपये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाता 20266209852 ब्रांच लाजपत नगर नई दिल्ली में डालने के लिए कहा। मैंने 1550 रूपये डाल दिये तो उन्होंने मुझे रिलायंस कम्पनी का ऑफर लेटर तथा एक लेटर सूचना और प्रोद्द्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार का मेरी ईमेल पर भेजा जिसमें 27510 रूपये सरकारी टैक्स जमा करवाने की बात कही गई थी।

मैंने 27510 रूपये भी जमा करवा दिये तो उन्होंने मुझसे 13500 रूपये डिमांड ड्राफ्ट चार्जेज के तौर पर जमा करवाने के लिए कहा। मैंने ये रूपये भी जमा करवा दिए तो उन्होंने मेरे फोन उठाने बंद कर दिये। जो पैसे मैंने इस खाते में जमा करवाये वह पैसे मेरी बहन की शादी के लिए रखे थे। मैं अपने परिवार को 45 लाख रूपये का सरप्राइज देना चाहता था, लेकिन जब मुझे ठगी का एहसास हुआ तो मैं अपने परिवार को मुहँ दिखाने के लायक नहीं बचा और मैंने रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

मेरी असमय मौत के बाद मेरी रूह धरती पर ही भटक रही है और लोगों को ठगी के इस जंजाल के प्रति जागरूक कर रही है। मेरे दावे की सत्यता के लिये आप ऊपर दिये गये बैंक खाते की 11 अगस्त से 18 अगस्त की स्टेटमेंट देख सकते हैं। ऐसे लगभग 300 फ्रॉड ग्रुप अख़बारों में फर्जी विज्ञापन देकर भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनके झांसे में ना आयें। आप 5 लोगों को 2 मिनट में ये सन्देश जरूर भेजें और पार्क, बैठक, घर और दफ्तर के लोगों को मौखिक तौर पर इस ठगी के खेल के बारे में जरूर बतायें। मेरी रूह को शान्ति मिलेगी और आपको आत्मसंतुष्टि।

यूपी पुलिस में इंस्पेक्टर विनोद सिरोही के फेसबुक वॉल से.

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रिपोर्टर सर्वेश कुकरा ने दैनिक भास्कर के फरेबी मालिकों रमेश अग्रवाल और सुधीर अग्रवाल के खिलाफ दायर किया धोखाधड़ी का केस

: टारगेट पूरा करने के बावजूद विदेश भेजने का वादा पूरा न करने पर रिपोर्टर ने दायर किया केस, कोर्ट ने पुलिस को जांच के निर्देश दिए, अगली सुनवाई 19 अक्टूबर को : हरियाणा में हिसार जिले के हांसी शहर में दैनिक भास्कर के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दायर किया गया है। इसमें दैनिक भास्कर के चेयरमैन रमेश अग्रवाल, एमडी सुधीर अग्रवाल समेत कई लोगों को पार्टी बनाया गया है। दैनिक भास्कर के पूर्व रिपोर्टर सर्वेश कुकरा ने कोर्ट में दायर की गई शिकायत में कहा है कि दैनिक भास्कर ने उन्हें विज्ञापन का एक टारगेट पूरा करने के एवज में विदेश टूर का वायदा किया था।

इस बारे में उन्हें लेटरहैड पर ऑफर भी दिया गया था लेकिन टारगेट पूरा होने पर भास्कर ने उन्हें धोखा दे दिया तथा टूर नहीं दिया। इस केस में दैनिक भास्कर के चेयरमैन रमेश अग्रवाल, एमडी सुधीर अग्रवाल के अलावा हिसार के संपादक हिमांशु घिल्डियाल, मार्केटिंग हैड अशोक शर्मा तथा धीरज त्रिपाठी को भी पार्टी बनाया गया है। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस को जांच के निर्देश दिए हैं। सर्वेश कुकरा ने कोर्ट में दायर की गई शिकायत में तमाम ऑफर लैटर तथा बैंक की स्टेटमेंट भी लगाई है जिनके द्वारा भास्कर को पेमेंट किए जाने की बात सत्यापित होती है। मामले की अगली सुनवाई 19 अक्तूबर को होगी।

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होशंगाबाद भास्कर के जीएम सुरेंद्र राय के खिलाफ लड़कीबाजी के चक्कर में हुई एफआईआर

अपने रंगीनमिजाज अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले होशंगाबाद दैनिक भास्कर के जीएम सुरेंद्र राय पर भोपाल में एफआईआर दर्ज हुई है। जीएम ने दैनिक भास्कर में कार्यरत एक पूर्व महिला कर्मचारी के इश्क में पड़कर उसके मंगेतर को जान से मारने की धमकी दे डाली। भोपाल के कमला नगर थाने में हुई रिपोर्ट के अनुसार जीएम ने मंगेतर को महिला कर्मचारी से शादी करने पर जान से मारने व अन्य प्रकार की धमकियों के लिए कई बार फोन किया था।

जानकारी के अनुसार जीएम के साथ भास्कर के ही दो लोगों ने भी फोन लगाकर धमकी दी थी। महिला उत्पीड़न रोकने के लिए भास्कर संबंधितों पर तत्काल एक्शन लेने की बात करता है। अब देखना यह है कि क्या इस मामले में भास्कर संस्थान जीएम जैसे बड़े अधिकारी पर कार्यवाई करेगा।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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विज्ञापन के लिए दैनिक भास्कर का मार्केटिंग प्रतिनिधि धमका रहा है व्यापारी को (सुनिए टेप)

बड़े नेता, बड़े अफसर, बड़ी कंपनियां अगर खुलेआम वसूली, रिश्वतखोरी, उगाही करें तो उनके खिलाफ कार्रवाई एक लाख में एकाध मामलों में ही होती है, वह भी तब जब इनके बीच आपसी झगड़े हो जाएं. अन्यथा सब दोनों हाथ से संविधान, कानून और नैतिकता की धज्जियां उड़ाते हुए मुद्रा मोचन में लगे रहते हैं. इन डकैतों की सेहत पर असर इसलिए भी नहीं पड़ता क्योंकि पुलिस, कोर्ट और सिस्टम इनकी रक्षा में जुट जाता है, बचाने में जुट जाता है. ताजा मामला दैनिक भास्कर का है. इस अखबार के मार्केटिंग के लोग किस तरह व्यापारियों को धमकाते हैं, विज्ञापन के लिए, इसे नीचे दिए गए टेप वाले लिंक पर क्लिक करके सुना जा सकता है.

राजस्थान स्थित कोटा जिले के गुमानपुरा के एक व्यापारी को विज्ञापन के लिए दैनिक भास्कर का मार्केटिंग प्रतिनिधि धमका रहा है. वो खुद बोल रहा है कि दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका दोनों डाकू हैं. इसने विज्ञापन ना देने पर उल्टी खबर छापने की धमकी दी. इससे पता चलता है कि मीडिया वाले पैसे मिलने पर चुप रहते हैं और पैसे न दिए तो उल्टी खबर दिखाने लगते हैं. इसका एक सटीक उदहारण कुछ दिन पहले भी देखा जा चुका है. कोटा के मेयर महेश के नालंदा में चल रहे अवैध काम का कवरेज करने गए पत्रकारों को मेयर के लोगों ने बंदी बना लिया. इसकी FIR भी दर्ज़ है लेकिन अख़बार में यह खबर नहीं छपी क्योंकि विज्ञापन के माध्यम से पैसा फेककर मीडिया का मुँह बंद कर दिया गया था. अब आप बताओ इसे बिकाऊ मीडिया नहीं बोलोगे तो और क्या बोलोगे.

टेप सुनने के लिए इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें: https://www.youtube.com/watch?v=vD73IgSceOo

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दैनिक भास्कर में काम करने वालों को डीबी डिजिटल का आईकार्ड दिया जा रहा

दैनिक भास्कर बिलासपुर में 2014-15 में जितने भी पत्रकारों की नई नियुक्ति हुई है उन्हें ‘डीबी डिजिटल’ कंपनी के नाम पर आईकार्ड दिया जा रहा है। आईकार्ड का एक फोटो उपर नमूने के बतौर देखिए। इसमें ठेका श्रमिक शब्द पत्रकार के लिए लिखा गया है जो सबसे ज्यादा दुखद है। पत्रकारिता के लिए काम करने वालों के लिए ठेका शब्द का प्रयोग कर भास्कर जैसा अखबार पत्र नहीं बल्कि सिर्फ कागज का टुकड़ा कहलाने के लायक है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

भड़ास तक आप भी मीडिया जगत की कोई सूचना पहुंचा सकते हैं, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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कलबुर्गी के हत्यारे से कम नहीं दैनिक भास्कर का जुर्म

Vineet Kumar :  वैसे तो न्यूज वेबसाइट के नाम पर पार्शियल पोर्न वेबसाइट चला रहे भास्कर समूह के लिए हिट्स के खेल में नीचता की हद तक उतर आना आम बात है. इसे हम रूटीन के तौर पर देखते आए हैं. फैशन शो के दौरान मॉडल के कपड़े खिसक जाते हैं तो वो उस हिस्से को ब्लर करने के बजाय लाल रंग का दिल बनाना ज्यादा बेहतर समझता है. लेकिन अब इस हद तक उतर आएगा कि ये अश्लीलता शब्दों को बेधकर घुस आएगी और वो भी उस संदर्भ में जहां असहमति में खड़े होना आसान नहीं है.

दैनिक भास्कर से कोई पूछे तो सही कि कलबुर्गी की मौत पर चुप्पी साधे साहित्य अकादमी (जिसकी चर्चा Abhishek Srivastava ने विस्तार से की है) के प्रतिरोध में उसके पुरस्कार को लौटाना डर का परिचायक है या उस साहस का जो एक से एक दिग्गजों में जीवन की व्यवहारिकता के तर्क के साथ गायब हो गई है? मुझे याद है जिस साल उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी सम्मान मिला था, उस वक्त उन पर कई तरह के आरोप लगे थे, सत्ता और उन्हीं महंतों के साथ सेत-मेत कर लेने की अफवाहें फैलायीं गई थी जिनका उदय प्रकाश से रचना और जीवन के स्तर पर लगातार विरोध रहा है. उदय प्रकाश क्या, साहित्यिक जगत में अमूमन किसी भी पुरस्कार के मिलने पर लेखक के सम्मान में इजाफा होने के बजाय उसकी साख पर सवाल उठने शुरू हो जाते हैं..जरूरी नहीं कि इसके लिए स्वयं लेखक ने जुगत भिड़ाई हो लेकिन ये पुरस्कार खुद इतने बदनाम और सवालों के घेरे में आ गए हैं कि इसे स्वीकार करनेवाला लेखक कई बार तमाम योग्यताओं के बावजूद साहित्य-बिरादरी में दुरदुराया जाने लग जाता है.

उस वक्त उदय प्रकाश ने अपने स्तर से ठीक-ठाक तर्क दिए थे लेकिन हमले जारी रहे. माहौल ऐसा बना कि उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान नहीं, वाजपेयी सम्मान मिला हो. खैर, वो तमाम लोग यदि तब की अपनी-अपनी पोस्ट पलटकर देखें और उदय प्रकाश के इस फैसले से मिलान करें तो एकबारगी जरूर एहसास होगा कि तब हमने जल्दीबाजी कर दी थी. ये भी है कि ऐसा किए जाने से उदय प्रकाश पर लगते रहे आरोप, होते रहे हमले पर विराम नहीं लग जाएंगे लेकिन इस सवाल के सिरे से सोचकर देखें तो कि क्या अकेले उदय प्रकाश तो जीवित लेखक नहीं हैं जिन्होंने एक साहित्य अकादमी प्राप्त लेखक की सरेआम हत्या कर दिए जाने पर पुरस्कार लौटाकर अपना प्रतिरोध जाहिर करना जरूरी समझा? क्या ये इस हत्या के खिलाफ लिखे गए किसी लेख से कम महत्व रखता है?

ये सही है कि ऐसा करने से न तो साहित्य अकादमी की क्षुद्रता कम होगी और न ही वो इस प्रतिरोध का सम्मान करेगा लेकिन इतना तो जरूर है कि हमारा उस लिखे के प्रति और यकीन बढ़ेगा जिसे कभी इसी अकादमी ने सम्मानित किया था. कुछ नहीं तो इतना तो जरूर है कि साहित्य अकादमी मिलने और स्वीकार कर लेने से उदय प्रकाश का जितना सम्मान नहीं हुआ( आरोप लगनेवाली बात को नत्थी करके देखें तो) उससे कई गुना ज्यादा कद इसके लौटा देने से बढ़ा है. बहुतेरे लेखकों, बुद्धिजीवियों के लिए मौके पर चुप रह जाना जितना व्यावहारिक फैसला हुआ करता है, उदय प्रकाश का ऐसा किया जाना भी उतना ही व्यावहारिक है..आखिर व्यावहारिकता का एक ही पक्ष क्यों हो ?

लेकिन दैनिक भास्कर या दूसरा कोई भी मीडिया मंच प्रतिरोध की इस भाषा को समझने में नाकाम है या फिर वो काबिलियत हासिल ही नहीं कि तो कम से उसे इस बात का दावा तो छोड़ ही देना चाहिए कि वो हिन्दी पत्रकारिता कर रहे हैं. हिन्दी दिवस के सटे दिन में उसका ऐसा किया जाना १४ सितंबर के मौके पर तैयार किए जानेवाले विशेष पन्ने के उपर एक अश्लील चुटकुला ही होगा.

उदय प्रकाश की इन पंक्तियों में डर का जो अर्थ खुलता है ये वो डर नहीं है जिसे भास्कर ने सपाट अर्थ में लिया- ”साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है। अब यह चुप रहने का और मुंह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है।”

आप ही सोचिए कि इन पंक्तियों में डर शामिल है या कुंवर नारायण की पंक्ति “या तो अ ब स की तरह जीना है या अरस्तू की तरह जहर पीना है” से गुजरकर फैसले तक पहुंचा एक लेखक लेकिन दक्षिणपंथी हत्यारों ने तो कलबुर्गी की हत्या की जबकि दैनिक भास्कर ने एक लेखक के जिंदा रहने के सबूत को मरा घोषित कर दिया.

ये जुर्म कुछ कम बड़ा नहीं है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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भास्कर में एजेंट ही समाचार का काम देखेंगे, इस नई नीति से ढेर सारे पत्रकार हुए बेरोजगार

आदरणीय,

अभिवादन स्वीकार करें.

निवेदन करना चाहूंगा कि रायसेन जिले के बरेली में दैनिक भास्कर, भोपाल के लिए स्ट्रिंगर के रूप पांच वर्ष से कार्यरत हूं. अब यह तय हुआ है कि भास्कर में एजेंट ही समाचार का काम देखेंगे. यह संपूर्ण मध्यप्रदेश में किया गया है. इसके पीछे कंपनी की सोच यह बताई जा रही है कि रिपोर्टर पर केवल खर्च होता है, जबकि एजेंट कमाकर भी देते हैं. इस तरह मेरी सेवाएं करीब-करीब समाप्त हैं.

मेरी शैक्षणिक योग्यता प्राचीन इतिहास और दर्शनशास्त्र में एमए है और 1985 से सक्रिय पत्रकारिता करता रहा हूं. इसमें भोपाल में साप्ताहिक हिंदी हेराल्ड, नवभारत और दैनिक भास्कर का कार्यकाल और आकाशवाणी के समाचार एकांश के लिए जिले की चिट्ठी शामिल है. पारिवारिक कारणों से बरेली आने के बाद यहां भी निरंतर सक्रिय बना रहा हूं. अचानक मौखिक आदेश से दैनिक भास्कर के लिए काम कर रहे मेरे जैसे तमाम लोग बेरोजगार हो गए हैं.

धन्यवाद सहित!
सत्य नारायण याज्ञवल्क्य
जवाहर कॉलोनी, बरेली
जिला रायसेन. मप्र
yagyawalkyasn@gmail.com

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दैनिक भास्कर मजीठिया के डर से रात के अंधेरे में दिल्ली से फरार

दैनिक भास्कर प्रबंधन ने दिल्ली के राजेंद्र प्लेस में चल रहे अपने संपादकीय कार्यालय को रातोंरात बिना किसी को खबर किए बंद कर इसे 125 किमी. दूर रेवाड़ी पहुंचा दिया है. यहां तक कि उसने अपने कर्मचारियों तक को बताने की जरूरत नहीं समझी. इन कर्मचरियों का कसूर यह था कि ये मजीठिया वेज बोर्ड लागू कराने के लिए अपनी आवाज बुलंद किए हुए थे और इन्होंने प्रबंधन के दबाव में हलफनामा देने से इनकार कर दिया था.

प्रबंधन अपने दो-तीन चहेतों और चार-पांच नवनियुक्त लोगों के साथ 29 अगस्त को आधी रात के बाद रेवाड़ी रवाना हो गया. मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे 11 कर्मचारियों को साथ ले जाना तो दूर, उन्हें ऑफिस ट्रांसफर की सूचना देना तक जरूरी नहीं समझा. दरअसल प्रबंधन को किसी ने पट्टी पढाई है कि रेवाड़ी जाने पर मजीठिया का भूत उनका पीछा छोड़ देगा. लकिन मजीठिया की लड़ाई लेबर कमिश्नर, राज्य और केंद्र सरकार से होती हुई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है. कानून के हाथ बहुत लंबे हैं और रेवाड़ी सुप्रीम कोर्ट की जद से बाहर नहीं है. अब दैनिक भास्कर के दिल्ली, फरीदाबाद और गुडगाँव संस्करण के सभी पेज रेवाड़ी में बनेंगे और वहीँ छपेंगे. अख़बार को रेवाड़ी से लाकर यहां बांटा जाएगा. इस तरह बात-बात में रिकॉर्ड बनाने का दावा करने वाला दैनिक भास्कर एक और रिकॉर्ड बनाने जा रहा है.

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हरिभूमि की जूठन परोस रहा है दैनिक भास्कर रायपुर!

खुद को देश का सबसे तेज समाचार पत्र होने का दावा करने वाला दैनिक भास्कर पुरानी व प्रकाशित खबर फ्रंट पेज पर छाप रहा है। ताजा मामला दैनिक भास्कर के रायपुर संस्करण के फ्रंट पेज पर 20 अगस्त, 2015 को प्रकाशित समाचार शीर्षक- ‘एसीबी की छापेमारी के खिलाफ आईएएस एसोसिएशन का मोर्चा’ है। यही समाचार दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने से एक दिन पूर्व 19 अगस्त, 2015 को हरिभूमि के फ्रंट पेज पर ‘आईएएस अफसरों ने दी सीएम के दर पर दस्तक’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुका था।

समाचार में दैनिक भास्कर ने भी खबर का वहीं एंगल लिया है जो हरिभूमि में प्रकाशित हो चुकी है। कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन पर नक्सलियों से सांठगांठ के कांग्रेस विधायकों के आरोपों का मुद्दा तथा आईएएस अफसर पर जनप्रतिनिधियों के नामजद आरोपों का जो मुद्दा हरिभूमि ने एक दिन पहले प्रकाशित किया है, वही विषय दैनिक भास्कर ने भी लिया है। नंबर वन बनने की दौड़ में दैनिक भास्कर पाठकों को बासी व कई दिन पुरानी खबर ताजा बना कर परोसने से परहेज नहीं कर रहा है। यह पहली बार नहीं कि दैनिक भास्कर ने हरिभूमि में प्रकाशित समाचार को रिराइट कर प्रकाशित किया है। पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है।

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भास्कर छोड़ पत्रिका गए संतोष पांडेय

पानीपत : यहां भास्कर में कार्यरत संतोष पांडेय ने अखबार छोड़ दिया है। अब वह राजस्थान पत्रिका, जयपुर के साथ अपना आगे का कार्यकाल शुरू करने जा रहे हैं। वह इससे पूर्व सतना, वाराणसी, देहरादून, लखनऊ में मीडिया के साथ जुड़े रहे हैं।

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मजीठिया वेतनमान तो दूर, इंक्रीमेंट भी नहीं देना चाहता भास्कर

दैनिक भास्कर की ज्यादातर यूनिटों में इन दिनो मजीठिया वेतनमान लागू न होने को लेकर भारी असंतोष है। प्रबंधन इंक्रीमेंट तक देने को तैयार नहीं। प्रबंधन के लोग मीडिया कर्मियों को तरह तरह की चेतावनियां और धमकियां दे रहे हैं।

मजीठिया को हजम करने के लिए दैनिक भास्कर प्रबंधन हर संभव कोशिश कर रहा है. तीन महीने विलंब से महज पांच से सात प्रतिशत इन्क्रीमेंट कर भास्कर ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दे दिया है कि मजीठिया तो दूर, मजीठिया की उम्मीद भी रखा तो इन्क्रीमेंट भी नहीं दिया जाएगा. प्रबंधन के गुर्गे और चमचे सरेआम यह कह रहे हैं कि प्रबंधन का सरकार हो या कोर्ट, कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

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