‘प्रतिनिधि’ न्यूज चैनल में सेलरी के लिए बवाल, एडिटर इन चीफ घिरे, पुलिस आई (देखें वीडियो)

‘प्रतिनिधि’ न्यूज चैनल वैसे तो दिन भर उपदेश देता रहता है, नैतिकता पिलाता रहता है, सिस्टम ठीक करने के लिए कमर कसे दिखता रहता है लेकिन बात जब खुद के चैनल के भीतर शोषण की आती है तो यहां भी हाल बाकियों जैसा ही दिखता है. खबर है कि इस चैनल के इंप्लाई कई महीने से बिना सेलरी काम कर रहे हैं. एक रोज उनका धैर्य जवाब दे गया. कहा जा रहा है कि चैनल के एडिटर इन चीफ जब बिना सैलरी दिए सामान लेकर जा रहे थे तो कर्मचारियों ने उन्हें रोक लिया और खुद के बकाया पैसे की बात की.

इस पर एडिटर इन चीफ आलोक कुमार सेलरी दिलाने की बजाए कर्मियों से ही उलझने लगे. जब बात पुलिस तक पहुँची तो कर्मचारियों को 15 फरवरी का चेक दिया गया है. बताया जा रहा है कि यहां ऐसे भी कई इंप्लाई हैं जो एक साल से अपनी सेलरी का इंतज़ार कर रहे हैं. चैनल के कर्मियों ने साफ कह दिया है कि उन्हें उनका बकाया वेतन दे दिया जाए. वे इस माहौल में काम करने को अब बिलकुल इच्छुक नहीं हैं. नीचे तीन वीडियो दिए जा रहे हैं. ये वीडियो ही चैनल की वर्तमान स्थिति के गवाह हैं. देखें नीचे दिए तीनों वीडियो…

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नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

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दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर यूएनआई प्रबंधन को 23 लाख रुपए जमा कराना पड़ा

नई दिल्ली : आखिरकार दिल्ली हाई कोर्ट के कड़े आदेश पर देश की प्रतिष्ठित समाचार एजेन्सी यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया (यूएनआई) के प्रबंधन को एक वरिष्ठ पत्रकार सहित दो कर्मियों के लम्बित वेतन भुगतान के मद में लगभग 23 लाख रुपए कोर्ट में जमा कराना पड़ा. इसके साथ ही अदालत की तरफ़ से जारी कुर्की की कार्रवाई से प्रबंधन को मुक्ति मिल गयी. हालाँकि हाई कोर्ट ने जुर्माने की 20 प्रतिशत रक़म तत्काल नहीं जमा कराने की प्रबंधन को छूट दे दी.

इससे पूर्व दिल्ली की एक अदालत से जारी कुर्की वारंट को लेकर दिल्ली पुलिस की एक टीम पिछले दिनों यू.एन.आई. मुख्यालय पहुंची थी. प्रबंधन ने रिकवरी आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी लेकिन हाईकोर्ट के कड़े निर्देश पर प्रबंधन को लगभग 23 लाख रुपए जमा कराने पड़े. यूएनआई बचाओ अभियान से जुड़े वकीलों सर्वश्री अरविन्द चौधरी एवं राहुल झा ने यह जानकारी दी।

संस्थान के ही एक वरिष्ठ पत्रकार के लम्बित वेतन आदि भुगतान के मद में करीब 15 लाख रुपये की रिकवरी के लिए दिल्ली की एक अदालत ने संस्थान के निदेशकों सर्व श्री विश्वास त्रिपाठी एवं प्रफुल्ल महेश्वरी के नाम कुर्की वारंट जारी किया था। श्रम उपायुक्त (नई दिल्ली) की अदालत से जारी आदेश के बावजूद यूएनआई प्रबंधन ने पीड़ित को यह राशि भुगतान नहीं किया था। बाद में विभाग की ओर से इस राशि की रिकवरी के लिए चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत को भेजा गया था।

ऐसा ही एक मामला संस्थान के एक दलित कर्मचारी से जुड़ा है, जिसे श्रम उपायुक्त की अदालत से जारी आदेश के मुताबिक करीब साढे बारह लाख रुपये का भुगतान किया जाना था। इस मामले में भी दिल्ली हाईकोर्ट के कड़े आदेश पर पैसे जमा कराये गये. इस दलित कर्मचारी के प्रताड़ना के मामले में संस्थान के दो पत्रकारों सहित तीन को एससी/ एसटी एक्ट के तहत दिल्ली की एक सत्र अदालत ने 12 दिसंबर 2013 को न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा था। यह मामला माननीय उच्च न्यायालय में लम्बित है।

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रिपोर्टरों का पैसा खा गया यह चैनल!

सेवा में,
सम्मानित चैनल हेड / सीनियर्स / रिपोर्ट्स / स्टाफ
नेशनल वायस चैनल

आप और हम लोगों ने नेशनल वायस न्यूज़ चैनल को बड़ी मेहनत से आगे बढ़ाया और कम समय में मेहनत के बलबूते पर आगे तक लेकर गए और उस मेहनत की मलाई किसी ओर को समर्पित की गई। हमने दिन रात मेहनत कर लगभग दो साल तक चैनल को अपने खून पसीने से सींचा मगर हमारे सीनियर्स, चैनल के उच्चाधिकारियों ने हमारी मेहनत की मलाई खूब अच्छे से खाया और अपना पेट भरा। साथ ही उनका भी भरा जो उनके चाटुकार थे। मैंने अपनी मेहनत से चैनल को खूब काम करके दिया। खुद भूखा रहा। मगर चैनल को भूखा नहीं रहने दिया। उसका पेट भरता रहा। अपने करियर को देखते हुए घर में झूठा दिलासा देता रहा कि मैं एक अच्छे चैनल में काम कर रहा हूँ। मुझे अच्छा मेहनताना मिलता है। दिल टूट गया जब मेरे पिताजी ने एक दिन कहा कि अपनी कमाई से कुछ घर भी लेकर आया कर। मगर उन्हें कहाँ पता था कि मेरी मेहनत की कमाई तो चैनल के बड़े लोगों में बंट रही है।

सभी को यह बता दूं मुझे पत्रकारिता में लंबा समय हो गया है। मगर मैंने कभी चैनल के नाम पर दलाली नहीं की। मैंने मेहनत की और मेहनताना के नाम पर कुछ नहीं मिला। चैनल के उच्च साथियों से पता चलता कि हमें अगले माह से वेतन दिया जाएगा। मैं दुबारा काम शुरू कर देता। मगर आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। ईमानदारी का बड़ा अच्छा फल मिला। उसके लिए आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद। उच्च अधिकारियों द्वारा लुभावने लड्डू जो दिए जाते रहे, उनका भी धन्यवाद। आप लोगों को मान गए कि आप लोग मैनेज करने में एक्सपर्ट हैं। मेरी अन्य सभी साथियों के लिए एक सलाह। आप लोगों को भी लुभावने वादे किये जा रहे हैं मगर वह पूरे नहीं होने वाले। बाकी क्या कहूं। सभी तो विद्वतजनों में गिने जाते हैं।

बड़े बुजुर्ग कह कर गये है कि जो गरीब की मेहनत को कुचलता है तो उसका जरूर बुरा होता है। मगर मैं यह नहीं चाहूंगा। मैं तो यह चाहूंगा कि आप लोगों का चैनल दिन रात तरक्की करे। सिर्फ इस बात से डरता हूँ चैनल को किसी मेहनती व्यक्ति की दिल से हाय न लग जाये क्योंकि जिसने मेहनत की होगी वह व्यक्ति चैनल के लिए की गयी मेहनत पर जरूर रोया होगा। दुःख तो इस बात का होता है जब चैनल का वरिष्ठ अधिकारी ये बात बताने पर जवाब देता है कि चैनल किसी रिपोर्टर से पूछ कर काम नहीं करता। बाद में वह अपने ही रिपोर्टर को कहता है कि आपको बात करने की तमीज नहीं। वैसे चैनल की दुकान चला रहे उस व्यक्ति को बता दूं, धंधे की इज्जत करना सीखो, साथ ही उनकी भी जो लोग आपकी दुकान चलाने में आपका सहयोग दे रहे हैं। हर आदमी बिकाऊ नहीं होता।

आप लोगों के साथ काम करने का मौका मिला उसके लिए आप सभी का धन्यवाद. और एक जरुरी बात… जितने भी लोग यह सोचते है की आपका ये चैनल ETV चैनल को टक्कर दे रहा है या देगा तो वह सरासर गलतफहमी में जी रहा है। अपने दिल से पूछें कि चैनल उस नेटवर्क के बराबर है या नहीं। यह चैनल कभी एक जगह पर नहीं टिक सकता। इसका उदाहरण यह खुद ही देता रहा है। कभी नोएडा तो कभी लखनऊ। सोचनीय विषय यह जो खुद ही एक जगह पर टिका नहीं हो वह दूसरे को कैसे टिका पायेगा। हो सके तो चैनल जो वायदे किये थे, जो बिल मंगवाए थे, उन्हें पूरा करे। भगवान न करे कि कोई मेहनत का मेहनताना न मिलने पर भूखा सोये। 

धन्यवाद
कुलदीप थपलियाल
thapliyalkuldeep312@gmail.com

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नेशनल वॉइस न्यूज़ चैनल पर टिहरी रिपोर्टर का 43800 रुपये बकाया!

उत्तराखंड के जनपद टिहरी गढ़वाल के नेशनल वॉइस के रिपोर्टर को नहीं मिला सितम्बर 2016 से स्टोरी का कोई भी पैसा… सितम्बर 2016 से जून 2017 तक 43800 रुपये बकाया… काफी समय से नेशनल वॉइस के bureau chief प्रखर प्रकाश मिश्रा के आश्वासन के बाद भी उत्तराखंड के सभी रिपोर्टर नेशनल वौइस चैनल में कार्य करते रहे… लेकिन कुछ समय पहले bureau chief प्रखर प्रकाश मिश्रा जी को उनके पद से हटा दिया गया है…

नये bureau chief सुरेंद्र जी अब सभी रिपोर्टरों को आश्वासन दे रहे हैं कि अब से सभी का पैसे टाइम पर मिलेगा.. पुराने पैसे की चैनल के नए मालिक से बात चल रही है.. उत्तराखंड में नेशनल वॉइस न्यूज़ चैनल नये रिपोर्टरो को रखने की कोशिशों में लगा हुआ है, जिससे पुराना पैसा देने से बचा जा सके… क्या इसी तरह नेशनल वॉइस न्यूज़ चैनल के द्वारा नये रिपोर्टरो को भी उल्लू बनाया जाएगा!

अंकित
टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड)   
9720470064
ankitmittalsml@gmail.com

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गुटका किंग के अखबार में 7 अगस्त तक सेलरी न मिलने का क्या है राज?

खबर आ रही है कि इंदौर में सबसे अधिक धनी अपने आपको मानने वाले एक अखबार दबंग दुनिया में 7 अगस्त तक कर्मचारियों को सेलरी नसीब नहीं हुई है। यानी 1 या 2 तारीख को वेतन देने वाले इस लखपति अखबार में इतने दिनों तक कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। वैसे रक्षाबंधन पर्व पर कर्मचारियों के हाथों में वेतन नहीं आने से कई मायूस दिखाई दिए। इधर ईमेल से मिली खबरों के अनुसार यह बात सामने आ रही है कि अखबार में इनकम टैक्स का डंडा चला है इस कारण 7 अगस्त तक कर्मचारियों के अकाउंट में वेतन नहीं पहुंचा है।

सूत्र बताते हैं कि संध्या दैनिक अखबार खोलने की घोषणा के बाद कई अखबार मालिकों ने खुलकर इनकम टैक्स का डंडा किया है, जिससे पिछले तीन दिनों से इनकम टैक्स की कार्रवाई चल रही है इस कारण कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया गया है। वैसे सत्य क्या है यह तो वे  ही जाने, लेकिन सूत्रों के हवाले से तो यही खबर आ रही है।

20 प्रतिशत कटौती का डंडा

सूत्र बताते हैं कि इस लखपति अखबार में 7 अगस्त तक वेतन तो नहीं दिया है ऊपर यह घोषणा कर दी है कि इंदौर सहित सभी जगह से प्रकाशित अखबार के कर्मचारियों के वेतन में 20 प्रतिशत की कटौती की जाएगी। सूत्र बताते हैं कि इसी कारण अब तक वेतन नहीं दिया गया है। वैसे इस 20 प्रतिशत कटौती को मजीठिया से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि 20 प्रतिशत कटौती उन कर्मचारियों की गई है, जिन्हें आधे पैसे बैंक अकाउंट से और आधे बाउचर से दिए जाते हैं। इसके बाद सितम्बर में मजीठिया लागू करने की घोषणा कर दी जाएगी। वैसे अभी तक किसी भी कर्मचारी का वेतन बैंक में जमा नहीं होने से सभी के दिल की धड़कन बंद हो चुकी है।

नहीं हुआ 15 अगस्त को लांच

पहले यह घोषणा की जा रही थी कि 15 अगस्त को सांध्य दैनिक लांच किया जाएगा। लेकिन यह घोषणा हवा में उड़ गई। सूत्र बताते हैं कि फिलहाल जो अखबार निकल रहा है उसमें ही करीब 20 रिपोर्टर, सब एडिटर और ऑपरेटरों की आवश्यकता है। फोन लगाने के बावजूद कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं, जो जा रहे हैं उन्हें विरोधी सीधे हकाल देते हैं। यानी अपने ही दुश्मन बनकर थाली में छेद करने के लिए लगे हैं। और इस पर 20 प्रतिशत की कटौती ने एक और नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। अब राय देने वालों का क्या वह तो मालिक को राय देते रहते हैं, लेकिन मालिक ऐसे चमचों की राय लेकर ऐसे निर्णय करें तो उसे क्या  कहेंगे।जो कुछ भी हो आगे क्या होगा इसका इंतजार करें।

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इंडिया वॉयस चैनल और जनसंदेश अखबार में सेलरी नहीं मिल रही

इंडिया वॉयस न्यूज चैनल में, जो यूपी और उत्तराखंड की खबरें प्रसारित करता है,  पिछले 2 महीने से ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों की सेलरी नहीं मिली है. हालात ये हैं कि कर्मचारियों के पास घर का किराया देने तक के पैसे नहीं है… यहां तक की 2017 विधानसभा चुनाव के बाद कई स्टॉफ को बाहर का रास्ता दिखाया गया, उनकी भी सेलरी अभी तक नहीं दी गई है…

उधर, जन संदेश कार्यालय सोनभद्र में तीन माह से वेतन न मिलने के चलते कर्मचारियों के समक्ष भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है। 7 अगस्त को रक्षाांधन पर्व होने के बाद भी वेतन न मिलने से कार्य करने वाले कर्मचारियों में मायूसी देखी जा रही है। ब्यूरो चीफ राहुल श्रीवास्तव महीने में शायद एकाध बार ही आफिस आते हैं। पैसा मांगने पर अपशदों का प्रयोग किया जाता है। आफिस के सहारे रहने वाले कर्मचारी किस तरह से काम करें, यह उनको समझ में नहीं आ रहा है। बनारस आफिस से भी कर्मचारियों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

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न्यूज नेशन के मालिकों-प्रबंधकों! अप्रेजल फार्म तो पहले ही भरवा लिए, बढ़ी हुई सेलरी कब तक दोगे?

न्यूज नेशन की चिंदी चोरी… एक तरफ तो पत्रकार दुनिया में हो रहे अन्याय की आवाज उठाते हैं वहीं दूसरी ओर खुद पर हो रहे अन्याय को चुपचाप सह लेते हैं। इसके उदाहरण तो कई हैं मगर आज यह बात मीडिया के एक बहुत बड़े संस्थान से जुड़ी है। बात हो रही है न्यूज़ नेशन न्यूज़ चैनल की। प्रबंधन के 2 चैनल (न्यूज नेशन, न्यूजस्टेट) हैं। न्यूज नेशन टॉप 5 का चैनल है और न्यूज स्टेट यूपी-उत्तराखंड में काफी समय से पहले पायदान पर काबिज है। साथ ही तीसरे चैनल (न्यूजस्टेट MP-CG) की तैयारियां भी जोरों पर हैं। इससे साफ है कि संस्थान के पास पैसों की कमी नहीं है।

मगर फिर भी न्यूज नेशन लगातार 3 महीने से अपने कर्मचारियों का अप्रेजल करने से कतरा रहा है। मई के आखिर में अप्रेजल फॉर्म भरवाने को बाद 3 बार तनख्वाह आई लेकिन बस तनख्वाह अकेले ही आई, संग में अप्रेजल नहीं लाई। संस्थान में कुछ कर्मचारी अब भी आस लगाए बैठे हैं कि शायद अगले महीने अच्छे दिन आ जाएं। कुछ का अप्रेजल से भरोसा उठ चुका है।

कुछ मानते हैं कि मुख्य लोग जिन्हें मालिकान लोग अप्रेजल देना चाहते थे और जो उनके खास थे, उन्हें दे चुके हैं। कुछ का यह भी कहना है कि संस्थान से लोग छोड़ रहे हैं इसलिए भी अप्रेजल नहीं किया जा रहा है। वजह चाहे जो हो, इन सबके बीच पिसने वाला वही पत्रकार है जो जुर्म और अन्याय की आवाज बनता है, जो दूसरों के लिए कैमरा उठा जान पर खेल कर रिपोर्टिंग करता है, वही पत्रकार असहाय होकर सब कुछ चुपचाप झेलता है और किसी से कुछ बिना कहे काम करता रहता है।

संस्थान से पूछना चाहूंगा कि जब चैनल की पैसे देने की ताकत नहीं थी तो उसने अप्रेजल फॉर्म ही क्यों दिए। अगर संस्थान के पास पैसों की कमी है तो तीसरा चैनल लाने के बजाय कर्मचारियों को उनका पैसा ही दे देते। अगर अप्रेजल ना करना हो तो इस बात को साफ सरल और सीधे शब्दों में कर्मचारियों को मेल या किसी दूसरे तरीके से बता दिया जाय ताकि कोई भी इसकी उम्मीद मन में ना पाले।

न्यूज नेशन के एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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हिंदुस्तान, बरेली में वेतन को लेकर फर्जीवाड़ा, खुलासे से कर्मचारियों में हड़कंप

बरेली से बड़ी खबर आ रही है, हिंदुस्तान बरेली में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से बचने के लिए कंपनी की चेयरपर्सन शोभना भरतिया को डुबोने पर आमादा अफसरों की चौकड़ी ने कर्मचारियों के वेतन को लेकर बड़ा फर्जीवाड़ा किया है। इसका खुलासा जनसूचना अधिकार के तहत डीएलसी बरेली ने मजीठिया क्रांतिकारी निर्मल कान्त शुक्ला को दी गई सूचनाओं में किया है। जनसूचना के तहत मिली जानकारी के अनुसार हिंदुस्तान बरेली ने खुद को अमर उजाला से भी एक पायदान नीचे जाकर छठी कैटेगिरी में होना बताया है। कहा कि वह तो कर्मचारियों को मजीठिया से कही अधिक वेतन हर माह दे रहे हैं।

हिंदुस्तान ने जो वेतन चार्ट श्रम विभाग को दिया है, उसके मुताबिक संपादकीय विभाग के सीनियर कॉपी एडिटर पंकज कुमार वत्स को 45,109, अनुराग शुक्ल को 38,163, प्रदीप चंद्र तिवारी को 40,378, राजेश्वर विश्वकर्मा को 37,452, रवि श्रीवास्तव को 29,707, सुबीर कुमार शर्मा को 38,612, चीफ कॉपी एडिटर/चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा को 38,967, पीयूष मिश्रा को 41,507, सुनील कुमार मिश्रा को 36,235, सीनियर डिजाइनर दिनेश ठाकुर को 28,986, सीनियर फोटो जर्नलिस्ट रोहित उमराव को 37,557 रूपये मासिक वेतन-भत्तों आदि का भुगतान किया जा रहा है।

इसके अलावा न्यूज़ एडिटर अनुरोध कुमार भारद्वाज, प्रोडक्शन मैनेजर प्रलय चक्रवर्ती, डीजीएम गौतम कुमार वैश्य, आईटी मैनेजर हरिओम गुप्ता, विज्ञापन मैनेजर अतुल मिश्रा को 50,000 रूपये से अधिक मासिक वेतन-भत्तों का भुगतान किया जा रहा है। जोकि मजीठिया वेज बोर्ड के तहत छठी कैटेगिरी की यूनिट के निर्धारित वेतन-भत्तों से कहीं अधिक है। इसके अलावा सीनियर एग्जीक्यूटिव ओमपाल सिंह को 31,582, एग्जीक्यूटिव धीरेंद्र प्रसाद सिंह को 39,329, पवित्र सिंह को 38,293 रूपये मासिक वेतन-भत्तों का भुगतान किया जा रहा है। इसीलिए इन कर्मचारियों का मजीठिया का एरियर बकाया होने का प्रश्न ही नहीं।

कंपनी ने ये डाटा श्रम विभाग को माह मई’ 2015 में दिया है यानि इस समय इन कर्मचारियों को दो साल का इंक्रीमेंट जोड़कर इससे भी कहीं आधी का भुगतान करना हिंदुस्तान बरेली अपने रिकार्ड में बेख़ौफ़ होकर दर्शा रहा है। हिंदुस्तान ने बरेली यूनिट में कुल 82 कर्मचारियों/अधिकारियों का स्टाफ होना दर्शाया है, उसमें लखीमपुर ब्यूरो के इंचार्ज मयंक वाजपेयी, पीलीभीत ब्यूरो के इंचार्ज पंकज कुमार मिश्रा, बदायूं ब्यूरो के इंचार्ज जगमोहन शर्मा, शाहजहांपुर ब्यूरो इंचार्ज विवेक सेंगर जोकि कंपनी के ऑन रोल इम्प्लाई हैं, उनको शामिल नहीं किया। चार्ट में ब्यूरो स्टाफ नदारद है।

श्रम विभाग के रिकार्ड के मुताबिक हिंदुस्तान बरेली ने बर्ष 2008-09 का 72लाख, बर्ष 2009-10 का 2.72 करोड़ सकल राजस्व दर्शाया है।प्रसार 78,442 प्रतियां है। हिंदुस्तान बरेली में वेतन के फर्जीबाड़े का आरटीआई में खुलासा होने से कर्मचारी भड़के हुए हैं।यूनिट में हड़कंप मच हुआ है। मजीठिया क्रन्तिकारी राजेश्वर विश्वकर्मा व पंकज मिश्रा का कहना है कि इससे बड़ा सफ़ेद झूठ हो नहीं सकता। कंपनी ने उनका वेतन 10 हजार रूपये बढ़ाकर दिखाया है।वेतन पर्ची और बैंक स्टेटमेंट ही हिंदुस्तान को झूठा सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत है।वह इस मामले में पीड़ित होने के नाते आपराधिक मुकदमा कंपनी के जिम्मेदार लोगों पर करने जा रहे हैं।दरअसल मजीठिया देने से बचने के लिए ये घिनौनी करतूत ग्रुप संपादक शशि शेखर, डायरेक्टर एच आर शरद सक्सेना की चौकड़ी की है।एच आर इंचार्ज राकेश गौतम की है।

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कई महीने की रुकी सेलरी मांगने गए मीडियाकर्मियों को राज एक्सप्रेस के मालिक ने पीटा

इस प्रकरण में राज एक्सप्रेस के संपादक अनुराग त्रिवेदी की भूमिका बेहद निंदनीय… मध्यप्रदेश की राजधानी से प्रकाशित दैनिक राज एक्सप्रेस में एक बार फिर आर्थिक संकट के बादल छा गए हैं। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। स्टाफ को बीते चार महीने से सेलरी नहीं मिली है। किसी के बच्चों की स्कूल की फीस पेंडिंग हो गई है तो कोई अपनी आजीविका चलाने के लिए संर्घष कर रहा है। लेकिन अखबार के मालिक और संपादक और संपादकीय विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अपने ही स्टाफ के विरुद्ध नजर आ रहे हैं।

बीते एक हफ्ते से संपादकीय विभाग का स्टाफ सेलेरी लेने के लिए एचआर विभाग के चक्कर लगा रहा है। लेकिन उन्हें रोजाना कोई न कोई आश्वासन देकर लौटा दिया जाता है। पानी सिर से उपर हो जाने के कारण सोमवार को अपकंट्री में काम करने वाले सब एडिटर और आपरेटरों ने काम को रोक दिया और मालिक से मिलने के लिए संपादक के पास चर्चा करने गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए तथा​कथित संपादक अनुराग त्रिवेदी ने पहले तो जयचंद का रोल निभाते हुए सभी को अपने यकीन में लेकर मालिक से मिलने भेज दिया।

जब सब कर्मचारी मालिके के पास गए तो मालिक ने नेतृत्व कर रहे राजकुमार सोनी के साथ मारपीट कर दी। साथ ही सभी को धमकाते हुआ नौकरी छोड़कर जाने को भी कह दिया। ऐसे समय में स्थिति को संभालने के बजाए संपादक अनुराग त्रिवेदी, सेंट्रल डेस्क के इंचार्ज पवन सोनी ने अपनी ही टीम के कर्मचारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सभी कर्मचारियों की कमियां मालिक को गिनवाने लगे।

ये वहीं संपादक और इंचार्ज हैं जो परमानेंट मालिक के तलवे चाटते हैं। ये संस्था में ​मालिक को छोड़ किसी के सगे नहीं हैं। इनकी गुलामी का बड़ा कारण इन्हें कही दूसरी जगह नौकरी का न मिलना भी है। इन लोगों ने मालिक से कई दफा एडवांस सेलरी ले रखी है। इसके कारण ये न्याय दिलाने के बजाए अपने ही साथियों का दोहन करते रहते हैं। अनुराग त्रिवेदी को तो एक दफा अखबार में अश्लील चित्र प्रकाशित करने के कारण मालिक ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। लेकिन जब पूरे भोपाल में कहीं नौकरी नहीं मिली तो हाथ पैर जोड़कर वापस आ गया।

संस्था के तीन लोग अखबार को डुबाकर मोटी सेलरी ऐंठ रहे हैं, कभी अपने स्टाफ के साथ नहीं खड़े हुए। इनमें अनुराग त्रिवेदी अव्वल नंबर पर हैं। दूसरा पवन सोनी है जो सिर्फ कापी पेस्ट खबरों से अखबार के पन्ने भरता है। तीसरे नंबर पर हैं समूह संपादक जो 60 की उम्र पार कर चुके हैं और फ्री की पगार सिर्फ मालिक की चुगली करने की लेते हैं। खुद को संपादक कहने वाला अनुराग त्रिवेदी ग्वालियर का है और वहां के गठजोड़ से संबंधित कई किस्म के आरोप उस पर लगते रहते हैं। हर बार वह मालिक का करीबी होने के कारण बचता रहा है।

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‘चक दे’ में काम कराते हैं लेकिन सेलरी नहीं देते

मेरा नाम रणजीत कौर है और मैंने ‘चक दे’ में 8 जून 2016 को ज्वाइन किया था, बतौर न्यूज़ एंकर इन पंजाबी. स्टार्टिंग में बड़ी बड़ी बातें की गयी थीं. पर था कुछ नहीं. नाईट ड्यूटी थी और सिक्योरिटी के नाम पर कुछ नहीं था. एक छोटी सी बिल्डिंग में इसका ऑफिस है, फरीदाबाद में. वहीं कॉल सेंटर चलते हैं. वहीं न्यूज़ चैनल भी है. इस चैनल का मालिक एनआरआई है.

यहां गणेश नायर है जो सुब कुछ देखते हैं. नाईट में जो लड़कियां रहती हैं उनकी सेफ्टी के लिये कुछ भी नहीं है. गणेश नायर अपने नीचे काम करने वालों का शोषण करते हैं. कहने को तो ये चैनल बताते हैं लेकिन इनके पास कोई लाइसेंस नहीं है चैनल चलाने का. ये दरअसल वेब न्यूज़ चैनल चलाते हैं. यहां पर लड़कियों को बिना कारण परेशान किया जाता है. जिसे भी इम्प्लॉयी को रखा जाता है उसे एक या दो महीने काम कराके बिना सेलरी के ही वापस भेज दिया जाता है.

मैंने नाईट शिफ्ट की है जिससे मेरी हेल्थ तो खराब हुई ही, साथ में मैं फाइनेंशली भी काफी वीक हुई. गणेश नायर फालतू की बातें करता था. वह लुभावनी बातें करके शोषण करने के मौके ढूंढत था. मेरे अलावा बहुत से लोग हैं जिनकी सेलरी उसने नहीं दी. साथ में मेंटली परेशान किया वह अलग से. बात मेरे लिए पैसों का नहीं है. ऐसे काम बंद होने चाहिए जहां काम करने वालों का हर तरह से शोषण किया जाता है. मैं नहीं चाहती मेरे बाद कोई दूसरा बंदा इस चैनल के झांसे में फंसे और अपना वक्त, पैसा बर्बाद करे.

रणजीत कौर
jesikajesus84@gmail.com

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Re-open the case against Dr. B. N. Goswami and Chabi Bardhan

atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary… Misuse of government property and Power

To,
The Commissioner of Police,
Near Pune Station, Pune 411001

Subject: Re-open the case against Dr. B. N. Goswami (retired director of IITM, Pune) and Chabi Bardhan for atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary, Misuse of government property and Power

Respected sir,

Herewith I request for arrest of Dr. B. N. Goswami and Chabi Bardhan for atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary, Misuse of government property and Power. Kindly note that, I file the Atrocity case agaist Dr. B. N. Goswami (retired director of IITM, Pune) on 26/09/2013 at Chaturshrungi Police Thane (Mr. R. G. Devrukhkar, Police Hawaldar 4776 received it). On 22/10/2013 Sahayak V Police Nirikshak Shir V. R. Gaud took Jabab.

But Dr. B. N. Goswami and Chabi Bardhan pressurize IITM employees threating them that they will not give promotions; terminate them with false allegations similar to me. Hence submitted forceful sign collected paper to misguide police.

Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardhan started blackmailing and threatening people saying that Dr. Shailesh Nayak is in Director’s pocket and even PMO office will not touch Dr. B. N. Goswami. Ms. Chabi Bardhan also tell people that each Governing council member including chairman and MoES Secretary get their Share (Money) so no one can do anything against them.  And Dr. B. N. Goswami says that he has ample of Government money and Gold that they can even Purchase Hon’ble Supreme Court of India with Government money.

Herewith I request for the inquiry regarding following persons and reasons for collective crime

1. Dr. P. Suryachandra Rao, 2. Dr. P Mukhopadhyay, 3. Shri A. B. Sikdar, 4. Mr. Kausar Ali, 5. Dr. Suresh Tiwari (IITM, New Delhi) for making false reports against me for conspiracy and removing me from Job and for creating forgery documents against me, with the hands of Ms. Chabi Bardhan and Dr. B. N. Goswami.

Kindly note that account officer had Hand over my salary to Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardan illegally and creating forgery  documents for Income Tax Return statement for the year 2012-2013 with hands of Ms. Chabi bardhan and Dr. B. N. Goswami.

I also requesting to investigate Dr. D. K. Siingh as Ms. Chabi Bardhan send Dr. D. K. Siingh and Mr. Alok Sagar Gautam (student of Dr. D. K. Siingh) several times to force me to meet her at her home (alone as well as with wife and kids) and give Khoka or Pety (money) to cancel my transfer. They want to corrupt me. I refuse to do so because for official work I dislike to go anyone’s home also I don’t have money to give her and Dr. B. N. Goswami for transfer cancellation. Hence have been remove from to teach the lesson to employees what Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardhan threatened me and done the same.

I also request to Initiate the inquiry against Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardhan for encouraging to create forgery documents to above officials and robbery of my salary and Ms. Chabi Bardhan regarding the same as per the law of land.

I strongly request to reopen my case and take the statements of IITM employees again and re investigate the case.

I also request for the arrest of Dr. B. N. Goswami who stay at Panchwati, near IITM, Pashan (retired director of IITM, Pune) and Chabi Bardhan for atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary, Misuse of government property and Power.

Hope I will get justice by making punishment and restore of my job.

Sincerely,
Kirankumar Johare
Mobile 9970368009
kkjohare@hotmail.com
Date:-13 March 2017

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सहारा मीडिया में सेलरी संकट से त्रस्त कर्मियों ने शुरू किया मेन गेट पर धरना-प्रदर्शन (देखें वीडियोज)

सहारा मीडिया के नोएडा स्थित मुख्य आफिस के गेट पर सहारा कर्मियों ने सेलरी के लिए धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. कई महीने की सेलरी दबाए बैठे सहारा प्रबंधन ने अपने कर्मियों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है. इससे परेशान कई कर्मचारी अब गेट पर धरना प्रदर्शन शुरू कर चुके हैं. दूसरे मीडिया हाउसेज इस आंदोलन को इसलिए कवर नहीं कर रहे क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई के तहत वे एक दूसरे के घर में चलने वाले उठापटक को इग्नोर करते हैं. धरना प्रदर्शन सात जनवरी से चल रहा है. धरने में करीब 25 कर्मचारी खुल कर हिस्सा ले रहे हैं.

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