महिला पत्रकार और उनकी बहन से बनारस में खुलेआम पांच लफंगों ने की छेड़छाड़, 100 नंबर काम न आया

Arundhati Pal : वाह रे बनारस की व्यवस्था.. वाह रे बनारस के लोग… शर्म आ गयी आज बनारसी होने पर. बड़े गर्व के साथ बनारस का नाम लेती थी लेकिन आज जब होली के मौके पर बनारस आई तो शर्म आ गयी। आज करीब 8.30 बजे लंका के पास मेरे और मेरी बहन के साथ कुछ 5 लड़कों ने मिल कर सरेआम छेड़खानी शुरू कर दी.. वहाँ मौजूद मेरे पुरुष मित्र के मना करने पर उन्होंने मारपीट गालीगलौज शुरू कर दी..

इमरजेंसी नंबर 100 न जाने कितनी बार डायल किया नबंर कनेक्ट नही हुआ और कनेक्ट हुआ भी तो किसी ने रिसीव नही किया और जब रिसीव किया भी तो उधर से हेल्लो की आवाज़ आते ही कॉल डिसकनेक्ट हो गयी..इसके बाद वहां से कॉल बैक का तो चांस ही नही.. करीब 9 बार कॉल किया मैंने..

क्या यही व्यवस्था है आप लोगो की Varanasi police ?

क्या घर की बेटीयों को भी ऐसी ही सुरक्षा देते हैं आप लोग?

और हां, वारदात के दौरान पब्लिक में खड़े 50-60 लड़कों में से सिर्फ एक लड़का हमारी मदद करने की लिए निकला उसको भी उन 5 लड़को ने पीटना शुरू कर दिया.. बाकि खुद को खांटी बनारसी कहने वाले कायर तमाशा देख रहे थे।

Narendra Modi सर, सत्ता बदलने के बाद अब व्यवस्था बदलने की उम्मीद रखते हैं.

दैनिक भास्कर समूह से जुड़ी और हरियाणा के करनाल में कार्यरत महिला पत्रकार अरुंधती पाल की एफबी वॉल से.

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एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को!

यूपी में रक्तहीन क्रांति पर भड़ास एडिटर यशवंत की त्वरित प्रतिक्रिया- ‘मीडियाकर्मियों का अंतहीन उत्पीड़न करने वाले अखिलेश राज का खात्मा स्वागत योग्य’

Yashwant Singh : यूपी में हुए बदलाव का स्वागत कीजिए. सपा और बसपा नामक दो लुटेरे गिरोहों से त्रस्त जनता ने तीसरे पर दाव लगाया है. यूपी में न आम आदमी पार्टी है और न कम्युनिस्ट हैं. सपा और बसपा ने बारी बारी शासन किया, लगातार. इनके शासन में एक बात कामन रही. जमकर लूट, जमकर झूठ, जमकर जंगलराज और जमकर मुस्लिम तुष्टीकरण. इससे नाराज जनता ने तीसरी और एकमात्र बची पार्टी बीजेपी को जमकर वोट दिया ताकि सपा-बसपा को सबक सिखाया जा सके.

प्रचंड बहुमत से यूपी में सत्ता पाने वाली भाजपा ने अगर अगले दो साल में शासन करने का ढर्रा नहीं बदला, सपा-बसपा वाली लूट मार शैली से इतर एक नया सकारात्मक कल्चर नहीं डेवलप किया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी में थउंस जाएगी यानि ढेर हो जाएगी. मैंने निजी तौर पर अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को हराने के लिए अपील किया था क्योंकि इन महोदय के राज में एक पत्रकार जिंदा जला दिया गया, पत्रकार ने मरने से पहले जलाने वाले मंत्री का नाम भी लिया लेकिन उस मंत्री को सत्ता से बेदखल नहीं किया गया. आपको यह भी याद होगा कि अखिलेश यादव ने यूपी में सरकार बनाते हुए मुझे कुछ भ्रष्ट पतित संपादकों और मीडिया हाउसों के इशारे पर उठवा कर अवैध तरीके से 68 दिनों तक जेल में बंद करवाया था.

मेरे बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को भी जेल में डलवाया गया. बाद में आफिस और घरों पर छापे डलवाए गए. खैर, हम लोग तो जेल से जश्न मनाते हुए निकले और ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिख डाला. पर फकीर का श्राप आह तो पड़ता ही है. एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को! मैंने सपा को वोट न देकर किसी को भी वोट देने की अपील की थी. ढेर सारे लखनवी चारण पत्रकारों और ढेर सारे मीडिया हाउसों के ‘अखिलेश जिंदाबाद’ वाली पेड न्यूज पत्रकारिता के बावजूद अखिलेश यादव को जनता ने दक्खिन लगा दिया.

बीजेपी वाले जश्न बिलकुल मनाएं, लेकिन ध्यान रखें कि जनता ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी दे दी है. अब शासन का नया ढर्रा विकसित करना होगा और जंगलराज-लूटराज से यूपी को मुक्ति दिलानी होगी. हम सबकी नजर यूपी की नई भाजपा सरकार पर रहेगी. फिलहाल मोदी और शाह की करिश्माई जोड़ी को बधाई… ये लोग सच में इस लोकतंत्र में वोटों की राजनीति-गणित के शहंशाह साबित हो रहे हैं. जैजै

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्ट स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें : YASHWANT FB POST

ये है वो खबर जिसे भड़ास की तरफ से यूपी चुनाव से ठीक पहले एक अपील के रूप में जारी किया गया था…

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आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने अखिलेश यादव के संरक्षण में हुए एक बड़े घोटाले का किया भंडाफोड़

Surya Pratap Singh : उद्योग मंत्री/ मुख्य मंत्री के संरक्षण में उत्तर प्रदेश में UPSIDC बना एक घोटालों का अड्डा…. मुख्यमंत्री/उद्योग मंत्री अखिलेश की नाक के नीचे UPSIDC में रु. २०,००० करोड़ का भूमि घोटाला हुआ हैं….मनमाने ढंग से साक्षात्कार के माध्यम से भू आवंटन किया गया है …. साक्षात्कार का मतलब रिश्वत की सौदागिरी !!!
मुख्यमंत्री/ उद्योग मंत्री अखिलेश यादव ने अपने मित्र के नाम पर ‘स्टील प्लांट’ लगाने के लिए UPSIDC के सिकंदराबाद औद्योगिक क्षेत्र में 111 ऐक़ड भूमि बिना किसी टेंडर पर वर्ष २०१३-२०१४ में औने-पौने मूल्य/बहुत सस्ते में वर्ष २०१४ में आवंटित की गयी है ….. जिसकी जाँच आने वाली सरकार क्या जाँच कराएगी ? मेरे इस सम्बंध में निम्न प्रश्न हैं:

1. क्या इस भूमि के आवंटन से पूर्व क्या कोई स्कीम निकाली गयी थी …विज्ञापन दिया गया था या नहीं? यदि नहीं तो क्यों? किसके अलिखित निर्देश पर यह भूमि आवंटित की गयी ?

2. क्या कोई open auction के लिए टेंडर निकला गया था। यदि नहीं, तो क्यों?

3. भूमि का क्या कोई रिज़र्व प्राइस रखा गया था ? यदि नहीं तो क्यों? यदि रिज़र्व प्राइस रखा गया था तो इसका आधार क्या था ?

4. क्या कलेक्टर द्वारा निर्धारित मूल्य पर या मार्केटिंग प्राइस पर आवंटन किया गया था?

5. आवंटन से पूर्व किस स्तर से स्वीकृति ली गयी। क्या मंत्री परिषद का अनुमोदन किया गया था ? यदि नहीं तो क्यों? आवंटन आदेश पर किसके हस्ताक्षर हैं?

6. आवंटन के लिए क्या कोई कमेटी बनायी गयी थी और उसके सदस्य कौन-२ थे ?

7. कितना नुक़सान UPSIDC को हुआ? इसका ज़िम्मेदार कौन?

इसी प्रकार दूसरा बड़ा घोटाला मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कहने पर ‘भसीन ग्रूप’ को Grand Venezia/Grand Venice Mall के लिए 10.5 ऐक़ड़ इंडस्ट्रीयल भूमि को वर्ष २०१४ में commercial में परिवर्तित करके भूमि आवंटन किया गया है। इस १.५ million sq. mt. में बन रहे मॉल के लिए निर्माण कार्य/नक़्शा पारित करने में बड़ा घुटाला हुआ है ..यह मॉल UPSIDC area near Kasna Site IV, Greater Noida में स्थित है। इसके कई फ़्लोर मुख्यमंत्री, उनके मित्रों व कई नौकरशाहों ने अपने नाम आवंटित कराए हैं। इस के sales rate Rs. १५,०००- २०,००० per sq ft. है। इसकी उच्च स्तरीय जाँच में सब सामने आ जाएगा। इस सम्बंध में निम्न प्रश्न हैं:

1. Industrial area में भू उपयोग परिवर्तन कर भसीन ग्रूप की दी गयी १०.५ ऐक़ड भूमि का land use change कर commercial किन परिस्थितियों में किया गया?

2. आवंटन का आधार क्या था? किस स्तर का अनुमोदन लिया गया? क्या मंत्री परिषद का अनुमोदन लिया गया?

3. इस १०.५ acre भूमि का open auction क्यों नहीं किया गया? नियमों का उल्लंघन कर इंडस्ट्रीयल भूमि का commercial स्वरूप क्यों किया गया? नियम विरुद्ध 40 लाख sq.ft. buildup किस दबाव में स्वीकृत कर दिया गया….

4. कितने नेताओं व IAS अधिकारियों के व उनके परिवारों के नाम कितने floors आवंटित हैं ? नेता-नौकरशाह-रियल इस्टेट माफ़िया का गठजोड़ का नमूना है, यह मॉल।

5. नॉएडा क्षेत्र से मिले होने के कारण इस भूमि के मूल्य व नॉएडा अथॉरिटी द्वारा सेक्टर-१८ में आवंटित भूमि के मूल्य में कितना अंतर था और क्यों?

6. कन्स्ट्रक्शन area में कितनी अतिरिक्त छूट दी गयी व कितनी बार नक़्शे व भू उपयोग परिवर्तनों में छूट दी गयी?

7. २० फ़्लोर कन्स्ट्रक्शन की अनुमति किन नियमों के तहत दी गयी है।

UPSIDC में भ्रष्ट इंजीनियरों की फ़ौज है जिनके ख़िलाफ़ CBI तक की जाँच चल रही है … जेल तक जा चुके हैं… ED द्वारा प्रापर्टी भी जप्त की गयी है फिर भी ये भ्रष्ट इंजीनियर प्रमोशन देकर joint MD तक बना दिए गए, सभी अधिकार MD लोगों ने प्रतिनिधायित कर दिए गए…. हाई कोर्ट व सप्रीम कोर्ट के अनेक आदेशों को ठेंगा दिखाया गया है। IAS ऑफ़िसर तक निलम्बित हुये हैं… लेकिन मुख्यमंत्री जो स्वमं उद्योग मंत्री है ने आँखे बंद कर रखी हैं… आख़िर क्यों ?

Troinka सिटी ग़ाज़ियाबाद में भी बड़े पैमाने पर भू आवंटन व land use change पैसे लेकर किए गए हैं। planstic city औरैया, कन्नौज में स्थापित फ़ूड पार्क, Trans-Ganga कानपुर , theme पॉर्क आगरा व इलाहबाद में नव स्थापित इंडस्ट्रीयल पार्क में निर्माण व भू आवंटन में भी घोटाले की पटकथा रची गयी है। सड़के व अन्य निर्माण एक ही स्थान पर बिना काम किए भुगतान प्राप्त किए गए….UPSIDC के प्रदेश सभी industrial areas में भूमि आवंटन व लैंड यूज़ परिवर्तन में घोटाले हुए हैं… क्या-२ बताऊँ?

अतः मैं माँग करता हूँ कि UPSIDC के उक्त घोटालों की CBI से जाँच करायी जाए ….. नेता-आईएएस अधिकारियों-इंजीनियरस-Real Estate माफ़िया के घोटाले की उच्च स्तरीय जाँच कराना आने वाली सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी….देखते हैं क्या आने वाली सरकार इन घोटालों की जाँच कराती या नहीं…. या फिर बातें है बातों का क्या ..वाली कहावत चरितार्थ होती है ….उत्तर प्रदेश में बड़े-२ घोटाले मुख्यमंत्रियों के संरक्षण में होते रहे हैं न कोई जाँच हुई और न कोई अभी जेल गया …. ये जनता के साथ विश्वासघात है, कोरा विश्वासघात…..

यूपी के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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बहुत उदार और उदात्त है यूपी पुलिस, थाने से भाग जाने देती है लफंगों को (देखें वीडियो)

यूपी की बहादुर पुलिस खुद भले चोर बदमाश न पकड़ पाए लेकिन जब कोई दूसरा पकड़ कर पुलिस को सौंपता है तो पुलिस वाले पूरी उदारता बरतते हुए उसे चले जाने देते हैं… शायद इसीलिए कहा जाता है चोर पुलिस मौसेर भाई.. नीचे कमेंट बाक्स में दिए गए एक वीडियो को देखिए…

लड़की बात रही है कि फीमेल बाथरूम में वीडियो बनाने वाले एक युवक को पकड़ कर पुलिस को सौंपा गया लेकिन पुलिस ने उस युवक को भाग जाने दिया… मामला आगरा का है…. धन्य है हमारी यूपी पुलिस.. एक सैल्यूट तो बनता ही है जी, इस अदभुत उदात्तता और मानवीयता के लिए…

देखें वीडियो…

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लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता का एक ताजा अनुभव

विष्णु गुप्त

क्या लखनऊ की पत्रकारिता अखिलेश सरकार की रखैल है? लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर क्यों बना हुआ रहता है? अखिलेश सरकार के खिलाफ लखानउ की पत्रकारिता कुछ विशेष लिखने से क्यों डरती है, सहमती है? अखिलेश सरकार की कडी आलोचना वाली प्रेस विज्ञप्ति तक छापने से लखनऊ के अखबार इनकार  क्यों कर देते हैं? अब यहां प्रष्न उठता है कि लखनऊ के अखबार अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने से डरते क्यों हैं? क्या सिर्फ रिश्वतखोरी का ही प्रश्न है, या फिर खिलाफ लिखने पर अखिलेश सरकार द्वारा प्रताडित होने का भी डर है?

सही तो यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने पर लखनऊ की पत्रकारिता को प्रताड़ित होने का भी डर है और रिश्वतखोरी से हाथ धोने का भी डर है। अखिलेश सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में पत्रकारों को अपने पक्ष में करने के लिए दोनों तरह के हथकंडे अपना रखे है। एक हथकंडा पत्रकारों और अखबार मालिकों को रिश्वतखोरी कराने और दूसरे हथकंडे में खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न करना।

अखिलेश सरकार के इस दोनों हथकंडों की परिधि में लखनऊ की पत्रकारिता पूरी तरह चपेट में हैं। ईमानदार और स्वतंत्र पत्रकारों की हत्या हुई, उत्पीड़न हुआ पर लखनऊ में अखिलेश सत्ता के खिलाफ पत्रकारों की कोई सशक्त आवाज नहीं उठी। यूपी के पत्रकारों की हत्या और उत्पीडन की आवाज दिल्ली तक तो पहुंची और दिल्ली में अखिलेश सरकार के खिलाफ पत्रकारों की आवाज भी उठी थी पर लखनऊ में सषक्त आवाज नहीं उठी। पत्रकारिता हमेशा सत्ता को आईना दिखाने के लिए जानी जाती है और यह धारणा विकसित है कि स्वच्छ और निडर पत्रकारिता ही अराजक, भ्रष्ट और निकम्मी सत्ता की कुंभकर्णी नींद से जगाती है और जन चेतना का संचार कर ऐसी सत्ता को जनाक्रोश का सामना कराती है। पर पत्रकारिता के इस धर्म का कहीं कोई वीरता है नहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए यह चितांजनक स्थिति है, जिस पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

अभी-अभी हमने लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर देखा है, अखिलेश सरकार की शरणागत पत्रकारिता को देखा है। कैसे एक मामूली प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम का अखबार या चैनल संज्ञान लेने से इनकार कर देते हैं कि वह प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम अखिलेश सरकार के खिलाफ था। प्रसंग मेरी पुस्तक से जुड़ा हुआ है। सर्वविदित है कि अखिलेश के गुंडा राज पर एक मेरी पुस्तक आयी है, पुस्तक का नाम है, ‘अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार’। लोकशक्ति अभियान द्वारा लखनऊ में मेरी पुस्तक पर एक परिचर्चा कार्यक्रम रखा गया था। परिचर्चा कार्यक्रम में कई हस्तियां शामिल थीं, कई पत्रकार भी शामिल थे। परिचर्चा कार्यक्रम में लोगों ने पुस्तक पर खट्टी-मिटठी चर्चा की। हमने यह सोचा था कि परिचर्चा कार्यक्रम को एक समाचार दृष्टि से जरूर जगह मिलेगी। जिन अखबारों के प्रतिनिधि नहीं पहुंचे थे उन अखबारों को परिचर्चा कार्यक्रम की प्रेस विज्ञप्ति कार्यक्रम के आयोजक लोकशक्ति अभियान द्वारा भेज दी गयी थी। पर परिचर्चा कार्यक्रम की खबर कहीं भी नहीं छपी।   

मैं एक कॉलमनिष्ट हूं। लखनऊ के कई अखबारों में मेरा कॉलम भी छपता है। इसलिए मैने कई संपादकों को कॉल कर पूछ लिया कि भाई परिचर्चा कार्यक्रम की खबर क्यों नहीं छापी? यह तो साधारण और सूचनात्मक खबर थी। पहले तो आनाकानी हुई फिर संपादकों का कहना था कि अखिलेश सरकार से कौन बैर लेगा, अखिलेश के गुंडों से कौन लडाई मोल लेगा, आप तो दिल्ली वाले हैं, लखनऊ से सीधे दिल्ली पहुंच जायेंगे, आपको डर नहीं है पर हमे तो लखनऊ में रहना है, अगर अखिलेश सरकार की वापसी हो गयी तो फिर अगले पांच साल तक हमारा अखबार निशाने पर रहेगा। संपादकों की यह चिंता और डर के पीछे एक नहीं कई अन्य रहस्य भी है जिन्हें बेपर्दा करना जरूरी है।

अब यहां प्रश्न उठता है कि अखबारों और संपादकों के डर के पीछे अन्य रहस्य क्या है? संपादकों ने पूरा सच नहीं बताया। यह सही है कि राज्य सत्ता के खिलाफ लिखने और अभियानरत रहने से उत्पीड़न का खतरा रहता है। पर पत्रकारिता तो खतरों से खेलने का नाम है, पत्रकारिता तो जान पर खेलकर खबरें निकालने और सभी को सच का आईना दिखाने का नाम है? राज्य सत्ता से डरने वाले, गुंडों से डरने वाले, समाजविरोधी से डरने वाले, भ्रष्ट अधिकारियों से डरने वाले और ऐेसे लोगों के सामने शरणागत होने वाले लोग पत्रकार हो ही नहीं सकते हैं, ऐसे लोग चरणपादुका संस्कृति के होते हैं, दलाल किस्म के होते हैं, इनके लिए पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ की पूर्ति के लिए एक सशक्त माध्यम भर होती है, पत्रकारिता को सरकार, गुंडों, असामाजिक तत्वों और भ्रष्ट अधिकारियों का चरणपादुका बना कर अपनी झोली भरते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज पत्रकारिता में लोग एक मिशन के तहत नहीं आते हैं, वीरता दिखाने के लिए नहीं आते हैं, परिवर्तन के लिए नहीं आते हैं, क्रांति के लिए नहीं आते हैं। सिर्फ और सिर्फ पेट पालने और नौकरी करने आते हैं। फिर अन्य लोगों और पत्रकारों में अंतर क्या रह जायेगा? पत्रकार फिर अपने को विशेष क्यों और कैसे कह पायेंगे।

जब हमने जानने की यह कोशिश की आखिर असली रहस्य क्या है तो पता चला कि यह रहस्य रिश्वतखोरी का है। लखनऊ में पत्रकारों को रिश्वतखोरी कराने की एक बडी विषैली संस्कृति बन चुकी है। रिश्वतखोरी कराने के लिए प्रतिस्पर्द्धा होता रहा है। प्राय: सभी सरकारो में यह संस्कृति रही है। पर अखिलेश की सरकार मे यह संस्कृति और भी विषैली बन गयी है। लखनऊ ही नहीं बल्कि नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर और वाराणसी जैसे शहरों में सैकडों पत्रकारों को अखिलेश सरकार ने आवास की सुविधा दी है। सरकारी नियम के अनुसार जिसका जिस शहर में अपना आवास होता है उस शहर मेें ऐसे पत्रकार को सरकारी आवास नहीं मिल सकता है। पर दर्जनों-दर्जनों ऐसे पत्रकार हैं जिनका खुद का मकान है पर सरकारी मकान भी आंवटित करा रखे हैं। कई ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्होने वर्षों पहले पत्रकारिता छोड रखी है, जिनका अब पत्रकारिता से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है फिर पत्रकार कोटे से सरकारी आवास की सुविधा भोग रहे हैं। कई ऐसे लोग भी है जिनकी जिंदगी कब्र में लटकी हुई है फिर भी पत्रकार के नाम पर सरकारी मकान की सुविधा से अपनी दो पीढियों को लाभार्थी करा रहे हैं। ऐसे लोग अखिलेश सरकार से डर कर पत्रकारिता का गला तो घोटेंगे ही, यह तय है।

सरकारी विज्ञापन एक बड़ा कारण है। छोटा-बड़ा सभी अखबार और चैनल आज सरकारी विज्ञापन पर निर्भर हैं। सरकारी विज्ञापन के लिए अखबार और चैनल फर्जी सर्कुलेशन दिखाते हैं। लखनऊ में कई ऐसे अखबार हैं जिनका सर्कुलेशन लाख-लाख तक है पर ऐसे अखबारों का कार्यालय भी ढंग का नहीं है, नियमित कर्मचारी तक नहीं है, पत्रकार के नाम पर ऑपरेटर रख कर अखबार निकाल लिया जाता है। बडे़ अखबार भी कोई दूध के धोये हुए नहीं है। बडे़ अखबारों के कई धंधे होते हैं, बडे अखबारों के मालिक पैरवी और दलाली का कार्य करते हैं। बडे़ अखबारों के वैध और अवैध धंघे तभी तक चलते रहेंगे और इनकी पैरबी और दलाली तभी तक चलती रहेगी जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। विज्ञापन भी तभी तक मिलते रहेंगे जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। अगर अखबार और चैनल सत्ता के साथ मधुर संबंध नहीं रखेगे तो फिर सत्ता इनकी फर्जी सर्कुलेशन की पोल देगी और सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया जायेगा। सरकारी विज्ञापन बंद होने से छोटे अखबार बंद हो जायेगे और बडे अखबारों का भी बुरा हाल हो जायेगा।

जिन लोगों ने अखिलेश सरकार के खिलाफ जाकर लिखने का साहस दिखाया है उन सभी पत्रकारों को अखिलेश सरकार का कोपभाजन बनना पडा है। एक पत्रकार है जिनका नाम अपूप गुप्ता है, वे एक पत्रिका निकालते है, जिनका नाम दृष्टांत है। दृष्टांत नामक पत्रिका पिछले 15 सालों से सत्ता के खिलाफ बुलंदी के साथ लड रही है। अनूप गुप्ता और उनकी पत्रिका दृष्टांत की खासियत यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ आग उगलती रही है, अखिलेश सरकार के कुनबेवाद, गुंडावाद, भ्रष्टचारवाद के खिलाफ लिखते रहे हैं, एक पर एक भ्रष्टाचार, गुडागर्दी की कहानियां खोलते रहे हैं। पर इसकी कीमत अनूप गुप्ता को चुकानी पडी है।

पहले तो अखिलेश सरकार और उनकी भ्रष्ट नौकरषाही का बदबूदार चेहरों ने अनूप गुप्ता पर लालच का हथकंडा अपनाया। जब लालच के हथकंडे में अनूप गुप्ता नहीं फंसे तो फिर उन पर तरह तरह के जुल्म ढाये गये, उत्पीडन की कोई कसर नहीं छोडी गयी। अनूप गुप्ता की पत्रिका का निबंधन रद करा दिया गया, अनूप गुप्ता की हत्या तक कराने की कोषिष हुई। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रातोरात अनूप गुप्ता का आंवटित आवास का आंवटन रद कर दिया गया। अनूप गुप्ता का आवास से सारा सामान सडक पर फेक दिया गया। अगर अनूप गुप्ता भी अखिलेश सरकार की चाटुकारिता पंसद कर ली होती तो फिर न तो उनसे आवास छीना जाता और न ही उनका उत्पीडन होता। अखिलेश की सत्ता में एक पत्रकार को कैसे जला कर मार डाला गया था, यह भी उल्लेखनीय है।

लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता की जगह ईमानदार, निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता की स्थापना की उम्मीद भी तो नहीं बनती है।

लेखक विष्णु गुप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और इनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं। लेखक से मोबाइल नंबर 09968997060 या मेल आईडी guptvishnu@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

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काम बोलता है : चार घंटे तक इमरजेंसी में कराहती रही बूढ़ी मां, बेटे को जबरन थाने में बिठाये रखा

वाराणसी। यूपी में चल रहे चुनावी दंगल में भले ही ‘काम बोलता है’ का धुन आम मानुष के लिए सुशासन होने का दावा भर रहा हो पर जमीन पर थानों में वर्दी की दबंगई के आगे आम आदमी का गूंगापन और लाचारी बोल रहा है। बीते रविवार यही नजारा देखने को मिला जब अपनी 92 वर्षीय बूढ़ी मां माया देवी को उन्हीं की बहू कंचन और उसके मामा मंगला प्रसाद ने मार-पीट कर घायल कर दिया। बेटा घनश्याम जायसवाल ने तत्काल इसकी सूचना 100 नम्बर पर डायल कर दी और पुलिस से मदद मांगी तो मौके पर पहुंची पुलिस ने समझौते की बेशकीमती सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। 

घबराया बेटा जब एम्बुलेंस में चोटिल मां को लेकर कबीरचौरा स्थित मण्डलीय चिकित्सालय पहुंचा तो वहां मौजूद डाक्टर ने मामले को पुलिस केस बताकर पहले एफआईआर करने की सलाह दी। परेशान घनश्याम मां को वहां इमरजेंसी वार्ड में तन्हां छोड़कर सिगरा थाने पहुंचा तो उल्टे माताकुण्ड चौकी इंचार्ज लक्ष्मण यादव ने घनश्याम को थाने में रात 9 बजे तक बिठाये रखा। इस दौरान लगातार उस पर समझौता करने के लिए दबाव बनाया जाता रहा। उधर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पड़ी बूढ़ी घायल मां घंटो दर्द से कराहती रही।

घटना की जानकारी मिलने पर वहां पहुंचे चंद पत्रकारों ने जब डाक्टर से इस बारे में बात की तब कही जाकर उनका इलाज शुरू हुआ। असंवेदनशील तंत्र यहां किस तरह आम जन की जिदंगी से खेल रहा है, ये उसकी एक बानगी है।

घटना की जानकारी लेने थाने पहुंचे पत्रकारों के सामने एसओ सिगरा ने जब चौकी इंचार्ज से घटना के बारे में पूछा तो वहां भी चौकी इंजार्च मामले की लीपा-पोती करने में लगे रहे। चार घंटे तक फरियादी को थाने में क्यों रोके रखा, इस सवाल पर चौकी इंचार्ज महोदय के पास कोई जवाब नहीं था। फरियादी घनश्याम जायसवाल के तहरीर को भी चौकी इंचार्ज ने अपने पास दबा कर रख लिया। बाद में एसओ महोदय की फटकार के बाद चौकी इंचार्ज ने तहरीर उन्हें दिया।

घटना की गंभीरता को देखते हुए एसओ ने फौरन बहू कंचन और उसके मामा के खिलाफ मुकदमा कायम करने के साथ चौकी इंचार्ज को अस्पताल जाकर चोटिल माया देवी का बयान लेने का आदेश दिया। फिलहाल 92 साल की बूढ़ी माया देवी मण्डलीय अस्पताल के आर्थोपेडिक वार्ड के वार्ड न. 6 के बेड न. 10 पर जिस्मानी दर्द से ज्यादा समय के साथ अर्थहीन होते जा रहे रिश्तों और असंवेदनशील प्रशासन के दर्द से ज्यादा दुःखी है, जहां काम नारों और विज्ञापनों में बोल रहा है।

सोमवार को जब इस मामले में एसओ सिगरा से मोाबाइल पर बात की गई तो उनका जवाब था कि एफ.आई.आर दर्ज कर ली गई है, धाराओं के बारे में थाने से जानकारी लें। सिगरा थाने पर फोन करने पर दूसरी तरफ से आवाज आयी यह नम्बर इस समय काम नहीं कर रहा है। खबर लिखे जाने तक पीड़िता का मेडिकल मुआयना तक नहीं हुआ था।

वाराणसी के पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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मथुरा की मीडिया शहर के कोतवाल पर मेहरबान है या वाहन चोर गैंग पर?

अब तक आपने पुलिस की कार्यप्रणाली के खट्टे-मीठे अनुभव बहुत देखे और सुने होंगे किन्तु लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया के अनुभव शायद कभी-कभी महसूस किये होंगे या सुने होंगे लेकिन मेरे साथ घटी घटना को सुनकर शायद लोकतंत्र शर्मिंदा हो जाये लेकिन दोलत के भूखे भेड़ियों की सेहत पर इसका कोई असर पड़ेगा इसकी मुझे भी कल्पना नहीं है। वैसे मैने ढ़ाई दशक के पत्रकारिता के कार्यकाल में अपनी कलम के माध्यम से हजारों पीड़ितों की निस्वार्थ मदद कर उन्हैं राहत दिलाई है लेकिन पिछले दिनों 20 फरवरी को मेरे कार्यालय के बाहर से मेरी बाइक न. यूपी 85 यू 5666 चोरी हुई तो मुझे पुलिस के साथ-साथ मीडिया के सहयोग की जरूरत महसूस हुई। जिसमें पहले तो मुझे पुलिसिया कार्यशैली का सामना करना पड़ा और मथुरा कोतवाल से तड़का-भड़की हुई और जिसके चलते तहरीर लेने से इंकार कर दिया गया।

इसकी जानकारी मैने सभी मीडिया कर्मियों को लिखित तथा मोबाइल द्वारा दिये जाने के बावजूद भी दो-तीन पत्रकारों ने जो पुलिस की दलाली से दूर रहते हैं उन्होंने तो बाइक चोरी का समाचार प्रकाशित किया लेकिन प्रमुख समाचार पत्र एवं पत्रकार बाइक चोरी की घटना को छिपा गये। मेरे द्वारा करीब दो दर्जन करीब पत्रकारों से सहयोग की अपेक्षा की लेकिन कोई कोई मेरे साथ मदद के लिए खड़ा हुआ नजर नहीं आया। बल्कि कोतवाली पुलिस द्वारा पकड़े गये बाइक चोर गैंग की मदद करते हुऐ कई पत्रकार कोतवाली के चक्कर लगाते नजर आये। इसके अलावा कई लोग मुझे मीडिया कर्मियों को पार्टी, गिफ्ट, लिफाफा उनके साथ खर्चा करने या फिर पुलिस से लेन-देन कर एफआईआर दर्ज कराने का सुझाव देते रहे। जिसे मेरे जमीर ने मंजूर नहीं किया।

मीडिया की कार्यशैली को देखकर मुझे लगा कि जब मेरे साथी मीडिया कर्मियों का एक पुराने पत्रकार के साथ यही व्यवहार है तो उनका आम जनता और पीड़ितों के साथ कैसा व्यवहार होता होगा। इसे देखकर मैने अपने मित्र स्वच्छ छवि के तेज तर्रार मथुरा बार एशोसियेशन के तत्कालीन अध्यक्ष एवं वर्तमान प्रत्याशी विजयपाल सिंह तौमर एड. जिन्होंने जवाहरबाग को भी कब्जाईयों के कब्जे से जनहित याचिका के माध्यम से मुक्त कराया था को पूरी घटना से अवगत कराया तो उन्होंने एसएसपी मथुरा से मोबाईल पर सम्पर्क स्थापित किया लेकिन वार्ता न होने पर अगले दिन वह मेरे साथ एसएसपी कार्यालय पहुंचे जहां एसएसपी की अनुपस्थिति में एसपी क्राइम राजेश कुमार सौनकर से मुलाकात कर पुलिस की कार्यप्रणाली से अवगत कराया। जिसके बाद बाइक चोरी की घटना पांच दिन बाद दर्ज हो सकी। लेकिन एफआईआर दर्ज होने के बावजूद भी बाइक चोरी की खबर की एक लाइन भी प्रकाशित नहीं की गई।

मथुरा की मीडिया मथुरा कोतवाल पर मेहरबान है या फिर वाहन चोर गैंग पर यह तो वही जाने अथवा फिर मुझसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी है यह मेरी जानकारी से बाहर है। लेकिन मैं आम जनता पीड़ितों, शोषितों के साथ – साथ मीडिया कर्मियों के हर सुख-दुःख में अवश्य शामिल होता रहा हूं। इसके बावजूद भी मेरे साथ मीडिया के हुऐ इस व्यवहार ने – ‘‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया’’ की कहावत को सटीक चरितार्थ किया। एक तरफ प्रैस वार्ता के नाम पर समौसे, पकौड़े, लिफाफे, पटका, शराब की बोतल, कपड़े, तस्वीर की चाहत में पत्रकारों की भीड़ नजर आती है। बल्कि इसके बदले रस्सी को सांप बनाने में भी अपनी शान समझतें हैं। लेकिन मीडिया खबर अथवा सहयोग के बदले किसी अपने पीड़ित पीड़ित भाई से भी सुविधाशुल्क या फिर किसी अन्य सुविधा की उम्मीद करे तो उससे ज्यादा और शर्मनाक क्या हो सकता है।

मीडिया के इस व्यवहार को देखकर मुझे देश के रक्षामंत्री एवं पूर्वजनरल वी.के. सिंह के वो शब्द याद आ रहे हैं कि ‘‘पत्रकारों की स्थिति वैश्याओं से भी बदतरहै’’ जो आज के माहौल में सटीक साबित हो रहे हैं। जो दौलत और दलाली की चाहत में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के साथ – साथ अपनों का गला घोटनें में भी पीछे नहीं है। जिसने मानवता के नाम पर पुलिस और नेताओं को भी काफी पीछे छोड़ दिया है। हालांकि आज भी कुछ पत्रकारों की ईमानदारी पर कोई प्रश्न चिन्ह् नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन वह आज के माहौल में पुलिस-प्रशासन-नेताओं-माफियाओं से दूरी बनाकर जैसे तैसे अपना जीवन यापन करने पर मजबूर हैं। लेकिन वह ‘असली’ पत्रकारों की श्रेणी से बाहर होते दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि ‘‘जो सबसे बड़ा दलाल है, वही पत्रकारिता में मालामाल है’’ की पक्तियां को सटीक चरितार्थ है। और उसके लिये ‘‘दौलत है ईमान मेरा’’ सर्वोपरि है।

मफतलाल अग्रवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता
mafatlalmathura@gmail.com

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अखिलेश यादव जी, कहां हैं हत्यारे?

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कार्यकाल लगभग समाप्ति के दौर में है। अगली सरकार के लिए जद्दोजहद अंतिम चरण मे है। अखिलेश यादव पूरे पांच वर्ष तक सूबे की सत्ता पर निष्कंटक राज करते रहे लेकिन इस दौरान उन्होंने एक बार भी डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान हत्याकाण्ड को लेकर किए गए वायदों को याद करने की कोशिश नहीं की। बताना जरूरी है कि अखिलेश यादव ने (डॉ. सचान हत्याकाण्ड के दो दिन बाद 24 जून 2011) पत्रकारों के समक्ष डॉ. सचान की मौत को हत्या मानते हुए सीबीआई जांच की मांग की थी। डॉ. सचान के परिवार से भी वायदा किया था कि, उन्हें न्याय दिलाने के लिए किसी भी हद तक जाना पड़े, वे और उनकी समाजवादी पार्टी पीछे नहीं हटेगी। लगभग छह साल बाद की तस्वीर यह बताने के लिए काफी है कि अखिलेश यादव ने अपना वायदा पूरा नहीं किया। डॉ. सचान का परिवार पूरे पांच वर्ष तक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से न्याय की आस लगाए बैठा रहा। शायद डॉ. सचान की आत्मा भी मुख्यमंत्री  से यही पूछ रही होगी कि, कहां हैं हत्यारे!!

भ्रष्ट अधिकारियों और अपराधियों से पटी यूपी में लगभग छह वर्ष पूर्व एक चर्चित हत्याकांड (डॉक्टर योगेन्द्र सिंह सचान) को अंजाम दिया गया। इस हत्याकांड को जिस सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, वह तो काबिले गौर है ही साथ ही जिस तरह से यूपी की सरकारों ने तमाम सुबूतों और जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए चंद दिनों में ही पूरे मामले को दफन कर दिया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं। यहां तक कि निष्पक्ष जांच एजेंसी का दावा करने वाली सीबीआई की भूमिका कथित हत्यारों और कथित भ्रष्टों के तलवे चाटते नजर आयी। इस हत्याकांड को जिस तरह से अंजाम दिया गया और जिस तरह से दफन कर दिया गया, उससे इतना जरूर साबित हो जाता है कि यूपी के अपराधियों में यदि दम है तो बड़े से बड़ा मामला चंद दिनों में ही दफन किया जा सकता है।

गौरतलब है कि परिवार कल्याण विभाग के तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी बी.पी.सिंह की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजे गए तत्कालीन उप मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान की जिला जेल अस्पताल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी थी। इस हत्याकांड में आरोपियों की फेहरिस्त तैयार होती उससे पहले ही हत्याकांड का पटाक्षेप कर दिया गया। इस हत्याकांड से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू ऐसे थे जिन्हें कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था, फिर भी जिंदा मक्खी निगली गयी। आखिर वह कौन सी वजह थी, जिसने न्यायिक जांच रिपोर्ट तक को मानने से इनकार कर दिया? यदि न्यायिक जांच झूठी थी तो सरकार ने न्यायिक जांच अधिकारी राजेश उपाध्याय के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की? गौरतलब है कि दंड प्रक्रिया संहिता में इस बात का प्राविधान है कि हिरासत में होने वाली मौत की जाँच अनिवार्य रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जाएगी। दूसरी ओर यदि सीबीआई की रिपोर्ट में संदेह था तो दोबारा अधिकारी बदलकर जांच क्यों नहीं करवायी गयी? शरीर पर मौजूद गहरे घाव किस धारदार हथियार से बनाए गए थे? इसकी जांच को भी नजरअंदाज कर दिया गया। साफ जाहिर है कि अरबों के घोटाले में संलिप्त बड़ी मछलियों को बचाने के फेर में छोटी मछलियों को शिकार बनाया गया।

देश के सर्वाधिक चर्चित घोटालों में से एक एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ डॉ योगेन्द्र सिंह सचान (उप मुख्य चिकित्साधिकारी) की लाश जिला कारागार (लखनऊ) के प्रथम तल पर स्थित निर्माणाधीन ऑपरेशन थिएटर के शौचालय में पायी जाती है। डॉ. सचान का शव कमोड सीट पर सिस्टन की ओर मुंह किए हुए था। सिर कमोड के सिस्टन पर टिका हुआ था। शरीर पर गहरे घाव थे, जिस वजह से उनका पूरा शरीर खून से लथपथ था। गले में बेल्ट का फंदा लगा हुआ था। दोनों पैर जमीन पर टिके हुए थे। मौका-ए-वारदात की पूरी तस्वीर यह साबित करने के लिए काफी थी कि डॉ. सचान ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उनकी हत्या की गयी थी। जेल कर्मी भी दबी जुबान से हत्या के बाबत कानाफूसी करते रहे। पूरे जेल का माहौल ऐसा था, जैसे सभी को मालूम हो कि डॉ. सचान की हत्या किसने करवायी और किसने की?

डॉ. सचान की निर्मम हत्या किए जाने सम्बन्धी सारे सुबूत पुलिस और जांच एजेंसियों के पास थे, इसके बावजूद तत्कालीन बसपा सरकार के कार्यकाल में सरकार ने दावा किया कि डॉ. सचान ने जेल में आत्महत्या कर ली। उस वक्त भी यही सम्भावनाएं व्यक्त की जा रही थीं कि एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ पुख्ता दस्तावेज डॉ. सचान के पास थे। यदि वे जीवित रहते और उन्हें जेल होती तो निश्चित तौर पर कई बडे़ नेताओं को जेल हो जाती। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर भी शिकंजा कसा जा सकता था। दूसरी ओर डॉ. सचान के परिजन सरकार के दावों से संतुष्ट नहीं थे, परिणामस्वरूप न्यायिक जांच शुरु की गयी। जांच का दायित्व (न्यायिक जांच अधिकारी, मुख्य न्यायिक मजिस्टेªट, लखनऊ) राजेश उपाध्याय को सौंपा गया। महज एक पखवारे में ही तमाम दस्तावेजों के साथ जांच रिपोर्ट शासन के पास भेज दी गयी। निष्पक्ष तरीके से अंजाम दी गयी जांच रिपोर्ट ने तत्कालीन सरकार के दावों की कलई खोल दी। जांच रिपोर्ट (11 जुलाई 2011) में डॉ. सचान की मौत को आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या करार दिया गया। जांच रिपोर्ट पटल पर आते ही सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया। लगने लगा था कि डॉ. सचान की मौत का रहस्य तो उजागर होगा ही साथ ही एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ तमाम मगरमच्छ कानून के जाल में आ जायेंगे। तथाकथित दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई होती इससे पहले ही सूबे में चुनाव का बिगुल बज गया। चुनाव नतीजों ने सूबे की सत्ता बदल दी। एनआरएचएम घोटाले की पृष्ठभूमि तैयार करने और डॉ. सचान हत्याकाण्ड पर लीपा-पोती करने वाली बसपा सरकार का पतन हो गया। बसपा की धुर-विरोधी  अखिलेश यादव की सरकार ने सूबे में कदम रखा तो विभागीय कर्मचारियों से लेकर सूबे के चिकित्सकों में घोटाले पर से पर्दा उठने की उम्मीद जागृत हुई। परिजनों की फरियाद पर मामले को सीबीआई के सुपुर्द किया गया।

डॉ. सचान हत्याकाण्ड से जुडे़ कथित हत्यारों और हत्या की साजिश में शामिल शातिरों के हाई-प्रोफाइल सम्पर्कों का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि तमाम सुबूतों और न्यायिक जांच को दर-किनार करते हुए सीबीआई ने निर्मम हत्याकांड केा आत्महत्या बताकर पूरे प्रकरण को ही दफन कर दिया। डॉ. सचान का परिवार चिल्लाता रहा कि डॉ. सचान दिमागी रूप से काफी मजबूत थे, वे आत्महत्या नहीं कर सकते, लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी। अन्ततः हैरतअंगेज तरीके से डॉ. सचान हत्याकांड से जुड़ी फाइल बंद कर दी गयी।

न्यायिक जांच के दौरान कई पहलू ऐसे नजर आए जो यह साबित करने के लिए काफी थे कि डॉ. सचान ने आत्महत्या नहीं बल्कि उनकी हत्या की गयी थी। इस चर्चित हत्याकांड में तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा का नाम विपक्ष ने जमकर उछाला। सड़क से लेकर संसद तक कथित आरोपी मंत्रियों के नाम उछाले गए। तत्कालीन बसपा सरकार और तत्पश्चात अखिलेश सरकार की बेशर्मी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि उसने तमाम दस्तावेजों को नजरअंदाज करते हुए इस केस में रुचि दिखानी ही बंद कर दी। ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे दोनों ही सरकारों ने कथित हत्यारों और लुटेरों को बचाने की ठान रखी हो।

उस वक्त विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया था कि डॉ. सचान की मौत सरकार में गहरे तक जड़ें जमा चुके भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की साजिश का एक हिस्सा है। विपक्ष के आरोप पर सरकार की तरफ से तत्कालीन कैबिनेट सचिव शंशाक शेखर (अब स्वर्गीय) ने बचाव करते हुए कहा था कि विरोधी दल प्रदेश की जनता को गुमराह कर रहे हैं। सरकार पूरे मामले की गहनता से जांच करवा रही है। सही तथ्य जल्द ही आम जनता के समक्ष होंगे।

11 जुलाई 2011 को सौंपी गयी न्यायिक जांच रिपोर्ट और डॉ.सचान की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ लिखा था कि उनकी मौत गले में बेल्ट बंधने की वजह से नहीं बल्कि ज्यादा खून बहने से हुई थी। इतना ही नहीं लखनऊ जेल में वारदात के वक्त जेल में निरुद्ध एक कैदी के बयान ने सरकार की नीयत पर उंगली उठायी। कैदी का कहना था कि (सचान की हत्या के दिन) लखनऊ जेल में घटना वाले दिन जो हुआ, वह शायद इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा। अमूमन जेल में शाम का खाना साढ़े छह बजे मिलता है घटना वाले दिन चार बजे ही खाना बांट दिया गया था। खाना समाप्त होते ही सारे कैदियों को वापस बैरकों में भेज दिया गया था। एक खबरिया चैनल में एक कैदी के बयान (जेल से रिहा होने के बाद) को आधार मानें तो, सबसे कहा गया था वे एक-दूसरे से बात नही करेंगे। इसके तुरन्त बाद ही पूरी जेल में शोर-शराबा शुरू हो गया। जोर-जोर से आवाजें आने लगी थीं कि मार दिया गया, मार दिया गया। हैरत की बात है कि सरकार की साजिश को उजागर करती इस रिपोर्ट की न तो सच्चाई जानने की कोशिश हुई और न ही उस कैदी से बयान लिए गए जिसने खबरिया चैनल में घटना का जिक्र किया था।

प्रारम्भिक जांच में डॉ. सचान के शरीर पर आठ स्थानों पर गंभीर चोट के निशान पाए गए थे। हाथ की नसें कटी हुई पायी गयी थीं। जांघ, गर्दन, छाती, कंधे और पेट पर जख्म के निशान पाए गए थे। डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह और प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे के बयान को भी संजीदगी से लेने के बजाए उनके बयान को झूठा करार दिया गया। इस सम्बन्ध में न्यायिक जांच रिपोर्ट कुछ और ही कहती है। न्यायिक जांच रिपोर्ट में जिला कारागार, लखनऊ के वरिष्ठ अधीक्षक से पूछताछ के आधार पर कहा गया है कि जिस डॉ. सचान की हत्या हुई थी, उस दिन तत्कालीन मजिस्टेªट जेल के अन्दर ही नहीं आए थे। जेल के अन्दर उनके पी.ए. आए थे। इस बात की पुष्टि जेल के फार्मासिस्ट संजय कुमार सिंह ने भी की थी। इन परिस्थितियों में डिप्टी जेलर और प्रधान बंदी रक्षक के झूठ बोलने का प्रश्न ही नहीं उठता। न्यायिक जांच के दौरान आत्महत्या से सम्बन्धित कोई नोट नहीं पाया गया। सामान्यतः यह देखने में आया है कि, शिक्षित व्यक्ति जब कभी आत्महत्या करता है तो कोई न कोई सुसाइड नोट अवश्य लिखता है लेकिन डॉ. सचान के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। फोरेंसिंक मेडिसिन एवं टॉक्सीकोलॉजी विभाग (छत्रपति शाहूजी महाराज, चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ में लेक्चरर) के डॉ. मौसमी ने भी अपने बयान में कहा था कि मृतक के शरीर में जितनी गहरी चोटें 8 स्थानों पर आयी हैं, इतनी गहरी चोटें आत्महत्या करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं लगा सकता। मृतक स्वयं एक डॉक्टर था, एक डॉक्टर से आत्महत्या से पूर्व इतनी सारी गहरी चोटें लगाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। हैरत की बात है कि फोरेंसिक मेडिसन के चिकित्सक की रिपोर्ट को भी नजरअंदाज कर दिया गया। डॉ. मौसमी तो यहां तक कहते हैं कि दोनों हाथों की ब्लीडिंग प्वाइंट पर एक ही तरह की चोटें आयी हैं। इस तरह की चोटें अर्धविक्षिप्त व्यक्ति से भी करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

इस सम्बन्ध में पोस्टमार्टम करने वाली टीम में शामिल डॉ. दुबे के बयान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डॉ. दुबे ने बयान दिया था कि मैंने इससे पहले लगभग 100 से ज्यादा पोस्टमार्टम किए होंगे लेकिन आज तक कोई भी केस ऐसा नहीं मिला जिसमें किसी आत्महत्या करने वाले ने अपने शरीर की इतनी सारी नसें काटी हों। डॉ. सचान की गर्दन पर लिंगेचर मार्क हत्या की पुष्टि के लिए काफी है। गर्दन पर ‘लिंगेचर मार्क’ मौत के बाद की चोट है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि लिंगेचर मार्क मृत्यु के बाद का है, लिहाजा यह साबित हो जाता है कि डॉ. सचान की हत्या करने के बाद उसे आत्महत्या दिखाने की गरज से किसी अन्य व्यक्ति ने ही उनके गले में फंदा लगाया होगा।

इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस पूरे हत्याकांड को अंजाम देने में जेल प्रशासन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पोस्टमार्टम के अनुसार डॉ. सचान की मौत 22 जून 2011 को सुबह 10 बजे के आस-पास हुई थी। जिला कारागार में नियमतः सुबह 6 बजे पहली गिनती होती है। उसके बाद रात 8 बजे तक चार बार बंदी रक्षकों की ड्यूटी बदलती है और हर बार कैदियों की गिनती की जाती है। घटना वाले दिन जेल प्रशासन यह तो कहता है कि गिनती के वक्त एक बंदी हर बार कम नजर आया लेकिन वह कौन था, इसके बारे में जानने की किसी ने कोशिश नहीं की, या फिर जान-बूझकर डॉ. सचान की अनुपस्थिति को नजरअंदाज किया जाता रहा। जांच के दौरान यह बात सामने आयी कि घटना वाले दिन सुबह साढे़ सात बजे एक सिपाही डॉ. सचान को रिमाण्ड के नाम पर अपने साथ ले गया था। आमतौर पर सिपाही जेल अस्पताल के भीतर आकर कैदियों को रिमाण्ड पर ले जाने के लिए पुकार लगाता है लेकिन डॉ. सचान को रिमाण्ड पर ले जाने के लिए जिस सिपाही ने पुकार लगायी थी, वह सिपाही अस्पताल गेट के बाहर ऐसे खड़ा था, जिसका चेहरा जेल अस्पताल में भर्ती किसी कैदी ने नहीं देखा।

गौरतलब है कि रिमाण्ड पर ले जाने से पूर्व बाकायदा लिखा-पढ़ी होती है। इस सम्बन्ध में जब न्यायिक जांच अधिकारी ने पर्ची के सम्बन्ध में पूछा तो कहा गया कि पर्ची प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे के पास है। इस सम्बन्ध में प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे (इनकी जिम्मेदारी कैदियों की प्रत्येक गणना के समक्ष अपनी उपस्थिति में ही करायी जाती है) ने न्यायिक जांच अधिकारी को जो बयान दिया वह बेहद चौंकाने वाला था। बकौल बाबू राम दुबे, ‘किसी ने अफवाह फैला दी है कि डॉ. सचान को अदालत रिमाण्ड पर भेजा गया है। जब मैं शाम 5 बजे आया, उस वक्त अफवाह फैल गयी थी कि डॉ. सचान अदालत गए हैं। बाबू राम दुबे के अनुसार घटना वाले दिन दोपहर करीब 11 बजे कैदियों की गिनती की गयी थी, उस वक्त सभी बंदी मौजूद थे। 11.30 बजे तक डॉ. सचान को तो उसने स्वयं जेल के अन्दर ही देखा था।

न्यायिक जांच अधिकारी का दावा है कि बाबू राम दुबे का यह बयान पूरी तरह झूठ पर आधारित था। बाबू राम दुबे ने बयान दिया था कि डॉ. सचान उसने जेल परिसर में ही देखा था जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. सचान की मौत 10 बजे ही हो गयी थी। रही बात ड्यूटी की तो घटना वाले दिन सुबह 8 बजे से 12 बजे तक की ड्यूटी पर बंदी रक्षक पहीन्द्र सिंह तैनात था। साफ जाहिर है कि प्रधान बंदी रक्षक का बयान पूरी तरह से झूठ पर आधारित था।

डॉ. सचान को डायरी लिखने की आदत शुरू से ही थी। लखनऊ जेल में भी वे डायरी लिखते थे। मौत के बाद जब उनकी वस्तुओं को खंगाला गया तो उनकी डायरी मिली। डायरी का पहला पेज फटा हुआ था। इसी आधार पर पुलिस ने सचान का सुसाइड नोट मिलने का दावा किया था सुसाइड नोट डॉ. सचान के शव के पास से बरामद नहीं हुआ। पुलिस ने सुसाइड नोट के सन्दर्भ में बताया था कि इस नोट में सिर्फ इतना लिखा है कि मैं निर्दोष हूं और मेरी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार न माना जाए। सुसाइड नोट पर सचान के दस्तखत न होने के कारण इसकी पुष्टि नहीं की जा सकी।

दूसरी ओर पत्नी का दावा है कि उनके पति की हत्या की गयी थी। गौरतलब है कि डॉ. सचान की पत्नी स्वयं एक चिकित्सक हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखने के बाद उन्होंने दावे के साथ कहा था कि रिपोर्ट में अंकित चोटों और रिपोर्ट के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचती हूं कि यह हत्या का मामला है। मेरे और मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को घटनास्थल नहंी दिखाया गया, जिससे हम लोग उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष निकाल सकते। डॉ. सचान की पत्नी ने न्यायिक जांच अधिकारी के समक्ष बयान दिया था कि उन्हें पूरा विश्वास है कि उनके पति ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उनकी साजिशन हत्या की गयी है। घटना के अगले दिन उन्हें कोर्ट आना था, शायद कुछ लोगांे को आशंका हो गयी होगी कि कहीं उनका नाम न उजागर हो जाए, लिहाजा उनकी कोर्ट में पेशी से एक दिन पहले ही जेल में हत्या कर दी गयी। डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान के बडे़ भाई डॉ. आर.के. सचान डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में प्रमुख अधीक्षक के पद पर रह चुके हैं। न्यायिक जांच अधिकारी को दिए गए बयान में उन्होंने दावे के साथ कहा है कि मेरे भाई डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान की हत्या की गयी है, उसने आत्महत्या नहीं की। मैं किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं ले सकता, परन्तु विभाग में बैठे उच्च लोगों का हाथ हो सकता है। इन लोगों में उच्च अधिकारी से लेकर सम्बन्धित विभाग के मंत्री भी हो सकते हैं। डॉ. योगेन्द्र की किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, उनकी हत्या का कारण विभाग का पैसा हो सकता है। डॉ. योगेन्द्र के बड़े भाई का यह बयान तत्कालीन सरकार के जिम्मेदार लोगों की तरफ इशारा करता रहा लेकिन बसपा की धुर-विरोधी सपा सरकार ने भी पूरे पांच वर्ष तक मामले के वास्तविक दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटायी।

हत्या को आत्महत्या का अमली जामा पहनाने में गोसाईंगज (लखनऊ) पुलिस ने भी पूरी कोशिश की। कारागार में रात्रि आठ बजे डॉ. सचान की लाश मिलती है। तत्काल घटना की सूचना शीर्ष अधिकारियों को दे दी जाती है। वायरलेस पर मैसेज भेजने में डेढ़ घंटे का समय लगाया जाता है। वायरलेस पर सूचना मिलते ही गोसाईंगज पुलिस रात्रि लगभग दस बजे जेल परिसर में पहुंचती है। चूंकि रात काफी हो गयी थी और जेल के टॉयलेट में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं थी लिहाजा टार्च की रोशनी और ड्रैगेन लाइट से लाश का मुआयना किया जाता है। रोशनी पर्याप्त न होने का हवाला देते हुए फ्रिंगर प्रिंट भी नहीं लिया जाता। फोटोग्राफी जरूर की जाती है। गोसाईगंज पुलिस घटना वाले स्थान को सील कर अगले दिन आने की बात करती है, इसी बीच डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह के कहने पर पुलिस टॉयलेट में दोबारा सर्च करती है। हैरत की बात है तो चन्द मिनट पहले तक पर्याप्त रोशनी न होने का बहाना कर पुलिस अगले दिन आने की बात करती है, वहीं डिप्टी जेलर के कहने पर सर्च के दौरान उसे डेªनेज के अन्दर से शेविंग करने वाला आधा ब्लेड उसे मिल जाता है। उस ब्लेड के एक तरफ खून लगा था जबकि दूसरी तरफ खून नहीं था। इसके अलावा मौके से कोई अन्य वस्तु नहीं मिली जो यह साबित कर सके कि उसी हथियार से डॉ. सचान ने आत्महत्या की होगी। गौरतलब है कि छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ की ओर से फोरेेंसिक विशेषज्ञों ने शपथ पत्र में लिखा है, ‘‘डॉ. सचान के शरीर पर 8 चोटें किसी शार्प वेपैन से आयी हैं और एक लिंगेचर मार्क हैं। लिंगेचर मार्क को मरने के बाद की चोट बतायी गयी। यह भी दावा किया गया कि जिस धारदार हथियार से डॉ. सचान को चोटें आयी हैं, वह धारदार हथियार भारी होगा, क्योंकि घाव पर इकीमॉसिस मौजूद थे। इसका मतलब है कि चोट किसी भारी धारदार हथियार से पहुंचायी गयी थीं, दाढ़ी बनाने वाले ब्लेड से चोटें नहीं पहुंचायी जा सकती थीं’’। फोरेंसिक विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बाद पुलिस को मिले ब्लेड (दाढ़ी बनाने वाला) का कोई महत्व नहीं रह जाता। तहसीलदार (मोहनलालगंज) जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने भी अपने शपथ पत्र में कहा है कि उनकी उपस्थिति में घटना स्थल से कोई भी धारदार हथियार नहीं मिला।

इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद जेलर बी.एस.मुकुन्द, डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह, प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे और बंदी रक्षक पहीन्द्र सिंह की भूमिका संदिग्ध बतायी गयी थी। हैरत की बात है कि न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद भी नामजद कथित दोषियों को पर्याप्त सजा नहीं दी गयी। कहा तो यहां तक जा रहा है कि यदि किसी एक को सजा मिलती तो निश्चित तौर पर पूरा मामला स्वेटर के धागे की तरह खुलता चला जाता। यहां तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा समेत कई मंत्री-विधायक सलाखों के पीछे नजर आते। यहां तक कि कई सफेदपोश नौकरशाह भी गिरफ्त में होते।

यूपी की राजधानी लखनऊ की अति सुरक्षित मानी जाने वाली जिला जेल में एक हाई-प्रोफाइल हत्याकांड को अंजाम दिया जाता है। हत्यारे हत्या करने के बाद पटल से गायब हो जाते हैं। चूंकि मामला हाई-प्रोफाइल एनआरएचएम के घोटालेबाजों से जुड़ा हुआ था लिहाजा तत्कालीन बसपा सरकार ने चन्द दिनों में ही हाई-प्रोफाइल हत्याकांड को आत्महत्या में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिना जांच किए सरकार की तरफ से आधिकारिक जानकारी भी दे दी गयी कि डिप्टी सीएमओ ने आत्महत्या कर ली। चिकित्सक का परिवार आत्महत्या की बात मानने को कतई तैयार नहीं था। चूंकि अभिरक्षा में कैदी की मौत होने पर न्यायिक जांच की प्रक्रिया है, लिहाजा जांच हुई। रिपोर्ट शासन के पास आयी तो सभी का चौंकना स्वाभाविक था। न्यायिक जांच में डिप्टी सीएमओ की मौत को तमाम सुबूतों के साथ हत्या करार दिया गया। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई से करवायी गयी। कथित हत्यारों की पहुंच का अंदाजा यहीं से लगाया जा सकता कि तमाम सुबूतों और न्यायिक जांच रिपोर्ट के बावजूद सीबीआई ने डिप्टी सीएमओ की मौत को आत्महत्या में तब्दील कर दिया। स्थिति यह है कि जिन्हें जेल में होना चाहिए था, वे आराम फरमा रहे हैं, जिनके नाम शक के आधार पर दर्ज किए गए थे वे आज भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं।

आगे है…

अदालत ने भी माना हत्या

क्या कहती है सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट?

क्या है एनआरएचएम घोटाला…?

हत्याकांड पर अखिलेश सरकार की रहस्यमयी चुप्पी

डॉ. योगेन्द्र सचान के बेटे का दावा

बलि का बकरा बने डॉ. शुक्ला-सचान!

पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें….

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पांडे जी पांडे जी… गो माता को कटवाता जी…

Yashwant Singh : पुलिस अफसर अगर इमानदार बन जाएं, सत्ताधारियों की परवाह करना बंद कर दें और अपना दायित्व निभाते हुए काले कारनामे वालों का स्टिंग करना शुरू कर दें तो बस हफ्ते भर में सारी बुराइयां दूर हो जाएंगी… एक आईपीएस अफसर ने एक स्टिंग किया.. नतीजा हुआ, तबादला.. पुरानी लेकिन रोचक कहानी है… पता नहीं राणा साहब इन दिनों कहां पोस्टेड हैं…

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पांडे जी पांडे जी… गो माता को कटवाता जी… एक पांडे जी हैं. यूपी में. राज्यमंत्री स्तर के आदमी हैं. पांडे जी अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. पांडे जी गोकशी कराने का काम भी कराते हैं. पांडे जी का एक कार्यकर्ता है. वो भी पांडे जी है. वह गोरक्षा समिति मुजफ्फरनगर का प्रमुख रह चुका है. वह उत्तर प्रदेश ब्राहमण युवजन सभा का सदर है. वह भी पशु तस्करी कराता है. देखिए, एक स्टिंग आपरेशन, जिसे यूपी कैडर के एक आईपीएस अधिकारी ने कराया और पांडेयजी लोगों के पशु तस्करी में लिप्त होने के खेल का खुलासा किया. हालांकि वह आईपीएस अफसर अब शंट किया जा चुका है लेकिन पांडेयजी लोगों का खेल निर्बाध रूप से जारी है…. संपूर्ण खबर और संपूर्ण स्टिंग देखने के लिए यहां क्लिक करें…

इस स्टिंग के कारण आईपीएस नवनीत कुमार राणा पर गिरी गाज! (देखें वीडियो)
http://old1.bhadas4media.com/…/8985-2013-02-25-08-34-03.html

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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आगरा में कवरेज कर रहे पत्रकार फरहान खान के साथ पुलिस ने की हाथापाई (देखें वीडियो)

आगरा की पुलिस ने पत्रकारों को भी नही बख्शा. थाना एत्माउद्दोला ट्रांस यमुना के चौकी इंचार्ज ने की टीवी चैनल के पत्रकार से की हाथापाई. वर्दी के रोब में धमकाते हुये कहा कि तुझे लौटकर देखता हूं. पूरा नजारा हुआ कैमरे में कैद. आगरा के पत्रकार फरहान खान थाना एत्मादौला पर कवरेज करने के लिए गये थे. तभी अचानक वहां चौकी इंचार्ज मनोज भाटी आ गए और कवरेज कर रहे पत्रकार से हाथापाई शुरू कर दी. भद्दी भद्दी गालियां दी.

पत्रकार को आगे देख लेने की धमकी दे डाली. इस दौरान वहां काफी संख्या में भीड़ जमा हो गई. दरअसल तीन दिन से लगातार थाना एत्माउद्दौला पुलिस की कार्यशैली की खबर दिखाने को लेकर नाराज थे चौकी इंचार्ज. संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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अखिलेश यादव संग साइकिल चलाते राहुल कंवल का चमचई भरा इंटरव्यू पेड न्यूज़ ही तो है!

अखिलेश यादव के साथ साईकिल चलाते हुए ‘आज तक’ के राहुल कंवल का आधा घंटे का चमचई भरा इंटरव्यू करना क्या पेड न्यूज़ में नहीं आता? साईकिल पर ही बैठे हुए डिंपल यादव का इंटरव्यू करना भी। गोमती रिवर फ्रंट का भी प्रचार। [वैसे गोमती रिवर फ्रंट बहुत सुंदर बना दिख रहा है।]

याद कीजिए बीते विधान सभा चुनाव में चुनाव आयोग के निर्देश पर मायावती की बसपा के चुनाव निशान हाथी को सभी पार्कों में ढंक दिया गया था, लखनऊ से लगायत नोयडा तक। अलग बात है मायावती की बसपा बहुमत से बहुत दूर रह गई। इस बार भी पेट्रोल पंप पर से मोदी की फ़ोटो चुनाव आयोग ने हटवा दीं। ज़िक्र ज़रुरी है कि साईकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान है और कि आज तक की दिल्ली से आई टीम हफ़्ते भर से लखनऊ में डेरा डाले हुई है।

आज तक के मालिक अरुण पुरी और चैनल के पत्रकार राहुल कंवल, अंजना ओम कश्यप, जावेद अंसारी आदि समूची कैमरा टीम सहित सभी उपस्थित हैं। दिलचस्प यह कि अखिलेश यादव का इंटरव्यू खत्म होते ही उन के पिता मुलायम सिंह यादव का गुडी-गुडी वाला इंटरव्यू भी आधा घंटा का शुरू हो गया है जब कि मुलायम परिवार की एकता दौड़ का विश्लेषण अगला कार्यक्रम है। ऐसे ऐलान की एक पट्टी चल रही है। एक पुराना फ़िल्मी गाना है, क्या प्यार इसी को कहते हैं? की तर्ज़ पर पूछा जा सकता है क्या पेड न्यूज़ इसी को कहते हैं?

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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यूपी में जंगलराज : पेड़ लगाने पर एसडीएम ने भेज दिया नोटिस!

माननीय महोदय

मैं सिंहासन चौहान इस शिकायत पत्र के द्वारा आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूँ कि जहां पूरी दुनिया बदलते पर्यावरण को बचाने में लगी हुई है और इसके लिए पूरी दुनिया में ज्यादा से ज्यादा पेड़ पौधे लगाने के ऊपर जोर दिया जा रहा है वहीं हमारे बेल्थरा रोड (जिला-बलिया, उत्तर प्रदेश) के SDM ने हमें पेड़ लगाने को लेकर हमारे पिताजी के नाम से 58000 रूपये का जुर्माना लगाया है. वह भी तब जबकि हमने अपनी जमीन पर पेड़ पौधे लगाए हैं. सारा मामला यह है कि SDM बेल्थरा रोड बदले की भावना में मुझे परेशान करने के लिए मेरे पिता जी के नाम से नोटिस भेजा था.

नोटिस दो जनवरी का है और हमारे घर एक आदमी 24 जनवरी को वह नोटिस लेकर आया. 11 जनवरी को हमारे भाई का निधन हो जाने की वजह और जरुरी काम से हमारे पिताजी घर पर नहीं थे. इसलिए हमने वह नोटिस रिसीव नहीं किया क्योंकि नोटिस पिताजी के नाम से था और वो घर पर नहीं थे. इससे पहले ना तो हमारे चक की पैमाईश हुई है और ना ही इस बारे में कोई सूचना दी गयी है. जो भी चकरोड बना है उसको छोड़कर हमने अपने चक में ही पेड़ लगाये हैं. ये सब SDM बदले की भावना से प्रेरित होकर मुझे परेशान करने के लिए कर रहे हैं मगर मेरे नाम से कोई जमीन जायदाद नहीं है इसलिए उन्होंने मेरे पिता जी के नाम से नोटिस भेजा है.

दरअसल पूरी कहानी ये है कि गाँव में एक चकरोड के ऊपर दो व्यक्तियों ने अवैध अतिक्रमण किया हुआ है उसके लिए मैंने उत्तर प्रदेश सरकार की जन सुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई. मगर लेखापाल और कानूनगो ने पैसे खाकर गलत रिपोर्ट लगाई कि अतिक्रमण हटा दिया गया है. मैंने दुबारा शिकायत की तो फिर गलत रिपोर्ट लगाई गयी. मैंने तीसरी बार शिकायत की तो उसके ऊपर ये रिपोर्ट लगाई की शिकायतकर्ता को बार बार शिकायत करने की आदत है. इस प्रकार मुझे मनोरोगी होने का एहसास दिलाते हैं. इस संबंध में मैंने माननीय जिलाधिकारी महोदय से इस तीन अधिकारीयों के खिलाफ माननीय न्यायालय में मुक़दमा दर्ज कराने की अनुमति मांगी मगर मेरा पत्र SDM बेल्थरा रोड को भेज दिया गया.

फिर मैं मंडलाधिकारी और माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश से मुक़दमा चलाने की अनुमति मांगी. इससे बदले की भावना से प्रेरित होकर SDM /तहसीलदार बेल्थरारोड़ ने ये नोटिस भेजा है. हमारा एक कमरा TUBE WELL के लिए और एक कमरा पशुओं के भूसा रखने के लिए बना हुआ है. वो हमने अपने चक के अन्दर बनाया है. किसी सरकारी जमीन पर नहीं बनाया है. पेड़ अनुकूल पर्यावरण के लिए चकरोड के किनारे लगाये गए हैं, ना तो कहीं से रास्ता अवरुद्ध है ना किसी को कोई परेशानी है. मेरे पास सारी तस्वीरें, नोटिस और शिकायत की कॉपी मौजूद है. अतः आप से निवेदन है कृपया उचित कार्यवाही कराएं. नहीं चाहिए ऐसी सरकार, नहीं चाहिए ऐसे अधिकारी.

धन्यवाद
भवदीय
सिंहासन चौहान
बलिया
Mob: 9839932064

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यूपी में इस बहादुर महिला पत्रकार के साथ पुलिस वालों ने की मारपीट, एक लाइन हाजिर

आरोपी चौकी प्रभारी समेत एक अन्य सिपाही पर अभी भी नहीं हुई कार्यवाही

शाहजहांपुर से खबर है कि कोतवाली की अजीजगंज पुलिस चौकी के तहत आने वाली कांशीराम कॉलोनी की निवासी रुखसार से पुलिस वालों ने गालीगलौज की. रुखसार पेशे से पत्रकार हैं. वे अपने एरिया में होने वाली हर खबर को प्रमुखता से छापती हैं. इसी बात से चौकी अजीजगंज के पुलिस कर्मी उनसे खफा रहते थे. इसी क्रम में 08 फ़रवरी को रात करीब 9 बजे के आसपास उनके घर चौकी का सिपाही शराब के नशे में घुस गया और गालियां देने लगा.

महिला पत्रकार रुखसाना ने जब इस बात का विरोध किया तो उक्त सिपाही ने रुखसार के साथ मारपीट की. इससे महिला पत्रकार के शरीर से लेकर हाथ में चोटें आयीं. उसने इस बात की लिखित शिकायत एसपी केबी सिंह से की. एसपी ने जांच सीओ सिटी को सौंप दी. जाँच के बाद आरोपी सिपाही विनोद यादव को लाइन हाजिर कर दिया गया. लेकिन मामले को काफी दिनों तक दबाये रखने वाले चौकी प्रभारी समेत एक सिपाही पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है.

योगेन्द्र सिंह
बरेली

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किसी को वोट दे लेना, पर सपा को नहीं… वजह बता रहे भड़ास एडिटर यशवंत

Yashwant Singh : हे मीडिया के साथियों, यूपी चुनाव में सपा को जरूर हराना. वोट चाहे बसपा को देना या भाजपा को या रालोद को या किसी को न देना, लेकिन सपा को कतई मत देना. वजह? सिर्फ पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके मंत्री राममूर्ति वर्मा के कहने पर कोतवाल और सिपाहियों ने पत्रकार जगेंद्र को शाहजहांपुर में जिंदा जला दिया था. जगेंद्र ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में मंत्री राममूर्ति वर्मा का नाम लिया था. जगेंद्र ने राममूर्ति के खिलाफ कई खबरें लिखी थीं. मंत्री राममूर्ति तरह तरह से जगेंद्र को धमकाता रहता था. जगेंद्र लिख चुके थे कि मंत्री राममूर्ति उसे मार डालना चाहता है क्योंकि वह उसकी पोल खोलता रहता है.

जिसकी आशंका थी, वही हुआ. मंत्री राममूर्ति के इशारे पर सारा पुलिस प्रशासन जगेंद्र को मारने के लिए जुट गया. बाकायदा घर में घुसकर पत्रकार जगेंद्र पर पेट्रोल डालकर जलाया गया. लखनऊ में भर्ती जगेंद्र ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर से लेकर जांच मजिस्ट्रेट तक को हत्यारों के नाम बताए लेकिन अखिलेश यादव ने आजतक हत्यारे मंत्री राममूर्ति वर्मा को बर्खास्त नहीं किया. अखिलेश यादव के युवा होने, इनके स्मार्टफोन देने के वादे, इनके विकास के प्रलाप पर मत जाना. यह अपने खानदान का सबसे काइयां नेता है. परम भ्रष्ट गायत्री प्रजापति से लेकर हत्यारे राममूर्ति वर्मा को पालने वाला यह युवा नेता अगर इस बार खुद के बल पर जीत गया तो समझो इसके राज में वो-वो नंगा नाच होगा जिसकी कल्पना नहीं कर सकते.

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता द्वारा बेलगाम नेताओं को शाक थिरेपी दिया जाना है. इन्हें पांच साल के लिए सत्ता से बाहर करो ताकि ये आत्मचिंतन और मनन करें. अखिलेश यादव ने पांच साल राज कर लिया. इन्हें पांच साल का ब्रेक दिया जाना चाहिए ताकि थोड़ी ज्यादा समझदारी हासिल कर सकें. अभी जो इन्होंने अपने खानदान से फिक्स मैच खेला है, उससे लॉ एंड आर्डर समेत तमाम सवाल परिदृश्य से बाहर हो गए और अखिलेश की छवि एक नए बहादुर युवा नेता की बना दी गई जो माफियाओं और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ है. लेकिन सच्चाई बिलकुल इसके उलट है. यह सारा कुछ मीडिया, मुलायम और अखिलेश द्वारा फिक्स था. अब तो आपको यकीन आ गया होगा जब मुलायम ने साफ साफ कह दिया कि वे अखिलेश और राहुल के लिए प्रचार करेंगे, शिवपाल नई पार्टी नहीं बनाएंगे, वे कभी किसी पर कोई गुस्सा न थे. सपा में आज भी हत्यारे, भ्रष्टाचारी और माफिया नेता-मंत्री अपने पूरे दमखम के साथ मौजूद हैं और साइकिल चिन्ह पर ही चुनाव लड़ रहे हैं. 

तो, हे यूपी के मतदाताओं, खासकर मीडिया के साथियों, मुझ भड़ासी की दिली अपील पर कान धरो, अपने वोट को किसी को भी दे डालो, बस सपा को मत देना. साथ ही सपा को वोट न देने के लिए आप लोग अपने दोस्तों, मित्रों और परिजनों को कनवींस करें. सिर्फ जगेंद्र हत्याकांड की कहानी बताओ. एक पत्रकार को घर में घुसकर जला मारने वाला मंत्री अगर अखिलेश यादव द्वारा बर्खास्त नहीं किया जा सकता तो सोचिए इनके राज में हमारा आपका और आम लोगों का क्या हाल होगा.

बाकी, दिल्ली और लखनऊ के कई बड़े दलाल पत्रकारों के लिखने बोलने पर मत जाना. ये लोग लगातार सपा और अखिलेश का चरण चुंबन करते हुए इनके पक्ष में गायन करते हुए मिल जाएंगे. ये लोग अपने-अपने चैनलों और अखबारों में अखिलेश यादव की छवि बनाते, इन्हें जीतता हुआ दिखाते मिल जाएंगे. इन पर ध्यान मत देना. इन लोगों ने बीते पांच साल में अखिलेश के रहमोकरम से अरबों रुपये कमा चुके हैं और इन्हें नमक का कर्ज तो अदा करना ही है.

99 प्रतिशत मुख्यधारा के मीडिया घराने, जिसमें अखबार और चैनल दोनों शामिल हैं, यूपी की सत्ताधारी पार्टी के रहमोकरम के तले दबे हैं. ये लोग इतना ब्लैक पैसा और नगद विज्ञापन पा चुके हैं कि इन्हें अखिलेश यादव को जीतता हुआ दिखाना मजबूरी है. ये लोग सोची समझी साजिश के तहत सपा के मुकाबले बसपा और भाजपा को कमजोर-कमतर दिखा रहे हैं. मीडिया वालों के पेड न्यूज और पेड सर्वे पर यकीन न करना. अपना दिल दिमाग लगाना. सपा को जरूर हराना. 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करें : Yash on FB

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यूपी के इस दरोगा ने खुद खोल दी अपनी पोल (सुनें टेप)

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में एक दरोगा और डॉयल-100 सिपाही के बीच बातचीत का एक ऑडियो वायरल हुआ है। इस ऑडियो में दारोगा ने डॉयल-100 के सिपाही से अपने अवैध कामकाज में दखल न देने की हिदायत दी है। इस तरह दरोगा ने खुद ही अपने तमाम अवैध कामकाज की पोल खोलकर रख दी है। दरोगा का नाम राकेश शर्मा है जो मूरतगंज पुलिस चौकी में प्रभारी के बतौर तैनात है। दरोगा की वायरल ऑडियो ने पुलिस महकमे को शर्मशार कर दिया है।

मूरतगंज हाइवे पर तैनात डॉयल-100 के सिपाही अकबर खां से बातचीत के दौरान दरोगा ने अपने तमाम अवैध सिस्टम में दखल न देने की हिदायत दी है। ऑडियो वायरल होने के बाद कौशांबी पुलिस के अफसर उस डॉयल-100 सिपाही के खिलाफ ही कार्यवाही की कवायद कर रहे है जिसने दरोगा की शर्मनाक करतूत को टेप किया है। कौशांबी के नेशनल हाइवे पर मूरतगंज पुलिस चौकी स्थापित है। हाइवे से गुजरने वाले वाहनों से अवैध वसूली की जाती है। प्रतिबंधित मवेशी से लदे वाहन ही नहीं बल्कि अवैध मिट्टी बालू व गिट्टी से लदी ओवरलोड गाड़ियां भी पुलिसिया सिस्टम को सलाम करके ही गुजरती हैं।

वायरल ऑडियो में डॉयल-100 के सिपाही अकबर खां ने सूचना के बाद प्रतिबंधित मवेशी से लदे वाहन को रोकने की हिमाकत की तो वाहन चालक मुरारगंज चौकी प्रभारी की हनक पर अभद्रता पर उतारू हो गया। डॉयल-100 सिपाही ने जब चौकी प्रभारी से बात की तो दरोगा ने साफ शब्दों में सिस्टम में न दखल देने की हिदायत दी। दरोगा ने कहा कि जितना भी अवैध कार्य हो रहा है वो सब थाना व पुलिस चौकी के सिस्टम में है और इस बात की जानकारी मुझे व मेरे इंस्पेक्टर को भी है। सिस्टम में किसी भी प्रकार का दखल बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।

टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

धारा सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : scribe.dsyadav@gmail.com

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चुनाव आयोग की सख्ती के बाद भी भदोही में बाहुबली विजय मिश्रा का आतंक

सौ से अधिक आपराधिक मामलों का आरोपी विजय मिश्रा भदोही का एक ऐसा बाहुबली है, जो अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या कराने के लिए कुख्यात हैं। इसके इसी हरकत पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने पांच साल तक जेल के सलाखों के पीछे रखा। लेकिन, जैसे ही सपा की सरकार बनी, यादवी कुनबे के आकाओं की चरणवंदना कर न सिर्फ जेल से बाहर आया, बल्कि पांच साल के कार्यकाल में हर वह कुकर्म किया, जिससे जनता खौफ में जीने को विवश रही। अब जब चचा-भतीजे की लड़ाई में अखिलेश ने टिकट काट दिया है, तो उन्हें ही धमकी देते हुए कहा है वह भदोही ही नहीं, पूर्वांचल से सपा को नेस्तनाबूद कर देंगे। हालांकि यह उसका सिर्फ और सिर्फ गीदड़भभकी से अधिक कुछ नहीं है। इस धमकी के पीछे उसकी मंशा है किसी दूसरे दल में शामिल होकर टिकट हासिल करने की…

सुरेश गांधी

चुनाव में स्वच्छ छवि बनाने के लिए सपा के सर्वेसर्वा अखिलेश यादव ने ज्ञानपुर (भदोही) के विधायक विजय मिश्रा का टिकट काट दिया। इस बौखलाहट में उसने न सिर्फ पूर्वांचल से सपा का सूपड़ा साफ करने की धमकी दी, बल्कि भदोही के कई जनप्रतिनिधियों को धौंस के बल पर सपा से इस्तीफा भी दिलवा दिया। माना जा रहा है कि उसकी इस धमकी व करोड़ो-अरबों की काली कमाई के घनचक्कर में कोई दूसरा दल उसे अपना उम्मींदवार बना सकता है। सूत्रों पर यकीन करें तो विजय मिश्रा पिछले छह महीने से बीजेपी के संपर्क में है। प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या के साथ उसकी कई मीटिंग भी हो चुकी है। लेकिन उसके आतंक वाली छवि को लेकर बीजेपी किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती है। यही कारण है कि केशव प्रसाद मौर्या से डील होने के बाद भी पार्टी आलाकमान उन्हें सीधी इंट्री देने से कतरा रहा है।

कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी विजय मिश्रा को अपना दल के अनुप्रिया गुट के जरिए अपने साथ जोड़ेगी। मतलब साफ है बीजेपी एक तीर से दो निशाना साधना चाहती है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है कि चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा का यही असली मुखौटा है। हालांकि भाजपा से भी दुत्कारे जाने पर वह प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के प्रेम चंद बिन्द से भी मिलकर चुनाव लड़ सकता है। हो जो भी, सपा ने इस बार विजय मिश्रा का टिकट काटकर रामरति बिन्द को मैदान में उतारा है।

गौरतलब है कि मुलायम, शिवपाल व रामगोपाल से नजदीकियों के चलते पूरी पार्टी ने हमेशा विजय मिश्रा को सिर आंखों पर बैठाये रखा। मौजूदा दौर में जब सपा के अंदर सत्ता का संग्राम व काली कमाई के बंटवारे को लेकर झगड़े में जब शिवपाल का कद घटा तो उसने अपना नया ठौर खोजने में ही भलाई समझी। जब अखिलेश ने टिकट काटकर बाहर का रास्ता दिखा दिया है तो अकेले ही चुनावी समर में उतरने का फैसला लिया है। उसका दावा है कि भदोही समेत आसपास के कई जिलों में अपने उम्मीदवार उतारकर सपा से अपने अपमान का बदला लेगा। उसने एमएलसी पत्नी रामलली मिश्र, उसके टुकड़ों पर पलने वाले पूर्व विधायक शारदा प्रसाद बिंद, जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लाक प्रमुख, क्षेत्र पंचायत सदस्य आदि से इस्तीफा भी दिलवा दिया है।

पुलिस रिकार्ड के मुताबिक रुंगटा अपहरणकांड से सुर्खियों में आए विजय मिश्रा पर भदोही, इलाहाबाद समेत अन्य जनपदों में लूट, हत्या, डकैती, चोरी आदि के कुल 105 मामले दर्ज हैं। इसमें सबसे बड़ा जघन्य अपराध साल 2002 के चुनाव में ज्ञानपुर विधानसभा से बीजेपी से चुनाव लड़ रहे गोरखनाथ पांडेय के भाई रामेश्वर पांडेय की 22 फरवरी को मतदानबूथ पर हत्या किए जाने का है। हालांकि तीन-तिकड़म से इस घटना से वह बरी हो गया है। इलाहाबाद में अमवा निवासी कांस्टेबिल महेन्द्र मिश्रा व राकेशधर त्रिपाठी के भाई धरनीधर त्रिपाठी की नृशंस हत्या, पूर्वमंत्री नंदगोपाल नंदी पर आरडीएक्स विस्फोटक से प्राणघातक हमला, इलाहाबाद के प्रतापपुर में चुनाव के दौरान फायरिंग की घटना में आरोपी होने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने पुलिस लगा दी। हालांकि वेश बदलकर फरारी काटने के बाद दिल्ली पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन्हें नैनी जेल समेत कई जेलों का सफर करना पड़ा।

सपा की सरकार बनते ही मानो उसकी लाटरी लग गयी। विधानसभा चुनाव 2017 में फिर से सत्ता पाने को बेताब कुनबे के आका शिवपाल ने पूर्वांचल के ईनामी माफियाओं को एकजुट करने का जिम्मा विजय मिश्रा को सौंपा। मन इतना बढ़ा कि अखिलेश यादव की मौजूदगी में भदोही की एक सभा मंच पर मुलायम के करीबी कालीन निर्यातक को धमकी दी थी कि अखिलेश से यारी करनी है तो घर बुलाकर करो, सभा में नहीं। इस धमकी का ही असर रहा कि अखिलेश जनता से विकास की बात कहने के बजाय विजय की शान में कसीदें पढ़ने लगे थे। विजय मिश्रा की ही साठगांठ व तीन-तिकड़म का नतीजा है कि अतीक इलाहाबाद के मंच पर चढ़े तो अंसारी बंधुओं की पार्टी कौमी एकता दल का विलय सपा में हुआ।

बता दें, यह वही बाहुबली विधायक विजय मिश्रा है जो मुख्तार अंसारी के करीबियों में से एक तो है ही भदोही समेत पूर्वांचल में सौ से अधिक हत्या, लूट, डकैती, अपहरण रंगदारी आदि के मुकदमें दर्ज है। रुंगटा अपहरण कांड में मुख्तार के साथ आरोपी भी बनाएं जा चुके है। इनकी सेटिंग-गेटिंग का हाल यह है कि अपनी बात मनवाने व अपना जलवा कायम करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है। एमएलसी चुनाव में अपनी पत्नी रामलली को जितवाने के लिए मुख्तार के धुर विरोधी बृजेश सिंह से हाथ मिलाना और उन्हें जितवाना तो एक बानगी है। इनके एक-दो नहीं सैकड़ों किस्से व कारनामे क्षेत्र में मशहूर है जिसमें वह सगे-संबंधियों को भी वाट लगाने में नहीं हिचकिचाते।

हालांकि पार्टी में अंदरुनी कलह तो काफी दिनों से थी, लेकिन बाहुबली विधायक विजय मिश्रा द्वारा बालू खनन से लेकर सड़क निर्माण सहित अन्य योजनाओं की धन के बंदरबाट व डीएम-एसपी से मिलकर पार्टी कार्यर्ताओं के उत्पीड़न, पत्रकार, कालीन निर्यातकों व संभ्रात नागरिकों पर फर्जी मुकदमा कराने के साथ ही जमीन कब्जा आदि प्रकरण के बाद सत्ता के शिखर प्रोफेसर रामगोपाल यादव, मुलायम सिंह यादव व शिवपाल सिंह यादव को अपने अकूत धन के बूते अपना गुलाम बनाकर अपनी बिटिया सीमा मिश्रा को टिकट हथिया लेने से बेबस संगठन व पार्टी कार्यकर्ता घुटन सा महसूस करने लगे थे। जिलाध्यक्ष प्रदीप यादव सहित तमाम कार्यकर्ताओं ने पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव से मिलकर अनुरोध किया कि अगर प्रत्याशी नहीं बदला गया तो न सिर्फ हम चुनाव हार जायेंगे, बल्कि पार्टी की छवि भी धूमिल हो रही है।

विजय मिश्रा के अकूत धन से दबे मुलायम सिंह यादव ने इन जांबाज कार्यकर्ताओं को डांटने के बाद यह कहकर भगा दिया कि जाओ सभी मिलकर सीमा को हरवा देना, मैं कह रहा हूं। निराश कार्यकर्ता वापस तो चले आए, लेकिन अंदर ही अंदर घुटते रहे। संगठन सहित पार्टी के जुझारु कार्यकर्ताओं को तवज्जो न देकर बाहुबली विधायक ने बूथ स्तर पर किराए के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंप दी और संगठन से यहकर बैठने को कहा कि रुपये में बड़ी ताकत होती है, 50 करोड़ रुपये खर्च कर मैं चुनाव जीत जाउंगा। लेकिन जनता ने हरा दिया।

आम जनमानस में एक ही चर्चा है, दगा किसी का सगा नही। तीन-पांच के घनचक्कर में भले ही विजय मिश्रा बरी हो गया, लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं। तिहरेकांड में मारे गए सूर्यनारायण शुक्ला के हत्यारों को सजा दिलाने का श्री मिश्रा भले ही दंभ भरता हो, लेकिन पूरा जिला जानता है कि लड़ाई वर्चस्व व ठेकेदारी की रही। डाक्टर को सजा दिलाकर पूरे जनपद में सड़क से लेकर बालू खनन तक पर कब्जा कर लिया गया। प्रतिदिन अवैध तरीके से 150-180 ट्रक बालू इब्राहिमपुर-बिहरोजपुर से विजय मिश्रा फिलिंग टोकन से जा रहा है, आखिर क्यों मौन है प्रशसन। ब्राह्मण समाज घड़ियाली आंसू बहाने वाले श्री मिश्रा को समझ चुकी है, इंतजार है तो बस उस वक्त का। निर्यातक व बुनकर वर्ग कह रहा है कि माफिया विधायक द्वारा विकास का पैसा खुलेआम बंदरबाट करने, भ्रष्टाचार को बढ़ावा व जिले को माफियाओं के हवाले कर पिस्तौल की राजनीति पनपाने के लिए इस बार सबक सिखाएंगी।

लेखक सुरेश गांधी भदोही के वरिष्ठ पत्रकार हैं. SURESH GANDHI से संपर्क iamsureshgandhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी के इस बवाली और तानाशाह डीएम ने मीडियाकर्मियों को सरेआम हड़काया (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के जंगलराज में विविध प्रजातियों के अधिकारी खूब फलते-फूलते पाए जाते हैं. एक महोदय हैं बहराइच जिले के डीएम उर्फ जिलाधिकारी. इन्हें लोग प्यार से अब ‘बवाली DM’ कह कर पुकारने लगे हैं. ये खुद ही बवाल करते कराते रहते हैं. इन महाशय को तानाशाही पसंद है. जब चाहेंगे तब मीडिया को दौड़ा लेंगे. कैमरे बंद करा देंगे. डांट लगा देंगे. जब चाहेंगे तब किसी होमगार्ड को डंडे से पीट देंगे. होमगार्ड की पिटाई करने वाले डीएम के रूप में कुख्यात जिलाधिकारी अभय का ताजा कारनामा है पत्रकारों को डांट डपट कर कैमरा बंद कराना और कवरेज से रोकना.

बहराइच के विवादों में घिरे रहने वाले जिलाधिकारी अभय ने आचार संहिता की आड़ में मीडिया कवरेज के दौरान चालू कैमरे को न केवल बन्द कराया बल्कि पत्रकारों को डांट लगाते हुए धारा 144 का हवाला देकर कार्यवाही की धमकी दी. नीचे दिए गए वीडियो को देखिए. डीएम साहब के ये बोल आपको सुनाई पड़ेंगे : ”बन्द करो कैमरा, तुमको बोला सबको बोला.. समझकर बात किया कीजिये… आवाज मत करो वहां पर….इसकी रिकार्डिंग हटाओ….”.

दरअसल बहराइच पालीटेक्निक कालेज की छात्र छात्राएं अपने प्रिंसिपल द्वारा छात्राओं का शोषण किये जाने से आक्रोशित होकर जिलाधिकारी का घेराव कर अपना दर्द बयां कर रही थी. इसी दौरान पत्रकार जब डीएम के घेराव को कैमरे से शूट करने लगे तो जिलाधिकारी भड़क गए. उन्होंने तमाम अफसरों, पुलिस कर्मियों व छात्र छात्राओं की मौजूदगी में पत्रकारों को अभद्रता पूर्वक डांट लगाते हुए न केवल उनका कैमरा बन्द कराया बल्कि उन्होंने अपने स्टाफ से रिकार्डिंग देखने को भी कह दिया. साथ ही धारा 144 का हवाला देकर कार्यवाही की धमकी दी. जिलाधिकारी बहराइच की बेअंदाजी को देखकर सारे लोग हतप्रभ हो गए.

जिलाधिकारी अभय का ये कारनामा कोई नया नहीं है. इससे पहले अपने बंगले पर तैनात सुरक्षा कर्मियों (होमगार्ड) की डंडे से पिटाई करने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही की मांग को लेकर हजारों की तादात में होमगार्डों ने कई दिन धरना प्रदर्शन किया था. सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाले डीएम अभय के विरुद्ध अब तक कई बार शिकायत हुई है लेकिन हर बार वो सत्ताधरी दल के करीबी होने के कारण कार्यवाही से बचते रहे हैं. शायद यही कारण है जिलाधिकारी की बेअंदाजी बदस्तूर कायम है. जिलाधिकारी के बर्ताव को लेकर जिले के मीडियाकर्मियों में भारी रोष है. पत्रकारों ने प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से बात कर कार्यवाही की मांग की है.

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दंगों के दाग और अपराधों की आग से कैसे बचेंगे अखिलेश यादव

अलीगढ़ में हुई महिलाओं से मारपीट और लूटपाट की दो घटनाओं ने बुलंदशहर कांड की याद फिर ताजा कर दी है। उत्त्तर प्रदेश में दंगों के सवाल पर सपा सरकार को विपक्षी दल पहले से ही घेरते आ रहे हैं। तो ऐसे में सवाल उठ रहा है कि चुनाव के समय अब अखिलेश यादव दंगों के दाग और अपराधों की आग से खुद और पार्टी को कैसे बचाएंगे ?

धीरज सिंह

घटनाएं होती हैं और कुछ समय बाद लोग उन्हें भूल जाते हैं मगर चुनाव आते ही राजनैतिक दल एक- दूसरे का लेखा-जोखा कुरेद कर फिर बाहर निकाल देते है। लोग जिन बातों को भूल चुके थे, चुनाव के ऐन पहले फिर से सुर्खियां बनने लगती हैं। प्रदेश में हुए दंगे और आपराधिक वारदात, कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं जो समाजवादी पार्टी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पीछा नहीं छोड़ेंगे। मार्च 2012 में उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम आने के बाद जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने युवा पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया तो जनता प्रदेश के विकास का सपना देख रही थी। लैपटॉप मिलने की आशा में प्रदेश के युवाओं में भारी उत्साह था।

मुख्यमंत्री की गद्दी संभालने के बाद अखिलेश भी अपने चुनावी वादे करने में जुट गये। प्रदेश भर में हजारों छात्र-छात्राओं को लैपटॉप बांटे गए। अखिलेश की महत्वाकांक्षी योजना प्रदेश में मेट्रो दौड़ाने की थी, उस पर भी अमल शुरू हो गया। यह सब कुछ ऐसे होता रहा, मानों अगला चुनाव मेट्रो और लैपटॉप के दम पर ही जीतना हो। चुनाव की अधिसूचना आने से पहले मुख्यमंत्री ने जैसे-तैसे मेट्रो का रन ट्रायल भी करवा ही दिया। हालांकि अभी लखनऊ में मेट्रो का काफी काम अभी बाकी है और मेट्रो को चलने में काफी समय लगने वाला है।

यूपी मिशन-2017 का लक्ष्य सामने आया तो सपा के दिग्गज फिर माथापच्ची में जुट गए। लैपटॉप तो बांट चुके, अब इस बार क्या? काफी सोच-विचार के बाद घोषणा हुई कि इस बार स्मार्ट मोबाइल फोन बांटे जाएंगे। आखिर युवाओं में मोबाइल फोन का क्रेज जो है। तो क्या मोबाइल और मेट्रो अखिलेश भइया की चुनावी नैया पार लगा देंगे। विपक्षी दल इस बात को जोर-शोर से प्रचारित करते हैं कि सपा की सरकार बनते ही उत्तर प्रदेश में अपराध बढ़ने लगते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा मुखिया बहन मायावती जब भी प्रेस कान्फ्रेंस में पहले से ही लिखा-लिखाया भाषण पढ़ती हैं तो यह जिक्र करना कभी नहीं भूलती हैं कि प्रदेश में अपराधों की बाढ़ आ गई और जंगल राज कायम हो चुका है। भाजपा और कांग्रेस के नेता भी सपा सरकार पर ऐसे आरोप लगाते रहते हैं। भाजपा नेता कह चुके हैं कि अखिलेश की सरकार आने के बाद से प्रदेश में 500 से ज्यादा छोटे-बड़े दंगे हो चुके हैं। अखिलेश के राज में सबसे बड़ा दाग मुजफ्फरनगर में हुए दंगे हैं। प्रदेश के कुछ हिस्सों से हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा भी राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन चुका है।

बुलंदशहर हाईवे पर जुलाई 1016 को हुई शर्मनाक घटना अखबारों और न्यूज चैनलों की सुर्खी बनी थी, मां-बेटी से दुष्कर्म की घटना की गूंज विदेशों तक हुई थी। इस कलंक को धोने के लिए राज्य सरकार ने यूपी-100 डायल योजना लांच की। इस योजना का जोर शोर से प्रचार किया गया और वाहवाही लूटने की कोशिश की गई। पुलिस के आला अधिकारी प्रदेश में कानून व्यवस्था चुस्त- दुरुस्त होने का दावा करने लगे। वूमेन्स हेल्पलाइन और यूपी- 100 डायल चालू होने के बाद तो क्या वाकई प्रदेश में अपराध थम गये हैं। चुनावी बेला में बुलंदशहर जैसा कांड होने से अखिलेश सरकार को फिर भारी धक्का लगा है। 22 जनवरी 2017 को अलीगढ़ के टप्पल क्षेत्र के गांव जिकरपुर में एक रिटायर डीआईजी के फार्म हाउस पर मां-बेटी के साथ मार-पीट और लूटपाट की वारदात और एक्सप्रेस वे पर बस यात्रियों से लूटपाट की वारदात ने प्रदेश में कानून व्यवस्था के दावों की सच्चाई उधेड़ कर रख दी है। बताया जा रहा है कि ये दोनों ताजा वारदात बुलंदशहर कांड की तर्ज पर ही अंजाम दी गई हैं और अपराधियों के बढ़े हौसले को उजागर कर रही हैं। क्या राज्य की जनता मेट्रो, मोबाइल और लैपटॉप को राज्य की खुशहाली मान लेगी। विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश और उनकी पार्टी को दंगों और अपराधों पर भी जवाब देना होगा।

धीरज सिंह
dhirajsinghdv@gmail.com

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समझदार दर्शक बाप-बेटे की फिल्म को नकार देंगे

सबने अच्छा काम किया, पर स्क्रिप्ट कमजोर थी। कहानी को थोड़ा और लंबा खिंचना था। दोनों मुख्य कलाकारों मुलायम और अखिलेश ने अच्छी एक्टिंग की। डायरेक्टर तथा सह कलाकार शिवपाल यादव ने भी अच्छा काम किया है फिल्म में। अमर सिंह का गेस्ट अपियरंस भी ठीक ठाक रहा। रामगोपाल यादव और अच्छा कर सकते थे, पर उन्हें ज्यादा मौका नहीं मिला। आजम खान का छोटा पर असरदार रोल था।

जूनियर आर्टीस्ट (सपा समर्थकों) ने भी भरपूर साथ दिया। वैसे जूनियर आर्टिस्टों का ज्यादा कुछ काम रहता नहीं है, वह सिर्फ पीछे खड़े हो कर, जैसे आगे वाला नाचता है वैसे नाचते हैं। बढ़िया नाचे.. एकाध बेचारे झुलस कर सचमुच का आत्मदाह भी कर डाले… फिल्म पूरी तरह नायक प्रधान थी तो हिरोइन डिंपल भौजी के करने लायक कुछ था नहीं। पाँच साल यूपी को बर्बाद कर अपने बेटे को भ्रष्टाचार तथा जातिवादी राजनीति से उपर उठा कर… उसकी अब तक की नाकामी और अकललेस वाली असलीयत को बदलकर उसे एक मजबूत नेता के रूप में प्रस्तुत करके, फिर एक बार यूपी के विकास के लिये तरस रही जनता के ऊपर मुख्यमंत्री बना कर थोपने की कहानी दर्शाती हुई फिल्म है- ‘समाजवाद के लंहगा में परिवारवाद’।

यह वन-टाइम वॉच मूवी थी। ऐसी फिल्में पहले भी बनी है। समझदार दर्शक इस फिल्म को नकार देंगे। ऐसी स्थिति में इस फिल्म की सफलता इस पर टिकी है कि कितने मानसिक दिव्यांग दर्शक इस झोल वाली (कमजोर) फिल्म को देखते हैं। फिल्म में कलाकार कितनी भी अच्छी एक्टिंग कर ले पर… मजबूत स्टोरी ही फिल्म की जान होती है। कमजोर कहानी तथा वही पुराना घिसापिटा क्लाइमेक्स शायद ही इस फिल्म को फ्लॉप होने से बचा पाये।

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एक थे लोहियाजी जिन्होने अहंकारी इन्दिरा का दिमाग ठिकाने लगा दिया था। दूसरे हैं उनके चेले (तथाकथित समाजवादी) जो अहंकारी कांग्रेसियों से ठगबंधन करने के लिए लालायित हैं। राममनोहर लोहिया जी भाड़े की ‘टैक्सी’ से संसद भवन में घुसे। ड्राइवर सरदार था। तभी सामने सायरन बजाती पायलट कार आई और लोहिया की टैक्सी को हटने का इशारा किया! सरदार ने गाड़ी रोक दी, लोहिया जी बोल उठे – क्या हुआ गाडी क्यों रोक दी?

सरदार ड्राइवर ने कहा, सामने से इंदिरा जी का काफिला आ रहा है। लोहिया जी ने कहा– गाड़ी को बीच में रखो और चलते रहो. इंदिरा गाँधी का पूरा काफिला रुक गया, इंदिरा ने पूछा क्या हुआ? पुलिस वालो ने बताया, लोहिया टैक्सी में है, रास्ता रोक दिया है। इंदिरा ने कहा- पहले उन्हें जाने दो. फिर लोहिया अंदर चले गए. सुरक्षा में लगे पुलिस अधिकारी के हुक्म से संसद भवन से बाहर आते ही सरदार ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया गया.

शाम को सरदारनी बदहवास चीखती हुयी लोहिया आवास में घुसी और उन्हें अपने पति की गिरफ्तारी की बात बताई. लोहिया जी तुरंत थाने पहुंचे और पूछा किसकी हिम्मत हुयी सरदार को गिरफ्तार करने की? उन्होंने तुरंत थाने से गृह मंत्रालय में फोन लगाया और निडरता पूर्वक बोले– नेहरू की बेटी को बोल देना कल संसद में मैं सरकार की ऐसी दुर्गति बनाऊँगा पूरा देश देखेगा। पांच मिनट में PM हाउस से फोन आ गया। सरदार ड्राइवर को तुरंत रिहा कर दिया गया. दूसरे दिन गुस्साये लोहिया कुछ बोलने के लिए खड़े होते, इंदिरा ने कहा कल की घटना के लिए मैं आपसे माफ़ी मांगती हूँ. मैंने अपने सुरक्षा में लगे सब बड़े अधिकारियों को कल ही निलंबित क़र दिया है. लोहिया शांत हो गए. ऐसे थे लोहिया जी जो एक अदना से टैक्सी ड्राइवर के लिए इंदिरा गाँधी को भी झुका देते थे. और, एक ये (परिवार वाद के वाहक) तथाकथित लोहियावादी बाप-बेटा हैं जो सत्ता पाने के चक्कर में इससे उससे सबसे गठजोड़ करते जा रहे हैं. 

Dushyant sahu
dushyanttata321@gmail.com

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नेता जी, आपके उसी सवाल का बस जवाब दिया है अखिलेश ने!

Nadeem : आदरणीय नेता जी, आप बेहद दुखी हैं। आपका दुखी होना लाजिमी भी है। मुझे मालूम है कि आप इतने दुखी नहीं होते अगर यह बगावत आपके बेटे की जगह किसी और ने की होती लेकिन जो कुछ हुआ उसके लिए कहीं न कहीं आप खुद जिम्मेदार है।

याद कीजिये 24 अक्टूबर 2016 का वो दिन, जिस बैठक का पूरे देश में लाइव टेलीकास्ट हो रहा था, उस बैठक में आपने बहुत ही हिकारत भरे अंदाज़ में अखिलेश से मुखातिब होते हुए कहा था, ‘अखिलेश तुम्हारी हैसियत क्या है? अमर सिंह हमारे भाई हैं, उन्होंने हमें कई बार बचाया।’

माफ़ कीजियेगा नेता जी, अखिलेश ने तो आपके उसी सवाल का जवाब भर दिया है।

उसने तो बस यह दिखाया है कि उसकी हैसियत यह है कि उसके एक बुलावे पर 224 में से 197 विधायक उसके साथ खड़े होते है, इनमे भी तमाम वो जिन्हें आपने टिकट देने का एलान कर रखा है। अखिलेश ने अगर अपनी हैसियत नहीं बताई होती तो उसे यह सवाल न जाने कितने और मौकों पर सुनना पड़ता।

हां, एक बात और, हो सकता है अमर सिंह जी ने तमाम मौकों पर आपको बचाया हो लेकिन आपके खून पसीने से खड़ी पार्टी को टूटने से नहीं बचा सके। नेता जी, पार्टी आपकी, बेटा आपका, मुझे आपके विवाद में पड़ने का कोई हक नही, लेकिन बस इतना भर कहना चाहता हूं अक्सर दम्भ की परिणित ऐसी ही होती है।

आपका एक प्रशंसक

नवभारत टाइम्स अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार नदीम की एफबी वॉल से.

ये वीडियो देखें…

अखिलेश के पावरफुर होने से किन्नर खुश https://www.youtube.com/watch?v=Yafh-jUHW8k

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हे अखिलेश, जब मुजफ्फरनगर में दंगा और सैफई में नाच हो रहा था तब आपने क्यों नहीं आवाज निकाली?

प्रिय अखिलेश भैया,

जब 2012 में चुनाव था, तब मेरे पास वोट नही था। सपा नापसन्द होते हुए भी मैंने आपको सपोर्ट किया, दूसरों को कहा आपको वोट दें। ऐसा सुनने में आता रहा कि आप तो इस परिवारवाद से ऊपर आना चाहते हैं लेकिन आपके ही घर के लोग आपको फैसले नहीं करने देते, वगैरह!! तो मुझे आपसे यह कहना है कि फैसले कदम दर कदम लिए जाते हैं। आपने तब क्यों नहीं आवाज़ निकाली जब मुजफ्फरनगर दंगे हो रहे थे, और सैफई में नाच होता रहा।

जिस ढंग से पार्टी ऑफिस पर कब्ज़ा हुआ, उससे क्या जताना चाहते हैं? जैसे कि उत्तर प्रदेश आपकी सल्तनत है और आप इसके शहज़ादे जो तख़्तापलट करेंगे! नेता जो थे, वो आपके पिता श्री हैं । उनका संघर्ष है ये पार्टी । कांग्रेस के भक्ति काल में जब वो प्रचार के लिए गांव गांव जाते थे तब काले झंडे से ले कर जूते तक, सब उन्होंने सहा है और हिम्मत नहीं हारी है । आज इटावा में अहीरों को जो इज़्ज़त मिली है, उनकी देन है, भले इसका गलत फायदा उठाया जा रहा है तब भी । आपको उनकी बे इज़्ज़ती करने का कोई अधिकार नहीं है।

आपने पार्टी पर कब्ज़ा कर के ये सिद्ध किया कि आपको स.पा. की बैसाखी की जरूरत है, आपका अचानक से यह दुस्साहस आपकी बौखलाहट दिखा रहा है । आप परिवारवाद से निकले ही नहीं, एक चाचा छोड़ा तो दूसरे को लाद लिया !! आप को खुद को सिद्ध करना ही था तो छोड़ते पार्टी, और करते संघर्ष ! इस बार नहीं भी तो अगली बार बनते मुख्यमंत्री और तब कहलाते आप नेता, अपने पिता की तरह!

सपा को उसके हाल पर छोड़ते, पिता जी की जिंदगी भर की मेहनत थी वो ! आपके पिता में लाख़ कमी रही लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वो आपसे बेहतर देख पा रहे होंगे कि आप के पिछलग्गू क्या कर रहे हैं । आपको चने के झाड़ पर चढ़ाया जा रहा है और आप चढ़ रहे हैं! अगर आप चुनाव जीतते हैं तो उम्मीद है कि आप अपनी अक्ल चलाएंगे, सलाहकारों की नहीं!

इस बार एक वोटर!

लेखिका अपूर्वा प्रताप सिंह आगरा की निवासी हैं और सोशल मीडिया पर बेबाक टिप्पणियों के लिए जानी पहचानी जाती हैं. उनका यह लिखा उनकी एफबी वॉल से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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‘नई उमंग’ के जरिए सपा मुस्लिमों को बरगला रही, रिहाई मंच ने उर्दू पत्रिका को भेजा नोटिस

लखनऊ । रिहाई मंच नामक संगठन ने आरोप लगाया है कि अखिलेश सरकार मुसलमानों को गुमराह करने के लिए उनके बीच अपनी उपलब्ध्यिों के झूठे दावों वाली उर्दू की सरकारी पत्रिका ‘नई उमंग’ प्रकाशित कर वितरित करा रही है जिसमें बेगुनाह मुसलमानों के रिहा किए जाने का वादा पूरा कर दिए जाने का दावा किया गया है। रिहाई मंच ने ‘नई उमंग’ पत्रिका के खिलाफ नोटिस भेजा है।

लाटूश रोड स्थित रिहाई मंच कार्यालय पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में रिहाई मंच अध्यक्ष मो0 शुऐब ने कहा कि ‘नई उमंग’ नाम से सूचना विभाग द्वारा जारी उर्दू पत्रिका के पृष्ठ संख्या 34 और 35 पर प्रदेश के एडीशनल एडवोकेट जनरल जफरयाब जीलानी ने दावा किया है कि ‘अखिलेश सरकार ने बेकसूरों पर से मुकदमा खत्म कराने के मामले में बेहद संजीदगी से काम किया तथा निमेष कमीशन की रिपोर्ट की सिफारिशात को कबूल करते हुए उन्हें भी अमल में लाया गया’।

वहीं इस इंटरव्यूव में उन्होंने यह भी दावा किया है कि सरकार ने 5 हजार बेगुनाहों की रिहाई कराई है जबकि सच्चाई तो यह है कि पूरे देश में आतंकवाद के नाम पर 5 हजार बेगुनाह मुसलमान बंद भी नहीं हैं। वहीं निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर सरकार ने कोई कार्यवाई ही नहीं की है। अगर कार्यवाई की होती तो तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद को फंसाने वाले पुलिस और खुफिया विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाई की होती और उन्हें जेल भेजा होता। वहीं उल्टे सरकार ने अदालत द्वारा 9 साल बाद बरी हुए 6 मुस्लिम युवकों नौशाद, जलालुद्दीन, मोहम्मद अली अकबर हुसैन, शेख मुख्तार, अजीजुर्रहमान सरदार और नूर इस्लाम मंडल के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी है। जिसकी सुनवाई की तारीख 31 जनवरी 2017 को नियत है।

रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि समाजवादी पार्टी ऐसी पत्रिकाओं के जरिए मुसलमानों को बरगलाने की कोशिश कर रही है। जिसके खिलाफ रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जफरयाब जीलानी, अपर महाधिवक्ता, ‘नई उमंग’ के संरक्षक श्री नवनीत सहगल, सुधीश कुमार ओझा, प्रकाशक, डाॅ आरएस पांडेय, सम्पादकीय सलाहकार, सैय्यद अमजद हुसैन सम्पादकीय सलाहकार, सैय्यद वजाहत हुसैन रिजवी, निगरां, सुहैल वहीद, सम्पादक को पार्टी बनाते हुए कानूनी नोटिस भेजा है। जिसमें आरोप लगाया गया है कि पुस्तक द्वारा सबने एक राय से साजिश करके सपा को राजनीतिक लाभ पहंुचाने के लिए राजकीय धन का जिसके वे न्यासी हैं, राजकीय कार्य से अतिरिक्त व्यय करके न्यास भंग किया है। नोटिस के जरिए सभी से सामूहिक रूप से तथा अलग-अलग स्पष्टीकरण मांगी गई है। जिसके न मिलने पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने और विधिक कार्यवाई कर प्रकाशन में होने वाले व्यय को उनसे वसूलने और राजकीय कोष में जमा कराने और इस प्रक्रिया में होने वाले खर्च को उनसे वसूल करने की बात कही गई है।

लखनऊ रिहाई मंच के महासचिव शकील कुरैशी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि सपा ने न सिर्फ वादा खिलाफी की है बल्कि ऐसे झूठे दावे करके मुसलमानों के जख्म पर नमक छिड़कने का काम किया है। जिसका खामियाजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ेगा। श्री कुरैशी जिनका पिछले दिनों भोपाल फर्जी एनकांउटर के खिलाफ धरना देते वक्त पुलिस ने हमला करके हाथ तोड़ दिया था, ने कहा कि मुसलमानों को बरगलाकर सपा के लिए वोट दिलवाने का काम करने वाले का तो जमीर तभी बिक गया था जब उन्होंने बाबरी मस्जिद को चांदी की तश्तरी में रखकर विहिप को सौंप दी थी। जिसके एवज में उनको माडल हाउस में रामभवन नाम की एक शानदार कोठी विहिप ने बतौर तौफा सौंपी थी। उन्होंने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव में मुसलमान सपा के 5 साल के मुस्लिम विरोधी शासन मंे 300 से ज्यादा हुए दंगों का हिसाब मांगने जा रहा है। 

नजीब के लिए इन्साफ मांग रहे एएमयू छात्रों पर सपाई पुलिस के हमलों ने खोली विकास अभियान की पोल 

अलीगढ : जेएनयू के लापता छात्र नजीब के लिए अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों के इन्साफ मार्च पर मार्च उत्तर प्रदेश की सांप्रदायिक सपा सरकार के बर्बर पुलिसिया हमले की रिहाई मंच ने घोर निंदा की है। अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी से छात्रों का जनसैलाब नजीब के लिए इंसाफ मार्च की शक्ल में शुरू हुआ। यह मार्च पूरी तरह से शांतिपूर्ण था। छात्रों की मांग थी की नजीब को वापस लाया जाये और उसपर हमला करने वाले एबीवीपी के गुंडों पर कार्यवाही की जाये| छात्रों ने रेल रोकने का ऐलान किया था। उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा पहले तो छात्रों को यूनिवर्सिटी कैंपस में ही रोकने की कोशिशें की गयी और बाब-ए-सय्यद पर भारी पुलिस और आर.ए.एफ बल लगा दिया गया लेकिन छात्रों के शांतिपूर्ण जनसैलाब को रोका नहीं जा सका। छात्रों द्वारा निकाले  इन्साफ मार्च को बरगलाने में जब गए सपा सरकार की सांप्रदायिक पुलिस नाकाम रही तो अपनी तीन नाकाम कोशिशों के बाद आगे बढ़ रहे छात्रों पर पुलिस ने हमला कर दिया।

बाब ए सय्यद से निकलकर छात्र का जनसैलाब घंटाघर पहुँच गया जहाँ उत्तर प्रदेश की  सांप्रदायिक सपा सरकार की पुलिस ने छात्रों पर वाटर कैनन का प्रयोग किया और हमला कर दिया। इस बर्बर पिटाई में बहुत से छात्र घायल हुए। पुलिस ने मार्च में शामिल छात्राओं को भी नहीं बख्शा और उन पर भी लाठियां बरसाईं। इस बर्बर पिटाई के बाद नजीब के लिए इन्साफ मांग रहे छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया| 

रिहाई मंच इस पुलिस कार्यवाही के लिए सपा और भाजपा के नापाक और सांप्रदायिक गठजोड़ को जिम्मेदार मानता है। रिहाई मंच के मोहम्मद आरिफ ने कहा कि सपा सरकार का विकास एक जुमला भर है। पहले मदसों के छात्रों को आतंकवादी बताकर फर्जी फंसाया जाता था अब यह मदरसों से बढ़कर जेएनयू और एएमयू जैसे संस्थानों में पढने वालों को निशाना बनाया जा रहा है। रोहित वेमुला और नजीब जैसों को जब पढने की आजादी और सुरक्षा नहीं है तो क्या उन्हें जेलों में डालकर सपा सरकार विकास करना चाहती है। इन्साफ मांग रहे एएमयू छात्रों को उत्तर प्रदेश  पुलिस द्वारा यह कहना कि तुम्हे भी नजीब बना देंगे, सपा की सामाजिक न्याय और विकास के दावों की पोल खोल देता है। सपा सरकार की मौजूदा कलह को उन्होंने दरअसल अखिलेश और शिवपाल के बीच लूट को लेकर झगड़ा बताया जिसका विकास से कोई लेना देना नहीं है।

रिहाई मंच के साथी और एएमयू के शोध छात्र अमानुल्लाह ने कहा कि आनेवाले २०१७ चुनाव में सपा सरकार को हर एक लाठी का हिसाब देना होगा और एएमयू छात्रों पर पड़ी हर एक लाठी सपा के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी। रिहाई मंच के साथी और एएमयू के शोध छात्र सलमान हबीब ने कहा कि भोपाल फर्जी एनकाउंटर के विरोध में लखनऊ में राजीव यादव पर पुलिसिया हमला और एएमयू छात्रों पर हमला अखिलेश के सारे विकास दावों की पोल खोल देता है। अखिलेश के लिए विकास का मतलब अपना विकास है जिसमें लूट के हिस्से को लेकर उनकी पार्टी में खुद घमासान मचा हुआ है। इस में दलित और मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है। उन्हें केवल झूठ, जेल और लाठियां, और दंगे ही मिले हैं। नजीब के लिए इन्साफ मार्च में एएमयू छात्रसंघ के सभी पदाधिकारी मौजूद रहे साथ में रिहाई मंच अलीगढ के मोहम्मद आरिफ, सलमान हबीब, अमानुल्लाह, तौसीफ खान, दाऊद इब्राहीम आदि भी इस मार्च में शामिल हुए।

द्वारा जारी :
रिहाई मंच
लखमऊ / अलीगढ़

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नेताजी को दादरी कांड, मुज्जफरनगर कांड और हाईवे रेप कांड के समय अनुशासनहीनता क्यों नहीं दिखाई दी?

यूपी में अनुशासनहीनता का कड़वा सच…

मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक माहौल ने गंभीर चिंतन के लिए मजबूर कर दिया है। मैं ही नहीं मेरे जैसे हर कलमकार के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है। यहां एक बार फिर राजनीतिक मूल्य हाशिये पर चढ़ते दिखाई दे रहे हैं। स्वयं को सही साबित के लिए बाप-बेटे में ठन गई है तो, कुछ लोग विभीषण की भूमिका भी बखूबी निभा रहे हैं। खैर ये समाजवादी पार्टी का निजी मामला है, इस पर ज्यादा समय व्यर्थ करना उचित नहीं लगता। मेरा सवाल यहां नेता जी उर्फ मुलायम सिंह साहब से है।

मुलायम जी, आपकी पार्टी में आपके मुख्यमंत्री बेटे, आपके भाई पार्टी के नियमों से हटकर कुछ करते हैं तो वो आपको अनुशासनहीनता लगती है। आपने इस अनुशासनहीनता के खिलाफ बड़ी ही तत्परता के साथ बेटे और भाई को पार्टी से निकालने का खेल भी खेला। खैर, चलो मान लिया ये भी आपका निजी मामला है, हालांकि अब इसमें निजता जैसा कुछ रहा नहीं। मैं यहां मुलायम सिंह जी की तारिफ करना चाहूंगा कि उन्होंने पार्टी में अनुशासनहीनता के खिलाफ काफी कड़े तेवर अपनाय। लेकिन मैं नेता जी से यहां सवाल पूछता हूं कि क्या उस वक्त आपको अनुशासनहीनता नहीं दिखाई दी जब दादरी कांड की सांप्रदायिक आग उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में फैली। क्या उस वक्त आपको अनुशासनहीनता नहीं दिखाई दी जब मुज्जफरनगर के दंगों में उत्तर प्रदेश जल रहा था। क्या उस वक्त आपको अनुशासनहीनत नहीं दिखी जब हाई वे पर एक मजबूर बाप के सामने ही उसकी पत्नी और बेटी से घंटों बलात्कार किया जाता है।

नेता जी ऐसे सैकड़ों मामले हैं जब अनुशासन को खूंटी पर टांगकर उत्तर प्रदेश की अस्मत लूटी गई है। तब आपने अनुशासनहीनता के खिलाफ कार्रवाई करते हुए अपनी पार्टी से किसी को क्यों नहीं निकाला। या फिर मैं यह मान लूं, समाज में,  आपके राज्य में अनुशासनहीनता से आपको कई फर्क नहीं पड़ता बस पार्टी में अनुशासनहीनता आप बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। या फिर इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि हर राजनीतिक पार्टी का यही असली चेहरा है। देश की अनुशासनहीनता से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है बस वोट की राह में पार्टी में आने वाले हर रोड़े, अनुशासनहीनता की कसौटी में आते हैं।

विनोद विद्रोही
Blog: www.vinodngp.blogspot.in 
Email: vinody37@gmail.com

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खुला पत्र : अखिलेश यादव जी, अवाम की नज़र में आपकी छवि एक कायर नेता की हो गई है

माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी के नाम खुला पत्र…..

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध…

माननीय मुख्यमंत्री जी, आज दैनिक अमर उजाला में आपका एक वक्तव्य पढ़ा आपने एक कार्यक्रम दौरान अपने संबोधन में कहा है कि…”हम वैसे ही काम कर रहे हैं जैसे गार्जियन की इच्छा”… अखिलेश जी, 2017 में अगर उत्तर-प्रदेश में फ़ासिस्ट ताक़तों की फिरकापरस्त हुक़ूमत मुसल्लत हुयी और उत्तर-प्रदेश की सेक्युलर अवाम को फ़िरक़ा परस्तो के हाथों में सौपा गया तो जितनी ज़िम्मेदारी आपके चाचा शिवपाल जी,आपके पिता जी मुलायम सिंह यादव जी की होगी उससे कहीं बढ़कर इसके ज़िम्मेदार आप ख़ुद होंगे।सिर्फ ये कहने भर से की जैसे बड़ो की मर्ज़ी…से आप अपने दामन को नहीं बचा सकते।

उत्तर-प्रदेश की अवाम ने आपको अपना नेता माना तो अवाम आपसे ये तवक़्क़ो भी रखती है कि विपरीत परिस्तिथि में आपको कठोर क़दम उठाना चाहिये था,हक़ और बातिल की जंग में हक़ परस्ती का क़ायदा बन कर उभारना चाहिये था,आप सिर्फ अब नेता जी के बेटे नहीं,शिवपाल चाचा के भतीजे ही नहीं बल्कि 4.5 करोड़ की आबादी के सरपरस्त भी हैं,आप न तो अच्छे बेटे ही साबित हो पाए और न ही अच्छे सरपरस्त…या तो आपको अपने परिवार के आगे बिलकुल हथियार डाल देने चाहिये थे और चुपचाप पद से इस्तीफा दे कर वापस ऑस्ट्रिलिया चले जाना चाहिये था ताकि कम से कम एक आदर्शवादी बेटे की छवि तो बनी रहती आपकी…

फिर अगर अवाम का क़ायद बनने का जज़्बा वाक़ई आपके दिल में था तो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आपको अपनी आवाज़ बुलंद करते हुये खड़े हो जाना चाहिये था।अखिलेश जी ये जम्हूरी निज़ाम है यहाँ दोनों हाथ में लड्डू नहीं चलते, अवाम को इतना भी बड़ा बेवक़ूफ़ मत समझीये की वो आपको इतनी आसानी से माफ़ कर देगी वो भी तब की जब अवाम हर कदम पर हर फैसले में आपके साथ शाना ब शाना खड़ी हुई, बुज़ुर्गों की दुआ आपके साथ,नोवजवां का खून आपके साथ,बच्चो का प्यार आपके साथ… और क्या चाहिये था आपको साहब…मगर आपको डर सता रहा था अपना इख़्तेदार जाने का, आप डर गए फैसला लेने से.

मौजूदा वक़्त में अवाम की नज़र में आपकी हैसियत अब सिर्फ एक कायर नेता की बची है जिसको हमेशा कुर्सी जाने का डर सताता रहा…मुस्लिम वोटों पर हुक़ूमत में आप आये तो आपको थोड़ा तारीख़े इस्लाम भी पड़ना चाहिये था…अगर मेरे हुसैन ज़ालिम के हाथ पर बैत कर जाते तो आज इस्लाम का वुजूद न होता…और इस वक़्त आपकी कारगर्दगी बता रही है कि आपमें वो जज़्बा इच्छाशक्ति नहीं है कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ परचम बुलंद कर पाएं और इतिहास में अमर हो जाएं,आपकी कायरता ये बयां कर रही है कि आप कितना भी विकास पुरुष होने का डंका पीट लें मगर अब अवाम की नज़र में आप कायर पुरुष ही हैं…

अखिलेश जी, संघर्ष की कोख से नायक जन्म लेता है और अब आप नायक नहीं खलनायक बन कर सामने आये हैं…न तारीख माफ़ करेगी, आपको और न अवाम… अखिलेश जी, आप सियासत में हारे हुए उस राज कुमार की तरह नज़र आरहे हैं जिसके सामने शतरंज की सारी बिसात पलट गयी और राजकुमार अपनी बारी का ही इंतेज़ार करता रहा… अखिलेश जी, इतिहास “बारी” को न लिखता है न याद करता है, इतिहास हमेशा फैसले को मान्यता देता है…

डॉ. एस. ई. हुदा
नेशनल कन्वेनर
हुदैबिया कमेटी
बरेली

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फैजाबाद में दैनिक जागरण के चार पत्रकारों को जिंदा जलाकर मारने की कोशिश

नोटबंदी के फैसले के बाद हो रही कैश की समस्या के चलते पत्रकारों को जिंदा जलाने की घटना सामने आई है। उत्तरप्रदेश के फैजाबाद में एक पेट्रोल पंप के कर्मचारियों पर आरोप है कि उन्होंने चार पत्रकारों को जिंदा जलाकर मारने की कोशिश की। ये चारों वहां के एक हिंदी अखबार दैनिक जागरण में काम करते हैं। पत्रकार पेट्रोल पंप पर झगड़ा होने के बाद पास ही में अपने दफ्तर में जाकर छिप गए थे। लेकिन पेट्रोल पंप का स्टाफ वहां भी पहुंच गया और ऑफिस के अंदर घुसकर पत्रकारों और बाकी स्टाफ से साथ भी मारपीट की। बाद में किसी ने पुलिस को सूचना दी। उसके बाद जाकर मामला शांत हुआ।

पत्रकार ऑफिस के पास वाले पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाने गया था। उसे 200 रुपए का पेट्रोल भरवाना था। इसके लिए उसने 10-10 के बीस सिक्के पेट्रोल भर रहे शख्स को देने चाहे। लेकिन उसने उनको लेने से मना कर दिया और कहा कि उसे नोट चाहिए और वह सिक्के नहीं लेगा।जब पत्रकार ने उससे वजह जाननी चाही तो वह लड़ने लगा। लड़ाई कुछ ही देर में हाथापाई पर पहुंच गई। जिन पत्रकारों पर हमला हुआ उसमें से एक का नाम कृष्ण कांत गुप्ता है। उन्होंने कहा, ‘मेरे कुछ दोस्त झगड़े की सुनकर पेट्रोल पंप की तरफ आए थे। उन लोगों को देखकर पेट्रोल पंप के स्टाफ ने उनके ऊपर पेट्रोल छिड़क दिया और उन्हें जिंदा जलाने की कोशिश की।’

भारत के कई राज्य पत्रकारों के लिहाज से सुरक्षित नहीं कहे जा सकते। 12 नंवबर को बिहार में हिंदी के अखबार दैनिक भास्कर के पत्रकार की कुछ अज्ञात लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके अलावा भी ऐसे कई किस्से मौजूद हैं। इससे पहले मई में हिंदी के अखबार हिंदुस्तान के सीनियर पत्रकार राजदेव रंजन को सिवान जिले में गोली मारी गई थी। सीबीआई अबतक उस केस की जांच कर रही है। इस साल (2016) दुनियाभर में कम से कम 57 पत्रकार अपना दायित्व निभाते हुए मारे गए हैं। यह रिपोर्ट प्रेस स्वतंत्रता समूह ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ ने दी थी।

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चचा को अतीक और मुख्तार जैसे दंबग ही पसंद आते हैं!

अजय कुमार, लखनऊ

मकड़जाल जैसी यूपी की सियासत : उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की सरगर्मी लगातार बढ़ती जा रही है। सबके अपनी-अपनी जीत के दावे हैं। दावों को मजबूती प्रदान करने के लिये तमाम तरह के तर्क भी दिये जा रहे हैं। इन तर्को के पीछे मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने का ‘खाका’ छिपा हुआ है। आरोप-प्रत्यारोप को चुनावी सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। आज स्थिति यह है कि सभी दलों के नेताओं के पास विरोधियों के लिये तो कहने को बहुत कुछ है,लेकिन अपने बारे में बोलते समय कहीं न कहीं इनकी जुबान अटक जाती है। कोई भी दल ऐसा नहीं है जिसे पाक-साफ करार दिया जा सकता हो।

समाजवादी पार्टी कुनबे के झगड़े में उलझी हुई है तो बसपा में नेताओं की भगदड़ मची हुई है। बीजेपी मोदी के सहारे अपनी नैया पार करने की कोशिश में है। उसको कोई ऐसा चेहरा नहीं मिल रहा है,जिसे वह प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर सके। कांग्रेस के लिये समस्या यह है कि उसके युवराज राहुल गांधी अपने भाषणों से सिर्फ अपने भीतर ही उर्जा और जोश भर पाते है।  न तो उनकी बातों से वोटर प्रभावित होते हैं,न ही कार्यकर्ताओं में किसी तरह का जोश देखने को मिलता है। कहने को कांग्रेस ने ब्राहमण नेता और दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को यूपी का भावी सीएम प्रोजेक्ट कर दिया है,लेकिन शीला जी को यही नहीं पता है कि अगर कांग्रेस का सपा से चुनावी तालमेल हो जायेगा तो चुनाव में उनकी क्या हैसियत रहेगी।

बात सबसे पहले सपा की। सपा नेता और सीएम अखिलेश यादव का अपना दामन तो पाक-साफ है,लेकिन उनकी सरकार के कई दंबग,बदजुबान और माफिया टाइप के मंत्री और पार्टी के नेता उनके लिये सिरदर्द बने हुए हैं। सपा नेताओं/कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी और अखिलेश सरकार के समानांतर चलता गुंडाराज विरोधियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। सपा राज में गुंडागर्दी पर लगाम लगाया जाना मुश्किल है, इसका ताजा उदाहरण है बाहुबली अतीक अहमद के गुर्गो द्वारा इलाहाबाद के एक शिक्षण संस्थान में जाकर सुरक्षा कर्मियों के साथ मारपीट और शिक्षको साथ अभद्रता किया जाना है। अतीक के गुर्गे उत्पात मचाते रहे और पुलिस घटना स्थल पर तब पहुंची जब अतीक अपने समर्थकों के साथ चला गया। अखिलेश को अतीक पंसद नहीं हैं, लेकिन वह चचा के चलते मजबूर हैं। चचा को अतीक और मुख्तार जैसे दंबग ही पसंद आते हैं। अखिलेश के हाथ बांध दिये गये है तो पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पार्टी नेताओं की दबंगई के मसले में चुपी साधे रहता है।

पार्टी ही नहीं परिवार का भी बुरा हाल है। सपा में अंकल, चाचा-भतीजे की जंग कभी थमती दिखाई देती है तो कभी यह ‘आग का दरिया’ बन आती हैं। सपा परिवार में टिकट वितरण के साथ फिर से मनमुटाव सामने आने लगा है। हाल ही में आया अखिलेश का बयान,‘ चाचा-अंकल हो न हों,जनता हमारे साथ है।’ काफी कुछ कहता है। उधर, नेताजी मुलायम सिंह यादव को समझ में ही नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें। अखिलेश को मनाते हैं तो शिवपाल नाराज हो जाते हैं और शिवपाल को मनाते हैं तो अखिलेश खेमा आंख दिखाने लगता है। अमर सिंह एक बार फिर नेताजी की ‘नाक का बाल’ बन गये हैं। मुलायम सिंह और पार्टी नोटबंदी के खिलाफ मोर्चा खोले हैं,वहीं अमर सिंह नोटबंदी को सही ठहराने में जुटे हैं। अखिलेश की नाराजगी की परवाह न करते हुए मुलायम ने अमर सिंह को पार्टी का स्टार प्रचारक का दर्जा तक दे दिया है। चंद दिनों के निष्कासन के बाद सपा में वापस आने के बाद प्रोफेसर रामगोपाल यादव नये सिरे से अपनी जड़े मजबूत करने में लगे हैं। सपा दो फाड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। पार्टी का एक धड़ा पुरानी परिपाटी पर चलते हुए मुस्लिम,पिछड़ा,यादव कार्ड खेल रहा है,वहीं सीएम अखिलेश यादव विकास के सहारे चुनाव जीतना चाहते हैं,लेकिन जब उनका विश्वास हिचकोले खाता है तो 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति के आरक्षण कोटे में डालने का कारनामा (प्रस्ताव) भी कर डालते हैं।  विकासवादी छवि बनाने के चक्कर में अखिलेश कई आधे-अछूरी योजनाओं का भी उद्घाटन करते जा रहे हैं। लखनऊ में मेट्रो टेªन और विधान भवन के सामने बने लोक भवन का मामला हो या फिर यमुना एक्सप्रेस वे के उद्घाटन इसी से जुड़ा मसला है। लोकभवन में तो फिर भी कामकाज शुरू हो गया है, लेकिन मेट्रो शुरू होने में तो अभी तीन माह का समय बाकी है और यमुना एक्सप्रेस वे कब आवागमन के लिये खुलेगा कोई नहीं जानता है। इसी लिये अखिलेश, ‘बुआ’ और बसपा सुप्रीमों मायावती के निशाने पर भी हैं। वह अखिलेश के तीन सौ सीटें जीतने के दावे पर तंज कसते हुए कहती हैं कि यह बबुआ द्वारा कही गई ‘बबुआ’ जैसी बाते हैं। आचार संहिता लागू होने की आहट के बीच सीएम ने अरबों करोड़ की हजारों नई योजनाओं का उद्घाटन कर डाला।

तमाम किन्तु-परंतुओं के बीच आश्चर्य होता है कि एक तरफ अखिलेश यादव को सपा का मुख्य ‘ब्रांड’ बताती है और दूसरी तरफ टिकट बंटवारें में अखिलेश को तवज्जो नहीं मिलती है। सपा में जिस तरह से प्रत्याशियों की घोषणा और उनमें बदलाव हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि पार्टी के भीतर  शह-मात का खेल रूकने वाला नहीं है। इसी वजह से चुनाव की घोषणा के बाद तक प्रत्याशियों में व्यापक फेरबदल से इन्कार नहीं किया जा सकता है। संघर्ष टिकट बंटवारे के अधिकार को लेकर है,इसी लिये दागियों को टिकट से असंतुष्ट अखिलेश यह कहकर कि ‘टिकट तो अंतिम समय तक बदलते रहते हैं’ भविष्य में बदलावों को संकेत दे रहे हैं।

सपा की आपसी कलह से सबसे अधिक मुस्लिम वोटर चिंतित है,जिन्होंने 2012 में सपा को सत्ता तक पहुंचाया था। कहने को तो मुसलमनों के पास बसपा का भी विकल्प मौजूद है, लेकिन बसपा राज में मुस्लिमों के उतने हित नहीं सध पाते हैं जितने सपा राज में सध जाते हैं। सपा एक तरफ आपसी कलह से जूझ रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर कोई फैसला नहीं किये जाने से भी सपा के मुस्लिम वोटर परेशान हैं। उन्हें डर सता रहा है कि कहीं 2014 के लोकसभा चुनाव जैसे हालात न पैदा हो जायें। 2014 के चुनाव में एक भी मुस्लिम नेता चुनाव नहीं जीत पाया था। किसी गलतफहमी की वजह से मुस्लिम वोट अगर सपा-बसपा के बीच बंटता हैं तो इसका कांग्रेस को तो कोई खास नुकसान नहीं होगा,क्योंकि उसके पास यूपी में खोने के लिये कुछ ज्यादा नहीं है, लेकिन सपा की सियासी जमीन खिसक सकती है।

उधर, मौके की नजाकत को भांप कर बसपा सुप्रीमों मायावती मुस्लिमों पर खूब डोरे डाल रही हैं। वह मुस्‍ालमानों को अपने काम गिनवाने के साथ-साथ मुस्लिम भाईचारा सम्‍मेलन के द्वारा भी लुभा रही हैं। बसपा ने विधानसभा चुनावों में मुसलमानों पर बड़ा दांव लगाते हुए करीब सवा सौ टिकट मुस्लिम उम्‍मीदवारों को दिए है। बसपा सुप्रीमों का गणित बिल्कुल साफ है। उन्हें लगत है कि 18-19 फीसदी मुसलमान और 22-23 फीसदी दलित वोट बसपा की झोली में पड़  जाएं तो उसका बेड़ा पार हो जाएगा। मायावती के अलावा बसपा महासचिव नसीमुद्दीन और प्रदेश अध्‍यक्ष राम अचल राजभर भी ‘मु‍स्लिमों को सपा से आगाह कर रहे हैं। बसपा द्वारा जगह-जगह तमाम माध्यमों से बताया जा रहा है कि माया राज में उनके लिए क्‍या-क्‍या काम किए गये थे। तीन तलाक के मसले पर बसपा ने मु‍स्लिमों की भावना का आदर किया है। बसपा मु‍स्लिमों को यह भी बता रही है कि भाजपा और सपा में कितनी नजदीकियां हैं। भाजपा शासन में दलितों और मुसलमानों पर हुए अत्‍याचार को भी गिनाया जा रहा है। ताकि लोग भाजपा, सपा और बसपा में से अपने लिए बेहतर विकल्‍प चुन सकें।

गौरतलब हो करीब 150 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक होता हैं।  मायावती मुसलमानों से कह रही हैं कि सपा में चल रही जंग के कारण उसके नेता दो खेमों में बंटे हुए हैं। अखिलेश के लोग शिवपाल के और शिवपाल के लोग अखिलेश के लोगों को हराने में लगे हैं। ऐसे में मुसलमानों ने सपा को वोट करा तो उनका वोट खराब हो जाएगा और इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा। इसलिए यूपी में भाजपा को रोकना है तो मुस्लिम उनकी पार्टी को वोट दें।

पूरे देश में लगातार हार का मुंह देख रही कांग्रेस यूपी को लेकर एक बार फिर आशावान है। कांग्रेस की कोशिश अपने परंपरागत ब्राहमण, दलित,मुस्लिम और किसान वोटरों को साधने की है। कांग्रेस की खाट पंचायत, दलित स्‍वाभिमान यात्रा, राहुल संदेश यात्रा इसी का हिस्सा है। देश के सबसे बड़े सूबे यूपी पर सियासी कब्‍जे की लड़ाई को कांग्रेस 2019 की रिहर्सल मानकर चल रही है। बसपा की तरह कांग्रेस भी 23 फीसदी दलित वोट बैंक और 19 फीसदी मुस्लिम वोटों पर सबसे तगड़ी नजर लगाए हुए है। मुस्लिमों को बताया जा रहा है कि पूदे देश में अगर बीजेपी को कोई रोक सकता है तो कांग्रेस ही है। इसी तरह कांग्रेस अपनी तमाम यात्राओं के सहारे दलितों को भी कई वायदे गिना रही है। इसमें मुख्‍य रूप से दलितों की शिक्षा, सुरक्षा और उनके स्‍वाभिमान से जुड़े मसलों के अलावा हर दलित खेतिहर मजदूर के परिवार को आवास। दलित युवाओं को रोजगार के लिए बिना गारंटी तीन लाख का लोन। जवाहर नवोदय विद्यालय की तरह हर ब्‍लॉक में दलितों के लिए आवासीय विद्यालय। दलितों को उनके अधिकारों की सुरक्षा व उत्‍पीड़न की दशा में न्‍याय व पुनर्वास के लिए प्रदेश के सभी 1388 थानों में ‘सुरक्षा मित्र’ की नियुक्ति होगी। दलित परिवारों को उनसे संबंधित योजनाओं का पूरा लाभ दिलाने के लिए सभी 821 ब्‍लाकों में ‘विकास मित्र’ की नियुक्‍ति होगी। अंबेडकर ‘आरोग्‍य श्री’ योजना के तहत हर दलित परिवार को सरकारी या निजी अस्‍पताल में दो लाख रुपये तक फ्री चिकित्‍सा सहायता। हर दलित छात्र को 10वीं के बाद हॉस्‍टल के लिए प्रतिमाह 1000 रुपये की छात्रवृत्‍ित जैसे लोकलुभावन वादे शामिल हैं।

दलित वोट बैंक पर नजर लगाये कांग्रेस आलाकमान कहता है उसकी दलित स्वाभिमान यात्रा 100 गांवों में जाएगी। करीब 80 दिन में यह प्रदेश का भ्रमण करेगी। एक दिन एक गांव में रहेगी। यात्रा को लीड करने वाले नेता आलाकमान को हर रोज की गतिविधि का ब्‍योरा भेजेंगे। उत्‍तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी अनुसूचित जाति विभाग की ओर से रवाना की गई इस स्वाभिमान यात्रा का  खास चेहरा दलित नेता और पूर्व नौकरशाह पीएल पूनिया हैं तो ब्राहमणों को लुभाने के लिये दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को लगाया गया है। सियासी चाल में फिल्म अभिनेता और यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष राजब्बर भी अपनी पिछड़ी जाति का बखान करने लगे हैं। गुलाम नबी आजाद के सहारे कांग्रेस मुसलमानों को अपने पाले में खींचना चाहती है। राजनैतिक जानकार यह मान कर चल रहे हैं कि इस बार यूपी का विधानसभा चुनाव राहुल गांधी की अग्नि परीक्षा लेकर रहेगा। अगर यूपी की सत्ता में भी बीजेपी की वापसी हो गई तो फिर कांग्रेस का मिशन 2019 शायद ही सफल हो पायेगा। सोनिया गांधी की गिरती सेहत और राहुल गांधी के पार्टी अध्‍यक्ष की कुर्सी की ओर बढ़ रहे कदम भी यूपी की हार-जीत का फासला तय करेंगे। इसीलिए राहुल ने यूपी चुनाव की रणनीति बनाने लिए प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार को जिम्‍मेदारी सौंपी है। प्रशांत लगातार इस कोशिश में लगे हैं कि कांग्रेस-सपा के बीच गठजोड़ हो जाये।

उत्तर प्रदेश में सत्ता का सियासी वनवास खत्म करने के लिये सबसे अधिक बेचैन भारतीय जनता पार्टी नजर आ रही है। बसपा, सपा और कांग्रेस भाजपा के प्रचार तंत्र के सामने कहीं नहीं टिक रहे। सबसे ज्‍यादा रैलियां भाजपा ने ही की हैं। भाजपा यूपी में करो या मरो के हिसाब से काम कर रहा है। उसे पता है कि यूपी में अगर बीजेपी का विजयी रथ अगर ठहर गया तो  2019 में दिल्ली के  लिए उसकी राह काफी मुश्किल हो जाएगी। बीजेपी की परिवर्तन यात्रा, पिछड़ा वर्ग सम्‍मेलन, युवा सम्‍मेलन और महिला सम्‍मेलन से लोगों को जोड़ने की कोशिश जारी है। महिला विंग की कमान मायावती पर विवादित टिप्पणी करने वाले निष्कासित बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह की पत्नी स्‍वाती सिंह संभाल रही हैं जो मायावती-दयाशंकर प्रकरण से उभरीं हैं। पार्टी की कोशिश की है लगभग हर जिले में महिला, युवा और पिछड़ा वर्ग सम्‍मेलन करके ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जाए। हालांकि अभी तक पार्टी ने एक भी टिकट घोषित नहीं किया है। वैसे कहा यह भी जा रहा है कि यूपी सहित पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव में नोटबंदी के पक्ष और विपक्ष में वहां की जनता अपना फैसला सुना सकती है। कुल मिलाकर यूपी की सियासत मकड़जाल जैसी उलझी नजर आ रही है।

परिवारवाद भी चर्चा में..

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में प्रत्याशियों को लेकर इस बार भी कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। हमेशा की तरह इस बार भी बागी, दागी और परिवारवाद का बोलबाला दिखने लगा है। चुनाव तारीखों के ऐलान के बीच भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा में टिकट के लिए मारामारी तेज हो गई है। बसपा ने अघोषित रूप से अपने प्रत्याशी तय कर लिये हैं। सपा में भी टिकट बंटवारे का काम तेजी से चल रहा है,लेकिन राष्ट्रीय पार्टी कहलाने वाली कांग्रेस और बीजेपी में अभी मामला ठंडा पड़ा हुआ है। बीजेपी तो मकर संक्रांति के बाद टिकट घोषित करने की बात कह रही है,लेकिन कांग्रेस का ध्यान टिकट बांटने से अधिक सपा के साथ गठबंधन पर लगा है। कांग्रेस बिहार की तरह यूपी में भी 70-80 सीटें मिलने पर भी सपा के सामने समपर्ण कर सकती है। बात परिवारवाद की कि जाये तो  बसपा में जहां रिश्तेदारों की संख्या सीमित है, वहीं भाजपा और सपा में दिग्गज नेता अपने परिवार और रिश्तेदारों के लिए विधानसभा के टिकट का जुगाड़ करने के लिये तन-मन-धन सेें जुटे हुए हैं।

यूपी विधानसभा को लेकर भाजपा में इस बार सबसे अधिक टिकट के लिए मारामारी चल रही है। नोटबंदी के पश्चात कुछ राज्यों में हुए निकाय और विधान सभा तथा लोकसभा के उप-चुनावों में बीजेपी जिस तरह से उभर कर आई है,उससे उसके हौसले बढ़े हुए हैं। बीजेपी में सर्वे और इंटरव्यू के सहारे पार्टी दिग्गजों के रिश्तेदारों को एडजस्ट करने की कवायद चल रही है। पुराने दिग्गज नेता और राजस्थान के राज्यपाल से लेकर केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र और पूर्व मुख्यमंत्री जगदम्बिका पाल अपने-अपने रिश्तेदारों के लिये हाथ-पैर मार रहे हैं। दूसरी ओर बाहरी नेताओं ने भी अपने- अपने चहेतों की सूची पार्टी आलाकमान  को सौंप रखी है। अगर सब कुछ ठीकठाक रहा तो कल्याण सिंह के पोते और राजबीर सिंह राजू भईया के पुत्र एटा विधानसभा से चुनाव लड़ सकते हैं। इसके अलावा फतेहपुर सीकरी से कल्याण के एक और रिश्तेदार हेमवीर सिंह ने भी चुनाव लड़ने के लिए कमर कस ली है। वह लोध समाज के वोटों को भाजपा के पाले में ला सकते हैं। केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र केंद्र में अपनी आखिरी पारी खेल रहे हैं। वह अपने सुपुत्र अमित मिश्र को समय रहते पार्टी में एडजस्ट करना चाहते हैं। अमित के लिए लखनऊ की सीट उपलब्ध कराई जा सकती है। इसके अलावा जगदम्बिका पाल भी बस्ती सदर से अपने रिश्तेदार को चुनावी मैदान में उतारने की कवायद में हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और आगरा के सांसद राम शंकर कठेरिया की धर्मपत्नी को इटावा से टिकट मिलना लगभग तय है। पूर्व मंत्री उदय भान करवरिया की धर्मपत्नी नीलम करवरिया भी इलाहाबाद के मेजा से टिकट की होड़ में हैं। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पुराने दिग्गज नेता ओमप्रकाश सिंह के सुपुत्र मिर्जापुर से टिकट के लिए कतार में हैं। इसके अलावा बसपा से भाजपा में शामिल हुए दिग्गज नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक भी अपने चहेतों के लिए टिकट चाहते हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य के सुपुत्र उत्कृष्ट मौर्य रायबरेली से चुनाव लड़ सकते हैं जबकि ब्राह्मण चेहरे के तौर चर्चित बृजेश पाठक की धर्मपत्नी को भी टिकट मिल सकता है। कांग्रेस से नाराज होकर भाजपा में आईं वरिष्ठ नेता रीता बहुगुणा जोशी अपने पुत्र मयंक जोशी के लिए टिकट चाहती हैं। हालांकि भाजपा रीता बहुगुणा जोशी को इलाहाबाद से चुनाव लड़ाना चाहती है। वरिष्ठ नेता लालजी टंडन के सुपुत्र गोपालजी टंडन लखनऊ से विधायक हैं। उनका टिकट पक्का माना जा रहा है। भाजपा सरकार बनने की स्थिति में सत्ता में महत्वपूर्ण भागीदारी मिल सकती है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सुपुत्र पंकज सिंह बीजेपी के प्रदेश स्तरीय नेता हैं। चुनाव में उनकी भूमिका महत्वहपूर्ण होगी,उनको चुनाव लड़ाने का फैसला हाईकमान को लेना है। सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में बाहुबली से लेकर पार्टी दिग्गजों के रिश्तेदारों तक के टिकट पक्के माने जा रहे हैं। सपा सु्प्रीमो मुलायम सिंह यादव के परिवार के दो से तीन नए चेहरे आगामी विधानसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमा सकते हैं। मुलायम सिंह की बहू अपर्णा यादव को लखनऊ विधानसभा से टिकट मिल चुका है। शिवपाल यादव के सुपुत्र आदित्य यादव अपने पिता की विधानसभा जसवंत नगर के प्रभारी हैं। इस बार वो भी चुनाव में अपना भाग्य आजमाएंगे। सपा ने अब तक लगभग करीब 210 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। इनमें आजम खान के बेटे औबेदुल्ला आजम को रामपुर के स्वार से टिकट मिला है। इससे पहले सूची में शाही इमाम अहमद बुखारी के दामाद उमर अली खान को भी बेहट, सहारनपुर से टिकट मिल चुका है। सपा में बाहुबलियों को भी दिल खोलकर टिकट दिया गया है। इनमें सिगबतुल्ला अंसारी को गाजीपुर के मोहम्दाबाद सीट, अतीक अहमद को कानपुर कैंट और नसीमुद्दीन सिद्दीकी के भाई हसीमुद्दीन सिद्दीकी को टिकट दिया गया है। अंसारी बंधुओं का टिकट भी पक्का है जबकि मधुमिता हत्याकांड मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व विधायक अमरमणि त्रिपाठी के पुत्र अमनमणि को भी टिकट मिल चुका है। उन पर भी अपनी पत्नी की हत्या का आरोप का है,लेकिन सीबीआई द्वारा उनकी गिरफ्तारी के बाद अब अमनमणि का टिकट कट भी सकता है। सपा ने कांग्रेस के बागी विधायक मुकेश श्रीवास्तव को भी टिकट दिया है। मुकेश एनएचआरएम घोटाले में आरोपी हैं। ये हालात सभी राजनीतिक दलों में हैं।

यूपी में आधे विधायक दागी

उत्तर प्रदेश के कुल 403 विधायकों में से 47 प्रतिशत यानी 189 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 98 ऐसे हैं जिनके ऊपर हत्या, बलात्कार जैसी संगीन धाराओं में रिपोर्ट दर्ज है। विधायकों के हलफनामों के आधार पर तैयार यूपी इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक सपा के 224 विधायकों में से 111 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 56 के खिलाफ गंभीर मामले हैं। सपा के बाद दूसरा नंबर बसपा का है। उसके 80 विधायकों में से 29 के खिलाफ आपराधिक मुकदमे हैं, जिसमें से 14 माननीयों पर तो गंभीर मामले हैं। इस मामले में भाजपा का ट्रैक रिकार्ड भी अच्छा नहीं। उसके 47 में से 25 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं जबकि इनमें 14 पर गंभीर आरोप हैं। कांग्रेस के 28 में से 13 विधायकों पर आपराधिक मामले हैं।

यूपी के छह विस चुनावों में कांग्रेस की परफार्मेंस

वर्ष   सीट
2012  28
2007  22
2002  25
1996  33    
1993  28
1991  46

यूपी 2012 चुनाव में रही पार्टियों की स्थिति

पार्टी/निर्दलीय             सीट   वोट प्रतिशत

समाजवादी पार्टी          224  29.13 प्रतिशत
बहुजन समाजवादी पार्टी   80   25.91
भारती जनता पार्टी         47   15.00
कांग्रेस पार्टी               28  11.65
राष्ट्रीय लोकदल            09  2.33
निर्दलीय                   06   4.13
पीस पार्टी                  04  2.35
कौमी एकता दल          02  0.55   
अपना दल                 01  0.90
राष्ट्रवादी कांग्रेस           01  0.33
इत्ततहाद-ए-मिल्लत का. 01  0.55

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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मोदी के मंत्री का आरोप- 3000 करोड़ का मआवजा अखिलेश और उनके बाप मुलायम खा गए (देखें वीडियो)

मोदी सरकार के जल संसाधन राज्य मंत्री संजीव बाल्यान ने यूपी में सत्ता परिवर्तन की बजाय व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत बताते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव पर आग बबूला आरोप लगाए है। कहा है कि लखनऊ से जिला बिकते हैं और ओलावृष्टि का मुआवजे का केंद्र का भेजा 3000 करोड़ रुपया अखिलेश और उनके बाप मुलायम खा गए है। हाथरस जिले के क़स्बा सादाबाद में पार्टी के पिछड़ावर्ग सम्मेलन में सिरकत करने आये केंद्रीय राज्य मंत्री श्री बाल्यान ने अखिलेश सरकार के कामकाज पर सबाल खड़ा करते हुए कहा है कि लखनऊ से दो- दो करोड़ में जिला बिकते है फिर यहां आकर एसपी दस- दस लाख बीस -बीस लाख में थाने बेचते है। सूबे में ऐसी सरकार होगी तो कैसे काम चलेगा।

ओलावृष्टि में हुए नुकसान का मुआवजा किसानों तक न पँहुचने की बात कहते हुए ही उन्होंने बताया कि केंद्र ने ३००० करोड़ रुपया भेजा था जिसे अखिलेश तथा मुलायमसिंह खा गए। यही नही मंत्री श्री बाल्यान ने यूपी पुलिस की निरीहता की कहानी परोसते हुए कहा कि इन्हें तो डीजल पैट्रोल के भी पैसे नही मिलते है वो भी इन्हें रिश्वत से डलवाना पड़ता है। उसके बाद भी जगह जगह पुलिस पिटती है तो इसमें गलती उनकी नही समाजवादी पार्टी की है। खनन माफियाओं और शराब माफियाओं के एक फोन पर तबादले हो जाते है इनके। उन्होंने पुलिसवालों के लिए कहा कि यूपी में बीजेपी की सरकार बनने पर एक सप्ताह में एक छुट्टी मिलने की व्यवस्था होगी। व्यवस्था परिवर्तन की हिमायत करते हुए उन्होंने क्षेत्रीय पार्टियों की सरकारों को चोर- डाकू की संज्ञा तक दे दी। 

नोट बंदी के मुद्दे पर बोलते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री श्री बाल्यान ने क्षेत्रीय दलों के नेताओं को निशाने पर लिया। बीएसपी नेता मायावती पर उन्होंने दो से लेकर चार करोड़ में ४०३ सीटें बेचने और डेढ़ दो हज़ार करोड़ रुपया कमाने का आरोप लगाया और कहा कि बेचारी के सारे नोट एक फैसले से कागज के टुकड़े हो गए। सपा में चाचा भतीजे की लड़ाई को भी उन्होंने पैसे से जोड़ा। किसानों के लिए यह जानकारी देते हुए कि सरकार बनने पर उन्हें मध्य प्रदेश की तरह बिना ब्याज लोन मिलेगा। मंत्री श्री बाल्यान ने पीएम मोदी की सोच को भी लोगों को बताया। कहा कि भृष्ट नेताओं और अधिकारियों से जो पैसा आएगा उससे लोन की ब्याज देने का काम किया जायेगा। नोटबंदी की परेशानी को स्वीकारते हुए उन्होंने इसे आखिरी लाइन बताया। कहा कि जनता को इस लाइन में लगने के बाद फिर लाइन में लगने की जरूरत नही पड़ेगी।

संबंधित वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : https://youtu.be/0lwKEvIF4vs

विनय ओसवाल
हाथरस
9837061661​

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शिक्षक रामाशीष सिंह की हत्या के लिए सत्ता के नशे में चूर अखिलेश जिम्मेदार

लखनऊ की ‘मित्र पुलिस’ सपाईयों की मित्र, जनता की शत्रु : चचा-भतीजे में माल के बंटवारे के झगड़े में आए सपाई गुंडों की दामादों की तरह खातिर : पेंशन मांगने वालों पर कातिलाना हमला : हजरतगंज में सिर्फ गंजिंग हो सकती है, इंसाफ की आवाज नहीं उठ सकती : लखनऊ, 08 दिसम्बर 2016 । रिहाई मंच ने लखनऊ में शिक्षकों पर पुलिसिया हमले और उसमें शिक्षक रामाशीष सिंह की मौत के लिए अखिलेश यादव को जिम्मेदार ठहराया है। मंच ने कहा कि पिछली 2 नवंबर को भी हजरतगंज गांधी प्रतिमा पर इंसाफ मांगते रिहाई मंच नेताओं पर इसी तरीके से कातिलाना हमला पुलिस ने किया था। आज जिस तरह पुलिस ने शिक्षक का कत्ल किया और सैकड़ों को गंभीर रूप से घायल किया, वह साफ करता है कि यह हमले सिर्फ पुलिसिया नहीं है बल्कि यह सब सरकार की सरपरस्ती में हो रहे हैं।

रिहाई मंच के लाटूश रोड स्थित कार्यालय पर हुई बैठक में मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने शिक्षक रामाशीष सिंह के कत्ल के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि अखिलेश अपनी धूमिल छवि को बचाने के लिए इंसाफ मांगते लोगों पर कातिलाना हमले करवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव और रिहाई मंच लखनऊ इकाई के महासचिव शकील कुरैशी पर भी इसी तरीके से हजरतगंज पुलिस ने कातिलाना हमला किया था। अगर सूबे के प्रशासन ने ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई की होती तो आज शिक्षक रामाशीष सिंह का कत्ल करने की हिम्मत इस पुलिस में नहीं होती।
 
रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि जिस तरीके से सूबे की राजधानी में शिक्षक रामाशीष सिंह की दौड़ा-दौड़ा पीटा और हत्या की, वह साबित करता है कि सूबे में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि इस सरकार में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पुलिस और नेता कत्ल करते हैं और फिर अखिलेश मुआवजा देते हैं। यह इंसाफ को कुचलने की एक परंपरा सी बन गई है। जिस तरीके से पिछले दिनों बांदा में पांच मुस्लिम युवकों को मार-मार कर पुलिस ने चमड़ी उधेड़ ली, इलाहाबाद के एक युवक आरिफ को इतना मारा कि वह कोमा में है- ठीक इसी तरीके से सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा ने पत्रकार जगेन्द्र को जिन्दा जलवा दिया। बाराबंकी में पत्रकार की मां से थाने में बलात्कार की कोशिश और फिर उन्हंे जिन्दा जला दिया जाना, बहराइच में आरटीआई कार्यकर्ता को पुलिस की मौजूदगी में दौड़ा कर मार दिया जाना- ये सिर्फ घटनाएं नहीं हैं बल्कि अखिलेश सरकार का वह क्रूरतम चेहरा है जिस पर विकास का नकाब लगाकर अखिलेश राजनीति करना चाहते हैं।   उत्तर प्रदेश दलित, मुस्लिम और महिलाओं के खिलाफ हिंसा में सर्वोच्च स्थान पर है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी मूलभूत सुविधाएं फेल हैं। पर हमारे मुख्यमंत्री को सूबे के किसानों से छीनी गई जमीन पर हाइवे बनाने में ही गर्व है।
 
रिहाई मंच नेता जैद अहमद फारूकी ने कहा कि लखनऊ पुलिस को इंसाफ की मांग करने वालों का कत्ल करने के लिए ही ‘मित्र पुलिस’ का तमगा दिया गया है। जो नेताओं के लिए तो मित्र है लेकिन अपने पंेशन की मांग करने वाले शिक्षकों और गरीब जनता के लिए शत्रू है। अम्बेडकर कांग्रेस के फरीद खान ने आरोप लगाया कि अखिलेश सरकार में पुलिस सपा कार्यकर्ताओं की तरह काम कर रही है।
 
रिहाई मंच लखनऊ इकाई महासचिव शकील कुरैशी ने कहा कि बुधवार को राजधानी की सड़कों पर जिस तरीके से शिक्षकों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा जा रहा था, उसने 2 नवंबर की रिहाई मंच के धरने पर नेताओं पर हुए पुलिसिया हमले को एक बार फिर से दोहराया है। ठीक इसी तरह 2 नंबर को जब हम भोपाल फर्जी मुठभेड़ के सवाल पर धरने पर बैठे थे, उस वक्त हमारे साथी राजीव यादव और हमें न सिर्फ दौड़ा-दौड़ा कर ठीक इसी तरह पीटा गया और घंटों पुलिस हिरासत में जिस तरीके से हमारे बेहोश साथी को पुलिस पीट रही थी और बार-बार यह कहने के बावजूद कि साथी की मौत हो जाएगी, मारे जा रही थी से साफ हो जाता है कि हमले जानबूझ कर किए जा रहे है। जिसके नतीजे के रूप में आज रामाशीष सिंह की मौत हमारे सामने है।
 
शरद जायसवाल ने कहा कि काला धन के बंटवारे के लिए चचा-भतीजे की लड़ाई में शामिल होने आए प्रदेश भर के सपाई गुंडों की तो ‘मित्र पुलिस’ दामादों की तरह सेवा करती है लेकिन अपने वाजिब हक की मांग करने वाले शिक्षकों को पीट कर मार डालती है।
 
रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि सूबे में जिस तरह से लोकतांत्रिक आवाजों पर अखिलेश का पुलिसिया हमला बढ़ रहा है, वह साफ करता है कि वह ऐसी आवाजों को दबाकर नाइंसाफी की हकीकत पर परदा डालने की कोशिश कर रहे हंै। उन्होंने कहा कि राजधानी जेसे संवेदनशील जगहों पर आपराधिक प्रवित्ति वाले पुलिस अधिकारियों को तैनात कर अखिलेश की सरपरस्ती में ऐसी क्रूरतम कारवाइयां हो रही हैं। मंच प्रवक्ता ने कहा कि फर्जी विकास की राजनीति हर वक्त हिंसात्मक होती है जिसका मोदी उदाहरण हैं और अखिलेश भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं। तारिक शफीक ने कहा कि विधानसभा पर इंसाफ की गुहार करती गरीब आम जनता पर सिर्फ इसलिए पुलिसिया हमले किए जा रहे हैं ताकि गंजिंग करती टाइल्स मार्का जनता शोषितों के शोषण की इन सच्चाइयों को न जान पाए। उन्होंने अखिलेश से सवाल किया कि आम गरीब जिस तरह के हालात में हैं वह उनसे इंसाफ की मांग नहीं करेंगे तो क्या सिर्फ मैट्रो और हाइवे देखकर अपना पेट भरेगें?
 
द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता रिहाई मंच
9415254919

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यूपी का महाभ्रष्ट मंत्री गायत्री प्रजापति आजकल मुलायम और अखिलेश दोनों की आंखों का तारा-दुलारा हो गया है!

Yashwant Singh : दिन रात नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिख-लिख के इस शख्स को पीएम बनवा चुके सेकुलर / कामरेड / दलित / पिछड़े / मुस्लिम किस्म के भाइयों-बहनों से अनुरोध करूंगा कि कभी-कभी अपने ‘घर-परिवार’ यानि सपा-बसपा की कारस्तानी पर भी कलम चला लिया करें. उत्तर प्रदेश का महाभ्रष्ट मंत्री गायत्री प्रजापति आजकल मुलायम और अखिलेश की आंखों का तारा दुलारा हो गया है. बरेली में मंच पर भाषण दे रहे नेताजी मुलायम सिंह यादव अपनी बात सीएम अखिलेश यादव तक पहुंचाने के लिए बार बार गायत्री प्रजापति को निरखते-संबोधित करते रहे.

उफ्फफ… इस अदा पर कौन न मर जाए. दिन रात समाजवाद की दुहाई देने वाले ये बाप-बेटे असल में जंगलराज के प्रवर्तक हैं. बाप भदेस टाइप का जंगलराज चलाता था तो बेटा थोड़ा साफिस्टिकेटेड तरीके से चला रहा है. जनता के अरबों रुपये लुटा कर दिन रात अखबारों चैनलों विज्ञापन चलवा देख कर ये बाप बेटे आपस में ही यूपी को उत्तम प्रदेश घोषित करते हुए तालियां पीट कर एक दूजे की पीठ थपथपा लिया करते हैं.

जानने वाले जानते हैं कि गायत्री तो बहाना है, असल में यूपी में उगाही / करप्शन की सारी नदियां वाया गायत्री एंड अदर दरअसल यादव खानदान के समुद्र में ही विलीन होती हैं. कुछ लैपटाप बांटकर, कुछ सड़क बनाकर, कुछ घोषणाएं करके ये टीपू मान चुका है कि उससे बड़ा विकास पुरुष कोई न हुआ है न होगा. और धन्य हैं इसके पेड हरकारे जो इसकी हर अदा पर वाह वाह कहते लिखते गाते रहते हैं और बदले में भ्रष्टाचार के संगम से कुछ सीपियां चुन लाते हैं.

इन कथित समाजवादियों से तो लाख गुना अच्छी थीं जयललिता जिन्होंने गरीबों के लिए जीना, खाना, पढ़ना, इलाज कराना, इलाज कराना, शादी करना… सब कुछ लगभग फ्री कर दिया था. सच्ची समाजवादी तो जयललिता को कहना चाहिए, भले ही वो ब्राह्मण खानदान में पैदा हुईं.

जाति की राजनीति करने वालों को धर्म की राजनीति करने वालों का विरोध करने का कोई नैतिक हक नहीं है. सबसे पहले आप आज के समय का मनुष्य बनिए, तार्किक होइए, वैज्ञानिक सोच से लैस होइए, जाति-धर्म से उपर उठिए, अपने संस्कार-सोच को अपग्रेड कर माडर्न बनाइए, जो गलत हो तो उसे गलत कहने का साहस रखिए.

सेलेक्टिव होकर, चूजी होकर, एजेंडा लेकर आलोचना करते रहना असल में एक किस्म का फीसावाद ही है. उनका धर्म और झूठ आज देश को आतंकित किए है तो आपका जातिवाद और जंगलराज प्रदेश को चिरकुट किस्म का बनाए है.

फिलहाल तो आज मुलायम और अखिलेश को शेम शेम कहने का दिल कह रहा है क्योंकि भ्रष्टाचारियों, अपराधियों, लुटेरों को गले लगाए बाप-बेटा जब लोकतंत्र, जनता व समाजवाद की बात करते हैं तो उत्तर प्रदेश के साथ इनका छल, झूठ और दगा खुद-ब-खुद सार्वजनिक हो जाता है व इनके प्रति भी एक नफरत का भाव पैदा हो जाता है, वैसे ही जैसे धर्म के कारोबार से अंधविश्वास /  नफरत / अज्ञान / दलाली  फैला कर जनविरोधी राज चलाने वाले सवर्ण सामंती मानसिकता के नेताओं के प्रति होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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सरहद की रक्षा करने वाला फौजी और उसके परिजन यूपी में सुरक्षित नहीं (देखें वीडियो)

यूपी में जंगलराज का आलम ये है कि सेना का एक जांबाज़ जवान यूपी पुलिस से न्याय की मांग कर रहा है और पुलिस कान में तेल डाले सोई है. आगरा के रहने वाले फौजी के घर हुई थी चोरी, लेकिन पुलिस ने अब तक नहीं की कोई कार्रवाही. पीड़ित सैनिक काट रहा है थानों चौकियों के चक्कर. जम्मू-कश्मीर में तैनात अरविन्द कुमार पिछले बीस वर्षों से भारत माता की हिफाज़त बॉर्डर पर खड़े होकर कर रहा है. रविन्द्र के कंधे पर देश की इज्जत और हिफाज़त की जिम्मेदारी है, लेकिन उसका खुद का घर असुरक्षित है.

आगरा के थाना एत्मादौला क्षेत्र अंतर्गत गायत्री विहार कॉलोनी निवासी अरविन्द कुमार सेना के घर में उनकी पत्नी और माँ रहती हैं. कुछ दिन पूर्व उसके घर कुछ बदमाशों ने धावा बोल दिया और लाखों के जेवरात और नकदी पार कर ले गए. इसकी जानकारी जब अरिवन्द को दी गई तो वह आगरा दौड़ा चला आया. वह शिकायत करने थाने पहुँचा. उसका आरोप है कि पहले तो पुलिस उसकी चोरी की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए तैयार ही नहीं थी. जैसे तैसे उसकी एफआईआर दर्ज की, लेकिन अब तक न तो चोरों को गिरफ्तार किया गया है और न उसकी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाही की गई.

अरविन्द इस सिलसिले में आगरा डीएम से भी मिल चुके है लेकिन वह भी आश्वासन देकर भगा देते हैं. फौजी अरविंद ने कहा जब भारत देश में सैनिक का घर सुरक्षित नहीं हो सकता है तो आमजन कैसे सुरक्षित रह सकता है. उसका कहना है आगरा पुलिस से उसको कोई उम्मीद नहीं है. अब उसका पुलिस से विश्वास उठ गया है. वीडियो देखने के लिए इन लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/pZp37521XN8

https://youtu.be/7RVu1Rv2Njo

आगरा से फरहान खान की रिपोर्ट.

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