गंभीर रूप ले रहा मुस्लिमों के खिलाफ बन रहा माहौल

बहुत संवेदनशील मुद्दे पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं। आज की तारीख में यह लिखना बनता भी है। मैं बात कर रहा हूं पुरे विश्व में मुस्लिमों के खिलाफ बन रहे माहौल की। चाहे अमरीका हो, रूस हो, फ्रांस हो, नेपाल हो या फिर भारत या फिर गैर मुस्लिम अन्य कोई देश लगभग सभी देशों में मुस्लिमों के खिलाफ एक अजब सा माहौल बनता जा रहा है। यहां तक कि मुस्लिमों का साथ देते आ रहे चीन में भी। जो मुस्लिम देश हैं या तो वे दूसरे समुदायों से भिड़ रहे हैं या फिर आतंकवाद से जूझ रहे हैं। कहना गलत न होगा कि मुस्लिम समाज पर एक आफत सी आ गई है।

मैं इस माहौल का बड़ा कारण मुस्लिम समाज में पनपे आतंकवादी संगठनों को मानता हूं। चाहे आईएसआईएस हो, लस्कर ए तैयबा हो। या फिर अन्य कोई संगठन। लगभग सभी आतंकी संगठन किसी न किसी रूप में मुस्लिम समाज से संबंध रखते हैं। यही वजह है कि जब भी आतंकवाद पर कोई बड़ी बहस होती है तो मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा किया जाता है। आतंकवाद मुद्दे पर मुस्लिम समाज की चुप्पी से गलत संदेश जा रहा है।

मुस्लिमों को समझना होगा कि आतंकवाद मुद्दे पर मुस्लिम देश के रूप में पहचान बना चुपे पाकिस्तान की खुलकर पैरवी करने वाले चीन में भी मुस्लिमों के लिए अच्छी खबर नहीं आ रही हैं। हाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद की पैरवी करने तथा आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का साथ न देने वाले चीन में इन दिनों इस्लाम-विरोधी माहौल बन रहा है। हाल ही में केंद्रीय चीन स्थित शहर नांगांग में जब एक मस्जिद बनने का प्रस्ताव पारित हुआ तो स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए बड़ी संख्या में लोग सोशल मीडिया पर मुस्लिम-विरोधी संदेश पोस्ट करने लगे।

मुस्लिम बहुल शिनजांग प्रांत में चीन ने दाढ़ी रखने-बुर्का पहनने पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही धार्मिक तरीके से शादी करने पर रोक लगा दी गई।  विश्व की बड़ी शक्ति माने जाने वाले अमरीका के राष्ट्रपति डोलाल्ड ट्रंप मुस्लिमों को लेकर कोर्ट से भी टकराने को तैयार हैं। सबसे महफूज जगह भारत में भी मुस्लिमों के खिलाफ बड़ा भयानक माहौल बना हुआ है।
अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज को इन सब पर मंथन करना होगा। एक देश समझ में आ सकता है। एक समाज समझ में आ सकता है। पूरे विश्व में यदि मुस्लिमों के खिलाफ माहौल बना है तो यह निश्चित रूप से बड़ी बहस का मुद्दा है।

मुस्लिम समाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंथन करना होगा कि आखिर उनके समाज में ऐसी क्या-क्या कमियां आ गईं कि सभी के सभी उनके पीछे पड़ गए। उनको संदेह की दृष्टि से देखने वाले लोगों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए मुस्लिम आतंकवाद के खिलाफ सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे है? क्यों नहीं उन लोगों का विरोध करते जो आतंकवाद के मुद्दे पर पूरे के पूरे मुस्लिम समाज को घसीट लेते हैं।

मुझे लगता है कि आज फिर मुस्लिम समाज को उस भाईचारे को लेकर अभियान की जरूरत है, जिसके लिए इस समाज ने समय-समय पर लोकप्रियता बटोरी है। जो आतंकवाद पूरी मानव जाति का दुश्मन बना हुआ है, उसके खिलाफ मुस्लिम समाज को ही मोर्चा संभालना होगा। जो राजनीतिक दल वोटबैंक के रूप में उनका इस्तेमाल कर रहे हैं उन्हें मुंह तोड़ जवाब देना होगा। भटके बच्चों को हथियार और कलम का अंतर समझाना होगा। मुस्लिम समाज से हो रही नफरत को बड़ी चुनौती के रूप में लेना होगा। मुस्लिम समाज के प्रतीक माने जाने वाले दाढ़ी, बुर्के को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर जो संदेह व्यक्त किया जा रहा है उस पर बड़े स्तर पर मंथन की जरूरत है।

मुस्लिम समाज के साथ ही अन्य समाज के गणमान्य लोगों को भी आगे आकर पूरे विश्व में बने रहे घृणा, नफरत के माहौल को समाप्त कर भाईचारे के माहौल को बनाने की पहल करनी होगी। बात मुस्लिम समाज की ही नहीं है, पूरे विश्व में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि हर देश में नस्लीय हमले बढ़े हैं। जिससे विभिन्न देशों में रह रहे विभिन्न देशों के युवाओं के लिए खतरा पैदा हो गया है। इस सब के लिए कौन जिम्मेदार हैं ? कौन हैं इस तरह का माहौल बनाने वाले लोग ? कौन लोग हैं जो इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं ? इन सब लोगों को बेनकाब करना होगा।

चरण सिंह राजपूत
राष्ट्रीय अध्यक्ष फाइट फॉर राइट
charansraj12@gmail.com

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तोड़ डालो कॉलर पकड़ने वाले बदतमीज प्रबंधन का हाथ!

हाथ तोड़ दो जो तुम्हारा कॉलर पकड़े। मुंह तोड़ दो जो तुमको गाली दे। मैं यह बात हिन्दुस्तान अखबार के उन कर्मियों से ही नहीं कह रहा हूं, जिनके साथ उनके प्रबंधन ने बदतमीजी की है। मैं उन सभी मीडियाकर्मियों से कह रहा हूं, जिनके साथ उनका प्रबंधन बदतमीजी कर रहा है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा जेल ही तो जाना पड़ेगा। जेल तो भगत सिंह भी गए थे। दमन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेल तो जाना ही पड़ता है।

देखने में आ रहा है कि मीडियाकर्मियों के उत्पीडन के मामले कोई तंत्र काम नहीं आ रहा है। ऐसे में कोर्ट ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं करता कि प्रबंधन मीडियाकर्मियों के साथ बुरा बर्ताव न कर सके। हम लोग तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही प्रबंधन से अपना हक़ मांग रहे हैं। जब कोर्ट के आदेश की अवमानना करने वाले प्रबंधनों का दिमाग इतना ख़राब है तो इसका जिम्मेदार कौन है ? यदि कोर्ट ने मजीठिया मांगने पर प्रबंधन के तबादला किये गए दो कर्मियों को वापस वहीँ काम पर भेज दिया और प्रबंधन ने फिर से तबादले का पत्र इन्हें पकड़ा दिया तो क्या प्रबंधन ने कोर्ट के आदेश की अवमानना फिर से नहीं की?

ऐसे में कोर्ट बिना देर किये बदतमीजी करने वाले प्रबंधन के लोगों को जेल में डाल देना चाहिए। वह भी लंबे समय तह।  साहस दिखाने वाले कर्मियों के साथ प्रबंधन लगातार बदतमीजी कर रहा है और केस की लड़ाई लड़ रहे वकील और कोर्ट मूकदर्शक की भूमिका में है। अब तो एक ही बात समझ में आ रही कि मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मी या तो अपने दम पर प्रबंधन के सीने पर चढ़कर काम करने की भूमिका बनाएं या फिर लंबी लड़ाई लड़ने के लिए अपने को तैयार करें। सुप्रीम कोर्ट और मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे वकीलों के रुख से कतई नहीं लग रहा है कि बर्खाश्त और स्थानांतरित होने वाले मीडियाकर्मियों को जल्द कोई राहत मिलने जा रही है। मजीठिया की लड़ाई हम लोग जीत भी जाते हैं तो भले ही अखबार मालिक जेल भेज दिये जाएं पर काम पर  जाए बिना हमें न्याय नहीं मिलेगा। हां अंदर बैठे लोग हमें माने या न माने हम लोग उनकी लड़ाई जरूर लड़ रहे हैं और तब भी उनका ही फायदा होगा।

यह मीडियाकर्मियों के लिए शर्मनाक ही है कि रांची में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप वेतन और भत्ते मांगने वाले दो कर्मचारी कोर्ट से जीतकर जब अपने काम पर लौटे तो कार्मिक प्रबंधक उनका कालर पकड़ कर अपशब्दों का इस्तेमाल किया। यदि अभी नहीं संभले तो यह स्थिति प्रिंट मीडिया के तो हर कर्मचारी से साथ आनी है किसी के साथ अब तो किसी के साथ बाद में।

मजीठिया वेजबोर्ड की लडाई लड रहे रांची हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में कार्यरत अमित अखौरी और शिवकुमार सिंह आप लोग डटे  रहो। हम लोग इतिहास रचेंगे। पर कमी हमारी भी है जो लोग मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे हैं वे एकजुट नहीं हो पा रहे हैं। हम हम लोग एकजुट होकर अपने हक़ की लड़ाई लड़ें। गज़ब स्थिति पैदा हो गई है देश में । पत्रकारों से एचआरहेड बदतमीजी कर रहा है और अपने को देश कर्णधार बताने वाले पत्रकार तलाशबीन बने हुए हैं। यदि थोड़ी बहुत शर्म और गैरत अभी बची है तो  डूब मरो चुल्लूभर पानी में। 

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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भाजपा का मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम पर आकर क्यों अटक जाता है?

…आखिर कब तक काटोगे नफरत की राजनीति की फसल? उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान चल रहा है। वैसे तो कई संगठन चुनावी समर में हैं पर असली मुकाबला सपा-कांग्रेस गठबंधन, बसपा और भाजपा के बीच है। बसपा भापजा पर निशाना साधते हुए कानून व्यवस्था पर उंगली उठा रही है तो सपा सरकार की उपलब्धियां गिना रही है और कांग्रेस केंद्र सरकार की खामियां गिनाकर अपने को साबित कर रही है। इन सबके बीच भाजपा केंद्र में ढाई साल से ऊपर हो जाने के बावजूद भावनाओं का सहारा लेकर वोटों का ध्रुर्वीकरण करने का खेल खेल रही है।

चुनावी शुरुआत में भले ही भाजपा प्रचारकों ने कानून व्यवस्था पर उंगली उठाई हो पर हर चुनाव की तरह ही इन चुनाव में भी उसका एकसूत्रीय एजेंडा हिन्दू वोटों का ध्रुर्वीकरण करना है। जहां भाजपा अध्यक्ष  अमित शाह ने कांग्रेस, सपा व बसपा को ‘कसाब’ की संज्ञा दे दी वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कब्रिस्तान और श्मशान के लिए आवंटित जमीन पर हिन्दू वाटबैंक को रिझाने की कोशिश की वहीं और ईद व दीवाली पर लाइट को लेकर वोटों का ध्रुर्वीकरण करने का प्रयास किया। यहां तक कि अब ट्रेन हादसे को लेकर एक विशेष वर्ग पर हमला बोला।

इसमें दो राय नहीं कि चुनाव के समय वोटों के ध्रुर्वीकरण को लेकर तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं पर क्या हर चुनाव में भाजपा के पास बस भावनात्मक मुद्दे ही हैं। किसी देश का प्रधानमंत्री किसी प्रदेश की सरकार की नीतियों पर उंगली उठाए तो उससे उसका कद गिराता है। यदि किसी प्रदेश में कहीं गलत हो रहा है तो आप तो केंद्र में बैठे हैं। आप सब कुछ कर सकते हैं, तो क्यों नहीं करते। अमित शाह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार में उनकी सरकार बनते ही बूचड़खाने बंद करा दिये जाएंगे। गो हत्या नहीं होगी। प्रधानमंत्री कहते हैं किसानों का कर्जा माफ कर दिया जाएगा।

मेरी समझ में तो यह नहीं आता कि जब ये लोग केंद्र में सरकार चला रहे हैं तो केंद्र की उपलब्धि पर वोट क्यों नहीं मांगते? वैसे भी जनता ने मोदी जी को प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनाया है। जहां तक कर्जा माफ करने की बात है तो आप तो पूरे देश के किसानों का कर्जा माफ कर सकते हैं। गो हत्या की बात है तो देश के आधे प्रदेशों में तो आपकी ही सरकरा चल रही है तो इतने बड़े स्तर पर मांस का निर्यात कैसे हो रहा है। बात गो हत्या की ही क्यों पशु हत्या की क्यों नहीं करते ? भैंसा, भैंस, बकरी, बकरा, सूअर क्या जीव नहीं हैं क्या?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगरा एक्सप्रेस, लखनऊ मेट्रो, पेंशन आदि उपलब्धियां गिना तो रहे हैं पर भाजपा का मुद्दा तो बस हिन्दू मुस्लिम पर आकर अटक जाता है। बेरोजगारी की बात नहीं करेंगे। भ्रष्टाचार की बात नहीं करेंगे। शिक्षा में सुधार की बात नहीं करेंगे।  किसान आत्महत्या की बात नहीं करेंगे ? महंगाई की बात नहीं करेंगे ? नोटबंदी के चलते हुई परेशानी की बात नहीं करेंगे? भाईचारे की बात नहीं करेंगे। देश व प्रदेश को कैसे विकास के रास्ते पर ले जाएंंगे, यह नहीं बताएंगे। बस समाज में जातिवाद, धर्मवाद, हिन्दू-मुस्लिम, तेरा-मेरा का जहर खोलकर सत्ता हासिल करनी है।

देश के बंटवारे के समय गांधी जी ने मुस्लिमों को रोकते हुए यही तो कहा था कि हम देश को विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न जातियों व विभिन्न धर्मों का ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश बनाएंगे जो दूसरे देशों के लिए मिसाल होगा तो फिर यह बांटने की नीति क्यों? नफरत की नीति क्यों? हमारे समाज में तो बड़ा छोटों के प्रति त्याग व बलिदान की भावना रखता है। करना आपको हिन्दुओं के लिए भी कुछ नहीं है। बस राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। यदि करना है तो बताओ विवादित ढांचे के ध्वस्त होने में मरे युवाओं के लिए आपने क्या किया? मुजफ्फरनगर दंगे में मरे लोगों के लिए आपने क्या किया? किसी गरीब हिन्दू की बेटी की शादी में दो रुपए का कन्या भिजवाया।

किसी गरीब हिन्दू बच्चे की पढ़ाई में दो पैसे का  योगदान दिया। किसी गरीब बेसहाय परिवार की मदद की? आप तो भूमि अधिग्रहण कानून लागू कर किसानों की जमीन हड़पना चाहते थे। श्रम कानून में संशोधन कर मजदूर की मजदूरी गिरवी रखना चाहते थे। तो आप कैसे हुए किसान व मजदूर के हितैषी? आपको तो बस समाज को बांटने की राजनीति करनी है। कब तक काटोगे नफरत की राजनीति पर खड़ी की गई इस वोटबैंक की फसल को। इस देश को आपस में मिलकर विकास के रास्ते पर ले जाने की जरूरत है। मिलजुल कर भाईचारा कायम करने की जरूरत है।

लेखक चरण सिंह राजपूत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं और मीडियाकर्मियों की हक की लड़ाई के लिए सक्रिय रहते हैं.

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कौन करेगा बर्खास्त मीडियाकर्मियों के साथ न्याय?

क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पक्ष में आवाज उठाना गुनाह है? अमित नूतन की पत्नी की मौत है या हत्या?

भड़ास फॉर मीडिया पर पढ़ा कि राजस्थान पत्रिका से बर्खास्त अमित नूतन की पत्नी का निधन हो गया। अमित नूतन का दोष यह था कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए प्रबंधन से मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन की मांग की थी। इस साहस की कीमत उन्हें पहले बखार्रस्तगी और अब अपनी पत्नी के निधन के रूप में चुकानी पड़ी। यह घटना भले ही लोगों को आम लग रही हो पर जिन हालातों में अमित नूतन की पत्नी का निधन हुआ है यह मामला बड़ा है। देश की सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पक्ष में आवाज उठाना क्या गुनाह है ? जब अमित नूतन को बर्खास्त किया गया तो सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?

जिन अखबार मालिकों ने अमित नूतन के परिवार के सामने इस तरह की परिस्थिति पैदा की, उन पर क्या कार्रवाई की ? क्या यह हत्या का मामला नहीं है ? जो लोग किसी व्यक्ति को मरने के लिए मजबूर कर दें वे उसके हत्यारे होने चाहिए? कौन बताएगा कि कविता नूतन की मौत का दोषी कौन है ? वे लोग जिन्होंने अमित नूतन को बर्खास्त किया या फिर वे लोग जो उसे न्याय न दिलवा सके या न दे सके। अमित नूतन की पत्नी का निधन हो गया तो लोगों को उनकी दयनीय हालत का पता चल गया पर जो दूसरे लोग मजीठिया मांगने पर बर्खास्त किए गए हैं, क्या उनके सामने भी इसी तरह के हालात नही होंगे?

दैनिक जागरण में 450, राष्ट्रीय सहारा में 47 और अन्य अखबारों में ऐसे कितने मीडियाकर्मी मजीठिया मांगने पर बर्खास्त किए गए हैं। राष्ट्रीय सहारा में 25 कर्मचारी ऐसे हैं कि जिन्हें 17 माह का बकाया वेतन और मजीठिया मांगने पर बर्खास्त किया गया है। देश बड़े वकील इस मामले की पैरवी कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ दायर किए गए अवमानना केस की सुनवाई सुन रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिरकार यह सुनवाई हो रही है किन कर्मचारियों के हित में ? जिन कर्मचारियों ने साहस दिखाकर अखबार मालिकों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया उन्हें तो बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मान भी लिया जाए कि मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन मिलने लगेगा। बर्खास्त कर्मचारियों को तो इससे भी कोई फायदा होता नहीं दिखाई दे रहा है।

लंबे समय से बेरोजगारी का दंश झेल रहे ये कर्मचारी इस दयनीय हालत में भी मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे हैं। अपनी आंखों के सामने ही अपने बच्चों को अभाव में जीते देख रहे हंै। मेरी तो समझ में यह ही नहीं आ रहा है कि हम लोग आखिरकार लड़ किसके लिए रहे हैं ? मेरा माननीय सुप्रीम कोर्ट और मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे वकीलों से प्रश्न है कि क्या मजीठिया वेज बोर्ड से वेतन मिलने से पहले उन बर्खास्त कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं होनी चाहिए, जिन्होंने साहस दिखाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करने के लिए अखबार प्रबंधन और मालिकों से कहा।

इस मामले की पैरवी कर रहे वकील कह रहे हैं कि मीडियाकर्मी मजीठिया  के लिए क्लेक करें। जिन कर्मचारियों ने मजीठिया की मांग की हैं वे तो सभी बर्खास्त कर दिए गए हैं। उनके लिए आप क्या कर रहे हैं ? ऐसे में कौन उठाएगा मजीठिया वेज बोर्ड की आवाज ? कौन करेगा बड़े वकीलों और सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास ? यदि बर्खास्त होते ही अमित नूतन को न्याय मिल गया होता तो शायद उनकी पत्नी का निधन न होता। साथ ही अन्य अखबारों के मालिक मजीठिया मांगने पर किसी मीडियाकर्मी को बर्खास्त न करते । जब ये लोग बर्बाद हो जाएंगे तब मिलेगा इन्हें न्याय। या जब इनके पास कुछ नहीं बचेगा तब इन्हें बहुत कुछ मिलेगा। क्या फायदा होगा इस न्याय का ? बात अमित नूतन की ही नहीं है कि बर्खास्त किए गए लगभग सभी कर्मचारियों के हालात ऐसे ही हैं। सुप्रीम कोर्ट और मजीठिया वेज बोर्ड के मुकदमे की पैरवी कर रहे वकीलों ने बर्खास्त कर्मचारियों के साथ यदि जल्द न्याय नहीं किया तो हालात और भयावह हो सकत हैं। अखबार मालिकों का मनोबल बढ़ा हुआ है। जो भी कर्मचारी मजीठिया कीम मांग करता है उसे बर्खास्त कर दिया जाता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट और वकील क्या कर रहे हैं ?

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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मीडिया में छंटनी : एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है, हक के लिए हुंकार भरें मीडियाकर्मी!

सुना है कि एबीपी ग्रुप ने 700 मीडियाकर्मियों से इस्तीफा लिखवा लिया है। दैनिक भास्कर में भी पुराने कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाया जा रहा है। दमन का यह खेल पूरे मीडिया जगत में चल रहा है। मजीठिया वेज बोर्ड की वजह से प्रिंट मीडिया में कुछ ज्यादा ही कहर बरपाया जा रहा है। चाहे राष्ट्रीय सहारा हो, दैनिक जागरण हो, हिन्दुस्तान हो या फिर अमर उजाला लगभग सभी समाचार पत्रों में कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना दिया गया है।

दूसरों की लड़ाई लड़ने का दम भरने वाले मीडियाकर्मी अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं। सहमे हुए हैं। डरे हुए हैं। जो मीडियाकर्मी आगे बढ़कर कुछ साहस दिखाते हैं, उन्हें प्रबंधन का निशाना बना दिया जा रहा है। अखबार मालिकानों और प्रबंधनों ने चाटुकार, दलाल, बेगैरत और जमीर बेच चुके कर्मचारियों को अपना मुखबिर बना रखा है। मजीठिया न देना पड़े, इसलिए पुराने कर्मचारियों का टारगेट बनाया जा रहा है। दमन के इस खेल में सभी मीडियाकर्मी शांत होकर अपना भारी नुकसान कर रहे हैं। यह सोचकर कि ‘मैं तो बचा हूं, रहूंगा, खुश हो रहे हैं। यह नहीं समझ रहे हैं कि जल्द ही उनका भी नंबर आने वाला है।

दरअसल अखबार मालिकान किसी भी हालत में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर देना नहीं चाहते। यही वजह है कि पुराने कर्मचारियों पर गाज गिर रही है। मालिकान किसी भी तरह से रेगुलर कर्मचारियों को निकालकर कांटेक्ट बेस पर कर्मचारी रखने की नीति बना रहे हैं। इसलिए जो कर्मचारी यह सोच रहे हैं कि वह बच जाएंगे, वह भारी भूल कर रहे हैं। कर्मचारियों को लामबंद होकर इस दमन के खिलाफ आवाज उठानी होगी। कर्मचारियों को यह समझना होगा कि यदि सबने मिलकर यह लड़ाई लड़ ली तो मजीठिया भी मिलेगा और नौकरी भी और ऐसे ही डरते रहे तो न नौकरी बचेगी और न ही पैसा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिकों को खिलाफ अवमानना का केस चल रहा है। ये लोग कब तक बचेंगे।

हम लोग हर हाल में जीतेंगे पर जो लोग कमजोर बने हुए हैं उन्हें तो मालिकान और प्रबंधन डरा-धमकाकर भगा ही देंगे। रोज बड़े स्तर पर कर्मचारी निकाले जा रहे हैं। एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है। राष्ट्रीय सहारा सहारा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब मुकुल राजवंशी और उत्पल कौशिक को निकाला गया तो। कर्मचारी प्रबंधन का खुलकर विरोध न कर पाएं। यही वजह रही कि देहरादून में अरुण श्रीवास्तव को निकाल दिया गया। कुछ दिन बाद में हक की लड़ाई की अगुआई कर रहे 21 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। हाल ही में 25 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है। इनका 17 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। न तो उनका पैसा दिया जा रहा है और न ही नौकरी पर लिया जा रहा है। जरा-जरा की बात पर पूरे दिन शोर मचाने वाले टीवी चैनल, व प्रिंट मीडिया में अपने बीच में सताये जा रहे साथियों के लिए कोई जगह नहीं है। अब समय आ गया है कि मीडियाकर्मी संगठित होकर अपने दमन के खिलाफ हुंकार भरें। यदि अब भी चुप रहे तो अपने तो दुर्गति करोगे ही साथ ही में अपने बच्चों से भी निगाह नहीं मिला पाओगे।

राष्ट्रीय सहारा और दैनिक जागरण समेत कई अखबारों से बर्खास्त किए गए कर्मचारी बेरोजगार होकर भी प्रिंट मीडियाकर्मियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। अंदर काम कर रहे कर्मचारियों को यह समझना होगा कि थोड़ा बहुत भय मालिकानों और प्रबंधनों में यदि है तो वह इस लड़ाई का ही है। कर्मचारियों में तालमेल का अभाव, नौकरी जाने का डर, लालच और चाटुकारिता का फायदा  उठाकर मालिकान और प्रबंधन कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रहे हैं। सभी लामबंद होकर लड़ लिए तो मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन भी मिलेगा और एरियर भी। यदि इसी तरह से डरते रहे।

एक-दूसरे से दूरियां बनाते रहे तो न तो पैसा मिलेगा और न ही नौकरी बचेगी। एक-एक कर सभी को निशाना बना दिया जाएगा। जब जागोगे तो समय निकल चुका होगा। जब उठोगे प्रबंधन उठने लायक नहीं छोड़ेगा। यह समझ लो कि मजीठिया की लड़ाई ऐसी लड़ाई है जो मीडियाकर्मियों की जिंदगी बदल कर रख देगी। इसे सब मिलकर मजबूती से लड़ें। सुप्रीम कार्ट का आदेश है तब भी डर रहे हो। यह जान लो कि मजीठिया मांगने पर जो साथी बर्खास्त किए गए हैं वे सभी ससम्मान अंदर जाएंगे तथा मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पूरा वेतन और एरियर पाएंगे। इन कर्मचारियों का बाद में मालिकान और प्रबंधन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। जो कर्मचारी अंदर बैठकर सेटिंग में लगे हैं, उनकी सबसे अधिक दुर्गति होगी। सोचे जो 700 कर्मचारी एबीपी समूह ने निकाले हैं। जो दैनिक भास्कर या अन्य अखबारों से निकाले जा रहे हैं। वे सभी हमारे ही बीच के हैं। क्या उनकी जरूरतें किसी से कम हैं। सोचो, जिस दिन आप निकाले जाओगे और आपके बीच के दूसरे कर्मचारी मूकदर्शक बने रहेंगे तो उनके बारे में आपकी क्या सोच होगी ?

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा प्रबंधन के दमन से दम तोड़ गया सहाराकर्मी!

राष्ट्रीय सहारा में दमनात्मक नीति का हाल यह है कि हक मांगने पर 47 कर्मचारियों को बर्खास्त किया जा चुका है। काम कर रहे कर्मचारियों को इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह मानसिक रूप से बीमार हैं। प्रबंधन कर्मचारियों को बुला-बुलाकर इस्तीफा लिखवाने की धमकी दे रहा है। नौकरी लेने की नीयत से बहुत सारे कर्मचारियों का दूर-दराज स्थानों पर स्थानांतरण कर दिया गया है। यह सब तब किया जा रहा है कि जब प्रबंधन कर्मचारियों को बकाया पैसा देने को तैयार नहीं। प्रबंधन के इस दमन के आगे प्रोसेस विभाग में काम कर रहा बी.एम. यादव दम तोड़ गया।

बताया जा रहा है कि एचआर विभाग ने उसे बुलाकर जाने क्या कहा कि वह डिप्रेशन में चला गया। गंभीर हालत होने पर जब उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया तो उसका निधन हो गया। लंबे समय का वेतन रुका होने की वजह से उसकी आर्थिक हालत इतनी खराब हो गई थी कि जब अस्पताल से उसके शव को घर लाया गया तो मकान मालिक ने शव को घर न लाने दिया। आनन-फानन में किसी तरह से उसका अंतिम संस्कार किया गया।

यह है देश के सबसे विशालतम परिवार की कहानी। इसी कड़ी में विज्ञापन विभाग के जेपी तिवारी का भी निधन हो गया। सहारा में ये कोई नई बात नहीं है कि गत दिनों सर्विस डिजीवन में काम कर रहे एक युवा ने इसलिए आत्महत्या कर ली थी कि क्योंकि किराया न देने पर उसके मकान मालिक ने उसके बच्चों के सामने ही उसे बहुत जलील कर दिया था।

गत वर्ष लखनऊ में एक कर्मचारी ने छत से गिरकर इसलिए आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि लंबे समय से उसे वेतन न मिलने के कारण परिवार में रोज बेइज्जत होना पड़ता था। टीवी में काम कर रहे एक कर्मचारी की मौत इसलिए हो गई क्योंकि लंबे समय तक सेलरी न मिलने पर बीमारी की स्थिति में भी वह कई दिनों तक ब्रेड खाकर काम चलाता रहा। यह हाल देशभक्ति का ठकोसला करने वाले इस समूह का। अधिकारियों व मालिकान को देख लो तो खर्चे ऐसे कि राजा-महाराजा भी शर्मा जाएं।

दुखद तो यह है कि सहारा मीडिया में तीन बार आंदोलन करने के बावजूद कर्मचारियों का जमीर नहीं जागा। आज भी 10-15 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मजीठिया नहीं मिल रहा है। बर्खास्त कर्मचारी मजीठिया व कर्मचारियों के हक की लड़ाई लड़ रहे पर अभी भी ऐसे कितने कर्मचारी हैं कि जो प्रबंधन की चाटुकारिता में लगे हैं। यह हाल तब जब एक-एक कर सबका नंबर आ रहा है।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सेलरी और बकाया मांगने बीवी-बच्चों समेत सहारा आफिस पहुंचे बर्खास्त मीडियाकर्मियों ने जमकर लगाए नारे (देखें वीडियो)

गणतंत्र दिवस पर सहारा मीडिया के पीड़ित कर्मचारियों ने सहारा प्रबंधन को सरेआम ललकारा… ‘सुब्रत तेरी गुंडागर्दी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी’। ‘जयब्रत तेरी गुंडागर्दी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी’, ‘बेईमान प्रबंधन बाहर आओ’, ‘चोर प्रबंधन बाहर आओ’, ‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’, ‘अभी तो ली अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’… ये नारे किसी रैली या जुलूस में नहीं लग रहे थे। ये नारे लग रहे थे गणतंत्र दिवस के दिन सुबह आठ बजे नोएडा के सेक्टर 11 स्थित राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र के मेन गेट पर.

नारे लगाने वाले थे, राष्ट्रीय सहारा के प्रबंधन द्वारा बर्खास्त किए गए कर्मचारी व उनके बीवी-बच्चे। ये कर्मचारी अपने परिवार को साथ लेकर सहारा प्रबंधन से अपना 17 माह का बकाया वेतन, मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बकाया सेलरी और बची नौकरी का हिसाब मांग रहे थे। सहारा प्रबंधन ने हाल ही में अवैधानिक रूप से 25 कर्मचारी बर्खास्त किए हैं। 22 कर्मचारियों की नौकरी मई माह में ले ली थी।

इस गणतंत्र दिवस को इन कर्मचारियों ने प्रबंधन की ऐसी हेकड़ी निकाली कि सहारा के किसी भी अधिकारी की मेन गेट से निकलने की हिम्मत न हुई। जब प्रबंधन ध्वजारोहण की तैयारी कर रहा था तो उसी समय इन कर्मचारियों ने प्रबंधन को ललकार दिया। जिस कार्यक्रम में घंटों देशभक्ति का ढकोसला चलता था, वह कार्यक्रम मात्र आधे घंटे में खत्म कर दिया गया। कर्मचारियों की इस ललकार से प्रबंधन की चूलें हिल गईं। आनन-फानन में मीडिया हेड अभिजीत सरकार ने गार्डों के माध्यम से संदेश भिजवाया कि वे लोग ये सब न करें, एक सप्ताह के अंदर उनका हिसाब कर दिया जाएगा। आंदोलनकारी कर्मचारी इस संदेश को नहीं माने। उन्होंने न्याय और हक मिलने तक लड़ाई लड़ने का ऐलान किया। इन कर्मचारियों ने सहारा मीडिया वर्कर्स यूनियन और फाइट फॉर राइट का बैनर लगा रखा है।

इस प्रदर्शन का अंदर काम कर रहे कर्मचारियों पर यह असर पड़ा है कि जो कर्मचारी प्रबंधन की कार्रवाई से डरे हुए थे अब वे निर्भीक होकर आंदोलनकारियों से बातें करते नजर आ आ रहे हैं। अगले माह यदि सहारा सुप्रीम कोर्ट में निवेशकों के हड़पे रुपए में से 600 करोड़ रुपए जमा नहीं करा पाया तो सुब्रत राय का जेल जाना निश्चित है। यह कर्मचारी भी बखूबी समझ रहे हैं कि यदि यह व्यक्ति जेल चला गया तो उन्हें आंदोलन के बल पर गत 10 महीने से जो नियमित रूप से वेतन मिल रहा है, वह भी आगे नहीं मिल पाएगा। वैसे भी लगभग सभी कर्मचारियों का 10-15 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं मिल रहा है। यही सब वजह है कि सहारा मीडिया में फिर से बड़े आंदोलन की भूमिका बनने लगी है।

दरअसल सहारा प्रबंधन का रवैया बड़ा तानाशाह और गुंडागर्दी का रहा है। किसी समय इस प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों को इतना डरा-धमका कर रखा था कि जहां चाहे हस्ताक्षर करवा लेता था। सुब्रत राय के जेल जाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से जबर्दस्ती अरबों की उगाही कर ली गई। कारगिल के नाम पर 10 साल तक कर्मचारियों के वेतन से 100-500 रुपए काटा जाता रहा। उपर वाले के घर देर है, अंधेर नहीं। पाप का घड़ा जल्द भरने वाला है। बड़े बड़े साम्राज्य जब भरभरा कर गिर गए तो सहारा की क्या बिसात। यह समूह जिस तरह से अपने कर्मचारियों और उनके परिजनों का उत्पीड़न कर उनकी आह और श्राप हासिल कर रहा है, उससे इसका अंत नजदीक दिख रहा है। ऐय्याशी और समारोहों के नाम पर करोड़ों फूंकने वाले इस ग्रुप को अपने कर्मियों के जीवन की चिंता नहीं है। 

नोएडा में सहारा मीडिया के मेन गेट पर हुए प्रदर्शन का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

सहारा मीडिया में काम कर चुके चरण सिंह राजपूत की रिपोर्ट. संपर्क : charansraj12@gmail.com

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सहारा का हाल : अय्याशी के लिए पैसा है पर कर्मचारियों के लिए नहीं!

चरण सिंह राजपूत

सुना है कि पैरोल पर जेल से छूटे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय ने 18 जनवरी की शाम को दिल्ली के मौर्य होटल में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर अपनी शादी की वर्षगांठ मनाई। इस कार्यक्रम में करोड़ों का खर्च किया गया। जनता के खून-पसीने की कमाई पर मौज-मस्ती करना इस व्यक्ति के लिए कोई नयी बात नहीं है। गत दिनों लखनऊ में अपनी पुस्तक ‘थिंक विद मी’ के विमोचन पर भी करोड़ों रुपए बहा दिए। अखबारों में विज्ञापन छपवाया कि देश को आदर्श बनाओ, भारत को महान बनाओ। दुर्भाग्य देखिए, यह सुब्रत राय अपनी संस्था और अपने आप को तो आदर्श व महान बना नहीं पाए लेकिन देश को आदर्श और महान बनाने चल पड़े हैं। गरीब जनता को ठगेंगे। कर्मचारियों का शोषण और उत्पीड़न करेंगे पर देशभक्ति का ढकोसला करेंगे। यह व्यक्ति कितना बड़ा नौटंकीबाज है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि आप सहारा के कार्यालयों में जाएंगे तो आपको वहां पर भारत माता की तस्वीर दिखाई देगी।

कार्यक्रमों की शुरुआत में आप इस व्यक्ति को भारत माता की तस्वीर के सामने दीप प्रज्ज्वलित करते पाएंगे। दिखावे के लिए यह संस्था गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस को भारत पर्व के रूप में मनाती है। तिरंगे का इस्तेमाल ऐसे किया जाता है कि जैसे इनसे बड़ा देशभक्त कोई दूसरा हिन्दुस्तान में नहीं। देशभक्तों को लूटकर देशभक्ति का जो दिखावा ऐसे लोग कर रहे हैं। यह देश के लिए बहुत घातक है। ऐसे लोगों के चेहरे बेनकाब करने बहुत जरूरी है। कारगिल के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए की उगाही करने वाला। जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए ठगने वाला यह व्यक्ति देश और समाज दोनों को बेवकूफ बना रहा है। सुप्रीम कोर्ट को बनाने चला था कि आ गया शिकंजे में। अपनी मां के निधन पर पैरोल पर जेल से छुटकर कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना रहा है।

जिन कर्मचारियों के बल पर 2000 रुपए से दो लाख करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित कर पाया यह व्यक्ति, अब उन्हीं कर्मचारियों को बर्बाद करने में लगा है। कर्मचारियों को सच बोलने की शिक्षा देने वाले इस व्यक्ति को सच्चाई पसंद नहीं। जो जितना झूठ बोलता हो, चाटुकारिता करता हो। निर्लज्ज और बेशर्म हो। वह उतना ही इसे पसंद आता है। स्वाभिमानी, खुद्दार और ईमानदार कर्मचारी तो जैसे इसका सबसे बड़ा दुश्मन हो। प्रवचन ऐसे देता है कि बाबा आशाराम और रामपाल भी शर्मा  जाएं। कितना निरंकुश और तानाशाह है यह व्यक्ति। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मीडिया में सहारा में चल रही अराजकता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया तो जैसे इसके सीने पर पैर रख दिया गया हो। इस व्यक्ति ने आंदोलन की अगुआई कर रहे कर्मचारियों को जेल में बुलाकर धमकाना चाहा पर उन कर्मचारियों की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने हर बात का मुंहतोड़ जवाब दिया। देशभक्ति का ढकोसला करने वाली संस्था पर जिस दिन सीबीआई जांच बैठेगी उस दिन लोगों को पता चल जाएगा कि इसमें कितने गड़बड़झाले हुए हैं।

यह वह संस्था है जिसके मालिकान और अधिकारी अय्याशी करते हैं और कर्मचारियों को एक-एक पैसे के लिए तरसाया जाता है। भले ही आज की तारीख में कर्मचारियों को वेतन मिलने लगा हो पर आज भी 10-17 माह का बकाया वेतन संस्था पर है। जिन कर्मचारियों का रिटायरमेंट हुआ है। उन्हें पैसा नहीं दिया गया। जिन लोगों ने एक्जिट प्लॉन के तहत नौकरी छोड़ी है। उन्हें पैसा नहीं मिला है। हमेशा कोर्ट के सम्मान की बात करने वाला यह व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन देने को तैयार नहीं। जिंदगी के महत्पवूर्ण 20-25 साल संस्था को देने वाले कर्मचारी अब इसे बोझ लगने लगे हैं। किसी को तबादले के नाम पर तो किसी को बर्खास्त कर और किसी को तरह-तरह के तरीके अपनाकर परेशान कर नौकरी से निकालने में लगा है। वह भी बिना भुगतान किए बिना। मीडिया से 22 कर्मचारी मई माह में निकाल दिए गए थे कि हाल ही में 25 कर्मचारियों की नौकरी ले ली गई। यह कर्मचारी इस हाड़ कंपकपाती ठंड में राष्ट्रीय सहारा (नोएडा) के मेन गेट पर जमीन पर बैठकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं पर इन लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। इन सब बातों की ओर शासन-प्रशासन, उत्तर प्रदेश व केंद्र सरकारों के अलावा सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करना बहुत जरूरी हो गया है।

चरण सिंह राजपूत

पूर्व सहारा कर्मी

charansraj12@gmail.com

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हाड़ कंपाती ठंड में सहारा के मेन गेट पर बैठे ये बर्खास्त 25 कर्मी किसी को नहीं दिख रहे!

किसी को नहीं दिखाया दे रहा सहारा का यह अन्याय… नोएडा में बड़ी संख्या में राजनीतिक व सामाजिक संगठन हैं। ट्रेड यूनियनें भी हैं। देश व समाज की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाले पत्रकार भी हैं। पर किसी को इस हाड़ कंपाती ठंड में गेट पर बैठे बर्खास्त 25 कर्मचारी नहीं दिखाई दे रहे हैं। 17 महीने का बकाया वेतन दिए बिना सहारा प्रबंधन ने इन असहाय कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया पर इनकी पीड़ा समझने को कोई तैयार नहीं।

नोएडा में श्रम मंत्रालय से लेकर जिला प्रशासन की पूरी व्यवस्था है पर कोई भी व्यक्ति इन कर्मचारियों को इनका हक नहीं दिलवा पा रहा है। किसान-मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाले दलों को क्या मेन गेट पर बैठे ये कर्मचारी दिखाई नहीं दे रहे हैं ? मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाली सीटू भी क्या इस अन्याय से अंजान है। बड़ी-बड़ी बातें लिखने वाले लेखकों को ये पीड़ित मीडियाकर्मी नहीं दिखाई दे रहे हैं? कौन बनेगा इन कर्मचारियों की आवाज? कौन समझगेगा इन कर्मचारियों के बीवी-बच्चों की पीड़ा। बच्चों को साक्षर और स्वस्थ बनाने की बात करने वाली सरकारें बताएं कि जिन कर्मचारियों का 17 महीने का बकाया वेतन न दिया गया हो और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया हो। वे अपने बच्चों को कहां से पढ़ाएं? कहां से खिलाएं? कहां से बीमारी का इलाज कराएं?


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विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने वाले सहारा प्रबंधन के पास इन कर्मचारियों को पैसा देने के लिए नहीं। सहारा मालिकान और अधिकारियों के किसी खर्चे में कोई कमी नहीं है। जमकर अय्याशी हो रहे ही है पर पीड़ित कर्मचारियों के लिए पैसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि अंदर काम कर रहे कर्मचारी बहुत खुश हों। उनका भी 10-12 महीने का बकाया वेतन संस्था ने नहीं दिया है। स्थानांतरण के नाम पर इन्हें भी डराया हुआ है। देश को आदर्श बनाने और भारत को महान बनाने की बात करने वाला संस्था का चेयरमैन जिंदगी के 20-25 वर्ष संस्था को देने वाले कर्मचारियों की नौकरी ले लेता है पर इनके पक्ष में कोई आवाज नहीं उठती, इससे शर्मनाक बात और नहीं हो सकती है।

इस नपुंसक समाज में हर कोई ताकतवर व्यक्ति के साथ खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। गरीबों को सताकर नायक बन रहे हैं। मुझसे भी काफी लोग कह रहे हैं आप क्यों बिना वजह के इतनी बड़ी संस्था से दुश्मनी मोल ले रहे हो। मेरा कहना है कि मरा तो जन्म ही अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए हुआ है। दूसरों के लिए लड़ने के लिए हुआ है। अपने बच्चों की परवरिश तो मैं मजदूरी करके भी कर लूंगा पर किसी दमन के सामने नहीं झुकूंगा। जब हम अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ सकते तो दूसरों की क्या खाक लड़ेंगे। जानवरों की खाल भी जूते बन जाते हैं पर आदमी की खाल के तो जूते भी नहीं बनते। क्या करेंगे हम इस शरीर का? कहां ले जाएंगे इन पैसों को? जितना हम दूसरों के काम आ जाएंगे वह ही हमारा असली पुरुषार्थ है। अपने लिए तो सब जीते हैं जरा दूसरों के लिए भी जी कर देखो।

मैंने तो सहारा के अन्याय के खिलाफ 2006 में ही मोर्चा खोल दिया था। हम लोग एक-एक पैसा सहारा से लेकर रहेंगे और एक बार ससम्मान अंदर भी जाकर दिखाएंगे। हमारे हौंसलों को कोई गेट कोई ताकत नहीं रोक सकती है। कानूनी रूप से हम सहारा को मुंह तोड़ जवाब देते रहेंगे।

देखें यह वीडियो, कैसे इस ठंढ में सहारा के बर्खास्त कर्मी मेन गेट पर जमे हैं और सहारा प्रबंधन के अन्याय के खिलाफ जमकर अपनी बात रख रहे हैं>>

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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स्वामी अग्निवेश ने खोला सहारा के खिलाफ मोर्चा!

राष्ट्रीय सहारा में टर्मिनेट किए गए कर्मचारियों को फोन पर किया संबोधित, डीएम को लिखा पत्र

सहारा मीडिया में हो रहे शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ समाज सुधारक और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश ने मोर्चा खोल दिया है। जहां उन्होंने नोएडा के सेक्टर 11 स्थित राष्ट्रीय सहारा के मेन गेट पर चल रहे बर्खास्त 25 कर्मचारियों के धरने को मोबाइल फोन से संबोधित किया, वहीं इस मामले को लेकर गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी को पत्र भी लिखा है। अपने संबोधन में उन्होंने कर्मचारियों को आश्वस्त किया कि उनके हक की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लड़ी जाएगी। 17 माह का बकाया वेतन रहते हुए कर्मचारियों की बर्खास्तगी को उन्होंने अपराध करार दिया।

सहारा के उत्पीड़न पर जिला प्रशासन की चुप्पी पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि नोएडा जैसे शहर में कोई संस्था इस हद तक कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रही है और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। यह शर्मनाक है। स्वामी अग्निवेश ने जिलाधिकारी को लिखे पत्र में सहारा प्रबंधन के खिलाफ के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है। साथ ही कार्रवाई की सूचना दिल्ली स्थित उनके कार्यालय को देने को लिखा है। उचित वेतन दिए बिना काम कराने को स्वामी अग्निवेश बंधुआ मजदूरी मानते हैं। सहारा मीडिया में तो 17 माह का बकाया वेतन दिए बिना कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है। 22 कर्मचारी पहले निकाल दिए थे। बड़े स्तर पर दूर-दूराज क्षेत्रों में कर्मचारियों का स्थानांतरणर कर दिया जा रहा है वह भी बिना बकाया वेतन दिए बिना।

इस संस्था का गजब खेल है। एक ओर संस्था का चेयरमैन सुब्रत राय थिंक विंद मी पुस्तक लिखता है। देश को आदर्श और भारत को महान बनाने की बातें लिखकर अखबारों में विज्ञापन छपवाए जाते हैं। लखनऊ में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता उस कार्यक्रम में पहुंचते हैं। अपने को बड़ा देशभक्त बताने वाले बाबा रामदेव तो सुब्रत राय से मिलकर अपने को धन्य मानने लगे। जगजाहिर है कि यह संस्था अपने कर्मचारियों का किस हद तक शोषण और उत्पीड़न कर रही है। दबे-कुचले और किसान मजदूरों की लड़ाई लड़ने का दावे करने वाले किसी नेता ने कर्मचारियों के शोषण की बात उठाने की जहमत नहीं समझी।

बताया जाता है कि इस संस्था ने कारगिल के नाम पर 10 साल तक अपने कर्मचारियों के वेतन से 100-500 रुपए काटे। संस्था के चेयरमैन ने अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए ठग लिए। इस संस्था के खिलाफ यदि स्वामी अग्निवेश ने आवाज बुलंद की है तो निश्चित रूप से इस आवाज में और दिग्गजों की आवाज भी जुड़ेंगी और देशभक्ति के नाम पर समाज और देश को गुमराह करने वाले संस्था के चेयरमैन का चेहरा बेनकाब होगा।

ज्ञात हो कि स्वामी अग्निवेश लंबे समय से बंधुआ मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे हैं। किसी समय उन्होंने फरीदाबाद में पत्थर खदानों से 2000 के आसपास परिवारों को छुड़ाकर पुनर्वासित कराया था। पीआईएल भी स्वामी अग्निवेश की देन हैै। बताया जाता है कि इन खदान मजदूरों की समस्याओं से संबंधित एक पत्र स्वामी अग्निवेश ने सुप्रीम कोर्ट को पोस्ट कार्ड पर लिखा था, जिसे कोर्ट ने पीआईएल मानते हुए मजदूरों के पक्ष में अपना फैसला दिया था।

अक्सर देखा जाता है कि जब मीडिया में शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की बात आती है तो राजनीतिक व सामाजिक संगठन दूर भागने लगते हैं। ऐसे में स्वामी अग्निवेश ने राष्ट्रीय सहारा से निकाले गए कर्मचारियों के पक्ष में आवाज उठाकर उन लोगों के मुंह पर तमाचा मारा है जो बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं पर करते कुछ नहीं। खुद मीङिया दूसरों की आवाज तो उठाने की बात करता है पर मीडिया में शोषण और उत्पीड़न का जो खेल खेला जा रहा है उस पर न कुछ बोलने को तैयार है और न ही लिखने को। दैनिक, जागरण, राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों के कितने पत्रकार और कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड  की मांग करने और मीडिया में हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने पर बाहर कर दिए गए पर  मीडिया की ओर से कोई आवाज नहीं उठी। ऐसा नहीं है कि इलोक्ट्रिक मीडिया इससे खेल से वंचित है। यहां पर तो हालात और बुरे हैं।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा मीडिया प्रबंधन ने 25 कर्मियों की नौकरी ले ली

चरण सिंह राजपूत की रिपोर्ट…

सहारा अपनी ऐबदारी से बाज नहीं आ रहा है। जहां कर्मचारियों को 12-17 महीने का बकाया वेतन देने को तैयार नहीं वहीं सुप्रीम कोर्ट आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से सेलरी। साथ ही कर्मचारियों का दूर-दूराज स्थानांतरण कर नौकरी छोड़ने को मजबूर कर रहा है। वह भी बिना बकाया वेतन भुगतान किए। राष्ट्रीय सहारा में हक की आवाज उठाने वाले 22 कर्मचारियों को पहले की बर्खास्त कर दिया गया था कि बिना कारण बताए कॉमर्शियल प्रिंटिंग में काम कर रहे 25 कर्मचारियों की सेवा आज समाप्त कर दी गई। इन कर्मचारियों का दोष बस इतना था कि इन लोगों ने अपना 17 महीने का बकाया वेतन मांगा था।

पीड़ित कर्मचारी सहारा मीडिया वर्कर्स यूनियन का बैनर लगाकर इस ठंड के मौसम में राष्ट्रीय सहारा के गेट पर अपने हक की गुहार लगा रहे हैं पर सहारा प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। हालांकि बंधुआ मुक्ति मोर्चा का समर्थन इन पीड़ित कर्मचारियों को मिला है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश ने दिल्ली से पीड़ित कर्मचारियों की लड़ाई लड़ने का दंभ भरा है।

कहने को तो जिला स्तर पर श्रमिकों के शोषण रोकने के लिए उप श्रमायुक्त कार्यालय की व्यवस्था की गई है। जिलाधिकारी की भी जिम्मेदारी बनती है कि किसी कंपनी में किसी श्रमिक के साथ किसी तरह का अन्याय न हो सके। राष्ट्रीय सहारा में गत ढाई साल से कई बार आंदोलन हो चुका है पर कर्मचारियों को उनका बकाया भुगतान नहीं दिया गया। उल्टे 47 कर्मचारियों को संस्था से निकाल दिया गया। बड़े स्तर पर स्थानांतरण किए जा रहे हैं। सहारा में कर्मचारियों के उत्पीड़न की दास्तां जिला प्रशासन से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदय तक लिखी जा चुकी है पर किसी तरह की कोई राहत नहीं मिली। अब तो कर्मचारियों को अदालत ही एक सहारा है। संस्था की मक्कारी देखिए कि एक ओर कर्मचारियों को कई माह से वेतन नहीं मिला था दूसरी ओर 2014 में आयकर छापे में नोएडा के राष्ट्रीय सहारा परिसर से 134 करोड़ रुपए बरामद किए गए।

दिलचस्प बात यह है कि आयकर विभाग के इस छापे में एक डायरी बरामद हुई थी जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री रहते प्रधानमंत्री समेत 100 नेताओं को पैसे देने की बात लिखी हुई है। जब इस बारे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को घसीटा तो आयकर नियामक आयोग से सहारा को राहत दिलवा दी गई। दरअसल सहारा ने नियामक आयोग में डायरी को सबूत न मानने की याचिका दायर की थी। पहले तो आयोग ने डायरी को सबूत मानते हुए याचिका ठुकरा दी पर किसी दबाव में यह याचिका स्वीकार की गई और मात्र तीन दिन के अंदर  फैसला देकर सहारा को राहत दे दी गई। यह वह सहारा है जिसके चेयरमैन सुब्रत राय ने अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों की उगाही कर ली।

यह वह सहारा है जिसके चेयरमैन ने कारगिल के नाम पर अपने ही वर्करों से 100-500 रुपए प्रति माह के हिसाब से दस साल तक वेतन से काटे। अब जब डायरी में गुजरात का मुख्यमंत्री रहते प्रधानमंत्री को पैसे देने का मुद्दा उठा तो आयकर नियामक आयोग को भी सेट कर लिया। इसे भी मैनेज ही कहा जाएगा कि सहारा डायरी का मुद्दा अब न तो केजरीवाल उठा रहे हैं और न ही राहुल गांधी। हां प्रशांत भूषण अपने मिशन में जरूर डटे हैं। वह मीडियाकर्मियों के हित में सुप्रीम कोर्ट में चल रही मजीठिया वेजबोर्ड की सुनवाई में भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री कहने तो गरीबों के बड़े हितैषी बने घूमते हैं पर सहारा कर्मियों की उत्पीड़न की दास्तां उनके मंत्रालय को कई बार लिखी गई हैं पर उन्होंने न तो सहारा के खिलाफ कोई जांच बैठाई और नही कोई कार्रवाई की। पीएमओ से कर्मचारियों को भी कोई राहत नहीं मिली है। ऐसे में क्या माना जाए ? तो यह माना जाए कि प्रधानमंत्री बस जनता को बेवकूफ बनाने में लगे हैं। यदि नहीं तो सहारा के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते या जांच क्यों नहीं बैठाते?

चरण सिंह राजूपत
charansraj12@gmail.com

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ऐसे नहीं छोड़ेंगे मोदी जी, आपके झोले की तलाशी होगी!

सहारा की डायरी में पैसे लेने वालों में आपका भी नाम है मोदी जी, फिर आप मौन क्यों हैं? यदि आप निर्दोष हैं तो सहारा के खिलाफ कार्रवाई कराओ…

नोटबंदी की मयाद पूरी हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवम्बर को इस नोटबंदी योजना की घोषणा की थी। उन्होंने जनता से 50 दिन का समय मांगा था। उनका कहना था कि 50 दिन बाद यदि स्थिति न सुधरी तो जनता जिस चौराहे पर चाहे उन्हें सजा दे दे। इसमें दो राय नहीं कि योजना सही थी पर बिना तैयारी के इस योजना को लागू करने पर आम आदमी को जो परेशानी हुई वह छिपी नहीं है। सबके बड़ा कलंक इस योजना पर यह लगा है कि बेईमानों को सबक सिखाने के लिए लाई गई इस योजना ने अब तक 100 से भी अधिक लोगों की कुर्बानी ले ली है। इस योजना में अभी तक किसी भी नेता और पूंजीपति का कुछ नहीं बिगड़ा।

गत दिनों प्रधानमंत्री ने परेशान होकर यह कहा था कि वह तो फकीर हैं, अपना झोला उठाकर चल पड़ेंगे। मोदी जी ऐसे कैसे चल पड़ेंगे। इस योजना में जिन लोगों की मौत हुई है। उनकी पत्नियों के सिंदूर लेकर आपको कैसे जाने देंगे। जिन बहनों की शादी टूटी है उनके आंसूओं को लेकर कैसे जाने देंगे। पैसे न मिलने पर जिन लोगों को जलालत का सामना करना पड़ा है। उस अपमान को लेकर कैसे ले जाने देंगे। पैसा न मिलने पर जिन मकान मालिकों ने किराएदारों की बहू-बेटियों पर कुदृष्टि डाली है। उस अहसास को लेकर कैसे ले जाने देंगे।

सहारा की डायरी में पैसे लेने वालों में आपका भी नाम है। मौन क्यों हैं? यदि आप निर्दोष हैं तो सहारा के खिलाफ कार्रवाई कराओ। 99 और अन्य लोगों के नाम हैं। मामला शांत कैसे हो गया। छापे पड़े तो दो-तीन साल हो गए हैं। सहारा के नोएडा कार्यालय से 134 करोड़ रुपए जब्त हुए थे। आपको  प्रधानमंत्री बने ढाई साल हो गए हैं। सहारा के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई न होना आपको संदेह के घेरे में ला रहा है। यदि बात सही है तो 65 करोड़ रुपए झोले में डालकर कैसे ले जाने देंगे।

काला धन खत्म करने के लिए आपको जहां प्रहार करना चाहिए था वहां नहीं किया। कालाधन तो सबसे अधिक राजनीतिक दलों के पास है। भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के खातों पर जांच करानी चाहिए थी। आपने बसपा और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भाई के खाते पर जरूर छापेमारी कराई पर अन्य दलों और उसके नेताओं के खातों का क्या कर रहे हैं? देश के भ्रष्ट नौकरशाह का क्या कर रहे हैं? आपने बेईमानों को सबक सिखाने के लिए यह योजना लागू की पर बेईमानों ने तो अपने काले धन को भी सफेद कर लिया। आप कितने दावे करते घूम रहे हों पर अभी तक यदि परेशान हुआ है तो बस आम आदमी ही हुआ है। इस नोटबंदी में बेईमान न तो लाइन में खड़े हुए और न ही उन्हें कोई परेशानी हुई और न ही कोई मरा। आगे भी आम आदमी को परेशानी होती ही दिखाई दे रही है। आम आदमी दो हजार के लिए लाइन में खड़ा रहा और बैंकों की मिलीभगत से बेईमानों ने अरबों-खरबों के नए नोट जुटा लिए, कैसे?

आप जब नोटबंदी पर पूंजीपतियों का कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो बेनामी संपत्ति में क्या बिगाड़ेंगे ? कई पूंजीपति तो बैंकों का 1,14,000 करोड़ कर्जा दबाए बैठे हैं। आप ने तो उनसे यह पैसा वसूल पा रहे हैं और न ही उनके नाम सार्वजनिक कर पा रहे हैं। तो यह माना जाए कि गरीब आदमी से जमा कराया पैसा भी आप इन पूंजीपतियों को लोन के रूप में दे देंगे। यदि भ्रष्टाचार की बात है तो आपने चुनाव से पहले संसद को दागियों से मुक्त करने का आश्वासन जनता को दिया था। सबसे पहले भाजपा सांसदों पर कार्रवाई की बात की थी। क्या हुआ ? मोदी जी अब बातों से काम नहीं चलेगी अब कुछ ऐसा काम करो जो धरातल पर दिखाई दे।

CHARAN SINGH RAJPUT
charansraj12@gmail.com

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मैं भी अमर सिंह की राजनीति का शिकार हुआ हूं

राजनीति से भी बाहर किए जाएं अमर सिंह जैसे नेता

अमर सिंह जैसे नेता पार्टी ही नहीं बल्कि राजनीति से भी बाहर किए जाने चाहिए। दलाल टाइप के नेताओं ने राजनीति का बहुत नुकसान किया है। राजनीति में आचारवान, वैचारिक और संघर्षशील नेताओं की जगह अमर सिंह जैसे मैनेजर लेते जा रहे हैं। इस तरह के लोगों ने ईमानदार नेताओं को भी दलाली सिखाकर भ्रष्ट बना दिया है। ऐसे लोगों की वजह से संगठन ही प्रभावित नहीं होता बल्कि संघर्ष के बल पर आगे बढ़ने का दम रखने वाले युवा भी गलत रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। इस तरह के नेताओं से देश और समाज दोनों का नुकसान हो रहा है।

इस व्यक्ति ने कभी कोई ऐसा काम नहीं किया कि उनकी तारीफ की जाए सके। जिस व्यक्ति के साथ भी संबंध बनाएं उसके परिवार में ही फूट डलवा दी। चाहे उद्योगपति अनिल अंबानी हो, फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन हो या फिर सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय। यह आदमी कितना घटिया है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बताया जाता है कि जब सुब्रत राय गंभीर बीमार पड़े तो यह उनसे अपने पैसे मांगने पहुंच गए।

मैं खुद भी अमर सिंह की राजनीति का शिकार हुआ हूं। जब मैं समाजवादी पार्टी में था तो पूर्व सांसद सी.एन. सिंह ने मुझे प्रताप सेना का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। बाद में पता चला कि अमर सिंह प्रताप सेना के संरक्षक हैं। मैं उन दिनों दिन में समाजवादी और प्रताप सेना के लिए काम करता था तथा रात में राष्ट्रीय सहारा में ड्यूटी करता था। कड़ी मेहनत पर हासिल की मेरी लोकप्रियता से जलने वाले कुछ लोगों के उकसावे में आकर अमर सिंह ने मेरा स्थानांतरण पटना में करवा दिया। चार साल तक मैं पटना में रहा, जिसके चलते मेरा राजनीतिक और पत्रकारिता का करियर बहुत प्रभावित हुआ। समाजवादी पार्टी में अभी भी बहुत अमर सिंह हैं, जिन्हें अखिलेश यादव को पार्टी से निकालना होगा।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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मौत के सौदागर बने कोटा के कोचिंग सेंटर संचालक…. इस साल 16 छात्रों ने आत्महत्या की

इसे शिक्षा का व्यवसायीकरण कहें। युवा पीढ़ी का भटकाव या परिजनों की निगरानी में न रहना या फिर भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था में निराशा का माहौल वजह जो भी हो दूरदराज शहरों में भविष्य बनाने जा रहे युवाओं में से काफी मौत को गले लगा रहे हैं। रात-दिन मेहनत कर पैसे जुटाने वाले परिजन सदमे में जा रहे हैं। स्थिति यह है कि एजुकेशन हब के नाम से प्रसिद्ध हो चुके राजस्थान के कोटा में इस साल 16 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की है। ये बात और दर्दनाक है कि इनमें से अधिकतर बिहार के हैं। हाजीपुर के अंकित गुप्ता ने चंबल नदी में छलांग लगाकर इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि वह मेडिकल फील्ड में जाने के अपने माता-पिता के सपने को पूरा नहीं कर पा रहा था।

गत दिनों एक छात्र ने 500 फुट इमारत से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्र भी दो साल से मेडिकल की तैयारी कर रहा था। बताया जा रहा है कि वह डिप्रेशन में रहता था। अभी कुछ ही दिन पहले बिहार से डॉक्टर बनने का सपना लेकर कोटा आई एक छात्रा ने फंदे से लटकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्रा भी हॉस्टल में रहकर मेडिकल की कोचिंग कर रही थी। छात्रा स्वभाव से खुशमिजाज बताई जा रही है। पढ़ने में भी तेज बताई जा रही यह छात्रा सीन साल से मेडिकल की तैयारी कर रही थी। इस छात्रा की तीन साल से कोचिंग करने की वजह से या तो उसे परिजनों के खर्चे की चिंता सता रही हो या फिर साथियों या परिजनों/रिश्तेदारों के ताने। जिस वजह से उसने मौत को गले लगाया।

बात कोटा की नहीं है कि विभिन्न शहरों में इस तरह की खबरे सुनने को मिल जाती है। गत दिनों नोएडा के एमिटी विश्वविद्यालय में एक छात्र ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसी उपस्थिति कम होने की वजह से उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया था। इन सब बातों को देखते हुए प्रश्न उठता है कि जीवन को उच्च स्तर का बनाने वाली शिक्षा को गृहण करते करते युवा आत्महत्या क्यों कर रहे हैं ? मामला इतना गंभीर है कि इन मामलों पर मंथन बहुत जरुरी हो गया है। क्या इन शिक्षण संस्थानों का माहौल ऐसा विषाक्त कर दिया गया है कि युवा इस माहौल में अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं। या फिर बच्चों पर परिजनों के उच्च शिक्षा थोप देने की प्रवृत्ति या फिर रोजगार न मिलने की असुरक्षा। या फिर बात-बात पर समझौता करने वाली प्रवृत्ति के चलते युवा में समस्याओं से जूझने का कम हो रहा माद्दा।

आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप में सत्र खत्म होने वाले सत्र में इस तरह के संवेदनशील मुद्दे नहीं उठाए जाते हैं। जो मां-बाप तरह-तरह की समस्याओं का सामना करते-करते बच्चों की परवरिश करते हैं। सीने पर पत्थर रखकर बच्चों कों अपने से दूर कर देते हैं। जब उनको बच्चों की मौत की खबर सुनने मिलती तो उनकी मनोदशा क्या होती होगी ? क्या इस बात को कभी शिक्षा का व्यापारियों ने समझने की कोशिश की है ? सरकारों को वोटबैंक की राजनीति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता।

ये लोग तो वोट के लिए कभी आरक्षण की पैरवी करते हैं तो कभी जातिवाद धर्मवाद की और कभी क्षेत्रवाद की। बच्चों की भविष्य कैसे संवरे ? कैसे बच्चों में भाईचारा बढ़े। इससे न सरकारों को सरोकार है और न ही राजनीतिक दलों को। जिस देश का भविष्य ही दम तोड़ने लगे उसका दशा क्या होने वाली है बताने की जरूरत नहीं। कहीं आरक्षण के नाम पर जातिवाद का जहर। तो कहीं पर भेदभाव और कहीं पर क्षेत्रवाद। कभी कश्मीर में बच्चों के मरने की खबर सुनने को मिलती है तो कभी कर्नाटक में और कभी दिल्ली में। कुछ दिन तक राजनीति होती है और बाद में मामला शांत। जिसके घर से गया झेलता तो वह है। कब सुधरेगी यह व्यवस्था।

राजनीति के बढ़ते वर्चस्व के चलते हर कोई राजनीति में जाना चाहता है। देश व समाज की सेवा करने नहीं बल्कि देश को लूटने। इस व्यवस्था में कहीं पर बच्चे अपराध की दलदल में फंसे जा रहे हैं तो कहीं पर टूटकर आत्महत्या कर ले रहे हैं। सरकारों व राजनीतिक दलों के साथ नौकरशाह को बस चिंता है तो बस लूटखसोट की। जब कोटा एक साल में इतने बड़े स्तर पर आत्महत्या के मामले सामने आए हैं तो सरकारी स्तर पर कोई जांच क्यों नहीं बैठाई गई। बच्चों के पढ़ने के बाद रोजगार ढूंढते समय तो आत्महत्या के मामले सुन लेते थे पर पढ़ाई करते समय आत्महत्या के बढ़ इन मामलों पर मंथन के साथ संबंधित शिक्षण संस्थानों में जांच कमेटी बैठाने की जरूरत है जो ईमानदारी से जांच रिपोर्ट सौंपे।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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इन संपादकों की वजह से जाने कितने मीडियाकर्मियों के घर बर्बाद हो रहे हैं

भड़ुआगिरी करनी है तो अखबार में नहीं कोठे पर करो… : मजीठिया मांगने पर अभी तक दैनिक जागरण व राष्ट्रीय सहारा में बर्खास्तगी का खेल चल रहा था अब यह खेल हिन्दुस्तान में शुरू हो गया है। इस खेल में मालिकों से ज्यादा भूमिका निभा रहे हैं वे संपादक जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और लिखते हैं। कमजोरों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले ये लोग कितने गिरे हुए हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन कनिष्ठों के बल पर इन लोगों न केवल मोटी कमाई की बल्कि नाम भी रोशन किया अब ये लोग न केवल उनका उत्पीड़न कर रहे हैं बल्कि नौकरी तक से भी निकाल दे रहे हैं। किसके लिए ? मालिकों का मुनाफा व इनकी दलाली कम न हो जाए। आपके कनिष्ठों के बच्चे भले ही भूखे मर जाएं पर आप और आपके मालिकों की अय्याशी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। मीडिया की हालत देखकर मुझे बहुत तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही है।  मजबूर हूं। अरे यदि भड़ु्रआगिरी ही करनी है तो किसी वैश्या के कोठे पर जाकर करो। कम से कम मुहर तो लगी रहेगी।

पेशा पकड़ रखा है देश व समाज सेवा का और काम कर रहे हो देश व समाज के दुश्मनों का। यदि आप लोग मीडियाकर्मियों की लड़ाई नहीं लड़ सकते हो तो उनका उत्पीड़न तो मत करो। मैं पूछता हूं कि इन संपादकों से आप लोगों में से ऐसे कितने संपादक हैं, जिनकी नौकरी चली जाएगी तो उनके बच्चे भूखे मर जाएंगे। अरे बहुत मार लिया अपने कनिष्ठों का हक। अब यदि मीडियाकर्मियों के हक में क्रांति का माहौल बना है तो इस महायज्ञ आहुति नहीं देनी है तो मत दीजिए पर पानी तो मत डालिए। मैं इन अधिकारियों के बीबी-बच्चों व रिश्तेदारों से भी पूछता हूं, क्या आप लोगों का भी जमीर नहीं जाग रहा है? आपको पता इन संपादकों की वजह से कितने घर बर्बाद हो रहे हैं? पीड़ितों की आह से निकली कमाई से अपने बच्चों का भविष्य कैसे संवारोगे। यह कितना बड़ा धोखा है कि अखबारों में इन संपादकों के लेख पढ़कर कितने लोग इनसे कितनी उम्मीदें लगाते होंगे। ये लोग अपने लेख में तो बड़ी-बड़ी बातें लिखते हैं पर इनकी सोच बहुत छोटी है। देश की सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पीड़ित शोषित मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेतनमान देने को तैयार नहीं। जो मांग रहे हैं उन्हें बर्खास्त कर दे रहे हैं।

राष्ट्रीय सहारा में मजीठिया तो मिला ही नहीं, साथ ही 12 -15 महीने की सेलरी बकाया है। कुछ साथियों ने हिम्मत कर हक की आवाज उठाई तो कुछ गद्दार कर्मियों की वजह से उन्हें संस्था से बाहर होना पड़ा। ये लोग यह भूल रहे हैं कि उन आंदोलनकारियों की वजह से ही वातानुकूलित आफिस में काम कर रहे इन कर्मियों को कई महीने से नियमित रूप से वेतन मिल रहा है। जो वेतन आधा मिलने लगा था वह पूरा इन लोगों ने कराया। तमाशबीन कर्मियों को यह समझना होगा कि मीडिया में अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद हो चुकी है। चिंगारी रूपी यह आवाज जब आग बनेगी इसकी चपेट में कौन-कौन  आएगा यह तो समय ही बताएगा पर सुप्रीम कोर्ट ने एक समय दिया है जिसका हम लोग फायदा उठाएं।

मैं उन साथियों से कहता हूं जो बंधुआ मजदूरों की तरह सिर नीचे कर चुपचाप काम कर रहे हैं। भाईयों जो लड़ता है वह पाता है। मजीठिया भी उन्हें ही मिलेगा जो लड़ेगा ? जो बर्खास्त साथी मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे हैं वे तो अप हक पा ही लेंगे पर आप लोग उनसे कैसे निगाह मिला पाओगे? सुप्रीम कोर्ट का आदेश है तो डरना क्या ? हर लड़ाई में थोड़ी बहुत परेशानी तो पड़ती ही है। मेरा अनुभव रहा है कि सच्चाई की लड़ाई लड़ने वाले को भगवान ऐसी ताकत दे देता है, जिसके बल पर वह सभी बाधाओं को पार कर लेता है। जरा सोचो जो साथी मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे वे बेरोजगार हैं, तब भी लड़ भी रहे हैं। अपने बच्चे भी पाल रहे हैं और तरह-तरह की परेशानियों से भी जूझ रहे हैं। तो हम लोग आज से ही संकल्प लें कि दूसरों की लड़ाई लड़ने दंभ भरने वाले हम मीडियाकर्मी अब अपनी लड़ाई भी लड़ेंगे।

चरण सिंह राजपूत
वरिष्ठ पत्रकार
charansraj12@gmail.com

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भड़ुओं को छोड़ दें, जो पत्रकार हैं वो अपने हक की लड़ाई लड़ें

जरूरतमंदों की आवाज उठाने का दावा करने वाले पत्रकारों की हालत यह है कि वे लोग अपनी लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं। कुछ स्वार्थी, लालची व कायर पत्रकारों ने मीडिया में ऐसा माहौल बनाकर रख दिया है कि जो जितना बड़ा दलाल उतना ही बड़ा पत्रकार। स्वाभिमान, ईमानदार व कर्मठ पत्रकारों को या तो काम नहीं करने दिया जाता या फिर उनको नकारा साबित कर दिया जाता है। इन सबसे यदि ये लोग उबर गए तो इनका इतना दमन किया जाता है कि इन्हें इसका विरोध करना पड़ता है। विरोध का नतीजा यह होता है कि उन्हें नौकरी  से हाथ  धोना  पड़ता है।

टीवी चैनलों व अखबारों में बड़ी बातें कही जाती हैं छापी जाती हैं पर जमीनी हकीकत यह है कि यदि कहीं सबसे ज्यादा शोषण है तो वह मीडिया है। इसके लिए मालिकों से ज्यादा जिम्मेदार बेगैरत, चाटुकार, चरित्रहीन व कमजोर प्रवत्ति के वे अधिकारी हैं जो अपने फायदे के लिए कुछ भी दांव पर लगा देते हैं। युवाओं में भले ही मीडिया के प्रति आकर्षण बढ़ रहा हो। मीडिया की चमक-दमक से भले ही लोग चौंधिया जा रहे हों पर स्थिति यह है कि मीडियाकर्मी दयनीय जीवन बिताने को मजबूर हैं। हां दलाल मीडियाकर्मी जरूर मजे में हैं। मैं मीडिया में शोषण के लिए मीडियाकर्मियों को भी बहुत हद तक जिम्मेदार मानता हूं। विभिन्न मीडिया संस्थानों में विभिन्न कारणों से बड़े स्तर पर पत्रकारों को बर्खास्त कर दिया गया। निलंबित कर दिया गया। स्थानांतरण कर दिया गया। कितने संस्थानों में कई-कई महीने से सेलरी नहीं मिल रही है। राष्ट्रीय सहारा इसमें प्रमुख है। यहां 12-16 महीने की सेलरी बकाया है।

गत दिनों कुछ कर्मचारियों ने हिम्मत कर बकाया वेतन की मांग उठाई तो उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। इन कर्मचारियों का मात्र दोष इतना था ही इन लोगों ने तीन माह का बकाया वेतन तथा पीडीसी मांगे थे। हालांकि राष्ट्रपति महोदय से इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगने तथा मामला पीएमओ तक पहुंचाने तथा गेट पर प्रदर्शन करने के बाद प्रबंधन को बकाया वेतन देना पड़ा। मैं सहारा प्रबंधन की निरंकुशता के लिए यहां पर काम कर रहे कर्मचारियों को भी दोषी मानता हूं। यदि बर्खास्त कर्मचारियों के साथ ये लोग भी बकाया वेतन के लिए अड़ जाते तो प्रबंधन को बर्खास्त कर्मचारियों को तो वापस लेना ही पड़ता। साथ ही इन लोगों को भी काफी बकाया वेतन मिल जाता। प्रबंधन की मजबूरी यह थी क्योंकि काम ठप था। इस प्रकरण में कुछ लोगों ने जो गद्दारी की है, वह सहारा क्रांति में काले धब्बे के रूप में याद किया जाएगा। इसी तरह का हाल दैनिक जागरण का है बड़े स्तर पर कर्मचारी बर्खास्त व निलंबित होकर सड़कों पर घूम रहे हैं और ये लोग जिनकी लड़ाई लड़ रहे थे वे प्रबंधन के दबाव में काम कर रहे हैं।

मैं मीडिया में जिस तरह से दबाव में काम कराया जा रहा है उसे बंधुआ मजदूरी की संज्ञा देता हूं। मैं एक ऐसे साथी का उदाहरण दे रहा हूं, जिससे भले ही बेगैरत लोगों पर कुछ असर नहीं पड़े पर जो लोग संवेदनशील हैं उनके रोंगटे खड़े हो जायेंगे।  हमारा एक साथी ओमपाल शर्मा एक अख़बार में कार्यरत था। लंबे समय तक वेतन न मिलने की स्थिति में एक हादसे का शिकार होकर घायल हो गया था। उचित इलाज न होने पर उसका निधन हो गया। इस गम में उसकी मां भी गुजर गई। बाद में उसे  किसी तरह की मदद न मिलने पर उसकी पत्नी ने भी दम तोड़ दिया। इस साथी के छोटे-छोटे बच्चे हैं। ओमपाल शर्मा तो मात्र उदाहरण है, ऐसे कितने ओमपाल इस व्यवस्था में दम तोड़ रहे हैं और बेगैरत पत्रकार प्रबंधन से मिलकर अपने साथियों के शोषण में भागीदारी निभा रहे हैं। आज यदि सबसे बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत है वह मीडिया है।

जो पत्रकार सरकारों की तारीफ में लिखते रहते हैं, उनके लिए मैं लिखना चाहता हूं। जो सरकारें अपने वोटबैंक के लिए सातवां वेतनमान आयोग लागू कर रही हैं उन सरकारों को मीडियाकर्मियों के लिए गठित मजीठिया आयोग नहीं दिखाई दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मीडिया समूहों के मालिकों के दबाव में सरकारें अभी तक मजीठिया आयोग लागू नहीं करा पाई हैं। मेरा सभी मीडिया साथियों से कहना है कि अब समय आ गया है कि हम लोग अपने मान-सम्मान व अधिकार के लिए खड़े हो जाएं। जो भडुवे पत्रकार हैं उन्हें छोड़ दो। मीडियाकर्मियों की लड़ाई लड़ने के लिए एक फेडरेशन की जरूरत है। सोचो कि हम लोगों की ओर जरूरतमंद लोग भी आशा भरी निगाहों से देखते हैंं। जब हम लोग अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ सकते तो हमें पत्रकार कहने को कोई अधिकार नहीं?

चरण सिंह राजपूत
राष्ट्रीय सहारा से बर्खास्त पत्रकार
charansraj12@gmail.com

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