दैनिक जागरण, नारनौल में ऑफिस ब्‍वॉय से प्रभारी बने राजेंद्र

: देवेंद्र को किया गया दरकिनार : दैनिक जागरण अखबार में नित नए कारनामें देखे जाते हैं। अब नया कारनामा नारनौल हरियाणा में सामने आया है। यहां पर जागरण प्रबंधन ने योग्यता को दरकिनार कर स्टाफर को छोड़ आफिस ब्वाय को प्रमोट करके आफिस का इंजार्च बना दिया। जिसकी स्थानीय मीडिया में भी काफी चर्चा है। माना जा रहा है कि यह योग्‍यता से ज्‍यादा चाटुकारिता का परिणाम है।

हुआ यूं की नारनौल कार्यालय में कई वर्षों से चीफ रिपोर्टर का पद रिक्त है। इसलिए रेवाड़ी के महेश वैद्य को यहां का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है। महेश वैद्य ने भी तुरंत यहां का कार्यभार लिया था। इससे पूर्व यहां पर रोहताश सिंह यादव संवाद सहयोगी होकर भी कई वर्षों से कार्यालय प्रभारी रहे हैं। करीब ढाई साल पूर्व उनकी तबीयत खराब होने पर देवेंद्र यादव को जागरण ने स्टाफर के रूप में रिपोर्टर लगाया था। जिसके हिसाब से करीब दो साल से देवेंद्र यादव ही वरिष्ठता के तहत कार्यालय प्रभारी के रूप में कार्य कर रहा है। वहीं इनके अलावा रोहतास सिंह का भतीजा राजेंद्र, जो करीब पांच साल पूर्व आफिस ब्वाय के रूप में लगा था, उसे स्टाफ की कमी होने पर तीन साल पूर्व संवाद सहयोगी बनवा दिया गया। वहीं वह देवेंद्र कई वर्ष जूनियर भी है व पूर्व में अमर उजाला के ब्यूरो प्रमुख भी रह चुके हैं। अब रोहतास सिंह के रिटायर होने पर उन्होंने भाई-भतीजावाद के चलते सीजेएम निशिकांत ठाकुर से चाटुकारिता कर अपने भतीजे राजेंद्र की पदोन्नति करा स्टाफ रिपोर्टर के साथ कार्यालय प्रभारी का भी दर्जा दिला दिया। प्रबंधन से चाटुकारिता करने पर राजेंद्र से कई वर्ष सीनियर रहे देवेंद्र को दरकिनार करते हुए राजेंद्र की न केवल सैलरी में भारी इजाफा कर दिया गया बल्कि उसे कार्यालय प्रभारी का पद भी दे दिया गया। इस प्रकार एक आफिस ब्वाय ने महज चार साल के दौरान कार्यालय प्रभारी का पद हासिल कर सबको चौंका दिया है।

वहीं खास बात यह भी है कि देवेंद्र ने जहां 2004 में पत्रकारिता में मास्टर डिग्री प्राप्त की थी। वहीं राजेंद्र ने हाल ही में दूरस्थ शिक्षा के तहत अपनी बीए की पढ़ाई ही की है। वहीं उसे पत्रकारिता व लिखने का अनुभव भी काफी कम है। जागरण प्रबंधन के इस नए कारनामे की स्थानीय मीडिया में काफी चर्चा है तथा पत्रकार यह कह रहे हैं कि जागरण में योग्यता की नहीं, बल्कि चाटुकारिता की अहमियत है। जिस प्रकार महेश वैद्य चाटुकारिता कर दूसरे जिले में हस्तक्षेप कर रहे हैं। उसी तर्ज पर रोहतास सिंह यादव ने भी अपने भतीजे के लिए प्रबंधन की जमकर चाटुकारिता की तथा राजेंद्र को आफिस ब्वाय से आफिस इंचार्ज बनवा दिया।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

राज समूह का न्‍यूज चैनल ‘राज टीवी’ 8 जुलाई को होगा लांच

अरुण सहलोत की कंपनी का टीवी चैनल 'राज टीवी' आठ जुलाई को लांच होने जा रहा है. सहलोत मध्य प्रदेश के जाने माने बिल्डर हैं और राज एक्सप्रेस नामक अखबार का प्रकाशन करते हैं. काफी समय से इस चैनल की तैयारियां चल रही थीं. पिछले दिनों इस चैनल में भर्तियों के लिए विज्ञापन निकाला गया था.

बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने मध्‍य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्‍यान में रखकर अपने समूह को मजबूत कर रहा है. अखबार के बाद अब यह समूह रीजनल चैनल लांच करने जा रहा है. चैनल की भर्तियां लगभग पूरी की जा चुकी हैं. टीम बन चुकी है. सूत्रों का कहना है कि चैनल में एमसीआर-पीसीआर-स्‍टूडियो आदि का काम भी पूरा हो चुका है. गौरतलब है कि अरुण सहलोत तथा उनका अखबार उस समय चर्चा में आया था, जब उन्‍होंने मध्‍य प्रदेश सरकार से सीधी लड़ाई मोल ली थी, जिसमें उनको नुकसान भी उठाना पड़ा. इसके बाद भी वे पीछे नहीं हटे.

मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के लिए मीडियाकर्मियों ने निकाली रैली

HYDERABAD : Journalists from various parts of the State on Wednesday took out a rally here to highlight the problems faced by them in mofussil areas. The procession that began from Sundaraiah Vignana Kendram ended at Indira Park where a meeting was addressed by trade union leaders, including former Minister Nayani Narasimha Reddy.

The rally was organised by the A.P. Working Journalists’ Federation whose president B. Basava Punnaiah and general secretary G. Anjaneyulu also spoke on the occasion.

The speakers demanded job security, house sites and accreditation for journalists. They also demanded implementation of recommendations by Justice Gurubux Majithia on wages, a pension scheme as in Kerala, Karnataka, Madhya Pradesh, Tamil Nadu, Bihar and Odisha and a commission to study the problems facing journalists. A delegation also submitted a memorandum to Information and Public Relations Minister D.K. Aruna. (द हिंदू)

महाराष्‍ट्र में 3 जुलाई को आंदोलन की रणनीति बनाएगा पत्रकार हमला विरोधी कृती

महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर बढ़ते हमले और इस विषय पर महाराष्ट्र सरकार द्वारा साधी हुई चुप्पी के विरोध में राज्य व्यापी आंदोलन छेड़ने के लिए पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति पर बढ़ते दबाव के चलते समिति की बैठक 3 जुलाई को मुंबई में होने जा रही है. दोपहर दो बजे मराठी पत्रकार परिषद के सीएसटी स्थित दफ्तर में इस मीटिंग का आयोजन किया गया है. समिति के कन्वेनर एसएम देशमुख मीटिंग की अध्यक्षता करेंगे.

मीटिंग में समिति के सदस्यों के अलावा शहर के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को भी निमंत्रित किया गया है. महाराष्ट्र विधानमंडल का वर्षाकालीन अधिवेशन 15 जुलाई से शुरू होने जा रहा है. इस दौरान महाराष्ट्र में उग्र आंदोलन छेड़ने का फैसला इस मीटिंग में लिया जा सकता है. पत्रकारों के उपर बढ़ते हमले रोकने के लिये समिति पिछले तीन सालों से आंदोलन चला रही है. समिति की मांग है कि    पत्रकारों के उपर होने वाला हमला नॉन बेलेबल ऑफेन्स बनाया जाय. साथ पत्रकारों पर हमले की कार्रवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट की ओर से की जाए.

इसी मांग को लेकर पिछले 8 मई को समति की ओर से पनवेल से मुख्‍यमंत्री आवास वर्षा तक कार रैली का आयोजन किया गया था. उस वक्‍त मुख्‍यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने इस बिल का ड्राफ्ट कैबिनेट के सामने रखने का वादा किया था. लेकिन यह वादा पूरा नहीं किया गया. जबकि इसके बाद से पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं. इस वर्ष के शुरुआत से लेकर अब तक 40 से ज्‍यादा पत्रकार हमलों के शिकार बन चुके हैं. सीएम की वादाखिलाफी से महाराष्‍ट्र के पत्रकारों में काफी गुस्‍सा है.

बरेली में छंटनी मामले में दैनिक जागरण को मिला हाई कोर्ट से स्‍टे

बरेली में दैनिक जागरण ने छंटनी के शिकार हुए कर्मचारियों द्वारा लेबर कोर्ट में किए गए केस में हाई कोर्ट से स्‍टे ले लिया है. कोर्ट ने लेबर कमिश्‍नर तथा पूर्व कर्मचारियों ने जुलाई के दूसरे सप्‍ताह तक अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है. खबर है कि कोर्ट ने यह स्‍टे टेक्निकल आधार पर दिया है.

गौरतलब है कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने बरेली में कार्यरत रहे निर्भय सक्‍सेना, अरुण द्विवेदी, रमेश चंद्र राय, सुधांशु श्रीवास्‍तव एवं नवीन द्विवेदी समेत कुछ अन्‍य कर्मचारियों से जबरिया इस्‍तीफा ले लिया था. इन लोगों को छंटनी का शिकार बना दिया गया था. इसके बाद ये लोग लेबर कोर्ट में दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. बताया जा रहा है कि श्रम विभाग ने इन लोगों के पक्ष में जिन धाराओं में मामला दर्ज किया है, जागरण उसी के आधार पर यह स्‍टे लिया है.

मामला लेबर कोर्ट एक्‍ट के टेन सी में कर दिया है, जिस पर जागरण प्रबंधन ने हाई कोर्ट के सिंगल बेंच को यह बताते हुए स्‍टे ले लिया है कि यह धारा उनपर लागू नहीं होता है. बताया जा रहा है कि कोर्ट ने पीडि़त कर्मचारियों ने जुलाई के दूसरे सप्‍ताह तक अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया है. इन पूर्व कर्मचारियों द्वारा अपना पक्ष रखे जाने के बाद कोर्ट आगे की सुनवाई करेगा.

सामूहिक बलात्‍कार मामले के गवाहों की पुलिस ने दी धमकी

नवी मुंबई :  तुर्भे में दस वर्षीय नाबालिक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और इलाज के दौरान मृत मामले की गवाह लड़कियों को धमकाए जाने का आरोप मृत लड़की के घर वालों ने लगाया है। इस के साथ ही गिरफ्तार युवकों में तीन युवकों के बालिग होने की जानकरी लड़की के घर वालों ने देते हुए इस मामले में चारों युवकों का मेडिकल जांच कर फांसी की सजा देने की मांग की है।

बता दें कि तुर्भे की हनुमान नगर में रहने वाली दस वर्षीय लड़की के साथ वही पास में रहने वाले चार युवको ने १६ जून को दस रुपये का लालच दिखाकर उसे पास के ही पहाड़ी पर बारी बारी से बलात्कार किया। इस घटना में पीड़ित लड़की घर आने के बाद बुखार से तपती रही। लड़की को जब उल्टियां होने लगी तो १६ जून को उसे एनएमएमसी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस बीच लड़की का तबीयत बिगड़ने पर 20 जून को ही उसे डीवाई पाटिल अस्पताल में भर्ती कराया गया। जंहा उपचार के दौरान उस की मौत हो गयी। इस के बाद पुलिस ने चारों युवकों के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कर हिरासत में लिया और भिवंडी स्थित बालसुधार गृह में भेज दिया है।

पुलिस ने आरोपी लड़कों की उम्र नाबालिग होने के कारण बला सुधार गृह में भेजा है। इस के विरोध में पीड़ित लड़की के घर वालों ने पुलिस से मांग किया है कि उक्त युवकों की मेडिकल जांच किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया है कि इन युवकों के उम्र १८ साल से अधिक है। इस के लिए उन्हें फांसी की सजा मिलनी चाहिए ताकि मेरी बेटी को न्याय मिल सके।

गवाहों को पुलिस की धमकी : तुर्भे हनुमान नगर की १० वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार मामले की गवाह लड़कियों को पुलिस स्टेशन में पूछताछ के लिए बुलाये जाने पर तुर्भे पुलिस स्टेशन के पुलिस द्वारा धमकाए जाने का आरोप पीड़ित लड़की के पिता ने लगाया है। उन्होंने बताया कि बुधवार को पुलिस स्टेशन में गवाह लड़की को बुलाये जाने पर ले गए थे, लेकिन वहां मौजूद चव्हाण नामक पुलिस कर्मचारी ने उस लड़की को कहा कि तू बोलना कि यह गिरने से बीमार थी और उस के सर में मार लगाने से मौत हो गयी है। इस की जानकारी उन्होंने तुर्भे पुलिस को दिया है। सूत्रों के अनुसार उक्त पुलिस कर्मचारी पर कार्रवाई करने की तैयारी पुलिस विभाग कर रहा है।  

नागरिकों ने निकाली श्रद्धांजलि यात्रा : सामूहिक बलात्कार के कारन मृत दस वर्षीय बच्ची को श्रद्धांजलि देने के लिए नागरिकों ने गुरुवार शाम को कैंडल मार्च निकला। इस मार्च ने सैकड़ों नागरिक शामिल होकर श्रद्धांजलि दी। इस के साथ ही मांग किया कि आरोपी लड़कों को कठोर से कठोर सजा होनी चाहिए। इस यात्रा में हनुमान नगर की सर्वाधिक महिलायें शामिल थी। महिलाओं ने आवाज उठाया है कि अगर उक्त लड़की को न्याय नहीं मिला तो हम महिलायें इस के खिलाफ जन आन्दोलन करेंगे।

मुंबई से नागमणि पांडेय की रिपोर्ट.

बिजली कंपनियों की लाटरी निकल आयी कोयला नियामक फैसले से!

अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान! बिजली कंपनियों की लाटरी निकल आयी कोयला नियामक फैसले से! भारत सरकार और राज्य सरकारें बिजली कंपनियों के हक में है। जिन्हें बिजली कंपनियों की ओर से बार-बार बिजली दरें बढ़ाये जाने पर कोई खास ऐतराज नहीं होता। लेकिन जबर्दस्त कारपोरेट लाबिइंग के असर में पूरी राजनीतिक जमात कोल इंडिया के खिलाफ लामबंद हो गयी। जो यूनियनें कोल इंडिया के विनिवेश और विभाजन के खिलाफ आंदोलन कर रही हैं, उनके पीछे भी राजनीतिक दल हैं। जो यूनियनों के विपरीत कोल इंडिया के खिलाफ बिजली कंपनियों के ही हित साध रहे हैं।

सीसीईए की बैठक में कोल रेगुलेटर बॉडी कोयला नियामक बनाने का भी फैसला लिया गया है। कोयला नियामक बनना बिजली कंपनियों के लिए अच्छी खबर है। दावा तो यह किया जा रहा है कि इसके बाद बिजली कंपनियों के लिए कोयले की किल्लत दूर होगी और कीमत मनमाने तरह से नहीं बढ़ेगी। कोयला नियामक की मुख्य जिम्मेदारी नीलामी से पहले रिजर्व प्राइस सुझाना, कीमत और क्वालिटी पर मतभेद हल करना होगा। कोयला नियामक बन जाने के बाद देखना तो यह है कि बिजली कंपनियों को मनमाने ढंग से बिजली दरें बढ़ाने के लिए अब कौन सा बहाना मिलता है।

सरकार फैसले की वजह से ही बिजली और उर्वरक कंपनियों के लिए की लाटरी निकल आयी है, बाजार के रुख से यह साफ जाहिर है। प्राकृतिक गैस के दाम बाद में तय होने की खबर से पावर और फर्टिलाइजर शेयरों को सहारा मिला। साथ ही, कोयला नियामक को मंजूरी मिलने का भी फायदा से पावर शेयरों को मिला। सरकार के मुताबिक पावर प्रोजेक्ट्स के कोयला सप्लाई मसले को पूरी तरह से सुलझा लिया गया है। अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट्स के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का मसौदा तैयार है। पावर डिस्ट्रिब्यूशन सेक्टर से जुड़ी नीतियों में सुधार करने की जरूरत है। फर्टिलाइजर और पावर कंपनियों के गैस सप्लाई पर जल्द कैबिनेट नोट लाया जाएगा। सरकार ने कोल इंडिया के उत्पादन का लक्ष्य 49.2 करोड़ टन रखा है। वहीं, बिजली की क्षमता का लक्ष्य 18432 मेगावॉट रखा है।

अब राहत की सांस ले रहे हैं कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल को उम्मीद है कि संसद में कोयला नियामक बिल पास हो जाएगा। कोयला नियामक का प्रस्ताव लंबे समय से अटक हुआ था। कोयला नियामक के आने से सेक्टर में पारदर्शिता आएगी। 1 हफ्ते में सरकारी कंपनियों को कोयले के ब्लॉक दिए जाएंगे। कोल गेट घोटाले को रफा दफा करने के लिए कोयला नियामक का बखूबी इस्तेमाल होना है। जाहिर है। कोयला मंत्रालय ने मई 2012 में कोयला नियामक प्राधिकरण विधेयक 2012 की मंजूरी के लिए आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) के समक्ष प्रस्ताव रखा था। कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (सीसीईए) ने कोल पूल प्राइसिंग को मंजूरी दी है। इंपोर्टेड कोल से बिजली उत्पादन पर होने पर कोयले की बढ़ी कीमत का बोझ ग्राहकों पर डाला जाएगा। इससे बिजली महंगी होने की आशंका है। सरकार के इस फैसले से 2009 के बाद बने 78000 मेगावॉट क्षमता के पावर प्लांट को फायदा होगा। ऐसे में टाटा पावर, अदानी पावर, सीईएससी, जीएमआर इंफ्रा और रिलायंस इंफ्रा जैसी कंपनियों को राहत मिलेगी।

कोयला नियामक की जिम्मेदारी के तहत कोयले की कीमत और गुणवत्ता पर मतभेद हल करना, कोयला ब्लॉक की नीलामी से पहले रिजर्व प्राइस सुझाना, कोयले की कीमत में पारदर्शिता की गाइडलाइंस के साथ ही कोयला ब्लॉक की नीलामी की गाइडलाइंस तय करना शामिल होंगे। अब कोल इंडिया बिजली कंपनियों की मांग के 65 फीसदी कोयले की आपूर्ति करेगा। बाकी बचा कोयला कंपनियों को सीधे आयात करना होगा या कोल इंडिया के जरिए आयात कर सकती है। महंगे कोयले का बोझ ग्राहकों पर डालने के फैसले के बाद बिजली की दरों में 20-25 पैसे प्रति यूनिट की बढ़ोतरी होगी। आयातित कोयले की कैलोरोफिल वैल्यू ज्यादा होती है जिससे इससे बनने वाली बिजली भी कुछ महंगी होती है।

वित्त मंत्री पी चिदंबरम का कहना है कि कोयला ब्लॉक आवंटन कोयला नियामक के दायरे में नहीं आएगा। संसद की मंजूरी के बाद कोयला नियामक को लागू किया जाएगा। कोल इंडिया कीमतें तय करेगी, वहीं, कोयला नियामक नियम बनाएगा।

चिदंबरम ने संवाददाताओं से कहा कि कोयला नियामक प्राधिकरण विधेयक, 2013 को मंजूरी के लिए संसद के अगले सत्र में पेश किया जाएगा। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘विधेयक पारित होने का इंतजार करने की बजाय हमने इस विनियामक प्राधिकारण को कार्यपालिका के आदेश के जरिए गठित करने का प्रस्ताव किया है। पहले भी ऐसा किया जा चुका है। पेंशन कोष निनियमन एवं विकास प्राधिकारण (पीएफआरडीए) का गठन भी सरकारी आदेश से ही किया गया था। यह अब भी सरकारी आदेश के तहत ही काम कर रहा है। सेबी का गठन भी सरकारी आदेश से किया गया था सेबी सांविधिक निकाय बाद में बना। ’ केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कल शाम कोयला क्षेत्र के लिए नियामक के गठन को मंजूरी दी थी। चिदंबरम ने कहा कि कोयला नियामक प्राधिकरण विधेयक, 2013 संसद के अगले सत्र में पेश किया जाएगा।

उन्होंने कहा, चूंकि कोयला नियामक का गठन जरूरी है, इसलिए शुरू में इसे सरकारी आदेश के जरिये बनाया जाएगा और हम उम्मीद करते हैं कि इस बारे में विधेयक जल्द से जल्द पारित हो जाएगा। चिदंबरम ने कहा कहा कि प्राधिकरण के दायरे में कोयला ब्लाक आवंटन नहीं आएगा। मंत्रिमंडल इस बारे में पहले ही फैसला कर चुका है। वित्त मंत्री ने कहा कि यह प्राधिकरण सभी अंशधारकों के हितों का संरक्षण करेगा। चिदंबरम ने कहा कि कोयला नियामक प्राधिकरण मूल्य तय करने के सिद्धान्तों तथा तौर तरीके बारे में बताएा। साथ ही वह दो अंशधारकों के बीच विवाद का निपटान भी करेगा।

विधेयक के संसद में पारित हो जाने के बाद विस्तृत विवरण तैयार कर शुरूआती कोष के लिए सरकार को भेजा जाएगा। मंत्रिमंडल ने इस प्रस्ताव को भी मंजूरी दी कि यदि विधेयक के पारित होने में देरी होगी, तो कार्यकारी आदेश के जरिए नियामक स्थापित किया जाएगा। नियामक हालांकि कोयला पट्टी आवंटन में हस्तक्षेप नहीं कर पाएगा और कोल इंडिया लिमिटेड कोयले की कीमत तय करती रहेगी।

बहरहाल कोयला नियामक बनाने के फैसले के साथ साथ सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों की दिशा में बड़ा कदम उठाने की वजह से बाजार 2.75 फीसदी उछले। सरकार ने नैचुरल गैस के दाम दोगुने करने का फैसला किया है। साथ ही, रुपये में आई जोरदार तेजी और एशियाई बाजारों में मजबूती से भी घरेलू बाजारों में जोश आया।सेंसेक्स 520 अंक चढ़कर 19396 और निफ्टी 160 अंक चढ़कर 5842 पर बंद हुए। दिग्गजों के साथ-साथ मिडकैप शेयर भी उछले। निफ्टी मिडकैप 3.2 फीसदी चढ़ा। वहीं, छोटे शेयर बाजार की तेजी पिछड़े। बीएसई स्मॉलकैप में करीब 1.5 फीसदी की तेजी आई।दिग्गजों में जिंदल स्टील, कोल इंडिया, बीएचईएल, रिलायंस इंफ्रा, बीपीसीएल, बजाज ऑटो, सन फार्मा, एनएमडीसी, एलएंडटी, एचडीएफसी, हिंडाल्को, आईसीआईसीआई बैंक, भारती एयरटेल, गेल, टाटा पावर, पावर ग्रिड 7-3.5 फीसदी उछले हैं।  चालू खाता घाटा कम होने और सरकार द्वारा सुधार पर जोर देने की कोशिशों का असर बाजार पर दिख रहा है। कारोबार शुरू होने के साथ बाजार में तेजी दर्ज की जा रही है।सरकार के फैसले के बाद कंपनी के शेयरों में खरीदारी बढ़ गई है। कोल इंडिया के शेयरों में भी तेजी दर्ज की जा रही है। सरकार द्वारा कोयला नियामक को मंजूरी मिलने के बाद कंपनी के शेयरों में तेजी आई है। बीएचईएल, एलऐंडटी और जिंदल स्टील के शेयर भी चढ़े हुए हैं।

कोयला नियामक को मंजूरी दिये जाने से शेयर बाजार में पावर कंपनियों के शेयर भाव में मजबूती का रुख बना हुआ है। आज शेयर बाजार में कोल इंडिया का शेयर 309.50 रुपये तक चढ़ गया। दोपहर 2:48 बजे 6.80% की मजबूती के साथ यह 306.45 रुपये पर है।एनटीपीसी के शेयर भाव में भी मजबूती का रुख है। बीएसई में कंपनी का शेयर 2.67% की बढ़त के साथ 144.20 रुपये पर है।शेयर बाजार में टाटा पावर के शेयर भाव में भी मजबूती का रुख है।

नियामक, कोयले के नमूने एकत्र करने और कोयले को साफ करने की प्रक्रिया भी तय करेगा। गुरुवार को सीसीईए की बैठक के बाद जारी आधिकारिक बयान में कहा गया, "प्राधिकरण कोयले की गुणवत्ता तय करने के लिए जांच की प्रक्रिया तय करेगा, खदानों को बंद करने का आदेश देगा और उसकी प्रक्रिया पर नजर रखेगा, कच्चे और शुद्धीकृत कोयले की कीमत निर्धारण की प्रक्रिया तय करेगा, विभिन्न पक्षों के बीच विवादों पर फैसला देगा और केंद्र सरकार द्वारा सौंपे गए अन्य कार्यो का निष्पादन करेगा।" बयान में कहा गया है कि "कोयला नियामक प्राधिकरण कोष" नाम से एक कोष गठित किया जाएगा और प्राधिकरण को मिलने वाले सभी प्रकार के अनुदान और शुल्क इसी कोष में जमा किए जाएंगे।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्त वर्ष 2014 के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निवेश का लक्ष्य तय किए हैं। देश में निवेश का माहौल सुधारने के लिए मनमोहन सिंह ने इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मंत्रालयों के साथ बैठक की। नए लक्ष्य के तहत सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाएगी। साल दर साल के मुताबिक सड़क निर्माण का लक्ष्य 9500 किमी से घटाकर 5000 किमी रखा गया है। वहीं, एयरपोर्ट में निवेश का लक्ष्य 1023 करोड़ रुपये से घटाकर 900 करोड़ रुपये रखा है।

वित्त वर्ष 2014 में सरकार एयरपोर्ट निर्माण पर खासा जोर देने वाली है। एयरपोर्ट अथॉरिटी देश भर में 50 नए लो कॉस्ट एयरपोर्ट बनाएगी। नवी मुंबई, मुंबई के जुहु, गोवा, कन्नौर के ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट को मंजूरी दी गई है। भुवनेश्वर और इंफाल में इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाए जाएंगे।इसके अलावा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत अगले 6 महीने में सरकार 1 लाख करोड़ रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मंजूरी दे सकती है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष, मोंटेक सिंह अहलूवालिया के मुताबिक इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निवेश बढ़ाया जा सकता है।

क फैसला करते हुए पांच साल में पहली बार प्राकृतिक गैस की कीमत बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। देश में उत्पादित गैस की मौजूदा कीमत 4.2 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू (गैस मापने का मानक) से बढ़ कर लगभग दोगुनी हो जाएगी। नई दर अप्रैल, 2014 से लागू होगी और पांच साल तक प्रभावी रहेगी। इससे देश के पेट्रोलियम क्षेत्र में देसी-विदेशी निवेश आने की संभावना तो है, लेकिन यह भी तय है कि ग्राहकों को बिजली व उर्वरक के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की बैठक में रंगराजन समिति के फार्मूले के आधार पर प्राकृतिक गैस कीमत बढ़ाने के फैसले को मंजूरी दे दी गई। प्रस्ताव के मुताबिक अब हर तीन महीने पर गैस की कीमत संशोधित की जाएगी। इस समय जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार को देख कर पेट्रोल की कीमत तय की जाती है, उसी तरह से अब गैस की कीमत भी तय होगी। पेट्रोलियम मंत्रालय ने अपने कैबिनेट नोट में प्राकृतिक गैस की कीमत 6.7 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू करने का प्रस्ताव किया था। मगर माना जा रहा है कि अप्रैल 2014 से जब नई दर लागू होगी तब अंतरराष्ट्रीय कीमत के आधार पर यह आठ डॉलर प्रति एमएमबीटीयू के आसपास हो जाएगी।

इस फैसले का देश के ऊर्जा क्षेत्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। गैस की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी कम होने की वजह से कंपनियां भारत में निवेश नहीं कर पा रही थीं। पहले जो गैस फील्ड मिले थे, उनमें भी नया निवेश नहीं हो रहा था। इस वजह से केजी बेसिन में गैस उत्पादन घट कर एक तिहाई रह गई है। इस फैसले के बाद देश के बिजली प्लांटों को पर्याप्त गैस मिल सकेगी। अभी लगभग 18 हजार मेगावाट के गैस आधारित बिजली प्लांट गैस की कमी की वजह से बंद पड़े हुए हैं। अब इन्हें फिर से चलाना संभव हो सकेगा। मगर गैस की कीमत बढ़ने से बिजली उत्पादन लागत बढ़ेगी जिसे अंतत: ग्राहकों को ही चुकाना पड़ेगा। इसी तरह से स्टील, उर्वरक व सीमेंट उद्योगों की लागत भी बढ़ेगी और उनकी कीमतों में भी इजाफा हो सकता है।

गैस की कीमत बढ़ाने के साथ ही सीसीईए ने कोयला क्षेत्र के लिए नियामक गठित करने संबंधी विधेयक को भी मंजूरी दे दी। कोयला नियामक प्राधिकरण विधेयक को यूपीए सरकार वर्ष 2010 से तैयार कर रही है। इसे अब जा कर अंतिम रूप दिया जा सका है। इसे मानसून सत्र में सरकार संसद में पेश करेगी। प्रस्तावित नियामक को कोयला कीमत तय करने का पूरा अधिकार नहीं दिया गया है। प्राधिकरण को सिर्फ कुछ विशेष मामलों में ही कीमत तय करने बारे में हस्तक्षेप करने का अधिकार होगा। इसके अलावा सीसीईए ने नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड (एनएफएल) की 7.64 फीसद हिस्सेदारी विनिवेश को भी हरी झंडी दिखा दी। सरकार को इससे 125 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है।

फैसले का दूरगामी असर-

1. 18 हजार मेगावाट क्षमता के बिजली प्लांट को मिलेगी गैस

2. केजी बेसिन में रिलायंस बढ़ाएगी निवेश, बढ़ेगा उत्पादन

3. तेल व गैस क्षेत्र में आएगा नया निवेश

4. उर्वरक कंपनियों पर भी पड़ेगा असर, बढ़ेगी कीमत

5. सीमेंट व स्टील की कीमतों भी इजाफा तय

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

उत्‍तराखंड को आपदा से बचा सकता है ‘नैनीताल माडल’

नैनीताल : कहते हैं कि आपदा और कष्ट मनुष्य की परीक्षा लेते हैं और समझदार मनुष्य उनसे सबक लेकर भावी और बड़े कष्टों से स्वयं को बचाने की तैयारी कर लेते हैं। ऐसी ही एक बड़ी आपदा नैनीताल में 18 सितंबर 1880 को आई थी, जिसने तब केवल ढाई हजार की जनसंख्या वाले इस शहर के 151 लोगों और नगर के प्राचीन नयना देवी मंदिर को लीलने के साथ नगर का नक्शा ही बदल दिया था, लेकिन उस समय उठाए गए कदमों का ही असर है कि यह बेहद कमजोर भौगोलिक संरचना का नगर आज तक सुरक्षित है।

इसी तरह पहाड़ के ऊंचाई के अन्य गांव भी बारिश की आपदा से सुरक्षित रहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि नैनीताल और पहाड़ के परंपरागत मॉडल केदारघाटी व चारधाम यात्रा क्षेत्र से भी भविष्य की आपदाओं की आशंका को कम कर सकते हैं। 1841 में स्थापित नैनीताल में वर्ष 1867 में बड़ा भूस्खलन हुआ था, और भी कई भूस्खलन आते रहते थे, इसी कारण यहाँ राजभवन को कई जगह स्थानांतरित करना पढ़ा था। लेकिन 18 सितम्बर 1880 की तिथि नगर के लिए कभी न भुलाने वाली तिथि है।

तब 16 से 18 सितम्बर तक 40 घंटों में 20 से 25 इंच तक बारिश हुई थी। इसके कारण आई आपदा को लिखते हुए अंग्रेज लेखक एटकिंसन भी सिहर उठे थे। लेकिन उसी आपदा के बाद लिये गये सबक से सरोवर नगरी आज तक बची है और तब से नगर में कोई बड़ा भूस्खलन भी नहीं हुआ है। उस दुर्घटना से सबक लेते हुए तत्कालीन अंग्रेज नियंताओं ने पहले चरण में नगर के सबसे खतरनाक शेर-का-डंडा, चीना (वर्तमान नैना), अयारपाटा, लेक बेसिन व बड़ा नाला (बलिया नाला) में नालों का निर्माण कराया। बाद में 1890 में नगर पालिका ने रुपये से अन्य नाले बनवाए। 23 सितम्बर 1898 को इंजीनियर वाइल्ड ब्लड्स द्वारा बनाए नक्शों के आधार पर 35 से अधिक नाले बनाए गए।

वर्ष 1901 तक कैचपिट युक्त 50 नालों (लम्बाई 77,292 फीट) और 100 शाखाओं का निर्माण (लंबाई 1,06,499 फीट) कर लिया गया। बारिश में कैच पिटों में भरा मलबा हटा लिया जाता था। अंग्रेजों ने ही नगर के आधार बलिया नाले में भी सुरक्षा कार्य करवाए जो आज भी बिना एक इंच हिले नगर को थामे हुए हैं। यह अलग बात है कि इधर कुछ वर्ष पूर्व ही हमारे इंजीनियरों द्वारा बलिया नाला में कराये गए कार्य कमोबेश पूरी तरह दरक गये हैं। बहरहाल, बाद के वर्षो में और खासकर इधर 1984 में अल्मोड़ा से लेकर हल्द्वानी और 2010 में पूरा अल्मोड़ा एनएच कोसी की बाढ़ में बहने के साथ ही बेतालघाट और ओखलकांडा क्षेत्रों में जल-प्रलय जैसे ही नजारे रहे, लेकिन नैनीताल कमोबेश पूरी तरह सुरक्षित रहा।

ऐसे में भूवैज्ञानिकों का मानना है ऐसी भौगोलिक संरचना में बसे प्रदेश के शहरों को "नैनीताल मॉडल" का उपयोग कर आपदा से बचाया जा सकता है। कुमाऊं विवि के विज्ञान संकायाध्यक्ष एवं भू-वैज्ञानिक प्रो. सीसी पंत एवं यूजीसी वैज्ञानिक प्रो. बीएस कोटलिया का कहना है कि नैनीताल मॉडल के सुरक्षित 'ड्रेनेज सिस्टम' के साथ ही पहाड़ के परंपरागत सिस्टम का उपयोग कर प्रदेश को आपदा से काफी हद तक बचाया जा सकता है। इसके लिए पहाड़ के परंपरागत गांवों की तरह नदियों के किनारे की भूमि पर खेतों (सेरों) और उसके ऊपर ही मकान बनाने का मॉडल कड़ाई से पालन करना जरूरी है। प्रो. कोटलिया का कहना है कि मानसून में नदियों के अधिकतम स्तर से 60 फीट की ऊंचाई तक किसी भी प्रकार के निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

लेखक नवीन जोशी उत्‍तराखंड में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

उत्‍तराखंड आपदा में मीडिया की हीरोइक्‍स

केदारनाथ मंदिर के पास सेना का हेलीकॉप्टर उतरा और उसका चालक उतर कर बाहर आया तो एक अंग्रेजी चैनल की रिपोर्टर ने उसका नाम उसकी कमीज पर लिखा देख पहला सवाल किया-आप मुसलमान हैं.

आप यहां..सैनिक ने तुरंत जवाब दिया : मैडम सेना में हम सबका एक ही धर्म होता है-इंडिया. मेरा भी मन था कि मैं कभी मंदिर में आऊं. सवाल निरी मूर्खता से भरा था. रिपोर्टर को निरुत्तर होना ही था. यह कौन-सी मानसिकता थी, जिसके चलते उस आपदा में भी उसे धर्ममूलक सवाल पूछना जरूरी लगा कि आप मुसलमान होकर भी यहां कैसे आए हैं. उसे हैरत थी कि एक मुसलमान सैनिक को क्या कोई संकोच नहीं हुआ? लेकिन उस जवान ने जो जवाब दिया; जो एक अखबार में छपा. वह उसका मुंहतोड़ उत्तर था.

बातचीत की इस मूर्खता के आगे का रिकार्ड बनाया एक अन्य चैनल के रिपोर्टर ने. वह उस बाढ़ग्रस्त इलाके की रिपेर्टिंग करने के चाव में एक आपदा में फंसे यात्री के कंधे पर चढ़कर, अपनी टांगें लटका कर रिपोर्टिंग करने लगा. जिस व्यक्ति के कंधे पर वह सवार था, वह पानी में आधे से ज्यादा डूबा हुआ चल रहा था. इस सीन के बाद चैनल ने उसे उचित ही बर्खास्त किया. इस पर उसने प्रतिवाद किया कि उसे शिकार बनाया जा रहा है! ये दो घटनाएं बाढ़ग्रस्त इलाके को दिखाने में स्पर्धी बने चैनलों की रिपोर्टिंग की आवारगी की कहानी कहती हैं. हमारे चैनलों के ज्यादातर रिपोर्टर मिजाज से मुंहजोर होते हैं. वे कई बार बेतुके सवाल तो पूछा ही करते हैं.

साक्षात्कार लेना एक बड़ी मेहनत वाली कला मानी जाती है. साक्षात् घटना स्थल से रिपोर्ट करना भी एक विशिष्ट कला है. घटनास्थल या आपदा स्थल से कवर करना टीवी के चौबीस बाई सात के कवरेज वाले दिनों में और भी चुनौतीपूर्ण कला बन जाती है. उत्तराखंड आपदा के लाइव कवरेज की प्रक्रिया में कई नई बातें नजर आई : पहली तो यही कि हमारे नामी अंग्रेजी चैनलों के पास आपदा का कवरेज करने वाले दक्ष और समर्पित रिपोर्टर नहीं हैं. उनके पास डिजास्टर प्रबंधन के दौरान काम में आने वाले कौशल और जरूरी दक्षता का अभाव दिखता है.

केदारनाथ पहुंचे चैनलों के रिपोर्टर और कैमरामेन वही थे, जो इससे पहले अन्ना आंदोलन को कवर करते नजर आए या केजरीवाल को कवर करते नजर आए या दिसम्बर में हुई बलात्कार की जघन्य घटना और उसके प्रतिरोध में उपजे आंदोलन को कवर करते नजर आएं या किसी चुनाव को कवर करते नजर आते हैं या किसी संसदीय कार्यवाही का कवरेज करते नजर आते हैं. आपदा प्रबंधन के कवरेज करने के लिए हर आम पत्रकार नहीं जा सकता. उसे आपदा संबंधी बातों की न्यूनतम ट्रेनिंग तो चाहिए ही. कल को वह किसी दुर्घटना में फंस गया तो वही खबर बन जाएगा, जिस तरह युद्ध को कवर करने के लिए अलग रिपोर्टर हुआ करते हैं, जो युद्ध संबंधी बारीकियां जानते हैं, उसी तरह विशिष्ट कार्य के लिए विशेष-दक्ष रिपोर्टर और कैमरामैन चाहिए.

बारह दिन बाद केदारनाथ मंदिर के पुजारी का एक बयान अखबार में पढ़ा. जिसमें वे कह रहे थे कि मंदिर के अंदर मीडिया के लोगों को नहीं जाना चाहिए. हमें नहीं मालूम कि यह खबर क्या उस कवरेज की प्रतिक्रिया में आई जिसमें एक चैनल के पत्रकार-कैमरामैन मंदिर के गर्भ गृह में घुस कर रिपोर्टर कर रहे थे. वह पत्रकार बार-बार यह कह रहा था कि इस जगह की संवेदनशीलता का पूरा ध्यान रखते हुए हम अंदर का हाल दिखा रहे हैं. अंदर का दृश्य वाकई विदारक था.

गर्भगृह में कीचड़ भरा था. रिपोर्टर ने बताया कि यहां गर्भगृह के कीचड़ में कई लोग दबे हैं. पुजारी जी की आपत्ति पुजारी जी कहेंगे. मंदिर में जाना उचित था या नहीं, ये रिपोर्टर और चैनल बता सकते हैं. हमें तो मंदिर में घुसकर दिखाने वाले उस रिपोर्टर से थोड़ी हमदर्दी ही रही जो सुबह से लेकर शाम तक कवर करता बोलता रहा था. उसका गला पड़ गया था. चेहरे पर बेहद थकान दिख रही थी, उसे जोर से बोला तक नहीं जा रहा था. लेकिन रिपोर्ट किए जा रहा था. उसे आदेश मिला होगा.

क्या उसकी जगह कोई दूसरा रिपोर्टर नहीं लग सकता था? क्या चैनल ने उसकी जगह कोई रिप्लेसमेंट दिया था? चैनलों ने सात-आठ जगह कवर कराया. जगह-जगह रिपोर्टर भेजे. लेकिन लगता है कि थकान के बाद जगह लेने के लिए दूसरे न भेजे. मीडिया इतना काम जरूर सही किया कि उसने प्रशासन को लगातार जवाबदेह बनाया. कमियों को रेखांकित किया लेकिन ऐसा करते करते वह प्रशासन मात्र को संदिग्ध बनाता रहा. यह अति थी. अपनी इसी अति को संतुलित करने के लिए या तो सेना के जवानों को हीरो बनाया या अपने रिपोर्टरों को हीरो बनाया.

सेना के एक अफसर ने सेना के हीरोइक्स पर कुर्बान होते मीडिया से जवाब में यह कहा भी कि हम तो अपनी डूयटी कर रहे हैं. चलिए मीडिया ने सेना को हीरो बनाया तो ठीक लगा. सेना के कर्त्तव्यभाव को मीडिया सेवा समझकर तारीफ कर रहा था. वह नहीं समझ सका कि पेशेवर सेना अपना कर्त्तव्य करती है. तारीफ की भूखी नहीं होती.

एक चैनल पर एक एंकर अपने चैनल के रिपोर्टरों कैमरामैनों के अनुभव सुनवा-दिखा रही थी. वे जीरो गांउड से रिपोर्टिंग करके आए थे. ऐसा बता रही थी. कायदे से तो वे अपनी डयूटी ही करके आए थे लेकिन डयूटी को अहसान बताना मीडिया की मध्यवर्गीय स्टाइल है. चूंकि मीडिया अपने अलावा हरेक को संदेहास्पद मानकर चलता है. इसलिए अपनी ही बनाई अति के संतुलित करने के लिए उसे हीरो मानने या गढ़ने पड़ते हैं. राजनेता गलत. राजनीति गलत. सेना सही. उक्त प्रसंग से हमें तो ऐसा लगता है कि कथित जनतांत्रिक चैनल सिविल सोसाइटी की जगह सेना को ही आदर्श मानते हैं और ड्यूटी को अहसान मानते हैं. सेना हमेशा अपना कर्त्तव्य निभाती है. उसे मीडिया की तारीफ नहीं चाहिए.

लेखक सुधीश पचौरी वरिष्‍ठ पत्रकार एवं साहित्‍यकार हैं. इनका यह लेख सहारा में भी प्रकाशित हो चुका है.

जिंदल से उगाही मामले में जी न्‍यूज के खिलाफ आरोप पत्र तैयार

जी न्‍यूज द्वारा जिंदल पावर एंड स्टील लिमिटेड से कथित कोल आवंटन घोटाले की आड़ में 100 करोड़ रुपये की उगाही के प्रयास के मामले में पुलिस ने जांच पूरी कर ली है। पुलिस ने रिपोर्ट पर कानूनी राय भी ले ली है। उम्मीद है कि इस मामले में जुलाई के पहले सप्ताह में आरोप पत्र दायर कर दिया जाएगा।

गौरतलब है कि जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी, समीर अहलूवालिया, कंपनी के चेयरमैन सुभाष चंद्रा और उनके बेटे व प्रबंध निदेशक पुनीत गोयनका के खिलाफ जिंदल स्टील ने नेगेटिव खबरों को रोकने के नाम पर 100 करोड़ रुपये की उगाही के प्रयास को लेकर एफआईआर दर्ज कराई थी। इस मामले में चारों आरोपी जमानत पर हैं।

सूत्रों के अनुसार, जांच में कहा गया है कि कथित कोयला घोटाले की संसद में पेश सीएजी रिपोर्ट को आधार बनाकर उसे गलत तरीके से चैनल पर दिखाया गया ताकि उगाही की जा सके। स्टिंग ऑपरेशन के ऑडियो व वीडियो से भी इस तथ्य का खुलासा हुआ है। हालांकि, जी न्यूज ने 100 करोड़ रुपये विज्ञापन के रूप में लेने का तर्क रखा, लेकिन पुलिस ने उसे खारिज कर दिया।

पुलिस के अनुसार, इस तथ्य की भी पुष्टि हो चुकी है कि समीर और सुधीर होटल हयात में जिंदल स्टील के निदेशक-एचआर राजीव भदौरिया से मिले व 100 करोड़ रुपये की मांग दोहराई। साथ ही वे पैसे लेने के लिए विज्ञापन का अनुबंध बनाकर ले गए थे। समीर और सुधीर को गिरफ्तारी के 20 दिन बाद अदालत ने 17 दिसंबर, 2012 को जमानत दे दी थी, जबकि चेयरमैन और प्रबंध निदेशक को अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी थी। (अमर उजाला)

यूपी में आरटीआई पर पल्‍ला झाड़ रहे हैं कई विभाग

एक ही बिंदु पर गृह विभाग और डीजी ऑफिस से मांगी गयी सूचना में दिये गए उत्तर से उत्तर प्रदेश में आरटीआई को लेकर विभागों का रवैया स्पष्ट हो जाता है. आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने 02 नवंबर 2004 को हुई मुख्यमंत्री समीक्षा से सम्बंधित कुछ सूचनाएं उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग और डीजीपी कार्यालय से माँगा. सूचना यह मांगी गयी थी यह समीक्षा बैठकें कब-कब और कहाँ आयोजित की गयीं, इनमे किन-किन आईपीएस अधिकारियों को दंड या चेतावनी दी गयी आदि.

इस पर डीजीपी कार्यालय ने दिनांक 21 जून 2013 को यह पत्र धारा 6(3) आरटीआई एक्ट में गृह विभाग को अंतरित कर दिया और कहा कि ये सूचनाएँ गृह विभाग से सम्बंधित होने के कारण वहीँ मिलेंगी. मजेदार बात यह है कि लगभग मिलती-जुलती सूचनाओं पर गृह विभाग ने दिनांक 28 जून को ठाकुर का एक दूसरा पत्र डीजीपी कार्यालय यह कहते हुए अंतरित किया कि ये सूचनाएँ डीजीपी कार्यालय से सम्बंधित हैं. इस तरह एक ही सूचना में गृह विभाग और डीजीपी कार्यालय एक दूसरे पर पल्ला झाड़ रहे हैं जबकि यह सूचना दोनों जगह उपलब्ध होनी चाहिए. यह स्थिति वास्तव में निंदनीय है.

उदयपुर में भास्‍कर के रिपोर्टर ने एक खबर की 12 बजा दी!

किसी रिपोर्टर की किसी से बनती नहीं हो तो क्‍या खबर की 12 बजा देनी चाहिए, नहीं ना! लेकिन उदयपुर भास्‍कर में ऐसा ही होता है। नीचे भास्‍कर वेबसाइट की खबर की स्‍क्रीन शॉट दे रहा हूं, उसमें आपको साफ दिख जाएगा कि क्‍या खेल खेला गया है। इस खबर को लिखने में पत्रकारिता की बजाय निजी खुन्‍नस को प्राथमिकता दी गई है।

उदयपुर शहर कांग्रेस कार्यकारणी का पुनर्गठन किया गया, जिसमें नीलिमा सुखाडिया को अध्‍यक्ष बनाया गया है। अन्‍य कई पदाधिकारी भी बनाए गए हैं। खबर में पूरी कार्यकारिणी का विवरण दिया गया है, लेकिन पूरी खबर में माननीय रिपोर्टर महोदय, जिनकी नीलिमा सुखाडि़या से नहीं बनती, इसलिए पूरी खबर में कहीं भी अध्‍यक्ष महोदया के नाम का जिक्र तक नहीं किया गया है, जबकि सबसे पहले अध्‍यक्ष का नाम तो आना ही चाहिए था। आप भी देखिए कैसे कैसे खेल करते हैं भास्‍कर के रिपोर्टर।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

4रीयल न्‍यूज में इनपुट हेड बने प्रदीप श्रीवास्‍तव

4रीयल न्‍यूज से खबर है कि प्रदीप श्रीवास्‍तव ने इनपुट हेड के पद पर ज्‍वाइन किया है. प्रदीप इसके पहले लंबे समय तक स्‍टार न्‍यूज में रह चुके हैं तथा इन दिनों अपना मोबाइल न्‍यूज स्‍टार लाइव 24 का संचालन कर रहे थे. प्रदीप ने अपने करियर की शुरुआत करेंट न्‍यूज के साथ की थी. इसके बाद वीर अर्जुन, न्‍यूज एजेंसी ईएमएस तथा बीएजी को लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं. प्रदीप बीएजी के रेड एलर्ट और सनसनी टीम के शुरुआती दौर के साथी रहे हैं.

बीएजी से इस्‍तीफा देने के बाद वे सहारा समय एनसीआर से जुड़ गए थे. यहां कुछ समय काम करने के बाद वे स्‍टार न्‍यूज चले गए थे. यहां वे लगभग पांच सालों तक जुड़े रहे. प्रबंधन से विवाद होने के बाद उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया था तथा अपना मोबाइल न्‍यूज संचालित कर रहे थे.

बौखलाए सीडीओ ने संवाददाता के सामने फाड़ा अख़बार

North India Times : नार्थ इण्डिया टाइम्स समाचार पत्र में २३ जून के अंक में प्रकाशित हुई खबर को लेकर बौखलाए पीलीभीत जनपद के मुख्य विकास अधिकारी विजय कुमार सिंह ने जिला संवाददाता के सामने अपने खिलाफ प्रकाशित खबर को लेकर बातों ही बातों में अख़बार को फाड़ दिया। इस घटना को लेकर स्थानीय पत्रकारों में रोष व्याप्त है एवं पत्रकारों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि उपरोक्त मामले की निष्पक्ष जाँच कराकर दोषियों पर उचित कार्यवाही करें.

फेसबुक वॉल से साभार.

हिंदुस्‍तान के ब्‍यूरो प्रभारी के पितृशोक पर पत्रकारों ने जताया शोक

हिन्दुस्तान के बलिया ब्यूरो कार्यालय के प्रभारी व श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिला कोषाध्यक्ष धनन्जय पाण्डेय को पितृ शोक पर पत्रकारों ने अपनी शोकांजलि अर्पित किया है। पाण्डेय के पिता चन्द्र दीप पाण्डेय का पिछले दिनों देहावसान हो गया। इनके निधन पर श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की शोक बैठक हुई, जिसमें मृतात्मा की शांति हेतु प्रार्थना की गयी तथा दो मिनट तक मौन रहा गया।

बैठक में जिलाध्यक्ष अनूप कुमार हेमकर, केके पाठक, डाक्टर अखिलेश सिन्‍हा, सतीश मेहता, भोला प्रसाद, रोशन जायसवाल, अनिल अकेला, मनोज चतुर्वेदी, पशुपति नाथ, अमित कुमार, राजेश ओझा, अरविन्द गुप्ता, अशोक जायसवाल, शिव कुमार हेमकर, अभयेश मिश्र, विजय यादव, विजय गुप्ता, घनश्याम गुप्ता, घनश्याम तिवारी, शकील अहमद नवीन मिश्र, डाक्टर आशुतोष शुक्ला आदि मौजूद रहे।

औरंगाबाद में आईबीएन-लोकमत के पत्रकार तथा कैमरामैन पर हमला

आईबीएन-लोकमत न्यूज चैनल के आौरंगाबाद ब्यूरो चीफ सिध्दार्थ गोदाम और वीडियो जर्नलिस्ट सुधीर जाधव पर शुक्रवार की दोपहर औरंगाबाद में एक शिक्षा संस्थान के डाइरेक्‍टर ने हल्ला बोल दिया. वाई एस खेडकर इंटरनेशनल स्कूल में छात्रों की तरफ से पनिशमेंट के तौर पर गैरकानूनी तरीके से शुल्क वसूला जाता था. इस से छात्रों के परिजन काफी नाराज थे. आईबीएन-लोकमत ने इस के विरोध में आवाज उठाया था. जिसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने स्‍कूल में चल रहे इस गोरखधंधे की इंक्‍वायरी शुरू की थी.

बताया जा रहा है कि इससे मीडिया पर नाराज संस्‍थान संचालक खेडकर ने शुक्रवार को आईबीएऩ -लोकमत के कैमरामैन से कैमेरा छीनने की कोशिश की. उसके साथ मारपीट की गई. उसे एक कमरे मे बंद करने की भी कोशिश की गई. यह देखकर ब्यूरो चीफ सिध्दार्थ गोदाम ने खेडेकर को रोकने कोशिश की तो उनके साथ भी मारपीट की गई. दोनों को चोटें भी आई हैं. महाराष्‍ट्र में छह महीनों में पत्रकारों हमले की यह चालीसवीं घटना हैं. महाराष्ट्र मे पिछले पंद्रह दिनों में ही पत्रकारों के ऊपर हुआ यह सातवां हमला है. इस मारपीट का महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति ने निदा की है.

पत्रकारों का काम सबसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण : करीना

मुंबई। बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर पत्रकारों के पेशे को काफी चुनौतीपूर्ण मानती हैं। उनका कहना है कि पत्रकारिता करना बहुत मुश्किल काम है। करीना ने अपना यह अनुभव प्रकाश झा की फिल्‍म सत्‍याग्रह में एक टीवी रिपोर्टर की भूमिका निभाने के बाद साझा किया है। करीना ने कहा मीडिया में काम करना काफी कठिन है। काम के अलावा भी पत्रकारों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

करीना ने कहा कि मुझे खुशी है कि सत्‍याग्रह में मैंने एक पत्रकार की भूमिका निभायी है। गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात पत्रकारों को न्यूज कवर करने के लिये जाना ही पड़ता है। यह काम कम से कम  मेरे लिये बहुत ही कठिन है। उन्होंने कहा कि फिल्म में मेरा निभाया गया टीवी पत्रकार का किरदार कुछ ऐसे पत्रकारों से प्रभावित है जिनका मुख्य ध्यान काम के प्रति फोकस रहता है। उन्होंने कहा कि फिल्म में अपना किरदार निभाकर मैं समझी कि पत्रकारों को कितना दबाव रहता है।

बिजनेस भास्‍कर से चार की छंटनी, अखबार बंद किए जाने की चर्चा

दैनिक भास्कर समूह के बिजनेस अखबार बिजनेस भास्कर को लग रहा है प्रबंधन द्वारा बंद किये जाने की योजना है। लगातार छंटनी के दौर से गुजर रहे बिजनेस भास्कर के पांच साल पूरे होते होते इसकी टीम एक चौथाई भी नहीं रह गई है। इसी महीने में इसके मुंबई प्रमुख अजय कुमार, राजेश विक्रांत, अजीत सिंह की तीन सदस्यीय टीम को अखबार से बाहर कर दिया गया है। 

मुंबई देश की वित्तीय राजधानी है फिर भी अब वहां पर इस अखबार में एकमात्र प्रशिक्षु रिपोर्टर ही बची है, जिसके सहारे काम चलाया जा रहा है। दूसरी तरफ दिल्ली से भी राय तपन को निकाल दिया गया है। स्थिति यह है कि डेस्क पर एक कर्मचारी गैर हाजिर हो जाए तो एक पेज कम करना होता है। चर्चा है कि अखबार को प्रबंधन बंद कर सकता है क्योंकि इसमें उसकी दिलचस्पी नहीं बची है और अखबार लगातार घाटे में चल रहा है। पहले इस अखबार में कुल 200 के करीब कर्मचारी थे जो अब घटकर 50 के आस पास रह गए हैं। (कानाफूसी)

राहुल बारपुते स्‍मरण का आयो‍जन 14 जुलाई को इंदौर में, जुटेंगे दिग्‍गज पत्रकार

इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब के संस्थापक अध्यक्ष स्व. राहुल बारपुते की स्मृति में ‘राहुल स्मरण’ कार्यक्रम १४ जुलाई को आयोजित किया जाएगा। आयोजन में देश के वरिष्ठ साहित्यकार एवं संपादक शामिल होंगे। २६ जून को राहुल बारपुते की जन्मतिथि के अवसर पर इंदौर प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम के दौरान यह निर्णय लिया गया।

प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल एवं महासचिव अरविंद तिवारी ने बताया कि रविवार, १४ जुलाई को शाम ०४ बजे आनंद मोहन माथुर सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में पत्रकार विजय मनोहर तिवारी द्वारा संकलित एवं मध्यप्रदेश माध्यम द्वारा मुद्रित ३७० पेजों की पुस्तक का विमोचन भी किया जाएगा। समारोह में सर्वश्री हरिवंश, ओम थानवी, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, अशोक वाजपेयी, राहुल देव, अभय छजलानी, श्रवण गर्ग, अच्युतानंद मिश्र आदि अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। इस कार्यक्रम में स्व. बारपुते के सान्निध्य में कार्य कर चुके अनेक पत्रकारों को भी आमंत्रित किया जा रहा है। राहुल बारपुते के जन्मतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में प्रवीण कुमार खारीवाल, अरविंद तिवारी, राजीव बारपुते, संजय लाहोटी, विजय मनोहर तिवारी, शशीन्द्र जलधारी, अमित सोनी, सुनील जोशी, अतुल लागू, कमल कस्तूरी, हेमंत शर्मा, नितिन माहेश्वरी, नवनीत शुक्ला आदि उपस्थित थे। इस अवसर पर इंदौर प्रेस क्लब प्रबंधकारिणी समिति ने ६० वर्ष की उम्र से अधिक वाले सदस्यों का ताउम्र सदस्यता शुल्क माफ करने का निर्णय भी लिया।

राहुल बारपुते के बारे में- राहुल गोविंद बारपुते का जन्म २६ जून १९२२ को इंदौर में हुआ। उत्तर प्रदेश में नैनी से कृषि में स्नातक की डिग्री ली। वे ११ फरवरी १९५४ को नईदुनिया के संपादक बने। उन्होंने २० फरवरी १९८१ को अपने प्रिय एवं प्रखर संपादकीय सहयोगी राजेंद्र माथुर को संपादक का दायित्व सौंपा तो नईदुनिया ने उन्हें प्रबंधन में शामिल कर लिया। बगैर किसी लाभांश के एक वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी के रूप में अखबार में उनकी उपस्थिति अटूट रही। जब राजेंद्र माथुर १९८२ में नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर इंदौर से दिल्ली गए तो राहुलजी को संपादकीय सलाहकार बनाया गया। पत्रकार के अलावा रंगमंच, संगीत और चित्रकला जैसी रचनात्मक विधाओं से भी राहुलजी का जीवनपर्यंत गहरा रिश्ता रहा। वे मध्य प्रदेश कला परिषद् के लंबे समय तक सदस्य और इंदौर प्रेस क्लब के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे। देहावसान ७४ वर्ष की आयु में ०३ जून १९९६ में इंदौर में हुआ। नईदुनिया ने अपने सबसे पुराने संगी के विदा होने पर प्रकाशित शोकाकुल संपादकीय के पहले ही वाक्य में लिखा- श्री राहुल बारपुते के नाम के पहले स्वर्गीय लिखने से बड़ी वेदना इस समाचार पत्र के लिए और क्या हो सकती है।

लेनिन रघुवंशी एवं श्रुति नागवंशी पर लगे फर्जी मामले की जांच के लिए सीएम एवं डीजीपी से मिला प्रतिनिधि मंडल

मानवाधिकार जननिगारानी समिति की 8 सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल लखनऊ में मुख्यमंत्री व पुलिस महानिदेशक उत्तर-प्रदेश से मिलकर उत्तर-प्रदेश में मुस्लिमों पर हो रहे पुलिस उत्पीड़न और सामाजिक कार्यकर्ता डा. लेनिन रघुवंशी व श्रुती नागवंशी पर लगे फर्जी मुक़दमे की निष्पक्ष जांच कराने हेतु ज्ञापन दिया. इस आठ सदस्‍यीय टीम में डा. लेनिन के अलावा श्रुति नागवंशी, रागीब अली, अनूप कुमार श्रीवास्‍वत, इद्रीश अहमद, शिरीन शबाना खान, उत्‍कर्ष सिन्‍हा एवं अली अहमद शामिल थे.

मुख्यमंत्री कार्यालय से पूर्व निर्धारित मीटिंग के तहत आज दोपहर 2 बजे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय श्री अखिलेश यादव के आवास (5 कालिदास मार्ग) पर मानवाधिकार जननिगरानी समिति के महासचिव डा. लेनिन सहित आठ सदस्यों का प्रतिनिधि मण्डल मिलकर उनसे लगभग आधे घंटे तक मुलाक़ात कर बात-चीत किया. इस बात-चीत में प्रतिनिधियों ने उत्तर प्रदेश में मुसलमानों पर यातना और दंगों में प्रताड़ित मुसलमानों के 40 केस उन्हें सौंपा जिसपर उन्होंने त्वरित कार्यवाही का आश्वासन दिया.

इसके साथ ही माननीय मुख्यमंत्री व पुलिस महानिदेशक उत्तर-प्रदेश श्री देवराज नागर ने डा. लेनिन व अन्य 5 लोगो के ऊपर पूर्व में सन 2007 में 505 B के तहत लगे फर्जी मुकदमे व अभी वर्तमान में डा. लेनिन व श्रुति पर लगे फर्जी मुकदमे की अपने स्तर से जांच कराकर तुरन्त कार्यवाही हेतु आश्वासन दिया. इसके साथ ही उत्तर-प्रदेश राज्य सरकार द्वारा बुनकरों के बिजली बिल माफी का आदेश होने के बावजूद भी बुनकरों का उत्पीड़न किया जा रहा है इस विषय पर माननीय मुख्यमंत्री महोदय ने काफी गंभीरता से इस मामले की जांच की बात कही.

‘मोदी मंत्र’ से भाजपा की अंदरूनी बाधाएं नहीं हो पा रही हैं छूमंतर!

भाजपा चुनाव अभियान समिति की कमान मिलने के बाद नरेंद्र मोदी का पार्टी के अंदर रुतबा बढ़ गया है। अब वे नियोजित रणनीति के तहत राज्यों में संगठन के ढीले पड़े ‘नट-बोल्ट’ कसने में जुट गए हैं। अपने कुछ राजनीतिक ‘मंत्रों’ के जरिए वे अंदरूनी उठापटक को भी थामने की जुगत में लगे हैं। उनकी कोशिश यही है कि आपस में होड़ लगाने वाले गुटों में एकता का मंत्र फूंक दिया जाए। ताकि, अगले साल होने वाले लोकसभा के चुनाव में पार्टी का ढांचा मजबूती से चुनावी चुनौती के लिए तैयार हो सके।

उन्होंने अपने इस अभियान की शुरुआत महाराष्ट्र से कर दी है। कोशिश की गई कि प्रदेश के सभी बड़े नेताओं को एकसाथ बैठाकर एकता का संदेश दे दिया जाए। लेकिन, इस एजेंडे में टीम मोदी पूरी तौर पर सफल नहीं हो पा रही। क्योंकि, एक गुट को साधने में दूसरा गुट तुनक जाता है। कुछ ऐसी ही स्थिति कल महाराष्ट्र में मोदी दौरे के वक्त दिखाई पड़ी।

नरेंद्र मोदी पार्टी में नया रुतबा हासिल करने के बाद कल पहली बार मुंबई पहुंचे। यहां पर उन्होंने महाराष्ट्र भाजपा कोर ग्रुप के नेताओं के साथ लंबी मंत्रणा की। दरअसल, महाराष्ट्र दौरे का उनका राजनीतिक एजेंडा यही था कि इस बार गोपीनाथ मुंडे और नितिन गडकरी गुटों के बीच समझौता करा दिया जाए। ताकि, यहां पर पार्टी मजबूती से चुनावी चुनौती के लिए तैयार हो सके। इसी एजेंडे के तहत बैठक में विशेष आमंत्रित के रूप में पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और लोकसभा में पार्टी के उपनेता गोपीनाथ मुंडे को खासतौर पर बुलाया गया था। बैठक में हिस्सा लेने के लिए राज्य के संगठन प्रभारी महासचिव राजीव प्रताप रूडी भी पहुंचे थे। कोर ग्रुप की बैठक में राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष पीयूष गोयल और पूर्व सांसद किरीट सोमैया को भी बुलाया गया। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर भी हाजिर रहे। लेकिन, नितिन गडकरी अचानक नदारत हो गए।

सूत्रों के अनुसार, पहले से ही तय था कि गडकरी, मोदी के मुंबई प्रवास के दौरान हाजिर रहेंगे। वे कोर ग्रुप की बैठक में मुंडे के साथ हिस्सेदारी जरूर करेंगे। गडकरी की अनुपस्थिति को लेकर कई सवाल भी उठे। यही चर्चा रही कि टीम मोदी के लोग राज्य की राजनीति में मुंडे के गुट को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। ऐसे में, गडकरी ने गैर-हाजिर रहकर अपनी नाराजगी का संदेश दे दिया है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्षों में गडकरी और मोदी के भी रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे। पार्टी अध्यक्ष के रूप में गडकरी की राजनीतिक शैली को मोदी हजम नहीं कर पाते रहे। गडकरी के कार्यकाल में हुई दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकों से भी मोदी नदारत रहे थे। यहां तक कि तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी के कई निर्देशों को ‘दबंग’ मोदी ने ठेंगा दिखा दिया था। पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान मोदी प्रचार अभियान में शामिल नहीं हुए। जबकि, गडकरी ने यहां की कुछ रैलियों में शामिल होने के लिए उनसे खासतौर पर कहा था। इस तरह के कई मुद्दे रहे हैं, जिनकी वजह से दोनों के रिश्ते लंबे समय से पटरी पर नहीं आए।
      
पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जोरदार पैरवी की थी कि इस साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी एक अलग से प्रचार समिति बनाए। इसकी कमान वो गडकरी को सौंप दे। आडवाणी की इस सलाह को लेकर पार्टी के अंदर विवाद बढ़ने की आशंका बढ़ी थी। इसी के चलते गडकरी ने खुद ऐलान किया था कि वे ऐसी किसी चुनावी समिति की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। क्योंकि, वे लोकसभा का चुनाव नागपुर से लड़ना चाहते हैं। इसी की तैयारी में अब अपना ज्यादा समय लगाना पसंद करेंगे। सूत्रों का दावा है कि संघ नेतृत्व के निर्देश पर गडकरी ने इस आशय का ऐलान किया था। जबकि, वे अंदरूनी तौर पर मोदी की ‘बुलडोजरी’ राजनीतिक शैली को पसंद नहीं करते।

गडकरी की नाराजगी से महाराष्ट्र में भाजपा का काफी नुकसान हो सकता है। क्योंकि, मुंडे और गडकरी गुटों की खींचतान के चलते पिछले लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को खासा नुकसान हुआ था। इसको देखते   हुए खुद मोदी ने गडकरी को मनाने की कोशिश की है। शायद इसी के चलते कुछ दिनों से गडकरी, मोदी के पक्ष में जमकर बयानबाजी भी करते नजर आए। इसी से लगने लगा था कि अब मोदी और गडकरी के बीच सबकुछ सामान्य हो गया है। ऐसे में, मोदी का ‘महाराष्ट्र मिशन’ कामयाब हो सकता है। लेकिन, गडकरी की गैर-हाजिरी से कई संशय अंदरूनी राजनीति में फिर से तैरने लगे हैं। हालांकि, प्रकाश जावडेÞकर ने यही सफाई दी है कि गडकरी को जरूरी निजी काम से दिल्ली जाना पड़ा। क्योंकि, उन्हें वीजा संबंधी कुछ आवश्यक काम पड़ गया है। ऐसे में, गडकरी की गैर-हाजिरी के दूसरे राजनीतिक निहितार्थ नहीं निकाले जाने चाहिए।

भाजपा के रणनीतिकार जिन राज्यों में अपने सांसदों की संख्या बढ़ाने का मंसूबा बांधे हैं, उनमें महाराष्ट्र भी शामिल है। यहां पर शिवसेना और भाजपा का बहुत पुराना राजनीतिक गठबंधन चला आ रहा है। शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे बीच-बीच में ‘तड़क-भड़क’ वाले बयान देकर टीम मोदी को बेचैन कर देते हैं। पिछले दिनों उत्तराखंड में हुई तबाही के प्रकरण में उद्धव ने मोदी की जमकर खिंचाई की थी। ठाकरे ने अपनी पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में पिछले दिनों लिखा था कि मोदी तो प्रधानमंत्री पद के चेहरे हैं। ऐसे में उन्हें केवल गुजरातियों की चिंता नहीं जतानी चाहिए। इस तरह की राजनीतिक शैली से उनकी छवि का दायरा और संकीर्ण बनेगा। इस टिप्पणी को लेकर यही कहा गया कि ठाकरे भी मोदी को लेकर सहज नहीं हैं। इन राजनीतिक अटकलों के बीच मोदी ने ठाकरे के घर ‘मातोश्री’ में जाकर मुलाकात कर ली है। दोनों नेताओं के गले मिलते हुए फोटो भी जारी हुए। उद्धव ने लगे हाथ जमकर मोदी के गुणगान भी कर डाले।
      
 दरअसल, उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे को लेकर काफी बेचैन रहते हैं। क्योंकि, चचेरे भाई राज ठाकरे की बढ़ती लोकप्रियता, शिवसेना के लिए राजनीतिक चुनौती बनती जा रही है। जबकि, मोदी ने राज ठाकरे को ज्यादा अहमियत देना शुरू किया है। मोदी ने उन्हें विशेष अतिथि की हैसियत से अहमदाबाद भी बुलाया था। यह बात उद्धव पचा नहीं पाए। पिछले दिनों मोदी के प्रकरण में आडवाणी ने पार्टी के अंदर काफी जोर अजमाइश की थी। नाराजगी में इस्तीफे का दांव भी चल दिया था। इस प्रकरण में उद्धव ठाकरे ने भी आडवाणी के प्रति हमदर्दी जताई थी। भाजपा नेतृत्व को सलाह दी थी कि आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता की राय को एकदम दरकिनार करना, एनडीए की राजनीतिक के लिए घातक हो सकता है। ठाकरे के इन तेवरों को देखते हुए टीम मोदी ने रणनीतिक प्रबंधन किया है। इसी के तहत मोदी और उद्धव ठाकरे की मुलाकात को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पिछले दिनों पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी मुंबई में उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी। वे शिवसेना प्रमुख को भरोसा दिला आए हैं कि भाजपा के लिए शिवसेना की दोस्ती बहुत अहमियत रखती है। ऐसे में, पार्टी कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिससे कि शिवसेना की भावनाएं आहत हो जाए। अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा नेतृत्व ने राज ठाकरे के मामले में शिवसेना को विश्वास में लेना शुरू कर दिया है। उल्लेखनीय है कि गडकरी लॉबी इस बात की पैरवी करती आई है कि एनडीए के अंदर शिवसेना के साथ मनसे को भी समाहित करने की कोशिश की जाए। ऐसा करने से कांग्रेस और एनसीपी विरोधी वोट बंटने का खतरा नहीं रहेगा। जबकि, शिवसेना इस तरह की किसी रणनीति के धुर खिलाफ है। क्योंकि, राज ठाकरे का राजनीतिक कद बढ़ जाने से शिवसेना अपने को असुरक्षित समझने लगी है। राजनाथ के बाद अब मोदी ने भी उद्धव ठाकरे को ‘पक्की दोस्ती’ का भरोसा दिलाने की कोशिश की है। लेकिन, सबसे मुश्किल यही है कि भाजपा की अंदरूनी उठापटक को मोदी कैसे दूर कराएं? वे ‘मिशन महाराष्ट्र’ के बाद उत्तर प्रदेश की तरफ रुख करने वाले हैं। क्योंकि, यहां भी पार्टी के अंदर ढेर सी अंदरूनी दिक्कतें हैं। इस संदर्भ में प्रदेश के संगठन प्रभारी अमित शाह ने उन्हें अपनी गोपनीय रिपोर्ट भी दे दी है। अमित शाह, मोदी के खास सिपहसालार हैं। मोदी ने शाह को उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन का प्रभार दिलाकर, यहां पर चल रही दशकों की गुटबाजी को खत्म कराने का लक्ष्य रखा है। अब देखना है कि मोदी और उनके सिपहसालार यूपी की अंदरूनी किचकिच पर कैसे काबू पाते हैं?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

छत्‍तीसगढ़ सरकार ने वरिष्‍ठ पत्रकारों के लिए लागू की सम्‍मान योजना

छत्तीसगढ़ सरकार ने वरिष्ठ मीडिया कर्मी सम्मान योजना को लागू करने की मंजूरी प्रदान कर दी है. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल की हुई बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की दी. इस योजना की घोषणा राज्य सरकार ने चालू वित्त वर्ष के बजट में की थी. योजना के तहत पत्रकारों को पांच हजार रुपए प्रति माह की सम्मान राशि प्रदान की जायेगी.

सरकारी प्रवक्ता ने इस निर्णय की जानकारी देते हुए बताया कि इस योजना के तहत एक जुलाई 2013 को 62 वर्ष की आयु पूरी करने वाले पूर्णकालिक पत्रकार पात्र होंगे. सम्बधित पत्रकार की पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में कम से कम 20 वर्ष की सेवा होना चाहिए और छत्तीसगढ़ में कम से कम 10 वर्ष अधिमान्य पत्रकार होना चाहिए. योजना फिलहाल पांच वर्ष के लिए लागू होगी इसके बाद इसकी समीक्षा कर इसे आगे जारी रखने पर विचार होगा. योजना के बारे में शेष विस्तृत दिशा निर्देश का उल्लेख जल्द जारी होने वाली अधिसूचना में होगा.

राष्‍ट्रीय सहारा, देहरादून के ब्‍यूरो प्रभारी मनोज कंडवाल सस्‍पेंड

राष्‍ट्रीय सहारा, देहरादून से खबर है कि मनोज कंडवाल का सस्‍पेंड कर दिया गया है. वे ब्‍यूरो प्रभारी के पद पर कार्यरत थे. बताया जा रहा है कि प्रबंधन को उनके खिलाफ कई शिकायतें मिली थी. इस बीच आपदा की रिपोर्टिंग में सही काम नहीं कर पाने का आरोप लगाते हुए उन्‍हें सस्‍पेंड कर दिया गया. बताया जा रहा है कि अन्‍य अखबारों से दोयम दर्जे के कवरेज देखते हुए मैनेजमेंट ने यह फैसला लिया है. हालांकि इस संदर्भ में मनोज से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु उनसे बात नहीं हो पाई.

मेरठ में अनिल भास्‍कर ने ग्रहण किया अपना कार्यभार

वाराणसी के संपादक रहे अनिल भास्‍कर ने मेरठ में ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें पश्चिम यूपी के हेड के तौर पर यह जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. अनिल भास्‍कर ने प्रधान संपादक की मौजूदगी अपना कार्यभार ग्रहण किया. सूर्यकांत द्विवेदी स्‍थानीय संपादक के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी निभाते रहेंगे. पहले खबर आ रही थी कि स्ट्रिंगर से कथित तौर पर पैसे लेने के मामले में उन्‍हें दिल्‍ली अटैच किया जा सकता है लेकिन प्रबंधन ने जांच के बाद उन्‍हें क्‍लीन चिट दे दिया.

फिलहाल पश्चिमी यूपी के हेड की जिम्‍मेदारी डा. तीरविजय सिंह संभाल रहे हैं. समझा जा रहा है कि जल्‍द ही उन्‍हें भी बिहार का स्‍टेट हेड बनाकर पटना भेजा जाएगा, जबकि पटना में स्‍टेट हेड की जिम्‍मेदारी निभा रहे केके उपाध्‍याय को लखनऊ लाकर नवीन जोशी की जगह पूर्वी यूपी का स्‍टेट हेड बनाया जाएगा. नवीन जोशी अगले कुछ महीनों के भीतर रिटायर होने वाले हैं.

नोएडा, दिल्ली के बाद अब गाजियाबाद में भी डीएलए आफिस में लगेगा ताला!

प्रिंट मीडिया में अपनी पहचान बना चुके डीएलए अखबार का बोरिया बिस्तर दो माह पहले नोएडा से दिल्ली स्थित आईएनएस आफिस में शिफ्ट कर दिया गया था। एक सप्ताह पहले दिल्ली आफिस में ताला लग गया। वहां से 13 रिपोर्टर्स को एक दिन पहले ही आने के लिए मना कर दिया गया था। उसके बाद से गाजियाबाद कार्यालय पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। कई तरह की चर्चा होने लगी थी।

अब ये तय है कि गाजियाबाद आफिस पर भी ताला लगेगा। ये दीगर बात है कि अखबार महिना-दो महीना या पंद्रह दिन कब तक खिंचता है, यह देखने वाली बात होगी। अब गाजियाबाद में सभी रिपोर्टरों को नौकरी तलाशने के लिए कह दिया गया है।

कमाल खान ने अनुसूचित जातियों पर की अभद्र टिप्‍पणी, अमिताभ पहुंचे थाने

फिल्म निर्माता, निर्देशक, अभिनेता कमाल आर खान द्वारा राँझना फिल्म की रिव्यू में दो अनुसूचित जातियों के प्रति अत्यंत ही निंदनीय आपराधिक टिप्पणी की गयी है. 20 जून 2013 को यूट्यूब पर लोड हुए 9.40 मिनट के इस वीडियो रिव्यू पर फिल्म के हीरो धनुष के लिए अत्यंत ही अमर्यादित टिप्पणियाँ तो की ही गयी हैं, साथ ही यह भी कहा है- “सर, पता नहीं आप यूपी से हैं या नहीं हैं, पर मैं यूपी से हूँ. पूरे यूपी में जैसा धनुष है वैसे आपको #@$ मिलेंगे, #$^@ मिलेंगे, (दो अनुसूचित जाति भंगी और चमार शब्द यहाँ प्रयोग किये गए हैं) पर एक भी इतना सड़ा हुआ पंडित आपको पूरे यूपी में कहीं नहीं मिलेगा.”

कमाल आर खान की यह टिप्पणी सीधे-सीधे जातिसूचक है और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(1)(x) के अंतर्गत अपराध है. इस अपराध की भयावहता इस कारण और भी बढ़ जाती है कि यह टिप्पणी एक सामाजिक हैसियत वाले कथित फिल्म स्टार द्वारा आज के इक्कीसवीं सदी के समाज में की गयी है. इस सम्बन्ध में अमिताभा ठाकुर ने थाना गोमतीनगर में एफआईआर दर्ज किये जाने को प्रार्थनापत्र दिया है.  



दी गयी एफआईआर की प्रति–

सेवा में,
थाना प्रभारी,
थाना गोमतीनगर,
जनपद लखनऊ  

विषय- श्री कमाल आर खान द्वारा राँझना नामक फिल्म की रिव्यू में अत्यंत ही निंदनीय आपराधिक टिप्पणी के सम्बन्ध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने हेतु

महोदय,
      
कृपया अनुरोध है कि मैं अमिताभ ठाकुर, पेशे से आईपीएस अधिकारी स्थायी पता- निवासी 5/426, विराम खंड, गोमती नगर, लखनऊ हूँ. मैं आपके समक्ष श्री कमाल आर खान पता- बँगला नंबर 7/70, महादा एस वी पी नगर, निकट वर्सोवा टेलीफोन एक्सचेंज, अँधेरी (वेस्ट), मुंबई- 400053, फोन नंबर-022 – 26375425 / 26 / 27 / 28 / 29 / 30, ईमेल kamalintlbom@hotmail.com / kamaalrkhan@hotmail.com द्वारा हाल में ही प्रदर्शित एक फिल्म राँझना के सम्बन्ध में एक विडियो रिव्यू में प्रयुक्त किये गए अत्यंत ही निंदनीय, जातिसूचक, आपराधिक शब्दों और टिप्पणियों को आपके समक्ष इस अनुरोध के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इस सम्बन्ध में तत्काल प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर अग्रिम कार्यवाही करने की कृपा करें.

मुझे यूट्यूब पर प्रसारित होने वाले इस विडियो रिव्यू (रिकॉर्डिंग) की सूचना एक मित्र के माध्यम से मिली और मैंने वेबसाईट लिंक http://www.youtube.com/watch?v=WwVKjmsS37U पर “Raanjhanaa Movie Review by KRK | KRK Live” शीर्षक यह विडियो अपने निवास पर देखा. यह विडियो 9.40 मिनट का है और यह 20 जून 2013 को लोड किया गया बताया जा रहा है.

इस विडियो रिव्यू में इस फिल्म के हीरो श्री धनुष के लिए अत्यंत ही आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गयी हैं पर चूँकि वे पूर्णतया व्यक्तिगत टिप्पणियाँ हैं अतः मैं उन पर कुछ नहीं कहना चाहता.

जिस विषय को मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ वह है श्री कमाल आर खान की टिप्पणी- “सर, पता नहीं आप यूपी से हैं या नहीं है, बट मैं यूपी से हूँ. पूरे यूपी में जैसा धनुष है वैसे आपको भंगी मिलेंगे, चमार मिलेंगे, बट एक भी इतना सड़ा हुआ पंडित आपको पूरे यूपी में कहीं नहीं मिलेगा.”

स्पष्ट है कि श्री कमाल आर खान की यह टिप्पणी सीधे-सीधे जातिसूचक है. यह अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(1)(x) के अंतर्गत अपराध है.

इस अपराध की भयावहता इस कारण और भी बढ़ जाती है कि यह टिप्पणी एक पढ़े, लिखे, सामाजिक हैसियत वाले एक कथित फिल्म स्टार द्वारा आज के इक्कीसवीं सदी के समाज में की गयी है और इस कारण से श्री कमाल खान का आचरण पूरी तरह अक्षम्य है.

मैं स्वयं इन जातियों से नहीं हूँ पर एक बुद्धिजीवी और सामाजिक रूप से संवेदनशील व्यक्ति होने के नाते मैं भी श्री खान के इस अत्यंत घृणित और बेतुके टिप्पणी से अन्तःस्थल तक आहत और अचंभित हूँ और इस रूप में इस प्रकरण में सामने आ कर कठोरतम विधिक कार्यवाही संपन्न कराना अपना नैतिक और विधिक कर्तव्य समझते हुए आपके सम्मुख उपस्थित हुआ हूँ. यह सादर निवेदन करूँगा  कि श्री कमाल खान की उपरोक्त टिप्पणी किसी भी प्रकार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अथवा मनोरंजन हेतु दिया गया वक्तव्य नहीं है बल्कि सीधे-सीधे दो अनुसूचित जाति के लोगों पर घृणित और ओछी टिप्पणी है.

अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उपरोक्त आपराधिक कृत्य के संज्ञेय अपराध होने के कारण धारा 154 सीआरपीसी के अंतर्गत इनके सम्बन्ध में उपयुक्त तथा विधिसम्मत धाराओं में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करें. मैं विशेषकर निवेदन करूँगा कि अनुसूचित जाति के प्रति किये गए इस इस अत्यंत गंभीर अपराध के सम्बन्ध में एफआईआर दर्ज किया जाना और आज के समय में भी इस प्रकार की घटिया सोच रखने वाले लोगों पर दंडात्मक कार्यवाही किया जाना न्याय हित में नितांत आवश्यक प्रतीत होता है.
                                                                       

                                                                          भवदीय,

पत्र संख्या- AT/Kamal/01                                       (अमिताभ ठाकुर)
दिनांक- 28/06/2013                                            5/426, विराम खंड,
                                                                       गोमती नगर, लखनऊ  
                                                                        94155-34526

अरुणिमा सिन्‍हा से कौन सी दुश्‍मनी थी दैनिक जागरण की?

छोटों की गलती को कोई भी नजरअंदाज कर देता है लेकिन वहीं गलती अगर विश्व के नम्बर एक कहने वाले से हो तो कोई भी नजरअंदाज नही कर सकता है। नया मामला एवरेस्ट विजेता अरुणिमा सिन्हा के सम्मान कार्यक्रम का है। विचारणीय है कि अरुणिमा सिन्हा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की शाख्सियत बन चुकी है और सुल्तानपुर में ही इनका जन्म भी हुआ है। एक ओर जहां हिन्दुस्तान एवं अमर उजाला से लेकर लगभग पत्रों द्वारा इस जिले के लिए ऐसे विशिष्ट कार्यक्रम का कवरेज किया गया वहीं दैनिक जागरण में इसके बारे में एक शब्द भी नहीं दिखा। इसे आखिर क्या कहा जा सकता है?

जागरण द्वारा जहां इससे निम्न स्तर के खबरों को तरजीह दिया गया वहीं यह खबर नदारद रही। एवरेस्ट पर भारतीय ध्वज फहराकर देश का मान बढ़ाने वाली अरुणिमा सिन्हा को इंडिया इनसाइड मासिक पत्रिका द्वारा 27 जून गुरुवार को सुल्तानपुर में आयोजित कार्यक्रम में सम्मानित किया गया था। इस सम्मान कार्यक्रम में अरुणिमा सिन्हा सहित, मुख्य अतिथि राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष डॉ. सुरभि शुक्ला, जिला पंचायत अध्यक्ष पृथ्वीपाल यादव व वरिष्ठ साहित्यकार शिवमूर्ति सहित सम्पादक इंडिया इनसाइड अरुण सिंह भी थे। जिला पंचायत अध्यक्ष ने एवरेस्ट विजेता को नकद धनराशि देकर सम्मानित किया।

साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा कि अरुणिमा जैसी प्रतिभा के लिए निशक्त शब्द नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मुम्बई से आये अतुल अरोड़ा ने अरुणिमा पर एक डाक्यूमेंट्री बनाने की घोषणा की। अरुणिमा ने उत्तराखंड पीडि़तो के लिए पांच लाख रुपये सहायता राशि देने की घोषणा की। जागरण के अंदरुनी प्रोटोकाल में खबरों के क्या-क्या मानदंड है ये तो जागरण ही जाने लेकिन सुल्तानपुर की बेटी, जिसने एक पैर से एवरेस्ट को जीतकर जहां एक तरफ नया वैश्विक कीर्तिमान बनाया और बाढ़ पीडि़तों को 5 लाख रुपयें भी दिये, वहीं दूसरी तरफ उस बेटी को उसी की माटी के जागरण ने अपने खबरों से मिटा दिया।

जागरण का यह कोई नया मामला नहीं हैं इससे पहले भी जागरण ने अनेकों कारनामें किये हैं और इसे उसका फल भी मिला है। आईटीसी लिमिटेड सिगरेट बनानेवाली देश की प्रमुख कंपनी के कारण आसपास के गांवों में विद्यमान जल -प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण से परेशान नया गांव के ग्रामीणों के प्रदर्शन की खबर नहीं छापने पर अक्रोधित ग्रामीणों ने मुंगेर शहर के गुलजार पोखर मोहल्ला स्थित दैनिक जागरण कार्यालय के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया था और इसके पक्षपातपूर्ण रवैया की भर्त्‍सना करते हुए ग्रामीणों ने दैनिक जागरण कार्यालय के समक्ष दैनिक जागरण अखबार की सैकड़ों प्रतियों को सरेआम विरोध स्वरूप जला दिया था और दैनिक जागरण मुर्दाबाद के नारे भी लगाये थे।

पी न्‍यूज के संपादक विकास गुप्‍ता की रिपोर्ट. इनसे 9451135000, 9451135555 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

नीतीश क्या बनेंगे, किंग या किंगमेकर?

एनडीए और बीजेपी से नाता तोड़ने के बाद से नीतीश कुमार ने बहुत कुछ कहा है। तमाम पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में उनके लंबे-लंबे इंटरव्यू प्रकाशित-प्रसारित हुए हैं, मगर उन्होंने इसका कोई संकेत नहीं दिया है कि आख़िर वे अब करना क्या चाहते हैं, उनका लक्ष्य क्या है? उन्होंने अपने सारे पत्ते सीने से लगाकर रखे हैं और सबको कयास लगाने के लिए खुला छोड़ दिया है।

वैसे भी नीतीश कुमार घुन्ना किस्म के नेता माने जाते हैं। उनके आलोचक तो यहाँ तक कहते हैं कि उनके मुँह में नहीं, पेट में दाँत हैं। इसका मतलब यही है कि वे किसी को हवा नहीं लगने देते कि उनकी अगली चाल क्या होगी। इसलिए ये स्वाभाविक ही है कि नीतीश की भावी रणनीति को लेकर किसी के पास सीधा जवाब नहीं है।

दरअसल, नीतीश की अगली चाल को समझने के लिए उनको और उनकी राजनीति को समझना बहुत ज़रूरी है। इसमें संदेह नहीं है कि वे एक महत्वाकांक्षी नेता हैं और बड़े दाँव खेलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसीलिए ये तय है कि ना नुकुर करने के बावज़ूद वे चुपचाप प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को मज़बूत कर रहे होंगे। ये उनकी भावी राजनीति की पटकथा का हिस्सा है। आम चुनाव के ठीक पहले मोदी को मुद्दा बनाकर एनडीए से रिश्ता तोड़ने के पीछे इसके अलावा और कोई कारण नहीं हो सकता कि अब वे राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाना चाहते हैं। दो चुनाव जीतकर और लालू यादव को ध्वस्त करने के बाद प्रदेश की राजनीति में उन्हें जो हासिल करना था वे कर चुके हैं। प्रदेश सरकार अगले ढाई साल के लिए सुरक्षित है इसलिए उनके पास खोने के लिए भी कुछ नहीं है। ऐसे में साफ़ है कि राष्ट्रीय राजनीति ही उनका एजेंडा हो सकती है और वहाँ भी वे छोटे खिलाड़ी के रूप में तो नहीं ही खेलना चाहेंगे, वर्ना बीजेपी ने क्या बिगाड़ा था।

वैसे भी बिना किसी बड़े लक्ष्य के बीजेपी से सत्रह साल पुराना रिश्ता तोड़ने के पीछे कोई मामूली वजह नहीं हो सकती। अगर राज्य के मुस्लिम मतदाता ही उनकी चिंता का विषय थे तो इसकी फ़िक्र उन्हें पहले भी होनी चाहिए थी। आखिर वे संघ परिवार से हर स्तर पर लंबे समय से जुड़े हुए थे। इसलिए ये मानकर चलना चाहिए कि वे किंगमेकर नहीं किंग की भूमिका के लिए तैयारी कर रहे हैं। लेकिन वे मोदी की तरह हड़बड़िया नहीं हैं कि मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली शैली में हर जगह खुद को प्रस्तुत करने लगें। वे फूँक-फूँक कर आगे बढ़ेंगे और जब तक उन्हें भरोसा नहीं हो जाएगा कि उनके लिए सिंहासन तैयार है तब तक अपना माथा तिलक के लिए आगे नहीं बढ़ाएंगे।

वास्तव में जल्दबाज़ी नीतीश के स्वभाव में नहीं है। कोई भी फ़ैसला लेने से पहले वे लंबा वक्त लेते हैं और लंबी तैयारी करते हैं। लालू यादव को सत्ता से हटाने के लिए उन्होंने अरसे तक तैयारी और गोलबंदी की थी। मोदी से भी उनकी रार कोई दो-चार साल की नहीं है। पिछले करीब दस साल से वे मोदी से दूरी बरतने की कोशिश कर रहे थे और 2005 में बिहार में सरकार बनाने के बाद से तो खुलकर अदावत दिखाने लगे थे। किसी भी चुनाव में प्रचार के लिए आने से रोकने से लेकर कोसी के बाढ़ पीड़ितों के लिए भेजा गया चेक लौटाने तक वे लगातार संबंध तोड़ने की भूमिका तैयार कर रहे थे। इसी के समानांतर बीजेपी से अलग होने की ज़मीन भी तैयार हो रही थी। जब उन्होंने बिहार में अपने पाँव अच्छे से जमा लिए और अपनी सत्ता को काफ़ी हद तक निरापद बना लिया तब बीजेपी को आख़िरी झटका दिया।

नीतीश को करीब से देखने वाले जानते हैं कि वे अपनी छवि को बहुत प्यार करते हैं। वे चाहते हैं कि लोग उन्हें साफ़-सुथरे और सत्ता से विरक्त एक ऐसे राजनेता के रूप में देखें, जो जनहित के अलावा कुछ सोचता ही नहीं है। मीडिया का इस्तेमाल करके उन्होंने इस छवि को भली-भाँति गढ़ा है और देश-दुनिया में इसी छवि का प्रचार-प्रसार भी खूब किया-करवाया है। बहरहाल, सचाई चाहे जो हो लेकिन चूँकि नीतीश अपनी इसी छवि के ज़रिए अपनी दावेदारी को पुख़्ता करना चाहते होंगे, इसलिए अपने मुँह से कभी नहीं कहेंगे कि वे प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं। ये कहने के लिए उनके पास बहुत से लोग हैं, लेकिन उनको भी समय से पहले बोलने नहीं दिया जाएगा। राहुल गाँधी के बरक्स दावेदारी प्रस्तुत करने को उतावले नरेंद्र मोदी का चरित्र ठीक इसका उलटा है। इसी उतावली में उन्होंने अपनी पार्टी का बना बनाया खेल बिगाड़ दिया। अलबत्ता एक बिहारी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद जगाकर मतदाताओं को रिझाने में वे और उनकी पार्टी हरगिज नहीं चूकना चाहेगी।

नीतीश की एक दूसरी छवि उनके प्रचार अभियान के बावज़ूद बनी है और जो सच के करीब भी है। निजी एवं सार्वजनिक व्यवहार में वे भी मोदी ही की तरह हठी और दंभी हैं। उनके साथ काम करने वाले नेता इसे बेहतर जानते हैं। सत्ता और राजनीति के संचालन में इसकी बराबर झलक मिलती रही है। इसी तरह वे अपने विरोधियों के मामले में बहुत निर्मम हैं। मोदी की ही तरह उन्होंने किसी भी ऐसे नेता को खड़े नहीं होने दिया है जो उनकी आलोचना करे या उन्हें चुनौती दे सके। इसीलिए जेडीयू और नीतीश एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। पार्टी में किसी भी नेता की कोई ख़ास हैसियत नहीं है चाहे वे शरद यादव ही क्यों न हों। मीडिया के साथ भी उनका बर्ताव भी इसी तरह का रहा है। बिहार का मीडिया इसे अच्छी तरह समझता है और ऐसा कुछ भी करने से बचता है जिससे उन्हें नीतीश का कोपभाजन बनना पड़े।

नीतीश की छवि-निर्माण परियोजना में हाल में आए परिवर्तन पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए। हालाँकि ये उन्होंने मोदी के संदर्भ में मोदी के विरूद्ध शुरू की थी। इस नई छवि में वे खुद को पिछड़े एवं ग़रीब राज्यों के नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यहीं उन्होंने मोदी के विकास मॉडल के बरक्स अपने विकास मॉडल को रखकर अमीर बनाम ग़रीब की शक्ल दे दी है। नीतीश के राजनीतिक मॉडल की परिकल्पना का आधार भी यही है। वे खुद को समावेशी और धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, ख़ास तौर पर बीजेपी से संबंध विच्छेद के बाद से। ये इसी परियोजना का कमाल है कि वे एक ही झटके में सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष नेता बन गए हैं और उन्होंने भारतीय राजनीति में एक बार फिर से धर्मनिरपेक्षता के आधार पर ध्रुवीकरण की शुरुआत कर दी है। यहां तक कि प्रधानमंत्री तक उन्हें सर्टिफिकेट दे रहे हैं और वामपंथी दल उनके समर्थन में खड़े हो गए हैं।

नीतीश ये भली-भाँति जानते हैं कि एनडीए से नाता तोड़कर उन्होंने भारतीय राजनीति में तमाम संभावनाओं को खोल दिया है। लड़ाई अब यूपीए बनाम एनडीए तक सिमटी नहीं रह गई है और सारे प्रयोगों के लिए मैदान खुल गया है। पार्टियों और मोर्चों के लिए ही नहीं प्रधानमंत्री बनने के बहुत सारे महत्वाकांक्षियों को भी कुर्सी ज़्यादा करीब दिखने लगी है। ज़ाहिर है ऐसे में उसी की दावेदारी मज़बूत होगी जो ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीतकर लाएगा और जिसकी सबसे ज़्यादा स्वीकार्यता होगी। इस लिहाज़ से नीतीश का काम अभी आधा भी नहीं हुआ है। बिना बीजेपी के उन्हें अब अपनी सीटों में इज़ाफ़ा भी करके दिखाना होगा। अगर वे इसमें कामयाब नहीं हुए तो प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी जगहँसाई की वजह भी बन जाएगी। नीतीश ये कतई नहीं चाहेंगे, इसलिए उनकी नीति इंतज़ार करने और देखने की होगी।

नीतीश की राजनीति की एक ख़ासियत ये भी है कि वे अंतिम समय तक रहस्य बनाकर रखते हैं। इसका लाभ ये होता है कि वे कभी भी अपना फ़ैसला बदल सकते हैं या अन्य विकल्पों को आज़मा सकते हैं। इसीलिए उन्होंने काँग्रेस के संकेतों का आधा-अधूरा जवाब ही दिया है। वे ममता बैनर्जी के तथाकथित फेडरल फ्रंट की व्याख्या भी गोलमोल तरीके से कर रहे हैं और तीसरे मोर्चे का ज़िक्र छिड़ने पर हँस देते हैं। मगर उन्होंने इनमें से किसी भी विकल्प को न तो खारिज़ किया है और न ही किसी के प्रति अपना अनुराग दिखाया है। साफ़ है कि जब तक वे कोई फ़ैसला नहीं ले लेंगे तब तक भनक भी नहीं लगने देंगे। हो सकता है काँग्रेस से कोई डील हो, जाए। हो सकता है न हो और वे तीसरे विकल्प के गठन में सक्रियता के साथ जुट जाएं।

लोग आज नीतीश में लोहिया और जयप्रकाश को ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, मगर सचाई ये है कि दोनों ही बहुत पीछे छूट गए हैं। समाजवाद भी पीछे छूट गया है और ग़ैर काँग्रेसवाद अगर छूटा नहीं है तो बहुत कमज़ोर ज़रूर पड़ गया है। मंडल के प्रभाव में समाजवादी जाति आधारित राजनीति को अपना अस्त्र बना चुके हैं। इसके ज़रिए आसानी से सत्ता मिलने के कारण उनका इस पर भरोसा भी बढ़ा है। नीतीश ने बिहार में नई सोशल इंजीनियरिंग करके इसे और आगे बढ़ा दिया है। लालू यादव के मुस्लिम-यादव समीकरण के जवाब में उन्होंने जिस जातीय गणित को आकार दिया है, अब सही मायनों में उसकी परीक्षा होगी ये नीतीश बखूबी जानते हैं। इसलिए अपने राजनीतिक भविष्य का निर्धारित करने के पहले वे इसे मज़बूत करने में जुट जाएंगे। फिलहाल यही उनकी पहली प्राथमिकता होगी। इस मोर्चे पर वे जितना आश्वस्त होंगे उसी से उनकी भावी राजनीति भी निर्धारित होगी।

वरिष्‍ठ पत्रकार मुकेश कुमार का यह लेख नईदुनिया में भी प्रकाशित हो चुका है.

अपने कर्मचारियों को सैलरी दे चुका है क्रिएटिव नेस्‍ट मीडिया : डीएन पटेल

Dear Mr.Yashwant, Editor, Bhadas4Media. This is here in reference of online news (Bhadas4media) about "Creative Nest Media Pvt Ltd." You have spread a wrong news on your website that Creative Nest Media has shut down and did not release any salary of employees.

So I'm, D. N. Patel, C.O.O. of Creative Nest Media Pvt Ltd, would like to enlighten you that sadly it has happened in some unavoidable circumstances however company has given the one month salary of employees already and we have all the salary slip and receiving of all the employee for the matter of our record so kindly take care of that your released news.

I will appreciate if you will do the needful asap.

D. N. Patel

(COO)

Creative Nest Media Pvt. Ltd.

M-66, First Floor, Punj House,

Outer Circle, Connaught place,

New Delhi -110001.

61 टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द, 38 को कारण बताओ नोटिस

नई दिल्ली : सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 61 टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं. इन चैनलों के लाइसेंस जांच में मानकों पर खरे नहीं उतरने के बाद रद्द किए गए. साथ ही मंत्रालय ने 38 प्रसारकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

इन प्रसारकों को प्रसारण कंपनी के निदेशक मंडल में या उसकी हिस्सेदारी में बदलाव की सूचना नहीं देने की वजह से कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. नियम के मुताबिक ऐसे किसी भी बदलाव की जानकारी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को देना अनिवार्य है.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जिन प्रसारकों को नोटिस दिया है उनमें से 32 ने बिना मंत्रालय को सूचित किए अपनी अंशधारिका के स्वरुप में बदलाव किया है. जबकि बचे 6 प्रसारकों ने अपने निदेशक मंडल में बदलाव की मंत्रालय को सूचना नहीं दी है. अधिकारियों के मुताबिक, पिछले एक साल से मंत्रालय उन सभी प्रसारण कंपनियों के मालिकाना हक और निदेशक मंडल के ब्योरे की गहन जांच कर रही थी जिन्होंने टीवी चैनल चलाने के लिए लाइसेंस लिए थे.

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि एक वक्त चैनलों की संख्या 877 तक पहुंच गई थी लेकिन कई कंपनियां मंत्रालय की जांच के दौरान मानकों पर खरी नहीं उतरीं. इसलिए 61 चैनलों के लाइसेंस रद्द होने के बाद अभी 816 चैनल काम कर रहे हैं. इनमें 408 गैर समाचार चैनल हैं जबकि 398 समाचार एवं समसामयिक मामलों के हैं. (श्रीन्‍यूज)

भूख की चिंता छोड़ लोगों की मदद के लिए जूझ रही है बूंद की टीम

Mayank Saxena : बूंद की 14 लोगों की एक टीम अगस्त्यमुनि इलाके के चंद्रपुरी में कैम्प कर रही है…चंद्रपुरी 12 दिन पहले तक केदारनाथ यात्रा का मुख्य रूट था…हाईवे सरीखा, जहां बड़े मार्केट थे..ठहरने के लिए रेसॉर्ट और होटल थे…खाना खाने के लिए रेस्टोरेंट थे…खूबसूरत नज़ारे थे…भीड़ थी…गाड़ियां थीं…चहल पहल थी…इस इलाके में दो पुल थे…एक पुल बाढ़ में बह गया है.

एक पुल बचा है लेकिन उसके आगे की सड़क नहीं बची है…पीछे की ओर रुद्रप्रयाग से आने वाली सड़क भी बंद है…और मयाली-तिलवाड़ा की ओर से आने वाली सड़क भी…आप अगर यहां आना भी चाहेंगे तो आपको जान जोखिम में डालनी होगी…हम 14 लोग यहां हैं…9 लोगों की एक और टीम यहां पहुंच रही है…

यहां धीरे धीरे इलाके से राशन खत्म होता जा रहा है…और इसीलिए सबसे ज़्यादा ज़रूरत यहां मूलभूत ज़रूरत की चीज़ों की है…बाकी दुनिया से सम्पर्क कट जाने की वजह से यहां पर राशन नहीं पहुंच पा रहा है…संभवतः जिनके पास राशन का स्टॉक होगा भी वो उसे बाद में ब्लैक करने की कोशिश करेंगे… ऐसे में आपसे निवेदन है कि आप एक ऐसा फंड तैयार करें, जिसके ज़रिए हम ऋषिकेश या हरिद्वार से राशन भर कर यहां पर एक जगह स्टॉक कर पाएं और लोगों को राशनिंग सिस्टम की तरह वितरित कर पाएं…

इसके अलावा कई इलाकों में पानी के दूषित हो जाने की वजह से बीमारियां फैल रही हैं…ऐसे में पानी साफ करने की किट्स की बहुत ज़रूरत है…साथ ही डायरिया, कॉलरा, टायफाइड, मलेरिया जैसी महामारियों से बचाव और लड़ने वाली दवाओं…और साथ ही कुछ वालंटियर करने वाले डॉक्टर्स की हमें बड़ी ज़रूरत है…आप इसके लिए सम्पर्क कर सकते हैं…

Deependra Raja Pandey 9871838883
Ila Joshi 9711540494
Mohit Khan 09650455337
Gaurav Gupta 09415522249

हम प्रयास कर रहे हैं कि जल्द से जल्द बूंद को एक संस्था अथवा ट्रस्ट के तौर पर पंजीकृत करवा लें, जिससे न केवल इसका एक अधिकृत बैंक खाता हो, बल्कि विश्वसनीयता और पारदर्शिता भी बढ़े (हालांकि अभी भी है)…और साथ ही दानदाताओं को टैक्स में छूट मिल सके…

ख़ैर अभी मुद्दा ये बिल्कुल नहींम…मुद्दा सिर्फ ये है कि आपकी जिस्मानी गर्मी को राहत पहुंचाने वाला उत्तराखंड अब आपके ज़ेहन को क्यों परेशान नहीं कर रहा है…क्या आप में से किसी को भी रात को नींद में उत्तराखंड की त्रासदी के बुरे सपने नहीं आते…क्या एक पल को आप हंसते हंसते ठिठक कर ये नहीं सोचते कि ये किस तरह की त्रासदी थी, जिसमें हज़ारों इंसान पलक झपकते मौत के आगोश में चले गए…

ज़िंदगी आपको बार बार मौका देती है खुद को साबित करने का…सवाल ये है कि आप अपनी ज़िंदगी को ज़िंदगी साबित होने का कितनी बार मौका दे पाते हैं…मौका है, इसे दस्तूर न बनने दीजिए…वसीम बरेलवी साहब का एक मशहूर शेर फिर मौजूं है…

उसूलों पर जो आंच आए, तो टकराना ज़रूरी है
जो ज़िंदा हो अगर, ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है.

युवा पत्रकार मयंक सक्‍सेना के एफबी वॉल से साभार.

वरिष्‍ठ पत्रकार कमल नयन का लखनऊ में निधन

बनारस के वरिष्‍ठ पत्रकार कमल नयन का शुक्रवार को लखनऊ में निधन हो गया. वे 75 वर्ष के थे. उनका निधन लखनऊ में गोमतीनगर स्थित उनके पुत्र के आवास पर हुआ. कमल नयन लंबे समय तक धर्मयुग के साथ काम किया. इसके बाद लगभग ढाई दशक तक बनारस में गांडीव अखबार के साथ वरिष्‍ठ संवाददाता के रूप में जुड़े रहे.

इन दिनों वो खुद की एक पत्रिका प्रकाशित कर रहे थे. कमल नयन का अंतिम संस्‍कार आज शाम बनारस में किया जाएगा.कमलजी के पुत्र लखनऊ में सेल्‍स टैक्‍स विभाग में अधिकारी थे. वे इन्‍हीं के साथ गोमती नगर में रह रहे थे. कमलजी के निधन पर मुख्‍यमंत्री ने भी शोक जताया है. निधन की सूचना मिलने पर बनारस की पत्रकारिता में भी शोक की लहर है. 

मृतकों को श्रद्धांजलि देने के लिए पत्रकारों ने किया हवन

उत्‍तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा में असमय काल के गाल में समा गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए मुगलसराय के पत्रकारों ने स्‍थानीय दुर्गा मंदिर में विधि विधान से हवन पूजन किया गया. साथ ही लापता लोगों की कुशलता के लिए भी पत्रकारों ने प्रार्थना की. इस दौरान पत्रकारों ने दो मिनट का मौन रखकर मृत लोगों की आत्‍मा की शांति तथा उनके परिजनों को शक्ति देने की प्रार्थना की.

पत्रकारों ने यथासंभव सहयोग जुटाने की योजना बनाई है. इस दौरान तारकेश्वर सिंह, कमलेश तिवारी, संजय अग्रवाल, करुणापति तिवारी, सुनील विश्वकर्मा, सुनील सिंह, राजीव गुप्ता, महेंद्र प्रजापति, केके गुप्ता, विनोद पाल, घनश्याम पाण्डेय, मनोहर गुप्ता, आदित्य नारायण ''डब्बू'' आदि पत्रकार मौजूद रहे.

विकास संवाद का सातवां मीडिया सम्‍मेलन इटारसी में 29 जून से

विकास संवाद के तत्‍वावधान में 29 जून से 1 जुलाई तक सातवां मीडिया सम्‍मलेन इटारसी के सुखतवा (केसला) में आयोजित किया जा रहा है. तीन दिन तक चलने वाले इस आयोजन में देश भी के तमाम पत्रकार भाग लेंगे. इसके पहले यह सम्‍मेलन पचमढ़ी, बांधवगढ़, चित्रकूट, महेश्वर, छतरपुर, पचमढ़ी में हो चुका है. सातवां सम्‍मेलन सुखतवा (केसला) में आयोजित किया जा रहा है.

इस मीडिया सम्‍मलेन में संवाद का विषय है – संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा और मीडिया. विकास संवाद केसला में आयोजन इसलिए कर रहा है ताकि इस इलाके की बड़ी समस्‍या को आवाज मिल सके. होशंगाबाद जिले में इटारसी के पास स्थित है केसला. केसला के पास ही है सुखतवा. यहीं पर मौजूद है तवा बाँध, जिसके रिसाव से ही तवा के आसपास की मिट्टी के खराब होने का दंश भोग रहे हैं लोग.

पास ही एक गाँव है धाईं. बोरी अभ्यारण्य के विस्तार से विस्थापित हुए गाँवों का सरकारी आदर्श पुनर्वास स्थल, जो बार-बार यही सवाल छोड़ता है कि यदि यह आदर्श पुनर्वास है तो फिर….? मध्य भारत में मिलिट्री के जवानों के लिए गोला-बारूद बनाने वाली आयुध निर्माणी, इटारसी का परीक्षण केंद्र है ताकू.  जिसके आसपास के हर गाँव में आपको या विधवाएं मिलेंगी या मिलेंगे विकलांग, ये वे लोग हैं जो कि तोप के गोलों के जले हुए खोल बीनते हुए इस दशा में पहुंचे हैं.

अंधविश्‍वास का समर्थन करती पेड न्‍यूज भास्‍कर की अंग्रेजी वेबसाइट पर

आज के युग में भले ही मीडिया कितना हाईटेक हो जाए, लेकिन जहां कमाई का जरिया हो तो वह अंधविश्‍वास की खबरों को भी बढ़ा-चढ़ाकर प्रकाशित/प्रसारित करने से नहीं चूकता। और अगर बात दैनिक भास्कर समूह की हो, तो उसके तो क्या कहने। कुछ ऐसा ही वाकया हुआ है दैनिक भास्कर की अंग्रेजी वेबसाइट डेली भास्कर डाट कॉम पर।

इस वेबसाइट पर राजस्थान के दौसा जिले में स्थित घाटा मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में आस्था के नाम पर होने वाले अंधविश्‍वास को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। वेबसाइट पर भूत-पिशाच, काला जादू तथा ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्त कराने संबंधी समाचार छपा है। इस समाचार में प्रकाशित किया गया है कि जर्मनी, नीदरलैण्ड, एम्स तथा दिल्ली यूनिवर्सिटी के शोधार्थी, वैज्ञानिक तथा मनोचिकित्सक मेहंदीपुर बालाजी में इस बात की रिसर्च करने आ रहे हैं कि आखिर यहां लोगों के शरीर से भूत-प्रेत कैसे निकाले जाते हैं। खबर में दिल्ली यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलाजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर पी.सी. जोशी के हवाले से कहा गया है कि इसके लिए जर्मनी और भारत के बीच प्रोजेक्ट तैयार किया गया है।

रिसर्च के लिए जर्मनी और भारत के शोधार्थियों के मेहंदीपुर जाने या इसकी तैयारियों संबंधी खबर में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सबसे अलग गोपनीय तथ्य यह है कि यह खबर तब प्रकाशित की गई है जब ईटीवी राजस्थान ने मेहंदीपुर बालाजी में आस्था के नाम पर अंधविश्‍वास के खिलाफ खबरों का निरंतर प्रसारण किया है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार घाटा मेहंदीपुर ट्रस्ट के प्रमुख महंत
किशोरपुरी महाराज ने एक पीआर एजेंसी से भी ईटीवी राजस्थान पर खबरों का प्रसारण रूकवाने के लिए सहायता ली, लेकिन डील फाइनल नहीं हो पाई। ऐसे में अब वेब और अन्य माध्यमों से यहां के माहौल को सामान्य बनाने की खबरों का प्रकाशन करवाया जा रहा है।

यह भी गोपनीय रूप से सूचना मिली है कि भास्कर समूह को इसके लिए करीब 15 लाख रुपए का भुगतान भी घाटा मेहंदीपुर ट्रस्ट की ओर से किया गया है। भास्कर ने करीब ढाई साल पहले भी इसी प्रकार के समाचार अपनी वेबसाइट और अखबार में प्रकाशित किए थे, दोनों के स्‍क्रीन शॉट नीचे दिए जा रहे हैं।

भास्‍कर की अंग्रेजी वेबसाइट

उल्लेखनीय है कि घाटा मेहंदीपुर बालाजी के गर्भगृह में स्थापित बालाजी की प्रतिमा के दर्शनों के लिए कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं लेकिन गर्भगृह के उपर स्थित ‘‘प्रेतराज के दरबार’’ में कई अंधविश्‍वासी लोग भूत-प्रेत, चुडैल और पिशाचों से मुक्ति दिलाने के लिए अपने परिजनों को यहां लेकर आते हैं। जहां मंदिर समिति के पण्डित उनका कथित इलाज करते हैं।

भास्‍कर की हिंदी वेबसाइट पर प्रकाशित खबर

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

क्रिएटिव नेस्‍ट मीडिया ने बं‍द किया पब्लिकेशन, कर्मचारी सड़क पर

Dear mr Yashwant, I am informing you that CREATIVE NEST MEDIA, publisher of ATELIER and DIVA magazines has closed down the business without prior notice to employees. Company pichale 2 saal se ghate mei chal rahi thi. 17th june ko achanak shaam ko ARPITA MD of Creative Nest Media ne elan ker diya ki kal se koi bhi office na aaye publication band ker diya gaya hai.

saare employees awak rah gaye….. kisi ko salary nahi di office mei tala laga diya… saare emplyees sarak per aa gaye hain…. madam ARPITa ko koi bhi ferk nahi parta hai…. This is not the right way to close down the business. agar usko business band hi karna tha to pahle sab ko inform karna chahiye phir notice ke baad business band karna chahiye…yeh to bilcul tuglak shahi jaisa ealan tha.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कोयला दाम निर्धारण में कोल इंडिया के वर्चस्व का जमाना खत्म

: राजनीतिक और कारपोरेट लाबिइंग ने रंग दिखाया, कोयला मंत्रालय ने नहीं दिया साथ : कोयला दाम निर्धारण में कोल इंडिया के वर्चस्व का जमाना खत्म हुआ। यूनियनों के प्रबल विरोध के चलते विनिवेश और विभाजन का फैसला टलते जाने के मद्देनजर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोयला नियामक यानि कोल रेगुलेटरी बोर्ड की स्थापना के प्रस्ताव को मंजूर कर दिया है। अब कोयला नियामक कोयला मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया तय करेगा। कोल इंडिया एकतरफा तौर पर कोयले का दाम न बढ़ाये, इसके लिए जोरदार राजनीतिक और कारपोरेट लाबिइंग चल रही थी।

यूनियनों और अफसरों के आंदोलनकारी तेवर से निपटने में व्यस्त कोल इंडिया प्रबंधन इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर पाया और न ही कोयला मंत्रालय उसके हक में खड़ा हुआ। इससे बिजली और इस्पात कंपनियों को भारी राहत मिल गयी है। कोल इंडिया कोयला के मूल्य निर्धारण के लिए जनवरी तक यूएचवी प्रणाली अपना रही थी। इसके तहत कोयले को ए से लेकर जी तक 7 श्रेणियों में बांटा जाता था। लेकिन काफी विरोध प्रदर्शन के बाद मूल्य वृद्धि हो हाल में वापस ले लिया गया है। फिलहाल कोयले के मूलय निर्धारण के लिए कोल इंडिया जीसीवी प्रणाली अपना रही है। इसके तहत प्रति किलो कोयले में 300 किलो कैलोरी के ब्रैंडविड्थ के आधार पर 17 स्लैब तैयार किए गए हैं। बहरहाल, कोल इंडिया के सूत्रों ने कहा कि फिलहाल जीसीवी प्रणाली को वापस लेने की कोई योजना नहीं है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोयला नियामकीय विधेयक, 2012 के मसविदे को तुरत फुरत पास कर दिया है, जिसे विभिन्न समितियों और विशेषज्ञों टीमों ने लंबी कवायद के तहत तैयार किया है। मूल्य निर्धारण के अलावा कोयला आपूर्ति और गुणवत्ता संबंधी विवादों के निपटारा का भी कोयला नियामक को हक होगा। अब तक इस सिलसिले में सीसीआई का फैसला ही अंतिम हुआ करता था। विधेयक मसविदा को मंत्रियों की एक टीम ने पहले ही मंजूर किया हुआ है और अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसपर अपनी मुहर लगा दी है। कोयला नियामक बनने के बाद आपूर्ति और गुणवत्ता के मामलों में भी कोल इंडिया का पक्ष कमजोर होगा, ऐसी आशंका है।

गौरतलब है कि कोयला नियामक इस ईंधन के मूल्य, नमूने तथा अन्य व्यवहार की निगरानी करेगा। वित्त मंत्री पी चिदंबरम की अगुवाई वाली अंतर मंत्रालीय समिति की बैठक में इस मुद्दे पर विचार विमर्श किया गया। मंत्री समूह की बैठक में देश में कोयले की गुणवत्ता और इस क्षेत्र से जुड़े मुद्दों की निगरानी के लिए कोयला नियामक बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिल। समिति में सदस्य कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने तब कहा कि बातचीत जारी है और सरकार जल्द कोयला नियामक की नियुक्ति कर सकती है। जायसवाल ने कहा कि हमने इस मसले पर विचार विमर्श किया। उन्होंने कहा, 'हमें उम्मीद है इसे मंत्री समूह की बैठक में अंतिम रूप दे दिया जाएगा।' कोल इंडिया लिमिटेड और बिजली कंपनियों के बीच ईंधन आपूर्ति समझौते को लेकर हुए विवाद के बाद केंद्रीय बिजली मंत्री ने कोयला नियामक स्थापित करने की मांग की ताकि कोयले के आवंटन और मूल्य संबंधी मुद्दों को आसानी से निपटाया जा सके।

उन्होंने कहा कि नियामक यह भी तय करेगा कि सकल कैलोरी मान (जीसीवी) प्रणाली को अपनाया जाए या नहीं। इसके बाद आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी चंदा कोछड़ के नेतृत्व वाले उप-समूह ने सभी चालू विद्युत परियोजनाओं से संबद्ध कोयला खरीद एवं मूल्य निर्धारण प्रणाली (सीपीपीएम) के तेज कार्यान्वयन की वकालत की है। उप-समूह ने तेज मंजूरी प्रक्रिया, खनन विकास परिचालन, व्यावसायिक खनिकों और कोयला आयात पर निर्भरता घटाए जाने के लिए निजी खदानों से अतिरिक्त कोयले की बिक्री की नीति के जरिये घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाए जाने की जरूरत पर जोर दिया है। इसके अलावा उप-समूह ने यह भी सुझाव दिया है कि गैस आपूर्ति समझौते और दीर्घावधि पीपीए की अवधि में असमानताओं को दूर किए जाने के लिए गैस आधारित विद्युत खरीद के लिए उक अलग स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट (एसबीडी) की स्थापना के साथ सरकारी कंपनी गेल इंडिया को पूल ऑपरेटर के रूप में नियुक्त किया जाएगा। गैस आधारित स्टेशनों से बिजली खरीदने के लिए बिजली खरीद एवं दरों पर एक अलग नीति बनाई जाएगी।

गौरतलब है कि मंत्रियों की टीम ने कोयला मूल्य निर्धारण का अधिकार उत्पादक के पास ही रखने की सिफारिश की थी। लेकिन लाबिंइग के चलते इस सिफारिश को खटाई में डाल दिया गया। कोयला मूल्य निर्धारम के सिद्धांतों, विधियों को तय करने और विवादों के निपटारे के अधिकार देकर प्राधिकरण के फैसले को ही अंतिम मानने के प्रवधान कर दिये गये हैं। कोल इंडिया मूल्य निर्धारण अवश्य करेगा लेकिन प्राधिकरण के सिद्धांतों और विधियों के मुतबिक ही। विवादों के निपटारे का अधिकार होने के कारण प्राधिकरण को कोल इंडिया के किसी भी फैसले में हस्तक्षेप करते रहने का अवसर बना रहेगा।

इसी बीच आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीईए) ने प्राकृतिक गैस की कीमतों में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। नेचुरल गैस की कीमतों पर सी रंगराजन कमेटी की सिफारिशें मंजूर की गई हैं। प्राकृतिक गैस की कीमत 4.2 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू से बढ़ाकर 8.4 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू की गई है। बढ़ी हुई कीमतें अप्रैल 2014 से लागू होंगी। हर 3 महीने में कीमतों की समीक्षा की जाएगी। इस फैसले से रिलायंस इंडस्ट्रीज, ओएनजीसी, केर्न इंडिया और ऑयल इंडिया को फायदा होगा। हालांकि, फर्टिलाइजर और पावर कंपनियों को नुकसान होगा। इसके अलावा सीसीईए ने धान के एमएसपी में 60 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी करने को मंजूरी दी है। अब 2013-14 के लिए धान का एमएसपी 1310 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। वहीं, सीबीआई के अधिकार बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली है।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

समाचार प्‍लस में अमितेश का प्रमोशन, बने सीनियर रिपोर्टर

समाचार प्‍लस चैनल से खबर है कि अमितेश श्रीवास्‍तव का प्रमोशन कर दिया गया है. लखनऊ में रिपोर्टर के रूप में चैनल को अपनी सेवा दे रहे अमितेश को सीनियर रिपोर्टर बना दिया गया है. यह प्रमोशन एक जुलाई से प्रभावी होगा. इसके लिए प्रबंधन ने लेटर भी जारी कर दिया है.

अमितेश शुरुआती दौर से ही चैनल को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. प्रबंधन ने उनके मेहतन तथा कार्यक्षमता को देखते हुए उनके तरक्‍की प्रदान की है. अमितेश इसके पहले आईबीएन7, इंडिया न्‍यूज, वॉयस ऑफ इंडिया और स्‍टार न्‍यूज जैसे संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. गौरतलब है कि एक साल के अंदर ही समाचार प्‍लस प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों को इंक्रीमेंट भी दिया था. एक साल पूरा होने के बाद अच्‍छा काम करने वालों को प्रमोशन भी दिया जा रहा है.

गोपीनाथ मुंडे ने कहा- चुनाव में खर्चे 8 करोड़, जो करना हैं कर लें

नई दिल्ली। बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे का एक बयान उन पर ही भारी पड़ सकता है। गोपीनाथ मुंडे ने एक सभा के दौरान कहा कि उन्होंने चुनाव में 8 करोड़ रुपये खर्च किए। मुंडे ने ये भी कहा कि अगर इस कबूलनामे के चलते उन पर कोई कानूनी कार्रवाई होती है तो उन्हें कोई परवाह नहीं है। वैसे भी अब लोकसभा चुनाव होने में बस कुछ ही महीने बचे हैं। गौरतलब है कि एक सांसद के लिए चुनाव खर्च की सीमा सिर्फ 40 लाख रुपये है।

मुंडे ने गुरुवार को नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में एक सभा में कहा कि पहले चुनाव में मैंने महज कुछ हजार रुपये खर्च किए, लेकिन पिछले चुनाव में 8 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े। अब कोई चुनाव आयोग या इनकम टैक्स का अधिकारी यहां है और सुन रहा है तो सुन ले। वैसे भी अब कुछ ही महीने बचे हैं।

मुंडे के बयान के बाद कांग्रेस ने हमला बोल दिया है। कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा कि मुंडे ने देश के नियम औऱ कानून का उल्लंघन किया है। चुनाव आयोग को कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। चतुर्वेदी ने कहा कि अपने चुनाव के बाद मुंडे ने अपना अकाउंट जमा किया होगा, जो नियमानुसार हर सांसद को करना होता है। अगर उन्होंने ये आकड़े नहीं बताए थे तो उनके ऊपर आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए।

वहीं सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि गोपीनाथ मुंडे पर चुनाव को आयोग को संज्ञान लेना होगा। ये चुनाव आयोग को देखना होगा कि कोई उम्मीदवार कितना खर्च करना है। मुंडे 25 लाख की लिमिट को कई बार पार कर चुके हैं। अगर मुंडे जी ने कहा है कि उन्होंने खर्च ज्यादा किया है तो चुनाव आयोग तय करे उसे क्या करना है। (आईबीएन7)

केदारनाथ से रामबाड़ा तक पड़े हुए हैं 2000 शव!

केदार घाटी से रामबाड़ा के बीच करीब 2000 शव अब भी पड़े हुए हैं। इनमें से कई खुले में हैं, तो कई मलबे में दबे हुए हैं। केदारनाथ में बचाव अभियान के बाद लौटे आईटीबीपी व उत्तराखंड पुलिस की टीम ने गुरुवार को आंखों-देखा हाल बयां किया।

ये जवान भयावह मंजर देखकर अभी तक सामान्य नहीं हो पाए हैं। वहीं राज्य सरकार ने माना कि त्रासदी में तीन हजार लोग लापता हैं। बाढ़ व भूस्खलन के बाद बचाव कार्यों के लिए जवानों की एक टीम कुछ दिनों पहले रामबाड़ा पहुंची थी।

शुरू में इनके जरिए खबर आई कि अकेले रामबाड़ा में 100 शव पड़े हैं। लेकिन बचाव अभियान के बाद वापस लौटे जवान पूरा मंजर देख सदमे में हैं। अपनी पहचान उजागर न किए जाने की बात कहते हुए जवानों ने बताया कि रामबाड़ा से केदारघाटी की ओर हर कदम पर एक लाश पड़ी है।

रामबाड़ा में टूटे होटलों और धर्मशालाओं के प्रत्येक कमरे में चार-पांच शव पड़े हैं। इन जवानों ने कई शवों को सुरक्षित स्थानों पर पाया। इनका मानना है कि उनकी मौत डर व ठंड से हुई होगी।

बहरहाल, यहां-वहां पड़े शवों से फैलने वाले संक्रमण को ध्यान में रखते हुए केदारनाथ और आसपास के क्षेत्रों में जवानों ने ब्लीचिंग पाउडर और गैमक्सीन का छिड़काव किया है। इससे संक्रमण और गिद्द-चील द्वारा शवों को नोचने का खतरा कम हुआ है। (साभार : हिंदुस्‍तान)

अब फिजिक्स का पेपर भी हिंदी और संस्कृत की तरह कम्युनल होने लगा है!

Shambhunath Shukla : दिल्ली विश्वविद्यालय में साइंस फैकल्टी में प्रवेश के लिए आई पहली सूची में कट ऑफ सौ प्रतिशत अंकों की है। सीबीएसई की परीक्षा शुरू होने के एकाध रोज पहले दिल्ली से निकलने वाले एक अखबार के एक स्थानीय संपादक और मल्टी मीडिया प्राडक्ट बेचने वाली कंपनी की दिल्ली से निकलने वाली मैगजीन ने हर वर्ष की भांति कुछ अलग-अलग टिप्स छापे थे। इन टिप्स के मुताबिक फिजिक्स की परीक्षा देने के पहले विद्यार्थी महामृत्युंजय मंत्र पढ़कर निकलें।

मंत्र कुछ यूं है- ऊँ त्र्यबंकं यजामहे सुंगंधिम् पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बंधनान मृत्र्योमुक्षिमामृतात। अब फिजिक्स का पेपर भी हिंदी और संस्कृत की तरह कम्युनल होने लगा है!

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ला के एफबी वॉल से साभार.

पत्रकारिता के स्‍वर्णयुग में किस संपादक ने नेहरू के नीतियों के खिलाफ लिखा था

पत्रकारिता के तथाकथित स्वर्ण युग और यशस्वी संपादकों के दौर में किस महान अखबार और संपादक ने प्रधानमंत्री नेहरू की नीतियों के खिलाफ संपादकीय लिखा. कितने अखबारों ने लाल बहादुर शास्त्री की नेतृत्व वाली सरकारी की किसी भी तरह की आलोचना की. दो अखबारों को छोड़ दें तो 1977 तक किसने इंदिरा गांधी के खिलाफ कुछ भी लिखा.

…फिर भी अगर वही आपका स्वर्ण युग है, तो आप टाइम मशीन में फ्रींज़ हो गए हैं. इसे दिमाग से डायनासोर हो जाना भी कहते हैं. इसका सरल इलाज यह है कि नेशनल आर्काइव में जाकर पुराने अखबार पढ़ें. बीमारी दूर हो जाएगी.

वरिष्‍ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से साभार.

NAPM Condemns attack on Prafulla Samantara and Lingraz Azad in Bolangir, Orissa

New Delhi : On the night of 26th June, Prafulla Samantara, senior activist and National Convener, NAPM and Lingraj Azad, Samajwadi Jan Parishad was attacked at Bolangir station, while returning from a Padyatra organised by the people opposing Lower Suktel Project in the region.

They were attacked by the President of Bolangir Lower Suktel Action Committee and his supporters. It has to be noted here that Lower Suktel Action Committee is the group which supports commencement of the project. Odisha government has managed to create a conflict and division amongst people, who is fuelling this kind of violence in the region, only to grab land, water and forest from communities.

A section of the Bolangir press and local police rushed to the spot and rescued them. Prafulla Samantara has reached back Bhubaneswar. It was never expected of the President of the Action Committee Mr. Panda to resort to undemocratic and brutal methods to express his anger and frustrations. In the last but one issue of the Samadrusti, Prafulla Samantara had appealed Mr. Panda to come for an open discussion on the issue. Mr. Panda discuused it openly by attacking him last night.

Lower Suktel Project is one of the hundreds of projects being implemented in name of development in Odisha which is displacing the adivasis, workers, farmers in favour of the capitalists. The project got its environment clearance during 1980s, but no construction started after that. The government has spent a large amount of money on paper on the rehabilitation of the displaced people. In 2013, the govt. tried to start the construction by forcefully acquiring the land but due to strong protest and resistance of the people they could not do it. Villagers were even brutally attacked but protests have continued. National Alliance of People’s Movements supports their struggle for a dignified livelihood and to save their land, water and forest from forceful acquistion.

Prafulla Samantara is one of the most visible activists of Odisha, playing an active role in supporting various people’s movements like anti-POSCO movement, anti-Vedanta movement and many other struggles in Odisha. He is also a petitioner to the Supreme Court’s committee to protect Niyamgiri as well as a petitioner for the Saxena Committee whose report forced the Ministry of Environment and Forests to suspend the clearance for Vedanta. Lingaraj Bhai is a renowned peasant leader and Secretary of Samajwadi Jan Parishad.

We understand that the recent attacks and many other previous attacks on the life of Prafulla Samantara is based on the committed action and writings of him, against the massive ecological destruction and displacement initiated by the industrialists, capitalists with the help of the State Government.

NAPM demands that Odisha government must desist from further acquisition in the area, since water will no longer be used for irrigation but for meeting the needs of the industry. It should also stop dividing and supporting a section of people pitching them against their own fellow beings. The struggle of people in defence of their livelihood and natural resources will continue and grow in strength with support from people’s movements across the country.

Medha Patkar, Dr. Sunilam, Arundhati Dhuru, Gabriele Deitrich, Sister Celia, Ramakrishna Raju, C R Neelkandan, Sudhir Vombetekere, Bhupender Singh Rawat, Saraswati Kavula, Kamayani Swami, Mahendra Yadav, Rajendra Ravi, Vimal Bhai, Meera, Madhuresh Kumar, Seela M Mahapatra. (साउथ एशिया सिटीजन वेब)

P.Sainath on board of journalism university

Eminent journalists P. Sainath and Ananya Banerjee have been nominated to the board of management of Haridev Joshi University of Journalism and Mass Communication. Rajasthan Governor Margaret Alva, Chancellor of the university, has nominated them for a three-year term.

Mr. Sainath, a Magsaysay Award winner, is the Rural Affairs Editor of The Hindu based in Mumbai. He has been instrumental in defining the contours of the discourse on agricultural distress, rural poverty and corruption within the media in India.

Author of the highly acclaimed and widely read Everybody loves a good drought, he is also the guest faculty at the Asian College of Journalism (ACJ), Chennai, and the Sophia college, Mumbai. Ananya Banerjee is the Deputy Director-General of Doordarshan and a media consultant. She specialises channel management, personnel and human resource training and the making of biopics.

The Haridev Joshi University of Journalism and Mass Communication was established by an Act passed in the Assembly following Chief Minister Ashok Gehlot’s budget announcement of 2012-13. Sunny Sebastian, former Deputy Editor, The Hindu is the first and current Vice-Chancellor of the university. (Courtesy : The Hindu)

मीडिया प्रत्यक्ष तौर पर अराजकता मानसिकता के हिरोईज्म का प्रोमोट करता है

: उत्‍तराखंड आपदा : तसवीर का दूसरा एवं ‘सही पहलू’ यह है कि यह हेलीकॉप्टर आपदा का जायजा लेने आया था और पहले उतर नहीं पा रहा था. चारों ओर मलबा फैला था. पहले यह देखना था कि हेलीकॉप्टर सुरक्षित उतारे जा सकते हैं या नहीं. रिस्क लेकर पायलट ने उतारा और एक टीम इलाके की स्थिति का जायजा लेकर तुरंत वापस गयी.

एक-दो पीड़ितों को बैठा सकते थे, पर संभव नहीं था. सैकड़ों पीड़ितों में आपस में ही मारामारी हो जाती. संभवत: इस आपाधापी में हेलीकॉप्टर वापस जा ही नहीं पाता और मलबे में ही फंस जाता. यही हेलीकॉप्टर वापस जाकर अधिकारियों को ‘ग्राउंड जीरो’ की स्थिति बताता है और फिर 22 हेलीकॉप्टर पीड़ितों के लिए भेजे जाते हैं. मीडिया के लिए हमेशा ही सत्य अपनी समग्रता में खबर नहीं बन पाता. उसे वही खबर रास आती है, जिसमें उसे लाभ दिखता है.

पीड़ित अगर भावुक होता है, तो यह स्वाभाविक है. मगर, मीडियावाले इसी भावनात्मकता के ‘विविध व एकपक्षीय’ रंग को दिखाने में लाभ देखते हैं. स्पष्ट नीति है, जितना ही प्रशासन व नेताओं को नकारा साबित करेंगे, जितना उनको गालियां देंगे, उतना ही आम आदमी खुश होता है. जब पीड़ा हो, गुस्सा स्वाभाविक तौर पर आता है और इस गुस्से का लाभ अगर न कमाया जाये, तो मीडिया को लगता है जैसे उनका कोई औचित्य ही नहीं रह जाता.

कई सवाल हैं, जिन्हें पूछने की जरूरत नहीं, अब उन पर जांच के बाद सख्त कार्रवाई की जरूरत है. एक महिला रिपोर्टर, ऋषिकेश से सटे हाइ-वे पर खड़ी होकर बेबाकी से कह रही हैं कि वे केदारनाथ के रास्ते में हैं. एक रिपोर्टर 200 किमी यात्रा मार्ग के उस हिस्से में फंसे व्यक्ति से बाइट लेता है कि प्रशासन कुछ भी मुहैया नहीं करा रही, जहां आपदा का बेहद कम असर है.

वहां लोग सिर्फ मार्ग बंद होने के कारण रुके हुए हैं. पूरा प्रशासन जब केदारनाथ व आसपास के बेहद गंभीर स्थितिवाले इलाकों में जुटा है, स्वाभाविक है सारा ध्यान वहां है. पूरे आपदा रिपोर्टिग में शुरुआती तीन-चार दिनों तक, लगभग सारे मीडियावालों ने सिर्फ यात्रा मार्ग के निचले व कम आपदावाले क्षेत्रों में फंसे लोगों से बात करके अपनी रिपोर्टिग की.

पत्रकारिता का मूल सिद्धांत ताक पर रखा गया, जो कहता है कि पहले ‘आधिकारिक’ बयान को प्राथमिकता दी जाये, फिर रिपोर्ट को पूर्णता देने के लिए प्रत्यक्षदर्शियों की बात भी ली जाये. यहां किसी ने अधिकारियों से बात नहीं की. ऐसे ‘अप्रत्यक्ष’ प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत को न सिर्फ अपनी रिपोर्ट का आधार बनाया, बल्कि उसकी बिना पर बड़े और निष्कर्षकारी निजी बयान भी दे दिये, जिन्हें अफवाह की श्रेणी में रखा जा सकता है. इस आपदा में ही नहीं, पहले भी मीडिया ने गंभीर मौकों पर भी ऐसा ही तमाशा और अराजक सनसनी पेश किया है.

और किसी भी सूरत में अपने दोष को न मानने की अपनी जिद नहीं छोड़ी है. आज वक्त है, जब प्रेस काउंसिल या शीर्ष न्यायपालिका इस पर आधिकारिक पहल करे और इस आपदा में मीडिया की भूमिका के सभी पहलुओं की समग्रता से जांच कराये. सुप्रीम कोर्ट जब सरकारों को इस आपदा में उनकी भूमिका पर नोटिस जारी कर सकता है, तो मीडिया को क्यों नहीं? प्रेस काउंसिल को भी आगे आने की जरूरत है. मीडिया प्रजातंत्र का चौथा खंभा है. अगर कार्यपालिका को न्यायपालिका संवैधानिक जवाबदेही न निभाने के लिए कठघरे में खड़ा कर सकती है, तो मीडिया क्या संविधान, प्रजातंत्र और देश से भी बड़ा है?

एक आम व्यक्ति, भावनाओं में बह कर फेसबुक या ट्विटर पर कोई टिप्पणी कर देता है या कोई स्केच पोस्ट कर देता है, तो उस पर देशद्रोह तक का इल्जाम लगाने में मिनट की देरी नहीं होती. मगर, इस पूरी आपदा में व अन्य संवेदनशील मामलों में भी, मीडिया, तथाकथित ‘सूत्रों’ एवं प्रत्क्षदर्शियों के हवाले से गलत और पूरे तंत्र के खिलाफ अफवाहें फैलाता है, तब उसे न सिर्फ कोई कुछ नहीं कहता, बल्कि मीडिया को ढेरों वाहवाही मिलती है. क्यों? आज भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में सरकारों, नेताओं और शासन तंत्र के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. दोष सिर्फ तंत्र का नहीं है. दुनिया मानती है, भारत में अब चुनाव निष्पक्ष एवं साफ-सुथरे होते हैं.

फिर भी, अगर सैकड़ों दागी या अनैतिक लोग चुने जा रहे हैं, तो क्या दोष आम जनता का नहीं है? आइआइटी के कुछ लोग चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं. सड़क पर जब पुलिस बिना हेलमेट पहने दुपहिया चालकों को पकड़ती है या शराब पीकर वाहन चलानेवालों का ‘ब्रेथ ऐनेलाइजर टेस्ट’ करती है, तो हजारों लोग पुलिस को गालियां देते हैं. मीडिया प्रत्यक्ष तौर पर अराजकता मानसिकता के हिरोईज्म का प्रोमोट करता है. दिल्ली में आम लोग सड़क पर उतर जाते हैं और प्रदर्शन के नाम पर अराजकता की पराकाष्ठा करते हैं और मीडिया उनको ‘हीरो’ बनाता है.

एक 16-17 साल की लड़की सुरक्षा घेरा तोड़ कर प्रधानमंत्री आवास के सामने मनमोहन सिंह को अपशब्द कहते हुए चिल्लाती है और पुलिस के साथ उलझती है. मीडिया का कैमरा सब दिखाता है और स्टूडियो में एंकर कहता है, ‘आप देख रहे हैं व्यवस्था की नाकामी पर आम आदमी का दर्द और गुस्सा!’ अब अगर पुलिस ऐसे लोगों पर गंभीर कार्रवाई करती है, तो पूरा तंत्र मीडिया की नजर में तानाशाह हो जाता है. मगर, कोई मीडिया प्रदर्शनकारियों से अपील नहीं करता कि विरोध प्रकट करने के लिए अराजकता की जरूरत नहीं होती. कानून कोई भी तोड़े, वह अपराधी ही होता है, आंदोलनकारी नहीं.

जिस तरह टीवी पर एंकर अपने शो में नेताओं, अधिकारियों और तंत्र के प्रतिनिधियों का मजाक उड़ाते हैं और उनका अपमान करते हैं, वह बेहद खतरनाक है. एक चैनल ने एक केंद्रीय मंत्री से 15 सेकेंड में आपदा राहत पर सरकार की स्थिति स्पष्ट करने को कहा. मंत्री जी जब तक संभल पाते और कह पाते, समय समाप्त हो गया और एंकर ने दर्शकों की ओर मुखातिब होकर निष्कर्ष दे डाला, ‘आपने देखा, सरकार कितनी बेबस है, उसके पास कहने को कुछ नहीं है.

साफ है, आम आदमी के दर्द की सुध लेनेवाला कोई नहीं.’ मंत्री जी को पता भी नहीं था कि उनका बयान अब टीवी पर नहीं आ रहा और वे बोलते रहे. सुनना किसे था! सुन कर भी कौन मानता! मीडिया को स्वयं को नियंत्रित करने का अवसर दिया जा चुका है. खासकर विजुअल मीडिया को. वे लगातार और भी अराजक हुए जा रहे हैं. राजनीति और सरकारों के हाथ बंधे हैं. उन्हें मीडिया की बेहद जरूरत होती है, इसलिए वे उनसे पंगा नहीं ले सकते. एक ही रास्ता बचा है, वह है सुप्रीम कोर्ट.

न्यायपालिका अगर पहल करे, तो देश में अराजकता की मानसिकता फैलानेवाले इस तरह की मीडिया की भूमिका की समग्रता से जांच हो सकती है और जरूरी कानून बना कर मीडिया को रेगुलेट किया जा सकता है. खुद मीडिया के अंदर ही कई बेहद गंभीर और जानकार लोग हैं, जिन्हें पता है कि भारतीय मीडिया के किन पहलुओं की समीक्षा होनी चाहिए और कैसे गुणात्मक ‘रेगुलेशन-रेजीम’ बनाया जा सकता है. यह बात मान लेनी होगी कि नीयत में शायद उतनी खोट नहीं. खराबी है पूरे मीडिया वर्किग कल्चर में, रिक्रूटमेंट, ट्रेनिंग में और मैनेजमेंट सिस्टम में.

प्रभात खबर में प्रकाशित संतोष झा की रिपोर्ट.

साधना न्‍यूज से प्रतीक और मुकेश का इस्‍तीफा

साधना न्‍यूज से खबर है कि प्रतीक मिश्रा और मुकेश कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. ये लोग लंबे समय से इस चैनल के साथ जुड़े हुए थे. बताया जा रहा है कि प्रतीक अपनी नई पारी जिया न्‍यूज के साथ शुरू करने जा रहे हैं. वहीं मुकेश ने अपनी नई पारी हरियाला के चैनल 5 ज्‍वाइन करने जा रहे हैं. दोनों लोग साधना से पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

भारत में आपदा प्रबंधन किसकी जिम्मेदारी है?

भारत में लोगों को आपदा से बचाना या तत्काल राहत देना किसकी जिम्मेदारी है? ..हमें नहीं मालूम! हमारी छोड़िए.. पांच दशकों से सरकार भी इसी यक्ष प्रश्न से जूझ रही है। दरअसल आपदा प्रबंधन तंत्र की सबसे बड़ी आपदा यह है कि लोगों को कुदरती कहर से बचाने की जिम्मेदारी अनेक की है और किसी एक की नहीं।

इस देश में जब लोग बाढ़ में डूब रहे होते हैं, भूकंप के मलबे में दब कर छटपटाते हैं या फिर ताकतवर तूफान से जूझ रहे होते हैं, भूस्‍खलन, बादल फटने से लोग लोग मर रहे होते हैं, तब दिल्ली में फाइलें सवाल पूछ रही होती हैं कि आपदा प्रबंधन किसका दायित्व है? कैबिनेट सचिवालय? जो हर मर्ज की दवा है। गृह मंत्रालय? जिसके पास दर्जनों दर्द हैं। प्रदेश का मुख्यमंत्री? जो केंद्र के भरोसे है। या फिर नवगठित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण? जिसे अभी तक सिर्फ ज्ञान देने और विज्ञापन करने का काम मिला है। एक प्राधिकरण सिर्फ 65 करोड़ रुपये के सालाना बजट में कर भी क्या सकता है। ध्यान रखिए कि इस प्राधिकरण के मुखिया खुद प्रधानमंत्री हैं।

जिस देश में हर पांच साल में बाढ़ 75 लाख हेक्टेयर जमीन और करीब 1600 जानें लील जाती हो, पिछले 270 वर्षों में जिस भारतीय उपमहाद्वीप ने दुनिया में आए 23 सबसे बड़े समुद्री तूफानों में से 21 की मार झेली हो और ये तूफान भारत में छह लाख जानें लेकर शांत हुए हों, जिस मुल्क की 59 फीसदी जमीन कभी भी थरथरा सकती हो और पिछले 18 सालों में आए छह बड़े भूकंपों में जहां 24 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हों, वहां आपदा प्रबंधन तंत्र का कोई माई-बाप न होना आपराधिक लापरवाही है। सरकार ने संगठित तौर पर 1954 से आपदा प्रबंधन की कोशिश शुरू की थी और अब तक यही तय नहीं हो सका है कि आपदा प्रबंधन की कमान किसके हाथ है। भारत का आपदा प्रबंधन तंत्र इतना उलझा हुआ है कि इस पर शोध हो सकता है। आपदा प्रबंधन का एक सिरा कैबिनेट
सचिव के हाथ में है तो दूसरा गृह मंत्रालय, तीसरा राज्यों, चौथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन या फिर पांचवां सेना के। समझना मुश्किल नहीं है कि इस तंत्र में जिम्मेदारी टालने के अलावा और क्या हो सकता है। गृह मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी का यह कहना, 'आपदा प्रबंधन तंत्र की संरचना ही अपने आप में आपदा है। प्रकृति के कहर से तो हम जूझ नहीं पा रहे, अगर मानवजनित आपदाएं मसलन जैविक या आणविक हमला हो जाए तो फिर सब कुछ भगवान भरोसे ही होगा..', भी यही जाहिर करता है।

उल्लेखनीय है कि सुनामी के बाद जो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बनाया गया था, उसका मकसद और कार्य क्या है यही अभी तय नहीं हो सका है। सालाना पांच हजार करोड़ से ज्यादा की आर्थिक
क्षति का कारण बनने वाली आपदाओं से जूझने के लिए इसे साल में 65 करोड़ रुपये मिलते हैं और काम है लोगों को आपदाओं से बचने के लिए तैयार करना। पर बुनियादी सवाल यह है कि आपदा आने के बाद लोगों को बचाए कौन? यकीन मानिए कि जैसा तंत्र है उसमें लोग भगवान भरोसे ही बचते हैं।

उत्तराखंड में भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ की भयावहता के मद्देनजर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की योजना बनाई है। एनडीएमए के उपाध्यक्ष शशिधर रेड्डी ने सोमवार को बताया कि उत्तराखंड समेत देश के अन्य हिमालयी प्रदेश बारिश, बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ भूकंप के प्रभाव वाले क्षेत्र भी माने जाते हैं। ऐसे में हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भविष्य में अगर प्राकृतिक आपदा आए, तो हमारे पास इससे निपटने की पूरी व्यवस्था पहले से हो। हमने उत्तराखंड त्रासदी से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का फैसला किया है। रेड्डी ने बताया कि इस आपदा से जुड़े सभी पहलुओं का दस्तावेजीकरण किया जाएगा। कमियां उजागर कर व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए उपाए भी सुझाए जाएंगे। साथ ही आपदा के संदर्भ में सभी पक्षों की भूमिकाएं भी स्पष्ट की जाएंगी। एनडीएमए ने पहली बार इस तरह की पहल की है।

उत्तराखंड में हुई भारी तबाही को देखते हुए आखिर अब तो हमें आपदा प्रबंधन सीखना चाहिए, सोलह सौ किलोमीटर से अधिक के समुद्री किनारे तथा भूकंप के मामले में सक्रिय अफगानिस्तान से प्लेट जुड़ा होने के कारण गुजरात पर हमेशा आपदाओं का खतरा बना रहता है। बताते है कि गुजरात में इजरायल का एक्वा स्टिक लिसनिंग डिवाइस सिस्टम उनकी आपदा टीम की धड़कन है। ब्रीदिंग सिस्टम, अंडर वाटर सर्च कैमरा, आधुनिक इन्फेलेटेबल बोट, हाई वाल्यूम वाटर पंपिंग..। यह उपकरण जमीन के नीचे बीस मीटर की गहराई में दबे किसी इसान के दिल की धड़कन तक सुन लेता है। मोटर वाली जेट्स्की बोट और गोताखोरों को लगातार 12 घटे (आम ब्रीदिंग सिस्टम की क्षमता 45 मिनट तक आक्सीजन देने की है) तक आक्सीजन उपलब्ध कराने वाला अंडर वाटर ब्रीदिंग एपेरेटस भी है। नीदरलैंड का हाइड्रोलिक रेस्क्यू इक्विपमेंट भी है, जो मजबूत छत को फोड़ कर फर्श या गाड़ी में फंसे व्यक्ति को निकालने का रास्ता बनाता है। गुजरात ने अग्निकांड से निपटने के लिए बड़ी संख्या में अल्ट्रा हाई प्रेशर फाइटिग सिस्टम भी खरीदे हैं। आम तौर पर आग बुझाने में किसी अन्य उपकरण से जितना पानी लगता है, यह सिस्टम उससे 15 गुना कम पानी में काम कर देता है। इसे अहमदाबाद के दाणीलीमड़ा मुख्य फायर स्टेशन ने डिजाइन किया है। यह आग पर पानी की एक चादर सी बिछा कर गर्मी सोख लेता है। अमेरिका के सर्च कैमरे तथा स्वीडन के अंडर वाटर सर्च कैमरे भी  अपनी राहत और बचाव टीमों को दिए हैं। ये उपकरण जमीन के दस फीट नीचे तथा 770 फीट गहरे पानी में भी तस्वीरें उतार कर वहां फंसे व्यक्ति का सटीक विवरण देते हैं। अमरीका की लाइन थ्रोइंग
गन से बाढ़ में या ऊंची बिल्डिंग पर फंसे व्यक्ति तक गन के जरिए रस्सा फेंक कर उसे बचाया जा सकता है। राज्य की एम्बुलेंस सेवा 108 ने तो गंभीर वक्त पर बहुत अच्छे परिणाम दिए हैं। अब गुजरात में कहीं भी पंद्रह मिनट में एम्बुलेंस सेवा प्राप्त की जा सकती है।

वर्तमान में आपदा प्रबन्धन का सरकारी तंत्र देखें ता कैबिनेट सचिव, गृहमंत्रालय, राज्यों में मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन विभाग और सेना इस तंत्र का हिस्सा हैं। यह भी सच है कि हमारे देश में आपदा प्रबन्धन की स्थिति ज्यादा ही लचर है। हमारे आपदा प्रबन्धन की कमजोर कड़ी लगभग हर आपदा में ढीली दिखी, लकिन हमने उसे मजबूत करन का प्रयास नहीं किया। मीडिया की भाषा में यह ‘प्रशासनिक लापरवाही’ अथवा न्यायपालिका की भाषा में ‘आपराधिक निष्क्रियता’ है। प्रभावी आपदा प्रबन्धन की पहली शर्त है जागरूकता और प्रभावित क्षेत्र में तत्काल राहत एजेन्सी की पहुंच। यदि लोगों में आपदा की जागरूकता नहीं है तो तबाही भीषण होगी और राहत में दिक्कतें आएंगी। आपदा सम्भावित क्षेत्र में तो लोगों को बचाव की बुनियादी जानकारी देकर भी आपदा से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है। आपदा प्रबन्धन के बाकी तत्वों में ठीक नियोजन, समुचित संचार व्यवस्था, ईमानदार एवं प्रभावी नेतृत्व, समन्वय आदि काफी महत्वपूर्ण हैं। हमारे देश में व्यवस्था की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि यहां सब-एक दूसरे पर जिम्मेवारी डालते रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक औसतन 5 से 10 हजार करोड़ की आर्थिक क्षति तो प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं से उठाते हैं लकिन इससे
जूझन के लिये आपदा प्रबन्धन पर हमारा बजट महज 65 करोड़ रुपये है। इस धनराशि में अधिकांश प्रचार आदि पर ही खर्च हो जाता है। प्रशिक्षण की अभी तो तैयारी भी नहीं है।

वर्ष 2005 में आपदा प्रबन्धन अधिनियम संसद ने पारित कर दिया है। इसके बाद से ही राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण का गठन किया गया है। प्राधिकरण के सदस्य के. एम़ सिंह कहते हैं, ‘‘महज तीन साल में ही हमसे ज्यादा अपेक्षा क्यों रखते हैं? वक्त दीजिये हम एक प्रभावी आपदा प्रबन्धन उपलब्ध कराएंगे।’’ राज्य सरकारों को भी अपना आपदा प्रबन्धन तंत्र मजबूत और प्रभावी बनाना चाहिए। बाढ़ प्रभावित इलाके में स्थानीय मदद से प्रत्येक गांव या दो-तीन गांवों पर एक आपदा राहत केन्द्र की स्थापना कर वहां दो-तीन महीन का अनाज, पर्याप्त साधन, जरूरी दवाएं, पशुओं का चारा, नाव, तारपोलीन व अन्य जरूरी चीजों का बाढ़ से पूर्व ही इन्तजाम सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

लेखक शैलेन्द्र चौहान पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा जयपुर में रहते हैं.

राजस्‍थान रॉयल्‍स लांच करेगा अपना चैनल ‘आरआर टीवी’

मुंबई : दुनिया की हाई प्रोफाइल फुटबॉल टीमें जैसे मैनचेस्टर यूनाइटेड और एफसी बार्सिलोना के पास अपने ब्रांड जैसे ‘बार्सा टीवी’ और ‘एमयू टीवी’ प्रोमोट करने के लिए अपने मीडिया मंच हैं, इसी की तर्ज पर राजस्थान रॉयल्स ‘आरआर टीवी’ लांच करेगा।

‘एंगेज स्पोर्ट्स मीडिया’ के साथ साझेदारी में लांच हुए इस चैनल में प्रशंसकों को विशेष मूल कार्यक्रम देखने को मिलेंगे। इसकी शुरुआत इंडियन प्रीमियर लीग 2013 से पहले कर दी गई थी और इसकी तैयारी के लिए कप्तान राहुल द्रविड़ और रॉयल्स टीम के ‘बिहाइंड द सीन’ जुटाने शुरू कर दिए थे।

‘आरआर टीवी’ में टीम के रोज के ऑनलाइन वीडियो क्लिप्स शामिल किए जाएंगे। इसमें मौजूदा और बीते सत्र के कई टीवी शो दिखाए जाएंगे। इसे रॉयल्स की वेबसाइट और सोशल वेटवर्किंग साइट जैसे फैन जोन, यू-ट्यूब, फेसबुक और ट्विटर के अलावा ऑनलाइन प्रकाशक, समाचार और खेल की वेबसाइटों, रेडियो, मोबाइल और टीवी नेटवर्क, उप-महाद्वीप और चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों तक पहुंचाया जाएगा। (भाषा)

महाराष्‍ट्र में नहीं रूक रहा मीडिया पर हमला, बीड़ में एक और पत्रकार को पीटा गया

महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर हो रहे हमले रूकने का नाम नही ले रहे हैं. कल बुधवार को बीड जिले के तालखेड में एक और पत्रकार पीटा गया. बीड से प्रसिध्द होने वाले दैनिक झुंजार नेता के रिपोर्टर अरविंद वाव्हल इस हमले मे बुरी तरह से घायल हो गये. उनके सिर और हाथ पर चोट आय़ी है. ग्राम पंचायत चुनाव में विरोध में खबरें देने का आरोप लगाकर भूतपूर्व सरपंच ने यह हमला किया है. इस वारदात की एफआईआर माजलगांव पुलिस में दे दी गई है.

माजलगांव तहसील में पिछले एक महीने में पत्रकारों के उपर होने वाला यह तीसरा हमला है. राज्य में पिछले छह महीने में 39 पत्रकारों के उपर हमले हुये हैं. राज्य में हर दो दिन में एक पत्रकार पीटा जा रहा है. महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके में ज्‍यादा हमले हो रहे हैं. जैसे जैसे चुनाव नजदीक आयेंगे वैसे वैसे पत्रकारों के उपर होन वाले हमले में बढ़ोतरी होने की आशंका मराठी पत्रकार परिषद के कार्याध्यक्ष किरण नाईक ने जताई है.

इसी लिए चुनाव के पहले पत्रकार सुरक्षा कानून लाने की मांग राज्य में पत्रकार कर रहे हैं. 8 मई को जब पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति ने मुख्यमंत्री के सरकारी निवास वर्षा पर मोर्चा निकाला था तब समिति के प्रतिनिधिमंडल के साथ चर्चा करते वख्त मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कानून का बिल कैबिनेट के सामने लाने का वादा किया था. लेकिन उसके बाद कैबिनेट की पांच मीटिंग्‍स हो गयी लेकिन अभी तक यह बिल कैबिनेट के सामने नहीं लाया गया. इससे नाराज समिति 15 जुलाई से शुरू हो रहे विधानमंडल के अधिवेशन के दौरान राज्य में आंदोलन करने का निर्णय ले सकती है. समिती की बैठक अगले सप्‍ताह मुंबई में हो रही है. पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति ने तालखेड़ के पत्रकार के उपर हुए हमले की निंदा की है.

यूके आपदा : 50 करोड़ में मैनेज हुआ नेशनल मीडिया, कई पत्रकारों को अलग से राहत!

उत्‍तराखण्‍ड की आपदा की गूंज पूरे देश तथा विदेश में है तथा इसके लिए उत्‍तराखण्‍ड का आपदा प्रबन्‍धन मंत्रालय तथा चार धाम यात्रा समिति व मुख्‍यमंत्री की आलोचना पूरे देश में हो रही है, उत्‍तराखण्‍ड की आपदा का विपरीत असर कांग्रेस पर पड़ना तय माना जा रहा है, वहीं मुख्‍यमंत्री को अपनी कुर्सी सलामत रहने की चिंता सताने लगी है, इसके लिए नेशनल मीडिया को मैनेज किये जाने का खेल शुरू किया गया.

आपदा के लोग को राहत मिले या न मिले, इससे कोई फर्क नहीं पडता, परन्‍तु नेशनल मीडिया को काबू में किया जाना जरूरी था. दिल्‍ली से छन कर आ रही जनचर्चा के अनुसार इसके लिए भारी बजट व्‍यय किया गया. 50 सीआर में नेशनल मीडिया मैनेज किये जाने की चर्चा है, जिसमें 2 सीआर चैनलों को दिये गये, जिसमें 5 प्रमुख हैं. वहीं एक चैनल के तेजतर्रार सम्‍पादक को व्‍यक्तिगत अलग से दिया गया. इसके बाद स्‍थानीय स्‍तर पर अलग से मैनेज किया गया और इनके मौजमस्‍ती के लिए हेलीकाप्‍टर का इंतजाम अलग से हुआ.

इसके बाद चैनलों का रूख ही बदल गया, भयावहता को कम किये जाने लगा तथा चैनलों ने अपने रिपोर्टरों को गांवों की सड़कों की ओर भेज दिया तथा जहां नुकसान कम हुआ है. उस ओर रूख मोड दिया, जहां आनन फानन में मदद पहुंचायी गयी, यानि नैशनल मीडिया राहत पैकेज पाकर डिफेंस में आ गया. इसका एक उदाहरण तब सामने आया जब कांग्रेसी विचारधारा के माने जाने वाले एक हिंदी न्‍यूज चैनल डिबेट में राहुल गॉधी की उत्‍तराखण्‍ड यात्रा पर एक बड़े पत्रकार उनके डिफेंस में नजर आये. इस चैनल के प्रमुख एडिटर ने अपने तेज तर्रार स्‍वभाव से अलग पहचान बनायी है. इसी से भयभीत विजय बहुगुणा के मीडिया मैनेजमेंन्‍ट ने इनको अलग से राहत दिये जाने की चर्चा दिल्‍ली में है.

दिल्‍ली से देहरादून पहुंची जनचर्चा के अनुसार कांग्रेस हाईकमान का गंभीर रूख देखते हुए सकते में आयी विजय बहुगुणा सरकार ने पूरा जोर नेशनल मीडिया को मैनेज करने पर लगा दिया. इसमें 50 सीआर का बजट खर्च किये जाने की चर्चा है. इसके बाद नैशनल मीडिया का रूख ही डिफेंस वाला हो गया. सत्‍य छुपाओ, मिशन शुरू हो गया. लाशों की घाटी में हेलीकाप्‍टर से उड़ते चैनलों के प्रतिनिधि देवभूमि में आकर कुछ दूसरा ही खेल खेलने लगे. चैनलों में डिबेट शुरू करा दी गयी. भयावह वाले स्‍थानों को कैमरों की नजरों से ओझल रखा जाने लगा है. अनगिनत उतराखंड के निवासियों का भी अब तक न तो पता चला है और न ही कोई उनकी भी सुध ले रहा है. यह मुददा चैनल दबाने व छुपाने में लगे हैं क्‍योंकि वह मैनेज हो चुके हैं. अब उनको लाशों से क्‍या मिलेगा?

केदार वैली के 101 गांवों का अता पता नहीं है तो बदरीनाथ क्षेत्र के भी कई गांवों तक का पता नहीं है, परन्‍तु यह न्‍यूज टीवी चैनलों से गायब है. अनगिनत उतराखंड के निवासियों का भी अब तक न तो पता चला है और न ही कोई उनकी भी सुध ले रहा है. कर्णप्रयाग से नारायण बगड़, देवाल, थराली और गवालदम तक की कहानी एक जैसी है. हर कस्बे और गांवों में रहने वाले लोग प्राकृतिक आपदा की मार से पीड़ित हैं. अलकनंदा, पिंडर और मंदाकिनी नदियों के किनारे बसे गांवों में मकान मलबे के ढेर में बदल गए हैं. अब इन गांवों को फिर से बसाना एक बड़ी चुनौती है. श्रीनगर में अलकनंदा ने तबाही मचाई. उत्तराखंड की हर नदी तबाही मचा रही थी. मंदाकिनी नदी ने केदारघाटी में और अलकनंदा नदी ने बदरीनाथ से श्रीनगर और उससे आगे तक भारी तबाही मचाई. परन्‍तु चैनल इस तरह की कोई भी फुटेज या खबर दिखाने से गुरेज कर रहे हैं.

जिससे कुपित होकर कुदरत ने रौद्र रूप अपनाया था, वही कार्य अब नेशनल मीडिया करने लगा है. वहीं दूसरी ओर फेसबुक में विनय उनियाल का कमेन्‍ट आया है कि आज प्रात: आपदा पीडित लोगों के परिजनों का धैर्य भी जवाब दे गया. सुबह सुबह एक पत्रकार की जमकर धुनाई कर डाली और एक वाहन आग के हवाले कर दिया. (कानाफूसी)

देहरादून से चन्‍द्रशेखर जोशी की एक्‍सक्‍लूसिव रिपोर्ट.

क्‍या उत्‍तराखंड में सही थी टीवी न्‍यूज चैनलों की रिपोर्टिंग?

अपनी मशहूर पुस्तक “पावर्टी एंड फेमिंस” (गरीबी और दुर्भिक्ष) में विश्व के प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने लिखा था “क्रियाशील प्रजातंत्र में दुर्भिक्ष (अनाज ना मिलने से होने वाली भूखमरी) नहीं हो सकता”। उनका मानना था कि क्रियाशील प्रजातंत्र में मीडिया सक्रिय भूमिका निभाती है। ऐसे में मीडिया की रिपोर्टिंग से पैदा हुए जनमत का दबाव इतना अधिक होता है कि तत्कालीन सरकार मजबूर हो जाती है, अनाज को तत्काल किसी भी तरह से संकट में आये क्षेत्र में पहुंचाने के लिए, भले हीं उसके लिए उसे कुछ भी उपक्रम करना पड़े। 

सेन का मानना था कि सन १९४२ में आये बंगाल दुर्भिक्ष में करीब २० लाख लोग मौत के मुंह में समा गए, यह अँगरेज़ सरकार की गलत नीति और जनता के प्रति उदासीनता की वजह से हुआ। सेन ने यह सिद्ध किया कि उस समय भी सरकार के गोदामों में काफी अनाज था जो कि बंगाल के गांवों में भेजा जा सकता था।

उत्तराखंड में आये प्रलय का कारण सीधे तौर पर दिखने वाली प्राकृतिक आपदा हो या परोक्ष रूप से मानव की अदूरदर्शिता- या लोलुपता-जनित कुप्रभाव, एक बात साफ़ है कि शुरू के दो दिन तक सरकार वह तत्परता नहीं दिखा पायी जो बाद के दिनों में देखने में आया। यह भी उतना हीं सत्य है कि मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस तरह से दिन रात इस विभीषिका को दिखाया उससे ना केवल राज्य सरकार बल्कि दिल्ली में बैठे शासक भी चौंक गए। पूरे भारत में इसे लेकर एक बेचैनी सी पैदा हुई। यही होती है मीडिया की भूमिका, शायद इस पैरामीटर पर मीडिया पूरी तरह खरा उतरा।

लेकिन कवरेज को लेकर कुछ मुद्दे जरूर उठे। खासकर इस बात को लेकर कि इतने गंभीर मुद्दे पर भी मीडिया की सेंसिटिविटी कहीं स्तरीय नहीं थी। हर चैनल यह कहता पाया गया कि सबसे पहले उसने केदारनाथ की तस्वीर दिखाई या रिपोर्टर इस की कवरेज में शब्दों के चयन में उतने सतर्क नहीं थे जितना अपेक्षित था। एक आम शिकायत यह थी कि शुरू में हेलीकॉप्टरों से कुछ रिपोर्टर और कैमरामैन अपने चैनलों के प्रभाव का इस्तेमाल करके आपदाग्रस्त दुर्गम इलाकों में पहुंचे जब कि उन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल इमदाद पहुंचाने में होना चाहिए था। दरअसल परम्परागत रिपोर्टिंग में जगह पर पहुंचना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए पहली शर्त होती रही है, लिहाज़ा रिपोर्टिंग टीम हर संभव प्रयास करती है स्पॉट पर पहुँचने के लिए।

इन रिपोर्टरों में अधिकांश उन हेलीकॉप्टरों से गए जिन पर नेता तथाकथित स्थिति का जायजा लेने के लिए उड़ान भर रहे थे। चूंकि ना तो नेता को स्थिति की भयावहता मालूम थी ना ही रिपोर्टरों को लिहाज़ा शुरू के दौर में यह क्षम्य हो सकता है क्योंकि वस्तुस्थिति से दुनिया को वाकिफ करना मीडिया का पहला कर्तव्य था। लेकिन बाद में जब यह स्पष्ट हो गया कि सबसे बड़ी ज़रूरत पीड़ितों की जान बचाना था, उसके बाद होड़ में आये मीडिया का इस बात पर जोर देना कि कुछ चैनल अगर दुर्गम स्थानों पर पहुंचाए गए हैं तो “हम क्यों नहीं” यह इसी मानसिकता का परिचायक था जिसके तहत चैनल यह भी कह रहे थे कि “हम सबसे पहले तस्वीरें दिखा रहे हैं”। होड़ जब सार्थक ना होकर गैरजिम्मेदाराना होने लगती है तब अच्छे प्रयास भी बेमानी हो जाते हैं।

एक अन्य उदाहरण लें। एक रिपोर्टर अवसाद में बैठे पीड़ितों के एक समूह के पास जा कर पूछता है “यहाँ क्या आप में से किसी का कोई सगा-सम्बन्धी भी मरा है“। टीवी चैनल देखने वालों को यह लगा कि अगला सवाल कहीं यह ना हो “क्या आप लोगों में से किसी का सगा-सम्बन्धी कुछ देर में मरने वाला तो नहीं है”। अगर हम एक तरफ सरकार को दोष दे रहे हैं कि आपातकाल से निपटने के लिए डिजास्टर प्रबंधन में लगी सरकारी एजेंसियों के पास कोई “एस ओ पी” (स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) नहीं था तो शायद मीडिया के लीडरों (संपादकों) को यह देखना होगा कि क्या उन्होंने अपने फील्ड स्टाफ (रिपोर्टिंग टीम) के लिए कोई एस ओ पी बनाई थी?

क्या यह सच नहीं है कि पीड़ितों को देखते ही टूट पड़ने वाले रिपोर्टरों को बताना होगा कि नुमाइश लगा कर “पहले हम” के भाव का सर्वथा परित्याग करते हुए एक संजीदगी के साथ पीड़ितों से बात की जाये। एक साथ दर्जनों कैमरे देखकर पीड़ित कई बार कुछ ऐसा कह देता है जो पूरे प्रयास को बाधित कर सकता है। मसलन पूरे देश से आये तीर्थ-यात्री फंसे हैं। ऐसे में यह बताना कि “अमुक जगह स्थानीय लोगों ने पीड़ितों को लूटा है, उनमें से कुछ जिन्दा लेकिन अशक्त लोगों को लूट कर खाई में फेंक दिया गया”, पूरे देश में उत्तराखंड के लोगों को लिए एक बड़ा ख़तरा पैदा कर सकता था। दरअसल कोई भी ऐसी रिपोर्टिंग जिससे कहीं भावनात्मक द्वेष पैदा होने का खतरा हो आपेक्षित नहीं है। हाँ, यह बात सारे रिपोर्टर सरकार या पुलिस को बता सकते हैं। सरकार या पुलिस को भी यह डर रहेगा कि अगर त्वरित कार्रवाई नहीं की गयी तो मीडिया इसे उजागर भी कर सकती है यह बताते हुए कि सरकार या पुलिस के संज्ञान में यह बात पहले लाई गयी थी।       

सबसे अधिक आरोप मीडिया पर उस समय लगे जब एक चैनल के रिपोर्टर ने एक पीड़ित बालक के कंधे पर बैठ कर पी-टू-सी (कैमरे की तरफ मुखातिब हो कर सूरते हाल बयां करने की विधा) किया। स्पष्ट है कि पीड़ित बालक के कंधे पर बैठना ना तो कोई सन्देश के लिए था नहीं किसी तरह भी नैतिक था। रिपोर्टर का व्यवहार पत्रकारिता के हर मानदंड के विपरीत हीं नहीं था, शर्मनाक भी था। शायद फील्ड स्टाफ को अभी ना केवल और प्रोफेशनल ट्रेनिंग की ज़रूरत है बल्कि उन्हें मानवीय मूल्यों से भी दो-चार करने की दरकार है।

तमाम एडिटरों ने स्वतः ही इन गलतियों को संज्ञान में लिया। संपादकों की सर्वोच्च संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बी ई ए) ने फैसला लिया कि भविष्य में ऐसी स्थिति ना बने इसके लिए कवरेज के सभी आयामों को लेकर एक एस ओ पी बनाया जाये और ना केवल फील्ड स्टाफ को बल्कि डेस्क को भी इन स्थितियों को लेकर अधिक सेंसिटिव बनाया जाये। बी ई ए ने इसके लिए कमर वहीद नकवी (पूर्व न्यूज डायरेक्टर आज तक) की अध्यक्षता में एक पांच –सदस्यीय समिति गठित की है जिसमें अर्नब गोस्वामी (एडीटर-इन-चीफ टाइम्स नाउ), विनोद कापड़ी (मैनेजिंग एडिटर इंडिया टीवी), सुप्रिया प्रसाद (मैनेजिंग एडिटर आज तक) एवं विनय तिवारी (मैनेजिंग एडिटर सीएनएन-आईबीएन) सदस्य है। इस समिति की एक बैठक हाल ही में संपन्न हुई है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

राष्‍ट्रीय सहारा ने मकान मालिक को नहीं दिया किराया, तालाबंदी की चेतावनी

राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस यूनिट जुड़े चंदौली जिले के मुगलसराय कार्यालय से खबर है कि पांच महीने का किराया बकाया होने पर मकान मालिक ने तालाबंदी करने की चेतावनी दी है. उन्‍होंने प्रबंधन को फैक्‍स भेजकर चेताया है कि 24 घंटे में अगर पांच महीने के बकाया पैसे का भुगतान नहीं किया गया तो वे ताला बंद करने के लिए मजबूर होंगे. बताया जा रहा है कि भागवत नारायण चौरसिया के मकान में लंबे समय से राष्‍ट्रीय सहारा का कार्यालय है.

पिछले पांच महीने से उन्‍हें मकान का किराया नहीं मिला है. कई बार उन्‍होंने प्रबंधन से गुहार लगाई परन्‍तु अब तक बात नहीं बन पाई है, जिसके बाद उन्‍होंने फैक्‍स भेजकर तालाबंदी की चेतावनी दी है.

मैंने खुशी खुशी टीवी100 से इस्‍तीफा दिया है : गौरव गुप्‍ता

यशवंत जी प्रणाम, हां ये सच है कि मैंने जैन टीवी में अपनी नई पारी का आगाज किया है. यहां मुझे कुमाऊं की पूरी कमान दी गई है और पूरे अधिकार दिए गए हैं, लेकिन जैसा कि भड़ास पर भेजे गए किसी पत्रकार के पत्र में बताया गया है उसमें कई तथ्‍य सही नहीं हैं. हां ये भी सच है कि पिछले कई सालों में बहुत से रिपोर्टर ने टीवी100 छोड़ दिया.

लेकिन जहां तक मेरी बात है मैंने किसी तरह के मनमाने रवैये के कारण चैनल नहीं छोड़ा है. खुशी-खुशी जैन टीवी में अपने गुरु जे थामस सर और दिलीप सर के साथ काम करने का मन था, जो पूरा करने के लिए मैंने टीवी100 से इस्‍तीफा दिया है.
     
मैं टीवी100 में किसी रिपोर्टर या ब्‍यूरोचीफ की तरह काम नहीं किया बल्कि टीवी100 में एसके गुप्‍ता जी और श्री कुलीन गुप्‍ता जी ने मुझे अपने बच्‍चे जैसा माहौल दिया और अभी भी जैन में जाने पर खुशी खुशी विदा किया. भड़ास पर इस सच को स्‍वीकारने में मुझे जरा भी संकोच नहीं है कि उत्‍तराखंड में मैं आज जो कुछ भी हूं तो सिर्फ टीवी100 और एसके गुप्‍ता जी और कुलीन गुप्‍ता जी के कारण.       
     
हां, पिछले सात साल उत्‍तराखंड में टीवी100 के साथ काम करते हुए कब बीते पता ही नहीं चला. अब यशवंत जी आपका आशीर्वाद रहा तो जैन टीवी में भी अच्‍छा काम करूंगा ऐसी मेरी कोशिश होगी. हां, पर आपके माध्‍यम से मैं कहना चाहता हूं कि टीवी100 में मैं उन सभी का आभारी हूं जिन जिन के साथ काम करते हुए मैं सीखा है. और अपनी नई पारी जैन टीवी में शुरू की है. जैन टीवी में मुझे मेरे गुरु जे थामस सर लाए हैं. और जे थामस सर ने ही मुझे अक्‍टूबर 2006 में टीवी100 ज्‍वाइन कराया था. कोशिश करूंगा कि मैं थामस सर के भरोसे पर खरा उतर सकूं.

आपका छोटा भाई

गौरव गुप्‍ता

जैन टीवी
कुमाऊं

मूल खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें – धीरे-धीरे टूट रही है टीवी100 की टीम, जिम्‍मेदार कौन?

अपराधियों की सूचना देने वाले पत्रकार को सिपाही ने बंधक बनाकर धमकाया, मामला दर्ज

लखनऊ : क्या आप पुलिस की मदद करना चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि आपके क्षेत्र में रह रहे संदिग्ध लोगों से पुलिस पूछताछ करे?  यदि आप देश और समाज के दुश्मनों के बारे में कुछ जानते हैं और उसे पुलिस को बता कर किसी अप्रिय घटना को घटने से पहले पुलिस को होशियार करना चाहते हैं तो आप को भी बहुत होशियारी से काम लेना होगा. कहीं ऐसा न हो कि अराजक तत्वों से सांठ गांठ रखने वाले कुछ पुलिस कर्मी आप को ही निशाना बनाने का प्रयास न कर दें. यही सच है जो अपराधियों की सूचना देने वाले एक पत्रकार के सामने आया. 

समाज की चिंता करने वाले एक पत्रकार ने सीओ को फ़ोन कर बताया कि गुलमर्ग होटल के पास कुछ संदिग्ध लोगों के आने की खबर उसके पास आई है. आप इसे चेक करा लीजिये. पत्रकार अपना फ़र्ज़ निभाकर बेफिक्र हो गया, लेकिन अपराधियों के मददगार सिपाही ने उस पत्रकार को बहाने से बुलाया और लक्ज़री कार में बैठा कर अपने साथियों की मदद से उसे न सिर्फ डराया बल्कि रिवाल्वर लगा कर जान से मारने की धमकी भी दी और दो घंटे तक कर में शहर में घुमाने के बाद उसे अमीनाबाद में लाकर छोड़ दिया.

सिपाही के चंगुल से आजाद हुए पत्रकार विजय चावला ने एसएसपी से मुलाक़ात कर उन्हें पूरी जानकारी से अवगत कराया तो उन्होंने सीओ कैसरबाग को जाँच के आदेश दिए. जाँच के बाद सिपाही पृथ्वीराज और एक अन्य साथी के खिलाफ अमीनाबाद कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया गया है. मारवाड़ी गली अमीनाबाद में अपने परिवार के साथ रहने वाले पत्रकार विजय चावला ने बताया कि 20 जून को किसी ने उनके मोबाइल पर फ़ोन कर बताया कि अमीनाबाद में गुलमर्ग होटल के करीब एक घर में कुछ संदिग्ध लोग रुके हैं आप पुलिस को बता दीजिये. विजय के मुताबिक उन्होंने अपना फ़र्ज़ समझते हुए सीओ कैसरबाग हृदेश कठेरिया को इस जानकारी से अवगत करा दिया.  

विजय के मुताबिक मंगलवार की दोपहर पृथ्वीराज नाम के सिपाही ने उन्हें फ़ोन करके अमीनाबाद बुलाया और वहां खड़ी सफ़ेद रंग की एक लक्ज़री कार में बैठाया. कार में पहले से ड्राईवर के अलावा दो लोग और सवार थे. कार सवार लोगों ने उनकी कनपटी पर रिवाल्वर लगा दी और कहा कि तुम ने सीओ को क्या बताया था. विजय चावला ने अपनी जान बचाने के लिए वो सब उन लोगों को बताया जो उन्होंने सीओ कैसरबाग को बताया था. विजय के मुताबिक कार में सवार सिपाही और दूसरे लोगों ने उन्हें लगभग दो घंटे तक कार में बैठा कर खूब डराया. फिर महानगर के एक रेस्टोरेंट में ले जाकर नाश्ता कराया और अमीनाबाद लाकर वार्निंग देने के बाद कार से उतर दिया.

डरे सहमे विजय चावला ने एसएसपी से मिलकर सिपाही की करतूत से अवगत कराया तो उन्होंने जाँच का आदेश दिया. विजय चावला की तहरीर पर सिपाही व उसके साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. अब देखना है कि समाज की चिंता कर पुलिस की मदद करने वाले पत्रकार विजय चावला को न्याय मिलता है या नहीं.

एचटी, जयपुर के संपादक बने हिमाचल प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन के चेयरमैन

हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, जयपुर के एडिटर केएस तोमर को हिमाचल प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन का चेयरमैन नियुक्‍त किया गया है. केएस तोमर लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी नियुक्ति की जानकारी सरकार की तरफ से दी गई है.

KS Tomar appointed HPPSC chairman

Himachal Pradesh government on Wednesday appointed KS Tomar as the chairman of the Himachal Pradesh Public Service Commission (HPPSC). At present, Tomar is a senior associate editor with Hindustan Times in Jaipur. The state government appointed Tomar under Article 316 of the Constitution.

Tomar (58) has been appointed for a six-year tenure from the date on which he joins office or until he attains the age of 62 years, whichever is earlier. He hails from Toron village in Paonta Sahib sub-division of Himachal. Tomar started his career as a journalist from a weekly in Shimla and later joined the Hindustan Times. Tomar has also worked in Kathmandu. (एचटी)

उत्तराखंड से बर्बादी की रिपोर्ट (1) : श्रीनगर जल विद्युत परियोजना हुई तबाह

अलकनन्दा नदी में आयी विनाशकारी बाढ़ ने श्रीनगर में भी अपना तांडव दिखाया। नगर के एक बड़े हिस्से को पूरी तरह से बरबाद कर दिया। बाढ़ ने एसएसबी अकादमी का परिसर, आईटीआई परिसर बुरी तरह तबाह हो गया। 70 आवासीय भवनों में रहने वाले सौ से अधिक परिवार बेघर हो गये हैं। इन मकानों में दस से बारह फीट तक मिट्टी भर गयी है। घर का कोई भी सामान काम का नहीं रह गया है। 1970 में बेलाकूची की बाढ़़ की रिर्पोटिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार डा. उमाशंकर थपलियाल का कहना है कि उस समय भी श्रीनगर में अलकनंदा नदी में लगभग इतना ही उफान था लेकिन तबाही इतनी नहीं हुई थी।

श्रीनगर में मची भीषण तबाही के लिए निर्माणाधीन श्रीनगर जल विद्युत परियोजना जिम्मेदार है। परियोजना का निर्माण करवा रही जीवीके कंपनी ने डैम साइट कोटेश्वर से किलकिलेश्वर तक नदी किनारे लाखों ट्रक मिट्टी डंप की। इस कारण इस क्षेत्र में नदी की चौड़ाई कम हो गयी। गत 16 एवं 17 जून को आयी बाढ़ ने इस मिट्टी को काटना शुरू किया। जिससे नदी के जलस्तर में दो मीटर तक की बढ़ोतरी हो गयी। सीमा सुरक्षा बल के परिसर में जहां बाढ़ ने तांडव मचाया वहां श्रीयंत्र टापू से नदी अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर न आकार में बहती है, और उससे आगे नदी की चैड़ाई अचानक कम हो जाती है। इस कारण उस दिन जब बाढ़ के साथ श्रीनगर परियोजना की मिट्टी आयी तो वह उतनी मात्रा में आगे नहीं जा पायी जितनी की बाढ़ प्रभावित क्षेत्र तक आयी थी। फलस्वरूप पानी के साथ आयी यह मिट्टी एसएसबी, आईटीआई तथा शक्ति विहार क्षेत्र में जमा होने लगी। क्षेत्र से जब बाढ़ का पानी उतरा तो लोगों के होश उड़ गये। इस क्षेत्र के 70 आवासीय भवन एसएसबी अकादमी का आधा क्षेत्र, आईटीआई, खाद्य गोदाम, गैस गोदाम, रेशम फार्म में 12 फीट तक मिट्टी जमा हो गयी। कई आवासीय भवन तो छत तक मिट्टी में समा गये हैं। इन घरों में रहने वाले लोगों की जीवन भर की पूंजी जमींदोज हो गयी।

एक प्रभावित विनोद उनियाल का कहना है कि इस बाढ़ में उनके घर के अंदर कमरों में आठ फीट तक मिट्टी जमा हो गयी है। जीवन भर की कमाई का सारा सामान बर्बाद हो चुका है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि जीवन अब कैसे चलेगा। शक्ति विहार मोहल्ले में किराना की दुकान से आजीविका चलाने वाले संतोष चन्द्र नौटियाल पर तो इस आपदा की दोहरी मार पड़ी है। मकान के साथ साथ इनकी दुकान का सारा सामान मलबे में दफन हो गया है। जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा हो गया है। एससबी अकादमी के निदेशक एस. बंदोपाध्याय की माने तो अकेले अकादमी को लगभग सौ करोड़ का नुकसान हुआ है। इस हिसाब से देखा जाय तो श्रीनगर क्षेत्र में कुल नुकसान का आंकड़ा तीन सौ करोड़ तक जा सकता है।

इसके अलावा देवप्रयाग में भी जलविद्युत परियोजनाओं की मिट्टी से कई सरकारी एवं आवसीय भवन अटे पड़े हैं। श्रीनगर जल विद्युत परियोजना द्वारा नदी किनारे अवैध रूप डंप की गयी मिट्टी अब गायब है। और नदी क्षेत्र पूर्व की तरह दिखायी देने लगा है। श्रीकोट में इस तरह की तबाही नहीं हुई वहां भी नदी किनारे बहुत से मकान हैं। दरअसल श्रीकोट के कुछ आगे चैरास झूला पुल से किलकिलेश्वर तक परियोजना की ज्यादातर मिट्टी डंप की गयी थी। इस कारण श्रीकोट इस तबाही से बच गया। भू-वैज्ञानिक डा. एसपी सती का कहना है कि उत्तराखंड में बाढ़ से हुई तबाही मे यहां बन रही जल विद्युत परियोजनाओं का बहुत बड़ा हाथ है। श्रीनगर जल विद्युत परियोजना की पांच लाख घनमीटर मिट्टी अलकनंदा के किनारे डंप की गयी। जब नदी में बाढ़ आयी तो उससे तेजी से यह मिट्टी पानी के संपर्क में आयी और इससे नदी का आकार एकाएक बढ़ गया। क्यों कि यह मिट्टी श्रीनगर के ठीक सामने थी इसलिए यह बाढ़ के कारण श्रीनगर के निचले इलाकों में जमा हो गयी और तबाही का कारण बनी।

देवप्रयाग से लगभग 30 किलोमीटर, अलकनंदागंगा पर बनी 330 मेगावाट की यह परियोजना तमाम पर्यावरणीय शर्तों को दरकिनार करके र्सिफ और र्सिफ राजनैतिक दवाब के कारण आगे बढ़ाई गई है। इसकी जानकारी हम दे सकते है।

श्रीनगर से सीताराम बहुगुणा की रिपोर्ट.

खंडित होता हमारा लोकतंत्र

: 26 जून को इमरजेंसी पर विशेष : 26 जून 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल लागू किया गया था। उसके 38 साल बीत गये। तब से गंगा व गोमती में बहुत पानी बह चुका है। देश और दुनिया में बड़े बदलाव आये हैं। पर आज जब भी भारतीय लोकतंत्र की चर्चा होती है इमरजेंसी के दौर को काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है।

1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्‍ता में आईं। आते ही मीसा जैसा कानून बनाया जिसका उद्देश्य ही राजनीतिक विरोध का दमन करना था। इंदिरा गांधी कंग्रेस का पर्याय बनकर ही नहीं उभरी बल्कि ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ के नारे के तहत वे देश का पर्याय बना दी गई। इसकी परिणति 26 जून 1975 को देश के ऊपर इमरजेंसी लगाने की घोषणा के रूप में हुई।

इमरजेंसी के दौरान अनेक राजनीतिक संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संगठन बनाने के अधिकार को छीन लिया गया। प्रेस की आजादी समाप्त कर दी गई। सरकार विरोधी विचारधारा रखने वाले असंख्य लोगों को बिना मुकदमा चलाए जेलों में डाल दिया गया। संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत सभी मौलिक अधिकारों को रद्द कर दिया गया। मीसा और डी आई आर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। करीब 34,630 लोगों को मीसा के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया। मीसा के आपातकालीन प्रवधानों के तहत सरकार को यह विशेषाधिकार प्राप्त था कि वह बिना कारण बताए अपने राजनीतिक विरोधियों को हिरासत में रख सकती थीं। इमरजेंसी के दौरान हजारों लोगों को डी आई आर में नजरबंद किया गया।

इमरजेंसी कोई अकेली घटना नहीं है जिसने हमारे लोकतंत्र को लहुलूहान किया है। ऐसी बहुत सी घटनाएं इस आजाद भारत में हुई हैं जिनमें हम इमरजेंसी की छवियां देख सकते हैं। आज भी हमारी सरकार के पास ऐसे दमनकारी कानूनों का पूरा तोपखाना है जहां से जनता की स्वतंत्रता और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर गोलाबारी की जाती है, विरोध की आवाज को दबा दिया जाता है। यह देश के अन्दर अघोषित तौर पर इमरजेंसी की हालत है। इन्हें काले कानूनों के रूप में जाना जाता है। ये कानून अंग्रेजों के द्वारा बनाये गये रोलट एक्ट जैसे कानून की याद दिलाते हैं। आज भी देश के बड़े हिस्से में विशेष सशस्त्र बल कानून (आफ्सपा) लागू है। यह कानून हमें न सिर्फ इमरजेंसी के दौर की याद को ताजा करता हैं बल्कि भारतीय संविधान और लोकतंत्र के खण्डित चेहरे से भीं रू ब रू कराता है।

हमारी संसद ने नये नये दमनकारी कानून बनाये हैं या पहले के कानूनों में यह तर्क देते हुए संशोधन किये हैं कि चूंकि परिस्थितियां असामान्य हो चुकी हैं और इन आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए मौजूदा कानून अपर्याप्त हैं, ऐसे में स्थितियों को नियंत्रित करने, उन्हें सामान्य व शंतिपूर्ण बनाने के लिए सुरक्षाबलों को असाधारण कानूनों के कवर की जरूरत है। इन कानूनों को बनाने के पीछे जो बड़ा कारण सरकार की ओर से दिया गया है, वह है देश के अन्दर बढ़ रही आतंकवादी व माओवादी गतिविधियां हैं। ये राष्ट्रीय अखण्डता व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। वैसे इस संबंध में सरकार की नीतियों व दृष्टिकोण पर अलग से विचार की जरूरत है फिर भी तथ्य यही बताते हैं कि इन कानूनों से आतंकवादी व माओवादी गतिविधियां तो नियंत्रित नहीं हुई, बेशक इन कानूनों के माध्यम से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लोकतांत्रिक आंदोलनों व संगठनों को दमन का शिकार बनाया गया। चाहे विनायक सेन हो या सीमा आजाद या अभी हाल में कबीर कला मंच के कलाकार शतल साठे व सचिन माली ऐसे ही कानूनों के शिकार बनाये गये।

सच्चाई यह है कि भारतीय राज्य सुरक्षाबलों को ऐसे कानूनी अधिकारों से लैस कर दिया है ताकि वे बे रोक टोक कार्रवाई कर सके और उनके अमानवीय कृत्य के लिए उनके विरूद्ध कोई कार्रवाई न हो सके। ‘आफ्सपा’ के प्रावधानों के तहत सेना व अर्द्धसैनिक बलों को ऐसा ही विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकता है, किसी को गिरफ्तार कर सकता है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकता है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से बचाता है जब तक कि केन्द्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुँच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है। इन राज्यों में लोकतंत्र सीमित हुआ है, जन आन्दोलनों को दमन का सामना करना पड़ा है तथा सामान्य विरोध को भी विद्रोह के रूप में देखा गया है।

गौरतलब है कि जिन समस्याओं से निबटने के लिए सरकार द्वारा ‘आफ्सपा’ लागू किया गया, देखने मे यही आया है कि उन राज्यों में इससे समस्याएँ तो हल नहीं हुई, बेशक उनका विस्तार जरूर हुआ है। पूर्वोतर राज्यों से लेकर कश्मीर, जहाँ यह कानून पिछले कई दशकों से लागू है, की कहानी यही सच्चाई बयान कर रही है। 1956 में नगा विद्रोहियों से निबटने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा पहली बार सेना भेजी गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में बयान दिया था कि सेना का इस्तेमाल अस्थाई है तथा छ महीने के अन्दर सेना वहाँ से वापस बुला ली जायेगी। पर वास्तविकता इसके ठीक उलट है। सेना समूचे पूर्वोत्‍तर भारत के चप्पे.चप्पे में पहुँच गई। 1958 में ‘आफ्सपा’ लागू हुआ और 1972 में पूरे पूर्वोत्‍तर राज्यों में इसका विस्तार कर दिया गया। 1990 में जम्मू और कश्मीर भी इस कानून के दायरे में आ गया। आज हालत यह है कि देश के छठे या 16 प्रतिशत हिस्से में यह कानून लागू है।

लोकतांत्रिक और मानवाधिकार संगठनों ने जो तथ्य पेश किये हैं, उनके अनुसार जिन प्रदेशों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ है, राज्य का चरित्र ज्यादा दमनकारी होता गया है, जनता का सरकार और व्यवस्था से अलगाव बढ़ा है तथा लोगों में विरोध व स्वतंत्रता की चेतना ने आकार लिया है। इरोम शर्मिला इसी चेतना की मुखर अभिव्यक्ति हैं जो ‘आफ्सपा’ को मणिपुर से हटाये जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। इस साल 4 नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के तेरह साल पूरे हो जायेंगे। जनरोष व आक्रोश की इससे बड़ी अभिव्यक्ति क्या हो सकती है कि असम राइफल्स के जवानों द्वारा  थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’।

हमारा देश कश्मीर से कन्याकुमार तथा कच्छ से कोहिमा तक एक है। देश संविधान से चलता है। हमारी राजनीतिक प्रणाली लोकतांत्रिक है। सवाल है कि इस सम्पूर्ण भूभाग में क्या हमारे लोकतंत्र का एक ही रूप मौजूद है ? जिन राज्यों या क्षेत्रों में ‘आफ्सपा’ लागू है क्या हमारा वही संविधान लागू होता है जो देश के अन्य हिस्सों में लागू है? डॉ0 अम्बेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के समक्ष कहा था कि भारतीय गणतंत्र के रूप में 26 जनवरी 1950 को हम अंतरविरोधों से भरपूर जिन्दगी में प्रवेश कर रहे हैं जहां हमारे पास राजनीतिक समानता व स्वतंत्रता होगी, वहीं आर्थिक व सामाजिक जीवन में यह हमारे लिए दुर्लभ रहेगा। डॉ0 अम्बेडकर की ये शंकाएं निर्मूल नहीं थीं। आर्थिक जीवन की कौन कहे, राजनीतिक समानता व स्वतंत्रता भी आजाद भारत में क्षतिग्रस्त होती रही है। भारतीय राज्य की संवेदनहीनता ही नहीं बल्कि उसका अपने लोक के साथ संवादहीनता भी बढ़ी है। डॉ0 अम्बेडकर ने संविधान को लेकर कुछ आशंकाएं जरूर जाहिर की थीं लेकिन कभी नहीं सोचा होगा कि गणतंत्र के बासठ-तिरसठ सालों में हमारा संविधान व लोकतंत्र इतना खण्डित होगा। हमारे लोकतंत्र व संविधान का चेहरा इतना दरक जाएगा।

लेखक कौशल किशोर सोशल एक्टिविस्‍ट हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

थाने के मुंशी ने पत्रकार से किया दुर्व्‍यवहार, नाराज मीडियाकर्मी एएसपी से मिले

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर स्थित विभिन्न समाचार पत्रों के मीडिया कर्मचारी बुधवार को एएसपी हमीरपुर अरविन्द चौधरी से मिले और सुजानपुर थाने के मुंशी द्वारा एक पत्रकार से किए गए दुर्व्‍यवहार के बारे अवगत करवाया। हमीरपुर के मीडिया कर्मचारी एक सम्मानीय अखबार के पत्रकार से मुंशी द्वारा सही व्यवहार न करने की घटना की कड़ी निन्दा करते हैं। वहीं मीडिया कर्मचारियों ने एएसपी अरविन्द चौधरी द्वारा इस बारे में सन्तोष जनक उत्तर न देने और सुजानपुर थाने के मुंशी के व्यवहार को सही ठहराए जाने के मामले को मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश व डीजीपी के पास उठाए जाने का निर्णय लिया है।

एसपी हमीरपुर द्वारा 25 जून को जारी क्राईम रिपोर्ट के बाद जब एक पत्रकार ने सुजानपुर थाना में फोन कर घटित घटना के बारे कुछ जानकारी हासिल करनी चाही तो मुंशी ने बेरूखी दिखाते हुए बात करने से मना कर दिया। गौरतलब है कि आज जब इस सन्दर्भ में मीडिया कर्मी श्री चौधरी से मामला उठाने के लिए गए तो उन्होंने कोई ठीक उत्तर न देकर यह जताने का प्रयास किया कि सुजानपुर पुलिस स्टेशन द्वारा किया गया व्यवहार सही था और पुलिस विभाग ने ही इस तरह के निर्देश जारी किए हैं।  

एएसपी ने यहां तक कह दिया कि थाने में तैनात कांस्टेबलों और एसएचओ को क्राईम की जानकारी नहीं होती जबकि सारे मामले थानों में ही दर्ज किए जाते हैं। मीडिया कर्मचारियों ने सारे घटनाक्रम की कड़ी निन्दा की है और मामले को मुख्यमंत्री और डीजीपी तक पहुंचाने का निर्णय लिया है। प्रतिनिघि मंडल में सुरेंद्र कटोच, डीपी गुप्ता, कपिल बस्सी, रणवीर ठाकुर, रजनीश शर्मा, राजीव चौहान और मोहिन्दर सिंह शामिल थे।

हमीरपुर से विजयेन्दर शर्मा की रिर्पोट.

पत्रकार सतीश का पशु तस्‍करी में लिप्‍त पुलिस का स्टिंग, पूरी चौकी लाइन हाजिर

23 जून की रात 12 बजे मैं मुण्डेरवा थाना क्षेत्र के खजौला चौकी के पास नेशनल हाईवे 28 पर पहुंचा। जैसे ही 12 बजकर 5 मिनट हुये खजौला चौकी के दो सिपाही एक मोटर साइकिल पर सवार होकर टोल प्लाजा की तरफ भागे। यह सारी तस्वीरें मैं गोपनीय कैमरे से कैद रहा था। कुछ ही देर बाद मैंने देखा दोनों सिपाही भैंसों से लदी एक ट्रक को रोक लिया। दोनों में से एक सिपाही ट्रक के अंदर जाकर सेटिंग में जुट गया। 10 मिनट के बाद वह सिपाही ट्रक से उतरा और अपने साथी सिपाही के साथ चौकी वापस चला गया।

इसी तरह से दर्जनों ट्रकों के साथ सिपाही की वसूली होती रही। जिस ट्रक से इन सिपाहियों ने वसूली की थी मैंने उसे अपनी टीम के साथ मिलकर पलेट नगर टोल प्लाजा पर रोका और पूछताछ की। पता चला कि सिपाहियों ने ट्रक वाले से 1500 रुपये लिये हैं। ट्रक में लदे पशुओं के बारे में पूछा तो पता चला कि ये सभी भैंस कटने के लिये ले जाई जा रही हैं। इतनी जानकारी मिलने के बाद मैंने एसपी आनन्द कुलकर्णी को फोन से सूचना दी। वह भी मौके पर पहुंच कर अपने तस्कर पुलिस कर्मियों की हकीकत को देखा। लगभग आधे घंटे तक एसपी की मौजूदगी में मैंने और मेरे साथियों ने 3 ट्रक को और इस तरह के कार्य में लिप्त पाये जाने पर जानकारी देकर उन्हें पकड़वाया।

एसपी साहब अपने सिपाहियों की हकीकत जानने के लिये चुपके से चौकी पर भी गये थे, जहां उन्हें कुछ भी सबूत नहीं मिले और वे वापस लौट गये। एसपी ने हमें इंटरव्यू में कहा कि इस मामले में जांच कर रहे हैं और कार्रवाई करेंगे। मगर अपने पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई करना उनके लिये आसान नहीं। फिर डीआईजी ने मेरे इस स्टिंग आपरेशन की फुटेज देखी और एसपी को तुरन्त चौकी के सभी पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई करने का आदेश दिया। कुछ ही देर बाद एसपी ने खजौला चौकी से सभी पुलिस कर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया।

इस स्टिंग आपरेशन की खबर करने के बाद मेरे उपर ऐसे ऐसे लोगों का दबाव था, जिसे मैं आपसे शेयर नहीं कर सकता। मगर इतना जरूर कहुंगा कि पत्रकारिता में भी कुछ बेईमान लोग हैं जो हमें ईमानदारी के रास्ते से भटकाते हैं। इस स्टिंग आपरेशन में हाईवे पर पशुओं से भरे ट्रक ने हमें कुचलने का पूरा प्रयास किया मगर कामयाब नहीं हो सका और मेरी मेहनत रंग लाई कि गलत करने वाले पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया गया।

सतीश श्रीवास्‍तव

बस्‍ती

यूपी

पत्रकारिता में एमफिल करने वाले उज्‍जवल को मिला गोल्‍ड मेडल

एक दशक तक सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे उज्‍जवल को एमफिल में गोल्‍ड मेडल प्राप्‍त हुआ है. पत्रकारिता छोड़कर वे महात्‍मा गांधी अंतराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय से एमफिल कर रहे थे. उज्‍जवल के शोध का विषय था 'स्ट्रिंगर की चुनौतियां'. उज्‍जवल ने दस साल पहले केबल चैनल से अपने पत्रकारिता की शुरुआत की थी.

वे तीन साल तक प्रभात खबर में कॉपी एडिटर और रिपोर्टर के रूप में काम किया. इसके बाद साढ़े चार साल तक आई नेक्‍स्‍ट, पटना को भी अपनी सेवाएं दीं. इसके बाद वे एमफिल करने वर्धा चले गए थे. उज्‍जवल बताते हैं कि उनके शोध कार्य में भड़ास4मीडिया का भी सहयोग रहा है. 

हिंदुस्‍तान ने छापी गलत खबर, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ने जताई आपत्ति

इलाहाबाद में हिंदुस्‍तान अखबार ने बीते 20 जून को एक खबर प्रकाशित की, जिसमें लिखा गया कि दिनांक 19 जून को भारत के राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने टेली कांफ्रेसिंग के माध्‍यम से इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के कुलपति के साथ बातचीत की तथा हाल पूछा. इस खबर के प्रकाशन के बाद यूनिवर्सिटी ने नाराजगी जताई है.

यूनिवर्सिटी के पीआरओ ने बाकायदे प्रेस विज्ञप्ति जारी करके इस खबर को आधारहीन तथा मनगढ़त बताया है. पीआरओ ने हिंदुस्‍तान छोड़कर अन्‍य अखबारों के एक विज्ञप्ति भी जारी किया है.

पीआर कंपनी से मिलकर झूठी खबर के जरिए मोदी को रैंबो बनाने वाले टीआओई के खिलाफ प्रेस काउंसिल को पत्र

Chairperson, Press Council of India: Inquire into serious violation of media ethics by Times of India, Dear Sir,  As per Times of India report (http://timesofindia.indiatimes.com/india/Narendra-Modi-lands-in-Uttarakhand-flies-out-with-15000-Gujaratis/articleshow/20721118.cms) Narendra Modi flies in Uttarakhand, goes in a huddle with his crack team and then sends 15000 Gujaratis back to safety in one night.  How, I ask, when even the Army has been able to rescue just 20000 in a week. The questions are-

1- How did Team Modi selectively locate these Gujaratis apart from all those stranded from 27 other Indian States and 7 Union Territories?

2- Did Modi's choppers and Boeings and luxury buses were given priority landing rights? If yes, did they choose Gujaratis over those more in need?

3- That is if Team Modi disposed all rules of rescue that define the order of evacuation- seriously sick first, followed by children and elderly, followed by women and able bodied men?

4- If the answer to the above questions is yes then this act of privileging Gujarati victims over all above is a criminal act and those responsible should be prosecuted.

If no, then ToI is lying in plain and simple terms and It should be punished for masquerading Paid Advertisement as news.

Sincerely,

Samar Anarya

Petition by

Samar Anarya

Kowloon, Hong Kong
 

Forget Modi, even Rambo can’t save 15,000 pilgrims, experts say

AHMEDABAD: Narendra Modi's spin doctors came in for some harsh criticism on Sunday for giving out an impression that the Gujarat chief minster had transformed into Rambo and helped rescue 15,000 Gujarati pilgrims stranded in the Uttarakhand floods. Experts said it was practically impossible to move 15,000 people in a short span of time even by the armed forces, whose personnel are trained for such massive tasks. The government's own records showed that of the 2,000-odd people who have returned to Gujarat till Saturday, about 1,200 had used arrangements made by the state government. The 400-plus pilgrims that reached Ahmedabad railway station on Sunday morning had made their own arrangements to return home.

Union I&B minister Manish Tewari on Sunday said Modi's claims reflected "rank opportunism" to try and milk a tragedy for political reasons. All the elements of national power put together had on Saturday evacuated 10,000 people and in all the government had been successful in evacuating 17,000 people, he said.

"Now in all this, if somebody wants to become Rambo and claims that he alone in a span of two days during a trip of disaster tourism brought out 15,000 people, I am afraid for the lack of a better word, it just reflects rank opportunism and sheer desperation to try and politicize and even milk a tragedy for political reasons," he said.

The first flight of Gujarati pilgrims came on Saturday with 134 people. Flying in 15,000 people in 36 hours would have needed at least 115 flights, but theses many aircraft have not landed at the Ahmedabad airport.

"Does Modi have his own private army that he managed to bring back 15,000 pilgrims in two days," asked Congress leader Shaktisinh Gohil. "Almost all states have helped Uttarakhand in this crisis and none of them have tried to get cheap publicity like this. Modi should also explain why he has offered just Rs 2 crore as aid to the flood-hit state when even Bimaru states like Bihar have offered Rs 5 crore."

टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित खबर

अमिताभ ठाकुर के कदम से सहमत नहीं हैं आईपीएस महेंद्र नाथ तिवारी

यूपी कैडर के आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर का मानना है कि आईपीएस एसोसिएशन का निर्माण और संचालन गलत है क्योंकि ऐसे किसी एसोसिएशन के निर्माण की छूट कानून में नहीं है. इसी आधार पर उन्होंने इस एसोसिएशन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की अर्जी थाने में दी. अमिताभ का मानना है कि अगर एसोसिएशन बने तो उसमें सारे के सारे पुलिस वाले शामिल हों, सिर्फ आईपीएस एसोसिएशन क्यों रहे, और बाकी पुलिसवालों को आप एसोसिएशन बनाने की छूट न दें. इस दोहरे रवैये के खिलाफ अमिताभ ठाकुर ने लड़ाई शुरू की है. उनकी इस मुहिम को कई आईपीएस अफसर पचा नहीं पा रहे. आईपीएस महेंद्र नाथ तिवारी ने अमिताभ ठाकुर की इस पहल पर टिप्पणी की. तब अमिताभ ने तिवारी जी की टिप्पणी को लिखते हुए उन्हें अपना जवाब अपने फेसबुक वॉल पर दिया. लीजिए, पढ़िए…

Amitabh Thakur : Sri Mahendra Nath Tiwari, IPS says about my attempt to register FIR against UP IPS Association-"This is a classical example of a disgruntled IPS officer damaging the same service which has given so much recognition to him. I think the victimisation if any should not be so negatively retailiated as there are other platforms to be explored for creativity in the public interest ."

With due regards to Sri Tripathi, there is no disgruntlement at personal level because any personal loss and gain in service have lost their meaning to me long ahead. This effort is only an attempt to bring forth the point that law of the land stands true for one and all. Would he react to why association of subordinate police officers is hugely resisted by IPS officers while having an association which prima-facie comes as being against law?

अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

ढंग से समझ लीजिए, बादल फटने जैसी कोई चीज़ नहीं होती

Rajiv Nayan Bahuguna : ढंग से समझ लीजिए . बादल फटने जैसी कोई चीज़ नहीं होती . एक ही जगह पर घनीभूत बारिश को लोग बादल फटना समझ बैठते हैं . इस तरह समुद्र तटीय क्षेत्रों में दिन में बीसियों बार बादल फटते हैं . जैसे गंजी खोपडी पर ओले की मार तगड़ी पड़ती है , वैसे ही वृक्ष और वनस्पति विहीन भूमि की नंगी त्वचा बारिश को नहीं झेल पाती और रपट जाती है . पत्थर और मिट्टी निकालने के लिए किये गए गड्ढे इसमें कोढ़ में खाज का काम करते हैं

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.

आजतक पर प्रकट हो गए विनोद दुआ!

Zafar Irshad : क्या मशहूर पत्रकार विनोद दुआ ने एनडीटीवी छोड़ दिया है .?.यह सवाल इस लिए मन में आया की आज न्यूज़ पेपर में एक विज्ञापन निकला है, जिसमे बताया गया है विनोद दुआ के प्रोग्राम आप इस समय दिल्ली आजतक और दूरदर्शन पर देखिये, और आकशवाणी और आजतक के रेडियो ऍफ़ एम पर सुनिए…अगर यह खबर सही है, तो दुर्भाग्य पूर्ण है, क्योंकि प्रणव रॉय और विनोद दुआ को बचपन में ब्लैक वाइट टीवी पर देखता आ रहा हूँ, और आज भी दुआ जब अपने "ज़ायका इंडिया का " प्रोग्राम में यह कहते थे की एक एकलौते हम ही है जो देश के लिए खाते है, तो बरबस चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी…एनडीटीवी मैं केवल विनोद दुआ और रविश कुमार की वजह से ही देखता था…अच्छा नहीं लगा दुआ का यूँ एनडीटीवी से जाना…पता नहीं क्या कारण है.?.जो रॉय और दुआ की कम से कम 20 साल पुरानी दोस्ती टूट गयी….

Iqbal Ahmad Agar sahi baaat hai to NDTV ka zaika hi bigad jayega

Ameeque Jamei Woh shayad ndtv ke mulazim kabhi nahi rahe azaad khyaal ke shaks hai kuchh program dia kartr the aur woh to desh ke liye khate aur likhne wale logo me se hai
 
Sanjog Walter SAD NEWS
 
Rj Prabhakar Gupta what a breaking news
 
Sheeba Aslam Fehmi Ravish Kumar to theek, lekin Vinod Dua ne journalism me contribute karna to kab ka chhora. Unki kami nahi khalegi, wo kuchh karte hi nahi they ab. Achha hua chale gaye.
 
Rj Prabhakar Gupta me sharing ur post
 
Ramesh Kumar Bimal सब माया और कुर्सी का कमल है।
 
Syed Haider lack of knowledge on the subject force me to acknowledge your view ..
 
Priyanka Singh यही दुआ जी नक्सलवादियों पर स्टोरी करते हुए पूछते हैं कि क्या सारे आदिवासी नक्सलवादी हैं…? ठीक वैसे जैसे कोई पूछे क्या सारे मुसलमान आतंकवादी हैं…. जैसे कोई कह रहा हो कि आप या तो इधर है या उधर हैं.

Sp Dogra A sad breaking news for me !
 
Zishan Haider mujhe bhi samajh nahi aaya ki maajra kya hai. main ne 3 hafte pahle dua sahab ka FB pe open letter dekha Roy k naam. bada saqt lehja tha. lekin 2 din pahle hi ndtv pe dekha dua sahab ko zayaqa prog me.. aakhir maajra hai kya..
 
Mohit Kandhari ab woh sach dikhate nahin chipata hain aur dua saab ko bhi haqekaat raas nahin aa rahi hogi
 
Nitin Somkuwar ji so sad mai bhi dono ka jabrdst fan raha hu..
 
Manish Bhartiya सन १९८५ में इनके कार्यक्रम जिसमे ये जनता के सवलों और समस्याओं से सीधे मंत्रियों को रूबरू कराते थे का लाभ मेरे परिवार को भी मिला था और गैस एजेंसी के विरूद्ध कार्यवाही हुई थी. वैसे जफ़र भाई जब दोस्ती के बीच सत्ता की चाशनी आ जाये तो कुछ भी हो सकता है, सुना है दुआ साहब पोलिटिकल जौर्नलिस्ट बनना चाहते थे और प्रणब राय ने ऐसा होने नहीं दिया.
 
Zafar Irshad Sheeba Aslam Fehmi…Madam aap shayed woh DARD nahi samajhti hai jo ko employee kisi Media house me apni zindagi ke keemti 20-25 saal laga kar chorta hai use…Woh Media House uska apna ghar ho jaata hai kyoki din ke 12 se 15 hrs wo wahi guzarta hai…aap Journalist nahi hai is liye kisi Journalist ka DARD nahi samajh payengi…"Kuch to Majbooriya rahi hongi u hi koi Bewafa nahi hota" Mohtarma….
 
Zafar Irshad Is mudde par agar BHADAS ke Yashwant Singh ji kuch prakash daale to behtar hoga bcoz unke paas Media ki har jaankari rahti hai…
 
Vineet Kumar Singh Vinod Dua ne kaafi kade shabdon mein Pranav Roy ki alochna ki thi… kaha tha ki unko Roy ne dhokha diya hai
 
Shahnawaz Akhtar Vindo Dua has mention it in his tweet that Roy betrayed him.. he had also said that Roy had promised him for a political show but later he refused…it is indeed a sad happening as both these people were known for good journalism and were considered good humans too!
 
Mohd Uzair IT SAD NEWS FOR ME ONLY TWO PERSON IN NDTV 1.RAVISH KUMAR 2.VINOD
 
Yashwant Singh इरशाद भाई, मेरे पास उतनी ही जानकारी है जितनी आप लोगों के यहां. संडे को आजतक पर दुआ का इंटरव्यू देखा, जो दिल्ली सेंटर्ड प्रोग्राम के लिए था… उस इंटरव्यू में जिस जिस तरह के सवाल जवाब हुए उससे लगा कि दुआ अब एनडीटीवी के साथ नहीं हैं और बीच-बचाव, मध्यस्थता की कोशिशें सफल नहीं हुईं.. दुआ-राय प्रकरण कुछ वैसा ही है कि दो मित्रों में एक मित्र उद्योगपति बन जाए और दूसरा मजदूर बना रहे.. एक दिन उद्यमी अपने मजदूर को अपनी कंपनी से निकाल दे… और मजदूर चिल्लाए कि ये साला मालिक कभी मेरा मित्र था और मेरा इस्तेमाल करके इतना बड़ा आदमी बन गया और अब मुझे ही निकाल दिया… यह ऐसी परिघटना है जो हमेशा घटित होती है और ऐसे में ही मार्क्स बाबा का वह दर्शन याद आता है कि जब आदमी का क्लास बदलता है तो उसका उसी मुताबिक कैरेक्टर भी बदल जाता है..

Zafar Irshad Thanks Yashwant Singh bhai…Aap ne bahut sahi tareeke se Vishleshan kiya…Isi liye BHADAS aur Aap itna famous hai…

कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से.

क्या एचटी ने अभिजीत मजूमदार से पेड न्यूज वाली स्टोरी कराई है?

Himanshu Kumar : इस रिपोर्ट में पत्रकार महोदय लिखते हैं की दंतेवाडा में कैटरीना कैफ का कोका कोला पीते हुए होर्डिंग लगा हुआ है इससे सिद्ध होता है की अब वहाँ सामान्य स्तिथि बहाल हो रही है. इन पत्रकार बन्धु ने बस्तर जाने से पहले मुझ से कई बार बात की थी. और मैंने इन्हें पुलिस द्वारा आदिवासियों पर होने वाले कई ज़ुल्मों की घटनाओं के बारे में बताया था. ऐसी घटनाएँ आज भी जारी हैं. लेकिन इन पत्रकार महोदय ने अपनी इस रिपोर्ट में उन घटनाओं का कोई ज़िक्र नहीं किया है. इन पत्रकार महोदय को मैंने साम सेट्टी गाँव की छह बलात्कार पीड़ित लड़कियों के बारे में बताया गया था जिनके साथ पुलिस ने दो बार सामूहिक बलात्कार किया है और अभी पिछले महीने ही उन लड़कियों को ज़बरदस्ती अपनी शिकायत वापस लेने के लिए पीटा गया था.

मैंने इन पत्रकार महोदय को उन लड़कियों से मिलने की सलाह भी दी थी लेकिन इन्होने उस घटना पर एक लाइन भी अपनी इस रिपोर्ट में नहीं लिखी. बल्कि ये लिख रहे हैं की पुलिस तो आदिवासियों का दिल जीत रही है और उसमे सफल भी हो रही है. आदिवासी लड़कियों को पीट कर दिल जीतने का तरीका हमने तो पहली बार देखा है भाई. इसी तरह से सार्केगुदा में मारे गए सत्रह लोगों में से छः लोगों को इन्होने नक्सली लिख दिया है जबकि यह पूरी तरह सिद्ध हो चूका है की मारे गए सभी आदिवासी निर्दोष गाँव वाले ही थे. बस्तर में सरकारी ज़ुल्म आज भी बस्तूर जारी है. पता नहीं ऐसी झूटी रिपोर्ट किसे खुश करने के लिए लिखी गयी है? और ऐसी रिपोर्ट से किसको क्या फायदा होगा? जहाँ तक मैं जानता हूँ झूठ का सबसे ज्यादा नुक्सान तो आपके दोस्तों को ही होता है. अगर आप वाकई सरकार को फायदा पहुचना चाहते है तो उसे सच्चाई बताइये उससे सरकार को शायद अपनी गलती सुधारने का मौका मिले.

हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

एचटी में छपी अभिजीत मजूमदार की रिपोर्ट इस प्रकार है…


Winning battle of Bastar

Abhijit Majumder, Hindustan Times

Despite recent Naxal attacks, military action backed by development is undoing years of neglect, atrocities on tribals. But will India overcome corruption, build roads, and bridges of the mind? Abhijit Majumder reports from Bastar, iconic heart of Maoist insurgency.

Every day, the punishment for missing the target changes. Today’s penance: Applying the rain-wet, red earth of Bastar all over one’s face.

At the Karnpur headquarters of Cobra, the elite jungle commandoes of the Central Reserve Police Force (CRPF), AK-47 bullets missing the cardboard target during practice means humiliation. Outside the camp, it could mean death.

In Bastar, the iconic heart of the Maoist Naxalite insurgency in India, the paramilitary and the state police can’t afford to miss targets in the war against one of the most wily and ruthless guerrilla outfits in the world.

While the forces fight to recover the territory still under Maoist control, other wings of the government struggle to reclaim every inch of tribal mindspace lost over years of neglect, arrogance, and atrocities.

The good news is — it is difficult to believe — democracy is winning. The progress is painfully slow, the path savagely slippery and peppered with landmines. Snipers lie in wait on both sides, claiming, in their latest roadkill, 28 people at the misty Darbha Ghat, some high-profile Congress leaders among the victims.

Where there is no road, there is often corruption involving government officials and contractors, who take money but don’t take the tar to remote, cut-off villages.

There are massive problems of inter-state coordination between agencies fighting an insurgency which stretches across 10 states at the heart of India. Equipment like unmanned aerial vehicles is dated. Political will to exterminate Red Terror wildly fluctuates.

But since 2010, some things have gone right. The movement killed 908 and 1,005 people in 2009 and 2010, while in 2011 and 2012 the toll slid to 611 and 415. There were 2,258 attacks in 2009 compared with 1,415 in 2012. Till April 30 last year, there were 162 deaths, while it is 120 in the same period this year.

Dantewada, once a dreaded ‘liberated zone’ of the Maoists, is now an educational town. A hive of schools, colleges, hostels, and a marketplace dotted with ATMs buzz below hoardings of actor Katrina Kaif seductively sipping cola.

The muddy Dankani river gurgles nearby as the small town — like many that post-liberalised India has spawned — goes about its business. A huge educational hub is coming at Geedam nearby.

Dantewada is one of the victories in this long battle. While the interiors are still prone to Naxal activity, the town and surrounding areas stand as an example of how military action followed by determined developmental work can reclaim spaces that the democracy has lost.
Maoist rebels march during their 9th Convention at an undisclosed location in the jungles of Chhattisgarh. AP

“The insurgency is fuelled by the Maoist leadership from the neighbouring Andhra Pradesh. We are slowly winning over our tribals whom these leaders intimidate and indoctrinate,” says Chhattisgarh chief minister Raman Singh. “We are coming up with social, health, and educational schemes for the tribals, and have got clear results on the ground.”

The CRPF organises more than 100 telemedicine camps each on Mondays and Thursdays connecting locals to the All India Institute of Medical Sciences branch in Raipur over Skype.

The troops distribute footballs, solar panels, medicines and other stuff among the tribals — mainly Gonds and Halbas — who comprise 69% of the region’s population.

The state’s biggest medical college is coming up on the outskirts of Jagdalpur, the biggest town in the Bastar region.

In the last one year, the access of forces in ‘liberated areas’ has increased dramatically, says Zulfiquar Hasan, inspector general, CRPF, Chhattisgarh. Encounters with Maoist guerrillas used to happen at an average 4-5 km from a CRPF camp.

These exchanges have been happening at an average 12-13 km from the camps nowadays, indicating the troops’ greater capacity to engage the enemy in its own territory, says Hasan.

In south Odisha’s Malkangiri, called the ‘Cut-Off area’, a place supreme leader Ganpathy is believed to be hiding in, the Border Security Force has managed to break into some places and Cobra has conducted operations.

In Sarkiguda, 12 villagers along with half a dozen Maoists were killed a couple of years ago, but CRPF has still managed to build a camp nearby and keep in touch with villagers, mainly because of community work, say officers.

The highway beyond Sarkiguda, however, bears scars of the raging war. More than 200 ditches have been dug up, some up to six feet deep, and the stretch is carpeted with landmines.

In Basaguda, where a few years ago a board used to hang on a blasted bridge proclaiming, ‘Forces not allowed’, the Pota Cabin residential school for tribal children has come up.

As one enters the Sukhma district from Dantewada, the forests thicken. This is still a hunting ground of the Naxals. The Maoists core group visits the remote villages, hold enrolment drives (annual membership fee is R10, or about 20 cents), instruct villagers on issues to agitate on, organise medical camps and even run schools.

But even parts of Sukma seem to be changing. Lalu Mada, 21, says he does not want to be a Maoist. He takes three much younger siblings back home from a tribal fair celebrating Ban Durga, the goddess of the forests. Although he never went to school, he says almost all the children in nearby villages are schoolgoers.

“There are lots of schools now. The National Mineral Development Corporation (NMDC) has built these,” he says. Ruhul Sheikh, a postal employee in Sukma, says his post office deals with a fair volume of fixed deposits, pension, and National Rural Employment Guarantee Act (NREGA) money.

The Maoists are bitterly opposed to NREGA, the country biggest rural jobs scheme, but won’t keep their hands off the juice either.

A public works contractor in Sukma, requesting anonymity, says 10% to 20% of the NREGA money contractors distribute among their workers is taken away by Maoists.

“No road or development work in this zone happens without their permission and a part of the money going to them,” he says.

Lately, the Maoists have raised two army-like battalions and 10 companies of fighters, says an intelligence source. The desperation of being hunted in their own territory has made them opt for unusual, high-visibility attacks on politicians and civilians.

People in Bastar say that the attack on politicians could be a big turning point. Maoists assaults on former West Bengal CM Buddhadev Bhattacharya and ex-Andhra CM Chandrababu Naidu had invited massive state reprisals.

“They are desperate. The government shouldn’t show its panic. That’s what they want. We are winning this. We should coordinate better, and stay determined,” says a paramilitary officer.

Maoists’ recent pamphlets point to an acute shortage of arms, which possibly prompted the attempt to rob arms on June 14. There is stiff resistance to mining in Kanker, Raoghat and other areas because jobs will wean the tribal youth away from Maoists.

Guerrillas carry out tactical counter offensive campaigns (TCOC) after the winter harvest and till just before monsoon –– between mid-March and mid-June –– when they can co-opt the tribal agricultural workforce in their bloodsport.

But community policing by both the state and paramilitary is making them nervous. “Boycott civic action by the forces,” a pamphlet cautions villagers. It bitterly opposes the massive educational city at Geedam.

Also, they are hounding leaders of the disbanded Salwa Judum, a government-armed outfit of local tribals, after killing its most prominent leader Mahendra Karma on May 25.

“In their pamphlets, at their meetings, they talk about killing me and other Salwa Judum leaders,” says Soyam Mukka, who lives in fear in Konta.

“The locals have no complaint and the situation has vastly improved. It is only through guns that Maoists control them, make them join their meetings, serve food, dig up roads, send sons and daughters for terror training.”

The biggest challenge for democracy is that the Maoists reach where the government cannot: hundreds of nameless or little-known places where there are no roads or communication.

In Chhattisgarh and Jharkhand, two worst Naxal-affected states, teledensity (number of phones per 100 people) was below 10% in 2010. India’s current mobile density is more than 80%.

There are allegations of wanton corruption and a nexus between state engineers and private contractors. The contractor gets a hefty advance running into crores which he can keep for 10 years without paying interest.

Often, after getting the advance, contractors burn their own vehicles or destroy their own site, presenting it as a Maoist attack. This helps them wriggle out of the rest of the work citing lack of protection.

In most cases, they complete WBM and earth work in which profit margins are very high. “The so-called Maoist attack happens only at the bitumen or pitch work stage because there is very little money in black tar carpeting,” says a district official, requesting anonymity.

“Roads are the lifeline of the democracy. Which is why the Naxals do not want them built in the remote interiors,” says Ajay Yadav, superintendent of police, Jagdalpur.

He took over last month after the last SP was suspended following the May 25 attack. “Even if we suffer casualties, we are willing to provide security for road building,” he says.

The roads will have to be built, but building bridges are perhaps more crucial. Angers against the government still simmers.

After the May 25 attack, a note released by Gudsa Usendi, spokesperson of the Dandakaranya Special Zonal Committee, CPI (Maoist) said that on May 17, cited eight people including three “innocent children” being killed by police and paramilitary forces in Edsametta village of Bijapur district.

But forces say the direction of the wind is slowly changing.

“Earlier, there was near-total hostility from the local population. The real achievement on the ground today is that in most places, we know that given a chance, the local people are with us,” says Uday Divyanshu, 38, commander of 204 battalion of Cobra, and among the most highly regarded young officers on the frontline of the war against Red Terror.

Officers say that more than bullets, a football lobbed at a swarm of tribal children makes a big difference here.

तो क्या ऐसे निकाल ले गए नरेन्द्र मोदी अपने गुजरातियों को?

Dinesh Mansera : मुझे बद्रीनाथ से, विकास जुगरान ने बताया की यहाँ निजी कंपनियों के हेलीकाप्टर आते थे, उनके पास लिस्ट होती थी और वो अपनी सूची अनुसार लोगो को बैठा के ले जाते थे. विकास खुद बद्रीनाथ में हवाई सेवा बुकिंग का काम भी करते है. वे कहते हैं उनके विमान भी ऐसा सब कुछ हेड ऑफिस के आदेश पर कर रहे थे… तो क्या ऐसे निकाल ले गए नरेन्द्र मोदी अपने गुजरातियों को?

एनडीटीवी से जुड़े दिनेश मानसेरा के फेसबुक वॉल से.

“आप” ललितपुर के जिला संयोजक ब्रिजलाल और उनके मित्र की निर्मम हत्या

Aam Aadmi Party :  भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में खड़े होने वालों के दुश्मनों की कमी नही है. जबसे हम इस लड़ाई में आये हैं, हमारे कार्यकर्ताओं पर हमले होते रहे हैं. बड़े दुःख के साथ बताना पड़ रहा है कि, "आप" ललितपुर के जिला संयोजक ब्रिजलाल और उनके मित्र की निर्मम हत्या कर दी गयी है.

पूर्व कांग्रेस एमपी सुजान सिंह बुंदेला, और उनके लड़के पर धारा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज हुआ है. हमारे क्रांतिकारी देशभक्तों की कमी कभी पूरी नही हो सकेगी. आइये उनकी आत्मा की शांति के लिए हम मिलकर प्रार्थना करते हैं.

आम आदमी पार्टी के फेसबुक वॉल से.

यहां पर आकर आरएसएस फेल हो जाता है

स्वप्निल कुमार : आर.एस. एस. ने इस देश की सेवा की है इस बात में संदेह नही है । मै भी कभी स्वयं सेवक रह चुका हूँ, स्वयं सेवको के समर्पण, सेवाभावना, उत्साह आदि को जानता हूँ । और उसका आज भी तहे दिल से सम्मान करता हूँ. लेकिन, किसी भी संस्था की आत्मा होती है उसका 'एजेंड़ा' । वह किन उद्देश्यो के लिये काम कर रही है, समाज में किन मूल्यों को स्थापित करना चाहती है ?

यहाँ पर आकर आर. एस. एस. फेल हो जाता है । वो सिखाता है कि तुम हिंदू होने पर गर्व करो. जबकि, यह संयोग मात्र है कि मेरा, तुम्हारा या किसी और का जन्म हिंदू घर में हुआ है । इसमे प्रकृति का कोई हस्तक्षेप नही । वो तो लाखो करोड़ो साल से अपनी व्यवस्था से चल रही हैं । ये हिंदु, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैनी, बुद्धिस्ट, पारसी, यहूदी आदि रोज नये – नये पैदा तथाकथित भगवान, खड़े होते संगठन ये सब इंसानी दिमागी फितूर हैं, कचरा है. ये तुम्हारी गुलामी की मानसिकता का द्योतक है कि तुमने बुद्धत्व को छोड़ 'बुद्ध' को पकड़ा ।

आर.एस. एस. आज भी हिंदु राष्ट्र के सपने देखता है. इसके लिये वो किसी किसी भी हद तक गिर सकता है. हत्याओ के उत्सव मना सकता है. ऐसी सोच तो तमाम कठमुल्लो ( जैसे इंडियन मुजाहद्दीन) की भी है. और अपरोक्ष रूप से इसाई मिशनरियो की भी है. नफरत की राजनीति कर रहें है ये लोग और इसे हिदुंत्व का नाम देते है । आर.एस. एस. विशुद्द रूप से एक ब्राम्हणवादी संस्था है, जो अपने उन्ही सड़े – गले आग्रहो में जीती है। जिसके तमाम भोले – भाले कार्यकर्ताओं को नही पता कि उनका भावनात्मक रूप से शोषण किया जा रहा है । इसलिये मुख्य रूप से कार्यकर्ता नहीं बल्कि इनके आका, मुखिया दोषी हैं।

स्वप्निल कुमार के फेसबुक वॉल से.
 

शाजी जमां और विनोद कापड़ी को लेकर कानाफूसी

दो चर्चाएं तेज हैं. पहली तो ये कि एक बड़ा समूह दो चैनल लेकर आ रहा है जिसमें एक नेशनल न्यूज चैनल होगा. इस समूह की कोशिश न्यूज चैनल्स के स्थापित नामों को तोड़ने की है. इस कड़ी में चर्चा है कि उस ग्रुप ने एबीपी न्यूज के संपादक शाजी जमां से संपर्क किया है. चर्चा यहां तक है कि शाजी जमां इस नए न्यूज चैनल में एडिटर इन चीफ के रूप में ज्वाइन कर सकते हैं. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है.

शाजी जमां अगर एबीपी न्यूज छोड़ेंगे तो उनकी जगह संपादक के रूप में विनोद कापड़ी को लाया जाएगा, ऐसा सूत्र बता रहे. साथ ही सूत्र यह भी बता रहे कि विनोद कापड़ी पिछले सात आठ दिनों से इंडिया टीवी के आफिस नहीं आ रहे. बताया जाता है कि एबीपी ग्रुप यानि आनंद बाजार पत्रिका के मालिकों से कापड़ी के ठीकठाक रिलेशन हैं और कापड़ी को एबीपी न्यूज, जो पूर्व में स्टार न्यूज था, से शाजी जमां के कारण जाना पड़ा था. ये सारी बातें अभी तक चर्चा के स्तर पर ही हैं. किसी भी तरीके से इनकी पुष्टि नहीं हो पाई है. लेकिन वो कहा जाता है न कि मीडिया इंडस्ट्री हमेशा गासिप्स से भरी रहती है और इन दिनों गासिप के प्रधान पात्र शाजी जमां व विनोद कापड़ी हैं. देखना है कि ये कानाफूसी भविष्य में सच साबित होती है या कोरी गपबाजी साबित होती है. (कानाफूसी)

मंत्रीजी के नाम पर सौ करोड़ रुपये उगाही का टारगेट!

भड़ास को कुछ ऐसे तथ्य पता चले हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में तैनात एक मंत्री के नाम पर उनके अधीनस्थ लोग लगभग सौ करोड़ रुपये उगाही का टारगेट बनाए हुए हैं और इस टारगेट को पूरा करने के लिए पैसा वसूलो अभियान पर कई लोग निकल चुके हैं.

एक मंत्रालय से संबद्ध वेंडरों, सप्लायरों, रिसीवरों, ठेकेदारों, अधीनस्थ अन्य कंपनियों से उगाही का यह टारगेट है. मंत्री जी इस मंत्रालय के सर्वेसर्वा हैं और उनका पीएस इस पूरे अभियान का नेतृत्व कर रहा है. मंत्री जी के अधीन की कई सरकारी कंपनियों के मुखिया अफसरों को कह दिया गया है कि आगामी चुनाव और कांग्रेस का बड़ा सा भार प्रभार मंत्री जी को मिलने के कारण ढेर सारा पैसा चाहिए, इसलिए सबको मिल जुटकर यह टारगेट हासिल करना है.

मध्य भारत के एक वेंडर ने उगाही अभियान में शामिल छत्तीसगढ़ के एक शख्स का काफी कुछ प्रमाण अपने पास रख लिया है. उनसे पता चलता है कि उगाही अभियान जोरशोर से चल रहा है और इसे क्रियान्वित करने के लिए मंत्री के चेले देश के कोने-कोने में घूम रहे हैं. हाल-फिलहाल एक मंत्री जी अपने पीएस के फोन काल डिटेल के कारण सीबीआई के जाल में फंसे और उससे यह साबित भी हुआ कि मंत्री के बिहाफ पर उनका पीएस सारा गोरखधंधा संभालता है.

सूत्रों का कहना है कि देर-सबेर इस पैसा उगाहो अभियान के भी ऐसे प्रमाण सार्वजनिक हो जाएंगे जिसके जरिए पता चल जाएगा कि इस देश और इस देश की कंपनियों, जनता के पैसे को कैसे लूटा-लुटाया जाता है. भड़ास इस प्रकरण से जुड़े कई तथ्य व डाक्यूमेंट्स की जांच कर रहा है. शीघ्र ही पूरी कहानी असली नाम पते के साथ सार्वजनिक की जाएगी. फिलहाल संबंधित आरोपी जनों को पूरे मसले पर उनका पक्ष जानने के लिए मेल कर दिया गया है.

साथ ही, कुछ लोग इस मामले को सीबीआई में ले जाने की भी तैयारी कर रहे हैं. हालांकि सीबीआई काफी कुछ केंद्र सरकार के निर्देश पर कार्य करती है, इसलिए यह उम्मीद कम है कि सीबीआई खुद की पहल पर मंत्री के खास लोगों के गिरेबान पर हाथ डालेगी, लेकिन सीबीआई के संज्ञान में मामला आ जाने से प्रकरण काफी कुछ आन रिकार्ड आ सकता है और फिर कोर्ट का रास्ता अपनाया जा सकता है. इस प्रकरण की कड़ियों के तार जोड़ रहे लोगों का कहना है कि मसला अब काफी नाजुक मोड़ पर जा चुका है और संभव है कि चुनाव से पहले ही मंत्री जी अपने लोगों की करनी के कारण कठघरे में घिर जाएं.

राजस्‍थान के छह पत्रकारों को कप्‍तान दुर्गाप्रसाद चौधरी पत्रकारिता पुरस्‍कार

राजस्‍थान के सबसे पुराने राज्‍य स्‍तरीय समाचार पत्र दैनिक नवज्‍योति के संस्‍थापक संपादक एवं स्‍वतंत्रता सेनानी कप्‍तान दुर्गाप्रसाद चौधरी पत्रकारिता पुरस्‍कार 2013 के लिए छह पत्रकारों को चयन हुआ है। ये पुरस्‍कार राजस्‍थान की झीलों की नगरी उदयपुर में 29 जून को आयोजित समारोह में दिए जाएंगे।

दैनिक नवज्‍योति के प्रधान संपादक दीनबंधु चौधरी के अनुसार उदयपुर कोर्ट चौराहा स्थित आरएनटी मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में सुबह दस बजे से आयोजित होने वाले इस समारोह के मुख्‍य अतिथि कांग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव और पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री डा सीपी जोशी होंगे। अध्‍यक्षता राजस्‍थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया करेंगे।

दीनबंधु ने बताया कि केन्‍द्रीय शहरी विकास और गरीबी उन्‍मूलन मंत्री डा. गिरिजा व्‍यास, सांसद रघुवीर मीना, नगर विकास प्रन्‍यास उदयपुर के अध्‍यक्ष रूप कुमार खुराना, नगर निगम उदयपुर की महापौर श्रीमती रजनी डांगी और उदयपुर ग्रामीण की विधायक श्रीमती सज्‍जन कटारा समारोह के विशिष्‍ठ अतिथि होंगे। चौधरी ने बताया कि समारोह में प्रथम पुरस्‍कार के रूप में 31 हजार रुपए और पांच अन्‍य पुरस्‍कारों में 11 – 11 हजार रुपए दिए जाएंगे। पुरस्‍कार के लिए पांच सदस्‍यीय चयन समिति का गठन किया गया था। समिति ने चयनित नामों की घोषणा कर दी है।

इस वर्ष का पुरस्‍कार बांसवाडा के दीपक श्रीमाल समेत छह को : कप्‍तान दुर्गाप्रसाद चौधरी पत्रकारिता पुरस्‍कार चयन समिति के सदस्‍य और दैनिक नवज्‍योति के मुख्‍य संवाददाता एलएल शर्मा ने बताया कि वर्ष 2013 का कप्‍तान दुर्गाप्रसाद चौधरी पत्रकारिता पुरस्‍कार के लिए बांसवाडा के दीपक श्रीमाल का चयन किया गया है। पांच अन्‍य पुरस्‍कारों के लिए चित्‍तौडगढ़ जिले के कपासन के केशव पथिक, उदयपुर के सुदर्शन सिंह, राजसमंद जिले के देवगढ के लोकेन्‍द्र सिंह, डूंगरपुर जिले के सीमलवाड़ा के हरीश कुमार पण्‍डया और प्रतापगढ़ जिले के धरियावद के राजकुमार कोठारी का चयन किया गया है। शर्मा ने बताया कि कप्‍तान दुर्गाप्रसाद चौधरी पत्रकारिता पुरस्‍कार के लिए करीब सवा सौ प्रविष्टियां प्राप्‍त हुई थी। 

कल का दिन मेरे टीवी करियर का सबसे अच्छा दिन था : निशांत चतुर्वेदी

निशांत चतुर्वेदी न्यूज एक्सप्रेस चैनल के हेड हैं. कल उन्होंने उत्तराखंड के हर्षिल में राहत कैंप में इंतजार कर रहे लोगों की जब तस्वीर दिखा रहे थे तो उसी वक्त कानपुर के एक सज्जन का फोन आया और उन्होंने बताया कि अभी अभी जो तस्वीर चैनल पर चली है, उसमें उनका भाई दिख रहा है, प्लीज उससे बता करा दीजिए. और, देखते ही देखते निशांत के प्रयास से उस कानपुर के शख्स का अपने बिछड़े भाई से संपर्क हो गया.

सारा कुछ आन एयर हुआ और निशांत ने आन स्पाट एंकरिंग का नायाब नमूना दिखाया. वे एंकरिंग करते हुए ही पीसीआर, रिपोर्टिंग, एसाइनमेंट… कई डिपार्टमेंट्स को निर्देश देते रहे और सब कुछ बेहद सहज व एक्शन से भरा लग रहा था. उस वक्त जो भी यह शो देख रहा था, उसने निशांत की एंकरिंग का लोहा माना. निशांत ने फेसबुक पर भी लिखा है कि कल का दिन उस शो के कारण उनके करियर का सबसे अच्छा दिन था. नीचे निशांत का एफबी पर स्टेटस व उस पर आए कुछ कमेंट दिए जा रहे हैं..


Nishant Chaturvedi : Yesterday was the best day of my TV career. While Anchoring special show 'Uttarakhand Control Room'. Gyan Singh called us 4m Kanpur & identified his brother ONAIR and all of it happened because of the latest exclusive footage of the survivour we showed from Harsil..Thank You News Express..

    Nalin Singh let me congratulate the whole team….UR'S WAS THE BEST ONE…. HAVE FOLLOWED IT DAILY..SO HAVE MY 400 JOURNO STUDENTS… FAB JOB…!! TOO GOOD !! THE WHOLE TEAM SIMPLY ROX.. JAI HIND !!
 
    Jai Prakash congrts
 
    Siddharth Ojha many many congratulations!!
   
    Prashant V. Singh Good job!
    
    Ankur Swaroop Saxena Badhai ho sir…
     
    Ramesh Sarraf aapka channel ne uttarakhnd trasadi par itna shaandar kaam kiya hai jo manavta ke itihaas me bemisaal hoga aapka baar-baar aabhar nishant ji.
     
    Santosh Poonia yes i was seen u r too good sir congrats..
     
    Pushpendra Mishra congratulations Sir…
     
    Lakhvinder Rana congrats sir
     
    Deepak Chaturvedi Congrats
     
    Kedarnath Pandey Congrats ….!!!
     
    Santosh Pathak This is real journalism.
     
    Manoj Setia Well done .. Nishant…………
     
    Shadab Mujtaba This is the real media power for society
     
    Raakesh Pathak wonderfull i cd understand the feeling. congrats for g8 job. this really the g8 one.
     
    Mamta Bhatt Great job
     
    Vidhi Agarwal gr8… ! these r the moments wen we feel proud to be associated with this industry….kuddos!
     
    Bimalendra Nath Ojha its gr8…we are proud of you
     
    Krishna Sharma Great job,,Nishant ji
     
    Naved Qureshi Great job
     
    Mohammad Irfan Sheikh gREAT WORK NISHANT keep it up……
     
    Banwari Yadav Ultimate..!!
   

वितरक आवाज के सात साल पूरे, वर्षगांठ पर 29 जून को गाजियाबाद में महाधिवेशन

मीडिया तथा अखबार वितरकों की खबरों पर आधारित न्‍यूज पेपर 'वितरक आवाज' के प्रकाशन की सातवीं वर्ष गांठ पर 29 जून को गाजियाबाद में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. गाजियाबाद समाचार पत्र वितरक संघ के बैनर तले यह कार्यक्रम लोहिया नगर के अग्रसेन भवन में आयोजित किया गया है.

इस अवसर पर 'समाचार पत्र वितरक समाज के उत्‍थान की दिशा में आपकी राय' विषयक गोष्‍ठ का भी आयोजन किया गया है. गोष्‍ठी के मुख्‍य वक्‍ता वितरक आवाज के संपादक राकेश पांडेय होंगे. कार्यक्रम में राष्‍ट्रीय स्‍तर के समाचार पत्रों के वरिष्‍ठ प्रबंधकों को आमंत्रित किया गया है.

ईमानदार नेता बनने का मादा होता तो आप कमांडेंट को नहीं सीएम को सस्‍पेंड करते राहुल

सुनीता भास्कर : राहुल गांधी के न्याय का भी कोई जवाब नहीं….उत्तराखंड के दौरे से लौटते ही उन्होंने एनडीआरऍफ़ के कमान्डेंट को हटाकर उनके मूल विभाग आईटीबीपी में भेज दिया.. हवाला रेस्क्यू में देरी का…गोकि देरी का सारा जिम्मा एकमात्र एनडीआरऍफ़ का हो..एनडीआरफ़ दूसरे दिन से ही वायुसेना के साथ कदम से कदम मिला के जी जान से रेस्क्यू में जुटा है..हेलीकॉप्‍टर क्रेश में उसने अपने नौ जवान खोये हैं. वैसे ही जवानों का मोरल डाउन है.

केंद्र सरकार की इस हरकत के बाद उन जवानों पर भी क्या बीतेगी. जिन्हें प्रोत्साहन की जगह सस्पेंसन लेटर मिल रहा….राहुल जी जरा आँख कान खोलो अपने..मुख्यमंत्री से लेकर अपनी ही सरकार के दर्जनों मंत्रियों पर नजर दौडाओ जिन्हें हेलीकॉप्‍टर में अपने साथ आपदा पीड़ितों का भरा जान अपनी शान में गुस्ताखी ही लग रहा..हेलिपैडों पर जहाँ सारा दिन परिजन अपनों के उतरने का इन्तजार कर रहे तब एक एक कर उन हेलीकॉप्‍टरों से यह आपके मंत्री उतर रहे हैं..एक को पूरा एक हेलीकॉप्‍टर चाहिए….आपको अपनी सरकार में कोई खामी नजर नहीं आई जब शुरू के दो दिन तक वह वायुसेना व एनडीआरऍफ़ से कोइ तालमेल नहीं कर पायी, वरना हजारों भूख से मरते लोगों को बचाया जा सकता था.

मुख्यमंत्री से लेकर तहसील तक का पूरा सरकारी अमला पहले दूसरे दिन तो छोडिये आज बारह दिन बाद भी कितना मुस्तैद है यह आपदा पीड़ितों की जुबानी भी सुना जा सकता है….आपके चहेते मुख्यमंत्री के सु(पुत्र) के आर्डर से कल सारा दिन रेस्क्यू किये लोगों को मीडिया से नहीं मिलने दिया गया…क्यूंकि वह पूरे बारह दिन की आपबीती से आपकी सरकार के पूरे सिस्टम को तार तार व बेपर्दा कर रहे थे…क्या ऐसे अब आप अपने माथे पर लगे बदइन्तजामी के दाग को हटाओगे…..तुम में एक ईमानदार नेता बनने का माद्दा होता तो तुम दिल्ली पहुंचकर आपदा कमान्डेंट को नहीं अपने मुख्यमंत्री को सस्पेंड करते राहुल.

पत्रकार सुनीता भास्‍कर के एफबी वॉल से साभार.

कितने भी पुल टूट जाएं, इंसानों को इंसानों से जोड़ने वाले पुल कभी नहीं टूटते

Mayank Saxena : इस जगह न फोन काम कर रहे हैं…और न ही बिजली है…सड़कें बह चुकी हैं…बाहरी दुनिया से जोड़ने वाला एकमात्र पुल बह चुका है…न राशन बचा है और न दवाईयां…हमारी एक टीम उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि इलाके के विजयनगर, गंगानगर और चंद्रपुरी इलाके में है…जान पर खेल कर ये टीम, बेहद मुश्किल सड़क से होते हुए, फिर पैदल एक कमज़ोर बचे पुल को पार कर के इस इलाके में आई, जहां पर सब बह चुका है और सड़की की जगह एक खाई बची है.

मंदाकिनी नदी सिल्ट जमने से अपने मूल् स्तर से भी 12 फुट ऊपर बह रही है…आस पास की सड़कें बह गई हैं…रास्तों में कहीं भूस्खलन है तो कहीं पेड़ गिरे हुए हैं…पूरा इलाका तबाह है…दुनिया से सड़क सम्पर्क टूट जाने के कारण राशन या अन्य सामान नहीं आ सकता है…मैं इस समय एल एंड टी के हाइड्रोलिक प्रोजेक्ट के दफ्तर के स्टोर में हूं…पूरा प्रोजेक्ट बह गया है…पावर हाउस भी…सिर्फ ये स्टोर बचा है और एक टनल…खतरा बरकरार है…पावर प्रोजेक्ट 2 साल पीछे चला गया है और ये इलाका 50 साल पीछे.

यहां मदद की बहुत ज़रूरत है…राशन की भी…दवाईयों की भी…और श्रमदान की भी…क्या बूंद की टीम्स तैयार हैं…जान का खतरा भी हो सकता है…फिलहाल मैं, Aj Singh , Gaurav Gupta और Nitish Singh यहां पहुंचे हैं…यहां आने के लिए पुल पैदल पार कर के हमको पहाड़ पर खड़ी और टेढ़ी चढ़ाई करनी पड़ी…आप आएंगे तो लोगों की मदद होगी…राशन चाहिए…दवाएं भी…सरकार, आर्मी, आईटीबीपी यहां अभी किसी ने काम शुरु नहीं किया है… Ila Joshi समेत बाकी टीम भी यहां पहुंच रही है…उसी टूटे हुए पुल से…उसी पहाड़ से… लेकिन हम जानते हैं कि कितने भी रास्ते, कितने भी पुल टूट जाएं, इंसानों को इंसानों से जोड़ने वाले पुल कभी नहीं टूटते…तो आपका इंतज़ार रहेगा.

युवा पत्रकार मयंक सक्‍सेना के एफबी वॉल से साभार.

इंडियन एक्‍सप्रेस ने भी छापी असंवेदनशील पत्रकार की खबर

न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल के रिपोर्टर रहे नारायण परगाई की बाढ़ पीडित के कंधे पर चढ़कर की गई पीटूसी की खबर इंडियन एक्‍सप्रेस ने भी प्रकाशित की है. नारायण की इसी गलती के कारण प्रबंधन ने भी उन्‍हें चैनल से बाहर कर दिया था. इंडियन एक्‍सप्रेस में प्रकाशित खबर में भी इस शर्मनाक बताया गया है, हालांकि रिपोर्टर का कहना है कि उसे इसके जरिए बदनाम करने की कोशिश की गई है. नीचे पढि़ए इंडियन एक्‍सप्रेस में प्रकाशित खबर.. 

TV journalist reports sitting on flood victim's shoulder, sacked

Hindi news TV channel News Express Wednesday sacked its Dehradun reporter after a video clip showing him reporting sitting on the shoulder of a victim went viral on the Internet and sparked outrage.

The reporter, Narayan Pargaien, however, claimed that the people he was covering in Dehradun's Bindal area insisted he ride on one of their shoulders as they did not want Pargaien to cross a river on his own. "Such an act by the reporter, Mr Narayan Pargaien, was not just inhuman but was also against the culture of our esteemed organisation," the channel said on its website.

"News Express channel did not broadcast this video of Mr Narayan Pargaien but it was uploaded by someone we don't know. Mr Pargaien was working as a retainer… and on Tuesday… this channel terminated Mr Pargaien with immediate effect, as such an act by the reporter is a grave misconduct."

Pargaien admitted that he had got on to the shoulder of a flood victim but the footage was deleted from his report. He claimed a friend had "betrayed" him and uploaded it on YouTube as part of a conspiracy to damage his career.

"I had crossed the water on my own. The locals shared their problems and I ensured availability of rations for them. I gave a patient hearing to their problems," Pargaien told The Indian Express. "They forced me to ride on the shoulder of a local. They told me they won't allow me to cross the river on my own," he said, adding that he could not refuse them.

कात्यायनी ने चार लोगों को भेजा मानहानि का नोटिस

प्रति, 1. अजय प्रकाश, नई दिल्ली, 2. सत्येन्द्र कुमार, लखनऊ, 3. ओम प्रकाश सिन्हा, लखनऊ, 4. मुकुल श्रीवास्तव, गोरखपुर, 5. देवेन्द्र प्रताप, मेरठ (प्रतिवादीगण)

द्वारा,
1.    जन चेतना पुस्तक प्रतिष्ठान, सचिव, राम बाबू पाल, डी-68 निराला नगर, लखनऊ
2.    राहुल फाउण्डेशन, अध्यक्ष कात्यायनी, एमआईजी-135, राप्ती नगर गोरखपुर
3.    अरविन्द मेमोरियल ट्रस्ट, ट्रस्टी सत्यम वर्मा, 69 A -1 बाबा का पुरवा, लखनऊ
4.    कात्यायनी, पत्नी एसपी सिन्हा (शशि प्रकाश सिन्हा), 69 A -1 बाबा का पुरवा, लखनऊ
5.    राम बाबू पाल, पुत्र श्री बालगोविन्द पाल, 69 बाबा का पुरवा लखनऊ।
6.    सत्यम वर्मा पुत्र डॉ. एलबी वर्मा (लाल बहादुर वर्मा), c/o डी-68 निराला नगर, लखनऊ (वादीगण)

1.    मुवक्किल नं0-1, प्रगतिशील पुस्तक सोसाइटी, प्रगतिशील विचारों के प्रचार हेतु एवं पूंजीवादी स्वार्थ, लालच की विचारधारा के विरोध में पुस्तकों का प्रचार-प्रसार।
2.    मुवक्किल नं0-2, राहुल सांकृत्यायन से प्रेरित कार्यो को आगे बढ़ाने की संस्था एवं प्रकाशन कार्य।
3.    मुवक्किल नं0-3, अरविन्द सिंह के विचारों के लिये ट्रस्ट एवं अरविन्द मार्क्सवादी  अध्ययन संस्थान के द्वारा बौद्धिक कार्य।
4.    मुवक्किल नं0-4, बड़ी कवियत्री, बड़ी पत्रकार एवं चर्चित कार्यकर्ता
5.    मुवक्किल नं0-5, महान कलाकार, बड़े पत्रकार, अनुराग बाल ट्रस्ट के अध्यक्ष
6.    मुवक्किल नं0-6, वरिष्ठ पत्रकार, महान अनुवादक, अध्यक्ष, जनचेतना सोसाइटी
उपरोक्त तीनों व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से समाज सेवा के काम में लगे हैं, अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ एवं सम्मानित बुद्धिजीवी है और समाज में उन्हें बहुत सम्मान प्राप्त है।
प्रतिवादी 1,2,3,4, 5 भी पहले हमारे साथ जुड़े थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता सामान्य से भी नीचे थी। 2,3,4 को उनके नकारात्मक सोच एवं र्काो के कारण संस्था से निकाल दिया गया और 2 नं0 खुद ही निकल गये।

इन चारों लोगों ने मिलकर हमारे खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से कुत्सा प्रचार करना शुरू किया, इसमें जन ज्वार डाट काम जो 1 नं0 के द्वारा संचालित किया जाता है, उसकी सहयोगी भूमिका थी। इससे हमारे मुवक्किलों के सम्मान की अपूर्णीय क्षति हुयी। कुत्सा प्रचार की झूठी आरोप निम्न हैः-

1.    कि हमारे मुवक्किल समाज कार्य के नाम पर धंधा करते हैं।
2.    कार्यकर्ताओं को बंधुआ मजदूर की तरह शोषण करते हैं।
3.    हमारे मुवक्कित 4,5,6 इस धंधे में मुख्य मुनाफा कमाते हैं।
4.    हमारे मुवक्किलों ने अरविन्द सिंह की हत्या की, जबकि उनकी मृत्यु बीमारी से हुयी।
5.    मुवक्किलों की संस्था को एक अंजाने/काल्पनिक संगठन क्रांतिकारी कम्युनिष्ट लोग से जोड़ा।
6.    हमारे मुवक्किलों को आपराधिक गिरोह कहा, जनता की सम्पत्ति लूटने का आरोप लगाया और एक युवा व्यक्ति को अपने पिता से धन उगाही करवाया ताकि ये लोग ऐश का जीवन जी सकें।
7.    परिवारवाद का आरोप लगाया।
8.    अपने से अलग विचार वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे पुलिस केस कराये।
9.    आम जनता की सम्पति लूटने, धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया।
10.    पैसा इकट्ठा करने के उद्देश्य से कार्यकर्ताओं के साथ झूठ बोला गया, धोखाधड़ी की गयी और विश्वासघात किया।
11.    धन उगाही के लिये युवाओं को उनके माता पिता के खिलाफ उकसाया गया। एन0जी0ओ0, सरकारी संस्थाओं और पूंजीपतियों से भारी पैमाने पर पैसा लिया गया।
12.    कार्य कर्ताओं को नौकर समझा गया और उन्हें सेल्समैन बनाया गया।
13.    संस्थाओं को बदनाम करने के उद्देश्य से उन्हें एक काल्पनिक संगठन ‘क्रांतिकारी कम्यूनिष्ट लीग’ से जुड़ा बताया।
14.    कार्यकर्ताओं को दम घोंटू माहौल में अवसादग्रस्त बनाने का आरोप।
15.    अवैतनिक कर्मचारियों द्वारा धनउगाही करने का आरोप।
16.    अरविन्द सिंह के नाम पर धन उगाही का आरोप।
17.    लोगों के घर और संपत्ति हड़पने का आरोप।
18.    अरविन्द सिंह, शालिनी, कमला पाण्डे, विश्वनाथ मिश्र की मृत्यु के जिम्मेदार इन लोगों को बताया।
19.    आपराधिक गिरोह संचालित करने का आरोप।

उक्त ब्लागों के सावधानी पूर्ण अध्ययन से यह स्पष्ट है कि हमारे मुवक्किलों 4,5,6 को निजी तौर पर और 1,2,3 सामाजिक संस्थाओं को जानबूझकर क्षति पहुंचाने के ध्येय से झूठी, अनर्गल बातें लिखी गई है। हमारे मुवक्किल जिनकी बहुत अच्छी सामाजिक छवि है, उसे बहुत नुकसान पहुंचा और उन्हें विकास करने और आगे बढ़ने में रूकावट आयी।

प्रतिवादी नं0-1, जो जनज्वार का संपादन करते हैं, चाहते तो इस कुत्सा प्रचार को नियंत्रित कर सकते थे, लेकिन जानबूझकर इस झूठे अनर्गल बातों को प्रचारित किया। हालाकि हमारे मुवक्किलयों की सामाजिक हैसियत बेहिसाब हे, फिर भी यदि बहुत उदारता पूर्वक मूल्यांकन किया जाय तो यह प्रति मुवक्किल 25 लाख रूपये होती है। प्रतिवादी नं0 1 से 4 तक इस कुत्सा प्रचार में शामिल है, वे इस नोटिस को पाने के एक सप्ताह के भीतर इस रकम का भुगतान करें, नहीं तो कोर्ट के माध्यम से वसूली की जायेगी, और उन्हें उचित सजा दिलवाया जायेगा।
    
इस रकम के भुगतान के साथ प्रतिवादीगण कुत्सा प्रचार का काम तुरन्त बंद करें और हमारे मुवक्किलों से क्षमा याचना करें, और उसे समाचार पत्रों में प्रकाशित करवायें, नहीं तो हम न्यायालय में इस क्षतिपूर्ति के लिये जायेंगे और प्रतिवादियों को दण्डित करवायेंगे।

भवदीय

(अनूप गुरूनानी)
एडवोकेट,लखनऊ

बिजनेस भास्‍कर के पांच साल पूरे, संपादक ने गिनाई चुनौतियां

दैनिक भास्कर समूह का 'बिजनेस भास्कर' अपने प्रकाशन के पांच वर्ष पूरे कर चुका है। आज से यह छठे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। बिजनेस भास्कर ने हिंदी बिजनेस पत्रकारिता में जब पहला कदम रखा, तभी दुनियाभर में आर्थिक सुस्ती की शुरुआत हुई थी।

इस लिहाज से हमें पहले कदम से ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालात अब भी बहुत अच्छे नहीं हैं। बल्कि यूं कहें कि अब तो परिस्थितियां पहले के मुकाबले और जटिल हो गई हैं। अमेरिका में सुधार है तो यूरोप अब भी भंवर में है।

एशिया में निर्यात आधारित अर्थव्यवस्थाएं मुश्किल में हैं लेकिन चीन और भारत अपेक्षाकृत बेहतर अवस्था में हैं। ऐसे ही जटिल हालात में बिजनेस भास्कर की अहमियत बढ़ी। लोगों को जरूरत महसूस हुई एक ऐसे साथी की जो उनका हमकदम बन सके, उनकी आमदनी में इजाफा कर सके। आर्थिक शब्दों के आडंबर से आक्रांत पाठक चीजों को सहज और सरल भाषा में समझना चाहते थे।

बिजनेस भास्कर ने इसमें उनकी बखूबी मदद की। इसका सुबूत पाठकों के वे पत्र हैं जिन्होंने हमारे सुझावों से फायदा उठाने के बाद हमें धन्यवाद के रूप में भेजे। यानी हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि बिजनेस भास्कर 'भरोसे का अखबार' बनने में कामयाब रहा है।

बदलाव सृजन का ही एक रूप है। बीते पांच वर्षों में हालात काफी बदले हैं। विश्व अर्थव्यवस्था पर मंदी की छाया दूर जाती दिख रही है, हालांकि सुस्ती बरकरार है। इससे निपटने के लिए भारत में भी सुधारों को नई दिशा देने की कोशिश की गई। इसके लिए फाइनेंशियल इन्क्लूजन को अहम जरिया माना गया। लेकिन बिजनेस भास्कर ने इस जरूरत को बहुत पहले महसूस कर लिया था।

इसीलिए छोटे और मझोले कारोबारियों के रूप में एक नया पाठक वर्ग बनाया गया। बड़ी कंपनियों की बात तो सभी करते थे, लेकिन एसएमई की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती थी। हमने एसएमई और आम आदमी से जुड़े मुद्दों और फैसलों को प्रमुखता दी। हमें खुशी है कि इन वर्गों में बिजनेस भास्कर की अच्छी पैठ बनी।

अक्सर कहा जाता है कि अपने देश में नीति निर्माताओं को उन लोगों की हकीकत का पता नहीं होता जिनके लिए वे नीतियां बनाते हैं। इस लिहाज से हमने कई मौकों पर नीति नियंताओं की भी मदद की। मसलन, मल्टीब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश के मसले पर हमने जनमत को सरकार तक पहुंचाया।

बिजनेस भास्कर ने शुरूआत से ही पर्सनल फाइनेंस यानी पैसे का हिसाब-किताब या दूसरे शब्दों में कहें तो आमदनी बढ़ाने पर खास ध्यान दिया है। इन पांच वर्षों में इस लिहाज से भी कई बदलाव हुए। शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड के साथ कमोडिटी भी निवेश का अहम जरिया बनी।

बांड में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी। बीमा की उलझनें कम हुईं और उपभोक्ताओं की जरूरतों के मुताबिक उत्पाद आए। स्टॉक मार्केट में छोटे निवेशकों को लाने की कवायद तेज हुई। हमने इस क्षेत्र के बदलावों से न सिर्फ पाठकों को रू-ब-रू कराया बल्कि उन्हें बेहतर निवेश के गुर भी बताए।

इन पांच वर्षों में बिजनेस भास्कर हिंदी का सबसे बड़ा मौलिक बिजनेस अखबार बनने में कामयाब रहा है। इस अवसर पर हम बिजनेस भास्कर परिवार की ओर से सभी पाठकों का आभार प्रकट करते हैं और उनका शुक्रिया अदा करते हैं। उम्मीद है कि आपके सुझाव हमें पूर्ववत मिलते रहेंगे।

धन्यवाद

एस.के. सिंह
स्थानीय संपादक

साभार : बीबी

संत समीर, अजीत वेडनेरकर एवं विश्‍वनाथ सचदेव को राष्‍ट्रीय पत्रकारिता पुरस्‍कार

माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल के प्रतिष्ठित ‘महेश गुप्ता राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार’, ‘लाल बलदेव सिंह राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार’ तथा ‘माधवराव सप्रे राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार’ इस वर्ष हिन्दी पत्रकारिता के तीन विशिष्ट शब्दकर्मियों ‘कादम्बिनी’ (दिल्ली) के मुख्य कॉपी सम्पादक व समाजकर्मी सन्त समीर, ‘अमर उजाला’ (बनारस) के सम्पादक ‘अजीत वेडनेरकर’ और ‘नवभारत टाइम्स’ (मुम्बई) के पूर्व सम्पादक विश्वनाथ सचदेव को प्रदान किए गए।

ये सम्मान सप्रे संग्रहालय के 30वें स्थापना दिवस के मौके पर भोपाल में आयोजित एक सम्मान समारोह में मध्य प्रदेश के संस्कृति मन्त्री लक्ष्मीकान्त शर्मा ने दिए। ज्ञातव्य है कि सन्त समीर की समाचारपत्रों में भाषा की वर्तनी पर केन्द्रित ‘हिन्दी की वर्तनी’ तथा अजीत वेडनेरकर की ‘शब्दों का सफर’ हाल के दिनों में अपने विषय की सर्वाधिक चर्चित पुस्तकें रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव को हिन्दी पत्रकारिता में उनके अवदान के लिए सम्मानित किया गया।

संत समीर पुरस्‍कार लेते हुए
अजीत वेडनेरकर पुरस्‍कार लेते हुए
विश्वनाथ सचदेव पुरस्‍कार लेते हुए

जनसंदेश टाइम्‍स, महाराजगंज के दफ्तर में लगा ताला

महारागंज से खबर है कि वहां जन्संदेश टाइम्स के दफ्तर में ताला लग गया है. दफ्तर में एक नहीं तीन-तीन ताले लगे हैं. पहला ताला मकान मालिक का है, दूसरा ताला जिला प्रभारी का है और तीसरा ताला फोटोग्राफर का है. मकान मालिक किराए के लिए और फोटोग्राफर अपने वेतन के लिए दफ्तर में ताला जड़ दिए हैं. जिलाप्रभारी अपने लिए दूसरे अखबार में ठौर के जुगाड़ में लग गए हैं.

बताया जा रहा है कि जन्संदेश की हालत ठीक नहीं चल रही है. उसमें काम करने वाले ही अब जनसंदेश को शोक सन्देश कहने लगे हैं. कर्मचारियों और पत्रकारों को समय से वेतन न मिलने से बहुत परेशानी खड़ी हो गयी है. जो लोग शैलेन्द्र मणि की ख्याति और ग्लैमर देख कर जागरण को अलविदा कर जन्संदेश ज्वाइन किये सभी पछता रहे है. जिला और तहसीलों में स्थित दफ्तरों की हालत ठीक नहीं है. महाराजगंज की तालाबंदी बहुत कुछ बया कर रही है.

जी समूह लांच करेगा अपना रीजनल चैनल जी न्‍यूज राजस्‍थान

जी न्‍यूज ग्रुप जल्‍द ही एक और रीजनल चैनल लांच करने जा रहा है. राजस्‍थान में विधानसभा चुनाव को देखते हुए जी समूह जी न्‍यूज राजस्‍थान जल्‍द लांच करने जा रहा है. इसके लिए नियुक्तियां भी आखिरी दौर में है. हाल ही में चैनल गोयल समूह से अलग होने के बाद एमपी-सीजी रीजनल चैनल लांच किया है.

सूत्रों का कहना है कि जल्‍द ही राजस्‍थान चैनल को टेस्‍ट रन पर भेजा जाने वाला है. इसके बाद समूह बिहार चैनल लांच करेगा. बताया जा रहा है कि राजस्‍थान, बिहार के बाद भी जी समूह अन्‍य कई राज्‍यों में अपने रीजनल चैनल लांच करेगा.

उत्‍तराखंड त्रासदी पर सोनिया और बहुगुणा के हंसते फोटो को लेकर बवाल

उत्तराखंड त्रासदी से पूरे देश में शोक की लहर है वहीं देश के माननीय नेताओं के राहत पहुंचाने के दावों के मुस्कुराते हुए विज्ञापन हैं. जी हां ऐसा वाक्या पेश आया है उत्तराखंड सरकार ने छवि सुधारने के लिए लाखों खर्च करके अखबारों में जो विज्ञापन छपवाए हैं उनमें सोनिया गांधी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की मुस्कुराती हुईं तस्वीरें छापी गईं.

दोनों नेताओं की मुस्कुराती तस्वीरों के चलते उत्तराखंड सरकार लोगों के निशाने पर है. इसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी तस्वीर है.ये तस्वीरें लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही हैं. हालांकि बाद में उत्तराखंड सरकार ने इस गलती को सुधारते हुए मंगलवार को अखबारों में नया विज्ञापन जारी किया.

उत्तराखंड सरकार ने 'मुसीबत की घड़ी में साथ रहने की प्रतिज्ञा' वाले विज्ञापन में आम लोगों तक पहुंचाई गई राहत के बड़े-बड़े दावे किए गए हैं. सेना से आगे सरकार का नाम जोड़ते हुए 83 हजार लोगों को बचाने का दावा किया गया है, जबकि साफ है कि यह रेस्क्यू ऑपरेशन सेना के बलबूते ही चल रहा है. लोगों को सरकारी अधिकारी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं.

किसी तरह जान बचाकर आए लोग भी स्थानीय प्रशासन को कोस रहे हैं, जबकि सेना के जवानों को दुआएं दे रहे हैं. हाल इतना बुरा है कि बहुगुणा सरकार अपने काम का बखान भी ठीक से न कर सकी. विज्ञापनों में वर्तनी की भी गलतियां हैं. जिसे लोगों ने मूर्खतापूर्ण और असंवेदनशील करार दिया है.

इस एड कैंपेन में खामियां सिर्फ फोटो तक सीमित नहीं थी. इन एड में वर्तनी में चौंकाने वाली गलतियां थी. पहले दिन, Uttarakhand की जगह "Uttrakhand" छपा. वहीं, "relief measures" बन गया "relief measurers". हालांकि, मंगलवार को राज्य का नाम तो सही हो गया पर "relief measurers" अपनी जगह पर बना रहा. ऐसे में जब एक एक पैसे की मदद पीड़ितों को राहत पहुंचा सकती है ऐसे में सिर्फ कोरी विज्ञापनबाजी पर लाखों रुपये पानी में बहा देना कहां तक उचित है. (सहारा)

राष्‍ट्रीय शोक है यह आपदा, 30 जून को पहुंचे जंतर-मंतर

भूकंप से लाटूर में 20 हजार मौतें हुईं- कोई राष्‍ट्रीय शोक नहीं। कच्‍छ और भुज में वर्ष 2000 में आए जलजले ने बीस हजार लोगों को बेवजह लील लि‍या, 'राष्‍ट्र' की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। सुनामी में तकरीबन साढ़े दस हजार लोग अकाल मौत के शि‍कार हो गए, उसे राष्‍ट्रीय आपदा घोषि‍त कि‍या गया, फि‍र भी सत्‍ता प्रति‍ष्‍ठान का कलेजा नहीं पि‍घला।

अब अगर ताउम्र समाज को गंदा करने वाले और हमारी जेब कतरने वाले कि‍सी नेता की मौत हो गई होती तो सत्‍ता में शीर्ष पर बैठे लोगों का कलेजा बाहर आ जाता। उसके शोक में छुट्टी से लेकर ति‍रंगा झुकाने तक की हर रस्‍म पूरी की जाती। इतना ही नहीं, दो ढाई एकड़ जमीन पर उसकी समाधि बनाकर उसे देश पर हमेशा के लि‍ए थोप दि‍या जाता।

उत्‍तराखंड में बरसे पहाड़ से पूरा देश स्‍तब्‍ध है, क्षुब्‍ध और दुखी है। बच्‍चों से लेकर बुजुर्गों तक की आंखों में सवाल ही सवाल है। क्‍यों हुआ ऐसा, और अब क्‍या होगा। पहाड़ों में लोगों का मरना बदस्‍तूर जारी है, पर सरकार इस पीड़ा को महसूस करती दि‍खाई ही नहीं दे रही है। राहत के लिए देश का खजाना भले ही खोल दि‍या गया हो, पर ये तो सभी जानते हैं कि अभी इसमें कि‍तनी बंदरबांट होगी। मनमोहन-सोनि‍या ने हवाई सर्वे करके अपने कर्तव्‍यों पर जो फुलस्‍टॉप लगाया है, उसका असर पूरी सरकारी मशीनरी पर अभी से देखा जा रहा है। शुक्र है कि हमारे जवान वहां हैं, नहीं तो स्‍थि‍तियां और भी ज्‍यादा वि‍कट होतीं।

देश के झंडा कोड में यहां तक की व्‍यवस्‍था है कि अगर कोई वि‍देशी नेता भी मरे तो राष्‍ट्रीय शोक घोषि‍त कि‍या जा सकता है। जि‍न लोगों के नाम पर हमारा देश दुनि‍या का सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाता है, क्‍या उनकी इतने बड़े पैमाने पर हुई मौतें राष्‍ट्रीय शोक के लायक नहीं हैं। अगर देश में वाकई लोकतंत्र है, तो सीधी सी बात है, कि उत्‍तराखंड में हुई मौतें इसकी हकदार हैं। सरकार अगर घड़ि‍याली आंसू नहीं बहा रही तो साबि‍त करे कि वो वाकई गमजदा है।

आखि‍र ये लोकतंत्र का कौन चेहरा है। कौन से तंत्र की है यह सरकार जो अपने हजारों लोगों की मौत से दुखी नहीं होती। नेताओं की मौत पर तो ति‍रंगे को झुकाने का पैमाना झंडा कोड में बना लि‍या गया, मासूमों की मौत पर कि‍सी कोड में कोई जि‍क्र करना भी नहीं ठीक समझा। अमेरि‍का में पि‍छले दि‍नों आए तूफान में हुई मौतों के बाद राष्‍ट्रीय शोक घोषि‍त हुआ और खुद ओबामा उसकी शोक सभा में शरीक हुए। 15 जून के बाद से कैबि‍नेट की कम से कम दो बैठकें हो चुकी हैं, जि‍नमें दो मि‍नट का मौन भी नहीं रखा गया।

आप अगर इस नजरिये से सहमत हैं और चाहते हैं कि केंद्र सरकार इस दिशा में पहल करे तो अगली ३० जून को १२ बजे जंतर-मंतर पहुंचे। इस मौके पर उत्तराखंड के मृतकों को श्रद्धांजलि देने के साथ ही राष्ट्रीय शोक घोषित करने और पहाड़ो के विनाश की समीक्षा की मांग होगी।

उस दिन दोपहर में ही ‘आज’ अखबार का बंडल उतरते देखकर अजीब लगा

Shambhunath Shukla : सावधान! आपातकाल लागू है। साल 1975 तारीख 26 जून। दोपहर के ढाई बज रहे थे। अपना अखबारी बुलेटिन नया मोर्चा छोड़ने का समय हो रहा था। इसे हम चार पांच एमएल के विचारों के हामी लेकिन डेमोक्रेटिक मूल्यों में यकीन करने वाले साथियों ने निकाला था। इसमें एक लघु उद्यमी अजय सहगल, मजदूरों के बीच काम कर रहे पीयूषकांत सूर उर्फ मोना दा, कामरेड सुमनराज और साथी दिनेश चंद्र बंधु ने निकाला था।

हम इसकी 500 प्रतियां छापते, जिसकी लागत करीब ढाई सौ रुपये आती। हम खुद ही इसे आईआईटी व मेडिकल कालेज में समान विचारों वाले छात्रों को बेच आते। हम इसकी एक प्रति आठ आने में बेचते इस तरह लागत तो निकाल ही लेते। यहा पेपर साप्ताहिक था। उस दिन हम प्रिंटिंग मशीन से सारी कापियां निकल आने का इंतजार कर रहे थे ताकि फटाफट उन्हें अपने शुभचिंतकों को बांट आएं। कुछ ही देर पहले ज्ञान वैष्णव ढाबे से हम दोपहर का खाना खाकर लौट रहे थे तो रास्ते में जयहिंद टाकीज के पास एक मेटाडोर से आज अखबार के बंडल उतरते हुए देखा तो अजीब लगा कि दोपहर के समय ये बंडल क्यों उतारे जा रहे हैं।

हमें अपने अखबार को छोडऩे की जल्दी थे इसलिए हम बिना कुछ पता किए आ गए शंकर प्रिंटर्स और उसके मालिक से कहने लगे कि जल्दी हमारा अखबार छुड़वा दें। शंकर प्रिंटर्स कानपुर में गुमटी नंबर पांच के एक शापिंग कांप्लेक्स के बेसमेंट में था। तभी दूर से आती हाकर्स की आवाज आई आज की ताजा खबर, आज की ताजा खबर हम भागकर ऊपर आए और ताजा खबर यानी आज का उस दिन का स्पेशल बुलेटिन खरीद लिया। उसमें आठ कालम में बैनर था आपातकाल लागू। यह पढ़ते ही हम सन्न रह गए। शंकर प्रिंटर्स के मालिक ने मशीन बंद की और अपने छापाखाने पर ताला डालकर चले गए। हमें 12 जून के बाद से ही यह अंदेशा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में हार के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार को बचाए रखने के लिए कोई अप्रत्याशित कदम उठाएंगी पर इमरजेंसी लगाने को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद राजी हो जाएंगे यह नहीं सोचा था।

कांग्रेस के तमाम मंत्री ऐसा कदम उठाए जाने के खिलाफ थे पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय और संजय गांधी इसके प्रबल समर्थकों मे से थे। पर इंदिरा जी पुत्र प्रेम में इस कदर अराजनीतिक कदम उठा लेंगी यह हम नहीं सोच पा रहे थे। कुछ ही देर में पुलिस चारों तरफ फैलने लगी। शंकर प्रिंटर्स भी आई पर वहां ताला लगा था। हमें तो वह पहचानती नहीं थी लेकिन अंदेशा था कि घर में पुलिस आ सकती है इसलिए हमने एक दोस्त को घर भेजा और कहलवा दिया कि बता देना शंभू गांव गए। क्योंकि हमारे साथियों ने तय किया था कि अब हमें यूजी यानी अंडरग्राउंड हो जाना चहिए। वह रात तो हमने शहर में ही मोना दा के एक परिचित के यहां काटी। यह एक शुक्ला परिवार था। घर के मालिक समृद्ध व्यापारी थे और उनको राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। पर मालकिन मोना की सिंपेथाइजर थीं। वे ढलती उम्र की एक भली और धार्मिक महिला थीं।

उन्हें यह नहीं पता था कि कामरेड मोना की पालिटिक्स क्या है लेकिन उन्हें लगता था कि मोना एक भला काम कर रहा है इसलिए वे मोना को आर्थिक मदद भी किया करती थीं। हम उस रात वहीं रुके और सुबह सब को कहा गया कि अपने-अपने ठिकाने तलाशो। मैंने सुबह झांसी पैसेंजर पकड़ी और कानपुर के बाद के पांचवें स्टेशन तिलौंची उतर कर अपने गांव चला गया। दादी-बाबा इस तरह मेरे अचानक आ जाने से कुछ परेशान हुए पर मैंने समझा दिया कि कुछ दिन रुकूंगा। फिर जल्दी ही अपना गांव छोड़कर अपने पिताजी की मौसी के गांव अंगद पुर आ गया। पिताजी के मौसा अंगदपुर के टंडन परिवार के कारिंदा थे। अच्छी खासी जमीन थी उनके पास और बाग बगीचे ऊपर से। वे निसंतान थे और पिताजी को बहुत पसंद करते थे। चाहते थे कि पिताजी यहीं आकर रहें। मेरी अपनी दादी भी चाहती थीं कि उनकी छोटी बहन उनके चार बेटों में से एक को गोद ले लें ताकि उनकी गरीबी मिटे। लेकिन पिताजी की मौसी अपने भाई को अपने यहां रखना चाहती थीं इसलिए मौसा की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने भाई को बुला लिया। पर मेरे से उनका लगाव था इसलिए मैं इमरजेंसी के दौरान अंगदपुर रहा जाकर। पर वहां न तो अखबार था न ही संचार के अन्य साधन।

हालांकि अंगदपुर अब एनएच-2 के किनारे अब आ गया है और अखबार, रेडियो और टीवी के सारे साधन वहां उपलब्ध हैं। धीरे-धीरे मैं अपने अन्य साथियों की कमी के कारण बोर होने लगा लेकिन बिना पुख्ता सूचना के कानपुर जाना खतरे से खाली नहीं था। पढ़ाई भी अधूरी छूटी हुई थी और उम्र कुल बीस की। तभी एक दिन बाबा आए और घोषणा कर गए कि शंभू की शादी कर देने का फैसला किया है। पिताजी आए तो मैंने पूछा उन्होंने कहा कि लड़की देख लो। मैंने विरोध किया कि खिलाएगा पिलाएगा कौन? वे बोले अभी तुम्हारा खर्चा कौन उठाता है तो जैसे तुम्हारा खर्च उठाया जा रहा है वैसे ही एक और प्राणी का खर्च उठाया जाएगा। मैं कानपुर आ गया। अब यहां सब कुछ सामान्य था। एक कांग्रेसी मित्र से पूछा तो उसने कहा कि मजे करो यहां गोविंद नगर पुलिस की यह औकात नहीं कि तुम पर हाथ धरे लेकिन उस सीपीआई वाले तिवारी से न मिलना वह पुलिस का मुखबिर है।

दरअसल उस समय सीपीआई (एमएल) और सीपीएम तो कांग्रेस के खिलाफ थे लेकिन सीपीआई सोवियत संघ के चलते इंदिरा गांधी और इमरजेंसी की समर्थक। मैं एक दिन आईआईटी भी गया वहां श्रीनिवास से मिला पता चला कि आजकल वे कणाद दर्शन पर शोध कर रहे हैं और सुनील सहस्त्रबुद्धे गांधी दर्शन पर। यानी एमएल के सारे कार्यकर्ता अचानक दार्शनिक हो गए हैं। कामरेड शिवकुमार मिश्र जरूर डटे थे पर उनका भी बाद में मोहभंग हो गया। अगले साल इमरजेंसी के दौरान ही मेरी शादी हो गई और जिससे हुई वह मेरे ही कालेज में पढ़ चुकी थी। यह इमरजेंसी विचारों के साथ ही मेरे जीवन में अनुशासन लाने वाली तो रही ही।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ला के एफबी वॉल से साभार.

मंगल कलश की एच आर हेड बनीं दीपिका शर्मा, नईदुनिया से कृष्‍णपाल का इस्‍तीफा

धार्मिक चैनल मंगल कलश में कई तब्दीलियों की खबर आ रही है। मैनेजमेन्ट चैनल को रफ्तार देने में लग गया है। इसके लिए एचआर हेड के तौर पर दीपिका शर्मा को लाया गया है। दीपिका इससे पहले कई चैनलों के साथ काम कर चुकी हैं। टोटल टीवी, टीवी-100, मनोरंजन टीवी आदि चैनलों में उन्होंने वरिष्ठ पदों पर काम किया है।

दीपिका ने आते ही चैनल को व्यवस्थित करने का काम शुरू कर दिया है। चैनल में स्टॉफ बढ़ाने का काम भी उनके जिम्मे दिया गया है। चैनल अपने विस्तार की ओर कदम बढ़ा रहा है। इसके तहत मार्केटिंग की टीम को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया जा रहा है।

दूसरी तरफ इंदौर से खबर है कि नईदुनिया से कृष्‍णपाल सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है। उनके इस्‍तीफे का कारण नहीं पता चल पाया है। वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। वे काफी समय से नई दुनिया के साथ जुड़े हुए थे।

सीजेएम ने सहारा क्‍यू शॉप के डाइरेक्टर खिलाफ केस में रिपोर्ट मंगाई

सीजेएम लखनऊ प्रमोद कुमार ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा सहारा क्यू शॉप यूनिक प्रोडक्ट्स रेंज लिमिटेड, मुंबई के डाइरेक्टर के खिलाफ थाना गोमती नगर, लखनऊ में धारा 500 आईपीसी में दर्ज मानहानि सम्बंधित एनसीआर में रिपोर्ट मंगवाई है. मामले की अगली सुनवाई 01 जुलाई को होगी.

नूतन ने सीजेएम से धारा 155(2) सीआरपीसी के तहत इस असंज्ञेय अपराध में विवेचना कराये जाने की प्रार्थना की. प्रार्थनापत्र में कहा गया कि यदि इस प्रकरण में अग्रिम विवेचना नहीं कराई गयी तो अभियुक्त का मनोबल काफी बढ़ेगा और डाइरेक्टर द्वारा उन्हें और उनके पति आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को सहारा क्यू शॉप के खिलाफ जनहित में सेबी तथा कंपनी रजिस्ट्रार, मुंबई को शिकायत करने पर बिना आधार के सफेदपोश उगाही करने वाला बताने के बारे में उनका दोष निर्धारण नहीं हो सकेगा.

पूर्व में अमिताभ और नूतन ने डाइरेक्टर, सहारा क्यू शॉप को ऐसे शब्द प्रयोग करने पर 01 फ़रवरी और  02 मई 2013  को नोटिस भेज कर अपने आरोपों के पक्ष में तथ्य प्रस्तुत करने या गलती स्वीकार करने को कहा. उनके द्वारा कोई उत्तर नहीं मिलने पर नूतन ने इन शब्दों को अपनी ख्याति की अपहानि बताते हुए एफआईआर दर्ज कराया था.

न्यूज़ एक्सप्रेस के टेक्निकल सेटअप की दुनिया भर में धूम

देश का पहला राष्ट्रीय हाई डेफ्नीशियन यानी एचडी चैनल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इसमें इस्तेमाल की गई टेक्नाल़ॉजी और उपकरणों को लेकर प्रशंसात्मक लेख प्रकाशित हो रहे हैं। चैनल की तारीफ़ की मुख्य वजह बहुत कम कीमत पर एचडी टेकनालॉजी से उसका लैस होना है।

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व में ऐसा पहली बार हुआ है कि इतनी किफ़ायत के साथ कोई एचडी चैनल लगाया गया हो और दो साल तक उसमें किसी तरह की कोई समस्य़ा पैदा न हुई हो। चैनल के टेक्निकल डायरेक्टर श्याम साल्वी की सही उपकरणों के चयन, उनके इंटीग्रेशन और सफल संचालन के लिए तारीफ़ की गई है। साल्वी अब तक 16 से ज्यादा चैनल स्थापित कर चुके हैं।

न्यूज़ एक्सप्रेस सन् 2011 में 28 जुलाई को शुरू हुआ था और अपनी टेक्नालाजी एवं ठोस कंटेंट की वजह से छह महीने के अंदर ही वह देश के टॉप 10 चैनलों में शुमार हो गया था। प्रकाशित लेखों में चैनल में लगे अत्याधुनिक उपकरणों की भी विस्तार से बात की गई है। स्नेल विलकाक्स के उपकरण गुणवत्ता के मानदंड पर सर्वोच्च माने जाते हैं और न्यूज़ एक्सप्रेस में लगाए गए हैं।

न्यूज़रूम आटोमेशन इएनपीएस, क्वांटल सर्वर, विज़ारटी ग्राफिक्स का कंबिनेशन सफलतापूर्वक काम कर रहा है। देश और दुनिया के बहुत सारे चैनलों ने न्यूज़एक्सप्रेस के टेक्निकल सेटअप को देखा और सराहा है।  जिन पत्र-पत्रिकाओं  में चैनल के टेक्निकल सेटअप  और उपकरणों के बारे में  सामग्री छपी है वे हैं-

Wall Street Communication Press (USA), Snell (UK), Screen Africa (South Africa) , Content + Technology (Asia Pacific). Broadcast Engineering (Worldwide), IBE (UK), APB( Asia), Broadcasting News, tv-bay( US/UK),TV News Check, Indianmediabook,page2rss, Broadcast Show

Publisher Link:

http://www.snellgroup.com/news-and-events/press-releases/

http://www.screenafrica.com/page/news/tv-and-video-production-technology/1629367-Production-at-News-Express-TV#.Ub9QNPlpnxo

http://www.tvnewscheck.com/playout/2013/06/snell-powers-indias-first-all-hd-news-channel/

http://page2rss.com/1c825ef304988bc23317c6cf6ab5c48f

http://www.industriesnews.net/story?sid=s215254741&cid=19

http://www.content-technology.com/asiapacificnews/?p=4879

http://www.ibeweb.com/NewsArticle.aspx?ArticleID=24b5c43c-0475-472e-9722-4e63e5ee5231

http://broadcastengineering.com/switchers/news-express-tv-selects-snell-technology

http://www.apb-news.com/news/management-home/item/1544-snell-drives-india%E2%80%99s-%E2%80%9Cfirst%E2%80%9D-all-hd-news-channel.html

http://tv-bay.com/news/Snell_Innovation_Drives_Production_Switching__Master_Control__and_Playout_for_News_Express_TV__Indias_First_All-HD_News_Channel/7118.html

http://www.broadcastshow.com/news/Snell_Innovation_Drives_Production_Switching__Master_Control__and_Playout_for_News_Express_TV__Indias_First_All-HD_News_Channel/7118.html

प्रेस रिलीज

दैनिक जागरण ने छापी सनसनी फैलाने वाली खबर!

दैनिक जागरण का बदायूं कार्यालय बड़े लोगों से जुड़ी खबरों में भले ही खेल करता हो, लेकिन सनसनी फैलाने में कोई कसर नहीं छोडता। बिना किसी आधार के बदायूं के तार हैदराबाद बम धमाके से जोड़ दिये, जिससे अधिकांश लोग आश्चर्यचकित हैं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आतंकवादी बदायूं में भी हैं। खबर का कोई आधार नहीं है, इसलिए संपादक ने अंदर के पेज पर भी खबर को लीड नहीं बनाया, लेकिन खबर में हैदराबाद धमाके का फाइल फोटो छाप कर सनसनी फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

असलियत में पूर्व क्राइम रिपोर्टर अमित सक्सेना शराब नहीं पीते और न ही पुलिस की दलाली करते हैं, जिससे ब्यूरो चीफ ने आते ही क्राइम रिपोर्टर अमित सक्सेना से क्राइम बीट लेकर फोटोग्राफर ग्रीश पाल को दे दी, जिनका न्यूज सेंस भी बहुत ठीक नहीं है और न ही सही से हिन्दी लिख पाते हैं, तभी इस सनसनी फैलाने वाली खबर में भी पम्‍पलेट को पंफलेट लिखा है, जिसे पढ़ कर अधिकांश लोग चुटकी लेते देखे गए।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

हिंदुस्‍तान, चंदौली के विज्ञापन एजेंट तथा उसकी पत्‍नी पर पिता ने किया जानलेवा हमला

चंदौली जिले से खबर है कि हिंदुस्‍तान के जिला विज्ञापन एजेंट रहमान तथा उनकी बीबी पर उनके पिता ने ही जानलेवा हमला किया है. चापड़ से किए गए हमले पति-पत्‍नी गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. बताया जा रहा है कि यह हमला घरेलू विवाद में किया गया है. रहमान तथा उनकी बीबी का इलाज सकलडीहा में चल रहा है. लोगों में चर्चा है कि आखिर ऐसा कौन सा कारण पैदा हो गया कि बाप को अपने इकलौते पुत्र पर जानलेवा हमला करने की नौबत आ गई. हालांकि रहमान की तरफ से एफआईआर दर्ज नहीं कराए जाने के चलते पुलिस ने आरोपी पिता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है.

जानकारी के अनुसार चंदौली जिले के सकलडीहा थाना क्षेत्र के डेढगांवा में रहने वाले तथा हिंदुस्‍तान के विज्ञापन की जिम्‍मेदारी देखने वाले रहमान बुधवार की सुबह तैयार होकर घर से कार्यालय जाने के लिए निकल ही रहे थे कि अचानक उनके पिता ने उनके ऊपर धड़ाधड़ चापड़ से वार कर दिया. रहमान किसी तरह जान बचाकर बाहर भागे अन्‍यथा उनकी जान भी जा सकती थी. इसके बाद नाराज पिता ने उनकी पत्‍नी पर भी हमला कर दिया. किसी तरह शोर शराबा सुनकर लोग पहुंचे तथा दोनों को बचाया.

गंभीर रूप से घायल रहमान तथा उनकी पत्‍नी को सकलडीहा हास्‍पीटल में भर्ती कराया गया है, जहां दोनों का इलाज चल रहा है. दम्‍पति की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है. हालांकि रहमान पर इसके पहले भी एक बार हमला हो चुका है. उनकी छवि क्षेत्र में थोड़ी विवादित मानी जाती है. हालांकि सबसे ज्‍यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर ऐसा कौन सा घरेलू विवाद था, जिसकी वजह से एक पिता ने अपने इकलौते पुत्र तथा उसकी पत्‍नी का जान लेने पर उतारू हो गया. हमले की जानकारी मिलने के बाद पुलिस आरोपी पिता को पकड़ कर कोतवाली ले आई, लेकिन रहमान की तरफ से मामला नहीं दर्ज कराए जाने के चलते उन्‍हें छोड़ दिया गया.

उपमा सिंह एवं सौरभ त्रिपाठी ने लखनऊ में नभाटा ज्‍वाइन किया

दैनिक भास्‍कर, लुधियाना से खबर है कि उपमा सिंह एवं सौरभ त्रिपाठी ने इस्‍तीफा दे दिया है. दोनों लोग अपनी नई पारी लखनऊ में नवभारत टाइम्‍स के साथ शुरू कर चुके हैं. उपमा दैनिक भास्‍कर में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थीं. नभाटा में उन्‍होंने सीनियर करेस्‍पांडेंट के पद पर ज्‍वाइन किया है. वे इसके पहले लंबे समय तक लखनऊ में अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे चुकी हैं.

सौरभ ने भी नभाटा ज्‍वाइन कर लिया है. सौरभ भास्‍कर के साथ सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. उन्‍हें यहां भी उसी पद पर लाया गया है. वे आज समाज से इस्‍तीफा देकर दैनिक भास्‍कर से जुड़े थे.

Chief editor, reporter held for Rs 1 lakh extortion

MUMBAI: The chief editor and the reporter of a local magazine from Mira Road were arrested for extorting Rs 1 lakh from a hotelier in Borivali East on Monday. The reporter, AmitPanvar (29), was caught red-handed while accepting the sum. Police said Panvar and his editor, NityanandPandey, 40, had filed complaints against the hotelier, Rahat Khan, for running illegal activities.

Khan's hotel is based at Devipada in Borivali East. The two scribes first demanded a large sum of money from Khan and eventually settled at Rs 1 lakh. Khan had recorded their conversation and submitted it to the police. The accused-duo will be produced before a local court on Tuesday. Officials from the Kasturba Marg police station said the magazine had been running for the past five years. (टीओआई)

”कांग्रेसी नेताओं पर नक्‍सली हमला राजनीतिक साजिश”

रायपुर : केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने पिछले महीने दरभा क्षेत्र में कांग्रेस परिवर्तन यात्रा पर नक्सली हमले को राजनीतिक साजिश करार देते हुए कहा कि कुछ लोग कांग्रेस की सरकार बनने नहीं देना चाहते हैं। यह हमला न केवल नक्सली हमला था बल्कि सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हिस्सा था।

जयराम रमेश ने कहा कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस परिवर्तन यात्रा के माध्यम से फिर से कांग्रेस के पक्ष में काफी सकारात्मक माहौल बन रहा था लेकिन कुछ विचारधाराओं ने कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए इस तरह की साजिश रची। जयराम ने कहा कि इसके बावजूद कांग्रेस हार नहीं मानेगी और परिवर्तन यात्रा जारी रखेगी। जयराम ने यह भी कहा कि यहां कुछ गैर सरकारी संगठन काम कर रहे हैं। क्षेत्र में ठेकेदार और कुछ राजनीतिक दल के नेता नक्सलियों की मदद करते हैं। (एजेंसी)

पंजाब केसरी से इस्‍तीफा देकर अमर उजाला पहुंचे राकेश एवं सौरभ

हिमाचल में पंजाब केसरी से दो लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया है. पालमपुर में तैनात राकेश ठाकुर और सौरभ सूद ने संस्‍थान को बाय कर दिया है. राकेश सब एडिटर तथा सौरभ रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. दोनों लोगों ने अपनी नई पारी अमर उजाला, शिमला के साथ शुरू की है.

राकेश को यहां भी सब एडिटर बनाया गया है. वहीं सौरभ ने रिपोर्टर के रूप में ज्‍वाइन किया है. सौरभ की अमर उजाला के साथ यह दूसरी पारी है. इसके पहले भी वे अमर उजाला, जम्‍मू को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. तब वे डेस्‍क पर अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे थे.

कैग ने हुड्डा के दो मीडिया एडवाइजरों की नियुक्ति पर उठाया सवाल

चंडीगढ़ : सरकार के खर्चे का लेखा-जोखा रखने वाली संस्था, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की टेढ़ी नजर इस बार मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दो एडिशनल मीडिया एडवाइजरों पर है। कैग के प्रिंसिपल अकाउंट जनरल (ऑडिट) ने सरकार को पत्र लिखकर ये बताने के लिए कहा है कि आखिर इन नियुक्तियों की जरूरत क्या थी?

नौ अप्रैल 2013 को लिखे गए पत्र (क्रमांक एसएस/एमईएमओ-4/2013-14/3) में प्रिंसिपल अकाउंट जनरल ने कहा है कि २५ नवंबर 2009 को मुख्यमंत्री के दो एडिशनल मीडिया एडवाइजर नियुक्त किए गए। कैग जानना चाहती है कि इन नियुक्तियों की क्या जरूरत थी? गौरतलब है कि सुनील परती और केवल ढींगरा को मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का एडिशनल मीडिया एडवाइजर बनाने की नोटिफकेशन (1/15/05-आईपीपी) 25 नवंबर 2009 को जारी की गई थी।

नरेंद्र मोदी के चारण में लगा हुआ था आजतक

Vineet Kumar : कल दिनभर देश का नंबर वन और सबसे तेज चैनल आजतक नरेन्द्र मोदी के चारण में लगा हुआ था. वो जमकर सरकार की आलोचना करते हुए नरेन्द्र मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ रहा था. दिनभर चली इस स्टोरी में जीरो पर्सेंट रिपोर्टिंग थी और दरअसल अमेरिका की उसी apco worldwide पीआर कंपनी की तैयार की गई स्क्रिप्ट पर नाच रहा था और आपको सबसे भोथरा कर रहा था जिसे कि नरेन्द्र मोदी अपनी छवि दुरुस्त करने के लिए करोड़ों रुपये देते आए हैं.

अगर आपको इसी तरह की मैनेज्ड स्टोरी देखनी है तो टीवी छोड़कर थोड़ी और मेहनत कीजिए और उन पीआर एजेंसियों की वेबसाइट पर थोड़ा टहल आइए जो मीडिया को अपने पैरों की जूती बनाकर इमेज बिल्डिंग का काम करते हैं. आफ जिसे कांग्रेस वर्सेज बीजेपी का मामला देखते वो दो पीआर एजेंसियों के बीच की प्रतिस्पर्धा है.

विनीत कुमार के एफबी वॉल से साभार.

न्‍यूज एक्‍सप्रेस से नारायण परगाई बर्खास्‍त

न्‍यूज एक्‍सप्रेस से खबर है कि देहरादून के रिपोर्टर नरायण परगाई को बर्खास्‍त कर दिया गया है. उन पर गलत वीडियो भेजने का आरोप था. बताया जा रहा है कि चैनल हेड निशांत चतुर्वेदी ने इसे संस्‍थान के साथ धोखाधड़ी मानते हुए उन्‍हें हटा दिया. इसके पहले भी एक बच्‍चे के कंधे पर बैठकर पीटूसी देते नारायण विवादों में आ गए थे.

सूत्रों का कहना है कि नारायण ने इंदौर के पाताल पानी का वीडियो यू ट्यूब से अपलोड करके उसे एक्‍सक्‍लूसिव बताते हुए न्‍यूज एक्‍सप्रेस के नोएडा ऑफिस भेजा था. बताया जा रहा है कि यह विजुअल जब चैनल हेड ने देखा तो सन्‍न रह गए. सूत्रों का कहना है कि निशांत चतुर्वेदी इस घटना पर दो साल पहले ही एंकरिंग कर चुके थे, लिहाजा यह वीडियो तत्‍काल उन्‍होंने पहचान लिया. इसके बाद जांच हुई तो पता चला कि नारायण ने यह वीडियो एक्‍सक्‍लूसिव बताकर भेजा था.

इसके बाद चैनल हेड ने पत्रकार के इस कार्रवाई को अक्षम्‍य तथा संस्‍थान के साथ धोखाधड़ी मानते हुए तत्‍काल प्रभाव से निकाल बाहर कर दिया. नारायण इसके पहले भी एक बच्‍चे के ऊपर चढ़कर रिपोर्टिंग करते हुए विवादों में फंस गए थे. हालांकि यह वीडियो चैनल ने नहीं चलाया था.

दारोगा ने पत्रकार को अखबार से निकलवाया!

झांसी में पुलिस और पत्रकारों की बीच चल रहे विवाद के बीच खबर है कि पत्रकारों का साथ देने वाले एक क्राइम रिपोर्टर को प्रभारी दारोगा ने अखबार से निकलवा दिया. यह अखबार जमीन का धंधा करने वाला एक व्‍यक्ति निकालता है, लिहाजा दारोगा ने उसे फंसाने की धमकी देते हुए रिपोर्टर को निकलवा दिया. क्राइम रिपोर्टर इस घटना से बुरी तरह दुखी है. इस घटना से मीडिया की औकात भी पता चल जाती है.

गौरतलब है कि थाना शहर कोतवाली प्रभारी दरोगा जेपी यादव द्वारा गत दिनों एक महिला के आरोप पर आजतक चैनल के रिपोर्टटर अमित श्रीवास्‍तव पर बलात्‍कार के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया गया था. अमित को फर्जी मामले में फंसाकर जेल भेजे जाने से बौखलाए पत्रकार साथी दारोगा जेपी यादव को हटाने की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे. यहां दो कथित पत्रकारों के बवाल के बाद धरना-अनशन खतम हो गया. आरोप लगाया कि योजनाबद्ध तरीके से ही जेपी यादव ने इन दोनों पत्रकारों को भेजकर बवाल कराया तथा अपने खिलाफ चल रहे प्रदर्शन को खतम करवा दिया. इस मामले में पत्रकार हाशमी को भी जेल भेज दिया गया.

बताया जा रहा है कि यहीं से प्रकाशित एक अखबार में क्राइम रिपोर्टर का काम करने वाले राकेश वर्मा (बदला नाम) भी धरने में बढ़चढ़कर भाग लिया. बताया जा रहा है कि राकेश समेत कई पत्रकारों पर पुलिस ने दबाव बनाकर अनशन में भाग ना लेने की सलाह दी, लेकिन ये पत्रकार नहीं माने. बताया जा रहा है कि इसके बाद दारोगा ने अखबार के मालिक से संपर्क किया तथा राकेश को हटाने का फरमान सुनाया. हालांकि अपुष्‍ट आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि दारोगा ने राकेश को न हटाए जाने पर अखबार मालिक के कई जमीनों की पोल खोलने की धमकी भी दी. बताया जा रहा है कि इसके बाद राकेश को अखबार से हटा दिया गया. पीडि़त पत्रकार इस घटना से बहुत ही आहत है. वैसे आरोप है कि यह सारी कार्रवाई उनके ही अखबार के दो लोगों ने मिलकर करवाई है.

जयपुर से प्रकाशित होगा नेशनल न्‍यूज!

जयपुर से नेशनल न्यूज प्रकाशित होने की जबरदस्त चर्चाओं के बीच इस अखबार से राजधानी के कई पत्रकारों के जुड़ने की खबरें आ रही हैं। राजस्थान में इस साल के अंत तक चुनाव होने हैं। चुनावों की तैयारियों के बीच कई अखबारों और न्यूज चैनलों के आने की भी चर्चाएं हैं।

ऐेसे ही जयपुर से नेशनल न्यूज के आने की चर्चा है। बताया जाता है कि नेशनल न्यूज प्रबंधन ने अच्छे पत्रकारों की तलाश  शुरू कर दी है। राजधानी के प्रमुख अखबारों के कई पत्रकारों का नाम नेशनल न्यूज से जुड़ने और जुड़ने की कोशिश करने वालों में शामिल किया जा रहा है। (कानाफूसी)

जनसत्ता को 65000 कॉपी तक पहुंचा दिया तो मेरी कोठी खाली करा ली गई

Shambhunath Shukla : कोलकाता में तीन साल बिताए। मुझे कोलकाता दिल्ली की तुलना में सदैव पसंद आया। पर वहां जिस जनसत्ता अखबार का संपादक मैं था उसका सरकुलेशन बढ़ाने को इंडियन एक्सप्रेस का प्रबंधन राजी नहीं था और एक दिन तो वह आया जब मैंने प्रसार कोलकाता जैसे अहिंदीभाषी शहर में जनसत्ता को ६५००० कॉपी तक पहुंचा दिया। बस यही बात इंडियन एक्सप्रेस के प्रबंधन को खल गई। और कोलकाता में मुझे रहने के लिए अलीपुर की जो कोठी दी गई थी वह तत्काल खाली करा ली गई।

यह कहते हुए कि बंटवारे में वह कोठी एक्सप्रेस के मदुरई ग्रुप के पास चली गई है। अचानक शाम को अपना सामान लेकर मुझे सड़क पर आ जाना पड़ा। वह तो डॉक्टर प्रभाकर श्रोत्रिय वहां भारतीय भाषा परिषद के निदेशक थे उन्होंने फौरन थियेटर रोड स्थित भाषा परिषद के अतिथि गृह में मेरे रुकने का इंतजाम कराया। रात काटने का ठीहा निश्चित हो जाने के बाद जनसत्ता की पत्रिका संबरंग के प्रभारी श्री अरविंद चतुर्वेद ने सारा सामान शिफ्ट करवाया। एक बड़ी बिपदा से निपटने के बाद राहत के कुछ पल।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

विनीता ने जी न्‍यूज तथा सुशांत ने अमर उजाला ज्‍वाइन किया

शगुन टीवी से इस्‍तीफा देकर विनीता त्रिपाठी ने अपनी नई पारी जी न्‍यूज राजस्‍थान के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. विनीता इसके पहले हमार टीवी, मौर्य टीवी को भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. इन चैनलों में वे एंकर के रूप में काम कर चुकी हैं. माना जा रहा है कि जी न्‍यूज में भी उन्‍हें यह जिम्‍मेदारी सौंपी जा सकती है. 

अमर उजाला, आगरा के साथ सुशांत मिश्रा ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें डेस्‍क पर लाया गया है. सुशांत का चयन नोएडा में हुआ था, जिसके बाद उन्‍हें आगरा भेजा गया है.

धीरे-धीरे टूट रही है टीवी100 की टीम, जिम्‍मेदार कौन?

उत्तराखंड के एक और रीजनल चैनल की डूबने की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। जिस तरह की जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक टीवी 100 न्यूज चैनल को बहुत जल्द ही बैसाखियों के सहारे की जरूरत पड़ने वाली है। टीवी 100 के कुमाउं मंडल से ब्यूरो चीफ गौरव गुप्ता ने इस्तीफा दे दिया है। गौरव गुप्ता टीवी 100 के साथ पिछले कई सालों से जुड़े हुए थे। कहा जा रहा है चैनल प्रबंधन के मनमाने रवैये से तंग आकर गौरव गुप्ता ने चैनल को अलविदा कह दिया है, गौरव ने जैन टीवी के साथ अपनी नई पारी शुरू की है।

इसी तरह से भगवानपुर से रिपोर्टर मोहम्मद अजीम ने भी टीवी 100 से अलविदा कहकर जैन टीवी ज्वाइन कर लिया था। मोहम्मद अजीम भी चैनल प्रबंधन के मनमाने रवैये से तंग आ चुके थे। कुछ साल पहले देहरादून से खुर्रम शम्सी ने चैनल की पॉलिसी से तंग आकर अलविदा कह दिया था अब वो ईटीवी के साथ काम कर रहे हैं। चैनल प्रबंधन की पॉलिसी से तंग आकर ही देहरादून से टीवी 100 के ब्यूरो चीफ शाहीन चैधरी के साथ अनबन हुई और नतीजा ये हुआ कि टीवी 100 ने देहरादून के ब्यूरो ऑफिस पर ताला लगा दिया। ऐसी ही स्थिती मसूरी से रिपोर्टर प्रेम सिंह के साथ हुई, उन्होंने भी चैनल प्रबंधन के मनमाने रवैये से तंग आकर अलविदा कह दिया है।

कुछ ऐसा ही हाल लक्सर से रिपोर्टर श्याम राठी के साथ हुआ, उन्होंने भी चैनल छोड दिया। अब वो भी जैन के साथ जुड गए हैं। टिहरी से अरविंद नौटियाल ने भी कई महीने तक टीवी 100 को छोड़़े रखा। विकासनगर से मोहित यादव को कुछ ऐसे ही कारणों से इस्तीफा देना पड़ा। इसके अलावा दिल्ली देखने वाले राहुल शर्मा ने भी चैनल की पॉलिसी से तंग आकर चैनल से बाय कह दिया। इसके अलावा पिछले दिनों टीवी 100 न्यूज चैनल के नोएडा ऑफिस से भी एक साथ करीब 15 लोगों ने चैनल छोड दिया था। नोएडा ऑफिस में भी अब चैनल के पास एक दो चेहरे की काम के बचे हैं। अगर वो गए तो समझिए टीवी 100 का बंटाधार हो जाएगा।

उधर उत्तराखंड में भी टीवी 100 की टीम लगातार टूट रही है। खबर है देहरादून, हरिदार, उत्तरकाशी, हल्दवानी, रामनगर और काशीपुर समेत कई और जगह के रिपोर्टर लगातार दूसरे चैनल में जाने के रास्ते तलाश रहे हैं। इनमें कई ऐसे रिपोर्टर है जो टीवी 100 के साथ कई कई सालों से काम कर रहे हैं। इस चैनल की सबसे बड़ी परेशानी इस बात को लेकर है कि यहां रिपोर्टर के उपर विज्ञापन का प्रेशर खूब रहता है। इस चैनल में हालात ऐसे हैं कि हर महीने एक टीम को उत्तराखंड और हिमाचल भेजा जाता है। ये टीम रिपोर्टर के साथ रहती है और नए नए तरीके से विज्ञापन निकालना सिखाती है। इस पैसे के आने के बाद ही ऑफिस के कर्मचारियों को सैलेरी बंटती है।

उत्तराखंड के कुछेक रिपोर्टर को छोड़ दें तो चैनल किसी को भी सैलेरी नहीं देता हैं। शुक्र करो रिपोर्टर का कि वो बगैर कुछ लिए मुफ्त में खबरें भेजते रहते हैं। इसके बावजूद भी अगर रिपोर्टर पर विज्ञापन का प्रेशर रहेगा तो वो तो चैनल छोड़ेंगे ही। यही वजह है कि यहां डेढ महीने में एक बार सैलरी मिलती है। टीवी 100 को आप न्यूज चैनल ना कहकर बनिए की दुकान कहे तो ज्यादा बेहतर होगा। क्योंकि इसमें न्यूज चैनल जैसा कुछ है ही नहीं। चैनल से इतने लोगों का निकलना, खतरे की घंटी है। जिस तरह से टीवी 100 की टीम टूट रही है उसको देखते हुए लगता है कि लोकसभा चुनाव तक इसका बाजा बजने वाला है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सेना का एमआई17 हेलीकॉप्‍टर दुर्घटनाग्रस्‍त, आठ लोगों की मौत

देहरादून। गौरीकुंड में राहत-बचाव काम में लगा एक हेलीकॉप्टर गिर गया है। वायुसेना के MI-17 हेलीकॉप्टर में सवार सभी आठ लोगों की मौत हो गई है। मरने वालों में 5 एयरफोर्स के जवान और 3 आम नागरिक थे। ये हादसा गौरीकुंड से उत्तर दिशा में हुआ। इस हेलीकॉप्टर को पिछले साल ही खरीदा गया था।

दरअसल उत्तराखंड में तबाही के बाद से MI-17 हेलीकॉप्टर के जरिए बड़े पैमाने पर जगह-जगह फंसे लोगों को निकालने का काम किया जा रहा था। इसी बीच यह हादसा हो गया। किस वजह से ये हादसा हुआ इसका पता नहीं चल पाया है। रक्षा मंत्रालय ने हादसे की जांच के आदेश दिए।

सिटी एसपी की प्रेसवार्ता में पत्रकार कुनाल का मोबाइल चोरी

टीवी पत्रकार कुनाल जायसवाल का मोबाइल पुलिस की नाक के नीचे से गायब हो गया. कुनाल के साथ यह घटना उस वक्‍त हुई जब वे नोएडा फेस 2 थाने में एसपी सिटी की प्रेस वार्ता कवर कर रहे थे. इस दौरान सीओ सिटी और थानाध्‍यक्ष भी मौजूद थे, लेकिन इसके बावजूद चोरों ने कुनाल के मोबाइल पर हाथ साफ कर दिया. कुनाल का कहना है कि जब पुलिस अधिकारी के ऑफिस में ऐसा हाल है तो शहर में क्‍या होता होगा?

जिला होम्योपैथी अधिकारी सहित तीन स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज

देवरिया। होम्योपैथी विभाग में हुए अस्सी लाख रुपए के घोटाले के मामले में जिला प्रशासन दोषियों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के मामले में टाल मटोल कर रहा था कि इस बीच मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के निर्देश पर कोतवाली पुलिस ने जिला होम्योपैथी अधिकारी (डीएचओ) समेत तीन स्वास्थ्य कर्मियों के विरूद्ध मुकदमा दर्ज किए जाने का आदेश दिया है।

न्यायालय के आदेश के अनुपालन में पुलिस ने बिना कोई विलम्ब किए आरोपियों के खिलाफ कोतवाली थाने में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468 व 471 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है। मुकदमा दर्ज होने से स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गई है।

उल्लेखनीय है कि जिला होम्योपैथ विभाग में पिछले करीब एक दशक से कर्मचारियों के जीपीएफ एवं अन्य भुगतानों के मामले में बड़े पैमाने पर धांधली की जा रही थी। बताया जाता है कि इस सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर पूर्व जिलाधिकारी रविकान्त सिंह ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी डाक्टर अमर नाथ तिवारी को जांच सौंपी थी। रिपोर्ट में करीब अस्सी लाख रुपए की हेरा-फेरी किए जाने का मामला सामने आया। जिसमें जिला कोषागार एवं कुछ बैंकों की भूमिका संदिग्ध पाई गई।

इस सम्बन्ध में जिला प्रशासन ने बेसिक शिक्षा विभाग के लेखाकार से भी मामले की जांच कराई। लेखाकार ने भी वित्तीय दुरुपयोग किए जाने की पुष्टि कर दी। लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों जिला प्रशासन मुकदमा दर्ज कराने से बच रहा था। निवर्तनमान जिलाधिकारी विवके ने तो यहां तक निर्देश दिया था कि यदि चालीस लाख रुपया दोषी कर्मचारी जमा कर देंगे तो उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं होगी। हालांकि शासन ने देवरिया के होम्योपैथ विभाग में कई वर्षों से एक ही पटल पर कुण्डली जमा कर बैठे एक दबंग कर्मचारी शैलेन्द्र सिंह को निलम्बित कर दिया है। परन्तु जिला प्रशासन एफआईआर दर्ज कराने के मामले में पेशोपेश में पड़ा हुआ था।

लेकिन इसी बीच एक स्वास्थ्य कर्मचारी ने दोषियों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सरकारी धन के गबन एवं धोखाधड़ी किए जाने से सम्बन्धित प्रार्थना पत्र दे दिया। न्यायालय ने प्रकरण को गंभीर मानते हुए एफ आई आर दर्ज किए जाने का निर्देश दिया। जिसके आधार पर कोतवाली थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर दी गई है।

इस सम्बन्ध में इन्सपेक्टर राम औतार यादव ने बताया कि गौरी बाजार स्थित होम्योपैथी चिकित्सालय देवंगांव में तैनात फार्मासिस्ट अनिल कुमार ने गाजियाबाद में पढ़ रहे अपने लड़के के दुर्घटनाग्रस्त होने पर चिकित्सा प्रतिपूर्ति के लिए डी एच ओ को आवेदन किया था। भुगतान के लिए सम्बन्धित लिपिक शैलेन्द्र सिंह केे पास वह कई वर्षों तक दौड़ता रहा। बाद में पता चला कि लिपिक ने सांठ-गांठ कर देयकों का फर्जी तरीके से भुगतान करा लिया है। मामले की जांच कर जब जिलाधिकारी को रिपोर्ट भेजी गई तो शिकायत सही पाई गई। लेकिन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नही कराया गया।

इसी आधार पर फार्मासिस्ट अनिल कुमार ने धारा 156 (3) सीआरपीसी के तहत न्यायालय में वाद दाखिल किया। जिसके आधार पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कुमारी इन्दु द्विवेदी ने प्रभारी निरीक्षक कोतवाली को उचित धाराओं में पंजीकृत करने का आदेश दिया है। जिसके आधार पर डीएचओ डाक्टर सुभाष चन्द्र वर्मा, लिपिक शैलेन्द्र कुमार सिंह व रामवृक्ष के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। खबर है कि आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए उच्च न्यायालय जाने की फिराक में है।

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

“उसका रिश्‍तेदार आईएएस है, कंप्रोमाइज कर लो ठीक रहेगा”

आम तौर पर देखा गया है कि एक सीनियर जर्नलिस्ट अपने जूनियर की हर संभव मदद करता है और उसका उत्साह बढ़ाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी में तो दृश्य कुछ और है। हुआ यूं कि एक अंग्रेज़ी दैनिक के युवा पत्रकार की बेटी लखनऊ के एक बड़े गर्ल्स कॉलेज में पढ़ती है।

कुछ दिनों से उसकी 8 साल की बच्ची स्कूल जाने से कतरा रही थी। माँ बाप के बहुत कुरेदने पर उसने रोते हुए बताया कि एक फलां सब्जेक्ट की टीचर उसे और अन्य बच्चे, जिनकी राइटिंग स्पीड थोड़ी कम है और राइटिंग थोड़ी गंदी है, उन्हें वो ज़मीन पर बैठा देती है। और जब वो डांटती है तो और बच्चे हँसते हैं। हमे इन्सल्ट फील होता है इसलिए मैं स्कूल नहीं जाऊँगी।

सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के बाद भी अगर किसी बच्चे को पब्लिकली हुमिलिएट किया जाए तो ये गलत है और यही सोच कर इस युवा पत्रकार ने प्रिंसिपल से मुलाकात की। और भी पैरेंट्स ने इंडाइरेक्‍टली अपनी बात पहुंचाई पर प्रिंसिपल ने इस युवा को बुला कर परसनली मीटिंग रखी और 2-3 दिन बाद उस टीचर का इस्तीफा ले लिया गया। ये तो हुई एक जेनुइन बात जो हर जिम्‍मेदार माँ-बाप अपने बच्चे के लिए करेगा।

पर हद तो तब हो गई जब मीटिंग वाले दिन शाम को ही उस युवा पत्रकार के पास एक बड़े ही वरिष्ठ और सरकारी तंत्र में खासे लोकप्रिय पत्रकार का फोन आता है। "तुम्हारी कम्प्लेंट की वजह से एक टीचर का इस्तीफा ले लिया गया है", वो कहते हैं। युवा को उस वक़्त तक नहीं मालूम था कि एक्शन लिया जा चुका है। उसे 3 दिन बाद पता चला। उन्होंने आगे कहा, "उस टीचर के एक रिश्तेदार आईएएस हैं और वो तुम्हारे बॉस के बारे में पूछ रहा था। उनका नंबर मांग रहा था। कम्‍प्रोमाइज कर लो ठीक रहेगा।''

हालांकि उस युवा पत्रकार ने आगे न कुछ किया न किसी से बात की क्योंकि ऐसी गीदड़ भभकियां देने की आदत कई वरिष्‍ठों के बारे में प्रचलित है. लेकिन इससे ये सिद्ध होता है कि कुछ वरिष्ठ अपनी मूछ लोगों के सामने टाइट करने में और फर्जी भोकाल टाइट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। इन्हे शायद ये नहीं मालूम कि ऐसे लोगों की मुंह पर वाह वाह और पीठ पीछे ऐसी की तैसी होती है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्रकार के पत्र पर आधारित.

मध्‍य प्रदेश एवं छत्‍तीसगढ़ में चैनलों के स्ट्रिंगरों की चांदी

मध्‍यप्रदेश में इन दिनों रीजनल टेलीविजन चैनल के स्ट्रिंगर्स की चांदी है.. एक-एक स्ट्रिंगर हाथ में दो-दो तीन-तीन चैनलों की माइक आईडी पकड़े घूम रहा है.. इसका कारण यह है कि हाल ही में तीन नए चैनल्‍स ने मप्र में दस्‍तक दी है.. इनमें जी चौबीस घंटे, पर्ल और आईबीसी 24 शामिल है.

मप्र में नंबर दो की पोजीशन पर बने रहते हुए अपने प्रतिस्‍पर्धियों को कड़ी चुनौती देने वाले बंसल न्‍यूज पर इन चैनलों की खास नजर रही..यही वजह है कि इन तीनों चैनल्‍स की पुरजोर कोशिश रही है कि बंसल न्‍यूज से बेहतर लोगों को प्रलोभन देकर जोड़ा जाए.

सिर्फ बंसल ही नहीं साधना और सहारा मप्र/छग के रिपोर्टर और स्ट्रिंगर्स पर भी नए चैनलों की नजर है.. सहारा के भोपाल ब्‍यूरो में पदस्‍थ वरिष्‍ठ संवाददाता आशुतोष नाडकर को आईबीसी 24 ने उनकी मौजूदा सेलरी से 20 हजार रुपए ज्‍यादा का ऑफर करते हुए बुलाया था.. लेकिन मानना पड़ेगा आशुतोष की संस्‍थान भक्ति को कि उन्‍होंने इसके बाद भी ऑफर ठुकरा दिया.. मप्र के कुछ बड़े जिलों के सहारा के स्ट्रिंगर्स पर भी आईबीसी 24 की नजर है.

दरअसल मप्र में आईबीसी 24 नंबर वन का तगड़ा दावेदार है.. इस वजह से वह धीरे-धीरे ही सही लेकिन एक लंबी रणनीति बना कर उस पर काम कर रहा है.. इस रणनीति का एक अहम हिस्‍सा है सहारा के बड़े जिलों में तैनात रिपोर्टर और स्ट्रिंगर्स को अपने नेटवर्क का हिस्‍सा बनाना.. यह सिलसिला यही नहीं थमने वाला है.. आने वाले दो तीन महीनों में कम से कम चार और नए रीजनल चैनल मप्र/छग में आमद दर्ज कराने वाले हैं.. यानी टीवी पत्रकारों और स्ट्रिंगर्स को ढेर सारे अवसर मिलने वाले हैं.. लेकिन यह समय सोच समझ कर फैसले लेने का भी है.. चुनाव के बाद कितने चैनल मैदान में बने रहेंगे और जो बड़े चैनल हैं वह कास्‍ट कटिंग के नाम पर कितनों पर गाज गिराएंगे यह कहना मुश्किल है.. इसलिए बेहतरी इसी में है कि पत्रकार सोच समझ कर फैसलें करें.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

टीवी100 से इस्‍तीफा देकर जैन टीवी पहुंचे गौरव और अजीम

उत्‍तराखंड के टीवी100 से खबर है कि कुमांऊ ब्‍यूरोचीफ गौरव गुप्‍ता ने चैनल से इस्‍तीफा दे दिया है. वे चैनल के लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. गौरव के पहले रुड़की ब्‍यूरोचीफ मोहम्‍मद अजीम ने भी टीवी100 से इस्‍तीफा दिया है.

गौरव ने अपनी नई पारी जैन टीवी के साथ कुमाऊं ब्‍यूरोचीफ के रूप में शुरू की है. जबकि अजीम भी जैन टीवी से जुड़ गए हैं. बताया जा रहा है कि कई और लोग टीवी100 से इस्‍तीफा देकर जैन टीवी ज्‍वाइन कर सकते हैं.

सीजेएम ने यूपी आईपीएस एसोसियेशन पर रिपोर्ट मंगाई

सीजेएम लखनऊ श्री प्रमोद कुमार ने आज उत्तर प्रदेश आईपीएस एसोसियेशन के विधिविरुद्ध होने पर एफआईआर कराने मेरे प्रार्थनापत्र पर मेरे अधिवक्ता श्री त्रिपुरेश त्रिपाठी की बहस सुन कर थाना महानगर, लखनऊ से रिपोर्ट मंगवाई है. मामले की अगली सुनवाई 04 जुलाई को होगी.

मैंने प्रार्थनापत्र में कहा कि यूपी पुलिस रेगुलेशन के पैरा 398 के अनुसार आईपीएस अधिकारी पुलिस बल के सदस्य हैं, अतः पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट 1966 की धारा 3(1) के अनुसार वे बिना केन्द्र अथवा राज्य सरकार की स्पष्ट अनुमति के कोई  ऐसी संस्था नहीं बना सकते जो पूर्णतया सामाजिक, धार्मिक एवं मनोरंजक नहीं हो.  आरटीआई से प्राप्त सूचना के अनुसार इस एसोसियेशन को किसी स्तर पर कोई अनुमति नहीं मिली हुई है.

अतः मैंने यूपी आईपीएस एसोसियेशन के पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट की धारा 4 के अंतर्गत अपराध होने के नाते इसके पदाधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर  दर्ज कराने की मांग की. थाना महानगर द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं कर मात्र पीली पर्ची की रसीद दी गयी. तब मैंने धारा 154(3) सीआरपीसी के तहत एसएसपी लखनऊ को एफआईआर दर्ज करने के लिए प्रार्थनापत्र भेजा और उसके बाद धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत कोर्ट में आवेदन किया.

अजय प्रकाश भास्‍कर समूह की पत्रिका ‘अहा जिंदगी’ से जुड़े

युवा पत्रकार अजय प्रकाश ने दैनिक भास्कर, जयपुर से अपनी नई पारी शुरू कर ली है। उन्होंने वहां दैनिक भास्कर के मैगजीन डिवीजन "अहा जिंदगी" में चीफ सब एडिटर के पद पर ज्वाइन किया है। इससे पहले वे लंबे समय से दिल्ली में पाक्षिक समाचार पत्रिका द पब्लिक एजेंडा में नौकरी कर रहे थे।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रहने वाले अजय द पब्लिक एजेंडा में नौकरी करने के अलावा लंबे समय से एक समाचार वेबसाइट जनज्वार डाट काम का संचालन भी करते रहे हैं। द पब्लिक एजेंडा से पहले अजय साप्ताहिक समाचार पत्र द संडे पोस्ट और विराट वैभव में भी रह चुके हैं। उनकी कई कहानियां, लेख और रिपोर्टें कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। अजय प्रकाश की बेबाक लेखनी और जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए उन्हें 2011 में पहले अनिल सिन्हा मेमोरियल अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। 

लूट के लिए प्रेस छायाकार पर जानलेवा हमला

वाराणसी। हिन्दी के सबसे पुराने अखबार के छायाकार अनिल मिश्रा पर कुछ लोगों ने जानलेवा हमला कर उनकी बाइक, मोबाइल, कैमरा, सोने की चेन और नगदी छीन लिया। हमले में अनिल को चोट आयी है। बताया जाता है कि रविवार की रात प्रेस का काम खत्म होने के बाद रात 1.30 बजे के करीब वो अपने घर संथवा जा रहे थे। कीटगंज वाटर प्लांट के पास जैसे ही अनिल पहुंचे अचानक सामने से आ रहे बाइक पर तीन युवकों ने अनिल को रोक लिया इससे पहले कि अनिल कुछ समझ पाते युवकों ने उनपर हमला कर दिया।

शनिवार की सुबह नगर के अन्य छायाकारों के साथ अनिल ने एसएसपी से भेंटकर अपने साथ हुए घटना की सारी जानकारी दी। इसके बाद एसएसपी के निर्देश पर सारनाथ पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। मामले की जांच चल रही है।

बनारस से भास्‍कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

मुरादाबाद में अमर उजाला के रिपोर्टर ने छाप दी फर्जी खबर!

उत्तराखंड में ८ दिन के बाद हालात थोड़े बेहतर हुए हैं. हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया गया है. और जो मौत के मुंह में समा गए हैं उनका अंतिम संस्कार वहीं पर किया जा रहा है. ऐसे में हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अपनी रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं. चाहे वो साधुओं के वेश में लुटेरे हों या लाशों पर राजनीति करते नेता. लेकिन हैरत की बात है कि मुरादाबाद का एक पत्रकार, जो अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित अखबार से जुडा है, ऐसी फर्जी खबरे छाप कर सनसनी फैलाने से बाज नहीं आ रहा और उत्तराखंड के पीडितों के जख्मों पर नमक छिड़क रहा है.

मुरादाबाद में २५ जून के अंक में पेज नम्बर ४ पर "पिता को बचाने में बह गए तीन बहन भाई" शीर्षक से एक खबर प्रकाशित की गई है, जिसमें मुरादाबाद पालिटेक्निक में लगे राहत शिविर में पहुंचे परितोष पाण्डेय का जिक्र करते हुए अमर उजाला के रिपोर्टर ने लिखा है कि ये हादसा गौरीकुंड और केदारनाथ के बीच हुआ है. परितोष के साथ एक परिवार वहां मौजूद था, जिनमें एक पिता, दो बेटियां और एक बेटा अचानक आई बाढ़ में देखते ही देखते बह गए.

रिपोर्टर ने वीडियो देखा और बिना जांच पड़ताल किये अखबार में फोटो छापकर पूरे शहर में सनसनी फैला दी. रिपोर्टर ने शीर्षक में ४ लोगों को पानी की धार में बहने का जिक्र किया है, जबकि उसके द्वारा छापे गए फोटो में साफ़ दिख रहा है कि ये ५ लोग हैं. इतना ही नहीं हमने पालिटेक्निक में लगे कैम्प में भी जाकर तस्दीक की है कि वहां परितोष नाम का कोई शख्स नहीं आया. आइये हम बताते हैं वो सच जिसे पढ़कर आप भी चकित हो जायेंगे.

ये हादसा आज से २ साल पहले १८ जुलाई २०११ को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के पिकनिक स्पॉट पाताल पानी में घटी थी, जहा इंदौर के राठी परिवार के ५ सदस्य अचानक आई पानी की तेज धार में फंस गए और पांचों ने अपने आपको आपस में पकड़ लिया और लहरों से लड़ाई करने लगे. मगर पानी का बहाव इतना तेज हो गया कि वो अपने आपको संभाल नहीं पाए और पांचों पानी में बह गए. इनमें से तीन लोग जिनके नाम छवि, चंद्रशेखर और मुदिता हैं, उनकी मौत हो गई और दो लोगों को बचा लिया गया. इस वीडियो को गौरव पाटीदार नाम के शख्स ने अपने मोबाइल में कैद किया था, जो १८ जुलाई २०११ को यू ट्यूब पर उपलोड किया गया गया था. और आज तक इसको देखने वालों की संख्या 2468728 पहुंच गई है.
 
मुरादाबाद अमर उजाला का ये रिपोर्टर वाकई में अपना १०० प्रतिशत अखबार के लिए दे रहा है. मगर क्या पीडितों को इस तरह से राहत दी जाती है. मुरादाबाद के भी दर्जनों लोग इस भीषण त्रासदी के बाद से लापता हैं, जिनका दर्द सुनने वाला कोई नहीं है. ऐसे में इस तरह की फर्जी खबरें उनके मन को कितनी ठेस पंहुचा रही होंगी, इसका अंदाजा हम भी नहीं लगा सकते. एक्सक्लूसिव खबर के लिए इस रिपोर्टर को अमर उजाला क्या इनाम देता है. ये पढ़ने के लिए भी हमें इंतज़ार रहेगा.

shahnawaz

shahnawaz.mbd07@gmail.com

रसाज टाइम्‍स के संपादक के विरुद्ध एफआईआर की खबर जागरण ने क्‍यों नहीं छापी?

रईस अहमद बदायूं के मूल निवासी हैं और मुंबई में रहते हैं, वहाँ इनका बड़ा कारोबार बताया जाता है. पिछले कुछ दिनों से इनकी गतिविधियां बदायूं में बढ़ गई हैं. राजनीति में भी रुचि दिख रही है. लोकसभा क्षेत्र बदायूं से विभिन्न दलों से टिकट मांगने की चर्चा होती रही है. सामाजिक कार्यों में भी बढ़ कर भाग लेते दिख रहे हैं. पिछले दिनों हुये बदायूं महोत्सव में सह-संयोजक थे. चर्चा है कि लाखों रुपए देकर यह पदवी मिली थी, साथ ही मीडिया में भी आ गए हैं.

रसाज़ टाइम्स नाम से साप्ताहिक अखबार निकालने लगे हैं. कंटेंट और ले-आउट की बात छोड़िए. खास बात यह है कि अमर उजाला की बरेली प्रेस में छपता है. इस अखबार का दूसरा संस्करण मुंबई से निकलता है. खैर, होली-दिवाली के मौके पर पत्रकारों पर भी मोटी मेहरबानी दिखाते रहे हैं, सो कई पत्रकार इनके खास चेले हैं. एक जमीन पर कब्जे को लेकर थाना सिविल लाइन में इनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ, जिसे आज हिंदुस्तान ने पेज-3 की लीड खबर बनाया है. वहीं अमर उजाला ने खबर छाप कर कर्तव्य की इति श्री की है, लेकिन जागरण पूरी खबर ही हजम कर गया. जागरण की यह हरकत दिन भर चर्चा का विषय बनी रही.

अमर उजाला
हिंदुस्‍तान

डीएलए के दिल्‍ली एडिशन पर लगेगा ताला!

एनसीआर से प्रकाशित मिड डे अखबार डीएलए के बारे में खबर आ रही है कि इस अखबार को बंद किया जा रहा है. कई लोगों को काम करने से मना कर दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि दिल्‍ली ऑफिस में मौजूद ज्‍यादातर मशीनरी को मेरठ भेज दिया गया है. खबर आ रही है कि घाटे की स्थिति में चल रहे इस अखबार के कार्यालय पर भी जल्‍द ताला लगने वाला है. दो दिन पहले तमाम कर्मचारियों को आने से मना कर दिया गया.

सूत्रों का कहना है कि अब कुल मिलाकर आधा दर्जन लोगों की टीम ही इस अखबार में बची रह गई है, जिसके सहारे अगले कुछ दिनों तक अखबार का प्रकाशन चलेगा. डीएलए को लेकर इन दिनों तमाम तरह की खबरें आ रही हैं. यूपी में एडिशन लांच करने की चर्चाएं भी हैं, लेकिन प्रबंधन ऐसी किसी बात से इनकार कर रहा है. हालांकि अखबार के बंद होने के बारे में जब संपादक वीरेंद्र सेंगर से बात की गई तो उन्‍होंने इसे अफवाह करार देते हुए कहा कि खर्च कम करने के लिए कुछ लोगों की छंटनी की गई है. इसके चलते लोग अखबार बंद होने की अफवाह फैला रहे हैं. अखबार बंद होने नहीं जा रहा है.

महाराष्‍ट्र में एक और पत्रकार पर हमला

पश्चिम महाराष्ट्र के इचलकरंजी से प्रकाशित होने वाले दैनिक "महासत्ता" के वरिष्ठ पत्रकार बाल मकवाना के घर पर शनिवार रात स्थानीय पार्टी "आवाडे कांग्रेस" के कुछ कार्यकर्ताओं ने हमला बोल दिया और जमकर पत्‍थरबाजी की गई. इससे बाल मकवाना जी के मकान को काफी नुकसान पहुंचा है. मकवाना के घर जब पत्थर फेंके जा रहे थे उसी वक्त किसी ने पुलिस को फोन कर इस बात की जानकारी दी. सूचना के बाद घटनास्‍थल पर पुलिस पहुंच गई, जिसके बाद हमलावार भाग खड़े हुए.

बाल मकवाना स्थानीय अखबार महासत्ता में "राजवाड़ा चौक" से नाम का एक विकली कॉलम चलाते हैं. इस कॉलम में उन्होंने "सहकार महर्षि या घऱ महर्षि" शीर्षक में सरकार पर व्यंगात्मक टिप्पणी की थी. जब कि इस टिप्पणी में किसी का नाम का उल्ल्लेख नहीं किया गया था. लेकिन इस टिप्‍पणी को अपने नेता के ऊपर किया गया मानकर क्रोधित लोकल पार्टी के 25-30 कार्यकर्ता पूर्व उपनगराध्यक्ष बालासाहब कलागते और प्रकाश मोरे के नेतृत्‍व में शनिवार दोपहर मकवाना के घर जुलूस लेकर पहुंच गए. उन्होंने मकवाना को धमकाया कि अगर भविष्य में उनके नेता के विरोध में किसी तरह की टिप्पणी की गयी या कुछ लिखा तो वे बर्दाश्त नहीं करेंगे.

उसी दिन रात कुछ कार्यकर्ता फिर से मकवाना के घर पहुंचे. उन्होंने मकवाना के घर पर पथराव की. इससे घर का काफी नुकसान हुआ. पुलिस ने पत्रकार के घऱ संरक्षण दिया है, लेकिन इस वारदात से मकवाना परिवार काफी दहशत में है. इस घटना की इचलकरंजी के पत्रकारों ने निंदा की है. मराठी पत्रकार परिषद के कार्याध्यक्ष किरण नाईक ने भी इस हमले की कड़ी शब्दों में भर्त्‍सना की है. महाराष्ट्र में पिछले आठ दिन में चार पत्रकारों पर हमले हुए हैं. आये दिन हो रहे हमले की सरकार अनदेखी कर रही है. इसके विरोध में फिर से आंदोलन छेड़ेन के विषय में महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी ऍक्शन कमेटी की बैठक में विचार विमर्श किया जाएगा. अगले सप्‍ताह मुंबई में यह बैठक होगी. यह जानकारी समति के कन्‍वेनर एसएम देशमुख ने दी है.

समाचार प्‍लस के ग्रुप एडिटर उमेश कुमार उत्‍तराखंड के 20 गांवों को लेंगे गोद

उत्‍तराखंड में आई भयानक तबाही से हर भारतीय दुखी है, वहीं उत्तराखंड के रहने वालों को इस आपदा ने झकझोर कर रख दिया है. पहाड़ पर आई तबाही के बाद पहाड़ पर फिर से जिंदगी आसान बनाने के लिए तमाम उत्‍तराखंडी अपना छोटा बड़ा योगदान दे रहे हैं. इसी क्रम में उत्‍तराखंड से ताल्‍लुक रखने वाले पत्रकार तथा समाचार प्‍लस चैनल के समूह संपादक उमेश कुमार ने भी पहल की है. उन्‍होंने जरूरत के सामानों के साथ एक ट्रक उत्‍तराखंड के लिए भेजा है.

समाचार प्‍लस द्वारा जुटाए गए इस राहत सामग्री के साथ डा. कुमार विश्‍वास और डाक्‍टरों की टीम भी उत्‍तराखंड गई है. चैनल जल्‍द ही पांच और ट्रक राहत सामग्री के साथ देहरादून भेजने वाला है. उमेश कुमार का कहना है कि इस आपदा से पहाड़ पूरी तरह तबाह हो गया है. अब नए सिरे से इसे बसाने के लिए सभी के योगदान की जरूरत है. मुझसे जितना बन पड़ेगा उतना करूंगा. उन्‍होंने उत्‍तराखंड के चयनित बीस गांवों को गोद लेने का ऐलान भी किया है.

उमेश कुमार का कहना है कि इन चयनित गांवों में बिस्‍तर, कंबल, दवा एवं अन्‍य जरूरत के सामानों को उपलब्‍ध कराने के साथ वे बिजली के खंभों और तारों की मरम्‍मत भी कराएंगे. इसके अलावा डाक्‍टरों की टीम भी इन गांवों में सक्रिय रहेगी. बच्‍चों को किताबें तथा अन्‍य जरूरत की चीजों दी जाएंगी. इन गांवों में आंशिक रूप से टूटी सड़कों का भी निमार्ण कराया जाएगा. उनके इस काम में विदेशों में रहने वाले उनके साथी भी सहयोग कर रहे हैं. ब्रिटेन में रहने वाले प्रवेश कुमार, यूएसए में रहने वाले रोनित तथा दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले सनी के अलावा रैमोन लांबा भी आर्थिक योगदान कर रहे हैं.

इन लोगों के अलावा प्रापर्टी गुरु, सुपरटेक, जीटीए, प्रापर्टी एक्‍सपर्ट जैसे बिल्‍डर भी उमेश कुमार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने को तैयार हैं. इसके अलावा समाचार प्‍लस चैनल के टॉप मैनेजमेंट के लोग अपनी दो दिन की सैलरी उत्‍तराखंड राहत के लिए दिए जाने की घोषणा की है, जबकि खुद उमेश कुमार अपनी पंद्रह दिन की सैलरी दान करेंगे. इसके अलावा चैनल के अन्‍य कर्मचारी भी अपनी सहुलियत के अनुसार इसमें योगदान दे रहे हैं.

एक तरफ जहां देश के बड़े बड़े औद्योगिक घराने इस भीषण आपदा पर चुप्‍पी साधे हुए हैं वहीं उमेश जैसे तमाम युवा उत्‍तराखंड के एक बड़े इलाके को आबाद करने तथा फंसे लोगों को बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं. समाचार प्‍लस के ही पत्रकार मयंक सक्‍सेना भी उत्‍तराखंड में पहुंचकर फंसे लोगों के लिए काम कर रहे हैं.  

क्‍या सच सामने आने के डर से टैम से दूर भाग रहे हैं चैनल?

यह आप पर निर्भर करता है कि भारतीय मीडिया और मनोरंजन (एमऐंडई) कारोबार में छाई निराशा, असंतुष्टि और बेचैनी के बीच आप सबसे पहले किन चीजों पर गौर करेंगे। आप इन बदले हालात पर हंस सकते हैं, चीख सकते हैं, घबरा सकते हैं या नजर फेर भी सकते हैं। बड़े पैमाने पर कई टेलीविजन प्रसारणकर्ताओं ने एक साथ टेलीविजन दर्शकों की रेटिंग मापने वाली एजेंसी टैम की सेवाएं लेनी बंद कर दी जो बेहद हास्यास्पद सी बात लगती है।

ये वही कंपनियां है जिन्हें कई सालों तक टैम मीडिया रिसर्च के टेलीविजन रेटिंग मापने के नमूने से कोई एतराज नहीं था। अब जब टैम ने रेटिंग मापने के लिए अपने नमूने के आकार में बढ़ोतरी की है तो कई नेटवर्क अपनी कम पहुंच और रेटिंग के आंकड़ों को देखकर हैरान हो रहे हैं। टैम ने अपने नमूने के दायरे में 100,000 के कम आबादी वाले शहरों को भी शामिल किया है।

इन चैनलों के हैरान होने की वजह यह थी कि उनके वितरण की रणनीति का पूरा जोर टैम वाले शहरों तक ही सीमित था। भारत के छोटे शहरों के लिए तैयार कराए गए कार्यक्रमों में निवेश करने चंद प्रसारणकर्ताओं को छोड़कर लगभग सभी चैनल टैम के मेट्रो शहर पर केंद्रित नमूने से मिले शानदार आंकड़े से काफी खुश थे। जब टैम ने दर्शकों के एक बड़े वर्ग को नमूने के तौर पर लेना शुरू किया तो उनकी संख्या में गिरावट आई।

इन चैनलों के लिए 12 मिनट वाले विज्ञापन नियम ने आग में घी डालने का काम किया और वे ज्यादा दबाव महसूस करने लगे हैं। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने यह आदेश दिया है कि चैनलों को अपने विज्ञापन समय में कटौती करनी होगी और एक घंटे के कार्यक्रम में 15-25 मिनट के विज्ञापन के बजाय इसका समय 12 मिनट तक ही सीमित होना चाहिए।

विश्लेषकों का कहना है कि नतीजतन इससे दरों में 20 से 30 फीसदी की तेजी आएगी खासतौर पर बड़े नेटवर्कों के लिए यह रुझान लाजिमी होगा। प्रमुख पांच नेटवर्कों का स्टार, सोनी, सन, जी और नेटवर्क 18 का दबदबा टेलीविजन देखने में बिताए गए कुल वक्त में सबसे ज्यादा है और इन चैनलों की 65 फीसदी से भी ज्यादा की हिस्सेदारी है। इनमें से हरेक चैनल का नेटवर्क 10 से 35 चैनलों के बीच है। अगर टैम के आंकड़े किसी चैनल की कम पहुंच और रेटिंग को दर्शा रहे हैं तो ऐसे में दरों में इजाफा मुश्किल ही होगा। यह वजह है कि सभी बड़ी हड़बड़ी से टैम की सेवाएं लेना समाप्त कर रहे हैं। हालांकि विज्ञापनदाता अब भी यह कह रहे हैं कि जब तक ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च कौंसिल के आंकड़े नहीं आने शुरू होते तब तक टैम के आंकड़े पर ही रणनीति बनानी होगी।

दूसरी चीज जिस पर हम गौर करेंगे कि जो मीडिया व विज्ञापन प्रकाशन और वेबसाइटें टैम के आंकड़े लेती हैं उन पर रोक लगने की कोशिश हो सकती है। इस साल की शुरुआत में टैम ने चैनल या नेटवर्क संबंधित आंकड़ों को संवाददाताओं से साझा करना बंद कर दिया क्योंकि इसके मुख्य ग्राहक प्रसारणकर्ताओं को यह बात पसंद नहीं आ रही थी।

मिसाल के तौर पर अगर मुझे यह विश्लेषण करना है कि पांच नेटवर्कों का प्रदर्शन दर्शकों की हिस्सेदारी के लिहाज से कैसा है तो मुझे किसी एक नेटवर्क से यह गुजारिश करनी होगी कि वह अपने आंकड़े को साझा करे। हालांकि हमारे पास इन आंकड़ों की प्रामाणिकता की जांच का भी कोई तरीका नहीं होगा। टीवी प्रसारणकर्ताओं का इस तरह का अतार्किक और बचकाना बरताव बेहद हास्यास्पद है।

नेटवर्क 18 ने फोब्र्स इंडिया के चार वरिष्ठ संपादकों को बड़े निंदनीय तरीके से निकाला गया जो अपने आप में एक मिसाल है। संपादकों का दावा है कि उन्होंने स्टॉक विकल्प की मांग की थी जिसकी वजह से उन्हें निकाल दिया गया था।

नेटवर्क 18 के अधिकारियों ने न्यूजरूम में ही सारे मामले को सुलटाने की कोशिश की। हालांकि वजह जो भी रही हो इससे आपको अंदाजा जरूर मिल सकता है कि क्यों बेहतर कंटेंट भारतीय समाचारपत्रों और चैनलों से गायब हो रहे हैं। किसी भी बेहतर कंटेंट को तैयार करने के लिए जितने समय और संसाधनों की जरूरत होती है उसके लिए ज्यादातर चैनल और अखबार के प्रकाशक तैयार भी नहीं होते। अखबारों और टीवी कंपनियों में प्रशिक्षण, सुझाव देना, संपादकों को विश्व स्तर की एक टीम तैयार करने की छूट देना भी ज्यादा समय बर्बाद होने और लागत बढ़ाने के तौर पर देखा जाता है।

अब हम मीडिया नीति की प्राथमिकताओं पर गौर करते हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने पिछले कुछ सालों में टैम की रेटिंग की निगरानी करने के लिए तीन अलग-अलग समितियां नियुक्त कीं। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग इस पर ध्यान नहीं दे रहा है। किसी बॉक्स ऑफिस की कमाई या अखबार के सर्कुलेशन की तरह ही रेटिंग से सरकार का कोई लेना देना नहीं है। सरकार का संबंध मीडिया नीति और प्रसार भारती से ही है। अहम सवाल यह है कि आखिर करदाताओं की 1500-1800 करोड़ रुपये की पूंजी अगर सरकारी चैनल दूरदर्शन पर खर्च की जाती है तो आखिर इसे बीबीसी की तरह ही विश्वस्तरीय चैनल क्यों नहीं बनाया जा सकता?

वित्त मंत्रालय देश भर में मनोरंजन कर को बराबर क्यों नहीं करती? इसके अलावा भी कुछ सवाल हैं कि फिल्म थियेटर की इमारत को इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा क्यों दिया जाता है या कंसर्ट की कमाई के बारे में सरकार का क्या नजरिया है? इससे उन्हें देश के बड़े-छोटे शहरों में निर्माण करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।

आखिर मीडिया पर राजनीतिक स्वामित्व के बढ़ते वर्चस्व या पेड न्यूज की समस्या को खत्म करने के लिए कोई कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? मंत्रालय यह चाहता है कि 12 मिनट वाले विज्ञापन के नियमों को लागू करने से पहले देशभर में डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाए और इसके लिए पूरा दबाव भी दिया जा रहा है। ऐसे में कई छोटे स्वतंत्र चैनलों और नेटवर्क का अस्तित्व खत्म होने का खतरा है। मौजूदा ड्रामा को देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि मीडिया और मनोरंजन उद्योग शेक्सपियर के दुखांत नाटक का प्रतिनिधित्व कर रहा है। (बीएस)

काबुल में राष्‍ट्रपति भवन पर आतंकी हमला, 20 पत्रकार भी फंसे

काबुल : अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में तालिबानी आतंकवादियों ने आज राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रीय सीआईए कार्यालय पर हमला किया है। इसमें कई पत्रकार भी फंस गए। राष्‍ट्रपति आज सुबह संवाददाता सम्‍मलेन आयोजित करने वाले थे। पत्रकार इसके लिए ही राष्‍ट्रपति भवन पहुंच रहे थे। आतंकवादियों ने स्थानीय समयानुसार सुबह 6.30 बजे काबुल के उच्च सुरक्षा वाले इलाके में विस्फोट किए और गोलीबारी की जो एक घंटे तक जारी रही। इस इलाके में कई दूतावास और आधिकारिक इमारतें भी हैं।

पुलिस ने बताया कि भवन के विशाल परिसर के एक प्रवेश द्वार पर तीन या चार हमलावर आए और विस्फोटकों से लदी कार को छोड़कर वहां से भाग गए और कार में विस्फोट कर दिया। काबुल पुलिस प्रमुख मोहम्मद अयूब सलांगी ने घटनास्थल पर मौजूद संवाददाताओं को बताया कि सभी आतंकवादी मारे गए हैं और इस हमले में कोई सुरक्षाकर्मी या नागरिक नहीं मारा गया। उन्होंने इससे अधिक कोई जानकारी नहीं दी। राष्ट्रपति हामिद करजई राष्ट्रपति भवन में आज सुबह संवाददाता सम्मेलन आयोजित करने वाले थे और पत्रकारों को वहां आने को कहा गया था। बताया जा रहा है कि कम से कम 20 पत्रकार भी फंसे हुए हैं। हमले की जिम्‍मेदारी तालिबान ने ली है।

आशीष बाम की नई पारी, निहार रंजन का तबादला

दबंग दुनिया, इंदौर से खबर है कि आशीष बाम ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी इंदौर में ही नईदुनिया के साथ की है. उन्‍हें डेस्‍क पर लाया गया है. आशीष इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

दूसरी तरफ नईदुनिया, इंदौर से ही खबर है कि यहां डेस्‍क पर कार्यरत निहार रंजन का तबादला लखनऊ के लिए कर दिया गया है. उनके तबादले के कारणों के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई है. माना जा रहा है कि उन्‍हें लखनऊ में समूह के ही किसी अखबार में ज्‍वाइन कराया जाएगा.

कवरेज के नाम पर हवाई यात्रा और हवाखोरी कर रहे हैं पत्रकार!

आशीष कुमार 'अंशु' : टीवी के उन पत्रकारों को समझना चाहिए जो उत्तराखंड की इस तबाही को अपने चैनल के लिए कवर कर रहे हैं, यह वक्त हेलीकाप्टर में खबर के नाम पर हवाई यात्रा या हवाखोरी का नहीं है. वास्तव में खबरिया चैनल के रिपोर्टर खबर के नाम जिस तरह के बाईट कलेक्ट कर रहे हैं, वह तो वे पीड़ितों के आने के बाद भी कर सकते हैं। इसके लिए हेलीकाप्टर में एक पीड़ित की जगह घेरने की क्या जरूरत है? इस वक्त एक व्यक्ति की जगह घेरने का अर्थ है, एक व्यक्ति की जान दांव पर लगाना।

यदि चैनल को खबर अधिक जरूरी लगती है तो अपने खर्चे पर चौपर बुक करे और अपने रिपोर्टर को अपने खर्चे पर भेजे। पीड़ितों की जगह घेर कर बैठे रिपोर्टर, पीड़ितों का कितना भला कर रहे हैं, यह टीवी खबरिया चैनल देख रहे लोग समझ ही रहे हैं। (क्या किसी टीवी चैनल ने अभी तक हेलीकॉप्टर बुक करके अपने रिपोर्टर को भेजा है, उत्तराखंड त्रासदी कवर करने के लिए).

युवा पत्रकार आशीष कुमार अंशु के एफबी वॉल से साभार.

चुनाव आया, चलो दंगा-दंगा खेले

विश्व हिंदू परिषद ने ऐलान किया है कि अगामी मानसून सत्र में अगर राममंदिर निर्माण के लिए कानून नहीं बना तो वह देश भर में व्यापक आंदोलन शुरू करेगी। अगस्त माह से अयोध्या में साधु संतों को इकट्ठा करके इसके लिए माहौल बनाने की शुरुआत की जायेगी। यह कुछ नया नहीं है। जब-जब चुनाव पास आते हैं तब-तब विहिप जैसे संगठन अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए ऐसा ड्रामा करते रहते हैं। इस बार भी पूरे प्रदेश में यही माहौल बनाने की तैयारी की जा रही है। दुःख की बात यह है कि देश के साधु-संत भी राजनेताओं की तरह यह घिनौना आचरण करने लगे हैं।

राम मंदिर के नाम पर एक बार सत्ता के सिंहासन तक पहुंच चुकी भाजपा जानती है कि राम नाम का सहारा ही उसे एक बार फिर सत्ता तक पहुंचा सकता है। लिहाजा वह हर चुनाव से पहले इसका प्रयोग करती रहती है। यह बात दीगर है कि अब इस कार्ड को जनता भलीभांति समझ चुकी है, लिहाजा वह इनके झांसे में नहीं आती। मगर यह लोग अपने इस खेल को खेलने से बाज नहीं आते। उनको लगता है कि उनके इस दांव से ही लोग सब कुछ भूल कर उनके समर्थन में जुट जायेंगे। दरअसल उनकी यह सोच उनके हिसाब से कुछ हद तक सही भी है। यह लोग कई बार देख चुके हैं कि इस देश में जब धर्म का रंग चढ़ता है तब बाकी सारे रंग फीके पड़ जाते हैं। देश के सामने कितने भी गंभीर मुद्दे क्यों न हो मगर धर्म का मुद्दा हर बात पर भारी पड़ जाता है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद विश्व हिंदू परिषद यह घिनौना खेल खेल चुकी है। विध्वंस के पहले और विध्वंस के बाद पूरे देश भर में यह नारे लिखे नजर आते थे कि सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनायेंगे या फिर जिस हिंदू का खून नहीं खौला खून नहीं वह पानी है। स्वाभाविक था कि इस तरह के नारों ने पूरे देश में नफरत का वातारण तैयार कर दिया था। हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से नफरत करने लगे थे। संघ और विहिप को यह वातावरण बहुत लुभाता है। हकीकत यही है कि ऐसे ही वातावरण से उनकी दुकान चलती है। लिहाजा यह सभी लोग वातावरण में और उत्तेजना फैलान में लग गये। राम मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या में पत्थर तराशने का काम जोर-शोर से शुरू कर दिया गया। छोटी-छोटी शीशियों में गंगाजल के नाम पर सड़क की टंकियों से पानी भरकर बेचा जाने लगा। पत्थर तराशने और मंदिर निर्माण के लिए देश और विदेश से अरबों रुपया इन संगठनों को मिलने लगा। तब इनको लगा कि राम नाम को बेचने से बेहतर धंधा कोई दूसरा नहीं हो सकता।

इस बीच लोकसभा चुनावों में इसी उन्माद के सहारे भाजपा अपने सहयोगियों के दम पर सत्ता तक भी पहुंच गयी। मगर सत्ता संभालने के साथ ही भाजपा नेताओं को पूरी तरह एहसास हो गया कि अब अगर मंदिर की बात की तो दिल्ली का सिंहासन दूर हो जायेगा। लिहाजा भाजपा नेताओं ने राम से ज्यादा कुर्सी को महत्व दिया और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पूरे पांच साल तक राममंदिर को भूले बैठे रही। तब संघ या विहिप के किसी नेता ने नहीं कहा कि आपने भगवान राम की सौगंध खायी है कि मंदिर वही बनायेंगे। अब तो मौका आ गया है कि मंदिर बनवा दिया जाये। जाहिर है संघ और विहिप के साथ भाजपा के लिए राममंदिर सिर्फ तक माध्यम था जिसके जरिये दिल्ली की सत्ता हासिल की जा सकती थी। इसके बाद हुए चुनाव में जनता ने भाजपा को सबक भी सिखा दिया। पिछले दो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाई।

भाजपा अपने नये सहयोगियों की तलाश करती रही। इस दौरान संघ परिवार बेहद बैचेन हो गया क्योंकि देश भर में संघ की शाखाओं में बेहद कमी होती जा रही थी। इसी बीच नरेन्द्र मोदी का उदय उग्र हिंदू नायक की तरह हुआ। गुजरात दंगों के बाद हिंदू कट्टरपंथी ताकतें उन्हें बेहद पसंद करने लगी थी। इन्हीं लोगों ने माहौल बनाया कि अगर मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया जाये तो भाजपा अपने दम पर चुनाव जीत सकती है। नतीजे में गोवा में मोदी को प्रचार समिति का प्रमुख बनाने के साथ ही उग्र हिंदुवाद की नींव फिर तैयार होने लगी। विहिप अयोध्या में फिर से साधु-संत इकट्ठा करने के साथ ही अपना पुराना नाटक खेलने की पटकथा तैयार कर रहा है। मोदी के सबसे दुलारे अमित शाह यूपी में आकर संघ के मददगार की भूमिका अपना रहे हैं।

विहिप के लोगों को लग रहा है कि मोदी यूपी में आकर मंदिर बनाने की हुंकार भरेंगे और देश के लोग खुद-ब-खुद मंदिर बनाने के लिए जुट जायेंगे क्योंकि माहौल बनाने का बाकी काम तो संत समुदाय कर चुका होगा। यूपी में इन संगठनों की राह आसान भी लगती है। समाजवादी पार्टी मुसलमानों को लुभाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। भाजपा की इन कोशिशों को यह कहकर प्रचारित करेगी कि सपा अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए सभी ताक पर रख रही है। इस तरह के आरोप लगाकर वह हिन्दुओं को एक मंच पर लाने की कोशिश करेगी। तो बदले में सपा मुसलमानों को लुभाने के लिए और आगे आयेगी। नतीजा यही होगा कि धर्म के नाम पर लोगों में दूरिंया बढेंगीं।

काश इन लोगों को समझ में आ जाता कि लोग अब इनकी बातों में आने वाले नहीं हैं। लोग जागरुक हो गये हैं। उन्हें पता है कि संघ और विहिप ने केवल दिल्ली दरबार तक पहुंचने के लिए राम मंदिर का सहारा लिया लिहाजा अब उनकी दाल गलने वाली नहीं है। पिछले काफी समय से यह हो रहा है कि जब यह लोग राममंदिर का नाम भी लेते हैं तो लोगों को चिढ़ होने लगती है। मगर कुछ लोगों को अभी भी लगता है कि कुछ जगह हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगे हो जायें तो उनके लिए काफी अच्छा माहौल बन सकता है। लिहाजा लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर जमीन को लाल खून से रंगने की तैयारी की जा रही है। काश इस देश के लोग धर्म के नाम पर नाटक करने वालों को इतना कड़ा संदेश दें कि भविष्य में कभी भी कोई यह खेल खेलने को सोच न सके।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के प्रधान संपादक हैं.

समाज में मुख्यधारा नामक कोई धारा नहीं होती : अनिल चमाडि़या

‘फारवर्ड प्रेस’ एक मासिक पत्रिका भर नहीं है। यह पत्रकारिता का नया प्रयोग है। उपेक्षा को स्वर देने का घोषित स्तर पर इतना बड़ा प्रयास कुछ गुस्से में और कुछ प्रतिक्रिया में आज तक नहीं हुआ। व्यापक दायरे की सामग्री देने की जो कोशिश ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के जरिए की जा रही है, उसे ना केवल निरंतर जारी रखने बल्कि तेजी से विकसित करने की जरूरत है। यह निष्कर्ष भारत की पहली हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषी मासिक पत्रिका ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के पत्रकारों की दो दिवसीय कार्यशाला में सामने आया। कार्यशाला 21 व 22 जून 2013 को नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में सम्पन्न हुई। कार्यशाला में देशभर के 30 से अधिक पत्रकारों ने भाग लिया।

प्रबंध संपादक के रूप में प्रमोद रंजन के पद संभालने के बाद फारवर्ड प्रेस की प्रगति के प्रयासों की एक कड़ी यह कार्यशाला थी। कार्यशाला की अहम चुनौती और बहस का मुद्दा था कि सूचना तंत्र के इस विकसित युग में मासिक प्रिंट पत्रिका की अलग पहचान और अस्तित्व को कैसे बरकरार रखा जाए।

प्रधान संपादक आइवन कोस्का ने तीन सत्रों में ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के इतिहास, दृष्टिकोण और मूल्यों को वैज्ञानिक तरीके से विस्तार से पत्रकारों के सामने रखा। उन्होंने सवाल-जवाब के जरिए अपनी बातें स्पष्ट कीं। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के योगदानी संपादक और ग्लोबल स्टडीज यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डॉ. थॉम वोल्फ ने ‘वे फॉरवर्ड फॉर बहुजन भारत’ विषय पर महात्मा गांधी, ज्योतिबा फुले, डॉ. अंबेडकर, कार्ल मार्क्स, टॉमस पेन, रॉबर्ट बी. एजर्टन आदि विचारकों के अध्ययन को सार रूप में प्रस्तुत किया। शोधार्थी केविन ब्रिकमन ने भारतीय संविधान और सामाजिक चुनौतियों के संदर्भ में ‘डॉ अम्बेडकर्स प्रोग्रेस-प्रोन प्रीएम्बल’ विषय पर विचार रखे।

‘जन मीडिया’ के संपादक अनिल चमड़िया ने ‘कैसे करें बहुजन पत्रकारिता : किन विषयों को उठाए फॉरवर्ड प्रेस’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में रूप बदल रहा है परंतु परिस्थितियां वही हैं। समाज में मुख्यधारा नामक कोई धारा नहीं होती। असल में यह वर्चस्वधारा है। इस वर्चस्वधारा से मुकाबला करना है तो नदी के किनारे स्थित मोटे तने का पेड़ नहीं छोटी सी मछली बनना होगा जो धारा के विपरीत चलने का प्रयास करती है, अपने जिंदा होने का सबूत देती है। दौड़ने से पहले सोचने की आदत डालनी होगी। दिमाग का दायरा सीमित नहीं रखना होगा और हमेशा धुरी का ध्यान रखना होगा। जय-पराजय का नहीं बल्कि समानता का माहौल बनाना होगा। कार्यशाला का संचालन प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने किया। चेयरपर्सन श्रीमती सिल्विया कोस्का ने सभी का धन्यवाद दिया।

कार्यशाला कुछ हटकर रही। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ के द्विभाषी तेवर की तरह आइवन कोस्का, डॉ. वोल्फ, केविन आदि के अंग्रेजी विचारों का वाक्य दर वाक्य बनारस के संवाददाता अशोक कुमार वर्मा ने हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ ने संभागियों को ढेर सारी पुस्तकें और पत्रिकाएं आदि अध्ययन सामग्री निशुल्क प्रदान की। संभागियों को रोल प्ले, पीपीडी प्रजेंटेशन के माध्यम से व्यावहारिक जानकारी दी गई। ‘फॉरवर्ड प्रेस’ से जुड़े पत्रकारों को खुद पहली बार पता लगा कि उनके ज्यादातर साथी किसी ना किसी जागरूकता आंदोलन में सक्रिय रहे हैं या किसी प्रतिष्ठित दैनिक में पांच से पच्चीस साल जुड़े रहे हैं या आज भी जुडे़ हैं और ज्यादातर ने कोई ना कोई पुस्तक, शोध या अध्ययन किया है।

कार्यशाला में जिन संवाददाताओं ने भाग लिया उनमें चेयर पर्सन सिल्विया कोस्का, प्रधान संपादक आइवन कोस्का, प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन, सहायक संपादक पंकज चौधरी, मुख्य संवाददाता अमरेंद्र कुमार आर्य, विशेष संवाददाता अशोक चौधरी, सासाराम से असलम परवेज, बनारस से अशोक कुमार आर्य, पटना से अरूण कुमार, अहमदाबाद से अरनोल क्रिस्टी, लखनऊ से अनुराग भास्कर, दिल्ली से लीलाधर शर्मा, साहिबाबाद से मुकेश कुमार तिवारी, कोलकाता से पापरी चंदा, बाघा से पंकज कुमार, लुधियाना से राजेश मचल, आगरा से राजीव आजाद, अजमेर से राजेंद्र हाड़ा, अम्बामठ से सचिन गरूड, नारनौल से संजय मान, बरेली से शंभु दयाल वाजपेयी, लखनऊ से शाहीद परवेज, नई दिल्ली से राकेश कुमार सिंह और पालम से विपिन कुमार ने भाग लिया।

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट.

समाचार प्‍लस की राहत सामग्री के साथ हरिद्वार पहुंचे डा. कुमार विश्‍वास

Dr. Kumar Vishwas : डा कुमार विश्वास कल उत्तराखंड पंहुचे। समाचार एजेंसी 'समाचार प्लस' के साथ साझा रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए डॉक्टरों के दल और राहत सामग्री की एक खेप ले कर डा कुमार विश्वास कल देर शाम हरिद्वार स्थित रिलीफ़ कैम्प पंहुचे, और आज भोर से राहत कार्य में पहले से जुटे कार्यकर्ताओं के साथ दुर्गम गावों तक पंहुचने की कोशिश में दल के साथ निकले हैं।

डा. कुमार विश्‍वास के एफबी पेज से साभार.

विज्ञापन में गड़बड़ी करने वाले कर्मी को बाथरूम में बंद किया

बनारस से खबर है कि हिंदी दैनिक 'आज' के प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों ने अखबार के विज्ञापन विभाग में कार्य करने वाले कर्मचारी शिव कुमार पाण्डेय को घंटों तक ऑफिस के बाथरूम में बंद रखा। बताया जा रहा है कि शिव कुमार पर विज्ञापन के भुगतान में कुछ गड़बड़ी करने का आरोप था। जब इस गड़बड़ी की शिकायत प्रबंधन के उच्‍च अधिकारियों को मिली तो उन्‍होंने शिव कुमार को ऑफिस में बुलाया तथा बाथरूम में बंद कर दिया।

घंटों बाथरूम में बंद शिव कुमार ने जब विज्ञापन की पूरी राशि भुगतान करने को तैयार हुए तब उन्‍हें बाहर निकाला गया तथा ही जल्‍दी से रकम चुकाने की हिदायत दी गई।

पत्रकार हरेंद्र शुक्‍ला के घर से लाखों की चोरी

वाराणसी। लंका थाना क्षेत्र के बालाजी कालोनी निवासी लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र के पूर्वांचल के ब्यूरोचीफ हरेंद्र शुक्ला के मकान का ताला तोड़कर बदमाशों ने गुरुवार को दिनदहाड़े 80 हजार रुपये नगद और लाखों रुपये मूल्य का आभूषण चुरा ले गए। चोरों ने इस अपार्टमेंट के दूसरे तल पर स्थित स्टेट बैंक के एक सहायक मैनेजर के घर को भी खंगालने में कोई संकोच नहीं किया।

इलाकाई पुलिस इस मामले में एक आरोपित को पकड़ने के बाद उसे छोड़ दिया। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी लोग उंगली उठाने लगे हैं। हरेंद्र शुक्‍ला अमर उजाला, दैनिक जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स और हिंदुस्‍तान जैसे अखबारों में काम कर चुके हैं।

‘आप’ से जुड़ेंगी डा. नूतन ठाकुर

Nutan Thakur : मैंने आम आमदी पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया. कुछ ने सही कहा कुछ ने गलत. आप दोनों अपनी जगह सही हैं. प्रश्न पार्टी का नहीं है. प्रश्न वास्तव में देश और समाज के लिए कुछ कर सकने का है. यदि ऐसा कुछ भी कर पायी तो अच्छा, यदि सिर्फ दूसरी पार्टियों को भला-बुरा कहने में सारी उर्जा लगा दी तो बहुत बुरा.

डा. नूतन ठाकुर के एफ‍बी वॉल से साभार.

जनसंदेश टाइम्‍स, कानपुर के आरई आलोक पांडेय का इस्‍तीफा

जनसंदेश टाइम्‍स, कानपुर के स्‍थानीय संपादक आलोक पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अखबार के साथ लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. बताया जा रहा है कि प्रबंधन के अनदेखी के कारण उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है. बताया जा रहा है कि आर्थिक दिक्‍कतों से जूझ रहे इस अखबार में पत्रकारों तथा कर्मचारियों की कमी है, जिसके चलते यह अखबार अपने प्रतिद्ंवद्वी अखबारों से टक्‍कर लेने में मुश्किल हो रही थी. इसके साथ अन्‍य अखबार कानपुर यूनिट से जुड़े जिलों के लिए अलग से एडिशन प्रकाशित कर रहे थे, वहीं जनसंदेश टाइम्‍स इस यूनिट से जुड़े सभी जिलों के लिए एक ही एडिशन निकाल रहा था.

बताया जा रहा है कि इस कारण यह अखबार लगातार पिटता जा रहा था. प्रबंधन की अनदेखी के बाद आलोक पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया. उन्‍होंने अखबार में डीएनई के पद पर ज्‍वाइन किया था तथा प्रमोशन पाकर स्‍थानीय संपादक के रूप में जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. आलोक पिछले 17 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं तथा अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, आज समाज अखबार के लिए विभिन्न शहरों में काम कर चुके हैं. 

जानिए.. कैसे गरीबी-मुसीबत के बीच अखबार निकालते हैं ये 15 बच्‍चे!

बाजारवाद में अखबार निकालना बच्चों का खेल नहीं है लेकिन गरीब, अनाथ और फुटपाथ के बच्चों के लिए तो अखबार निकालना मानो बच्चों का खेल जैसा ही हो गया है। झोपड-पट्टी और सड़कों के किनारे रहने वाले गरीब एवं अनाथ बच्चे करीब 15 साल से हर महीने 'हमारा अखबार' निकालते हैं। यह अखबार अपराध, खेलकूद, मनोरंजन केसाथ बालपन को प्रभावित करने वाली हर खुशी और गम की घटनाओं से भरा रहता है।

इसे समझने के लिए पाठक को भी बचपन में लौटना पड़ता है क्योंकि इसमें छपने वाले लेखों का न कोई तारतम्य होता है और न ही शब्दों एवं व्याकरण की कसौटी इन पर लागू होती है। इनके काम करने के तरीके कहीं ज्यादा हैरान करने वाले हैं। अखबार का न कोई दफ्तर है और न ही प्रकाशक एवं प्रिंटर है। हर अंक में इसके संवाददाता एवं संपादक बदलते रहते हैं। इस अखबार में लिखने वाले बच्चों से बात करना भी मुश्किल होता है क्योंकि इनमें ज्यादातर समाजिक रूप से उपेक्षित गरीब घरों के बच्चे हैं, जिनकी प्रतिभा अंतर्मुखी रहती है। बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दिलाने के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन 'डोर स्टेप स्कूल' अखबार निकालने में इनकी मदद करता है। यह अखबार 1998 से हर महीने निकलता है।

डोर स्टेप स्कूल की निदेशक बीना सेठ लश्करी कहती हैं कि ये बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, क्योंकि घर चलाने के लिए मां बाप के काम में हाथ बटाते हैं। हमारी सबसे बड़ी चुनौती इन बच्चों को पढ़ाने के लिए इनके घरवालों को तैयार करने की होती है। यहां पढऩे वाले बच्चे अपने परिवार और जिंदगी के बारे में ऐसी बातें बताते हैं, जो मीडिया में सामान्यतया नहीं आतीं। इनके मिलने वाली जानकारी में पुलिस वालों द्वारा परिवार को तंग किया जाना, पिता द्वारा माता की पिटाई के दुखद पल के साथ त्योहार मनाने के तरीके, क्रिकेट जैसे खेल में दिलचस्पी आदि जैसे सुखद अनुभव शामिल होते हैं। लश्कारी का कहना है कि यह सब सुनने के बाद ही इनके अनुभवों को अखबार का रूप देने का विचार सामने आया। अखबार में बच्चों के लेख और चित्र शामिल होते हैं।

इन बच्चों को पढ़ाने और अखबार निकालने में मदद करने वाली विजया दलवी अखबार निकालने के तरीके के बारे में बताती हैं कि पहले बच्चों को लिखने को कहा जाता है। पेंसिल से लिखे शब्दों को माइक्रोटिक पेन से लिखा जाता है। इसके बाद अक्षरों को काटकर ए फोर आकार के सादे पृष्ठ पर चिपकाया जाता है और उसकी फोटो कॉपी कराई जाती है। दलवी का कहना है कि बच्चों के लिखे का संपादन नहीं होता, शब्दों को काटते वक्त सिर्फ यह देखा जाता है कि लाइनें ज्यादा टेढ़ी न हों। लश्करी कहती है, 'इसे हम कलर प्रिंट नहीं करना चाहते और न ही इसमें छपने वाले लेखों में बहुत ज्यादा संपादन की जरूरत समझी जाती है। ऐसा करने से बच्चों के लेख की मूल भावना खत्म हो जाएगी। फिर उसमें अपनापन नहीं, बल्कि बाजारवाद दिखाई देगा जिसकी हमें जरूरत नहीं है।' अखबार पढऩे पर ऐसा लगता है, जैसे कोई बच्चा पाठक से बात कर रहा है। उसकी लडखड़ाती आवाज, टूटे फूटे शब्द और हिंदी में घुली मिली उसकी बोली की मिठास सहज आंखों के सामने आने लगती है।

अखबार का खर्च निकालने के सवाल पर लश्करी कहती हैं कि इसमें विज्ञापन नहीं छपता। ऐसा करने से बच्चों के दर्द और उनकी छिपी भावनाओं के बजाय विज्ञापन का असर नजर आने लगेगा। उन्होंने बताया कि इसकी 100 प्रतियां निकलती हैं और एक प्रति की लागत 6-7 रुपये आती है। इसकी बिक्री से ही जरूरत भर को पैसे मिल जाते हैं। कुछ लोग लागत से ज्यादा पैसे दे देते हैं। डोर स्टेप स्कूल में पढ़ाई करने वाली देवी चौहान आज खुद गली-गली जाकर बच्चों को पढ़ाती हैं। उनका कहना है कि इस समय अखबारों में बच्चों के कॉलम खत्म हो चुके हैं और जो आता भी है, बड़े घरों के बच्चों की सोच होती है। यह अखबार झोपड़-पट्टी में रहनेवाले बच्चों की लेखनी से सजता है। डोर स्टेप स्कूल बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने के लिए काम करने वाला एनजीओ है। संगठन मुंबई और पुणे में करीब 50,000 बच्चों को शिक्षा देने में जुटा है। इसकी बस 6 बसें हैं जो चलते फिरते स्कूल का काम करती हैं। एनजीओ की मोबाइल लाइब्रेरी भी है, जिससे बच्चों को पढ़ाने का काम किया जाता है। (बीएस)

जय प्रकाश ने खबर मंत्र तथा सुरजीत ने प्रभात खबर ज्‍वाइन किया

प्रभात खबर, धनबाद से जय प्रकाश ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. जयप्रकाश ने अपनी नई पारी की शुरुआत वरिष्‍ठ पत्रकार हरिनारायण सिंह के अखबार खबर मंत्री के साथ की है. उन्‍हें यहां भी सीनियर सब एडिटर बनाया गया है. जय प्रकाश कई अन्‍य संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

खबर मंत्री, रांची से खबर है कि सुरजीत सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर क्राइम रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. सुरजीत ने अपनी वापसी प्रभात खबर में की है. उन्‍हें उसी पद पर लाया गया है. वे इसके पहले भी प्रभात खबर में कार्यरत थे, परन्‍तु कुछ विवाद के बाद अखबार से उनका संबंध विच्‍छेद हो गया था. इसके बाद इन्‍होंने खबर मंत्र ज्‍वाइन कर लिया.

पत्रकार को मिली जान से मारने की धमकी, मीडियाकर्मी एसपी से मिले

नीमच। नीमच में पत्रकारों को धमकाने की घटनाएं बढ़ रही है। शनिवार को पत्रकार जगत ने कड़े शब्दों में निंदा की। एसपी रुडोल्फ अल्वारेस से मिले। एसपी ने कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया। शनिवार को मीडियाकर्मियों पर बढ़ रहे हमला और धमकी की घटनाओं को लेकर पत्रकार सड़कों पर उतर गए। जिले भर के पत्रकार एकजुट होकर दोपहर को एसपी निवास पहुंचे। वहां पर एसपी को ज्ञापन सौंपा।

पत्रकार को धमकाने की यह दूसरी घटना है। पत्रकार मूलचंद खीची को केंसूदा के विक्रम आंजना ने जान से मारने की धमकी दी थी। हाल ही में उनसे जुड़े हुए कांग्रेस के नेता राजकुमार अहीर और उसके भाई दिनेश अहीर ने जान से मारने की धमकी दी। दोनों मामले में पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज काराई, लेकिन पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। पत्रकारों ने दिए ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि विधायक उदयलाल आंजना, मनोहर आंजना, विक्रम आंजना तथा उनकी पत्नियां और परिवार के अन्य सदस्य भी मुझे जान से खत्म करवा सकते हैं। जगदीश गुर्जर आए दिन मुझे धमकाता है।

वरिष्‍ठ पत्रकार मोतीलाल शर्मा, विष्‍णु मीणा के नेतृत्‍व में मूलचंद खींची को धमकी देने, हत्या करवाने के मामले में अलग से ज्ञापन सौंपा गया। पत्रकारों ने एसपी रुडोल्फ अल्वारेस को ज्ञापन दिया और कार्रवाई की मांग की। एसपी ने आश्वासन दिया कि नए सिरे से जांच करवायी जाएगी, आप चिंता न करिए, कोई किसी को मार नहीं सकता। इस मौके पर वरिष्‍ठ पत्रकार मुकेश सहारिया, विष्‍णु परिहार, नई दुनिया के ब्यूरो चीफ शिवेंद्र दुबे, प्रेस क्लब के अध्यक्ष भूपेंद्र गौड़ बाबा, राहुल जैन, पंडित कमलकांत जोशी, मोतीलाल शर्मा, विष्‍णु चौहान, जयकुमार अहीर, पवन शर्मा, राधवेंद्र शर्मा, विवेक कटारिया, जोगेंद्र सलूजा सरदार, मजहर भाई, घनश्याम लोहार, श्याम गुर्जर, दीपक खताबिया, दीपक चौहान समेत कई पत्रकार मौजूद थे।

आईपीएस एसोसियेशन के पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने थाने पहुंचा आईपीएस अफसर

Amitabh Thakur : अभी कुछ देर पहले मैं यूपी आईपीएस एसोसियेशन के पदाधिकारियों के विरुद्ध धारा 3(1) पुलिस बल (अधिकारों का निषेध) अधिनियम 1966, जिसके अनुसार कोई भी पुलिसकर्मी बिना सरकार के अनुमति के कोई एसोसियेशन नहीं बना सकता, के उल्लंघन पर एफआईआर दर्ज कराने थाना महानगर, लखनऊ गया. थाने पर मेरा प्रार्थनापत्र रख लिया गया और मुझे एक पीली पर्ची (रसीद) दे दी गयी जबकि धारा 154(1) सीआरपीसी के अनुसार इसमें एफआईआर दर्ज होना चाहिए था. अब मैं धारा 154(3) सीआरपीसी के अंतर्गत एसएसपी लखनऊ को एफआईआर के लिए पोस्ट द्वारा प्रार्थनापत्र भेज रहा हूँ.

Just went to police station Mahanagar, Lucknow presenting an application for registration of FIR against office-holders of the UP IPS Association for being in violation of section 3(1) of the Police Forces (Restriction of Rights) Act 1966 which says that policemen can form an association only after taking due permission from the State government. The police officer received the application and gave a yellow- coloured receipt while as per section 154(1) CrPC , an FIR should have been registered. Shall now send a letter by post for registration of FIR to the SSP, Lucknow as prescribed in section 154(3) CrPC.

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

Odisha Chit Fund Scam and the Human face

Carlo Pietro Giovanni Guglielmo Tebaldo Ponzi or simply Charles Ponzi. It is the name of a con artist who in the 1920s did something similar to what you find in the oft-mentioned Chit fund scam presently in news across Odisha and beyond. The art of tempting investors to invest their funds for highly profitable early returns while actually paying the early investors with the funds from the later investors was the con-artistry of Ponzi and such fraudulent schemes have been termed as Ponzi schemes in the dubious memory of Charles Ponzi. Unfortunately Odisha today boasts of not one but allegedly several Ponzis.

The Odisha Ponzi or Chit fund scam makes for interesting reading nowadays. The morning newspapers detail that a certain chit fund company’s managing director was housing his wife in a plush South Delhi bungalow at a princely monthly rental amount of Rs. 7 lakhs apart from the company’s corporate office rental billing at Rs.8.5 lakhs per month. Another Odia Ponzi was recently arrested in a metro city while attempting to reorganize his company agents for another round of money-making notwithstanding that he was out on bail. Still another Ponzi admitted about his Rs.75 crore pay-offs to some bigwigs in the ruling Biju Janata Dal party in Odisha. The names of those bigwigs are not revealed strangely by the investigating state department which has a habit of leaking information otherwise. But a vernacular television channel played a taped telephonic conversation of a Ponzi indicating links to an Odisha Jan Morch leader. It is surprising that the television channel could only lay hands on that specific tape which has the conversation of the Ponzi linking to the OJM leader. Probably the conversations with alleged BJD leaders are still in transit!

Before the Odisha Chit fund scam was unearthed, each time a BMW, Mercedes, Audi or Jaguar car would pass by on Bhubaneswar high streets, I would marvel at the new entrepreneurs of Odisha. After the scam broke, the media has been reporting of dozens of such high-breed cars being confiscated from the Ponzis. Interestingly a few days back it was reported that a few BMWs, Audis and a Jaguar were found with keys in the ignition near the house of a Ponzi. It appeared that a few political biggies had undertaken a James Bond-like operation late night and quietly left the cars near the house of the Ponzi. These cars had probably been supplied by the Ponzi to them as protection money in kind probably. With each day, a new Ponzi appears with a few high value cars. The next time a BMW or Jaguar passes by; I may be excused for peering too hard and scratching my chin to decipher whether it belongs to a real-time entrepreneur, wannabe-Ponzi, fleeing-Ponzi or Ponzi’s political god-fathers.

In the race of media reports, from cars to wealthy property, from Ponzis to Ponzi masters, all have been reported diligently. The political accusations and counter-accusations have been blowing from both the ruling party and the opposition. Demands for a judicial probe or a CBI probe or a probe by the Serious Fraud Investigating Organisation (SFIO) have been gaining coverage. But in all of this, about 20 lakh people of Odisha are estimated to have been impacted by this Chit fund scam. They of course have been heard and seen shouting slogans, holding rallies and demanding that their invested funds be returned back by the state Government. There are quite a few voices who think otherwise. They are of the opinion that since these investors indulged in greed by investing their funds in such highly illogical financial dreams woven by the Ponzis, therefore the responsibility for the good or bad of the invested funds lie with the investors and not with the state. The fraud was rather brought on by these investors on themselves is argued by some quarters.

There is no logical riposte to such a logical statement. If someone approached you with a financial plan of doubling your money in 75 days or giving you a 20 percent monthly dividend on your investment, naturally you would spot it as a fraud.  When the nationalized and private sector banks and financial institutions have a hard time in trying to keep the return on investment at a respectable distance beyond the reach of the creeping inflation, the idea of such grandiose schemes would ring warning bells for many reading this article. But spare a thought for a retired school teacher in an obscure part of rural Odisha’s Balasore district. His monthly pension barely covers his family’s food, clothing and shelter needs. Having married late, his son is presently in 12th Class and wants to be an engineer. His beautiful daughter is about to graduate in Political Science with quite a few matrimonial offers without any dowry demands lining the house. But the retired gentleman has to find funds for the education of his son and the marriage expenses of minimum clothing and jewellery for his daughter coupled with a wedding lunch for the village.

Anticipating these financial needs, he had invested his meager funds that he got when he retired two years back. The first stop for the funds was the nearest bank branch. But at about nine percent return, it was barely trying to keep up against the rising inflation. Then a former student as an agent of a company arrived and promised a better financial deal. When hunger wrenches the stomach and thirst parches the throat, the burning sand in the desert resembles an oasis and this mirage leads such retired people to believe in the fraudulent much-promised oasis. This school teacher invested his everything in the financial company that his former student in the form of an agent offered. It turned out that this was a Ponzi scam which hit him on his face. Presently, he has no money for his daughter’s wedding, no funds for his wannabe engineer son and now no money for his ailing wife who took to the bed after this Ponzi scam hit their family like a sledge hammer. I am not trying to justify the illogical decision taken by this gentleman. I am just trying to establish the human behavioural weaknesses of a retired school teacher with empty pockets and rising needs and a former student on whom he blindly placed his trust. Can we truly pass on the guilt to him for having invested in this company?

There are many young girls who will not see the wedding that they were coyly looking forward to due to this Chit fund scam. Many young men who were expecting to start their professional education or vocations will never find that fitting start in life. Many elderly men and women who have nothing left in their coffers as bad health approaches with growing age will recline back with closed weary eyes. Many dreams will never come alive. Many hopes will die before seeing the light of the day. Many smiles will never crease the face. The Odisha chit fund scam is not only about the confiscated BMWs and Audis, neither about the sealed filthy rich properties of the Ponzis nor about the political slug-fest that will continue till 2014. It is about those hundreds and thousands of shattered dreams that see no tomorrow. It is about those thousands of families that stare into an unknown future. It is about those twenty lakh people who demand an answer.

Why were such Ponzi companies allowed to function? Did no one in the state Government know about them? How come the Chief Minister Naveen Patnaik graces the meetings hosted by such a Ponzi? How come a Ponzi was recommended by a ruling BJD big-wig for a state award? How come the Ponzis print prospectuses, open bank accounts, run financial circulation and strut about thumbing a nose at the Government apparatus for so many years without not one, repeat; not one MLA or minister or bureaucrat ever raising a finger about this in the state assembly or secretariat? Why have the BJD leaders who have been named by the Ponzis not been questioned by the investigating agencies so far? Why have the journalists named by a Ponzi for allegedly having been provided protection money not been questioned so far? Why is Chief Minister Naveen Patnaik trying to wash his hands off the sins of his party-men like Pontius Pilate? It is not the greed of the investors that has failed them; it is the breeding ground of illegitimate political corruption that ensured the survival of such Ponzi companies to thrive for many years before the Ponzi dirt belched into the open. The state Government has to answer.

The human face of this grave travesty of justice cannot be wished away by a judicial probe till kingdom come. The investigation has to be handed over to the CBI or SFIO. The fast track courts need to be expedited for the trail of all these chit fund cases and since the widespread fraud has taken place under the watch of the state Government, the state Government has to create a corpus for returning the principal amount invested by these small investors of Odisha. It is not the first time that a Ponzi scam has surfaced but it could well be the last, only if the corrupt politicians can be weeded out through impartial investigation and strict compliances ensured through the Registrar of Cooperative Societies and or the Registrar of Companies coupled with due vigilance and diligence by law enforcement agencies. Only then the small investor will not have to watch his daughter sit unwed at home or his son’s dreams of being an engineer remain unfulfilled. The real story of this Odisha Chit fund scam is not the cash or the fancy cars but rather the creased forehead of a pensive looking retired school teacher. The human face!

Report by Dr. Sasmit Patra.

राशन विक्रेता से चौथ वसूली के आरोप में दो पत्रकार हिरासत में

मथुरा। अपराधियों, पुलिस, तथाकथित नेताओं के साथ-साथ अब मीडिया में पत्रकारिता के हथियार का इस्तेमाल कर अवैध धन वसूली करने के मामले भी आये दिन उजागर हो रहे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व गोवर्धन सेक्स रैकेट में पकड़े गये पत्रकार का मामला ठण्डा भी नहीं हुआ था कि राशन कालाबाजारी के नाम पर विक्रेता से धन वसूली करने के प्रयास में दो कथित पत्रकारों की पिटाई सामने आ गई है। इन कथित पत्रकारों को पकड़कर गोवर्धन पुलिस के हवाले कर दिया गया है। समाचार लिखे जाने तक पुलिस जांच पड़ताल में जुटी हुई थी।

प्राप्त विवरण के अनुसार कस्बा गोवर्धन में रविवार को राशन विक्रेता ट्रैक्टर ट्राली में राशन को कालाबाजारी के लिये ले जा रहा था। बताया जाता है कि इसकी जानकारी किसी नजदीकी व्यक्ति ने बरसाना के एक कथित पत्रकार को दी तो वह अपने एक अन्य साथी को लेकर बाइक पर गोवर्धन आ गये और ट्रैक्टर ट्राली का पीछा कर कैमरे में कैद कर लिया। इसकी जानकारी राशन विक्रेता को होने पर उसने अपने अन्य लोगों को बुला लिया। और कथित पत्रकारों पर धन वसूली का आरोप लगाते हुऐ उनकी जमकर पिटाई कर दी।

इसकी जानकारी पुलिस को मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पत्रकारों को थाने ले आयी। देर रात तक पुलिस जांच पड़ताल में जुटी हुई थी। बताया जाता है कि राशन विक्रेता रवि उर्फ बबलू भारद्वाज पूर्व में सेक्स रैकेट में पत्रकार के साथ जेल जा चुका है। इससे पूर्व रिफाइनरी थाना क्षेत्र में भी काला तेल एवं खनन माफियाओं से अवैध धन वसूल करने गये कुछ पत्रकारों की पिटाई कर ग्रामीणों ने पुलिस को सौंपा था। जिनके माफी मांगने पर छोड़ा था। इसी तरह के कई मामले शहर से लेकर देहात में यूपी बोर्ड परीक्षा के दौरान कई विद्यालयों पर दिखाई दिये थे। जबकि आये दिन कथित पत्रकारों को पुलिस चौकी थाना तहसील एवं सरकारी कार्यालयों में दलाल के रूप में कभी भी देखा जा सकता है।

उत्तराखंड आपदा के बाद शुरू हुई राजनीति पर तीन कार्टून (देखें)

उत्तराखंड आपदा को लेकर राजनीति तेज हो गई है. यह राजनीति कई चेहरों के साथ सामने है. मीडिया से लेकर नेता, नौकरशाह सब राजनीति के हिस्से हैं. इसी पर तीन कार्टून पेश हैं..

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

ठगे जा रहे केबल उपभोक्‍ता, 30 जून को केबल ऑपरेटर करेंगे हड़ताल

केबल टीवी सर्विसेज के डिजिटाइजेशन के बहाने उपभोक्ताओं को खुलेआम लुटा जा रहा है। पहले तो सेट टाप बाक्स लगाने की मुहिम चली और अब कस्टमर एप्लीकेशन फॉर्म (सीएएफ) जमा कराने की मुहिम है। पसंदीदा चैनल देखने के लिए पसंद के मुताबिक जेबें खाली करनी होंगी। समाचार चैनलों को देखने के लिए भी ज्यादा भुगतान करना होगा। यहां तक कि विदेशी समाचार चैनल बीबीसी और सीएनएन को देखने के लिए पापुलर पैकेज काफी नहीं होगा।

बंगाल के केबल टीवी आपरेटरों ने इसके खिलाफ 30 जून को हड़ताल करने का ऐलान किया है। केबल टीवी आपरेटरों का संगठन शुरू से सेट टाप बाक्स लगाने का विरोध करता आ रहा है। मुख्यमंत्री ममत बनर्जी ने भी इसका विरोध किया था। राज्य सरकार के विरोध के चलते बंगाल में डिजिटाइजेशन का काम देरी से पूरा हुआ। अब सेट टाप बाक्स लग जाने के बाद घुमाकर केबल टीवी शुल्क बढ़ाया जा रहा है। कम से कम सौ रुपये में जो सौ मुफ्त चैनल दिखाये जाने हैं, उसमें फिल्मों, खेल और समाचार के चैनल शामिल नहीं हैं। क्षेत्रीय चैनलों को शामिल करके पैकेज का कोटा पूरी किया जा रहा है। जहां 150 रुपये में सारे चैनल देखने को मिलते थे, वहां 180 रुपये के पापुलर पैक में भी पसंदीदा चैनल नहीं है। 230 रुपये के पैकेज में भी सारे पसंदीदा चैनल नहीं है। 280 रुपये खर्च करें तो आपको वे तमाम चैनल देखने को मिलेंगे, जिसे आप 150 रुपये में देख रहे थे। इसके चलते नाराज उपभोक्ता केबल सेवा छोड़कर होम टीवी का विकल्प भी अपना रहे हैं। जो ऐसा नहीं कर रहे हैं वे प्रबल विरोध कर रहे हैं। केबल आपरेटरों का कहना है कि जिस तरह से उपभोक्ताओं से अतिरिक्त शुल्क लिया जाना अनिवार्य कर दिया जा रहा है, उनका धंधा ही चौपट हो जायेगा।

केबल टीवी ग्राहकों के कस्टमर एप्लीकेशन फॉर्म (सीएएफ) जमा करना अनिवार्य है। इसके बाद उन उपभोक्ताओं के केबल कनेक्शन काट दिए जाएंगे जिन्होंने यह फॉर्म जमा नहीं कराया है। इस फॉर्म में व्यक्तिगत जानकारियां और पसंद के चैनलों की सूची मांगी गई है। टेलीकॉम नियामक ट्राई ने यह आदेश जारी किया है। केबल ऑपरेटरों के खिलाफ टेलीकॉम रेगुलटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) का  आरोप है कि वे मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) को सेट टॉप बॉक्स सब्सक्राइबर की डिटेल्स नहीं दे रहे हैं। ये डिटेल्स केबल टीवी सर्विसेज के डिजिटाइजेशन में जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी है। आरोप है कि केबल ऑपरेटर डिजिटल एड्रेसेबल केबल टीवी सिस्टम (डीएएस) लागू करने से संबंधित नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। डीएएस में सेट टॉप बॉक्स को सब्सक्राइबर के टीवी सेट के साथ कनेक्ट करना होता है। ट्राई ने कहा है कि डीएएस को सिलसिलेवार ढंग से लागू करने की कवायद के तहत जरूरी है कि केबल ऑपरेटर सब्सक्राइबर की सर्विस की चॉइस और बुके सहित उनके डिटेल मेंटेन करें, लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। इन्हें एमएसओ के पास भी फॉरवर्ड नहीं किया जा रहा है, जबकि जवाबदेही तय करने के लिए ये डिटेल्स जरूरी हैं।

ट्राई के प्रमुख सलाहकार सुधीर गुप्ता ने कहा कि जो उपभोक्ता स्थानीय केबल ऑपरेटर या मल्टी सिस्टम ऑपरेटर (एमएसओ) को यह फॉर्म जमा नहीं कर पाएंगे उनका कनेक्शन बंद कर दिया जाएगा। फॉर्म जमा कराने के बाद ही उनका केबल प्रसारण शुरू होगा। ट्राई के चेयरमैन राहुल खुल्लर ने कहा कि यह कानून एक नवंबर, 2012 से ही लागू है। ग्राहकों को यह फॉर्म स्थानीय केबल ऑपरेटर के पास जमा करने हैं। ये ऑपरेटर इन फॉर्म को एमएसओ के पास जमा करेंगे। एमएसओ ने अब तक केबल ग्राहकों से नरमी बरतते हुए कनेक्शन बंद नहीं किए हैं। खुल्लर ने कहा कि एमएसओ पर शिकंजा कसने के हालात बन रहे हैं। ट्राई के पास और कोई विकल्प नहीं है। नियामक कानून के तहत स्थानीय केबल ऑपरेटरों और एमएसओ पर मुकदमे की तैयारी कर रहा है। कानून में एमएसओ के लिए ग्राहकों द्वारा भुगतान की गई रकम का बिल देने का प्रावधान है। ट्राई ने पिछले महीने एक नया प्रावधान भी जोड़ा है। इसके तहत केबल टीवी ग्राहकों को सेट टॉप बॉक्स लगवाने के लिए एकमुश्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा। ग्राहकों को यह लाभ डिजिटल एड्रेसेबल केबल टीवी सिस्टम (डास) के तहत दिया जाएगा।

ट्राई ने मई 2012 में 'स्टैंडर्ड्स ऑफ क्वालिटी ऑफ सर्विसेज' तैयार किया था, जिसमें कंज्यूमर लेवल पर सर्विस की क्वालिटी दुरुस्त करने के लिए केबल टीवी कनेक्शन, डिस्कनेक्शन, ट्रांसफर, शिफ्टिंग, सब्सक्राइबर की शिकायत दर्ज करना और उसका निपटारा करना, सेट टॉप बॉक्स खरीदना, सप्लाई करना, चैनल की पोजीशन चेंज करना, बिल पेमेंट और केबल ऑपरेटरों और एमएसओ की जिम्मेदारी तय करना जैसी चीजें शामिल हैं। स्टैंडर्ड्स ऑफ क्वालिटी सर्विसेज के एक प्रोविजन के मुताबिक, केबल ऑपरेटरों के लिए कंज्यूमर इंफॉर्मेशन मुहैया कराना जरूरी है। ट्राई ने पहले फेज में चार मेट्रो में सेट टॉप बॉक्स लगाने में हुई प्रगति की समीक्षा में कहा था कि सभी लिंक्ड ऑपरेटर सीडेड और ऑपरेशनलाइज्ड सेट टॉप बॉक्स की कुल संख्या, सब्सक्राइबर की चॉइस, बुके जैसी जरूरी कंज्यूमर डिटेल नहीं दे रहे हैं।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

उत्तराखंड जैसी आपदा में फंस जाएं तो इन बातों को जरूर ध्यान रखें…

Rajiv Nayan Bahuguna : भविष्य में यदि आप उत्तराखंड जैसी आपदा में फंस जाए तो क्या करें….

1- घबराएं नहीं. विमान दुर्घटना में हताहतों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साबित होता है कि कई यात्री विमान के भूलुंठित होने से पहले ही आकाश में सदमे से मर जाते हैं. घबराहट में आप उचित निर्णय नहीं ले सकते.

2- तेज बारिश होने की स्थिति में चट्टान य गुफा के नीचे शरण लेने की बजाय किसी मज़बूत पेड़ के नीचे खड़े हो जाएँ या खुले में.

3- देखें कि आपके ऊपर या नीचे कोई कमज़ोर पहाड़ तो नहीं?

4- जब बारिश थम जाये तो मलबे के ढेर को पार न करें, वह दरक सकता है. जहाँ से मलबा आना शुरू हुआ है, वहां ऊपर से पार करें, चाहे कितनी भी चढाई चढनी पड़े.

5- बारिश थमने के बाद और धूप आ जाने पर बे परवाह न हो जाएँ . धूप पड़ने से जिन चट्टानों में पाणी भरा है , वह अक्सर दरकती हैं .

6- दौड़ न लगाएं. आगे-पीछे, ऊपर-नीचे देखते चलें.

7- रसद खत्म होने पर जंगली फल अथवा पत्तियां खाएं. पहाड़ पर कुछ बूटियाँ विषैली हैं लेकिन वृक्षों के उत्पाद सुरक्षित हैं.

8- आपदा में रात बितानी पड़ जाए, तो किसी भी सूखे नाले या घाटी में न रहें, वहाँ कभी भी पानी आ सकता है.

9- यदि एकांत में कोई ठग, लुटेरा मिले तो अपने मोबाइल फोन से किसी से बात करने का नाटक करें, यह आभास दें कि आपके साथी आस-पास ही हैं. मोबाइल फोन न हो तो ऐसे ही किसी का नाम लेकर झूठी आवाज़ लगाएं.

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.

न्यायमूर्ति काटजू हैं कहां? बीमार हैं या विदेश में या कहीं पहाड़ पर फंसे…???

Sanjaya Kumar Singh : मुझे लगता है न्यायमूर्ति काटजू बीमार हैं या विदेश में। या फिर मुमकिन है वे भी कहीं पहाड़ पर फंसे हों। मीडिया वालों को इसका पता लगाना चाहिए। कुछ भी बोलकर मीडिया में बने रहने की इच्छा और प्रतिभा रखने वाला वह व्यक्ति इतने मौके यूं ही जाने देगा। मुझे यकीन नहीं हो रहा है। कुछ तो बात है। मीडिया में किस्म – किस्म की रिपोर्टिंग हो रही है कोई आदमी को गधा बना रहा है और अपने गधा होने का सबूत बिना मांगे दे रहा है और ऐसे में मीडिया वालों की योग्यता का रिकार्ड रखने के लिए भी काटजू साब को सामने आना चाहिए। पता नहीं वे यह काम पर्दे के पीछे से तो नहीं कर रहे हैं। वाकई चिन्ता हो रही है।

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Shambhunath Shukla : अरे, अपने जस्टिस मार्कण्डेय काटजू कहां चले गए? आखिर उत्तराखंड की बिपदा प्रेस से भी संबंधित हैं। वह होते तो समझाते कि इस बिपदा का कवरेज कैसे होना चाहिए। आखिर काटजू साहब भी उत्तरापथ के ही पंडित हैं।

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Pankaj Mukaati : इसका मतलब ये है कि – देश चलाने का दंभ भरने वाला वो सारे लोग जो इस वक्त चुप हैं। बीमार है, अक्सर ऐसे मौके पर गायब रहने वाले लोगों की बीमारी का नाम कोई बता सके तो मेहरबानी होगी और दवा खोजने में भी आसानी रहेगी.

एफबी वॉल से.

इस संवदेनहीन ‘इंडिया न्यूज’ चैनल को कब अकल आएगी (देखें तस्वीरें)

उत्तराखंड में राहत और बचाव कार्य में न्यूज चैनल वाले बाधा बनने लगे हैं. इन्हें हेलीकाप्टर से दौरा कराने, इनकी आवभगत करने, इनको वीडियो शूट कराने के लिए इनकी मदद और मिजाजपुर्सी के लिए राहत-बचाव में लगे कर्मियों को लगा दिया गया है. आपको अगर यकीन न हो तो नीचे दी गई तस्वीरें देखें. इंडिया न्यूज चैनल की जर्नलिस्ट शीतल राजपूत की मदद में एक एनडीआरएफ कर्मी जुटा है. वह माइक आईडी का वायर हाथ में पकड़े हुए है ताकि शीतल राजपूत ठीक से रिपोर्टिंग कर सकें.

यह एनडीआरएफ कर्मी इसी समय में आपदा में फंसे लोगों के लिए कुछ कर सकता था, लेकिन उसे फुल टाइम जाब दे दिया गया है इंडिया न्यूज चैनल की पत्रकार शीतल राजपूत की मदद करना. सोचिए, जब ऐसे संवेदनहीन न्यूज चैनल हों तो आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ये वृहत्तर मानवता के हित में भूमिका निभाएंगे. अभी कल ही एक चैनल के रिपोर्टर एक गरीब आदमी के कंधे पर बैठकर रिपोर्टिंग करते दिखे. ऐसे मुश्किल समय में मीडियाकर्मियों से अपेक्षा है कि वे राहत बचाव कार्य में लगे लोगों से कोई मदद न लें.

न्यूज चैनल वालों को अगर वाकई किसी मददगार की जरूरत हो तो वे अपने आफिस से असिस्टेंट बुलवा लें, लेकिन प्लीज, आपदा में फंसे लोगों के जान बचाने के काम में शामिल कर्मियों को बख्श दें. ज्ञात हो कि इंडिया न्यूज चैनल के प्रधान संपादक दीपक चौरसिया हैं और इसके मालिक कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा के पुत्र कार्तिक शर्मा हैं.