अपनी रिपोर्टर पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो सुधीर चौधरी, साफ कहो नैतिक जिम्मेदारी मेरी है

Sanjaya Kumar Singh : गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर एफआईआर हुई तो पढ़िए सुधीर चौधरी का बचाव। संपादक जी कह रहे हैं कि रिपोर्टर पूजा मेहता सिर्फ 25 साल की है। पूजा को ममता बनर्जी की असहिष्णुता झेलना पड़ रहा है जबकि पूजा अपने संपादक की नालायकी झेल रही है। ज़ी न्यूज संतुलित खबरें कर रहा होता तो खिलाफ खबरों पर भी एफआईआर नहीं होती है और संपादकी झाड़ने वाले मौका मिलते ही फंसा दिए जाते हैं – ये कौन नहीं जानता है। पूजा नहीं जानती होगी सुधीर चौधरी को तो पता ही है। अब पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो। कहो, नैतिक जिम्मेदारी मेरी है। पूजा का नाम एफआईआर से हटा दिया जाए। पूजा की आड़ में खुद बचने का रास्ता क्यों खोज रहे हो।

कायदे से रिपोर्टिंग के लिए परेशान किया जाना गलत है। ममता बनर्जी ने जो किया वह समर्थन करने लायक नहीं है लेकिन संपादक रिपोर्टर की आड़ क्यों ले? दोष उसके सिर क्यों मढ़े? जिम्मेदारी तो संपादक की होती है और अगर रिपोर्ट सही है तो संपादक कहेगा सही है और नहीं तो माफी मांगेगा? रिपोर्टर की आड़ लेने का क्या मतलब लगाया जाए?

मैं ज़ी न्यूज की रिपोर्टिंग / संपादकी देखता नहीं लेकिन संपादक के रूप में बचाव बड़ा लचर है। दम है तो यही कहते कि रिपोर्ट सही है। ममता मुझे झेल भेज दें। अब जूनियर रिपोर्टर की आड़ में रिरिया क्यो रहे हो? आखिर स्टोरी पास करने की जिम्मेदारी तो तुम्हारी है सुधीर चौधरी।  अगर ममता ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया (अभी तो एफआईआर ही हुई है) तो लिखो ना बताओ, दिखाओ, रोने क्यों लगे? अगर एफआईआर कराना मुख्यमंत्री की असहिष्णुता है तो तुम्हारा यह बचाव दुम दबाकर रिरियाना है। इससे अच्छा होता, सीधे गलती मान लेते। तुम भी तो मीडिया की आजादी के नाम पर भौंक रहे हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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ईमानदारी के इस पर्व में सबसे ज्यादा नकदी भाजपाइयों के पास पकड़ी गई

Sanjaya Kumar Singh : भ्रष्टाचार दूर करने और देश में ईमानदारी स्थापित करने के भाजपाई राष्ट्रवादी त्यौहार के 50 दिन जैसे-जैसे पूरे होने के करीब आ रहे हैं इसका क्रूर और असली चेहरा सामने आ रहा है। यह रंगपोत कर चेहरा चमकाने की कोशिश का वीभत्स रूप था। लोगों की जान लेकर भी छवि बनाने का क्रूर खेल। भक्तों और सरकार के हिसाब से ईमानदारी स्थापित हो चुकी है और कालाधन लगभग खत्म हो गया है।

मुझे तो लग रहा है कि यह चुनाव में चंदा नहीं देने वालों को धमकाने, ब्लैकमेल करने की एक मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल की कोशिश का सरकारी रूप था जो संयोग से सत्ता में भी है। अब यही बचा रह गया है कि सरकार एक नियम बनाए जिसके मुताबिक नोटबंदी की घोषणा के बाद 1000 या 500 के पांच या कम नोट जमा करने वाले गरीबों के बारे में मान लिया जाए कि उन्होंने राष्ट्रवादी पार्टी के राष्ट्रनिर्माण प्रयासों में सहयोग नहीं किया है और उनके ये पैसे सीधे भाजपा के खाते में ट्रांसफर हो जाएं।

सुनने में यह अटपटा लग रहा है। पर अभी तक जो हुआ वह कम अटपटा नहीं है। और, जब इतना सब हो गया तो यह भी हो सकता है। पढ़िए यह खबर। इसके अलावा, आप जानते हैं कि सबसे ज्यादा नकदी भाजपाइयों के पास पकड़ी गई। सबका हिसाब भी है। तो यह ईमानदारी पर्व था किसके लिए? और इतने लोगों को इतना परेशान करके, करीब 100 लोगों की जान लेकर मिला क्या?

मुंबई में पकड़े गए 10 करोड़ रुपए पंकजा-प्रीतम मुंडे के को-ऑपरेटिव बैंक के निकले

मुंबई. यहां से पकड़ा गया 10 करोड़ रुपए का कैश महाराष्ट्र सरकार की मंत्री पंकजा मुंडे और उनकी सांसद बहन प्रीतम मुंडे के को-ऑपरेटिव बैंक का निकला। सांसद प्रीतम ने इस मामले में कहा- “मुंबई ब्रांच से पुणे ब्रांच में ले जाया जा रहे कैश का पूरा हिसाब बैंक के पास है।” बता दें कि गुरुवार को मुंबई में एक कार से पुलिस ने 10 करोड़ 10 लाख रुपए का कैश बरामद किया था। इसमें 10 लाख रुपए 2000 रुपए के नए नोटों में थे। बोरों में भरा था कैश. पुलिस ने गुरुवार को घाटकोपर-मानखुर्द लिंक रोड स्थित छेड़ा नगर के पास यह कैश पकड़ा था। – इसे बोरों में भरकर मुंबई से पुणे ले जाया जा रहा था। इस मामले में पुलिस ने 3 लोगों को हिरासत में लिया था। 10 करोड़ के पुराने नोट और 10 लाख के 2000 के नोट थे. यह छापेमारी एन्फोर्समेंट डायरोक्टोरेट (ईडी), इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और मुंबई पुलिस ने की थी। पकड़ी गई रकम में 10 करोड़ रुपए 500 के पुराने नोट और बाकी के 10 लाख 2000 के नए नोटों में मिले थे। डीसीपी शाहजी उमाप ने बताया कि यह कार्रवाई इंटेलिजेंस इनपुट्स पर की गई थी। पूरा कैश कार से बरामद हुआ था। कार में बैठे तीन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की तो तीनों ने खुद को पुणे के वैद्यनाथ अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक का इम्प्लॉइज बताया। पुलिस ने बताया, “पकड़े गए लोगों में से एक वैद्यनाथ शहरी सहकारी बैंक की पिंपरी चिंचवाड ब्रांच का मैनेजर है। जबकि 2 ने बैंक के कर्मचारी होने का दावा किया है।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेशनल अनुवादक हैं.

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मोदी के पीएम पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे माई लॉर्ड!

Sanjaya Kumar Singh : मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है… मामला देश की सर्वोच्च अदालत में है और बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं। मेरी कोई औकात नहीं कि इस मामले में टिप्पणी करूं पर जैन हवाला मामले को अच्छी तरह फॉलो करने के अपने अनुभव से कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता जायज है। लेकिन यहां मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है। मामला ठीक से जांच कराए जाने का है।

जैन हवाला मामले में 115 अभियुक्त थे और सभी मामलों की जांच, तथा उन्हें साबित करना अपेक्षाकृत मुश्किल था। पर यहां मामला सीधा है। आज टेलीग्राफ की इस खबर से भी लगता है गुजरात सीएम अगर गुजरात अलकली केमिकल है तो उसे भुगतान क्यों हुआ, हुआ कि नहीं इसकी जांच हो जाए और यह रिश्वत है (किसी और कारण से, किसी और को) तो उस मामले में कार्रवाई हो और इसे खत्म माना जाए। पर मामला है तो उसे अंजाम तक पहुंचाना ही चाहिए।

राजदीप सरदेसाई के साथ अरविन्द केजरीवाल की बातचीत से जो मामला समझ में आता है वह यह है कि बुनियादी तौर पर एक मामला है, शक है। सुप्रीम कोर्ट के लिए यह पर्याप्त नहीं है इस पर कोई विवाद नहीं है। पर मामला यह है कि इसकी जांच होनी चाहिए। पर्याप्त सबूत जुटाए जा सकते हैं कि नहीं? जुटाने की कोशिश हुई कि नहीं? कौन करेगा? क्यों और कैसे करेगा? अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि इसकी जांच नहीं कराई जा रही है, नहीं होने दी जा रही है। संबंधित अधिकारियों का तबादला कर दिया गया आदि। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट में अपील यह होनी चाहिए थी (मुझे लग रहा है अभी ऐसा नहीं है, मैं गलत हो सकता हूं) कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित हो? यह नहीं कि उपलब्ध सबूतों पर ही कार्रवाई हो। सबूत कार्रवाई के लिए पर्याप्त न हों, यह संभव है। पर जांच के लिए तो पर्याप्त हैं ही।

इस खबर में कहा गया है कि गुजरात सीएम का मतलब गुजरात अलकली केमिकल्स है – गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं। ठीक है। हो सकता है। पर इस बात की जांच हो जाए पुष्टि हो जाए कि गुजरात सीएम गुजरात अलकली केमिकल्स ही है। अगर किसी ने किसी कंपनी को इतनी राशि दी है तो उसका कारण होगा, संबंध होगा, सबूत भी होंगे। आदि। साबित होना कोई मुश्किल नहीं है।

और, जब ईमानदारी की बात हो रही है और वह देश के सभी लोगों पर समान रूप से लागू होना है तो गुजरात अलकली केमिकल्स को यह भुगतान किसलिए हुआ, नकद हुआ कि चेक से और नकद हुआ तो क्यों? संतोषजनक जवाब मिल जाए। बात खत्म। नैतिकिता का तकाजा है और चूंकि मामला प्रधानमंत्री से संबंधित है, और प्रधानमंत्री न भी चाहें तो जांच करने वाले को एक भय रहेगा इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि काम (जांच) करने वालों को यह भय न रहे। कैसे न रहे – यह सुनिश्चित करना संबंधित विभागों, लोगों और संस्थाओं का काम है।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की यह चिन्ता भी जायज है कि चूंकि मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ है इसलिए इसे जल्दी निपटाया जाना चाहिए और सबूत जल्दी चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों को अपने सबूतों पर यकीन है और लगता है कि सब साबित हो सकता है पर प्रधानमंत्री के इस पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे या सबूत जुटाने में क्या समस्या आ रही है – सुप्रीम कोर्ट को यह बताया जाता तो मेरे ख्याल से बेहतर रहता।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें :

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जब ‘भक्त’ अखबार बनाते हैं…

Sanjay Kumar Singh :  नोटबंदी का मामला पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में था। इसके अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस और नवोदय टाइम्स का पहला पेज देखिए। इंडियन एक्सप्रेस की खबर की शीर्षक है, “क्या नकदी नीति जल्दबादी में अपनाई गई, क्या दिमाग लगाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा”। यह खबर एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है और फोल्ड से ऊपर है। यही खबर नवोदय टाइम्स ने फोल्ड के नीचे छापी है और शीर्षक लगाया है, “सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी पर पूछा, कब सामान्य होंगी स्थितियां”, दूसरी लाइन में, “हालात 10-15 दिन में ठीक हो जाएंगे : सरकार”।

कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों अखबारों ने एक ही खबर को जो ट्रीटमेंट दिया है उसी से खबर की धार कम हो जाती है। यह सामान्य है होता रहता है। पर खबर से आप नुकसान पहुंचाएं तो उसकी भरपाई भी कर दें। एक खबर मजबूरी में छापनी पड़ी (इतने बेशर्म नहीं हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ऐसी खबर खा जाएं या अंदर छाप दें) तो उसकी भरपाई करने वाली खबर वहीं छाप दें। नवोदय टाइम्स ने आज यह शर्मनाक काम किया है। इसी अखबार में पहले पेज की आज की बॉटम लीड है, “नोटबंदी : पीएम के दिल्ली ऑफिस में बैठकर काम करती थी रिसर्चर्स की टीम”। दूसरी लाइन है, “मोदी ने 6 विश्वस्तों के साथ की गोपनीय तैयारी !” अब आप बताइए, इस दूसरी खबर का कोई मतलब है? तैयारी की पूरी पोल खुल गई, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि दिमाग नहीं लगाया गया तो शीर्षक कुछ और लगाना तथा दूसरी खबर छापकर कहना कि दिमाग लगाया था। पाठकों को मूर्ख समझना है। आज से नवोदय टाइम्स पढ़ना बंद।

पुनःश्च – एक मित्र ने कमेंट में लिखा है कि नवोदय टाइम्स वाली खबर हिन्दुस्तान में भी है। पत्रकारिता की भाषा में इसे प्लांटेशन कहा जाता है। छपने के बाद तो शर्मनाक हो ही जाता है इसलिए छापने से पहले समझना होता है कि हमारा उपयोग तो नहीं किया जा रहा है। सरकार (या किसी परम भक्त) ने सुप्रीम कोर्ट में खिंचाई वाली खबर की भरपाई जारी की और अखबार ने नतमस्तक होकर सेवा मुहैया करा दी। विडंबना यह है कि इसपर सरकार सर्विस टैक्स नहीं लेती।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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टाइम्स की दुकान और पत्रकार से छुटकारा

अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाऊ क्यों छोड़ा, वे जानें। पर जैसा कि नौकरी छोड़ने वाले ज्यादातर पत्रकारों के साथ होता है, नौकरी छोड़ने के समय हर कोई कहता है, अपना कुछ काम करेंगे। ऐसा कई पत्रकारों के मामले में हुआ है। कई साल से हो रहा है। किसी एक का क्या नाम लेना – लोग जानते हैं और जो नहीं जानते उनके लिए नाम बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। वैसे यह सच है कि नौकरी छोड़ने के बाद कइयों ने अपना काम शुरू भी किया, कर भी रहे हैं पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि जैसी संस्था छोड़ी वैसी ही खड़ी कर ली। या जो है वैसी होने की ओर अग्रसर है। फिर भी अर्नब गोस्वामी के बारे में कहा जा रहा है (उन्होंने नहीं कहा है) कि वे चैनल शुरू करेंगे। और फिर इससे जुड़ी अटकलें। मेरी दिलचस्पी उसमें नहीं है।

मुझे यह समझ में आ रहा है कि अर्नब जितनी तनख्वाह पाते होंगे उतने का पूरा कारोबार कर लेना भी असाधारण होगा – शुरू करने के बाद कई वर्षों तक। ऐसे में कोई स्वेच्छा से क्यों नौकरी छोड़ेगा और कोई योजना-साजिश है तो उसका खुलासा धीरे-धीरे ही होगा। इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्प याद है। सोचा आज इस मौके पर उसी की चर्चा करूं। मौका है, दस्तूर भी। मामला पुराना है, मोटे तौर पर टाइम्स संस्थान का अपनी हिन्दी की पत्रिकाओं को बंद करना। दूसरे शब्दों में, 10, दरियागंज का इतिहास हो जाना। टाइम्स ने अचानक हिन्दी की अपनी कई अच्छी, चलती, बिकती, प्रतिष्ठित और लोकप्रिय पत्रिकाओं को बंद करने की घोषणा कर दी। हिन्दी के पत्रकार – कहां छोड़ने और मानने वाले थे। और उस जमाने में सरकार हिन्दी के पत्रकारों को नाराज कैसे कर सकती थी।

टाइम्स समूह को समझ में आया कि पत्रकारों से छुटकारा पत्रकार ही दिलाएगा और घोषणा हुई कि सभी टाइटिल्स मशहूर पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने ले लिए हैं। (दे दिया, बेच दिया, खरीद लिया – मुझे याद नहीं है और अब महत्वपूर्ण भी नहीं है)। पत्रकारों को लगा कि मालिक बदलेगा। अच्छा है, पत्रकार मालिक होगा। नौकरी यहां नहीं, वहां कर लूंगा। आंदोलन शांत। मामला ठंडे बस्ते में। वो पत्रिकाएं आज तक बाजार में नहीं दिखीं। छपती हों और नेताओं के घर डाक से जाती हों तो मुझे नहीं पता। वैसे उन दिनों साउथ एक्सटेंशन की एक बिल्डिंग पर पत्रिकाओं के बोर्ड जरूर लगे थे। कुछ दिनों बाद से ही नहीं दिखते।

अर्नब का मामला अलग है। पर हिन्दी के पत्रकारों के मालिकों से संबंध हमेशा दिलचस्प रहे हैं। आनंद बाजार समूह ने हिन्दी की पत्रिका रविवार बंद की तो फिर हिन्दी में हाथ नहीं डाला। इंडिया टुडे हिन्दी में निकलता है पर गिनती के कर्मचारियों से। हिन्दी आउटलुक का हाल आप जानते हैं। और भी कई हैं। पत्रकार से छुटकारा पाना किसी भी संस्थान के लिए मुश्किल होता है और कोई भी पत्रकार रामनाथ गोयनका बनने से कम का सपना नहीं देखता है। ऐसे में पत्रकारों खासकर हिन्दी वालों को बांटने और अमीर बनाने का खेल भी हुआ संपादक नाम की संस्था अंग्रेजी में खत्म हो गई पर हिन्दी में बची हुई है तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है। यह अलग बात है कि आम पत्रकारों को इससे कोई लाभ नहीं है।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं.

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वरुण गांधी की वह फोटो हमारे पास भी है, लेकिन सार्वजनिक नहीं करूँगा

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया में संघ की घुसपैठ और उसका असर… मीडिया में अपनी घुसपैठ संघ ने बहुत पहले शुरू कर दी थी। जो मीडिया संस्थान चला सकते हैं उन्हें भी प्रोत्साहन और शाखा जाने वाले जो अखबारों में नौकरी करना चाहें उन्हें भी सहारा। कई लोग हैं, जाने-पहचाने चिन्हित। अब तो संघी पत्रकारों की दूसरी पीढ़ी भी सक्रिय है। हालांकि, संघ इसमें अकेला नहीं है पर उसका काम ज्यादा असरदार, योजनाबद्ध, सफाई से होता रहा है और इसके कई उदाहरण हैं। अब तो दिखाई देने लगा है। इतना खुल्लम खुल्ला कि आंखें चौंधिया जाएं। पर युद्ध और प्रेम में सब जायज है। सत्ता हथियाने और उसे बनाए रखने के लिए आप चुनाव न लड़ें “युद्ध” करें और चुनाव लड़ने के लिए सेना और सैनिक कार्रवाई को भुनाएं तो चुनाव लड़ने और युद्ध लड़ने का अंतर मिट जाता है।

ईमानदार पत्रकारिता मतदाताओं को यह सब बताती। इसपर चर्चा करती। पर पत्रकारिता में जब अपने लोग पहले से विधिवित प्लांट कर दिए गए हों तो जो चर्चा सबसे चर्चित है, कौन कराता है आप जानते हैं। देश में चुनाव ही नहीं राजनीति भी बदलेगी। बदल रही है। पत्रकारिता में संघ और संघी हों इसमें बुराई नहीं है बुराई संघी पत्रकारिता में है। चंचल जी की यह पोस्ट यही बताती है। पर संघी पत्रकारिता करने वाले नहीं समझेंगे। झेलने वाले जब वरुण गांधी जैसे भाजपा नेता हो सकते हैं और रीता बहुगुणा को तो चंचलजी याद दिला ही रहे हैं। संघी पत्रकारों को भी अपनी स्थिति भी समझ लेनी चाहिए। वाकई देश बदल रहा है। बात समझ में नहीं आ रही है तो मत समझिए।

गर्व से कहो हम हिन्दू हैं का नुकसान यही है कि भारत जो इंडिया बन रहा था, इनक्रेडिबल इंडिया होने का दावा किया जा रहा था वह अब हिन्दुस्तान बन रहा है और दावा यह कि वह पाकिस्तान से अलग (अच्छा) होगा। कैसे? इसपर बात नहीं करेंगे क्योंकि वह तो स्थापित सत्य है। यही है बदलती पत्रकारिता। और बदलता भारत। पहले सूर्या अकेली पत्रिका थी अब संदीप कुमार की सीडी चलाने वाले कई चैनल हैं।

चंचल जी (फेसबुक पर Chanchal Bhu नाम से) की इस पोस्ट से प्रेरित — “सेक्स बहुत गन्दी चीज है, इसके बावजूद आज हम डेढ़ सौ करोड़ तक पहुँच गये है। बच्चों को सेक्स की शिक्षा देना चाहिए, तर्कपूर्ण सहमति है। लेकिन सेक्स की ताकत देखिये और उसका अंतर्विरोध, जब तक गोपनीय है, ग्राह्य है, परम आनंद की पराकाष्ठा है, उघर गया तो आपको समूल नष्ट कर देगा। जो समाज इस अंतर्द्वंद पर खड़ा है, उसकी भ्रूण हत्या तय है। एक वाक्या सुनिये। बाबू जगजीवन राम बहुत बड़ी शख्सियत थे, उनके बेटे सुरेश राम किसी होटल में अपनी महिला मित्र के साथ नग्न अवस्था में देखे गए। उसका फोटू हुआ, और सारे संपादकों के पास प्रकाशनार्थ भेज भी दिया गया लेकिन किसी ने भी नही छापा। सिवाय एक महिला संपादक के। पत्रिका का नाम था सूर्या और संपादक थीं आज की भाजपा मंत्री मेनका गांधी। आज इतिहास फिर पलटा खाया है। मेनका के सुपुत्र वरुण गांधी उसी तरह लपेटे में आये हैं जैसे सुरेश राम आये थे। फोटो कौन बाँट रहा है, सब को पता है। इतना ही नही आज वरुण पर आरोप लग रहा है कि वरुण इस फोटो के बदले देश की सारी गुप्त बाते आर्म्स डीलर को देते रहे। यानी वरुण देशद्रोही है। पीएमओ के पास इसका खुलासा है । आपातकाल में मेनका गांधी की भूमिका का बदला इस तरह लिया जा रहा है । जो भी लोग अगल बगल से निकल कर गिरोह की तरफ भाग रहे हैं, एक दिन सब का यही हश्र होगा। रीता जी @ आप भी ख़याल रखियेगा , आपके पिता जी ने संघ पर क्या बोला था , आप भूल चुकी होंगी लेकिन उसकी कसक नागपुर में बनी हुई है। वरुण गांधी की वह फोटो हमारे पास भी है, लेकिन सार्वजनिक नही करूँगा।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं.

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#IndiaTvExposed : अजीत अंजुम जी, चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं!

इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है…

Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी #IndiaTvExposed से डिफेंस मोड में क्यों है? मुझे कथित अभियान, साजिश की सूचना संपादक अजीत अंजुम की पोस्ट से मिली। इमरान शेख की चिट्ठी में एक सर्वज्ञात और सबसे साधारण (आज कल के हिसाब से) आरोप के अलावा कोई खास बात नहीं है। अभी तो उसने प्रधानमंत्री से मिलकर सारी बात बताने के लिए समय भर मांगा है। मुझे नहीं लगता कि किसी विशेष संबंध या कारण के इमरान शेख को प्रधानमंत्री से मिलने का समय मिल पाएगा। फिर भी इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है। चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने उपरोक्त एफबी पोस्ट में अजीत अंजुम की जिस पोस्ट का जिक्र किया है, वो इस प्रकार है…

Ajit Anjum : इंडिया टीवी के खिलाफ सोशल मीडिया पर #IndiaTVExposed का हैशटैग क्रिएट करके बेबुनियाद और तथ्यहीन Propaganda चलाया जा रहा है .. इंडिया टीवी के खिलाफ मुहिम चलाने वाले लोग इंडिया टीवी के एक पूर्व रिपोर्टर इमरान शेख की एक चिट्ठी को हथियार बनाकर सोशल मीडिया में चैनल के खिलाफ झूठा और तथ्यहीन दुष्प्रचार कर रहे हैं इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल बाद इमरान शेख ने पीएम मोदी के नाम चिट्ठी लिखकर चैनल पर मनगढ़ंत आरोप लगाया है कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में False and Fabricated खबरें करने को कहा गया . इससे परेशान होकर उन्होंने चैनल छोड़ दिया . इसी चिट्ठी को मुद्दा बनाकर #IndiaTVExposed हैशटैग के जरिए दुष्प्रचार करने वालों के लिए कुछ जरुरी तथ्य…

1 ) इमरान शेख मुंबई में एक साल पहले तक इंडिया टीवी के क्राइम/लोकल रिपोर्टर थे . जो लोग न्यूज चैनल की Functioning को थोड़ा भी जानते हैं , उन्हें पता होगा कि मुंबई के क्राइम रिपोर्टर का पीएम और केन्द्र सरकार की खबरों से कोई लेना-देना नहीं होता..मुंबई का क्राइम रिपोर्टर पीएम के पक्ष में न तो कई खबर कर सकता है, न ही उसे करने को कहा जा सकता है.

2 ) इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल तक तो इमरान शेख ने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही. न ही ऐसा कोई आरोप लगाया. एक साल बाद अचानक ऐसा आरोप लगाना इस बात का सबूत है कि कुछ लोगों ने या तो उसे साजिश का मोहरा बनाया या फिर उनकी मंशा संदिग्ध है.

3 ) मुंबई ब्यूरो में काम करने के दौरान डियूटी में उनकी लापरवाही की कई बार शिकायत मिली थी और खबरें मिस करने पर इंडिया टीवी के सीनियर एडिटर्स की तरफ से उन्हें लिखित और मौखिक चेतावनी भी दी गई थी. बार –बार चेतावनी के बाद उन्हें 8 अक्तूबर 2015 को दो दिन के लिए सस्पेंड कर दिया गया था. फिर भी उनका रवैया नहीं बदला और वो अपने वरिष्ठ सहयोगियों से बदसलूकी करते रहे .

4 ) इमरान शेख को कई बार उनके काम न करने /अपनी साथियों के साथ बदसलूकी करने और डियूटी पर लापरवाही वरतने के लिए चेतावनी दी गई. ये सारे तथ्य सितंबर – अक्तूबर 2015 में दिल्ली और मुंबई के कई सहयोगियों के बीच मेल पर हुए Chain of communication में मैजूद है.

5) 17 अक्तूबर 2015 को इमरान शेख ने अपने वकील से माध्यम से एक नोटिस भेजा , जिसमें उन्होंने तीन वरिष्ठ सहयोगियों के खिलाफ परेशान करने का आरोप लगाया लेकिन उस नोटिस में भी ऐसी कोई बात नहीं लिखी गई जो इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल बाद उन्होंने सनसनीखेज ढंग से अपनी चिट्ठी में लिखी है. जो बात उन्होंने एक साल पहले के नोटिस और एडिटर को लिखी चिट्ठी में नहीं लिखी, वो आज क्यों लिख रहे हैं? इसके पीछे क्या साजिश है?

6 ) चिट्ठी से साफ पता चलता है कि इंडिया टीवी से अलग होने के एक साल बाद इमरान शेख किसी के इशारे पर बहकावे में आकर बिल्कुल आधारहीन आरोप लगाकर इंडिया टीवी को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा बन रहे हैं.

Under the hashtag #IndiaTvExposed, a baseless and malicious propaganda is being launched on social media by some vested interests against India TV. These people are circulating false and malicious allegations against the news channel on social media by using a purported open letter posted on Facebook by a former India TV reporter Imran Sheikh. In his purported open letter, Imran Sheikh has made baseless allegation that he was asked to file false and fabricated news in favour of Prime Minister Narendra Modi, because of which he resigned from the news channel. Here are some facts which clearly debunk the malicious propaganda being made by vested interests under the hashtag #IndiaTVExposed:

1) Imran Sheikh was a crime/local reporter for India TV in Mumbai till a year ago. Any news-conscious person, who knows the bare outline of how a news channel works, understands that a crime reporter posted in Mumbai has nothing to do with filing stories related to the Prime Minister and the central government. A crime reporter posted in Mumbai can neither do a TV story in favour of the Prime Minister, nor can he be asked to do so by his seniors.

2) After quitting India TV, Imran Sheikh did not level any allegation against the channel for more than a year. The very fact, that he levelled such an allegation a year after quitting the channel, indicates that some vested interests have used him as a pawn in a nefarious game or his intentions are suspect.

3) The Mumbai Bureau received several complaints of negligence in duty against Imran Sheikh, and he was given verbal and written warnings several times by senior editors at India TV for missing news stories. Following repeated warnings, he was suspended for two days on October 8, 2015, but his attitude did not change for the better, and he continued to misbehave with his senior colleagues.

4) Imran Sheikh was warned several times for not working properly/for misbehaving with his colleagues and for negligence in duty. All these facts exist as record in the chain of mail communications between him and several colleagues based in Delhi and Mumbai during October 2015.

5) On October 17, 2015, Imran Sheikh sent a notice through his lawyer in which he levelled charges of harrassment against three of his senior colleagues, but no mention was made of the charge that he has now levelled in his open letter posted on Facebook a year after quitting. The question arises: Why did he not write a letter to the Editor on this said issue or mention it in his lawyer’s notice? What could be the motive behind this?

6) The open letter by Imran Sheikh on his Facebook wall clearly indicates that he has become part of a falsehood campaign to denigrate India TV by levelling baseless allegation at the instigation of some vested interests.

अब पढ़ें इमरान शेख द्वारा प्रधानमंत्री को भेजी गई चिट्ठी…

 

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पत्रकारिता का मौजूदा दौर और एक्सक्लूसिव खबरों का खेल

एक्सप्रेस ने छापे इस सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत तो हिन्दू ने छापे पिछले सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत

Sanjaya Kumar Singh : खोजी पत्रकारिता भी दरअसल पौधा रोपण या प्लांटेशन की पत्रकारिता ही है। जब इसकी शुरुआत हुई थी तो ढूंढ़-ढांढ़ कर जनहित की खबरें लाई जाती थीं जो आमतौर पर सरकार और शासकों के खिलाफ होती थीं। मीडिया को नियंत्रित करने की सरकार की कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि ऐसी खबरों की जगह कम होती गई और फिर पेड न्यूज शुरू हुआ। अब तो ज्यादातर अखबार के लगभग सारे पन्ने पेड न्यूज होते हैं या यूं कहिए कि चाटुकारिता वाले होते हैं। बदले में विज्ञापन मिलता है। नहीं तो विज्ञापन बंद कर देने की धमकी। अब जब खोजी पत्रकारिता मुख्यधारा की पत्रकारिता से गायब हो चली है तो आइए खोजी पत्रकारिता को याद करें। श्रद्धांजलि दें। वैसे यह भी सच है कि ज्यादातर मामलों में खोजी खबरें भी आखिर कोई नाराज ही “लीक” करता है। उद्देश्य उस गड़बड़ी को ठीक करना होता है।

आपने पिछले दिनों पढ़ा होगा कि ठाणे में अवैध ढंग से चल रहे एक कॉल सेंटर के कर्मचारियों ने ही पुलिस को उसकी सूचना दी थी और पुलिस ने कारर्वाई की तो पता चला कि कॉलसेंटर अमेरिकी नागरिकों से अवैध वसूली करने वालों का संगठित गिरोह था। पहले इस तरह की खबरें मीडिया में छपवाई जाती थीं और पुलिस कार्रवाई करने को मजबूर होती थी। अब ऐसी खबरें छपती नहीं हैं और पुलिस के पास जो पहुंचती होंगी उनमें से सब पर कार्रवाई होती होगी यह मानना बेवकूफी है। अभी तक होता यह था कि ऐसी लीक को जो छाप दें या जिसकी साख हो उसके पास ऐसी खबरें आती रहेंगी, दुनिया इसे खोजी पत्रकारिता मानती रहेगी।

अब भक्ति पत्रकारिता शुरू हुई है। इसमें बुरी बात यही है कि स्वतंत्र या निष्पक्ष दिखने के लिए एक भी खबर सरकार के खिलाफ गई तो सारी भक्ति बेकार चली जाएगी। जबकि विरोध वाली पत्रकारिता में प्लांटेशन के अलवा अपनी इच्छा से भी खबरें करने की स्वतंत्रता रहती है। इसीलिए वहां पत्रकारिता करने की संभवना ज्यादा है और उसे भक्ति पत्रकारिता की तरह बुरा नहीं माना जाता। अगर आप किसी दबाव या लालच में भक्ति की खबरें देते हैं तो स्वेच्छा से भी भक्ति की ही खबरें देनी होगी। खोजी पत्रकारिता इस मायने में भक्ति से काफी अलग है।

अरुण शौरी लिख चुके हैं कि एक्सप्रेस के रीसेप्शन पर लोग पूरी फाइल छोड़ जाते थे और फोन करके बता देते थे कि फाइल रख आया हूं। ऐसे में जब राजीव गांधी के खिलाफ बोफर्स घोटाला चल रहा था और एक्सप्रेस रोज नई-नई खबरें (लीक) छाप रहा था तो सरकार के खिलाफ उसकी खबरें वैसे ही देखी जाती थीं जैसे आज सरकार की भक्ति की खबरें देखी जाती हैं। खबर लीक करने वालों का मकसद और लक्ष्य होता है। इसलिए वह चाहता है कि लीक को गंभीरता से लिया जाए। मुझे याद है बोफर्स की तमाम खबरें एक्सप्रेस में छपती थीं और एकाध चेन्नई के एक अखबार में। उन दिनों हमलोग हिन्दू में बोफर्स की एक्सक्लूसिव खबरों के बारे में यही राय रखते थे।

अब जब एक्सप्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक पर भक्ति वाली रिपोर्टिंग की है तो पुराना जमाना याद आ रहा है। खिलाफ खबरें छापने के लिए भी किसी साख वाले (संतुलित माने जाने वाले) अखबार को चुना गया था। ऐसे में सरकार ने अपने समर्थन में खबर छपवाने के लिए टीवी चैनलों की साख के मद्देनजर एक्सप्रेस की साख का उपयोग किया। यह भी संभव है कि एक्सप्रेस ने अपनी यह निशुल्क सेवा स्वेच्छा से उपलब्ध कराई हो पर अभी यह चर्चा का विषय नहीं है। और जैसी उम्मीद थी भक्तगण एक्सप्रेस की साख के हवाले से कहने लगे, एक्सप्रेस में छपी है खबर !! कहने का मतलब, खबर सरकार के खिलाफ हो या पक्ष में, छपवाने (फैलाने) वालों के खेल के नियम हैं और वे साख तलाशते हैं या उपयोग करते हैं। मीडिया ने जिस तेजी से अपनी साख कोई है उसमें इस खेल का क्या होगा?

हो सकता है, कुछ समय में मीडिया की साख बनाने के लिए सरकार के खिलाफ खबरें छापने-छपवाने का खेल शुरू हो। करोड़ों का धंधा करने वाला यह चौथा स्तंभ यूं ही नहीं चलता रहेगा। ताकत है तो उसका उपयोग-प्रदर्शन भी होगा ही। फिलहाल, एक्सप्रेस ने जो क्रांतिकारी खबर छापी है वह भारत में खोजी पत्रकारिता के इतिहास में ‘बेमिसाल’ साबित हो सकता है। दिल्ली डेटलाइन से छपी खबर पढ़ने पर समझ में आता है कि सारा मामला आईडिया का है। किसी सर जी ने एन्क्रिप्टेड चैट सिस्टम से लिखित सवाल भेजकर अनजाने आम निवासियों का इंटरव्यू किया। तमाम हस्तियां सवाल पहले लिखकर मांगती हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने आम आदमी को भी यह सुविधा दी। सुधीर चौधरी को पत्रकारिता के लिए पुरस्कृत करने के बाद इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता में यही बाकी रह गया था।

जहां तक भाजपा की राष्ट्रवादी सरकार के राज में मीडिया की भक्ति की बात है, मीडिया ऐसे तमाम मुद्दे उछाल देता है जो मुद्दा होते ही नहीं हैं। दूसरी ओर, ऐसे तमाम मुद्दों पर चुप्पी साध लेता है जिनपर चर्चा होनी चाहिए। इसी क्रम में सर्जिकल स्ट्राइक से संबंधित सबूत का मुद्दा भी है। अव्वल तो सर्जिकल स्ट्राइक ही मुद्दा नहीं है। पर हम इसके सबूतों की चर्चा कर रहे हैं। इसमें मीडिया को जो मुद्दे उठाने चाहिए वे छूट जा रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक ढिंढोरा पीटने की चीज नहीं है। जब सार्वजनिक चर्चा होगी तो सवाल भी उठने शुरू हुए। जब यह दावा सामने आया कि पहले भी स्ट्राइक हुए हैं औऱ पुरानी सरकारों ने इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं की तो यह कहा जाने लगा कि पहले स्ट्राइक हुए थे इसका क्या सबूत है। ऐसे में अगर एक्सप्रेस ने लीक से हटकर यह साबित करने की कोशिश की कि कुछ तो हुआ था तो आज हिन्दू ने छापा है कि पहले भी कुछ-कुछ होता रहा है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. ANUVAAD COMMUNICATION के हेड Sanjaya से संपर्क 9810143426 के जरिए किया जा सकता है.

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क्या एनडीटीवी ने मोदी सरकार के दबाव में चिदंबरम का इंटरव्यू नहीं दिखाया?

Sanjaya Kumar Singh : एनडीटीवी पर कार्रवाई हो, इसकी आड़ में ब्लैकमेल गलत है… एनडीटीवी के खिलाफ कोई वित्तीय मामला है। यह हमेशा से कहा जाता रहा है। एनडीटीवी का स्पष्टीकरण भी आता रहा है। सरकार के खिलाफ मीडिया संस्थानों पर आरोप कोई नई बात नहीं है और सरकार समर्थक माने जाने वाले मीडिया संस्थान पर विपक्षी दल आरोप लगाएं इसमें भी कुछ नया नहीं है। पर भड़ास 4 मीडिया की आठवीं सालगिरह के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव ने बिना नाम लिए एनडीटीवी का जिक्र किया था और श्रोताओं को यह यकीन दिलाया था कि दाल में कुछ तो काला है। परोक्ष रूप से उनका कहना यही था कि संस्थान में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का बेनामी निवेश है जिसकी जांच करने से उन्हें रोका गया।

उस दिन साथी पत्रकारों से बातचीत में पता लगा कि लोगों को संजय कुमार श्रीवास्तव के आरोपों पर यकीन नहीं था। ऐसे साथियों का कहना था कि अगर राजस्व सेवा अधिकारी की बातों में दम होता तो मोदी सरकार ने अभी तक कार्रवाई की होती। हालांकि, मेरा मानना है कि मीडिया से कोई भी सरकार सीधे मोर्चा नहीं लेती है। खासकर तब जब झुकने के लिए कहने पर पहले ही ज्यादातर मीडिया संस्थान रेंग रहे हों। इसलिए एनडीटीवी की नई संपादकीय नीति और पूर्व गृह व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का इंटरव्यू नहीं दिखाने का एनडीटीवी का निर्णय चिन्ता पैदा करने वाला है। अगर कुछ गड़बड़ है तो कार्रवाई की जाए – कोई एतराज नहीं है। पर गड़बड़ी की आड़ में दबाव डालना, संपादकीय नीति प्रभावित करना गलत है। आम लोग विज्ञापन के लिए “बिक जाने” जैसे चलताऊ आरोप लगा रहे हैं पर मामला उससे गंभीर है।

एनडीटीवी का यह मामला इसलिए भी गंभीर है कि अभी तक यह सरकार के खिलाफ अकेले डटा हुआ था और दूसरे संजय श्रीवास्तव का जो आरोप है वह यही कि वित्त मंत्री रहते हुए पी चिदंबरम ने उन्हें एनडीटीवी के मामलों की पड़ताल करने के लिए परेशान और प्रताड़ित किया। अब अगर एनडीटीवी उसी पी चिदंबरम का इंटरव्यू (रिकार्ड होने पर भी) नहीं दिखा रहा है तो बात समझ में आ रही है। संजय श्रीवास्तव का आरोप तो लगभग यही है कि एनडीटीवी में पी चिदंबरम का बेनामी निवेश है और उन्हें इस मामले की तह में जाने से रोका गया। अब वही एनडीटीवी और चिदंबरम एक तरह से आमने-सामने हैं। सरकार कार्रवाई करे पर घपले-घोटाले में राजनीति ना करे और इसकी आड़ में ब्लैकमेल तो बिल्कुल अनुचित है। सरकार को और एनडीटीवी को भी चाहिए कि इस मामले में स्थिति साफ करें।

आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने भड़ास के कार्यक्रम में क्या कहा, जानने के लिए इसे पढ़ें : https://www.bhadas4media.com/sabha-sangat/10688-bhadas-karyakram

पी. चिदंबरम का इंटरव्यू न दिखाने संबंधी मूल खबर का लिंक ये है… http://thewire.in/71640/ndtv-censor-news-compromises-national-security/

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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अब बताओ जनरल वीके सिंह साहब! प्रेस को प्रेस्टीट्यूट बनाने के लिए कौन जिम्मेदार है?

Sanjaya Kumar Singh : जनरल वीके सिंह ने मीडिया को प्रेसटीट्यूट कहा था तो लोगों को बहुत अच्छा लगा था और अब भी लोग इस विशेषण का उपयोग करते ही हैं। लेकिन अभी जो हालात हैं उसमें मीडिया काम कैसे करे और सूचना कैसे दे? इसपर कोई बोलने वाला नहीं है। मीडिया की अपनी मजबूरियां हैं। फिर भी, कहने की जरूरत नहीं है कि यह स्थिति सरकारी नालायकी के कारण है और मुश्किलों से निपटने का शुतुरमुर्गी तरीका है। जिसतरह वेस्यावृत्ति कोई शौक से नहीं करता उसी तरह संभव है कि मीडिया की भी मजबूरियां हों।

उड़ी हमले के बाद एक वेब पत्रिका ने खबर चलाई कि भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की है और उसके 20 सैनिक हेलीकॉप्टर से पाक अधिकृत कश्मीर गए और कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार आए। हो सकता है कि सेना ने सरकार की अनुमति से या बगैर इजाजत ऐसी कार्रवाई की हो जिसे गुप्त रखने की योजना हो। पर जब यह खबर ‘लीक’ हो गई तो यह पहली चूक है और अगर गलत ही है तो सरकार को तुरंत खंडन क्यों नहीं कर देना चाहिए? चूंकि सरकार का खंडन मुझे नहीं दिखा इसलिए मैं यह मानकर चल रहा था कि खबर सही है और सरकार इसे गोपनीय रखना चाहती है। मीडिया को सच-झूठ की चिन्ता न हो तो आम आदमी कर भी क्या सकता है? खबर जिस तेजी से फैल रही है उस तेजी से खंडन फैलाने में क्या दिक्कत है?

अचानक मुझे ख्याल आया कि अखबार में काम करते हुए हमलोग अपने संबंधित संवाददाता से कहते थे कि आधिकारिक बयान चाहिए। सब कुछ लगभग एक फोन कॉल की दूरी पर होता था। जब मोबाइल नहीं थे, तब भी। संवाददाता संबंधित अधिकारियों से बात करके बता देता था कि आधिकारिक बयान क्या है। यह भी कि खबर सही है या गलत या अधिकारी ने कहा है कि उसे कोट न किया जाए। कभी-कभी यह भी होता था कि अधिकारी सबकुछ बताने के बावजूद कहता था कि मेरी आपसे कोई बात नहीं हुई। खबर उसी हिसाब से छपती थी और लगभग सभी अखबारों में अक्सर एक सी छपती थी।

शायद इसलिए कि तरीका एक था, खबर का खंडन या पुष्टि करने वाले या खबर देने वाले सिर्फ एक और निश्चित स्रोत होते थे। मुझे याद नहीं है कि पहले कभी ऐसा हुआ हो कि एक संस्थान अपनी खबर के समर्थन में ना कोई स्रोत बताये ना सबूत दे फिर भी उसे सही कहे। दूसरी ओर, कोई सरकारी बयान बगैर किसी अधिकारी के नाम के जारी हो और उसके उलट खबर भी चले। पाक अधिकृत पाकिस्तान में उड़ी हमले की जवाबी कार्रवाई के संबंध में इंडिया टुडे की एक खबर मिली जिससे पता चलता है कि इस सरकार के राज में पत्रकारों के लिए काम करना कितना मुश्किल है। प्रेसटीट्यूट तो कह दिया जाता है पर अधिकृत खबर प्राप्त करने का घोषित निश्चित स्रोत ना हो तो मीडिया में अटकलें ही चलेंगी। और अटकलें जाहिर हैं सबकी अलग होंगी।

इंडिया टुडे की इस खबर में कहा गया है कि क्विंट अपनी खबर पर कायम है लेकिन सेना ने आधिकारिक तौर पर ऐसे किसी अभियान से इनकार किया है। सशस्त्र सेना ने भी इस खबर से इनकार किया है। इंडिया टुडे ने लिखा है कि उसके रिपोर्टर्स ने जब सरकार के उच्च पदस्थ अधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होंने इस खबर को “उर्वर कल्पना की उड़ान” बताया। लेकिन वे रिकार्ड पर आने को तैयार नहीं हुए। सवाल उठता है – क्यो? अगर हमला नहीं हुआ है, गलत खबर चल रही है, आप जानते हैं कि खबर गलत है तो सामने आने में किसका डर है? क्यों है?

क्या सेना और सरकार के प्रवक्ता घोषित नहीं हैं? नहीं हैं तो पत्रकार किससे संपर्क करे और हैं तो सरकार क्यों नहीं कहती कि अधिकृत प्रवक्ता से संपर्क करके वास्तविक स्थिति जान ली जा सकती है। और पत्रकार उनसे संपर्क किए बगैर अपुष्ट खबरें चलाते हैं। तकनीक के इस जमाने में यह सब बहुत आसान है और बहुत तेजी से दुनिया भर में फैल सकता है। फिर भी नहीं हो रहा है तो इसका मतलब यह क्यों नहीं लगाया जाए कि सरकार चाहती है कि स्थिति ऐसी ही बनी रहे।

पीओके में जवाबी कार्रवाई की खबर अगर गलत है तो साफ-साफ खंडन क्यों नहीं किया जा रहा है और जब पहली बार खबर देने वाला कह रहा है कि उसकी खबर सही है तो दूसरे कैसे छोड़ दें और बगैर पुष्टि किए कैसे सही मान लें। जनरल वीके सिंह इसका जवाब नहीं देंगे लेकिन प्रेस को प्रेस्टीट्यूट बनाने के लिए कौन जिम्मेदार है? इस बारे में आपकी क्या राय है – यही बताइए।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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जीबी रोड पर कोठा चला रहा है एक केंद्रीय मंत्री, जांच रोकने के लिए मुझे फंसाया जा रहा : स्वाति मालीवाल

Sanjaya Kumar Singh : निराधार नहीं हैं स्वाति मालीवाल के आरोप पर “खबर” तो एफआईआर ही है…. आप जानते हैं कि दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो ने एफआईआर लिखाई है। स्वाति के खिलाफ आयोग की पूर्व अध्यक्ष बरखा शुक्ला ने आरोप लगाया है कि स्वाति ने 85 लोगों को आवेदन किए बिना ही दिल्ली महिला आयोग में नौकरी पर रख लिया। इस मामले में स्वाति से सोमवार को दो घंटे पूछताछ भी की गई थी। एसीबी ने स्वाति को 27 सवाल भेजे हैं, जिनका जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया है।

मामला दर्ज होने के बाद स्वाति मालीवाल ने कहा था कि सारी राजनीतिक पार्टियों में ऐसे लोग है, जिन्हें उनका काम पंसद नहीं आता है। इसलिए उनपर आरोप लग रहे है। अन्य मामलों की तरह इस मामले में भी स्वाति की मीडिया ट्रायल शुरू हो चुका हैं। “स्वाति मालीवाल को सता रहा है गिरफ्तारी का डर” – जैसी खबरें चल रही हैं। दूसरी ओर, स्वाति ने आरोप लगाया है कि एक केंद्रीय मंत्री और दिल्ली के नेता जीबी रोड पर कोठा चलाने से जुड़े हुए हैं और वे इस मामले की जांच कर रही हैं इसीलिए उन्हें फंसाया गया है। मैं नहीं जानता कि स्वाति के आरोप सही हैं या उनपर लगे आरोप गलत हैं। दोनों सही हो सकते हैं और दोनों गलत हो सकते हैं।

पर स्वाति के आरोप गंभीर हैं। एक बड़े रैकेट के हैं। स्वाति पर जो आरोप लगे हैं वे भ्रष्टाचार के हैं कुछ रुपयों के हो सकते हैं और संभव है तकनीकी गड़बड़ी ही हो और पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ हो। पर प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिए? और किसे मिल रही है। ऐसा नहीं है कि स्वाति के आरोप निराधार हैं। पिछले दिनों वेश्यावृत्ति के एक मामले में दिल्ली पुलिस ने अपने 42 लोगों का स्थानांतरण कर दिया था। यह इसी महीने की खबर है। जांच तो उसी समय शुरू हो गई होगी पर क्या हुआ मैं नहीं जानता। पर यह जानता हूं कि तबादला सजा नहीं है। अगर संबंध थे तो सिर्फ तबादला करके क्यों छोड़ दिया गया?

अब स्वाति मालीवाल पर एफआईआर हुई है। अगर आप इन सारी चीजों को जोड़कर देखेंगे तो मामला स्पष्ट है पर यह ऐसे ही “उलझा’ रहेगा। हो सकता है स्वाति मालीवाल गिरफ्तार भी हो जाएं पर रैकेट का खुलासा नहीं होगा। ना कोई यह कहेगा कि स्वाति के आरोप निराधार थे। अच्छी तरह जांच कर ली गई कुछ नहीं मिला। स्वाति के खिलाफ एफआईआर की खबरें तो खूब दिख रही हैं, उनका आरोप ज्यादा गंभीर है, और एफआईआर के कारण नजरअंदाज करने लायक नहीं है पर उसकी चर्चा अपेक्षाकृत बहुत कम है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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दैनिक हिन्दुस्तान के सीवान संवाददाता राजदेव रंजन हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने से क्यों भाग रही मोदी सरकार?

शहाबुद्दीन को जमानत मिलने पर बहुत शोर मचा हुआ है। इतने बड़े या कुख्यात अपराधी को जमानत कैसे मिल गई? आज रवीश कुमार ने अपने कार्यक्रम में शहाबुद्दीन के कथित शिकारों में एक, दैनिक हिन्दुस्तान के सीवान संवाददाता राजदेव रंजन की हत्या की चर्चा की। पता चला कि बिहार सरकार ने चार महीने पहले केंद्र सरकार से इस हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की थी। रंजन यादव की पत्नी ने कहा कि वे इस संबंध में केंद्रीय गृहमंत्री से मिल चुकी हैं और प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा है।

बिहार सरकार की घोषणा और सिफारिश के बावजूद अभी तक इस मामले की सीबीआई जांच शुरू भी नहीं हुई है। वह भी तब जब हत्या के बाद अखबार के संपादक शशि शेखर ने लिखा था, “हम लडेंगे क्योंकि लड़ने की जरूरत है”। चार महीने तक कई संस्करण वाले एक पूरे अखबार के (प्रधान संपादक समेत) लड़ने के बावजूद सीबीआई जांच शुरू नहीं हुई। यह है आजकल मीडिया या पत्रकारों की ताकत। अब इसमें यह पूछना कि शहाबुद्दीन को जमानत कैसे मिल गई? मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा है। इसपर तो रिसर्च करना पड़ेगा।

एनडीटीवी से बातचीत में राजदेव रंजन की पत्नी आशा रंजन ने एक निजी चैनल पर शहाबुद्दीन के उस बयान की चर्चा की जिसमें उन्होंने कहा है कि सीबीआई ने मामला देखने के बाद इसे अपने हाथ में लेने लायक नहीं समझा और वापस कर दिया। आशा देवी ने सवाल किया कि जो बात केन्द्र सरकार नहीं बता रही, गृह मंत्री ने नहीं बताया उसकी जानकारी हाल तक जेल में रहे शहाबुद्दीन को कैसे हो गई। आशा रंजन ने कहा कि अगर इस मामले से शहाबुद्दीन का कोई लेना-देना नहीं है तो इस मामले में जानकारी एकत्र करने की क्या जरूरत है?

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन के लिए चर्चित हैं.

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वसूली करने वाले संपादक और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने वाले संपादक में क्या कोई अंतर होता है?

Sanjaya Kumar Singh : आज शिक्षक दिवस पर पत्रकारिता से जुड़े कुछ सवाल। क्या पत्रकारिता का कोई गुरू यह बता सकता है कि…

1) “भारत के सबसे ताकतवर शख्स” का इंटरव्यू करने के लिए कैसी योग्यता चाहिए होती है?

2) इसकी पढ़ाई पत्रकारिता में होती है या चैनल चलाने वाले धनपशु कराते हैं?

3) ऐसा व्यक्ति खुद तय करता है कि वह किस “योग्य और प्रतिभाशाली” को इंटरव्यू देगा?

4) इस “योग्य व प्रतिभाशाली” की पहचान किस आधार या शर्तों पर होती है?

5) “भारत के सबसे ताकतवर सख्स” का खिताब क्या पदेन है? अगर नहीं तो इसकी पहचान कैसे की जाती है?

6) इससे पहले यह खिताब (पदेन या वैसे) किसी को मिला है या पहली बार किसी चैनल ने दिया है?

7) तुम हमारी तारीफ करो, मैं तुम्हारी करता हूं – क्या अखबारों के तुम मुझे छापो मैं तुम्हे छापूं से मिलती-जुलती बीमारी है?

8) बलात्कार की शिकार महिला की पहचान क्या बलात्कारी की पार्टी के आधार पर छिपाई या उजागर की जाती है?

9) पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के लिए टाइम्स नाऊ पर जो जुर्माना लगा है वह क्या केवल अंग्रेजी चैनलों के लिए है?

10) वसूली करने वाले संपादक और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने वाले संपादक में क्या कोई अंतर होता है?

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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कैसे-कैसे मीडिया संस्थान और मीडिया में नौकरी की ये कैसी शर्तें?

यह कोई प्रयुक्ति पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी है जो अपने सेवा करार में बताती है कि कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के तहत पंजीकृत है। यह लोगों को नौकरी पर रखती है तो उनसे “सेवा करार” करती है। इसमें यह नहीं बताया गया है कि सेवा के बदले क्या दिया जाएगा पर यह प्रमुखता से लिखा है कि बांड की तारीख एक साल (12 महीने) नौकरी जरूर करूंगा। यही नहीं, इसमें यह भी लिखा है कि अगर बांड पर दस्तखत करने वाला ऐसा नहीं कर पाया तो उसे एक लाख रुपए बतौर पेनल्टी देना होगा।

अभी और सुनिए, इसके लिए कोई दस्तावेज नहीं दिए जाएंगे। वैसे तो ऐसी कंपनी में काम करने के रिलीज लेटर और अनुभव प्रमाणपत्र का क्या मतलब होगा पर कंपनी ने खुल्लम खुल्ला यह एलान कर रखा है कि अगर आपने एक साल नौकरी नहीं की तो कोई सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा। कंपनी की मनमानी और एकतरफा सोच इतनी ही नहीं है। कंपनी अपने यहां सेवा देने वालों से यह भी लिखवा लेती है कि वह कंपनी या कंपनी के अधिकारियों को किसी भी ढंग से बदनाम नहीं करेगा और अगर ऐसा कुछ किया गया तो यह भी सेवा शर्तों का उल्लंघन होगा। इन शर्तों पर नौकरी करने वाले लोगों को कंपनी से कुछ शिकायत थी जिसकी सूचना Bhadas4Media.com पर प्रकाशित हुई तो कंपनी ने अपनी इन सेवा शर्तों को सार्वजनिक किया जैसे इनकी कोई कानूनी अहमियत हो। और इसी आधार पर कंपनी ने बताया है कि उसने किसे किस कारण से नौकरी से निकाल दिया। आइए, एक नजर उसपर भी डालें…

”…As per the story you mentioned some names for whom we didn’t paid dues…let me talk about it Mr Varun Aryan took Laptop from the Company & 5,000 rupees from employee fund till the date he didn’t returned his assets though we cleared his dues with single paisa..”

कंपनी दावा कर रही है कि 5,000 रुपए और लैपटॉप ‘सेवक’ के पास होने के बावजूद उसके बकाया का भुगतान कर दिया गया। जो पहली नजर में ही अविश्वसनीय प्रतीत हो रहा है। अंग्रेजी इतनी शानदार है कि कंपनी की ओर से दावा करने वाले की योग्यता का खुलासा हो जा रहा है और समझ में आ रहा है कि कोई भी समझदार आदमी ऐसी बातें नहीं करेगा। फिर भी यह एक रजिस्टर्ड कंपनी है।

”…Then Coming to Mr Rajshekhar Mishra, is the one who is not ready to respect the boss more over not ready to work till edition gets finalised what is the use ?? we said him to get lost & he was with us for more days on his wish and we cleared all his dues, let us send the copy to you…”

कंपनी खुद ही कह रही है, we said him to get lost इसके बावजूद कर्मचारी अपनी इच्छा से ज्यादा समय तक बना रहा फिर भी हमने पैसे दिए। भइया कंपनी चला रहे हो या खैरात बांट रहे हो?

Now Turn Mr Sachin Choudhary, when we are ready to launch he took leave by saying his wife is ill & when we terminated him he is saying my wife is not ill and I said lie, then when we terminate one person how can we clear his dues, moreover he is having his one year employment bond with us.

पत्नी बीमार थी तो नौकरी से निकाल दिया। अब वह कह है कि मैंने झूठ बोला। पत्नी की बीमारी नौकरी छुड़ा देगी तो बचाने के लि झूठ बोलना ही पड़ेगा। क्या चाहते हो – नौकरी छोड़ दे। तो यही बोलो। पत्नी बीमार होने का उपयोग करोगे तो कर्मचारी बेचारा क्या करे?

Last but not the least Mr Sajjan Choudhary, same with him, when he signed one year bond & all of sudden he told he is resigning then management took time to approve his resignation and its not even a month, then how come you say that we are spoiling their career. They spoiled our PRAYUKTI CAREER without any knowledge.

और कर्मचारी के इस्तीफा देने से कंपनी का कैरियर चौपट हो गया।

Last but not the least, last time we are warning before publishing try to know the facts, and delete that news immediately if not I will publish about your deeds in my paper & at the same time I will proceed with legal actions. I don’t spare wrong things when we are right.

और अंत में खिलाफ खबर छापने वाले को अंतिम चेतावनी। कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ अपने अखबार में छापने की धमकी। भाई जान कह रहे हैं कि हम गलत चीज को नहीं छोड़ते जब हम ठीक हों। समझ में आए तो मुझे भी बताइए कहना क्या चाह रहे हैं। सड़क पर निपटेंगे या अदालत में? मूल खबर पढ़ना चाहें तो लिंक ये रहा : https://www.bhadas4media.com/print/10520-pryukti-letter

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संजय जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन / टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके एफबी वॉल से लिया गया है.


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पतंजलि को ऐसे विज्ञापन करने की इजाजत है तो मेक इन इंडिया और एफडीआई का क्या मतलब?

Sanjaya Kumar Singh : ”विदेशी कंपनियां हमारे देश के लिए बहुत ही खतरनाक हैं – पतंजलि”…  पतंजलि का एक राष्ट्रवादी विज्ञापन आता है – पतंजलि अपनाइए देश को आर्थिक आजादी दिलाइए। इसमें दावा किया जाता है कि विदेशी कंपनियां अपना मुनाफा विदेश ले जाती हैं, देश में कोई लोकोपकारी काम नहीं करती हैं पतंजलि का उद्देश्य सिर्फ चैरिटी है। विदेशी कंपनियां हमारे देश के लिए बहुत ही खतरनाक हैं। इस विज्ञापन का भाव विदेशी कंपनियों के खिलाफ तो है ही बिना नाम लिए देशी कंपनियों को भी छोटा या तुच्छ बताने की कोशिश की गई है जबकि पतंजलि अभी समाज सेवा में टाटा जैसी कंपनियों का पासंग भी नहीं हो सकता है। टाटा तो एक है, ऐसी कितनी ही कंपनियां हैं जो वर्षों से अपने स्तर पर समाज सेवा के काम कर रही हैं।

टोयोटा ने देश भर में (बनारस समेत) सार्वजनिक शौंचालय बनवाए हैं, मर्सिडीज सड़क सुरक्षा की दिशा में काम कर रही है। मेरा मकसद इन कंपनियों का प्रचार करना नहीं, पतंजलि के विज्ञापन का टुच्चापन सामने लाना है। निश्चित रूप से यह विज्ञापन अनुचित और अनैतिक तो है ही, सिर्फ मैं, मैं करने वाला भी है। निश्चित रूप से इसे प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। एक ऐसी कंपनी जो पहले भी भ्रमित करने वाले और गलत विज्ञापन चला चुकी है, ऐसा विज्ञापन कैसे चला सकती है?

अगर पतंजलि को ऐसे विज्ञापन करने की इजाजत है तो मेक इन इंडिया और एफडीआई का क्या मतलब? अगर कोई विदेशी कंपनी भारतीय कंपनी या उत्पाद की खामी बताने वाला विज्ञापन चलाए तो क्या वह ठीक होगा। बाबा रामदेव सिर्फ अपनी या अपनी कंपनी की बात करें तो मैं विवाद में नहीं पड़ूंगा लेकिन भारत अगर उत्पादों और कारोबार के लिहाज से इतना ही योग्य और अग्रणी होता तो चीनी उत्पाद भारतीय बाजार में क्यों भर गए? इसमें कोई शक नहीं है कि कई चीजों को कानून बनाकर जबरन रोका गया है। भारतीय उद्योग प्रतिबंध के दम पर फलने-फूलने के इंतजार में हैं। इसके बावजूद ऐसे विज्ञापन क्या किसी विदेशी कंपनी को भारत में निवेश करने के लिए प्रेरित करेंगे। 2000 सीसी के ऊपर की डीजल गाड़ियों के पंजीकरण पर प्रतिबंध को टोयोटा ने पहले ही मौत का फरमान कहा है पर अतिथि देवो भव वाले देश में अतिथि को फंसाकर उसके पैसे कथित रूप से निवेश करवाकर इस तरह अपमानित करें यह कहां का राष्ट्रवाद है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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लोकसभा की आज की कार्यवाही पर अजात अभिषेक की यह लाइव कमेंट्री पढ़ने लायक

Sanjaya Kumar Singh : लोकसभा की आज की कार्यवाही पर अजात अभिषेक की लाइव कमेंट्री पढ़ने लायक है। पूरा दिन लोकसभा की कार्यवाही देखा महंगाई पर चर्चा हो रही थी और सरकार के जितने भी नुमाइंदे थे सब मॉनसून के उपर सारी जिम्मेदारी डाल रहे थे, बता रहे थे कि दो साल पानी नहीं बरसा और इस साल बरसा है तो आगे सब ठीक हो जाएगा। शाम को ये लब्बोलुआब निकला की सरकार मुंह बाये बारिश के लिए आसमान की ओर ताक रही है और हम मुंह बाये सरकार की ओर ताक रहे हैं। चलो टीवी बंद करते हैं पहले भी हमारा कट रहा था आगे भी हमारा ही कटेगा।

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5 बार लोकसभा सांसद, एक बार राज्यसभा सांसद और दो बार केंद्रीय मंत्री सदन में खड़े होकर डॉ लोहिया को कोट करके झूठ बोल रहे हैं कि दवाओं के दाम इस सरकार ने कम किये हैं जिसका लाभ गरीब आदमी को मिल रहा है । कैंसर की दवा 8000 से एक लाख आठ हजार करने का श्रेय इसी मोदी सरकार को है। 1 अप्रैल 2015 को सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर 509 दवाओं का दाम बढा दिया था। हुकुमदेव जी झूठ जितना मर्जी हो बोलिए लेकिन लोहिया का नाम मत लिजिए वरना लोहिया जी जहां भी होंगे शर्मिंदा हो रहे होंगे।

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जेटली जी ने लोकसभा में 15-20 मिनट दाल की महंगाई पर छौंक लगाया और तृणमूल कांग्रेस के सुगाता राय ने उस पर दो मिनट में रायता फेर दिये। वैश्विक दुनिया में तेल की कीमतों में गिरावट आयी तो सरकार ने उसका लाभ आम उपभोक्ताओं को हस्तांतरित करने के बजाय टैक्स बढा दिया और अपनी जेबें भर ली। जब दाल की कीमतें बढ़ रही हैं तो उपभोक्ता को पूरा पैसा देना है। मतलब लाभ नहीं बांटेगी सरकार लेकिन हानि का पूरा जनता से वसूलेगी। फिर वही बात आ गई कि इन लोगों ने ‘ल’ पढा है ‘द’ नहीं पढा है।

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लोकसभा में राहुल गांधी के महंगाई के आरोप पर मधुबनी के सांसद हुकुमदेव जी जैसा वरिष्ठ नेता जब जन-धन योजना में एकाउंट खोलने की बात करने लगता है तो लगता है कि वाकई में राजनीति अब चारण युग के चरमोत्कर्ष पर है। बाकी “भारत की राजधानी क्या है” पूछने पर “शिमला बहुत सुंदर है” बताना संघी राजनीति का पुराना कल्चर है।

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सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक पब्लिक प्रोविडेंट फंड और ईपीएफ में करीब 27000 हजार करोड़ रुपए का कोई भी दावेदार नहीं है और अब वो इसे ट्रांसफर करके वरिष्ठ नागरिकों के लिए कल्याण कोष बनाना चाहते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए सरकार का सोचना बहुत ही प्रशंसनीय है लेकिन हुजूर आप नाम कमाना चाहते हैं तो कमाइये लेकिन मजदूरों के पैसे से क्यों? आप क्रेडिट कार्ड रखते हैं दो दिन लेट होइए पेमेंट करने में दिन में 50 बार फोन आ जायेगा, एक सामान्य व्यक्ति कैसा भी लोन ले और उसकी किश्त बाउंस होते ही बैंक आपको कहीं से भी खोजकर ले आयेगा और कैसे भी करके वो आपसे वसूल कर लेगा। आज मजदूरों का पैसा जो उनकी अज्ञानता और मुश्किल सरकारी तंत्र की वजह से सरकार के पास पडा है अगर सरकार बहादुर चाह ले तो पंद्रह दिन में हर खाताधारक का पैसा उसके पास होगा लेकिन सरकारों ने ‘ल’ पढा है ‘द’ पढा ही नहीं है। आप गाय, गोबर, गोमूत्र में उलझे रहिए सरकार आपकी जेब काटने में तत्पर है। (बात सोलह आने सही है, सरकार जब अपना पैसा नहीं छोड़ती तो गरीबों का रखने की कैसे सोच सकती है।)

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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आज लगा कि प्रभाष जी की यादों को संघ ने गोद ले लिया है!

प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम पर जनसत्ता के कुछ पुराने लोगों की चर्चा…. प्रभाष प्रसंग में नहीं जा सका। अफ़सोस था। फिर फेसबुक पर किसी का लिखा ये पढ़ा और अफ़सोस कम हुआ: “अभी वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् डॉ. क्लॉड अल्वारेस का ‘गणेश और आधुनिक बुद्धिजीवी’ विषय पर प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान चल रहा है। वे महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं, “वैसे तो मेरे परिचय में कहा जाता है कि मैं ‘रोमन कैथोलिक’ हूं लेकिन रोम से हमारा क्या लेना-देना, वास्तव में मैं ‘हिंदू क्रिश्चियन’ हूं, क्योंकि मेरे पूर्वज हिंदू थे और मैं मानता हूं कि जो भारत में रहता है वह सब हिंदू है।”

सबको हिंदू घोषित करने की ये बीमारी भारत को कहीं पाकिस्तान न बना दे!

उन्होंने और भी दिलचस्प बातें कहीं। चूक गए। अफसोस करो। कहीं हिंदू राष्ट्र तो घोषित नहीं कर दिया?

उन्होंने बताया कि बैगन की 3500 प्रजातियां हैं और चावल की 350000। लग रहा था हम पूसा इंस्टीट्यूट में बैठे हैं।

अच्छा। और ये कि ये सब प्रजातियाँ आर्यावर्त ने ही विश्व को दीं। जिन्हें अब मोन्सान्टो बेच रहा है जैसे बोईंग ने पुष्पक विमान का ब्लूप्रिंट चुरा लिया था और अब मज़े कर रहा है।

बिल्कुल। अगर तुम वहां नहीं थे। फिर भी पता है तो ये पार्टी लाइन का ही मामला लगता है।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने ठीक कहा था कि गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी हुई थी। लोगों ने उनका मजाक उड़ाया पर कोई उनके बचाव में नहीं आया। फिर बताया कि प्लास्टिक सर्जरी सबसे पहले भारत में ही शुरू हुई थी। बहुत ही ज्ञानवर्धक भाषण था।

अब अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं रहा। लेकिन वो तो एक हिस्सा भर था। बाकायदा – लैपटॉप प्रेजेंटेशन के जरिए (यह सब बताया गया)। प्रधानमंत्री जो कहते हैं ठीक ही कहते होंगे। (आज के आयोजन में) प्रभाष परंपरा न्यास की विविधता दिखी। प्रधानमंत्री के @#$%^^& का भरपूर, तर्कसंगत बचाव किया गया।

आज प्रभाष जोशी होते तो कल सुबह के जनसत्ता में ये सब सुनकर क्या लिखते? अब बस कल्पना ही कर सकते हैं। जीवित नहीं रह पाते। वो तो बहुत पहले की स्थितियां नहीं झेल पाए। पेड न्यूज ने ही उनकी बलि ले ली। ये सब उनके वश का नहीं था। राय साब का लिखा छपता। (जो छपा है पढ़ सकते हैं)।

 

(उपरोक्त न्यूज कटिंग पर क्लिक करें ताकि साफ-साफ पढ़ सकें)

वे एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) में हैं ये भी तो है। शायद इसीलिए वहां वंदना शिवा भी थीं। इतना ही नहीं, वहां एक और सज्जन जिन्हें गैलिलियो प्राइज भी मिला और वे बच्चों को एक हफ्ते में maths समझा देने में समर्थ भी हैं (भी मौजूद थे)। दिग्गज आलोचक नामवर सिंह ने कहा हिन्दुस्तान में भुलाने का एक दौर रहा है। महत्वपूर्ण ये है कि तीसरा press commission जल्दी ही घोषित हो जाएगा।

अब उन्हीं की याद में पुनरुत्थानवादी डंका बजा रहे हैं। इससे भयानक और क्या हो सकता है। “संघ कबीले” पर प्रभाष जी के लिखे को न्यूट्रलाइज ऐसे ही किया जा सकता है। आज तो लगा कि प्रभाष जी (उनकी यादों को) संघ ने गोद ले लिया है। हालांकि एक ही व्यक्ति का भाषण खतरनाक था। बाकी झेलने लायक थे। कौन थे वो सज्जन? (यह सवाल गैलिलियो प्राइज विजेता के लिए है)। गणित के उस्ताद बताया। तीन दिन में कैलकुलस पढ़ा देने का दावा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हैं। नाम याद नहीं रहा। श्रोताओं में थे। (एक नाम, को संबोधित) उनकी योग्यता और तर्क शक्ति पर संदेश नहीं है। पर मौका और तथ्य …. प्रभाष जोशी को भी संघ ने एप्रोप्रिएट किया!!

प्रभाष जी ऐसे पोंगों के खिलाफ थे….अफ़सोस ये है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके लिखे पर बात ही नहीं की जा रही है। और ये एक साज़िश के तहत हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे भगत सिंह की तस्वीर पर फूल चढ़ाने वाले नहीं चाहते कि भगत सिंह का लिखा पढ़ा जाए। बिलकुल यही बात है। हुआ तो लगभग वही। हालांकि, संदेह का लाभ देते हुए कहा जा सकता है कि आयोजकों की जिम्मेदारी वक्ता के चयन तक ही थी। और मंच पर जिस तरह राय साब उनके पास गए, और उन्होंने कई पन्ने (एक साथ) पलट दिए और अचनाक समय कम होने की बात कर उपसंहार करने लगे उससे लगता है कि आयोजकों की सहमति नहीं भी हो सकती है। और उनसे बाकायदा जल्दी समाप्त करने के लिए कहा गया हो। क्या प्रभाष जी के लेखन पर एक कार्यशाला आयोजित नहीं करनी चाहिए ताकि उनको सिर्फ़ एक परंपरा-प्रेमी संपादक के तौर पर प्रोजेक्ट करने के षड्यंत्र को कुछ तो रोका जा सके।

मेरा सवाल है: आज प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व पर बात करना ज़्यादा प्रासंगिक है या उनके लेखन पर? अगर कोई उनके लेखन पर चुप्पी साधे है और सिर्फ़ उनके व्यक्तित्व पर पुष्पांजलि देना चाहता है तो मुझे इसमें षड्यंत्र साफ़ नज़र आता है। आयोजकों की नीयत पर मुझे शक नहीं है। प्रभाष जी के लेखन पर जरूर बातचीत होनी चाहिए। उनके लेखन में जो बदलाव आया उस पर भी सोचा जाना चाहिए। ये शोध की बात है। आयोजक-प्रायोजक तो अपना नफा-नुकसान देखेगा ही। किसी फेसबुकिया की सन्दर्भ से काट कर की गई आधी-अधूरी रिपोर्टिंग से पूरे आयोजन के बाबत निष्कर्ष निकाल कर फ़तवा देने की हड़बड़ी क्यों? विद्वतजनों से सादर फतवा यहां कौन किसको देगा। कौन नवसिखुआ है। पर ब्रेकिंग न्यूज का अलग मजा है। इसे झेलना सीखना ही होगा। टन टना टन्न लगता है कानों में … सोच समझ कर बैलेंस करके लिखा पढ़ने में कहां मजा आएगा।

……. भाई ने मुद्दे की बात उठाई है ………

प्रभाष जी के जमाने में ही संघमार्का हिंदू वादियों की भरमार थी। अब उस इतिहास में क्या कोई संशोधन मुमकिन है? मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रभाष जी के लेखन को इस दौर में फिर से याद करने की गुज़ारिश कर रहा हूँ। हम प्रभाष जी को ज़रूर याद रखें पर उनके लेखन को पशेपर्दा करना एक साज़िश से कम नहीं है। ज़िम्मेदार कोई भी हो। एक गोष्ठी सिर्फ़ उनके लिखे पर होनी चाहिए। इस पर नहीं कि वो कितने महान संपादक थे। प्रभाष जी को महान उनके लेखन और विचार ने बनाया। इसका ध्यान रखा जाए। प्रभाष जी के लेखन पर चर्चा उत्तम आइडिया है …….. ।

(बगैर अनुमति उद्धृत किया जा रहा है इसलिए नाम जानबूझ कर हटा दिए गए हैं। हालांकि, चर्चा सार्वजनिक और सबकी जानकारी में रिकार्डेड है।)

लेखक संजय कुमार सिंह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन / टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं.

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‘आप’ सिद्धू को सीएम का चेहरा बना रही तो इससे उसकी दरिद्रता ज़ाहिर होती है : ओम थानवी

Om Thanvi : क्या आप पार्टी सचमुच नवजोत सिद्धू को पंजाब में मुख्यमंत्री का चेहरा बना रही है? अगर ऐसा है तो इससे आप पार्टी की दरिद्रता ही ज़ाहिर होती है। जैसा कि सुनते हैं, पंजाब में पार्टी की ज़बरदस्त साख पहले ही क़ायम हो चुकी है। फिर सिद्धू उसे क्या भोगने आ रहे हैं? ‘आप’ भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा से दूर रहते हुए पनपी पार्टी है। जबकि सिद्धू हिंसा के ऐसे मामले में शामिल रहे हैं, जिसमें उनके ही शहर के एक नागरिक को जान से हाथ धोना पड़ा था।

उच्च न्यायालय ने सिद्धू को उस ग़ैरइरादतन हत्या का अपराधी ठहराया। ज़िल्लत के साथ उन्हें लोकसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। फिर सिद्धू भरोसे के राजनेता भी नहीं। उनकी अमृतसर की सीट अरुण जेटली को दे दी गई तो कहते हैं उन्होंने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार की जड़ें काटीं। हाल में पहले उन्हें राज्यसभा में लाया गया, शायद इसलिए कि पंजाब चुनाव में नुक़सान न पहुँचाएँ। तीन महीने के भीतर उन्होंने अपनी ‘माई-बाप’ पार्टी को फिर पीठ दिखा दी। ऐसा व्यक्ति ‘आप’ के लिए कैसे भरोसे का साबित होगा?

‘आप’ में अनेक नेता ऐसे हैं जिन्हें पूरा पंजाब जानता है। कँवर संधू जैसे कार्यकर्ताओं की सामाजिक ही नहीं, बौद्धिक छवि भी बड़ी है। इस मुक़ाम पर कहाँ केजरीवाल हँसोड़-लपोड़ सिद्धू के चक्कर में पड़ गए (अगर पड़ गए)!

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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पत्रकारिता के रंगरूटों, भक्त पत्रकारों… पहले बरखा पर आरोप तो जान लो!

Sanjaya Kumar Singh : बरखा दत्त के पक्ष में… पत्रकारिता के रंगरूटों, भक्त पत्रकारों – बरखा पर आरोप जान लो… संस्कारी सरकार के भक्तों के संस्कार इतनी बदबू फैला रहे हैं कि नए बने शौंचालयों का कोई फायदा ही नहीं हुआ। कहीं चिट्ठी बह रही है तो कहीं आरोप। स्वच्छता अभियान का जो हो, बदबू तो बढ़ रही है। इसके लिए रोहित सरदाना जैसे लोगों को बताना होगा कि सवाल खुले में ना करें – बदबू बहुत ज्यादा हो गई है। वैसे तो रोहित की हैसियत नहीं है कि बरखा दत्त के बारे में रवीश से पूछते पर भक्तों की मंडली सोशल मीडिया पर रोहित को कंधे पर बैठाकर जिस ढंग से नाच रही है उसमें भक्तों को बताना जरूरी है कि मुद्दा है क्या और बरखा पर शोर मचाने वाले, उसपर आरोप लगाने वालों को सच बता दिया जाए।

कल मैंने स्मृति ईरानी को लिखी उनकी चिट्ठी की भाषा, शैली, संयम, शब्दों के चयन और रुख की तारीफ की तो एक मित्र ने पूछा, “क्या इससे बरखा के पाप धुल जायेंगे या उनकी पत्रकारिता की खोई साख अब वापस आएगी!” मैंने पूछा, “आप बरखा के किस ‘पाप’ की बात कर रहे हैं? उसपर कोई एफआईआईर है? जेल गई? जिनलोगों पर एफआईआर है, जेल हो आए, तड़ी पार हैं पहले उनकी बात कीजिए। बरखा पर ही करनी है तो पहले एक एफआईआर करवाइए। फिर बात कीजिए। अच्छा लगेगा।”

उन्होंने लिखा, “जब किसी की साख ही न बची हो तो उसकी बातों की मार्केट वैल्यू कुछ नहीं होती जनता के बीच (खास जमात के समर्थकों और पिछलग्गुओं के अलावा)। नीरा राडिया से लेकर गुजरात और कारगिल की रिपोर्टिंग के सबूत ही काफी हैं और टेलीविजन की दुनिया की गन्दगी और बातों को मैं भी बेहतर जनता हूं। अगर आप पूर्वाग्रही होकर बात करना चाहते हैं तो वाद बेकार है, साथ ही आपसे विवाद करने का भी मेरा कोई मंतव्य नहीं क्योंकि मैं आपका सम्मान करता हूं, भले ही कहीं पर मतभिन्नता होती हो।”

इन्होंने मुझे असमंजस में डाल दिया। मेरे सवाल का जवाब तो नहीं दिया आरोप यह कि, “अगर आप पूर्वाग्रही होकर बात करना चाहते हैं।” इसी पोस्ट पर एक अन्य मित्र ने लिखा, “बरखा का कैरेक्टर पता है तुम्हे? दलाली तथाकथित पत्रकारों का असली पेशा हो गया है आजकल”। जुमलों की सरकार और भक्ति के जमाने में जब प्रधानमंत्री मन की बात कर रहे हैं तो कोई भी अपने मन की बात को “खबर” बना दे रहा है। मैंने बरखा के चरित्र पर सवाल उठाने वाले से कहा, “मेरी उम्र 52 साल है और ये फेसबुक पर लिखा है। आप मुझे तुम कह रहे हैं तो सीनियर और अनुभवी होंगे। किसी महिला का कैरेक्टर कैसे मालूम करते हैं और उसपर आरोप लगाने के लिए कोई सबूत चाहिए होता है या यूंही मोदी जी की तरह कह दिया तो मान लूं?

बरखा पर लगे आरोपों का पता लगाने के लिए गूगल सर्च करने पर एक ब्लॉग http://sins-of-barkha.blogspot.in मिला। मुझे लगा सारे मामले एक ही जगह मिल जाएंगे काम आसान हो जाएगा पर यहां एक नया आरोप मालूम हुआ कि बरखा को पिछले वित्त मंत्री ने 300 करोड़ रुपए का कर्ज दे रखा है। एक प्रतिशत के मामूली ब्याज पर। यह एक अप्रैल 2011 की पोस्ट है। इसमें लिखा है आरटीआई कार्यकर्ताओं को इस मामले पर आरटीआई लगाना चाहिए पर आरटीआई और दिल्ली विश्वविद्यालय में तो अब कोई अंतर रह नहीं गया है तो आगे कुछ नहीं है। ना इस ब्लॉग पर कोई दूसरा आरोप। हां, ब्लॉग लेखक ने यह जरूर कहा है कि बरखा को जानने के लिए राडियागेट या बरखागेट गूगल कर लिया जाए। मैंने ऐसा ही किया। अब मुझे http://barkhagate.blogspot.in मिला। इस पर जो लिखा मिला सो इस प्रकार है…

So what the heck is ‪#‎Barkhagate‬?

Its a scam involving journalist @bdutt and a lobbyist for leading Telcos and Industrialists by name Radia, in connection to the support to UPA government in 2009 between Congress and DMK. The transcript of the whole conversation was put up on the website of the Open The Magazine….

…”As talks between the DMK and Congress (‘them’) broke down over joining the Government in May 2009, Radia was actively involved in opening channels between the two parties through, among others, television journalist Barkha Dutt”

ध्यान दीजिए इसमें बरखा दत्त अकेले नहीं हैं। लेकिन नाम उनका ही लिया जाता है। इसके अलावा, यहां चार वॉयस ट्रांसक्रिप्ट पोस्ट किया होना दिखाई दे रहा है। पर ये चारो नहीं चले। देखें पहली तस्वीर। यह मामला 2010 से सार्वजनिक जानकारी में है। कोई एफआईआर या कार्रवाई की सूचना ना मुझे है ना इस ब्लॉग पर इसलिए यह माना जा सकता है कि सरकार को इस मामले में कोई मतलब नहीं है या सरकार की राय में यह अपराध नहीं है। राडियागेट मैं नहीं देख रहा क्योंकि अभी मुद्दा राडिया नहीं बरखा हैं। अगर किसी को राडिया से बरखा के और कनेक्शन की जानकारी हो तो लिख सकता है। मुझे नहीं पता है। मैंने नहीं सुना और मैं ऐसा कुछ नेट पर ढूंढ़ नहीं पाया।

बरखा पर तीसरा गंभीर आरोप कारगिल युद्ध के दौरान उनकी लाइव रिपोर्टिंग से कार्रवाई की जगह मालूम हो जाना और पाकिस्तानी हमले में भारतीय सैनिकों के घायल होने का आरोप है। मुझे लगता है कि यह मामला पूरी तरह सच और जैसा बताया जा रहा है वैसा ही हो तो भी यह गलती सिर्फ बरखा की नहीं है। पूरी एनडीटीवी टीम और लाइव प्रसारण से जुड़े नियमों, देख-रख और निगरानी करने वालों के साथ-साथ इस संबंध में नियम बनाने वालों की चूक का मामला है। बरखा तो युदस्थल से रिपोर्ट कर रही थीं और बहादुरी का काम कर रही थीं उसे लाइव दिखना और देखने वालों द्वारा इसका का दुरुपयोग किया जाना बहुत ही विस्तृत मामला है और बरखा की दिलेरी की जगह उसे इसके लिए दोषी ठहराना अनुचित है। यह मामला मई – जून 1999 का है।

इसके बाद मुंबई पर आतंकवादी हमला अप्रैल 2012 में हुआ था। तब भी टीवी के सीधे प्रसारण से समस्या हुई थी। और तब यह गलती बरखा ने नहीं, देश के कई नामी-गिरामी टीवी चैनलों और पत्रकारों ने की थी। एक बार गलती और उसका खामियाजा जानने के बाद ना किसी ने सावधानी बरती ना किसी को इसकी जरूरत लगी ना ऐसा कोई नियम बनाया गया, पूरे तीन साल तक और देश की मीडिया या कहिए देश ने वही गलती दोहराई जो बरखा औऱ एनडीटीवी ने की थी। इससे सीख लेने की जरूरत नहीं है? क्या इस संबंध में नियम अब स्पष्ट घोषित हैं? दिशा निर्देश स्पष्ट हैं? कभी किसी ने पूछा? सोचा? लेकिन बरखा दत्त दोषी है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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दो साल में इस राष्ट्रवादी सरकार ने क्या काम किए हैं, बताना मुश्किल हो रहा है

Sanjaya Kumar Singh : काम करने वाली राष्ट्रवादी सरकार ने पिछले दो साल में क्या काम किए हैं बताना मुश्किल हो रहा है। तरह-तरह के काम तो बताए ही जा रहे हैं महंगाई और मंदी के पक्ष में कारण भी गिनाए जा रहे हैं और इसमें अच्छे दिनों का सपना दिखाने में कोई कमी नहीं आई है। एनडीटीवी पर रवीश के कार्यक्रम में एक अंग्रेजी पत्रकार ने कुछ दिलचस्प तथ्य दिए –

(1) कोल ब्लॉक के आवंटन में पैसे जमा करने के कारण कारोबारियों के पास नकदी नहीं बची है

(2) (सरकार की सख्ती के कारण) बाजार में काला पैसा नहीं है और इसलिए फ्लैट नहीं बिक रहे हैं। उनका कहना था कि रीयल इस्टेट का कारोबार काले धन से ही चलता है।

(3) याद नहीं आ रहा किस बात पर, लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि एसबीआई में डिपोजिट (जमा) बढ़ा है।

और अब यह खबर पढ़ने को मिली…

”एसबीआई का चौथी तिमाही का शुद्ध मुनाफा 66 फीसदी घटा… भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का एकल शुद्ध मुनाफा 31 मार्च को समाप्त चौथी तिमाही के दौरान 66 फीसदी गिरकर 1,263.81 करोड़ रुपए रह गया”…

अजीब संयोग है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

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‘फ्री सेक्स’ का सही हिंदी शब्द ‘संभोग’ है यानि जो समान रूप से भोगा जाए

Sanjaya Kumar Singh : फ्रीसेक्स को हिन्दी में गलत समझकर उसपर हल्ला मचाने वालों को नहीं पता है कि क्रिया रूप में सेक्स के लिए हिन्दी में सही शब्द संभोग है। मोटे तौर पर इसका मतलब समान रूप से भोगना हुआ। जिसे गैर हिन्दी भाषी (आप कहना चाहें तो कह लीजिए अंग्रेजी की कम ज्ञानी) ने फ्री सेक्स लिख दिया और हिन्दी के ज्ञानियों ने उसका मतलब लगाया मुफ्त यौन संबंध या उन्मुक्त संबंध। बाकी लोग पूरी बात पढ़े जाने समझे बिना लगे हिन्दी से बलात्कार करने जो नहीं कर सकते थे वे बलात्कार का मजा लेने के लिए पूछते रहे फ्रीसेक्स का मतलब क्या होता है।

फ्रीसेक्स का मतलब होता है संभोग। जिसमें कोई पैसे का लेन-देन ना हो। जो समान रूप से भोगा जाए। उम्मीद है जो नहीं जानते थे वे समझ जाएंगे। जो जानते हुए नहीं समझ रहे थे वीर हिन्दी के ये ज्ञानी या ज्ञान पिपासु निश्चित रूप से धन्य हैं। मैंने लिखा था इसे अंग्रेजी वाला क्या समझा पाएगा पर समझाया एक अंग्रेजी में कमेंट करने वाले ने ही। शुक्रिया Subhash Goher. किसी शब्द को पकड़ कर बैठने का कोई मतलब नहीं है। जब कहने वाले ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके कहने का क्या मतलब है। कोई भी व्यक्ति गलत या अनुपयुक्त शब्द का चयन कर सकता है। उसमें स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। और, स्पष्टीकरण के बाद बात खत्म हो जानी चाहिए। कविता ने ही नहीं, उनकी मां भी स्पष्ट कर चुकी हैं कि उनका मतलब क्या था, है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए सुभाष गोहर के कमेंट को पढ़िए…

Subhash Goher : Sanjaya Kumar Singh Ji self declared Gyani will never understand. If a dog bites us we don’t bite the dog in return. It is no way civilised to propose a girl to do sex on India Gate even if originator of this debate had intended a different meaning. This debate is being done by political people and political supporters are always biased. They have agenda to win only and for that they can go to any level.

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जो पत्रकार वेज बोर्ड की सिफारिशें नहीं ले पाते वे किसी साथी को मरने पर मुआवजा क्या दिलवाएंगे

Sanjaya Kumar Singh : पत्रकारिता के जंगलराज का क्या होगा… झारखंड में एक पत्रकार की हत्या के बाद सीवान में दैनिक हिन्दुस्तान के संवाददाता की हत्या हुई तो बिहार में जंगलराज का आरोप लग गया और जनता की मांग पर मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने सीबाआई जांच की घोषणा कर दी। निश्चित रूप से सीबीआई से जांच कराने का मतलब यह नहीं है कि मामला सुलझ ही जाएगा और हत्यारों को सजा हो ही जाएगी। फिर भी मान लेता हूं, सीबीआई जांच करेगी और मामला साफ हो जाएगा। अभियुक्तों को सजा हो जाएगी। पर इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि पीड़ित परिवार का उचित मुआवजा मिले। आखिर पत्रकार की हत्या उसके काम के सिलसिले में काम के दौरान हुई है। उसका परिवार भी है।

जंगलराज की लड़ाई तो राजनीतिक है। राजनीतिक दल लड़ेंगे। पर मृतक पत्रकार को मुआवजा कौन दिलवाएगा? हिन्दुस्तान प्रबंधन ने अभी तक ऐसी कोई घोषणा नहीं की है। यहां महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि मृतक हिन्दुस्तान के संवाददाता थे या स्ट्रिंगर। अगर संवाददाता थे तो कंपनी के नियमों के अनुसार उन्हें मुआवजा, भत्ता मिलना चाहिए। नहीं थे तो कंपनी को मजबूर किया जाना चाहिए कि हत्या कर दिए जाने के बाद कंपनी उन्हें वाजिब मुआवजा दे (जो किसी कर्मचारी को काम पर मारे जाने की दशा में मिलना चाहिए)। और अगर कंपनी नहीं देती है तो और कौन देगा। जाहिर है बिहार सरकार को यह उदारता दिखाना चाहिए क्योंकि हत्या तो कानून व्यवस्था का मामला है ही। पर यह सब ऐसे ही नहीं होगा इसके लिए लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

और लड़ाई लड़ी ही जाए तो बिहार में ही क्यों। झारखंड और उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं? मुझे नहीं लगता कि पत्रकारों की लड़ाई “स्ट्रिंगर” और “संवादसूत्र” लड़ सकेंगे। इसलिए नहीं कि वे कमजोर होते हैं। इसलिए कि वे लड़ने लायक होते तो स्ट्रिंगर या संवाद सूत्र के रूप में खबर नहीं भेज रहे होते। ऐसे में अगर लड़ाई बिहार सरकार / राज्य सरकारों से लड़नी है तो मीडिया संस्थानों को सामने आना होगा। पर जो संस्थान कर्मचारी को पूरी सुविधाएं नहीं देता वो क्या मुआवजा देगा। फिर भी मैं संस्थान की नीयत पर क्यों शक करूं। बिहार में अगर संस्थान को यह काम करना होता तो हिन्दुस्तान के संपादक और स्थानीय संपादक मुख्य भूमिका में होंते। होना चाहिए। इसमें संपादक और स्थानीय संपादक की हस्ती और व्यक्तित्व की भी भूमिका होगी।

हिन्दुस्तान के मुख्य संपादक का लिखा पढ़कर तो नहीं लगता कि लड़ाई आगे बढ़ने वाली है। हालांकि हत्या वाले दिन जो अंक निकला, जिस तरह पहले पेज को श्वेत-श्याम रखा गया, पहले पन्ने पर विज्ञापनों का “जैकेट” होने के बाद भी यह सूचना दी गई उससे लगा कि स्थानीय टीम दमदार हैं। कोई अच्छा नेतृत्व होगा। पर वे इस मामले में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करते नजर नहीं आ रहे हैं। कल एनडीटीवी पर अपने कार्यक्रम में रवीश कुमार ने कहा कि हिन्दुस्तान से कोई नहीं आया।

लड़ाई को संस्थान के संपादक और स्थानीय संपादक से शक्ति मिल सकती है। स्ट्रिंगर की हत्या होने उसकी मौत होने पर मुआवजे का एक नियम बनवाया जा सकता है। पर यह लड़ाई खुलकर लड़नी होगी। पर हिन्दुस्तान के स्थानीय संपादक पर्दे के पीछे हैं, रखे गए हैं या मजबूर हैं। (मैं नहीं जानता कारण क्या है।) पर अभी तक ऐसा नहीं लग रहा है कि हिन्दुस्तान के सभी बड़े पत्रकार मिलकर यह लड़ाई लड़ेंगे। जब हिन्दुस्तान के बड़े पत्रकार ही एकजुट नहीं होंगे। तो स्ट्रिंगर से क्या उम्मीद की जाए। और दूसरे राज्यों का मामला तो पुराना हो चुका है। जो पत्रकार वेजबोर्ड की सिफारिशें नहीं ले पाते वे किसी साथी को मरने पर मुआवजा क्या दिलवाएंगे?

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के इस एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Rakesh Pandey पत्रकारों में एकता नहीं है। संगठन का अभाव है।लड़ने का माद्दा नहीं है। बैंक कर्मियों से अपने हकों की लड़ाई करना सीखें। जब कुर्बानी देनी ही है तो अपने वेतन भत्तों और सेवा शर्तों के लिए भी लडे।

Sanjaya Kumar Singh असल में पत्रकारों के कई वर्ग हैं, वेतन वाले, बिना वेतन वाले, काम करने वाले, बिना काम करने वाले, अफसर के चम्मच, संपादक के चम्मच, मोटी तनख्वाह वाले, औपचारिक तनख्वाह वाले, खबर लिखने वाले, वसूली करने वाले, संपादक / मालिक के लिए वसूली करने वाले, सिर्फ पैसे वाली खबरें करने वाले, कई पत्रकारों मालिकों को ठेका दिलाने से लेकर पुरस्कार दिलाने का ठेका लेते हैं आदि आदि। चूंकि यह बैंक कर्मचारियों की तरह अलग-अलग ग्रेड का मामला नहीं है इसलिए उससे तुलना नहीं की जा सकती है।

Rakesh Pandey मुझे याद पड़ता है दिल्ली में साठ सत्तर के दशक में हमारे बैंक के लीडर कामरेड एच एल परवाना हुआ करते थे। वे दिल्ली में वर्किंग जर्नलिस्ट/ श्रमजीवी पत्रकार के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़े थे।

Pradeep Upadhyay कुछ घटनाए घट जाती हैं तभी यह विचार आता है। बहुत सारे स्ट्रीगर आर्थिक असुरक्षा के कारण जान जोखिम में नहीं डालते,होना भी यही चाहिए। क्योंकि प्रबन्ध तंत्र का रुख एकदम उल्टा होता है। पत्रकारो को सहयोग क्या देगें उल्टा उनको ही प्रताडित करेगें ।

Sanjaya Kumar Singh बिल्कुल। मेरा मानना है कि पत्रकारों का रुतबा ऐसा होना चाहिए कि हत्या तो दूर, कोई आंख उठाकर देखने की हिम्मत ना करे। पर इसके लिए सिर्फ पत्रकारिता करनी होगी। लाला की दुकान की नौकरी में पत्रकारिता का मजा तो नहीं मिलेगा। लेकिन समस्या यह है कि स्ट्रिंगर ना लाला का नौकर है ना पत्रकार का मजा पाता है। पत्रकार भी बंटे हुए है राजनितिक गुटबाजी में … जब पत्रकारो की पिटाई होती है तो कई पत्रकार खुश होते है और उसे जायज बताते है … ज्यादातर मीडिया संसथान राजनितिक या औद्योगिक घराने में तब्दील हो चुके है। ऊपर मैंने लिखा है कि कई तरह के पत्रकार होते हैं। उनमें अंग्रेजी हिन्दी के साथ आईएनएस (दिल्ली से बाहर के अखबारों के लिए काम करने वाले) वाले पत्रकार , बाहर के शहरों से निकलने वाले हिन्दी अंग्रेजी पत्रकारों के अलावा दूसरी भाषाओं के, फिर टेलीविजन, रेडियो, उसमें भी सरकारी प्राइवेट। बहुत हैं। उसमे एक अलग कटैगरी भी है छि न्यूज़ वाला पत्रकार .. जो बाकि के पत्रकारो को हमेशा गलत साबित करने में लगा रहता है 🙂

Anurag Srivastava स्थानीय नेतृत्व वाकई दमदार है। डॉक्टर तीर विजय हैं सम्पादक लेकिन बात घूम फिर कर फिर वही कि दिल्ली तो बस दिल्ली है और फिर करोड़ों के विज्ञापनों का क्या होगा?


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दिल्ली में मोदी की मां का आना और गुजरात में पूनम बेन का नाले में गिरना… दो घटनाएं, दो स्थापनाएं…

Sanjaya Kumar Singh : एक पत्रकार मित्र का कहना है कि प्रधानमंत्री बनने के दो साल बाद नरेन्द्र मोदी की मां मदर्स डे पर दिल्ली आईं। इसमें भी लोग राजनीति देख रहे हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को। पर वे बता रहे थे कि जैसे आईं वैसे ही चली जातीं तो किसी को पता ही नहीं चलता। इसलिए बताना पड़ा कि आई थीं और चली गईं। क्यों? मैं नहीं जानता। अब संयोग से यह सूचना तमिलनाडु में मतदान से पहले वाले दिन आई ताकि मतदान वाले दिन अखबारों में छपे।

लोगों को मां की सेवा याद रहे। यह मकसद तो नहीं ही रहा होगा। पर ऐसा हुआ। पत्रकार भाई लोगों ने ही छापा है। पर अब पेट में दर्द हो रहा है। इसके साथ तर्क यह कि दक्षिण के लोग बूढ़ी मां की सेवा के मामले में बहुत भावुक होते हैं और जब पूरा हिंदुस्तान खिलाफ था तब भी तमिल इंदिरा मां के पक्ष में थे। निश्चित रूप से मोदी जी की माँ का उनके साथ रहना, आना-जाना मोदी जी का पर्सनल मामला है। जैसे कि हर किसी की माँ का होता है। पर राजनीति में संयोग पर्सनल नहीं होता है। संयोग के मायने निकाले जाते रहे हैं। क्या किया जाए। खबर नहीं है पर बोले-लिखे बिना रहा भी नहीं जाता है पत्रकारों से।

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जनप्रतिनिधि के नाले में गिरने का अफसोस है। ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ करे। दीर्घायु बनाए। लेकिन मुद्दा यह है कि ऐसा पिछड़े बिहार और जंगलराज वाले इलाकों में क्यों नहीं होता है। इसमें किसका हाथ है। दोषी कौन है? जिम्मेदारी किसकी है। क्या देश इस बारे में कुछ जानना चाहता है? शुरुआती सूचना के मुताबिक पूनम बेन नाले पर बने सीमेंट-कंक्रीट के अस्थायी पुल या ढक्कन पर खड़ीं थीं। जो टूट गया। यह भ्रष्टाचार का मामला है या ईश्वर की इच्छा या आरक्षण से बने इंजीनियर का कमाल? देश के अन्य हिस्सों में होने वाली दुर्घटनाओं पर तरह-तरह के विचार और ज्ञान देने वाले भक्त जानना चाहेंगे कि माजरा क्या है? पता चले तो मुझे भी जानना है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मोदी के दो साल : मीडिया को डरा फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया… अब ‘दिक्कत’ दे रहीं अदालतों को ठीक करेंगे साहब लोग

Sanjaya Kumar Singh : सत्ता मिली तो ये कर दूंगा, वो कर दूंगा। ऐसे, वैसे। अब विपक्ष (जो बचा ही नहीं था) सहयोग नहीं कर रहा है। मीडिया को डरा कर और फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया। अधिकारियों को पहले ही कसने का दावा किया गया। यह भी कि सब समय से आते-जाते हैं। प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं। अधिकारी परेशान हैं, काम करते करते। नालायकों को दो साल पहले ही हटा दिया गया था।

पहले जनधन खाते के नाम पर फिर सबसिडी छोड़ने की अपील करके जनता से लिया ही है, दिया कुछ नहीं। सफाई नगर निगमें कराती हैं पर स्वच्छता टैक्स केंद्र सरकार लेती है। सर्विस टैक्स बढ़ा दिया सो अलग। इन सबके बावजूद जनता को क्या मिला उसकी बात नहीं करेंगे। अब अदालतें दखल ना दें ताकि हम उत्तराखंड करें या डिग्री पर चुप रहें। आरटीआई कानून से तकलीफ हो ही रही है। देखते हैं पांच साल में और क्या क्या मांगते हैं। दिया क्या है ये मत पूछिए। राज करेंगे (मूंग दलेंगे) 2024 तक। मुंगरी लाल के हसीन सपने याद आ गए।

देखें ये खबर…


सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल न दें अदालतें : अरुण जेटली

नई दिल्ली: वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आज फिर कहा कि अदालतों को सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए। इंडियन वीमेंस प्रेस कोर के एक कार्यक्रम में उन्होंने आरबीआई गवर्नर से सरकार के टकराव की खबर को भी गलत बताया।

“कोर्ट कार्यपालिका का विकल्प नहीं हो सकती। कोर्ट उसकी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकती। सभी संस्थाओं को लक्ष्मण रेखा खींचना होगी।” वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को दिल्ली में पत्रकार वार्ता में यह बात कही। कानून के जानकार वित्त मंत्री ने बहुत सतर्क होकर ये साफ किया कि अदालत और सरकार के कामकाज के दायरे अलग हैं। अदालतों को अपनी लक्ष्मणरेखा खींचनी होगी।

वित्त मंत्री की इस सलाह के पीछे हाल के कई मसले हैं। उत्तराखंड पर राष्ट्रपति शासन के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया; आधार को वित्त विधेयक बनाने का मामला अदालत में है; दिल्ली में डीज़ल गाड़ियों पर बैन लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी सरकार निराश है और ताज़ा मामला मेडिकल एंट्रेंस को लेकर एनईईटी का है। जेटली ने कहा, “मेरी नज़र में मेडिकल संस्थाओं में दाखिले का मामला कार्यपालिका के अधीन आता है।”

लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने के इल्ज़ाम को लेकर जेटली किनाराकशी कर गए। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन पर बीजेपी के हमले को भी उन्होंने मीडिया के मत्थे मढ़ दिया और कहा कि आरबीआई से सरकार का कोई टकराव नहीं है। अरुण जेटली ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंधों को लेकर मीडिया में छपने वाली खबरों को आपको गंभीरता से लेना चाहिए।” वित्त मंत्री से कहा कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंध मजबूत हैं।

सूखा और NEET जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को लेकर अरुण जेटली ने अपनी चिंताएं जताईं, लेकिन जिस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में हस्तक्षेप किया …उससे यह सवाल उठता है कि क्या सरकार और राजनीतिक दलों ने इन मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाहन सही तरीके से किया था। क्या उनकी कमजोरियों की वजह से ही कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा था। (साभार एनडीटीवी डाट काम)


वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के इस एफबी स्टेटस जिसे दर्जनों लोगों ने शेयर किया है, पर आए कुछ प्रमुख पठनीय कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Priyadarshan Shastri : पहले दीवानी मुकदमों में वादी के बयान जज के सामने मौखिक होते थे वादी का वकील सवाल करता था तथा वादी अपनी याददाश्त के आधार पर जवाब देता था कि उसने मुक़दमा क्यों पेश किया है उसे समस्या क्या है ? इसमें फायदा ये होता था कि कई बार दावे में कोई झूठी मनगढ़ंत बात लिखी होती थी वह पकड़ में आ जाती थी …. फिर नंबर आता था प्रतिवादी के वकील का कि वह वादी से ज़िरह में सवाल पूछे …. ऐसे में होता ये था कि वकील अपनी चतुराई से असत्यता को उगलवाने की पूरी कोशिश करता था …. ये सारी प्रक्रिया न्यायालय द्वारा रिकॉर्ड की जाती थी । पहली बार अटल जी के समय जब जेटली जी लॉ मिनिस्टर थे तब सीपीसी में संशोधन कर उक्त सिस्टम में बदलाव कर लिखित में शपथपत्र प्रस्तुत करने की व्यवस्था लागू कर दी । अब याददाश्त पर बयान वाली प्रक्रिया समाप्त हो गई । अब तो दावे को ही शपथपत्र के रूप में टाइप कर प्रस्तुत कर दिया जाता है … कई बार ज़िरह के नाम पर न्यायालय प्रश्नावली पहले ही मांग लेता है। कहने का मतलब ये है कि न्यायिक प्रक्रिया का मूल जिससे वकील सत्यता को उजागर करते थे वह समाप्त हो ही गयी है अब मुक़दमा केवल कागज़ी कार्यवाही रह गया है।

Mrinal Singh : बात इससे कहीं ज़्यादा गंभीर है! ये वक्तव्य इस बात का संकेत है की अब सरकार अदालत पर नकेल कसने के लिए कदम उठाने जा रही है! अघोषित एमर्जेन्सी अब अगले चरण की ओर जा रही है जहाँ संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण होगा! पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विश्वविद्यालयों का तो हाल देख ही लिया जहाँ से विरोध के स्वर उभर रहे थे! मेरा अनुमान है की अगला हमला संविधान पर होगा और समय आ गया है की जनता इसका पूरी ताक़त से विरोध करे जैसे एमेरजेंसी में किया था!

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मेनस्ट्रीम पत्रकारिता मूर्खता के प्रसार का व्यापार है, आउटलुक की कारस्तानी देखिये

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केरल की तुलना सोमालिया से कर गए। उसकी निन्दा हुई तो अमित शाह ने केरल सरकार को “नालायक” साबित करने के लिए कुपोषण से बच्चों की मौत का आरोप लगाया और आउटलुक के एक पुराने अंक का सहारा लिया। चुनाव प्रचार के अंतिम दिन पूरे आत्मविश्वास के साथ। इस बारे में Prakash K Ray ने लिखा है, बहुत समय से मेरी यह दृढ़ मान्यता रही है कि मेनस्ट्रीम पत्रकारिता मूर्खता के प्रसार का व्यापार है।

अब इस आउटलुक की कारस्तानी देखिये। अमेरिकी सरकार की श्रीलंका पर रिपोर्ट लगी तस्वीर को केरल की बता कर धंधा कर लिया। भाजपा इस झूठ को चुनाव में भुनाने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी सरकार की रिपोर्ट इस लिंक पर देखें- http://www.state.gov/documents/organization/131025.pdf

अब आउटलुक ने ऐसा क्यों किया यह तो आउटलुक जाने। पर केरल में कुपोषण से मौत की चर्चा में आप तीन साल पुरानी पत्रिका का अंक पेश करेंगे तो पूछा जा सकता है कि बाकी मौतें आपको क्यों नहीं दिखीं? भूख से मौत के निम्न मामले गूगल पहले पेज पर दिखा रहा हैं। अमित शाह ने केरल में कुपोषण से हुई मौतों पर सवाल उठाया है। अच्छी बात है। पर ये मौतें भी तो भारत में हुई हैं। भले किसी बड़ी या स्थापित पत्रिका में न छपी हों। पर सरकार के पास तो अपना सूचना तंत्र है, होना चाहिए। वैसे भी, इस तरह की खबरों के लिए सिर्फ मीडिया के भरोसे नहीं रहा जा सकता है। पर अमित शाह ने इनकी चर्चा नहीं की क्योंकि चुनाव केरल में हैं।

अमित शाह साहेब!! देश भर में आपकी सरकार है। प्रधानमंत्री सारे देश के हैं। गलत तुलना कर गए तो उसे सही साबित करने की कोशिश से बेहतर नहीं होता कि बाकी देश का ख्याल रखते? देश के जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां मुख्यमंत्रियों को फ्री हैंड और जहां नहीं है वहां जंगलराज साबित करने में लगे रहेंगे तो देश कैसे चलेगा?

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


इसी मसले पर अभिषेक और रतीश का लिखा ये भी पढ़ें….

Abhishek Srivastava : साहेब ने केरल की सोमालिया से तुलना की तो उनके सिपाही उनसे बड़े काबिल निकले। अमित शाह ने आउटलुक का तीन साल पुराना कवर रैली में दिखाते हुए कहा कि सोमालिया पर माफी की तो भूल जाओ, पहले इस बच्‍चे के मरने पर माफी मांगो चांडी। पता चला कि कवर वाला बच्‍चा केरल नहीं, श्रीलंका का निकल गया। मीडिया का एक फ्रॉड कैसे राजनीति में दूसरे फ्रॉड को जन्म देता है, इसकी ताज़ा मिसाल देखिए और इसे सामने लाने के लिए Prakash K Ray का शुक्रिया अदा कीजिए।

Ratish Kumar Singh साधारण लोग तो पत्रकारों को ‘holier than thou’ मानते हैं। भला हो अमित शाह का नहीं तो आउटलुक जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका का फर्जीवाड़ा हम जैसे साधारण मानुष को पता ही नहीं चलता। आउटलुक झूठ छापकर भी अपनी प्रतिष्ठा नहीं खोता, और आप उम्मीद रखते हैं की उसे कोट करके कोई खो देगा।

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मोदी सरकार के दो साल और शशि शेखर का यह ‘हिंदुस्तानी’ आलेख

Sanjaya Kumar Singh : भक्तों की शिकायत रहती है कि मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और इस सरकार के खिलाफ ही लिखता हूं। उनके पक्ष में कुछ नहीं लिखता। कल इसे पढ़ने के बाद लगा कि इसमें कुछ खास नहीं है। इसलिए शेयर नहीं किया। कुछ अच्छा ढूंढ़ रहा था उसी में अदालतों पर जेटली साब के विचार मिल गए जिसे पहले शेयर कर चुका हूं। सरकार के दो साल पूरे होने पर किसी ने कुछ और अच्छा लिखा हो तो शेयर करना चाहता था। पर मुझे तो कुछ नहीं मिला। आपको मिला हो तो शेयर कीजिए। टैग भी कर सकते हैं।

मैं भी जानना चाहता हूं कि मोदी जी ने दो साल में आखिर किया क्या है (रेल किराया बढ़ाने, इधर का सिलेंडर उधर करने और स्वच्छता टैक्स लगाने के अलावा)। अंग्रेजी में हो, तो भी चलेगा। फिलहाल तो इसे पढ़िए और खुश होइए कि मोदी जी लोगों के नाम भी याद रखते हैं। पर ये जान लीजिए कि सेल्फी पत्रकार विरोध में ना लिखें, बिना काम किए पक्ष में भी नहीं लिख पाएंगे। पक्ष में लिखवाने के लिए पुरस्कार ईनाम बांटना भी पर्याप्त नहीं होगा – कुछ काम ही करना पड़ेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक शशि शेखर का लिखा हुआ है। वही हिन्दुस्तान जिसके सीवान संवाददाता की हत्या हो गई तो एक दिन बाद संपादक जी ने लिखा था, “हम लडेंगे, क्योंकि लड़ने की जरूरत है”। यह लाइन पंजाबी कवि ‘पाश’ से उधार ली हुई है।


दो बरस बाद प्रधानमंत्री मोदी

-शशि शेखर-

दिल्ली में ‘हैदराबाद हाउस’ के तौर-तरीके अनोखे हैं। वहां कदम रखते ही ‘लुटियन्स दिल्ली’ की भद्रता तक बौनी लगने लगती है। द्वारपाल हों या नफीस बेयरे अथवा विदेश मंत्रालय के सजे-धजे अधिकारी, हरेक में ऐसी नफासत कि भदेस-से-भदेस इंसान ‘भद्र’ बनने को बेताब हो जाए। हैदराबाद के महाकंजूस निजाम द्वारा बनाया गया यह वैभवशाली भवन अब विदेश मंत्रालय के उपयोग में आता है। सर्वोच्च विदेशी हस्तियों से मुलाकात और उनके सम्मान में दी जाने वाली भव्य दावतों के कारण यह इमारत विदेशों में भारत की पहचान बन गई है।

उस दिन हम लोग यहां कतार में खडे़ थे। क्यों? दरअसल, जब कभी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष अथवा प्रधानमंत्री आता है, तो देश के प्रमुख लोगों से उसकी मुलाकात कराई जाती है। वे सबको देख-पहचान सकें, इसके लिए नामचीन हस्तियों को एक पंक्ति में खड़ा कर दिया जाता है। विदेशी मेहमान को कोई वरिष्ठ अधिकारी बारी-बारी सबसे रूबरू करवाता है। उनसे दो-एक कदम पीछे भारतीय प्रधानमंत्री चल रहे होते हैं। इस बहाने उनकी भी इन तमाम लोगों से ‘हैलो-हाय’ हो जाती है।

उस दिन नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के सम्मान में भारतीय ‘पीएम’ ने दोपहर-भोज का आयोजन किया था। ओली साहब आए। सभी से अति औपचारिक मुस्कान के साथ ‘हैंडशेक’ किया और आगे बढ़ गए। इसके विपरीत, नरेंद्र मोदी लोगों से ठहरकर हालचाल पूछते और उन्हें अनौपचारिक बराबरी का एहसास दिलाते। एक मेहमान से हाथ मिलाते हुए अचानक प्रधानमंत्री ने मेरी ओर देखा और हंसते हुए पूछा- ‘शशि, कैसे हो भैया?’ मैं चौंक गया। इनसे मेरी कुल तीन बार की रस्मी मुलाकात है। जो शख्स सैकड़ों लोगों से रोज मिलता हो, उसकी ऐसी गजब की याददाश्त! विस्मित होने वाला वहां मैं अकेला नहीं था।

कुछ देर पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पास से गुजरे थे। मैंने उनका अभिवादन किया, पर कोई जवाब न मिला। क्या उन्होंने मुझे देखा नहीं या पहचान नहीं सके, या फिर वह कुछ सोच रहे थे? मैं तो उनके साथ कई बार विदेश गया हूं। हर बार आमना-सामना होने पर सलाम-बंदगी होती थी, फिर यह क्या? नरेंद्र मोदी के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि वह बेहद अक्खड़ हैं, पर पिछली तीन मुलाकातों में सिर्फ मुझे ही नहीं, बल्कि साथी संपादकों को भी उनमें विनम्रता भरी गर्मजोशी नजर आई थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह दिल्ली के ‘भद्रलोक’ का रचा हुआ तमाशा है? उन्होंने हमेशा क्षेत्रीय नेताओं का मजाक उड़ाया है।

उन्हें बददिमाग, बदगुमान या बेजुबान साबित करने की कोशिश की है। सिर्फ मोदी ही क्यों, उनके विरोधी तक इसके शिकार होते रहे हैं। अरविंद केजरीवाल, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जयललिता अथवा पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा इसके उदाहरण हैं। शायद इसीलिए के कामराज ने लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने से इनकार कर दिया था। उन्हीं के सहयोग से इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं। श्रीमती गांधी विलक्षण थीं, पर बताने की जरूरत नहीं कि वह किस वर्ग से आती थीं।

दिल्ली अब तक ‘नॉन लुटियन्स’ को शीर्ष पदों पर अस्वीकार करती आई है। अरुण जेटली शायद इसीलिए कहते हैं कि सबसे अधिक असहिष्णुता तो खुद नरेंद्र मोदी ने झेली है। वजह? वह देश के पहले ‘नॉन लुटियन’ पूर्णकालिक प्रधानमंत्री हैं। इससे पूर्व जितने प्रधानमंत्री पांच साल के लिए चुने गए, वे मूलत: कहीं के रहने वाले हों, पर बरसों लुटियन दिल्ली के प्रासादों में रहने के कारण उन्होंने ‘दिल्ली-क्लब’ में अपनी जगह बना ली थी। प्रधानमंत्री मोदी इसे समझते हैं, पर घबराते या कतराते नहीं। अपनी बात को समूची शिद्दत से रखने का उनमें अद्भुत माद्दा है।

इसी के जरिये वह आम आदमी की तालियों के साथ ‘खास लोगों’ की आलोचना भी बटोरते चलते हैं। 16 मई को 16वीं लोकसभा के नतीजे आए दो साल हो गए। इस दिन तय हो गया था कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अब नरेंद्र दामोदरदास मोदी को बैठना है। वह लंबे-चौडे़ वायदों और अकल्पनीय लगने वाले बहुमत के साथ सत्ता-सदन में पहुंचे थे। कार्यकाल का 40 फीसदी समय निकलने के बाद वह कितने सफल या असफल रहे हैं? पहली बात तो यह कि उनकी सरकार पर अभी तक भ्रष्टाचार का कोई गंभीर आरोप नहीं लगा है।

देश की सीमाओं के अंदर, पठानकोट को छोड़ दें, तो कोई बर्बर आतंकवादी हमला नहीं हुआ और सीमा पर पाक की ओर से चलने वाली गोलियां फिलहाल थमी हुई हैं। उनसे पहले किसी प्रधानमंत्री को आईएस, अल-कायदा, आईएसआई जैसे तमाम खूनी संगठनों से एक साथ लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी थी। भारत इन दरिंदों से सफलतापूर्वक जूझ रहा है, जबकि यूरोप और अमेरिका थरथरा रहे हैं। इसी दौरान बांग्लादेश के जन्म के समय से ही चले आ रहे ‘सीमा विवाद’ का निपटारा हुआ, जो बड़ी सफलता है। बांग्लादेश ‘बॉर्डर’ पूर्वोत्तर के आतंकवादियों का आश्रय-स्थल रहा है। शेख हसीना वाजेद और नरेंद्र मोदी के गर्मजोशी भरे रिश्तों ने इन पर अंकुश लगाया है।

इसी दौरान, म्यांमार की सीमा में घुसकर भारतीय सेना ने उल्फा आतंकियों का मनोबल तोड़ा। अपने विदेशी दौरों के दौरान भारतीय शासनाध्यक्ष ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य का लोहा समूची दुनिया से मनवाया। यही वजह है कि चीन से ज्यादा विदेशी निवेश (प्रतिशत में) भारत को हासिल होने लगा है। उम्मीद है कि अगले वर्ष हम आठ फीसदी की विकास दर हासिल कर लेंगे, जो विश्व के महत्वपूर्ण देशों में सबसे ज्यादा होगी। गंगा सफाई, स्वच्छ-भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, गैस सब्सिडी त्यागो और उज्ज्वला जैसी योजनाओं से उन्होंने पूरे देश में अनोखी जागृति लाने की कोशिश की।

इससे पहले की सरकारों ने भी सामाजिक कल्याण के कारगर कार्य किए, पर उन्हें जनचर्चा में तब्दील कर देने का सामर्थ्य इंदिरा गांधी के बाद किसी और प्रधानमंत्री में नहीं दिखा। इसके अलावा, जन-धन योजना, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं से उन्होंने युवाओं और समाज की निचली सीढ़ियों पर खड़े लोगों के लिए नए रास्ते खोले। क्या वह इन तमाम योजनाओं को सिरे तक पहुंचा पाएंगे?

मैंने देहरादून हवाई अड्डे पर वरिष्ठ मंत्री रामविलास पासवान से यह सवाल सरेआम पूछ लिया। उन्होंने कहा, मुझे और भी प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का मौका मिला है, पर मैंने किसी को भी लगातार 14 से 16 घंटे जूझते नहीं देखा। रायसीना पहाड़ी पर चर्चा है कि उनके साथ काम करने वाले अधिकारी उनकी इस जोशीली कार्यशैली से आतंकित रहते हैं।

वह अपने सहयोगियों पर भी पैनी नजर रखते हैं, ताकि कहीं कोई शिथिलता न रह जाए। इस सबके बावजूद यह सच है कि दादरी में अखलाक की हत्या हो या जेएनयू प्रकरण, या फिर रोहित वेमुला की आत्महत्या, केंद्र सरकार हर बार अनावश्यक विवादों में घिरी। यही नहीं, कुछ सांसदों की बयानबाजी और सत्ताधारी पार्टी से नजदीकी का दावा करने वाले संगठनों ने भी केंद्र सरकार की ‘यश-यात्रा’ का रास्ता रोका। इसी तरह, दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा की पराजय को भी केंद्र सरकार से जोड़कर देखने की कोशिश की गई। हर बार निशाने पर नरेंद्र मोदी रहे। समय रहते वरिष्ठ साथियों की समुचित प्रतिक्रिया ही ऐसे मामलों से निपटने की सियासी कुंजी है। उम्मीद है, आने वाले दिनों में केंद्र सरकार ‘रिस्क मैनेजमेंट’ की एक टीम बनाएगी, ताकि अनावश्यक झंझटों से बचा जा सके। ‘अच्छे दिन’ लाने के लिए अच्छा वातावरण बनाना जरूरी है। (साभार : हिन्दुस्तान)


एक ये मिला है…

A Slap For All Those Asking Kahan Hain Ache Din !! 2 Years Of Modi Governance

यह सरकारी विज्ञप्तियों का अच्छा संकलन है। रूटीन के कामों में कुछ अच्छे-कुछ बुरे, कुछ तेज, कुछ धीमें होते ही हैं। उन्हें ही उपलब्धियों के नाम पर परोस दिया गया है। जन धन योजना को बड़ी योजना दो साल से बताया जा रहा है पर उससे लाभ किसे मिला – ये नहीं बताया जा रहा है। इससे सरकार ने सिर्फ पैसे वसूले हैं किसे लाभ दिया वह नहीं बता रही है। रेलवे में बहुत काम हुआ है पर ट्रेन समय से चले इस बारे में कोई बात नहीं हो रही है। फिर भी, चलिए एक तो मिला।

दो साल पर तो नहीं लेकिन देश की सामान्य दशा का भगवंत मान का यह चित्रण लाजवाब है। कोई इसका कोई काट हो तो बताइए।

देश में नफरत की राजनीति का बोल-बाला है
आम लोगों का निकल चुका दीवाला है
सोने की दुकानों पर लोहे का ताला है
अल्पसंख्यक हर रोज डर के माहौल में रहते हैं
सरकार जी बता दीजिए
क्या इन्हीं को अच्छे दिन कहते हैं
छोटा व्यापारी और किसान हो चुका है दिवालिया
9000 करोड़ लेकर विदेश में विजय मना रहा है कोई माल्या
दुश्मन हर रोज बॉर्डर पार कर रहे हैं
हर रोज हमारे जांबाज जवान मर रहे हैं
10 सर काटकर लाएंगे अगर वो एक काटते हैं
लेकिन मोदी जी नवाजशरीफ का बर्थडे केक काट रहे हैं
एक तरफ हैप्पी टू यू है दूसरी तरफ खून के दरिया बहते हैं
सरकार जी बता दीजिए
क्या इन्हीं को अच्छे दिन कहते हैं
काले धन के बारे में कुछ लिखता हूं तो कलम रुक जाती है
15 लाख की रकम लिखने से पहले स्याही सूख जाती है
हर वादा जुमला निकला
अब तो शक है क्या चाय बनानी आती है
करोड़ों लोगों के पास नहीं है पानी पीने को
क्या रेडियो पर ही सुनते रहें 56 ईंच के सीने को
प्रधानमंत्री जी तो विदेश की सैर पर रहते हैं
चलो प्रधानमंत्री जी किसी विदेशी रैली के जरिए बता दो
क्या इन्हीं को अच्छे दिन कहते हैं
पंजाब में सरेआम नशा बिकता है
एक बाप अपने नौजवान बेटे के कफन पर
प्रधानमंत्री जी के लिए मेमोरेंडम लिखता है
क्या अभी भी, कुछ भी आपको गलत नहीं दिखता है
पंजाब के पानी के साथ इंसाफ कीजिए
पंजाब के किसानों का कर्जा माफ कीजिए
जो हर दिन गले में फंदा डालकर पेड़ पर लटकते हैं
मैं पूछना चाहता हूं, मोदी जी बता दीजिए
क्या इन्हीं को अच्छे दिन कहते हैं।
– भगवंत मान

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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लड़ाई ऐसे नहीं लड़ी जाती शशि शेखर जी

पटना में अपने संवाददाता की हत्या के बाद दैनिक हिन्दुस्तान अपने संवाददाता के साथ है, यह बड़ी बात है। मुझे नहीं पता पीड़ित संवादादाता हिन्दुस्तान के पेरॉल पर थे या स्ट्रिंगर। लेकिन इतिहास गवाह है, हिन्दी अखबार का संवाददाता मरता है तो वह स्ट्रिंगर ही होता है। मरने के बाद उसका संस्थान उससे पल्ला झाड़ लेता है। हिन्दुस्तान ने ऐसा नहीं किया बहुत बड़ी बात बात है। इसके लिए पूरे संस्थान की प्रशंसा की जानी चाहिए। पर संपादक जी एक दिन बाद जगे और लिख रहे हैं हम लड़ेंगे क्योंकि जरूरत है। बहुत ही लिजलिजा है।

इससे अच्छा संदेश तो पटना की टीम ने हत्या के बाद जो एडिशन निकाला उससे दे दिया था। कहने की जरूरत नहीं है, लाजवाब निकाला। लड़ने का तेवर वहां दिख रहा था। आपका लिखा तो औपचारिकता है। नौकरी बजाना है, शर्मनाक है। आपका लिखा पढ़कर मुझे याद आया जब इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल के दौरान जनसत्ता के तीन लोग घायल हुए थे तो इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन के साथ जनसत्ता ने क्या रुख अपनाया था और क्या तेवर था।

ठीक है, वह झगड़ा हड़ताल को लेकर था लेकिन एक्सप्रेस मैनेजमेंट उसे सरकार से लड़ाई के रूप में ले रहा था और वैसे ही तेवर थे। आप लड़ेंगे क्योंकि जरूरत है जमा नहीं। जरूरत तो बहुत पहले से है। आप अभी जगें हैं और नीन्द में ही लग रहे हैं। पाठकों के लिए मैं अपनी अप्रकाशित पुस्तक से एक्सप्रेस मैनेजमेंट की घोषणा और प्रभाष जी का लिखा पेश कर रहा हूं। यह बताने के लिए कि लड़ा कैसे जाता है। प्लेसमेंट के लिहाज से ही देखें तो पेज वन बॉटम हार्ड न्यूज नहीं होता है। प्लेसमेंट ही बहुत कुछ कह रहा है।

प्रबंधन की घोषणा 

दो दिसंबर 1987 को जारी कंपनी प्रबंधन की घोषणा के बारे में जनसत्ता ने लिखा था, “प्रबंधन ने जनसत्ता के बहादुर पत्रकारों पर कायराना हमले की निन्दा की है। प्रबंधन ने कहा है कि जनसत्ता के प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह और महादेव चौहान पर टीएम नागराजन के गुंडों ने हमला किया। नागराजन गुंडों और कुछ बाहरी राजनैतिक ताकतों की मदद से इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता के दिल्ली के संस्करणों को बंद कराने पर तुले थे। दिल्ली दफ्तर के बहादुर साथियों ने उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया। जनसत्ता के ये तीन साथी भी इन्हीं में से थे। जनसत्ता और एक्सप्रेस को निकालने के संकल्प के साथ जुटे इन युवकों की कोशिशों से दोनों अखबार निकले पर गुंडे नहीं चाहते थे कि अखबार हॉकरों तक पहुंच पाए। जब तक प्रदीप कुमार सिंह, संजय सिंह और महादेव चौहान जैसे लोग रहेंगे जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस को निकलने से कोई नहीं रोक सकता। 

प्रबंधन को इन बहादुर साथियों पर हुए हमले से गहरी ठेस पहुंची है। वह इन युवकों के साहस के सामने श्रद्धा से सिर झुकाता है क्योंकि वे खतरे से आमने सामने मुकाबला करते हुए घायल हुए हैं ना कि उससे कतराते हुए। हमले में पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल, मनोज चतुर्वेदी और अजय शर्मा भी घायल हुए हैं। ये युवक दिन भर की मेहनत को अखबार विक्रेताओं तक पहुंचाने की गारंटी करने का असाधारण काम कर रहे थे। वह अखबार पहुंचाने वाली गाड़ियों की पहरेदारी कर रहे थे। प्रबंधन की घोषणा में कहा गया है कि वह सच्चाई के हक में इन साथियों के समर्थन की कोई भरपाई नहीं कर सकता लेकिन कृतज्ञता के एक छोटे से प्रतीक के रूप में प्रबंधन ने प्रदीप कुमार सिंह, संजय सिंह और महादेव चौहान के लिए 10,001 रुपए प्रत्येक और मनोज चतुर्वेदी, शंभूनाथ शुक्ल और अजय शर्मा के लिए 2001 रुपए प्रत्येक की कृतज्ञता राशि की घोषणा की है। (इस घोषणा के साथ हमले की खबर जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंशियल एक्सप्रेस – तीनों में प्रमुखता से छपी थी।)

प्रभाष जोशी ने लिखा था 

3 दिसंबर 1987 के जनसत्ता में पहले पेज पर छपी खबर के साथ प्रभाष जोशी का विशेष आलेख भी था। “तेजाब से बची आंखें”, शीर्षक से उन्होंने लिखा था, “एक्सप्रेस बिल्डिंग के कोने में लगे तंबू से कुछ थके लोग नारे लगा रहे हैं – मजदूर, मजदूर भाई-भाई और मजदूर एकता जिन्दाबाद। इन्हीं में से तीन-चार लोगों ने परसों रात जनसत्ता के उन आठ साथियों पर गुंडों से तेजाब, पत्थरों, लाठियों और सरियों से हमला करवाया जो प्रसार विभाग के मजदूरों की रक्षा में अपने दफ्तर से प्रताप भवन जाकर लौट रहे थे। इन उप संपादकों और संवाददाताओं से प्रसार विभाग के साथियों ने संरक्षण मांगा था क्योंकि हिंसा आतंक और सरकारी मदद से “हड़ताल” करने वाले मजदूर नेताओं ने अखबार न बंटने देने की धमकी दे रखी थी। लेकिन जनसत्ता के ये साथी अड़तालीस दिन बाद निकले अपने अखबार को पाठकों तक पहुंचाना चाहते थे। टाइम्स बिल्डिंग के सामने कोई पंद्रह-बीस लोगों ने उनपर घात लगाकर हमला किया। तेजाब से अपनी आंखें बचाकर भागते साथियों में से ट्रेनी उपसंपादक संजय सिंह गिर गया। उस लड़के को इन “हड़ताल बहादुरों” ने इतना पीटा कि सिर पर दर्जन भर टांके आए। 

इस हमले के डेढ़ घंटे बाद आए एसीपी वीरेन्द्र सिंह ने वहां तैनात बीसियों पुलिस वालों से यह नहीं पूछा कि उनके होते हुए हमला कैसे हुआ और हमलावर क्यों नहीं पकड़े गए। उन्होंने कहा कि इन जर्नलिस्टों को रात में वहां जाने की क्या जरूरत थी? दरियागंज पुलिस ने कहा कि ये पत्रकार चाय पीने निकले थे और हड़तालियों के तंबू के सामने से गुजरे इसलिए झगड़ा हो गया। लेकिन एसीपी वीरेन्द्र सिंह की सीख और पुलिस की गलतबयानी का क्या गिला? जिस बिल्डिंग के सामने इन पत्रकारों पर हमला हुआ वहां से निकलने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वनामधन्य संपादक गिरिलाल जैन से कोई पूछे तो वे भी कहेंगे कि पत्रकारों को अखबार निकालने की जरूरत क्या थी? हड़ताल है अपने घर में बैठो। पत्रकार का आखिर क्या रोल है? क्या वह अंगरक्षक है जो अखबार लादने वालों के साथ जाए? उसका काम गुंडों से मजदूरों को पिटते देखना है और जब उसके खुद के साथ ही कोई बदसलूकी हो तो अपने अखबार में हड़ताल करवा के दूसरे दिन संपादकीय लिखना है। पत्रकार पर्यवेक्षक है जबतक उसकी कार रोककर पुलिस आईडेंटिटी कार्ड न मांगे। अगर पुलिस ऐसा कर दे तो पत्रकार को तथ्यों से आंख मूंदकर लिखने की आजादी है लेकिन यह भी तभी तक जब तक सरकार न रोके। 

ऐसे गिरिलाल जैन सब तरफ हैं इसलिए 28 अक्तबूर को अपना अखबार निकालने की एक्सप्रेस के लोगों की कोशिश पर जमीन आसमान एक कर देने वाले वाले आज चुप हैं। वे दबी जुबान से इसकी निन्दा भी नहीं करते हैं क्योंकि जैसा कि दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट की एक बैठक में कोई महासंघ के किसी अध्यक्ष संतोष कुमार ने कहा था, ‘हड़तालों में तो ऐसी हिंसा होती ही है।’ यूनियन हिंसा हिंसा न भवति! जनसत्ता के सोलह पत्रकार साथी यूनियन नेताओं के बताने पर गुंडों से पिट चुके हैं। न पुलिस ने कुछ किया है न पत्रकारों के वाचाल संघों ने। भले ही लोकतंत्र हो, सरकार की थोपी गई हड़ताल को तोड़ने और अखबार निकालने की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। संजय सिंह, प्रदीप सिंह, महादेव चौहान और मंगलेश डबराल ने अपने खून से यह कीमत चुका दी है और अभी किसी का भी उत्साह चुका नहीं हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया था कि एक्सप्रेस बिल्डिंग से 50 मीटर दूर तक धरना देना वालों को पहुंचाया जाए। उन्हें नहीं हटाया गया। पुलिस को एक्सप्रेस के लोगों के आने-जाने की सुरक्षा करने को कोर्ट ने कहा था। और बिल्डिंग के बाहर बीसियों पुलिस वालों के बावजूद तंबू से निकले लोगों ने हमला करवा दिया और वापस आकर सो गए लेकिन पुलिस ने नहीं देखा। जब घायल पत्रकार पानी के लिए चिल्लाते एक्सप्रेस भवन में भागे आए और उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया गया तब भी पुलिस को कुछ मालूम नहीं हुआ। जब एक्सप्रेस के लोग हल्ला करते हुए पुलिस के पीछे पड़े तो किसी अफसर ने पूछा – कहां हुआ हमला, क्यों हल्ला मचा रहे हो ! मौके पर तैनात दरियागंज के थानेदार कालिया को जीप में सोते हुए से मैंने जब जगाया तो हमला हुए को आधा घंटा हो गया था। इसके बाद से रक्षा में तैनात पुलिस लगातार शिकायत करती रही कि पत्रकारों को बाहर जाने की क्या जरूरत थी और जाना ही था तो बता कर क्यों नहीं गए? सोने वालों और हमला होते हुए न देखने वालों को बताने से फायदा? पुलिस की पहरेदारी और वफादार प्रेस की पहरेदारी में कोई फर्क नहीं है। संजय सिंह, प्रदीप सिंह और महादेव चौहान भगवान की कृपा मानो कि मुंह पर फेंके गए तेजाब से तुम्हारी आंखें बच गईं। यही आंखें तुम्हे अपनी पत्रकारिता की सच्चाई दिखाएंगी।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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बिहार में एक पत्रकार मारा गया तो जंगलराज, यूपी में चार महीने में तीन पत्रकार मारे गए तो कोई खास बात नहीं!

Sanjaya Kumar Singh : मैं पहले ही लिख चुका हूं कि झारखंड के चतरा में पत्रकार की हत्या हुई तो बात आई-गई हो गई। पर बिहार में हुई तो जंगलराज हो गया। उत्तर प्रदेश में चार महीने में तीन पत्रकारों की हत्या हुई। कोई खास बात नहीं। मध्य प्रदेश में पत्रकार संदीप कोठारी को जिन्दा जलाकर दफना दिया गया, छत्तीसगढ़ में भी पत्रकार की हत्या हुई और दिल्ली में भी हुई। फरीदाबाद में एक पत्रकार ने खुदकुशी की पर उसकी हत्या में एक पुलिस वाले को गिरफ्तार किया गया है।

इन सब घटनाओं के बावजूद बिहार में पत्रकार की हत्या हुई तो जंगलराज है। हो सकता है झारखंड में रामराज हो। लेकिन मरने वाले पत्रकारों और उनके परिवार के लिए इनमें क्या अंतर? हत्याएं और भी हुई होंगी। पत्रकार की हत्या अगर पेशेगत कारणों से होती है तो निश्चित रूप से बुरी है और चिन्ता का कारण भी। पर हत्या को राजनीतिक रंग देना किस पार्टी की सरकार है उसके आधार पर महत्त्व देना और उस आधार पर खबर को प्रमुखता देना कैसे उचित हो सकता है। ठीक है, कोई पत्रकार बड़ा और कोई छोटा होता है। पर यह उसके काम से तय होना चाहिए। इस बात से नहीं कि उसकी हत्या जहां हुई वहां किस पार्टी की सरकार थी।

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पहले पुलिस कहती थी कि अपराध हमारे क्षेत्र में नहीं हुआ है। अब सोशल मीडिया में भी अपराध कहां हुआ – उससे तय होता है कि चर्चा होनी है कि नहीं। अपराध सामान्य है या सरकार की लापरवाही, नाकामी। अविभाजित बिहार के चतरा में पत्रकार की हत्या होती है, उसकी खबर आती है पर सामान्य अपराध की घटना के रूप में देखी और समझ कर छोड़ दी जाती है। उसके चौबीस घंटे के अंदर कोई साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर सीवान में एक और पत्रकार की हत्या होती है। यह हत्या बिहार सरकार की नाकामी हो जाती है। चतरा में पत्रकार की हत्या सरकार की नाकामी नहीं है क्योंकि चतरा तकनीकी तौर पर झारखंड में है। (सीमा क्षेत्र का मामला है मैं यकीनी तौर पर नहीं कह सकता है कि चतरा में हत्यास्थल झारखंड में ही है, हो सकता है बिहार में ही हो पर चूंकि बिहार और झारखंड पक्का नहीं है इसलिए चतरा की हत्या पर नहीं बोलेंगे) क्योंकि झारखंड में भाजपा की सरकार है। इसलिए झारखंड की हत्या पर सोशल मीडिया में पोस्ट नहीं हैं। ना के बराबर हैं। झारंखंड की हत्या की सूचना भी नहीं है लोगों के पास। सीवान की हत्या पर सब को कुछ ना कुछ कहना है। हर किसी की राय है। जब झारखंड की हत्या पर नहीं है और बिहार की हत्या पर राय दी जा रही है तो समझ सकते हैं कि राय क्या होगी। बिना संपादक की रिपोर्टिंग ऐसे ही होती है। यह है भविष्य की पत्रकारिता, भविष्य की राजनीति और पत्रकारों का भविष्य। लगे रहो भक्तों। मीडिया को गाली देना आसान है।

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बिहार में जंगलराज का प्रचार करने वालों कों बहुत तकलीफ है कि हत्यारों ने एक दिन पहले एक और पत्रकार को जहां मारा वह जगह झारखंड में है और संयोग से वहां भाजपा का राज है। हत्या और पत्रकारों की हत्या में भी राजनीति, खेमेबाजी। वैसे, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से दिल्ली सबसे ऊपर है। बिहार का स्थान 23 वां और उत्तर प्रदेश उससे भी नीचे है। आंकड़े तो आंकड़े हैं, आंकड़ों का क्या? सच यही है कि एक पत्रकार की हत्या जंगलराज में हुई तो एक की राम राज्य में भी!

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे?

Sanjaya Kumar Singh : मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे हैं। और नहीं कर रहे हैं तो भक्तों ने जैसे कन्हैया को नेता बनाया वैसे ही अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को पंजाब चुनाव जीतने का मौका क्यों दे रहे हैं। भक्तों के उछलकूद का लाभ अरविन्द केजरीवाल को मिल रहा है। अलमारी में रखी डिग्री अंडा-बच्चा तो देती नहीं। ना बीमार होकर अस्पताल जाती है। आमलोगों की डिग्री तो पत्नी कहीं रख देगी, चूल्हा जला चुकी होगी या बच्चों के टिफिन पैक करके दे देगी। मोदी जी के साथ तो ये सब लफड़ा भी नहीं है। फिर इतनी देर?

डिग्री के मामले में अरविन्द केजरीवाल के दावे में दम लगता है। रही सही कसर चुप्पी से पूरी हो जा रही है। रेत में सिर छुपाने से काम नहीं चलता है। जितनी देर करेंगे उतने फंसेंगे। फिर इस्तीफा देने से कम में बात नहीं बनेगी। केजरीवाल को एक और श्रेय मिल जाएगा।

नरेन्द्र मोदी की डिग्री पर उठ रहे सवाल भाजपा के लिए बहुत मामूली हैं और सोनिया गांधी के रिश्वत लेने का मामला बहुत बड़ा। छप्पन ईंची सरकार की सीमा खुद तय हो रही है। ना सोनिया के खिलाफ कार्रवाई करेंगे ना मोदी पर आरोप का जवाब देंगे। आम आदमी पार्टी को तो अपना ही स्तर नहीं पता है। जय हो। यही हाल रहा तो देश की राजनीति में मजा ही नहीं रहेगा। एकदम गोबर हो जाएगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : इधर केजरीवाल बढ़-चढ़कर, ऐलानिया, खुल्लमखुल्ला, ताल ठोंकते हुए, डंके की चोट पर मोदी जी की डिग्रियों को फर्जी बता रहे हैंऔर उधर सरकार तथा बीजेपी दुबकी हुए है। वह चुप्पी धारण किए हुए है और इस कोशिश में है कि अगस्ता वेस्टलैंड के शोर-शराबे में केजरीवाल की आवाज़ दब जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। दूसरे इससे संदेह और भी पक्के होते जा रहे हैं कि मोदी ने फर्ज़ी डिग्रियाँ हासिल कीं और देश को उल्लू बनाया। प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में ऐसी राय बने ये न लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। ये उस हिंदुत्ववादी राजनीति पर भी कलंक होगा जो सदाचार को खुद की बपौती मानकर सबको दुषचरित्र साबित करने पर आमादा रहती है। इसलिए पार्टी और सरकार को सबूतों के साथ केजरीवाल के आरोपों का जवाब देना चाहिए, बल्कि उन पर क्रिमिनल डेफेमेशन का केस भी दायर कर देना चाहिए।

मोदीजी को दिल्ली सरकार और केजरीवाल टीम से निपटने की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने उनको काम न करने देने की चालें चलकर फुरसतिया बना दिया। अब ये तो सबको पता ही है कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। यही वजह है कि वे अपना वक़्त उनको परेशान करने के नए नए तरीके खोजने में लगा रहे हैं। अब अगर मोदीजी और उपराज्यापाल साहब इस रणनीति को उलट दें तो केजरीवाल सरकार काम में उलझकर रह जाएगी और उसके पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि आपके खिलाफ़ खुराफ़ात में ही लगे रहें।

ये दिल्ली यूनिवर्सिटी भी केजरीवाल एंड कंपनी के साथ साज़िश में शामिल है। ये जान-बूझकर पीएम और आपकी डिग्रियों के बारे में भ्रम की स्थिति बनाकर अफवाहों और दुष्प्रचार को हवा दे रही है। स्मृति जी वीसी को तुरंत बर्खास्त करिए और न माने तो विवि ही बंद कर दीजिए। और अभी तक आपने सूचना आयुक्त को क्यों छोड़ रखा है? उसे भी उसके किए की सज़ा दीजिए। आरटीआई क्या इसी के लिए बनाई गई है कि आप हर कोई पीएम को बदनाम करने के लिए उसका इस्तेमाल करता फिरे। कड़ा सबक सिखाइए सबको।

अब तो प्रधानमंत्री को अपनी डिग्रियां निकालकर इन स्यूडो सेकुलरिस्टों और आपवालों के मुँह पर मारकर दिखा देना चाहिए कि ये लोग उनके बारे में जो अनर्गल प्रचार करते रहते हैं वह कितना झूठा है, कितना दुराग्रहों से प्रेरित है। स्मृति ईरानी आप भी मत छोड़िए इन नामुरादों को। वैसे तो ये नरक में जाएंगे ही और इनको कीड़े भी पड़ेंगे मगर ज़रूरी है कि आप लोगों की उज्ज्वल छवि देशवासियों और दुनिया के सामने और भी निखर करआए। आखिर आप देश के दो महत्वपूर्ण पदों पर बैठी महान विभूतियाँ हैं और आप लोग देश का नया इतिहास लिख रहे हैं। आपसे देशभक्तों को कितनी आशाएं हैं। उन्हें आप पर कितना विश्वास है ये आपसे बेहतर भला कौन जानता है। वे आप पर उछाले जा रहे कीचड़ से बहुत आहत हैं और उद्वेलित भी हैं। अगर संविधान और कानून न होता इस देश में तो वे एक को भी न छोड़ते। उम्मीद है आप लोग उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और विरोधियों को धूल चला देंगे। उन सबकी और मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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करण थापर ने अरुण शौरी से पूछा- आप मोदी के प्रति इतने कटु इसलिए हैं कि आपको मंत्री नहीं बनाया?

Sanjaya Kumar Singh : अरुण शौरी और करण थापर की शानदार और दिलचस्प बातचीत। अंत में करण थापर ने पूछा है, क्या आप नरेन्द्र मोदी के प्रति इतने कटु इसलिए हैं कि आप मंत्री बनना चाहते थे और आपको मंत्री नहीं बनाया गया। इसका दिलचस्प जवाब देते हुए अरुण शौरी ने पूछा, हम लोग एक दूसरे को कितने साल से जानते हैं? यही कोई 20-30 साल। चलिए 20 साल। मैं आपसे पूछता हूं, क्या आपको लगता है कि मैं इन लोगों के साथ रह पाता। और फिर हंसते हुए कहते हैं, इस लिहाज से मैं उन्हें दूरदर्शी कहूंगा कि उन्हें पहले से अंदाजा था।

अरुण शौरी नरेन्द्र मोदी के अच्छे आलोचकों में हैं। दूसरी ओर, करण थापर उन पत्रकारों में हैं जिसे नरेन्द्र मोदी ने 2014 चुनाव के पहले इंटरव्यू देने से मना कर दिया था। या कहिए कि पहले ही सवाल पर उठ गए थे। शायद यह कहते हुए कि मित्रता बनी रहे। इस इंटरव्यू में देखिए कि करण कैसे पूछते हैं, आप कह रहे हैं कि? आपके कहने का मतलब यह हुआ? यानी कई बार सिर्फ हां या ना में जवाब देना होता है। इस इंटरव्यू में भी करण थापर ने यही किया है और अरुण शौरी ने बगैर लाग-लपेट के सीधा जवाब दिया है। जो मतलब लगाया गया, उसे स्वीकार किया या और स्पष्ट कर दिया। नरेन्द्र मोदी के बारे में उन्होंने नीरज के शेर का हवाला दिया जो इस प्रकार है, “उसे तो पने गुलदस्ते की रौनक ही से मतलब है, कहाँ गुलचीं के फुरसत है कि दर्दे-गुलसिताँ समझे।” काश, यह बातचीत हिन्दी में होती पर तब शायद इतनी धारदार नहीं होती।

Arun Shourie says ‘President’ Modi is running a one-man show. 10 brutal things he said

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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