‘जनसत्ता’ जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है!

Sanjaya Kumar Singh : जनसत्ता एक अच्छा अखबार था और जब खराब होना शुरू हुआ तो लगातार खराब होता गया। उसका कोई ग्राफ नहीं बना। कुंए में (गड्ढे) में जाती बाल्टी की तरह सीधी रेखा बनती जा रही है। मैं समझ रहा था कि बाल्टी मराठवाड़ा के किसी कुंए में छोड़ दी गई है पड़ी हुई है। लेकिन अच्छे अखबार के पाठक भी अच्छे होते हैं और बता देते हैं कि जनसत्ता आज कैसे और नीचे गया। एक दिन मैं भी लिखने बैठा था तो लगा कहां दीवार पर सिर मारूं।

पर आज ‘अलविदा जनसत्ता’ पढ़कर लगा कि संस्थान इससे खुश होगा या दुखी। जनसत्ता जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है। एक समय था कि एक पाठक की प्रतिक्रिया को जनसत्ता में प्रमुखता से छापा गया था उसके उसे साथ नोट लगा था कि यह सिर्फ कड़वा-कड़वा है। मीठा-मीठा निकाल लिया गया है। बाद में लिखने वाले जनसत्ता में सहायक संपादक बने। अब इस पाठक की सार्वजनिक चिट्ठी जनसत्ता के बारे में फिर कड़वा-कड़वा बयां कर रही है।

पढ़ें मूल पोस्ट :

जनसत्ता में कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vinod K. Chandola फटफटिया लेखक/ सम्पादक महज़ उनके आदर्श जिन्हें गहरी छपास होती है!

Hemraj Chauhan सही बात है एक महीने पहले मैं भी अलविदा कहा चुका हूं, प्रभाष जोशी जी के बारे आप लोगों से इतना सुना है कि जनसत्ता से बहुत उम्मीद बढ जाती है. ओम थानवी सर ने इसे अलग बनाए रखा और हिंदी अखबारों से पर अब ये वो भी नहीं रहा था. बस लंबी लंबी खबरें, ना कोई विचार सिर्फ खानापूर्ति..

Radhakishan Meghwanshi संजय कुमार सिंह जी किसी के अलविदा कह देने मात्र से जनसत्ता का अंत नहीं हो जाएगा , कहानिया लिखी जाती रही है , किसी को कम और किसी को ज्यादा महत्त्व दिया जाता रहा है , यहाँ सनी लीओन को ज्यादा महत्त्व देने से भारतीय संस्कारी पुरुषों को या किसी व्यक्ति विशेष को परेशानी हो सकती है पर मुझे जनसत्ता जैसे संसथान और उनके पत्रकारों पर ही ज्यादा भरोषा है !

Alok Sinha लेकिन दैनिक भास्कर जैसे शासन समर्थक ( चाहे किसी का भी शासन हो ) से हारना अच्छा नहीं लगता और आज इंडियन एक्सप्रेस भी कौन सा तीर मार रहा हे इसे TV . मीडिया का असर ना कहे | नवभारत टाइम्स , हिन्दुस्तान , अदि की क्या हालत हे , ये तो मानना ही पडेगा की पत्रकारों की पौध सूख रही हे | नई पीढ़ी में कोई अखबारी पत्रकार बनना ही नहीं चाहता ,मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ,खुले मैदान में कोई दौड़ना नहीं चाहता रही बात भास्कर की वहीं बात कांग्रेस और बीजेपी का अंतर की सही मार्केटिंग और साजसज्जा के साथ परोसना जिसे आता हे उसका वास्तविक प्रचार प्रसार कितना हे पर निर्भर हे, भास्कर का देश का सर्वाधिक बिकने वाला हिंदी पेपर बना ,क्या वास्तविक रिपोर्ट हे ? रमेश अगरवाल जी के बाद उनका पब्लिक रिलेशन कौन करेगा ( यंहा नाम पब्लिक रिलेशन जरूर हे लेकिन वो पब्लिक रिलेशन ना हो कर कुछ और हे ) कभी भासकर मध्यप्रदेश में स्वदेश और नई दुनिया से टक्क्र लेता था कभी आगे कभी पीची लेकिन जब ,नव भारत टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स ने हिंदी के क्षेत्र में हथियार फेक दिए तो उसका फायदा जनसत्ता ने ना उठाकर भास्कर ने उठाया |बिना कोई नामचीन पत्रकार होते हुए और संपादक होते हुए |और आज राजिस्थान में पत्रिका ,यूपी में अमर उजाला ,जागरण, पंजाब में पंजाब केसरी ,गुजरात में पत्रिका , महाराष्ट्र में जनसत्ता, पत्रिका ,हरियाणा में जनसत्ता और पंजाब केसरी ,और तो और दिल्ली में जनसत्ता , पंजाब केसरी, आदि को तकर देने लगा , कैसे बिना नामचीन पत्रकार और संपादक मंडल के |

Sanjaya Kumar Singh जब तक सनी लियोन के बारे में पढ़ने वाले रहेंगे उसके बारे में लिखा भी जाएगा। पढ़ने वाले को शर्म नहीं तो लिखने वाले को क्यों हो। आप बिल्कुल ठीक हैं Meghwanshi जी। और जनसत्ता में अभी क्या बुराई उससे पीछे बहुत सारे अखबार हैं।

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बड़े-बड़े अखबारों के प्रतिनिधि असल में पैसे कमाने के लिए ठेकेदारी से लेकर ब्लैकमेल तक के धंधे करते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : बदल रहा है पत्रकारों का धंधा… हिन्दी पत्रकारों के बारे में अक्सर यह कहा सुना जाता है कि पत्रकार हैं ये तो ठीक है, गर चलाने के लिए क्या करते हैं? शुरू में यह मजाक लगता था बाद में पता चला कि देश के ज्यादातार हिस्से में बड़े-बड़े अखबारों के प्रतिनिधि असल में पैसे कमाने के लिए ठेकेदारी से लेकर ब्लैकमेल तक के धंधे करते हैं। कहने वाले कह देते हैं कि अंशकालिक संवाददाताओं के धंधे बुलंद होते हैं पर कुछेक अपवाद को नियम नहीं माना जा सकता।

सच ये है कि वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन देने से बचने के लिए इनसे बाकायदा लिखवाकर ले लिया जाता है कि पत्रकारिता उनका शौक है, पेशा नहीं और वे शौकिया खबरें लिखते हैं। लिहाजा जो मिल जाए वही पर्याप्त है और घर चलाने के लिए वे कुछ और धंधा करते हैं। यह सब पुरानी घिसी-पिटी कहानियां हैं। और ऐसे में यह जानना सुखद आश्चर्य है कि अगस्ता मामले में खुलासे न करने के लिए पत्रकारों को पैसे दिए गए थे। पत्रकारिता का जो हाल हैं उनमें इतने पैसे पा लेना वाकई गौरव की बात है। और यह जानने के लिए हर कोई उतावला है कि वो खुशकिस्मत पत्रकार कौन हैं और दरअसल क्या करते हैं। विवेक सक्सेना ने “मन की बात” लिख दी है, जो नीचे है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

पत्रकारः धंधों ‘के’ नहीं, ‘ये’ है!

विवेक सक्सेना

मैंने पहले एक कालम में इस घटना का जिक्र किया था वह फिर अगस्ता कांड के कारण याद हो आई। घटना कुछ इस प्रकार थी कि हम लोग 1982 में असम विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करने गए थे। राज्य में करीब 8-10 दिन रहे। वहां के एक व्यवसायी गोयनका परिवार ने हमारी काफी मदद की और उनसे हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। जिस दिन हम लोग वापस लौटने वाले थे उसकी पूर्व संध्या पर उन्होंने हमारे सम्मान में रात्रि भोज का आयोजन किया जिसमें शहर की तमाम हस्तियां आयीं। बड़े गर्व से वे लोगों को हमसे मिलवाते हुए बता रहे थे कि देखों दिल्ली के पत्रकार मेरे दोस्त हैं।

खाना खत्म होने पर उन्होंने अपने दादा से हमें मिलवाने की इच्छा जताई। वे हमें लेकर एक कोठरी में गए। जहां उनके बुजुर्ग दादा लेटे हुए थे। उन्होंने कहा, ‘लाला इनसे मिलो ये दिल्ली से आए हुए पत्रकार हैं। बुजुर्ग लालाजी ने हमें ऊपर तक देखा और फिर पूछा पत्रकार है वो तो ठीक है। पर धंधों के है? रोटी पानी कैसे चले हैं?

तब हमें लगा कि जैसे किसी ने हम पर घड़ों पानी डाल दिया हो। उस समय एक आम आदमी के मन में पत्रकारों को लेकर कुछ इस तरह की धारणा रहती थी। पत्रकार का मतलब एक फक्कड़, तंगहाली से गुजरता हुआ इंसान माना जाता था। पर अब जब अगस्ता डील में पत्रकारों को करोड़ों रुपए बांटने की खबर पढ़ी तो मन गर्व से भर गया। सच कहूं तो इस पूरे विवाद में यह खुलासा होने के बाद मेरा और कुछ पढ़ने जानने का मन ही नहीं कर रहा है। मैं उन पत्रकारों के नाम जानने के लिए बेहद उत्सुक हूं। मेरा बस चले तो पत्रकारों को सम्मानित करने वाली किसी दुकान से अनुरोध कर इन सभी को पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके इस उत्कर्ष कार्य के लिए सम्मानित किए जाने का आग्रह करुंगा।

हां, मैं इसके लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी चलाने को तैयार हूं। वजह यह है कि इस खबर ने पत्रकारों की जो हैसियत बढ़ाई हैं उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। आम धारणा यही रहती आयी थी कि पत्रकारों को महज मुरगा खिलाकर, शराब पिलाकर कुछ भी लिखवाया जा सकता है। इसी कालम में मैंने यह भी लिखा था कि जब पत्रकारश्रेष्ठ खुरानाजी को पहली बार ज्ञानी जैल सिंह से किसी बंदूक का लाइसेंस दिलवाने की एवज में डेढ़ लाख रुपए मिले थे तो वे बौखला गए थे। पूरी रात सो नहीं सके थे। यह किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि यार हम तो खा पीकर ही काम करवा देते थे। कोई बहुत खुश हुआ तो छोटी मोटी गिफ्ट थमा दिया करता था। जब एक बेहद उद्यमी भाजपा के अध्यक्ष बने जो कि केंद्रीय मंत्री भी हैं तो उनसे किसी ने कहा कि आप दिल्ली जा रहे हैं। वहां के पत्रकारों से जरा बचकर रहिएगा। बहुत तेज होते हैं तो उन्होंने छूटते ही कहा था कि तुम उनकी चिंता मत करो। पांच-पांच हजार के कुछ और पैकेट तैयार करवा लूंगा। हालांकि बाद में वे पत्रकारिता का ही शिकार हुए। उन्होंने पैकेट दिए नहीं या इतनी रकम से पत्रकारों को मोह पाने में नाकाम रहे, कह नहीं सकता।

आमतौर पर पत्रकारों को प्रेस कान्फ्रेस में छोटे-मोटे उपहार मिला करते हैं। पहले घड़ी का चलन शुरु हुआ फिर केलकुलेटर मिलने लगे। जब इलेक्ट्रानिक सामान की भरमार हुई तो सैलफोन, पैन ड्राइव, टेबलेट आदि दिए जाने लगे। मेरा मानना है कि उन्हें 50 रुपए के टंबलर से लेकर 10-15 हजार रुपए तक के गिफ्ट दिए जाते हैं। यह देने वाले की हैसियत और उसके उत्पाद पर निर्भर करता है। जैसे कि हाल में जिंगल बैल नामक सैल फोन कंपनी ने पत्रकारों को सेल फोन बांटे। बाबा रामदेव रिपोर्टरों को अपने उत्पाद का हैंपर और चैनल मालिक को विज्ञापन बांटते हैं। पत्रकारों की कितनी कम कीमत लगाई जाती रही इसका भी जिक्र पुनः करना जरुरी हो जाता है। दिल्ली के एक बहुत बड़ी हलवाई श्रृंखला के मालिक की बेटी ने पानी में नृत्य प्रस्तुत किया। इसका आयोजन तालकटोरा स्थित स्विमिंग पुल में किया गया था। जब पत्रकार प्रदर्शन देख रहे थे तभी वहां लालाजी आ गए। उन्होंने जोर से कहा, ‘अबे पम्मों, समय क्यों बरबाद कर रहा है, नाचवाच दिखवाना बंद कर इन्हें अंदर ले जा। दारु पिला। मुरगे खिला वरना खबर कैसे छपेगी।’

तब भी पत्रकारों की बहुत कम कीमत आंकी जाती थी। वैसे मैं पत्रकारों की इज्जत व हैसियत बढ़ाने का पहला श्रेय ‘नीरा राडिया’ टेप्स को देना चाहता हूं। जिनके प्रकाशन से यह खुलासा हुआ कि किस तरह से कुछ पत्रकार इस सरकार की नीतियां तक बदल देने की हैसियत रखते थे। महिला पत्रकारों की तो पहुंच प्रधानमंत्री के किचन कैबिनेट तक थी जहां वे कुछ भी पकवा सकने की ताकत रखती थीं। उनके तार इतने गहरे जुड़े थे कि यह सुनिश्चित करने लगी कि संचार मंत्रालय किसे सौंपा जाए। हालांकि किवदंती तो यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कुछ पत्रकारों ने उत्तरप्रदेश सरीखे अहम राज्य में भाजपा के टिकट वितरण में बहुत अहम भूमिका अदा की थी। मुझे इस बात पर गर्व है कि कम से कम हिंदी के किसी पत्रकार को यह गौरव हासिल हुआ।

अभी तक अपना अनुभव यही रहा है कि हिंदी व भाषायी पत्रकारों की माल बांटते समय भी अनदेखी की जाती रही है। करीब डेढ़ दशक पहले हिंदी के तीन पत्रकारों द्वारा किसी इनकम टैक्स कमिश्नर का मनचाही जगह तबादला करवा देने के बदले में डेढ़ करोड़ रुपए लेने की खबर आयी थी। तब अनिल बंसल ने कहा था कि हिंदी पत्रकारिता के लिए यह बहुत गर्व की बात है क्योंकि उन पर तो बेल का शरबत या मिठाई, मुरगा, दारु लेकर ही काम करवाने की खबरें सुनने को मिलती रही है। वैसे अगस्ता कांड के खुलासे के मुताबिक हर पत्रकार को 10 लाख रुपए प्रतिमाह दिए जा रहे थे। पत्रकार तो क्या जब हिंदी के संपादक तक महज डेढ़ दो हजार रू के लिए अपना अखबार छोड़कर चैनल पर बहस करने पहुंच जाते हो, उनका इस सूची में नाम आना सचमुच गर्व की बात है। लगता है अगस्ता की सूची में अंग्रेजी के ही पत्रकार है। अगर किसी हिंदी के पत्रकार का नाम आया तो मैं तुरंत गुवाहाटी फोन मिलाकर लाला से जरूर कहूंगा, ‘असली धंधो तो ये हैं।’

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मीडिया में आए नए लोगों के लिए स्टिंग और ब्लैकमेलिंग वाली पत्रकारिता बन गई है मजबूरी!

Sanjaya Kumar Singh : नए पत्रकारों के लिए क्या करें, क्या नहीं… जानना जरूरी… फरीदाबाद में पत्रकार पूजा तिवारी की मौत के मामले में कहा जा रहा है कि ब्लैकमेलिंग का आरोप लगने के बाद वह अवसाद में थी और इसीलिए उसने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या कर लेने से ब्लैकमेलिंग का मामला कम नहीं होता पर जिस ढंग से उसके अलग-थलग पड़ जाने के मामले सामने आ रहे हैं उसमें क्या यह जरूरी नहीं है कि मीडिया संस्थान स्टिंग (जोखिम वाली रिपोर्टिंग) करने करवाने के बारे में अपने नियम बनाए और घोषित करे। क्या इसमें सरकार और समाज की कोई भूमिका नहीं है। अव्वल तो मेरा मानना है कि गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 ही बेजरूरत है और एक तरफ इसका अपेक्षित लाभ नजर नहीं आ रहा है तो दूसरी तरफ इसके दुरुपयोग के कई मामले हैं।

ऐसे कुछ और कानून हैं जिनका उपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा होता है। इसलिए नए पत्रकारों को ऐसे मामलों में काम करने से पूर्व सतर्क रहना चाहिए और पढ़ाई के दौरान उन्हें इन बातों की भी जानकारी दी जानी चाहिए। पर पत्रकारिता के धंधे में पैसे नहीं होने के कारण जो लोग पत्रकारिता पढ़ाकर अपना परिवार चला रहे हैं, वे इन बुराइयों को क्योंकर बताने लगे। इसका नतीजा यह है कि पत्रकारिता ‘पढ़’ कर इस पेशे में आने वालों को भी इस पेशे की बुराइयों, खतरों और जोखिमों की जानकारी लगभग नहीं होती है। निश्चित रूप से इसका कारण यह है कि पत्रकारिता का कोई निश्चित पाठ्यक्रम ही निर्धारित नहीं है। इसके नुकसान ही हैं। पर नुकसान झेलने वाला इस धंधे में फंसने के बाद पुराने लोगों की नाराजगी नहीं लेना चाहेगा और पुराने लोग अपने धंधे का नुकसान क्यों करें। वह भी तब जब कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में नए आने वाले पत्रकार दिशाहीन और लक्ष्य हीन हैं। पत्रकारिता से समाज सुधारने के सपने लेकर इस पेशे में आया युवा समाज की बुराइयों का शिकार हो जाए यह कम अफसोसनाक नहीं है।

मेरा मानना है कि मीडिया को जानने वाले पुराने लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे नए पत्रकारों के लिए – क्या करें और क्या नहीं तैयार करें जिसमें उन्हें ऐसी स्टोरी करने से बचने की सलाह दी जानी चाहिए। हो सकता है पूजा से यह स्टोरी वसूली के लिए ही कराई गई हो और उसका उपयोग किया गया हो। यह अलग बात है कि कामयाबी नहीं मिली और उसे आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा या उसकी हत्या कर दी गई। भविष्य में पूजा जैसों को इससे बचाने के लिए यह काम कैसे किया जा सकता है, इस पर विचार होना चाहिए। पत्रकारिता की पढ़ाई कराने वाले कुकरमुत्ते की तरह उग आए मीडिया शिक्षण संस्थान लाखों रुपए की फीस लेते हैं जबकि शुरुआती नौकरी 10 हजार रुपए महीने की भी मुश्किल से मिलती है। ऐसे में नए लोगों के लिए स्टिंग और ब्लैकमेलिंग वाली पत्रकारिता बहुत आसान और मजबूरी भी है। खासकर तब जब मीडिया संस्थानों पर भी ऐसा करने का आरोप हो। इसमें कौन किसका उपयोग करेगा और कौन फंस जाएगा यह सुनिश्चित करना वैसे भी मुश्किल है।

अंशकालिक संवाददाता से स्टिंग कराने में मीडिया संस्थान को लाभ ही लाभ है जबकि संवाददाता को अक्सर नाम या श्रेय भी नहीं मिलता है। स्टोरी हिट होती है तो चैनल का नाम होता है। नहीं चली या उसमें खामियां हों तो संवाददाता बदनाम होता है। कोई एफआईआर हो जाए, जिसके खिलाफ स्टोरी की जाए, वह मोर्चा खोल ले तो मीडिया संस्थान हाथ झाड़ ले और सीधे कह दे कि संबंधित व्यक्ति हमारा संवाददाता ही नहीं है। कोई खतरा जोखिम हो तो उसकी भरपाई नहीं ही होनी है। दूसरी ओर, मीडिया में स्टिंग का उपयोग खूब हो रहा है। जो प्रसारित हो रहे हैं वही कम नहीं हैं, जिन्हें प्रसारित नहीं करके सौदा कर लिया गया, उसकी संख्या भी कम नहीं होगी।

इसलिए जरूरी है कि मीडिया में नए आने वालों को पूरे मामले की जानकारी दी जाए। भावी पीढ़ी के लिए कुछ करना जरूरी है। मीडिया में काम करते हुए कई बार मनुष्य की संवेदनाएं वैसे भी कम हो जाती हैं। ऐसे में मीडिया मालिकों को अपने कर्मचारियों के मरने, बीमार होने और अवसाद में चले जाने की चिन्ता नहीं है तो यह काम समाज को करना होगा। समाज अभी तक मीडिया ट्रायल से ही परेशान है पर अभी की स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री भी मीडिया ट्रायल के शिकार हैं। बात-बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री अपनी डिग्री के मामले में चुप हैं तो दूसरी ओर, तरह-तरह की खबरें छप रही हैं। भिन्न कारणों से प्रधानमंत्री को इसकी परवाह नहीं है तो आम आदमी परवाह करके भी क्या कर पाएगा। यह भी विचारणीय है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. इस स्टेटस पर पत्रकार प्रतिमा का पठनीय कमेंट इस प्रकार है….

Pratima Rakesh देहरादून के अल्पकालिक अनुभव के आधार पर आपकी बात अक्षरशः प्रामाणिक मानती हूँ ! मैंने ड्रग्स पर एक स्टोरी किया पल्टनबाजार से लेकर राजपुर रोड तक ड्रग पैडलर्स का पीछा करते हुए तंग गली के मुहाने तक पहुँची! सरकारी नेम्पेलेट न लगी होती (प्राइवेट गाड़ी पर) तो जाने क्या होता. लेकिन संथानीय संपादक जी ने जो तीन नशीली चीज़ें मैं ले आई थी, अपने एक प्रिय संवाददाता के साथ गड़प करते हुए कहा- अरे मैडम क्यों खामखां रिस्क लेती हैं.. और मेरी सारी मेहनत मिट्टी में तो नहीं, स्थानीय सम्पादक जी के पेट में चली गई…! No evidence to prove!

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हे भक्तों, पत्रकारों को समझने में 67 साल भी कम पड़ जाएंगे, पहले ढंग से जान तो लो

Sanjaya Kumar Singh : भक्तों को जब से पता चला है कि अगस्ता वेस्टलैंड ने पत्रकारों को भी पैसे दिए थे – सब पगलाए घूम रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि सरकार 15 लाख नहीं दे पाई तो क्या हुआ अगस्ता से पैसे पाने वाले पत्रकारों के नाम मालूम हों और सबों को भक्ति की लाइन में लगा लें। (मने पैसे अगस्ता ने दिए काम भक्त उनसे अपना वाला कराएंगे)। सपना है, लेकिन समस्या वो नहीं है। समस्या भक्तों के अधकचरे ज्ञान से है।

उन्हें पता नहीं है कि पैसे, नौकरी और काम के लिए तो पत्रकार जमाने से लाइन लगते रहे हैं। बहुत मामूली उपहरों के लिए भी लाइन में दिखे होंगे। लेकिन सब एक से नहीं होते हैं। इन्हीं में कोई रवीश कुमार है तो कोई सुधीर चौधरी, कोई प्रणय राय है तो रजत शर्मा, कोई विनोद दुआ तो कोई दीपक चौरसिया। एमजे अकबर हैं तो चंदन मित्रा भी और संतोष भारतीय हैं तो राम बहादुर राय भी। संजय निरुपम हैं तो राजीव शुक्ला भी। तरुण तेजपाल हैं तो अनिरुद्ध बहल भी हैं। सभी पत्रकार भक्तों की तरह एक ही गुण या अवगुण वाले नहीं होते हैं। कोई क्रिकेट पर लिखता है कोई कबड्डी पर। पत्रकारों को नहीं संभाल पाओगे। पहले ढंग से जान तो लो। पत्रकारों को समझने में 67 साल भी कम पड़ जाएंगे। फिर कोशिश करना।

जनसत्ता अखबार में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. 

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फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकारों को गालियां देता है दैनिक जागरण भदोही का पत्रकार हरिनाथ यादव!

Sanjaya Kumar Singh : छोटे शहरों के बड़े अखबारों की पत्रकारिता… भदोही में एक नेता के भतीजे ने किसी लड़की से छेड़खानी की और बात बढ़ी को उससे बदतमीजी की तथा उसके कपड़े भी फाड़ दिए। यह खबर भदोही से कायदे से रिपोर्ट नहीं हुई और लखनऊ के पत्रकार कुमार सौवीर ने इसपर अपने पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम पर विस्तार से लिखा और फेसबुक पर उसका लिंक भी दिया। खबर का शीर्षक था, “समाजवादी नवरात्र शुरू: एमएलए के भतीजे ने सरेआम नंगा किया अनाथ किशोरी को”।

इस क्रम में और भी खबरें कीं। उन्होंने एक और खबर लिखी, “भदोही काण्ड: धंधा है दलाली व चरण-चूमने का, खबर कैसे मिले”। इसे पप्पू जी यादव ने शेयर किया और टिप्पणी लगाई, “भदोही के पत्रकारों की जय हो”। इसपर हरिनाथ यादव ने कमेंट में दैनिक जागरण में छपी खबर लगाई और लिखा, “दैनिक जागरण ने प्रथम पेज पर प्रकाशित किया है। पत्रकारों पर आरोप मढ़ने से पहले अपनी गिरेबां में जरूर झांक लिया करें”। यहां तक तो मुझे मामला ठीक लग रहा था और लगा कि भदोही में भी कोई वीर और कर्मठ पत्रकार है जिसकी प्रतिभा दबी हुई है।

इसीलिए इसमें मेरी दिलचस्पी जगी। इसपर कुमार सौवीर ने लिखा, “Harinath Yadav : हादसे के तीन बाद तुम्‍हें खबर मिली, इसके लिए पहले शर्म के चलते अपना चेहरा काला कर लो। पत्रकारिता के बेशर्म चेहरा हो तुम। भदोही की अपनी ही बेटियों की इज्‍जत को इस तरह अपनी दलाली के लिए बेच रहे हो तुम। आक्‍थू।” आप कुमार सौवीर की भाषा और आक्थू कहने से असहमत और नाराज हो सकते हैं पर अभी मुद्दा वो नहीं है। वे खबर नहीं करने और इसका कारण दलाली बता रहे हैं। इसपर हरिनाथ यादव ने लिखा, “ Kumar Sauvir किसी जमाने में आप जौनपुर में एक अच्छे समाचार पत्र में कार्यरत थे। आपकी कारस्तानी के चलते आपको वहां से हटा कर मुख्यालय से जोड़ा गया था। बाद में वहां से आप को भगाया गया।” यह आरोप का जवाब नहीं है और आरोप के जवाब में आरोप लगाने से आरोप खत्म नहीं हो जाता।

इस पर कुमार सौवीर ने लिखा, “और तुम भदोही में रह कर भदोही की बेहाल बेटियों को न्‍याय दिलाने के बजाय सादाब जैसे अपराधियों की दलाली में उन बच्चियों की इज्‍जत और उनके भविष्‍य को बेच रहे हो। करते रहो। तुम्‍हारी नीय‍त ही यही है। इसके अलावा तुम क्‍या कर सकते हो। तैयार रहना, जल्‍दी ही तुम सब की खबर लूंगा। फेसबुक पर कमेंट और फिर जवाब भी कमेंट के रूप में हुई इस बातचीत का स्क्रीन शॉट कुमार सौवीर ने पोस्ट किया और है इसे पप्पू जी यादव ने भी साझा किया है। पर यह बातचीत मुझे मिली नहीं इसलिए संक्षेप में लिख रहा हूं। स्क्रीन शॉट पढ़ने में साफ नहीं है और पूरी बातचीत टाइप करने में समय लगेगा। इसलिए सिर्फ जरूरी अंश।

कुमार सौवीर ने लिखा कि लड़की सरेबाजार नंगा कर दी गई और महज छेड़खानी का सर्टिफिकेट देते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती है। इसपर हरिनाथ यादव ने लिखा, “ऑफिस में बैठकर समाज सेवा की बात करते हैं भदोही आयो और सच्चाई जानो घटना की और पत्रकारों के बारे में भी।” इसपर कुमार सौवीर ने लिखा, “खूब पता है क्या करते हो तुमलोग भदोही में रहकर। इतनी बड़ी घटना को तुमलोगों ने तीन दिनों तक छिपाए रखा। जबकि हादसे के एक घंटे बाद ही पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया था।” हरिनाथ यादव ने इसके जवाब में लिखा, “घटना के दिन मैं छुट्टी पर था। दूसरे दिन पता चलते ही समाचार प्रकाशित किया गया।” इसके बाद गाली और आरोप। अपने ऊपर गाली लगाने वालों को धमकी आदि-आदि।

मैं इस खबर की चर्चा पत्रकारों के निजी संबंध या आरोप-प्रत्यारोप के विश्लेषण के लिए नहीं कर रहा हूं। इस खबर के जरिए मैं यह दिखाना चाह रहा हूं कि छोटे शहरों में अंशकालिक पत्रकारों के सहारे, न्यूनतम वेतन से भी कम तनख्वाह पर काम करने वाले पत्रकारों के जरिए हिन्दी के बड़े और तेजी से बढ़ने वाले अखबारों की पत्रकारिता कैसी है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की जरूरत समाज को है पर उसकी क्या दशा है। गली-मोहल्लों में संवाददाताओं की फौज और हर शहर से अखबार और छोटी-छोटी जगहों से संस्करण निकालने वाले अखबार में अगर एक व्यक्ति छुट्टी पर हो तो खबर अगले दिन छपती है (आरोप तो ज्यादा है)। बिहार यूपी में ऐसे मामलों में होता यह है कि मीडिया में शोर मचने पर एफआईआर लिखी जाती है पर यहां एफआईआर होने के बाद भी खबर नहीं है।

अमूमन होता यह है कि हिन्दी पट्टी के सभी शहरों में रिपोर्टर शाम को 100 नंबर पर या पुलिस कंट्रोल रूम में किसी परिचित, मित्र या सूत्र को फोन करके खबरें लिख देता है और उसकी दिहाड़ी पूरी हो जाती है। इसीलिए ज्यादातर मामलों में खबरें एफआईआर की तरह ही लिखी जाती हैं। यहां छेड़खानी का आरोप एक नेता के भतीजे पर है और प्रकाशित खबर में नीचे लिखा हुआ है कि कपड़े फाड़ दिए। सरे राह किसी लड़की का कपड़ा फाड़ देने बगैर छुए और जबरदस्ती किए संभव नहीं है और नए कानून के तहत मेरे ख्याल से यह बलात्कार की श्रेणी में आएगा पर एफआईआर क्या है और मामला क्या है यही सब देखना रिपोर्टर का काम होता है। अगर रिपोर्टर चूक जाए तो डेस्क पर बैठे लोगों का काम होता है कि रिपोर्टर को आवश्यक जानकारी देने के लिए कहा जाए। पर ऐसा कुछ जागरण के डेस्क ने नहीं किया और पुरानी खबर को आधी-अधूरी छाप दी।

इसलिए खबर बेचने का आरोप लग रहा है तो रिपोर्टर छुट्टी पर होने का बहाना बना रहा है और आरोप लगाने वाले पर आरोप लगा रहा है, उससे भी बात नहीं बनी तो गाली दे रहा है। ऐसी है हमारे यहां छोटे शहरों के बड़े अखबारों की पत्रकारिता। दिलचस्प है कि हरिनाथ यादव फेसबुक पर खुद को दैनिक जागरण से जुड़ा बता रहे हैं और जागरण का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं पर गालियां देकर। किसी संस्थान का प्रतिनिधि अपने संस्थान की ओर से बोलते हुए किसी को गाली लिखे – शर्मनाक से अच्छा शब्द नहीं मिल रहा है मुझे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से. इस स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…..

Shambhunath Shukla कुमार सौवीर हिम्मती पत्रकार हैं और शायद इसीलिए सांस्थानिक पत्रकारिता उन्हें स्वीकार नहीं कर पाई। पर आपने इस पूरे घटनाक्रम का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है। इन सारे अखबारों के मुफस्सिल संवाददाता बस किसी तरह दिहाड़ी पूरी करते हैं और खबरों के लिए वे थानेदार के भरोसे रहते हैं साथ ही उनके साथ मिलकर एकाध मामलों में पैरवी कर लेते हैं जो उनकी रोजमर्रा की आदत है। किसी खबर के प्रति उनका रवैया चलताऊ और निपटाऊ रहता है। पर यह सिर्फ रिमोट एरिया में ही नहीं। वर्नाक्यूलर अखबारों के राजधानी स्थित दफ्तरों में यही होता है। कल एनडीटीवी के प्राइम टाइम में रवीश कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस के न्यूज रूम से बैठकर शो किया था उसे देखकर आंखें खुली की खुली रह गईं। और अपने जनसत्ता वाले दिन याद आ गए जब हम सब एक्सप्रेस के न्यूज रूम में ही बैठते थे और उनसे खबरें साझा करते थे। शायद इसीलिए तब की हिंदी पत्रकारिता भी आज की तरह चलताऊ नहीं थी।

Kumar Pal सर स्थिति इससे भी कही ज्यादा जटिल और भयाभय है। कस्बों के रिपोर्टर ख़बरों में कम और दलाली में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। कहीं न कहीं इसके लिए मीडिया समूह भी जिम्मेदार है। हर एजेंसी से नियूनतम महिना तय है उसे हर महीने उतना देना ही देना है अगर नहीं दिया तो उसकी दुकान बंद। दरअसल अख़बारों ने मजबूर कर दिया है पत्रकारों को दलाली करने के लिए। अख़बार अब वेतन देने की बात नहीं करते अब सीधे सीधे बात होती है महीने में कितना दोगे। और अख़बार को कितने चाहिए जिससे सामंजस्य बैठ जाता है वही पत्रकार का तमगा लगाये दलाली करता फिरता है। आज पत्रकारिता गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। प्रतिभावान पत्रकार सड़कों की खाक छान रहे है और चापलूस मालिकों के चहेते बन मलाई खा रहे है। आज कल काम से ज्यादा चापलूसी भा रही है।

Sunil Singh छोटे शहरों में बाकई पत्रकार पुलिस थाने से खबर निकाल कर छाप देते हैं। उस खवर की गहराई में नही जाते हैं। और इनकी दलाली तो सबको मालूम ही है। दारू मुर्गे पर भी बिक जाते हैं।

Sanjeev Gupta ये 100 टका सच्चाई है। सही विश्लेषण।

मूल खबर पढ़ें….

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राकेश सिन्हा ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे… फिर सच्चाई क्या है…

Sanjaya Kumar Singh : भूल सुधार… एक पोस्ट में मैंने लिखा कि भाजपा के विचारक राकेश सिन्हा जनसत्ता में थे। परिचित हैं। उसे भड़ास4मीडिया ने प्रकाशित किया और अपने ट्वीटर पर भी। राकेश जी ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे। मैंने चेक कर लिया। मुझे ही गलत याद था और मैं उन्हें जनसत्ता का स्ट्रिंगर समझता था। पर चूंकि स्ट्रिंगर और स्टाफर के तकनीकी अंतर को मैं नहीं मानता इसलिए मैंने लिख दिया था कि वे जनसत्ता में थे।

मैंने चेक कर लिया वे वाकई जनसत्ता में नहीं रहे। उनकी एकाध खबरें (उनके नाम के साथ) जरूर छपीं हैं पर वे स्टाफ में तो नहीं ही थे और इनकार कर रहे हैं तो स्ट्रिंगर भी नहीं थे। असल में वे ऑफिस आते-जाते थे और रिपोर्टिंग कक्ष में पाए भी जाते थे तभी की हाय हलो है। मुमकिन है अब उन्हें याद नहीं होगा तो परिचित भी नहीं हैं। हालांकि मुझे इसी से भ्रम हुआ। असल में हम जैसों के कांफिडेंस (जिसे मैंने भ्रम लिखा है) का कारण यह है कि उन दिनों जनसत्ता में खबर के साथ किसी का एक बार नाम छप जाता था तो वह उसी को लेकर घूमता और दिखाता था, सीना ठोंककर कहता भी था कि वह जनसत्ता में है।

लोग बाग पूछते कि वो तो वहां है, ऐसा है, वैसा है, जनसत्ता में कैसे है तो हमीं लोग बताते रहते थे कि नहीं स्ट्रिंगर है, फ्रीलांसर है (अंशकालिक कर्मचारी) आदि। आम लोग तो तब ना इसका अंतर जानते थे ना समझते थे। आपस में भी बुरा लगता था कि एक ही काम के लिए किसी को ज्यादा वेतन आई कार्ड (कनवेयंस अलाउंस भी, जो मुझे नहीं मिलता था और बहुत तकलीफ रही) सब कुछ और किसी को कुछ नहीं। राकेश जी मना कर रहे हैं कि जनसत्ता में नहीं थे तो मैं इसकी पुष्टि करता हूं और इसके लिए खुले दिल से उनकी प्रशंसा भी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Ajay Setia राकेश सिंहा कभी जनसत्ता में नहीं थे. वह इंडियन एक्सप्रैस में लिखा करते थे.

Sanjaya Kumar Singh ये तो और नई जानकारी है। मुझे लगता है उम्र का असर मेरी याद्दाश्त पर पड़ रहा है।

Ajay Setia मैने आप की पोस्ट में उन का नाम पढा तो आश्चर्य हुआ.लेकिन जानबूझकर टिप्पणी नहीं की थी. आईएएस की भागदौड के बाद राकेश सिन्हा करीब करीब उन्हीं दिनों में दिल्ली विवि में अध्यापक हो गए थे.

Sanjaya Kumar Singh दिल्ली विश्विद्यालय के एक कालेज में पढ़ाते हुए सुधीश पचौरी जनसत्ता में नियमित कॉलम लिखते थे और दफ्तर कम आते थे। आप बता रहे हैं कि राकेश जी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे और मुझे याद है कि वे जनसत्ता दफ्तर (अब मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग कहूंगा) सुधीश जी के मुकाबले तो बहुत ज्यादा आते थे (एक समय)। फिर भी यह विवाद का मुद्दा नहीं है। एक्सप्रेस बिल्डिंग आने वालों का हिसाब नहीं रखा जा सकता है। अरुण शौरी लिख चुके हैं कि लोग भ्रष्टाचार की पूरी फाइल रीसेप्शन पर छोड़ जाते थे फिर फोन करके बताते थे कि फाइल छोड़ आया हूं।

Ambrish Kumar वे दूसरे राकेश सिन्हा है अक्सर शाम को सुशील सिंह के साथ प्रेस क्लब में मिलेंगे वे एक्सप्रेस थे और एक तीसरे भी हैं जो अब एक्सप्रेस में हैं तीसरे वाले ब्यूरो में हम लोगो के समय से है अब प्रमोशन हो गया है.

Ramendra Jenwar जनसत्ता मेँ नहीँ थे तब तो उनका जीवन ही बेकार है उन्हेँ पत्रकार नहीँ माना जा सकता…जैसे देशभक्ति का प्रमाणपत्र सँघ कार्यालय से मिलने पर ही मान्य होता है ऎसे ही पत्रकारिता का जनसत्ता से.

Sanjaya Kumar Singh नहीं उनके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। वो पत्रकार होने का दावा भी नहीं करते और इस खंडन के बाद तो लगता है, पहले भी ऐसा कोई शौक नहीं रखते होंगे। आप किसी और का गुस्सा किसी और पर निकाल रहे हैं।

Mohd Zahid जहाँ भी थे या हैं, एक नंबर के छूठे और मक्कार हैं।

Kumar Bhawesh Chandra वह अपने रवि प्रकाश के अच्छे मित्र हैं। 20 आशीर्वाद (अस्तबल) में आना जाना था। इस नाते हम सभी उन्हें तभी से जानते हैं।

Ambrish Kumar तब उन्हें कोई नहीं जानता था, अब वे किसी को नहीं पहचानते हैं हिसाब बराबर. वे जनसत्ता में भी आते / मंडराते थे पर उसका अब कोई अर्थ नहीं.


मूल पोस्ट….

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सेक्स हौव्वा क्यों है… सेक्स पर चर्चा जरूरत है, बोल्ड होना नहीं

Sanjaya Kumar Singh : आज के समाज में जब लड़कियां नौकरी कर रही हैं, बड़े शहरों में परिवार से दूर अकेले रह रही हैं, किराए पर मकान लेने की समस्या है, शादी देर से हो रही है आदि कई कारण है जिनके आलोक में लिव-इन एक जरूरत है। लिव इन वालों के यौन संबंध के मामले में भी मेरी राय वही है – जरूरत है। इसे ना कानून बनाकर रोका जा सकता है। Continue reading

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सुमंत भट्टाचार्य फेसबुक पर भक्तों के बीच वैसे ही लोकप्रिय हैं जैसे टीवी पर राकेश सिन्हा!

Sanjaya Kumar Singh : भक्ति या आस्था समर्थन, नहीं रोग है… मित्र सुमंत भट्टाचार्य फेसबुक पर भक्तों के बीच वैसे ही लोकप्रिय हैं जैसे टीवी पर राकेश सिन्हा। दोनों जनसत्ता में रहे हैं। राकेश सिन्हा सिर्फ परिचित हैं। सुमंत मित्र रहे हैं। विमर्श के बड़े पैरोकार हैं। मुझसे भी उलझते रहते हैं और कहते हैं कि विमर्श का फलक खुला रहना चाहिए। जब आप सवाल उठाते हैं तो कोई भी आपसे सवाल पूछ सकता है। आपकी निष्पक्षता जांच सकता है। यहां तक कि मैं कन्हैया को जमानत मिल जाने की बात करूं तो वे मुझसे पूछ सकते हैं कि मैं शाहबानो मामले में क्या जानता हूं। और फिर ऐसे ही विमर्श करते रहना चाहते हैं जिसमें मुद्दा गोल हो जाता है। जो अक्सर भाजपा, संघ या सरकार के खिलाफ होता है। मैंने उनसे सार्वजनिक रूप से हार मान ली है और मानता हूं कि वे विमर्श के बहाने लोगों को विषयांतर करने का महान काम कर रहे हैं।

इसी क्रम में उन्होंने एक महिला मित्र से कहा (फेसबुक पर लिखकर), ”तुम्हारी वाल पर विमर्श क्यों नहीं होता… कब तक देह के प्रदर्शन से लाइक और कमेंट बटोरोगी”। इसे उन्होंने बुरा मान लिया। और पोस्ट करके इन्हें भला-बुरा कहा। भक्त अपने हिसाब से छौंक लगाते रहे। और जब इन्होंने मान लिया कि जीत गए तो फिर एक पोस्ट डाली अपने जवाब के साथ। और उसपर एक समर्थक की यह टिप्पणी और उनके इस जवाब ने मेरा संयम तोड़ दिया। पिछली बार उनके कमेंट को पोस्ट बनाकर मैंने बाकायदा उन्हें विमर्श के लिए आमंत्रित किया था पर हार गया। तभी मैंने तय किया था कि उनसे नहीं भिड़ूंगा। लेकिन आदत से मजबूर कल फिर थोड़ी बहुत हो ही गई।

एक महिला से विमर्श की उनकी अपील (उसका अंदाज) और उसपर उनकी प्रतिक्रिया से मुझ लग रहा है कि भक्ति, आस्था नहीं रोग है। (हालांकि वे मुझसे कह चुके हैं कि मैं भक्ति के बारे में नहीं जानता, समस्या यह है कि मैंने इतिहास नहीं पढ़ा (मैं विज्ञान का छात्र रहा हूं) और विश्वविद्यालय में धक्के नहीं खाए। अब उन्होंने खुद साबित कर दिया कि जो हुआ अच्छा ही रहा। जानबूझकर टैग नहीं कर रहा हूं वरना वे विमर्श का निमंत्रण मान लेते हैं। दरअसल यह सार्वजनिक रूप से हार मानना है। भक्त इसे सुमंत की निन्दा ना मानें (है भी नहीं) और मुझे बख्श दें। मैंने आपके महान गुरू, श्रेष्ठ, सलाहकार और काबिलतम फेसबुकिए के बारे में अपने अनुभव भर बताए हैं। इसे उसी रूप में लिया जाए। बस।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पत्रकार अजय सेतिया की विरोध और भक्ति की पत्रकारिता

Sanjaya Kumar Singh : इंदौर में एक अभय प्रशाल (abhayprashal.com) है। यह एक स्टेडियम, स्पोर्ट्स क्लब और मध्य प्रदेश की खेल राजधानी कहे जाने वाले इंदौर में खेलों का मुख्य केंद्र भी। इसका नाम अभय प्रशाल एक समय हिन्दी के बड़े और सम्मानित मीडिया संस्थान रहे नई दुनिया के संपादक, मालिक, पत्रकार या सर्वेसर्वा अभय छजलानी के नाम पर है। इंदौर एक समय नई दुनिया का मुख्यालय भी था। नहीं जानने वालों के लिए मैं अभय प्रशाल के नामकरण की कहानी उमेश त्रिवेदी के एक निबंध, “वे हर बार अमिट छाप छोड़ते हैं”, से कर रहा हूं जो अभय छजलानी के बारे में है और 1997 में प्रकाशित, “कठोर डग, सधे कदम” में प्रकाशित है। संबंधित अंश (संपादित) इस प्रकार है…

”….खेल प्रशाल का लोकार्पण समारोह होने वाला था। अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकस मंत्री और दिग्विजय सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। मेरे दिमाग में पहले से ही यह विचार कुलबुला रहा था कि खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर होना चाहिए। ….. दूसरी ओर इंदौर में सुरेश गावड़े भी इसी लाइन पर सोच रहे थे। उनका फोन आया कि – उमेश खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर होना चाहिए ….। अगले दिन पुष्पा मित्तल का फोन था कि – उमेश जी आप क्या सोचते हैं, यदि खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर हो तो …? …. मैंने सोचा यह बात अभय जी के कान में डाल दी जाए। ….. वे अपनी तरफ से खेल प्रशाल का नाम रख चुके थे। ….. इसी उधेड़बुन में जब मैं खेल प्रशाल का निमंत्रण देने मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पास पहुंचा तो उन्होंने पूछा कि इस मौके पर क्या घोषणा की जा सकती हैं, जिससे समारोह स्थायी रूप से यादगार बन सके। मैंने अभय जी के निर्देशानुसार उन्हें सुझाव दिया…..। मुख्यमंत्री ने मेरी शक्ल देखी और कहा कि खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर रख दें तो कैसा रहेगा? ….. इसके बाद बात आई-गई हो गई। … लेकिन हमलोगों का उस वक्त आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मुख्यमंत्री ने अचानक नामकरण का प्रस्ताव रख दिया और ऐसा लगा कि उन्होंने खेल प्रशाल में बैठे सभी लोगों के मन की बात कह दी। लेकिन मुख्यमंत्री का यह प्रस्ताव अभय जी के लिए सबसे ज्यादा सकपकाने वाला था। उनके चेहरे पर इतना संकोच, इतना असमंजश, इतनी ऊहापोह मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। ….. रमेशा बाहेती दर्शकों का मूड भांप चुके थे। उन्होंने तत्काल ट्रस्ट की ओर से प्रस्ताव रखकर मुख्यमंत्री के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी। …. किन्तु अभय जी के लिए यह चौंकाने वाला प्रसंग था जो उनके चेहरे पर साफ नजर आ रहा था।”

इस कहानी का साथी अजय सेतिया की इस पोस्ट से कोई संबंध नहीं है। इसका मकसद पाठकों को यह बताना है कि आप पूरी बात न जानें तो कई बार गलत निष्कर्ष निकाल सकते हैं। जैसे यह माना जाता है कि जीवित व्यक्तियों के नाम पर नामकरण नहीं होता है या हो जाए तो अपशकुन होता है, आदि। यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। आज मैंने फोन करके पूछ लिया अभय छजलानी 80-85 साल की उम्र में भी सक्रिय और स्वस्थ हैं। ईश्वर से कामना है कि दीर्घायु हों। यहां अजय सेतिया की पोस्ट को उद्धृत करने का मकसद यह बताना है कि कैसे व्यक्ति निष्पक्ष होते हुए भी आधारहीन विरोध कर सकता है। और यह दावा करता रह सकता है कि वह सरकार का समर्थन नहीं करता है। उनकी पोस्ट है, “फिलहाल इसका नाम गतिमान एक्सप्रेस है। सोचो यूपीए शासन काल में चलती तो इसका क्या नाम होता।”

भारतीय रेल में नेहरू, गांधी के नाम पर कोई ट्रेन मुझे तो याद नहीं आ रही है। ट्रेन का नाम ज्यादातर उनके छूटने-पहुंचने के स्थान पर या राजधानी, शताब्दी, गरीबरथ, दुरंतो जैसे हैं और नया नाम गतिमान भी इसी क्रम में है। ऐसे में गतिमान नाम के लिए कोई श्रेय देना या यूपीए का मजाक उड़ाना (निष्पक्ष पत्रकार के लिए) बेमतलब का काम है। मैं नहीं कहता कि कांग्रेस ने नेहरू, इंदिरा, गांधी, राजीव आदि के नाम पर जो नाम रखे हैं वो सभी सही हैं या उसमें अति नहीं हुई है। पर एक पत्रकार के रूप में मुझे विरोध करना होगा तो बाकायदा करूंगा तर्क-सबूत के साथ। सेतिया जी, आप भले नरेन्द्र मोदी के पक्ष में नहीं लिख रहे हैं पर भक्तों की तरह काम कर रहे हैं। भक्त कहां लिखते हैं। हर लिखे पर टिप्पणी जरूर करते हैं। सरकार विरोधी को आपिया, कांग्रेसी, सेकुलर करार देते हैं। आप वही करते नजर आ रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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इसलिए लड़के आत्महत्या नहीं करते, लड़कियां कर लेती हैं

प्रत्यूशा की मौत के बहाने : मरने वाली लड़की ही क्यों?

Sanjaya Kumar Singh : मैंने किसानों की आत्महत्या पर नहीं लिखा, डेल्टा मेघवाल की मौत पर भी नहीं लिखा लेकिन प्रत्यूशा बनर्जी की मौत पर लिख रहा हूं। कारण इसी में है फिर भी ना समझ में आए तो उसपर फिर कभी बात कर लेंगे। फिलहाल प्रत्यूशा और उसके जैसी अभिनेत्रियों की मौत के कारणों को समझने की कोशिश करते हैं। जो छोटे शहरों से निकलकर बड़ा काम करती है। शोहरत और पैसा कमाती हैं, सब ठीक-ठाक चल रहा होता है और अचानक पता चलता है कि उसकी मौत हो गई (आत्महत्या कर ली, हत्या हो गई या शीना बोरा की तरह) या गायब हो गई। कारण हर तरह के हैं, होते हैं लेकिन प्रेम संबंध, पति, प्रेमी, आशिक, ब्वायफ्रेंड की भूमिका भी सामने आती है और कुछ मामले खुलते हैं, कुछ नहीं खुलते हैं। मरने वाली बदनाम जरूरी होती है या कर दी जाती है। मीडिया ट्रायल की अलग समस्या है। जो तुरंत बंद होना चाहिए पर वह हमारे हाथ में नहीं है। Continue reading

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जांच के नाम पर पत्रकार पुष्प शर्मा को प्रताड़ित कर रही है दिल्ली पुलिस

Sanjaya Kumar Singh : मंत्री जी, अब चुप रहने का विकल्प नहीं है। इसका अर्थ बदल गया है। दिलचस्प हो रहा है आयुष मंत्रालय से जुड़ा विवाद। आयुष मंत्रालय के संबंध में एक सूचना आई थी कि मंत्रालय नीतिगत रूप से मुसलमानों की नियुक्ति नहीं करता है। यह सूचना पहली नजर में ही गलत लगती है और यकीन करने लायक नहीं है। मेरा मानना है कि अगर ऐसी कोई नीति होगी भी तो स्वीकार नहीं की जाएगी और आरटीआई के जवाब में आसानी से आ जाए यह तो संभव नहीं है। फिर भी कोई ऐसी सूचना प्रकाशित करे तो इसके कई कारण हो सकते हैं और यहां मैं उनके विस्तार में नहीं जाकर यही कहूंगा कि मैं इंतजार कर रहा था कि यह मामला इस लायक हो जाए कि इसमें दिलचस्पी बने। आज सुबह के अखबारों में खबर है कि संबंधित पत्रकार पुष्प शर्मा को पुलिस ने कल शाम अपने अंदाज में उसके घर से ‘उठा’ लिया और फिर रात साढे दस बजे यह कहकर छोड़ा गया कि आज सुबह 10 बजे थाने में पहुंच कर सारी बात बताएं, सबूत दें आदि।

कुल मिलाकर केंद्र में नई सरकार बनने के बाद (मुझे लग रहा है कि दिल्ली में) सोशल मीडिया पर फैलने वाले कथित अफवाहों की पहली बार जांच हो रही है। हालांकि, जांच के नाम पर यह पुलिस प्रताड़ना ही है पर पुलिस को इतना अधिकार मिला मान लिया जाए तो मामला यह लगता है कि संबंधित रिपोर्टर ने आरटीआई के तहत कई सवाल पूछे थे और उसमें एक यह भी था कि योग के प्रशिक्षण के लिए कितने मुसलिम आवेदकों को विदेश भेजा गया। आयुष मंत्रालय की एक विज्ञप्ति के अनुसार चौथा सवाल इस प्रकार था, “How many Muslim candidates were invited, selected or sent abroad as Yoga trainer/teacher during World Yoga Day 2015”. विज्ञप्ति के अनुसार कुल सात सवाल थे। मैं यहां ज्यादा विस्तार में नहीं जाकर सिर्फ उसी मुद्दे की चर्चा करूंगा जिसपर विवाद है और यह यह भी विवाद खत्म करने के लिए मंत्रालय मूल मुद्दे पर चुप रहकर लीपापोती क्यों कर रहा है?

मंत्रालय का कहना है कि इस आरटीआई को उसने तीन एजेंसियों को अग्रसारित कर दिया था और यह आरटीआई कानून की धारा 6(3) के तहत महज अग्रसारण (फॉर्वार्डिंग) है और इसलिए सवालों का कोई जवाब नहीं है। विज्ञप्ति में आरोप लगाया गया है कि 08.10.2015 के इस अग्रसारण पत्र का उपयोग मीडिया ने इस मामले में किया है पर एक फर्जी, बगैर अस्तित्व वाले अनुलग्नक (ANNEXURE – I) एक के साथ। मंत्रालय साफ तौर पर कह रहा है कि इसे जारी ही नहीं किया गया था। इसी स्पष्टीकरण में आगे कहा गया है कि कथित अनुलग्नक में जो जानकारी दी गई है वह ना सिर्फ गढ़ी हुई बल्कि वास्तविकता से दूर, गलत भी है। इसमें दावा किया गया है कि योग विशेषज्ञों / उत्साहियों को निमंत्रण उनके धर्म का संदर्भ लिए बगैर भेजा गया था। मेरा सवाल इसी से जुड़ा है, मैं मंत्रालय की सारी बातें मान रहा हूं। और यह भी कि जिस सूची का उपयोग किया गया वह फर्जी है। और साथ ही यह भी कि आरटीआई का जवाब नहीं दिया गया है। क्यों?

क्या यह जरूरी नहीं है कि आरटीआई का जवाब दिया जाए और देरी का कारण बताया जाए। मेरा मानना है कि सरकार ने अगर कुल 26 लोगों को अभी साल भर पहले विदेश भेजे थे तो उनका नाम बताने में असुविधा नहीं होनी चाहिए। और अगर सरकार ऐसा कर देती है तो मामला अपने आप खत्म हो जाएगा। पुलिस को भी जांच में सुविधा होगी। लेकिन अभी तक जो स्थिति है उससे लग रहा है कि आरोप यह है कि मंत्रालय में मुस्लिमों की नियुक्ति ही नहीं होती है। सबसे पहले इस खबर को प्रकाशित करने वाले “मिल्ली गजट” की खबर पर प्रतिक्रिया करते हुए कई पाठकों ने भी मंत्रालय के कर्मचारियों-अधिकारियों की सूची का लिंक दिया है जिसमें मुस्लिम नाम हैं। मैंने भी जब इस मामले की जांच करनी चाही तो सबसे पहले यही देखा और फिर मुझे समझ में नहीं आया कि मामला क्या है तो मूल खबर पढ़ी।

अभी तो मुद्दा यह है कि आयुष (या योग) मंत्रालय के हवाले से जो कहा गया है वह गलत है या सही (मैं सच झूठ की बात नहीं कर रहा) और वह इस प्रकार है, “The ministry said, a total of 711 Muslim yoga trainers had applied for the short-term assignment abroad but none was even called for an interview while 26 trainers (all Hindus) were sent abroad on this assignment. The reply also revealed that 3841 Muslim candidates applied till October 2015 for the post of Yoga trainer/teacher with the Ministry but none was selected. The RTI reply of the Ayush Ministry bluntly revealed the reason for the rejection of all applications by Muslim Yoga teachers as follow: “As per government policy – No Muslim candidate was invited, selected or sent abroad.” The reply also makes it clear that even for assignment within India no Muslim was selected, although a total of 3841 Muslims had applied for the yoga teacher jobs.”

मंत्रालय के लिए यह कहना आसान तो है कि अनुलग्नक फर्जी है। पर अनुलग्नक जैसा है और जिन स्थितियों में प्रकाशित हुआ है उससे फर्जी लगता नहीं है। वैसे भी, यह बड़ा मुश्किल है कि किसे सच माना जाए। ऐसे में मंत्रालय का भी कुछ दायित्व है और वह इससे मुक्त नहीं हो सकता है। इसका खंडन तो इस प्रकार होगा कि योगा प्रशिक्षक के लिए किसी मुस्लिम के आवेदन नहीं आए या XXX आए और XX को प्रशिक्षण के लिए विदेश भेजा गया या भेजा ही नहीं गया। इसमें XX हिन्दू, XX मुस्लिम और XX अन्य धर्मों के लोग थे। दूसरा मुद्दा है कि अक्तूबर 2015 तक 3841 मुस्लिम उम्मीदवारों ने योग प्रशिक्षक / शिक्षक के रूप में आवेदन किया था। पर किसी का चुनाव नहीं किया गया। पुराने जमाने में सरकारी जवाब हो सकता था कि यह आरोप गलत है आरटीआई और पारदर्शिता के जमाने में यह कहना बनता है कि नहीं एक भी आवेदन नहीं आया या 3841 नहीं, XXXX आवेदन आए थे और फलां-फलां को रखा गया है। पुराने समय में सरकार के पास चुप रहने का विकल्प था। अब नहीं है और चुप रहने के मायने बदल गए हैं।

www.milligazette.com/news/13831-we-dont-recruit-indian-muslims-modi-govts-ayush-ministry

http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=137855

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क : Facebook.com/sanjaya.kumarsingh


मूल खबर….

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रेलवे के इतने बड़े झूठ और फर्जीवाड़े पर मीडिया और मंत्रालय ने चुप्पी क्यों साध रखी है?

Sanjaya Kumar Singh : रेल मंत्री ट्वीटर पर व्यस्त और अपराधी-ठग अपने धंधे में… अब स्पष्टीकरण से क्या लाभ जब चिड़िया चुग गई खेत… रेल मंत्री सुरेश प्रभु जब ट्वीटर के सहारे मुश्किल में फंसे रेल यात्रियों को खाना, पानी और डायपर पहुंचाने की व्यवस्था कर रहे थे तो ठगों, अपराधियों और संभवतः रेलवे से जुड़े लोगों का एक गिरोह आम युवाओं, रोजगार तलाश करने वालों को ठगने-लूटने में लगा हुआ था। जरूरी नहीं है कि यह सूचना सही हो। यह भी संभव है कि रेल मंत्रालय की जानकारी के बगैर या कायदे-कानूनों को पूर्ण किए बगैर रेल सुरक्षा बल में 17,000 कांसटेबल की नियुक्ति के विज्ञापन निकाल दिए गए हों और अब जब पता चला तो नियुक्ति की घोषणा को फर्जी करार दिया गया।

आज नवोदय टाइम्स में छपी एक खबर से पता चला कि मंत्रालय की जानकारी के बगैर विज्ञापन निकाल दिया गया था और अब रेलवे ने साफ कर दिया है कि ये विज्ञापन फर्जी हैं। अखबार के मुताबिक ऑनलाइन दिखने वाले विज्ञापन फर्जी हैं और रेलवे ने ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं चलाई है। अखबार की खबर यह भी कहती है कि इस कथित खुलासे के बाद रेल मंत्रालय में हड़कप मचा है। मैंने गूगल पर तलाशने की कोशिश की तो कई विज्ञापन और खबरें मिलीं। कौन देश भक्त है और कौन देशद्रोही यह तय करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है इसलिए मैंने कुछ स्क्रीन शॉट रख लिए हैं और कुछ इसके साथ पोस्ट कर रहा हूं।

देखिए कि यह खेल कब से चल रहा है और कल्पना कीजिए कि जो मंत्री कुछ घंटे (या दिन) की रेल यात्रा में पानी-खाना नहीं मिलने वालों को आवश्यक सुविधाएं मुहैया करा देता है उसे इन विज्ञापनों का महीनों तक पता नहीं चला तो उसे क्या कहा जाए। मैं शुरू से कह रहा हूं कि ट्वीटर पर यात्रियों को सेवा मुहैया कराने का काम कोई भी छोटा बड़ा अधिकारी कर सकता है। मंत्री को मंत्री वाले काम करने चाहिए पर भक्त मीडिया को प्रशंसा करने और मंत्री जी को प्रशंसा प्राप्त करने से फुर्सत मिलती तो वे देखते कि उनके मंत्रालय के नाम पर फर्जीवाड़ा चल रहा है। मंत्रालय ने तो स्पष्टीकरण देकर अपना हाथ झाड़ लिया लेकिन मंत्रीजी की तारीफ करने वाले मीडिया के साथी इसपर कुछ समय और श्रम लगाएंगे क्या?

07 अगस्त 2014 की इस विज्ञप्ति के बाद रेल मंत्रालय कैसे कह सकता है कि विज्ञापन फर्जी हैं और अगर फर्जी हैं तो जनता को इसकी जानकारी देने के लिए रेलवे ने क्या किया जबकि संसद में रेल राज्य मंत्री एक सवाल के जवाब में कह चुके हैं कि फर्जी विज्ञापनों की स्थिति में रेलवे लोगों को जागरूक करने का काम करता है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. Facebook.com/sanjaya.kumarsingh

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टेलीग्राफ ने पिछले एक महीने में जो हेडिंग दी, वह बहुत आसान काम नहीं है

Ambrish Kumar : सिर्फ दो अखबार… अपनी जो पोस्ट पब्लिक में थी उसमें बहुत से अंजान लोग भी आए. कई आहत थे तो कई आहत करने का प्रयास कर गए. उनकी एक नाराजगी अपन के पत्रकार होने के साथ पूर्व में इंडियन एक्सप्रेस समूह का पत्रकार होने से ज्यादा थी. वे मीडिया की भूमिका से नाराज थे. पर यह नाराजगी दो अखबारों से ज्यादा थी. अपनी प्रोफाइल में इंडियन एक्सप्रेस है ही जो एक अख़बार था तो दूसरा टेलीग्राफ. दोनों की दिल्ली में सांकेतिक मौजूदगी है, बड़े प्रसार वाले अखबारों के मुकाबले. एक्सप्रेस से अपना लंबा संबंध रहा है और उसका इतिहास भूगोल सब जानते भी हैं. चेन्नई अब कहा जाता है पर आजादी से पहले के मद्रास में किस तरह अंग्रेजों से यह अख़बार नुकसान सहकर लड़ा, यह कम लोग जानते है.

आपातकाल में जब तथाकथित देशभक्त मीडिया इंदिरा गांधी तो दूर वीसी शुक्ल के चरणों में लोट रहा था तब यह तनकर खड़ा था. उसके बाद भी बोफोर्स से लेकर ठाक्कर कमीशन हो या अन्य विवाद. इसे टकराते भिड़ते देखा. बाद में इसके हरावल दस्ते का एक सिपाही भी बना. जनसत्ता ने चौरासी के दंगों में जिस तरह सिखों की आवाज उठाई वह बेमिसाल है. उसके बाद भी यह तेवर बरक़रार रहा. इसलिए इंडियन एक्सप्रेस आज भी अख़बारों की भीड़ में अलग है. टेलीग्राफ ने पिछले एक महीने में जो हेडिंग दी कवरेज की वह बहुत आसान नहीं है. टेलीग्राफ का शानदार इतिहास रहा है. टेलीग्राफ के साथी पीयूष बताते हैं कि किस तरह एक एक स्टोरी पर रात दो बजे तक पूरी टीम काम करती है. आप असहमत हो सकते हैं. पर समूचे अख़बार को निशाने पर लें, यह ठीक नहीं. सही तरीका यह है कि इन्हें न पढ़ें. समस्या खत्म. तनाव ख़त्म. अखबारों की भीड़ है. कोई भी विश्व का या देश का बड़ा अख़बार उठाएं और पढ़ें. आप भी खुश हम भी खुश.

अख़बार अख़बार में फर्क है. हिंदी में जो नहीं मिलेगा वह अंग्रेजी में मिल जायेगा. हिंदी की चुटीली हेडिंग के साथ. टाइम्स आफ इंडिया ने सुभाष चंद्र बोस के परिजन सांसद सुगाता बोस का भाषण दिया है. राष्ट्रभक्ति पर कम से कम नव राष्ट्रवादियों को उसे पढना चाहिए पर चैनल की तरह हिंदी वालों ने इससे बचने का प्रयास और ढंग से दिया ही नहीं, कहीं पाठक ज्यादा जागरूक न हो जाए. पाठक ही अख़बार नहीं बनाता है, अख़बार भी पाठक को बनाता है. अब यह भूमिका अंग्रेजी अख़बार ज्यादा बेहतर ढंग से निभा रहे है. बहरहाल आज का टेलीग्राफ फिर देखें.

Sanjaya Kumar Singh : दि टेलीग्राफ का शीर्षक आज भी सबसे छोटा सबसे चुटीला है। जब प्रधानमंत्री को दो साल में देश की मीडिया को संबोधित करने का समय न मिले, दीवाली मिलन के नाम पर पत्रकारों को बुलाकर सेल्फी खींचने का सत्र चलाया जाए तो अखबारों के शीर्षक पर चर्चा करना, वह भी, तब जब स्टार मंत्री के ‘शानदार’ भाषण की तारीफ ना हो, भक्तों को क्यों पसंद आएगा। भक्ति में लगे लोगों को इसपर चर्चा से भी परहेज है।

वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार और संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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इंडियन एक्सप्रेस का ज़ी न्यूज से विश्व दीपक के इस्तीफे की खबर छापना यानि अंधेरे में एक किरण तो है ही

मुझे पत्रकारिता का पेशा इसीलिए पसंद है। अपना काम करते रहने के लिए किसी लाला की दुकान की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, लालाओं ने स्थिति इतनी विकट कर दी है कि किसी चैनल या अखबार में नौकरी करने के लिए गालियां सुननी पड़ती है जबकि नौकरी छोड़ना इतना आसान नहीं होता है। पर नौकरी छोड़कर कहां कोई इतना कवरेज या समर्थन पाता है। घर-परिवार चलाने के लिए पत्रकारिता के सिद्धांतों से समझौता करके नौकरी करते रहने से अच्छा है पत्रकारिता छोड़कर पैसे ही कमाए जाएं और पैसे कमाने का बंदोबस्त हो या हो जाए तो विशुद्ध (जैसा मन करे) पत्रकारिता की जाए।

मशहूर नर्तकी मृणालिणी साराभाई के निधन पर प्रधानमंत्री द्वारा शोक नहीं व्यक्त किए जाने पर उनकी बेटी, मशहूर नृत्यांगना – मल्लिका साराभाई ने फेसबुक पर लिखा था कि प्रधानमंत्री को इस पर शर्म आनी चाहिए। इस पर भाजपा नेता और मध्यप्रदेश के विधायक कैलाश विजयवर्गीय मामले को पूरी तरह मोड़ दिया और ऐसा उन्होंने जानबूझकर भारतीय संस्कृति, मान्यता और रिवाजों की आड़ में किया जो तकनीकी तौर पर तो सही था पर पहली ही नजर में गलत और झूठ लग रहा था। उन्होंने फैला दिया कि मृणालिनी के निधन के दिन ही पीएमओ की ओर से उनके बेटे कार्तिकेय साराभाई के पास संवेदना प्रकट करते हुए एक पत्र भेजा गया था। बताया गया कि यह पत्र निधन वाले दिन ही लिखा गया था (जबकि मल्लिका ने अगले दिन प्रधानमंत्री को कोसा था)। कैलाश विजयवर्गीय ने इसकी जानकारी ट्वीटर पर भी दी बताते हैं।

तब ज्यादातर अखबारों और चैनलों ने विजयवर्गीय के बयान को जस का तस उनके हवाले से या उनका नाम दिए बगैर या भाजपा नेता के हवाले प्रसारित कर दिया। सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने मृणालिणी साराभाई के बेटे से संपर्क करके सच जानने की कोशिश की थी और लिखा था कि सैकड़ों शोक संदेश आए हैं जिन्हें उन्होंने तब तक देखा नहीं था। ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने इसकी जरूरत नहीं समझी। अब जब इंडियन एक्सप्रेस ने ज़ी न्यूज से विश्व दीपक के इस्तीफे की खबर छापी है तो लगता है कि पत्रकारिता सीखने वाले नए पुराने लोगों के लिए अंधेरे में एक किरण तो है ही।

पढ़िए इंडियन एक्सप्रेस की खबर

Zee News producer quits: Video we shot had no Pakistan Zindabad slogan

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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रजत शर्मा, आपने बस्सी जी को बचने का मौका दिया तो कन्हैया को भी अपना पक्ष रखने का मौका दीजिए!

Sanjaya Kumar Singh : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राजनीति से पत्रकारिता में आए रजत शर्मा बुधवार, 17 फरवरी को अपने चैनल पर दिल्ली के पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी से बातचीत दिखा रहे थे जिसमें बस्सी ने बार-बार पर सिर्फ यही कहा कि कन्हैया कुमार के खिलाफ “पर्याप्त सबूत” हैं। रजत शर्मा के साथ-साथ दुनिया जानती है कि सबूत होने पर ही गिरफ्तारी होती है और सबूत पर्याप्त या अकाट्य नहीं होते हैं, तभी अभियुक्त अदालत से छूटते रहते हैं। ऐसे में सबूत जुटाने वाले से ही पूछना या कहलवाना या उसे कहने का मौका देने का मतलब समझ में आता है। जिसे नहीं समझ में आता है, नहीं समझ में आएगा।

फिर भी रजत जी अगर निष्पक्ष हैं तो नैतिकता का तकाजा है कि एक बार किसी ऐसे व्यक्ति को मौका दें जो कन्हैया की तरफ से बताए कि उसे फंसाया गया है और कैसे सबूत निराधार हैं। “आप की अदालत” में ही फैसला होना है तो कन्हैया के वकील को भी मौका मिलना चाहिए ना? आपने बस्सी जी को बचने का मौका दिया तो कन्हैया को भी अपना पक्ष रखने का मौका दीजिए। कन्हैया तो जेल में है कहकर अपनी “अदालत” को खुद ही क्यों एकतरफा साबित कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जागरण की ये खबर मर्यादा की कौन सी सीमा में है?

Sanjaya Kumar Singh : बुलंदशहर के सेल्फी मामले में सच चाहे जो हो, मामला डीएम बनाम दैनिक जागरण हो गया है। मोटा-मोटी मामला ये है कि डीएम के साथ किसी ने सेल्फी लेने की कोशिश की तो डीएम ने एतराज किया और सेल्फी लेने वाले के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाकर उसे जेल भेज दिया। इस बारे में पूछने के लिए जागरण के संवाददाता ने डीएम को फोन किया तो उन्होंने कथित रूप से आपा खो दिया और “डीएम मर्यादा की सारी सीमा भूल गईं”।

ऑडियो मैंने भी सुना है पर मुझे नहीं लगता कि डीएम पर जो आरोप है वह निष्पक्ष या पूर्वग्रह से प्रेरित नहीं हैं। फिर यहां मुद्दा वह नहीं है। डीएम की कथित नाराजगी के बाद बुलंदशहर में जागरण कार्यालय के बाहर दो ट्रक कूड़ा फिंकवा दिया गया जिसके बारे में जागरण की खबर पढ़कर लगता है कि आरोप एक पक्षीय है और कबर में गंभीरता नहीं है। बहुत ही चलताऊ अंदाज में लिखी खबर का स्क्रीन शॉट देखिए। हालांकि, दैनिक जागरण को वैसे भी गंभीर या अच्छी तरह लिखी खबरों के लिए नहीं जाना जाता है पर जब वह खुद एक पक्ष है तो थोड़ी गंभीरता और संयम दिखाना बनता है।

मीडिया को मौका मिले तो न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का मौका नहीं चूकता पर अदालतों में अगर किसी का किसी मामले से जुड़ाव हो तो वह मामले से खुद को अलग कर लेता है। पर मीडिया में ऐसा कोई रिवाज नहीं है। उल्टे ऐसे मामलों में मीडिया वाले यह मान लेते हैं कि उन्हें जो जी में आए – लिखने की आजादी है। जागरण के साइट की खबर पढ़िए – ऊपर लिखा गया है कि कूड़ा सुबह सात बजे फेंका गया नीचे वह देर रात हो गया है। सुबह सात बजे और देर रात – में बहुत फर्क है और दोनों सही नहीं हो सकता। दो ट्रक दो बार में फेंके गए हैं तो बताया जाना चाहिए और यह भी कि फोन देर रात किए गए या सुबह सात बजे और फिर कितनी देर इंतजार करने के बाद जागरण वालों ने अपनी व्यवस्था की। यह सब न बताकर मौके पर मौजूद अनाम लोगों और “कई समाजसेवियों” के हवाले से अखबार ने अपनी बात लिखी है और चूंकि बार-बार फोन करने पर भी पालिका कर्मी कूड़ा उठाने नहीं पहुंचे इसलिए मान लिया गया है कि, “कूड़ा डीएम के इशारे पर फेंका गया है”।

यही नहीं, तमाम टीवी चैनल भी बुलंदशहर पहुंचने लगे हैं जबकि मीडिया का ही मामला होने के नाते लिखा जाना चाहिए था कि फंला टीवी चैनल के अमुक रिपोर्टर और कैमरा मैन आ चुके हैं और अमुक आने वाले हैं। अगर ऐसा ही था तो नैतिकता का तकाजा है कि अखबार इस बारे में खुद खबर नहीं लिखता पर इस एकतरफा और डीएम “मर्यादा की सारी सीमा भूल गईं” बताने वाली खबर में जागरण को खुद मर्यादा में रहने की जरूरत नहीं समझ में आई। जागरण ने सिर्फ तस्वीर लगा दी होती और लिखता कि यह कूड़ा इतने बजे ऐसे लोग या इस गाड़ी से इतने लोग डाल गए तो बात बन जाती, पाठकों को सूचना मिल जाती और अखबार भी मर्यादा नहीं तोड़ता। पर दूसरों को सीख देना हमेशा आसान होता है। अनाम कर्मचारियों ने दबी जुबान से जो बताया वह शीर्षक बन गया। मैं यह नहीं कह रहा कि खबर गलत है। मेरा कहना है कि खबर सही हो तो भी पक्षपातपूर्ण लग रही है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


पूरे मामले को समझने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें…

जागरण ने जो कूड़ा देश में फैलाया है उसके सामने यह कूड़ा कुछ भी नहीं

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आओ बेटा दैनिक जागरण, अब दिखाओ जलवा, एक महिला डीएम ने चेहरे पर कूड़ा पोत तुम्हारी औकात दुनिया को दिखा दी

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दैनिक जागरण की कुत्सित मानसिकता पर बुलंदशहर के सफाईकर्मियों का प्रहार, आफिस को कचरे से पाटा (देखें वीडियो)

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जबरन सेल्फी लेने वाले मनचले को जेल भिजवाने वाली डीएम चंद्रकला के पीछे क्यों पड़ा है दैनिक जागरण?

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सेल्फी प्रकरण पर जागरण के रिपोर्टर का सवाल सुनते ही आगबबूला हुई बुलंदशहर की डीएम, मां-बहन कह कह के जमकर हड़काया, सुनें यह टेप

 

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पत्रकार हो तो अरुण शौरी जैसा वरना फिर सीधा दलाल हो तो बेहतर है

Sumant Bhattacharya : पत्रकार अरुण शौरी ने पद्म सम्मान लेने से मना कर दिया.. वो भी पहले इस सूची में थे… शौरी ने कहा. मैंने किसी भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया.. पत्रकार हो तो शौरी जैसा….. वरना फिर सीधा दलाल हो तो बेहतर है…. ना शौरी ने इस पर शोर मचाया … और ना ही न्यूज हेडलाइन बनने की कोशिश की… इसे कहते सहिष्णुता. व्यवस्था का वॉच डॉग यदि .. हुकूमत से अनुकंपा लेगा तो.. फिर भौंकेगा किस पर…? शौरी के इस कदम को.. उदार ह्दय और लोकतंत्र को मजबूत करने… के कदम के तौर पर मोदी साहेब को स्वागत करना चाहिए. जाहिर है, अनुकंपा ग्रहण करने वाले… सिर्फ निर्दोष नागरिक समाज पर भौंकते हैं. हुकूमत पर नहीं..

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कल मैंने लिखा कि अरुण शौरी ने .. पहले ही चरण में पद्म पुरस्कार से खुद को हटा लिया था.. और कोई शोरशराबा भी नहीं मचाया.. तो कई मित्रों ने अरुण शौरी की पत्रकारीय नैतिकता पर हमला बोल दिया.. और यहां तक कह डाला, शौरी मंत्री पद ना मिलने से रूठे हुए हैं.. मैं जानता हूं, शौरी के बारे में उनकी समझ सेकंडरी सोर्स पर है… चलिए आप मित्रों से एक अनुभव साझा करता हूं.. मैं उस वक्त टाइम्स ऑफ इंडिया में ट्रेनिंग कर रहा था… और शौरी साहेब एक्सप्रेस छोड़ चुके थे.. हम सभी ट्रेनी ग्रुप में शौरी साहेब के ईस्ट एंड वाले घर में गए…

काफी देर तक बात होती रही… बीच-बीच में एक फोन आ रहा था लैंड लाइन पर.. बातचीत रोक कर अरुण शौरी जाते और फिर लौट कर बात करने लगते.. पांच-छह बार के बाद तंग आ गए.. अबकी जब लौटे तो उनके मुंह से निकल ही गया… तंग कर डाला… हम युवा थे, तो बेसाख्ता पूछ बैठे.. किसने सर..? शौरी साहेब ने कहा, राजीव ने.. हमारा तुरंत ही अगला सवाल था, कौन राजीव…?

शौरी साहेब बोले, राजीव गांधी…. अब हम कहां रुकने वाले थे और … तब संपादक भी आज के संपादकों की तरह भौकाल नहीं बांधते थे.. शौरी साहेब ने कहा, राजीव बार-बार एक ही बात पूछ रहा है.. सरकार से समर्थन वापस ले लूं क्या..? हमने फिर पूछा, तो आपने क्या कहा..? शौरी साहेब ने कहा, मैं उससे एक ही बात कह रहा हूं… इस वक्त देश की सरकार सिर्फ स्थायी सरकार की चाहत रखती है.. और उसके बाद राजीव गांधी ने समर्थन वापस ले लिया…. तो यह था शौरी साहेब का कद… उन पर नकारात्मक टिप्पणी करने से पहले गुजरे वक्त पर.. और संपादकों के मयार को अच्छी तरह से जांच परख लिया करें.. आज के संपादकों को देख गुजरे कल के संपादकों… पत्रकारों की हैसियत और नैतिकता को जांचने की जुर्रत कभी ना करें…. बाकि आपकी मर्जी..जो चाहें कहें और जो चाहें लिखें..

Sanjaya Kumar Singh : अरुण शौरी वो संपादक हैं जो उपप्रधानमंत्री की गाली को उन्हीं शब्दों में छाप दिया, तमाम खोजी खबरें छापने के बाद श्रेय लेने की बजाय लिखा कि लोग पूरी फाइल रीसेप्शन पर छोड़ जाते हैं सिर्फ छापने का माद्दा चाहिए और ये भी कि लिखते रहो तो लोगों को याद रहता है वरना लोग भूल जाते हैं। वो किसी गलतफहमी के शिकार कभी नहीं रहे। और पैसे पद के बारे में खुद लिख चुके हैं कि 1988-90 में 20,000 रुपए की पेंशन मिलती थी (वर्ल्ड बैंक से) और शायद अकेले संपादक हैं जो एक्सप्रेस और टीओआई दोनों में काम किया। साथ काम करने वालों को पहले नाम से जानते हैं और खुद को अरुण ही कहलाना पसंद करते हैं। एक्सप्रेस और गुरुमूर्ति की जोड़ी ने रिलायंस की जो बैंड बजाई थी – उसके बाद मौजूदा सरकार में उनके मंत्री बनने की उम्मीद किसी को नहीं होगी। अरुण शौरी को तो नहीं ही। उनका कद मंत्री से बहुत ऊंचा है।

इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के दिल्ली केंद्र में 1987 में हुई हड़ताल जब खत्म हुई तो शहर में लगे होर्डिंग पर लिखा था, इंडियन एक्सप्रेस एंड जनसत्ता आर बैक – इंसपाइट ऑफ देम। जब इंडियन एक्सप्रेस एसपी-डीएम से नहीं, सीधे प्रधानमंत्री से लोहा लेता था और तब मनमोहन सिंह जैसे भले आदमी प्रधानमंत्री नहीं थे। अरुण शौरी जैसे संपादक हड़ताल खत्म होने के बाद “गुड मॉर्निंग मिस्टर गांधी” जैसा संपादकीय लिखने की हैसियत रखते थे।

जहां तक इंडियन एक्सप्रेस, अरुण शौरी या रामनाथ गोयनका की बात है राजीव गांधी की सरकार गिरने के बाद भी अखबार सरकार का भोंपू नहीं बना। एक हस्ताक्षरित बयान में रामनाथ गोयनका ने कहा था, जहां तक मेरा सवाल है, “मैं सिर्फ यही कहूंगा कि इस तरह का मनमानी के आगे मैं घुटने नहीं टेकूंगा। अपने अंतिम सांस तक मैं आजादी के उन सिद्धांतों के लिए लड़ूंगा जिनके लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में संघर्ष किया था। एक्सप्रेस समूह के प्रत्येक पाठक और इस देश में आजादी से प्यार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति मेरा यह वादा है।” अब न ऐसा वादा करने वाले रहे और न वादा करने की हैसियत रखने वाले लोग।

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्या और संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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महंगी पड़ी भावना की राजनीति, चौदह दिन की जेल

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल पर स्याही फेंक कर चर्चा में आई भावना अरोड़ा को चौदह दिन के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। चौदह दिन की जेल अच्छे-भले अपराधी के लिए पर्याप्त है भावना जैसी गैर आपराधिक, राजनैतिक पृष्ठभूमि की युवती के लिए जीवन बदलने वाला साबित होना चाहिए। सिर्फ जीवन बदलने वाला ही नहीं, संभवतः राजनीति सीखा और करवा लेने वाला भी।

भावना ने अरविन्द केजरीवाल का विरोध करने के लिए उनपर स्याही फेंकने का बहुत ही लोकप्रिय और चर्चित तरीका अपनाने का निर्णय किया होगा तो इसकी कल्पना शायद नहीं की होगी। थोड़ी चर्चा के साथ थोड़ी पिटाई चल जाती है और महिला होने के नाते भावना ने सोचा होगा कि यह भी नहीं होगा। अगर भावना ने पिछले मामलों से प्रेरणा पाई हो तो उनके साथ धोखा हो गया। अगर राजनीति के लिए भावना का उपयोग किया गया और महिला होने का लाभ लेने की कोशिश की गई हो तो मामला उल्टा पड़ा।

अब लग रहा है कि कुल मिलाकर भावना को सौदा महंगा पड़ा। वे अपनी मां से कहकर निकली थीं, टीवी देखना। और टीवी पर दिखने के लिए 14 दिन की जेल! वे चाहे जिस पार्टी या सोच की हों, राजनीति में आगे बढ़ने का शॉर्ट कट और इसे अपनाने के उनके निर्णय में भावना की कोई जगह अब नहीं रही। राजनीति में भावना की कार्रवाई का कोई समर्थन करे या विरोध अब भुगतना भावना को ही है। हो सकता है उन्हें इसका पर्याप्त फल भी मिले पर वे इसे पचा पाएंगी कि नहीं और सच कहूं तो भावनात्मक रूप से इस लायक रहेंगी कि नहीं, यह भविष्य ही बताएगा।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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टीवी चैनलों ने ‘ज्योतिष’ को कहां पहुंचाया

Sanjaya Kumar Singh : “मुझे याद आ रहा था कि बहुत साल पहले टीवी पर अजब-गजब ख़बरों का दौर आया था। हम लोगों ने भी ऐसी बहुत सी ख़बरें दिखलाई थीं। कभी कोई जादूगर आता, कभी कोई नाक से गाने वाला आता और कभी कोई नाक से खाने वाला। कोई बालों से ट्रक खींचता, तो कोई ट्यूब लाइट ही खा जाता। मेरे एक साथी को ऐसी ख़बरों में बहुत आनंद आता था। वो इन खब़रों को इंटरनेट पर ढूंढता और फिर उन्हें अजब-गजब के नाम से दिखलाता।

एक दिन वो दफ्तर नहीं आया। मैंने उसे फोन किया तो वो रोने लगा। रोते-रोते उसने बतलाया था कि कल जब वो दफ्तर में बल्ब खाने वाला शो दिखला रहा था, उसी समय उसके सात साल के बेटे ने एक पुराने बल्ब को तोड़ कर उसकी तीन साल की बेटी को खाने के लिए दिया। उसने कहा कि देखो टीवी पर आ रहा है।

वो तो समय रहते उन बच्चों पर निगाह पड़ गई और वो नहीं हुआ, जिसके बारे में सोच कर रूह कांप जाती है। पर उसके बाद उसे लगने लगा कि हम टीवी पर जो दिखलाते हैं, उसका असर दूर-दूर तक होता है। उसके बाद ऐसी खब़रों से उसने तौबा कर ली। मैं उसे अक्सर मना करता था ऐसी ख़बरें दिखलाने से। पर जब तक अपने पर नहीं आती है, आदमी समझता नहीं।

***

कल वो छोटी-सी लड़की, जिसे अभी अपनी पढ़ाई पूरी करनी है, अपना करीयर शुरू करना है, वो मुझसे पूछ रही थी कि क्या फलां ज्योतिषी का नंबर मिल जाएगा? इसका मतलब ये हुआ कि जिन भविष्वाणियों को हम टीवी पर यूं ही टीआरपी के चक्कर में और मनोरंजन के चक्कर में दिखलाते हैं, उनका असर इस नई पीढ़ी पर भी पड़ रहा है। तो क्या ऐसा भी होता होगा कि घरेलू समस्याओं को सुलझाने के लिए लोग इन चक्करों में फंसते होंगे? ज़रूर होता होगा।

अब तक तो मैं दूसरों को नसीहत ही देता आया हूं कि ऐसा करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए। पर कल के फोन के बाद मुझे लगने लगा है कि पहले मुझे सीखने की ज़रूरत है कि हमें टीवी पर क्या दिखलाना चाहिए, क्या नहीं दिखलाना चाहिए। पहले मैं सोचता था कि पुरानी पीढ़ी ही इन ज्योतिषियों की बातें सुनती होगी, और उसका समय कटता होगा। नई पीढ़ी को तो मुझे इतना ही बतलाना है कि रिश्ते मन के भाव से सुधरते हैं। प्रेम से सुधरते हैं।

फिलहाल उस एक फोन ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है। मैं कल रात से बहुत बार कुछ-कुछ सोचता रहा हूं। मैं जो फैसला लूंगा, वो तो लूंगा ही, लेकिन फिलहाल मेरा दुख ये भी है कि आख़िर एक सास-बहू में क्यों नहीं बन पाती है? क्यों उनके बीच अहं की इतनी लड़ाई है? कुल जमा चार लोग घर मैं हैं, क्यों खुशी-खुशी साथ नहीं रह पा रहे।”

Sanjay Sinha की आज की उपरोक्त पोस्ट के इस अंश को पढ़कर याद आया कि एक बार मित्र को ज्योतिष वाला पन्ना बनाकर घर जाना था। पंडित जी का कॉलम नहीं आया था, देर हो रही थी। उस समय फोन, ई मेल थे नहीं। किसी को आकर दे जाना था। और हमारे पास इंतजार के अलावा कोई विकल्प नहीं था। हाथ का लिखा कॉलम साथी को मिलता उसके बाद वह कंपोज होता, प्रूफ रीडिंग आदि के बाद पेज में लगता तब वह साथी निकल पाता। पूरा पेज बन चुका था।

उसने अपनी परेशानी बताई तो मैंने उसे सुझाव दिया कि कोई पुराना निकाल कर लगा दे और निकल चले। सुझाव उसे पसंद आया और उसने ऐसा ही किया। बात आई-गई हो गई। किसी को पता भी नहीं चला। पर पंडित जी जब अगले सप्ताह आए तो चकित थे कि उन्होंने तो कॉलम दिया नहीं, छपा कैसे? उन्हें चिन्ता अपने धंधे की थी। और इसी से बात खुली कि पंडित जी के बिना भी ज्योतिष का कॉलम कैसे छपता रह सकता है। खैर वो कॉलम जितना महत्त्वपूर्ण था उस हिसाब से आगे कुछ नहीं हुआ और कॉलम चलता रहा। जिसे टीवी वालों ने इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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‘जी न्यूज’ के पक्ष में प्रदर्शन! सुधीर चौधरी हुए खुश, देखें तस्वीर

 

Sanjaya Kumar Singh : ज़ी न्यूज कार्यालय के बाहर इन युवकों ने ज़ी न्यूज की खबरों से एकजुटता दिखाते हुए प्रदर्शन किया और इसे जी न्यूज के रामनाथ गोयनका पुरस्कार विजेता, संपादक सुधीर चौघरी ने अपने फेसबुक पेज पर लगाया है। कैप्शन लिखा है:

Youngsters outside Zee News office to show solidarity with Zee News. It’s very heartening to see the young generation supporting a news channel which is very rare these. Thank you guys!

“यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा है कि युवा पीढ़ी एक समाचार चैनल का समर्थन करे, जो इन (दिनों) बहुत दुर्लभ है। शुक्रिया गाइज।”

(अब गाइज की हिन्दी मैं जानबूझकर नहीं लिख रहा हूं। आप जो चाहें समझ लें)।

चार घंटे में इसे 431 शेयर, 4028 लाइक और 328 कमेंट मिल चुके हैं। है ना अच्छे दिन?

अब समाचार चैनल के पक्ष में युवा इस तरह एकजुटता दिखाएं और संपादक अपने चैनल के समर्थन को इस तरह फेसबुक पर प्रचारित प्रसारित करें तो टीवी पर बेचारा कपिल शर्मा क्या करेगा?”

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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डीएनए इंडिया की एक खबर का पोस्टमार्टम : खबरों में विचार घुसेड़ने की पत्रकारिता कहां सिखाई जाती है…

खबर और विचार बिल्कुल अलग चीजें हैं। पत्रकारिता की पहली सीख होती है, खबर में विचारों का घालमेल ना हो। उसपर कोई राय भी ना दी जाए। संपादित खबरों को यथासंभव जस का तस प्रस्तुत कर दिया जाए। निर्णय लेने या विचार बनाने का काम पाठकों पर छोड़ दिया जाए। पत्रकारिता के ह्रास के साथ साथ खबरों और विचारों का अंतर भी खत्म होता जा रहा है। पत्रकारिता में विचारों की बेईमानी वैसे ही मिलाई जा रही है जैसे दूध में मिलाया गया पानी मिनरल वाटर है। आज इस शीर्षक पर नजर गई तो लगा कि यह कौन सी पत्रकारिता है और क्या यह आम पाठक के लिए की जा रही है। खबर का शीर्षक ही – एक उद्देश्य की पूर्ति करता लगता है।

उद्देश्य क्या है – सब समझते हैं। फिर भी यह बेशर्मी हो रही है तो क्या मुफ्त में। कायदे-सिद्धांतों, नीति-नियमों की बलि मुफ्त में क्यों चढ़ाई जा रही है। कहीं उद्देश्य और लक्ष्य बड़े तो नहीं है। इसपर कौन ध्यान देगा। स्टेकधारकों को ही परवाह नहीं है तो दूसरे क्यों चिन्ता करें। आइए इस खबर पर नजर डालते हैं। माफ कीजिएगा, मैंने अंग्रेजी की खबर ली है। हिन्दी की भी ले सकता था। पर वहां हालत और बुरी है। सुधार की उम्मीद और संभावनाएं बिल्कुल अलग हैं। इसलिए मैं हिन्दी की बात करना ही नहीं चाहता। यह मेरा निजी पूर्वग्रह भी हो सकता है। पर जिस ढंग से अंग्रेजी की अनूदित खबरें हिन्दी में उपयोग होती है या हिन्दी अखबारों में नौकरी की पहली शर्त अनुवाद की योग्यता होती है – इसलिए, मुझे लगता है कि अंग्रेजी की खबर की चर्चा करना अनुचित या व्यर्थ नहीं है।

यह खबर डीएनए इंडिया की है पर पीटीआई की बताई जा रही है। नीचे लिंक दिया है। कृपया नोट करें कि खबरें संपादित की जाती रहती हैं और बाद में बदल सकती हैं। मैंने जो खबर ली है वह यहां कॉपी पेस्ट है। मेरे ख्याल से शीर्षक में Odd-Even Effect: Rajiv Chowk picture was fake but, का प्रयोग एक उद्देश्य के लिए है और यह खबर का भाग नहीं है। खबर दरअसल यह है कि ऑड ईवन प्रयोग शुरू होने से दिल्ली मेट्रो में यात्रियों की संख्या बढ़ गई है और शीर्षक “Delhi metro got additional 2 lakh commuters” पर्याप्त था। चाहते तो ऑड ईवन की चर्चा भी की जा सकती थी पर फर्जी फोटो से जोड़ना उसकी ‘जरूरत’ बताने की कोशिश लगता है।

Odd-Even Effect: Rajiv Chowk picture was fake, but Delhi metro got additional 2 lakh commuters

Date published: Tuesday, 5 January 2016 – 7:05pm IST | Place: New Delhi | Agency: PTI

On Monday, a picture showing a jam packed Rajiv Chowk metro station went viral on social media prompting Delhi Metro Rail Corporation Chief Mangu Singh to clarify that it was an old image.

Delhi Metro’s ridership went up by two lakh on Monday, the first full-fledged working day since the odd-even scheme for movement of vehicles came into force in the national capital, even as DMRC officials said the train service has previously witnessed larger riderships.

खबर का पहला पैराग्राफ तो शीर्षक की पुष्टि करता है लेकिन आगे जो जानकारी है वह शीर्षक को बेमतलब बना देती है। आड ईवन से जोड़ कर जो साबित करना था वह तो हो ही नहीं रहा है। तथ्य यह है कि दिल्ली मेट्रो में इतनी राइडरशिप ऑड ईवन के बिना भी रही है। तो कायदे से खबर यही होनी थी। जो खबर दी गई है वह तो खबर है ही नहीं। राइडर शिप तो ऑड ईवन के बिना भी घटती बढ़ती रही है। दिल्ली में दरअसल इन दिनों छुट्टियां रहती हैं और काफी लोग शहर से बाहर हैं। इसलिए सोमवार यानी चार जानवरी को भले ऑड ईवन पॉलिसी का पहला दिन माना गया हो पर वह असल में था नहीं। सड़क पर गाड़ियां तो इसके असर से कम रहीं पर कार पूल और अन्य कारणों से (मेट्रो में भी यात्री बढ़े ही) और खबर अगर किसी लक्ष्य से नहीं की जाती तो आगे की जो खबर है उतनी ही होनी चाहिए थी। यही प्रमुख बात है, यही सूचना है और यही पाठकों की दिलचस्पी की चीज है। पर जबरन पाठक की दिलचस्पी अपनी दिलचस्पी के अनुसार मान ली गई है।  

Although at 28,19,657 on Monday, the figure was a good two lakh above the average daily ridership of 26 lakh, metro officials say it was nothing unusual as every first working day of the week sees such large passenger volume. As per official data, three of the last five working Mondays saw more passengers travelling on the network than yesterday. On December 21, ridership had touched 28,88,128.

On Blue Line (Line 3/4), considered as one of the most busiest corridors, four of the five Mondays had saw more ridership. On December 21, it was 10,61,814 as opposed to yesterday’s 10,09,105

देखिए यह सूचना कितनी दिलचस्प, नई या अनूठी है। पर दब गई या दबा दी गई। आगे पता चलेगा कि यह खबर दिल्ली मेट्रो के बयान पर आधारित है। बचाव यह हो सकता है कि मेट्रो ने ऐसी ही खबर दी थी। 

“Delhi Metro was successful in handling the expected huge rush on all its lines, on the first working Monday of the year. All necessary measures were already planned in advance and were in place to manage any additional rush of passengers. All lines and stations were thoroughly monitored throughout the day,” DMRC said in a statement.

During the 15-day odd-even trial, DMRC has planned to run 70 additional trips daily, taking the total figure to 3,192 to handle passenger rush.

यह बयान है। दिल्ली मेट्रो अपनी सफलता बता रहा है – पाठक को इससे क्या मतलब। यह तो मीडिया वालों की सूचना के लिए है। जिसने धक्के खाए या नहीं खाए या तस्वीर देख ली उसके लिए यह सब पढ़ने की नहीं, अनुभव करने की चीज है। फिर भी।

डीएनए की खबर का लिंक नीचे है>

http://www.dnaindia.com/india/report-odd-even-effect-rajiv-chowk-picture-was-fake-but-delhi-metro-got-additional-2-lakh-commuters-2162568

लेखक संजय कुमार सिंह मीडिया विश्लेषक हैं. आप जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. अनुवादक के बतौर लंबे समय से आत्मनिर्भर पत्रकार हैं. सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता के जरिए मीडिया व राजनीति के विभिन्न उलझे सुलझे पहलुओं पर अपने नजरिए से लिखते पढ़ते रहते हैं.

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Arise India Limited : पढ़िए इस नालायक कंपनी की कहानी एक पीड़ित पत्रकार की जुबानी

Sanjaya Kumar Singh : नाम अराइज Arise India Limited. – लक्षण चिर निद्रा में सोने वाले। मैंने पिछले साल आपकी कंपनी का एक गीजर चैम्पियन 25 लीटर खरीदा था। कुछ ही महीने उपयोग करने का बाद टपकने लगा। इस साल गीजर की जरूरत शुरू हुई तब से शिकायत करने की कोशिश करते हुए जब शिकायत दर्ज करा पाया तो मेकैनिक ने बताया कि टैंक बदलना पड़ेगा। मेरे पास खरीदने की रसीद थी, गारंटी कार्ड उस समय नहीं था। मेकैनिक फिर आने की कहकर गया और लापता रहा। दीवाली की छुट्टी के चक्कर में मैने फोन नहीं किया। फोन मिला तो बताया गया कि मैकेनिक ने कहा है कि मेरे पास गारंटी कार्ड नहीं है – इसलिए मामला खत्म।

कंपनी ने मुझे ना तो यह जानकारी देने और ना मुझसे कुछ पूछने की जरूरत समझी जबकि शिकायत करने पर मुझे एक कोड दिया गया था और शिकायत दूर हो जाने पर मुझे मेकैनिक को वह कोड बताना था। सुनने में यह व्यवस्था बहुत अच्छी लगी पर है सिर्फ दिखावा। मैंने बताया कि मेरे पास गारंटी कार्ड है और मैंने कहा भी था कि ढूंढ़ने पर मिल जाएगा। पर मेकैनिक तो कंपनी के निर्देशों का पालन कर रहा था और चूंकि काम लंबा है इसलिए मुफ्त में करने से बचने की कोशिश चल रही है। मैंने 16 नवंबर 2015 को दुबारा शिकायत कराई है जिसका नंबर है UP00115611055779 – पूरे दो दिन बाकायदा गुजर गए पर ना कोई आया ना फोन। गीजर के उपयोग का समय निकला जा रहा है और अराइज नाम से उत्पाद बेचने वाली कंपनी अपनी सुस्ती के पूरे सबूत दे रही है। गारंटी एक साल की है और एक महीने रह गए हैं।

कंपनी शायद कोशिश कर रही है कि किसी तरह यह एक महीना निकल जाए। पिछली शिकायत का नंबर है – UP0011561101848 जो 04.11.2015 की है। कंपनी ने गारंटी के 365 में से 14 दिन निकाल दिए हैं। ईमेल से शिकायत कोई नहीं देखता ना फीडबैक भेजने पर जवाब आता है। फोन कभी मिलता है कभी नहीं – उठता तो बहुत ही कम है। औऱ यह समस्या सिर्फ उपभोक्ता सेवा के साथ नहीं कंपनी के मुख्यालय के फोन के साथ भी है। कौन कहता है – नाम का असर होता है। यहां तो पूरा मामला अराइज का उल्टा है। पिछले साल तक यह कंपनी अच्छा काम कर रही थी विज्ञापन भी आ रहे थे और सुना 800 करोड़ रुपए की कंपनी है और 800 की गारंटी पूरी करने में ये हाल।

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मैंने पिछली बार लिखा था कि जिस कंपनी का नाम Arise India Limited है, उसके लक्षण चिर निद्रा में सोने वाले हैं। पर अब लग रहा है कंपनी होश में आ गई है और अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पा रही है। जैसा कि मैं लिख चुका हूं, पिछले साल मैंने कंपनी का एक गीजर चैम्पियन 25 लीटर खरीदा था। कुछ ही महीने उपयोग करने का बाद टपकने लगा। इस साल गीजर की जरूरत शुरू हुई तब से शिकायत करने की कोशिश करते हुए जब शिकायत दर्ज करा पाया तो मेकैनिक ने बताया कि टैंक बदलना पड़ेगा। मेरे पास खरीदने की रसीद थी, गारंटी कार्ड उस समय नहीं था। मेकैनिक फिर आने की कहकर गया और लापता रहा। दीवाली की छुट्टी के चक्कर में मैने फोन नहीं किया। फोन मिला तो बताया गया कि मैकेनिक ने कहा है कि मेरे पास गारंटी कार्ड नहीं है – इसलिए मामला खत्म।

कंपनी ने मुझे ना तो यह जानकारी देने और ना मुझसे कुछ पूछने की जरूरत समझी जबकि शिकायत करने पर मुझे एक कोड दिया गया था और शिकायत दूर हो जाने पर मुझे मेकैनिक को वह कोड बताना था। सुनने में यह व्यवस्था बहुत अच्छी लगी। पर है सिर्फ दिखावा। मैंने बताया कि मेरे पास गारंटी कार्ड है और मैंने कहा भी था कि ढूंढ़ने पर मिल जाएगा। पर मेकैनिक तो कंपनी के निर्देशों का पालन कर रहा था और चूंकि काम लंबा है इसलिए मुफ्त में करने से बचने की कोशिश चल रही है। मैंने 16 नवंबर 2015 को दुबारा शिकायत कराई जिसका नंबर UP00115611055779 था। कुछ नहीं हुआ। शिकायत अपने आप गायब। गीजर के उपयोग का समय निकला गया और अराइज नाम से उत्पाद बेचने वाली कंपनी अपनी सुस्ती के पूरे सबूत देती रही। गारंटी एक साल की है और शिकायत कराने के बाद काम होने में दो महीने लग गए। अभी हुआ इतना ही है कि ग्राहक शिकायत के इनके नंबर पर रोज बात हो जा रही है और रोज कल कह दिया जा रहा है।

पहली बार, 4 नवंबर 2015 को दर्ज कराई गई शिकायत का नंबर है – UP0011561101848 और भले ही कंपनी ने गारंटी कार्ड ना होने के बहाने इसे खत्म कर दिया लेकिन 23 नवंबर से दर्ज शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, यह कंपनी के रिकार्ड में है। मैं पहले लिख चुका हूं कि ई-मेल से शिकायत कोई नहीं देखता ना फीडबैक भेजने पर जवाब आता है। फोन कभी मिलता है कभी नहीं – उठता तो बहुत ही कम है। औऱ यह समस्या सिर्फ उपभोक्ता सेवा के साथ नहीं कंपनी के मुख्यालय के फोन के साथ भी है। कौन कहता है – नाम का असर होता है। यहां तो पूरा मामला अराइज का उल्टा है। पिछले साल तक यह कंपनी अच्छा काम कर रही थी विज्ञापन भी आ रहे थे। और अब यह हाल।

असल में, गीजर का टैंक सबसे महत्त्वपूर्ण और महंगा, खराब होने वाला हिस्सा है। मेरे गीजर का टैंक ही खराब है। और इन्हें अच्छा या कुछ दिन चलने वाला टैंक नहीं मिल रहा है। लगता है, कंपनी मेरे लिए कोई अच्छा या खास टैंक ढूंढ़ रही है ताकि वो फिर खराब ना हो और मैं फिर फेसबुक अभियान ना छेड़ दूं। आपको बताऊं कि फेसबुक पर भी कंपनी का पेज है उसपर मेरा लिखा प्रकाशित नहीं हुआ (The page owner will review your post) यानी देखकर प्रकाशित किया जाएगा। उसके बाद मैंने सोचा था हर सप्ताह एक अखबार में शिकायत छपवा दूं। पहले में छपने के बाद दूसरे में नहीं छपा। जो बेचारा यह कॉलम देखता है उसने अपनी लाचारी बता दी। विज्ञापनों के दम पर चलने वाली कंपनियां आजकल ऐसे ही काम करती हैं। और हम मेक इन इंडिया और मेक फॉर इंडिया में लगे हैं। कंज्यूमर की चिन्ता न कंपनियों को है और न बगैर किसी सेवा के सर्विस टैक्स वसूलने वाली सरकार को।

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने अनुवादक संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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श्रद्धांजलि : अरविन्द उप्रेती ने एक सीख तब दी थी और एक आज दी

Sanjaya Kumar Singh : अरविन्द उप्रेती जनसत्ता के अपने साथी थे। आज अचानक चले गए। उनकी मस्ती का जवाब नहीं। आराम से गुटखा खाते, काम करना और खाने–पीने के जुगाड़ में लगे रहना। इससे ज्यादा की उनकी चिन्ता या परेशानी कभी मालूम नहीं हुई। जनसत्ता की बुरी स्थिति में जब पेज भरने के लिए खबरों का अकाल सा होता था और खबरें बनाने वाले साथी न के बराबर होते थे तब भी उन्हें कभी परेशान नहीं देखा। आराम से आना और आराम से जाना। मन हुआ तो आए नहीं तो छुट्टी। ड्यूटी जो हो सो हो। बहुत पुरानी बात है। आरके पुरम में रहते थे और घर बदलना था। हमलोगों से कहा कि यार कल घर बदलना है। सुबह आ जाओ थोड़ी मदद करना और मटन खाया जाएगा। अगले दिन मैं साथी Sanjay Sinha के साथ पहुंच गया। उस समय की गृहस्थी में ज्यादा सामान तो नहीं था पर दो कमरे का घर था तो समान कम भी नहीं था। लेकिन अरविन्द भाई बगैर किसी तनाव के मिले। कोई पैकिंग नहीं थी कोई तैयारी नहीं।

स्व. अरविंद उप्रेती

हमलोग पहुंचे तभी सोकर उठे थे। रात की ड्यूटी की थी। हमारी चिन्ता घर बदलने के बाद मटन और फिर दफ्तर जाने की थी। पर वो निश्चिन्त थे। अकेले तो थे ही। मेटाडोर (गाड़ी) वाला आया, किसी तरह पैकिंग हुई और घर बदल गया। सामान शिफ्ट करने के दौरान अरविन्द भाई के घर में कई बंडल अखबार के ऐसे बरामद हुए जो खोले ही नहीं गए थे। उस समय हम पत्रकारों को अखबार के पैसे नहीं, अखबार ही भिजवाए जाते थे ताकि हम उन पैसों से कोई और काम नहीं करें और पढ़-लिखकर (काम करने के लिए) टाइट रहें। लेकिन अरविन्द भाई जो एडिशन बनाकर आते थे उसे खोलकर देखते भी नहीं थे। दूसरे अखबार पढ़ना और देखना तो दूर। हमलोगों ने खूब शोर मचाया लेकिन उनपर कोई असर नहीं। ना कोई शिकायत।

उस दिन घर बदलने के बाद अपने वादे के अनुकूल उन्होंने खुद मटन बनाकर खिलाया। लाजवाब। आज भी उसका स्वाद और उससे ज्यादा, बनाने में उनका लगन याद है। बैगर तैयारी के आराम से घर बदलकर, मटन खिलाकर हमलोगों को समय से ऑफिस के लिए रवाना कर दिया। इसके बाद से कितने ही घर बदले, कितने लोगों का घर बदलने में साथ दिया पर खाने के मामले में कोई ऐसा निश्चित नहीं रहा। सबने खाने की व्यवस्था की हुई थी। खुद किसी ने बनाया हो याद नहीं है। पत्नी वालों ने या किसी की पत्नी ने भी। ये कीर्तिमान अरविन्द भाई के नाम ही है।

बहुत पुरानी बात है अरविन्द भाई को पता चला कि मेरे चाचा फौज में हैं तो उन्होंने शराब का जुगाड़ करने देने का पहला और आखिरी निवेदन किया। मैंने बंदोबस्त कर दिया। चाचा से मैंने शराब ली तो मेरे सास-ससुर साथ थे और शादी के कुछ ही दिन हुए थे। पता नहीं इस बारे में उनलोगों ने क्या सोचा पर मुझे बाद में खटका हुआ और मैंने मन ही मन तय किया कि यह लेना-देना नहीं करूंगा। यह अरविन्द भाई से मुझे मिली पहली सीख थी और उनकी अपनी तरह की आखिरी सेवा। हालांकि, अरविन्द जी के पीने को लेकर मैं अक्सर उनसे कहना चाहता रहा कि संभल कर और जितना आप पीते हैं, उसके लिए जरूरी है कि नियमित जांच आदि कराते रहें। उनसे यह सब कहना उनके व्यवहार के इतना प्रतिकूल था कि मैं चाहकर और कई बार कोशिश करके भी कह नहीं पाया।

लगता था उनका जवाब पता है तो क्या कहना। आज इस तरह उनके अचानक चले जाने की खबर सुनकर दूसरी सीख मिली कि अगर किसी के बारे में ऐसा सोचा था तो कहना भी जरूर चाहिए। मुझे नहीं पता अरविन्द भाई इतनी जल्दी क्यों चले गए। पर शराब पीने वाले दूसरे करीबी जिस उम्र में गए हैं उससे तो लग रहा है कि वे समय से गए। गलती मेरी रही कि मैंने उन्हें रोकने की कोई कोशिश नहीं की। अरविन्द भाई के निधन पर अब अफसोस ही किया जा सकता है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिवार को यह दुख सहने की शक्ति। (फोटो Ambrish Kumar के सौजन्य से)

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यादें : तब अरविंद उप्रेती का जवाब था- ‘छोड़ो यार बहुत हो गई नौकरी, अब मौज करनी है’

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अरविंद उप्रेती साइलेंट रहते थे, लेकिन इतने चुपचाप चले जाएंगे, उम्मीद न थी

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छप्पन इंच का लिजलिजा सीना और केजरीवाल का हिम्मत भरा प्रयोग

Sanjaya Kumar Singh : 56 ईंची का लिजलिजा सीना… नई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से सूचना के सामान्य स्रोतों और परंपरागत तरीकों को बंद करके सेल्फी पत्रकारिता और मन की बात जैसी रिपोर्टिंग शुरू की है। प्रधानमंत्री विदेशी दौरों में पत्रकारों को अपने साथ विमान में भर या ढो कर नहीं ले जाते हैं इसका ढिंढोरा (गैर सरकारी प्रचारकों द्वारा ही सही) खूब पीटा गया पर रिपोर्टर नहीं जाएंगे तो खबरें कौन भेजेगा और भेजता रहा यह नहीं बताया गया। प्रचार यह किया गया कि ज्यादा पत्रकारों को नहीं ले जाने से प्रधानमंत्री की यात्रा का खर्च कम हो गया है लेकिन यह नहीं बताया गया कि कितना कम हुआ? किस मद में हुआ? क्योंकि, विमान तो वैसे ही जा रहे हैं, अब सीटें खाली रह रही होंगी। जो जानकारी वेबसाइट पर होनी चाहिए वह भी नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार का जनता से संवाद नहीं है।

प्रधानमंत्री भले दावा करें कि वे गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले से सोशल मीडिया पर ऐक्टिव हैं पर यह नहीं बताते कि उस समय कौन सी मीडिया पर ऐक्टिव थे। एकतरफा संवाद चल रहा है। जवाब वो देते नहीं सिर्फ मन की बात करते हैं। औचक भौचक लाहौर की यात्रा कर आए लेकिन उससे देश का क्या भला हुआ या होने की उम्मीद है इस बारे में कुछ बताया नहीं गया और पठानकोट हो गया। इसमें कोई शक नहीं कि पहले मामले को दबाने और कम करने के साथ-साथ लापरवाहियों को छिपाने की कोशिश की गई। अभी भी कोई अधिकृत खबर नहीं आ रही है और मीडिया ने मुंबई हमले के समय जो जैसी रिपोर्टिंग की थी वैसे ही कर रही है।

ना मीडिया को जनता या देश या मुश्किल में फंसे लोगों की चिन्ता है और ना सरकार में उनकी भलाई की ईच्छा शक्ति। नुकसान कम या मामूली है यह बताने की कोशिश हर कोई कर रहा है। सरकारें अमूमन ऐसी ही होती हैं। इस सरकार से भी कोई उम्मीद नहीं करता अगर ये लव लेटर लिखने का मजाक उड़ाकर सत्ता में नहीं आए होते। पर लव लेटर लिखने वाले उतना तो कर रहे थे तुमसे तो जिसपर लव लेटर लिखना बनता है उधर गर्दन नहीं घुमाई जा रही। 56 ईंची सीना इतना लिजलिजा हो सकता है यह अंदाजा किसी को नहीं था। बात सिर्फ पठानकोट या पाकिस्तान पर हमला करने या उससे निपटने की नहीं है। आप तो अरविन्द केजरीवाल को हैंडल नहीं कर पा रहे हैं। आरोप लगा दिया कि ऑड ईवन फार्मूला भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए है और पर्दा डालने के लिए नजीब जंग को छोड़ दिया। वो भी ऐसे कि खुद को छूट मिल गई तो ऑड ईवन में जनता की याद नहीं आई पर दिल्ली सरकार डीडीसीए की जांच नहीं कर सकती है।

दिल्ली सरकार पूरी दिल्ली को (उपराज्यपाल और केंद्रीय मंत्रियों को छोड़ दे तो) नचा सकती है लेकिन डीडीसीए के घोटाले की जांच नहीं कर सकती (क्योंकि घोटाला तब हुआ तब भाजपा का असरदार नेता उसका अध्यक्ष था)। गैर सरकारी प्रचारक ये बताने में लगे हैं कि आज मेट्रो में बहुत भीड़ है। जो मेट्रो से नहीं चलता है वो जानता है कि बहुत भीड़ होती है। फोटो देखता रहा है और जो चलता है उसे पता है शुरू से हो रही है। फिर भी।

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यह प्रयोग गैर जरूरी नहीं है… दिल्ली में ऑड ईवन फॉर्मूला के बारे में आप जो चाहें कहने और राय बनाने के लिए स्वतंत्र हैं (भाषा की शालीनता उसे गंभीर बनाती है) और मैं इस स्वतंत्रता का घनघोर समर्थक हूं। पर केजरीवाल जो कर रहे हैं वह प्रयोग है, शुरू से। कहा था कि जनता अगर नहीं चाहेगी तो इसे लागू नहीं किया जा सकता है और दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट कर दिया था कि स्वयंसेवी लोगों को रोक नहीं सकेंगे। फिर भी ऑड-ईवन चल रहा है तो इसलिए कि इसे जनता का समर्थन है। हो सकता है विरोधी फेस बुक पर ही हों या फिर 2000 रुपए के जुर्माने या किसी और कारण से [इसमें सरकार विरोधी, (मोटे तौर पर भक्त) कहलाना शामिल है] मेट्रो में यात्रा कर रहे हों। कुछेक भक्त समझते हैं कि सत्ता चाटुकार या भक्त ही बनाती है पर सच यह है कि सत्ता के समर्थक और विरोधी होते ही हैं। ऐसे में, दिल्ली में प्रदूषण के मद्देनजर यह प्रयोग लाजमी हो ना हो, गैर जरूरी नहीं है।

इसके बावजूद केजरीवाल सरकार ने यह जोखिम उठाया है तो वह इसके विरोध के लिए तैयार होगी ही। लेकिन तथ्य यह है कि अमूमन सरकारें ऐसा जोखिम भी नहीं उठातीं। केजरीवाल को ड्रामा करना होता तो एलजी और केंद्रीय मंत्रियों को भी इसके दायरे में ले आते और अपने एलजी साब कहां पीछे रहने वाले थे। पर ऐसा नहीं करके उन्होंने यह प्रयोग करने का निर्णय किया है। शुरू के तीन दिन ठीक-ठाक गुजर जाने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि आज कुछ हो जाएगा पर अभी तक सब ठीक ही लगता है। विरोधी भी अभी तक यही कह रहे हैं कि मेट्रो में भीड़ बहुत ज्यादा है। सड़क पर आम सोमवार के मुकाबले ट्रैफिक बहुत कम है इससे कोई इनकार नहीं कर रहा है। अगर ऐसा है तो मेट्रो में भीड़ नियंत्रित करने के उपाय करने होंगे, किए जा सकते हैं। कर दिए जाएंगे।

मेट्रो से चलने वालों या अपनी गाड़ी छोड़कर जाने वालों को कैसी क्या दिक्कत हुई यह अभी पता नहीं चला है। अभी सिर्फ फोटुएं ही आई हीं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा है कि 15 तारीख के बाद इसपर विचार करके आगे की योजना बनाई जाएगी। अपने बारे में खुद उन्होंने सुबह ही रेडियो पर कहा था कि वे दो अन्य मंत्रियों के साथ उनकी नैनो कार से दफ्तर जाएंगे। आरोप लगाने और मजाक उड़ाने के लिए कुछ भी कहा जा सकता है।

स्कूल बसों की तरह ऑफिस बसें क्यों नहीं? सम-विषम का फार्मूला लोगों को जागरूक करने के लिए तो ठीक है। कार पूलिंग के लिए प्रेरित करने के लिए भी ठीक है। अपील करने के लिए भी अच्छा है। पर जबरदस्ती लागू करने के लिए ठीक नहीं है। अभी स्थिति यह है कि जिसके पास एक गाड़ी है वह दूसरी खरीदने की सोच रहा है और जिसके पास नहीं है उसे लिफ्ट मिलने की संभावना आधी रह गई है या उससे भी कम क्योंकि वह पूलिंग वाले साथियों को प्राथमिकता देगा। बगैर सार्वजनिक परिवहन को ठीक और दुरुस्त किए कोई भी पाबंदी लगाई जाए गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी, घटेगी नहीं। और भारत में सार्वजनिक परिवहन को ऐसा बनाना कि कार वाले उसमें (स्वेच्छा से) चलने लगें, दुरुह है।

दिल्ली में प्रदूषण का कारण पड़ोसी राज्यों से रोज आने और वापस चले जाने वाले वाहनों की बड़ी संख्या भी होती है। ऑड ईवन में इनके मामले में भी वही व्यवहार होगा पर गाजियाबाद, गुड़गांव, नोएडा और फरीदाबाद में चलने वाली गाड़ियां अपने इलाके में जो प्रदूषण फैलाती हैं उसका असर क्या दिल्ली नहीं पहुंचेगा? ऐसे में सिर्फ दिल्ली वालों से उम्मीद करना उनके साथ ज्यादती भी है। जहां तक सड़कों पर गाड़ियों के कारण प्रदूषण का सवाल है, मेट्रो चलने के बाद बहुत सारे लोग वैसे ही गाड़ी और मोटर साइकिलों से दफ्तर नहीं जाते हैं और इसका पता मेट्रो स्टेशन पर खड़ी गाड़ियों से लगता है। ज्यादातर मेट्रो स्टेशन पर पार्किंग की जगह कम पड़ जाती है। और भी लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें इसके लिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर करना होगा।

कार से दफ्तर जाने वाले के लिए मेट्रो से दफ्तर जाना मुश्किल ही नहीं कई मामलों में असंभव भी है। हर कोई खड़े होकर यात्रा नहीं कर सकता। बाकी पार्किंग से प्लैटफॉर्म तक पहुंचना भी आसान नहीं है। इतनी परेशानी के बाद जो प्रदूषण कम होगा वह किसी मंत्री या लाट साब की सरकारी गाड़ी किसी भी क्षण पूरा कर देगी। अगर वाकई सड़क पर गाड़ियां कम करनी है तो स्कूल बसों की तरह ऑफिस बसें (गाड़ियां) चलाई जानी चाहिए। हालांकि, बहुत सारे अभिभावक भिन्न कारणों से बच्चों को भी कार से स्कूल छुड़वाते हैं। इसके कारण देखते हुए ऐसे उपाय किए जाने चाहिए कि ऐसी गाड़ियों का बंदोबस्त किया जाए जो लोगों को घर से ले जाए और वापस घर छोड़े समय से, आराम से। यह काम ऑफिस वाले भी कर सकते हैं और कर्मचारी भी आपसी सहयोग से कर सकते हैं। रोज गाड़ी से दफ्तर जाने वालों के लिए इससे कम कोई उपाय उन्हें मजबूर करना है। कभी-कभी जाने वालों या जिसके पास कार खरीदने के पैसे ही ना हों उसकी बात अलग है। प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक और प्रेरित करने का लाभ यह हो कि लोग मोहल्ले के बाजार तक पैदल जाने लगें, मेट्रो स्टेशन तक पैदल चले जाएं – वह भी कम नहीं होगा और भीड़-भाड़ भी काफी कम हो जाएगी।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने अनुवादक हैं. उनका ये लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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भारत में क्रांति के लिए माहौल तैयार… वजह गिना रहे हैं जस्टिस काटजू

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

मैं कह चुका हूं कि भारत एक तरह की फ्रेंच क्रांति की ओर बढ़ रहा है। कई इतिहासकार फ्रेंच नेशनल असेम्बली के टेनिस कोर्ट ओथ को (इस्टेट्स जनरल में तीसरा इस्टेट) जो 20 जून 1789 को लिया गया था, फ्रेंच क्रांति की शुरुआत मानते हैं। मेरा मानना है कि राजेन्द्र कुमार के दफ्तर पर छापा, जिसे दिल्ली के मुख्यमंत्री के दफ्तर पर छापा माना जा रहा है, और इसपर उनकी प्रतिक्रिया (प्रधानमंत्री मोदी को मनोरोगी कहना) भारतीय क्रांति का अग्रदूत है क्योंकि अब सरकारी संस्थाएं (दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार) ने एक-दूसरे से लड़ना शुरू कर दिया है। किसी क्रांति के लिए सिर्फ लोगों का व्यथित होना पर्याप्त नहीं है। यह भी आवश्यक है कि शासक एक दूसरे से लड़ने लगें।

इन तथ्यों पर विचार करें…

भारत में लोग गहरी व्यथा में हैं। भारी गरीबी, बढ़ती बेरोजगारी (हर साल एक करोड़ युवा रोजगार बाजार में कदम रखते हैं पर हमारी अर्थव्यवस्था के संगठित क्षेत्र में हर साल रोजगार के सिर्फ पांच लाख मौके तैयार होते हैं), खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमत, कुपोषण (हमारे यहां 50% बच्चे इसके शिकार हैं), आम आदमी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं और अच्छी शिक्षा का लगभग ना होना, किसानों का आत्महत्या आदि।

हमारी राजनीतिज्ञों का हित राष्ट्रहित का बिल्कुल उल्टा है। हमारे नेता का हित चुनाव जीतना है और इसके लिए उन्हें जातीय और साम्प्रदायिक वोट बैंक यानी सामंती ताकतों को प्रभावित करना है और इन्हीं पर निर्भर रहना है। हालांकि, राष्ट्रहित में सामंती ताकतों को खत्म किए जाने, आमलोगों के बीच वैज्ञानिक विचारों के प्रचार और द्रुत औद्योगीकरण की आवश्यकता है। इन्हीं उपायों से गरीबी, बेरोजगारी आदि दूर हो सकती है और हमारे यहां आम आदमी का जीवन स्तर बेहतर हो सकता है। 

संसद से उम्मीद थी कि यह एक ऐसी संस्था होगी जहां भिन्न हितों के मतभेद बहस और चर्चा के बाद शांतिपूर्वक सुलझा लिए जाएंगे। पर इसकी स्थिति क्या हो गई है? मछली बाजार बन गया है।

हमारी सभी सरकारी संस्थाएं खोखली हो गई हैं। लगता है संविधान चुक गया है। बोलने और अभिव्यक्ति की औपचारिक आजादी, बराबरी आदि का एक गरीब, भूखे या बेरोजगार आदमी के लिए क्या मतलब है?

गुजरे कुछ दिनों में हमने देखा है कि संसद बमुश्किल चलती है। सदस्य चीखते-चिल्लाते हैं। अक्सर एक ही साथ और कभी भी सदन के बीच में पहुंच जाते हैं और बमुश्किल कोई अर्थपूर्ण बहस होती है या कोई काम हो पाता है। जब यूपीए सत्ता में थी तो भाजपा सदस्य सदन नहीं चलने देते थे (उस समय की विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने खुलेआम कहा था कि संसद को बाधित करना लोकतांत्रिक विरोध का जायज तरीका है)। अब जब एनडीए सत्ता में है, कांग्रेस और अन्य वही कर रहे हैं। मानसून सत्र यूं ही खत्म हो गया था और मौजूदा शीतकालीन सत्र का हश्र भी वही लगता है। लग रहा है कि बजट सत्र में भी यही सब दोहराया जाएगा। और यही चलता रहेगा। ऐसा लग रहा है कि चर्चा और कानून बनाने की  एक संस्था के रूप में संसद हमेशा के लिए खत्म हो गई है।

यही नहीं, बड़ी संख्या में हमारे सांसदों और विधायकों की आपराधिक पृष्ठभूमि है। हमारे राजनीतिज्ञ ज्यादातर कभी न सुधरने वाले दुष्ट दुर्जन हैं जिन्हें भारत से कोई वाजिब प्यार नहीं है बल्कि ऐसे लोग हैं जिन्होंने देश को लूटा है और देश की ज्यादातर संपदा को गुप्त विदेशी बैंकों और सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया है। ये वो लोग हैं जो जानते हैं कि कैसे जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक का लाभ उठाते हैं। अक्सर इसके लिए जातीय और धार्मिक घृणा को बढ़ावा देते हैं। हमारी नौकरशाही मोटे तौर पर भ्रष्ट हो चुकी है और यही हाल न्यायपालिका के बड़े हिस्से का है जो एक मजाक बनकर रह गई है क्योंकि मुकदमों पर फैसला आने में बहुत समय लगता है।

सामंतों ने हमारे लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है और अब ज्यादातर जगहों पर चुनाव जाति और धार्मिक वोट बैंक के आधार पर होते हैं और उम्मीदवार की प्रतिभा या योग्यता बेमतलब है।

“है मौजाजान एक कुलजुम–ए-खून काश यहीं हो आता है अभी देखिए क्या है मेरे आगे” – मिर्जा गालिब (खून का एक उग्र तूफान मेरे सामने है, काश यह इतना भर ही होता …. पर देखिए आने वाले समय में क्या कुछ आता है।” मिर्जा गालिब का यह शेर भारत में आने वाले समय के लिहाज से अशुभ और अनिष्ट सूचक है।

केंद्र की मौजूदा सरकार ‘विकास’ के जिस नारे पर सत्ता में आई थी वह फर्जी, धोखा और जुमला साबित हुआ है इसलिए, अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए कुछ लोगों के पास अब एकमात्र तरीका यह बचेगा कि वे बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले और नरसंहार कराएं तथा इसके लिए उकसाएं। वैसे ही जैसे हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ किया था।

केंद्र की मौजूदा सरकार ‘विकास’ के नारे और भारी अपेक्षाओं के साथ सत्ता में आई थी। इसका मतलब या कम से कम यह समझा गया था कि युवाओं के लिए रोजगार के लाखों मौके बनेंगे, औद्योगिक विकास होगा जिससे कारोबारियों और दूसरों को लाभ होगा तथा जनता को आम संपन्नता का लाभ मिलेगा।

ख) नई सरकार के सत्ता में आए डेढ़ साल से ऊपर हो चुके हैं पर विकास का नामों निशान नहीं है (अंग्रेजी में मेरे आलेख जिनके शीर्षक इस प्रकार हैं, देखें ‘दि शेप ऑफ थिंग्स टू कम’, ‘विकास’, ‘हेल्थकेयर इन इंडिया’, ‘भारत में कुपोषण’, ‘भारत में बेरोजगारी’, ‘दि ट्रिकल डाउन थ्योरी’, ‘दि ड्रीम हैज इवैपोरेटेड’ आदि।) इन्हें आप मेरे फेसबुक पेज और मेरे ब्लॉग justicekatju.blogspot.in पर देख सकते हैं। हमलोगों ने जो कुछ देखा है वह  स्वच्छता अभियान, घर वापसी सुशासन दिवस, योग दिवस आदि जैसे स्टंट हैं। अपने आलेखों में मैंने दिखाया है कि यह सरकार जिन आर्थिक नीतियों का पालन कर रही है उससे आर्थिक मंदी आना पक्का है। सच तो यह है कि हाल के आंकड़े से पता चलता है कि निर्माण और निर्यात घट रहा है (भारतीय रिजर्व बैंक के गवरनर रघुराम राजन ने कहा है कि ज्यादातर कारखाने 70% क्षमता पर काम कर रहे हैं)। इससे बेरोजगारी और बढ़ रही है। व्यापार की दुनिया में आमतौर पर मंदी है हालांकि मुट्ठीभर बड़े व्यापारियों को भले ही लाभ हुआ हो। आवश्यक खाद्य पदार्थों जैसे दाल और प्याज की कीमतें पहले ही आसमान छू चुकी हैं।

ग) नतीजनत यह सरकार दिन प्रतिदिन अलोकप्रिय होती जाएगी। लोगों खासकर युवाओं का भ्रम धीरे-धीरे टूटेगा और वे महसूस करेंगे कि उन्हें बेवकूफ बनाया गया और हमारे सुपरमैन ने सत्ता में आने पर भारत को स्वर्ग बनाने तथा शांग्री-ला लाने का झूठा वादा किया था और अब लोगों को अधर में छोड़ दिया है।

घ) भ्रम दूर होने और निराशा हाथ लगने के साथ भारत में लोग जिन आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं और बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी, बड़े पैमाने पर कुपोषण, किसानों की आत्महत्या आदि के साथ जिन परेशानियों से जूझ रहे हैं उसका असर यही होगा कि बड़े पैमाने पर लोकप्रिय आंदोलन चलेंगे, गड़बड़ियां होंगी देश भर में उथल-पुथल होगा।

इन सब चीजों का निष्कर्ष यह है कि भारत में एक तरह कि फ्रेंच क्रांति अवश्यंभावी लगती है। हालांकि, इससे पहले लंबी अवधि तक अराजकता रहेगी।

उपरोक्त लेख जस्टिस मार्कंडेय काटजू के अंग्रेजी में लिखे आर्टकिल का हिंदी अनुवाद है. वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक संजय कुमार सिंह ने ट्रांसलेशन का काम बिना शुल्क लिए भड़ास की खातिर किया है. संजय जी से संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है. जस्टिस काटजू का अंग्रेजी में लिखा मूल आर्टकिल पढ़ने के लिए नीचे के शीर्षक पर क्लिक करें>

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सम-विषम के नाम पर आम जनता को परेशान करने के लिए अड़ गई आम आदमी पार्टी की सरकार

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी और सरकार के आगे तर्क!! दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए जांच के तौर पर शुरू की जा रही सम विषम नंबर की कारों को सम विषम तारीखों को ही चलने देने के फैसले की घोषणा में इतनी छूट है कि – यह प्रयोग सफल हो या असफल कोई खास मतलब नहीं है। सम-विषम नंबर के नाम पर असल में दिल्ली की आबादी को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। एक आबादी जो इससे बेसर है। चाहे वह वीआईपी हो या मोटरसाइकिल चलाने वाली या महिलाएं। दूसरी आबादी इससे प्रभावित होने वालों की है और यह दिल्ली में रोज दफ्तर आने जाने वालों का है जो सबसे ज्यादा परेशानी झेलेगी। चूंकि मामला स्थायी नहीं है इसलिए परेशानी और ज्यादा है। वरना परेशान होने वाला अपने लिए कोई इंतजाम करता।

प्रयोग अवधि के दौरान छूट पाने वाली गाडियों में सीएनजी गाड़ियां तो हैं पर महंगी और तथाकथित शून्य उत्सर्जन वाली गाड़ियां नहीं हैं। इसी तरह जिस प्रदूषण जांच के नाम पर दिल्ली वालों को वर्षों से परेशान किया जा रहा है उसका भी कोई मतलब इस परीक्षण अवधि के दौरान नहीं है। सरकारें अपने फैसले कर लेती हैं, जनता से ना पूछा जाता है और ना उनकी राय का कोई मतलब होता है। इसीलिए मेक इन इंडिया और मेक फॉर इंडिया तो है लेकिन मेक फॉर कंज्यूमर की चिन्ता किसी को नहीं है। इसी तरह, प्रदूषण के बहाने नियम तो बना दिए गए, प्रयोग के तौर पर ही सही 15 दिन स्कूल भी बंद कर दिए जाएंगे तो गैर वास्तविक स्थितियों में यह पता कैसे चलेगा कि प्रयोग सफल रहा या असफल। 15 दिन स्कूल बंद करके यह प्रयोग करने से बेहतर नहीं होता कि ऐसे समय किया जाता जब स्कूल बंद रहते हैं। हालांकि, इस दौरान भी ज्यादातर अवधि में स्कूल बंद रहेंगे और ऐसे में जो आबादी दिल्ली के बाहर चली जाएगी उसका अंदाजा कैसे होगा। क्या कोई आंकड़ा है जो यह बताता हो कि छुट्टियों में कितने लोग दिल्ली से बाहर चले जाते हैं।

अगर यह निर्णय़ पक्का होता तो मनुष्य वैकल्पिक स्थायी इंतजाम करता। पर यहां वह स्थिति भी नहीं है। इसलिए प्रयोग ठीक से हो ही नहीं सकता है। उदाहरण के लिए किसी के पास दो गाड़ियां हैं और दोनों सम या विसम नंबर वाली – तो प्रयोग अवधि में वह कुछ नहीं कर सकता है। छह महीने (या ऐसी ही) पूर्व घोषणा होती तो वह कोई उपाय करता। कोई दंपति साथ जाते हैं – एक ही गाड़ी है। इसलिए पति चलाता है। पहले पता होता तो पत्नी सीख लेती, चलाने लगती। दफ्तर जाने वाली महिला 12 साल तक के बच्चे को लेकर जाएगी नहीं और पति के साथ (खुद चलाकर दूसरे नंबर वाली गाड़ी से) नहीं जा सकती है। मुझे यह भी नहीं जम रहा है। ये कुछ उदाहरण हैं मुझे नजर आ रहे हैं। जाहिर है, और भी कई होंगे। पर हर चीज जनता से पूछकर करने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस बार जनता को मौका ही नहीं दिया और प्रयोग के नाम पर 15 दिन (इसके सात-आठ दिन) एक कार वाले या सम-अथवा विषम नंबर की ज्यादा गाड़ियों वाले आम मतदाताओं को परेशान करने की ठान ली है।

हालांकि, मुझे इसमें एक रास्ता नजर आ रहा है। अगर ऐसा कर दिया जाए तो लोगों को सहूलियत हो जाएगी और सरकार को कुछ सही आंकड़े भी मिल सकते हैं। सम नंबर वाले दिन विषम और विषम नंबर वाले दिन सम नंबर की गाड़ी चलाने का जुर्माना दो हजार रुपए है। प्रयोग अवधि में इसे 10 हजार रुपए एक मुश्त कर दिया जाए और यह भी देख लिया जाए कि कितने लोग प्रदूषण कम करने के नाम पर ये पैसे देने के लिए तैयार होते हैं – और प्रयोग अवधि की यह छूट बाद में उपयुक्त समझी जाए तो स्थायी भी हो सकती है। वरना दिल्ली में ज्यादातर लोगों के पास जितना पैसा है उससे दूसरी गाड़ी के नाम पर और फिर सम या विषम नंबर वाली गाड़ी के नाम पर गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी ही घटेगी नहीं और उसका दबाव किसी ना किसी रूप में रहेगा ही।

टैक्सियों को महीने में 15 दिन ही चलाने की इजाजात देने का मतलब होगा टैक्सी वाला 15 दिन गाड़ी खड़ी रखने के पैसे यात्रियों-ग्राहकों से ही वसूलेगा। बाकी दिन वही गाड़ियां यूपी और हरियाणा में चलाएगा। प्रदूषण उधर होगा, उसका लाभ भी बढ़ जाएगा। मरेगा आम आदमी। जहां तक टैक्सी को सीएनजी से चलाने का सवाल है, मेरे टैक्सी वाले ने बड़ी व्यावहारिक समस्या बताई। उसका कहना है कि डीजल चुराकर बेचा जा सकता है, सीएनजी नहीं। इसलिए ड्राइवर सीएनजी गाड़ी चलाना नहीं चाहते हैं और यात्रियों को परेशान करते हैं ताकि मालिक उन्हें सीएनजी गाड़ी ना दें (यह बात उसने हर बार सीएनजी भराने की शिकायत करने पर ही बताई थी कि ड्राइवर जानबूझकर यात्री को परेशान करते हैं)। दिल्ली की पूर्व मुख्य शीला दीक्षित ने भी कहा है कि यह शुरुआत आधी-अधूरी तैयारी पर की जा रही है। मजे की बात यह है कि इस पर दिल्ली के अजीब राज्यपाल नजीब जंग को कोई एतराज नहीं है। शायद वे और उनकी केंद्र सरकार इस प्रयोग से मुक्त है इसलिए।

सरकार का यह व्यवहार कैसा है इसे बताने के लिए Sanjay Sinha ने यह चुटकुला लिखा था मैं भी अपनी बात इसी चुटकुले से खत्म करूंगा बाकी पत्नी और सरकार का कुछ किया नहीं जा सकता है। झेलना ही पड़ता है। चुटुकुला इस तरह है – “एक बार एक महिला अपने पति की गैरमौजूदगी में अपने प्रेमी के साथ बेडरूम सो रही में थी। पति शहर से दूर कहीं दौरे पर गया था। पत्नी को मालूम था कि पति दो दिनों के बाद ही आएगा। पर उस रात पति अचानक घर जल्दी पहुंच गया। उसने अपनी चाबी से कमरे का दरवाजा खोला और भीतर चला आया। पत्नी अचानक कमरे में अपने पति को देख कर जरा भी नहीं घबराई। उसने बहुत संयत होकर पूछा, “अरे, तुम जल्दी कैसे चले आए? तुम तो दो दिनों के लिए दौरे पर गए थे न?”

पति ने पत्नी के सवालों का जवाब देने की जगह पत्नी से पूछा कि ये कौन है?

अब पत्नी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वो लगभग चिल्लाने वाली स्थिति में थी। उसने कहा, “तुम बात मत बदलो। मैंने जो पूछा है, पहले उसका जवाब दो, तुम जल्दी कैसे आ गए?”

Arvind Kejriwal भी ऐसे ही हैं?

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. वह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर कार्य कर चुके हैं और इन दिनों कंटेंट फील्ड में बतौर उद्यमी सक्रिय हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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भक्तों की भाषा पर वर्षों चुप-शांत रहे अरुण जेटली अब केजरीवाल को भाषा संबंधी सीख दे रहे हैं

Sanjaya Kumar Singh : अरुण जेटली का महत्त्व… लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जब नरेन्द्र मोदी अनोखे और बाद में जुमले घोषित किए जा चुके दावे कर रहे थे तो पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि नरेन्द्र मोदी का आर्थिक ज्ञान रसीदी टिकट के पीछे लिखे जाने भर है। नरेन्द्र मोदी ने यह कहकर इसका जवाब दिया था कि वे जानकारों के सहयोग से सरकार चलाएंगे। ऐसे में वित्त मंत्री कौन होता है यह महत्त्वपूर्ण था और जब अरुण जेटली का नाम सार्वजनिक हो गया तो समझ में आ गया कि राजा की जान किस तोते में है।

यह तो मालूम ही था कि अरुण जेटली को अमृतसर से मशहूर क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू की जगह टिकट दिया गया था और वे कांग्रेस के अमरेन्द्र सिंह से चुनाव हार गए थे। फिर भी मंत्री बने तो उनका महत्त्व नहीं समझने वाला राजनीति का कोई नवसिखुआ ही होगा। इसलिए, कीर्ति आजाद ने जब डीडीसीए के मामले में ही सही, अरुण जेटली के खिलाफ मोर्चा खोल लिया तो मामला गंभीर होना ही था। कीर्ति आजाद ने अपनी ओर से सावधानी बरती भी लेकिन कीर्ति के खुलासे का लाभ उठाने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपना हिसाब बराबर करने की कोशिश में अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के नेताओं ने अरुण जेटली को अपनी सहिष्णुता दिखाने का मौका दिखा और उन्होंने उसकी कीमत 10 करोड़ रुपए लगाई।

भक्तों की भाषा पर वर्षों चुप और शांत रहे अरुण जेटली अब अरविन्द केजरीवाल को भाषा संबंधी सीख दे रहे हैं (वे कह रहे हैं कि अरविन्द मुख्यमंत्री हैं उसका ख्याल उन्हें रखना चाहिए बाकी लोगों की बात अलग है) पर यह अलग मुद्दा है। जेटली के महत्त्व का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि मानहानि के मामले में जब वे बयान दर्ज करवाने अदालत पहुंचे तो उनके साथ केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी और पीयूष गोयल भी थे। जेटली के अदालत पहुंचने से पहले उनके समर्थक कोर्ट के बाहर मौजूद रहकर नारेबाजी करते रहे। पटियाला हाउस कोर्ट में इस पर 5 जनवरी को सुनवाई होगी।

खास बात यह रही कि जेटली ने कीर्ति आज़ाद के खिलाफ केस दर्ज नहीं किया है। उधर, भारतीय जनता पार्टी ने अरुण जेटली के महत्त्व को समझते हुए, कीर्ति आजाद को पार्टी से निलंबित कर दिया है। अब कीर्ति का पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से यह पूछना जायज है (जब जेटली को उनसे कोई शिकायत ही नहीं है, होती तो उनके खिलाफ भी शिकायत दर्ज कराते) कि उन्हें उनका अपराध बताया जाए। यही नहीं, जेटली की ओर से दायर आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ इस मुकदमे में आम आदमी पार्टी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी पेश होंगे।

कुल मिलाकर, स्थितियां ऐसी बनीं हैं जैसे कांग्रेस की जान अगर सोनिया गांधी और राहुल गांधी में है तो केंद्र की मौजूदा सरकार की जान अरुण जेटली में है। इससे सुब्रह्मणियम स्वामी से बेहतर कौन समझेगा। सो वे कीर्ति आजाद के साथ है। और सुना है डीडीसीए के मामले में कीर्ति भी अदालत में मुकदमा दायर करेंगे (दोनों मामलों में समानता यह है कि आरोप पुराने हैं, सरकार जांच करा चुकी है, कुछ नहीं मिला है। पर जेटली को हेरल्ड मामले में और कीर्ति को डीडीसीए मामले में हुई जांच से संतोष नहीं है और जैसे स्वामी ने नेशनल हेरल्ड मामले में किया है वैसे ही वे डीडीसीए मामले में करने वाले हैं)।

रही सही कसर दिल्ली के अजीब लाटसाब नजीब जंग ने पूरी कर दी है। डीडीसीए के इस मामले में वे अरविन्द केजरीवाल की जांच कराने की कोशिशों में हमेशा की तरह अड़ंगा लगाने का अपने कर्तव्य उम्मीद के अनुसार पूरी लगन से निभा रहे हैं। और ऐसे में ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ वाली पार्टी जिसे ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ भी कहा जाता है का नया कदम देखने लायक होगा। ‘कोऊ नृप हों हमें का हानि’ – में विश्वास करने वाले सभी लोगों को मुफ्त का यह मनोरंजन मुबारक। उम्मीद है, सिर्फ मुनाफा पहुंचाने वाली मुफ्त की खबरों से टीआरपी बटोरने और टाइमपास करने को मजबूर सेल्फी मीडिया को भी इस मामले से पर्याप्त मसाला मिलेगा।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नेशनल हेरल्ड मामले में अरुण जेटली ने फेसबुक पर लिखा कि घपला हुआ है पर सरकार कार्रवाई नहीं कर रही!

Sanjaya Kumar Singh : भक्तों की भीड़ ने विवादित ढांचे पर फैसला कर दिया। राम लला तंबू में आ गए तो आ गए। 23 साल से पड़े हैं तो पड़े रहें। भक्तों को समझ में नहीं आया। अब उतने ही बुद्धिमान लोग चाहते हैं कि सलमान खान के मामले में भी वैसा ही फैसला होना चाहिए था। नेशनल हेरल्ड मामले में अरुण जेटली पूरा विवाद फेसबुक पर लिख रहे हैं। यह भी बता रहे हैं कि घपला तो हुआ है पर सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है। सरकार शायद इंतजार कर रही है कि भीड़ फैसला सुनाए ना सुनाए, राय तो बना ही ले। फैसला असल में अभी चाहिए भी नहीं। जब सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है तो अदालत में क्या मामला है यह सुब्रमणियम स्वामी को बताने दीजिए। रजत शर्मा की अदालत को दिखाने दीजिए। सुधीर चौधरी को डीएनए करने दीजिए। आप वित्त मंत्री का काम कीजिए – सुब्रमणियम स्वामी के सहायक मत बनिए। और बनिए तो मानिए कि स्वामी सरकार की ही सेवा कर रहे हैं।

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संजय दत्त को जुर्माना नहीं हुआ, सजा हुई। जेल काटना पड़ा। अदालत का फैसला है। लालू यादव चारा चोर हैं। अदालत का फैसला है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अदालती कार्रवाई का सामना करना चाहिए और सलमान खान बरी हो गए क्योंकि पैसे वाले हैं। अदालतें अखबार की खबरों के अनुसार फैसला दें या उपलब्ध तथ्यों के आधार पर। गलती हमारी है – जो गरीब बरी होते हैं उन्हें हम जानते ही नहीं हैं। हमारी दिलचस्पी इंद्राणी और पीटर मुखर्जी को सजा दिलाने में तो है पर इनकी बेटी के लापता हो जाने में नहीं होती है। फिर भी अदालत के चुने हुए फैसलों पर जनता अपना निर्णय सुनाएगी।

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सलमान खान बरी हो गए। अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए मानना पड़ेगा कि उनके खिलाफ सबूत पूरे और पर्याप्त नहीं थे। अभियोजन अपना दावा साबित नहीं कर पाया। यह तथ्य होने के बाद भी दुखद हो सकता है पर हम गौ तस्करों (और गोमांस भक्षकों) को सड़क पर पकड़कर या घर से खींच कर ना मारें – इतना तो बताता ही है ये फैसला। और ये फैसला अगर यूं ही होता तो संजय दत्त को जेल नहीं होती। हो सकता है, इसमें दोष हो, खामियां हों पर मीडिया ट्रायल से अच्छा है। अपराधी को मौत के घाट उतारने के बाद उसके निर्दोष साबित होने पर अफसोस भी ना कर पाने से अच्छा है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सेल्फीमार पत्रकारों को आज के टेलीग्राफ अखबार का पहला पन्ना जरूर पढ़ना चाहिए

Sanjaya Kumar Singh : मेरा पसंदीदा अखबार। इसी को पढ़कर पत्रकारिता का चस्का लगा था और जब इसमें अपनी रिपोर्ट छप गई तो लगा अंग्रेजी में भी छप गया। उस समय सभी पत्रिकाओं में कम से कम एक रिपोर्ट छपवा लेने का रिकार्ड बना रहा था। बाद में प्रभाष जी को बताया कि टेलीग्राफ में भी छप चुका हूं तो उन्होंने कहा कि उसकी अंग्रेजी तो हिन्दी जैसी ही (आसान) है। तब समझ में आया था कि घर में स्टेट्समैन आने के बावजूद मुझे टेलीग्राफ क्यों अच्छा लगता था। पर अब भी अच्छा लग रहा है तो उसका कारण कुछ और है। इसके संस्थापक संपादक कांग्रेस से होते हुए भाजपा में पहुंच गए हैं पर अखबार के तेवर लगभग वैसे ही है। सेल्फी पत्रकारों के इस दौर में भी।

टेलीग्राफ के फ्रंट पेज को आप उपर देख रहे हैं. लीड खबर का टेक्स्ट मैटरर यहां दिया जा रहा है:

Q: THIS IS THE MEDIA WE EXPECT WILL ASK TOUGH QUESTIONS OF THIS GOVERNMENT?
— Omar Abdullah, former CM, Jammu & Kashmir

– A: TWO PICTURES ARE WORTH A THOUSAND WORDS

Our Special Correspondent

Journalists mob Prime Minister Narendra Modi for clicking selfies with him during the Diwali Mangal Milan at the BJP headquarters in New Delhi on Saturday. Former Jammu and Kashmir chief minister Omar Abdullah later tweeted: “This is the media we expect will ask tough questions of this government? Great visuals of an undignified selfie circus!!!” (PTI pictures)

New Delhi, Nov. 28: One journalist rested part of a cheek against Narendra Modi’s, aimed his cellphone with a sharpshooter’s concentration and clicked away.

The occasion was a Diwali bash Modi and BJP president Amit Shah hosted at the party headquarters today for journalists.

An indulgent security apparatus made a token show of warding the admirers off now and then as the Prime Minister was pursued by a gaggle of wide-eyed, selfie-seeking journalists for 45 minutes around the circumference of the huge lawn on 9 Ashoka Road.

Modi and Shah spoke briefly from a specially mounted dais that seated ministers Arun Jaitley, M. Venkaiah Naidu and Nitin Gadkari and Ramlal, the BJP general secretary (organisation).

The unstated rule was the audience would not ask questions because it was not intended to be a “media conference”.

Presumably because there was little else to do, some – not all – among the milling crowd of journalists steeled themselves to shoot photographs with the Prime Minister.

Once Modi dismounted and “mingled” with the gathering, out came the mobiles and click went the camera buttons.

Just as one Modi fan, “lucky” enough to thread his way through the crowd and reach close to his object of admiration, readied to click, another would sneak his palm in, put his phone over that of the first one and shoot, leaving his rival fuming. The nifty sleight of hand was pulled off in two or three seconds.

Every five steps the Prime Minister took – with the BJP’s young MP Anurag Thakur and media cell chief Shrikant Sharma in tow – was milestoned by a selfie stopover.

When the selfie perambulation concluded, Modi stopped by for a few seconds to wish journalists he recognised from the years he had spent at the party office as a general secretary.

Many of the selfie-seekers posted their visual trophies on their Twitter and Facebook walls.

For much of the day, the media scramble trended on Twitter in a handle, #ModiMediaGate, that panned journalists for the open adulation.

A Twitterer, Aditi, announced that Modi had launched the “Pradhan Mantri Journalist Selfie Yojana” although the Prime Minister is not known to have played any role in triggering the photo-op rush.

Omar Abdullah, National Conference leader and former Jammu and Kashmir chief minister, was unsparing on the journalists who fell over each other to click the selfies. “This is the media we expect will ask tough questions of this government? Great visuals of an undignified selfie circus!!!”

L.K. Advani, who had famously voiced the opinion that when journalists were asked to “bend” during the Emergency, they “crawled”, was not at the venue to say what he thought of present-day journalists doing the opposite – straining and stretching on their toes – but with the same overawed mindset.

Veteran editor Kuldip Nayar, who was jailed during the Emergency, lamented the fawning on display.

“Modi’s public relationship is better than the others. Otherwise, he does not deserve all this adulation because he has not delivered anything on the ground. Journalists today lack the guts. The establishment does not have to do anything because journalists willingly offer their necks,” Nayar told The Telegraph.

Last year, too, the BJP had hosted a post-Diwali bash at the same place. Modi wore the aura of a victor then and posed for selfies although the shoots were fewer.

Modi said the Diwali do had to be deferred this time because of his packed schedule, adding that if it was not done today, he might have had to wait for Christmas, a festival that never figured on the BJP’s calendar of events. BJP chief Shah wished a great year for the country’s democratic traditions.

The wall between the ruling estates and the fourth estate (journalism) is invisible but a well-established convention in the free world.

When Saddam Hussein was captured in 2003 and Paul Bremer, the then US administrator in Iraq, made the triumphal “We-got-him” announcement, several journalists had risen to their feet and applauded.

Opinion eventually emerged that there was no room for such applause in journalism.

Ishraqat al Sadr, an editor who was among those who cheered, told his side of the story later: “I was remembering all of my friends that he (Saddam) killed, and I was thinking of the nightmares I had for three years that he had me tortured.” After applauding and jeering, al Sadr had wept.

Until George W. Bush came to power, American reporters had taken care not to say “we” for the US while asking questions and preferred a dispassionate “the US” or “the United States”.

Even in media boxes at sporting events – where writers unabashedly support home teams – a cardinal rule is never to applaud or cheer any feat on the ground. Some media organisations are so particular that jobs can be lost for transgressions. Sports Illustrated , the US media franchise , had fired motorsports reporter Tom Bowles in 2011 for cheering the winner of a race.

As Abdullah pointed out today, the scenes of journalists – supposed to be poker-faced professionals not given to displays of emotion while on assignment – competing with one another are certain to make readers and viewers wonder whether the same group can ask the ruling establishment uncomfortable questions.

Already, one of the biting criticisms against the Modi government has been that instead of managing the economy, it is trying to “manage the headlines”.

It was not always so. There was a time in India when stiletto thrusts marked the craft, however high, mighty and noble the target was.

An anecdote about Pothan Joseph, the editor who poked fun at everything under the sun through his column Over a Cup of Tea during the Nehru era, tells a vivid tale.

When Rajendra Prasad, one of the most respected public figures in Independent India, was re-elected as President amid suggestions of manoeuvring, Joseph wrote in his daily column: “Rajen Babu was sitting in his presidential suite, eagerly waiting to give his reluctant consent to continue as President.”

Readers had a good laugh but a badly hurt Rajen Babu wrote a nasty letter to the editor, according to an article in The Hindu newspaper.

Redemption awaits the bearers of selfie sticks if they can wield the professional stiletto with the same finesse and ruthlessness.

The BJP event on Saturday was covered by a reporter who watched the spectacle playing out on an LED TV screen and periodically ducked for cover from the thrusting cameras and selfie sticks.

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हिंदुस्तान टाइम्स के इस आर्टकिल से पता चला कि अरूण शौरी की पत्नी भी बीमार हैं…

(जन्म से बीमार और ह्वीलचेयर धारी पुत्र आदित्य शौरी के साथ अरुण शौरी. फोटो साभार हिंदुस्तान टाइम्स)

Sanjaya Kumar Singh : अरुण शौरी जब इंडियन एक्सप्रेस में संपादक थे तो मैं जनसत्ता में भर्ती हुआ था और प्रशिक्षु था तभी 1987 की हड़ताल हुई थी और हड़तालियों के हमले में मुझे चोटें आई थीं। इसलिए थोड़ी करीबी रही। जनसत्ता में रहते हुए अखबार के डेढ़ पन्नों में छपने वाले उनके आलेखों के बड़े हिस्से अनुवाद मैंने कई बार किया है। बाद में जब वे एक्सप्रेस में नहीं थे तो उनकी एक पुस्तक के अनुवाद के सिलसिले में उनके घर गया था।

घर ढूंढ़ने में दिक्कत तो नहीं हुई से लेकर नीचे गेट तक छोड़ने आना और स्कूटर ध्यान से चलाना तक की हिदायत देने वाले अरुण शौरी ने अपने बेटे और पत्नी से मेरा परिचय “माई फ्रेंड” के रूप में कराया था।  उनके लिखे का फैन तो हूं ही, घर पहुंचने से वापस निकलने तक उनका व्यवहार, उनके सवाल, उनकी चिन्ता और आत्मीयता दंग करने वाली थी। आज इस लेख से पता चला कि अब उनकी पत्नी भी बीमार हैं। पता नहीं, ईश्वर दुख देने के लिए पात्रों का चुनाव किस आधार पर करता है।

हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित आर्टकिल का लिंक ये है>

http://goo.gl/5Umu52

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