फर्जी सूचना पर यकीन करने का नतीजा !!

आज गाजियाबाद के एक स्कूल के बच्चों के अभिभावकों को सुबह-सुबह एसएमएस से सूचना मिली कि स्कूल बंद है। जाहिर है, बच्चों में यह सूचना सबसे पहले फैली। एक बच्चे ने अपने पिता को सूचना दी तो पिता ने बच्चे से कहा कि अपने क्लास के ग्रुप में देखो। व्हाट्सऐप्प का यह ग्रुप अभिभावकों के लिए है और स्कूल के सभी कक्षाओं के लिए अलग। अभिभावक ही उस ग्रुप में होते हैं। इस बच्चे के पिता ने उसे अपना फोन देखने के लिए कहा, बच्चे के पास उसका अलग फोन है। उसके उसके क्लास के साथी ने फोन करके एसएमएस की सूचना दी थी।
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पेट्रोल की कीमत कम करने की राजनीति और उसकी रिपोर्टिंग का खेल

केंद्र सरकार ने महीनों तक लाचारी दिखाने के बाद कल अचानक पेट्रोल के दाम कम कर दिए और भाजपा शासित राज्यों से भी कीमत कम करने के लिए कहा लिहाजा राज्यों ने भी ढाई रुपए प्रति लीटर कम कर दिए। खुद डेढ़ रुपए, तेल कंपनियों से कहकर एक रुपए औऱ राज्यों से कहकर ढाई रुपए – कुल पांच रुपए प्रति लीटर की कमी हुई है जो पर्याप्त न भी हो तो कम नहीं है। इसमें खास बात यह है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार नहीं है तो दिल्ली में कीमत 2.50 रुपए ही कम हुए। दूसरी प्रमुख बात यह है कि राज्यों में चुनाव की घोषणा होने वाली है और उससे पहले यह एक महत्वपूर्ण लोक लुभावन फैसला है। इसमें केंद्र सरकार ने अपनी उस घोषणा का भी ख्याल नहीं रखा जिसका अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है। Continue reading

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कोबरा पोस्ट का सनसनीखेज खुलासा : 29 दलों के 194 नेताओं ने चुनाव आयोग को दिए हैं गलत पैन नंबर!

कोबरा पोस्ट ने अपने एक सनसनीखेज खुलासे में दावा किया है कि देश के 194 नेताओं ने चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने के लिए दी गई जानकारी में गलत पैन नंबर दिया है। पैन मतलब पर्मानेंट अकाउंट नंबर या स्थायी खाता संख्या। यह आयकर विभाग द्वारा जारी किया जाता है और आपके तमाम आय, व्यय और संपत्ति आदि की खरीद बिक्री सब इससे जुड़े रहते हैं या जुड़े रहने चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर उनकी जांच या मिलान हो सके। आय छिपाना और बेनामी संपत्ति को रोकने के लिए पैन नंबर जरूरी है। और तो और बैंक में 50 हजार रुपए से ज्यादा नकद जमा करने पर भी पैन नंबर देना अनिवार्य है। ऐसे में इसकी महत्ता समझी जा सकती है। Continue reading

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मुख्य न्यायाधीश की खबर में दैनिक भास्कर ने सबसे ज्यादा मेहनत की है

बुधवार (03 अक्तूबर) की घटनाओं और आज के अखबारों में छपी खबरों के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण खबर है – मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई का शपथ लेना और शाम में उनके सम्मान में आयोजित समारोह में कही उनकी बातें। एक और खबर, बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती द्वारा इस साल के आखिर में राजस्थान और मध्य प्रदेश में होने वाले चुनावों के सिलसिले में कांग्रेस को कथित रूप से झटका दिए जाने की खबर का राजनीतिक महत्व है। और यह सभी अखबारों में पहले पेज पर है। ज्यादातर लीड। Continue reading

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मोदी सरकार का मीडिया मैनेजमेंट बहुत कमजोर पड़ गया… जानें ताजा हाल!

प्रचार से पुरस्कार और पुरस्कार का प्रचार

आज के अखबारों में पूरे पन्ने का एक विज्ञापन है जिसमें भारत सरकार के पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नवीन और नवीनकरणीय ऊर्जा मंत्रालय तथा पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को समस्त भारत की ओर से बधाई दी है। यह बधाई प्रधानमंत्री को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार “चैम्पियन ऑफ दि अर्थ” से सम्मानित किए जाने के लिए दी गई है। विज्ञापन कहता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पर्यावरण संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम (पर) अंकुश लगाने के प्रयासों में सराहनीय नेतृत्व प्रदान करने के लिए पॉलिसी लीडरशिप श्रेणी में पुरस्कृत किया गया है। विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पर्यावरण संरक्षण : विजन, कार्य एवं मिशन का भी जिक्र है।

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नवलखा को जमानत और मोदी के गुरूजी के लिए सरकारी कृपा

आज के अखबारों में भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गौतम नवलखा को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत मिल जाने की खबर प्रमुखता से छपी है तो द टेलीग्राफ ने इस खबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुरूजी, संभाजी भिडे के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार द्वारा छह मामले वापस लिए जाने की खबर के साथ प्रमुखता से छापा है। महाराष्ट्र ने भिडे के खिलाफ छह मामले खत्म किए – फ्लैग शीर्षक है और मोदी के गुरूजी के लिए सरकारी कृपा शीर्षक से अखबार ने इस खबर को बॉटम बनाया है। खबर के बीच में गौतम नवलखा की छोटी सी खबर फोटो के साथ है जिसका शीर्षक है, जमानत मिली।

खबर के मुताबिक भीमा कोरेगांव हिंसा के शुरुआती प्रमुख आरोपी, संघ परिवार के सहयोगी, भिडे का नाम एक जनवरी की जातीय हिंसा के बाद दाखिल कराई गई एफआईआर में था। जबकि एक साल बाद इस मामले में गिरफ्तार किए गए 10 वाम झुकाव वाले ऐक्टिविस्ट्स में से सिर्फ एक का नाम इसमें था। अखबार ने लिखा है कि आरटीआई के तहत हासिल जवाब के मुताबिक भाजपा नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने जून में भिडे के खिलाफ मामले वापस ले लिए थे। इससे पहले राज्य मंत्रिमंडल की एक उपसमिति ने इस संबंध में निर्णय लिया था। अखबार ने लिखा है कि 2014 का अपना चुनाव अभियान शुरू करने से पहले नरेन्द्र मोदी सांगली स्थित भिडे के घर गए थे और एक जनसभा में कहा था, मैं स्वयं सांगली नहीं आया हूं। मुझे भिडे गुरूजी ने आपके शहर में आने का आदेश दिया था और मैं यहां हूं।

अखबार ने आगे लिखा है, पुणे के एक वकील ने पूछा, क्या पुलिस के लिए एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करना संभव है जिसके पांव प्रधानमंत्री छूते हैं। बुजुर्ग भिडे श्री शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक हैं और अपना रास्ता अलग चुनने से पहले सतारा-सांगली-कोल्हापुर के क्षेत्र में आरएसएस के प्रचारक थे। कोल्हापुर रेंज के विशेष इंस्पेक्टर जनरल, विश्वास नांगरे पाटिल ने कहा, उन्हें 2008 से लेकर अब तक के सभी मामलों से मुक्त कर दिया गया है। अखबार के मुताबिक मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता शकील अहमद शेख ने मार्च में एक आरटीआई के जरिए जानना चाहा था कि 2008 से अब तक राजनीतिकों के खिलाफ कितने मामले वापस लिए गए हैं। दो अपीलों के बाद उन्हें शनिवार को जवाब मिला।

भिडे के खिलाफ कुछ मामले 2008 के हैं जब वे और उनके समर्थकों ने आशुतोष गोवारीकर की फिल्म जोधा अकबर के प्रदर्शन के खिलाफ ऐतिहासिक गलतियों का आरोप लगाते हुए थिएटर में तोड़-फोड़ की थी। कुछ महीनों बाद उन्होंने सांगली में भी भारी हंगामा किया था। सरकार द्वारा मामला वापस लिए जाने के छह महीने बाद भिडे का नाम एक जातीय हिन्सा में आया। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। एफआईआर में भिडे और भाजपा पार्षद तथा हिन्दू एकता मंच के संस्थापक, मिलिन्द एकबोटे का नाम था। एकबोटे जमानत पर हैं लेकिन भिडे को कभी गिरफ्तार ही नहीं किया गया। पुणे के एसपी ग्रामीण संदीप पाटिल ने भिडे के मामले में कहा कि उनके शामिल होने का कोई सबूत नहीं है। हमारे पास एकबोटे के खिलाफ सबूत है और जल्दी ही चार्जशीट दाखिल की जाएगी।

पुणे पुलिस ने मामले से संबंध में इस साल जून में पांच ऐक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार किया और पांच अन्य को अगस्त में पकड़ा। इसके लिए देश भर में कई जगह छापे मारे गए। उनपर माओवादियों से संपर्क रखने और मोदी की हत्या और सरकार गिराने की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया गया है।

Source: Navbharat Times/Internet.

पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com

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केंद्र सरकार बीमा करा रही है, दिल्ली सरकार अस्पतालों में आरक्षण

आज के हिन्दुस्तान टाइम्स में मुझे एक परेशान करने वाली खबर दिखी। खबर यह है कि दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में दिल्ली वालों के लिए 80 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी गई हैं और इससे अस्पताल के ओपीडी में भीड़ आधी रह गई है। जाहिर है, इससे दिल्ली वालों को लाभ होगा पर जो आधे लोग दिल्ली के नहीं थे और इस अस्पताल में इलाज कराते थे वे कहां जाएं? उनके लिए क्या कोई व्यवस्था हुई? कोई विकल्प है? मेरे ख्याल से नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि ये सब लोग दिल्ली से सटे गाजियाबाद में रहने वाले हैं और यहां मेरठ से भी लोग इलाज कराने आते थे। गाजियाबाद, नोएडा नए बसे इलाके हैं और यहां इलाज की सरकारी सुविधा नहीं के बराबर है। इसीलिए निजी अस्पताल तो खूब हैं पर यहां इलाज कराना सबके वश का नहीं है। इसीलिए ये लोग दिल्ली के अस्पतालों में जाते हैं।

अमर उजाला के अनुसार, “दिल्ली सरकार का कहना है कि दिल्ली के अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इसके कारण कई बार राजधानी के लोगों को ही समय पर उपचार नहीं मिल पाता है। इसलिए सरकार अभी जीटीबी अस्पताल में इस योजना की शुरुआत की है। इस अस्पताल में 17 में से 13 काउंटर सिर्फ दिल्ली वालों के लिए आरक्षित होंगे। इलाज कराने के लिए अस्पताल पहुंचने पर मरीज को अपना वोटर आईडी कार्ड दिखाना होगा। दिल्ली और बाहरी राज्यों के मरीज के बाकायदा अलग-अलग रंग के कार्ड भी बनाए जाएंगे। योजना सफल रही तो दिल्ली सरकार अपने अन्य अस्पतालों में भी इस योजना को लागू करेगी।”दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने से सरकारी अस्पतालों की स्थिति काफी बेहतर हुई है और पहले भी बिहार यूपी के अस्पतालों से बेहतर थी। दिल्ली का एम्स बिहार यूपी वालों से ही भरा रहता है। अब जब दूसरे अस्पताल ठीक हुए हैं तो बाहर से यहां आने वालों की संख्या भी बढ़ी थी। दिल्ली सरकार ने हालांकि दिल्ली से बाहर वालों के लिए रोक नहीं लगाई है पर दिल्ली वालों के लिए 80 प्रतिशत बिस्तर आरक्षित कर दिए हैं और इसी से काफी फर्क पड़ा है। देखना है केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार दिल्ली के आस-पास रहने वालों के लिए क्या व्यवस्था करती है और कब तक।

वैसे, यह खबर दूसरे अखबारों में भी है और जब यह योजना लागू करने की बात चल रही थी तबकी खबरें भी नेट पर मिलीं। वैसे तो मुझे इसका अनुमान भी था पर आयुष्मान भारत के शोर में इस खबर का अलग महत्व है। आप जानते हैं कि सरकार ने चुनाव पूर्व प्रचार के लिए आयुष्मान भारत योजना की घोषणा की है इसके तहत 10 करोड़ लोगों का पांच व्यक्ति के परिवार के हिसाब से प्रति परिवार पांच लाख रुपए का बीमा किया जाना है। अभी इस योजना मद में 2000 करोड़ रुपए रखे गए हैं और इस हिसाब से प्रति व्यक्ति बीमा का खर्च बैठता है 200 रुपए।

आपको याद होगा कि सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार जनधन बीमा योजना शुरू की थी और तमाम लोगों के खाते खुलवाए थे। शून्य जमा राशि वाले। इसमें भी बीमा की योजना थी। एक 12 रुपए के करीब की औऱ दूसरी 300 रुपए के करीब की। इस तरह यह सरकार शुरू से बीमा कराने में यकीन करती रही है। पारदर्शिता का तकाजा है कि इस बीमा से कितने लोगों को फायदा हुआ इसका विवरण सार्वजनिक किया जाता और संबंधित जानकारी आमतौर पर उपलब्ध होती। अब जाते-जाते सरकार ने बीमा कराने का काम और बढ़ा दिया है जबकि जरूरत सुविधाएं उपलब्ध कराने की ज्यादा है और सरकार जिन सुविधाओं के लिए बीमा करा रही है वह उसकी जिम्मेदारी है।

2000 करोड़ रुपए के बीमा का लाभ पता नहीं कितने लोग उठा पाएंगे और भले ही बीमा 10 करोड़ लोगों का हो जाए पर लाभान्वित वही होगा जिसे इलाज के पैसे मिल ही न जाएं समय पर मिल जाएं। पर इसकी संभावना कितनी है इसका कोई भी अनुमान लगा सकता है। खासकर तब जब प्रति व्यक्ति बीमा एक लाख रुपए का ही है और अलग-अलग बीमारियों के लिए अधिकतम राशि निश्चत है। वैसे भी यह सुविधा अस्पताल में दाखिल होने वालों के लिए है और अनुमान है कि चार प्रतिशत लोगों को ही अस्पताल में दाखिल होकर इलाज कराने की जरूरत होती है। आजकल अखबारों में सिर्फ सूचनाएं छपती हैं। उनका विश्लेषण कम होता है इसलिए आम पाठक को यह सब पता ही नहीं चलता है वह समझ रहा है कि उसका बीमा है। उसे नहीं पता कि इलाज कहां कराना है।

आम जनता को यह भी नहीं पता है कि देश भर में आयुष्मान योजना चलाने वाली सरकार (दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार इसमें शामिल नहीं है) कश्मीर में (वहां राष्ट्रपति सरकार है) सरकारी कर्मचारियों से कहा है कि वे अपने परिवार के लिए आयुष्मान जैसी ही छह लाख रुपए की बीमा योजना 8770 रुपए के करीब में खरीदें और इसके लिए वहां की सरकार ने बाकायदा निजी क्षेत्र की रिलायंस समूह की कंपनी से करार किया है। यह स्थिति तब है जब आप हम पढ़ते रहते हैं कि कश्मीर में घायल होने वाले सेना के जवानों को भी इलाज के लिए दिल्ली लाया जाता रहा है। जाहिर है वहां इलाज की सुविधा अपर्याप्त है पर सरकार वहां के सरकारी कर्मचारियों से भी कह रही है कि वे बीमा करा लें। सिर्फ छह लाख रुपए प्रति परिवार जिसमें दिल्ली आकर इलाज कराना कतई संभव नहीं होगा।

पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क anuvaad@hotmail.com

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इमेज बनाने में जुटे शिवराज की छवि का सरकारी विज्ञापन कहीं सत्यानाश तो नहीं कर रहे?

दिल्ली के हिन्दुस्तान टाइम्स में मध्य प्रदेश सरकार का दो पेज का विज्ञापन है। पहले और दूसरे पेज पर टाटा स्टील का विज्ञापन है जबकि तीसरे और चौथे पेज पर मध्य प्रदेश सरकार का यह विज्ञापन है। इस कारण अखबार का पहला पेज आज पांचवा (असल में सातवां) पेज है। जाहिर है अतिरिक्त पैसे देकर छपवाया गया है। Continue reading

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इस ‘ईमानदार’ सरकार से अच्छी तो वो ‘भ्रष्ट’ सरकार ही थी!

Sanjaya Kumar Singh : असली विकास तो महंगाई का हुआ है… इस सरकार ने असली विकास महंगाई बढ़ाने में किया है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं है। गैस की सबसिडी छुड़ा दी और जिसे दी उसके लिए इतनी महंगी है कि पूरा प्रयास ही बेकार गया। रेलों का किराया वैसे ही बढ़ा दिया है। Continue reading

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सरकारी दावा और ढिंढोरची अखबार

केंद्र सरकार ने कल (शुक्रवार, 31 अगस्त को) अर्थव्यवस्था से संबंधित आंकड़े जारी किए और इनके आधार पर दावा किया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास की दर, उम्मीद से ज्यादा 8.2 प्रतिशत रही। आज ज्यादातर अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी है। इसके साथ खबर यह भी थी कि रुपया और गिरा तथा अब एक डॉलर 71 रुपए के बराबर हो गया है। Continue reading

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The Telegraph का आज का पहला पेज फिर जबरदस्त है, जरूर देखें

Sanjaya Kumar Singh

आज का The Telegraph का पहला पेज फिर जबरदस्त है। टेलीग्राफ ने भीमा कोरेगांव मामले में बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी की कोशिश के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, ‘विरोध लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्‍व है, यदि सेफ्टी वॉल्‍व को काम करने से रोका जाएगा तो प्रेशर कुकर फट जाएगा’ और नोटबंदी पर भारतीय रिजर्व बैंक की सूचना, कि 99.3 प्रतिशत नोट वापस सिस्टम में आ गए को मिलाकर लीड बनाया है। Continue reading

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हिन्दी के लेखकों को छापेंगे नहीं और अंग्रेजी वालों का अनुवाद करने की कुव्वत नहीं है!


Sanjaya Kumar Singh

अनुवाद की गलती हिन्दी में पढ़ने का मजा खराब कर देती हैं… इंडियन एक्सप्रेस में हर इतवार को प्रकाशित होने वाले पी चिदंबरम के आज के आलेख का शीर्षक है – फर्स्ट एनार्की, नाऊ ऑटार्की (First anarchy, now autarky)। यह आलेख केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पर है। इंट्रो के एक पैरा ग्राफ से स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के काम-काज और आर्थिक नीतियों पर टिप्पणी है। Continue reading

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मैं कोलकाता के The Telegraph का फैन हूं… काश, हिन्दी में कोई ऐसा अखबार होता!

Sanjaya Kumar Singh : ऐसे कितने दिन और किसलिए चलेंगे ये अखबार? मैं कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ का फैन हूं। शुरू से। भाजपा सांसद एमजे अकबर इसके संस्थापक संपादक हैं और मैं स्थापना के समय से पढ़ रहा हूं। वो कांग्रेस होते हुए भाजपा में पहुंचे हैं। दिल्ली आने के बाद यह अखबार नहीं मिलता था पर जब भी मौका मिला पुरानी फाइलें भी पढ़ता रहा।

द टेलीग्राफ का आज (विश्वासमत के ठीक अगले दिन) का पहला पन्ना… गले लगने से 56 ईंची सीना चूर हो गया और प्रतिक्रिया गुस्से व घृणा की थी… तूफानी गले लगना (या पड़ना)… और हां, सरकार सरकार 325-126 से जीत गई (कोष्ठक में)

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अमर उजाला पढ़ना, ”मेरे लिए ‘टॉरपिडो’ की तरह है”

Sanjaya Kumar Singh : अमर उजाला पढ़ना, ”मेरे लिए ‘टॉरपिडो’ की तरह है”. अमर उजाला हिन्दी के अच्छे, बड़े और पुराने अखबारों में है। आज शर्मिष्ठा (और राष्ट्रपति प्रणब) मुखर्जी की खबर दिलचस्प है। देख रहा था कि हिन्दी के अखबारों में कहां कैसे छपी है तो पता चला अमर उजाला में भी छपी है। Continue reading

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आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं?

Sanjaya Kumar Singh : एक मशहूर टेलीविजन एंकर के बारे में Dilip Mandal की यह पोस्ट पढ़ने लायक है।

“जिस संपादक ने रोहित सरदाना को टीवी में पहली नौकरी दी थी, उन”के दर्द को कौन समझ सकता है. उन्हें क्या मालूम था कि रोहित में इतना जहर भरा है. रोहित तब बेहद मासूम बनकर उनके पास आया होगा. चूंकि मैं उस संपादक को जानता हूं, इसलिए उस दर्द को महसूस कर सकता हूं. अगर उन्हें पता होता कि रोहित की हरकतों से आगे चलकर समाज टूटेगा, तो रोहित को वह नौकरी कतई न मिलती. रोहित की हरकतों से लोगों के मन में नफरत भर रही है. इस दुष्कर्म का बोझ लेकर रोहित पता नहीं क्या बनना चाहता है. वह एक सम्मानित पत्रकार तो कभी नहीं बन पाएगा. हद से हद उसकी हैसियत उस बंदर की होगी, जिसके बनाए पुल पर चढ़कर सेना ने लंका की ओर प्रस्थान किया था. इतिहास तो राजा का होता है, बंदरों का इतिहास नहीं होता. रोहितों का इतिहास में कोई जिक्र नहीं होता. रोहित पत्रकारिता का तोगड़िया बनेगा और आखिर में रोएगा. लेकिन यह होने तक समाज को इसकी कीमत चुकानी होगी. इतनी कड़वाहट क्यों बो रहे हो रोहित? हो सकता है कि निजी जीवन में तुम या तुम्हारे परिवार का कोई दर्द हो. कोई शिकायत हो. लेकिन मासूमों के घर जलाकर उसकी कीमत वसूलोगे क्या? आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं? उन्हें ही क्या हासिल हो जाएगा? गाड़ी की लंबाई चार इंच बढ़ भी गई तो क्या? कौन देखता है, कौन जानता है, कौन पूछता है? टीआरपी की वासना में लोगों की जान चली जाएगी. अब तो रुक जाओ. पत्रकारिता नहीं तो इंसानियत की खातिर ही सही.”

दिलीप मंडल की इस पोस्ट के बाद हिन्दी टेलीविजन पत्रकारिता में नियुक्तियों पर यह लेख पढ़िए। इसे मैंने अपनी पुस्तक, ”पत्रकारिता : जो मैंने देखा, जाना, समझा”  www.goo.gl/xBHcEx में भी साभार उद्धृत किया है। इस आलेख की सिफारिश इसलिए कर रहा हूं कि इसके बारे में एक पाठक ने लिखा है, “जितेंद्र जी, आपने जो बयां किया उसे पोस्टर बनाकर दीवारों पर चिपकाना चाहिए”। लिंक यह रहा…

http://old1.bhadas4media.com/article-comment/12842-2013-07-07-08-49-31.html

आलेख जिसकी सिफारिश कर रहा हूं

http://old1.bhadas4media.com/print/12808-2013-07-05-13-58-10.html

हिन्दी पत्रकारिता के पतन को समझना हो तो काम आएगा। खासकर उदारीकरण के बाद के भारत में पत्रकारिता के क्षेत्र में आए लोगों के लिए।

पुनःश्च

आपकी मान्यता (जो भी है, जैसी भी है) का विस्तार होगा अगर आप उस टिप्पणी को पढ़ेंगे। मैंने दिलीप की पोस्ट को बतौर संदर्भ लिया है। लिखा भी है कि इसके बाद इस टिप्पणी को पढ़िए। – किसी ने पढ़कर कमेंट लिखा हो ऐसा नहीं लगता है। सबकी दिलीप (और रोहित के बारे में) एक तय राय है जिसपर बात करने, सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। चूंकि जो राय बनी है वह ऐसे ही, सुनी-सुनाई बातों पर, ऊपरी जानकारी के आधार पर है इसलिए कोई और जानना नहीं चाहता – शायद पढ़ने लिखने का रिवाज ही नहीं रह गया है। या हर कोई समझता है कि ज्यादा जानने की जरूरत नहीं है। जितेन्द्र जी को पढ़िए तो सही। यह पोस्ट दिलीप की पोस्ट पढ़वाने के लिए नहीं है। हिन्दी (टेलीविजन) पत्रकारिता पर आपकी जानकारी बढ़ाने के लिए है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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अंग्रेजी अखबार भी खबर की जगह लोरी छापते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : कानपुर में पकड़े गए 92 करोड़ रुपए के पुराने नोट वाली खबर का फॉलो अप आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी छपा है। मैं अंग्रेजी अखबारों को हिन्दी वालों के मुकाबले थोड़ा गंभीर मानता हूं और दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स को। पर ये भी सरकार के भोंपू का ही काम करते हैं।

मूल खबर थी कि कोई व्यक्ति पुराने नोट को बदलवाने का दावा कर रहा था और उसके इस आश्वासन पर देश के भिन्न शहरों से कई लोग आए थे और मूल खबर पर यकीन किया जाए तो यह पैसा किसी एक व्यक्ति का नहीं, कई लोगों का है। इसीलिए 16 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। मूल खबर में यह नहीं बताया गया था कि पुराने नोट इस समय तक कैसे बदले जा सकते थे – जबकि रिपोर्टिंग के लिहाज से और मेरे जैसे पाठक के लिए भी यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

अभी तक उसकी कोई चर्चा नहीं है जबकि इतना पैसा अगर कई लोगों से इकट्ठा किया गया था तो कोई भरोसेमंद कहानी जरूर बनाई गई होगी और यह कोई बहुत गोपनीय नहीं रहा होगा। वैसे भी कहा जाता है कि जिस बात को तीन लोग जान जाएं वह गोपनीय नहीं रह सकता है। यहां तो 16 लोग जानते ही थे। फिर भी उसपर कोई रोशनी नहीं है।

मूल खबर के फॉलो अप में आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा है कि इस राशि पर इतना टैक्स बनेगा और चूंकि एक व्यक्ति के घर से पकड़ा गया है इसलिए वही जिम्मेदार होगा, दूसरों से पूछताछ की जाएगी और अगर बाकी लोगों ने अपना स्वीकार नहीं किया तो जिसके घर से बरामद हुआ है उसी का माना जाएगा।

देखना है कि जांच एजेंसियां पुराने नोट रखने से संबंधित नया कानून लागू करती हैं कि नहीं आदि। खास बात यह है कि आज की खबर का शीर्षक यही बनाया गया है कि पकड़े गए दलाल को 483 करोड़ रुपया जुर्माना देना हो सकता है – उसके पास इतने पैसे हैं कि नहीं और नहीं हैं तो सरकार क्या करेगी आदि ज्यादा दिलचस्प और चिन्ताजनक मामलों पर खबर लगभग मौन है।

खबर में बहुत सारी बातें हैं पर यह नहीं है कि नोट बदले कैसे जाते या लोग बदले जाने के झांसे में कैसे आ गए। मजे की बात यह है कि खबर मूल मुद्दे पर तो शांत है अधिकारियों के (यानी ईमानदार सरकार) के दावे को प्रमुखता से छाप रहा है। जैसे कि नए कानून से जिसके यहां पुराने नोट बरामद हुए उसे पांच गुना जुर्माना देना होगा। ये अखबार वाले भी सरकार की तरफ से लोरी गाने और जनता को मीठी नीन्द सुलाने का ही काम कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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क्या अमित शाह का इस्तीफा नहीं होना चाहिए?

Sanjay Kumar Singh : सीबीआई जज बीएच लोया की मौत के मामले की स्वतंत्र जांच कराने की याचिका पर जब सुनवाई हो रही है तो क्या भारतीय जनता पार्टी का यह नैतिक दायित्व नहीं है कि वह अपने अध्यक्ष अमित शाह से इस्तीफा मांग ले। जैसा कि कहा जाता है न्याय होना ही नहीं चाहिए, होता हुआ दिखना भी चाहिए। इसी तरह जनता की सेवा का दावा करने वाली पार्टी को क्या न्यूनतम आदर्शों का पालन नहीं करना चाहिए उसपर अमल करते हुए नजर भी आना चाहिए।

मंत्री होना और सरकारी नौकरी में रहना एक बात है और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का अध्यक्ष होना बिल्कुल अलग बात है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण खुफिया कैमरे में एक फर्जी हथियार डीलर से पैसे लेते पकड़े गए थे तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। अबके अध्यक्ष पर हत्या कराने के आरोप हैं, गवाहों को डराने-धमकाने के परिस्थिति जन्य साक्ष्य हैं और सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों में से चार ने तकरीबन इसी मामले में ऐसी कार्रवाई की जो देश में अभी तक अनूठा और अकेला है।

दूसरी ओर अमित शाह से संबंधित मामले में राहत देने वाले जज को रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बनाने से लेकर जज लोया से पहले के आदेश और बाद की स्थितियां तथा इतना बड़ा बवाल होने के बाद जज लोया के बेटे का प्रेस कांफ्रेंस कर कहना कि उसे हत्या के मामले में कोई शक नहीं है अमित शाह की ताकत भी बताता है। यही नहीं, जज लोया के बेटे ने पहले भी बांबे हाईकोर्ट में यह बात कही थी फिर प्रेस कांफ्रेंस की जरूरत और उसका समय बहुत कुछ कहता है।

इस मामले में कारवां की खबर जज लोया की बहन और पिता के बयान पर आधारित है। उनकी सुरक्षा का भी सवाल है। इन सारी परिस्थितियों में अगर अमित शाह का कानूनन इस्तीफा देना जरूरी न हो तो क्या नैतिकता का तकाजा नहीं है कि वे स्वयं इस्तीफा दें। और अगर नहीं देते हैं तो क्या पार्टी को पार्टी के आम कार्यकर्ता को यह मांग नहीं करना चाहिए कि निष्पक्ष और बाहरी प्रभाव तथा गवाहों की सुरक्षा के लिए उनका सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष पद से अलग होना जरूरी है।

अमित शाह का अध्यक्ष बने रहना इस समय उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पार्टी के लिए नहीं है। दूसरी तरफ अगर पार्टी कानून और देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास करती है तो उसे चाहिए कि वह अपने अध्यक्ष को अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्त होने के लिए कहे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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नौकरी दिलाने वाले एक नामी पोर्टल ने प्रोफाइल बनाने के लिए इस वरिष्ठ पत्रकार से 5,000 रुपए लिए..

Sanjaya Kumar Singh : चपरासी की नौकरी और विधायक के बेटे की सफलता…  70 साल कुछ नहीं हुआ बनाम चार साल खूब काम हुआ… 2002 में जनसत्ता की नौकरी छोड़ने के बाद मुझ नौकरी ढूंढ़ने या करने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। 2011 में साथी Yashwant Singh ने bhadas4media के लिए बीता साल कैसे गुजरा पर लिखने की अपील की थी। तब मैंने लिखा था, “मेरे लिए बीता साल इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि इस साल एक ज्ञान हुआ और मुझे सबसे ज्यादा खुशी इसी से हुई। अभी तक मैं मानता था कि जितना खर्च हो उतना कमाया जा सकता है। 1987 में नौकरी शुरू करने के बाद से इसी फार्मूले पर चल रहा था। खर्च पहले करता था कमाने की बाद में सोचता था। संयोग से गाड़ी ठीक-ठाक चलती रही। …. पर गुजरे साल लगा कि खर्च बढ़ गया है या पैसे कम आ रहे हैं। हो सकता है ऐसा दुनिया भर में चली मंदी के खत्म होते-होते भी हुआ हो।

हालांकि, मई 2002 में जनसत्ता की नौकरी छोड़ते समय मैंने यह नहीं सोचा था कि नौकरी नहीं करूंगा या बगैर नौकरी के काम चल जाएगा। पर सात साल कोई दिक्कत नहीं आई। आठवें साल आई तो और भी काफी कुछ सीखने-जानने को मिला पर वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है। …. अनुवाद के अपने धंधे से खर्च नहीं चला तो नौकरी के बाजार को टटोलना शुरू किया और पाया कि बहुत खराब स्थिति में भी मैं बगैर नौकरी के घर बैठे जितना कमा ले रहा था उतने की नौकरी आसानी से उपलब्ध नहीं थी (मन लायक तो बिल्कुल नहीं) और जिन साथियों से बात हुई उनसे पता चला कि मैं जो अपेक्षा कर रहा हूं वह ज्यादा है और मुझ जैसी योग्यता वाले के लिए उतने पैसे मिलना संभव नहीं है।”

अब आता हूं 2017 पर और यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा पर। इससे पहले आप पढ़ चुके हैं कि चपरासी की नौकरी के लिए कितने और कैसे लोगों के आवेदन आए और आखिरकार वह नौकरी एक विधायक के शाहजादे को मिली। अब इसमें यह महत्वपूर्ण नहीं है कि नौकरी विधायक की सिफारिश से मिली या विधायक का बेटा ही सर्वश्रेष्ठ था। दोनों ही स्थिति अच्छी नहीं है। एक स्थिति पिछले 70 साल के कारण है और दूसरी पिछले लगभग चार साल के कारण। असल में हमारी सरकारें ऐसी ही रही हैं। आप कह सकते हैं कि हम भी ऐसे ही हैं। पर फिलहाल वह मुद्दा नहीं है।

मैं बता चुका हूं कि 2014 में देश में आई ईमानदार सरकार ने एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू किया जो छोटा-मोटा धंधा करने वालों को मार डालने का पुख्ता इंतजाम है। मैंने अपना काम छोड़कर यही बताने की कोशिश की कि मेरे जैसा सामान्य पढ़ा-लिखा, वर्षों से कंप्यूटर पर काम कर रहा व्यक्ति जो ठीक-ठाक कमा भी लेता है, जीएसटी की शर्तें पूरी नहीं कर सकता है तो आम आदमी कैसे करेंगे। सरकारी नियमों के कारण बैंक ने मेरा चालू खाता ब्लॉक कर दिया है क्योंकि 21 साल से चल रही मेरी फर्म की ऐसी कोई पहचान नहीं है जो बैंक की केवाईसी जरूरतें पूरी करे और नया मैं बनवाऊंगा नहीं। जाहिर है उसका असर काम-धंधे और कमाई पर भी पड़ा है। और यह सिर्फ मेरे साथ नहीं हुआ होगा।

2011 के आस-पास जब मैंने नौकरी का बाजार टटोलना शुरू किया था कि नौकरी दिलाने वाले एक नामी पोर्टल ने उस समय 5,000 रुपए में मेरा प्रोफाइल बनाने की पेशकश की थी। प्रोफाइल क्या बनाना था, जो डिग्री और अनुभव होगा वही ना? उसमें बेल-बूटे और फूल-पत्ती आदि तो लगने नहीं थे। पर मैंने ठगी सीखने के लिए बेवकूफ बनना स्वीकार किया और 5000 रुपए खर्च करके प्रोफाइल बनवाया। उस समय मैंने यही सोचा था कि एक इंटरव्यू कॉल भी आ गया (हिन्दी में काम करने के लिए किसी अहिन्दी क्षेत्र यथा कोलकाता, बंगलौर, चेन्नई या हैदराबाद) तो विमान किराए में अपना 5000 रुपया निकल जाएगा। मैं इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं कर रहा था। पर आज सात साल में उस प्रोफाइल पर एक इंटरव्यू कॉल भी नहीं आया। आप कह सकते हैं मैंने आवेदन ही नहीं किया होगा। यह आंशिक रूप से सही है पर मुझे नौकरी दे सकने वाले को मेरी सिफारिश करने का काम भी उस 5000 में शामिल था। वैसे भी ये कंपनी तो सही उम्मीदवार ढूंढ़कर कंपनी से कमीशन लेगी ही। तो मैंने भले कोशिश नहीं की, उस कंपनी ने तो की ही होगी। खैर।

उसी कंपनी का एक मेल आज आया। जी हां, सात साल में एक इटरव्यू नहीं करा पाने के बावजूद कंपनी मुझे छोड़ नहीं रही है (उसे लगता होगा मैं 5000 रुपए दे सकने वाला बेवकूफ हूं) और मेल आते रहते हैं। पेशकशें भी। एक बड़े हिन्दी दैनिक के स्थानीय संपादक के लिए भी फोन आया था। मैंने न्यूनतम अपेक्षा बताई और बात खत्म हो गई। फिर भी संपर्क (एकतरफा) बना हुआ है। कंपनी अब (काफी समय से) कह रही है कि मैं कोई कोर्स कर लूं (इस समय, साढ़े 53 साल की उम्र में) तो मुझे नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। हंसी आती है मैं मेल पढ़ता भी नहीं हूं। क्योंकि जमशेदपुर के एक्सएलआरआई में नौकरी करने वालों की तरक्की के लिए पार्ट टाइम कोर्स हुआ करता था (जो मैं कर सकता था) नहीं करने का अफसोस है और उसकी भरपाई के लिए 2010-11 के दौरान ही एक कोर्स के बारे में पता किया तो कुल खर्च था 17 लाख रुपए। जी हां, 17 लाख रुपए। मैंने तय किया कि बेटे पर इतने पैसे खर्च किए जाएं तो लाभ जल्दी और पक्का होगा। और हुआ। हो रहा है।

सच यही है कि दूरदृष्टि ना हो परिवार छोड़कर शिखर पर पहुंच जाइए या फिर बेटे को चपरासी बनवाइए – अपने लिए तो सब ठीक है पर देश के लिए तो कोई कोर्स कर लीजिए। कब तक हार्ड वर्क का तबला बजवाकर लोगों को ठंड से बचाइएगा।

संजय कुमार सिंह जनसत्ता अखबार में कार्य करने के बाद से अनुवाद की अपनी कंपनी का संचालन कर रहे हैं. उनसे संपर्क https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh के जरिए किया जा सकता है.

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जीएसटी के खिलाफ लगातार लिखने वाले पत्रकार संजय कुमार सिंह की फर्म का चालू खाता बैंक ने ब्लॉक किया

जीएसटी की प्रयोगशाला की अपनी अंतिम किस्त लिख चुका हैं. यह 100 वीं किस्त है. इसी दरम्यान पता चला कि एचडीएफसी बैंक ने केवाईसी के चक्कर में (मतलब, जीएसटी जैसा कोई पंजीकरण हो) मेरी फर्म का चालू खाता ब्लॉक कर दिया है जबकि नियमतः मुझे किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब आयकर रिटर्न व टीडीएस चालू खाता चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। फिर भी हमें डिजिटल लेन-देन करना है। अभी उससे निपटना है।

जीएसटी पर लिखना मैंने 50 किस्त के बाद ही बंद करना सोचा था पर इतना मसाला था कि 100 किस्तें हो गईं। कुछ और व्यस्तताओं के कारण मैंने जीएसटी की प्रयोगशाला बंद कर दी पर जीएसटी की ही सख्ती में मेरा अकाउंट ब्लॉक हो गया है। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि जीएसटी में छूट का अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा उल्टे इसका दुरुपयोग हो सकता है और छूट देने के अधिकारों का चुनावी लाभ के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। असल में अंतिम लाभार्थी तक कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है।

जीएसटी से मेरी शिकायत यही है कि पहले 10 और अब 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष तक के कारोबार को जब जीएसटी से मुक्त रखा गया है तो कंप्यूटर पर काम करने के कारण या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली के गाजियाबाद में रह कर दिल्ली और गुड़गांव के काम कंप्यूटर से करके ई-मेल से भेजने के कारण मुझपर जीएसटी की बाध्यता क्यों हो। यह तकनीक का उपयोग नहीं करने देना है। तकनीकी रूप से इसका कोई मतलब नहीं है। व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है और पहले भी ऐसी कई कोशिशें नाकाम होती रही हैं पर अभी उस विस्तार में नहीं जाउंगा। फिलहाल राहत की बात यही है कि सरकार ने इन पर छूट दे दी है और अब मेरे जैसे मामलों में जीएसटी पंजीकरण की कोई तकनीकी बाध्यता नहीं है। लेकिन बैंक वालों को यह कौन समझाएगा? लकीर के फकीरों ने मेरा (असल में मेरी पत्नी की फर्म का) खाता ब्लॉक कर दिया है।

कारण यह है कि हमलोग घर से काम करते हैं और घर हमारा अपना है। अगर किराए का होता तो हम मकान मालिक से किराए का करार अपनी फर्म के नाम से करते और बैंक उस करार के आधार पर मान लेता कि मैं अपने किराए के घर से ही अपना कारोबार करता हूं। पर चूंकि घर मेरा अपना है इसलिए ऐसा कोई करार नहीं कर सकता और जरूरत नहीं है तो किराए पर ऑफिस के लिए जगह क्यों लूं? इसी तरह, अगर मैं घर से दुकान चला रहा होता (जो गलत है पर देश भर में खुलेआम चल ही रहे हैं) तो नगर निगम से दुकान और प्रतिष्ठान प्रमाणपत्र या व्यापार लाइसेंस ले लेता – अभी भी ले सकता हूं पर नहीं है इसलिए खाता ब्लॉक है क्योंकि उस पर पैसे (रिश्वत कहिए) खर्च नहीं किए हैं।

बैंक ने ऐसे तमाम दस्तावेजों की सूची दी है जो तीन समूहों में है और मौखिक रूप से कहा गया है कि हरेक समूह का एक दस्तावेज चाहिए। समस्या हमारी इकाई की पहचान और पते को लेकर है क्योंकि हमारे मामले में ऐसे किसी दस्तावेज (दरअसल पंजीकरण) की आवश्यकता नहीं है और हम पर दबाव डाला जा रहा है कि हम कोई पंजीकरण कराएं और उसके नियमों में बंधें। लालफीताशाही के नियंत्रण में आएं। ऊपर मैंने कुछ उदाहरण दिए हैं और जो बाकी विकल्प हैं उनकी चर्चा करें तो आप पाएंगे कि देश में (दरअसल बैंक में) छोटा-मोटा प्रोपराइटरशिप कंसर्न चलाने से आसान है एचयूएफ चलाना। एचयूएफ यानी हिन्दू अविभाजित परिवार। कुछ लोग कहते हैं कि यह सुविधा हिन्दुओं के तुष्टिकरण के लिए है। यहां मैं उस विस्तार में नहीं जाउंगा पर इसकी तुलना प्रोपराइटरशिप कंसर्न से करके बताउंगा कि बाप-दादा के धन पर ऐश करना तो वैसे ही आसान है एचयूएफ की सुविधाएं उसे भोगने की पूरी व्यवस्था करता है और बैंकों ने प्रोपराइटरशिप कंसर्न को उसी के मुकाबले रखकर काम करके पैसा कमाना मुश्किल बना दिया है या बना रहे हैं।

एंटाइटी यानी इकाई के सबूत के रूप में सोल प्रोपराइटरशिप कंसर्न या एचयूएफ से एक ही दस्तावेज मांगे जाते हैं जैसे बिजली, पानी, लैंडलाइन फोन का बिल जो इकाई के नाम पर हो। एचयूएफ के मामले में यह कर्ता यानी परिवार के मुखिया के नाम पर ही होगा और यही पर्याप्त है पर प्रोपराइटरशिप कंसर्न के मामले में यह कंसर्न के नाम से चाहिए। कंसर्न के मुखिया के नाम से नहीं चलेगा। इसी तरह जो भी दस्तावेज बताए गए हैं वे मेरे मामले में आवश्यक नहीं हैं इसलिए नहीं हैं और खाता ब्लॉक है (हालांकि उसमें बहुत पैसा नहीं है)। खास बात यह है कि बैंक इस बात की जांच खुद नहीं करेगा और उसकी चिट्ठियां इस पते पर डिलीवर हो रही हैं पर वह पर्याप्त नहीं है। बैंक वाले आकर भी जांच नहीं करेंगे और ना यह कहने या लिखकर देने से मानेगें कि हम जहां रहेते हैं वहीं से अपना काम भी कर लेते हैं। इसलिए जय जय।

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है

Sanjaya Kumar Singh : प्रेस की स्वतंत्रता का भाजपाई अर्थ… अमित शाह के बेटे के खिलाफ खबर छपने पर 100 करोड़ का दावा और स्टे। हालांकि बहाल नहीं रह पाया। भाजपा के सबसे पैसे वाले सदस्यों में एक माने जाने वाले राजस्यसभा सदस्य का नाम पैराडाइज पेपर में आने पर एक सप्ताह का मौनव्रत और अगले ही दिन अखबारों के लिए विज्ञापन तैयार हो जाना – बताता है कि भाजपा के नेताओं के लिए प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का अलग मतलब है। और इसे रोकने के लिए 40 साल पुराना मामला भी अचानक निकल सकता है। आइए, फिलहाल आरके सिन्हा का मामला देखें।

मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है। हालांकि, यह विज्ञापन इंडियन एक्सप्रेस में नहीं है। पता नहीं एक्सप्रेस ने छापा नहीं या उसे दिया ही नहीं गया। भाजपा राज में विज्ञापनों का अपना खेल चल रहा है और वह अलग मुद्दा है। विज्ञापन के रूप में छपा आरके सिन्हा का स्पष्टीकरण उनके सांसद के लेटरहेड पर है और राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को संबोधित है। इसमें उन्होंने विदेशी कंपनी में शेयर होने के आरोप तो स्वीकार कर लिए हैं पर बताया है कि वह क्यों है और कैसे हुआ तथा कैसे गलत नहीं है। चुनाव के समय की जाने वाली घोषणा में इसका विवरण न होने के बारे में सफाई दी है और कारण बताया है कि नियमतः यह जरूरी नहीं है। श्री सिन्हा का यह स्पष्टीकरण अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ है।

विज्ञापन के रूप में छपे लेडर हेड पर उन्हें कानून व न्याय मंत्रालय और दूरसंचार मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य भी बताया गया है। विकीपीडिया के मुताबिक वे एक भारतीय पत्रकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक उद्यमी हैं और सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज के संस्थापक हैं। अपने पत्र में श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस पर अनैतिक पत्रकारिता का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस अखबार ने दशकों से बरकरार उनकी छवि को निहित स्वार्थों से धूमिल करने की कोशिश की है। श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस के अध्यक्ष विवेक गोयनका, मुख्य संपादक राजकमल झा और संपादकीय कर्मी रितु सरीन और श्याम लाल यादव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई शुरू करने का आग्रह किया है।

एक्सप्रेस ने यह खुलासा 6 नवंबर को छापा था और उसी दिन उन्होंने लिखकर बताया था कि वे मौनव्रत पर हैं पर आज (09 नवंबर) छपा जवाब अगले ही दिन यानी 7 नवंबर की तारीख का है। इसमें उन्होंने लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले पत्र में दिए गए तथ्य “पारदर्शितापूर्ण तरीके से” इंडियन एक्सप्रेस टीम के साथ साझा किए गए थे। इसके बावजूद एक्सप्रेस ने बगैर तथ्यों के भ्रम पैदा करने वाली खबर फैलाई है और निहित स्वार्थों के लिए छवि खराब करने का काम किया है। खास बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर के साथ बॉक्स में इनका पक्ष भी छापा था और यह सूचना भी लगाई थी कि पूरी प्रतिक्रिया के लिए एक्सप्रेस की साइट देखें। मैंने उनकी प्रतिक्रिया एक्सप्रेस की साइट पर नहीं देखी (मुझे देखने की जरूरत नहीं लगी)।

सिन्हा साब पत्रकार हैं, मुझसे भी पुराने और सीनियर पर मुझे लगता है कि एक्सप्रेस ने जो खबर छापी है वह तथ्यों पर आधारित है और जो छापा है उससे संबंधित उनके पारदर्शी जवाब का अंश भी छाप दिया है। बाकी वेबसाइट पर है। और यह तथ्य वे मान रहे हैं कि विदेशी कंपनी में शेयर है और उसकी जानकारी राज्य सभा चुनाव में नहीं दी गई थी। यही एक्सप्रेस की खबर है फिर भी वे एक्सप्रेस पर प्रेस की आजादी के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही कांग्रेस के नेताओं के नाम लेकर कहा है कि दूसरे लोगों को लक्ष्य क्यों नहीं किया जा रहा है। जबकि एक्सप्रेस ने पहले ही दिन लिखा था कि करोड़ों पेज के ये मामले 10 महीने की पड़ताल के बाद छापे जा रहे हैं औऱ अगले 40 दिनों तक छपेंगे। भाजपा की प्रेस की स्वतंत्रता के मायने बिल्कुल अलग लगते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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पैराडाइज पेपर्स ने फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ की अनैतिकता और लालच का किया खुलासा

सिंगापुर की स्टेंट बनाने वाली कंपनी ने डा. अशोक सेठ को अपने शेयर दिए और डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की.. इस तरह प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया.. कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है… यह मामला चिकित्सा पेशे में शीर्ष स्तर की अनैतिकता और लालच को दर्शाता है जहां मरीज का हित प्रमुख नहीं बल्कि डाक्टर और अस्पताल का लाभ सर्वोच्च हो गया है…

-संजय कुमार सिंह-

इंडियन एक्सप्रेस ने विदेशी कंपनियों में धन जमा करने के मामलों का अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है। खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संघटन की इस खोज में 714 भारतीय लिंक मिले हैं और ऐसी फर्में भी हैं जिनकी जांच सीबीआई कर रही है। अखबार इससे पहले पनामा पेपर छाप चुका है। इसे पैराडाइज पेपर नाम दिया गया है। अखबार का दावा है कि इस जांच में उसने 10 महीने लगाए हैं और 13.4 मिलियन (एक करोड़ 34 लाख) दस्तावेजों की जांच की है। इसके लिए 195 समाचार संगठनों के साथ मिलकर काम किया है। इनमें दि गार्जियन, बीबीसी (यूके), दि न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका), ओसीसीआरपी (रूस), ली मोन्डे (फ्रांस) , ईआई कांफिडेंशियल (स्पेन), एबीसी फोर कॉर्नर्स (ऑस्ट्रेलिया), सीबीसी/रेडियो (कनाडा), ला नैसियॉन (अर्जेन्टीना) शामिल हैं।

अखबार ने पहले पन्ने पर अपनी इस खबर को पूरे आठ कॉलम में बैनर बनाया है और उन्नी का कार्टून, “बिजनेस ऐड यूजुअल” भी लीड के साथ आ गया है. सिंगल कालम का यह छोटा सा कार्टून आज मारक है। इसमें 8 नवंबर को नोटबंदी दिवस के रूप में याद किया गया है और कहा गया है, “गुड मॉर्निंग! प्रकाश ध्वनि से थोड़ा पहले पहुंच गया है”। इसका मतलब बहुत गहरा है और समझने की जरूरत है, इसे समझाया नहीं जा सकता है। खासकर तब जब नोटबंदी का कोई फायदा दिखा नहीं सिर्फ बताया जाता रहा है और उसमें यह भी कि करोड़ों लोगों की जांच चल रही है। दो सौ लोगों को मारकर साल भर से जांच चल रही है और जैसा कि एक्सप्रेस के कार्टून में कहा गया है प्रकाश की किरण वहां से आ रही है, आवाज कहीं और से बाद में आएगी – यह विज्ञान है। लेकिन इसी को काबिलयत बना कर पेश करने का भी एक अंदाज है। संयोग से, आज इंडियन एक्सप्रेस के शुरू के पन्नों में विज्ञापनों का जैकेट नहीं है। इसलिए पढ़ना भी सुविधाजनक है और देखने में भी आज इंडियन एक्सप्रेस अपने पुराने तेवर में लग रहा है। एक्सप्रेस का यह खुलासा अभी जारी है। अखबार के कई पन्ने रंगने के बाद अभी आगे भी मसाला आएगा।    

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने खुलासे में पहले पेज पर फोर्टिस के डॉक्टर अशोक सेठ का मामला भी छापा है। शीर्षक में ही कहा गया है कि डॉ. सेठ अपने मरीजों के लिए जिस कंपनी के स्टेंट का उपयोग करते थे उन्हें उसके शेयर मिले थे। इस खबर के साथ डॉ अशोक सेठ की फोटो है और कैप्शन लगा है नो रांग डुइंग, क्लेम्स कार्डियोलॉजिस्ट अशोक सेठ। यानी कोई गलत काम नहीं, हृदय रोग विशेषज्ञ अशोक सेठ ने दावा किया। ऋतु सरीन की इस खबर के मुताबिक जांचे गए दस्तावेजों के एक सेट में यह हितों के संभावित टकराव के रूप में सामने आता है। इंडियन एक्सप्रेस ने रिकार्ड की जांच के बाद लिखा है कि पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित, फोर्टिस-एस्कॉर्ट्स के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ को 2004 में सिंगापुर आधार वाली एक कंपनी जो स्टेंट बनाती है, ने पूंजी बाजार में जाने से पहले अपने शेयर दिए थे। बाद में डॉ. सेठ ने अपने मरीजों को यही स्टेंट लगवाने की सिफारिश की और प्राप्त शेयरों से लाभ कमाया। कंपनी का नाम बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप है। यह इंटरवेंशन कार्डियोलॉजी और क्रिटिकल केयर प्रक्रियाओं के लिए चिकित्सा उपकरणों का निर्माण और उनका विपणन करती है। कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक,  बायोसेंसर्स इंटरनेशनल ग्रुप लिमिटेड का निगमन बरमुडा में 28 मई 1998 को हुआ था और यह सिंगापुर में पंजीकृत है।

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि संपर्क करने पर डॉ.सेठ ने बताया कि उन्होंने तीन साल तक बायोसेंसर्स के शेयर अपने पास रखे और 54 लाख रुपए का मुनाफा कमाकर बेच दिया। डॉ. सेठ का दावा है कि जब तक कंपनी के शेयर उनके पास रहे उन्होंने इसका उपयोग उनका दावा है कि अपने टैक्स रिटर्न में उन्होंने इसकी घोषणा की है। अखबार की खबर में हितों के टकराव आदि का विस्तार से विवरण है। जब मेरे पास कंपनी के शेयर थे (कंपनी ने आवंटित 2004 में किए थे पर इन्होंने लिया अप्रैल 2013 में पर उसी कीमत में, ठीक से समझने के लिए एक्सप्रेस की पूरी खबर देखें) तब मैंने सिर्फ सिर्फ सात बायोमेट्रिक्स स्टेंट लगाए। डॉ. सेठ का कहना है कि उनके पास कंपनी के शेयरों की संख्या बहुत मामूली थी पर इसे हितों का टकराव माना जा सकता है इसलिए जब मेरे पास शेयर थे तब मैंने बायोसेंसर्स के उत्पादों का उपयोग नहीं किया।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी मूल खबर में लिखा है, तेजी से अंतरराष्ट्रीय हो रही दुनिया में कॉरपोरेट पुनर्गठन या विस्तार के लिए विदेशी इकाई की स्थापना भले ही अवैध न हो पर एक अहम मुद्दा तो है ही कि कैसे कुछ विदेशी फर्में (यहां ऐप्पलबाई का जिक्र है) बहुराष्ट्रीय निगमों को कानून में गड़बड़ियों या चूक का लाभ उठाने का मौका देती हैं जिससे वे अपने देश में जायज टैक्स देने से बच जाती हैं। इसलिए पैराडाइज पेपर्स नियामक एजेंसियों के लिए जांच के दरवाजे खोलती हैं ताकि वे तय करें कि ये सौदे अथवा लेन-देन संबंधित देश के कायदे कानूनों के मुताबिक वैधानिक और विधिवत हैं कि नहीं। यहां सवाल उठता है कि एक्सप्रेस ने जब पनामा पेपर्स की रिपोर्ट छापी थी उसकी ही कौन सी जांच हुई और क्या फर्क पड़ा।

उल्टे, नोटबंदी की बरसी पर सरकार बता रही है कि एक साल से (नोटबंदी से मिले) कितने लोगों की जांच चल रही है और नोटो की गिनती की तरह जारी है। कार्रवाई करने में कितना समय लगेगा या कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है समझा जा सकता है। अखबार की खबर के मुताबक, लीक हुए डाटा में 180 देशों का प्रतिनिधित्व है उसमें भारत का स्थान, नामों की संख्या के लिहाज से 19वां हैं (इसका ईज ऑफ बिजनेस से संबंध है कि नहीं, राम जाने)। कुल मिलाकर 714 भारतीयों के नाम हैं। यह दिलचस्प है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐप्पलबाई के दूसरे सबसे बड़े क्लाइंट होने का श्रेय एक भारतीय कंपनी सन ग्रुप को है जिसकी स्थापना नंद लाल खेमका ने की है। इस कंपनी की 118 इकाइयां अलग-अलग देशों में हैं।

ऐप्पलबाई के भारतीय ग्राहकों में कई प्रमुख कॉरपोरेट और कंपनियां हैं जिनकी बाद में सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसी जांच भी कर रही है। और इस जांच का आलम यह है कि सीबीआई का भेजा एक लेटर रोगेटरी ऐप्पलबाई के पास पहुंच चुका है। कॉरपोरेट के अलावा जो नाम हैं उनमें अमिताभ बच्चन, नीरा राडिया और फिल्म स्टार संजय दत्त की पत्नी शामिल हैं। एक नया नाम जो मुझे चौंकाने वाला लगा वह सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज (एसआईएस) के संस्थापक और भाजपा के राज्य सभा सदस्य आरके सिन्हा से जुड़ी है। नाम तो जयंत सिन्हा, सचिन पायलट और कार्ति चिदंबरम के भी हैं पर मेरे लिए ताज्जुब वाला नाम आरके सिन्हा का ही है।  

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.


ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद, संजय कुमार सिंह के सौजन्य से, पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें : 

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जयंत सिन्हा, ईबे, पियरे ओमिडयार, नरेंद्र मोदी और बाहरी पूंजी का भारतीय चुनाव में खुला खेल!

ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह के सौजन्य से पढ़ें…

केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद pando.com पर Mark Ames ने 26 मई 2014 को लिखा था- “भारत में चुनाव के बाद एक कट्टरपंथी हिन्दू सुपरमैसिस्ट (हिन्दुत्व की सर्वोच्चता चाहने वाले) जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है, को सत्ता मिल गई है। इसके साथ ही व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जय कारने (यहां भी जय) ने कहा है कि ओबामा प्रशासन एक ऐसे व्यक्ति के साथ “मिलकर काम करने का इंतजार कर रहा है” जो अल्पसंख्यक मुसलमानों (और अल्पसंख्यक ईसाइयों) के घिनौने जनसंहार में भूमिका के लिए 2005 से अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) के वीजा ब्लैकलिस्ट में है।

इस शुरुआती पैरा ग्राफ से आपको लेखक, पांडो डॉट कॉम के तेवर और लेख का अंदाजा हो जाएगा। इसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा के बारे में लिखा था, पांडो के पाठक जानते हैं कि ओमिडयार (Omidyar Network) नेटवर्क ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार की लोकोपकारी शाखा है। 2009 से ओमिडयार नेटवर्क ने भारत में अपने पोर्टफोलियो के किसी अन्य देश की तुलना में ज्यादा निवेश किया है। ये निवेश मुख्य रूप से जयंत सिन्हा की बदौलत हैं जो मैकिन्जी के पूर्व साझेदार और हावर्ड के एमबीए हैं जिसे अक्तूबर 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स को चलाने के लिए नौकरी पर रखा गया था।

सिन्हा के कार्यकाल में ओमिडयार नेटवर्क ने अपने निवेश का बड़ा हिस्सा भारत की ओर घुमा दिया। इस तरह 2013 तक भारत में निवेश ओमिडयार नेटवर्क के प्रतिबद्ध कोष का 18 प्रतिशत जो 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा था हो चुका था। इसमें इसके पोर्टफोलियो की कुल कंपनियों का 36 प्रतिशत शामिल था। इस साल श्री सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की नौकरी छोड़ दी ताकि मोदी के चुनाव अभियान में सलाह दे सकें और भाजपा के टिकट पर एक संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ सकें। सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने 1998 से 2002 तक पिछली भाजपा सरकार में वित्त मंत्री के रूप में काम किया था जब उनकी सरकार ने परमाणु बम का परीक्षण किया था। इस साल सिन्हा के पिता ने अपनी संसदीय सीट छोड़ दी और बेटे जयंत सिन्हा को अपनी जगह लेने दी।

चुनाव प्रचार के दौरान जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने गुजरात दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी द्वारा माफी मांगने से मना किए जाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। तब उन्होंने कहा था, “मोदी सही हैं … वे माफी क्यों मांगें?”  ओमिडयार के पूर्व कर्मचारी उनके बेटे जयंत सिन्हा ने (जब लेख लिखा गया था उससे कुछ सप्ताह पहले) दावा किया कि उनके पिता की भाजपा सरकार ने 1998 में अंतरराष्ट्रीय नाराजगी को नजरअंदाज कर परमाणु बम का परीक्षण किया जिसे पोखरण के नाम से जाना जाता है। मोदी को चुनाव जीतने में सहायता करने के लिए जयंत सिन्हा के ओमिडयार नेटवर्क छोड़ने के कुछ ही समय बाद मोदी ने एक भाषण दिया जिसमें भारत के ई कामर्स बाजार को ई-बे जैसी विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की मांग की। ईबे के सबसे बड़े शेयरधारक पियरे ओमिडयार हैं।

संदेश स्पष्ट था- मोदी हाईटेक इंडिया के उम्मीदवार हैं, हिंसक अतिराष्ट्रवाद के बावजूद। इसी समय सिन्हा ने मोदी और बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों जैसे जेपी मोरगन, मोरगन स्टैनली और नोमुरा बैंक के बीच एक समिट मीटिंग का आयोजन करने में सहायता की। संभवत: इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है कि मोदी के अति राष्ट्रवादी प्रयासों की सवारी करके पिछले सप्ताहांत (लेख पुराना है, उसके हिसाब से) जब जयंत सिन्हा चुनाव जीत गए तो ओमिडयार नेटवर्क ने उन्हें बधाई दी।  इसके कुछ ही समय बाद ओमिडयार के पूर्व कर्मी (पुराने आदमी भी कह सकते हैं) ने जोर देकर कहा कि, “श्री मोदी एक महान लोकतांत्रिक (हस्ती) हैं।”

इसके बाद pando.com पर Mark Ames ने ही 9 नवंबर  2014 को (नोटबंदी के बाद) एक और दिलचस्प पीस लिखा था। इसका शीर्षक था, भारत में पियरे ओमिडयार का आदमी मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दूसरा शीर्षक था, ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार के ग्लोबल इंपैक्ट फंड में लंबे समय तक सीनियर एक्जीक्यूटिव रहे जयंत सिन्हा को भारतीय अतिराष्ट्रवादी नेता नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।  बोल्ड अक्षर में अपडेट के साथ शुरू होने वाली कहानी इस प्रकार थी – सिन्हा (जयंत) का नया पद स्पष्ट बता दिया गया है – वो अब भारत के जूनियर वित्त मंत्री हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के तहत काम कर रहे हैं। लंबे समय तक ओमिडयार का आदमी रहा व्यक्ति अब इस स्थिति में है कि 2015 का बजट तैयार करने में सहायता करेगा जिसके बारे में (प्रधानमंत्री) नरेन्द्र मोदी ने (हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक) संकेत दिया है कि “बदलाव लाने वाला” होगा। 

जयंत सिन्हा ने 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स की स्थापना की थी और फर्स्ट लुक मीडिया पब्लिशर्स इंपैक्ट फंड में साझेदार और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की पांच सदस्यों वाली ग्लोबल एक्जीक्यूटिव कमेटी में भी काम किया था तथा ओमिडयार नेटवर्क के 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा के फंड को भारत की ओर मोड़ दिया था। इस तरह इसे दुनिया के सबसे बड़े, 700 मिलिय़न डॉलर के इंपैक्ट फंड के लिए सबसे सक्रिय अकेले देश का निवेश बनाया था।  इस साल के शुरू में ओमिडयार नेटवर्क के साझेदार और प्रबंध निदेशक का पद छोड़ दिया था ताकि धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपने पिता की संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकें।

अब मोदी मंत्रिमंडल में सिन्हा की नियुक्ति ने उन्हें पिछले दो सप्ताह में किसी दक्षिण पंथी, कारोबार समर्थक सरकार में सत्ता तक पहुंचने वाली दूसरी ओमिडयार हस्ती बना दिया है।  
पांडो डॉट कॉम ने आगे लिखा है, जैसा पांडो डेली पूरे साल सूचित करता रहा है, जयंत सिन्हा और उनके बॉस, ओमिडयार भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक अस्वाभाविक दोहरी भूमिका निभाते रहे हैं और लोकोपकारी दिखने वाले काम सोच-समझ कर राजनीतिक निवेश के रूप में किए गए हैं जो सिन्हा के राजनैतिक अभियान का हिस्सा रहा है।

ओमिडयार के ऐसे ग्रांट में से कुछ लाभ के लिए किए गए निवेश थे। जैसे एसकेएस माइक्रोफाइनेंस जैसी माइक्रोफाइनेंस फर्म में ओमिडयार निवेश जिसका समापन बहुत ही घातक ढंग से हुआ जब एसकेएस के कर्ज वसूलने वालों ने जोर लगाया और उनपर सैकड़ों गरीब ग्रामीणों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप लगा। इन लोगों ने कीटनाशक पीकर, डूबकर और अन्य तरीकों से आत्महत्या कर ली थी। ओमिडयार सिन्हा का एक और निवेश गैर सरकारी संगठनों में गया जिसने धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर अच्छी तरह काम किया जब वह विपक्ष में थी और यह काम खासतौर से पिछली (सेंटर-लेफ्ट) सरकार के भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करने का था  जो 2007 से इस साल तक लगातार सत्ता में बनी रही।

भाजपा ने इस साल का चुनाव भ्रष्टाचार के विरोध के दम पर जीता और ओमिडयार सरकार ने भारत के सबसे प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी गैर सरकारी संगठनों के अभियान, “आई पेड अ ब्राइब” के लिए धन मुहैया कराया।  2010 में सिन्हा और ओंमिडयार नेटवर्क ने एक भारतीय गैरसरकारी संगठन, जनाग्रह को तीन मिलियन डॉलर दिए ताकि वह  “आई पेड अ ब्राइब” अभियान चला सके। इस खबर में भी जयंत सिन्हा ओमिडयार नेटवर्क की मिलीभगत का जिक्र है तथा गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक सहायता तथा उसकी शैली का विवरण है। इसमें अजीत डोभाल के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाना शामिल है। 

इसी खबर में आगे बताया गया है कि सिन्हा और ओमिडयार से धन पाने वाला एक और गैर सरकारी संगठन 2012 में सांसदों को देश के सख्त ई कामर्स कानून के संबंध में अवैध रूप से प्रभावित करता पकड़ा गया था। उस समय भारत की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी ने इस एनजीओ की निन्दा की थी और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक कहा था तथा विदेशी खुफिया एजेंसी को छिपकर काम करने और भारत सरकार में घुसपैठ करने में सहायता करने का आरोप लगाया था और इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था (इस एनजीओ का नाम नहीं है)।

इस मामले के पकड़े जाने के बाद संबंधित एनजीओ के सह-संस्थापक सीवी मधुकर को ओमिडयार ने नौकरी पर रख लिया। अब वे “सरकारी पारदर्शिता” में  ओमिडयार नेटवर्क इंडिया के डायरेक्टर ऑफ इनवेस्टमेंट हैं। इस बीच सिन्हा अपना काम करते रहे हैं … जिससे ओमिडयार को प्रत्यक्ष लाभ होता है जो अभी भी ईबे के चेयरमैन हैं। … जून (2014 में) के शुरू में मोदी और सिन्हा के चुनाव जीतने के बाद, मोदी की नई सरकार ने ईबे साथ-साथ अमैजन और गूगल के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था ताकि भारत के ई कामर्स कानून लिखने में सहायता की जा सके।

अनुवादक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय लंबे समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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लेखक, पत्रकार, चित्रकार, फ्रीलांसर… सब जीएसटी के दायरे में!

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

वैसे तो मीडिया संस्थान, अस्पताल और शिक्षा संस्थान अपने मूल कार्यों के लिए जीएसटी से मुक्त हैं पर ज्यादातर मामलों में अन्य संबंधित सेवाएं देने या प्राप्त करने के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है। बहुत सारे लेखक पत्रकार अभी तक यह माने बैठे हैं कि जीएसटी उनके लिए नहीं है। पर है और बहुत स्पष्ट रूप से है। असल में आरएनआई से पंजीकृत मीडिया संस्थान जीएसटी में नहीं हैं और अखबार या पत्रिकाओं (उत्पाद) पर जीएसटी नहीं है इसलिए जीएसटी की आंच फ्रीलांसर्स तक पहुंचने में अभी समय लगेगा। मेरे ज्यादातर ग्राहक कॉरपोरेट और पीआर एजेंसी हैं इसलिए मुझे सबसे पहले काम मिलना बंद हो गया। जुलाई में जो काम हुआ उसका पर्चेज ऑर्डर अब आना शुरू हुआ है। और काम नहीं आ रहा है सो अलग। संक्षेप में यही समझिए कि गाड़ी पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है।

अखबारों और मीडिया संस्थाओं के लिए काम करना जीएसटी मुक्त नहीं है। सिर्फ खबर भेजना अपवाद है और इसके लिए जीएसटी पंजीकरण जरूरी नहीं है। आप सोच सकते हैं कि कुछ ना कुछ रास्ता निकल जाएगा नहीं तो मीडिया संस्थान नकद तो दे ही सकता है। पर ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। एक तो अब नकद देना-लेना मुश्किल होता जा रहा है या कहिए बैंक के जरिए पैसे लेना-देना अपेक्षाकृत आसान है। दूसरे, कोई भी संस्थान या व्यक्ति आयकर के लिए अपने खर्चों का हिसाब रखता है। इसलिए नकद देकर भी काम कराएगा तो खर्चा दिखाना ही पड़ेगा और वह जीएसटी के नियमों का उल्लंघन होगा। इसे ऐसे समझिए कि कोई भी संस्थान या व्यक्ति अपना खर्च ना दिखाए तो आयकर में फंसे और दिखाए तो जीएसटी में फंसे। सबको चोर मानने वाली सरकार ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा है। इसे आप सरकार की प्रशंसा मान सकते हैं।

वैसे भी, ज्यादातर लेखक, पत्रकार, फ्रीलांसर किसी एक अखबार में तो लिखते नहीं हैं और ना ही एक राज्य की पत्रिकाओं में। और नियम है कि दूसरे राज्य के अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा न ली जाए। इसलिए, नियमों में छूट को एक अप्रैल से आगे बढ़ाया नहीं गया तो देर-सबेर जीएसटी पंजीकरण जरूरी हो जाएगा। ऐसी हालत में मीडिया संस्थानों की मजबूरी है कि वे फ्रीलांसर्स से जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए कहें और पंजीकरण न होने पर देर सबेर आपको छापना बंद कर दें। क्योंकि रिकार्ड में कोई कब तक गलती या गैर कानूनी काम करता रहेगा। जहां तक जीएसटी पंजीकरण के झंझट और खर्चों का सवाल है फ्रीलांसिंग की कमाई से उसका खर्चा उठाना संभव नहीं है। दूसरी ओऱ, मीडिया वाले क्यों लेख और विचार छाप कर झंझट में पड़ेंगे। वे भी सिर्फ खबरें छापने लगेंगे।

इससे राहत तभी मिलेगी जब नियम बदले जाएं। याद रखें, छह अक्तूबर को घोषित छूट अस्थायी हैं। अगर आप एनसीआर से कोई छोटी बड़ी पत्रिका निकालते हैं और गाजियाबाद, दिल्ली और गुड़गांव के फ्रीलांसर, चित्रकार, कलाकार, प्रूफ रीडर की सेवाएं लेते हैं तो नियमतः सबका जीएसटी पंजीकृत होना जरूरी है। इस संबंध में Pankaj Chaturvedi जी ने फेस बुक पर लिखा है, “जीएसटी में बदलाव नहीं हुए तो प्रकाशन उद्योग से जुड़े लोग भूखे मरेंगे। विडंबना है कि कोई भी प्रक्षक संघ इस पर आवाज़ नहीं उठा रहा हैं। जीएसटी में मुद्रित पुस्तक को तो मुक्त रखा गया है लेकिन कागज़ तो ठीक ही है, प्रूफ रीडिंग, सम्पादन, चित्रांकन जैसे कार्यों के भुगतान पर जीएसटी अनिवार्य कर दिया गया है। पिछले दिनों 16 साल से मेरे साथ काम कर रहे एक प्रूफ रीडर मेरे पास आये, उनसे मैंने भुगतान के लिए जीएसटी में पंजीयन के लिए कहा, उन्होंने कहा- यह काम मेरा मुफ्त में मान लेना, मैं इस झंझट में नहीं पड़ सकता।

“असल में नियम है कि दो-पांच हज़ार का कार्य करने वाले ऐसे लोग भी अपने बिल में अठारह प्रतिशत जीएसटी क्लेम करें, फिर वे इस राशि को खुद जमा करवाएं, फिर उसका रिटर्न फाइल करते रहें। जाहिर है कि चित्रकार या प्रूफ का कार्य करने वाले के पास ना तो इतना समय है, न कमाई और ना ही अनिवार्य जीएसटी का तकनीकी ज्ञान। नतीजतन इस तरह के काम करने वाले कुछ और करने लगेंगे और येन केन प्रकारेन पुस्तकों को तैयार करने में बड़ा नुकसान होगा। हिंदी के प्रकाशक वैसे ही आर्थिक दवाब में हैं। पुस्तक मेले आदि में सहभागिता के लिए भी जीएसटी लगने से स्टाल का किराया बढ़ गया हैं। मेरी जानकारी में कई ऐसे प्रकाशन गृह है जो बंद होने जा रहे हैं। उनमें कुछ हिंदी-अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तकें छापने वाले भी हैं। ऐसे में प्रूफ, चित्र, अनुवाद जैसे अस्थायी कार्य करने वालों का विमुख होना खतरे की घंटी है।”

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू होने के बाद परेशान हो गए. वह जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 75 से ज्यादा किस्त लिख चुके हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए कर सकते हैं.

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पत्रकारिता फील्ड में आने वालों, इस किताब को पढ़ लो… फिर न कहना- ‘ये कहां फंस गए हम!’

पत्रकारिता की दुनिया को ‘संजय’ की नजर से देखने-समझने के लिए ‘पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा’ को पढें…

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की पुस्तक “पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा“ उन तमाम लोगों के लिए आंख खोलने वाली है, जो आज भी पत्रकारों में बाबूराव विष्णु पड़ारकर या गणेश शंकर विद्यार्थी देखते हैं और जो ग्लैमर से प्रभावित होकर पत्रकारिता को पेशा बनाना चाहते हैं। यह सच है कि चीजें जैसी दिखाई पड़ती हैं, उनको वैसी ही वही मान ले सकता है जिसके पास अंतर्दृष्टि नहीं होगी। पर जिसके पास अंतर्दृष्टि है वह चीजों को उसके अंतिम छोर तक देखता है। चीजें जैसी दिखती हैं, वह उसे उसी रूप में कदापि स्वीकार नहीं करता। चिंतन-मनन करता है और अपनी अंतर्दृष्टि से सत्य की तलाश करता है।

(पुस्तक लेखक संजय कुमार सिंह. उपर है संजय की किताब का कवर पेज)


इस पुस्तक के लेखक ने भी अपनी इसी अंतर्दृष्टि से तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने लाने का प्रयास किया है और मैं कह सकता हूं कि लेखक इसमें कामयाब है। वह इस पुस्तक के माध्यम से अपने तीन दशकों से ज्यादा के पत्रकारीय अनुभवों के आधार पर नई पीढ़ी के पत्रकारों या पत्रकारिता को पेशा बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को इस पेशे की हकीकत से रू-ब-रू कराकर यह समझाने में सफल हैं कि करियर के लिहाज से यह पेशा कैसे ठीक नहीं है।

अस्सी के दशक में हिंदी पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले “जनसत्ता” के संपादक प्रभाष जोशी ने इस पुस्तक के लेखक संजय कुमार सिंह के साथ हुई एक घटना का हवाला देते हुए संपादकीय लिखा था – “तेजाब से बची आंखें।”…और कहा था कि ये आंखें राह दिखाएंगी। उनकी यह टिप्पणी भले किसी और संदर्भ में थी। पर मैं आज देख रहा हूं कि संजय कुमार सिंह की अंतर्दृष्टि वाकई नई पीढ़ी को राह दिखा रही है।

यह आदर्श स्थिति है कि पत्रकारिता ऐसी हो जो मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का पोषण करे। यानी उसके शरीर, मन और आत्मा को पुष्ट करे। दूसरे शब्दों में पत्रकारिता ऐसी हो जो बेहतर मनुष्यता को निर्मित करने में संलग्न हो, सिर्फ घटनाओं के वृतांत इकट्ठे न करे। पर यह पुस्तक इस सत्य से बखूबी पर्दा हटाती है कि बदलते परिवेश में पत्रकारिता जैसी वीभत्स दिखती है, उससे भी गई-बीती है। पत्रकारों को इस स्थिति में ला खड़ा किया गया है कि उसे कुछ नकारात्मक नहीं मिलता है तो वह उसे पैदा करने की कोशिश में रहता है। कह सकते हैं कि उनके सामने हर प्रकार के झूठ निर्मित करने की मजबूरी है।

मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक पत्रकारिता के बाहरी स्वरूप को देखकर उसे अपना कैरियर बनाने का सपना देखने वाले युवाओं को नई दृष्टि प्रदान करेगी। इसके बावजूद जो युवा पत्रकारिता को पेशा बनाएंगे तो उन्हें इस बात का मलाल नहीं होगा कि क्या सोचा था और क्या हो गया। अच्छी बात है कि यह पुस्तक Amazon पर भी उपलब्ध है। सुविधा के लिए उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। लेकिन उसके पहले, description पर इस किताब के बारे में जो description दिया गया है, उसे पढ़ें…

‘स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। प्रकारांतर में अखबारों की भूमिका लोकतंत्र के प्रहरी की हो गई और इसे कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाने लगा। कालांतर में ऐसी स्थितियाँ बनीं कि खोजी खबरें अब होती नहीं हैं; मालिकान सिर्फ पैसे कमा रहे हैं। पत्रकारिता के उसूलों-सिद्धांतों का पालन अब कोई जरूरी नहीं रहा। फिर भी नए संस्करण निकल रहे हैं और इन सारी स्थितियों में कुल मिलाकर मीडिया की नौकरी में जोखिम कम हो गया है और यह एक प्रोफेशन यानी पेशा बन गया है। और शायद इसीलिए पत्रकारिता की पढ़ाई की लोकप्रियता बढ़ रही है, जबकि पहले माना जाता था कि यह सब सिखाया नहीं जा सकता है। अब जब छात्र भारी फीस चुकाकर इस पेशे को अपना रहे हैं तो उनकी अपेक्षा और उनका आउटपुट कुछ और होगा। दूसरी ओर मीडिया संस्थान पेशेवर होने की बजाय विज्ञापनों और खबरों के घोषित-अघोषित घाल-मेल में लगे हैं। ऐसे में इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि कैसे यह पेशा तो है, पर अच्छा कॅरियर नहीं है और तमाम लोग आजीवन बगैर पूर्णकालिक नौकरी के खबरें भेजने का काम करते हैं और जिन संस्थानों के लिए काम करते हैं, वह उनसे लिखवाकर ले लेता है कि खबरें भेजना उनका व्यवसाय नहीं है।

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लेखक किशोर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क +919811147422 या kk2801@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए कॉरपोरेट तख्तापलट की कोशिश की जा रही है?

Sanjaya Kumar Singh : क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए क्या कॉरपोरेट तख्ता पलट की कोशिश की जा रही है? शुक्रवार की सुबह एनडीटीवी के बिक जाने की खबर पढ़कर मुझे याद आया कि प्रणय राय को अगर कंपनी बेचनी ही होती तो वे आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपए के लिए पड़े सीबीआई के छापे के बाद प्रेस कांफ्रेंस क्यों करते। क्यों कहते कि झुकेंगे नहीं। मुझे इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर यकीन नहीं हुआ।

मैंने पूरी खबर पढ़ी और अंदर मिल गया कि इसकी पुष्टि नहीं हुई है और स्पाइस जेट के अधिकारी ने तो खबर को पूरी तरह गलत और निराधार कहा था। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर छापी थी तो कारण सूत्र पर भरोसा होगा और इसके पक्ष में तर्क यह था कि एनडीटीवी ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मेरे हिसाब से ऐसी खबरों के सही होने की संभावना आधी-आधी ही रहती है। इसलिए मैं अगर ब्रेकिंग चलाने की जल्दी ना हो तो इंतजार करना पसंद करता हूं। दोपहर तक स्पष्ट हो गया कि इंडियन एक्सप्रेस चूक गया था। मेरा मानना है कि इस तरह गलत खबर प्लांट करने या कराने की कोशिश करने वालों को सबक सीखाना चाहिए पर अब नहीं लगता कि वैसे दिन कभी आएंगे। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

शाम तक मुझे समझ में आ गया कि हो ना हो यह एनडीटीवी में तख्ता पलट की कोशिश चल रही होगी। देश में कॉरपोरेट तख्ता पलट का पहला और संभवतः सबसे चर्चित मामला अनिवासी भारतीय स्वराज पॉल और देसी उद्योग समूह डीसीएम तथा एस्कॉर्ट्स से जुड़ा था। डीसीएम यानी दिल्ली क्लॉथ मिल को तब खादी के बाद देसी कपड़ों यानी भारतीयता का प्रतीक माना जाता था। एस्कॉर्ट्स को उस समय उसके मालिक नंदा परिवार के लिए जाना जाता था। राजन नंदा दूसरी पीढ़ी के मालिक थे उनके पिता हर प्रसाद आजादी के समय पाकिस्तान से आए थे। राजन नंदा की पत्नी राजकपूर की बेटी ऋृतु हैं और उनके बेटे निखिल की शादी अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता से हुई है। यह विवरण ये बताने के लिए स्वराज पॉल ने किससे किसलिए पंगा लिया होगा और क्यों नाकाम रहे। एस्कॉर्ट्स समूह पर नंदा परिवार का नियंत्रण पांच से 10 प्रतिशत के बीच की हिस्सेदारी से था और नियंत्रण की इस कोशिश के बाद कई महीनों तक भारतीय उद्योग जगह में उत्सुकता औऱ चिन्ता छाई रही। आखिरकार स्वराज पॉल ने हथियार डाल दिए।

अब स्थिति थोड़ी अलग है। तख्ता पलट का उद्देश्य भी। एक मीडिया संस्थान जो सरकार के खिलाफ है उसे सरकार समर्थक ताकतें नियंत्रण में लेना चाहती हैं। तरीके वही आजमाए जा सकते हैं औऱ कल जो सब हुआ वह ऐसी ही कोशिश का हिस्सा लगता है। इसमें करना सिर्फ यह होता है कि बाजार से किसी कंपनी के इतने शेयर खरीद लिए जाएं कि जिसका नियंत्रण है उससे ज्यादा हो जाए या निदेशक मंडल में बहुमत हो जाए। यह आसान नहीं है पर तकनीकी रूप से संभव है। इसे कंपनी का बिकना नहीं कहा जाएगा पर स्थिति वैसी ही होगी। सैंया भये कोतवाल से यह संभव है। वैसे ही जैसे थानेदार अपना हो तो कितने भी पुराने किराएदार को भगा ही देगा। इसलिए मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में काम कर चुके और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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जीएसटी का सच (पार्ट 25 से 36 तक) : छोटे अखबारों पर डीएवीपी के जरिए जीएसटी की मार

जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (25) सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी से छोटे अखबार भी परेशान हैं। सरकारी विज्ञापनों पर आश्रित इन अखबारों को डीएवीपी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) के जरिए विज्ञापन दिए जाते हैं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद डीएवीपी ने विज्ञापन जारी करने के नियमों में सख्ती लाई है और इससे कई प्रकाशन पहले से मुश्किल में हैं। अब उनपर जीएसटी का डंडा भी चल रहा है। खास बात यह है कि डीएवीपी 20 लाख से कम टर्नओवर वाले प्रकाशकों पर भी जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए दबाव डाल रहा है। डीएवीपी का कहना है कि बिना जीएसटी में पंजीकृत हुए सरकारी विज्ञापन उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है। दूसरी ओर, एक छोटी पत्रिका के संपादक के मुताबिक जनवरी 2017 से अब तक मात्र 250 सेंटीमीटर विज्ञापन दिया गया है, जिसकी कीमत सर्कुलेशन के आधार पर 1500 सौ से 5000 रुपये है। ऐसे में डीएवीपी जीएसटी को लेकर छोटे अखबारों से क्यों जबरदस्ती कर रहा है यह प्रकाशकों की समझ से बाहर है। वो भी तब जब उनका टर्नओवर ही ढाई-तीन लाख से दस-बारह लाख तक ही है, और इसकी सीए ऑडिट, वार्षिक विवरणी हर साल ऑनलाइन और फिजिकली डीएवीपी को भेजी जाती है।

जानकारों का कहना है कि सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं। छोटे अखबार मालिकों के मुताबिक यह समय छोटे और मध्यम अखबारों के लिए अब तक का सबसे कठिन समय है। समाचार पत्र उद्योग दूसरे उद्योगों की तरह सरकार से संरक्षण की उम्मीद करता है पर हालात उल्टे हैं। डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति को दमनकारी बताने वाले छोटे अखबार मालिकों का कहना है जीएसटी ने प्रिन्ट मीडिया की जान लेना शुरू कर दिया है। प्रिन्ट मीडिया के लिए राज्य एवं केन्द्र सरकार ने हमेशा सर्कुलेशन स्लैब के आधार पर विज्ञापन दरें तय करने का प्रावधान रखा है। इसका नतीजा यह है कि अखबारों की सीनियारिटी पर कभी गौर नहीं किया गया। मजबूरन कुछेक अखबार मालिक विज्ञापन दर हासिल करने के फेर मे सर्कुलेशन बढा कर बताते हैं। यदि सीनियारिटी के आधार पर रेट तय होता तो अखबार वालों को यह सब करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

डीएवीपी की संशोधित विज्ञापन नीति से सैकड़ों अखबार पहले ही बाहर हो चुके हैं। 1 जून 17 से नई विज्ञापन नीति लागू कर डीएवीपी ने कइयों का गला घोंट दिया। अब तक डीएवीपी के सदमे से छोटे अखबार बाहर आये ही नही कि जीएसटी जैसे कानून ने इन अखबारों की जान खतरे मे डाल दी। न्यूज पेपर छापने वाली प्रिन्टिंग मशीन पर 5 प्रतिशत, विज्ञापनों पर 5 प्रतिशत और न्यूज प्रिन्ट पेपर खरीदने पर 5 प्रतिशत जीएसटी का प्रावधान हैं। हकीकत यह हैं कि राज्य एवं केन्द्र सरकार से कुल मिला कर छोटे अखबारों को सालाना एक से डेढ लाख का औसत विज्ञापन भी नहीं मिलता हैं। उसपर जीएसटी पंजीकरण की बाध्यता इन अखबारों को मार डालेगी।

प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्‍पेस (स्‍थान या जगह) की बिक्री पर लागू वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर पर भी विवाद रहा। इस बारे में उठे सवाल पर सरकार ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्थान की  बिक्री पर जीएसटी 5 प्रतिशत है। यदि विज्ञापन एजेंसी ‘प्रिंसिपल से प्रिंसिपल’ के आधार पर काम करती है, अर्थात वह किसी समाचार-पत्र संस्‍थान से स्‍पेस खरीदती है और इस स्‍पेस को विज्ञापन के लिए ग्राहकों को अपने खाते के अंतर्गत ही यानी एक प्रिंसिपल के रूप में बेचती है, तो वह ग्राहक से विज्ञापन एजेंसी द्वारा वसूली गई पूरी राशि पर 5 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा। वहीं, दूसरी ओर यदि कोई विज्ञापन एजेंसी किसी समाचार-पत्र संस्‍थान के एक एजेंट के रूप में कमीशन के आधार पर विज्ञापन के लिए किसी स्‍पेस को बेचती है, तो वह समाचार पत्र संस्‍थान से प्राप्त बिक्री कमीशन पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगी। इस तरह के बिक्री कमीशन पर अदा किए गए जीएसटी के आईटीसी का भुगतान समाचार पत्र संस्‍थान के लिए उपलब्ध होगा। स्पष्ट है कि जीएसटी के नियमों में कोई ढील छोटे अखबारों के लिए भी नहीं है और जीएसटी के दबाव में छोटे अखबार बंद होते हैं या नहीं निकल पाते हैं तो किसी को कोई परवाह नहीं है। अखबार मालिक अपना देखें।

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जीएसटी का सच (पार्ट 13 से 23 तक) : जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (13) : गाजियाबाद से एनसीआर में काम के लिए जीएसटी जरूरी

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

सरकारी स्तर पर जब यह तय हो गया कि जीएसटी लागू होगा ही तो मेरे दिमाग में इस बारे में तीन बातें थी – 1) कारोबार की राशि के लिहाज से मैं इससे मुक्त रहूंगा 2) नया है इसलिए अनुपालन आसान होगा, मामूली औपचारिकताएं मैं खुद कर लूंगा और 3) कोई विकल्प नहीं हुआ तो मित्र सीए हैं ही। पर जब लागू हुआ तो तीनों बातें हवा हो गईं। राशि तो पहले के 10 लाख रुपए प्रति वर्ष की तुलना में 20 लाख कर दी गई पर अंतर राज्यीय कारोबार (एक देश एक टैक्स के नारों के बीच) करने के कारण फंस जाउंगा यह तो सोचा ही नहीं था। इसका आसान उपाय था दिल्ली शिफ्ट कर जाना। ज्यादातर ग्राहक या उनका मुख्यालय दिल्ली में है। इसलिए सिर्फ दिल्ली के ग्राहकों से मेरा काम चल जाता। लेकिन कंप्यूटर और ई मेल के काम करने वाले निश्चित रूप से जीएसटी के दायरे में आएंगे – यह भी मेरी कल्पना में नहीं था। तीसरा विकल्प तो है ही। महंगा है पर मित्रों के भरोसे चल जाएगा। उसमें कोई समस्या नहीं है।

सिर्फ कंप्यूटर से अपना कारोबार कर लेना बहुत मामूली निवेश से गुजारा कर लेना है। इसे छूट मिलनी चाहिए थी तो इसपर टैक्स भरने की औपचारिकता जबरदस्ती लादी गई है। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया के जमाने में जब रोजगार के नए मौके बन ही नहीं रहे हैं। सीए और सीए के सहायकों के काम की जो संभावना बन रही है वह बहुत सारे काम बंद कराने की कीमत पर होगा। 

अब मैं देख रहा हूं कि बहुत सारे लोगों ने पंजीकरण करा लिया है या पंजीकरण से संबंधित शिक्षण सत्रों आदि में हिस्सा लिया है। पर अनुपालन या झंझटों के संबंध में उनकी जानकारी नहीं है. यहां तक कि रिटर्न फाइल करने की तारीख निकल गई और उन्हें कुछ पता नहीं है। इससे मेरी इस धारणा की पुष्टि होती है कि पंजीकरण तो मजबूरी में हर कोई करा लेगा पर अनुपालन (बिक्री कम होने के कारण) नहीं होगा और लोग यह मानकर चलेंगे कि उनके जैसे छोटे कारोबारियों को कौन पूछेगा। यह एक हद तक सही भी है पर चुन कर परेशान किए जाने के साथ रिश्वतखोरी का रास्ता तो खोलता ही है। मेरा एतराज या मेरी परेशानी यही है।

अभी तक जिन जानकारों से मेरी बात हुई है। सब ने मुझे कंपोजिट स्कीम में पंजीकरण कराने की सलाह दी है। हालांकि, मेरे सवालों का जवाब कोई नहीं दे पाया और स्पष्ट हो गया कि उनकी जानकारी बहुत ही सतही है। इसलिए, सबके कहने के बावजूद मैंने अभी तक पंजीकरण नहीं कराया है। कंपोजिट स्कीम को अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के सरकारी जवाब (जिसका कानूनी महत्व नहीं है) में संरचना योजना कहा गया है। जो गलत है। कंपोजिट का मतलब संयुक्त या मिश्रित होना चाहिए पर वह अलग विषय है। यह छोटे करदाताओं (जिनका वित्तीय वर्ष का कारोबार 50 लाख रुपए है) के लिए है। इस योजना के अंतर्गत करदाता बिना इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) लाभ प्राप्त किए एक राज्य में एक वर्ष के दौरान अपने कुल कारोबार के प्रतिशत के रूप में कर का भुगतान करेंगे। सीजीएसटी और एसजीएसटी / यूटीजीएसटी के लिए कर की न्यूनतम दर (उत्पादकों के लिए एक प्रतिशत, अन्य मामलों में आधा प्रतिशत और अनुसूची जो के पैरा छह (बी) में उल्लिखित विशिष्ट सेवाओं अर्थात भोजन परोसने की सेवाएं अथवा मानव उपयोग के लिए अन्य वस्तु के लिए 2.5 प्रतिशत) से कम नहीं होगा। नारा एक देश एक जीएसटी और दर अलग-अलग।

कंपोजिट स्कीम का विकल्प चुनने वाला करदाता अपने ग्राहकों से कोई कर नहीं लेगा। लेकिन जमा कराएगा। यह रोजगार करने का टैक्स है? मोटा-मोटी इसका मतलब यही हुआ कि कारोबार का 2.5 प्रतिशत देकर जीएसटी से पीछा छुड़ाइए। पर यह जैसा मुझे समझ में आ रहा है, 20 लाख से ऊपर 50 लाख से नीचे के कारोबार वालों के लिए है जो अपना कारोबार कम समझते हैं पर सरकार जिन्हें बख्शना नहीं चाहती है। यह मेरे लिए नहीं हो सकता है। और जवाब में यह बात स्पष्ट लिखी है। 

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जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी : जीएसटी का सच (पार्ट 1 से 12 तक)

जीएसटी का सच (पार्ट 1) : जीएसटी यानि छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी के बारे में बातें तो बड़ी-बड़ी की गईं पर यह छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन है। मेरे कुछ ग्राहकों ने कहा कि अंतरराज्यीय “कारोबार” करने वालों के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है और कायदे से वे काम कराना तो दूर जो काम करा चुके उसका भुगतान भी नहीं कर सकते। शुरू में तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ पर अब लगता है कि वे सही ही कर रहे हैं। वैसे भी नौकरी करने वाले क्यों जोखिम उठाएं। वे काम नहीं कराएंगे, गलत हो तो क्यों करें। तनख्वाह तो मिलनी ही है। पर यह सब कितने दिन कैसे चलेगा भविष्य बताएगा।

आज मैं पंजीकरण कराने के नियम देखते हुए गलती से सिंगापुर जीएसटी की साइट पर चला गया पर उसकी भाषाशैली से ही समझ में आ गया कि मैं कहीं और हूं। भारत में जीएसटी कौंसिल की साइट (http://www.gstcouncil.gov.in) अभी आधी अधूरी है और सिर्फ अंग्रेजी में है। जीएसटी हेल्प पर क्लिक कीजिए तो हेल्प डेस्क खुलता है और वहां एक फोन नंबर तथा ई-मेल के अलावा कुछ नहीं है। सर्च में रजिस्ट्रेशन (अंग्रेजी में) डालने पर ऐसा कोई पेज नहीं खुलता जहां आप सीधे पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकें।  ढूंढ़ते हुए http://www.gstindia.com पर (यह सरकारी नहीं है) अंग्रेजी में सीए आकाश फोफलिया का एक आलेख मिला उसका यह अंश उल्लेखनीय है। जीएसटी के तहत किन लोगों के लिए पंजीकरण आवश्यक है।

3. Persons requiring registration

Following are the persons required to take registration under this act –

(a) Persons making inter-state supply, irrespective of any threshold limit
(b) Casual taxable persons, irrespective of the threshold specified
(c) Persons who are required to pay tax under reverse charge
(d) Non resident taxable persons
(e) Persons who are required to deduct tax under section 37 (TDS)
(f) Agents
(g) Input service distributor
(h) Supply of goods or services through electronic commerce operator, other than branded services
(i) Every electronic commerce operator
(j) Aggregator who supplies service under his brand name or his trade name
(k) Other notified persons

आपने पढ़ा होगा कि 20 लाख रुपए प्रति वर्ष का कारोबार करने वालों को जीएसटी में पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह, दावा किया गया है कि छोटे कारोबारों को जीएसटी से कोई परेशानी नहीं होगी। यहां बताया गया है कि जीएसटी किन लोगों के लिए जरूरी है और इसमें पहला बिन्दु है, जो लोग अंतरराज्यीय आपूर्ति करते हैं। आपने यह भी सुना होगा – एक देश एक जीएसटी। अब आप जानते हैं कि जीएसटी की कई दरें हैं पर कहा यही जा रहा है कि एक देश और एक जीएसटी। दूसरे अगर आप अंतरराज्यीय कारोबार करते हैं (उससे चाहे किसी तरह गुजर करते हों) तो  जीएसटी पंजीकरण आवश्यक हैं। फिर एक देश एक जीएसटी का क्या मतलब। मेरे साथ यही समस्या है – मैं गाजियाबाद में रहता हूं और मेरे ज्यादातर ग्राहक दिल्ली या गुड़गांव के हैं। इसलिए वे जीएसटी पंजीकरण के बिना मुझे काम देंगे ही नहीं। इसमें एक और बिन्दु “एच” दिलचस्प है। इसके मुताबिक, अगर आप अपनी सेवा या सामान इलेक्ट्रॉनिक कामर्स ऑपरेटर के जरिए सप्लाई करते हैं तब भी जीएसटी के तहत पंजीकरण आवश्यक है। लेन-देन डिजटल कीजिए और पूरा धंधा ही इलेक्ट्रॉनिक हो तो टैक्स के जाल में फंसना जरूरी है। यह विकास है। 

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जानिए, जीएसटी ने किस तरह एक वरिष्ठ पत्रकार को बेरोजगारी की कगार पर ला खड़ा किया

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

जनसत्ता की नौकरी के साथ शौकिया अनुवाद करने वाले संजय कुमार सिंह ने 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की थी और 2002 में नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक अनुवाद करते रहे। उदारीकरण के बाद देश में आने वाले बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय का मानना है कि एक समय आएगा जब कंप्यूटर से कायदे का अनुवाद संभव हो जाएगा। इसलिए वे इसमें भविष्य नहीं देखते और अनुवाद सिखाने में यकीन नहीं रखते। अकेले ही जितना काम कर सकते हैं, करते रहे।

सब ठीक-ठाक चल रहा था कि एक जुलाई से जीएसटी लागू हो गया और अचानक सब कुछ बदल गया। जीएसटी से संजय बेरोजगार होने की कगार पर हैं और मानते हैं कि अपनी पसंद का पेशा अपनाने की आजादी अब नहीं रही। नौकरी के साथ छोटा-मोटा काम करके आप अतिरिक्त कमाई नहीं कर सकते हैं। ना ही मामूली निवेश से छोटा-मोटा काम करके जीवन यापन कर सकते हैं। जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 24 किस्त लिख चुके हैं।

संजय भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहते हैं : ”’मुझे जीएसटी ने मारा.. ये सच है.. जीएसटी के कारण इन दिनों मेरे पास कोई काम-धंधा नहीं है… इस बारे में बताने वाला कोई (मुफ्त का भरोसेमंद जानकार) नहीं मिल रहा है.. मैं पूरे लगन से इस बारे में जानने समझने की कोशिश कर रहा हूं… तय करना है कि जीएसटी पंजीकरण कराना वाकई जरूरी है कि नहीं और है तो यह कितना मुसीबत है और कोई लाभ होगा कि ऐवें ही… कुछेक क्लाइंट्स ने पैसे नहीं दिए, उनका क्या करना है…. यही कारण है कि रोज का अनुभव फेसबुक पर डाल रहा हूं… कोई कुछ मुझे बताना समझाना चाहे तो sanjaya_singh@hotmail.com पर भेज सकते हैं.”

आइए, अब संजय का लिखा 24वां पार्ट पढ़ते हैं…

जीएसटी का सच (24) जीएसटी में पंजीकरण यानि ओखली में सिर डालना है

जीएसटी मेरे लिए मुद्दा तब बना जब दिल्ली और गुड़गांव के मेरे ग्राहकों ने कह दिया कि जीएसटी पंजीकरण के बगैर वे मुझे काम नहीं दे सकते। मैं जीएसटी के बारे में जितना जानता था उस हिसाब से पंजीकरण कराना मुझे भारी झंझट का काम लग रहा था क्योंकि रिटर्न दाखिल करना, टैक्स वसूल कर जमा करना और फिर जहां संभव हो वापस लेना – मेरे लिए असंभव नहीं तो भारी मुसीबत जरूर है और इसके लिए एक अकाउंटैंट जरूरी लग रहा था। मेरे कुछ सवाल थे जिनका जवाब नहीं था और बगैर ठीक से समझे मुझे जीएसटी पंजीकरण कराना ओखली में सिर डालने जैसा लगा। जब काम आना बंद ही हो गया तो जल्दबाजी में पंजीकरण कराने से जरूरी मुझे समझना (और समझाना) लगा क्योंकि इस बारे में कोई ठीक से नहीं जानता था।

इस क्रम में अभी तक यही समझ में आया है कि पंजीकरण जरूरी है और ग्राहक ठीक कह रहे हैं। इसमें सेवा लेने वाले के लिए यह विकल्प नहीं रह गया है कि छोटा कारोबारी जीएसटी पंजीकृत नहीं होगा तो टैक्स नहीं लेगा और सेवा सस्ती मिल जाएगी ना इस बात का कोई मतलब है कि छोटा कारोबारी अच्छी सेवा देता है। नियम ऐसे हैं कि दूसरे राज्य के (मैं गाजियाबाद में हूं, गुड़गांव हरियाणा में और दिल्ली अलग राज्य है) अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा ली ही नहीं जा सकती है। पंजीकृत सेवा प्रदाता न हो और आप अपंजीकृत सेवा प्रदाता से सेवा लेते हैं तो टैक्स की रकम आपको अपने पास से जमा कराना है। रीवर्स चार्ज व्यवस्था के तहत इसकी वापसी संभव हुई तो वापस भी मिलेगी पर जमा कराने से कोई छूट नहीं है।

इस तरह, यह स्पष्ट है कि कागजी खाना पूर्ति का काम काफी बढ़ जाएगा। हद तो यह है कि पंजीकरण के बाद बिक्री ना हो शून्य रिटर्न भी समय पर दाखिल करना है और न करने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। यह अलग बात है कि पहला ही रिटर्न सिर्फ 64 प्रतिशत कारोबारियों ने जमा कराया और बाकी के जुर्माने की रकम माफ करने और नहीं करने के संबंध में परस्पर विरोधी खबरें भी आईं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार ने आधी-अधूरी तैयारी से जीएसटी लागू कर दिया है और इस बारे में जानकारी देने की कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं है और जीएसटी कौंसिल के वेबसाइट ऐसा है कि गूगल सर्च करो तो तमाम सॉफ्टवेयर विक्रेताओं से लेकर सीए और ब्लॉग लिखने वालों के आर्टिकल मिल जाएंगे (जिन्हें अधिकृत नहीं माना जा सकता) पर जीएसटी कौंसिल की अधिकृत सूचना नेट पर नहीं मिलेगी। आप पूछ सकते हैं कि सरकारी संस्थान से ऐसी अपेक्षा क्यों? इसलिए कि जीएसटी का सारा काम कंप्यूटर और इंटरनेट से ही होना है। 20 लाख रुपए प्रति वर्ष से कम का कारोबार होने के बावजूद मुझे पंजीकरण इसीलिए कराना है कि मैं कंप्यूटर से काम करता हूं और घर बैठे अपनी सेवा दिल्ली व गुड़गांव (या कहीं के भी) ग्राहकों को भेज देता हूं और उनसे पैसे ले लेता हूं। 

अभी तक मुझे जीएसटी जितना समझ में आया है वह यही है कि आप कानून का पालन कर नहीं सकते और नहीं करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि अपराध तकनीकी होगा पर ज्यादा चूं-चां करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। इसलिए आप डर कर रहिए। अपने काम से मतलब रखिए। अपना काम कीजिए। मुझे यह स्थिति मंजूर नहीं है। मैं यही बता रहा हूं कि नियम परेशान करने के लिए बनाए गए हैं या परेशान करने वाले हैं। पर दूसरी स्थिति यह है कि मैं अपना काम छोड़ दूं या कुछ और करूं। पर यह इतना आसान नहीं है। अभी तक यह रास्ता नजर आ रहा है कि जहां (जिस राज्य से भी) काम मिलने की संभावना हो वहां मैं किसी से साझेदारी करूं और उसके घर को अपनी फर्म का कार्यालय बताऊं तो स्थानीय सेवा प्रदाता होने के दावे पर बगैर पंजीकरण काम मिल सकता है पर चूंकि सेवा लेने वाले को टैक्स अपने पास से जमा कराना ही होगा इसलिए सेवा लेने वाला कोई प्राथमिकता नहीं देगा। विचित्र स्थिति है। 

पार्ट एक से बारह तक पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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पार्ट तेरह से तेइस तक पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ वाले कीकू शारदा की गिरफ्तारी बाबा राम रहीम की ताकत दिखाने के लिए हुई थी!

Sanjaya Kumar Singh : क्या ये सच नहीं है कि कीकू शारदा की गिरफ्तारी तब बाबा राम रहीम की ताकत बताने के लिए की गई थी… धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की शिकायत पर टीवी अभिनेता कीकू शारदा के खिलाफ कार्रवाई करने वाली पुलिस को क्या यह पता नहीं था कि गुरमीत सिंह पर बलात्कार के आरोप हैं और उसकी जांच चल रही है। पुलिस जब बलात्कार के मामलों में कार्रवाई नहीं करती है और धार्मिक आस्था भड़काने की शिकायत पर कार्रवाई करेगी तो भक्त पगलाएंगे ही। जांच होनी चाहिए कि पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई किसके कहने पर की? हरियाणा पुलिस जब कीकू को गिरफ्तार कर मुंबई से ले आई थी तब स्थानीय मीडिया का काम था कि वह याद दिलाती कि बाबा बलात्कार के मामले में अभियुक्त है और पुलिस की फुर्ती असाधारण है। अगर मीडिया ने अपना यह मामूली सा काम किया होता और सरकार ने इस घटना से सीख ली होती तो पुलिस को भी जान रही होती।

‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ में पलक का किरदार निभाने वाले कीकू शारदा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा कि डेरा सच्चा सौदा कोई धर्म नहीं है और यह बात डेरे की वेबसाइट से भी साफ पता चलती है। ऐसे में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला बनता ही नहीं है। फतेहाबाद पुलिस ने जांच में पाया कि कीकू के खिलाफ मामला बनता ही नहीं है, लिहाजा उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की अर्जी अदालत में दायर की गई है। सरकार के इस जवाब को रिकार्ड में लेते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आरके जैन ने सुनवाई 27 अप्रैल 2016 तक स्थगित कर दी थी।

इस मामले से संबंधित मार्च 2016 की खबरें वेब साइट पर मिलीं जिनके मुताबिक कीकू की रिहाई पीएमओ के हस्तक्षेप पर हुई थी और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि कामेडियन का उत्पीड़न नहीं होने देंगे। इसके बावजूद यह सच है कि डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम (और बलात्कार के आरोपी, अब दोषी) की मिमिक्री करने के ‘जुर्म’ में कमीडियन कीकू शारदा दो बार हिरासत में लिए गए। उन्होंने कहा है कि यह बेहद यातनापूर्ण और दुखद था। एनडीटीवी से बात करते हुए ऐक्टर ने कहा था, मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे जेल में 14 दिन नहीं गुजारने पड़े।

कीकू ने यह भी कहा था, ‘हालांकि जेल मेरे लिए ज्यादा महफूज थी, क्योंकि बाहर तो भयंकर भीड़ है।’ कीकू ने कहा कि अगली बार से वह ज्यादा सतर्क रहेंगे और ऐसे किसी ऐक्ट से पहले रिसर्च भी करेंगे। उन्होंने कहा, ‘काश हर कोई खुद पर हंसना सीख सके और सबमें थोड़ा ह्यूमर हो।’ लेकिन सरकार और पुलिस ने इससे कोई सीख नहीं ली। पुलिस को तो खैर क्या सीखना था पर सरकार कैसे चूक गई?

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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