जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी : जीएसटी का सच (पार्ट 1 से 12 तक)

जीएसटी का सच (पार्ट 1) : जीएसटी यानि छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी के बारे में बातें तो बड़ी-बड़ी की गईं पर यह छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन है। मेरे कुछ ग्राहकों ने कहा कि अंतरराज्यीय “कारोबार” करने वालों के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है और कायदे से वे काम कराना तो दूर जो काम करा चुके उसका भुगतान भी नहीं कर सकते। शुरू में तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ पर अब लगता है कि वे सही ही कर रहे हैं। वैसे भी नौकरी करने वाले क्यों जोखिम उठाएं। वे काम नहीं कराएंगे, गलत हो तो क्यों करें। तनख्वाह तो मिलनी ही है। पर यह सब कितने दिन कैसे चलेगा भविष्य बताएगा।

आज मैं पंजीकरण कराने के नियम देखते हुए गलती से सिंगापुर जीएसटी की साइट पर चला गया पर उसकी भाषाशैली से ही समझ में आ गया कि मैं कहीं और हूं। भारत में जीएसटी कौंसिल की साइट (http://www.gstcouncil.gov.in) अभी आधी अधूरी है और सिर्फ अंग्रेजी में है। जीएसटी हेल्प पर क्लिक कीजिए तो हेल्प डेस्क खुलता है और वहां एक फोन नंबर तथा ई-मेल के अलावा कुछ नहीं है। सर्च में रजिस्ट्रेशन (अंग्रेजी में) डालने पर ऐसा कोई पेज नहीं खुलता जहां आप सीधे पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकें।  ढूंढ़ते हुए http://www.gstindia.com पर (यह सरकारी नहीं है) अंग्रेजी में सीए आकाश फोफलिया का एक आलेख मिला उसका यह अंश उल्लेखनीय है। जीएसटी के तहत किन लोगों के लिए पंजीकरण आवश्यक है।

3. Persons requiring registration

Following are the persons required to take registration under this act –

(a) Persons making inter-state supply, irrespective of any threshold limit
(b) Casual taxable persons, irrespective of the threshold specified
(c) Persons who are required to pay tax under reverse charge
(d) Non resident taxable persons
(e) Persons who are required to deduct tax under section 37 (TDS)
(f) Agents
(g) Input service distributor
(h) Supply of goods or services through electronic commerce operator, other than branded services
(i) Every electronic commerce operator
(j) Aggregator who supplies service under his brand name or his trade name
(k) Other notified persons

आपने पढ़ा होगा कि 20 लाख रुपए प्रति वर्ष का कारोबार करने वालों को जीएसटी में पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह, दावा किया गया है कि छोटे कारोबारों को जीएसटी से कोई परेशानी नहीं होगी। यहां बताया गया है कि जीएसटी किन लोगों के लिए जरूरी है और इसमें पहला बिन्दु है, जो लोग अंतरराज्यीय आपूर्ति करते हैं। आपने यह भी सुना होगा – एक देश एक जीएसटी। अब आप जानते हैं कि जीएसटी की कई दरें हैं पर कहा यही जा रहा है कि एक देश और एक जीएसटी। दूसरे अगर आप अंतरराज्यीय कारोबार करते हैं (उससे चाहे किसी तरह गुजर करते हों) तो  जीएसटी पंजीकरण आवश्यक हैं। फिर एक देश एक जीएसटी का क्या मतलब। मेरे साथ यही समस्या है – मैं गाजियाबाद में रहता हूं और मेरे ज्यादातर ग्राहक दिल्ली या गुड़गांव के हैं। इसलिए वे जीएसटी पंजीकरण के बिना मुझे काम देंगे ही नहीं। इसमें एक और बिन्दु “एच” दिलचस्प है। इसके मुताबिक, अगर आप अपनी सेवा या सामान इलेक्ट्रॉनिक कामर्स ऑपरेटर के जरिए सप्लाई करते हैं तब भी जीएसटी के तहत पंजीकरण आवश्यक है। लेन-देन डिजटल कीजिए और पूरा धंधा ही इलेक्ट्रॉनिक हो तो टैक्स के जाल में फंसना जरूरी है। यह विकास है। 

इसके आगे का पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें… 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जानिए, जीएसटी ने किस तरह एक वरिष्ठ पत्रकार को बेरोजगारी की कगार पर ला खड़ा किया

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

जनसत्ता की नौकरी के साथ शौकिया अनुवाद करने वाले संजय कुमार सिंह ने 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की थी और 2002 में नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक अनुवाद करते रहे। उदारीकरण के बाद देश में आने वाले बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय का मानना है कि एक समय आएगा जब कंप्यूटर से कायदे का अनुवाद संभव हो जाएगा। इसलिए वे इसमें भविष्य नहीं देखते और अनुवाद सिखाने में यकीन नहीं रखते। अकेले ही जितना काम कर सकते हैं, करते रहे।

सब ठीक-ठाक चल रहा था कि एक जुलाई से जीएसटी लागू हो गया और अचानक सब कुछ बदल गया। जीएसटी से संजय बेरोजगार होने की कगार पर हैं और मानते हैं कि अपनी पसंद का पेशा अपनाने की आजादी अब नहीं रही। नौकरी के साथ छोटा-मोटा काम करके आप अतिरिक्त कमाई नहीं कर सकते हैं। ना ही मामूली निवेश से छोटा-मोटा काम करके जीवन यापन कर सकते हैं। जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 24 किस्त लिख चुके हैं।

संजय भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहते हैं : ”’मुझे जीएसटी ने मारा.. ये सच है.. जीएसटी के कारण इन दिनों मेरे पास कोई काम-धंधा नहीं है… इस बारे में बताने वाला कोई (मुफ्त का भरोसेमंद जानकार) नहीं मिल रहा है.. मैं पूरे लगन से इस बारे में जानने समझने की कोशिश कर रहा हूं… तय करना है कि जीएसटी पंजीकरण कराना वाकई जरूरी है कि नहीं और है तो यह कितना मुसीबत है और कोई लाभ होगा कि ऐवें ही… कुछेक क्लाइंट्स ने पैसे नहीं दिए, उनका क्या करना है…. यही कारण है कि रोज का अनुभव फेसबुक पर डाल रहा हूं… कोई कुछ मुझे बताना समझाना चाहे तो sanjaya_singh@hotmail.com पर भेज सकते हैं.”

आइए, अब संजय का लिखा 24वां पार्ट पढ़ते हैं…

जीएसटी का सच (24) जीएसटी में पंजीकरण यानि ओखली में सिर डालना है

जीएसटी मेरे लिए मुद्दा तब बना जब दिल्ली और गुड़गांव के मेरे ग्राहकों ने कह दिया कि जीएसटी पंजीकरण के बगैर वे मुझे काम नहीं दे सकते। मैं जीएसटी के बारे में जितना जानता था उस हिसाब से पंजीकरण कराना मुझे भारी झंझट का काम लग रहा था क्योंकि रिटर्न दाखिल करना, टैक्स वसूल कर जमा करना और फिर जहां संभव हो वापस लेना – मेरे लिए असंभव नहीं तो भारी मुसीबत जरूर है और इसके लिए एक अकाउंटैंट जरूरी लग रहा था। मेरे कुछ सवाल थे जिनका जवाब नहीं था और बगैर ठीक से समझे मुझे जीएसटी पंजीकरण कराना ओखली में सिर डालने जैसा लगा। जब काम आना बंद ही हो गया तो जल्दबाजी में पंजीकरण कराने से जरूरी मुझे समझना (और समझाना) लगा क्योंकि इस बारे में कोई ठीक से नहीं जानता था।

इस क्रम में अभी तक यही समझ में आया है कि पंजीकरण जरूरी है और ग्राहक ठीक कह रहे हैं। इसमें सेवा लेने वाले के लिए यह विकल्प नहीं रह गया है कि छोटा कारोबारी जीएसटी पंजीकृत नहीं होगा तो टैक्स नहीं लेगा और सेवा सस्ती मिल जाएगी ना इस बात का कोई मतलब है कि छोटा कारोबारी अच्छी सेवा देता है। नियम ऐसे हैं कि दूसरे राज्य के (मैं गाजियाबाद में हूं, गुड़गांव हरियाणा में और दिल्ली अलग राज्य है) अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा ली ही नहीं जा सकती है। पंजीकृत सेवा प्रदाता न हो और आप अपंजीकृत सेवा प्रदाता से सेवा लेते हैं तो टैक्स की रकम आपको अपने पास से जमा कराना है। रीवर्स चार्ज व्यवस्था के तहत इसकी वापसी संभव हुई तो वापस भी मिलेगी पर जमा कराने से कोई छूट नहीं है।

इस तरह, यह स्पष्ट है कि कागजी खाना पूर्ति का काम काफी बढ़ जाएगा। हद तो यह है कि पंजीकरण के बाद बिक्री ना हो शून्य रिटर्न भी समय पर दाखिल करना है और न करने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। यह अलग बात है कि पहला ही रिटर्न सिर्फ 64 प्रतिशत कारोबारियों ने जमा कराया और बाकी के जुर्माने की रकम माफ करने और नहीं करने के संबंध में परस्पर विरोधी खबरें भी आईं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार ने आधी-अधूरी तैयारी से जीएसटी लागू कर दिया है और इस बारे में जानकारी देने की कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं है और जीएसटी कौंसिल के वेबसाइट ऐसा है कि गूगल सर्च करो तो तमाम सॉफ्टवेयर विक्रेताओं से लेकर सीए और ब्लॉग लिखने वालों के आर्टिकल मिल जाएंगे (जिन्हें अधिकृत नहीं माना जा सकता) पर जीएसटी कौंसिल की अधिकृत सूचना नेट पर नहीं मिलेगी। आप पूछ सकते हैं कि सरकारी संस्थान से ऐसी अपेक्षा क्यों? इसलिए कि जीएसटी का सारा काम कंप्यूटर और इंटरनेट से ही होना है। 20 लाख रुपए प्रति वर्ष से कम का कारोबार होने के बावजूद मुझे पंजीकरण इसीलिए कराना है कि मैं कंप्यूटर से काम करता हूं और घर बैठे अपनी सेवा दिल्ली व गुड़गांव (या कहीं के भी) ग्राहकों को भेज देता हूं और उनसे पैसे ले लेता हूं। 

अभी तक मुझे जीएसटी जितना समझ में आया है वह यही है कि आप कानून का पालन कर नहीं सकते और नहीं करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि अपराध तकनीकी होगा पर ज्यादा चूं-चां करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। इसलिए आप डर कर रहिए। अपने काम से मतलब रखिए। अपना काम कीजिए। मुझे यह स्थिति मंजूर नहीं है। मैं यही बता रहा हूं कि नियम परेशान करने के लिए बनाए गए हैं या परेशान करने वाले हैं। पर दूसरी स्थिति यह है कि मैं अपना काम छोड़ दूं या कुछ और करूं। पर यह इतना आसान नहीं है। अभी तक यह रास्ता नजर आ रहा है कि जहां (जिस राज्य से भी) काम मिलने की संभावना हो वहां मैं किसी से साझेदारी करूं और उसके घर को अपनी फर्म का कार्यालय बताऊं तो स्थानीय सेवा प्रदाता होने के दावे पर बगैर पंजीकरण काम मिल सकता है पर चूंकि सेवा लेने वाले को टैक्स अपने पास से जमा कराना ही होगा इसलिए सेवा लेने वाला कोई प्राथमिकता नहीं देगा। विचित्र स्थिति है। 

पार्ट एक से बारह तक पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

xxx

पार्ट तेरह से तेइस तक पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ वाले कीकू शारदा की गिरफ्तारी बाबा राम रहीम की ताकत दिखाने के लिए हुई थी!

Sanjaya Kumar Singh : क्या ये सच नहीं है कि कीकू शारदा की गिरफ्तारी तब बाबा राम रहीम की ताकत बताने के लिए की गई थी… धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की शिकायत पर टीवी अभिनेता कीकू शारदा के खिलाफ कार्रवाई करने वाली पुलिस को क्या यह पता नहीं था कि गुरमीत सिंह पर बलात्कार के आरोप हैं और उसकी जांच चल रही है। पुलिस जब बलात्कार के मामलों में कार्रवाई नहीं करती है और धार्मिक आस्था भड़काने की शिकायत पर कार्रवाई करेगी तो भक्त पगलाएंगे ही। जांच होनी चाहिए कि पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई किसके कहने पर की? हरियाणा पुलिस जब कीकू को गिरफ्तार कर मुंबई से ले आई थी तब स्थानीय मीडिया का काम था कि वह याद दिलाती कि बाबा बलात्कार के मामले में अभियुक्त है और पुलिस की फुर्ती असाधारण है। अगर मीडिया ने अपना यह मामूली सा काम किया होता और सरकार ने इस घटना से सीख ली होती तो पुलिस को भी जान रही होती।

‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ में पलक का किरदार निभाने वाले कीकू शारदा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा कि डेरा सच्चा सौदा कोई धर्म नहीं है और यह बात डेरे की वेबसाइट से भी साफ पता चलती है। ऐसे में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला बनता ही नहीं है। फतेहाबाद पुलिस ने जांच में पाया कि कीकू के खिलाफ मामला बनता ही नहीं है, लिहाजा उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की अर्जी अदालत में दायर की गई है। सरकार के इस जवाब को रिकार्ड में लेते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आरके जैन ने सुनवाई 27 अप्रैल 2016 तक स्थगित कर दी थी।

इस मामले से संबंधित मार्च 2016 की खबरें वेब साइट पर मिलीं जिनके मुताबिक कीकू की रिहाई पीएमओ के हस्तक्षेप पर हुई थी और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि कामेडियन का उत्पीड़न नहीं होने देंगे। इसके बावजूद यह सच है कि डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम (और बलात्कार के आरोपी, अब दोषी) की मिमिक्री करने के ‘जुर्म’ में कमीडियन कीकू शारदा दो बार हिरासत में लिए गए। उन्होंने कहा है कि यह बेहद यातनापूर्ण और दुखद था। एनडीटीवी से बात करते हुए ऐक्टर ने कहा था, मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे जेल में 14 दिन नहीं गुजारने पड़े।

कीकू ने यह भी कहा था, ‘हालांकि जेल मेरे लिए ज्यादा महफूज थी, क्योंकि बाहर तो भयंकर भीड़ है।’ कीकू ने कहा कि अगली बार से वह ज्यादा सतर्क रहेंगे और ऐसे किसी ऐक्ट से पहले रिसर्च भी करेंगे। उन्होंने कहा, ‘काश हर कोई खुद पर हंसना सीख सके और सबमें थोड़ा ह्यूमर हो।’ लेकिन सरकार और पुलिस ने इससे कोई सीख नहीं ली। पुलिस को तो खैर क्या सीखना था पर सरकार कैसे चूक गई?

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रजत शर्मा के सिर पर बालों की खेती अच्छी हो गई है!

Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी पर आप की अदालत में सोनू निगम थे। सोनू निगम के कारण आज मोदी वाले एपिसोड के बाद रजत शर्मा को देखा। बालों की खेती अच्छी हो गई है। पर फिलहाल मुद्दा यह है कि एक सवाल के जवाब में सोनू ने कहा कि मैं भिखारी बनकर यह देखना समझना चाहता था कि बिना प्रचार, ब्रांडिंग और माइक आदि के सिर्फ मेरी आवाज का क्या महत्व है। और सत्तर साल के एक भिखारी के रूप में मैंने महसूस किया कि मेरी आवाज वही कोई 12-14 रुपए की है जो उस दिन उसे मिले थे। जिसे सोनू निगम ने फ्रेम करवाकर ऑफिस में रखा है। सोनू ने स्पष्ट किया कि आदमी पर सिर्फ उसकी योग्यता का नहीं और भी बहुत सारी चीजों का असर होता है।

इस कार्यक्रम को देखने के बाद Raghwendra Singh की एक पोस्ट पढ़ने को मिली, जो इस प्रकार है-

आज किसी चैनेल पर लालूजी की जीवनी के बारे में बता रहा था। इससे पता चलता है की लालूजी तो मोदीजी से भी महान हैं। मोदीजी शहर में चाय बेचकर pm बन गये लालूजी उससे भी बुरी हालात में थे। मज़दूरी कर, काठ का सिलेट पर पढ़ाई की और भंगरैया से उसे मिटाते थे और भैंस पर चढ़कर स्कूल जाते थे और कई दिन भूखे रहे थे पर कभी भी गाला फाड़ का नहीं बोले मैं मज़दूरी कर cm बने। अगर ये भी अपनी पब्लिसिटी करते तो pm बन सकते थे।

भले ही यह पोस्ट लालू यादव या उस कार्यक्रम से असहमति में हो पर मुझे लगता है कि ब्रांडिंग का अपना महत्व तो है। वरना चार लाख का डिजाइनर सूट पहनने वाला क्यों कहता कि उसे प्रधान सेवक बना दिया जाए। क्यों सबके खाते में 15 लाख रुपए आने का सपना दिखाता? और अगर किसी ने यह सब नहीं किया तो वह कहे भी नहीं? वह भी तब जब चाय बेचने की कहानी सबको मालूम है। मालगाडियों में भी चाय बेचते थे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यूं हैं :

Ambrish Kumar खेती? यह कैसे संभव हुई.

Sanjaya Kumar Singh पैसों का खेल है। काफी दिन से चल रहा था। खेती 2009 में ही शुरू हो गई थी। आलोक तोमर ने तब ये लिखा था-
इससे तो टकले ही अच्छे थे रजत शर्मा!
http://old.bhadas4media.com/tv/1299-alok-tomar.html

Alka Bhartiya प्रचार करने वाले सारे साधन खरीद लिए हैं उन्होंने और साधनों के मालिक हैं की उसके आगे हाथ जोड़े खड़े हैं

Sanjaya Kumar Singh मामला सिर्फ प्रचार का नहीं। अनैतिक होने और उसकी सीमा का है। कुछ लोग प्रचार में बिल्कुल अनैतिक नहीं होते और भाजपा इसकी कोई सीमा नहीं मानती।

Anil Saxena अलका जी आपकी बात सही है लेकिन भाजपा का संगठन बहुत मजबूत है और इसी लिये अफवाह फैलाने में भी इनका कोई मुकाबला नही।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारिता का अर्नबीकरण!

Sanjaya Kumar Singh : अर्नब गोस्वामी को मैं नहीं देखता। भाजपा से उसके संबंध जानने और उसके झुकावों को देखने के बाद अर्नब को निष्पक्ष नहीं माना जा सकता है। ऐसे में कल नए चैनल के उद्घाटन को लेकर भी दिलचस्पी नहीं रही। लालू यादव से संबंधित ऑडियो के प्रसारण और उसमें गैंगस्टर शहाबुद्दीन का लालू यादव से कहना, “खत्तम है आपका एसपी” – ऐसा कोई मतलब नहीं देता है जो बताया और बनाया जा रहा है। एक साल पुराने इस मामले को जिस तरह पेश किया गया है वह भाजपा समर्थन और लालू-नीतिश विरोध ज्यादा पत्रकारिता या रिपोर्टिंग कम है। ठीक है, अंग्रेजी का यह चैनल बिहार के मतदाताओं पर क्या प्रभाव छोड़ पाएगा। फिर भी…

इस रिपोर्ट में नीतिश की राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आने की संभावना के मद्देनजर उनपर टीका टिप्पणी ज्यादा है, उन्हें जवाब देना होगा, नहीं देंगे तो आप (भाजपा वाले) क्या करेंगे जैसे सवाल आदि का वीडियो देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि सब कुछ भाजपा की राजनीति का हिस्सा है। भाजपा कहती तो यह है कि कांग्रेस के लोग बेईमान हैं, पैसे कमाए हैं पर चैनल उसके समर्थकों के ज्यादा है। नया चैनल भी उसी के समर्थक का आया। तब, जब भ्रष्टाचार से कमाई बंद है और तमाम चैनलों की माली हालत खराब है। किसी कांग्रेसी का चैनल आया हो तो मुझे पता नहीं है। लेकिन होगा भी तो छोटा-मोटा। पर वह अलग मुद्दा है।

फिलहाल तो मुद्दा है यह है कि भाजपा की राजनीति का जवाब दूसरी पार्टी के लोग उसी की भाषा में क्यों नहीं दे रहे हैं। ये लव लेटर लिखने वाले लव लेटर ही लिखेंगे? पूछेंगे नहीं कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा है। पांच साल के लिए फर्जी सर्टिफिकेट पर सांसद चुनी गई ज्योति धुर्वे का मामला अदालत में तय हो यह अगर ठीक भी हो तो पिछली बार पांच साल में रिपोर्ट ही नहीं आने पर कार्रवाई कौन करेगा? देश की राजनीति में सिर्फ भाजपा ही सक्रिय लग रही है बाकी सब भाजपा की चालों को झेल रहे हैं, जवाब देना या दे पाना तो बहुत दूर।

सबका “काला धन” खत्म हो गया और लगता है सिर्फ भाजपा के पास सफेद धन था, है और बचा हुआ है। पत्रकारिता पर एक कार्यक्रम में कल एक मित्र ने “टीवी का अर्नबीकरण” कहा। मैं कहता हूं अर्नब से पत्रकारिता सीखिए। नए स्टार्टअप में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिलेगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडिया को लेकर आशावादी रहे पत्रकार एनके सिंह की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव व वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह को मैंने पहली और आखिरी बार भड़ास फॉर मीडिया के आठवें स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित एक समारोह में सुना था। भड़ास आमतौर पर मीडिया से निराश और मेरे जैसे हताश लोगों का मंच है। मैंने बहुत पहले मान लिया था कि भारत में मीडिया का कुछ हो नहीं सकता है। उसके बाद भड़ास4मीडिया की स्थापना हुई और उसकी सफलता के आठवें वर्ष एनके सिंह ने सगर्व कहा था कि भड़ास नकारात्मक है, निराशा परोसता है आदि।

उस मौके पर भी श्री सिंह ने मीडिया से जबरदस्त उम्मीद दिखाई थी जो निश्चित रूप से आशावाद का चरम था। उसके बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मीडिया से कुछ उम्मीद की जाए और मुझे ऐसा भी नहीं लगा कि मीडिया ने अपने लिए कोई और बड़ा या गंदा गड्डा खोद लिया है। भाजपा का उदय और विस्तार निश्चत रूप से एक ऐसा मुद्दा है जो मीडिया में सिरे से गायब है पर मीडिया अगर दंतहीन, विषहीन हो गया या बना दिया गया है तो वह भाजपा के लिए ही। पर वह अलग मुद्दा है।

मुझे तो गुजरे करीब साल में ऐसा कुछ खास फर्क नजर नहीं आया कि उसके बारे में राय बदली जाए (जिसकी पहले खराब नहीं थी उसकी बात कर रहा हूं)। हां, एनके सिंह को फिर कहीं सुनने का मौका नहीं लगा। आज यूं ही अखबार पलटते हुए एनके सिंह का लिखा एक लेख दिखा- ‘आज के जमाने में हिन्दी अखबारों का एडिट पेज कौन पढ़े औऱ किस लिए पढ़े’।

फिर भी एनके सिंह की तस्वीर देखकर और पुराने संदर्भ के मद्देनजर पढ़ना पड़ा। अब अगर एनके सिंह को मीडिया की हालत खराब लग रही है तो मैं मान लेता हूं कि मैं इस मामले में उनसे योग्य चाहे ना हूं, 10-12 साल आगे जरूर चल रहा हूं। मीडिया की हालत पर एक जानकार, अनुभवी और काफी समय तक आशावादी रहे एनके सिंह की निश्चित रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणी है। आप भी पढ़िए। नीचे दिए लिंक पर क्लिक करिए…

http://epaper.navodayatimes.in/c/18283157

xxx

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से हिन्दी पत्रकारिता को अच्छे कार्यकर्ता मिले। उनमें से ज्यादातर अब बूढ़े, रिटायर और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। इस बीच, नौकरी का हाल भी सबको पता चल गया है। छह लाख की फीस और 10 हजार की सैलरी। संयोग से छह लाख के एजुकेशन लोन की ईएमआई भी इतनी ही बनती है। ऐसे में शिक्षित पत्रकार कितने होंगे ये तो भविष्य बताएगा। राष्ट्रवादी सरकार कुछ मजबूर पत्रकार जरूर बनाएगी। कार्यकर्ताओं की यह नई खेप शौक से या मजबूरी में पत्रकारिता ही करेगी। हिन्दी मीडिया को 25 साल और वेतन भत्तों की चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मंदिर बने ना बने। हिन्दी पत्रकारिता ऐसे ही चलती रहेगी।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पीएम मोदी के घर पर एसपीजी की महिलाएं रात में ड्यूटी क्यों नहीं करना चाहतीं?

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री के घर और निजता से संबंधित ये कैसी खबर? इस बार के “शुक्रवार” (24 फरवरी – 02 मार्च 2017) मैग्जीन में एक गंभीर खबर है। पहले पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित इस खबर का शीर्षक है, “फिर विवादों में घिरी एसपीजी” लेकिन यह प्रधानमंत्री निवास से संबंधित विवाद खड़ा कर रही है। खबर के मुताबिक एसपीजी की महिला सुरक्षा कर्मियों ने अपने आला अफसरों से गुहार लगाई है कि उन्हें रात की ड्यूटी पर न रखा जाए।

यहां यह गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के घर में परिवार की कोई महिला सदस्य नहीं रहती है। आम जानकारी यही है कि प्रधानमंत्री अपने घर पर अकेले रहते हैं। ऐसे में भारतीय संस्कारों के लिहाज से महिला सुरक्षा कर्मियों की रात की ड्यूटी लगनी ही नहीं चाहिए। उन्हें अधिकारियों से गुहार लगाने की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यही नहीं, खबर में आगे कहा गया है, “माना जा रहा है कि वे किसी विवाद का साक्षी बनना नहीं चाहती हैं।” यह और गंभीर है।

खबर में (टाइपिंग की कुछ गड़बड़ी है) कहा गया है कि एसपीजी के तत्कालीन निदेशक दुर्गा प्रसाद को हटा दिया गया था। हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई थी। हालांकि जिस तरह से यह कार्रवाई की गई थी उसमें तमाम अटकलों को बल मिला था। इनमें एक अटकल यह भी थी कि दुर्गा प्रसाद चाहते थे कि प्रधानमंत्री से जो भी मिलने आए उसे कैमरों के सामने से गुजरना पड़े और उसका पूरा रिकार्ड रखा जाए। इसमें कोई बुराई नहीं है और यह जरूरी भी लगता है। पर उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी (और पद से हटा दिया गया)। खबर में यह नहीं लिखा है कि दुर्गाप्रसाद के बाद कौन निदेशक हैं और अब क्या होता है। ना ही अभी के निदेशक से कोई बातचीत की गई है।

खबर में आगे लिखा है, अब यह अफवाह जोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि उनके निवास में लगे कैमरे कमरों के अंदर नजर रखें। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं तो शयन कक्षों में कैमरे नहीं होने चाहिए और दरवाजे तक को कैमरे की नजर में लाकर अंदर छोड़ा जा सकता है और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। पर विवाद हैं औऱ महिलाएं रात में ड्यूटी करना नहीं चाहती हैं – सबको जोड़ कर देखिए तो एक बड़ी खबर बनती है। अगर अधिकृत खबर नहीं छपी तो तरह-तरह की अफवाहें उड़ती रह सकती हैं और प्रधानमंत्री के घर के बारे में ऐसी खबरें, जैसे अंदर जाने वालों के लिए कैमरा नहीं है – सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Pratima Rakesh दाल में काला है या पूरी दाल काली है ?स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप कहीं साहब के पास आने वाले लोगों की सूचना लीक ना कर दे इसलिये ये मनाही हो रही है!

Surendra Grover इस खबर को पढ़ कर लग रहा है कि दाल में कुछ काला ज़रूर है जिसकी साक्षी वे महिला सुरक्षा कर्मी नहीं बनना चाहती..

Sanjaya Kumar Singh है कोई जो कर सके इस खबर का फॉलो अप? कांग्रेसी इस स्तर तक नहीं गिरते।

Pankaj Pathak लगता है ‘साहेब’ खुद घर में रेनकोट पहने घूमते हैं, नहाने का तो पता नहीं।

Sunil Kumar Singh गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी के आवास पर एक महिला आती थी जिससे वो अकेले में मिलते थे । ऐसा एक आईपीएस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है इस मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा में चर्चा भी हो चुकी है जो ऑन दी रिकॉर्ड है ।

आलोक पाण्डेय कांग्रेसी अफवाह उड़ाने में माहिर है

Sanjaya Kumar Singh हां भाई। कैमरा ही नहीं रहेगा तो सबूत कहां से आए। वो तो एनडी तिवारी जैसे लोग लगवाते हैं और खुद वीडियो बांटते हैं।


संजय कुमार सिंह का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भाजपा के पक्ष में प्रायोजित तरीके से लिखने वाले प्रदीप सिंह कोई अकेले पत्रकार नहीं हैं

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव जीतने की भाजपाई चालें, मीडिया और मीडिया वाले… उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। भक्त, सेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक सब अपनी सेवा भक्ति-भाव से मुहैया करा रहे हैं। इसमें ना कुछ बुरा है ना गलत। बस मीडिया और मीडिया वालों की भूमिका देखने लायक है। नए और मीडिया को बाहर से देखने वालों को शायद स्थिति की गंभीरता समझ न आए पर जिस ढंग से पत्रकारों का स्वयंसेवक दल भाजपा के पक्ष में लगा हुआ है वह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा एक सांप्रादियक पार्टी है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन मजबूरी में ही करती है।

नरेन्द्र मोदी को जिन स्थितियों में जिस तरह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया और उसके बाद जीतने पर उन्होंने जो सब किया, जो कार्यशैली रही वह काफी हद तक तानाशाह वाली है। इसे उनकी घोषित-अघोषित, दिखने वाली और न दिखने वाली अच्छाइयों के बदले तूल न दिया जाए यह तो समझ में आता है। पर अपेक्षित लाभ न होने पर भी नरेन्द्र मोदी और आज की भाजपा का समर्थन भारत जो इंडिया बन रहा था उसे हिन्दुस्तान बनाने का समर्थन करना है। मीडिया का काम आम लोगों को इस बारे में बताना और इंडिया से हिन्दुस्तान बनने के नफा-नुकसान पर चर्चा करना है पर मीडिया के एक बड़े हिस्से ने तय कर लिया हो उग्र हिन्दुत्व ही देशहित है।

मीडिया पैसे के लिए और दबाव में ऐसा करे – तो बात समझ में आती है। उसे रोकने के लिए भी दबाव बनाया जा सकता है। पाठकों को बताया जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि जनता चीजों को समझेगी तो मीडिया से ऐसे प्रभावित नहीं होगी जैसे आमतौर पर हो सकती है। लेकिन स्थिति उससे विकट है। मीडिया के लोग खुलकर भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। कुतर्क कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं वे तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्ति वाली और हिन्दुत्व की पत्रकारिता कर रहे हैं। जो पुराने लोग संघ समर्थक पत्रकार माने जाते हैं उन्हें भी अब घोषित रूप से समर्थन करने में हिचक नहीं है।

इसी क्रम में आज वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने आज जागरण में प्रकाशित अपने लेख, “उत्तर प्रदेश की चुनावी हवा” का लिंक फेसबुक पर साझा किया है। पूरा लेख क्या होगा इसका अंदाजा है इसलिए पढ़ा नहीं और जो अंश हाइलाइट किया गया है उसे पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि लेखक कहना क्या चाहता है। संबंधित अंश है, “यदि भाजपा मोदी के प्रचि वंचित तबकों के आदर भाव को वोट में बदल लेती है तो चुनाव जातीय समीकरणों से परे जा सकता है।” प्रदीप सिंह फेसबुक पर सक्रिय नहीं है। इस लेख से पहले उनका जो लेख उनकी वाल पर दिख रहा है वह 2 दिसंबर का है। आज 23 फरवरी को एक लेख का लिंक देने भर से यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि वे भाजपा का प्रचार कर रहे हैं। पर दो दिंसबर की उनकी पोस्ट है, “राज्यसभा में हंगामा और नारेबाजी कर रहे सदस्यों से सभापति हामिद अंसारी ने पूछा ये नारे सड़कों पर क्यों नहीं लग रहे? सवाल तो बड़ा वाजिब है। पर अभी तक कोई जवाब आया नहीं है।” इसे 17 लोगों ने शेयर किया है।

दो दिसंबर को ही उनकी एक और पोस्ट है जो एक दिसंबर को जागरण में ही प्रकाशित उनके लेख का लिंक है या उसे साझा किया गया है। इससे पहले उनकी पोस्ट 6 अक्तूबर की है। यह भी जागरण में प्रकाशित उनके लेख का लिंक है। लेख का शीर्षक है, “कुतर्कों के नए देवता” और यह सर्जिकल स्ट्राइक पर है। इसकी शुरुआत इस तरह होती है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। फिल्म अमर प्रेम का यह गाना भारतीय नेताओं पर सटीक बैठता है। नेता किसी घटना, बयान या भाषण पर प्रतिक्रिया देने से पहले यह सोचता है कि जो हुआ है उसका फायदा किसे होगा। फायदा अपने विरोधी को होता दिखे तो वह विरोध में किसी हद तक जाने को तैयार रहता है। इस मामले में अमूमन फौज को अपवाद माना जाता था, लेकिन अब नहीं। यह नरेंद्र मोदी का सत्ता काल है।” इस पोस्ट में लिखा है, “मित्रों लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं। दैनिक जागरण के आज के संस्करण में सम्पादकीय पेज पर छपा मेरा लेख आपकी सेवा में पेश है।”

इससे पहले की पोस्ट सात जुलाई की है जो उन्होंने किसी और का लिखा साझा किया है और अंग्रेजी में है। यह पोस्ट राजनीतिक नहीं है। प्रदीप सिंह का रुझान भाजपा की तरफ है, यह कोई नई बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे इनदिनों अपने सामान्य कार्य से अलग जागरण में लिख रहे हैं उसे फेसबुक पर साझा कर रहे हैं और जागरण उनके नाम के साथ उनकी ई-मेल आईडी नहीं, response@jagran.com छाप रहा है। क्या यह पेड न्यूज या प्रायोजित लेख है? कहने की जरूरत नहीं है कि Pradeep Singh अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से यह मीडिया विश्लेषण लिया गया है. संजय से संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

TH TIGER HOLIDAYS वालों की इस नोटिस से कौन डरेगा!

Sanjaya Kumar Singh : इन्हें अंग्रेजी तो नहीं ही आती है, हिन्दी आती होती तो हिन्दी में ही लिखते! अगर आप किसी को कोई सेवा प्राप्त करने के लिए पैसे दें और बाद में महसूस करें कि आपको सेवा ठीक नहीं मिली, ठग लिया गया और यह भी कि आप किसी ठग या चोर कंपनी के चक्कर में फंस गए थे तो क्या करेंगे? मेरे ख्याल से सबसे पहले यही कोशिश करेंगे कि अपने सभी मित्रों-परिचितों को बताएंगे कि फलां कंपनी ठीक नहीं है, पैसे लेकर पूरी सेवा नहीं देती है, मैं ठगा जा चुका हूं आदि।

इससे पहले कुछेक मामलों में कंपनी को चिट्ठी लिखना भी बनता है पर उसे आप हिन्दी में शिकायत करें वह अंग्रेजी में जवाब दे या आप अंग्रेजी में शिकायत करें और वह जिस अंग्रेजी में जवाब दे वही समझ में नहीं आए तो क्या करेंगे? अभी तक मैं समझता था कि निजी क्षेत्र में योग्य लोग रखे जाते हैं। और नौकरी चलती रहने की गारंटी भले ना हो काम करने वाले की पूछ रहती ही है। मैं समझता था कि हिन्दी में ही भाषा और शुद्धता से कोई मतलब नहीं होता है पर अब तो अंग्रेजी वालों का भी वही हाल दिख रहा है। आज यह नोटिस पढ़कर लगा कि क्या मजाक चल रहा है। कैसे-कैसे लोग काम करने के लिए रख लिए जा रहे हैं और शिक्षा का क्या स्तर है। हिन्दी में छपी शिकायत पर एतराज अंग्रेजी में आया और अंग्रेजी भी क्या शानदार !!

एक भी वाक्य सही नहीं है। इनमें ज्यादातर गलतियां तो कंप्यूटर बता दे। पर उसकी भी जरूरत नहीं समझी गई। व्याकरण से लेकर वाक्य विन्यास और हिज्जे तक की ऐसी-तैसी की गई है। इस नोटिस से कौन डरेगा और इस नोटिस के बाद अदालत में भी कंपनी क्या जाएगी और कैसे वकील कर लेगी राम जाने। और काम करने वाले लोग ऐसे हैं तो कंपनी क्या खाकर सेवा देगी। कैसे देगी? हम कहां जा रहे हैं? देश में पहली जरूरत रोजगार के मौके बढ़ाने की है जिनलोगों को अपनी औकात ही मालूम नहीं है उनके लिए रोजागर के मौके कैसे बनेंगे और नहीं बनेंगे तो भविष्य कैसा होगा?

संबंधित खबर यूं है : 

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट

Sanjaya Kumar Singh : घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट… खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन की डायरी और कैलेंडर पर महात्मा गांधी की फोटो हटाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो लगाए जाने के सवाल पर भक्त मीडिया ने पता नहीं अधिकारियों की इच्छा या आदेश पर या अपने स्तर पर ही नया पैंतरा लिया है। और, इस मामले में प्रधानमंत्री की छवि को हो सकने वाले नुकसान को धोने की कोशिश है। तर्क वही कि फोटो के उपयोग से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति नहीं ली गई थी। यहां, यह खबर जब पहली बार आई थी तो आधिकारिक तौर पर क्या कहा गया था, उल्लेखनीय है। इंडियन एक्सप्रेस की साइट पर मूल खबर के साथ पीएमओ की प्रतिक्रिया भी है और इसका उल्लेख शीर्षक में ही है, “विवाद अनावश्यक है”।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

indian express news

पीटीआई के हवाले से 13 जनवरी को शाम 740 बजे की इस खबर में कहा गया है, The Prime Minister ‘s Office (PMO) said the controversy was “unnecessary” as “there is no rule in KVIC that it’s diary and calendar should have only Gandhiji’s photo.”

PMO sources said in the past also, there was no picture of Mahatma Gandhi on such KVIC material.

“In the calendars and diaries of 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013, 2016, there was no picture of Gandhi. So there is no question of Modi replacing Gandhiji’s picture,” the sources said.

“Those stoking the controversy over the issue should realize that during Congress rule of 50 years, the sale of khadi remained restricted to 2 per cent to 7 per cent but in last two years, the sale has seen an unprecedented jump of 34 per cent. This is because of PM’s efforts to popularise khadi,” they added.

The PMO said “Modi is an icon of the youth and the growing popularity of khadi in the world is testimony to this.”

The PMO said the KVIC diary and calendar has photographs of Modi distributing charkha among poor women, they said.

लगभग ऐसा ही बयान उसी दिन केवीआईसी के चेयरमैन के नाम से जारी किया गया है। बाद में एनडीटीवी के कार्यक्रम में भी श्री सक्सेना ऐसी ही बातें करते रहे। इसके बाद अब यह छापने, कहने या लिखने का क्या मतलब कि प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना उनकी फोटो का इस्तेमाल किया गया? तमाम लोग इस निर्णय का बचाव कर चुके हैं। भक्तगण चाहे जो कहें, महात्मा गांधी की फोटो हटाकर प्रधानमंत्री की फोटो लगाना चापलूसी के अलावा कुछ और हो नहीं सकता। इसके समर्थन में कुछ तर्क ढूंढ़े और गढ़े भी जा सकते हैं। बात खत्म हो जाती और मामला ठंडा हो ही जाता। पर अब यह खबर पूरे मामले में प्रधानमंत्री के लचर मीडिया मैनेजमेंट की पोल खोल रही है। प्रधानमंत्री के स्तर पर ऐसी खबरें कोई उच्च अधिकारी यूं ही नहीं छपवाएगा। इकनोमिक टाइम्स की यह खबर आज की है और एक्सक्लूसिव के तौर पर दी गई है। किसी अनाम सूत्र से ऑफ दि रिकार्ड बातचीत के आधार पर ऐसी खबरें हिन्दी में क्षतिपूर्ति कही जाती हैं और बड़े पदों पर बैठे लोगों की भक्ति और चापलूसी में ही चलवाई जाती हैं। पर होती मीडिया मैनेजमेंट का हिस्सा ही है। इसमें सूचना तो है नहीं. जो तर्क दिया जा रहा है वह भी निराधार।

इकानामिक टाइम्स में छपी न्यूज पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

economic times news

प्रधानमंत्री कार्यालय की सेवा में दी गई यह खबर बहुत ही लचर है और इसमें अनाम शिखर के अधिकारी के हवाले से कहा गया है, “This is not the first instance of someone walking the extra mile to impress the PM or to show their association with the PM.” इससे विवाद बढ़ेगा ही घटेगा नहीं और इन तर्कों को कोई मानने से रहा। इस खबर से यह समझना मुश्किल नहीं है कि पीएम से करीबी दिखाने की कोशिश करने वाले का पूर्व में बचाव करने के बाद अब उसी को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है और कोई भक्त होगा तो बन भी जाएगा या शहीद होना खुशी-खुशी स्वीकार कर लेगा। पर इससे यह भी साफ हो रहा है कि प्रधानमंत्री का मीडिया मैंनेजमेंट बहुत ही घटिया है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री सारे निर्णय स्वंय लेते हैं और सलाहकारों की नहीं चलती है। ऐसे में उन्हें मान लेना चाहिए कि मीडिया मैनेजमेंट और राजनीति अलग-अलग चीजें हैं। मीडिया को दबाने, खरीदने धमकाने के आरोपों के बाद इस तरह की चूक उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे. उनसे संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आत्महत्या पर उतारू है BSNL

वैशाली, गाजियाबाद में मेरे पास बीएसएनएल के तीन लैंडलाइन नंबर थे। वैशाली में एयरटेल आने के बाद बीएसएनएल पर निर्भरता कम होती गई और बिल का भुगतान नहीं हुआ। टेलीफोन कटा रहा और कटा ही रह गया। कोई हिसाब नहीं, कोई सूचना नहीं, कोई कार्रवाई नहीं। मैंने मान लिया कि जमा की गई सुरक्षा राशि बीएसएनएल ने रख लिया। सरकारी कंपनी खा गई। मैंने भी छोड़ दिया। वास्तविकता चाहे जो हो।

अभी नोटबंदी के बाद जब डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना शुरू हुआ तो मैंने बीएसएनएल के अपने आखिरी फोन का बिल भी चुका दिया। फोन उपयोग नहीं के बराबर होता था पर बकाया बताने वाला एसएमएस आता रहता था तो सोचा कौन कर्ज रखे। बिल चुकाने पर जब फोन चालू नहीं हुआ तो पता चला कि बिल तीन महीने से भुगतान नहीं हुआ था इसलिए कट गया है और अब चालू कराने के लिए फिर से फॉर्म भरना होगा। मैंने कहा कि फॉर्म भेज दिया जाए, भर दूंगा। पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बीएसएनएल के अधिकारियों को मेल भेजने और फोन करने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई।

बताया गया कि बीएसएनएल के ऑफिस जाकर ही फॉर्म भरना होगा। मैंने मना कर दिया। मेरा कहना है कि आज के जमाने में ये कैसे चलेगा? जब दूसरी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां घर बैठे फोन दे रही हैं तो बीएसएनएल के दफ्तर जाकर कौन और क्यों फोन कनेक्शन लेगा। आखिरकार एक सज्जन फॉर्म लेकर आए। उन्होंने बताया कि फॉर्म के साथ 500 रुपए भी देने होंगे। बात मेरी समझ में नहीं आई। उनका कहना था कि मेरा कनेक्शन बंद किया जा चुका है और मेरे पैसे (सुरक्षा राशि और जो बिल मैंने जमा कर दिया उसके समायोजन के बाद, टेलीफोन इंस्ट्रूमेंट के पैसे काटकर) वापस आ जाएंगे। अगर मुझे बीएसएनएल का फोन चाहिए (जो बंद हो चुका है) तो नए सिरे से आवेदन करना होगा और सुरक्षा राशि एडवांस देनी होगी। मैंने पूछा नहीं कि चेक चलेगा या नकद ही देना है। मैंने मना कर दिया कि जब बीएसएनएल को नंबर बंद करने की इतनी जल्दी है तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए और नंबर बंद रहे।

पर मुद्दा यह है कि पहले जो दो नंबर दो बंद हुए उनके हिसाब का क्या हुआ? जब टेलीफोन उपकरण के पैसे काटे जाने हैं तो वापस करने के लिए क्यों नहीं कहा गया (मेरे पास बीएसएनएल के तीनों घटिया उपकरण लगभग अनुपयुक्त सुरक्षित रखे हैं, लौटाने के लिए ही) और जब मेरे पैसे बीएसएनएल के पास हैं ही तो कनेक्शन बंद करने की इतनी जल्दी क्यों? इन सबके अलावा ये स्क्रीन शॉट देखिए – मेरे पास 23 नवंबर को संदेश आया कि 25 नवंबर तक पैसे जमा कराए जा सकते हैं।

जब बंद कर दिया था तो संदेश क्यों? मैंने 24 नवंबर को पैसे जमा करा दिए 25 नवंबर को मुझे संदेश भी मिला कि पैसे प्राप्त हो गए हैं। फिर फोन बंद क्यों हो गया? बंद ही था तो पैसे क्यों मांगे जा रहे थे और जब इंतजार ही नहीं करना था तो 25 नवंबर की तारीख किसलिए बताई जा रही थी? यह सरकारी कंपनी का भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? बीएसएनएल को बंद कराने की साजिश के अलावा क्या है?  देखता हूं, पैसे वापस आते हैं कि फोन चालू होता है। मुझे तो दोनों की उम्मीद नहीं है। 

लेखक Sanjaya Kumar Singh वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक हैं. उनसे संपर्क anuvaadmail@gmail.com या +91 98101 43426 के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अपनी रिपोर्टर पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो सुधीर चौधरी, साफ कहो नैतिक जिम्मेदारी मेरी है

Sanjaya Kumar Singh : गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर एफआईआर हुई तो पढ़िए सुधीर चौधरी का बचाव। संपादक जी कह रहे हैं कि रिपोर्टर पूजा मेहता सिर्फ 25 साल की है। पूजा को ममता बनर्जी की असहिष्णुता झेलना पड़ रहा है जबकि पूजा अपने संपादक की नालायकी झेल रही है। ज़ी न्यूज संतुलित खबरें कर रहा होता तो खिलाफ खबरों पर भी एफआईआर नहीं होती है और संपादकी झाड़ने वाले मौका मिलते ही फंसा दिए जाते हैं – ये कौन नहीं जानता है। पूजा नहीं जानती होगी सुधीर चौधरी को तो पता ही है। अब पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो। कहो, नैतिक जिम्मेदारी मेरी है। पूजा का नाम एफआईआर से हटा दिया जाए। पूजा की आड़ में खुद बचने का रास्ता क्यों खोज रहे हो।

कायदे से रिपोर्टिंग के लिए परेशान किया जाना गलत है। ममता बनर्जी ने जो किया वह समर्थन करने लायक नहीं है लेकिन संपादक रिपोर्टर की आड़ क्यों ले? दोष उसके सिर क्यों मढ़े? जिम्मेदारी तो संपादक की होती है और अगर रिपोर्ट सही है तो संपादक कहेगा सही है और नहीं तो माफी मांगेगा? रिपोर्टर की आड़ लेने का क्या मतलब लगाया जाए?

मैं ज़ी न्यूज की रिपोर्टिंग / संपादकी देखता नहीं लेकिन संपादक के रूप में बचाव बड़ा लचर है। दम है तो यही कहते कि रिपोर्ट सही है। ममता मुझे झेल भेज दें। अब जूनियर रिपोर्टर की आड़ में रिरिया क्यो रहे हो? आखिर स्टोरी पास करने की जिम्मेदारी तो तुम्हारी है सुधीर चौधरी।  अगर ममता ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया (अभी तो एफआईआर ही हुई है) तो लिखो ना बताओ, दिखाओ, रोने क्यों लगे? अगर एफआईआर कराना मुख्यमंत्री की असहिष्णुता है तो तुम्हारा यह बचाव दुम दबाकर रिरियाना है। इससे अच्छा होता, सीधे गलती मान लेते। तुम भी तो मीडिया की आजादी के नाम पर भौंक रहे हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ईमानदारी के इस पर्व में सबसे ज्यादा नकदी भाजपाइयों के पास पकड़ी गई

Sanjaya Kumar Singh : भ्रष्टाचार दूर करने और देश में ईमानदारी स्थापित करने के भाजपाई राष्ट्रवादी त्यौहार के 50 दिन जैसे-जैसे पूरे होने के करीब आ रहे हैं इसका क्रूर और असली चेहरा सामने आ रहा है। यह रंगपोत कर चेहरा चमकाने की कोशिश का वीभत्स रूप था। लोगों की जान लेकर भी छवि बनाने का क्रूर खेल। भक्तों और सरकार के हिसाब से ईमानदारी स्थापित हो चुकी है और कालाधन लगभग खत्म हो गया है।

मुझे तो लग रहा है कि यह चुनाव में चंदा नहीं देने वालों को धमकाने, ब्लैकमेल करने की एक मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल की कोशिश का सरकारी रूप था जो संयोग से सत्ता में भी है। अब यही बचा रह गया है कि सरकार एक नियम बनाए जिसके मुताबिक नोटबंदी की घोषणा के बाद 1000 या 500 के पांच या कम नोट जमा करने वाले गरीबों के बारे में मान लिया जाए कि उन्होंने राष्ट्रवादी पार्टी के राष्ट्रनिर्माण प्रयासों में सहयोग नहीं किया है और उनके ये पैसे सीधे भाजपा के खाते में ट्रांसफर हो जाएं।

सुनने में यह अटपटा लग रहा है। पर अभी तक जो हुआ वह कम अटपटा नहीं है। और, जब इतना सब हो गया तो यह भी हो सकता है। पढ़िए यह खबर। इसके अलावा, आप जानते हैं कि सबसे ज्यादा नकदी भाजपाइयों के पास पकड़ी गई। सबका हिसाब भी है। तो यह ईमानदारी पर्व था किसके लिए? और इतने लोगों को इतना परेशान करके, करीब 100 लोगों की जान लेकर मिला क्या?

मुंबई में पकड़े गए 10 करोड़ रुपए पंकजा-प्रीतम मुंडे के को-ऑपरेटिव बैंक के निकले

मुंबई. यहां से पकड़ा गया 10 करोड़ रुपए का कैश महाराष्ट्र सरकार की मंत्री पंकजा मुंडे और उनकी सांसद बहन प्रीतम मुंडे के को-ऑपरेटिव बैंक का निकला। सांसद प्रीतम ने इस मामले में कहा- “मुंबई ब्रांच से पुणे ब्रांच में ले जाया जा रहे कैश का पूरा हिसाब बैंक के पास है।” बता दें कि गुरुवार को मुंबई में एक कार से पुलिस ने 10 करोड़ 10 लाख रुपए का कैश बरामद किया था। इसमें 10 लाख रुपए 2000 रुपए के नए नोटों में थे। बोरों में भरा था कैश. पुलिस ने गुरुवार को घाटकोपर-मानखुर्द लिंक रोड स्थित छेड़ा नगर के पास यह कैश पकड़ा था। – इसे बोरों में भरकर मुंबई से पुणे ले जाया जा रहा था। इस मामले में पुलिस ने 3 लोगों को हिरासत में लिया था। 10 करोड़ के पुराने नोट और 10 लाख के 2000 के नोट थे. यह छापेमारी एन्फोर्समेंट डायरोक्टोरेट (ईडी), इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और मुंबई पुलिस ने की थी। पकड़ी गई रकम में 10 करोड़ रुपए 500 के पुराने नोट और बाकी के 10 लाख 2000 के नए नोटों में मिले थे। डीसीपी शाहजी उमाप ने बताया कि यह कार्रवाई इंटेलिजेंस इनपुट्स पर की गई थी। पूरा कैश कार से बरामद हुआ था। कार में बैठे तीन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की तो तीनों ने खुद को पुणे के वैद्यनाथ अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक का इम्प्लॉइज बताया। पुलिस ने बताया, “पकड़े गए लोगों में से एक वैद्यनाथ शहरी सहकारी बैंक की पिंपरी चिंचवाड ब्रांच का मैनेजर है। जबकि 2 ने बैंक के कर्मचारी होने का दावा किया है।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेशनल अनुवादक हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी के पीएम पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे माई लॉर्ड!

Sanjaya Kumar Singh : मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है… मामला देश की सर्वोच्च अदालत में है और बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं। मेरी कोई औकात नहीं कि इस मामले में टिप्पणी करूं पर जैन हवाला मामले को अच्छी तरह फॉलो करने के अपने अनुभव से कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता जायज है। लेकिन यहां मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है। मामला ठीक से जांच कराए जाने का है।

जैन हवाला मामले में 115 अभियुक्त थे और सभी मामलों की जांच, तथा उन्हें साबित करना अपेक्षाकृत मुश्किल था। पर यहां मामला सीधा है। आज टेलीग्राफ की इस खबर से भी लगता है गुजरात सीएम अगर गुजरात अलकली केमिकल है तो उसे भुगतान क्यों हुआ, हुआ कि नहीं इसकी जांच हो जाए और यह रिश्वत है (किसी और कारण से, किसी और को) तो उस मामले में कार्रवाई हो और इसे खत्म माना जाए। पर मामला है तो उसे अंजाम तक पहुंचाना ही चाहिए।

राजदीप सरदेसाई के साथ अरविन्द केजरीवाल की बातचीत से जो मामला समझ में आता है वह यह है कि बुनियादी तौर पर एक मामला है, शक है। सुप्रीम कोर्ट के लिए यह पर्याप्त नहीं है इस पर कोई विवाद नहीं है। पर मामला यह है कि इसकी जांच होनी चाहिए। पर्याप्त सबूत जुटाए जा सकते हैं कि नहीं? जुटाने की कोशिश हुई कि नहीं? कौन करेगा? क्यों और कैसे करेगा? अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि इसकी जांच नहीं कराई जा रही है, नहीं होने दी जा रही है। संबंधित अधिकारियों का तबादला कर दिया गया आदि। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट में अपील यह होनी चाहिए थी (मुझे लग रहा है अभी ऐसा नहीं है, मैं गलत हो सकता हूं) कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित हो? यह नहीं कि उपलब्ध सबूतों पर ही कार्रवाई हो। सबूत कार्रवाई के लिए पर्याप्त न हों, यह संभव है। पर जांच के लिए तो पर्याप्त हैं ही।

इस खबर में कहा गया है कि गुजरात सीएम का मतलब गुजरात अलकली केमिकल्स है – गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं। ठीक है। हो सकता है। पर इस बात की जांच हो जाए पुष्टि हो जाए कि गुजरात सीएम गुजरात अलकली केमिकल्स ही है। अगर किसी ने किसी कंपनी को इतनी राशि दी है तो उसका कारण होगा, संबंध होगा, सबूत भी होंगे। आदि। साबित होना कोई मुश्किल नहीं है।

और, जब ईमानदारी की बात हो रही है और वह देश के सभी लोगों पर समान रूप से लागू होना है तो गुजरात अलकली केमिकल्स को यह भुगतान किसलिए हुआ, नकद हुआ कि चेक से और नकद हुआ तो क्यों? संतोषजनक जवाब मिल जाए। बात खत्म। नैतिकिता का तकाजा है और चूंकि मामला प्रधानमंत्री से संबंधित है, और प्रधानमंत्री न भी चाहें तो जांच करने वाले को एक भय रहेगा इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि काम (जांच) करने वालों को यह भय न रहे। कैसे न रहे – यह सुनिश्चित करना संबंधित विभागों, लोगों और संस्थाओं का काम है।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की यह चिन्ता भी जायज है कि चूंकि मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ है इसलिए इसे जल्दी निपटाया जाना चाहिए और सबूत जल्दी चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों को अपने सबूतों पर यकीन है और लगता है कि सब साबित हो सकता है पर प्रधानमंत्री के इस पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे या सबूत जुटाने में क्या समस्या आ रही है – सुप्रीम कोर्ट को यह बताया जाता तो मेरे ख्याल से बेहतर रहता।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें :

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जब ‘भक्त’ अखबार बनाते हैं…

Sanjay Kumar Singh :  नोटबंदी का मामला पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में था। इसके अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस और नवोदय टाइम्स का पहला पेज देखिए। इंडियन एक्सप्रेस की खबर की शीर्षक है, “क्या नकदी नीति जल्दबादी में अपनाई गई, क्या दिमाग लगाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा”। यह खबर एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है और फोल्ड से ऊपर है। यही खबर नवोदय टाइम्स ने फोल्ड के नीचे छापी है और शीर्षक लगाया है, “सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी पर पूछा, कब सामान्य होंगी स्थितियां”, दूसरी लाइन में, “हालात 10-15 दिन में ठीक हो जाएंगे : सरकार”।

कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों अखबारों ने एक ही खबर को जो ट्रीटमेंट दिया है उसी से खबर की धार कम हो जाती है। यह सामान्य है होता रहता है। पर खबर से आप नुकसान पहुंचाएं तो उसकी भरपाई भी कर दें। एक खबर मजबूरी में छापनी पड़ी (इतने बेशर्म नहीं हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ऐसी खबर खा जाएं या अंदर छाप दें) तो उसकी भरपाई करने वाली खबर वहीं छाप दें। नवोदय टाइम्स ने आज यह शर्मनाक काम किया है। इसी अखबार में पहले पेज की आज की बॉटम लीड है, “नोटबंदी : पीएम के दिल्ली ऑफिस में बैठकर काम करती थी रिसर्चर्स की टीम”। दूसरी लाइन है, “मोदी ने 6 विश्वस्तों के साथ की गोपनीय तैयारी !” अब आप बताइए, इस दूसरी खबर का कोई मतलब है? तैयारी की पूरी पोल खुल गई, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि दिमाग नहीं लगाया गया तो शीर्षक कुछ और लगाना तथा दूसरी खबर छापकर कहना कि दिमाग लगाया था। पाठकों को मूर्ख समझना है। आज से नवोदय टाइम्स पढ़ना बंद।

पुनःश्च – एक मित्र ने कमेंट में लिखा है कि नवोदय टाइम्स वाली खबर हिन्दुस्तान में भी है। पत्रकारिता की भाषा में इसे प्लांटेशन कहा जाता है। छपने के बाद तो शर्मनाक हो ही जाता है इसलिए छापने से पहले समझना होता है कि हमारा उपयोग तो नहीं किया जा रहा है। सरकार (या किसी परम भक्त) ने सुप्रीम कोर्ट में खिंचाई वाली खबर की भरपाई जारी की और अखबार ने नतमस्तक होकर सेवा मुहैया करा दी। विडंबना यह है कि इसपर सरकार सर्विस टैक्स नहीं लेती।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टाइम्स की दुकान और पत्रकार से छुटकारा

अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाऊ क्यों छोड़ा, वे जानें। पर जैसा कि नौकरी छोड़ने वाले ज्यादातर पत्रकारों के साथ होता है, नौकरी छोड़ने के समय हर कोई कहता है, अपना कुछ काम करेंगे। ऐसा कई पत्रकारों के मामले में हुआ है। कई साल से हो रहा है। किसी एक का क्या नाम लेना – लोग जानते हैं और जो नहीं जानते उनके लिए नाम बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। वैसे यह सच है कि नौकरी छोड़ने के बाद कइयों ने अपना काम शुरू भी किया, कर भी रहे हैं पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि जैसी संस्था छोड़ी वैसी ही खड़ी कर ली। या जो है वैसी होने की ओर अग्रसर है। फिर भी अर्नब गोस्वामी के बारे में कहा जा रहा है (उन्होंने नहीं कहा है) कि वे चैनल शुरू करेंगे। और फिर इससे जुड़ी अटकलें। मेरी दिलचस्पी उसमें नहीं है।

मुझे यह समझ में आ रहा है कि अर्नब जितनी तनख्वाह पाते होंगे उतने का पूरा कारोबार कर लेना भी असाधारण होगा – शुरू करने के बाद कई वर्षों तक। ऐसे में कोई स्वेच्छा से क्यों नौकरी छोड़ेगा और कोई योजना-साजिश है तो उसका खुलासा धीरे-धीरे ही होगा। इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्प याद है। सोचा आज इस मौके पर उसी की चर्चा करूं। मौका है, दस्तूर भी। मामला पुराना है, मोटे तौर पर टाइम्स संस्थान का अपनी हिन्दी की पत्रिकाओं को बंद करना। दूसरे शब्दों में, 10, दरियागंज का इतिहास हो जाना। टाइम्स ने अचानक हिन्दी की अपनी कई अच्छी, चलती, बिकती, प्रतिष्ठित और लोकप्रिय पत्रिकाओं को बंद करने की घोषणा कर दी। हिन्दी के पत्रकार – कहां छोड़ने और मानने वाले थे। और उस जमाने में सरकार हिन्दी के पत्रकारों को नाराज कैसे कर सकती थी।

टाइम्स समूह को समझ में आया कि पत्रकारों से छुटकारा पत्रकार ही दिलाएगा और घोषणा हुई कि सभी टाइटिल्स मशहूर पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने ले लिए हैं। (दे दिया, बेच दिया, खरीद लिया – मुझे याद नहीं है और अब महत्वपूर्ण भी नहीं है)। पत्रकारों को लगा कि मालिक बदलेगा। अच्छा है, पत्रकार मालिक होगा। नौकरी यहां नहीं, वहां कर लूंगा। आंदोलन शांत। मामला ठंडे बस्ते में। वो पत्रिकाएं आज तक बाजार में नहीं दिखीं। छपती हों और नेताओं के घर डाक से जाती हों तो मुझे नहीं पता। वैसे उन दिनों साउथ एक्सटेंशन की एक बिल्डिंग पर पत्रिकाओं के बोर्ड जरूर लगे थे। कुछ दिनों बाद से ही नहीं दिखते।

अर्नब का मामला अलग है। पर हिन्दी के पत्रकारों के मालिकों से संबंध हमेशा दिलचस्प रहे हैं। आनंद बाजार समूह ने हिन्दी की पत्रिका रविवार बंद की तो फिर हिन्दी में हाथ नहीं डाला। इंडिया टुडे हिन्दी में निकलता है पर गिनती के कर्मचारियों से। हिन्दी आउटलुक का हाल आप जानते हैं। और भी कई हैं। पत्रकार से छुटकारा पाना किसी भी संस्थान के लिए मुश्किल होता है और कोई भी पत्रकार रामनाथ गोयनका बनने से कम का सपना नहीं देखता है। ऐसे में पत्रकारों खासकर हिन्दी वालों को बांटने और अमीर बनाने का खेल भी हुआ संपादक नाम की संस्था अंग्रेजी में खत्म हो गई पर हिन्दी में बची हुई है तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है। यह अलग बात है कि आम पत्रकारों को इससे कोई लाभ नहीं है।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वरुण गांधी की वह फोटो हमारे पास भी है, लेकिन सार्वजनिक नहीं करूँगा

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया में संघ की घुसपैठ और उसका असर… मीडिया में अपनी घुसपैठ संघ ने बहुत पहले शुरू कर दी थी। जो मीडिया संस्थान चला सकते हैं उन्हें भी प्रोत्साहन और शाखा जाने वाले जो अखबारों में नौकरी करना चाहें उन्हें भी सहारा। कई लोग हैं, जाने-पहचाने चिन्हित। अब तो संघी पत्रकारों की दूसरी पीढ़ी भी सक्रिय है। हालांकि, संघ इसमें अकेला नहीं है पर उसका काम ज्यादा असरदार, योजनाबद्ध, सफाई से होता रहा है और इसके कई उदाहरण हैं। अब तो दिखाई देने लगा है। इतना खुल्लम खुल्ला कि आंखें चौंधिया जाएं। पर युद्ध और प्रेम में सब जायज है। सत्ता हथियाने और उसे बनाए रखने के लिए आप चुनाव न लड़ें “युद्ध” करें और चुनाव लड़ने के लिए सेना और सैनिक कार्रवाई को भुनाएं तो चुनाव लड़ने और युद्ध लड़ने का अंतर मिट जाता है।

ईमानदार पत्रकारिता मतदाताओं को यह सब बताती। इसपर चर्चा करती। पर पत्रकारिता में जब अपने लोग पहले से विधिवित प्लांट कर दिए गए हों तो जो चर्चा सबसे चर्चित है, कौन कराता है आप जानते हैं। देश में चुनाव ही नहीं राजनीति भी बदलेगी। बदल रही है। पत्रकारिता में संघ और संघी हों इसमें बुराई नहीं है बुराई संघी पत्रकारिता में है। चंचल जी की यह पोस्ट यही बताती है। पर संघी पत्रकारिता करने वाले नहीं समझेंगे। झेलने वाले जब वरुण गांधी जैसे भाजपा नेता हो सकते हैं और रीता बहुगुणा को तो चंचलजी याद दिला ही रहे हैं। संघी पत्रकारों को भी अपनी स्थिति भी समझ लेनी चाहिए। वाकई देश बदल रहा है। बात समझ में नहीं आ रही है तो मत समझिए।

गर्व से कहो हम हिन्दू हैं का नुकसान यही है कि भारत जो इंडिया बन रहा था, इनक्रेडिबल इंडिया होने का दावा किया जा रहा था वह अब हिन्दुस्तान बन रहा है और दावा यह कि वह पाकिस्तान से अलग (अच्छा) होगा। कैसे? इसपर बात नहीं करेंगे क्योंकि वह तो स्थापित सत्य है। यही है बदलती पत्रकारिता। और बदलता भारत। पहले सूर्या अकेली पत्रिका थी अब संदीप कुमार की सीडी चलाने वाले कई चैनल हैं।

चंचल जी (फेसबुक पर Chanchal Bhu नाम से) की इस पोस्ट से प्रेरित — “सेक्स बहुत गन्दी चीज है, इसके बावजूद आज हम डेढ़ सौ करोड़ तक पहुँच गये है। बच्चों को सेक्स की शिक्षा देना चाहिए, तर्कपूर्ण सहमति है। लेकिन सेक्स की ताकत देखिये और उसका अंतर्विरोध, जब तक गोपनीय है, ग्राह्य है, परम आनंद की पराकाष्ठा है, उघर गया तो आपको समूल नष्ट कर देगा। जो समाज इस अंतर्द्वंद पर खड़ा है, उसकी भ्रूण हत्या तय है। एक वाक्या सुनिये। बाबू जगजीवन राम बहुत बड़ी शख्सियत थे, उनके बेटे सुरेश राम किसी होटल में अपनी महिला मित्र के साथ नग्न अवस्था में देखे गए। उसका फोटू हुआ, और सारे संपादकों के पास प्रकाशनार्थ भेज भी दिया गया लेकिन किसी ने भी नही छापा। सिवाय एक महिला संपादक के। पत्रिका का नाम था सूर्या और संपादक थीं आज की भाजपा मंत्री मेनका गांधी। आज इतिहास फिर पलटा खाया है। मेनका के सुपुत्र वरुण गांधी उसी तरह लपेटे में आये हैं जैसे सुरेश राम आये थे। फोटो कौन बाँट रहा है, सब को पता है। इतना ही नही आज वरुण पर आरोप लग रहा है कि वरुण इस फोटो के बदले देश की सारी गुप्त बाते आर्म्स डीलर को देते रहे। यानी वरुण देशद्रोही है। पीएमओ के पास इसका खुलासा है । आपातकाल में मेनका गांधी की भूमिका का बदला इस तरह लिया जा रहा है । जो भी लोग अगल बगल से निकल कर गिरोह की तरफ भाग रहे हैं, एक दिन सब का यही हश्र होगा। रीता जी @ आप भी ख़याल रखियेगा , आपके पिता जी ने संघ पर क्या बोला था , आप भूल चुकी होंगी लेकिन उसकी कसक नागपुर में बनी हुई है। वरुण गांधी की वह फोटो हमारे पास भी है, लेकिन सार्वजनिक नही करूँगा।”

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

#IndiaTvExposed : अजीत अंजुम जी, चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं!

इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है…

Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी #IndiaTvExposed से डिफेंस मोड में क्यों है? मुझे कथित अभियान, साजिश की सूचना संपादक अजीत अंजुम की पोस्ट से मिली। इमरान शेख की चिट्ठी में एक सर्वज्ञात और सबसे साधारण (आज कल के हिसाब से) आरोप के अलावा कोई खास बात नहीं है। अभी तो उसने प्रधानमंत्री से मिलकर सारी बात बताने के लिए समय भर मांगा है। मुझे नहीं लगता कि किसी विशेष संबंध या कारण के इमरान शेख को प्रधानमंत्री से मिलने का समय मिल पाएगा। फिर भी इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है। चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने उपरोक्त एफबी पोस्ट में अजीत अंजुम की जिस पोस्ट का जिक्र किया है, वो इस प्रकार है…

Ajit Anjum : इंडिया टीवी के खिलाफ सोशल मीडिया पर #IndiaTVExposed का हैशटैग क्रिएट करके बेबुनियाद और तथ्यहीन Propaganda चलाया जा रहा है .. इंडिया टीवी के खिलाफ मुहिम चलाने वाले लोग इंडिया टीवी के एक पूर्व रिपोर्टर इमरान शेख की एक चिट्ठी को हथियार बनाकर सोशल मीडिया में चैनल के खिलाफ झूठा और तथ्यहीन दुष्प्रचार कर रहे हैं इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल बाद इमरान शेख ने पीएम मोदी के नाम चिट्ठी लिखकर चैनल पर मनगढ़ंत आरोप लगाया है कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में False and Fabricated खबरें करने को कहा गया . इससे परेशान होकर उन्होंने चैनल छोड़ दिया . इसी चिट्ठी को मुद्दा बनाकर #IndiaTVExposed हैशटैग के जरिए दुष्प्रचार करने वालों के लिए कुछ जरुरी तथ्य…

1 ) इमरान शेख मुंबई में एक साल पहले तक इंडिया टीवी के क्राइम/लोकल रिपोर्टर थे . जो लोग न्यूज चैनल की Functioning को थोड़ा भी जानते हैं , उन्हें पता होगा कि मुंबई के क्राइम रिपोर्टर का पीएम और केन्द्र सरकार की खबरों से कोई लेना-देना नहीं होता..मुंबई का क्राइम रिपोर्टर पीएम के पक्ष में न तो कई खबर कर सकता है, न ही उसे करने को कहा जा सकता है.

2 ) इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल तक तो इमरान शेख ने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही. न ही ऐसा कोई आरोप लगाया. एक साल बाद अचानक ऐसा आरोप लगाना इस बात का सबूत है कि कुछ लोगों ने या तो उसे साजिश का मोहरा बनाया या फिर उनकी मंशा संदिग्ध है.

3 ) मुंबई ब्यूरो में काम करने के दौरान डियूटी में उनकी लापरवाही की कई बार शिकायत मिली थी और खबरें मिस करने पर इंडिया टीवी के सीनियर एडिटर्स की तरफ से उन्हें लिखित और मौखिक चेतावनी भी दी गई थी. बार –बार चेतावनी के बाद उन्हें 8 अक्तूबर 2015 को दो दिन के लिए सस्पेंड कर दिया गया था. फिर भी उनका रवैया नहीं बदला और वो अपने वरिष्ठ सहयोगियों से बदसलूकी करते रहे .

4 ) इमरान शेख को कई बार उनके काम न करने /अपनी साथियों के साथ बदसलूकी करने और डियूटी पर लापरवाही वरतने के लिए चेतावनी दी गई. ये सारे तथ्य सितंबर – अक्तूबर 2015 में दिल्ली और मुंबई के कई सहयोगियों के बीच मेल पर हुए Chain of communication में मैजूद है.

5) 17 अक्तूबर 2015 को इमरान शेख ने अपने वकील से माध्यम से एक नोटिस भेजा , जिसमें उन्होंने तीन वरिष्ठ सहयोगियों के खिलाफ परेशान करने का आरोप लगाया लेकिन उस नोटिस में भी ऐसी कोई बात नहीं लिखी गई जो इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल बाद उन्होंने सनसनीखेज ढंग से अपनी चिट्ठी में लिखी है. जो बात उन्होंने एक साल पहले के नोटिस और एडिटर को लिखी चिट्ठी में नहीं लिखी, वो आज क्यों लिख रहे हैं? इसके पीछे क्या साजिश है?

6 ) चिट्ठी से साफ पता चलता है कि इंडिया टीवी से अलग होने के एक साल बाद इमरान शेख किसी के इशारे पर बहकावे में आकर बिल्कुल आधारहीन आरोप लगाकर इंडिया टीवी को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा बन रहे हैं.

Under the hashtag #IndiaTvExposed, a baseless and malicious propaganda is being launched on social media by some vested interests against India TV. These people are circulating false and malicious allegations against the news channel on social media by using a purported open letter posted on Facebook by a former India TV reporter Imran Sheikh. In his purported open letter, Imran Sheikh has made baseless allegation that he was asked to file false and fabricated news in favour of Prime Minister Narendra Modi, because of which he resigned from the news channel. Here are some facts which clearly debunk the malicious propaganda being made by vested interests under the hashtag #IndiaTVExposed:

1) Imran Sheikh was a crime/local reporter for India TV in Mumbai till a year ago. Any news-conscious person, who knows the bare outline of how a news channel works, understands that a crime reporter posted in Mumbai has nothing to do with filing stories related to the Prime Minister and the central government. A crime reporter posted in Mumbai can neither do a TV story in favour of the Prime Minister, nor can he be asked to do so by his seniors.

2) After quitting India TV, Imran Sheikh did not level any allegation against the channel for more than a year. The very fact, that he levelled such an allegation a year after quitting the channel, indicates that some vested interests have used him as a pawn in a nefarious game or his intentions are suspect.

3) The Mumbai Bureau received several complaints of negligence in duty against Imran Sheikh, and he was given verbal and written warnings several times by senior editors at India TV for missing news stories. Following repeated warnings, he was suspended for two days on October 8, 2015, but his attitude did not change for the better, and he continued to misbehave with his senior colleagues.

4) Imran Sheikh was warned several times for not working properly/for misbehaving with his colleagues and for negligence in duty. All these facts exist as record in the chain of mail communications between him and several colleagues based in Delhi and Mumbai during October 2015.

5) On October 17, 2015, Imran Sheikh sent a notice through his lawyer in which he levelled charges of harrassment against three of his senior colleagues, but no mention was made of the charge that he has now levelled in his open letter posted on Facebook a year after quitting. The question arises: Why did he not write a letter to the Editor on this said issue or mention it in his lawyer’s notice? What could be the motive behind this?

6) The open letter by Imran Sheikh on his Facebook wall clearly indicates that he has become part of a falsehood campaign to denigrate India TV by levelling baseless allegation at the instigation of some vested interests.

अब पढ़ें इमरान शेख द्वारा प्रधानमंत्री को भेजी गई चिट्ठी…

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारिता का मौजूदा दौर और एक्सक्लूसिव खबरों का खेल

एक्सप्रेस ने छापे इस सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत तो हिन्दू ने छापे पिछले सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत

Sanjaya Kumar Singh : खोजी पत्रकारिता भी दरअसल पौधा रोपण या प्लांटेशन की पत्रकारिता ही है। जब इसकी शुरुआत हुई थी तो ढूंढ़-ढांढ़ कर जनहित की खबरें लाई जाती थीं जो आमतौर पर सरकार और शासकों के खिलाफ होती थीं। मीडिया को नियंत्रित करने की सरकार की कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि ऐसी खबरों की जगह कम होती गई और फिर पेड न्यूज शुरू हुआ। अब तो ज्यादातर अखबार के लगभग सारे पन्ने पेड न्यूज होते हैं या यूं कहिए कि चाटुकारिता वाले होते हैं। बदले में विज्ञापन मिलता है। नहीं तो विज्ञापन बंद कर देने की धमकी। अब जब खोजी पत्रकारिता मुख्यधारा की पत्रकारिता से गायब हो चली है तो आइए खोजी पत्रकारिता को याद करें। श्रद्धांजलि दें। वैसे यह भी सच है कि ज्यादातर मामलों में खोजी खबरें भी आखिर कोई नाराज ही “लीक” करता है। उद्देश्य उस गड़बड़ी को ठीक करना होता है।

आपने पिछले दिनों पढ़ा होगा कि ठाणे में अवैध ढंग से चल रहे एक कॉल सेंटर के कर्मचारियों ने ही पुलिस को उसकी सूचना दी थी और पुलिस ने कारर्वाई की तो पता चला कि कॉलसेंटर अमेरिकी नागरिकों से अवैध वसूली करने वालों का संगठित गिरोह था। पहले इस तरह की खबरें मीडिया में छपवाई जाती थीं और पुलिस कार्रवाई करने को मजबूर होती थी। अब ऐसी खबरें छपती नहीं हैं और पुलिस के पास जो पहुंचती होंगी उनमें से सब पर कार्रवाई होती होगी यह मानना बेवकूफी है। अभी तक होता यह था कि ऐसी लीक को जो छाप दें या जिसकी साख हो उसके पास ऐसी खबरें आती रहेंगी, दुनिया इसे खोजी पत्रकारिता मानती रहेगी।

अब भक्ति पत्रकारिता शुरू हुई है। इसमें बुरी बात यही है कि स्वतंत्र या निष्पक्ष दिखने के लिए एक भी खबर सरकार के खिलाफ गई तो सारी भक्ति बेकार चली जाएगी। जबकि विरोध वाली पत्रकारिता में प्लांटेशन के अलवा अपनी इच्छा से भी खबरें करने की स्वतंत्रता रहती है। इसीलिए वहां पत्रकारिता करने की संभवना ज्यादा है और उसे भक्ति पत्रकारिता की तरह बुरा नहीं माना जाता। अगर आप किसी दबाव या लालच में भक्ति की खबरें देते हैं तो स्वेच्छा से भी भक्ति की ही खबरें देनी होगी। खोजी पत्रकारिता इस मायने में भक्ति से काफी अलग है।

अरुण शौरी लिख चुके हैं कि एक्सप्रेस के रीसेप्शन पर लोग पूरी फाइल छोड़ जाते थे और फोन करके बता देते थे कि फाइल रख आया हूं। ऐसे में जब राजीव गांधी के खिलाफ बोफर्स घोटाला चल रहा था और एक्सप्रेस रोज नई-नई खबरें (लीक) छाप रहा था तो सरकार के खिलाफ उसकी खबरें वैसे ही देखी जाती थीं जैसे आज सरकार की भक्ति की खबरें देखी जाती हैं। खबर लीक करने वालों का मकसद और लक्ष्य होता है। इसलिए वह चाहता है कि लीक को गंभीरता से लिया जाए। मुझे याद है बोफर्स की तमाम खबरें एक्सप्रेस में छपती थीं और एकाध चेन्नई के एक अखबार में। उन दिनों हमलोग हिन्दू में बोफर्स की एक्सक्लूसिव खबरों के बारे में यही राय रखते थे।

अब जब एक्सप्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक पर भक्ति वाली रिपोर्टिंग की है तो पुराना जमाना याद आ रहा है। खिलाफ खबरें छापने के लिए भी किसी साख वाले (संतुलित माने जाने वाले) अखबार को चुना गया था। ऐसे में सरकार ने अपने समर्थन में खबर छपवाने के लिए टीवी चैनलों की साख के मद्देनजर एक्सप्रेस की साख का उपयोग किया। यह भी संभव है कि एक्सप्रेस ने अपनी यह निशुल्क सेवा स्वेच्छा से उपलब्ध कराई हो पर अभी यह चर्चा का विषय नहीं है। और जैसी उम्मीद थी भक्तगण एक्सप्रेस की साख के हवाले से कहने लगे, एक्सप्रेस में छपी है खबर !! कहने का मतलब, खबर सरकार के खिलाफ हो या पक्ष में, छपवाने (फैलाने) वालों के खेल के नियम हैं और वे साख तलाशते हैं या उपयोग करते हैं। मीडिया ने जिस तेजी से अपनी साख कोई है उसमें इस खेल का क्या होगा?

हो सकता है, कुछ समय में मीडिया की साख बनाने के लिए सरकार के खिलाफ खबरें छापने-छपवाने का खेल शुरू हो। करोड़ों का धंधा करने वाला यह चौथा स्तंभ यूं ही नहीं चलता रहेगा। ताकत है तो उसका उपयोग-प्रदर्शन भी होगा ही। फिलहाल, एक्सप्रेस ने जो क्रांतिकारी खबर छापी है वह भारत में खोजी पत्रकारिता के इतिहास में ‘बेमिसाल’ साबित हो सकता है। दिल्ली डेटलाइन से छपी खबर पढ़ने पर समझ में आता है कि सारा मामला आईडिया का है। किसी सर जी ने एन्क्रिप्टेड चैट सिस्टम से लिखित सवाल भेजकर अनजाने आम निवासियों का इंटरव्यू किया। तमाम हस्तियां सवाल पहले लिखकर मांगती हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने आम आदमी को भी यह सुविधा दी। सुधीर चौधरी को पत्रकारिता के लिए पुरस्कृत करने के बाद इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता में यही बाकी रह गया था।

जहां तक भाजपा की राष्ट्रवादी सरकार के राज में मीडिया की भक्ति की बात है, मीडिया ऐसे तमाम मुद्दे उछाल देता है जो मुद्दा होते ही नहीं हैं। दूसरी ओर, ऐसे तमाम मुद्दों पर चुप्पी साध लेता है जिनपर चर्चा होनी चाहिए। इसी क्रम में सर्जिकल स्ट्राइक से संबंधित सबूत का मुद्दा भी है। अव्वल तो सर्जिकल स्ट्राइक ही मुद्दा नहीं है। पर हम इसके सबूतों की चर्चा कर रहे हैं। इसमें मीडिया को जो मुद्दे उठाने चाहिए वे छूट जा रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक ढिंढोरा पीटने की चीज नहीं है। जब सार्वजनिक चर्चा होगी तो सवाल भी उठने शुरू हुए। जब यह दावा सामने आया कि पहले भी स्ट्राइक हुए हैं औऱ पुरानी सरकारों ने इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं की तो यह कहा जाने लगा कि पहले स्ट्राइक हुए थे इसका क्या सबूत है। ऐसे में अगर एक्सप्रेस ने लीक से हटकर यह साबित करने की कोशिश की कि कुछ तो हुआ था तो आज हिन्दू ने छापा है कि पहले भी कुछ-कुछ होता रहा है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. ANUVAAD COMMUNICATION के हेड Sanjaya से संपर्क 9810143426 के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या एनडीटीवी ने मोदी सरकार के दबाव में चिदंबरम का इंटरव्यू नहीं दिखाया?

Sanjaya Kumar Singh : एनडीटीवी पर कार्रवाई हो, इसकी आड़ में ब्लैकमेल गलत है… एनडीटीवी के खिलाफ कोई वित्तीय मामला है। यह हमेशा से कहा जाता रहा है। एनडीटीवी का स्पष्टीकरण भी आता रहा है। सरकार के खिलाफ मीडिया संस्थानों पर आरोप कोई नई बात नहीं है और सरकार समर्थक माने जाने वाले मीडिया संस्थान पर विपक्षी दल आरोप लगाएं इसमें भी कुछ नया नहीं है। पर भड़ास 4 मीडिया की आठवीं सालगिरह के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव ने बिना नाम लिए एनडीटीवी का जिक्र किया था और श्रोताओं को यह यकीन दिलाया था कि दाल में कुछ तो काला है। परोक्ष रूप से उनका कहना यही था कि संस्थान में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का बेनामी निवेश है जिसकी जांच करने से उन्हें रोका गया।

उस दिन साथी पत्रकारों से बातचीत में पता लगा कि लोगों को संजय कुमार श्रीवास्तव के आरोपों पर यकीन नहीं था। ऐसे साथियों का कहना था कि अगर राजस्व सेवा अधिकारी की बातों में दम होता तो मोदी सरकार ने अभी तक कार्रवाई की होती। हालांकि, मेरा मानना है कि मीडिया से कोई भी सरकार सीधे मोर्चा नहीं लेती है। खासकर तब जब झुकने के लिए कहने पर पहले ही ज्यादातर मीडिया संस्थान रेंग रहे हों। इसलिए एनडीटीवी की नई संपादकीय नीति और पूर्व गृह व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का इंटरव्यू नहीं दिखाने का एनडीटीवी का निर्णय चिन्ता पैदा करने वाला है। अगर कुछ गड़बड़ है तो कार्रवाई की जाए – कोई एतराज नहीं है। पर गड़बड़ी की आड़ में दबाव डालना, संपादकीय नीति प्रभावित करना गलत है। आम लोग विज्ञापन के लिए “बिक जाने” जैसे चलताऊ आरोप लगा रहे हैं पर मामला उससे गंभीर है।

एनडीटीवी का यह मामला इसलिए भी गंभीर है कि अभी तक यह सरकार के खिलाफ अकेले डटा हुआ था और दूसरे संजय श्रीवास्तव का जो आरोप है वह यही कि वित्त मंत्री रहते हुए पी चिदंबरम ने उन्हें एनडीटीवी के मामलों की पड़ताल करने के लिए परेशान और प्रताड़ित किया। अब अगर एनडीटीवी उसी पी चिदंबरम का इंटरव्यू (रिकार्ड होने पर भी) नहीं दिखा रहा है तो बात समझ में आ रही है। संजय श्रीवास्तव का आरोप तो लगभग यही है कि एनडीटीवी में पी चिदंबरम का बेनामी निवेश है और उन्हें इस मामले की तह में जाने से रोका गया। अब वही एनडीटीवी और चिदंबरम एक तरह से आमने-सामने हैं। सरकार कार्रवाई करे पर घपले-घोटाले में राजनीति ना करे और इसकी आड़ में ब्लैकमेल तो बिल्कुल अनुचित है। सरकार को और एनडीटीवी को भी चाहिए कि इस मामले में स्थिति साफ करें।

आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने भड़ास के कार्यक्रम में क्या कहा, जानने के लिए इसे पढ़ें : https://www.bhadas4media.com/sabha-sangat/10688-bhadas-karyakram

पी. चिदंबरम का इंटरव्यू न दिखाने संबंधी मूल खबर का लिंक ये है… http://thewire.in/71640/ndtv-censor-news-compromises-national-security/

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अब बताओ जनरल वीके सिंह साहब! प्रेस को प्रेस्टीट्यूट बनाने के लिए कौन जिम्मेदार है?

Sanjaya Kumar Singh : जनरल वीके सिंह ने मीडिया को प्रेसटीट्यूट कहा था तो लोगों को बहुत अच्छा लगा था और अब भी लोग इस विशेषण का उपयोग करते ही हैं। लेकिन अभी जो हालात हैं उसमें मीडिया काम कैसे करे और सूचना कैसे दे? इसपर कोई बोलने वाला नहीं है। मीडिया की अपनी मजबूरियां हैं। फिर भी, कहने की जरूरत नहीं है कि यह स्थिति सरकारी नालायकी के कारण है और मुश्किलों से निपटने का शुतुरमुर्गी तरीका है। जिसतरह वेस्यावृत्ति कोई शौक से नहीं करता उसी तरह संभव है कि मीडिया की भी मजबूरियां हों।

उड़ी हमले के बाद एक वेब पत्रिका ने खबर चलाई कि भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की है और उसके 20 सैनिक हेलीकॉप्टर से पाक अधिकृत कश्मीर गए और कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार आए। हो सकता है कि सेना ने सरकार की अनुमति से या बगैर इजाजत ऐसी कार्रवाई की हो जिसे गुप्त रखने की योजना हो। पर जब यह खबर ‘लीक’ हो गई तो यह पहली चूक है और अगर गलत ही है तो सरकार को तुरंत खंडन क्यों नहीं कर देना चाहिए? चूंकि सरकार का खंडन मुझे नहीं दिखा इसलिए मैं यह मानकर चल रहा था कि खबर सही है और सरकार इसे गोपनीय रखना चाहती है। मीडिया को सच-झूठ की चिन्ता न हो तो आम आदमी कर भी क्या सकता है? खबर जिस तेजी से फैल रही है उस तेजी से खंडन फैलाने में क्या दिक्कत है?

अचानक मुझे ख्याल आया कि अखबार में काम करते हुए हमलोग अपने संबंधित संवाददाता से कहते थे कि आधिकारिक बयान चाहिए। सब कुछ लगभग एक फोन कॉल की दूरी पर होता था। जब मोबाइल नहीं थे, तब भी। संवाददाता संबंधित अधिकारियों से बात करके बता देता था कि आधिकारिक बयान क्या है। यह भी कि खबर सही है या गलत या अधिकारी ने कहा है कि उसे कोट न किया जाए। कभी-कभी यह भी होता था कि अधिकारी सबकुछ बताने के बावजूद कहता था कि मेरी आपसे कोई बात नहीं हुई। खबर उसी हिसाब से छपती थी और लगभग सभी अखबारों में अक्सर एक सी छपती थी।

शायद इसलिए कि तरीका एक था, खबर का खंडन या पुष्टि करने वाले या खबर देने वाले सिर्फ एक और निश्चित स्रोत होते थे। मुझे याद नहीं है कि पहले कभी ऐसा हुआ हो कि एक संस्थान अपनी खबर के समर्थन में ना कोई स्रोत बताये ना सबूत दे फिर भी उसे सही कहे। दूसरी ओर, कोई सरकारी बयान बगैर किसी अधिकारी के नाम के जारी हो और उसके उलट खबर भी चले। पाक अधिकृत पाकिस्तान में उड़ी हमले की जवाबी कार्रवाई के संबंध में इंडिया टुडे की एक खबर मिली जिससे पता चलता है कि इस सरकार के राज में पत्रकारों के लिए काम करना कितना मुश्किल है। प्रेसटीट्यूट तो कह दिया जाता है पर अधिकृत खबर प्राप्त करने का घोषित निश्चित स्रोत ना हो तो मीडिया में अटकलें ही चलेंगी। और अटकलें जाहिर हैं सबकी अलग होंगी।

इंडिया टुडे की इस खबर में कहा गया है कि क्विंट अपनी खबर पर कायम है लेकिन सेना ने आधिकारिक तौर पर ऐसे किसी अभियान से इनकार किया है। सशस्त्र सेना ने भी इस खबर से इनकार किया है। इंडिया टुडे ने लिखा है कि उसके रिपोर्टर्स ने जब सरकार के उच्च पदस्थ अधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होंने इस खबर को “उर्वर कल्पना की उड़ान” बताया। लेकिन वे रिकार्ड पर आने को तैयार नहीं हुए। सवाल उठता है – क्यो? अगर हमला नहीं हुआ है, गलत खबर चल रही है, आप जानते हैं कि खबर गलत है तो सामने आने में किसका डर है? क्यों है?

क्या सेना और सरकार के प्रवक्ता घोषित नहीं हैं? नहीं हैं तो पत्रकार किससे संपर्क करे और हैं तो सरकार क्यों नहीं कहती कि अधिकृत प्रवक्ता से संपर्क करके वास्तविक स्थिति जान ली जा सकती है। और पत्रकार उनसे संपर्क किए बगैर अपुष्ट खबरें चलाते हैं। तकनीक के इस जमाने में यह सब बहुत आसान है और बहुत तेजी से दुनिया भर में फैल सकता है। फिर भी नहीं हो रहा है तो इसका मतलब यह क्यों नहीं लगाया जाए कि सरकार चाहती है कि स्थिति ऐसी ही बनी रहे।

पीओके में जवाबी कार्रवाई की खबर अगर गलत है तो साफ-साफ खंडन क्यों नहीं किया जा रहा है और जब पहली बार खबर देने वाला कह रहा है कि उसकी खबर सही है तो दूसरे कैसे छोड़ दें और बगैर पुष्टि किए कैसे सही मान लें। जनरल वीके सिंह इसका जवाब नहीं देंगे लेकिन प्रेस को प्रेस्टीट्यूट बनाने के लिए कौन जिम्मेदार है? इस बारे में आपकी क्या राय है – यही बताइए।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जीबी रोड पर कोठा चला रहा है एक केंद्रीय मंत्री, जांच रोकने के लिए मुझे फंसाया जा रहा : स्वाति मालीवाल

Sanjaya Kumar Singh : निराधार नहीं हैं स्वाति मालीवाल के आरोप पर “खबर” तो एफआईआर ही है…. आप जानते हैं कि दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो ने एफआईआर लिखाई है। स्वाति के खिलाफ आयोग की पूर्व अध्यक्ष बरखा शुक्ला ने आरोप लगाया है कि स्वाति ने 85 लोगों को आवेदन किए बिना ही दिल्ली महिला आयोग में नौकरी पर रख लिया। इस मामले में स्वाति से सोमवार को दो घंटे पूछताछ भी की गई थी। एसीबी ने स्वाति को 27 सवाल भेजे हैं, जिनका जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया है।

मामला दर्ज होने के बाद स्वाति मालीवाल ने कहा था कि सारी राजनीतिक पार्टियों में ऐसे लोग है, जिन्हें उनका काम पंसद नहीं आता है। इसलिए उनपर आरोप लग रहे है। अन्य मामलों की तरह इस मामले में भी स्वाति की मीडिया ट्रायल शुरू हो चुका हैं। “स्वाति मालीवाल को सता रहा है गिरफ्तारी का डर” – जैसी खबरें चल रही हैं। दूसरी ओर, स्वाति ने आरोप लगाया है कि एक केंद्रीय मंत्री और दिल्ली के नेता जीबी रोड पर कोठा चलाने से जुड़े हुए हैं और वे इस मामले की जांच कर रही हैं इसीलिए उन्हें फंसाया गया है। मैं नहीं जानता कि स्वाति के आरोप सही हैं या उनपर लगे आरोप गलत हैं। दोनों सही हो सकते हैं और दोनों गलत हो सकते हैं।

पर स्वाति के आरोप गंभीर हैं। एक बड़े रैकेट के हैं। स्वाति पर जो आरोप लगे हैं वे भ्रष्टाचार के हैं कुछ रुपयों के हो सकते हैं और संभव है तकनीकी गड़बड़ी ही हो और पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ हो। पर प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिए? और किसे मिल रही है। ऐसा नहीं है कि स्वाति के आरोप निराधार हैं। पिछले दिनों वेश्यावृत्ति के एक मामले में दिल्ली पुलिस ने अपने 42 लोगों का स्थानांतरण कर दिया था। यह इसी महीने की खबर है। जांच तो उसी समय शुरू हो गई होगी पर क्या हुआ मैं नहीं जानता। पर यह जानता हूं कि तबादला सजा नहीं है। अगर संबंध थे तो सिर्फ तबादला करके क्यों छोड़ दिया गया?

अब स्वाति मालीवाल पर एफआईआर हुई है। अगर आप इन सारी चीजों को जोड़कर देखेंगे तो मामला स्पष्ट है पर यह ऐसे ही “उलझा’ रहेगा। हो सकता है स्वाति मालीवाल गिरफ्तार भी हो जाएं पर रैकेट का खुलासा नहीं होगा। ना कोई यह कहेगा कि स्वाति के आरोप निराधार थे। अच्छी तरह जांच कर ली गई कुछ नहीं मिला। स्वाति के खिलाफ एफआईआर की खबरें तो खूब दिख रही हैं, उनका आरोप ज्यादा गंभीर है, और एफआईआर के कारण नजरअंदाज करने लायक नहीं है पर उसकी चर्चा अपेक्षाकृत बहुत कम है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दैनिक हिन्दुस्तान के सीवान संवाददाता राजदेव रंजन हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने से क्यों भाग रही मोदी सरकार?

शहाबुद्दीन को जमानत मिलने पर बहुत शोर मचा हुआ है। इतने बड़े या कुख्यात अपराधी को जमानत कैसे मिल गई? आज रवीश कुमार ने अपने कार्यक्रम में शहाबुद्दीन के कथित शिकारों में एक, दैनिक हिन्दुस्तान के सीवान संवाददाता राजदेव रंजन की हत्या की चर्चा की। पता चला कि बिहार सरकार ने चार महीने पहले केंद्र सरकार से इस हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की थी। रंजन यादव की पत्नी ने कहा कि वे इस संबंध में केंद्रीय गृहमंत्री से मिल चुकी हैं और प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा है।

बिहार सरकार की घोषणा और सिफारिश के बावजूद अभी तक इस मामले की सीबीआई जांच शुरू भी नहीं हुई है। वह भी तब जब हत्या के बाद अखबार के संपादक शशि शेखर ने लिखा था, “हम लडेंगे क्योंकि लड़ने की जरूरत है”। चार महीने तक कई संस्करण वाले एक पूरे अखबार के (प्रधान संपादक समेत) लड़ने के बावजूद सीबीआई जांच शुरू नहीं हुई। यह है आजकल मीडिया या पत्रकारों की ताकत। अब इसमें यह पूछना कि शहाबुद्दीन को जमानत कैसे मिल गई? मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा है। इसपर तो रिसर्च करना पड़ेगा।

एनडीटीवी से बातचीत में राजदेव रंजन की पत्नी आशा रंजन ने एक निजी चैनल पर शहाबुद्दीन के उस बयान की चर्चा की जिसमें उन्होंने कहा है कि सीबीआई ने मामला देखने के बाद इसे अपने हाथ में लेने लायक नहीं समझा और वापस कर दिया। आशा देवी ने सवाल किया कि जो बात केन्द्र सरकार नहीं बता रही, गृह मंत्री ने नहीं बताया उसकी जानकारी हाल तक जेल में रहे शहाबुद्दीन को कैसे हो गई। आशा रंजन ने कहा कि अगर इस मामले से शहाबुद्दीन का कोई लेना-देना नहीं है तो इस मामले में जानकारी एकत्र करने की क्या जरूरत है?

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन के लिए चर्चित हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वसूली करने वाले संपादक और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने वाले संपादक में क्या कोई अंतर होता है?

Sanjaya Kumar Singh : आज शिक्षक दिवस पर पत्रकारिता से जुड़े कुछ सवाल। क्या पत्रकारिता का कोई गुरू यह बता सकता है कि…

1) “भारत के सबसे ताकतवर शख्स” का इंटरव्यू करने के लिए कैसी योग्यता चाहिए होती है?

2) इसकी पढ़ाई पत्रकारिता में होती है या चैनल चलाने वाले धनपशु कराते हैं?

3) ऐसा व्यक्ति खुद तय करता है कि वह किस “योग्य और प्रतिभाशाली” को इंटरव्यू देगा?

4) इस “योग्य व प्रतिभाशाली” की पहचान किस आधार या शर्तों पर होती है?

5) “भारत के सबसे ताकतवर सख्स” का खिताब क्या पदेन है? अगर नहीं तो इसकी पहचान कैसे की जाती है?

6) इससे पहले यह खिताब (पदेन या वैसे) किसी को मिला है या पहली बार किसी चैनल ने दिया है?

7) तुम हमारी तारीफ करो, मैं तुम्हारी करता हूं – क्या अखबारों के तुम मुझे छापो मैं तुम्हे छापूं से मिलती-जुलती बीमारी है?

8) बलात्कार की शिकार महिला की पहचान क्या बलात्कारी की पार्टी के आधार पर छिपाई या उजागर की जाती है?

9) पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के लिए टाइम्स नाऊ पर जो जुर्माना लगा है वह क्या केवल अंग्रेजी चैनलों के लिए है?

10) वसूली करने वाले संपादक और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने वाले संपादक में क्या कोई अंतर होता है?

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कैसे-कैसे मीडिया संस्थान और मीडिया में नौकरी की ये कैसी शर्तें?

यह कोई प्रयुक्ति पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी है जो अपने सेवा करार में बताती है कि कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के तहत पंजीकृत है। यह लोगों को नौकरी पर रखती है तो उनसे “सेवा करार” करती है। इसमें यह नहीं बताया गया है कि सेवा के बदले क्या दिया जाएगा पर यह प्रमुखता से लिखा है कि बांड की तारीख एक साल (12 महीने) नौकरी जरूर करूंगा। यही नहीं, इसमें यह भी लिखा है कि अगर बांड पर दस्तखत करने वाला ऐसा नहीं कर पाया तो उसे एक लाख रुपए बतौर पेनल्टी देना होगा।

अभी और सुनिए, इसके लिए कोई दस्तावेज नहीं दिए जाएंगे। वैसे तो ऐसी कंपनी में काम करने के रिलीज लेटर और अनुभव प्रमाणपत्र का क्या मतलब होगा पर कंपनी ने खुल्लम खुल्ला यह एलान कर रखा है कि अगर आपने एक साल नौकरी नहीं की तो कोई सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा। कंपनी की मनमानी और एकतरफा सोच इतनी ही नहीं है। कंपनी अपने यहां सेवा देने वालों से यह भी लिखवा लेती है कि वह कंपनी या कंपनी के अधिकारियों को किसी भी ढंग से बदनाम नहीं करेगा और अगर ऐसा कुछ किया गया तो यह भी सेवा शर्तों का उल्लंघन होगा। इन शर्तों पर नौकरी करने वाले लोगों को कंपनी से कुछ शिकायत थी जिसकी सूचना Bhadas4Media.com पर प्रकाशित हुई तो कंपनी ने अपनी इन सेवा शर्तों को सार्वजनिक किया जैसे इनकी कोई कानूनी अहमियत हो। और इसी आधार पर कंपनी ने बताया है कि उसने किसे किस कारण से नौकरी से निकाल दिया। आइए, एक नजर उसपर भी डालें…

”…As per the story you mentioned some names for whom we didn’t paid dues…let me talk about it Mr Varun Aryan took Laptop from the Company & 5,000 rupees from employee fund till the date he didn’t returned his assets though we cleared his dues with single paisa..”

कंपनी दावा कर रही है कि 5,000 रुपए और लैपटॉप ‘सेवक’ के पास होने के बावजूद उसके बकाया का भुगतान कर दिया गया। जो पहली नजर में ही अविश्वसनीय प्रतीत हो रहा है। अंग्रेजी इतनी शानदार है कि कंपनी की ओर से दावा करने वाले की योग्यता का खुलासा हो जा रहा है और समझ में आ रहा है कि कोई भी समझदार आदमी ऐसी बातें नहीं करेगा। फिर भी यह एक रजिस्टर्ड कंपनी है।

”…Then Coming to Mr Rajshekhar Mishra, is the one who is not ready to respect the boss more over not ready to work till edition gets finalised what is the use ?? we said him to get lost & he was with us for more days on his wish and we cleared all his dues, let us send the copy to you…”

कंपनी खुद ही कह रही है, we said him to get lost इसके बावजूद कर्मचारी अपनी इच्छा से ज्यादा समय तक बना रहा फिर भी हमने पैसे दिए। भइया कंपनी चला रहे हो या खैरात बांट रहे हो?

Now Turn Mr Sachin Choudhary, when we are ready to launch he took leave by saying his wife is ill & when we terminated him he is saying my wife is not ill and I said lie, then when we terminate one person how can we clear his dues, moreover he is having his one year employment bond with us.

पत्नी बीमार थी तो नौकरी से निकाल दिया। अब वह कह है कि मैंने झूठ बोला। पत्नी की बीमारी नौकरी छुड़ा देगी तो बचाने के लि झूठ बोलना ही पड़ेगा। क्या चाहते हो – नौकरी छोड़ दे। तो यही बोलो। पत्नी बीमार होने का उपयोग करोगे तो कर्मचारी बेचारा क्या करे?

Last but not the least Mr Sajjan Choudhary, same with him, when he signed one year bond & all of sudden he told he is resigning then management took time to approve his resignation and its not even a month, then how come you say that we are spoiling their career. They spoiled our PRAYUKTI CAREER without any knowledge.

और कर्मचारी के इस्तीफा देने से कंपनी का कैरियर चौपट हो गया।

Last but not the least, last time we are warning before publishing try to know the facts, and delete that news immediately if not I will publish about your deeds in my paper & at the same time I will proceed with legal actions. I don’t spare wrong things when we are right.

और अंत में खिलाफ खबर छापने वाले को अंतिम चेतावनी। कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ अपने अखबार में छापने की धमकी। भाई जान कह रहे हैं कि हम गलत चीज को नहीं छोड़ते जब हम ठीक हों। समझ में आए तो मुझे भी बताइए कहना क्या चाह रहे हैं। सड़क पर निपटेंगे या अदालत में? मूल खबर पढ़ना चाहें तो लिंक ये रहा : https://www.bhadas4media.com/print/10520-pryukti-letter

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संजय जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन / टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके एफबी वॉल से लिया गया है.


संबंधित खबरें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पतंजलि को ऐसे विज्ञापन करने की इजाजत है तो मेक इन इंडिया और एफडीआई का क्या मतलब?

Sanjaya Kumar Singh : ”विदेशी कंपनियां हमारे देश के लिए बहुत ही खतरनाक हैं – पतंजलि”…  पतंजलि का एक राष्ट्रवादी विज्ञापन आता है – पतंजलि अपनाइए देश को आर्थिक आजादी दिलाइए। इसमें दावा किया जाता है कि विदेशी कंपनियां अपना मुनाफा विदेश ले जाती हैं, देश में कोई लोकोपकारी काम नहीं करती हैं पतंजलि का उद्देश्य सिर्फ चैरिटी है। विदेशी कंपनियां हमारे देश के लिए बहुत ही खतरनाक हैं। इस विज्ञापन का भाव विदेशी कंपनियों के खिलाफ तो है ही बिना नाम लिए देशी कंपनियों को भी छोटा या तुच्छ बताने की कोशिश की गई है जबकि पतंजलि अभी समाज सेवा में टाटा जैसी कंपनियों का पासंग भी नहीं हो सकता है। टाटा तो एक है, ऐसी कितनी ही कंपनियां हैं जो वर्षों से अपने स्तर पर समाज सेवा के काम कर रही हैं।

टोयोटा ने देश भर में (बनारस समेत) सार्वजनिक शौंचालय बनवाए हैं, मर्सिडीज सड़क सुरक्षा की दिशा में काम कर रही है। मेरा मकसद इन कंपनियों का प्रचार करना नहीं, पतंजलि के विज्ञापन का टुच्चापन सामने लाना है। निश्चित रूप से यह विज्ञापन अनुचित और अनैतिक तो है ही, सिर्फ मैं, मैं करने वाला भी है। निश्चित रूप से इसे प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। एक ऐसी कंपनी जो पहले भी भ्रमित करने वाले और गलत विज्ञापन चला चुकी है, ऐसा विज्ञापन कैसे चला सकती है?

अगर पतंजलि को ऐसे विज्ञापन करने की इजाजत है तो मेक इन इंडिया और एफडीआई का क्या मतलब? अगर कोई विदेशी कंपनी भारतीय कंपनी या उत्पाद की खामी बताने वाला विज्ञापन चलाए तो क्या वह ठीक होगा। बाबा रामदेव सिर्फ अपनी या अपनी कंपनी की बात करें तो मैं विवाद में नहीं पड़ूंगा लेकिन भारत अगर उत्पादों और कारोबार के लिहाज से इतना ही योग्य और अग्रणी होता तो चीनी उत्पाद भारतीय बाजार में क्यों भर गए? इसमें कोई शक नहीं है कि कई चीजों को कानून बनाकर जबरन रोका गया है। भारतीय उद्योग प्रतिबंध के दम पर फलने-फूलने के इंतजार में हैं। इसके बावजूद ऐसे विज्ञापन क्या किसी विदेशी कंपनी को भारत में निवेश करने के लिए प्रेरित करेंगे। 2000 सीसी के ऊपर की डीजल गाड़ियों के पंजीकरण पर प्रतिबंध को टोयोटा ने पहले ही मौत का फरमान कहा है पर अतिथि देवो भव वाले देश में अतिथि को फंसाकर उसके पैसे कथित रूप से निवेश करवाकर इस तरह अपमानित करें यह कहां का राष्ट्रवाद है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

लोकसभा की आज की कार्यवाही पर अजात अभिषेक की यह लाइव कमेंट्री पढ़ने लायक

Sanjaya Kumar Singh : लोकसभा की आज की कार्यवाही पर अजात अभिषेक की लाइव कमेंट्री पढ़ने लायक है। पूरा दिन लोकसभा की कार्यवाही देखा महंगाई पर चर्चा हो रही थी और सरकार के जितने भी नुमाइंदे थे सब मॉनसून के उपर सारी जिम्मेदारी डाल रहे थे, बता रहे थे कि दो साल पानी नहीं बरसा और इस साल बरसा है तो आगे सब ठीक हो जाएगा। शाम को ये लब्बोलुआब निकला की सरकार मुंह बाये बारिश के लिए आसमान की ओर ताक रही है और हम मुंह बाये सरकार की ओर ताक रहे हैं। चलो टीवी बंद करते हैं पहले भी हमारा कट रहा था आगे भी हमारा ही कटेगा।

XXX

5 बार लोकसभा सांसद, एक बार राज्यसभा सांसद और दो बार केंद्रीय मंत्री सदन में खड़े होकर डॉ लोहिया को कोट करके झूठ बोल रहे हैं कि दवाओं के दाम इस सरकार ने कम किये हैं जिसका लाभ गरीब आदमी को मिल रहा है । कैंसर की दवा 8000 से एक लाख आठ हजार करने का श्रेय इसी मोदी सरकार को है। 1 अप्रैल 2015 को सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर 509 दवाओं का दाम बढा दिया था। हुकुमदेव जी झूठ जितना मर्जी हो बोलिए लेकिन लोहिया का नाम मत लिजिए वरना लोहिया जी जहां भी होंगे शर्मिंदा हो रहे होंगे।

XXX

जेटली जी ने लोकसभा में 15-20 मिनट दाल की महंगाई पर छौंक लगाया और तृणमूल कांग्रेस के सुगाता राय ने उस पर दो मिनट में रायता फेर दिये। वैश्विक दुनिया में तेल की कीमतों में गिरावट आयी तो सरकार ने उसका लाभ आम उपभोक्ताओं को हस्तांतरित करने के बजाय टैक्स बढा दिया और अपनी जेबें भर ली। जब दाल की कीमतें बढ़ रही हैं तो उपभोक्ता को पूरा पैसा देना है। मतलब लाभ नहीं बांटेगी सरकार लेकिन हानि का पूरा जनता से वसूलेगी। फिर वही बात आ गई कि इन लोगों ने ‘ल’ पढा है ‘द’ नहीं पढा है।

XXX

लोकसभा में राहुल गांधी के महंगाई के आरोप पर मधुबनी के सांसद हुकुमदेव जी जैसा वरिष्ठ नेता जब जन-धन योजना में एकाउंट खोलने की बात करने लगता है तो लगता है कि वाकई में राजनीति अब चारण युग के चरमोत्कर्ष पर है। बाकी “भारत की राजधानी क्या है” पूछने पर “शिमला बहुत सुंदर है” बताना संघी राजनीति का पुराना कल्चर है।

XXX

सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक पब्लिक प्रोविडेंट फंड और ईपीएफ में करीब 27000 हजार करोड़ रुपए का कोई भी दावेदार नहीं है और अब वो इसे ट्रांसफर करके वरिष्ठ नागरिकों के लिए कल्याण कोष बनाना चाहते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए सरकार का सोचना बहुत ही प्रशंसनीय है लेकिन हुजूर आप नाम कमाना चाहते हैं तो कमाइये लेकिन मजदूरों के पैसे से क्यों? आप क्रेडिट कार्ड रखते हैं दो दिन लेट होइए पेमेंट करने में दिन में 50 बार फोन आ जायेगा, एक सामान्य व्यक्ति कैसा भी लोन ले और उसकी किश्त बाउंस होते ही बैंक आपको कहीं से भी खोजकर ले आयेगा और कैसे भी करके वो आपसे वसूल कर लेगा। आज मजदूरों का पैसा जो उनकी अज्ञानता और मुश्किल सरकारी तंत्र की वजह से सरकार के पास पडा है अगर सरकार बहादुर चाह ले तो पंद्रह दिन में हर खाताधारक का पैसा उसके पास होगा लेकिन सरकारों ने ‘ल’ पढा है ‘द’ पढा ही नहीं है। आप गाय, गोबर, गोमूत्र में उलझे रहिए सरकार आपकी जेब काटने में तत्पर है। (बात सोलह आने सही है, सरकार जब अपना पैसा नहीं छोड़ती तो गरीबों का रखने की कैसे सोच सकती है।)

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आज लगा कि प्रभाष जी की यादों को संघ ने गोद ले लिया है!

प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम पर जनसत्ता के कुछ पुराने लोगों की चर्चा…. प्रभाष प्रसंग में नहीं जा सका। अफ़सोस था। फिर फेसबुक पर किसी का लिखा ये पढ़ा और अफ़सोस कम हुआ: “अभी वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् डॉ. क्लॉड अल्वारेस का ‘गणेश और आधुनिक बुद्धिजीवी’ विषय पर प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान चल रहा है। वे महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं, “वैसे तो मेरे परिचय में कहा जाता है कि मैं ‘रोमन कैथोलिक’ हूं लेकिन रोम से हमारा क्या लेना-देना, वास्तव में मैं ‘हिंदू क्रिश्चियन’ हूं, क्योंकि मेरे पूर्वज हिंदू थे और मैं मानता हूं कि जो भारत में रहता है वह सब हिंदू है।”

सबको हिंदू घोषित करने की ये बीमारी भारत को कहीं पाकिस्तान न बना दे!

उन्होंने और भी दिलचस्प बातें कहीं। चूक गए। अफसोस करो। कहीं हिंदू राष्ट्र तो घोषित नहीं कर दिया?

उन्होंने बताया कि बैगन की 3500 प्रजातियां हैं और चावल की 350000। लग रहा था हम पूसा इंस्टीट्यूट में बैठे हैं।

अच्छा। और ये कि ये सब प्रजातियाँ आर्यावर्त ने ही विश्व को दीं। जिन्हें अब मोन्सान्टो बेच रहा है जैसे बोईंग ने पुष्पक विमान का ब्लूप्रिंट चुरा लिया था और अब मज़े कर रहा है।

बिल्कुल। अगर तुम वहां नहीं थे। फिर भी पता है तो ये पार्टी लाइन का ही मामला लगता है।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने ठीक कहा था कि गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी हुई थी। लोगों ने उनका मजाक उड़ाया पर कोई उनके बचाव में नहीं आया। फिर बताया कि प्लास्टिक सर्जरी सबसे पहले भारत में ही शुरू हुई थी। बहुत ही ज्ञानवर्धक भाषण था।

अब अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं रहा। लेकिन वो तो एक हिस्सा भर था। बाकायदा – लैपटॉप प्रेजेंटेशन के जरिए (यह सब बताया गया)। प्रधानमंत्री जो कहते हैं ठीक ही कहते होंगे। (आज के आयोजन में) प्रभाष परंपरा न्यास की विविधता दिखी। प्रधानमंत्री के @#$%^^& का भरपूर, तर्कसंगत बचाव किया गया।

आज प्रभाष जोशी होते तो कल सुबह के जनसत्ता में ये सब सुनकर क्या लिखते? अब बस कल्पना ही कर सकते हैं। जीवित नहीं रह पाते। वो तो बहुत पहले की स्थितियां नहीं झेल पाए। पेड न्यूज ने ही उनकी बलि ले ली। ये सब उनके वश का नहीं था। राय साब का लिखा छपता। (जो छपा है पढ़ सकते हैं)।

 

(उपरोक्त न्यूज कटिंग पर क्लिक करें ताकि साफ-साफ पढ़ सकें)

वे एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) में हैं ये भी तो है। शायद इसीलिए वहां वंदना शिवा भी थीं। इतना ही नहीं, वहां एक और सज्जन जिन्हें गैलिलियो प्राइज भी मिला और वे बच्चों को एक हफ्ते में maths समझा देने में समर्थ भी हैं (भी मौजूद थे)। दिग्गज आलोचक नामवर सिंह ने कहा हिन्दुस्तान में भुलाने का एक दौर रहा है। महत्वपूर्ण ये है कि तीसरा press commission जल्दी ही घोषित हो जाएगा।

अब उन्हीं की याद में पुनरुत्थानवादी डंका बजा रहे हैं। इससे भयानक और क्या हो सकता है। “संघ कबीले” पर प्रभाष जी के लिखे को न्यूट्रलाइज ऐसे ही किया जा सकता है। आज तो लगा कि प्रभाष जी (उनकी यादों को) संघ ने गोद ले लिया है। हालांकि एक ही व्यक्ति का भाषण खतरनाक था। बाकी झेलने लायक थे। कौन थे वो सज्जन? (यह सवाल गैलिलियो प्राइज विजेता के लिए है)। गणित के उस्ताद बताया। तीन दिन में कैलकुलस पढ़ा देने का दावा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हैं। नाम याद नहीं रहा। श्रोताओं में थे। (एक नाम, को संबोधित) उनकी योग्यता और तर्क शक्ति पर संदेश नहीं है। पर मौका और तथ्य …. प्रभाष जोशी को भी संघ ने एप्रोप्रिएट किया!!

प्रभाष जी ऐसे पोंगों के खिलाफ थे….अफ़सोस ये है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके लिखे पर बात ही नहीं की जा रही है। और ये एक साज़िश के तहत हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे भगत सिंह की तस्वीर पर फूल चढ़ाने वाले नहीं चाहते कि भगत सिंह का लिखा पढ़ा जाए। बिलकुल यही बात है। हुआ तो लगभग वही। हालांकि, संदेह का लाभ देते हुए कहा जा सकता है कि आयोजकों की जिम्मेदारी वक्ता के चयन तक ही थी। और मंच पर जिस तरह राय साब उनके पास गए, और उन्होंने कई पन्ने (एक साथ) पलट दिए और अचनाक समय कम होने की बात कर उपसंहार करने लगे उससे लगता है कि आयोजकों की सहमति नहीं भी हो सकती है। और उनसे बाकायदा जल्दी समाप्त करने के लिए कहा गया हो। क्या प्रभाष जी के लेखन पर एक कार्यशाला आयोजित नहीं करनी चाहिए ताकि उनको सिर्फ़ एक परंपरा-प्रेमी संपादक के तौर पर प्रोजेक्ट करने के षड्यंत्र को कुछ तो रोका जा सके।

मेरा सवाल है: आज प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व पर बात करना ज़्यादा प्रासंगिक है या उनके लेखन पर? अगर कोई उनके लेखन पर चुप्पी साधे है और सिर्फ़ उनके व्यक्तित्व पर पुष्पांजलि देना चाहता है तो मुझे इसमें षड्यंत्र साफ़ नज़र आता है। आयोजकों की नीयत पर मुझे शक नहीं है। प्रभाष जी के लेखन पर जरूर बातचीत होनी चाहिए। उनके लेखन में जो बदलाव आया उस पर भी सोचा जाना चाहिए। ये शोध की बात है। आयोजक-प्रायोजक तो अपना नफा-नुकसान देखेगा ही। किसी फेसबुकिया की सन्दर्भ से काट कर की गई आधी-अधूरी रिपोर्टिंग से पूरे आयोजन के बाबत निष्कर्ष निकाल कर फ़तवा देने की हड़बड़ी क्यों? विद्वतजनों से सादर फतवा यहां कौन किसको देगा। कौन नवसिखुआ है। पर ब्रेकिंग न्यूज का अलग मजा है। इसे झेलना सीखना ही होगा। टन टना टन्न लगता है कानों में … सोच समझ कर बैलेंस करके लिखा पढ़ने में कहां मजा आएगा।

……. भाई ने मुद्दे की बात उठाई है ………

प्रभाष जी के जमाने में ही संघमार्का हिंदू वादियों की भरमार थी। अब उस इतिहास में क्या कोई संशोधन मुमकिन है? मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रभाष जी के लेखन को इस दौर में फिर से याद करने की गुज़ारिश कर रहा हूँ। हम प्रभाष जी को ज़रूर याद रखें पर उनके लेखन को पशेपर्दा करना एक साज़िश से कम नहीं है। ज़िम्मेदार कोई भी हो। एक गोष्ठी सिर्फ़ उनके लिखे पर होनी चाहिए। इस पर नहीं कि वो कितने महान संपादक थे। प्रभाष जी को महान उनके लेखन और विचार ने बनाया। इसका ध्यान रखा जाए। प्रभाष जी के लेखन पर चर्चा उत्तम आइडिया है …….. ।

(बगैर अनुमति उद्धृत किया जा रहा है इसलिए नाम जानबूझ कर हटा दिए गए हैं। हालांकि, चर्चा सार्वजनिक और सबकी जानकारी में रिकार्डेड है।)

लेखक संजय कुमार सिंह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन / टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘आप’ सिद्धू को सीएम का चेहरा बना रही तो इससे उसकी दरिद्रता ज़ाहिर होती है : ओम थानवी

Om Thanvi : क्या आप पार्टी सचमुच नवजोत सिद्धू को पंजाब में मुख्यमंत्री का चेहरा बना रही है? अगर ऐसा है तो इससे आप पार्टी की दरिद्रता ही ज़ाहिर होती है। जैसा कि सुनते हैं, पंजाब में पार्टी की ज़बरदस्त साख पहले ही क़ायम हो चुकी है। फिर सिद्धू उसे क्या भोगने आ रहे हैं? ‘आप’ भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा से दूर रहते हुए पनपी पार्टी है। जबकि सिद्धू हिंसा के ऐसे मामले में शामिल रहे हैं, जिसमें उनके ही शहर के एक नागरिक को जान से हाथ धोना पड़ा था।

उच्च न्यायालय ने सिद्धू को उस ग़ैरइरादतन हत्या का अपराधी ठहराया। ज़िल्लत के साथ उन्हें लोकसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। फिर सिद्धू भरोसे के राजनेता भी नहीं। उनकी अमृतसर की सीट अरुण जेटली को दे दी गई तो कहते हैं उन्होंने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार की जड़ें काटीं। हाल में पहले उन्हें राज्यसभा में लाया गया, शायद इसलिए कि पंजाब चुनाव में नुक़सान न पहुँचाएँ। तीन महीने के भीतर उन्होंने अपनी ‘माई-बाप’ पार्टी को फिर पीठ दिखा दी। ऐसा व्यक्ति ‘आप’ के लिए कैसे भरोसे का साबित होगा?

‘आप’ में अनेक नेता ऐसे हैं जिन्हें पूरा पंजाब जानता है। कँवर संधू जैसे कार्यकर्ताओं की सामाजिक ही नहीं, बौद्धिक छवि भी बड़ी है। इस मुक़ाम पर कहाँ केजरीवाल हँसोड़-लपोड़ सिद्धू के चक्कर में पड़ गए (अगर पड़ गए)!

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारिता के रंगरूटों, भक्त पत्रकारों… पहले बरखा पर आरोप तो जान लो!

Sanjaya Kumar Singh : बरखा दत्त के पक्ष में… पत्रकारिता के रंगरूटों, भक्त पत्रकारों – बरखा पर आरोप जान लो… संस्कारी सरकार के भक्तों के संस्कार इतनी बदबू फैला रहे हैं कि नए बने शौंचालयों का कोई फायदा ही नहीं हुआ। कहीं चिट्ठी बह रही है तो कहीं आरोप। स्वच्छता अभियान का जो हो, बदबू तो बढ़ रही है। इसके लिए रोहित सरदाना जैसे लोगों को बताना होगा कि सवाल खुले में ना करें – बदबू बहुत ज्यादा हो गई है। वैसे तो रोहित की हैसियत नहीं है कि बरखा दत्त के बारे में रवीश से पूछते पर भक्तों की मंडली सोशल मीडिया पर रोहित को कंधे पर बैठाकर जिस ढंग से नाच रही है उसमें भक्तों को बताना जरूरी है कि मुद्दा है क्या और बरखा पर शोर मचाने वाले, उसपर आरोप लगाने वालों को सच बता दिया जाए।

कल मैंने स्मृति ईरानी को लिखी उनकी चिट्ठी की भाषा, शैली, संयम, शब्दों के चयन और रुख की तारीफ की तो एक मित्र ने पूछा, “क्या इससे बरखा के पाप धुल जायेंगे या उनकी पत्रकारिता की खोई साख अब वापस आएगी!” मैंने पूछा, “आप बरखा के किस ‘पाप’ की बात कर रहे हैं? उसपर कोई एफआईआईर है? जेल गई? जिनलोगों पर एफआईआर है, जेल हो आए, तड़ी पार हैं पहले उनकी बात कीजिए। बरखा पर ही करनी है तो पहले एक एफआईआर करवाइए। फिर बात कीजिए। अच्छा लगेगा।”

उन्होंने लिखा, “जब किसी की साख ही न बची हो तो उसकी बातों की मार्केट वैल्यू कुछ नहीं होती जनता के बीच (खास जमात के समर्थकों और पिछलग्गुओं के अलावा)। नीरा राडिया से लेकर गुजरात और कारगिल की रिपोर्टिंग के सबूत ही काफी हैं और टेलीविजन की दुनिया की गन्दगी और बातों को मैं भी बेहतर जनता हूं। अगर आप पूर्वाग्रही होकर बात करना चाहते हैं तो वाद बेकार है, साथ ही आपसे विवाद करने का भी मेरा कोई मंतव्य नहीं क्योंकि मैं आपका सम्मान करता हूं, भले ही कहीं पर मतभिन्नता होती हो।”

इन्होंने मुझे असमंजस में डाल दिया। मेरे सवाल का जवाब तो नहीं दिया आरोप यह कि, “अगर आप पूर्वाग्रही होकर बात करना चाहते हैं।” इसी पोस्ट पर एक अन्य मित्र ने लिखा, “बरखा का कैरेक्टर पता है तुम्हे? दलाली तथाकथित पत्रकारों का असली पेशा हो गया है आजकल”। जुमलों की सरकार और भक्ति के जमाने में जब प्रधानमंत्री मन की बात कर रहे हैं तो कोई भी अपने मन की बात को “खबर” बना दे रहा है। मैंने बरखा के चरित्र पर सवाल उठाने वाले से कहा, “मेरी उम्र 52 साल है और ये फेसबुक पर लिखा है। आप मुझे तुम कह रहे हैं तो सीनियर और अनुभवी होंगे। किसी महिला का कैरेक्टर कैसे मालूम करते हैं और उसपर आरोप लगाने के लिए कोई सबूत चाहिए होता है या यूंही मोदी जी की तरह कह दिया तो मान लूं?

बरखा पर लगे आरोपों का पता लगाने के लिए गूगल सर्च करने पर एक ब्लॉग http://sins-of-barkha.blogspot.in मिला। मुझे लगा सारे मामले एक ही जगह मिल जाएंगे काम आसान हो जाएगा पर यहां एक नया आरोप मालूम हुआ कि बरखा को पिछले वित्त मंत्री ने 300 करोड़ रुपए का कर्ज दे रखा है। एक प्रतिशत के मामूली ब्याज पर। यह एक अप्रैल 2011 की पोस्ट है। इसमें लिखा है आरटीआई कार्यकर्ताओं को इस मामले पर आरटीआई लगाना चाहिए पर आरटीआई और दिल्ली विश्वविद्यालय में तो अब कोई अंतर रह नहीं गया है तो आगे कुछ नहीं है। ना इस ब्लॉग पर कोई दूसरा आरोप। हां, ब्लॉग लेखक ने यह जरूर कहा है कि बरखा को जानने के लिए राडियागेट या बरखागेट गूगल कर लिया जाए। मैंने ऐसा ही किया। अब मुझे http://barkhagate.blogspot.in मिला। इस पर जो लिखा मिला सो इस प्रकार है…

So what the heck is ‪#‎Barkhagate‬?

Its a scam involving journalist @bdutt and a lobbyist for leading Telcos and Industrialists by name Radia, in connection to the support to UPA government in 2009 between Congress and DMK. The transcript of the whole conversation was put up on the website of the Open The Magazine….

…”As talks between the DMK and Congress (‘them’) broke down over joining the Government in May 2009, Radia was actively involved in opening channels between the two parties through, among others, television journalist Barkha Dutt”

ध्यान दीजिए इसमें बरखा दत्त अकेले नहीं हैं। लेकिन नाम उनका ही लिया जाता है। इसके अलावा, यहां चार वॉयस ट्रांसक्रिप्ट पोस्ट किया होना दिखाई दे रहा है। पर ये चारो नहीं चले। देखें पहली तस्वीर। यह मामला 2010 से सार्वजनिक जानकारी में है। कोई एफआईआर या कार्रवाई की सूचना ना मुझे है ना इस ब्लॉग पर इसलिए यह माना जा सकता है कि सरकार को इस मामले में कोई मतलब नहीं है या सरकार की राय में यह अपराध नहीं है। राडियागेट मैं नहीं देख रहा क्योंकि अभी मुद्दा राडिया नहीं बरखा हैं। अगर किसी को राडिया से बरखा के और कनेक्शन की जानकारी हो तो लिख सकता है। मुझे नहीं पता है। मैंने नहीं सुना और मैं ऐसा कुछ नेट पर ढूंढ़ नहीं पाया।

बरखा पर तीसरा गंभीर आरोप कारगिल युद्ध के दौरान उनकी लाइव रिपोर्टिंग से कार्रवाई की जगह मालूम हो जाना और पाकिस्तानी हमले में भारतीय सैनिकों के घायल होने का आरोप है। मुझे लगता है कि यह मामला पूरी तरह सच और जैसा बताया जा रहा है वैसा ही हो तो भी यह गलती सिर्फ बरखा की नहीं है। पूरी एनडीटीवी टीम और लाइव प्रसारण से जुड़े नियमों, देख-रख और निगरानी करने वालों के साथ-साथ इस संबंध में नियम बनाने वालों की चूक का मामला है। बरखा तो युदस्थल से रिपोर्ट कर रही थीं और बहादुरी का काम कर रही थीं उसे लाइव दिखना और देखने वालों द्वारा इसका का दुरुपयोग किया जाना बहुत ही विस्तृत मामला है और बरखा की दिलेरी की जगह उसे इसके लिए दोषी ठहराना अनुचित है। यह मामला मई – जून 1999 का है।

इसके बाद मुंबई पर आतंकवादी हमला अप्रैल 2012 में हुआ था। तब भी टीवी के सीधे प्रसारण से समस्या हुई थी। और तब यह गलती बरखा ने नहीं, देश के कई नामी-गिरामी टीवी चैनलों और पत्रकारों ने की थी। एक बार गलती और उसका खामियाजा जानने के बाद ना किसी ने सावधानी बरती ना किसी को इसकी जरूरत लगी ना ऐसा कोई नियम बनाया गया, पूरे तीन साल तक और देश की मीडिया या कहिए देश ने वही गलती दोहराई जो बरखा औऱ एनडीटीवी ने की थी। इससे सीख लेने की जरूरत नहीं है? क्या इस संबंध में नियम अब स्पष्ट घोषित हैं? दिशा निर्देश स्पष्ट हैं? कभी किसी ने पूछा? सोचा? लेकिन बरखा दत्त दोषी है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: