‘सरकार’ जी नवरात्र में मांस भक्षण के नियम बता दें

Sanjaya Kumar Singh : मुंबई में शिवसैनिकों ने वामपंथी से दक्षिणपंथी हुए, साप्ताहिक ब्लिट्ज में पत्रकारिता करते हुए लाल कृष्ण आडवाणी के करीबी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण लेखक रहे, कैश फॉर वोट स्कैम में जेल हो आए सुधीन्द्र कुलकर्णी के साथ आज जैसा व्यवहार किया और उससे पहले की स्थितियों, उसपर प्रतिक्रिया, चुप्पी और समर्थन के मद्देनजर यह स्पष्ट हो गया है कि देश में, जहां कहीं भी दक्षिणपंथी विचारों के लोग पर्याप्त संख्या में हैं वहां पुलिस प्रशासन को छोड़ इन भक्तों के कानून का पालन करना नागरिकों की मजबूरी है। पुलिस है, पर बाद की कार्रवाई (आप चाहें और हिम्मत हो तो लीपापोती कह सकते हैं) के लिए।

ऐसे में देशवासियों और ‘सरकार’ का यह दायित्व है कि नए नियम बता दिए जाएं। इस ‘सरकार’ से तो यह उम्मीद करना भी बेमानी है कि वह विज्ञापन छपवाकर या बयान जारी करके अपने नए नियम बताएगी या इच्छाएं जताएगी। और यह भी कि ‘सरकारी’ बयान अखबारों-टेलीविजन और रेडियो पर खबर के रूप में छापे, दिखाए और सुनाए जाएंगे। देर सबेर ‘सरकार’ यह सब करने लगेगी पर जब तक ऐसा नहीं हो रहा है जनता को अपने हित में चाहिए कि वह शक होने पर ‘सरकार’ से पूछ ले। पर ‘सरकार’ से पूछे भी कैसे। सरकार तो अपनी पसंद के विषयों पर काम करती है और कई विषय मन में आते ही नहीं हैं।

‘सरकार’ ने तो अभी तक यही तय नहीं किया है कि आम जनता को शंका समाधान कैसे करना है या करना भी है कि नहीं। यह भी संभव है कि ‘सरकार’ ने तय किया हो वह ‘स्वहित’ के मामले जनता को बता देगी और जनता को उसका पालन करना ही होगा। यहां तक तो ‘सरकार’ से असहमत होने का कोई कारण नहीं है। पर इतने बड़े देश में विविधता, विवाद, भ्रम और उलझन स्वाभाविक हैं। और मैं भी एक उलझन में हूं। इस पोस्ट का मकसद यही है और मैं एलान करता हूं कि यह किसी भी रूप में ‘सरकार’ का विरोध करने या उसपर तंज कसने के लिए नहीं है।

मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि जनहित में ‘सरकार’ को चाहिए कि वह लोगों के उलझन दूर करती रहे और एक नंबर (टॉल फ्री हो तो और अच्छा है) घोषित कर दे (प्रचारित / बांटने का काम हम कर लेंगे) जहां लोग पूछ सकें कि मांस खाना है या नहीं? मेरी लंबाई 5 फीट 6 ईंच है कितने फीट की स्कर्ट पहन सकती हूं? पहूनं तो ऊपरी हिस्सा कहां (सिर से या अंगूठे से कितनी दूर रखूं), एक लड़के या लड़की के साथ डेट पर जाना है। धर्म के सबूत के रूप में कौन से दस्तावाज मान्य हैं (मेरे पास जो हैं किसी में धर्म नहीं लिखा है) आदि।

पाठक कृपया इन समस्याओं को हल्के में ना लें। और अगर आप हिन्दू हैं और फिर भी किसी कारण से सरकार विरोधी हैं (नकली हिन्दू होने, नेहरू जी जैसे या फिर किसी अन्य कारण से) तो आपके पास पाकिस्तान जाने का भी विकल्प नहीं है। अगर आप समझ रहे थे कि नेपाल चले जाएंगे (वहां जाने के लिए पासपोर्ट भी नहीं चाहिए) तो अपनी गलतफहमियां दूर कर लें। भूकंप के बाद भारत सरकार ने उसकी सेवा करके अपना जो प्रचार किया था याद है ना। और नेपाल ने जिस तरह एतराज किया था। मीडिया को भी गरिया था। उसकी कसर निकाली जा रही है। उसे सबक तो सीखाना ही था। तीन तरफ से भारत से घिरा है तब इतनी गर्मी थी उसे। तो अब नेपाल आपका स्वागत करे भी तो आप वहां रहेंगे कहां और जाएंगे। कैसे। नेपाल में पांच सितारा होटल बंद हैं क्योंकि वहां ग्राहक नहीं हैं और ग्राहक नहीं हैं क्योंकि सड़कों पर चलने के लिए ईंधन नहीं है और भारत सरकार बिहार चुनाव में व्यस्त है।

नवरात्र शुरू होने वाले हैं। मैं जानना चाहता था कि इस दौरान मांस भक्षण से संबंधित नियम क्या हैं। सभी धर्मों के लिए एक है या अलग-अलग। खरीद कर खा सकते हैं कि नहीं, नहीं खा सकते हैं तो क्या फ्रोजन भी प्रतिबंधित रहेगा और अगर हां तो पहले से जो फ्रीज में हैं उन्हें वहीं रखा जा सकता है या लोहे की अलमारी में रखना होगा या सड़क पर फेंक देना है या केले के पत्ते में बांधकर, लाल कपड़े में लपेटकर कूड़े दान में फेंकना है। फिलहाल तो मैं इसी उलझन में दुबला हुआ जा रहा हूं। किसी और को कोई उलझन हो तो यहां कमेंट मे डाल दें ताकि ‘सरकार’ भी समझे कि मेरी मांग कितनी जायज और जरूरत सम्मत है।

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भक्तों को मौका दिया गया है कि वे भी अपना काला धन सफेद कर लें!

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव से पहले विदेशों में रखे काले धन को मुद्दा बनाने और उसे वापस लाकर देश के हर नागरिक को 15 लाख रुपए मिलने का सपना दिखाने और फिर उसे जुमला बताकर झांसा देने वाली सरकार ने विदेशों में काले पैसे रखने वालों के लिए एक योजना पेश की है। कायदे से सरकार को इसका खूब प्रचार करना चाहिए ताकि लोग इसका भरपूर लाभ उठाएं और सरकार को टैक्स मिले। स्पष्ट कारणों से इसका वैसा प्रचार नहीं किया जा रहा है।

इस योजना के तहत विदेशों में काले धन की घोषणा करने की तारीख 30 सितंबर 2015 है। अगर आपने भी विदेश में काला धन छुपा रखा है तो जल्दी कीजिए, घोषणा करके, टैक्स देकर काले धन को सफेद बनाइए। समय रहते मौके का लाभ उठाइए। (नोट : यह विदेशों में काला धन रखने वाले देशभक्त मित्रों के लिए सूचना भर है। इसका कोई और मतलब ना लगाया जाए।) हां, खबर तो पुरानी है। पर इसका प्रचार औपचारिक तौर पर ही किया गया। असल में पहले कहा जाता था कि कांग्रेसियों का काला पैसा विदेश में है। अब भक्तों को मौका दिया गया है कि वे अपना सफेद कर लें। फिर शायद कोई कार्रवाई हो।

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दिल्ली में डेंगू से लड़ने का ठेका सिर्फ अरविन्द केजरीवाल ने लिया है!

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली में डेंगू से लड़ने का ठेका सिर्फ अरविन्द केजरीवाल ने लिया है। बाकी देश में तो ना मच्छर हैं ना डेंगू होता है। गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव में भी नहीं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री पिछली दफा बिहार चुनाव के उम्मीदवारों की घोषणा कर रहे थे और माननीय उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के अफसरों को बता रहे हैं कि उन्हें किसका आदेश मानना है, किसका नहीं।

भाजपा के आम कार्यकर्ता दिल्ली सरकार के घोटाले ढूंढ़ने में लगे हैं और ढूंढ़ निकाला कि दिल्ली सरकार ने 30 रुपए किलो प्याज बेचकर भी कमाई की। 70-80 रुपए किलो बेचने वालों ने कोई कमाई नहीं की। जानते हैं क्यों? अरविन्द केजरीवाल आईआईटी के पढ़े, भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी जो रहे हैं। हालांकि, भक्त फिर भी कहते हैं कि आईआईटी पर सरकार बेकार खर्च कर रही है – आईआईटी वालों से देश को कोई लाभ नहीं हुआ है।

भाजपा ने यह आरोप तब लगाया है जब उसके एक नेता पिछले दिनों रेडियो विज्ञापन के जरिए बता रहे थे कि अप्रैल में केंद्र सरकार ने 19 रुपए किलो प्याज खरीदकर रखा था। दिल्ली सरकार ने ध्यान नहीं दिया। ना प्याज खरीदा। उल्टे कुछ मुनाफाखोरों को बढ़ावा दिया और इस महंगाई को बढ़ावा देने के कारण आज प्याज महंगा बिक रहा है। अब वही भाजपा कह रही है कि अरविन्द केजरीवाल ने 18 रुपए किलो खरीदा और 30 रुपए किलो बेचकर घोटाला कर दिया। केंद्र सरकार ने 19 रुपए किलो खरीदकर रखा था वो 70 रुपए किलो बिका फिर भी कोई घोटाला नहीं हुआ। भैया सोच लो क्या आरोप लगाना है। आपस में बैठकर तय कर लो। मोदी जी तो टीम इंडिया की बात कर रहे थे और यहां टीम भाजपा की कथनी और करनी में ही अंतर दिख रहा है।

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मोदी और केजरीवाल के चुनावी युद्ध वाली डॉक्यूमेंट्री ‘बैटल फॉर बनारस’ सेंसर में अटकी

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की युद्ध भूमि वाराणसी में हुई चुनावी लड़ाई को दिखाने वाली एक डॉक्यूमेंट्री सेंसर बोर्ड में अटक गई है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है डॉक्यूमेंट्री फिल्म नहीं होती – यह मौके पर रिकॉर्ड किए गए वास्तविक वीडियो का फिल्म के रूप में संकलन होता है और इसे फिल्म बनाने के लिए रचनात्मक आजादी भी लगभग नहीं ली जाती है। पर जाने-माने फिल्मकार, कमल स्वरूप ने दावा किया है कि पिछले साल के लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट पर चुनावी भिड़ंत पर आधारित उनकी एक डॉक्यूमेंट्री को सेंसर बोर्ड ने यह कहते हुए मंजूरी देने से इंकार कर दिया कि यह ‘उसके दिशा निर्देशों के अनुरूप नहीं बैठती है।’

यानी चुनाव प्रचार के दौरान जो सब हुआ जिसे देश दुनिया ने टीवी पर और अपनी नंगी, चश्मे और लेंस वाली आंखों से देखा वह सेंसर बोर्ड के दिशा निर्देशों के अनुरूप नहीं है। और सेंसर बोर्ड यह बात किसी आम आदमी को नहीं, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक कमल स्वरूप से कहा है। उन्होंने दावा किया कि बोर्ड ने अभी उन्हें इस बारे में लिखित रूप से अवगत नहीं कराया है, हालांकि उन्हें मौखिक रूप से बताया गया कि यह सेंसर बोर्ड के दिशानिर्देशों में फिट नहीं बैठती है।

समाचार एजेंसी भाषा और टीवी चैनल आजतक की खबरों पर यकीन करें तो ‘बैटल फॉर बनारस’ को हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने देखा। इसमें वाराणसी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच के मुकाबले को दर्शाया गया है। पता नहीं डॉक्यूमेंट्री में जो दिखाया गया है वह आम उम्मीदवारों के स्तर की लड़ाई नहीं है या प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के स्तर की नहीं होने के कारण सेंसर बोर्ड इसपर बनी डॉक्यूमेंट्री को अपने दिशा निर्देशों के अनुकूल नहीं मान रहा है। वैसे, बात यहीं तक होती तो कुछ खास नहीं था। वैसे भी यह तीन दिन पुरानी खबर है। पर समस्या यह है कि बिहार चुनाव में सभी उम्मीदवार फिर उसी रूप में हैं। और भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री, महामहिम श्री नरेन्द्र मोदी पहले की ही तरह फिर मोर्चे पर हैं और अपने तमाम गोले बेधड़क दागे जा रहे हैं।

बाद में चुनाव आयोग इसपर बनने वाली डॉक्टूमेंट्री दिखाने की इजाजात नहीं देगा। इसलिए, प्रधानमंत्री और दूसरे नेता भी चुनाव प्रचार में जनता को जो मनोरंजन मुहैया कराते हैं उसे अगर आप मनोरंजन के रूप में ही देखना चाहते हैं तो अभी ही देख लें, रिकार्ड करके रख लें। बाद में सेंसर बोर्ड क्या करेगा और क्या कहेगा कोई नहीं जानता। वो तो गनीमत कहिए कि सेंसर बोर्ड इतने महान कार्य में व्यस्त है। वरना इन्हीं भाषणों को दिखाकर टीआरपी बटोरने वाले समाचार चैनलों को सेंसर बोर्ड के अधीन क्यों नहीं होना चाहिए। सेंसर बोर्ड खाली समय में इस ओर भी ध्यान दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। तैयार हो जाइए।

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यह देखिए हरियाणा के मुख्यमंत्री की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में विज्ञापन की शक्ल में

Sanjaya Kumar Singh : यही अच्छे दिन हैं क्या। पर किसके लिए? ना खाउंगा ना खाने दूंगा तो ठीक है। पर जायज पैसे भी नहीं देंगे और अपनी मर्जी से दान के पैसे उड़ाएंगे – यह कैसे ठीक हो सकता है। यह देखिए हरियाणा के मुख्यमंत्री की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में विज्ञापन की शक्ल में। यह खबर है और खबर के रूप में छप सकती थी, छपनी चाहिए थी और छपवाने के लिए जारी की जानी चाहिए थी। नहीं छपती तो इसमें ऐसा कुछ नहीं है कि पैसे खर्च कर विज्ञापन के रूप में छपवाया जाए। चंदे के पैसे विज्ञापन में उड़ाने का कोई मतलब नहीं है।

हो सकता है, इस विज्ञापन में जो कहा गया है वह प्रेस विज्ञप्ति के रूप में जारी किया गया हो और मुफ्त में हिन्दुस्तान टाइम्स में नहीं छपा हो। पर देश में हजारों लाखों अखबार हैं, हरियाणा से भी ढेरों अखबार निकलते हैं और प्रेस विज्ञप्ति जारी करके इन्हें कायदे से अखबारों में संबंधित लोगों तक भेजकर खबर के रूप में मुफ्त छपवाया जा सकता था। पर ये क्या? खबर भी विज्ञापन के रूप में। यह पैसों की बर्बादी है माननीय मुख्यमंत्री जी। अगर मुख्य मंत्री शिलान्यास करे, उद्घाटन करे और उसकी खबर ना छपे तो क्या कहा जाए।

अव्वल तो ऐसा होना नहीं चाहिए पर अगर दो चार अखबारों में यह खबर नहीं छपी हो तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसके लिए पैसे बर्बाद किए जाएं और खबर को विज्ञापन की शक्ल में छपवाया जाए। आखिर क्या है इस खबर में जो इसका छपना इतना जरूरी था। अभी तक तो मीडिया को ही कहा जाता था कि उसे खबरों की तमीज नहीं है और सिर्फ बिकने वाली खबरें महत्त्व पाती हैं। पर यहां तो ‘बिकने वाली’ खबर भी पैसे की ताकत से छप रही हैं। अगर विज्ञापन के पैसे उस संस्थान वालों ने दिए जिनकी खबर है तो यह और निराशाजनक है। मुख्यमंत्री का मीडिया विभाग और पूरा ताम झाम किस लिए होता है।

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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के कारनामे और मीडिया में एफडीआई… भारत को एफडीआई (विदेशी संस्थागत निवेश) तो चाहिए पर समाचार मीडिया में सिर्फ 26 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत है। दूसरी ओर, कोई भी (भारतीय नागरिक) मीडिया मंडी में दुकान खोल ले रहा है। यहां तक तो ठीक है – पर तुरंत ही टोकरी उठाकर हांफता-कांपता कभी जेल, कभी अस्पताल पहुंच जा रहा है। पर कोई देखने वाला नहीं है। ना अस्पताल में, ना जेल में। वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन तो पुराने संस्थान नहीं देते, नए और नौसिखुओं से क्या उम्मीद? कार्रवाई किसी पर नहीं होती।

देश के मीडिया उद्योग में नीरा राडिया से लेकर पीटर और इंद्राणी मुखर्जी तक ने पैसे लगाए निकाले। पत्रकार और राजनीतिज्ञ राजीव शुक्ल (पत्नी भी) मीडिया में हैं।  राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे। कॉरपोरेट की बात करूं तो सहारा से लेकर रिलायंस तक का पैसा मीडिया में है। इनके कारनामे आप सब जानते हैं। 1800 करोड़ रुपए के निवेश पर बीएमडब्लू में 1800 लोगों को नौकरी और अखबार या चैनल पैसे ना होने से बंद हो रहे हैं। कैसे-कैसों के कैसे कैसे चैनल खुल रहे हैं। मीडिया में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन रह रहा है, कौन भागने वाला है, कौन टिकने आया है, कौन पिटने वाला है, कौन भुनाने आया है, कौन जोड़ने, कौन तोड़ने, कौन धंधा करने और कौन कमाने। गंवाने भी कोई आया है क्या। कौन कमा रहा है, कैसे? नहीं कमा रहा है तो क्यो? कोई गंवा भी रहा है क्या। कहां से।

सरकारी विज्ञापनों की 8000 करोड़ रुपए की मलाई कौन और कैसे खा रहा है? कौन ललचा रहा है? किसे अंगूर खट्टे लग रहे हैं – बहुत सारे सवाल और विषय हैं। क्षेत्र तो बहुते बड़ा है। अनुसंधान का। घोटाला घपला का। बहुत मसाला होगा। फिल्म सीरियल, कहानी, उपन्यास, नाटक-नौटकी, कविता के लिए। इसपर कुछ होना चाहिए। कच्चा माल भड़ा पड़ा है। कैसे निकलेगा। दूसरी ओर, प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत एफडीआई की ही अनुमति है। दूसरे कई उद्योगों में 100 प्रतिशत है। मेक इन इंडिया का नारा है। तो विदेशी संस्थान को 100 प्रतिशत निवेश से अखबार निकालने या मीडिया चैनल चलाने की इजाजत क्यों नहीं। कौन मना कर रहा है, विरोध कौन कर रहा है। कोई समर्थक भी है क्या। क्या कारण हैं। ये सब जानने का अधिकार तो हमें है। कुछ सोचो, कुछ करो। देसी मीडिया संस्थानों की दशा इतनी खराब है। फिर भी एफडीआई नहीं। आखिर क्यों? दक्षिण भारत में मीडिया और राजनीति का जो मेल है, पश्चिम भारत में क्या कहने , उत्तरपूर्व में मीडिया की अलग ही दुनिया है। बहुत ही मसालेदार।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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स्टार वालों के लिए नए सीरियल का आइडिया- ”क्यूंकि वह अपनी ही बेटी की सास कैसे बनती!”

Sanjaya Kumar Singh : स्टार टीवी और ऐसे दूसरे विदेशी चैनलों के भारत आने का विरोध करने वालों का सबसे मजबूत तर्क था – इससे भारतीय संस्कृति खराब होगी। चैनल आया, संस्कृति क्या खराब होती चैनल का चाल चलन और रूप रंग ही बदल गया। किसी को अनुमान नहीं रहा होगा कि भारतीय संस्कृति को खराब करने का आरोप जिस चैनल पर लगाया जा रहा है उसके कर्ता-धर्ता के जरिए भारतीय संस्कृति का छिपा हुआ रंग-रूप इस तरह दिख जाएगा।

शीना और इंद्राणी

ना मुखर्जी साब के बेटे को अपनी मौसी या आधी या सौतेली बहन से प्रेम होता ना मामला खुलता। अब भाई लोग मौसी से प्रेम करेंगे और संस्कृति की बात करेंगे तो कितने दिन गंदगी छिपा लोगे। बदबू तो आएगी ही। संस्कृति रक्षक पीटर मुखर्जी के हिन्दुत्व की छानबीन ना करें नहीं तो बिहार यूपी के भी उदाहरण मिल जाएंगे।

अभी तक की कहानी के अनुसार हत्या हुई, “क्यूंकि वह अपनी ही बेटी की सास कैसे बनती”। स्टार पर आने वाला नया सीरियल हो सकता है।

और हां…

सावधानी हटी दुर्घटना घटी
प्रेम में चूक – बेटा दामाद बना।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके और इन दिनों बतौर उद्यमी सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


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तीस्ता के खिलाफ ये खबर मीडिया ट्रायल का हिस्सा है!

Sanjaya Kumar Singh : मैं तीस्ता समर्थक नहीं हूं। ठीक से फॉलो भी नहीं करता। पर उनके खिलाफ इस खबर में दम नहीं है। मीडिया ट्रायल का हिस्सा है। बदनाम करने की कोशिश। खबर तब होती जब बताया जाता कि कुल कितने दिन में कितने की शराब पी गई (या पिलाई गई) कितनी फिल्मों की सीडी कितने दिनों में खरीदी गई। काम करने वाला कोई आदमी कितनी शराब पी जाएगा और कितनी सीडी देख लेगा। बांटा होता तो लगता कि आरोप है।

सुबह से शाम काम करते हुए हमलोग भी हजार दो हजार रुपए पर उड़ा देते हैं। दोस्त मित्र हों, साथ काम करने वाले तो यह खर्च ज्यादा भी होता है। अब कोई कहे कि दिन भर मेहनत करके कमाता है, शाम को पीने (खाने में) उड़ा देता है। भइया वो कमाई का बहुत छोटा हिस्सा होता है। और काम करने वाला आदमी इतना खर्च करता है – खुराक कहिए इसे डीजल मोबिल। ये कोई भ्रष्टाचार नहीं है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


Samar Anarya : जियो तीस्ता सीतलवाड़ आज हिन्दुस्तानी मीडिआ को उसकी औक़ात बताने के लिए. यह कहने के लिए कि ‘ब्रीफिंग’ है- जवाब नहीं देंगे, जो दिल हो कहिये। अरे हिटलर नहीं जीत पाया जनता से, अंबानियों अडानियों के जरखरीद जीत जायेंगे? मैं तीस्ता हूँ- और जो जो साबिर अली को कल तक भाजपा के दो मंत्रियों के मुताबिक आतंकवादी मानते थे, दाऊद का आदमी मानते थे, या तीस्ता बनेंगे, या अपनी जुबान बेच चुके गुलाम। ठीक वैसे जैसे उनमें से एक मंत्री गिरिराज सिंह (वही पाकिस्तान भेजू) बेच चुका है या बेशर्म लालची- (वही मुख़्तार अब्बास नक़वी जिसको इस बार ट्वीट करने के पहले ही धमका दिया लगता है.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

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अरविन्द केजरीवाल से बरखा दत्त का ये इंटरव्यू देखने सुनने लायक है

Sanjaya Kumar Singh : अरविन्द केजरीवाल और बरखा दत्त ने इस इंटरव्यू में भाजपा की राजनीति से लेकर मैगी तक की चर्चा की है। एलजी की तो ऐसी तैसी कर दी – यह कहते हुए कि ये तो कांग्रेस के नियुक्त किए हुए हैं। अपनी नौकरी बचाने के लिए काम कर रहे हैं और अमित शाह का चपरासी बुलाएगा तो रेंगते हुए जाएंगे। उपराज्यपाल के पद की गरिमा खराब कर रहे हैं आदि। दिल्ली सरकार के सौ दिन पूरे होने पर कनॉट प्लेस में पूरे मंत्रिमंडल ने आम जनता से बात की थी और अब करीब 52 मिनट का यह विस्तृत इंटरव्यू।

इसमें कोई शक नहीं है कि इंटरव्यू देने के लिए चैनल का चुनाव अरविन्द ने अपनी पसंद के अनुसार किया है पर इंटरव्यू में यह जिक्र है कि पहले कोई शर्त नहीं रखी गई थी। कुछ तो है इस आदमी में। कहा कि नरेन्द्र मोदी जान लें कि मैं राहुल गांधी नहीं हूं। पर इसके विस्तार में नहीं गए। पूछने पर कहा कि लोग समझ जाएंगे। अरविन्द ने दिल्ली के उपराज्यपाल पर उपरोक्त अपमानजनक आरोप लगाने के साथ-साथ यह भी कहा कि वे फोन नहीं उठाते, बिजली मंत्री को मिलने का समय चार दिन बाद दिया। डीटीसी कर्मचारियों की हड़ताल के मामले में एस्मा लगाना था पर रात में फाइल घर पहुंच जाने के बाद भी सुबह 10 बजे दस्तखत हुए तब जाकर 12 बजे हड़ताल टूटी और तब तक दिल्ली की जनता को परेशानी हो चुकी थी। उन्होंने कहा कि केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार आम आदमी पार्टी को सत्ता सौंपने के लिए दिल्ली की जनता से बदला ले रही है।

मीडिया के बारे में उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि कैसे गलत खबरें छापी गईं, खंडन नहीं छापा गया और इसी क्रम में यह भी कहा है कि मीडिया में चर्चा रही कि दिल्ली सरकार के 40 आईएएस अफसरों ने छुट्टी मांगी है, कइयों ने तबादले का आवेदन दिया है आदि। अरविन्द ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई आवेदन नहीं मिला है और अगर किसी को ट्रांसफर चाहिए तो बताए हम 24 घंटे में मुक्त कर देंगे। हम किसी दुखी आत्मा को दिल्ली में रखना नहीं चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता नलिन कोहली ने कहा था कि अरविन्द केजरीवाल ग्लोरीफायड मेयर हैं। इस बारे में पूछे जाने पर अरविन्द ने कहा वो जो चाहें कहते रहें। 49 दिन की सरकार के बाद उनके ऐसे ही बयानों ने 67 सीटें दिलाई हैं।

अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में तबादलों का करोड़ों का उद्योग चल रहा था। अब बंद हो गया है और इसलिए सब उनके खिलाफ हो गए हैं। राज्यपाल हर चीज अपने नियंत्रण में चाहते हैं, कार्रवाई नहीं करने देते, रोज एक ‘लव लेटर’ भेज देते हैं। हेडमास्टर हैं क्या। ऐसे सरकार चलेगी क्या। दिक्कत है तो कोर्ट जाएं। पूछा गया कि आपलोग बैठकर विवाद क्यों नहीं निपटा लेते। अरविन्द ने कहा कि विवाद हमारे बीच होता तो निपट जाता। उनसे जो कहा गया है वो कर रहे हैं। वरना नियम है कि विवाद की स्थिति में क्या करना है। वो कुछ नहीं करते, सिर्फ परेशान करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर कई आरोपों के साथ एक आरोप यह भी है कि हमने उन्हें चिट्ठी लिखी है। जवाब आया क्या? अरविन्द ने कहा, “जवाब तो वो देते नहीं।” देश के दूसरे मुख्यमंत्रियों से उन्होंने कहा कि उन्हें समझ लेना चाहिए कि आज हमारे साथ ऐसा हो रहा है तो कल उनके साथ भी ऐसा होगा। बरखा दत्त ने कहा कि बाकी तो पूर्ण राज्य हैं। इसपर अरविन्द ने कहा कि इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि केंद्र में तानाशाही सोच वाली सरकार आती है तो राज्यपाल से कैसे काम कराती है। उन्होंने यह भी कहा कि इसीलिए कई राज्यों के राज्यपाल बदले गए हैं।

पूरा इंटरव्यू आप इस लिंक https://www.youtube.com/watch?v=4bEZWe1Ij1c पर क्लिक करके देख-सुन सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सुनील शाह और अमर उजाला : दोनों मेड फॉर ईच अदर थे…

यकीन नहीं हो रहा है कि सुनील शाह नहीं रहे। मैं 20 से 24 अप्रैल तक दिल्ली में नहीं था। लौटकर आया तो पता चला कि जनसत्ता में मित्र रहे सुनील शाह जो इस समय अमर उजाला, हलद्वानी में संपादक थे – एक कार दुर्घटना में घायल हो गए हैं और बेहतर इलाज के लिए दिल्ली लाया गया। फोन पर उनकी पत्नी से बात हुई तो पता चला वे सर गंगा राम हॉस्पीटल में दाखिल हैं। अस्पताल जाकर पता चला कि हलद्वानी में कार दुर्घटना बहुत मामूली थी और उनकी कलाई की हड्डी टूट गई थी। इसके लिए ऑपरेशन कर कलाई में प्लेट लगाई गई थी जो कोई खास चोट नहीं कही जाएगी।

सुनील शाह और संजय कुमार सिंह : पुराने दिनों की याद दिलाती एक तस्वीर

अपने-अपने परिवार के साथ सुनील शाह और संजय कुमार सिंह : याद आए बीते दिन

 

सुनील शाह के पैतृक घर के सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचाते संजय कुमार सिंह : पुराने दिनों की सुनहरी यादें

बाद में उन्हें लंग इंफेक्शन (फेफड़े का संक्रमण) हो गया और इसीलिए दिल्ली लाया गया था। इतवार को डॉक्टरों ने कहा था कि हालत गंभीर है पर न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि ऐसा क्या संक्रमण होगा जो इतने बड़े अस्पताल में ठीक नहीं होगा। हालांकि उसी दिन सुबह उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। शाम को डायलिसिस भी करनी पड़ी। छह यूनिट खून की जरूरत थी। अगले दिन यानी सोमवार को मुझे सुबह पहुंचना था पर मैं दोपहर बाद पहुंच पाया और शाम को वापस आया। कह कर आया था कि सुबह फिर आउंगा। उससे पहले ही पता चला कि रात में दिल का भयंकर दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

पहली सूचना मिलने के बाद मैं इंतजार करता रहा कि किसी तरह यह गलत साबित हो। पर दूसरी फिर तीसरी सूचना के बाद मानना पड़ा कि सुनील शाह नहीं रहे। मेरी हिम्मत नहीं हुई कि भाभी जी से बात करूं। सुनील से मेरी खूब बनती थी। मैं फिल्में नहीं देखता और वो अंग्रेजी फिल्मों के खूब शौकीन थे। चाणक्य में मैंने उनके साथ कई फिल्में देखी हैं। हालांकि अंग्रेजी फिल्में मुझे कभी समझ में नहीं आई और चाणक्य का उस समय का एयरकंडीशनर मुझे अच्छी नीन्द में सुला देता था। मैं फिल्म के दौरान ज्यादातर सोता रहता था। फिर भी सुनील मुझे अपने साथ ले जाते। उनके पास मोटर साइकिल थी और हम लोगों ने कई फिल्में देखीं। हालांकि, मुझे एक का भी नाम याद नहीं है।

सुनील शाह ठेठ नैनीताल के रहने वाले थे और आय्यारपाटा में उनके पिताजी का शानदार बंगला, कार और पुराने शाही फर्नीचर सब देखने लायक थे। सुनील को जब पता चला कि मैं नैनीताल या पहाड़ पर कभी नहीं गया तो एक बार गर्मी की छुट्टी में मुझे उन्होंने अपने साथ चलने की पेशकश की। मैं उनके साथ गया और चार पांच दिन रहकर वापस आया। सुनील शाह के साथ स्कूटर पर नैनीताल घूमने का आनंद ही कुछ और था। उनके लिए मैं मैदान का अजूबा इंसान था जिसने उस समय तक पहाड़ नहीं देखा था और मेरे लिए पहाड़ पर रहने वाले अजूबे जहां कुछ समतल नहीं था। आय्यारपाटा में सुनील के कई रिश्तेदार थे और मैं कइयों के घर गया था। 

सुनील शाह जब जनसत्ता छोड़कर गए तो बहुत बुरा लगा। पर पेशेगत स्थितियों के लिहाज से उनका निर्णय ठीक ही था। वे घर के पास रहना चाहते थे और अमर उजाला से भी उनका लगाव था। दोनों मेड फॉर ईच अदर थे। उनसे मिलने मैं बरेली गया था। तब वे नगर संस्करण के इंचार्ज थे और देर रात तक दफ्तर में उनसे गप्प लड़ाने का अलग ही आनंद था। उनसे दुनिया जहान की बातें होती थीं और जब फोन आज की तरह सस्ता और सुलभ नहीं था तब भी हम नियमित संपर्क में रहे।

सुनील शाह उस समय भी कैमरे और फोटोग्राफी के शौकीन रहे। उनका एक पुराना कैमरा काफी समय मेरे पास रहा और मेरी खींची ज्यादातर पुरानी तस्वीरें उसी कैमरे की हैं। हिन्दी पत्रकारिता में मैं खुद को मिसफिट पाता हूं और मुझे कुछ ही लोग अपने जैसे मिले और सुनील शाह निश्चित रूप से उनमें सबसे करीबी लगे। सुनील उम्र में मुझसे बड़े थे पर शादी बाद में हुई। कल ही पता चला कि वे मुझसे सात साल बड़े थे। शादी के बाद वे दिल्ली आए थे और हमलोग साथ ही कुतुब मीनार घूमने गए थे। सुनील अपने पीछे पत्नी और दो बेटे छोड़ गए हैं। बड़ा बेटा इंजीनियरिंग दूसरे वर्ष में है और छोटा अभी स्कूल में। कई पुरानी यादें हैं। आज सब याद आ रहा है। बहुत याद आएगी आपकी सुनील भाई। श्रद्धांजलि।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्य करने के बाद इन दिनों अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद के कार्य की कंपनी संचालित करते हैं. मीडिया से लेकर राजनीति और समाज के विभिन्न आयामों पर अपनी बेबाक लेखनी चलाने वाले संजय से संपर्क anuvaadmail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

मूल खबर:

अमर उजाला हल्द्वानी के संपादक सुनील शाह का दिल्ली में निधन

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तुम्हें विदा करते हुए बहुत उदास हूँ सुनील…

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टीवी कार्यक्रम और विज्ञापन के बीच चलो चलें जुमले बनाएं

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का दिन था। मैं दिन भर घर पर ही था लेकिन जिससे भी बात हुई सबका यही कहना था कि आम आदमी पार्टी की स्थिति मजबूत दिख रही है। शाम में सोचा एक्जिट पॉल देख लिया जाए। शाम 6:00 बजे टीवी ऑन किया और चैनल सर्फ करते हुए देखा कि इंडिया टीवी पर अजीत अंजुम Ajit Anjum एंकरिंग कर रहे थे। इसी पर रुक गया। 6:20 होने तक लगने लगा कि मैं खबरें देख रहा हूं या विज्ञापन। पुराना अनुभव यह रहा है कि एक चैनल पर विज्ञापन आता है तो दूसरे पर भी विज्ञापन ही आ रहा होता है और चैनल बदलने का कोई लाभ नहीं मिलता।

उल्टे आप जो देख रहे होते हैं वह छूट जाता है और आप कुछ नया देखने लगते हैं। अंत में लगता है कि आपने ना विज्ञापन देखे ना कोई खबर या चर्चा। इसलिए, सोचा आज समय नोट किया जाए और एक्जिट पॉल पर चर्चा भी देख ही लूं। कार्यक्रम शुरू होने के करीब आधे घंटे बाद दिन में तीन बजे तक के आंकड़ों के अनुसार एक्जिट पोल की खबर आई कि आम आदमी और भाजपा में कड़ी टक्कर है और आम आदमी पार्टी भाजपा से आगे है।

कांग्रेस को मिले वोटों का प्रतिशत पिछले विधानसभा चुनाव से कम हुआ है और वह ज्यादातर आम आदमी पार्टी के पक्ष में गया है। वोटों का प्रतिशत भाजपा का भी बढ़ा है पर उससे सीटें नहीं बढ़ने वाली हैं। बाद में जो आंकड़े आए उससे पक्का हो गया कि वोटों का प्रतिशत बढ़ने के बाद भी भाजपा की सीटें कम होंगी और आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है। पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस भी नुकसान में रही है और उसकी सीटें 0-2 के बीच रहने की उम्मीद है। इतनी सी जानकारी मुझे डेढ़ घंटे में मिली। बीच-बीच में कांग्रेस और भाजपा के प्रतिनिधियों तथा विनोद शर्मा और मधुकर उपाध्याय के विचार जानने को मिले। हालांकि ये कभी खुलकर बोल नहीं पाए। जैसे ही कोई बोलना शुरू करता था ब्रेक लेने का समय आ जाता था। और एंकर ने काफी समय ब्रेक लेने में ही जाया कर दिया। आइए देखें कितनी देर प्रोग्राम देखने के लिए मुझे कितनी देर विज्ञापन झेलने पड़े।

ब्रेक शुरू ब्रेक खत्म विज्ञापन कार्यक्रम
6:23      6:29   06      11
6:40      6:47   07      05
6:52      6:59   07      13
7:12      7:19   07       03
7:22      7:29   07      11
7:40      7:47   07      04
7:51     8:00    नोट नहीं किया
कुल (मिनट में)     41      47

खबर तो कुछ ही मिनट की थी बाकी तथाकथित चर्चा और वह भी 41 मिनट विज्ञापन में 47 मिनट। यह स्थिति तब है जब हम डीटीएच कनेक्शन के लिए अच्छा खासा पैसा देते हैं और इसमें मनोरंजन कर भी होता है। टेलीविजन पर समाचारों और चर्चा की हालत तथा गुणवत्ता तो लगातार खराब हो ही रही है पैसे देकर विज्ञापन देखना और उसपर मनोरंजन कर देना ज्यादा नहीं चलने वाला है। मेरे घर में तीन केबल कनेक्शन थे अब एक ही रह गया है। फिलहाल ऐसा तो नहीं लग रहा है कि मैं यह इकलैता कनेक्शन भी बंद करा दूंगा पर मेरी ही तरह अगर और लोग भी तीन से एक कनेक्शन पर आ गए हों तो टीवी पर विज्ञापन और विज्ञापन के बीच टीवी के कार्यक्रमों का भविष्य भी चर्चा का विषय हो सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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ये हार बहुत भीषण है म्हराज!

Sheetal P Singh : पिछले दो दिनों में दिल्ली के सारे अख़बारों में पहले पेज पर छापे गये मोदी जी + बेदी जी के विज्ञापन का कुल बिल है क़रीब चौबीस करोड़ रुपये। आउटडोर विज्ञापन एजेंसियों को होर्डिंग / पोस्टर / पैम्फलेट / बैनर / स्टेशनरी / अन्य चुनावी सामग्री के बिल इससे अलग हैं। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा प्रधानमंत्री और अन्य हैवीवेट सभाओं के (कुल दो सौ के क़रीब)इंतज़ाम तथा टेलिविज़न / रेडियो विज्ञापन और क़रीब दो लाख के क़रीब आयातित कार्यकर्ताओं के रख रखाव का ख़र्च श्रद्धानुसार जोड़ लें। आम आदमी पार्टी के पास कुल चुनाव चंदा क़रीब चौदह करोड़ आया। बीस करोड़ का लक्ष्य था। कुछ उधार रह गया होगा। औसतन दोनों दलों के ख़र्च में कोई दस गुने का अंतर है और नतीजे (exit poll) बता रहे हैं कि तिस पर भी “आप” दो गुने से ज़्यादा सीटें जीतने जा रही है! ये हार बहुत भीषण है म्हराज! ध्यान दें, ”आप” बनारस में पहले ही एक माफ़िया के समर्थन की कोशिश ठुकरा चुकी थी, आज उसने “बुख़ारी” के चालाकी भरे समर्थन को लात मार कर बीजेपी की चालबाज़ी की हवा निकाल दी।

Om Thanvi : तमाम एग्जिट पोल नतीजों के समान रुख से उन लोगों के मुंह बंद हुए (जो बचे उनके असल नतीजे के रोज हो जाएंगे) जो लोगों के चेहरों को नहीं पढ़ना चाहते, न हवा में तैरती गंध भांप पाते हैं। आज कई चैनलों पर जाना हुआ, कई पत्रकार मित्रों से मुलाकात हुई; यह सुनना अच्छा लगा कि जनता के बदलते मानस का हमें बेहतर अंदाजा हुआ और उसे उसी भाव में निरंतर हमने कहा भी। इस जोखिम के बावजूद कि पक्षपात और बिकाऊ हो जाने जैसे आरोप झेलने होंगे। सच्चाई यह है कि इस समर में केंद्र की विराट ताकत की हार, दिग्गज नेताओं की फौज के पराभव, पूंजीपतियों की थैलियों की निरर्थकता और जाति-धर्म आदि जैसे अनेक ध्रुवों के मिथक टूटने की सम्भावना कदम-कदम पर जाहिर थी। बहरहाल, ‘आप’ पार्टी के समर्थन में उमड़ा जन-सैलाब दिल्ली प्रदेश में ही नहीं, केंद्र की राजनीति के लिए भी नया आगाज है – यह बदलाव राजनीति के समूचे ढर्रे को प्रभावित करेगा। कुछ ज्यादा कह दिया क्या? इंतजार कीजिए और देखते रहिए। देश की राजनीति का रंग और तेवर अब बदलना ही चाहिए। क्या कांग्रेस, भाजपा और अन्य दल नए संदेश और निहितार्थ समझ रहे हैं? और मोदीजी, आपके लिए डॉ लोहिया का संदेश — सुधरो या टूटो। इससे पहले कि संघ – और प्रकारांतर से पार्टी – अपनी ताकत फिर दिखाने लगे। ‘गुड गवर्नेन्स’ का झांसा नारे की शक्ल में बहुत ज्यादा खिंचेगा नहीं, जब लोग दिल्ली के छोटे-से शासन तंत्र से उसे जोड़कर देखने लगेंगे। ये केजरीवाल, जो सुबह हजामत करवाकर बैठा है, बड़ी जालिम चीज है!

Sanjaya Kumar Singh : एक्जिट पॉल के नतीजे देखने के बाद मुझे भाजपा के विज्ञापन याद आ रहे हैं। मैने सब लिख रखे हैं आज ये देखिए, “मैं किरण बेदी। दिल्ली में जब विकास की बात चली तो हमारे लोकप्रिय जननायक श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसकी कमान मेरे हाथों में दी और कहा, दिल्ली से आप पिछले 40 सालों से जुड़ी हैं अब थोड़ी सेवा और करनी है। मेरा ये मानना है कि दिल्ली में विकास का ये काम हम मिलजुल कर ही कर सकते हैं। इसलिए इस बार हमें भाजपा को पूर्ण बहुमत से जीताना है। मेरा दिल्ली वालों से वादा है कि हम आपको एक सुरक्षित और भ्रष्टाचार मुक्त राजधानी देंगे।” चलो चलें मोदी के साथ, अबकी बार मोदी सरकार और घर-घर में मोदी के बाद इस विज्ञापन में खुद किरण बेदी कहती हैं, “विकास का ये काम मिल-जुल कर ही कर सकते हैं।” सवाल ये उठता है कि मिल-जुल कर ही विकास करना था तो दिल्ली भाजपा के पुराने, अनुभवी नेताओं के साथ मिलजुल कर जीतने की कोशिश क्यों नहीं की गई। और मिल-जुल कर ही करना था तो दिल्ली में मोदी जी को किरण या क्रेन सेतु की जरूरत क्यों पड़ी। ना पार्टी ने स्पष्ट किया ना मतदाताओं को समझ में आया। मतदान के बाद किरण बेदी ने भाजपा के प्रति जो कृतज्ञता दिखाई उससे भी लगा कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए नहीं, किरण बेदी को बनाने के लिए ज्यादा जोर लगा रही थी। वरना क्या कारण है कि मास्टर स्ट्रोक इस तरह फिस्स हो गया। देखिए, चुनाव परिणाम अगर एक्जिट पॉल जैसे ही रहे तो भाजपा शायद इसपर विचार करे और कुछ समझ में आए। मै समझ रहा था कि भाजपा अगर दिल्ली में हार भी गई तो किरण बेदी का राज्यपाल बनना तय है। पर किरण बेदी 40 साल दिल्ली में ही रही हैं, बाहर तो वो टिक ही नहीं पाईं – चंडीगढ़ भी नहीं। गवरनर कहां की बनाई जाएंगी। कोई अनुमान?

Jaishankar Gupta : हमने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनाव के समय भी तमाम ओपीनियन और एक्जिट पोल्स को खारिज करते सार्वजनिक तौर पर, एक टीवी चैनल पर वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों के साथ चुनावी चर्चा में कहा था कि आप को 30 से कम सीटें नहीं मिलेंगी। तब कोई मानने को तैयार न था। इस बार भी शुरू से हमारा मानना रहा है कि आप को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा, लेकिन केजरीवाल के बारे में प्रधानमंत्री मोदी जी और उनकी पार्टी के बौने हो गए बडे नेताओं के मुंह से ‘सुभाषित’ झरने लगे, बौखलाहट में भाजपा की चुनावी राजनीति के चाणक्य और खासतौर से लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के सूत्रधार स्वनामधन्य अमित शाह जी ने मतदान से दो दिन पहले अपना रणनीतिक ज्ञान बांटा कि विदेश में जमा कालाधन लाकर र भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रु. जमा करने का वादा चुनावी जुमला भर था और यह भी कि दिल्ली का यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर रेफरेंडम नहीं माना जाना चाहिए, उसके बाद हमने कहना शुरू किया कि ‘आप’ को 40 से अधिक सीटें मिल सकती हैं। पता नहीं सीटों का आंकडा कहां जाकर फीट बैठेगा। दस फरवरी को सब पता चल जाएगा।

Mukesh Kumar : सारे एक्जिट पोल आम आदमी पार्टी की जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। हालाँकि अंतिम परिणाम आने बाक़ी हैं लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दस लाख का सूट पहनकर अपनी हार स्वीकार करने की तैयारी नहीं कर लेनी चाहिए। उन्होंने अपने विज्ञापनों में कहा था कि जो देश सोच रहा है वह दिल्ली सोचती है, तो देश ने दिल्ली के ज़रिए संदेश दे दिया है कि उन्हें न तो उनका अंदाज़ रास आ रहा है और न ही उनकी सरकार का चाल-चलन। अपने परिवार के कुकर्मों पर चुप्पी साधे रहने और कुछ न करने का उनका अंदाज भी उनके पाप के घड़े को भर रहा है। क्या वे चेतेंगे? उनके महारणनीतिकार और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह समाज को तोड़-फोड़ कर जिस तरह की राजनीतिक बिसात बिछाकर विजय हासिल करने का नुस्खा आजमाते रहे हैं, उनके लिए भी इस हार में संदेश छिपा है। ओबामा की मत सुनिए मगर दिल्ली और देश की आवाज़ तो सुन लीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, ओम थानवी, संजय कुमार सिंह, जयशंकर गुप्त और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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सच सामने आया : किरण बेदी नहीं, सुरजीत कौर आजाद भारत की पहली महिला आईपीएस अफसर

Sanjaya Kumar Singh : शीशे के घरों से चुनाव लड़ना… भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर पार्टी की ओर से दिल्ली की मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनना किरण बेदी के लिए काफी महंगा पड़ा। चुनाव अभी हुए नहीं है फिर भी उनके जीवन की दो प्रमुख कमाई इस चुनाव में खर्च हो गई। पहली कमाई थी इंदिरा गांधी की कार टो करने का श्रेय जो पिछले दिनों बुरी तरह खर्च हो गई। उनकी दूसरी कमाई थी – देश की पहली महिला आईपीएस होने का श्रेय। और अब यह कमाई भी खर्च होती दिखाई दे रही है।

एक पुराने अखबार के कतरन की यह तस्वीर बताती है कि देश की पहली महिला आईपीएस ऑफिसर पंजाब कैडर की सुरजीत कौर (1956) थीं जिनका 1957 में एक कार दुर्घटना में निधन हो गया था। जबकि हम लोग अभी तक किरण बेदी को ही देश की पहली महिला आईपीएस अफसर जानते-मानते रहे हैं। सुरजीत कौर के आईपीएस के लिए चुने जाने के बाद जल्दी ही निधन हो जाने और इसके करीब 16 साल बाद 1972 में किरण बेदी के आईपीएस बनने पर हो सकता है उस समय किरण बेदी को पहली महिला आईपीएस अधिकारी कहा और मान लिया गया होगा। और उनकी यही छवि बनी रही। अब अगर यह खुलासा हो रहा है तो इसका श्रेय सूचना और संचार क्रांति के साथ भारतीय चुनावों को भी देना पड़ेगा। अभी तक तो यही कहा जाता था कि शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। पर बुलेट प्रूफ शीशे के जमाने में इसमें संशोधन की आवश्यकता लग रही है। शीशे के घरों से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।

किरण बेदी वाकई पहली महिला आईपीएस नहीं है वाले सच को छुपाए रखने के लिए कितने लोगों को दोषी माना जाए। जैसा कि नरेन्द्र मोदी ने कहा है कांग्रेस ने 67 साल कुछ नहीं किया – पर यह एक काम तो किया कि उनके (उनकी पार्टी) के लिए किरण बेदी तैयार करने में योगदान किया। खबर के मुताबिक दिल्ली में जाने-माने वेद मारवाह सुरजीत कौर के बैचमेट हैं, उन्होंने भी यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की तो क्या वेद मारवाह को इस काम में कांग्रेस पार्टी का सहयोगी माना जाए। इंदिरा गांधी की कार टो करने के जिस मामले से वे स्टार बनीं उस मामले में भी कांग्रेस ने सार्वजनिक तौर पर कुछ कहा हो ऐसा सुनने में नहीं आया। उसकी इस चुप्पी को क्या माना जाए।

यूपीएससी, जो लोगों के समान्य ज्ञान की परीक्षा लेकर आईएएस-आईपीएस चुनता बनाता है, इतने वर्षों तक इस जानकारी को छिपाए रहा या एक गलत सूचना को सही करने की जरूरत नहीं समझी। क्या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। इतना जबरदस्त सहयोग मिलने के बाद भी किरण बेदी की पसंद कांग्रेस पार्टी नहीं रही। पहले तो अन्ना आंदोलन में भाग लेकर वे कांग्रेस सरकार का विरोध करती हैं और फिर प्रमुख विरोधी दल भाजपा में शामिल हो जाती हैं। कांग्रेस का विरोध तो आम आदमी पार्टी भी कर रही थी पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को चुना। क्या इसलिए कि उन्हें लगता है कि उनके जैसे लोगों की शरणस्थली भाजपा है। बहुत सारे सवाल हैं और मीडिया की भूमिका भी। पर उसकी चर्चा फिजूल है। कटघरे में सिर्फ किरण बेदी नहीं – देश की राजनीति, राजनीतिक पार्टियां, समाज और संस्थाएं और कुछ दूसरे प्रमुख नागरिक भी हैं। सिर्फ किरण बेदी को दोषी मानना मुझे ठीक नहीं लग रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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‘आप’ ने ढूंढ़ा बिकाऊ मीडिया पर खर्च का पूरा लाभ पाने का तरीका

 

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी ने ढूंढ़ा बिकाऊ मीडिया पर खर्च का पूरा लाभ पाने का तरीका। फर्जी सर्वेक्षणों का बाप है यह तरीका। इसे कहते हैं आईडिया। यह विज्ञापन इस तरह आ रहा है जैसे रेडियो चैनल खुद सर्वेक्षण कर रहा हो। इसमें किसी व्यक्ति से पूछा जाता है पिछली बार आपने किसे वोट दिया था। वह चाहे जो कहे दूसरा सवाल होता है इस बार किसे देंगे– आम आदमी पार्टी को। और क्यों में, आम आदमी के पक्ष में कारण बताया जाता है।

इस तरह पार्टी अपने पक्ष में वोट डालने के कारण तो लोगों को बता ही रही है जो ध्यान नहीं देगा वह समझेगा कि पिछली बार कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी को वोट देने वाले सभी लोग इस बार आम आदमी पार्टी को वोट देंगे और उनके पास इसके ठोस कारण हैं। बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किए जाने वाले इन विज्ञापनों में टेलीविजन चैनलों को जैसे अचानक ब्रेक लेना पड़ता है वैसे ही ब्रेक ले लिया जाता है। काम की बात खत्म होते ही। और फिर आखिर में कहा जाता है कि यह विज्ञापन था। तब तक इसका जो असर होना होता है, हो चुका होता है।

और भाजपा की ओर से अपने स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी की आवाज में चलाए जा रहे विज्ञापन, “भाइयों और बहनों ये विजय यात्रा क्यों चल पड़ी है। एक के बाद एक भारतीय जनता पार्टी जनता के दिलों में इतना प्यार और विश्वास कैसे बना पाई है। भाइयों और बहनों जो देश का मूड है वही दिल्ली का मूड है। जो देश चाहता है वही दिल्ली चाहता है” का करारा और दिलचस्प जवाब है। यह ऐसा आईडिया है, जिससे कोई भी धोखा खा जाए। प्रस्तुति बहुत ही शानदार और स्वाभाविक है। रेडियो का प्रचार और विज्ञापनों के लिए जबरदस्त उपयोग।

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कालाधन और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर 100 दिन में काला धन वापस लाने की बातें करके देश के मध्यम वर्ग को ललचा देने के बाद भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में अब गरीबों और झुग्गी झोपड़ी वालों को चारा डाल रही है। दिल्ली चुनाव में “जहां झुग्गी, वहीं मकान” का नारा इसी रणनीति के तहत है। और गरीबों को लक्ष्य करने के लिए ही भाजपा के जो विज्ञापन इन दिनों प्रमुखता से प्रसारित हो रहे हैं उनमें पहला है, हमारा वोट भाजपा को। मोदी जी आए हैं तो बैंक में हमारा खाता खुला, डेबिट कार्ड मिला, बीमा मिला गैस सिलेंडर का फायदा मिला अब झुग्गी वालों को मकान मिलने की बात भी हो रही है। इसी क्रम में एक और विज्ञापन है, ना-ना मेमसाब, उनको वोट। हम नहीं देंगे। पानी देंगे, बिजली देंगे, कहकर सब के वोट ले लिए पर ये तो उन्हें मिले ना जिनके पास मीटर थे। हम झुग्गी वालों को क्या मिला। और तीसरा विज्ञापन है, पिछली सरकार तो गठबंधन से बनी थी साब जी। सब साथ हो लिए। क्योंकि सबको विश्वास था कि दिल्ली का भला होगा। लेकिन ड्राइवर तजुर्बेकार ना हो तो गाड़ी तो ठुकेगी ना। सब जानते हैं कि गाड़ी ठुकी नहीं, ब्रेक लगाया गया था। ऐसे में, गरीबों को साधने के फेर में मध्यम वर्ग को चुका हुआ मानने वाली भाजपा अपने खर्च पर आम आदमी पार्टी की उपलब्धियां भी प्रचारित कर रही है।

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जैसे-जैसे दिल्ली में मतदान की तारीख करीब आ रही है भारतीय जनता पार्टी अपने सभी हथियारों का उपयोग कर लेने पर आमादा है। जिस तरह काले धन के पैसे 100 दिन में लाने का झूठा और अव्यावहारिक वादा करके पार्टी केंद्र में सत्ता में आई है वैसा ही झूठा और अव्यवहारिक वादा वह दिल्ली के गरीबों से कर रही है। खादी के बिना बाजू वाले कुर्तों से डिजाइनर और स्पेशल सूट पर पहुंच चुके नरेन्द्र मोदी गरीबों को फिर सपने दिखा रहे हैं। इसबार जहां झुग्गी वहां मकान का वादा काले धन को वापस लाने से भी बड़ा धोखा है। क्या यह संभव है। पर देश का प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल खुलेआम झूठ बोल रहा है। काले धन का तो लोग इंतजार कर रहे हैं पर किसी दिन दिल्ली में झुग्गियां उजाड़ी गईं और लोग चढ़ बैठे सात रेसकोर्स रोड पर तो क्या होगा, किसी ने सोचा है। गरीबों के लिए घर का सपना वैसे ही बहुत बड़ा होता है। ऐसा सपना नहीं दिखाया जाना चाहिए कि गरीब मरने मारने को उतारू हो जाए। भाजपा अगर रिकार्ड सीटों के साथ सत्ता में आई है तो कहीं ऐसा ना हो कि रिकार्डतोड़ तरीके से सत्ता से हटाई जाए। तैयारी पार्टी खुद कर रही लगती है।

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मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद जो काम किए हैं उसका प्रचार दिल्ली में चुनाव के मद्देनजर रेडियो पर आ रहा है। इसमें एक आदमी कहता है कि मोदी जी आए हैं तो बैंक में खाता खुला, डेबिट कार्ड मिला, बीमा हुआ, रसोई गैस का फायदा मिला – अब मैं आपको बताऊं कि वो ये नहीं कहता कि चेक बुक मिला और खाते का नंबर भी मिला। वाकई बहुत काम हुआ है। और रसोई गैस की सबसिडी खाते में ट्रांसफर करने की योजना पिछली सरकार की थी – मेरे ख्याल से। विज्ञापन में यह नहीं कहा गया है कि खाते जिस काले धन के पैसे की उम्मीद में लोगों ने खोले हैं वो चुनाव बाद आ जाएंगे। और जनता पर यह कम अहसान नहीं है। मैं अगले विज्ञापन का इंतजार बेसब्री से कर रहा हूं।

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महंगी कमाई मुफ्त में ‘खर्च’ हो गई… दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में किरण बेदी के जीवन की एक प्रमुख कमाई (इंदिरा गांधी की कार टो करने का श्रेय) खर्च हो गई। और मजेदार यह है कि इस खर्च को ना किरण बेदी के चुनावी खर्च में जोड़ा जा सकता है और ना भारतीय जनता पार्टी के। दुख की बात यह है इस महत्त्वपूर्ण कमाई के खर्च होने का कोई लाभ किसी को नहीं मिलेगा। यहां तक कि मीडिया को भी इस ‘रहस्योद्घाटन’ का कोई श्रेय नहीं दिया जा सकता है।

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खबर है कि किरण बेदी के पास दो पते पर दो वोटर आई कार्ड हैं। भक्तगण इसपर भी बुद्धिमानी दिखा रहे हैं। अभी दो दिन पहले ही उपराष्ट्रपति से भी ज्यादा ज्ञानी लोगों ने अपने ज्ञान का नंगा प्रदर्शन किया है। अब फिर कूद पड़े। अपनी अज्ञानता दिखाने। भक्तों के मामले में यह कहावत बिल्कुल सही लगती है, Its better to keep your mouth shut and let people think that you are a fool than to open it and clear all doubts. समस्या बहुत गंभीर है। लोग तुरंत फैसला सुनाने लगते हैं, खेमे में बंट जाते हैं। कार्यवाही मेरे या किसी के कहने या चाहने से नहीं हो सकती या वो नहीं होगी जो कोई चाहेगा। कार्यवाही नियमानुसार ही होगी। अगर किसी ने मतदाता सूची में नाम डालने के लिए आवेदन किया हो तो उसे पता होना चाहिए कि आप का नाम मतदाता सूची में ऐसे ही नहीं आ जाता है। इसके लिए आप बाकायदा आवेदन करते हैं और घोषणा करते हैं कि आप मतदाता सूची में नाम आने की शर्तें पूरी करते हैं। इसी में यह घोषणा भी होती है कि मेरा नाम किसी और मतदान क्षेत्र की मतदाता सूची में नहीं है या है उसे काटकर इस मतदान क्षेत्र में मेरा नाम दर्ज किया जाए। दो जगह नाम रहने का मतलब है आपने आवेदन में नहीं बताया। अगर बताया था तो आवेदन पत्र से साबित हो जाएगा, आप कर दीजिए। बात खत्म। या आप चाहते हैं कि बताने के बावजूद आपका नाम कटा क्यों नहीं तो इसकी मांग कीजिए, दोषी के खिलाफ कार्रवाई होगी। पर आपने नाम काटने का आवेदन किया ही नहीं हो, या यह घोषणा ही नहीं की हो कि आपका नाम कहीं और है, तो आप दोषी हैं, कार्रवाई आपके खिलाफ होगी। लेकिन इसमें अदालती पेंच हैं। कई बार आप आवेदन खुद नहीं करते हैं, दस्तखत गंभीरता से नहीं मिलाए जाते हैं। इस बिना पर आप अदालत से शायद बच जाएं पर मामला तय तो अदालत में ही होगा। भक्त बेकार ज्ञान बघारने लगते हैं और मजे की बात यह कि अमूमन यह नहीं कहा जाता कि नियम क्या है या फैसला तो अदालत में लोगा। लोग टूट पड़ते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


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अजीत अंजुम की बिटिया जिया ने मोदी की बजाय केजरी पर मुहर मारा (देखें वीडियो)

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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

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जानिए, उन वजहों को जिसके कारण दिल्ली में किरण बेदी फैक्टर अरविंद केजरीवाल को बहुमत दिला रहा है

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एनडीटीवी प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को पूरी तरह घेर लिया

Shambhunath Shukla : एक अच्छा पत्रकार वही है जो नेता को अपने बोल-बचन से घेर ले। बेचारा नेता तर्क ही न दे पाए और हताशा में अंट-शंट बकने लगे। खासकर टीवी पत्रकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। बीस जनवरी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को ऐसा घेरा कि उन्हें जवाब तक नहीं सूझ सका। अकेले कोहली ही नहीं कांग्रेस के प्रवक्ता जय प्रकाश अग्रवाल भी लडख़ड़ा गए। नौसिखुआ पत्रकारों को इन दिग्गजों से सीखना चाहिए कि कैसे टीवी पत्रकारिता की जाए और कैसे डिबेट में शामिल वरिष्ठ पत्रकार संचालन कर रहे पत्रकार के साथ सही और तार्किक मुद्दे पर एकजुटता दिखाएं। पत्रकार इसी समाज का हिस्सा है। राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति उसे भी प्रभावित करेगी। निष्पक्ष तो कोई बेजान चीज ही हो सकती है। मगर एक चेतन प्राणी को पक्षकार तो बनना ही पड़ेगा। अब देखना यह है कि यह पक्षधरता किसके साथ है। जो पत्रकार जनता के साथ हैं, वे निश्चय ही सम्मान के काबिल हैं।

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी (अरविन्द केजरीवाल) नहीं होती तो दिल्ली का मुख्यमंत्री कोई मनोज तिवारी, जगदीश मुखी, विजय कुमार मल्होत्रा या स्मृति ईरानी हो सकता था। पर मोदी की दिल्ली रैली के बाद पार्टी को लगा कि बेहतर विकल्प की जरूरत है और किरण बेदी परिदृश्य में आईं। बेशक यह दिल्ली के लिए बेहतर विकल्प है। दूसरे संभावित उम्मीदवारों से अच्छी हैं। दिल्ली को लाभ हुआ है। भारतीय जनता पार्टी आम आदमी पार्टी से परेशान है। मोदी के नाम पर वोट मांगने की रणनीति बदलनी पड़ी। भाजपा को केजरीवाल से (बादल + चौटाला+पवार से भी) ज्यादा डर लग रहा है। यह अच्छी बात है। अरविन्द केजरीवाल के कारण ही हम देख रहे हैं कि संघ से बाहर का भी कोई व्यक्ति भाजपा का चेहरा बन पाया। और मोदी ही हर जगह भाजपा के चेहरा नहीं रहेंगे। यह भी अच्छी बात है, सकारात्मक है। अगर हम एक ईमानदार और अच्छी साख वाली ताकत बना सकें तो स्थापित राष्ट्रीय पार्टियां ईमानदार नए चेहरों को जोड़ने के लिए मजबूर होंगी। इस दबाव को बनाए रखने की जरूरत है। आप को समर्थन का मतलब है राष्ट्रीय दलों को जनता के प्रति अपना व्यवहार बदलने के लिए मजबूर करना।

Mukesh Kumar : केजरीवाल का कहना सही लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी नाक बचाने के लिए किरण बेदी को आनन-फानन में मुख्यंमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया है। अब अगर हारे तो ठीकरा बेदी के सिर फूटेगा और जीते तो कहा जाएगा मोदी बड़े रणनीतिकार हैं। लेकिन दिल्ली की हार मोदी एंड कंपनी के लिए बड़ी हार होगी और इसके ब़ड़े प्रभाव भविष्य की राजनीति पर देखने को मिलेंगे। आपको क्या लगता है, बेदी के कंधों पर रखकर बंदूक चलाने के इस प्रयोग से मोदी दिल्ली बचा पाएंगे?

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला, संजय कुमार सिंह और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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मोदी जी, आप देश के प्रधानमंत्री हैं, दिल्ली के लिए कोई और देखिए

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली में सत्ता पाने के लिए भारतीय जनता पार्टी 24 घंटे बिजली, गरीबों को घर, झुग्गी-झोपड़ी खत्म करना, अवैध कॉलोनी को नियमित करने जैसी सुविधाओं का चारा फेंक रही है। दिल्ली में वैसे भी प्रति व्यक्ति आय देश के कई शहरों के मुकाबले ज्यादा है। स्कूल, अस्पताल, गैस कनेक्शन जैसी सुविधाएं तो हैं ही।

कुल मिलाकर, देश भर में रहने लायक जगह दिल्ली ही है। गरीबों के लिए तो काफी मुफीद। आगे और होगी। रोजगार के मौके हैं सो अलग। गाजियाबाद में बिजली रहती नहीं है और दिल्ली में जाएगी नहीं – कहीं ऐसा ना हो कि पूरा देश दिल्ली में ही रहने लगे। अमीर-गरीब सब। बाकी देश में भी बिजली, पानी का कुछ करिए मोदी साब। सब कुछ दिल्ली में ही। आप देश के प्रधानमंत्री हैं, दिल्ली के लिए कोई और देखिए। किसी और को चलाने दीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर अच्छा चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने रेडियो पर एक विज्ञापन चलाया जो इस प्रकार है, “गलती मेरी ही थी। आम आदमी, आम आदमी कहकर धोखा दे दिया। बड़े-बड़े वादे। पानी मुफ्त कर देंगे। आंसू दे गया। घर के काम छोड़कर उसके लिए मीटिंग करवाई, मोहल्लों में। पर बदले में क्या मिला। सब छोड़कर भाग गया। इनके अपने आदमी तक चले गए। गैर जिम्मेदारी का बदला लेंगे। अब इस नाकाम आदमी को वोट न देंगे। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

इसका जवाब अरविन्द केजरीवाल की आवाज में आ रहा है। रेडियो विज्ञापन में वे कहते हैं, “मैंने एफएम रेडियो पर एक बुजुर्ग महिला की आवाज सुनी। बहुत दुखी नजर आ रही थीं क्योंकि उन्होंने मुझे वोट दिया और मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्हें लगा, मैंने उनके वोट का सम्मान नहीं किया। आज मैं उन्हीं से मुखातिब हूं। मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि माताजी, मैं कहीं भाग के नहीं गया कुछ ही दिनों में पूर्ण बहुमत लेके आपकी सेवा में फिर आ रहा हूं। आप अपना विश्वास बनाए रखिए। ना तो आपका वोट व्यर्थ गया ना आपका परिश्रम। कमी रह गई थी तो कुछ सीटों की आप विश्वास और आशीर्वाद बनाए रखिए हम पूर्ण बहुमत लेकर आपकी सेवा करने पूरे पांच साल के लिए फिर से वापस आ रहे हैं। आप नाराजगी छोड़िए, थोड़ा मुस्कुरा दीजिए।”

इसके अलावा, भाजपा और उसके सहयोगियों ने जो वोटबटोरू मुद्दे उठाए हैं (जीन्स पहनने, महिलाओं की नौकरी, लव जेहाद, गोड्से की मूर्ति) उनका मजाक उड़ाने वाला एक विज्ञापन आम आदमी पार्टी की ओर से आता है। हालांकि इसमें भाजपा का नाम नहीं लिया गया है। भाजपा के ज्यादातर विज्ञापन आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को लक्ष्य करते हैं। मुद्दे उसके पास हैं नहीं या उन्हें अभी सामने नहीं ला रही है पर अभी जो तीर दागे जा रहे हैं उसका एक और नमूना देखिए…

“कुछ ना था वो। चार दिन की चांदनी दिखाकर भाग गया। तुम खुद सोचो, जो अपने लालच के लिए एक बार जनता का विश्वास तोड़ सकता है वो दोबारा क्या ऐसा नहीं कर सकता? मगर भाई … … अरे तू रहने दे। सरकारी बंगला ठुकराने के बाद बंगला ले लिया… गाड़ी ठुकराने के बाद वो भी ले ली। जो अपने वादों पर ना टिका वो अपने विश्वास पर क्या खाक टिकेगा? ऐसी बचकानी हरकत करने वाले को तू चाहता है कि मैं वोट दूं। बात करता है। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

देखना है जनता नाराजगी छोड़कर मुस्कुराती है या मुस्कुराते हुए मोदी के साथ चली जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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अमेरिका में खबरों को बेचने के लिए उन्हें झूठ के आंसुओं से नहीं सींचा जाता

साथी Sanjay Sinha ने अमेरिका के ट्विन टावर पर हमले की खबर से संबंधित एक टिप्पणी आज सवेरे फेसबुक पर लिखी और पांच घंटे में 400 शेयर 913 लाइक और 274 कमेंट आए। इनमें ज्यादातर सकारात्मक या पक्ष में हैं। टिप्पणी में उसने मुझे भी टैग किया है क्योंकि उन दिनों हिन्दी में ई-मेल तभी संभव था जब दोनों जगह हिन्दी के एक ही फौन्ट हो। संजय अमेरिका से अपनी खबरें मुझे भेजता था और मैं प्रिंटआउट दफ्तर में देता था जिसे दुबारा कंपोज कर जनसत्ता में छापा जाता था। टिप्पणी मेरी वाल पर भी है और अगर आपने पूरी पोस्ट नहीं पढ़ी तो यह हिस्सा पढ़िए…

…. लेकिन अमेरिका में इतना बड़ा हादसा हो गया। एक भी लाश नहीं दिख रही थी। टीवी वाले कह रहे हैं कि दस हजार लोग मर गए। दस हजार मर गए तो लाशों को कौन ले भागा? यहां के टीवी वाले मूर्ख हैं। बस दो विमानों के टकराने की खबरें दिखाए जा रहे हैं। एक भी लाश नहीं? कोट-पैंट-शर्ट पर लाल निशान वाली तस्वीरें कहां हैं? लोगों के जूते? वो मातमी धुन? मैं एक-एक कर सारे चैनल बदल चुका। कहीं कुछ नहीं। बस इतनी सी खबर कि अमेरिका पर सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ है। बुश ने ये कहा है। इसके अलावा न किसी और का कोई बयान न खून से रंगी कोई तस्वीर।

आपको सिर्फ बताने के लिए बता रहा हूं कि जिस वक्त ट्वीन टावर पर हमला हुआ था, उस वक्त सीएनएन वहां अपनी एक फिल्म शूट कर रहा था। क्योंकि उनकी शूटिंग चल रही थी, इसीलिए ट्वीन टावर से विमान के टकराने की घटना शूट हो गई। वो करीब-करीब लाइव विजुअल था, जिसे आपने यहां टीवी पर बार-बार देखा। लेकिन आपने दस हजार मौत में से एक भी लाश अपने टीवी स्क्रीन पर नहीं देखी होगी।

वहां के लोग खबरों को जुगुप्सापूर्ण नहीं बनाते। वहां खबरों में थ्रिल नहीं पैदा किया जाता। वहां खबरों में मौत का ड्रामा नहीं रचा जाता। वहां खबरों को बेचने के लिए उन्हें झूठ के आंसुओं से नहीं सींचा जाता। वहां किसी बच्चे की कापी पर खून के पड़े छींटों को सनसनीखेज नहीं बना कर उस तरह उन पर कविताएं नहीं गढ़ी जातीं, जिस तरह पाकिस्तान में एक स्कूल में बच्चों पर हुए हमले के बाद हम सबने दिखाई हैं। वहां मौत को थ्रिल नहीं माना जाता। उनके लिए ज़िंदगी थ्रिल है। वो आसमान से कूदते हैं, पहाड़ पर चढ़ते हैं, समंदर में गोते लगाते हैं। ये सब उनकी खबरें हैं। वो ज़िंदगी को लाइव जीते हैं। हमारी तरह मौत को नहीं।

आप अपने दिमाग पर जोर डालिए। मैं भी डाल रहा हूं। मुझे न्यूयार्क में उतने बड़े हमले में मौत की एक भी तस्वीर नहीं दिखी थी। मैं तो वहीं था। जब मुझे नहीं दिखी तो आपको भी नहीं ही दिखी होगी। मैंने उस घटना के बारे में अपने बेटे से उस दिन सिर्फ इतनी बात की थी कि तुम परेशान मत होना। ऐसी घटनाएं हो जाती हैं।

संजय की खबर उस दिन “अमेरिका को डर है कि बच्चे कहीं डर न जाएं” शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। खबर छपने के बाद शीर्षक की चर्चा हुई थी और अमेरिका के रुख की तारीफ भी। मुझे लगा था कि भारतीय मीडिया कुछ सीखेगा पर सब बेकार रहा। अब सोशल मीडिया पर तो लोग और आगे निकल गए हैं। दोष किसे दिया जाए। कोई लाशें बेच रहा है, कोई मनोरंजन कर रहा है और कोई टाइमपास।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली पुलिस ने विज्ञापन पर रोक लगाकर ‘आप’ को मुफ्त में लाभ दे दिया!

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को दिया मौका…. दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी के एक विज्ञापन पर रोक लगाकर उसे मुफ्त में लाभ की स्थिति में पहुंचा दिया है। जो काम लाखों के विज्ञापन से नहीं होता, वह मुफ्त में हो गया। आम आदमी पार्टी ने कहा है कि विज्ञापन पर यह रोक पूरी तरह गैर कानूनी है। हालांकि अरविन्द केजरीवाल ने इस विज्ञापन के बचाव में जो कुछ कहा है वह पार्टी के संदेश को और मजबूती तथा ज्यादा असरदार ढंग से कह रहा है।

इस विज्ञापन में एक युवती अपने साथ हुई छेड़खानी की घटना के बारे में बताती है। इस दौरान वह कहती है कि पुलिस ने किस तरह उसे परेशान किया। एफआईआर नहीं लिखी आदि। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि विज्ञापन में शामिल महिला वाकई ऐसी किसी घटना की शिकार है या कोई काल्पनिक चरित्र। और यह सब पता करने से पहले अपनी छवि ठीक करने के नाम पर दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी को अपनी छवि चमकाने का एक बढ़िया मौका दे दिया है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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हिन्दुस्तान टाइम्स गाजियाबाद संस्करण की दों खबरें : ऐसी खबरों को हम लोग प्लांटेशन कहते हैं

Sanjaya Kumar Singh : ये कैसी खबर… काफी समय से मेरा मानना रहा है कि अखबारों में (और चैनलों पर भी) कैसी खबरें की जाएं, कब की जाएं और क्यों की जाएं या न की जाएं इस संबंध में योजना बनाने और सोचने समझने का काम नहीं के बराबर होता है या बहुत कम होता है। मीडिया का उद्देश्य अब पैसे कमाने रह गया है और इसमें किसी को शक नहीं है। पर पैसे खर्च करने में कटौती का असर यह है ऐसी खबरें भी छप जाती हैं जिनका कोई मतलब नहीं होता है। इसी क्रम में दों खबरें पेश है।

आज के हिन्दुस्तान टाइम्स, गाजियाबाद में नोएडा गाजियाबाद वाले पन्ने पर एक साथ दों खबरें हैं (मुमकिन है ये खबरें दिल्ली और दूसरी जगहों के अखबारों में ना हो या किसी और पन्ने पर हो) – एक का शीर्षक है, “नोएडा के बाबू को हटाए जाने से परियोजनाएं देर हो सकती हैं” और दूसरे का, “सरकारी अधिकारी नोएडा के इंजीनियर इन चीफ की खाली जगह के लिए मुकाबले में” हैं। आपको पता होगा कि आयकर अधिकारियों ने नोएडा के तीन प्राधिकरणों के इकलौते प्रमुख यादव सिंह (जी हां, यही नाम है) के ठिकानों पर छापा मारा और कोई 1000 करोड़ रुपए की अवैध संपत्ति का पता लगाया। छापों में जो संपत्ति मिली है वह खुले आम सड़कों पर थी, सार्वजनिक जगहों पर कब्जे के रूप में थी। इतने पैसे खुले-आम लूट मार करके ही बनाए जा सकते हैं फिर भी हम आप तब जान पाए जब आयकर वालों ने छापा मारा और आयकर वालों को बेईमान कहने वालों की कमी नहीं है। पर वह अलग मुद्दा है।

अब इतनी रकम मिली है तो जांच होगी ही और दस्तूर यह है कि अभियुक्त को पद से हटा दिया जाता है। गुरूवार को मामला सामने आने के बाद इस आशय की खबरें भी दिखी थीं कि यादव सिंह को अभी तक पद से हटाया नहीं गया है। और शुक्रवार को जब हटा दिया गया तो इतवार के अखबार में (रिपोर्टर ने शनिवार को ही लिख दिया) खबर छप रही है कि परियोजनाएं देर हो जाएंगी और खाली पद के लिए मारा-मारी शुरू हो गई है। मैं नहीं कहता कि खबर तथ्यात्मक रूप से गलत है पर इस खबर का क्या मतलब है? वह भी तब जब खबर में ही कहा गया है कि अधिकारियों ने दावा किया कि इससे परियोजनाएं देर नहीं होंगी। यही नहीं, तीनों प्राधिकरणों के चेयरमैन रमा रमण के हवाले से भी कहा गया है कि हटाए गए अधिकारियों के कनिष्ठ सुनिश्चित करेंगे कि परियोजनाएं समय पर पूरी हों। हो सकता है ऐसा न हो और खबर लिखने वाले की आशंका सही हो पर इसके लिए कुछ दिन इंतजार किया जा सकता था या कोई ठोस कारण बताया जाना चाहिए था। “दोनों पक्ष प्रस्तुत कर दिया जाए, निर्णय पाठक कर लेगा” के सिद्धांत का ऐसी खबरों में क्या मतलब?

ऐसी ही दूसरी खबर है, खाली पद (पदों) के लिए प्रतिस्पर्धा। इसमें सिर्फ यह कहा गया है कि यादव सिंह राजनैतिक तौर पर सक्रिय हैं। बसपा और सपा दोनों के करीबी हैं। अनजाने सूत्रों के हवाले से यह भी कि सपा सरकार में उन्होंने ताकत पाई और इंजीनियरिंग विभाग में उनके कई दुश्मन हो गए। अखबार को सूत्रों ने ही बताया है कि यादव ने अपने विरोधियों को इंजीनियर इन चीफ का पद नहीं कब्जाने दिया क्योंकि उनके अच्छे राजनैतिक संपर्क थे। आगे एक अनाम अधिकारी ने कहा है कि अब चूंकि वे (यादव सिंह) पद से हटा दिए गए हैं, इसलिए उनके विरोधी पद पाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इस खबर में किसी का नाम नहीं है और ऐसे में इसका भी कोई मतलब नहीं है। इस कमाऊ पद के लिए अगर मारा-मारी हो रही है तो वह स्वाभाविक ही है हालांकि अभी तो (खबर लिखने तक) दो ही दिन निकले थे। इसमें एक पाठक के रूप में मैं यह जानना चाहता हूं कि अगली नियुक्ति भी तीनों प्राधिकरण के लिए एक ही होगी या अब तीन लोगों की नियुक्ति होगी। खबर में इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। अब देखता हूं किसी और अखबार में इस बारे में कोई अटकल या खबर है क्या? ऐसी खबरों को हमलोग प्लांटेशन कहते थे। और रिपोर्टर ऐसी खबर देता था तो कहता था, एक पौधा ले लो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नलिनी सिंह कल स्कर्ट टी शर्ट में दिखीं

Sanjaya Kumar Singh : नलिनी सिंह दूरदर्शन की संभवतः सबसे पुरानी एंकर हैं। 1985 में सच की परछाईं प्रस्तुत करते हुए कैसे कपड़े पहनती थीं ये तो याद नहीं है पर कल स्कर्ट टी शर्ट में थीं। आंखिन देखी भी दूरदर्शन के पुराने कार्यक्रमों में है और कल बहुत दिनों बाद दिख गया। इस कार्यक्रम में मेरी दिलचस्पी कभी रही नहीं और कल तो लगा कि आंखिन देखी असल में अपराध की खबरों की बहुत ही घटिया प्रस्तुति है और टीवी एंकर या रिपोर्टर की आंखिन देखी नहीं, हिन्दी पट्टी के पुलिसियों की आंखिन देखी है – जिसका विवरण बहुत ही फूहड़ ढंग से प्रस्तुत कर दिया जाता है।

 

कार्यक्रम कैसा है इसकी चर्चा न भी करूं तो यह कहना ही पड़ेगा कि नलिनी सिंह ने कोई तरक्की नहीं की है। अगर दूरदर्शन पर बने रहने के लिए ऐसे फटीचर कार्यक्रम बनाते रहना कोई मजबूरी हो तो भी नलिनी सिंह इसे क्यों एंकर कर रही हैं, समझ में नहीं आया। वह भी धर दबोचा, आत्मबल से लबालब जैसे शब्दों के साथ अपने उसी पुराने अंदाज में। लगा ही नहीं कि 2014 खत्म होने को आ गया है। उसपर से तुर्रा यह कि रैपिडेक्स इंग्लीश स्पीकिंग कोर्स, एमडीएच मसाले, मुग्ली घुट्टी 555 और कायम चूर्ण के विज्ञापनों के साथ। धन्य है हमारा दूरदर्शन और जो इस कार्यक्रम को देख रहे हैं (तभी तो चल रहा है) वो भी। इतना पुराना कार्यक्रम है और तस्वीर ढूंढ़ने के लिए गूगल में आंखिन देखी डाला तो एक तस्वीर नहीं मिली। और शुरू के पन्ने पर इससे जुड़ी कोई खबर भी नहीं। नलिनी सिंह सर्च करने पर यह (उपर प्रकाशित) तस्वीर मिली। यह एक खबर के साथ है जिसके मुताबिक तलवार दंपत्ति (राजेश और नुपुर तलवार – आरुषि हत्याकांड) ने नलिनी सिंह को गवाह बनाने की मांग की थी। यानी नलिनी सिंह और आंखिन देखी गूगल पर जीरो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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ऑफिसियल ट्रिप है, ऐश कीजिए कंपनी के खर्चे पर… कोई पत्रकारिता नहीं है यह सब…

Sanjaya Kumar Singh : भड़ास पर छपी ‘पुण्य प्रसून बाजपेयी, सुप्रिय प्रसाद, राहुल कंवल और दीपक शर्मा कल क्यों जा रहे हैं लखनऊ?‘ खबर को पढ़कर एक पुरानी घटना याद आ गई। जनसत्ता के लिए जब मेरा चुनाव हुआ उन्हीं दिनों जमशेदपुर से निकलने वाले एक अंग्रेजी अखबार के संवाददाता की हत्या हो गई थी। पत्रकारिता को पेशे के रूप में चुनने से पहले मुझे यह तय करना था कि कितना खतरनाक है यह पेशा। मैंने जमशेदपुर के एक बहुत ही ईमानदार पत्रकार से इस बाबत बात की। उनसे लगभग सीधे पूछा था कि जिस पत्रकार की हत्या हुई उसकी तो कोई खबर मुझे याद नहीं है। दूसरी ओर आप एक से बढ़कर एक खबरें लिखते हैं – क्या आपको डर नहीं लगता धमकी नहीं मिलती।

तब उन्होंने कहा था कि अगर आप अपना काम करो, ईमानदारी से करो तो कोई बुरा नहीं मानता, कोई खुंदक नहीं पालता। लेकिन आप खबरें करने में सेलेक्टिव होगे, किसी के खिलाफ लिखोगे, किसी के खिलाफ नहीं तो स्थिति खराब होगी। उस समय तो मुझे लगा था कि उन्होंने पॉलिटिकली करेक्ट जवाब दे दिया था – अब लगता है कि मामला ऐसा ही है। पहले ईमानदारी से खबरें की जाती थीं और जब कोई प्रेस के खिलाफ होता था तो सभी प्रेस वाले मिलकर विरोध करते थे। अब आप सुविधा भी लोगे और खिलाफ भी लिखोगे – विज्ञापन ज्यादा चाहिए, प्लॉट कोने वाला चाहिए, वेज बोर्ड नहीं देने की आजादी चाहिए तो फिर विरोध कैसा। और फिर सामने वाला प्लॉट की कीमत याद दिलाएगा तो दूसरा क्यों साथ दे। यह सब किसी खास संस्थान में काम करने की कीमत है – ऑफिसियल ट्रिप है, ऐश कीजिए कंपनी के खर्चे पर। कोई पत्रकारिता नहीं है यह सब।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पैसे कमाने की होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी बीमार हैं और दो महीने में तीसरी बार अस्पताल में हैं। तीमारदारी करते हुए अस्पताल में समय काटने के लिए नकद देकर अखबार खरीदता और पढ़ता हूं। इसी क्रम में पिछले दिनों ‘द हिन्दू’ खरीदा तो पता चला कि आजकल आठ रुपए का आ रहा है। आपमें से बहुतों को पता नहीं होगा कि रोज घर आने वाला अखबार कितने का होता है। महीने भर का बिल देने वालों के लिए यह कोई खास बात नहीं है।

इसी क्रम में आज (इतवार) को मैंने एक स्टॉल वाले से कहा कि एक-एक इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स दे दो। उसने अखबार पकड़ाए और कहा 10 रुपए। मैंने कहा किसके कितने। उसने कहा हिन्दुस्तान टाइम्स तो साब पांच रुपए का है। ये भी (इंडियन एक्सप्रेस) पांच रुपए का है। मैंने कहा, कहां लिखा है दिखाओ। वह ढूंढ़ने लगा और 5 अक्तूबर दिखाकर कहा ये देखो साब। मैंने कहा ये तो आज की तारीख लिखी है। अब वह बेचारा और परेशान उसके साथ मैं भी। असल में आज इतवार को दोनों अखबारों में पहला पन्ना विज्ञापन का था और विज्ञापन के साथ बने मास्ट हेड में तारीख आदि तो हैं पर अखबार की कीमत नहीं लिखी है, न जाने क्यों। जब हॉकर को नहीं मिला तो मैंने उसकी सहायता के लिए अंदर के (जो असल में पहला था) पन्ने पर कीमत ढूंढ़ना शुरू किया और ढूंढ़ निकाला।

हॉकर सही था, मैंने 10 रुपए दिए और अखबार लेकर आगे बढ़ा तो अफसोस कर रहा था कि मैंने बेकार बेचारे कम पढ़े-लिखे अखबार विक्रेता को परेशान किया। पर साथ ही यह ख्याल भी आया कि अखबार वाले हम पाठकों का तो ख्याल नहीं ही रखते हैं, अपने विक्रेताओं की भी चिन्ता उन्हें नहीं है। एक समय था जब पहले पन्ने पर एक ही विज्ञापन होता था। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती गई और अब अखबार वाले अपना पूरा पहला पन्ना बेच दे रहे हैं और पाठकों को पहले पन्ने की खबरें अंदर पढ़ा रहे हैं। पाठकों की परवाह तो अखबार वालों को नहीं है। उन्हें चिन्ता विज्ञापन देने वालों की है और उनकी सेवा वे अच्छी तरह कर भी रहे हैं पर बेचारे गरीब, कम पढ़े-लिखे विक्रेताओं का ख्याल तो रखो। पैसे कमाने की इस होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है, यह जानकर आज थोड़ा अफसोस हुआ।

दूसरी ओर, अखबार में विज्ञापन देने और छापने वालों को बता दूं – मैंने नहीं देखा कि विज्ञापन किसी चीज का था। शाम को बच्चों ने बताया कि आमिर खान का प्रोग्राम आज शुरू हो गया तब समझ में आया कि हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पेज के विज्ञापन में खबरें क्यों छपीं थीं और उनपर विज्ञापन क्यों लिखा था। अब याद नहीं आ रहा है कि इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर क्या विज्ञापन था (हालांकि था हिन्दुस्तान टाइम्स से अलग)। देखते हैं अखबार वाले इस तरह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए कब तक धंधा कर पाते हैं। हमारी तो जो मजबूरी है सो हइये है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मार खाएं, घाटा हो जाए, फंस जाएं, सरकार बकाया निकाल दे तो पत्रकार हो जाएंगे

(File Photo Sanjay Kumar Singh)

Sanjaya Kumar Singh : कई मित्रों ने कहा कि राजदीप सरदेसाई की पिटाई पर मैंने नहीं लिखा। साथी Sumant ने कहा है, “…. हमारी खामोशी भी पत्रकारिता के गिरते स्तर की गुनहगार है संजय भाई …..।” सुमंत से असहमत होने का कोई कारण नहीं है। कैश फॉर वोट स्कैम और उसकी लापता सीडी का मामला आपको याद होगा। एक मामला मैं और याद दिलाता हूं। हर्षद मेहता ने एक कॉलम लिखना शुरू किया था और उसका हिन्दी अनुवाद मुझे हिन्दी के अखबारों में छपवाना था। उस समय कई संपादकों ने कहा था कि हर्षद मेहता का कॉलम नहीं छापेंगे। हर्षद मेहता होते तो आज अखबार या चैनल भी चला रहे होते और वो संपादक उनकी नौकरी बजा रहे होते। पर वो अलग मुद्दा है। उस समय इतनी नैतिकता तो थी इनमें।

पर अब? मुझे सुभाष गोयल उर्फ सुभाष चंद्रा याद आते हैं। सुना है अपने चैनल पर लोगों को उद्यम चलाना सीखा रहे हैं। ये कैसे पत्रकार? धंधेबाज हैं। पैसे कमाना लक्ष्य है। मार खाएं, घाटा हो जाए, फंस जाएं, सरकार बकाया निकाल दे तो पत्रकार हो जाएंगे। ऐसे पत्रकारों को मैं पत्रकार नहीं मानता। उनकी पिटाई को पत्रकार की पिटाई नहीं मानता। वैसे भी खिलाड़ी पिता का पत्रकार बेटा राजदीप सरदेसाई पत्रकारिता की एक दुकान खड़ी करके उसे 4000 करोड़ रुपए में बेच चुका है। 4000 करोड़ रुपए का मालिक बनने के लिए उसने पत्रकारिता के साथ-साथ तमाम हथकंडे अपनाए होंगे। ऐसे को दुनिया पत्रकार माने तो माने मैं नहीं मानता। ऐसे लोगों की पिटाई के कई कारण हो सकते हैं, भले ही प्रत्यक्ष तौर पर पत्रकारिता दिखाई दे। रामनाथ गोयनका को पत्रकार माना जा सकता है पर राजदीप सरदेसाई और रजत शर्मा को पत्रकार मानना मुझे नहीं जम रहा। अब तो सुभाष गोयल भी पत्रकार हैं – सरकारी मान्यता से लेकर दिल्ली में बंगला झटक लें तो हम-आप क्या कर लेंगे। पर ये ऐसे पत्रकार हैं जो पत्रकारिता के साथ सारे धंधे करेंगे और पिटेंगे तो पत्रकार हो जाएंगे।

जनसत्ता अखबार में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. 


(File Photo Mukesh Yadav)

Mukesh Yadav :राजदीप मारपीट प्रकरण में अब दूसरे पक्ष का विडियो सामने आया है! अगर पहला विडियो राजदीप द्वारा प्रायोजित था तो दूसरा सुब्रामण्यम स्वामी (बीजेपी) द्वारा प्रायोजित नहीं होगा इस बात की क्या गारंटी है? गौरतलब है कि दोनो ही विडियो बस कुछ सेकंड के हैं! एक में राजदीप पर हमला होते हुए दिख रहा है तो दूसरे विडियो में राजदीप खुद हमलावर है! आखिर इस पूरे सिलसिले को समेटता हुआ मास्टर विडियो कहाँ है? बेशक इस मामले में अब थर्ड पार्टी इन्वेस्टीगेशन होना ही चाहिए, तब तक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी…जो भी दोषी होगा मेरी तरफ से उसकी एडवांस में निंदा।

जो मित्र ‘दूसरे विडियो’ में राजदीप को आक्रामक मुद्रा में देख निष्कर्षत: उसे विलेन घोषित कर चुके हैं, वे जल्दबाजी में संभवत: अर्ध सत्य ही देख पा रहे हैं! उन्हें कुछ दूसरे विडियो खोजकर देखने चाहिए। इनमें एकदम साफ नजर आ रहा कि आरएसएस के स्वयं सेवकों ने किस कदर राजदीप की घेराबंदी की हुई है और लगातार अपमानित कर रहे हैं! अगर आप मुझसे सहमत नहीं हो तो क्या बोलने नहीं दोगे? सवाल नहीं पूछने दोगे? रिपोर्टिंग नहीं करने दोगे? उलटे लांछन लगाओगे?…तुम्हारी ऐस्सी की तैस्स..! बस यही हुआ था। राजदीप का दोष सिर्फ इतना है कि – ही जस्ट गेट प्रोवोक्ड बाय दोज फासिस्ट्स! मैडिसन स्क्वायर में हुई इस घटना के माध्यम से आरएसएस ने न्यूज़ मीडिया को साफ़ सन्देश दे दिया है- या तो आप हमारे और हमारी सरकार के साथ हैं या फिर आप कहीं नहीं हैं! और आपके साथ भी वही किया जाएगा, जो तुम्हारे इस बंधु (राजदीप) के साथ हुआ है!…समझे की नहीं!

मीडिया से जुड़े रहे पत्रकार मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

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जनसत्ता अखबार में नौकरी शुरू करने के कुछ समय बाद ही समझ में आ गया कि मैं इस पेशे में गलत आ गया हूं

Sanjaya Kumar Singh :  हिन्दी, हिन्दी की नौकरी, अर्ध बेरोजगारी और हिन्दी में बने रहना… जनसत्ता में उपसंपादक बनने के लिए लिखित परीक्षा पास करने के बाद इंटरव्यू से पहले ही सहायक संपादक बनवारी जी ने बता दिया था कि प्रशिक्षु रखा जाएगा और (लगभग) एक हजार रुपए महीने मिलेंगे। इतने में दिल्ली में रहना मुश्किल है, रह सकोगे तो बताओ। मैंने पूछा कि प्रशिक्षण अवधि कितने की है। बताया गया एक साल और फिर पूरे पैसे मिलने लगेंगे। पूरे मतलब कितने ना मैंने पूछा और ना उन्होंने बताया। बाद में पता चला कि प्रशिक्षण अवधि में 40 प्रतिशत तनख्वाह मिलती है। पूरे का मतलब अब आप समझ सकते हैं। मेरे लिए उस समय भी ये पैसे कम नहीं, बहुत कम थे।

नौकरी शुरू करने के बाद कुछ ही समय में यह समझ में आ गया कि मैं इस पेशे में गलत आ गया हूं। मैं मानता हूं कि यह पेशा (कम वेतन और सुविधाओं के कारण) मेरे लायक नहीं है। आप यह मान सकते हैं कि मैं इस पेशे के लायक नहीं था। मुझे दोनों में कोई खास अंतर नहीं लगता है। वैसे, मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि जनसत्ता या हिन्दी पत्रकारिता ने वेतन भत्तों के अलावा जो दिया वह कत्तई कम नहीं है। पर यह तो मिलना ही था। मैं यह बताना चाहता हूं कि आम नौकरियों में जो वेतन भत्ते, सुविधाएं आदि अमूमन मिलते ही हैं वह भी पत्रकारिता में मुश्किल है और जिन सुविधाओं के लिए पत्रकार बड़ी और लंबी-चौड़ी खबरें लिखते हैं वे खुद उन्हें नहीं मिलतीं। दुर्भाग्य यह कि वे इसके लिए लड़ते नहीं हैं, बोल भी नहीं पाते और इस तरह लिखना तो अपमान भी समझते हैं। हिन्दी पत्रकारिता बहुत हद तक एक पवित्र गाय की तरह है जिसके खिलाफ कुछ बोला नहीं जाता और उससे कुछ अपेक्षा भी नहीं की जाती है। फिर भी लोग उसकी सेवा करते रहते हैं।

अखबारों या पत्रकारिता की हालत खराब होने का एक कारण यह भी है कि अब पेशेवर संपादक नहीं के बराबर हैं। जो काम देख रहे हैं उनमें ज्यादातर को पत्रकारिता की तमीज नहीं है और पैसे कमाने की मजबूरी ऊपर से। अपने लिए और लाला के लिए भी। नियुक्ति के मामले में संपादकों पर दबाव आज से नहीं है। जनसत्ता ज्वायन करने के बाद विज्ञापन निकला कि एक राष्ट्रीय हिन्दी अखबार को जमशेदपुर में अपने पटना संस्करण के लिए जमशेदपुर में रिपोर्टर चाहिए था। मैंने आवेदन किया। लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद कॉल लेटर नहीं आया तो मैंन कुछ परिचितों से चर्चा की। संयोग से अखबार के उस समय के प्रधान संपादक परिचित के परिचित निकले और इंटरव्यू उन्हीं ने लिया था। परिचित के साथ बात-चीत में उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय तक कोई नियुक्ति नहीं हुई थी पर साथ ही यह भी कहा कि मैं किसी राजनीतिज्ञ से अखबार के बड़े लोगों में से किसी को कहलवा दूं तो चुनाव हो जाएगा (उन्होंने दो-चार नाम भी बताए) वरना सिफारिश के बगैर उनके यहां कोई नियुक्ति नहीं होती। हिन्दी में सच पूछिए तो तीन ही राष्ट्रीय अखबार हैं। एक में मैं था ही, दूसरे की हालत यह रही। तीसरा अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया समूह का था जो अखबार को प्रोडक्ट मानने की घोषणा कर चुका था और अब कह चुका है कि वह खबरों का नहीं विज्ञापनों का धंधा करता है। इस संस्थान ने एक नीतिगत फैसला लिया और नवभारत टाइम्स का ब्यूरो बंद कर दिया। अब लगता है कि टाइम्स समूह के मालिकानों की ही तरह जनसत्ता के मालिकानों ने भी उस समय के फैशन के अनुसार अपने हिन्दी प्रकाशन पर ध्यान देना बंद कर दिया होगा।

हिन्दी पत्रकारों के लिए एक संभावना आजतक चैनल शुरू होने की योजना से बनी। कुछ लोगों ने मुझे वहां जाने की सलाह दी। कुछ ही दिनों में वहां जान पहचान निकल आई और मैं पूरी सिफारिश (यह सिफारिश पत्रकारों की थी, मंत्री या ऐसे किसी शक्तिशाली की नहीं) के साथ उस समय वहां जो काम देख रहा था उनसे बातचीत के लिए पहुंचा। अच्छी बातचीत हुई और मामला ठीक लग रहा। चलते समय उन्होंने पूछा कि मुझे जनसत्ता में कितने पैसे मिलते हैं और इसके जवाब में मैंने जो पैसे मिलते थे वह बताया तो उन्होंने ऐसा मुंह बनाया जैसे मैं कहीं बेगार कर रहा था। जनसत्ता में मेरी नौकरी सिर्फ छह घंटे की थी और मैं खुद को अर्ध बेरोजगार मानता था। ऐसे में मेरी कम तनख्वाह पर उन्होंने जो मुंह बनाया उसपर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने बहुत ही खराब ढंग से कहा कि उतने पैसे मुझे सिर्फ छह घंटे काम करने के मिलते हैं और टीवी में चूंकि कम से कम 12 घंटे काम करने की बात हो रही है इसलिए मैं ढाई से तीन गुना तनख्वाह की अपेक्षा करूंगा। मुझे उस समय भी पता था कि इस तरह नहीं कहना चाहिए पर जो मैं हूं सो हूं। बाद में इस चैनल के सर्वेसर्वा मशहूर पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह हुए और उन्हें जिन्हें नहीं रखना था उनके लिए बड़ी अच्छी शर्त रखी थी – अनुभवी लोग चाहिए। उन दिनों उमेश जोशी के अलावा गिनती के लोग थे जो अखबार और टीवी दोनों में काम करते थे। पर इनमें से कोई आजतक में नहीं रखा गया। आज तक जब शुरू हुआ था तो देश में हिन्दी के समाचार चैनलों में काम करने वाले या कर चुके बहुत कम लोग थे। उनमें उसे अनुभवी कहां और कैसे मिले यह अलग विषय है। हां, आज तक शुरू होने पर जो प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई थी वह अंग्रेजी में बनी थी और एक पीआर एजेंसी के लिए उसका हिन्दी अनुवाद मैंने किया था।

इसके बाद चैनलों की एक तरह से बाढ़ आई और प्रिंट मीडिया के कई लोगों ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का रुख किया और कई बगैर अनुभव के लोग खप गए। कइयों की मोटी तनख्वाह हो गई और पत्रकारों की तनख्वाह इतनी बढ़ गई थी कि इंडिया टुडे ने इसपर स्टोरी भी की थी। जुगाड़ और जान-पहचान के साथ मुमकिन है, योग्यता से भी काफी लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चले गए पर मुझे मौका नहीं मिला। सच कहूं तो आज तक वाली घटना के बाद मैं किसी टीवी चैनल में नौकरी मांगने गया भी नहीं। एक मित्र अब बंद हो चुके चैनल में अच्छे पद पर थे। काफी लोगों को रखा भी था। मेरे एक साथी ने बहुत जिद की कि उस साझे मित्र से नौकरी के लिए बात करने में कोई बुराई नहीं है और ज्यादा से ज्यादा वह मना कर देगा। मैं भी उसके साथ चलूं। मैं नहीं गया। लौटकर साथी ने बताया ने कि उस मित्र ने जितनी देर बात की उसके पैर मेज पर ही रहे। नौकरी तो उसने नहीं ही दी। वह मित्र है तो हिन्दी भाषी पर नौकरी अंग्रेजी की करता है।

इधर जनसत्ता में तरक्की हो नहीं रही थी। प्रभाष जोशी रिटायर हो गए। नए संपादक ने तरक्की की रेवड़ी बांटी और कुछ लोगों को दो तरक्की दी। मुझे एक ही तरक्की मिली थी। मैं फिर निराश ही रहा। संपादक जी कुछ दिन में छोड़ गए। उनके बाद ओम थानवी आए। लगा नहीं कि ज्यादा समय चल पाउंगा। इसी बीच वीआरएस लेने का ऑफर आ गया और मैंने उसे गले लगा लिया। हिन्दी अखबार में आने से पहले मैं जमशेदुपर में अमृत बाजार पत्रिका के लिए रिपोर्टिंग करता था और दि टेलीग्राफ में मेरी रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी थी। मैं अंग्रेजी पत्रकारिता में भी जा सकता था – पर वहां शायद कमजोर होता या उतना मजबूत नहीं जितना हिन्दी में था या हूं। इसलिए मैंने अंग्रेजी पत्रकारिता में जाना ठीक नहीं समझा और अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद को प्राथमिकता दी। मुझे लगता है मेरे स्वभाव और मेरी सीमाओं के लिहाज से यह ठीक ही रहा।

(अपनी अप्रकाशित अनाम पुस्तक का संपादित अंश, साथी Sumant Bhattacharya के आग्रह पर।)

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

    Shivnath Jha जिन सुविधाओं के लिए पत्रकार बड़ी और लंबी-चौड़ी खबरें लिखते हैं वे खुद उन्हें नहीं मिलतीं।
 
    Shivnath Jha क्षमा याचना के साथ: इंडियन एक्सप्रेस समूह से प्रकाशित समाचार-पत्रों में मालिक से मुख्तार (संपादकों) और कुछ प्रमुख पत्रकारों ने जितनी “अपनी-अपनी दुकानदारी चलायी” शायद इसका प्रतिक है JOURNALISM of DISCOURAGE
 
    Sumant Bhattacharya संजय भाई,,.जब आापकी आपबीती को पढ़ रहा था तो लगा कि खुद को बयां कर रहा हूं कहीं ना कहीं….फिलहाल अपनी सारी टिप्पणियां सुरक्षित रखते हुए इतनी भर गुजारिश करूंगा कि दास्तां में शामिल घटनाओं को और विस्तार दें और किरदार साफ करें..आखिर यह आपका पेज है..और यहां कोई आपकी राह में अवरोध नहीं है।
   
    Pramod Shukla सुमंत जी के आग्रह को मैं दोहरा रहा हूं…… विस्तार देने और किरदार साफ करने में संकोच कैसा….. वैसे भी जब जनसत्ता के रिपोर्टर रिपोर्ट लिखने में संकोच नहीं करते रहे हैं, और संपादक संपादन में कोई संकोच न करने की परंपरा डाले थे…. तो फिर संकोच कैसा……. खुलासा होना ही चाहिए कि ….. औरो को दो ….. आप को एक ही क्यो….. वीआरएस को गले लगाने की जरूरत…. या मजबूरी क्यो आन पड़ी गले… विस्तार लोग पढ़ना चाहते हैं….. ये सिर्फ आप की आत्मकथा नहीं है… इसमें समाहित है हिन्दी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण दैनक की अंदरूनी कथा… सत्य… जो अंदर के ही नहीं, बाहर के लोग भी पढ़ना चाहेंगे, पसंद करेंगे……
    
    Kishore Kumar एसपी सिंह को मसीहा मानने वालों की कमी नहीं और आप उनकी पत्रकारिता पर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं!
    
    Sanjaya Kumar Singh Pramod Shukla जी, किरदारों के नाम और पहचान किताब में स्पष्ट हैं। यहां नहीं देने के दो कारण है – एक तो बहुत पुरानी बात है, संबंधित लोगों को याद दिलाने की जरूरत है। और दूसरे किताब के लिए कुछ नया, अनकहा, अनजाना रहना चाहिए। संकोच कोई नहीं है। मेरे ख्याल से पात्रों को भी नहीं होगा।
    
    Sanjaya Kumar Singh किशोर जी, एसपी सिंह को जो, जो मानते थे मानें। मेरी उनसे एक मुलाकात भी नहीं है। आजतक में मेरी भिड़ंत उनके संपादक बनने से पहले हुई थी और उसके बाद मुझे वहां जाना भी नहीं था। लेकिन उनकी शर्त पर उन्हें लोग कहां मिले और जिनके मामले में उन्होंने अपनी ही शर्त तोड़ी – उसका कारण मुझे बहुत बाद में एक लेख में मिला आपको मेल कर रहा हूं। पढ़िए और आनंद लीजिए। एसपी सिंह के बारे में जनपथ डॉट कॉम पर जितेन्द्र कुमार का यह आलेख, “टेलीविज़न पत्रकारिता: संदर्भ एसपी सिंह” शीर्षक से एक प्रकाशित हुआ। उसे पढ़कर लगा कि एसपी सिंह के बारे में लेखक की राय तकरीबन वही है जो मेरी है।
 

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