अमानवीयता की हद : बीमार पिता की सेवा न कर सके इसलिए नवज्योति प्रबंधन ने मीडियाकर्मी का तबादला कर दिया!

राजस्थान : नवज्योति अखबार से खबर है कि प्रबंधन ने बेहद अमानवीय रवैया अख्तियार करते हुए एक मीडियाकर्मी का तबादला इसलिए उसके घर से दूर कर दिया ताकि वह अपने बीमार पिता की सेवा न कर सके और फिर मजबूरी में नौकरी छोड़ कर वापस घर लौट आए. बात हो रही है सुदेश शर्मा की. अजमेर से प्रकाशित नवज्योति अखबार के प्रबंधन ने सुदेश का तबादला कोटा कर दिया. यह तबादला तब किया जब सुदेश के पिता को ब्रेन हैमरेज हुआ.

सुदेश के पिता भी नवज्योति के मीडियाकर्मी रहे हैं और 55 साल से इस अखबार की सेवा कर रहे थे. पर उन्हें इसी साल जनवरी को ब्रेन हैमरेज हो गया. उनकी देखरेख उनके मीडियाकर्मी बेटे सुदेश शर्मा करते थे. सुदेश शर्मा ने मजीठिया के लिए अजमेर में लेबर कमिश्नर के यहां केस भी लगा रखा है. इससे नाराज प्रबंधन ने सुदेश का तबादला कोटा कर दिया ताकि वह पिता की देखरेख करने की मजबूरी में इस्तीफा देकर घर लौट जाए. यह सब हरकत उसी डीबी चौधरी की है जो कभी सुदेश शर्मा के पिता का खास हुआ करता था लेकिन आजकल प्रबंधन के इशारे पर अपने ही साथियों का उत्पीड़न कर रहा है.

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जैन मुनि को भी झांसा देने से नहीं चूके अजमेर के फर्जी पत्रकार!

अजमेर। कभी आदर्श पत्रकारिता की पहचान रहा राजस्थान का अजमेर शहर अब पत्रकारिता के पतन का वायस बन गया है। अब यहां सिर्फ सम्बन्धों को पाला-पोसा जा रहा है। पत्रकार खुद फर्जी पत्रकारों की जमात खड़ी कर रहे हैं। बुधवार को तब हद हो गई जब प्रख्यात जैन मुनि प्रसन्न सागर महाराज ने अजमेर में मंगल प्रवेश करने के बाद प्रेस वार्ता की। बाकी पत्रकारों की तरह देश के एक बड़े अखबार का स्थानीय चीफ रिपोर्टर खुद भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंचा और अपने पड़ोसी (प्रोपर्टी डीलर) को भी फर्जी पत्रकार बनाकर साथ ले गया। उस रिपोर्टर ने अपने पड़ोसी को बाकायदा पत्रकार बताते हुए मुनि श्री से मिलवाया और उनसे बतौर गिफ्ट चांदी का सिक्का भी दिलवाया।

दूसरे पत्रकार उस फर्जी पत्रकार को देखकर चौंके, क्योंकि वास्तव में वह पत्रकार न होकर प्रोपर्टी डीलर है। मगर अफ़सोस, एक भी पत्रकार ने इस पर आपत्ति नहीं जताई। अब वह फर्जी पत्रकार अपने जीवन की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुनि के आशीर्वाद स्वरूप चांदी का सिक्का पाकर अभिभूत हो रहा है।

पता चला है कि चीफ रिपोर्टर की इस करतूत का पता उसके सम्पादक को लग चुका है। इससे पहले भी चीफ रिपोर्टर और प्रोपर्टी डीलर की यह दोस्ती चर्चित रह चुकी है। खबर तो यह भी है कि चीफ रिपोर्टर ने अपने इस दोस्त को सरकारी ठेके भी दिलवाना शुरू कर दिया है। देखना यह है कि सम्पादक जी अपने अखबार का फर्जी रिपोर्टर बनाने वाले चीफ रिपोर्टर को क्या सजा/सलाह या दंड देते हैं।

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अजमेर में भास्कर और पत्रिका ने दाम बढ़ाया तो अखबार वितरकों ने शुरू किया बहिष्कार, नवज्योति की बल्ले बल्ले

अजमेर में दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने एक राय होकर विगत 22 फरवरी को अचानक अखबार की कीमत 4.50 रुपए प्रति कॉपी कर दी। उस दिन तो हॉकर ने अखबार उठा लिया लेकिन अगले दिन उन्होंने बढ़ी कीमत वापस लेने की मांग करते हुए अखबार उठाने से मना कर दिया। उस दिन से वे लगातार दोनों अखबारों का बहिष्कार कर रहे हैं। इससे अखबार प्रबंधन में हड़कम्प मचा हुआ है।

प्रबंधन बढ़ी कीमत वापस लेने और हॉकर्स का कमीशन बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। अखबार नहीं उठने से परेशान प्रबंधन ने 10000 रुपए वेतन पर नए हॉकर्स की भर्ती शुरू कर दी है। साथ ही तांगों-जीपों में स्टाफ से अखबार बिकवाया जा रहा है। रातभर काम करने के बाद स्टाफ को सुबह गली-गली भटककर अखबार बांटने को कहा गया है। मगर ऐसा हो नहीं रहा। पांच-छह दिन से शहर में भास्कर-पत्रिका की कॉपियां देखने को नहीं मिल रही है। जाहिर है जो थोड़ी-बहुत कॉपी छापी जा रही है, वह भी रद्दी हो रही है।

दैनिक नवज्योति की पौ-बारह

हॉकर द्वारा भास्कर-पत्रिका का बहिष्कार करने का सीधा फायदा दैनिक नवज्योति को मिल रहा है। शहर में नवज्योति की रिकार्ड तोड़ कॉपियां बिक रही हैं। नवज्योति आजादी पूर्व से निकलने वाला राजस्थान प्रदेश का एकमात्र अखबार है।

अजमेर में भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव पर हमला

अजमेर। भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव गोविंद सिंह जादम पर शुक्रवार देरशाम अज्ञात नकाबपोश हमलावरों ने जानलेवा हमला कर दिया। रामगंज थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर हमलावरों की तलाश शुरू कर दी है। इस हमले को हॉकरों की हड़ताल से जोडक़र देखा जा रहा है। इससे माहौल गरमाने की आशंका है।

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सोशल मीडिया पर टिप्‍पणी से अजमेर में पुलिस पर पथराव

अजमेर (राजस्थान) : जिले के रामगंज थाना इलाके में सोशल मीडिया पर आपत्तीजनक टिप्पणी के बाद दो सम्प्रदायों के बीच टकराव को रोकने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पडा.

पुलिस कप्तान विकास कुमार की मौजूदगी में पुलिसकर्मियों ने रामगंज थाने का घेराव करने आये समुदाय विशेष के लोगो को खदेडा. डिप्टी एसपी राजेश मीणा ने मामाले की जानकारी देते हुए बताया कि सोशल मीडिया व्हाट्सएप पर धर्म विशेष के खिलाफ गलत बयान बाजी की थी. इस बात को लेकर समुदाय के लोगों में रोष व्याप्त हो गया. बडी संख्या में सोमलपुर,फकीराखेडा और आस पास के ग्रामों से लोगो का हुजूम थाने पर उमड़ पडा और नारेबाजी शुरू कर दी.

पुलिस ने आपत्तिजनक पोस्ट डालने के आरोपी छात्र को थाने ले आई. वहीं छात्र के समर्थन में हिन्दुवादी संगठनों के लोग भी थाने पर आ गए. माहौल बिगड़ता देख मौके पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी पहुंचे और समझाइश की लेकिन कोई प्रभाव नहीं पड़ा और पुलिस पर प्रदर्शनकरियों  ने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया. हालात बिगड़ने पर पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर भीड को खदेड़ दिया.

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भास्कर के बूढ़े एडिटर अपने इंतजाम में व्यस्त, रिपोर्टर मस्त, काम-काज ध्वस्त

दैनिक भास्कर के अजमेर संस्करण में पिछले कई महीनों से पत्रकारों की मौज हो रही है। इसका कारण बुजुर्ग संपादक रमेश अग्रवाल का दूसरे कामों में व्यस्त होना है। संपादक अग्रवाल ऐसे तो करीब दो साल पहले ही रिटायर हो चुके हैं, मगर वो अब एक्सटेंशन पर हैं। 

 

मूल रूप से अजमेर के ही निवासी अग्रवाल का ध्यान अब अपने संपादन के बजाय अपने दूसरे धंधों पर है। वो अपने रिटायर्डमेंट के बाद के जीवन को खुशहाल बनाने में लगे हैं। उन्होंने अजयमेरु प्रेस क्लब को वापस जिंदा किया है। वे स्वयं क्लब के अध्यक्ष बन गए हैं। वे रोजाना लगभग तीन घंटे का समय प्रेस क्लब को देते हैं और इस दौरान शहर के विभिन्न वर्गों के लोग वहां जुटते हैं। अग्रवाल ने सालों पहले अजमेर के पंचशील नगर इलाके में जमीन खरीदी थी। अब उस पर अपार्टमेंट बनाने का काम शुरू करवा दिया है। 

कुल मिलाकर उनका ध्यान अखबारी कामकाज पर बिल्कुल नहीं है। इसका फायदा चीफ रिपोर्टर सुरेश कासलीवाल और दूसरे रिपोर्टर जमकर उठा रहे हैं। कासलीवाल अजमेर दबंग भाजपा नेता भंवरसिंह पलाड़ा सहित कई असफरों के फेवर में जुटे हैं। आए दिन इनके स्तुतिगान छापते रहते हैं। पलाड़ा की सह पर उन्होंने अजमेर की दलित जिला प्रमुख के खिलाफ भी भास्कर में अभियान चला रखा है। खास बात यह है कि कासलीवाल की ये हरकतें कोई नई नहीं हैं। वे जब ब्यावर में भास्कर के ब्यूरो चीफ थे तो वहां तत्कालीन भाजपा विधायक देवीशंकर भूतड़ा के पक्षधर थे। उनके इशारे पर ही सारी खबरें लिखते थे। उनकी इन हरकतों की शिकायत तत्कालीन संपादक ने ब्यावर से हटा दिया था, मगर अब रमेश अग्रवाल के कार्यकाल में उनके अच्छे दिन वापस लौट आए हैं।  अग्रवाल के दूसरे कामों बिजी होने और अखबार पर ध्यान नहीं होने कासलीवाल और उनके चेलों को खुलकर खाने और खेलने का मौका मिल रहा है। बताते हैं कि कासलीवाल संपादक की अनदेखी का फायदा उठाते हुए डेस्क को भी अपने शिकंजें में ले लिया है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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अजमेर ‘पत्रिका’ में अहंकारी संपादक का आतंक, दुखद रवैये से स्टॉफ परेशान

राजस्थान पत्रिका अजमेर में जब से उपेंद्र शर्मा को संपादक बनाया गया है, स्टाफ पर मुसीबत टूट पड़ी है। जूनियर रिपोर्टर से सीधे संपादक की कुर्सी पर बैठे उपेंद्र शर्मा किसी को कुछ नहीं समझ रहे। उनसे पहले यहां ज्ञानेश उपाध्याय जैसे धीर-गंभीर और विद्वान संपादक थे। उपाध्याय ने अपने छोटे से कार्यकाल में सभी को मान-सम्मान दिया। लेकिन उपेंद्र शर्मा तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। 

वो आए दिन डेस्क या रिपोर्टिंग के किसी भी साथी को बिना बात प्रताडि़त करते रहते हैं। जो उनकी तानाशाही का विरोध करते हैं, उसके वो साइड लाइन कर देते हैं। उन्होंने सबसे पहले हिन्दी के विद्वान और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र गुप्ता को शिकार बनाया। गुप्ता ने उनकी बचकानी बातों का विरोध किया तो उनका अजमेर से हुबली तबादला करवाकर अन्य कर्मचारियों के खौफ पैदा कर दिया। ये करके उनका अन्य कर्मचारियों को साफ मैसेज था कि जो मुझसे टकराएगा वो यहां नहीं रह पाएगा। 

उनको दूसरा शिकार बने युवा और उत्साही रिपोर्टर भूपेंद्र सिंह। विद्युत निगम और राजस्व मंडल की राज्य स्तरीय विभाग पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले भूपेंद्र सिंह अपनी सपाट बयानी के लिए विख्यात है, लेकिन उनकी ईमानदारी और काबिलियत के कारण तमात संपादकों ने उनका सम्मान किया। मगर उपेंद्र शर्मा ने आते ही उन्हें प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। बताते हैं कि उपेंद्र और भूपेंद्र दोनों जयपुर में रिपोर्टिंग करते थे। उसी दौरान किसी मशले पर दोनों के बीच कहासुनी हुई थी, उसका खामियाजा अब उसे भुगतना पड़ रहा है। 

पिछले दिनों उपेंद्र शर्मा ने भूपेंद्र सिंह का तबादला नागौर जिले के कुचामन ब्यूरो में कर दिया। इससे भूपेंद्र सिंह परेशान हो गए। वे पत्नी और तीन साल के बेटे के साथ अजमेर में रहते हैं और उन्होंने कुछ दिन पहले ही अजमेर के एक स्कूल में बेटे को एडमिशन कराया था। तबादले से परेशान भूपेंद्र सिंह गुहार करने उपेंद्र शर्मा के पास पहुंचे और कहा कि उनकी पत्नी और बेटा अकेले अजमेर में नहीं रह पाएंगे। अभी उन्होंने २० हजार रुपए एडमिशन पर खर्च किए हैं। ऐसे में वे परिवार को कुचामन भी नहीं ले जा सकते। तमाम मिन्नतों के बावजूद संपादक ने उनकी गुहार नहीं मानी। आखिरकार हताश और परेशान भूपेंद्र सिंह ने जयपुर जाकर गु्रप एडिटर भुवनेश जैन के सामने मसले को रखा और अपनी परेशानी बताई। इस पर उनका तबादला रोक दिया गया। इससे संपादक उपेंद्र शर्मा और खफा हो गए। उन्होंने भूपेंद्र सिंह को रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्क पर लगा दिया। 

संपादकीय विभाग के अन्य लोग भी संपादक के तुगलकी फैसलों और व्यवहार से परेशान है। एक परेशान डेस्ककर्मी ने बताया कि संपादक उपेंद्र शर्मा रोज शाम को कुछ रिपोर्टरों को बुलाकार अपना दरबार लगाते हैं और करीब एक घंटा अपनी जयपुर की रिपोर्टिंग को लेकर शेखी बगारते हैं। मबजूरी में रिपोर्टरों को उनकी तारीफों के पुल बांधने पड़ते हैँ। उसके बाद उपेंद्र शर्मा डिनर करने घर चले जाते हैं, फिर राते तो दस बजे वापस ऑफिस आते हैं। आते ही थोड़ी देर बाद दो रिपार्टरों के साथ टहलने निकल जाते हैं। उनकी इन हरकतों से रिपोर्टरों के कामकाज पर प्रभाव पड़ रहा है और अक्सर डेस्क को खबरों लेट मिल रही है, इससे इसलिए एडिशन भी समय से नहीं छूट रहा है। संपादक चटौरेपन को लेकर भी स्टाफ परेशान है। वो आए दिन किसी ना किसी से दावत की फरमाइश भी कर बैठते हैं। अब बेचारे पत्रकार को जैसे-तैसे उनकी फरमाइश पूरी करनी पड़ती है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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‘हम लोग’ ऐसे बनाएंगे अजमेर को स्मार्ट ?

बहुत दिनों बाद इतवार को गौरव पथ जाना हुआ। जाना था पंचशील इसलिए इस रास्ते से निकलना ही था। यह वही गौरव पथ है जिसे नगर सुधार न्यास ने दस साल पहले बड़े गाजे बाजे से और जिसे देखकर अजमेरवासी गौरव किया करेंगे जैसे जुमलों के साथ तैयार करने का दावा किया था। गौरव पथ जिसे हर कोई अपनी सुविधा के नाम से पुकारता है परंतु गौरव पथ नहीं कहता। नवज्योति वाले इसे अपने पूर्वज दुर्गाप्रसाद चैधरी मार्ग के नाम से लिखते और पुकारते हैं और इस मार्ग पर रहने वाली जनता इसे आनासागर लिंक रोड कहती है। नवज्योति के अलावा बाकी अखबारों में इसे आनासागर सक्र्युलर रोड कहा जाता है। एक सड़क के चार नाम तो अपन बता चुके हैं। अब हालत भी सुन लीजिए। 

रोड के बीचोंबीच बना शिवमंदिर आज तक ना तो शिफट हुआ और ना ही हटाया गया है। इससे कुछ कदम दूरी पर ही देवनारायण मंदिर है जो सडक के किनारे है जिसके कारण सड़क वहीं से सिकुडना शुरू हुई तो मानसिंह होटल के आगे तक उसी हालत में चलती चली गई। धार्मिक भावनाओं में बहे गुर्जर समाज ने उस समय विरोध किया जरूर था परंतु असली फायदा उठाया जी मॉल ने। गौरव पथ बन रहा था और जी मॉल भी। लम्बे चौडे बहुमंजिला जी मॉल ने पार्किंग के नाम पर आगे जगह छोड़ी जिसमें अब पार्किंग नहीं बल्कि कला के नाम पर बिना अनुमति की करतब बाजियां होती है, जो कई दफा चाकूबाजी और लातघूंसा बाजी बन चुकी है और रास्ता जाम कर चुकी है। ऐसे जाम तभी खुलते हैं जब सरकारी गाड़ी में सैर सपाटे को निकला सरकारी अफसर का कोई परिवार फंस जाता है। कथित पार्किंग स्पेस के बाहर जी मॉल आने वालों की कारें खड़ी हो जाती है। कोई माई का लाल उठाने वाला, टोकने वाला या रोकने वाला नहीं है। डिवाइडर के दूसरी तरफ सड़क तक बने पुराने मकानों से सड़क की हालत ऐसी हो जाती है आप दस की स्पीड से ही वहां से निकल पाते हैं। 

जी हां यही वह मार्ग है जिस पर से और वही जी मॉल है जिसके सामने से रोजाना दिन में कम से चार दफा अजमेर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया, नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सीआर मीणा, नगर निगम के आयुक्त नारायण लाल मीणा, अजमेर विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार अफसर और नेता निकलते हैं। थोड़ा सा आगे इसी मार्ग पर जी मॉल से आधा किलोमीटर आगे राजस्थान पत्रिका और उससे करीब डेढ किलोमीटर आगे दैनिक भास्कर का दफतर है। वहां के पत्रकारों को रोजाना इसी मार्ग से आना जाना है। जी मॉल के पहले इसी मार्ग पर आधा किलोमीटर पहले दैनिक नवज्योति के मालिक और प्रधान सम्पादक दीनबंधु चैधरी रहते हैं। किसी को भी तो यह ना बन रहा था तब दिखा और ना अब दिखाई दे रहा है। अखबारों ने खबरें जरूर छापी पर अफसरों ने क्या किया। जी मॉल बनाकर ही छोड़ा। 

यही क्यों ? इसी मार्ग की शुरूआत पर संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय है। अस्पताल एक प्रतिबंधित क्षेत्र होता है जहां के बाहर की सड़क से निकलते हुए आप गाडी का वाहन भी नहीं बजा सकते ताकि मरीज डिस्टर्ब ना हो। अस्पताल के ठीक सामने सड़क पर माताजी का मंदिर बन चुका है। नवरात्रा में अस्पताल की सड़क रोक दी जाती है। बड़े बड़े डेक और माइक पर रात भर भजन संध्या होती है। पुलिस का हर इंस्पेक्जर जरनल, पुलिस सुपरिन्टेन्डेट, यहां तक कि हाईकोर्ट के जज तक माताजी को ढोक देने वहां रूकते हैं। मंदिर बना था ऑटो वालों को अवैध तौर पर खड़े करने का संरक्षण देने के लिए, बन रहा था तब भी किसी को नहीं दिखा, अब भी किसी को नहीं दिख रहा है। अस्पताल के आगे रोज सुबह शाम घंटे घडि़याल बजते हैं। सड़क पर भक्तों की गाडि़यों का अतिक्रमण होता है परंतु यह सब रोकने वाले पुलिस, जज और प्रशासन के अफसर माता की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े, आंखें बंद किए खडे़ रहते हैं तो बाहर सिपाही ‘अव्यवस्था’ फैलाने वालों को ठिकाने लगाने में जुटी रहती है। अस्पताल के चारों ओर शादी समारोह स्थल है जहां आए दिन बैंड बाजों, पटाखों, गीत संगीत की धूम मची रहती है, मरीजों की चिंता किसी को नहीं रहती। 

अभी अपन मदारगेट, दरगाह बाजार, नया बाजार, नला बाजार, स्टेशन रोड, कचहरी रोड नहीं पहुंचे हैं। शहर में किसी जगह फुटपाथ है तो सिर्फ अंग्रेजों के बनाए मार्टिंन्डल ब्रिज पर। कभी वह फुटपाथ खाली रहता था आज उन पर सब्जी, पोस्टर, फल बेचने वालों का स्थायाी कब्जा है। नसीराबाद और श्रीनगर को जाने वाली रोडवेज बसों के स्टेंड है। बस स्टेंड है तो टेम्पो स्टेंड क्यों नहीं होगा ? टेम्पो अच्छा याद दिलाया। एक भी सिटी बस टेम्पो ड्राईवर वर्दी में नहीं मिलेगा। उनका कंडक्टर वर्दी तो छोडि़ए वह अपनी महिला सवारियों से ही द्विअर्थी अंदाज में बात करेगा। बीच सड़क और ऐन मोड पर टेम्पो सिटी बस का रूकना धर्म है, बगैर रूट के चलना तो आम बात है। दुपहिया वाहन चालक हेलमेट लगाए नहीं मिलेंगे। अभी दो दिन पहले की ही बात है। हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर आदेश कर दिया कि अजमेर में बने अवैध कॉम्लैक्सों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। मन मारकर निगम ने दो जगह  कार्रवाई की कोशिश ही की थी कि व्यापारी ‘अवैध निर्माण’ के खिलाफ कार्रवाई के विरोध में हड़ताल पर उतर आए। उनका कहना था, बन गया सो बन गया थोड़े पैसे लो और इन्हें नियमित करो। 

यह कुछ बानगियां हैं उस शहर की जिसे अमेरिका के बराक ओबामा ने स्मार्ट सिटी बनाने का वादा किया है। प्रशासन स्मार्ट सिटी के नाम पर रोजाना पचास साठ समोसे तोडने में लगा है। इस माहौल में अजमेर के कुछ कथित जागरूक, बुद्धिजीवी, प्रबुद्ध लोग इकट्ठा हुए हैं। नई दिल्ली के अरविंद केजरीवाल उनके प्रेरणा पुरूष हैं और चार महीने बाद अगस्त की शुरूआत में अजमेर नगर निगम के चुनाव हैं। उन्हें लग रहा है कि जब केजरीवाल दिल्ली पर कब्जा कर सकते हैं तो हम निगम पर क्यों नहीं। बीजेपी और कांग्रेस वाले इनमें शामिल नहीं है। उनका दावा है कि अच्छे, ईमानदार, साफ छवि के लोग निगम चुनाव में खड़े किए जाएं या उन्हें समर्थन दिया जाए ताकि शहर सुधरे। 

हम लोग से जुड़े ज्यादातर ऐसे हैं जो अब तक सिर्फ ज्ञापन देने, मुलाकात करने तक सीमित रहे हैं। ज्यादातर ने अपने घरों के बाहर आठ से दस फीट लम्बा रैम्प और अपने मकान के बाहर छोटा सा गार्डन बनाकर सरकारी सड़क को संकरा करने का योगदान बखूबी दिया हुआ है। कुछ ऐसे भी हैं जो आज नेता हैं परंतु कुछ समय पहले जब सरकारी नौकरी में थे तो पचास रूपए मिले बगैर फाइल आगे नहीं खिसकाते थे। बगैर पैसा मिले वह काम ही नहीं करते थे जो करने का सारी जिंदगी वेतन उठाते रहे। जी मॉल और माताजी मंदिर के सामने से खुद भी गुजरते हैं परंतु वह इन्हें समस्या नहीं लगती। टेम्पो, सिटी बसो, तारागढ़ या सरवाड़ जाने वाली अवैध टैक्सियों या इनसे जुड़ी और समस्याओं की जानकारी खुद भी रखते हैं परंतु इनके लिए कहते नहीं है। पिछले दिनों हुए अवैध निर्माणों को नियमित करने के व्यापारियों के आंदोलन पर हम लोग ने आज तक जुबान नहीं खोली। ऐसे कैसे कोई आपको वोट और सपोर्ट देगा ?  

आपको पता है अजमेर में कभी भी इतवार या तीज त्यौहार के अवकाश वाले दिन सफाई नहीं होती। नियम और ठेका दिन में दोनों समय सफाई का है परंतु रोस्टर पर अवकाश की जगह सामूहिक साप्ताहिक अवकाश का नया नियम सिर्फ अजमेर में ही है। परंतु यह हम लोग वालों को नहीं दिखता। अच्छा है अजमेर नगर निगम के अफसरों को रेलवे, रोडवेज, अस्पताल, पानी या बिजली की नौकरी का मौका नहीं मिला वरना वहां भी वह रोस्टर की जगह एक दिन का सामूहिक अवकाश का नियम लागू कर देते तब रविवार और अवकाश के दिन अजमेर में ना रेल, बस चलते, ना पानी बिजली आते और उस दिन इलाज भी नहीं होता। हम लोग के बैनर तले चुनाव लड़ने लड़ाने वालों के लिए यह समस्या नहीं है या उनके ध्यान में नहीं आ रही है या फिर वे जानबूझकर उपेक्षित कर रहे हैं। धन्य है स्मार्ट अजमेर के स्मार्ट भावी नेता।  

मीडिया विश्लेषक राजेंद्र हाड़ा संपर्क : 9549155160/9829270160  

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अजमेर में ट्रेनिंग ले रहे हैं देश के प्रथम नेत्रबाधित न्यायाधीश

अजमेर : बहुत शीघ्र आप एक ऐसी अदालत देखेंगे, जिसके न्यायाधीश नेत्र बाधित होंगे। यहां इन दिनो ब्रम्हानंद शर्मा जज की ट्रेनिंग ले रहे हैं। वह देश के संभवतः पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश बनने जा रहे हैं। उनका चयन पिछले दिनों ही राजस्थान न्यायिक सेवा में हुआ है। ब्रम्हानंद उस आखिरी बैच के हैं, जिन्हें राजस्थान लोक सेवा आयोग ने चुना है। अब राजस्थान हाईकोर्ट मजिस्ट्रेटों की भर्ती करेगा।

भीलवाड़ा जिले के आसींद के रहने वाले ब्रम्हानंद शर्मा न्यायाधीश पद के लिए चयनित होने से पहले एक साल भीलवाड़ा कलेक्ट्रेट और उसके बाद करीब सालभर सार्वजनिक निर्माण विभाग में कनिष्ठ लिपिक रहे हैं। 7 अगस्त, 1973 को जन्मे ब्रम्हानंद शर्मा आयु की दृष्टि से अपने बैच में सबसे बड़े ही नहीं, जज्बा भी सबसे अधिक रखते हैं, वह अब ये साबित करने के मोहताज नहीं हैं। 

द्वितीय श्रेणी से सेवानिवृत्त शिक्षक रामस्वरूप शर्मा के बेटे ब्रम्हानंद की ज्यादातर पढ़ाई भीलवाड़ा में हुई। समाज शास्त्र में एमए के बाद उन्होंने भीलवाड़ा के राजकीय विधि महाविद्यालय से एलएलबी भी की। ब्रम्हानंद की पढ़ाई अभी छूटी नहीं है। वे वर्द्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट में एलएलएम भी कर रहे हैं।

ब्रम्हानंद बताते हैं कि उनके पास एक सॉफ्टवेयर है, जिसमें लिखी या टाइप की  हुई सामग्री को स्कैन कर कम्प्यूटर में अपलोड कर दिया जाता है। सॉफ्टवेयर उस सामग्री को आवाज में बदल देता है। इस तरह वह सुनकर मुकदमे की पूरी फाइल समझ लेंगे। पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी भी तो इसी तरह की है। उनका मानना है कि भविष्य में आने वाले ई-कोर्ट उनके लिए वरदान साबित होंगे। 

ये संयोग ही कहा जाएगा कि ब्रम्हानंद शर्मा के रूप में पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश अजमेर की उसी अदालत परिसर में हैं, जहां आजादी के पहले देश के पहले नेत्रहीन वकील मुकुट बिहारी लाल भार्गव वकालत किया करते थे। भार्गव देश की संविधान निर्मात्री सभा के एक मात्र नेत्रहीन सदस्य थे और पहली भारतीय संसद के पहले नेत्रहीन सदस्य थे। वे अजमेर के पहले लोकसभा सदस्य चुने गए थे। भार्गव ब्रिटिशकाल में हाईकोर्ट का दर्जा रखने वाली अजमेर-मेरवाड़ा यूनियन प्रोविन्स के ज्यूडिशियल कमिश्नर की अदालत, लंदन की प्रिवी कौंसिल और आजादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत किए थे।  

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमरे के जाने-माने वकील और पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ”राजेंद्र हाड़ा, 860/8, भगवान गंज, अजमेर- 305 001” या 09829270160 व 09549155160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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शाहनवाज हुसैन की पत्नी रेनु की किताब का 11 साल बाद फिर विमोचन

पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन की पत्नी रेनु के कविता संग्रह ‘जैसे’ का शनिवार, 13 फरवरी 2015 को अजमेर में हुआ विमोचन राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गया। बताया जाता है कि इस कविता संग्रह का विमोचन सन् 2003 में हो चुका है। इतने साल बाद फिर से विमोचन कई को बेनकाब कर गया। अजमेर के कुछ चाटुकार साहित्यकारों और राजनेताओं की जुगलबंदी ने राजनीतिक फायदे और शाहनवाज से निकटता बढ़ाने के मकसद से रेनु को अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में एक समारोह में आमंत्रित किया।

उनके आमंत्रण के पीछे वसुंधरा सरकार के एक अति उत्साही और स्वार्थी मंत्री का दिमाग बताया जाता है। रेनु को बुलवाने के पीछे मंत्री का शातिर दिमाग इतनी हरकत में रहा कि उसने जानते बूझते इस हकीकत की जानकारी किसी को नहीं दी। यही नहीं, विश्वविद्यालय के अफसरों को बेवकूफ बनाते हुए उनसे यह घोषणा भी करवा दी कि इस काव्य संग्रह की कविताओं को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करवाया जाएगा। उनका बस नहीं चला वरना रेनु के मुंह पर लगाम भी लगा देते और वह कुछ नहीं कहने देते जो उन्होंने यहां कहा।

रेनु ने अपने भाषण और अखबारों को दिए इंटरव्यूज में साफ कहा कि लव के साथ जेहाद जैसा कुछ नहीं होता। उन्होंने खुद बीस साल पहले शाहनवाज से लव किया था। उन्हें जेहाद जैसी किसी परिस्थिति का सामना नहीं करना प़ड़ा। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों संस्कृतियों को नजदीक से देखा है। जो आज लव जेहाद का मुद्दा उठा रहे हैं, उन्हें शायद लव के बारे में भी कुछ नहीं पता। प्यार सच्चा हो तो वह कोई सीमाएं नहीं मानता। शाहनवाज हुसैन के हंसमुख स्वभाव और आदतों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी शादी, दो बच्चों और खुशहाल जिन्दगी के लिए सूफी संत गरीब नवाज ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की जमकर तारीफ की। 

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: 09549155160 और 09829270160 

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अब फिर रोज खुलने लगा अजमेर का अजयमेरू प्रेस क्लब

स्थापना के 14 सालों में कई साल बंद रहने के बाद अब अजयमेरू प्रेस क्लब फिर रोजाना खुलने लगा है। अजमेर नगर निगम की ऐतिहासिक बिलडिंग गांधी भवन के उपरी तले पर अगर आप किसी भी दिन सुबह दस से शाम 5 बजे तक जाते हैं तो वहां सेवा राम मिलता है। नाम का ही नहीं काम का भी सेवा राम। शुरूआत हुई है तो अब मात्र ढाई रूपए में चाय भी मिलने लगी है। यह व्यवस्था शुरू होने के बाद से तो याद नहीं कि वहां आने वाले किसी सदस्य ने अकेले चाय पी हो। पीछे स्थित मदार गेट पर हर तरह का नाश्ता मिलता ही है। वैसे बाजार में चाय के दाम दस से पंद्रह रूपए है। काफी लम्बा अरसा बंद रहने के बाद जुलाई 2014 में क्लब फिर शुरू हुआ।

बंद क्यों रहा यह किस्सा फिर कभी। स्टेशन रोड पर रेलवे स्टेशन से थोड़ा हटकर स्थित इस प्रेस क्लब के अब तक जिले भर से करीब दो सौ से अधिक सदस्य बन चुके हैं। पत्रकारों के साथ साहित्यकारों, लेखकों, प्रबुद्ध नागरिकों के लिए भी गुंजाइश रखी गई है। इसलिए सदस्यता के भी कुछ रूप दिए गए हैं। सन् 2000 में स्थापना हुई तब इसके पहले अध्यक्ष बने दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल। उनके बाद नवज्योति के नरेंद्र चौहान, राजेंद्र गुंजल, नरेन राजगुरू रहे। फिर क्लब बंद हो गया। अब फिर से लोग जुटे और सर्वसम्मति से एक बार फिर डॉ. रमेश अग्रवाल को इसका अध्यक्ष बना दिया गया।

महासचिव बने जी न्यूज मरूधरा के मनवीर, पंजाब केसरी के एसपी मित्तल और हिन्दू के कमल वर्यानी उपाध्यक्ष बने हैं। पर मानना पड़ेगा क्लब जिंदा रखने के लिए फोटोग्राफर सत्य नारायण जाला और दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार प्रताप सनकत को जो किसी ड्यूटी की तरह बिना नागा रोजाना क्लब आते हैं और इसके लिए संसाधन जुटाते हैं। छह सात महीने में, आधा दर्जन से ज्यादा दफा सदस्य सामूहिक भोज कर चुके हैं। यह भोज कराया कुछ सदस्यों ने स्वेच्छा से। दो दफा तिरंगा झंडा भी फहरा चुके हैं। कुछ अन्य गतिविधियों के लिए कमेटियों का गठन भी किया हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार गिरधर तेजवानी ने जहां सदस्यता छानबीन समिति संभाली है, वहीं राजेंद्र हाड़ा को विधि सलाहकार का जिम्मा दिया गया है। सबसे अधिक सक्रिय हैं लम्बे समय तक खेल खबरें देखने वाले विनीत लोहिया। लोहिया ने कैरम प्रतियोगिताओं का ऐसा आयोजन शुरू किया है कि प्रेस क्लब पर अब रोजाना दोपहर 1 से शाम 4 बजे तक बीस-पच्चीस सदस्य जुट जाते हैं।

दैनिक भास्कर में प्रशासनिक बीट संभालने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेश कासलीवाल ने नए भवन की जिम्मेदारी ली है। काफी हद तक काम चल रहा है। केंद्र सरकार के जल संसाधन राज्य मंत्री सांवर लाल जाट, राज्य सरकार में महिला व बाल विकास राज्य मंत्री अनिता भदेल और स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी तीनों प्रेस क्लब आ चुके हैं और यहां की मानद सदस्यता ले चुके हैं। इनसे पहले 14 साल पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सबसे पहले मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी इस क्लब की मानद सदस्यता ले चुके हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा लगे और उन्हीं के नाम पर बने ऐतिहासिक गांधी भवन में इस क्लब का चलने और शाम 6 बजते तक ताले लग जाने से आप समझ ही चुके होंगे कि अन्य प्रेस क्लबों जैसी दारू की परम्परा यहां नहीं है। यूं ज्यादातर सदस्यों को दारू की लत भी नहीं है। प्रेस क्लबों में क्या यह अपवाद नहीं है। शायद इसीलिए ज्यादातर अमीरों से दारू की जगह प्रेस क्लब में नया फ्रिज, नई मेज-कुर्सिया, आलमारी, कारपेट, चमकती टाइलें, टीवी, कैरम, शतरंज, वाई फाई जुटा ली गई हैं। अब टेबिल टेनिस की नई टेबलें लाने की तैयारी हैं। आई तो चौदह साल पहले भी थीं पर अब वे कबाड़ जो हो चुकी हैं।

फोटो: अजयमेरू प्रेस क्लब में हुई कैरम प्रतियोगता के प्रथम चरण के विजेता प्रेस क्लब अध्यक्ष डॉ. रमेश अग्रवाल और हौंसलों की उडान समाचार पत्र के सुनील को चल वैजयंती प्रदान करते अखिल भारतीय टेबिल टेनिस महासंघ के सचिव धनराज चौधरी। साथ खडे़ हैं प्रेस क्लब के खेलकूद संयोजक विनीत लोहिया और उपाध्यक्ष एसपी मित्तल।

अजमेर से वरिष्ठ पत्रकार और वकील राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: 09549155160 और 09829270160

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भड़ास की मुहिम पर भरोसा करें या नहीं करें?

जिन्हें हो खौफ रास्तों का, वो अपने घर से चले ही क्यों?
करें तूफानों का सामना, जिन्हें मंजिलों की तलाश है।

प्रिय साथियों,

समय कम बचा है। अब किसी सुखद अहसास का इंतजार मत करो। अपने कदम बढ़ाओ। वक्त निकलने के बाद आप के हाथ में कुछ भी नहीं रहेगा। मेरे पास देश के हर प्रदेश के पत्रकार साथियों के फोन आ रहे हैं। मैं सबसे हाथ जोड़कर निवेदन करना चाहता हूं कि मुझे फोन करना बंद कर दीजिए। कुछ पत्रकार भड़ास के संपादक यशवंतजी को लेकर आशंकाओं से भरे हैं। पत्रकार मुझसे पूछ रहे हैं कि भड़ास की मुहिम पर भरोसा करें या नहीं करें। मुझे ऐसे सवालों से दुख हो रहा है।

मुझे फोन करने वाले हर पत्रकार साथी को मैं कह रहा हूं कि ऐसी मानसिक स्थिति ने ही हमें कभी एकजुट नहीं होने दिया। यशंवत सर पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में किसी भी तरह की आशंका उनकी मुहिम और पत्रकारों के प्रति भावना को ठेस पहुंचा सकती है। आप यशवतं जी पर भरोसा ही नहीं आंख बंद कर भरोसा करें। मैं जानता हूं कि मजीठिया की इस पूरी लड़ाई के असली सलाम के वही हकदार हैं। मैं लंबे समय से देख रहा हूं।

यशवंतजी चाहते हैं कि देश के पत्रकारों को मजीठिया मिले। पत्रकार शोषण की स्थिति से बाहर आएं। मैंने वो किया जो मुझे उचित लगा। जो मेरे लिए बेहतर था। मेरी कंपनी से किए समझौते को मैं डिस्क्लोज नहीं कर सकता लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि देश के सभी मीडिया हाउस मालिक बिना लड़ाई लड़े आपको कुछ नहीं देने वाले हैं। कंपनियां शोषण के तरीके सीख चुकी हैं। मीडिया हाउस मालिकों के आस-पास ऐसे लोग हैं जो लाखों रुपए की तनख्वाह लेकर आप लोगों के शोषण के तरीके उन्हें सिखा रहे हैं। असल में यह बड़ी मछलियों जैसी कहावत को ही साबित कर रहे हैं। लेकिन अब समय क्रांति का झंडा उठाने का है।

आप लोग आशांकित मत रहिए। हमने वकीलों पर बड़ी राशि खर्च की है। भड़ास जिस राशि का निवेदन कर रहा है वह इतनी बड़ी लड़ाई के लिए कुछ भी नहीं है। हम गणित के जोड़ बाकी गुणा भाग में उलझ कर कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट आपको आपका हक दिलाने के लिए तैयार है। बस आपको अपना एक कदम बढ़ाना है। डरकर न कभी किसी ने कुछ पाया है न कभी कोई पाएगा। मेरा अनुभव कहता है कि निडरता ही आपको आपके लक्ष्य तक आसानी से पहुंचा पाएगी। यशवंतजी इस लड़ाई के असली हीरो हैं। असली सलाम उन्हें कीजिए। उन्हें मेरा सलाम है। किसी ने तो पत्रकारों की सुध ली। पत्रकार तो बेसुध हैं। पूरे समाज के हर तबके की सुध लेना वाला यह वर्ग खुद कभी अपनी सुध नहीं ले पाया है। दोस्तों समय कह रहा है बड़ा युद्ध लड़ो। इस बार नहीं तो फिर कभी नहीं लड़ पाआगे। यशवंत सर की यह मुहिम मीडिया हाउसों के लिए चिंता और चुनौती का सबब बनी हई है। इसलिए वे ऐन केन प्रकारेण इस मुहिम को असफल करने के लिए पत्रकारों में आशंकाएं पैदा करने समेत तमाम हथकंडे अपना रहे हैं।
आप सभी साथियों को धन्यवाद।

आपका

रजनीश रोहिल्ला

पूर्व चीफ रिपोर्टर
दैनिक भास्कर
अजमेर


पूरे मामले को समझने के लिए नीचे दिए गए तीन शीर्षकों पर क्लिक करें…

मजीठिया के हिसाब से पैसा मिलते ही रजनीश रोहिल्ला ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ली (देखें कोर्ट आर्डर)

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मजीठिया वेज बोर्ड : रजनीश रोहिला समेत तीन मीडियाकर्मियों के आगे झुका भास्कर प्रबंधन, पूरे पैसे दिए

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भड़ास संग मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने को 250 मीडियाकर्मी तैयार, 25 जनवरी तक कर सकते हैं आवेदन

 

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अजमेर से निकलने वाले दैनिक भास्कर को क्या हो गया है? जरा इस न्यूज को तो देखिए

: मंत्री के सादगी से मनाए जन्मदिन में दो हजार का जीमण? : अजमेर से निकलने वाले दैनिक भास्कर को क्या हो गया है? खबर बनाते, उसका सम्पादन करते, पेज जांचते समय कोई यह देखने वाला नहीं है कि खबर क्या जा रही है। एक-दो साल पुरानी खबरों को ज्यों की त्यों छापने से भी जब पेट नहीं भरा तो अब भास्कर ने सारे शहर की आंखों में धूल झोंकने का काम शुरू कर दिया है। रविवार, 11 जनवरी 2015 का दिन था। वसुंधरा सरकार के एक मंत्री का जन्मदिन। मंत्री ने एक दिन पहले सारे अखबारों को प्रेस नोट भिजवा दिया, मंत्री जी सादगी से मनाएंगे जन्मदिन। पत्रकारों को मंत्री ने खुद फोन किया। गद्गद पत्रकार नतमस्तक हो गए। अब जरा मंत्री की सादगी पर गौर कीजिए।

सुबह आर्य समाज के अनाथ आश्रम में हवन और अल्पाहार किया। वहां अपने विधायक कोष से दिए गए पांच कंम्प्यूटरों और एक प्रिंटर शुरू किए और अनाथ आश्रम द्वारा तैयार कराए गए कंप्यूटर कक्ष का फीता काटा। गौर कर रहे हैं आप मंत्री ने खुद के नहीं विधायक कोष से दिए गए कंप्यूटर-प्रिंटर और आश्रम के ही एक कमरे का फीता काटा। अल्पाहार की व्यवस्था भी मंत्री की खुद की नहीं थी। खास बात आश्रम के अध्यक्ष पांच दफा अजमेर के सांसद रहे हैं।

अजमेर विकास प्राधिकरण की ओर से आनासागर झील के किनारे सवा करोड़ रूपए की लागत से बनाए जाने वाले पाथ वे का उद्घाटन किया। खुद के धेले की एक पाई नहीं। नाश्ता और सारा तामझाम अजमेर विकास प्राधिकरण का। इतवार के बावजूद सारे अफसर मंत्री और उसके चेले चपाटों की चाकरी में मौजूद। आधा दर्जन से ज्यादा स्कूलें रविवार होने के बावजूद खोली गईं। कुछ एक्टिव बच्चे-बच्चियां बुलाए गए। मौखिक फरमान था मंत्री जी का जन्मदिन है, कुछ करना है। पढाई जाए भाड़ में। मास्साब-मैडमों को तबादला/प्रमोशन जरूरी था। मंत्री का खास साबित होने की प्रतियोगिता शुरू हो गई। एक स्कूल के मास्साब-मैडमों ने स्कूल में ही मंत्री को लड्डुओं से तौला। एक स्कूल के मास्साब-मैडमों ने स्कूल में ही अपना खून दान कर डाला।

एक स्कूल के मास्साब-मैडमों ने पौधे लगवा डाले, बड़ी मैडम ने मंत्री को भी तुलसी लगा एक गमला मंत्री की हथेली में रख दिया। बच्चों को मंत्री से पेड़ और पर्यावरण पर उपदेश सुना डाला। एक स्कूल के मास्साब-मैडमों और में सरकारी योजना मंे बने तीन कमरों का फीता कटवा दिया। मास्साब-मैडमों के एक संगठन ने मंत्री को साफा पहनाया और हाथ में तलवार थमा दी। लोकतंत्र में मंत्री के हाथों किसकी हत्या का इरादा है मास्साबों ? और दांत निपोरते मंत्री किस पर तलवार चलाने का इरादा है। कभी अपने सास-ससुर, मां-बाप का जन्मदिन नहीं मनाने वाले इन मास्साबों-मैडमों ने लड़डू बांटे, बंटवाएं, केक काटे-कटवाए, बैंड बाजे बजवाए।

मंत्री के चेले चपाटों ने शहर-भर में बधाई के बड़े-बड़े पोस्टर लगवाकर और अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन देकर मोदी के सफाई, सादगी,फिजूलखर्ची और सुंदरता के नारे की हवा निकाल दी। मंत्री ने एक अनाथ आश्रम में भी बुजुर्गों के हाल चाल जाने। यह अनाथ आश्रम भी भाजपा नेताओं की सरपरस्ती में चलता है। दिखावे के लिए थोड़ी दूरी तक साइकिल चलाई। अपने शागिर्दों की महंगी कारों में पुष्कर और नारेली तीर्थ पूजा। गायों को चारा भी खिलाया।

दोपहर बाद अपने घर पर सुंदरकांड का पाठ कराया और उसके बाद प्रसादी के नाम पर महाभोज कराया। मंत्री का भोज था। मंत्री से संतरी तक जुटे। अपने संपादकों के आगे पत्रकारों की बिसात क्या, मंत्री के चरणों में लोट लगाते नजर आए।  तोहफा भी कबूल किया। करीब दो हजार लोगों ने जमकर भोजन किया। मोदी के नारे, ‘न खाउंगा, ना खाने दूंगा’ को अपने भाषणों में दोहराने, तालियां पिटवाने वाले, पारदर्शिता का दावा करने वाले मंत्री क्या इस जीमण, निमंत्रण पत्र, सुंदरकांड के आयोजन पर हुए खर्च का ब्यौरा देने की हिम्मत रखते हैं।

पता नहीं भास्कर के पत्रकारों-संपादकों को इतने आयोजनों के बावजूद कहां-कैसी सादगी नजर आई। कुछ पत्रकार तो बाकायदा हिमायत में खडे़ नजर आए बेचारे मंत्री जी तो सादगी चाहते थे, उनके चेलों ने सब पर पानी फेर दिया। अरे कोई मंत्री की गर्दन पर बंदूक रखकर क्या यह सब करवा रहा था। शिलान्यास, उद्घाटन, भाषण, बैनर, विज्ञापन, महाभोज अगर सादगी का नाम है तो धन्य है ऐसी पत्रकारिता। इतना ही क्यों मिनट टू मिनट का कवरेज।

एक बॉक्स न्यूज है 11 तारीख, 11 बजकर, 11 मिनट पर लोकार्पण। भइया हद है चमचागिरी और चापलूसी की भी। दूसरी बॉक्स न्यूज है जन्मदिन का शानदार तोहफा। केन्टोनमेट बोर्ड के चुनावों में छह में से चार सीटों पर भाजपा की जीत। अरे क्या सचमुच घास चरने चली गई अक्ल। कांग्रेस ने तो चुनाव ही नहीं लड़ा। दो सांसदों जिनमें से एक राज्य मंत्री, दूसरा भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री और दो राजस्थान सरकार के मंत्री और फिर छह में से चार पर भाजपा की जीत। कांग्रेस मैदान में नहीं, सामने सभी निर्दलीय। इनमें भी एक जीत सिर्फ चार मतों की। यह है अक्ल पत्रकारों की और फिर मांगते हैं मजीठिया। यह तो बात हुई पत्रकारों की परंतु अपनी पार्टी की सरकार के एक मंत्री की इस सादगी पर प्रधानमंत्री मोदी की नीति क्या होगी? 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और उनकी दरगाह पर हिन्दी का पहला वेब न्यूज पोर्टल तैयार हो रहा

पिछले एक दो साल से लगातार यह उधेड़बुन थी कि मीडिया के क्षेत्र में ही ऐसा कुछ किया जाना चाहिए जो नया हो। नए मीडिया न्यूज पोर्टल से थोड़ा आगे, थोड़ा हटकर और थोड़ा बहुआयामी भी। वेबसाइट, न्यूज पोर्टल, न्यूज सोर्स, रिसर्च कुलमिलाकर ऐसा ही कुछ। विषय की तलाश अपने शहर अजमेर में ही पूरी हो गई। सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और उनकी दरगाह। कुछ और भी वजह रहीं। ना गांठ में पैसा था और ना ही कोई संसाधन। बस कर दी शुरूआत। इस सच्चाई को स्वीकारने में कतई संकोच नहीं है कि इसकी शुरूआती प्रेरणा भड़ास के भाई यशवंत से मिली। उन्होंने भड़ास पर कई मर्तबा पत्रकार साथियों को इस बात के लिए प्रेरित किया है कि वे नए मीडिया में आगे आएं। उनकी इस सोच का ही परिणाम Media4Khwajagaribnawaz.com है।

अजमेर से बाहर के जितने भी मिलते हैं। उनके मन में भी ख्वाजा साहब के लिए श्रद्धा, आस्था या फिर अजीब सी उत्सुकता नजर आती है। कुछ ऐसी विचित्रताएं हैं जिसने इस दिशा में और प्रेरित किया। जैसे कि 802 साल पहले ख्वाजा साहब जिस्मानी तौर पर इस दुनिया से जा चुके थे और करीब ढाई सौ साल तक उनकी मजार कच्ची रही। कि किसी को भुलाने-बिसराने के लिए यह अरसा कम नहीं होता परंतु आज वहां दस से पंद्रह हजार लोग रोजाना आते हैं। कि इस्लाम के अनुयायियों के लिए मक्का के बाद दुनिया का यह दूसरा सबसे बड़ा आस्था का केंद्र है। कि रोजाना यहां आने वाले श्रद्धालुओं में मुसलमानों से ज्यादा तादाद हिन्दुओं की है। कि यह पहला मजार है जहां महिलाओं को भी सजदा करने की इजाजत है। कि इस्लाम के चिश्तिया सिलसिले का सबसे बड़ा केंद्र ख्वाजा साहब हैं। कि चिश्तिया सिलसिले में संगीत को प्रमुखता दी गई है। कि महफिल और कव्वाली के बगैर गरीब नवाज का जिक्र अधूरा रहता है। कि हुमायूं की जान बचाने वाले और एक दिन की बादशाहत में चमड़े के सिक्के चला देने वाले भिश्ती बादशाह का मजार इसी दरगाह में है। कि शहंशाह अकबर फतहपुर सीकरी से यहां पैदल चलकर आया। कि बादशाह जहांगीर ने तीन साल यहीं रहकर हिन्दुस्तान की सल्तनत संभाली। कि शाहजहां की बेटी जहांआरा यहीं की होकर रह गई। और यह भी कि नई दिल्ली के ख्वाजा कुतुबुद्दीन के शिष्य और हजरत निजामुद्दीन औलिया के गुरू ख्वाजा साहब की दरगाह में इतिहास के ऐसे ही कई पन्ने खुले हुए हैं।

इस वेब न्यूज पोर्टल के लिए तथ्य एवं ऐतिहासिक सामग्री जुटाने में छह महीने से अधिक का वक्त लगा। करीब पचास से अधिक फारसी और उर्दू से अंग्रेजी में अनुवादित और अंग्रेजी तथा हिन्दी ग्रंथों से सामग्री जुटाई गई। कोशिश यह की गई है कि गरीब नवाज और दरगाह शरीफ के बारे मे आपके मन मे उठने वाले हर सवाल का जवाब इस वेब न्यूज पोर्टल में मिले। ख्वाजा साहब के जन्म से लेकर दुनिया से परदा कर लेने तक की पूरी जानकारी, ख्वाजा साहब की शिक्षाएं, उनकी रहमत से जुड़ी वास्तविक घटनाएं, गरीब नवाज का करम, यहां सजदा करने आई हस्तियां, दरगाह में कहां, क्या है, कौन-कौन सी ईमारतें हैं, जियारत के दौरान किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, अजमेर पहुंचने के लिए रेल और बसें, अजमेर पहुंचने के बाद किन-किन रास्तों से गुजर कर दरगाह पहुंचा जा सकता है, इस्लाम में सूफीमत, सूफी सिलसिला, सूफी तसव्वुुफ, गरीब नवाज और चिश्तिया सिलसिला, सूफी काव्य, नृत्य और संगीत, दरगाह कमेटी, अंजुमन सैयद जादगान, अंजुमन शेख जादगान, सज्जादानशीन आदि तमाम ऐसी जानकारियां हैं जो एक जगह और हिन्दी में नहीं मिल सकेगी। इसके अलावा ख्वाजा साहब और दरगाह से जुड़ी जरूरी ताजातरीन खबरें भी मुहैया रहेगी। सूफी संगीत की अपनी अलग दुनिया होती है। इसलिए हर महीने एक सूफी गाना भी इस वेब न्यूज पोर्टल पर सुनने को मिलेगा। आने वाले दिनों में दरगाह के खुद्दाम, अजमेर की होटलें, अजमेर में कहां से क्या खरीदारी कर सकते हैं, टेªवल कंपनियां, सरवाड़ शरीफ, नागौर शरीफ, तारागढ़ शरीफ आदि जानकारियां भी शीघ्र मुहैया करवाई जाएंगी। ख्वाजा साहब, गरीब नवाज और दरगाह शरीफ आदि नामो से कई वैबसाइट हैं। सब में दो बातें समान है। एक सभी अंग्रेजी में हैं और दूसरी ज्यादातर वैबसाइट वे हैं जो ख्वाजा साहब के खादिमों ने बनाई है जिनका मुख्य मकसद लोगों को जियारत के लिए आमंत्रित करना होता है।

दरगाह आने वाले जायरीन में 90 फीसदी हिन्दी भाषा बोलते-समझते हैं। इसलिए इरादा किया गया कि वेबसाइट हिन्दी में हो और इसे रूप दिया गया वेब न्यूज पोर्टल का, www.media4khwajagaribnawaz.com नाम से। एक और मकसद था विभिन्न समाचार पत्रं, पत्रिकाएं, न्यूज व फीचर एजेंसियां, वेबसाइट, न्यूज चैनल चाहें तो इस ‘वेब न्यूज पोर्टल’ की जानकारियों और खबरों का इस्तेमाल अपने लिए कर सकें। कितनी और कैसी खबरें बनती हैं इस दरगाह से। पिछले एक-दो महीने में यहां जम्मू-कश्मीर से पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफती, बांग्ला देश संसद की अध्यक्ष डॉ शीरिन शरमीन चौधरी, फिल्म निर्माता मुजफ्फर अली, अभिनेत्री करीना कपूर, शायर वसीम बरेलवी, अनवर जलालपुरी, आप पार्टी की राखी बिडला, दुनिया के सबसे बुजुर्ग चित्रकार सैयद हसन रजा, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, उनकी पत्नी सलमा अंसारी, अजय देवगन, क्रिकेटर अजहरूद्दीन, फिल्म अभिनेत्री मनीषा कोईराला आदि यहां जियारत के लिए आए। बाबा फरीद का चिल्ला जियारत के लिए खुला। मोहर्रम में कर्बला का मंजर और हाइदौस की परम्परा। ऐसी बहुत सी खबरें हैं जो पठनीय और जानकारी के लिए जरूरी होती हैं। वेब न्यूज पोर्टल का लिंक http://www.media4khwajagaribnawaz.com है। अभी तक कोई टीम नहीं है। एक अकेले पत्रकार, वकील और राजनीति व मीडिया विश्लेषक राजेंद्र हाड़ा का प्रयास। दस साल दैनिक नवज्योति, दस साल दैनिक भास्कर और अन्य अखबार-एजेंसियों का करीब 28 साल का पत्रकारिता व लेखन का अनुभव साथ है और विश्वास है, अकेले ही कुछ कर दिखाने का।

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमेर के जाने-माने पत्रकार और वकील हैं. उनसे संपर्क 09829270160 या 09549155160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

रजनीश रोहिल्ला


9950954588. ये मोबाइल नंबर रजनीश रोहिल्ला का है. अजमेर में हैं. यहीं से प्रकाशित दैनिक भास्कर अखबार में सीनियर रिपोर्टर हैं. इन्होंने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”मजीठिया दो”. न मिलना था सो न मिला. उल्टे ट्रांसफर और प्रताड़ना का दौर शुरू. तब फिर रजनीश रोहिल्ला ने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”तुझे तेरी औकात दिखाउंगा”. ठान लिया तो पूरी कायनात रजनीश रोहिल्ला के लक्ष्य को पाने-दिलाने में जुट गई.

अजमेर के इस सीनियर रिपोर्टर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. मजीठिया वेज बोर्ड न देने को लेकर कंटेंप्ट आफ कोर्ट. सुप्रीम कोर्ट ने कुबूल किया इसे. केस रजिस्टर किया. अब साले भास्कर वाले गिड़गिड़ा रहे हैं रजनीश रोहिल्ला के आगे.. ”…आ जाओ भाई… सेटल कर लो… पैसे ले लो.. सब कर लो पर आ जाओ.. बस याचिका वापस ले लो.. कह दो कि सब ठीक है…. ” टाइप की बातें कहते करते हुए.

रजनीश रोहिल्ला का कल मेरे पास फोन आया. बोले- यशवंत भाई, ये स्थिति है अब. मैंने कहा- मित्र, आप अब खुद अकेले नहीं है. देश भर के पत्रकारों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. पूरे प्रकरण वाकये पर लिखकर भेजिए. इसे प्रकाशित किया जाएगा ताकि भास्कर वालों का हरामजदगी और एक पत्रकार के साहस की कहानी सबके सामने रखी बताई जा सकी. रजनीश रोहिल्ला ने वादा निभाया और आज जब सुबह मैंने भड़ास का मेल चेक करना शुरू किया तो उनका ये आर्टकिल पड़ा मिला. पढ़िए, और कुछ न कर पाइए तो कम से कम फोन करके रजनीश रोहिल्ला को उनकी इस बहादुरी / मर्दानगी पर बधाई सराहना शाबाशी दे डालिए…

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं

नमस्कार

9 साल तक पत्रकारों के लंबे संघर्ष के बाद बने मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई निणार्यक दौर में है। हमारी कंपनियां हमें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना नहीं चाहती। हालांकि वे खुद शुद्ध व्यवसायिक लाभ कमा रही है। हमारे शोषण को जारी रखकर हमें आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखना चाहती हैं। कुछ मैनेजर टाइप के लोगों को जरूर अच्छा पैसा दिया जा रहा है। ये वो लोग हैं जो केवल मालिकों के हितों के बारे में ही सोचते हैं। हम पत्रकारों को तो बेचारा समझकर लालीपॉप देने का सिलसिला चला रखा है। लेकिन अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों की परिभाषा और वेतन का स्ट्रक्चर भी बना दिया है। अब मालिक मनमाना रवैया नहीं अपना सकते हैं। इन मालिकों की हिमत देखिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी मानने के लिए तैयार नही है। उसे भी मजाक समझ रहे हैं।

मालिकों ने तुगलकी फरमान जारी कर अधिकांश पत्रकारों से दबाव डालकर  लिखवाया कि उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं चाहिए। मालिकों की नजर में पत्रकार वर्ग असहाय, मजबूर और बेचारा है। मालिकों की सोच के अनुसार पत्रकारों ने उस काले आदेशों पर हस्ताक्षर कर दिए। जबकि एक स्वर में उस काले आदेश का विरोध किया जाना चाहिए था। पर, पत्रकार सोच रहे थे  कि नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।  परिवार पर आर्थिक संकट आ जाएगा। लेकिन जरा सोचिए एक रणनीति बनाकर सारे  पत्रकार एक साथ मजठिया की मांग कर दें तो कंपनियां क्या बिगाड़ पाएगी। वो भी उस समय जब देश का सुप्रीम कोर्ट हमारे पीछे बैठा हो।

दोस्तों मैंने मालिकों द्वारा भेजे गए काले फरमान को मानने से मना कर दिया। मैंने लाख दबाव के बावजूद भी काले आदेश वाले कागज पर हस्ताक्षर नहीं किए। मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। मेरा ट्रांसफर महाराष्ट्र के जालना में मराठी भाषी अखबार में कर दिया लेकिन मैं बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ। कंपनी के मैनेजर सोच रहे थे कि मै उनके पैरों में पड़ूंगा गिड़गिड़ाउंगा। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

मैंने मजीठिया वेजेज को लागू करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कंटेप्ट पीटीशन दायर की। मुझे उस समय बहुत खुशी हुई जब जानकारी मिली की कंटेप्ट पीटीशन को सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्टर कर लिया। यह मजीठिया की लड़ाई की पहली बड़ी जीत थी। मेरी पीटीशन का रजिस्टर नंबर 21773 है। दो महीने बाद मुझे केस नंबर 401 मिला। यह आप सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर देख सकते हैं। 13 अक्टूबर को दीपावली के समय सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों को बड़ा तोहफा देते हुए देश के सभी मीडिया हाउस मालिकों को दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड की पालना रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।

मित्रों, यह दो महीने 13 दिसंबर को पूरे होंगे। अगर इस दिनांक तक मालिक पालना रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर पाए तो उनके खिलाफ कंटेंप्ट की कार्रवाई शुरू होगी। लड़ाई महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुकी है। मैं इसका असर देख और महसूस कर पा रहा हूं। मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी मुझसे संपर्क साध रहे हैं। समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं। समझौता किस बात का, कैसा समझौता। मैने स्पष्ट कर दिया है कि मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कीजिए। मैं आगे की लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार हूं। मैं जानता हूं कि मालिक किसी भी हद तक जा सकते हैं। मेरी जिंदगी के साथ खिलवाड़ या फिर किसी भी तरह का नुकसान भी पहंचा सकते हैं लेकिन मैं सुपीम कोर्ट  और आप सब के भरोसे पर लड़ाई लड़ रहा हूं। इसलिए मझे कोई चिंता नहीं है। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ मेरे अकेले की नहीं बल्कि सब पत्रकार भाइयों की है।

मित्रों मैं पिछले सात महीनों से बिना वेतन के चल रहा हूं। निश्चित रूप से मुझे कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। महीने में कई दिन मेरे कोर्ट में बीत रहे हैं। मजीठिया नहीं मिलने तक लड़ाई जारी रहेगी। मेर आप से अपील है इस संघर्ष में आप जैसा भी सहयोग कर सकते हैं। जरूर कीजिए। सुप्रीम कोर्ट हमारे साथ है। हमारी जीत निश्चित है।  मेरा निवेदन है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को इंटरनेट पर आप एक बार जरूर पढ़ें और ज्यादा से ज्यादा पत्रकार साथियों को इसकी जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाएं। सुप्रीम कोर्ट में अगली तारीख 2 जनवरी है।

आपका
रजनीश रोहिल्ला
9950954588
सीनियर रिपोर्टर
दैनिक भास्कर
अजमेर संस्करण

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इस संपादक के काले कारनामों से पूरा अजमेर और मीडिया वाकिफ है

: तेरह साल मीडिया में काम करने के बावजूद एक वरिष्ठ साथी ने इतना सा सहयोग नहीं किया : आपके सामने होता तो आपके मुंह पर थूक कर जाता : अभी दो दिन पहले मैंने और मेरे रिश्तेदार अधिकारी ने दो गलती की…मेरे रिश्तेदार को अपनी गलती पर पछतावा होगा या नहीं…ये तो मैं नहीं जानता…लेकिन मुझे मेरी गलती पर कोई पछतावा नहीं…वे रिश्तेदार राजस्थान रोडवेज में अजमेर आगार में आगार प्रबंधक है और जयपुर के एक विधायक के छोटे भाई हैं…दो दिन पहले उनका परिवार जयपुर से अजमेर के लिए अजमेर आगार की बस में बैठकर रवाना हुआ…इसमें उनका निजी परिवार और आश्रित माँ के आलावा शायद एक दो लोग और थे…बस कंडेक्टर ने इस मामले की जानकारी सिन्धी कैंप से अजमेर आगार प्रबंधन को दे दी…

प्रबंधन ने अधिकारी के परिवार का मामला होने का मामला बताकर उन्हें लाने की अनुमति दे दी….रोडवेज में ऐसा आमतौर पर होता है…मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ…बस के ड्राईवर ने चीफ मैनेजर से पुरानी खुन्नस निकालने के लिए अजमेर में एक आप नेता को फोन कर दिया…उसने बीच रास्ते में बस रोक कर हंगामा खड़ा कर दिया…फ़्लाइंग जाँच पहुंची तो 9 में से 5 लोगों के पास रोडवेज  कर्मचारियों को मुफ्त यात्रा के लिए मिलने वाले पास पाए गए…मामला मीडिया तक पहुँच गया…

मुझे बड़े भाई का फोन आया…जानकारी करने पर पता चला अजमेर में राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति उस आप नेता को और उसकी खबरों को कोई तरजीह नहीं देते हैं…लेकिन दैनिक भास्कर में उसकी तगड़ी सेटिंग है….मैंने कुछ समय अजमेर भास्कर में सीनियर रिपोर्टर के तौर पर काम भी किया था….भास्कर में रोडवेज की खबर लिखने वाला रिपोर्टर मेरा मित्र था…लिहाजा मैंने उसे फोन किया तो उसने खबर डेस्क पर चले जाने का हवाला दिया…मैंने पूरे मामले की जानकारी लेकर अजमेर भास्कर के स्थानीय संपादक रमेश अग्रवाल को फोन कर पूरे मामले की हकीकत से अवगत कराया…

मैंने पूरी जिम्मेदारी लेते हुए अग्रवाल साहब से अनुरोध किया कि सर खबर पूरी तरह फर्जी है…अधिकारी के खिलाफ यह षड्यंत्र रचाया गया है…मैंने उन्हें बहुत बड़ा मामला नहीं होने की बात कहकर खबर रोकने का आग्रह किया…संपादक ने कहा खबर कभी रोकी नहीं जाती…मैं उनके तर्क से सहमत हुआ…अख़बार की गरिमा और मेरा पारिवारिक मामला होने का हवाला देकर मैंने उन्हें खबर में सही तथ्य छापने का निवेदन किया…उन्होंने मुझे पूरी मदद के लिए आश्वस्त किया…इस सिलसिले में देर रात तक मेरी उनसे तीन बार फोन पर बात भी हुई…उन्होंने आश्वस्त किया की मैं देख लूँगा, तुम चिंता मत करो…

अगले दिन सुबह खबर छप गई…इनकी एडिटिंग की हालत देखिए रोडवेज के चीफ मैनेजेर को निक नेम में सीएम बुलाते हैं…इन बुद्धी के मारों ने सीएम वसुंधरा राजे लिख दिया…कभी खबर पढ़ते तो एडिट करते ना…खबर जो छपी आपके सामने रख रहा हूँ… आप खुद अंदाजा लगाना…खबर कितनी फर्जी है…जिस तरह ख़बर छपी, बेहद दुख हुआ…तेरह साल मीडिया में काम करने के बावजूद एक वरिष्ठ साथी ने इतना सा सहयोग नहीं किया…जब मुझे और आप सबको पता है इन संस्थानों में खबरों के साथ क्या होता है…जब मैंने उन्हें फोन किया तो बचने के लिए तर्क था…स्टेट हेड का फोन आ गया था…मैंने कहा- सर आप मुझे फोन पर बता देते…मैं स्टेट हेड से बात कर लेता…इस पर उन्होंने मुझ पर अपनी अफसरी झाड़ते हुए कहा…अब क्या तुम मुझे निर्देश दोगे…मैंने भी तपाक से जवाब दे दिया “निर्देश क्या, आपका जूनियर पत्रकार होने और विनम्र अनुरोध करने के बावजूद मेरे साथ जो किया है…अगर अभी मैं आपके सामने होता तो आपके मुंह पर थूक कर जाता”

हो सकता है मैंने गलत किया हो…कुछ लोगों को बुरा भी लगेगा…लेकिन मुझे इसका ना तो कोई मलाल है ना ही कोई रंज…भले ही इसके लिए मुझे कुछ भी भुगतना पड़े…ऐसे घटिया लोगो को सबक सिखाने का यही तरीका है…इस संपादक के काले कारनामों से पूरा अजमेर और मीडिया वाकिफ है…मालिकों के सामने दया का पात्र बनकर ये अजमेर में बरसों से जमा बैठा है…इसने ऑफिस में अपने तीन दलाल पाल रखे हैं और बेचारे जूनियर रिपोर्टरों से रिपोर्टिंग के बजाय खुद के धंधेबाजी के काम करवाते हैं…एक सटोरिये के पैसों से शहर में युवराज रेसीडेंसी में क्या कारनामे किए हैं सबको पता है…हमको आज भी खाने के फाके हैं और साहब की फेक्टरियाँ चल रही हैं…इनके कारनामों पर तो पूरी किताब लिखी जा सकती है…आजकल अपने चेलो से एक प्रेस क्लब बनवाकर खुद अध्यक्ष बनकर बैठे हैं…भास्कर प्रबंधन है कि धृतराष्ट्र बना बैठा है…

खैर, ये पहला मामला नहीं…गालियाँ सुनने के आदी है ये लोग तो…भास्कर में काम करने के दौरान मेरी कई ख़बरें रोकने पर इनने और इनके एक चेले संतोष गुप्ता ने कई बार गलियाँ सुनी थी…आप लोग यह मत समझना कि इसने मेरे कहने पर खबर नहीं रोकी तो में बदला लेने के लिए ऐसे लिख रहा हूँ…सवाल यह है बरसों से मीडिया में होने के बावजूद एक पत्रकार अपने साथी पत्रकार के पारिवारिक मामलों में इतना भी सहयोग नहीं कर सकता तो क्या मतलब इन भड़वों को सर-सर करने का…सुन लेना भड़वों मैंने शान से और पूरी ईमानदारी से पत्रकारिता की है…मैं किसी के बाप से नहीं डरता हूँ…तुम जैसे भांड मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते…मैं तो फ़कीर हूँ…खोने को मेरे पास कुछ नहीं…तुम्हारी तो दलाली की दुकाने है…सोच लेना…जो नेता मुझ से डरते थे तुम लोगों को उनके आगे गिड़गिड़ाते देखा है मैंने…कहो तो नाम भी बता दूं…इस दुनिया में मैं भगवान के बाद सिर्फ श्रीपाल शक्तावत से डरता हूँ…वो पत्रकारिता के असली मर्द हैं…तुम तो दल्ले हो दल्ले (यह शब्द सबके लिए नहीं है…उसके लिए ही है जिनकी मैं बात कर रहा हूँ…अजमेर की पत्रकारिता में कई अच्छे लोग भी हैं)

लेखक कमलेश केशोट राजस्थान में वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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एक साल पुरानी फोटो छापने के मामले में फोटोग्राफर सेवामुक्त, रिपोर्टर सस्पेंड

दैनिक भास्कर में एक साल पुरानी फोटो छपने की खबर भड़ास पर प्रकाशित होने के बाद भास्कर प्रबंधन ने एक्शन लिया है. पता चला है कि संबंधित फोटो ग्राफर को सेवा से मुक्त कर दिया गया है. रिपोर्टर को स्पष्टीकरण देने तक निलंबित कर दिया गया है. भड़ास पर इस मामले की खबर छपते ही अजमेर भास्कर में उठापटक तेज हो गई. मामले की जांच बिठाई गई और जांच नतीजे आने के बाद प्रबंधन ने एक्शन लिया.

मूल खबर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

दैनिक भास्कर अजमेर ने छापी ईद की एक साल पुरानी फोटो

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दैनिक भास्कर अजमेर ने छापी ईद की एक साल पुरानी फोटो

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हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करने वाला दैनिक भास्कर अब लगता हैं बासी व पुरानी फोटोज़ से ही अपनी गुजर बसर कर रहा हैं। भास्कर के कर्मचारियों के आलस्य का अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं कि एक फोटो जो साल भर पहले भास्कर ने ही अपने अखबार में छापी थी उसे फिर से आज अखबार में छाप दिया गया। अगर कोई खड्ड़ा या कोई ऐसी समस्या की फोटो होती जो साल भर पूर्व भी ऐसी थी और अब भी वैसी हैं तो समझ आता हैं मगर फोटो तो थी ईद पर नमाज अदा कर रहे अकीदतमंदों की।

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पिछले वर्ष छपी फोटो

मामला अजमेर जिले का है जहां केकड़ी डेडलाईन से ईद की खबर फोटो सहित छपी। लेकिन फोटो वही जो पिछले साल ईद पर छपी थी। ऐसे में सवालों के घेरे में भास्कर के स्थानीय पत्रकार व डेस्क इंचार्ज ही हैं, मगर हां डेस्क इंचार्ज तो यह कह कर निकल जायेगें कि भई एक साल पुरानी फोटो उन्हे याद थोड़ी हैं जो स्थानीय पत्रकार ने भेजी उसे ही लगा दी गई। अब स्थानीय पत्रकार क्या जवाब देंगें यह देखने वाली बात होगी। ज्ञात रहे कि केकड़ी के भास्कर के पत्रकार को पिछले दिनों ही जयपुर में भास्कर प्रबंधन द्वारा उत्कृष्ठ विज्ञापन कार्य के लिये सम्मानित किया गया था।

इसके बाद उन्होने अगले ही दिन क्षेत्रीय विधायक की फोटो के साथ फुल पेज का एड लगवा दिया था जिसके बाद उन्हे भास्कर ने कुछ दिनों के लिये सस्पेंड भी कर दिया गया था और लिखित माफीनामा भी लिखवाया था। भास्कर के अजमेर संस्करण संपादक की मेहरबानी से इनकी नौकरी बच पाई थी। अब फिर से ये मुसिबत में नजर आ रहे हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

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