पत्रकारिता में ‘सुपारी किलर’ और ‘शार्प शूटर’ घुस आए हैं, इनकी रोकथाम न हुई तो सबके चश्मे टूटेंगे!

Rajiv Nayan Bahuguna : दिल्ली प्रेस क्लब ऑफ इंडिया परिसर में एक उद्दाम पत्रकार यशवंत सिंह को दो “पत्रकारों” द्वारा पीटा जाना कर्नाटक में पत्रकार मेध से कम चिंताजनक और भयावह नहीं है। दरअसल जब से पत्रकारिता में लिखने, पढ़ने और गुनने की अनिवार्यता समाप्त हुई है, तबसे तरह तरह के सुपारी किलर और शार्प शूटर इस पेशे में घुस आए हैं। वह न सिर्फ अपने कम्प्यूटर, मोबाइल और कैमरे से अपने शिकार को निशाना बनाते हैं, बल्कि हाथ, लात, चाकू और तमंचे का भी बेहिचक इस्तेमाल करते हैं।

इस पेशे में इनकी उपस्थिति वास्तविक श्रम जीवी पत्रकारों के लिए राजनैतिक और आर्थिक धन पशुओं से अधिक भयावह है। इनकी रोकथाम न हुई, तो बारी बारी सबके हाथ, पाँव चश्मे तथा नाक तोड़ेंगे, जैसे यशवंत की तोड़ी है। इनका मुक़ाबला लिख कर, बोल कर तथा जूतिया कर करना अपरिहार्य है।

उत्तराखंड के वरिष्ठ और चर्चित पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

भड़ास संपादक यशवंत पर हमले को लेकर धीरेंद्र गिरी, पंकज कुमार झा और शैलेंद्र शुक्ला की प्रतिक्रियाएं कुछ यूं हैं…

Dhirendra Giri : बेबाक शख्सियत है Yashwant Singh जी…. फ़र्ज़ी लोग इस वज़न को सह नही पाते… खैर उन्होंने कई दफा टुच्चो को सहा है। आगे भी वह हमेशा की तरह मज़बूत ही दिखाई देंगे । इस आक्रमण की घोर निंदा पढ़ने लिखने और चिंतन करने वाली पूरी बिरादरी को करनी चाहिए।

पंकज कुमार झा : मीडिया के एजेंडा आक्रमण के हमलोग भी ऐसे शिकार हो जाते हैं कि कोई घोषित अपराधी की हत्या पर पिल पड़ते हैं जबकि अपने निजी सम्पर्क के लोगों, मित्रों तक के साथ हुए किसी आक्रमण तक पर ध्यान नही जाता. गौरी लंकेश की हत्या पर होते वाम दुकानदारी के बीच ही मित्र Yashwant Singh पर प्रेस क्लब में आक्रमण की ख़बर आयी. कोई भुप्पी और किसी त्रिपाठी ने दारू के नशे में इस करतूत को अंजाम दिया. दोनों शायद किसी ख़बर के भड़ास पर छापे जाने से नाराज़ थे. आइए इस हरकत की भर्त्सना करें और अगर कर पायें तो दोषियों को दंडित कराने की कोशिश हो. सभ्य समाज में ऐसा कोई कृत्य बिल्कुल भी सहन करने लायक नही होनी चाहिए.

ये हैं दोनों हमलावर…

Shailendra Shukla : यशवंत भाई पर हमला यानी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के चौथे स्तम्भ पर हमला..  भारत वर्ष में ऐसा माना जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अगर ये सही है तो यशवंत भाई और भड़ास चौथे स्तम्भ के स्तम्भ है। भाई के ऊपर कुछ तथाकथित पत्रकारों ने हमला किया और वह भी भरोसे में लेकर। यशवंत भाई… यानी अगर मीडिया आपके साथ गलत कर रहा है तो उसके खिलाफ खड़ा होने वाला एकमात्र इंसान… कुछ छुटभैये किश्म के तथाकथित फर्जी पत्रकारों ने उनके साथ जो गुस्ताखी की है उसकी सजा उन्हें कानून पता नहीं कब देगा लेकिन अगर मुझे भविष्य में ऐसा अवसर मिलता है जिसमें उन सज्जनों से मुलाकात होती है तो उनकी खातिरदारी मैं जरूर करूँगा… उसके बदले इस देश का कानून जो भी सजा मेरे लिए तय करेगा मैं उसे सत्य नारायण भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लूंगा। अब बात यशवंत भाई और उन तथाकथित पापी किश्म के पत्रकारों की… अगर उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई को धोखा दिया तो वे गलत हैं… उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई पर हमला किया तो भी वो गलत हैं … किसी दीवार पर मैंने लिखा हुआ एक वाक्य पढ़ा था ….

“अगर आप किसी को धोखा देने में कामयाब हो जाते हो तो ये आपकी जीत नहीं है… बल्कि ये सोचो सामने वाले को आप पर कितना भरोसा था जिसे आपने तोड़ दिया”

खैर यशवंत भाई से बात की मैन भावुक होकर बदले की भावना प्रकट की और मैं आज नहीं तो कल उस चूहे तक जरूर पहुँच जाऊंगा… लेकिन भैया हो सकता है आप राम हो पर मैं नहीं…. मैंने लक्ष्मण जी की एक बात बिलकुल गाँठ बांध रखी है….

“जो ज्यादा मीठा होता है.. वह अपना नाश कराता है।
देखो तो मीठे गन्ने को.. कोल्हू में पेरा जाता है।।”

मैं यशवंत भाई पर हुए हमले की निंदा नहीं करूंगा… भर्तसना नहीं करूँगा… लेकिन अगर मौका मिला तो “जैसे को तैसा” वाला मुहावरा हमलावरों के साथ जरूर चरित्रार्थ करूँगा। अगर मेरे फेसबुक वॉल या किसी अन्य माध्यम से ये मैसेज उन दुर्जनों तक पहुचता है तो वो खुलकर मेरे सामने आ सकते है। वह इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अगर वो धूर्त हैं… ठग हैं… मीठी मीठी बातों में मुझे फंसा लेंगे जैसे यशवंत भाई के साथ उन्होंने किया तो ऐसे मत सोचें… क्योंकि मैं वाकई में महाधूर्त… हूँ खासकर उन दुर्जनों से तो ज्यादा… पता नहीं मेरे इस पत्र को भड़ास अपने पास जगह देगा कि नहीं लेकिन अगर देता है तो अच्छा लगेगा… मेरा मैसेज दुर्जनों तक जल्दी पहुचेंगे.…. क्योंकि सफाई कर्मचारी से लेकर मुख्य संपादक तक सब भड़ास पढ़ते हैं… अगर हमलावर जरा सा भी मीडिया से जुड़े होंगे तो भड़ास जरूर पढ़ते होंगे…

पूरे मामले को समझने के लिए ये भी पढ़ें…

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संघी वर्तमान को भी तोड़-मरोड़ देते हैं! (संदर्भ : गौरी लंकेश को ईसाई बताना और दफनाए जाने का जिक्र करना )

Rajiv Nayan Bahuguna : इतिहास तो छोड़िए, जिस निर्लज्जता और मूर्खता के साथ संघी वर्तमान को भी तोड़ मरोड़ देते हैं, वह हतप्रभ कर देता है। विदित हो कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ इलाकों में गंगा को गंगे, गीता को गीते, नेता को नेते और पत्रिका को पत्रिके कहा-लिखा जाता है। तदनुसार गौरी लंकेश की पत्रिका का नाम है- लंकेश पत्रिके। इसे मरोड़ कर वह बेशर्म कह रहे हैं कि उसका नाम गौरी लंकेश पेट्रिक है। वह ईसाई थी और उसे दफनाया गया। बता दूं कि दक्षिण के कई हिन्दू समुदायों में दाह की बजाय भू-समाधि दी जाती है। मसलन आद्य शंकराचार्य के माता पिता की भू-समाधि का प्रकरण अधिसंख्य जानते हैं।

गौरी के पिता पी लंकेश का नाम मैं अपनी पत्रकारिता के प्रारंभिक दिनों में कौतुक से सुनता था, उसके ‘लंकेश’ सरनेम के कारण। गांघी के बाद वह अकेला लोक प्रिय पत्रिका का मालिक था, जो बगैर विज्ञापन के पॉपुलर मैगज़ीन निकालता था। उसकी पत्रिका लाखों में बिकती थी, और दिल्ली तक उसकी धमक सुनाई पड़ती थी। जाहिल, अपढ़, बेशर्म, इतिहास विमुख संघियों का 1977 में लाल कृष्ण आडवाणी ने बड़े मीडिया हाउसों में धसान किया, जब आडवाणी सूचना मंत्री बना। फलस्वरूप जिन्हें पढ़ना भी नहीं आता था, वह लिखने लगे। कालांतर में इन्होंने पत्रकारिता में जम कर अंधाधुंध की।

हमारे समय मे व्यावसायिक पत्रकारिता के कठिन मान दन्ड थे। एमए और अधूरी पीएचडी करने के बाद मुझे नवभारत टाइम्स की नौकरी करनी थी। उसके सम्पादक मेरे पिता के निकट मित्र राजेन्द्र माथुर थे। उन्होंने बगैर परीक्षा के मुझ रखने से मना कर दिया, और प्रस्ताव रखा कि वह मुझे किसी यूनिवर्सिटी में हिंदी का लेक्चरर बना देंगे। लेकिन मुझे ओनली पत्रकार बनना था। सो मुझे कहा गया कि 15 दिन बाद नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण के लिए परीक्षा होगी। तैयार रहूं। परीक्षा में हिंदी, सामान्य ज्ञान, इतिहास, अंग्रेज़ी आदि का कठिन पर्चा होता था। अन्य में तो मैं होशियार था, पर मुझे अंग्रेज़ी तब इतनी ही आती थी, जितनी आज सोनिया गांधी को हिंदी आती है। मैं डर कर, माथुर को बगैर बताए परीक्षा के वक़्त गांव भाग गया, और दो माह बाद लौटा। मुझसे पूछताछ हुई, डांट पड़ी। छह माह बाद फिर पटना संस्करण के लिए एग्जाम हुए। इस बार माथुर की नज़र बचा कर एक सीनियर कुमाउनी जर्नलिस्ट दीवान सिंह मेहता ने मुझे अंग्रेज़ी के पर्चे में नकल करवा कर पास कराया। बाद में मैंने अपनी अंग्रेज़ी सुधरी। ऐ, मूर्ख, आ मुझसे ट्यूशन पढ़ भाषा, हिस्ट्री, पोयम और जोग्राफी का।

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

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केजरीवाल महोदय को ये एक श्रेय तो जरूर जाता है….

Rajiv Nayan Bahuguna : अरविन्द केजरीवाल को एक श्रेय तो जाता है कि उसने धुर विरोधी कांग्रेस और भाजपा को कम से कम एक मुद्दे पर एकजुट कर दिया। एक दूसरे से फुर्सत पाते ही वे दोनों केजरीवाल पर टूट पड़ते हैं। क्यों? उदाहरण से समझाता हूं।

आज से 20 साल पहले मैं फूलों की घाटी को जाता था। रस्ते में विकट पगडंडी पर धूर्त लोकल ढाबे वाले उस समय भी 20 रूपये में चाय का कल्चवाणी बेचते थे। किसी निरीह यात्री ने विरोध किया, तो आपसी प्रतिद्वंदिता भूल गर्म चिमटे और मुछ्याले लेकर उस पर टूट पड़ते थे। एक अन्य स्थानीय युवक ने विकल्प दिया। ताज़ा चाय 5 रूपये में देना शुरू की।

मैं पँहुचा तो सभी ढाबे वाले समवेत हो मेरे पास आकर बोले- यह छोकरा सस्ते के चक्कर में गन्दे पानी तथा नकली चीनी वाली घटिया चाय बेचता है। कभी दुर्घटना हो जायेगी। आप पत्रकार हो, इसके विरोध में लिखो।

मैंने प्रति प्रश्न किया- जब यहां आस पास सब जगह स्वच्छ जल के निर्झर बह रहे हैं, तो यह गन्दा पानी लेने क्या 18 किलोमीटर दूर हाइवे पर जाता होगा? क्योंकि उससे पहले यहां गन्दा पानी कहीँ उपलब्ध ही नहीं है। और, तुम सब मिल कर उससे नकली चीनी की एक मूठ छीन लाओ, मैं देखना चाहता हूँ।

इस पर सब मुझ पर कुपित हो गए और बोले, तू फ़र्ज़ी पत्रकार है।

बस केजरीवाल से सबको यही समस्या है। उसने स्वच्छ, पारदर्शी, वैकल्पिक राजनीति का मार्ग प्रशस्त कर दिया, तो अब तोड़ नहीं सूझ रहा। जैसे गांधी की राजनीति का तोड़ न सूझा, तो उसके विरोधी उसकी बकरी को लेकर ही बहस छेड़े रहते थे। वैसे ही केजरीवाल के मफलर और उसकी खांसी को लेकर मार मचाए रहते हैं, क्योंकि शेष क्या कहेंगे, उसने जो कहा, वह किया। अब तू सुधर जा, या कोई और धंधा देख ले। दिल्ली पंजाब के पश्चात यह संक्रमण और फैलेगा। सुधरो, या सिधारो।

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

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हरीश रावत ने उत्तराखंड के सात पत्रकारों को उल्लू बनाया!

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत पक्के वाले नेता है. कुछ कुछ ओवर स्मार्ट नेता हैं. काफी समय से इन्होंने कई पत्रकारों को सूचना आयुक्त बनाने का लालीपाप दे रखा था लेकिन बना किसी को नहीं रहे थे. राजीव नयन बहुगुणा तो खुद को नया सूचना आयुक्त अब बना तब बना मान कर चल रहे थे और लोगों से बधाइयां आदि भी ले रहे थे. पर हरीश रावत इतनी आसानी से किसी को कुछ देते कहां.

अब जब चुनावी अधिसूचना जारी हो गई है तो आनन फानन में हरीश रावत ने तीन सूचना आयुक्तों के पद के लिए कुल आठ नाम प्रस्तावित कर राज्यपाल के पास भेज दिए. इन आठ में सात पत्रकार हैं और एक अवर सचिव लोकसभा. राज्यपाल ने चुनावी आचार संहिता का हवाला देते हुए और प्रस्ताव में ढेर सारी कमियों का जिक्र करते हुए वापस लौटा दिया. इस तरह सात पत्रकारों के दिल के अरमां आसूओं में बह गए. हरीश रावत को अच्छे से पता था कि आधा अधूरा प्रस्ताव मान्य न होगा.

साथ ही चुनाव आचार संहिता के बीच यह काम होना मुश्किल है. पर हरीश रावत ने सभी पत्रकारों को लालीपाप थमा रखा था और सभी को हां हां कह रखा था इसलिए उनने सबका मान रख दिया, सबका नाम लिख दिया और पद किसी को नहीं मिला. यानि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी. जिन सात पत्रकारों के नामों का प्रस्ताव सीएम रावत ने किया है, वे इस प्रकार हैं-

पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा

पत्रकार केवल नंद सती

पत्रकार जन सिंह रावत

पत्रकार दर्शन सिंह रावत

पत्रकार चंद्र सिंह ग्वाल

पत्रकार हरीश लखेड़ा

पत्रकार डीएस कुंवर

देवेंद्र सिंह (अवर सचिव लोकसभा)

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‘नैनीताल समाचार’ और राजीव लोचन साह के बिना उत्तराखंड की जागरूक पत्रकारिता की कल्पना नहीं की जा सकती

क्षेत्रीय पत्रकारिता का प्रतिमान ‘नैनीताल समाचार’

चार-पांच दिन से मैं भाई साहब की बरसी की वजह से गाँव में था. परसों पंकज बिष्ट जी का हैरानी भरा फोन आया कि क्या ‘नैनीताल समाचार’ बंद हो रहा है? मैं खुद भी इस खबर को सुन कर हैरान हुआ. नैनीताल लौटकर फेसबुक टटोला तो काफी बाद में महेश जोशी की खबर के साथ एक बहुत अशिष्ट भाषा में लिखी पोस्ट पर नजर पड़ी. मुझे लगता है, यह पोस्ट एकदम व्यक्तिगत दुराग्रहों के आधार पर लिखी गयी है, ठीक ही हुआ कि इसे व्यापक प्रचार नहीं मिला. जहाँ तक ‘नैनीताल समाचार’ और राजीव लोचन साह का प्रश्न है, आज के दिन इन दोनों के बिना नैनीताल ही नहीं, उत्तराखंड की जागरूक पत्रकारिता की कल्पना नहीं की जा सकती.

इसके शुरुआती दिनों से ही मैं राजीव को सताता रहा हूँ, बल्कि कहना चाहिए, उकसाता रहा हूँ. एक अंक तो इसका मैंने भी सम्पादित किया है. मुझे हमेशा लगता रहा है कि एक क्षेत्रीय अख़बार के रूप में ही नहीं, एक जागरूक पत्रकारिता के प्रतिमान के रूप में यह अख़बार हिंदी पत्रकारिता में याद किया जायेगा. (राजेन्द्र यादव का जब भी फोन आता था, वे ‘नैनीताल समाचार’ का जरूर जिक्र करते थे.) एक छोटी जगह से, जहाँ हर छोटी-सी बात को भी व्यक्तिगत आक्षेप के रूप में लिया जाता हो, इतना जिंदादिल और निष्पक्ष समाचार-पत्र निकाल ले जाना छोटी बात नहीं है.

मुझे इस अख़बार की सबसे बड़ी बात यह लगती है कि इसके संपादक ने कभी भी इसे अपने प्रचार के लिए इस्तेमाल नहीं किया. (अगर मैं गलत नहीं हूँ तो यह बात उन्होंने निश्चय ही शैलेश मटियानी से सीखी होगी) हाल के अंकों में संपादक के नाम से टिप्पणियां दिखाई देने लगी हैं, पहले तो वह अपनी बात छद्म नाम से या दूसरों के नाम से लिखा करते थे. यह इस अख़बार की निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता ही है कि किसी ज़माने में इस अख़बार को लोग शेखर पाठक और गिर्दा का अख़बार समझते थे. आज इन दोनों बड़ी प्रतिभाओं की जो राष्ट्रीय स्तर की पहचान बनी है, उसमें इस समाचार पत्र के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. नैनीताल के रहने वाले हम सब जानते हैं कि इस अख़बार के लिए किस तरह राजीव ने मांग-मांग कर पैसा एकत्र किया है. ऐसे व्यक्तित्व के लिए ओछी बातें शोभा नहीं देतीं, बल्कि ये खुद की ही संस्कारहीनता दर्शाती हैं.

बटरोही जी की फेसबुक वॉल से.

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‘नैनीताल समाचार’ बंद होने की आहट से अब नये सिरे से घर से बेदखली का अहसास हो रहा है

पलाश विश्वास

मुझे बहुत चिंता हो रही है नैनीताल और ‘नैनीताल समाचार’ को लेकर। इससे पहले राजीव नयन बहुगुणा ने ‘नैनीताल समाचार’ बंद होने की आहट लिखकर चेतावनी के साथ इसे बचाने की अपील भी की है। अब डीएसबी कालेज में हिंदी विभाग के अद्यक्ष रहे प्रख्यात साहित्यकार बटरोही जी ने फिर ‘नैनीताल समाचार’ पर लिखा है। ‘नैनीताल समाचार’ न होता तो अंग्रेजी माध्यम से बीए पास करने वाला मैं अंग्रेजी साहित्य से एमए करते हुए हिंदी पत्रकारिता से इस तरह गुंथ न जाता।

यह सही है कि गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी की प्रेरणा से हाई स्कूल पास करते ही मैं बांग्ला के साथ हिंदी में भी लिखने लगा था।लेकिन तब मैं कविताएं और कहानियां लिख रहा था।दैनिक पर्वतीय में भी मैं कविताएं ज्यादा लिखा करता था और कभी कभार पन्ना भरने के मकसद से धीरेंद्र शाह के कहने पर टिप्पणी वगैरह कर देता था। जनपक्षधर पत्रकारिता की दीक्षा मेरी नैनीताल समाचार में ही हुई। शेखर पाठक और गिरदा से मैंने रपटें लिखनी सिखी।

कितने लोग उस टीम में थे। विपिन त्रिपाठी और निर्मल जोशी, जो बाद में हाईकोर्ट के वकील बने, दिवंगत हो गये। भगत दाज्यू दिवंगत हो गये। षष्ठीद्तत भट्ट नहीं रहे। शेरदा अनपढ़ नहीं रहे। उप्रेती जी नहीं रहे। गोविंद पंत राजू बड़े पत्रकार बन गये तो धीरेंद्र अस्थाना बड़े सहित्यकार। कैलाश पपनै भी नैनीताल समाचार से जुड़े थे तो दिवंगत सुनील साह और प्रमोद जोशी भी। वाया गिरदा देशभर के रंगकर्मी भी हमसे जुड़े रहे हैं। शेखर जोशी से लेकर शैलेश मटियानी तक सारे लोगं से नैनीताल समाचार की वजह से घरेलू संबंध बने। नैनीताल समाचार की वजह से महाश्वेता देवी हमें कुमायूंनी बंगाली कहती लिखती रहीं।

हरीश पंत और पवन राकेश नैनीताल में और लखनऊ से नवीन जोशी व्यवस्था की कमान संभाले रहते थे। सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट, ज्ञान रंजन, वीरेन डंगवाल, देवेन मेवाडी, पंकज बिष्ट से लेकर हिंदी साहित्य के तमाम लोग और हिमालय से हर शख्स नैनीताल समाचार से जुड़ा था। उमा भट्ट से लेकर उत्तराखंड की कितनी महिला कार्यकर्ता, शमशेर सिंह बिष्ट की अगुवाई में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के तमाम कार्यकर्ता जिनमें मौजूदा मुख्यमत्री हरीश रावत, सांसद प्रदीप टमटा, राजनेता राजा बहुगुणा और पीसी तिवारी किसका नामोल्लेख करुं और किसका न करुं।

नैनीताल के तमाम रंगकर्मी जहूर आलम की अगुवाई में नैनीताल समाचार से जुड़े थे तो डीएसबी कालेज के हर अध्यापक का जुड़ाव नैनीताल समाचार से था। इनमें से चंद्रेश शास्त्री तो दिवंगत हो गये। फेड्रिक स्मैटचेक भी नहीं रहे। बटरोही जी हैं। अजय रावत जी से अब बहुत दिन हुए हमारा संपर्क नहीं रहा। नैनीताल समाचार हर मायने में नैनीताल, उत्तराखंड और हिमालय का प्रतिनिधित्व करता रहा है। उसके बिना न नैनीताल और न हिमालय की कोई कल्पना कर सकता हूं।

नैनीताल समाचार को हम गिरदा जैसे लोगों की विरासत कह सकते हैं लेकिल इसे संपादक राजीव लोचन शाह का निजी उद्यम न माने तो बेहतर हो। चिपको आंदोलन से लेकर पहाड़ के जीवन मरण के हर मसले को लगातार संबोधित करने का यह सिलसिला बंद हो जायेगा तो यह न सिर्फ हिमालयी जनता का, बल्कि हिंदी पत्रकारिता का भारी अपूरणीय नुकसान होगा। हम नैनीताल समाचार के माध्यम से ही लघु पत्रिका आंदोलन होकर समयांतर और समकालीन तीसरी दुनिया से जुड़े।

राजीवदाज्यू को मैं किशोर वय से जानता रहा हूं और वे सचमुच मेरे बड़े भाई रहे हैं। उनका परिवार मेरा परिवार रहा है और उनका घर मेरा घर रहा है। मैं जब भी पिछले 36 साल की पत्रकारिता में बसंतीपुर अपने घर गया तो नैनीताल हर हाल में जाता रहा है क्योंकि नैनीताल समाचार की वजह से हमेशा नैनीताल मेरा घर रहा है। अब नये सिरे से घर से बेदखली का अहसास हो रहा है।

लेखक पलाश विश्वास लंबे समय तक जनसत्ता कोलकाता में कार्यरत रहे और इन दिनों आजाद पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.

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उत्तराखंड का चर्चित और सरोकारी अखबार ‘नैनीताल समाचार’ बंद होगा

Rajiv Nayan Bahuguna : ‘नैनीताल समाचार’ के बंद होने की आहट सुन रहा हूँ. चार दशक से यह अखबार उत्तराखंड के किसी ढोली या पुरोहित की तरह हर सुख दुःख में नौबत और घंटी बजाता रहा है. मैं लगभग पहले अंक से ही इसका पाठक और यदा कदा लेखक भी रहा हूँ. कयी बनिये और लाले अखबार, मैगज़ीन, चैनल आदि घाटा उठाकर भी चलाते रहे हैं, चलाते रहेंगे. क्योंकि उसके जरिये वह अपने कई टेढ़े हुए उल्लुओं को सीधा करते हैं.

एक्टिविस्ट वणिक Rajiv Lochan Sah नि:संदेह इस लोकयज्ञ को घाटा सह कर चलाते रहे हैं, और इस अखबार के कारण उन्हें चाहे सामाजिक प्रतिष्ठा मिली हो, लेकिन आर्थिक-राजनैतिक रूप से उनके लिए यह घाटे का सौदा ही रहा है. आर्थिक और पारिवारिक कारणों से वह इसे बंद करने का अप्रिय निर्णय ले रहे हैं, तो इसके लिए उनकी भर्त्सना नहीं की जा सकती. आखिर वह कोई हातिमताई नहीं हैं, जो अपने चूतडों का गोश्त काट कर जनता को खिलाते रहें.

उस प्रतिष्ठान में कार्यरत महेश जोशी का विस्थापन अवश्य चिंता का विषय है, और उनका पुनर्वास अकेले साह की नहीं, अपितु हम सबकी ज़िम्मेदारी है.. मैं अपने स्तर पर मदद करूंगा. मित्रों को भी प्रेरित करूँगा. आप भी करिए.

वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी और एक्टिविस्ट राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से. इस स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Kamlesh Bhatt जरूर चार दशक अपने आप में इतिहास हैं

Jayprakash Panwar Its a sad news for me too……I started my journalism carrier with Nainital Samachar in 1988……It should be online e paper now but who will take responsibilities this is a big question. I think Shah ji should think about it…..

Jitendra Anthwal Uttarakhand Ka Durbhagya Hai Ki Bahar Ke File Copy Wale Gairbhashi Akhbar Bhi Is Rajya Mein Falful Rahe Hain Aur Dusari Taraf Nainital Samachar Jaisi Dharohar Khatm Ho Rahi Hai. Uttarakhand Ke Tamam Sangharsho Aur Hr Sukh-Dukh Ke Sakshi Rahe Nainital Samachar Ko Bachaya Jana Jaruri Hai, Vrna Ek-Ek Kr Khatm Ho Rahe Pahad Ke Mool Akhbaro Ke Baad Nayi Pidhi Ke Samne Jo Hoga Wo Hamar Nahi Hoga…..

Sanjay Kothiyal Nainital samachar uttrakhand ki patrakarita ki samridh virasat ko aage baraane wala saathi rshs he.

Dhananjay Singh दुखद है. ई-पेपर के रूप में बचा रहना चाहिए.जानकार लोग शाह जी की मदद करें

Devendra Budakoti Shahji should call for fresh renewal of subscription.

Sanjay Kothiyal Janpaksh ko rakhne wale ab bache hi kitne akhbaar hain. Aaj jabki har second aur har line biki hui he ese me yah khabar vichlit kar rahi he. Rajiv da ko nirnay lene me jaldbaazi nahin karni chaahiye.

Deepak Chand कई छिपे हुई पाक्षिक मासिक ऐसे ही सहीद होते गए है जैसे बिग बाज़ार माल के बगल में पान का खुमचा कब गयब हो जाता है किसी को पता नहीं चलता 🙁

Dinesh Semwal इस अखबार को चलाने की जिम्मेदारी अब आपको स्वयं संभालनी होगी तभी आपकी क्षमता का भी पता चल सकेगा वरना लाला की नौकरी ताे सभी कर लेते हैं।

Joy Prakash Bisht इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। येसे मुकाम़ बन जाते हैं जब सतत् प्रयास भी थम जाता है।

Dataram Chamoli इस समाचार पत्र का बंद होना जनता के लिए बहुत ही दुखद खबर होगी।

Hari Mohan Bhatt कुछ करना चाहिऐ..!! मेरा पहला अखबार था नैनीताल समाचार..!! क्या सरकार से मदद मिल सकती है?

Rupesh Kumar Singh पूंजीवाद के दौर में सहकारिता पर टिकी व्यवस्था और कितने दिन चलेगी ? सच है तो सही नहीं है । राजीव दा, महेश दा, यह मैं क्या सुन रहा हूं. नैनीताल समाचार को पढ़ने लिखने का पुराना वास्ता है । सहकारिता पर चलने वाला संस्थान बंद करने का निर्णय किसका है? क्या इसके लिए आम राय ली गयी? नहीं तो यह फैसला सहकारिता के सिद्धांत के खिलाफ है।

Vijay Narayan Uniyal जब जब तकनीक विकसित होती है पुरानी तकनीक समाप्त होती जाती है। उदाहरण के लिए कलम लकड़ी की फिर निब होल्डर फिर स्याही भरने वाला पेन फिर रिफिलिंग फिर जाटर तमाम। इसी तरह अन्य चीजों मे भी है। ग्रामोफोन से आधुनिक 3d. स्वचालित तकनीक ब्लूचिप। वायरलेस लैंडलाइन से एन्डोयड फोन। वायरलेस से वटसअप। इसी प्रकार अखबार पत्रिका न्यूज चैनल टीवी कम्प्यूटर मे बदलते गये है। किसी ऐतिहासिक चीज का समाप्त होना व्यक्ति और समाज के लिए सोचनीय तो है परन्तु तेजी से हो रहे परिवर्तन को अपनाना अनिवार्य हो जाता है। इतना किया जा सकता है कि पुरानी चीज के विकल्प मे जो चीज नयी आ रही है उनको प्राथमिकता से आबंटित हो जिन्हे पुराना अनुभव है। जैसे इस केस मे शाह सर को टीवी चैनल सीरियल आबंटित किये जाये। सुझाव है।

Chandan Bangari सरोकारी पत्रकारिता की पहचान नैनीताल समाचार के बंद होने की खबर बड़े आघात से कम नहीं है। मैं स्तब्ध हूँ। पत्रकारिता का क मैंने इसी अख़बार से सीखा। हर महीने महेश दा का फ़ोन आ जाता कि तुम लिखते नहीं हो। कुछ समय समाचार के लिए भी निकालो। मगर परिस्थितियां चाहे जो भी रही हो मगर ये बहुत बुरी खबर है।

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रामदेव की दवाएं और सामान न खरीदने के लिए तर्क दे रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा

Rajiv Nayan Bahuguna : क्यों न खाएं रामदेव की दवा… मैं कोई रसायन शास्त्री अथवा कीमियागर नहीं हूँ, अतः अपने सामान्य बुद्धि विवेक का प्रयोग कर मित्रों को सलाह देता हूँ कि रामदेव के किसी भी उत्पाद का इस्तेमाल न करें, अपितु बहिष्कार करें।

1:- रामदेव का व्यक्तित्व संदिग्ध है। किसी संदिग्ध व्यक्ति से असन्दिग्ध और शुद्ध उत्पाद की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

2:- भगवा बाना पहनने वाला व्यक्ति यदि राजनीति, विज्ञापन, प्रचार, विमान, अकूत धन सम्पदा के फेर में पड़े, तो वह स्वतः ही कोई ठग, मायावी अथवा बुरी नीयत वाला व्यक्ति है। साधुवेश में सीता हरण करने वाले रावण का प्रतीक ग्रहण करें।

3:- एक सन्यासी अग्नि वर्ण के चीवर पहनने से पहले स्वयं ही अपना श्राद्ध करता है। अर्थात हर प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। भगवा वस्त्र छोड़ कर स्वप्न में भी सन्यासी कोई अन्य वस्त्र धारण करे, तो वह स्वतः ही सन्यास च्युत हो जाता है, यह आद्य शंकराचार्य की देशणा है। सन्यासी माइनस 30 डिग्री तापमान में भी कोई अन्य वस्त्र नहीं पहनते, चाहे जान चली जाए। लेकिन व्यर्थ के प्राण भय से ग्रसित हो रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में क्या किया था, सभी जानते हैं।

4:- झूठ बोलना कलयुग में मानव स्वभाव है। हम सभी बोलते हैं। लेकिन सन्यासी झूठ बोलने लगे तो धर्म का कौन हवाल। इन दोनों ने बाल किसन की फ़र्ज़ी डिग्री को लेकर साफ़ झूठ बोला।

5:- मेरे मित्र और टिहरी बाँध आंदोलन में साथी रहे राजीव दीक्षित दुर्योग से रामदेव के फेर में पड़ गए। बीमार हुए तो मैंने उन्हें राम देव की नीम हकीमी छोड़ उचित उपचार की सलाह दी। नहीं माने। मर गए।

6:- धर्म निरपेक्षता, लोकतन्त्र और समतावाद के मूल्यों में विश्वास करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए रामदेव की दवा ज़हर के समान है। गांधी अंग्रेजी दवा को छूते तक नहीं थे, क्योंकि अंग्रेजी सभ्यता के विरुद्ध थे।

यह पोस्ट सिर्फ विवेक शील मनुष्यों के लिए है, भक्तों के लिए नहीं। भक्त गण मज़े से रामदेव की दवा खाकर अनुलोम विलोम करें। अपने खाते में आ चुके 15 लाख रोकड़े का प्रबन्धन करें। इस पोस्ट पर मुझसे फ़ालतू हुज़्ज़त न करें।

अब बात थोड़ी पहाड़ की और गर्मियों में आने वाले मैदानी भाइयों के लिए…. जब गर्मी सताये, तो कम्प्यूटर पर बैठ बर्फ़ के चित्र देखो। बार बार पहाड़ न जाओ। जब जाओ तो वहां तमीज़ से रहो। धमाल न मचाओ। प्लास्टिक, पॉलीथिन और अपने मन की गन्दगी वहां न छोडो। गर्म कपड़े वहीं के स्थानीय अभिक्रम से निर्मित खरीदो, और भोजन भी स्थानीय करो। चाउमिन न खाओ। बिसलेरी न पीओ। पहाड़ के हर झरने का पानी मिनरल वाटर है। रामदेव के झांसे में आकर उसकी चीजें मत खरीदो। जब पहाड़ भी गर्म और कलुषित हो जाएंगे, तो कहाँ जाओगे।

जहाँ तक सम्भव हो कार की बजाय बस से जाओ। गाड़ी तेज़ न हांको। हॉर्न कम बजाओ। पहाड़ी नदी में गहरे न उतरो। सेल्फ़ी लेते वक़्त बन्दर और चिंपैंजी जैसी शक़्ल न बनाओ। वहां के लोक देवताओं का सम्मान करो। ये गैर साम्प्रदायिक और सरल होते हैं। इनका सांस्कृतिक महत्व भी है। मसूरी, नैनीताल की अपेक्षा ग्वालदम, गैरसैण, सोमेश्र्वर, जगेश्र्वर, चोपता, पंवाली जाओ। मसूरी-नैनीताल में ठग्गू का समोसा बिकता है, छोटी जगहों पर प्यार और सम्मान मिलेगा। निन्देह यहां लड़कियां छेड़ोगे और नंगा नाच करोगे, तो बुरे पिटोगे। भागने का कोई रास्ता नहीं रहता। जिस रास्ते से आये हो, उसी से जाना भी पड़ता है। हरिद्वार या देहरादून अथवा हल्द्वानी में कभी नाइट स्टे मत करो। कुछ आगे बढ़ कर ही छोटी, लेकिन सौम्य बस्तियां मिलेंगी।

और अंत में पुनः नेक सलाह। राम देव का उत्पाद कभी न खरीदना। वह विज्ञापन का मायावी है, और कुछ नहीं।

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.

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एक बार कमला पति त्रिपाठी के कहने पर हेमवती नंदन बहुगुणा भांग खा कर चित भी हुए थे

Rajiv Nayan Bahuguna : दरअसल इंदिरा गांधी और हेमवती नन्दन बहुगुणा में सन्देह के अंकुर 10 साल पहले ही पनप चुके थे, जिन्हें उनके उद्दंड, दबंग और अशिष्ट पुत्र संजय गांघी ने बाद में खाद पानी दिया। 1971 में कांग्रेस की शानदार जीत के उपरान्त बहुगुणा को उम्मीद थी कि पार्टी विभाजन और फिर राष्ट्र पति के विकट चुनाव में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के चलते इंदिरा गांधी उन्हें केंद्र में ताक़तवर मंत्री बनाएंगी। लेकिन उन्हें मात्र संचार राज्य मंत्री बनाया गया, वह भी अधीनस्थ। क्योंकि वह पहली बार सांसद बने थे। इससे रूठ कर बहुगुणा कोप भवन में चले गए और 15 दिन तक चार्ज नहीं लिया। हार कर और कुढ़ कर इंदिरा गांधी ने उन्हें मंत्रालय का स्वतन्त्र चार्ज तो दे दिया पर मन में गाँठ पड़ गयी। इधर बहुगुणा भी अपनी बड़ी भूमिका की तलाश में थे, जो नियति ने उन्हें प्रदान कर दी।

उत्तर प्रदेश के धोती धारी महंत किस्म के बूढ़े मुख्य मंत्री कमला पति त्रिपाठी बुरी तरह फेल हो चुके थे। पुलिस वाले हड़ताली बन अपने हथियारों समेत सड़कों पर थे। यह एक अभूतपूर्व स्थिति थी। ऐसे में इंदिरा गांधी के चाटुकार एवं विश्वास पात्र ज्ञानी ज़ैल सिंह ने बहुगुणा को प्रदेश की कमान सौंपने की सलाह दी। इंदिरा ने आशंका व्यक्त की कि यह जगजीवन राम का आदमी है। इस पर बुद्धिमान चाटुकार दरबारी ने उत्तर दिया कि हम सत्ता के लोभी राजनेता किसी के नहीं होते। आप इसे मुख्य मंत्री बना दो, तो तुरन्त आपका बन जाएगा। उधर कमला पति त्रिपाठी एक घोर जातिवादी नेता थे। उन्हें लगता था कि प्रदेश की ब्राह्मण विरोधी लॉबी ने उन्हें हटवाया है। पद से हटने पर वह आहत तथा अपमानित महसूस कर रहे थे, तथा अपनी जगह अपनी पसन्द का मुख्य मंत्री चाहते थे। लेकिन उनकी हालत केले के छिलके पर रपट पड़े उस बूढ़े जैसी दयनीय और हास्यास्पद थी, जो खुद उठ न पा रहा हो। बहुगुणा अपने पिता के सिवा सिर्फ उन्हीं के पैर छूते थे।

दोनों के पुराने रिश्ते थे। एक बार त्रिपाठी के कहने पर बहुगुणा भांग खा कर चित भी हुए थे। अतः उन्होंने भी बहुगुणा की सिफारिश की। ऐसा कर दिया गया। बहुगुणा ने आते ही प्रदेश के हालात सम्भाले और छह महीने बाद प्रदेश में अधमरी हो चुकी कांग्रेस को चुनाव भी जिता दिया। यहां तक कि प्रदेश में विपक्ष के महान दिग्गज चन्द्र भानु गुप्त की छल बल से ज़मानत भी ज़ब्त करवा दी। चन्द्र भानु गुप्त उनसे पूछते थे- रे नटवर लाल, हराया तो ठीक, लेकिन ज़मानत कैसे ज़ब्त करायी मेरी, यह तो बता। बहुगुणा का जवाब था- आपकी ही सिखाई घातें हैं गुरु देव। मैंने भी बहुत बाद में एकाधिक बार उनसे यह रहस्य जानना चाहा। “तुम्हें कभी यह अवश्य बताऊंगा”, उनका जवाब होता, लेकिन उससे पहले वह मर गए।

वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.

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वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा होंगे उत्तराखंड के नए सूचना आयुक्त

बड़ी खबर उत्तराखंड से आ रही है. वरिष्ठ, फक्कड़ और बेबाक पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा उत्तराखंड के नए सूचना आयुक्त होंगे. वे विनोद नौटियाल की जगह लेंगे. राजीव नयन बहुगुणा कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. वे जाने-माने पर्यावरविद सुंदरलाल बहुगुणा के सुपुत्र हैं. घुमक्कड़ और फक्कड़ स्वभाव के राजीव नयन बहुगुणा अपने बेबाकबयानी के लिए जाने जाते हैं. 

जनपक्षधरता और जनसरोकार के प्रति आग्रही राजीव नयन बहुगुणा के सूचना आयुक्त बनने से ये माना जा रहा है कि उत्तराखंड की जनता को लाभ होगा और आरटीआई आंदोलन मजबूत बनेगा. राजीव नयन बहुगुणा अच्छे गायक के साथ-साथ बांसुरी और हारमोनियम वादक भी हैं. देखिए उनका संगीतमय रूप.. होली गीत गाते राजीव बहुगुणा को सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: https://www.youtube.com/watch?v=XDL5JsXLko8

इस शीर्षक पर क्लिक कर राजीव के एक अन्य संगीतमय रूप को देख सुन सकते हैं:  राजीव नयन बहुगुणा की बांसुरी और माधो दास की उदासीनता


(अपने पिता जाने-माने पर्यावरणवादी सुंदरलाल बहुगुणा के साथ वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा.)


 

राजीव नयन बहुगुणा द्वारा फेसबुक पर लिखे गए कुछ आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक कर सकते हैं…

Qamar Waheed Naqvi अंध विश्वासी भी थे, तंत्र तो नहीं, पर मन्त्र पर विश्वास करते थे!

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अगर कोई खेमा था तो वह राजेंद्र माथुर का था और एसपी उसी के अंदर थे : कमर वहीद नकवी

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ढोंगी सतपाल महाराज और सात्विक मोरारी बापू

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जब टिकट के लिए उदयन शर्मा को अर्जुन सिंह के चमचों की कार का दरवाज़ा खोलना पड़ा था…

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नेता जिस तरह कुत्ता, तोता, गाय या गुंडे पालता है, उसी तरह पत्रकार भी पालता है

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गिर्दा के जन्मदिन पर राजीव नयन बहुगुणा ने फैज का गीत ‘हम देखेंगे…’ सुनाया

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मेरे पिता अनशन पर थे और उस समय मीडिया इतना बाजारू नहीं हुआ था

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मुझे धन दोहन की नयी राह मिल गयी और मैंने उन्हें दो-तीन बार फिर ठगा

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बनिया चाहे संन्यासी भी हो जाए, वह अपना वणिक धर्म नहीं छोड़ता

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नभाटा के मेरे उत्तराखंडी वरिष्ठों ने अंग्रेज़ी के पर्चे में नकल करवा कर मुझे पास करा दिया

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ढंग से समझ लीजिए, बादल फटने जैसी कोई चीज़ नहीं होती

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उत्तराखंड जैसी आपदा में फंस जाएं तो इन बातों को जरूर ध्यान रखें…

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राहत के नाम पर कपड़े, पैसे, खाना न भेजें, वह जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा

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उन जैसा सज्जन, सीधा, झूठा, दिल का साफ़ और कलाकार संघी पत्रकार मुझे और कोई नहीं मिला

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अगर कोई खेमा था तो वह राजेंद्र माथुर का था और एसपी उसी के अंदर थे : कमर वहीद नकवी

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी राजीव नयन बहुगुणा इन दिनों ‘मेरे संपादक – मेरे संतापक’ शीर्षक से एक सीरिज लिख रहे हैं, फेसबुक पर. इसमें अपने करियर के दौरान मिले संपादकों के बारे में अपनी समझ और अनुभव के हिसाब से रोचक तरीके से कथा लेखन कार्य करते हैं. इसी सीरिज के तहत वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी के बारे में वो आजकल लिख रहे हैं. राजीव ने अपनी ताजा पोस्ट में लिखा कि नकवी सुरेंद्र प्रताप सिंह खेमे के थे. इस बात पर खुद नकवी ने आपत्ति की और विस्तार से राजेंद्र माथुर व एसपी सिंह के बारे में लिखा. साथ ही खेमे को लेकर स्पष्ट किया कि कौन किस खेमे में था, अगर कोई खेमा था तो. राजीव नयन बहुगुणा और कमर वहीद नकवी के रोचक लेखन को आप यहां नीचे पढ़ सकते हैं. नकवी जी ने अपनी बात कई अलग-अलग टिप्पणियों के जरिए रखी है, जिसे एक साथ यहां जोड़कर दिया जा रहा है.

Rajiv Nayan Bahuguna :  कमर वहीद नकवी यद्यपि राजेंद्र माथुर की कल्पना के पुरुष थे बट वह विधि वश दूसरे खेमे में भर्ती हो गये। माथुर कहते थे कि मैं एक श्रेष्ठ पत्रकार में एक संत का दर्शन करता हूँ। वह संत नकवी थे पर माथुर और नकवी एक दूसरे को कभी ढंग से जान ही नहीं पाए। नकवी सुरेन्द्र प्रताप सिंह के खेमे के थे, और खुद को बहुत बड़ा तीसमार खान, रन नीतिकार और सूरमा समझते थे, लेकिन थे निरे पत्रकार। अगर बगैर हेलमेट कोई पुलिस वाला चालान काट दे, तो बगलें झांकने लगते थे। यानी की सिर्फ पत्रकार थे, बाकी खुद के बारे में डींग हांकते थे। अगर घर में गैस खत्म हो जाए तो थानेदार को फोन नही करते थे, चटक शर्ट पहन कर हमें लेक्चर देते थे।

टिहरी से देहरादून की धूल और थकान भरी यात्रा के उपरान्त Qamar Waheed Naqvi ने यकायक मेरी जंघा पर धौल जमाई। मैं विस्मित हो गया, क्योंकि अब तक मेरी जांघ पर हथेली रखने का अधिकार सिर्फ मेरे आत्मज और मेरे पिता को था। नकवी बोले- अगर बुरा न मानें तो आपसे एक निवेदन करूं। मैं सम्म्झ गया कि वह मेरी अत्यधिक मद्यपान की प्रवृत्ति पर कुछ कहने वाले हैं। मैंने अपना सर कार की अगली सीट के सोफे पर टिका दिया और अपनी दोनों भुजाएँ अपने सर के नीचे रख दीं। अब नक़वी सिर्फ इतना बोले- ”जब आप पहले पीते थे तो पता नहीं लगता था। अब जरा सा पीने के बाद भी आपकी आवाज़ लहरा जाती है।” मैं चुप रहा तो आधे मिनट के सुकूत के बाद बोले- ”क्या आपको एम्बेसेडर कार में ही यात्रा करना पसंद है?” यह एक शिक्षक का मनोवैज्ञानिक उपचार था, जो मुझ जैसे कितनों को ही ऊँगली पकड़ के चलना सिखा चुका था।

Qamar Waheed Naqvi : राजीव नयन बहुगुणा जी, मैं कभी चाहता नहीं था कि अपने बारे में कुछ लिखूँ. मैंने कभी चाहा नहीं कि मेरे जीवन में कब, क्या और कैसे बीता, यह किसी को बताऊँ या लिखूँ. दुनिया को क्या लेना-देना एक अदना-से आदमी के जीवन से? लेकिन आप कुछ ऐसा लिख रहे हैं, जो हो सकता है कि आपका सत्य हो, जैसा आपने देखा हो या जैसा आपको दिखा हो या जैसा आपने समझा हो. पर ज़रूरी नहीं कि सत्य वैसा ही हो. मैं कभी किसी ख़ेमे में रहा नहीं और कभी मैंने अपना कोई ख़ेमा बनाया नहीं. कुछ लोगों के प्रति ज़्यादा श्रद्धा हो सकती है, कुछ लोग किन्हीं मामलों में ज़्यादा प्रभावित कर सकते हैं, कुछ लोगों से स्वभावतः ज़्यादा निकटता हो सकती है, कुछ लोगों से मित्रता और कुछ से अति मित्रता हो सकती है. इसका मतलब यह नहीं कि मैं या कोई उनके ख़ेमों में गिना जाय!

हो सकता है कि आप ख़ेमे की परिभाषा के बिना किसी को देख पाने में दिक़्क़त महसूस करते हों, लेकिन कुछ लोग किसी खाँचे में फ़िट नहीं किये जा सकते! मैं भी ज़रा बेतुका हूँ और दुनिया की सामान्य परिभाषाओं, पैमानों और दृष्टि में कभी फ़िट नहीं होता. वैसे आप अपनी कोई भी राय बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन तथ्य सही होने चाहिए. मेरा जीवन केवल उतना ही नहीं, जितना आपने मुझे जयपुर में देखा है. मैं जयपुर के बहुत पहले भी था और उसके बहुत बाद भी हूँ. एसपी मेरे बहुत पसन्दीदा थे, लेकिन राजेन्द्र माथुर और एसपी की तुलना नहीं की जा सकती. माथुर जी जैसा व्यक्ति करोड़ों में कोई एक होता है. वह मेरे परम-परम श्रद्धेय हैं और सदा रहेंगे. उनके जैसा पत्रकार और इनसान मैंने उनके अलावा अपने साठ सालों के जीवन में कोई दूसरा नहीं देखा.

दूसरी बात यह कि मेरा करियर बनाने में दो सम्पादकों का सबसे बड़ा योगदान है, उनमें से एक हैं आनन्द जैन, जो 1980 में नवभारत टाइम्स के सम्पादक थे और ट्रेनी जर्नलिस्ट की भर्ती के लिए जिन्होंने मेरा पहला इंटरव्यू किया था और मुझे चुन कर फाइनल इंटरव्यू के लिए मुम्बई भेजा था. और फाइनल इंटरव्यू के बाद हिन्दी में मैं अकेले चुना गया था. दूसरे सम्पादक हैं राजेन्द्र माथुर, जो 1982 के अन्त होने के कुछ पहले नवभारत टाइम्स के प्रधान सम्पादक बने थे. उनसे मेरा परिचय संयोगवश ही हुआ था. 30 या 31 दिसम्बर 1982 को वह पहली बार नभाटा सम्पादक के तौर पर मुम्बई आये थे. 1 जनवरी 1983 को जब मैं दफ़्तर पहुँचा, तब पता चला कि माथुर जी मेरे बारे में कई बार पूछ चुके थे. कारण यह कि उन्हें मेरी लिखी यह ख़बर बहुत पसन्द आ गयी थी कि मुम्बई ने पिछली रात नया साल कैसे मनाया. उस परिचय के कुछ महीनों बाद जब पता चला कि लखनऊ से नवभारत टाइम्स शुरू होनेवाला है, तो मैंने इच्छा जतायी कि मैं नये अख़बार में काम करके सीखना चाहता हूँ और उन्होंने बड़ी जद्दोजहद कर मुझे लखनऊ भिजवा दिया….

एसपी से मेरी पहली मुलाक़ात मुम्बई में हुई, जब मैं ट्रेनी ही था और वह रविवार के सम्पादक. बाद में नभाटा, लखनऊ में काम करने के दौरान भी एकाध बार उनसे मुलाक़ात हुई, लेकिन यह मुलाक़ात बढ़ी 1986 के बाद, जब मैं चौथी दुनिया में काम करने दिल्ली आया, उन दिनों माथुर जी नभाटा के प्रधान सम्पादक और एसपी कार्यकारी सम्पादक थे. बाद में 1989 में माथुर जी और एसपी ने तय किया कि मुझे और रामकृपाल जी को फिर नभाटा लखनऊ जा कर उस अख़बार को सम्भालना चाहिए और इस तरह हम दोनों (मैं और रामकृपाल) एक बार फिर लखनऊ काम करने पहुँचे. यह वह दौर था, जब मैंने पहली बार एसपी के निर्देशन में काम किया.

तो अगर कोई खेमा था तो वह राजेन्द्र माथुर का खेमा था और सच यह है कि एसपी उसी खेमे के अन्दर थे, वह कभी उसके बाहर नहीं रहे. हालाँकि बहुत-से लोग एसपी-राजेन्द्र माथुर को अलग करके देखते रहे, लेकिन जहाँ तक मेरी समझ है राजेन्द्र माथुर और एसपी दोनों एक-दूसरे के पूरक थे और एक-दूसरे में बहुत-सी चीज़ें जोड़ते थे और अगर वे दोनों कुछ और दिन एक साथ काम कर पाते को बहुत कुछ उन्होंने कर दिखाया होता. माथुर जी के असामयिक निधन के कारण यह जोड़ी टूट गयी. एसपी का जो योगदान हिन्दी के उस समय के पत्रकारों को है, वह भी अप्रतिम है और हमारे जैसे लोग एसपी के तेवर, ख़बरों पर उनकी ज़बर्दस्त पकड़, निर्भीकता, बेबाकी के क़ायल थे और वह हमारे लिए प्रेरणा के बहुत बड़े स्रोत थे. राजीव नयन बहुगुणा जी, आप लिखें जो लिखना चाहें, लेकिन राजेन्द्र माथुर और एसपी इतने बड़े हैं कि ये किसी ख़ेमेबाज़ी के मुहताज नहीं है.

रहस्य मेरे कोई नहीं हैं. और किसी के ‘रहस्यों’ की ओर ध्यान देने का न कभी स्वभाव रहा, न फ़ुर्सत. केवल इतना कहना चाह रहा हूँ कि जो लिखें, वह सुनी-सुनाई थ्योरी न हो. जो अवधारणा आपने बनायी हो, उसे लिखने के पहले कुछ जानकार लोगों से भी बात कर लेते तो बात साफ़ होती. एसपी और माथुर जी के साथ काम करने वाले और उन्हें निकट से जानने वाले तमाम लोग अभी जीवित हैं. उनमें से बहुत-से लोग बहुत कुछ बता सकते हैं. दूसरे यह कि आपने मेरे साथ काम किया है. एक पत्रकार के तौर पर मैं आपकी संवेदनशील रिपोर्टिंग का बड़ा क़ायल रहा और आपको पसन्द भी बहुत करता था. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप मेरे खेमे में थे! हो सकता है कि बहुत-से लोग ऐसा समझते हों, हो सकता है कि आपको भी ऐसा ही लगा हो, लेकिन मेरा तो कोई खेमा था नहीं. न तब था, न कभी रहा. कथा तत्व रखिए, लेकिन वह सत्य के निकट हो. इसके लिए रिसर्च करनी होती है, यही आग्रह है. जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, स्कूटर मैंने कभी बिना हेलमेट के चलायी नहीं. इस मामले में बड़ा डरपोक हूँ. जान से खेलने लायक़ दुस्साहस नहीं है मुझमें!

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Qamar Waheed Naqvi अंध विश्वासी भी थे… तंत्र तो नहीं, पर मन्त्र पर विश्वास करते थे….

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Qamar Waheed Naqvi अंध विश्वासी भी थे… तंत्र तो नहीं, पर मन्त्र पर विश्वास करते थे….

Rajiv Nayan Bahuguna : कमर वहीद नकवी के शुभ नाम से मैं विज्ञ था। लेकिन अखबार की नौकरी में आने के बाद जब भी कोई उनका ज़िक्र करता, तो नकवी – राम कृपाल कहता। इससे मुझे लगा की शायद यह कोई आधुनिक सेकुलर है, जो गुरमीत राम रहीम सिंह टाइप नाम मिक्स करता है। बाद में विदित हुआ की यह सलीम – जावेद या नदीम – श्रवण टाइप जोड़ी है, और नकवी तथा राम कृपाल दोनों भिन्न व्यक्ति हैं। नकवी छींट की शर्ट पहनने वाले, क्षीण काय लेकिन भारी आवाज़ वाले व्यक्ति थे। मुंह में खैनी दाब कर चुप रहने वाले लेकिन अपनी गतिविधियों से एक मुखर व्यक्ति थे। उनसे मिलने के कुछ ही मिनट बाद मैं समझ गया की यह मुसलमान राजेन्द्र माथुर की जाति का है।

Qamar Waheed NaqviQamar Waheed Naqvi

बहुत कम बोलने वाले Qamar Waheed Naqvi से कुछ उगलवाना दुरूह था। वह एक तरह के मौनी बाबा थे। शब्दों की तरह पैसे में भी कृपण तो नहीं पर मितव्ययी थे। शराब वर्षों पहले तिलान्जित कर चुके थे, लेकिन भोजन भी सादा और शाकाहारी था। अपनी बचत के शब्द और धन यथा स्थान खर्च करते। एक बार एक दिवंगत मूर्धन्य लेकिन आर्थिक क्षीण पत्रकार की सहायता के लिए मैंने एक आयोजन किया। नकवी ने उसमें सभी राज पुरुषों और व्यवसायियों से बड़ी रक़म दे कर उन सबकी नाक काट ली। कभी मेरे साथ भी ढाबे या होटल में खाने बैठे, तो जी खोल कर खर्च करते थे।

एक उदार, वैज्ञानिक तथा तार्किक दृष्टिकोण से सज्जित Qamar Waheed Naqvi अंध विश्वासी भी थे। तंत्र तो नहीं, पर मन्त्र पर विश्वास करते थे। हमारे दफ्तर का एक अधेड़ और निपट घामड़ सब एडिटर उनके पास देर तक बैठ कर उनसे ग्रह नखत के बारे में बतियाता। उन्हें संभवतः मूर्ति पूजा पर भी विश्वास था। एक बार शिव जी का एक विग्रह खरीदने वह मेरे साथ देर तक संग तराशों की बस्ती में घूमे। गाड़ियों की बैटरी के बारे में चर्चा करना भी उनका प्रिय शगल था। बातों ही बातों में मैं इस निष्कर्ष पर पंहुचा कि उनके परिजन संभवत काशी में बैटरी का काम करते थे। खबर को चटपटा बनाने का हुनर उन्हें खूब आता था, लेकिन दूसरी ओर उनके भीतर कहीं सामाजिक प्रतिबद्धता भी गहरे पैठी थी। हिंदी के इस हद तक पंडित थे कि संस्कृत निष्ठ शब्दों से भी पार पा लेते, जब कि तब तक पत्रकारिता में भाषा का भ्रष्टाचार शुरू हो गया था और कुत्सित भाषा लिखी जाने लगी थी।

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी और यायावर राजीव नयन बहुगुणा द्वारा फेसबुक पर लिखे जा रहे ‘मेरे सम्पादक – मेरे संतापक’ सीरिज से. इस लिखे पर वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने अपनी तरफ से जो टिप्पणी / प्रतिक्रिया की है, वह यूं है….

Qamar Waheed Naqvi : तंत्र-मंत्र वाली बात तो मैं नहीं जानता और यह भी नहीं कह सकता कि किसने मुझे कितना जाना और समझा है. मैं आपको इतना कह सकता हूँ कि ज्योतिष में मेरी किसी समय बड़ी रुचि थी. जयपुर के जिस सज्जन के बारे में Rajiv Nayan Bahuguna ने लिखा है, वह उन दिनों मेरे साथ काम करते थे और ज्योतिष में उनकी रुचि भी थे, पेशेवर ज्योतिषी नहीं थे, ज्योतिष का अध्य्यन करते रहते थे. उनसे अकसर इसी विषय पर चर्चा होती थी. बाद में दिल्ली आने पर मैंने भारतीय विद्या भवन से दो वर्ष का ज्योतिष पाठ्यक्रम पूरा किया, एक साल स्वर्ण पदक के साथ और एक साल रजत पदक के साथ. उसके बाद पाँच-छह साल तक वहीं शोध कक्षाओं में रहा, ज्योतिष पर कुछ लेख भी लिखे जो श्री के. एन. राव के सम्पादन में वहाँ से निकलने वाली ज्योतिष पत्रिका में छपे भी. ये सभी बातें मेरे साथ काम कर चुके बहुत-से सहयोगियों को पता भी हैं और इसमें कुछ भी गोपनीय या छुपाने जैसा नहीं है. और, यह भी कि ज्योतिष अन्धविश्वास नहीं है, लेकिन सच यह है कि जो लोग अपने को ज्योतिषी बताते घूमते हैं, उनमें से 99.99% को ज्योतिष का आधा ज भी नहीं आता और वह अन्धविश्वास फैलाते फिरते हैं. ज़्यादातर पत्रकारों को भी इसकी कोई समझ नहीं है, इसलिए वह ऐसी बात कहते हैं. अन्यथा ज्योतिष पढ़ने के लिए सात-आठ जीवन का समय भी कम है! बहरहाल, अब ज्योतिष छूट चुका है क्योंकि नौकरी की व्यस्तताओं के कारण अध्ययन-अभ्यास हुआ नहीं और सब धीरे-धीरे छूट और भूल-बिसर गया.

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अगर कोई खेमा था तो वह राजेंद्र माथुर का था और एसपी उसी के अंदर थे : कमर वहीद नकवी

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