IFWJ के मधुबनी जिलाध्यक्ष पर पत्रकार पर हमला करने का आरोप

विषय : संगठन के मधुबनी जिला अध्यक्ष द्वारा गाली गलौज और जातिसूचक संबोधन के साथ जान से मारने की धमकी!

माननीय अध्यक्ष महोदय,

इन्डियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट

महाशय,

ज्ञात हो कि मधुबनी जिला से संगठन के अध्यक्ष के रूप में हेमंत सिंह नामित हैं, बीते दिनों फेसबुक पर उन्होंने कुछ तस्वीरों के साथ एक पोस्ट डाली। इसके माध्यम से उन्होंने खुद को एक्यूप्रेशर का डोक्टर होने की घोषणा कर लोगों से बधाई माँगा, लोगों ने बधाई दिया भी और उस पर टिपण्णी करने वालों में मैं भी शामिल था, तस्वीरों को देखते हुए मैं बधाई देते हुए उनसे कहा की मित्र ये डिप्लोमा है और डिप्लोमा के आधार पर किसी को डॉक्टरेट नहीं मिलता है कृपया पोस्ट को सुधार करें अन्यथा इस पोस्ट के आधार पर अप ही नहीं समूची पत्रकारिता कौम शर्मिन्दा होगी ! जिस प्रतिक्रया के एवज में पहले तो पोस्ट पर ही मुझ से गाली गलौज की गई!

दिनांक 20 जनवरी को जिले के पत्रकारों द्वारा खेलकूद के विषय में मीडिया की एक बैठक रखी गई थी जिसमें जिले के पत्रकार शामिल थे जहाँ अचानक से हेमंत सिंह का आगमन होता है और आते ही मेरे ऊपर हमला के साथ अभद्रता और शर्मनाक गाली गलौज की बौछार होने लगती है, पत्रकार भी शायद सन्न रह गए होंगे लेकिन मेरे तो कुछ समझ नहीं आया और मैं वाकई शून्य में चला गया. गालियों में माँ की पिता की बहन की बेटी की गलियों के बौछारों के बीच जान से मारने की धमकी के साथ कहा गया कि “ब्राह्मण है नहीं तो मुंह में जूता कोंच के मार देता”।

इस शर्मनाक वाकये के गवाह जिले के सभी पत्रकार ख़ामोशी से तमाशबीन बने रहे और हेमंत सिंह ने मर्यादा की सारी सीमा पार की, हाँ कुछ पत्रकारों ने जरूर हेमंत सिंह को पकड़ के रखा अन्यथा वो मुझ पर हमला कर चुका था.

माननीय, क्या संगठन गुंडों को संस्था का अध्यक्ष बनाता है? वैचारिक और संस्थागत सैधानित क्रियान्वयन को धुल धूसरित करने वाले अपराधिक प्रवृति के अध्यक्ष से क्या पत्रकारिता का संगठन पत्रकारों की आवाज़ बुलंद करना चाहता है, वाकई ये शर्मनाक है कि संगठन का जिला अध्यक्ष खबर नहीं लिख सकता, संगठन के लिए एक चिट्ठी नहीं लिख सकता, मगर दबंगता के साथ गैर पत्रकारिता के हर कार्य को संगठन के आड़ में जरूर अमली जामा पहनाता है. हेमंत सिंह ने अब वो अपने वाल से पोस्ट हटा चुका है मगर फिर भी मैं आपको उसके द्वारा पोस्ट किये गए आई कार्ड और प्रमाण पत्र को साझा कर रहा हूँ जिसमें आई कार्ड की वैधता 2019 तक है और प्रमाण पत्र 2017 का निर्गत है जो स्पष्ट करता है कि ये डिप्लोमा भी फर्जी है!

मैं हेमंत सिंह के व्यक्तिगत कार्यों और कृतित्वों पर सवाल नहीं उठा रहा। मैं हेमंत सिंह को आरोपित भी नहीं करूंगा क्यूंकि मेरा सवाल संगठन से उठेगा और उत्तर भी संगठन से ही उचित कार्यवाही के साथ अपेक्षित रखूंगा!

भवदीय
रजनीश के झा
सम्पादक, लाइव आर्यावर्त डॉट कॉम
+91-9899730304

आगे पढ़ें… आरोपी हेमंत सिंह का वर्जन…. नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें….

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Majithia : Registry has assured that the Case will be listed on the priority basis

Dear Comrades,

The office of the ‘Indian Federation of Working Journalists’ (IFWJ) has been inundated with innumerable telephone calls and emails to know as to why the date of hearing of the Majithia case, which was fixed on 17th January 2017, was not taken up? On the last of date of hearing i.e. 10th January the matter was listed for arguments on Legal Issues. The arguments remained inconclusive.

Thereupon the bench consisting of Justice Ranjan Gogoi and Justice Ashok Bhushan posted it for 17th of January 2017. We approached the listing branch of Registry to know the reason for deletion. We have been informed that some changes have been introduced for the listing of the cases by the Hon’ble Supreme Court in consultation with the Supreme Court Bar Association. Although it is very rare to delete any case if the date is fixed by the Bench itself, yet in certain circumstances it is done, as in this case it has happened.

As per the new policy of listing from Tuesday to Thursday very limited number of case would be taken up. For the time being only a few time consuming cases will be heard on these three days. Be that as it may, the Registry has assured that the Majithia Case will be listed on the priority basis because of its urgency.

Change of eminent lawyer by Ushodaya is perplexing

We would also like to inform that on the last date of hearing i.e. 16th of November 2016 Shri Gopal Subramanian was fielded by the Ushodaya Publications, the publishers of the Eenadu newspaper, and he had persuaded the Court with his uncommon skill to adjourn the case because he wanted some clarifications from his client. He had told the court in a most unequivocal and categorical manner that ‘implementation of Majithia means complete implementation and not the façade of implementation’. He had also assured the Court that he would prevail upon his client the Ushodaya Publications and particularly to its owner Mr. Ramoji Rao to comply with the orders of the Supreme Court by implementing the Majithia Recommendations in its letter and spirit. It was very reassuring for the employees but it appears that he (GS) has not been able to convince Mr. Ramoji Rao and, therefore, he decided to quit. Now he has been replaced by another Senior Advocate Shri Shyam Divan by the Ushodaya Publications.

This attitude of Ramoji Rao has completely exposed his duplicity, hypocrisy and his having two faces. The conduct of the other newspaper owners like Dainik Jagran, Dainik Bhaskar and Rajasthan Patrika is more appalling than Ramoji Rao and highly reprehensible to say the least. Therefore, we have to remain united to defeat the evil incarnates.

Parmanand Pandey
Secretary General
IFWJ

मजीठिया : रजिस्ट्री का आश्वासन जल्द सूचीबद्ध होगा मामला

यह जानने के लिए कि मजीठिया मामले की सुनवाई, जो 17 जनवरी को तय की गई थी, के तय तिथि पर ना हो पाने को लेकर इंडियन फैडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्ल्यूजे) के कार्यालय में असंख्य टेलीफोन कॉल और ईमेल की बाढ़ सी आ गई गई है। सुनवाई की पिछली तारीख यानि 10 जनवरी को यह मामला कानूनी मुद्दों पर बहस के लिए 17 जनवरी को सूचीबद्ध किया गया था। इस दौरान बहस निष्कर्षहीन  रही थी। इसके बाद न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की बेंच ने सुनवाई को 17 जनवरी तक बढ़ा दिया था।

हमने रजिस्ट्री की लिस्टिंग शाखा से मामले को तारीख से हटाने के कारण का पता लगाने के लिए संपर्क किया, तो  हमें बताया गया कि मामलों को सूचीबद्ध करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के साथ विचार-विमर्श करके माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा कुछ बदलाव किए गए हैं। यद्यपि अगर तारीख खंडपीठ द्वारा ही तय की गई हो तो इसे सूची से हटाया जाने का मामला बहुत ही दुर्लभ होता है, हालांकि कुछ निश्चित परिस्थितियों में ऐसा होता है, जो इस मामले में हुआ है।

गुरुवार से मंगलवार तक सूचीबद्ध किए जाने वाले मामलों को लेकर बनाई गई नीति के अनुसार बहुत ही सीमित संख्या में मामले सुने जाएंगे। आने वाले समय में इस दौरान केवल कुछ समय लेने वाले मामलों को ही इन तीन दिनों में सुना जाएगा। जो भी हो, रजिस्ट्री ने आश्वासन दिया है कि मजीठिया मामले को इसकी अति अवश्यकता की वजह से प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध किया जाएगा।

परमानंद पांडे
महासचिव
आईएफडब्ल्यूजे

(हिंदी अनुवाद – रविंद्र अग्रवाल , ravi76agg@gmail.com )

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IFWJ opens legal cell to help Hindustan Times employees

New Delhi : Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) condemns the  decision of the Hindustan Times Management for closing down the publication centers of Bhopal, Indore, Ranchi, Kanpur, Allahabad, Varanasi and Kolkata.

IFWJ President K Vikram Rao has urged the Prime Minister Sri. Narendra Modi intervene. He has asked the IFWJ state units to lodge a formal complaint with the Chief Ministers of Madhya Pradesh, Uttar Pradesh, Jharkhand and West Bengal to take note of the victimisation of journalists and non-journalist employees. It is an arbitrary closure of the six editions of the newspapers and removal of a large number of employees from many publication centers. This act is illegal and in violation of labour laws of India.

The Hindustan Times management is yet to implement the Majithia Wage Boards recommendations. The method of changing the designations and indiscriminately transferring the employees to far off places to deprive them the benefits of the Wage Boards.

The IFWJ appeals to employees of different editions that they should lodge complaints with the respective labour commissioners in their states and forward a copy to our official email ifwj.media@gmail.com.

IFWJ has formed a legal cell which is headed by IFWJ legal advisor Sri Ashwani Kumar Dubey. Sri Dubey is Advocate on Record in the Supreme Court of India, he is an expert on Labour laws, Trade Unions and Environment. He will be more than happy to advise the aggrieved employees regarding the right course of action. IFWJ Secretary Headquarters Vipin Dhuliya (Mob: 9818627033) and National Federation of Newspaper Employees General Secretary Com. C.M.Papni (Mob: 9871757316) will also be available for any help.

You may also contact IFWJ’s state units in the respective states:

Madhya Pradesh : Salman Khan President M.P.-W.J.U.: 8602420351

Uttar Pradesh: Com.Haseeb Siddiqui President U.P.W.J.U.: 9369774311

Jharkhand : Shahnawaz Hassan President J.J.A.:  9472752955

West Bengal : Ranjan Lahari President W.B.-W.J.U.: 9434861122

IFWJ has been working tirelessly for the rights of journalists since 1950. We are always there for our colleagues. As a Journalist Trade Union we are there to help not charge any fee or take undue favours, advantages from the distressed employees.

Vipin Dhuliya
Secretary HQ
IFWJ

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K Vikram Rao : The Bluff Master

Dear Prakash Mishra,

We do not know whether you are a person in flesh and bones or a ghost created by Mr.Vikram Rao because he has the inherent nature of creating such imaginary persons as to cover his misdeeds. But if you are really a person in body and form then we must congratulate you for weaving such cock and bull stories. Sitting in the hinterland of Odisha in Behrampur if you had so much information (or figment of imagination) about what happened in Chennai then you are certainly a supernatural person. It is not your fault. In fact, your ‘creator’ Vikram Rao suffers from a disease called OCD (Obsessive Compulsive Disorder) and that is why Parmanand Pandey, Hemant Tiwari and K. Asudhulla haunt him even in his dreams (courtesy opening line of the Manifesto of the Communist Party). He must not forget that his depravity will turn out to be a nightmare for him.

First of all, let us make it very clear the book that you have referred to was not on Ms.Jayalalitha. There was no preamble or introduction from the writer. It was mere compilation of facts and information which was received through RTI. The information was given by the government departments and nobody has disputed the facts till date. The RTI activist is a member of the CUJ. Therefore, we feel proud of the part of the book release function organised by the CUJ. Those who watch the scales of power cannot fight corruption and that is what your manufacturer Mr Vikram Rao has done all along.

It also demonstrates the imbecility and cowardice writer when he says that ‘you must be feeling ashamed of the results of Tamilnadu election’.  What is there to be ashamed of? Does it mean that those who contested elections in Tamilnadu and lost should feel ashamed of contesting the election? Is it your definition of democracy? It is the beauty of the democracy to fight for one’s cause irrespective of the consequences. Therefore, Mr. Unknown Mishra, our fight will continue for the eradication of corruption from all walks of life to the extent that is possible from us. The purpose of journalism is to spouse to the cause of the people and not to work like a tout and broker. What we did was in true spirit of journalism what Mr. Vikram Rao is doing falls in the other category. He is adept and expert in changing his colours like a chameleon and grin before the powers that be. That is the reason that he has been able to get monetary favours from all dispensations – Congress to BJP to Samajwadi Party to RJD and JD(U).

Today Mr Vikram Rao is singing paeans to Ms Jayalalitya but few years ago he was praising Karunanidhi to be the tallest leader of the state with the choicest abuse reserved for the lady. This is his character. Parmanand Pandey, on the other hand, is steeled with struggles and has come out from the trial of the fire. Therefore, when you say that by releasing a book Parmanand Pandey and IFWJ leaders B.V. Mallikarjunaiah, Hemant Tiwari, K. Asudhulla, Anbazagharn and others have disgraced the journalists’ community of Tamilnadu is not only ridiculous but a self-explained commentary on Mr. Vikram Rao and his known and unknown ilk. Mr.Vikram Rao has been illegally using the name and the banner of the ‘Indian Federation of Working Journalists’ (IFWJ) even after his expulsion from the organisation shows his shamelessness. But don’t worry, appropriate action will follow very soon against this discredited man, who was a journalist once upon a time. He sold the profession of journalism for furtherance of his own benefits. New he is out to besmirch of the name of the IFWJ, which we would never allow him to do. Despite his all widow-wailing no journalist from all over the country has thought it fit to stand with him. He is treated like a pariah by everybody.

His role as a member of the Manisana and Majithia Wage Boards has been despicable to say the least. We thought that he will have some remorse for his sinful and insincere acts towards journalists but alas! That is not so with Mr Vikram Rao. As far as our office in Kotla (Delhi) is concerned if you (if you exist at all) may visit it on any working day. It is behind the Indian Express building of which you claim to be a correspondent in Behrampur although we have enquired it from Delhi and Bhubaneswar offices of the Indian Express and we have been told that there is no person in the name of Prashant Mishra, who works as their correspondent. But nothing is impossible for Mr. Vikram Rao, who thinks that he can run any phoney organisation with the help of bimbos, floozies, tourists, anti-union retired journalists and jobless sundry creatures. We can only say about his letter to Ms. Jayalalitha that the leadership of the IFWJ, which was present at the book release ceremony, would be more than happy if any inquiry is conducted by the State Government. The inquiry will be the vindication of our fight against corruption. As far as his clam for the IFWJ is concerned, anybody can find it out from the same phone no., which he has given in his letter, to know his locus standi and status. The time has come to call the bluff of Mr. Vikram Rao, the bluffmaster, that he is.

With wish all best,

Yours sincerely,
K. Asudhulla
Secretary (South)
0-9677080609
ifwj.ifwj@gmail.com

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लखनऊ के पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस ने पत्रकार नेता विक्रम राव को जालसाज कहा!

के.  विक्रम राव  अपने झूठ, फरेब, जालसाजी और फर्जीवाड़े के लिए कुख्यात रहे हैं। लेकिन अब जयंत वर्मा जाँच समिति  की रिपोर्ट के बाद से वे इतना बौखला उठे हैं कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा है। हालाँकि उन्हें आई. एफ. डब्लू. जे. से कब का निष्कासित किया जा चुका है लेकिन यह जाल-साज संगठन के नाम का बेजा इस्तेमाल करने से बाज नहीं आ रहा है और आई. एफ. डब्लू. जे. पदाधिकारियों के खिलाफ मिथ्या ख़बरें फैला रहा है। उनकी बढ़ती हुई बेचैनी ही उनके मानसिक संतुलन को बिगाड़ रही है।  क्योँकि जाँच समिति के अध्यक्ष श्री जयंत वर्मा पिछले दो दिनों से लखनऊ में हैं और उन्होंने उन स्थानों का दौरा किया जहाँ पर आई. एफ. डब्लू. जे. के प्रेस का उपयोग हुआ और तमाम धांधलियां की गई।  जयंत वर्मा समिति ने लखनऊ के तमांम अधिकारियों के बयान भी दर्ज किये हैं जो विक्रम राव की १०० करोड़ रुपए से ज्यादा की धांधली को उजागर करते हैं।  श्री जयंत वर्मा समिति के अन्य सदस्य सिद्धार्थ कलहंस और मोहम्मद कामरान भी उनके साथ थे। 

विक्रम राव का एक ताजा झूठ व्हाट्सएप्प पर प्रचारित किया है।  जिसमें उन्होंने  कहा है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री टी. एस. ठाकुर ने बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया से कहा है कि वह आई. एफ. डब्लू. जे. के महासचिव परमानन्द पांडेय के खिलाफ कार्रवाई करें।  मानसिक  रूप से विक्षिप्त ही ऐसी शोशे बाजी कर सकता है।  यह कितना हास्यास्पद है कि विक्रम राव  सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाई कोर्ट, बार कौंसिल और अन्य बार संगठनों का नाम लेकर अपने को बचाना चाहते हैं। खैर, उन्हें अपनी गढ़ी दुनिया में रहने दीजिये। 

वस्तुस्थिति यह है कि श्री परमानन्द पांडेय सुप्रीम कोर्ट  ऑफ़ इंडिया में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड हैं और आई. एफ. डब्लू. जे.  के महासचिव भी हैं।  सम्भवतः विक्रम राव को ट्रेड यूनियन एक्ट की धारा – २२(२) का ज्ञान नहीं है।  इसीलिए वह ऐसी बेतुकी बातों से सभी  को दिगभ्रमित  करना चाहते हैं और अपनी जालसाजियों से ध्यान हटाना चाहते हैं। पूरे भारत में सैकड़ों नहीं अपितु  हजारों की संख्या में ऐसे वकील हैं  जो तमांम श्रमिक संघों, राजनीतिक पार्टियों और दूसरी पंजीकृत संगठनों के सदस्य एवं पदाधिकारी भी हैं।  दूर जाने की जरूरत नहीं है।  स्वर्गीय एम. के. रामा मूर्ति सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता थे और साथ ही आई. एफ. डब्लू. जे. के महासचिव रहे।    श्रमिकों के लिए उनकी लड़ाई और योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।  लेकिन कौन कहे विक्रम राव से  जो धोखाधड़ी के लिए जाने जाएगें। सभी सदस्यों  को हम यह बता दें विगत २-३ मार्च को बेंगलोर में विक्रम राव, उनके पुत्र और उनके  कुछ लगुओं-भगुओं ने मुख्य मंत्री के कार्यालय और बाबा आंबेडकर की तस्वीर का अपमान किया था जिसके लिए शीघ्र ही उनके खिलाफ कार्रवाई होने वाली है। 

अपनी झूठी खबर में उन्होंने चेन्नई पुलिस को दी गई शिकायत और विधवा विलाप का  उल्लेख किया है।  लेकिन हमें यह बताने में गर्व  है कि पिछले महीने आई. एफ. डब्लू. जे. के अध्यक्ष बी. वी. मल्लिकार्जुनय, उपाध्यक्ष हेमंत तिवारी, महासचिव परमानन्द पांडेय, सचिव के. असदुल्ला, सी. यू.जे. प्रेजिडेंट अंबजगन सहित अन्य पदाधिकारियों के साथ एक पुस्तक का विमोचन किया था जो सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त की गई जानकारी पर है।  आई. एफ. डब्लू. जे. का वर्तमान नेतृत्व भ्रष्ठाचार  से लड़ाई के प्रति कटिबद्ध है,इसीलिए भ्रष्ठाचार में आकंठ डूबे विक्रम राव की बौखलाहट देखते ही बन रही है। श्री राव के अंदर इतना नैतिक सहस नहीं है कि वे अपने नाम से कुछ लिख भी सके।  इसीलिए एक बेचारे और लगभग अनपढ़ संतोष चतुर्वेदी की आड़ में मिथ्या  प्रचार कर रहे हैं।  साथियों, ईमानदारी विक्रम राव के लिए दुःस्वप्न की तरह है लेकिन हम ऐसे लोगों के खिलाफ लड़ने की अपनी कसम को दोहराते हैं। 

आई. एफ. डब्लू. जे. जिंदाबाद                 
सिद्धार्थ कलहंस
(सचिव उत्तरी)

Vikram Rao losing balance in the heat of Enquiry Committee Report

K. Vikram Rao is known for his frauds, cheating, distortions and lies is now feeling the heat of being exposed because the Jayant Verma Inquiry Committee is soon going to release the while paper on his misdeeds. He has already been expelled from the IFWJ but he is still spreading lies and canards against IFWJ and its Office Bearers by using the name of organisation. His growing unease is driving him mad. Com. Jayant Verma, the head of the Inquiry Committee, was in Lucknow for two days and he visited number of places and met many journalists and officials and recorded their statements on bungling and financial irregularities of K. Vikram Rao and his family. Com. Verma was assisted by other two members of the Committee: Siddharth Kalhans and Mohd. Kamran.

The latest bluff of Vikram Rao is his message on ‘whatsapp’ saying that the Chief Justice of the Supreme Court of India Shri T.S. Thakur has asked the Bar Council of India for initiating action against Parmanand Pandey. It is ridiculous. Only mentally challenged people drop names like Vikram Rao. If he thinks that by dropping the names of the Supreme Court, Delhi High Court, Bar Council and the Bar Associations, he will be able to save himself, then let him live in his own make-believe world. Com. Parmanand Pandey is an Advocate-on-Record in the Supreme Court of India and he is also the Secretary General of the IFWJ. Perhaps Shri Vikram Rao does not know that Section 22(2) of the Trade Union Act provides that he can be the office bearer of the IFWJ. Thousands of advocates all over the country are the office bearers of the Trade Unions, Political Parties and other registered organisations. There is no bar on them. Why to go far away, the late M.K. Rama Murthy, a celebrated Senior Lawyer of the Supreme Court of India was also the Secretary General of the IFWJ. His contributions to the Labour jurisprudence are praised all over. But you cannot convince a cheat and a fraud like Vikram Rao, that too, when he is in extreme desperation.  

Let it be known to all members that Karnataka Police can take action against Mr. Vikram Rao, his son and his cronies on any day for desecrating the office of the Chief Minister and also the portrait of Baba Sahab Ambedkar on March 2/3 in Bangalore. Nobody knows what complaint has he made to the Chennai Police but we feel proud to say that the IFWJ President B.V. Mallikarjunaiah, Vice-President Hemant Tiwari and Secretary General Parmanand Pandey, Secretary K. Asudhulla, CUJ President V. Anbazhagan along with many other office bearers of the IFWJ released a book in the Chennai Press Club exposing the corruption in the government departments from 2007 onward. IFWJ’s present leadership is for zero tolerance on the issues of corruption but any fight against corruption make Shri Vikram Rao makes him jittery because he has always been neck deep in corruption. He does not have the guts to say something and that is why; he hides behind the persons like poor Santhosh Chaturvedi, who unfortunately is hardly better than an illiterate person to spread lies. Honesty is a nightmare for Vikram Rao but we vow to fight against persons like him.

Long live IFWJ  
Siddharth Kalhans
(Secretry North)

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परमानंद पांडेय के खिलाफ शिकायती पत्र पर सर्वोच्च न्यायालय ने बार कौंसिल को दिया कार्यवाही का निर्देश

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के बार कौंसिल को निर्देशित किया है कि वह IFWJ द्वारा अपने पूर्व प्रधान सचिव परमानंद पाण्डेय (अब एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड) के विरुद्ध प्रदत्त शिकायत पत्र पर कार्यवाही करे| विगत 10 मार्च 2016 को IFWJ ने भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर को आवेदन दिया था कि वकील परमानन्द पाण्डेय “पेशेवर अवचार, उपेक्षा, दुर्व्यपदेशन और कपट” के दोषी है| अपने 20-पृष्ट के ज्ञापन में, जिसमे कई दस्तावेज तथा नियमावली शामिल है,  IFWJ ने कहा कि “ पाण्डेय पूर्णकालिक अधिवक्ता( एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड : क्रमांक 809, पंजीकृत संख्या 13888, तारीख 14-12-2001, सर्वोच्च न्यायालय) है तथा साथ ही में पूर्णकालिक श्रमजीवी पत्रकार भी है|” ऐसी बात वकील और पत्रकार दोनों के नैतिक आचरण के विरुद्ध है|

सर्वोच्च न्यायालय ने आभासी तौर पर सूक्ष्म जांच कर IFWJ को सूचित किया कि उसके आवेदन को बार कौंसिल को निर्देशित कर दिया गया है| इस निर्देश को सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय ने दिया है| अपने निष्कर्ष को निरुपित करते हुए प्रधान निबंधक कार्यालय ने टिप्पणी भी की है कि IFWJ का आवेदन “ स्वत: स्पष्ट” (self explanatory) है| विधि शब्दावली में इस संज्ञा सूचक “स्वत: स्पष्ट” शब्द का अर्थ होता है कि “ प्रदत्त सूचना से सुगमतापूर्वक समझा जा सकता है तथा अन्य अथवा अतिरिक्त स्पष्टीकरण आवश्यक नही है”|

भारत की बार कौंसिल के निर्णय से सारा भ्रम (काफी तो अब तक मिट चुका है), जिसे पूर्व प्रधान सचिव ने फैलाया है, पूर्णतया दूर हो जाएगा| परमानंद पाण्डेय ने जो अवैध, फर्जी तथा जाली संगठन में नक्कालों और छदमरूप-धारियों को भर रखा है, वह नेस्तानाबूद हो जाएगा| इस बीच IFWJ ने भारत की बार कौंसिल के अध्यक्ष से मौखिक सुनवाई का अनुरोध किया है| दिल्ली उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी.रोहिणी, राष्ट्रीय, दिल्ली प्रदेशीय तथा सर्वोच्च न्यायालय के बार एसोसिएशनों के अध्यक्षो से भी भेंट का समय माँगा है| इससे पाण्डेय का छल-कपट उजागर किया जा सकेगा|

शुभकामनाओं के साथ
संतोष चतुर्वेदी
राष्ट्रीय सचिव

चेन्नई पुलिस द्वारा कार्यवाही

IFWJ ने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक को लिखित शिकायत दी थी कि गत मार्च माह में चेन्नई नगर में परमानन्द पाण्डेय तथा हेमंत तिवारी नामक व्यक्ति IFWJ के कथित प्रधान सचिव तथा कथित उपाध्यक्ष बनकर किसी समारोह में शरीक हुए थे| दोनों फर्जीवाड़ा के अपराधी है| राज्य विधानसभा निर्वाचन के कारण जांच विलंबित हो गई| चेन्नई पुलिस कमिश्नर कार्यालय से प्राप्त सूचना के अनुसार इसी माह के अंत में कार्यवाही की जायेगी एवं फौजदारी मुकदमा कायम होगा|


Supreme Court asks Bar Council for action on IFWJ plea against Pandey

The Supreme Court of India has asked the Bar Council of India to take action on the IFWJ representation against its former secretary general Parmanand Pandey, an Advocate on Record. The IFWJ has lodged a complaint against Pandey with Mr.Justice Tirath Singh Thakur, Chief Justice of India, on 10th March 2016 for “Professional Misconduct, Negligence, Misrepresentation and Fraud by him(Pandey)”.  In a 20-page representation, including several documents and the Rule Book, the IFWJ has stated that “Pandey is a full-time practicing Lawyer (Advocate on Record, Serial No.809, Regn. No. 13888 of 14-12-2001 SCI) and also at the same time a full-time working journalist”. Such a thing is against the ethical conduct of both Lawyer and Journalist.

The Supreme Court of India, apparently after a close scrutiny, has informed the petitioner (IFWJ) that it has referred the matter to the Bar Council of India. The reference was made by the office of the Registrar General of Supreme Court, New Delhi. It underscores its finding by stating that the IFWJ’s complaint is “Self Explanatory”, meaning in legal terms, that the representation “is easily understood from the information already given and not needing any further explanation and also that it is obvious, bearing its meaning in its own face”.

The decision of the Bar Council of India will clear the confusion, (clear to all already, but a stamp of approval is more than welcome) created by the former secretary general who is trying to promote an illegal, bogus and fake body of imposters and impersonators. Meanwhile the IFWJ has requested for a hearing with the Chairman of the Bar Council of India, New Delhi. The IFWJ also proposes to seek audience with the Chief Justice of the Delhi High Court (Justice G.Rohini) and the Chairmen of the Bar Associations of India, of the Supreme Court and also of Delhi, to expose Pandey’s fraud.

With warm regards
Santosh Chaturvedi
Secretary (North)

Chennai Police initiates action

On the IFWJ complaint to the Tamil Nadu Director General of Police, the Chennai Police Commissioner has initiated probe against Parmanand Pandey and one Hemant Tiwari for impersonating as the so-called IFWJ secretary general and so-called vice president at a function in Chennai last March. The probe was delayed due to State Assembly Elections but will be completed by this month end. Criminal action will ensue.  

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My leader and guide Jayasheel Rao

The IFWJ mourns the death of its stalwart and founder S.V. Jayasheel Rao at 88 in Bengluru on 28 April 2016. Since his wife’s death some years ago, Jayasheel Rao felt lonely, melancholy gripping him. From IFWJ view point it must be said to Jayasheel Rao’s credit that he fought and got IFWJ posts on his own. He had no political support like most other office-bearers. He was not gifted the IFWJ secretary general’s post. The then President Attu Raghvan of the CPI had per force nominated Jayasheel Rao as the Secretary General because Raghvan had secured just decimal five percent vote margin in his victory over me in 1981. Raghvan did a wise act by nominating Jayasheel Rao as secretary-general which kept the organization united.

I had first met Jayasheel Rao in 1971 at Gandhinagar (April 1971) when he led the Karnataka delegation to the 15th plenary session, hosted by the Gujarat Journalists Union, of which I was then the general secretary. I was a reporter with the Times of India, Ahmedabad. It was my rare privilege of lifting Jayasheela’s baggage to ferry him to his suite in the delegates’ camp at Pathik Ashram. His next-door occupant was Subodh Bose, that CPM fighter from Kolkata. May be a joke but it is true. When I put down Jayasheel Rao’s baggage in his room, Subodh Babu’s wife asked for a bucket of water for bath. I fetched a bucketful. She tried to tip me. Then Subodh Babu emerged and introduced me to his wife. I could see her shy face.

Those were the days when the IFWJ had office-bearers who had worked their way up to get elected, not merely nominated to post they never would have even got in their life. Jayasheel Rao could never get enough National Council support to win. He had to wait for a decade. The 1980 presidential election was a turning point in the IFWJ annals. Three nominations received by the C.R.O. included T.R. Ramaswami (Tamil Nadu), S.V. Jayasheel Rao (Karnataka) and mine (Uttar Pradesh). Khadri Shamanna, editor of the daily Samyukta Karnataka (Bengaluru) and a veteran Lohia socialist, wrote to me to withdraw in favour of Jayasheel Rao as anti-CPI and anti-Emergency votes would be split. I promptly withdrew and campaigned for Jayasheel Rao. In our camp then were Chittaranjan Alva and S.K. Pande (their C.P.M. had opposed the 1975-77 Emergency), Upendra Vajpaie (Delhi) Akhil Hussain (Gujarat), K. Mathew Roy (Kerala), B. Nageswara Rao (A.P.), Manohar Andhare and Prakash Dube (Maharashtra), and majority of KUWJ members. Almost 98 percent of U.P. members voted for Jayasheel Rao. I was then IFWJ secretary general but campaigned for Jayasheel Rao, after duly informing T.R. Ramaswami, president, who was seeking re-election. Jayasheel lost by few hundred votes. But that set the trend for change. In the subsequent presidential poll Jayasheel Rao insisted that I must contest. The rival candidate was formidable, Attu Ragavan, a CPI top notch and Blitz bureau chief in Delhi. Jayasheel Rao more than paid back to me as I got the KUWJ votes in bulk. Raghavan polled 1780 votes and I secured 1709 votes. It was all due to Jayasheel Rao.

I got closer to Jayasheel Rao during the Ayodhya plenary session (April 1984) when the Raghavan group disowned him. Jayasheel Rao was our first nominee for vice-presidentship, the second was Prakash Dubey, opposed by Santosh Kumar of the CPI. Both won hands down and then began a glorious innings of Jayasheel Rao as vice-president. He was our nominee on the Bhachawat wage board. Soon I nominated him to the Press Council of India as IFWJ representative. He represented the IFWJ in a European media session. He was his brilliant best opposing the IFWJ affiliation with the Soviet dominated International Organisation of Journalists (IOJ) during the IFWJ convention in Srinagar (Kashmir : 1985). The IFWJ remained non-aligned, thanks to Jayasheela Rao.

Normally cool, Jayasheel Rao was once in rage with me. It was in 1986 presidential poll. Mumbai’s CPI municipal councilor Madhu Shetye was the candidate. There was a virulent campaign that bogus voters of Uttar Pradesh will get me re-elected. Irked by such vicious words, I told a press conference in Nagpur that if my victory margin is less than 900 votes (that was then the total membership of U.P.W.J.U.),  I would rather not accept office and let Shettye be declared president, despite defeat. Jayasheel Rao felt that I was stupid and foolhardy. But I won the election by 1924 votes, including a majority in Maharashtra, Shetye’s home State. Jayasheel Rao was the first to congratulate me. His support in southern States had in the previous (1984) election got me a vote percentage of 89 in an electorate of 5,600.

Jayasheela Rao took the U.P. WJU members in Bengaluru to a rare and delicioys cuisine. It was Mavilly restaurant where 56 types of items are served, but each only once. Everyone of them excelled over the other in taste and delicacy. Among those relishing the items were Madan Mohan Bahuguna, Ravindra Singh, Duresh Shukla, Jokhu Tiwari, Manohar Khadikar, Haseeb Siddiqi, Sheetala Singh and others who will still recall the event.

UPWJU president Haseeb Siddiqui will remember meeting Jayasheel Rao first time in 1973 at the Pune plenary session when young Haseeb, fresh in the Navjeevan daily, was the UPWJU delegate. Many people of that era in the IFWJ are no more. And those who are today’s members were then not even born, at least in the IFWJ or the UPWJU. Till then the IFWJ never allowed upstarts to usurp posts which they would never have dreamt otherwise to occupy. New climes, new methods, no matter foul or fair.

I pay my homage to that lighthouse and landmark in the India’s working journalists struggle. We thanks the Congress Chief Minister of Karnataka, Sri Siddharamayya ji, for arranging a state funeral for S.V.Jayasheel Rao in Chamatajapeta crematorium, Bengaluru.

K. Vikarm Rao
President IFWJ

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कलहंस, हेमंत और परमानन्द पाण्डेय जी इतना गिर जायेंगे, उम्मीद न थी….

भाई सिद्दार्थ कलहंस,

अपनी लेखनी से परोक्ष तौर पर ही सही आप (भास्कर) दुबे को चौबे बनने में जुटे है| वह (भास्कर) कभी पत्रकार रहा ही नहीं तो अब क्या ख़ाक लिख पायेगा? भास्कर दुबे के बारे में जानकारी करने पर मालूम चला की ये फैजाबाद लखनऊ नॉएडा एवं अन्य जगह के पुलिस थानों में काफ़ी चर्चित व्यक्ति है| इनके ऊपर हत्या, लूट, अपहरण जैसे गंभीर आरोप लगे है| फैजाबाद जिले से तो ये तड़ीपार तक किये जा चुके हैं| बड़ा आश्चर्य हुआ, आप जैसे वरिष्ठ पत्रकार को ऐसे अपराधियों के नाम से जवाब दिलवाना पड़ रहा है| शायद आपके परम मित्र हेमंत तिवारी का असर आप पर प्रभावी है|

बड़ा दुख होता है आपकी इस गिरावट पर| आपने मुझे हलवाई बताया तो अपमानजनक क्या है| भ्रातहन्ता तो नहीं हूँ (हत्यारा), टीवी के मार्फ़त उगाही तो नहीं करता हूँ| आपने कहा कि श्री परमानन्द पाण्डेय जनसत्ता के मुख्य उप संपादक थे| आपकी जानकारी अधूरी है| वे जनसत्ता के मुख्य उप संपादक ज़रूर थे परन्तु वे वहां से अपने कृत्यों के कारण निकाल दिये गये थे| वह कृत्य मालूम है आपको? चलिये मैं बताता हूँ, श्री परमानन्द पाण्डेय पर आरोप था कि उन्होंने अपने संपादक स्वर्गीय श्री प्रभाष जोशी पर acid से हमला किया था, किसी मामूली विवाद पर| प्रभाष जी दयालु थे, क्षमा कर दिया| जेल भेजना चाहिये था 10 वर्षों के लिये|

पिछले 30 वर्षों से परमानन्द पाण्डेय का भारण पोषण IFWJ के रहमो करम से हुआ है| उनकी वकालत में 90% प्रतिशत योगदान संगठन का है, शायद इसी कारण वे निकाले जाने के बावजूद संगठन से चिपके रहना चाहते हैं| रेलवे दफ्तर शिवगोपाल मिश्रा जी ने कामरेड के विक्रम राव को दिया था| अपना प्राइवेट चैम्बर बना डाला पाण्डेय जी ने| शिकायत हुई और हम सबको खाली करना पड़ा|

बुनियादी बात ये है भैया कि उच्चतम न्यायालय का वकील कैसे श्रमजीवी पत्रकार हो सकता है| सबसे बड़ा फ्रॉड तो पाण्डेय जी ने किया| वह जालिया है, फ्राडिया है, फर्जी पत्रकार है| अब IFWJ का कोढ़ दूर हो गया| वस्तुतः IFWJ श्रमजीवी पत्रकार संगठन बन गया| कलहंस साहब, आप, हेमंत और परमानन्द पाण्डेय जी इतना गिर जायेंगे कि अपने साथी की लाश पर राजनीती करेंगे, ये उम्मीद नहीं थी | अत्यंत दुःख होता है स्मरण कर के, कि हम सब कभी साथ थे| चेत जायें और अपराधियों और फ्राडों का साथ छोड़ दें वरना जो थोडा बहुत बचा है वो भी खत्म हो जायेगा| आप सभी की जाल्सजियाँ बहुत जल्द ख़त्म होंगी|

संतोष चतुर्वेदी
9720777778
chaturvedisantosh53@gmail.com
IFWJ


प्रिय श्री संतोष जी,

भाई कलहंस के नाम आपका लिखा पत्र पढ़ा अभी तक तो हमने आपका कभी नाम तक नहीं सुना था ये भी नहीं मालूम की आप पत्रकार है या कुछ और काम करते है। अभी अभी किसी ने बताया कि आप किसी हलवाई की दुकान पर कचौड़ियां तलते थे। ये चमत्कार विक्रम राव जैसा आदमी ही कर सकता है की आप जैसा व्यक्ति परमानन्द पांडेय, हेमंत तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे लोगो पर टिप्पणियां कर सके, आपको तो नहीं लेकिन परम आदरणीय  विक्रम राव जी को तो यह पता ही होगा की श्री परमानन्द पांडेय जनसत्ता की प्रक्रिया में शीर्ष स्थान प्राप्त कर मुख्य उप सम्पादक बने थे। अब आप  उन्हें फ़र्ज़ी कह रहे है तो यह टिपण्णी आप उनपर नहीं बल्की अपने और अपने नेता और उनके चेले चपटो पर की है। ठीक ही तो कहते है पीलिया के रोगी को सब पीला ही नज़र आता है, आपके  मुंह से संविधान की  बात ऐसी लगती है जैसे अँधा प्रकृति की छटाओं का वर्णन कर रहा हो इसलिए निवेदन है की आप अपने नेता से कह दे की संविधान को फिर से पढ़ लें।

रेलवे यूनियन के दफ्तर के बारे मैं तो आपके नेता ने मथुरा से मंच से कहा था की IFWJ का दफ्तर न्यूयॉर्क और लंदन से भी महंगी जगह पर है फिर क्यों खाली कर के भागना पड़ा और मयूर विहार में किसी के घर का पता दे रखा है ये भी एक धोखाधड़ी है रिहायशी जगह पर दफ्तर कैसे खोल सकते है? खैर छोडिए आप आपने पुराने पेशे मैं फिर लौट जाइये उसमे बहुत फायदा है और आपके नेता शीघ्र  उपयुक्त स्थान पर पहुँच जायेंगे। हां आपने जालसाजी खत्म करने जैसा नारा दिया अपने पत्र में स्व. हिमांशु जी का जिक्र करते हुए आपने यह बात लिखी है। निश्चित आप तक उनका वह स्लोगन पहुंचा होगा जो उन्होंने आईएफडब्लूजे की दिल्ली एनसीआर बैठक में २८ फरवरी २०१६ को दिया था। नारा था आईएफडब्लूजे को जालसाजों से मुक्त करो।

मथुरा निवासी, आईएफडब्लूजे आगरा मंडल के संयोजक संवाददाता कहलाने वाले और राजधानी लखनऊ का पता देकर छायाकार की राज्य मुख्यालय की मान्यता लेने जैसी जालसाजी खत्म होनी चाहिए। लखनऊ से दिल्ली तक की यात्रा कर सरकार से ४८००० रुपये का बिल लगा कर जालसाजी करने वाले और फिर विजिलेंस की जांच झेलने जैसे जालसाज भी खत्म होने चाहिए। धोखे से आईएफडब्लूजे के खाते से पैसे निकालने और फिर जालसाजी के लिए रिकवरी नोटिस पाने वाले व खाता सीज हो जाने की नौबत लाने वाले की जालसाजी जरुर खत्म होनी चाहिए।

इंटरनेशनल आर्गनाइजेशन आफ जर्नलिस्ट (आईओजे) से पत्रकारों की भलाई के लिए मिली प्रिटिंग मशीन को डकार कर अपने निजी घर (जो सरकार से रियायती दामों पर मिला है) में सेंटर फार मीडिया एंड प्रेस नाम की दुकान खोल कर करोड़ों का माल बनाने जैसी जालसाजी भी खत्म होनी चाहिए।

जालसाजी की फेहरिस्त लंबी है, छायाकार महोदय!

कामरेड भास्कर दूबे
8400333894
bhaskardube@gmail.com

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Who is Vipin Dhulia in IFWJ? शर्म करो, पुलिस न हुई घर की खेती हो गई जिसे चाहा जेल भिजवा दिया

IFWJ National Council Member Shabahat Vijeta letter against Talibani Farmaan of Vipin Dhulia

अध्यक्ष
आई.एफ.डब्ल्यू.जे.
और
समस्त कार्यकारिणी

शक्ति संगठन में होती है. टूटन में नहीं. मैं तो हमेशा से संगठन का पक्षधर रहा हूँ. राजनीति क्योंकि मेरा पेशा नहीं है इसलिए राजनीति की वह बारीकियां नहीं जानता हूँ जिनसे पिछले कुछ दिनों से दो-चार हो रहा हूँ. मैं पत्रकार हूँ और अपने पेशे को ईमानदारी से निभाता हूँ. अपनी पत्रकारिता के 23 सालों में पत्रकारिता के संघर्षों को बहुत करीब से देखा और समझा है. मुझे अच्छी तरह से पता है कि ऐसा कोई संगठन नहीं है जो दस-दस बरस तक संवादसूत्री करने वाले के दर्द को समझ सके. कोई ऐसा संगठन नहीं है जो आठ-आठ महीने काम के बावजूद वेतन न पाने वाले पत्रकार को वेतन दिला सके.

पत्रकार रात-दिन इस तरह से बिहैव करते हैं जैसे कि उनसे बड़ा कोई है नहीं जबकि उनकी खुद की नौकरी की एक दिन की भी गारंटी नहीं है. हद तो यह है कि जिस राजनीति की आज चरणवंदना हो रही है उससे जुड़े लोग पत्रकारिता को प्रास्टीटयूट तक कह चुके हैं. पत्रकारिता को वेश्या बताने वाला मंत्री आज भी शान से मंत्री बना है किसी संगठन ने उस मंत्री के खिलाफ आज तक एक शब्द मुंह से नहीं निकाला.

मैं वर्किंग जर्नलिस्ट हूँ. 23 साल से वर्किंग जर्नलिस्ट हूँ. हाल में राष्ट्रीय पार्षद चुना गया हूँ. मुझे जानकारी मिली कि 28-29 फरवरी को दिल्ली में और 2 से 6 मार्च तक बेंगलुरु में आई.एफ.डब्ल्यू.जे. का सम्मलेन है. मैं दिल्ली अधिवेशन में शामिल होने गया. मेरा बेंगलुरु का भी कार्यक्रम तय था. इसके लिए मैंने बाकायदा अपने कार्यालय से छुट्टी ली थी और रिज़र्वेशन कराया था. इस बारे में कोई भी काम किसी से छुपाकर नहीं किया गया था लेकिन आज मिले ई-मेल से जानकारी मिली कि जो पत्रकार दिल्ली गए हैं वह अगर बेंगलुरु आये तो उन्हें पुलिस के सिपुर्द कर दिया जायेगा.

इस ई-मेल को जिस बेहूदगी से ड्राफ्ट किया गया उसे पढ़कर शर्म आती है कि उसे ड्राफ्ट करने वाला किस मुंह से खुद को पत्रकार कहता है. जो लोग पत्रकारों के साथ हो रही बेइंसाफियों के खिलाफ पुलिस के पास नहीं गए. जो तमाम मंत्रियों द्वारा सार्वजानिक तौर पर पत्रकारों का अपमान करने पर भी मुंह सिये रहे. जो जनरल वी.के.सिंह द्वारा पत्रकारों को वेश्या बताने पर भी यह तय नहीं कर पाए कि वह वास्तव में वेश्या हैं या नहीं वह उन पत्रकारों को जेल भिजवा देंगे जो दिल्ली अधिवेशन में शिरकत करने गए थे.

आई.एफ.डब्ल्यू.जे. के सेक्रेटरी हेडक्वार्टर विपिन धूलिया के हस्ताक्षरों से मिली जानकारी से मुझे पता चला कि बेंगलुरु गया तो पुलिस के सिपुर्द कर दिया जाएगा. शर्म करो विपिन धूलिया. पुलिस न हुई घर की खेती हो गई जिसे चाहा जेल भिजवा दिया. पुलिस के पास और कोई काम तो है नहीं जो किसी को भी जेल भिजवा दोगे.

पत्रकारिता के किसी भी वरिष्ठ के अपमान की बात मैं सोच भी नहीं सकता. क्योंकि मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि मैं अपने वरिष्ठों का अपमान करूंगा तो मेरे कनिष्ठ मेरा अपमान करेंगे. जिस तरह से मैं वरिष्ठों का सम्मान करता हूँ उसी तरह से आई.एफ.डब्ल्यू.जे. का भी सम्मान करता हूँ. इस बैनर पर अधिवेशन करने वाले का नाम क्या है इससे मुझे कोई मतलब नहीं है. मैं संगठन का लम्बे समय से सदस्य हूँ. अब राष्ट्रीय पार्षद चुना गया हूँ. चुने गए व्यक्ति को हटाने के लिए पर्याप्त कारण होने चाहिए. कोई अधिवेशन हो जाने के बाद अगर उसे कोई फर्जी बताता है तो हकीकत में वह खुद फर्जी होता है. सबको पता था कि 28-29 को अधिवेशन हो रहा है ऐसे में अगर इस अधिवेशन से ऐतराज़ था तो यह बात बतानी चाहिए थी. अगर नहीं बतायी थी तो फिर न बताने वाले की गलती है. जब बताने वाला गलत है तो फिर उसके पास फैसले का अधिकार रह ही नहीं जाता.

दिल्ली अधिवेशन से पहले कई दिन से ई-मेल वार छिड़ी थी. तब कहाँ थे यह विपिन धूलिया. क्या इन्हें कोई जानकारी नहीं थी. अगर इन्हें जानकारी नहीं थी तब तो इन्हें खुद तय करना चाहिए कि यह इतने अहम पद पर रहें या नहीं रहें.

धूलिया जी, मैं पत्रकार हूँ. आई.एफ.डब्ल्यू.जे. का स्वाभाविक सदस्य हूँ. चुना गया पार्षद हूँ. मैं कलम का सिपाही हूँ. वरिष्ठों का सम्मान करना जानता हूँ. मुझे श्री के.विक्रम राव का निमंत्रण मिलेगा तो उसे स्वीकारूंगा, श्री हेमंत तिवारी पत्रकारों के भले के लिए कहीं सम्मलेन करेंगे तो वहां भी जाऊंगा. मेरे पास श्री राव और श्री तिवारी दोनों का निमंत्रण था लेकिन आपके पत्र की बेहूदा भाषा ने मुझे यह सोचने पर विवश किया है कि जिस अधिवेशन में 21 राज्यों के डेढ़ सौ पत्रकारों को जेल भेजने की तैयारी की जा रही है उसे आई.एफ.डब्ल्यू.जे. का अधिवेशन कहा जाए या नहीं. पत्रकारों का कुछ भला तो कर नहीं सके चले हैं उनके सम्मान से खेलने. सम्मान देने का काम सिर्फ खुदा का है. वही चाहे तो कोई अपमानित हो सकता है. मुझे नहीं लगता कि खुदा मेरे खिलाफ है. इससे मुझे डर नहीं लगता. बेंगलुरु अधिवेशन करिए. आपकी छोटी सोच की वजह से उसमें शामिल नहीं हो पा रहा हूँ. लेकिन प्लीज़ अब कभी मत कहियेगा कि आपकी सोच जनरल वी.के.सिंह से अलग है.

शबाहत हुसैन विजेता
राष्ट्रीय पार्षद
आई.एफ.डब्ल्यू.जे.


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upsacc की तरह ifwj के भी दो टुकड़े हो गये!

पत्रकारों के बटवारे का दर्द

-नवेद शिकोह-

पत्रकारों के बंटवारे के ‘जिन्नाओ’, कितने टुकड़े करोगे हमारे! फिल्म ‘जिस्म’ ने अच्छा बिजनेस दिया तो ‘जिस्म-टू’ बन गयी। इसी तरह नागिन-वन के बाद नागिन-टू, आशिकी के बाद आशिकी टू बनी। व्यवसायिक फिल्मों की व्यवसायिक सोच ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में ये ट्रेन्ड शुरु किया था। भारत की आजादी के फौरन बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ। नफा-नुकसान की व्यवसायिक सोच के साथ भारत की आजादी की लड़ाई मे मोहम्मद अली जिन्ना का शामिल होना कितना महंगा पड़ा था। जिन्ना की व्यवसायिक सोच की गन्दी सियासत ने भारत का बटवारा करके हमारे देश के टुकड़े कर दिये।

पत्रकार साथियों,  आप लोग जिन्ना को नायक मानते हो या खलनायक! जब ऐसे व्यक्ति को हम सब खलनायक मानते है तो फिर स्वार्थ से भरी व्यवसायिक सोच वाले उन पत्रकारों का साथ क्यों देते हो जो संवाददाता समिति-1,  संवाददाता समिति-2,  ifwj-1, Ifwj-2 जैसे तमाशे करके पत्रकारों का बटवारा कर रहे है। यकीन मानिये इनके खुद के हाथ इतने कमजोर हैं कि ये आप जैसे भोले-भालो के कंधो के बिना बंटवारे के दंगे मे बंदूके चला ही नहीं सकते हैं। आप कब तक और कितने हिस्सों में बटोगे? आप ‘इनके आदमी’ और ‘उनके समर्थक’ के रूप में अपने खुद के अस्तित्व की हत्या क्यों कर रहे है? आपमें से ज्यादातर लोग मेरी बातो से सहमत होगे। और वो किसी भी गुटबाजी से सहमत भी नही है। वो खुद भी किसी गुट में नहीं हैं। लेकिन आप लोग गुटबाजी और पत्रकारों के बटवारे के विरोध मे सामने क्यो नही आते?

विरोध का मतलब तलवारे चलाना नहीं। किसी का अपमान करना भी नहीं। न्यायालय जाना भी नहीं। जिन्दाबाद- मुर्दाबाद के नारे लगाना, धरना-प्रदर्शन या अनशन पर बैठ जाना ही नहीं। सियासत करना या किसी का नेतृत्व स्वीकार करना भी नहीं। आप कलमकार है। पत्रकारों का बटवारा करने और उन्हें बाटने की गन्दी सियासत करने वालों के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध रूपी दो शब्द भी आप अपने कलम से नही लिख सकते! आप कब तक किसी बाजीराव, मनोज तिवारी, हिमांशु मिश्र, हिसाब सिद्दीकी या रुपेश बहादुर सिंह (लखनऊ के पत्रकारों के बदले हुए नाम) के आदमी बने रहेगे। क्यों ना हम-आप इनके-उनके आदमी बनने के बजाय मर्द बनकर पत्रकारों के बटवारे के खिलाफ आवाज उठाये और गंदी सियासत का खातमा करें।

आज वाट्सअप पर दिल्ली के एक कार्यक्रम की तस्वीरे देखकर दिली अफसोस हुआ। पता चला कि Upsacc की तरह ifwj जैसी  इतनी पुरानी पत्रकारों की ट्रेड यूनियन के भी दो टुकड़े हो गये। Ifwj के बटवारे पर गम-ओ-गुस्से के साथ मुनव्वर राना साहब के एक शेर का एक मिसरा और बात खत्म :- ”…सियासत एकता की जड़ में मठ्ठा डाल देती है”

नवेद शिकोह

लखनऊ मे पत्रकारों के बटवारे की गन्दी सियासत से त्रस्त एक मामूली पत्रकार

navedshikoh84@gmail.com

09369670660

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विक्रम राव को लखनऊ में ifwj के ही एक अन्य साथी कामरान ने दिखाया आइना

तुम खामोश रहो ……..IFWJ की बेबसाइट पर संविधान ACCOUNTS सब हैं… आप थोड़ा पढ़े लिखे होते कामरान…. अगर आप जि़म्मेदार होते…

-के. विक्रम राव (राष्ट्रीय अध्यक्ष, IFWJ)

I cannot keep SILENCE…May be you….

My firm believe that in today’s context of relentless upheaval in the media world, and journalism in particular, that it is a good time to resurrect the moribund organization registered way back in the year 1950 and put it back on the map. I agree, and this is why I decided to stand for election to the National Council after being approached by one of my friend and son of senior IFWJ leader.

The UPWJ/IFWJ, is always an illustrious organization, serving journalists and other media professionals until falling under bad leadership or disputes in leadership and hard times recently.

That the IFWJ is in disarray, there can be no doubt. There were allegation stories, Sacking of Post bearers in the last two months. No justified reasons from any Seniors from either side was given. My several emails remain unanswered till date, no response among either the President or her hand-picked appointees that occupy most of the so-called ‘executive committee’.

Like me other National Council elected for the first time stand on the precipice, waiting to see how all this plays out. I am one of them. However, rather than standing idly by, I have decided that the IFWJ is probably something worth fighting for. Hence I opted to fight for a cause, for my duties for my organization IFWJ.

This is indeed a struggle for the soul of the IFWJ. It will either be left to become the plaything of some of our SENIORS and their handmaidens or they will be removed and a new light with more young Comrades will be elected.

What I have learnt from others is that since several years the President and other senior are self-appointed members of the executive were not elected but appointed. Likewise in UPWJ NC are more or less appointed not elected. Everything was predefined and no NC can deny this fact. The state units of IFWJ are currently ruled as if this is a tinpot dictatorship, where members are supposed to sit idly by waiting for edicts to come down from on high.

The actions of the President IFWJ and ‘State committee’ (UPWJ) are opaque, lack the guidance of rules, procedures and principles consistently applied – the Constitution notwithstanding. Meetings are held without notice, minutes, or indication of who participated, etc. and decisions dispensed from on high. Such practices are not acceptable by any organization, least not that of an organization that purports to representat the interests of media workers and journalists committed to a well-functioning free press within a democratic society.

There are several problems in all of this, and I will raise these issues from time to time. The most important of all to know the SOUL of our parental organization i.e. CONSTITUTION, ACCOUNTS of the organization.

I have send several emails, personally tried to contact the seniors, IFWJ Media Incharge but all keeps pin drop silence on this issue. I, therefor decided to ask our National President K. Vikram Rao in front of all journalist in Lucknow and his reply is shocking. One of my friend has send me Video recording of the so called agitation at Gandhi Pratima, GPO Park, Lucknow. My elder borther Pranshu Misra and others who raised hands knowing UPWJ/IFWJ well, provide me copy of constitution/accounts or should feel ashamed of themselves publicly acknowledging having accounts/constitution of UPWJ/IFWJ.

The IFWJ President Truth is exposed in the video footage which will be uploaded shortly. Conversation in form of text to expose the FACT and FACES of so called leaders ……

तुम खामोश रहो ……..IFWJ की बेबसाइट पर संविधान ACCOUNTS सब हैं आप थोड़ा पढ़े लिखे होते कामरान अगर आप जि़म्मेदार होते…

-के. विक्रम राव (राष्ट्रीय अध्यक्ष IFWJ)

सभी जिम्मेदार और पढ़े लिखे साथियों से अपील है आप www.ifwj.in website देखकर बताये कहां है संविधान accounts, और मेरा भी ज्ञान बढ़ायें। अगर मैं झूठा तो मेरा सर आपका जूता —–

Tell me if I’m wrong, I offered to tender my resignation from the post of NC. Stepping outside the post is neither easy or fun. However, once I decided to accept my position, I committed to doing the best I could and “the right thing”.

Hope to get response….

Thanking and assuring of my best strength at all times..

Regards
Mohammad Kamran
NC
UPWJ/IFWJ
9335907080
indiankamran@gmail.com

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Now time has come when wolf has to be unmasked to safe guard media employees interests : Parmanand Pandey

To,

All Presidents, General Secretaries of the State Units, Working Committee Members & Special Invitees,

Dear comrade,

I am sorry for not having communicated for quite long time. The delay certainly needs to be explained. After the so-called Mathura meeting when I reached Delhi on 1st December I had to rush to the Court. While I was still in the court premises, the IFWJ Office Secretary, Shribhagwan Bhardwaj telephoned me that he and Shri K. Vikram Rao along with his wife and son are at the office. Shri Rao had already sounded Shri R.P. Yadav and Shri Vipin Dhuliya to be at the office at 4 o’clock. Shri Rao had also telephoned to the AIRF Secretary General, Shri Shiv Gopal Mishra and requested him to come to the office. Shri Shiv Gopal Mishra, a seasoned and the top ranking trade union leader of the country was busy in some meeting and therefore, expressed his inability  to come to the office but instructed the Divisional Secretary of the New Delhi Shri T.S. Rana to be at the office to find out as to what was the matter.

Shri Rana was also of unaware anything and before he could comprehend the situation the family members of Shri Rao put up two big locks on the grill-door of the office. They had also brought along a locksmith to break open the locks of the office. After putting two locks they also bought a piece of cloth and some wax to seal it. In this entire drama the railway union had no role to play. Thus the office is locked since then and no work could be done from December 1st onward. Most of my court files and some other personal belongings are in the office. Thereafter a circular written in the name of the Shri Vipin Dhulia was also issued but there was no mention of this development.

Brief story about the IFWJ office

Shri Shiv Gopal Mishra is a towering leader of the All-India Railwaymen’s Federation (AIRF). Shri S.K. Tyagi is the General Secretary of the Northern Railwaymen’s Union (NRMU).They have been kind enough in  providing shelter to the IFWJ for the last nearly two decades. When the IFWJ was driven out from the DUJ office, Comrade Vikram Rao made a tall claim that he would have a new swanky office for the IFWJ in Delhi but they all proved to be false. In his latest circular he has written that the IFWJ office will be renovated after Karnataka Session. Perhaps in the name of the renovation he may again start a collection drive for a hefty amount but rest assured not even a penny would be spent on it.

Earlier in the name of renovating and upgrading the office, he must have taken lakhs of rupees from nobody knows how many people but nothing was done. So much so, last time when the computer of the IFWJ office, was stolen, he refused to send even an old computer from his press of Lucknow, which incidentally is also the IFWJ property. It was Mr. K.M. Jha, the Secretary (Central), who was benevolent enough to send a computer and printer to Delhi from Bhopal.

Thus the IFWJ office is closed from 1st December because Shri Vikram Rao wanted to paralyse its functioning. I have been also rendering some legal assistance to Railway Union from the same office. Thus the IFWJ office was doubling up for my legal profession also, although I have my independent chamber and office, which I have started using again. I used the Federation’s office for the legal profession only to save time and work more for the union. I must also explain it that I have been taking up only the cases of the workers and the criminal cases of the poor people, who cannot afford to engage the lawyers. Thus in a way the aim of Shri Vikram Rao by getting the office locked was to capitulate my functioning and weaken the cause of workers and the poor. It is also to be noted that hundreds of newspaper employees are fighting for the Majithia Award implementation through me and therefore they can obviously smell rot and see the hands of the newspaper owners in getting the office locked.

Our friends, who have waged the fight against the proprietors of the newspapers, say that there is an obvious link between one of the top newspaper proprietors of Uttar Pradesh and some of the office bearers of the IFWJ. The proprietors of that newspaper clearly instructed these self styled leaders of the IFWJ to cripple my functioning because I have become the biggest sore in their eyes. Look at the temerity of Shri Vikram Rao and his family in locking as if it was his personal property.

I am eternally grateful to Shri Shiv Gopal Mishra and Shri S.K. Tyagi, who commiserated with my plight and offered another place to me to open the office. It is a different matter altogether that I most politely declined their offer and started working from my chamber with greater vigour and zeal for the cause of the poor, down trodden and working class. It may take some more time to come to the rails.

It may not be out of place to mention here what a very prominent journalist of Lucknow has been asking that how come any trade unionist in any newspaper has not been able to survive even for a few years in their respective organizations but Com. Rao retired from the Times of India without working in the organization for years together and availed all retiral benefits?

Therefore, now the time has come when the wolf has to be unmasked to safe guard the interests of the media employees. The office of the IFWJ is still lying closed and the interests of the employees are suffering but Vikram Rao is chuckling and deflecting the attention in the name of holding some conference somewhere in South India with the sole aim of collecting money to fill his own coffers.

Kingdoms may rise and fall but pimps and touts always flourish, so goes a saying. Now it is for you to take a decision whether IFWJ’s glory is to be restored to make it a vanguard of a movement or a vehicle of vested interests?

Thanking you,
Yours comradely,
Parmanand Pandey
Secretary General- IFWJ

प्रेषक: कृष्णमोहन झा. संपर्क: krishanmohanjha@gmail.com

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के. विक्रम राव ने परमानंद पांडेय और हेमंत तिवारी को नोटिस भेजा

Notice : Mr. Parmanand Pandey

Hemant Tiwari’s circular makes irresponsible and unwarranted reading. Enclosed the show-cause notice, issued to Tiwari. What is more irresponsible is your allowing Tiwari to use your (fake/duplicate) Email id for issuing the invitation for the so-called national council meeting.

Before I consult collegues under Rule 22 (d) of the IFWJ Constitution and before taking any action, I want to know if you had asked Tiwari to call such a meeting for which the President’s written approval is mandatory (Rule 24 (a)).

I wait your immediate reply on my Email Id k.vikramrao@gmail.com

(K. Vikram Rao)
President
IFWJ


Notice-1 : Mr. Hemant Tiwari

I have seen your circular with your stupid allegations against the IFWJ leadership, against the Mathura session of the IFWJ working committee and about your holding an unconstitutional meeting of the National Council at Agra/Varanasi. The circular itself is a serious act of indiscipline. You may see in the IFWJ headquarter secretary’s circular a detailed nationwide reaction on your circular. This stresses the urgency of action against you.

Before taking any action against you, here is a notice to you to show cause as to why you should not be suspended from the primary membership of the IFWJ. If your apology comes or your clarification is satisfactory, this notice may be withdrawn. Otherwise you face termination of your membership.

I wait your immediate reply on my Email Id k.vikramrao@gmail.com

(K. Vikram Rao)
President           
IFWJ

पूरे मामले को समझने के लिए इन लिंक्स पर क्लिक करें>

राष्ट्रीय सचिव ने पत्र लिखकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव पर लगाया आरोप- आपने IFWJ को जेबी संस्था बना दिया

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सूप तो बोले पर चलनी (कृष्णमोहन झा) भी बोले?

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आईएफडब्ल्यूजे के महासचिव परमानंद पांडेय ने भी खोला अध्यक्ष के. विक्रम राव के खिलाफ मोर्चा

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आईएफडब्ल्यूजे की मथुरा बैठक अवैध, अब बनारस या आगरा में पुन: नियमानुसार होगी बैठक

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Now time has come when wolf has to be unmasked to safe guard media employees interests : Parmanand Pandey

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नौटंकी जारी है : के. विक्रम राव ने हेमंत तिवारी को और हेमंत तिवारी ने के. विक्रम राव को संगठन से निकाला

पत्रकार संगठन के नाम पर दलाली का कारोबार करने वाले आपस में ही भिड़ पड़े हैं. IFWJ संगठन से के. विक्रम राव ने हेमंत तिवारी को निकाल बाहर किया तो हेमंत तिवारी ने के. विक्रम राव को ही निकाले जाने का ऐलान कर दिया. इस पूरे प्रकरण को मीडिया वाले चटखारे लेकर पढ़ सुन बता रहे हैं क्योंकि यहां लड़ाई पत्रकारिता की नहीं बल्कि दलाली के धंधे पर कब्जे की है. निलंबन संबंधी दोनों पक्षों की ओर से भेजे गए समाचार इस प्रकार हैं…

पहली खबर…
IFWJ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव ने सचिव पद पर तैनात हेमंत तिवारी को संगठन विरोधी गतिविधियों के चलते निलंबित कर दिया है. ज्ञात हो की हेमंत तिवारी ने बिना राष्ट्रीय अध्यक्ष IFWJ की अनुमति के 18 दिसम्बर को एक सूचना जारी की थी जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय पार्षदों की बैठक बुलाने की बात कही थी. हेमंत तिवारी ने हाल में हुए मथुरा अधिवेशन जिसमें सभी राष्ट्रीय पार्षद सम्मिलित हुए थे, उसे अवैध बताया था. हेमंत की इस हरकत का विरोध IFWJ की सभी राज्य इकाइयों के अध्यक्ष और महामंत्रियों ने किया था और सभी राष्ट्रीय पार्षदों ने उनके निष्कासन की मांग करी थी. IFWJ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने 18 दिसम्बर को हेमंत तिवारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था जिसका हेमंत तिवारी द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया था. नोटिस में हेमंत तिवारी को निलंबित करते हुए उन्हें 30 दिन का समय दिया गया है जिसके अन्दर वे अपना माफीनामा पेश कर सकते हैं अन्यथा उन्हें निष्कासित कर दिया जायेगा.

दूसरी खबर…
इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के राष्ट्रीय सचिव (उत्तर) हेमन्त तिवारी ने के. विक्रम राव को पत्र लिखकर सूचित किया है कि राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पाण्डे ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सत्य पारिक, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मल्लिकर्जुनिअह, राष्ट्रीय सचिव (सैंट्रल) कृष्णमोहन झा, राष्ट्रीय सचिव (दक्षिण) के. असदुल्ला से चर्चा कर आई.एफ.डब्ल्यू.जे. के अध्यक्ष पर लगे गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के साथ ही संघ विरोधी गतिविधियों एवं आपराधिक कृत्य की वजह से के. विक्रम राव को अध्यक्ष पद से हटाने का निर्णय लिया है. वर्किंग कमेटी के समस्त सदस्यों ने राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पाण्डे के निर्णय पर अपनी सहमति जताई है साथ ही उस निर्णय का स्वागत भी किया है. श्री तिवारी ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि आगामी माह में राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पाण्डेय की अनुमति से नेशनल काउंसिल की बैठक आगरा या वाराणसी में आयोजित कर नए अध्यक्ष का चयन किया जाएगा. आई.एफ.डब्ल्यू.जे. के संविधान की धारा 63 के तहत किसी भी व्यक्ति के विरूद्ध आर्थिक आपराधिक एवं संघ विरोधी कृत्य किए जाने पर कार्यवाही का अधिकार वर्किंग कमेटी को है. श्री तिवारी ने यह भी कहा है कि विक्रम राव द्वारा यदि अध्यक्ष के रूप में कोई पत्र व्यवहार किया जाता है तो यह अमान्य माना जाएगा और संगठन उन पर वैधानिक कार्यवाही करेगा.

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हेमन्त तिवारी ने के. विक्रम राव को संगठन से निकालते हुए जो पत्र लिखा, उसे पढ़ें

Dear Shri K. Vikram Rao,

This is with reference to your illegal show cause notice dated 18.12.2015 and so-called suspension letter sent to me today by email.

Your show cause notice and suspension both are unconstitutional, ultra vires and ridiculous and that is why, I did not think it necessary to send any reply to you. Since you have emailed fatuous letters to hundreds of other person that is why; I think it proper to tell you that you are no longer the President of IFWJ because no election has taken place for the post for the last many years. However, the Working Committee is in existence because it has been duly constituted in the last delegate session and by virtue of that Working Committee I continue to be the Secretary (North) of the IFWJ.

For your information National Council meeting to be held at Varanasi/Agra has been called by me in the capacity of Secretary (North) with the consent of Secretary General, your approval is not at all necessary because you do not exist to be the President of IFWJ. Apart from it, I would like to quote rule 63 which warrant action against you because you are playing in the hands of employer. This National Council meeting has been called to discuss the organisational matter to strengthen the organization and for deciding about the IFWJ Presidential Election. For your ready reference, I would like to reproduce rule 63 of the IFWJ Constitution.

Rule 63

Any member or affiliated body be liable to disciplinary action by the Working Committee of the Federation in case of:

(a)  default of payment;
(b)  criminal breach of trust;
(c)  defiance of any resolution or a directive of the delegates’ conference, National Council and the Working Committee of the Federation;
(d)  any activity or utterance prejudicial to the interests of the Federation or actively serving the interests of the employers as against the interest of the employees;
 
A member against whom there is a complaint of indiscipline shall be given a charge sheet in writing by the Working Committee and he shall be asked to submit a written explanation. He shall have a right to address the Working Committee on the subject if he so desires. The Working Committee shall take the decision after hearing the member concerned.

(e)  Disclosure of IFWJ matters to the press or to a non-member.

Through this letter you are being asked within 72 hours as to why your membership from IFWJ be not terminated for;
 
A)   Financial irregularities
B)   Using the IFWJ’s press and printing machine for your personal enrichment
C) For bringing disrepute to the organisation by submitting and collecting the inflated bills as a wage board member. The inquiry of the Labour Ministry is still going on against your misconduct.
D)   Hobnobbing with the newspaper proprietor against the interest of employees
E)   Disclosing the IFWJ matters to the Press and non-members

The charges against you are of very serious nature. However, you are asked to explain within 72 hours of the receipt of this show cause notice as to why the Working Committee, which is to meet at Agra/Varanasi should not take appropriate disciplinary action against you?

Thanking you

Yours sincerely
Hemant Tiwari
Secretary (North)-IFWJ

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आईएफडब्ल्यूजे की मथुरा बैठक अवैध, अब बनारस या आगरा में पुन: नियमानुसार होगी बैठक

इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय सचिव (नार्थ) हेमंत तिवारी ने एक सरकुलर जारी कर आईएफडब्ल्यूजे की मथुरा में दिनांक 29-30 नवंबर 2015 को संपन्न बैठक को अवैध बताया है। श्री तिवारी ने Secy. (North) Dec/2015  के अंतर्गत सरकुलर में राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि मथुरा में जो बैठक बुलाई गई थी उस बैठक को आयोजित करने वाले संस्था की तरफ से अधिकृत नहीं थे। आईएफडब्ल्यूजे के संविधान के अनुसार बैठक राष्ट्रीय महासचिव आमंत्रित करते हैं और उनके द्वारा ही सरकुलर जारी कर बैठक की सूचना सभी को दी जाती है।

 

मथुरा में आयोजित बैठक की जानकारी स्वयं राष्ट्रीय महासचिव को नहीं थी। जिन लोगों ने मथुरा में बैठक का आयोजन किया था उन पर कार्यक्रम के नाम पर चंदा उगाही के गंभीर आरोप लगे है। यहां तक की समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से सम्मान कराने के नाम पर जिला प्रशासन से चंदा उगाही की खबर इंटेलिजेस विभाग से मुलायसिंह यादव को मिली तो उन्होंने अपने पूर्व निर्धारित पत्रकारों के सम्मेलन में पहुंचने का कार्यक्रम निरस्त कर दिया। मथुरा में जो वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाने की बात कही गई वह के. डी. डेंटल कालेज के एक छोटे से कक्ष में आयोजित की गई। वर्किंग कमेटी की बैठक में केवल आईएफडब्ल्यूजे के निर्वाचित वर्किंग कमेटी मेम्बर, उपाध्यक्ष, 6 सचिव जिसमें एक महिला और एक मुख्यालय सचिव, कोषाध्यक्ष, अध्यक्ष होते है जिन्हें आईएफडब्ल्यूजे के संविधान में वोटिंग पावर दिया गया है।

इसके साथ ही राज्यों की संबंद्ध इकाई के अध्यक्ष और महासचिव भी बैठक में उपस्थित रह सकते है, लेकिन उन्हें वोटिंग अधिकार नहीं है। इस बैठक में 11 वर्किंग कमेटी के सदस्य और पदाधिकारी बाहर थे केवल 4 सदस्य बैठक में मौजूद थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देश पर इन 11 सदस्यों को भीतर जाने से रोकने के लिए स्थानीय समिति ने बाउंसर की व्यवस्था की थी। आयोजकों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देश पर बड़ी संख्या में विशेष आमंत्रित सदस्यों और अन्य अवांछनिय लोगों को बैठाकर बैठक संपन्न करा ली। इस बैठक में आईएफडब्ल्यूजे से संबंद्ध कई राज्यों की इकाईयों के प्रतिनिधि अधिकारिक सूचना न मिल पाने की वजह से मथुरा नहीं आए। इसी तरह आईएफडब्ल्यूजे के 10 कार्यकारिणी सदस्यों ने इस अवैध बैठक का बहिष्कार किया।

मथुरा में 11 पदाधिकारियों को बैठक से बाहर रखा गया उसमें आईएफडब्ल्यूजे के उपाध्यक्ष श्री बी. बी. मल्लिकार्जुन, उपाध्क्ष श्री सत्या पारिख, सचिव (सेन्ट्रल) कृष्णमोहन झा, सचिव (साउथ) असदुल्ला, सचिव (नार्थ) हेमंत तिवारी, वर्किंग कमेटी सदस्य श्री सिद्धार्थ कालहंस, श्री बी. जानकी रमन, रहेमुतल्लाह रेनुयाल, बी. पंडयन प्रमुख थे। राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पाण्डे के नेतृत्व में सभी पदाधिकारियों ने बैठक का विरोध किया। अगली नेशनल काउन्सिल की बैठक जल्द ही आगरा या बनारस में आयोजित की जाएगी।

कृष्णमोहन झा की रिपोर्ट. संपर्क: krishanmohanjha@gmail.com

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सूप तो बोले पर चलनी (कृष्णमोहन झा) भी बोले?

कृष्ण मोहन झा को IFWJ की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष का जवाब

मिस्टर कृण्णमोहन झा

 

राष्ट्रीय अध्यक्ष कामेरड के विक्रम राव के नाम आपका ईमेल पढ़ा। हंसी आई। एक फूहड़ जोक लगा। प्रधान सचिव परमानद पाण्डेय जिनकी आप तरफदारी कर रहें हैं ने ही आपको गंभीर आरोपों और कदाचार के लियें सस्पेण्ड कर दिया था (9 अगस्त 2014 वाला पत्र सलग्न)। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ही आपको फिर बहाल किया। उन्हे आप ही सन्यास लेने को कह रहे है|

फ़िलहाल आप तो भोपल इकाई तथा मध्य प्रदेश वर्किग जर्नलिस्ट्स यूनियन के प्राथमिक सदस्य भी नहीं हैं। तो फिर राष्ट्रीय सचिव IFWJ अपने को किस हैसियत से लिखते है| जाहिर है कि उज्जैन मे कुछ महीनों बाद होने वाले सिंहस्थ के अवसर पर करोडों रुपये के सरकारी विज्ञापन में से लाखों रुपये आप अपनी एजेंसी के लिये हड़पना चाहते हैं। इसीलिये IFWJ के राष्ट्रीय  सचिव पद का इस्तेमाल करने की यह साजिश है। अब तक IFWJ के पद का इस्तेमाल कर आप मध्य प्रदेश सरकार से अकूत धनराशी विज्ञापन के तौर पर हथिया चुके है।

बड़ी वित्तीय नैतिकता की बात आप करते हैं। IFWJ की वर्किगं कमेटी की बैठक मे विधायक सदन, भोपाल (6 व 7 सितम्बर 2013) में भाजपा नेता “कुलस्ते” ने दस लाख रुपये का अनुदान धोषित किया था। आपने आज तक इस राशी को IFWJ  को नही भेजा ओैर न मध्य प्रदेश इकाई को दिया ? क्या किया इन लाखों रुपयो का? करोड़ो रुपयें मूल्य वाले पत्रकार भवन (भोपाल) पर कब्जा जमाने हेतु आप IFWJ के हर शत्रु और प्रतिद्वन्दी के हमराह होते रहे। शिकायतों के कारण ही धोखा खाने के पूर्व ही परमानदं पाण्डेय ने आपको निकाल दिया था। आपको राष्ट्रीय सचिव कामरेड विक्रम राव ने ही बनाया था।

आप यदि इतने कर्मठ सदस्य होते तो IFWJ की हर बैठक मे आप आते या अनुपस्थिति का कारण बताकर छूट ले लेते । आपको पता है कि IFWJ संविधान के अनुसार तीन बैठकों में लगातार यदि कोई सदस्य नही आता है तो उसकी सदस्यता निरस्त हो जाती है। गुवाहाटी, भुवनेश्वर और बस्तर में आप नही आये। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने फोन द्धारा आपको स्मरण कराया था और आने का अनुरोध किया था। आपको IFWJ मे रूचि ही नही रही अथवा निजी धंधो का दबाव अधिक रहा होगा।

कृपया बतायें कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के विरूद्ध पर्चा निकालने के लिये किस पदाधिकारी से कितनी दिहाड़ी आपको मिली ?  उस पदाधिकारी का भविष्य तो अब अस्ताचल पर है। आप युवा है फिर भी डूबने चले है। कोई बड़ा लाभ मिल रहा है क्या ?अलबत्ता परमानंद पाण्डेय का के विक्रम राव से दूर होने पर आपकी पीड़ा में मै साथ हूँ । पाण्डेय जी 29 वर्षो से IFWJ  मुख्यलय के एकमात्र प्रभारी रहे । क्या आपने किसी भी सम्मेलन में दिल्ली ईकाई के किसी पदाधिकारी से भेट हुई ?  राज्यों की रपट पेश होते समय दिल्ली यूनियन की रपट कभी जानी आपने | IFWJ के विगत  सम्मेलनों के मिनट्स तथा इतने सालो के आडिटेड वित्तीय विवरण को देखा सुना ? आपने, कम से कम कोषाध्यक्ष श्याम बाबू का शिकवा तो यही है कि उन्हेाने IFWJ का वित्तीय लेखा-जोखा कभी नहीं ही देखा।

श्याम बाबु ने तो पाण्डेय जी से वित्तीय रपट मांगी भी पर उन्हें यह कह कर टाल दिया गया की रपट दिल्ली ऑफिस से जमा कर दी गई है | शायद यह जानकारी आपने छुपाना बेहतर समझा| राष्ट्रीय  अध्यक्ष शायद आप के सुझाव पर सन्यास ले लें, पर आप तो घकियाने, खदेडे जाने के बाद भी लौट आ रहे हैं। इतना प्रेम IFWJ से है या धन उगाही नहीं हो पा रही?

IFWJ के बारे में आप कितने जानकार हैं इसका अन्दाज आपकी इस लाइन से लग जाता है जब आपने IFWJ के सस्थापक-अध्यक्ष स्वर्गीय एम. चलपति राव केा उनका पिता लिखा। कामरेड विक्रम राव के पिता स्वर्गीय के. रामा राव है, स्वाधीनता सेनानी, सांसद और नेहरू के नेशनल हेरल्ड  के (9 सितम्बरं 1938) सस्थापक-सम्पादक थे। उनके प्रशिक्षु और शिष्य रहे एम चलपति राव। इतने मूढ़ और अनजान है आप और खुद को राष्ट्रीय सचिव बताने का ढोंग करते है।

अन्त में कहावत से पत्र खत्म करूँ 
सूप तो बोले पर चलनी (कृष्णमोहन झा) भी बोले? 
घोर कलयुग आ गया।
कौआ मोती चुग रहा है।

सलमान खान
अध्यक्ष
इंडियन फाउडेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट
मध्यप्रदेश इकाई

मूल खबर>

 

राष्ट्रीय सचिव ने पत्र लिखकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव पर लगाया आरोप- आपने IFWJ को जेबी संस्था बना दिया

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राष्ट्रीय सचिव ने पत्र लिखकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव पर लगाया आरोप- आपने IFWJ को जेबी संस्था बना दिया

वरिष्ठ पत्रकार एवं आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रिय सचिव कृष्णमोहन झा ने आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव को पत्र लिखकर आईना दिखा दिया है. झा ने राव पर कई किस्म के आरोप लगाए हैं. श्री झा द्वारा राव को लिखे गए लंबे पत्र का कुछ अंश नीचे प्रकाशित किया जा रहा है…

प्रति,

श्री के. विक्रमराव

राष्ट्रीय अध्यक्ष

आईएफडब्ल्यूजे

देश के पत्रकारों एवं गैर पत्रकार समाचार कर्मियों के सबसे बड़े संगठन ‘इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्टस’ का मैं पिछले डेढ़ दशकों से न केवल सक्रिय सदस्य रहा हूं बल्कि संगठन की मध्यप्रदेश इकाई का अध्यक्ष एवं संगठन के राष्ट्रीय सचिव के पद की जिम्मेदारी निर्वहन करने का सौभाग्य भी अर्जित कर चुका हूं। एक प्रखर पत्रकार और अद्भूत नेतृत्व क्षमता के धनी अध्यक्ष के रूप में आपके विशिष्ट गुणों का मैं कभी इस हद तक प्रशंसक बन गया था कि मुझ पर व्यक्ति पूजा के आरोप भी चस्पा कर दिए गए, लेकिन मैं तो मानों अपने पेशे में आपको ऐसा आराध्य देव बना चुका था कि मैंने उन आरोपों की तनिक भी परवाह नहीं की और सदैव प्राणप्रण से इस चिंता में डूबा रहा कि मेरे मन मंदिर में स्थापित मेरे इस आराध्य की प्रतिभा को कोई खंडित न कर पाए। परंतु आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी हैं। न केवल मेरे आराध्य की मूर्ति खंडित हो चुकी है बल्कि आपके प्रति मेरा विश्वास भी खंडित हो चुका है।

भले ही पिछले तीन दशकों में संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में आपको कहीं से कोई चुनौती न मिली हो परंतु पिछले कुछ माहों से आपके खिलाफ जो सनसनी खेज आरोप लगाए जा रहे हैं उनकी उपेक्षा कर पाना अब मेरे लिए संभव नहीं रह गया है। मुझे आश्चर्य केवल इस बात का है कि आपकी प्रतिष्ठा को तार तार कर देने वाले इन आरोपों पर आपने अभी तक कोई स्पष्टीकरण देना उचित नहीं समझा है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप इन आरोपों के चक्रव्यूह में इस तरह घिर चुके है कि उसके घेरे से बाहर निकल पाने की सामर्थ आपके अंदर शेष नहीं बची है। आपका मौन क्या इन गंभीर आरोपों की स्वीकारोक्ति का संकेत नहीं देता।

आप पर पिछले कुछ माहों से आरोप लगाए जा रहे है वे निसंदेह इतनी गंभीर प्रवृति के हैं कि उनसे विचलित होकर तो कोई भी निष्कलंक छवि वाला श्रमिक नेता अपने पद से इस्तीफा देने की पेशकश कर देता परंतु आपके व्यवहार से कतई ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आप दूध का दूध और पानी का पानी कर पाने का साहस दिखा पाएंगे। आखिर आप यह साबित करने में कोई दिलचस्पी क्यों नहीं ले रहे हैं कि दाल में कही कुछ काला नहीं है। आपकी सोची समझी चुप्पी से केवल एक ही ध्वनि निकलती है कि आपके अपने ऊपर लगने वाले नाना प्रकार के आरोपों से कोई इंकार इसलिए नहीं है क्योंकि आप आईएफडब्ल्यूजे के अध्यक्ष की कुर्सी पर हर हाल में आजीवन काबिज बने रहना चाहते है।

इतने वर्षों तक अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज रहने से आपके अंदर जो कुर्सी मोह पनप चुका है उससे मुक्त होने की इच्छा अगर उम्र के इस पड़ाव में भी आपके पास नहीं है तो क्या यह मान लिया जाए कि आपने आईएफडब्ल्यूजे रूपी इस विशाल वटवृक्ष का नामोनिशान मिटा कर ही उसके अध्यक्ष की कुर्सी छोडऩे की ठान रखी है जिसे कभी आपके पूज्य पिताजी एवं स्वनामधन्य पत्रकार स्व. श्री चेलापति राव सहित मूर्धन्य पत्रकारों ने अपने खून पसीने से सींचकर इसकी नींव रखी थी। इन्होंने तो कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनके उत्तराधिकारी के रूप में आप इस वृहद संगठन को अपने व्यक्तिगत स्वामित्व वाली संस्था का रूप देने में कोई संकोच नहीं करेंगे।

क्या यह सही नहीं है कि आप संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अधिनायकवादी शैली को ही तरजीह दे रहे है। आप इस सस्था के विभिन्न केन्द्रीय एवं प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों को अपने मोहरों के रूप में इस्तेमाल करना चाहते है और जिसने भी आपकों मोहरा बनने से इंकार कर दिया उसे तत्काल प्रभाव से पदमुक्त करने में आपने कोई देर नहीं की। आपके लिए उस समय अपना अहंकार सर्वोपरि था संस्था के हित आपके लिए गौण हो गए। आपने कभी यह जानने की जरूरत ही नहीं समझी की जिसे आप संगठन में किसी बड़े पद की जिम्मेदारी सौंप रहे है उसके पास उस पद की जिम्मेदारियों के निर्वहन की क्षमता योग्यता और अनुभव है की अथवा नहीं। दरअसल आप तो यसमेन चाहते थे और जिसने भी यसमेन बनने से इंकार कर दिया वह आपका कोपभाजन बन बैठा।

अत्यंत कठिन परिस्थितियों में संगठन के जिन कर्मठ पदाधिकारियों एवं नेताओं ने आपकी प्रतिष्ठा को तार तार होने से बचाया उन्हें भी आपने संगठन के सम्मेलनों में अपमानित करने में कोई संकोच नहीं किया। मैं अत्यंत विनम्रता पूर्वक यह सगल आपसे पूछना चाहता हूं कि हाल में ही मथुरा में संपन्न हुई आईएफडब्ल्यूजे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राष्ट्रीय महासचिव श्री परमानंद पाण्डे के साथ जो बदसलूकी की गई क्या वह पूर्व नियोजित घटना नहीं थी। अब तक संगठन की ओर से लड़ी जाने वाली हर लड़ाई में हर कदम पर आपको कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने वाले परमानंद पाण्डे क्या आज आपकी नजरों में इसलिए खटकने लगे है क्योंकि वे संगठन के उन पदाधिकारियों का साथ देने का साहस दिखा रहे है जो आपकी अधिनायकवादी कार्यशैली के विरूद्ध आवाज बुलंद कर रहे हैं। संगठन के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में श्री परमान्द पाण्डे द्वारा की गई स्तुत्य सेवाओं के प्रति तिरस्कार का यह भाव क्या प्रदर्शित नहीं करता कि आप संगठन में किसी और कामरेड का कद ऊंचा होते हुए नहीं देख सकते।

मैं यह समझ पाने में असमर्थ हूं कि आपके पास आखिर भय के उस दायरे से बाहर निकलने की इच्छाशक्ति क्यों नहीं है जो संगठन की युवा शक्ति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप संगठन को तब तक ही जीवित रखना चाहते हैं जब तक कि इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी आपके कब्जे में है। इस पत्र के माध्यम से मैं आपसे यह मांग करना चाहता हूं कि मेरे हस्ताक्षर के बिना मेरे नाम से जारी उक्त कथित पत्र के पीछे किसकी साजिश है उसका पता लगाने के लिए संगठन की ओर से सभी आवश्यक कार्रवाई की जाए। निसंदेह हेमन्त तविारी के साथ मेरे वर्षों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों में दरार डालने का ऐसा घृणित प्रयास है जिसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है।

आपके विरूद्ध लग रहे आरोपों की फेहरिस्त इतनी लंबी हो चुकी है कि इस छोटे से पत्र में उन सबका जिक्र कर पाना ही संभव नहीं है और उन गंभीर प्रवृति के आरोपों का खंडन करने के लिए कोई सर्व स्वीकार्य स्पष्टीकरण देने का नैतिक साहस अगर आप नहीं दिखा रहे है तो इसका एकमात्र संदेश यही है कि आपने इन्हें स्वीकार कर लिया है। अगर बात केवल आपकी अधिनायकवादी कार्यशैली तक ही सीमित होती तो भी उसका कोई औचित्य सिद्ध करने का आधार आप खोज सकते थे परंतु आपके विरूद्ध जो आर्थिक कदाचरण के इतने गंभीर आरोप सामने आ चुके है उन्हें देखकर तो पूरे संगठन का सिर ही शर्म से झुक जाएगा कि इतनी हेराफेरी करने वाले एक वयोवृद्ध कामरेड आज संगठन के सिरमौर बने हुए हैं।

हवाई यात्राओं के बिलों में हेराफेरी, संगठन के सम्मेलनों के लिए प्रतिनिधियों से एकत्र की गई प्रतिनिधि शुल्क की समूची राशि को एक समानान्तर निजी खाते में जमा करने के आरोप भी आपको अगर मानसिक पीड़ा नहीं पहुंचाते तो सचमुच ही आश्चर्य का विषय है। क्या आप पर लगने वाले इन आरोपों की सत्यता को आप झुठलाने की स्थिति में हैं कि जब भी आईएफडब्ल्यूजे का कही कोई सम्मेलन आयोजित किया गया तो उसके आयोजन पर आने वाला समस्त आर्थिक भार वहन करने की जिम्मेदारी आपने स्थानीय इकाइयों पर डाल दी और प्रतिनिधि शुल्क के तौर पर जमा हुई भारी भरकम राशि आप समेटकर लखनऊ ले गए और उसका आपने संगठन के हित में कहा उपयोग किया यह कोई नहीं जनता क्योंकि आपने तो खुद को इतना ताकतवर बना रखा था कि कोई आपसे पूछने की जुर्रत ही न कर सके।

संगठन के नाम विभिन्न राजनेताओं व सत्ताधारियों से जो दान प्राप्त किया गया उसके हिसाब किताब में पारदर्शिता रखने की आपने कभी जरूरत ही महसूस नहीं कि क्योंकि आप ने तो सदैव संगठन को स्वत्वाधिकारी माना है। एक प्रखर पत्रकार के रूप में अपने सदैव सार्वजनिक जीवन में शुचिता का पाठ राजनेताओं व सत्ताधिकारियों को पढ़ाया है और जब भी कोई भ्रष्टाचार का मामला सामने आया तो अपने जिम्मेदार लोगों पर करारी चोट भी की है परन्तु आपके सिद्धांत, आदर्श और नैतिकता की बड़ी बड़ी बाते क्या दूसरों के लिए भर थी आपने स्व. प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के शासनकाल में उनकी तानाशाही के विरोध में 18 माह कारावास में बिताएं परंतु अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया परंतु आज जब आप आईएफडब्ल्यूजे को तानाशाह की भांति संचालित कर रहे हैं तो आप की आत्मा क्यों नहीं कचोटती।

क्रिकेट के धुरंधर खिलाढ़ी भी अपने खेल जीवन में तब ही सन्यास ले लेने को उचित मानते है जबकि वे यह मान चुकते हैं कि आगे उत्कृष्ट खेल का प्रदर्शन कर पाना उनके लिए संभव नहीं होगा। निसंदेह जो खिलाड़ी उचित समय पर फैसला करते है उन्हें सम्मान पूर्वक विदाई पाने का सौभाग्य मिलता है परन्तु आप तो अपने गौरवशाली अतीत को अपने उस वर्तमान की काली छाया से आच्छादित करने में हाथ ले रहे हैं जिसमें आपकी उपलब्धियों के नाम पर आपने केवल आरोप ही आरोप संग्रहित कर रखे हैं। मैं नहीं जानता कि इसके पीछे आपकी कोई मजबूरी है अथवा विदाई की इस बेला में भी सम्मान अर्जित करने की आपकी कोई इच्छा नहीं है। काश आपने हिन्दी के मूर्धन्य कवि स्व. श्री भवानी प्रसाद की इन पक्तियों में छिपे संदेश को पढ़ा होता-

द्वार की ये कुंजियां, लो तुम संभालो।
अब नहीं घर द्वार मेरा, तुम संभालो।।
मीत मेरे से विदा मैं जा रहा हूं।
सभी के चरणों नमन मैं जा रहा हूं।।

फैसला तो आपको ही करना है। हमारी शुभकामनाएं सदैव आपके साथ रहेंगी।

विनीत

आपका शुभाकांक्षी
कृष्णमोहन झा
राष्ट्रीय सचिव (सेन्ट्रल)
IFWJ

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जब पत्रकार संगठन पूरी तरह दलाली की तरफ अग्रसर हो जाते हैं तो मूल मुद्दों का जिक्र तक नहीं करते. यही हाल आईएफडब्लूजे का है. इनके राष्ट्रीय अधिवेशन की आफिसियल प्रेस रिलीज में मजीठिया वेज बोर्ड से लेकर आगरा में पत्रकारों पर लाठीचार्ज के मुद्दों का कहीं कोई जिक्र तक नहीं है. प्रेस रिलीज में संगठन के महासचिव परमानंद पांडेय तक का नाम नहीं है. सूत्रों ने बताया कि परमानंद पांडेय ने शिवपाल यादव के सामने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में यूपी सरकार की बेरुखी का मुद्दा उठाया. लेकिन इस प्रकरण का प्रेस रिलीज में कोई जिक्र नहीं है. पढ़िए आप भी प्रेस रिलीज, ताकि जान सकें कि इसमें जिक्र किस बात का है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

आईएफडब्लूजे के 65वें राष्ट्रीय अधिवेशन को शिवपाल सिंह यादव ने संबोधित किया

पत्रकारिता, संगीत और कला तब तक रहेगी जब तक सृष्टि रहेगी

मथुरा। देश के चैथे स्तम्भ ने देश को हर मुश्किल समय में दिशा प्रदान करने का कार्य किया है। उक्त विचार इण्डियन फैडरेशन आॅफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (आईएफडब्लूजे) के 65वें राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन समारोह में उत्तर प्रदेश के कबीना मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने व्यक्त किये। उन्होने इस मौके पर कहा कि पुरातन कालों में भी मीडिया का महत्व बना रहा है चाहे वह द्वापरयुग में भगवान श्री कृष्ण हो अथवा महाभारत के संजय आदि सभी ने मीडिया का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता, संगीत और कला तब तक रहेगी जब तक सृष्टि रहेगी। मैं अगर राजनीति में न होता तो साधु सन्तो के सानिध्य में रहता। पत्रकारिता भ्रष्टाचार और राजनीति से परे होनी चाहिये। आज टैक्नोलाॅजी के दौर में सोशल मीडिया बहुत प्रचलित है लेकिन प्रिन्ट मीडिया अखबार का महत्व जो पहले कभी हुआ करता था वो आज भी उतना ही है।

इस अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री के0 विक्रम राव जी ने कहा कि बदलते परिवेश में पत्रकारों को चरित्र निर्माण के लिये अपना मूल्यांकन करने की बहुत आवश्यकता है। उन्होंने मंत्री शिवपाल सिंह यादव का धन्यवाद दिया कि खराब मौसम होने के बावजूद वे कार्यक्रम में शिरकत करने आये। उन्होंने कहा कि जब भी बिहार का इतिहास लिखा जायेगा तो महागठबन्धन की संरचना में शिवपाल सिंह यादव की भूमिका का ही वर्णन आयेगा।

उन्होंने दक्षिण एशिया के पत्रकारों का सार्क पत्रकार महासंघ स्थापना की प्रतिबद्धता दोहरायी। इस दो दिवसीय अधिवेशन में 27 राज्यों एवं देश के केन्द्र शासित प्रदेशों के 590 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इससे पूर्व रविवार को आईएफडब्लूजे की कार्यकारिणी बैठक में कई महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लिये गये। मध्य प्रदेश के अध्यक्ष सलमान खान द्वारा उठाये गये मुददे पर राष्ट्रीय अध्यक्ष ने राजस्थान के जगदीश नारायण जैमन, केरला के सी0आर0 रामचंद्रन एवं आंध्र प्रदेश के वीरभद्र राव छत्तीसगढ एवं अन्य मामलों की जांच करेंगे।

कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्याम बाबू शर्मा, सचिव (विदेश मामले) मदन गौड़ा, डा0 उपेन्द्र पाधि, सीआरओ डा0 देवाशीष बोस, मध्य प्रदेश के अध्यक्ष सलमान खान, उ0प्र0 के अध्यक्ष हसीब सिददकी, गीतिका ताल्लुकदार, के0 विश्वदेव राव ने देश भर से जुटे पत्रकारों को पत्रकारिता में चरित्र की चुनौतियों को इंगित करते हुए इसे सतत संघर्ष बताया।

तमिलनाडु के सज्ञाराज और चन्द्रिका ने जून में आयोजित होने वाले संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन की घोषणा की है। वहीं अन्तर्राष्ट्रीय मामलों के सचिव श्री मदन गौड़ा ने आगामी फरवरी में होने वाले कर्नाटक अधिवेशन के लिये कबीना मंत्री श्री यादव को भी वहां आने के लिये आमंत्रित किया। इस दौरान राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दिल्ली मुख्यालय के सचिव के रूप में वरिष्ट पत्रकार विपिन धूलिया को मनोनीत किया है।

के0डी0 डेन्टल काॅलेज के विशाल सभागार में आज सोमवार को आयोजित इस कार्यक्रमें मथुरा के जिलाधिकारी श्री राजेश कुमार, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डा0 राकेश कुमार, मथुरा वृन्दावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष चन्द्रप्रकाश सिंह, सचिव एसबी सिंह आदि जनपद भर के अधिकारियों के अलावा वरिष्ठ पत्रकार देशभक्त बाजपेयी जी, उपाध्यक्ष सत्या पारिक, सुल्तान शहरयार खान, श्याम जोशी, रामदत्त त्रिपाठी, मुदित माथुर, अरविन्द अवस्थी, एन0 राजू, विनोद चैधरी, प्रवेश चतुर्वेदी, संजय द्विवेदी, अमित भार्गव, सुरेश सैनी, हरिओम पाण्डेय, विकास शर्मा, फैजल कुरैशी, अनिल सारस्वत, वकील खान, मधुसूदन शर्मा आदि ने शिरकत की। इस कार्यक्रम के मुख्य संयोजक श्री सन्तोष चतुर्वेदी ने अन्त में सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।

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पत्रकारों की लड़ाई लड़ने वाले परमानंद पांडेय को अपमानित करना शुरू किया के. विक्रम राव ने!

देश के जाने माने पत्रकार नेता परमानंद पांडेय को अपमानित करने की मुहिम खुद उनके ही संगठन के वरिष्ठों ने शुरू कर दी है. वरिष्ठ पत्रकार और सुप्रीम कोर्ट के वकील परमानंद पांडेय ने मजीठिया वेज बोर्ड की लंबी व मुश्किल लड़ाई लड़ते हुए पूरे देश में आम पत्रकारों के बीच सम्मान और प्रशंसा हासिल की है. लेकिन वे जिस पत्रकार संगठन IFWJ में महासचिव हैं, उसी संगठन के वरिष्ठ लोग उन्हें अपमानित करने की मुहिम चलाने लगे हैं.

ताजी खबर ये है कि आईएफडब्ल्यूजे के सम्मेलन में जब कार्यकारिणी के कई सदस्यों को के. विक्रम राव ने भाग लेने से रोकने की कोशिश की तो परमानंद पांडेय ने बतौर महासचिव इस कृत्य का विरोध किया और सम्मेलन का वाकआउट कर गए. सूत्रों का कहना है कि असल में पूरी लड़ाई सरोकार बनाम दलाली की है. एक तरफ परमानंद पांडेय पत्रकार हितों को लेकर संघर्षरत हैं और सत्ता व मीडिया प्रतिष्ठानों से टकरा रहे हैं तो दूसरी तरफ सत्ता के चारण किस्म के पदाधिकारी हैं जो संगठन को अपने कब्जे में रखकर हर हाल में दलाली संस्कृति को मुख्यधारा बनाए रखना चाहते हैं.

परमानंद पांडे पर के. विक्रम राव खेमे ने आरोप लगाया है कि मजीठिया वेज बोर्ड का केस लड़ने के लिए उन्होंने आईएफडब्लूजे के आफिस का इस्तेमाल किया. यह बड़ा ही हास्यास्पद आरोप है कि अगर कोई पत्रकार संगठन का पदाधिकारी है तो वह पत्रकारों के हित के लिए लड़ता है तो इसमें क्या गलत है. मोदी और मुलायम के हाथों सम्मानित होकर खुद को महान पत्रकार बताने दिखाने वाले के. विक्रम राव नहीं चाहते कि संगठन के बैनर तले पत्रकारों के हित की लड़ाई लड़ी जाए. वे संगठन को सिर्फ नेताओं मंत्रियों अफसरों के आगे समर्पित करके इससे लाभ हासिल करना चाहते हैं. मकान, दुकान, सम्मान, रुपया, पैसा, एवार्ड हासिल करने के चक्कर में ही आज देश के ढेर सारे पत्रकार संगठनों महज हवा हवाई व भाषणबाजी तक सिमट गए हैं.

सूत्रों के मुताबिक आईएफडब्लूजे कार्य समिति की बैठक में विक्रम राव ने दो दर्जन बाउंसर बुला लिए. चर्चा है कि प्रधान महासचिव परमानंद सहित सात सदस्यों को शामिल होने से रोका. परमानंद पांडेय को महासचिव पद से हटाने की भी तैयारी है ताकि संगठन का दलाली के लिए पूर्ण रुपेण इस्तेमाल किया जा सके और कोई सवाल उठाने वाला न रहे. सम्मेलन में गैर सदस्यों को शामिल कर बैठक की औपचारिकता पूरी की जा रही है. उद्घाटन समारोह से मुलायम सिंह यादव ने किया किनारा. डीएम को बनाया मुख्य अतिथि. मथुरा में हुए सम्मेलन को लेकर आरोप लगाया जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव के कार्यक्रम के नाम पर जम कर वसूली की गई. सायकिल स्टैंड चलाने वाले और कचौड़ी बेचने वालों को सम्मेलन का आयोजक बनाकर यह दिखा दिया गया कि संगठन पूरी तरह जेबी हो चुका है.

ज्ञात हो कि परमानंद पांडेय एक जमाने में जनसत्ता अखबार में चीफ सब एडिटर हुआ करते थे. उन्होंने पत्रकारों के हित के लिए तीन माह की लंबी स्ट्राइक कराई. बाद में प्रबंधन ने उनका तबादला गोरखपुर कर दिया. उन्हें जब प्रबंधन ने किनारे करने की कोशिश की तो वे वकालत पढ़े होने के कारण सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे और मीडिया वालों की लड़ाई को अपने हाथ में लेकर अंजाम तक पहुंचाने लगे. उन्हें IFWJ का महासचिव बनाया गया लेकिन उन्हें काम करने यानि पत्रकारों की लड़ाई लड़ने से रोकने की भरसक कोशिश की गई लेकिन वो अपने पथ पर डटे रहे. ताजा विवाद के बाद माना जा रहा है कि के. विक्रम राव व उनकी लाबी परमानंद पांडेय को संगठन से बाहर करके संगठन को अपने मनमुताबिक संचालित करेगी.

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NO NEWSPAPER IS PUBLISHED FROM ANDAMAN AND NICOBAR!

There is no daily newspaper in the Union Territory of Andaman and Nicobar. There are a few small weekly newspapers which do not employ any regular employee. One or two persons are employed by them on hourly basis to bring out the weeklies. It has been stated by Mr. Madhu Sudhan Baidya, Labour Commissioner and Director of Employment Training (Andaman and Nicobar Administration) in his affidavit filed before Hon’ble Supreme Court of India.

He says that ‘there is only one Government Newspaper Establishment in the Andaman & Nicobar Islands and all employees employed in the said establishment are being paid as per the pay scales at par with Central Government Employees fixed by the Government of India. Further, the employees in numbers one or two are working in other Private Newspaper Establishments (other than One Man Establishments) on part time basis i.e. hourly basis (one or two hour) in the Union Territory of Andaman and Nicobar Islands.’

The order for filing the status report by the State Governments was passed by the Hon’ble Supreme Court on April 28, 2015. They were asked to appoint Labour Inspectors within a month and send the report within three months thereafter. The time limit for filing the status report by the Governments expired on 27 August 2015 but most of the State Governments have yet to file the report.

The notable defaulters are the Governments of Uttar Pradesh, Bihar, Haryana, West Bengal, Assam, Gujarat, Maharashtra, Karnataka, Kerala, Andhra Pradesh, Telangana and Tamilnadu. Most of the big and medium newspapers are published from these states where the employees have been deprived of the benefits of the Majithia Award. Therefore, the status report from these states will determine the fate of the Contempt Petitions.

The date of hearing of Contempt Petitions is being deferred week after week because the registry deletes the case from the cause list. The reasons being given by the registry are that the reports from important States are still awaited and excess number of listed cases.

Parmanand Pandey
Secy.Gen.
IFWJ


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Union Labour Ministry asks UP Government to ensure implementation of Majithia Award

The PMO (Prime Minister’s office) has asked the Union Labour Ministry to coordinate with the State Government of Uttar Pradesh for the implementation of the Majithia Award. In a letter to the Prime Minister Narendra Modi, the IFWJ requested him to immediately intervene and ensure the implementation of the Majithia Award which has already been notified by the Government of India on 11.11.2011. The writ petitions filed by the newspaper proprietors against the recommendations of the Majithia Award were also dismissed by the Hon’ble Supreme Court of India on 07.02.2014.

However, most of the newspapers have failed to implement the Award. That is why, a bunch of contempt petitions have been filed by the newspaper employees in the Supreme Court. The Court has taken cognizance of it, and has directed the State Governments to file the status report with regard to the implementation of the Wage Board. It is highly regrettable that many of the State Governments, including the State of U P, have not filed the status report till date. As a result of it, the newspaper employees across the country are undergoing through great hardships.

In the mean time, most of the newspapers, particularly like Dainik Jagran, Dainik Bhaskar, Rajasthan Patrika, Nai Duniya, Prabhat Khabar, Eenadu, Hindustan Times have started harassing and victimising the employees by transferring, suspending and terminating.

In a communication to the IFWJ, the Union Labour Ministry has said that the primary responsibility of the implementation of Award lies with the State Government and therefore the Ministry is asking the Govt. of Uttar Pradesh to ensure the implementation of the Award. The photocopy of the letter is attached herewith.

Parmanand Pandey
Secretary General
IFWJ

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Newspapers of J&K feign ignorance about the Majithia Award

The report of the Government of J&K filed in the Supreme Court of India on the status of the implementation of the Majithia Wage Boards filed by the Labour Commissioner Shri Vipra Bhal says that ‘None of the newspapers has been found to be satisfactorily abiding by the recommendations (Majithia Wage Board) citing one or the other ground. The newspaper establishments have, however, been made to understand that they are statutorily obliged  to abide by them and any lapse in this regard may result in launching of prosecution against them.’

The affidavit of the Labour Commissioner reveals that many few newspaper establishments have feigned ignorance regarding the Majithia recommendations and their obligations of implementing the same. Major media houses, like the Hindustan Times and Indian Express, have been found to be operating through three -four employees on contract basis and on inquiry in respect of compliance of recommendations they claimed that the employees engaged through the contract are beyond the ambit of the Wage Board recommendations. The report says that except for the Amar Ujala Group none of the newspaper establishment has even bothered to furnish any reply to the queries of the Labour Commissioner.

The report says that the Government of J&K has initiated prosecution against two newspapers in Jammu namely; ‘Punjab Kesari’ and ‘Early Times’. Similarly, in the Kashmir region the Labour Department prosecution against six newspapers has started. Thus, the report of the Government of J&K suggests that the newspapers of state have little respect even to the order/direction of the Hon’ble Supreme Court of India.

Parmanand Pandey
Secy. Gen. IFWJ

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Majithia Award: it is as dismal in Madhya Pradesh as in other states

The story of Madhya Pradesh is no different from other states as far as the implementation of the Majithia Wage Award. Till date only six states viz. Delhi, Punjab, Madhya Pradesh, Jharkhand, Rajasthan and Sikkim have filed their status reports. The situation is in Madhya Pradesh is dismal and the condition of the newspaper employees is as pathetic, if not more, as in other states.

The report filed with the affidavit of Shri K.C. Gupta, Labour Commissioner of Government of Madhya Pradesh at Indore tells the sordid saga of exploitation of the Employees by the newspaper owners in Madhya Pradesh. However, the Labour Department of Madhya Pradesh has done a good job by filing the case of prosecution against the newspaper owners in the court of Chief Judicial Magistrates of different districts.

Indore, Bhopal, Gwalior, Jabalpur, Ujjain, Rewa, Sagar and Satna are the major publication centres of newspapers in Madhya Pradesh. Nai Dunia, Raj Express, Dainik Bhaskar, Free Press, Patrika, Hindustan Times and Swadesh are the main newspapers, which are published from the state, but none of these newspapers has been found to have implemented the Wage Award.

Dainik Bhaskar has adopted the same ruse of Section-20j in all its publication of Madhya Pradesh, which it has adopted in other states. Not to be outdone, the same tactics has been adopted by Nai Dunia, which has now been taken over by the largest selling newspaper of the Country i.e. Dainik Jagran. Some of the newspapers have sought time to furnish the information about the implementation of the Award but there is not even a shred of doubt on one score that no newspaper has provided the benefits of the Majithia Wage revision to their employees in Madhya Pradesh.

Parmanand Pandey
Secy. Gen.
IFWJ

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Newspapers of Jharkhand have refused to cooperate with State Government about Majithia Award

All big newspapers coming out from the state of Jharkhand have not even bothered to reply to the queries of the Labour Department. The State Labour Commissioner Shri Praveen Kumar Toppo has filed the report on sworn affidavit. An advance copy of the report has been served on employees counsel Parmanand Pandey, which says that the notices were issued 93 newspapers they have refused to cooperate with required information.

Newspaper owners have not produced any record or registers to the inspectors of the Labour Department making difficult for them to ascertain the magnitude of the implementation of the recommendations of the Award. Two newspapers Dainik Jagran and the Hindustan Media Ventures (publishers of the Hindustan) have taken stand that the employees do not want the hiked wages under the Majithia Wage Award, as they are content with the existing salary, which is much less than what the Wage Board has recommended.

To be very fair the Labour Commissioner of Jharkhand has stated in his report that there is an inherent contradiction between Section – 20j and Section – 13 of the Working Journalist Act and he has wanted the Hon’ble Supreme Court to clarify the contradictions so as the Governments could take any definite decision on the issue. The chart that has been annexed with the affidavit demonstrates that there are 18 newspapers, which regularly come out from the State Capital Ranchi and none of them has implemented the Award.

Similarly, 24 newspapers are published from Bokaro but not even one has been reported to implement the Award. Jamshedpur is another important centre of publication wherefrom 27 newspapers, including the Telegraph of the ABP Pvt. Ltd. and the Prabhat Khabar are printed regularly. While the Telegraph has not bothered even to reply to the notice, the Prabhat Khabar has used the shield of Section 20j for not giving the Wage Board.

The publisher of the Prabhat Khabar i.e. Neutral Publishing House claims that there are only 43 employees working for the newspaper but it is startling to know that out of these only three employees are on the payroll, 39 are on contract and one is a daily wager. The brazenness of the management has crossed all heights and limits, when it says that all employees have opted for proviso 20j of the Wage Board recommendations.

Further to rub the salt on the wounds, the management has refused to produce any record. Similarly, the publisher of the Hindustan i.e. Hindustan Media Ventures Ltd. claims that there are only 51 employees, who bring out the newspaper. Out of it, there are only 13 employees on regular employment and 13 are on contract. This newspaper says that the Majithia Award stand implemented in this organization, thanks to Section 20j of the Wage Board recommendations.

Dainik Jagran and Dainik Bhaskar have no comparison as far as the exploitation of the employees is concerned. The proprietors of these newspapers do not have even a wee bit of shame in saying that the employees do not want Wage Board, they are happy with the existing wages. It is a known fact that this option under Section 20j has been forcibly obtained by the managements under the pain of threat and intimidation. The report has two pleasant surprises that two small newspapers- one from Dumka and other from Jamshedpur- have said that they have implemented the Award.

In nutshell, all-important newspapers like Hindustan Media Ventures Ltd., Prabhat Khabar, Dainik Jagran, Dainik Bhaskar, Aaj, Hindustan Times, Telegraph, Sanmarg, and Ranchi Express have cocked the snook to the law of the land and they have been violate the labour laws with the gay abandon.

P.S.: The next date of hearing of the Contempt Petitions has been tentatively fixed for 15th of September. However, the report of many state governments is yet to come, therefore, there is every possibility that the hearing for arguments may not take place on said date.

Ram P. Yadav
Secy
IFWJ


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HT, IE among 47 Delhi newspapers have dared not to implement Majithia Award

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HT, IE among 47 Delhi newspapers have dared not to implement Majithia Award

Except four newspapers namely; The Hindu, The Tribune, The Decan Herald and Bennet Coleman & Company (publishers of The Times of India, Economic Times and Navbharat Times) and one news agency i.e. the Press Trust of India no newspaper/news agency being published from Delhi has implemented the Majithia Award. This has been revealed in the affidavit of the Government of Delhi submitted by Dr. Madhu Teotia, Labour Commissioner of Government of NCT of Delhi.

According to the report, the Labour Department carried out the inspection in 77 newspaper establishments and 2 news agencies, which included 26 one-man establishments in which Wage Boards are not applicable. Out of remaining 53 newspapers, establishments/news agencies only four above named newspapers establishments have implemented the Award. Other newspapers have not at all implemented the Award.

Strangely, three important newspapers namely; Dainik Jagran, Dainik Bhaskar and Hind Samachar have skirted the implementation in the name of Section – 20j of the Majithia Wage Board recommendations. It will be interesting to know that according to Section – 20j of the Majithia Wage Board recommendations, the employees could exercise the option of not taking the advantage of the Wage Revision provided they were satisfied with wages, they have already been getting. The wages, which are being given to the employees of Dainik Jagran, and Dainik Bhaskar are less than 1/3rd of the Wage Boards recommendations.

It is all the more interesting to know that the option was to be utilised by the employees within three weeks of the notification of the Award. However, if the employees were highly satisfied with the ‘princely amount’ of wages given by these newspapers, then what was the need for these newspapers to have filed Writ Petitions in the Supreme Court of India against the Award? Further, if the employees were so satisfied with the ‘handsome’ salaries, then why did they approach the Hon’ble Supreme Court of India for the implementation of the Award? And if the Hon’ble Supreme had accepted their version then what was the need for it to appoint the special labour Inspectors to find out the status? Thus, it appears that these newspapers are telling the blatant lie with no fear to the law or law enforcing agencies.

What is highly baffling is that the important newspapers like the Hindustan Times (H.T. Media Ltd.), Hindustan Media Venture Ltd., the Statesman, India Today, Amar Ujala and Sahara India have openly dared to have not implemented the Award. Indian Express is another major newspaper, which has been audacious enough not to provide any information to the Labour Department.

Meanwhile, the Government of Jharkhand has also filed its status report and the same will be shared tomorrow.

Parmanand Pandey

Secy. Gen.

IFWJ

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None of major newspapers of Punjab has implemented the Majithia says the affidavit of the State Labour Commissioner

The reports of Special Labour Inspectors appointed by the State Governments on the direction of the Hon’ble Supreme Court of India vide its order of 28.04.2015 to find out the status of the implementation of the Majithia Award in newspapers has now started trickling in. Sikkim has been the first Government, which sent its report through its Chief Secretary almost a month ago.

 

Given the alacrity shown by the Government of NCT of Delhi, it was expected that it would take the lead in filing the report but unfortunately, it is proving to be a laggard. Frankly speaking, all eyes are set on Delhi because most of the important newspapers come out from the national capital and it would interesting to know that how these big newspapers send the law and law enforcers on holiday.

There are four main newspapers in Punjab namely; the Punjab Kesari, Dainik Jagran, Dainik Bhaskar and the Ajit. However, none of these four major newspapers has implemented the Award. This has been stated in the affidavit of the Labour Commissioner of Punjab Harbhupinder Singh Nanda submitted in the Supreme Court of India with an advance copy to the undersigned.

Thus, the Punjab has become the second state, which has filed its report, which provides very revealing and startling information. It says that there are 531 newspaper establishments, which are regularly functioning from the State of Punjab. Out of these 442 are self-managed by the owners, as they do not employ anybody. Out of the rest 89 establishments, only four have implemented and they are H.T. Media Ltd. of Mohali having 94 employees on rolls and the other three are the Chardikala of Patiala, and the Tribune of Jalandhar and Bhatinda with 14, 59 and 18 employees respectively.

One fact is, nevertheless, incontrovertible that almost all newspapers either have withheld the information or have given false information. Surprisingly, the State Government has not initiated any action against any of the erring newspapers so far. As far as the H.T. Media Ltd., the publisher of the important daily, The Hindustan Times, is concerned, it has fed very wrong information to the Inspectors about the number of employees, the revenue of the newspaper and its classification etc; and the state officials have, no wonder, accepted them without any demur.

Now the onerous responsibility has fallen on the journalists and non-journalists working for different newspapers of Punjab to debunk and nail the lies of the newspaper proprietors particularly of the H.T. Media Ltd., which is out to throw dust rather chilli powder in the eyes of all, the workers, the public, the administration and the judiciary. Let the truth prevail. Sikkim has stated that there is no newspaper in the state, where the Majithia Award could be applicable and this appears to be ex facie correct.

Parmanand Pandey

Secy. Gen.

IFWJ

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के. विक्रम राव आईएफडब्ल्यूजे के निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित

नई दिल्ली : इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्टस (आईएफडब्ल्यूजे) की शीर्ष कमेटी ने कामरेड के. विक्रम राव को निर्विरोध अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया है। सत्र का कार्यकाल 2016-18 तक का है।

आईएफडब्ल्यूजे के सचिव राम पी. यादव के मुताबिक आईएफडब्ल्यूजे के केंद्रीय निर्वाचन अधिकारी डा. देबाशीष बोस (बिहार) और सहायक निर्वाचन आधिकारी डा. उपेन्द्र पाधी (ओडिशा) ने नामांकन पत्रों की जांच के पश्चात राव के निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा की। आईएफडब्ल्यूजे की 25 इकाइयों में से 18 राज्य इकाइयों ने राव के पक्ष में प्रस्तावना एवं अनुमोदन किया था, जिनमें से मुख्य रूप से जम्मू एण्ड कश्मीर, मणिपुर, तमिलनाडू हैं। राष्ट्रीय पार्षदों के चुनाव की प्रकिया शुरू हो गई है। यह अक्टूबर तक संपन्न हो जायेगी। नव निर्वाचित राष्ट्रीय परिषद इस वर्ष के अंत में बैंगलोर के अधिवेशन में राष्ट्रीय पार्षदों का निर्वाचन करेगी।

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Bhaskar obtaining illegal undertaking from employees, IFWJ writes to Delhi CM

Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) has condemned the sinister attempts of Dainik Bhasker management to obtain forcibly the undertaking from the employees that they do not want the Majithia Award. In an email to Delhi Chief Minister of Delhi Arvind Kejriwal, Labour Minister Gopal Rai and the Labour Commissioner, the Secretary General of the IFWJ Parmanand Pandey, has requested them to intervene to safeguard the interests of the employees. The IFWJ has also sent a protest letter to the Managing Director of the D.B. Corp Ramesh Chandra Agarwal desist from indulging into gross unfair labour practice of getting signatures from employees.

In his letter to the Chief Minister and the Labour Minister Shri Pandey has said that the management was not paying wages and allowances to the employees as per the Majithia Award despite the notification by the Government and the order of the Hon’ble Supreme Court of India. Thus, the employees of Dainik Bhaskar had no choice but to file many contempt petitions in the Supreme Court. On the last date of hearing, the Supreme Court ordered all the state governments to appoint Labour Inspectors to find out the status of the implementation of the Majithia Award. Needless to say, that a large number of the newspapers has not implemented the Award but the worst violators are Dainik Bhaskar, Dainik Jagran, Naidunia, Rajasthan Patrika, Prabhat Khabar, Aaj, Sahara, the Hindustan Times, and the Statesman etc.

To hoodwink the order of the Supreme Court the newspaper employers are adopting the coercive methods to secure the signatures of the employees on a paper stating that they are satisfied with the wages being given to them by their newspapers and therefore, they do not want Majithia Award. It is a ridiculous ruse of the owners, which can be seen through any body but the most distressing part is that the state governments are maintaining the policy of criminal detachment by overlooking the interests of the employees and thereby the supporting the proprietors. 

Surprisingly, Dainik Bhaskar management was trying to get the signature of the employees even till yesterday, at a time when the investigations about the status of the Majithia Award as order by the Supreme Court are in the full swing, which demonstrates that the owner of Dainik Bhaskar has fear for the law, the government or even of the court. 

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IFWJ supports the ongoing struggle of Jagran and Strike call of Rashtriya Sahara employees

Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) and its affiliate Delhi Union of Working Journalists (DUWJ) have extended unflinching support to the struggling employees of Dainik Jagran and striking employees of Rashtriya Sahara. In a joint statement, the IFWJ Secretary General Parmanand Pandey and the General Secretary of the DUWJ Chandan Rai have denounced the anti-labour, exploitative and dictatorial managements of Dainik Jagran and Rashtriya Sahara.

It may be noted that the management of Dainik Jagran has been indulging into unethical and illegal arm-twisting of employees to muzzle their genuine demands of employees. Known for its repressive policies against the employees, the Jagran Management has not been allowing the employees even to form their own legitimate workers’ union. The employees of Dainik Jagran, however, deserve to be congratulated for their rocklike unity and peaceful agitation, which they have been carrying on for the last many days. The Jagran management has been denying the Majithia Award to its employees despite the clear direction of the Supreme Court, which was given to the management on its own petition vide W.P.(C) 546/2011. So much so, the tyrannical management has not paid the annual increments to most of its employees.

The Jagran Prakashan Ltd. Employees Union of NOIDA initially registered its protest with the management but the insolent management did not pay any heed to the demands. The employees then lodged their complaint with the Deputy Labour Commissioner of NOIDA but the adamant management did not agree to meet even the genuine demands of the employees. The employees then decided to tie black badges in protest against the highhandedness of the management. The IFWJ and DUWJ have urged the Government of Uttar Pradesh to immediately intervene in the matter and ask the Jagran management to see to the reason and accept the genuine demands of the workers without further delay.

The employees of Rashtriya Sahara, who have been undergoing hardship for non-payment their wages for so many have rightly decided to strike the work in the newspaper and its news channel because there was no other course left for them. Significantly, employees of the Sahara group have been very loyal to the owner of newspaper but there is always a limit to any tolerance. The Rashtriya Sahara management has always defied the law of the land and imposed its own set outrageous laws and rules for the employees but how long it can work when their bellies are empty? 

IFWJ and the DUWJ wonder with shock why the governments at the Centre and the States are maintaining the dubious silence over the illegality after illegality of the Rashtriya Sahara, which has the obvious disdain for the rules and regulations. It appears that the governments are brazenly taking side of the exploiters vis-à-vis the employees of Rashtriya Sahara.  Pandey and Rai have also asked the governments in the States and at the Centre to prevail upon the management of the Rashtriya Sahara to immediately pay the wages of the employees of Rashtriya Sahara.

Ram P. Yadav
Secretary-IFWJ

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