गुलाब कोठारी जी, मोहन भागवत के अलावा और लोगों से भी मिला करिए, ज्ञान में वृद्धि होगी!

आदरणी गुलाब कोठारी जी

मालिक और प्रधान संपादक, राजस्थान पत्रिका

आरक्षण को लेकर आपने एक सर्वे किया है। आपके अखबार को लेकर एक रिसर्च मैंने भी की है। हाल ही में आपके अखबार के प्रथम पृष्ठ पर एक सर्वे छपा। इसमें बताया गया था कि आरक्षण से किस प्रकार समाज में वैमनस्य बढ़ रहा है। हालांकि आरक्षण के खिलाफ ये कोई आपकी पहली खबर नहीं थी। आप लंबे समय से आरक्षण के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। यह खबर उसकी बानगी मात्र है। कुछ दिनों पहले आरक्षण पर आपका एक संपादकीय भी आया था। इसमें आरक्षण के खिलाफ खूब जहर उगला गया था और जमकर ज्ञान पेला गया था। Continue reading

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मजीठिया मामले में पत्रिका प्रबंधन को आज फिर मुंहकी खानी पड़ी!

Vijay Sharma : पत्रिका प्रबन्धन को आज फिर मुंहकी खानी पड़ी। प्रबन्धन ने 190 कर्मचारियों के मामले में राजस्थान हाई कोर्ट से स्टे ले कर उसे लम्बा खींचने की कोशिश कर रहा था। लेकिन पत्रिका प्रबन्धन की ये कोशिश नाकाम हो गई और आज राजस्थान हाई कोर्ट ने स्टे ऑर्डर खारिज करते हुए लेबर कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार मामला निपटाने के आदेश दिए। Continue reading

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चुनाव से पहले सरकार ने पत्रिका के ब्यूरो चीफ राजकुमार सोनी का तबादला कोयम्बटूर कराया

Ambrish Kumar : छतीसगढ़ से मुझे वर्ष 2003 में अपने एक्सप्रेस प्रबंधन ने जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिल्ली भेजने का आदेश दिया था. तब अपने पर कांग्रेस विरोध का आरोप था. भाजपाई सब साथ थे. कांग्रेस की सरकार थी. खबरों को लेकर अजीत जोगी से ठनी हुई थी. किसने दबाव डाला यह सब जानते थे. Continue reading

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ऋतिक रोशन ने पत्रिका और भास्कर को सरेआम लताड़ा, देखें ट्वीट

अभिनेता ऋतिक रोशन के बारे में अनर्गल खबर छापना पत्रिका और भास्कर जैसे बड़े अखबारों की वेबसाइटों को भारी पड़ा. ऋितिक रोशन ने इन दोनों अखबारों की वेबसाइटों के लिंक को सबके सामने यानि पूरे सोशल मीडिया की भीड़ की मौजूदगी में शेयर कर इन मीडिया हाउसों की क्लास ले ली. Continue reading

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राजस्थान पत्रिका और राजस्थान सरकार में कई साल से ठनी है, पढ़ें गुलाब कोठारी को जोरदार संपादकीय

Dilip Khan : राजस्थान पत्रिका और राजस्थान सरकार के बीच बीते कई साल से ठनी हुई है। पहले सबकुछ ठीक चल रहा था, फिर किसी बात से चिढ़कर सरकार ने विज्ञापन देना बंद कर दिया। गुलाब कोठारी ने उस वक़्त भी तीखा संपादकीय लिखा था। फिर सरकारी अनुदान से चल रहे गोशालों में दर्जनों गायों के मरने वाली ख़बर ने सरकार को और परेशान कर दिया। राजस्थान पत्रिका ने इस पर कई दिनों तक सीरीज चला दी।

गुलाब कोठारी दक्षिण दिशा के हैं, लेकिन विज्ञापन ही जब इस दिशा से नहीं आएगा तो परेड दाएं मुड़ क्यों करेगा कोई? भास्कर वाले उनसे ज़्यादा दक्षिणावृत्त हैं। और सब जानते हैं कि राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर में गलाकाट प्रतियोगिता है। गुलाब कोठारी का आज का संपादकीय ज़रूरी हस्तक्षेप है, लेकिन मुनाफ़े और धंधे की गलियों में किस इरादे से कोई आवाज़ दे रहा है, ये जानना ज़रूरी है। संपादकीय नीचे है :

राज्यसभा टीवी में कार्यरत पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

भाजपा की राजस्थान सरकार का काला कारनामा… मीडिया पर पाबंदी वाला बिल विधानसभा में पेश.. सुनिए यशवंत को…

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हिट्स-लाइक के लिए अश्लीलता पर उतारू पत्रिका ग्रुप का पोर्टल, देखें ये हेडिंग और फोटो

एक दौर था जब लोग पत्रकारों के ईमानदार होने और निष्पक्ष पत्रकारिता के शानदार प्रयोगों के उदारहण दिया करते थे। बदलते समय के साथ साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का भी स्वरूप और लेखन बदल गया है। अब पत्रकारिता के नाम पर बड़े बैनर के वेब पोर्टल तक ज्यादा से ज्यादा हिट्स और लाइक के चक्कर में अश्लीलता परोसने में जरा भी गुरेज नहीं कर रहे हैं।

कई बड़ी फिल्मों में मीडिया पार्टनर रहने वाले पत्रिका के वेब वेंचर ने कामुक और कामवासना की एक कहानी लिख दी। यह कहानी भाई-बहन के रिश्ते को लेकर लिखा गया है। क्या अब पाठक खबर की जगह ऐसी सेक्स स्टोरी पढ़ेंगे? उस पर भी खबर लिखने वाले रिपोर्टर ने स्टोरी की हैडिंग भी बड़ी ‘खूबसूरती’ से सोचने के बाद दी है, जिस पर संपादक जी ने अपनी मोहर लगाई होगी। साथ ही इस खबर के साथ जिस काल्पनिक तस्वीर का प्रयोग किया गया है, वह भी सेमी पोर्न से कम नहीं है.

लखनऊ से अक्षय कुमार की रिपोर्ट.

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‘राजस्थान पत्रिका’ अखबार का एक और कारनामा… ‘श्रीमती राहुल गांधी’ छाप डाला!

सीधी बात तो यह है कि ‘पत्रिका’ अखबार खुद में ब्लंडर्स का स्पेशल एडिशन है। इसी फेहरिस्त में चुरु से निकलने वाला ‘पत्रिका’ का एडिशन भी पीछे नहीं रह गया है। दरअसल 15 अगस्त के मौके पर कांग्रेस पार्टी की ओर से मिले बड़े से विज्ञापन में वहां के होनहार कर्मियों ने सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी को भी “श्रीमती” लगाकर बड़े में छाप दिया। अब पत्रिका या कोठारी जी को गलतियां भूलकर आगे बढ़ने की आदत होगी लेकिन उनका क्या, जिनको लगता है कि गलतियां सबक लेने के लिए होती हैं, न कि एक लेवल ऊपर होकर फिर से करने की चीज।

इसके पहले भी पत्रिका ने “उल्टा तिरंगा” पकड़ी युवती को बड़े में छापकर देशभक्ति की मिसाल दी थी। और तो और, छत्तीसगढ़ वालों ने तो फुल पेज विज्ञापन में CM रमन सिंह को PM रमन सिंह बताकर छाप दिया था। तो भई ऐसा है कि किसी कार्यक्रम में माइक मिलने के बाद ज्ञान देना या खुद से खुद को महान बताने का काम कोई भी कर सकता है। अगर आपका वजूद मीडिया क्षेत्र से है तो नमूना से आगे बढ़कर ब्रांड बनने पर जोर लगाइये।

आशीष चौकसे
ब्लागर और पत्रकार
ashishchouksey0019@gmail.com

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राजस्थान पत्रिका प्रबंधन से श्रम विभाग ने पूछा- क्यों नहीं दिया मजीठिया, कारण बताओ

राजस्थान पत्रिका के एमडी को श्रम विभाग ने नोटिस भेजकर उपस्थित होने को कहा

जयपुर। सर्वोच्च न्यायालय के मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में 19 जून को दिए गए फैसले के बाद पत्रकारों की उम्मीदों को झटका जरूर लगा था, लेकिन इस फैसले के बाद पत्रकारों की उम्मीदों को नए पंख भी मिल गए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देशभर के श्रम कार्यालयों में मजीठिया वेज बोर्ड को हल्के में नहीं ले रहे हैं। लेबर विभाग को लेकर आम धारणा है कि यहां सालों साल मामले ​खिंचते चले जाते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद श्रम विभाग को लेकर मजबूरी में ही सही सक्रिय होना पड़ रहा है।

राजस्थान के श्रम विभाग के अतिरिक्त श्रम आयुक्त राजीव किशोर सक्सेना ने कर्मचारियों की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए राजस्थान पत्रिका के एमडी को नोटिस जारी कर कारण पूछा है। नोटिस में माननीय सुप्रीम कोर्ट के 14 मार्च 2011 और 19 जून 2017 के आदेशों का हवाला देते हुए पूछा गया है कि आपने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनुपालना की है या नहीं। यदि नहीं की है, तो 10 अगस्त को शाम 4 बजे श्रम विभाग में उपस्थित होकर कारण बताएं।

राजस्थान पत्रिका के कर्मचारियों की ओर से दो—ढाई साल पहले से ही श्रम विभाग में शिकायतें दर्ज हैं, लेकिन इन शिकायतों पर अब तक कोई कार्यवाही होती नहीं दिख रही थी। ताजा मामले में राजस्थान पत्रिका के जयपुर मुख्यालय में कार्यरत उपसंपादक विपुल शर्मा और बीकानेर में कार्यरत वरिष्ठ उपसंपादक विनोद कुमार बालोदिया की शिकायतों को भी श्रम विभाग ने पूर्व में दर्ज शिकायतों के साथ संलग्न करते हुए राजस्थान पत्रिका प्रबंधन से जवाब मांगा है। अब राजस्थान पत्रिका प्रबंधन चाहे जो भी जवाब दे, लेकिन मजीठिया तो देना ही होगा।

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‘पत्रिका’ अखबार ने जिंदा मंत्री को ‘मार’ कर श्रद्धांजलि तक दिलवा दिया!

राजस्थान पत्रिका के जालोर एडिशन में 10 अगस्त को ‘पूर्व केन्द्रीय मंत्री को श्रद्धांजलि दी’’ शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई. इसमें राजस्थान के जीते-जागते विधायक व मंत्री को भाजपा पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं द्वारा श्रद्धांजलि दी जाने संबंधी खबर प्रकाशित कर दी गई. गौरतलब है कि बुधवार को दिल्ली में अजमेर सांसद व पूर्व केन्द्रीय मंत्री सांवर लाल जाट का निधन हो गया. इसकी खबरें सभी टीवी न्यूज चैनल्स पर पूरे दिन चलीं और सभी अखबारों में फ्रंट पेज पर भी छपीं.

पत्रिका में भी यह खबर सभी एडिशन में फ्रंट पेज पर छापी गई. मगर जालोर एडिशन में पेज नंबर आठ पर छपी खबर में सांवर लाल जाट की जगह राजस्थान के कृषि मंत्री प्रभूलाल सैनी का निधन होना बता दिया गया. साथ ही कार्यकर्ताओं द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी जाना छाप दिया गया. यह गलती संवाददाता ने की या डेस्क पर बैठे कर्मियों ने, यह पत्रिका की आंतरिक जांच का विषय है लेकिन यह गलती बहुत बड़ी है.

राजस्थान पत्रिका एक प्रतिष्ठित अखबार है और जन-जन में इसकी एक अलग पहचान व विश्वसनीयता है. इस विश्वसनीयता पर इस गलती ने बड़ा बट्टा लगाया है. हिन्दी साहित्य क्षेत्र में खुद को श्रेष्ठ कहलाने वाले गुलाब कोठारी के पत्रिका अखबार की इस कारगुजारी से कई लोग मजे भी ले रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि क्या यही ज्ञान है कि मौत हुई सांसद सांवरलाल जाट की, और मार दिया कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी को.

पत्रकार पीयूष राठी की रिपोर्ट.

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पत्रिका, मंदसौर आफिस में कार्यरत मुरली मनोहर शर्मा की अमानवीय और घटिया हरकत

Shri Maan ji, mei Mandsaur Patrika me circulation back office or account ka work dekhta thha. 25.01.2016 Ko muje Murli Manohar Sharma davra cabin me Bulaya Gaya. Khaa Gaya ki kal se aap Ko nokari par nahi aana he. Mene uska reson puchha to bole koi reson nahi hei. Mene Khaa thik hei, mujhe letter de do aap to me kal se office nahi ayunga. Lekin letter Dene se bhi Mana kar diya.

us Adhikari se meri bhot bhas hui or me usse bol ke aaya Ki me labour office jaake aap ki Shikayat karunga. wo bole ki Ha, aap se ho jo aap kar leve. Jub me vaha se Nikla to usse pahle mere pass jitne bhi agent ke Rs the, 30000 Rs, vo maine Murli Manohar Sharma Ko de diye. kyo ki vo Hamra Mandsaur office ka Adhikari he. Mene vo pese usse de diye.

Mene rside kaat Rakhi thhi to usne vo pese JAMA nahi karye or office me bol diya ki Mahesh Patidar office se pese le ke Gaya or mere name se thane me date 01.02.2017 Ko ek latter de aaye ki me office ke pese leke Gaya hu. muje fasaya ja Raha he or mere name se case file karva rahe he.

majethiya ki maang ki gayi thhi mere davra, es liye ESA Kiya ja Raha he. pahle bhi ye 02 Shri taresh Sharma or Shri Ram babu bharthi karmchari Ko Mandsaur office se nikaal chuke he. jinka case Mandsaur laber me chal Raha he. un logo ne case kar rakha he. Mandsaur Patrika ka kesa Insaaf he ki mere saath ESA Kiya ja Raha he or baaki karmchari ke saath bhi.

Mahesh Patidar
Mandsaur
8959262702
mayank8959262702@gmail.com

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भूरिया ने ऐसे अखबार के पक्ष में संसद में आवाज उठाई जिसे कर्मचारी शोषण में गोल्ड मेडल मिलना चाहिए

आदरणीय भूरिया जी,

नमस्कार,

सुबह-सुबह राजस्थान पत्रिका के प्रथम पेज पर आपकी मीडिया के दमन को लेकर चिंता के विषय में पढ़ा। अच्छा लगा। मीडिया के अधिकारों की बात होनी चाहिए। पुरजोर तरीके से मीडिया की दबती आवाज, अभिव्यक्ति, आजादी आदि-आदि के लिए लड़ना चाहिए। पर, आश्चर्यजनक तो यह है कि आप संपूर्ण मीडिया के लिए लड़े नहीं। एक विशेष अखबार की आपको चिंता हुई। कोई विशेष कारण। आखिर क्या मजबूरी थी? आपने कहा, अखबार के विज्ञापन रोकना लोकतंत्र विरोधी है। यह बात हजम नहीं हुई।

आप ही समझाओ लोकतंत्र में कहां उल्लेख है कि अखबार को सरकार का विज्ञापन देना अनिवार्य है? अखबार को सरकार विज्ञापन नहीं देगी तो लोकतंत्र को क्या नुकसान होगा? विज्ञापन रोककर सरकार कैसे मीडिया हाउस पर अंकुश लगा सकती है? क्या सरकार ने अखबार की प्रिंटिंग प्रेस पर ताला लगा दिया या उसके प्रतिनिधियों के सचिवालय में घुसने के पास रद्द कर दिए या रिपोर्टरों को खबर करने से रोका जा रहा है या किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई की है? यदि ऐसा कुछ किया है तो वाकई आपको आवाज ही नहीं उठानी चाहिए, बल्कि सरकार की मुखालफत (आपने खिलाफत शब्द का इस्तेमाल किया, जो गलत है) करनी चाहिए। सर जी सड़क पर उतरकर लड़ें, हम आपके साथ कंधे से कंधा मिलाएंगे।

लेकिन आपने तो ऐसे अखबार के पक्ष में संसद को चुना, जिसे कर्मचारी शोषण में ओलंपिक का गोल्ड मेडल मिलना चाहिए। जो अपना वाजिब हक मांग रहे पत्रकारों का गला घोंटने में अव्वल है। जिसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना के 5 केस चल रहे हैं। 200 से ज्यादा पत्रकार-गैर पत्रकार आप ही की सरकार (यूपीए-2) के लागू मजीठिया वेजबोर्ड को पाने के लिए कोर्ट की शरण में हैं। जिनमें 25 से ज्यादा पत्रकार-गैर पत्रकारों को बिना कारण बर्खास्त किया जा चुका है। 40 से ज्यादा को बेघर किया गया है। यह अखबार अपने कर्मचारियों से अमानवीय व्यवहार की सारी हदें तोड़ रहा है। यहां पत्रकारों की तुलना कुत्तों से हो रही है। अखबार पत्रकार नाम के प्राणी को ही यह विलुप्त बनाने पर आतुर है। आप ही बताएं, ऐसे अखबार ने अपने आर्थिक हितों के लिए आपका तो इस्तेमाल नहीं किया?

आप वरिष्ठ राजनेता हैं। आपका जनता में बहुत सम्मान है। आप भारी मतों से विजयी होकर लोकतंत्र के मंदिर में पहुंचे हो। आपसे छोटा से अनुरोध है, जैसे आपने इस अखबार के लिए संसद में आवाज उठाई, उससे थोड़ा कम इस अखबार द्वारा प्रताड़ित पत्रकार-गैर पत्रकारों की भी आप आवाज बनें। हम आपके बहुत-बहुत आभारी रहेंगे। देर शाम राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी ने भी कुछ ऐसा ही किया, यही सवाल गहलोत जी से भी है।

धन्यवाद।
विनोद पाठक

विनोद पाठक के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vikas Bokdia : मुझे लगता है की भूरिया ने गुलाब कोठारी का कोई पुराना कर्ज उतारा है ऐसा दुस्साहस करके।। संसद में जो कागज़ पता नहीं कौनसे टेबल की दराज के डस्टबीन में फेंक दिया गया उसकी आत्मप्रशंसा करते हुए ऐसी भ्रामक खबर छापना गुलाब कोठारी के असली व्यक्तित्व को दर्शाता है। आपको बता दूँ की ये खबर छपने के बाद से भूरिया अपना फोन स्विच ऑफ करके किसी दड़बे में छुप गए हैं। देखते हैं वे कब तक हमारे सवालों से बच पाते हैं। इधर सुना है कि कोठारी ने विपक्षी सांसदों को एप्रोच करके इस मुद्दे पर वसुंधरा को घेरने का कोई प्लान बनाया है। मगर मेरा मानना है कि ये दांव कहीं उल्टा न पड़ जाये।। चौबेजी कहीं दुबेजी नहीं बन जाएँ।।।
…तुलसी हाय गरीब की
कबहू ना निष्फल जाय
मरे बैल के चाम सूं
लौह भसम होई जाय।

Parmanand Pandey : Beautiful commentary. You have exposed the duplicity of the gentleman. Shabash.

Amit Mishra : पत्रिका के मालिकानों पर माननीय सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के 7 मुकदमे चल रहे

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पत्रिका के उज्जैन संस्करण की हालत खराब, कर्मी दुखी, कइयों ने दिया इस्तीफा

राजस्थान पत्रिका के उज्जैन संस्करण के इन दिनों हालात खराब चल रहे हैं। यहां डेस्क पर काम करने वाले लोगों की संख्या कम होती जा रही है। लगता है प्रबंधन को इस बड़े संस्करण की फिक्र ही नहीं है। पिछले दिनों अवकाश ना मिलने के कारण परिवार को समय नहीं दे पा रहे डेस्क के राकेश बैंडवाल और सूरजभान चंदेल ने अखबार को टाटा कह दिया। वहीं आईटी विभाग के शम्मी जोशी भी इंदौर के आईटी हेड महेंद्र खींची के व्यवहार के कारण अखबार छोड़ गए। जोनल एडिटर के एक आदेश के बाद संपादकीय कार्य बखूबी अंजाम देने वाले महेश बागवान को आईटी का काम सौंप दिया गया जो किसी को हजम नहीं हो रहा।

अब डेस्क पर सिर्फ पांच लोग बचे हैं। उज्जैन से तीन संस्करण निकलते हैं और डेस्ककर्मी सिर्फ पांच। इसमें से एक कर्मचारी का साप्ताहिक अवकाश होता है। ऐसे में चार लोग मिलकर अखबार निकाल रहे हैं। इनमें से किसी साथी को यदि आवश्यक पारिवारिक कार्य भी हो तो वह ऑफिस छोड़कर नहीं जा सकता। उसे 10 घंटे से ज्यादा काम करना ही है। चाहे उसके  परिवार के काम बिगड़ जाएं, लेकिन अखबार अच्छा और समय पर निकालना जरूरी है।

सिंहस्थ के दौरान भी प्रबंधन ने दो माह तक रिपोर्टर और डेस्ककर्मियों के साप्ताहिक अवकाश और अन्य अवकाशों पर प्रतिबंध लगा दिया था। रिपोर्टर तो फील्ड के काम के साथ ही सिंहस्थ में परिवार को घुमा भी लाए, लेकिन डेस्ककर्मियों को यह मौका नहीं मिल सका। उन्हें अवकाश नहीं दिया गया। ऐसे में उन्हें जीवनभर इस बात का संताप रहेगा कि 12 साल में एक बार होने वाला महापर्व वे अपने परिवार को नहीं दिखा पाए। सिंहस्थ के बाद अब तक डेस्क के साथियों के उन दिनों के अवकाश की क्षतिपूर्ति के लिए ना तो अवकाश दिए जा रहे हैं और ना ही भुगतान।

ये उज्जैन पत्रिका के कर्मचारियों की निष्ठा ही है कि माहौल बनने के बाद भी किसी ने भी पत्रिका के खिलाफ मजीठिया मामले में कोई केस नहीं किया। फिर भी उनके साथ ऐसा किया जा रहा है। कई साथियों के परिवार में कोई मांगलिक कार्य हो तो भी उसे अवकाश नहीं मिल पाता। साप्ताहिक अवकाश मिलेगा ही, यह भी निश्चित नहीं है। कार्य की अधिकता बताकर हर कभी साप्ताहिक बंद कर दिए जाते हैं। इसके चलते डेस्ककर्मी खुद को प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं। इस कारण ही राकेश बैंडवाल को नौकरी छोडऩे का फैसला लेना पड़ा। उसने संपादक से अवकाश की मांग की तो संपादक ने उसे डेस्क पर साथियों की कमी होने की मजबूरी बताई। अवकाश स्वीकृत नहीं होने पर उसने परिवार को तवज्जो देते हुए नौकरी छोडऩा ही बेहतर समझा।

खुद संपादक राजीव जैन भी अगस्त 2015 में न्यूज एडिटर अभिषेक श्रीवास्तव के तबादले के बाद से लगातार तीन माह तक बिना अवकाश कार्य करते रहे। इसका कारण यह रहा कि श्रीवास्तव की जगह कोई नया न्यूज एडिटर नहीं भेजा गया। नतीजा उन्हें चिकन पाक्स हो गया। इसके बाद भी सेकंड मैन की क्षतिपूर्ति नहीं की गई। फिर डेस्क इंचार्ज अनिल मुकाती को ही सेकंडमैन की जिम्मेदारी दे दी गई। इसके बाद संपादक जैन ने साप्ताहिक अवकाश लेना शुरू किया।

एक पत्रिका कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मजीठिया वेज बोर्ड न देने के लिए अपने कर्मियों को प्लेसमेंट एजेंसी के हवाले कर रहा राजस्थान पत्रिका प्रबंधन!

वाचमैनों की तरह घूम घूम कर नौकरी करेंगे पत्रकार…. मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतन, भत्ते और सुविधाएं न देना पड़े इसके लिए अखबार मालिक इस हद तक जा रहे हैं कि अपने ही कर्मचारियों को प्लेसमेंट एजेंसी के हवाले कर दे रहे हैं और ये कर्मचारी बेचारे बिलकुल एक गुलाम की तरह हंटर के खौफ से प्लेसमेंट एजेंसी में काम करने को मजबूर हैं। इस तरह का मामला सामने आया है देश के एक बड़े समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में।

यहाँ के एक कर्मचारी ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि सिर्फ 10 हजार रुपये में प्लेसमेंट एजेंसी ने उसे बंधुआ मजदूर बना दिया है और 24 घंटे तक उन्हें काम करना पड़ रहा है। राजस्थान पत्रिका में भर्ती हुआ यह कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड की खबर भड़ास4मीडिया पर रोज पढता है मगर नौकरी जाने के डर से अपना दर्द नहीं बता पा रहा था मगर अब हिम्मत किया और अपना दर्द बताया। उसने वाट्सअप के जरिये जो सन्देश भेजा है, वह इस प्रकार है….

”भाई साहब, मैं एक निम्न आय वर्ग के परिवार से हूं। पिछले कई साल से राजसथान पत्रिका में काम करता हूँ, वितरण विभाग में। हमारे विभाग का काम आप जानते ही होंगे, 24 घंटों का होता है। एक बार आफिस जाने के बाद घर जाने का समय तय नहीं होता कि वापसी कब होगी। परिवार से सही ढंग से मिल भी नहीं पाता पर मजबूरी के कारण सब कुछ सहन कर रहा हूँ। मेरे जैसे कई लोग हैं। हमारे अखबार के मालिक रोज बड़ी बड़ी बातें छापतें हैं कि समाज में लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, ऐसा हो रहा है, लेकिन खुद हमारा खून चूस रहे हैं। हमे नाम का ही वेतन दिया जाता है। सेलरी स्टेटमेंट नहीं दिया जाता। श्रम कानून का पालन नहीं किया जाता है। हमे वेतन में मूल वेतन डीए आदि कुछ नहीं दिया जाता। अदर्स कैटगरी में सेलरी अधिक दिखाई जाती है। पूछने पर निकाल देने की धमकी दी जाती है। मजबूरी में सब सहन कर रहा हूँ। आपके आर्टकिल्स भड़ास4मीडिया में पढा तब लगा कि भगवान ने आपको हम गरीबों की मदद के लिए भेजा है। हमें यही कहा जाता है कि हमारे को डीए नहीं मिल सकता। ग्रेड वाले कर्मचारियों से लिखवा लिया गया है कि हमें मजीठिया नहीं चाहिये। श्रम आयुक्त कार्यालय से भी कोई जांच करने नहीं आया। हमें दिये नियुक्ति पत्र में बेसिक+डीए बताया गया है लेकिन मुझे दिये गये सेलरी सर्टिफिकेट में डीए नहीं दिखाया गया है। forte foliage pvt. Ltd नामक एक प्लेसमेंट कंपनी में हम लोगों को राजस्थान पत्रिका ने भेज दिया है। अब हमें मुंह खोलने पर ट्रांसफर की धमकी दी जा रही है।”

सूत्र तो यहाँ तक चर्चा कर रहे हैं कि राजस्थान पत्रिका इसी तरह प्लेसमेंट एजेंसी के जरिये अब पत्रकारों और दूसरे कर्मचारियों की भर्ती कर रही है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322511335
shashikantsingh2@gmail.com

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क्या पत्रिका का प्रसार बहुत तेजी से गिर रहा है? देखें ये अंदर के आंकड़े

पत्रिका ग्रुप के ये खुफिया दस्तावेज वहीं के कुछ साथियों ने भड़ास को भेजा है. नीचे दोनों दस्तावेज प्रकाशित किए जा रहे हैं. इन इंटर आफिस कम्युनिकेशन से पता चलता है कि पत्रिका अखबार का प्रसार ज्यादातर जगहों पर गिर रहा है…

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आखिरकार पत्रिका प्रबंधन ने दिया कर्मचारी का रोका वेतन

पत्रिका प्रबंधन को एक कर्मचारी ने आखिरकार झुकाते हुए अपनी शेष वेतन राशि ले ली। दरअसल टीएडीए व वीक आफ का पैसा मांगने पर छग के सूरजपुर जिले के रिपोर्टर रक्षेन्द्र प्रताप सिंह को छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय संपादक ने समाचार भेजने से मना कर दिया। इससे क्षुब्ध होकर कर्मचारी ने रिजाइन कर अपनी सैलरी व वीक आफ के पैसे मांगे।

कंपनी द्वारा राशि न दिए जाने पर कर्मचारी ने जिला श्रम पदाधिकारी के समक्ष शिकायत की। इस पर सुनवाई के दौरान कंपनी के क्षेत्रीय संपादक राजेश लाहोटी, फोर्ट फोलियेज के कर्मचारियों ने रक्षेन्द्र को उनके बकाया राशि का चेक प्रदान किया। इस वाक्ये से यह स्पष्ट हो गया है कि कंपनी अपने कर्मचारियों का मानसिक व आर्थिक तौर पर शोषण करती है। वहीं रक्षेन्द्र ने कहा कि कंपनी के कर्मचारी विरोधी नीतियों के विरुद्ध उनकी जीत निश्चित ही अन्य कर्मचारियों का हौसला बढ़ाएगी।

मूल खबर…

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अजमेर में भास्कर और पत्रिका ने दाम बढ़ाया तो अखबार वितरकों ने शुरू किया बहिष्कार, नवज्योति की बल्ले बल्ले

अजमेर में दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने एक राय होकर विगत 22 फरवरी को अचानक अखबार की कीमत 4.50 रुपए प्रति कॉपी कर दी। उस दिन तो हॉकर ने अखबार उठा लिया लेकिन अगले दिन उन्होंने बढ़ी कीमत वापस लेने की मांग करते हुए अखबार उठाने से मना कर दिया। उस दिन से वे लगातार दोनों अखबारों का बहिष्कार कर रहे हैं। इससे अखबार प्रबंधन में हड़कम्प मचा हुआ है।

प्रबंधन बढ़ी कीमत वापस लेने और हॉकर्स का कमीशन बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। अखबार नहीं उठने से परेशान प्रबंधन ने 10000 रुपए वेतन पर नए हॉकर्स की भर्ती शुरू कर दी है। साथ ही तांगों-जीपों में स्टाफ से अखबार बिकवाया जा रहा है। रातभर काम करने के बाद स्टाफ को सुबह गली-गली भटककर अखबार बांटने को कहा गया है। मगर ऐसा हो नहीं रहा। पांच-छह दिन से शहर में भास्कर-पत्रिका की कॉपियां देखने को नहीं मिल रही है। जाहिर है जो थोड़ी-बहुत कॉपी छापी जा रही है, वह भी रद्दी हो रही है।

दैनिक नवज्योति की पौ-बारह

हॉकर द्वारा भास्कर-पत्रिका का बहिष्कार करने का सीधा फायदा दैनिक नवज्योति को मिल रहा है। शहर में नवज्योति की रिकार्ड तोड़ कॉपियां बिक रही हैं। नवज्योति आजादी पूर्व से निकलने वाला राजस्थान प्रदेश का एकमात्र अखबार है।

अजमेर में भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव पर हमला

अजमेर। भारतीय समाचार पत्र उप वितरक संघ के जिला महासचिव गोविंद सिंह जादम पर शुक्रवार देरशाम अज्ञात नकाबपोश हमलावरों ने जानलेवा हमला कर दिया। रामगंज थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर हमलावरों की तलाश शुरू कर दी है। इस हमले को हॉकरों की हड़ताल से जोडक़र देखा जा रहा है। इससे माहौल गरमाने की आशंका है।

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पत्रिका ने अपने कर्मी को बर्खास्त किया तो कर्मी ने नोटिस भिजवाया और लेबर आफिस में शिकायत दर्ज कराई

राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार पत्रिका के ग्वालियर संस्करण के सरकुलेशन डिपार्टमेंट में कार्यरत शैलेंद्र सिंह को प्रबंधन ने बिना किसी पूर्व सूचना के संस्थान से टर्मिनेट कर दिया. इससे दुखी महेंद्र ने प्रबंधन को वकील के माध्यम से लीगल नोटिस भिजवाया है और लेबर आफिस में शिकायत दर्ज कराई है. इस प्रकरण से संबंधित सभी दस्तावेज नीचे दिए जा रहे हैं…

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पिता की तेरहवीं में छुट्टी लेकर गए फोटो जर्नलिस्ट की चार दिन की तनख्वाह काट ली

राजस्थान पत्रिका समूह में उत्पीड़न और प्रताड़ना की ढेर सारी कहानियां सामने आती रही हैं. एक ताजे घटनाक्रम के मुताबिक पत्रिका ग्वालियर के फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पाण्डेय अपने पिता की तरेहवीं में हिस्सा लेने के लिए अवकाश पर गए थे. जब वे लौटकर आए तो पता चला उनका अवकाश मंजूर नहीं किया गया है और उनके वेतन से चार दिन की सेलरी काट ली गई है. इससे आहत पांडेय ने प्रबंधन को पत्र लिखकर न्याय करने की गुहार की है.

सूत्रों के मुताबिक पिता जी की तेरहवीं पर अवकाश पर जाने की नियमानुसार सूचना पत्र के जरिए फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पांडेय ने अपने इंचार्ज नीरज सिरोहिया को और वरिष्ठों को दी थी. इसके बाद वे अवकाश पर चले गए क्योंकि जाना जरूरी था. अवकाश से लौटने के बाद उन्हें 4 दिन की कम सेलरी दी गयी. उन्हें बताया गया कि बिना मंजूरी के अवकाश पर जाने की वजह से सेलरी काटी गयी है. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि किसी के पिता की तेरहवीं हो और वह लिखित में छुट्टी की अप्लीकेशन देकर जाए और वह छुट्टी एसेप्ट न हो. इसी को कहते हैं ताकत के नशे में होने पर आंखों पर घमंड और पाप की पट्टी चढ़ जाती है और सब कुछ उलटा दिखने लगता है.

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पत्रिका समूह, प्रधान संपादक, खुला खत, 22 दिसंबर की लंबी रात और कोहिनूर कंडोम!

माननीय प्रधान संपादक,

पत्रिका समूह

दिनांक 22 दिसंबर 2015 को आपके अखबार के पेज 7 पर कोहिनूर कॉन्डोम के विज्ञापन जिसकी हैडिंग ’22 दिसम्बर है साल की सबसे लम्बी रात, इसे दें कुछ एकस्ट्रा टाईम’ तथा सब हैडिंग ‘इस रात की सुबह नहीं’ सहित एक युगल का फोटो भी है…. देखा और पढ़ा। एक बार तो सोचा उसी समय आपको यह पत्र लिखूं, लेकिन फिर सोचा 22 दिसंबर के बाद लिखूं, जिससे आपकी और आपके जैसी सोच वालों की रात खराब ना हो! बहुत ही शर्मनाक बात है कि आए दिन आप अपनी लेखनी द्वारा ज्ञान झाड़ते रहते हैं, कई बार व्याख्यानों में भी ज्ञान ढोल आते हैं और अपने अखबार में क्या छप रहा है, उसका पता ही नहीं।

अब आप यह दलील मत देना कि यह तो विज्ञापन है, हमारा क्या लेना-देना। यह सही है कि विज्ञापनदाता जो विज्ञापन देना चाहता है, वही आप छापते हैं, लेकिन ऐसे घटिया विज्ञापन को छापने से मना करने का आपके पास पूरा अधिकार है। आप अपने लेख में यह जरूर लिखते हैं कि इसे नई पीढ़ी को भी पढ़वाएं, तो क्या नई पीढ़ी केवल आपके लेख पढऩे के लिए ही अखबार पढ़ेगी? उसे यह विज्ञापन नजर नहीं आएगा? आपको कैसा लगेगा यदि ’22 दिसंबर की सबसे लंबी रात’ गुजरने के बाद सुबह पौत्र-पौत्रियां आपसे और आपके पुत्र-पुत्रवधुओं से पूछे कि कैसी रही रात….?

फेसबुक पर ‘जर्नलिस्ट जयपुर’ नामक पेज पर प्रकाशित पोस्ट.

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आईपीएस सिकेरा से पत्रिका के संपादक महेंद्र ने माफीनामा छापने का वादा किया (सुनें टेप)

Navniet Sekera : भगवान से भी तेज UP.Patrika.com … अभी अभी एक नयी जानकारी आई है , कि उपरोक्त न्यूज़ दिनाँक Patrika news network Posted: 2015-12-25 17:07:54 IST से स्पष्ट है कि यह न्यूज़ 25 दिसंबर को शाम को 5 बजकर 7 मिनट 54 वें सेकंड में अपलोड की गयी…

स्वतः स्पष्ट है कि घटना यदि सच है तो एक या दो दिन पूर्व की फीनिक्स मॉल की होगी.. जबकि मेरा परिवार 25 दिसंबर की रात में 11.15 बजे का शो देखने वेव मॉल गया था..  मैं तो गया ही नहीं था.. इस आडियो को सुनें… पूरे सच का खुलासा हो जाएगा…. नीचे लिंक पर क्लिक करें>

https://www.youtube.com/watch?v=nwSu0LWKYyE

आईपीएस और आईजी नवनीत सिकेरा के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर>

पत्रिका वालों ने की बदमाशी, आईपीएस नवनीत सिकेरा के बारे में सरासर झूठी खबर छाप दी

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भास्कर के बाद अब पत्रिका वालों ने की बदमाशी, आईपीएस नवनीत सिकेरा के बारे में सरासर झूठी खबर छाप दी

भास्कर वालों ने पाकिस्तानी झंडा फहराए जाने की झूठी खबर छापकर अपनी थू थू सोशल मीडिया पर कराई तो इस काम में भला राजस्थान पत्रिका क्यों पीछे रहता. पत्रिका वालों के यूपी के पत्रकारों ने आईपीएस नवनीत सिकेरा के बारे में बिलकुल उलटी खबर छाप दी है. खुद नवनीत सिकेरा ने सोशल मीडिया पर इस झूठ का पर्दाफाश कर अपना पक्ष रखा है. इसके बाद लोग सिकेरा की पोस्ट को शेयर लाइक कर पत्रिका वालों को इस किस्म का सरासर झूठ छापने के लिए लानत भेज रहे हैं. पहले पढ़िए सिकेरा ने क्या लिखा है और उनके बार में पत्रिका में खबर क्या छपी है….

Navniet Sekera : सुबह उठा और सोचा कि आज अपना एक और संस्मरण आप सभी साथ शेयर करुँ, तभी एक फोन आया कि आपने क्या कमाल कर दिया, बाजिराओ मस्तानी शो एक घण्टे डिले करा दिया। सच मानो, मैं सन्न रह गया यह सुनकर क्यूँकि आज कल में ही मूवी देखने प्लान था, बिना मूवी देखे इतना तमाशा कैसे हो गया। दिमाग तेजी से चलना शुरू हो गया, ठण्ड खुमारी भी उतर गयी। फिर मित्र ने उस वेब पोर्टल लिंक भेजा, पढ़ कर कान लाल हो गए, सर पर लगी टोपी उतारनी पड़ी। शत प्रतिशत झूठ बात को प्रकाशित करके, व्हाट्सएप्प पर वायरल करके किसी को कैसे बदनाम किया जाता है.  इनसे सीखिये। जो न्यूज़ up.patrika.com पर प्रकशित हुई उसका पहला पैरा हूबहू कट पेस्ट कर रहा हूँ।

”Patrika News : लखनऊ : जहां एक तरफ छुट्टी पर लोग फिल्म देखने के लिए कड़ाके की ठंड में दूर-दूर से आ रहे हैं। लंबी लाइन में खड़े होकर फिल्म की टिकट लेते हैं। वहीं, मौजूदा सरकार का संरक्षण पाने वाले अधिकारी आम जनता को दरकिनार कर अपनी धाक का फायदा उठाने की होड़ में रहते हैं। ऐसा ही नजारा पिछली रात लखनऊ के आलमबाग स्थित फीनिक्स मॉल में दिखा, जब एक बड़े पुलिस अफसर के लिए शो लगभग एक घंटे देर से शुरू किया गया। 50 मिनट बाद शुरू हुआ शो… रात 10:50 शुरू होने वाला बाजीराव मस्तानी का शो 11:40 पर शुरू हुआ। वहां मौजूद एक सूत्र ने पत्रिका को यह खबर दी। उसने बताया कि इस शो को देखने के लिए महिला प्रकोष्ठ के आईजी नवनीत सिकेरा को भी आना था। समय पर नहीं पहुंच पाने के चलते पीवीआर सिनेमा ने शो को रोके रखा और उनके आने पर करीब 50 मिनट बाद आखरी शो शुरू किया गया।”

सच क्या है? मैं या मेरे परिवार का कोई सदश्य फीनिक्स मॉल में गया ही नहीं. मैंने आजतक भी उपरोक्त मूवी नहीं देखी है. मेरे परिवार से मेरी पत्नी, बेटी और माँ सिर्फ तीन महिला सदस्य वेव मॉल में उपरोक्त मूवी देखने गए थे. शो का समय था 11.15 pm. ये लोग समय से पहुंचे, समय से मूवी स्टार्ट हुई और समय पर ही शो समाप्त हुआ (वेव के मैनेजर के अनुसार). मात्र 112 लोग इस मूवी को देखने आये हुए थे. फिर मैंने इस न्यूज़ पोर्टल के श्री महेंद्र प्रताप से बात की. उनसे क्या बात हुई उसकी रिकॉर्डिंग और ट्रांसक्रिप्ट अगली पोस्ट में पोस्ट कर रहा हूँ। मेरी बेटी बहुत अपसेट है उसका कहना है कि हर हालत में इस पोर्टल को कोर्ट में स्यू करो, और डेफमशन सूट करो (कोर्ट में मानहानि का मुक़दमा). आपकी राय क्या है? साथ ही आप से विनम्र अनुरोध है कि उक्त पत्रिका का सच सबके साथ शेयर करें, और सबको बताएं किस तरह पूरे झूठ को ये सच का पायजामा पहना देती है.

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टीए डीए और वीकली आफ मांगने पर नौकरी से निकाला, मीडियाकर्मी पहुंचा श्रम विभाग, पढ़ें शिकायती पत्र

प्रति,
जिला श्रम पदाधिकारी
जिला – सूरजपुर (छत्तीसगढ़)
विषय- उचित कार्यवाही हेतु,
आवेदक – रक्षेन्द्र प्रताप सिंह
ग्राम पोस्ट बड़सरा
जिला सूरजपुर (छग)

विरुद्ध
फोर्ट फोलियोज प्रायवेट लिमिटेड
रजिस्टर्ड ऑफिस: 217, लक्ष्मी काम्पलेक्स, एमआई रोड, जयपुर-302001 राजस्थान
2. क्षेत्रीय संपादक, दैनिक पत्रिका कार्यालय
मंगल भवन, लिंक रोड बिलासपुर

महोदय,

आवेदक निम्नांकित कथन करता है –

यह कि आवेदक को इंटरव्यू के आधार पर संपादकीय पद पर अनावेदक क्रमांक 1 द्वारा संलग्न नियुक्ति आदेश के तहत विगत 01.04.2014 को नियुक्ति प्रदान की गई थी।

यह कि आवेदक का साक्षात्कार बिलासपुर स्थित क्षेत्रीय पत्रिका कार्यालय में लेने के उपरांत आवेदक की नियुक्ति सूरजपुर जिले हेतु की गई थी।

यह कि विगत 21 जून को अम्बिकापुर स्थित राजमोहनी देवी भवन, पीजी कॉलेज के सामने, मनेन्द्रगढ़ रोड अम्बिकापुर में पत्रिका प्रबंधन द्वारा पुलिस अवार्डस (2015) का आयोजन किया गया था।

यह कि उक्त कार्यक्रम में शामिल होने हेतु अंबिकापुर स्थित कार्यालय से कहा गया जिसमें मैंने शामिल होने हेतु टीएडीए मांगा जिस पर वहां से मुझे संपादक राजेश लाहोटी से बात करने को कहा गया।

यह कि संपादक से बातचीत करने पर उन्होंने मुझे समाचार भेजने से ही मना कर दिया। उनके इस दुर्व्यव्हार से क्षुब्ध होकर मैंने अपना त्यागपत्र मेल से प्रेषित करते हुए भविष्य निधि आदि राशि की मांग की।

यह कि कंपनी द्वारा न तो मुझे आफिस, कम्प्यूटर आदि प्रदान किया गया। कंपनी द्वारा ओंकार पांडेय जिला प्रतिनिधि के घर से ही समाचार प्रेषित करने को कहा गया था।

यह कि अपने पद से त्यागपत्र देने के उपरांत एचआर विभाग, ब्यूरो कार्यालय अंबिकापुर व संपादक रायपुर को जून माह में किए गए 21 दिनों के राशि व ईपीएफ आदि की राशि हेतु कई बार मेल व मोबाईल के माध्यम से संपर्क किया गया। हर कोई राजेष लाहोटी संपादक से बात करने को कहकर मुझे टाल दिया करते थे।

यह कि अनावेदक क्रमांक 1 द्वारा दिए गए नियुक्ति आदेश के कंडिका क्रमांक 9 के तहत सप्ताह में एक दिवस वीकली ऑफ दिया जाना था। विगत 1 अप्रैल 2014 से 21 जून 2015 तक के मेरे कार्यकाल में मुझे कभी वीकली आफ प्रदान नहीं किया गया। जिसकी मांग करने पर भी अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर कंपनी द्वारा नियुक्ति निरस्त कर दी जाती।

अतः श्रीमान जी से अनुरोध है कि निम्न बिंदुओं पर जांच कराते हुए आवेदक को कंप्युटर का किराया, वीकली आफ पर किए गए कार्य, जून 2015 में 21 दिवस की राषि व ईपीएफ व पीएफ की राशि प्रदान कराने की कृपा करें।

जांच के बिन्दु
-पत्रिका अखबार के संपादकीय विभाग में एक ही पद के लिए निर्धारित वेतनमान व इंक्रीमेंट नीति की जांच कराई जाए।
-कर्मचारियों को वीकली आफ प्रदान किया जाता है अथवा नहीं? इस तथ्य की भी जांच कराई जावे।
-यह कि इस्तीफा देने के उपरांत आखिर किसके इशारे पर मुझे मानसिक और आर्थिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता रहा? जबकि मैनें मेल के माध्यम से राज्य के संपादक तक को मामले से अवगत करा दिया था।

भवदीय
रक्षेन्द्र प्रताप सिंह
ग्राम पोस्ट बड़सरा
जिला सूरजपुर  (छग)
पिन – 497331
मो़. 9907290333

संलग्न –
संपादक, एचआर व को किए गए मेल की हार्ड प्रति

प्रतिलिपि:-
फोर्ट फोलियेज प्राय. लिमि.
श्रम आयुक्त बिलासपुर
दिनांक – 27.12.2015

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पत्रिका अखबार के गरिष्ठ, वरिष्ठ और कनिष्ठ संपादकों को 22 दिसंबर की कोहिनूर कंडोम वाली लंबी रात के अनुभव पर लिखना चाहिए!

कंडोम का विज्ञापन तो ठीक है लेकिन क्या इसे अब ऐसे बेचा जाएगा? और, क्या इसे ऐसे बेचने के प्रयास को अखबार वाले यूं ही सफल हो जाने देंगे? माना कि गंदा है पर धंधा है, लेकिन कितना गंदा है, क्या बताएगा या तू पूरा अंधा है? पत्रिका अखबार में यह विज्ञापन छपा है कोहिनूर कंडोम का. देख लीजिए.

इसके संपादकों को इस एंगल स्टोरी कराना चाहिए और सबसे पहले खुद का 22 दिसंबर की वाली कोहिनूर कंडोम भरी लंबी रात का अनुभव फ्रंट पेज पर टाप बाक्स या बाटम में प्रकाशित करना चाहिए. तब न होगी दम वाली बात. वरना ये क्या कि पैसा लेने के लिए कुछ भी विज्ञापन छाप दिया और जब उस एंगल पर कंटेंट की बारी आई तो दांतें निपोरने लगे.

सुना है कि पत्रिका अखबार के गरिष्ठ संपादक जी बड़े ज्ञानी हैं और गाहे बगाहे दर्शन पेलते रहते हैं. उम्मीद है उनने भी अपने खानदान में 23 तारीख की सुबह चाय के दौरान हर एक परिजन से 22 वाली रात का फीडबैक लिया होगा. जैजै.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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आरके मार्बल्स व वंडर सीमेंट के यहां छापेमारी की खबर को खा गया राजस्थान पत्रिका अखबार!

राजस्थान का सबसे बड़ा मीडिया समूह होने का दावा करने वाला अखबार राजस्थान पत्रिका प्रदेश की सबसे बड़ी खबर को खा गया. खान विभाग घूस कांड के क्रम में दो कंपनियों पर छापे की न्यूज को राजस्थान पत्रिका ने नहीं छापा. राजस्थान खान विभाग घूस काण्ड के बाद से ही आरके मार्बल्स और सहयोगी कंपनी वंडर सीमेंट जांच के घेरे में हैं. इसी क्रम में आयकर विभाग ने समूह के सियासी रसूख को देखते हुए केंद्रीय रिज़र्व पुलिस के 80 हथियार बंद जवानों के साथ गुप्त तरीके से एक साथ 4 राज्यों के 29 ठिकानों पर छापे मारे. इस छापेमारी के दौरान 7000 करोड़ की सम्पति दस्तावेज और 250 करोड़ नकद बरामद की.

सबसे ज्यादा छापे की कार्यवाही राजस्थान के सात शहरों में हुई. दिलचस्प बात ये कि प्रदेश का सबसे बड़ा मीडिया समूह होने का दावा करने वाला अखबार राजस्थान पत्रिका इस खबर को छिपा गया. हर साल मिलने वाले करोड़ों का विज्ञापन पत्रकारिता पर भारी पड़ गई. इसी तरह इन्द्राणी-शीना के मुद्दे पर 15 दिन लगातार पूरे देश को हिलाने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भी ये छापेमारी की खबर गायब है. दैनिक भास्कर ने इस छापे की खबर मुख्य पृष्ठ के साथ ही अंदर के पेजों पर विशेष कवर स्टोरी छापी.

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देश को गुलाब कोठारी जैसे मनुवादियों से आज़ाद होना पड़ेगा

एक लेख दैनिक पत्रिका दिनांक 30 अगस्‍त 2015 को प्रकाशित लेख ‘’आरक्षण से अब आज़ाद हो देश’’ जिसके लेखक है श्री गुलाब कोठारी की प्रतिक्रिया में लिखी गई है। ग़ौरतलब है की यह लेख पत्रिका की जैकेट स्‍टोरी (मुख्‍य पेपर के मुख्‍य पत्र पर) के रूप में प्रकाशित हुआ था। इस लेख को प्रारंभ करने के पहले बता दू की श्री गुलाब कोठारी एक व्‍यवसायी है वे पत्रिका (पूर्व में इसका नाम राजस्‍थान पत्रिका था) के मालिक एवं प्रधान संपादक है। वे जैन धर्म से ताल्‍लुख रखते है इस लिहाज से वे अल्‍पसंख्‍यक की श्रेणी में आते है।

विवादित लेख का मुख्‍य शीर्षक है ‘जातियों के आंदोलन की नई रणनीति हमें भी जोड़ों या खत्‍म करो जातिगत आरक्षण व्‍यवस्‍था’ श्री गुलाब कोठारी को  आरक्षण से आपत्‍ती है वे कहते है ‘अच्‍छी योग्‍यता वाले युवा सरकारी नौकरी से परहेज क्‍यो करने लग गये? उनका पलायन  भी होने लगेगा तो सरकार और देश के पास सिवाए ‘’ब्रेन ड्रेन’’ का रोना रोने के क्‍या रह जायेगा? फिर आरक्षित वर्ग में भी सभी को इसका लाभ भी नही मिल पा रहा है।’

श्री कोठारी जी यहां एक औसत दर्जे के ब्राम्‍हण वादियों की भाषा बोल रहे है। शायद उन्‍न्‍हे नही मालूम की आई ए एस की परीक्षा में अधिक अंक पाने वाले आरक्षित प्रत्‍यासी को नौकरी नही मिल पाती क्‍योकि ओरल में सामान्‍य वर्ग को ज्‍यादा अंक दे दिये जाते है। वो सिर्फ इसलिए की आरक्षित वर्ग को कमतर आंका जा सके। यदि सवर्ण ब्रेन ड्रेन नही है तो बताएं सर्वणों ने आज तक कौन सा अविष्‍कार किया है सिवाए ऊँच नीच छुआ छूत के। आरक्षित वर्ग में किसको लाभ मिल रहा है किसे नही। इसकी चिन्‍ता आपको क्‍यो हाने लगी कोठारी जी ? आपकी छाती में सौंप इसलिए लोट रहा है न कि एक पिछड़ा दलित तरक्‍की कर रहा है।

गुलाब कोठारी का दुख है की आरक्षण विरोध में कौन साथ देगा आरक्षण वाले तो आधे है। कोठारी जी मनु का आरक्षण पाकर प्रधान संपादक तो आप बन गये लेकिन सिर्फ लिखते रहे पढ़ने की जहमत आपने नही उठाई मै यहां बतादू की SC ST OBC &  MINORITY मिलाकर आरक्षित वर्ग 85% होते है वर्तमान जनगणना के आधार पर। भले ही इन्‍हे आज 50% आरक्षण मिल रहा हो। लेकिन आप तो आरक्षित वर्ग को ही 50% बता रहे हो। कोठारी जी लिखते है कि ‘जो काम 700 सालों से मुगल नही कर पाये, 200 सालों से अंग्रेज नही कर पाये वही उजाड़ मात्र पांच मिनट में पूर्व प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह कर गये। यह कांटा कोई बौध्दिक तर्क से निकलने वाला कांटा नही है। देश बांटने का इतना सहज उपक्रम शायद इतिहास में अन्‍यत्र नही होगा।

कोठारी जी मनु ने 6,500 जातियों में बाँटा उनके धंधे भी आरक्षित किये तो आपको देश बटने का खतरा नही हुआ। लेकिन वर्तमान आरक्षण से देश बटने का खतरा दिख रहा है आपको। आपका दर्ज ये ही कि अंगरेज़ों के पूर्व किसी 1700 वर्ष तक किसी आंक्रांताओं ने जाति प्रथा को नही छेड़ा इसलिए आप उन आंक्रांताओं के ग़ुलाम बनने के लिए तैयार थे, उनसे खुश थे। क्‍योकि आपके ग़ुलाम आपकी पकड़ में थे। लेकिन अँग्रेज़ काल में ही आपकी पकड़ ढीली पड़ने लगी जब साइमन कमीशन का कम्‍युनल एवार्ड आया जो अनुसूचित जाति और जनजाति आरक्षण का आधार बना बाद में मण्‍डल कमीशन आया जो पिछड़ा वर्ग आरक्षण का आधार बना। इसे आप देश को बांटने का आधार बता रहे है। मुझे तरस आता है आपकी बुध्‍दी पर और साथ-साथ आप ये धमकी भी देते है की ये कांटा बौध्दिक तर्क से नही निकलने वाला। याद रखिये कोठारी साहब आज भी अनारक्षित वर्ग भारत में सिर्फ 14.5% ही है तो क्‍या आप 85% आरक्षित वर्ग पर तलवार चलाऐंगे ?

हॉं ये बात सही कि अब ये बाते आप बौध्दिक तर्क से नही जीत सकते क्‍योकि आरक्षित वर्ग पढ़ लिख कर तर्क करना सीख गया है। आपके बेतुके तर्क का माकूल जबाब दे सकता है। गुलाब कोठारी आरक्षण के विरोध में कुछ आंकड़े पेश करते है वे लिखते है देश को नुकसान हो रहा है ‘अध्‍ययन के अनुसार नौकरी में आरक्षण का लाभ उठाने वाले पिछड़े छात्रों को फायदा तो हुआ पर यही निवेश अगर सामान्‍य छात्रों पर किया जाता तो देश को अधिक लाभ होता।’

कोठारी जी ये अध्‍ययन कहां ओर किस ऐजेन्‍सी नने कराए है यदि ये बताने की जहमत उठाते तो अच्‍छा रहता।  आप ये बताई ये- वर्षो से मरीज़ के पेट में कैची तौलिया छोड़ने वाले डाक्‍टर किस वर्ग के है। जितने आई ए एस घोटाले में फसे है किस वर्ग के है?  आज 15% सामान्‍य वर्ग के लिए 50% आरक्षण लागू है। जबकि संख्‍या के मुताबिक 15% सामान्‍य वर्ग के लिए सिर्फ 15% ही भागीदारी होनी चाहिए लेकिन कोठारी जी क्‍ज्ञै 50% से मन नही भरता वे तो पूरा 100% चाहिए वो भी 15% के लिए।

वे एक गुमनाम तथाकथित दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के हवाले से लिखते है कि सम्‍पन्‍न तबके को ही आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। पता नही ये कौन व्‍यक्ति है उन्‍हे ये तक नही मालूम पूरे आरक्षण का आज भी आधा प्रतिशत पद खाली रह जाता है। जिसे बैकलाग से भरने की कोशिश की जाती है। जो बाद में उपयुक्‍त उम्‍मीदवार नही है बता कर सामान्‍य वर्ग से भर्ती की जा‍ती है। गुलाब कोठारी के लिए राह, अब आसान नही है  कई दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, अल्‍पसंख्‍यक वर्ग एवं पूरा आरक्षित वर्ग उनके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही का मन बना रहा है। साथ ही उनके समाचार पत्र ‘पत्रिका’ को पूरे देश में बहिस्‍कार की योजना बना रहा है। ताकि कोई ऐसा दुस्‍साहस न कर सके।

दर असल पूरे विश्व में वंचित समुदाय को आरक्षण देकर आगे बढाना कोई नई बात नही है। विकसित देश इसी सहारे आज विकसित हो पाये है। हमारे देश की तरह विदेशों में भी राज तंत्र, सामंती तंत्र और पादरी पूरोहित तंत्र का खात्मा करने के लिए तथा वंचित वर्ग के अधिकार हड़पने का सिलसिला खत्म  करने के लिए आरक्षण जैसी सुविधाऐं दी गई हे। अमेरिका में इसे लिंडन जान्सवन के समय ‘एफर्मेटिव एक्स न’ के नाम से प्रक्रिया शुरू की गई। तब जाकर अमेरिका महाशक्ति बन सका। इसी प्रकार फ्रांस में डिप्रेस्ड क्लास के नाम से तो कनाडा और यूरोप में अलग अलग नाम से यह आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। लेकिन इसके पीछे वही सिद्धांत है जो हमारे यहां आरक्षण व्यवस्था  के लि‍ए है। कुछ देशों में ‘’ तरजीही नि‍युक्तियां ’’ नाम से तो कहीं ‘’रिवर्स डिस्क्रमनेशन ’’ के नाम पर आरक्षण लागू कर देश को तरक्की  पर लाने की कोशिश हो रही है। बात यही तक नही रूकती बडी बडी मल्टी नेशनल कम्पनियां प्रतिवर्ष अपने कर्मचारियों का एक कम्यु।नल रिर्पोट भी  प्रकाशित करती है कि किस जाति या समुदाय का व्यक्ति कितनी संख्या में किस पद पर कार्यरत है। फेसबुक सहित कई कम्पनियाँ ऐसी रिर्पोट पेश करती रही है। ताकि भाई भतिजा वाद, बैक डोर एन्ट्रीि‍ पर रोक लगे तथा जिसकी जितनी संख्या , उसकी उतनी भागी दारी के सिद्धांत पर संतुलन बनाया जा सके। ये विदेशी कम्पनियाँ ऐसा करने में गर्वाविंत महसूस करती है।

इस लेख मे संविधान का मज़ाक उड़ाया गया

वे लिखते है की ‘स्‍वतंत्रता के बाद हमारे ही प्रतिनिधियों ने हमारे ज्ञान की जमकर धज्जियाँ उड़ाई। संविधान को धर्म निरपेक्ष कहकर हमारी संस्‍कृति के साथ भौड़ा मज़ाक ही किया । शासन में धर्म का प्रवेश वर्जित हो गया। हमारी संस्‍कृति का आधार आश्रम व्‍यवस्‍था तथा इसी के साथ वर्ण व्‍यवस्‍था रही है।’

आश्‍चर्य है कि आखिर किस बाल पर कोठारी जी संविधान के विरूद्ध ऐसी बाते लिखते है। उनके विरूद्ध देश द्रोह का मुकदमा दायर हो सकता है। उनकी न्‍यूज पेपर पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। दरअसल उनका असली  दर्द यही है की संविधान को धर्म निरपेक्ष नही रखा जाना था। इसे हिन्‍दू धर्म से जोड़ा जानना था। ताकि पिछड़ा को पिछड़ा दलित को दलित और अल्‍पसंख्‍यक को और अल्‍पसंख्‍यक रखा जा सके। उन्‍हे वर्णाश्रम जाति व्‍यवस्‍था  जिन्‍हे वे अपनी महान संस्‍कृति मान रहे है, टूटने का भय सता रहा है।

वे आगे लिखते है ‘संविधान में आरक्षण का जो विष बीज बोया गया था वह अब वट वृक्ष बनकर पनपने लगा है।’

ये वाक्‍य संविधान के विरूद्ध घोर अपमान जनक है। आरक्षण के विरोध में अपना एक तर्क हो सकता है लेकिन सीधे सीधे संविधान को नीचा दिखाने का प्रयास आजद भारत में पहली बार इस तरह पढ़ने मिला। यह एक प्रकार से देश द्रेाह का मामला है।

कोठारी जी सीधे-सीधे ये क्‍यो नही कहते मै संविधान को नही मानता। आप कहते है संविधान में आरक्षण का विष बोया गया। आपको मालूम भी है आरक्षण क्‍यो मिला। कोठारी जी लिखने के साथ थोड़ा पढ़ने की जहमत उठाते तो बेहतर होता। मै आपको बता दू की आरक्षित वर्ग को आरक्षण किसी एहसान के तले नही मिला है। आज़ादी के पहले सायमन कमीशन ने अंबेडकर के सिफारिश पर दलित आदिवासी के लिए कम्‍युनल एर्वाड की घोषणा की थी। यानि दलितों को निर्वाचन/ प्रतिनीधी समेत विशेष सुविधाएं। लेकिन गांधी ने इसका विरोध किया वे अनशन में बैठ गये, उनका तर्क था की ये सुविधाएँ इन्‍हे नही मिलनी चाहिए इससे हिन्‍दू धर्म हिस्‍सो में बट जायेगा। ये हिन्‍दू धर्म का अंदरूनी मामला हे मिलकर सुलझायेगे। अंबेडकर पर गांधी के अंनशन तुड़वाने का चौतरफा दबाव बढने लगा। दबाव में आकर दलित समुदाय ने जो समझौता गांधी के साथ किया वह पूना पैक्‍ट कहलाया। आज भी  दलित  इस समझौते को आज भी अपनी हार के रूप में याद करते, वे कहते है यदि समझौता नही होता तो हम आपने मालिक खुद होते, आरक्षण जैसे भीख की हमे जरूरत ही नही पड़ती। आज़ादी बाद में यही समझौता आरक्षण, स्‍कालरशिप जैसी सुविधाओं के रूप में संविधान में शामिल हुआ। तो अब बताई ये आरक्षण लेकर आरक्षित वर्ग एहसान कर रहे है या देकर आप?

और हॉं यह भी बताना जरूरी है की कुछ अशिक्षित लोग ये तर्क देते है की आरक्षण केवल 10 वर्षो के लिए लागू हे ये बढाया जाना गलत है तो मै यह जानकारी दे दू की राजनीति में लागू आरक्षण के बारे में से कानून है न की सरकारी नौकरी में।

और हॉं वास्‍तविक आरक्षण के जनक ‘मनु’ की मूर्ति जो रास्‍थान हाईकोर्ट के परिसर में लगाई गई है उससे तो आपको कोई आपत्‍ती नही है न। वह आरक्षण जो 2200 साल से लागू है उसमें तो आपको कोई संशोधन की जरूरत नही महसूस नही होती है न?

बेहतर होता श्री गुलाब कोठारी राजस्‍थान की जरूरी समस्‍या जैसे खाप पंचायत, कन्‍या वध प्रथा पर लिखते। वे इस पर भी लिखते की राजस्‍थान में महिला पुरूष के अनुपात का अंतर क्‍यो‍ है? क्‍यो राजस्थान की गिनती पिछड़े राज्‍यो में होती है? लेकिन दुर्भाग्‍य है कि उन्‍हे ये कोई समस्‍या नही दिखती। लेकिन सौभाग्‍य उनका है जिन्‍होने उनके इस लेख से एक जुट होने और संघर्ष करने की प्रेरणा मिल रही है।

दलित लेखक संजीव खुदशाह बिलासपुर छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं. एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद थिएटर से लेकर पत्रकारिता तक में सक्रिय रहे. वे प्रगतिशील विचारक, कवि, कथाकार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं. “सफाई कामगार समुदाय” एवं “आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग”  इनकी चर्चित कृतियां हैं. इनकी किताबें मराठी, पंजाबी एवं ओडिया सहित अन्य भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं. संजीव की पहचान मिमिक्री कलाकार और नाट्यकर्मी के रूप में भी है. इन्हें कई पुरस्‍कार एवं सम्मान से सम्मानित किए जा चुका है. संपर्क: 09977082331

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राजस्थान पत्रिका लखनऊ के संपादक बने महेंद्र सिंह

राजस्थान पत्रिका रायपुर (छत्तीसगढ़) के संपादक महेंद्र प्रताप सिंह का तबादला यूपी में हो गया है। उनको लखनऊ का संपादक बनाया गया है।

राजस्थान पत्रिका उत्तर प्रदेश में अपने डिजिटल, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया का विस्तार कर रहा है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सिंह छत्तीसगढ़ में पत्रिका की लांचिंग के समय से जुड़े रहे हैं। बिलासपुर में भी इन्होंने संपादक रहते हुए पत्रिका को नई उंचाई दी थी। छत्तीसगढ़ में पत्रिका की कोर टीम के सदस्य रहे श्री सिंह की पहचान निष्पछ, बेबाक और तेज तरार पत्रकार की है। छ्त्तीसगढ़ में अपनी धारदार खबरों और जनसरोकार पत्रकारिता की वजह से पत्रिका 5 साल के भीतर ही नंबर 1 के पायदान पर पहुंच गया। श्री सिंह अच्छे टीम लीडर हैं। इन्हे अख़बारों की लांचिंग का अक्सपर्ट माना जाता है। छत्तीसगढ़ में पत्रिका की लांचिंग के पहले श्री सिंह राष्ट्रीय सहारा के पटना, देहरादून और कानपुर जैसे संस्करणों की सफल लांचिंग करा चुके हैं।

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भास्कर छोड़ पत्रिका गए संतोष पांडेय

पानीपत : यहां भास्कर में कार्यरत संतोष पांडेय ने अखबार छोड़ दिया है। अब वह राजस्थान पत्रिका, जयपुर के साथ अपना आगे का कार्यकाल शुरू करने जा रहे हैं। वह इससे पूर्व सतना, वाराणसी, देहरादून, लखनऊ में मीडिया के साथ जुड़े रहे हैं।

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राजस्थान पत्रिका के रिपोर्टर ने चारागाह की जमीन को पत्नी के नाम आवंटित करा लिया

अजमेर (राजस्थान) : जिले के सावर क्षेत्र में राजस्थान पत्रिका के रिपोर्टर सत्यनारायण कहार पर लाखों रूपयों की बेशकीमती चारागाह भूमि को अपने नाम आवंटित करवाने का आरोप लगा है। सत्यनारायण पूर्व में ग्राम पंचायत सदारा का उपसरपंच रह चुका है। तब भी यह पत्रिका का ही रिपोर्टर था।

सत्यनारायण पर आरोप हैं कि इसने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए मिलिभगत कर ग्राम सदारी में देवनारायण मंदिर के रास्ते पर स्थित जमीन को अपनी पत्नी के नाम आवंटित करवा लिया। इसके विरोध में सोमवार को ग्राम सदारी व भोपों का झोपड़ा के ग्रामीणों ने उपखण्ड मुख्यालय केकड़ी पर प्रदर्शन किया और एसडीएम को कलक्टर के नाम का ज्ञापन भी सौंपा। ग्रामीणों का आरोप है कि उक्त जमीन पर उनके मवेशी चारा चरते हैं और यह देवनारायण भगवान के मंदिर की जमीन है। ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि यह आवंटन निरस्त नहीं किया गया तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे।

एक पत्रकार द्वारा भेजे पत्र पर आधारित खब

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गुलाब कोठारी का विरोध करने की सजा, राहुल शर्मा समेत कइयों का दूरदराज तबादला

राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी के खिलाफ उदयपुर में मजीठिया को लेकर विरोध-प्रदर्शन करने वाले पत्रकारों पर आखिर पत्रिका मैनेजमेंट ने गाज गिरा ही दी। पत्रिका मैनेजमेंट ने उदयपुर राजस्थान पत्रिका के डेस्क इंचार्ज राहुल शर्मा का तबादला कोयमबटूर कर दिया है। उनके अलावा विकास बाकोलिया सहित दो पत्रकारों को चार्जशीट दी गई है। कुल मिलाकर इनको भी देर-सवेर रवाना कर दिया जाएगा। गौरतलब है कि हाल ही में पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी उदयपुर के एक विवि में आए थे। यहां उनका सम्मान समारोह था। इसी दौरान उदयपुर पत्रिका के कुछ पत्रकारों ने कोठारी के खिलाफ जबर्दस्त प्रदर्शन किया।

ये लोग मजीठिया आयोग की सिफारिश लागू करने की मांग कर रहे थे। उन्होंने कार्यक्रम स्थल पर कोठारी के खिलाफ पर्चे भी बांटे। उस प्रकरण से खफा पत्रिका मैनेजमेंट ने आंदोलनकारी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। प्रदर्शन के अगवा माने जा रहे राहुल शर्मा का तबादला कोयमबटूर किया गया है। खास बात ये है कि कोयम्बटूर से पत्रिका का कोई एडिशन नहीं निकलता है। इस तरह राजस्थान से इतनी दूर भेजकर सीधे काले पानी की सजा दी गई है। उनके अलावा विकास बाकोलिया और एक अन्य पत्रकार को चार्जशीट दी गई है।

बताया जा रहा है कि यह केवल एक खानापूर्ति है और इन दोनों को भी जल्द की टरमिनेट कर दिया जाएगा या कहीं दूर तबादला किया जाएगा। हालांकि उदयपुर के प्रदर्शन में ललित भटनागर भी शामिल थे, लेकिन उनका मैनेजटमेंट पहले ही कहीं दूर तबादला कर काले पानी की सजा दे चुका है। पत्रिका के मुख्यालय जयपुर और उदयपुर ही नहीं अजमेर एवं अन्य संस्करणों में भी इन दिनों दमन का दौर जारी है। अजमेर में मजीठिया की मांग को लेकर केस करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र गुप्ता का तबादला हुबली किया गया है।

जानकारों के अनुसार यहां के संपादक उपेंद्र शर्मा पत्रकारों के उत्पीडऩ में जुटे हुए हैं। जुनियर रिपोर्टर से सीधे संपादक की कुर्सी पर पहुंचे शर्मा किसी भी पत्रकार से तमीज से बात नहीं करते। हालत ये है कि राजेंद्र गुप्ता ओर संतोष खाचरियावा से जैसे काबिल पत्रकारों को यहां से रवाना कराने के बाद अब वो और कई वरिष्ठ पत्रकारों को तंग करने में लगे हैं। इसके उलट उनका अखबार को लेकर वो बिल्कुल संजीदा नहीं है और रात को दफ्तर में बैठने के बजाय वो ऑफिस के पीछे की कॉलोनी में घूमने निकल जाते हैं।

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अजमेर ‘पत्रिका’ में अहंकारी संपादक का आतंक, दुखद रवैये से स्टॉफ परेशान

राजस्थान पत्रिका अजमेर में जब से उपेंद्र शर्मा को संपादक बनाया गया है, स्टाफ पर मुसीबत टूट पड़ी है। जूनियर रिपोर्टर से सीधे संपादक की कुर्सी पर बैठे उपेंद्र शर्मा किसी को कुछ नहीं समझ रहे। उनसे पहले यहां ज्ञानेश उपाध्याय जैसे धीर-गंभीर और विद्वान संपादक थे। उपाध्याय ने अपने छोटे से कार्यकाल में सभी को मान-सम्मान दिया। लेकिन उपेंद्र शर्मा तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। 

वो आए दिन डेस्क या रिपोर्टिंग के किसी भी साथी को बिना बात प्रताडि़त करते रहते हैं। जो उनकी तानाशाही का विरोध करते हैं, उसके वो साइड लाइन कर देते हैं। उन्होंने सबसे पहले हिन्दी के विद्वान और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र गुप्ता को शिकार बनाया। गुप्ता ने उनकी बचकानी बातों का विरोध किया तो उनका अजमेर से हुबली तबादला करवाकर अन्य कर्मचारियों के खौफ पैदा कर दिया। ये करके उनका अन्य कर्मचारियों को साफ मैसेज था कि जो मुझसे टकराएगा वो यहां नहीं रह पाएगा। 

उनको दूसरा शिकार बने युवा और उत्साही रिपोर्टर भूपेंद्र सिंह। विद्युत निगम और राजस्व मंडल की राज्य स्तरीय विभाग पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले भूपेंद्र सिंह अपनी सपाट बयानी के लिए विख्यात है, लेकिन उनकी ईमानदारी और काबिलियत के कारण तमात संपादकों ने उनका सम्मान किया। मगर उपेंद्र शर्मा ने आते ही उन्हें प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। बताते हैं कि उपेंद्र और भूपेंद्र दोनों जयपुर में रिपोर्टिंग करते थे। उसी दौरान किसी मशले पर दोनों के बीच कहासुनी हुई थी, उसका खामियाजा अब उसे भुगतना पड़ रहा है। 

पिछले दिनों उपेंद्र शर्मा ने भूपेंद्र सिंह का तबादला नागौर जिले के कुचामन ब्यूरो में कर दिया। इससे भूपेंद्र सिंह परेशान हो गए। वे पत्नी और तीन साल के बेटे के साथ अजमेर में रहते हैं और उन्होंने कुछ दिन पहले ही अजमेर के एक स्कूल में बेटे को एडमिशन कराया था। तबादले से परेशान भूपेंद्र सिंह गुहार करने उपेंद्र शर्मा के पास पहुंचे और कहा कि उनकी पत्नी और बेटा अकेले अजमेर में नहीं रह पाएंगे। अभी उन्होंने २० हजार रुपए एडमिशन पर खर्च किए हैं। ऐसे में वे परिवार को कुचामन भी नहीं ले जा सकते। तमाम मिन्नतों के बावजूद संपादक ने उनकी गुहार नहीं मानी। आखिरकार हताश और परेशान भूपेंद्र सिंह ने जयपुर जाकर गु्रप एडिटर भुवनेश जैन के सामने मसले को रखा और अपनी परेशानी बताई। इस पर उनका तबादला रोक दिया गया। इससे संपादक उपेंद्र शर्मा और खफा हो गए। उन्होंने भूपेंद्र सिंह को रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्क पर लगा दिया। 

संपादकीय विभाग के अन्य लोग भी संपादक के तुगलकी फैसलों और व्यवहार से परेशान है। एक परेशान डेस्ककर्मी ने बताया कि संपादक उपेंद्र शर्मा रोज शाम को कुछ रिपोर्टरों को बुलाकार अपना दरबार लगाते हैं और करीब एक घंटा अपनी जयपुर की रिपोर्टिंग को लेकर शेखी बगारते हैं। मबजूरी में रिपोर्टरों को उनकी तारीफों के पुल बांधने पड़ते हैँ। उसके बाद उपेंद्र शर्मा डिनर करने घर चले जाते हैं, फिर राते तो दस बजे वापस ऑफिस आते हैं। आते ही थोड़ी देर बाद दो रिपार्टरों के साथ टहलने निकल जाते हैं। उनकी इन हरकतों से रिपोर्टरों के कामकाज पर प्रभाव पड़ रहा है और अक्सर डेस्क को खबरों लेट मिल रही है, इससे इसलिए एडिशन भी समय से नहीं छूट रहा है। संपादक चटौरेपन को लेकर भी स्टाफ परेशान है। वो आए दिन किसी ना किसी से दावत की फरमाइश भी कर बैठते हैं। अब बेचारे पत्रकार को जैसे-तैसे उनकी फरमाइश पूरी करनी पड़ती है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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