हिंदुस्‍तान के बाद जागरण का भी फर्जीवाड़ा सामने आया, रजिस्‍ट्रेशन के लिए आवेदन

बिहार में हिंदुस्‍तान के बाद अब दैनिक जागरण के फर्जीवाड़े का भी पर्दाफाश होने लगा है. हिंदुस्‍तान के फर्जी एडिशनों के खुलासे के बाद अब जागरण के घोटाले का भी पोल खुलने लगा है.  इस बात की तस्‍दीक खुद जागरण का प्रिंट लाइन कर रहा है. इससे जाहिर हो रहा है कि जागरण पिछले बारह सालों से अवैध तरीके से बिहार में अखबार का प्रकाशन कर रहा है. श्रीकृष्‍ण प्रसाद द्वारा हिंदुस्‍तान की गड़बड़ी उजागर करने के बाद जागरण, मुजफ्फरपुर के पूर्व कर्मचारी रमण कुमार यादव भी जागरण के गोरखधंधे को उजागर करने में जी जान से जुट गए हैं.

जाहिर है, जिस तरह पिछले दिनों रमण कुमार द्वारा पीसीआई जांच टीम के सदस्‍यों के सामने जागरण का पोल खोला गया है, उससे जागरण प्रबंधन बदहवास तथा परेशान है. इसी का परिणाम है कि अब मुजफ्फरपुर के प्रिंट लाइन में रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर नहीं जा रहा है. उसकी जगह आवेदित प्रकाशित किया जा रहा है. जागरण ने 23 जून को नए रजिस्‍ट्रेशन के लिए आवेदन किया है. यानी साफ है कि दैनिक जागरण भी पूरे बिहार में गलत तरीके से सरकारी तथा गैर सरकारी विज्ञापन वसूल रहा था. एक ही एडिशन के लिए अलग अलग रेट पर अब तक करोड़ों रुपये के घोटाला किए जाने का अनुमान लगाया जाने लगा है.

गौरतलब है कि अब तक दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर के प्रिंट लाइन में रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर BIHHIN/2000/3097 प्रकाशित किया जाता था तथा ईमेल में patna@pat.jagran.com का प्रकाशन किया जाता था. इसके अलावा पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर तथा सिलीगुडी से प्रकाशित और पटना से मुद्रित लिखा जाता था. परन्‍तु 29 जून से मुजफ्फरपुर में अखबार का प्रिंट लाइन चेंज हो गया है. रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर की जगह आवेदित, memo no- 101 dated 23/6/2012 लिखा जा रहा है. ईमेल भी बदल कर muzaffrarpur@mzf.jagran.com कर दिया गया है. साथ ही अखबार का मुद्रण एवं प्रकाशन भी मुजफ्फरपुर ही लिखा जा रहा है. पहले सभी विवाद पटना कोर्ट में सुलझाए जाने की बात लिखी जा रही थी, अब इसे मुजफ्फरपुर कर दिया गया है.  

साफ है कि हिंदुस्‍तान की तरह जागरण ने भी गलत तरीके से अखबार का अवैध केंद्रों से प्रकाशन कर करोड़ों रुपये के सरकार विज्ञापन की हेराफेरी की है. समझा जा रहा है कि जल्‍द ही जागरण के भी फर्जीवाड़े का खुलासा होगा. रमण कुमार कहते हैं कि वे जागरण के इस फर्जीवाड़े को अंजाम तक पहुंचा कर रहेंगे. जागरण भले ही रजिस्‍ट्रेशन के लिए अभी आवेदन कर अपने बचने की कोशिश शुरू कर दी हो, पर उसे पिछले बारह सालों का हिसाब तो देना ही होगा.

जागरण भूल गया पत्रकारिता और कानून : बलात्‍कार पीडिता का नाम व पता तक छाप डाला

अब तो सही में लग रहा है कि जागरण समूह अपने पतनकाल की तरफ चल पड़ा है। नंबर एक होने का दावा करने वाला जागरण अपनी गलतियों के लिए तो जाना ही जाता है पर ताजा मामले में जागरण ने एसी घटिया हरकत की है, जिसे भूल तो कतई नहीं कहा जा सकता। जागरण के पंजाब संस्करण में होशियारपुर से एक ऐसी घिनौनी हरकत की गई है जो न तो कानून की नजर में सही है और न ही किसी भी तरह से पत्रकारिता के उसूलों के अनुरूप है।

अखबार में बलात्कार की पीड़िता से पुलिस के बदसलूकी की खबर छपी है। यही खबर अखबार के इंटरनेट संस्करण पर भी है। खबर में लिखने वाले ने न सिर्फ बलात्कार पीड़िता का नाम बल्कि उसके पिता का नाम और घर का पता गांव तक लिख डाला है। यही नहीं पिता की मौत के बाद से वह अपने ननिहाल में कहां रह रही है उस गांव तक का भी पता अखबार ने बड़े चाव से छापा है। माना कि खबर भेजने वाला रिपोर्टर भांग खाए बैठा होगा लेकिन ब्यूरो में इस खबर को एडिट करने वाले जुगाड़ू क्या भाड़ झोंक रहे थे कि पीड़िता को इस तरह सरे बाजार शर्मसार करने में उन्हें रत्ती भर भी गुरेज नहीं हुआ।

इसके बाद खबर जब डेस्क पर पहुंची तो डेस्क पर बैठे जुगाड़ू क्या नींद में खबरें देखते हैं कि किसी को यह दिखा नहीं। उस पर से दूसरों को बिना जान पहचान के ही 'अच्छे आदमी नहीं हैं' बताने वाला खुद टेस्ट फेल संपादक क्या कर रहा था जिसके नाक के नीचे से यह सब गुजर गया। इंटरनेट संस्करण पर भी जागरण के बेवकूफाना हरकत को देखा जा सकता है। अब तो सच में लगने लगा है कि समूह जितनी तेजी से ऊचाई की तरफ चढ़ा था अब उतनी ही तेजी के साथ नीचे आने को भी बेकरार है। आप भी पढिए इस खबर को।

प्रदीप सौरभ को लंदन में मिला 18वां अंतर्राष्‍ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्‍मान

: जो लेखक अपने समय के सत्‍य को संबोधित नहीं करता वह इतिहास के कूड़े में फेंक दिया जाता है – प्रदीप सौरभ : (लंदन) – ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में उपन्यासकार प्रदीप सौरभ को उनके उपन्यास तीसरी ताली के लिये ‘अट्ठारहवां अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान’ प्रदान करते हुए वैस्ट ब्रॉमविच के लॉर्ड किंग ने कहा कि लेखक ही समाज में बदलाव ला सकता है। उन्होंने आगे कहा कि कोई भी संस्कृति तभी बची रह सकती है यदि उसकी भाषा की ताक़त महफ़ूज़ रहे। इस अवसर पर उन्होंने सर्रे निवासी ब्रिटिश हिन्दी एवं उर्दू के शायर श्री सोहन राही को तेरहवां पद्मानंद साहित्य सम्मान भी प्रदान किया। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने सम्मान समारोह की मेज़बानी की।

श्री विरेन्द्र शर्मा ने प्रदीप सौरभ के उपन्यास के विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 21वीं सदी में हमारी बहुत सी परम्पराएं मान्य नहीं रही हैं। यह उपन्यास एक चेतावनी है कि हमें अपने समाज में हिजड़ों के प्रति नज़रिया बदलना होगा। इस विषय में उन्होंने ब्रिटेन जैसे उन्नत देशों से सीख लेने की सलाह दी। उन्होंने सोहन राही के सम्मान को अपने शहर का सम्मान बताया जहां से दोनों जीवन में आगे बढ़ कर ब्रिटेन पहुंचे।

सम्मान ग्रहण करते हुए प्रदीप सौरभ ने स्पष्ट किया कि “लेखक को रचना के माध्यम से तोला जाए न कि उसके व्यक्तिगत जीवन से।” उन्होंने आगे ज़ोर दे कर कहा, “जीवन जीने के लिये बचपन से कितने समझौते, कितने ग़लत काम किये होंगे, मैं उन्हें स्वीकार करता हूं। मैं पत्रकार हूं, टी.वी. चैनल में काम करता हूं, कहने को सच्चाई की मशाल लिये खड़ा हूं, मगर सच तो यह है कि अपनी अख़बार के मालिक के लिये दलाली करता हूं। मगर जब मैं लेखन करता हूं तो स्वतन्त्र होता हूं। हर इन्सान के चेहरे पर अनेक मुखौटे होते हैं और मैं तो मुखौटों का म्यूज़ियम हूं।” दीप्ति शर्मा ने तीसरी ताली के उपन्यास अंश का मार्मिक पाठ किया।

काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी ने समारोह में वाणी प्रकाशन की युवा प्रकाशक आदिति महेश्वरी की उपस्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह हिन्दी साहित्य के लिये शुभ समाचार है कि पढ़े लिखे युवा अब हिन्दी प्रकाशन क्षेत्र में पदार्पण कर रहे हैं। इससे सकारात्मक बदलाव आने की पूरी संभावना है। मैंने हमेशा ही यह कहा है कि हिन्दी उपन्यास और कहानी लेखन में शोध बहुत कम किया जाता है। किन्तु तीसरी ताली पढ़ कर पता चलता है कि प्रदीप सौरभ ने हिजड़ों के जीवन पर कितना शोध किया है। काउंसलर ज़ुबैरी ने सोहन राही को हिन्दी और उर्दू का श्रेष्ठ गीतकार कहा।

कथा यू.के. के महासचिव कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने सम्मानित पुस्तकों की चयन प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए समारोह में मौजूद सोआस विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष फ़्रेंचेस्का ऑरसीनी को सम्बोधित करते हुए आग्रह किया कि विद्यार्थियों का सक्रिय लेखकों के साथ पारस्परिक मेलजोल ज़रूरी है। इससे ब्रिटेन में हिन्दी साहित्य एवं गतिविधियों को एक नई दिशा मिलेगी। संचालन करते हुए तेजेन्द्र शर्मा ने तीसरी ताली उपन्यास एवं सोहन राही के गीतों एवं ग़ज़लों से परिचय करवाया। फ़्रेंचेस्का ऑर्सीनी ने तेजेन्द्र शर्मा के प्रस्ताव का स्वागत किया और कहा कि भविष्य में कथा सम्मान का आयोजन ऐसे समय में किया जाए जबकि विश्विद्यालय की कक्षाएं चल रही हों और अन्य साहित्यिक गतिविधियां भी हो रही हों।

कथा यू. के. के अध्यक्ष श्री कैलाश बुधवार ने उपन्यास तीसरी ताली पर भारत के समीक्षकों की टिप्पणियां पढ़ कर सुनाईं जिनमें सुधीश पचौरी, हीरालाल नागर एवं निरंजन क्षोत्रिय की टिप्पणियां शामिल थीं। सोहन राही की पुस्तक कुछ ग़ज़लें कुछ गीत पर अपना लेख पढ़ते हुए नॉटिंघम की कवियत्री जय वर्मा ने कहा कि, “सोहन राही एक पीढ़ी के लिए नहीं हैं वे युवा से लेकर सब उम्र वालों को अपने से लगते है। अंतर्मन की जटिल गुत्थियों को सुलझाते हुए जीने के अर्थ को अपनी संवेदनशील और मार्मिक कविताओं द्वारा जनसाधारण तक पहुंचाने में सफल हुए हैं।”

सोहन राही ने कथा यू.के. के निर्णायक मण्डल को धन्यवाद देते हुए कहा, “शेर कहना मेरा शुगल ही नहीं, मेरे जीवन की उपासना है। शेर-ओ-अदब मेरा जीवन है, मेरे गीत मेरा ओढ़ना बिछौना हैं।” उन्होंने अपने गीत – कोयल कूक पपीहा बानी… का सस्वर पाठ भी किया। श्री गौरीशंकर (उप-निदेशक नेहरू सेंटर) ने कहा कि यह गर्व का विषय है कि अब कथा यू.के. सम्मान की चर्चा यू.पी.एस.सी. बैंकिंग बोर्ड एवं रेल्वे बोर्ड के टेस्टों में भी होती है। सरस्वती वंदना निशि ने की; सोहन राही का मानपत्र मुंबई से पधारीं मधु अरोड़ा ने पढ़ा तो प्रदीप सौरभ का मानपत्र पढ़ा हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार ने। संचालन तेजेन्द्र शर्मा ने किया।

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर के.सी. मोहन, काउंसलर ग्रेवाल, श्रीमती पद्मजा, प्रो. अमीन मुग़ल, अयूब ऑलिया, जितेन्द्र बिल्लु, राम शर्मा मीत, अचला शर्मा, उषा राजे सक्सेना, गोविन्द शर्मा, नीना पॉल, महेन्द्र दवेसर, पद्मेश गुप्त, निखिल कौशिक, विजय राणा, मीरा कौशिक, परवेज़ आलम, पुष्पा रॉव, कविता वाचकनवी, शन्नो अग्रवाल, वेद मोहला, डा. महिपाल वर्मा, के.बी.एल.सक्सेना आदि ने भाग लिया।

भास्‍कर, सागर से नरेंद्र सिंह अकेला का तबादला, विपुल गुप्‍ता नए आरई

दैनिक भास्कर प्रबंधन ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए सागर संस्करण के स्थानीय संपादक नरेंद्र सिंह अकेला का तबादला अंबाला के लिए कर दिया है। उनके स्थान पर नेशनल न्यूज रूम टीम के विपुल गुप्ता को नया स्‍थानीय संपादक नियुक्त किया है। अकेला अंबाला की जिम्‍मेदारी संभालेंगे, जहां केवल 4 पेज का पुलआउट तैयार किया जाता है। जबकि सागर में सागर सिटी के अलावा छतरपुर-टीकमगढ, दमोह संस्करण स्वतंत्र रूप से छापे जाते हैं। 

प्रबंधन के द्वारा अकेला को इस तरह अंबाला भेजे जाने के निर्णय को पत्रकार जगत में उनके डिमोशन के रूप में देखा जा रहा है। बताया जाता है कि अकेला की कार्यशैली पर प्रबंधन पिछले एक साल से कड़ी नजर रखे हुए था। इसका कारण उनका सागर संपादक रहते हुए कई विवादों में घिरना था। उनके कार्यकाल में दैनिक भास्कर, सागर के करीब एक दर्जन वरिष्ठ और योग्य, अनुभवी सहयोगियों को जाना पड़ा। इसमें सिटी डेस्क इंचार्ज संजय करीर, बीना प्रभारी ओपी ताम्रंकार, सागर के क्राइम रिपोर्टर बसंत सेन, दमोह प्रभारी ओपी सोनी, छतरपुर ब्यूरो आशीष खरे, सब एडीटर सागर संजय पांडे, सिटी इंचार्ज, सागर अजय खरे, सीनियर रिपोर्टर सतीश लिखारिया का नाम शामिल है। जबकि दैनिक भास्कर सागर संस्करण को एक ब्यूरो से संस्करण के मुकाम तक पहुंचाने वाले सबसे सीनियर और रीजनल इंचार्ज प्रहलाद नायक को सागर छोड़कर रतलाम जाना पड़ा था।

नरेंद्र सिंह अकेला तब सुर्खियों में आए थे जब बुंदेलखंड में अज्ञात हमलावरों ने उन पर हमला किया था, वे करीब 20 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहे थे। सागर में नरेंद्र सिंह अकेला इस बड़ी घटना के अलावा कई अन्य अप्रिय प्रसंगों के कारण चर्चाओं में रहे। स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंट में मंच पर न चढ़ने देने, विश्वविद्यालय में आईजी के साथ एक टाक शो में उनके उद्बोधन के बाद अनिल पुरोहित द्वारा उनकी जमकर खबर लेने जैसी घटनाओं ने भास्कर की छवि को बुरी तरह धूमिल किया था। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा द्वारा सागर में अपने राष्‍ट्रीय अधिवेशन में स्थानीय भाजपा विधायक शैलेंद्र जैन और कांग्रेस विधायक गोविंदसिंह राजपूत की उपस्थिति में मंच से दैनिक भास्कर सागर के संपादक नरेंद्र सिंह अकेला के विरू़द्ध निंदा प्रस्ताव पारित करना। इन सबके चलते अकेला का सागर से जाना तय माना जा रहा था।

31 जुलाई को होगा शिमला प्रेस क्‍लब का चुनाव

प्रेस क्लब शिमला के चुनाव 31 जुलाई 2012 को कराने का निर्णय ले लिया गया है। वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु के सख्त रवैये को देखते हुए क्लब की संचालन परिषद की आपात बैठक में चुनाव कराने का फैसला हुआ। क्लब के चुनाव तीन साल बाद कराए जा रहे हैं। 13 अक्तूबर 2009 में क्लब के सालाना चुनाव हुए थे। कायदे से 13 अक्तूबर 2010 से पहले नए चुनाव हो जाने चाहिए थे, जो करीब तीन साल बीतने के बाद भी नहीं कराए गए।

इसके खिलाफ कृष्णभानु ने आवाज उठाई और क्लब के अध्यक्ष धनंजय शर्मा को अलग-अलग पांच पत्र लिखे। इन पत्रों में क्लब में अढ़ाई साल से लंबित लाखों रुपयों के उधार के साथ-साथ वित्तीय व अन्य अनियमितताओं का उल्लेख था। हजारों रुपयों के गबन का भी आरोप लगाया गया। साथ ही तत्काल चुनाव कराने की मांग की गई। कृष्णभानु शिमला प्रेस क्लब के लगातार पांच बार अध्यक्ष और तीन दफा मुख्य महासचिव रह चुके हैं। उन्होंने अकेले दम पर क्लब को सुधारने का बीड़ा उठाया, जिसके परिणाम तत्काल सामने आने लगे।

जिस दिन पत्र लिखकर कृष्णभानु ने क्लब में हजारों रूपए के गबन का आरोप लगाया, ठीक उसी दिन शाम को किसी ने क्लब में हजारों रुपए जमा करा दिए गए, जो उसी दिन बहीखाते में दर्ज भी हो गए। क्लब की उधारी लगभग साढ़े चार लाख तक पहुंच चुकी थी। कुछ सदस्यों की उधारी 40 से 50 हजार रुपए थी, जो लम्बे समय से उसे चुकता नहीं कर रहे थे। क्लब की संचालन परिषद ने कई बार उधारखोर सदस्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्णय लिए, लेकिन वह रद्दी की टोकरी में पड़े रहे और उधारखोरों का उधार बढ़ता गया। भानु ने इसके लिए क्लब के अध्यक्ष धनंजय शर्मा को जिम्मेदार ठहराया। कृष्णभानु के सख्त तेवरों को देखते हुए उधारखोरों में भी हड़कंप मच गया। परिणामस्वरूप धड़ाधड़ वसूली होने लगी। लगभग दो लाख की वसूली हो चुकी हैं। बाकियों को 7 जुलाई तक का समय दिया गया है। निश्चित तारीख तक भुगतान न किया तो संबंधित सदस्य डिफाल्टर हो जाएंगे और वे क्लब की सुविधाओं से वंचित कर दिए जाएंगे।

गौरतलब है कि क्लब के अध्यक्ष धनंजय शर्मा ने इससे पूर्व चुनाव टालने की भरसक कोशिश की। 27 जून को साधारण अधिवेशन बुलाया, लेकिन सदस्यों को सलीके से इसकी सूचना ही नहीं दी गई। कायदे-कानून को भी ठेंगा दिखाया गया। कृष्णभानु ने कानूनी तौर पर इस अधिवेशन को ‘अवैध’ बताया। परिणामस्वरूप सदस्यों ने साधारण अधिवेशन का बहिष्कार कर दिया। 160 में से 140 से ज्यादा सदस्यों ने बैठक से किनारा कर लिया। इससे धनंजय शर्मा को बड़ा झटका लगा। उन्हें मालूम पड़ गया कि वह क्लब की लड़ाई में कहां खड़े हैं।

कृष्णभानु ने धनंजय शर्मा को अंतिम पत्र 28 जून 2012 को लिखा। उन्होंने प्रश्न किया कि आखिर धनंजय शर्मा चुनाव क्यों टालना चाहते हैं। क्या लालच है? क्या फंडा है? क्या भूख है? बगैर फेविकोल के कुर्सी पर क्यों चिपक गए हैं? क्या राज है? कुछ तो बताइए? उन्होंने कहा कि साधारण अधिवेशन छोड़िए और संचालन परिषद की बैठक बुलाकर चुनाव का फैसला कीजिए। इस पत्र का असर हुआ और आपात बैठक बुलाकर 29 जून को चुनाव कराने का निर्णय ले लिया गया।

सवाल उठता है कि क्या शिमला प्रेस क्लब का विवाद यहीं खत्म हो गया है। यदि हाँ, तो इस विवाद के लिए कौन जिम्मेदार है? क्लब के सदस्य इस विवाद के लिए क्लब के कर्ताधर्ताओं, खासकर अध्यक्ष धनंजय शर्मा को दोषी मान रहे हैं। यदि उन्होंने समय पर चुनाव कराए होते अथवा रेवड़ियों की तरह ‘अपनों’ को उधार न बांटा होता तो ऐसी स्थिति उत्पन्न ही न होती। तीन साल तक क्लब के हजारों रुपए किसी की जेब में पड़े रहे और धनंजय शर्मा कुम्भकर्णी नींद सोते रहे। कृष्णभानु यदि मामला न उठाते तो यह हजारों रुपए डकार दिए जाते। फिर इसकी जिम्मेदारी से अध्यक्ष होने के नाते धनंजय शर्मा कैसे बच सकते हैं?

शिमला से राकेश कुमार की रिपोर्ट.

न्‍यू मीडिया पर सेंसरशिप नहीं इंटरनेट वॉच की जरूरत

मीडिया से जुड़े लोगों ने ऑनलाइन मीडिया को नियंत्रित करने के सरकार के प्रयास की आलोचना की और आगाह किया कि जल्दबाजी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए. नोएडा में बुधवार 27 जून को आयोजित ‘एस पी सिंह स्मृति समारोह 2012’ में मौजूद मीडिया के तमाम लोगों ने सरकार के ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध किया. मीडिया खबर डॉट कॉम की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में ‘इंटरनेट सेंसरशिप और ऑनलाइन मीडिया का भविष्य’ विषय पर चर्चा हुई.

कार्यक्रम में आनलाइन मीडिया पर नकेल कसने के सरकार के प्रयासों की निंदा की गई. केंद्र सरकार की ओर से सोशल साइटों को सोनिया गांधी के खिलाफ की गई एक टिप्पणी को हटाने के लिए कहना और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से उनके कार्टून प्रसारित करने वाले एक प्रोफेसर को गिरफ्तार किये जाने पर चिंता व्यक्त की गयी. बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की पूर्व एडिटर सलमा जैदी ने कहा कि सेंसरशिप की बात तो ठीक है लेकिन एक इंटरनेट वॉच होना चाहिए.

‘इंटरनेट सेंसरशिप और आनलाइन मीडिया का भविष्य’ विषय पर वेब दुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक ने कहा कि ऑनलाइन मीडिया ने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को प्लेटफॉर्म दिया है. इंटरनेट पर सेंसरशिप के सवाल पर कार्णिक का कहना था कि ‘बांध नदियों पर बनते हैं, समुद्र पर नही’. आज इंटरनेट एक समुद्र की तरह हो गया है जिस पर किसी प्रकार का सेंसरशिप लगाना अतार्किक और अव्यवहारिक है.

इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ काम कर रही जर्मनी की कोवैक्स ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सोशल एक्सपेटेंस भारत में ज्यादा है? भारत में बहुत सारे अंतर्राष्ट्रीय प्रावधान पहले से ही भारतीय संविधान में डाले गए गए हैं. जब हम सेंसरशिप की बात करते हैं तो सिर्फ मीडिया सेंसरशिप की बात नहीं कर रहे हैं, इसके अलावे भी हमें बाकी चीजों पर बात करनी होगी. हमारी बात कहने की कोई जगह नहीं है. मेरा स्पेस नहीं है, लेस प्रोटेक्टेड. ऐसा नही है कि कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं होनी चाहिए, लेकिन लेजिटिमेसी की बात है. दिल्ली यूनिवर्सटी के लेडी श्रीराम कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ. वर्तिका नंदा का इंटरनेट पर सेंसरशिप के बारे में कहना था कि अगर सेंसरशिप का मतलब गला घोटना है तो मैं इसका समर्थन नहीं करती, अगर इसका मतलब एक लक्ष्मण रेखा है, जो बताता है कि हर चीज की एक सीमा होती है तो ये गलत नहीं है.

न्यूज़ एक्सप्रेस के प्रमुख मुकेश कुमार ने कहा कि मैं ऑनलाइन और सेंसरशिप की बात को आइसोलेशन में नहीं देखना चाहता. मुझे लगता है कि ये सेंसरशिप माहौल में लगायी जा रही है. सेंसरशिप के और जो फार्म है उस पर भी बात होनी चाहिए. मैं तो देख रहा हूं कि नितिश कुमार भी एक अघोषित सेंशरशिप लगा रहे हैं. एक कंट्रोल मार्केट सेंसरशिप लगायी जा रही है. बाजार सरकार को नियंत्रित और संचालित किया जा रहा है, बाजार का जो सेंसरशिप है, उस पर भी लगाम लगाया जाना चाहिए. वहीं छत्तीसगढ़ न्यायालय के पूर्व चीफ जस्टिस फखरुद्दीन साहब ने ऑनलाइन मीडिया की तारीफ़ करते हुए कहा कि ऑनलाइन ने जो सबसे अच्छी बात की है वो ये कि आईना सामने रख दिया. सच बात मान लीजिए,चेहरे पर धूल, इल्जाम आईने पर लगाना भूल है. हमसे बाद की पीढ़ी ज्यादा जानती है क्योंकि सोशल मीडिया ने ऐसा किया है.

महुआ ग्रुप के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत ने इंटरनेट के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज इंटरनेट बहुत जरूरी हो गया है और इसपर किसी भी तरह का सेंसर समाज के लिए ठीक नहीं. वैसे सरकार की मंशा ऐसी रही है. यह लोकतंत्र के बुनियादी अधिकार पर रोक लगाने जैसा है. इस कार्यक्रम में बीबीसी हिंदी.कॉम की पूर्व एडिटर सलमा जैदी, वेबदुनिया के एडिटर जयदीप कार्णिक, मीडिया विश्लेषक डॉ. वर्तिका नंदा, न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार, महुआ न्यूज़ के ग्रुप एडिटर यशवंत राणा, जर्मनी की कोवैक्स, वेबदुनिया के जयदीप कार्णिक, छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ जस्टिस फखरुद्दीन और इन.कॉम (हिंदी) के संपादक  निमिष कुमार शामिल हुए जबकि मंच संचालन युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने किया. प्रेस रिलीज

जागरण, कानपुर में यूनिट हेड, सीजीएम एवं आईटी हेड पर महिलाकर्मी ने लगाया यौन शोषण का आरोप

दैनिक जागरण अब नैतिकता की धरातल से भी गिरने लगा है. कानपुर से खबर है कि तीन वरिष्‍ठ अधिकारियों ने एक महिला कर्मचारी का यौन शोषण किया. महिला ने इस मामले की लिखित शिकायत कानपुर की महिला थाना में की है. पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. सोमवार को इन चारों को पूछताछ के लिए थाने बुलाया जाएगा. 

दैनिक जागरण, कानपुर में कम्‍प्‍यूटर सेक्‍शन में काम करने वाली अविवाहित 36 वर्षीय रवीना मिश्रा (बदला हुआ नाम) ने कानपुर की महिला थाने में शिकायत करते हुए आरोप लगाया है कि उनके साथ जागरण, कानपुर के यूनिट हेड नितेंद्र श्रीवास्‍तव, सीजीएम सतीश चंद्र मिश्रा तथा आईटी सेक्‍शन के हेड प्रदीप अवस्‍थी ने यौन शोषण किया. रवीना के आरोप के अनुसार इन लोगों ने उन्‍हें एक कमरे में बुलाया तथा कहा कि कंपनी की छंटनी की लिस्‍ट में आपका भी नाम है. इसके बाद इन लोगों ने कहा कि या तो आप छंटनी के लिए तैयार रहिए या फिर हमारी बात मानिए. इसके बाद इन लोगों ने यौन शोषण किया.

सूत्रों का कहना है कि लगभग आधे घंटे बाद रवीना उस कमरे से रोते हुए निकलीं. अधिकारी उन्‍हें चुप कराने की कोशिश कर रहे थे. किसी के पूछने पर भी रवीना ने किसी को कोई बात नहीं बताई. 26 जून की शाम को उन्‍होंने महिला थाने में इस बात की लिखित शिकायत की. 27 पुलिस ने इस मामले में प्रारंभिक जांच पड़ताल की. बताया जा रहा है कि पुलिस इस मामले में यौन शोषण के आरोपी बनाए गए अधिकारियों को सोमवार को महिला थाने में पूछताछ के लिए बुलाएगी.

इस संदर्भ में रवीना द्वारा आरोपी बनाए गए यूनिट हेड नितेंद्र श्रीवास्‍तव का कहना है कि ये आरोप बेबुनियाद और झूठा है. उक्‍त महिला का अपने विभाग के हेड से किसी बात को लेकर विवाद हुआ था, उसके बाद उसने अपने कम्‍प्‍यूटर की सारी फाइलें डिलीट कर दी. जब उसे इस मामले में चार्जशीट दिया गया तो वो अब उल्‍टे सीधे आरोप लगा रही है. इस स्थिति में अब तो किसी महिला कर्मचारी को डांटने से भी परहेज करना पड़ेगा.

दूसरी तरफ सर्वोदय नगर के अलावा कानपुर के साकेतनगर में स्थित दैनिक जागरण के पत्रकारिता इंस्‍टीट्यूट के एक वरिष्‍ठ अधिकारी पर एक छात्रा ने यौन शोषण का आरोप लगाया है. यहां भी इस मामले को लेकर बवाल मचा हुआ है. ज्‍यादातर छात्र-छात्रा आरोपों को सही मानते हुए छात्रा के साथ खड़े हैं. अब देखना है कि प्रबंधन इस मामले में क्‍या कदम उठाता है.

स्‍वतंत्र राजस्‍थान ने दूसरे तथा आपणां अंदाज ने चौथे साल में प्रवेश किया

गुजरात के सूरत से प्रकाशित हिंदी साप्‍ताहिक स्‍वतंत्र राजस्‍थान ने दूसरे साल में प्रवेश किया है. 12 पेज के इस अखबार के संपादक राजसमंद जिले के रहने वाले मोती सिंह राजपूत हैं. वहीं कर्नाटक के हुबली से प्रकाशित हिंदी अखबार 'आपणां अंदाज' ने भी तीन वर्ष पूरे करके चौथे वर्ष में प्रवेश किया है. इस अखबार के प्रकाशक और संपादक सुरेंद्र के मेहता हैं. इस अखबार की लांचिंग 8 जून 2009 को हुई थी.

जागरण ने ज्‍यादा पैसे लेकर दिया कम का रसीद, वीरेंद्र दत्‍त का कमीशन भी मारा

दैनिक जागरण समूह पैसा के लिए भूखा भेडि़या बन चुका है. तमाम लोगों के पैसे हड़प रहा है. बनारस में जागरण ने अध्‍यापकों को मानदेय देने का वादा करके पैसे नहीं दिए तो देहरादून में वीरेंद्र दत्‍त गैरोला के विज्ञापन का कमीशन संस्‍थान ने मार लिया है. इतना ही नहीं उसने प्रत्‍याशियों द्वारा दिए गए धनराशि की बजाय कम राशि का रसीद पकड़ा दिया, जिससे प्रत्‍याशियों में भी नाराजगी है.

वीरेंद्र दत्‍त गैरोला, जिनसे प्रबंधन ने जबरिया इस्‍तीफा मांग लिया था, ने जागरण संस्‍थान को बीते विधानसभा चुनाव के दौरान लगभग दो लाख रुपये के विज्ञापन उपलब्‍ध कराए थे. प्रबंधन ने वादा किया था कि विज्ञापन लाने वाले लोगों को पंद्रह प्रतिशत कमिशन दिया जाएगा. परन्‍तु संस्‍थान ने ना तो वीरेंद्र दत्‍त को उनके कमीशन के लगभग 29 हजार रुपये उपलब्‍ध कराए और ना ही प्रत्‍याशियों को उनके द्वारा दिए गए धनराशि की रसीद ही दिए. प्रत्‍याशी भी जागरण के इस धोखाधड़ी से नाराज हैं.

इसके साथ ही जागरण द्वारा चुनावों के दौरान पेड न्‍यूज के रूप में की जा रही धांधली तथा ब्‍लैकमनी जुटाने के खेल का भी खुलासा हो रहा है. यानी जागरण प्रत्‍याशियों से ज्‍यादा पैसे लेकर उन्‍हें कम पैसे की रसीद देकर देश के साथ भी धोखा कर रहा है. साथ ही प्रत्‍याशियों को भी धोखेबाजी के मजबूर करता रहा है, उकसाता रहा है. फिलहाल वीरेंद्र दत्‍त ने प्रबंधन को पत्र लिखकर अपने कमीशन के बकायए पैसे की मांग की है. इतना ही नहीं जागरण ने उनके एक महीने के ईएल का पैसा भी हड़प लिया है.

चलिए, मेरी तो लॉटरी खुली, डर का लाभ मिला

Om Thanvi – मेरे मित्र बड़े संवेदनशील हैं और मैं बेशर्म! न्यू योर्क यात्रा में सुपर स्पेशल सिक्योरिटी क्या झेली, मित्रों के यहाँ तक फ़ोन आ रहे हैं! मैं संग्रहालयों और सेन्ट्रल पार्क की हवाखोरी कर रहा हूँ. क्या मेरी भाषा से लगा कि कोई बड़ा हादसा हुआ? रात गयी, बात गयी. अरे भाई, मुसलमान दोस्तों को तो कदम-कदम पर इनसे जूझना पड़ता है. शाहरुख़ खान जैसे शख्स को घंटों बिठाकर पूछताछ करते हैं. अपने साथ यही किया कि एक्स-रे कुछ ज़्यादा कर दिया. दर्ज़ा बढाया ही है. बस उलझन रही तो यही कि मुझ शरीफ़ (?!) को उन्होंने छांटा कैसे? एक अधिकारी से यहाँ यों ही भेंट हुई एक कार्यक्रम में. ज़िक्र छिड़ा तो वह बोला लॉटरी की तरह कभी-कभी रेंडम चेक करते हैं, मशीनरी की सम्हाल के लिए! चलिए, तो मेरी लॉटरी खुली. किसी-न-किसी की ऐसे रोज़ खुलती होगी. कुल मिलाकर बात वही कि डरे हुए लोग हैं. सो इसका लाभ उन्हें दिया! फ़िक्र मत कीजिये, आज लन्दन के लिए निकल रहा हूँ; और इसमें किसी को भला क्या दिक्कत?

अंजू शर्मा shubhkamnayen sir….

Anandmani Tripathi yah to hai bade dil ki badi baat

Anandmani Tripathi jarra sa bhi ashm nahi dikhta

Anandmani Tripathi sach sir isi liye ap ko main koti koti pranam karta hun

 Avanish Pathak आप महान हैं। लोगो का फोन करके आप की शुभ चिंता नही करने चाहिए । आपके फेसबुक अपडेट फॉलो करते रहने चाहिए। हैप्‍पी जर्नी ।

Navneet Pandey around the world…all the best..

 Ashutosh Kumar कोई रहस्य नहीं है . ओम ओसामा से मिलता जुलता है न , बस धर लिया गया .वाय टू टेक रिस्क ..

 Prakash Khatri hawakhori karte rahiyega sir.

 Yogendra Kumar Purohit best wishes and take care..

  Sudhindra Kumar bhagwaan aaplee lottery har baar khule aur aap shah rukh Khan bane aur likhe ek kitab

Anurag Arya वैसे ओम जी ऐसे" डरना " ज्यादा बेहतर है .इससे सुरक्षा बनी रहती है .इस देश को भी डरना चाहिए इसने कई हमले झेले है मैंने तो कई एक्सपेरिएंस किये है जिन दिनों स्वाइन फ्लू का हल्ला देश में था मैंने हैदराबाद की यात्रा की थी .उस वक़्त न तो किसी बाहर आने वाले की जांच हो रही थी ना जाने वालो की .ओर एक बात जब "सो काल्ड प्लेग" सूरत में फैला था .मै सूरत में था हम तीन लोग ट्रेन से दिल्ली में आये कोई जांच नहीं . ओर अब लेटेस्ट आज की खबर हमारे एक मित्र एयरपोर्ट से आज मेरठ आये रस्ते में एक घंटा जाम में फंसे रहे दो एम्बुलेंस भी .कारण? लोग मुरादनगर से मेरठ के रस्ते में सड़क पर नमाज पढने बैठ गए .रास्ता वन लेन हो गया .

Rajshekhar Vyas charewati -charewati………………………

 Subhash Chandra Kushwaha phir bhi mun me pritirodh jinda rhna chahiye.

 अंशुमाली रस्तोगी यात्रा करें, खूब घूमें-फिरें और आनंद लें…

 Karun Acharya apki yatra safal ho masa ji… regards

ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

देश लाइव से इस्‍तीफा देकर टोटल टीवी पहुंचे सौरव मिश्रा

देशलाइव से खबर है कि सौरव मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर आउटपुट हेड थे. सौरव ने अपनी नई पारी टोटल टीवी के साथ शुरू की है. यहां भी उन्‍हें महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. सौरव पिछले ग्‍यारह सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. इन्‍होंने करियर की शुरुआत ईटीवी से की थी. इसके बाद फोकस टीवी एवं साधना टीवी को भी प्रोड्यूसर के रूप में अपनी सेवाएं दीं. साधना से इस्‍तीफा देने के बाद ये चैनल वन से जुड़ गए थे. जहां इन्‍हें आउटपुट हेड बनाया गया. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद ये देश लाइव से जुड़ गए थे. सौरव की गिनती अच्‍छे टीवी पत्रकारों में की जाती है.

नदी में डूबे हॉकर की तलाश जारी, अब तक नहीं मिला शव

पूर्णिया : मोहनपुर ओपी क्षेत्र के समाचार पत्र विक्रेता ज्योतिष कुमार बुधवार को नाव दुर्घटना में भागलपुर जिला के ढोलबज्जा थाना क्षेत्र के निर्माणाधीन विजय घाट पुल के पास डूब गया था। जिसका पता घटना के दूसरे दिन भी नहीं चल सका। जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित स्थानीय लोगों द्वारा लगभग आधा दर्जन नावों पर सवार होकर बुधवार से उसकी तलाश लगातार जारी है।

जानकारी के अनुसार नवगछिया से सुबह साढ़े छह बजे ज्योतिष भगत निर्माणाधीन विजय पुल पहुंचे तथा वहां एक नाव पर चढ़ा इसी बीच नाव पीपापुल से टकरा गई तथा किनारे पर बैठा ज्योतिष पानी में डूब गया। इधर नाव पर सवार मोहनपुर क्षेत्र के अंझरी गांव के मो. गफार आलम जो दिल्ली से अपने परिवार के साथ लौट रहे थे ने भी बताया कि नाव जैसे ही पीपा पुल से टकराई कि ज्योतिष नदी में गिर पड़ा तथा हाथ-पांव मारने लगा। नाव पर सवार अन्य लोगों ने नाविक से ज्योतिष को बचाने के लिए कहा गया परंतु नाविक ने यह कहकर बात को टाल दिया कि वह भी नाविक ही है तैरकर बाहर निकल आएगा। परंतु उसे पानी से बाहर नहीं निकलते देख इसकी सूचना जब तक स्थानीय लोगों को दी गई तब तक वह नाव लेकर फरार हो गया।

इस बात की पुष्टि करते हुए मोहनपुर ओपी अध्यक्ष विनोद पांडे ने कहा कि चश्मदीद व्यक्ति ने उन्हें तथा ढोलबज्जा पुलिस को भी घटना की सारी जानकारी दी है। सीओ ने बताया कि नियमानुसार जबतक शव नहीं मिल जाता है तबतक कोई सरकारी सहायता नहीं दी जा सकती है। वैसे इस संबंध में वरीय पदाधिकारियों से बात कर कुछ बताएंगे। इधर ढोलबज्जा पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। (जागरण)

पंकज पचौरी से सिर्फ 30 हजार रुपये अधिक पाते हैं मनमोहन सिंह

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री की तनख्वाह उनके मीडिया सलाहकार से महज 30 हजार रुपए अधिक है। प्रधानमंत्री को हर माह मिलते हैं 1.60 लाख रुपए तो उनके मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी को सैलरी के रूप में मिलते हैं 1.30 लाख रुपये। प्रधानमंत्री कार्यालय ने डॉ. मनमोहन सिंह समेत अपने सभी कर्मचारियों की आमदनी की जानकारी आम कर दी है। इसको सार्वजनिक करने के लिए हवाला दिया गया है कि इसे राजकाज में पारदर्शिता आएगी।

पीएमओ में कुल 404 कर्मचारी-अधिकारी हैं। पीएमओ वेबसाइट पर सभी की तनख्वाह की सूची जारी की गई है। इनमें से तीन कर्मचारियों की संपत्ति का आंकड़ा भी सार्वजनिक किया गया है। पिछले सात सालों से पीएमओ में काम कर रहे ओएसडी मुथु कुमार की सैलरी 1.44 लाख रुपए है। जबकि प्रधानमंत्री के विशेष दूत एसके लांबा को प्रति माह 1.13 लाख रुपये मिलते हैं। हलांकि इनकी संपत्ति का खुलासा नहीं किया गया है। यह जानकारी सूचना के अधिकार की धारा 4 (अपनी ओर से सूचनाएं जारी करना) के तहत जारी किया गया है। इस बारे में मेल टुडे समेत कई अखबारों ने भी खबर प्रकाशित की है. नीचे मेल टुडे की खबर.


What the Prime Minister and his key men earn : Government discloses salaries and assets of the key officials in the PMO

They are the Prime Minister's power pack, the movers and shakers in the all-powerful Prime Minister's Office (PMO). Power flows from their file jottings and orders issued sometimes in monosyllables.

Rarely seen in public, they reveal little about themselves, let alone disclose their pay.

But for the sake of transparency, the government has made public the salaries and assets of the top three officials in the PMO – principal secretary to the PM Pulok Chatterji, National Security Adviser Shiv Shankar Menon and adviser to the PM TKA Nair.

The disclosure, made under Section 4 of the RTI (Right to Information) Act that encourages proactive disclosure of information for the sake of transparency, also reveals the salaries of the communications adviser in the PMO Pankaj Pachauri, the officer on special duty to the PM K. Muthu Kumar and the PM's special envoy S.K. Lambah.

In fact, the salaries of all the 404 people working in the PMO, their total salary bill, the PMO's budget for 2012-13, the travel details of officials besides the PM's own salary have been posted on the PMO's website.

Pachauri draws Rs1.3 lakh per month, only Rs30,000 short of the PM's salary which is Rs1.6 lakh.

He worked with a leading news channel before moving into the PMO in January this year. Pachauri is the second-highest paid official in the PMO after Muthu Kumar, who draws Rs1.44 lakh per month.

Kumar is an Indian Information Services officer who earlier worked with Doordarshan. He has been in the PMO for the last seven years.

Interestingly, Chatterji, Menon and Nair draw less than Pachauri. Chatterji, considered the most important man in the PMO and the force behind all major policy decisions aimed at revving up the government struggling to step out of a policy paralysis, draws just Rs92,000 per month.

Both Menon and Nair draw Rs1.13 lakh per month. Lambah also draws Rs1.13 lakh per month.
PRIME MINISTER'S SALARY SLIP

Rs50,000 pay

Rs3,000 sumptuary allowance

Rs62,000 daily allowance (Rs2,000 per day)

Rs45,000 constituency allowance

Rs1.6 lakh – gross pay/month

As far as immovable assets go, Menon owns two flats in Delhi, one in Mayur Vihar with a present market value of Rs1.5 crore and another in the posh Anand Niketan area with a market value of Rs10 crore. He earns Rs32.6 lakh annually from these properties.

Chhaterji owns two flats, one in Dwarka and another under-construction four-bedroom apartment in Greater Noida. He owns a residential plot in Faridabad as well. Nair has only one property, in Kerala; a double-storey house in Thiruvananthapuram.

Overall, the PMO comes across as a huge department. In all, 404 people keep it running at a monthly wage bill of Rs1.49 crore. Of the total budget of the PMO for 2012-13 which is Rs29.3 crore, 70 per cent (Rs20 crore) will be spent on paying salaries alone; Rs3.5 crore has been earmarked for 'office expenses'.

Every year, the PMO spends Rs3 crore on the foreign travel of officials or the PM and Rs45 lakh on domestic travel. There is no staff shortage.

The only key post vacant is of media adviser to the PM after Harish Khare quit.

Journalism Vs Jingoism

The release of Indian national Surjeet Singh by Pakistan is considered as a forward move in normalising the extinct relation between the two neighbors. The development has been welcomed across the country but the Sarabjit– Surjeet fiasco, prior to latter’s release – evoked strong reactions and sentiments from the people.

Pakistan government did clarify the confusion a few hours later but by that time the media, in both the countries, had ran the much awaited and coveted news without verifying the fact. Needless to say the damage was done.

Farhatullah Babar, President Asif Ali Zardari’s media adviser, in his interview to media persons had clearly said that it was Surjeet Singh as the Indian prisoner Pakistan planned to release. But it was the media which created complete chaos.

In the arena of sabse tez, sabse aage, etc, etc, the electronic media did every possible move, what it could do, in keeping its audience ‘ahead’ and ‘informed’. In India, most TV news channels staged fancy talk shows, animated programmes and panel discussions on Surjeet-Sarabjit drama to instill an emotional and sensational feeling among its audience.

Print media in both the countries seemed equally prompt in updating their website with the chaotic news as their print edition would take substantial time in reaching the readers. The immature reporting by some esteemed daily newspaper left the readers stirred and wondered.

One of the important reasons behind this mess-up could be the linguistic barrier of the journalists. Urdu is an official language in Pakistan and the release order was reported to be in the same language. There is minor difference in the names of two captive, Sarabjit-Surjeet, if written in Urdu. There are limited number of journalists in India who are equally good at Urdu language and can interpret the same into other languages. The always-in-a-hurry journo misinterpreted it and ran with the news at first hand.

However, such mistake was not expected from Pakistani journalists who turned equally insane like their Indian bro in reporting the development.

On June 27, in India, , The Hindu, The Indian Express, Hindustan Times; and in Pakistan, The Down, The Nation, Statesman, and Pakistan Observer’s headline carried a clarification by Pakistan government that it was Surjeet and not Sarabjit.

The Surjeet-Sarabjit chaos did not end up with this mess-up. The two-day consecutive reporting in India’s largest circulated newspaper The Times of India did the rest damage by painting the whole development with wrong brush. First the paper reported it as Pakistan’s “U-turn” and then blamed ‘Jihadi groups’ for the “U-turn”.

On June 27, the paper adorned it with a headline, “Midnight Drama: Pakistan does a U-turn on Sarabjit”. The following day the newspaper went a step ahead and gave a bold headline, “Pak may have done Sarabjit U-turn under Jihadi pressure”.

The headline was directly derived from Sarabjit’s bereaved family who blamed Islamic fundamentalists Jamaat-e-Islami, Pakistan and the Jamaat-ud Dawa for mounting pressure on the Pakistan government to take a U-tern.

Whosoever has followed the development and the official release order developed an apparent understanding that it was actually Surjeet Singh; hence there was no U-turn. When it was not a U-turn what validates the paper to put the blame on Jihadi groups.

At a time when the whole country seemed jubilant at Surjeet’s release and his homecoming and urging the neighbouring country to consider Sarabjit’s release; the major daily was shedding tears and putting the blame on ‘Jihadi groups’ – further deteriorating the situation for worst.

Over the years the news reporting cross the country has significantly been jingoistic. Patriotic fervor have overpowered journalistic ethics which reflect in the news reporting. And India-Pakistan are no exception to this.

The two examples in hand can significantly elaborate the points. Surjeet Singh, on his arrival in India, addressed media persons and admitted that he was an Indian spy sent to Pakistan by India’s Research and Analysis Wing (RAW).

As expected the news had limited coverage in Indian print and electronic media but was extensively covered and published by Pakistani media.

Another example: The arrest of Abu Jindal. The Indian media is filled with numerous reports which joins the dots of Mumbai terror attacks to cross border. Here Pakistani media has observed restraint over the reporting and even defied any association with the captive.

For the last few years the links of every terror activity in India connects to foreign soil. India blames Pakistan for supporting terror activities and Pakistan as usual states it as a matter of mutual concern.

The disclosure of Abu Jindal’s association with ISI and Surjeet’s with RAW have strengthened their claim. These might be the reason why some sections in media in both the countries are quick in declaring and accusing the other for sponsoring terror activities.

Pakistan has also been cynical about the treatment meted out to their national captive in Indian Jails. The Nation (Pakistan), in an editorial on June 27, alleges that Pakistani prisoners in Indian jails have no consideration shown to them, while Indians imprisoned in Pakistani jails, even if convicted of attempting to harm the Pakistani state have been treated well.

Media has power and it can significantly contribute in narrowing the gaps between the neighbours. Immature and insane reporting will only enlarge difference and spread hatred among the people. Being jingoistic is natural but let such feeling not overcome the ethics of journalism.

Shafaque Alam

… उस दिन लगा कि यहां बिक गए हैं कुछ मीडिया संस्‍थान

जब से प्रदेश में रमन सरकार आयी है तब से तो छत्तीसगढ में मीडिया का रोल ही खत्म हो गया है…अगर हम एक दो मीडिया संस्थानो को छोड़ दें तो यह भी कहा जा सकता है कि प्रदेश की मीडिया मैनेज है, लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां के पत्रकार बिके हों, लेकिन यह जरूर है कि कलम उनकी है पर स्याही मालिक की, जो अखबार या न्यूज चैनल का मालिक कहे वही खबर चले। जहां प्रदेश की सरकार इन प्रदेशिक चैनलों को सालाना करोड़ों का विज्ञापन देती है तो वही कुछ प्राइवेट संस्थान भी विज्ञापन की मोटी रकम देते हैं और चैनल और संस्थान के बीच हो जाता है करार।

अब संस्थान चाहे जो कुछ भी अच्छा या बुरा करे अखबार और चैनल सिर्फ उसकी अच्छाई दिखाएंगे। ताजा मामला छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर से जुड़ा हुआ है। 27 जून को भोपाल से संचालित एक न्यूज चैनल में लगभग दो से ढाई बजे एक खबर ब्रेक होती है कि बिलासपुर के करगी रोड कोटा स्थित सीवी रमन यूनिवर्सिटी से पीजीडीसीए के सी प्लस प्लस का पर्चा लीक हो गया है, जिस खबर पर चैनल के पत्रकार का फोनो भी होता है। मैं उस समय टीवी ही देख रहा था तो स्वाभाविक था कि मैं खबर की पुष्टि के लिए दूसरे चैनल भी देखूंगा। लगभग दस मिनट तक किसी चैनल में ऐसी कुछ खबर नहीं दिखी, फिर थोड़ी देर बाद एक और प्रादेशिक चैनल में वो खबर तीन बजे ब्रेक हुई। मुझे लगा आखिर मामला क्या है?

मैंने वही पहले वाला चैनल लगाया जिस पर ये खबर पहले ब्रेक हुई थी और इस चैनल पर पूरी खबर दिखाई जाती है कि कैसे इस न्यूज चैनल ने दलाल के माध्यम से जो परीक्षा दो बजे से होने वाला है उसका पेपर एक बजे ही सिर्फ तीन हजार रुपए में खरीद लिया। फिर जब दो बजे परीक्षा चालू हुआ तब चैनल के पत्रकार द्वारा उसी पर्चे को मिलाया गया तो पाया गया कि दोनों में एक जैसे ही प्रश्न आये थे। इतने में लाइट बंद हो गई और मैं मार्केट चला गया। शाम को मैंने सोचा कि सीवी रमन विश्वविद्यालय में इतनी बडी गड़बड़ी हुई है तो भले ही थोड़ी देर से चले सभी चैनलों में दिखाएगा। यही सोच कर मैं शाम 7 बजे से 10 बजे तक बार बार चैनल बदलता रहा लेकिन ये खबर सिर्फ दो चैनलो पर दिखी। फिर मै यही सोचते हुए सो गया कि आखिर क्यों ये खबर छत्तीसगढ़ प्रदेश के नम्बर वन चैनल, जो कहता है कि सवाल आपका है, उसमें क्यों नहीं चली? मुझे बात समझ में नहीं आ रही थी, क्यों कि मैं हमेशा रात 10 बजे से 11 बजे तक यही चैनल देखता हूं। और इसकी खबर देखे बिना सोता नहीं हूं।

मैं सो गया। सुबह हो गई घर पर अखबार आया। मैंने सभी अखबारों में देखा मगर सीवी रमन की खबर सिर्फ एक अखबार में दिखी, जो कि शुरू से ही सरकार के विरोध में खबर छापने के नाम से जाना जाता है। मैंने अपने दोस्त से इस बारे में चर्चा की तो उसने बताया कि भाई बिलासपुर में मीडिया विज्ञापन के आगे खबरों को कोई जगह नहीं देती। सीवी रमन सभी चैनल और अखबारों को लाखो का सालाना विज्ञापन देता है तो कोई थोड़े ही उसके विरोध में छापेगा। अब मुझे बात समझने में देर न लगी। क्यों कि अब मैं समझ चुका था कि मीडिया भी मैनेज हो सकती है (मैं पत्रकारो की बड़ी इज्जत करता हूं, मेरा मकसद किसी की बुराई करना या किसी को ठेस पंहुचाना नहीं है, लेकिन आशा करता हूं कि देश का हर पत्रकार अपनी जिम्मेदारियों का सतत निर्वहन करते हुए देश का नाम रोशन करेंगे क्यों कि देश के लोगों को पत्रकारों से बड़ी उम्मीदें और विश्वास है)।

महेश सिंह गहलोत

एडवोकेट

हाईकोर्ट बिलासपुर

छत्‍तीसगढ़

बीएस लाली को क्‍लीनचीट देने की तैयारी में सीबीआई

नई दिल्ली। सीबीआई ने राष्ट्रमंडल खेलों के प्रसारण अधिकार मामले में प्रसार भारती के पूर्व सीईओ बीएस लाली को क्लीनचिट देने की तैयारी कर ली है। शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने मामला जांच एजेंसी को सौंपा था। साल भर की जांच के बाद सीबीआई का कहना है कि आरोपों में कोई दम नहीं है और फैसले सामूहिक और विवेकपूर्ण तरीके से लिए गए।

सूत्रों के मुताबिक लाली के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने का फैसला किया गया है। प्रसार भारती ने 246 करोड़ रुपये का अधिकांश बजट एसआईएस को खेलों के प्रसारण के लिए दिया था। एसआईएस ने यह काम सिर्फ 176 करोड़ रुपये में जूम को दे दिया। इस तरह सरकार को 100 करोड़ रुपये का चूना लगा। सीबीआई ने लाली और जूम कम्यूनिकेशंस के एमडी वसीम देहलवी के खिलाफ केस दर्ज किया था। देहलवी ब्रिटिश कंपनी एसआइएस लाइव के रेजीडेंट डायरेक्टर भी हैं। आरोपों के बाद लाली को निलंबित कर दिया गया था।

सीबीआई अब कह रही है कि प्रसार भारती ने भुगतान के समय कोई बदलाव नहीं किया। संविदा के मसौदे में बदलाव भी एसआईएस को लाभ पहुंचाने के मकसद से नहीं किया गया था। कांट्रैक्ट के अंतिम प्रारूप पर सॉलिसिटर जनरल की सहमति थी। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अगुआई वाली निगरानी समिति ने इसे मंजूर किया था। सूत्रों के मुताबिक संविदा के स्पष्ट तौर पर एसआईएस के पक्ष में होने के बावजूद यह एक सामूहिक प्रशासनिक निर्णय था। राष्ट्रमंडल के 17 में 10 खेलों को कवर न करने के दूरदर्शन के फैसले में भी सीबीआई को जांच में कोई खामी नहीं मिली। (एजेंसी)

बिना लाइव प्रोग्राम किए ही वापस लौट आई एबीपी न्‍यूज की टीम

जींद : आमिर खान के शो सत्यमेव जयते के 'असर' कार्यक्रम के तहत कवरेज के लिए पहुंची एबीपी न्यूज चैनल की टीम वापस लौट गई। तकनीकी कारणों के चलते यह कार्यक्रम रद कर दिया गया। हालांकि इस कार्यक्रम के रद होने कई और कारण स्‍थानीय लोगों द्वारा बताए जा रहे थे. बीते रविवार को आमिर खान ने अपने शो सत्यमेव जयते में पेस्टीसाइड के खिलाफ कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। इसी के तहत निडाना गांव में हो रही जहर मुक्त खेती को लेकर यहां के किसानों से लाइव बातचीत करने के लिए चैनल की टीम ने कार्यक्रम बनाया था।

एबीपी न्यूज चैनल की टीम भी शुक्रवार सुबह जींद पहुंच चुकी थी, सारी तैयारियां भी शुरू कर दी गई। परन्‍तु अचानक टीम ने दोपहर में कार्यक्रम रद कर दिया। एबीपी न्‍यूज की टीम अपने ओबी वैन के साथ वापस लौट गई, जिससे किसानों को मायूसी हाथ लगी। कार्यक्रम रद होने का आधिकारिक कारण तकनीकी गड़बड़ी को बताया गया, परन्‍तु गांव वाले चर्चा करते रहे कि कुछ आर्थिक अड़चनों के चलते एबीपी न्‍यूज चैनल ने ये कार्यक्रम नहीं किया।

असांजे ने स्‍कॉटलैंड पुलिस के समर्पण की नोटिस को खारिज किया

लंदन। स्वीडिश वेबसाइट विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने स्कॉटलैंड पुलिस द्वारा समर्पण करने की नोटिस को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा है कि जमानत की शर्तो का उल्लंघन करने के बाद वह पुलिस स्टेशन में पेश नहीं होंगे। यह नोटिस उन्हें गुरुवार को लंदन स्थित एक्वाडोर दूतावास में भेजी गई थी, जहां उन्होंने स्वीडन प्रत्यर्पित किए जाने से बचने के लिए शरण ले रखी है। उन्होंने एक्वाडोर से राजनीतिक शरण देने के लिए आवेदन किया है।

स्वीडन में दो महिलाओं ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। पुलिस इस मामले में उनसे पूछताछ करना चाहती है। ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई को उन्हें स्वीडन प्रत्यर्पित करने का फैसला सुनाया था। साथ ही कहा था कि उन्हें 28 जून से पहले प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता। यह अवधि गुरुवार को समाप्त हो गई। पुलिस द्वारा जारी बयान के मुताबिक,'समर्पण न करना फिर से जमानत की शर्तो का उल्लंघन करना है और उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है।' रात में दस बजे से सुबह आठ बजे तक जमानत के दौरान दिए गए पते पर रहना शर्तो में शामिल था, लेकिन गत 20 जून को एक्वाडोर के दूतावास में शरण लेकर असांजे पहले ही शर्तो का उल्लंघन कर चुके हैं। (एजेंसी)

ए2जेड न्‍यूज चैनल में सभी कर्मचारियों को मिला इंक्रीमेंट

ए2जेड न्‍यूज चैनल से खबर है कि यहां दस से लेकर बीस प्रतिशत का इंक्रीमेंट किया गया है. प्रबंधन ने सभी विभाग के कर्मचारियों को इंक्रीमेंट का तोहफा दिया है. काफी समय से कर्मचारियों को इंक्रीमेंट नहीं दिया गया था. प्रबंधन ने परफारमेंस के आधार पर एक हजार रुपये से लेकर तीन हजार रुपये तक का इंक्रीमेंट दिया है. इंक्रीमेंट के बाद कर्मचारी खुश हैं. हालांकि पु‍राने कर्मचारियों में इस बात को लेकर नाराजगी भी है कि प्रबंधन नए कर्मचारियों को भी इंक्रीमेंट दे दिया है.

चैनल में इंक्रीमेंट किए जाने के बारे में पूछे जाने पर सीईओ वेद शर्मा ने बताया कि प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों को संतुष्‍ट करने का प्रयास किया है. किसी से भेद भाव नहीं किया गया है. कर्मचारियों के कार्यक्षमता के अनुसार इंक्रीमेंट किया गया है.

बिजनेस भास्‍कर से आर्थिक संपादक हरवीर सिंह का इस्‍तीफा

बिजनेस भास्‍कर, दिल्‍ली से खबर है कि हरवीर सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे आर्थिक संपादक के पद पर कार्यरत थे. सूत्रों का कहना है कि भास्‍कर की एचआर हेड रचना कामना से मुलाकात के बाद उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा प्रबंधन को सौंप दिया. हरवीर सिंह के इस्‍तीफा देने के मूल कारणों का पता नहीं चल पाया है.  हरवीर सिंह की गिनती अच्‍छे आर्थिक पत्रकारों में की जाती है. वे काफी समय से बिजनेस भास्‍कर से जुड़े हुए थे. हरवीर अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. वैसे बताया जा रहा है कि उन्‍हें कहीं बेहतर ऑपर मिला है. इसके चलते उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है.

Fraud Nirmal Baba (101) : फैसला आने से पहले गिरफ्तार नहीं होंगे निर्मलजीत

अररिया : पूर्णिया के जिला एवं सत्र न्यायाधीश संजय कुमार ने चर्चित निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा की दाखिल अग्रिम जमानत अर्जी पर निर्णय न आने तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया है। न्यायालय ने फारबिसगंज थानाध्यक्ष से उक्त लंबित मामले की केस डायरी भी मांगी है। पूर्णिया के जिला न्यायाधीश श्री कुमार ने उक्त आदेश 26 जून को अपने अररिया में आयोजित कैंप कोर्ट के दौरान सुनाया है।

एक लंबित मामले में आरोपी बनाए गए निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा की ओर से इसी साल 15 मई को अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल हुआ था। जिसमें एबीपी नंबर 440/12 के तहत जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई की। कैंप कोर्ट में इस मामले को लेकर वरीय अधिवक्ता देव नारायण सेन, सत्यजीत राय आदि द्वारा जमानत अर्जी पर बहस के दौरान कानून के कई सूक्ष्म पहलुओं की चर्चा की गयी तथा निर्मल बाबा को अग्रिम जमानत के लिये कोर्ट से गुहार लगायी गयी। वहीं लोक अभियोजक एलएन यादव ने केस डायरी की मांग करने की बात रखी।

उल्‍लेखनीय है कि फारबिसगंज के निवासी राकेश कुमार सिंह ने स्थानीय थाने में शिकायत किया था, जिसे पुलिस ने कांड संख्या 154/12 के तहत दर्ज किया था। राकेश ने अपनी तीन हजार आय का उल्लेख निर्मल बाबा का टीवी चैनलों में चलाये जा रहे प्रोग्राम व समागम से प्रभावित होने की बात कही तथा कमाई के दसवां हिस्सा दशवंत में देने से लाभ होने की बात से प्रभावित हुआ। इसी क्रम में राकेश ने फारबिसगंज स्थित पंजाब नेशनल बैंक में तीन किस्तों में कुल एक हजार रुपये दशवंद के रूप में जमा किये, लेकिन इसके बाद भी उन्‍हें कोई लाभ नहीं मिला। इसके बाद राकेश इसे अपने आस्था के साथ खिलवाड़ व ठगी मानते हुए थाने में शिकायत दर्ज कराई।

इसके बाद जांच अधिकारी के अनुरोध तथा प्राप्‍त जांच रिपोर्ट के बाद अररिया के सीजेएम ने वारंट जारी किया। इसके बाद निर्मल बाबा हाई कोर्ट पटना पहुंच गए तथा उनके विरुद्ध जारी वारंट पर निर्धारित समयावधि के लिए स्‍टे आर्डर ले लिया। इसी मामले से संबंधित अग्रिम जमानत अर्जी संख्या 440/12 में डीजे पूर्णिया ने कैंप कोर्ट अररिया में सुनवाई की तथा उक्त जमानत अर्जी पर निर्णय आने तक निर्मल बाबा की गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया है। 


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संस्‍कारहीन जागरण, वाराणसी ने हड़प लिए दर्जनों अध्‍यापकों का मानदेय

शायद दूसरों के पैसे मारकर ही दैन‍िक जागरण समूह ने खुद को धनी संस्‍थान बनाया है. मामला चंदौली जिले से जुड़ा हुआ है. अपने कर्मचारियों का खून चूसने वाला जागरण अक्‍सर सरोकारों की नौटंकी करता रहता है. इसी क्रम में दैनिक जागरण, वाराणसी ने इस साल फरवरी महीने में संस्‍कारशाला परीक्षा का आयोजन किया था. इसमें छात्रों से संस्‍कार से संबंधित सवाल पूछे गए थे. कितनी विडम्‍बना है कि जिस समूह में खुद संस्‍कार नहीं है वो संस्‍कारशाला का आयोजन कर रहा है, ठीक उसी तरह जैसे विद्या की देवी सरस्‍वती पूजा पढ़े लिखे कम और अनपढ़ ज्‍यादा करते हैं.  

चंदौली जिले के लगभग आधा दर्जन स्‍कूलों में इस परीक्षा का आयोजन किया गया था. इसमें जागरण की तरफ से वादा किया गया था परीक्षा में अव्‍वल आने वाले बच्‍चों को तो सम्‍मानित किया ही जाएगा, कक्ष निरीक्षक की भूमिका निभाने वाले अध्‍यापकों को भी मानदेय दिया जाएगा. अव्‍वल आने वाले छात्रों को तो किसी तरह पुरस्‍कार देकर सलटा लिया, परन्‍तु अध्‍यापकों को मानदेय अब तक नहीं दिया गया. इस परीक्षा का संयोजक विनय कुमार वर्मा को बनाया गया था. हर सेंटर पर तीन अध्‍यापकों की ड्यूटी लगाई गई थी.  

अखबार संस्‍थान का मामला होने के चलते अध्‍यापकों ने विश्‍वास कर लिया कि देर सवेर उन्‍हें मानदेय मिल जाएगा, परन्‍तु अखबार प्रबंधन ने उन्‍हें उनके मेहनत का पैसा देना भी गंवारा नहीं समझा. अध्‍यापक अपने मानदेय के बारे में एकाध बार पूछकर शांत हो गए कि इतना पैसा थोड़े ही है कि उनकी जिंदगी रूक जाएगी, पर उन्‍हें अखबार प्रबंधन के झूठ बोलने तथा धोखा देने के रवैये पर गुस्‍सा जरूर आया. इस बारे में जब परीक्षा संयोजक बनाए गए विनय वर्मा से पूछा गया था तो उन्‍होंने इसके लिए प्रबंधन से बात करने को कहा तथा कहा कि उनका इससे कोई लेना देना नहीं है, प्रबंधन ही पैसा नहीं दे रहा है.

इस संदर्भ में दैनिक जागरण के जीएम अंकुर चड्ढा को भी अध्‍यापकों का पैसा जागरण प्रबंधन द्वारा मारे जाने की बात से अवगत कराया गया. उन्‍होंने भी मामले को दिखवाने का आश्‍वासन दिया, पर शायद अंकुर की मंशा भी इन अध्‍यापकों का पैसा हड़प जाने की रही होगी. तभी तो अब तक अध्‍यापकों को उनका मानदेय नहीं मिला है. जागरण के इस भिखमंगई पर अध्‍यापक वर्ग थू थू कर रहा है. उनका कहना है कि पैसा महत्‍वपूर्ण नहीं पर बात तो सत्‍य बताना चाहिए था कि हम पैसा नहीं देंगे. जाहिर है जिन लोगों ने खुद शिक्षा को रखैल बना रखा हो उन्‍हें शिक्षा के महत्‍व क्‍या पता. जल्‍द ही जागरण से जुड़े ऐसे लोगों की पोल खोली जाएगी जो जागरण की नौकरी करते हुए भी विद्यापीठ से संस्‍थागत छात्र के रूप में परीक्षाएं पास की हैं. यानी शुद्ध रूप से चार सौ बीसी.

बरेली में सीकेटी का जनमोर्चा से समझौता, लांच करेंगे इवनिंग अखबार

बरेली से खबर है कि दैनिक जागरण के पूर्व सीजीएम चंद्रक्रांत त्रिपाठी नए इवनिंग अखबार के साथ कई पत्रिकाएं लांच करने की तैयारी कर रहे हैं. इसके लिए उन्‍होंने जनमोर्चा अखबार के मालिक सरदार कमलजीत सिंह से समझौता किया है. सीकेटी और कमलजीत सिंह का ज्‍वाइंट मीडिया वेंचर मार्निंग डेली जनमोर्चा के अलावा एक इवनिंग डेली, साप्‍ताहिक अखबार तथा स्‍वास्‍थ्‍य तथा महिलाओं पर आधारित पत्रिका का प्रकाशन करेगा.

फिलहाल अखबार और पत्रिका के नाम के बारे में जानकारी नहीं दी जा रही है. क्‍योंकि ये आरएनआई में आवेदन की प्रक्रिया में हैं. इस समूह का संचालन जनमोर्चा के बिल्डिंग से किया जाएगा. सूत्रों का कहना है कि इस पूरे वेंचर में सीकेटी का हिस्‍सा 51 फीसदी तथा कमलजीत सिंह का 49 फीसदी होगा. अखबार के प्रकाशन के नया प्रिंटिंग मशीन भी लगावाया जाएगा.  इसके अलावा सीकेटी का ज्‍वाइंट मीडिया वेंचर मीडिया स्‍कूल का संचालन भी करेगा. 

संभावना जताई जा रही है कि सीकेटी की टीम में उनके कई पुराने सहयोगी भी जुड़ेंगे. फिलहाल जिन नामों की चर्चा है उसमें वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूदयाल बाजपेयी, अरुण द्विवेदी, रमेश चंद्र राय समेत कुछ और नाम शामिल हैं. सूत्रों का कहना है कि सीकेटी पहले इवनिंग अखबार से बरेली मार्केट को तौलेंगे, उसके बाद अपने खुद के सेटअप के साथ मार्निंग अखबार की लांचिंग करेंगे. फिलहाल वे कम से कम रिस्‍क लेकर चलने की रणनीति के तहत बरेली के नब्‍ज की थाह लेंगे.

डीएलसी ने कहा मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के बाद ही किए जाएं तबादले

दैनिक जागरण, बरेली में मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के मामले शुक्रवार को सुनवाई थी, परन्‍तु जागरण से कोई भी डिप्‍टी लेबर कमिश्‍नर के कार्यालय में नहीं पहुंचा. डीएलसी ने फोन पर सीजीएम एएन सिंह से इस मामले की प्रगति के बारे में पूछा, जिस पर उन्‍होंने सुप्रीम कोर्ट में मामला होने का हवाला दिया. डीएलसी ने जागरण के कर्मचारियों के तबादले को भी अवैध बताते हुए मजीठिया लागू करने को कहा.

डीएलसी ने स्‍पष्‍ट कहा कि कर्मचारियों द्वारा मामला दायर करने के बाद इनका तबादला किया गया है, लिहाजा यह आदेश उचित नहीं है. अगर प्रबंधन मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू कर देता है तो सभी कर्मचारी अपने तबादले वाले यूनिटों में ज्‍वाइन कर लेंगे. उन्‍होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया लागू करने के संदर्भ में‍ किसी अखबार प्रबंधन को राहत नहीं दी है. इसलिए कोर्ट के नाम पर बरगलाना गलत है. उन्‍होंने कहा कि ये सरकार आदेश हैं और हम इसे लागू करवाएंगे.

उल्‍लेखनीय है कि केंद्रीय श्रम सचिव ने श्रम कार्यालयों को पत्र लिखकर मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने की स्थिति के बारे में जांच के आदेश दिए हैं. बरेली में रुहेलखंड मीडिया वकर्स एसोसिएशन के अलावा कोई भी संगठन पत्रकारों के पक्ष में खड़ा नहीं है. एसोसिएशन के सदस्‍य मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के जांच के लिए जिलाधिकारी को पत्रक सौंपेंगे तथा प्रदर्शन करेंगे. पत्रकार हित में जारी इन आंदोलनों का नेतृत्‍व रुहेलखंड मीडिया वकर्स एसोसिएशन के अध्‍यक्ष सुरेंद्र शर्मा तथा महासचिव मुख्‍तार अंसारी कर रहे हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ के ब्‍यूरो के कर्मचारियों को छह माह से नहीं मिला वेतन

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ यूनिट के ब्‍यूरो और उनके स्‍टाफों को पिछले छह माह से वेतन नहीं मिला है. यह हालात तभी से पैदा हुए हैं, जब से सौरभ जैन की एनएचआरएम घोटाले में नाम आने के बाद से जनसंदेश टाइम्‍स से विदाई हुई है. उनके बाद आए एमडी अनुज पौद्दार सिर्फ आश्‍वासनों के सहारे अखबार की नाव खींच रहे हैं. उनके व्‍यवहार से भी कर्मचारी लगातार परेशान रहते हैं.

खबर है कि लखनऊ यूनिट से जुड़े जिलों के ब्‍यूरो में पिछले छह महीने से कोई पैसा नहीं गया है. ना तो काम करने वाले पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों को उनका मानदेय मिला है. पैसा ना मिलने से वे किसी तरह नगद-उधार करके अपना काम चला रहे हैं. उन्‍हें पैसा की जगह बस आश्‍वासन दिया गया है. जब कर्मचा‍री वेतन और अन्‍य खर्चों की मांग करते हैं उन्‍हें दस दिन में मिल जाएगा कहकर टाल दिया जाता है. कर्मचारी परेशान है कि छह माह बीतने को आए परन्‍तु वो दस दिन आजतक नहीं आ पाए.

कर्मचारियों का कहना है कि जब से अनुज पोद्दार ने अखबार की जिम्‍मेदारी संभाली है तब से ही मुश्किलें शुरू हुई हैं. वो कोई बात स्‍पष्‍ट नहीं करते हैं. आश्‍वासन देकर बड़े बड़े वादे करते हैं जब निभाने की बारी आती है तो हाथ खड़े कर लेते हैं. कर्मचारियों का कहना है कि पहले सब कुछ तय वक्‍त पर मिलता था, परन्‍तु उनके आने के बाद से स्थितियां बिगड़ गईं. गौरतलब है कि अनुज पोद्दार के व्‍यवहार से तंग आकर प्रधान संपादक ने भी पिछले दिनों इस्‍तीफा दे दिया था. 

पीछे छूटता गांव और चकाचौंध में भटकते युवा

बड़े-बड़े तुर्रम खां गांवों में ही पैदा हुए। बहुत ऊँचे तक उड़े। आखिर दम गाँव में ही आकर लेना पड़ा। आज भी कई महाशय दिल्ली-मुम्‍बई में भले ही अटके हों, उनकी लेखनी में गाँव सांस नहीं ले तो उन्हें कोई सूंघे भी नहीं. समझदारी भी इसी में ही है कि हम महीने में एकाध चक्कर गाँव का दे मारे. सार-संभाल कर या इससे मिला-जुलता नाटक कर आयें। कई मर्तबा दिल बहलाने के लिए बहुत से काम मज़बूरी में करने पड़ते हैं। अफसोस जो हमारे दायित्व का हिस्सा है। वही अभिनय की विषयवस्तु बनती जा रही है। कई माँ-बाप तो बेचारे बेटे-बेटियों के अभिनय से ही अपना जी बहलाकर ज़िंदा है। बूढ़े लोग शहर जा बसी इस जवां पीढ़ी की वापसी हेतु अपनी बाप-दादा की सम्पत्ति के हक का क्या प्रलोभन देंगे ये पीढ़ी तो पहले से ही लाखों के पैकेज में उलझ गयी थी, जब उनके पिताश्री और माता श्री उन्हें पढ़ा-लिखाई के वक़्त पैसे देकर बसों-ट्रेनों में विदा करने जाया करते थे।

अफसोस, सिनेमा और किताबों में गाँव की साख भले घटती-बढ़ती रही हो, लेकिन नगरीय जीवन जीने वाले युवाओं के मन में गाँव हमेशा हिलोरे मारता रहता है। तब वे चाहे शहर में ठूंसे हों या गाँव में ही जमे हुए हों। ये तो समय की करवट ही है जो तमाम हमउम्र के जवान पट्ठे इस हिलोर को अब कुछ कम आंकने लगे हैं। बेचारों की व्यस्तता ही इतना घेरे रखती है उन्हें कि कई साथी तो इन हिलोरों की उठान को एक नज़र तक नहीं देख पाते। अफसोस, जबकि इधर छुट्टियां बिताने ठेठ गाँव आये एक युवा की कहानी में गाँव में उसके रहने के हालत अक्सर दूजे युवा की कहानी से मेल खाती हैं। गंवई संस्कृति में पले-बढ़े और अब शहर में जा चिपके हम साहबजादों को कौन समझाए कि जन्म भूमि क्या होती है जिसे तुम बिसारकर उसे उलांघते हुए बहुत आगे चले गए हो। किसमें हिम्मत है जो बैठकर इन राह भटके दोस्तों को रास्ता दिखा दे।

काश ये जवान आँखें समझ पाती कि क्यूं गाँव से शहर की वापसी पर माँ-पिताजी का मुंह छोटा सा हो जाता है। वे आखिर तक कुछ बातें याद दिलाते रहते हैं। हम गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ने की जुगत में रेस पर हाथ धरे रहते हैं। हुंकारे भरते हुए आखिर हमारी अति आधुनिक औलादें आगे बढ़ ही जाती हैं। और इन तमाम दृश्यों में फिर से एक बार पीछे न सिर्फ गाँव छूटता है बल्कि अपने हाल ज़िंदगी जीते माँ-पिताजी छूट जाते हैं। वे वहाँ अपनी सारी फुर्सत हम नाचीज़जनों पर खर्चते हैं। और इधर हम बेकाम की चीजों में उलझे हुए ख़ास रिश्तों तक की टोह नहीं ले पाते हैं। अजीब ज़िंदगी है। कभी-कभी खुद पर बहुत दया आती है। स्वयं को ही कटघरों में खड़ा पाते हैं। खुद को सजा देने की बात सोचते ही हैं कि अचानक इसी शहर का कोई ज़रूरी काम याद आ पड़ता है। कोई नई सेमीनारें आवाज़ लगाती हैं, प्रेस की संगतें बुलाती हैं या दोस्तों के साथ की शामें, जहां हम बोतलें खोलने के अलावा कभी-कभी कुछ भी सार्थक नहीं कर पाते। हम सोचना छोड़ बस आखिर में चल पड़ते हैं।

हमारे ज़रूरी कामों की फेहरिस्त में समय निकाल कर गाँव फोन लगाना या कि फिर गाँव को अपने विचारों के केंद्र में लाना कभी कभार ही शामिल कर पाते हैं। इस दौड़ में हम भूल जाते हैं कि बूढ़े पिताजी कैसे आटे को पिसाने के लिए चक्की तक लाते-ले जाते होंगे। कैसे नल के चार दिन में आने पर हैंडपंप-बावड़ी-तालाब खंगालते होंगे। हमें लगता है कि उनके पास बहुत सी फुर्सत बची हुयी होती है। इधर कितने व्यस्त हैं हम जिनके पास खर्चने को इतना वक़्त भी नहीं कि हम इत्मीनान से अपनी जन्म भूमि को याद कर सकें। पोतड़े धोने वाली उस माँ से ठीक से बतिया सकें। अगर माँ है तब तक तो उसकी ज़रूरत अनुभव नहीं होती है, अफसोस। ये पक्की बात है कि बाद के सालों में कितने ही छाती माथे कूटते रहो, हाथ कुछ नहीं आने वाला, जब माँ नहीं रहेगी। कम से कम अब तो संतान की कीमत तो समझे जब खुद हमारी संतानें स्कूल जाने लगी हैं। ये आत्मबोध कभी कभार कर लेने से दुःख हल्का हो जाता है। मगर मन भारी हो जाता है। वैसे भी आत्मचिंतन का ये सही समय है।

ये किसी अतीत मोह की चर्चा की जुगाली नहीं वरन अतीत बोध के विमर्श का हिस्सा है। पिताजी की आँखों के आगे करियर में बढ़ते हुए बच्चे जाने कब आँखों से ओझल हो जाते हैं, इसके पीछे के असली कारणों और बाद के परिणाम जैसे विषय आज शोध के ज़रूरी विषय हो चले हैं। इस पूरे खेल में पिताजी को चक्कर देना सीख चुकी हमारी युवा ज़मात खुद मन ही मन जानती है। तमाम हथकंडों के साथ वे शहर में अपने नितांत निजी पल बिताते हुए नितांत अकेले पड़ जाने के खतरे की तरफ बढ़े जा रहे हैं। इस पूरे चक्र में पता नहीं चलता कब अपने से बड़ों को हम अलग-थलग डाल देते हैं। इधर माँ-बाप ये सोचकर ही हैरान रहते हैं कि एक दिन इन जवान बच्चों की अपने प्राथमिकताओं की सूची में बहुत सी ज़रूरी चीजें गायब होती जा रही हैं, मसलन संस्कार, नैतिकता, सचाई, प्यार, निस्वार्थ भाव, सेवा, आदर। ऐसी तमाम परतें त्वचा से चरम रोग के प्रभाव की तरह साथ छोड़ती जा रही हैं। असल में ये संक्रमण का दौर हैं जिसके प्रभाव से हर रिश्ता प्रभावित हो चुका है।

आज की पीढ़ी जो वनस्पति घी पर ज़िंदा है। मिलावटी और बाजारू उत्पादों की पैदाइश हैं। विचारधारा के नाम पर अधरझूल में अटकी ज्ञान गंगा से लबरेज़ हैं। बड़ा विकट समय है। हम यहाँ युवाओं को सिरे से नकार नहीं रहे वरन युवा जमात के भेजे में जमने वाली गलत परिभाषाओं के खिलाफ एक माहौल बनाना चाहते हैं। वैसे ही काम की जुगत में फंसा युवा अपने लिए ही समय नहीं जुटा पाता, फिर भला वो अपने एकल परिवार के लिए फुरसत जुटा डाले, बहुत हैं। ये समाज उसका आभारी रहेगा। अब भला हम उससे  कैसे आशा करें कि वो बहुत पीछे छूट गए अपने गाँव को याद कर पायेगा। यहाँ गाँव एक प्रतीक भी हो सकता है जो उसके बीत उस दौर से जुड़ा हो, जहां उसके जन्मने-तुतलाने-बढ़ने के शुरुआती दिन बीत रहे थे। अपने बीते को इस हद तक आज की पीढी बिसार सकती है कि जिसमें माँ-पिताजी तक भी शामिल हों जाए। सोचने भर से ही बहुत खतरनाक लगता है।

अब तमाम बहाने गढ़े जायेंगे कि नौकरी, काम-धंधा, घर-परिवार, यारी-दोस्ती, सफ़र जैसी सब बातें। अरे दोस्तों उन बुजुर्गों को हम अनुभवहीन क्या बतलाते चले, उन्होंने दुनिया देखी है। वे आपकी आँख़ें देखे बगैर ही माज़रा भांप लेने का कौशल रखते हैं। अपनी नज़र में उन्हें बेचारे मान लेने वाले युवा सही मायने में आज बहुत गरीब हो चले हैं। भले वे बूढ़े आपकी इस नयी धोखेबाजी के करीब करीब शक्ल वाली शब्दावली से अनजाने हो, मगर जुबान की चपलता और चालाकियां वे भले से जानते हैं। सच मानिए वे आपके इन दुराग्रहों पर भी चुप रह सब कुछ सह लेंगे। उनके सहने की शक्ति का अंदाजा इस युवा पीढ़ी को भला कहाँ। मैं भी इसी ज़मात का हिस्सा हूँ, जहां गिनीचुनी कुछ नवाचारी बातों में फंसा अपने अभिभावक को उलझा आता हूँ। कई मर्तबा बहाने कम पड़ जाते हैं, जब माँ बार-बार गाँव नहीं आ पाने का कारण पूछती है। हम बहुत बुरे फंसे हुए मर्द हैं। न आगे बढ़ने के न पीछे जाने के। ये बीमारी केवल खासकर मध्यमवर्गीय युवाओं के साथ ज्यादा फिट बैठती है। बाकी सेठ-साहूकारों की मुझे नहीं मालूम।

लेखक माणिक राजस्‍थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्‍यापक हैं. 'अपनी माटी' वेब पत्रिका के पूर्व संपादक हैं. साथ ही आकाशवाणी चित्‍तौड़ के एमएम चैनल मीरा के लिए पिछले पांच सालों से उद्घोषक के रूप में सेवा रहे हैं. सालों से स्पिक मैके नामक सांस्‍कृतिक आंदोलन से भी जुड़े़ हुए हैं. उनकी कविताएं उनके ब्‍लॉग माणिकनामा पर पढ़ी जा सकती हैं.

मुजफ्फरनगर में तीन टीवी पत्रकारों की कमरे में बंद करके पिटाई

मुजफ्फरनगर में प्रत्याशियों से उगाही करने गए तीन टीवी चैनलों के कैमरामैन को कमरे में बंद करके बुरी तरह से पीटे गए। हालांकि तीनों टीवी24 के कैमरामैन हैं, लेकिन ठुकाई के दौरान एक कैमरामैन अपने आपको ईटीवी का पत्रकार बता रहा था, जिसके पास से एक वैधता खत्म हो चुका ईटीवी का एक पहचान पत्र और कैमरा भी लोगों ने छीन लिया। हांलाकि बाद में 40 हजार रुपये देकर मामला निपटाया गया।

दरअसल मुजफ्फरनगर के शाहपुर नगर पंचायत से सचिन जैन अध्यक्ष पद की दावेदारी के साथ चुनाव मैदान में उतरा है। मंगलवार की शाम मजफ्फरनगर मुख्यालय से टीवी24 के तीन कैमरामैन विजय कुमार, संजू कुमार व अमित कल्याणी शाहपुर जा पहुंचे। तीनों ने प्रत्याशी सचिन जैन की ओर से मतदाताओं को लुभाने के लिए बांटी जा रही शराब और नोटों की गड्डियों को शूट कर लिया। शूट करने के बाद तीनों कैमरामेन अपने समर्थकों से घिरे बैठे प्रत्याशी के पास पहुंचे और ब्लैकमेल करते हुए मोटी रकम की मांग करने लगे। जिस पर प्रत्याशी के समर्थक भड़क गए और तीनों कैमरामैनों को मौके पर ही दबोच लिया। तीनों की कनपटी पर पिस्टल लगाकर मोबाइल, कैमरा और अन्य सामान छीन लिए।

पूछताछ के दौरान जहां विजय और अमित कल्याणी ने अपने को टीवी24 के पत्रकार बताए, वहीं संजू ने अपने आप को ईटीवी का पत्रकार बताया। इसने ईटीवी का कार्ड भी लोगों को दिखाया। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार तीनों को एक कमरे में बंद करके घंटों पीटा गया। इसी बीच मामले के बारे में शाहपुर थाना प्रभारी जेएस सिरोही को जानकारी हुई। सूचना मिलते ही एसओ मय फोर्स के मौके पर पहुंचे और तीनों को बंधन मुक्त कराया। मामले को दबाने और कैमरे की एवज में प्रत्याशी की ओर से इन कैमरामैनों को 40 हजार रुपये दिए गए हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

उत्‍तराखंड में कांग्रेस के लिए आसान, भाजपा के लिए प्रतिष्‍ठा बनी सितारगंज सीट

नैनीताल। सितारगंज की विधानसभा सीट के उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा फिलहाल बेहतर स्थिति में नजर आ रहे है। वोट डालने के रोज तक मौजूदा हालात कायम रहे तो मुख्यमंत्री बहुगुणा की जीत तकरीबन पक्की मानी जा रही है। उत्‍तराखण्ड क्रान्ति दल, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के चुनाव नहीं लड़ने से बहुगुणा का पलडा़ भारी हो गया है। भाजपा बहुगुणा की जीत को रोकने के लिए पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ रही है। पर चुनावी गणित मुख्यमंत्री के हक में दिख रहा है।

इस साल 30 जनवरी को हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर सितारगंज से किरन मंडल चुनाव जीते थे। मंडल ने तेइस मई को विधायकी और भाजपा को अलविदा कह मुख्यमंत्री बहुगुणा के हक में यह सीट खाली कर दी। मंडल के इस्तीफे के चलते सितारगंज विधानसभा सीट में उपचुनाव हो रहा है। इस बार कांग्रेस से विजय बहुगुणा, भाजपा से प्रकाश पंत, उत्‍तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के दीवान सिंह और तीन निर्दलियों समेत छह उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। यहॉ आठ जुलाई को वोट डाले जाएंगे।

सितारगंज में करीब बयानबे हजार के आसपास वोट है। इस साल जनवरी में हुए विधानसभा चुनाव में यहॉ 73768 यानी 80.64 फीसदी वोट पडे़ थे। जिसमें से भाजपा के किरन मंडल को 29280, बसपा के नारायण पाल को 16668, कांग्रेस के सुरेश कुमार को 15560 और कांग्रेस के बागी अनवार अहमद को 7085 वोट मिले थे। कुल पडे़ वोटों 73768 में से 68593 यानी करीब 93 फीसदी वोट इन चारों उम्मीदवारों को मिले थे। मौजूदा चुनाव में ये सभी उम्मीदवार मुख्यमंत्री बहुगुणा के साथ है। उनके लिए वोट मॉग रहे है।

सितारगंज बंगाली बहुल इलाका है। यहॉ सबसे ज्यादा वोट बंगाली समुदाय के है। दूसरी बडी़ तादाद मुस्लिम वोटरों की है। कांग्रेस ने विकास को चुनावी मुद्दा बनाया है। कांग्रेस की प्रदेश सरकार नजराने के तौर पर पट्टाधारियों को जमीन का मालिकाना हक देने का 30 मई को शासनादेश जारी कर चुकी है। सरकार के इस फैसले से बंगाली समुदाय को सबसे ज्यादा फायदा होना है। जाहिर है चुनाव में कांग्रेस को भी इसका लाभ मिलेगा।

भाजपा ने पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत को चुनाव मैदान में उतारा है। पंत उत्‍तराखण्ड की अंतरिम सरकार में विधानसभा अध्यक्ष रह चुके है। वे पिछली भाजपा सरकार में नम्बर दो के कैबिनेट मंत्री थे। भाजपा की उत्‍तराखण्ड की सियासत में प्रकाश पंत का नाम प्रदेश के बडे़ नेताओं में शुमार है। वे प्रभावशाली कैबिनेट मंत्री रहते पिथौरागढ़ से कांग्रेस के मयूख महर से पिछला विधानसभा चुनाव हार गये थे। पंत आखिरी दिन बीस जून को अपना नामांकन करा पाये। उनके नामांकन के रोज पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूडी और रमेश पोखरियाल “निशंक“ का नहीं आना भी चर्चा का विषय रहा।

भाजपा ने इस चुनाव में किरन मंडल के विधायकी छोड़ कांग्रेस में जाने के मसले को मुख्य मुद्दा बनाया है। भाजपा के राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर के कुछ नेता सितारगंज से उनकी पार्टी के विधायक को खरीदकर सीट खाली कराने के आरोपों की शिकायत को लेकर दो बार चुनाव आयोग से मिल चुके है। इस मामले में भाजपा के प्रदेश के सभी बडे़ नेता प्रदेश के गवर्नर से भेंट कर किरन मंडल के विधायकी छोड़ कांग्रेस में शामिल होने के मामले की सीबीआई जॉच और नार्को टेस्ट कराने की मॉग कर चुके है। भाजपा का आरोप है कि किरन मंडल ने विधायकी छोड़ने की एवज में दस करोड़ रुपये लिए है।

इसके जवाब में कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि देवभूमि उत्‍तराखण्ड के भीतर विरोधी पार्टी के विधायक को तोड़ने की परम्परा का सूत्रपात भाजपा ने ही किया है। 2007 में जब भुवन चन्द्र खडूडी़ उत्‍तराखण्ड के मुख्यमंत्री बने तब वे पौडी़ लोकसभा सीट से सांसद थे। उन्होंने धूमाकोट से तब के कांग्रेस के विधायक टीपीएस रावत से इस्तीफा दिला उनकी सीट से उपचुनाव लडा़ और जीते।

प्रयाग पाण्‍डे
इसकी एवज में भाजपा ने टीपीएस रावत को पौडी़ लोकसभा सीट से उपचुनाव लडा़या था। अब किरन मंडल से इस्तीफा दिला विजय बहुगुणा ने पुराना हिसाब चुकता कर लिया है। लिहाजा इस मुद्दे पर भाजपा को हो-हल्ला करने का नैतिक अधिकार नहीं है। कुल मिलाकर सितारगंज में वोटरों का रूझान और चुनावी समीकरण कांग्रेस और मुख्यमंत्री बहुगुणा के हक में है। यहॉ समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार नहीं होने और उक्रांद और बसपा के कांग्रेस के पक्ष में खडे़ होने से बहुगुणा की चुनावी राह बेहद आसान नजर आ रही है।

लेखक प्रयाग पाण्‍डे उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

चेतना मंच नहीं दे रहा है अपने दो पुराने कर्मचारियों का बकाया वेतन

नोएडा से प्रकाशित मिड डे अखबार चेतना मंच ने अपने कई कर्मचारियों के पैसे मार चुका है. ताजा सूचना है कि यहां काम करने वाले दो रिपोर्टरों के पैसा भी चेतना मंच प्रबंधन नहीं दे रहा है. बताया जा रहा है कि सीनियर रिपोर्टर अरुण सिन्‍हा और रिपोर्टर अनुराग सिंह ने पिछले दिनों चेतना मंच से इस्‍तीफा देकर दूसरे अखबारों में नौकरी शुरू की है. इन लोगों ने नौकरी छोड़ने की सूचना प्रबंधन को देते हुए अपने वेतन की मांग की, परन्‍तु प्रबंधन ने बाद में वेतन देने की बात कहकर मामले को टाल दिया.

अरुण सिन्‍हा ने सच कहूं में ज्‍वाइन किया तो अनुराग सिंह दैनिक भास्‍कर के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. चेतना मंच प्रबंधन इन लोगों का बकाया पैसा देने में आनाकानी कर रहा है. इसके चलते दोनों पत्रकार परेशान हैं. चेतना मंच प्रबंधन इसके पहले भी कई लोगों की सैलरी मार चुका है, जिसमें वरिष्‍ठ पत्रकार आरके चांद का नाम भी शामिल है. प्रबंधन ने आरके चांद की सैलरी भी अब तक नहीं दी जबकि उनको नौकरी छोड़े लगभग तीन साल होने को आ गए हैं. गौरतलब है कि चेतना मंच दूसरे संस्‍थान से जुड़ने वाले पत्रकारों के साथ यही रवैया अपनाता रहा है.

राष्‍ट्रपति का विरोध करने वाले चैनल की संपत्ति जब्‍त करने का आदेश

वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज का विरोध करने वाली एक टेलीवीजन चैनल की 57 लाख डॉलर की संपत्ति को जब्त करने का आदेश दिया है. टेलीवीजन कंपनी ग्लोबोविजन पर कैदियों के दंगे को प्रसारित करने का आरोप लगाया गया था. साल भर पहले वेनेजुएला के बाहर काराकस में हुए दंगे का प्रसारण करने के आरोप में टेलीविजन कंपनी ग्लोबोविजन पर सरकार ने दो लाख डॉलर का जुर्माना लगा दिया गया था.

शावेज विरोधी टीवी चैनल ग्लोबोविजन सरकार के इस फैसले का विरोध कर रही है. टीवी चैनल ने आरोप लगाया है कि अक्तूबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव प्रचार शुरु होने से ठीक तीन दिन पहले सरकार उसे डरा-धमका रही है. (बीबीसी)

एनबीटी, मुंबई ने धूमधाम से मनाई अपनी 62वीं साल गिरह

यूं तो मुंबई की हर शाम दिलकश होती है, पर 26 जून को कफ परेड के पास सागर किनारे ढली शाम कुछ ज्यादा ही ग्रेसफुल हो चली थी। कफ परेड के ताज प्रेजिडेंट होटेल में एनबीटी की 62 वीं सालगिरह को सेलिब्रेट करने के लिए नेता, कॉर्पोरेट हस्तियां, अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और गृहमंत्री आरआर पाटील ने इस मौके को मुंबई के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया।

इस अवसर पर एनबीटी के संपादक सुंदर चंद ठाकुर ने कहा कि आज 'एनबीटी' एक मजबूत ब्रांड के तौर पर उभरा है तो सिर्फ इसीलिए कि इस अखबार ने वक्त के साथ खुद को बदला है। उन्होंने कहा, 'हमारी प्रतिद्वंद्विता किसी और अखबार से नहीं, अपने आप से रही है।' मुंबई उपनगर के पालकमंत्री नसीम खान ने एनबीटी को इस अवसर पर बधाई दी और कहा कि आने वाले समय में भी एनबीटी मुंबई के विकास के लिए यूं ही काम करता रहेगा। मशहूर शायद निदा फाजली ने अपनी चंद पंक्तियों में एनबीटी को मुबारकबाद दी। (एनबीटी)

पत्रकार नताशा से पहले लारा के साथ भी हो चुका है मिस्र में यौन दुर्व्‍यवहार (देखें वीडियो)

मिस्र की राजधानी काहिरा में बीते रविवार को 21 वर्षीय युवा ब्रि‍टिश महिला के साथ हुए यौन दुर्व्‍यवहार एवं छेड़छाड़ के मामले ने तूल पकड़ लिया है. जब पूरा मिश्र मुर्सी के राष्‍ट्रपति बनने का जश्‍न मना रहा था तो उसी दौरान कुछ बहशियों ने पत्रकार नताशा स्मिथ के कपड़े फाड़ दिए तथा उनके साथ बहुत ही गंदे तरीके से छेड़छाड़ की. उनका यौन शोषण किया. यह पहला मामला नहीं है जब मिस्र में महिला पत्रकारों के साथ अभद्रता की गई हो.

इसके पहले भी सीबीएस न्‍यूज की लारा लोगन के साथ ही ऐसा हादसा हो चुका है. लारा के साथ घटित हादसे की वीडियो आप यहां देख सकते हैं…

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=L-gmsp8fwk8


(सुनें)

ट्रक के धक्‍के से बाइक सवार पत्रकार शिवनाम की मौत

रमाबाई नगर : अकबरपुर कोतवाली क्षेत्र के कस्बा रनियां में तेज रफ्तार ट्रक ने बाइक सवार पत्रकार की मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए. सूचना पर पहुंची पुलिस ने उन्हें उपचार के लिए जिला अस्पताल भेजा, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. मृतक के पुत्र की तहरीर पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है. साथ ही टक्‍कर मारने वाले ट्रक को कब्‍जे में लेने के साथ ही चालक को भी गिरफ्तार कर लिया है.

जानकारी के अनुसार 14/19 ए-3 सिविल लाइंस थाना ग्वालटोली कानपुर नगर निवासी पत्रकार शिवनाम सिंह चौहान बुधवार देर रात बाइक से अकबरपुर से कानपुर जा रहे थे. उनका पुत्र अभिजीत सिंह तथा शिवराजपुर थाना क्षेत्र के ग्राम सिकंदरपुर निवासी उनके रिश्‍ते के भाई इंद्रनारायण सिंह दूसरी बाइक से उनके पीछे चल रहे थे. शिवनाम सिंह जैसे ही रनियां कस्बे में पुलिस चौकी के पास पहुंचे तो मौरंग लादकर कानपुर की ओर जा रही तेज रफ्तार ट्रक यूपी 77 एन 7427 ने उनकी बाइक में पीछे से जोरदार टक्कर मार दी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए. उनकी बाइक भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई.

पत्रकार के पुत्र तथा उनके भाई ने तत्‍काल इसकी सूचना पुलिस को दी. सूचना पर रनियां चौकी प्रभारी राकेश पांडेय पुलिस बल के साथ घटना स्‍थल पर पहुंच गए. तत्‍काल एम्‍बुलेंस का जुगाड़ कर इलाज के लिए शिवनाम सिंह को जिला चिकित्‍सालय भिजवाया. परन्‍तु इलाज के दौरान ही शिवनाम सिंह की मौत हो गई. चौकी प्रभारी ने बताया कि मृतक के पुत्र अभिजीत की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर दुर्घटना करने वाले ट्रक चालक शिव कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया है. वह गुजराई थाना के गजनेर का रहने वाला है. पुलिस ने ट्रक को भी कब्जे में लिया है.

हिंदुत्ववादी पीएम के मुद्दे पर मोहन भागवत को शम्सुल इस्लाम का खुला पत्र

: An open letter to RSS Sarsanghchalak, Shri Mohan Bhagwat on why a Hindutvadi should not be the Prime Minister of India :  To, Rashtriya Swayamsevak Sangh Sarsanghchalak, Shri Mohan Bhagwat ji, Namaskar, I was not surprised to read your comments in newspapers that it was not necessary to be a secular person to occupy the office of Prime Minister in a Democratic-Secular India. As per the press reports you wondered why a Hinduwadi could not become PM of India.[i] I am sure you understand better than me that being a Hinduwadi is not the same as professing Hindu religion.

Our national leaders like Mahatma Gandhi, Sardar Patel, Jawaharlal Nehru, Subhashchander Bose, Rammanohar Lohia, Rajguru, Sukhdev and many-many more were Hindu by faith but not Hinduwadi. In fact, Mahatma Gandhi, a great practitioner of Hind religion, was brutally assassinated for not being a Hinduwadi by a gang having allegiance to Hindu Mahasabha and RSS. Surely, by Hinduwadi you mean a believer in Hindutva, a kind of political Hinduism, outlined by Vinayak Damodar Savarkar ji in his book Hindutva[ii] and later developed by RSS ideologues like M. S. Golwalkar. You will agree with me that RSS, under your command currently, has been a prominent flag-bearer of Hindutva since its inception in 1925.

I feel before arriving at the conclusion that there is no harm in allowing person/s who believes in Hindutva to become PM of India we will have to understand what Hindutva is. You will agree with me that we need to understand whether Hindutva is compatible with principles of Democracy, Justice, Egalitarianism &Secularism. In this connection, please, allow me to scrutinize some of the original documents and sources which legitimately belong to the RSS or its brother organizations like Hindu Mahasabha. If you find that I am dishonest in referring to these or misrepresenting facts, you will be at liberty to initiate defamation process against me.

DOES HINDUTVA STAND FOR A TWO-NATION THEORY?

Bhagwat ji! I would like to refresh your memory that both the originator of Hindutva, V. D. Savarkar ji and its flag-bearer, RSS earlier and under your command too had and have unequivocal faith in in Two-nation theory; that Hindus and Muslims are two different nations. While Muslim League under the leadership of Mohammed Ali Jinnah resolved to have a separate homeland for Muslims of India in the form of Pakistan in 1940, Savarkar propagated as early as 1937 that Hindus and Muslims were two different nations. While delivering presidential address to the 19th Hindu Mahasabha session at Ahmedabad Savarkar ji unequivocally declared,

“As it is, there are two antagonistic nations living side by side in India, several infantile politicians commit the serious mistake in supposing that India is already welded into a harmonious nation, or that it could be welded thus for the mere wish to do so. These were well meaning but unthinking friends take their dreams for realities. That is why they are impatient of communal tangles and attribute them to communal organizations. But the solid fact is that the so-called communal questions are but a legacy handed down to us by centuries of cultural, religious and national antagonism between the Hindus and Moslems…Let us bravely face unpleasant facts as they are. India cannot be assumed today to be a unitarian and homogenous nation, but on the contrary there are two nations in the main: the Hindus and the Moslems, in India.”[iii]

Sir! Has it not been the cardinal principle of your organization also? The RSS following into the foot-steps of Savarkar ji, always rejected the idea that Hindus, Muslims, Sikhs and Christians together constituted a nation. Your English organ,Organizer, on the very eve of Independence, (August 14, 1947) editorially (titledWhither) underlined its belief in Two-Nation theory once again in the following words:

“Let us no longer allow ourselves to be influenced by false notions of nationhood. Much of the mental confusion and the present and future troubles can be removed by the ready recognition of the simple fact that in Hindusthan only the Hindus form the nation and the national structure must be built on that safe and sound foundation…the nation itself must be built up of Hindus, on Hindu traditions, culture, ideas and aspirations.”

Bhagwat ji! Please, help our country to understand how the believers in Hindutva are different from pre-partition Muslim Leaguers who once played prominent role in dismembering India.

DOES HINUTVA RESPECT NATIONAL FLAG AND DEMOCRACY?

Sir, it may not be out of context to know your attitude towards National Flag which represents a Democratic-Secular India. It is important to know it from the head of organizations which swears by Hindutva. I would like to draw your attention to the following statement which appeared in the English organOrganizer, again on the eve of Independence:

“The people who have come to power by the kick of fate may give in our hands the Tricolour but it never [sic] be respected and owned by Hindus. The word three is in itself an evil, and a flag having three colours will certainly produce a very bad psychological effect and is injurious to a country.” [iv]

Can those who denigrate the National Flag in such foul language be allowed to rule this country?

Sarsanghchalak ji! Lay persons like me need to know from practitioners of Hindutva like you what you think of Democracy. I would like to draw your attention to a statement made by second Sarsanghchalak of the RSS and its most prominent ideologue till date, M. S. Golwalkar. As per the RSS archives Golwalkar ji while addressing a group of 1350 top level cadres of the RSS in 1940 declared:

“RSS inspired by one flag, one leader and one ideology is lighting the flame of Hindutva in each and every corner of this great land.”[v]

Learned Bhagwat ji! This slogan of one flag, one leader and one ideology was also the battle cry of Fascist and Nazi parties of Europe in the first half of 20thcentury. What they did to democracy is well-known to this world. Can those who believe in such totalitarian designs be allowed to rule our country?

DOES HINDUTVA STAND FOR CASTEISM?

Sarsanghchalak ji! You will agree with me that RSS and its brother organizations who want to have a Hindutva rule in India hated the Constitution of India which was drafted under the guidance of Dr. B. R. Ambedkar. When the Constituent Assembly of India had finalized the Constitution of India RSS was not happy. Its organ, Organizer in an editorial on November 30, 1949, complained:

“But in our constitution there is no mention of the unique constitutional development in ancient Bharat. Manu’s Laws were written long before Lycurgus of Sparta or Solon of Persia. To this day his laws as enunciated in theManusmriti excite the admiration of the world and elicit spontaneous obedience and conformity. But to our constitutional pundits that means nothing.”

Bhagwat ji! It may not be a secret to you that Savarkar ji remained a great protagonist of Casteism and worshipper of Manusmriti throughout his life. The institutions of Casteism and Untouchability were the outcome of Manu’s thought about which Savarkar said the following:

“Manusmriti is that scripture which is most worshipable after Vedas for our Hindu Nation and which from ancient times has become the basis of our culture-customs, thought and practice. This book for centuries has codified the spiritual and divine march of our nation. Even today the rules which are followed by crores of Hindus in their lives and practice are based on Manusmriti. TodayManusmriti is Hindu Law.”[vi]

Sir! What kind of civilization the RSS under your command and under Hindutva ideology wants to build by enforcing the laws of Manu, can be known by having a glimpse of the laws prescribed by Manu for the Dalits/Untouchables and women. Some of these dehumanizing and degenerate laws, which are presented here, are self-explanatory.

LAWS OF MANU CONCERNING DALITS/UNTOUCHABLES.

(1) For the sake of the prosperity of the worlds (the divine one) caused the Brahmana, the Kshatriya, the Vaisya, and the Sudra to proceed from his mouth, his arm, his thighs and his feet.
(2) One occupation only the lord prescribed to the Sudras, to serve meekly even these (other) three castes.
(3) Once-born man (a Sudra), who insults a twice-born man with gross invective, shall have his tongue cut out; for he is of low origin.
(4) If he mentions the names and castes (gati) of the (twice-born) with contumely, an iron nail, ten fingers long, shall be thrust red-hot into his mouth.
(5) If he arrogantly teaches Brahmanas their duty, the king shall cause hot oil to be poured into his mouth and into his ears.
(6) With whatever limb a man of a low caste does hurt to (a man of the three) highest (castes), even that limb shall be cut off; that is the teaching of Manu.
(7) He who raises his hand or a stick, shall have his hand cut off; he who in anger kicks with his foot, shall have his foot cut off.
(8) A low-caste man who tries to place himself on the same seat with a man of a high caste, shall be branded on his hip and be banished, or (the king) shall cause his buttock to be gashed.
(9) Let him never slay a Brahmana, though he have committed all (possible) crimes; let him banish such an (offender), leaving all his property (to him) and (his body) unhurt.

LAWS OF MANU CONCRNING WOMEN

1. Day and night woman must be kept in dependence by the males (of) their (families), and, if they attach themselves to sensual enjoyments, they must be kept under one’s control.
2. Her father protects (her) in childhood, her husband protects (her) in youth, and her sons protect (her) in old age; a woman is never fit for independence.
3. Women must particularly be guarded against evil inclinations, however trifling (they may appear); for, if they are not guarded, they will bring sorrow on two families.
4. Considering that the highest duty of all castes, even weak husbands (must) strive to guard their wives.
5. No man can completely guard women by force; but they can be guarded by the employment of the (following) expedients:
6. Let the (husband) employ his (wife) in the collection and expenditure of his wealth, in keeping (everything) clean, in (the fulfillment of) religious duties, in the preparation of his food, and in looking after the household utensils.
7. Women, confined in the house under trustworthy and obedient servants, are not (well) guarded; but those who of their own accord keep guard over themselves, are well guarded.
8. Women do not care for beauty, nor is their attention fixed on age; (thinking), ‘(It is enough that) he is a man,’ they give themselves to the handsome and to the ugly.
9. Through their passion for men, through their mutable temper, through their natural heartlessness, they become disloyal towards their husbands, however carefully they may be guarded in this (world).
10. (When creating them) Manu allotted to women (a love of their) bed, (of their) seat and (of) ornament, impure desires, wrath, dishonesty, malice, and bad conduct.
11. For women no (sacramental) rite (is performed) with sacred texts, thus the law is settled; women (whoare) destitute of strength and destitute of (the knowledge of) Vedic texts, (are as impure as) falsehood (itself), that is a fixed rule.
I would like to remind you that a copy of Manusmriti was burnt as a protest in the presence of Dr. BR Ambedkar during historic Mahad agitation in December, 1927.

Sir! You will agree with me that Golwalkar ji was the most prominent theorist of the RSS and he like Savarkar ji, believed that Casteism was a natural integral part of Hinduism. In fact, Golwalkar went to the extent of declaring that Casteism was synonymous with the Hindu nation. According to him, the Hindu people are none else but The Virat Purusha, the Almighty manifesting himself […] [according to purusha sukta] sun and moon are his eyes, the stars and the skies are created from hisnabhi [navel] and Brahmin is the head, Kshatriya the hands, Vaishya the thighs and Shudra the feet. This means that the people who have this fourfold arrangement, i.e., the Hindu People, is [sic] our God. This supreme vision of Godhead is the very core of our concept of ‘nation’ and has permeated our thinking and given rise to various unique concepts of our cultural heritage.[vii]

Sarsanghchalak ji! The truth is that Hindutva is nothing but an ideology which stands for totalitarianism, Casteism and injustice. I would conclude with the words of Dr. B. R. Ambedkar who said:

“If Hindu Raj does become a fact, it will, no doubt, be the greatest calamity for this country…It is a menace to liberty, equality and fraternity. On that account it is incompatible with democracy. Hindu Raj must be prevented at any cost.”[viii]
Bhagwat ji! Reality is that Hindutva is not dangerous for minorities only but also for vast majority of Hindus, specially, Dalits and women.

I would be eagerly looking forward to receive your kind response to issues raised in this letter.

Thanking you.

Yours,

Shamsul Islam

Delhi, 25-06-2012

भयभीत अमेरिकियों के जटिल कानून से अबकी ओम थानवी की हुई दुर्दशा

अमेरिका वाले बेहद डरे हुए रहते हैं. इसी कारण उन्होंने ऐसे ऐसे जटिल नियम कानून बना रखे हैं कि दूसरे देशों के लोगों का वहां पहुंचने पर कई बार कचूमर निकल जाता है. कलाम, शाहरुख आदि की बेइज्जती की खबरें हम लोग पढ़ते रहते हैं. जनसत्ता के संपादक व वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के साथ जो ताजा मामला पेश आया है, उससे वे खुद भी स्तब्ध हैं और अमेरिका की इस बेचारगी पर चर्चा के मूड में हैं. तभी उन्होंने अपनी पूरी बात फेसबुक पर डाल दी है, टिकट की तस्वीर के समेत. वहीं से उनकी बात उन्हीं के शब्दों में यहां पेश कर रहे हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


Om Thanvi : सऊ पाउलो से न्यूयोर्क के लिए रवाना होने पर दिलचस्प हादसा हुआ. सुरक्षा जांच आदि के बाद अमेरिकन एयरलाइंस के विमान में चढ़ते वक़्त मेरा बोर्डिंग पास देखकर वहां तैनात महिला चौंकी. मुझे देखा, फिर दुबारा बोर्डिंग पास. बोली, आपकी विशेष सुरक्षा जांच होगी. बोर्डिंग पास पर लिखा था: SSSS. यानी गहन सिक्योरिटी का पात्र. इस इबारत पर मैंने तब तक ध्यान ही नहीं दिया था. बहरहाल, मुझसे ज़्यादा वह इस कार्रवाई पर हैरान दीखती थी. विमान सेवा भले अमेरिकी हो, महिला ब्राज़ील की थी और ब्राज़ीली बेहद भले होते हैं. पर ड्यूटी ड्यूटी थी. सरेआम लाइन से अलग कर मुझे पास के एक छोटे से कक्ष में ले गए. ओढ़ी हुई विनम्रता और प्रशिक्षित शिष्टाचार वाले संवादों (हाउ वाज़ द डे, सर! …) के साथ एक कुरसी पर बिठा कर जूते खुलवाए. उनकी जांच की. फिर सावधान की मुद्रा में एक मशीन के आगे खड़ा कर शरीर के आर-पार देखा. फिर पतलून की दोनों जेबों के अस्तर बाहर उलटवाए; उन पर झीने कागज़ के टुकड़ों को मसला और उन्हें पास में रखी एक मशीन में डालकर जांचा. ऐसे ही मेरी कमरपेटी के बक़ल को कागज़ के टुकड़े से रगड़ कर परखा. आदि. बीच में वही दीक्षित सौजन्य: सर, आपको असुविधा हो रही होगी पर यह प्रक्रिया बस पूरी होने ही वाली है! और प्रक्रिया पूरी हो गयी. शौक़ से अपनी सीट पर तशरीफ़ ले जाइए! बोले, आपको हुई दिक्कत के लिए हम क्षमा चाहते हैं. दिखावे के लिए सही, उन्होंने क्षमा मांगी जो मैंने दे दी. चारा भी क्या था? बीच रास्ते आप क्या कह/कर सकते हैं? उनकी दशा पर तरस ही खा सकते हैं. पहले पता हो कि हमसे परेशानी है तो अमेरिका क्यों, यूरोप या अफ्रीका होकर ही ब्राज़ील पहुंचा जा सकता है! खैर, यह ज़रूर सोचा कि मैं इन्हें डरावना कहाँ से लगा? अमेरिका कई बार आना-जाना हुआ है, पर यह सौभाग्य पहली बार ही मिला! औरों की बात जाने दीजिए, घड़ी भर के लिए सही, उन्होंने मुझ नाचीज़ को भी महान डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की श्रेणी में ला रखा!! जो हो, यक़ीन मानिए, अमेरिकी सभ्यता अपने में बड़ी भयभीत सभ्यता है.

        Rajshekhar Vyas main na kahta tha??????????
 
        Nilay Upadhyay अमेरिकी सभ्यता भयभीत सभ्यता है.
 
        Anand Kumar Shukla waah…badnaam honge to kya naam na hoga…lekin aapse kisi ko kya khatra ho sakta hai! pata nahi kis namuraad ne ye SSSS likh dala tha..
   
        Vijaya Sati ‎!!
    
        गंगा सहाय मीणा अंतिम पंक्ति सबसे दिलचस्‍प है- जो हो, यक़ीन मानिए, अमेरिकी सभ्यता अपने में बड़ी भयभीत सभ्यता है.
     
        Rajshekhar Vyas halanki omji hamare pas to "white pasport ''hota hain par jfk newyork ya new ork""ganv hi kyon na ho ye aam bat hain….ha…anun ne talashi nahi lene di to nahi hi leni di
      
        Om Thanvi न लिखा जाता तो उनकी (शाश्वत) बेचारगी और अपनी (तात्कालिक) लाचारी का यह अनुभव कहाँ हासिल होता!
       
        Shastri Kosalendradas Sir ye kya?
        
        Anirudh Umat Bhayabheet bhi….shabhyata bhi…!
         
        Rajshekhar Vyas ek dara hua rashtra hi sabko darata hain maine apni pustak "toot raha hain amerika"main is dare /bhaybhi rastra par vistar se likha hain
         
        Om Thanvi Safar ke maze!
         
        गंगा सहाय मीणा क्‍या बाद में आपको इस SSSS लिखने का मतलब और कारण पता चला… ?
         
        Sharad Kokas seedhe saade sabhya shahari इतना परेशान किया गया ….
         
        Shishir Woike वे अपने ही लोगों से कम भयभीत नहीं हैं सर…अफ्रीकन अमेरिकन, नेटिव अमेरिकन्स, मेक्सिकन्स को चलते फिरते गोली मार देते हैं… एक दौर था जब लोगों को कम्युनिस्ट बताकर जेल में डाला करते थे…एक ये दौर है जब हर नॉन-व्हाईट उन्हें टेररिस्ट लगता है..
         
        Om Thanvi इसीलिए कहा भयभीत लोग हैं!
 
        Om Thanvi कारण पर अब ज़्यादा क्या सोचना! जब (उनके लिए) मैं शरीफ़ ही निकला!
 
        Mutha Rakesh kya ye marka SSSS sabhi bharityo ke liye hai ya aur kaun kaun desh ke liye hai ye
   
        गंगा सहाय मीणा लेकिन बेवजह यात्रियों को परेशान करना गैर-कानूनी है. अगर इसका कारण नस्‍लीय है तो और भी ज्‍यादा गलत है.
    
        Virendra Jain आपने यह जानने की कोशिश नहींकी कि ऐसा कोड क्यों लगाया गया, आखिर गलतफहमी कहाँ हुयी
     
        Om Thanvi फ़्लाइट पकड़ें या अमेरकी कंपनी के भले मगर हुक्म के पाबन्द ब्राज़ीली मुलाज़िमों से उलझें या पीछे दो फ़रलांग दूर लौटकर उस अमेरिकी से पूछें कि बता चार एस कैसे जड़े! इतनी ऊर्जा इस पर खपाने से अच्छा है तरस खाइए और आगे का सफ़र जारी रखिए. यह भी एक अनुभव हुआ. सबको कहाँ नसीब होता है!
      
        Avadhesh Yadav : Americi sabhya hai ya nahi , apne anubhav se nahi jaanta , lekin aapka kathan sahi hai ki wo dare hue hai . . .
       
        Munna Kumar Jha : gambhir mamla hai sarkaar aagey aakar aise mudde par vichaar kare.
         
        Vikas Kumar मुझे इस पूरे मामले में यह बड़ी बात लगी कि उन्होंने आपसे बार-बार क्षमा मागीं. जैसा आपने कहा दिखावे के लिए. हां…मान ही लेते हैं कि दिखावे के लिए. अपने यहां तो दिखावे के लिए भी सुरक्षा वाले सौरी नहीं कहेंगे. और जांच के दौरान ही आपसे ऐसा व्यवहार करेंगे कि आपको कई बार लगेगा वाकई मैं अपराधी ही तो नहीं हूं.
         
        Durgaprasad Agrawal बधाई ओम जी, और वैसे यह तो आपकी सहज विनम्रता है वरना हमारे लिए तो वैसे भी आप किसी भी महान से कम नहीं हैं.
         
        Om Thanvi यह आपकी ज़र्रानवाज़ी!
         
        Om Thanvi पर आगे भी सुनिए. न्यू योर्क पहुँच कर कोई मोमा (म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट) और मेट (मेट्रोपोलिटन म्यूज़ियम) में वरमीर, रेनुआ, मातीस, माने, मोने, वैन गौग, पॉल गोगां, पिकासो, पॉल क्ली, गुस्ताव क्लिम्ट, फ्रीदा कालो, जेकसन पौलेक की अमर कृतियाँ देखने लगे तो अमेरिका की बोर्डर सिक्योरिटी, इमिग्रेशन या कस्टम आदि का झमेला टुच्ची चीज़ लगता है. जिसे इनकी मज़बूरी, नासमझी, बेवकूफ़ी या बदमज़गी कुछ भी समझिये, उस पर दोस्तों के बीच बैठकर हँसना चाहिए और भुला देना चाहिए — जैसा कि मैंने क्या है!
 
        गंगा सहाय मीणा : मेरी नजर में ये बातें हंसने की नहीं है. अगर किसी अमेरिकी नागरिक के साथ कहीं ऐसा होता है तब भी क्‍या यह मामला इतना 'सहज' लगेगा? दरअसल यह अपनी संप्रभु‍ता अमेरिका के यहां गिरवी रख चुकी हमारी सरकारों की 'मेहरबानी' का नतीजा है. सवाल डिग्‍निटी का है और संसार के हर व्‍यक्ति की डिग्‍निटी का बराबर महत्‍व है- चाहे वह बराक ओबामा हो, आप हों, या अफ्रीका का कोई आदिवासी.
   
        Jugnu Trivedi ‎:( 🙁 🙁
    
        Yogendra Kumar Purohit Ek darshan sashtri kah kar gaye hai jivan bhay or bhukh ke karan par hi tika hai..anubhaw ki kadiyaa har din judti hi jaati hai or jivan ki janjir/jaal ban jaati hai..jai ho..
     
        Nadim S. Akhter थानवी साब, आपने जिस तरह का चित्रण अपनी लेखनी से किया है, ऐसा लगा लाइव टेलिकास्ट देख लिया…लेकिन आपने ये नहीं बताया कि आपके टिकट पर 'SSSS' क्यों छापा गया…???
      
        Kavita Vachaknavee ऐसी घटनाओं के लिए किसी देश की सुरक्षा पद्धति को धिक्कारने की अपेक्षा उन्हें धिक्कारना चाहिए जिनके कारण भारतीय और एशियाई संदिग्ध हो गए हैं। अपने देश की सुरक्षा, व्यवस्था और नियम के प्रति प्रतिबद्धता कोई बुरी चीज थोड़े ही है। क्या भारत जैसी लचर व्यवस्था की प्रशंसा की जानी चाहिए जहाँ दिन रात किस किस कोने और किस किस देश से कोई भी घुसा आ रहा है और किसी को अंतर नहीं पड़ता ? ग्लासगो एयरपोर्ट हमले से जुड़े दक्षिण भारत के दो लोगों की गिरफ्तारी पर प्रधानमन्त्री (मनमोहन सिंह) का यह बयान कि वे रात भर उनके परिवार की चिंता में सो नहीं सके, भारत द्वारा आतंकवाद के खुलेआम आधिकारिक समर्थन जैसा था। उसके बाद से दुनिया में अब प्रत्येक भारतीय संदिग्ध हो गया है। अतः दोष जाँच के लिए रोकने वालों का नहीं अपितु प्रत्येक भारतीय को संदिग्ध व अविश्वसनीय बना देने वाले हमारे अपनों के उस व्यवहार का है जो अनुत्तरदायी ही नहीं बेहद धूर्त और खतरनाक भी रहते आए हैं।
 
        Deep Sankhla ‎:)
 
        Akhlaq Usmani Maaf Kar Do Sir, Darpok Qaumen Apne Saaye Se Bhi Darti Hain.
   
        Archana Lizu Liza Kavita:Vry true kavita g..bat sirf yahi h, jise howa bna dia gya h.
  

देखिए तस्वीर, मायावती के कमरे के बाहर मीडिया वालों के निकलवाए गए जूते-चप्पलों का ढेर

ये तस्वीर लखनऊ से एक पत्रकार ने मेल की है. तस्वीर मायावती के कमरे के बाहर की है. जो जूते और चप्पल दिख रहे हैं, वे पत्रकारों के हैं. मायावती ने मीडियावालों को बुलवाया लेकिन उन्हें जूते उतार कर ही अंदर आने का फरमान सुना दिया. इस फरमान का अक्षरणः पालन पत्रकारों ने किया. कहने वाले कहते हैं कि मायावती को डर था कि कहीं कोई पत्रकार जूता चप्पल इस्तेमाल करने की रणनीति बनाकर न आ जाएं. जरनैल सिंह वाला प्रकरण सबको याद होगा जिसमें उन्होंने चिदंबरम पर जूते फेंक दिए थे.

हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना था कि सुरक्षा कारणों के चलते जूते चप्पल बाहर निकलवाए गए. वहीं, कुछ अन्य का कहना है कि मनुवाद का विरोध करने वाली मायावती खुद भी मनुवादी हो चुकी हैं, इसी कारण वे जूते चप्पल बाहर निकलवाकर कर घर में घुसने देती हैं. जितने मुंह, उतनी चर्चाएं. फिलहाल देखिए ये चित्र…..

संबंधित खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- जूते उतारने के बाद ही पत्रकारों को मिली माया के दरबार में एंट्री

प्रदीप ठाकुर, आरिफ निसार, अमित गुप्ता कार्यमुक्त

दो पत्रकारों के बारे में सूचना है कि उन लोगों ने अपने अपने संस्थानों से विदा ले लिया है. प्रदीप ठाकुर पंजाब की शक्ति नामक नए लांच होने वाले अखबार में वरिष्ठ पद पर थे. अखबार अभी लांच भी नहीं हो पाया कि उन्हें प्रबंधन ने बाहर का रास्ता दिखा दिया. उनको लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं. उधर, आरिफ निसार चैनल वन न्यूज में वरिष्ठ पद पर कार्यरत थे. उनके बारे में भी सूचना है कि वे अपने संस्थान से कार्यमुक्त हो चुके हैं. आरिफ को संस्थान से क्यों हटाया गया, यह पता नहीं चल पाया है. उनको लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं. दैनिक जागरण, पानीपत से सूचना है कि रीजनल एरिया मैनेजर अमित गुप्ता का संस्थान से नाता टूट गया है. यह पता नहीं चल पाया है कि उन्होंने खुद इस्तीफा दिया है या फिर वे जागरण की छंटनी नीति के शिकार हुए हैं.

bhadas4media@gmail.com पर मेल करके आप खुद की या अपने साथियों की आवाजाही की सूचना भड़ास तक दे सकते हैं.

डा. उमाकांत मिश्रा बने इंडिया न्यूज मीडिया एकेडमी के हेड, सुषमा सिंह एचआर हेड

'आज समाज' अखबार और चैनल 'इंडिया न्यूज' को चलाने वाले ग्रुप की तरफ से इंडिया न्यूज मीडिया एकेडमी खोलने की घोषणा की गई है. इस शिक्षण संस्थान में पत्रकारिता की शिक्षा दी जाएगी. इस एकेडमी की जिम्मेदारी डा. उमाकांत मिश्रा को सौंपी गई है. ग्रुप के सीईओ राकेश शर्मा ने इस बारे में एक आंतरिक मेल जारी किया है. एक अन्य बदलाव के तहत सुषमा सिंह को आईटीवी और जीएमआई का एचआर हेड बनाया गया है. सुषमा 11 वर्षों से सहारा, आइडिया समेत विभिन्न कंपनियों में सक्रिय रही हैं.

bhadas4media@gmail.com पर मेल करके आप अपनी बात भड़ास तक पहुंचा सकते हैं.

उदय सिन्हा के सिर में गंभीर चोट, कई टांके लगे

वरिष्ठ पत्रकार और चैनल वन के मैनेजिंग एडिटर उदय सिन्हा गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. उनके सिर में काफी जख्म आया है. उन्हें आधा दर्जन से ज्यादा टांके लगे हैं. शुगर लेवल अचानक गिरने के कारण चेतना के स्तर पर वे ब्लैक आउट हो गए और गिर पड़े. उनका सिर घर में रखी टेबल के एक कोने से टकराया और अंदर तक घुस गया. इस हादसे से घरवाले स्तब्ध हो गए. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. चीखने चिल्लाने व रोने की प्रक्रिया में ही घरवालों ने ग्लूकान डी उदय सिन्हा को पिला दिया. इससे शुगर लेवल मेनटेन हुआ और स्थिति सुधरी.  घरवालों द्वारा ग्लूकान डी पिलाने का अचानक लिया गया यह फैसला उदय सिन्हा के लिए जीवनदायी साबित हुआ.

लेकिन गंभीर गल्ती यह हुई कि रात करीब बारह बजे के आसपास हुए इस हादसे के बाद घरवाले पूरी रात उदय सिन्हा को घर में ही रखे रहे. वे उदय सिन्हा के होश में आने का इंतजार करते रहे और सुबह के वक्त उन्हें अस्पताल ले जाया गया. सिर में कई टांके लगे. सिटीस्कैन से पता चला है कि दिमाग के अंदरूनी हिस्से में और कोई दिक्कत नहीं है. उदय सिन्हा का बचना एक चमत्कार की तरह है क्योंकि शुगर लेवल अचानक गिरने के बाद बेहोश कई घंटे घर में पड़े रहने के दौरान कुछ भी हो सकता था. उदय सिन्हा लखनऊ, दिल्ली, गुवाहाटी, पटना, रांची समेत कई शहरों में कई अखबारों के संपादक रहे हैं.

उदय सिन्हा


भड़ास पर प्रकाशित उदय सिन्हा के एक पुराने इंटरव्यू को इन लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं….

सहारा से इस्‍तीफा देकर तनवीर एवं राजकिशोर ने बंसल न्‍यूज ज्‍वाइन किया

तनवीर वारसी ने सहारा समय से इस्‍तीफा दे दिया है. वे राजगढ़ जिले में सहारा समय के ब्‍यूरोचीफ के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. तनवीर ने अपनी नई पारी बंसल न्‍यूज के साथ शुरू की है. उन्‍हें तीन जिलों – राजगढ़, शाजापुर और गुना का ब्‍यूरो चीफ बनाया गया है. वे लम्‍बे समय से सहारा को अपनी सेवाएं दे रहे थे. सहारा समय से ही राजकिशोर सोनी ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे रायसेन जिले के ब्‍यूरोचीफ थे तथा पिछले नौ सालों से चैनल को अपनी सेवाएं दे रहे थे. राजकिशोर को बंसल न्‍यूज में मध्‍य प्रदेश के स्ट्रिंगरों का हेड बनाया गया है. उन्‍होंने अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है.

bhadas4media@gmail.com पर मले करके आप अपनी जानकारी भड़ास के साथ साझा कर सकते हैं.

पुलिस ने जर्मनी की महिला पत्रकार को कंधमाल जाने से रोका

भुवनेश्वर। जर्मनी की एक महिला पत्रकार को कंधमाल जिले के लांजीगढ़ जनजातीय इलाके में जाने से रोक दिया गया है, क्योंकि नक्सली क्षेत्र में चलाए जा रहे नक्सल विरोधी ऑपरेश ग्रीन हंट के विरोध में शुक्रवार से विरोध सप्ताह मना रहे हैं। नई दिल्ली में जर्मन रेडियो नेटवर्क की दक्षिण एशिया की संवाददाता सैंड्रा पीटर्समैन अपने भारतीय सहयोगी अनूप सक्सेना के साथ एक रपट तैयार करने के लिए भवानीपटना जिले में गई थीं।

जिले की पुलिस अधीक्षक सुधा सिंह ने कहा कि उन्होंने सैंड्रा के लिए एक परामर्श जारी किया है कि वह इस इलाके में न जाएं। सिंह ने आईएएनएस से कहा, "यह मात्र एक सलाह भर है। मैंने उनसे कहा कि यदि वह इलाके का दौरा करना चाहती हैं तो कर सकती है लेकिन अपनी जिम्मेदारी पर।" उन्होंने कहा कि पुलिस ने सक्सेना को इलाके में जाने से नहीं रोका है, क्योंकि वह भारतीय नागरिक हैं। सैंड्रा ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि यह मीडिया पर नियंत्रण करने की कोशिश है। गौरतलब है कि बीते मार्च में नक्सलवादियों द्वारा इटली के दो नागरिकों का अपहरण किए जाने के बाद पुलिस इस इलाके में विदेशियों को जाने के लिए हतोत्साहित कर रही है। (मेरी खबर)

जागरण में बंपर छंटनी (43) : अलीगढ़ में प्रबंधन ने दो लोगों को वापस बुलाया

दैनिक जागरण, अलीगढ़ से खबर है कि प्रबंधन ने अपने दो सहयोगियों को वापस बुला लिया है. हालांकि सूत्रों का कहना है कि जागरण इसे अपनी गलती मानकर इन लोगों को वापस नहीं बुलाया है बल्कि नोटिस भेजे जाने के बाद इन लोगों को वापस बुलाया गया है. वैसे कहा यह भी जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों में हुए घटनाक्रम के बाद जागरण प्रबंधन के होश उड़े हुए हैं तथा वो छंटनी के शिकार बनाए गए कुछेक लोगों को वापस लेकर दूसरे विवादों से बचना चाहता है.

गौरतलब है कि अभी दो दिन के भीतर ही जागरण से छंटनी के शिकार हुए अमरीश त्‍यागी का निधन हो गया. वे बुरी तरह अवसाद में चले गए थे. पत्रकार का एक बड़ा तबका तथा आमलोग अमरीश त्‍यागी की मौत का जिम्‍मेदार जागरण को ही मान रहे हैं. वहीं रायबरेली में अखबार ने दो महीने पुरानी खबर प्रकाशित कर दी थी. जिसके बाद इस अखबार की पूरे रायबरेली में जमकर छीछालेदर हुई. इस तरह की गड़बडि़यों के बाद जागरण को अब अपने पुराने लोग याद आने लगे हैं.

बताया जा रहा है कि अलीगढ़ में छंटनी के शिकार बनाए गए पत्रकारों ने प्रबंधन को कानूनी नोटिस भेजा था. कहीं कोई और गड़बड़ी ना हो जाए तथा घबराहट में जागरण ने दो लोगों को वापस बुला लिया है. अलीगढ़ में जागरण प्रबंधन ने चार लोगों से इस्‍तीफा मांगा था. बाकी दो लोग ब्‍यूरो में तैनात थे. प्रबंधन ने जिन लोगों को वापस बुलाया है उसमें वरिष्‍ठ पत्रकार सुधीर भारद्वाज और राजीव कुमार शर्मा शामिल हैं. सुधीर भारद्वाज पिछले ढाई दशक से जागरण के साथ जुड़े हुए थे.


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अंजना कश्‍यप पहुंचीं आजतक, एईपी के पद पर ज्‍वाइन किया

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तेज तर्रार एंकर अंजना कश्यप ने टीवी टुडे ग्रुप के आजतक चैनल में ज्वाइन कर लिया है। अंजना इससे पहले स्टार न्यूज/एबीपी न्यूज में थीं। स्टार न्यूज के एबीपी न्यूज में बदले जाने के प्रोमो में जब अंजना कश्यप नहीं दिख रही थीं, तभी से कयास लगाए जा रहे थे कि वो आजतक जा रही हैं।

भड़ास4मीडिया ने पहले भी इसके बारे में खबर प्रकाशित की थी। लेकिन अब सारे कयासों को विराम मिल गया है। अंजना कश्यप ने 27 जून को ही आजतक चैनल में बतौर एईपी ज्वाइन किया है। अंजना टीवी की तेज तर्रार एंकर मानी जाती हैं। करीब एक साल से वो स्टार न्यूज में थीं। इससे पहले अंजना न्यूज 24 और जी न्यूज में काम कर चुकी हैं। न्यूज 24 में कई स्पेशल शो और खासकर उनका एक घंटे का साप्ताहिक शो दो टूक काफी मशहूर हुआ था। चाहे वो इंटरटेनमेंट से जुड़ी खबर हो या फिर इमोशन से या फिर कोई गंभीर राजनीतिक चर्चा हो, अंजना टीवी न्यूज के हर फार्मेट में खुद को ढाल लेने में माहिर हैं। भड़ास 4 मीडिया से बातचीत में अंजना ने स्वीकार किया कि उन्होंने आजतक ज्वाइन कर लिया है। देश के नंबर वन चैनल से जुड़कर वो बेहद खुश हैं।

दिल्‍ली पुलिस हेडक्‍वार्टर के पास पत्रकार को बदमाशों ने लूटा

नई दिल्‍ली: आईटीओ पर दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर के सामने देर रात ऑटो में सवार पत्रकार समेत कुछ लोगों को बदमाशों ने लूट लिया. बदमाश इनोवा कार में सवार थे. वे अपनी इनोवा कार ऑटो के सामने खड़ी करके लूट की घटना को अंजाम दिया. इस ताजा वारदात ने एक बार फिर दिल्‍ली पुलिस के सुरक्षा के दावों पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगा दिए हैं. बुधवार देर रात करीब डेढ़ बजे लूट की इस वारदात में एक पत्रकार समेत कुल तीन लोग शिकार हुए हैं.

पुलिस हेडक्वार्टर के करीब लूटपाट हुआ और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लग सकी. लूट का शिकार हुआ पत्रकार लुटेरों को रोकने में तो कामयाब नहीं हो सका, लेकिन मुस्तैदी दिखाते हुए उसने बदमाशों की इनोवा कार का नंबर जरूर नोट कर लिया. पर सवाल यही है कि क्‍या नम्‍बर मिलने के बाद भी दिल्ली पुलिस के हाथ उन लुटेरों के गिरेबान तक पहुंच पाएंगे. हेडक्वार्टर के पास ये सब हुआ तो दिल्ली के बाकी इलाकों में सुरक्षा के दावों में कितना दम है इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.

युवा महिला पत्रकार नताशा पर टूटे बहशी, न्‍यूड कर बुरी तरह छेड़छाड़

लंदन : मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर एक ब्रिटिश पत्रकार के साथ भीड़ द्वारा जानवरों जैसा सुलूक करने का मामला सामने आया है। पत्रकार का शारीरिक शोषण उस दौरान हुआ, जब तहरीर चौक पर मिस्र के राष्ट्रपति चुनावों के परिणाम घोषित होने पर जश्न मनाया जा रहा था। डेली मेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक 21 साल की नताशा स्मिथ ने बताया कि तहरीर चौक पर रिपोर्टिंग के दौरान उस पर कई पुरुषों ने हमला कर दिया। नताशा ने बताया कि हमलावरों ने जबरन उसके कपड़े फाड़ दिए और उसके साथ जानवरों जैसा सुलूक किया।

नताशा ने बताया कि लोगों ने उसके पूरे कपड़े उतार दिए और वे जानवरों की तरह उसके निजी अंगों को नोचने लगे। स्मिथ का यह भी कहना है कि भीड़ में मौजूद लोगों ने उसके निजी अंगों से बुरी तरह छेड़छाड़ की। ब्रिटेन के एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार नताशा दो अन्य लोगों की मदद से बुर्का पहनकर वहां से बचकर निकल पाई। इस वाकये के बारे में अपने ब्लॉग पर लिखते हुए उसने बताया, 'मैं वहां पर केवल बुरी नजर वाले लोगों को देख पा रही थी। लोग मुझपर ऐसे टूट पड़े थे, जैसे मैं ताजा मांस हूं।'

गौरतलब है कि यह हादसा बीते रविवार को घटित हुआ, जब पूरे मिस्र में मोहम्मद मुर्सी के राष्ट्रपति चुने जाने पर जश्न का माहौल था। देश के पहले लोकतांत्रिक ढंग से नेता चुने जाने के मौके पर काहिरा के तहरीर चौक पर भी जश्न मनाया जा रहा था और हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे। स्मिथ, फालमाउथ यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल जर्नलिज्म में मास्टर्स हैं और वे तहरीर चौक पर भीड़ की रिकॉर्डिंग कर रही थी। स्मिथ महिला अधिकारों के मुद्दे पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए मिस्र में थी।

स्मिथ पहली पश्चिमी महिला नहीं है जिसका मिस्र में शोषण किया गया है। सीबीएस न्यूज की लारा लोगन पर भी वर्ष 2011 में हमला हो चुका है। मिस्र की पत्रकार मोना एल्टाहवे पर भी भी बीते नवंबर मिस्र के सिक्योरिटी फोर्स द्वारा हमला किया जा चुका है। (एजेंसी)

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : लड़ने वाले साथियों को आर्थिक एवं कानूनी सहयोग की जरूरत

मुंगेर। मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड के दैनिक हिन्दुस्तान के लगभग दो सौ करोड़ के कथित विज्ञापन फर्जीवाड़ा का मुकदमा लड़ रहे आरटीआई एक्टिविस्ट काशी प्रसाद और श्रीकृष्ण प्रसाद ने देश के क्रांतिकारी राष्‍ट्रभक्‍तों से आर्थिक सहयोग की अपील की है। दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में डीएसपी स्तर से पर्यवेक्षण रिपोर्ट जारी होने और एसपी स्तर से रिपोर्ट -टू जारी होने के बाद इस विज्ञापन फर्जीवाड़ा की कानूनी लड़ाई पटना उच्च न्यायालय पहुंच गई है।

प्रसाद द्वय ने आर्थिक अपराध के इस राष्‍ट्रीय स्तर के मीडिया के विज्ञापन घोटाले के अभियुक्तों को सजा दिलाने में युद्धरत टीम को स्वेच्छा से ‘श्रीकृष्ण प्रसाद‘ के स्टेट बैंक आफ इंडिया के सेविंग एकाउंट नं0-10788923007‘ में दान करने की अपील की गई है। इस मुकदमे के उच्चतम न्यायालय तक जाने की भी संभावना व्यक्त की जा रही है। उच्चतम न्यायालय के अधिवक्तागण, जो इस कानूनी लड़ाई में सहयोग देने के इच्छुक हैं, लेखक के पते पर सम्पर्क कर सकते हैं। युद्धरत टीम के सदस्यगण ऐसे कानूनविदों का आभारी रहेंगे।

मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : शशि शेखर, अकु श्रीवास्‍तव, विनोद बंधु एवं अमित चोपड़ा भी पहुंचे पटना हाई कोर्ट

मुंगेर। राष्‍ट्रीय स्तर के दैनिक हिन्दुस्तान के लगभग दो सौ करोड़ के सनसनीखेज विज्ञापन घोटाले के नामजद आरोपी प्रधान संपादक ‘हिन्दुस्तान‘ शशि शेखर, पूर्व कार्यकारी संपादक ‘हिन्दुस्तान‘ पटना संस्करण अकु श्रीवास्तव, उप-स्थानीय संपादक ‘हिन्दुस्तान‘ भागलपुर संस्करण  बिनोद बंधु और प्रकाशक ‘हिन्दुस्तान‘ अमित चोपड़ा ने भी अब पटना उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्त्ति मिस रेखा एम दोशित के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 482 के तहत क्रिमिनल मिससेलिनियस, जिसकी संख्या- क्रि0मिस0- 16763/2012 है, दायर किया है।

पटना उच्च न्यायालय में दायर याचिका में सभी नामजद अभियुक्तों ने मुंगेर कोतवाली पुलिस थाना की प्राथमिकी, जिसकी संख्या-445/2011, दिनांक 18 नवंबर, 2011 है, को रद्द (क्वेश) करने की प्रार्थना उच्च न्यायालय से की है। सभी अभियुक्तों ने पटना उच्च न्यायालय में इस याचिका के निबटारा होने तक मुंगेर पुलिस को अभियुक्तों के विरुद्ध कार्रवाई (कोअरसिव -स्टेप) करने से रोकने की भी प्रार्थना की है।

इस बीच, पटना उच्च न्यायालय के डिप्टी रजिस्ट्रार (प्रशासन) ने हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला कांड के सूचक व सामाजिक कार्यकर्त्ता मन्टू शर्मा (मुंगेर) को आगामी 09 जुलाई, 2012 को पटना उच्च न्यायालय में हाजिर होने की नोटिस भेजी है। डिप्टी रजिस्ट्रार ने सूचित किया है कि पटना उच्च न्यायालय अभियुक्तों की ओर से दायर याचिका पर 09 जुलाई को सुनवाई करेगा। नामजद अभियुक्तों ने पटना उच्च न्यायालय में दायर याचिका में बिहार सरकार, मुंगेर के जिला पदाधिकारी और भागलपुर के जिला पदाधिकारी को भी ‘अपोजिट-पार्टी‘ बनाया है।

स्मरणीय है कि हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला की प्रथम नामजद अभियुक्त द हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष व पूर्व राज्य सभा सदस्य शोभना भरतिया पहले ही इसी मुकदमे में पटना उच्च न्यायालयमें क्रिमिनल मिससेलिनियस, जिसका नम्बर – क्रि0 मिस0 नं0- 2951/2012 है, दायर कर चुकी हैं। इस याचिका पर सुनवाई में पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्त्ति ज्योति शरण ने शोभना भरतिया के विरूद्ध पुलिस कार्रवाई (कोअरसिव-स्टेपस) पर रोक लगा दी है।

स्मरणीय है कि मुंगेर पुलिस ने दैनिक हिन्दुस्तान के लगभग दो सौ करोड़ के विज्ञापन घोटाले में पर्यवेक्षण रिपोर्ट में नामजद अभियुक्त शोभना भरतिया (अध्यक्ष, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड), शशि शेखर (प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान), अकु श्रीवास्तव (पूर्व कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण), बिनोद बंधु (उप-स्थानीय संपादक, भागलपुर संस्करण) और अमित चोपड़ा (मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड) के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं क्रमशः 420, 471, 476 और प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट 1867 की धाराएं 8 (बी), 14 और 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को ‘प्रथम दृष्टया सत्य‘ घोषित किया है। पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन ने इस मुकदमे में अभियोजन के पक्ष में रिपोर्ट-टू भी जारी कर दी है। अब पुलिस को इस मुकदमे में नामजद और अप्राथमिक अभियुक्तों के विरूद्ध अभियोग-पत्र न्यायालय में समर्पित करना बाकी है।

मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

प्रसार भारती में इस साल 3500 लोगों को मिलेंगी नौकरियां

: मंत्री ने बताया 14000 पद खाली : भारत की सार्वजनिक प्रसारण संस्‍थान प्रसार भारती कर्मचारियों के कमी से जूझ रहा है. प्रसार भारती में 14 हजार से ज्‍यादा पद खाली पड़े हुए हैं. सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने यह जानकारी तिरुवंतपुरम में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान दी. श्रीमती सोनी ने बताया कि इन खाली पदों में से साढ़े तीन हजार पदों को इसी साल भर लिया जाएगा. इसके लिए तैयारियां की जा रही हैं.

सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने स्‍पष्‍ट किया कि संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्‍बल ऑनलाइन मीडिया के लिए आवश्‍यक दिशा निर्देश तय करने की कवायद में जुटे हुए हैं. इसके लिए वे तमाम संबंधित लोगों के साथ कई बैठकें भी कर चुके हैं. इसके बाद ऑनलाइन मीडिया के नियमन पर कोई निर्णय लिया जाएगा. श्रीमती सोनी के साथ गृहमंत्री पी चिदम्‍बरम और केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद भी मौजूद थे.

शिमला प्रेस क्‍लब के साधारण अधिवेशन का सदस्‍यों ने किया बहिष्‍कार

शिमला प्रेस क्लब का विवाद लगातार गहराता जा रहा है। क्लब के साधारण अधिवेशन का क्लब के सदस्यों ने बहिष्कार कर दिया। कुल 160 सदस्यों में से 140 सदस्य बैठक में नहीं आए। नतीजतन ‘कोरम’ पूरा न होने के कारण बैठक स्थगित कर दी गई। क्लब के लगातार पांच बार अध्यक्ष रह चुके वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु ने इस साधारण अधिवेशन को पहले ही ‘गैरकानूनी’ घोषित कर दिया था। उनका आरोप था कि साधारण अधिवेशन बुलाने की प्रक्रिया को अनदेखा किया गया। रजिस्‍ट्रेशन एक्ट (अधिनियम) की धारा 20 (3) और उपविधि की धारा 32 (1) के अनुसार यह अधिवेशन पूरी तरह अवैध था।

वास्तव में इस साधारण अधिवेशन की सूचना सदस्यों को नियमानुसार नहीं दी गई। कृष्णभानु द्वारा अधिवेशन को अवैध बताने के बाद सदस्यों ने किनारा कर लिया। नतीजतन मौजूदा अध्यक्ष धनंजय शर्मा को अहसास हो गया कि वे इस जंग में कहां खड़े हैं। अब 2 जुलाई को पुनः साधारण अधिवेशन बुलाया गया है, जबकि इसकी जरूरत ही नहीं है। यदि नीयत ठीक हो तो संचालन परिषद की बैठक बुलाकर नए चुनावों की तिथि घोषित की जा सकती है। इस सारे प्रकरण को लेकर वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु ने क्लब के अध्यक्ष धनंजय शर्मा को एक बार फिर पत्र लिखा है, जो नीचे प्रस्तुत है –


दिनांकः 28.6.2012

श्री धनंजय शर्मा
अध्यक्ष (?)
प्रेस क्लब ऑफ शिमला
पं. पदम देव कॉम्पलेक्स (धरातल मंजिल)
दि रिज, शिमला (हि.प्र.)

प्रिय धनंजय,

साधारण अधिवेशन का ‘कोरम’ पूरा न होने पर बधाई। जिस ढंग से आपने क्लब का साधारण अधिवेशन बुलवाया, उससे पहले ही जाहिर हो गया था कि ‘कोरम’ नहीं होगा। यही आप चाहते थे, ताकि मामला टलता रहे और लगभग तीन साल बाद भी आप क्लब की कुर्सी पर चिपके रहें। आखिर क्लब में ऐसा रखा क्या है कि आप कुर्सी छोड़ना ही नहीं चाहते। शराब-बियर, बकरा-बकरी, मुर्गा-मुर्गी, लंच-डीनर या कुछ और…? एक साल के लिए चुनाव हुए थे। तीन साल होने जा रहे हैं और आप बिना फेविकोल कुर्सी पर चिपक गए हैं। क्यों? क्या फंडा है? क्या लालच है? क्या भूख है? आखिर वजह तो बताएं कि तमाम नियम कायदे ताक पर रखकर आप कैसे बिना कोलतार, बिना सिमेंट और बिना फेविकोल के चिपक लिए हैं। आखिर चुनाव क्यों नहीं कराना चाहते? क्या राज है? कुछ तो बताएं।

18 जून के पत्र में स्पष्ट कर चुका हूं कि आप तमाम नियम कायदों को ताक में रखकर क्लब से चिपके बैठे हैं। अधिनियम और उपविधि की कई धाराओं का उल्लंघन कर अपराधिक तरीके से क्लब को धकेल रहे हैं। क्लब का जो साधारण अधिवेशन आपने बुलावाया, वह पहले ही विवादों में घिर गया था। इसकी मुख्यतः दो वजहें थीं। एक- आपकी संचालन परिषद की एक वर्ष की अवधि समाप्त हो चुकी है, इसीलिए साधारण अधिवेशन बुलाने के लिए आप सक्षम ही नहीं हैं। दो- आपने साधारण अधिवेशन बुलाने की प्रक्रिया का उल्लंघन किया। अधिनियम की धारा 20 (3) और उपविधि की धारा 32 (1) को नजरअंदाज करके आपने इस साधारण अधिवेशन को बुलाया, जो कानूनी दृष्टि से ‘अवैध’ है। यही कारण है कि क्लब के करीब 160 सदस्यों में से डेढ़ दर्जन सदस्य भी साधारण अधिवेशन में उपस्थित नहीं हुए। यही आप चाहते थे। न चाहते तो सभी सदस्यों को नियमानुसार 21 दिन पहले डाक से सूचना भेजते। आपने तो मुझे भी चार दिन पहले यानी 23 जून 2012 को बैठक सम्बंधी सूचना भेजी। मैंने इस ‘अवैध’ साधारण अधिवेशन में नहीं आना था, सो नहीं आया। मेरा साथ क्लब के 160 में से लगभग 140 सदस्यों ने दिया और बैठक का बहिष्कार किया। अब सोचिए (यदि सोचने की क्षमता है तो) कि आप धर्म और अधर्म की इस जंग में कहां खड़े हैं।

सुना है अब आपने 2 जुलाई 2012 को स्थगित साधारण अधिवेशन आमंत्रित किया है। यह किसका निर्णय है और किस नियम के तहत बुलाया जा रहा है? क्या यह निर्णय संचालन परिषद का है या धनंजय शर्मा का? मैं एक बार फिर आपको बता दूं कि यदि लगातार तीन बार साधारण अधिवेशन का ‘कोरम’ पूरा न हो तो ‘स्थगित साधारण अधिवेशन’ बुलाया जा सकता है। यहां तो आप अपराधिक मनमानी करने पर उतर आए हैं। यह ‘गेंदामल खेमराज’ की दुकान नहीं है, बल्कि पंजीकृत संस्थान है। आखिर आपका सलाहकार है कौन? कौन है जो शुभचिन्तक के भेष में आपका सबसे बड़ा दुश्मन है? वास्तव में आप उस पद के काबिल ही नहीं है, जिसपर तीन साल पहले आपको लोगों ने बिठा दिया था। आपके हाथ में उस्तरा थमाने के पापी बहुत हैं, मैं भी हूं। आप सम्भल जाइए। आपकी तहजीब अपनी खंजर से आप ही खुदकुशी करने पर क्यों आमादा है?

बेहतर होगा यदि संचालन परिषद की बैठक बुलाकर चुनाव का फैसला ले लें। अन्यथा मैं अपने इरादों और आरोपों पर कायम हूं। कोई भी कानूनी कार्रवाई करने से पहले कहने का अवसर नहीं देना चाहता कि सावधान नहीं किया। यही कारण है कि बार-बार सावधान कर रहा हूं। अतः हे धनंजय शर्मा ! मूर्खों को त्यागो, अपनी सद्बुद्धि का इस्तेमाल करो और धर्म के पक्ष में खड़े होकर निर्णय लो। इस वक्त आपका धर्म जल्द से जल्द चुनाव कराना है, जो दो साल से लम्बित हैं।

आपका शुभाकांक्षी

( कृष्णभानु )

पूर्व अध्यक्ष
प्रेस क्लब ऑफ शिमला

लॉटरी निकली : अजमेर के 34 पत्रकारों को आबंटित होंगे भूखंड

नरेन शाहनी भगत की अध्यक्षता में बुधवार को कोटड़ा स्थित पत्रकार कॉलोनी के तीसरे चरण की लॉटरी निकाली गई। इसमें 34 पत्रकारों को भूखंड आवंटित किए जाएंगे। न्यास अब चौथे चरण के लिए जल्द आवेदन आमंत्रित करेगा। न्यास अध्यक्ष नरेन शाहनी भगत ने बताया कि पत्रकारों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। जानकारी के मुताबिक बुधवार को नरेन शाहनी भगत की अध्यक्षता में आवंटन समिति की बैठक हुई। इसमें न्यास सचिव पुष्पा सत्यानी व अन्य अधिकारियों के अलावा पत्रकारों के प्रतिनिधि दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक दीन बंधु चौधरी, दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल, राजस्थान पत्रिका के स्थानीय संपादक दौलत सिंह चौहान, अजयमेरू प्रेस क्लब के अध्यक्ष याद हुसैन कुरैशी शामिल हुए।

बैठक में पत्रकारों के आवेदन पत्रों की जांच के बाद लॉटरी निकालने का निर्णय किया गया। न्यास अध्यक्ष नरेन शाहनी ने लॉटरी निकाली और 34 आवेदकों के भूखंडों के नंबर घोषित किए। पत्रकारों को तय दर के मुताबिक डिमांड नोट दिए जाएंगे और राशि जमा होने के बाद आवंटन पत्र जल्द से जल्द जारी किए जाएंगे। न्यास अध्यक्ष ने बताया कि जिन पत्रकारों के आवेदन लंबित हैं उन पर भी शीघ्र ही निर्णय किया जाएगा। इस बाबत जल्दी ही समिति की बैठक आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि न्यास अब चौथे चरण की लॉटरी के लिए भी प्रयास करेगा और आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार और मुख्य मंत्री अशोक गहलोत की मंशा पत्रकारों के हितों का पूरा ध्यान रखने की रही है। इसीलिए नियमों में व्यापक शिथिलता भी सरकार ने दे रखी है।

पत्रकार कॉलोनी में पत्रकारों को तीसरे चरण के प्लॉट आवंटन का मामला 2006 से लंबित था। नगर सुधार न्यास में जन प्रतिनिधि नहीं होने का नुकसान पत्रकारों को उठाना पड़ा। दूसरे चरण की लॉटरी तत्कालीन न्यास अध्यक्ष धर्मेश जैन के कार्यकाल में निकाली गई थी। इसके बाद से ही न्यास में अध्यक्ष का पद खाली रहा। नरेन शाहनी भगत ने पदभार ग्रहण करते ही आश्वासन दिया था कि पत्रकारों को जल्दी ही भूखंड आवंटित किए जाएंगे। (प्रेनो)

हेमचंद्र पांडे की दूसरी बरसी पर गौतम नवलखा बताएंगे पत्रकारिता की हालत

: 2 जुलाई को आयोजित है व्‍याख्‍यान : इस साल का हेमचंद्र पांडे मेमोरियल लेक्चर जाने-माने नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और ईपीडब्ल्यू के संपादकीय सलाहकर गौतम नवलखा देंगे. दूसरा हेम चंद्र पांडे स्मृति व्याख्यान 2 जुलाई, 2012 को है. वक़्त है शाम 4.30 बजे. स्थान- जवाहर लाल नेहरू नेशनल यूथ सेंटर (जीपीएफ़ के नज़दीक), दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ, दिल्ली. विषय: भारतीय लोकतंत्र, जनाधिकार और पत्रकारिता की हालत.

हेम चंद्र पांडे आज हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन जिस रास्ते पर चलते हुए उन्होंने अपनी जान दी उसे भारतीय पत्रकारिता में एक मिसाल के तौर पर याद किया जा सकता है. आज देश में पत्रकारिता ख़रबों का धंधा बन चुकी है. उसमें काम करने वालों से हमेशा पेशेवर होने की मांग की जाती है. इस पेशे को कुछ इस तरह से समझाया जाता है कि जैसे पत्रकार समाज से बिल्कुल कटा हुआ प्राणी है और उसे घटनाओं को जैसे का तैसा रिपोर्ट कर देना है, बस. हेम कॉरपोरेट की तरफ से प्रचारित ऐसी पत्रकारिता के ख़िलाफ़ थे. हेम लोगों की तकलीफ़ों को अपनी लेखनी का विषय बनाते थे. ज़रूरत पड़ने पर जन-आंदोलनों में भी शरीक होते थे. पत्रकारिता में निष्पक्षता की दुहाई देकर धन्ना सेठों का पक्ष लेने वाली अभिजात पत्रकारिता के ख़िलाफ़ आम जनता के पक्ष में खड़े पत्रकार थे.

जब दो जुलाई दो हज़ार दस को आंध्र प्रदेश पुलिस ने हेम को भाकपा (माओवादी) प्रवक्ता आज़ाद के साथ फ़र्जी मुठभेड़ में मार डाला तो उनकी व्यापक सामाजिक सक्रियता का ही नतीज़ा था कि अन्याय के ख़िलाफ़ बड़ी संख्या में लोग सामने आए. पत्रकारों और न्यायपसंद लोगों ने फर्जी मुठभेड़ की कहानी को खुली चुनौती दी. फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग के लिए गई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और पूर्व न्यायाधीशों की एक टीम ने फर्जी मुठभेड़ के सारे सुबूत इकट्ठा किए. हत्याकांड की निष्पक्ष जांच की मांग हुई, लेकिन सरकार जांच के लिए तैयार नहीं हुई. बाद में सर्वोच्च अदालत के आदेश पर सरकार को सीबीआई जांच के लिए तैयार होना पड़ा. तब भी सवाल उठा था कि जब गृह मंत्री ही हेम और आज़ाद के क़त्ल का आरोपी हो तो उसके मातहत काम करने वाली सीबीआई कैसे निष्पक्ष जांच करेगी? आख़िरकार वही हुआ जो होना था. कुछ दिन पहले सीबीआई ने जांच की औपचारिकता निभाकर सर्वोच्च न्यायालय में कह दिया है कि हेम और आज़ाद को पुलिस ने असली मुठभेड़ में मारा था.

इस मामले में अदालती कार्यवाही के दौरान एक बार सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गणतंत्र अपने बच्चों की हत्या की इजाज़त नहीं दे सकता. उसने सीबीआई को इस मामले की जांच करने का आदेश दिया. तब हेम की मां रमा पांडे ने भावुक होकर अदालत की इस टिप्पणी को न्याय की उम्मीद की तरह देखा था. लेकिन सीबीआई और अदालत ने मुठभेड़ को असली ठहराकर इंसाफ़ की आस लगाए एक मां की उम्मीद पर पूरी तरह पानी फेर दिया है. लेकिन न हेम की मां और न ही हम इस झूठ को मानने को तैयार हैं. हम इतना ज़रूर समझते हैं कि अपने से असहमत बच्चों के प्रति ये गणतंत्र कितना क्रूर है इसका अमुमान हेम चंद्र पांडे की हत्या से लगाया जा सकता है. व्यवस्था से असहमति रखने वालों को सींखचों के पीछे डालने और मिटा देने का चलन दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है. इलाहाबाद की पत्रकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद और उनके पति विश्व विजय को उम्र क़ैद की सज़ा इसकी ताज़ा मिसाल है.

ऐसे दौर में, हेम को याद करने का मतलब हर तरह के अन्याय के ख़िलाफ़ एकजुट होना है. असहमति के अधिकार के लिए लड़ना है. हेम की मौत के बाद उनके पुराने साथियों और हम-ख़्याल पत्रकारों ने मिलकर हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी बनाई थी. तब हमने तय किया था कि हेम के आदर्शों को ज़िंदा रखने के लिए हर साल उनके शहादत दिवस पर एक व्याख्यान करवाएंगे. इस बहाने भारतीय समाज, राजनीति और पत्रकारिता के रिश्तों पर बात की जाएगी और बेहतर समाज का विकल्प तलाशने की कोशिश भी जारी रहेगी. इस बार दूसरा हेम स्मृति व्याख्यान होना है.

पहला व्याख्यान वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सुमंता बनर्जी ने दिया था. उन्होंने पत्रकारिता और जन- पक्षधरता पर बात करते हुए कहा था कि “हेम एक्टिविस्ट पत्रकारों की उस परंपरा में आते हैं जो जॉन रीड, एडगर स्नो, जैक बेल्डेन, हरीश मुखर्जी, ब्रह्मा बंधोपाध्याय से लेकर सरोज दत्त तक फ़ैली है. इस परंपरा में वे अज्ञात किंतु सचेत पत्रकार भी शामिल हैं जो हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में न्याय के पक्ष में साहस के साथ खड़े हैं.” इस बार हमने  जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े रहने वाले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और इकोनोमिट एंड पॉलिटिकल वीकली के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा को भारतीय लोकतंत्र, जनाधिकार और पत्रकारिता की हालत पर बोलने के लिए बुलाया है. दूसरे हेम मेमोरियल लेक्चर में आपकी मौज़ूदगी असहमति की हत्या करने वालों के ख़िलाफ़ एक राजनीतिक टिप्पणी की तरह होगी.

हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी की तरफ़ से भूपेन सिंह द्वारा जारी.

जूते उतारने के बाद ही पत्रकारों को मिली माया के दरबार में एंट्री

एक खबर कल की है लखनऊ से. जैसा आपको मालूम है कि राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है और इसी सिलसिले में कल केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ल उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से मिलने उनके आवास 13 ए माल एवेन्यू लखनऊ पहुंचे. जाहिर सी बात है दादा के समर्थन के लिए मायावती को प्रस्तावक बनाया गया है, उसी की कवरेज हेतु लखनऊ के सभी बडे़ पत्रकार भी पहुंचे, अपनी सबसे बड़ी दुश्‍मन के घर यानी मायावती के निजी आवास.

आपको याद होगा जब वह सीएम थीं तो उनके सरकारी आवास 5- कालीदास मार्ग पर पत्रकारों का आना जाना पूरी तरह से बंद था और मीडिया तो वहां का नक्शा भी भूल चुकी थी. तो अब पूर्व मुख्यमंत्री जब अपने निजी आवास पर हैं तो किसकी मजाल वहां भटक जाए. इसी सिलसिले में मीडिया को घर के अन्दर के शाट्स को कवरेज करने की अनुमति तो दी गयी, लेकिन सभी मीडियाकर्मियों से अपने अपने जूते उतार कर ही अन्दर आने को कहा गया. फिर क्या था? कवरेज तो करनी ही थी इसलिए सभी पत्रकार बंधु अपने-अपने जूते उतार कर ही अन्दर गए, जिसमें सभी बड़े-बड़े चैनलों के दिग्गज पत्रकार शामिल थे और ज्यादातर पंडित. छुआ-छूत जैसी प्रथा के कारण ही माया को यह दर्जा मिला है जिसके लिए उन्हें दलित की बेटी कहा जाता है, लेकिन चुनाव में हारने की दुश्मनी तो निकालनी ही थी लिहाज़ा इसी तरीके से पत्रकारों की बेइज्जती ही सही. अब इसे माया को जूते का डर कहा जाए या माया की यूपी के पत्रकारों से दुश्मनी, इसे आप लोग ही तय करें. 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सवालों से घिरे मीडिया के कई दिग्गज खीझे और झल्लाए

Mayank Saxena : दिल्ली में कल एसपी सिंह स्मृति समारोह का आयोजन हुआ. इसमें मीडिया के कई दिग्गज आए थे. ये लोग सवालों में घिरे और घेरे गए. कई बार लोगों, जूनियर पत्रकारों और छात्रों के सवालों ने घेरा. ठीक वैसे ही ये लोग सवालों से घिरे जैसे उनके शोज़ में अमूमन नेता और बाकी लोग घिरते हैं। आप यकीन मानिएगा कई बार इनमें से ज़्यादातर के पास नेताओं से बहुत अलग जवाब नहीं थे, कई बार ये नेताओं की ही तरह खीझे और झल्लाए, कई बार ये बचकाने स्पष्टीकरण देने लगे, कई बार सिर्फ सहमति दे कर चुप हो गए…

ये वही सब बाते हैं, जिनके लिए अपने पैनल में बैठे अपने शिकारों का ये मज़ाक उड़ाते हैं, भर्त्सना करते हैं, निंदा करते हैं। लेकिन दरअसल अंदर से उतना ही अमीर और कद्दावर बनना भी चाहते हैं, और वही राह उनको यहां ले आई है, जब मीडिया को बेहतर, प्रामाणिक और ईमानदार सिस्टम बनाने की बजाय इनका सारा ध्यान इस बात पर है कि इनकी जेब में लगा पेन कैसा होना चाहिए….जूते चमक रहे हैं या नहीं…हालांकि कई सारे जवाब बहुत अच्छे भी थे…पर हर अच्छे जवाब से आप सहमत हो जाएं, ये भी तो अच्छा नहीं है…

        निहाल सिंह JAI PATRKARITA…

        Shayak Alok यह प्रवृति है.. जिसे जहाँ मौका मिलता है वहां वह खुद को ऐसा ही नेता स्टायल 'बड़ा' 'व्यस्त' 'लापरवाह' 'दुनिया मेरे ठेंगे पर' दिखाने की जुगत करता है या इस जुगत का शिकार होता है .. हालांकि यह बनावटीपन भी बनावटी है ..वहां पे किसी पर्टिकुलर व्यक्ति से आपको निराशा हुई हो और कभी आपको वह किसी शादी के भोज में मिले तो अलग व्यवहार रखेगा.. उससे मिलने उसके कार्यालय पहुंचे तो अलग व्यवहार और पोर्ट ब्लेयर में बीच पर आपसे टकरा जाए तो अलग व्यवहार.. 🙂

टीवी जर्नलिस्ट मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से साभार.

वयोवृद्ध पत्रकार-साहित्यकार डॉ. रुक्म त्रिपाठी सम्मानित

: ‘बाजार में खड़ी है पत्रकारिता, जो कीमत चुकाता है, उसकी बोली बोलने लगती है’ : कोलकाता : पिछले दिनों यहां भारतीय भाषा परिषद के सभागार में हिंदी पत्रकारिता के 186 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में स्थानीय हिंदी दैनिक ‘छपते छपते’ के तत्वावधान में ‘हिंदी पत्रकारिता की 186 वर्ष की यात्राः एक सिंहावलोकन’ विषय पर परिचर्चा और हिंदी के पांच वयोवृद्ध पत्रकारों के सम्मान का समारोह आयोजित किया गया। इसमें डॉ. रुक्म त्रिपाठी, संतन कुमार पांडेय, सुदामा प्रसाद सिंह, मोहम्मद इसराइल अंसारी व रामगोपाल खेतान को पत्रकारिता में उनकी सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र व कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता ने किया। डॉ. मिश्र ने अपने संबोधन में युवा पत्रकारों से पत्रकारिता के उत्कृष्ण प्रतिमानों को पुनः स्थापित करने की अपील की। उन्होंने हिंदी समाचारपत्रों के गौरवमय अतीत की याद दिलाते हुए कहा कि आज पत्रों के कलेवर तो बेहतर हुए हैं लेकिन उनमें संस्कारों और राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति संघर्ष का भाव नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पाठकों का दबाव ही समाचारपत्रों को फिर से जनोन्मुखी बनायेगा।

समारोह के मुख्य अतिथि कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता ने भी समाचापत्रों के स्तर और मूल्यों में गिरावट के प्रति चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समाचारपत्रों के संपादकों और पत्रकारों को खुद इस बारे में समीक्षा करनी चाहिए कि यह स्थिति क्यों आयी। छपते छपते हिंदी दैनिक परिवार की ओर से पांचों सम्मानित पत्रकारों का सम्मान स्मारक चिह्न प्रदान करने के अलावा शाल ओढ़ा कर और उत्तरीय प्रदान कर सम्मानित किया गया। सम्मानित पत्रकारों ने पत्रकारिता के बारे में अपने विचार व्यक्ति किये। पत्रकारिता के गिरते स्तर के बारे में डॉ. रुक्म त्रिपाठी ने कहा कि आज पत्रकारिता बाजार में खड़ी है, जो भी उसकी कीमत चुकाता है, यह उसी के बोल बोलने लगती है।

इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. रुक्म त्रिपाठी ने कहा-‘ मैंने आधी शताब्दी से भी अधिक समय पत्रकारिता और लेखन में गुजारा है। मैं पत्रकारिता के अतीत से वर्तमान तक से सक्रिय रूप से जुड़ा रहा हूं और इसके उत्थान-पतन का साक्षी रहा हूं। आज जब हम इसकी उपलब्धि का आकलन करते हैं तो हमारे सामने इसके उत्कर्ष और पतन के पक्ष उजागर होते हैं। पत्रकारिता का जिसे स्वर्ण युग कह सकते हैं वह इसके प्रारंभ के वर्ष थे जब इसका उद्देश्य, इसके सिद्धांत और निष्ठा ही इसका सबसे बड़ा धन होते थे। यह सत्यम् शिवम् सुंदरम् के उद्देश्य पर आधारित पत्रकारिता थी। यानी जो सत्य है कल्याणकारी है उसकी प्रतिष्ठा और जो स्वेच्छारिता, अन्याय अनाचार है उसकी निर्भीक होकर समालोचना ही इसका धर्म था। तब पत्रकार एक ध्येय एक निष्ठा लेकर चलते थे जो बिकाऊ नहीं थी। तब पैसे के मोह में सामाजिक दायित्वों को तिलांजलि दे कोई ठकुरसुहाती नहीं लिखता था। वह स्वाधीनता आंदोलन का युग था।

हिंदी पत्रकारिता ओतप्रोत भाव से इस आंदोलन को प्रोत्साहित करने इसे अपना सक्षम समर्थन देने में जुटी थी। पत्रकारिता के कई मनीषियों को इसके चलते ब्रिटिश राज का कोपभाजन भी बनना पड़ा लेकिन वे अपने उद्देश्य से नहीं डिगे। हिंदी पत्रकारिता का अतीत जितना निर्मल और उज्जवल था, इसका वर्तमान उतना ही कलुषित, दिशाहीन और सामाजिक सरोकार से कटा हुआ है।आज जब हम इसके अतीत और वर्तमान का आकलन करने बैठते हैं तो सबसे पहले यही प्रश्न आता है कि क्या वर्षों पूर्व जब पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था, तब से आज तक क्या यह अपने उद्देश्यों और सिद्धांतों पर अडिग रह पायी है। हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि पत्रकारिता अपने मूल्य उद्देश्यों और न सिद्धांतों ने न सिर्फ भटकी है अपितु दिशाहीन भी हो गयी है। आज इसमें मूल्यों का क्षरण, सिद्धांतों और उद्देश्यों का निर्मम हनन हो रहा है। यह अपने सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों से विमुख हो स्वेच्छारी और स्वार्थी हो गयी है। वैसे इस अराजक दौर और निराशा के घटाटोप में भी ऐसे निष्ठावान पत्रकार आज भी हैं जिनकी कलम बिकाऊ नहीं है। यही भविष्य के लिए उम्मीद की किरण हैं।

आज पत्रकारिता ऊहापोह और विवशता के दोराहे पर आ खड़ी हुई है। दोराहा जहां उसके सामने  व्यावसायिकता और राजनीतिक व अन्य दबावों का संकट है। दिनों दिन प्रकाशन संबंधी वस्तुओं की कीमतों से उसके सामने अस्तित्व का भी संकट है जिसके चलते उसे न चाहते हुए भी कुछ ऐसे समझौते करने पड़ते हैं जहां मूल्यों और सिद्धांतों को बलि देने को विवश होना पड़ता है। गलाकाट प्रतियोगिता और बदलते सामाजिक, राजनीतिक मूल्यों से उपजे दबाव के चलते  पत्रकारिता अपने मूल्य उद्देश्यों से भटकती जा रही है। ऐसे में हमें यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या वाकई पत्रकारिता  186 साल बाद उस  ऊंचाई पर पहुंची है जहां उसे होना चाहिए था। जहां उसके पहुंचाने का स्वप्न इसके पुरोधाओं ने देखा था। क्या वाकई वह सार्थक और सक्षम तौर पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका निभाने में सफल रही है।

जहां तक पत्रकारिता की प्रगति का प्रश्न है इसने तकनीकी ढंग से बेहद प्रगति की है लेकिन उसके नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आज जो चाहे इसे अपने ढंग से इस्तेमाल कर सकता है। कभी पत्रकारिता मिशन थी आज मोनोपोली है। जिसकी जैसी इच्छा अपने हित में इसका इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में इसका सत्यम् शिवम् सुंदरम् का सिद्धांत छीजता जा रहा है। कभी देश के स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरक और प्राण शक्ति रही पत्रकारिता उद्देश्यहीन हो बाजार में आ खड़ी हुई है। जो चाहता है इसकी मुंहमांगी कीमत चुकाता है और यह उसके ही बोल बोलने लगती है। अपने सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे यह ऐसे हाथों में खेलने लगी है, जो इसे स्वेच्छाचारी और स्वार्थी बना रहे हैं। यह पतन की उस राह पर चल पड़ी है, जहां से अगर इसे अभी नहीं उबारा गया तो बहुत देर हो जायेगी। वैसे आज भी कुछ सार्थक पत्रकारिता के सारथी हैं जिन्हें अपने ध्येय, अपनी निष्ठा और सिद्धांतों से प्रेम है, वे बिके नहीं और यही हमारे लिए आशा की किरण के समान हैं। इन्हें प्रणाम और इसके कार्य को साधुवाद।’ कार्यक्रम के सूत्रधार और छपते-छपते के संपादक विश्वंभर नेवर ने अपने स्वागत भाषण में पत्रकारों की अंतर्वेदना और संघर्ष का जिक्र किया। संचालन सुश्री राजप्रभा दासानी ने किया।

आजतक से रिटायर होने के बाद फेसबुक के जरिए शुद्ध हिंदी-उर्दू सिखा रहे हैं नकवी

कहते हैं सीखने की उम्र नहीं होती. वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी को ही ले लीजिए. वैसे तो ये रिटायर हो गए हैं. पर आजकल ये छात्र और गुरु, दोनों भूमिकाओं में आ चुके हैं. छात्र इसलिए कि वे हिंदी में टाइपिंग सीख रहे हैं और काफी कुछ सीख चुके हैं. गुरु इसलिए कि वे फेसबुक के माध्यम से पत्रकारों व अन्य लोगों को शुद्ध हिंदी उर्दू लिखना सिखा-बता रहे हैं. उनकी इस पहल को लोग खूब पसंद कर रहे हैं और संशय में पड़े लोग उनसे अपनी शंका का निराकरण भी करा रहे हैं.

दादा नाम से मशहूर कमर वहीद नकवी का फेसबुक पर दो एकाउंट है. एक तो उनका अपना एकाउंट है और दूसरा उनके नाम से एक पेज है. इन दोनों तक निम्न लिंक के जरिए जा सकते हैं और उनकी पाठशाला के छात्र बन सकते हैं.

http://www.facebook.com/qamarwaheed.naqvi

http://www.facebook.com/qwnaqvi

नीचे उनके वॉल से साभार लेकर कुछ पोस्ट प्रकाशित किए जा रहे हैं…

Qamar Waheed Naqvi : परसों एक हिन्दी चैनल पर महाराष्ट्र के शहर DHULIYA का नाम चल रहा था—"धुलिया". सही नाम "धुलै" है. ज़्यादातर हिन्दी चैनलों और अखबारों में "धुलै" को "धुलिया" या "धूलिया" लिखा जाता है, जो ग़लत है. इसी तरह महाराष्ट्र के दो और शहरों के नाम अकसर ग़लत लिखे जाते हैं. "सातारा" को प्रायः "सतारा" और "सोलापुर" को "शोलापुर" लिखा जाता है, जो ग़लत है. इनके सही नाम हैं — "सातारा" और "सोलापुर". यही नहीं, "आम्बेडकर", "गावसकर" और "तेंडुलकर" भी हिन्दी में ग़लत ढंग से क्रमशः "अम्बेडकर", "गावस्कर" और "तेन्दुलकर" लिखे जाते हैं. हमारे यहाँ अखबारों और टीवी चैनलों के न्यूज़ रूम की विडम्बना यह है कि जिन नामों के सही उच्चारण लोगों को पता नहीं हैं, उनके बारे में सही जानकारी हासिल करने का कष्ट कोई करता ही नहीं है. और अगर बता भी दिया जाय तो ग़लती सुधारने की तकलीफ़ भी कोई उठाना नहीं चाहता. और यह बात सिर्फ हिन्दी के पत्रकारों पर ही लागू नहीं होती. मैं आज से बत्तीस साल पहले जब १९८० में ट्रेनी हो कर नवभारत टाइम्स, मुंबई पहुंचा, तो कुछ महीनों बाद मेरी नज़र एक मराठी अखबार पर पड़ी, जिसमें एक शहर का नाम "मीरत" लिखा हुआ था. (अंग्रेजी में स्पेलिंग होती है: MEERUT). मुझे बड़ी हैरानी हुई. मैंने उनके एक वरिष्ठ सम्पादक से कहा कि यह खबर तो यू. पी. के मेरठ शहर की है लेकिन आप के अखबार में "मीरत" छपा है. इस ग़लती को सुधारा जाना चाहिए. मुझे जवाब मिला कि हम जानते हैं कि सही नाम मेरठ है लेकिन बरसों से हम इसे "मीरत" लिखते आ रहे हैं, इसलिए अब इसे नहीं बदला जा सकता. अजीब तर्क था. ग़लती का जब पता चल जाय, उसे सुधार लेने में क्या हर्ज है? वैसे ऐसी ज़्यादातर ग़लतियों का बड़ा कारण उनकी अंग्रेजी स्पेलिंग भी हैं. अंग्रेजी के टीवी चैनलों में होनेवाले ग़लत उच्चारण को प्रायः हिन्दीवाले आँख मूँद कर उठा लेते हैं. अब जैसे "कसाब" (KASAB) को ही लें. अंग्रेजी के लोग उसे "कसब" ही कह कर पुकारते हैं, जबकि सबको मालूम है कि सही उच्चारण "कसाब" है.

        Nadim S. Akhter क्या बात है सर!! बहुतों को आइना दिखा दिया आज आपने…वैसे मुंबई के सम्पादक साहब का रवैया चौंकाने वाला है… ग़लती अगर पता चल जाए तो उसे सुधारने में क्या हर्ज है…ये तो वही बात हुई कि हम कसाब को कसब ही बोलेंगे क्योंकि वैसा बोलते आए हैं और 'राम' को 'रामा' (Rama) क्योंकि अंग्रज़ी बोलने वाले elite को रामा बोलने में अंग्रेजियत का एहसास ज्यादा होता है.
        आप से गुजारिश है कि एक दिन ये जरूर बताइएगा कि अंग्रेजी के शब्दों को जब हिंदी में लिखा जाता है, तो उसे कैसे लिखेंगे. अब नवभारत टाइम्स दिल्ली का ही उदाहरण लें. वहां ये तय पाया गया कि आक्सफोर्ड डिक्शनरी में जो उच्चारण है, उसी के हिसाब से लिखेंगे और ये उच्चारण क्या है, कैसे लिखा जाना है, इसे तय करने का अधिकार एक व्यक्ति विशेष को दे दिया गया.
        फिर देखिए क्या हुआ..अंग्रेजी का एक शब्द है 'guerilla'..इसे आमतौर पर हम हिन्दी में 'गुरिल्ला' लिखते हैं लेकिन नवभारत टाइम्स दिल्ली में तय किया गया कि इसे 'गरिल्ला' लिखा जाएगा..अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी में कैसे लिखा जाए, यह हमेशा एक चैलेंज रहता है क्योंकि oxford dictionary का उच्चारण सुनकर भी आप उसे हिन्दी में सही लिख दें, ये हमेशा मुमकिन नहीं…इस बारे में आप क्या सोचते हैं सर. सादर.
         
        Qamar Waheed Naqvi मैंने शिशिर सिंह के एक सवाल के जवाब में अंग्रेजी शब्दों के बारे में अभी-अभी लिखा है, कृपया देख लें.
         
        Rajeev Sharma सर, भारत सरकार को क्या कहना चाहिए- केन्द्रीय सरकार या संघीय सरकार
         
        Feroz Haider sir, main bhee newsroom me eis pareshani se rooz do char hota hoon. khaskar urdu ke words par lekin bada sawal ye hai ke system ko kaise sudhhara jai aur seniors ke ego ko bina hurt kiye kaise output sahi ho gaye.
         
        Zafar Abbas i feel worried wn the channels misuse the dot or "nukhta" of urdu..They dont refrain themselves from the use of the urdu words but wn it comes to using "Nukhta" they try to maintain their hindi stature…Khuda aur juda me bus ek nukhte ka hi farq hai…lekin na jane kyu kuch ek channels ko chodkar bechare nukhte ka koi istemaal nahi kar raha hai..
         
        Dhirendra Pandey बिलकुल सही बात उठाई है आपने | और इन्ही लोगों को पढ़ सुन कर के हम लोंग भी गलत बोलने लगतें है, और इस तरह भाषा का स्वरुप बदल जाता है | आज साहित्य और सिमेमा के अलावा मीडिया का बहुत बड़ा रोल है बल्कि सबसे बड़ा रोल है भाषा को समृद्ध या विकृत करने में पर ये लोंग आज सुविधा और जल्दबाज़ी के कारण इसको महत्वपूर्ण नहीं समझतें और इस पर ध्यान नहीं देतें है |
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Qamar Waheed Naqvi : किसी ने पूछा था कि "हालांकि" सही है या "हांलाकि". जवाब है, "हालांकि" सही है. मनीष झा ने पूछा है कि "शुद्ध" और "विशुद्ध" का अर्थ क्या एक-दूसरे से भिन्न है और क्या दोनों शब्द संस्कृत से आये हैं. जवाब है कि ये दोनों ही शब्द संस्कृत के हैं और एक ही अर्थ व्यक्त करते हैं. वरुण कुमार ने पूछा है कि सेमी फ़ाइनल अलग-अलग लिखा जाय या जोड़ कर. मेरे ख्याल से "सेमी फ़ाइनल" या " सेमीफ़ाइनल" लिखने में कोई बुराई नहीं है. बहुत शुद्ध लिखना चाहते हैं तो "सेमी-फ़ाइनल" लिखें. लेकिन "सेमि फ़ाइनल" या "सेमिफ़ाइनल" ग़लत है.

        Padampati Sharma jari rakhana Dada is Pathshala ko. Hindi par yah aapka bahut bada upkaar hoga\
 
        Viplava Awasthi Sir 'corruption' word ka hindi translation kaise likha jaye??
 
        Rajan Prakash धन्यवाद सर, मेरा एक प्रश्न है… सही क्या है सांवैधानिक या संवैधानिक ?
   
        Mrityunjay Kumar sir राजनैतिक या राजनितिक जीवन में कौन सही है
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Qamar Waheed Naqvi : बेअसर, प्रभावहीन और "असरहीन" और "हैवीपन से भारीनेस" तक : १९९०-९१ में जब मैं नवभारत टाइम्स, लखनऊ में था, एक दिन एक सहयोगी ने शीर्षक लगाया, "अमुक का असरहीन अभिनय." मैंने पूछा, भई, यह "असरहीन" क्या होता है? "असर" अरबी का और "हीन" हिन्दी का. आप इसकी जगह प्रभावहीन या बेअसर नहीं लिख सकते थे. जवाब था ज़रूर लिख सकते थे, लेकिन दिमाग़ में ऐसा कुछ खटका ही नहीं कि इसमें कुछ गड़बड़ है. अभी पिछले दिनों एक अखबार के शीर्षक में फिर "असरहीन" दिख गया. ज़ाहिर है कि बीस-बाईस साल पहले शुरू हुई "असरहीन" की यात्रा काफी प्रभावशाली तरीक़े से जारी है. दरअसल, हिन्दी लिखने में ज़्यादातर ग़लतियाँ ऐसी ही होती हैं जो बस बे-ध्यानी में हो जाती हैं. थोड़ा-सा ठहर कर सोचें तो ऐसी बहुत-सी ग़लतियों से बचा जा सकता है. दुनिया की तमाम भाषाओं के शब्दों का आप हिन्दी में बेहिचक इस्तेमाल करें, लेकिन बेहतर होगा कि दो भाषाओं के शब्दों का आधा-आधा हिस्सा जोड़ कर एक शब्द न बनायें. वर्ना तो हम एक दिन ऐसे भी प्रयोग देखेंगे : आज बहुत "हैवीपन" महसूस हो रहा है या सिर में "भारीनेस" लग रही है.

        Dhirendra Pandey बड़ी खतरेबुल बात है
 
        Satya Prakash Yes, you are right sir. People are also frequently using 'nuksandayak' and 'afsosjanak'. Correct words are 'nuksandeh' and afsosnak'. This trend needs to be arrested.
 
        Rajesh Priyadarshi नुक़सानदायक भी ऐसा ही है, नुक़सादेह की जगह
   
        Shishir Singh मुझे नहीं लगता कि अन्तिम लाइन जैसी नौबत आएगी, करने को कोई करना चाहे तो कर दे, पर वो खटकेगा। असरहीन की तरह नहीं कि आज तक मुझे मालूम ही नहीं था। हिन्दी और उर्दू का मेल ऐसा है कि ऐसी गलतियाँ बार-बार होंगी ही। (ये मेरा निजी विचार था)। फिर भी अच्छा है कि आप के बहाने काफी कुछ गलतियाँ समझ आयेंगी।
    
        Rahul Tripathi ‎"हैवीपन" तो सुनने में आ जाता है, और कई बार सुना भी है !लेकिन,खबरों में नहीं देखा हा ये जरुर है की आने वाले समय में "भारीनेस" से ग्रसित हो अगर कही छप गया तो ये प्रमाणिक हो सकता है …. राजस्थान में तो हम अखबारों में इस तरह के कई शब्द देखते ही रहते है जैसे "घरबदर" किया " "धूजनी" छूटी ( कंपकपी )"मोयला" (सरसों की फसल काटने बाद उड़ने वाल एक कीट) सही शब्द तो मुझे भी नहीं मालुम और एक "रायला " ( राई ) ये शब्द अक्सर अखबारमे छपते है !
     
        Abhishek Priydarshi sir.. ab hindi ki atma bachi hai kaha…
      
        Subhash Neerav कुछ गलतियाँ अनजाने में हो जाती हैं, लेकिन पता चलने पर भी उसे दोहराएं तो यह गलत है… मुझे भी आज आपने एक नई चीज़ सिखाई…मैं ऐसी गलती करने से सर्तक रहूँगा…
      
        Suman Bajpai ab vakt kahan logon ke pass ki hindi ke marm ko samjhe, aajkal to her koi hindi ko ek majak samajhta hai, typist bhi apni chalata hai
        
        Aditya Pujan Thanx sir…really eyeopening…
         
        Rudrashiv Mishra Sir, kya beasr likh sakte hain
         
        Rakesh Rakesh Ranjan kya bariki hai sir…
         
        Sandeep Bundela Great sir!
         
        Qamar Waheed Naqvi रुद्रशिव जी, आपके प्रश्न का उत्तर तो मैंने अपनी मूल पोस्ट में दिया ही है. "बेअसर" बिलकुल सही है.
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Qamar Waheed Naqvi : त्रिवेणी प्रसाद पाण्डेय ने पूछा है: "उंगली" सही है या "अँगुली?" जवाब है: मूल संस्कृत शब्द है "अंगुलि", जिससे बिगड़ कर "अँगुली" बना. ये दोनों ही सही हैं लेकिन हिन्दी के आम इस्तेमाल में "उंगली" लिखना ही उचित रहेगा. क्योंकि अब "उंगली" ही सब जगह प्रचलन में है.

        Charan Singh Qamar saheb, that good. Every progressive language changes with time and usage.
 
        Sharad Mishra sir aapka jawab nahi……..
 
        Praveesh KT you are great
   
        Sharad Mishra sir, aapse aisa hi vayvharik gyaan milta rahe……
    
        Dhirendra Pandey नहीं अगर सही मालूम है तो सही ही लिखना चाहिए | मै तो अँगुली ही लिखूंगा
     
        Mohammad Anas बारीकियों से वाकिफ़ कराने हेतु धन्यवाद सर !
      
        Pankaj Mishra sir, daaku aangulimaal tha ya unglimaal!!!!!! mujhe lagta hai aangulimaal tha aur jo galat likhte hai vo likhen. sahi shabd aanguli hi hona chahiye. hamare haath me anguliyan hoti hai ungliyan nahin.
       
        Triveni Prasad Pandey शुक्रिया सर
        
        Shyam Parmar अर्तार्थ वास्तविक जानकारी के साथ साथ प्रचलन का भी ख्याल रखा जाए ?
         
        Manish Jha तो फिर उस डाकू का नाम ''अंगुलिमाल'' था कि ''उंगलीमाल'' ?
         
        Qamar Waheed Naqvi डाकू अंगुलिमाल था.
         
        Amit Bhatt एक देसी तरीके से नापने के लिए भी तो 'अंगुल' इकाई का इस्तेमाल होता है। सो अंगुलि ही सही है। हां, उस डाकू का नाम भी अंगुलिमाल ही तो पढ़ा है अब तक।
         
        Dhananjay Singh अँगुलि से बना अँगुल अभी भी नाप के लिए कई जगहों पर बोला जाता है ।
        काश फ़ारसी और सँस्कृत को स्कूलों में अनिवार्य किया जाता; भाषा सुधर जाती ।
         
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Leena Kumar : सर, क्या बताएंगे कि अंशकालिक और अंशकालीन में कोई फर्क है क्या ? part time (जैसे part time job ) की हिन्दी क्या होगी?

Qamar Waheed Naqvi : यहाँ "अंशकालिक" सही है, लेकिन मेरे ख्याल से "पार्ट टाइम नौकरी" लिखना ज्यादा बेहतर होगा. कारण यह कि आम बोलचाल में कोई "अंशकालिक" नहीं बोलता. बोलचाल की भाषा हमेशा सहज होती है, क्योंकि हम बोलते समय आमतौर पर ऐसे शब्द चुनते हैं, जिन्हें बोलने में कम से कम प्रयास करना पड़े.

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Shishir Singh : सर मेरे शहर के एक बड़े अखबार के स्थानीय संस्करणों में ' कॉलोनी' की जगह कॉलनि प्रयोग होता है, क्या ये सही है? कॉलोनी की सही वर्तनी भी बताइगा। इसके अलावा अन्य भाषा के शब्दों को देवनागरी में लिखते वक्त किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए कि उनकी शुद्ध वर्तनी लिखी जा सके। ( कमेटी और कमिटि इस पर भी प्रकाश डालिएगा।

Qamar Waheed Naqvi : अंग्रेजी में सही उच्चारण "कॉलनि" के ही निकट है, लेकिन हिन्दी में आमतौर पर "कालोनी" ही प्रचलित है. इसी तरह COMMITTEE का सही उच्चारण "कमिटी" है, लेकिन ज़्यादातर "कमेटी" ही लिखा जाता है. अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी में किस रूप में लिखा जाय, इस विषय पर काफी मतभेद है. विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी के स्वभाव के अनुसार ढाल कर इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन आजकल दूसरा एक बड़ा वर्ग इस बात का पक्षधर है कि अंग्रेजी शब्दों को ठीक वैसे ही लिखा जाना चाहिए, जैसा कि अंग्रेजी में उनका मूल उच्चारण होता है. अगर दूसरे वर्ग के तर्क को माना जाय तो "कॉलनि" और "कमिटी" ही सही बैठेंगे.

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Shishir Singh : ‎'असरहीन' के बहाने आपने अपने एक पोस्ट में बताया था कि किस तरह एक गलत संधि का प्रयोग होता है। एक और जिज्ञासा है सर। अखबारों में लिखा जाता है कि 'भारी संख्या में भीड़ जुटी' यहाँ ज्यादा या बड़ी के स्थान पर भारी को प्रयोग करना क्या उचित है? (अगर कारण हो तो कारण भी बताने की कृपा करें।)

Qamar Waheed Naqvi : सही है— "बड़ी संख्या में भीड़ जुटी". "संख्या" भारी कैसे होगी? तकनीकी रूप से भारी वह चीज़ होगी, जिसमें भार या वज़न होगा. संख्या ज्यादा या कम होगी, इसलिए ज्यादा संख्या को "बड़ी संख्या" कहना ही उचित होगा.

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Harishankar Shahi : सर, लेख में "किन्तु" "परन्तु" "आखिर" "फिर" इन जैसे शब्दों का प्रयोग कम से कम होना चाहिए, या इनके प्रयोग को लेकर कोई ऐसा आदर्श प्रतिबंध बनाने की आवश्यकता नही होती है. सर वाक्य की शुरुआत इन शब्दों से करना उचित होता है या नहीं.

Qamar Waheed Naqvi : इस विषय में यह आप पर निर्भर है कि आप इन शब्दों का कितना प्रयोग करना चाहते हैं. इन शब्दों से वाक्य शुरू करने में कुछ भी ग़लत नहीं है.

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Akhilesh Sharma : दादा। एक शब्द बहुत चल निकला है। बवाल। मुझे किसी ने बताया कि इसका शाब्दिक अर्थ अलग है, लेकिन चैनलों पर इसका प्रयोग विवाद, मतभेद या हंगामे के लिए होने लगा है। कृपया प्रकाश डालें। दूसरा है कहीं न कहीं। जब रिपोर्टरों को कुछ नहीं सूझता तो इसका इस्तेमाल एक ही वाक्य में दो-तीन बार कर डालते हैं। जैसे अंग्रेजी के रिपोर्टर यू नो, यू नो करते हैं।

Qamar Waheed Naqvi : अखिलेश जी, सही शब्द वबाल है, बवाल नहीं. यह अरबी भाषा का शब्द है, लेकिन आजकल "बवाल" शब्द ही प्रचलन में है, इसलिए इसी को सही मानिए. बवाल (सही शब्द : वबाल) का अर्थ है: बखेड़ा, फसाद, झंझट, मुसीबत, विपत्ति, आपदा आदि. मेरे ख्याल से टीवी चैनलों में यह प्रायः इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है. "बवालेजान" (सही है वबालेजान या वबालेजां) का अर्थ है : जान का जंजाल, प्राणों के लिए मुसीबत. टीवी पत्रकार अकसर "कहीं न कहीं" का इस्तेमाल करते हैं तो इसमें कोई ख़ास बुराई नहीं है. ज्यादा समस्या है बार-बार उनके "जी बिलकुल" बोलने पर, जो न सिर्फ बेकार में बिना किसी मतलब के बोला जाता है, बल्कि कई बार एंकर जो सवाल पूछता है, रिपोर्टर "जी बिलकुल" कह कर केवल उसकी पुष्टि करता है, चाहे वहां ऐसा करने की कोई ज़रुरत न हो. जैसे, एंकर ने पूछा, "क्या आपको लगता है कि दुर्घटनास्थल दूर होने कारण राहत पहुंचाने में देर हुई?" और रिपोर्टर ने जवाब शुरू किया, "जी बिलकुल….."

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Qamar Waheed Naqvi : हिन्दी में हजारों शब्दों को लेकर विवाद कई दशकों से चल रहा है कि वे पुल्लिंग हैं या स्त्रीलिंग. "सोच" और "आत्मा" दो ऐसे शब्द हैं जो मूल संस्कृत में पुल्लिंग हैं, लेकिन हिन्दी में जनसामान्य वर्ग इन्हें प्रायः स्त्रीलिंग के तौर पर इस्तेमाल करता है. इसी तरह संस्कृत में "गरिमा", "लघिमा", "अग्नि" आदि शब्दों को पुल्लिंग माना गया है, लेकिन हिन्दी में ये सभी शब्द स्त्रीलिंग में ही प्रयोग में लाये जाते हैं. फिर कुछ ऐसे हिन्दी के शब्द हैं, जिन्हें लेकर खुद हिन्दी के बड़े कोशकार एकमत नहीं हो पाये हैं, जैसे "झंझट" शब्द को नागरी प्रचारिणी सभा के कोशकार स्त्रीलिंग मानते हैं, तो अन्य बहुत से कोशकार इसे पुल्लिंग मानते हैं. (स्रोत: ज्ञानमंडल कोश की भूमिका) और फिर हिन्दी और उर्दू में आपस में इतना घालमेल है कि कई बार भ्रम पैदा होता है. जैसे प्याज़. बात १९८४ की है. उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स, लखनऊ में उप-सम्पादक था. एक दिन एक खबर बनाते हुए मैंने शीर्षक लगाया, "प्याज़ महँगी हुई", तभी हमारे स्थानीय सम्पादक श्री रामपाल सिंह की नज़र उस पर पड़ गयी. वह बोले, "पंडित जी, प्याज़ महँगी नहीं, महंगा होता है." मुझे आश्चर्य हुआ. बचपन से मैं प्याज़ को स्त्रीलिंग मानता आ रहा था. मैंने फ़ौरन उर्दू-हिन्दी कोश (उन दिनों प्रायः सभी अच्छे अख़बारों के न्यूज़ रूम में उर्दू-हिन्दी, अंग्रेजी-हिन्दी और एक अच्छा हिन्दी कोश ज़रूर होता था) उठाया और रामपाल जी को दिखाया कि इसमें तो प्याज़ को स्त्रीलिंग लिखा गया है. उनहोंने कहा कि उर्दू में होता होगा, हिन्दी में तो यह पुल्लिंग ही है. फिर हिन्दी कोश देखा गया. उसमें प्याज़ को पुल्लिंग लिखा गया था. इसलिए, यह विवाद इतना आसान नहीं कि हम-आप इसे चुटकियों में सुलझा लें. जब तक भाषा रहेगी, इस तरह के विवाद चलते रहेंगे और इन्हीं के बीच से समाधान भी निकलता रहेगा.

        Salma Zaidi इसी तरह चर्चा को लेकर भी भ्रम है. उर्दू में चर्चा होता है और हिंदी में होती है.
 
        Girijesh Vashistha सर दही के लिंग को लेकर भी काफी विवाद है । कहीं ये खाई जाती है तो कहीं खाया जाता है ।

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Qamar Waheed Naqvi : "कार्रवाई" और "कार्यवाही" — देखने में इन दोनों शब्दों में ज्यादा फ़र्क समझ में नहीं आता, लेकिन इनके अर्थ बिलकुल अलग-अलग हैं.  "कार्रवाई" कहते हैं "एक्शन" (ACTION) को और "कार्यवाही" कहते हैं "प्रोसीडिंग"(PROCEEDINGS) को. उदाहरण के तौर पर संसद या विधानसभा के सदनों में जो कामकाज हुआ, उसे कहेंगे "कार्यवाही". और सरकार ने जो कदम उठाये, किसी मामले में जो 'एक्शन' लिया, उसे कहेंगे "कार्रवाई".

    कुछ उदाहरण:

    १. दवाओं में मिलावट रोकने के लिए सरकार ने अफसरों को कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिये हैं.
    २. पुलिस ने बदमाशों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में ढिलाई बरती.
    ३. सरकार ने एलान किया कि टैक्स चोरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई तेज़ की जायेगी.

    ऊपर के तीनों उदाहरण "एक्शन" (ACTION) को बता रहे हैं. अब ये उदाहरण देखें:

    १. विपक्ष के शोर-शराबे के कारण विधानसभा की कार्यवाही दो घंटे ठप्प रही.
    २. सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों से कहा है कि वे अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग करते समय ध्यान रखें कि तथ्यों को सही तरह से पेश किया जाये.
    ३. जांच आयोग ने मामले की सुनवाई की अपनी कार्यवाही पूरी कर ली है.

    ऊपर के सभी उदाहरणों में "प्रोसीडिंग" (PROCEEDING) की बात हो रही है. यानी विधानसभा, अदालत और जांच आयोग में जो कामकाज हुआ, वह है "प्रोसीडिंग" और उसे कहा जायेगा "कार्यवाही".

    अब एक और उदाहरण देखें:
    अदालती कार्यवाही में बाधा डालने कोशिश कर रहे एक युवक के ख़िलाफ़ अदालत ने पुलिस को तुरंत कार्रवाई करने के निर्देश दिये.

    इस उदाहरण से साफ़ हो जायेगा कि "कार्यवाही" और "कार्रवाई" में क्या फ़र्क है.

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Qamar Waheed Naqvi : उर्दू के कुछ शब्द बहुत ज्यादा इस्तेमाल होते हैं. जैसे मुहम्मद, मुहल्ला, मुहताज, मुहब्बत आदि. अक्सर लोग इन्हें "मोहम्मद", "मोहल्ला", "मोहताज", "मोहब्बत" लिखते हैं जो ग़लत है.

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Qamar Waheed Naqvi : नयी दिल्ली सही है या नई दिल्ली? हुए सही है या हुये? लिए सही है या लिये? स्थायी सही है या स्थाई? उत्तर है: हिंदी के जो शब्द 'आ' पर समाप्त होते हैं, वे 'ए' और 'ई' के द्वारा अपना रूप बदलेंगे. जैसे 'हुआ' में बदलाव होगा : 'हुए' और 'हुई.' और जो शब्द 'या' पर ख़त्म होते हैं उन्हें 'य' पर ही पूरा किया जाएगा. जैसे 'नया' को 'नये' और 'नयी' में ही बदला जाना चाहिए. इसी तरह रूपये लिखना सही है, रुपए ग़लत है क्योंकि 'रुपया' का अंत 'या' पर होता है, 'आ' पर नहीं. उम्मीद है ये आसान सा नियम समझ में आ गया होगा. इसी तरह अंग्रेजी के फॉर शब्द के लिए लिखा जाएगा 'लिए', लेकिन अंग्रेजी के टेक शब्द के लिए लिखा जाएगा 'लिये.' एक उदहारण देखें : दर्जी ने कमीज़ सीने के लिए सौ रूपये लिये. हिंदी में 'स्थाई' कोई शब्द नहीं होता , ये लिखना ग़लत है. सही है 'स्थायी' और इससे बनता है 'स्थायित्व.' अक्सर मैं देखता हूँ कि लोग 'स्थाई' और 'स्थाईत्व' लिखते हैं, ये दोनों ही ग़लत हैं.

        Ashish Awasthi Very good information …. n useful too … thanks Waheed saheb !!!!!!
 
        Rajeev Mittal आपको अपने बीच पाकर बहुत अच्छा लगा……अब आप जल्दी से फेसबुक मित्र बानिये और मेरे नोट्स का लुत्फ़ उठाइये
 
        Akhilesh Sharma वैसे तो दोनों ही सही हैं। ये जनसत्ता और नवभारत टाइम्स का विवाद था। जिसमें जीत जनसत्ता की हुई। अब रेलवे स्टेशन को छोड़कर कहीं भी नयी दिल्ली नहीं दिखता। नई दिल्ली ही चल निकला है।
    
        Qamar Waheed Naqvi अखिलेश जी, भला दोनों कैसे सही हो सकते हैं? सही तो कोई एक ही हो सकता है और सही "नयी" ही है. और ये विवाद जनसत्ता और नवभारत टाइम्स का नहीं था. जो वर्तनी मैं बता रहा हूँ, वह अज्ञेय जी ने आगे बढ़ाई थी और तब जनसत्ता का कहीं दूर- दूर कोई पता नहीं था. बाद में जब राजेंद्र माथुर जी नवभारत टाइम्स के सम्पादक बने तो उन्होंने "नई", "गई" चलाया, बाद में सरकारी तंत्र ने इसे अपना लिया. लेकिन सरकारी हिंदी की रचना किस मानसिकता के लोगों ने की और किस तरह से उसको जड़ बना दिया, ये हम सब जानते हैं. इसी का नतीजा है की सरकारी हिंदी में लिखी विज्ञप्तियों को समझना टेढ़ी खीर बन गया है. देवनागरी बहुत वैज्ञानिक लिपि है और इसके साथ पिछले बीस-पच्चीस सालों में काफी अतार्किक छेड़छाड़ की गयी, जिस पर मैं आगे भी लिखूंगा. आज के सोशल मीडिया के ज़माने में पुरानी ग़लतियों को सुधार सकने की उम्मीद दिख रही है.
      
        Akhilesh Sharma धन्यवाद दादा। अपनी अज्ञानता के लिए क्षमा चाहता हूँ। मैं तो अब भी चँद्र बिंदु का प्रयोग करना चाहता हूँ लेकिन कोई अनुमति नहीं देता। आपसे फिर सीखने का अवसर मिल रहा है ये मेरे जैसे लोगों के लिए सौभाग्य का विषय है।
       
        Akhilesh Sharma आप फेसबुक पर फ्रेंड बनने का भी अवसर दें। पेज पर बातचीत ज़रा मुश्किल होती है।
        
        Vijay Rana Great Naqvi Saheb, Hindi journalists really like this kind of guidance. I think everyone who works in Hindi must join this page.
         
        Vijay Rana Akhilesh and Alok pl send this page to as many people as possible.
         
        Alok Joshi ‎Vijay Bhai you can also share this on your wall and spread the message.
         
        Vijay Rana Surely Alok, I will.
         
        Hemant Joshi नकवी जी..कृपया इसका स्वनिम शास्त्रीय तर्क भी समझा दें…
         
        Sandeep Kumar इसका मतलब मेरा प्रिय अखबार रहा 'नई दुनिया' अपना नाम ही गलत लिखता रहा है शुरू से
         
        Swati Arjun बहुत शुक्रिया…काफी ज्ञानवर्धक जानकारी है ये….आपको फॉलो करती रहूंगी..
         
        Qamar Waheed Naqvi हेमंत जी, मैंने वह तर्क अपने पोस्ट में दिया है. जो शब्द "या" पर समाप्त होते हैं, जैसे नया, गया, किया, लिया, गाया, जाया (मैं अकसर वहां जाया करता हूँ), वे सभी "यी" और "ये" पर आकर ठहरेंगे, जैसे: नयी, गयी, किये, लिये, गायी, जाये, जायेगा इत्यादि.
        जो शब्द "आ" पर ख़त्म होते हैं, वे "ई" और "ए' पर आकर रुकेंगे जैसे: हुआ से हुई और हुए बनेगा.
        अंग्रेजी के FOR को "लिए" और TAKE को "लिये" लिखा जाना चाहिए.

        हेमंत जी, मैंने वह तर्क अपने पोस्ट में दिया है. जो शब्द "या" पर समाप्त होते हैं, जैसे नया, गया, किया, लिया, गाया, जाया (मैं अकसर वहां जाया करता हूँ), वे सभी "यी" और "ये" पर आकर ठहरेंगे, जैसे: नयी, गयी, किये, लिये, गायी, जाये, जायेगा इत्यादि.
        जो शब्द "आ" पर ख़त्म होते हैं, वे "ई" और "ए' पर आकर रुकेंगे जैसे: हुआ से हुई और हुए बनेगा.

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Qamar Waheed Naqvi : संसार की हर भाषा उन सभी भाषाओं से शब्द लेती है, जो उसके संपर्क में आती हैं. और जो भाषाएँ अपने दरवाज़े बंद रखती हैं और किसी दूसरी भाषा के शब्दों को अन्दर नहीं आने देती हैं, वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं. अपने विकास क्रम में भाषाएँ कई प्रकार से पनपती, बिगड़ती, बदलती, एक-दूसरे से घुलती- मिलती, एक- दूसरे के शब्दों को ग्रहण करती हुई आगे बढती हैं. उदाहरण के तौर पर हिन्दी में तुर्की भाषा के करीब सात हज़ार से ज्यादा शब्द हैं. अरबी- फ़ारसी के भी हज़ारों शब्द हैं. अंग्रेजी शब्द तो ख़ैर बहुत ही ज्यादा हैं और नित नये-नये शब्द जुड़ते जा रहे हैं. इस प्रक्रिया में भाषा समृद्ध होती है और भाषा के विकास की यह एक स्वाभाविक, महत्वपूर्ण और आवश्यक प्रकिया है. उदाहरण के तौर पर किताब तुर्की भाषा का शब्द है, अचार फ़ारसी का और अबीर अरबी भाषा का. इसी तरह अंग्रेजी में GURU जैसे शब्द हिन्दी से गये हैं.

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Qamar Waheed Naqvi : ताज़ा हमेशा "ताज़ा" ही रहेगा. कई बार लोगों को लिखते देखा है: ताज़ी सब्जियां. "ताज़ा" का स्त्रीलिंग नहीं बनता. उसे हमेशा "ताज़ा" ही लिखा जाएगा, चाहे उसे किसी भी शब्द से जोड़ा जाये. "ताज़ी" शब्द का मतलब है : अरबी भाषा, अरब का घोड़ा, शिकारी कुत्ता, अरब का रहनेवाला.

        Nitin Pradhan शुक्रिया सर, मैंने ताजा को ताजी तो कभी नहीं किया, लेकिन ताजी का यह अर्थ भी नहीं पता था।
 
        Rajiva Joshi दरअसल, ताजा तुर्की भाषा से लिया गया शब्द है और यहाँ आज भी प्रयुक्त होता है| यहाँ ताजा सब्जी को "taze sebze" कहते हैं|

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साधना टीवी को निलय सिंह एवं हिंदुस्‍तान को सुनील सिंह ने अलविदा कहा

: अजय यादव नए प्रभारी बनाए गए : साधना न्‍यूज, रांची से खबर है कि निलय सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे चैनल में ब्‍यूरोचीफ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. निलय ने अपनी नई पारी रांची में ही आर्यन टीवी के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. निलय साधना की लांचिंग के समय से जुड़े़ हुए थे. वे इसके पहले सहारा तथा बीएजी को भी लंबे समय तक अपनी सेवाएं दे चुके हैं. निलय पिछले बारह सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी गिनती झारखंड के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. निलय के आर्यन ज्‍वाइन करने की पुष्टि झारखंड स्‍टेट हेड सर्वेश सिंह ने भी की.

हिंदुस्‍तान, हरिद्वार से खबर है कि सुनील सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे प्रभारी के रूप में अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. सुनील की जगह अजय यादव को हरिद्वार में अखबार का नया इंचार्ज बनाया गया है. सुनील अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. सुनील काफी समय से अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

जागरण, इलाहाबाद से पवन सक्‍सेना का इस्‍तीफा

दैनिक जागरण, इलाहाबाद से वरिष्‍ठ पत्रकार पवन सक्‍सेना ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा दैनिक जागरण के प्रबंधक को फैक्‍स से भेज दिया है. इस्‍तीफे की मूल कॉपी रजिस्‍टर्ड डाक से भेजी है. पवन का स्‍थानांतरण कुछ समय पहले ही बरेली से इलाहाबाद के लिए किया गया था. वे एक दशक से ज्‍यादा समय से बरेली में जागरण को अपनी सेवा दे रहे थे. वे बरेली में सिटी चीफ के रूप में कार्यरत थे.

तबादले के बाद से ही पवन मेडिकल पर चल रहे थे. पवन की गिनती जागरण, बरेली के पूर्व महाप्रबंधक चंद्रकांत त्रिपाठी के खास लोगों में की जाती थी. माना जा रहा है कि देरसबेर पवन सीकेटी के किसी प्रोजेक्‍ट के साथ दिख सकते हैं. जागरण के पहले भी पवन कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पूछे जाने पर पवन ने अपने इस्‍तीफे की पुष्टि की तथा इसे व्‍यक्तिगत कारणों से दिया गया इस्‍तीफा बताया.

जयकांत शर्मा स्‍मृति फोटो प्रतियोगिता के लिए प्रविष्ठियां आमंत्रित

उदयपुर। मोहनलाल सुखाडिया विश्‍वविद्यालय उदयपुर के पत्रकारिता विभाग और लेकसिटी प्रेस क्‍लब उदयपुर के संयुक्‍त तत्‍वावधान में राज्‍य स्‍तरीय जयकान्‍त शर्मा स्‍मृति फोटो प्रतियोगिता के लिए राजस्‍थान के फोटो पत्रकारों से 15 जुलाई तक प्रविष्ठियां आमन्त्रित की गई है। सुखाडिया विश्‍वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रभारी डा. कुंजन आचार्य ने बताया कि सुविवि के स्‍वर्ण जयन्‍ती वर्ष के उपलक्ष्‍य में आयोजित की जा रही इस प्रतियोगिता के लिए 1 जुलाई 2011 से 30 जून 2012 के बीच समाचार पत्रों में प्रकाशित छायाचित्रों को प्रवि‍ष्‍ठी के तौर पर भेजा जा सकता है।

उन्‍होंने बताया कि फोटो पत्रकार इसके लिए 12 गुणा 15 आकार के मूल फोटो के साथ अखबार में प्रकाशित उक्‍त फोटो की कतरन संलग्‍न कर के- लेकसिटी प्रेस क्‍लब, रैन बसेरा के उदयपुर प्रथम तल, सूचना केन्‍द्र के सामने, चेतक सर्किल उदयपुर के पते पर डाक द्वारा तथा इसी प्रविष्ठि की एक साफ्ट प्रति acharyakunj@gmail.com पर ईमेल कर दे। प्राप्‍त होने वाली प्रविष्ठियों की एक प्रदर्शनी उदयपुर के सूचना केन्‍द्र में लगाई जाएगी जहां विशेषज्ञ टीम मूल्‍यांकन करगी। प्रथम विजेता को 7500, द्वितीय विजेता को 5000 तथा तृतीय स्‍थान पर रहने वाली प्रविष्‍ठी को 2100 रुपए नकद पुरस्‍कार, प्रमाण पत्र तथा स्‍मृति चिन्‍ह प्रदान किया जाएगा। यह प्रतियोगिता वरिष्‍ठ फोटो पत्रकार रहे स्‍वर्गीय जयकान्‍त शर्मा की स्‍मृति में आयोजित की जाती है।

उल्‍लेखनीय है कि गत वर्ष इसी प्रतियोगिता के अवसर पर सुखाडिया विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो इन्‍द्र वर्द्धन त्रिवेदी ने घोषणा की थी कि विश्‍वविद्यालय के स्‍वर्ण जयन्‍ती वर्ष के उपलक्ष्‍य में अगले वर्ष यह प्रतियोगिता विश्‍वविद्यालय आयोजित करेगा। इसी क्रम में हाल ही लेकसिटी प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष अख्‍तर हुसैन तथा महासचिव मनु राव ने कुलपति के साथ इस सम्‍बन्‍ध में चर्चा की थी।

गहलोत सरकार नियम ताक पर रखकर देती है अधिस्‍वीकरण

राजस्थान सरकार का सूचना और जनसंपर्क विभाग बेचारा पत्रकारों के अधिस्वीकरण के नियम और कायदे निर्धारित करता है और मुख्य मंत्री का कार्यालय इन नियम कायदों की धज्जियां उड़ाता है. दूसरा कार्यकाल संभालते ही गहलोत सरकार ने राज्य में पहली बार वर्ष 2009 में तीन ऐसे फोटो-पत्रकारों को “विशिष्ट प्रकरण” मान कर अधिस्वीकरण किया वो भी स्वतंत्र फोटो पत्रकार के रूप में और उसके बाद ये “एहसान”  अब 2012 तक किसी अन्य पर नहीं किया गया.

सूचना के अधिकार के बावत मांगी सूचना के अनुसार (क्र./प्रस्था/सू.अ./40/2012/7439/7-5-12/सू.ज.सं विभाग/राजस्थान सरकार) स्वतंत्र फोटो-पत्रकार के लिये कम से कम 25 वर्ष का अनुभव, न्यूनतम आयु 45 वर्ष और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता “सीनियर सेकेंडरी अथवा समकक्ष परीक्षा उतीर्ण होना आवश्यक है. विजय दिवाकर द्वारा मांगी गयी आरटीआई सूचना के अनुसार मुख्‍यमंत्री ने विशिष्ट प्रकरण मानते हुए, एक ऐसे फोटो-पत्रकार रोहित जैन पारस को स्वतंत्र पत्रकार का अधिस्वीकरण 2009 में दे दिया जब वो 33 वर्ष का था और वह सीनियर सेकेंडरी भी फेल है. आजीविका पत्रकारिता पर आश्रित होना भी आवश्यक है, पर चूंकि वे फोटो स्टूडियो भी चलाते हैं, इसलिये मुख्‍यमंत्री कार्यालय ने ये प्रमाण-पत्र भी मांगना आवश्यक नहीं समझा. आवेदक के आचरण के संबंध में जिला मजिस्ट्रेट का सत्यापन भी आवश्यक होता है, मगर इसकी चिंता भी सीएमओ ने नहीं की. दिलचस्प बात ये है कि प्रार्थी के पास केवल जिले स्तर के पेपर्स में एक-दो फोटो देने का ही 12 साल का ही अनुभव बताया गया है. यानी वह 20 साल की उम्र से कथित फोटो-जर्नलिस्ट है.

आखिर सीएमओ ने ये अनुकंपा इस पर क्यों दिखाई? ऐसी क्या मजबूरी थी जो तीन जनों रोहित जैन पारस (दो अन्य महेश आचार्य, उत्तम कुमार जोशी की सूचना उपलब्ध नहीं हुई) को अधिस्वीकरण का कानूनी अधिकार दे दिया. जिसके तहत रोहित जेडीए की एक नयी सरकारी योजना में एक भूखंड प्राप्ति की चयन सूची में आ गया है, जबकि एक जेडीए प्लाट पत्रकार कोटे में इसके पिता के पास भी है, जिसमें ये रह रहे हैं. कम से कम दस ऐसे फोटो जर्नलिस्ट होंगे जो वर्षों से अधिस्वीकरण के लिये हर साल आवेदन करते हैं. मगर मुख्‍यमंत्री के पत्रकार सलाहकार मंडली से ये जेन्‍युइन फोटो-पत्रकार दूर हैं. रोहित कुछ ऐसे प्रिंट पत्रकारों को ओब्लाईज्ड करता है जो मुख्‍यमंत्री के सलाहकार मंडल में हैं और जिनकी एप्रोच पर बिना कानूनी पेचिदिगियां देखे मुख्‍यमंत्री ने इन्हें विशिष्ट प्रकरण मानकर अधिस्वीकरण की फाईल पर मोहर लगा दी. रोहित के बायोडाटा के अनुसार वे कम से कम एक दर्जन पत्रों के लिये, जिनमें द हिंदू, पीटीआई, टेलीग्राफ में वे फ्रीलांसिग करते हैं. ताज्जुब ये कि इन संस्थाओं ने ऐसी एक भी चिट्ठी नहीं दी जो सू.ज.सं विभाग अपने उपरोक्त पत्र में जवाब में लगा सकता. सादे आवेदन पर बिना किसी राजपत्रित अधिकारी के एटेस्टेड के मुख्‍यमंत्री के सलाहाकार मंडल से रेवड़ी मिल जाना राजस्थान में अनूठी मिसाल और गैर कानूनी अपवाद है.

ब्रेकिंग न्‍यूज ने रुकवा दी सरबजीत की रिहाई?

विदेश मंत्रालय सोता रहा और नींद के आगोश में हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने पाकिस्तान को सरबजीत की रिहाई पर बधाई भी दे दी. सवाल ये है कि अगर हमारी सरकार को पाकिस्तानी सरकार की तरफ से सरबजीत की रिहाई के बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं थी, तो विदेश मंत्री को बधाई देने की जल्दी क्यों थी? सरबजीत पाकिस्तान के लाहौर की कोटलखपत जेल में मनप्रीत नाम के किसी शख्स की सज़ा काट रहा है. अपने आप में ये बेहद हैरान कर देने वाला मामला है जिसमें एक शख्स किसी दूसरे के नाम से सज़ा काट रहा है. पाकिस्तानी सरकार और वहां का सुप्रीमकोर्ट सरबजीत को सरबजीत मानने के लिए ही तैयार नहीं है. वो तो उसे मनप्रीत मान कर सजा दे चुका है. तो फिर कैसे बदला सारा घटनाक्रम… कैसे अचानक हुई सरबजीत की रिहाई की घोषणा.. और उसके छह घंटे बाद कैसे पाकिस्तान पलट गया?

अगर इस मामले में भारतीय मीडिया ने जल्दबाजी ना दिखाई होती तो शायद पाकिस्तान पलटी नहीं खाता. हुआ यूं कि बीते दिनों भारत ने एक चर्चित पाकिस्तानी कैदी की रिहाई की थी, जिसके बाद से ही पाक राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी पर भी एक कदम आगे बढ़ाने का अंतर्राष्ट्रीय दबाव काम कर रहा था. ज़रदारी ने काफी सोच विचार के बाद सरबजीत की रिहाई का ये ऐतिहासिक फैसला लिया था. ज़रदारी ये अच्छी तरह जानते थे कि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित सरबजीत के केस में रिहाई का फैसला उन्हें पश्चिमी देशों ख़ास कर अमेरिका में खासी वाह-वाही दिलाएगा. लेकिन उन्हें इस बात का भी डर था कि घरेलू स्तर पर कट्टरपंथी उनके इस निर्णय से नाराज़ भी हो सकते हैं. इसके अलावा उन्हें आईएसआई और सेना की भी नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है. पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट सरबजीत को फांसी की सजा सुना चुका है और आईएसआई के साथ पाकिस्तानी सेना भी सरबजीत की रिहाई के पक्ष में नहीं है. फिर भी ज़रदारी ने इन बड़ी ताकतों पाकिस्तानी सेना, सुप्रीम कोर्ट और आईएसआई को नजरअंदाज़ कर जोखिम उठाया. जिससके बाद पाक कट्टरपंथी जमात की भौंहे तन गईं थी.

इसे सरबजीत और उसके परिवार की बदकिस्मती ही कहेंगे कि सरबजीत की रिहाई की आधिकारिक घोषणा होने के पहले ही ये खबर लीक हो गई. सरबजीत का केस बेहद चर्चित होने की वजह से ये खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई. पाकिस्तानी मीडिया में इस पर मिली जुली प्रतिक्रया आई. लेकिन वहां के मीडिया ने सरबजीत की रिहाई पर सवाल भी उठाया. पाकिस्तानी मीडिया ने कट्टरपंथियों की भावनाओं के मुताबिक़ सरबजीत का इकबालिया बयान वाला टेप भी दिखाया. इधर पाकिस्तानी मीडिया की खबरों के आधार पर भारत में भी सरबजीत की रिहाई की खबर ब्रेकिंग न्यूज़ बना दी गई. बधाई और खुशियों के सन्देश बांटे जाने लगे. पंजाब सहित देश के कईं हिस्सों में खुशी की लहर दौड़ गई. दोनों देशों के बीच सम्बन्ध मजबूत होने का पुराना राग अलापा जाने लगा. ये बात भला पाकिस्तान की कट्टरपंथी जमात को कैसे रास आ सकती थी?

सबसे बड़ी बात… ज़रदारी ने ये फैसला उस वक्त लिया था जब वो प्रधानमंत्री यूसुफ़ राजा गिलानी को खो चुके थे. ज़रदारी को बचाने के फेर में गिलानी का पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने तख्ता पलट कर दिया था. इसलिए ज़रदारी पहले से ही बेहद दबाव में थे. इस नाजुक वक्त में वो पाकिस्तान की तीन बड़ी ताकतों (सेना, सुप्रीम कोर्ट और आईएसआई) को नाराज नहीं कर सकते थे. अगर पाकिस्तानी सरकार सरबजीत की रिहाई की कोई आधिकारिक घोषणा कर देती तब ज़रदारी के लिए अपने कदम पीछे खींचना मुश्किल था. लेकिन चूंकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, इसलिए पाकिस्तान के लिए पलटी मारने के लिए पूरा मैदान खाली था. और मौके की नजाकत को भांपते हुए ज़रदारी ने इसमें ज़रा भी देर नहीं की. निष्कर्ष ये कि अगर सरबजीत की रिहाई की खबर की आधिकारिक पुष्टि होने तक हम संयम बरतते और उसे प्रसारित नहीं करते तो ज़रदारी के लिए अपने कदम पीछे खींचना नामुमकिन हो जाता… और सरबजीत की रिहाई निश्चित मानी जा सकती थी.

लेखक योगेश गुलाटी टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

पिंक सिटी प्रेस क्‍लब में कर्मचारियों को पीटने वालों का सम्‍मान!

: कानाफूसी : देशभर में अपना अलग स्थान रखने वाला पिंक सिटी प्रेस क्लब जयपुर इन दिनों आपसी विवादों का अड्डा बन गया है। आलम यह यह हैं कि क्लब के पदाधिकारियों की मौजूदगी में बाहरी तत्वों ने क्लब के कर्मचारियों की धुनाई की। इससे नाराज कर्मचारी एक एक कर नौकरी छोड़कर जा रहे हैं। पीड़ित कर्मचारियों को डरा धमकाकर उल्टा फंसाने की बात की जा रही है।

पिछले दिनों प्रेस क्लब के सामने आरएसटी वोल्वो का ऑफिस खुला है। इसके संचालक ने जब गाड़ियां प्रेसक्लब के सामने लगाना शुरू की तो एक अखबार के फोटो ग्राफर ने उसे मना किया इस पर तिलमिलाए वोल्वो संचालक और उसके कर्मचारियों ने फोटोग्राफर की जमकर धुनाई की। बीच बचाव करने पहुंचे प्रेस क्लब के कर्मचारियों को भी वोल्वो संचालक ने जमकर धुना। इसके कुछ समय बाद प्रेस क्लब के पदाधिकारी पहुंच गए तथा मामला शांत कराने का आश्‍वासन दे दिया। इसके बदले वोल्वो संचालक को प्रेस क्लब का एसोसिएट सदस्य बनाने के लिए पैसों की मांग की गई। चर्चा तो यह भी है कि कुछ पदाधिकारियों ने इसके बदले मोटी रकम भी वसूली है। फोटोग्राफर तथा कर्मचारियों की धुनाई करने वाले वोल्‍वो संचालक के खिलाफ मामला दर्ज करवाने की बजाय प्रेस क्लब के पदाधिकारी उसको ससम्मान क्लब में लेकर आए और मिठाइयां भी बांटी, इतना ही नही उसे क्लब में खाना भी खिलाया।

यह बात प्रेस क्लब के सदस्यों में फैलने के बाद थू थू हो रहा है। वहीं अपने ही चुने हुए पदाधिकारियों को हटाने के लिए जनरल मीटिंग की तैयारियां भी शुरू हो गई है। प्रेस क्लब में पत्रकारों और कर्मचारियों के साथ हाथापाई और बदतमीजी होना आम बात हो गई है। बहुत से पत्रकारों ने क्लब का रास्ता ही छोड़ दिया। वहीं जो आते भी हैं उनके मन में भी हमेशा भय बना रहता है। क्लब में घटिया खाना परोसा जाने की भी शिकायत है।  ग्रीष्म कालीन गतिविधियों में भाग लेने वाले बच्चों को काफी मायूसी हुई। बच्चों को ना तो समय पर खाना मिला, ना ही नाश्‍ता।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

यह जागरण के पतन की शुरुआत है या मानवीय गलती है

: अखबार ने प्रकाशित की दो माह पुरानी खबर : अब लग रहा है कि दैनिक जागरण के पतन की शुरुआत हो रही है. या फिर खबरों का टोटा होने लगा है. या फिर अब ऐसे ही लोग बचे रह गए हैं, जिन्‍हें खबरों से कोई लेना देना नहीं है बल्कि किसी तरह पेज भरने से मतलब है. मामला जागरण, रायबरेली का है. अखबार ने दो महीने पुराने खबर को प्रकाशित कर दिया है. खबर समस्‍यात्‍मक होती तो शायद चल जाता, पर खबर बड़े लोगों से जुड़ा हुआ है, लिहाजा पूरे रायबरेली में अखबार की छीछालेदर हो रही है.

जागरण ने आज के एडिशन में एक खबर प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है – शोभा के विवाह में आ सकते हैं सपा मुखिया व मुख्‍यमंत्री। यह खबर सपा सांसद और कुख्‍यात डकैत ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल की बेटी शोभा की शादी से जुड़ी हुई है. अखबार ने लिखा है कि इस वीवीआईपी शादी में मुलायम सिंह यादव एवं अखिलेश यादव समेत तमाम मंत्री, सांसद व विधायक आएंगे. खबर बिल्‍कुल सामान्‍य है, पर दिलचस्‍प तथ्‍य यह है कि यह शादी दो महीने पहले ही हो चुकी है. अखबार ने दो महीने बाद यह खबर दी है.

शोभा की शादी बीते 25 अप्रैल को जीआईसी मैदान पर बाराबंकी के प्रमोद कुमार के साथ हुई है. पर अखबार ने यह खबर 27 जून को प्रकाशित की है. दूसरी बात जिस जीआईसी मैदान में शादी होने की बात कही गई है, उस जीआईसी मैदान में इस समय प्रदर्शनी लगी हुई है. इस खबर के प्रकाशित होने के बाद से अखबार की पूरे रायबरेली में छीछालेदर हो रही है. हर कोई अखबार के पत्रकारों तथा प्रबंधकों पर थूक रहा है. लोग अब इसे दैनिक जागरण के पतन की शुरुआत भी मानने लगे हैं.

उल्‍लेखनीय है कि अपने को बड़ा ब्रांड मानते हुए जागरण ने अपने तमाम पुराने कर्मचारियों को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया. जिन लोगों को बाहर किया गया वे जागरण को इस स्थिति तक पहुंचाने में अपना सर्वस्‍व लगा दिया था. पर जागरण ने अपने नींव के पत्‍थरों को ही बाहर का रास्‍त दिखा दिया. कमजोर नींव का असर भी दिखने लगा है. अब खबर कहां से तथा किसकी गलती से प्रकाशित हुई ये तो जागरण का इंटर्नल मैटर है, परन्‍तु बाहर लोग चर्चा करने लगे हैं कि सैकड़ों कर्मचारियों की आह इस बनिया संस्‍थान को लगनी शुरू हो चुकी है. जल्‍द ही यह अखबार अपनी गति को प्राप्‍त होगा. 

सीरिया में न्‍यूज चैनल पर बंदूकधारियों का हमला, सात की मौत

दमिश्क : सीरिया में सरकार समर्थक टीवी चैनल अल-इखबरिया के कार्यालय पर बुधवार को बंदूकधारियों द्वारा किए गए एक हमले में सात लोग मारे गए हैं। सरकारी समाचार एजेंसी साना ने यह जानकारी दी। सीरिया की राजधानी दमिश्क के दक्षिणी इलाके में हुए इस हमले में पत्रकार एवं सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं। इस घटना से कुछ ही समय पहले राष्ट्रपति बशर अल-असद ने कहा था कि सीरिया इस समय पूर्ण युद्ध की स्थिति से गुजर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र एवं अरब लीग के दूत कोफी अन्नान ने शनिवार को सीरिया पर संयुक्त राष्ट्र के समूह की बैठक बुलाई है। बीबीसी के अनुसार घटनास्थल का दौरा करके लौटे सीरिया के सूचना मंत्री उमरान अल-जोएबी ने कहा कि कुछ लोगों को अगवा करके उनकी निर्दयता से हत्या की गई है। (एजेंसी)

घनश्‍याम कौशिक एवं विवेक आनंद की नई पारी

घनश्‍याम कौशिक ने खबरें अभीतक न्‍यूज चैनल से इस्‍तीफा दे दिया है. वे एसोसिएट प्रोड्यूसर कम एंकर के रूप में चैनल को अपनी सेवाएं दे रहे थे. घनश्‍याम ने अपनी नई पारी 4रीयल न्‍यूज के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी एसोसिएट प्रोड्यूसर कम एंकर बनाया गया है. घनश्‍याम इसके पहले जनसंदेश न्‍यूज चैनल समेत ईएसपीएन, चैनल वन और पीटीसी को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

आर्यन टीवी से विवेक आनंद ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे एंकर की जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. विवेक ने अपनी नई पारी मौर्य टीवी के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां प्रोड्यूसर कम एंकर बनाया गया है. विवेक इसके पहले भी कई चैनलों में एंकर की भूमिका निभा चुके हैं.

बौखलाए बिगड़ैल नशेड़ी ने मीडियाकर्मियों के कैमरे पर हाथ मारा

पहले तो जुहू रेव पार्टी में जमकर नशे पर थिरके और जब पुलिस छापा पड़ा और जांच रिपोर्ट पाजिटिव आई तो बिगडैड़ रईसजादे बौखला गए हैं. ऐसा ही एक मामला जुहू पुलिस थाने में देखने को मिला. मीडिया वालों के सवालों से नाराज एक बिगड़ैल नशेड़ी ने मीडिया के कैमरा पर हाथ मार दिया. मीडियाकर्मियों से बदतमीजी भी की.

रिपोर्ट पॉजिटिव पाए जाने के बाद क्रेग प्रकाश शिनॉय नामक युवक मंगलवार को जुहू पुलिस स्‍टेशन में हाजिरी लगाने आया था. वहां मौजूद मीडियाकर्मियों ने उससे कुछ सवाल पूछना चाहा तो वो बौखला गया. नाराजगी में उसने मीडिया के कैमरे पर हाथ मार दिया. मीडियाकर्मियों से भी बदतमीजी की. इतना ही नहीं बदतमीजी के बाद क्रेग शिनॉय ने अपना नाम भी बदल लिया तथा खुद को रोहन बताने लगा.

हिंदुस्‍तान में किसने किया पांच-पांच लाख रुपये का सौदा?

: कानाफूसी : यशवंतजी, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के पूर्व चेयरमैन केतन देसाई के खिलाफ सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल किया है, जिस पर 21 जुलाई को सभी आरोपियों को तलब किया गया है. मामला बरेली के एसआरएमएस मेडिकल कालेज और रुहेलखंड मेडिकल कालेज में हुए घपले को लेकर है. पूर्व स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री रामदास भी इसमें शक के दायरे में हैं. मामला सीबीआई का है इसलिए खबर लखनऊ से जारी हुई.

लखनऊ डेटलाइन से जारी इस खबर को अमर उजाला ने अपने 23 और 24 जून के अंक में इस खबर को पेज वन पर प्रमुखता से छापा है. दैनिक जागरण ने अंदर के पेज पर लीड के रूप में 23 और 24 जून को खबर दी. नए नजरिए की बात करने वाले हिंदुस्‍तान में खेल हो गया. हिंदुस्‍तान में 23 जून को खबर छपी डीसी कॉलम में उसमें भी मेडिकल कॉलेज का नाम नहीं था. सीबीआई चार्जशीट में दोनों कालेज के चेयरमैन और निदेशक का भी नाम है. हिंदुस्‍तान ने कोई नाम नहीं दिया, जबकि अमर उजाला और दैनिक जागरण ने नाम प्रकाशित किया. 24 जून को हिंदुस्‍तान ने कोई न्‍यूज ही नहीं छापी.  

इसके बाद से ही बरेली में चर्चा है कि सीबीआई खबर दबाने के लिए हिंदुस्‍तान में दोनों मेडिकल कॉलेज से पांच-पांच लाख रुपये लिए गए. पैसे लेने में एडिटोरियल विभाग के एक बड़े पत्रकार का नाम आ रहा है. चर्चा है कि यह डील मार्केटिंग के एक बंदे ने कराई. पैसे में हिस्‍सा नहीं मिलने पर बीट रिपोर्टर ने भांडा फोड़ दिया तब हंगामा शुरू हुआ. नए आए यूनिट हेड ने मामला ऊपर तक पहुंचा दिया है. खबर है कि मामले की छानीबीन होने जा रही है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

शिमला में अमर उजाला को एक और झटका, निक्‍का राम हिंदुस्‍तान पहुंचे

अमर उजाला, शिमला को लगातार झटके लग रहे हैं. पिछले कुछ समय में लगभग दस लोगों ने अखबार को बाय करके दूसरे अखबारों की तरफ रुख किया है. ताजा खबर है कि शिमला में तैनात सीनियर सब एडिटर निक्‍का राम ने अमर उजाला से इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी देहरादून में हिंदुस्‍तान के साथ शुरू कर रहे हैं. उन्‍हें यहां भी सीनियर सब बनाया गया है. निक्‍का रामपुर ऑफिस के इंचार्ज थे. वे अमर उजाला से लंबे समय से जुड़े हुए थे तथा अखबार को धर्मशाला, जालंधर समेत कई स्‍थानों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

इसके पहले सुनील डभाल भी शिमला से इस्‍तीफा देकर देहरादून में हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन कर चुके हैं. इन दोनों लोगों के अलावा सुखदेव गौतम, अनिकेत सोनी, धीरज गुरुंग, सत्‍ते महेश, पवन कुमार, सोमी प्रकाश, धनंजय शर्मा भी अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर दूसरे अखबारों से जुड़ चुके हैं. इनमें कई तो जिलों के इंचार्ज थे. लगातार इस्‍तीफे के चलते अमर उजाला प्रबंधन परेशान है.

अपनी भूमिका का पुनर्निधारण करे मीडिया : धूमल

शिमला। मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने विश्वसनीयता के संकट में चुनौतियों के दृष्टिगत मीडिया से अपनी भूमिका के पुन: निर्धारण का आग्रह किया है। मुख्यमंत्री आज चम्बा के प्रेस कक्ष में पत्रकारों को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में न केवल मीडिया बल्कि समूचा समाज बदलाव के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि कोई भी सूचना सच्चाई एवं तथ्यों पर आधारित रह कर ही लम्बे समय तक स्थाई बनी रह सकी है।

धूमल ने कहा कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने के कारण वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रेस को अपनी भूमिका का पुनर्निधारण करना चाहिए और समाज के अखण्ड विकास के लिए कार्य करना चाहिए। प्रदेश सरकार राज्य के हर वर्ग के विकास के लिए गंभीर प्रयास कर रही है, जिसके लिए मीडिया को आगे आने की आवश्यकता है ताकि समाज के निचले स्तर तक लोगों को सेवाएं एवं सूचना उपलब्ध हो सके। आज भी लोग मीडिया से ही आशा करते हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया के लिए विश्वसनीयता आवश्यक है, क्योंकि लोगों को मीडिया द्वारा दिए जाने वाले समाचार एवं विचारों पर पूर्ण विश्वास है।

धूमल ने कहा कि मीडिया को अपनी साख को बनाये रखने के लिए कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता है। प्राचीन काल से ही मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है तथा आज के आधुनिक युग में भी मीडिया की भूमिका प्रासंगिक एवं समाचीन है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में कार्यरत पत्रकारों को हर संभव सहायता एवं सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं ताकि वे सुचारू रूप से अपने कार्य का निर्वहन कर सकें। उन्होंने कहा कि राज्य में पत्रकार कल्याण कोष का सृजन किया गया है तथा पत्रकारों को बीमा छत्र इत्यादि सुविधाएं प्रदान की गई हैं। इससे पूर्व वरिष्ठ पत्रकार श्री बी.के. पराशर ने मुख्यमंत्री का स्वागत किया तथा प्रेस रूम का दौरा करने के लिए उनका आभार व्यक्त किया। चम्बा प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री शिव शर्मा ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। प्रेस क्लब के सदस्य तथा शहर के अन्य गणमान्य व्यक्ति भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

श‍िमला से विजयेन्दर शर्मा की रिपोर्ट.

आईआईएमसी के एडमिशन में फिर चलेगी डायरेक्टर सुनीत टंडन की मनमानी!

देश के सबसे प्रतिष्ठित कहे जाने वाले भारतीय पत्रकारिता संस्थान यानी आईआईएमसी में एडमिशन की प्रक्रिया आखिरी चरण में है और डायरेक्टर की मनमानी की चर्चा भी पूरे शबाब पर है। खबर है कि 28 जून से होने वाले इंटरव्यू से ऐन पहले न्यूज़ जर्नलिज्म के विभागाध्यक्ष शिवाजी सरकार को ही बोर्ड से हटा दिया गया है। इंटरव्यू बोर्ड में अब एक दूसरे सदस्य हेमंत जोशी को रख दिया गया है। ग़ौरतलब है कि हेमंत जोशी शुरुआत से ही जुगाड़ के भरोसे इस संस्थान में आए बताए जाते हैं। पिछले साल उन्हें ऐतिहासिक ढंग से बिना किसी प्रक्रिया के प्रमोशन भी दे दिया गया था।

बताया जाता है कि हेमंत जोशी को रखे जाने का आदेश अचानक मंगलवार को जारी हुआ है जिसमें ऐडमिशन कमेटी की अध्यक्ष जय चंदीराम की बजाय डायरेक्टर सुनीत टंडन के हस्ताक्षर हैं। ये इंटरव्यू 28, 29 और 30 जून को होने हैं, जिसमें आईआईएमसी के चार केंद्रों दिल्ली, ढेंकानाल, हरिद्वार और अमरावती के लिए 160 विद्यार्थियों का चयन किया जाएगा। आईआईएमसी में यह चर्चा जोरों पर है कि संस्थान को मिले करोड़ों के बजट को मनमाने ढंग से खर्च कर देने वाली लॉबी अब एडमिशन में भी मनमानी चाहती है। शिवाजी सरकार से इस लॉबी का पुराना विवाद रहा है और पिछले साल भी ऐन ऐडमिशन से पहले उन्हें इंटरव्यू बोर्ड से हटा दिया गया था। 

शिवाजी सरकार से संपर्क करने पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया। बताया जाता है कि हाल ही में आईआईएमसी में योजना आयोग से करीब 48 करोड़ रुपए आए थे जिनके इस्तेमाल में भारी गड़बड़ियों के आरोप हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चित डायरेक्टर सुनीत टंडन का करोड़ों का टॉयलेट भी है जिसपर योजना आयोग की तर्ज़ पर ही कई करोड़ रुपए फूंके गए हैं। लोगों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि ऑफिस के टॉयलेट में जकूज़ी बाथ और ऑटोमेटिक शावर्स क्यों लगाए गए है?

छंटनी के विरोध में पत्रकारों ने जंतर मंतर पर दिया धरना

दिल्‍ली पत्रकार संघ के बैनर तले दर्जनों पत्रकारों ने 25 जून को जंतर-मंतर पर धरना दिया. ये पत्रकार बिना कारण के संस्‍थानों से निकाले जाने के विरोध में धरना दे रहे थे. इस धरना में लांच होने जा रहे 4रीयल न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों से निकाले गए पत्रकार शामिल थे. पत्रकारों की मांग थी कि उनके लिए जर्नलिस्‍ट प्रोटेक्‍शन एक्‍ट लाया जाए. पत्रकारों ने इस संदर्भ में नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट (एनयूजे) को भी शिकायती पत्र भेजा है.

4रीयल न्‍यूज समेत तमाम चैनलों के पत्र अब प्रधानमंत्री आवास, सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी समेत कई लोगों के घरों के सामने धरना देंगे. उल्‍लेखनीय है कि पिछले दिनों हुई छंटनी में तमाम चैनलों एवं संस्‍थानों से दर्जनों पत्रकारों को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया.

अमरीश त्‍यागी की मौत के लिए जागरण को जिम्‍मेदार मान रहे हैं पत्रकार

देवबंद (सहारनपुर) : जागरण प्रबन्ध तंत्र की उत्पीड़नात्मक नीतियों ने वरिष्‍ठ पत्रकार अमरीश त्‍यागी की जान ले ली। जागरण अखबार ने लगभग दो दशक से संस्थान की सेवा कर रहे अमरीश त्यागी के निधन पर प्रकाशित समाचार में उनके जागरण से जुडने तक का जिक्र करना भी गंवारा नहीं किया। इस घटना से नगर के पत्रकारों तथा अमरीश को जानने वालों में जागरण समूह के प्रति रोष पनप रहा है। लोग इस समूह के नाश होने की कामना करने लगे हैं।

मृदुल स्वभाव के 49 वर्षीय पत्रकार अमरीश त्यागी देवबंद प्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष थे और वर्ष 1996 में दैनिक जागरण के तहसील प्रभारी बने थे। उस समय देवबंद में जागरण की 350 प्रतियां वितरित होती थी। अमरीश त्यागी ने कड़ी मेहनत कर देवबंद क्षेत्र में जागरण को बुलंदिया देते हुए अखबार की प्रसार संख्या को 2500 तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। जागरण प्रबधंतंत्र ने कुछ दिन पूर्व उनकी सेवाओं को नकारते हुए जी हजूरी करने वाले उनके एक जूनियर को देवबंद का प्रभारी बना दिया। जूनियर को प्रभारी बनाये जाने से उनके सम्मान को ठेस पहुंची और उनके खबर लगाए जाने भी बंद कर दिए गए थे। इससे आहत होकर

अमरीश त्‍यागी
अमरीश त्‍यागी ने एक पखवाडा पूर्व मेरठ कार्यालय में अपना इस्तीफा भेज दिया था। तभी से श्री त्यागी मानसिक अवसाद के शिकार हो गए थे और वह अपने साथियों से कहते थे कि उनका जागरण से दिली लगाव हो गया है और वह किसी अन्य अखबार में काम करना पसंद नहीं करेंगे।

इसके बाद मानसिक तनाव ने 25 जून को उनकी जिंदगी को निगल लिया। अमरीश त्यागी के आकस्मिक निधन से जनपद भर के पत्रकारों में शोक की लहर है। असमय उनके जाने का किसी को विश्‍वास नहीं हो रहा है। सभी इसके लिए दैनिक जागरण प्रबंधन को ही जिम्‍मेदार मान रहे हैं। स्थानीय पत्रकारों में भी बेवजह अमरीश त्यागी को जागरण समूह द्वारा उत्पीड़न किये जाने का मलाल है। बनियों के इस समूह ने एक पत्रकार को असमय काल के गाल में भेज दिया। अमरीश त्यागी कुलसत गांव के किसान परिवार से ताल्लुकात रखते थे। देवबंद के लोग अमरीश त्‍यागी के निधन के बाद जागरण समूह से दूरी बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। 

पिंटू शर्मा की रिपोर्ट.

महुआ समूह की नाजुक हालत के बीच आरसी शुक्‍ला का इस्‍तीफा

महुआ की खबरों की खुशबू शायद अब खात्‍मे पर है। इस समूह की महुआ न्‍यूज और न्‍यूज लाइन नामक दोनों चैनल अब दम तोड़ गये हैं। महुआ न्‍यूजलाइन तो पूरे यूपी में गधे के सिर की सींग की तरह खत्‍म हो गया है, जबकि महुआ न्‍यूज अब पटना और रांची में यदाकदा और कहीं-कहीं दिख जा रहा है। खबर तो यहां तक है कि इन दोनों चैनलों के कर्मचरियों को पिछले मई महीने से वेतन तक के दर्शन नहीं हुए हैं। स्ट्रिंगर्स को तो डेढ़ साल से पारिश्रमिक भुगतान दिया ही नहीं गया है। वैसे चर्चा के मुताबिक इस समूह में दूसरे ओहदे पर माने जाते आरसी शुक्‍ला ने आंतरिक स्थितियों से तंग आकर इस्‍तीफा दे दिया है। कई दूसरे बड़े मोहरों को भी जल्‍दी ही दरवाजे से निकालने की चर्चाएं भी बनती बतायीं जा रही हैं।

महुआ न्‍यूज और महुआ न्‍यूज लाइन की लाइनें अब परमानेंटली आफ हो गयी है। पिछले एक महीने से न्‍यूज लाइन का प्रसारण पूरे यूपी में बंद है। इस चैनल के कर्मचारी अब औपचारिकता के लिए भी खबरें भेजने की कोशिशें कर रहे हैं। यही हालत महुआ न्‍यूज चैनल की है। बताते हैं कि झारखंड में केवल रांची तक और बिहार में केवल पटना तक ही इस चैनल की विजिबिलिटी हो रही है। वह भी यदा-कदा और कहीं-कहीं। दीगर बात है कि भोजपुरी मनोरंजन चैनल महुआ का प्रसारण जरूर हो रहा है, लेकिन वह भी केवल झारखंड और बिहार तक ही सीमित है। यूपी में इस चैनल का कोई नाम-पता अब नहीं बचा है।

तबाही का कारण चैनलों में डिस्‍ट्रीब्‍यूशन का संकट है। बताते हैं कि प्रसारण के लिए केबिल ऑपरेटरों से की गयी बातचीत चैनल प्रबंधन से आखिरी समय में टूट गयी है। हालांकि पिछले एक साल पहले न्‍यूजलाइन के वितरण को लेकर हाय-तौबा चल रही थी। चुनाव के पहले केबिल ऑपरेटरों ने चैनल प्रबंधन के आश्‍वासन पर संचालन शुरू कर दिया था कि जल्‍दी ही भुगतान उन्‍हें मिल जाएगा। लेकिन कई महीना बीत जाने के बाद भी जब ऑपरेटरों को भुगतान नहीं मिला तो उन्‍होंने प्रसारण ठप कर दिया। यही हालत महुआ न्‍यूज की भी है। रांची और पटना के अलावा बिहार और झारखंड के किसी भी इलाके में महुआ न्‍यूज का प्रसारण पिछले महीनों से बंद है। खबर है कि चैनल प्रबंधन के पास केबिल ऑपरेटरों को भुगतान करने के लिए पैसा ही नहीं बचा है।

इन चैनलों में वेतन भुगतान का भी मामला अब बुरी तरह फंस गया बताते हैं। मई माह से किसी भी कर्मचारी को वेतन का भुगतान नहीं दिया गया है। अकेले नोएडा मुख्‍यालय में ही अराजकता की हालत पैदा हो चुकी है। कई कर्मचारी अवकाश पर चले गये हैं।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

पड़ोसी के नौकर ने की थी पत्रकार सलमा जैदी के घर में चोरी

नई दिल्ली : पिछले दिनों वरिष्ठ महिला पत्रकार सलमा जैदी के घर चोरी के मामले में वसंतकुंज उत्तरी थाना पुलिस ने पड़ोसी के नौकर विष्णु को गिरफ्तार किया है। उसे घर खरीदने के लिए पैसों की जरूरत थी। पुलिस ने चोरी का सामान बरामद कर लिया है। डीसीपी, दक्षिण जिला छाया शर्मा के मुताबिक सलमा जैदी वसंतकुंज उत्तरी थाना क्षेत्र में रहती हैं। बीते 14 जून को वे घर से बाहर गई थीं। शाम को जब घर पहुंची तो ताला टूटा मिला। लाखों के गहने, विदेशी मुद्रा, दो महंगे मोबाइल, डीवीडी प्लेयर, कैमरा और अन्य सामान गायब था।

सर्विलांस से पुलिस ने जाच में पाया कि उनका एक मोबाइल इन दिनों हरियाणा में चल रहा है, जिससे लगातार विष्णु नामक एक शख्स से बात हो रही थी। पुलिस ने सोमवार शाम विष्णु को दबोच लिया। वह सलमा जैदी के पड़ोस के घर में नौकर था। पूछताछ में उसने चोरी कबूल कर ली। विष्णु ने बताया कि घटना वाली शाम जब जैदी घर से बाहर निकलीं, तभी वह घर में लगे पाइप की मदद से उनके घर तक पहुंच गया और चोरी कर फरार हो गया था। बाद में सारा सामान अपने भाई मुरारी को सौंपकर खुद छिपकर रहने लगा था। पुलिस ने चोरी का सारा सामान बरामद कर मुरारी की तलाश शुरू कर दी है। साभार : जागरण

अफगानिस्‍तान की राजकुमारी से प्‍यार करते हैं राहुल गांधी?

नई दिल्ली : क्या कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी अफगानिस्तान की राजकुमारी से प्यार करते हैं? 'द संडे गार्जियन' में छपी रिपोर्ट को सही मानें तो ऐसा ही है। रिपोर्ट में राहुल गांधी का नाम अफगानिस्तान के पूर्व शासक मोहम्मद जहीर शाह की पोती से जोड़ा गया है। लेकिन रिपोर्ट में अफगानी राजकुमारी का नाम नहीं दिया गया है। मशहूर पत्रकार एमजे अकबर के साप्ताहिक अखबार 'द संडे गार्जियन' ने यह दावा भी किया है कि अफगानी राजकुमारी ने धर्म परिवर्तन करते हुए ईसाई धर्म भी स्वीकार कर लिया है। अखबार का दावा है कि यह जोड़ा रविवार को सोनिया गांधी के आवास पर आयोजित होने वाली प्रार्थना सभा होम चैपल में भी साथ-साथ हिस्सा ले चुका है।

रिपोर्ट के मुताबिक, '43 साल के राहुल गांधी और अफगानी राजकुमारी को दिल्ली के अमन होटल में साथ-साथ देखा जा सकता है। दोनों इस होटल में अक्सर आते हैं। राहुल गांधी होटल के फिटनेस सेंटर में काफी वक्त बिताते हैं।' अफगानी राजकुमारी के दादा जहीर शाह ने 1933 से लेकर चार दशकों तक अफगानिस्तान पर राज किया। 1973 में उनके ही चचेरे भाई मोहम्मद दाऊद खान ने उनका तख्तापलट कर दिया। इसके बाद जहीर शाह इटली चले गए और वहां निर्वासित जीवन जीने लगे। लेकिन 2002 में वे फिर अफगानिस्तान लौटे और उन्हें फादर ऑफ नेशन का खिताब दिया गया। 2007 में 93 साल की उम्र में जहीर शाह का निधन हुआ।

इस खबर के प्रकाशित होने के बाद कई विदेशी अखबारों और वेबसाइटों ने द संडे गार्जियन के हवाले से इस खबर को प्रमुखता से जगह दी है। इनमें 'जकार्ता पोस्ट' जैसी वेबसाइटें शामिल हैं। सोशल वेबसाइटों पर भी राहुल और राजकुमारी के कथित रिश्ते को लेकर हलचल है। ट्विटर पर कई लोग इस खबर को लेकर दंग हैं तो कई सवाल भी पूछ रहे हैं। साभार : भास्‍कर

बरगड में पत्रकारों पर हमला करने वाले डाक्‍टर के खिलाफ सड़क पर उतरे मीडियाकर्मी

 भुवनेश्वर। बरगड जिले में डाक्टर द्वारा पत्रकारों की पिटाई के मामले में मीडिया युनिटी फार फ्रीडम आफ प्रेस के बैनर तले मीडियाकर्मिय़ों ने धरना दिया तथा आरोपी डाक्टर की गिरफ्तारी की मांग की है। एमयूपीएफ की ओर से वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत पटनायक ने बरगड में पत्रकारों पर हमले को अभिव्य़क्ति की स्वतंत्रता पर हमला तथा मानवीय मूल्य पर सीधा हमला बताते हुए आरोपी डाक्टर व उनके परिवार को सदस्यों के खिलाफ कडी कार्रवाई की मांग की है।

उल्लेखनीय़ है कि गत 19 को बरगड जिले में एक नर्सिंग होम चलाने वाले डाक्टर प्रफुल्ल पात्र ने चार पत्रकारों पर हमला किया था। ये पत्रकार एक गरीब मरीज की सहायता का निवेदन करने के लिए डाक्टर के पास गये थे। श्री पटनायक ने बताया कि उस डाक्टर व उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ थाने में मामला दायर होने के बाद भी पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर रही है। बरगड जिला पत्रकार संघ ने इस घटना की कडी निंदा पहले ही कर चुकी है। जिला पत्रकार संघ के अध्यश्र शंकर बल्लभ मिश्र के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि दल जिलाधिकारी से मिल कर आरोपी डाक्टर के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। मीडिया युनिटी फार फ्रीडम आफ प्रेस भी बरगड जिला पत्रकार संघ के मांग का समर्थन करने के साथ साथ उनकी गिरफ्तारी की मांग की है। बताया जाता है कि डा. पात्र का कलाहांडी जिले में स्थानांतरण हो गया है लेकिन वह वहां न जाकर छुट्टी पर हैं तथा निजी नर्सिंग होम चला रहे हैं। इस विरोध प्रदर्शन में अनेक पत्रकार शामिल हुए।

भुवनेश्‍वर से समन्‍वय नंद की रिपोर्ट.

लोकमत समूह से सीओओ ज्‍वलंत स्‍वरूप का इस्‍तीफा

लोकमत मीडिया समूह से खबर है कि ज्‍वलंत स्‍वरूप ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीओओ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. ज्‍वलंत लोकमत समूह से पिछले 21 सालों से जुड़े हुए थे. उनकी गिनती समूह के तेजतर्रार अधिकारियों में की जाती थी. उन्‍होंने इस्‍तीफा भले ही दे दिया है परन्‍तु वे कंपनी के साथ सलाहकार के रूप में अब भी जुड़े रहेंगे.

और एशिया का दूसरा सबसे पुराना न्‍यूज पेपर है…

एशिया के दूसरे सबसे पुराना न्‍यूज पेपर प्रकाशित करने का श्रेय भारत के पास है. पिछले डेढ़ सौ साल से भी अधिक समय से यह अखबार मुंबई से प्रकाशित हो रहा है. यह अखबार इसी साल अपने 180वें वर्ष में प्रवेश किया है. बाम्‍बे बेस्‍ड इस पारसी अखबार का नाम है- जाम ए जमशेद. इस अखबार की संपादक हैं. सेरनाज इंजीनियर. 180वें साल में प्रवेश करने पर इस अखबार के संपादक से डेक्‍कन हेराल्‍ड के प्रभात शरण ने बातचीत की. नीचे डेक्‍कन में प्रकाशित बातचीत….

Behind the Ingrid Bergmanesque smile is a steel gritty woman, steering over one-and-a-half-century-old boat in turbulent waters.

The journalistic journey of Shernaaz Engineer from covering fashion shows in early 90s for newspapers and magazines to handling the editorial convolutions of a newspaper revered by the fire-worshipping community whose populace is fast dwindling has been a long haul.

Ten years after the first Asian news paper–Bombay Samachar–was launched in Mumbai by Indians in 1822, an influential Parsi family–Marzban — started a Gujarati daily newspaper titled Jam-e-Jamshed, celebrating this year its 180 years of existence.

 Techno-info onslaught has not been able to throw them into the annals of history; the very existe­nce of these old newspapers has become a multi-faceted metaphor of India desperately wanting to protect its sense and sensibilities in a stark world.  Engineer spoke to Prabhat Sharan of Deccan Herald about the newspaper turned newsweekly Jam-e-Jamshed that loyally reports to Parsis, community issues interspersing it with important national and international news.

Excerpts:

What does Jam-e-Jamshed means? And is the origin of newspaper connected to the growth ofMumbai as a trade post in the early 19th century?

Jam-e-Jamshed is the second oldest newspaper in Asia; the first being Mumbai Samachar, which interestingly still comes out from the same place where it was started. Jam-e-Jamshed also had its own iconic red brick building at Ballard Pier near Mumbai Docks before shifting out.

The paper was started by extremely influential Marzban family of Mumbai. In Persian language it means the goblet in which you can see the future.

And then if you accept that premise then it becomes clear. See this was the time when Gujaratis, Parsis and Bohras–the three key trading communities–were slowly establishing themselves in and around Mumbai port.

And with the trade bourse coming up, the emergence of  a newspaper was bound to be there. And the first newspapers carried reports primarily revolving around businesses in Europe as well as events that affected the Indian sub-continent then.

During early 20th century the newspaper reported on freedom struggle and if Parsis were the first to embrace several aspects of western life-styles then the community was also heavily into freedom struggle.Parsis are politically extremely volatile as the flames we venerate.

But has the newspaper always been catering to Parsis? Did it have a spectrum of diverse readership from other communities?

The newspaper primarily had a readership from the trading communities. And Parsis, of course, comprised a major chunk. But then other huge chunk of readership came from the Bohra community. Both are  business communities. And since Parsis are the original “argumentative Indians” the newspaper also had moorings in carrying extreme views and debates on every topic on the earth.

That brings us to the sensitive issue –volatility of a Parsi psyche. The community has always fascinated fiction writers, film makers and caricaturists.

In fact in the very word Parsi is a trope in films while depicting “eccentricity”; for a community newspaper focussing on sub-cultural happenings, it must be requiring an arduous balancing act.

There is an old saying among Parsis that we are such an argumentative lot that if there is one Parsi left in the world then that Parsi would be arguing with the mirror image.  And the arguments are on virtually every topic.

It is a fact that Parsis are a highly literate lot; so you can very well expect the kind of topics that are debated upon and the references that are cited to prove one’s point. The newspaper is a platform we provide.

And it is surprising that despite the popularity of media networking I have found people still use newspapers to air their views and to top it all people even use newspapers to inform public about the views that have been put out on social networking sites. The contra­diction of media seems to be like that of our community.

True but the question still remains, as to how do you tackle community issues which intrinsically harbour diverse contradictory views? Say for example the issue of exogamy for women. While the men are allowed to marry outside the community, the women are ostracised if they opt for marrying outside the community.

The attitude reeks of patriarchal structures and the community was the first to encourage education for women.

Absolutely. Parsis continue to harbour patriarchal structures. They do not want to leave their old structures like they do not want abandon their antiques.

Of course, the two things are different but seriously, it is a dichotomy in a community which prides itself on being extremely progressive and at the same time wants to retain ideas which are anti-woman. We have had so much of debates on this issue but frankly speaking it all boils down to the fact that there are so many trusts and bodies with heavily laden coffers. And that’s the sole point.

But then isn’t it also going against the very existence of a community which is demographically fast getting decimated?

There seems to be a lot of misconceptions regarding the shrinking of community population across the world. A sociological research has revealed that there are primarily three reasons behind it: a) Late or no marriage and mind you there are more unmarried Parsi women and men then in any other community in country at least it seems so; b)

Girls marrying outside the community and the  ex-communication; and c) Parsis those marrying within community opting for one child option. And see another problem is that most of the Parsis are settling abroad… so today we have a 60:40 ratio of population. I know this for a fact because the newspaper is sent abroad in countries like Australia, the UK and Canada. And mind you this is done through post.

But the controversy does not end at the ostracism. There have been issues like Tower of Silence for–several Parsis now opt for cremation, while the clergy still frown upon .The clergy has never been able to  influence our editorial policy.

That is also because Parsis are so loyal to Jam-e-Jamshed that every family even if it is staying in Auckland, it subscribe to it. And that is why the paper is bi-lingual. Earlier we had only  four pages in English and 16 pages in Gujarati. I reversed it. There was uproar but the winds of changes sometimes manage to change the tides. साभार : डेक्‍कन हेराल्‍ड

साक्षी के वरिष्‍ठ पत्रकार एवं पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर

हैदराबाद। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के एक वरिष्ठ अधिकारी के फोन कॉल के आकड़े से सम्बंधित विवाद ने मंगलवार को एक नया मोड़ ले लिया। साइबराबाद पुलिस ने मंगलवार को एक महिला की शिकायत पर एक पत्रकार और एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज किया। सीबीआई अधिकारी इस महिला के सम्पर्क में था। तेलुगू दैनिक 'साक्षी' के एक वरिष्ठ संवाददाता के यादगिरि रेड्डी, और नचराम पुलिस थाने के पुलिस निरीक्षक एम श्रीनिवास राव तथा अन्य के खिलाफ एक मामला साइबराबाद आयुक्तालय के साइबर अपराध पुलिस थाने में दर्ज किया गया। 'साक्षी' वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेता वाई एस जगनमोहन रेड्डी के स्वामित्व वाला अखबार है।

सीबीआई के संयुक्त निदेशक वी वी लक्ष्मीनारायण की मित्र, चंद्रबाला वासिरेड्डी की एक शिकायत पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2000, भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम-1885, और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम-1923 -के तहत एक मामला दर्ज किया गया है। साइबराबाद पुलिस आयुक्त द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, वासिरेड्डी ने आरोप लगाया है कि साक्षी न्यूज चैनल ने उनके सेल फोन के कॉल विवरण की गोपनीय जानकारियां सार्वजनिक करके उनकी मर्यादा को नुकसान पहुंचाने के लिए एक कार्यक्रम का प्रसारण किया था। वासिरेड्डी की एक याचिका पर राज्य मानवाधिकार आयोग के निर्देश के बाद पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई की है।

वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने 21 जून को लक्ष्मीनारायण द्वारा वासिरेड्डी और साक्षी के प्रतिद्वंद्वी मीडिया समूहों के पत्रकारों को किए गए कॉल्स के विवरणों का खुलासा किया था। लक्ष्मीनारायण पर जगनमोहन रेड्डी के खिलाफ अवैध सम्पत्ति के मामले में पक्षपातपूर्ण जांच करने का आरोप लगाते हुए वाईएसआर कांग्रेस ने दावा किया था कि पिछले दो महीनों के दौरान चंद्रबाला ने लक्ष्मीनारायण को 328 कॉल्स किए थे, जबकि लक्ष्मीनारायण ने चंद्रबाला को 411 कॉल्स किए थे। साभार : आईबीएन

ऋषि के इस्‍तीफे के बाद समीर जैन के दामाद सत्‍यन बने टीआईएल के सीईओ

टाइम्‍स आफ इंडिया से खबर है कि टाइम्‍स इंटरनेट लिमिटेड के नए सीईओ सत्‍यन गजवानी होंगे. सत्‍यम को ऋषि खियानी की जगह सीईओ बनाया गया है. ऋषि टाइम्‍स समूह से इस्‍तीफा देकर खुद का वेंचर लाने की योजना पर काम कर रहे हैं. ऋषि ने 2009 में टाइम्‍स समूह के इंटरनेट डिविजन को ज्‍वाइन किया था. इसके पहले वे वेब18 से जुडे हुए थे. वे इन दिनों नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं. सत्‍यन को तत्‍काल प्रभाव से इंटरनेट कंपनी का सीईओ बना दिया गया है. सत्‍यन टाइम्‍स समूह के मालिक समीर जैन के दामाद हैं.

मियामी में जन्‍मे सत्‍यन समीर जैन की पेंटर बेटी त्रिशाला जैन के पति हैं. दोनों की मुलाकात पढ़ाई के दौरान स्‍टेनफोर्ड में हुई थी. गजवानी का कहना है कि ऋषि का कंपनी से जाना तकलीफदेय है पर उनके भविष्‍य को लेकर उत्‍सुकता है. इंडियाटाइम्‍स ने उनकी लीडरशिप में अच्‍छा प्रोग्रेस किया. मैं उनके उनके बनाए गए नींव पर कंपनी को आगे ले जाने और उंचाइयों पर पहुंचाने के लिए उत्‍साहित हूं.

मेरी वर्षों पुरानी प्रतिष्‍ठा को धूमिल करने का प्रयास है : विनय

संपादक, भड़ास4मीडिया. महोदय, मैं पिछले आठ वर्ष से छत्‍तरपुर में प्रमुख एमएसओ एवं केबल ऑपरेटर हूं. विगत 24 जून को मनोज कुमार नाम के व्‍यक्ति द्वारा हमारे व हमारे सिटी न्‍यूज चैनल पेप्‍टेक टाइम के विरुद्ध भ्रामक एवं आपत्तिजनक खबर पोस्‍ट की गई है. इस खबर के चलते पेप्‍टेक केबल नेटवर्क एवं पेप्‍टेक टाइम न्‍यूज चैनल की वर्षों पुरानी प्रतिष्‍ठा धूमिल हुई है. कृपया इस खबर को भेजने वाले मनोज कुमार की जानकारी लेकर उसके खिलाफ उचित कार्रवाई कराएं तथा हमारा पक्ष जानकर खबर का प्रकाशन रोकने की कृपा करें.

विनय चौरसिया

पेप्‍टेक के‍बल नेटवर्क
छतरपुर (म.प्र.)
मोबाइल – 9826909090 – 9425140803


मूल खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें – छत्‍तरपुर में खुलेआम वसूली कर रहा है साधाना न्‍यूज का पत्रकार

Fraud Nirmal Baba (100) : निर्मल बाबा के अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला सुरक्षित

अररिया। बिहार के अररिया जिले की एक स्थानीय अदालत ने स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु निर्मल बाबा की अग्रिम जमानत याचिका पर बहस पूरी करने के बाद अपना फैसला मंगलवार को अगले आदेश के लिए सुरक्षित रख लिया। जिला न्यायाधीश संजय कुमार के कैंप कोर्ट ने निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह नरुला की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। निर्मल बाबा के वकील देवनारायण सेन ने अग्रिम जमानत की अर्जी दी थी।

लोक अभियोजक लक्ष्मीनारायण ने प्रशासन की ओर से इस मामले में बहस की। गौरतलब है कि पूर्णिया, अररिया और किशनगंज जिले के लिए एक ही जिला न्यायाधीश है और वे तीनों जिलों में कैंप कोर्ट लगाते हैं। निर्मल बाबा के खिलाफ फारबिसगंज थाने में दायर एक मामले की सुनवाई करते हुए बीते 19 मई को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी सत्येंद्र रजक ने गिरफ्तारी वॉरंट जारी किया था, जिसे 22 जून को पटना उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था।

हालांकि, पटना उच्च न्यायालय ने अपराध प्रक्रिया संहिता की संगत धाराओं के तहत निर्मल बाबा को गिरफ्तार करने से रोकने के अररिया पुलिस को कोई निर्देश देने से इनकार कर दिया था। राकेश कुमार नामक एक युवक ने बीते 21 अप्रैल को फारबिसगंज थाने में बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया था। (एजेंसी)


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बाल काटने पर मुस्लिम महिला एंकर को सस्‍पेंड किया गया

कुआलालंपुर। मलेशिया में एक टीवी एंकर का अपने बाल काटकर कैंसर जनजागरूकता अभियान का समर्थन करने का फैसला उसे महंगा पड़ा और उसे नौकरी गंवानी पड़ी। चैनल ने शर्त रखी है कि अब बाल बड़े होने के बाद ही उसे नौकरी पर रखा जाएगा। स्थानीय मीडिया ने मंगलवार को खबर दी कि लोकप्रिय मलेशियाई चैनल एनटीवी 7 की प्रजेंटर और टेलीविजन हस्ती रास अदिबा मोहम्मद रदजी ने दावा किया कि महिलाओं को सिर मुड़ाने के फतवे का उल्लंघन करने को लेकर अज्ञात व्यक्तियों ने फोन कर उसे गालियां दीं।

एनटीवी 7 में स्वतंत्र आधार पर काम करने वाली रास अदिबा ने नैशनल कैंसर काउंसिल के कैंसर जनजागरूकता अभियान के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए पिछले शुक्रवार को अपने बाल कटवा लिए थे। स्टार अखबार ने कहा कि एनटीवी 7 को उसका नया लुक रास नहीं आया और उसने उसे फरमान सुना दिया कि जबतक उसके बाल स्वीकार्य लंबाई तक लंबे नहीं हो जाते हैं वह ऑन एयर नहीं दिख सकती।

रास अबिदा ने कहा, 'मैं ईश्वर के प्रति जवाबदेह हूं। इस्लाम एक जीवन पद्धति है और हमें हमेशा लोगों की मदद के लिए कहा जाता है। मैं मुसलमान हूं और मैं पांच बार नमाज पढ़ती हूं और मैं अपने धर्म से प्यार करती हूं।' उन्होंने कहा, 'दिवंगत सौतेले पिता कैंसर के कारण चल बसे। मेरे चाचा कैंसर से पीड़ित हैं लेकिन जिंदा हैं। मेरे कई दोस्त इस बीमारी से जूझ रहे हैं। इससे मेरा दिल पिघल गया।' (एजेंसी)


: Ras Adiba in her new haircut in this picture taken from her Facebook page : Kuala Lumpur: A Muslim TV anchor's decision to support cancer awareness by chopping off her hair has cost the woman her job at a Malaysian channel, which wants her to grow back her mane to an "acceptable" length before being allowed to resume her work.

Popular Malaysian NTV7 news anchor and television personality Ras Adiba Mohd Radzi has also claimed to have received anonymous calls abusing her for defying a 'fatwa' prohibiting women from shaving their head, local media reported today. Ras Adiba, who works on a freelance basis for NTV7, cropped her hair on Friday last to show solidarity with The National Cancer Council cancer awareness campaign.

However, NTV7 found her new look too much to handle, ruling that she could no longer appear on air until her hair grows back to an acceptable length, Star newspaper said. An NTV7 source said Ras Adiba had approached them before getting shorn, and the management had told her that if her hair was cropped, she would not be allowed to announce the news, the paper said.

She was told that once her hair had grown, she could resume her part-time position as newscaster. "We can't put a bald person on air, especially for news and the anchor is a woman. We have to upkeep a certain look and feel. "Ras suggested a wig, which we were against because it would look strange for her to appear on air in a wig and then in public with a shaved head," the source said.

The source also added that that NTV7's management had fully supported Ras Adiba's cause and had left the decision to her. Ras Adiba's has also received anonymous calls abusing her for defying a fatwa that prohibits women from shaving their head. "The callers claimed to be from a religious department," she told the paper.

However, Ras Adiba said she did her research before cutting off her locks, adding that she still had hair and that her scalp could not be seen. "I am answerable to God. Islam is a way of life, and we are told to always help people. I am a Muslim, I pray five times a day and I love my religion," she said.

"My late stepfather died of cancer, my uncle is a cancer survivor. I have many friends going through it, and it breaks my heart." She has currently taken to wearing a turban chosen for her by her young son, as she finds it comfortable.

जागरण की छंटनी के शिकार हुए अमरीश त्‍यागी का निधन

दैनिक जागरण से छंटनी के शिकार हुए एक और पत्रकार काल के गाल में समा गए. बताया जा रहा है कि निकाले जाने के सदमे से वे उबर नहीं पाए और हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया. मामला सहारनपुर का है. देवबंद में बरसों से जागरण के लिए काम करने वाले अमरीश त्‍यागी का निधन हो गया. वे 49 साल के थे. वे बीस सालों से दैनिक जागरण से जुड़े हुए थे. परन्‍तु जागरण ने उनके सेवाभाव को सम्‍मान देने की बजाय उनके हिस्‍से में संस्‍थान से बाहर करने का अपमान दिया, जिससे वे उबर नहीं पाए.

अमरीश देवबंद के पास ही स्थित कुलसठ गांव के रहने वाले थे. इनका अंतिम संस्‍कार कुलसठ में ही किया गया. जागरण प्रबंधन ने जिस तरह का व्‍यवहार इनके साथ किया उससे यह काफी डिप्रेशन में चले गए थे और आखिर तक उबर नहीं पाए. प्रबंधन ने इनके समाचार छापने बंद करके इन्‍हें छंटनी का शिकार बनाया. बीस सालों की सेवा के बाद अचानक जागरण प्रबंधन के इस कदम ने इन्‍हें असमय मौत के गाल में ढकेल दिया. अमरीश के निधन के बाद तमाम लोगों के मुंह से जागरण के लिए बददुआएं निकल रही हैं. शायद ताकत के मद में चूर प्रबंधन को इससे फर्क ना पड़े, पर ये बददुआएं खाली नहीं जाएंगी.

जिस तरह जागरण समूह राक्षसी विचारधारा अपनाते हुए मानव संसाधन की बजाय धन संसाधन की तरफ प्रलयंकारी गति से दौड़ रहा है, उसे देखते हुए तो दिन दूर नहीं लग रहा है जब इसे भी अकाल मौत मरना पड़ेगा. 'आज' समूह भी इसी गति को दौड़ते हुए अपनी गति को प्राप्‍त हो गया है. कभी समाज में तूती बोलने वाले इस अखबार का अब नामलेवा तक नहीं रह गए हैं. जागरण को जागरण बनाने वाले लोगों को ही दरकिनार कर यह अखबार खुद ही अपनी कब्र खोद रहा है. अपने कारनामों से यह अखबार बदनाम हो ही रहा है, घटियापने के चलते यह पत्रकार जगत में भी लगातार अविश्‍वसनीय होता जा रहा है. 

न्‍यूज चैनलों में स्‍टूडियो डिस्‍कशन भड़ैती से ज्‍यादा नहीं

टीवी चैनलों में समसामयिक मुद्दों पर होने वाले स्टूडियो डिस्कशन जनोपादेयता की कसौटी पर निरर्थक साबित हो रहे हैं। कॉमेडी के नाम पर घटिया टिप्पणी व स्तरहीन भावभंगिमा देखने के बाद कम से कम दर्शकों को किरदारों के भोंडेपन से ओछा ही सही कुछ मनोरंजन तो होता ही है लेकिन स्टूडियो डिस्कशन से शायद यह भी हासिल नहीं हो पाता। दरअसल स्टूडियो डिस्कशन की अवधारणा मीडिया की उस मूल भूमिका से आती है जिसके तहत जनता को मुद्दों के बारे में सूचित करना, शिक्षित करना मीडिया का मुख्य कर्तव्य होता है। लेकिन तथ्यों की बेहद कम जानकारी, तर्कशास्त्र की अल्प समझ और यह भाव कि “दूसरे पक्ष को बोलने नहीं दिया”, मीडिया के इस पूरे प्रयास को बेमानी कर देता है।

नतीज़ा यह होता है कि गठबंधन की मर्यादा या विदेशी कंपनियों का भारतीय रिटेल में आने सरीखे गंभीर मुद्दों में भी चर्चा बहकती हुयी इस बात पर पहुंच जाती है कि भारतीय जनता पार्टी का कौन नेता जेल में है या यूपीए सरकार कितनी भ्रष्ट है। चर्चा चाहे किसी भी मुद्दे पर हो अगर राजनीतिक दलों के लोग बैठे हों तो वह चर्चा गांव के अशिक्षित दो परिवारों के बीच नाली के झगड़े से बेहतर नहीं दिखायी देती। प्रजातंत्र की संतोषप्रद व्यवस्था के लिए पांच तत्व हैं। पहला- राजनीतिज्ञों का उच्च स्तर, दूसरा- प्रतिस्पर्धी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के बीच कार्यक्रमों को लेकर एक प्रतियोगी भाव लेकिन साथ ही राष्ट्र की व्यापक दिशा को लेकर आम सहमति, तीसरा- सिविल सेवाओं की एक परंपरा जिसमें अधिकारी अपने मंत्रियों को नीति बनाने व अनुपालन करने में मदद करें, चौथा- विरोधी मतों के प्रति आदर की संस्कृति और पांचवा- आलोचना के लिए आलोचना करने की आदत का पूर्ण परित्याग।

खबरिया चैनलों के स्टूडियो डिस्कशन में इन पांचों का सर्वथा अभाव मिलता है। अव्वल तो राजनीतिक वर्ग में ही उच्च स्तरीय लोगों का नितांत अभाव होता जा रहा है और जो कुछ लोग बच गए हैं वह अपनी गरिमा बचाने के लिए टीवी के डिस्कशन में आना पसंद नहीं करते। लिहाज़ा सभी पार्टियों ने द्वितीय या तृतीय स्तर के ऐसे नेताओं को भेजना शुरू किया जिनका मष्तिष्क भले ही खाली हो लेकिन गले की ताकत पूरी हो। इन्हें न तो अर्थशास्त्र का ज्ञान होता है, न संविधान का, न ही ये जनअपेक्षाओं से बाबस्ता रहते हैं। इनका एक ही ध्येय होता है कि चिल्ला कर दूसरी पार्टी को चुप करा दो और जैसे ही इनके नेता के खिलाफ कोई बोले तो इतना हंगामा कर दो कि वह नेता खुश हो जाए। शायद राजनीतिक दल यह भूल रहे हैं कि टेलीविज़न एक सशक्त माध्यम है जिसमें जनता भड़ैती भी देखती है और गंभीर परिचर्चा के प्रति भी उसकी ललक रहती है। लेकिन भड़ैती का प्रभाव चाय की चुस्कियों के बाद खत्म हो जाता है, गंभीर चर्चा उस पर आजीवन प्रभाव डालती है।

ब्रिटिश संसद की एक परंपरा है कि अगर कोई एक नेता, चाहे वह कितना ही बड़ा हो या कितना ही छोटा हो, कुछ बोल रहा हो तब बीच में कोई दूसरा सदस्य नहीं बोलता। लेकिन अगर कोई सदस्य बीच में बोलने के लिए खड़ा होता है तब पहले से बोल रहा वक्ता तत्काल ही बैठ जाता है। इंद्रजीत गुप्ता तक यह परंपरा कायम रही लेकिन बाद के दिनों में “लंग पावर” का इस्तेमाल सदन में विपक्षी को चुप करने और अपने नेता के सामने श्रेय पाने का साधन बन गया। इसी आदत का पालन खबरिया चैनलों के स्टूडियो डिस्कशन में भी देखने को मिलता है। 2500 साल पहले भारत के वैशाली राज्य में और यूनान के एथेंस शहर की जनसभाओं में भी विपक्षी विचार को पूरी मान्यता देने की परंपरा रही है ताकि विचार-विमर्श के जरिए एक निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। लेकिन वर्तमान में यह भाव बिल्कुल ही खत्म होता जा रहा है।

हाल ही में एक राष्ट्रीय हिंदी चैनल पर गठबंधन की राजनीति और उसकी नैतिकता को लेकर एक परिचर्चा हुयी। पूरी चर्चा में एक बार भी किसी राजनीतिक या गैर-राजनीतिक प्रतिभागी ने यह नहीं बताया कि एक अच्छे गठबंधन की क्या शर्तें व मर्यादाएं होती हैं? चर्चा की गुणवत्ता इतनी नीचे रही कि तीन राजनीतिक दल के प्रतिभागी लगातार यही चर्चा कर रहे थे कि दूसरी पार्टी के कौन-कौन से लोग भ्रष्टाचार के मामले में जेल में हैं। अपेक्षा यह थी कि दुनिया के अन्य प्रजातंत्रों में गठबंधन सरकार हैं तो क्यों हैं? विकास और गठबंधन का उन देशों में क्या रिश्ता है या गठबंधन पर अगर जनोपादेय न होने का संकट है तो कहीं ऐसा तो नहीं कि वर्तमान चुनाव पद्दति “फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम” दोषी है? लेकिन 42 मिनट के विमर्श में 25 मिनट से ज्यादा कांग्रेसी और भाजपा के प्रतिभागी एक-दूसरे पक्ष के कितने नेता भ्रष्टाचार को लेकर जेल में हैं, इस बात की चर्चा करते रहे।

मेरा पूरा विश्वास है कि प्राइम टाइम में हुयी परिचर्चा के बाद दर्शक गठबंधन का “ग” भी नहीं समझ पाया। चूंकि समाज में तर्कशक्ति आमतौर पर काफी कम है इसलिए चिल्लाने वाले प्रतिभागियों को उसके कार्यकर्ताओं से डिस्कशन के बाद संदेश आते हैं “वाह आपने बिल्कुल चुप करा दिया विपक्षियों को और छा गए”, और तब यह प्रतिभागी विजयी भाव से अगले किसी चैनल में चला जाता है। उसे यह समझ नहीं आता कि उसके इस पूरे कृत्य को जनता ने दो जोकरों के बीच लड़ाई से ज्यादा कुछ नहीं समझा। नतीज़ा यह होता है कि प्रजातंत्र की गुणवत्ता एक बार फिर नीचे आ जाती है।

आज जरूरत इस बात की है कि न्यूज़ चैनल इस तरह के गंभीर मसले पर होने वाली चर्चाओं का एक कोड तैयार करें जिसमें एंकर या मॉडरेटर की इजाज़त के बिना प्रतिभागी न बोलें और कोई भी जवाब मूल प्रश्न से बहक रहा हो तब उस वक्ता को ताकीद की जाए। “लंग पावर” का इस्तेमाल करने वाले प्रतिभागियों का इस तरह गंभीर परिचर्चाओं में आना पूरी स्टूडियो डिस्कशन की सार्थकता को खत्म कर रहा है। प्राइम टाइम का उद्देश्य गंभीर मुद्दों को जनधरातल पर लाना, मुद्दों के पक्ष-विपक्ष से अवगत कराना व जनता को अपनी बुद्धिमत्तापूर्ण राय बनाने (इनफॉर्म्ड ओपिनियन) में मदद करना होता है। लेकिन वर्तमान में यह प्रयास भड़ैती से ज्यादा कुछ नहीं रह गया है। राजनीतिक दलों से भी अपेक्षा रहती है कि वह मुद्दों पर अपना पक्ष प्रस्तुत करें न कि “बोलती बंद” करने का भाव रखें। किसी ने एक शेर कहा है-

खामोश! ऐ दिल, भरी महफिल में चिल्लाना नहीं अच्छा,
अदब पहला करीना है मोहब्बत के करीनों में।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

परीक्षा में अखिलेश को सौ नंबर यानी माई-बिटिया गौनहर, बाप-पूत बजनिया

वो किसी को भी हतप्रभ कर देने वाला वाकया था। यूपी बोर्ड परीक्षा के दौरान प्रतापगढ़ के एक परीक्षाकेंद्र में उड़नदस्ते की टीम ने छापा मारा तो वहां का नजारा देख दंग रह गए। ब्लैक बोर्ड पर लिखे परीक्षा के सवालों के जवाब परीक्षार्थी उत्तर पुस्तिका में हूबहू उतार रहे थे। टीम के मुखिया का चेहरा गुस्से से लाल। ब्लैक बोर्ड की तरफ तेज आवाज में केंद्र प्रभारी को डपटा-ये…आखिर हो क्या रहा है? उससे से भी कड़कती आवाज में केंद्र प्रभारी ने कहा- देख नहीं रहे हैं, बोर्ड की परीक्षा बोर्ड पर हो रही है (यूपी बोर्ड की परीक्षा ब्लैक बोर्ड पर)।

केंद्र प्रभारी के तेवर देख उड़नदस्ता टीम के मुखिया बैकफुट पर आए। आवाज थोड़ा नरम किया। बोले- ’बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है।’ परीक्षा केंद्र प्रभारी भी थोड़ा नरम पड़े। टीम को आदर से कुर्सी पर बैठने का इशारा कर बगल खड़े सहकर्मी को जलपान लाने का आर्डर दिया। बोले- साहब, इत्मीनान से बैठिए। गर्मी तेज है, पहले रिलेक्स होइए। आपकी एक-एक बात का जवाब दूंगा। तब तक टीम के दूसरे सदस्य बुदबुदाए- ऐसी परीक्षा? क्या होगा इन बच्चों का? परीक्षा प्रभारी ने जवाब दिया-साहब यह बच्चों की नहीं, टीचर की परीक्षा है। ज्यादातर टीचर ही सवाल नहीं हल कर पा रहे। नकल की ऐसी ही दशा रही तो आने वाले समय में साल्वर खोजे नहीं मिलेंगे। काहे कि ज्यादातर ऐसे लोग परीक्षा पास करेंगे जो किताब का नाम और पाठ्यक्रम तक नहीं जानते होंगे।

तल्ख आवाज में परीक्षा प्रभारी ने कहा- परीक्षा की दुर्दशा की वजह उन नीति-नियंताओं से पूछिए जिन्होंने बोर्ड परीक्षा को तमाशा बनाकर रख दिया है। बहरहाल, रिजल्ट निकला। चारों तरफ धूम मच गई। नकल और परीक्षकों की महती कृपा कि कोई लड़का फेल ही नहीं, सब के सब पास। पहले जितने कुल परीक्षार्थी पास हुआ करते थे इस बार उतने परीक्षार्थी केवल फर्स्ट डिवीजन आए। साहब, नंबरों की झमाझम बरसात हो गई। कोई भी सेकंड-थर्ड नहीं। सो, ऐसे माहौल में सीएम अखिलेश यादव भी बंपर तरीके से पास हो गए। तीन महीने के कार्यकाल में उनके पिताश्री मुलायम सिंह यादव ने कॉपी जांची तो नंबर देने में ‘महती-कृपा’ कर दी। सौ में पूरे सौ नंबर दे डाले। वही हाल है ‘माई-बिटिया गौनहर, बाप-पूत बजनिया।’   

राजनीति वोट का विषय है। इसमें बॉयलोजी, मैथ्स के बजाए भूगोल, इतिहास, हिंदी की तरह कम नंबर मिलते हैं। सवाल है कि परीक्षार्थी से कमजोर को कॉपी जांचने और नंबर देने का अधिकार कितना उचित है? मत भूलिए, मुलायम सिंह को सूबे की जनता पिछले चुनाव में पूरी तरह से नकार चुकी है। इस बार सपा की जीत अखिलेश यादव को आगे कर चुनाव लड़ने, लैपटॉप-टेबलेट, बेरोजगारी भत्ता, जनता की गाढ़ी कमाई को मूर्तियों में लगाने, लुटेरे विधायक-मंत्रियों को जेल भेजवाने की लगातार घोषणाओं का परिणाम था। अहंकार ग्रस्त मायावती को सबक सिखाने के लिए जनता एकजुट हुई। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रही भाजपा का भ्रष्टाचार के ‘हीरो’ को गले लगाने और कांग्रेस के युवराज राहुल का जनसभाओं में बांह मरोड़कर सबक सिखाने की शैली, इन सब दोहरी भूमिकाओं वाले नाटकों ने जनता को रिएक्ट किया।

चुनावी वादों का हाल किसी से भी छिपा नहीं है। ज्यादातर वादे हवा-हवाई। प्रतापगढ़ में समूची बस्ती फूंकी गई। छब्बीस मकान जले, दर्जनों लोग लहूलुहान। कई महिला-पुरूष अभी तक लापता हैं। सपा कार्यकर्ताओं द्वारा अफसरों की पिटाई। इलाहाबाद में फाफामऊ के विधायक के भाई का फाफामऊ बाजार में हंगामा। लालगोपालगंज टाउन एरिया में मूक बधिर ग्यारह साल की दलित बालिका से गैंगरेप, तीसरे दिन हुई पंचायत में आरोपी युवकों पर केस न करने के एवज में इक्कीस हजार रुपए का ‘जुर्माना’, इलाहाबाद के हंडिया इलाके के विधायक का दारोगा को चौकी में आकर जूते से पीटने की सरेआम धमकी। मुलायम यादवजी आखिर इन सबका माइनस नंबर कुछ होता है कि नहीं? हे नेताजी, जनता इन सबका जवाब चाहती है।

मामले का समापन एक और उदाहरण से। सन् 2001 में हमारा बेटा इंटर बोर्ड की परीक्षा में बैठा। रिजल्ट आया तो बेटे समेत उस कॉलेज के 54 बच्चे फर्स्ट डिवीजन आए। कॉलेज के प्रधानाचार्य, प्रबंधक से लेकर अभिभावक तक इतराने लगे, पर उन सबकी इतराहट थोड़े ही दिन रह सकी। दो महीने बाद हुई इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बीए प्रवेश परीक्षा में उन 54 ‘मेधावी बच्चों’ में एक भी पास नहीं हो सका। मेरे जैसे तमाम पिताओं को तगड़ा झटका लगा। मुलायम सिंहजी आप भी अखिलेश के पिता हैं। इन घटनाओं से सबक लीजिए। 

लेखक शिवाशंकर पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, हिंदुस्‍तान, अमर उजाला जैसे अखबारों में काम करने के बाद सक्रिय रूप से स्‍वतंत्र पत्रकारिता में जमे हुए हैं. इनसे संपर्क 09565694757 के जरिए किया जा सकता है.

विनीत की न्‍यूजटाइम्‍स के साथ नई पारी, जागरण से अनिल को हटाया गया

न्यूजटाइम्स24×7 में दो लोगों ने अपनी नई पारी की शुरुआत की है। इसमें कोमल रॉय और वीनीत शामिल हैं। इन दोनों की संस्थान के साथ यह दूसरी पारी है। दोनों कुछ समय पहले संस्थान में की गई छटनी में शामिल थे। अब दोनों ने संस्थान दोबारा से ज्वाइन कर लिया है। दोनों को असिस्टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है। और आउटपुट डेस्क पर अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे।

दैनिक जागरण, आजमगढ़ से खबर है कि प्रबंधन ने हरैया तहसील के रिपोर्टर अनिल ओझा को हटा दिया है. अनिल को कुछ शिकायत मिलने के बाद प्रबंधन ने बाहर का रास्‍ता दिखाया है. वे पिछले दस सालों से जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

आज न्‍यूज चैनल के कार्यालय पर गोलीबारी, दो घायल

पाकिस्तान के कराची में एक निजी टेलीविजन चैनल आज न्यूज़ के केंद्रीय कार्यालय पर अज्ञात बंदूकधारियों की गोलीबारी में दो लोग घायल हो गए हैं. प्रतिबंधित तालिबान पाकिस्तान के प्रवक्ता एहसान अल्लाह एहसान ने समाचार पर हमले की जिम्मेदारी ली है. किसी निजी टीवी चैनल पर तालिबान के हमले का यह पहला प्रकरण है. तालिबान के प्रवक्ता ने बीबीसी संवाददाता दलावर खान मंत्री को अज्ञात स्थान से टेलीफोन कर हमले की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए कहा कि आज समाचार तालिबान विरोधी टिप्पणी कर रहा था और उनका पक्ष सही ढंग से पेश नहीं कर रहा था.

प्रवक्ता के अनुसार कुछ दिन पहले राज्य खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के जिला दीर में सुरक्षाबलों पर हमले के बाद आज समाचार ने तालिबान के खिलाफ प्रचार किया था. दूसरी ओर आज न्यूज के अनुसार मोटर साइकिल पर सवार अज्ञात लोगों की कराची स्थित उनके केंद्रीय कार्यालय पर गोलीबारी के कारण एक सुरक्षा गार्ड और आज समाचार एक कर्मचारी घायल हो गया है. आज न्यूज का कहना है कि शुरुआती जांच के मुताबिक हमलावरों की संख्या चार थी और वे फायरिंग के बाद फरार होने में सफल हो गए.

आज न्यूज के अनुसार गोलीबारी के कारण कार्यालय के बाहर खड़ी गाड़ियों को भी नुकसान पहुंचा है. आज न्यूज के हिसाब से फायरिंग यह घटना ऐसे समय हुई जब शहर नेता प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ़ की मौजूदगी के कारण सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए थे. प्रधानमंत्री के सलाहकार रहमान मलिक ने आज टीवी कार्यालय पर हमले के चलते पुलिस प्रमुख से घटना रिपोर्ट तलब कर ली है. इसके अलावा देश के विभिन्न पत्रकारिता संगठनों ने गोलीबारी की घटना की तीव्र शब्दों में निंदा की है.

समाचार संगठनों का कहना है कि पाकिस्तान को पत्रकारों के लिए खतरनाक जगह माना जाता है और यहां पर पत्रकारों पर हमले के कई घटनाएं हो चुकी हैं लेकिन बहुत कम ही ऐसा हुआ कि इन हमलों में शामिल लोगों का पता चल सका हो. इससे पहले इस साल जनवरी में राज्य खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के जिला चारसद्दा में गोलीबारी के कारण महमंद एजेंसी के एक स्थानीय पत्रकार सल्लल्लाह खान मारे गए थे. साभार : बीबीसी

Fraud Nirmal Baba (99) : भड़ास को बधाई, पर चैनल वाले तो चोर लगते हैं

नमस्कार, सबसे पहले में भड़ास टीम को हार्दिक बड़ाई देता हूँ कि यह पाखंडी निर्मल बाबा के बारे में लोगों को जागरूक कर रही है। इस में योगदान देने के लिए मैं भी सदैव तैयार हूँ। और आप जो ये सामाजिक कार्य कर रहे हैं तो वो भी अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैं भी निर्मल जैसे पाखंडियों के बारे में बहुत कुछ करना-कहना चाहता हूँ मगर मेरे पास इतना कुछ साधन नहीं हैं और समझ में नहीं आता कि क्या करूँ?

मुझे तो इन पाखंडियों पर इतना गुस्सा आता है कि पूछो ही मत। मगर एक तो इस बात से यह सब करने से रह जाता हूँ कि प्रशासन के पास जब इतने सारे अधिकार होने के बाबजूद वो कुछ नहीं कर रहा है तो अकेला में कैसे कर सकता हूँ? प्रशासन क्यों इतना चुप है? ये सब लोग मुझे तो चोर लगते हैं चाहे वो प्रशासन के कुछ लोग हों या फिर न्‍यूज चैनल वाले। मीडिया ने इस कदर इसे हाइलाइट कर दिया है कि एक आम आदमी भी हमारी बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा है। वैसे मैं भी इस के खिलाफ कुछ सबूत ढूंढ रहा हूँ और सोच रहा हूँ कि इन जैसे लोगों के खिलाफ केस दायर कर करूँ। मगर दैनिक जीवन में इतने सारे काम रहते हैं कि उस बात से दिमाग ही हट जाता है और प्रॉब्लम तो तब आती है जब बन्दा रात में ड्यूटी करता है, किराये के घर में रहता है, हर चीज़ के बारे में सोचना, काफी बातें हैं।

आज में जिसे भी अनैतिक देखता हूँ बड़ा गुस्सा आता है मगर बेबस कि तरह रह जाता हूँ। न्‍यूज चैनल मेरी लाइफ का सबसे बड़ा झटका है जहाँ निर्मल के कार्यक्रम में कोई भी विज्ञापन नहीं देता, मगर जब ही कोई अच्छी खबर होगी तो उस पर समाचार सबसे कम और ब्रेक सबसे ज्यादा होते हैं। ये एक कड़वा सच नहीं है तो क्या है? मगर क्या करे सब लोग मिले हुए हैं और ज्यादातर लोग भ्रष्ट हैं। वैसे ये ज्यादातर काम सरकार की कमी से हो रहे हैं क्योंकि आज कि सरकार में ज्यादातर लोग भ्रष्ट हैं और अपनी कमियों और भ्रष्टता को दबाने के लिए ही ये लोग प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनने चाहते हैं, जिस से इनकी सारी कमी छुप जाये। फिर ना तो 2जी स्‍पेक्‍ट्रम, बोफोर्स, सीडब्‍ल्‍यूजी आदि कुछ भी नहीं होगा भले ही लोकपाल आ जाये। आज की सरकार जब इस निर्मल जैसे पाखंडियों का कुछ नहीं कर सकती तो फिर ये ये सोनिया, दिग्विजय, कलमाणी, राजा आदि का क्या कर सकती है? आज का पूरा प्रशासन लगभग भ्रष्ट है और कुछ भी नहीं हो सकता। मैं तो बस दिसम्बर 2012 का इंतज़ार कर रहा हूँ क्योंकि मैंने ये सुना था कि उस दिन दुनिया ख़त्म हो जाएगी। वैसे ऐसे भ्रष्ट लोगों की संतान इनके सामने पल पल मरे मुझे तब ख़ुशी होगी और उस समय ये कुछ भी ना कर पाए पूरी पॉवर होने के बाबजूद भी।

सुनील शर्मा

सीनियर इंटरनेट मार्केटिंग स्‍पेशलिस्‍ट

सेक्‍टर 63, नोएडा, यूपी

संपर्क : +91 9718744453


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टीआरपी बनाम गुणवत्‍ता : बाजार के दबाव से परेशान है समूचे विश्‍व का मीडिया

भारत में मीडिया की भूमिका को लेकर तीखी बहस होती है.आलोचक कहते हैं कि मीडिया अपना काम जिम्मेदारी से नहीं कर रहा. सूचना देने के अलावा लोगों को शिक्षित करना भी मीडिया का काम है. जर्मन शहर बॉन में भी एक ऐसी ही बहस चल रही है जिसमें 'संस्कृति, शिक्षा और मीडिया–टिकाऊ दुनिया का निर्माण' पर बात करने के लिए लोग इकट्ठा हुए हैं. यह सम्मेलन उसी बिल्डिंग में हो रहा है जिसमें कभी जर्मनी की ससंद बैठा करती थी. तब बॉन शहर पश्चिमी जर्मनी की राजधानी हुआ करता था.

दुनिया भर के 100 देशों के प्रतिनिधि इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं और यह आयोजन किया जा रहा है डॉयचे वेले की तरफ से. तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन की शुरुआत हुई डॉयेचे वेले के उप निदेशक, राइनहार्ड्ट हार्टश्टाइन के भाषण से. हार्टश्टाइन ने कहा, ''चाहे पश्चिम हो या पूरब हो या दुनिया का कोई देश हो, शिक्षा- संस्कृति और शांतिपूर्वक तरीके से आपस में मिलकर रहने की चाबी है. इसमें मीडिया की भूमिका दो तरह की हो सकती है. पहली यह कि वह सूचना को सार्वजनिक करे. जहां समस्या है वहां पारदर्शिता लाए और दूसरा यह कि मीडिया बताए कि भेदभाव कहां पर है और कैसे इसे हटाया जा सकता है.''

सम्मेलन को कई सत्रों में बांटा गया है और इसमें दुनिया भर के मीडियाकर्मी, राजनीति विश्लेषक, ब्लॉगर और संस्कृति कर्मी हिस्सा ले रहे हैं. जिन बड़े नामों की इस बार सबसे ज्यादा चर्चा है उनमें जर्मनी के विदेश मंत्री गीडो वेस्टरवेले और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति बदरुद्दीन यूसुफ हबीबी प्रमुख हैं. वेस्टरवेले मंगलवार को इस सम्मेलन में शिरकत करेंगे.

पहले दिन के पहले सत्र की शुरुआत हुई मीडिया की नैतिकता पर बहस से. शुरुआत की जर्मनी के उल्म विश्वविद्यालय में आईटी के प्रोफेसर राडरमाखर ने. 'टीआरपी बनाम गुणवत्ता – शिक्षित करने के मिशन और बजार के दबाव के बीच फंसा मीडिया,' इस विषय पर राडरमाखर ने कहा, ''मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. मीडिया लाखों लोगों के दिमाग को प्रभावित करता है. कई बार जो लोग सही सोचते हैं उनकी आवाज दब जाती है.'' बीच में भारत का भी जिक्र हुआ. भारत की शिक्षा पद्धति के बारे में राडरमाखर ने कहा कि वहां शिक्षा का मॉडल पश्चिम के मुकाबले एकदम अलग है. अभी ये नहीं कहा जा सकता कि कौन सही है.

इस सम्मेलन में सामूहिक विकास, सोशल मीडिया, अरब और अफ्रीका के निर्माण में मीडिया की भूमिका, शिक्षा का अधिकार, सामाजिक सक्रियता, सेना और मीडिया और साइबर मीडिया जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी. इस सम्मेलन का मकसद न तो राजनीतिक मंच मुहैया कराना है और न ही अकादमिक मंच तैयार करना है. यूनेस्को के जर्मन कमीशन के महासचिव रोनाल्ड बर्नेकर कहते हैं कि इसका मकसद,'' दुनिया भर के लोगों को एक जगह पर इकट्ठा करना और समस्याओं का समाधान निकालना है.''यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में करीब 80 करोड़ बच्चे अशिक्षित हैं. दूसरी तरफ यह भी सच है कि दुनिया एक सूचना समाज में बदलती जा रही है. ऐसे में ग्लोबल मीडिया फोरम जैसे सम्मेलन की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है. साभार : डायच वेले

कवि और पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय ने शुरू किया ”युग ज़माना”

लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट से अभी हाल में ही फीचर एडिटर पद से इस्तीफा देने वाले कवि और पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय ने नया प्रयोग शुरू किया है. उन्होंने युग जमाना नाम से इंटरनेट पर एक पत्रिका लांच की है. पूरा पता www.yugjamana.org है. कादंबिनी, दिल्ली से इस्तीफा देने के बाद हरे प्रकाश लखनऊ में जनसंदेश टाइम्स के साथ जुड़ गए थे. वहां जब हालात खराब होने लगे तो डीएनए, लखनऊ से जुड़ गए. यहां का भी माहौल जब रास नहीं आया तो उन्होंने नौकरी को बाय बोलकर अपने मन का काम शुरू किया है.

''बुराई के पक्ष में'' कविता से मशहूर हुए हरे प्रकाश जनपक्षधर पत्रकार हैं. उनका तेवर उनके नए प्रयोग में दिखने लगा है. ''युग ज़माना'' उन सभी के लिए पठनीय प्लेटफार्म बनेगा जो समाज और जनता के लिए संवेदना व सरोकार रखते हैं. इस ई-पत्रिका में नए प्रयोग के बारे में और इसके आर्थिक माडल के बारे में एक जगह विस्तार से लिखा गया है, इसी लिखावट से पत्रिका के अंदाज़ व आग़ाज़ को समझा जा सकता है…

युग-ज़माना – नये दौर की एक ज़रूरी पत्रिका

हम उन तमाम किस्सों को कहेंगे जिन्हें नहीं कहा गया है और उन किस्सों को कहेंगे जिन्हें बार-बार कहे जाने के बावजूद अनसुना कर दिया गया है। हम नई बातें करेंगे और पुरानी बातें भी करेंगे। हम उन सब बातों पर बातें करेंगे जिससे यह युग-ज़माना खराब होता जा रहा है। हम उन बातों को सामने लाने की कोशिश करेंगे जिससे यह युग-ज़माना बेहतर हो सके। यह युग-ज़माना आपका है, इसलिए जिम्मदारी भी आपकी है। यह मंच आपका है । आपके पास अगर हैं कुछ ऐसी बातें जो होनी चाहिए, तो आइए करते हैं उन बातों को यहां साझा..

कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, साक्षात्कार, रिपोर्ट, खबरें, प्रेस विज्ञप्ति, फोटो सब कुछ भेजें, जो चाहे सो भेजें। आप पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आयोजनों की दिलचस्प रिपोर्टिंग भी भेज सकते हैं। हम सभी तरह की रचनाओं और टिप्पणियों पर विचार करते हैं और उचित महसूस होने पर प्रकाशित करते हैं। यह मंच आपका है, अतः आप भारत में हों या भारत के बाहर हों, अपनी लिखी चीजें संकोच छोड़कर भेजें। किसी औपचारिक आमंत्रण का इंतजार व्यर्थ है। अगर आप हमारे नियमित संवाददाता बनना चाहते हैं, तो भी संपर्क करें।

चूंकि यह फिलहाल पूरी तरह एक अनियोजित, असंगठित और विज्ञापन हीन प्रयास है और इस पत्रिका को चलाने में बेरोजगार युवकों की एक टीम लगी हुई है, अतः इस पत्रिका की सक्रियता बल्कि इसका जीवन अंशदान पर आधारित है। अंशदान इस मुहिम के समर्थकों की कुल मासिक आय का कुछ हिस्सा है या एकमुश्त दी गई सहयोग राशि है, जो जाहिर तौर पर अत्यंत सामान्य और लघु ही हो सकती है। हम स्थाई अंशदानकर्ताओं को खोजने का प्रयत्न करेंगे। अपने ऐसे सहयोगी-संरक्षकों का नाम भी सम्मान के साथ यहां दे सकते हैं, अगर वे चाहें। ध्यान रखें कि हम निःस्वार्थ सहयोग ही स्वीकारते हैं। हम इसके लिए आपके किसी हित साधन का माध्यम नहीं बनेंगे। यदि आपको लगता है कि आपको हमारी मदद करनी चाहिए, तो निम्न सूत्रों पर सम्पर्क करें-

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लोकमत समाचार में मैनेजर बने आलोक, कोमल की नई पारी

हिंदुस्‍तान, मेरठ से खबर है कि आलोक कुमार शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सेल्‍स हेड के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे. आलोक ने अपनी नई पारी लोकमत समाचार के साथ औरंगाबाद में शुरू की है. उन्‍हें मैनेजर बनाया गया है. आलोक पिछले ग्‍यारह सालों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. इसके पहले वे अमर उजाला के साथ बनारस तथा लखनऊ में भी काम कर चुके हैं. उनकी गिनती तेजतर्रार मैनेजरों में की जाती है.

न्‍यूज टाइम (जनसंदेश) चैनल से खबर है कि कोमल रॉय ने यहां से अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें यहां असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर बनाया गया है. ये इनकी दूसरी पारी है. इन्‍हें आउटपुट में लाया गया है.

यूपी में मंत्री ने करा दिया पुलिस-प्रशासन पर हमला!

एक मंत्री का समर्थक था लूट का आरोपित। सीधे तौर पर तो मंत्री प्रशासन पर कार्रवाई नहीं कर पाये, लेकिन मंत्री ने अपने समर्थकों को इशारा कर दिया। अभी जिले के आला अफसर मौके पर अपराधियों से पूछताछ में जुटे थे, कि अचानक मंत्री के समर्थकों ने अपने साथियों को छुड़ाने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाने को थाने पर ही हमला करा दिया। अपराधियों को जेल बंद करने की कार्रवाई के दौरान करीब साढ़े तीन सौ समर्थकों ने पुलिस पर फायरिंग कर दी और जिलाधिकारी की कार को पुल से फेंक कर गोमती नदी के हवाले कर दिया। अब यह कथित मंत्री इस मामले से अपना नाम हटाने की जुगत में है और बेबस प्रशासन मंत्री का नाम इस मामले से गोल करने की कवायद में है। प्रदेश पुलिस भी इस मामले में माझी का नाम बचाने में जुटी है।

यह वाकया है राजधानी से सटे जिले सुल्‍तानपुर का और जिस मंत्री का नाम इस मामले में उछल रहा है, वह है संखलाल माझी। प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार में मांझी का ओहदा है स्‍वास्‍थ्‍य-परिवार कल्‍याण विभाग में राज्‍य मंत्री का। आजमगढ़ मार्ग से सटे जिले अंबेदकरनगर में संखलाल मांझी का विधानसभा क्षेत्र आता है। प्रदेश सरकार में मुस्लिम राजनीति की शिया धारा के मजबूत खंभा की पहचाने वाले और पूर्व पुलिस अफसर रहे अहमद हसन के दाहिना हाथ माने जाते हैं संखलाल मांझी। लेकिन सुल्‍तानपुर के इस हादसे में सपाई कार्यकर्ताओं की करतूत ने प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर एक बड़ा बट्टा लगा दिया है। जाहिर है कि ऊपरी दबावों के चलते सुल्‍तानपुर जिला का प्रशासन मामले की लीपापोती में लगा दीखता है।

शुरुआत हुई एक युवा उद्यमी पीयूष सिंह की लूट से। दिल्‍ली निवासी इस युवा व्‍यवसायी ने अपने सुल्‍तानपुर के कादीपुर स्थित पैतृक गांव में एक बड़ी पोल्‍ट्री यूनिट स्‍थापित करने का इरादा किया था। काम शुरू हो चुका था। यहां कारीगरों को तत्‍काल भुगतान होना था तो पीयूष सिंह दिल्‍ली से रकम लेकर ट्रेन से सुल्‍तानपुर पहुंचा। 25 मई के भोर वक्‍त था करीब करीब ढाई बजे। निजी कार पर बैठ कर पीयूष कादीपुर की ओर बढ़ा। दस किलोमीटर के आगे ही कुछ बदमाशों ने कार पर कीलें फेंक कर उसे पंक्‍चर करा दिया और पीयूष, उसके चाचा व उसके ड्राइवर की पिटाई कर उससे साढ़े दस लाख की नकदी और लैपटाप व एक मोबाइल लूट कर फरार हो गये। बाद में किसी तरह यह लोग पास के गोसाईंगंज थाने पर पहुंचे और रिपोर्ट दर्ज करायी।

सर्विलांस की मदद से सुल्‍तानपुर पुलिस करीब बीस दिन बाद लुटेरों तक पहुंच पायी और 16 जून की शाम साढ़े आठ बजे इनमें से दो लुटेरों को पुलिस ने दबोच लिया। लुटेरों के पास से साढ़े तीन लाख रुपये की नकदी, लैपटॉप और मोबाइल भी बरामद हो गया। बाकी लोगों की तलाशी में दबिश डालने के लिए कई टीमें बनायी गयीं और गोसाईंगंज थाना की पुलिस ने पकड़े गये संतोष और बब्‍लू मांझी नामक लुटेरों की फर्द तैयार शुरू कर दी। पीयूष सिंह ने लुटेरों की शिनाख्‍त भी कर दी।

बताते हैं कि इन लुटेरों का गांव कादीपुर मार्ग स्थित तातियानगर जमुनिहा है और उनकी करीबी जान-पहचान संखलाल मांझी से है। यह गांव केवट-बहुल है और लूट व हत्‍या जैसी वारदातों में कई अपराधी यहीं से हैं। यह अपराधी राजनीतिक आश्रय पाये हैं। कुछ ही पहले यहां अपराधियों की पकड़ के लिए फैजाबाद के डीजीआई ने खुद कमर कसी थी, लेकिन बलवाइयों ने उन्‍हें घर पर बुरी तरह पीट दिया था। बहरहाल, इस ताजा पकड़-धकड़ की खबर मिलने पर करीब साढ़े तीन सौ लोगों ने गोसाईंगंज थाने को घेर लिया। तनाव देखकर जिलाधिकारी रमाकांत कुमार और पुलिस अधीक्षक अलंकृता सिंह दल-बल के साथ मौके पर पहुंचे। भड़के लोगों को समझाने की कोशिश निरर्थक हो गयी और अचानक ही मौजूद लोगों ने बलवा शुरू कर दिया।

पुलिस पर भीड़ से गोलियां चलने शुरू हो गयीं। इस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और हवाई फायरिंग कर दी। भाग कर छितर-बितर भीड़ ने जिलाधिकारी की कार को पुल से धकेल कर गोमती नदी के हवाले कर दिया। इस हादसे में जिले के एएसपी, सीओ सिटी और एसओ समेत 22 पुलिसकर्मियों को चोटें आयीं हैं, जिनमें कई की हालत गंभीर है। हंगामा संभालने के बाद पुलिस ने चिंहित चारों गांवों के बलवाइयों पर जानलेवा हमला समेत अनेक धाराओं पर सामूहिक मुकदमा भी दर्ज करा दिया और पकड़-धकड़ की कार्रवाई शुरू हो गयी। पड़ोसी जिलों की पुलिस को बुलाकर इलाके में फ्लैग मार्च और सघन छानबीन-तलाशी की जा रही है। पुलिस ने लूट में शामिल सुल्‍तानपुर के रामनरेश, परसुराम, बबलू निषाद तथा सीएसएम नगर के नदीम उर्फ निजामुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया।

45 नामजद और 300 अन्‍य लोगों के खिलाफ रिपोर्ट के बाद अब तक 7 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। लेकिन इसी बीच पुलिस को पता चल गया कि इस बलवे में राज्‍यमंत्री संखलाल मांझी का इशारा था। स्‍थानीय पत्रकार मनुराम पांडेय बताते हैं कि बलवे के समय मांझी सर्किट हाउस में टिके थे। एक अन्‍य सूत्रों के अनुसार लुटेरों को छुड़ाने के लिए उसके समर्थक जब मांझी के पास पहुंचे तो मांझी ने खुद तो आधिकारिक तौर पर कोई कार्रवाई करने की बात की, लेकिन लोगों को सलाह दी कि वे लोग थाने पर हंगामा करें जिससे मजबूर होकर पुलिस इन लोगों को छोड़ दे। बताते हैं कि मांझी की इस सलाह को मानकर ही यह उपद्रवी गोसाईगंज थाने पर हंगामा करने पहुंचे थे।

बहरहाल, पुलिस ने बलवाइयों पर सामूहिक मुकदमा दर्ज कर दिया है, लेकिन अलंकृता सिंह ने मांझी की संलिप्‍तता का आरोप वे खारिज करती हैं। लेकिन पुलिस महकमे में मांझी की करतूत की बात साफ तौर कही जा रही है। यह दीगर बात है कि संखलाल मांझी इस मामले में अपना हाथ नहीं बता रहे हैं, मगर सूत्र बताते हैं कि प्रदेश प्रशासन ने मामला में मांझी का नाम न कुबूल करने के निर्देश दिये हैं। लेकिन इस हालत ने प्रदेश के निजाम के रवैये का खुलासा तो कर ही दिया है। साथ ही यह भी कि प्रदेश में उद्योग लगाने की ख्‍वाहिशमंदों का स्‍वागत किस तरह होगा।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.

सुरक्षा कानून की मांग को लेकर लखनऊ के पत्रकारों ने धरना दिया

लखनऊ। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अलग से कानून बनाये जाने की मांग को लेकर राजधानी के पत्रकार आज विधान भवन के सामने धरने पर बैठे। धरने में भारी संख्या में पत्रकार, छायाकार और मीडियाकर्मी शामिल हुए। धरने का आयोजन नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इण्डिया) की राज्य शाखा उ.प्र. जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) ने किया।  धरने को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि देश भर में पत्रकारों की सुरक्षा खतरे में है। पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने की परिस्थितियां दिन प्रतिदिन विषम होती जा रही हैं।

वक्‍ताओं ने कहा कि पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं। उन्हें धमकियां दी जा रहीं। देश के कई हिस्सों में पत्रकारों को अपने काम के दौरान जान गंवानी पड़ी है। पत्रकारिता के जोखिम भरे क्षेत्र को दृष्टिगत रखते हुए पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक विशेष कानून बनाया जाना चाहिए। यह कानून पत्रकारों पर हो रहे हमलों तथा उनकी जानमान की सुरक्षा कर सकेगा। वक्ताओं ने धरने पर बताया कि एनयूजे की ओर से पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर दो साल से आन्दोलन चलाया जा रहा है। इसके लिए एनयूजे और उसकी राज्य इकाइयां अपने अधिवेशनों तथा सम्मेलनों में प्रस्ताव पारित कर चुकी हैं। पिछले साल भी 25 जून को देश व्यापी धरना प्रदर्शन का आयोजन किया गया था।

धरने पर वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र शुक्ला, पी.के.राय, पी.बी.वर्मा, अजय कुमार, प्रमोद गोस्वामी, राजीव शुक्ला, सर्वेश कुमार सिंह, सुभाष सिंह, सत्येन्द्र अवस्थी, किशन सेठ, सुनील पावगी, तारकेश्वर मिश्र, प्रभात त्रिपाठी, रजा रिजवी, दिलीप अग्निहोत्री, रवीन्द्र शुक्ला, अशोक मिश्र, भारत सिंह, राजेश सिंह, सुशील सहाय, सुनील त्रिवेदी समेत भारी संख्या में पत्रकार बैठे। धरने के बाद पत्रकारों ने महामहिम राष्ट्रपति को सम्बोधित ज्ञापन राजभवन जाकर प्रमुख सचिव राज्यपाल जी.बी. पटनायक को भेंट किया। ज्ञापन में मांग की गई है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए केन्द्र सरकार संसद से अधिनियम बनाकर विशष कानून बनाये।

अमेरिका नहीं भेजे जाने की गारंटी चाहते हैं जूलियन असांजे

सिडनी। विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने सोमवार को इस बात की राजनयिक गारंटी दिए जाने की मांग की कि यदि उन्हें आपराधिक आरोपों का सामना करने के लिए स्वीडन भेजा जाता है तो गोपनीय दस्तावेजों के प्रकाशन को लेकर उन्हें अमेरिका के हवाले नहीं किया जाएगा। 40 साल के ऑस्ट्रेलियाई नागरिक असांजे ने कहा कि वह यौन शोषण आरोपों में बहस का सामना करने के लिए स्वीडन जाने को तैयार हैं लेकिन उन्हें डर है कि स्टॉकहोम उन्हें अमेरिका के हवाले कर देगा जहां उन पर विकीलीक्स द्वारा किए गए खुलासों के लिए जासूसी और साजिश रचने के आरोपों का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने लंदन में इक्वाडोर दूतावास से सिडनी मर्निंग हेराल्ड को बताया, 'अंतत: यह मामला इस बात पर निर्भर करेगा कि ब्रिटेन, अमेरिका और स्वीडन किस प्रकार की गारंटी देने के इच्छुक हैं।' उन्होंने इक्वाडोर से शरण दिए जाने की अपील की है। विकिलीक्स ने इराक और अफगानिस्तान युद्धों समेत कई राजनयिक केबल को सार्वजनिक कर दिया था। असांजे ने कहा, 'उदाहरण के लिए, यदि अमेरिका इस बात की गारंटी देता है कि उनके खिलाफ जांच बंद कर दी जाएगी तो यह महत्वपूर्ण होगा। राजनयिक प्रतिबद्धताओं का वजन होता है।' स्वीडन के प्रत्यर्पण से बचने के लिए पिछले करीब एक सप्ताह से इक्वाडोर दूतावास में रह रहे असांजे ने एक बार फिर उनके मामले से निपटने के तौर तरीकों को लेकर ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड की आलोचना की। (एजेंसी)

बिल्‍ड की बुराई कर सकते हैं, पर उसके बिना नहीं रह सकते

: विवादों के बीच अखबार के साथ साल पूरे : करीब आठ करोड़ की आबादी वाले जर्मनी में बिल्ड त्साइटुंग नाम के अखबार की 4.1 करोड़ कॉपियां बिकती हैं. अखबार अपनी 60वीं वर्षगांठ मना रहा है. अखबार आए दिन आलोचनाएं भी झेलता है लेकिन फिर भी सबको हिलाता रहता है. कई लोग बिल्ड त्साइटुंग को समचारों के लिए पढ़ते हैं और कई लोग इसमें छपने वाली निर्वस्त्र युवतियों की तस्वीरों के लिए अखबार खरीदते हैं. लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि बिल्ड की हेडलाइन गजब तीखी और जज्बाती होती है. अखबार छोटी और चटकारेदार हेडलाइन के लिए मशहूर है. 2005 में जब जर्मनी के योसेफ राटत्सिंगर पोप चुने गए तो बिल्ड त्साइटुंग ने हेडलाइन दी, "वियर सिंड पाप्स्ट" यानी 'हम पोप हैं.'

बिल्ड के चीफ एडिटर काई डीकमान कहते हैं, "बिल्ड की हेडलाइन ही अच्छी होती है. यह एक्सक्लूसिव होती है या यह दर्शकों को सोचने का मौका देती है या उन्हें चौंका देती है." जर्मन इतिहास की दुखद घटनाओं में भी बिल्ड ने अपनी हेडलाइन से समझौता नहीं किया. 9/11 के हमलों के अगले दिन बिल्ड ने हेडलाइन दी, "शक्तिमान ईश्वर हमारे साथ है", इसने पाठकों को चौंका दिया. पिछले साल ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस विलियम की शादी के अगले दिन बिल्ड ने वर और वधू के चुंबन का फोटो मुख्य पेज पर छापा और हेडलाइन दी, 'किस, किस, हुर्रे.'

बिल्ड का इतिहास : बिल्ड- जर्मन भाषा के इस शब्द का अर्थ है, तस्वीर. बिल्ड का पहला संस्करण 24 जून 1952 को आया. तब अखबार सिर्फ चार पन्ने का था. अखबार के संस्थापक आक्सेल श्प्रिंगर ने ब्रिटेन के टेबलॉयड्स का मॉडल अपनाया. बिल्ड के लिए उन्होंने 'तस्वीरों से भरी, कम टेक्स्ट वाली और लोकप्रिय विषय उठाने वाली' राह तय की. नतीजा यह हुआ कि एक साल से भी कम समय में बिल्ड की रीडरशिप पांच लाख के पार चली गई. उस वक्त अखबार में राजनीतिक विषय कम होते थे. लेकिन 1960 के दशक की शुरूआत में बर्लिन की दीवार का निर्माण शुरू हुआ. दीवार निर्माण के पहले ही दिन की तस्वीर छापते हुए बिल्ड ने हेडलाइन दी, "पश्चिम कुछ नहीं कर रहा है." इसके बाद बिल्ड राजनीतिक अखबार बन गया. अखबार के प्रकाशक श्प्रिंगर जर्मन राजनीति को लेकर अपना नजरिया बिल्ड के जरिए बताने लगे.

हत्या में बिल्ड! : लेकिन 1960 के दशक के अंत में छात्रों का बड़ा समूह बिल्ड के खिलाफ प्रदर्शन करने लगा. छात्रों ने आरोप लगाया कि अखबार तटस्थ पर्यवेक्षक की भूमिका से गिर रहा है. अफवाहें उड़ी कि अखबार ने वामपंथी प्रदर्शनकारियों के नेता रुडी डूट्श्के की हत्या की कोशिश में शामिल हुआ. हजारों लोग सड़कों पर उतरे. उनके हाथ में पोस्टर थे, जिन पर लिखा गया था, "बिल्ड ने ही मारा भी." प्रदर्शन की वजह से अखबार का म्यूनिख का दफ्तर सूना पड़ गया. हैम्बर्ग का छपाई मुख्यालय बंद करना पड़ा.

बिल्ड की संपादकीय टीम ने बीते छह दशकों के उतार चढ़ाव से कई अनुभव जुटाए. अखबार ने राजनेताओं और राजनीति पर तल्ख टिप्पणियां भी कीं. लेकिन अब सनसनीखेज रिपोर्ट को लेकर उसका स्तर थोड़ा कम झटकेदार हुआ है. बिल्ड के पूर्व रिपोर्टर गुएंटर वालराफ ने अपनी किताब में साफ कहा है, "बिल्ड रिपोर्टिंग के दौरान लगातार लोगों के निजी और अंतरंगता के पलों में भी घुसा." वालराफ स्वीकार करते हैं कि वह कुछ लोगों के सुसाइड नोट भी देख चुके हैं, जिनकी निजी जिंदगी को बिल्ड ने सार्वजनिक कर दिया. खोजी पत्रकार वालराफ ने बिल्ड की हकीकत जानने के लिए उसमें काम किया.

बिल्ड की ताकत : आज इस बात में कोई शक नहीं है कि बिल्ड जर्मनी में एक ताकत है. बर्लिन में बैठे नेताओं के लिए भी अखबार से पार पाना मुश्किल है. पूर्व चांसलर हेलमुट कोल के प्रवक्ता ने एक बार कहा कि वह बिल्ड त्साइंटुग पढ़े बिना कभी नहीं निकले. उनके मुताबिक इस अखबार के जरिए 'कोई देश की मूड को पढ़ सकता है.' बर्लिन में विदेशी दूतावासों में काम करने वाले अधिकारी भी बिल्ड की अहमियत समझते हैं. ब्रिटिश दूतावास के रॉब एलिस ने डॉयचे वेले को बताया कि बिल्ड सामान्यतया ऐसे मुद्दे को उठाता है जो महत्वपूर्ण नेताओं के एजेंडे में होते हैं. यह जर्मनी के ऐसे मुद्दे होते हैं जिनमें लंदन के नेताओं की भी दिलचस्पी होती है.

वुल्फ पर भारी पड़ा बिल्ड :  बिल्ड को सभी नेता अपने करीब रखना चाहते हैं, लेकिन अखबार ऐसा है कि कभी भी किसी नेता की खाट खड़ी कर दे. लिहाजा नेता बहुत सावधान रहते हैं. बिल्ड की खबरों ने जर्मनी में कुछ बड़े नेताओं का राजनीतिक भविष्य खत्म किया है. पूर्व राष्ट्रपति क्रिस्टियान वुल्फ को तो बिल्ड की वजह से पद छोड़ना पड़ा. बिल्ड ने एक हफ्ते तक वुल्फ के खिलाफ ऐसा अभियान छेड़ा कि उन्हें राष्ट्रपति भवन से निकलना पड़ा. जर्मनी में बिल्ड की बुराई की जा सकती है लेकिन उसके बिना रहा नहीं जा सकता. सवा करोड़ से ज्यादा लोगों का यह अखबार जर्मन समाज की बड़ी ताकत है. साभार : डायचवेले
 

डीएलसी के आदेश पर जागरण, बरेली के पत्रकारों को मिली मई की सैलरी

दैनिक जागरण, बरेली से खबर है कि छंटनी की लिस्‍ट में शामिल किए गए पत्रकारों को प्रबंधन ने मई माह की सैलरी प्रदान कर दी है. प्रबंधन ने एक दर्जन से ज्‍यादा कर्मचारियों से इस्‍तीफा मांगा था, जिसमें एडिटोरियल समेत कई विभाग के कर्मचारी शामिल थे. इन लोगों ने उप श्रमायुक्‍त का दरवाजा खटखटाया था. डीएलसी (उप श्रमायुक्‍त) एमएल चौधरी ने जागरण प्रबंधन को तीन दिन के भीतर मई माह का वेतन देने तथा 22 जून को कर्मचारियों का नियुक्ति पत्र तथा संस्‍थान का स्‍टैंडिंग आर्डर प्रस्‍तुत करने का आदेश दिया था. डीएलसी कोर्ट में ही मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई भी चल रही है. 

प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों के मई माह का वेतन तो अवमुक्‍त कर दिया, परन्‍तु 22 जून को जागरण का कोई भी व्‍यक्ति कर्मचारियों का नियुक्ति पत्र या स्‍टैंडिंग आर्डर लेकर डीएलसी कार्यालय नहीं पहुंचा. डीएलसी से नाराजगी दिखाते हुए प्रबंधन को जल्‍द से जल्‍द उक्‍त दोनों पेपर प्रस्‍तुत करने का निर्देश दिया है. उन्‍होंने सुनवाई की अगली तारीख 29 जून निर्धारित की है. अब देखना है कि जागरण प्रबंधन 29 जून को उक्‍त कागजातों के साथ पहुंचता है या फिर गच्‍चा दे जाता है.    

मुंबई में एनबीटी के 62 साल पूरे, प्रसून जोशी, चित्रांगदा समेत कई होंगे सम्‍मानित

टाइम्‍स समूह के हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्‍स के मुंबई में 62 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं. इस अवसर प्रबंधन मुंबई में 'एनबीटी उड़ान अवार्ड' समारोह का आयोजन कर रहा है. 26 जून यानी कल मुंबई के ताज में आयोजित समारोह में अखबार मुंबई के प्रमुख हस्तियों को सम्‍मानित करेगा. एनबीटी पिछले पांच सालों से हिंदी भाषा में बेहतर काम करने वालों को सम्‍मानित करता आ रहा है. कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि महाराष्‍ट्र के सीएम पृथ्‍वीराज चव्‍हाण होंगे. इस बार गीतकार प्रसून जोशी, चित्रांगदा सिंह, मिलिंद देवड़ा समेत कई हस्तियों को एनबीडी उड़ान से सम्‍मानित किया जाएगा.

प्रबंधन का कहना है कि 26 जून को पाठकों को अखबार में विशेष कंटेंट उपलब्‍ध कराया जाएगा. इसमें एनबीटी के पिछले सभी इवेंटों की जानकारियां भी पाठकों तक पहुंचाई जाएंगी. इसके अलावा भी कई नए इनोवेशन किए जाएंगे.

ईराक में बीबीसी समेत 44 मीडिया संस्‍थानों को बंद करने का आदेश

बगदाद : ईराक सरकार ने देश में संचालित हो रहे 44 मीडिया संस्थानों को बंद करने का आदेश दिया है, जिनमें ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन (बीबीसी) और वायस आफ अमेरिका भी शामिल हैं। सूत्रों ने बताया कि इराक सरकार की प्रसारक नियमन संस्था कम्युनिकेशन्स एण्ड मीडिया कमीशन (सीएमसी) ने प्रसारण लाइसेंस की फीस जमा नहीं किये जाने की वजह से यह आदेश जारी किया है हालांकि अभी उसने अपनी तरफ से कोई अन्य कार्रवाई नहीं की है।

निशाने पर आए इन 44 मीडिया संगठनों में स्थानीय निजी चैनल शरकिया और बगदादिया के अलावा अमेरिका की वित्तीय मदद से चलने वाला रेडियो सावा भी शामिल है। सीएमसी के एक उच्च पदस्थ सूत्र ने बताया कि यह आदेश स्थानीय प्रशासन को भी भेज दिया गया है जो इन मीडिया संस्थानों को बंद कराने का काम करेगा। सूत्र ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का देश में शिया सुन्नी टकराव की रिपोर्टिग से कुछ भी लेना देना नहीं है।

कुछ समाचारों में इस आदेश के पीछे ऐसे कारणों का उल्लेख किया गया था। उधर पत्रकारों के संगठन जर्नलिस्टिक फ्रीडम्स आब्जर्वेटरी ने इस कदम का कडा विरोध किया है। संगठन के प्रमुख जियाद अल अजीली ने कहा कि देश इस समय राजनीतिक अनिश्चितता से गुजर रहा है। ऐसे समय यह कदम एकदम गलत और मूर्खतापूर्ण है। (एजेंसी)

झारखंड में दैनिक भास्‍कर से कई के इस्‍तीफा देने की चर्चाएं

: कानाफूसी :  दैनिक भास्‍कर, झारखंड में इन दिनों चर्चाओं ने हलचल मचा रखा है. कुलदीप व्‍यास के झारखंड हेड बनाए जाने के बाद ही अनुमान लगाया जा रहा था कि तमाम बदलाव होंगे, किए जाएंगे, दिखाई पड़ेंगे. अब कई तरह की चर्चाएं हैं. संपादकों के बदले जाने की चर्चा है तो दूसरे विभागों से इस्‍तीफा दिए जाने की खबरें हैं. हालांकि आधिकारिक रूप से इस बात से इनकार किया जा रहा है, लेकिन जिस तरह की बातें हो रही हैं, उससे लगता है कि कहीं न कहीं अंदर खिचड़ी जरूर पक रही है.

शुरुआत करते हैं स्‍टेट बिजनेस हेड अजय धवन के इस्‍तीफा देने की अपुष्‍ट खबर से. झारखंड में अजय धवन के इस्‍तीफा देने की खबरें आ रही हैं, जबकि अजय धवन खुद ऐसी किसी भी संभावना से इनकार करते हुए इसे गलत बताते हैं. उनका कहना है कि कुछ लोग निजी स्‍वार्थ से इस तरह की खबरें उड़ाते ही रहते हैं. वे भास्‍कर के साथ काम कर रहे हैं. अजय धवन के साथ स्‍टेड प्रोडक्‍शन हेड विक्रमजीत शर्मा के बारे में भी ऐसी ही अफवाहें उड़ रही हैं. विक्रमजीत शर्मा भी ऐसी किसी बात से इनकार करते हैं. वो बताते हैं कि बेटी की शादी में छुट्टी पर घर आया हूं. एक जुलाई को रांची पहुंच जाउंगा. इनके अलावा एजीएम आशीष सिंह और एचआर से अनंदिता मिश्रा के इस्‍तीफा देने की चर्चाएं हैं. हालांकि इन लोगों से बात नहीं हो पाई.

 इतना ही संपादकीय विभाग से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि रांची के संपादक राघवेंद्र को जमशेदपुर भेजे जाने की तैयारी की जा रही है. राघवेंद्र का पसंदीदा डेस्‍टीनेशन शुरू से धनबाद रहा है. वे जमशेदपुर की बजाय धनबाद जाना चाहते हैं. वहीं जमशेदपुर के संपादक डा. संतोष मानव को भोपाल बुलाए की बात कही जा रही है. एक चर्चा यह भी है कि बसंत झा को धनबाद से जमशेदपुर और राघवेंद्र को उनकी इच्‍छानुसार धनबाद भेजा जा सकता है. रांची में कोई स्‍थानीय संपादक नहीं रहेगा. कुलदीप व्‍यास ही यहां की जिम्‍मेदारी देखेंगे. हालांकि आधिकारिक रूप से वरिष्‍ठ इस तरह की बात से इनकार कर रहे हैं. पर चर्चाओं का धुंआ आग लगने का संदेश जरूर करा रहा है.

जागरण में बंपर छंटनी (42) : हरियाणा में गैर बिहारी बनाए जा रहे छंटनी के शिकार

दैनिक जागरण, हरियाणा में इस समय जमकर क्षेत्रवाद चल रहा है. इस तरह की चर्चा हर यूनिट में है. इसको बल इसलिए भी मिला है कि अब तक दैनिक जागरण से जितने भी लोग छंटनी के शिकार बनाए गए हैं, वे हरियाणा या यूपी के हैं. बिहार के एक भी बंदे को बाहर नहीं किया गया है. इन यूनिटों में हर कोई बस यही चर्चा कर रहा है कि अगर आप हरियाणा में जागरण की नौकरी करना चाहते हैं तो आपकी पहली प्राथमिकता बिहारी होनी चाहिए और दूसरी ब्राह्मण. तीसरी आप किसी के रिश्‍तेदार हो तो सोने पर सुहागा है.

दैनिक जागरण, हरियाणा के सोनीपत यूनिट में तो इसकी पुष्टि भी हो रही है. सोनीपत के ब्‍यूरोचीफ संजय मिश्रा बिहार से हैं. निशिकांत ठाकुर के दूर के रिश्‍तेदार ऋषि कुमार झा भी बिहार से हैं. यहां से जिन लोगों को निशाना बनाया गया उसमें ब्रिजेश तिवारी यूपी से ताल्‍लुक रखते थे. दिनेश हरियाणा से ताल्‍लुक रखते थे. इतना ही नहीं नवीन कुमार मिश्रा, जो यूपी के रहने वाले हैं, को भी इसलिए रोहतक भेजा गया ताकि उन्‍हें बाहर किया जा सके. अंतत: उनसे भी इस्‍तीफा ले लिया गया. ऐसे ही हालात दूसरी यूनिटों के भी हैं.


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शिमला प्रेस क्‍लब का साधारण अधिवेशन भी विवादों में घिरा

विवादों में घिरे प्रेस क्लब शिमला का साधारण अधिवेशन भी विवादास्पद हो गया है। क्लब की संचालन परिषद की 2 जून की बैठक में 27 जून को साधारण अधिवेशन बुलाए जाने का फैसला लिया गया, लेकिन इसकी जानकारी 22 जून तक किसी को नहीं दी गई। 22 जून को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के प्रेस रूम में लगे अखबार के बक्सों में पत्र डालकर साधारण अधिवेशन की सूचना दी गई। यानी ठीक पांच दिन पहले सदस्यों को साधारण अधिवेशन की सूचना देने के लिए यह नायाब तरीका खोजा गया, जिसने अपने आप में बॉयलाज और सरकारी अधिनियम की धज्जियां उड़ा दी हैं। यह साधारण अधिवेशन नियमानुसार नहीं बुलाया गया, नतीजतन सब कुछ ‘अवैध’ हो गया है।

गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु के सख्त पत्र के बाद क्लब के कर्ताधर्ताओं को साधारण अधिवेशन बुलाना पड़ा। क्लब के सालाना चुनाव 13 अक्तूबर 2009 को हुए थे। कायदे से 13 अक्तूबर 2010 से पहले चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन ढाई साल बीतने के बावजूद चुनाव नहीं कराए गए। इसका विरोध करते हुए कृष्णभानु ने क्लब के अध्यक्ष धनंजय शर्मा को सख्त पत्र लिखा और अनियमितताओं के गम्भीर आरोप लगाए। अंततः धनंजय शर्मा ने क्लब की संचालन परिषद की बैठक बुलाकर साधारण अधिवेशन बुलाने का निर्णय लिया, ताकि नए चुनाव कराए जा सकें।

साधारण अधिवेशन बुलाए जाने के तरीके से कृष्णभानु के आरोप साबित हो गए कि धनंजय शर्मा क्लब को प्रा. लि. कम्पनी की तरह चला रहे हैं। अधिनियम की धारा 20 (3) और उपविधि की धारा 32(1) के मुताबिक सदस्यों को साधारण अधिवेशन की सूचना कम से कम 21 दिन पहले दी जानी लाजिमी है। नियमानुसार सभी सदस्यों को रजि. पत्रों द्वारा सूचना भेजी जाती है, लेकिन यहां केवल पांच दिन पहले नायाब तरीके से सूचना भेजी गई। सदस्यों को नियमानुसार सूचना न भेजे जाने से क्लब का यह साधारण अधिवेशन ‘अवैध’ हो गया है। सम्पर्क करने पर वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु ने कहा कि यह धनंजय शर्मा की सोची समझी साजिश लगती है। मजबूर होकर क्लब का साधारण अधिवेशन तो बुलाना पड़ा, लेकिन अब कोशिश है कि ‘कोरम’ ही पूरा न हो और सब टल जाए। यही कारण लगता है कि क्लब के सभी सदस्यों को समय पर सूचित ही नहीं किया गया।

भ्रष्‍टाचार के आरोप में भास्‍कर के रमेश अग्रवाल सहित 21 के खिलाफ कोर्ट में अर्जी

: 26 जून को होगी अगली सुनवाई : इंदौर। केंद्र सरकार द्वारा संचालित नागरिक सुविधा केंद्र (कॉमन सर्विसेस सेंटर) योजना में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए इंदौर की विशेष अदालत में एक अर्जी पेश कर धोखाधड़ी व भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा में आपराधिक केस दर्ज करने की मांग की गई है। अर्जी में दैनिक भास्कर के रमेशचंद्र अग्रवाल को राईटर्स एंड पब्लिशर्स लिमिटेड भोपाल के डायरेक्टर के नाते आरोपी बनाया गया है, मामले में एनजीओ संस्था नेटवर्क फॉर इनफार्मेशन एंड कम्प्यूटर टेक्नालॉजी (एनआईसीटी) के कर्ताधर्ताओं सहित कुल 21 लोगों को आरोपी बनाया गया है।

परिवादी पत्रकार प्रदीप मिश्रा व जितेंद्र जायसवाल ने शुक्रवार को इंदौर की विशेष अदालत (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) में न्यायाधीश राजीवकुमार श्रीवास्तव के समक्ष सीआरपीसी की धारा 156 (3) में एक अर्जी एडवोकेट अभिषेक रावल के जरिये पेश की है। मिश्रा ने बताया कि अर्जी में योजना में अनियमितताओं का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि इंदौर -उज्जैन संभाग के 2158 लोगों के साथ करोड़ों की धोखाधड़ी की गई है। केंद्र ने प्रदेश में 9232 सेंटर्स खोलने की अनुमति दी थी। योजना के क्रियान्वयन के लिए आईटी विभाग की सहायक एजेंसी मप्र स्टेट इलेक्ट्रानिक डेव्लपमेंट कार्पोरेशन (एमपीसीईडीसी) को स्टेट डेसीगनेटेड एजेंसी (एसडीए) नियुक्त किया गया था। एसडीए का मुख्य कार्य प्रदेश के इन सेंटर्स को मूर्तरूप देना था और पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के माध्यम से इन केंद्रों की स्थापना हेतु निजी कपंनियों, ट्रस्टों व एनजीओ से निविदाएं आमंत्रित करना था। इसके तहत एनआईटीसी जो कि एक एनजीओ संस्था के रूप में पंजीकृत है को इंदौर-उज्जैन के 2158 सेंटर्स खोलने की जिम्मेदारी दी गई थी। एनआईटीसी की जमानत राईटर्स एंड पब्लिशर्स लिमिटेड, भोपाल ने दी थी।

केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक प्रत्येक सेंटर के लिए न्यूनतम 1106 रूपए प्रतिमाह की दर से सहायता राशि देने का प्रावधान था लेकिन एनआईसीटी ने सरकार से सहायता लेने की बजाय प्रोजेक्ट हासिल करने के लिए उज्जैन हेतु 3 व इंदौर हेतु 5 रुपए प्रतिमाह की बोली लगाकर यह ठेका हासिल कर लिया। यही नहीं सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी सेंटर्स की स्थापना हेतु कोई राशि नहीं ली जाएंगी बल्कि सेंटर्स स्थापित करने के लिए सहायता दी जाएंगी, इसके विपरीत एनआईसीटी के संचालकों ने ग्रामीण बेरोजगारों से 35 हजार से 1.5 लाख तक की राशि मान्यता देने के नाम पर जमा कराई, जो करोड़ों में है और भी कई अनियमितताएं बरती। एमपीसीईडीसी ने एनआईसीटी के साथ अनुबंध में यह शर्त रखी थी कि किसी भी तरह की अनियमितताएं पई गई तो अनुबंध निरस्त कर धरोहर राशि को राजसात कर ली जाएंगी और यदि किसी प्रकार का भ्रष्टाचार सामने आया तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत कार्रवाई की जाएंगी। 18 फरवरी 2008 से 31 मार्च 2012 तक एनआईसीटी की रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि 2158 सेंटर में से मात्र 918 सेंटर ही चालू थे, जबकि अनुबंध के अनुसार सेंटर बंद होने पर भारी पेनल्टी का प्रावधान था किंतु एनआईसीटी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

अर्जी में राईटस एंड पब्लिशर्स लिमिटेड भोपाल एवं उसके डायरेक्टर रमेशचंद्र अग्रवाल, सहायक मैनेजर विवेक जैन, नेटवर्क फॉर इन्फार्मेशन एंड कम्प्यूटर टेक्नालॉजी (एनआईसीटी) एवं उसके प्रेसीडेंट डा. भरत अग्रवाल, मप्र स्टेट इलेक्ट्रॉनिक डेव्लपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड व उसके मैनेजिंग डायरेक्टर अनुराग श्रीवास्तव, सिनीयर जनरल मैनेजर पीएन धायनी, केआर नारायण, जनरल मैनेजर लक्ष्मीकांत तिवारी, मैनेजिंग डायरेक्टर हरी रंजन राव, आईटी विभाग के सचिव अनुराग जैन, एनआईसीटी के सीईओ मुकेश हजेला, डायरेक्टर जितेंद्र चौधरी, महेंद्र गुप्ता, रवी सावला, हिमांशु झंवर, पीजी मिश्रा, माया चौधरी, सोनिया हजेला, अरविंद चौधरी सहित कुल 21 लोगों को आरोपी बनाया है और उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 420,107,104, 415, 120 (बी) व भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग करते हुए 34 गवाहों की सूची पेश की गई है। इस अर्जी पर अब 26 जून को सुनवाई होगी।

क्या है कॉमन सर्विस सेंटर

वर्ष 2006 में केंद्रीय सूचना एवं प्रोद्योगिकी विभाग ने गांवों में कॉमन सर्विस सेंटर की स्थापना की गई थी ताकि गांवों में रहनेवाले लाखों लोग नई तकनीक का फायदा ले सकें और उन्हें सरकारी विभागों के चक्कर न लगाना पड़े। इन केंद्र से ग्रामीण नागरिक खसरे की नकल, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र या आवेदन, रोजगार गारंटी जैसे कार्य व केंद्र व राज्य की विभिन्न योजनाओं आदि की जानकारी प्राप्त कर सकते है। इसमें डिजीटल फोटो, फोटोकापी, डीटीपी, ईमेल, रेल टिकट जैसी व्यावसायिक सेवाएं भी शामिल की गई थी। साभार : पीपुल्‍स समाचार

पूर्वी दिल्‍ली में कुछ नेताओं का मुखपत्र बन गया है दैनिक जागरण

पूर्वी दिल्ली में इनदिनों दैनिक जागरण कुछ नेताओं का मुखपत्र बनकर रह गया है. नेताओं के दौरे से लेकर दूसरे प्रोग्राम प्रमुखता से छापे जा रहे हैं. इतना ही नहीं कुछ नेताओं की प्रेस विज्ञप्ति तक जागरण कार्यालय से बनकर जा रही है. इसके अलावा कुछ नेताओं के कार्यक्रम तक जागरण कार्यालयों से तय हो रहे हैं. बात में कितनी सच्चाई है इसकी प्रमाणिकता पिछले एक माह के पूर्वी दिल्ली संस्कार को देख कर साफ लगाई जा सकती है.

दरअसल, दैनिक जागरण पूर्वी दिल्ली कार्यालय के मुख्य संवाददाता राजीव अग्रवाल इन दिनों कुछ छुटभैये नेताओं के मार्फ़त वरिष्ट नेताओं की चापलूसी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं. स्थिति यह है कि प्रतिदिन बीजेपी के एक नेता आनंद त्रिवेदी अपनी वैगनार कार लेकर या तो जागरण के दफ्तर आ जाते हैं या फिर राजीव उन्हें फ़ोन करके बुला लेते हैं. बुलावे पर आना उनकी मजबूरी भी है क्योंकि उनको भी अपनी प्रेस रिलीज़ जो लगवानी होती है. उसके बाद राजीव अग्रवाल उनकी गाड़ी में बैठ कर पूर्वी दिल्ली की मेयर अन्नपूर्णा मिश्रा के ऑफिस पहुंच जाते हैं. वहां पहुंच कर राजीव अग्रवाल मेयर की चापलूसी करने में कोई कोई कोर कसर नहीं छोड़ते. राजीव अग्रवाल उन्हें कहां कब दौरा करना है उसकी सलाह भी देते हैं. इतना ही नहीं एक दिन पहले लगी खबर की तब तक चर्चा करते हैं, जबतक उन्हें उसका पारिश्रमिक न मिल जाये. इसके आलावा राजीव अग्रवाल मेयर और उनके बेटे कपिल के मीडिया सलाहकार भी बने हुए हैं.

मेयर के पीए को भी शीशे में उतरने में लगे हुए हैं. मेयर का कार्यक्रम को राजीव अपने अख़बार में तो छपवाते  ही हैं दूसरे अख़बार में खबर छपवाने के लिए प्रेस विज्ञप्ति बनाकर मेयर के बेटे और पीए को मेल भी करते हैं. यहाँ बता दें कि पूर्वी दिल्ली में जागरण के पाठक दिन ब दिन कम होते जा रहे हैं. इतना ही नहीं ऑफिस में भी वो ही लोग प्रेस रिलीज़ लेकर आते हैं जो उसके बदले जेब ढीली करने की ताकत रखते हैं. आम लोग तो अब जागरण से काटने लगे हैं. इसके आलावा राजीव अग्रवाल का रिकॉर्ड रहा है कि वो कंपनी से पेट्रोल का भुगतान तो लेते हैं पर फिल्ड में घूमने के लिए आज तक स्कूटर में किक नहीं मारी. वो हमेशा किसी ना किसी छुटभैये नेता की गाड़ी मंगाकर उससे जाते हैं. जब तक आनंद त्रिवेदी नहीं थे तब तक मास्टर अलाउदीन की वरसा गाड़ी से जाया करते थे. अगर किसी ने एक बार मना कर दी तो फिर उसकी प्रेस विज्ञप्ति लगाना बंद.   

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पत्रकार डा. वेदप्रताप वैदिक के पिता का निधन

नई दिल्ली। प्रसिद्ध पत्रकार एवं राजनीतिक चिंतक डॉ. वेदप्रताप वैदिक के पिता जगदीश प्रसाद वैदिक का आज दोपहर इंदौर में निधन हो गया है। उनकी आयु 88 वर्ष थी। उनकी अंत्येष्टि कल सुबह इंदौर में की जाएगी। डॉ. वैदिक और उनके परिवार के सभी लोग कल सुबह विमान से इंदौर पहुंचेंगे। जगदीश प्रसाद वैदिक का संन्यासी नाम स्वामी वैदिकानंद था। उनका जन्म इंदौर में हुआ था। वे किशोरावस्था से ही समाज सुधार और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते रहे। वे मध्यप्रदेश के आर्य समाज आंदोलन के सूत्रधारों में से एक थे। उन्होंने अपने जीवन को सदाचार, निर्भयता और सत्य के आग्रह का अनुपम उदाहरण बनाया था।

उन्होंने 1989 में इंदौर में अखिल भारतीय अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन का आयोजन किया। जिसमें भूतपूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के अलावा दर्जनों मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों ने भी भाग लिया। इंदौर की दृष्टि से ये अ​भूतपूर्व कार्यक्रम था। अभी कुछ ही दिनों पहले उन्होंने अपने बंगले की जमीन में से दो करोड़ रुपए की जमीन सरकार को दान दी थी। वे नौजवानों की कई पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहे। अभी कुछ दिन पहले मप्र के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के अध्यक्ष प्रभात झा व कई दलों के नेतागण उन्हें देखने अस्पताए भी आए थे।

अजय शर्मा के उजाला कार्यालय में घुसने पर पाबंदी, नवीन का जागरण से इस्‍तीफा

अमर उजाला, मेरठ से खबर है कि अजय शर्मा के ऑफिस में घुसने पर पाबंदी लगा दी गई है. वे जूनियर सब के पद पर कार्यरत थे. इन दिनों बागपत डेस्‍क पर काम कर रहे थे. अजय पिछले चार सालों से अमर उजाला से जुड़े हुए थे. बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई अनुशासनहीनता के चलते की गई है. सूत्रों का कहना है कि उन्‍होंने एनई के साथ बदतमीजी की थी, जिसके बाद उनके कार्यालय में घुसने पर रोक लगा दी गई. समझा जा रहा है कि जल्‍द ही उनको बाहर किया जाएगा.

दैनिक जागरण, रो‍हतक से खबर है कि नवीन कुमार मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे फोटो जर्नलिस्‍ट के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे थे. नवीन ने अपनी नई पारी रोहतक में ही दैनिक भास्‍कर के साथ शुरू की है. वे पिछले एक दशक से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे पंजाब केसरी, पीटीआई और टाइम्‍स ऑफ इंडिया जैसे संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

आखिर क्‍यों पत्रकारों के बूथ में प्रवेश पर पाबंदी लगाई गई?

बलिया। किसी चुनाव को सम्पन्न कराने में शासन व प्रशासन का अहम योगदान रहता हैं। वहीं मीडिया की भी अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका रहती हैं। लेकिन इस बार के निकाय चुनाव में समाचार संकलन के लिए प्रशासन ने जो प्रेस पास जारी किया वह पत्रकारों के लिए गले के पट्टे की कहावत चरितार्थ कर रहा है। साथ ही एक बारगी यह सोचने पर भी विवश कर रहा है कि कहीं चुनाव में गड़बड़ी करने या गड़बड़ी होने की आशंका तो प्रशासन को नहीं थी। कहीं इसीलिए प्रशासन ने पत्रकारों को जो प्रेस पास जारी उस पर बूथ पर जाने पर रोक लगा दिया।

मीडिया के कवरेज के लिए प्रशासन ने पास तो जारी किया लेकिन उस पर स्‍पष्‍ट रूप से यह भी लिख भी दिया कि 'बूथों के अन्दर प्रवेश वर्जित है'। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्‍या  जनपदीय प्रशासन सत्ता के पक्ष कुछ गड़बड़ी करना चाहता था? अगर ऐसा नहीं है तो पत्रकारों को ऐसा पास जारी क्यों किया गया? क्यों प्रशासन पत्रकारों के साथ इतना क्रूर मजाक किया? आखिर प्रशासन को कौन सा डर सता रहा था या प्रशासन किसके इशारे पर यह कार्य किया?

गौरतलब हैं कि जब पत्रकार बूथों के अन्दर की रिर्पोटिंग नहीं कर पाएगा या फोटो नहीं दे पायेगा तो फिर उसको प्रशासन द्वारा दिए गए पास का क्या मतलब है? पास तो इसीलिए जारी किया जाता हैं कि मीडिया स्वत्रंत होकर सच्चाई को जनता के सामने लाये। लेकिन जनपदीय प्रशासन ने जो गन्दा व क्रूर मजाक किया है। इसके पीछे भी कोई राज हैं। और यह राज प्रशासन के अलावा और कोई नहीं जान सकता। एक तो पास जारी करते-करते 23 जून की रात्रि को पास जारी किया गया। उसके बाद पास के ऊपर सीधे व स्पष्‍ट शब्दों में मोटे अक्षरों में लिख दिया कि अन्दर जाना मना हैं। ऐसे में सवाल उठता हैं कि उस पास का मतलब क्या? जब पत्रकार अन्दर नहीं जायेंगे तब सच्चाई कैसे सामने आयेगी? यह एक महत्तवपूर्ण प्रश्न हैं। इतना तो जरूर हैं कि प्रशासन ने यह पास जारी कर साफ तौर पर जाहिर कर दिया कि मतदान में गड़बड़ी होगी। इसके साथ ही यह भी जाहिर कर दिया कि प्रशासन सकुशल व निष्‍पक्ष चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। आखिर इतना बड़ा मजाक वो भी चौथे स्तम्भ से कुछ समझ में नहीं आता।

लेखक गणेशजी वर्मा बलिया में कैनवीज टाइम्‍स से जुड़े हुए हैं.

पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए पत्रकार लखनऊ में सोमवार को देंगे धरना

लखनऊ। पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने की मांग को लेकर नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इण्डिया) के आह्वान पर राजधानी के पत्रकार सोमवार को विधान भवन के सामने धरना देंगे। धरने का आयोजन एनयूजे की राय शाखा उ.प्र.जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) ने किया है। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने जानकारी देते हुए बताया कि पत्रकारों का धरना पूर्वान्ह 11 बजे से अपरान्ह 2 बजे तक होगा। धरने पर बड़ी संख्या में राजधानी के पत्रकार, छायाकार एवं मीडियाकर्मी बैठेंगे। धरने के बाद उपजा के पदाधिकारी राजभवन जाकर महामहिम को ज्ञापन भेट करेंगे।

श्री दीक्षित ने बताया कि हमारा केन्द्रीय संगठन गत दो वर्ष से पत्रकार सुरक्षा कानून बनाये जाने की मांग कर रहा है। इसके लिए एनयूजे के सम्मेलनों तथा कार्यकारिणी की बैठकों में कई बार प्रस्ताव पारित किये गए हैं। गत वर्ष भी 25 जून को देश के सभी रायों की राजधानियों तथा जिला मुख्यालयों पर धरने का आयोजन किया गया था। इस बार भी 25 जून को ही राज्‍यों की राजधानियों तथा जिला मुख्यालयों पर धरना आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने सभी पत्रकारों से धरने में शामिल होकर इसे सफल बनाने की अपील की है। ताकि केन्द्र व राज्‍य सरकारें पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने पर विचार करें।

सरोज सम्‍मान से सम्‍मानित होंगे राजेश जोशी

भोपाल : साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्‍मानित प्रख्‍यात कवि राजेश जोशी को वर्ष 2012 के जनकवि मुकुट बिहारी सरोज सम्‍मान से नवाजा जायेगा। श्री सरोज जी के जन्मदिन 26 जुलाई को आयोजित गरिमामय समारोह में यह सम्‍मान प्रदान किया जायेगा। चैंबर ऑफ कामर्स भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में श्री राजेश जोशी को श्रीफल शॉल सम्‍मान पत्र और 11 हजार रुपये की सम्‍मान निधि भेंट की जायेगी।

जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास की आज जारी विज्ञप्ति के अनुसार नई कविता के प्रमुख हस्ताक्षर श्री जोशी को उनके काव्य संग्रह दो पंक्तियों के बीच पर देश का सर्वोच्च साहित्य सम्‍मान साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें श्रीकांत वर्मा सम्‍मान, पहल सम्‍मान सहित कई सम्‍मान प्राप्त हो चुके हैं। गौरतलब है कि जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास ऐसे रचनाकारों को सरोज सम्‍मान से सम्‍मानित करता है, जिसके रचना संसार में जन सरोकार और प्रगतिशीलता खास अहमियत रखते हों। न्यास अब तक निदा फाजली, नरेश सक्सेना, उदय प्रताप सिंह, निर्मला पुतुल, अदम गौंडवीं, कृष्ण बक्षी और डा.सीता किशोर खरे को सम्‍मानित कर चुका है। (एजेंसी)

प्रभात खबर, पटना के पाठकों के दिन की शुरुआत आम की खुशबू के साथ

पटना : प्रभात खबर के पटना शहर के पाठकों की खातिर 23 जुलाई का दिन बहुत ही खास रहा. अपने पाठकों को चौंकाने के लिए बिहार में पहली बार सुंगधित अखबार पहुंचाने का प्रयोग प्रभात खबर ने किया. 23 जुलाई की सुबह प्रभात खबर अपने पाठकों के घर आम की भीनी खुशबू के साथ पहुंचा. अखबार के इस प्रयोग व प्रयास को पाठकों ने भी खूब सराहा. अखबार ने खुशबूदार अखबार पर पाठकों की राय को भी एसएमएस पर आमंत्रित किया था. सुबह से ही बड़ी संख्या में एसएमएस आने का दौर शुरू हुआ, जो दिन के 12 बजे तक जारी रहा. करीब 96 प्रतिशत पाठकों ने खुशबूदार अखबार के प्रयोग की काफी सराहना की है.

प्रभात खबर ने अपने पाठकों को आम की खुशबू के साथ अखबार देने के आइडिया पर काम करना शुरू किया. विज्ञापनों की एक सीरीज शुरू करके बताया कि तीन रुपये में मिलेगा आम, खबरें होंगी जूसी. इस तरह के विज्ञापनों ने शहर में प्रभात खबर को लेकर एक बजे ही लोगों में एक्‍साइटमेंट क्रिएट कर दिया था. दो-तीन दिन से ही पाठकों, विज्ञापनदाताओं व शुभेच्‍छुओं के टेलीफोन आ रहे थे. वे जानना चाहते थे कि यह क्या माजरा है. आज सुबह प्रभात खबर के साथ आम की खुशबू ने यह राज खोला, तो उन्हें अच्छा लगा. इस तरह की अनेक प्रतिक्रियाएं हमें हासिल हुई हैं. प्रभात खबर आने वाले दिनों, महीनों में इस तरह का और भी प्रयोग करेगा. इनोवेशन के जरिए अपने पाठकों के दिल तक और पहुंचने का यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा. प्रेस रिलीज

सिद्धार्थनगर में विवाद के बाद जर्नलिस्‍ट प्रेस क्‍लब का गठन

सिद्धार्थनगर प्रेस क्‍लब में भगदड़ की स्थिति मच गई है. इसी भगदड़ में कुछ लोगों ने प्रेस क्‍लब छोड़कर नया संगठन जर्नलिस्‍ट प्रेस क्‍लब का गठन कर लिया. मामला हिसाब-किताब के विवाद को लेकर पैदा हुआ. सिद्धार्थनगर प्रेस क्‍लब के वरिष्‍ठ उपाध्‍यक्ष संतोष कुमार पाण्‍डेय ने प्रेस क्‍लब के आय-व्‍यय का हिसाब मीटिंग में मांगा तो अध्‍यक्ष संतोष कुमार श्रीवास्‍तव तथा महामंत्री सलमान आमिर नाराज हो गए. मीटिंग करके दोनों ने संतोष कुमार पाण्‍डेय को निकाल दिया.

आरोप है कि प्रेस क्‍लब के पदाधिकारियों ने शपथ ग्रहण के दौरान जमकर माल पीटा था. इसके बाद ही विवाद हुआ. संतोष को निकाले जाने से नाराज पत्रकारों का बड़ा समूह शनिवार को मीटिंग करके जर्नलिस्‍ट प्रेस क्‍लब सिद्धार्थनगर का गठन कर लिया तथा भ्रष्‍टाचार के खिलाफ बिगुल फूंकने का ऐलान कर दिया. इसमें एमपी गोश्वामी अध्यक्ष, राजेश शर्मा मंत्री, संतोष कुमार पाण्डेय वरिष्ठ उपाध्यक्ष, राधेश्याम गुप्ता कोषाध्यक्ष, कमलकांत त्रिपाठी संगठन मंत्री, आलोक मिश्र प्रचार-प्रसार मंत्री, रणजीत कुमार कसौधन आय-व्यय मंत्री एवं रामाशीष दूबे को संप्रेक्षक मनोनित गया. 

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्‍ठ पत्रकार नजीर मलिक एवं संचालन बीपी त्रिपाठी ने किया. क्‍लब की अगली बैठक 27 जून को दिन में एक बजे सूचना कार्यालय में बुलाई गयी है. इसमें तहसील स्तर पर संगठन के गठन तथा विस्‍तार पर चर्चा होगी. इस दौरान पदाधिकारियों के अतिरिक्त अरविन्द झा, जय शंकर प्रसाद मिश्र, उसमान अली, अशोक चौधरी, शिवेन्द्र सिंह, संकटा प्रसाद शुक्ल, सीताराम यादव, अविनाश आजाद आदि मौजूद थे.

अनुराग कश्‍यप के निशाने पर पत्रकार पंकज शुक्‍ल

गैंग ऑफ वासेपुर से एक बार फिर चर्चा में आए अनुराग कश्‍यप का विवादों के साथ चोली और दामन का साथ है। हमेशा विवादों में रहने वाले अनुराग अपनी नकारात्‍मक खबरों पर पत्रकारों को गाली देने से भी बाज नहीं आते हैं। कुछ दिनों पहले वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष के झा को गधा तक कह चुके अनुराग के निशाने पर इनदिनों मुंबई के एक पत्रकार हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार पंकज शुक्‍ल को लेकर अनुराग कहते हैं कि पंकज शुक्‍ल जी बहुत समय से मेरे और वासेपुर के खिलाफ लिख रहे हैं। उनकी राय उनकी अपनी है लेकिन उन्‍हें एक्‍सपोज करने का समय आ गया है। अनुराग यहां भी नहीं रुकते हैं और खुलकर कहते हैं कि पंकज फिल्‍ममेकर बनना चाहते हैं। इसलिए ऐसा कर रहे हैं। अनुराग के अनुसार, पंकज एक बकरा लेकर आए, बोले ये करोड़ लगाने को तैयार हैं अगर आप फिल्‍म में जुड़ें। लेकिन मैंने मना कर दिया।

अनुराग कश्‍यप के आरोपों पर पंकज कहते हैं कि अनुराग कश्यप एक संघर्षशील निर्देशक हैं और संघर्ष के जरिए अपनी पहचान बनाने वाले लोग अक्सर बातों में मुलायमियत नहीं रख पाते। मेरे ऊपर उन्होंने फिल्ममेकर बनने की चाहत रखने का आरोप लगाया है तो मैं तो पहले से ही फिल्ममेकर हूं। एक फीचर फिल्म, छह शॉर्ट फिल्में, चार डॉक्यूमेंट्री फिल्में बना चुका हूं। जो देश विदेश के फिल्म समारोहों में दिखाई जा चुकी हैं, प्रशंसा भी पा चुकी हैं।

पंकज का कहना  है कि मेरी अनुराग से कोई प्रतियोगिता नहीं है। मेरे एक निर्माता मित्र अनुराग कश्यप को बतौर निर्देशक लेकर मेरी एक कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे। अनुराग का प्रोडक्शन हाउस संभालने वाली गुनीत मोंगा का कहना था कि वो निर्माता बजाय नई फिल्म बनाने के अनुराग की बतौर निर्माता निर्माणाधीन फिल्म में पैसा लगाएं। बस इसी पर बात नहीं बनी। अनुराग ने मना किया हो ऐसी कोई बात ही नहीं है।

जानकारों का कहना है कि अनुराग ने फिल्म जगत में अपनी जो जगह बनाई है, उसके लिए वह लोगों से काफी लड़े भिड़े हैं। पांच, ब्लैक फ्राइडे और गुलाल जैसी फिल्में लोगों को अच्छी लगी पर ढंग से रिलीज नहीं हो पाईं तो अनुराग में सिस्टम को लेकर गुस्सा है। ऐसे में अनुराग के सामने जो भी कायदे या सिस्टम की बात करता है.वो अनुराग को सिस्टम का आदमी लगने लगता है।

दिनकर जी का जन्‍म दिन और छप्‍पन भोग

किसी चुनाव के दौरान अगर जन्‍मदिन पड़ जाए तो क्‍या कहना? और जन्‍मदिन पत्रकार का हो तो फिर तो सोने पर सुहागा है. मेरठ में दैनिक जागरण के एक वरिष्‍ठ पत्रकार के जन्‍मदिन मनाने की चर्चा चहुं ओर छाई हुई है. पचास से ज्‍यादा बसंत देख चुके इन पत्रकार महोदय को अचानक जन्‍मदिन मनाने की बात सूझ गई. सूझे भी क्‍यों नहीं निकाय चुनाव का दौर जो चल रहा है. फिर क्‍या था? इसके पहले के जन्‍म दिन भले ही न मने हों, पर इस बार जन्‍मदिन मनाने में इन्‍होंने बिल्‍कुल कोताही नहीं बरती. पर अजीब बात यह हो गई कि पत्रकार महोदय ने मेरठ भर के धन्‍ना सेठों को तो जन्‍मदिन की पार्टी में बुलाया पर अपने साथियों को भूल गए. 

अब आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर जागरण के कौन सूरमा हैं. तो अब आपको ज्‍यादा इंतजार नहीं कराते हैं. इस बर्थडे ब्‍वाय का नाम है दिनेश दिनकर. जनाब दैनिक जागरण, मेरठ में सिटी चीफ हैं. सिटी में इनकी बढि़या पकड़ है. जनाब पचास पार हैं. अब जन्‍मदिन के दौरान निकाय चुनाव आ गया या चुनाव के दौरान जन्‍मदिन आ गया यह तो बाद में समझने समझाने वाली बात है, पर जन्‍मदिन तो था ही. इस जन्‍मदिन की तैयारी भी इन्‍होंने बड़ी ही गुपचुप ढंग से की. पर सूंघने वाले सूंघ ही लिए और जनाब की पोल खुल गई. और चर्चा हनुमानजी की पूंछ की तरह लगातार लंबी होती चली गई.  

वैसे बताया जा रहा है कि दैनिक जागरण के निदेशक तरुण गुप्‍ता जी विदेश में थे. निकाय चुनाव का मौसम भी था, तो दिनकर जी को जन्‍मदिन मनाने का मौका बेहतर लगा. वैसे भी पचास पार होने के बाद जन्‍मदिन मनाने का मौका तो बिरले के हाथों ही लगता है. दूसरे अगले साल के जन्मदिन पर संभावना भी नहीं है कि कोई चुनाव पड़े, लिहाजा अपने जन्‍मदिन पर इन्‍होंने मेरठ भर के दर्जनों मेयर और पार्षद प्रत्‍याशियों को जन्‍मदिन का नेवता बांट दिया. पुलिस अधिकारियों को भी बुलाया. बिल्‍डर भी आए, ज्‍वेलर्स भी आए. जो लोग दिनकर जी के जन्‍मदिन में शामिल हो सकने लायक औकात रखते थे, मतलब असामी थे, सभी को नेवत दिया गया. पर सहकर्मियों को जन्‍मदिन पार्टी की भनक तक लगने नहीं दी गई.

अब जागरण जैसे अखबार के सिटी चीफ का जन्‍मदिन हो तो भला खाली हाथ कहां कोई आएगा. यहां भी ऐसा ही हुआ. प्रत्‍याशी आए, पुलिस वाले आए, बिल्‍डर आए, ज्‍वेलर्स आए, धनपशु भी आए. सबने अपनी अपनी औकात और श्रद्धा के अनुरूप बर्थडे ब्‍वाय को जन्‍मदिन का प्रसाद चढ़ाया. जन्‍मदिन का 56 भोग लगा कालीपलटन स्थित औघनाथ धाम में. अतिथियों ने वृंदावन से मंगवाए गए डांस पार्टी का मजा भी लिया. अमूमन औघड़नाथ में 56 भोग दिन में बनता है, पर बर्थडे ब्‍वाय जागरण के थे तो ये भोग रात को लगाया गया. जमकर बर्थडे ब्‍याय को विश किया गया. पर लाख कोशिशों के बाद भी इसकी भनक मीडियावालों को लग ही गई. 

जब खबर मीडियावालों के हाथ लगी तो फिर छुपती कहां? एक से होते हुए दूसरे तक पहुंची. चर्चा पर चर्चा. अब साथियों को जन्‍मदिन की खुशी कम जन्‍मदिन में मिले तोहफो का गम ज्‍यादा होने लगा. मेरठ के मीडिया मंडी में अनुमान लगाया जाने लगा कि फिफ्टी प्‍लस के बर्थडे ब्‍वाय ने कितना माल पीटा है. अंदाजा लाखों में लगाया गया. अब इतना माल पीटे जाने की खबर मिली तो कई साथियों के पेट में दर्द होने लगा, कई को खट्टे डकार आने लगे. खैर, अब जागरण जैसे संस्‍थान में कार्यरत हैं दिनकर जी तो फिर दिक्‍कत क्‍या है. इस संस्‍थान के पत्रकार तो कभी भी जन्‍मदिन मना सकते हैं. कब्र में पांव लटके होने तक. ये अमर उजाला थोड़े ही है कि इस तरह की शिकायत मिलने पर कार्रवाई करेगा. जागरण है जो मन आए वो करिए यहां नियम, नैतिकता, नीति की कोई जरूरत नहीं पड़ती.

पत्रिका समूह के डिप्‍टी एडिटर भुवनेश जैन को राष्‍ट्रीय पत्रकारिता पुरस्‍कार

भोपाल। माधवराव सप्रे स्मृति समाचार-पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल के 28 वें स्थापना दिवस के मौके पर शनिवार को लाल बलदेव सिंह राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार पत्रिका समूह के डिप्टी एडीटर भुवनेश जैन को धारदार पत्रकारिता के लिए मिला। राज्यपाल रामनरेश यादव द्वारा दिए गए पुरस्कार को उनकी अनुपस्थिति में पत्रिका भोपाल के स्थानीय संपादक हरीश मलिक ने ग्रहण किया।

राज्यपाल ने इस दौरान कहा कि पत्र, पत्रिका और पत्रकार, ये तीनों ही समाज को नई दिशा दे सकते है। इसलिए पत्रकारों को लेखनी के शब्दों और विचारों के आधार पर देश को नई दिशा दिखानी होगी। उन्होंने कहा कि सप्रे संग्रहालय पुराने जमाने के पत्र-पत्रिकाओं के  समकालीन इतिहास के सूत्र और साक्ष्य दर्ज करने वाला देश का एकमात्र संग्रहालय बन चुका है। इसे शीर्ष स्तर पर पहुंचाने के लिए 'पद्मश्री' से सम्मानित संग्रहालय के अध्यक्ष विजयदत्त श्रीधर को बधाई दी। राज्यपाल ने इस दौरान माधवराव सप्रे राष्ट्रीय पुरस्कार प्रकाश दुबे को सुसम्पादन और रचनात्मक लेखन तथा पहला महेश गुप्ता पुरस्कार डा. राधेश्याम शुक्ल को दक्षिण भारत के अहिंदी भाषी क्षेत्र में उत्कृष्ट  समाचार सम्पादन के लिए दिया। राज्यपाल ने सप्रे संस्थान के कॉन्फ्रेंस हॉल व पुस्तकालय उन्नयन कार्यों का शुभारंभ किया। साभार : पत्रिका

चर्तु‍थ लाडली मीडिया अवार्ड के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित

पॉपुलेशन फर्स्ट द्वारा जेंडर संवेदनीलता पर चतुर्थ लाडली मीडिया पुरस्कार 2011..12 के लिए मीडिया की प्रविष्टियां आमंत्रित की गई है। लाडली मीडिया राष्ट्रीय अवार्ड के तहत प्रिंट मीडिया, विज्ञापन, टेलीविजन, रेडियो, वेब मीडिया से संस्थागत अथवा स्वतंत्र रूप से जुडे वह सभी प्रतिभागी हिस्सा ले सकते हैं जिन्होंने न्यूज, फीचर, खोजपरक रिपोर्ट, संपादकीय, आलेख, विज्ञापन, ई मैगजीन, ब्लॉग, वेब ग्रुप्स, सोल मीडिया कैम्पेन, डाक्यूमेंट्री, धारावाहिक, रेडियो नाटक एवं मुद्दों पर आधारित कार्यक्रम के माध्यम से लिंग आधारित भेदभाव को चुनौती देते हुए विभि मुद्दों को उठाया तथा बालिकाओं की सकारात्मक छवि चित्रित की है।

इस अवार्ड की पात्रता के लिए जेण्डर मुद्दों पर समझ और सार्वजनिक जागरूकता को बढावा देना, महिलाओं के अधिकार और जेण्डर मुद्दों के बारे में विधि संबंधी परिवर्तन और नीति को प्रभावित करने में योगदान, जेण्डर मुद्दों पर रिपोर्टिंग में साहस मौलिकता और रचनात्मकता को दर्शाना तथा जेण्डर दृष्टिकोण के साथ मुद्दों का सही एवं संतुलित प्रस्तुतिकरण को मापदंड माना गया है। यह अवार्ड आगामी अक्टूबर माह में प्रदान किये जायेंगे। प्रविष्टियां एक जुलाई 2010 से 31 दिसंबर 2011 के बीच प्रकाशित..प्रसारित हुई हों। यह अवार्ड देश के उत्तरी क्षेत्र के चंडीगढ, छतीसगढ, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एंड कश्मीर, मध्यप्रदेश, पंजाब, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड के विज्ञापन तथा मीडिया के प्रोफेनल्स एवं ‘‘फ्रीलांसर्स को दिए जाते है। प्रविष्टियां भेजने की अंतिम तारीख आगामी 15 जुलाई है। प्रविष्ट फार्म पापुलेन फर्स्ट की वेवसाइट से डाउनलोड किये जा सकते हैं। (एजेंसी)

अंग्रेजी अखबार के पत्रकारों ने संपादक से जबाब तलब किया

हांगकांग के एक अंग्रेजी अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के पत्रकारों ने अपने संपादक से जवाब तलब किया है कि लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता ली वांगयांग की मौत को क्यों बेहद कम कवरेज दी गई. वो अस्पताल के कमरे में लटके हुए पाए गए थे. ली दृष्टिहीन थे और दो दशक जेल में गुजारे के बाद चलने फिरने के काबिल भी नहीं रह गए थे. चीनी अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने आत्महत्या की है जबकि हांगकांग में बहुत से लोगों का मानना है कि उनकी हत्या की गई है.

उनकी मौत की खबर को सभी अखबारों ने प्रमुखता से छापा जबकि साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के पत्रकारों कहना है कि उनके अखबार ने इस खबर को ज्यादा तवज्जो नहीं दी ताकि चीन सरकार को बुरा न लगे. साभार : बीबीसी

आदित्‍याज प्रबंधन ने नौकरी ले ली, पर छह माह की सैलरी नहीं दी

श्रीमान भड़ास मीडिया प्रभारी यशवंत जी, सादर नमस्कार मैं कई बार अपने दिल की भड़ास आपकी लोकप्रिय वेबसाइट पर भेज चुका हूं, लेकिन मेरी दिल की बात आज तक प्रकाशित नहीं की गई। मुझ गरीब से ऐसी क्या गलती हो गई। हम ग्वालियर से प्रकाशित दैनिक हिन्दी समाचार पत्र दैनिक आदित्याज में काम करते थे। जिन्हें विगत माह नौकरी से एक साथ निकाल दिया गया। उसके मालिक दीपेन्द्र टमोटिया, जीएम दुबे जी, संपादक अरविन्द चौहान जी हैं।

हम लोग अखबार के शुरुआत से ही काम कर रहे थे, लेकिन हम लोगों को पांच-छह माह से वेतन भी नहीं दिया गया। वेतन मांगने पर हमें हर माह हमेशा तारीख ही मिलती रही। जब हम लोगों ने परेशान होकर काम बंद कर दिया तो अखबार के माननीय संपादक अरविंद चौहान ग्वालियर से बाहर चले गए और जीएम साहब को फोन किया तो उन्होंने फोन पर कहा कि वे दिल्ली में है। आकर बात करेंगे, आप लोग काम करें। लेकिन जब हम लोगों ने काम करने से इनकार कर दिया तो जीएम साहब तुरंत आ गए और कहने लगे कि मैं अभी ही ट्रेन से उतर कर चला आ रहा हूं।

खैर, हम लोगों को नौकरी से निकाले जाने का दुख नहीं है। दुख तो इस बात का है कि हम और हमारे परिवार को गुजारा कैसे चले, क्योंकि हम लोगों का पांच-छह माह का वेतन भी नहीं दिया गया। जबकि हमें नौकरी से निकालते समय कहा गया था कि आप सभी का वेतन दो-चार दिन में दे दिया जाएगा। जब हम लोग पांच दिन बाद अपना वेतन लेने पहुंचे तो हमसे कहा गया कि अगले हफ्ते आना, मालिक बाहर गए हुए हैं। इसी तरह आज दो माह होने को आए पर अब तक हमलोगों का बकाया वेतन नहीं मिला। अब आप ही बताएं हम लोग क्या करें? आप हमारी व्यथा समझ सकते हैं। अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं।

अमर प्रजापति

amar.gwl@gmail.com

डीएम के सामने ही आपस में भिड़ गए गोण्‍डा के पत्रकार

यूपी के गोण्‍डा जिले में शनिवार को पत्रकार जिलाधिकारी के सामने ही एक दूसरे भिड़ गए. एक दूसरे को देख लेने तक की धमकी दे डाली. किसी तरह बीच बचाव करके मामला शांत कराया गया. जिलाधिकारी ने निकाय चुनाव को लेकर प्रेसवार्ता बुलाई थी, इसमें जिले भर के मीडियाकर्मी बुलाए गए थे. इसी बीच एक पत्रकार डीएम से कुछ सवाल करने लगे. सवाल निकाय चुनाव से संदर्भित न होकर व्‍यक्तिगत हो गए. जिस पर जिलाधिकारी ने कहा कि अगर व्‍यक्तिगत सवाल पूछने हैं तो बाद में मिल लीजिएगा.

इसी बीच एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने उक्‍त पत्रकार को इस तरह के सवाल करने से मना किया ताकि वे लोग जल्‍द से प्रेस वार्ता निपटाकर अपने कार्यालय जा सकें. यही बात उक्‍त पत्रकार को नागवार गुजर गई. उन्‍होंने सबके सामने ही वरिष्‍ठ पत्रकार से अभद्रता करनी शुरू कर दी. इसके बाद जिलाधिकारी कार्यालय में हो हल्‍ला मच गया. हालात बेकाबू हो गए. एक दूसरे को देख लेने तक की धमकी दी गई. सवाल पूछने वाले पत्रकार ने डीएम की शिकायत भी करने की धमकी दे डाली. किसी तरह अन्‍य पत्रकारों ने बीच बचाव कर मामला शांत कराया तब जाकर प्रेस कांफ्रेंस आयोजित हो पाया. देखें वीडियो.

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/620/media-world/gonda-mei-dm-ki-pc-mei-patrakaaro-ki-gundayi.html

छत्‍तरपुर में खुलेआम वसूली कर रहा है साधाना न्‍यूज का पत्रकार

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में पेप्टिक केबल नेटवर्क (एमएसओ) के दम पर साधना न्यूज़ एमपी/ सीजी में नियुक्त हुए लोकेश चौरासिया ने साधना न्यूज़ की माइक आईडी पकड़ते ही जिले में व्यापारियों, मेडिकल संस्थानों और शिक्षण संस्थानों के संचालकों से अवैध वसूली करना शुरू कर दी है. कक्षा दसवीं फ़ेल इस पत्रकार ने पहले शहर के दीपक किराना स्टोर से राजश्री नाम का गुटका पकड़कर उसे अधिकारियों के नाम पर धमकाने लगा.

दुकान संचालक ने साधना न्यूज़ के पत्रकार लोकेश चौरसिया की अधिकारियों से कार्रवाई करवाने की धमकी भरी बातों से डर गया और जब दुकानदार हाथ-पैर जोड़ने लगा तो फिर इस पत्रकार ने गुटका छोड़ने और कार्रवाई न होने देने के एवज में २० हजार रुपये की मांग की, लेकिन दुकान संचालक पत्रकार द्वारा मांगी गई इस कीमत को सुनकर घबरा गया. अंत में मामला १० हजार रुपये में सेट हुआ तो अपनी वसूली की रकम लेकर साधना न्यूज़ का यह पत्रकार लोकेश चौरासिया भाग गया. विश्वास नहीं हो तो आप इसे वीडिओ में देख सकते हैं, जिसमें वह काली टीशर्ट पहने हुआ है. और उसके हाथ में राजश्री नाम के गुटका का पैकेट है. वह दुकानदार को लगातार धमका रहा है क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश में तम्बाकू युक्त गुटका के उत्पादन और बिक्री पर रोक लगा दी गई है.

ताजा मामला है महात्मा गाँधी ग्रामोदय चित्रकूट विश्वविद्यालय, सतना का जिसकी वर्तमान में परीक्षा का आयोजन छतरपुर में किया गया है. जैसे ही साधना न्यूज़ के पत्रकार लोकेश चौरासिया को जानकारी लगी तो वह जा धमका परीक्षा केंद्र पर और वहां बैठे परीक्षा केंद्र प्रभारी को केंद्र में नक़ल होने की धमकी देने लगा. जब केंद्र प्रभारी ने नक़ल न होने की बात कही तो इस पत्रकार ने खुलेआम पैसे की मांग कर डाली, साथ ही पैसा न देने पर अधिकारियों से कार्रवाई कराये जाने की धमकी भी दे डाली. परीक्षा के आयोजक साधना

लोकेश
न्यूज़ के इस पत्रकार की इस धमकी से घबरा गये और केंद्र में किसी तरह का विवाद न हो उसके खातिर एक बार इस पत्रकार को पैसे देकर केंद्र से भगा दिया गया, लेकिन जब शेर के मुंह में खून लग जाये तो वह भला कैसे शांत बैठेगा और लोकेश चौरसिया दुबारा पैसा मांगने के लिये केंद्र पर पहुंच गया.

कई बार फोन पर धमकाने के बाद जब यह पत्रकार परीक्षा केंद्र पर पहुंचा तो वहाे बैठे कालेज संचालक ने इस भिखारी पत्रकार को पैसा दे देना ही उचित समझा और आखिरकार इस साधना न्यूज़ के पत्रकार ने चार हजार रूपये परीक्षा के आयोजकों से वसूल ही लिये यकीन न हो तो जरा सुनिए साधना न्यूज़ के नाम से किस तरह से यह लोकेश चौरासिया जिले में वसूली कर अपना धंधा चला रहा है. वैसे तो यह लोकेश चौरसिया नाम का पत्रकार छतरपुर शहर के पेप्टिक केबल नेटवर्क के पेप्टिक टाइम न्यूज़ का कैमरा मैन है और साथ ही वर्तमान में लांच हुए न्यूज़ एक्सप्रेस नाम के नेशनल न्यूज़ चैनल का संवाददाता है और जब इन चैनलों से इसकी दुकानदारी नहीं जमी तो केबल नेटवर्क के संचालक की दम पर साधना न्यूज़ की माइक आईड़ी ले ली, क्योंकि साधना न्यूज़ मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ का रीजनल चैनल है. और अब साधना न्यूज़ के चलते इस पत्रकार की वसूली का छतरपुर जिले में खासा नाम है. वहीं जब ब्‍लैकमेलिंग की खबरें न्यूज़ एक्सप्रेस और साधना न्यूज़ पर नहीं चलती हैं तो यह पेप्टिक केबल के पेप्टिक टाइम न्यूज़ पर खबर चलाकर लोगों से अवैध वसूली करता है.

यकीन नहीं तो देखिये इस खबर को कि लोकेश चौरासिया ने एक मेडिकल दुकान आरोग्य मेडिकल स्टोर की झूठी खबर पेप्टिक टाइम न्यूज़ पर सिर्फ इसलिए दिखाई कि मेडिकल संचालक ने वसूली का पैसा देने से मना कर दिया था. और जब यह पत्रकार मेडिकल संचालक को धमकाने पहुंचा तो वहां पर बात हाथा-पाई, गाली ग्‍लौच तक पहुंच गई थी. सुना तो यह भी है कि इस लोकेश चौरासिया को, जो साधना न्यूज़ के द्वारा, पीआरओ लेटर जारी किया गया है वह महज सात माह का है और साथ ही कम्पनी द्वारा बिना पैसा की शर्त पर काम करना लिखा गया है. लोकेश की अवैध वसूली और पत्रकारिता के रोब के शिकार हुए मेडिकल संचालक, किराना व्यापारी और शिक्षण संस्थान के लोग अब इस पूरे मामले की शिकायत साधना न्यूज़ और न्यूज़ एक्सप्रेस के अधिकारियों से करेंगे. इसकी उन्‍होंने तैयारी भी कर ली है.

मनोज कुमार

manojchhatarpur74@gmail.com

क्‍लाउन टाइम्‍स के खिलाफ कोर्ट पहुंचे जी न्‍यूज के पूर्व स्ट्रिंगर रामसुंदर राजू

बनारस में जी न्‍यूज से जुड़ा विवाद अब कोर्ट में पहुंच गया है. जी न्‍यूज यूपी के पूर्व स्ट्रिंगर राम सुंदर राजू ने इस मामले में वेबसाइट क्‍लाउन टाइम्‍स को कोर्ट में घसीट लिया है. उन्‍होंने वेबसाइट पर मानहानि करने का आरोप लगाया है. इस मामले की अगली सुनवाई 28 जून को होगी. जी न्‍यूज बनारस में ब्‍यूरोचीफ विकास कौशिक एवं राम सुंदर राजू के बीच काफी लम्‍बे समय से शीत युद्ध चल रहा था. इसके चलते राम सुंदर अपने फीड कार्यालय से भेजने की बजाय अपने खर्चे पर दूसरे स्‍थानों से भेजते थे.

इस बीच वेबसाइट क्‍लाउन टाइम्‍स पर राजू को लेकर एक खबर प्रकाशित हुई. खबर के छपने के बाद विवाद बढ़ गया. इसी बीच राजेश कुमार अग्रहरि नामक युवक ने भी क्‍लाउन टाइम्‍स के खिलाफ सिगरा थाने में मामला दर्ज करा दिया. क्‍लाउन टाइम्‍स के प्रधान संपादक अशोक मिश्रा तथा संपादक अनिल मिश्रा के खिलाफ आईपीसी की धारा 386, 501, 504, 506 के तहत मामला दर्ज करा दिया गया. इस बीच जी न्‍यूज प्रबंधन ने भी इन विवादों को देखते हुए राम सुंदर राजू का कांट्रैक्‍ट आगे 31 मई के बाद आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया. कंपनी के इस कदम से राजू बिल्‍कुल बौखला गए. इसके बाद उन्‍होंने वेबसाइट पर प्रकाशित खबर को साजिश मानते हुए कोर्ट चले गए. उन्‍होंने वेबसाइट और उसके संपादकों को पार्टी बनाते हुए मानहानि समेत कई मामलों में परिवाद दायर किया है.

सुभाष राय ने डेली न्यूज एक्टिविस्ट का प्रधान संपादक पद छोड़ा

लखनऊ से सूचना है कि सुभाष राय ने हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट का प्रधान संपादक पद छोड़ दिया है. वे कुछ महीने पहले ही इस अखबार से जुड़े थे. उससे पहले वे लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के लांचिंग चीफ एडिटर थे. सुभाष राय अमर उजाला, आगरा में लंबे समय तक संपादक रहे हैं. बाद में वह अजय अग्रवाल के हिंदी दैनिक डीएलए के एडिटर बने. डेली न्यूज एक्टिविस्ट से सुभाष राय के साथ आए हरे प्रकाश उपाध्याय ने पहले ही इस्तीफा दे दिया है. यह पता नहीं चल पाया है कि सुभाष राय नई पारी कहां शुरू करने जा रहे हैं.

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राज एक्‍सप्रेस से डीजीएम केके दुबे तथा टीवी9 से प्रदीप शुक्‍ला का इस्‍तीफा

राज एक्‍सप्रेस, जबलपुर से खबर है कि केके दुबे ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर मार्केटिंग और सेल्‍स विभाग में डीजीएम के पद पर कार्यरत थे. वे लगभग चार सालों से राज एक्‍सप्रेस को अपनी सेवाएं दे रहे थे. केके ने अपनी नई पारी मुंबई बेस्‍ड विज्ञापन एजेंसी कांसेप्‍ट कम्‍युनिकेशन के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें ब्रांच मैनेजर बनाया गया है. केके राज एक्‍सप्रेस में ब्रांडिंग इवेंट और प्रमोशन की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. 

टीवी9 दिल्‍ली से खबर है कि प्रदीप शुक्‍ला ने इस्‍तीफा दे दिया है. उनका तबादला पिछले दिनों ही गुजरात के भावनगर से दिल्‍ली के लिए किया गया था. उन्‍होंने दिल्‍ली ज्‍वाइन करने के बाद प्रबंधन से छुट्टी की गुहार लगाई थी, परन्‍तु प्रबंधन ने छुट्टी देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद प्रदीप ने इस्‍तीफा दे दिया. प्रदीप पिछले पांच सालों से टीवी9 को भावनगर में अपनी सेवाएं दे रहे थे. प्रदीप शुक्‍ला के तबादले के बार में कहा जा रहा है कि उन्‍हें घूस मांगने वाले एक अधिकारी को एंटी करप्‍शन टीम द्वारा गिरफ्तार करवाने की वजह से दिल्‍ली भेजा गया है. प्रदीप लगभग डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. इसके पहले जी न्‍यूज और अल्‍फा को भी लम्‍बे समय तक अपनी सेवाएं दे चुके हैं. प्रदीप ने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की थी. वे कुछ समय तक राजनीति से भी जुड़े रहे हैं.  

एनबीटी में रामकृपाल सिंह बने नेशनल एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर, संजय खाती, दिलबर गोठी आरई बनाए गए

नवभारत टाइम्‍स में कई सीनियर जर्नलिस्‍टों का प्रमोशन किया गया है. प्रबंधन ने अपने तीन सीनियर जर्नलिस्‍टों को प्रमोट कर आरई बना दिया है. वहीं संपादक रामकृपाल सिंह का कद भी बढ़ा दिया गया है. उन्‍हें प्रबंधन ने प्रमोट करके नेशनल एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर बना दिया है. वरिष्‍ठ पत्रकार संजय खाती को प्रमोट करके एनबीटी के दिल्‍ली एडिशन का स्‍थानीय संपादक बनाया गया है.

वरिष्‍ठ पत्रकार दिलबर गोठी को एनसीआर एडिशन का स्‍थानीय संपादक बनाया गया है. वरिष्‍ठ खेल पत्रकार सुंदर सिंह ठाकुर को मुंबई एडिशन का आरई बना दिया गया है. आशीष पांडेय को दिल्‍ली एडिशन का डिप्‍टी आरई बनाया गया है. माना जा रहा है कि ये सारे बदलाव अखबार को और मजबूत करने के लिए किए जा रहे हैं. 

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बिहार में दैनिक जागरण के अवैध संस्‍करणों की पोल पीसीआई टीम के सामने खोली गई

: जागरण पर भी विज्ञापन फर्जीवाड़ा करने का आरोप : सीबीआई से जांच कराने की मांग : मुंगेर। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्त्ति मार्कण्डेय काटजू के द्वारा भारतीय प्रेस परिषद के संविधान की धारा 13 के अधीन ‘‘बिहार में सच लिखने, दिखाने और बोलने की पत्रकारीय अभिव्यक्ति पर सरकारी दबाव‘‘ की जांच के लिए परिषद के सदस्य राजीव रंजन नाग की अध्यक्षता में गठित ‘जांच कमिटी‘ के समक्ष मुजफ्फरपुर और मुंगेर में क्रमशः 11 और 12 जून को दैनिक जागरण के सरकारी विज्ञापन के फर्जीवाड़ा को ससबूत उजागर किया गया।

मुजफ्फरपुर में जागरण से निष्कासित कर्मी रमण कुमार यादव ने दैनिक जागरण के सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा के सबूतों को जांच कमिटी के समक्ष पेश किया, जबकि मुंगेर में संस्कार भारती के मुंगेर जिला प्रमुख व जागरण के पूर्व संवाददाता कंचन शर्मा ने जांच कमिटी से दैनिक जागरण के राष्ट्रीय स्तर के अवैध संस्करण और विज्ञापन फर्जीवाड़ा के मामले में प्रेस परिषद से पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की पूरजोर मांग की। मुजफ्फरपुर में भी रमण कुमार यादव ने जांच कमिटी से दैनिक जागरण के सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा की जांच की सिफारिश सीबीआई से कराने की सिफारिश प्रेस परिषद से करने की मांग की। दोनों ने प्रेस परिषद से तत्काल बिहार के जिलों-जिलों में मुद्रित और प्रकाशित होने वाले दैनिक जागरण के अवैध संस्करणों के प्रकाशन को तुरंत बन्द कराने की भी पूरजोर मांग लिखित रूप में की।

जांच कमिटी में सदस्य के रूप में पटना के पत्रकार अरुण कुमार (टाइम्स आफ इंडिया) भी शामिल थे। अस्वस्थता के कारण जांच कमिटी के तीसरे सदस्य कल्याण बरुआ मुंगेर नहीं आ सके। जांच कमिटी के अध्यक्ष को लिखित रूप में शिकायत-पत्र सुपुर्द कर संस्कार भारती के मुंगेर जिला प्रमुख कंचन शर्मा ने दैनिक जागरण के देशव्यापी अखबार के निबंधन में जालसाजी और धोखाधड़ी के बल पर अवैध संस्करणों के जरिए सरकारी विज्ञापन की लूट के मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश करने की मांग की। सीबीआई जांच के समर्थन में श्री शर्मा ने जांच कमिटी के समक्ष लिखित तर्क पेश किया और बताया कि ‘‘प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली टी0 जयराज ने कार्यालय पत्रांक संख्या-612/165/1071/आरटीआई/एनपीसीएस, दिनांक 17-03-2011 के जरिए सूचित किया कि –‘‘प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय के अभिलेख के अनुसार बिहार के भागलपुर से दैनिक जागरण निबंधित नहीं है। जहां तक अखबार के प्रकाशन को रद्द करने का सवाल है, जिला पदाधिकारी, भागलपुर ऐसे मामलों के निबटारे के लिए सक्षम पदाधिकारी हैं।‘‘

जिला पदाधिकारी, भागलपुर को इस मामले में काररवाई के लिए लिखा गया तो जिला पदाधिकारी ने कार्रवाई करने से साफ इंकार कर दिया। जांच कमिटी के समक्ष कंचन शर्मा ने बताया कि किस प्रकार पटना की निबंधन संख्या को राज्य के अन्य जिलों-जिलों से निकल रहे अवैध दैनिक जागरण संस्करणों में चिपकाकर अवैध संस्करण छापा जा रहा है और विज्ञापन प्रकाशन मद में केन्द्र और राज्य सरकारों के राजस्व की लूट की जा रही है। इस अवैध संस्करण और सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा में प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय, नई दिल्ली, डीएवीपी, नई दिल्ली और पटना स्थित सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की संलिप्तता स्पष्ट प्रमाणित हुई है। इस देश व्यापी जागरण के विज्ञापन घोटाले की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए।

इस बीच, मुजफ्फरपुर के रमण कुमार यादव और मुंगेर के कंचन शर्मा ने इस संवाददाता को बताया कि भारतीय प्रेस परिषद की जांच कमिटी के समक्ष दैनिक जागरण के अवैध संस्करण और विज्ञापन फर्जीवाड़ा के सच को उजागर करने के बाद दैनिक जागरण के गुर्गे लगातार जान से मार डालने की धमकी उन्हें लगातार दे रहे हैं। दोनों ने कहा कि वे लोग ‘मौत‘ को टोकरी में लेकर दैनिक जागरण के आर्थिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि उनके साथ भविष्य में कोई अप्रिय घटना घटती है, तो अखबार के निदेशक मंडल के अध्यक्ष के साथ-साथ सभी संपादक जिम्मेवार होंगे।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट। इनसे संपर्क मोबाइल नं0-09470400813 के जरिए किया जा सकता है।

सीपी ठाकुर के सामने भाजपा विधायक ने पत्रकार को पीटा, हत्‍या की धमकी भी दी

मुजफ्फरपुर। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सीपी ठाकुर के प्रेसवार्ता के दौरान शनिवार को मुजफ्फरपुर से भाजपा विधायक सुरेश शर्मा व उनके समर्थकों ने एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार की जमकर पिटाई कर दी। विधायक ने पत्रकार को दो दिनों के अंदर जान से मार देने की धमकी भी दी। पीडि़त पत्रकार अजय पांडेय ने विधायक सुरेश शर्मा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सीपी ठाकुर एवं दो अज्ञात हमलावरों पर काजी मुहम्मदपुर थाना में जान से मारने की प्राथमिकी दर्ज करायी है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

जानकारी के अनुसार शनिवार की शाम को सर्किट हाउस में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सीपी ठाकुर के निर्देश पर जिलाध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने प्रेसवार्ता बुलायी थी। प्रेसवार्ता के दौरान एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक के स्थानीय संवाददाता अजय पांडेय ने मुजफ्फरपुर के भाजपा विधायक सुरेश शर्मा से संबंधित कुछ सवाल प्रदेश अध्यक्ष डा. ठाकुर से पूछा। इन सवालों को सुनकर विधायक नाराज हो गए। उन्‍होंने आवेश में आकर पत्रकार को जान से मारने की धमकी दी। अजय ने जब इसका विरोध किया तो प्रदेश अध्यक्ष सीपी ठाकुर के सामने ही विधायक और उसके दो समर्थक उस पत्रकार के साथ मारपीट करने लगे। अन्‍य पत्रकारों ने बीच बचाव करके किसी तरह अजय पांडेय को विधायक एवं उनके गुर्गों के चंगुल से बचाया। सरेआम पत्रकार को मारे-पीटे जाने से नाराज पत्रकारों ने सीपी ठाकुर के प्रेस वार्ता का बायकाट कर दिया।

घटना से आहत अजय पांडेय अपने साथी पत्रकारों के साथ थान काजी मुहम्‍मदपुर पहुंचे तथा भाजपा प्रदेश अध्‍यक्ष डा. सीपी ठाकुर, विधायक सुरेश शर्मा तथा दो अज्ञातों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। पुलिस ने मामला संख्‍या 191/12 में आईपीसी की धारा 307, 323, 324, 504 एवं 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली है। मामले की जांच की जा रही है। इस संदर्भ में तिरहुत प्रक्षेत्र के आईजी गुप्‍तेश्‍वर पांडेय ने पत्रकार पर हमले की घटना को दुर्भाग्‍यपूर्ण बताते हुए जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई की बात कही है। हालांकि उन्‍होंने यह भी कहा कि उन्‍हें इस मामले की अभी पूरी जानकारी नहीं है। 

सड़ता गेहूं और अखिलेश सरकार के सौ दिन!

प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार के सौ दिन पूरे हो गये। शपथ लेने के बाद अखिलेश की सादगी और काम करने की लगन देखकर लगता था कि सौ दिन के बाद इस नौजवान को शाबाशी देने जैसी कई चीजें हम लोगों के पास होंगी। मगर सौ दिन पूरा होने पर एक बड़ी खबर और कई फोटो अखबार में दिखाई दी कि प्रदेश में हजारों कुंतल गेहूं पहली बरसात में ही सड़ गया क्योंकि कुछ नाकारा अफसर इस गेंहू को गोदामों में रखने की व्यवस्था नहीं कर पाये। यह खबर बेहद सदमा देने वाली है, साथ ही यह एहसास कराने वाली भी कि सिंहासन पर बैठने वाले लोग ही बदलते है व्यवस्थायें नहीं बदलतीं। अभी भी हालात ज्यों के त्यों हैं। गरीब को अनाज नहीं और तंत्र चलाने वालों के पास अनाज को रखने की जगह नहीं।

समझ नहीं आता कि यह व्यवस्थायें कब सुधरेंगी। हर साल जब गेहूं खरीद शुरू होती है तो लगता है मानो प्रदेश में हाहाकार मच गया। किसान अपना गेहूं लेकर मंडी जाता है। वहां उसका गेहूं तो नहीं बिकता मगर उसका साबका दलालों से जरूर पड़ जाता है। यह दलाल किसी भी कीमत पर किसान को उसकी फसल के वाजिब मूल्य नहीं मिलने देते। मंडी में दलालों की पूरी फौज रहती है और किसान बेसहारा अपनी फसलों के लिए इधर से उधर घूमता रहता है।  हर साल खबर आती है कि फसल रखने के लिए बोरों की कमी पड़ रही है। बोरों की खरीद में हर साल लाखों करोड़ों रुपये का कमीशन खाया जाता है। मगर बोरों की कमी हमेशा बनी रहती है। इन बोरों की कमी के कारण अफसर अपने आप को असहाय बता देते हैं और मुंह लटकाकर किसान से कह देते हैं चूंकि बोरे नहीं हैं किसानों का गेहूं नही रखा जा सकता। मगर वहीं खड़े दलालों के पास बोरे भी होते हैं और इन दलालों के खरीदे गये गेंहू को रखने के लिए अफसरों के पास जगह भी।

जब एक दिन अचानक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने कुछ साथियों के साथ उन्नाव गेहूं खरीद केन्द्र का दौरा करने पहुंच गए तो हकीकत उनके सामने आ गयी। वहां पर सिर्फ दलाल राज ही चल रहा था और किसान बेहाल थे। यहीं नही वहां लगे गेहूं तौलने के कांटे पर जब मुख्यमंत्री चढ़ गए तो उस कांटे में उनका वजन ही बीस किलो बताया। जाहिर है सत्‍तर किलो से ज्यादा वजन के मुख्यमंत्री को बीस किलो बताने वाली मशीन किसान का गेहूं भी इसी अनुपात में तौलती होगी। होना तो यह चाहिए था कि इस घटना के बाद इस व्यवस्था के दोषी सबसे बड़े अफसरों को कड़े से कड़ा दण्ड दिया जाना चाहिए था। मगर मात्र कुछ छोटे कर्मचारियों को ही निलंबित करके खानापूर्ति कर ली गयी। अफसर शाही का आलम इससे समझा जा सकता है कि जब मुख्यमंत्री ने वहां की डीएम से पूछा कि उन्होंने जिस किसी ऐसे गेहूं खरीद केन्द्र का दौरा किया हो जहां व्यवस्थायें सुचारु रूप से चल रही हों तो उसका नाम बता दें। जिससे वह उस केन्‍द्र का निरीक्षण कर सकें। मगर जिलाधिकारी को ऐसे किसी भी केन्द्र का नाम नहीं पता था। जाहिर था कि जिले में ऐसा कोई केन्द्र नहीं था जहां व्यवस्थायें सुचारू रूप से चल रही हों। तमतमाये मुख्यमंत्री ने डीएम को तत्काल हटाने के निर्देश दे दिये और यूपी के नाकारा नियुक्ति विभाग ने नये डीएम को तैनात करने में हफ्तों लगा दिये।

इस बीच मानसून की पहली बरसात प्रदेश में हो गयी। जिस बात का डर था वही सबित हो गयी। हजारों कुन्तल गेंहू भीगने के कारण सड़ गया। और यह तय है कि जब मानसून पूरी तरह आ जायेगा तो लाखों कुन्तल गेहूं इसी तरह सड़ जायेगा। सवाल इस बात का है कि क्या किसी भी रूप में यह व्यवस्था नहीं की जा सकती थी कि प्रदेश में अनाज की इस तरह दुर्गति न की जाये। हम लोग क्या अनाज के रखने के लिए गोदाम नहीं बना सकते। क्या हम हर साल इसी तरह अपना अनाज सडऩे के लिए छोड़ सकते हैं। इस अव्यवस्था के अलावा कुछ और मूलभूत बातें हैं जिस पर ध्‍यान देना ही चाहिए। अभी भी बुंदेलखंड और पूर्वांचल के हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास दो वक्त खाने के लिए अनाज नहीं है। कई परिवार भुखमरी के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। क्या इन गरीबों की मौत किसी पर कोई असर नही डालती। क्या प्रदेश के मुखिया का यह कर्तव्य नहीं है कि जो अनाज सड़ रहा हो वह गरीबों तक बंट जाये। जो राजनीति में घाघ हो गए हैं और जिनकी संवेदनायें खत्म हो गयी हैं उनकी बात करना बेमानी है। मगर अखिलेश तो अभी युवा हैं। अपनी कार्यशैली से भी वह सादगी से भरे लगते हैं। तो क्या माना जाय कि भ्रष्ट नौकरशाहों ने उन्हें भी अपने चंगुल में फंसा लिया, जिससे उन्हें प्रदेश की यह भयंकर स्थिति दिखाई नहीं पड़ रही। या फिर यह अफसर केन्द्र की तरह यहां भी कोई लंबा खेल खेल रहे हैं।

केन्द्र सरकार ने भी इसी तरह लाखों कुन्तल गेहूं सडऩे दिया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी उसे गरीबों में नही बंटवाया। बाद में पता चला कि सड़े हुए गेहूं को शराब के व्यापारियों ने ले लिया क्योंकि इस गेहूं से बढिय़ा शराब बन जाती है। तो फिर क्या माना जाये कि सौ दिन में यहां भी शराब के व्यापारी इतने ताकतवर हो गये कि अखिलेश जैसे मुख्यमंत्री को भी उन्होंने इतने प्रभाव में ले लिया कि खुले में गेहूं सड़ता रहे मगर मुख्यमंत्री अपनी जुबां भी न खोलें। गरीबों की आह से बड़ी कोई और आह नही होती। जब सरकारें गरीबों के हितों से विमुख हो जाती हैं तो इतिहास गवाह है कि तख्ता पलट हो ही जाता है। अच्छा हो कि

संजय शर्मा
अखिलेश यादव एक कड़ा बयान जारी करें कि जिस जिले में गेंहू रखने की जगह न होने के कारण अगर सड़ा तो वहां के कलेक्टर को चौबीस घंटे के अन्दर निलंबित कर दिया जायेगा। और यह सिर्फ चेतावनी ही न हो बल्कि ऐसा दो चार जिलों में करके भी दिखा दिया जाये तो यह तय है कि प्रदेश में एक किलो गेहूं भी कहीं सड़ नहीं सकता। मगर इन सबको करने के लिए भ्रष्ट अफसरों से दूर रहना बेहद अनिवार्य है। और अपनी सरकार के सौ दिन पूरा करने पर अखिलेश यादव को यह तो समझ में आ ही जाना चाहिए कि नौकरशाहों ने ही मायावती को डुबोया था और अखिलेश सरकार के नौकरशाह भी कम गुल नहीं खिला रहे।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं.

नेपाल के लिए आगे क्‍या है रास्‍ता?

जब डा. बाबू राम भटटराई नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे तब नेपाली जनता में यह आशा जगी थी कि नेपाल में राजनीतिक गतिरोध जल्द ही समाप्त हो जायेगा। नया संविधान बनेगा। नया नेपाल नई रोशनी में तरक्की और खुशहाली की नई इबारत लिखेगा। इस सोच के पीछे कुछ जायज वजहें भी थीं। मसलन डा. बाबूराम भटटराई का उदारवादी चेहरा। राजनैतिक दूरदृष्टी। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की उनकी शैक्षणिक पूष्ठभूमि। यही नहीं माआवादियों के भूमिगत आन्दोलन के दौरान जो कुछ जानकारी उनके बारे में छनकर आती थी उससे भी उनके विराट राजनैतिक व्यक्त्वि का ही पता चलता था। संविधान सभा के चुनाव में गोरखा से वे सभासद चुने गये थे। वे सर्वाधिक 82 प्रतिशत मत हासिल करने वाले वे नेपाल के पहले सभासद थे। जो रिकार्ड मतों से जीते थे।

27 मई की अर्धरात्रि तक आम नेपाली के अलावा सामान्य बौद्धिक स्तर के आम नेपाली को भी यह अहसास हो चला था कि नये संविधान की घोषणा डा. बाबू राम भटटराई द्वारा आखिरी लमहों में ही सही, जाते जाते कर दी जायेगी। साथ ही आम जन को यह भी भरोसा था कि जिन जिन बिन्दुओं पर असहमति है उसे रूपान्तरित संसद द्वारा बाद में हल कर लिया जायेगा। लेकिन इसके उलट प्रधानमंत्री ने मध्यरात्रि संविधान सभा के दूसरे चुनाव का एलान कर सभी को चौंका दिया। अब सवाल उठता है कि नेपाल की शान्ति प्रक्रिया कैसे पटरी पर आयेगी? अब आगे का रास्ता क्या है? उन विवादित मुद्दों का अब क्या होगा जिस पर सहमति बन गयी है? मसलन माओवादी लड़ाकुओं का समायोजन? क्या संविधान सभा का नया चुनाव ही नेपाल की राजनैतिक गतिरोध को समाप्त कर नये नेपाल के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा? या फिर रास्ते और भी है? दूसरा सबसे अहम और महत्वपूर्ण सवाल चार साल पहले हुए संविधान सभा के चुनाव से नेपाली जनता को क्या हासिल हुआ? जिसमें अरबों रुपयों के अलावा नेपाली जनता के सपने स्वाहा हुए अलग से? कुल मिलाकर नेपाल की शान्ति प्रक्रिया वहीं आकर ठहर गयी हैं जहां से चार साल पहले चली थी। नया संविधान तयशुदा समय सीमा के भीतर न पाने से शान्ति प्रयासों को गहरा धक्का लगा है।

आपको याद दिला दें प्रधानमंत्री बनते ही छठ और बकरीद पर्व के मौके पर देश वासियों को शुभकामना देते हुए प्रधानमत्री भटटराई ने जनकपुर में कहा था कि नये संविधान का पहला मसौदा 30 नवम्बर 2011 तक सार्वजनिक कर दिया जायेगा। चार बार संविधान सभा की समय सीमा बढ़ाने के बावजूद संविधान नहीं पेश हो पाया। माओवादी अध्यक्ष व गणतंत्र नेपाल के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहल उर्फ प्रचण्ड तो बाबूराम भटटराई से दो कदम आगे जाते हुए 5 नवम्बर 2011 को अपनी अमेरिकी यात्रा से पूर्व ही राजनैतिक गतिरोध समाप्त कर शान्ति प्रक्रिया को पटरी पर लाने को आतुर दिख रहे थे। उसके पीछे उनकी मंशा विश्व बिरादरी को यह संदेश देने की थी माओवादी राजनीति की मुख्य धारा में आकर नेपाल को प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया में लाने के लिए पूरी तरह गंभीर है। भोली भाली नेपाली जनता आंख मूंदे अपने नेताओ पर भरोसा करती रही है। अन्ततः उसे निराशा ही हाथ लगी। विभिन्न राजनैतिक दलों की मुसलसल बैठकें और तमाम तरह की सहमति के कथित प्रयासों के बावजूद भी नया संविधान चार वर्षों में नहीं बन पाया।

बतातें चलें कि नेपाल में संविधान सभा का चुनाव चुनाव मात्र दो सालों के लिए किया गया था। नेताओं ने अपनी राजनैतिक स्वार्थों को उपर रख कर ही काम किया। इनकी दलगत निष्ठा हमेशा ही राष्ट्रीय निष्ठा पर भारी पड़ी। नेपाली जनता ने नेताओं को भेजा तो था संविधान बनाने के लिए लेकिन किस तरह सत्ता की ललक ने एक एक कर सभी राजनैतिक दलों के चेहरों से नकाब हटा दिये। सत्ता के इस खेल में यह जगजाहिर हो गया कि सभी दल कुर्सी के लिए कितने बेताब हैं। कुर्सी के में नेपाली जनादेश की अवहेलना करते हुए कुल चार बार संविधान सभा की मियाद बढ़ायी गयी। पहली बार एक साल, दोबारा 6 माह के लिए, तीसरी और चौथी बार तीन तीन माह। बार बार संविधान सभा की समय सीमा को बढ़ाये जाने के मसले को नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए इस बार समय सीमा बढ़ाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जो कि 27 मई को खत्म हो गयी। इस तरह दो साल के लिए गठित संविधान सभा चार वर्षों में नेपाली जनता को नया संविधान देने में नाकामयाब रही।

राजनैतिक विश्लेषकों की माने तो बहुत से विवादित मसले हल कर लिए गये थे जिसमें माआवादी लड़ाकों के समायोजन का मसला सबसे अहम था। इसके अलावा विभिन्न जातियों व समूहों से भी सहमति बन गयी थी। नया संविधान न बन पाने के पीछे प्रमुख कारण जाति के आधार पर राज्यों के गठन का मसला है। मधेशी हिमाली