‘रिपब-लिक टीवी’ मानें भाजपा की गुंडा वाहिनी, शेहला रशीद ने कुछ गलत नहीं किया!

Samar Anarya : अगर आपको लगता है कि रिपब-लिक टीवी वाले को भगा के शेहला रशीद डोरा ने कुछ गलत कर दिया है तो आप निहायक बेवकूफ हैं! क्या है कि नैतिकता और सिद्धांत दोनों उन पर लागू होते हैं जो खुद भी उन्हें मानते हों! और अगर आपको लगता है कि रिपब-लिक पत्रकारिता की नैतिकता मानता है, एक खबरिया चैनल है तो यह आपकी कम बुद्धि की दिक्कत है- हमारी नहीं!

आपको याद भी है कि कैसे रिपब-लिक ने भीड़ को उमर खालिद और कन्हैया जैसे साथियों के खिलाफ हिंसा करने को उकसाने की भरपूर कोशिश की थी? क्या लगता है आपको? जब तक रिपब-लिक एकाध साथी को सच में न मरवा दे तब तक उसे न्यूज़ चैनल मानेंगे? सो साथियों की लाशों पर गिद्ध भोज की प्रतीक्षा न करें! रिपब-लिक को वह मानें जो वह है- भाजपा की गुंडा वाहिनी! बाकी शेहला ने जो किया ठीक किया मगर कम किया! ज़्यादा दिन न लगेंगे जब जनता इन गुंडों की और बेहतर दवा करना शुरू कर देगी! तब हम निंदा भी करेंगे कि हिंसा ठीक नहीं है!

Dilip Khan : दो दिनों से कई पोस्ट पढ़ चुका हूं जिसमें Shehla Rashid की इस बात पर आलोचना की जा रही है कि उसने Republic के पत्रकार को क्यों हड़काया। कुछ बातें कहने को हैं:

1. ये जो ताज़ा रिपब्लिक है और जिसका डॉन पहले TIMES NOW में था, उसने कैसी रिपोर्टिंग और कैसी डिबेट की JNU को लेकर? ज़्यादा नहीं, बस डेढ़ साल पहले की बात है। पूरे देश में जेएनयू की जो ख़ास तरह की छवि बनाई गई, उसमें अर्नब गोस्वामी का बड़ा रोल है।

2. टाइम्स नाऊ जब जेएनयू, शेहला, Umar, Kanhaiya, Anirban इन सबको देशद्रोही बता रहा था तो वो कौन सी Neutrality और Objectivity दिखा रहा था? Objectivity नाम के शब्द को पत्रकारिता में बार-बार रटाया जाता है। पहले मीडिया इसे फॉलो करे। शेहला एक्टिविस्ट है। उसे पक्ष-विपक्ष चुनने की आज़ादी है। उसे आज़ादी है कि वो किसी चैनल को बाइट दे और किसी की माइक सामने से हटा दे। आप ज़बर्दस्ती मुंह पे माइक टांग देंगे क्या?

3. ये भी हो सकता है कि वो रिपोर्टर अपने चैनल की आइडियोलॉजिकल फ्रेम से अलग हो। ऐसा होता भी है। लेकिन माइक जिस संस्था की थी उसका एजेंडा बिल्कुल क्लीयर है। पहले दिन से साफ़ है। उस एजेंडे को शेहला अपने विरोध में पाती है। इसलिए उसकी मर्जी है कि वो माइक हटाने को कह दें।

4. जिस प्रोटेस्ट में शेहला ने ऐसा किया वो 3 बजे प्रेस क्लब के भीतर वाला प्रोटेस्ट नहीं था, जिसे “सिर्फ़ पत्रकारों” का कहकर प्रचारित किया जा रहा है। शेहला वाला मामला उससे पहले का है, जो पत्रकारों के अलावा एक्टिविस्टों की साझे कॉल पर हो रहे प्रोटेस्ट में घटित हुआ।

5. मान लीजिए किसी मीडिया हाउस ने किसी संस्था के ख़िलाफ़ रिपोर्टिंग की। हफ़्ते भर बाद उस संस्था का कोई आदमी न्यूज़रूम पहुंच जाए और ज्ञान देने लगे तो चैनल वाले क्या करेंगे?

6. गौरी लंकेश की हत्या पर जो खेमा जश्न मना रहा है, रिपब्लिक उस खेमे को आइडियोलॉजिकल खुराक देता है। ऐसे में Gauri Lankesh की हत्या के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में अगर रिपब्लिक की माइक कोई मुंह पर तान दे तो स्वाभाविक ग़ुस्सा निकलेगा।

7. पत्रकारिता में या कहीं भी objectivity सबसे बेकार चीज़ है। इसपर किसी को कोई डाउट हो तो अलग से बात कर लेंगे। ऑब्जेक्टिविटी की जो वैचारिक hegemony है वो बहुत ख़तरनाक है। तराजू से तौल कर निष्पक्षता नहीं आती। आप टास्क के तौर पर मुझे कोई बढ़िया डिबेट/लेख दे दीजिए मैं बता दूंगा कि कहां कहां ऑब्जेकेटिविटी नहीं है। लेख अगर ऑब्जेक्टिविटीवादी का हो तो और बढ़िया

सोशल एक्टिविस्ट और मानवाधिकारवादी समर अनार्या और पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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रवीश ने अपने ब्लाग और पोस्ट से चुनौती दी- साबित करो कि यह फोटोशाप नहीं है!

Sheetal P Singh : बूसी बसिया. कल गौरी लंकेश को इसाई बताकर खारिज किया गया था, सबूत में उनके दफ़नाये जाने को उत्तर भारत के कुपढ़ समाज के मूढ़ मष्तिष्क में ठोंसा गया और यह भी कहा गया कि वे केरल की संघ कार्यकर्ताओं की हत्या के पक्ष में लिख रही थीं!

इन अफ़वाहों को कल तथ्यों के जरिये जमींदोज किया गया। लगभग हर परिचित संघी दीवाल पर जाकर मैंने चुनौती दी कि क्या आप जानते हैं कि लिंगायत और तमाम अन्य (ग़ैर मुस्लिम / इसाई) शवों को दफ़नाते हैं? सबूत माँगा तो इसाई होने पर अफवाह का ट्वीट मिला। पत्रिके को पैट्रिक बता कर मूर्ख उत्तर भारतीय संघी समर्थकों का ऊपरी माला चाटा जा रहा था । रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी किसी अफवाहबाज ने माफ़ी नहीं माँगी!

केरल के संघी कार्यकर्ताओं की हत्या के समर्थन की अफवाह पर उनकी पत्रिका के एक रेखाचित्र को पेश किया गया! मैंने पूछा कि यह तो ओणम विवाद का रेखाचित्र है तो अफवाहबाज फ़रार! आज नये हथियार आगे किये गये हैं! रवीश कुमार के एक फ़र्ज़ी बयान को (जिसमें वे मोदी जी को गुंडा कह रहे हैं) उड़ाया गया जिसे ख़ुद रवीश ने अपने ब्लाग और पोस्ट से चुनौती दे दी कि साबित करो कि यह फोटोशाप नहीं है! इसके बाद इसी तर्ज़ के कुछ नये चुटकुले दरपेश हैं ! संघियों झूठ के पैर नहीं होते ! बूसी बसिया।

Avinish Mishra : समर शेष है। कोई समाज कब शिकारी बन जाता है? और कब कबिला से निकलकर चांद पर पहुँच जाता है. ये चंद लम्हों का खेल नहीं है.. मानव सभ्यता का ये विकास वर्षों के अनेक घटना/खोज/रिसर्च के बाद हुआ है। हम मानव बर्बरता से सभ्यता की ओर आएँ. इतना ही नहीं भारत सभ्यता और संस्कृति में पूरे विश्व धरोहर में सबसे आगे रहा।

जरा सोचिए! महमूद गजनी से लेकर अंग्रेज तक और गौरी से लेकर मुगल सल्तनत तक ना जाने कितने लूटेरे भारत आए. अपना सम्राज्य स्थापित किए. सभ्यता को कुछ हद तक नष्ट भी करने की पूरी कोशिश की. मगर हमारी सनातन सभ्यता जस की तस रही. वसुधैव कटुंबकम का ध्येय अटल रहा. मगर आजादी के 70 साल बाद बुद्ध और गांधी के इस देश को क्या हो गया है? एक साल पहले मैंने एक लेख लिखा था सियासत से ज्यादा अब मुझे आम आदमी से डर लगता है. ये बात आज भी प्रासंगिक है.

जरा सोचिए! एक भीड़ निहत्थे को मारती है और भीड़ का कुछ हिस्सा उस मौत पर जश्न मनाती है. अब सवाल ये की हम कहां जा रहे हैं? सभ्यता से बर्बरता की ओर? भीड़ को कौन लोंग शह दे रहे हैं? वही लोंग जो मौत पर जश्न मना रहे है. समाजवैज्ञानिक रॉस ने कहा था- “भीड़ के लिए जो एक पल नायक होता है वही दूसरे पल पीड़ित हो जाता है।” फ्रांस क्रांति के समय रॉब्सपियर ने भीड़ की सहायता से आतंक राज कायम कर लिया मगर वही भीड़ एक समय उसे गिलस्टीन पर चढ़ा दिया। इस भीड़ को पहचानिये.. इन लोगों को पहचानिये जो दूसरों की मौत पर जश्न मना रहे है? ये कौन लोंग है? क्या ये लोंग आपके अगल बगल में तो नहीं है? क्या ये आपके मरने के बाद जश्न नहीं मनाएँगे? सोचिए! दिनकर ने लिखा है..
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उसका भी अपराध।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और अविनीश मिश्रा की एफबी वॉल से.

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शहला का बिहेवियर कहीं से भी जागृति शुक्ला या दधीचि से अलग नहीं लगा!

Prabhat Shunglu : शहला राशिद का प्रेस क्लब प्रोटेस्ट वाला वीडिया यू ट्यूब पर देखा। दो बातें कहनी हैं। एक- शहला ने जब रिपब्लिक टीवी को गेट आउट कहा तो वो मुझे उसका ये बिहेवियर कहीं से भी जागृति शुक्ला या दधीचि से अलग नहीं लगा। दूसरा- शहला या किसी को भी प्रेस और पत्रकारिता के इस दौर को कोसने का पूरा हक है, लेकिन शहला के अंदाज़ और भाषा में वायलंस था और मैं इसकी निंदा करता हूं।

रिपब्लिक टीवी के पत्रकार को भी वहां रहकर अपना काम करने का पूरा हक था जैसे कि और चैनल्स भी कर रहे थे। वहां खड़े दूसरे पत्रकारों नें शहला को अपने कंडक्ट के लिये माफी मांगने पर ज़ोर नहीं दिया, इससे ये भी साफ है कि पत्रकारिता आइडियोलिजी के पूर्वाग्रहों से इतना ग्रसित है कि ग़लत को भी सही बताने पर मजबूर हो गई है या गलत के विरोध में सेलेक्टिव हो गई है। और वो इसलिये भी क्योंकि अब पत्रकार अपनी मनपसंद पार्टी का भोंपू कहलाने में ज्यादा गर्व महसूस करता है।

ये अब एक्टिविस्ट भी नहीं रहे। महज़ पार्टी प्रवक्ता में ट्रांसफॉर्म हो चुके हैं। प्रेस क्लब मैनेजमेंट ने नेताओं को मंच देकर गौरी लंकेश की आत्मा को चोट पहुंचाई है। इसके लिये मैनेजमेंट को लिखित तौर पर मेल के ज़रिये सभी सदस्यों से माफी मांगनी चाहिये।

टीवी पत्रकार प्रभात शुंगलू की एफबी वॉल से.

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रिपोर्टर ‘रिपब्लिक’ का हो या ‘पांचजन्य’ का, ‘वायर’ का हो या ‘एक्सप्रेस’ का, उसे रहने का हक़ है

Panini Anand : कल संघ या भाजपा का कोई व्यक्ति अगर किसी पत्रकार को उसके चैनल या पब्लिकेशन की पहचान की वजह से भगाएगा तो हम उसे सही मानें या ग़लत. रिपोर्टर रिपब्लिक का हो या पांचजन्य का, वायर का हो या एक्सप्रेस का, उसे रहने का हक़ है. यह बात सारे सार्वजनिक जीवन वाले लोग समझ लें. नहीं समझेंगे तो हम इसका विरोध करेंगे, चाहे आप किसी भी विचारधारा के हों. याद रखिए, अन्याय के विरुद्ध लड़ते हुए अन्याय करना खुद अन्यायी बन जाना है.

पत्रकार पाणिनी आनंद की एफबी वॉल से. इस पर आईं कुछ प्रमुख टिप्पणियां…

Gilvester Assari ; But that reporter was trying to shove his Mike on her face…as if he wanted to provoke her..she asked him to take away the Mike but he didn’t. .yes getting provoked by such provocations will only affect the larger fight…should not fall in their trap…

Panini Anand माइक दूर क्यों करें. हम जो कह रहे हैं उसमें अगर कुछ गलत नहीं, संदेह नहीं तो फिर चिंता कैसी. किलिंग द मैसेंजर को कैसे सही ठहरा दें. रिपब्लिक गलत है इसलिए हम भी गलती करें क्या. भाजपा ने एनडीटीवी का बहिष्कार कर रखा है. क्या वो सही है.

Kuldeep Kumar मैंने संघ और भाजपा के अनेक शीर्ष नेताओं का इंटरव्यू किया लेकिन अटलबिहारी वाजपेयी ने कभी टाइम नहीं दिया. दिया तो मिले नहीं. क्या मैं उनके साथ ज़बरदस्ती कर सकता था? यदि कोई टीवी पत्रकार मुझसे कोई प्रश्न करता है, तो क्या मुझे जवाब देने या न देने की आज़ादी नहीं है? टीवी पत्रकारों में जो अहंकार है वह कभी प्रिंट पत्रकारों में नज़र नहीं आया. उनका रवैया यह होता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम आपकी बाइट लेना चाहें और आप न दें. लोकतंत्र में बहिष्कार की भी आज़ादी है. यदि भाजपा ने एनडीटीवी का बहिष्कार कर रखा है तो यह उसका अधिकार है. और यदि एनडीटीवी भी किसी नेता या पार्टी का बहिष्कार करना चाहे तो यह उसका अधिकार होगा.

Gilvester Assari The way these people have been shoving the Mike on people, shouting at people, chasing g them in groups is no journalism either..and what is happening in their studio, how people are treated, shouted down, branded anti national, maoists, Pakistanis does not require any explanation….in a way they are getting it back from some if not everyone…

Panini Anand हां मुझे पता है. लेकिन हम जानवर के साथ जानवर बन गए तो वहीं हार जाएंगे. अपना धैर्य रखना है. लोग देख रहे हैं कि सही कौन है और गलत कौन. और अगर चिंता इतनी ही है तो सामने आए रिपोर्टर को मत दुतकारिए, रिपब्लिक चैनल के सामने जाकर लड़िए, प्रदर्शन कीजिए. विरोध का यह तरीका असंगत है और हमें छोटा बनाता है. बहिष्कार कीजिए लेकिन बहिष्कार की भाषा उनकी भाषा जैसी न हो. यह ध्यान रखना होगा. हत्यारे को मृत्युदंड का विरोध इसी तर्क के आधार पर करते हैं.

Nirnimesh Kumar Well said Panini. We should fight all those who attempt to muzzle the voice of dissent.

Jyotsna Singh Panini Sir, Republic and Panchjanya mein fark hai. Panchjanya “independent journalism” karne ka dawa nahi karta hai. Shehla and her comrades have been victims of fake and propagandist reporting by this channel. The channel continues to indulge in unethical reporting. And there is no redressal — what are Editors Guild or Press Council doing? We have let unethical reporting grow in this country and we have called this upon ourselves!

Panini Anand बिल्कुल पूछिए कि ये सब संस्थाएं क्या कर रही हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि रिपब्लिक ज़हरीला चैनल है. लेकिन जब आप सार्वजनिक मंच पर सार्वजनिक स्थान पर बोल रहे हों, तो आप यह तय नहीं करेंगे कि कौन आपको सुनेगा और कौन वहां से भाग जाए. आप उसके माइक के सामने कहिए कि वो पत्रकारिता को कलंकित कर रहा है. गेट लॉस्ट वाला तरीका तो सही नहीं है. सबसे बड़ा संकट यही है कि हम अपने जैसों के बीच अपनी जैसी बातें कहने के आदी हो चुके हैं. विरोधियों, असहमतों के बीच जाकर या उनके सामने सधे और तार्किक ढंग से बात करने की आदत नहीं रही. और इसीलिए हम एक बौद्धिक ब्राह्मणवाद में जी रहे हैं. इसीलिए मुट्ठीभर बचे हैं. मैं तो कई बातों पर गांधी से असहमत हूं लेकिन यह एक बात उनसे सीखने लायक है. विरोधियों के सामने अपनी बात को कैसे रखना है और कैसा बर्ताव करना है. वो आदमी अपने विरोधी को चारों खाने चित्त कर देता था.

Jyotsna Singh I will do what you are proposing. But I can do it as a journalist, because what happens in my profession is my responsibility too. But I will have different expectations from others. Republic is not opposition, Republic is propaganda. For her, that’s what it means…

Nirnimesh Kumar But the press club is not the place for a non-journalist to fight the alleged biases. They should hit the street or go to the designated forum.

Prince Pratikshit रिपब्लिक टीवी को अगर कोई न्यूज़ चैनल मानता है तो वो हद दर्जे का बेवकूफ इंसान है। दरअसल ये गुंडों की एक फ़ौज का नाम है जो पत्रकारिता के नाम पर गुंडागर्दी करते हैं, लोगों का चरित्रहरण करते हैं। हत्यारों एवं हत्याओं पर जश्न मनाने वालों को ये वैचारिक खुराक देते हैं। ये लोग समाज में ज़हर घोलने वाले हैं जो स्टूडीयो में बैठ कर दिन रात लोगों के ज़हन में बारूद भर रहे हैं।

Nirnimesh Kumar No sir, there is a big difference between a political party and a media organidation. The media is an open forum which a political party is not.

Vivek Raj Press should be free – we may not agree with a channel but we can’t stop them from recording your views in public.

Vaibhav Sinha Rehne ka haq hai… Undoubtedly this is must, we are with you in the fight.

Manikant Thakur यही तेवर या ऐसा ही रवैया रहा तो और सिमटते जाएँगे.

Ravish Kumar बिल्कुल सबको सब जगह रहने का हक है। गलत हुआ

Chaman Lal Over projection by media Itself, create illusion in the minds of young leaders of their ‘power’ to control,which itself is a bigger illusion!

Nirnimesh Kumar Congrats for letting your conscience speak out

Chaman Lal It is very tough and complex situation,I have lost all interest in going to electronic media discussions unless it is some sensible anchor and participants,now almost becoming very rare!Even on that day,I avoided going to even a non controversial channel for discussion

Masaud Akhtar मैं शहला के बर्ताव के साथ हूँ। पत्रकार अपने व्यवहार व काम से पत्रकार के रूप में आएं। सिर्फ साइन बोर्ड होने से कुछ नहीं होता।

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संघी वर्तमान को भी तोड़-मरोड़ देते हैं! (संदर्भ : गौरी लंकेश को ईसाई बताना और दफनाए जाने का जिक्र करना )

Rajiv Nayan Bahuguna : इतिहास तो छोड़िए, जिस निर्लज्जता और मूर्खता के साथ संघी वर्तमान को भी तोड़ मरोड़ देते हैं, वह हतप्रभ कर देता है। विदित हो कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ इलाकों में गंगा को गंगे, गीता को गीते, नेता को नेते और पत्रिका को पत्रिके कहा-लिखा जाता है। तदनुसार गौरी लंकेश की पत्रिका का नाम है- लंकेश पत्रिके। इसे मरोड़ कर वह बेशर्म कह रहे हैं कि उसका नाम गौरी लंकेश पेट्रिक है। वह ईसाई थी और उसे दफनाया गया। बता दूं कि दक्षिण के कई हिन्दू समुदायों में दाह की बजाय भू-समाधि दी जाती है। मसलन आद्य शंकराचार्य के माता पिता की भू-समाधि का प्रकरण अधिसंख्य जानते हैं।

गौरी के पिता पी लंकेश का नाम मैं अपनी पत्रकारिता के प्रारंभिक दिनों में कौतुक से सुनता था, उसके ‘लंकेश’ सरनेम के कारण। गांघी के बाद वह अकेला लोक प्रिय पत्रिका का मालिक था, जो बगैर विज्ञापन के पॉपुलर मैगज़ीन निकालता था। उसकी पत्रिका लाखों में बिकती थी, और दिल्ली तक उसकी धमक सुनाई पड़ती थी। जाहिल, अपढ़, बेशर्म, इतिहास विमुख संघियों का 1977 में लाल कृष्ण आडवाणी ने बड़े मीडिया हाउसों में धसान किया, जब आडवाणी सूचना मंत्री बना। फलस्वरूप जिन्हें पढ़ना भी नहीं आता था, वह लिखने लगे। कालांतर में इन्होंने पत्रकारिता में जम कर अंधाधुंध की।

हमारे समय मे व्यावसायिक पत्रकारिता के कठिन मान दन्ड थे। एमए और अधूरी पीएचडी करने के बाद मुझे नवभारत टाइम्स की नौकरी करनी थी। उसके सम्पादक मेरे पिता के निकट मित्र राजेन्द्र माथुर थे। उन्होंने बगैर परीक्षा के मुझ रखने से मना कर दिया, और प्रस्ताव रखा कि वह मुझे किसी यूनिवर्सिटी में हिंदी का लेक्चरर बना देंगे। लेकिन मुझे ओनली पत्रकार बनना था। सो मुझे कहा गया कि 15 दिन बाद नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण के लिए परीक्षा होगी। तैयार रहूं। परीक्षा में हिंदी, सामान्य ज्ञान, इतिहास, अंग्रेज़ी आदि का कठिन पर्चा होता था। अन्य में तो मैं होशियार था, पर मुझे अंग्रेज़ी तब इतनी ही आती थी, जितनी आज सोनिया गांधी को हिंदी आती है। मैं डर कर, माथुर को बगैर बताए परीक्षा के वक़्त गांव भाग गया, और दो माह बाद लौटा। मुझसे पूछताछ हुई, डांट पड़ी। छह माह बाद फिर पटना संस्करण के लिए एग्जाम हुए। इस बार माथुर की नज़र बचा कर एक सीनियर कुमाउनी जर्नलिस्ट दीवान सिंह मेहता ने मुझे अंग्रेज़ी के पर्चे में नकल करवा कर पास कराया। बाद में मैंने अपनी अंग्रेज़ी सुधरी। ऐ, मूर्ख, आ मुझसे ट्यूशन पढ़ भाषा, हिस्ट्री, पोयम और जोग्राफी का।

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

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हे सहला राशिद, संस्थानों की लड़ाई व्यक्तियों से नहीं लड़ी जाती!

Atul Chaurasia : सहला राशिद जिस तरह से उंगलियां नचा-नचा कर पत्रकार को लताड़ रही हैं, वह माथे पर चढ़ चुका सेलीब्रेटी नशा भी हो सकता है. संस्थानों की लड़ाई व्यक्तियों से नहीं लड़ी जाती है, यह बात शायद उन्हें समझ नहीं आ रही है. रिपब्लिक की लड़ाई को पत्रकार के साथ निपटाना शायद उन्हें सस्ता और आसान जरिया लगा हो. पर मुगालते से जितना जल्दी बाहर निकल जाएं उतना बेहतर.

उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि मीडिया के जिस हिस्से को वह अपने समर्थन में समझ रही है वह जेएनयू रूपी एक संस्थान का समर्थक है किसी सहला या कन्हैया का नहीं. जिस दिन रण में उतरेंगी उस दिन समझ आ जाएगा…

पत्रकार अतुल चौरसिया की एफबी वॉल से.

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Murder of Gauri Lankesh is another horrific act of capitalist-communal nexus

The Socialist Party strongly condemns the murder of Gauri Lankesh, activist and editor of  ‘Lankesh Patrika’. The party calls upon the state and the central government to arrest and sentence the killers of Gauri Lankesh at the earliest.

The Socialist Party believes that the killing of intellectuals, writers, journalists and political activists is being committed one after the other due to the capitalist-communal nexus operating within the country’s politics. That could be the only reason why the governmental system does not make serious efforts to even identify the killers.

The party considers that the suicides of lakhs of farmers and the mob-lynching of the citizens of minority community too is a result of this capitalist-communal nexus, whose main players are the BJP and the Congress.

In the party’s view, the increasing communal fanaticism in the country can be curbed only when neo-liberal fanaticism is rejected. Only then can there be an end to day-to-day killings and suicides.

गौरी लंकेश की हत्या पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ का एक और घृणित कृत्य 

सोशलिस्ट पार्टी प्रखर पत्रकार और ‘लंकेश पत्रिका’ की संपादक गौरी लंकेश की हत्या की कड़ी निंदा करती है. पार्टी कर्णाटक राज्य और केंद्र सरकार से मांग करती है कि गौरी लंकेश के हत्यारों को जल्द से जल्द पकड़ कर सजा दी जाए. 

सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि देश की राजनीति पर काबिज़ पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ के चलते एक के बाद एक बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं की जा रही हैं. यही कारण है कि सरकारी तंत्र हत्यारों का पता लगाने का गंभीर प्रयास नहीं करता. पार्टी लाखों किसानों की आत्महत्याओं और अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिकों की भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं को भी इसी पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ का नतीज़ा मानती है, भाजपा और कांग्रेस जिसकी प्रमुख खिलाड़ी हैं.

सोशलिस्ट पार्टी का मत है कि देश में बढ़ती सांप्रदायिक कट्टरता पर तभी लगाम लगाईं जा सकती है जब नवउदारवादी कट्टरता को छोड़ा जाए. तभी दिन-दहाड़े की जाने वाली हत्याओं और आत्महत्याओं का सिलसिला रोका जा सकता है.  

Dr. Abhijit Vaidya
Spokesperson
Socialist Party (India)

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Country wide outrage over killing of Journalist Gauri Lankesh

There has been widespread resentment and outrage throughout the country over the dastardly killing of the intrepid journalist Gauri Lankesh, the Editor of Lankesh Patrike of Bengaluru. The President of the Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) has already demanded for the enquiry into her death as nothing is clear whether she was killed by right wing forces or ultra-left Naxalites as was also on their hit list. Today a demonstration and dharna led by the IFWJ President Shri B.V. Mallikarjunaiah was organised in Bengaluru. The President of the Karnataka Union of Working Journalists Shri N. Raju also joined him along with hundreds of journalists to condemn cowardly murder of Ms.Gauri. The demonstration converged at the Press Club where all speakers condoled her death.

Similar demonstrations and dharnas were organised by the state units of the IFWJ in various parts of the country. In Lucknow, a Dharna was staged at the feet of Gandhi statue. The IFWJ Vice-President Shri Hemant Tiwari, Secretary Shri Siddharth Kalhans, Shri Bhaskar Dube, Shri Rajesh Mishra, Shri Utkarsh Sinha, Mohd. Kamran and others expressed concern over the growing intolerance and violence in the society.

Rajasthan Working Journalists Union is tomorrow organizing a candle march in Jaipur, which will be led by IFWJ Vice-President Shri Vashisth Kumar Sharma, Working Committee member, Shri Ish Madhu Talwar and President of the Rajasthan Working Journalists Union, Shri Harish Gupta.

IFWJ Secretary (South) Shri K. Asudhualla along with the CUJ President Sri Anbu organised a massive march on the streets of Chennai shouting slogans against the killers of Gauri Lankesh, who was gunned down goondas in the capital town of Karnataka.

President of the Chhattisgarh Journalists Union, Shri Ishwar Dubey and the Working Committee member, Shri Shankar Pandey and the IFWJ Secretary, Shri Sanjay Dubey have expressed great concern over the vulnerability of the journalists because of the poor law and order.

The President of the State Union of Working Journalists (Uttarakhand), Shri Shankar Dutt Sharma and the Convenor of Madhya Bharat Working Journalists Union Shri Awadhesh Bhargav have demanded that an independent enquiry must be conducted to bring the culprits to the book.

IFWJ Vice-Presidents – Shri K. M. Jha and Shri Bibhuti Bhusan Kar, who is also the President of the Utkal Journalists Association (UJA) have condoled the tragic end of Ms. Gauri Lankesh and have asked the State government to get it thoroughly probed.

The President of Telangana Union of Journalists, Shri Kappara Prasada Rao, the IFWJ Working Committee member, Shri Wilson Prabhakar Rao and the President of Rayalaseema-Andhra Union of Working Journalists, Shri M. Gopal Reddy have said that the violence must be curbed to ensure that the freedom of speech and expression does not get throttled.

The IFWJ Vice-President, Shri Keshab Kalita and the Secretary, Ms. Gitika Talukdar and the General Secretary of the Assam Union of Working Journalists, Shri Tutumoni Phukkan have demanded that the government must ensure that criminals are given the stringent punishment for this heinous crime.

The President of the Bihar Men’s Journalists Unions, Shri S, N. Shyam and the General Secretary, Shri Sudhanshu Kumar Satish have said in a statement that in Bihar the journalists have to face the wrath of the goondas and the government as well. They have asked the Central and State Government to not only give the compensation but must ensure that the family members of such journalists were not harassed.

IFWJ Secretary Rehmatullah Rounyal and the President of the J&K Working Journalists Union have strongly condemned the attack on the freedom of speech and expression. They have hoped that journalists would have the stealy resolve to relentlessly fight for the preservation of their most valuable right of freedom of speech and expression.

In New Delhi IFWJ secretary General Parmanand Pandey and the Treasurer, Shri Rinku Yadav led the protest march. In Haryana the IFWJ Secretary, Shri Randeep Ghangas has condemned the killing and has said that the journalists are facing grave challenges as every trick of the trade is adopted by the anti-social elements to brow beat them.  Similar reports are pouring in from other states. IFWJ has decided to continue the protest till assailants are brought to book.

Protests in MGAHV University wardha against Gauri Lankesh’s Muder गौरी लंकेश हत्याकांड के खिलाफ हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में कैंडल मार्च और प्रतिरोध सभा का आयोजन

सामाजिक कार्यकर्ता, आजाद विचार, स्वछंद निर्भीक लिखने और बोलने वाली ‘लंकेश पत्रिके’ की संपादक कन्नड़ भाषा की वरिष्ठ पत्रकार ‘गौरी लंकेश’ की हत्या मंगलवार को अज्ञात हमलावरों ने उनके निवास के बहार गोली मारकर कर दी गई। एक पत्रकार के तौर पर गौरी लंकेश दक्षिणपंथी राजनीति को लेकर आलोचनात्मक रुख रखती थीं। वे सीधे सरकार से तीखे सवाल पूछती थीं। ये सवाल सिर्फ वर्तमान सरकार से ही नहीं बल्कि इससे पूर्व की सरकारों से भी वे तीखे सवाल किया करती रही थी। गौरी लगातार हिंदुत्ववादी गुंडों और उनसे जुड़े अन्य संगठन के विरुद्ध लिखती रही थीं। यह नहीं है कि वे बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के विरुद्ध ही लिख रही थीं बल्कि अन्य सरकारों की दोगली चरित्र को भी पर्दाफास कर रही थीं।

दक्षिणपंथी संकीर्ण सोच का भी वे पर्दाफाश कर रही थीं। गौरी लंकेश की हत्या मात्र गौरी लंकेश की हत्या नहीं है बल्कि यह अभिव्यक्ति के आजादी की हत्या है, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की हत्या है। इस हत्या के माध्यम से डर पैदा करने की कोशिश की जा रही है ताकि कोई और सरकार से सवाल कोई न पूछे सके तथा दक्षिणपंथी संकीर्ण सोच पर सवाल न खड़ा करे। इस तरह की यह पहली हत्या नहीं है बल्कि इससे पहले भी श्रृंखलाबद्ध हत्याएं हुईं हैं। इस श्रृंखला में पनसारे, दाभोलकर और कलबुर्गी भी शामिल हैं। आश्चर्य की बात है कि ऐसी हत्यायों में अब तक किसी भी हत्यारे की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। ऐसी हत्यायों के विरुद्ध खड़ा होना और उनके लिये न्याय सुनिश्चित करवाना सभी न्याय पसन्द लोगों की जिम्मेदारी है।

इस निर्मम हत्या के विरोध में महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में विद्यार्थियों ने कैंडल मार्च और प्रतिरोध सभा रखी। विश्वविद्यालय के तमाम शिक्षक, प्रगतिशील विद्यार्थी और आइसा विद्यार्थी संगठन सांगठनिक रूप से शामिल हो अपना विरोध प्रकट किया। प्रतिरोध सभा मे अपनी बात रखते हुए प्रोफेसर डॉ.अमरेंद्र ने कहा कि गौरी लंकेश जैसी प्रखर पत्रकारों की सुरक्षा करना हमारी सरकारों की जिम्मेदारी है जिसमे वह असफल साबित हुई है। सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों ने गौरी लंकेश की हत्या की निंदा की और रोष प्रकट कर सरकार से मांग की है कि हत्यारों को शीघ्र पकड़ उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जाये जिससे इस घटना की पुनःवृति न हो और समाज में एक न्यायिक सौहार्द बना रहे।

IIMCAA Demands Court Monitored SIT Probe into Gauri Lankesh Murder

IIMC Alumni Association is shocked at the brutal murder of senior alumna and journalist Gauri Lankesh in Bengaluru. We strongly condemn the use of violence as an arm to suppress the freedom of expression of a citizen. Gauri Lankesh, known for her fearless journalism and uncompromising stand on free speech, will live in our memories forever. Her murder is an attempt to silence the voice of dissent. IIMC Alumni Association demands that the Karnataka Government take prompt actions to bring the culprits to justice for Gauri along with court monitored SIT probe into the killing.

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IFWJ, DUJ and JFA condemns killing of fearless journalist Gauri Lankesh

Bengaluru : Indian Federation of Working Journalist has condemned the gruesome killing of Gauri Lankesh, the bold editor of the popular weekly tabloid ‘Lankesh Patrike’. In a statement, the IFWJ President B V Mallikarjunaiah and the Secretary General Parmanand Pandey have asked the government of Karnatka to immediately bring the culprits to book and take stringent action against them.
It may be noted that, of late, the attacks on the journalists across the country have increased the mainly because of the rise of intolerance of different groups.

Although it is impossible to provide security cover to every journalist throughout the country, yet insuring of severe punishment to such anti-social elements will certainly be an effective deterrence, which will go a long way in protecting the journalists as well as other citizens. The IFWJ has also demanded that the government of Karnataka must adequately compensate the bereaved family of the late Gauri Lankesh. The IFWJ pays its homage to the courageous lady journalist, who made the supreme sacrifice for the sake of the protection of her constitutional rights of freedom of speech and expression.

DUJ Condemns Murder of Journalist Gauri Lankesh
Delhi Union of Journalists strongly condemns the dastardly murder of journalist Gaouri Lankesh and demands immediate identification and arrest of the culprits. It calls up on members to join a collective protest at the Press Club of India at 3pm today.

JFA condemns murder of Bengaluru journalist

Guwahati: Journalists’ Forum Assam (JFA) strongly condemned the murder of Bengaluru  based editor-journalist Gauri Lankesh on 5 September 2017 by unidentified assailants. One of the senior journalist & social activists of Karnataka, Ms  Gauri was shot dead at her residence in Rajarajeshwari Nagar on Tuesday evening. Ms  Gauri, 55, was critical against all kinds of communal forces in the country. She also faced convictions in two defamation cases. Elder daughter of a noted Kannada litterateur- journalist P Lankesh, Ms Gauri used to receive threats from various extreme forces in the recent past, but she did not bow down. Survived by her mother, filmmaker sister Kavita, theatre worker brother Indrajit with others,  Ms  Gauriowned and edited ‘Gauri Lankesh Patrike’, a popular Kannada magazine.

Karnataka chief minister and also a senior Congress leader Siddaramaiah condemned her murder and assured proper actions to book the culprits at the earliest. “Apart from non-physical attacks to silence media, as the year 2017 rolls on, India stands at an awkward position over the journo-murder index, as we have witnessed the murder of six professional journalists in the last nine months. Hence, we reiterate our old demand for a special protection law for the scribes across the country,” said a statement issued by JFA president Rupam Barua and secretary Nava Thakuria.

Prior to Ms  Gauri, a Haryana based television journalist (Surender Singh Rana) was shot dead on 29 July. Rana,  35, was associated with the Jammu-based news channel JK 24×7 News. The other victims include Kamlesh Jain, 42, (killed on May 31 in Madhya Pradesh), Shyam Sharma, 40, (May 15 in MP), Brajesh Kumar Singh, 28, (3 January in Bihar) and Hari Prakash, 31, (2 January in Jharkhand). India lost five journalists to assailants in 2015, which was preceded by two cases in 2014. However, 2013 reported as many as 11 journalists’ murders, as three northeastern media employees (Sujit Bhattacharya, Ranjit Chowdhury and Balaram Ghosh from Tripura) fell victim to the perpetrators.

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