पटना के एक अखबार के प्रबंधन ने डीएलसी को वाशिंग मशीन और आरओ गिफ्ट किया!

पटना के एक अखबार के एक मीडिया कर्मी ने जानकारी दी है कि यहां जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड न देना पड़े इसके लिए एक भ्रष्ट डिप्टी लेबर कमिश्नर महोदय चांदी काट रहे हैं। इस मीडियाकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर जानकारी दी कि पटना के महाधूर्त डिप्टी लेबर कमिश्नर को अखबार प्रबंधन ने अपने एक खास मातहत के जरिये वाशिंग मशीन और पानी को शुद्ध करने वाला आरओ गिफ्ट किया है। इसके अलावा अन्य उपहार भी समय समय पर दिए जा रहे हैं। इस बारे में सूत्रों का कहना है कि अखबार प्रबंधन ने डीएलसी को ये खास गिफ्ट इसलिए भेंट दिया है ताकि मजीठिया मामले में ये अखबार प्रबंधन की मदद करें।

सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि बिहार के लेबर कमिश्नर गोपाल मीणा काफी ईमानदार हैं मगर भ्रष्ट डीएलसी के सामने उनकी भी नहीं चल रही है। ये गिफ्ट अखबार के एकाउंट हेड के जरिये भेजा गया है। फिलहाल अब अखबार के मीडियाकर्मी इस मामले की विजलेंस के जरिये जांच कराने जा रहे हैं जिसमें जांच का मुख्य बिंदु है कि अकाउंट हेड, पटना यूनिट हेड, चीफ एचआर और डीएलसी के मोबाइल का सीडीआर निकाला जाय ताकि पता चले कि इनमें आपस में क्या बातें होती थीं। अखबार द्वारा गिफ्ट को किन-किन रास्तों से होते हुये अधिकारी के घर पहुँचाया गया, उसका भी वीडियो फुटेज उपलब्ध करा दिया जाएगा।

एक मीडियाकर्मी द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना पर आधारित.

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में यूपी के मीडियाकर्मी यहां करें शिकायत

यूपी सरकार की मजीठिया निगरानी समिति की बैठक 8 अगस्त को होने जा रही है। मजीठिया मांगने पर यदि आपके खिलाफ अन्याय हो हुआ है या हो रहा है तो आप अपनी संक्षिप्त रिपोर्ट (नाम, पता, मोबाइल नंबर, अखबार का नाम औऱ 5 लाइन में घटनाक्रम) इन मेल आईडीज पर भेज दें…

ankitbishnoi1@rocketmail.com

lokeshlko@gmail.com

muditmathur@hotmail.com

ये सभी समिति के सदस्य हैं जो आपकी बात को यूपी सरकार के श्रम मंत्री व प्रमुख सचिव श्रम के सामने रखेंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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मजीठिया के लिए कानूनी सहायता कैंप : दर्जनों मीडियाकर्मियों ने क्लेम के लिए बढ़ाया कदम

वाराणसी। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू कराने की लड़ाई की अगुवाई कर रहे समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को पराड़कर स्मृति मवन में “कानूनी सहायता शिविर लगाया गया। शिविर में काफी संख्या में पत्रकारों, समाचार पत्र कर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को कैसे हासिल किया जाय, इसकी कानूनी जानकारी ली। समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी ने कैम्प में आये पत्रकारों समाचार पत्र कर्मचारियो कों मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियो के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए उसे कानूनी रूप से कैसे लिया जा सकता है उससे अवगत कराया। 

पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार शाम ४ से ६ बजे तक पराडकर स्मृति भवन में चले इस कैम्प में दर्जनो समाचार पत्र कर्मचारियों ने समाचार पत्र कर्मचारी यूनीयन के मंत्री अजय मुखर्जी को मुकदमें के लिए अपने जरूरी कागजात सौंपा साथ ही आवश्यक औपचारिकताए पूरी की। इनमे कई ऐसे लोग भी रहें जो सम्बन्धित कागजात के साथ नहीं आये थे उन्होंने जल्द ही औपचारिकताए पूरी करने के लिए कहा। मालूम हो कि समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ ने  मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियो को लागू कराने के लिए इन दिनों बिगुल बजा रखा है। इस सम्बन्ध में शनिवार को पत्रकारों के प्रतिनिधि मण्डल ने जिलाधिकारी से मुलाकात की थी। उन्हें अपनी मांगों से सम्बन्धित ज्ञापन सौंपा था।

मजीठिया मामले में शासन तक पहुंची काशी से उठी फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग

काशी में  मजीठिया की लडाई की अगुवाई कर रहे समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ की कोशिशें अब रंग लाने लगी है। पत्रकारों व गैर पत्रकारों के मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए काशी से उठी फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग संबंधी ज्ञापन पर कार्रवाई की ओर कदम बढे हैं। समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन और काशी पत्रकार संघ का संयुक्त आवेदन पत्र पोर्टल पर दर्ज हो गया है, जिसका पंजीकरण क्रमांक 12197170191907 है| इसकी नवीनतम स्थिति जनसुनवाई पोर्टल / ऐप के माध्यम से देखा जा सकता है| संबंधित पत्र अपर मुख्य सचिव / प्रमुख सचिव / सचिव सूचना, को अग्रेतर कार्यवाही हेतु प्रेषित कर दिया गया है| शनिवार को ही बनारस के डीएम के जरिए सीएम को ज्ञापन भेजा गया। डीएम से डीएलसी स्तर के मामलों की नियमित सुनवाई कराने की मांग रखी गई। इसपर डीएम योगेश्वर राम मिश्र ने वार्ता के दौरान मौजूद डीएलसी के प्रतिनिधि से साफ तौर पर कहा कि पत्रकारों से संबंधित मुकदमों की सूची तैयार कर उनमें हो रही कार्यवाही का पूरा विवरण उपलब्ध करायें। उन्होंने कहा कि इसकी हर हफ्ते वे समीक्षा करेंगें। इस क्रम में डीएम ने कहा कि आठ अगस्त को वे खुद डीएलसी कार्यालय में एक घंटे बैठकर मुकदमों के प्रगति की समीक्षा करेंगे। डीएम ने यह भी निर्देश दिया कि मुकदमों में तीन दिन से ज्यादा की डेट न दी जाए। तीन से चार डेट में मुकदमों का निस्तारण हर हाल में सुनिश्चित किया जाए।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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बनारस में मजीठिया मामले में मीडियाकर्मियों के मुकदमों की फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह होगी सुनवाई

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर को लेकर पत्रकारों व गैर पत्रकारों की लड़ाईं लड़ रहे समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ की पहल पर अब डीएलसी स्तर तक के सभी तरह के मुकदमों की सुनवाई निर्धारित समय के भीतर पूरी होगी। इस आशय का आदेश जिलाधिकारी योगेश्वर राम मिश्र ने शनिवार को समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ के संयुक्त प्रतिनिधिमण्डल की बातों को सुनने के बाद दी।

प्रतिनिधि मण्डल में शामिल पत्रकारों ने डीएलसी स्तर पर मुकदमों की सुनवाई में अत्यधिक विलम्ब पर नाराजगी जतायी। डीएम ने वार्ता के दौरान मौजूद डीएलसी के प्रतिनिधि से साफ तौर पर कहा कि पत्रकारों से सम्वन्धित मुकदमों की सूची तैयार कर उनमें हो रही कार्यवाही का पूरा विवरण उन्हें उपलब्ध करायें। उन्होंने कहा कि इसकी हर हफ्ते वे समीक्षा करेंगे। इस क्रम में डीएम ने कहा कि आठ अगस्त को वे खुद डीएलसी कार्यालय में एक घंटे बैठकर मुकदमों के प्रगति की समीक्षा करेंगेI

डीएम ने यह भी निर्देश दिया कि मुकदमों में तीन दिन से ज्यादा की डेट न दी जाए। तीन से चार डेट में मुकदमों का निस्तारण हर हाल में सुनिश्चित किया जाय। प्रतिनिधिमण्डल ने श्रम न्यायालयों में सम्बन्धित मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए “फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रदेश सरकार से मांग से सम्बन्धित ज्ञापन डीएम के माध्यम से सीएम योगी आदित्यनाथ को भेजा’। इस सम्बन्ध मे पत्रकारों का प्रतिनिधिमण्डल मुख्यमंत्री से मिलने के लिए लखनऊ जाने वाला है।

प्रतिनिधिमण्डल में समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी, काशी पत्रकार संघ अध्यक्ष सुमाष सिंह, महामंत्री अत्रि भारद्वाज, पूर्व अध्यक्ष विकास पाठक, पूर्व महामंत्री राजेन्द्र रंगप्पा के अलावा एके लारी,  रमेश राय, मनोज श्रीवास्तव, लक्ष्मी कांत द्विवेदी, जगाधारी, सुधीर गरोडकर, संजय सेठ आदि शामिल थे।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट

9322411335

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अखबार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करना ही होगा : कामगार आयुक्त

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश महाराष्ट्र में लागू कराने के लिये बनायी गयी त्रिपक्षीय समिति की बैठक में महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त यशवंत केरुरे ने अखबार मालिकों के प्रतिनिधियों को स्पष्ट तौर पर कह दिया कि 19 जून 2017 को माननीय सुप्रीमकोर्ट के आये फैसले के बाद अखबार मालिकों को बचने का कोई रास्ता नहीं बचा है। अखबार मालिकों को हर हाल में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करनी ही पड़ेगी। श्री केरुरे ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट ने जो आदेश जारी किया है उसको लागू कराना हमारी जिम्मेदारी है और अखबार मालिकों को इसको लागू करना ही पड़ेगा। इस बैठक की अध्यक्षता करते हुये कामगार आयुक्त ने कहा कि अवमानना क्रमांक ४११/२०१४ की सुनवाई के बाद माननीय सुप्रीमकोर्ट ने 19 जून 2017 को आदेश जारी किया है जिसमें चार मुख्य मुद्दे सामने आये हैं। इसमें वर्किंग जर्नलिस्ट की उपधारा २०(जे), ठेका कर्मचारी, वेरियेबल पे, हैवी कैश लॉश की संकल्पना मुख्य थी।

कामगार आयुक्त ने कहा कि अखबार मालिक २० (जे) की आड़ में बचते रहे हैं जबकि १९ जून २०१७ के आदेश में सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सभी श्रमिक पत्रकार और पत्रकारेत्तर कर्मचारी आयोग की तरह वेतन पाने के पात्र हैं। सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस आयोग का अधिक लाभ यदि एकाद कर्मचारी को मिल रहा हो तो भी अधिक से अधिक कर्मचारी इसके लाभ के पात्र हैं। ठेका कर्मचारी के मुद्दे पर उन्होने कहा कि सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उक्त अधिनियम की धारा २(सी), २ (एफ) और २(डीडी ) में दिये गये वर्किंग जर्नलिस्ट एंड नान जर्नलिस्ट न्यूज पेपर इम्पलाईज की व्याख्या के अनुसार तथा मजीठिया वेतन आयोग की शिफारिश के अनुसार स्थायी और ठेका कामगार में फर्क नहीं है।  सुप्रीमकोर्ट का मानना है कि सभी ठेका कर्मचारी  को मजीठिया वेतन आयोग की शिफारिश के अनुसार वेतन देने की सीमा में शामिल नहीं किया गया है।  वेरियेबल पेय के मुद्दे पर उन्होने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट ने इस मुद्दे पर स्पष्ट किया है कि केन्द्र शासन ने केन्द्र शासन के कर्मचारियोें के लिये ६ वें वेतन आयोेग की तर्ज पर मजीठिया वेतन आयोग ने देश के श्रमिक पत्रकार और पत्रकारेत्तर कर्मचारियों के लिये वेरियेबल पे की संकल्पना की है। भारी वित्तीय घाटे के मुद्दे पर श्री केरुरे ने माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा लिये गये निर्णय को त्रिपक्षीय समिति को बताया।

इस दौरान नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (एनयूजे) महाराष्ट्र की महासचिव शीतल करंदेकर ने अध्यक्ष यशवंत केरुरे का ध्यान दिलाया कि अखबार मालिक फर्जी एफीडेविट दे रहे हैं। साथ ही लोकमत और सकाल अखबारों में अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वालों की छंटनी कर रहे हैं। इस पर यशवंत केरुरे ने तीखी नाराजगी जतायी और कहा कि अखबार मालिक ऐसा नहीं कर सकते। मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन हर मीडियाकर्मी का अधिकार है और ये अधिकार उन्हें सुप्रीमकोर्ट ने दिया है। उन्होंने कहा कि कई अखबार मालिकों की ऐसी शिकायतें आ रही हैं कि वे मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन मांगने वाले कर्मचारियों को शोषण कर रहे हैं। इसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। इस बैठक में कामगार आयुक्त ने कहा कि किसी भी मीडियाकर्मी को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन मागने पर अगर तबादला या परेशान किया गया तो वे इस मामले को निजी तौर पर भी गंभीरता से लेंगे।

शीतल करंदेकर ने इस दौरान एक अन्य मुद भी उठाया जिसमें अखबार मालिकों द्वारा जानबूझ कर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू ना करना शामिल है। कामगार आयुक्त ने इस दौरान मालिकों के प्रतिनिधियों की बातों को भी समझा और आदेश दिया कि वे प्रेस रीलिज जारी करने जारहे हैं ताकि हर अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करें। इस बैठक में बृहन्मुंबई जर्नलिस्ट यूनियन (बीयूजे) के एम जे पांडे, इंदर जैन आदि के अलावा वरिष्ठ लेबर अधिकारी श्री बुआ और सहायक कामगार आयुक्त शिरिन लोखंडे आदि भी मौजूद थीं। कामगार आयुक्त ने इस दौरान यह भी कहा कि अखबार मालिक अपनी अलग अलग यूनिट दिखा रहे हैं और बचने का रास्ता खोज रहे हैं तथा २ डी एक्ट का उलंघन कर रहे हैं। यह नहीं चलेगा। सुप्रीमकोर्ट ने इसपर भी व्याख्या कर दी है।   बीयूजे के एम जे पांडे ने कहा कि आज अखबार मालिक क्लासिफिकेशन के नाम पर बचते आरहे हैं और उनकी आयकर विभाग से  बैलेंससीट मंगाने की जरुरत है इस पर उन्होने कहा कि हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इंदर जैन ने भी मीडियाकर्मियों का पक्ष रखा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार, आरटीआई एक्सपर्ट और मजीठिया सेल समन्वयक (एनयूजे महाराष्ट्र)
९३२२४११३३५

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हिमाचल प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्‍टस यूनियन गठित, मजीठिया को लेकर निर्णायक जंग की तैयारी

मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को लागू करवाने और प्रबंधन के उत्‍पीड़न के खिलाफ पिछले दिन वर्षों से लड़ाई लड़ रहे वरिष्‍ठ पत्रकार रविंद्र अग्रवाल के प्रयासों से हिमाचल प्रदेश में पहली बार पत्रकार एवं गैर-पत्रकार अखबार कर्मियों की यूनियन का गठन कर लिया गया है। हिमाचल के कई पत्रकार और गैरपत्रकार साथी इस यूनियन के सदस्‍य बन चुके हैं और अभी भी सदस्‍यता अभियान जारी है। एक जून को इस हिमाचल प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्‍टस यूनियन(एचपीडब्‍ल्‍यूजेयू) के नाम से गठित इस कर्मचारी यूनियन में पत्रकार और गैरपत्रकार दोनों ही श्रेणियों के अखबार कर्मियों को शामिल किया जाएगा। नियमित और संविदा/अनुबंध कर्मी भी यूनियन के सदस्‍य बन सकते हैं, वशर्ते इनका पेशा सिर्फ अखबार के कार्य से ही जुड़ा होना चाहिए।

इस यूनियन का प्रदेश अध्‍यक्ष सर्वसम्‍मति से रविंद्र अग्रवाल को बनाया गया है। महासचिव की जिम्‍मेवारी कपिल देव को दी गई है। अन्‍य पदाधिकारियों में मुरारी शर्मा को वरिष्‍ठ उपाध्‍यक्ष, उदयवीर पठानिया व वासूदेव नंदन को उपाध्‍यक्ष, टीना ठाकुर व नवनीत बत्‍ता को सचिव और रामकेवल सिंह को कोषाध्‍यक्ष चुना गया है। इस यूनियन की संबद्धता इंडियन फैडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्‍ट़स(आईएफडब्‍ल्‍यूजे), नई दिल्‍ली से ली गई है। एचपीडब्‍ल्‍यूजे के अध्‍यक्ष रविंद्र अग्रवाल व सचिव कपिल देवी ने एक संयुक्‍त बयान में बताया कि इस यू‍नियन के गठन का मकसद हिमाचल प्रदेश के श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार अखबार कर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान व एरियर दिलवाने के साथ ही इनकी समस्‍याओं को सरकारी व कानूनी स्‍तर पर सुलझाना रहेगा। इन्‍होंने कहा कि मजीठिया वेजबोर्ड को लागू करवाने के लिए प्रदेश सरकार और श्रम विभाग अब तक ढुलमुल नीति अपनाए हुए हैं।

यूनियन जल्‍द ही इस संबंध में मुख्‍यमंत्री वीरभद्र सिंह, श्रम मंत्री मुकेश अग्निहत्री और श्रम विभाग के आयुक्‍त हिमांशु शेखर चौधरी को ज्ञापन भेज कर अखबार कर्मियों की चिंताओं से अवगत करवाएगी। साथ ही मजीठिया वेजबोर्ड की मांग करने वाले पत्रकारों के तबादलों और जबरन इस्‍तीफे लिए जाने की अखबार प्रबंधनों की कार्रवाई की भी यूनियन कड़े शब्‍दों में नींदा करती है। एचपीडब्‍ल्‍यूजे के अध्‍यक्ष रविंद्र अग्रवाल ने कहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और रूख से एक बात तो स्‍पष्‍ट हो चुकी है कि अखबार प्रबंधन अपने कर्मचयारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान और एरियर देने से नहीं बच सकते। भेले ही अब वे दबमनकारी नीतियों के चलते अखबार कर्मियों की आवाज को दबाए हुए हैं, मगर जल्‍द ही हिमाचल प्रदेश के समस्‍त कर्मी एचपीडब्‍ल्‍यूजेयू के बैनर तले एकत्रित होकर निर्णायक लड़ाई शुरू कर देंगे। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया कि यह लड़ाई किसी समाचार स्‍थापना में प्रबंधन विरोधी गतिविधियों से जुड़ी कतई नहीं होगी, बल्कि कानूनी तौर पर अखबार कर्मियों के संवैधानिक हकों हो प्राप्‍त करने के तौर पर होगी। इस संबंध में जल्‍द ही यूनियन की वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई जाएगी।

उन्‍होंने कहा कि अखबार कर्मियों के हितों के लिए यूनियन कानूनी जंग लड़ने को तैयार है। इससे पहले प्रदेश सरकार और श्रम विभाग को वर्किंग जर्नलिस्‍टस एक्‍ट,1955 के प्रावधानों सहित मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को लागू करवाने के लिए अनुरोध किया जाएगा, अगर अब भी प्रदेश सरकार और श्रम विभाग अखबार प्रबंधन के दबाव में आकर कार्रवाई से परहेज करते हैं तो इनके खिलाफ माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायल के आदेश लागू न करवाने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। रविंद्र अग्रवाल ने कहा कि प्रदेश के श्रमजीवी पत्रकार एवं गैर पत्रकार अखबार कर्मी मोबाइल नंबर 9418394382(wattsapp) या मेल आईडी hpwjunion@gmail.com पर अपनी समस्‍या या सुझाव भेज सकते हैं। रविंद्र अग्रवाल ने एचपीडब्‍ल्‍यूजेयू को संबद्धता देने के लिए आईएफडब्‍ल्‍यूजे के महासचिव एवं परमानंद पांडेय का आभार भी व्यक्‍त किया है।

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क्या नोएडा के डीएलसी रहे बीके राय दैनिक जागरण के आदेशपाल की तरह काम करते थे?

माननीय सुप्रीम कोर्ट से मजीठिया को लेकर जो फैसला आया, उसको मालिकानों ने अपने काम कर रहे वर्कर के बीच गलत तरह से पेश किया। उदाहरण के तौर पर दैनिक जागरण को लेते हैं। सभी जानते हैं कि दैनिक जागरण का रसूख केंद्रीय सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक में है। इनके प्यादे अक्सर इस बात की धौंस मजीठिया का केस करने वाले वर्करों को देते रहते हैं कि रविशंकर प्रसाद, जेटली जी और पी एम मोदी जागरण की बात सुनते हैं। देश में ऐसा कौन है जो जागरण की बात नहीं मानेगा? इन नेताओं की आय दिन तस्वीरें जागरण के मालिकानों के साथ अख़बारों में छपती रहती हैं। देखें तो, प्यादों की बात सही भी है, क्योंकि यह सब जागरण के वर्करों ने देखा भी है। तभी तो जागरण के मालिकान और मैनेजमेंट बेख़ौफ़ होकर किसी भी दफ्तर में गलत तर्क या गलत शपथ पत्र देते नहीं हिचकते हैं।

पर सच यह भी है कि ऐसा करके मालिकान या इनके प्यादे सिर्फ वर्कर को परेशान करते हैं और इस काम में उनके सहयोगी बनते हैं सरकारी अफसर। नोएडा जागरण की बात करें, तो यहाँ के वर्कर की मजीठिया मामले को लेकर हुए टर्मिनेशन और उसको लेकर हुई कुछ सुनवाइयों के दृश्य यहाँ उल्लेखनीय हैं। एक बार नोएडा के डी एल सी कार्यालय में तारीख के मुताबिक सवा दो सौ टर्मिनेट वर्कर की भीड़ आयी थी। कुछ लोग अंदर यानी डी एल सी के कमरे में थे बाकि सब बाहर खड़े थे। इन सुनवाइयों के दौरान अजीब दृश्य तब उत्पन्न होता था, जब डी एल सी महोदय यानी श्री बी के राय वर्कर को देखने के बाद मुस्कुराते हुए कहते, आज तारीख है क्या? वर्कर जब कहते कि जी सर, आज तारीख है। आपने 3 बजे बुलाया था। तब वे कहते, अच्छा ठीक है। फिर श्री राय अपने मोबाइल से फोन करते जागरण के कुछ अधिकारियों को। एक ने नहीं सुनी तो दूसरे को, दूसरे ने नहीं सुनी तो तीसरे को, तीसरे ने नहीं सुनी तो…..। कुल मिलाकर वर्करों को यह पता चल जाता था कि श्री राय के मोबाइल में जागरण नोएडा के सभी प्यादे के मोबाइल नंबर फीड हैं। यहाँ तक कि बिचौलिये का भी।

अजीब तो तब लगता, जब किसी एक प्यादे का नंबर लग जाता, तो श्री बी के राय दुआ सलाम करने के बाद यह पूछते कि आपके वर्कर आये हुए हैं, आप क्या कहते हैं? फिर उधर से जो जवाब मिलता था, उनके चेहरे के भाव से पता चल जाता था जैसे श्री राय यूपी के एक डीएलसी नहीं, जागरण के आदेशपाल हों। फिर ये गिड़गिड़ाते कि आ जाइये न, आ जाते तो अच्छा होता। उनके इस आग्रह और विनय पर कभी एक घंटे तो कभी दो घंटे बाद जागरण का कोई प्यादा, चाहे वह छोटा हो या बड़ा या फिर कोई बिचौलिया, जो जागरण और डी एल सी के बीच तमाम दूसरे केसों में भी शामिल होता है, आता और वह आएं, बाएं, साएं बोलकर आगे की तारीख लेता और चला जाता। इन वार्ताओं के दौरान डी एल सी साहब का रवैया एक समर्थ सरकारी अफसर जैसा न होकर ऐसा होता था, जैसे वह खरीदार और बेचने वाले के बीच का इंसान हो।

माना जा सकता है कि कमोवेश यही स्थिति हर राज्य के डी एल सी की होगी। अख़बार के मैनेजर और प्यादे इन्हें जूते की नोंक पर रखते होंगे और ये अफसर अपनी औकात भूलकर या तो कमाने या फिर डर के मारे या नौकरी बचाने के लिए ऐसा करने को मजबूर होते होंगे कि कहीं मालिकान आलाकमान से शिकायत न कर दें और डी एल सी साहब का तबादला, मऊ, बलिया, जौनपुर, अमरोहा या बाराबंकी न हो जाये, जहाँ न तो नोएडा जैसा काम है और न नोएडा जैसी कमाई।

सूत्र यह भी बताते हैं कि नोएडा में या तो मंत्री जी के खास लोगों की पोस्टिंग होती है या फिर उनकी, जो…. । बावजूद इसके आज की बात करें, तो हालिया आये माननीय सुप्रीम कोर्ट के आर्डर ने मालिकानों का चैन छीन लिया है। अब उसके दिल से डर नहीं जा रहा है। कोई जाने या न जाने, पर मालिकान जानता है कि अवमानना का जिन्न कभी भी उसकी गिरेबान पकड़ सकता है और वर्करों द्वारा इसकी तैयारी भी चल रही है। आये आदेश के मुताबिक इस बार मालिक वर्करों का पैसा देने में अगर चूके, तो अख़बार मालिकानों को जेल जाने से कोई नहीं बचा सकेगा।

दूसरी ओर डी एल सी, जो मालिकानों द्वारा वर्करों के केस में डराये, धमकाये, या सताए गए या जाते रहे हों, माननीय सुप्रीम कोर्ट का आर्डर उनके लिए ढाल बनकर आया है। वे अब उसका सहारा ले सकते हैं और मालिकानों से कह सकते हैं कि अगर मैंने गलत किया तो मेरी नौकरी चली जायेगी। …और यह सच भी है, क्योंकि अब किसी गलती पर वर्कर उन्हें नहीं छोड़ेंगे और आगे की अदालत में जायेंगे। जाहिर है, फिर उनकी भी शामत आएगी, जो गड़बड़ करेंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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सेवानिवृत्त मीडियाकर्मी भी अपना हक लेने के लिए मीडिया मालिकों के खिलाफ मैदान में कूदे

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर अवमानना के केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उसके बाद अख़बार कार्यालयों से अपनी सेवा से निवृत हो चुके वर्कर भी अब इस लड़ाई में कूद पड़े हैं। जाहिर है, मालिकान ने अभी तक जो पैसा दिया है, वह मजीठिया के अनुसार नहीं दिया है। पिछले दिनों पटना के कुछ रिटायर वर्करों ने अखबार मालिकानों पर अपना दावा लिखित रूप से ठोंका। सूत्र बताते हैं कि इनकी संख्या बारह के करीब है। इस कड़ी में आगे कुछ और लोगों के जुड़ने की उम्मीद है और आशा की जानी चाहिए कि यह आग धीरे धीरे पूरे देश में लगेगी।

मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ 2008 की जनवरी से मिलना तय हुआ है। तत्कालीन जारी गैजेट में इसका उल्लेख भी है कि वर्कर के बेसिक वेतन का 30 प्रतिशत 2008 से 10 नवम्बर 2011 तक देना है। फिर 11 नवम्बर 2011 से लेकर आज तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन मिलना है। इनसे अलग एक बात और जो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अख़बार मालिकानों से दोबारा कही है, वह यह है कि अख़बार मालिकानों को अपने यहाँ हर हाल में 7 फरवरी 2014 से वर्करों को देने वाली सैलरी को मजीठिया के हिसाब से लागू करना ही है।

जिस अख़बार ने इसे लागू नहीं किया और जुलाई में मिली वेतन पर्ची के साथ उसका कोई वर्कर यदि कोर्ट में चला गया तो वह माननीय सुप्रीम कोर्ट की अवमानना में जेल जायेगा। बस वर्कर को यह साबित करना होगा कि अख़बार समूह किस ग्रेड में है और वह किस ग्रेड का वेतन अपने वर्कर को दे रहा है। ग्रेड साबित करने के लिए अख़बार का वार्षिक टर्नओवर देना होगा। अगर अख़बार या समूह का टर्नओवर 1000 करोड़ है, तो वह ए ग्रेड में  आएगा। 500 से 1000 के बीच का है, तो बी ग्रेड में आएगा। मेरा मानना है, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, पंजाब केसरी, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि ए ग्रेड में आएंगे।

जो भी अख़बार कर्मचारी रिटायर हुए हैं, वे इस उपरोक्त साल और मजीठिया के हिसाब से एक अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्हें और कितनी राशि मिलेगी। मेरा तो सीधा मानना है कि ज़िन्दगी भर में कोई अख़बार कर्मी अगर रिटायर होने के बाद 5 से 7 या 10 लाख रूपए जोड़ता है, तो इस समयावधि में आने वाले वर्कर और अच्छी रकम पाने के हकदार होते हैं। बस उन्हें कोर्ट में लड़ना होगा, क्योंकि कोर्ट का यह आदेश है कि जो केस में जायेगा, वही मजीठिया पायेगा। भले ही मालिकान या उनके प्यादे वर्कर को गलत तरह से समझाते हैं, पर वे जानते हैं कि उनकी जान दिनों दिन सांसत में फंसती ही जा रही है। रिटायर वर्कर का क्या जाना है, वे सब कुछ ले चुके हैं। उन्हें केस लगाकर जो भी मिलेगा, बोनस ही होगा वह भी ज़िन्दगी भर की कमाई से 2 या 3 गुना ज्यादा।

मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वर्कर को सैलरी हालिया माह में नहीं मिली, तो उसके मालिकानों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। माननीय सुप्रीम कोर्ट की बात अगर याद हो तो उन्होंने अख़बार मालिकानों को स्पष्ट तौर पर यह कह दिया है कि उन्हें वह एक मौका दे रहे हैं और मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उन्हें अपने यहाँ हर हाल में वेतन लागू कर देना है। इसके लिए कोर्ट ने तारीख भी फिर से स्पष्ट कर दी है यानि 7 फरवरी 2014 से यह मान्य होगी। वर्कर के वकील अब इस लाइन पर आगे बढ़ रहे हैं और तैयारियों में जुटे हैं कि आगे मालिकानों को कैसे गिरफ्त में लिया जाए!

अब यह भी तय है कि जिन वर्करों को कंपनी ने 7 फरवरी 2014 के बाद चाहे जिस बहाने से निकाला है, वे सीधे तौर पर अवमानना के केस में अपनी सैलरी स्लिप दिखाकर कोर्ट जा सकते हैं कि यह रही मेरी सैलरी स्लिप और मुझे इसका लाभ अब भी नहीं मिला है। यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि जिन लोगों ने अवमानना का केस माननीय सुप्रीम कोर्ट में किया था, उनमें बहुत से ऐसे थे, जिन्होंने 20जे के कंसेंट पर साइन नहीं किया था। इस आधार पर भी कोर्ट मालिकानों को अवमानना का दोषी करार दे सकता है। जरूरत है सही तरह से कोर्ट में अपनी बात रखने की और कोर्ट को समझाने की। यदि ऐसा हुआ, तो भी मालिकान जेल जा सकते हैं। कुल मिलाकर मजीठिया का जिन्न अख़बार मालिकानों को फ़िलहाल तो जकड़े ही रहेगा। वर्कर और उनके वकील गुरिल्ला युद्ध की तरह हमेशा तैयारी करते रहेंगे। इससे मुक्ति तभी मिलेगी, जब मालिकान अपने यहाँ सही तौर पर मजीठिया के अनुसार वेतन लागू कर देंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया : सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद श्रम अधिकारियों का रवैया बदला है

सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया को लेकर जो फैसला दिया है, उसके बाद हर जिले के डीएलसी आफिस यानी सहायक श्रम आयुक्त कार्यालय के हर कर्मचारियों का रवैया बदला है। इन कर्मचारियों का रुख इसलिए बदला है कि 19 जून 2017 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के आये फैसले में यह स्पष्ट लिखा है कि मजीठिया वेतन आयोग के मामले में सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के क्या दायित्व होंगे। यही वजह है कि मजीठिया का मामला 19 जून के बाद जहां भी शुरू हुआ है, मालिकान की तरफदारी करने वाले सभी सरकारी अधिकारी का रवैया बदला है।

पहले इनकी बातों से, इनके काम करने के तरीकों से, इनके हाव भाव से स्पष्ट होता था जैसे ये अख़बार मालिकानों की नौकरी करते हों। वर्कर की मदद के लिए बनाये गए ये अफसर सही में मालिकानों के लिए काम करने में जुटे होते थे, लेकिन मजीठिया मामले के आये आदेश के बाद इनका मिजाज और काम करने का अंदाज़ बदला है। हालांकि माना यह भी जाता है कि ये किसी न किसी तरह अब भी मालिकान के लिए काम करेंगे। इसलिए अब वर्करों को भी इनसे सतर्क रहना होगा। इन पर नज़र भी रखनी होगी, इनकी कार्य करने के तरीके को समझना होगा और वर्कर को आगे बढ़ने के लिए तैयार रहना होगा, मसलन हाई कोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इनकी शिकायत करने के लिए।

माननीय सुप्रीम कोर्ट से आये आदेश का डर सरकारी अफसर के मन में हुआ है। यही वजह है कि इन दिनों जहाँ भी मजीठिया का केस चल रहा है, अफसर इस काम को करने में देर नहीं लगा रहे हैं। पिछले दिनों राजस्थान पत्रिका का मामला वर्करों के लिए खुश करने वाला था। वहां जीतेन्द्र जाट के मामले में लेबर कोर्ट ने पत्रिका प्रबंधन से नौकरी पर रखने के लिए कहा। अभी कानपुर में दैनिक जागरण के वर्कर का मामला भी ऐसा ही सुना गया। कोर्ट ने जागरण की एक नहीं सुनी और लगातार सुनवाई करने की बात की। दो दिन सुनवाई हुई, जिसके बाद जागरण ने कोर्ट के आगे गिड़गिड़ाया कि सर एक तारीख आप अपनी मर्ज़ी से दे दें, तब कोर्ट ने एक सप्ताह की मोहलत दी। जागरण ने पिछले दिनों पंजाब के जालन्धर में भी सरकारी बाबू के आगे हाथ जोड़े और वर्कर के वकील से मिलकर और उन्हें लोभ देकर मामले को निपटाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।

कुल मिलाकर वर्कर के पक्ष में हवा चली है और इसका श्रेय जाता है माननीय सुप्रीम कोर्ट को, जिनके फैसले ने मालिकानों की हर चाल को जकड़ रखा है। मालिकान तन से हारे अभी भले ही नहीं दिख रहे हैं, पर वे जल्दी ही तन और मन दोनों से हारे नज़र आएंगे। वर्करों का धन उन्हें देना ही पड़ेगा। संभव है, अख़बार मालिकानों के खिलाफ मजीठिया के केस जहां भी चल रहे होंगे, कमोवेश सभी सरकारी अफसर की नीयत अब बदली सी होगी और ये मालिकान के प्यादे सरकारी दफ्तर से पालतू की तरह भगाए जा रहे होंगे। बाबजूद हमें उस कहावत को नहीं भूलना चाहिए कि कुत्ते की दुम को सालोंसाल चोंगे में यानी पाइप में डाल कर छोड़ दो, वह तब भी सीधी नहीं होगी। सरकारी अफसर थोड़े बदल भी जाएँ, मालिकान के ये प्यादे कभी भरोसे के लायक नहीं हो सकते।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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अपने अखबार मालिकों के धंधों का काला चिट्ठा निकालिये, मजीठिया लेने में काम आएंगे

एक-दो अख़बारों को छोड़ दें तो सभी अख़बार या अख़बार समूहों में वेतन को लेकर कोई न कोई लोचा जरूर है। सवाल वही है कि अगर किसी आयोग ने हमारी तनख्वाह 2000 रूपये तय की है और मालिकान हमें 1995 रुपये दे रहे हैं, तो 5 रुपये की गड़बड़ी तो मालिकान ने की ही है। फिर इस लिहाज से आयोग के आदेश का सही तरह से पालन कहां हुआ? सरकार द्वारा मंजूर इस देनदारी को अख़बार मालिकानों ने सही तरह से नहीं निभाया है।

मजीठिया का लाभ 2008 की जनवरी से मिलना तय हुआ है। गैजेट ऑफ़ इंडिया में भी इसका उल्लेख है कि मालिकानों को वर्कर के बेसिक वेतन का 30 प्रतिशत 2008 से 10 नवम्बर 2011 तक देना है। फिर 11 नवम्बर 2011 से लेकर आज तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन मिलना है। इनसे अलग यह बात माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मालिकानों से दोबारा कही है कि अख़बार मालिकान अपने कर्मचारियों को 7 फरवरी 2014 से जो सेलरी देंगे, वह मजीठिया के हिसाब से देंगे। इसे अभी तक किसी अख़बार ने लागू नहीं किया है और मिली सेलरी स्लिप को लेकर अगर कोई वर्कर कोर्ट में चला गया, तो मालिक अवमानना के केस में फंसेगा और वर्कर को पैसे देगा।

देखें तो टर्नओवर और एक्ट के हिसाब से दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, पंजाब केसरी, प्रभात खबर, अमर उजाला, नवभारत, हरिभूमि, अजीत समाचार, दबंग दुनिया, लोकमत आदि अख़बार ‘ए’ ग्रेड में आएंगे। इनमें बहुत से मालिकान ने अपने कुछ अन्य कामों को छिपाया हुआ है। आपको इनके अन्य कामों को उजागर करने में लग जाना है। इन उपरोक्त अख़बारों में से कुछ मालिकानों ने अपना टर्नओवर सरकार के सामने गलत पेश किया है। कुछ के कागजात निकाले गए हैं। आप सब भी अपनी कम्पनी और मालिकानों से जुड़े अन्य धंधे का काला चिट्ठा निकालिये। वे आगे सबूत के तौर पर काम आएंगे। फिर सरकार को हम बताएंगे कि फलां कम्पनी ने सेबी या अन्य जगह झूठे कागजात पेश किये हैं। फिर इनका हश्र क्या होगा, दुनिया देखेगी।

19 जून को जो आर्डर सुप्रीम कोर्ट से आया है, मजीठिया को लेकर, वह स्पष्ट है। इस आदेश के परिप्रेक्ष्य में अब न तो सरकारी कर्मचारी कोई हीलाहवाली करेंगे और न ही कोई और। मालिकान को झूठ बोलने और बरगलाने का अवसर अब न तो डीएलसी देगा और न लेबर कोर्ट। अब न अख़बार की धौंस चलेगी और न मनमानी। अब सब मान चुके हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट से बड़ा यहाँ कोई नहीं है। इसलिए अब वर्कर अपने पैसे मालिकानों से आसानी से ले सकेंगे। कुछ वक्त भले ही लग जाये, 6 या 8 महीना।

वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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अगर आप प्रिंट मीडिया से रिटायर हुए हैं या नौकरी से निकाले गए हैं तो पा सकते हैं लाखों रुपये, जानें कैसे

जो मीडियाकर्मी दुनिया में नही हैं उनके परिजन भी पा सकते हैं मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने के लिए वे मीडियाकर्मी भी सामने आ सकते हैं जो वर्ष 2008 से 18 जुलाई 2017 के बीच सेवानिवृत हुए हैं। यही नहीं, अगर कंपनी ने आपको इस अवधि के दौरान नौकरी से निकाल दिया है तो ऐसे लोग भी लाखों रुपये पा सकते हैं।

आपको बता दें कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट का स्पष्ट आदेश आ चुका है। इस आदेश को संज्ञान में लेकर अखबार मालिकों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उन प्रिंट मीडिया कर्मियों को देना ही पड़ेगा जो वर्ष 2008 से अब तक यानि जुलाई 2018 के बीच रिटायर हो चुके हैं। यही नहीं, अगर किसी मीडियाकर्मी का इस अवधि में निधन हो गया है और वे निधन से पूर्व इस अवधि में ड्यूटी पर थे तब भी उनके घर वाले मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार मृतक के आश्रित के रूप में या किसी अन्य को इस बाबत सुनवाई में उपस्थित रहने का अधिकार पत्र देकर लाखों रुपये का अपना बकाया ले सकते हैं।

ये बकाया चालीस लाख रुपये तक हो सकता है। सभी मीडियाकर्मियों से निवेदन है कि अगर आपका कोई परिचित मीडियाकर्मी इस समयावधि (2008 से 2017) के बीच रिटायर हुआ है, टर्मिनेट किया गया है या उसने त्यागपत्र दिया है तो ऐसे मीडियाकर्मी को ढूंढे तथा उनकी मदद करने के लिए आगे आएं। यही नहीं, अगर कोई प्रिंट मीडिया कर्मी चाहे वह किसी भी विभाग में काम करता हो, अगर उसकी मृत्यु हो चुकी है और वह 2008 से 2017 के बीच ड्यूटी पर था या इस दौरान रिटायर हुआ था तो उसके परिजनों को खोजकर उनसे मजीठिया वेज बोर्ड के तहत 17(1) का लेबर विभाग में क्लेम लगवाएं। अगर कहीं किसी को कोई दिक्कत आए तो आप मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह से 9322411335 पर संपर्क कर सकते हैं।

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नईदुनिया प्रबन्धन ने मजीठिया क्रांतिकारियों की सेलरी में मात्र सौ रुपये प्रतिमाह की वृद्धि की

जागरण प्रकाशन की इकाई नईदुनिया ने वार्षिक वेतन वृद्धि के दौरान मजीठिया का केस लगाने वाले अपने समस्त कर्मचारियों के वेतन में प्रतिमाह मात्र 100 रुपये की वृद्धि की है। कहा जा रहा है कि ऐसा कर नईदुनिया और जागरण के प्रबन्धन ने अपने कर्मचारियों को, जिन्होंने अपने जायज़ वेतन की मांग के चलते मजीठिया के लिए कोर्ट केस किया हुआ है, सजा के तौर पर यह मामूली वेतन वृद्धि की है।

सुनने में आया है कि यह प्रबन्धन द्वारा ही लिया गया फैसला था कि केस करने वाले समस्त कर्मचारियों को सौ रुपये से लेकर अधिकतम चार सौ रुपये की ही वेतन वृद्धि की जाए। ऐसा करके नईदुनिया प्रबन्धन ने मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसाओं का अनुपालन जानबूझकर नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट की फिर अवमानना की है। जिन कर्मचारियों ने मजीठिया के लिए केस नहीं लगाया है, उनको वेतन वृद्धि का भरपूर लाभ दिया गया है। सुनने में आया है कि उपरोक्त भेदभाव भरे वेतन वृद्धि के चलते पीड़ित कर्मचारियों द्वारा लेबर कोर्ट, लेबर कमिश्नर को जल्द शिकायती पत्र भेजे जाने की तैयारी है। उधर सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को भी इस मामले में एक शिकायती पत्र भेजा जा रहा है।

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कोर्ट ने दैनिक जागरण को लगाई फटकार, रोज होगी मजीठिया की सुनवाई

कानपुर से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मियों के लिए एक अच्छी खबर आ रही है. आज कानपुर लेबर कोर्ट ने दैनिक जागरण समूह की कंपनी जागरण प्रकाशन लिमिटेड को कड़ी फटकार लगाई. आज मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई थी. सुनवाई के दौरान जब जागरण प्रकाशन का नंबर आया तो जागरण प्रकाशन की तरफ से कोई मौजूद नहीं था. वकील ने कोर्ट से अगली तारीख देने की अप्लीकेशन लगा दी.

इस पर मीडियाकर्मियों और उनके वकील ने आपत्ति जताई. मीडियाकर्मियों के वकील ने कहा कि जागरण के लोग लगातार कोर्ट को गुमराह कर समय नष्ट कर रहे हैं. ये लोग लगातार हीलाहवाली कर रहे हैं ताकि कोर्ट का समय बर्बाद हो और क्लेम करने वाले थक हार कर घर बैठ जाएं. मजिस्टेट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद जागरण प्रकाशन के वकील को फटकार लगाई.

मजिस्ट्रेट ने जागरण के रवैये पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अगर इन लोगों को समय चाहिये तो हम बस एक दिन का समय देते हैं. कल यानी 12 जुलाई को आइए. अब मजीठिया की प्रतिदिन तारीख लगेगी और प्रतिदिन सुनवायी होगी. इतना सुनते ही मीडिया कर्मियों के चेहरे खुशी से खिल गये और जागरण का वकील मुंह लटकाए खड़ा रहा.

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मजीठिया : पत्रिका को पत्रकार जितेंद्र जाट का तमाचा, लेबर कोर्ट में जीते टर्मिनेशन का केस

कल 10 जुलाई यानि सावन के पहले सोमवार को एक शुभ समाचार आया। पत्रिका अखबार के मालिक गुलाब कोठारी और उनके ख़ास सिपहसालारों की हार की शुरुआत हो गई है। पत्रिका के मालिकों के खिलाफ जब कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के केस लगाये तो पत्रिका प्रबन्धन ने संबंधित कर्मचारियों को टर्मिनेट-ट्रान्सफर करना शुरू कर दिया। टर्मिनेशन-ट्रान्सफर के खिलाफ कर्मचारी लेबर कोर्ट गए।

उन टर्मिनेट कर्मचारियों में से मेरे एक पत्रकार साथी जितेंद्र जाट भी थे जिन्होंने ग्वालियर लेबर कोर्ट में टर्मिनेशन को चुनौती दी जिसका फैसला कल आ गया। इसमें जितेंद्र जाट की जीत और पत्रिका के मालिकों की करारी हार हुई। लेबर कोर्ट ने पत्रकार जितेंद्र जाट को बहाल करने के आदेश पत्रिका अखबार के प्रबंधन को दिए हैं। यह पत्रिका के हार की शुरुआत है।

पत्रकार विजय शर्मा की एफबी वॉल से.

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मजीठिया पर ताजे फैसले के बाद मीडियाकर्मियों के पक्ष में शुरू हुआ एक्शन, मालिकों और प्यादों के चेहरे सूखे

हाल में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया मामले को लेकर जो आदेश सुनाया, उसने अख़बार मालिकानों की जान हलक में अटका दी है। अब हर मालिकान अपने प्यादों को इस काम में लगा रखा है कि कहीं से भी राहत ढूंढ के लाओ। वैसे तो कमोवेश देश के सभी अखबार मालिकान इस बात को मान चुके हैं कि आये इस आदेश ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। मालिकों के पालतू, जो हर यूनिट में 4 या 5 होते हैं और पूरे ग्रुप में 1 या 2, ने कुछ साल पहले मालिकानों को जो आइडिया दिया था ठेके पर वर्कर रखने का, वह भी अब किसी काम का साबित नहीं हुआ।आये फैसले ने सभी को पैसा लेने का हकदार बना दिया और इन पालतुओं की सारी कवायद धरी रह गयी।

दैनिक जागरण की कुछ यूनिटों में काम करने वाले वर्कर अब संगठित हो रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि यहाँ भी अब आरसी यानी रिकवरी सर्टिफिकेट कटने वाली है। सूत्र कहते हैं, 3 दिन पहले की बात है। पंजाब के लुधियाना में दैनिक जागरण का एक प्यादा डीएलसी कार्यालय गया और वहां के बाबू से वर्कर की फाइल देने की बात की। जब वह नहीं माना, तो उसे साथ गए मैनेजर ने उससे होटल चलने की बात कही। वह तब भी नहीं माना, तो लालच भी दिया, लेकिन बाबू ने साफ कह दिया कि मुझे अपनी नौकरी प्यारी है। जब जागरण की दाल डीएलसी कार्यालय में नहीं गली, तो वह वर्कर के वकील के पास गया। प्यादा और मैनेजर ने वकील साहब से भी इस बारे में बात की और लोभ दिया, लेकिन मामला टाँय टाँय फिस्स साबित हुआ। जागरण के बेचारे दोनों प्यादे अपना सा मुंह लटकाए लौट आये। कहा जा रहा है कि यहाँ भी दैनिक भास्कर की तरह आरसी कटने वाली है इसीलिये मैनेजमेंट के हाथ पांव फूले हुए हैं और ऐसी स्थिति में प्यादों की नौकरी मालिक के जूते की नोंक पर ही होती है।

जागरण नोएडा की बात करें तो यहाँ कोई ऐसा प्यादा मालिक को नज़र नहीं आ रहा जो वर्करों से बात कर सके। उन्हें यह भी पता है कि नोएडा के लड़ाकू वर्करों से बात करने का मतलब है पूरे ग्रुप के वर्करों के लिए बात करना, इसीलिये जागरण प्रबंधन अलग-अलग यूनिटों में जाकर फ़िलहाल अपनी जुगत भिड़ा रहे हैं, ताकि जागरण पर देनदारी कम से कम आये। लेकिन वर्कर कहाँ मानने वाले हैं, वे तो कोर्ट के जरिये ही अपना हिसाब लेने के लिए दृढ हैं और अब इसमें इनके साथ जुड़ने वाले हैं काम करने वाले वर्कर भी। देखें तो ऐसा करना अंदर के वर्करों की मजबूरी भी है। अगर मैनेजमेंट ने नोएडा के रहने किसी वर्कर का तबादला रांची, इंदौर, जम्मू या सिलीगुड़ी कर दिया, तो ऐसी स्थिति में उन्हें केस वहीँ करना होगा और नोएडा के वर्कर के लिए यह संभव नहीं है कि वह बिना नौकरी के घर से दूर जाकर जागरण से लड़े। वर्कर के लिए यही बेहतर है कि वह जल्दी से एक अर्जी स्थानीय डी एल सी में मजीठिया मांगने का लगाये और साथ ही क्लेम लगाकर ठाठ से नौकरी करे। ऐसा करने से नौकरी भी सुरक्षित और पैसा भी निश्चित। फिर ट्रांसफर या किसी भी तरह की यातना मान्य नहीं होगी।

उल्लेखनीय है कि देनदारी से बचने के लिए लोकमत अखबार के प्रबंधन ने 186 परमानेंट वर्कर को निकाल दिया है ताकि आगे की देनदारी से बचा जाये। इनसे अलग लोकमत के मालिक ने मजीठिया के चक्कर में लगभग 2400 ठेका कर्मचारियों का 30 जून से कांट्रेक्ट रिन्यूअल नहीं किया है कि मजीठिया से कम वेतन देंगे तो अवमानना में अब जेल जाना होगा। माननीय सुप्रीमकोर्ट के 19 जून 2017 को आये नए आदेश के बाद सभी बड़े अख़बार समूह को तगड़ा झटका लगा है।सूत्रों के मुताबिक महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा लोकमत समूह में ठेका कर्मचारी हैं और सुप्रीमकोर्ट ने अपने 19 जून के आदेश में साफ कर दिया है कि ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मिलेगा।

सूत्र कहते हैं कि लोकमत समूह में लगभग 3000 कर्मचारी काम करते हैं जिनमे सिर्फ 20 प्रतिशत परमानेंट हैं, बाकी 80 परसेंट कांट्रेक्ट वाले।इन कर्मचारियों का कांट्रेक्ट 30 जून को खत्म हो गया, मगर कंपनी ने अभी तक किसी का कांट्रेक्ट रिनुअल नहीं किया है। खबर यह भी आ रही है कि लोकमत ने कई कर्मचारियों की सुप्रीम कोर्ट से आए नए आदेश के बाद छुट्टी भी कर दी है। वे कर्मचारी अब मजीठिया की जंग में कूदने की तैयारी कर रहे हैं ताकि उनको उनका अधिकार मिले। यह बात तय है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद सभी अखबार प्रबंधन की सांस गले में अटकी हुई है और सभी मजीठिया देनदारी से मुक्ति पाने के लिए फड़फड़ा रहे हैं।

फैसल का प्रभाव देश के डीएलसी कार्यालयों और निचली अदालतों में दिखना शुरू हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के आये आदेश के बाद महाराष्ट्र में जो आरसी कटी है, वह पुख्ता मानी जा रही है। अधिकारी ने आरसी काटने से पहले सारी कार्यवाही पूरी की है और मालिकान की बात भी इस तरह से रखी है, जिससे आरसी पर आगे रोक लगने की उम्मीद न के बराबर है। जबकि पहले ऐसा नहीं होता था। पहले वर्कर को ये अधिकारी किसी बहाने से टाल देते थे। ये हमेशा मालिकानों की सुनते थे और उन्हीं के लिए काम करते थे। लेकिन आये सख्त आर्डर के बाद इन्हें समझ में आ गया है कि अब वर्करों के साथ गड़बड़ी नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए भी हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ साफ कह दिया है कि सही काम किया जाये और वर्कर को काम न होने पर ऊपर शिकायत करने के लिए कहा है।

आरसी में स्पष्ट लिखा है कि देश के नंबर 1 अख़बार दैनिक भास्कर के समूह डी बी कॉर्प लि. के माहिम और बीकेसी यानी बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स कार्यालय को नीलाम कर इन यहाँ तीन कर्मचारियों को देना होगा पैसा। देखा जाये तो 19 जून के बाद देश में यह पहली आरसी यानी रिकवरी सर्टिफिकेट कटी है। दैनिक भास्कर के ये तीनों वर्कर हैं मुंबई ब्यूरो में कार्यरत प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट (एंटरटेनमेंट) धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज शेख। इस आरसी को मुंबई शहर की सहायक श्रम आयुक्त नीलांबरी भोसले ने 1 जुलाई, 2017 को जारी किया है।

तीनों वर्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अपने बकाए की मांग करते हुए स्थानीय श्रम विभाग में वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17 (1) के तहत क्लेम किया था। इस रिकवरी सर्टिफिकेट में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की राशि 18 लाख 70 हजार 68 रुपए, लतिका आत्माराम चव्हाण का 14 लाख 25 हजार 988 रुपए और आलिया शेख का 7 लाख 60 हजार 922 रुपए की आरसी जारी हुयी है। इसमें 30% अंतरिम राहत की राशि को जोड़ना शेष है साथ ही ब्याज भी।

बहरहाल, दैनिक भास्कर के वर्करों की कटी इस आरसी ने देश के सभी अखबार मालिकों का अहंकार जरूर तोड़ा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे भी एक के बाद एक सारे मालिकानों का हौसला टूटेगा। इक्के दुक्के को छोड़ दें तो अब देश के अधिकारी भी मालिकानों का साथ खुलकर नहीं देंगे। गलत करने पर अब उन्हें भी कोर्ट में खड़ा होना होगा, यह तय है। इस हिसाब से अब मालिकानों को मान लेना चाहिए कि सही में वर्करों का वक़्त आ गया है। उन्हें वर्करों की  पाई पाई देनी ही होगी।

मजीठिया क्रान्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण के फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बौखलाए अखबार मालिकों ने सैकड़ों लोगों को नौकरी से बाहर निकाला

लोकमत प्रबंधन ने अपने 186 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया… मजीठिया वेज बोर्ड का भूत डराता रहेगा अखबार मालिकों को…  पिछले दिनों मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई का जब फैसला आया, तब सारे अख़बार मालिकानों ने अपने दफ्तरों में यही खबर फैलाया कि जिन लोगों ने कोर्ट में अवमानना का केस डाला था, वे हार गए। हम यानी अखबार मालिकान जीत गए। फैसला 19 जून को आया था। अब कुछ समय बीत गया है और ज्यों ज्यों समय बीतता जा रहा है, मालिकानों की ख़ुशी गम में बदल रही है। उनके सामने अब बड़ी मुसीबत यह है कि कैसे लड़ाकू वर्करों के अगले कदम का मुकाबला किया जाये और कैसे अंदर बैठे यानी काम करने वाले वर्कर की देनदारी का रास्ता खत्म किया जाये।

यहाँ अहम बात यह है कि मालिकानों को सूझ नहीं रहा है कि वे क्या करें? उनके मन में यह बात बैठ गयी है कि बाहर के लड़ाके तो अपनी राशि ले ही लेंगे, लेकिन अंदर वालों को ठगा जा सकता है। उनकी सोच सही भी है कि अंदर वाले अब लड़ाई में नहीं जायेंगे, उनमें हिम्मत नहीं है। अगर हिम्मत होती तो वे भी सुप्रीम कोर्ट जाते और बाहर होते। यही वजह है कि समय से पहले, क्योंकि अगर 2 माह बाद अगर लड़ाके वर्कर फिर से कोर्ट में गए, जिसमें कुछ नए भी होंगे, तो उन्हें अंदर वालों को संभालना मुश्किल हो जायेगा, इसलिये अब मालिकों ने उनके साथ खेल करना शुरू कर दिया है।

यहां उल्लेखनीय है कि लोकमत प्रबंधन ने अपने 186 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया है। दैनिक लोकमत, औरंगाबाद, महाराष्ट्र के वर्करों ने खूब मेहनत से काम किया और अख़बार को अच्छे अख़बारों में शुमार कराया, लेकिन उन्हें मजीठिया का लाभ न देना पड़े, इसलिये पिछले दिनों मालिक ने काम करने वाले 186 कर्मचारियों को बाहर कर दिया। लोकमत प्रबंधन ने संपादकीय विभाग से 52 और अलग-अलग विभागों से कुल 134 लोगों को निकाला है।

दैनिक जागरण की बात करें, तो यहाँ भी अंदर काम करने वाले वर्करों को कभी किसी बहाने तो कभी टारगेट के नाम पर परेशान करने का दौर शुरू हो गया है। जाहिर है, मालिक के पास हर तरह के हथकंडे हैं। वे सभी को देर सबेर किसी न किसी खांचे में फिट कर ही देंगे। संपादकीय विभाग में भी एक नयी बात लायी गई है पी आई पी और जो इसके मुताबिक फिट नहीं होगा या काम नहीं करेगा, उसके साथ क्या किया जायेगा, पता नहीं। जागरण के बहुत से यूनिटों में ट्रांसफर का दौर जारी है और वहाँ नयी नयी परेशानी वर्करों के बीच रखी जा रही है, ताकि कुछ परेशान होकर कम्पनी छोड़ दे नहीं तो तबादला होना तो तय है ही। वर्करों का तबादला भी ऐसी जगह करेंगे कि वे परेशान हो जाएंगे और चूँकि उन्हें केस भी वहीँ करना होगा, तो वे लड़ नहीं पाएंगे।

वक़्त की नजाकत को भांपते हुए दैनिक भास्कर में भी कर्मचारियों को तोड़ने का सिलसिला जारी है। सूत्र बताते हैं कि वहां के कई कर्मचारी राजीनामा पर साइन भी कर चुके हैं। जानकार के मुताबिक लेबर कोर्ट में मामला वापस लेने की कवायद जारी है। हिंदुस्तान के वर्कर के साथ किस हद तक सलूक हुआ है यह सभी को पता है। वहां भी वर्कर को खरीदने की कोशिश हुई, लेकिन मालिक को सफलता हाथ नहीं लगी। वर्कर आज भी अपने स्टैंड पर कायम हैं।

अब सोचने वाली बात यह है कि मालिकानों के पक्ष में जब माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ ही गया है, जैसा वे अपने अंदर के वर्कर से कह रहे हैं, तो उन्हें यह सब करने की जरूरत क्या है? अब सब मालिकान किस बात से डर रहे हैं और क्यों डर रहे हैं? सच तो यह है कि मजीठिया का भूत अख़बार मालिकों को हमेशा डराता रहेगा और वर्करों की देनदारी दिनोदिन बढ़ती ही जायेगी। 

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया पर नए कोर्ट आर्डर के बाद लोकमत प्रबंधन ने 2400 मीडियाकर्मियों का कांट्रेक्ट रिनुअल लटकाया

मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद महाराष्ट्र में सबसे बड़ा झटका लोकमत अखबार को लगा है। सूत्रों के मुताबिक महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा लोकमत समूह में ठेका कर्मचारी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 19 जून 2017 के आदेश में साफ कर दिया है कि ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मिलेगा। अब लोकमत प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद सबसे ज्यादा सांसत में फंस गया है।

लोकमत श्रमिक संगठन के अध्यक्ष संजय पाटिल येवले ने इस खबर की पुष्टि करते हुए एक नई जानकारी दी है कि लोकमत समूह में लगभग 3000 कर्मचारी काम करते हैं जिनमे सिर्फ 20 प्रतिशत परमानेंट हैं, बाकी 80 परसेंट कांट्रेक्ट पर हैं। सुप्रीमकोर्ट के नए आदेश के बाद कंपनी ने अधिकांश कांट्रेक्ट कर्मचारियों का कांट्रेक्ट नवीनिकरण नहीं किया है। संजय पाटिल येवले के मुताबिक इन कांट्रेक्ट कर्मचारियों का कांट्रेक्ट 30 जून को खत्म हो गया मगर कंपनी एक सप्ताह बाद तक किसी का कांट्रेक्ट रिनुअल नही कर रही है बल्कि मजीठिया का लाभ देने से कैसे बचा जाए और नया कांट्रेक्ट किस तरीके का हो, इस पर कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रही है। उसके बाद ही नया कांट्रेक्ट किया जाएगा।

लोकमत समूह से उड़ती खबर ये भी आ रही है कि लोकमत ने कई कर्मचारियों को नए आदेश के बाद छुट्टी भी कर दिया है। अब इनमें से कई कर्मचारी मजीठिया की जंग में कूदने की तैयारी कर रहे हैं ताकि उनको उनका अधिकार मिले। आपको बता दें कि संजय पाटील येवले लोकमत श्रमिक संघटना के अध्यक्ष हैं और पिछले तीन साल से यह अखबार से बाहर हैं। यूनियन का मैटर लेबर, इंडस्ट्रीयल और हाइकोर्ट मे चल रहा है।

संजय पाटिल जब लोकमत में काम पर थे तो उन्होंने सिर्फ एक कर्मचारी को निकाले जाने पर दो दिन का असहयोग आंदोलन किया था। आपको बता दें कि लोकमत समूह मराठी दैनिक लोकमत, हिंदी दैनिक लोकमत समाचार और अंग्रेजी दैनिक लोकमत टाइम्स का प्रकाशन करता है। लोकमत समूह की यूनियन लोकमत श्रमिक संगठना ने ‘एक्चुअल वर्क एक्चुअल पे’ की मांग को लेकर प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा भी कर रखा है। फिलहाल सुप्रीमकोर्ट के नए आदेश के बाद प्रबंधन की सांस गले में अटक गई है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
9322411335

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भास्कर समूह की कंपनी डीबी कार्प के खिलाफ कट गई आरसी, मजीठिया क्रांतिकारियों का बकाया देने के लिए संपत्ति होगी नीलाम

BHASKAR

मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद महाराष्ट्र में कटी पहली आरसी… दैनिक भास्कर और दिव्य भास्कर समेत कई अखबारों को संचालित करने वाली भास्कर समूह की कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड के माहिम और बीकेसी कार्यालय को नीलाम कर कर्मचारियों को बकाया पैसा देने का आदेश…

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 19 जून को सुनाए गए फैसले के बाद देश भर के श्रम / कामगार विभाग सक्रिय हो गए हैं। महाराष्ट्र से इस संबंध में बड़ी खबर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश में पहला रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) महाराष्ट्र में जारी कर दिया गया। अपने आप को देश का नंबर वन अखबार बताने वाले दैनिक भास्कर की प्रबंधन कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड के खिलाफ महाराष्ट्र में पहला रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) यहां के लेबर विभाग ने जारी किया है।

इस रिकवरी सर्टिफिकेट में मुंबई के जिलाधिकारी को निर्देश दिया गया है कि डीबी कॉर्प लिमिटेड की संपत्ति को नीलाम कर वह बकायेदारों का बकाया दिलाएं। यह रिकवरी सर्टिफिकेट दैनिक भास्कर के मुंबई ब्यूरो में कार्यरत प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट (एंटरटेनमेंट) धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, इसी अखबार की रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज शेख के मामले में जारी किया गया है। इसे मुंबई शहर की सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले ने 1 जुलाई, 2017 को जारी किया है।

आपको बता दें कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह सहित लतिका चव्हाण और आलिया शेख ने दैनिक भास्कर की प्रबंधन कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड से जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अपने बकाए की मांग करते हुए स्थानीय श्रम विभाग में वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17 (1) के तहत क्लेम किया था। महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त कार्यालय की सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले ने इस मामले में लंबी सुनवाई की और दोनों पक्षों को गंभीरता से सुनने के बाद पाया कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण तथा आलिया शेख द्वारा मांगा गया बकाया सही है।

इसके बाद सुश्री भोसले ने पहले आर्डर (नोटिस) जारी किया कि डीबी कॉर्प इन कर्मचारियों का बकाया पैसा फौरन अदा करे। मगर 20-25 दिन गुजर जाने के बाद भी जब उक्त प्रबंधन के कानों पर जूं नहीं रेंगी तो उन्होंने जुलाई महीने की पहली तारीख को डीबी कॉर्प के विरुद्ध बकाए की वसूली के लिए रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कर दिया है।

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की बकाया राशि 18 लाख 70 हजार 68 रुपए, लतिका आत्माराम चव्हाण की 14 लाख 25 हजार 988 रुपए और आलिया शेख की 7 लाख 60 हजार 922 रुपए है। आरसी के मुताबिक इसमें 30% (अंतरिम राहत) की राशि को जोड़ना शेष है, किंतु संपूर्ण धनराशि पर 18% की दर से मांगी गई ब्याज की रकम का जिक्र नहीं है! वैसे इन तीनों रिकवरी सर्टिफिकेट से एक नया रिकॉर्ड तो बन ही गया है।

आरसी में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण तथा आलिया शेख का बकाया पैसा दिलाने के लिये डीबी कॉर्प की उन अचल संपत्तियों का विवरण भी दिया गया है जिसे जरूरत पड़ने पर नीलाम कर तीनों मांगकर्ताओं को पैसा दिया जाना है। इसमें मुंबई स्थित माहिम कार्यालय के अतिरिक्त डीबी कॉर्प का बीकेसी (बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स) स्थित नमन चैंबर्स वाला कार्यालय भी शामिल है।

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के अलावा लतिका चव्हाण और आलिया शेख ने यह क्लेम सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने अधिवक्ता और मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा के दिशा-निर्देश पर किया था। सो, माननीय सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आने के बाद कटी इस पहली आरसी से उन अखबार मालिकों का अहंकार जरूर टूटेगा, जो अब तक यही सोच रहे थे कि मीडियाकर्मी मुकदमा हार गये हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अखबार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें हर हाल में लागू करनी ही पड़ेंगी।

मुंबई से पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335 या shashikantsingh2@gmail.com

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मजीठिया पर ताजा फैसले के बाद मीडियाकर्मियों और लेबर कोर्ट की सक्रियता देख मालिकों की नींद हराम

यूपी के एक एडिशनल लेबर कमिश्नर ने जो बात कही, वह सच होता दिख रहा है। उनका कहना था कि मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर आये ताजा फैसले से मालिकानों की नींद हराम हो गई होगी। जाहिर सी बात है कि अब वे और उनके गुर्गे इस काम में लग गए हैं कि कैसे इन मजीठिया क्रांतिकारियों से पीछा छुड़ाया जाए। केस में आये पुराने वर्कर से तो वे परेशान हैं ही, अब नए लोगों यानि अंदर काम करने वाले वर्कर भी केस में आने की तैयारी कर चुके हैं। तय है कि जल्द ही नए केस लगने की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी।

मजीठिया को लेकर आए फैसले का दिन ज्यों ज्यों बीतता जा रहा है, मालिकान की चिंता बढ़ती जा रही है। उन्होंने अब अपने प्यादों को वर्कर से बातचीत करने के लिए भी कहा है। पिछले दिनों कुछ लोगों से बतचीत भी हुई, लेकिन अभी वे खुलकर सामने नहीं आये हैं। अभी वे वर्कर का रुख क्या है, यह जानना चाहते हैं। आगे की राह वे उसी हिसाब से तय करेंगे, ऐसा माना जा सकता है। दूसरी ओर वर्कर हैं कि वे अपनी राह छोड़ना नहीं चाहते। वे माननीय सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं और उनके दिए रास्ते पर चलकर अपना रास्ता तय करने को आतुर हैं। सब केस में जायेंगे और आखरी दम तक लड़ेंगे। उन सब की तैयारी हो गयी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब लेबर कोर्ट और डी एल सी के यहाँ वर्करों की भीड़ जुटेगी।

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आये हालिया फैसले के बाद एक बात और देखी जा रही है। अब डी एल सी और लेबर कोर्ट जल्दी जल्दी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानते हुए अपनी कार्रवाई करने में जुटे हैं और जो भी केस अख़बार के दफ्तर से आता है, उस पर ध्यान देते हैं। पहले यूपी में दैनिक जागरण को ज्यादा तवज्जो मिलती थी, लेकिन अब उनके फैसले पर एएलसी स्टे दे देते हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। इस बात का प्रमाण है हालिया जागरण की आगरा यूनिट से दो लोगों के हुए ट्रांसफर का स्टे होना।

दरअसल हुआ यह था कि दैनिक जागरण, आगरा के प्रबंधन ने दो पत्रकारों सुनयन शर्मा और रूपेश कुमार सिंह का मजीठिया केस में होने के कारण किसी बहाने से पिछले दिनों तबादला कर दिया था। सुनयन चीफ सब एडिटर हैं और रूपेश डिप्टी चीफ सब एडिटर। आगरा से एक का स्थानान्तरण जम्मू कर दिया गया और दूसरे का सिलीगुड़ी। ऐसा होने पर जब ये दोनों डी एल सी कार्यालय गए, तो अथारिटी ने इनके तबादलों पर रोक का आदेश जारी कर दिया। ऐसा होने से जागरण प्रबंधन तिलमिलाया हुआ है और वहां के मैनेजर को भगाने की तैयारी में है। उसे लग रहा है कि प्रशासन ने इस स्टे के जरिए उसके गाल पर तमाचा मारा है, जबकि आगरा के ए एल सी ने कानून का सही पालन किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब हर जिले में अख़बार कर्मियों के केस में ऐसा ही फैसला आएगा, जिससे मालिकानों का करार छिन जायेगा और वे एक दिन वर्कर के सामने घुटने टेकेंगे। पैसा और नौकरी दोनों देंगे, सो अलग।

सूत्र बताते हैं कि दैनिक जागरण अपने काम कर रहे वर्कर को मीठी गोली देने में जुटा है। मैनेजमेंट कहता है कि केस लड़ने वाले सुप्रीम कोर्ट में हार गए हैं। अब उनका कुछ नहीं होने वाला। अब उन्हें कौन बताये कि पढ़े लिखे लोग को माननीय सुप्रीम कोर्ट का आर्डर पढ़ना आता है, वे कंपनी की चाल समझ गए हैं और जो अभी तक नहीं समझे हैं, वे भी लोगों से पूछताछ करके जान लेंगे। मैनेजमेंट कर्मचारियों को खुश होकर जानकारी देने में तो जुटा है, लेकिन अंदर से उसका डर भी नहीं जा रहा है। वह यह भी बता देता है कि पैसा तो मिलेगा, पर कुछ वक्त लगेगा। इसके लिए वर्कर तैयार हैं। वह जानता है कि जितना पैसा मजीठिया का क्लेम लगाकर 3 या 4 साल में ले लेगा, उतना ज़िन्दगी भर काम करके वह नहीं जमा कर सकेगा। फिर ऐसी नौकरी से क्या फ़ायदा? फिलहाल सभी अख़बार समूह, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला, पंजाब केसरी आदि में इन दिनों वर्करों के बीच यही गणित चल रही है और मैनेजमेंट इन बातों को सुनकर परेशान हो रहा है। मालिकान का करार भी गायब है।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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(आखिरी पार्ट 5) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

26. अधिनियम के प्रावधानों में या वेजबोर्ड अवार्ड की शर्तों में ऐसा कुछ नहीं है, जो हमें अवार्ड के लाभ देने के लिए अनुबंध या ठेका कर्मचारियों को छोड़ कर, नियमित कर्मचारियों तक सीमित करेगा। इस संबंध में हमने अधिनियम की धारा  2(सी), 2(एफ) और 2(डीडी) में परिभाषित समाचारपत्र कर्मचारी, श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों की परिभाषा पर ध्यान दिया है। जहां तक वेरिएबल-पे का संबंध है, इस पर पहले ही उपरोक्त पैरा 7 में ध्यान दिया गया है और सारगर्भित किया गया है, जब यह न्यायालय वेरिएवल-पे की अवधारणा पर चर्चा की, तो विचार किया कि इस राहत का मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड में उचित और न्यायसंगत निरुपण किया गया है। इसलिए वेरिएबल-पे के संबंध में कोई अन्य विचार लेकर इस लाभ को दबाने/रोकने का कोई प्रश्र नहीं उठता है। वास्तव में अवार्ड के प्रासंगिक भाग का एक पठन यह दर्शाता है कि वेरिएबल-पे की अवधारणा, जो अवार्ड में लागू की गई थी, छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट में निहित ग्रेड-पे से ली गई है और इसका उद्देश्य अधिनियम के दायरे में आने वाले श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों को याथासंभव केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समतुल्य लाना है। जहां तक कि भारी नकदी हानि की बात है, हमारा मानना है कि बिलकुल वही भाव स्वयं इंगित करता है कि वह वित्तीय कठिनाइयों से अलग है और इस तरह की हानि प्रकृति में पंगु होने की सीमा से अलग, अवार्ड में निर्धारित समय की अवधि के अनुरुप होने चाहिए। यह तथ्यात्मक सवाल है जिसे केस टू केस या मामला दर मामला निर्धारित किया जाना चाहिए।

27. इस मामले में सभी संदेहों और अस्पष्टताओं को स्पष्ट करते हुए और यह मानते हुए कि किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान को, हमारे समक्ष मामलों के तथ्यों में, अवमानना करने का दोषी नहीं ठहरया जाना चाहिए, हम निर्देश देते हैं कि अब से मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को लागू न किए जाने या अन्यथा के संबंध में सभी शिकायतों को अधिनियम की धारा 17 के तहत मुहैया करवाए गए तंत्र के अनुसार निपटाया जाएगा। न्यायालयों के अवमानना क्षेत्राधिकार या अन्यथा के इस्तेमाल के लिए दोबारा न्यायालयों से संपर्क करने के बजाय अधिनियम के तहत मुहैया करवाई गई प्रवर्तन/इन्फोर्समेंट और उपचारकारी मशीनरी द्वारा ऐसी शिकायतों का समाधान किया जाना अधिक उचित होगा। 

28. जहां तक कि तबादलों/ बर्खास्तगी के मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने वाली रिट याचिकाओं के रूप में, जैसा कि मामला हो सकता है, से संबंध है, ऐसा लगता है कि ये संबंधित रिट याचिकाकर्ताओं की सेवा शर्तों से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के अत्याधिक विशेषाधिकार रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल इस तरह के सवाल के अधिनिर्णय के लिए करना न केवल अनुचित होगा परंतु ऐसे सवालों को अधिनियम के तहत या कानूनसंगत प्रावधानों(औद्योगिक विवाद अधिनियमए 1947 इत्यादि), जैसा कि मामला हो सकता है, के तहत उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष समाधान के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।

29. उपरोक्त राशनी में, सभी अवमानना याचिकाओं के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई रिट याचिकाओं का उत्तर मिल गया होगा और उपरोक्त संबंध में इनका निपटारा किया जाता है।

नई दिल्ली
19 जून, 2017

अनुवाद : रविंद्र अग्रवाल, धर्मशाला
संपर्क: 9816103265

इसके पहले वाले पार्ट पढ़ें…

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मजीठिया को लेकर ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ की उठी मांग

काशी पत्रकार संघ में हुई बैठक, पूर्वांचल सम्मेलन में तय होगी आंदोलन की रूप रेखा, सड़क से लेकर न्यायालय तक संघर्ष का निर्णय

वाराणसी : काशी पत्रकार संघ और समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन की संयुक्त बैठक रविवार 25 जून को पराड़कर स्मृति भवन में हुयी। इसमें मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हाल ही में हुए फैसले पर विस्तार से चर्चा हुयी। साथ ही यह निर्णय हुआ कि मजीठिया मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कराने के लिए पुरजोर आंदोलन किया जायेगा। इसके लिए शासन-प्रशासन के अधिकारियों से मिलकर उन्हें ज्ञापन सौंपा जायेगा। ताकि फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने से पत्रकारों को शीघ्र ही न्याय प्राप्त हो सके।

इसके साथ ही बैठक में मजीठिया को लेकर जल्द ही पूर्वाचंल स्तर का सम्मेलन कराने का निर्णय लिया गया। बैठक में यह भी तय हुआ कि मजीठिया वेतनमान लागू कराने के लिए सड़क से लेकर न्यायालय तक संघर्ष किया जायेगा। इसके लिए काशी पत्रकार संघ व समाचार पत्रकर्मचारी यूनियन की 11 सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन किया गया। इस समिति में काशी पत्रकार संघ के वर्तमान अध्यक्ष सुभाष चन्द्र सिंह, महामंत्री डा॰ अत्रि भारद्वाज के अलावा पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार, पूर्व अध्यक्ष संजय अस्थाना, पूर्व अध्यक्ष विकास पाठक, के अलावा सर्वश्री रमेश राय, जगधारी, असद कमाल लारी, मनोज श्रीवास्तव, के साथ ही कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष श्री योगेश कुमार गुप्त और मंत्री अजय मुखर्जी शामिल हैं। यह कमेटी जल्दी ही पूर्वांचल के जिलों का दौरा कर पत्रकारों को मजीठिया की लड़ाई के लिए लामबंद करेगी। साथ ही समाचार पत्र प्रबंधन व शासन-प्रशासन को भी इस बात के लिए मजबूर करेगी कि मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियां सभी समाचार पत्रों में लागू हो।

बैठक में समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी ने मजीठिया वेतनमान पर 19 जून, 2017 को आये निर्णय की विस्तार से जानकारी दी, साथ ही यह भी बताया कि अकेले बनारस में ही पत्रकारों-समाचार पत्र कर्मियों के 170 मुकदमें श्रम कार्यालय व श्रम न्यायालय में लम्बित है। बैठक में यह भी तय हुआ कि इलेक्ट्रानिक मीडिया व न्यूज पोर्टल के पत्रकारों व कर्मियों को उनके अधिकारों व न्यूनतम वेतममान दिलाने के लिए संघर्ष किया जाएगा। बैठक में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का स्वागत किया गया साथ ही पत्रकारों व समाचार पत्र कर्मियों से अपील की गयी कि मजीठिया वेज बोर्ड के तहत अपना अधिकार पाने को श्रम न्यायालय में यथाशीघ्र अपना वाद दाखिल करें। बैठक में सर्वश्री राजेन्द्र रंगप्पा, शैलेश चैरसिया, विनय सिंह, संजय सेठ, चंदन रूपानी, लक्ष्मीकांत द्विवेदी, बाबूलाल, अरविन्द मिश्रा, विनोद शर्मा सहित बड़ी संख्या में पत्रकार व गैर पत्रकार मौजूद थे।

अजय मुखर्जी
मंत्री
समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन

डा. अत्रि भारद्वाज
महामंत्री
काशी पत्रकार संघ

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एडवोकेट उमेश शर्मा ने मजीठिया के लिए नया क्लेम लगाने वालों के लिए नया फार्मेट जारी किया

अखबार और न्यूज एजेंसियों के मीडियाकर्मियों के वेतन भत्ते प्रमोशन से जुड़े मामले से संबंधित जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा ने माननीय सुप्रीमकोर्ट के १९ जून २०१७ को आये फैसले के बाद उन पत्रकारों तथा गैर-पत्रकारों के लिये एक नया फार्मेट जारी किया है जिन्होंने अभी तक कामगार आयुक्त कार्यालय में अपने बकाये राशि और वेतन वृद्धि के लिये क्लेम नहीं लगाया है।

इस नये फार्मेट को सिर्फ वही पत्रकार और गैर पत्रकार भरेंगे जिन्होने पहले कामगार आयुक्त कार्यालय या सहायक कामगार आयुक्त कार्यालय में क्लेम नहीं लगाया है। १७ (१) के इस फार्मेट में १९ जून २०१७ को आये सुप्रीमकोर्ट के फैसले को समाहित करते हुये कई नये प्वाईेंट जोड़े गये हैं। जिन पत्रकारों और गैर पत्रकारों ने एडवोकेट उमेश शर्मा का पुराना फार्मेट वाला आवेदन पत्र कामगार विभाग में जमा कराया है उनको ये नया आवेदन पत्र नहीं जमा करना है। ये सिर्फ नये क्लैमकर्ताओं के लिये उमेश शर्मा ने जारी किया है। आप को बता दें कि एडवोकेट उमेश शर्मा ने देश भर के पत्रकारों और गैर-पत्रकारों की लड़ाई माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ी है।

Sample draft of the Majithia Application

BEFORE THE LABOUR COMMISSIONER/DEPUTY LABOUR COMMISSIONER/ASSISTANT LABOUR COMMISSIONER,DISTRICT ( Name of the district and address of the office)
In the matter of:
NAME & ADDRESS OF THE CLAIMANT:
Name
Present Post
Date of Employment
Address
Category of the post as per Majithia Award
NAME & ADDRESS OF THE MANAGEMENT:
Category of management as per Majithia award
APPLICATION UNDER SECTION 17 (1) OF THE WORKING JOURNALISTS ACT FOR ISSUANCE OF RECOVERY CERTIFICATE AGAINST THE STATUTORY DUES OF THE CLAIMANT.

Respectfully submitted as under:

1. The management named above is a newspaper establishment, the employees of the establishment are entitled to the benefits of the Majithia Wage Board notification w.e.f. 11/11/11 as notified by the Central Government. The details of the category of the management under the said wage board award is given above and the details of the post of the claimant employee as covered under the said Award is also given above.
2. That Majithia Wage Board was constituted by the Central Government under Section 10 of the WJ Act and the report of the same was accepted by the Central Government and notified on 11/11/2011 under Section 12 of the said Act hence the said award has a statutory force and the claimant is entitled to the benefits as granted under the said award. The said Award has subsequently been upheld by the Supreme Court of India and specific directions for implementation of the same has been issued hence no dispute in this regard can be raised by the employer as the same would amount to contempt of court.
4. The management along with several other newspapers challenged the Majithia Notification before Supreme Court of India instead of implementing the same. The Honble Supreme Court of India finally dismissed the petitions filed against Majithia Notification and issued specific directions for the release of the benefits of Majithia Wage Board notification vide its orders dated 7/2/2014 within a period of one year w.e.f. 7/2/2014 along with arrears, the operative part of the directions of Supreme Court are reproduced here under for ready reference and compliance:

    71) Accordingly, we hold that the recommendations of the Boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India.
    72) Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs.
    73) In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions, the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the Government of India notified the recommendations of the Majithia Wage Boards. All the arrears up to March, 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April, 2014 onward.
    74) In view of the disposal of the writ petitions, the contempt petition is closed.

5.The management named above did not implement the aforesaid wage board notification and started extracting the signatures of the employees on pre-typed formats forcibly on threats of their jobs and started claiming that the recommendations of the wage board are not applicable on it. The aforesaid act of the management is in gross violation of Section 13 of the Working Journalists (C&S) and Misc. Provisions Act, 1955 as the working journalists are entitled to wages at rates not less than those specified in order. The provisions of Section 13 of the Act are very clear and are being reproduced for ready reference and compliance:

    13. Working Journalists entitled to wages at rates not less than those specified in the order.
    On the coming into operation of an order of the Central Government under Sec.12 every working journalist shall be entitled to be paid by his employer wages in the rate which shall, in no case, be less than the rate of wages specified in the order.

6. That the Working Journalists Act further protects the interest of the employees under Section 16 of the said Act by stating that any declaration, agreement etc which is inconsistent with the Act shall have no effect hence any claim being made by the employer regarding the declarations extracted by the employees is illegal on the face of it . The said provisions are reproduced here under for ready reference:

    16. Effect of laws and agreements inconsistent with this Act. (1) The provisions of this Act shall have effect notwithstanding anything inconsistent therewith contained in any other law or in the terms of any award, agreement or contract of service, whether made before or after the commencement of this Act :
    Provided that where under any such award, agreement, contact of service or otherwise a newspaper employee is entitled to benefits in respect of any matter which are more favorable to him than those to which he would be entitled under this Act, the newspaper employee shall continue to be entitled to the more favorable benefits in respect of that matter, notwithstanding that he receives benefits in respect of other matters under this Act.
    (2) Nothing contained in this Act shall be construed to preclude any newspaper employee from entering into an agreement with an employer for granting him rights or privileges in respect of any matter which are more favorable to him that those to which he would be entitled under this Act.

7. That the Supreme Court has considered all the contentions as raised before it in bunch of Contempt of court petitions and vide its orders dated 19/6/2017 reaffirmed that the newspaper establishments are under obligation to pay the Majithia Wage Board Award the remedy under Section 17 of the Working Journalists and Other Newspaper Employees (Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Act, 1955 is prescribed and the employees claimant the said benefits can seek the same by filing such applications, hence the present application.

8. That the details of the claims of the employee is as under:
Sr No. Salary period Salary paid Salary as per Majithia Award Difference/ Dues

Total Total dues

9. That the management is liable to pay the aforesaid benefits to the employee but is withholding the same illegally hence liable to pay interest on the same @ 24 % from the date of entitlement till the date of realization .

10. That the management be also restrained from victimizing the employee during the pendency of the present claim as contemplated under Section 16 of the said Act as there is a complete restriction on the action of the management . The said provision of law is reproduced here under for ready reference:

    16-A. Employer not to dismiss, discharge, etc., newspaper employee.- No employer in relation to a newspaper establishment shall, by reason of his liability for payment of wages to newspaper employees at the rates specified in an order of the Central Government under Sec. 12 or under Sec. 12 read with Sec. 13-AA or Sec. 13-DD, dismiss, discharge or retrench any newspaper employee.

11. It is therefore prayed that the management named above be directed to pay the dues as detailed above failing which a recovery certificate be issued in favour of the claimant.
Applicant
Name
Post
Address
Contact No.

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(पार्ट 4) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

22. प्रत्युत्तर में दायर किए गए विभिन्न शपथपत्रों में समाचारपत्र प्रतिष्ठानों द्वारा अपनाए गए स्टैंड/कदम से, समय-समय पर विभिन्न राज्यों के श्रम आयुक्तों द्वारा दायर की गई रिपोर्टों में किए गए बयानों से, और साथ ही दायर की गई लिखित दलीलों से और आगे दखी गई मौखिक प्रस्तुतियों से यह स्पष्ट होता है कि संबंधित समाचारपत्र प्रतिष्ठानों ने मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड हिस्से में या नहीं कार्यान्वित किया है, इसके तहत क्या इन समाचारपत्र संस्थानों ने केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत और अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड, जिसे दी गई चुनौती को इस न्यायालय द्वारा रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 के फैसले/जजमेेंट में निरस्त कर दिया गया है, की गुंजाईश और दायरे को माना है। दृढ़मत है कि अवार्ड के गैर-कार्यान्वयन या आंशिक कार्यान्वयन को लेकर जो आरोप है, जैसा कि हो सकता है, स्पष्ट रूप से विशेष तौर पर संबंधित समाचारपत्र संस्थानों की अवार्ड की समझ से उपजा है, यह हमारा विचारणीय नजरिया है कि संबंधित प्रतिष्ठानों को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 को दिए गए फैसले/जजमेेंट की जानबूझकर अव्हेलना का जिम्मेवार नहीं ठहरया जा सकता है। अच्छा रहेगा, कथित चूक को बदल कर इस न्यायालय द्वारा बरकरार रखे गए अवार्ड की गलत समझ के तौर पर जगह दी जाए। इसे जानबूझकर की गई चूक नहीं माना जाएगा, ताकि न्यायालय की अवमानना अधिनियम,1971 की धारा 2बी में परिभाषित सिविल अवमानना के उत्तरदायित्व को अकर्षित किया जा सके। यद्यपि कथित चूक हमारे लिए स्पष्टत: साक्ष्य है,किसी भी समाचारपत्र प्रतिष्ठान को जानबूझकर या इरादतन ऐसा करने के विचार की गैरमौजूदगी में अवमानना का उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर वे अवार्ड को इसकी उचित भावना और प्रभाव में, इस रोशनी के साथ कि हम अब क्या राय/समझौता प्रस्तावित करते हैं, लागू करने का एक और अवसर पाने के हकदार हैं।

23. मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को इस अदालत ने दिनांक 07.02.2014 को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिए गए फैसले में मंजूरी दे दी गई है। इसलिए, इस अवार्ड को पूर्ण रूप से लागू किया जाना है। हालांकि यह सही है कि संबंधित मुद्दों (i) खंड 20जे, (ii)क्या पुरस्कार अनुबंधित कर्मचारियों पर लागू होता है, (iii) क्या इसमें वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन शामिल है और (iv) वित्तीय क्षरण/घाटे की सीमा जो कि बकाए के भुगतान को रोकने के लिए उचित होगी, को विशेष रूप से किसी भी अवार्ड या इस न्यायालय के फैसले में नहीं निपटा गया है, इसमें कोई संदेह नहीं है हो सकता है कि अवार्ड की शर्तों के क्षेत्र और दायरे की पुनरावृत्ति जरूरी और उचित होगी। न्यायलय के आदेश(ओं) का उचित और पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए हम इसके बाद ऐसा करने का प्रस्ताव करते हैं। 

24. जहां तक कि अधिनियम के प्रावधानों के साथ पढ़े जाने वाले अवार्ड के अभी तक के अत्याधिक विवादास्पद मुद्दे क्लॉज 20(जे) का का स्वाल है, यह स्पष्ट है कि अधिनियम की धारा 2(सी) में परिभाषित प्रत्येक अखबार कर्मचारी को अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित और अधिसूचित वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन/मजदूरी प्राप्त करने की गारंटी का हकदार बनाता है। अधिसूचित वेतन/मजदूरी, जैसा कि हो सकता है, सभी मौजूदा अनुबंधों की जगह लेती है(supersedes करती है)।  हालाकि विधायिका ने धारा १६ के प्रावधानों को शामिल करके यह स्पष्ट कर दिया है कि मजदूरी तय होने और अधिसूचित होने के बावजूद , संबंधित कर्मचारी के लिए अधिनियम की धारा 12 की अधिसूचना के मुकाबले उसे अधिक फायदा देने वाले/अनुकूल किसी लाभ को स्वीकार करने का अवसर हमेशा खुला रहेगा। मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड का क्लॉज 20(जे), इसलिए, उपरोक्त रोशनी में पढऩा और समझना होगा। अधिनियम के तहत एक कर्मचारी को जो देय है, उससे कम प्राप्त करने के विकल्प की उपलब्धता पर  अधिनियम खामोश है। इस प्रकार का विकल्प वास्तव में आर्थिक छूट के सिद्धांत के दायरे में है, संबंधित कर्मचारियों के विशिष्ट स्टैंड/दृढ़मत को ध्यान में रखते हुए वर्तमान मामले में ऐसा मुद्दा नहीं उठता है, जो वर्तमान मामलों में उनके द्वारा तैयार की गई कथित रूप से अनैच्छिक प्राकृति की अंडरटेकिंग(परिवचन/वचन) से संबधित है। इसलिए अधिनियम की धारा 17 के तहत तथ्यों की पहचान करने वाली अथारिटी/प्राधिकरण द्वारा इसके तहत उत्पन हो रहे विवाद का निराकरण किया जाना चाहिए, जैसा कि बाद में व्यक्त/विज्ञापित किया गया है।

25. विधायिका के इतिहास से संबंधित किसी भी घटना में और अधिनियम को अधिनियमित/लागू करने से प्राप्त होने वाले उद्देश्य अर्थात अगर समाचारपत्र कर्मचारियों के लिए उचित मजदूरी नहीं है, तो न्यूनतम उपलब्ध करवाने के लिए, विजय कॉटन मिल्ज लि. और अन्य बनाम अजमेर राज्य (एआईआर1955 एससी 33) मामले में घोषणा/निर्णय के अनुपात के तहत न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत अधिसूचित तय मजदूरी को बिना-मोलभाव के कारण मौजूदा अधिनियम के तहत स्पष्ट रूप से नियंत्रित किया जाएगा।  बिजय कॉटेन मिल्ज़ लिमिटेड(सुप्रा) मामले की रिपोर्ट में पैरा चार, जोकि विशिष्ट सूचना के लिए उपरोक्त मुद्दे से जुड़ता है, नीचे दिया गया है:
“4. यह शायद ही विवादित हो सकता है कि श्रमिकों को जीने के लिए मजदूरी सुरक्षित करना, जो न केवल महज शारीरिक निर्वाह परंतु साथ ही स्वास्थ्य और मर्यादा का पोषण/अनुरक्षण करता है, जनता के सामान्य हित के अनुकूल है। हमारी संविधान के अनुच्छेद 43 में समाहित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में से एक है। यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि 1928 में जिनेवा में एक न्यूनतम मजदूरी फिक्सिंग सम्मेलन आयोजित किया गया था और इस सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्तावों को अंतरराष्ट्रीय श्रम संहिता में शामिल किया गया था। कहा जाता है कि इन प्रस्तावों को प्रभावी बनाने के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम परित किया गया था। साउथ इंडिया एस्टेट लेबर रेजोल्यूशंस आर्गेनाइजेशनबनाम स्टेट आफ मद्रास(एआईआर 1955 एमएडी45,पृष्ठ47) के अनुसार:
यदि श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी के आनंद से सुरक्षित किया जाना है और वे अपने नियोक्ता के शोषण से सुरक्षित किए जाने हैं, तो यह पूरी तरह जरूरी है कि उनके अनुबंध की आजादी पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए और इन पावंदियों को किसी भी मायने में अनुचित नहीं ठहरया जा सकता। दूसरी ओर, नियोक्ताओं को शिकायत करते नहीं सुना जा सकता, अगर वे अपने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने को मजबूर करते हैं, भले ही मजदूर अपनी गरीबी और असहाय होने के कारण कम मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं।  (जोर/Emphasis हमारा है)       

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द्वारा: रविंद्र अग्रवाल
धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश
संपर्क: 9816103265


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अगर तीन महीने तक मजीठिया का लाभ नहीं दिया तो सुप्रीम कोर्ट फिर जाने का रास्ता खुला है

7-2-2014 को मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया था, उसका कई हिस्सा इस बार भी दुहाराया गया है। ताजे आदेश में स्पष्ट लिखा है कि एक साल के अंदर 4 किश्तों में वर्कर के बकाया राशि का भुगतान मालिकान करें. यानि इस आर्डर के मुताबिक तीन माह बाद अगर वर्कर का पैसा नहीं मिला तो वर्कर फिर से माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे. जब तीन की बजाय 6 माह में भी वर्कर को पैसा मिलने लगेगा, तब नए क्रांतिकारियों की भीड़ डीएलसी और लेबर कोर्ट में जरूर देखने को मिलेगी.

उल्लेखनीय है कि मजीठिया देने से अब मालिकान बाल बाल नहीं बच पाएंगे. उन्हें हर हाल में वर्करों को पैसा देना होगा. वह भी फिक्स डिपॉजिट के अंदाज़ में. मालिक अब सुप्रीम कोर्ट की गिरफ्त में फंस चुके हैं और इस बार अगर उन्होंने अवमानना की, उनका बाल बाल बचना मुश्किल होगा और ऐसा होने पर उनके प्रिय प्यादे को खुद को बाल बाल बचाने के लिए कोई रास्ता नहीं मिलेगा. कुल मिलाकर यह तय है कि अब मजीठिया का भूत अख़बार मालिकानों और उनके प्यादों को जगे में भी डराता रहेगा.

अब यह भी तय माना जा रहा है कि कंपनियों के जो बड़े प्यादे हैं, जो सीनियर होने की हेकड़ी दिखाते हैं, वे खुद को होश में रखेंगे. वे अपने वर्करों से बहला कर, पुचकार कर, प्यार से बातें करके काम निकलना चाहेंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर कोई कर्मचारी भड़का, तो मामला जंगल की आग जैसा हो जाएगा. हर कोई सीना तान कर केस करने निकलेगा. ऐसा होने पर प्यादे अपनी नौकरी को बाल बाल बचाना चाहेंगे लेकिन बचाना बेहद मुश्किल होगा.

उल्लेखनीय बात यह भी है कि जो कर्मचारी, चाहे वह दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला, पंजाब केसरी आदि का हो, अगर उसने संसथान में तीन साल से अधिक समय गुजार लिया है, तो वह इस लड़ाई को बड़े मज़े से लड़ सकता है. बस थोड़ा संयम रखना होगा और उन्हें एक साल के लिए आर्थिक रूप से मज़बूत भी होना होगा. यहाँ स्पष्ट है कि इससे कम अवधि संस्थान में गुजरने वाले साथी से धैर्य से काम लें और वक़्त का इंतज़ार करें. अवसर उनके लिए भी आएगा.

हाँ तो कुल मिलाकर 3 साल नौकरी करने वाले साथी अगर केस में आते हैं तो कम से कम 10 से 15 लाख तो उन्हें मिलेगा ही. फिर जितने दिन केस लड़ेंगे, उसका भी पैसा उसमें जुड़ेगा. चूँकि आपने रिजाइन नहीं किया है और प्रताड़ित होकर केस किया है. अगर कंपनी ने नो एंट्री लगा दी, तो कुछ और काम करते रहिए और केस लड़िये, रोज मेल पर अपनी हाजिरी भेजते रहिए कि हम तो काम करने गए पर हमें रोक दिया गया इसलिए मेल से उपस्थिति कुबूल करें. इसके डाक्यूमेंट्स को इकट्ठा करते रहिए और कोर्ट में लगाते रहिए.

अगर नौकरी इस दौरान भी चलती रही, तो फिर आपकी बल्ले बल्ले है, क्योंकि देनदारी से बचने के लिए अगर कंपनी कुछ भी करती है, जैसे ट्रांसफर, सस्पेंशन या टर्मिनेशन, तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना होगा. एक्ट इसकी भी इजाजत नहीं देता. याद रहे कि अगर आप इसके लिए तैयार रहेंगे, तो मालिकानों के ये प्रिय प्यादे आपसे हमेशा डरेंगे और अपनी नौकरी बाल बाल बचाने में जुटे रहेंगे. कुल मिलाकर चैन से जीना है तो जाग जाइये….

मजीठिया क्रन्तिकारी और वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण के फेसबुक वॉल से.

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सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होगी याचिका…

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(पार्ट थ्री) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

16. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा सिफारिशों को स्वीकार करने और अधिसूचना जारी किए जाने के बाद श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के तहत अपना वेतन/मजदूरी प्राप्त करने के हकदार हैं। यह, अवमानना याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिनियम की धारा 16 के साथ धारा 13 के प्रावधानों से होता है, इन प्रावधानों के तहत वेजबोर्ड की सिफारिशें, अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित होने पर, सभी मौजूदा अनंबधों के साथ श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों की सेवा की शर्तों को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट अनुबंध/ठेका व्यवस्था को अधिलंघित  (Supersedes) करती है या इसकी जगह लेती है।

वेजबोर्ड द्वारा अनुसंशित, जैसे कि केंद्र सरकार द्वारा मंजूर और स्वीकृत वेतन/मजदूरी को संबंधित श्रमजीवी और गैर पत्रकार कर्मचारियों के अधिनियम द्वारा गारंटी दी जाती है। केवल अधिक लाभकारी/फायदेमंद और अनुकूल दरों को अपना कर ही अधिसूचित वेतन/मजदूरी को निर्गत/खत्म किया जा सकता है। इसलिए, अवमानना याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पिछली मजदूरी संरचना द्वारा नियंत्रित किसी भी समझौता या परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग), जो मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा सुझाई गई सिफारिशों से कम अनुकूल है, वो वैध नहीं है। इसके अलावा, वाद-विवाद उठाया गया था कि कोई भी परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग) स्वैच्छिक नहीं है, इन्हें दबाव और स्थानांतरण/बर्खास्त किए जाने के खतरे के तहत प्राप्त किया गया है। इसलिए अवमानना याचिकाकर्ताओं का निवेदन है कि उपरोक्तानुसार न्यायालय द्वारा मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को स्पष्ट किया जा सकता है।

17. जहां तक कि वेरिएवल-पे, अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों, और वित्तीय क्षमता का संबंध है, अवमानना याचिकाकर्ताओं का मामला इस प्रकार से है कि उपरोक्त सभी मामलों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा पूरी तरह से निपटाया गया है। उन सिफारिशों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा स्वीकार कर लिया गया है, तो कथित वजह पर कोई और बहस या विवाद के लिए कोई गुंजाईश नहीं है। अनुमोदित और अधिसिूचित वेजबोर्ड की सिफारिशें अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों सहित सभी श्रेणियों के कर्मचारियों पर लागू होती हैं, जो वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन के हकदार होंगे और वेरिएवल पे के समावेश द्वारा सभी भत्तों की गणना करेंगे। सभी नियोक्ता निर्धारित अवधि से बकाया राशि का भुगतान करने के लिए भी बाध्य हैं, जब तक कि एक प्रतिष्ठान को अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख से पहले तीन पूर्ववर्ती लेखा वर्षों में भारी नकदी हानि का सामना करना पड़ रहा है, जो कि नियोक्ता द्वारा अनुमानित महज वित्तीय कठिनाइयों से अलग होना चाहिए। 

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जागरण प्रबंधन को करारा तमाचा, दो पत्रकारों ने लेबर डिपार्टमेंट से अपना तबादला रुकवा लिया

मजीठिया वेज बोर्ड के लाभ मांगने पर दैनिक जागरण आगरा के प्रबंधन ने दो पत्रकारों का दूरदराज के इलाकों में तबादला करने का फरमान जारी कर दिया. इसके बाद दोनों पत्रकारों लेबर डिपार्टमेंट गए और अब लेबर डिपार्टमेंट ने इनका तबादला रोक दिया है. इन दो पत्रकारों के नाम हैं सुनयन शर्मा और रूपेश कुमार सिंह. दैनिक जागरण आगरा में सुनयन चीफ सब एडिटर हैं तो रूपेश डिप्टी चीफ सब एडिटर.

आगरा से सुनयन का स्थानान्तरण जम्मू कर दिया गया था और रूपेश का सिलीगुड़ी. पर अब लेबर कोर्ट ने इन तबादलों पर रोक का आदेश जारी कर दिया है. जागरण प्रबंधन के गाल पर तमाचा पड़ने से मीडियाकर्मियों में खुशी का माहौल है. दोनों जर्नलिस्ट सुनयन और रूपेश मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांग रहे थे. दैनिक जागरण के आगरा संस्करण में कार्यरत चीफ सब एडीटर सुनयन शर्मा और डिप्टी चीफ सब एडीटर रूपेश कुमार सिंह के स्थानान्तरणों के आदेशों पर श्रम विभाग ने जो रोक लगा दिया है, इसका असर दूर तक होने वाला है. दूसरी कई यूनिटों के पत्रकार भी अपने हक के लिए लड़ रहे हैं और प्रबंधन के उत्पीड़न के शिकार हैं.

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मजीठिया का लाभ लेने के लिए यह प्रक्रिया अपनाएं

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने वाले एडवोकेट उमेश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने के लिए एक दिशा-निर्देश जारी किया है जिसे फालो करके कोई भी मीडियाकर्मी मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पा सकते है.

कृपया नीचे दी गई तस्वीर पर लिखी बातों को गौर से पढ़ें और इनका सावधानी से पालन करें…

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मीडिया मालिकों के इस मुखबिर को भड़ास वालों ने दिया करारा जवाब

मजीठिया क्रांतिकारियों… सावधान… मीडिया मालिकों के मुखबिर नए नए रूप में टहलने लगे हैं… ऐसे ही एक मुखबिर ने भड़ास4मीडिया को झांस में लेने के लिए फर्जी आईडी से मीडिया हेल्पर बनने का दावा करते हुए इस उम्मीद से मेल भेजा कि भड़ास पर अच्छे खासे तरीके से छप जाएगा लेकिन भड़ास वालों ने इस मुखबिर की नीयत जान ली और इसे दिया करारा जवाब…

पढ़िए यह मुखबिर किस नए अंदाज में मुखबिरी पर निकला लेकिन इसका पाला भड़ास वालों से ऐसा पड़ा कि इसे न सिर्फ जवाब देकर इसकी औकात दिखा दी बल्कि इसकी नीयत का पर्दाफाश करते हुए प्रकाशन कर दिया जिससे मीडियाकर्मी सावधान रह सकें… कोई भी मीडियाकर्मी कभी उस किसी शख्स के झांसे में न आएं जो अपना नाम पहचान छुपाकर किसी किस्म की ‘क्रांति’ करने का आह्वान कर रहा हो. देखिए भड़ास वालों ने इस मुखबिर को किस तरह दिया है करारा जवाब…

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आप बाल-बाल बच गए हैं सर और इस वजह से हम प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल-बाल बचे!

19 जून को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो मजीठिया वेज बोर्ड का फैसला सुनाया था, उसमें मालिकान तो बाल-बाल बचे ही, मालिकानों के खास प्यादे भी बाल बाल बचे और ईश्वर को धन्यवाद किया. 19 को माननीय सुप्रीम कोर्ट की मीडिया पार्क में देश के तमाम मीडिया कर्मी आये हुए थे। सभी अपने अपने तर्कों से लैस थे। हर कोई अपनी बात को सच साबित करने में जुटा था। अभी दोपहर के बाद का 3 बजकर 20 मिनट हुआ था, देखा की कोर्ट के में गेट से सबसे पहले दैनिक जागरण के एक वकील और 2 प्यादे ऐसे बाहर निकले जैसे उनकी जान कोर्ट ने बख्श दी हो। तीनों के चेहरे पर बाल बाल बचने का भाव स्पष्ट दिख रहा था। वे सब यही सोचते आगे भाग रहे थे, क़ि यह खबर जल्दी से संजय गुप्ता को दें कि आप बाल बाल बच गए हैं सर और आपके बाल बाल बचने के साथ ही हम सब आपके प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल बाल बचे।

देखें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट से जो फैसला मजीठिया के बारे में आया है, उससे अभी तो8 मालिक बच गए हैं और इसी वजह से कर्मचारियों में निराशा का भाव है, क्योंकि उनका सोचना था कि इस मामले में मालिकानों में से कुछ को कोर्ट ज़रूर टांग देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वे बाल बाल बच गए। यहाँ उल्लेखनीय है कि मजीठिया देने से मालिकान बाल बाल नहीं बच पाएंगे। कल ये एकधारी तलवार पर चल रहे थे, अब ये दोधारी तलवार पर सवार हैं, जिसके डर से मालिकों की नींद फिर से जाने वाली है और मालिकों के प्रिय प्यादों को एक बार फिर जुगत ढूंढनी होगी बाल बाल बचने की। कुल मिलाकर यह तय है कि जब तक मजीठिया का मामला कोर्ट में रहेगा, मालिकान तो पैसा बचाने के लिए परेशान रहेंगे ही, उनके प्रिय प्यादे भी बाल बाल बचने के लिए सतर्क रहेंगे। क्योंकि कोर्ट ने प्यादों की स्थिति उस कटहर यानि कटहल जैसी बना दी है, जिसे पच्चर पका देता है। मालूम हो कि जब कटहल को अपने मन से पकाना होता है तो उसमें पच्चर यानि एक मोती कील नुमा लकड़ी खोंस यानि ठोंक देते हैं, जिससे कटहल तुरंत पक जाता है।

अब ये प्यादे जरा सा भी नौटंकी किये या सीनियर होने की हेकड़ी दिखाये, तो सभी कर्मचारी सीना तान के उनसे भिड़ जायेंगे कि रखो अपनी नौकरी, हम चले केस करने। चाहे वह कॉन्ट्रैक्ट वाला हो या वेज बोर्ड वाला या कोई भी। अब जाहिर है कि ऐसी स्थिति में कम्पनी के प्रिय प्यादों को अपनी नौकरी बाल बाल बचानी मुश्किल होगी। यहाँ उल्लेखनीय बात यह भी है कि जो कर्मचारी, चाहे वह दैनिक जागरण, भास्कर, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान आदि का हो, अगर उसने 3 साल से अधिक समय गुजार लिया है, तो वह इस लड़ाई को बड़े मज़े से अंजाम दे सकता है। बस थोड़ा संयम से काम लेना होगा। यह कैसे संभव होगा या कैसे अच्छा होगा वर्कर के लिए, इस बारे में बात फिर कभी। फ़िलहाल यह तय है कि अब ये मालिकानों के प्यादे किसी कर्मचारी को डांटने, प्रताड़ित करने से बाल बाल बचेंगे और दिन रात अपना समय अपनी नौकरी बचाने में लगाएंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एडवोकेट द्वय उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी दायर करेंगे पुनरीक्षण याचिका

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसला पर मीडियाकर्मियों में बहस-विचार-चर्चा जोरों पर है. ताजी सूचना ये है कि मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई से जुड़े रहे दो वकीलों उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर करने का ऐलान कर दिया है. ये दोनों वकील अलग-अलग रिव्यू पिटीशन दायर करेंगे. इनकी पुनरीक्षण याचिकाओं में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी न माने जाने का बिंदु तो होगा ही, ट्रांसफर-टर्मिनेशन जैसे मसलों पर स्पष्ट आदेश न दिया जाना और इस मजीठिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर न आने की सलाह देने जैसी बातों का भी उल्लेख होगा. इन समेत ढेर सारे बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करते हुए फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एडवोकेट उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी द्वारा रिव्यू पिटीशन दायर करने के ऐलान के बाद मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून को आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मीडियाकर्मियों और वकीलों का एक हिस्सा निराश है. शोषण, उत्पीड़न और अवमानना के आरोपी मीडिया मालिकों के साथ सुप्रीम कोर्ट का नरम व्यवहार चर्चा का विषय बना हुआ है. पीड़ित मीडियाकर्मियों को फौरी तौर पर कोई राहत सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में नहीं दी है और सभी को एक बार फिर लेबर कोर्ट का रुख करा दिया है जहां लड़ाई वर्षों चल सकती है. इन सब बिंदुओं को देखते हुए देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून के फैसले पर पुनर्विचार के लिए माननीय सुप्रीमकोर्ट में मीडियाकर्मियों के पक्ष में रिव्यू पिटीशन दायर करने का फैसला किया.

एडवोकेट उमेश शर्मा ने मजीठिया क्रांतिकारी और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह से बातचीत में साफ़ कहा कि वे मीडियाकर्मियों की लड़ाई को अधूरा नहीं छोड़ेंगे और वे इस फैसले में छूटी हुई कई बातों-खामियों को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. इसके लिए उनकी पूरी टीम तैयारी में लगी है. उमेश शर्मा ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश में कई खामियां हैं जिन पर सुप्रीमकोर्ट से गुहार लगाई जाएगी कि वे इन कमियों पर पुनर्विचार कर उन्हें दूर करें. एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा रिव्यू पिटीशन लगाए जाने की खबर से देश भर के मीडियाकर्मियों के चेहरे पर चमक आ गयी है. आपको बतादें कि उमेश शर्मा ने सुप्रीमकोर्ट का फैसला आने से पहले ही बता दिया था कि लीगल प्वाइंट की डफली ज्यादा बजेगी तो अखबार मालिक बच निकलेंगे. उनके इस पुराने इंटरव्यू को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : Advocate Umesh Sharma interview

देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों के वेतन और भत्ते तथा एरियर से जुड़ा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का मामला एक बार फिर सुप्रीमकोर्ट पहुंच रहा है. 19 जून को आये सुप्रीमकोर्ट के फैसले में यूं तो ज्यादातर फैसले मीडियाकर्मियों के पक्ष में आये हैं लेकिन कुछ फैसलों में सुप्रीमकोर्ट ने अखबार मालिकों को राहत दी है. इस फैसले में हुयी कुछ कमियों को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे एक अन्य वकील का नाम दिनेश तिवारी है.

एडवोकेट दिनेश तिवारी ने खुद इस खबर की पुष्टि पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह से फोन पर हुयी बातचीत में की है. उन्होंने कहा कि वे जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के 19 जून फैसले में कुछ कमी देख रहे हैं और इन कमियों को लेकर वे सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. दिनेश तिवारी बिहार के आरा के प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ मिथलेश कुमार का केस माननीय सुप्रीमकोर्ट तक लेकर आये थे. प्रभात खबर प्रबंधन ने मिथलेश कुमार का ट्रांसफर जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मांगने के कारण झारखण्ड के चाईबासा में कर दिया था.

इसके बाद वे एडवोकेट दिनेश तिवारी की मदद से सुप्रीमकोर्ट की शरण में गए थे. सुप्रीमकोर्ट ने उनके ट्रांसफर पर रोक लगा दिया था. एक प्रश्न के उत्तर में एडवोकेट दिनेश तिवारी ने कहा कि उन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अखबार मालिकों के खिलाफ लगाए गए अवमानना मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिए गए 19 जून के फैसले को अच्छी तरह पढ़ लिया है. ये फैसला वैसे तो अखबार कर्मियों के पक्ष में है लेकिन कुछ प्वाइंट हमारे खिलाफ गए हैं. अखबार कर्मियों के खिलाफ गए फैसले में कई खामियां है जिसका लाभ अखबार मालिक उठाएंगे. इसलिए वे रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. वे और उनकी पूरी टीम रिव्यू पिटीशन के लिए दिन रात तैयारी कर रही है. एडवोकेट दिनेश तिवारी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट किसी के मौलिक अधिकार को ब्लॉक नहीं कर सकता और किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट बार-बार न्याय के लिए जाने से रोक नहीं सकता.

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