संयुक्त आयुक्त श्रम ने जागरण के मालिक मोहन गुप्त को नोटिस भेजा, शेल कम्पनी ‘कंचन प्रकाशन’ का मुद्दा भी उठा

दैनिक जागरण के एचआर एजीएम विनोद शुक्ला की हुई फजीहत…  पटना : दैनिक जागरण के मालिक महेंद्र मोहन गुप्त को श्रम विभाग के संयुक्त आयुक्त डा. वीरेंद्र कुमार ने नोटिस जारी कर जागरण कर्मियों द्वारा दायर किए गए जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा को लेकर वाद में पक्ष रखने के लिए तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 22 दिसंबर को होनी है। वहीं दैनिक जागरण पटना के एजीएम एचआर विनोद शुक्ला के जागरण प्रबंधन के पक्ष में उपस्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए अधिवक्ता मदन तिवारी ने संबंधित बोर्ड के प्रस्ताव की अधिकृत कागजात की मांग कर एजीएम शुक्ला की बोलती बंद कर दी। दैनिक जागरण के हजारों कर्मियों को अपना कर्मचारी न मानने के दावे एजीएम शुक्ला के दावे की भी श्रम विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डा.  वीरेंद्र कुमार के सामने हवा निकल गई।

दैनिक जागरण, गया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार को प्रबंधन ने गया जिले से जम्मू तबादला कर दिया। पंकज कुमार की गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा के आलोक में वेतन और अन्य सुविधाओं की मांग की थी। पंकज कुमार गम्भीर रूप से बीमार पिछले साल हुए थे। मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर प्रबंधन इतना खफा हो गया कि 92 दिनों की उपार्जित अवकाश शेष रहने के बाद भी अक्टूबर और नवंबर 2016 के वेतन में 21 दिनों की वेतन कटौती कर दी।

पंकज कुमार ने प्रबंधन के फैसले के खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय की शरण में न्याय की गुहार लगाई। एरियर का बकाया 32.90 लाख रुपए के भुगतान की मांग की। साथ ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय से गया से जम्मू तबादला को रद्द करने की गुहार लगाई। सर्वोच्च न्यायालय ने पंकज कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने आदेश में छह महीने का टाइम बांड कर दिया। यानि छह माह में फैसला हो जाना है।  पंकज कुमार सहित दैनिक जागरण के कई कर्मियों के वाद की सुनवाई 5 December को पटना के श्रम संसाधन विभाग के संयुक्त आयुक्त डा.वीरेंद्र कुमार के समक्ष हुई।

पंकज कुमार की तरफ से अधिवक्ता मदन तिवारी ने जागरण की ओर से उपस्थित एजीएम विनोद शुक्ला की उपस्थिति पर सवाल उठाया। अधिवक्ता मदन तिवारी का कहना था कि किस हैसियत से विनोद शुक्ला जागरण के अध्यक्ष मदन मोहन गुप्ता, सीईओ संजय गुप्ता, सुनील गुप्ता एवं अन्य की ओर से उपस्थिति दर्ज कराई है। एजीएम शुक्ला ने कम्पनी सेक्रेटरी द्वारा प्रदत्त एक पत्र की फोटो कापी दिखाई। फोटो कापी पर विनोद शुक्ला को अधिकृत होने की बात कही गई थी।

इस पर अधिवक्ता मदन तिवारी ने कहा कि कम्पनी द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव की अभिप्रमाणित प्रति जो बोर्ड की बैठक की अध्यक्षता करने वाले चैयरमेन या निदेशक द्वारा हस्ताक्षरित रहेगी, वही प्रति न्यायालय में कम्पनी द्वारा अधिकृत व्यक्ति के शपथ पत्र के साथ दायर की जानी चाहिए। अधिवक्ता मदन तिवारी ने लिखित रूप से आपत्ति दर्ज कराई। उसके बाद न्यायालय ने विनोद शुक्ला को निर्देश दिया कि वे बोर्ड के प्रस्ताव की अधिकृत प्रति हलफनामा के साथ दायर करें।

अधिवक्ता मदन तिवारी ने श्रम विभाग द्वारा जागरण के अध्यक्ष मदन मोहन गुप्ता सहित अन्य निदेशकों के स्थान पर प्रबंधन जागरण को नोटिस जारी करने के मामले को उठाया।  संयुक्त आयुक्त डा. वीरेंद्र कुमार ने आपत्ति उठाए जाने पर कहा कि पूर्व में नोटिस जारी की गई थी। लेकिन अब जागरण समूह के अध्यक्ष मदन मोहन गुप्ता को नोटिस जारी किया गया है।

जागरण के कई कर्मियों ने श्रम विभाग के संयुक्त आयुक्त वीरेंद्र कुमार को बताया कि एजीएम विनोद शुक्ला को ओर से दायर जवाब में कहा गया है कि गोपेश कुमार एवं अन्य कंचन प्रकाशन के कर्मी हैं…  कंचन प्रकाशन के साथ जागरण प्रकाशन का कांट्रैक्ट प्रिंटिंग के जाब वर्क का है… इसलिए ये सभी दैनिक जागरण के कर्मचारी नहीं है।

अधिवक्ता मदन तिवारी ने संयुक्त आयुक्त वीरेंद्र कुमार के सामने न्यूज पेपर रजिस्ट्रेशन एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी अखबार एवं पत्रिका को अपने अखबार में अनिवार्य अधिघोषणा में उस प्रेस का नाम पता देना जरूरी है जहां अखबार प्रिन्ट होता है। लेकिन जागरण के किसी भी एडिशन में कंचन प्रकाशन को लेकर कोई घोषणा नहीं की गई या की जा रही है। ऐसे में न्यूज पेपर रजिस्ट्रेशन एक्ट का उल्लघंन जागरण प्रकाशन कर रहा है। ऐसे में अनिवार्य अधिघोषणा न करने  के नियम का न पालन करने के कारण अखबार का निबंधन भी रद्द हो सकता है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महाराष्ट्र के लेबर कमिश्नर का निर्देश- ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ देना जरूरी

सभी अखबारों की होगी फिर से जांच…  महाराष्ट्र के लेबर कमिश्नर द्वारा बुलाई गई त्रिपक्षीय समिति की बैठक में लेबर कमिश्नर यशवंत केरुरे ने अखबार मालिकों के प्रतिनिधियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि आपको माननीय सुप्रिमकोर्ट के आदेश का पालन करना ही पड़ेगा। श्री केरुरे ने कहा कि वेज बोर्ड का लाभ ठेका कर्मचारियों को भी देना अनिवार्य है। मुम्बई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स के लेबर कमिश्नर कार्यालय में बुलाई गई इस बैठक में  राज्यभर के विभागीय अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया था।

इस बैठक में सवाल उठाया गया कि जस्टिस मजिठिया वेजबोर्ड के अनुसार अपने बकाये का क्लेम लगाने में मीडिया कर्मियों में डर का माहौल क्यों है। अखबार मालिक लोगों को परेशान क्यों कर रहे हैं। ट्रांसफर टर्मिनेशन क्यों कर रहे हैं। नौकरी से निकालने या पेपर बन्द करने की धमकी देकर सादे कागज पर साइन क्यों कराया जा रहा है। कई अखबार मालिक अपने समाचार पत्र के कर्मचारियों से त्यागपत्र लेकर नई कंपनी में ठेके पर ज्वाइन करा रहे हैं। कई अखबार मालिक अपने कर्मचारियों को डिजिटल में ज्वाइन करा रहे हैं। ये मुद्दा नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट महाराष्ट्र की पत्रकार प्रतिनिधि शीतल करंदेकर ने उठाया।

इस पर लेबर कमिश्नर ने कहा कि मीडियाकर्मियों को घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है। मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ मीडियाकर्मियों को मिलेगा। इसमें संदेह नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें इसका लाभ जरूर मिलेगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का आदेश न मानने वालों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना का मामला चलेगा और जहां भी मीडियकर्मियोंको परेशान किया जा रहा है, वे शिकायत करें। उन्होंने सभी अधिकारियों को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों का तीन महीने में निस्तारण किया जाए।

एनयूजे महाराष्ट्र ने सभी अखबारों के फिर से सर्वे करने की मांग की जिस पर सहमति बनी। इस पर अखबार मालिकों के प्रतिनिधियों ने एतराज जताया और कहा कि फिर से जांच की कोई जरूरत नही है। इस दौरान ये मुद्दा भी उठा कि अखबार मालिक सरकारी विज्ञापन लेते समय खुद को नंबर वन का ग्रेड बताकर विज्ञापन लेते हैं जबकि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करते समय खुद को निचले ग्रेड का बताते हैं। आयुक्त ने जनवरी तक सभी समाचार पत्रों की जांच करने का आदेश दिया। इस जांच की डेट सभी पत्रकार प्रतिनिधियों को भी बताने की मांग की गई जिसे आयुक्त ने मान्य कर लिया।

इस अवसर पर बी यू जे के इन्दर जैन ने फिक्सेशन सार्टिफिकेट प्रत्येक कर्मचारी को देने का निवेदन किया। इस अवसर पर एनयूजे महाराष्ट्र ने मांग की कि समिति के कई सदस्य बैठक में नहीं आते। उनकी जगह मजीठिया के जानकार लोगों को सदस्य बनाया जाए। इस दौरान शीतल करंदेकर ने ये भी मुद्दा उठाया कि लेबर विभाग ने सुप्रीम कोर्ट को जो रिपोर्ट भेजा है, उसमें कई अखबारों में दिखाया गया है कि इन अखबारों में माणिसना वेज बोर्ड की सिफारिश लागू है। इसकी भी जांच कराई जाए। इस बैठक में लेबर डिपार्टमेंट के उपसचिव कार्णिक भी मौजूद थे। बैठक का संचालन ड्यूपीटी लेबर कमिश्नर श्री बुआ ने किया।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
एनयूजे महाराष्ट्र मजीठिया वेज बोर्ड समन्यवयक
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया मामला : दैनिक भास्कर मुंबई के सुनील कुकरेती ने भी लगा दिया क्लेम

डी बी कॉर्प लिमिटेड द्वारा संचालित दैनिक भास्कर समाचार-पत्र के प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड मामले में कंपनी को धूल चटाए जाने के बाद ‘भास्कर’ के मुंबई ब्यूरो में बागियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। अपने बकाए की वसूली के लिए श्रम विभाग पहुंचने वालों में अब नया नाम जुड़ा है सुनील कुकरेती का। सुनील इस संस्थान में बतौर सीनियर रिपोर्टर कार्यरत हैं।

आपको बता दें कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के बाद रिसेप्शनिस्ट लतिका चव्हाण और आलिया शेख ने भी बगावत का बिगुल बजाया था, जिसके परिणाम स्वरूप श्रम विभाग से कटी आरसी पर स्टे लेने के लिए ‘भास्कर’ प्रबंधन बॉम्बे हाई कोर्ट गया। इस पर न्यायालय ने जब आदेश दिया कि आरसी में उल्लेख की गई रकम की आधी धनराशि पहले कोर्ट में जमा की जाए, तब प्रबंधन ने माननीय सुप्रीम कोर्ट में जाकर हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी। यह बात और है कि सुप्रीम कोर्ट से इन्हें बैरंग लौटना पड़ा… आखिर हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, प्रबंधन ने सिंह और चव्हाण के साथ ही आलिया की आरसी का आधा पैसा माननीय अदालत में जमा करवा दिया है।

‘भास्कर’ प्रबंधन की हुई इस फजीहत का नतीजा यह हुआ है कि पहले जहां सिस्टम इंजीनियर ऐस्बर्ट गोंजाल्विस और ब्यूरो चीफ अनिल राही ने क्लेम लगाया, वहीं हालिया डेवलपमेंट को देखते हुए अब हिम्मत का परिचय सुनील कुकरेती ने दिया है… कुकरेती ने भी कंपनी के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया है! जी हां, सुनील कुकरेती ने मुंबई के श्रम आयुक्त कार्यालय में 7 नवंबर, 2017 को 35 लाख रुपए का क्लेम लगा कर अपने बकाया की मांग की है, जिसके तहत कंपनी को नोटिस जारी हुआ और विगत 27 नवंबर से सुनवाई भी शुरू हो चुकी है। इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख 15 दिसंबर है। यहां बताना आवश्यक है कि मजीठिया क्रांतिकारियों के संपर्क में ‘भास्कर’ के दो और कर्मचारी हैं, जो जल्द ही क्लेम लगाने जा रहे हैं। जाहिर है कि ‘भास्कर’ संस्थान में बागियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है तो देश के सबसे बड़े और विश्वसनीय अखबार में इन दिनों हड़कंप का माहौल है!

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
एनयूजे मजीठिया सेल समन्वयक
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया वेज बोर्ड मामला : सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों को राहत देने से किया इनकार, देखें ऑर्डर की कापी

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ सख्त होता जा रहा है। जी हां, सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों के लिए दो सख्त आदेश दिए हैं… पहला तो यह कि उन्हें अपने कर्मचारियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना ही पड़ेगा, भले ही उनका अखबार घाटे में हो। दूसरा, अखबार मालिकों को उन कर्मचारियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक लाभ देना पड़ेगा, जो ठेके पर हैं। सुप्रीम कोर्ट के रुख से यह भी स्पष्ट हो चुका है कि जिन मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ चाहिए, उन्हें क्लेम लगाना ही होगा।

आपको बता दें कि मीडियाकर्मियों ने माननीय सुप्रीम कोर्ट का ध्यान जब इस ओर दिलाया कि लेबर कोर्ट में जाने पर बहुत टाइम लगेगा और वहां इस तरह के मामले में कई-कई साल लग जाते हैं, तब माननीय सु्प्रीम कोर्ट ने उन्हें एक और राहत दी। यह राहत थी लेबर कोर्ट को टाइम बाउंड करने की। सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कोर्ट को स्पष्ट आदेश दे दिया कि वह 17 (2) से जुड़े सभी मामलों को वरीयता के आधार पर 6 माह में पूरा करे। इसके बाद कुछ मीडियाकर्मी फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गए और वहां गुहार लगाई कि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार, अपना बकाया मांगने पर संस्थान उन्हें नौकरी से निकाल दे रहा है!

इस पर सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने मीडियाकर्मियों के दर्द को एक बार फिर समझा और आदेश दिया कि जिन लोगों का भी मजीठिया मांगने के चलते ट्रांसफर या टर्मिनेशन हो रहा है, ऐसे मामलों का भी निचली अदालत 6 माह में निस्तारण करे। इससे अखबार मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार, बकाया मांगने वालों के ट्रांसफर / टर्मिनेशन की गति जहां धीमी कर दी, वहीं सुप्रीम कोर्ट द्वारा मीडियाकर्मियों का दर्द समझे जाने का असर यह हुआ कि अब निचली अदालतें भी नए ट्रांसफर / टर्मिनेशन के मामलों में मीडियाकर्मियों को फौरन राहत दे रही हैं।

यहां बताना यह भी आवश्यक है कि पिछले दिनों मुंबई में ‘दैनिक भास्कर’ की प्रबंधन कंपनी डी बी कॉर्प लि. के प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, रिसेप्शनिस्ट लतिका चव्हाण और आलिया शेख के पक्ष में लेबर डिपार्टमेंट ने रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) जारी किया था… कलेक्टर द्वारा वसूली की कार्यवाही भी तेजी से शुरू हो गई थी। हालांकि डी बी कॉर्प लि. ने इस पर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंच कर आरसी पर रोक लगाने की मांग की, मगर हाई कोर्ट ने उनकी एक न सुनी और साफ शब्दों में कह दिया कि कर्मचारियों की जो बकाया धनराशि है, पहले उसका 50 फीसदी हिस्सा कोर्ट में जमा किया जाए।

यह बात अलग है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद डी बी कॉर्प लि. ने माननीय सु्प्रीम कोर्ट में पहुंच कर विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई से गुहार लगाई कि हुजूर, हाई कोर्ट का पैसा जमा कराने का आदेश गलत है और इस पर तत्काल रोक लगाई जाए। लेकिन वहां इनका दांव उल्टा पड़ गया। गोगोई साहब और जस्टिस नवीन सिन्हा  का नया आदेश एक बार फिर मीडियाकर्मियों के पक्ष में ब्रह्मास्त्र बन गया है। असल में डी बी कॉर्प लि. को राहत देने से इनकार करते हुए उन्होंने ऑर्डर दिया कि हमें नहीं लगता कि हाई कोर्ट के निर्णय पर हमें दखल देना चाहिए। स्वाभाविक है कि इसके बाद मरता, क्या न करता? सो, जानकारी मिल रही है कि डी बी कॉर्प लि. प्रबंधन ने बॉम्बे हाई कोर्ट में तीनों कर्मचारियों की आधी-आधी बकाया राशि जमा करवा दी है। इससे साफ हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहां अखबार मालिकों के आने का रास्ता लगभग बंद कर दिया है। अब कोई भी मीडियाकर्मी अगर क्लेम लगाता है तो उसका निस्तारण भी जल्द होगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
एनयूजे मजीठिया सेल समन्वयक
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिन्दुस्तान प्रबन्धन को डीएलसी की कड़ी चेतावनी, कहा- हठधर्मी का रास्ता छोड़ें

बरेली से खबर आ रही है कि मजिठिया को लेकर उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के दौरान उपश्रमायुक्त बरेली ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि हिन्दुस्तान का प्रबन्धन हठधर्मी का रास्ता छोड़े। यदि कोई ये समझता है कि वह सर्वोपरि है तो ऐसे लोग जान लें, सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं है। ना मैं और ना अखबार मालिक। लिहाजा आपसी समझौते से शिकायतकर्ता कर्मचारियों से मसला निपटा लें, नहीं तो अगली तिथि पर मजबूरन उनको विधि सम्मत कड़ा निर्णय लेना पड़ेगा।

उपश्रमायुक्त ने मामले में प्रतिवादी संपादक मनीष मिश्रा, यूनिट हेड योगेंद्र सिंह की ओर से आये हिन्दुस्तान बरेली यूनिट के एच आर हेड सत्येंद्र अवस्थी को साफ-साफ कहा कि उनका संदेश वे उच्च प्रबन्धन तक पहुँचा दें। शिकायतकर्ताओं को मजिठिया के मुताबिक उनके सभी ड्यूज तत्काल अदा कर दें। इससे बचने के लिए शिकायतकर्ताओं को नोटिस देना, धमकाना, कथित जांच बैठाना, कार्रवाई करना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है।ये सब कुछ वह नहीं होने देंगे।

अंतिम नोटिस के बावजूद हिन्दुस्तान के एचआर डायरेक्टर राकेश सिंह गौतम अपना पक्ष रखने को ना तो स्वयं आये और ना ही उनका कोई प्रतिनिधि। शिकायतकर्ता मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला ने उप श्रमायुक्त को अवगत कराया कि एचआर डायरेक्टर राकेश सिंह गौतम बेहद शातिर है। संपादक और जीएम भी उनके समक्ष आने से मुंह छिपा रहे हैं, क्योंकि इनके पास किसी भी बात का कोई जवाब है ही नहीं। सत्येन्द्र अवस्थी पर कोई अधिकार नहीं हैं। सत्येन्द्र सिर्फ मैसेंजर की भूमिका में हैं। उप श्रमायुक्त ने अंतिम मौका देते हुए सुनवाई की अगली तिथि 30 नवम्बर मुकर्रर की है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया मांगने पर भाजपा विधायक ने रिपोर्टर को अखबार के दफ्तर में घुसने से रोका, मामला पहुंचा पुलिस स्टेशन

मुंबई : खुद को उत्तर भारतीयों का रहनुमा समझने वाले भाजपा विधायक और हमारा महानगर अखबार के मालिक आरएन सिंह के अखबार में उत्तर भारतीय कर्मचारियों का सबसे ज्यादा शोषण किया जा रहा है। इस अखबार के सीनियर रिपोर्टर (क्राइम) केके मिश्रा को विधायक के पालतू गार्ड हमारा महानगर के दफ्तर में पिछले कुछ दिनों से नहीं घुसने दे रहे हैं।

कृष्णकांत सभापति मिश्रा उर्फ केके मिश्रा की गलती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने विधायक जी से माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपने वेतन वृद्धि की मांग कर ली। हमारा महानगर अखबार के मालिक और भाजपा विधायक आर एन सिंह को ये बात नागवार गुजरी। उन्होंने अपनी निजी सुरक्षा कंपनी के गार्डों को हिदायत दे दिया कि केके मिश्रा को किसी भी तरह ऑफिस में घुसने मत दो।

उल्लेखनीय है कि केके मिश्रा पहले भी इस अखबार में काम कर चुके हैं और उसके बाद इस्तीफा देकर दूसरे अखबार में चले गए थे। मगर 2015  में अखबार मालिक आरएन सिंह ने फोन कर केके मिश्रा को वापस बुलाया और भरोसा दिया था कि अच्छा भुगतान किया जाएगा। मगर हुआ उल्टा। फिलहाल केके मिश्रा को विधायक जी के आदेश पर ऑफिस में नहीं आने दिया जा रहा है। के के मिश्रा ने  9 नवंबर 2017 को पुलिस स्टेशन और कामगार विभाग में विधायक जी के खिलाफ शिकायत दी है। केके मिश्रा के इस कदम से हमारा महानगर प्रबंधन में हड़कम्प का माहौल है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का होगा अनुपालन, केन्द्रीय मंत्री ने पत्रकारों को दिया आश्वासन

केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे और बिहार भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने मंगलवार को मीडियाकर्मियों को आश्वासन दिया कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में वे पत्रकारों की भावना को सक्षम स्थान व नेतृत्व के समक्ष अवश्य रखेंगे। केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे ने बिहार के गया जिले में पत्रकारों के समक्ष दावा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में किसी को भी दवा के अभाव में मरने नहीं देने को लक्षय रखा है।

केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे के इस दावे पर मीडियाकर्मियों ने सवाल किया कि केन्द्र सरकार जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा के आलोक में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को क्रियान्वित कयो नही करा रही है। बिहार में कई  मीडिया हाउस प्रखंड और अनुमंडल के पत्रकारों को क्रमशः दो और पांच सौ रुपए प्रति माह देता है। ऐसे में पत्रकार अपने परिवार का पालन कैसे करेगा। श्रम कानून के तहत ईपीएफ ईएसआई, सर्विस बुक आदि की सुविधा से 95 प्रतिशत पत्रकार वंचित है। केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे और प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने बताया कि वे यह सुनिश्चित कराने का प्रयास करेंगे कि उन्हें श्रम कानून के तहत उपलब्ध सभी सुविधाएं मिले। केन्द्रीय मंत्री और भाजपा प्रवक्ता के बयान के बाद पत्रकारों के बीच उम्मीद जगी कि शायद सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन निकट भविष्य में केन्द्र सरकार करा सकती है

केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पत्रकारों को श्रम कानून के तहत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए करेंगे पहल

केन्द्रीय राज्यमंत्री गिरिराज सिंह ने बिहार के गया में पत्रकारों के हक की लडाई में पहल करने की घोषणा की है। केन्द्रीय मंत्री श्री सिंह को जब पत्रकारों ने बताया कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा के आलोक में वेतन और अन्य सुविधाएं नहीं मिल रही है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा को लागू करने के लिए फैसला सुना दिया है। केन्द्रीय मंत्री श्री सिंह ने कहा कि श्रम कानून के तहत ईपीएफ ,ईएसआई, सर्विस बुक सहित जो भी सुविधाएं देय है। उसे दिलाने के लिए केन्द्रीय श्रम मंत्री से बात करेंगे। उन्होंने कहा कि यह जानकर तकलीफ हुआ कि बड़ी संख्या में  लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के मित्रों को प्रतिदिन तय दैनिक मजदूरी भी नहीं मिल रहा है। औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार सिंह ने भी पत्रकारों से सम्बंधित ज्ञापन की मांग कर आश्वासन दिया कि इस सम्बन्ध में वे पीएमओ और श्रम मंत्री तक पत्रकारों की बात पहुंचाने का प्रयास करेंगे।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सीनियर आईटी मैनेजर ने किया हिन्दुस्तान पर केस, मांगे 43.64 लाख

बरेली से बड़ी खबर आ रही है कि नोयडा बुलाकर जबरन इस्तीफा लिखा लेने से तिलमिलाए बरेली यूनिट के सीनियर आईटी मैनेजर हरिओम गुप्ता ने हिन्दुस्तान के प्रबन्धन को सबक सिखाने की ठान ली है। वे अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने को मैदान में उतर गए हैं। उन्होंने इस उत्पीड़न की वजह मजिठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतन-भत्ते आदि की मांग करना बताया। उन्होंने हिन्दुस्तान प्रबन्धन पर 43 लाख 64 हजार 850 रुपये के मजिठिया के बकाया एरियर का दावा उपश्रमायुक्त बरेली के समक्ष ठोंक दिया है। उपश्रमायुक्त ने हिन्दुस्तान के प्रबंधन को नोटिस जारी कर तलब किया है।

दरअसल माह मई में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप वेतन और भत्ते ना देने के मामले में अवमानना के केस में सुप्रीम कोर्ट के संभावित कड़े फैसले के आने से पहले ही हिन्दुस्तान प्रबंधन बुरी तरह बौखला गया था। बौखलाहट में हिन्दुस्तान प्रबंधन ने स्टाफ को और कम करना शुरू कर दिया था।ताकि मजीठिया मांगने और प्रबंधन की मुखालफत करने की  वह कर्मचारी हिम्मत ना जुटा सकें, जो अभी भी पांच-पांच आदमियों के काम का बोझ उठाकर उफ़ भी नहीं कर रहें हैं और मजीठिया वेतनमान व एरियर मिलने की झूठी उम्मीद पाले हुए नौकरी कर रहे हैं।

इसी साल माह मई में हिंदुस्तान प्रबंधन ने दहशत कायम करते हुए बरेली यूनिट के सीनियर आईटी मैनेजर हरिओम गुप्ता को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उनकी जगह लखनऊ से बुलाकर रमेश कुमार को सीनियर आईटी मैनेजर की कुर्सी सौंप दी थी। हरिओम गुप्ता को पहले नोयडा बुलाया गया फिर उनसे मजिठिया मांगने की हिमाकत करने की सजा देते हुए जबरन इस्तीफे पर साइन कर लिए गए थे।

बरेली में उसी समय इतना ही नहीं हिन्दुस्तान प्रबंधन ने कई सालों से बरेली यूनिट में कार्यरत गरीब मेहनतकश चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के भी पेट पर लात मार दी थी।ये कर्मचारी रोजी-रोटी खोकर सड़क पर आ गए हैं।जिनमें ऑफिस कर्मचारी विपिन कुमार राणा, राजेश कुमार शर्मा, माली विजयपाल , हाउस कीपर सुभाष वाल्मिकी, प्रोडक्शन के सुशील कुमार और पैकिजिंग सेक्शन के चार कर्मचारी हैं।

सुप्रीम कोर्ट की लगातार अवमानना करके न्यायपालिका को खुली चुनौती दे रहे बेख़ौफ़ हिन्दुस्तान प्रबंधन को अब जबरन निकाले गए सीनियर आईटी मैनेजर हरिओम गुप्ता ने सबक सिखाने की ठान ली है। उन्होंने हिन्दुस्तान द्वारा किये गए उत्पीड़न की उपश्रमायुक्त बरेली से शिकायत की है। साथ ही मजिठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतन-भत्तों आदि के एरियर का बकाया 43 लाख 64 हजार 850 रुपये का भुगतान दिलाने का आग्रह किया है। उप श्रमायुक्त बरेली के समक्ष श्री गुप्ता की ओर से पैरवी मजिठिया मामलों के जानकार/अधिवक्ता मनोज शर्मा व आलोक शंखधार कर रहे है। मनोज शर्मा ने बताया कि बरेली हिन्दुस्तान के सात और कर्मचारियों ने मजिठिया के क्लेम तैयार कराए हैं, जिन्हें श्रम विभाग/श्रम न्यायालय से न्याय दिलाने को वह  इसी सप्ताह केस करने जा रहे हैं। बरेली में मजिठिया की लड़ाई तेज होती जा रही है।

मालूम हो कि बरेली में 31 मार्च को डीएलसी के स्तर से हिंदुस्तान के चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा के पक्ष में 25,64,976 रूपये, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के पक्ष में 33,35,623 रूपये और सीनियर सब एडिटर निर्मलकांत शुक्ला के पक्ष में 32,51,135 रूपये की वसूली के लिए हिन्दुस्तान बरेली के महाप्रबंधक/यूनिट हेड और स्थानीय संपादक के नाम आरसी जारी हो चुकी हैं।

इस वीडियो को भी देख सुन सकते हैं :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया वेज बोर्ड : SC के आदेश का असर, लेबर कोर्ट ने दी छोटी डेट

सुप्रीम कोर्ट के 13 और 27 अक्टूबर के आदेश का असर अब लेबर कोर्ट में चल रहे मजीठिया वेज बोर्ड के केसों में दिखना शुरू हो गया है। लेबर कोर्ट प्रबंधन की लंबी डेट की मांग को अनसुना कर अब छोटी डेट दे रहे हैं। इससे रिकवरी, ट्रांसफर, टर्मिनेशन आदि के केस लड़ने वाले कर्मचारियों के अंदर उत्साह का संचार दौड़ पड़ा है।

30 अक्‍टूबर को होशांगाबाद लेबर कोर्ट में दैनिक भास्‍कर के 5 कर्मियों के ट्रांसफर और टर्मिनेशन में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की 13 और 27 अक्‍टूबर के आदेश की प्रतियां लगाई गईं। इसके बाद माननीय जज साहब ने 13 नवंबर की तारीख दी। भास्‍कर के वकील ने अपनी तरफ से लंबी डेट मांगने का पूरा प्रयास किया। परंतु माननीय जज साहब ने बोला कि 13 दिन का समय बहुत होता है। इसके बाद भास्‍कर का वकील कुछ नहीं बोल सका और उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वहीं कर्मियों के चेहरे पर मुस्‍कान खिल गई। सुनवाई के दौरान 5 में से 4 कर्मियों ने अपनी गवाही पूरी की।

इस वीडियो को भी देख-सुन सकते हैं :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया वेजबोर्ड मांगने पर हुए ट्रांस्फर / टर्मिनेशन के मामले भी छह माह में निपटाने होंगे : सुप्रीम कोर्ट

रविंद्र अग्रवाल की रिपोर्ट

अखबार कर्मियों को दिवाली के बाद छठ का तोहफा, पंकज कुमार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया उत्साहजनक आदेश…

अखबार मालिकों के सताए अखबार कर्मियों को सुप्रीम कोर्ट से एक और बड़ी राहत भरी खबर मिली है। माननीय सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस गोगोई और जस्टिस सिन्हा की बैंच ने आज मजीठिया वेजबोर्ड मांगने पर की गई टर्मिनेशन और ट्रांस्फर के मामलों को भी छह माह में निपटाने के आदेश जारी किए हैं। आज दैनिक जागरण गया के कर्मचारी पंकज की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों के खिलाफ लगाई गई अवमानना याचिाकाओं पर 19 जून को दिए गए आने निर्णय के पैरा नंबर 28 में बर्खास्तगी और तबादलों को लेकर दिए गए निर्देशों को भी वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(2) के तहत रेफर किए गए रिकवरी के मामलों में 13 अक्तूबर को दिए गए टाइम बाउंड के आर्डर के साथ अटैच करते हुए इन मामलों की सुनवाई भी छह माह के भीतर ही पूरी करने के निर्देश जारी किए हैं।

ज्ञात रहे कि गया के मजीठिया क्रांतिकारी पंकज कुमार मजीठिया वेजबोर्ड मांगने के चलते तबादले का शिकार हुए थे और उन्होंने पटना उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रह चुके सेवानिवृत्त जस्टिस नागेंद्र राय के सहयोग से दैनिक जागरण की इस तनाशाही के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए कार्यवाही करने से पल्ला झाड़ लिया था कि ट्रांस्फर व टर्मिनेशन के मामलों को अनुच्छेद 32 के तहत इतने उच्च स्तर की रिट याचिका में उठाना उचित नहीं है, क्योंकि ये मामले कर्मचारी की सेवा शर्तों से जुड़े होते हैं और इन्हें उचित प्राधिकारी के समक्ष ही उठाया जाना उचित रहेगा।

19 जून की जजमेंट के पैरा 28 का अनुवाद इस प्रकार से है-

“28. जहां तक कि तबादलों/ बर्खास्तगी के मामलों में हस्तक्षेप की मांग करने वाली रिट याचिकाओं के रूप में, जैसा कि मामला हो सकता है, से संबंध है, ऐसा लगता है कि ये संबंधित रिट याचिकाकर्ताओं की सेवा शर्तों से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के अत्याधिक विशेषाधिकार रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल इस तरह के सवाल के अधिनिर्णय के लिए करना न केवल अनुचित होगा परंतु ऐसे सवालों को अधिनियम के तहत या कानूनसंगत प्रावधानों(औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 इत्यादि), जैसा कि मामला हो सकता है, के तहत उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष समाधान के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।”

उधर, माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले 13 अक्तूबर, 2017 को 17(2) के तहत मजीठिया वेजबोर्ड के रिकवरी केे मामलों की सुनवाई को श्रम न्यायालयों में रेफ्रेंस प्राप्त होने के छह माह के भीतर प्राथमिकता के तौर पर निपटाने के आदेशों के बाद आज यानि 27 अक्तूबर को अवमानना याचिकाओं पर दिए गए निर्णय के पैरा 28 में उदृत्त ट्रांस्फर और टर्मिनेशन के मामलों को भी इन्हीं आदेशों से जोड़ कर छह माह में ही निपटाने के आदेश जारी करके अखबार मालिकों की लेटलतीफी की रणनीति से परेशान मजीठिया क्रांतिकारियों का उत्साह दोगुना कर दिया है। उनकी पिछले छह वर्षों से चली आ रही यह जंग अब निर्णयक दौर में है।

आज के इस निर्णय के लिए पंकज कुमार को इस मुकाम तक पहुंचने में निशुल्क मदद करने वाले पूर्व जस्टिस एवं अधिवक्ता नागेंद्र राय जी और उनकी टीम बधाई और आभार की पात्र है। उनकी टीम के सह अधिवक्ता मदन तिवारी और शशि शेखर ने पंकज कुमार को काफी हौसला दिया था। पंकज कुमार ने इस निर्णय के बाद खुशी जाहिर करते हुए बताया कि वे अपने अधिवक्ता पूर्व जस्टिस नागेंद्र राय के आभारी हैं, जिन्होंने उन्हें बिना किसी फीस के इस मुकाम तक पहुंचने में मदद की। वहीं उनके सह अधिवक्ताओं ने हमेशा उनकी हौसला अफजाई की और दिलासा देते रहे कि यकीन रखें जीत हमेशा सत्य की ही होती है।

उधर, 13 अक्तूबर के निर्णय के लिए मुख्य अवमानना याचिका संख्या 411/2014 के अविषेक राजा और उनके वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंज़ाल्विस  भी  उतने ही बधाई और आभार के पात्र हैं, जिन्होंने 19 जून और 13 अक्तूबर के निर्णयों में अहम भूमिका निभाई थी।

रविंद्र अग्रवाल

वरिष्ठ संवाददाता

धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश

संपर्क : 9816103265

इन्हें भी पढ़ सकते हैं : xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

छह माह में मजीठिया मामले निपटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लिखित कापी देखें

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आज २४ अक्टुबर २०१७ को एक आदेश जारी कर देश भर की लेबर कोर्ट और इंडस्ट्ीयल कोर्ट को निर्देश दिया है कि १७(२) के मामलों का निस्तारण प्रार्थमिकता के आधार पर ६ माह के अंदर करें। माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आज जारी अपने आदेश में उन मामलों पर कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की जो लेबर विभाग में चल रहे हैं।  माननीय सुप्रीमकोर्ट के आज जारी आदेश का उन मीडियाकर्मियों ने स्वागत किया है जिनका मामला लेबरकोर्ट या इंडस्ट्रीयल कोर्ट में १७(२) के तहत चल रहा था। लेकिन उन लोगो को थोड़ी परेशानी होगी जिनका १७(१) का मामला लेबर विभाग में चल रहा है।

आज आये माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का एडवोकेट उमेश शर्मा ने स्वागत किया है और कहा है कि ये आर्डर बहुत ही अच्छा है। उन्होंने कहा है कि इसमें सुप्रीमकोर्ट को १७ (१) को भी कवर करना चाहिये था। उन्होंने कहा है कि माननीय सुप्रीमकोर्ट के आज आये आर्डर से मीडियाकर्मियों की लड़ाई आसान हो गयी है मगर मीडियाकर्मियों को चाहिये कि अपनी लड़ाई अब होश में लड़ें। सबसे पहले कागजों पर अपनी कंपनी का क्लासिफिकेशन करें। आप जिस पद पर काम कर रहे हैं और आपका पोस्ट तथा ड्यूटी चार्ट जरूर अच्छी तरह से रखें।

उमेश शर्मा ने कहा है कि कर्मचारी अपनी ओर से लेबरकोर्ट या लेबर विभाग या इंडस्ट्रीयल कोर्ट में डेट ना लें। क्लेम करने वाले मीडियाकर्मी कागजातों से ही लड़ाई जीत सकते हैं, इसलिये ज्यादा से ज्यादा कागजाती द्स्तावेज अपने पास रखें। एडवोकेट उमेश शर्मा ने यह भी कहा है कि जिन लोगों ने १७(१) का क्लेम लगाया है, उन्हें इस आर्डर से निराश होने की जरूरत नहीं है। वे अपना मामला जल्द से जल्द १७(२) के तहत लेबर कोर्ट में ले जायें, जहां से उनकी जीत तय है।

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायाधीश नवीन सिन्हा की खंडपीठ ने वेजबोर्ड के तहत वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(2) के मामलों को निपटाने के लिए देश भर के लेबर कोर्टों/ट्रिब्यूनलों को श्रम विभाग द्वारा रेफरेंस करके भेजे गए रिकवरी के मामलों को छह माह के भीतर प्राथमिकता से निपटाने के आदेश जारी किए हैं। आज सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर यह आदेश अपलोड होते ही मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे अखबार कर्मियों में खुशी की लहर दौड़ गई। ज्ञात रहे कि हजारों अखबार कर्मी सात फरवरी 2014 को दिए गए सुप्रीम कार्ट के आदेशों के तहत मजीठिया वेजबोर्ड के तहत एरियर व वेतनमान की जंग लड़ रहे हैं। इनमें से सैकड़ों कर्मी अपनी नौकरी तक खो चुके हैं।

सुप्रीमकोर्ट का आर्डर ये है :

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दैनिक जागरण को लगा झटका, रामजी के तबादले पर श्रम विभाग ने लगाई रोक

कानपुर। “स्वघोषित चैम्पियन” दैनिक जागरण के मालिकान को ताजा झटका कानपुर श्रम विभाग से मिला है। सहायक श्रम आयुक्त आरपी तिवारी ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरूप वेतन एवं बकाये की मांग करने वाले दैनिक जागरण कानपुर में कार्यरत कर्मचारी रामजी मिश्रा के सिलीगुड़ी स्थानांतरण पर फिलहाल रोक लगा दी है। श्री तिवारी द्वारा जारी आदेश में दैनिक जागरण प्रबंधन की ओर से रामजी मिश्रा का कानपुर कार्यालय से सिलिगुड़ी किए गए तबादले को अनुचित एवं अवैधानिक करार दिया गया है।

गौरतलब है कि रामजी मिश्रा ने कानपुर श्रम विभाग में दिनांक 18 जुलाई 2017 को रिकवरी का क्लेम फाइल किया था। इससे झुब्ध होकर दैनिक जागरण के प्रबंधक ने दिनांक 24 जुलाई 2017 को रामजी का तबादला सिलीगुड़ी कर दिया था। इसके बाद रामजी ने तबादला निरस्त किए जाने की गुहार कानपुर श्रम विभाग में लगाई थी। बतातें चलें कि 19 जून 2017 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से देश के नंबर वन अखबार के मालिक सकते में आ गए थे।

कोर्ट के रुख और भविष्य की अड़चनों को सतही तौर पर ध्यान में रखते हुए मलिकान ने “कमजोर पेड़ों” को काटने की “सुपारी” प्रबंधक अजय सिंह को दे दी थी। इसके बाद अजय सिंह ने बेहद शातिराना अंदाज में उत्पीड़न करने के बाद 23 लोगों का तबादला कर दिया था। ये फैसला इन्हीं 23 कर्मचारियों में शामिल रामजी मिश्रा के मामले में आया है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नवभारत अखबार के 47 कर्मचारियों ने लगा दिया मजीठिया वेज बोर्ड का क्लेम

महाराष्ट्र के प्रमुख हिंदी दैनिक नवभारत में माननीय सुप्रीमकोर्ट के 13 अक्टूबर यानि आज के आदेश का असर दिखने लगा है। यहां आज दिनांक 13 अक्टूबर को बांबे यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट संलग्न महाराष्ट्र मीडिया एंप्लाइज यूनियन से जुड़े नवभारत हिंदी दैनिक के 47 कर्मचारियों ने सामूहिक रुप से ठाणे लेबर कमिश्नर कार्यालय में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाये का क्लेम फाइल किया।

इसी बीच खबर आयी कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि छह माह के अंदर श्रम विभाग और श्रम न्यायालय में मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित सभी मामलों का निपटारा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के ताजे आदेश की खबर और ठाणे लेबर कमिश्नर कार्यालय में क्लेम फाइल की खबर मिलते ही नवभारत कर्मियों ने खुशी का इजहार किया और वहीं प्रबंधन की सांस फूलने लगी है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश- ‘मजीठिया वेज बोर्ड के सभी प्रकरण 6 महीने के भीतर निपटाएं’

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता / दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए।

गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। हालांकि स्पष्टीकरण की याचिका जुलाई में ही दायर कर दी गई थी मगर इस पर फैसला आज आया जिससे मीडियाकर्मियों में एक बार फिर खुशी की लहर है।

आप सभी मीडियाकर्मियों से अपील है कि अपना बकाया हासिल करने के लिेए श्रम विभाग में क्लेम जरूर डालें अन्यथा आप इससे वंचित रह सकते हैं। अब अखबार मालिक किसी भी तरह से आनाकानी नहीं कर सकेंगे और मामले को लंबा नहीं खींच सकेंगे। अगर वे ऐसा करते हैं तो इस बार निश्चित रूप से विलफुल डिफेमेशन के दोषी करार दिए जाएंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
संपर्क : 9322411335 , shashikantsingh2@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया : जितेंद्र जाट की जीत से पत्रिका प्रबन्धन में भारी बौखलाहट

पत्रिका ग्वालियर के जितेंद्र जाट की शानदार जीत पत्रिका प्रबन्धन को हजम नहीं हो रही, इसीलिए जाट को जिस जगह बैठाया गया है उस जगह पर ख़ास तौर से CCTV कैमरा लगा दिया गया है ताकि यह देखा जा सके कि जाट से कौन-कौन कर्मचारी बात कर रहा है ताकि बाद में जाट से बात करने वाले कर्मचारी को सजा दी जा सके। साथ ही जाट के CCTV रेंज से बाहर जाते ही फोन कर पूछा जाता है कि जाट इस समय कहाँ पर हैं? कहीं कर्मचारियों से बात कर उनको मजीठिया क्लेम के लिए तैयार तो नहीं कर रहा?

इस तरह की तमाम आशंकाओं के कारण जाट पर पत्रिका के हेड ऑफिस जयपुर और ग्वालियर से दोहरी नजर रखी जा रही है। वहीँ दूसरी तरफ भोपाल के साथियों का केस भी फैसले के नजदीक है जिसमें पत्रिका प्रबन्धन को 100 प्रतिशत आशंका है कि भोपाल से भी 440 वोल्ट का झटका लगने वाला है इसीलिए भोपाल लेबर कोर्ट में न तो पत्रिका के लीगल मामले देखने वाला उपस्थित हो रहा और ना ही पत्रिका का वकील यह कह रहा कि जवाब जयपुर से आएगा। वर्ना अभी तक पत्रिका का वकील जयपुर से मिले दिशानिर्देश के अनुसार ही काम किया करता था लेकिन अब वकील अपने हिसाब से ही कोर्ट की कार्यवाही निबटा रहा है। इससे साफ़ तौर पर पत्रिका प्रबन्धन की घबराहट नजर आ रही है।

जाट की जीत से पहले तक अपने आपको चाणक्य मानने वाले पत्रिका के आला अधिकारियों ने अपने मालिकों को आश्वस्त किया हुआ था कि आप चिंता मत करो हम बैठे हुए हैं, हम कर्मचारियों को जीतने नहीं देंगे। लेकिन हुआ उलटा ही। इससे पत्रिका के मालिक चिढ गए उन चाणक्यों पर। इसी वजह से आला अधिकारियों का फ्यूज उड़ गया। अब उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या किया जाये?


मूल खबर :


कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एचटी मैनेजमेंट ने फिर कोई जवाब देने से इन्कार किया

हाईकोर्ट में रिट फाइल करने की आड़ में अगली तारीख ले ली…सीनियर वकील संजय कुमार सिंह मैनेजमेंट की ओर से पहुंचे डीएलसी कोर्ट… मामला मजीठिया वेज बोर्ड के कार्यान्वयन और ग्रेच्यूटी भुगतान में हुए फ्रॉड का है… पटना से खबर है कि मजीठिया मामले एवं उससे जुड़े ग्रेच्यूटी के सवाल पर डीएलसी पटना के यहां सुनवाई हुई और फिर हाईकोर्ट की आड़ लेकर मैनेजमेंट ने अगली तारीख ले ली।

पिछली बार भी यही हुआ था। मैनेजमेंट के एडवोकेट ने कहा कि हम इस सुनवाई के खिलाफ हाईकोर्ट गये हैं और अगली तारीख को कोई न कोई आदेश के साथ आएंगे, अन्यथा अगली तारीख को जवाब फाइल करेंगे। मगर इस बार भी फिर पुराना आलाप। इस बार मैनेजमेंट की ओर से सीनियर वकील संजय कुमार सिंह हाजिर हुए। अभी तक इस मामले में आरोपी शोभना भरतिया की ओर से कोई वकालतनामा दाखिल नहीं हुआ जबकि पिछली बार उन्हें स्पष्ट हिदायत दी गई थी। 

वर्कर्स की ओर से शिकायतकर्ता दिनेश कुमार सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट जब तक कोई आदेश पारित नहीं करता  या सुनवाई के लिए रिट एक्सेप्ट नहीं हो जाती, तब तक डीएलसी के यहां चल रही सुनवाई प्रक्रिया बाधित नहीं हो सकती है। मैनेजमेंट फिर न्याय प्रक्रिया को डिले करने की अपनी योजना में कामयाब हुआ और मामला अगली तारीख 11 नवम्बर तक के लिए टल गया।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : dksinghhh@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिंदुस्तान का पक्ष रखने डीएलसी के पास गए एचआर मैनेजर की हुई जमकर फजीहत

बरेली में बुधवार को उपश्रमायुक्त के समक्ष कर्मचारियों के उत्पीड़न के मामले में हिन्दुस्तान प्रबन्धन की ओर से पेश हुए एचआर प्रभारी सत्येंद्र अवस्थी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा। उनको प्रबन्धन का पक्ष रखे बगैर बैरंग लौटना पड़ा। डीएलसी ने ताकीद किया कि उनको (सतेंद्र अवस्थी) तब तक नहीं सुना जाएगा जब तक वह प्रतिवादियों की ओर से उनका पक्ष रखने का अधिकार पत्र लेकर नहीं आएंगे।

दरअसल मजिठिया क्रांतिकारी मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला ने उपश्रमायुक्त से शिकायत की कि हिन्दुस्तान प्रबन्धन मजिठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन-भत्तों व एरियर का उनके निर्णय व आदेश के क्रम में लाखों का भुगतान न करके उनका उत्पीड़न करने पर उतारू है। विधि विरुद्ध डोमेस्टिक जांच बैठा दी ताकि दबाव बनाया जा सके। मनमानी कार्रवाई व धमकियां दी जा रही हैं। ना तो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट और ना ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया जा रहा है। निर्मल कांत शुक्ला ने शिकायत में यह भी कहा कि हिन्दुस्तान प्रबन्धन तथाकथित डोमेस्टिक जांच के बहाने अपने परिसर में बुलाकर उनकी हत्या करना चाह रहा है।

उपश्रमायुक्त बरेली ने मामले को गंभीरता से लेते हुए हिंदुस्तान बरेली को नोटिस जारी किया और 4 अक्टूबर को अपना पक्ष अभिलेखीय साक्ष्य सहित प्रस्तुत करने का आदेश दिया। बुधवार को जब उपश्रमायुक्त कार्यालय में प्रबन्धन की ओर से एचआर प्रभारी सतेंद्र अवस्थी ने अपनी मौजूदगी की बात कही तो शिकायतकर्ता मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला ने उपश्रमायुक्त से कहा कि ये व्यक्ति एचटी मीडिया का नहीं है।

क्या इनके पास प्रतिवादिगणों की ओर से उनका पक्ष रखने का कोई अधिकारपत्र है? यदि नहीं तो फिर इनको सुनने का कोई मतलब नहीं क्योंकि ये सिर्फ संस्थान में चाय-पानी का बंदोबस्त करते हैं और डाक डिस्पैचर की भूमिका में रहते हैं। इनके अधिकारी बाद में ऊपरी अदालत में जाकर ये कहते है कि हमको तो सुना ही नहीं गया।कंपनी खुद सतेंद्र अवस्थी की ओर से रखे गए पक्ष को अपना पक्ष होने से मुकर जाती है। शिकायतकर्ता मनोज शर्मा ने ये भी कहा कि सतेंद्र अवस्थी ऑफ रोल कर्मचारी हैं। इनका एचटी से कोई मतलब नहीं। ना ही ये प्रबन्धन का हिस्सा हैं।

मनोज शर्मा, राजेश्वर विश्वकर्मा, निर्मल कांत शुक्ला की आपत्ति को उपश्रमायुक्त ने स्वीकार कर हिंदुस्तान प्रबंधन की ओर से आये सतेंद्र अवस्थी को नहीं सुना। फजीहत होती देख सतेंद्र अवस्थी खुद ही चुपचाप डीएलसी कार्यालय से खिसक लिए। अब उपश्रमायुक्त ने हिंदुस्तान के एचआर डायरेक्टर राकेश सिंह गौतम, बरेली यूनिट के जीएम योगेंद्र सिंह, बरेली के स्थानीय संपादक मनीष मिश्र को नोटिस जारी कर 16 अक्टूबर को तलब किया है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘हिंदुस्तान’ अखबार से छह करोड़ रुपये वसूलने के लिए आरसी जारी

मजीठिया प्रकरण में ‘हिंदुस्तान’ की सबसे बड़ी हार… लखनऊ से बड़ी ख़बर है। मजीठिया वेतनमान प्रकरण में दैनिक समाचार पत्र हिंदुस्तान की अब तक की सबसे बड़ी हार हुई है। कम्पनी का झूठ भी सामने आ गया है। यह भी सामने आया है कि मजीठिया वेज बोर्ड देने से बचने के लिए कम्पनी ने तरह तरह के षड्यंत्र किए। लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को करीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है। लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एम॰के॰ पाण्डेय ने 6 मार्च को हिंदुस्तान के खिलाफ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए जिलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है। श्रम अधिकारी ने जिलाधिकारी को भेजी रिकवरी-आरसी की धनराशि हिंदुस्तान से वसूल कर श्रम विभाग को देने को कहा है।

डीएम की अब यह ज़िम्मेदारी होगी की वह हिंदुस्तान से पैसा वसूल के श्रम विभाग को दें और फिर श्रम विभाग यह राशि मुकदमा करने वाले 16 कर्मचारियों को देगा। श्रम विभाग के इस आदेश से यह भी साबित हो गया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान नहीं दे रहा है। जबकि हिंदुस्तान प्रबंधन ने श्रम विभाग को यह लिखित जानकारी दी थी कि कम्पनी मजीठिया वेजबोर्ड के मुताबिक वेतन दे रही है। इसी आधार पर श्रम विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में यह गलत हलफ़नामा लगा दिया कि हिंदुस्तान मजीठिया के अनुसार वेतनमान दे रहा है। अब इस प्रकरण में गलत हलफ़नामा देने पर कम्पनी के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा भी चल सकता है। खुद श्रम विभाग ने यह लिखकर दिया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान नहीं दे रहा और ना ही विभाग को कागज उपलब्ध करा रहा है।

गौरतलब है कि सितम्बर 2016 को हिंदुस्तान व हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने प्रमुख सचिव श्रम के यहाँ शिकायत कर कहा था कि प्रबंधन मजीठिया वेतनमान के अनुसार वेतन नहीं दे रहा है। इसके बाद प्रबंधन उत्पीड़न पर उतर आया। आठ पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद श्रम विभाग में सभी पत्रकारों ने नौकरी से निकाले जाने और नवम्बर 2011 से 2016 के बीच मजीठिया वेतनमान का डिफ़्रेन्स दिए जाने का वाद दायर किया। बर्ख़ास्तगी का केस अभी विभाग में लम्बित है जबकि 6 मार्च को श्रम विभाग ने पत्रकारों के पक्ष को सही मानते हुए कम्पनी के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया। रिकवरी केस फ़ाइल करने में कुल 16 कर्मचारी शामिल थे। इन सभी को श्रम विभाग ने उनके वेतन के हिसाब से 10 लाख रुपए से 60 लाख रुपए तक भुगतान करने आदेश दिया है।

श्रम विभाग ने डीएम को जारी आरसी में कहा है कि यदि कम्पनी इस राशि का भुगतान तत्काल नहीं करती है तो कम्पनी की सम्पत्ति कुर्क कर राशि का भुगतान कराया जाए। हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र का झूठ इसी से समझा जा सकता है कि चार महीने की सुनवाई के बावजूद हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र अपनी ओर से एक भी लिखित जवाब दाखिल नहीं कर पाया।
कर्मचारियों ने मुकदमे में साक्ष्यों के साथ यह तर्क दिया की हिंदुस्तान एक नम्बर की कम्पनी है। प्रबंधन ने इसके ख़िलाफ़ कोई तर्क नहीं दिया जिससे यह साबित हुआ की कम्पनी एक नम्बर की है और मजीठिया अनुसार वेतन नहीं दिया जा रहा था।

कर्मचारियों के वक़ील शरद पाण्डेय ने श्रम विभाग में अपने तर्कों से साबित किया कि हिंदुस्तान ने अब तक मजीठिया वेतनमान नहीं दिया है और पूर्व में जो भी पत्र दिए वह झूठे थे। अनुभवी वकील शरद पाण्डेय ने कम्पनी के नामी-गिरामी वकीलों की फौज को अपने तर्कों से अनुत्तरित कर दिया। यह भी पता चला है कि हिंदुस्तान प्रबंधन ने पूर्व में भी जालसाजी करते हुए कोर्ट में इतने झूठे कागजात लगाए हैं कि आगे कोई भी वकील इनका केस लड़ने को तैयार नहीं हो रहा है। जिन 16 लोगों ने श्रम विभाग में वाद दायर किया था उनमें संजीव त्रिपाठी, प्रवीण पाण्डेय, संदीप त्रिपाठी, आलोक उपाध्याय, प्रसेनजीत रस्तोग, हैदर, लोकेश त्रिपाठी, आशीष दीप, हिमांशु रावत, एलपी पंत, जितेंद्र नागरकोटी, आरडी रावत, बीडी अग्रवाल, सोमेश नयन, रामचंदर, पंकज वर्मा शामिल है।

इन्हें भी पढ़ें…

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सोशल नेटवर्किंग जिताएगी ‘मजीठिया’ की जंग

जुटाना होगा जनाधार : हम देख ही रहे हैं कि मजीठिया के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट, लेबर कमिश्नर ऑफिस, लेबर कोर्ट और सरकार का रवैया क्या है। कितने अफ़सोस की बात है कि जिन लोगों ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर रिकवरी चालान इश्यू कराने तक की जीत हासिल की,उनमें से भी अधिकतर लोगों के खाते में पैसा नहीं पहुंचा है। बीयूजे सहित देश की कई संस्थाएं- संगठन हर स्तर पर संघर्षरत हैं ही, पर हमें मीडिया हाउसेस के खिलाफ़ अपनी जंग जीतने के लिए एक नई रणनीति भी अपनानी होगी। इस रणनीति के जनक यशवंत सिंह हैं, जिन्होंने ‘भड़ास 4 मीडिया’ लांच कर पत्रकारों को पूरे पत्रकारिता-जगत से जोड़ा।

मजीठिया-क्रांति में पत्रकारों को शामिल करने के मामले में इस वेबसाइट का योगदान अवर्णनीय है। लेकिन हमें इस क्रांति में आम जनता को भी शामिल करना चाहिए। इतिहास गवाह है कि अब तक सारी क्रांतियां जनाधार के बल पर ही सफल हुई हैं। ‘तीन तलाक ’ का मुद्दा और उस पर आया ऐतिहासिक फ़ैसला इसका नवीनतम उदाहरण है। अब ज़रूरत है कि हम महसाणा आयोग, वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट , मजीठिया वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों और उस पर न्यायपालिका व कार्यपालिका का रवैया तथा मीडिया हाउसेस की मनमानी को इतना प्रचारित करें कि यह गली- नुक्कड़ और चाय- पान की दुकानों तक पर चर्चा व बहस का मुद्दा बन जाए।

ज़ाहिर है कि इसमें अखबार और टीवी हमारा साथ नहीं देगा। लेकिन सोशल मीडिया आज इतना सशक्त माध्यम बन चुका है, जिसके सामने अख़बार और टीवी भी कमज़ोर है। देखिए न, अख़बार और टीवी मोदी- कीर्तन किए जा रहे हैं, इसके बावजूद सोशल मीडिया ने मोदी-सरकार के ख़िलाफ एक तबका तैयार कर दिया है। हम इस सबसे ज़्यादा ताक़तवर माध्यम का उपयोग मजीठिया पर जनाधार जुटाने के लिए बख़ूबी कर सकते हैं। बीयूजे की आम सभा में मेरे इस विचार का सभी ने खुले दिल से स्वागत किया था और इंदर जैन, जे.सी पांडे सहित कार्यकारिणी के सदस्यों ने इसकी रूपरेखा तैयार करने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी थी। वह ड्राफ्ट प्रस्तुत है, जिसमें करेक्शन और एडीशन की ज़िम्मेदारी हम सभी की है-

1. हम सभी प्रिंट मीडियाकर्मी फ़ेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, टंबलर, वीचैट आदि ज्यादा से ज्यादा सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़ें और उन पर अपनी सक्रियता बढ़ाएं। अपने ‘ कॉन्टैक्ट्स/ फ़्रेड्स’ को ‘भड़ास 4 मीडिया’ पढ़वाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित करें। 

2. हर बेवसाइट की अपनी अलग तरह की रीच और अप्रोच है। उसके स्वरूप को समझें, उसी के अनुसार सामग्री पोस्ट करें। जैसे कि आप फेसबुक पर पूरा आर्टिकल और ढेर सारे फ़ोटो पोस्ट कर सकते हैं, मगर इंस्टाग्राम मुख्य रूप से तस्वीरें पोस्ट करने के लिए है।

3. सबसे अहम् बात कि हमारी पोस्ट कैसी हो। अगर हम सीधे-सीधे मजीठिया का ज़िक्र करेंगे तो आम जनता क्या, हमारे – आपके घरवाले भी नहीं पढ़ना चाहेंगे। ज़रूरी होगा कि पोस्ट में निजी जीवन की घटनाओं- अनुभवों या सार्वजनिक चर्चाओं से मजीठिया को इंडायरेकटली जोड़ें, ताकि वह रूखी ख़बर की जगह इमोशनल , इंटरेस्टिंग, रीडेबल आइटम बन पड़े और लोग पढ़ने- ध्यान देने पर मज़बूर हो जाएं। संबंधित फ़ोटो सोने पर सुहागा का काम करेंगे । मैंने जल्दबाजी में इस तरह का पहला प्रयास अपने फ़ेसबुक अकाउंट Anil Rahi पर एक अलग पेज Anil Rahi : To The Point क्रिएट करके किया है। अगर ठीक लगे तो आप भी ऐसा कुछ करें, वर्ना सुझाव दें।

4. अपने अकाउंट में कांटैक्ट्स,फ्रेंड्स, फॉलोअर्स की संख्या बढ़ाएं। इसके लिए फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने के साथ – साथ खुद भी रिक्वेस्ट भेजने में संकोच न करें। जब बड़े- बड़े स्टार हमें रिक्वेस्ट भेज सकते हैं, फॉलो कर सकते हैं तो हमें कैसा संकोच !

5. फैमिली ग्रुप, फ्रेंड्स ग्रुप के अलावा भी तरह- तरह के ग्रुप से जुड़कर उनमें मजीठिया की चर्चा अप्रत्यक्ष रूप से करें।

6. प्रॉपर्टी, बिजनेस, फिटनेस, डेटिंग, रिलीजन आदि हर किस्म की कम्यूनिटी से भी जुड़ें और घुमा- फिराकर मजीठिया की बात करें।

7. पत्रकारों- गैरपत्रकारों की महसाणा- मजीठिया वाली पोस्ट पर लाइक, कमेंट, री-ट्वीट करने में कंजूसी न करें।

8. कानून की सीमा में रहते हुए मीडिया हाउसेस, लेबर कमिश्नर ऑफिस के अधिकारियों, कोर्ट्स के जजों- वकीलों के सहयोग , असहयोग, लापरवाही, पक्षपात आदि की चर्चा उनके नाम के उल्लेख के साथ करें।

9. जो लोग अखबारों में कार्यरत हैं, वे बगावती पोस्टिंग करके नौकरी न खोएं, जितने महीनों की सैलरी विदड्रॉ कर सकते हैं, करें। लेकिन मजीठिया संबंधी पोस्ट को लाइक, शेयर, री-ट्वीट वगैरह करने का साहस और सक्रियता ज़रूर रखें। ध्यान रहे कि आप डर कर मैनेजमेंट के तलवे भी चाटेंगे, तब भी आपकी नौकरी सुरक्षित नहीं है।  

10. हम में से कुछ लोग टीवी, रेडियो, स्कूल- कॉलेज के कार्यक्रमों आदि में आमंत्रित किए जाते हैं। वहां भी घुमा-फिरा कर मजीठिया और महसाणा का ज़िक्र करें। कुछ उसी तरह, जैसे कि नेताजी पुल का उद्घाटन करने आते हैं, मगर पुल से ज़्यादा अपनी और अपनी राजनीतिक पार्टी की उप्लब्धियां गिना जाते हैं। ख़ासकर मास मीडिया के स्टूडेंट्स से जुड़ने- जोड़ने का प्रयास करें।

11. पत्रकारों की छोटी- बड़ी ऐसी दर्जनों- सैकड़ों संस्थाएं हैं, जिनके ज़्यादातर सदस्य वर्किंग जर्नलिस्ट तो नहीं हैं, लेकिन जर्नलिस्ट वाला माइंडसेट रखते हैं। हम उन संस्थाओं को जोड़कर बीयूजे जैसे संगठन को और मज़बूत करें या फिर उनकी बेवसाइट्स, कम्युनिटीज़, ग्रुप्स से जुड़कर मजीठिया पर उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त करें।

12. वर्तमान सरकार को सपोर्ट करने वाली राजनीतिक पार्टियों से तो अपना दुखड़ा रोएं ही, विपक्ष की पार्टियों, प्रभावी लोगों को अपने पक्ष में खड़ा करें। इसके लिए लैपटॉप को किनारे रखकर खुद भी आना- जाना पड़ सकता है।

13. आजकल हर मशहूर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरद्वारों की अपनी बेवसाइट, पोर्टल, कम्युनिटी है। हमें उनके प्रमुख पुजारी, मुल्ला- मौलवी, पोप, गुरु साहब आदि से जुड़कर उनका समर्थन और सहयोग हासिल करना चाहिए। श्रद्धालु इनके प्रवचन को ऊपरवाले के फ़रमान की तरह ग्रहण करते हैं और हमारा 90 फ़ीसदी देश आस्तिक व श्रद्धालु है। इसके लिए नेटवर्किंग के अलावा पर्सनल विज़िट की भी ज़रूरत होगी। शुरुआत यूं भी हो सकती है कि हम लोग आते- जाते किसी मंदिर, मस्जिद गुरद्वारे में जाएं और पुजारी, पोप, मौलवी को इस हद तक कनविंस करें कि वे वहां पहुंचने वाले लोगों को मजीठिया के मुद्दे से परिचित कराएं, उन्हें हमारे पक्ष में खड़ा करें। इनकी बातों का असर बड़े- बड़े नेताओं और फिल्म स्टारों के आव्हान से भी ज्यादा होगा।

14. सक्रिय राजनीति से अलग और सरकारों के प्रभाव से  मुक्त अण्णा हज़ारे, बाबा रामदेव, श्री श्री रवि शंकर  जैसी हस्तियों को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया जाए। इसके लिए नेटवर्किंग के साथ फ़ोन कॉल और मेल- मुलाक़ात की भी ज़रूरत पड़ सकती है।

जनाधार जुटाने के ऐसे कई अन्य तरीके भी खोजे जा सकते हैं। मगर एक बात तय है। अगर हम सब पूरे हफ्ते में 22-24 घंटे भी मजीठिया के मुद्दे पर सोशल नेटवर्किंग को दें तो इस क्रांति की हवा के मंद झोखे देखते ही देखते आंधी- तूफ़ान बनकर देश को अपनी गिरफ़्त में ले लेंगे और ढीठ- बेगैरत मीडिया हाउसेस को वेतन व सुविधा संबंधी सारी सिफारिशें लागू करने के लिए मज़बूर होना पड़ेगा।

अनिल राही
anilrahii@gmail.com

ये भी पढ़ें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नवभारत कर्मियों ने दशहरा पर लिया प्रबंधन रूपी रावण के दहन का संकल्प (देखें वीडियो)

नवभारत कर्मचारियों ने महाराष्ट्र मीडिया इंप्लाइज यूनियन के बैनर तले शनिवार को विजयादशमी के अवसर पर सानपाड़ा पूर्व स्थित कार्यालय के सामने गेट मीटिंग की. मीटिंग में यूनियन से जुड़े करीब 70 कर्मचारियों के अलावा मिड-डे और डीएनए के कर्मचारी भी शामिल हुए. मीटिंग में नवभारत इकाई के अध्यक्ष केशव सिंह बिष्ट और सचिव अरुण गुप्ता ने अपनी बात रखी. मीटिंग के दौरान मजीठिया मुद्दे को जोर-शोर से उठाया गया. इस दौरान सभी कर्मचारियों ने नवभारत प्रबंधन को देने के लिए एक रिमाइंडर लेटर पर भी सिग्नेचर किया.

वक्ताओं ने कर्मचारियों की एकता पर बल दिया गया और कहा कि हम सफलता तभी पाएंगे जब एक रहेंगे. नवभारत इकाई के अध्यक्ष बिष्ट जी ने कहा कि हमारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि पिछले 20 वर्षों में नवभारत प्रबंधन ने कर्मचारियों का हर स्तर पर शोषण किया है. चाहे वेतन की बात हो या काम के घंटे की या फिर समय से वेतन मिलने की. प्रबंधन ने हमेशा कर्मचारियों को तरसाकर धमकी देते हुए प्रताड़ित किया है. यह सिलसिला पिछले 20 वर्षों से चला आ रहा है. लेकिन अब कर्मचारी जागरूक हुए हैं. वहीं सचिव अरुण गुप्ता ने अध्यक्ष बिष्ट जी की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है. अब सिर्फ पाना है. लेकिन पाने के लिए एकजुट रहना जरूरी है.

मीटिंग के दौरान मजीठिया के अलावा PF का मुद्दा उठा क्योंकि 1997 से 2005 तक प्रबंधन ने कुछ कर्मचारियों का एक भी पैसा PF नहीं काटा और न ही अपनी ओर से जमा किया है. इसके अलावा जब पीएफ काटना शुरू किया तो फैक्ट्री की तरह सीलिंग लगाकर काटा जा रहा है. इस संबंध में पीएफ कमिश्नर से की गई शिकायत और उस पर चल रहे काम की जानकारी दी गई.

मीटिंग के दौरान मशीनों का भी मुद्दा उठा क्योंकि प्रिंटिंग मशीन का मेंटेनेंस नहीं होने के कारण अखबार की छपाई अच्छी नहीं होती जिसका दोषारोपण प्रिंटर पर किया जाता है. दो दिन पहले प्रिंटर सागर चौहान को इसलिए नोटिस दिया गया. सागर ने प्रोडक्शन मैनेजर बंशीलाल राहत द्वारा प्रिंटिंग का मुद्दा उठाने पर मशीनों का मेंटेनेंस नहीं किए जाने की बात कही. अंत में सभी कर्मचारियों ने विजयादशमी के अवसर पर नवभारत प्रबंधन रूपी रावण का दहन करने का संकल्प लिया क्योंकि यही रावण कर्मचारियों को प्रताड़ित कर रहे हैं और समय पर वेतन तक नहीं दे रहे हैं. मजीठिया की मांग करने और मशीनों की समस्या बताने पर कर्मचारियों को नोटिस पकड़ा रहे हैं.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया मामला : बीमार जागरणकर्मी के जम्मू तबादला के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 13 अक्टूबर को सुनवाई

पंकज कुमार वर्सेज यूनियन आफ इंडिया रिट याचिका की सुनवाई जस्टिस रंजन गोगई व जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच करेगी… बिहार के गया जिले से जम्मू तबादला किये गए दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज कुमार के रिट याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर की टेनटेटिव तिथि निर्धारित की है. जस्टिस रंजन गोगई व जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच सुनवाई करेगी. बिहार के पूर्व कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नागेन्द्र राय सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता पंकज कुमार की ओर से अदालत में पक्ष रखेंगे.

क्या है मामला : पंकज कुमार दैनिक जागरण के गया कार्यालय में बतौर सब एडिटर कम रिपोर्टर के पद पर कार्यरत हैं. पिछले साल सितम्बर में पंकज कुमार को पेसमेकर लगाया गया. पूर्व में २००४ में भी पेसमेकर लगा था. पिछले साल अक्टूबर में एक अन्य आपरेशन हुआ. बीमारी व आर्थिक परेशानी से जूझ रहे पंकज ने मजीठिया वेज बोर्ड की मांग की. इसके बाद 21 दिन की वेतन कटौती मैनेजमेंट द्वारा कर दी गयी. मैनेजमेंट ने दबाव बनाने के लिए बीमार व अस्वस्थ पत्रकार पंकज को कार्यालय आकर बायोमेट्रिक हाजिरी लगाने को बाध्य किया. पंकज कुमार लुंगी पहनकर असहनीय दर्द के बीच कार्यालय जाते रहे. उन्होंने अर्न लीव में 21 दिन की वेतन कटौती को एडजस्ट करने की गुहार लगाई लेकिन कंपनी ने कोई तवज्जो नहीं दिया. मजीठिया का भूत उतारने के लिए एक मार्च से पटना ट्रान्सफर का मौखिक आदेश दिया गया.

पंकज कुमार ने 25 मार्च को श्रम आयुक्त के यहाँ मजीठिया की मांग करते हुए आवेदन दिया. कंपनी ने बैकडेट में 20 मार्च की तिथि में जम्मू ट्रान्सफर कर दिया. एक मार्च को प्रेषित कंपनी का ट्रान्सफर आर्डर पंकज को तीन अप्रैल को मिला. कंपनी की तानाशाही के खिलाफ पंकज कुमार सुप्रीम कोर्ट की शरण में न्याय की गुहार लगाने पहुंचे और दो याचिकाएं दाखिल की. 330/2017 रिट की सुनवाई 13 अक्टूबर को संभावित है.

इस बीच पंकज कुमार के ट्रान्सफर आर्डर के खिलाफ मगध प्रमंडल के सहायक उप श्रमआयुक्त विजय कुमार का 30 अगस्त का आदेश दैनिक जागरण के मुंह पर तमाचा है. उप श्रम आयुक्त विजय कुमार ने अपने आदेश में कहा है कि बीमार व अस्वस्थ पत्रकार पंकज कुमार को गया से जम्मू तबादला मजीठिया की मांग करने के कारण किया गया है. आदेश में साफ़ है कि प्रबंधन को ट्रान्सफर करने का अधिकार है. लेकिन अधिकार को कर्मचारी की जायज मांग मांगने के कारण उपयोग करना श्रम कानून के हित में नहीं है. उप श्रम आयुक्त विजय कुमार ने अपने आर्डर में साफ़ लिखा है कि पंकज कुमार का ट्रान्सफर आर्डर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है. साथ ही कंपनी के खिलाफ़ इस आरोप कि पुष्टि हो गयी कि पंकज कुमार को मजीठिया वेज की अनुसंशा का कोई लाभ देने का एक भी प्रमाण सुनवाई के दौरान देने में कंपनी सफल नहीं हो सकी.

पंकज ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में कंपनी को 32 लाख 90 हजार का डिमांड नोटिस अगस्त में भेजा. कंपनी की ओर से डिमांड नोटिस का कोई जबाव नहीं आया. इसके बाद पंकज ने श्रम सचिव से अनुरोध किया कि वे गया के कलेक्टर से दैनिक जागरण के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कराएं. पंकज कुमार की शिकायत पर जागरण कार्यालय पहुंचे जिला श्रम अधीक्षक जुबेर अहमद को मैनेजमेंट ने परिसर के अन्दर घुसने नहीं दिया. जागरण पर सर्विस बुक नहीं देने, ईपीएफ, स्वास्थ्य बीमा का लाभ न देने, गया यूनिट में मजीठिया वेज का अनुपालन न होने सहित कई आरोप हैं. बिहार के श्रम आयुक्त गोपाल मीणा पिछले दो महीने से उप श्रम आयुक्त को आरोप की जाँच कर रिपोर्ट समर्पित करने को कह रहे हैं. लेकिन श्रम आयुक्त श्री मीणा के आर्डर का अनुपालन उप श्रम आयुक्त डॉ. अपर्णा के स्तर से अभी तक नहीं किया गया है.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ अखबार ने अपने कर्मचारियों में मजीठिया वेज बोर्ड का का बकाया एरियर वितरित किया

देश के प्रमुख बिजनेस समाचार पत्र ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से खबर आ रही है कि इस अखबार ने अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया लाखों रुपये का एरियर दे दिया है। कर्मचारियों को पांच से आठ लाख रुपये तक उनका बकाया एरियर देकर वेतन वृद्धि का भी काम प्रबंधन ने किया है। हालांकि ये लाखों रुपये का एरियर सिर्फ उन्हीं मीडिया कर्मियों को दिया गया है जिनका वेतन कम था।

जिनका वेतन ज्यादा था, उनको इसका लाभ नहीं मिला है। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए इस अखबार के 12 संस्करणों में कम वेतन पाने वाले मीडियाकर्मियों को पांच से आठ लाख रुपये का उनका बकाया दिया गया है। हालांकि मजीठिया के जानकार इस दिए गए एरियर को ऊंट के मुंह में जीरा बता रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दूसरी बार भी मजीठिया सुनवाई में नहीं आया एचटी मैनेजमेंट

पटना : मजीठिया मामले में एक बार फिर हिन्दुस्तान टाइम्स मैनेजमेंट भाग खड़ा हुआ। कल 25 सितम्बर को श्रम विभाग के उप सचिव अमरेंद्र मिश्र के यहां सुनवाई आरंभ हुई। एचटी मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया। एक एडवोकेट आए मगर न तो उसके पास कंपनी की तरफ से दिया हुआ कोई वकालतनामा था और न ही कोई मांगी गई सूचना का कंपलायन्स। दूसरी बार लगातार प्रबंधन की अनुपस्थिति को उप सचिव अमरेंद्र मिश्र ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि यहां कानून से बढ़कर कोई नहीं है।

राकेश गौतम खुद पहली बैठक में ही उप सचिव को सुनवाई के दौरान यह लिखित दिया है कि पटना संस्करण एक पृथक स्टेबलिशमेंट है और यह दिल्ली से अलग है। उनके इस दावे को कामगारों की ओर से अधिकृत नेता दिनेश सिंह ने चुनौती दी कि पटना जब दिल्ली से पृथक एक अलग स्टेबलिशमेंट है तो राकेश गौतम सुनवाई से बाहर निकलें। एडवोकेट भी इस मामले की आरोपी शोभना भरतिया की ओर से वकालतनामा लेकर आएं। यह पिछली बार हुआ था और पुनः दोबारा यही पूरा वाकया दुहराया गया।

उनके बयान ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने में हुए घपले का भी राज खुद खोल दिया। उनके खुलासे से यह स्पष्ट हुआ कि एचटी पटना जो अपने रेवेन्यू के चलते आरंभ से ही ग्रुप 1A में रहा है, उसे इस बार राकेश गौतम ने नम्बर तीन में रखा और वह भी महज गिने चुने लोग तक सीमित। कुल मिलाकर पटना में एचआर हेड कोर्ट से लेकर कार्यालय तक हंसी का पात्र बने हुए हैं।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया मामला : प्रभात खबर के खिलाफ मिथलेश कुमार के रिव्यू पिटीशन पर सुप्रीमकोर्ट में 5 को सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ी खबर आ रही है। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे प्रभात खबर के आरा (बिहार) के ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार बनाम प्रभात खबर मामले में दायर रिव्यू पिटीशन पर 5 अक्टूबर को सुनवाई होगी। यह सुनवाई विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायाधीश नवीन सिन्हा द्वारा की जाएगी।

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे प्रभात खबर के आरा (बिहार) के ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार का प्रबंधन ने तबादला कर दिया तो मिथिलेश कुमार ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपने एडवोकेट दिनेश तिवारी के जरिये गुहार लगा दी थी। इस मामले में मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और नागेश्वर राव की खंड पीठ ने मिथिलेश कुमार के पक्ष में कदम उठाते हुये उनके ट्रांसफर पर अंतरिम रोक लगा दिया था। मगर फिर भी प्रभात खबर प्रबंधन ने उन्हें ज्वाईन नहीं कराया।

इसके बाद यह मामला ३ मई २०१७ को मिथिलेश कुमार के अधिवक्ता दिनेश तिवारी ने सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई के सामने रखा था। 19 जून 2017 को जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड का जो निर्णय आया उस पर मिथलेश कुमार का कहना है कि मेरे मामले पर स्पष्ट पक्ष नहीं रखा गया। इसके बाद मिथलेश कुमार ने अपने एडवोकेट दिनेश तिवारी के जरिये सुप्रीमकोर्ट मे रिव्यू पिटीशन दायर किया। इस पर 5 अक्टूबर को सुनवाई होगी। इस सुनवाई पर देश भर के मीडियाकर्मियों की नजर होगी।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया मामला : प्रभात खबर प्रबंधन के झूठ की होगी जांच

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर प्रबंधन के खिलाफ माननीय सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे प्रभात खबर के आरा (बिहार) के ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार बनाम प्रभात खबर मामले में सुनवाई के दौरान माननीय उप-श्रमायुक्त पटना के न्यायालय में प्रभात खबर प्रबंधन के प्रतिनिधि के रूप में शामिल महाप्रबंधक (फाइनेंस) कौशल कुमार अग्रवाल ने कहा कि प्रभात खबर द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड द्वारा निर्धारित वेतनमान सहित सारी सुविधाएं अपने शत प्रतिशत कर्मचारियों को दिया जा रहा है। अखबार प्रबंधन के इस तर्क का प्रभात खबर के आरा ब्यूरोचीफ मिथलेश कुमार ने कड़ा विरोध किया और कहा कि प्रबंधन झूठ बोल रहा है। इस अखबार के एक भी कर्मी को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं मिला है। इस पर उप-श्रमायुक्त वीरेंद्र कुमार ने कहा कि कर्मचारियों के पेमेंट से संबंधित बैंक स्टेटमेंट अगली तिथि को लेकर उप श्रमायुक्त कार्यालय में जमा करें।

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे प्रभात खबर के आरा (बिहार) के ब्यूरो चीफ मिथिलेश कुमार का प्रबंधन ने तबादला कर दिया तो मिथिलेश कुमार ने सीधे सुप्रीमकोर्ट में अपने एडवोकेट दिनेश तिवारी के जरिये गुहार लगा दी थी। इस मामले में मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और नागेश्वर राव की खंडपीठ ने मिथिलेश कुमार के पक्ष में कदम उठाते हुये उनके ट्रांसफर पर अंतरिम रोक लगा दिया था। मगर फिर भी प्रभात खबर प्रबंधन ने उन्हें ज्वाईन नहीं कराया। इसके बाद यह मामला ३ मई २०१७ को मिथिलेश कुमार के अधिवक्ता दिनेश तिवारी ने सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई के सामने रखा था। अब उपश्रमायुक्त पटना ने इस मामले में दशहरा के बाद की अगली तिथि दी है जिस पर प्रभात खबर प्रबंधन को अपने दस्तावेज के साथ आकर यह साबित करना पड़ेगा कि उसने अपने सभी अखबारकर्मियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दे दिया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जांच करने पहुंचे श्रम अधीक्षक को दैनिक जागरण के मैनेजर ने गेट के अंदर ही नहीं घुसने दिया

कानून और नियम को ठेंगे पर रखता है दैनिक जागरण प्रबन्धक… गया के श्रम अधीक्षक के साथ दैनिक जागरण प्रबंधक ने की गुंडागर्दी… नहीं करने दिया प्रेस की जांच… पंकज कुमार दैनिक जागरण गया के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं. इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड मांगा तो प्रबंधन ने इन्हें परेशान करना शुरू कर दिया… पंकज ने बिहार के श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के यहां एक आवेदन दिनांक 26.07.2017 को दिया था.. इसमें पंकज कुमार ने आरोप लगाया था कि गया सहित दैनिक जागरण बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर मीडियाकर्मियों को लाभ नहीं दिया जा रहा है. 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकारों एवं गैर-पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक समेत कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत ग्रेड की घोषणा भी नहीं की गई है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए अपने ज्ञापांक 3/डी-96/2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17 के माध्यम से दैनिक जागरण की नियमानुकूल आवश्यक जांच करने का आदेश निर्गत किया था तथा कृत कारवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराने का आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया था.  श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के उक्त आदेश के अनुपालन हेतु कल दिनांक 19 सितम्बर को श्रम अधीक्षक, गया जुबेर अहमद दैनिक जागरण प्रेस की जांच करने के लिए गए थे. परन्तु उन्हें प्रेस के मुख्य द्वार के अंदर प्रवेश करने की ईजाजत दैनिक जागरण के प्रबन्धक द्वारा नहीं दी गई.

यह घटना प्रबन्धक की गुंडागर्दी और कानून की अवहेलना को दर्शाता है.  पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. अपने गया से जम्मू तबादले को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा की मांग की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था.

बिहार से एडवोकेट मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : tiwarygaya@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया मामला : मुंबई हाईकोर्ट ने दिया डीबी कॉर्प लि. को कर्मचारियों का बकाया जमा करने का निर्देश

देश की आर्थिक राजधानी से एक बड़ी खबर आ रही है। मुंबई हाई कोर्ट ने ‘दैनिक भास्कर’ की प्रबंधन कंपनी “डी. बी. कॉर्प लि.” को निर्देश दिया है कि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार, प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज शेख की जो बकाया व एरियर्स की राशि बनी है, जिसके आधार पर श्रम विभाग ने वसूली प्रमाण-पत्र जारी किया है, उसका हिस्सा वह कोर्ट में जमा करे। इसी के साथ कोर्ट ने इस मामले में किसी भी तरह की सुनवाई पर दो सप्ताह की रोक लगा दी है।

गौरतलब है कि इन तीनों मीडियाकर्मियों ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा के दिशा-निर्देश पर मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक, वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17 (1) के तहत महाराष्ट्र के लेबर कमिश्नर कार्यालय में अपने बकाए की मांग की थी… यह राशि 10 लाख से लेकर 42 लाख रुपए तक बनी है, जिसे पाने के लिए इन्होंने उक्त विभाग में क्लेम लगाया था। इनके क्लेम से बौखलाए “डी. बी. कॉर्प लि.” प्रबंधन ने आनन-फानन में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का सीकर (राजस्थान) और लतिका चव्हाण का सोलापुर (महाराष्ट्र) ट्रांसफर कर दिया, जबकि आलिया शेख का ट्रांसफर न करने के पीछे कंपनी की रणनीति थी… जी हां, सिंह और चव्हाण ने इस ट्रांसफर को जब इंडस्ट्रियल कोर्ट में चुनौती दी और कोर्ट में कहा कि ट्रांसफर इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि हमने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपना बकाया मांगा है तो जवाब में कंपनी ने शेख के मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि इनका ट्रांसफर ‘मजीठिया’ के चलते किया गया होता तो शेख भला कैसे बच पातीं… लेकिन उनका ट्रांसफर तो नहीं किया गया है!

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह और लतिका चव्हाण ने कंपनी का डटकर मुकाबला किया… बेशक, लतिका को लेबर कोर्ट से राहत नहीं मिली। यह बात और है कि कोर्ट द्वारा सिंह के पक्ष में स्टे देने के बावजूद यह घाघ कंपनी उन्हें ड्यूटी पर लेने में आना-कानी करने लगी तो सिंह ने “डी. बी. कॉर्प” के खिलाफ लेबर कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दायर कर दिया… आखिर कंपनी को मजबूरन उन्हें मुंबई में ही ड्यूटी ज्वाइन करानी पड़ी! वैसे लतिका ने भी हिम्मत नहीं हारी है… उन्हें भी अपने देश की न्याय-व्यवस्था पर भरोसा है। लतिका ने लेबर कोर्ट के फैसले को मुंबई होई कोर्ट में चुनौती दी है, जिसकी सुनवाई चल रही है।

आपको बता दें कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों की खातिर असिस्टेंट लेबर कमिश्नर नीलांबरी भोसले के समक्ष इन तीनों मीडियाकर्मियों की सुनवाई करीब एक-डेढ़ साल तक चली… अंतत: सुश्री भोसले ने जब यह पाया कि इन तीनों का दावा सही है, उन्होंने “डी. बी. कॉर्प” को आदेश दिया कि वह इनका बकाया शीघ्र अदा करे। लेकिन चूंकि इस कंपनी ने तीन सप्ताह बाद तक भी उक्त आदेश पर अमल नहीं किया, लिहाजा सहायक कामगार आयुक्त सुश्री भोसले ने “डी. बी. कॉर्प” के विरुद्ध आरसी (रिकवरी सर्टीफिकेट) जारी कर दिया… मुंबई शहर के जिलाधिकारी से अपील की कि वे संबंधित कंपनी से (भू-राजस्व की भांति) वसूली करके इन मीडियाकर्मियों को उनकी बकाया राशि दिलाएं।

जाहिर है कि लेबर डिपार्टमेंट से जैसे ही यह आरसी जारी हुई, मुंबई के जिलाधिकारी के निर्देशानुसार, तहसील कार्यालय की टीम “डी. बी. कॉर्प” के माहिम (मुंबई) स्थित कार्यालय पहुंच गई… इसके बाद तो कंपनी में हड़कंप मच गया! जैसा कि अनुमान था, कंपनी भागकर मुंबई हाई कोर्ट पहुंची और स्टे के लिए कोर्ट के सामने झारखंड के एक पुराने मामले को बतौर रिफरेंस रखा। फिर भी कोर्ट की कॉपी से प्रतीत होता है कि वहां कंपनी की चाल तब धरी की धरी रह गई, जब माननीय अदालत ने निर्देश दिया कि वह इन मीडियाकर्मियों की बकाया राशि का पार्ट पेमेंट कोर्ट में जमा करवाए… तब (दो सप्ताह) तक इस मामले में कंपनी को राहत मिल गई है।

माना जा रहा है कि पार्ट पेमेंट के तौर पर कंपनी को इन मीडियाकर्मियों की बकाया राशि का भले ही 40-50 फीसदी रकम कोर्ट में जमा करवानी पड़े, वह रकम भी कई लाख के आंकड़े तक पहुंच जाएगी। बहरहाल, इस मामले की अगली सुनवाई नवंबर की पहली तारीख को मुंबई उच्च न्यायालय में निर्धारित है।जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ने वाले एडवोकेट उमेश शर्मा के सुझावानुसार ये कर्मचारी  संविधान के अन्नुछेद २२६ ( ३) के अंतर्गत,  उस राशि को लेने का आवेदन अब उच्चा न्यायालय में कर सकते हैं

शशिकांत सिंह
पत्रकार-आरटीआई एक्सपर्ट एवं एनयूजे मजीठिया सेल समन्वयक
मोबाइल: 9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया की जंग : दस दिन में भेजें नेशनल यूनियन की सदस्यता सूची

मजीठिया वेजबोर्ड को पूरी तरह लागू करवाने की जंग को अंजाम तक पहुंचाने के लिए बनाई जा रही नेशनल यूनियन के गठन के लिए सभी राज्यों के मजीठिया क्रांतिकारियों से निवेदन है कि वे अपने क्षेत्र या राज्य में मजीठिया वेजबोर्ड की लड़ाई  लड़ रहे या इसमें शामिल होने के इच्छुक साथियों की सूची नीचे दिए जा रहे फारमेट के अनुसार तैयार करके ए-4 कागज पर प्रिंट करने के बाद सदस्यों के हस्ताक्षर करवाकर दस दिनों के भीतर भिजवाने की व्यवस्था करवाने का कष्ट करें। इसके अलावा इसी फारमेट के अनुसार बनाई गई सूची की साफ्ट कापी में सदस्य के संस्थान और उसके पद की अतिरिक्त जानकारी भी भर कर मेल करने का भी कष्ट कीजिएगा। नीचे दिया गए फारमेट को ही प्रिंट करने के बजाय इसी तरह की डॉक्युमेंट फाइल बनवा कर टाइम या एरियल फांट में १० या १२ साइज में यह जानकारी टाइप करवाएं।

एक ही फाइल में सभी साथियों की जानकारी टाइप की जाए। सिर्फ सीरियल नंबर का कॉलम खाली रखा जाए, ताकि अगर जरूरत पड़ी तो इसे बाकी साथियों की सदस्यता सूची अनुसार नंबर डालकर पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सके। इससे सभी साथियों को एक जगह एकत्रित होने की असुविधा और खर्च से बचा जा सकेगा। जो साथी अपनी जानकारी गोपनीय तौर पर भिजवाना चाहते हैं, वे सिर्फ नीचे दी गई मेल आईडी के माध्यम से जानकारी भेज सकते हैं। इन्हें सदस्यता फार्म मेल के माध्यम से भेज दिया जाएगा। वहीं बाकी साथियों को भी सदस्यता फार्म भिजवाने की व्यवस्था बाद में की जाएगी।  

फिलहाल पहले पंजीकरण का कार्य करने के अलावा बैंक खाता खोलने और अन्य आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही सदस्यता फार्म भरवाए जाएंगे और शुल्क इत्यादि की प्राप्ति के साथ ही सभी सदस्यों और पदाधिकारियों को यूनियन के आईकार्ड भी जारी किए जाएंगे। पहले पंजीकरण के लिए गठित कार्यकारिणी के पदाधिकारी बाकी साथियों की सुविधानुसार सभी राज्यों का दौरा भी करेंगे। फिलहाल इस यूनियन के गठन का मकसद किसी अन्य यूनियन को नीचा दिखाना या इन्हें टक्कर देना नहीं है, बल्कि इनके सदस्यों व पदाधिकारियों को भी इसमें जुडऩे का निमंत्रण दिया जाता है, ताकि अखबारों में कार्यरत, निलंबित, निष्कासित या सेवानिवृत कर्मचारियों को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया जा सके।

फिलहाल यूनियन का प्रथम मकसद मजीठिया वेजबोर्ड को अक्षरश: लागू करवाना और अखबार कर्मियों के साथ की जा रही ज्यादतियों को रोकना रहेगा। इसके लिए मालिकों की संस्था से सीधे बात करने के अलावा इन्हें कटघरे में खड़ा करने के लिए एकजुट कोशिश की जाएगी। पिछली बार अलग-अलग गुटों में जंग लडऩे का नतीजा हम सब देख ही चुके हैं। लिहाजा एकजुट होकर सुनियोजित  तरीके से अपना हक लेने के लिए अब ऐसा कानूनी जाल बुना जाएगा, जिससे माननीय सर्वोच्च न्यायालय की आवमानना की परवाह किए बिना ज्यादतियां कर रहे अखबार मालिक बाहर ना निकल पाएं। वैसे भी किसी ने ठीक ही कहा है संघ यानि एकजुट होने में ही शक्ति निहित होती है।

लिहाजा सभी साथी चाहें वे मजीठिया वेजबोर्ड के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं या फिर किसी कारणवश जो लोग खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं, वे इस यूनियन का सदस्य बनकर एक बड़ी ताकत के साथ अपनी आवाज बुलंद करने का अंतिम अवसर अपने हाथ से जाने न दें। यह यूनियन सिर्फ पत्रकारों की नहीं बल्कि सभी अखबार कर्मियों की यूनियन है। चाहें वे नियमित हों या फिर अनुबंध पर, कार्यरत हैं या फिर निष्कासित, या फिर नवंबर 11 के बाद सेवानिवृत्त हुए कर्मचारी सभी निसंकोच इस यूनियन के साथ जुड़ कर अपना हक प्राप्त करने की ताकत पा सकते हैं। यूनियन सभी के लिए लेबर विभाग और लेबर कोर्ट में चल रहे मुकद्दमों से जुड़ी कानूनी जानकारी मुहैया करवाने से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक एकजुट होकर लड़ाई लडऩे की योजना पर काम करेगी। वहीं हाल ही में आए निर्णय के अनुसार नियमित और अनुबंध कर्मियों को भी उनका एरियार और नया वेतनमान दिलवाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों पर भी दबाव बनाने की रणनीति पर काम करेगी। अन्य कई योजनाएं दिमाग में हैं, फिलहाल शुरुआत तीन अक्टूबर के बाद दिल्ली से की जाएगी। फिर यह आंदोलन पूरे देश में फैलेगा।

कुछ साथियों को इस बात को लेकर असमंजस है कि वे तो पहले से मौजूद यूनियनों के सदस्य या पदाधिकारी हैं, तो इन्हें स्पष्ट किया जा रहा है कि यह अच्छी बात है कि वे किसी यूनियन के संरक्षण में हैं। फिलहाल वे इस यूनियन की सदस्याता जरूर लें, क्योंकि हम एक ऐसा राष्ट्रीय मंच तैयार करने जा रहे हैं जो बाकी सबसे हटकर हो और असरदार उपस्थिति के साथ सबको चकित करके रख दे। पहले से यूनियनों में शामिल साथियों के अनुभव का भी इस यूनियन को फायदा मिलेगा। कुछ नया करना है तो दूसरों की लकीर को काटने के बजाय एक बड़ी लकीर खिंचना ही बेहतर विकल्प होता है।

रविंद्र अग्रवाल
पता: वार्ड-8, कॉलेज रोड कांगड़ा, जिला कांगड़ा हिमाचल प्रदेश-176001
संपर्क नंबर: 9816103265, 9736003265, 9418394382
ईमेल आईडी:  ravi76agg@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया मामले मे चल रही सुनवाई से भाग खड़ा हुआ एचटी मैनेजमेंट

एचटी ग्रुप मामले को लटकाने के लिए हाईकोर्ट पहुंचा

पटना : हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप में मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किए जाने तथा ग्रेच्युटी के कैलकुलेशन मे भारी गड़बड़ी की शिकायत को लेकर पटना डीएलसी के यहां अलग-अलग दो चरणों मे सुनवाई हुई। 9 सितम्बर को सबसे पहले 11 बजे दिन से ग्रेच्यूटी को लेकर पहली सुनवाई थी मगर मैनेजमेंट भाग खड़ा हुआ। उसके अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने लिखित सूचना दी कि प्रबंधन ने इस मामले को लेकर पटना उच्च न्यायालय में एक रिट दायर की है, इसलिए इस पर सुनवाई रोकी जाय।

11 पत्रकार और गैर पत्रकारों द्वारा दायर मुख्य शिकायतकर्ता होने के नाते मैं दिनेश कुमार सिंह ने जब प्रबंधन के एडवोकेट से पूछा कि अभी सुनवाई शुरू नहीं हुई और आपने कोई जवाब तक फाईल नही किया फिर किस आदेश के खिलाफ कोर्ट गये? कोर्ट का कोई स्टे आर्डर है? तब उन्होंने कहा- नहीं। प्रबंधन के एडवोकेट से यह पूछा गया कि आप किसके एडवोकेट हैं तो उन्होंने कहा कि प्रबंधन की ओर से। फिर पूछा गया कि वकालतनामा कहां है। यहां पार्टी एचटी के चेयरपर्सन शोभना भरतिया हैं, उनके हस्ताक्षर के साथ वकालतनामा के साथ आइए। उन्होंने कहा कि अगली सुनवाई में वे शोभना भरतिया के वकालतनामा के साथ आएंगे, साथ ही कोर्ट का स्टे नहीं ला सके तो सुनवाई अगली तिथि 7 अक्टूबर को जवाब और उसके तमाम कंपलायन्स के साथ आएंगे।

यह विदित है की ग्रेच्यूटी के कैलकुलेशन के लिए उन्हें मजीठिया का फिटमेन्ट चार्ट देना होगा और इसमें गड़बड़ी और किसी तरह की हेराफेरी की सजा बहुत ही सख्त है। साफ है शोभना भरतिया को जेल जाना भी पड़ सकता है। उसी दिन दूसरी सुनवाई पुनः दो बजे से शुरू हुई और प्रबंधन ने यहीं से रटे हुए तोते की तरह बात शुरू की। प्रबंधन ने कहा कि यूनियन को हम नहीं मानते हैं। डीएलसी ने कहा कि इस मामले का निष्पादन हो चुका है, ऐसे में आप पुरानी बातों में समय जाया नहीं कर सकते।

पुनः वही सवाल उठा। शोभना भरतिया मुख्य आरोपी हैं इसलिए आरोपी के बचाव में यदि आप आते हैं तो उनका वकालतनामा साथ लाइए। प्रबंधन के एडवोकेट ने कहा कि वे शोभना भरतिया का वकालतनामा 20 सितम्बर तक जमा करा देंगे। उसके बाद सुनवाई की तिथि तय हो जाएगी। इस बार एचटी ग्रुप के बेतुके तर्क के लिए मशहूर एचआर निदेशक राकेश गौतम कहीं नजर नहीं आए।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मजीठिया वेजबोर्ड के लिए राष्ट्रीय यूनियन की तैयारी शुरू

साथियों, मजीठिया वेजबोर्ड की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए काफी दिनों से एक राष्ट्रीय स्तर की यूनियन बनाने को लेकर आवाज उठ रही थी। इसे देखते हुए दिल्ली/नोएडा के साथियों के सहयोग से इस सोच को अमलीजामा पहनाने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। पहले इस बात को लेकर मंथन हुआ कि क्या यूनियन के गठन के लिए पहले सभी साथियों की बैठक बुलाई जाए और फिर पंजीकरण की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाए। फिर काफी सोच विचार के बाद तय किया गया है कि त्योहारी सीजन होने के कारण सभी का एकत्रित हो पाना संभव नहीं है। लिहाजा दिल्ली के नजदीक के साथियों की मदद से पहले यूनियन का गठन कर लिया जाए और फिर किसी दिन सभी की सुविधा अनुसार एक महासभा बुलाकर शक्ति प्रदर्शन किया जाए।

फिलहाल तय हुआ है कि सभी राज्यों के मजीठिया क्रांतिकारी अपने-अपने समूह या जानकारी में चल रहे साथियों की एक सूची तैयार करें। इसमें व्यक्ति का नाम, स्थायी पता, संपर्क नंबर और  ईमेल आईडी सहित अंत में हस्ताक्षर की जगह रखी जाए। इस फारमेट को अंग्रेजी में टाइप करके इसका प्रिंट लेकर इसमें सभी के हस्ताक्षर करके इसे नीचे दिए पते पर भेज दिया जाए। इस आधार पर यूनियन की सदस्य संख्या तय हो जाएगी। पंजीकरण होने के बाद ही तय की गई पंजीकरण फीस सहित मासिक फीस के बारे में सबको उनकी ईमेल आईडी या व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिये सूचित किया जाएगा।

यूनियन के उद्देश्य, संविधान सहित अन्य योजनाओं की सूचना सार्वजनिक नहीं की जाएगी, इसकी जानकारी सदस्यों की ईमेल आईडी या मोबाइल ग्रुप के जरिये दी जाएगी। इस यूनियन का मकसद पहले से मौजूद यूनियनों की तरह राजनीति करने के बजाय कार्यरत, निश्कासित/बर्खास्त होने के बाद संघर्षरत और रिटायर हो चुके श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकार समाचार पत्र कर्मचारियों को वेजबोर्ड लागू करवाने, सेवा शर्तों का पालन करवाने, आवश्यक सुविधाओं की मांग को उचित मंच पर उठाने से लेकर इनके अधिकारों की कानूनी लड़ाई लडऩे सहित कल्याण के लिए काम करना होगा। लिहाजा जो व्यक्ति पहले से किसी यूनियन का सदस्य है, वह भी इस सांझा उद्देश्य के लिए यूनियन का सदस्य बन सकता है।

अपने-अपने क्षेत्र या समाचार पत्र के साथियों की सूची उपरोक्त फॉरमेट के अनुसार बनाकर पंजीकृत डाक के माध्यम से इस पतें पर भेजें:

रविंद्र अग्रवाल, वार्ड नंबर-8, कॉलेज रोड कांगड़ा, जिला कांगड़ा हिमाचल प्रदेश-176001, संपर्क नंबर: 9816103265,9736003265

इसके अलावा सूची की साफ्ट कापी मेल करके हस्ताक्षरित सूची भेजने की सूचना भी दे दें: ravi76agg@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: