निष्ठुर एचटी प्रबंधन ने नहीं दिया मृतक मीडियाकर्मी के परिजनों का पता, अब कौन देगा कंधा!

नई दिल्ली। अपने धरनारत कर्मी की मौत के बाद भी निष्ठुर हिन्दुस्तान प्रबंधन का दिल नहीं पिघला और उसने दिल्ली पुलिस को मृतक रविन्द्र ठाकुर के परिजनों के गांव का पता नहीं दिया। इससे रविन्द्र को अपनों का कंधा मिलने की उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है।

न्याय के लिए संघर्षरत रविन्द्र के साथियों का आरोप है कि संस्थान के गेट के बाहर ही आंदोलनरत अपने एक कर्मी की मौत से भी प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और उसने प्रेस परिसर में शुक्रवार को आई दिल्ली पुलिस को रविन्द्र के गांव का पता मुहैया नहीं कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन के पास रविन्द्र का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, उसने जानबूझकर बाराखंभा पुलिस को एड्रेस नहीं दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए भर्ती होने वाले कर्मी का HR पूरा रिकॉर्ड रखता है। उस रिकॉर्ड में कर्मी का स्थायी पता यानि गांव का पता भी सौ प्रतिशत दर्ज किया जाता है। रविन्द्र के पिता रंगीला सिंह भी हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे। ऐसे में उनके गांव का पता न होने का तर्क बेमानी है। रंगीला सिंह भी इसी संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत थे, जबकि रविन्द्र डिस्पैच में।

रविन्द्र के साथियों ने बताया कि रविन्द्र अपने बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। बस इतना ही पता है कि वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का रहनेवाला है और उसका घर पंजाब सीमा पर पड़ता है। वह दिल्ली में अपने पिता, भाई-भाभी आदि के साथ 118/1, सराय रोहिल्ला, कच्चा मोतीबाग में रहता था। कई साल पहले उसका परिवार उस मकान को बेचकर कहीं और शिफ्ट हो गया था। रविन्द्र की मौत के बाद जब उनके पड़ोसियों से संपर्क किया तो वे उनके परिजनों के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए। उनका कहना था कि वे कहां शिफ्ट हुए, उसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है। रविन्द्र के परिजनों ने शिफ्ट होने के बाद से आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। रविन्द्र के संघर्षरत साथियों का कहना है प्रबंधन के असहयोग के चलते कहीं हमारा साथी अंतिम समय में अपने परिजनों के कंधों से महरूम ना हो जाए।

उन्होंने देश के सभी न्यायप्रिय और जागरूक नागरिको से रविन्द्र के परिजनों का पता लगाने के लिए इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर और फारवर्ड करने की अपील की। उनका कहना है कि अखबार कर्मी के दुःखदर्द को कोई भी मीडिया हाउस जगह नहीँ देता, ऐसे में देश की जनता ही उनकी उम्मीद और सहारा है। यदि किसी को भी रविन्द्र के परिजनों के बारे कुछ भी जानकारी मिले तो उनके इन साथियों को सूचना देने का कष्ट करें…
अखिलेश राय – 9873892581
महेश राय – 9213760508
आरएस नेगी – 9990886337

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश- ‘मजीठिया वेज बोर्ड के सभी प्रकरण 6 महीने के भीतर निपटाएं’

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता / दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए।

गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। हालांकि स्पष्टीकरण की याचिका जुलाई में ही दायर कर दी गई थी मगर इस पर फैसला आज आया जिससे मीडियाकर्मियों में एक बार फिर खुशी की लहर है।

आप सभी मीडियाकर्मियों से अपील है कि अपना बकाया हासिल करने के लिेए श्रम विभाग में क्लेम जरूर डालें अन्यथा आप इससे वंचित रह सकते हैं। अब अखबार मालिक किसी भी तरह से आनाकानी नहीं कर सकेंगे और मामले को लंबा नहीं खींच सकेंगे। अगर वे ऐसा करते हैं तो इस बार निश्चित रूप से विलफुल डिफेमेशन के दोषी करार दिए जाएंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
संपर्क : 9322411335 , shashikantsingh2@gmail.com

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मजीठिया मामला : नवभारत के 47 मीडियाकर्मियों ने सौपा प्रबंधन को क्लेम डाटा

मुम्बई से एक बड़ी खबर आ रही है। पहली बार यहां किसी अखबार प्रबंधन को सीधे कर्मचारी यूनियन ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार 47 मीडियाकर्मियों का क्लेम का डाटा सौंप दिया है। गुरुवार 7 सितंबर 2017 को पूर्व निर्धारित नवभारत प्रबंधन और महाराष्ट्र मीडिया इंप्लाइज यूनियन नवभारत इकाई कार्यकारिणी की बैठक के दौरान यूनियन से जुड़े सभी 67 सदस्यों में से 47 सदस्यों का मजीठिया क्लेम का डाटाशीट नवभारत के प्रेसिडेंट श्रीनिवास जी को सौंप दी गई।

क्लेम फाइल करते समय महाराष्ट्र मीडिया इंप्लाइज यूनियन नवभारत इकाई के अध्यक्ष श्री केसर सिंह बिष्ट, सचिव श्री अरुण गुप्ता, कार्यकारिणी सदस्य श्री शेर सिंह, श्री राकेश पांडे, श्री सागर चौहान और श्री विष्णु मांजरेकर मौजूद थे। अब कंपनी प्रबंधन ने अगर निर्धारित समय तक इन कर्मचारियों का मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया नहीं दिया तो ये कर्मचारी कामगार आयुक्त महाराष्ट्र सरकार के समक्ष अपना दावा पेश करेंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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हड़ताल से उड़ान, बढ़ो बहु, चिड़ियाघर, नामकरण आदि की शूटिंग बंद

मुख्यमंत्री ने बुलाई फेडरेशन और प्रोड्यूसरों की बैठक… फ़िल्म और टीवी कामगार तथा महिला कलाकार और टेक्नीशियन पिछले 7 दिन से हड़ताल पर… अपनी विभिन्न मांगो को लेकर मुम्बई के गोरेगांव पूर्व स्थित फिल्मसिटी स्टूडियो के बाहर भारी बारिश में आमरण अनशन और हड़ताल पर बैठे फ़िल्म और टीवी कामगारों की यूनियनों को नेतृत्व करने वाली फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉयज और प्रोड्यूसरों की संस्था को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बैठक के लिए आमंत्रित किया है।

माना जारहा है कि इस बैठक में फेडरेशन की 22 यूनियनों के ढाई लाख सदस्यों के पक्ष में राहत भरी खबर आ सकती है। उधर फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉयज के प्रेजिडेंट बी एन तिवारी और जनरल सेक्रेटरी दिलीप पिठवा ने दावा किया कि रविवार को उड़ान, बढ़ो बहु, चिड़ियाघर, राजश्री प्रोडक्शन के एक सीरियल की भी शूटिंग बंद करके टेक्नीशियन, कामगार सेट से बाहर आ गये और हड़ताल में शामिल हो गए। फ़िल्म और टीवी कामगार तथा महिला कलाकार और टेक्नीशियन पिछले 7 दिन से हड़ताल पर हैं।

एन्ड टीवी के शो बढ़ो बहु की शूटिंग बंद हो गयी। सब टीवी के शो चिड़ियाघर की शूटिंग भी बंद करके शनिवार को ही कामगार सेट छोड़कर बाहर आये और हड़ताल में शामिल हो गए। फेडरेशन की पहल पर वैनिटीवेंन और इक्यूपमेंट वाले भी हड़ताल में शामिल हुए। कलर्स के शो उड़ान की भी आज शूटिंग कैंसिल हुई है। इस सभी शो के टेक्नीशियन शो छोड़कर बाहर आगये और हड़ताल में शामिल हो गए जबकि स्टारप्लस के शो नामकरण की 65 परसेंट टीम हड़ताल में शामिल हो गयी। इस शो की शूटिंग भी होना मुश्किल लग रहा है।

इस अनिश्चितकालीन हड़ताल के बारे में श्री तिवारी और पिठवा के मुताबिक फेडरेशन की इस अनिश्चित कालीनहड़ताल के पीछे उद्धेश्य है कि फिल्म और टेलीविजन इंडस्ट्रीज के सभी कामगारों, टैक्निशियनों और कलाकारों के साथ जो बरसों से वायदाखिलाफी और नाइंसाफी हो रही है उसको हमेशा के लिये समाप्त किया जाये। फेडरेशन लंबे समय से मांग करता रहा है कि आठ घंटे की शिफ्ट हो और हर अतिरिक्त घंटे के लिये डबल पेमेंट हो। हर क्राफ्ट के सभी कामगारों, टैक्निशियनों और कलाकारों आदि की चाहे वह मंथली हो या डेलीपैड, पारिश्रमिक में तत्काल वाजिब बढ़ेत्तरी, बिना एग्रीमेंट के काम पर रोक, मिनीमम रेट से कम पर एग्रीमेंट नहीं माना जायेगा। साथ ही जॉब सुरक्षा, उत्तम खानपान और सरकार द्वारा अनुमोदित सारी सुविधायें और ट्रेड यूनियन के प्रावधान हमारी प्रमुख मांग है। मगर निर्माता हमारी मांग को लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं।

बॉलीवुड में काम कर रहे ये कामगार अपना नया एमओयू साइन करवाना चाहते हैं, जिसकी मियाद पिछली फरवरी में खत्म हो चुकी है। ये एमओयू  हर ५ साल में साइन होता है।इस बार नए एग्रीमेंट में कामगारों की मांगों में उनका मेहनताना, सुरक्षा, समय पर भुगतान, काम करने की समय सीमा और बीमा शामिल हैं। इनके मुताबिक, इनका मेहनताना ३ से ६ महीने बाद मिलता है। १८-१८ घंटे काम करवाया जाता है।  इस हड़ताल को भाजपा की चित्रपट सेना का भी समर्थन मिला है।

मुंबई से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : shashikantsingh2@gmail.com

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फिल्म और टीवी कामगारों की हड़ताल शुरू, 40 टीवी सीरियल्स और 10 फिल्मों की शूटिंग ठप

मुंबई : अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सिनेमा और टेलीविजन इंडस्ट्रीज के कामगार और टेक्निशियन 14 अगस्त की रात से हड़ताल पर चले गये हैं। फेडरेशन आफ वेस्टर्न इंडिया सिने एंप्लॉयज संगठन के बैनर तले हो रही इस हड़ताल में २२ यूनियन शामिल हुयी हैं। फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में काम करने वाले 2.50 लाख कर्मचारी हड़ताल पर गये हैं। हड़ताल की वजह से फिल्म की शूटिंग के लिए स्टूडियो बुकिंग भी बंद हो गई है। जहां हमेशा चहलपहल रहती थी उन स्टूडियो में अब सन्नाटा पसर गया है।

१४ अगस्त की रात १२ बजकर एक मिनट पर फेडरेशन आफ वेस्टर्न इंडिया सिने एंप्लॉयज संगठन के 22 यूनियन के सदस्य सेट से बाहर आ गये। फेडरेशन के प्रेसिडेंट बी.एन. तिवारी और जनरल सेक्रेटरी दिलीप पिठवा के मुताबिक इस हड़ताल के कारण लगभग 40 टीवी धारावाहिकों और 10 फिल्मों की शूटिंग ठप हो गयी है। साथ ही मराठी और भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग पर भी असर पड़ा है। हड़ताल के कारण मुबई के फिल्म सिटी स्टुडियो, फिल्मीस्तान के अलावा मडआईलैंड के बंगलों और नायगांव के स्टुडियो में भी सन्नाटा पसर गया है। अधिकांश जगह डबिंग और रिकार्डिंग स्टुडियो भी बंद हो गये हैं।

फेडरेशन आफ वेस्टर्न इंडिया सिने एंप्लॉयज के प्रेसिडेंट बीएन तिवारी और जनरल सेक्रेटरी दिलीप पिठवा का कहना है कि हमारी फिल्म और टेलीविजन शो निमार्ताओं से मांग मजदूरों के लिए है। ये फिल्म और टेलीविजन इंडस्ट्रीज के सभी कामगारों, टैक्निशियनों और कलाकारों के हक की मांग है। इन लोगों की सबसे बड़ी मांग ये है कि जहां पर फिल्म की शूटिंग होती है वहां पर साफ सफाई नहीं रहती, शौचालय की सुविधा नहीं रहती, बहुत गंदगी रहती है। फिल्म इंडस्ट्री में बड़े बड़े लोग प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान का समर्थन करते हैं लेकिन जहां पर फिल्म की शूटिंग होती है वहां पर स्वच्छता कोई नहीं देखता। साफ-सफाई और सुरक्षा की मांग के अलावा आठ घंटे की शिफ्ट हो और हर अतिरिक्त घंटे के लिए डबल पेमेंट होनी चाहिए। हर क्राफ्ट के सभी कामगारों, टैक्निशियनों और कलाकारों आदि की चाहे वह मंथली हो या डेलीपैड, पारिश्रमिक में तत्काल वाजिब बढ़ोत्तरी, बिना एग्रीमेंट के काम पर रोक, मिनीमम रेट से कम पर एग्रीमेंट नहीं माना जाएगा, साथ ही जॉब सुरक्षा, उत्तम खानपान और सरकार द्वारा अनुमोदित सारी सुविधायें और ट्रेड यूनियन के प्रावधान हमारी प्रमुख मांग है।

फेडरेशन का कहना है की फिल्म निमार्ता कोशिश कर रहे हैं हमारे लोगों को तोड़ने के लिए लेकिन हम टूटने वाले नहीं हैं। जब तक हमारी मांग फिल्म निमार्ता और निर्देशक लिखित रूप से नहीं मानेंगे तब तक ये हड़ताल खत्म नहीं होगी। हमारे साथ पूरी टेक्निकल यूनियन है। फेडरेशन में जो २२ यूनियन शामिल हैं उसमें द साउंड एशोसिएशन आॅफ इंडिया, कैमरा एशोसिएशन , डायरेक्टर एशोसिएशन , आर्ट्स डायरेक्टर एशोसिएशन, स्टिल फोटोग्राफर एशोसिएशन, म्यूजिक डायरेक्टर एशोसिएशन, म्यूजिशियन एशोसिएशन, सिंगर एशोसिएशन, वाइसिंग एशोसिएशन, डांस मास्टर एशोसिएशन, डांसर एशोसिएशन, फाइटर एशोसिएशन , डमी एशोसिएशन , राइटर एशोसिएशन , प्रोडक्शन एशोसिएशन, एडिटर एशोसिएशन, जूनियर आर्टिस्ट एशोसिएशन, महिला कलाकार एशोसिएशन , मेकअप और ड्रेस डिपार्टमेंट एशोसिएशन, एलाइड मजदूर एशोसिएशन और जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर एशोसिएशन प्रमुख है। माना जा रहा है कि इस हड़ताल के कारण कई धारावाहिकोें के नये एपिसोड का प्रसारण भी खटाई में पड़ेगा और लोगो को अपने टीवी स्क्रीन पर पुराना एपिसोड ही देखने को मजबूर होना पड़ सकता है।

मुंबई से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : ९३२२४११३३५

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मजीठिया समिति की 20 को बैठक, अखबार मालिकों के फर्जी एफिडेविट का मामला उठेगा

मुंबई : देश भर के मीडिया कर्मियों के वेतन और प्रमोशन से जुड़े जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश को अमल में लाने के लिए गठित महाराष्ट्र की त्रिपक्षीय समिती की बैठक मुंबई में कामगार आयुक्त कार्यालय के समिती कक्ष में 20 जुलाई को आयोजित की जा रही है। माननीय सुप्रीमकोर्ट के 19 जून को आये आदेश के बाद महाराष्ट्र में ये पहली त्रिपक्षीय समिति की बैठक होगी। इस बैठक में पत्रकारों की तरफ से पांच प्रतिनिधि नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट की महाराष्ट्र महासचिव शीतल हरीश करदेकर, बृहन मुंबई यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट के मन्त्रराज जयराज पांडे, रवींद्र राघवेंन्द्र देशमुख, इंदर जैन कन्वेनर ज्वाइन्ट एक्शन कमेटी ठाणे और किरण शेलार शामिल होंगे।

मालिकों की तरफ से जो पांच लोग शामिल होंगे उनमें जयश्री खाडिलकर पांडे, वासुदेव मेदनकर, विवेक घोड़ वैद्य, राजेंद्र कृष्ण रॉव सोनावड़े और बालाजी अन्नाराव मुले हैं। इस समिति में लोकमत की तरफ से दो प्रतिनिधि शामिल किये गए हैं जिनके नाम बालाजी अन्ना रॉव मुले और विवेक घोड़ वैद्य हैं जबकि रोहिणी खाडिलकर नवाकाल की हैं। इसी तरह राजेंद्र सोनावड़े दैनिक देशदूत नासिक से हैं। वादुदेव मेदनकर सकाल मराठी पेपर से हैं। बैठक की अध्यक्षता कामगार आयुक्त महाराष्ट्र श्री यशवंत केरुरे करेंगे। श्री केरुरे ने साफ कहा कि वे माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का पालन कराने के लिये कटिबद्ध हैं।

उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के सभी अखबार मालिकों से 300 रुपये के स्टांप पेपर पर एफिडेविट मंगाया था। जिन अखबार मालिकों ने एफिडेविड नहीं दिया है उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है। इस त्रिपक्षीय समिति की बैठक में नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट की महाराष्ट्र महासचिव शीतल करंदेकर कामगार आयुक्त को एक ज्ञापन भी देंगी और मांग करेंगी कि अखबार मालिकों द्वारा दिये गए फर्जी एफिडेविट की जांच कराकर दोषी अखबार मालिकों के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज कराई जाए। साथ ही यह मांग भी करेंगी कि समिति में उन नए सदस्यों को भी शामिल किया जाए जिन्हें जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अच्छी समझ हो।

शशिकांत सिंह
पत्रकार, आरटीआई एक्सपर्ट और एनयूजे महाराष्ट्र मजीठिया सेल समन्यवयक
मुंबई
9322411335

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चर्चित मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह को एनयूजे (महाराष्ट्र) ने बनाया मजीठिया सेल का समन्यवयक

(शशिकांत सिंह)

दो कद्दावर मजीठिया क्रांतिकारियों ने महाराष्ट्र के मीडिया कर्मियों को उनका अधिकार दिलाने के लिए हाथ मिलाया है। देश के जाने माने मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह को नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के अध्यक्ष डॉ उदय जोशी और महाराष्ट्र की जनरल सेक्रेटरी शीतल करदेकर ने महाराष्ट्र का मजीठिया सेल का समन्यवक बनाया है। शीतल करदेकर महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाई गई जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की त्रिपक्षीय कमेटी में भी मीडिया कर्मियों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।

श्री शशिकांत सिंह के मुताबिक देश भर की कई पत्रकार यूनियन मुझे अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहीं थीं मगर मैं हमेशा इनकार करता रहा मगर मैं खुद मुम्बई का हूं, इसलिए मैंने महाराष्ट्र में इस संस्था नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट की महासचिव शीतल करदेकर के साथ महाराष्ट्र में मीडियाकर्मियों की लड़ाई में उनका साथ देना तय किया है। उधर शीतल करदेकर ने शशिकांत सिंह को मजीठिया सेल का समन्यवयक बनाये जाने पर खुशी जताई है और कहा है कि मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में शशिकांत सिंह एक जाना माना नाम हैं। उनके साथ महाराष्ट्र में मीडिया कर्मियों को उनका अधिकार जरूर मिलेगा।

महिला पत्रकार शीतल करदेकर महाराष्ट्र में पत्रकारों के अधिकार की लड़ाई लड़ने वाली एक जाना माना नाम हैं। वे देश में पहली बार महिला पत्रकारों का दो दिवसीय महिला सम्मेलन भी 29 और 30 जुलाई को मुम्बई से सटे पनवेल में करने जा रही हैं। शशिकांत सिंह ने महाराष्ट्र के सभी मीडियाकर्मियों से अपील की कि वे मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में शामिल होकर अपना हक अधिकार हासिल करें। मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई से संबंधित अधिक जानकारी के लिए शशिकांत सिंह से उनके मोबाइल नंबर 9322411335 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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मजीठिया वेज बोर्ड : काशी में कटी पहली 50 लाख की आरसी

बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी से एक बड़ी खबर आ रही है। यहाँ नार्दन इंडिया पत्रिका यानि एनआईपी के खिलाफ मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 50 लाख की रिकवरी सार्टफिकेट जारी की गयी है। यहाँ मजीठिया की लड़ाई की अगुवाई करने वाले समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन को पहली बड़ी सफलता मिली है।

यूनियन के महामंत्री अजय मुखर्जी के मुताबिक एनआई पी के पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य, महेश सेठ व फोटोग्राफर दिनेश के जस्टिस  मजीठिया वेज बोर्ड के तहत बकाया वेतन अंतरिम के वसूली के लिए लगभग 50 लाख की आरसी जारी हो गयी है। मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार बकाये वेतन की वसूली के लिए वाराणसी परिक्षेत्र में यह पहली आरसी है। आरसी जारी होना इस लड़ाई में शामिल साथियों के लिए सफलता का पहला कदम है। साथियों को बधाई ।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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भास्कर पर भारी पड़े पत्रकार धर्मेंद्र : कामगार आयुक्त ने भास्कर प्रबंधन को बकाया एरियर देने का निर्देश दिया

मजीठिया के अनुसार बकाया नहीं देने पर हो सकती है कुर्की…

(दैनिक भास्कर मुंबई के जुझारू पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह)

मुंबई के दैनिक भास्कर अखबार से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह सहित दो महिला कर्मचारियों के मामले में पहली बार कामगार आयुक्त महाराष्ट्र के कार्यालय ने लंबी सुनवाई के बाद डीबी कॉर्प को साफ़ निर्देश देते हुए नोटिस भेजा है कि पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह, कर्मचारी लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया शेख का जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाये का दावा सही है और आपको निर्देश दिया जाता है कि आप इन तीनों कर्मचारियों का बकाया राशि का जल्द भुगतान करें अन्यथा आपके खिलाफ वसूली आदेश जिलाधिकारी को निर्गत कर दिया जाएगा।

ज्ञात हो कि ऐसे मामलों में वसूली जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा बिलकुल उसी तरह की जाती है जैसे जमीन के बकाये की वसूली होती है। इसमें कुर्की की कार्रवाई तक भी शामिल है। यह आदेश सहायक कामगार आयुक्त महाराष्ट्र सरकार नीलांबरी भोसले ने 6 जून 2017 को जारी किया है। दैनिक भास्कर मुम्बई ब्यूरो के प्रिंसिपल कर्सपांडेन्ट धर्मेंद्र प्रताप सिंह, रिशेप्सनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया शेख ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट के दिशानिर्देशानुसार पिछले साल जून 2016 में महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त कार्यालय में 17 (1) के तहत अपने बकाये राशि की वसूली के लिए क्लेम किया था।

यह सुनवाई पूरे एक साल सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले के समक्ष चली। इस दौरान डी बी कॉर्प की पूरी एचआर टीम और उनके वकील ने तरह तरह के दांव पेंच का इस्तेमाल किया। धर्मेंद्र प्रताप सिंह और लतिका आत्माराम चव्हाण का ट्रांसफर भी काफी दूर कर दिया गया। बाद में धर्मेंद्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर पर अदालत ने रोक लगा दी मगर फिर भी कंपनी प्रबंधन ने उन्हें काम पर नहीं रखा जिसके बाद धर्मेंद्र ने कंपनी प्रबंधन के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला दायर करा दिया। फिलहाल धर्मेंद्र के जुझारू तेवर और कामगार आयुक्त कार्यालय की नोटिस के बाद डी बी कॉर्प प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। वे इस नोटिस पर हाईकोर्ट से स्टे लेने का प्रयास कर रहे हैं मगर धर्मेंद्र ने वहां भी प्रबंधन का रास्ता रोक कर केविएट लगा दिया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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इसी 19 जून को आएगा मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट का एतिहासिक फैसला

मीडिया मालिकों की नींद उड़ी, मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर…

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इंतजार की घड़ी खत्म होने को है. देश भर के प्रिंट मीडिया के कर्मियों के लिये न्याय का दिन आ गया है.  सुप्रीमकोर्ट की तरफ से 19 जून को फैसला सुनाया जाएगा. जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आर-पार का दिन होगा 19 जून 2017 की तारीख. अखबार मालिकों ने जो लंबे जुल्म ढाए हैं अपने मीडियाकर्मियों पर, जो भयंकर शोषण किया है, उसका हिसाब आने वाला है. इसी तारीख को तय हो जाएगा कि यह देश कानून, संविधान और नियम से चलता है या फिर कुछ मीडिया मालिकों, सत्तासीन नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाहों की मिलीभगत से.

पहले तो मीडिया मालिक सुप्रीम कोर्ट इसलिए गए कि मजीठिया वेज बोर्ड से उनका धंधा तबाह हो जाएगा. कोर्ट में लंबी चली सुनवाई के बाद मालिकों के खिलाफ फैसला आया कि तुम लोगों को हर हाल में अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से लाभ देना ही पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद जब मीडिया मालिकों ने अपनी मोटी चमड़ी दिखाते हुए मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ तरह तरह के बहानों के जरिए नहीं दिया तो सैकड़ों मीडियाकर्मियों ने अपने अपने संस्थानों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में डालीं. उन्हीं याचिकाओं का निबटारा 19 जून को होना है. 

19 जून को अवमानना मामले में सुप्रीमकोर्ट की तरफ से ऐतिहासिक फैसला सुनाया जाएगा. यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की खंडपीठ सुनायेगी. यह ऐतिहासिक फैसला 19 जून दिन सोमवार को सुप्रीमकोर्ट में दोपहर तीन बजे कोर्ट नंबर तीन में सुनाया जायेगा. देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने भी मीडियाकर्मियों के पक्ष में फैसला आने की उम्मीद जताई है.

सुप्रीमकोर्ट के फैसले की तिथि की घोषणा होते ही देश भर के मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है. वहीं अखबार मालिकों के खेमें में बेचैनी बढ़ गयी है. इस मामले की सुनवाई में मीडियाकर्मियों की तरफ से वरिष्ठ एडवोकेट कोलिन गोंसाल्विस, उमेश शर्मा, परमानंद पांडे और दिनेश तिवारी ने मीडियाकर्मियों का जोरदार तरीके से पक्ष रखा. अब सबकी नजरें 19 जून को सुप्रीमकोर्ट के एतिहासिक फैसले पर होगी. इस फैसले की तिथि की जानकारी पाते ही देश भर के पत्रकार नयी दिल्ली के लिये कूच करने की तैयारी कर रहे हैं.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
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महाराष्ट्र में पत्रकारों पर हमला अब पड़ेगा भारी, विधानसभा में सुरक्षा कानून पारित

महाराष्ट्र में पत्रकारों पर हमला अब भारी पड़ेगा। पत्रकारों पर हमले को गैर-जमानती अपराध मानते हुये महाराष्ट्र विधानसभा ने कल पत्रकार सुरक्षा कानून पारित कर दिया। पत्रकारों पर हमला करने वालों को तीन साल तक की सजा और 50 हजार रुपये तक जुर्माना लग सकता है। महाराष्ट्र के मुख्य़मंत्री देवेंद्र फणनवीस की कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को गुरुवार को मंजूर किया था। इसके बाद आज विधानसभा में यह विधेयक पारित किया गया। अब इस विधेयक को विधान परिषद में मंजूरी मिलने का इंतजार है।

सरकार द्वारा तैयार किया गया मसौदा विधेयक को पत्रकार संगठनों के पास सुझाव और आपत्तियों के लिए पिछले वर्ष भेजा गया था। सरकार ने सुझावों और आपत्तियों के बाद अंतिम मसौदा तैयार किया। इस विधेयक में पत्रकारों पर हमले को गैर जमानती अपराध बनाने का सुझाव है। हमलावर को जुमार्ना भरना होगा और पीड़ित का चिकित्सकीय खर्च भी उठाना होगा। किसी मीडिया घराने पर हमला करने की स्थिति में संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई हमलावर से की जाएगी। इस कानून का पत्रकारों द्वारा दुरूपयोग करने पर उन्हें दंडित किया जाएगा।

मुख्यमंत्री देवेन्द्र फणनवीस ने शनिवार को सदन में घोषणा की थी कि पत्रकारों पर हमला रोकने का विधेयक बजट सत्र के दौरान ही पेश किया जाएगा। अब सबकी नजरें जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश पर टिकी है कि महाराष्ट्र सरकार अखबार मालिकों के खिलाफ कब ठोस कदम उठाती है। पत्रकार सुरक्षा कानून विधेयक की मंजूरी पर पहली प्रतिक्रिया आयी है समाजवादी पार्टी की तरफ से। समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आजमी ने कहा कि महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में पत्रकार सुरक्षा कानून जरूरी था। कानून पारित होने पर अब पत्रकारों पर हमले की घटनाएं कम होंगी। उन्होंने मांग की कि पत्रकारों और मीडिया हाउसों पर हमले को गैर-जमानती अपराध बनाना चाहिए। आजमी ने कहा कि महाराष्ट्र में पत्रकार संरक्षण कानून विधेयक-२०१७ के पास होने से राज्य के तमाम पत्रकारों को राहत मिलेगी।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त ने सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने की फर्जी रिपोर्ट भेजी

महाराष्ट्र राज्य के श्रम आयुक्त की मीडिया मालिकों से मिलीभगत है, ऐसी आशंका तो बहुत पहले से जताई जा रही थी। परन्तु इस बात की पुष्टि हाल ही में महाराष्ट्र सरकार के विभिन्न कार्यालयों से  आरटीआई के जरिए प्राप्त हुए कागजातों ने कर दी है। जैसा कि विदित है माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार सभी मीडिया संस्थानों में वेतन देने का निर्देश दिया है और इसके लागू कराने की जिम्मेदारी श्रम आयुक्तों को सौंप दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में श्रम आयुक्त को निर्देशित करते हुए कहा है कि सभी कागजातों की पुष्टि करके मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने की विस्तृत रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपें। परन्तु  महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त द्वारा लगातार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की उपेक्षा की जा रही है। इतना ही नहीं, श्रमआयुक्त द्वारा सुप्रीम कोर्ट को अब तक जितनी भी रिपोर्ट भेजी गई है, वे सभी मालिकों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। संबंधित दस्तावेज़ों की पड़ताल भी नहीं की गई है। आरटीआई से जो जानकारी निकाली गयी है उससे साफ पता चलता है कि सुप्रीमकोर्ट को जो रिपोर्ट श्रमायुक्त द्वारा भेजी गयी है वो बिलकुल फर्जी है। कुछ ऐसे ही बिन्दु दृष्टिगत है-

मुंबई सहित देश के पांच अन्य श्हरों से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक प्रात:काल के संबंध में श्रम आयुक्त ने रिपोर्ट दी है कि इस समाचार पत्र में मजीठिया वेजबोर्ड पूरी तरह लागू है, जबकि यह समाचार पत्र फर्जी दस्तावेज़ों के जरिए सरकार को गुमराह कर रहा है। प्रात:काल ने श्रम आयुक्त कार्यालय में एफिडेविट देकर बताया है कि उस समाचार पत्र के मालिक 72 वर्षीय सुरेश गोयल हैं। आश्चर्य की बात है कि इसी एफिडेविट में उन्हें इसी संस्थान में वेतनभोगी संपादक भी बताया गया है।

प्रात:काल ने अपने एफिडेविट में बताया है कि उसके पास कुल आठ कर्मचारी हैं, जिसमें दो श्रमिक पत्रकार एक मुख्य संपादक, एक कार्यकारी संपादक तथा एक डीटीपी हेड है। बाकी 5 प्रबंधन के सदस्य हैं। इस समाचार पत्र का प्रबंधन समाचार पत्र के प्रकाशन में आऊटसोर्सिंग से भी काम नहीं कराता है और उसके यहाँ न ही कांट्रेक्ट पर कोई कर्मचारी कार्य करता है। आश्चर्य की बात है कि इस 12 पृष्ठों के दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन एक 72 वर्षीय मुख्य संपादक, एक कार्यकारी संपादक और एक डीटीपी हेड द्वारा किया जाता है। इसमें न तो कोई रिपोर्टर है, न कोई समाचार संपादक, उपसंपादक, प्रूफ रीडर और न ही कोई दूसरा डीटीपी ऑपरेटर।

प्रात:काल समाचार पत्र के कार्यरत पत्रकार के रूप में शिरीष गजानन चिटनिस प्रतिनिधि (मुंबई/१४१६), महीप गोयल-स्थानीय संपादक (मुंबई/१४१७), विष्णु नारायण देशमुख छायाचित्रकार (मुंबई/१६७४), हरिसिंह राजपुरोहित चीफ कारेस्टपांडेंस्ट (मुंबई/१८१९) को महाराष्ट्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अनुभवी पत्रकारों को दिया जाने वाला अधिस्वीकृति पत्र (एक्रिडेशन कार्ड) प्रदान किया गया है। उल्लेखनीय है कि अधिस्वीकृत पत्रकारों को काफी सारी सरकारी सुविधाएं दी जाती हैं तथा मंत्रालय सहित विभिन्न सरकारी कार्यालयों में प्रवेश की समय-सीमा में विशेष छूट दी जाती है। बता दें कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा मान्यता पात्र अनुभवी पत्रकारों को अधिस्वीकृति पत्र (एक्रिडेशन कार्ड) प्रदान किए जाते हैं। अधिस्वीकृति पत्र जारी करने से पहले लंबी प्रक्रिया पूरी की जाती है।

यह पत्र संबंधित संस्थान द्वारा प्रदत्त दस्तावेजों (जैसे- नियुक्ति पत्र, अनुभव प्रमाण, सेलरी स्लीप, पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, संकलित / लिखित समाचारों एवं फोटो आदि कटिंग, शैक्षणिक डाक्यूमेंट्स आदि) की पुष्टि तथा पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही जारी किए जाते हैं। यानि साफ़ तौर पर कहें तो श्रम आयुक्त को प्रातः काल ने जो एफिडेविड दिया है उसमें वर्किंग जर्नलिस्ट कैटेगरी में सिर्फ दो कर्मचारी बताये गए हैं सुरेश गोयल और महीप गोयल। जबकि आर टीआईसे पता चला है कि इस अखबार में कई कर्मचारी हैं जिनको बाकायदे राज्य सरकार से मान्यता मिली है।

प्रात:काल द्वारा श्रम आयुक्त कार्यालय में दिए गए एफिडेविट में विष्णु नारायण देशमुख को मैनेजर बताया गया है तथा उनकी नियुक्ति तिथि १२.११.२०१४ को बताई गई है। वहीं इनको प्रात:काल ने ही अपने यहां छायाचित्रकार बताकर अधिस्वीकृत पत्र (एक्रिडेशन कार्ड नं.- मुंबई/१६७४) दिलवाया है। इतना ही नहीं, अधिस्वीकृत पत्र धारक शिरीष गजानन चिटनिस, हरिसिंह राजपुरोहित को तो प्रात:काल ने अपना कर्मचारी भी नहीं बताया है। यहाँ सवाल यह उठता है कि जो व्यक्ति संस्थान में कार्यरत ही नहीं है उसे महाराष्ट्र सरकार द्वारा दिया जाने वाला इतना महत्वपूर्ण कार्ड क्यों और कैसे प्रात:काल प्रबंधन ने दिलवाया? इन सभी बातों की शिकायत श्रम आयुक्त के यहाँ पहले से की गई है।

यहाँ तक कि एक श्रमिक पत्रकार द्वारा श्रमआयुक्त कार्यालय में जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतन एवं एरियर दिलवाने का क्लेम भी लगा हुआ है। उसके बाद भी श्रम आयुक्त ने इस संबंध में बिना पड़ताल किए किन कारणों से सुप्रीम कोर्ट में यह रिपोर्ट भेज दी कि प्रात:काल में मजीठिया वेजबोर्ड पूरी तरह से लागू है? उपरोक्त बिन्दुओं को देखें तो साफ-साफ पता चलता है कि श्रम आयुक्त मीडिया मालिकों से मिलकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की सरासर अवहेलना करते हुए मालिकों के पक्ष वाली झूठी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेज रहे हैं।अब महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त को सुप्रीमकोर्ट में खीचने की कर्मचारी तैयारी कर रहे हैं।इस श्रम आयुक्त के फर्जीवाड़े का कुछ और सच जल्द सबके सामने लाया जाएगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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मजीठिया मामला : अखबारों को सबक सिखाने के लिए मीडियाकर्मी इस फार्मेट को भर कर डीएवीपी को भेजें

देश भर के अखबार मालिक अपने मीडियाकर्मियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ ना देने के लिए सीए से एक बैलेंसशीट बनवाकर ये साबित करने में लगे हैं कि उनकी अलग-अलग यूनिट है और वे ए ग्रेड अखबार नहीं बल्कि सी ग्रेड के अखबार हैं। ऐसा करके वह अपने कर्मियों की सेलरी कम आंकते हैं और उनका एरियर बकाया आदि भी बेहद कम कर देते हैं. क्लासिफिकेशन के नाम पर माननीय सुप्रीमकोर्ट को गुमराह करने में लगे अखबार मालिकों की ये रणनीती उन पर ही भारी पड़ने वाली है।

सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा ने गलत क्लासिफिकेशन बताने वाले अखबार मालिकों को सबक सिखाने के लिए एक फार्मेट जारी किया है। इस फार्मेट को भरकर सभी मीडियाकर्मी डीएवीपी को जल्द से जल्द भेंजे ताकि डीएवीपी में खुद को ए ग्रेड बताने वाले अखबार आगे से इस ए ग्रेड के आधार पर विज्ञापन न पा सकें. इससे इनके सरकारी विज्ञापन के रेट पर लगाम लगेगी. ज्यादा दाम पर लिये गये विज्ञापनों की वसूली भी हो सकती है. इनका सरकारी विज्ञापन रेट भी कम हो जायेगा.


एडवोकेट उमेश शर्मा का मजीठिया मामले में ताजा इंटरव्यू देखने सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=IorJcCxjb6M


मीडियाकर्मियों के पक्ष में माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने साफ कहा है कि देश भर के मीडियाकर्मी इस फार्मेट को भरें और इसे डीएवीपी को भेजें. साथ ही राज्य सरकार के सूचना निदेशालय को भी इसकी प्रति भेजें ताकि राज्य सरकार भी इस क्लासिफिकेशन का सच समझे और अखबार मालिकों का विज्ञापन रोक कर उनको ज्यादा दर पर दिये गये विज्ञापनों की राशि की वसूली करे.

इस फार्मेट में किसी भी तरह की छेड़छाड़ या टीका टिप्पणी ना करें. इस फार्मेट को सुप्रीमकोर्ट के जाने माने एडवोकेट उमेश शर्मा ने बनाया है. इसमें थोड़ी-सी भी फेरबदल की गयी तो अर्थ का अर्नथ होने का खतरा बढ़ जायेगा. देश भर के मीडियाकर्मियों को यह फार्मेट निशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है. मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने वालो सभी मीडियाकर्मी इसे भर कर डीएवीपी तथा राज्य सरकार के सूचना निदेशालय को भेजें. ये फार्मेट स्पीड पोस्ट से ही भेजें और इसकी पावती जरुर संभालकर रखें जो आगे सभी मीडियाकर्मियों को काम आयेगा.

फार्मेट ये है….

The Director-General Of Audio And Video Publicity,

Government Of India,
Ministry Of Information & Broadcasting,
CGO Complex, New Delhi.

    PAC,

DAVP, CGO , Complex, New Delhi.

Subject: Action under Regulation 5 and 25 of the Print Media Advertising And Policy Of The Government Of India- complaint of misrepresentation by the publishers of the newspaper under the name and style of: …..  ……  …… …… …… …… ….. …… …… …… …… …… …… ……….

Respected Sir,

This is brought to your notice that the newspaper publication named above is indulged in misrepresentation and violating the terms of grant of advertismeant by your Directorate. The aforesaid newspaper has violated the mandate as contemplated under Regulation 5 of the Print Media Advertising and Policy of the Government of India being regulated and enforced by you by misrepresenting about its circulation and has inflated the same by obtaining of fake and bogus certificate from its chartered accountants. In their reply as filed before the labour authorities, they have contended that they are in loss and their circulation figure is very low whereas the certificate filed before your directorate by the said newspaper shows very high figures of cirucaltion falsely. It is clear that the aforesaid publication is indulged in making false claims regarding its circulation hence liable for suspension of the advertised and under Clause 25 of the Print Media Advertising And Policy Of The Government Of India .

You will appreciate that the Majithia Wage Board Award as published by the Central Governmenet for newspaper employees including the journalists as well as non-journalists is based upon the category of the newspaper establishment as per the circulation figures hence the fudging, misprepresentation of the circulation figures is being done by the said newspaper establishmenet for overreaching the said Majithia Award. We are further constrained to report that the said newspaper establishement is even otherwise liable for action under Clause 25 of the Print Media Advertsising Policy of The Government of India as they have failed to honour the aforesaid Majithia Award on the one hand whereas they are claiming benefits of advertisements from your Directorate on the basis of fake circulation figures.

We have also come to know that the Audit Bureau Of Circulation, (ABC) figures as obtained by the aforesaid print media house are also fake , forged and inflated. The aforesaid persons are in fact suppressing the vital information regarding circulation of any newspaper and denying the statutory and legal rights to the employees by claiming that their circulation is very low. We are also contemplating filing of a complaint against the functioning of aforesaid ABC before the International Federation of audit bureau of certification, the parent body regulating the affairs of the ABC.

You are therefore requested to initiate action as contemplated under regulation 25 of the Print Media Advertising And Policy Of The Government Of India and cancel and suspend the advertisements being given by your Directorate to the aforesaid newspaper and to withdraw all the advertisements being given to the said newspaper on the basis of the fake figures of ciruclaiton.
The copy of the reply filed by the aforesaid newspaper before the labour authorities is being filed herewith for your perusal and action at your end.

Thanking you,
Yours

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Date:

Address:

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‘हिन्दुस्तान’ अखबार को मजीठिया क्रांतिकारियों ने हराया, जीएम व संपादक की आरसी कटी

बरेली से बड़ी खबर आ रही है कि उपश्रमायुक्त ने हिन्दुस्तान के महाप्रबंधक और स्थानीय संपादक के खिलाफ मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार तीन कर्मचारियों के वेतन व एरियर की बकाया वसूली के लिए आरसी जारी कर जिलाधिकारी को भेज दी है। हिन्दुस्तान प्रबंधन को सोमवार को श्रम न्यायालय में करारी हार का सामना करना पड़ा। इस खबर से हिन्दुस्तान के उच्च प्रबंधन में हड़कंप मच गया है। हालांकि हिन्दुस्तान प्रबंधन सोमवार को आरसी का आदेश रिसीव होने तक उसे रुकवाने के लिए आला अफसरों के जरिये दबाव बनाने में लगा रहा।

हिन्दुस्तान बरेली के चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा, सीनियर सब एडिटर निर्मलकांत शुक्ला, चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा, सीनियर कॉपी एडिटर रवि श्रीवास्तव, पेजीनेटर अजय कौशिक ने माह सितम्बर, 2016 में श्रमायुक्त को शिकायत भेजी थी कि उनको मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार वेतन भत्ते आदि नहीं मिल रहे हैं।

इस शिकायत को श्रमायुक्त ने निस्तारण के लिए उपश्रमायुक्त बरेली को भेज दिया। नोटिस जारी होने पर प्रबंधन की धमकियों और दबाव के चलते सुनील मिश्रा, रवि श्रीवास्तव और अजय कौशिक ने डीएलसी के समक्ष उपस्थित होकर शिकायत वापस ले ली जबकि बरेली से मजीठिया की लड़ाई की रणनीति सुनील मिश्रा ने तैयार की थी और शिकायत करने के लिए लोगों को प्रेरित किया था।

चार माह तक चली सुनवाई के दौरान प्रबंधन की ओर से क्लेमकर्ताओं को डराया व धमकाया भी गया लेकिन क्लेमकर्ता इस लड़ाई से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। इसी बीच सीनियर सब एडिटर राजेश्वर विश्वकर्मा भी मजीठिया की लड़ाई में उतर गए। हालात यह हैं कि हिन्दुस्तान बरेली में मजीठिया की आग अंदर ही अंदर धधक रही है। लगभग 50 फीसदी कर्मचारी अपना क्लेम बनवाकर पूरी तैयारी में हैं और लगातार मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे लोगों के सम्पर्क में हैं।

सुनवाई की पिछली तारीख 25 मार्च को भी प्रबंधन की ओर से मौजूद एचआर मैनेजर सत्येन्द्र अवस्थी ने मामले को लंबा खींचने के लिए तमाम कोशिशें कीं लेकिन क्लेमकर्ताओं के आगे उनकी एक न चली। डीएलसी ने उसी दिन प्रबंधन को साफ कर दिया कि आपका पक्ष सुन लिया गया है और भी कुछ कहना है तो आज ही पत्रावली पर लिखा दीजिए। इस पर प्रबंधन के प्रतिनिधि सत्येन्द्र अवस्थी ने लिखित बयान दिया कि अब प्रबंधन की ओर से इस प्रकरण में कुछ भी कहना शेष नहीं है। डीएलसी ने सुनवाई पूरी घोषित कर फाइल को आदेश पर ले लिया।

सोमवार को डीएलसी ने दोनों पक्षों को बुलवाकर अपना फैसला सुना दिया। डीएलसी रोशन लाल ने अपने फैसले में प्रबंधन के इस तर्क को अमान्य करार दिया कि क्लेमकर्ता वर्किंग जर्नलिस्ट नहीं बल्कि प्रबंधकीय व प्रशासकीय कैडर के हैं। डीएलसी ने क्लेमकर्ताओं के दाखिल क्लेम को सही करार देते हुए चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा के पक्ष में 25,64,976 रूपये, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के पक्ष में 33,35,623 रूपये और सीनियर सब एडिटर निर्मलकांत शुक्ला के पक्ष में 32,51,135 रूपये की वसूली के लिए हिन्दुस्तान बरेली के महाप्रबंधक/यूनिट हेड और स्थानीय संपादक के नाम आरसी जारी करके जिला अधिकारी, बरेली को भेज दी है।

डीएलसी का फैसला आने के बाद हिन्दुस्तान के उच्च प्रबंधन में हड़कंप मच गया। हिन्दुस्तान के आला अधिकारी रविवार शाम से ही बरेली में डेरा डालकर गुप्त बैठकें करके ऐनकेन प्रकारेण आरसी जारी होने से से रूकवाने के लिए रणनीति बनाते रहे लेकिन डीएलसी का फैसला आते ही उनके चेहरे लटक गए। दूसरी ओर, हिन्दुस्तान बरेली के सीनियर कॉपी एडिटर राजेश्वर विश्वकर्मा के दाखिल क्लेम पर उपश्रमायुक्त ने मंगलवार को संपादक को सुनवाई के लिए तलब किया है।

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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मजीठिया वेज बोर्ड : दिव्या सेंगर मामले में हाईकोर्ट ने ‘नयी दुनिया’ को राहत देने से किया इनकार

इंदौर से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां नई दुनिया अखबार में एक्जीक्यूटिव मार्केटिंग के पद पर कार्यरत दिव्या सेंगर के रायपुर में हुये ट्रांसफर पर सिविल कोर्ट द्वारा रोक लगाने के बाद हाईकोर्ट गए जागरण प्रबंधन के सहयोगी अखबार नयी दुनिया प्रबंधन को भयंकर हार का सामना करना पड़ा है। हाईकोर्ट ने साफ़ कह दिया कि निचली अदालत द्वारा ट्रांसफर पर लगाई गई रोक पूरी तरह सही है।

दिनांक 27 मार्च को मध्य प्रदेश जबलपुर की खंडपीठ इंदौर में एक याचिका की सुनवाई हुई। मामला कुछ यूं है कि मजीठिया वेतन प्राप्त करने के आवेदन पर दिव्या सेंगर नामक एक्जक्यूटिव मार्केटिंग का नई दुनिया प्रबंधन ने दुर्भावनापूर्वक ट्रांसफर कर दिया था। इसके बाद दिव्या अधीनस्थ न्यायलय चली गईं जहां से उन्हें स्थगन मिल गया। इससे असंतुष्ट नई दुनिया प्रबंधन हाईकोर्ट की शरण में रिट की बैसाखी का सहारा ले कर पहुंच गया। लेकिन हाईकोर्ट में नईदुनिया प्रबंधन और उसके उच्च अधिकारीगण को मुँहकी खानी पड़ी। इन लोगों द्वारा इंदौर के सबसे मंहगे वकीलों की फौज खड़ा करने के बावजूद हाईकोर्ट ने स्टे खारिज करने से मना कर दिया।

दिव्या सेंगर नामक नईदुनिया कर्मचारी की ओर से मनीष पाल एडवोकेट इंदौर के तर्कों से सहमत होकर उक्त याचिका पहली सुनवाई पर ही स्थगन आदेश पर स्थगन नहीं देते हुए डिस्पोस्ड कर दी गयी। खुद एडवोकेट मनीष पाल ने इस खबर की पुष्टि की है। नयी दुनिया अखबार प्रबंधन की ओर से मानद वरिष्ठ एडवोकेट एस सी बगड़िया और वरिष्ठ एडवोकेट गिरीश पटवर्धन ने कंपनी का पक्ष रखा।

आपको बता दें कि मजीठिया वेज बोर्ड के तहत वेतन-बकाया मांगने के कारण नयी दुनिया की इंदौर कार्यालय की दिव्या सिंह सेंगर का स्थानांतरण इंदौर से १४ जनवरी को छत्तीसगढ़ के रायपुर कर दिया गया और रिलीविंग आदेश 18 जनवरी को जारी कर दिया गया.

दिव्या सिंह सेंगर के अधिवक्ता मनीष पाल के द्वारा माननीय सिविल न्यायालय की शरण में जाकर स्थगन व स्थाई निषेधाज्ञा हेतु एक वाद प्रस्तुत किया गया और अदालत को बताया गया कि वादिनी दिव्या सेंगर को मजीठिया वेतन बोर्ड के लाभों के लिए श्रम आयुक्त के समक्ष ३० दिसंबर २०१६ की शिकायत प्रस्तुत करने के बाद दुर्भावना के कारण उसका ट्रांसफर किया गया।

माननीय न्यायालय द्वारा वादी अधिवक्ता मनीष पाल के तर्कों से सहमत होते हुए वाद का संतुलन प्रथम दृष्टया वादी के पक्ष में होना मानते हुए दिव्या के विरुद्ध स्थान्तरण और रिलीविंग आदेश पर अंतिम आदेश होने तक स्थगन दे दिया गया। इसके संबंध में आदेश दिनांक तीन फरवरी २०१७ को पारित किया. लेकिन अखबार प्रबंधन दिव्या को अदालती आदेश के बाद भी अखबार में ज्वाईन कराने के मूड में नहीं दिख्रा।

बार बार दिव्या अखबार के दफ्तर गयी मगर अदालती आदेश के बाद भी उन्हें पुराने स्थान पर ज्वाईन नहीं कराया गया और बहाना बनाया गया कि मुख्यालय से आपके बारे में आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। इसके बाद दिव्या सेंगर के अधिवक्ता मनीष पाल ने इंदौर में नयी दुनिया अखबार के प्रबंधन और प्रधान संपादक के खिलाफ अदालत की अवमानना की शिकायत की जिसके बाद अदालत ने अखबार प्रबंधन और प्रधान संपादक को नोटिस भेजा। इसी बीच नयी दुनिया प्रबंधन  इस स्टे पर रोक लगाने के लिए हाईकोर्ट पहुंचा मगर वहां भी उसको राहत नहीं मिली और अखबार प्रबंधन को मुंह की खानी पड़ी।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
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हिन्दुस्तान टाईम्स के बिकने की खबर राज्यसभा में भी गूंजी

शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले अखबार हिन्दुस्तान टाईम्स के रिलायंस के मुकेश अंबानी द्वारा खरीदे जाने का मुद्दा बुधवार को राज्यसभा में भी गूंजा। हालांकि अभी तक हिन्दुस्तान टाईम्स के बिकने की खबर पर न तो हिन्दुस्तान टाईम्स प्रबंधन ने अपना पक्ष रख रहा है और ना ही रिलायंस की ओर से आधिकारिक बयान आया है।

बुधवार को राज्यसभा में जदयू नेता शरद यादव ने कहा- ”हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया और ये उद्योगपति पत्रकारिता को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इस देश का क्या होगा? अब हिंदुस्तान टाइम्स भी बिक गया? कैसे चलेगा यह देश? यह चुनाव सुधार, यह बहस, ये सारी चीजें कहां आएंगी? कोई यहां पर बोलने के लिए तैयार नहीं है। निश्चित तौर पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जो मीडिया है, लोकशाही में, लोकतंत्र में, यह आपके हाथ में है, इस पार्लियामेंट के हाथ में है. कोई रास्ता निकलेगा या नहीं निकलेगा? ये जो पत्रकार है, ये चौथा खंभा है, उसके मालिक नहीं हैं और हिंदुस्तान में जब से बाजार आया है, तब से तो लोगों की पूंजी इतने बड़े पैमाने पर बढ़ी है। मैं आज बोल रहा हूं, तो यह मीडिया मेरे खिलाफ तंज कसेगा, वह बुरा लिखेगा। लेकिन मेरे जैसा आदमी, जब चार-साढ़े चार साल जेल में बंद रहकर आजाद भारत में आया, तो अगर अब मैं रुक जाऊंगा तो मैं समझता हूं कि मैं हिंदुस्तान की जनता के साथ विश्वासघात कर के जाऊंगा।”

शरद यादव ने राज्यसभा में आगे कहा कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिकने वाला है। तभी राज्यसभा के दूसरे सदस्यों ने श्री शरद यादव का ध्यान इस ओर दिलाया कि बिकने वाला नहीं बल्कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया है और इसे मुकेश अंबानी ने खरीदा है। इसके बाद श्री शरद यादव ने भी राज्यसभा में कहा कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया। श्री यादव ने कहा कि हमारे लोकतंत्र में बाजार आया, खूब आए लेकिन यह जो मीडिया है, इसको हमने किनके हाथों में सौंप दिया है? यह किन-किन लोगों के पास चला गया है? एक पूंजीपति है इस देश का, उसने 40 से 60 फीसदी मीडिया खरीद लिया है। ये अखबार के पूंजीपति मालिक कई धंधे कर रहे हैं। इन्होंने बड़ी-बड़ी जमीनें ले ली हैं और कई तरह के धंधे कर रहे हैं। वे यहां भी घुस आते हैं। इनको सब लोग टिकट दे देते हैं। मैं आपसे कह रहा हूं इस तरह यह लोकतंत्र कभी नहीं बचेगा।

श्री शरद यादव ने कहा कि इसके लिए एक कानून बनाना चाहिए कि अगर कोई मीडिया हाउस चलाता है या अखबार चलाता है, तो वह कोई दूसरा धंधा नहीं कर सकता है। हिंदुस्तान में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। यह जो पत्रकार ऊपर बैठा हुआ है, वह कुछ नहीं लिख सकता है क्योंकि उसके हाथ में कुछ नहीं है। यही जब सूबे में जाता है तो मीडिया वहां की सरकार की मुट्ठी में चला जाता है। जो पत्रकार सच लिखते हैं उसे निकालकर बाहर कर दिया जाता है। फिर यह देश कैसे बनेगा, आप कैसे सुधार कर लोगे। जदयू नेता ने कहा कि मैं सबसे पूछना चाहता हूं कि सुधार कैसे होगा। इस देश में मीडिया के बारे में बहस क्यों नहीं होती। इस देश में ऐसा कानून क्यों नहीं बनता कि कोई भी व्यापार या किसी तरह की क्रास होल्डिंग नहीं कर सकता? तब हिंदुस्तान बनेगा।

शरद यादव का पूरा बयान देखने के लिये इस वीडियो लिंक पर क्लिक करें

 

https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
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लोकसभा में फिर उठी मजीठिया की मांग, अबकी RSP के प्रेमचंद्रन ने उजागर किया पत्रकारों का दर्द

देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों का दर्द अब संसद सदस्यों को भी समझ में आने लगा है। कल दूसरे दिन भी लोकसभा में पत्रकारों के वेतन, एरियर और प्रमोशन से जुड़ा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का मामला उठा। इससे पहले मंगलवार को झारखंड के कोडरमा से सांसद डॉ रविन्द्र कुमार राय ने पत्रकारों को मिलने वाले वेतन व सुविधाओं का मामला उठाते हुए मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांग लोकसभा में की थी।

गुरुवार को लोकसभा में सभी पत्रकार और गैर पत्रकार समाचार-पत्र कर्मियों के लिए मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने तथा मीडिया संस्थानों में बड़े पैमाने पर पत्रकारों की हो रही छंटनी को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाने की मांग उठाई गई।

अबकी रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के केएनके प्रेमचंद्रन ने शून्यकाल के दौरान सदन में यह मामला उठाया। उन्होंने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है लेकिन आज उसकी ही हालत खराब होती जा रही है। कई साल होने को आया है लेकिन फिर भी कई समाचार पत्र और मीडिया संस्थान मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने को तैयार नहीं हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि 1955 में बने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के तहत पत्रकारों के वेतनमान की हर पांच साल में एक बार समीक्षा करने का प्रावधान किया गया था लेकिन उसे धता बता दिया गया और अब मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने से भी मीडिया संस्थान गुरेज कर रहे हैं। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर रहे लोगों का जिक्र करते हुए कहा कि वर्किंग जर्नलिस्ट कानून जब बना था तब देश में इलेक्ट्रानिक मीडिया नहीं था, ऐसे में इस क्षेत्र के लोगों को भी इस कानून में दायरे में लाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रेमचंद्रन ने मीडिया कंपनियों में मनमाने तरीके से पत्रकारों की छंटनी का मामला भी उठाया और कहा कि इसके कारण पत्रकारों के लिए नौकरी की सुरक्षा खत्म होने लगी है। उन्होंने कहा कि वह सरकार से अनुरोध करते हैं कि इस चलन को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया जाए और पत्रकारों की नौकरी सुरक्षित की जाए। आपको बता दें कि बुधवार को राज्य सभा में भी जदयू नेता शरद यादव ने मजीठिया वेतन आयोग को लागू ना करना तथा मालिकों की मनमानी का मुद्दा उठाया था। इसके बाद देश भर के पत्रकारों में खुशी की लहर है वहीं मालिकों के खेमे में बेचैनी देखी जा रही है।

डा. रविंद्र कुमार राय ने क्या बोला, वीडियो देखें : https://www.youtube.com/watch?v=sDCC-OeVLLI

शरद यादव ने क्या बोला, वीडियो देखें : https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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हिंदुस्तान, आगरा के 11 कर्मियों ने मांगा मजीठिया, श्रम विभाग ने प्रबंधन को लगाई कड़ी फटकार

20 मार्च और 22 मार्च को श्रम विभाग में हुई सुनवाई… हिंदुस्तान अखबार को चलाने वाली कंपनी को बुधवार को एक और तगड़े झटके का सामना करना पड़ा। हिन्दुस्तान की आगरा यूनिट में 11 मीडिया कर्मचारियों ने मजीठिया वेतन की सिफारिशें लागू करने की मांग की तो कंपनी ने कुछ को बाहर का रास्ता दिखाया तो कई के खिलाफ शोषण और प्रताड़ना का अभियान-सा छेड़ दिया। इससे दुखी कर्मचारियों ने श्रम विभाग की ओर रुख किया तो उन्हें बुधवार को बड़ी राहत मिली।

सोमवार को अपर श्रम आयुक्त प्रतिभा तिवारी के सामने दोनों पार्टियां उपस्थित हुईं। कंपनी प्रबंधन की ओर से बड़े अधिकारी आशीष मित्तल उपस्थित हुए। वहीं कर्मचारियों की तरफ से 11 मीडिया कर्मी अपने वकील शरद शुक्ला के साथ मौजूद रहे। गौरतलब है कि शरद शुक्ला यूपी के श्रम मामलों के काफी जानकार अधिवक्ता हैं।

कार्यवाही शुरू हुई तो कंपनी के अधिकारी आशीष मित्तल ने कई कुतर्क पेश किये। लेकिन जानकार अधिवक्ता शरद शुक्ला ने मित्तल के बड़े-बड़े दावों को आधारहीन और फर्जी साबित कर दिया। सुनवाई के दूसरे दिन कंपनी के तर्कों को फर्जी मानते हुए श्रम अधिकारी ने आरसी जारी करने का फैसला सुरक्षित रख लिया। आगरा में 11 कर्मचारियों के लिए कंपनी की ओर से करीब 4 करोड़ की देनदारी बन रही है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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मजीठिया वेज बोर्ड पर शरद यादव के जोरदार भाषण का मीडिया ने किया बहिष्कार, राज्यसभा में मीडिया को जमकर दुत्कार

शरद यादव द्वारा कल राज्यसभा में मजीठिया वेज बोर्ड, मीडिया की आजादी और मीडिया मालिकों की धंधेबाजी पर दिए गए जोरदार भाषण को न किसी चैनल न दिखाया और न किसी अखबार ने छापा… आज राज्यसभा में मीडिया की इस हरकत की जमकर की गई निंदा 

जदयू नेता शरद यादव द्वारा बुधवार को राज्यसभा में उठाये गये जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के क्रियान्वयन के मुद्दे को आज देश भर के किसी भी बड़े समाचार पत्र ने एक लाईन नहीं प्रकाशित किया। मीडिया मालिकों की इस हरकत से राज्यसभा में आज विपक्ष का तेवर तल्ख दिखा। विपक्ष ने गुरुवार को राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया और कहा कि मीडिया ने उच्च सदन में कल चुनाव सुधारों पर हुई चर्चा के दौरान संपन्न रचनात्मक बहसों तथा सुझावों का प्रकाशन नहीं किया।

बैठक शुरू होने पर सपा के नरेश अग्रवाल ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि देश अपेक्षा करता है कि सदन में जो कुछ हुआ, उसकी खबर दी जाए। लेकिन जो खबरें दी जाती हैं, वह यह होती हैं कि सांसदों ने हंगामा किया और आसन के समक्ष आ गए। अगर आप नकारात्मक खबरें देते हैं तो सकारात्मक खबरें भी दिया करें। उन्होंने कहा कि जदयू के शरद यादव ने कल चुनाव सुधारों पर जो भी सुझाव दिए थे, बड़े समाचार पत्रों ने उनके बारे में एक शब्द भी प्रकाशित नहीं किया। आसन को चाहिए कि वह मीडिया को इस बारे में निर्देश दे। सपा नेता ने कहा आप डांट नहीं सकते लेकिन यह निर्देश दे सकते हैं कि जो भी सकारात्मक चर्चाएं होती हैं उनकी खबर दी जानी चाहिए।

शरद यादव ने कहा कि कई मुद्दों पर होने वाली अच्छी बहसें सदन की चारदीवारी के अंदर ही दफन हो जाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया को दी गई आजादी पत्रकारों के लिए नहीं बल्कि मीडिया मालिकों के लिए आजादी बन गई है। उन्होंने मांग की कि सरकार को इस संबंध में एक कानून बनाना चाहिए कि मीडिया मालिक एक ही कारोबार करें। उप सभापति पी जे कुरियन ने कहा कि अगर मीडिया कोई खबर प्रकाशित नहीं कर रहा है तो इसमें आसन क्या कर सकता है। यादव ने कहा कि एक कानून बनाया जाना चाहिए जिसके अनुसार, मीडिया मालिकों को दूसरे कारोबार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।


शरद यादव का मीडिया पर दिया गया चर्चित भाषण अगर आपने नहीं सुना तो जरूर सुनिए… नीचे दिए लिंक पर क्लिक करिए…

https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY


कांग्रेस के आनंद शर्मा ने कहा कि मीडिया ने लोगों के विचारों को संवेदनशील बनाने और लोक महत्व के मुद्दों पर संवादों का संतुलन सुनिश्चित कर लोकतंत्र में अहम भूमिका निभाई है। लेकिन मीडिया में विपक्ष की राय को भी महत्व मिलना चाहिए। मनोनीत सदस्य एवं स्तंभकार स्वप्न दासगुप्ता ने कहा कि मीडिया को निर्देश देने की शुरुआत करना सरकार या संसद के लिए खतरनाक होगा। उनके इस कथन पर कई सदस्यों ने आपत्ति जताई। उप सभापति पी जे कुरियन ने कहा कि अगर समुचित नोटिस दिया जाए तो इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया पर आरोप लगाने का कोई औचित्य नहीं है।

उप सभापति पी जे कुरियन ने मलयालम में एक उक्ति कही और फिर उसका अंग्रेजी में अनुवाद बताते हुए कहा कि अगर कुत्ता आदमी को काटता है तो यह खबर नहीं है लेकिन अगर आदमी ने कुत्ते को काट लिया तो यह बड़ी खबर है। कुरियन ने कहा अगर आप ठीक से बैठें और संबोधित करें तो यह खबर नहीं है। लेकिन अगर आप संतुलित व्यवहार न करें तो यह खबर है। बहरहाल, मैं यह कहना चाहूंगा कि मीडिया हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और उन्हें जिम्मेदार होना चाहिए तथा ईमानदारीपूर्वक रिपोर्टिंग करना चाहिए।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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लोेकसभा और राज्यसभा में उठी मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की मांग (देखें वीडियो)

देश भर के अखबार मालिकों द्वारा अपने कर्मचारियों का किए जा रहा शोषण और मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने की मांग आज संसद में उठी। २४ घंटे के अंदर मीडियाकर्मियों के साथ अन्याय और वेज बोर्ड न लागू कर मीडिया मालिकों द्वारा की जा रही मनमानी का मसला राज्यसभा और लोकसभा दोनों जगहों में उठाया गया। बुधवार को राज्यसभा में जहां जाने माने नेता जदयू के शरद यादव ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश अभी तक लागू ना किए जाने का सवाल जोरशोर से उठाया वहीं मंगलवार को कोडरमा के सांसद डाक्टर रविंद्र कुमार राय ने इस मुद्दे को लोकसभा में जमकर उठाया।

अखबार मालिकों की मनमानी का मुद्दा राज्य सभा में दूसरे नेताओं ने भी उठाया और वे अखबार मालिकों पर जमकर बिफरे। चुनाव सुधार पर उच्च सदन में हुयी अल्पकालिक चर्चा में भाग लेते हुए जदयू के शरद यादव ने मीडिया में सुधारों की वकालत की और कहा कि अगर मीडिया पर पूंजीपतियों का नियंत्रण हो जाएगा तो इससे लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। शरद यादव ने कहा कि पत्रकारों को ठेके पर रखा जा रहा है। उन्होंने मांग की कि समाचार पत्रों के लिए मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए। यादव ने कहा कि उन्होंने खुद ही पेड न्यूज की आयोग से शिकायत की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि लोगों को सही खबरें नहीं मिल रही हैं। पत्रकार ईमानदार हैं लेकिन वे अपने मालिकों के कारण सही खबरें नहीं लिख पाते। उन्होंने कहा कि अब पूंजीपति मीडिया घरानों के मालिक हैं। उन्होंने कहा कि इस विषय पर विस्तार से चर्चा किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि पत्रकार जो लोकहित के संदेशों का प्रमुख वाहक और प्रहरी होता था, वह पूंजीपतियों के मीडिया में बढ़ते वर्चस्व के कारण ठेके पर रखे जाते हैं और हायर एंड फायर के खतरे से जूझते हैं। उन्होंने कहा कि आज मीडिया को आम जनता से काट दिया गया है।

शरद यादव का पूरा भाषण सुनने के लिए नीचे क्लिक करें : 

https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY

उधर कोडरमा के सांसद डॉ रविंद्र कुमार राय ने मंगलवार को लोकसभा में नियमावली 377 के अंतर्गत पत्रकारों को मिलने वाले वेतन और सुविधाओं का मामला उठाया। उन्होंने कहा कि पत्रकार लोकतंत्र में अपनी बड़ी भूमिका निभाते हैं, कुछ पत्रकारों को जीवन यापन करने लायक वेतन भी नहीं मिलता। देश में पत्रकारों के वेतन व सुविधाओं में वृद्वि हेतु जस्टिस जी आर मजीठिया वेज बोर्ड का गठन किया गया था। बोर्ड ने सभी तथ्यों को देखकर अपनी सिफारिशे सरकार को दी और 11 नवम्बर 2011 को अधिसूचित कर दिया गया।

बड़े खेद का विषय है कि आज तक भी अखबार मालिको द्वारा पत्रकारो को उनका हक नही दिया जा रहा है, इस तरह की अवमानना के कई मामले माननीय सर्वोच्य न्यायालय में विचाराधीन है । डॉ रविंद्र कुमार राय ने सरकार से अनुरोध किया कि देश के सभी पत्रकारो को मजीठिया बोर्ड की सिफारिशो अनुसार सुविधाएं तत्काल दी जाए और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशे न मामने वालो के विरूद्व कार्यवाही की जाए ताकि पत्रकारो को उनका हक मिल सकें।  उन्होंने कहा की माननीय मोदी जी के नेतृत्व में चल रही सरकार में हर वर्ग की चिंता हुई है, पत्रकारों के साथ अनदेखी न की जाये।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त की हो सकती है गिरफ्तारी!

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अखबार मालिकों के दबाव में काम करने वाले महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त की जल्द गिरफ्तारी हो सकती है। उनके खिलाफ 2 करोड़ ४३ लाख रुपये के डेयरी मिल्क घोटाले में एफआईआर दर्ज हुयी थी मगर आज लगभग नौ महीने बाद भी उनकी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। इस पूरे घोटाले का पर्दाफाश किया है मुंबई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह ने।

आरटीआई से मांगी गयी एक जानकारी में खुद मुंबई पुलिस ने कबूल किया है कि सितंबर २०१६ में हुये मिल्क कापरेटिव घोटाले में महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त यशवंत केरुरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गयी है मगर अब तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पायी है। पत्रकार शशिकांत सिंह द्वारा आरटीआई के जरिये मांगी गयी एक जानकारी में मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा के जीसी १ के पुलिस निरीक्षक भिलारे आ.बी. ने १८ फरवरी २०१७ को सहायक पुलिस आयुक्त प्रशासन को लिखे एक पत्र की प्रति उपलब्ध करायी है जिसमें लिखा गया है कि शशिकांत सिंह द्वारा मांगी गयी जानकारी आर्थिक अपराध शाखा के अपराध पंजीकरण क्रमांक ६२/ २०१६ से संबंधित है। इसमें प्रथम रिपोर्ट अपराध दाखिल होने के बाद माननीय ४७ वें न्यायालय मुंबई के सामने प्रस्तुत किया गया है।

इस सूचना में यह भी बताया गया है कि यशवंत केरुरे की गिरफ्तारी अब तक नहीं हो सकी है। यशवंत केरुरे और इस मामले में ९ लोगों के खिलाफ जो आरोप लगाये गये हैं वे एफआईआर की कापी में हैं। अब सवाल ये उठता है कि आखिर किसी आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुयी तो उसकी गिरफ्तारी अब तक क्यों नहीं हुयी। इस मामले में श्री शशिकांत सिंह ने साफ कहा है कि वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लेकर जायेंगे कि किस तरह एक अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद भी उसकी गिरफ्तारी नहीं होती है। साथ ही वे ये जानने का प्रयास करेंगे कि ऐसा इस देश में कैसे हो सकता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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‘हिंदुस्तान’ अखबार से 6 करोड़ वसूलने के लखनऊ के अतिरिक्त श्रमायुक्त के आदेश की कापी को पढ़िए

लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को क़रीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है. लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एमके पाण्डेय ने 6 मार्च को हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए ज़िलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है. इस बाबत खबर तो भड़ास4मीडिया पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है लेकिन आज हम यहां आदेश की पूरी कापी दे रहे हैं… नीचे आर्डर कापी का पहला पेज है….

पेज वन..

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‘हिंदुस्तान’ अखबार के खिलाफ आरसी जारी, 6 करोड़ वसूल कर 16 पत्रकारों में बंटेगा

लखनऊ से बड़ी ख़बर है। मजीठिया वेतनमान प्रकरण में दैनिक समाचार पत्र हिंदुस्तान की अब तक की सबसे बड़ी हार हुई है। कम्पनी का झूठ भी सामने आ गया है। यह भी सामने आया है कि मजीठिया की सिफ़ारिश से बचने के लिए कम्पनी ने तरह तरह के षड्यंत्र किए। लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को क़रीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है। लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एम॰के॰ पाण्डेय ने ६ मार्च को हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए ज़िलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है।

श्रम अधिकारी ने ज़िलाधिकारी को भेजी रिकवरी-आरसी की धनराशि हिंदुस्तान से वसूल कर श्रम विभाग को देने को कहा है। डीएम की अब यह ज़िम्मेदारी होगी की वह हिंदुस्तान से पैसा वसूल के श्रम विभाग को दें और फिर श्रम विभाग यह राशि मुक़दमा करने वाले 16 कर्मचारियों को देगा। श्रम विभाग के इस आदेश से यह भी साबित हो गया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक़ वेतनमान नहीं दे रहा है। जबकि हिंदुस्तान प्रबंधन ने श्रम विभाग को यह लिखित जानकारी दी थी कि कम्पनी मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक़ वेतन दे रही है।

इसी आधार पर श्रम विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में यह ग़लत हलफ़नामा लगा दिया कि हिंदुस्तान मजीठिया के अनुसार वेतनमान कर रहा है। अब इस प्रकरण में ग़लत हलफ़नामा देने पर कम्पनी के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी का मुकदमा भी चल सकता है। ख़ुद श्रम विभाग ने यह लिखकर दिया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतनमान नहीं दे रहा और न ही विभाग को काग़ज़ उपलब्ध करा रहा है।

ग़ौरतलब है कि सितम्बर २०१६ को हिंदुस्तान व हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकारों व ग़ैर पत्रकारों ने प्रमुख सचिव श्रम के यहाँ शिकायत कर कहा था कि प्रबंधन मजीठिया वेतनमान के अनुसार वेतन नहीं दे रहा है। इसके बाद प्रबंधन उत्पीड़न पर उतर आया। आठ पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद श्रम विभाग में सभी पत्रकारों ने नौकरी से निकाले जाने और नवम्बर २०११ से २०१६ के बीच मजीठिया वेतनमान का डिफरेंस दिए जाने का वाद दायर किया। बर्ख़ास्तगी का केस अभी विभाग में लम्बित है जबकि ६ मार्च को श्रम विभाग ने पत्रकारों के पक्ष को सही मानते हुए कम्पनी के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया।

रिकवरी केस फ़ाइल करने में कुल 16 कर्मचारी शामिल थे। इन सभी को श्रम विभाग ने उनके वेतन के हिसाब से 10 लाख रुपए से 60 लाख रुपए तक भुगतान करने का आदेश दिया है। श्रम विभाग ने डीएम को जारी आरसी में कहा है कि यदि कम्पनी इस राशि का भुगतान तत्काल नहीं करती है तो कम्पनी की सम्पत्ति कुर्क कर राशि का भुगतान कराया जाए। हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र का झूठ इसी से समझा जा सकता है कि चार महीने की सुनवायी के बावजूद हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र अपनी ओर से एक भी लिखित जवाब दाख़िल नहीं कर पाया।

कर्मचारियों ने मुक़दमे में साक्ष्यों के साथ यह तर्क दिया कि हिंदुस्तान अखबार एक नम्बर कैटगरी में आता है और इसी हिसाब से भुगतान किया जाना चाहिए। प्रबंधन ने इसके ख़िलाफ़ कोई तर्क नहीं दिया जिससे यह साबित हुआ कि कम्पनी कैटगरी नंबर वन की है और मजीठिया का भुगतान इस कैटगरी के हिसाब से नहीं दिया जा रहा है। कर्मचारियों के वक़ील शरद पाण्डेय ने श्रम विभाग में अपने तर्कोंं से साबित किया कि हिंदुस्तान ने अब तक मजीठिया वेतनमान नहीं दिया है और पूर्व में जो भी पत्र दिए वह झूठे थे।

अनुभवी वक़ील शरद ने कम्पनी के नामी-गिरामी वकीलों की फ़ौज को अपने तर्कों से अनुत्तरित कर दिया। यह भी पता चला है कि हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र पूर्व में जालसाज़ी करते हुए कोर्ट में इतने झूठे काग़ज़ात लगाए हैं कि आगे कोई भी वक़ील इनका केस लड़ने को तैयार नहीं हो रहा है। जिन १६ लोगों ने श्रम विभाग में वाद दायर किया था उनमें संजीव त्रिपाठी, प्रवीण पाण्डेय, संदीप त्रिपाठी, आलोक उपाध्याय, प्रसेनजीत रस्तोगी, हैदर, लोकेश त्रिपाठी, आशीष दीप, हिमांशु रावत, एलपी पंत, जितेंद्र नागरकोटी, आरडी रावत, बीडी अग्रवाल, सोमेश नयन, रामचंदर, पंकज वर्मा शामिल है।

पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

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दिल्ली की श्रम अदालत ने दैनिक जागरण पर ठोंका दो हजार रुपये का जुर्माना

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़े दिलीप कुमार द्विवेदी बनाम जागरण प्रकाशन मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय ने दैनिक जागरण पर दो हजार रुपये का जुर्माना ठोंक दिया है। इस जुर्माने के बाद से जागरण प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। बताते हैं कि गुरुवार को दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय में दैनिक जागरण के उन 15 लोगों के मामले की सुनवाई थी जिन्होंने मजीठिया बेज बोर्ड की मांग को लेकर जागरण प्रबंधन के खिलाफ केस लगाया था। इन सभी 15 लोगों को बिना किसी जाँच के झूठे आरोप लगाकर टर्मिनेट कर दिया गया था। गुरुवार को जब न्यायालय में पुकार हुयी तो इन कर्मचारियों के वकील श्री विनोद पाण्डे ने अपनी बात बताई।

इस पर जागरण प्रबंधन के वकील श्री आर के दुबे ने कहा कि मेरे सीनियर वकील कागजात के साथ आ रहे हैं, अभी रास्ते में हैं। माननीय जज ने कहा कि अगली तारीख पर दे देते हैं। इस पर वकील विनोद पांडेय ने कहा कि हुजूर, ये लोग मामले को लटकाना चाहते हैं, संबंधित डाक्यूमेंट्स नहीं देना चाहते हैं, वैसे ही हम बहुत लेट हो चुके हैं, आज हम देर से ही सही, आपके सामने इनका जवाब लेंगे। इस पर माननीय जज साहब ने पासओवर दे दिया और कहा कि 12 बजे आइये। तय समय पर वर्कर अपने वकील के साथ हाजिर हुए, तो मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया। जज ने फिर वर्कर को साढ़े बारह बजे आने के लिए कहा। फिर सभी उक्त समय पर हाजिर हुए, तब भी मैनेजमेंट के लोग गायब रहे। इसी बात पर और कानून के हिसाब से जागरण पर 2000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले की अगली तारीख 4 मई की लगी है।

सूत्रों के हवाले से दैनिक जागरण से जुड़ी एक और चर्चा भी यहां चल रही है कि प्रबंधन अब वर्करों से हारने वाला है। ऐसा कई मोर्चों पर हो रहा है। सूत्र कहते हैं कि एक ओर जहां अदालत में जागरण प्रबंधन की किरकिरी हुयी है वहीं उनमें अब हार का डर भी समाने लगा है। दैनिक जागरण में एक और चर्चा है कि जागरण में एक बड़ी मीटिंग हुई है, जिसमें यह बात भी सामने आयी कि जितने भी वर्कर बाहर हों, सबको जल्दी अंदर लिया जाये।

खबर है कि मालिकानों में अब हर जगह हो रही फजीहत की वजह से आपस में ही जूतमपैजार होने की नौबत आ गई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मजीठिया मामले को लेकर जागरण का पूरा घराना एक तरफ और संजय गुप्ता अकेले एक तरफ हैं। दूसरी ओर माननीय सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस में भी अब मालिकानों को हार नजर आ रही है, इसलिए भी परेशान हैं। जागरण के मालिक संजय गुप्ता की बात करें तो उन्होंने अपने वर्करों से मजीठिया की मांग करने के दौरान यह कहा था कि नौकरी हम देते हैं, सुप्रीम कोर्ट नहीं, हम जैसे चाहेंगे, वैसे काम कराएँगे, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह तब की बात है, लेकिन आज ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
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कर्मचारी एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड के, वेतन अभी भी दे रही एचएमवीएल

कई कर्मचारियों से त्यागपत्र लेने के बाद भी नहीं दिया गया पुराना बकाया… शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले अखबार हिन्दुस्तान से खबर आ रही है कि यहां कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से इस्तीफा दिलाकर नयी कंपनी में भले ही ज्वाईन करा लिया गया है मगर पटना सहित कई जगह रिजाईन लेने के बाद भी कई कर्मचारियों को उनका पुराना हिसाब नहीं दिया गया है। यही नहीं, हिंदुस्तान अखबार की कंपनी का नाम कल तक हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड था मगर अब एक नयी कंपनी खोलकर अखबार प्रबंधन ने उसका नाम रख दिया एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड। इस नई कंपनी में जबरिया कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से त्यागपत्र दिलाकर 1 जनवरी 2017 से ज्वाईन करा दिया गया है।

पटना से तो ये भी खबर आ रही है कि यहां कई कर्मचारियों से त्याग पत्र लेने के बाद भी उनका पुराना हिसाब एक भी पैसे का नहीं दिया गया। इसके बाद कर्मचारियों को संदेह हो रहा है कि उनकी पुरानी कंपनी का ग्रैच्युटी और फंड के पैसे क्यों नहीं दिये गये जबकि नियमानुसार कर्मचारी अगर त्यागपत्र देता है तो उसे उसके काम के साल के ग्रैच्युटी का भुगतान कंपनी करती है। फिर कंपनी ने ऐसा क्यों नही किया। यही नहीं हिन्दुस्तान के कुछ कर्मचारियों ने सूचना दी है कि कर्मचारियों का ट्रांसफर हिन्दुस्तान मल्टीमीडिया से नयी कंपनी में कर दिया गया है मगर वेतन अब भी पुरानी कंपनी से ही आ रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि दोनों कंपनी एक ही हैं और सिर्फ मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर देने से बचने के लिए नई कंपनी बना ली गयी है क्योंकि माह जनवरी और फरवरी का जो वेतन नई कंपनी के कर्मचारियों के बैंक खाते में आया है, वह एचएमवीएल की ओर से देना बैंक के मैसेज में दशार्या गया है। जाहिर है कि नई कंपनी सिर्फ कागजों में बना ली गई और सारे दायित्व व देनदारियां एचएमवीएल ही वहन करती रहेगी। ये सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और श्रम न्यायालय को धोखा देने के लिए हिन्दुस्तान के प्रबंधन ने रास्ता निकाला है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
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हिंदुस्तान बरेली से तीन लोगों ने उप श्रमायुक्त के कोर्ट में किया मजीठिया का क्लेम

बरेली से खबर आ रही है कि हिंदुस्तान अखबार के सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा ने 33,35,623 रुपये, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला ने 32,51,135 रुपये और चीफ रिपोर्टर डॉ. पंकज मिश्रा ने 25,64,976 रुपये का मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के अनुसार एरियर का क्लेम उप श्रमायुक्त बरेली के यहाँ ठोंक दिया है। तीनों ने उपश्रमायुक्त बरेली से शिकायत की है कि हिंदुस्तान प्रबंधन मजीठिया के अनुसार वेतन और बकाया देय मांगने पर उनको प्रताड़ित कर रहा है। साथ ही आये दिन धमका रहा है।

बरेली हिंदुस्तान के सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला ने उप श्रमायुक्त से लिखित शिकायत की है कि तीन माह पहले श्रमायुक्त कानपुर को भेजी गई जिस शिकायत पर उनके (उपश्रमायुक्त) द्वारा सुनवाई की जा रही है, उस शिकायत को वापस लेने के लिए हिंदुस्तान प्रबंधन लगातार दबाव बनाता रहा। हिंदुस्तान बरेली के एच आर हेड और मेरठ से आकर रीजनल एचआर हेड ने धमकाया कि यदि शिकायत वापस नहीं लोगे तो तुमको संस्थान से बाहर कर दिया जायेगा, तुम्हारा ट्रांसफर इतनी दूर कर देंगे, जहाँ से साल-साल भर अपने घर नहीं आ सकोगे।

निर्मल कान्त शुक्ला ने डीएलसी से कहा कि वह इन धमकियों से भयभीत हैं। ये दोनों उनके साथ कोई भी अनहोनी कारित करा सकते हैं। इन दोनों पर सख्त कार्रवाई की जाय। डीएलसी ने प्रबंधन से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई की तिथि 3 मार्च नियत की है।

दरअसल यूपी के श्रमायुक्त से मजीठिया के अनुसार वेतन न मिलने की बरेली हिंदुस्तान से चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा, सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, पेजिनेटर अजय कौशिक ने शिकायत भेजी थी। श्रमायुक्त ने बरेली डीएलसी को प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया, जिस पर डीएलसी बरेली सुनवाई कर रहे हैं। प्रबंधन के लोगों ने सुनील मिश्रा और रवि श्रीवास्तव को पहली ही सुनवाई पर डीएलसी के यहां ले जाकर ये लिख लिया और फाइल पर चस्पा करा दिया कि हमको मजीठिया के समस्त लाभ मिल रहे हैं, हमें संस्थान से कोई शिकायत नहीं है। हालांकि डीएलसी ने इस तरह स्टेनो की पास ले जाकर फाइल में कागज चस्पा कराने को मानने से इनकार कर दिया और रवि व सुनील को फिर नोटिस भेजकर बुलवाने और उन दोनों के खुद बयान लेने की बात कही है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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‘झारखंड मजीठिया संघर्ष समिति’ का गठन, 10 मार्च को रांची में धरना

झारखंड की राजधानी रांची से खबर आ रही है कि यहां उत्साही मीडियाकर्मियों ने ‘झारखंड मजीठिया संघर्ष समिति’ का गठन कर लिया है। इस बाबत बैठक रातू रोड, न्यू मार्केट स्थित राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘पूरी दुनिया’ के कार्यालय में हुई। डेढ़ दर्जन से अधिक मजीठिया कमियों की उपस्थिति में समिति की ओर से 27 फरवरी को डोरंडा स्थित श्रमाधीक्षक रांची-1 को ज्ञापन सौंपा गया है।

इसमें कहा गया है कि जिन अखबारों के कर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिलाने के लिए फॉर्म-सी भरकर श्रमायुक्त कार्यालय को उपलब्ध कराया है, अखबारों के प्रबंधन के दबाव में अब तक किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई है। फॉर्म-सी भरने वाले पत्रकारों ने चेतावनी दी है कि अगर प्रबंधन के खिलाफ सर्टिफिकेट केस नहीं किया गया, तो 10 मार्च को समिति की ओर से श्रमाधीक्षक कार्यालय के समक्ष जोरदार धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। इसमें भारी संख्या में मजीठिया कर्मी उपस्थित रहेंगे।

इस झारखंड मजीठिया संघर्ष समिति में कई जाने माने अखबारों के पत्रकार और गैर पत्रकार शामिल हैं। इस संघर्ष समिति के गठन की सूचना के बाद से ही झारखंड में अखबार मालिकों में हड़कंप का माहौल है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया मामले में काश सुप्रीमकोर्ट ऐसा कर देता!

देश के अधिकांश अखबार मालिकों के खिलाफ माननीय सुप्रीमकोर्ट में अवमानना का केस चल रहा है। इस मामले में सुप्रीमकोर्ट में अभी डेट नहीं पड़ पा रही है। अगर माननीय सुप्रीमकोर्ट कुछ चीजें कर दे तो सभी अखबार मालिकों की नसें ना सिर्फ ढीली हो जायेंगी बल्कि देश भर के मीडिया कर्मियों को इंसाफ भी मिल जायेगा। इसके लिये सबसे पहले जिन समाचार पत्रों की रिपोर्ट कामगार आयुक्त ने सुप्रीमकोर्ट में भेजी है उसमें जिन अखबार मालिकों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश नहीं लागू किया है या आंशिक रुप से लागू किया है ऐसे अखबारों के मैनेजिंग डायरेक्टर, डायरेक्टर, पार्टनर और सभी पार्टनरों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुये उनके खिलाफ कामगार आयुक्त को निर्देश दें कि उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दें और सभी जिलाधिकारियों, तहसीलदारों को निर्देश दें कि उनके खिलाफ रिकवरी कार्रवाई शुरू की जाये। उनको जमानत भी माननीय सुप्रीमकोर्ट से तभी प्राप्त हो जब वे मीडियाकर्मियों को उनका पूरा बकाया एरियर वेतन तथा प्रमोशन दें।

जिन मीडियाकर्मियों ने मजीठिया का क्लेम लगाया या याचिका दायर की ऐसे जितने मीडियाकर्मियों का प्रबंधन ने ट्रांसफर या टर्मिनेशन किया है ऐसे मीडियाकर्मियों के ट्रांसफर और ट्रमिनेशन पर रोक लगा दे। अब बाकी बचे ऐसे अखबार मालिक जिन्होंने कामगार आयुक्त को पटा कर यह रिपोर्ट लिखवा लिया कि उनके यहां मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू है ऐसे अखबारों की स्कूटनी करायी जाये। इसके लिये प्रदेश स्तर पर एक जांच कमेटी बनायी जाये। इस कमेटी में आयकर विभाग के अधिकारी, हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज, पत्रकारों द्वारा प्रत्येक राज्य में चुने गये उनके प्रतिनिधि और सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट हो।

यह कमेटी सभी अखबारों में यह विज्ञापन जारी करे कि इन अखबारों ने दावा किया है कि ये अपने कर्मचारियों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश दे रहे हैं। अखबार मालिकों के एक दावे की जांच के लिये तीन दिवसीय एक कैंप लगाया जा रहा है। अगर किसी भी कर्मचारी को जो इन अखबारों में काम करते हैं उनको वेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं मिल रहा है तो वे इस कैंप में संपर्क करें। इस कैंप में आयकर अधिकारी अखबारों और उनके प्रबंधन की सहयोगी कंपनियों के २००७ से १० तक की बैलेंससीट और दूसरे कागजात लेकर आयें।

इस कैंप में कामगार आयुक्त इस दावे की पुष्टि के सभी कागजात प्रमोशन लिस्ट लेकर आयें जिसकी एक सीए भी जांच करे और मीडियाकर्मियों की सेलरी स्लीप तथा दूसरे संबंधित कागजातों की उसी समय जांच कर अखबार के मैनेजिंग डायरेक्टर, डायरेक्टर, पार्टनर और सभी पार्टनरों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुये उनके खिलाफ कामगार आयुक्त को निर्देश दे कि उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा दें और  सभी जिलाधिकारियों, तहसीलदारों को निर्देश दे कि उनके खिलाफ रिकवरी कार्रवाई शुरू की जाये। उस अखबार के सभी मीडियाकर्मियों को उनका अधिकार दिलाया जाये। साथ ही इसकी पूरी रिपोर्ट माननीय सुप्रीमकोर्ट में भेजी जाये। इसके बाद जितने मामले १७. २ के लेबर कोर्ट में चल रहा हैं वे खुद ब खुद मीडियाकर्मी वापस ले लेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में ६ माह से ज्यादा का समय ना लगे। साथ ही जो मीडियाकर्मी २००७ से २०११ तक जिस पद पर था उसी पद को आधार माना जाये और उनका पद या विभाग या कंपनी ना बदला जाये।  काश सुप्रीमकोर्ट ऐसा कर देता।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेज बोर्ड से घबड़ाये हिन्दुस्तान प्रबंधन ने कर्मचारियों से लिया त्यागपत्र

एक नयी कंपनी एच टी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड में कराया गया ज्वाईन

देश के प्रतिष्ठित अखबार हिन्दुस्तान से खबर आ रही है कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अवमानना मामले से घबड़ाये प्रबंधन ने संपादकीय विभाग में कुछ संपादक लेबल के या पुराने लोगों को छोड़कर बाकी सभी से त्यागपत्र ले लिया है और इन सभी को एक नयी कंपनी एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड में ज्वाईन करा दिया गया है। साथ ही जितने भी हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग के कर्मचारी हैं, अधिकांश से जबरी इस्तीफे पर साईन करा लिया गया है।

पहले इस कंपनी का नाम हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड था मगर अब एक नयी कंपनी खोलकर अखबार प्रबंधन ने उसका नाम रख दिया एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड। इस नई कंपनी में जबरिया कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से त्यागपत्र दिलाकर ज्वाईन करा दिया गया है। पता चला है कि दिल्ली, नोएडा, पटना, बनारस, कानपुर, लखनऊ सभी जगह यह कार्रवाई की गई है। इन सभी जगहोंसे खबर आ रही है कि पुरानी कंपनी में अब सिर्फ उन्ही लोगों को रखा गया है जो बहुत पुराने थे। बाकी सभी को नयी कंपनी में ज्वाईन करा दिया गया है। कर्मचारी भी बेचारे कंपनी प्रबंधन के दबाव में साईन करने को मजबूर हो गये।

सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि पुरानी कंपनी का जहां पटना में पता अशोक सिनेमा है वहीं नयी कंपनी का कागज पर कुछ और पता है, मगर काम पुराने पते पर ही हो रहा है। सूत्र तो यहां तक बता रहे हैं कि हिन्दुस्तान प्रबंधन ने एक नया तरकीब खोजा है और वह ये है कि वह यह साबित करना चाहती है कि वह डिजिटल कंपनी से खबरें खरीद रही है और उस डिजिटल कंपनी के कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आते क्योंकि अभी तक वेब और टीवी के कर्मियों को वेज बोर्ड के दायरे में रखा ही नहीं गया है। मजीठिया वेज बोर्ड सिर्फ प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों पर लागू होता है। इस हिंदुस्तान प्रबंधन एक तीर से दो निशाने साध रहा है। नई नियुक्ति करके वह खर्चे बचा रहा है। साथ ही वेज बोर्ड के दायरे से भी कर्मचारियों को बाहर रखने की तरकीब निकाली है।

इस नई डिजिटल कंपनी एच टी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड से खरीदी गयी खबर को एच टी मीडिया वेंचर में मौजूद सात या आठ कर्मचारी ही बना रहे हैं। कंपनी ने जिन लोगों से इस्तीफे पर साईन कराया है उनको मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं दिया। सीधे सीधे कहें तो जिन कर्मचारियों ने इस कागजात पर साईन किया है उनका हाथ कंपनी ने काट लिया है। हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स के कई एडिशनों से ऐसी ही खबरें आ रही हैं जिससे यहां कर्मचारियों में हड़ंकप का माहौल है। हालांकि कानून के कई जानकारों का कहना है कि इसका भी तोड़ है और जल्द ही इस बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी। 

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
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मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई फिर टली

देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियो के वेतन, एरियर और प्रमोशन से जुड़े जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई  माननीय सुप्रीमकोर्ट में २३ फरवरी को होनी थी मगर  तकनीकि रीशैडेयुलिंग की वजह से अब आज २३ फरवरी को इस मामले की सुनवाई नहीं हो पायेगी। इस मामले की अगली डेट जल्द पड़ने की संभावना है।

सुप्रीमकोर्ट द्वारा जारी एडवांस लिस्ट में इस सुनवाई को शामिल किया गया था जिसका आयटम नंबर २४ था मगर फाईनल लिस्ट में यह सुनवाई शामिल नहीं हो पायी। इस मामले में देश भर के मीडियाकर्मियों की सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने कहा है कि तकनिकी रीशैडेयुलिंग की वजह से अब २३ फरवरी को इस मामले की सुनवाई नहीं हो पायेगी। इस मामले की अगली डेट जल्द पड़ने की संभावना है। मजीठिया वेज बोर्ड मामले की 10 जनवरी को सुनवाई हुई थी जिसके बाद अभी तक सब लटका हुआ है।

 10 जनवरी को हुयी सुनवाई में पत्रकारों की तरफ से चर्चित एडवोकेट प्रशांत भूषण भी शामिल हुए थे और उन्होंने भी मीडियाकर्मियों का जोरदार पक्ष रखा था। मीडियाकर्मियों की तरफ से इस केस में, प्रशांत भूषण,  सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंसाल्विस, उमेश शर्मा और परमानंद पांडेय ने जोरदार तरीके से मीडियाकर्मियों का पक्ष रखा था जिसके बाद अखबार मालिकों के खेमे में हड़कंप मच गया।  

उधर इस मामले में एडवोकेट विनोद पांडे और आश्विनी वैश्य का कहना है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई की डेट ना मिलने के पीछे वजह है कि यह केस पार्ट हर्ड है यानि आंशिक रूप से सुना गया है। 10 फरवरी के आर्डर को देखें तो उसमें स्पष्ट लिखा है कि केस की कुछ सुनवाई हुई है, कुछ होनी है और यह भी लिखा है कि इस केस को माननीय जज गोगोई और अशोक भूषण ही सुनेंगे। ऐसा होने की वजह साफ है कि अगर दूसरे जज पूरा केस फिर से सुनेंगे तो इससे समय जाया होगा। इस समय श्री गोगोई के साथ एक नए जज को रखा गया है, ऐसा होने की वजह से ही हमारा  केस लिस्ट में नहीं आया। आगे जब ये दोनों साथ होंगे, केस की सुनवाई होगी।

शशिकांत सिंह 

पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट 

९३२२४११३३५

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