जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं!

Rohini Gupte : मेरे एक मि‍त्र सहारनपुर में पत्रकार हुए। सहारनपुर के नहीं थे, मगर नौकरी खींच ले गई। तनख्‍वाह तय हुई साढ़े पांच हजार रुपए महीना, साढ़े तीन सौ रुपए मोबाइल और साढ़े छह सौ रुपए पेट्रोल। मित्र महोदय खुश कि चलो फ्रीलांसि‍ंग से तो पांच हजार का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था, यहां कम से कम साढ़े छह मिलेंगे। दि‍ल्‍ली से घर बार बीवी लेकर सहारनपुर पहुंचे और ढाई हजार रुपए में एक कमरा कि‍राए पर लि‍या। आठ दस साल पहले की बात है, ‘सस्‍ते’ का जमाना था। साथ में एक साथी पत्रकार काम करते थे, जि‍नका सहारनपुर में ही गांव था। वो गांव से आने वाली आलू प्‍याज में एक हि‍स्‍सा इन्‍हें भी देते, सो बेसि‍क सब्‍जी का भी खर्च कम हो गया। फि‍र भी बचते बचते महीने की बीस तारीख तक वो पैसे खत्‍म हो जाते, जो लाला हर महीने सात दि‍न देर से देता।

इसी बीच बीवी ने एक दि‍न खुशखबरी दी तो पत्रकार महोदय ने मंदि‍र में जुगाड़ लगाकर प्रसाद में चढ़े दो तीन कि‍लो लड्डू हथि‍याए और दफ्तर में सबका मुंह मीठा कराया। साथि‍यों ने जै-जै की, पत्रकार महोदय फूले। मैंने भी देखा, बाइचांस वहीं थी। सबकुछ ठीक चल रहा था कि पांचवे हफ्ते डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ भी ठीक नहीं। बीवी को भर्ती कराया, बच्‍चा गंवाया। डॉक्‍टरनी ने तो फीस नहीं ली, मगर साढ़े नौ हजार की दवाइयां लि‍ख दीं। साथी पत्रकारों ने मदद की, फि‍र भी साढ़े चार हजार रुपए की कमी थी। पत्रकार महोदय को वही अधि‍कारी याद आए, जि‍न्‍हें उनके बड़े भाई ने सहारनपुर में उनका लोकल गार्जियन बनाया था। ये पहुंचे उनके पास, लेकि‍न मुश्‍किल ये कि बतौर पत्रकार तो उन्‍होंने उस अधि‍कारी की भी बेजा हरकतें अखबार-ए-आम की हुई थीं। अब बोलें तो बोलें कैसे। बड़ी मुश्‍किल से अटक-अटक कर मुसीबत के बारे में बताया। अंत में मदद की दरख्‍वास्‍त की- यह कहकर कि सात तारीख को पूरी रकम चुका देंगे। अधि‍कारी महोदय ने कहा- सोचेंगे।

पत्रकार महोदय के मुताबि‍क उन्‍हें अंदाजा हो गया था, सो अधि‍कारी के यहां से बाइक लेकर नि‍कले और पहुंचे सीधे मि‍स्‍त्री की दूकान पर। बाइक बेच दी और उसकी जगह ली एक और भी सस्‍ती और तीसरे दि‍न खराब रहने वाली बाइक। बचे हुए पैसों से दवा खरीदी और घर पहुंचे। कुछ समय पहले उनसे बात हो रही थी। बता रहे थे कि लाला ने मजीठि‍या न देने के लि‍ए चार बार साइन कराए हैं। फि‍र उसी अधि‍कारी की याद दि‍लाई। बोले कि दि‍ल्‍ली रोड पर वसूली करते वि‍जलेंस वालों ने पकड़ा। कहने लगे- आप तो वापस चली गई थीं, मगर इस अधि‍कारी ने संपादक के पास लि‍खकर शि‍कायत की थी और मेरी रि‍कॉर्डिंग भी कर ली थी। लेकि‍न रिकॉर्डिंग में भी मैंने कोई गलत बात नहीं की थी, इसलि‍ए संपादक जी ने छोड़ दि‍या। दफ्तर आकर भी उन्‍होंने बहुत हंगामा कि‍या तो संपादक जी ने उनसे कहा कि आप मुकदमा दर्ज कराइए। वो तो पुलि‍स में नहीं गए, मगर अब पुलि‍स उन्‍हें जरूर ले गई।

अब उन्‍हें महीने में साढ़े बारह हजार रुपए तनख्‍वाह, पांच सौ मोबाइल और हजार पेट्रोल के मि‍लने लगे हैं। आलू प्‍याज वैसे ही साथी पत्रकार के गांव से बि‍ला नागा आ जाती है, जैसे आठ दस साल पहले आती थी। पैसे पहले बीस बाइस को खत्‍म होते थे, अब तो 18 तक का भी इंतजार नहीं करते और अगर सात को संडे पड़ गया तो नौ तक ही मि‍लते हैं। हर महीने आधी तनख्‍वाह एडवांस में कटती है। मैंने उनको कई बार कहा कि वि‍चार से जीवन नहीं चलेगा, कुछ कमाई करि‍ए। रि‍पोर्टर हैं तो अधि‍कारि‍यों से या कि‍सी से भी कुछ कमाने की सेटिंग करि‍ए। बोले, एक जगह मैगजीन डि‍जाइन करने का काम मि‍ला है, महीने में दो बार करना है, ढाई दे देंगे। कुल मि‍लाकर वो वैसे कमाने के लि‍ए नहीं मान रहे हैं, जैसे कि मैं कह रही हूं।

बात सहारनपुर के पत्रकार की ही नहीं है, कहानी अकेले एक अखबार की भी नहीं। पहले संपादक भी सबकी सोचते थे, अब तो संपादक वह जीव है जो सबसे ज्‍यादा सैलरी इसलि‍ए लेता है कि पत्रकारों को सबसे कम सैलरी दी जा सके। तुर्रा ये कि पत्रकारि‍ता का ‘त’ भी न पहचानने वाले जब तब उन्‍हें भ्रष्‍ट कहते रहते हैं। जानते हैं, पत्रकार दुनि‍या का अकेला ऐसा जीव होता है जो दुनि‍याभर के लि‍ए आवाज उठाता है, पर खुद के लि‍ए ऐसे खामोश हो जाता है, जैसे कि‍सी ने जबरदस्‍ती उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर बांध दि‍या हो। याद करि‍ए आखि‍री बार शहर में कब पत्रकारों को अपने लि‍ए आवाज उठाते देखा।

पत्रकार अगर भ्रष्‍ट हैं तो मैं कहती हूं कि‍ उन्‍हें और भी भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए। तब तक पूरी तरह से भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए, जब तक कि उनका और उनके परि‍वार का पेट तीन वक्‍त न भरे। धर्म भी यही कहता है। जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं। उन्‍हें अपने ही बच्‍चों की भूख भरी आह लगेगी। जि‍स कि‍सी को इस भ्रष्‍टाचार से दि‍क्‍कत है, तो पहले वह पत्रकारों की मदद करना शुरू करें, तभी उनकी भी दि‍क्‍कत खत्‍म होगी, पत्रकारों की भी। कुछ नहीं कर सकते तो कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए। जबरदस्‍ती। पत्रकारि‍ता हमेशा समाज के भरोसे ही आगे बढ़ती आई है, न कि सत्‍ता के। सत्‍ता के भरोसे होती तो सत्‍ता उसे कब की मिटा चुकी होती। चीन में देखि‍ए, मि‍टा ही चुकी है। दि‍ल्‍ली, लखनऊ, पटना, कलकत्‍ता का चश्‍मा उतारकर जरा उन शहरों के पत्रकारों की भी खबर लीजि‍ए, जहां से खबरें आती हैं। जोगेंद्र सिंह और राम चंदेर प्रजापति याद हैं या भूल गए?

रोहिणी गुप्ते की एफबी वॉल से.

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नागरिक करे तो जागरूकता, पत्रकार करे तो धौंस

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। फेसबुक की एक छोटी मगर बहुत प्यारी पोस्ट के जिक्र के साथ बात शुरू करेंगे। पोस्ट ये कि एक दुकानदार ने वस्तु का मूल्य अधिक लिया। ग्राहक ने उलाहना देते हुए वीडियो शूट किया। दुकानदार ने सॉरी करना ही था। हर क्षेत्र मेँ जागरूकता जरूरी है। बधाई, उस जागरूक ग्राहक को। तारीफ के काबिल है वो। लेकिन अगर यही काम किसी पत्रकार ने किया होता मौके पर हँगामा  हो जाता। लोग पत्रकार कि वीडियो बनाते। सोशल मीडिया पर बहुत से व्यक्ति ये लिखते, पत्रकार है, इसलिए धौंस दिखा रहा है। पत्रकारिता की आड़ लेकर दुकानदार को धमका रहा है। चाहे उस पत्रकार को कितने का भी नुकसान हुआ होता। पत्रकार के रूप मेँ किसी की पहचान उसके लिए मान सम्मान के साथ दुविधा, उलझन, कठिनाई भी लेकर आती है। क्योंकि हर सिक्के दो पहलू होते हैं। एक उदाहरण तो ऊपर दे दिया। आगे बढ़ते हैं।

किसी दूसरे फील्ड का व्यक्ति कहीं सम्मानित हो तो सब यही कहेंगे, भई! काबिल था, इसलिए सम्मान तो होना ही चाहिए। योग्यता का सम्मान हुआ है। हकदार था इस सम्मान का। और यही सम्मान किसी पत्रकार का हो जाए तो सभी की भाषा बदल जाती है। लोग कहेंगे, चमचा है साला प्रशासन का। चापलूस है। दल्ला है….और भी ना जाने क्या क्या! जनाब, आप सम्मानित होंगे तो आपकी उपलब्धि की खबर प्रिंट मीडिया मेँ होगी। लेकिन किसी पत्रकार का सम्मान होने पर उसके साथी ही खबर को हिचकिचाते, किचकिचाते हुए लगाएंगे। ना लगे तो ना भी लगे। कोई पूछने वाला हो इन सबसे कि क्या पत्रकार योग्य नहीं हो सकता?

वे क्या सम्मानित होने लायक नहीं होते! उनमें क्या योग्यता का अभाव होता है! कोई सरकारी विभाग ऐसा नहीं जहां अपने काम के लिए सुविधा शुल्क ना देना पड़ता हो। उस काम के लिए भी जो सरकारी अधिकारी/कर्मचारी का दायित्व है, पैसा देना पड़ता है। बिना जान पहचान तो कोई सरकारी कर्मचारी किसी की बात सुन ले तो समझो वह भाग्यशाली है। पत्रकार किसी से विज्ञापन मांग ले तो उसका सब मिट्टी हो जाता है। कोई किसी गिफ्ट द्वारा ओबलाइज कर दे तो ऐसे ऐसे कमेन्ट सुनने और पढ़ने को मिलते हैं कि क्या कहने! बिकाऊ मीडिया। ब्लेकमेलर पत्रकार।

कमाल है! दूसरे पैसे लें तो वे बहुत बढ़िया। व्यावहारिक। और पत्रकार लें तो बिकाऊ, ब्लैकमेलर। किसी की तारीफ कर दो तो सुनने को मिलेगा कि कुछ मिल गया होगा। आलोचना छाप दो ये कहेंगे, कुछ मिला नहीं होगा। सामान्य नागरिक द्वारा अपने अधिकार के लिए आवाज बुलंद  करने पर सब उसकी तारीफ करेंगे। उसका सम्मान करेंगे। उसके जज्बे को सलाम करेंगे, किन्तु कोई पत्रकार अपने हक के लिए कुछ बोले या लिखे तो बात उलटी हो जाएगी। कुछ बोलेंगे और कुछ खामोश रहेंगे। ऐसा सुनने को मिलेगा, पत्रकार है ना! इसलिए अपने रुतबे का गलत प्रयोग कर रहा है। एक नहीं अनेक बातें हैं। जो वही जानता है जिसने ये सब भोगा है। भोग रहा है। दुनिया चाहे कुछ भी करे लेकिन पत्रकार को  कहीं से किसी शो का कोई पास भी मिले तो चर्चा होने लगती है।

जनाब, पत्रकार होना कोई आसान नहीं है। और उसके लिए तो बहुत मुश्किल है जिसकी पहचान पत्रकार के रूप मेँ बन चुकी है। ऐसा नहीं है पत्रकार गलत नहीं होते। वे अपनी धौंस नहीं दिखाते। अपनी पोजीशन का का बेजा इस्तेमाल नहीं करते। होंगे ऐसे भी। क्योंकि वे भी हैं तो तो इसी समाज के। पत्रकारिता भी वैसा ही पेशा है जैसे और हैं। दूसरे पेशे मेँ भी बहुत सी बुराइयाँ होंगी। पेशे से जुड़े लोगों मेँ कमियाँ होंगी। ऐसा ही कुछ पत्रकारिता मेँ है। पत्रकारों मेँ है। ये शब्द धौंस दिखाने वाले, अपनी पोजीशन का बेजा इस्तेमाल करने वाले पत्रकारों /पत्रकारिता का बचाव नहीं कर रहे, बस वो बताने की कोशिश है जो पत्रकारों और पत्रकारिता को क्या क्या सहना पड़ता है। पीना पड़ता है। आज चार लाइन पढ़ो-

मेरा एक एक शब्द अब तो बिकाऊ है जनाब
ज़मीर! ज़मीर तो अब बस दिखाऊ है जनाब।
शहर तो पूरा मेरा सम्मान करता है जनाब
मगर पेट तो रोटी से ही भरता है ना जनाब। 

लेखक गोविंद गोयल गंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकारों की उम्र 55 साल होने पर सरकारें इन्हें सत्ता में एडजस्ट करें!

वर्तमान में पत्रकारिता की जो दशा है, उस हिसाब से सरकार को एक उम्र के बाद हर पत्रकार को शासन में एडजस्ट करना चाहिए। दरअसल, आज पत्रकारिता की राह में अनेक बाधाएं आ चुकी हैं। काम का बोझ, तनाव, समस्याएं, अपर्याप्त वेतन तो है ही इसके ऊपर हर वक्त सिर पर नौकरी जाने का खतरा मंडराता रहता है। मुख्य धारा का एक पत्रकार अपने जीवन में इतना परिश्रम और तनाव झेल जाता है कि 50-55 की उम्र के बाद वह किसी काम का नहीं रह जाता है। शायद यही कारण है कि इस उम्र के बाद आज अनेक पत्रकार अपनी लाइन बदलने का असफल प्रयास करते हैं।

हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने एक सराहनीय फैसला लेकर वरिष्ठ पत्रकार दर्शन सिंह रावत को मीडिया को-आर्डिनेटर बनाया है। इस फैसले का विरोध नहीं हुआ। इसका अर्थ है कि श्री रावत इस पद के लिए बिल्कुल योग्य हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी रही है। श्री रावत सीधे-सरल हैं। वे न राजनीति जानते हैं और न ही इसमें रुचि रखते हैं। हां, यह बात दीगर है कि कई बार ऐसा सीधा आदमी राजनीति का मोहरा बन जाता है। जितनी मेरी उम्र है, लगभग उतने वर्ष उन्हें पत्रकारिता में हो चुके होंगे। मैं जब अमर उजाला चंडीगढ़ में ट्रेनी और जूनियर सब एडीटर था, वे तब शिमला में अमर उजाला मंे सीनियर काॅरोस्पोंडेंट थे। अब तक उन्हें कहीं समूह संपादक बन जाना चाहिए था, लेकिन इसलिए नहीं बन पाए कि वे राजनीतिक लल्लो-चप्पोबाजी और चरणवंदना से बहुत दूर रहते हैं। मुझे खुशी है कि उन्हें सरकार ने उनके योग्य पद दिया, लेकिन सुखद आश्चर्य इस बात का भी है कि दर्शन सिंह रावत जैसा सीधा-सरल व्यक्ति इस पद तक कैसे पहुंचा! क्योंकि ऐसे पद प्रायः राजनीतिक सिद्धहस्त लोगों को ही मिलते हैं। अगर श्री रावत जैसे लोगों को यह मिले तो इसे सरकार की ईमानदार नीति का हिस्सा माना जाना चाहिए।

खैर, उत्तराखंड में ही पत्रकारों को सत्ता में एडजस्ट करने की परंपरा नहीं है। मैं यह हरियाणा में भी देख चुका हूं। दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पत्रकार रहे बलवंत तक्षक को 14-15 साल पहले ओमप्रकाश चैटाला सरकार में एडजस्ट किया गया था। लबोलुआब यह कि अगर पत्रकार योग्य, ईमानदार है तो उसके अनुभव का लाभ सरकार द्वारा लिया जाना चाहिए। जो काम सरकार की मोटी तनख्वाह वाले सूचना विभाग के अधिकारी नहीं कर पाते हैं, वह काम एक वरिष्ठ पत्रकार आसानी से कर सकता है। वैसे भी उत्तराखंड का सूचना विभाग पत्रकारों और अखबारों में भेदभाव को लेकर अक्सर चर्चाओं में रहता है। पत्रकारों को मान्यता देने को लेकर यहां क्या खेल चलता है, यह पत्रकारों से छिपा नहीं है। छोटे अखबारों और अखबारों को विज्ञापन देने की तो बात ही छोड़ दीजिए।

मेरा सुझाव यह है कि पत्रकारों की उम्र 55 साल होने के बाद सरकार इन्हें योग्यता और क्षमतानुसार सत्ता में एडजस्ट जरूर करे। शर्त यह कि सरकार पत्रकार को एडजस्ट करते समय गुटीय भावना, पार्टी भावना से ग्रस्त न हो। आज कोई यह कहता है कि फलां पत्रकार फलां मुख्यमंत्री का चहेता रहा तो यह बात सरासर गलत है खासकर बड़े अखबारों के मामले में। क्योंकि बड़े अखबारों में सत्ता से संबंध पत्रकार का नहीं, सीधे प्रबंधन और मालिकों का होता है। आज कोई योग्य पत्रकार सत्ता का अंग बनता है तो पत्रकारों को ईर्ष्या के बजाय खुश होना चाहिए। जब आठवीं फेल कोई आदमी अपनी पार्टी की सत्ता आने पर राज्यमंत्री बन सकता है तो एक पत्रकार क्यों न शासन का अंग बने!  जीवनभर लोकतंत्र के चैथे स्तंभ की भूमिका निभाने के बाद अंततः उसे भी सुविधासंपन्न नागरिक का जीवन जीने का हक होना चाहिए। खासकर उसके परिवार को।

डॉ. वीरेंद्र बर्त्वाल
देहरादून
veerendra.bartwal8@gmail.com

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चिंटू जी, पत्रकार बोलने के लिए नहीं, बुलवाने के लिए ही होता है!

Nitin Thakur : जब एक पत्रकार कोई सवाल करता है तो वो इस उम्मीद में नहीं करता कि सामनेवाला चुप हो जाए। वो वाकई चाहता है कि जवाब आए। जवाब आता है और अगर जवाब देनेवाला नेता हो तो बड़े जुमलों और भारी भाषा के साथ पूरी सफाई पेश करता है। इसके बाद पत्रकार अगले सवाल की तरफ बढ़ता है क्योंकि उसका काम हो चुका होता है। इसे कुछ चिंटू ये कह कर प्रचारित करते हैं कि वाह अमुक नेता ने पत्रकार की क्या बोलती बंद कर दी.. चिंटू जी, पत्रकार बोलने के लिए नहीं बुलवाने के लिए ही होता है।

वो चुभते सवाल ही इसलिए करता है ताकि आप को वो जवाब मिल सके जो नेता जी सीने में दबाए बैठे हैं, इसलिए अगली बार जब कोई पत्रकार सवाल करे और सामने से जवाब आए तो उसे पत्रकार की हार नहीं उपलब्धि समझिए। मुझे मालूम है कि देश में कहीं भी ठीक ठीक पत्रकारिता नहीं पढ़ाई जाती तो इस बेसिक समझ का अभाव इस लाइन में आने की कोशिश कर रहे ”डूड जर्नलिस्ट्स” में भी है। उनकी धारणा है कि पत्रकार सामनेवाले से बहस करने के लिए होता है।

फेसबुक के चर्चित लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

सुशांत शर्मा Han. Bahut sahi . Youtube pe rajdeep aur modi ji ke kuchh videos hain jinme rajdeep modi ji ke truck me baithe hain 2012 gujarat chunaav ke. Usme modi ji ne kuchh ulta seedha bola aur video ke caption hai, modi insulted rajdeep sardesai. Little do they know ki video as it play karwana bhi rajdeep ke hath me hi tha. Insult karwa ke bhi poora video sab log ko dikhaya hai. Aise hi patrakaaron ko bika hua kah dene se kaam nahi chalega desh ka !

Nitin Thakur सुशांत शर्मा बेशक। पत्रकार गाली खाकर, कारों के पीछे दौड़कर, नीचे बैठकर सिर्फ इसलिए जानकारियां जुगाड़ता है ताकि लोगों तक पहुंचा सके। टीवी ही नहीं, चाहे प्रिंट हो या फिर वेब या फिर कोई भी दूसरा माध्यम पत्रकार के पास जानकारी पाने के ये ही तरीके हैं। राजदीप सरदेसाई जितने बड़े घर से ताल्लुक रखते हैं उन्हें ये सब करने की ज़रूरत ही नहीं थी। उन्हें रोज़ी रोटी जैसा कोई संकट ही नहीं। उनके पिता की एकेडमी में सचिन तेंदुल्कर जैसे खिलाड़ियों ने क्रिकेट का ककहरा सीखा था। माना कि इन लोगों में लाख बुराइयां होंगी जो सबमें होती हैं पर इन्होंने खबर जुगाड़ने के लिए सिर्फ फोनबाज़ी नहीं की बल्कि जोखिम लेकर स्पॉट पर पहुंच रिपोर्ट्स दर्ज की। आज दौर चला है सवालों पर लगाम लगाने का। विपक्ष वगैरह को तो चुनाव में हराकर आप संख्या में कम कर सकते हो, बिकने वालों को खरीद सकते हो लेकिन ईमानदार और प्रतिबद्ध पत्रकार को खत्म करने का तरीका यही खोजा गया कि चार बेइमानों के नाम लेकर पूरे पेशे की विश्वसनीयता खत्म कर डालो। अब नेताओं से किया गया कोई आम और सहज सवाल भी दलाली से निकला सवाल आसानी से बनाया जा सकता है। इस पेशे को रगेदने में जितने ज़िम्मेदार पत्रकारिता संस्थान चलानेवाले हैं, उससे बहुत ज़्यादा वो हैं जिन्होंने पत्रकारों की क्रेडिबिलिटी को अपने लाभ के लिए भोथरा बनाया। अस्पतालों में शूटिंग मना होती है, सरकारी कार्यालयों में भी इजाजत नहीं होती लेकिन एक पत्रकार कैमरा छिपाकर और कानून तोड़कर वहां ये शूट करने के लिए पहुंचता है कि देखिए कानून तोड़ा जा रहा है। उस चैलेंज और रिस्क का सामना कोई नहीं कर सकता जब आप किसी चुने हुए नेता के क्षेत्र में पहुंचकर उसके वोटर्स से ही पूछ रहे होते हैं क्या आपके नेता ने आपकी परेशानी हल कर दी?

Pradeep Balbir Singh Negi बोलती बंद का कांसेप्ट इसलिए आया क्योंकि आजकल पत्रकार रह ही कहाँ गए है वो तो पार्टी की एजेंट्स हो गए है इसलिए जब वो अपनी पार्टी जी ओर से सवाल दागते है तो सामने वाले का जवाब कम और चुप्पी ज्यादा चाहते है । पत्रकारिता कम और शह और मात का खेल ज्यादा चलता है।

Manish Chandra Mishra सही बात…और टीवी वालों ने ऑन कैमरा कुछ ज्यादा ही एक्टिंग सिखा दी नेताओं को. ये एंकरानियां जब जबरदस्ती का कड़ा रुख अपनाती है तो बड़ी फनी लगती है. आजकल देवगन तो जबरदस्ती के साथ भी जबरदस्ती कर रहा है.

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पत्रिका के पत्रकारों के साथ और अधिक कठोर हुए गुलाब कोठारी

राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी का रवैया अपने ही स्टॉफ के प्रति दिनोदिन और अधिक कठोर होता जा रहा है। अपने खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में अवमानना के छह मामलों का सामना करने के बावजूद उनके रुख में मामूली सा भी बदलाव आने की बजाए मजीठिया मामले पर अवाज उठाने वालों के साथ उनकी सख्ती बढ़ती जा रही है। ताजा हालात खुद ब खुद बयान करती है ‘मददगार’ की विस्तृत रिपोर्ट –

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वरिष्ठ पत्रकार शरद शिंदे का निधन

इंदौर : वरिष्ठ पत्रकार शरद शिंदे का आज यहां निधन हो गया। वह 52 वर्ष के थे और मुंह के कैंसर से पीड़ित थे। शिंदे के बड़े भाई अशोक शिंदे ने बताया कि वरिष्ठ पत्रकार का कुम्हारखाड़ी श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया गया। उन्हें उनके भतीजे राहुल शिंदे ने मुखाग्नि दी। उनके शोकसंतप्त परिवार में उनकी पत्नी हैं। 

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झारखंड में झोला छाप पत्रकारों का आतंक, भंडाफोड़ के लिए पर्चे बांटे जाएंगे

झोलाछाप पत्रकारिता जनता के साथ छल है। एक ओर तो पत्रकारिता को चौथा स्तम्भ कहा जाता हैं, दूसरी ओर उस स्तम्भ की पहरेदारी झोलाछाप पत्रकारों के जिम्मे है। पत्रकारिता की विशेष पढ़ाई होती है, जहाँ जनता और देशहित की सीखा दी जाती है परन्तु भुरकुण्डा, रामगढ़ (झारखंड) के झोलाछाप पत्रकारों की बात ही कुछ और है। जनहित में इनके आतंक से निपटने के लिए अब दिल्ली तक पर्चे बांटे जाएंगे। 

यहाँ पिछले कई दिनों से झोलछाप पत्रकारों द्वारा जनता को दिग्भ्रमित किया जा रहा है। प्रमाण देने पर भी अखबार प्रबंधन द्वारा उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न करने से इस बात को बल मिलता है कि कहीं न कहीं जनता को धोखा देने में अखबार प्रबंधन की भी सहभागिता है। इस क्षेत्र के एक अपराधी तत्व के सारे डिटेल्स मौजूद हैं। फिर भी जनता के समक्ष उसे नहीं लाया जाना पत्रकारिता के साथ धोखा है। उस अपराधी के सारे डिटेल्स हिन्दुस्तान के एक झोलाछाप पत्रकार दुर्गेश तिवारी के हाथ लगे। इसकी सूचना हिन्दुस्तान के ‘महान’ संपादक शशि शेखर तक पंहुचाई गई। नतीजा जीरो रहा। शशि शेखर ने भी उस अपराधी तत्व के संबंध में गंभीर सूचनाओं को पाठकों से छिपाने का घृणित कार्य किया गया। 

धीरे धीरे उस अपराधी के सारे डिटेल्स स्थानीय झोलाछाप कुछ और पत्रकारों के पास पंहुचे तो उन्होंने भी अंदरखाने ले-देकर खामोशी साध ली। सच इतना ही नहीं है। राकेश पाण्डेय नाम के एक पत्रकार को केवल यूपी का वासी होने के कारण दैनिक जागरण ने रख लिया। योग्यता नदारद। ऐसे ही हैं प्रभात खबर के आलोक, महावीर ठाकुर, हिन्दुस्तान के दुर्गेश तिवारी आदि। अनुकम्पा पत्रकार। योग्यता भगवान जाने। प्रबंधन तो सब जानबूझकर अंधी काट रहा है। ‘आज’ के पत्रकार सरोज झा की तो बात ही निराली है। इनका मुख्य काम कोयले के लोकल सेलर से शहरी क्षेत्र के युवाओं के नाम पर अवैध वसूली करना। इन सबकी करतूतों की विधिवत जाँच की जाए जाये तो एक ही दिन में सारी बातें साफ हो जायेंगी।

पत्रकारिता के सिद्धांतों के सम्मान के लिए अब तो जनता की अदालत में इन झोलाछाप पत्रकारों के खिलाफ कदम उठाए जाने चाहिए। जनजागरण किया जाना चाहिए। अखबार प्रबंधन यदि इन पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई के साथ ही मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को लागू नहीं करते हैं तो अब दिल्ली तक पर्चे बांट कर इन सबका भंडाफोड़ किया जाएगा।

प्रमोद कुमार सिंह, अध्यक्ष, भारतीय अभिभावक संघ, भुरकुण्डा, रामगढ़, झारखंड

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पत्रकार शांतनु सैकिया ने भी किया था पैसे का भुगतान

पेट्रोलियम मंत्रालय से दस्तावेज लीक किए जाने के मामले में दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट दायर की है। दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में कहा है कि गिरफ्तार अधिकारी उन लोगों को हर महीने मोटी रकम देते थे, जिन्हें पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय से दस्तावेज चुराने का काम करने के लिए हायर किया गया था। उनमें से एक पत्रकार शांतनु सैकिया ने भी इन लोगों को पैसे का भुगतान किया।

चार्जशीट के मुताबिक, यह रकम 2.5 लाख रुपये प्रति महीने तक थी। दस्तावेज लीक मामले में सबसे पहले लालता प्रसाद और राकेश कुमार को शास्त्री भवन से गिरफ्तार किया गया था। चार्जशीट में कहा गया है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के शैलेश सक्सेना, एस्सार के विनय कुमार, केयर्सं इंडिया के के के नायक, जुबिलंट एनर्जी के सुभाष चंद्र और रिलायंस एडीएजी के ऋषि आनंद, एनर्जी कंसल्टेंट प्रयास जैन और पत्रकार शांतनु सैकिया ने इन लोगों को पैसे का भुगतान किया।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, ‘लगातार की गई पूछताछ के बाद इन सभी ने माना कि इन्होंने राकेश कुमार और लालता प्रसाद को अपने बिजनेस इंटरेस्ट के लिए मंत्रालय से दस्तावेज चुराने के लिए हायर किया था।’

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पत्रकारों को बड़ी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा : अरविंद मोहन

नई दिल्ली : प्रवासी शब्द का बहुत बृहद अर्थ हे। इसके मूल में जाने के बाद ही उसके दर्द को समझा जा सकता है। हम सभी लोग प्रवासी हैं, इसलिए किसी भी समाजपयोगी कार्यों को सिर्फ प्रवासी के दायरे में ही बांधा नहीं जा सकता। संस्थाओं को थोड़ा अलग सोचकर काम करना होगा, तभी सबका भला होगा। 

यह बात पत्रकारों की समस्याओं पर चर्चा और सुझाव के बाबत आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ताओं ने कही। गांधी शांति प्रतिष्ठान में अखिल भारतीय प्रांतीय प्रवासी एवं दलित विकास मंच के रविवार शाम आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय, अरविंद मोहन, असरार खान, राजीव निशाना, शम्स शाहनवाज, गजेंद्र चैहान, मुर्शीद करीम, मनोज सिंहा, आलोक, सुरजीत सिंह के साथ ही विशेष आमंत्रितों के रुप में आप नेता प्रो आनंद कुमार, आचार्य कृपलानी ट्रस्ट के अभय प्रताप, समाजवादी नेता राजवीर पंवार, पूर्व विधायक रघुनाथ गुप्ता सहित आदि मौजूद थे। विषय प्रवेश मंच के अध्यक्ष गोपाल झा और संचालन जनसत्ता के अमलेश राजू ने किया।

रामबहादुर राय ने कहा कि किसी भी संस्था का उद्देश्य स्पष्ठ होने चाहिए। पत्रकारिता का मंच है तो सपना दिखाने से ज्यादा योग्य पत्रकार बनाने की दिशा में काम होना चाहिए। जहां तक प्रवासियों का सवाल है तो पहले उनका सर्वे होना चाहिए पर उनके सामने आने वाली समस्याओं का वर्गीकरण कर उस पर रुपरेखा तय कर उस दिशा में काम शुरू करने की जरूरत है। सिर्फ सरकार के भरोसे पत्रकारों की समस्याओं को छोड़ना ठीक नहीं है। स्वतंत्र पत्रकारों के सामने अलग समस्या है और किसी संस्थान में काम करने वाले पत्रकारों के सामने अलग। दोयम दर्जे की बातों से अलग लक्ष्य निर्धारित कर इस दिशा में काम करने की जरूरत है। 

अरविंद मोहन ने कहा कि प्रवासियों की समस्या अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग है। एक पत्रकार के तौर पर पूरे प्रवासियों के दर्द को समझना होगा। पंजाब में प्रवासियों के हालात से लेकर देश के अन्य राज्यों पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तप्रदेश, मध्यप्रदेश, झारखंड के साथ ही राजधानी दिल्ली में रह रहे प्रवासियों पर सोचना होगा। प्रवासी मजदूरों की पीड़ा को नजदीक से देखने का उन्हें मौका मिला है, इसलिए वे दावे से कह सकते हैं कि पत्रकारिता को भी प्रवासियों के दायरे से अलग हटकर इसे गंभीरता पूर्वक सोचने की जरुरत है। जहां तक पत्रकारों के जीविकोपार्जन और मूलभूत सुविधाओं का सवाल है तो इसके लिए बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए संगठनों को तैयार रहना होगा।

प्रो आनंद कुमार ने कहा कि पत्रकार लोकतंत्र के पहरुआ हैं। बावजूद इसके पत्रकारों के सामने आने वाली कठिनाइयों को जानते समझते खूबसूरती से उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा है। पत्रकारों को सभी राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक संगठन अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं। मेरा तो मानना है कि अगर पत्रकार देश दुनिया के लिए पूरा जीवन न्योछावर कर रहे हैं तो उनके बच्चों के नामांकन से लेकर, उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा की गारंटी संबंधित एजंसियों और सरकार को देनी चाहिए। 

शम्स शाहनवाज ने ईमानदारी से पत्रकारिता करने वालों की समस्याएं रखते हुए मुश्किल हालातों में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दिल्ली सरकार की गिद्ध दृष्ठि की बातें कहीं। आलोक ने नई-नई तकनीक के नाम पर पत्रकारिता का मजाक उड़ाने और चटपटी खबरों के नाम पर भौंडेपन का जिक्र किया। राजीव निशाना ने केंद्र और दिल्ली सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जीविकोपार्जन के तरीके को भी इन सरकारों ने अपने हिसाब से परिभाषित करने का बीड़ा उठा लिया है। मुर्शीद करीम ने डीएवीपी से लेकर एबीसी की विश्वसनीयता पर चर्चा की। धन्यवाद ज्ञापन दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो अनिल ठाकुर ने किया। 

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पत्रकार रामप्रकाश मील नहीं रहे

श्रीगंगानगर के वरिष्ठ पत्रकार रामप्रकाश मील का गत दिनो जयपुर के एसएमएस अस्पताल में असामयिक निधन हो गया। वह 42 वर्ष के थे। वह अपने पीछे एक पुत्र, पुत्री और पत्नी को छोड़ गए हैं। वह एक न्यूज चैनल का इंटरव्यू देने वहां पहुंचे थे। मील का इंडिया टुडे सहित कई पत्र-पत्रिकाओं से लिखने-पढ़ने का नाता था। पत्रकारों ने उनके असामयिक निधन पर गहरा शोक जताया है। 

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पत्रकार सतीश शर्मा को हथकड़ी पहनाने के दोषी सात आईएएस-आईपीएस एवं थाना प्रभारियों से जवाब तलब

दमण : दीव पुलिस द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकार सतीश शर्मा को एक झूठे मामले में गिरफ्तार कर उन्हें हथकड़ी पहनाने के मामले की न्यायिक जांच में पुष्टि होने के बाद भारतीय प्रेस परिषद, नई दिल्ली ने मुख्य सचिव सहित पूर्व प्रशासक सत्य गोपाल, तत्कालीन पुलिस अधीक्षक दीपक पुरोहित, सी.ओ.पी. आरपी मीणा, वर्तमान आईजी सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारियों से चार सप्ताह में जवाब तलब किया है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में तत्कालीन प्रशासक सत्य गोपाल व अन्य पुलिस अधिकाारियों की भ्रष्ट कार्यशैली के विरुद्ध प्रकाशित खबरों का बदला लेने के बहाने दीव पुलिस थाने में दर्ज एक झूठी एफ.आई.आर. नंबर 31/2009 में दीव पुलिस ने मान्यता प्राप्त पत्रकार सतीश शर्मा को गिरफ्तार कर उन्हें न्यायालय में पेश किया था। पुलिस ने गलत दस्तावेज व जानकारी प्रस्तुत कर 7 दिनों के लिए उन्हें पुलिस रिमांड पर ले लिया था। इस दौरान पुलिस उनको दमण ले आई, जहां उन्हें सत्य गोपाल व पुलिस अधीक्षक दीपक पुरोहित की शह पर जांच अधिकारी गोविंद राजा ने हथकड़ी पहनाकर शहर में पैदल घुमाया था। इस घटना के पीछे शीर्ष अधिकारियों का सिर्फ और सिर्फ यह मकसद था कि उनके विरुद्ध समाचार प्रकाशित करने का हश्र क्या होता है, उन्हें बताया जा सके। पुलिस द्वारा सुप्रीम कोर्ट तथा मानवाधिकार आयोग की अवहेलना वाली इस घटना के बारे में विभिन्न समाचार पत्रों में अगले दिन समाचार भी प्रकाशित हुए थे।

पुलिस की इस घिनौनी हरकत से परेशान सतीश शर्मा ने भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष वाद दायर कर दोषी पुलिस अधिकारियों व प्रशासक सत्य गोपाल के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने की मांग की थी। इस पर सुनवाई करते हुए भारतीय प्रेस परिषद के निर्वतमान अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने मामले की न्यायिक जांच करवाने के आदेश दिये थे। इसके बाद मुंबई उच्च न्यायालय ने दमण-दीव एवं दादरा नगर हवेली के जिला एवं सत्र न्यायाधीश भोजराज पाटिल को जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया। पाटिल द्वारा मामले की शुरू की गई जांच पूरी हो, इससे पूर्व ही उनका तबादला हो गया। उसके बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश आर.आर. देशमुख ने इस जांच को पूरा कर भारतीय प्रेस परिषद को रिपोर्ट सौंप दी।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश आर.आर. देशमुख द्वारा सौंपी गई इस रिपोर्ट में 15 गवाहों के बयान, विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों को जांचने तथा शिकायतकर्ता व पीड़ित पत्रकार द्वारा जांच अधिकारी को पेश किये गए सबूतों के आधार पर उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि गोविंद राजा, कांस्टेबल भरत देवजी बामणिया व केपी सोलंकी द्वारा सतीश शर्मा को हथकड़ी पहनाए जाने की घटना सही साबित होती है।

भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष आई इस न्यायिक जांच रिपोर्ट ने पत्रकारों के साथ हो रहे उत्पीड़नों की पोल खोल दी। वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा बदले की भावना से की गई इस कार्रवाई को प्रेस परिषद ने गंभीरता से लेते हुए सत्यगोपाल, जो कि वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश में सचिव (श्रम विभाग), दिल्ली में कार्यरत दीपक पुरोहित (आई.पी.एस.), आर.पी. मीणा सहित संघप्रदेश दमण-दीव एवं दानह के मुख्य सचिव, गृह सचिव, आई.जी., पुलिस अधीक्षक तथा संबंधित पुलिस थानों के प्रभारियों से 4 सप्ताह के अंदर जवाब-तलब किया है। अब पुलिस अपने बचाव में इधर-उधर हाथ मारती नजर आ रही है।

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वरिष्ठ पत्रकार जेपी गुप्ता का 85वां जन्मदिन मनाया

अजमेर : अजमेरू प्रेस क्लब में शुक्रवार को वरिष्ठ पत्रकार जेपी गुप्ता का 85 वां जन्मदिन मनाया गया। क्लब अध्यक्ष डा. रमेश अग्रवाल, उपाध्यक्ष एसपी मित्तल, राजेंद्र हाड़ा, प्रताप सनकत, सूर्य प्रकाश गांधी, हरीश वरयानी, कमल वरयानी के अतिरिक्त उनके सहयोगी पत्रकार रहे राजेंद्र गुंजल, फोटोग्राफर रहे सत्यनारायण जाला, राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के सहायक जनसंपर्क निदेशक राजेंद्र गुप्ता समेत क्लब के अन्य सदस्य उपस्थित थे। सत्तर और अस्सी के दशक में गुप्ता अजमेर में अकेले पीटीआई, आकाशवाणी, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह, समाचार भारती और राजस्थान पत्रिका के अजमेर प्रतिनिधि का काम देखते थे। अस्वस्थता के बावजूद वे जोश खरोश में क्लब आए। उन्होंने केक काटा। सभी ने माल्यार्पण कर उनका अभिनंदन किया और बधाइयां दीं। इस अवसर पर गुप्ता ने अपने खट्टे मीठे अनुभव भी साझा किए। 

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‘कैनविज टाइम्स’ लखनऊ में रातोरात 10 पत्रकारों के पेट पर लात मारने की साजिश !

लखनऊ : ‘कैनविज टाइम्स’ की लखनऊ यूनिट में इन दिनों भयंकर अराजकता का महौल है। शीर्ष प्रबंधन का पैगाम लेकर गुरुवार को लखनऊ पहुंचे एचआर हेड कपिल शर्मा ने अचानक पूजा झा, प्रभात तिवारी, अमिता शुक्ला, जगत, साक्षी सिंह परिहार समेत लगभग दस लोगों को कल से (शुक्रवार से) ऑफिस आने के लिए मना कर दिया। 

पत्रकारिता जगत में ऐसी विडम्बनाएं आम हैं कि कर्मचारी को वजह बताए बगैर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। इसलिए इस पर ज्यादा चर्चा करना मतलब टाइम खोटा करना है। अब आते हैं असल मुद्दे पर…। संस्थान में सम्पादक शंभू दयाल बाजपेयी ने काफी स्टाफ भर लिया था, जो एक न एक दिन संस्थान के ऊपर बोझ बनना ही था। तो ऐसे में सबसे कमजोर पेड़ काटने का कुचक्र नितिन अग्रवाल, शंभू दयाल बाजपेयी और कपिल शर्मा द्वारा रचा गया। जब सभी इस घिनौने खेल को अंजाम देने के बाद अनभिज्ञता जाहिर कर रहे थे, ऐसे में कैनविज टाइम्स के ‘नामर्द’ पत्रकार एकजुट होने के बाजए लिस्ट में अपना नाम तो नहीं है, यह जानने के लिए ज्यादा लालायित थे। इस बीच एक सज्जन का नाम छंटनी लिस्ट में न होने और उनकी प्रोन्नति को लेकर भी संस्थान के मीडिया कर्मियों में चर्चाएं हैं। 

कम्पनी के चेयरमैन कन्हैया गुलाटी से अनुरोध किया गया है कि निष्पक्ष जांच कराकर पत्रकारों को न्याय दिलाया जाए। शंभू दयाल बाजपेयी, नितिन अग्रवाल और कपिल शर्मा के कार्यों की समीक्षा की जाए। किसी के पेट पर लात मारने से पहले इस बात की तस्दीक कर ली जाए। उसने संस्थान के साथ, अपने कर्म के साथ गद्दारी की या वफादारी। चलते-चलते बस गुलाटी जी तक इतनी बात जरूर पहुंचानी है, जिनके घर शीशे के होते हैं, वो पत्थरों से दुश्मनी नहीं करते। ये पत्रकार जरूर हैं पर थोड़े बागी किस्म के !!

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ये कौन से पत्रकार हैं, जो मुख्यमंत्री से मिले?

इंदौर : प्रेस क्लब इन दिनों पूरी तरह धंधेबाज पत्रकारों (वास्तव में ये पत्रकार हैं ही नहीं) का अड्डा बन गया है। जिनके हाथ में प्रेस क्लब का दारोमदार है, वे या तो भूतपूर्व पत्रकार हैं, दलाल हैं या फिर पूरी तरह फुर्सत में हैं। आजकल ये मुख्यमंत्री से पत्रकारों की मदद के नाम पर कुछ ऐंठने की कोशिश में लगे हैं। 

 

पिछले सोमवार को भोपाल में प्रेस क्लब के सदस्यों ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात की! बताया ये गया कि उन्होंने मीडियाकर्मियों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की! पर किसी को पता नहीं कि पत्रकारों की ऐसी कौनसी विकल समस्या है, जिसे लेकर मुख्यमंत्री से बातचीत की गई! मजीठिया वेतन आयोग की अनुशंसा लागू किया जाना पत्रकारों की सबसे बड़ी समस्या है, उसे लेकर प्रेस क्लब ने कभी न तो सरकार से बात की और न पत्रकारों का साथ दिया! मुख्यमंत्री से भोपाल मिलने गए पत्रकारों में एक प्रवीण खारीवाल हैं, जो प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं पर किसी अखबार से नहीं जुड़े! अरविंद तिवारी सचिव हैं, जिन्हें तीन अख़बारों से निकाला जा चुका है। शशीन्द्र जलधारी रिटायर हो चुके हैं और कविताएँ लिख रहे हैं। कीर्ति राणा किसी अखबार में नहीं हैं और फुर्सत में हैं। कमल कस्तूरी मूलतः बिल्डर है, कोई पत्रकार नहीं! नवनीत शुक्ला एक पिटा हुआ सांध्यकालीन अखबार निकलते हैं। के.के. शर्मा ‘गुड्डू’ नगर निगम के कर्मचारी हैं। मुख्यमंत्री से मिलने गए इस दल में एक भी ऐसा चेहरा नहीं है, जिसकी पहचान पत्रकार के तौर पर हो! 

 बताते हैं कि दरअसल, ये सभी भोपाल के ‘प्रदेश टुडे’ अखबार द्वारा आयोजित ऑटो-शो के लिए हृदेश दीक्षित के गेस्ट थे। इस शो में कोई बड़ा नेता आने को राजी नहीं हुआ! पहले सुषमा स्वराज के आने की बात कही गई, पर वे नहीं आई! मुख्यमंत्री ने भी भोपाल में होते हुए आने से किनारा कर लिया! यही कारण था कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए इंदौर प्रेस क्लब के इन कथित पत्रकारों के भोपाल आने का इंतजाम किया गया! इसके बाद भी मुख्यमंत्री वहां, नहीं गए।   

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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मुंबई में महिला रिपोर्टर से ट्रेन में छेड़छाड़ और लूटपाट

मुंबई : कलवा स्टेशन पर लोकल ट्रेन में बदमाशों ने गत दिनो एक महिला पत्रकार से छेड़छाड़ और लूटपाट की। रेलवे पुलिस के मुताबिक जाते जाते लुटेरे ने पत्रकार को धमकी भी दी। उसने ठाणे रेलवे पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी है।

घटना मंगलवार रात लगभग 1:30 बजे की बताई गई है। उस समय एक अखबार की वह महिला रिपोर्टर ड्यूटी के बाद लोकल ट्रेन में ठाणे की ओर अपने घर लौट रही थी। कलवा रेलवे स्टेशन पर एक अज्ञात बदमाश ने ट्रेन चलते ही छेड़छाड़ करते हुए उसका मोबाइल लूट लिया। फोन की कीमत 41 हजार बताई गई है। ठाणे के पुलिस अधिकारी अनंत राणे ने बताया कि इस मामले में सीसीटीवी फुटेज से आरोपी की तलाश की जा रही है।

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जम्मू-कश्मीर विधानसभा में ‘टेकवन’ के रिपोर्टर श्याम सुंदर बेहोश

जम्मू-कश्मीर : मंगलवार को विधानसभा में सदन की कार्यवाही की रिपोर्टिंग कर रहे एक पत्रकार प्रेसदीर्घा में बेहोश हो गए। इस दौरान सदन की कार्यवाही कुछ देर के लिए स्थगित कर दी गई।

जम्मू-कश्मीर के ‘टेकवन’ टेलीविजन के रिपोर्टर श्याम सुंदर राज्य विधानसभा की प्रेसदीर्घा में कुर्सी पर बैठे-बैठे बेहोश हो गए। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। उप मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने जम्मू मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल के चिकित्सकों से कहा कि यदि पत्रकार को इलाज के लिए राज्य से बाहर ले जाने की आवश्यकता हो, तो इस बारे में सूचित करें। इसका पूरा खर्च राज्य सरकार उठाएगी। विधानसभा अध्यक्ष कवींद्र गुप्ता ने सदन की कार्यवाही 10 मिनट के लिए स्थगित कर दी।

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भोपाल में आठ अप्रैल को विन्ध्य क्षेत्र के पत्रकारों का सम्मान

रीवा : मध्यप्रदेश शासन की ओर से पं. बनारसीदास चतुर्वेदी पत्रकारिता पुरस्कार के लिए चयनित विन्ध्य क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकारों को 8 अप्रैल 2015 को भोपाल में आयोजित हो रहे राज्य स्तरीय समारोह में पुरस्कृत-सम्मानित किया जायेगा। पुरस्कार के रूप में 51 हजार रुपये के साथ ही प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। राज्य शासन द्वारा गठित जूरी ने पिछले माह 18 मार्च को विन्ध्य क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार उमाशंकर तिवारी, शालिगराम शर्मा, सुदामा शरद, अजय सिंह, रमाकांत द्विवेदी, बृजेश पाठक एवं राजेश द्विवेदी को बनारसीदास चतुर्वेदी आंचलिक पत्रकारिता पुरस्कार देने की घोषणा की थी। 

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पत्रकार की कार में टक्कर मार कर कैमरा चेन की लूट, फरियाद पर एसआई ने धमकाया

हरदोई (उ.प्र.) : यहां से कन्नौज जाते समय एक न्यूज चैनल के ज़िला सवांददाता मो.आसिफ के वाहन पर बिलग्राम क्षेत्र के कुटुलुपुर के कोटेदार के भाई ने अपनी मोटरसाइकिल से टक्कर मार दी। उसी दौरान उनकी कार से कैमरा, चेन, चाभी लूट ली गई। फरियाद करने पर एसआई ने उन्हें धमकाते हुए वहां से भाग जाने को कहा। 

जब आसिफ ने रुक कर टक्कर मारने का कारण जानना चाहा तो उस स्थान पर बड़ी संख्या में भीड़ इकट्ठा हो गई। पेट्रोलिंग कर रहे बिलग्राम थाने के एसआई बी वीं सिंह अपने हमराह के साथ मौके पर पहुँच गए। उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद उल्टे पत्रकार को जातिसूचक गाली दी और तुरंत वहां से निकल जाने को कहा। 

जब आसिफ अपनी कार में बैठ कर जाने लगे तो कार से वीडियो कैमरा और सेन्टरलाक चाबी गायब मिली। जब इसकी शिकायत एसआई बीवी सिंह से की तो उसने फिर वही जुबान दोहराते हुए भाग जाने को कहा। बाद में थाना प्रभारी शैलन्द्र सिंह ने घटना की जानकारी होने से ही इनकार कर दिया। 

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झारखंड और कोयला खदानें न होतीं तो पत्रकार बनने का इरादा नहीं था

इस देश में झारखंड नहीं होता और न कोयला खानें होतीं तो मेरे पत्रकार बनने का कोई इरादा कभी न था। झारखंड और भारत की औद्योगिक उत्पादन प्रणाली को समझने के लिए सीधे जेएनयू से मैं अपरिचित मदन कश्यप के भरोसे अपने मित्र उर्मिलेश के कहने पर कुछ दिन झारखंड में बिताने के लिए कड़कती हुई उमस के मध्य तूफान एक्सप्रेस से मुगलसराय उतरकर पैसेंजर गाड़ी से धनबाद पहुंच गया था और कवि मदन कश्यप ने मुझे गुरुजी दिवंगत ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के दरबार में पेश कर दिया था और गुरुजी ने ही हाथ पकड़कर मुझे पत्रकारिता का अ आ क ख ग सिखाया।

तब पत्रकारिता में अपने होने का सबूत देने में इतना उलझ गया कोयला खदानों में कि फिर भद्रसमाज में होने का अहसास न हुआ और न आगे पढ़ाई जारी रखने की कभी इच्छा हुई। 

उन दिनों के अखबारों में तमाम मसीहावृंद के सुभाषित पढ़ लें तो जाहिर हो जायेगा कि वे हिंदुत्व का कैसे मुकाबला कर रहे थे। हमारे आदरणीय मित्र आनंद स्वरूप वर्मा ने अस्सी के दशक के मीडिया के उस युंगातकारी भूमिका पर सिलसिलेवार लिखा है। मने दिल्ली में उनसे मिलकर और अभी हाल में फोन पर उनसे अनुरोध किया है कि भारतीय मीडिया के कायाकल्प के उस दशक के सच को किताब के रूप में जरूर सामने लाये थो तमाम दावेदारों के दावों का निपटारा हो जाये। हमने वे तमाम आलेख हस्तक्षेप के लिए आनंद जी से मांगे हैं। मिलते ही हम साझा करेंगे।

सारी विधायें अब कारपोरेट हैं और केसरिया भी और हर जुबान पर देशी विदेशी पूंजी का ताला है और तमाम उजले चेहरे करोड़ों के रोजाना भाव बिक रहे हैं। हमारी औकात चाहे जो हो, हमारी हैसियत चाहे जो हो, हम इस दुस्समय को यूं गुजरते हुए कयामत बरपाने से पहले कम से कम दम भर चीखेंगे जरूर आखिरी सांस तक।

हमारे हिसाब से हिंदुत्व की सुनामी तो राममंदिर आंदोलन की शुरुआत कायदे से होने से पहले, राजीव गांधी के राममंदिर के ताला तुड़वाने से बहुत पहले आपरेशन ब्लू स्टार और सिखों के नरसंहार के जरिये पैदा हो गयी थी, जब समूचा सत्ता वर्ग और सारा मीडिया सिखों के सफाये पर तुला हिंदुत्व का आवाहन कर रहा था।

 हस्तक्षेप से साभार

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अश्लील वीडियो बनाने के आरोप में अहमदाबाद के सात पत्रकार गिरफ्तार

अहमदाबाद (गुजरात) : स्थानीय पुलिस ने एक डांस स्कूल चलानेवाली महिला से दो लाख रूपए की अवैध वसूली करने के आरोप में सात पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया है।

पुलिस के अनुसार इन सातो पत्रकारों में से दो पत्रकार टीवी 24 न्यूज चैनल के बताए गए हैं। जबकि अन्य पांच एक विकली अखबार के पत्रकार बताए जा रहे हैं। पकड़े गए आरोपियों के नाम सतीष अंबालाल पटेल, मुनेन्द्र सिंह जनोद, घनश्याम सिंह राजपूत, अर्जुन सिंह राठौड, राजेश राठौड, राजेश शर्मा और नरेन्द्र सिंह रहेवर हैं। सतीष पटले और मुनेन्द्र सिंह पूरे मामले के मुख्य सूत्रधार बताये जा रहे है, टीवी 24 जुड़े बताए गए हैं।

पुलिस के अनुसार कुछ माह पूर्व ये सातो आरोपी अहमदाबाद शहर के इसनपुर इलाके में एक डांस स्कूल चलाने वाली महिला के कमरे में जबरन घुस गए थे। उस दौरान महिला घर में अपने कपड़े बदल रही थी। उसी दौरान इन सभी जबर्दस्ती उस महिला की अश्लील विडियो बना ली थी। बाद में उस वीडियों को टीवी 24 चैनल पर प्रसारित कर बदनाम करने की धमकी देते हुए पीड़ित महिला से दो लाख रुपए की मांग करने लगे। महिला ने इसकी शिकायत इसनपुर थाने में दर्ज करा दी। तब से सातो आरोपी फरार चल रहे थे। पुलिस सातो आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले की छानबीन कर रही है। 

यह भी बताया जा रहा है कि इसनपुर थाने के एसएचओ ने इन सातों पत्रकारो को गलत फंसाया है। काफी समय से सतीष पटेल से इसनपुर पुलिस स्टेशन के एसएचओ से नाराज चल रहे थे। बदला लेने के लिए इन सभी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। 

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पत्रकार से बदसलूकी करने वाले दो एसआई समेत चार पुलिसकर्मी लाइन से अटैच

विदिशा : पत्रकार संजय भार्गव के साथ बदसलूकी करने वाले पुलिसकर्मियों को लाइन अटैच किया गया है। जानकारी के अनुसार 27 मार्च को जुलूस के कवरेज के दौरान पुलिस ने पत्रकार से बदसलूकी करते हुए उनके खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कराई थी। सीएसपी नागेंद्र पटेरिया ने बताया कि एसआई एचएस राजावत, एसआई वीरेंद्र सेन, प्रधान आरक्षक मानसिंह यादव और आरक्षक शाजिद खान को लाइन अटैच कर दिया गया है।

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‘मजीठिया समय’ में कहां दुबके हैं जमा-जुबानी गरिष्ठ-वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार

क्षमा करें, एक चलताऊ मुहावरे के बहाने इतनी गंभीर बात कहनी पड़ रही है, लेकिन जनभाषा में सधती इसी तरह से लगी ये बात – जो डर गया, सो मर गया। भारतीय मीडिया के लिए हम अपने दौर को ‘मजीठिया समय’ नाम दें तो इससे बड़ा अर्थ निकलता है। ‘मजीठिया समय’ के हीरो वे हैं, जो डरे-दुबके नहीं हैं, जो अवसरवादी नहीं हैं, जो सुप्रीम कोर्ट तक देश भर के श्रमजीवी पत्रकारों के हित के लिए आज अपना सब कुछ दांव पर लगाकर जूझ रहे हैं, न्याय दिलाने के लिए अपने संकल्प पर अडिग हैं। बाकी वे सब डरपोक हैं, जो मजीठिया का लाभ तो लेना चाहते हैं लेकिन चुपचाप ताकि नियोक्ता कहीं उन्हें जान-पहचान न जाए। इस अदा पर कौन न मर जाए ऐ खुदा कि जो कहते हैं – गाय भी हां, भैंस भी हां, बस सैलरी दे दो, लड़ाई जाए भाड़ में…

इसलिए और साफगोई से कहें तो ‘मजीठिया समय’ एक विभाजक रेखा है हिम्मतवर और डरपोक पत्रकारों के बीच। ‘मजीठिया समय’ उन लेखकों-साहित्यकारों-कवियों और गरिष्ठ-वरिष्ठ पत्रकारों को भी माफ नहीं करेगा, जो अखबार के पन्नों और टीवी स्क्रीन पर छाए रहने की गंदी (छपासी) लालसा में ‘मजीठिया समय’ पर अपना पक्ष चुराए पड़े हैं। और वे संगठन भी, जो पत्रकार-हितों के नाम पर तरह तरह की गोलबंदियां कर अपनी कमाई-धमाई में जुटे रहते हुए मालिकानों, अधिकारियों और सरकारों के गुर्गे हो चुके हैं। 

कुछ मित्रों का कहना है कि भूखे भजन न होइ गोपाला। मेरा सोचना है कि भूख तो उन्हें भी लगती है, उनका भी घर परिवार है, जो ‘मजीठिया समय’ में शोषितों के साथ हैं और जिनमें से कइयों की नौकरी चली गई, कइयों की दांव पर लगी है, लेकिन जो कत्तई कदम पीछे लौटाने को तैयार नहीं हैं। सबसे बड़ी दिक्कत क्या है कि सुंदर-सुंदर साहित्य लिखने वाले, क्रांतिकारी बहस-राग सुनाने वाले, समाज के दुख-दर्द पर जमा-जुबानी हमदर्दी लुटाने वाले पत्रकारों ही नहीं, किसी भी वर्ग के संघर्ष के समय कुतर्कों की आड़ में मुंह छिपा लेते हैं क्योंकि किसी न किसी के हिस्से की उन्हें मलाई सरपोटनी होती है, किसी न किसी (कारपोरेट मीडिया आदि) के भरोसे उन्हें अपनी छद्म महानता का सार्वजनिक प्रदर्शन करना होता है, मंच से अथवा मुंह-मुंह मिट्ठुओं की तरह। साहित्य और सूचना के नाम पर गोबर थापने वाले ऐसे बात बहादुरों की बड़ी लंबी-लंबी कतारें हैं। 

 इस ‘मजीठिया समय’ में उस कारपोरेट मीडिया का चरित्र देखिए कि हर दिन वह सौ रंग इसलिए बदल रहा है ताकि पत्रकारों का शोषण जारी रहे। एक अखबार (हिंदुस्तान) ने तो अपने यहां एडिटर शब्द पर ही स्याही फेर दी है क्योंकि एडिटर कहलाएगा तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उसे संपादकनामा कर्मियों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन देना पड़ जाएगा। एक अखबार (भास्कर) ने मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मियों को तो श्रम न्यायालय में चोर करार दिया है। एक अखबार (अमर उजाला) अपनी कंपनी की सभी यूनिटों को अलग अलग दर्शाने का नाटक कर रहा है। एक अखबार (दैनिक जागरण) ने तो सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया सिफारिशों और अदालती आदेशों को ही चैलेंज कर दिया है। यद्यपि सा-साफ ये सब के सब उच्चतम न्यायालय के मजीठिया संबंधी आदेश का अनुपालन न कर मानहानि के गुनहगार हैं। और हमारे राज्य की नीयत देखिए कि वह न्यायपालिका में कितनी आस्था रखता है। मजीठिया मामले पर उसने गंभीर चुप्पी साध रखी है क्योंकि वर्तमान या भविष्य के (पेड-सेट न्यूज वाला) चुनावी सर्कस खेलने में कारपोरेट मीडिया की पक्षधरता उसके लिए अपरिहार्य है। 

अखबार, न्जूज चैनल और फिल्मों वाला ये वही धन-मीडिया है, जिसने अपसंकृति को कलेजे से लगा रखा है। सत्ता का पत्ता-पत्ता चाटने के लिए। प्रकट-अप्रकट तौर पर इस ‘मजीठिया समय’ में जो भी धन-मीडिया के साथ हैं, वे सभी हमारे वक्त में शोषित पत्रकारों और न्यायपालिका, दोनों के गुनहगार हैं। समय ये सन्नाटा भी तोड़ेगा, साथ ही उन गुनहगारों की शिनाख्त कर उनके खोखले विचारों और गतिविधियों पर सवाल भी जरूर जड़ेगा।   

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प्रशासन, नेताओं और धन्नासेठों का दलाल बनने से बचें पत्रकार : आनंद स्वरूप वर्मा

पौड़ी (उत्तराखण्ड) : आज के दौर में लोगों तक सही सूचनाएं नहीं पहुंच रही हैं। पत्रकार पुलिस और प्रशासन के स्टेनो बन गये हैं। जैसी सूचनाएं वह देते हैं, पत्रकार उसी को अपने अखबार/चैनल को भेज देते हैं। अपने स्तर पर सूचनाओं की पुष्टि करने तथा उससे अलग तथ्य खोजने की मेहनत से बचते हैं। यह बात उमेश डोभाल स्मृति रजत जयंती समारोह में आयोजित व्याख्यान ‘बदलते परिवेश में जन प्रतिरोध’ विषय पर मुख्य वक्ता वरिष्ठ लेखक-पत्रकार और समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने कही। 

उन्होंने कहा कि लोगों में जागरूकता लाने में मीडिया की अहम भूमिका है और सुझाव दिया कि पत्रकारों को प्रशासन, नेताओं और धन्नासेठों का दलाल बनने से बचना चाहिए। बताया कि किस प्रकार से सरकारें, प्रशासन और पूंजीपति जनता को भ्रमित कर रहे है। ऐसे में पत्रकारों की जिम्मेदारी है कि वह जनता तक सही सूचनाएं पहुंचाएं और उसे जागरूक करें। उन्होंने सरकारी दस्तावेजों के हवाले से बताया कि छत्तीसगढ़ में सरकार और निजी क्षेत्र लोगों को उजाड़ रहा है और उत्पीडि़त कर रहा है।   

श्री वर्मा ने कहा कि वर्तमान परिवेश में पूंजीवाद हावी हो रहा है। ऐसे में लोगों में जागरूकता लाना जरूरी है। बताया कि 1990 के विश्व बैंक के एक दस्तावेज में कहा गया कि राज्य को कल्याणकारी योजनाएं बंद कर सारे जनकल्याणकारी काम-काज निजी क्षेत्र को सौंप देने चाहिए। उसके इस सूत्र को दुनिया भर की सरकारों ने बाइबिल की तरह अपना लिया। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने पीएम काउंसिल ऑन ट्रेड एंड इंडस्ट्री बनाई जिसके तहत सरकारी योजनाएं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का कार्यभार रिलायंस आदि कॉरपोरेट घरानों को सौंप दिए गये। 

उन्होंने वैश्वीकरण को साम्राज्यवाद का बदला हुआ रूप बताया। आज पत्रकारिता और सांस्कृतिक आन्दोलन दयनीय स्थिति में हैं। वर्मा ने कहा कि सरकारें चाहती हैं कि जनता हिंसा करे ताकि वह इस बहाने जनता के अधिकारों में कटौती कर कारपोरेट के लिये रास्ता साफ सके। इसलिये जनता को हिंसक प्रतिरोध से बचना चाहिए। निरंतर जनता को जागरूक करने और उसे गोलबंद करने के प्रयास व्यापक स्तर पर होने चाहिए। बताया कि आम जनता में कोई हथियार तभी उठाता है जब सभी तरह के लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के माध्यमों को सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा अनसुना कर दिया जाता है। कहा कि कोई भी आमजन मामूली बातों में हथियार उठाने की हिम्मत नहीं करता। सामान्यतया तो धन्नासेठों के बिगड़ैल बच्चे हथियार उठाते हैं जो एक पैग शराब न मिलने पर भी गोली चला सकते हैं। उल्लेखनीय है कि वर्मा उन पत्रकारों में से एक थे जिन्होंने  उमेश डोभाल के गुम हो जाने के समय दिल्ली में शराब माफिया के खिलाफ लोगों को गोलबंद करने में अहम भूमिका निभा कर दबाब बनाया गया था।  

वरिष्ठ पत्रकार और नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन शाह ने कहा कि जन प्रतिरोध के लिए सही बातों को सामने लाना जरूरी है। आज पूंजीवाद विभिन्न तरीकों से हमारे सोचने-समझने की क्षमता पर प्रतिकूल असर डाल भ्रमित कर रहा है। लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि हर व्यक्ति को प्रतिरोध के स्वरों को अपने तरीके से व्यक्त करना चाहिए। डा. उमा भट्ट ने कहा कि समाज को महिलाओं के प्रति सोच बदलने की जरूरत है। उन्होंने रामपुर तिराहा कांड के दोषियों को सजा नहीं मिलने पर दुख व्यक्त किया और आंदोलनकारियों द्वारा इस मामले को विस्मृति के गर्त में डालने पर क्षोभ व्यक्त किया। इस मौके पर खुले सत्र एवं परिचर्चा कार्यक्रम में विभिन्न वर्गों से जुड़े लोगों ने विचार रखे। संचालन योगेश धस्माना ने किया। 

भोजनकाल के बाद तीसरे खुले सत्र में विषय पर व्यापक चर्चा हुई। इसकी अध्यक्षता ओंकार बहुगुणा मामू ने की। इसमें बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी.सी. तिवारी ने कहा कि मात्र पत्रकारिता से व्यवसथा नहीं बदल सकती है। इसके लिये अच्छे लोगों को राजनीति में आना ही होगा, तभी सरकार को जगाया जा सकता है। सरकार चाहती है कि प्रतिरोध ही न हो क्योंकि ऐसा करने से उनको अपनी मनमानी करने की छूट मिल जाती है। उन्होंनें कहा कि उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट ने 25 सालों से आयोजन के जरिये प्रतिरोध की धारा को जिंदा रखा है। इसलिये इसके साथ जुड़ें। जनवादी लेखक त्रेपनसिंह वौहान ने कहा कि जनप्रतिरोध आज दबता जा रहा है। आज श्रमिक यूनियन नहीं बन सकते हंै इसीलिये आज श्रमिकों का जबरदस्त शोषण हो रहा है। रुद्रपुर से आये रूपेश कुमार सिंह ने कहा कि राज्य में 15 साल हो चुके हैं लेकिन में कोई भी राज्यस्तरीय राजनीतिक ताकत नही उभर सकी है। यहां पर राज कर रहे दल सही मायनों में जनआकाक्षाओं के अनुरूप कार्य ही नहीं कर रहे हैं। राज्य बनने के बाद पहाड़ ही नहीं तराई भी कई प्रकार की समस्या से जूझ रही है। उन्हानें सुझाव दिया कि राज्य के तराई क्षेत्र की समस्याओं को जानने के लिए भी पदयात्रा की जानी चाहिए।

देहरादून से आई पत्रकार मीरा रावत ने कहा कि आज प्रतिरोध के स्वरों को कुचला जा रहा है। उन्होंने बताया कि एक समय जिस आईटी पार्क को लेकर यहां पर रोजगार के सपने दिखाये गये थे उस आईटी पार्क की हालत देखकर रोना आता है। इस पार्क की जमीन का एक हिस्सा बिल्डरों को दे दिया गया है जो अपने एक-एक फ्लैट एक से सवा करोड़ में बेच रहे हैं। दिल्ली से आये लीलाधर काला ने कहा कि तकनीकी से आज काफी कुछ बदल गया है। सरकारें और पूंजी की ताकतें इसका अपने हित और जनता के खिलाफ इस्तेमाल कर रही हैं, हम कैसे इसका प्रयोग आम जन के हित में कर सकते हैं इस पर सोचा जाना चाहिए। चकबन्दी नेता गणेश सिंह गरीब ने कहा कि आज गांव खण्डहर हो रहे हैं समय रहते यदि सरकार और हम नहीं चेते तो वह पूरी तरह से खाली हो जायेंगे। यह राज्य एक प्रतिरोध के आन्दोलन बनने से ही बना लेकिन उसके बाद हम यह भूल गये कि हमने वह किसलिये मांगा था। हमारी प्राथमिकतायें क्यों बदल गई? इस पर हमें आत्मालोचना कर समान विचार वालों से संवाद बढ़ाना चाहिए। 

दिल्ली से आये वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया एक्टीविष्ट भूपेनसिंह ने मीडिया और जनप्रतिरोध के सच को समाने रखा। उन्होंने बताया कि आज की पत्रकारिता कारपोरेट के हाथों में ही है। जिनकी प्राथमिकता केवल पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने की है। हम आम जन के हित में कैसे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, इसका रास्ता हम आपसी संवाद से निकाल सकते हैं। प्रखर पत्रकार और भाकपा माले नेता इंद्रेश मैखुरी ने कहा कि मुख्यधारा का मीडिया बड़ी पूंजी से संचालित है, जिसके द्वारा वह अपने उत्पादों का प्रचार करता है, और पूंजीपति घरानों के सुरक्षा कवच का काम करता है। पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में जनमत का निर्माण करता है। इसके उपभोक्ता और इसमें काम करने वाले प्रयास करें तो इसका इस्तेमाल एक हद तक आम जन के लिए भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही जनपक्षीय लोगों को वैकल्पिक मीडिया खड़ा करने के प्रयास करने चाहिए। मैखुरी ने जनपक्षीय कार्यक्रमों में मुख्य/विशिष्ट अतिथियों के रूप में पूंजीवादी दलों के नेताओं को बुलाने से परहेज करने की सलाह दी। 

इस दौरान कुछ प्रस्ताव भी सामने रखे गये –

 1- कई बार यह सामने आ रहा है कि किस प्रकार उच्च अधिकारी और नेता अपने हितों के लिये नीतियां साध रहे हैं। राज्य में सत्ताधारी दलों और अधिकारियों का गठजोड़ इस नवोदित राज्य के लिये बेहद खतरनाक है। इसका प्रतिकार हो। 

2- सिडकुल की जमीनें औने-पौने दाम पर बिल्डरों व होटलेयर को देना बन्द हो। जिस प्रयोजन के लिये जमीने दी गई हो उसमें वही कार्य हो। राज्य में लैंड यूज बदलने का गेम बंद हो।

3- राज्य की खनन नीति ऐसी बने कि खनन माफिया न पनप सके।

4- केदारनाथ आपदा के बाद से सरकार को इस त्रासदी से सबक लेना चाहिये था। लेकिन सरकार अब भी नहीं चेती है और उसने फिर से विकास का वही पुराना राग अलापना आरम्भ कर दिया है। इससे फिर राज्य को दूसरी त्रासदी झेलनी पड़ सकती है। सरकार इसकी गम्भीरता को समझे।  

5- राज्य में पत्रकारों के वेतन के लिये मजीठिया आयोग लागू हो ताकि पत्रकारों का शोषण बंद हो। इसी प्रकार 60 साल पूरे कर चुके पत्रकारों को दूसरे राज्यों की तरह पेंशन दी जाए।

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जमशेदपुर में वरिष्ठ पत्रकार डीएनएस नीरज का निधन

जमशेदपुर : यहां से प्रकाशित कई अखबारों में संपादक और वरिष्ठ पदों पर रह चुके ध्रुवनारायण सिंह नीरज (डीएनएस) का रविवार 29 मार्च को हार्ट अटैक से निधन हो गया। वह 58 साल के थे। देर शाम भुइयांडीह स्थित सुवर्णरेखा बर्निंग घाट पर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। अंतिम संस्कार में विभिन्न राजनीतिक व सामाजिक संगठनों  के अलावा में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी शामिल हुए। डीएनएस अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र व एक पुत्री समेत भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं।

रविवार को अपराह्न साढ़े तीन बजे गाढ़ाबासा केबुल बस्ती स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा पड़ा। उन्हें टीएमएच ले जाने के दौरान रास्ते में ही निधन हो गया।  प्रभात खबर से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले नीरज की पहचान एक तेज -तर्रार पत्रकार के रूप में थी। उन्होंने जमशेदपुर के प्रभात खबर, इस्पात मेल, न्यू इस्पात मेल, उत्कल मेल में संपादक तथा दैनिक आज, उदितवाणी एवं हिन्दुस्तान समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर अपनी जिम्मेदारी निभायी।

उन्होंने कई शिक्षण संस्थानों में भी अपना योगदान दिया था। जमशेदपुर वर्कर्स कॉलेज, ग्रेजुएट कॉलेज, केएमपीएम कॉलेज और गुरुनानक इंटर कॉलेज में योगदान दिया। इसके अतिरिक्त हिंदी की कई किताबें भी उन्होंने लिखी थी। पत्रकारिता, शिक्षण कार्य और साहित्य के क्षेत्र में उनकी विशेष पहचान थी। प्रभात खबर परिवार एवं प्रेस क्लब ऑफ जमशेदपुर ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि हमारे बीच से एक ऐसा साथी बिछुड़ गया है, जिसकी भरपाई मुश्किल है। 

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बीबीसी पत्रकार सलमा जैदी का लंदन में निधन

वर्ष 2011 तक बीबीसी समाचार सेवा से लगभग डेढ़ दशक तक जुड़ी रहीं पत्रकार सलमा ज़ैदी का लंदन में निधन हो गया। वह कुछ समय से बीमार थीं। उन्होंने रविवार को लंदन में अंतिम सांस ली।

 वह बीबीसी हिंदी रेडियो पर एक जानी-मानी आवाज़ थीं और हिंदी भाषा में डिजिटल दुनिया में काम कर रही चंद महिलाओं में शुमार थीं। उन्होंने बीबीसी में अपनी पारी की शुरुआत बीबीसी हिंदी रेडियो से की थी। बाद में वह बीबीसी हिंदी ऑनलाइन की प्रमुख बनीं। बीबीसी में उन्होंने महिलाओं, अल्पसंख्यकों और बच्चों से जुड़े विषयों पर विशेष काम किया। 

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उधार खाए पत्रकार का आखिरी जवाब – ‘जो नंबर आपने डायल किया है, वह गलत है’ !

यह दुखद आपबीती है एक ऐसे शख्स की, जिसका कम्प्यूटर ऑपरेटर की नौकरी करते समय किसी सौरभ कुमार नाम के लंपट पत्रकार से पाला पड़ गया। जब कम्प्यूटर ऑपरेटर बसंत गांगले ने कुछ वर्ष पहले मोबाइल रिचार्ज करने की दुकान खोल ली तो सौरभ वहां से अपने और अपनी बहन के मोबाइल रिचार्ज कराने लगा। रिचार्जिंग की उधारी का यह सिलसिला वर्षों चलता रहा और अंततः गांगले की दुकान बंद हो गई। आखिरी बार उधारी मांगते समय गांगले के फोन पर सौरभ के मोबाइल से जवाब मिला – ‘जो नंबर आपने डायल किया है, वह गलत है।’ लंपट पत्रकार से पीड़ित बसंत गांगले ने अपनी दुखद आपबीती इन शब्दों में भड़ास4मीडिया को प्रकाशनार्थ प्रेषित की है…..  

” यह सच्चाई है एक कम्प्यूटर ऑपरेटर की, जिसका नाम है बसंत गांगले। इसने वर्ष 2009 में इंदौर (मध्य प्रदेश) के एक न्यूज पोर्टल में कम्प्यूटर ऑपरेटर की जॉब की। इस पोर्टल के आफिस में तकरीबन दो साल तक कम्प्यूटर ऑपरेटर की नौकरी की। इस पोर्टल को भोपाल से न्यूज मेल करने वाला सौरभ कुमार, जो कि उस समय राजएक्प्रेस में पत्रकार की हैसियत से नौकरी कर रहा था, वह रोजाना न्यूज मेल करता था और मैं ‘बसंत’ न्यूज को साईट पर अपलोड करने का काम करता था। दो साल आफिस में साईट का काम किया। उसके बाद मैंने अपना मोबाईल रिचार्ज की दुकान खोल ली। उसके बाद साइट का काम दुकान से ही करने लगा। सौरभ कुमार उस समय भी साइट को न्यूज मेल करता था। 

”जब उसको पता चला कि मैंने मोबाइल रिचार्ज की दुकान खोल ली है तो उसने खुद और अपनी बहन के मोबाइल नंबर पर फोन रिचार्ज करवाना शुरू किया। महीने भर में तकरीबन 1000 से 1500 रुपए का बैंलेस उधारी में डलवा लेता था और कहता था कि बसंत मेरा महीनेभर में इंदौर आना-जाना रहता है तो मैं तुझे तेरे बैलेंस के पैसे आकर दे दूंगा। 

”एक-दो बार तो उसने आकर पैसे दे दिए। फिर उसने साइट से काम छोड़ दिया मगर बैलेंस डलवाता रहता था। हर बार एक ही बात कहता था कि मैं पैसे दे दूंगा। मैंने सोचा, इतना बड़ा आदमी है, भला मेरे पैसे कैसे खा सकता है। इसी विश्वास के साथ मैं बैलेंस डालता रहा और 2100 रुपए तक का बैलेंस डाल दिया। 

”इस बीच मैंने उसे कई बार फोन लगाया। वह कहता कि बसंत मैं अगले हफ्ते इंदौर आना वाला हूं। तुझे पैसे दे दूंगा। इसी तरह के कई बहाने करता रहा। कभी बोलता, मैं तेरी दुकान के पास आ गया हूं, तू कहां है? जब मैं वहां पहुंचता तो वह नहीं रहता, क्योंकि वह झूठ बोलता था कि वह वहां पर है। वह कभी बोलता कि मैं ट्रेन में हूं, बस 2 घंटे बाद आ जाऊंगा। इसी तरह ढाई साल तक बहाने करता रहा। मुझे दुकान में नुकसान हो गया था, इसलिए मैंने दुकान अक्टूबर 2014 में बंद कर दी। 

”17 मार्च 2015 को मैंने फिर उसे फोन लगाया। उसने कहा- मैं एनईएफटी कर रहा हूं। तीन दिन में पैसे तेरे अकाउंट  में आ जाएंगे। मैंने 20 मार्च को एटीएम चेक किया। पैसे नहीं आए थे तो मैंने उसे फोन लगाया। उसने कहा – हां, यार मेरे अकांउट से पैसा अभी कटा नहीं है। मैं पहली बार एनईएफटी कर रहा हूं। मैं चेक करके बताता हूं। जब मैंने 21 मार्च को फिर चेक किया तो पैसे नहीं आए थे। मैंने उसे फिर इस फोन नंबर 8878993973 पर उसे काल किया तो उधर से जवाब मिला- ‘जो नंबर आपने डायल किया है, वह गलत है।’ ”

(बसंत गांगले का संपर्क नंबर – 9977240760)

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गैंगरेप के आरोपी पत्रकार की जमानत मंजूर

मुंबई : मुबंई हाईकोर्ट ने धारावी क्षेत्र में चलती कार में एक महिला से गैंग रेप के मामले में गिरफ्तार एक पत्रकार की जमानत मंजूर कर ली। न्यायमूर्ति रेवती धेरे ने आदेश दिया है कि आरोपी एम. अंसारी को 15 हजार रूपये के मुचलके पर रिहा किया जाए. अदालत ने आरोपी को इस मामले में आरोपपत्र दायर होने तक हर शनिवार धारावी पुलिस थाने जाने का निर्देश दिया. बीते साल 22 जुलाई को एक कार में चार लोगों ने 34 वर्षीय महिला का गैंग रेप किया था.

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भोपाल में पत्रकार मनोज वर्मा पर चार बाइकर्स ने किया जानलेवा हमला

भोपाल : एक स्थानीय अखबार में काम खत्म कर घर लौट रहे राजधानी के वरिष्ठ पत्रकार मनोज वर्मा पर चार बाइक सवारों ने सुभाष फाटक के पास डंडों से जानलेवा हमला कर दिया। उनके सिर में गंभीर चोटें आई हैं और दोनो हाथ टूट गए हैं। पुलिस मामला दर्ज कर घटना की छानबीन कर रही है।

हमले में घायल पत्रकार मनोज वर्मा

ये वारदात गत रविवार की रात करीब साढ़े दस बजे सुभाष फाटक के पास हुई। मनोज अपनी बाइक से एमपी नगर से सुभाष फाटक होते हुए अशोका गार्डन स्थित अपने घर जा रहे थे। इसी दौरान दो बाइकों पर सवार चार अज्ञात हमलावरों ने डंडों से उन पर हमला कर दिया। उनके दोनों हाथ टूट जाने के साथ ही सिर में भी गंभीर चोटें आई हैं।

घटना के बाद उनको सबसे पहले 108 एम्बुलेंस से जेपी अस्पताल ले जाया गया। बाद में वहां से उनको नर्मदा अस्पताल रेफर कर दिया गया। पत्रकार पर हमले की भाजपा ने निंदा करते हुए पुलिस से हमलावरों की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की है।

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पत्रकार महेंद्र पाठक सम्मानित

भोपाल : बाल विवाह रोकने के लिए चलाए जा रहे ‘लाड़ो अभियान’ के तहत गठित कोर ग्रुप के माध्यम से अधिनयम का कड़ाई से पालन कराने वाले उड़नदस्ता प्रभारी पत्रकार महेंद्र पाठक को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत दिनो आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में सम्मानित किया। उनको प्रशंसा पत्र व स्मृति चिह्न भेंट किया गया। इस दौरान परीयोजना अधिकारी चित्रा यादव और बालिका मुस्कान को भी सम्मानित किया गया।

पाठक पिछले 20 साल से अभियान चलाकर सतत बाल विवाह रोकने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने अभी तक 700 से अधिक बच्चों के विवाह रुकवाए हैं। इसके लिए जिला प्रशासन उन्हें चार बार सम्मानित कर चुका है। सन 2005 में उन्हें गाड फ्रे फिलीप्स इंडिया के माध्यम से सामाजिक बहादुरी के लिए रजत पदक देकर राज्यपाल ने सम्मानित किया था। महिला दिवस पर आयोजित समारोह में महिला एवं बाल विकास मंत्री माया सिंह, विभाग के प्रमुख सचिव जेएन कंसोटिया व आयुक्त कल्पना श्रीवास्तव भी मौजूद थीं। 

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गर्भवती महिला पत्रकार से क्यों होता है भेदभाव?

महाराष्ट्र की एक अदालत ने एक टीवी चैनल को आदेश दिया है कि ‘गर्भवती होने के बाद कंपनी की नौकरी से निकाली गईं’ पत्रकार को वापस काम पर रखा जाए और बक़ाया वेतन भी दिया जाए. पत्रकार ने अदालत से गुहार की थी कि उन्हें साल 2012 में गर्भवती होने के कुछ समय बाद ही कंपनी से निकाल दिया गया था. उनका दावा था कि ऐसा उनके गर्भवती होने की वजह से हुआ. लेकिन टीवी कंपनी का कहना है कि पत्रकार को ख़राब काम की वजह से बाहर किया गया था.

 

महिला को श्रम मामलों से जुड़ी दो अदालतों से राहत मिल चुकी है. टीवी कंपनी ने कहा है कि वह इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेगी. हालांकि ये शायद पहला केस नहीं है जिसमें किसी महिला के श्रम अधिकारों का हनन हुआ है लेकिन इस मामले पर महिलाओं का कोर्ट जाना आम नहीं है. श्रम मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2012 में मेटर्निटी बेनिफिट क़ानून के तहत देशभर में 122 शिकायतें दर्ज की गईं, पांच की तहक़ीक़ात हुई और दो में संस्था या कंपनी को दोषी पाया गया.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ में प्रोफ़ेसर पद्मिनि स्वामीनाथन ने मेटर्निटी बेनेफ़िट्स क़ानून पर एक शोध में महिलाओं को मेटर्निटी की छुट्टी न दिए जाने के कारण ढूंढें. उन्होंने पाया कि कभी महिलाओं को ‘कैज़ुअल’, ‘डेली’ या ‘ऐडहॉक’ नियुक्त किए जाने की वजह से, कभी ‘एपॉइंटमेंट लेटर’ में बदलाव कर और कभी वेतन का मासिक होने की बजाय एक-मुश्त दिए जाने की बिना पर मेटर्निटी लीव नहीं दी जाती है. पद्मिनि ने पाया कि कुछ मामलों में तो छुट्टी की अर्ज़ी का जवाब बर्ख़ास्त करने की चिट्ठी से दिया गया, और जब ऐसे मामले अदालत तक ले जाए गए तो महिला के हक़ में फ़ैसला आया. पद्मिनि कहती हैं, “क़ानून बहुत अच्छा है, लेकिन अक़्सर कंपनियां अपने नियमों को क़ानून के ऊपर रखकर इसका पालन नहीं करतीं. एक छोटे बच्चे का पालन पोषण कर रही औरत के भीतर इस तरह की वित्तीय और मानसिक ताक़त नहीं होती कि वो सालों-साल चलने वाली अदालती कारवाई को झेल सके. इसलिए वो ख़ामोश रह जाती है.”

मेटर्निटी बेनिफ़िट क़ानून गर्भवती महिला को तीन महीने के वेतन सहित छुट्टी का अधिकार देता है. शर्त यह कि छुट्टी पर जाने से पहले महिला ने 80 दिन तक उस जगह काम किया हो. क़ानून में महिला कर्मचारी के गर्भवती होने के दौरान नौकरी से निकाले जाने के बारे में भी कड़े प्रावधान हैं. इसके मुताबिक़ गर्भधारण की घोषणा के बाद नौकरी से निकाले जाने को सामान्य परिस्थिति नहीं माना जा सकता. यह क़ानून सरकारी और निजी क्षेत्र की नियमित और अस्थाई सभी महिला कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होता है.

मेटर्निटी बेनेफ़िट्स क़ानून महिला कर्मचारी को न्यूनतम सुविधा या सुरक्षा प्रदान करता है. इसके बाद सरकार, कंपनी या संस्था उसे और सुविधाएं देने के लिए स्वतंत्र है. स्वास्तिका दास को दिल्ली विश्वविद्यालय ने वापस नौकरी पर नहीं रखा. स्वागतिका दास दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में ‘ऐडहॉक’ शिक्षिका के पद पर काम कर रही थीं और इसी वजह से गर्भवती होने के बाद उन्हें वेतन सहित तीन महीने की छुट्टी नहीं दी गई. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “मेरे बेटे के जन्म के बाद जब मैं वापस लौटी तो मुझे नौकरी पर वापस भी नहीं रखा गया, पहले तो बहुत वादे किए गए थे और मुझे इतना भरोसा था कि मैंने लिखित में कोई आश्वासन नहीं लिया.”

अंजलि भूषण जब गर्भवती हुईं तो दिल्ली की एक मल्टीनेशनल के एचआर विभाग में काम कर रही थीं. बड़ी कंपनी में उन्हें मेटर्निटी की छुट्टी तो मिली पर तीन महीने ख़त्म होने के बाद जब उनके डॉक्टर ने कुछ दिन और छुट्टी पर रहने को कहा, उनकी कंपनी ने मना कर दिया. अंजलि मानती हैं कि क़ानून ‘मिनिमम’ सुरक्षा देता है जबकि बच्चा पैदा होने के बाद एक कामकाजी महिला को अपनी कंपनी से और मदद और सहानुभूति की ज़रूरत होती है. उनके मुताबिक, “इसके ठीक उलट जब मां बनने के बाद आप दफ़्तर जाती हैं, तो आपको कम ज़िम्मेदारी वाले काम दिए जाते हैं, क्योंकि आप देर शाम तक दफ़्तर में रुक नहीं सकतीं, आपको एक कमज़ोर कड़ी के रूप में देखा जाने लगता है.” अंजलि के मुताबिक इसकी जगह अगर कंपनी क्रेच की सुविधा दे या घर से काम करने का उपाय करे तो ये उन जैसी महिलाओं के करियर में मदद करेगा. लेकिन इस तरह के क़दम कुछ बड़ी कंपनियां ही उठा रही हैं.

भारत की सबसे बड़ी प्लेसमेंट एजंसियों में से एक ‘एबीसी कनसलटेंट्स’ के मैनेजिंग डायरेक्टर शिव अग्रवाल बताते हैं कि विदेश से अलग भारत में इंटरव्यू के स्तर पर महिलाओं से उनके परिवार और शादी के बारे में जानकारी मांगी जाती है. अग्रवाल के मुताबिक़ अगर कोई महिला मां बनने वाली हो या हाल में मां बनी हो तो कुछ नौकरियों के लिए इसको ध्यान में रखा जाता है. वह कहते हैं, “महिलाओं का ऐसा महसूस करना कि भेदभाव किया जा रहा है, ग़लत नहीं है. यह एक बड़ी चुनौती है, बड़ी कंपनियों में महिलाओं की ज़रूरतों के बारे में सोचा जाने लगा है लेकिन मध्य स्तर की कंपनियों की सोच ऐसी नहीं है और न ही उनके पास इस तरह की सुविधा देने के लिए वित्तीय क्षमता है.”

राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के इलाक़ों में 1,000 कामकाजी महिलाओं के साथ किए गए एक सर्वे में पाया गया कि बच्चा होने के बाद सिर्फ़ 18 से 34 प्रतिशत महिलाएं ही काम पर लौटीं. वीवी गिरी लेबर इंस्टीट्यूट में प्रोफ़ेसर शशि बाला के इस शोध में कपड़ा और स्वास्थ्य क्षेत्र के साथ-साथ ज़्यादा प्रशिक्षण वाली इन्फरमेशन टेकनॉलॉजी के क्षेत्र में काम कर रहीं महिलाओं से बातें की गईं. उन्होंने पाया कि ज़्यादा समृद्ध वर्ग वाली महिलाएं जो क्रेच जैसी सुविधाओं पर ख़र्च कर सकती हैं, उनकी काम पर लौटने की दर ज़्यादा है, और सभी वर्गों में अब भी परिवार ही बच्चे की देखरेख का माध्यम है. अंजलि कहती हैं कि शहरों में बदलते रहन-सहन के साथ अब परिवार का सहारा भी कम होता जा रहा है. ऐसे में कंपनियों की ओर से इस क्षेत्र में पहल और भी ज़रूरी है वर्ना कामकाजी महिलाओं की संख्या और गिरती जाएगी.

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक भारत में 15 साल से ऊपर की जितनी महिलाएं काम करने योग्य हैं उनमें से सिर्फ़ 27 प्रतिशत काम कर रही हैं. ब्रिक समूह के देशों, (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका) में यह सबसे कम और चीन में सबसे ज़्यादा, 64 प्रतिशत है. भारत की 2011 की जनगणना के मुताबिक़ महिलाओं के काम करने की यह दर भारत के शहरी इलाकों में सिर्फ़ 15 प्रतिशत है जबकि ग्रामीण इलाकों में उससे दोगुनी 30 प्रतिशत.

प्रोफ़ेसर स्वामिनाथन के मुताबिक़, “महिलाओं के लिए शिक्षा के अवसर तो बढ़े हैं लेकिन नौकरियों के नहीं. ख़ास तौर पर शहरी इलाक़ों में शिक्षित महिलाएं काम के दायरे से बाहर होती जा रही हैं, संभवत: ऐसा इसलिए है क्योंकि शादी के बाद बच्चे को संभालने की ज़िम्मेदारी से वह ख़ुद को अलग नहीं कर पा रहीं.”

(बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार)

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