नंदकिशोर त्रिखा : पत्रकारिता के आचार्य

  इस कठिन समय में जब पत्रकारिता की प्रामणिकता और विश्वसनीयता दोनों पर गहरे सवाल खड़े हो रहे हों, डा. नंदकिशोर त्रिखा जैसे पत्रकार, संपादक, मीडिया प्राध्यापक के निधन का समाचार विह्वल करने वाला है। वे पत्रकारिता के एक ऐसे पुरोधा थे जिसने मूल्यों के आधार पर पत्रकारिता की और बेहद प्रामाणिक लेखन किया। अपने विचारों और विश्वासों पर अडिग रहते हुए संपादकीय गरिमा को पुष्ट किया। उनका समूचा व्यक्तित्व एक अलग प्रकार की आभा और राष्ट्रीय चेतना से भरा-पूरा था।

डॉ. त्रिखा

  भारतीय जनमानस की गहरी समझ और उसके प्रति संवेदना उनमें साफ दिखती थी। वे लिखते, बोलते और विमर्श करते हुए एक संत सी धीरता के साथ दिखते थे। वे अपनी प्रस्तुति में बहुत आकर्षक भले न लगते रहे हों किंतु अपनी प्रतिबद्धता, विषय के साथ जुड़ाव और गहराई के साथ प्रस्तुति उन्हें एक ऐसे विमर्शकार के रूप में स्थापित करती थी, जिसे अपने प्रोफेशन से गहरी संवेदना है। इन अर्थों में वे एक संपादक और पत्रकार के साथ पत्रकारिता के आचार्य ज्यादा दिखते थे।

  नवभारत टाइम्स, लखनऊ के संपादक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के संस्थापक अध्यक्ष, एनयूजे के  माध्यम से पत्रकारों के हित की लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ता, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी जैसी उनकी अनेक छवियां हैं, लेकिन वे हर छवि में संपूर्ण हैं। पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में उनके छोटे से कार्यकाल की अनेक यादें यहां बिखरी पड़ी हैं। समयबद्धता और कक्षा में अनुशासन को उनके विद्यार्थी आज भी याद करते हैं। ये विद्यार्थी आज मीडिया में शिखर पदों पर हैं लेकिन उन्हें उनके बेहद अनुशासनप्रिय प्राध्यापक डा. त्रिखा नहीं भूले हैं। प्रातः 8 बजे की क्लास में भी वे 7.55 पर पहुंच जाने का व्रत निभाते थे।

वे ही थे, जिन्हें अनुशासित जीवन पसंद था और वे अपने बच्चों से भी यही उम्मीद रखते थे। समय के पार देखने की उनकी क्षमता अद्भुत थी। वे एक पत्रकार और संपादक के रूप में व्यस्त रहे, किंतु समय निकालकर विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकें लिखते थे। उनकी किताबें हिंदी पत्रकारिता की आधारभूत प्रारंभिक किताबों  में से एक हैं। खासकर समाचार संकलन और प्रेस विधि पर लिखी गयी उनकी किताबें दरअसल हिंदी में पत्रकारिता की बहुमूल्य पुस्तकें हैं। हिंदी में ऐसा करते हुए न सिर्फ वे नई पीढ़ी के लिए पाथेय देते हैं बल्कि पत्रकारिता के शिक्षण और प्रशिक्षण की बुनियादी चिंता करने वालों में शामिल हो जाते हैं।

इसी तरह दिल्ली और लखनऊ में उनकी पत्रकारिता की उजली पारी के पदचिन्ह बिखरे पड़े हैं। वे ही थे जो निरंतर नया विचार सीखते, लिखते और लोक में उसका प्रसार करते हुए दिखते रहे हैं। उनकी एक याद जाती है तो दूसरी तुरंत आती है। एनयूजे के माध्यम से पत्रकार हितों में किए गए उनके संघर्ष बताते हैं कि वे सिर्फ लिखकर मुक्त होने वालों में नहीं थे बल्कि सामूहिक हितों की साधना उनके जीवन का एक अहम हिस्सा रही है। डॉ. त्रिखा छह वर्ष भारतीय प्रेस परिषद् के भी सदस्य रहे ।उन्होंने 1963 से देश के अग्रणी राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता, वरिष्ठ सहायक-संपादक, राजनयिक प्रतिनिधि और स्थानीय संपादक के वरिष्ठ पदों पर कार्य किया । उससे पूर्व वे संवाद समिति हिन्दुस्थान समाचार के काठमांडू (नेपाल), उड़ीसा और दिल्ली में ब्यूरो प्रमुख और संपादक रहे ! अपने इस लम्बे पत्रकारिता-जीवन में उन्होंने देश-विदेश की ज्वलंत समस्याओं पर हजारों लेख, टिप्पणिया, सम्पादकीय, स्तम्भ और रिपोर्ताज लिखे।

   विचारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के बावजूद उनकी समूची पत्रकारिता में एक गहरी अंतर्दृष्टि, संवेदनशीलता, मानवीय मूल्य बोध, तटस्थता के दर्शन होते हैं। उनके संपादन में  निकले अखबार बेहद लोकतांत्रिकता चेतना से लैस रहे। वे ही थे जो सबको साध सकते थे और सबके साथ सधे कदमों से चल सकते थे। उनका संपादक सभी विचारों- विचार प्रवाहों को स्थान देने की लोकतांत्रिक चेतना से भरा-पूरा था। जीवन में भी वे इतने ही उदार थे। यही उदात्तता दरअसल भारतीयता है। जिसमें स्वीकार है, तिरस्कार नहीं है। वे व्यक्ति और विचार दोनों के प्रति गहरी संवेदना से पेश आते थे। उन्हें लोगों को सुनने में सुख मिलता था। वे सुनकर, गुनकर ही कोई प्रतिक्रिया करते थे। इस तरह एक मनुष्य के रूप में उन्हें हम बहुत बड़ा पाते हैं।

आखिरी सांस तक उनकी सक्रियता ने हमें सिखाया है किस बड़े होकर भी उदार, सक्रिय और समावेशी हुआ जा सकता है। वे रिश्तों को जीने और निभाने में आस्था रखते थे। उनके मित्रों में सत्ताधीशों से लेकर सामान्य जन सभी शामिल थे। लेकिन संवेदना के तल पर वे सबके लिए समभाव ही रखते थे। बाद के दिनों उनकी किताबें बड़े स्वरूप में प्रकाशित हुयीं जिसे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने प्रकाशित किया। अंग्रेजी में उनकी किताब रिपोर्टिंग आज के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर लिखी गयी है। इसी तरह प्रेस ला पर उनकी किताब बार-बार रेखांकित की जाती है। वे हमारे समय के एक ऐसे लेखक और संपादक थे जिन्हें हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार था।

वे अपने जीवन और लेखन में अगर किसी एक चीज के लिए याद किए जाएंगें तो वह है प्रामणिकता। मेरे जैसे अनेक पत्रकारों और मीडिया प्राध्यापकों के लिए वे हमेशा हीरो की तरह रहे हैं जिन्होंने खुद को हर जगह साबित किया और अव्वल ही रहे। हिंदी ही नहीं समूची भारतीय पत्रकारिता को उनकी अनुपस्थिति ने आहत किया है। आज जब समूची पत्रकारिता बाजारवाद और कारपोरेट के प्रभावों में अपनी अस्मिता संरक्षण के संघर्षरत है, तब डा. नंदकिशोर त्रिखा की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

लेखक संजय द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष और कुलसचिव हैं।

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आप चुनाव तो जीत जाएंगे पर भरोसा खो बैठेंगें!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में परिवर्तन कर देश की जनता को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे राजनीतिक संस्कृति में परिवर्तन के अपने वायदे पर कायम हैं। वे यथास्थिति को बदलना और निराशा के बादलों को छांटना चाहते हैं। उन्हें परिणाम पसंद है और इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व से काम न चले तो वे नौकरशाहों को भी अपनी टीम में शामिल कर सकते हैं। भारतीय राजनीति के इस विकट समय में उनके प्रयोग कितने लाभकारी होगें यह तो वक्त बताएगा, किंतु आम जन उन्हें आज भी भरोसे के साथ देख रहा है। यही नरेंद्र मोदी की शक्ति है कि लोगों का भरोसा उनपर कायम है।

यह भी एक कड़वा सच है कि तीन साल बीत गए हैं और सरकार के पास दो साल का समय ही शेष है। साथ ही यह सुविधा भी है कि विपक्ष आज भी मुद्दों के आधार पर कोई नया विकल्प देने के बजाए मोदी की आलोचना को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। भाजपा ने जिस तरह से अपना सामाजिक और भौगोलिक विस्तार किया है, कांग्रेस उसी तेजी से अपनी जमीन छोड़ रही है। तमाम क्षेत्रीय दल भाजपा के छाते के नीचे ही अपना भविष्य सुरक्षित पा रहे हैं। भाजपा के भीतर-बाहर भी नरेंद्र मोदी को कोई चुनौती नहीं है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति के तहत भाजपा के पास एक-एक कर राज्यों की सरकारें आती जा रही हैं। यह दृश्य बताता है कि हाल-फिलहाल भाजपा के विजयरथ को रोकने वाला कोई नहीं है।

संकट यह है कि कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह से निकलने को तैयार नहीं हैं। केंद्र सरकार की विफलताओं पर बात करते हुए कांग्रेस का आत्मविश्वास गायब सा दिखता है। विपक्ष के रूप में कांग्रेस के नेताओं की भूमिका को सही नहीं ठहराया जा सकता। हिंदी प्रदेशों में कांग्रेस नेतृत्वहीनता की स्थिति में है। अनिर्णय की शिकार कांग्रेस एक गहरी नेतृत्वहीनता का शिकार दिखती है। इसलिए विपक्ष को जिस तरह सत्ता पक्ष के साथ संवाद करना और घेरना चाहिए उसका अभाव दिखता है।

अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार सिर्फ धारणाओं का लाभ उठाकर कांग्रेस से अधिक नंबर प्राप्त कर रही है। हम देखें तो देश के तमाम मोर्चों पर सरकार की विफलता दिखती है, किंतु कांग्रेस ने जो भरोसा तोड़ा उसके कारण हमें भाजपा ही विकल्प दिखती है। भाजपा ने इस दौर की राजनीति में संघ परिवार की संयुक्त शक्ति के साथ जैसा प्रदर्शन किया है वह भारतीय राजनीति के इतिहास में अभूतपूर्व है। अमित शाह के नेतृत्व और सतत सक्रियता ने भाजपा की सुस्त सेना को भी चाक-चौबंद कर दिया है। कांग्रेस में इसका घोर अभाव दिखता है।

गांधी परिवार से जुड़े नेता सत्ता जाने के बाद आज भी जमीन पर नहीं उतरे हैं। उनकी राज करने की आकांक्षा तो है किंतु समाज से जुड़ने की तैयारी नहीं दिखती। ऐसे में कांग्रेस गहरे संकटों से दो-चार है। भाजपा जहां विचारधारा को लेकर धारदार तरीके से आगे बढ़ रही है और उसने अपने हिंदूवादी विचारों को लेकर रहा-सहा संकोच भी त्याग दिया है, वहीं कांग्रेस अपनी विचारधारा की दिशा क्या हो? यह तय नहीं कर पा रही है। पं. नेहरू ने अपने समय में जिन साम्यवादियों के चरित्र को समझ कर उनसे दूरी बना ली, किंतु राहुल जी आज भी ‘अल्ट्रा लेफ्ट’ ताकतों के साथ खड़े होने में संकोच नहीं करते। एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट कांग्रेस के वास्तविक संकटों की ओर इशारा करती है। ऐसे में नरेंद्र मोदी के अश्वमेघ के अश्व को पकड़ने वाला कोई वीर बालक विपक्ष में नहीं दिखता। बिहार की नितीश कुमार परिघटना ने विपक्षी एकता को जो मनोवैज्ञानिक चोट पहुंचाई है, उससे विपक्ष अभी उबर नहीं पाएगा। विपक्ष के नेता अपने आग्रहों से निकलने को तैयार नहीं हैं, ना ही उनमें सामूहिक नेतृत्व को लेकर कोई सोच दिखती है।

इस दौर में नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों को यह सोचना होगा कि जबकि देश में रचनात्मक विपक्ष नहीं है, तब उनकी जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से जो वादे किए, उस दिशा में सरकार कितना आगे बढ़ी है? खासकर रोजगार सृजन और भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष के सवाल पर। महंगाई के सवाल पर। लोगों की जिंदगी में कितनी राहतें और कितनी कठिनाईयां आई हैं। इसका हिसाब भी उन्हें देना होगा। राजनीति के मैदान में मिलती सफलताओं के मायने कई बार विकल्पहीनता और नेतृत्वहीनता भी होती है। कई बार मजबूत सांगठनिक आधार भी आपके काम आता है। इसका मतलब यह नहीं कि सब सुखी और चैन से हैं और विकास की गंगा बह रही है। राजनीति के मैदान से निकले अर्थों से जनता के वास्तविक जीवन का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री अनथक परिश्रम कर रहे हैं। श्री अमित शाह दल के विस्तार के लिए अप्रतिम भूमिका निभा रहे हैं। किंतु हमें यह भी विचार करना होगा कि आप सबकी इस हाड़ तोड मेहनत से क्या देश के आम आदमी का भाग्य बदल रहा है?

क्या मजदूर, किसान, युवा-छात्र और गृहणियां,व्यापारी सुख का अनुभव कर रहे हैं? देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के बाद जनता के भाग्य में भी परिर्वतन होता दिखना चाहिए। आपने अनेक कोशिशें की हैं, किंतु क्या उनके परिणाम जमीन पर दिख रहे हैं, इसका विचार करना होगा। देश के कुछ शहरों की चमकीली प्रगति इस महादेश के सवालों का उत्तर नहीं है। हमें उजड़ते गांवों, हर साल बाढ़ से उजड़ते परिवारों, आत्महत्या कर रहे किसानों के बारे में सोचना होगा। उस नौजवान का विचार भी करना होगा जो एक रोजगार के इंतजार में किशोर से युवा और युवा से सीधे बूढ़ा हो जाएगा। इलाज के अभाव में मरते हुए बच्चे एक सवाल की तरह हमारे सामने हैं। अपने बचपन को अगर हमने इतना असुरक्षित भविष्य दिया है तो आगे का क्या। ऐसे तमाम सवाल हमारे समाज और सरकारों के सामने हैं। राजनीतिक -प्रशासनिक तंत्र  का बदलाव भर नहीं उस संस्कृति में बदलाव के लिए 2014 में लोगों ने मोदी पर भरोसा जताया है। वह भरोसा कायम है..पर दरकेगा नहीं ऐसा नहीं कह सकते। सरकार के नए सिपहसलारों को ज्यादा तेजी से परिणाम देने वाली योजनाओं पर काम करने की जरूरत है। अन्यथा एक अवसर यूं ही केंद्र सरकार के हाथ से फिसलता जा रहा है। इसमें नुकसान सिर्फ यह है कि आप चुनाव तो जीत जाएंगें पर भरोसा खो बैठेंगें।

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्वेषक हैं. संपर्क : 09893598888)

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‘डीबी पोस्ट’ की खबर पर ‘माखनलाल’ में बवाल, एक शिक्षक ने खोला अखबार के खिलाफ मोर्चा

Sanjay Dwivedi : भोपाल का एक अंग्रेजी अखबार इन दिनों माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की छवि खराब कर रहा है। विगत 27 अगस्त, 2017 को उसने जो खबर छापी है उसे लेकर अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। अज्ञान, दुर्भावना और साजिशन लिखी गयी खबरें कैसै आपको गिराती हैं, यह खबर उसका उदाहरण है। अखबार लिखता है विश्वविद्यालय में अल्पसंख्यकों के त्यौहारों पर अवकाश नहीं होगा क्योंकि यहां आरएसएस का एजेंडा चल रहा है।

किसी भी विश्वविद्यालय में अकादमिक कैलेंडर अकादमिक गतिविधियों तक सीमित होते हैं और वे हर छुट्टी का जिक्र नहीं करते। मप्र सरकार द्वारा घोषित सभी छुट्टियां विश्वविद्यालय में बाध्यकारी हैं। मप्र जनसंपर्क के कैलेण्डर में इसका जिक्र होता है। विश्वविद्यालय द्वारा छापे गए कैलेंडर में भी सभी छुटिट्यों का जिक्र है। किंतु बिना तथ्यों को जांचे खबर लिखने की हड़बड़ी में संवाददाता महोदय अकादमिक कैलेंडर को अंतिम मानकर खबर लिख बैठे। विश्वविद्यालय के किसी जिम्मेदार अधिकारी से बात करने की जहमत नहीं उठाई, ऐसे में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और पूर्व विद्यार्थियों को लगता है कि अखबार का उद्देश्य तथ्यपूर्ण पत्रकारिता के बजाए विश्वविद्यालय की छवि खराब कर अपनी एक खबर बनाने तक सीमित है। ऐसी पत्रकारिता ही पूरी मीडिया को कलंकित करती है।

सरकारी संस्थाओं पर निशाना, कारपोरेट की मिजाजपुर्सी :

मुझे याद नहीं आता कि कारपोरेट मीडिया कभी भी किसी निजी विश्वविद्यालय के मामलों में ऐसी हरकत और उलजूलूल खबरें लिखने का पुरूषार्थ जुटा सके। मैंने आजतक इन अखबारों में निजी विश्वविद्यालयों, निजी अस्पतालों, निजी मोबाइल कंपनियों के खिलाफ खबर नहीं देखी। सरकारी विश्वविद्यालय, अस्पताल और संस्थाएं इनका आसान निशाना हैं। ताकि सरकारी संस्थाओं को बदनाम कर कारपोरेट की मिजाजपुर्सी की जा सके। लाखों रूपए की फीस लेकर पढ़ा रहे निजी विश्वविद्यालय इनके लिए स्वर्ग हैं, क्योंकि वे मोटे विज्ञापन से कारपोरेट मीडिया को खरीद चुके हैं। किंतु सस्ती फीस लेकर देश के गरीब और आखिरी आदमी को शिक्षा दे रहे संस्थान इनके निशाने पर हैं। देश में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय एक अकेला उदाहरण है जो बिना किसी सरकारी सहायता के अपने दम पर स्वावलंबन के साथ खड़ा है और विद्यार्थियों को सबसे कम फीस पर 28 प्रकार के विशेषज्ञता-कौशल आधारित कोर्स करवाता है।

सांप्रदायिक सद्भावना को चोट पहुंचाने की कोशिश :

इस खबर का दुखद पहलू यह है कि इसमें सांप्रदायिक सद् भावना को भी चोट पहुंचाने की कोशिश की गयी है। विश्वविद्यालय में हर, जाति-धर्म के विद्यार्थी आते हैं और उससे समानता के आधार पर व्यवहार किया जाता है। ऐसी खबरों के माध्यम से हिंदू-मुसलमान जैसे विवाद पैदा करना संवाददाता और समाचार पत्र की सोच को दर्शाता है। अफसोस यह समाचार देश के एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान द्वारा प्रकाशित किया जाता है। जिसकी हिँदी और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता में बहुत यशस्वी योगदान है। ऐसे संस्थान में बैठे कुछ पत्रकार जिस तरह अपनी खुन्नस निकालने के लिए, एजेंडा आधारित पत्रकारिता कर रहे हैं वह दुखद है।

पत्रकार के अज्ञान पर दया आती है कि उन्हें यह भी नहीं पता कि एक सरकारी संस्थान तो राज्य द्वारा निर्धारित छुट्टियां रोक नहीं सकता बल्कि निजी संस्थाओं को चाहे वे ईसाई मिशनों द्वारा संचालित विद्यालय हों या आरएसएस के शिशु मंदिर सबको यह अवकाश देने होते हैं। किंतु माखनलाल विवि की छवि बिगाड़ने में पत्रकार महोदय इस स्तर तक चले जाएंगें, इस अंदेशा नहीं था। पत्रकारिता में आ रहे छात्र-छात्राओं के लिए सबकः

1. किसी खबर को पूरी तरह चेक करने, पुष्टि के बाद ही छापें…

2. सांप्रदायिक दुर्भावना को बढ़ाने वाली खबरों को कभी प्रकाशित न करें, तथ्यों को जांचें….

3. किसी संस्था की छवि को बिगाड़ने वाली रिपोर्टिंग से बचें…

4. किसी के बहकावे में आकर संबंधित संस्था का पक्ष लिए बिना समाचार न छापें…

5. जरूरी हो तो इस विषय के विशेषज्ञों से बात जरूर करें…

कृपया पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल की छवि को बिगाड़कर छात्र-छात्राओं के भविष्य से न खेलें। देश के सबसे गरीब इलाकों के सबसे गरीब विद्यार्थी इस संस्था में आते हैं। उनके भविष्य से न खेलें। विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र होने के नाते यह पोस्ट बहुत दुखी मन से लिख रहा हूं। मुझे एक पूर्व पत्रकार होने के नाते भी इस बात का दुख है कि पत्रकारिता का स्तर कहां जा रहा है। आखिर हम पत्रकारिता की प्रामणिकता और विश्वसनीयता को क्या यूं ही गंवाते रहेंगें।

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के शिक्षक संजय द्विवेदी की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Ankur Vijaivargiya संजय जी की बातों से पूर्णतया सहमत हूं। माखनलाल का एक पूर्व छात्र होने के नाते मुझे अपने विश्वविद्यालय पर गर्व है। कल इसी खबर के संदर्भ में एक छात्र ने पूछा था कि आखिर माखनलाल का नाम जानता कौन है। मैंने उसे जवाब दिया था कि नाम जानना छोड़िए अब तो हमारे छात्रों के कामों को भी बड़े संस्थान मानने लग गए हैं। पहले बैच से लेकर आखिर पासआउट बैच के कई विद्यार्थियों से मेरा निजी और पारिवारिक परिचय है। सभी अपने अपने संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर हैं। हाल ही में अहमदाबाद के एक बड़े कौलेज में था। वहां मुख्य अतिथियों में से दो माखनलाल के पूर्व छात्र थे। जब वहां के शिक्षकों को बताया कि मैं भी माखनलाल से हूं, तो उनका विश्वविद्यालय के प्रति सम्मान देखते बनता था। हम सब माखनलाल के साथ थे, हैं और रहेंगे।

Vinit Utpal अंकुर, जिसने आपसे पूछा कि माखनलाल को जानता कौन है, जरा उनसे पूछिये कि ‘पत्रकार’ शब्द कहाँ से आया और इस शब्द को इजाद किसने किया था.

Mohammad Irfan पीत पत्राकारिता। मेरा सवाल ये है कि उक्त पत्रकार को सही जानकारी लेनी थी। उसे किसी अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र से बात करनी थी, तब जाकर रिपोर्ट लिखता। वाकई में तथ्यहीन, उद्देश्यहीन, विवेकहीन, भावहीन जितने भी हीन हैं सबको जमाकर उक्त खबर छापी गई। विश्विद्यालय के शिक्षकों से मालूमात करनी थी। ऐसी बेहूदा ख़बरों से संस्थान की विश्वसनीयता कम होती है और छात्रों पर बुरा असर पड़ता है। कारवाई होनी चाहिए।

Siddharth Sarathe आश्चर्य की बात है इतने नामी गिरामी अखबार के दफ्तर में कोई भी एक बुद्धिजीवी नही था जो एक बार तथ्यों को जांच लेता या जांचने के आदेश दे देता, क्या इतने बड़े अखबार की खबरें सिर्फ कुतर्कों ओर बयानबाजियों पर ही आधारित हैं ? शर्मनाक ….दरअसल कई पत्रकार ओर अखबार सरकारी संस्थानों पर उंगली उठाकर ही खुद को निष्पक्ष साबित करने का एकमात्र विकल्प मानते हैं ।

Keshav Kumar मानहानि का मामला दर्ज करने के साथ ही अखबार के संपादक, प्रबंधक और स्वामी को सांस्थानिक तौर पर शिकायत लिखें. निजी तौर पर भी शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी, बोर्ड सदस्य, पूर्व छात्र, मौजूदा छात्र- छात्राएं और शुभचिंतक जन भी अखबार, राज्य और केंद्र सरकार की मशीनरी के अलावा भारतीय प्रेस परिषद को पत्र लिखें. हर मोर्चे पर जवाब जरूरी होता है.

Soni Yadav बिलकुल सर.. अगर मैं गलत नही हूँ तो हमारे सभी साथी जो मीडिया में कार्यरत है उन्हें भी ईद या क्रिसमस की छुट्टी नही मिलती, तो क्या वह भी आर एस एस की वजह से है? नही, क्यूंकि वह उस संस्था की आवश्यकता है| और रही mcu की तो भले यहां यह घोषित नहीं है, पर छुट्टी मिलती जरूर है| तो ठीक उसी तरह सर जी MCU एक संसथान है जिसकी अपनी बाध्यताएं और limitations है| कृपया इस बात को समझे और हर चीज़ को राजनीती से न जोड़े| और एक बात जो मैं MCU के सभी passout से कहना चाहती| कृपया इस संसथान के खिलाफ काम न करे, हो सकता ऐसा करने पर आपको निजी रूप से लाभ हो, पर वह इस संसथान की छवि को छाती पोह्चाएगी| जिसकी भापाई करने में सालों लग जायेंगे, और जिसका सीधा और साफ़ नुकसान आने वाले छात्रों को होगा|

Surender Paul निकृष्ट पत्रकारिता का उत्कृष्ट नमूना… पिछले कुछ दिनों से ये सुपारी पत्रकार MCU के विरुद्ध एक सोची समझी साजिश के तहत ऐसी आधारहीन मनगढ़ंत और घटिया पत्रकारिता कर रहे हैं… मेरा सुझाव है कि हमें MCU में एक स्थान चिन्हित करके इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण और गैर जिम्मेदार खबरों का चस्पा कर उस पर अपनी टिप्पणी लिखनी चाहिए… इससे हमारे विद्यार्थियों के लिए निकृष्ट पत्रकारिता के उदाहरण भी सामने होंगे और ये अखबार और इनके सुपारी पत्रकार भी बेनकाब होते रहेंगे…

Abhishek Dubey university is poore mamle par chup kyu hai. abhi tak koi bayan MCU ki taraf se nahi aaya hai. kuthiala ji ka number band hai…message kiya koi jawab nahi…registrar sharma ji phone rcv nahi karte hain…message karo rply nahi karte hain…MCU jao milte nahi hain. कोर्ट जाने का विकल्प खुला है। आप कोर्ट जाएं।

Surender Paul समाचार के मूल्यों (news values) में एक मूल्य समाचार का बिकाउपन (Salability) भी जुड़ गया है। इसलिए इन दिनों माखनलाल विश्वविद्यालय के नये परिसर में प्रस्तावित गौशाला का मुद्दा भी काफी छाया हुआ है… हालांकि परिसर में गौशाला निर्माण का निर्णय चार वर्ष पूर्व ही लिया गया था लेकिन उस समय यह मुद्दा बिकाऊ नहीं था, आजकल बिकाऊ है इसलिए बात-बात पर बिकने वाले कुछ मीडिया घराने और कुछ तथाकथित पत्रकार इस मुद्दे को भी काफी उछाल रहे हैं। और दूसरा बिकाऊ मूल्य है ‘सांप्रदायिकता’ यह समाचार उसी मूल्य को ध्यान में रखकर गढ़ा गया लगता है। यह तो पीत पत्रकारिता से भी निकृष्ट और घटिया स्तर की पत्रकारिता हुई। ऐसे ही गैर जिम्मेदाराना समाचारों से सांप्रदायिक तनाव फैलता है। अब इस पत्रकार को यह कौन समझाए कि अकादमिक कैलेंडर और छुट्टियों के कैलेंडर में बहुत अंतर होता है। धिक्कार है, लानत है, …. सुपारी पत्रकारिता करने वालों कुछ तो शर्म करो… आखिर तुम्हारी ऐसी घटिया पत्रकारिता के उदाहरण हम अपनी कक्षाओं में विद्यार्थियों को देने वाले हैं…

Pravin Dubey इसलिए बात-बात पर बिकने वाले कुछ मीडिया घराने और कुछ तथाकथित पत्रकार इस मुद्दे को भी काफी उछाल रहे हैं.. आपकी पृष्ठभूमि निकलवाता हूँ कि आप जीवन में कभी बिके या नहीं…किस संघ के नेता की अनुकम्पा से आपकी नियुक्ति हुई है ये भी पता करवाता हूँ…

Surender Paul ज़रूर मेरा बैकग्राउंड पता करो Pravin Dubey और यह भी पता करो कि संघ से मेरा क्या कनेक्शन है। और रही बात बिकने की तो सुरेन्द्र पॉल न तो बिकाऊ था, न बिकाऊ है और न ही कभी बिकने वाला लेकिन आपकी इस टिप्पणी से आपकी सोच ज़रूर सामने आई है…

Pravin Dubey आप Surender Paul सबको बिकाऊ…दलाल निरुपित कर रहे हैं…सोच तो आमने-सामने आकर भी ज़ाहिर कर सकता हूँ..आप अमर उजाला में राजेश रापरिया साहब के वक़्त थे क्या…? आपके ही शब्दों को यदि मानू तो क्या आपसे भी वहां दलाली कराई जाती थी..और जहां तक मेरा प्रश्न है, तो मैं बता दूँ कि उस यूनिवर्सिटी में जितने खैरख्वाह आपके होंगे, उनसे मेरे बारे में पता कर लेना…सब चोर हैं पत्रकारिता में..एक आप ही शरीफ़ पैदा हुए हैं

Surender Paul भाई साहब इतना बुरा मत मानिये और दिल पे मत लीजिए मैंने ‘सबको’ नहीं कहा बल्कि ‘कुछ’ पत्रकारों और मीडिया घरानों की बात की है। और सबसे महत्वपूर्ण बात Context की है किस संदर्भ में कहा है। मैं आपको नहीं जानता और न ही आपकी धमकी की तर्ज पर मुझे आपका बैकग्राउंड पता करने की चाहत है… और इस फालतू काम के लिए समय तो बिल्कुल भी नहीं है। यह धमकी पत्रकारों की एक सदाबहार धमकी है क्योंकि हर बात में नकारात्मकाक ढूंढते ढूंढते उन्हें हर जगह ऐसे लोगों की तलाश रहती है जिनका बैकग्राउंड खंगालकर वो कुछ लिखकर उन्हें बदनाम कर सकें। मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया अनावश्यक बातों को तूल न दें। 1990 में बने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में कई योग्य शिक्षक अपनी सेवाएं दे चुके हैं और दे रहे हैं चाहे उनका बैकग्राउंड या राजनीतिक विचारधारा कुछ भी रही हो और अभी भी ऐसे शिक्षक यहां कार्यरत हैं। मैं भी Mainstream media छोड़कर पिछले 12 वर्षों से यहां अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। MCU को लेकर काफी कुछ छपता रहता है जिस पर मैंने कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन जिस समाचार को लेकर चर्चा हो रही है वह निकृष्ट और गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता का एक उदाहरण है। ऐसा समाचार देश के धार्मिक सौहार्द के लिए खतरा है। मैंने इस समाचार को लेकर ही अपनी प्रतिक्रिया दी है। मीडिया के लोग जब ऐसी हरकतें करते हैं तो मेरा भी दिल दुखता है और शायद आपको भी एक वरिष्ठ और जिम्मेदार पत्रकार के नाते चिंता तो अवश्य ही होती होगी क्योंकि हम सब एक ही बिरादरी के लोग हैं।

Sharad Jha कोई सही नहीं है Avinash सब गलत हैं, और मीडिया के बारे में कौन नहीं जानता कि बिना तड़का लगाये खबर नहीं छपती है। और हाँ मेरा विरोध कुव्यवस्था और भ्रष्टाचार से है मैं गौशाला का विरोधी नहीं हूँ,, पहले आप पत्रकारिता के लिये बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने पर कार्य कीजिए। नये परिसर को लेके जो हसीन सपना दिखया जा रहा है उसको पूरा कीजिये फिर गौशाला बनाइये या जो करिये। सपना मत दिखाइये की ऐसा होगा, वैसा होगा, भाई मैं हकीकत में जीने वाला इंसान हूँ, मुंगेरी लाल के हसीन सपने देख कर नहीं जीता हूँ। और जिन लोगों को ये लगता है कि मैंने अपने पोस्ट से माखनलाल की बुराई किया हूँ। उनको बस इतना कहूंगा कि भाई मैं हकीकत लिखा था अब यहां की सच्चाई बुरी है तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है, बुरा मैंने नहीं बनाया है। कुव्यवस्था अपने फैला रखी है, मेरे तरह बहुत बच्चे दूर से बहुत अरमान लेकर आते हैं यहां आकर नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली स्थिति हो जाती है। व्यथा तो निकलेगी ही। बहुत लोग हैं जो feel good में जीते हैं,उनकी जिंदगी उनको मुबारक हो।

Pravin Dubey आप जो भी हैं Surender Paul श्रीमान… मैं आपको नहीं जानता..अब तक मैं मौन था..माखनलाल यूनिवर्सिटी के आप पैरोकार हैं और लिख रहे हैं media has turned out to be one of the most corrupt institutions with absolutely no ethics or responsibility….इसका मतलब वो यूनिवर्सिटी भी दलाल और ब्लेकमेलर कैसे बने, इसकी तालीम दे रही है…मैं भी वही का स्टूडेंट हूँ 1995 बैच का…सिर्फ भाषण फेसबुक पर देना बहुत आसान बात है और किसी भी बयान या घटना को सबके ऊपर कृपया मत थोपिए और हाँ…ये सही है कि एक ख़ास विचारधारा की पोषक हो गई है माखनलाल यूनिवर्सिटी…..मुंह उठाकर कुछ भी बोलने से पहले उनके गिरेबान में भी झांकिए जिनकी आप वकालत कर रहे हैं..

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असहिष्णुता की बहस के बीच केरल की राजनीतिक हत्याएं

-संजय द्विवेदी

केरल में आए दिन हो रही राजनीतिक हत्याओं से एक सवाल उठना लाजिमी है कि भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में क्या असहमति की आवाजें खामोश कर दी जाएगीं? एक तरफ वामपंथी बौद्धिक गिरोह देश में असहिष्णुता की बहस चलाकर मोदी सरकार को घेरने का असफल प्रयास कर रहा है। वहीं दूसरी ओर उनके समान विचारधर्मी दल की केरल की राज्य सरकार के संरक्षण में असहमति की आवाज उठाने वालों को मौत के घाट उतार दिया जा रहा है।

   हमारा संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अपने विचारों के प्रसार की सबको आजादी देता है। भारत के विभिन्न राज्यों में भाषाई मतभेद, जातीय मतभेद और राजनीतिक मतभेद हमेशा से रहे हैं। सरकार की नीतियों का विरोध भी होता रहा है। उसके तरीके जनांदोलन,घरना-प्रदर्शन, नारेबाजी,बाजार बंद कराना जैसे विविध प्रकल्प राजनीतिक दल करते रहे हैं। अभी हाल में ही भारत में हुए राजनीतिक परिवर्तन के तहत केंद्र सहित कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें जनता के बहुमत से सत्ता में आई हैं। जब यह सत्ता परिवर्तन हो रहा था तो हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी इसे पचा नहीं पा रहे थे। और वे छोटी सी बात को तिल  का ताड़ बनाने का काम कर रहे थे। उनकी इस मुहिम में मीडिया का एक बड़ा वर्ग शामिल था। हम देखते हैं कि जहां पर भाजपा शासित राज्य हैं वहां विरोधी दलों के साथ एक लोकतांत्रिक व्यवहार कायम है। लेकिन केरल में जिस तरह से राजनीतिक विरोधियों को कुचलने और समाप्त कर डालने की हद तक जाकर कुचक्र रचे जा रहे हैं,वह आश्चर्य में डालते हैं। केरल में पिछले 13 महीने में दो दर्जन से अधिक स्वयंसेवकों की हत्याएं हो चुकी हैं। यह आंकड़ा पुलिस ने बताया है। जबकि चश्मदीद लोग इससे भी अधिक बर्बरता की कहानी बताते हैं।

   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने केरल में हो रही आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्याओं का आरोप सीपीएम पर लगाया है। उनका कहना है कि जिस-जिस क्षेत्र में सरकार की नीतियों का हमारे कार्यकर्ता लोकतांत्रिक ढंग से विरोध करते हैं, उन्हें या तो पुलिस थानों में अकारण बंद कर दिया जाता है और बाद में झूठे मुकदमे लादकर अपराधी घोषित कर दिया जाता है। कई जगहों पर स्वयंसेवकों को घरों से खींचकर गोलियों से उड़ाया जा रहा है।यह तांडव राज्य सरकार के संरक्षण में वामपंथी कार्यकर्ता कर रहे हैं। चूंकि शासन- सरकार का वामपंथियों को संरक्षण प्राप्त है इसलिए उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो रही है। केरल की इन रक्तरंजित घटनाओं को लेकर पिछले दिनों लोकसभा में भी जमकर हंगामा हुआ। जबकि केंद्र सरकार ने केरल के मुख्यमंत्री से इस संबंध में जवाब तलब किया है। परंतु आरएसएस का मानना है कि राज्य सरकार के इशारे पर अफसर सही जानकारी केंद्र को नहीं भेजते हैं।

   केरल में जो घटनाएं हो रही हैं वे कम्युनिस्टों की तालिबानी मानसिकता का परिचायक हैं ये पूरी तरह लक्षित और सुनियोजित हमले हैं। इन हमलों में मुख्य रूप से दलित स्वयंसेवकों को निशाना बनाया गया है। केरल में आरएसएस के बढ़ते प्रभाव और वामपंथियों की खिसकती जमीन के चलते वामपंथी हिंसक हो रहे हैं। वे आरएसएस सहित दूसरे विरोधियों पर भी हिंसक हमले कर रहे हैं। पर न जाने किन राजनीतिक कारणों से कांग्रेस वहां खामोश है, जबकि उनके अपने अनेक कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए हैं और कई की जानें भी गयी हैं। एक तरफ लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का आलाप और दूसरी तरफ विरोधी विचारों को खामोश कर देने की खूनी जंग भारतीय वामपंथियों के असली चेहरे को उजागर करती है। यह बात बताती है कि कैसे विपक्ष में रहने पर उनके सुर अलग और सत्ता में होने पर उनका आचरण क्या होता है। निर्दोष संघ कार्यकर्ता तो किसी राजनीतिक दल का हिस्सा भी नहीं हैं किंतु फिर भी उनके साथ यह आचरण बताता है कि वामपंथी किस तरह हिंदू विरोधी रूख अख्तियार किए  हुए हैं। राजनीति के क्षेत्र में केरल एक ऐसा उदाहरण है जिसकी बबर्रता की मिसाल मिलना कठिन है। एक सुशिक्षित राज्य होने के बाद भी वहां के मुख्य और सत्तारूढ़ दल का आचरण आश्चर्य चकित  करता है। पिछले दिनों केरल की घटनाओं की आंच तो दिल्ली तक पहुंची है और लोकसभा में इसे लेकर हंगामा हुआ है। भाजपा ने केरल की घटनाओं पर चिंता जताते हुए एनआईए या सीबीआई जांच की मांग की है।

  हमें यह देखना होगा कि हम ऐसी घटनाओं पर किस तरह चयनित दृष्टिकोण अपना रहे हैं। अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों पर हमारी पीड़ा छलक पड़ती है किंतु जब केरल में किस दलित हिंदु युवक  के साथ यही घटना होती है हमारी राजनीति और मीडिया, खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ हो रहे बर्बर आचरण पर किसी को कोई दर्द नहीं है। हमें देखना होगा कि आखिर हम कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं। हम किस तरह विरोधी विचारों को नष्ट कर देना चाहते हैं। आखिर इससे हमें क्या हासिल हो रहा है। क्या राजनीति एक मनुष्य की जान से बड़ी है। क्या संघ के लोगों को केरल में काम करने का अधिकार नहीं है।आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसवाले ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में जो वीडियो जारी किए हैं वह बताते हैं कि वामपंथी किस दुष्टता और अमानवीयता पर आमादा हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन कर रहे हैं। किस तरह वे गांवों में जूलूस निकालकर संघ के स्वयंसेवकों को कुत्ते की औलाद कहकर नारे बाजी कर रहे हैं।वे धमकी भरी भाषा में नारे लगा रहे हैं कि अगर संघ में रहना है तो अपनी मां से कहो वे तुम्हें भूल जाएं। आखिर यह किस राजनीतिक दल की सोच और भाषा है? आखिर क्या वामपंथी का वैचारिक और सांगठनिक आधार दरक गया है जो उन्हें भारतीय लोकतंत्र में रहते हुए इस भाषा का इस्तेमाल करना पड़ रहा है या यह उनका नैसर्गिक चरित्र है। कारण जो भी हों लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाली हर आवाज को आज केरल में आरएसएस के साथ खड़े होकर इन निर्मम हत्याओं की निंदा करनी चाहिए।

संजय द्विवेदी
अध्यक्षः जनसंचार विभाग,
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011 (मप्र)

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नोटबंदी, कैसलेश जैसी तमाम नादानियों के बाद भी नरेंद्र मोदी लोगों के दुलारे क्यों बने हुए हैं?

जिस दौर में राजनीति और राजनेताओं के प्रति अनास्था अपने चरम पर हो, उसमें नरेंद्र मोदी का उदय हमें आश्वस्त करता है। नोटबंदी, कैसलेश जैसी तमाम नादानियों के बाद भी नरेंद्र मोदी लोगों के दुलारे बने हुए हैं, तो यह मामला गंभीर हो जाता है। आखिर वे क्या कारण हैं जिसके चलते नरेंद्र मोदी अपनी सत्ता के तीन साल पूरे करने के बाद भी लोकप्रियता के चरम पर हैं। उनका जादू चुनाव दर चुनाव जारी है और वे हैं कि देश-विदेश को मथे जा रहे हैं। इस मंथन से कितना विष और कितना अमृत निकलेगा यह तो वक्त बताएगा, पर यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए वे उम्मीदों को जगाने वाले नेता साबित हुए हैं।

नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए चार बातें सामने आती हैं- एक तो उनकी प्रामाणिकता अंसदिग्ध है, यानी उनकी नीयत पर आम जनता का भरोसा कायम है। दूसरा उन-सा अथक परिश्रम और पूर्णकालिक राजनेता अभी राष्ट्रीय परिदृश्य पर कोई और नहीं है। तीसरा ताबड़तोड़ और बड़े फैसले लेकर उन्होंने सबको यह बता दिया है कि सरकार क्या सकती है। इसमें लालबत्ती हटाने, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, कैशलेस अभियान और जीएसटी को जोड़ सकते हैं। चौथी सबसे बड़ी बात उन्होंने एक सोए हुए और अवसादग्रस्त देश में उम्मीदों का ज्वार खड़ा कर दिया है। आकांक्षाओं को जगाने वाले राजनेता होने के नाते उनसे लोग जुड़ते ही जा रहे हैं।

‘अच्छे दिन’ भले ही एक जुमले के रूप में याद किया जाए पर मोदी हैं कि देश के युवाओं के लिए अभी भी उम्मीदों का चेहरा है। यह सब इसके बाद भी कि लोग महंगाई से बेहाल हैं, बैंक अपनी दादागिरी पर आमादा हैं। हर ट्रांजिक्शन आप पर भारी पड़ रहा है। यानी आम लोग मुसीबतें सहकर, कष्ट में रहकर भी मोदी-मोदी कर रहे हैं तो इस जादू को समझना जरूरी है। अगर राजनीति ही निर्णायक है और चुनावी परिणाम ही सब कुछ कहते हैं तो मोदी पर सवाल उठाने में हमें जल्दी नहीं करनी चाहिए। नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश एक अग्निपरीक्षा सरीखा था, जिसमें नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है। ऐसे में आखिर क्या है जो मोदी को खास बनाता है। अपने कष्टों को भूल कर, बलिदानों को भूलकर भी हमें मोदी ही उम्मीद का चेहरा दिख रहे हैं।

आप देखें तो आर्थिक मोर्चे पर हालात बदतर हैं। चीजों के दाम आसमान पर हैं। भरोसा न हो तो किसी भी शहर में सिर्फ टमाटर के दाम पूछ लीजिए। काश्मीर के मोर्चे पर हम लगातार पिट रहे हैं। सीमा पर भी अशांति है। पाक सीमा के साथ अब चीन सीमा पर भी हालात बुरे हैं। सरकार के मानवसंसाधन मंत्रालय का हाल बुरा है। तीन साल से नई शिक्षा नीति लाते-लाते अब उन्होंने कस्तूरीरंगन जी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई है। जाहिर है हीलाहवाली और कामों की प्राथमिकता में इस सरकार का अन्य सरकारों जैसा बुरा है। दूसरा नौकरशाही पर अतिशय निर्भरता और अपने काडर और राजनीतिक तंत्र पर अविश्वास इस सरकार की दूसरी विशेषता है।

लोगों को बेईमान मानकर बनाई जा रही नीतियां आर्थिक क्षेत्र में साफ दिखती हैं। जिसका परिणाम छोटे व्यापारियों और आम आदमी पर पड़ रहा है। बैंक और छोटी जमा पर घटती ब्याज दरें इसका उदाहरण हैं। यहां तक कि सुकन्या समृद्धि और किसान बचत पत्र भी इस सरकार की आंख में चुभ रहे हैं। आम आदमी के भरोसे और विश्वास पर चढ़कर आई सरकार की नीतियां आश्चर्य चकित करती हैं। विश्व की मंदी के दौर में भी हमारे सामान्य जनों की बचत ने इस देश की अर्थव्यवस्था को बचाए रखा, आज हालात यह हैं कि हमारी बचत की आदतों को हतोत्साहित करने और एक उपभोक्तावादी समाज बनाने के रास्ते पर सरकार की आर्थिक नीतियां हैं। आखिर छोटी बचत को हतोत्साहित कर, बैकों को सामान्य सेवाओं के लिए भी उपभोक्ताओ से पैसे लेने की बढ़ती प्रवृत्ति खतरनाक ही कही जाएगी। आज हालात यह हैं कि लोगों को अपने बैंक में जमा पैसे पर भी भरोसा नहीं रहा। इस बढ़ते अविश्वास के लिए निश्चित ही सरकार ही जिम्मेदार है।

अब सवाल यह उठता है कि इतना सारा  कुछ जनविरोधी तंत्र होने के बाद भी मोदी की जय-जयकार क्यों लग रही है। इसके लिए हमें इतिहास की वीथिकाओं में जाना होगा जहां लोग अपने ताकतवर नेता पर भरोसा करते हैं और उससे जुड़ना चाहते हैं। आज अगर नरेंद्र मोदी की तुलना इंदिरा गांधी से हो रही है तो कुछ गलत नहीं है। क्योंकि उनकी तुलना मनमोहन सिंह से नहीं हो सकती। किंतु मनमोहन सिंह के दस साल को गफलत और गलतियों भरे समय ने ही नरेंद्र मोदी को यह अवसर दिया है। मनमोहन सिंह ने देश को यह अहसास कराया कि देश को एक ताकतवर नेता की जरूरत है जो कड़े और त्वरित फैसले ले सके। उस समय अपने व्यापक संगठन आधार और गुजरात की सरकार के कार्यकाल के  आधार पर नरेंद्र मोदी ही सर्वोच्च विकल्प थे। यह मनमोहन मार्का राजनीति  से ऊब थी जिसने मोदी को एक बड़ा आकाश दिया। यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी अब प्रशासनिक स्तर पर जो भी कर रहे हों पर राजनीतिक फैसले बहुत सोच-समझ कर ले रहे हैं। उप्र में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी से लेकर राष्ट्रपति चयन तक उनकी दूरदर्शिता और राजनीति केंद्रित निर्णय सबके सामने हैं।

जाहिर तौर पर मोदी इस समय की राजनीति का प्रश्न और उत्तर दोनों हैं। वे संकटकाल से उपजे नेता हैं और उन्हें समाधान कारक नेता होना चाहिए। जैसे बेरोजगारी के विकराल प्रश्न पर, सरकार की बेबसी साफ दिखती है। प्रचार, इवेंट्स और नारों से अलग इस सरकार के रिपोर्ट कार्ड का आकलन जब भी होगा, उससे वे सारे सवाल पूछे जाएंगें, जो बाकी सत्ताधीशों से पूछे गए। भावनात्मक भाषणों, राष्ट्रवादी विचारों से आगे एक लंबी जिंदगी भी है जो हमेशा अपने लिए सुखों, सुविधाओं और सुरक्षा की मांग करती है। आक्रामक गौरक्षक, काश्मीर घाटी के पत्थरबाज, नक्सली आतंकी एक सवाल की तरह हमारे सामने हैं। आकांक्षाएं जगाने के साथ आकांक्षाओं को संबोधित करना भी जरूरी है।

नरेंद्र मोदी के लिए आने वाला समय इस अर्थ में सरल है कि विपक्ष उनके लिए कोई चुनौती पेश नहीं कर पा रहा है, पर इस अर्थ में उनकी चुनौती बहुत कठिन है कि वे उम्मीदों को जगाने वाले नेता हैं और उम्मीदें तोड़ नहीं सकते। अब नरेंद्र मोदी की जंग दरअसल खुद नरेंद्र मोदी से है। वे ही स्वयं के प्रतिद्वंद्वी हैं। 2014 के चुनाव अभियान में गूंजती उनकी आवाज “मैं देश नहीं झुकने दूंगा”, लोगों के कानों में गूंज रही है। आज के प्रधानमंत्री के लिए ये आवाजें एक चुनौती की तरह हैं, क्योंकि उसने देशवासियों से अच्छे दिन लाने के वादे पर वोट लिए थे। लोग भी आपको वोट करते रहेगें जब उन्हें भरोसा ना हो जाए कि 2014 का आपका सारा चुनाव अभियान और उसके नारे एक ‘जुमले’ की तरह थे। ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के लिए देश ने आपको वोट नहीं दिए थे। कांग्रेस की सरकार से ज्यादा मानवीय, ज्यादा जनधर्मी, ज्यादा संवेदनशील शासन के लिए लोगों ने आपको चुना था, ‘साहेब’ भी शायद इस भावना को समझ रहे होगें।

लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लेषक हैं. वे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क  09893598888 के जरिए किया जा सकता है.

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माखनलाल पत्रकारिता विवि के प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने भी लिख दी मोदी पर किताब

पुस्तक ‘मोदी युग’ का शीर्षक देखकर प्रथम दृष्टया लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्तुति में धड़ाधड़ प्रकाशित हो रही पुस्तकों में एक कड़ी और जुड़ गई। अल्पजीवी पत्र-पत्रिकाओं के लेखों के साथ ही एक के बाद एक सामने आ रही पुस्तकों में मोदी सरकार की जो अखंड वंदना चल रही है, वो अब उबाऊ लगने लगी है। परंतु पुस्तक को जब ध्यान से पढ़ना शुरू किया तो मेरा भ्रम बिखरता गया कि ये पुस्तक भी मोदी वंदना में एक और पुष्प का अर्पण है। वैसे भी संजय द्विवेदी की पत्रकारिता की तासीर से परिचित होने के कारण मेरे सामने यह तथ्य खुलने में ज्यादा देर नहीं लगी कि पुस्तक में यथार्थ का यथासंभव तटस्थ मूल्यांकन किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार संपादक और विचारक प्रोफेसर कमल दीक्षित का आमुख पढ़कर स्थिति और भी स्पष्ट हो गई। वस्तुत: प्रोफेसर कमल दीक्षित द्वारा लिखा गया आमुख पुस्तक की निष्पक्ष, दो टूक और सांगोपांग समीक्षा है। उसके बाद किसी के भी लिए संजय द्विवेदी की इस कृति की सामालोचना की गुंजाइश बचती नहीं है। यह स्वयं में सम्यक नीर-क्षीर विवेचन है।

भाजपा विरोधी समझे जाते रहे उर्दू के अखबारों और रिसालों को भी यह खुली आंखों से देखना पड़ रहा है कि बीते-तीन सालों की सियासत में दबदबा नरेंद्र मोदी का ही है। जिस तरह से बिखरे हुए प्रतिपक्ष के एकजुट होने की किसी भी कोशिश के पहले श्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा अचानक तुरूप का कोई पत्ता चल देती है, उससे सारी तस्वीर बदल जाती है। ताजा उदाहरण है राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में प्रतिपक्ष द्वारा किसी नाम पर एकजुटता से विचार करने से पहले ही भाजपा द्वारा दलित वर्ग के प्रबुध्द और बेदाग छवि वाले रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करके चमत्कृत कर देना। मै मौजूदा सियासी परिदृश्य को जांचने की कोशिश कर ही रहा था कि नजर हैदराबाद से प्रकाशित उर्दू डेली, ’’मुंसिफ’’ की इस आशय की खबर पर पड़ गई कि आज पूरे मुल्क में मोदी और भाजपा का ही दबदबा है। जैसे किसी जमाने मे पं. जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेस देश की राजनीति की नियंता रहा करती थी, वैसे ही आज श्री मोदी की टक्कर का कोई नेता नजर नहीं आता।

श्री मोदी के जो आलोचक उन पर अहंकारी होने का आरोप लगाते हैं उनको वर्तमान सरकार के नीतिगत फैसलों की श्रृंखला एक कोने में धकेल देती है। वस्तुतः श्री मोदी की राजनीति की शैली ही ऐसी है कि जिसमें किसी प्रकार के दैन्य-प्रदर्शन की कोई गुंजाईश ही नहीं है। संजय द्विवेदी की पुस्तक में ठीक ही लिखा है कि “नई राजनीति ने मान लिया है कि सत्ता का विनीत होना जरूरी नहीं है। अहंकार उसका एक अनिवार्य गुण है। भारत की प्रकृति और उसके परिवेश को समझे बिना किए जा रहे फैसले इसकी बानगी देते हैं। कैशलेश का हौवा ऐसा ही एक कदम है। यह हमारी परम्परा से बनी प्रकृति और अभ्यास को नष्ट कर टेक्नोलाजी के आगे आत्मसमर्पण कर देने की कार्रवाई है। एक जागृत और जीवंत समाज बनने के बजाय हमें उपभोक्ता समाज बनने से अब कोई रोक नहीं सकता।’’ इसी में आगे कहा गया है, “इस फैसले की जो ध्वनि और संदेश है वह खतरनाक है। यह फैसला इस बुनियाद पर लिया गया है कि औसत हिन्दुस्तानी चोर और बेईमान है। क्या नरेन्द्र मोदी ने भारत के विकास महामार्ग को पहचान लिया है या वे उन्हीं राजनीतिक नारों में उलझ रहे हैं, जिनमें भारत की राजनीति अरसे से उलझी हुई है? कर्ज माफी से लेकर अनेक उपाय किए गए किन्तु हालात यह है कि किसानों की आत्महत्याएं एक कड़वे सच की तरह सामने आती रहती है। भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार इन दिनों इस बात के लिए काफी दबाव में हैं कि उनके अच्छे कामों के बावजूद उसकी आलोचना और विरोध ज्यादा हो रहा है। उन्हें लगता है कि मीडिया उनके प्रतिपक्ष की भूमिका में खडे़ हैं। ’’मोदी सरकार’’  मीडिया से कुछ ज्यादा उदारता की उम्मीद कर रही है। यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि आपके राजनीतिक-वैचारिक विरोधी भी देश की बेहतरी के लिए मोदी-मोदी करने लगेंगे।”

प्रो. कमल दीक्षित जी के ही शब्दों में “मोदी युग ग्रंथ में संकलित लेखों में जहां श्री द्विवेदी, श्री मोदी की संगठन क्षमता, संकल्प निष्ठता और प्रशासनिक उत्कृष्टता को रेखांकित करते हैं, सत्ता को जनधर्मी बचाने के प्रयासों को उभारते हैं और संसदीय लोकतंत्र को सफल बनाने के उपायों को स्वर देते हैं, वहीं आत्मदैन्य से मुक्त हो रहे भारत की उजली छवि प्रस्तुत करते हैं, और राष्ट्रवाद की नई परिभाषा को रूपायित करते हैं। देश में क्षेत्रीय दलों के घटते जनाधार, लगातार सत्ता में बने रहने से आई नीति, निष्क्रियता, संसदीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की मर्यादा का उल्लंघन, राजनीतिक अवसरवाद जैसे सामरिक विषयों पर श्री द्विवेदी की टिप्पणियां विषयपरक तो हैं ही, वे प्रकारान्तर से हमारे लोकतंत्र की कमजोरियां को उभारने वाली हैं।’’

‘भारतीय मन और प्रकृति के खिलाफ है कैशलेस’ शीर्षक लेख में संजय द्विवेदी ने एक निष्पक्ष पत्रकार की छवि को सुरक्षित रखते हुए कड़वे-मीठे सच को दो टूक लिख दिया है कि “इस मामले में सरकार के प्रबंधकों की तारीफ करनी पडे़गी कि  वे हार को भी जीत में बदलने की क्षमता रखते हैं और विफलताओं का रूख मोड़कर तुरंत नया मुद्दा सामने ला सकते हैं। हमारा मीडिया, सरकार पर बलिहारी है ही।” दूसरा तथ्य यह, “हमारी जनता और हम जैसे तमाम आम लोग अर्थशास्त्री नहीं हैं। मीडिया और विज्ञापनों द्वारा लगातार हमें यह बताया जा रहा है कि नोटबंदी से कालेधन और आतंकवाद से लड़ाईमें जीत मिलेगी, तो हम सब यही मानने के लिए विवश हैं। नोटबंदी के प्रभाव के आंकलन करने की क्षमता और अधिकार दोनों हमारे पास नहीं हैं।’’ सवाल पूछा जा सकता है, नोटबंदी से क्या हासिल हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनेक क्षेत्रों में गतिशील हुआ है। भारत-पाकिस्तान संबंधों में नीतिगत स्पष्टता का आभास हुआ है। विदेश नीति के माध्यम से आतंकवाद के विरूध्द वैश्विक एकजुटता विकसित करने में भारत ने तीन वर्षों में जो बहुआयामी प्रयास किए उनके सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। इस कारण भी देश के आम लोगों की उम्मीदें अभी टूटी नहीं है और वे मोदी को परिणाम देने वाला राष्ट्र नायक मानते हैं। उससे साफ है कि सरकार ने उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने और कोयले, स्पेक्ट्रम जैसे संसाधनों की पारदर्शी नीलामी से जैसे साहसी फैसलों से भरोसा कायम किया है। देश की समस्याओं को पहचानने और अपनी दृष्टि को लोगों के सामने रखने का काम भी बखूबी इस सरकार ने किया है।

मन के तंतुओं में प्रतिबद्धता की सीमा तक रची वैचारिक आसक्ति को संजय द्विवेदी छुपाते भी नहीं है और ‘आजकल’ के दुनियादार लोगों की तरह सत्ता से काम निकालने के लिए उसका ढिंढ़ोरा भी नहीं पीटते। संजय की लोकप्रियता और सभी वर्गों में स्वीकृति का एक बड़ा कारण उनकी व्यवहार कुशलता भी है। अपनी बात पर दृढ़ रहते हुए भी वे दूसरों की सुनने का धैर्य रखते हैं और कभी-कभी इस अंदाज से असहमति भी व्यक्त करते हैं कि सामने वाला कहीं उलझ जाता है और उस उलझन के बावजूद उसका मर्म अमूर्त ही रह जाता है। संजय द्विवेदी की इस अदा पर मुझे उर्दू का एक शेर याद आता है “ न है इकरार का पहलू, न इनकार का पहलू, तेरा अंदाज मुझे नेहरू का बयां मालूम होता है।’’

परंतु यह संजय द्विवेदी की प्रकृति का मात्र संचारी भाव है। स्थायी भाव है व्यक्ति संस्था और शासन-प्रशासन तंत्र की गहरी पड़ताल करना। अपनी बात को दृढ़ता से कहना। हां, इतना अवश्य है कि इनका सौंदर्यबोध कई कुरूपताओं और अभद्रताओं पर झीनी-बीनी रेशमी चदरिया डाल देता है। सामने वाले को रेशमी चदरिया के स्पर्श की पुलक और लिखने वाले को यह प्रतीति की अप्रिय छवि से आंखें नहीं मूंदी। अपने अनुराग को किस हद तक छलकाना है और क्षोम को किस सीमा तक व्यक्त कर देना है, इस लेखन कला में संजय ने कुछ दशकों की साधना से सिद्धि प्राप्त कर ली है।

जहां बात सांस्कृतिक संस्कारों और सरोकारों की आती है, वहां संजय द्विवेदी शब्द जाल में पाठक को उलझाने और मूल मुददे से कतराने की बजाय स्पष्ट तथा सीधी धारणा व्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष में वह लिखते हैं, “आरएसएस को उसके आलोचक कुछ भी कहें पर उसका सबसे बड़ा जोर सामाजिक और सामुदायिक एकता पर है। आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों को जोड़ने और वृहत्तर हिंदू समाज की एकता और शक्ति के उसके प्रयास किसी से छिपे नहीं है। वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती जैसे संगठन संघ की प्रेरणा से ही सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इसलिए ईसाई मिशनरियों के साथ उसका संघर्ष देखने को मिलता है। आरएसएस के कार्यकर्ताओं के लिए सेवा का क्षेत्र बेहद महत्व का है।”

संजय द्विवेदी के जन्म से पूर्व के एक तथ्य को मैं अपनी तरफ से जोड़ना चाहता हूं, जब भारत विभाजन के पश्चात पश्चिमी पंजाब से लाखों की संख्या में हिंदू पूर्वी पंजाब पहुंचे तो संघ के स्वयंसेवकों ने बड़ी संख्या में उनके आतिथ्य, त्वरित पुर्नवास और उनके संबंधियों तक उन्हें पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय बड़ी तादाद में अनेक व्यक्ति घायल और अंग-भंग के शिकार होकर विभाजित भारत में पहुंचे थे। उन्हें यथा संभव उपचार उपलब्ध कराने में संघ के स्वयंसेवकों ने शासन-प्रशासन तंत्र को मुक्त सहयोग दिया था। उसके साथ ही स्वतंत्र भारत ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी संघ के अनुषांगिक संगठनों से जुडे़ समाज सेवियों को स्वतःस्फूर्त सक्रिय पाया जाता रहा।

संजय लिखते हैं “1950 में संघ के तत्कालीन संघ चालक श्रीगुरू जी ने पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की मदद के लिए आह्वान किया। 1965 में पाक आक्रमण के पीड़ितों की सहायता का काम किया। 1967 में अकाल पीड़ितों की मदद के लिए संघ आगे आया। 1978 के नवंबर माह में दक्षिण के प्रांतों में आए चक्रवाती तूफान में संघ आगे आया। इसी तरह 1983 में बाढ़ पीड़ितों की सहायता, 1997 में काश्मीरी विस्थापितों की मदद के अलावा तमाम ऐसे उदाहरण है जहां पीड़ित मानवता की मदद के लिए संघ खड़ा दिखा। इस तरह आरएसएस का चेहरा वही नहीं है जो दिखाया जाता है। संकट यह है कि आरएसएस का मार्ग ऐसा है कि आज की राजनीतिक शैली और राजनीतिक दलों को वह नहीं सुहाता। वह देशप्रेम, व्यक्ति निर्माण के फलसफे पर काम काम करता है। वह सार्वजनिक जीवन में शुचिता का पक्षधर है। वह देश में सभी नागरिकों के समान अधिकारों और कर्तव्यों की बात करता है। उसे पीड़ा है अपने ही देश में कोई शरणार्थी क्यों है। आज की राजनीति चुभते हुए सवालों से मुंह चुराती है। संघ उससे टकराता है और उनके समाधान के रास्ते भी बताता है। संकट यह भी है कि आज की राजनीति के पास न तो देश की चुनौतियों से लडने का माद्दा है न ही समाधान निकालने की इच्छाशक्ति। आरएसएस से इसलिए इस देश की राजनीति डरती है। वे लोग डरते हैं जिनकी निष्ठाएं और सोच कहीं और गिरवी पड़ी हैं। संघ अपने साधनों से, स्वदेशी संकल्पों से, स्वदेशी सपनों से खड़ा होता स्वालंबी देश चाहता है, जबकि हमारी राजनीति विदेशी पैसे और विदेशी राष्ट्रों की गुलामी में ही अपनी मुक्ति खोज रही है।ऐसे मिजाज से आरएसएस को समझा नहीं जा सकता। आरएसएस को समझने के लिए दिमाग से ज्यादा दिल की जरूरत है। क्या वो आपके पास है? ’’

पुस्तक के आवरण के मुखडे़ से उसकी पीठ सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति असहमति में हाथ उठाने वाले प्रखर लेखक-समालोचक विजय बहादुर सिंह, कुछ ख्यातिनाम पत्रकारों के साथ ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की टिप्पणियां संजय द्विवेदी की लोकप्रियता के जीवंत साक्ष्य उपस्थित करती हैं। तीन दशकों से अधिक समय के मेरे आत्मीय परिचय संजय द्विवेदी को मैंने एक आत्मीय ओजस्वी पत्रकार, प्रबुध्द अध्यापक और मनमोहिनी शक्ति से संपन्न मित्र के रूप में पाया है। अभी तो इन्होंने यशयात्रा का एक ही पड़ाव पार किया है। मंजिलें अभी और भी हैं। अनेक सुनहरी संभावनाओं का अनंत आकाश उड़ान भरने के लिए उनके सामने खुला पड़ा है।

पुस्तक: मोदी युग, लेखक: संजय द्विवेदी
प्रकाशकः पहले पहल प्रकाशन , 25 ए, प्रेस काम्पलेक्स, एम.पी. नगर,
भोपाल (म.प्र.) 462011,  मूल्य: 200 रूपए, पृष्ठ-250

पुस्तक के समीक्षक रमेश नैयर वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे दैनिक भास्कर, रायपुर के संपादक रहे हैं.

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स्मृति शेष – अनिल माधव दवे : बौद्धिक तेज से दमकता था उनका व्यक्तित्व

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री अनिल माधव दवे, देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में थे, जिनमें एक बौद्धिक गुरूत्वाकर्षण मौजूद था। उन्हें देखने, सुनने और सुनते रहने का मन होता था। पानी, पर्यावरण, नदी और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े सवालों पर उनमें गहरी अंर्तदृष्टि मौजूद थी। उनके साथ नदी महोत्सवों ,विश्व हिंदी सम्मेलन-भोपाल, अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ-उज्जैन सहित कई आयोजनों में काम करने का मौका मिला। उनकी विलक्षणता के आसपास होना कठिन था। वे एक ऐसे कठिन समय में हमें छोड़कर चले गए, जब देश को उनकी जरूरत सबसे ज्यादा थी। आज जब राजनीति में बौने कद के लोगों की बन आई तब वे एक आदमकद राजनेता-सामाजिक कार्यकर्ता के नाते हमारे बीच उन सवालों पर अलख जगा रहे थे, जो राजनीति के लिए वोट बैंक नहीं बनाते। वे ही ऐसे थे जो जिंदगी के, प्रकृति के सवालों को मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बना सकते थे।

भोपाल में जिन दिनों हम पढ़ाई करने आए तो वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे, विचार को लेकर स्पष्टता, दृढ़ता और गहराई के बावजूद उनमें जड़ता नहीं थी। वे उदारमना, बौद्धिक संवाद में रूचि रखने वाले, नए ढंग से सोचने वाले और जीवन को बहुत व्यवस्थित ढंग से जीने वाले व्यक्ति थे। उनके आसपास एक ऐसा आभामंडल स्वतः बन जाता था कि उनसे सीखने की ललक होती थी। नए विषयों को पढ़ना, सीखना और उन्हें अपने विचार परिवार (संघ परिवार) के विमर्श का हिस्सा बनाना, उन्हें महत्वपूर्ण बनाता था। वे परंपरा के पथ पर भी आधुनिक ढंग से सोचते थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अविवाहित रहकर समाज को समर्पित कर दिया। वे सच्चे अर्थों में भारत की ऋषि परंपरा के उत्तराधिकारी थे। संघ की शाखा लगाने से लेकर हवाई जहाज उड़ाने तक वे हर काम में सिद्धहस्त थे। 6 जुलाई, 1956 को मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर में जन्में श्री दवे की मां का नाम पुष्पादेवी और पिता का नाम माधव दवे था।

गहरा सौंदर्यबोध और सादगीः उनकी सादगी में भी एक सौंदर्यबोध परिलक्षित होता था। बांद्राभान (होशंगाबाद) में जब वे अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव का आयोजन करते थे, तो कई बार अपने विद्यार्थियों के साथ वहां जाना होता था। इतने भव्य कार्यक्रम की एक-एक चीज पर उनकी नजर होती थी। यही विलक्षता तब दिखाई दी, जब वे भोपाल में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में इसे स्थापित करते दिखे। आयोजनों की भव्यता के साथ सादगी और एक अलग वातावरण रचना उनसे सीखा जा सकता था। सही मायने में उनके आसपास की सादगी में भी एक गहरा सौंदर्यबोध छिपा होता था। वे एक साथ कितनी चीजों को साधते हैं, यह उनके पास होकर ही जाना जा सकता था। हम भाग्यशाली थे कि हमें उनके साथ एक नहीं अनेक आयोजनों में उनकी संगठनपुरूष की छवि, सौंदर्यबोध,भाषणकला,प्रेरित करनी वाली जिजीविषा के दर्शन हुए। विचार के प्रति अविचल आस्था, गहरी वैचारिकता, सांस्कृतिक बोध के साथ वे विविध अनुभवों को करके देखने वालों में थे। शौकिया पर्यटन ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा था। वे मुद्दों पर जिस अधिकार से अपनी बात रखते थे, वह बताती थी कि वे किस तरह विषय के साथ गहरे जुड़े हुए हैं। उनका कृतित्व और जीवन पर्यावरण, नदी संरक्षण, स्वदेशी के युगानुकूल प्रयोगों को समर्पित था। वे स्वदेशी और पर्यावरण की बात कहते नहीं, करके दिखाते थे। उनके मेगा इवेंट्स में तांबे के लोटे ,मिट्टी के घड़े, कुल्हड़ से लेकर भोजन के लिए पत्तलें इस्तेमाल होती थीं। आयोजनों में आवास के लिए उनके द्वारा बनाई गयी कुटिया में देश के दिग्गज भी आकर रहते थे। हर आयोजन में नवाचार करके उन्होंने सबको सिखाया कि कैसे परंपरा के साथ आधुनिकता को साधा जा सकता है। राजनीति में होकर भी वे इतने मोर्चों पर सक्रिय थे कि ताज्जुब होता था।

कुशल संगठक और रणनीतिकारः वे एक कुशल संगठनकर्ता होने के साथ चुनाव रणनीति में नई प्रविधियों के साथ उतरने के जानकार थे। भाजपा में जो कुछ कुशल चुनाव संचालक हैं, रणनीतिकार हैं, वे उनमें एक थे। किसी राजनेता की छवि को किस तरह जनता के बीच स्थापित करते हुए अनूकूल परिणाम लाना, यह मध्यप्रदेश के कई चुनावों में वे करते रहे। दिग्विजय सिंह के दस वर्ष के शासनकाल के बाद उमाश्री भारती के नेतृत्व में लड़े गए विधानसभा चुनाव और उसमें अनिल माधव दवे की भूमिका को याद करें तो उनकी कुशलता एक मानक की तरह सामने आएगी। वे ही ऐसे थे जो मध्यप्रदेश में उमाश्री भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान सबको साध सकते थे। सबको साथ लेकर चलना और साधारण कार्यकर्ता से भी, बड़े से बड़े काम करवा लेने की उनकी क्षमता मध्य प्रदेश ने बार-बार देखी और परखी थी।

बौद्धिकता-लेखन और संवाद से बनाई जगहः उनके लेखन में गहरी प्रामाणिकता, शोध और प्रस्तुति का सौंदर्य दिखता है। लिखने को कुछ भी लिखना उनके स्वभाव में नहीं था। वे शिवाजी एंड सुराज, क्रिएशन टू क्रिमेशन, रैफ्टिंग थ्रू ए सिविलाइजेशन, ए ट्रैवलॉग, शताब्‍दी के पांच काले पन्‍ने, संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से, महानायक चंद्रशेखर आजाद, रोटी और कमल की कहानी, समग्र ग्राम विकास, अमरकंटक से अमरकंटक तक, बेयांड कोपेनहेगन, यस आई कैन, सो कैन वी जैसी पुस्तकों के माध्यम से अपनी बौद्धिक क्षमताओं से लोगों को परिचित कराते हैं। अनछुए और उपेक्षित विषयों पर गहन चिंतन कर वे उसे लोकविमर्श का हिस्सा बना देते थे। आज मध्यप्रदेश में नदी संरक्षण को लेकर जो चिंता सरकार के स्तर पर दिखती है , उसके बीज कहीं न कहीं दवे जी ने ही डाले हैं, इसे कहने में संकोच नहीं करना चाहिए। वे नदी, पर्यावरण, जलवायु परिर्वतन,ग्राम विकास जैसे सवालों पर सोचने वाले राजनेता थे। नर्मदा समग्र संगठन के माध्यम से उनके काम हम सबके सामने हैं। नर्मदा समग्र का जो कार्यालय उन्होंने बनाया उसका नाम भी उन्होंने ‘नदी का घर’ रखा। वे अपने पूरे जीवन में हमें नदियों से, प्रकृति से, पहाड़ों से संवाद का तरीका सिखाते रहे। प्रकृति से संवाद दरअसल उनका एक प्रिय विषय था। दुनिया भर में होने वाली पर्यावरण से संबंधित संगोष्ठियों और सम्मेलनों मे वे ‘भारत’ (इंडिया नहीं) के एक अनिवार्य प्रतिनिधि थे। उनकी वाणी में भारत का आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना का निरंतर प्रवाह दिखता था। एक ऐसे समय में जब बाजारवाद  हमारे सिर चढ़कर नाच रहा है, प्रकृत्ति और पर्यावरण के समक्ष रोज संकट बढ़ता जा रहा है, हमारी नदियां और जलश्रोत- मानव रचित संकटों से बदहाल हैं, अनिल दवे की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

(लेखक संजय द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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केजरीवाल यानि हर रोज नया बवाल

अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, उससे राजनीतिज्ञों के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है। वे उम्मीदों को तोड़ने वाले राजनेता बनकर रह गए हैं। साफ-सुथरी राजनीति देने का वादा करके बनी आम आदमी पार्टी को सत्ता देने में दिल्ली की जनता ने जितनी तेजी दिखाई, उससे अधिक तेजी केजरीवाल और उनके दोस्तों ने जनता की उम्मीदें तोड़ने में दिखाई है।

भारतीय राजनीति में अन्ना हजारे के चेलों ने जिस तेजी से भरोसा खोया, उस तेजी से तो जयप्रकाश नारायण और महात्मा गांधी के चेले भी नहीं गिरे। दिल्ली की सत्ता में आकर अपनी अहंकारजन्य प्रस्तुति और देहभाषा से पूरी आप मंडली ने अपनी आभा खो दी है। खीजे हुए, नाराज और हमेशा गुस्सा में रहने वाली यह पूरी टीम रचनात्मकता से खाली है। एक महान आंदोलन का सर्वनाश करने का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है किंतु भरोसे को तोड़ने का पाप भी इन सबके नाम जरूर दर्ज किया जाएगा। जिस भारतीय संसदीय राजनीति के दुर्गुणों को कोसते हुए ये उसका विकल्प देने का बातें कर रहे थे, उन सारे दुर्गुणों से जिस तरह स्वयं ग्रस्त हुए वह देखने की बात है। राजनीति के बने-बनाए मानकों को छोड़कर नई राह बनाने कि हिम्मत तो इस समूह से गायब दिखती है। उसके अपनों ने जितनी जल्दी पार्टी से विदाई लेनी शुरू की तो लगा कि पार्टी अब बचेगी नहीं, किंतु सत्ता का मोह और प्रलोभन लोगों को जोड़े रखता है। सत्ता जितनी बची है,पार्टी भी उतनी ही बच तो जाए तो बड़ी बात है।

योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और प्रो. आनंद कुमार जैसे चेहरों से प्रारंभ हुई रुसवाई की कहानियां रोज बन रही हैं। कपिल मिश्र इस पूरी जंग में सबसे नया किंतु सबसे प्रभावी नाम हैं। उन्होंने जिस तरह केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमला किया, वह बताता है कि पार्टी में कुछ भी बेहतर नहीं चल रहा है। एक नई पार्टी जिसने एक नई राजनीति और नई संभावनाओं का अहसास कराया था, उसने बहुत कम समय में खासा निराश किया है। आम आदमी पार्टी का संकट यह है कि वह अपने परिवार में पैदा हो रहे संकटों के लिए भी भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि भाजपा एक प्रतिद्वंदी दल है और उससे किसी राहत की उम्मीद आप को क्यों करनी चाहिए। मुंह खोलते ही आप के नेता प्रधानमंत्री को कोसना शुरू कर देते हैं। भारत जैसे देश में जहां संघीय संरचना है वहां यह बहुत संभव है कि राज्य व केंद्र में अलग-अलग सरकारें हों। उनकी विचारधाराएं अलग-अलग हों। किंतु ये सरकारें समन्वय से काम करती हैं, एक दूसरे के खिलाफ सिर्फ तलवारें ही नहीं भांजतीं। ऐसा लगता है जैसे दिल्ली में पहली बार कोई सरकार बनी हो।

सरकार बनाकर और अभूतपूर्व बहुमत लाकर निश्चित ही अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने एक ऐतिहासिक काम किया था। किंतु सरकार भी ठीक से चलाकर भी दिखाते तो उससे वे इतिहासपुरूष बन सकते थे। एक राज्य को संभालने की क्षमता प्रदर्शित किए बिना वे प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न देखते हैं। जबकि जिस नरेंद्र मोदी को सुबह-शाम वे कोसते हैं वे भी गुजरात में तीन बार लगातार बेहतर सरकार चलाने के ट्रैक रिकार्ड के चलते दिल्ली पहुंचे हैं। ऐसे में सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना का काम आम आदमी पार्टी को नित नए विवादों में फंसा रहा है। अब तक वे अन्य दलों के सारे नेताओं को चोर और बेईमान कहने की सुविधा से लैस थे, किंतु अब उनके अपने ही उनकी नीयत पर शक कर रहे हैं। जिन पत्थरों से आम आदमी पार्टी ने दूसरे दलों के नेताओं को घायल किया था, वही पत्थर अब उनकी ओर हैं।

नितिन गडकरी जैसे अनेक नेताओं के खिलाफ आरोप और बाद में माफी मांग लेना का चलन बताता है कि आम आदमी पार्टी को मीडिया का इस्तेमाल आता है। लेकिन यह भी मानना होगा कि समाज बहुत बड़ा और मीडिया उसका बहुत छोटा हिस्सा है। जनमत को साधने के लिए एक बार झूठ काम आ सकता है किंतु बार-बार सफलताओं के लिए आपको विश्वसनीयता कायम करनी पड़ती है। आज की तारीख में आम आदमी पार्टी विश्वसनीयता के सबसे निचले तल पर है। अरविंद केजरीवाल कभी उम्मीदों का चेहरा था। हिंदुस्तान की आकाक्षांओं के प्रतीक थे, भ्रष्टाचार के विरूध्द एक प्रखर हस्तक्षेप थे, आज वे निराश करते नजर आते हैं। यह निराशा भी बहुत गहरी है और उजास कहीं नजर नहीं आती।

अपने आंदोलनकारी तेवरों से वे जनता के दिलों में बहुत जल्दी जगह बना सके। शायद इसका कारण यह था कि वे दिल्ली में आंदोलन कर रहे थे और ऐसे समय में कर रहे थे , जब सोशल मीडिया और टीवी मीडिया की विपुल उपस्थिति के चलते व्यक्ति रातोंरात स्थापित हो सकता है। उनके दिखाए सपनों और वादों के आधार अनेक युवा अपना कैरियर छोड़कर उनके साथ वालंटियर के रूप में मैदान में उतरे। उन सबके साझा प्रयासों ने दिल्ली में उन्हें सत्ता दिलाई। किंतु अपने अहंकार, संवादहीनता और नौकरशाही अकड़ से उन्होंने अपने परिवार को बहुत जल्दी बिखेर दिया। उनके प्रारंभिक अनेक साथी आज अनेक दलों में जा चुके हैं। आंदोलन के मूल नायक अन्ना हजारे उनसे मिलना पसंद नहीं करते। ये उदाहरण बताते हैं कि आंदोलन खड़ा करना और उसे परिणाम तक ले जाना दो अलग-अलग बातें हैं। एक संगठन को खड़ा करना और अपने कार्यकर्ताओं में समन्वय बनाए रखना सरल नहीं होता।

आम आदमी पार्टी जो एक वैकल्पिक राजनीति का माडल बन सकती थी, आज निराश करती नजर आ रही है। यह निराशा उसके चाहने वालों में तो है ही, देश के बौद्धिक वर्गों में भी है। लोकतंत्र इन्हीं विविधताओं और सक्रिय हस्तक्षेपों से सार्थक व जीवंत होता है। आम आदमी पार्टी में वह उर्जा थी कि वह अपनी व्यापक प्रश्नाकुलता से देश की सत्ता के सामने असुविधाजनक सवाल उठा सके। उनकी युवा टीम प्रभावित करती है। उनकी काम करने की शैली, सोशल मीडिया से लेकर परंपरागत माध्यमों के इस्तेमाल में उनकी सिद्धता, भ्रष्टाचार के विरूध्द रहने का आश्वासन लोगों में आप के प्रति मोह जगाता था। वह सपना बहुत कम समय में धराशाही होता दिख रहा है। सिर्फ एक आदमी की महत्वाकांक्षा, उसके अंहकार, टीम को लेकर न चल सकने की समस्या ने आम आदमी पार्टी को चौराहे पर ला खड़ा किया है।

दल का अनुशासन तार-तार है। पहले दूसरे दलों और नेताओं की हर बात को मीडिया के माध्यम से सामने लाने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अब अपनी सामान्य दलगत समस्याओं को भी टीवी पर तय करने लगे हैं। ऐसे में दल के कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जा रहा है। ऐसे में वे कहते रहे हैं कि यह भाजपा करवा रही है। जबकि अपने दल में अनुशासन और संवाद कायम करना आम आदमी पार्टी के नेताओं का काम है। यह काम भाजपा का नहीं है।

आम आदमी पार्टी में मची घमासान राजनीतिक दलों के लिए सबक भी है कि सिर्फ  चुनावी सफलताओं से मुगालते में आ जाना ठीक नहीं है। अंततः आपको लोगों से संवाद बनाए रखना होता है। दल हो या परिवार समन्वय, संवाद और सहकार से ही चलते हैं, अहंकार-संवादहीनता और दुर्व्यवहार से नहीं। आज की राजनीति के शासकों को चाहिए कि राजा की तरह नहीं, समन्वयवादी राजनेता की आचरण करें। अरविंद केजरीवाल के पास अभी भी आयु और समय दोनों है, पर सवाल यह है कि वे क्या चीजों के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं या नहीं। या केजरीवाल को यही लगता है कि उनकी सरकार, संगठन में सब जगह उन्हें नरेंद्र मोदी के लोगों ने घेर रखा है। राजनीति सच को स्वीकारने और सुधार करने  से आगे ही बढ़ती है, पर क्या वे इसके लिए तैयार हैं?

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्वेषक हैं.)

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भाजपा : वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति का समय

उत्तर प्रदेश अरसे बाद एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह ख्यात था कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भारी विजय के बाद भाजपा ने जिस तरह का भरोसा जताते हुए राज्य का ताज योगी आदित्यनाथ को पहनाया है, उससे पता चलता है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है।

भाजपा का आज तक का ट्रैक हिंदुत्व का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल कर सत्ता में आने का रहा है। देश की राजनीति में चल रहे विमर्श में भाजपा बड़ी चतुराई से इस कार्ड का इस्तेमाल तो करती थी, किंतु उसके नेतृत्व में इसे लेकर एक हिचक बनी रहती थी। वो हिचक अटल जी से लेकर आडवानी तक हर दौर में दिखी है। भाजपा का हर नेता सत्ता पाने के बाद यह साबित करने में लगा रहता है वह अन्य दलों के नेताओं के कम सेकुलर नहीं है।

उत्तर प्रदेश की ‘आदित्यनाथ परिघटना’ दरअसल भाजपा की वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति को स्थापित करती नजर आती है। नरेंद्र मोदी के राज्यारोहण के बाद योगी आदित्यनाथ का उदय भारतीय राजनीति में एक अलग किस्म की राजनीति की स्वीकृति का प्रतीक है। एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग, सन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त न थे। धर्म और धर्माचार्यों का इस्तेमाल, धार्मिक आस्था का दोहन और सत्ता पाते ही सभी धार्मिक प्रतीकों से मुक्ति लेकर सारी राजनीति सिर्फ तुष्टीकरण में लग जाती थी। प्रधानमंत्रियों समेत जाने कितने सत्ताधीशों के ताज जामा मस्जिद में झुके होगें, लेकिन हिंदुत्व के प्रति उनकी हिचक निरंतर थी। 

यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं की एक समय में दीनदयाल जी उदार थे, तो अटलजी और बलराज मधोक अपनी वक्रता के चलते उग्र नेता माने जाते थे। अटलजी का दौर आया तो लालकृष्ण आडवाणी उग्र कहे जाने लगे, फिर एक समय ऐसा भी आया जब आडवानी उदार हो गए और नरेंद्र मोदी उग्र मान जाने लगे। आज की व्याख्याएं सुनें- नरेंद्र मोदी उदार हो गए हैं और योगी आदित्यनाथ उग्र  माने जाने लगे हैं। यह मीडिया, बौद्धिकों की अपनी रोज बनाई जाती व्याख्याएं हैं। लेकिन सच यह है कि अटल, मधोक, आडवानी, मोदी या आदित्यनाथ कोई अलग-अलग लोग नहीं है। एक विचार के प्रति समर्पित राष्ट्रनायकों की सूची है यह। इसमें कोई कम जा ज्यादा उदार या कठोर नहीं है। किंतु भारतीय राजनीति का विमर्श  ऐसा है जिसमें वास्तविकता से अधिक ड्रामे पर भरोसा है। भारतीय राजनेता की मजबूरी है कि वह टोपी पहने, रोजा भले न रखे किंतु इफ्तार की दावतें दे। आप ध्यान दें सरकारी स्तर पर यह प्रहसन लंबे समय से जारी है। भाजपा भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में काम करती है। उसमें भी इस तरह के रोग हैं। वह भी राष्ट्रनीति के साथ थोड़े तुष्टिकरण को गलत नहीं मानती। जबकि उसका अपना नारा रहा है सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं। उसका एक नारा यह भी रहा है-“राम, रोटी और इंसाफ। ”

लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं। दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ पचीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी सन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।

आजादी के बाद के सत्तर सालों में देश की राजनीति का विमर्श भारतीयता और उसकी जड़ों की तरफ लौटने के बजाए घोर पश्चिमी और वामपंथी रह गया था। जबकि बेहतर होता कि आजादी के बाद हम अपनी ज्ञान परंपरा की और लौटते और अपनी जड़ों को मजबूत बनाते। किंतु सत्ता,शिक्षा, समाज और राजनीति में हमने पश्चिमी तो, कहीं वामपंथी विचारों के आधार पर चीजें खड़ी कीं। इसके कारण हमारा अपने समाज से ही रिश्ता कटता चला गया। सत्ता और जनता की दूरी और बढ़ गयी। सत्ता दाता बन बैठी और जनता याचक।  सेवक मालिक बन गए। ऐसे में लोकतंत्र एक छद्म लोकतंत्र बन गया। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हम सत्तर साल के बाद सड़कें बना रहे हैं। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हमारे अपने नौजवानों ने भारतीय राज्य के खिलाफ बंदूकें उठा रखी हैं। लोकतंत्र की विफलता की ये कहानियां सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं। राजनीतिक तंत्र के प्रति उठा भरोसा भी साधारण नहीं है।

बावजूद इसके 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम एक उम्मीद का अवतरण भी हैं। वे आशाओं, उम्मीदों से उपजे परिणाम हैं। नरेंद्र मोदी, आदित्यनाथ इन्हीं उम्मीदों  के चेहरे हैं। दोनों अंग्रेजी नहीं बोलते। दोनों जन-मन-गण के प्रतिनिधि है। यह भारतीय राजनीति का बदलता हुआ चेहरा है। क्या सच में भारत खुद को पहचान रहा है ? वह जातियों, पंथों, क्षेत्रों की पहचान से अलग एक बड़ी पहचान से जुड़ रहा है- वह पहचान है भारतीय होना, राष्ट्रीय होना। एक समय में राजनीति हमें नाउम्मीद करती हुयी नजर आती थी। बदले समय में वह उम्मीद जगा रही है। कुछ चेहरे ऐसे हैं जो भरोसा जगाते हैं। एक आकांक्षावान भारत बनता हुआ दिखता है। यह आकांक्षाएं राजनीति दलों के एजेंडे से जुड़ पाएं तो देश जल्दी और बेहतर बनेगा। राजनीतिक विमर्श और जनविमर्श को साथ लाने की कवायद हमें करनी ही होगी। जल्दी बहुत जल्दी। यह जितना और जितना जल्दी होगा भारत अपने भाग्य पर इठलाता दिखेगा।

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्वेषक हैं)

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भारतीय मन और प्रकृति के खिलाफ है कैशलेस

संजय द्विवेदी
हिंदुस्तान के दो बड़े नोटों को बंद कर केंद्र सरकार और उसके मुखिया ने यह तो साबित किया ही है कि ‘सरकार क्या कर सकती है।’ इस फैसले के लाभ या हानि का आकलन तो विद्वान अर्थशास्त्री करेगें, किंतु नरेंद्र मोदी कड़े फैसले ले सकते हैं, यह छवि पुख्ता ही हुयी है। एक स्मार्ट सरकार और स्मार्ट प्रधानमंत्री ही नोटबंदी की विफलता को देखकर उसका रूख कैशलेस की ओर मोड़ सकता है और ताबड़तोड़ छापों से अपनी छवि की रक्षा भी कर सकता है।

इस मामले में सरकार के प्रबंधकों की तारीफ करनी पड़ेगी कि वे हार को भी जीत में बदलने की क्षमता रखते हैं और विफलताओं का रूख मोड़कर तुरंत नया मुद्दा सामने ला सकते हैं। हमारा मीडिया तो सरकार पर बलिहारी है ही। दूसरा तथ्य यह कि हमारी जनता और हम जैसे तमाम आम लोग अर्थशास्त्री नहीं हैं। मीडिया और विज्ञापनों द्वारा लगातार हमें यह बताया जा रहा है कि नोटबंदी से कालेधन और आतंकवाद से लड़ाई में जीत मिलेगी, तो हम सब यही मानने के लिए विवश हैं। क्योंकि यह आकलन करने की क्षमता और अधिकार दोनों हमारे पास नहीं है कि नोटबंदी का हासिल क्या है।

भूल जाएंगें मन का गणितः

जहां तक कैशलेस का प्रश्न है, वह नोटबंदी की विफलता से उपजा एक शिगूफा है और कई मामलों में हम कैशलेस की ओर वैसे भी बढ़ ही रहे थे। इसे गति देना, ध्यान भटकाने के सिवा कुछ नहीं है। सत्ता में बैठे लोग जो भी फैसले लेते हैं, वह यह मानकर ही लेते हैं कि सबसे बुद्धिमान वही हैं और पांच साल के लिए देश उन्हें ठेके पर दिया गया है। मनमोहन सिंह सरकार के मंत्रियों में कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसों की देहभाषा और भाषा का स्मरण कीजिए और भाजपा के दिग्गज मंत्रियों की भाषा और देहभाषा का परीक्षण करें तो लगेगा कि सत्ता की भाषा एक ही होती है।

नई राजनीति ने मान लिया है कि सत्ता का विनीत होना जरूरी नहीं है। अहंकार उसका एक अनिवार्य गुण है। भारत की प्रकृति और उसके परिवेश को समझे बिना लिए जा रहे फैसले इसकी बानगी देते हैं। कैशलेस का हौवा ऐसा ही एक कदम है। यह हमारी परंपरा से बनी प्रकृति और अभ्यास को नष्ट कर टेक्नालाजी के आगे आत्मसमर्पण कर देने वाली कार्रवाई है। इससे कुछ हो न हो हम मन का गणित भूल जाएंगें। पहाड़े और वैदिक गणित के अभ्यास से उपजी कठिन गणनाएं करने का अभ्यास हम वैसे ही खो चुके हैं। अब नई कार्ड व्यवस्था हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। एक जागृत और जीवंत समाज बनने के बजाए हमें उपभोक्ता समाज बनने से अब कोई रोक नहीं सकता।

सारे लोग नहीं है बेईमानः

इस फैसले की जो ध्वनि और संदेश है वह खतरनाक है। यह फैसला ही इस बुनियाद पर लिया गया है कि औसत हिंदुस्तानी चोर और बेईमान है। अपने देशवासियों विशेषकर व्यवसायियों और आम लोगों को बेईमान समझने की हिकारत भरी नजर हमें अंग्रेजों के राज से मिली है। आजादी के बाद भी अंग्रेजी मन के अफसर, राजनेता और पढ़े-लिखे लोग देश के मेहनतकश लोगों को बेईमान ही मानते रहे। निकम्मा मानते रहे। गुलामी के दिनों में अंग्रेजों से मिले यह ‘मूल्य’ सत्ता में आज भी एक विचार की तरह बने हुए हैं। अफसोस कि यह औपनिवेशिक मानसिकता आज भी कायम है। जिसमें एक भारतीय को इन्हीं छवियों में देखा जाता है। इतिहास से सबक न लेकर हमने फिर से देशवासियों को बेईमान की तरह देखना शुरू किया है और बलात् उन्हें ईमानदारी सिखाने पर आमादा हैं। जबकि यह तय मानिए कि मनों को बदले बिना कोई भी टेक्नालाजी, बेईमानी की प्रवृत्ति को खत्म नहीं कर सकती है।

सच तो यह है कि आपके तमाम टैक्सों के जाल, इंस्पेक्टर राज, बेईमान और भ्रष्ट तंत्र की सेवा में लगे आम भारतीय ईमानदारी से जीवन जी नहीं सकते, न व्यापार कर सकते हैं, न नौकरी। कैशलेस एक बेहतर व्यवस्था हो सकती है, किंतु एक लोकतंत्र में रहते हुए यह हमारा चयन है कि हम कैशलेस को स्वीकारें या नकद में व्यवहार करें। कोई सरकार इसके लिए हमें बाध्य नहीं कर सकती है। यह भी मानना अधूरा सच है कि कैशलेस व्यवहार करके ईमानदारी लाई जा सकती है। ईमानदारी की तरह बेईमानी भी एक स्वभाव है। आप बलात् न तो किसी को ईमानदार बना सकते हैं, न ही लोग शौक के लिए बेईमान बनते हैं। सच तो यह है कि मनुष्य के बीच ईमानदारी एक मूल्य की तरह स्थापित होगी, उसके मन में भीतरी परिवर्तन होगें, वह आत्मप्रेरित होगा, तभी समाज में शुचिता स्थापित होगी। भारतीय संस्कृति तो देवत्व के साथ जुड़ती है। जिसमें जो देता है, वही देवता होता है। इसलिए लोगों की आंतरिक शक्ति और आत्मशक्ति को जगाने की जरूरत है। किंतु जिस तंत्र के भरोसे यह परिर्वतन लाने की तैयारी हमारी सरकार ने की है, वह तंत्र स्वयं कितना भ्रष्ट है, कहने की आवश्यकता नहीं है। इसकी नजीर हमारे बैंक तंत्र ने इसी नोटबंदी अभियान में पेश कर दी है। प्रशासनिक तंत्र, राजनीतिक तंत्र और न्यायिक तंत्र के तो तमाम किस्से लोकविमर्श में हैं।

आम हिंदुस्तानी पर कीजिए भरोसाः

हमारी सरकार को अपने लोगों पर भरोसा करना होगा। इंस्पेक्टर राज और राजनीतिक वसूली का तंत्र खत्म करना होगा। हमें बेईमान मानकर आप इस देश में ईमानदारी को स्थापित नहीं कर सकते। भीतर से मजबूत हिंदुस्तानी ही एक अच्छा देश बनाएंगें। नहीं तो आप हजारों चेक लगा लें, इंस्पेक्टर छोड़ दें, बेईमानी जारी रहेगी। आप लोगों को शिक्षित करने के बजाए, उन्हें पकड़ने, लांछित करने और बेईमान साबित की कोशिशों से खुश हैं तो खुश रहिए। आपको हमारे खाने पीने की चीजों से लेकर डायपर से लेकर च्ववनप्राश खरीदने की आदतों का, हमारे व्यक्तिगत विवरणों का विवरण कैशलेस के माध्यम से चाहिए तो बटोरिए और प्रसन्न रहिए।

भारतीय संस्कृति के प्रखर प्रवक्ताओं को यह जानना चाहिए कि हमारी संस्कृति में व्यक्ति की स्वायत्तता ही प्रधान है। शरीर झुकाए और टूटी रीढ़ वाले हिंदुस्तानी हमारी पहचान नहीं हैं। ऐसे में राजपुरूषों को चाहिए कि वे लोगों को ईमानदार बनाएं, लेकिन बलात् नहीं। जबरिया परिर्वतन की प्रक्रिया अंततः विफल ही होती है, यह भी होगी। व्यक्ति को मशीनें बदल नहीं सकतीं, न बदल पाएंगी। व्यक्ति तो तभी बदलेगा जब उसका मन बदलेगा, उसका जीवन बदलेगा। वरन् एकात्म मानवदर्शन की जरूरत क्या है? उसकी प्रासंगिकता क्या है? शायद इसीलिए, क्योंकि व्यक्ति सिर्फ पुरजा नहीं है, वह मन भी है। आप तय मानते हैं कि यह सफल होगी पर ज्यादातर लोग मानते हैं आपकी यह कोशिश विफल होगी, क्योंकि इसमें व्यक्ति के बजाए कानून और टेक्नालाजी पर भरोसा है। मन के बजाए इंस्पेक्टर राज पर जोर है। आधार कार्ड पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी आपका इतना आग्रह क्यों है? क्या यह सिर्फ सुरक्षा कारणों से है या बाजार इसके पीछे है? आप क्यों चाहते हैं कि सबका लेन-देन,खान पान, व्यवहार और लोकाचार रिकार्डेड हो? आपका अपने देशवासियों पर नहीं, तंत्र पर इतना भरोसा है तो कम्युनिस्टों में बुराई क्या थी? क्षमा करें आप चाहते नहीं थे, किंतु अब चाहने लगे हैं कि व्यक्ति नहीं, तंत्र मुख्य हो। तंत्र का सब पर कब्जा हो। इन्हीं हरकतों की अति से रूस का क्या हुआ आपके सामने है। इसलिए कृपया ईमानदारी के इस अभियान को व्यक्तिगत स्वतंत्रता को क्षति पहुंचाने के लिए इस्तेमाल न करें।

यह तंत्रवादी मार्ग है, राष्ट्रवादी नहीः

आप जिस तरफ जा रहे हैं, वह भारत का रास्ता नहीं है। वह राष्ट्रवादी नहीं, तंत्रवादी मार्ग है। आप एकात्म मानवदर्शन के नारे लगाते हुए, कम्युनिस्टों सरीखा आचरण नहीं कर सकते। हमारे पांच हजार साल के बाजार में जो मूल्य चले और विकसित हुए उन्हें अचानक शीर्षासन नहीं कराया जा सकता है। वस्तु विनिमय से लेकर दान पूजन में दक्षिणा के संस्कार तक भारत का मन मशीनों के सहारे नहीं बना है। इसलिए पश्चिमी स्वभाव को भारत पर आरोपित मत कीजिए। वे मशीनों पर इसलिए गए कि उनके पास लोग नहीं थे। इतना बड़ा देश अगर मशीनों और तंत्र पर चला गया तो हम उन करोड़ों हाथों का क्या करेगें जो किसी रोजगार की प्रतीक्षा में आज भी खड़े हैं। कार्ड को स्वाइप करने वाली मशीनों का निर्माण करने के बजाए लोगों के लिए रोजगार उत्पादन करने की सोचिए। तंत्र के बजाए बुद्धि को विकसित करने के जतन कीजिए। कैशलेस की नारेबाजी इस देश की प्रकृति व उसके स्वभाव के विरूद्ध है, इसे तुरंत बंद कीजिए। दुनिया के देशों की नकल करने के बजाए एक बार महात्मा गांधी की बहुत छोटी कृति ‘हिंद स्वराज’ को फिर से पढ़िए। ‘हिंद स्वराज’ का एक ‘सावधान पाठ’ आपको बहुत से सवालों के जवाब देगा। सही रास्ता मिलेगा, भरोसा कीजिए।

लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लेषक हैं. संपर्क : मोबाइल-09893598888

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मोदी सरकार : साल भर चले अढ़ाई कोस

: देश के प्रधानमंत्री के सामने सत्ता को मानवीय और जनधर्मी बनाने की चुनौती : भारतीय जनता पार्टी को पहली बार केंद्र में बहुमत दिलाकर सत्ता में आई नरेंद्र मोदी की सरकार के एक साल पूर्ण होने पर जो स्वाभाविक उत्साह और जोशीला वातावरण दिखना चाहिए वह सिरे से गायब है। क्या नरेंद्र मोदी की सरकार से उम्मीदें ज्यादा थीं और बहुत कुछ होता हुआ न देखकर यह निराशा सिरे चढ़ी है या लोगों का लगता है मोदी की सरकार अपने सपनों तक नहीं पहुंच पाएगी। सक्रियता, संवाद और सरकार की चपलता को देखें तो वह नंबर वन है। मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। उनके कद का कोई नेता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। वैश्विक राजनेता बनने की ओर अग्रसर मोदी आज दुनिया में सुने और सराहे जा रहे हैं। किंतु भारत के भीतर वह लहर थमती हुयी दिखती है।

 

दिल्ली चुनाव के परिणाम वह क्षण थे जिसने मोदी की हवा का गुब्बारा निकाल दिया तो कुशल प्रबंधक माने जा रहे भाजपा अध्यक्ष का चुनाव प्रबंधन औंधे मुंह पड़ा था। सिर्फ तीन सीटें जीतकर भाजपा दिल्ली प्रदेश में अपने सबसे बुरे समय में पहुंच गयी तो बिहार में उसके विरोधी एकजुट हो गए। यह वही समय था, जिसने मोदी की सर्वोच्चता को चुनौती दी। इधर अचानक लौटे राहुल गांधी के गर्जन-तर्जन और सोनिया गांधी के मार्च ने विपक्षी एकजुटता को भी मुखर किया। संसद में राज्यसभाई लाचारी पूरी सरकार पर भारी पड़ रही है और सरकार लोकसभा में बहुमत के बावजूद संसद के भीतर घबराई सी नजर आती है। वह तो भला हो अरविंद केजरीवाल और उनके नादान दोस्तों का कि वे ऐसी सरकार चला रहे हैं, जहां रोजाना एक खबर है और उनसे लोगों की उम्मीदें धराशाही हो गयी हैं। यह अकेली बात मोदी को राहत देने वाली साबित हुयी है।

केंद्र की सरकार को एक साल पूरा करते हुए अपयश बहुत मिले हैं। बिना कुछ गलत किए यह सरकार कारपोरेट की सरकार, किसान विरोधी सरकार, सूटबूट की सरकार, धन्नासेठों की सरकार जैसे तमगे पा चुकी है। आश्चर्य यह है कि भाजपा के कार्यकर्ता और उसका संगठन इन गलत आरोपों को खारिज करने के आत्मविश्वास से भी खाली है। आखिर इस सरकार ने ऐसा क्या जनविरोधी काम किया है कि उसे खुद पर भरोसा खो देना चाहिए? नरेंद्र मोदी की ईमानदारी, उनकी प्रामणिकता और जनता से संवाद के उनके निरंतर प्रयत्नों को क्यों नहीं सराहा जाना चाहिए? एक कठिन परिस्थितियों से वे देश को प्रगति और विकास की राजनीति से जोड़ना चाहते हैं। वह संकल्प उनकी देहभाषा और वाणी दोनों से दिखता है। किंतु क्या नरेंद्र मोदी यही अपेक्षा अपनी टीम से कर सकते हैं? अगर अरविंद केजरीवाल के नादान दोस्तों ने उनकी छवि जमीन पर ला दी है तो मोदी भी समान परिघटना के शिकार हैं। उनके दरबार में भी गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, आदित्यनाथ, साक्षी महराज जैसे नगीने हैं, जो उन्हें चैन नहीं लेने देते तो विरोधियों के हाथ में कुछ कहने के लिए मुद्दे पकड़ा देते हैं।

आप देखें तो अटल जी के नेतृत्व वाली राजग सरकार का जादू इतनी जल्दी नहीं टूटा था बल्कि साल पूरा करने पर अटल जी एक हीरो की तरह उभरे थे। यह भरोसा देश में पैदा हुआ थी कि गठबंधन की सरकारें भी सफलतापूर्वक चलाई जा सकती हैं। अटल जी के नेतृत्व के सामने भी संकट कम नहीं थे, किंतु उन्होंने उस समय जो करिश्मा कर दिखाया, वह बहुत महत्व का था। उनकी सरकार ने जब एक साल पूरा किया तो उत्साह चरम पर था हालांकि यह उत्साह आखिरी सालों में कायम नहीं रह सका। किंतु आज यह विचारणीय है कि वही उत्साह मोदी सरकार के एक साल पूरे करने पर क्यों नहीं दिखता।

क्या संगठन और सरकार में समन्वय का अभाव है? हालांकि यह शिकायत करने का अधिकार नरेंद्र मोदी को नहीं है क्योंकि यह माना जाता है कि अमित शाह उनका ही चयन हैं और वे मोदी को अच्छी तरह समझते हैं। फिर आखिर संकट कहां है? मोदी का मंत्रिमंडल क्या बेहद औसत काम करने वाली टीम बनकर नहीं रह गया है? उम्मीदों की तरफ भी छलांग लगाती हुयी यह सरकार नहीं दिखती। संसद में सरकार का फ्लोर मैनेजमेंट भी कई बार निष्प्रभावी दिखता है। मंत्री आत्मविश्वास से खाली दिखते हैं, किंतु उनका दंभ चरम पर है। कार्यकर्ताओं और सांसदों की न सुनने जैसी शिकायतें एक साल में ही मुखर हो रही हैं। जाहिर तौर पर दल के भीतर और बाहर बैचेनियां बहुत हैं। संजय जोशी प्रकरण को जिस तरह से मीडिया में जगह मिली और संगठन से जिस तरह के बर्ताव की खबरें आयीं, वह चौंकाने वाली हैं। क्या सामान्य शिष्टाचार भी अब अनुशासनहीनता की श्रेणी में आएंगे, यह बात लोग पूछने लगे हैं। नरेंद्र मोदी के अच्छे इरादों, संकल्पों के बावजूद समूची सरकार की जो छवि प्रक्षेपित हो रही है, वह बहुत उत्साह जगाने वाली नहीं है। समन्वय और संवाद का अभाव सर्वत्र और हर स्तर पर दिखता है। विकास और सुशासन के सवालों के साथ भाजपा के अपने भी कुछ संकल्प हैं। उसके साथ राजनीतिक संस्कृति में बदलाव की उम्मीदें भी जुड़ी हुई हैं, पर क्या बदल रहा है,यह कह पाना कठिन है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बहुत जल्दी मोदी से ज्यादा उम्मीदें पाली जा रही हैं। पर यह उम्मीदें तो मोदी ने ही जगाई थीं। वे पांच साल मांग रहे थे, जनता ने उन्हें पांच साल दिए हैं। अब वक्त डिलेवरी का है। जनता को राहत तो मिलनी चाहिए। किंतु मोदी सरकार के खिलाफ जिस तरह का संगठित दुष्प्रचार हो रहा है, वह इस सरकार की छवि पर ग्रहण लगाने के लिए पर्याप्त है।

दिल्ली में आकर मोदी दिल्ली को समझते, उसके पहले उनके विरोधी एकजुट हो चुके हैं। राजनेताओं में ही नहीं दिल्ली में बहुत बड़ी संख्या में बसने वाले नौकरशाहों, बुद्धिजीवियों की एक ऐसी आबादी है, जो मोदी को सफल होते देखना नहीं चाहती। इसलिए मोदी के हर कदम की आलोचना होगी। उन्हें देश की जनता ने स्वीकारा है, किंतु लुटियंस की दिल्ली ने नहीं। स्वाभाविक शासकों के लिए मोदी का राजधानी प्रवेश एक अस्वाभाविक घटना है। वे इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि एक राष्ट्रवादी विचारों की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में विराजी हुयी है। नरेंद्र मोदी की विफलता में ही इन भारतविरोधी बुद्धिजीवियों और अंतर्राष्ट्रीय ताकतों की शक्ति लगी हुयी है। देश के भीतर हो रही साधारण घटनाओं पर अमरीका की बौखलाहट देखिए। अश्वेतों पर आपराधिक अन्याय-अत्याचार करने वाले हमें धार्मिक सहिष्णुता की सलाहें दे रहे हैं क्योंकि हम धर्मान्तरण की प्रलोभनकारी घटनाओं के विरोध में हैं। वे ग्रीनपीस के साथ खड़े हैं क्योंकि सरकार भारतविरोधी तत्वों पर नकेल कसती हुयी दिखती है। ऐसे कठिन समय में नरेंद्र मोदी की सरकार को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह आराम से काम करे। उसके सामने यह चुनौती है कि वह समय में देश के सामने खड़े जटिल प्रश्नों का हल निकाले। मोदी अपने समय के नायक हैं और उन्हें यह चुनौतियां स्वीकारनी ही होगीं। साल का जश्न मने न मने, नरेंद्र मोदी और उनकी टीम को इतिहास ने यह अवसर दिया है कि वे देश का भाग्य बदल सकते हैं। इस दायित्वबोध को समझकर वे अपनी सत्ता और संगठन के संयोग से एक ऐसा वातावरण बनाएं जिसमें देश के आम आदमी का आत्मविश्वास बढ़े, लोकतंत्र सार्थक हो और संवाद निरंतर हो। उम्मीद की जानी कि अपनी सामान्य पृष्ठभूमि की विरासत का मान रखते हुए नरेंद्र मोदी इस सत्ता तंत्र को आम लोगों के लिए ज्यादा संवेदनशील, ज्यादा मानवीय बनाने के अपने प्रयत्नों को और तेज करेंगें। तब शायद उनके खिलाफ आलोचनाओं का संसार सीमित हो सके। अभी तो उन्हें लंबी यात्रा तय करनी है। 

लेखक संजय द्विवेदी मीडिया शिक्षक और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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प्रधानमंत्री मोदी भूमि अधिग्रहण मामले में रणनीतिक चूक के शिकार हुए

भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने आते ही जिस तरह भूमि अधिग्रहण को लेकर एक अध्यादेश प्रस्तुत कर स्वयं को विवादों में डाल दिया है, वह बात चौंकाने वाली है। यहां तक कि भाजपा और संघ परिवार के तमाम संगठन भी इस बात को समझ पाने में असफल हैं कि जिस कानून को लम्बी चर्चा और विवादों के बाद सबकी सहमति से 2013 में पास किया गया, उस पर बिना किसी संवाद के एक नया अध्यादेश और फिर कानून लाने की जरूरत क्या थी? इस पूरे प्रसंग में साफ दिखता है कि केन्द्र सरकार के अलावा कोई भी पक्ष इस विधेयक के साथ नहीं है।

हिन्दुस्तान के विकास के सपनों के साथ सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार से इतनी तो उम्मीद की ही जाती है कि वह बहुमत के अंहकार के बजाय जनमत के सम्मान का रास्ता अख्तियार करे। प्रधानमंत्री और उनके मंत्री इस मामले में एक रणनीतिक चूक का शिकार हुए हैं। जिसके चलते पूरे देश में भ्रम, निराशा और आक्रोश का वातावरण बन गया है। शायद सरकार के आकलन में कुछ भूल थी जिसके चलते किसी स्तर पर भी संवाद किए बिना इस बने-बनाए कानून से छेड़खानी की गई।

खाली जमीनों का कीजिए उपयोग

केंद्र सरकार इस विषय में संवादहीनता के आरोप से नहीं बच सकती, भले ही वह सत्ता की ताकत और अपने मैनेजरों के कुशल प्रबंधन से विधेयक को पास भी करा ले जाए। जाहिर तौर पर इस विधेयक का विरोध करने वाले लोग विकास विरोधी ही कहे जाएंगे और सरकार उन्हें विकास के रास्ते में रोड़े अटकाने वाले पत्थरों के रूप में ही आरोपित करना चाहेगी। लेकिन जहां छह करोड़ परिवारों के पास आज भी इंच भर जमीन नहीं है, वहां ऐसी बातें चिंता में डालती हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि इस देश में लड़ा गया सबसे बड़ा युद्ध महाभारत, दुर्योधन के द्वारा पांडवों को पांच गांव भी न देने की महाजिद के चलते शुरू हुआ था। दुर्योधन अपनी सत्ता की अकड़ में श्री कृष्ण से कहता है कि “हे केशव मैं युद्ध के बिना सूर्ई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा। ” भारत की सरकार 1894 के अंग्रेजों के काले कानून को 2013 में बदल पाई और अब फिर वह इतिहास को पीछे ले जाने की तैयारी है। देश में आज भी तमाम उद्योगों के नाम पर आरक्षित 50 हजार एकड़ भूमि खाली पड़ी है। कुल कृषि योग्य भूमि का 20 प्रतिशत बंजर पड़ी है। इन जमीनों के बजाय नई सरकार बहुउपयोगी और सिंचित भूमि का अधिग्रहण करने को लालायित है। यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या किसानों के हित और देश के हित अलग-अलग हैं? यह सच्चाई सबको पता है कि किस तरह सार्वजनिक कामों के लिए जमीनों का अधिग्रहण कर उनका लैंड यूज चेंज किया जाता है। 2010-11 में जो सवाल उठे थे, वे आज भी जिंदा हैं। सिंगूर, नंदीग्राम और भट्टापारसाल से लेकर मथुरा तक ये कहानियां बिखरी पड़ी हैं। सरकार ने हालात न सम्भाले तो टप्पल किसान आंदोलन जैसी स्थितियां दोबारा लौट सकती हैं।

इतनी हड़बड़ी में क्यों है सरकार

वर्ष 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून के समय श्रीमती सुषमा स्वराज, श्री विनय कटियार और रविशंकर प्रसाद ने संसद में जो कुछ कहा था, वे भाषण फिर से सुने जाने चाहिए और भाजपा से पूछा जाना चाहिए कि उनके सत्ता में रहने के और विपक्ष में रहने के आचरण में इतना द्वंद्व क्यों है? जिस कानून को बने साल भर नहीं बीता उस पर अध्यादेश और उसके बाद एक नया कानून लाने की तैयारी सरकार की विश्वसनीयता और हड़बड़ी पर सवाल खड़े करती है। एक साल के भीतर ही नया कानून लाने की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं। सरकार के प्रबंधकों को इस व्यापक विरोध की आशंका जरूर रही होगी। बावजूद इसके किसानों को साथ लेने की कोशिश क्यों नहीं की गई? यह एक बड़ा सवाल है। सरकार का कहना है कि उसने कई गैर-भाजपा राज्यों के सुझावों पर बदलाव करते हुए यह अध्यादेश जारी किया है। सवाल यह उठता है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने विरोधी राजनीतिक दलों के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की सलाह पर इतनी मेहरबान क्यों है कि उसे अपनी छवि की भी चिंता नहीं है। दिल्ली का चुनाव इन्हीं अफवाहों और भ्रमों के बीच हारने के बावजूद बीजेपी खुद को कॉरपोरेट और उद्योगपतियों के समर्थक तथा किसानों और आम आदमियों के विरोधी के रूप में स्थापित क्यों करना चाहती है?  यह आश्चर्य ही है कि लोगों को भरोसे में लिए बिना कोई राजनीतिक दल अपनी छवि को भी दांव पर लगाकर विकास की राजनीति करना चाहे। ऐसे विकास के मायने क्या हैं, जिसका लोकमत विरोधी हो? जिन कांग्रेसी और अन्य दलों के मित्रों के सुझाव पर भाजपा सरकार यह अध्यादेश लाई है, वे सड़क पर सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं।

भूमि अधिग्रहण तो ठीक भूमि-वितरण पर भी सोचिए

किसी भी भूमि अधिग्रहण के पहले, जिस सार्वजनिक सर्वेक्षण की वकालत पुराना कानून करता है, उसे हटाना भी खतरनाक है। इस कानून की स्टैंडिंग कमेटी की चेयरमैन रहीं श्रीमती सुमित्रा महाजन आज लोकसभा की अध्यक्ष हैं। जाहिर तौर पर 2013 में बने कानून के प्रभावों का साल-दो साल अध्ययन करने के बाद सरकार किसी नये कानून की तरफ लोगों से व्यापक विमर्श के बाद आगे बढ़ती तो कितना अच्छा होता। इस देश में भूमि अधिग्रहण की घटनाएं अनेक बार हुई हैं, विकास के नाम पर लगभग छह करोड़ लोगों का विस्थापन आजादी के बाद हुआ है। लेकिन, आप देखें तो केवल 17 प्रतिशत लोगों का हमारी सरकारें पुनर्वास कर सकी हैं। भाखड़ा नांगल बांध से लेकर नर्मदा के विस्थापित आज भी अपने बुनियादी अधिकारों के लिए मोहताज हैं। आजादी के बाद ऐसी स्थितियां हमें बताती हैं कि आज भी आखिरी आदमी सत्ताधीशों की चिंताओं से बहुत दूर है। देश में भूमिहीनों की एक बड़ी संख्या के बाद भी भूमि सुधार की दिशा में सरकारों ने बहुत कम काम किया है। सरकारें भूमि अधिग्रहण पर बातें करती हैं लेकिन भूमिहीनों को भूमि वितरण के सवाल पर खामोशी ओढ़ लेती हैं। जनहित क्या सिर्फ अमीरों को जमीन देना है या गरीबों को जमीनों से महरूम रखना?  संसद में एक समय श्री विनय कटियार और श्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि 70 या 80 नहीं बल्कि 100 प्रतिशत किसानों की सहमति होने पर ही भूमि का अधिग्रहण किया जाना चाहिए। क्या राजनीति सत्ता में होने की अलग है और विपक्ष में होने की अलग?

क्या सरकारें ही देशहित में सोचती है

किसानों की आत्महत्याओं की निरंतर खबरों के बीच सरकार बता रही है कि कब, किसकी सरकार के समय कितने अध्यादेश आए थे। आखिर इस तरह के कुतर्कों का मतलब क्या है?  आप हजार अध्यादेश लाएं वह एक संवैधानिक व्यवस्था है, किंतु क्या ये अध्यादेश बहुत जरूरी था, क्या इसके पक्ष में जनमत है? इन प्रश्नों का विचार जरूर करना चाहिए। या फिर जनमत बनाने की ओर बढ़ना चाहिए। केंद्र के एक माननीय मंत्री कहते हैं कि “हमारा बहुमत है, हम कानून पास करेंगे।” सत्ता की ऐसी भाषा न तो लोकतांत्रिक है, न ही स्वीकार्य। इसी तरह की देहभाषा और वाचालता जब यूपीए के मंत्री दिखाते थे, तो देश ने उसे दर्ज किया और समय पर प्रतिक्रिया भी की। हमारे वर्तमान राष्ट्रपति स्वयं ही एक अनुभवी राजनेता हैं। वे केंद्र की बहुमत प्राप्त सरकार को यह आगाह कर चुके हैं कि वह अध्यादेशों से बचे और लोगों की सहमति से कानून बनाए। बेहतर होगा कि सरकार इस पूरे मामले पर लोगों से सुझाव मांगे क्योंकि इस सरकार ने वोट अच्छे दिनों के लिए मांगे थे। अगर सरकार के किसी कदम से समाज के किसी वर्ग में यह आशंकाएं भी पैदा हो रही हैं कि वह उनके खिलाफ कानून बना रही है तो प्रधानमंत्री की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने ‘मन की बात’ लोगों से सीधे करें, न कि संसद के फ्लोर मैनेजर के भरोसे देश को छोड़ दें। यह कैसे माना जा सकता है कि सरकारें ही राष्ट्रहित में सोचती हैं? अगर ऐसा होता तो सरकारों के खिलाफ इतने बड़े-बड़े आंदोलन न खड़े होते और सरकारें न बदलतीं।

आज देश में लगभग 350 जगहों पर भूमि को लेकर टकराव दिख रहे हैं। एक जमाने में भाजपा ने खुद स्पेशल एकॉनोमिक जोन का विरोध किया था। सेज के नाम पर लगभग सात राज्यों में 38 हजार 245 हेक्टेयर जमीन सरकार ने किसानों से ली, उनमें से ज्यादातर खाली पड़ी हैं। पुनर्वास और उजड़ते किसानों की चिंताओं के बावजूद सरकारें एक सरीखा चरित्र अख्तियार कर चुकी हैं। जिनमें अच्छे दिनों की उम्मीदें दम तोड़ रही हैं। 1947 में जहां 20 करोड़ लोग खेती पर निर्भर थे, वहीं आज 70 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में अगर शरद यादव राज्यसभा में यह कहते हैं कि “खेती से बड़ा कोई उद्योग नहीं है” तो हमें इस बात पर विवाद नहीं करना चाहिए। बेहतर होगा कि हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री स्वयं आगे आकर देश के किसानों और आमजन की शंकाओं का समाधान करें। देश उनके मुंह से सुनना चाहता है कि आखिर यह कानून कैसे लोगों का उद्वार करेगा? वे कहेंगे तो लोग जमीनें छोड़ सकते हैं, लेकिन शर्त है कि सरकार संवाद तो करे।

लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लेषक हैं. संपर्क: 09893598888

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संजय द्विवेदी द्वारा संपादित दो पुस्तकों का विमोचन

भोपाल, 10 फरवरी। मीडिया विमर्श के तत्वावधान में आयोजित समारोह में लेखक एवं मीडिया गुरु संजय द्विवेदी द्वारा संपादित दो पुस्तकों ‘अजातशत्रु अच्युतानंद’ और ‘मीडिया, भूमण्डलीकरण और समाज’ का विमोचन किया गया। इस मौके पर संपादक श्री द्विवेदी ने कहा कि दोनों पुस्तकें रचनात्मक और सृजनात्मक पत्रकारिता के पुरोधाओं को समर्पित हैं। पुस्तकों का विमोचन माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व विद्यार्थियों ने किया, जो इन दिनों देश के विभिन्न मीडिया माध्यमों में कार्यरत हैं। कार्यक्रम का आयोजन सात फरवरी को भोपाल स्थित गांधी भवन में किया गया। इस मौके पर दिल्ली, छत्तीसगढ़, पंजाब, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, बिहार और उत्तरप्रदेश सहित अन्य शहरों से आए मीडियाकर्मी, बुद्धिजीवी एवं पत्रकारिता के विद्यार्थी मौजूद थे।

लेखक एवं संपादक श्री संजय द्विवेदी लगभग दो दशक से पत्रकारिता एवं लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा कई मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। वर्तमान में वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। श्री द्विवेदी निरंतर लेखन और संपादन में कार्यरत हैं। उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘अजातशत्रु अच्युतानंद’ का लोकार्पण संयुक्त रूप से सात पूर्व विद्यार्थियों ने किया, जिनमें आर जे अनादि (रेड एफएम, भोपाल), प्राची मजूमदार (हिंदुस्तान टाइम्स, भोपाल), राहुल चौकसे( पीपुल्स समाचार, भोपाल),पंकज कुमार साव( भास्कर डाट काम, रांची), मनीष अग्रवाल (नई दुनिया, इंदौर), हेमंत पाणिग्राही (जगदलपुर) और पंकज गुप्ता (जनजन जागरण, भोपाल) शामिल हैं।

इसी तरह दूसरी किताब ‘मीडिया, भूमण्डलीकरण और समाज’  का विमोचन सर्वश्री का लोकार्पण संयुक्त रूप से सात पूर्व विद्यार्थियों ने किया जिनमें संयुक्ता बनर्जी( भास्कर डिजिटल, भोपाल), अमित सिंह (आजतक,दिल्ली) चैतन्य चंदन ( डाउन टू अर्थ, दिल्ली),  राजीव कुमार गांधी (साधना टीवी, रायपुर), कौशल वर्मा (दिल्ली), प्रेम राम त्रिपाठी (स्टार समाचार, सतना), दीपक कुमार (बिहार पुलिस) शामिल हैं। दोनों पुस्तकें नई दिल्ली के प्रकाशक यश पब्लिकेशंस ने प्रकाशित की हैं। ‘अजातशत्रु अच्युतानंद’ पुस्तक जनसत्ता के पूर्व संपादक और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। पुस्तक में विभिन्न विद्वानों के लिखे 30 आलेख शामिल हैं। सर्वश्री रामबहादुर राय, विश्वनाथ सचदेव, पद्मश्री रमेशचंद्र शाह, पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, कैलाशचंद्र पंत, रघु ठाकुर, प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, रमेश नैयर, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, अभय प्रताप, संत समीर सहित कई प्रमुख लोगों ने अच्युतानंद मिश्र के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है।

दूसरी पुस्तक ‘मीडिया, भूमण्डलीकरण और समाज’ समूची पत्रकारिता के क्षेत्र में आए बदलावों को उजागर करती हुई दिखती है। संपादक संजय द्विवेदी कहते हैं कि “भूमण्डलीकरण के बाद देश के मीडिया की स्थितियों में बहुत बदलाव आए हैं। सच कहें तो पूरी दुनिया ही बदल गई है। ऐसे में भूमण्डलीकरण के चलते विविध क्षेत्रों में पड़े प्रभावों का आकलन मीडिया प्राध्यापकों, पत्रकारों, चिंतकों और विद्वानों ने इस पुस्तक में किया है।” पुस्तक में विभिन्न विद्वानों के 34 आलेख 203 तीन पृष्ठों में समाहित हैं। डॉ. रामगोपाल सिंह, पी. साईंनाथ, अष्टभुजा शुक्ल, प्रो. कमल दीक्षित, डॉ. सुशील त्रिवेदी, आनंद प्रधान, डॉ. श्रीकांत सिंह, डॉ. वर्तिका नंदा, अनिल चमडिय़ा, डॉ. हरीश अरोड़ा, डॉ. सुभद्रा राठौर, अंकुर विजयवर्गीय, लोकेन्द्र सिंह और ऋतेश चौधरी सहित अन्य विद्वानों ने इस पुस्तक में मीडिया में आए बदलावों को रेखांकित किया है। दोनों पुस्तकें निश्चित ही पत्रकारिता से जुड़े बौद्धिक जगत और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी साबित होंगी।

पुस्तक परिचयः

1. अजातशत्रु अच्युतानंद, संपादकः संजय द्विवेदी,

प्रकाशकः यश पब्लिकेशंस, 1 /11848, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा

दिल्ली-110032

मूल्यः 395/-   पृष्ठः144

2. मीडिया, भूमंडलीकरण और समाज, संपादकः संजय द्विवेदी,

प्रकाशकः यश पब्लिकेशंस, 1 /11848, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा

दिल्ली-110032

मूल्यः 495/-   पृष्ठः207

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