चार महीने पहले रेल टिकट कटाने वाले इंजीनियर का दिवाली पर घर जाने का सपना ‘वेटिंग’ ही रह गया!

Yashwant Singh : हरिद्वार में कार्यरत इंजीनियर गौरव जून महीने में तीन टिकट कटाए थे, दिल्ली से सहरसा जाने के लिए, अपनी बहनों के साथ। ट्रेन आज है लेकिन टिकट वेटिंग ही रह गया। चार्ट प्रीपेयर्ड। लास्ट मोमेंट में मुझे इत्तिला किया, सो हाथ पांव मारने के बावजूद कुछ कर न पाया। दिवाली अपने होम टाउन में मनाने की उनकी ख्वाहिश धरी रह गई। दिवाली के दिन अपने जिला-जवार में होने की चार महीने पहले से की गई तैयारी काम न आई।

धन्य है अपना देश। धन्य है भारतीय रेल। हां, सत्ता के नजदीकियों के चिंटू पिंटू मिंटू जब चाहें टिकट कटा कर सीधे रेल मंत्रालय से कन्फर्म करा सकते हैं। सरकार चाहें कांग्रेसियों की हो या संघियों की, इस देश में दो देस होने का एहसास बना रहेगा।

भड़ास एडिटर यशवंत की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Dushyant Rai प्रभु ने जुलाई में वेटिंग खत्म करने की बात कभी नहीं की थी।वाजपेयी सरकार के मालगाड़ियों के लिए अलग लाइनों (DFC)को अगर यूपीए सरकार ने पूरा किया होता तो आज किसी को टिकट के लिए रोना नहीं पड़ता। इस सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।मालगाड़ी में अधिकतम लोडिंग करने से पुरानी पटरियों की भी हालत गंभीर हो गई थी।हजारों किलोमीटर के ट्रैक पर 2 करोड़ यात्रियों को ढोते हुए भी यह सरकार अगले साल से कई रूटों पर DFC शुरू कर देगी। लगभग 3 साल में सबको बर्थ मिलने लगेगी और यात्रा का समय भी काफी कम हो जाएगा।

Rajiv Tiwari दूर तक साफ दिखाने वाला चश्मा लगाइए, मोदी लेंस को बदलकर।

Dushyant Rai अलीगढ़ से कानपुर की यात्रा ट्रेन यात्रा आम आदमी बन कर कीजिए, काम की गति और क्वालिटी देखकर आप को अपने कमेंट के लिए बड़ी शर्म आएगी।

Rajiv Tiwari शर्म आती है दुष्यंत जी, आप जैसे अंध समर्थकों पर, जो यह मानते है भारत निर्माण केवल 3 वर्षों में हुआ है। वरना पहले तो विशाल बियाबान जंगल था यहां। ट्रेन तो लोगों ने देखी ही नहीं थी…हैं ना सही बात।

Yashwant Singh भाई Rajiv Tiwari, दुष्यंत जी अपने पुराने मित्र और खरे आदमी हैं। रेल मंत्रालय से जुड़े हैं। हम लोगों को इनकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। दूसरा पक्ष हमेशा महत्वपूर्ण होता है। मालगाड़ी और यात्री रेल की लाइन अलग किए जाने की व्यवस्था से निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।

Rajiv Tiwari सहमत हूँ यशवंत भाई, लेकिन पक्ष को संतुलित तरीके से रखना भी एक कला होती है।

Sanjaya Kumar Singh दुष्यंत राय जी, दो नहीं तीन मोर्चों पर कहिए। यूपीए सरकार ने बुलेट ट्रेन भी चला दी होती तो मोदी जी को उसपर भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मेट्रो चलाया था तो उसका किराया बढ़ाकर खुश होने का मौका भी नहीं मिलता।

Yashwant Singh और ये भी सच है कि 60 साल में कांग्रेस अगर सबको यात्रा सुविधा प्रदान नहीं कर पाई तो प्राइमरी अपराधी हाथ का पंजा ही है। हां, bjp चीजों को ठीक करने के नारे के साथ आई थी तो इससे उम्मीद ज्यादा है और फिलहाल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी है। हो सकता है सही नीति पर अमल करके आगे चीजें ठीक कर दी जाएं, जिसका हम सबको इंतज़ार है।

Rajiv Tiwari संजय जी, बुलेट ट्रेन आने से देश का चहुँमुखी विकास हो जाने वाला है, जैसा पहले की सरकारों ने मेट्रो लाकर किया। चारों ओर सुख शांति, कहीं कोई परेशान नहीं, सर्व सुविधाओं की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और हर देशवासी उसमें गोते लगाकर पुण्य बटोर रहा है।

Rajiv Tiwari ठीक कहा आपने यशवंत भाई, कांग्रेस ने 60 साल में जो कुछ किया उसका परिणाम उसके सामने है। लेकिन 3 साल में 6 दशकों पुरानी मैली गंगा साफ करने का दावा करने वाले ये बातों के शेर खुद कहाँ खड़े हैं।

Sanjaya Kumar Singh मूल मुद्दा ये है Yashwant Singh जी कि वेटिंग लिस्ट लेने की भी तमीज नहीं है। जब तीन या चार महीने पहले बुकिंग शुरू होती है और छठ के लिए महीने भर बाद ही वेटिंग शुरू हो जाता है तो ये तय होना चाहिए कि वेटिंग कितना बुक करना है, कब तक और जो बुक हो जाए उसे कंफर्म मिलना ही चाहिए। वैसे भी अब जब अंतिम समय पर कैंसल कराने वालों को नहीं के बराबर पैसे मिलते हैं तो कुछ सीटें खाली रह जाएं पर तीन महीने पहले बुक कराने वालों को अंतिम दिन पता चले कि कंफर्म नहीं हुआ और उसे डिफेंड किया जाए कि फलाने ने वो नहीं किया और ढिमाके ने वो नहीं किया – खरा आदमी होना तो नहीं हो सकता। नौकरी हो रही है – उससे मुझे कोई एतराज नहीं है।

Dushyant Rai भाई साहब रेल का नेटवर्क इतना विशाल और इतने बोझ से दबा है कि नई सरकार रेल लाइन बिछाने, विद्युतीकरण और पुरानी लाइन सुधार में लगभग तीन गुना गति से काम कर रही है फिर भी अभी तीन साल लगेगा जनता को अपेक्षित सुविधा मिलने में।

Sanjaya Kumar Singh आप ठीक कह रहे हैं। फिर भी, जब अंतिम समय में कैंसल कराने वाले को टिकट नहीं मिलता है तो क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए (जैसे भी और उसमें छठ स्पेशल ट्रेन में वैकल्पिक आरक्षण मिलने पर चाहिए कि नहीं पूछ लेना शामिल है) कि तीन महीने पहले अपनी जरूरत बताने वाले को निराश नहीं किया जाए। क्या इस जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रेलवे की लाचारी को डिफेंड किया जाए? निश्चित रूप से यह लाचारी 130 करोड़ की आबादी के कारण है और हर कोई नरेन्द्र मोदी होता तो यह स्थिति नहीं आती। पर ये कर दूगां, वो कर दूंगा – कहने से पहले भी यही स्थिति थी।

Shyam Singh Rawat मैं ट्रेन नंबर 15035 व 15036–उत्तरांचल सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस का इसकी शुरुआत से ही नियमित यात्री हूं जो काठगोदाम-दिल्ली रूट पर चलती है। यह ट्रेन पहले ISO 9000 तथा ISO 2001-2008 द्वारा प्रमाणित एक अच्छी सेवा थी। अभी 25 सितंबर को इस ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ (Coach No.D-9), गाड़ी की हालत बहुत बुरी है। समय-पालन, डिब्बे के भीतर सफाई, कैटरिंग, पानी आदि सब चौपट। यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग सुविधा भी खत्म। 4 अक्टूबर को इसी ट्रेन नं.–15036 से वापस आने के लिए जब दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो नैशनल ट्रेन इक्वायरी सिस्टम पर इसका आगमन-प्रस्थान निर्धारित समय-सारणी के अनुसार ही क्रमश: 15.25 और 16.00 बजे दिखाया जा रहा था। जबकि सच्चाई यह थी कि यह ट्रेन 16.05 पर प्लेट फार्म सं―5 पर पहुंची और वहां से 16.35 पर काठगोदाम के लिए चली। यह ट्रेन अपने गंतव्य पर डेढ़ घंटा विलंब से पहुंची। इसकी शिकायत नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से उनके फेसबुक पेज पर की जिसे कुछ ही पलों में डिलीट कर दिया गया था। शायद यह मोदी सरकार की कपटपूर्ण नीति के अनुसार ‘आल इस वैल’ दिखा कर देश में भ्रम का वातावरण बनाने का एक हिस्सा है।

Prashant M Kumar ऐसे में बस यही लगता है कि अपना देश भी परदेस हो गया

Sarwar Kamal इस देश मे दो देश होने का अहसास बना रहेगा

निखिलेश त्रिवेदी भारतीय रेलवे जैसी थी और है वैसी ही आगे भी रहेगी। कायाकल्प की उम्मीद नहीं है।

Pramod Patel यह सरकार भी फेल. . . जनता ने मौका दिया और जनता को ही लुट लिया. . .

Pankaj Kumar अरे बाबा, मैने खुद कोलकाता से मोतिहारी जाने के लिये आज से तीन महीने पहले दो टिकट एसी टू टियर की ली थी। वेटिंग 1 और 2 मिला था। आज तक सीट कंफर्म नहीं हुआ हैं। परिवार को ले जाना है इस हताशे से फ्लाइट से दूसरे रूट से टिकट लिया। जो सबकुछ मिलाकर करीब करीब चौगुना बजट बढ़ गया। सभी रेलवे के मिनिस्टर , अधिकारी कहते फिरते है कि रेलवे घाटे में चल रही है, कोई आदमी बतावें कि जिस दिन उसे यात्रा करना है और उस दिन टिकट उसे आराम से मिल जाये। सभी ट्रेनें सालों भर फ़ूल रहती है। ट्रेन की सीटों से ज्यादा रेलवे के कर्मचारी है। जो दिनभर ऑफिस में गप व डींगें हाँकते और मारते है। सैलरी लेते है सबसे ज्यादा। आखिर क्यों न रेलवे घाटे में जाये।

Sushant Saurav Kya kahein iske liye bjp se jyada congg jimmedar h agar 50 salon m Cong Kam krti to bjp aati hi nhi

Gajendra Kumar Singh प्रभु जी तो जुलाई से वेटिंग खत्म करने की घोषणा की थी । अब तो खुद ही खिसक गये ।

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मोदी को भगवान न बनाओ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की घोषणा क्रांति की जमीन मेरठ में एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने की है। सिचाई विभाग से रिटायर इंजीनियर जेपी सिंह की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। ऐसे में उनके नाम का मंदिर बनना चाहिए। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो इस ऐलान के पीछे किसी की व्यक्तिगत इच्छा और भावना ही दिखाई देती है। पर रिटायर इंजीनियर की घोषणा एक लोकतांत्रिक देश में किसी नेता को भगवान बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

ऐसा नहीं है कि ऐसी घोषणा कोई पहली दफा देश में हुई है। प्रायः दक्षिण भारत से नेताओं और फिल्मी सितारों के मंदिर बनाने और पूजा करने की खबरे आती रही हैं। देश के कई राज्यों में कई लोगों ने अपने पंसदीदा नेताओं, फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के मंदिर बनाये हैं। वहीं अपने पंसदीदा सितारों और नेताओं की तस्वीर की पूजा करने वाले भी बढ़ी संख्या में है।

समर्थकों की ओर से अपने नेताओं के प्रति प्रेम दर्शाने के कइ्र्र मामले प्रकाश में आये हैं। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसी नेता हैं जिन्होंने खुद ही अपनी मूर्तियां लगवाई हैं। यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के पार्कों, स्मारकों में दलित नेताओं, चिंतकों, और सुधारकों के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं भी लगवाई हैं। इन प्रतिमाओं को लेकर यूपी की सियासत भी कई बार गर्मा चुकी है। लेकिन मूर्तियां वहीं की वहीं हैं। मायावती की शान में ‘माया पुराण’ की रचना भी की गई है। जिसमें मायावती को समता मूलक समाज की आराध्य देवी कहा गया है।

मोदी संघर्ष के नेता हैं। स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली पद तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। एक गरीब परिवार का लड़का आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ध्वजवाहक है। मोदी का जीवन चरित्र और संघर्ष देश के लाखों-लाख देशवासियों के लिये प्रेरणादायी है। उनका जीवन अभाव और गरीबी में बीता। ऐसे में समाज का वंचित, पिछड़ा, गरीब, मजदूर, किसान और अभाव में जीवन यापन करने वाला हिस्सा मोदी को अपना रोल माडल मानता है। आबादी का यह बड़ा हिस्सा मोदी केे जीवन से किसी न किसी तरीके से प्रेरणा पाता है। विधार्थी और युवा विशेषकर बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री मोदी को अपना रोल माडल मानते हैं।

भारत में फिल्मी सितारों के नाम पर मंदिर बनाया जाना कोई नई बात नहीं है। पहले इस तरह की खबरें केवल दक्षिण भारत से ही आती थीं। लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी खबरें सुनने में आती हैं। अभिनेत्री खुशबू के नाम का मंदिर तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली में मौजूद है और वो इस पर आश्चर्य व्यक्त कर चुकी हैं। खुशबू के अलावा ममता कुलकर्णी, नमीता, पूजा उमाशंकर के नाम पर भी मंदिर बातें की जाती हैं लेकिन अब तक उनकी पुष्टि नहीं हो सकी है। अमिताभ को पसंद करने वालों ने कुछ समय पहले कोलकाता में उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था जहां उनकी पूजा होती है। शिवसेवा के संस्थापक बाल ठाकरे का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। चंद्रपुर जिले के भद्रावती में इस मंदिर के निर्माण के लिए भद्रावती नगर परिषद ने करीब पांच एकड़ जमीन दी है।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि का मंदिर राज्य के वैलूर जिले में उनके समर्थको ने स्थापित किया है। डॉक्टर येदुगुड़ी सनदिंति राजशेखर रेड्डी को वाईएसआर के रूप में जाना जाता रहा. वे आंध्र प्रदेश के एक करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की इकाई ने विशाखापटनम में उनकी याद में एक मंदिर का निर्माण कराया। राजगोपालापुरम गांव में बने इस मंदिर को राजशेखरा रेड्डी अलायम नाम दिया गया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में 15 साल पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी का मंदिर बनवाया गया था। सत्यनारायण टेकरी नाम की पहाड़ी पर बने इस मंदिर में बाकायदा एक पुजारी भी रखा गया हैै। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के एक गांव में मोदी की मूर्ति की रोज पूजा-अर्चना की जाती है। आरएसएस के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रह चुके बृजेंद्र मिश्र ने भगवानपुर गांव के शिव मंदिर में मोदी की प्रतिमा स्थापित की थी। उसके बाद मंदिर को नाम दिया गया था ‘नमो नमो मंदिर’। इस मंदिर में रोज सुबह और शाम मोदी की आरती और पूजा की जाती है. जिसमें गांव के लोग भी भाग लेते हैं।

आंध्र प्रदेश के महबूब नगर में एक कांग्रेसी नेता ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक बड़ी मूर्ति बनवाई। नौ फीट की इस मूर्ति को तेलंगाना टाल्ली नाम दिया गया। जिसका अर्थ होता है तेलंगाना की माता। इस काम को अंजाम दिया कांग्रेस नेता पी. शंकर राव ने. अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी की यह मूर्ति स्थापित की गई। इसके अलावा कई बार सोनिया के देवी रूप वाले पोस्टर भी चर्चाओं में रहे हैं। बिहार के भभुआ जिले में भोजपुरी फिल्मों अभिनेता मनोज तिवारी ने पूजा-पाठ के साथ साल 2013 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की मूर्ति का अनावरण किया था। उनका मंदिर कैमूर जिले में बनवाया गया है। राजस्थान में बीजपी नेता और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पूजा करने वाले भी बहुत हैं। जोधपुर जिले में एक भाजपा नेता ने शहर के एक मंदिर में राजे का बड़ा सा पोस्टर लगाकर उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। उस पोस्टर में वसुंधरा राजे को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाया गया है।

गुजरात के राजकोट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर एक स्थानीय संगठन ओम युवा समूह ने बनवाया है। करीब 300 लोगों के इस संगठन ने आपस में चंदा एकत्र कर मंदिर बनाने का सारा खर्च उठाया। मंदिर बनाने में 4-5 लाख रुपये का खर्च आया है। मंदिर का उद्घाटन एक केंद्रीय मंत्री को करना था लेकिन मोदी की नाराजगी के बाद कार्यक्रम रद्द हो गया।
मीडिया खबरों के मुताबिक यह मंदिर मेरठ के सरधना क्षेत्र में मेरठ-करनाल हाईवे पर बनेगा। इसके लिए पांच 5 एकड़ की जमीन भी तय कर ली गई है। इसमें मोदी की 100 फीट ऊंची मूर्ति लगेगी। मंदिर निर्माण में दस करोड़ का खर्च आएगा। मंदिर बनाने में आने वाली लागत मोदी भक्तों से चंदे के रूप में लिया जाएगा। मंदिर का भूमि पूजन 23 अक्टूबर को होगा। इसको बनने में करीब 2 वर्ष का समय लगेगा। इस मंदिर के उद्घाटन के लिए बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भी पुष्पराज सिंह यादव नाम के एक व्यक्ति ने जलालपुर में मोदी का मंदिर बनाने का काम शुरू किया था। करुणानिधि का भक्त कहने वाले एक व्यक्ति ने वेल्लूर में उनका मंदिर बनाया है।

किसी की पसंद-नापंसद और भावनाओं को रोका नहीं जा सकता। पर सवाल यह है कि इस सबसे क्या होगा, क्या देश का कुछ भला होगा? मोदी समर्थकों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि मोदी खुद कभी ऐसा नहीं चाहेंगे। जिस देश में आज भी करीब 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं, करोड़ों लोगों को सिर ढकने के लिए एक अदद छत का सहारा नसीब नहीं है, न जाने कितने ही लोग भूखे पेट सोते हैं, वहां ऐसे मंदिरों की क्यों जरूरत पड़ने लगी।

इससे पूर्व भी गुजरात के राजकोट में 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाने की कोशिश की गई थी। ये कोशिश प्रधानमंत्री के समर्थकों की ओर से की गई थी। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने नाखुशी जताते हुए खबर को ‘स्तब्धकारी’ और ‘भारत की महान परंपराओं’ के खिलाफ बताया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है, मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है। मैं लोगों से ऐसा नहीं करने का आग्रह करता हूं।’ प्रधानमंत्री के ट्वीट के बाद राजकोट प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वहां से मोदी की मूर्ति को हटवा दिया था। लेकिन उस प्रकरण से भी कोई सीख ना लेते हुए अब उत्तर प्रदेश के मेरठ में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य मंदिर बनाने की बात कही जा रही है। हालांकि अभी तक मेरठ में मंदिर बनाए जाने के ऐलान पर पीएम मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि प्रधानमंत्री जल्द ही इस पर पिछली बार की तरह कोई ठोस कदम उठाएंगे।

लोकतंत्र में किसी नेता को भगवान का दर्जा देना उसका सम्मान बढ़ाना कतई नहीं हो सकता। जनप्रिय नेता तो प्रत्येक देशवासी के दिल में बसता है। उसके लिये किसी मंदिर या पूजा स्थल की जरूरत नहीं होती है। जब जनता अपने प्रिय नेता के कंधे से कंधा मिलाकर देश विकास के कार्यों में जुटती है तो ज्यादा सकारात्मक परिणाम हासिल होते हैं। पीएम मोदी का मंदिर बनाने वाला रिटायर अधिकारी अगर उनका मंदिर बनाने की बजाय गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के लिये विधालय, भूखों के लिये अन्न सेवा, पर्यावरण बचाने की मुहिम, नदियों की सफाई, स्वच्छता अभियान या विभिन्न सामाजिक कुरीतियों की दिशा में काम करे तो देशवासियों व प्रधानमंत्री को ज्यादा खुशी होगी।

मोदी पहले से ही 15 लाख वाले कोट के कारण काफी आलोचना झेल चुके हैं और अब यह मंदिर। ऐसे शगूफे वे नेता, समर्थक या प्रशंसक छोड़ते हैं जो जनता की सेवा करने में तो विफल रहते हैं, लेकिन अपने आकाओं की सेवा करना और चापलूसी का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते हैं। मोदी को भगवान बनाने से बेहतर है कि उन्हें सुशासन देने में ये नेता मदद करें। स्वयं प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक बता चुके हैं। इससे पूर्व जिन नेताओं या अभिनेताओं की मूर्तियां लगी या मंदिर उनके चाहने वालों न बनाएं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि किसी गलत परिपाटी को लगातार आगे बढ़ाया जाए। समाज में इस चेतना का संचार भी जरूरी है। ऐसी प्रवृति पर रोक लगनी चाहिए, किसी लोकतांत्रिक देश में किसी नेता का मंदिर बनना शुभ लक्ष्ण नहीं है। क्योंकि इससे नेता या लोकतंत्र दोनों में से किसी एक का नुकसान होना लाजिमी है।

डॉ. आशीष वशिष्ठ
स्वतंत्र  पत्रकार
लखनऊ, उ0प्र0, (भारत)
मोबाइल: (+91) 94 5100 5200  
E-mail : avjournalist@gmail.com

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एनडीटीवी और एबीपी न्यूज के अलावा बाकी सभी अखबार-चैनल करवा चौथ व्रत पर हैं!

Sheetal P Singh : सिर्फ एनडीटीवी और एबीपी न्यूज़ ही यह सूचना लोगों तकपहुंचा रहे हैं कि जय शाह की संपत्ति 16000 गुना बढ़ी| जबकि यह खुद जय शाह ने अपने रिटर्न में दाखिल किया है| बाकी सारे चैनल/ अखबारों के वेबपेज आज करवा चौथ के व्रत पर हैं!

Avinish Mishra : भक्तों की गुप्त डायरी से… मोटा भाई ने कोई घोटाला नहीं किया है.. मोटा भाई का संपत्ति तीन सौ गुणा नहीं बढ़ा है.. मोटा भाई के बेटे का बिजनेस 16000 गुणा नहीं बढ़ा है.. ये सब कोरी अफवाह है.. पार्टी को बदनाम करने कि साजिश है.. वामपंथी साजिश एक बार फिर नाकाम होंगे.. सुधर जाओ वामपंथियों.. दूध जैसे मोटा भाई पर दाग लगा रहे हो?? आई लव मोटा भाई.. आई लव जै भाई.. आई लव मोदी.. धन्यवाद!!

Dilip Khan : दो ही बातें हो सकती हैं। या तो जय शाह ने ईमानदारी से पैसे कमाए या फिर बेइमानी से। अगर ईमानदारी से कमाए तो जय शाह उद्यमियों का नायक हो सकता है। लेकिन सारे भक्त जिस तरह इस स्टोरी पर रिएक्ट कर रहे हैं, उससे ईमानदारी वाली बात ख़ुद ही ख़ारिज हो जा रही है। भक्त ख़ुद ही मिट्टी पलीद कर देते हैं वरना मैं तो शुरू से कह रहा कि जय शाह ने “दीन दयाल उपाध्याय पुत्रोन्नति योजना” के तहत पैसे कमाए। जय शाह जब उद्यमी बना तो कुछेक हज़ार रुपए से शुरुआत की। जय शाह को 2013-14 में 1,724 रुपए का घाटा हुआ। फिर जय शाह के पापा जिस पार्टी के अध्यक्ष थे, वो सत्ता में आ गई। जय शाह की कंपनी अगले ही साल साढ़े 80 करोड़ रुपए का व्यापार करने लग गई। ये देखकर पूरे देश में खुशहाली छा गई। अभूतपूर्व विकास देखकर लोगों ने रोटी की जगह केक खाना शुरू कर दिया। यूनेस्को ने इसे सर्वश्रेष्ठ विकास घोषित कर दिया। [आप चाहें तो जय शाह को विकास शब्द से रिप्लेस करके भी पढ़ सकते हैं]

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह, अविनीश मिश्रा और दिलीप खान की एफबी वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें…

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अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने ‘द वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही

‘द वायर’ की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है

Nitin Thakur : अमित शाह के बेटे की कमाई का हिसाब किताब जान लीजिए। जब आपकी नौकरियां जा रही थीं, तब कोई घाटे से 16 हज़ार गुना मुनाफे में जा रहा था। द वायर की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है।

Nitesh Tripathi : जब लगभग अधिकांश मीडिया हाउस सरकार के चरणों में लोट रही हैं ऐसे में ‘द वायर’ की एक स्टोरी ने सरकार के नाक में दम कर दिया. हालांकि इस खबर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार इतना तो जाने ले कि सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कोई तो ऐसा है जो अब भी धारा के विपरीत चलने का माद्दा रखता है. अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने प्रेस कांफ्रेंस कर ‘वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही है.

Abhishek Parashar : भक्तों ने मोटा भाई के बेटे की कंपनी में रातों रात हुई बेतहाशा बढ़ोतरी की खबर सामने लाने वाली रोहिणी सिंह के खिलाफ अपना काम शुरू कर दिया है. अभी कुछ लंपट यह कह रहे हैं कि उन्होंने ईटी से निकाल दिया गया, हो सकता है कल को यह बात कहीं और पहुंच जाए. लेकिन इन मूर्खों को यह समझ में नहीं आएगा, यह वही रोहिणी सिंह हैं, जिन्होंने वाड्रा के खिलाफ भी स्टोरी की थी. वही स्टोरी, जिसकी दम पर सवार होकर बीजेपी सत्ता में आई. भक्त भूलते बहुत तेजी से हैं, उन्हें याद नहीं रहता कुछ भी.

Manish Shandilya : न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की ख़बर में दावा किया गया कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की कंपनी का टर्न-ओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके पिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बेतहाशा बढ़ा है. ये ख़बर सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से फैली और ट्विटर और फ़ेसबुक पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गई. @ishar_adv नाम के हैंडल ने लिखा, ”बीजेपी ने अपना स्लोगन बदल लिया है. विकास की जय के बजाय जय का विकास. कोई ज्यादा अंतर नहीं है. अब हमें समझ आया कि आख़िर विकास कहां छिपा बैठा है.”

पत्रकार नितिन ठाकुर, नीतेश त्रिपाठी, अभिषेक पराशर और मनीष शांडिल्य की एफबी वॉल से.

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तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है, हमारे पास जय शाह!

Atul Chaurasia : जिनको लगता है कि मोदीजी ने भ्रष्टाचार मुक्त, स्वच्छ सरकार दे रखी है देश को उसे अमित शाह के बेटे जय शाह का प्रकरण जानना चाहिए. साथ ही आनंदी बेन पटेल के बेटे और बेटी का भी मामला जोड़ लीजियेगा। पिछली सरकार में दामादों की चांदी थी इस बार गुजरातियों के हाथ सोना-चांदी है।

Thakur Gautam Katyayn :  तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है तो हमारे पास जय शाह है। दोनों इतने प्रतिभावान हैं कि अपने -अपने सरकार के दौरान एक -दो साल में हीं इनकी कंपनी ने कई हज़ार गुना कमाई कर ली। रॉबर्ट वाड्रा को DLF ने unsecured लोन दिया था और अमित भाई शाह जी के बेटे जय शाह को रिलायंस के करीबी सांसद परिमल नाथवानी के समधी ने 15 करोड़ का लोन दिया। दोनों उद्योगपतियों ( रॉबर्ट और जय ) को प्राकृतिक संसाधनों से बहुत प्यार है। रॉबर्ट वाड्रा जमीन के धंधे में थे और जय शाह अनाज की खरीद- बिक्री और अक्षय ऊर्जा के कारोबार में। दोनों को खुद सामने आकर सफाई देने की कोई जरूरत नहीं है , उनके बिना कहे हजारों- लाखों लोग उनके वकील और चार्टर्ड एकॉउंटेंड बन कर उन्हें सही ठहराने में जुटे मिलेंगे। (नोट- संविधान के मुताबिक जब तक दोषसिद्ध नहीं हो जाता , व्यक्ति निर्दोष माना जायेगा। उपरोक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार श्री मनीष झा जी के हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छा लगा तो साझा कर रहा हूँ।)

Mayank Saxena : भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे के पक्ष में देश का रेलमंत्री प्रेस कांफ्रेंस कर के, उनकी कम्पनी की आय और काम के तरीके के आंकड़े समझा रहा है…आपको और अच्छे दिन चाहिए तो इस बार अमित शाह को ही प्रधानमंत्री बनाने की मांग कीजिए क्योंकि दाउद तो पीएम बनने भारत आने से रहा….

Rohini Gupte : अमि‍त शाह के सुपुत्र की कारस्‍तानी देख ली ना? शि‍वराज सिंह के सुपुत्र पर भी ध्‍यान रखि‍एगा। इसी साल से पट्ठे ने भोपाल में खोमचा खोलकर ‘फूल’ बेचना शुरू कि‍या है, र्स्‍टाटअप के नाम से…

पत्रकार अतुल चौरसिया, ठाकुर गौतम कात्यायन, मयंक सक्सेना और रोहिणी गुप्ते की एफबी वॉल से.

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अडानी के खदानों पर रिपोर्टिंग करने आई आस्ट्रेलियाई पत्रकारों की टीम को गुजरात पुलिस ने भगाया

आस्ट्रेलिया से ‘4कॉर्नर’ मीडिया हाउस की एक टीम अडानी के खदानों पर रिपोर्टिंग करने के लिए गुजरात आई थी. दरअसल आस्ट्रेलिया में सबसे बड़ी कोयला खदान परियोजना पर अडानी ग्रुप काम कर रहा है. इसी परियोजना के लिए पर्यावरण तथा अन्य ट्रैक रिकॉर्ड की जांच करने आस्ट्रेलिया की मीडिया टीम भारत आई थी. Continue reading

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‘भक्तों’ से जान का खतरा बताते हुए पीएम को लिखा गया रवीश कुमार का पत्र फेसबुक पर हुआ वायरल, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : भारत के प्रधानमंत्री को मेरा पत्र…

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सकुशल होंगे। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य की मंगल कामना करता हूं। आप असीम ऊर्जा के धनी बने रहें, इसकी दुआ करता हूं। पत्र का प्रयोजन सीमित है। विदित है कि सोशल मीडिया के मंचों पर भाषाई शालीनता कुचली जा रही है। इसमें आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के सदस्यों, समर्थकों के अलावा विरोधियों के संगठन और सदस्य भी शामिल हैं। इस विचलन और पतन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दुख की बात है कि अभद्र भाषा और धमकी देने वाले कुछ लोगों को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं। सार्वजनिक रूप से उजागर होने, विवाद होने के बाद भी फोलो करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की सोहबत में ऐसे लोग हों, यह न तो आपको शोभा देता है और न ही आपके पद की गरिमा को। किन्हीं ख़ास योग्यताओं के कारण ही आप किसी को फोलो करते होंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि धमकाने, गाली देने और घोर सांप्रदायिक बातें करने को आप फोलो करने की योग्यता नहीं मानते होंगे।

आपकी व्यस्तता समझ सकता हूं मगर आपकी टीम यह सुनिश्चित कर सकती है कि आप ऐसे किसी शख्स को ट्वीटर पर फोलो न करें। ये लोग आपकी गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। भारत की जनता ने आपको असीम प्यार दिया है, कोई कमी रह गई हो, तो आप उससे मांग सकते हैं, वो खुशी खुशी दे देगी। मगर यह शोभा नहीं देता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को फोलो करें जो आलोचकों के जीवित होने पर दुख जताता हो।

आज जबसे altnews.in पर पढ़ा है कि ऊं धर्म रक्षति रक्षित: नाम के व्हाट्स ग्रुप में जो लोग मुझे कुछ महीनों से भद्दी गालियां दे रहे थे, धमकी दे रहे थे, सांप्रदायिक बातें कर रहे थे, मुझ जैसे सर्वोच्च देशभक्त व दूसरे पत्रकारों को आतंकवादी बता रहे थे, उनमें से कुछ को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं, मैं सहम गया हूं। प्रधानमंत्री जी, इस व्हाट्स अप ग्रुप में मुझे और कुछ पत्रकारों को लेकर जिस स्तरहीन भाषा का इस्तमाल किया गया वो अगर मैं पढ़ दूं तो सुनने वाले कान बंद कर लेंगे। मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपनी सख़्त आलोचनाओं में भी आपका लिहाज़ करूं। महिला पत्रकारों के सम्मान में जिस भाषा का इस्तमाल किया गया है वो शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर आपके प्रति भी अभद्र भाषा का इस्तमाल किया जाता है। जिसका मुझे वाक़ई अफसोस है। लेकिन यहां मामला आपकी तरफ से ऐसे लोगों का है, जो मुझे जैसे अकेले पत्रकार को धमकियां देते रहे हैं। जब भी इस व्हाट्स अप ग्रुप से अलग होने का प्रयास किया, पकड़ इसे, भाग रहा है, मार इसे, टाइप की भाषा का इस्तमाल कर वापस जोड़ दिया गया।

राजनीति ने सोशल मीडिया और सड़क पर जो यह भीड़ तैयार की है, एक दिन समाज के लिए ख़ासकर महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इनकी गालियां महिला विरोधी होती हैं। इतनी सांप्रदायिक होती हैं कि आप तो बिल्कुल बर्दाश्त न करें। वैसे भी 2022 तक भारत से सांप्रदायिकता मिटा देना चाहते हैं। 15 अगस्त के आपके भाषण का भी इन पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हाल हाल तक मुझे धमकियां देते रहे हैं।

अब मेरा आपसे एक सवाल है। क्या आप वाक़ई नीरज दवे और निखिल दधीच को फोलो करते हैं? क्यों करते हैं? कुछ दिन पहले मैंने इनके व्हाट्स अप ग्रुप का कुछ स्क्रीन शाट अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ज़ाहिर कर दिया था। altnews.in के प्रतीक सिन्हा और नीलेश पुरोहित की पड़ताल बताती है कि ग्रुप का सदस्य नीरज दवे राजकोट का रहने वाला है और एक एक्सपोर्ट कंपनी का प्रबंध निदेशक है। नीरज दवे को आप फोलो करते हैं। जब मैंने लिखा कि इतनी अभद्र भाषा का इस्तमाल मत कीजिए तो लिखता है कि मुझे दुख है कि तू अभी तक जीवित है।

व्हाट्स अप ग्रुप का एक और सदस्य निखिल दधीच के बारे में कितना कुछ लिखा गया। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तब निखिल दधीच ने उनके बारे में जो कहा, वो आप कभी पसंद नहीं करेंगे, ये और बात है कि आप उस शख़्स को अभी तक फोलो कर रहे हैं। अगर मेरी जानकारी सही है तो। हाल ही में बीजेपी के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग़लत तरीके से एडिट की हुई मेरे भाषण का वीडियो शेयर किया था। इससे भ्रम फैला। altnews.in ने उसे भी उजागर किया मगर अमित मालवीय ने अफसोस तक प्रकट नहीं किया।

पर सर, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये निखिल दधीच मेरे मोबाइल फोन में आ बैठा है। घोर सांप्रदायिक व्हाट्स अप ग्रुप का सदस्य है जिससे मुझे ज़बरन जोड़ा जाता है। जहां मेरे बारे में हिंसक शब्दों का इस्तमाल किया जाता है। वाकई मैंने नहीं सोचा था कि इस ग्रुप के सदस्यों के तार आप तक पहुंचेंगे। काश altnews.in की यह पड़ताल ग़लत हो। निखिल दधीच की तो आपके कई मंत्रियों के साथ तस्वीरें हैं।

यही नहीं ऊं धर्म रक्षति रक्षित: ग्रुप के कई एडमिन हैं। कई एडमिन के नाम RSS, RSS-2 रखे गए हैं। एक एडमिन का नाम आकाश सोनी है। भारत की दूसरी महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जी, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा जी और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ आकाश सोनी की तस्वीर है। तस्वीर किसी की भी किसी के साथ हो सकती है लेकिन यह तो किसी को धमकाने या सांप्रदायिक बातें करने का ग्रुप चलाता था। आपके बारे में कोई लिख देता है तो उसके व्हाट्स अप ग्रुप के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मैंने ऐसी कई ख़बरें पढ़ी हैं।

क्या आकाश सोनी RSS का प्रमुख पदाधिकारी है? आकाश सोनी ने मेरे सहित अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के फोन नंबर को अपने पेज पर सार्वजनिक किया है। altnews.in की रिपोर्ट में यह बात बताई गई है।

पहले भी आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के नेताओं ने मेरा नंबर सार्वजनिक किया है और धमकियां मिली हैं। मैं परेशान तो हुआ परंतु आपको पत्र लिखने नहीं बैठा। इस बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं जानना चाहता हूं और आप भी पता करवाएं कि क्या इस व्हाट्स ग्रुप के लोग मेरी जान लेने की हद तक जा सकते हैं? क्या मेरी जान को ख़तरा है?
मैं एक सामान्य नागरिक हूं और अदना सा परंतु सजग पत्रकार हूं। जिसके बारे में आज कल हर दूसरा कहकर निकल जाता है कि जल्दी ही आपकी कृपा से सड़क पर आने वाला हूं। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इसका उत्सव भी मनाया गया कि अब मेरी नौकरी जाएगी। कइयों ने कहा और कहते हैं कि सरकार मेरे पीछे पड़ी है। हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को आपकी नापसंदगी के कारण चलता कर दिया गया। इसकी ख़बर मैंने thewire.in में पढ़ी। कहते हैं कि अब मेरी बारी है। यह सब सुनकर हंसी तो आती है पर चिन्तित होता हूं। मुझे यकीन करने का जी नहीं करता कि भारत का एक सशक्त प्रधानमंत्री एक पत्रकार की नौकरी ले सकता है। तब लोग कहते हैं कि थोड़े दिनों की बात है, देख लेना, तुम्हारा इंतज़ाम हो गया है। ऐसा है क्या सर?

ऐसा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। परंतु ऐसा मत होने दीजिएगा। मेरे लिए नहीं, भारत के महान लोकतंत्र की शान के लिए वरना लोग कहेंगे कि अगर मेरी आवाज़ अलग भी है, तल्ख़ भी है तो भी क्या इस महान लोकतंत्र में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है? एक पत्रकार की नौकरी लेने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के स्तर से होगा? ऐसी अटकलों को मैं व्हाट्स अप ग्रुप में दी जाने वाली धमकियों से जोड़कर देखता हूं। अगर आप इन लोगों को फोलो नहीं करते तो मैं सही में यह पत्र नहीं लिखता।

मेरे पास अल्युमिनियम का एक बक्सा है जिसे लेकर दिल्ली आया था। इन 27 वर्षों में ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया मगर वो बक्सा आज भी है। मैं उस बक्से के साथ मोतिहारी लौट सकता हूं, लेकिन परिवार का दायित्व भी है। रोज़गार की चिन्ता किसे नहीं होती है। बड़े बड़े कलाकार सत्तर पचहत्तर साल के होकर विज्ञापन करते रहते हैं ताकि पैसे कमा सकें। जब इतने पैसे वालों को घर चलाने की चिन्ता होती है तो मैं कैसे उस चिन्ता से अलग हो सकता हूं। मुझे भी है।

आप मेरे बच्चों को तो सड़क पर नहीं देखना चाहेंगे। चाहेंगे ? मुझसे इतनी नफ़रत? मेरे बच्चे तब भी आपको दुआ देंगे। मुझे सड़क से प्यार है। मैं सड़क पर आकर भी सवाल करता रहूंगा। चंपारण आकर बापू ने यही तो मिसाल दी कि सत्ता कितनी बड़ी हो, जगह कितना भी अनजान हो, नैतिक बल से कोई भी उसके सामने खड़ा हो सकता है। मैं उस महान मिट्टी का छोटा सा अंश हूं।

मैं किसी को डराने के लिए सच नहीं बोलता। बापू कहते थे कि जिस सच में अहंकार आ जाए वो सच नहीं रह जाता। मैं ख़ुद को और अधिक विनम्र बनाने और अपने भीतर के अंतर्विरोधों को लेकर प्रायश्चित करने के लिए बोलता हूं। जब मैं बोल नहीं पाता, लिख नहीं पाता तब उस सच को लेकर जूझता रहता हूं। मैं अपनी तमाम कमज़ोरियों से आज़ाद होने के संघर्ष में ही वो बात कह देता हूं जिसे सुनकर लोग कहते हैं कि तुम्हें सरकार से डर नहीं लगता। मुझे अपनी कमज़ोरियों से डर लगता है। अपनी कमज़ोरियों से लड़ने के लिए ही बोलता हूं। लिखता हूं। कई बार हार जाता हूं। तब ख़ुद को यही दिलासा देता कि इस बार फेल हो गया, अगली बार पास होने की कोशिश करूंगा। सत्ता के सामने बोलना उस साहस का प्रदर्शन है जिसका अधिकार संविधान देता है और जिसके संरक्षक आप हैं।

मैं यह पत्र सार्वजनिक रूप से भी प्रकाशित कर रहा हूं और आपको डाक द्वारा भी भेज रहा हूं। अगर आप निखिल दधीज, नीरज दवे और आकाश सोनी को जानते हैं तो उनसे बस इतना पूछ लीजिए कि कहीं इनका या इनके किसी ग्रुप का मुझे मारने का प्लान तो नहीं है। altnews.in का लिंक भी संलग्न कर रहा हूं। पत्र लिखने के क्रम में अगर मैंने आपका अनादर किया हो, तो माफ़ी मांगना चाहूंगा।

आपका शुभचिंतक

रवीश कुमार

पत्रकार

एनडीटीवी इंडिया

रवीश कुमार का उपरोक्त पत्र फेसबुक पर लाखों की संख्या में शेयर, लाइक और कमेंट हासिल कर चुका है..

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क्या वाकई नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है?

Dilip Khan : हार्ड वर्क वाले अर्थशास्त्री मोदी जी जब सत्ता में आए तो इन्होंने आर्थिक सलाह परिषद को ख़त्म कर दिया। जब अर्थव्यवस्था की बैंड बजने लगी तो दो दिन पहले यूटर्न लेते हुए परिषद को फिर से बहाल कर दिया। अर्थशास्त्री नरेन्द्र मोदी ने आंकड़ों को ‘खुशनुमा’ बनाने के लिए GDP गणना के पुराने नियम ही ख़त्म कर दिए। लेकिन गणना के नए नियमों के मुताबिक़ भी GDP दर तीन साल के न्यूनतम पर आ गई है। पुराना नियम लागू करे तो 3% का आंकड़ा रह जाता है।

अनुपम खेर समेत कई सहिष्णु अर्थशास्त्रियों ने जब नोटबंदी का समर्थन किया तो मोदी-जेटली फूलकर कुप्पा हो गए। अब ख़ुद सरकारी एजेंसियां दावा कर रही है कि इससे अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है। अमित शाह भले ही ‘तकनीकी कारण’ का जुमला फेंके, देश का सबसे बड़ा बैंक SBI परेशान है। खुलेआम अपना दयनीय हाल बता रहा है। निर्यात गिर गया, विनिर्माण क्षेत्र बैठ गया, रोज़गार पांच साल के निचले स्तर पर है। लघु-मध्यम उद्योग वाले रो रहे हैं। छोटे कारोबारी खस्ताहाल हैं। जो नोटबंदी से रह गई थी, वो कसर जीएसटी ने पूरी कर दी।

RBI में लगभग 100% नोट जमा हो गए। इसका क्या मतलब निकाला जाएगा? अनुमान के मुताबिक़ देश में क़रीब 6% कालाधन कैश में था। ज़्यादातर बड़े नोटों में। अब, जब क़रीब-क़रीब सारा पैसा जमा होकर एक्सचेंज हो गया है तो ज़ाहिर है कि ये कालाधन वैध धन बन गया। यानी नोटबंदी ने बाक़ी नुकसानों के साथ-साथ सबसे बड़ा काम ये किया कि कालेधन को वैध बना दिया। जो चालाक थे, उन्होंने सेटिंग कर कई खातों में पैसे जमा करवाए, कई लोगों के मार्फ़त पैसे बदले। जो कच्चे थे, उन्होंने अपने खाते में पैसे डाल लिए। पैसे से यहां मेरा मतलब कालाधन से है। अब क्या हो रहा है? ऐसे कई लोग आयकर विभाग की निगरानी में हैं। आयकर इंस्पेक्टर इनसे मिलकर घूस खाकर ओके कर दे रहा है। यानी कालाधन तो सफ़ेद हुआ ही, भ्रष्टाचार भी बढ़ गया। और मोदी जी ने जो इंस्पेक्टर राज ख़त्म करने की बात कही थी, वो वादा अरब सागर में डूब गया।

इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने का जुमला फेंकने वाले प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के बाद आयकर इंस्पेक्टरों को सांढ़ बना दिया है। जिसके खाते में हेर-फेर है, सब आयकर अधिकारियों से सेटिंग कर रहे हैं। नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने की बात कही गई थी, देख लीजिए बढ़ गया है। काला धन ख़त्म करने की बात कही गई थी। लगभग 100% पुराने नोट बैंक पहुंचकर अब वैध करेंसी बन गए हैं। मोदी जी, और डुबोइए देश को। काम पूरा नहीं हुआ है।

Chandan Srivastava : इंडियन एक्सप्रेस में आज यशवंत सिन्हा का जो आर्टिकल छपा है, वह पढ़ा जाना चाहिए। रोहिंग्या, बीएचयू, जेएनयू आदि तो ठीक है लेकिन अर्थव्यवस्था ही दम तोड़ देगी तो क्या बचेगा? अरूण जेटली को लेकर भाजपा का कोर वोटर कभी कम्फर्टेबल नहीं रहा। लेकिन उन्होंने मोदी को भाजपा का चेहरा बनने में सहयोग किया था, यही वजह है कि उनका हर पाप मोदी जी गले लगाने को तैयार हैं। लेकिन पापी को किसी भी प्रकार का समर्थन करने वाला और यहां तक कि उसके कृत्यों से नजरें फेर लेने वाला भी बराबर का पापी होता है। कुछ ऐसा ही कृष्ण ने गीता में भी कहा था जब अर्जुन भीष्म, द्रोण आदि के प्रति आसक्त हो रहे थे।

यशवंत सिन्हा से कांग्रेस जैसी पार्टियों को सीखना चाहिए कि आलोचना कैसे की जाती है। रोहिंग्या और भारत तेरे टुकड़े होंगे का समर्थन करके वे कभी मोदी से पार नहीं पा सकते। इतनी साधारण सी बात न जाने क्यों कांग्रेस के पल्ले नहीं पड़ रही। बहरहाल बात यशवंत सिन्हा के लेख की। पूर्व वित्त मंत्री लिखते हैं कि निजी निवेश में आज जितनी गिरावट है उतनी दो दशक में नहीं हुई। औद्योगिक उत्पादन का बुरा हाल है, कृषि क्षेत्र परेशानी में है, बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला निर्माण उद्योग भी संकट में है। नोटबंदी फेल रही है, गलत तरीके से GST लागू किए जाने से आज कारोबारियों के बीच खौफ का माहौल है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं।

वह आगे लिखते हैं, पहली तिमाही में विकास दर गिरकर 5.7 पर पहुंच गई जो तीन साल में सबसे कम है। सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से मंदी नहीं आई, वो सही हैं क्योंकि इस मंदी की शुरुआत पहले हो गई थी। नोटबंदी ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया। आर्टिकल के अंत में वह एक पंच लाइन देते हैं, ‘pm claims dat he has seen poverty from close quarters. His fm is working over time to make sure dat all indians also see itfrom equally close quarters.’ माने- ‘प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने काफी करीब से गरीबी देखी है। अब उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं कि देश का हर नागरिक भी करीब से गरीबी देखे।’

Vikas Mishra : 27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था- ”मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।” उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी। घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था। फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी। जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है।
मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे। देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए। एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया। पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है।

मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा। हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया। दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा। देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा। कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा। ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया।

तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा? क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे? क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को? ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे। तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा। मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी। उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा। मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया। राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था।

दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’। वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे। तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी। देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी। महंगाई चरम सीमा पर थी। मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा। विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे। मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था। जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं। नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे। देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया। अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी। 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई। उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी।

2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली। कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची। मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई। लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया।ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था। लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए। बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए।

यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया। घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी। पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए। चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया। मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई। तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे। ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे। जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली।

मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए। मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है। इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा। उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी। वैसे बता दें कि आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन है।

तीन पत्रकारों दिलीप खान, चंदन श्रीवास्तव और विकास मिश्र की एफबी वॉल से. दिलीप खान राज्यसभा टीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. चंदन श्रीवास्तव लखनऊ में पहले पत्रकार थे और अब वकालत कर रहे हैं. विकास मिश्र आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं.

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पत्रकारों को मिल रही गौरी लंकेश जैसा हश्र होने की धमकियां

Anil Jain : गौरी लंकेश की हत्या के बाद जैसी आशंका जताई गई थी, वैसा ही हो रहा है। त्रिपुरा में शांतनु भौमिक की हत्या इसकी पहली मिसाल है। पत्रकारों और लेखकों को धमकाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। नीचे दिया गया स्क्रीन शॉट मेरे मित्र और पुराने सहकर्मी अनिल सिन्हा को मिले वाट्सएप मैसेज का है।

अज्ञात व्यक्तियों की ओर से चार अलग-अलग फोन नंबरों (9984825094, 8874856328, 9984482860, 9984162349) से भेजे गए एक ही तरह के इस मैसेज में साफ तौर स्वीकार किया गया है कि गौरी लंकेश हिंदुत्ववादियों के हाथों इसलिए मारी गई, क्योंकि वह भाजपा और आरएसएस के खिलाफ लिखती थीं। मैसेज में गौरी को गद्दार, राष्ट्रविरोधी और हिंदू विरोधी करार दिया गया है। इसी के साथ मैसेज के आखिरी में धमकी दी गई है कि देश में जो भी व्यक्ति मोदी जी, भाजपा या संघ के खिलाफ लिखने की हिम्मत करेगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। मुसलमानों के नाम के साथ-साथ ऐसे गद्दारों को भी मिटा दिया जाएगा।

यह मैसेज अनिल सिन्हा के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी मिला है। मैसेज में भले ही प्रधानमंत्री श्री मोदी और भाजपा की तरफदारी की गई हो, लेकिन फिर भी यह कतई नहीं माना जा सकता कि इस तरह के धमकी भरे मैसेज प्रधानमंत्री या भाजपा की सहमति से भेजे जा रहे हो। हो सकता है कि कोई व्यक्ति या समूह भाजपा, संघ और मोदी जी का नाम लेकर इस तरह की शरारतपूर्ण कारस्तानी कर रहा हो।

जो भी हो, मामला गंभीर तो है ही। जिन लोगों को यह मैसेज प्राप्त हुआ है वे तो इस बारे में पुलिस में शिकायत दर्ज करा ही रहे हैं, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, प्रेस एसोसिएशन और अन्य पत्रकार संगठन भी इस मामले को अपने स्तर पर उठाएंगे ही। लेकिन सरकार को भी ऐसे मामले का संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करना चाहिए, क्योंकि पत्रकारों और लेखकों को धमकाने का यह काम प्रधानमंत्री और सत्तारूढ दल के नाम पर हो रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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मोदी राज में भी महंगाई डायन बनी हुई है!

अजय कुमार, लखनऊ
2014 के लोकसभा चुनाव समय बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ मंहगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। मंहगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओे ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मंहगाई फैक्टर सबसे मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षो के बाद भी मंहगाई डायन ही बनी हुई है।

मंहगाई नियंत्रण करने की नाकामी मोदी सरकार पर भारी पड़ती जा रही है। ऐसा लगता है कि अब तो जनता ने भी यह मान लिया हैकि कम से कम मंहगाई के मोर्चे पर मोदी और मनमोहन सरकार में ज्यादा अंतर नहीं हैं। बस, फर्क है तो इतना भर कि मनमोहन सरकार की नाकामी का ढ़िढोरा बीजेपी वालों ने ढोल-नगाड़े के साथ पीटा था, जबकि कांग्रेस और विपक्ष मंहगाई को मुद्दा ही नहीं बना पा रहा है।

शायद यही वजह है, जनता के बीच अब मंहगाई पर चर्चा कम हो रही है। एक समय था जब प्याज या टमाटर के दाम में जरा सी भी वृद्धि होती थी तो बीजेपी वाले पूरे देश में हाहाकार मचा देते थे, लेकिन आज हमारे नेतागण और तमाम बुद्धिजीवी मोदी सरकार को घेरने के लिये मंहगाई को मुद्दा बनाने की बजाये साम्प्रदायिकता, विचारधारा की लड़ाई, राष्ट्रवाद की बहस में ही उलझे हुए हैं।

हाल ही में टमाटर सौ रूपये किलो तक बिक गया, मगर यह सरकार के खिलाफ मुद्दा नहीं बन पाया। इसी प्रकार आजकल प्याज भी गृहणियों को रूला रहा है। पिछले वर्ष दाल के भाव आसमान छूने लगे थे, उरद सहित कुछ अन्य दालें तो 200 रूपये किलो तक बिक गई। गरीब की थाली से दाल गायब हुई, मगर विपक्ष गरीबों का दर्द नहीं बांट सका।
इन दिनों सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि पर एक पुरानी तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें दिखाया जा रहा है कि कांग्रेस के समय जब रसोई गैस के दाम बढ़ते थे तो किस तरह से बीजेपी के नेता अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज आदि धरने पर बैठ जातै थें।

अभी, रसोई गैस के दाम बढ़ते ही स्‍मृति ईरानी की पुरानी तस्वीर और ट्विट सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी थी,जिसमें वह मनमोहन सरकार के समय एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ने पर सिलेंडर को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं,लेकिन कांग्रेस की तरफ से ऐसा नजारा नहीं देखने को मिलता है।

बीते अगस्त महीने की बात है केंद्र की मोदी सरकार ने बिना सब्सिडी वाले एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम में 86 रुपये की बढ़ोतरी कर दी थी। सरकार ने इसके पीछे अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में एलपीजी के दाम बढ़ना वजह बताया। जो बिना-सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर 466.50 रुपए का था। उसके बाद से छह किस्तों में यह 271 रुपए यानी 58 प्रतिशत महंगा हो चुका है। तेल कंपनियों ने सब्सिडीशुदा रसोई गैस सिलेंडर का दाम भी मामूली 13 पैसे बढ़ाकर 434.93 रुपए प्रति सिलेंडर कर दिया। इससे पहले इसमें 9 पैसे की वृद्धि की गई। दो मामूली वृद्धि से पहले सब्सिडीशुदा गैस के दाम आठ बार बढ़े हैं और हर बार करीब दो रुपए की इसमें वृद्धि की गई। मगर कहीं कोई हाय-तौबा नहीे हुई।

बात 2014 से आज तक बढ़ती मंहगाई की कि जाये तो 26 मई 2014 को एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि मई 2017 में आटे की कीमत 19 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है। चावल के दाम 20 से 40 रुपये की जगह 18 से 47 रुपये प्रति किलो हैं। अरहर की दाल पहले 61 से 86 रुपये प्रति किलो पर मिल रही थी जबकि अब ये कीमत 60 से 145 रुपये के बीच है. बीच में ये 200 रु. प्रतिकिलो तक जा पहुंची थी। 31 से 50 रुपये के बीच मिलने वाली चीनी अब 34 से 56 रुपये प्रतिकिलो मिल रही है। दूध की कीमत 25 से 46 रुपये से बढ़कर 28 से 62 रुपये प्रति लीटर है. यानि खाने पीने की प्रमुख वस्तुओं की महंगाई कम होने के बजाय बढ़ गई है।

हालांकि महंगाई का सरकारी आंकड़ा मनमोहन सरकार के मुकाबले राहत भरा है। मई 2014 में खुदरा महंगाई दर जहां 8.2 प्रतिशत के आसपास थी तो अप्रैल 2017 का आंकड़ा 2.99 प्रतिशत रहा। इसी तरह खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई दर 8.89 फीसदी से घटकर 0.61 पर आ गई। दिल्ली में सब्सिडी वाला रसोई गैस का सिलिंडर मई 2014 के 414 रुपये के मुकाबले अब 442.77 रुपये में मिल रहा है। जबकि डीजल और पेट्रोल के दामों में अंतर नहीं आया है, लेकिन विरोधियों की दलील है कि दुनिया के बाजार में तेल-डीजल बनाने का कच्चा माल पहले की अपेक्षा जितना सस्ता हुआ है मोदी सरकार उस अनुपात में पेट्रोल डीजल सस्ता नहीं कर रही है।

अगस्त में खुदरा महंगाई दर भी थोक महंगाई दर की तरह चार महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई। अगस्त में थोक महंगाई की दर जुलाई के 1.88 फीसद से बढ़कर 3.24 फीसदी के स्तर पर पहुंच गयी। अगस्त 2016 में थोक महंगाई सूचकांक में 1.09 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी। अगस्त में थोक महंगाई में आई इस तेजी की वजह खाद्य पदार्थो और ईंधन की कीमतों में आई तेजी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई में और इजाफा हो सकता है, ऐसे में ब्याज दरों में कटौती के लिए अभी इंतजार करना पड़ सकता है। थोक महंगाई सूचकांक में आई तेजी की सबसे बड़ी वजह सब्जियों के दामों में हुई बढ़ोतरी रही है। जुलाई में सब्जियों की महंगाई दर्शाने वाले सूचकांक में 21.95 फीसद की वृद्धि हुई थी। लेकिन अगस्त में यह वृद्धि 44.91 फीसद के स्तर पर पहुंच गयी। इसके पीछे बड़ी वजह प्याज की कीमतों में आई तेजी रही।

प्याज की कीमत अगस्त महीने में 88.46 फीसद की दर से बढ़ी जो जुलाई में 9.50 फीसद के स्तर पर थी। इसके अलावा फल, सब्जियों, मीट, मछली की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईधन जनित महंगाई भी अगस्त में दोगुनी हो गई। जुलाई में फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में महंगाई दर 9.99 फीसद रही जो जुलाई 1016 में 4.37 फीसद पर थी। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ रहीं कीमतें और पावर टैरिफ में की गई बढ़ोतरी ही फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में आई तेजी का असली कारण है।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मोदी सरकार के लिए रवीश कुमार ने कहा- ”असफल योजनाओं की सफल सरकार, अबकी बार ईवेंट सरकार”

Ravish Kumar : असफल योजनाओं की सफल सरकार- अबकी बार ईवेंट सरकार… 2022 में बुलेट ट्रेन के आगमन को लेकर आशावाद के संचार में बुराई नहीं है। नतीजा पता है फिर भी उम्मीद है तो यह अच्छी बात है। मोदी सरकार ने हमें अनगिनत ईवेंट दिए हैं। जब तक कोई ईवेंट याद आता है कि अरे हां, वो भी तो था,उसका क्या हुआ, तब तक नया ईवेंट आ जाता है। सवाल पूछकर निराश होने का मौका ही नहीं मिलता।

जनता को आशा-आशा का खो-खो खेलने के लिए प्रेरित कर दिया जाता है। प्रेरना की तलाश में वो प्रेरित हो भी जाती है। होनी भी चाहिए। फिर भी ईमानदारी से देखेंगे कि जितने भी ईवेंट लांच हुए हैं, उनमें से ज़्यादातर फेल हुए हैं। बहुतों के पूरा होने का डेट 2019 की जगह 2022 कर दिया गया है। शायद किसी ज्योतिष ने बताया होगा कि 2022 कहने से शुभ होगा। ! काश कोई इन तमाम ईवेंट पर हुए खर्चे का हिसाब जोड़ देता। पता चलता कि इनके ईवेंटबाज़ी से ईवेंट कंपनियों का कारोबार कितना बढ़ा है। ठीक है कि विपक्ष नहीं है, 2019 में मोदी ही जीतेंगे, शुभकामनाएं, इन दो बातों को छोड़ कर तमाम ईवेंट का हिसाब करेंगे तो लगेगा कि मोदी सरकार अनेक असफल योजनाओं की सफल सरकार है। इस लाइन को दो बार पढ़िये। एक बार में नहीं समझ आएगा।

2016-17 के रेल बजट में बड़ोदरा में भारत की पहली रेल यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव था। उसके पहले दिसंबर 2015 में मनोज सिन्हा ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया था। अक्तूबर 2016 में खुद प्रधानमंत्री ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया। सुरेश प्रभु जैसे कथित रूप से काबिल मंत्री ने तीन साल रेल मंत्रालय चलाया लेकिन आप पता कर सकते हैं कि रेल यूनिवर्सिटी को लेकर कितनी प्रगति हुई है।

इसी तरह 2014 में देश भर से लोहा जमा किया गया कि सरदार पटेल की प्रतिमा बनेगी। सबसे ऊंची। 2014 से 17 आ गया। 17 भी बीत रहा है। लगता है इसे भी 2022 के खाते में शिफ्ट कर दिया गया है। इसके लिए तो बजट में कई सौ करोड़ का प्रस्ताव भी किया गया था।

2007 में गुजरात में गिफ्ट और केरल के कोच्ची में स्मार्ट सिटी की बुनियाद रखी गई। गुजरात के गिफ्ट को पूरा होने के लिए 70-80 हज़ार करोड़ का अनुमान बताया गया था। दस साल हो गए दोनों में से कोई तैयार नहीं हुआ। गिफ्ट में अभी तक करीब 2000 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं। दस साल में इतना तो बाकी पूरा होने में बीस साल लग जाएगा।

अब स्मार्ट सिटी का मतलब बदल दिया गया है. इसे डस्टबिन लगाने, बिजली का खंभा लगाने, वाई फाई लगाने तक सीमित कर दिया गया। जिन शहरों को लाखों करोड़ों से स्मार्ट होना था वो तो हुए नहीं, अब सौ दो सौ करोड़ से स्मार्ट होंगे। गंगा नहीं नहा सके तो जल ही छिड़क लीजिए जजमान।

गिफ्ट सिटी की बुनियाद रखते हुए बताया जाता था कि दस लाख रोज़गार का सृजन होगा मगर कितना हुआ, किसी को पता नहीं। कुछ भी बोल दो। गिफ्ट सिटी तब एक बडा ईवेंट था, अब ये ईंवेट कबाड़ में बदल चुका है। एक दो टावर बने हैं। जिसमें एक अंतर्राष्ट्रीय स्टाक एक्सचेंज का उदघाटन हुआ है। आप कोई भी बिजनेस चैनल खोलकर देख लीजिए कि इस एक्सचेंज का कोई नाम भी लेता है या नहीं। कोई 20-25 फाइनेंस कंपनियों ने अपना दफ्तर खोला है जिसे दो ढाई सौ लोग काम करते होंगे। हीरानंदानी के बनाए टावर में अधिकांश दफ्तर ख़ाली हैं।

लाल किले से सांसद आदर्श ग्राम योजना का एलान हुआ था। चंद अपवाद की गुज़ाइश छोड़ दें तो इस योजना की धज्जियां उड़ चुकी हैं। आदर्श ग्राम को लेकर बातें बड़ी बड़ी हुईं, आशा का संचार हुआ मगर कोई ग्राम आदर्श नहीं बना। लाल किले की घोषणा का भी कोई मोल नहीं रहा।

जयापुर और नागेपुर को प्रधानमंत्री ने आदर्श ग्राम के रूप में चुना है। यहां पर प्लास्टिक के शौचालय लगाए गए। क्यों लगाए गए? जब सारे देश में ईंट के शौचालय बन रहे हैं तो प्रदूषण का कारक प्लास्टिक के शौचालय क्यों लगाए गए? क्या इसके पीछ कोई खेल रहा होगा?

बनारस में क्योटो के नाम पर हेरिटेज पोल लगाया जा रहा है। ये हेरिटेज पोल क्या होता है। नक्काशीदार महंगे बिजली के पोल हेरिटेज पोल हो गए? ई नौका को कितने ज़ोर शोर से लांच किया गया था। अब बंद हो चुका है। वो भी एक ईवेंट था, आशा का संचार हुआ था। शिंजो आबे जब बनारस आए थे तब शहर के कई जगहों पर प्लास्टिक के शौचालय रख दिए गए। मल मूत्र की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं हुई। जब सड़ांध फैली तो नगर निगम ने प्लास्टिक के शौचालय उठाकर डंप कर दिया।

जिस साल स्वच्छता अभियान लांच हुआ था तब कई जगहों पर स्वच्छता के नवरत्न उग आए। सब नवर्तन चुनते थे। बनारस में ही स्वच्छता के नवरत्न चुने गए। क्या आप जानते हैं कि ये नवरत्न आज कल स्वच्छता को लेकर क्या कर रहे हैं।

बनारस में जिसे देखिए कोरपोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी का बजट लेकर चला आता है और अपनी मर्ज़ी का कुछ कर जाता है जो दिखे और लगे कि विकास है। घाट पर पत्थर की बेंच बना दी गई जबकि लकड़ी की चौकी रखे जाने की प्रथा है। बाढ़ के समय ये चौकियां हटा ली जाती थीं। पत्थर की बेंच ने घाट की सीढ़ियों का चेहरा बदल दिया है। सफेद रौशनी की फ्लड लाइट लगी तो लोगों ने विरोध किया। अब जाकर उस पर पीली पन्नी जैसी कोई चीज़ लगा दी गई है ताकि पीली रौशनी में घाट सुंदर दिखे।

प्रधानमंत्री के कारण बनारस को बहुत कुछ मिला भी है। बनारस के कई मोहल्लों में बिजली के तार ज़मीन के भीतर बिछा दिए गए हैं। सेना की ज़मीन लेकर पुलवरिया का रास्ता चौड़ा हो रहा है जिससे शहर को लाभ होगा। टाटा मेमोरियल यहां कैंसर अस्पताल बना रहा है। रिंग रोड बन रहा है। लालपुर में एक ट्रेड सेंटर भी है।

क्या आपको जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट याद है? आप जुलाई 2014 के अख़बार उठाकर देखिए, जब मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में जलमार्ग के लिए 4200 करोड़ का प्रावधान किया था तब इसे लेकर अखबारों में किस किस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए गए थे। रेलवे और सड़क की तुलना में माल ढुलाई की लागत 21 से 42 प्रतिशत कम हो जाएगा। हंसी नहीं आती आपको ऐसे आंकड़ों पर।

जल मार्ग विकास को लेकर गूगल सर्च में दो प्रेस रीलीज़ मिली है। एक 10 जून 2016 को पीआईबी ने जारी की है और एक 16 मार्च 2017 को। 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि पहले चरण में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया के बीच विकास चल रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि वाराणसी से हल्दिया के बीच जलमार्ग बन रहा है। इलाहाबाद कब और कैसे ग़ायब हो गया, पता नहीं।

2016 की प्रेस रीलीज़ में लिखा है कि इलाहाबाद से वाराणसी के बीच यात्रियों के ले जाने की सेवा चलेगी ताकि इन शहरों में जाम की समस्या कम हो। इसके लिए 100 करोड़ के निवेश की सूचना दी गई है। न किसी को बनारस में पता है और न इलाहाबाद में कि दोनों शहरों के बीच 100 करोड़ के निवेश से क्या हुआ है।

यही नहीं 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ सेवा शुरू होने का ज़िक्र है। क्या किसी ने इस साल पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ चलते देखा है? एक बार क्रूज़ आया था, फिर? वैसे बिना किसी प्रचार के कोलकाता में क्रूज़ सेवा है। काफी महंगा है।

जुलाई 2014 के बजट में 4200 करोड़ का प्रावधान है। कोई नतीजा नज़र आता है? वाराणसी के रामनगर में टर्मिनल बन रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि इस योजना पर 5369 करोड़ ख़र्च होगा और छह साल में योजना पूरी होगी। 2014 से छह साल या मार्च 2017 से छह साल?

प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि राष्ट्रीय जलमार्ग की परिकल्पना 1986 में की गई थी। इस पर मार्च 2016 तक 1871 करोड़ खर्च हो चुके हैं। अब यह साफ नहीं कि 1986 से मार्च 2016 तक या जुलाई 2014 से मार्च 2016 के बीच 1871 करोड़ ख़र्च हुए हैं। जल परिवहन राज्य मंत्री ने लोकसभा में लिखित रूप में यह जवाब दिया था।

नमामि गंगे को लेकर कितने ईवेंट रचे गए। गंगा साफ ही नहीं हुई। मंत्री बदल कर नए आ गए हैं। इस पर क्या लिखा जाए। आपको भी पता है कि एन जी टी ने नमामि गंगे के बारे में क्या क्या कहा है। 13 जुलाई 2017 के इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा है कि दो साल में गंगा की सफाई पर 7000 करोड़ ख़र्च हो गए और गंगा साफ नहीं हुई। ये 7000 करोड़ कहां ख़र्च हुए? कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा था क्या? या सारा पैसा जागरूकता अभियान में ही फूंक दिया गया? आप उस आर्डर को पढ़ंगें तो शर्म आएगी। गंगा से भी कोई छल कर सकता है?

इसलिए ये ईवेंट सरकार है। आपको ईवेंट चाहिए ईवेंट मिलेगा। किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे रिकार्ड ख़राब है।

नोट: इस पोस्ट को पढ़ते ही आईटी सेल वालों की शिफ्ट शुरू हो जाएगी। वे इनमें से किसी का जवाब नहीं देंगे। कहेंगे कि आप उस पर इस पर क्यों नहीं लिखते हैं। टाइप किए हुए मेसेज अलग-अलग नामों से पोस्ट किए जाएंगे। फिर इनका सरगना मेरा किसी लिखे या बोले को तोड़मरोड़ कर ट्वीट करेगा। उनके पास सत्ता है, मैं निहत्था हूं। दारोगा, आयकर विभाग, सीबीआई भी है। फिर भी कोई मिले तो कह देना कि छेनू आया था।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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पुण्य प्रसून बाजपेयी ने उठाया सवाल- एक करोड़ खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती क्यों नहीं?

रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं । दो महीने पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है। या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है।

हो जो भी लेकिन जब सवाल रोजगार ना होने का देश में उठ रहा है तो केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों के तहत आने वाले लाखों पद खाली पडे हैं। आलम ये है कि देश भर में 10 लाख प्राइमरी-अपर प्राइमरी स्कूल में टीचर के पद खाली पड़े हैं। 5,49,025 पद पुलिस विभाग में खाली पडे हैं। और जिस राज्य में कानून व्यवस्था सबसे चौपट है यानी यूपी। वहां पर आधे से ज्यादा पुलिस के पद खाली पड़े हैं। यूपी में 3,63,000 पुलिस के स्वीकृत पदो में से 1,82,000 पद खाली पड़े हैं। जाहिर है सरकारों के पास खाली पदो पर नियुक्ति करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। इसीलिये मुश्किल इतनी भर नहीं कि देश में एजुकेशन के प्रीमियर इंस्टीट्यूशन तक में पद खाली पड़े हैं। मसलन 1,22,000 पद इंजीनियरिंग कालेजो में खाली पडे है। 6,000 पद आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में खाली पड़े हैं।

6,000 पद देश के 47 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पड़े हैं। यानी कितना ध्यान सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर हो सकता है, ये इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में भारत अपनी तरह का अकेला देश है जहा स्कूल-कालेजों से लेकर अस्पतालो तक में स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है । आलम ये है कि 63,000 पद देश के 363 राज्य विश्वविघालय में खाली पडे हैं। 2 लाख से ज्यादा पद देश के 36 हजार सरकारी अस्पतालों में खाली पडे हैं। बुधवार को ही यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्दार्थ नाथ सिंह ने माना कि यूपी के सरकारी अस्पतालों में 7328 खाली पड़े पदो में से 2 हजार पदों पर जल्द भर्ती करेंगे। लेकिन खाली पदो से आगे की गंभीरता तो इस सच के साथ जुडी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कम से कम एक हजार मरीज पर एक डाक्टर होना ही चाहिये। लेकिन भारत में 1560 मरीज पर एक डाक्टर है। इस लिहाज से 5 लाख डाक्टर तो देश में तुरंत चाहिये । लेकिन इस दिशा में सरकारे जाये तब तो बात ही अलग है । पहली प्रथमिकता तो यही है कि जो पद स्वीकृत है। इनको ही भर लिया जाये। अन्यथा समझना ये भी होगा कि स्वास्थय व कल्याण मंत्रालय का ही कहना है कि फिलहाल देश में 3500 मनोचिकित्सक हैं जबकि 11,500 मनोचिकित्सक और चाहिये। और, जब सेना के लिये जब सरकार देश में ही हथियार बनाने के लिये नीतियां बना रही है और विदेशी निवेश के लिये हथियार सेक्टर भी खोल रही है तो सच ये भी है कि आर्डिनेंस फैक्ट्री में 14 फीसदी टैक्निकल पद तो 44 फिसदी नॉन-टेक्नीकल पद खाली पडे हैं।

यानी सवाल ये नहीं है कि रोजगार पैदा होंगे कैसे। सवाल तो ये है कि जिन जगहो पर पहले से पद स्वीकृत हैं, सरकार उन्हीं पदों को भरने की स्थिति में क्यों नहीं है। ये हालात देश के लिये खतरे की घंटी इसलिये है क्योंकि एक तरफ खाली पदों को भरने की स्थिति में सरकार नहीं है तो दूसरी तरफ बेरोजगारी का आलम ये है कि यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में भारत में 1 करोड 77 लाख बेरोजगार थे। जो 2017 में एक करोड 78 लाख हो चुके हैं और अगले बरस 1 करोड 80 पार कर जायेंगे। लेकिन भारत सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय की ही रिपोर्ट को परखे तो देश में 15 से 29 बरस के युवाओ करी तादाद 33,33,65,000 है। और ओईसीडी यानी आरगनाइजेशन फार इक्नामिक को-ओपरेशन एंड डेवलेपंमेंट की रिपोरट कहती है कि इन युवा तादाद के तीस पिसदी ने तो किसी नौकरी को कर रहे है ना ही पढाई कर रहे है। यानी करीब देश के 10 करोड युवा मुफलिसी में है । जो हालात किसी भी देश के लिये विस्पोटक है। लेकिन जब शिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र और राज्य सरकारे खाली पद को भर नहीं रही है तो समझना ये बी होगा कि देश में 18 से 23 बरस के युवाओं की तादाद 14 करोड से ज्यादा है। इसमें 3,42,11,000 छात्र कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। और ये सभी ये देख समझ रहे है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है। रोजगार ना पाने के हालात ये है कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट नौकरी लायक नही है। आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र डरे हुये हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेट तो है कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे है जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है। और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई सिस्टम या राजनीतिक जिम्मेदारी किसी सत्ता ने अपने ऊपर ली नहीं है।

आजतक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की एफबी वॉल से.

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मोदी की नीतियों से महिलाओं की सेविंग पर पड़ रही तगड़ी मार, पढ़िए ये खुलासा

Vikas Mishra : मेरी पत्नी का सेविंग अकाउंट था इंडियन ओवरसीज बैंक में। गुप्त खाता। जिसमें जमा रकम का मुझे घर में लिखित कानून के मुताबिक पता नहीं होना था, लेकिन श्रीमतीजी के मोबाइल में बैंक से अक्सर खातों से कुछ रुपये निकलने के मैसेज आने लगे। कभी एसएमएस चार्ज के नाम पर, कभी एटीएम चार्ज के नाम पर। बीवी आगबबूला। मैं बैंक पहुंचा तो पता चला कि सेविंग अकाउंट में ब्याज घटकर 3 फीसदी हो गया है। एसएमएस चार्ज हर महीने देना है, हर छह महीने में एटीएम चार्ज देना है। दूसरे बैंक के एटीएम से पैसे निकाले तो उसका चार्ज। चाहे एटीएम का इस्तेमाल हो या न हो उसका भी चार्ज। खैर, मैंने पत्नी का वो अकाउंट बंद करवा दिया।

खाता तो बंद हुआ, नए खाते के लिए बैंक की तलाश हुई। मैंने कहा पोस्ट ऑफिस में खुलवा लो। पोस्ट ऑफिस गए, वहां एक तो ब्याज 6 फीसदी से घटकर 4 फीसदी हो गया था। सर्वर ऊपर से डाउन। वहीं के एक कर्मचारी ने धीरे से कहा-भाई साहब कहां फंस रहे हो, झेल नहीं पाओगे। खैर, यस बैंक में सबसे ज्यादा 6 फीसदी ब्याज का विज्ञापन देखा था, वहां संपर्क किया, कंडीशन अप्लाई में देखा तो पता चला कि जो लोग एक करोड़ रुपये खाते में रखेंगे, उन्हें 6 फीसदी ब्याज मिलेगा। एक लाख रुपये से कम रखने वालों को 4 फीसदी। चार्जेज यहां भी कटेंगे। सभी बैंकों में कटेंगे। हां, एक शर्त और, दस हजार रुपये से कम हुआ बैलेंस तो भी चार्जेज कटेंगे। सभी बैंकों का ये नियम है।

इससे पहले कि आप गलत अनुमान लगा लें, मैं स्पष्ट कर दूं कि पत्नी की कुल जमा राशि 10 हजार रुपये से ऊपर है और 15 हजार से नीचे। बाकी तो मेरे ऊपर उन्हीं का उधार रहता है। उन्हें एक गुप्त अकाउंट रखने का शौक है, जिस पर अच्छा ब्याज मिले, पति को पता न हो कि कितना जमा है। अब वो पति को दौड़ा रही थीं, पति के पास दौड़ने के अलावा कोई चारा भी नहीं।

मैं अच्छा खासा कमाता हूं, मेरे लिए पत्नी का खाता खुलवाना एक मनोरंजक खेल हो सकता है, लेकिन मुझे फिक्र हो रही है करोड़ों उन महिलाओं की, जो बड़े जतन से कुछ सौ रुपये, सौ भी क्यों 40-50 रुपये तक बैंक में जमा करवाती हैं। उनकी फिक्र हो रही है, जिनके पास अकाउंट में 10 हजार रुपये मेंटेन कर पाने की क्षमता नहीं है। वो तो ये सोचकर बैंक में पैसे रखती होंगी कि ब्याज मिलेगा, जरूरत पड़ने पर पैसा काम आएगा, लेकिन बैंक ब्याज देना तो दूर, चार्जेज के नाम पर उनके खातों में दीमक छोड़ दे रहा है, जो एक रोज उनका अकाउंट चालकर जीरो बैलेंस पर छोड़ देगा। मेंटीनेंस चार्ज का नाम सुनकर ही मेरा खून खौलता है।

मेरी भानजी रुचि Ruchi Shukla का एचडीएफसी बैंक में खाता था। एक बार 10 हजार से कम बैलेंस हुआ, बैंक ने 1 हजार रुपये काट लिए। अगले महीने फिर कटे। उसने कुछ पैसे निकाल लिए। कुछ सौ रुपये छोड़े। अब हर महीने मैसेज आने लगा कि अकाउंट में माइनस इतने रुपये है। मैं बैंक मैनेजर से मिला। बताया कि सेविंग अकाउंट में माइनस 4 हजार रुपये का बैलेंस हो गया है। वो बोला- खाता चलाना हो तो इसे चुकाना पड़ेगा। नहीं चलाना, तो चुपचाप रहिए, एक रोज अपने आप बंद हो जाएगा।

बीए में अर्थशास्त्र मेरा विषय था। उसमें बैंकिंग का पाठ भी था। बताया गया था कि अगर आप 100 रुपये जमा करते हैं तो बैंक मानता है कि आप महीने में 15 रुपये से ज्यादा नहीं निकालेंगे, अब बैंक 85 रुपये को बाजार में लगाएगा, लोन देगा, ब्याज कमाएगा। आपको सेविंग अकाउंट पर ब्याज देगा। यही बैंकिंग है। यानी अगर बैंक में एक लाख करोड़ रुपये जमा हैं तो वो 85 हजार करोड़ रुपये का व्यापार करेगा, उधारी देगा, ब्याज से कमाएगा। दुनिया के किसी भी बैंक की इतनी औकात नहीं जो अपने सभी ग्राहकों का पूरा पैसा एक दिन में लौटा सके।

बैंक भी करें तो क्या करें। नोटबंदी के बाद बैंक तो मालामाल हैं, पैसे ठसे पड़े हैं, लेकिन कोई कर्ज लेने के लिए तैयार नहीं है। रियलिटी सेक्टर का भट्ठा बैठा हुआ है। लोन लेकर फ्लैट लेने वाले गूलर के फूल हो रहे है। पैसा उगलती जमीनों के ग्राहक गायब हो गए हैं। पर्सनल लोन तो होम लोन की दर पर मिल रहा है, लेने के लिए लोग तैयार नहीं हैं, बैंक वाले लोन के लिए फोन कर करके आजिज कर दे रहे हैं। और हां, जिन्हें वाकई लोन की जरूरत है, उनके पास इतनी संपत्ति नहीं, जिसे गिरवी रखकर लोन लें।

बैंकों में पैसा फंसा है, बैंक व्यापार कर नहीं पा रहे हैं। इसकी गाज गिर रही है उन गरीबों पर, जो एक एक पैसा जोड़कर बैंक में जमा कर रहे हैं। सरकारी हों या प्राइवेट बैंक, पीएफ हो या पीपीएफ, हर जगह जमा पर ब्याज दर घट चुकी है, घट रही है। सरकार चाहती ही नहीं कि कोई बैंक में पैसा जमा करे, लेकिन ये भी नहीं चाहती कि लोग नकद पैसा अपने पास रखें, क्योंकि उसे तो कैशलेस इंडिया बनाना है।

डिजिटल पेमेंट का हाल देखिए, एलपीजी गैस नकद खरीदने पर सस्ती है, क्रेडिट कार्ड से खरीदने पर महंगी। क्योंकि उसका अलग से चार्ज है। बिजली बिल क्रेडिट कार्ड से चुकाना, ट्रेन का टिकट कटाना महंगा हो गया है। नोटबंदी और जीएसटी ने व्यापारियों और दुकानदारों की बैंड बजा दी, लेकिन अब भी वो क्रेडिट कार्ड या किसी और माध्यम से डिजिटल पेमेंट लेने को तैयार नहीं हैं। कार्ड दो तो कहते हैं 2 फीसदी अलग से देना होगा। कोई रोकथाम नहीं। अब आपको गरज हो तो कैश दीजिए, सौदा लीजिए, वरना भाड़ में जाइए। कैश का हाल ये है कि छोटे शहरों और कस्बों में बैंकों ने सीमा रख दी है कि अकाउंट से बस इतनी ही रकम निकाल पाएंगे। मैं अर्थशास्त्र का ज्ञानी नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। अर्थव्यवस्था तो अड़ियल घोड़ी की तरह अटकी सी दिख रही है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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रिजर्व बैंक के आंकड़े दे रहे गवाही, कालाधन रखना अब ज्यादा आसान हुआ!

Anil Singh : 2000 के नोट 1000 पर भारी, कालाधन रखना आसान! आम धारणा है कि बड़े नोटों में कालाधन रखा जाता है। मोदी सरकार ने इसी तर्क के दम पर 1000 और 500 के पुराने नोट खत्म किए थे। अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा कहता है कि मार्च 2017 तक सिस्टम में 2000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा 6,57,100 करोड़ रुपए है, जबकि नोटबंदी से पहले 1000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा इससे 24,500 करोड़ रुपए कम 6,32,600 करोड़ रुपए थी।

यानि, रिजर्व बैंक ने सालाना रिपोर्ट के आंकड़े पेश किए हैं इससे साफ पता चलता है कि पहले सिस्टम में 1000 के नोट में जितना धन था, वह अब 2000 के नोट में रखे धन से 24,500 करोड़ रुपए कम है। तो, कालाधन खत्म हुआ या कालाधन रखने की सहूलियत बढ़ गई?

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नोटबंदी के ज़रिए कालेधन को खत्म करने का नहीं, बल्कि अपनों के कालेधन को सफेद करने का सरंजाम-इंतजाम किया गया था। सच एक दिन सामने आ ही जाएगा। ठीक जीएसटी लागू के 48 घंटे पहले जिन एक लाख शेल कंपनियों का रजिस्ट्रेशन खत्म किया गया है, उनके ज़रिए नोटबंदी के दौरान कई लाख करोड़ सफेद कराए गए हैं। मुश्किल यह है कि डी-रजिस्टर हो जाने के बाद इन एक लाख कंपनियों का कोई ट्रेस नहीं छोड़ा है मोदी एंड जेटली कंपनी ने। लेकिन सच एक न एक दिन सामने आ ही जाएगा। हो सकता है सुप्रीम कोर्ट के जरिए या सीएजी की किसी रिपोर्ट में।

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आईटीआर रिटर्न पर किसको उल्लू बना रहे हैं जेटली जी! वित्त मंत्री अरुण जेटली का दावा है कि नोटबंदी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि देश में वित्त वर्ष 2016-17 के लिए भरे गए इनकम टैक्स ई-रिटर्न की संख्या 25% बढ़ गई है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 के लिए कुल दाखिल आईटीआर 2.83 करोड़ रहे हैं। यह संख्या ठीक पिछले वित्त वर्ष 2015-16 के लिए 2.27 करोड़ थी। इस तरह यह 24.7% की वृद्धि है। अच्छी बात है। लेकिन गौर करने की बात है कि इससे पहले वित्त वर्ष 2014-15 के लिए यह संख्या 2.07 करोड़ थी। अगले साल 2015-16 में यह 9.7% बढ़कर 2.27 करोड़ हो गई। वहीं, पिछले साल 2013-14 से 8.7% कम (2.25 करोड़ से घटकर 2.07 करोड़) थी। आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या वित्त वर्ष 2010-11 के लिए 90.50 लाख, 2011-12 के लिए 1.64 करोड़ और 2012-13 के लिए 2.15 करोड़ रही थी। इस तरह वित्त वर्ष 2010-11 से लेकर वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या क्रमशः 82.22%, 31.10% और 4.65% बढ़ी थी। अतः जेटली महाशय! वित्त मंत्री के रूप में आप किसी कॉरपोरेट घराने की वकालत नहीं कर रहे, बल्कि देश का गुरुतर दायित्व संभाल रहे हैं। इसलिए झूठ बोलने की कला यहां काम नहीं आएगी। जवाब दीजिए कि वित्त वर्ष 2010-11 और 2011-12 में कोई नोटबंदी नहीं हुई थी, फिर भी क्यों आईटीआर भरनेवालों की संख्या 82 और 31 प्रतिशत बढ़ गई? इसलिए नो उल्लू बनाइंग…

कुल दाखिल आईटीआर रिटर्न की संख्या

वित्त वर्ष  : संख्या (लाख में) : पिछले साल से अंतर (%)

2016-17 : 283 : +24.67

2015-16 : 227 : +9.66

2014-15 : 207 : (-)8.69

2013-14 : 225 : +4.65

2012-13 : 215 : +31.10

2011-12 : 164 : +82.22

2010-11 : 90.5 : +78.39

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वित्त मंत्रालय = भारत = भारतीय नागरिक! गुरुवार को इकनॉमिस्ट इंडिया समिट में एक पत्रकार ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से पूछा कि क्या ऐसा नहीं है कि नोटबंदी वित्त मंत्रालय के लिए अच्छी थी, लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए नहीं, जिन्हें जान से लेकर नौकरी तक से हाथ घोना पड़ा और मुश्किलें झेलनी पड़ीं। इस पर जेटली का जवाब था, “मैं मानता हूं कि जो भारत के लिए अच्छा है, वही भारतीय नागरिकों के लिए अच्छा है।” धन्य हैं जेटली जी, जो आपने ज्ञान दिया कि सरकार और देश एक ही होता है। यही तर्क अंग्रेज बहादुर भी दिया करते थे। अच्छा है कि आम भारतीय अब भी सरकार को सरकार और अपने को प्रजा मानता है। वरना, जिस दिन वो इस मुल्क से सचमुच खुद को जोड़कर देखने लगेगा, उस दिन से आप जैसी सरकारों का तंबू-कनात उखड़ जाएगा, जिस तरह अंग्रेज़ों की सरकार का उखड़ा था। तब तक अंग्रेज़ों के बनाए औपनिवेशिक शासन तंत्र और कानून की सुरक्षा में बैठकर मौज करते रहिए, वित्त मंत्रालय के हित को भारत का हित बताते रहिए और विदेशी व बड़ी पूंजी का हित साधते रहिए।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार अनिल सिंह की एफबी वॉल से. अनिल सिंह अर्थकाम डाट काम नामक चर्चित आर्थिक पोर्टल के संस्थापक और संपादक भी हैं.

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जगदीश चंद्रा ने मोदी मंत्रिमंडल में भारी फेरबदल को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारी दी (देखें वीडियो)

जी ग्रुप के रीजनल न्यूज चैनलों के सीईओ जगदीश चंद्रा ने अपने ‘अ डायलाग विथ जेसी’ में मोदी मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारी दी है. जगदीश चंद्रा के मुताबिक रेल और जहाज वाले मंत्रालय मिलाकर एक किए जा सकते हैं ताकि टूरिज्म को समुचित बढ़ावा दिया जा सके और इन दोनों प्रमुख परिवहन के यात्रियों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं दी जा सके. जेसी का तो यहां तक कहना है कि इन दोनों एकीकृत मंत्रालयों के मंत्री नितिन गडकरी बनाए जाएंगे.

जगदीश चंद्रा का कहना है कि मोदी कैबिनेट में 2 सितंबर को विस्तार हो सकता है. इसको लेकर तीन दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह में लंबी चर्चा हो चुकी है. दो दर्जन मंत्री इस फेरबदल से प्रभावित होंगे. एक जैसे कई मंत्रालयों का आपस में विलय हो सकता है. रेलवे और सिविल एविशन की तरह एग्रीकल्चर और फर्टीलाइजर को भी एक में मिलाया जा सकता है. ये सारी कवायद 2019 के चुनावों को ध्यान में रख कर की जा रही है.

कलराज मिश्रा, लालाजी टंडन, विजय कुमार मल्होत्रा समेत सात लोगों को राज्यपाल बनाया जा सकता है. जेसी तो यहां तक संभावना जताते हैं कि 2019 के चुनावों के बाद नीतीश कुमार बिहार के सीएम पद से रिजाइन करके डिप्टी पीएम बन सकते हैं. ताजे फेरबदल में राधा मोहन सिंह, उमा भारती और राजीव प्रताप रूडी को कैबिनेट से हटाने की बात जेसी ने कही. चंद्रा ने राम माधव और भूपेंद्र यादव को भी मोदी सरकार में शामिल किए जाने की संभावना जताई.

जगदीश चंद्रा का यह चर्चित शो देखने के लिए नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें :

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महेश शर्मा का मंत्रालय बाबुओं के कब्जे में!

केंद्रीय संस्कृति एवं कला मंत्री महेश शर्मा का मंत्रालय कला एवं संस्कृति के सिवा सभी कार्य दक्षता से कर रहा है। चर्चा है कि इस दक्षता के लिए अवार्ड वापसी के नेता अशोक वाजपेयी से चुपके से हाथ मिलाकर शांति का समझौता कर लिया है। संस्कृति मंत्रालय के सभी स्वायत्त संसथान जैसे संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादेमी, साहित्य अकादमी पर मंत्रालय के बाबू अशोक वायपेयी के फॉर्मूले से कब्ज़ा जमा कर बैठे हैं और मंत्री साहब किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं हैं।

पूर्व काल में इन सभी संस्थानों में करोड़ों के घपले हुए हैं और इस सम्बन्ध में जाँच करने की बात तो कई बार हुई पर ढाक के तीन पात। मंत्री महोदय ने संसदीय समिति के समक्ष 2014 में कई बड़े वादे किये थे- जैसे सभी गांवों से कला एवं संस्कृति का जुड़ाव, भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों का वर्गीकरण, कला का मानचित्र इत्यादि। कई लुभावने वादों के साथ शुरू की गयी मुहिम मंत्रालय की फाइलों में उलझ कर रह गयी हैं और कोई भी कार्य शुरू नहीं हो पाया है।

यह अत्यंत ही दुखद है कि राष्ट्रवादी पार्टी का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी सांस्कृतिक क्षेत्र में कुछ भी कर पाने में असमर्थ है। संस्कार भारती जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सांस्कृतिक विधा पर काम करती है, वह भी मंत्री से खासी नाराज है। हाल में सिर्फ कल्याण चक्रवती के खिलाफ ही सीबीआई कार्यवाही शुरू की गयी है पर अशोक वाजपेयी के खिलाफ कुछ भी नहीं। संगीत नाटक अकादमी की सचिव हेलेन आचार्य जी का साठ हजार का मोबाइल का बिल, लीला सैमसन द्वारा नाट्यशाला पर ६ करोड़ खर्च करके उसको तुड़वाना, क्षेत्रीय कला केन्द्रों पर पूर्ववत खुली लूटपाट चल रही है। कलाकारों को दिया जाने वाला मानदेय अधिकारियों द्वारा कमीशन में लूटा जा रहा है। मंत्री महोदय इन बातों से अनभिज्ञ हैं।

पहले संयुक्त सचिव को बदला गया। फिर सचिव को बदला गया। पर बात वहीं के वहीं है। सभी बाबू एकजुट होकर मंत्री को नियमावली का ऐसा पाठ पढ़ाते हैं कि मंत्री बेचारे उलझ कर रह जाते हैं। इस तरह संस्कृति मंत्रालय पर कब्ज़ा बाबुओं के हाथ में रह जाता है। संघ से जुड़े कलाकार एवं कार्यकर्ता, जो दरकिनार हैं, धीमे स्वर में मंत्रीजी की कारगुजारियों पर नाराजगी जताते हैं। परन्तु मंत्री जी लगता है चैन की बांसुरी बजा रहें हैं। इस सांठगांठ में विशेष अधिकारी महोदय नवनीत सोनी की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन्हें मंत्रीजी ने नियमों को ताक पर रख कर नियुक्त किया हुआ है। सोनी के मूल नियोक्ता द्वारा से अभी भी अनापत्ति नहीं ली गयी है जो कार्मिक विभाग के नियमों का सीधा उल्लंघन है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मोदी और जेटली के ‘कुशल’ नेतृत्व के कारण विनिर्माण क्षेत्र भयंकर मंदी का शिकार!

Ashwini Kumar Srivastava : आठ साल पहले…यानी जब दुनियाभर में मंदी के कारण आर्थिक तबाही मची थी और भारत भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व में वैश्विक मंदी से जूझ रहा था… हालांकि उस मंदी में कई देश रसातल में पहुंच गए थे लेकिन भारत बड़ी मजबूती से न सिर्फ बाहर आया था बल्कि दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका और चीन से लोहा लेने लगा….

मगर आज यह विनिर्माण क्षेत्र वापस उस वैश्विक मंदी वाले रसातल में कैसे पहुंच गया? आज तो दुनिया में कहीं मंदी भी नहीं है…फिर मोदी जी के कुशल नेतृत्व और अरुण जेटली जैसे मेधावी वित्त मंत्री के निर्देशन में भारत की अर्थव्यवस्था तो अमेरिका और चीन को भी पीछे छोड़ने की तैयारी कर रही है।

हो न हो, ये आंकड़े ही गलत हैं। सब साले मोदी के दुश्मन, मुस्लिमपरस्त और राष्ट्रद्रोही हैं। इन फर्जी आंकड़ों को आज के अखबार में छाप कर वे यह समझ रहे हैं कि मैं मोदी या जेटली पर संदेह करूँगा? मूर्ख हैं ऐसे लोग।

खुद मोदी के सबसे बड़े आर्थिक सूरमा पनगढ़िया भले ही मोदी और जेटली के डूबते हुए आर्थिक जहाज से भाग खड़े हुए हों लेकिन मैं किसी भी हालत में मोदी का समर्थन करना नहीं छोडूंगा। कभी सपने में भी मोदी के किसी फैसले पर उंगली नहीं उठाऊंगा।

दुनिया भले ही इस तरह के आंकड़े देकर हमें भारत की आर्थिक बदहाली का डर दिखाती रहे, मैं तो वही देखूंगा, सुनूंगा और मानूँगा, जो मोदी चाहते हैं।

हटा दो इस तरह की सारी नकारात्मक खबरें मेरे सामने से। मुझे तो वह खबर दिखाओ, जिसमें लिखा हुआ है कि महाराणा प्रताप ने अकबर को हरा दिया था, डोभाल ने पाकिस्तान को घुटने टिकवा दिए थे और चीन हमारी ताकत से थर थर कांप रहा है…

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी जी! कब सुनोगे ‘बेरोजगारों’ के मन की बात

बेरोजगारों को रोजगार का सपना दिखाकर भारी बहुमत से सत्ता में आये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अच्छे दिन के वादे शिक्षित बेरोजगारों के लिये शेखचिल्ली के ख्वाब साबित हुए हैं। चपरासी की 5 पास नौकरी के लिये जहां एमबीए, बीटेक, एमटेक, ग्रेजुएट युवा लाइनों में लगे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट में मोदी सरकार को तो कटघरे में खड़ा ही किया गया है बल्कि भारत में बढ़ती बेरोजगारों की संख्या ने भी भयावह कहानी बयां की है। जो आने वाले दिनों में बड़े विवादों का कारण बन सकती है।

पिछले दिनों मोदी की बीजेपी सरकार को आए तीन साल पूरे हो गए हैं, लेकिन मोदी के वादे अभी भी अधूरे पड़े हैं। मोदी ने सरकार बनने से पहले युवाओं से वादा किया था कि जैसे ही उनकी सरकार आती है, वे सबसे पहले देश के 1 करोड़ युवाओं को नौकरी देने का काम करेंगे, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद अभी भी देश में करोड़ों की संख्या में युवा बेरोजगार बैठे है। बेरोजगारों का सपना था कि अगर मोदी जी की सरकार बनी तो उनके अच्छे दिन आ जायेंगे और उन्होंने मोदी जी की रैलियांे में तो जय-जयकार की ही बल्कि गांव की गलियों से लेकर महानगरों तक घूम-घूमकर मोदी के पक्ष में जमकर वोटिंग भी कराई। उस समय युवाओं में मोदी के प्रति जो जोश और जुनून था वह सरकार बनने के बाद ठण्डा होता नजर आ रहा है। बल्कि सरकार के प्रति आक्रोश की झलक भी दिखाई दे रही है, जो कभी भी लावा के रूप में उभर सकती है। आखिर हो भी क्यों ना, जब आज तीन साल बाद भी ना तो बेरोजगारों के चेहरों पर चमक दिखाई दे रही है और न ही उनके सपने साकार होते नजर आ रहे हैं।

कहने को तो आजादी के बाद ही रोजगार की गंभीर समस्या रही है लेकिन 1991 से 2013 के बीच भारत में करीब 30 करोड़ लोगों को नौकरी की जरूरत थी. इस दौरान केवल 14 करोड़ लोगों को रोजगार मिल सका। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और उनके आक्रोश को देखते हुए मोदी जी ने अच्छे दिनों का सपना दिखाकर उनका दिल तो जीता ही बल्कि प्रधानमंत्री की कुर्सी भी हासिल कर ली। मोदी सरकार ने युवाओं के सपनों को साकार करने के लिये स्किल इंडिया के तहत 2 अक्टूबर 2016 को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक और दो शुरू की। जिसके माध्यम से 2016 से लेकर 2020 तक यानी चार साल में 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी है, का पूरे देश में संचालन किया जा रहा है। लेकिन यह योजना जमीन पर कम कागजों पर ज्यादा दौड़ रही है। जिसमें एक तरफ सरकार ने हर साल 5 लाख युवाओं को ट्रेनिंग देने का दावा कर रही है वहीं पिछले दिनों आयी एक मीडिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि 29 जून 2017 तक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना दो के तहत एक लाख 70,000 लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। जबकि इस योजना के तहत हर साल पांच लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी थी यानी इस साल यह योजना काफी पीछे चल रही है।

छः जून की प्रेस काॅन्फ्रेंस में कौशल विकास मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने कहा था कि जुलाई 2015 में लॉन्च हुई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक के तहत साढ़े छब्बीस लाख लोगों को ट्रेनिंग दी चुकी है, जबकि कौशल विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर लिखा है कि इस योजना के तहत करीब-करीब 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है। लेकिन इस रिपोर्ट में मंत्री और मंत्रालय के बयान में साढ़े छह लाख काअंतर साफ नजर आता है। कौशल विकास योजना से जुड़े प्रशिक्षिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता दीपक गोस्वामी कहते हैं कि भारत सरकार प्रशिक्षण के नाम पर एनजीओ को 16 हजार रुपये का भुगतान कर रही है। जिसमें सांसद द्वारा सर्टिफिकेट के माध्यम से बेरोजगारों को शिक्षित करने का दावा किया जा रहा है। जबकि जमीनी धरातल पर इस योजना में बड़े पैमाने पर घोटाला और भ्रष्टाचार हो रहा है। जिससे बेरोजगारों के लिए यह योजना मात्र छलावा साबित हो रही है और एनजीओ मालामाल हो रहे हैं। जबकि भारतीय मजदूर संघ के मुताबिक नोटबंदी की वजह से 20 लाख नौकरियां चली गईं।

एक ओर प्रधानमंत्री मोदी देश और युवाओं की तकदीर बदलने का दावा कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट उनके दावांे और भाषणों को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में इजाफा होने के पूरे आसार हैं। नया रोजगार भी पैदा होने में कई अड़चनें आ सकती है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बेरोजगारी दर और स्तर अल्पकालिक तौर पर उच्च बने रह सकते हैं क्योंकि वैश्विक श्रम बल में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। विशेषकर वैश्विक बेरोजगारी दर में 2016 के 5.7 प्रतिशत की तुलना में 2017 में 5.8 प्रतिशत की मामूली बढ़त की संभावना है।

आईएलओ के महानिदेशक गाइ राइडर के मुताबिक इस वक्त हमलोग वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण उत्पन्न क्षति एवं सामाजिक संकट में सुधार लाने और हर साल श्रम बाजार में आने वाले लाखों नवआगंतुकों के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के निर्माण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। आईएलओ के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और रिपोर्ट के मुख्य लेखक स्टीवेन टॉबिन ने कहा कि उभरते देशों में हर दो कामगारों में से एक जबकि विकासशील देशों में हर पांच में से चार कामगारों को रोजगार की बेहतर स्थितियों की आवश्यकता है।
मोदी सरकार के तीन साल से अधिक के कार्यकाल में तमाम योजनाओं की घोषणाएं की गईं लेकिन जमीनी धरातल पर कोई भी एक योजना साकार रूप लेती नजर नहीं आ रही है। जिसमें उच्च शिक्षित बेरोजगार सफाई कर्मचारी, चपरासी, होमगार्ड, चैकीदार, सिपाही, कांस्टेबल जैसे पदों के लिये आवेदन कर बेरोजगारी का खौफनाक सच उजागर कर रहे हैं।

लेखक मफतलाल अग्रवाल मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संपर्क : 08865808521 , mafatlalmathura@gmail.com

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एक अपने भारत में हैं ‘शरीफ’ नेता मोदी जी, पनामा पेपर्स खा-चबा गए!

Yashwant Singh : एक अपने भारत में हैं ‘शरीफ’ नेता मोदी जी. पनामा पेपर्स ऐसे खा चबा गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो. भाजपाई सीएम रमन सिंह के बेटे से लगायत अमिताभ, अडानी आदि की कुंडली है वहां, लेकिन मजाल बंदा कोई जांच वांच करा ले. और, बनेगा सबसे बड़ा भ्रष्टाचार विरोधी. पड़ोसी पाकिस्तान से सबक ले लो जी.

कोई है जो सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर करके पनामा पेपर्स में भारतीयों के शामिल होने की सच्चाई सामने लाने की पहल करे और इसमें भारत सरकार को भी पार्टी बनाए कि ये लोग अब तक चुप क्यों हैं और इनने अब तक क्या कार्रवाई की. कांग्रेस वाले इसलिए चुप हैं इस मसले पर कि अव्वल तो ये खुदे महापापी और चोरकट हैं. दूसरे पनामा पेपर्स में कांग्रेसियों के भी तो नाम हैं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से सर्वोंत्तम यूं है :

Shyam Singh Rawat पनामा पेपर्स मामले में अपने यहाँ भी सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिससे सम्बंधित दस्तावेजों को अपर्याप्त बताते हुए खारिज कर दिया गया था। एक मुख्यमंत्री आत्महत्या करने से पहले 42 पृष्ठों में लंबा-चौड़ा स्युसाइड नोट लिख कर इस आशा में छोड़ जाता है कि देश में कहीं कोई सकारात्मक कार्रवाई होगी। चूंकि उसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों पर रिश्वतखोरी के आरोप थे, इसलिए उसे मृत्युपूर्व लिखित बयान नहीं मानते हुए रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। जबकि आमतौर पर ऐसे स्युसाइड नोट को पक्का सबूत माना जाता रहा है और शायद आगे भी माना जाएगा।

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मोदी राज में हगने पर भी जीएसटी!

Yashwant Singh : शौचालय जाने पर जीएसटी वसूलने वाले आज़ादी के बाद के पहले प्रधानमंत्री बने मोदी। पंजाब में रोडवेज बस स्टैंड पर सुलभ शौचालय की रसीद है ये। 5 रुपये शौच करने का चार्ज और एक रुपया जीएसटी। कुल 6 रुपये। महंगाई इतनी, गरीब खा न पाए, और, अगर हगने जाए तो टैक्स लिया जाए। उधर बिहार में हगने गए कई सारे गांव वालों को गिरफ्तार कर लिया गया, क्या तो कि खेत मे, खुले में, क्यों हग के गन्दगी फैला रहे हो। बेचारे सोच रहे होंगे कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों और मुगलों का राज था। कम से कम चैन से, बिना टैक्स के, हग तो पाते थे।

हमारे बड़े भाई और चिंतक Rajiv Nayan Bahuguna जी सही लिखते हैं–

”यह धरती मनुष्य अथवा मवेशियों के मल से नहीं, अपितु पोइलथिन, पेट्रोल, डीज़ल, कारखानों के धुएं अथवा वातानुकूलित संयंत्रों की गैस से दूषित होती है। और भी कई कारक हैं, मैने कुछ गिनाए। इन प्रदूषक तत्वों के लिए अमेरिका, चीन जैसे देश और भारत मे अम्बानी, अडानी जैसे उत्तरदायी हैं। खुले में शौच जाने वालों से पहले इन पर रोक लगाओ। बात बाहर या भीतर शौच जाने की नहीं , अपितु टट्टी के सदुपयोग की है हंसिये मत। गांधी जी यही करते थे। वह मैले से खाद बनाते थे। पुरानी कहावत भी है :-

गोबर, टट्टी और खली
इससे खेती दुगनी फली

गोबर और मल से गैस, ऊर्जा बनाने की तकनीक कब की आ चुकी। लेकिन ध्यान कौन दे। भारत के साथ एक पड़ोसी देश के युद्ध के समय एक नेता ने बयान दिया था- ”हमारी पूरी आबादी अगर एक साथ हग दे, तो वह लघु राष्ट्र उसी में दब जाएगा।” मैं संशोधन कर कहना चाहता हूं कि 120 करोड़ आबादी के मल मूत्र का अगर उपयोग हो जाये टिहरी जैसे 6 बांधों से अधिक ऊर्जा पैदा हो सकती है। किसी बस्ती, शहर अथवा गांव के शौचालयों का मल एक टैंक में इकट्ठा कर गैस निकाल ली जाए, और शेष उच्चिष्ट से खाद बने। लेकिन यह काम पैसा लेकर शौचालय चलाने वाले किसी गू माफिया के सुपुर्द न हो, बल्कि ग्राम एवम नागर समाज को दीक्षित किया जाए। मनुष्य, मवेशी, पशु तथा पखेरू की टट्टी इस धरती की धरोहर है।

आदरणीय शीश राम कंसवाल जी बताते हैं कि रेतीले इस्राइल को उपजाऊ बनाने के लिए विश्व भर से टट्टी खरीद कर खेतों में डाली गई , और आज इस्राइल खेती का सिरमौर है। इस पृथ्वी नामक उपग्रह के लिए विष है धन पशु की टट्टी। यह धन पशु कौन है? यह वही है जो खरबों की सार्वजनिक सम्पदा का गोलमाल कर विदेश में जा छुपता है, अथवा अपने पाप की कमाई से एक एक कर सारे चैनल खरीद डालने में जुटता है। और धन पशु की टट्टी क्या है? कारखानों से निकला रासायनिक कचरा एवं धुंआ, पॉलीथिन की पन्नी, पेट्रो केमिकल का कबाड़, शराब और कपड़े की मिल से निकला खलदर, खेतों को शनैः बांझ बनाने वाली रसायनिक खाद इत्यादि। धनपशु खुले में शौच करता है। इसकी टट्टी से जल, थल नभ अधमरे हो रहे हैं। इसे खुले में शौच से रोको। मनुष्य और मवेशी की मल सम्पदा का सदुपयोग करो। इससे धरती की सेहत सुधारो और ऊर्जा बनाओ।”

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों में इतने सारे दागी हैं, पर इस्तीफा केवल तेजस्वी यादव का चाहिए!

*तेजस्वी यादव का इस्तीफा चाहिए?

-ठीक है, पर नरोत्तम मिश्रा को तो मंत्री पद से हटा दीजिए न. आरोप साबित हो गए हैं। कदाचारी साबित हुए हैं। विधायकी चली गई है। बहुत बदनामी हो रही है।

*-देखिए, वो मामला अलग है।

-तो सुषमा स्वराज को ही हटा दीजिए, ललित मोदी की हेल्पर हैं। उनकी बेटी ललित मोदी की वकील हैं। सुषमा ने इस भगोड़े के लिए सिफारिशी चिट्ठी लिखी थी।

*-वो मामला भिन्न है।

– जेटली जी …. डीडीसीए वाले मामले पर आपके ही सांसद कीर्ति आजाद जेटली जी के बारे में कुछ ..

*-वो मामला तो “उलटा” ही है।

-वसुंधरा को ही देख लेते..वो भी ललित की हेल्पर हैं। वसुंधरा के बेटे की कंपनी में ललित का इनवेस्टमेंट है। ललित मान चुका है कि वह वसुंधरा का साथी है।

*-वो भी मामला जुदा ही है।

-तो मंत्री निहालचंद तो बलात्कार के मामले में फंसा है. कम से कम उसे तो.

*-वो मामला तो डिफरेंट है।

-व्यापम और डंपर घोटाले वाले शिवराज को. इतने लोग मार डाले गए व्यापम में।

*-वो मामला तो एकदम अलहदा है।

– पर, रमन सिंह तो धान-नान घोटाले के साथ-साथ न जाने कितने आदिवासियों को खाए बैठे हैं…

*-वो मामला तो मुख्तलिफ है।

-गडकरी जी तो साफ-साफ घोटाला किए, ड्राइवर को डायरेक्टर दिखाया..पूर्ति घोटाला तो उन्हीं का किया है न। सिंचाई स्कैम भी उसके सिर पर है। .

*- वो मामला तो अलग किस्म का है।

– जोगी ठाकुर आदित्यनाथ पर तो इतने केस हैं कि गिन ही नहीं सकते। अटैंप्ट टू मर्डर भी लगा है। उनकी अपनी एफिडेविट देख लीजिए..

*-वो मामला तो स्पेशल है

-उनके डिप्टी केशव मौर्या पर तो मर्डर तक का..

*-इसमें उसमें फर्क है

-खुद साहब पर भी तो दंगों समेत न जाने कितने केस में हैं। अनार पटेल को 400 एकड़ जमीन 92% डिस्काउंट में दे दी. सहारा डायरी में साहब के पैसा लेने का तो प्रमाण भी है. अडानी का प्लेन भी चुनाव में खूब उड़ाया था….

*वो तो मामला ही उस प्रकार का है. ..

देखिए.. ये सब छोड़िए..केवल तेजस्वी का इस्तीफा दिलाने से सब हो जाएगा। वो क्या है कि एक तरफ ये अकेला है..दूसरी तरफ इतनी लंबी फौज. एक तराजू पर तेजस्वी है..दूसरी पर ये सारे.. अब इतने सारे लोगों को इस्तीफा कराएंगे तो दिक्कत हो जाएगी न..इसलिए केवल तेजस्वी ही इस्तीफा दे दे तो उससे ही राजनीति स्वच्छ मान ली जाएगी। इससे क्या फर्क पड़ता है कि उस पर 2006 का एक केस हमने लगवाया है, जब उसकी उम्र यही कोई 13-14 साल रही होगी. क्रिकेट खेलता था शायद वह बच्चा.

महेंद्र नाथ यादव की एफबी वॉल से.

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मोदी राज में सैनेटरी नैपकिन को लक्ज़री मानते हुए इस पर 18% टैक्स थोप दिया गया!

Deepali Tayday : जिस देश में सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए निहायती मानवीय ज़रूरत अदद टॉयलेट्स तक अवेलेबल नहीं हो पाते, जबकि हर कुछ दूरी में लड़कों के लिए ऐसी व्यवस्था है, नहीं भी है तो भी यूरिन करने के लिए पूरा जहान खुला है। महिलाएँ इसी डर में बाहर जाने पर पानी नहीं पीती और कितनी तरह की प्रॉब्लम्स झेलती हैं। हाँ, यहाँ हर गली, नुक्कड़-चौराहों पर मंदिर जरूर मिल जाएंगे। इंसानों की क़ीमत नहीं, पत्थरों की जरूर है। ऐसे देश में सैनेटरी नैपकिन को लक्ज़री मानने और 18% टैक्स लगाने पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हो रहा।

पीरिड्स, उससे जुड़ी ज़रूरतें, हाइजिन कहाँ उन्हें समस्या लगेंगी। महिलाओं का स्वास्थ्य यहाँ पर कब चिंता का विषय रहा है। पहले सिर्फ़ देह थी, बच्चा पैदा करने की मशीन थीं, हाइजीन की बात ही छोड़िये और अधिकारों का तो नाम भी मत ले लेना।ब्राह्मणवाद इतने मेन्युट लेवल पर काम करता है कि आसानी से समझ नहीं आता। तुम वहीं पहुँच रही हो जहाँ से शुरू हुआ था। मनुस्मृति के हिसाब से जो औक़ात मनु ने तय की है वहीं धकेली जाओगी। देह हो, सिर्फ़ देह में बँधी रहो। सिंदूर और श्रृंगार है तुम्हारे लिए, पूजा का सामान सस्ता कर दिया है तुम्हारे लिए……..हाँ माहवारी का नाम मत लेना, वो खून चलता नहीं है भगवान की पूजा में। तो जो पेड यूज़ कर रहीं हैं वो लक्ज़री ही है, सब महिलाएँ इतनी रईस हैं कि आसानी से ख़रीद सकती हैं। नहीं भी ख़रीद सको तो जाओ भाड़ में हमें क्या…

थोड़ा सा इमेजिन करके देखो किन हालातों में , किस तरह से और कितनी मुश्किल में कौन लोग तुम्हारी पढ़ाई, समानता और सभी अधिकारों के लिए लड़े होंगे। फुले आई-बाबा और बाबासाहेब की वजह से आज फ़ेसबुक बोल पा रही हो। खूब रंग रही हो दीवार विरोध में। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई से लेकर ये क्रांति और फेमिनिज्म का झंडा ऊठाने में ये ज़ेहन में आए ही नहीं होंगे। यह सिर्फ टैक्स लग रहा है तो भोलापन है आपका…

फेसबुक की चर्चित लेखिका दीपाली की वॉल से.

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मोदी सरकार ने रियल एस्टेट उद्योग को सबसे बुरे दिनों के दर्शन करा दिए!

Ashwini Kumar Srivastava : अच्छे दिन लाने के नाम पर आई मोदी सरकार ने देश के साथ क्या सुलूक किया है, यह तो पता नहीं लेकिन कम से कम रियल एस्टेट उद्योग को तो जरूर ही उन्होंने मनमोहन सरकार के 10 बरसों के स्वर्णिम दौर से घसीट कर सबसे बुरे दिनों के दर्शन करा दिए हैं। पहले तो सरकार में आते ही काले धन के खिलाफ अभियान छेड़ने की धुन में न जाने कितने सनकी कानून बनाये या पुराने कानून के तहत ही नोटिस भेज-भेज कर देशभर को डराया….फिर बेनामी सम्पति कानून का ऐसा हव्वा खड़ा किया कि शरीफ आदमी भी दूसरा फ्लैट/मकान या प्लॉट लेने से कतराने लगा। ताकि कहीं उसकी किसी सम्पति को बेनामी करार देकर खुद सरकार ही न हड़प ले।

इसके बाद, साहब ने बिना कोई तैयारी किये नोटबंदी करके महीनों तक देशभर के लोगों को महज अपनी जरूरतभर का सामान खरीदने की बेबसी देकर रियल एस्टेट उद्योग की कमर ही तोड़ दी। उससे भी मन नहीं भरा तो फिर रेरा का ऐसा चक्कर चलाया कि रियल एस्टेट कंपनियां महीनों से चकरघिन्नी बनी हुई हैं। क्योंकि रेरा कानून भले ही कागजों में बन गया हो मगर इसके चलते ही रियल एस्टेट कंपनियां न तो कोई भुगतान स्वीकार कर पा रही हैं और न ही अपना कोई प्रोजेक्ट लांच कर पा रही हैं। इसकी वजह है इसमें लगाई गई वह शर्त, जिसके मुताबिक अब कोई भी रियल एस्टेट कंपनी रेरा में रजिस्टर्ड हुए बिना कारोबार नहीं कर सकती। लेकिन हद देखिये कि महीनों बीत चुके हैं लेकिन अभी रेरा का रेजिस्ट्रेशन कहाँ होना है, कैसे होना है, कितने दिन में होगा, यह तक बताने वाला भी कोई नहीं है।

जाहिर है, पहले तो रेरा की कमेटी बने, वह रजिस्ट्रेशन का तौर-तरीका और बाकी नियम-कायदे बताए, फिर जाकर वहां कंपनियां अप्लाई करें… और तब न जाने क्या संसाधन और कितना स्टाफ होगा रेरा की कमेटी में… और न जाने कितने दिन-महीने और लग जाएंगे देश में रियल एस्टेट कंपनियों को अपना कारोबार दोबारा शुरू करने में…यह पता लगे, तब ही मोदी के दिखाए अच्छे दिनों को लेकर रियल एस्टेट उद्योग में कुछ उम्मीद की किरण जग पाएगी।

लेकिन यह सब करके भी तसल्ली नहीं मिल पा रही थी तो इन हालात में कोढ़ में खाज की कहावत को सच करते हुए मोदी सरकार ने जीएसटी का बम उद्योग जगत पर और दे मारा। इन सबके बीच अभी हाल ही में एक खबर और आई थी, जिसमें कहा गया था कि 50 लाख से ऊपर की सम्पति खरीदने के लिए प्रवर्तन निदेशालय यानी कि ईडी जैसे खतरनाक विभाग से लोगों को मंजूरी लेनी होगी। भले ही जिन लोगों के पास काले धन के भंडार न हों लेकिन वे भी 50 लाख से ऊपर की सम्पति खरीदने के लालच में ईडी की लालफीताशाही या धौंसपट्टी में फंसने से परहेज तो करेंगे ही।

बिलकुल उसी तरह, जिस तरह अच्छा-भला शरीफ आदमी भी अपने देश में थानों में कोई मामला ले जाने से परहेज करता है, इस डर से कहीं ऐसा न हो कि इस मामले में या किसी और ही मामले में शक की निगाह से देखते हुए पुलिस उसके ही पीछे पड़ जाए। इन्हीं वजहों से हाल यह हो चुका है कि देश का सारा रियल एस्टेट उद्योग इस समय अपने वजूद को बचाये रखने के लिए जूझ रहा है। पेशेवर श्रमिक के साथ-साथ मजदूरों के खाली बैठने से न जाने कितनी नौकरियां इस क्षेत्र की तबाही से जा चुकी हैं। न जाने कितना राजस्व, जो स्टाम्प/टैक्स आदि के रूप में सरकार को इस उद्योग के फलने-फूलने से मिलता था, का नुकसान देश को मूर्खतापूर्ण नीतियों के चलते हो चुका है। सीमेंट, स्टील, लकड़ी, ईंट-भट्ठा, कंस्ट्रक्शन, इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर, विज्ञापन जगत, पेंट, टाइल्स, अन्य बिल्डिंग मटेरियल, होम फर्निशिंग आदि के रूप में इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े न जाने कितने उद्योग रियल एस्टेट की बर्बादी की चपेट में आकर खुद भी मुश्किल दिनों से जूझ रहे हैं।

न जाने कितने बैंक, होम लोन में आई भारी गिरावट के बाद तेजी से घटते अपने कारोबार को वापस पटरी पर लाने की जुगत में परेशान हैं। ऐसे में क्या देश की जीडीपी नहीं धराशाई होगी, आर्थिक विकास की दर में गिरावट नहीं आएगी, खरबों रुपये के राजस्व की हानि नहीं होगी सरकार को, बेरोजगारों की फौज नहीं बढ़ेगी, बाजार और उद्योग जगत की कमर नहीं टूटेगी…. ?

इसी वजह से तो यही सब हो रहा है देश में। जो देश मनमोहन सिंह की सरकार के समय आर्थिक महाशक्ति का सबसे बड़ा दावेदार बनते हुए अमेरिका और चीन तक की नींदें उड़ाने में कामयाब था, वही देश मोदी सरकार के आते ही महज तीन बरस में ही आर्थिक महाशक्ति बनना तो दूर, आर्थिक बदहाली की राह पर न जाने कितना आगे निकल चुका है।
जहां तक अर्थशास्त्र से की गई मेरी उच्च शिक्षा और देश के शीर्ष मीडिया हाउस/अखबारों में बतौर आर्थिक पत्रकार काम करने के 10 साल से भी ज्यादा के अनुभव के बाद उपजे मेरे ज्ञान या समझ का सवाल है, वह यही कहते हैं कि रियल एस्टेट उद्योग की बदहाली देश की अर्थव्यवस्था की चूलें तक हिलाने की क़ुव्वत रखती है। ऐसा नहीं होता तो 2008 में अमेरिका के रियल एस्टेट उद्योग की तबाही के बाद दुनियाभर में आई मंदी दुनिया ने नहीं देखी होती।

इसी वजह से मोदी सरकार को चाहिए कि वह किसी भी कीमत पर रात-दिन एक करके देश के रियल एस्टेट उद्योग को पटरी पर लाएं….अगर 2019 में देश को आर्थिक बदहाली की कगार पर लाकर पटक देने वाले प्रधानमंत्री के रूप में चुनाव में उतरकर वह जनता के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहते हैं तो…

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Satyendra PS आप यह जान लें कि मोदी यह सब करके चुनाव जीतेगा। औऱ आखिर में हिटलर टाइप देश बर्बाद करने के बाद आत्महत्या कर सकता है। आप रियल स्टेट बता रहे हैं। रेलवे को किस तरह बर्बाद किया और लूटा है इन सबों ने। किराया बढ़कर दोग्गुना हो चूका है। अब सरकार सब्सिडी छोड़ने की अपील करने जा रही है। इस साल परिचालन अनुपात 14 साल में सबसे घटिया रहा है।

Ashwini Kumar Srivastava “इजराइल से मिले समाचार से पता चला है कि मोदी जी ने 70 साल बाद किसी भारतीय पीएम के तौर पर इजराइल जाकर पूरे इजराइल के लोगों का दिल जीत लिया है। वहां उनके स्वागत में हर इजराइली लहालोट हो गया है। भारत और मोदी का डंका इससे दुनियाभर में बजने लगा है। और, अडानी ने वहां का सबसे बड़ा हथियारों का ठेका हथियाकर अपनी कंपनी और कारोबार को चार चांद लगा लिए हैं।” दरअसल, अडानी वाली लाइन गोल करके ही मीडिया और मोदी के अन्धभक्त मोदी को जनता के बीच में महानायक बनाकर पेश कर रहे हैं। यही तरीका वह मोदी के हर काम या फैसलों में अपनाते हैं। कोई नहीं जान पाता कि रेलवे को बर्बाद करने के पीछे किसको फायदा पहुंचाने का खेल चल रहा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे इजराइल जाकर इतनी मेहनत करने के पीछे किसका कारोबार बढ़ाने का खेल चल रहा है, यह जनता नहीं जान पा रही।

Arun Gautam बांग्लादेश गए थे तो अम्बानी के लिए ठेका ले आए थे… अभी इजराइल गए तो अडानी के लिए ठेका ले आये…  हमारे परिधानमंत्री प्राइवेट कंपनियों की एजेंटगिरी मस्त करते हैं.. ऐसा एजेंट PM पाकर देश धन्य है।

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हिंदू और यहूदी सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है!

Rajeev Mishra : प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा एक सरकारी दौरा नहीं है…एक राष्ट्र प्रमुख की दूसरे राष्ट्राध्यक्ष से मुलाक़ात भर नहीं है…यह दो प्राचीन सभ्यताओं का मिलन है… दो सभ्यताएं जिनमें बहुत कुछ कॉमन है…एक समय, इस्लाम की आपदा से पहले दोनों की सीमाएं मिलती थीं, पर दोनों में किसी तरह के टकराव की कहानी हमने नहीं सुनी. दोनों में से किसी को भी किसी और को अपने धर्म में शामिल करने की, अपने धर्म प्रचार की, मार्केटिंग की खुजली नहीं थी…

पर इतिहास में दोनों ने कुछ कॉमन गलतियाँ भी की हैं…सबसे बड़ी गलती की है; अपने काम से काम रखा है…हमने अपनी रोजी रोटी कमाने पर ध्यान दिया है…अपने बच्चे पाले हैं, अपने खेत जोते हैं, अपनी फसल काटी है, अपना सौदा बेचा खरीदा है. हिंदुओं और यहूदियों, दोनों सभ्यताओं ने विज्ञान, कला और संस्कृति को बहुमूल्य योगदान दिया है…पर दोनों में किसी को भी दुनिया जीतने का शौक कभी नहीं चढ़ा. दोनों के लिए धर्म का मतलब रहा, अपनी आत्मा का उत्थान…अपने बच्चों के संस्कार….

पर मानें या ना मानें, दोनों सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है. दोनों को अपने घर में घुसे आ रहे आक्रांताओं को झेलना पड़ा है. यहूदियों को डेढ़ हजार साल तक बिना घर के रहना पड़ा है. लेकिन दुनिया भर में फैले यहूदियों ने कभी कोई शिकायत नहीं की. जहाँ रहे, कुछ दिया ही है. कोई आतंकवादी नहीं बना…किसी ने बदला लेने की नहीं सोची…किसी ने कड़वाहट और घृणा नहीं बाँटी… लेकिन हमेशा सबकी घृणा का शिकार हुए.

कुछ ऐसे ही आज हिन्दू हैं, पूरी दुनिया में फैले हुए…अपने काम से काम रखने वाले, अपने बच्चों को स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी भेजने वाले, उन्हें डॉक्टर-इंजीनियर-अकाउंटेंट बनाने के फिक्रमंद…दुनिया से बेखबर…अपने हाथ से अपना देश निकलता जा रहा है…कोई बात नहीं, कहीं भी रोटी कमा लेंगे… पर एक दिन यहूदियों की नींद खुली, जब उन्होंने अपने आप को कंसंट्रेशन कैम्प्स में पाया…अपने बिस्तर पर सोये थे, गैस चैंबरों में जागे…लाखों जीवन गँवाने के बाद एक सबक सीखा…अपना एक देश बनाने के लिए लड़े, जीते, जिये…

आज हिन्दू अपने ऐतिहासिक गंतव्य पर यहूदियों से सिर्फ कुछ पीढ़ी पीछे-पीछे चल रहे हैं. जो खो रहा है उसकी समझ नहीं है. जो आने वाला है उसकी खबर नहीं है. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उलझे हैं. 70 साल बाद देश ने हिन्दू जनमत वाला एक नेतृत्व चुना है. उसे भी अपने इस ऐतिहासिक दायित्व का बोध है कि नहीं पता नहीं…सड़क, बिजली-पानी, नोट बदलने और टैक्स के गणित में उलझे हैं. पूरा देश, पूरी सभ्यता ही इसी गणित में उलझी है…

नानी पालकीवाला का एक लेख पढ़ा था इजराइल के बारे में. लिखते हैं…भारत और इजराइल को एक दूसरे से बहुत कुछ सीखना है….भारत को इजराइल से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे चलाना चाहिए…इजराइल को भारत से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे “नहीं” चलाना चाहिए…

मोदी जी इजराइल जाएंगे, यह एक ऐतिहासिक क्षण है. 70 सालों में किसी भी भारतीय नेता को यह नहीं सूझा…अब जब वो गए हैं तो सवाल उठता है कि वे वहाँ से क्या लेकर आएंगे. सिर्फ मेक इन इंडिया के एमओयू, रक्षा समझौते, नई तकनीक ले कर आएंगे…या वो सबक भी लेकर आएंगे जो यहूदियों ने औस्विज़ के गैस चैंबरों में सीखा था…

लंदन में मेडिकल फील्ड में कार्यरत राजीव मिश्रा की एफबी वॉल से.

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का सवाल- कोई भारतीय प्रधानमंत्री इससे पहले इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाया?

नजदीक होकर भी दूर क्यों रहा इजरायल… दो बरस पहले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इजरायल के एयरपोर्ट पर उतरे जरुर लेकिन पहले फिलीस्तीन गए फिर इजरायल दौरे पर गये। पिछले बरस जनवरी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज फिर पहले फिलिस्तीन गईं उसके बाद इजरायल गईं। लेकिन पीएम मोदी तो तीन दिन इजरायल में ही गुजारेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री इजराइल को लेकर संबंधों की नयी इबारत लिखने जा रहे हैं और भारत के उस एतिहासिक रुख को हमेशा के लिए खत्म कर रहे हैं, जिसकी छांव में गांधी से लेकर नेहरु तक की सोच अलग रही। महात्मा गांधी ने 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका में कई यहूदियों को अपना दोस्त बताते हुए लिखा, “यहूदियों के लिए धर्म के आधार पर अलग देश की मांग मुझे ज्यादा अपील नहीं करती। फिलीस्तीन अरबों का है, जिस तरह इंग्लैंड ब्रिटिश का और फ्रांस फ्रेंच लोगों का है और अरबों पर यहूदियों को थोपना गलत और अमानवीय है”।

इतना ही नहीं, 21 जुलाई 1946 को लिखे अपने एक और लेख में महात्मा गांधी ने लिखा, “दुनिया ने यहूदियों के साथ बहुत क्रूरता की है। अगर उनके साथ क्रूरता नहीं हुई होती तो उनके फिलिस्तीन जाने का सवाल ही नहीं उठता।” लेकिन महात्मा गांधी के विचार भारत की आजादी से पहले के थे। भारत की आजादी के बाद 29 नवंबर 1947 के बाद संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के मुद्दे पर वोटिंग होनी थी। उससे पहले भारत का समर्थन जुटाने के लिए इजराइल ने उस वक्त के सबसे बड़े यहूदी चेहरों में एक दुनिया के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन को मैदान में उतारा। आइंस्टाइन नेहरु के प्रशंसक और कुछ हद तक मित्र भी थे। नेहरु भी उनका बहुत सम्मान करते थे। 13 जून 1947 को अपने चार पेज के खत में आइंस्टान ने नेहरु को लिखा, “प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में हैं, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं। उन्हें न्याय और समानता चाहिए।”

इस खत में यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विस्तार से जिक्र था। इसके अलावा कई तर्क थे कि क्यों यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र चाहिए। नेहरु ने करीब एक महीने तक खत का जवाब नहीं दिया। फिर 11 जुलाई 1947 को जवाब देते हुए लिखा, “मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे यहूदियों के प्रति बहुत सहानूभूति है तो अरब लोगों के लिए भी है। मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में बहुत शानदार काम किया है और उन्होंने वहां के लोगों का जीवनस्तर सुधारने में बड़ा योगदान दिया है। लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है। आखिर इतने बेहतरीन कामों और उपलब्धियों के बावजूद वो अरब का दिल जीतने में क्यों कामयाब नहीं हुए। वो अरब को उनकी इच्छा के खिलाफ क्यों अपनी मांगे मानने के लिए विवश करना चाहते हैं।”

दरअसल गांधी नेहरु की सोच 1992 तक जारी रही। लेकिन 1991 में यूएसएसआर का ढहना, खाडी युद्ध और भारत के आर्थिक सुधार ने अमेरिका के साथ संबंधों के दरवाजे खोले और उसमें इजरायल से करीबी अमेरिकी संबंधों तले जरुरत बनी। 29 जनवरी 1992 को फिलिस्तीन राष्ट्रपति यासिर अराफात की सहमति के बाद भारत ने इजरायल के साथ डिप्लामेटिक संबंध को पूर्ण रुप से बहाल किया। लेकिन जिस दौर में इजरायल से संबंध नहीं भी थे तो उसका दूसरा चेहरा युद्ध के दौर में नजर आया। इतिहास के पन्ने बताते है कि 62, 71 और 99 के कारगिल युद्ध के वक्त इजरायल ने गुपचुप तरीके से भारत की मदद की थी और भारत ने बिना राजनयिक संबंधों के इजरायल से मदद मांगी भी थी।

1962 का युद्ध तो चीन का भारत की पीठ में छुरा भोंकने जैसा था। भारत युद्ध के मैदान में जा पहुंचा तब भारत की हालत ठीक नहीं थी। जिस नेहरु की अगुवाई में इजराइल गठन के विरोध में भारत ने 1950 में संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग की थी, उन्हीं नेहरु ने 1962 युद्ध के वक्त इजराइल से मदद मांगी। इजराइल फौरन तैयार हो गया। लेकिन नेहरु ने इजराइल के सामने एक शर्त रख दी। शर्त यह कि जिस शिप से हथियार भेजे जाएं, उस पर इजराइल का झंडा न हो और हथियारों पर इजराइल की मार्किंग न हो”। इजराइल के पीएम को बगैर झंडे वाली बात हजम नहीं हुई। उन्होंने हथियार देने से मना कर दिया। बाद में इजराइल के झंडे लगे जहाज को भारत ने मंजूर कर लिया तो इजराइली मदद भारत पहुंची। फिर 1971 के युद्ध में तो अमेरिका ने भारत के खिलाफ ही अपने सातवें बेड़े को भेज दिया लेकिन तब भी इजराइल ने भारत को गुपचुप तरीके से हथियार भेजे और उन्हें चलाने वाले लोग भी।

अमेरिकी पत्रकार गैरी बैस की किताब ‘द ब्लड टेलीग्राम’ में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पी एन हक्सर के दस्तावेजों के हवाले से कहा गया है कि “जुलाई 1971 में इस्राइली प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने गुप्त तरीके से एक इस्राइली हथियार निर्माता से कहा कि वह भारत को कुछ मोर्टार और हथियार मुहैया कराए और साथ ही उन्हें चलाने का प्रशिक्षण देने वाले कुछ लोग भी दे। जब हक्सर ने समर्थन के लिए इस्राइल पर जोर डाला तो गोल्डा मायर ने मदद जारी रखने का वादा किया।” जाहिर है इजराइल ने भारत से दोस्ती निभायी। 1999 में कारगिल युद्ध तो नयी पीढ़ी के जेहन में भी ताजा है। इस युद्ध से महज सात साल पहले ही भारत ने इजराइल के साथ पूर्ण रुप से राजनयिक रिश्ते के तार जोडे थे। लेकिन महज सात साल की औपचारिक दोस्ती को इजराइल ने युद्ध में ऐसे निभाया कि हेरॉन और सर्चर यूएवी दिए। जिनकी मदद से कारगिल की तस्वीरें ली गईं थीं वह इजरायल से आई। इजरायल ने भारत को मानवरहित विमान उपलब्‍ध कराए। सैटेलाइट से ली गई उन तस्वीरों को भी भारत से साझा किया, जिसमें दुश्मन के सैन्य ठिकाने दिख रहे थे। इतना ही नहीं, इजरायल ने बोफोर्स तोप के लिए गोला बारुद मुहैया कराया। भारतीय वायु सेना को मिराज 2000 एच युद्धक विमानों के लिए लेजर गाइडेड मिसाइल भी उपलब्‍ध कराए। यानी जिस दौर में इजरायल से कोई रक्षा समझौता भारत ने किया ही नहीं, उस दौर में इजरायल ने भारत को हथियार दिये।

अब इजरायल के साथ खुले तौर पर रक्षा संबंधों का दायरा इतना बडा हो चला है कि प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले ही रक्षा क्षेत्र में एकमुश्त कई बड़े डील की तैयारी हो चुकी है और 17 हजार करोड़ की मिसाइल डील को भारत मंजूरी भी दे चुका है। तो आखिरी सवाल, इन सबके बावजूद इससे पहले कोई प्रधानमंत्री इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाए। सच यही है कि एक तरफ देश में वोट बैंक की राजनीति है जो मानती है कि मुस्लिमों के मन में इजरायल को लेकर कड़वाहट है तो इजरायल के साथ खडे कैसे हुआ जाये। दूसरी तरफ 80 लाख भारतीय श्रमिक अरब देशो में काम कर रहे हैं। कही 70 के दशक की तर्ज पर इजरायल का साथ देने वालों के खिलाफ अरब वर्ल्ड ना खड़ा हो जाये। ये जहन में रहता जरुर है। वजह भी यही रही कि कांग्रेस को हमेशा लगा कि इजरायल से संबंध बढ़ाने का मतलब अरब देशों को खफा करना होगा, और इजरायल से संबंध भारत में रह रहे मुसलमानों को भी पार्टी से दूर करेगा। यानी राजनयिक संबंधों की डोर का एक सिरा भी घरेलू राजनीति के वोट बैंक से जुड़ गया। तो दूसरी तरफ बीजेपी के लिये मुस्लिम वोट बैक कोई मायने नही रखता है ये भी दूसरा सच है । क्योकि 2014 के चुनाव में कांग्रेस को महज 44 लोकसभा सीट मिली तब भी पार्टी को 37.60 मुस्लिम वोट मिला। वहीं बीजेपी को 282 सीटों पर जीत मिली लेकिन बीजेपी को 8.4 फीसदी मुस्लिम वोट मिला। तो सवाल कई है। लेकिन संबंधों की नई लकीर अगर पुरानी लकीर को मिटा रही है तो इंतजार करना होगा। रास्ता आगे का ही निकलना चाहिये।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी आजतक न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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ये देखो मोदी का मंत्री खुलेआम मूत रहा है!

मोदी का मंत्री सुरक्षा बलों के घेरे में खुलेआम मूत कर स्वच्छ भारत अभियान को कलंकित कर गया…

कृषि मंत्री राधा मोहन जी को लघुशंका लगी तो अपने इर्द-गिर्द सिक्योरिटी तैनात करके एक जगह पर खुलेआम खड़े-खड़े मंत्री ही शुरू हो गये… अब आप बताईये ऐसे मे मोदी जी और अमिताभ बच्चन जी की बातें याद रखें कि खुलें मे शौच या लघुशंका ना करें या फिर अपना आराम देखें.. बंदूक़ों के साये मे खुले में यह करने का आनंद मंत्री जी से अच्छा भला और कौन समझ सकता है…

मीडिया वाले तो पागल हैं.. खामखा हल्ला करते हैं… बिना बात बतंगड़ बना देते हैं… अरे भई, जब लग गई तो फिर क्या स्वच्छ भारत और क्या गंदा भारत… कुत्ते माफिक कहीं भी किनारा / दीवाल देखा और शुरू हो गए.. अगल बगल सिक्योरिटी वाले खड़े कर लेने से अब कोई मंत्री जी को टोक भी नहीं सकता और न ही उन्हें फूल गिफ्ट कर गांधीगिरी के जरिए शर्मिंदा कर सकता है क्योंकि मंत्री जी का खुलेआम मूतना संवैधानिक अधिकार है, सुरक्षा बल इस अधिकार को समुचित तरीके से मुहैया कराने के लिए कटिबद्ध हैं… जैजै 🙂

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केंद की मोदी व उत्तर प्रदेश की योगी सरकारें हाथ धोकर पत्रकारों के पीछे पड़ी हैं!

पत्रकारों के आवास आवंटन निरस्तीकरण का आदेश वापस ले योगी सरकार… सर्वविदित है केन्द्र की मोदी सरकार ने लघु-मध्यम समाचार पत्रो के प्रकाशन पर RNI एवम् DAVP के माध्यम से शिकंजा कसकर पत्रकारों के लिए कब्र खोद दी है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पत्रकारों को आवास आवंटन में अखिलेश सरकार के फैसले को  जबरन पत्रकारों पर थोप दिया है। जिसके परिणामस्वरूप पत्रकार घर से बाहर सड़क पर आकर दर-दर भटकने को मजबूर हो जायेंगे। लोकतन्त्र के सजग प्रहरियों का उत्पीड़न करना क्या न्याय संगत है?

आपको याद दिला दें, सुप्रीम कोर्ट में सत्यनारायण शुक्ला द्वारा मात्र पूर्व मुख्यमंत्रियों के अनधिकृत अध्यासन वाले आवासों को खाली कराने सम्बन्धी याचिका सिविल संख्या-657/2004 में पारित आदेश की राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा की गयी गलत व्याख्या को सहमति प्रदान कर,अखिलेश सरकार ने (शासन की नियमावली एवम् निर्धारित किराये पर समस्त पत्रकारों के पूर्व आवंटित) आवासों को निरस्त कर दिया था।

क्या योगी सरकार द्वारा अखिलेश सरकार के पत्रकारों को पूर्व आवंटित आवासों के निरस्तीकरण आदेश को संशोधित कर पुनरादेश नहीं करना चाहिए था? लेकिन योगी सरकार ने अखिलेश सरकार के तुगलकी फ़रमान को लागू कर दिया। यह भी महत्वपूर्ण है कि पत्रकारों को आवास आवंटन की जो नई नीति अखिलेश सरकार के आला अफसरों ने तैयार की थी, विसंगतियों से भरपूर है। लगता है कि अधिकारियों को नॉलिज नहीं थी। उसमें आवास आवंटन के लिए राज्य मुख्यालय की मान्यता होना जरुरी अर्हता रखी गयी है। जबकि सम्पादकों को राज्य मुख्यालय की मान्यता नहीं दी जाती। इसके फलस्वरूप पूर्व आवास आवंटी सम्पादक सड़क पर आ जायेंगे। इतना ही नहीं, निजी आवास न होने का शपथ पत्र भी माँगा जा रहा है। इसके आधार पर पूर्व आवंटी पत्रकारों को सींखचों के पीछे भेजने की तैयारी की जा सके।

मजेदार बात है कि योगी सरकार ने पिछली सरकार द्वारा तैयार की गयी नई आवास आवंटन नीति में कोई संशोधन न कर ज्यों का त्यों लागू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के याचिका कर्ता श्री सत्य नारायण शुक्ल भी स्वीकारते है कि राज्य संपत्ति विभाग की कार्रवाई गलत और माननीय न्यायलय की अवमानना है। माननीय मुख्यमन्त्री योगी आदित्य नाथ जी से विनम्र निवेदन है कि पत्रकारों के आवास आवंटन निरस्तीकरण का आदेश वापस लेने का कष्ट करें तथा राज्य संपत्ति विभाग को निर्देशित करे कि पत्रकारों को पूर्व आवंटित आवासों में पूर्ववत रहने दिया जाए।

रमेश चन्द जैन
प्रान्तीय महामन्त्री
यू.पी.जर्नलिस्ट्स एसोसिएसन
28-बी विधायक निवास
दारूल शफ़ा, लखनऊ
9412487182,9319204848

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मोदी-योगी राज में चोरी और चोरों का बोलबाला!

Yashwant Singh : अभी टिकट बुक कर रहा था, तत्काल में। प्रभु की साइट हैंग होती रही बार बार। paytm ने अलग से पैसा लिया और सरकार ने अलग से टैक्स वसूला, ऑनलाइन पेमेंट पर। ये साले भजपईये तो कांग्रेसियों से भी बड़े चोट्टे हैं। इनको रोज सुबह जूता भिगो कर पीटना चाहिए। मुस्लिम गाय गोबर पाकिस्तान राष्ट्रवाद के फर्जी मुद्दों पर देश को बांट कर खुद दोनों हाथ से लूटने में लगे हैं। ये लुटेरे खटमल की माफिक जनता का खून पी रहे हैं, थू सालों।

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कोई योगी भक्त भाजपाई समझाए कि सपा राज का यह महाचोरकट अभी तक यूपी का मुख्य सचिव कैसे बना हुआ है? अब तो बड़े अखबारों ने भी इस लुटेरे को पद पर बनाए रखने को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। ये आज के अमर उजाला में छपी न्यूज़ का एक हिस्सा है। पढ़ें और बूझें।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Sanjaya Kumar Singh : जीएसटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सर्विस टैक्स 15 प्रतिशत से 18 प्रतिशत हो जाएगा। उन सेवाओं के लिए भी जो सरकार को मुफ्त देना चाहिए पर देती नहीं है या घटिया होती है। आप दूसरों से पैसे देकर जो सेवाएं प्राप्त करते हैं उसके लिए भी सरकार सेवा कर लेती है। मनमोहन सिंह की बेईमान सरकार ने सात प्रतिशत से इसकी शुरुआत की थी जो बढ़ते हुए 15 प्रतिशत थी और जीएसटी के बाद ईमानदार सरकार इसे 18 प्रतिशत कर रही है। जय हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

इन्हें भी पढ़िए…

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मैंने मोदी को वोट दिया था पर अब लगता है देश की लुटिया डूबने वाली है!

वैसे तो किसी भी देश में एक साथ कई नाम ऐसे होते हैं जो चर्चित होते हैं लेकिन इस समय देश में यदि कोई नाम सबसे ज्यादा चर्चित है तो वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि टॉप टेन चर्चित नामों की लिस्ट बनाने के लिए कहा जाए तो एक से दस नंबर तक नरेंद्र मोदी का ही नाम लिखना पड़ेगा। दूसरा नाम वास्तव में ग्यारहवें नंबर पर आएगा। प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदा लोकप्रियता देश के लिए जितनी अच्छी है उतनी ही बुरी भी है।

अच्छी इसलिए कि मोदी अपनी मर्जी के हिसाब से काम कर सकते हैं और देश को बहुत आगे ले जा सकते हैं। वे देश के सबसे अधिक शक्ति प्राप्त प्रधानमंत्रियों में से एक हैं। बुरी इसलिए कि अत्यधिक लोकप्रियता उनमें तानाशाही प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है और उनकी गलत नीतियाँ देश को उतना ही अधिक नुकसान भी पहुँचा सकती हैं। दुनिया में इसके तमाम उदाहरण मौजूद हैं। दुनिया में जितने भी तानाशाह हुए हैं वे शुरुआत में जनता में बेहद लोकप्रिय रहे थे।

70 साल से हम कर क्या रहे हैं?
पिछले सत्तर सालों के शासन पर नजर डालने पर एक बात साफ हो जाती है कि देश की जनता अंध भक्ति की शिकार रही है। यह अंध भक्ति पहले जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और कांग्रेस पार्टी के प्रति थी अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति है। जरा सोचकर देखिए कि जनता की अंध भक्ति की यह प्रवृत्ति क्या किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ठीक है? वास्तव में आजादी के बाद हर पीढ़ी ने जागरूक रहने के बजाय अंध भक्तिपन ही ज्यादा दिखाई है और इसी का परिणाम रहा है देश में घटिया शासन। इसका असर यह हुआ कि विकास करने के मामले में हम फिसड्डी साबित हुए जबकि इतने सालों में दूसरे देश कहाँ से कहाँ निकल गए।

यह जरा कड़वा है मगर है सत्य कि जब तक हमारी यह अंध भक्ति की आदत नहीं छूटेगी बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है। सत्ता में आनेवाला हर कोई जनता को बेवकूफ बना जाएगा और जब तक हमें होश आएगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। अंध भक्ति का आलम यह है कि आज नरेंद्र मोदी की आलोचना करना ही सबसे बड़ा अपराध हो गया है। कमोबेश क्या यही स्थिति कांग्रेस के लंबे शासन काल में नहीं थी? कांग्रेस ने लाख गलतियाँ की फिर भी लोग उसे सत्ता सौंपते रहे। जबकि आज कांग्रेस को गाली देने वालों की कोई कमी नहीं है, कल भाजपा के साथ भी ऐसा ही होनेवाला है। ऐसा न हो इसलिए आज जागरूक होना जरूरी है।

लोकतंत्र के लिए खतरनाक है अंध भक्ति
पिछले सत्तर साल से देश में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है। इस सत्य को नकारते हुए कि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली ही सबसे अच्छी शासन प्रणाली होती है बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जो इस शासन प्रणाली को गाली देते रहते/रहे हैं। जबकि वे यह भूल जाते हैं कि इसके लिए वास्तव में जिम्मेदार तत्व क्या हैं। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के सफल होने की कुछ अनिवार्य शर्तें हैं जिसमें सबसे बड़ी शर्त है जनता का शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक होना।

अंध भक्तिपन तो लोकतंत्र की गर्दन मरोड़ने जैसा है। किसी भी शासक को अंध भक्त जनता ही पसंद आती है। वैसे जनता को अंध भक्ति करना ही है तो पांच साल में सिर्फ एक दिन अर्थात चुनाव के दिन करना चाहिए। बाकी के चार साल तीन सौ चौसठ दिन जनता को सजग प्रहरी बनकर डंडा लेकर चौकस खड़ा रहना चाहिए। सरकार यदि अच्छा काम कर रही है तो जनता उसकी पीठ थपथपाए लेकिन यदि वह गलत करती है तो उसके सिर पर डंडा मारे। तभी लोकतंत्र सफल हो सकता है अन्यथा रोते रहने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। वैसे भी हमारे देश के नेता महाधूर्तों की श्रेणी के हैं। वे बड़े मजे से जनता को ठगते रहते हैं और जनता को इसका पता सालों बाद ही चल पाता है।

मीडिया मुट्ठी में!
वर्तमान दौर में जनता को इसलिए भी जागरूक होना ज्यादा जरूरी है क्योंकि आज मीडिया सरकार की कठपुतली बना हुआ है। इससे पहले कभी ऐसा देखने को नहीं मिला कि पूरा मीडिया जगत सरकार की मुट्ठी में कैद हो। तब मीडिया सरकार के गलत फैसलों पर सवाल उठाता था जबकि आज का मीडिया सरकार की चाटुकारिता में लगा हुआ है और उसका इस्तेमाल सरकार की छवि चमकाने के लिए हो रहा है।

मीडिया मालिक पूरी तरह धंधेबाज हो गए हैं उन्हें पत्रकारिता के उसूलों से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें तो बस पैसे से मतलब है। अखबार-टीवी चैनल मीडिया मालिकों के लिए शानदार हथियार और ढाल हैं। वे इनका इस्तेमाल अपने सारे गलत कामों से बचने के लिए करते हैं। सरकार को भी तो ऐसे ही मीडिया मालिक चाहिए जो चोर हों क्योंकि सरकार इन्हें आसानी से अपनी मुट्ठी में कर सकती है। दूसरी ओर मीडिया मालिकों को इस देश की जनता से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें तो सिर्फ अपना धंधा बढ़ाना है।
 
आज जागने की ज्यादा जरूरत…
किसी भी देश का मीडिया जब सरकार के हाथों बिक जाए तो लोकतंत्र के लिए खतरा बढ़ जाता है। अब सवाल यह है कि ऐेसे में जनता सजग प्रहरी कैसे रह पाएगी क्योंकि जनता तो वही जानती है जो मीडिया उसे बताता है। अब जनता को पर्दे के पीछे चलने वाले खेल को समझना होगा और अंध भक्ति करनी छोड़नी होगी। सरकार के अच्छे कामों को अच्छा और गलत कामों को गलत कहने की आदत डालनी होगी। अंध भक्ति छोड़े बगैर यह नहीं हो सकता क्योंकि जब आप किसी के अंध भक्त होते हैं तो उसका गलत कदम भी आपको गलत नहीं लगता।

बेवजह बचाव करना छोड़ना होगा
अब बदलाव तेज गति से होना चाहिए और यह कहकर हमें किसी का भी बचाव करने की आदत छोड़नी पड़ेगी कि एक आदमी क्या-क्या करेगा, कहाँ-कहाँ ध्यान देगा क्योंकि सरकार कोई एक व्यक्ति होती ही नहीं है। हाँ, शीर्ष पर बैठा एक व्यक्ति बहुत बड़ा फर्क जरूर ला सकता है। पूरी दुनिया में इसके अनेक उदाहरण हैं जब एक नेता ने ही अपनी नीतियों से इतना बड़ा फर्क लाया कि उस देश के भाग्य का सितारा चमक गया।

मैं आपको यह बता देना चाहता हूँ कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मैंने भी नरेंद्र मोदी को वोट दिया था और उनमें एक ऐसे नेता की छवि को देखा था जो देश की तकदीर को बदल कर रख देने की ताकत रखता है। अब भी मैं ऐसा मानता हूँ कि देश को नरेंद्र मोदी जैसे ही मजबूत नेता की जरूरत है और देश को इस नेता का बखूबी इस्तेमाल कर लेना चाहिए लेकिन अंध भक्ति करने से ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला। 2014 के चुनाव में मोदी का नारा था ‘सबका साथ, सबका विकास’। यह नारा सभी को खूब भाया था और परिणाम था मोदी को पूर्ण बहुमत वाली सरकार मिलना। मोदी को इस नारे से जरा सा भी डिगना नहीं चाहिए था परंतु तीन साल के शासनकाल में ऐसा दिखाई नहीं दिया फिर भी अंध भक्ति में कोई कमी नहीं आई।

निश्चित रूप से हम सबको एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश चाहिए। अमन-चैन वाला मुल्क चाहिए। स्वच्छ और मजबूत प्रशासन वाला देश चाहिए लेकिन सरकार इस दिशा में बहुत बेहतर काम करती दिखाई नहीं देती। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने जो वादे किए थे वे अब भी पूरे होने बाकी हैं और सरकार लगातार इस कोशिश में है कि जनता का ध्यान इन मुद्दों की ओर न जाए। विचार कीजिए, क्या ऐसा नहीं हो रहा…।

लेखक व्यासमुनि प्रजापति पिछले 22 वर्षों से पत्रकारिता में हैं. साढ़े तीन साल पहले लोकमत ने साजिश के तहत एक साथ 61 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया था, उसमें से एक व्यास मुनि जी भी हैं. इनसे संपर्क prajapativyasmuni@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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नरेंद्र मोदी कहीं भाजपा के बहादुर शाह जफर यानी अंतिम प्रधानमंत्री तो नहीं साबित होने जा रहे हैं!

Ashwini Kumar Srivastava : देश के तकरीबन हर हिस्से से आ रहीं अराजकता की खबरें अब लोगों के जेहन में यह सवाल उठाने लग गई हैं कि नरेंद्र मोदी कहीं भाजपा के बहादुर शाह जफर यानी अंतिम प्रधानमंत्री तो नहीं साबित होने वाले हैं… जिन्हें इतिहास का ज्ञान होगा, वह जानते होंगे कि साढ़े तीन सौ बरस तक समूचे हिंदुस्तान पर हुकूमत करने वाले मुगल साम्राज्य के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर के समय में पूरा देश तो बहुत दूर की बात थी, दिल्ली और उसके आसपास ही मुगलिया कानून को मानने वाले नहीं रह गए थे…

लिहाजा, बेबस जफर अपने महल में बैठे शायरी कर रहे थे और दिल्ली और उसके आसपास भीड़ अराजक हो चुकी थी …जाहिर है, ऐसे में मुगलिया सल्तनत पूरे देश में भला कैसे टिकी रहती, जब दिल्ली और सम्राट के किले में ही उसने दम तोड़ दिया था। कुछ-कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों मोदी के नेतृत्व में भाजपा की हुकूमत का भी है, जिसका राज तो इस समय दिल्ली समेत सारे देश पर है…लेकिन इनसे न तो कश्मीर संभल पा रहा है और न ही दिल्ली और उसके आसपास का इलाका…

अब देखिये, कल ही कश्मीर में धर्मांध भीड़ ने अपने ही धर्म के डीएसपी को मस्जिद के बाहर ही पीट-पीट कर मार डाला। इसे पढ़कर हम सभी देशवासियों को न सिर्फ गुस्सा आया बल्कि हैरत भी हुई कि आखिर किस कदर अराजकता फैली हुई है कश्मीर में…फिर अचानक देश की राजधानी दिल्ली के बेहद नजदीक बल्लभगढ़ में वैसी ही भयावह घटना होने का समाचार आ गया….

तो क्या अब हमारे देश में कानून का राज खत्म हो चुका है और हमारा देश भी अब पाकिस्तान, सीरिया, अफगानिस्तान जैसे अराजक मुल्कों में बदलने लगा है? जहां कश्मीर से लेकर दिल्ली तक, गुजरात से लेकर बंगाल-झारखंड तक या फिर समूचे देश में ही हत्यारी भीड़ के हाथों सड़कों पर ‘त्वरित न्याय’ होता है…तो क्या अब इस देश का संविधान, कानून, अदालत, पुलिस खुद यहां के लोग ही मानने को तैयार ही नहीं है?

कश्मीर में भीड़ का अराजक होना बेहद चिंताजनक है क्योंकि हम कश्मीर खोना नहीं चाहते… और वहां हम हर कीमत पर भारत के संविधान, कानून, अदालत, पुलिस का राज ही देखना चाहते हैं, लेकिन दिल्ली के नजदीक ही भीड़ का अराजक होना तो उससे भी ज्यादा चिंताजनक है…क्योंकि जब हम दिल्ली और उसके आसपास ही कानून का राज कायम नहीं रख पाएंगे तो कश्मीर तो दिल्ली से वैसे भी बहुत दूर है…

Vikram Singh Chauhan : एक 16 साल के एक मुसलमान लड़के को लोकल ट्रेन में भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला। अब लोग बोल रहे हैं इसे साम्प्रदायिक रंग नहीं दिया जाये। लेकिन भीड़ का शिकार सिर्फ बेगुनाह मुसलमान क्यों हो रहे हैं? अख़लाक़ के बाद से हत्या का दौर जारी है। दरअसल इस भीड़ का नेतृत्व सत्ता में बैठे लोग कर रहे हैं ,उनके मुसलमानों को लेकर दिए जा रहे बयान कर रहे हैं ,टीवी न्यूज़ चैनल कर रहे हैं,उनके बड़बोले नेता मंत्री कर रहे हैं, कथित योगी, गुरु और बाबा कर रहे हैं। इन सबने मिलकर बहुसंख्य हिन्दू को मुसलमानों के खिलाफ उकसाया है और उकसा रहे हैं। इस मासूम की मौत के लिए ये सब जिम्मेदार हैं।

Sheetal P Singh : अजब वक़्त है. कुछ लोग कश्मीर में डिप्टी एस पी को पीट पीट कर मार डालने पर लिखते हैं. और, कुछ दूसरे लोग बल्लभगढ़ में सोलह बरस के बच्चे को पीट पीट कर मार डालने पर लिखते हैं. बहुत कम हैं जिन्हें दोनों घटनाएँ रुला पाती हैं. पता नहीं कैसे इन निर्दोष बेबस मौतों में फ़र्क़ कर लेते हैं लोग? अपनी पसंद का दुख चुन लेते हैं लोग? ओखला से बल्लभगढ़ तक तीन मुस्लिम बच्चों की अकारण सिर्फ मज़हबी आधार पर जानलेवा पिटाई करने वाली भीड़ का जो मानस है वही मोदी जी के बहुमत पाने का आधार है, “विकास”नहीं! और यह विनाश है, विकास नहीं! जिन्हे पसंद है वे देश को गृहयुद्ध में झोंकने की तैयारी ( नाइजीरिया जैसा बनाने) के गुनहगार हैं! दुर्भाग्य से एक तिहाई के करीब भारतीय इस रक्तरंजित मूढ़ता के पक्षकार हैं!

पत्रकार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव, विक्रम सिंह चौहान और शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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