इन अखबारों और चैनलों ने नहीं दिया अपने कर्मचारियों को बोनस

मुंबई : जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के तहत मीडियाकर्मियों का जितना एरियर बना, उसे डकार चुके कई अखबारों के मालिकों ने अब अपनी कई यूनिटों में कर्मचारियों का बोनस का पैसा भी हजम कर लिया और उन्हें एक ढेला तक बोनस के नाम पर नहीं दिया। बोनस न देने वालों में कुछ चैनलों का नाम भी सामने आ रहा है जिनमें टाइम्स नाऊ और इंडिया न्यूज़ भी शामिल है. सूत्रों के हवाले से मिली खबर के मुताबिक टाइम्स नाऊ और जूम ने मुम्बई के अपने कर्मचारियों को इस बार दीपावली पर बोनस नहीं दिया. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से खबर है कि यहाँ इंडिया न्यूज़ ने अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया।

उत्तर प्रदेश से ही एक और खबर आ रही है कि यहाँ हिंदुस्तान प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया। हिंदुस्तान प्रबंधन पर पहले भी आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं देता है। इसी तरह गुजरात के भुज से खबर है कि यहाँ सौराष्ट्र ट्रस्ट के अखबार कच्छ मित्र डेली ने अपने कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया। यहाँ 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। मराठी दैनिक सकाळ के नासिक यूनिट सहित कई दूसरी यूनिटों में भी कर्मचारियों को बोनस नहीं दिए गए. बोनस के नाम पर सिर्फ कुछ पैसे देने की भी खबर आ रही है।

डीबी कार्प से भी एक खबर आ रही है कि इस कंपनी ने अपने अखबारों की कई यूनिट में कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया. वहीं, कई कर्मचारियों का पैसा प्रत्येक माह काटा गया और बाद में उसी पैसे को बोनस के रूप में दे दिया गया. दैनिक जागरण से भी खबर आ रही है कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने अपने गोरखपुर यूनिट में कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया और सिर्फ आधा किलो सोनपापड़ी का पैकेट देकर खुश करने का प्रयास किया.

राष्ट्रीय सहारा से भी खबर आ रही है कि यहाँ भी कर्मचारियों को बोनस नहीं दिया गया. अमर उजाला में भी कई यूनिट में बोनस ना दिए जाने की कर्मचारियों ने सूचना भेजी है. जिन मीडिया कर्मियों को बोनस नहीं मिला, उनकी दिवाली इस बार फीकी रही. आपको बता दें कि बोनस देकर मालिक कर्मचारी पर एहसान नहीं करते हैं बल्कि बोनस हर कर्मचारी का अधिकार है. अगर आपको भी बोनस नहीं मिला है तो उसकी शिकायत कीजिये. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप भी पढ़िए बोनस एक्ट के क्या हैं नियम… 

http://labour.gov.in/hi/information-payment-bonus-1965

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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मजीठिया क्रान्ति : लोकमत के पांच और मीडिया कर्मियों ने लगाया क्लेम

मुंबई : महाराष्ट्र में इन दिनों मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और प्रमोशन मांगने वाले मीडियाकर्मियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मीडियाकर्मी जोश खरोश के साथ अखबार मालिकों के खिलाफ अपने हक़ के लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं। यहाँ लोकमत के 5 और मीडियाकर्मियों ने रिकवरी क्लेम लगाया है।ये सभी कर्मचारी लोकमत की अकोला यूनिट में कार्यरत हैं। इन पांच कर्मचारियों ने असिस्टेंट लेबर कमिश्नर अकोला के यहाँ 17(1) के तहत रिकवरी क्लेम लगाया है।

इस बीच समान कार्य के लिए समान वेतन अस्थायी कर्मचारियों पर लागू संबंधी उच्चतम न्यायालय के फैसले का महाराष्ट्र के चर्चित पत्रकार नेता और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह ने स्वागत किया है. ज्ञात हो कि उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत उन सभी पर लागू किया जाना चाहिए जो दैनिक वेतनभोगी, अस्थायी और अनुबंधित कर्मचारियों के तौर पर नियमित कर्मचारियों की तरह ही ड्यूटी करते हैं. उच्चतम न्यायालय ने समान कार्य के लिए समान वेतन से इनकार को ‘‘शोषणकारी गुलामी,’’ ‘‘अत्याचारी, दमनकारी और जबर्दस्ती’’ करार दिया.

न्यायालय ने कहा कि एक कल्याणकारी राज्य में सिद्धांत अस्थायी कर्मचारियों तक भी विस्तारित किया जाना चाहिए. न्यायमूर्ति जेएस खेहर और न्यायमूर्ति एस ए बोबड़े की एक पीठ ने कहा, ‘‘हमारी दृष्टि से श्रम के फल से वंचित करने के लिए कृत्रिम मानदंड बनाना गलत है. एक ही काम के लिए संलग्न किसी भी कर्मचारी को उस कर्मचारी से कम वेतन का भुगतान नहीं किया जा सकता जो वही कार्य और जिम्मेदारियां वहन करता है. निश्चित रूप से किसी भी कल्याणकारी राज्य में नहीं. ऐसा कदम अपमानजनक होने के साथ ही मानव गरिमा के आधार पर चोट करता है.’’ पीठ ने यह भी कहा कि ‘‘जिस किसी को भी कम वेतन पर काम करने के लिए बाध्य किया जाता है वह ऐसा स्वैच्छिक तौर पर नहीं करता. वह ऐसा अपने परिवार को भोजन और आश्रय मुहैया कराने के लिए अपने आत्मसम्मान और गरिमा की कीमत पर, अपने स्वाभिमान और ईमानदारी की कीमत पर करता है.’’

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मजीठिया क्रांतिकारियों से अपील, हम सभी आरटीआई को हथियार बनाएं

दोस्तों

मैं एक बार फिर आप सब से अपील कर रहा हूँ कि आप आरटीआई को हथियार बनाइये। श्रम विभाग के पास अखबार मालिकों द्वारा मंत्रियों से फोन करा कर उन पर दबाव डलवाया जा रहा है। उनके पास मंत्री हैं। हमारे पास आरटीआई है। इसी आरटीआई ने सुरेश कलमाणी को जेल डलवा दिया। शीला दीक्षित की कुर्सी छिनवा लिया। दिल्ली से कांग्रेस का सफाया हो गया। सिर्फ और सिर्फ इसी आरटीआई के कारण।

मेरे एक साथी भूपेश कुंभारे जो कोल्हापुर में हैं, 2012 में उन्हें कंपनी ने निकाल दिया। इंडस्ट्रियल कोर्ट गए। न्यायाधीश ने हाथ से आर्डर लिख दिया। आर्डर में क्या लिखा गया था, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट भी नहीं समझ पा रहे थे। भूपेश जी को किसी ने मेरा नंबर दिया। वे मुझसे मिलने कुछ दिन पहले मुम्बई आये और अपनी समस्या बताई। मैंने उनके आर्डर की कॉपी लिया और जिस इंडस्ट्रियल कोर्ट से उनको आर्डर मिला था उसमें आरटीआई लगा दिया। पूछा कि इस आर्डर में क्या लिखा गया है, मुझे उसकी टाइपिंग कॉपी उपलब्ध कराइये।

आप यकीन कीजिये, 19 अक्टूबर 2016 को ये आरटीआई लगाई थी और ठीक दस दिन बाद 29 अक्टूबर को मेरे पास इस आर टी आई में भूपेश कुंभारे जी के ऑर्डर की पूरी कॉपी टाइप कराकर  आ गयी। साथ में इसमें सिग्नेचर और मुहर भी है। मैं जानता हूँ आर्डर की ये टाइपिंग कॉपी भूपेश जी को भी मिल जाती लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें हाथ से लिखी आर्डर की प्रति मिली थी। साथियों,  ध्यान दीजिये, आज अखबार मालिकों के साथ मंत्री हैं, संभवतः कुछ मुख्यमंत्री भी होंगे लेकिन हमारे पास आरटीआई है, सुप्रीम कोर्ट है और यशवंत सिंह सर हैं, साथ ही एक बेहतर परामर्श देने वाले एडवोकेट उमेश शर्मा जी हैं। इसलिए मैं एक बार आप सबसे कहूंगा, प्लीज़, आरटीआई को हथियार बनाइये।

श्रम विभाग से अपनी कंपनी और उसकी सभी सहायक कंपनियों की 2007 से 10 तक की बैलेंश शीट मंगाइये। साथ ही कर्मचारियों की पूरी लिस्ट और मजीठिया वेज बोर्ड मामले में श्रम आयुक्त कार्यालय द्वारा अब तक की गयी कार्रवाई का पूरा विवरण मांगिये। माननीय सुप्रीमकोर्ट को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्या रिपोर्ट भेजी गयी है, उसकी रिपोर्ट मंगाइये। जो-जो सवाल दिमाग में आये,  सब आरटीआई के जरिये मांगिये। आज आप मुझसे महाराष्ट्र के किसी भी अखबार की कोई भी मजीठिया से जुडी जानकारी मांगिये, तुरंत दूंगा। आप सभी साथी भी अपने अपने प्रदेश की पूरी जानकारी इकठ्टा कीजिये श्रम आयुक्त कार्यालय से। देखिये, फिर अखबार मालिकों की कुंडली आपके सामने आती जायेगी।

कोई दिक्कत हो तो मुझे फोन कीजिये।

एक चीज और ध्यान दीजिए। अखबार मालिक जल्द ही हम सभी साथियों के खिलाफ पुलिस स्टेशन में फर्जी मामले भी दर्ज करा सकते हैं जिसमें पहला होगा चोरी का, मारपीट करने का। पत्रकारों पर जो सबसे बड़ा कलंक लगता है वो है हफ्ता वसूली, इसलिए ये भी आरोप लग सकता है। इसलिए पुलिस विभाग और सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को एक मेल भी करके रखिये कि मजीठिया वेज बोर्ड लाभ मांगने पर अखबार के मालिक हमें फर्जी मामले में फंसाने की धमकी दे रहे हैं। ये भी बहुत जरूरी है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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मुम्बई के दो पत्रकारों ने श्रम आयुक्त कार्यालय में किया ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ (देखें वीडियो)

पत्रकारों की छापेमारी से घबराए अधिकारियों ने गिफ्ट के पैकेट बाहर फेंके, गिफ्ट के पैकेटों का आरटीआई से माँगा गया जवाब, घटनाक्रम हुआ कैमरे में शूट

मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और प्रमोशन की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे मुम्बई के दो पत्रकारों शशिकान्त सिंह और धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने शनिवार को महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त कार्यालय में ऐसा सर्जिकल स्ट्राइक किया कि श्रम अधिकारी भी हक्के बक्के रह गए। ये दोनों पत्रकार काफी दिनों से देख रहे थे कि महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त और मुम्बई शहर कार्यालय में अखबार मालिकान सहित कई दूसरी कंपनी के लोग श्रम अधिकारियों को बड़े बड़े गिफ्ट के पैकेट दे रहें हैं, जो पूरी तरह गलत है। इन दोनो पत्रकारों ने तय किया कि इस मामले का भंडाफोड़ किया जाय।

दोनों पत्रकारों ने योजना बनायी। दोनों पत्रकारों ने पहले गिफ्ट के पैकेट लेकर जा रहे लोगों का श्रम आयुक्त कार्यालय में मोबाइल से वीडियो बनाया। फिर अधिकारियों के केबिन में घुसकर गिफ्ट के पैकेट आने पर मौखिक रूप से एतराज जताया। दोनों पत्रकारों की इस कार्रवाई से हड़कंप मच गया और जब तक दोनों पत्रकार कुछ अधिकारियों के केबिन में घुसते, अधिकारियों ने खुद गिफ्ट के पैकेट बाहर फेंक दिए। इसके बाद इन दोनों पत्रकारों ने फेंके गए गिफ्ट के पैकेट का भी मोबाइल से वीडियो बनाया। साथ ही श्रम आयुक्त कार्यालय के सुरक्षा रक्षक का इंटरव्यू लिया तो उसने बताया कि गाड़ियों से लोग आते हैं, गिफ्ट देकर जाते हैं। मुझे इनको रोकने या गिफ्ट के पैकेट की जांच का कोई लिखित आदेश श्रम आयुक्त या दूसरे अधिकारियों द्वारा नहीं दिया गया है। इसलिए मैं इन्हें चाहकर भी नहीं रोक सकता।

सुरक्षा रक्षक ने कई और चौंकाने वाली जानकारी दी। इसके बाद दोनों पत्रकार फिर श्रम आयुक्त से मिलने पहुंचे तो पता चला वे छुट्टी पर हैं और उन्होंने पंकज कुमार को चार्ज दिया है। दोनों पत्रकारों ने तुरंत एक आरटीआई डालकर ये जानकारी माँगी कि श्रम आयुक्त कार्यालय में पिछले चार दिनों में कितने गिफ्ट के पैकेट आये। उसकी कहाँ कहाँ जांच की गयी और इन गिफ्ट के पैकेटों को अंदर लाने की अनुमति किसने दी।

साथ ही दोनों पत्रकारों ने आरटीआई के जरिये श्रम आयुक्त कार्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरे का चार दिन का फुटेज भी माँगा है। अब अगर श्रम आयुक्त कार्यालय ये कहता है कि हमारे यहाँ गिफ्ट के पैकेट नहीं आये तो वीडियो दिखाकर उनसे सवाल फिर पूछा जाएगा और अगर सही रिपोर्ट आ गयी तो कई अधिकारियों की नौकरी चली जायेगी। साथ ही यह सवाल भी उठता है कि गिफ्ट के नाम पर कोई भी बम या दूसरे खतरनाक सामान या रिश्वत की रकम भी तो ला सकता है, फिर पैकेटों को बिना जांच के अंदर कैसे आने दिया जाता है। फिलहाल इस सर्जिकल स्ट्राइक से श्रम आयुक्त कार्यालय में हड़कंप का माहौल है।

देखें संबंधित वीडियो : https://www.youtube.com/watch?v=G2TE6mkAGOg

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मजीठिया की जंग : झूठ लिख कर बुरा फंसा डीबी कॉर्प!

‘जिद करो दुनिया बदलो’ का नारा देने वाला डीबी कॉर्प अब ‘झूठ बोलो और बुरे फंसो’ के पैटर्न पर काम कर रहा है। मंगलवार को मुंबई के श्रम आयुक्त कार्यालय में डी बी कॉर्प की महिला रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया शेख के मजीठिया वेज बोर्ड बोर्ड मामले की सुनवाई थी। लतिका और आलिया ने मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन और एरियर न मिलने पर 17 (1) के तहत रिकवरी का क्लेम श्रम आयुक्त कार्यालय में किया था।

आज कंपनी ने अपने वकील के जरिये सुनवाई में जवाब दिया कि ये दोनों महिला कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आती हैं जिस पर इन महिला कर्मचारियों के साथ गए पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह ने तुरंत भारत सरकार की 11 नवंबर 2011 को जारी अधिसूचना की कॉपी का संबंधित पेज खोल कर इस मामले की सुनवाई कर रही असिस्टेंट लेबर कमिश्नर के सामने रख दिया जिसमें ये साफ लिखा है कि रिसेप्शनिस्ट भी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में आती हैं।

इसके बाद डीबी कॉर्प और वकील की बोलती बंद हो गयी। उन्होंने अगला डेट लेने का प्रयास किया मगर उस समय मौजूद शशिकान्त सिंह और धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने कड़ा एतराज जताया और साफ़ कह दिया कि हमारे दिए गए तथ्य को रिकार्ड में लाया जाए और डीबी कॉर्प को इस मामले को साबित करने के लिए कहा जाय क्योंकि उन्ह लोगों ने लिखित रूप से कहा है कि ये कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आतीं। इसके बाद नीलांबरी भोसले ने इसे स्टेटमेंट में नोट किया और डीबी कॉर्प को 48 घंटे बाद का 27 अक्टूबर का डेट दिया और कहा कि आप प्रूफ लेकर आइये कि रिसेप्शनिस्ट मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आतीं।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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22 साल पहले भी उमेश शर्मा कटवा चुके हैं अखबार मालिक की आरसी

देश भर के मीडियाकर्मियों के अधिकार से जुड़े मजीठिया वेज बोर्ड मामले की माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा 22 साल पहले भी एक समाचार पत्र के मालिक की आरसी कटवा चुके हैं। ये मामला 1994 का है और अखबार का नाम था संडे मेल। संडे मेल अखबार में 300 से 400 कर्मचारियों का पैसा फंस गया था और इसका मालिक अचानक कार्यालय का तालाबंद कर लापता हो गया था। मालिक का नाम संजय डालमिया था। पैसा फंसने के बाद कुछ मीडियाकर्मी सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा के पास पहुंचे।

उमेश शर्मा ने तब इस केस को हैंडल किया और उस समय ट्रिब्यूनल में जाकर ना सिर्फ अखबार मालिक के खिलाफ आरसी जारी करवाया बल्कि 300 से 400 कर्मचारियों का पैसा भी दिलवाया। उस समय इस अखबार के मालिकान पर प्रत्येक कर्मचारी का आठ से दस हजार रुपये बकाया था जो उस समय के लिहाज से एक ठीकठाक एमाउंट हुआ करता था। एडवोकेट उमेश शर्मा ने एक बड़ी महिला पत्रकार को भी उसका बकाया आरसी कटवाकर सन्डे मेल से दिलवाया था। ये महिला पत्रकार अब टेलीविजन न्यूज़ का जाना माना नाम हैं। उस समय इस अखबार के मालिक की गाड़ी का गुस्साए कर्मचारियों ने कांच तक तोड़ डाला था।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया मामला : मुम्बई के 22 अखबार मालिकों को एफिडेविड देने का निर्देश

पत्रकारों के वेतन, एरियर और प्रमोशन से जुड़े मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आज मुम्बई शहर के श्रम उपायुक्त ने एक बड़ा निर्देश जारी कर 22 अखबार मालिकों को नोटिस भेज कर उन्हें 19 अक्टूबर तक एफिडेविड देने को कहा है। ये एफिडेविड 300 रुपये के स्टाम्प पेपर पर देना होगा और इस एफिडेविड में अखबार मालिकों को साफ़ तौर पर ये लिख कर देना पड़ेगा कि उन्होंने अपने सभी कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया दे दिया है। साथ ही ये भी कि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार ही वे कर्मचारियों को वेतन दे रहे हैं। अब अगर अखबार मालिकों ने झूठा एफिडेविड दिया और अगर ये झूठ सिद्ध हो गया तो उनके खिलाफ फर्जी एफिडेविड देने का नया मामला दर्ज होगा।

कामगार उपायुक्त द्वारा भेजे इस नोटिस में साफ़ कहा गया है कि अगर आप ने एफिडेविड नहीं दिया तो आपके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस नोटिस से अखबार मालिकों के गले में केकड़ा फंस गया है। अगर वो एफिडेविड देते हैं और वो फर्जी निकल गया तो उन पर एक नया केस दर्ज होगा। उन्होंने एफिडेविड नहीं दिया तो कामगार आयुक्त उनके खिलाफ मामला दर्ज कराएंगे। आपको बता दूँ कि कामगार आयुक्त ने मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़े सभी 17(1) के मामलों को 29 अक्टूबर तक निपटारे का आदेश राज्य के सभी कामगार उपायुक्तों को  दिया है।

अब देश के दूसरे राज्यों के श्रमायुक्तों को भी एफिडेविड वाला फार्मूला अपनाना चाहिए। ये नोटिस टाइम्स ऑफ इंडिया, मिड डे, सामना सहित कुल 22 अखबार मालिकों को भेजा गया है। आपको बता दें अखबार मालिक अपनी जान बचाने के लिए अपने कार्मिक प्रबंधक से फर्जी एफिडेविड दिला सकते हैं। अगर ऐसा हुआ और सिद्ध हो गया कि कार्मिक प्रबंधक या दूसरे अधिकारियों ने फर्जी एफिडेविड दिया है तो उनको आसानी से सुप्रीम कोर्ट में पार्टी बनाया जा सकता है और तब उन्हें तिहाड़ जेल में पूरी लाइफ बितानी पड़ सकती है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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भास्कर को झटके पर झटका, पत्रकार धर्मेंद्र के बाद अब रिसेप्शनिस्ट लतिका के भी ट्रांसफर पर कोर्ट ने लगाई रोक

भारत में ‘ज़िद करो दुनिया बदलो’ का नारा देने वाले डीबी कॉर्प को लगातार झटके लग रहे हैं, किंतु भास्कर प्रबंधन है कि सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। दैनिक भास्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगने पर अपने प्रिंसिपल करेस्पॅान्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का मुम्बई से सीकर (राजस्थान) ट्रांसफर कर दिया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह अदालत की शरण में गए और इंडस्ट्रियल कोर्ट ने इस ट्रांसफर पर रोक लगा दी। इसके बाद अब भास्कर की सहायक महाप्रबंधक (कार्मिक) अक्षता करंगुटकर ने डी बी कॉर्प के मुम्बई के माहिम स्थित कार्यालय में कार्यरत महिला रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण का सोलापुर में ट्रांसफर कर दिया।

लतिका ने भी मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर तथा प्रमोशन की मांग को लेकर 17(1) के तहत कामगार आयुक्त कार्यालय में रिकवरी क्लेम लगाया हुआ है। इस बात का पता जैसे ही भास्कर प्रबंधन को चला कि लतिका ने रिकवरी क्लेम लगाया है, भास्कर प्रबंधन ने उन्हें कुछ ले-दे कर क्लेम वापस लेने को कहा। जब लतिका ने इनकार कर दिया तो अक्षता करंगुटकर ने उन्हें सीधे तौर पर धमकी दी कि ‘मैं तुम्हारा करियर बर्बाद कर दूंगी!’ यहां बताना आवश्यक है कि लतिका ने इसकी लिखित शिकायत कामगार विभाग में भी की है। यह बात और है कि लतिका के फैसले से गुस्साई अक्षता करंगुटकर ने उसी दिन उनका ट्रांसफर सोलापुर में कर दिया और घर पर ट्रांसफर लेटर भेज दिया।

यही नहीं, अगले दिन से लतिका चव्हाण के डीबी कॅार्प (माहिम) दफ्तर में प्रवेश पर रोक तक लगा दी गई! प्रबंधन के इस मनमाने रवैये से क्षुब्ध लतिका ने मजीठिया वेज बोर्ड हेतु पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा से बात की। तत्पश्चात उन्हीं की सलाह पर इंडस्ट्रियल कोर्ट में डीबी कॉर्प के एमडी सुधीर अग्रवाल और सहायक महाप्रबंधक (कार्मिक) अक्षता करंगुटकर के साथ-साथ डी बी कॉर्प को भी पार्टी बनाते हुए एक केस फ़ाइल कर दिया।

इस मामले में लतिका चव्हाण का इंडस्ट्रियल कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा युवा एडवोकेट महेश शुक्ला ने। मामले की सुनवाई न्यायाधीश सूर्यवंशी जी ने किया। न्यायाधीश ने लतिका आत्माराम चव्हाण के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके ट्रांसफर पर रोक लगा दी। इस आदेश की जानकारी मिलते ही भास्कर कर्मियों में जहां एक बार फिर ख़ुशी फैल गई, वहीं भास्कर प्रबंधन इस दोहरे झटके से सकते में है! वैसे आपको बता दूं कि भास्कर प्रबंधन ने एक साल पहले भी अपने पत्रकार इंद्र कुमार जैन का ट्रांसफर किया था, मगर तब भी उसे मुंहकी खानी पड़ी थी। फिर 10 अक्टूबर को धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर और उस पर लगी अदालती रोक के बाद तो भास्कर की पूरे भारत में थू-थू हो रही है!

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मोबाइल: 09322411335

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ट्रांसफर-टर्मिनेशन से कानूनी बचाव के लिए एडवोकेट उमेश शर्मा ने जारी किया फार्मेट

इसे सभी लोग अपने अनुसार सुधार / संशोधित कर संबंधित श्रम अधिकारी को दें….

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में देश भर के पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज एक और फार्मेट जारी किया है। जिन मीडिया कर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत प्रबंधन के खिलाफ लेबर विभाग में 17 (1) का क्लेम लगाया है, वे सभी लोग इस फार्मेट को भरकर तत्काल अपने-अपने लेबर विभाग में जमा करा दें। इस फार्मेट के बाद अगर आपका प्रबंधन आपका ट्रांसफर या टर्मिनेशन या सस्पेंशन करता है तो आगे की कानूनी लड़ाई में यह काम आयेगा। यही नहीं, इससे मीडियाकर्मियों का प्रबंधन द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न पर भी काफी हद तक रोक लगेगी।

दोस्तों, आप सबसे एक बात और शेयर करूँगा। उमेश सर पिछले कई माह से मेरे कहने पर उन साथियों की मदद भी करते आ रहे हैं जो उनके क्लाइंट नहीं हैं। उमेश शर्मा सर ने नि:शुल्क कई साथियों को 17 (1) का भी क्लेम फार्मेट दिया जिसे बाद में देश भर के पत्रकारों ने भरा और अब भी उसी 17(1) के फार्मेट पर क्लेम किया जा रहा है। आप सबसे निवेदन है कि आप सब उनका सम्मान करते हुए अगर कुछ उनसे जानना पूछना बताना है तो उन्हें सीधे फोन करने की जगह उन्हें उनकी मेल आईडी LegalHelpLineindia@gmail.com पर मेल कर दिया करें। फिलहाल आप सब अभी तो उत्पीड़न या ट्रांसफर टर्मिनेशन रोकने के लिए तुरंत इस फार्मेट को भर कर लेबर विभाग में जमा करें और उसकी प्रति सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को भी जरूर भेजें। उमेश शर्मा सर द्वारा दिया गया नया फार्मेट ये है…

To ……………………..

Date……………………

Sub: Protest against harassment by the officials of the management-violation of the orders of Supreme Court of India and violation of Section 16 A of the WJ Act.

Sir,

I am constrained to protest against the illegal, unconstitutional and vindictive acts of the officials of the management in threatening and intimidating me just  because I have asserted my rights and filed the application under Section 17(1 ) of the Working Journalist Act for claiming my benefits under Majithia Wage Board Award. Earlier I had filed the CCP No. 129/2015 before the Supreme Court of India against the act of non-compliance of the directions issued by the Supreme Court of India in WP (C) No. 246/1011 on 7/2/2014.

Now, the  officials of the management  has started threatening and coercing me to withdraw the proceedings  and have  warned me that if I do not withdraw my CCP and the application under Section 17 (1) of the WJ Act, they will force me to resign from my services. I am being gunned down for my forthright stand in asserting my legal rights.

The abovesaid act of the officials of the management is illegal on the face of it as it is prohibited under Section 16 of the WJ Act . The said act is also contempt of the Supreme Court as the said officials are trying to overreach the proceedings pending before the Supreme Court by intimidating me under the threat of my services. I shall be forced to file Contempt of Court proceedings against the  officials of the management making them personally liable  before the Supreme Court besides invoking the powers contemplated under Section 16 A of the WJ Act if the threats being extended by the said officials is not withdrawn and I am allowed to perform my duties properly.

I once again request you to release the benefits arising out of the Majithia Wage Board to me in terms of the directions issued by the Supreme Court in its orders dated 7/2/2014 in WP (C) No. 246/2011.

Yours
………………
…………….
………………

Copy forwarded for information and action to:

Registrar, Supreme Court of India w.r.t. CCP No. 129/2015 titled as “Yashwant Singh Vs Mahendra Mohan Gupta & Ors” – with a prayer to place the present letter before the Bench alongiwith the file of the CCP for directions.

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भास्कर के पत्रकार ने प्रबंधन को दिया जोरदार झटका, अदालत से ट्रांसफर रुकवाया

मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण भास्कर प्रबंधन ने अपने पत्रकार धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का कर दिया था ट्रांसफर…

मुम्बई के तेज-तर्रार पत्रकारों में से एक धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का दैनिक भास्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगे जाने पर राजस्थान के सीकर में ट्रांसफर कर दिया था। मुम्बई में दैनिक भास्कर में एंटरटेनमेंट बीट के लिए प्रिंसिपल करेस्पांडेंट पद पर कार्यरत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह को भास्कर प्रबंधन ने पहले उन्हें लालच दिया कि कुछ ले-दे कर मामला ख़त्म करो। फिर उन्हें भास्कर की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर (कार्मिक) ने धमकी दी, जिसकी शिकायत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने श्रम आयुक्त से की।

जब धमकी से भी धर्मेन्द्र प्रताप सिंह नहीं डरे तो उनका राजस्थान के सीकर में एंटरटेनमेंट पेज के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर लेटर ठीक उस दिन उन्हें घर पर मिला, जब वे मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई के लिए दिल्ली गए थे। दिल्ली से वापस आये तो उन्हें दफ्तर में जाने नहीं दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों की तरफ से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा से सलाह ले कर इंडस्ट्रियल कोर्ट की शरण ली, जहां इंडस्ट्रियल कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा युवा एडवोकेट महेश शुक्ल ने।

इस बहस के दौरान इंडस्ट्रियल कोर्ट के जज श्री एस. डी. सूर्यवंशी ने मौखिक टिप्पणी की कि मजीठिया वेज बोर्ड आज देश का सबसे गर्म मामला है। माननीय न्यायाधीश ने साफ़ कहा कि डी बी कॉर्प ने धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर गलत तरीके से किया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने डीबी कॉर्प के एम. डी. सुधीर अग्रवाल और कार्मिक विभाग की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर सहित कंपनी को भी अदालत में पार्टी बनाया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की मदद की रविन्द्र अग्रवाल सरीखे देश के दूसरे पत्रकारों ने, जिन्होंने ऐन वक्त पर उन्हें तमाम जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करवाए। अदालत द्वारा धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर पर रोक लगाने से मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मियों में खुशी का माहौल है, जबकि भास्कर प्रबंधन के खेमे में निराशा है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता
मुंबई
संपर्क : 9322411335

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मजीठिया मांगने पर जिन साथियों का ट्रांसफर, टर्मिनेशन या निलंबन हुआ, वे अपना विवरण भेजें

….ताकि सुप्रीमकोर्ट के संज्ञान में लाया जा सके… 

दोस्तों, मजीठिया वेज बोर्ड के तहत मीडियाकर्मियों की सुनवाई माननीय सुप्रीमकोर्ट में तेजी से चल रही है। अगर आपने या आपके किसी साथी ने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत लाभ के पाने के लिये 17(1) का रिकवरी क्लेम लेबर विभाग में लगाया है और इस क्लेम को लगाने के बाद आपका या आपके किसी साथी का कंपनी प्रबंधन ने ट्रांसफर, टर्मिनेशन या निलंबन किया है तो आप अपना पूरा विवरण मुझे मेल पर भेजिये ताकि पता चल सके कि कितने लोगों के साथ मीडिया मालिकों ने अन्याय किया है। सभी लोगों का विवरण आने के बाद इसकी सूची बनायी जायेगी और इस ट्रांसफर, टर्मिनेशन या निलंबन के मुद्दे को सबूत के साथ माननीय सुप्रीमकोर्ट में एडवोकेट के जरिये रखा जायेगा। साथ ही माननीय सुप्रीमकोर्ट को बताया जायेगा कि किस तरह मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ  कर्मचारियों को ना देना पड़े, इसके लिये कंपनी प्रबंधन दमन की नीति अपना रही है।

मजीठिया मांगने के कारण जिन लोगा का उत्पीड़न, ट्रांसफर, टर्मिनेशन, निलंबन आदि हुआ है, उनके बारे में वकील के माध्यम से माननीय सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाने का पूरा प्रयास किया जायेगा ताकि इन कुकृत्यों पर तथा मालिकानों की मनमानी पर रोक लगाने का बंदोबस्त किया जा सके। प्रताड़ित किए गए लोगों की लिस्ट देने सुप्रीमकोर्ट को भी पता चल सकेगा कि किस तरह अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मांगने पर मीडियाकर्मियों का शोषण कर रहे हैं।

आपको सिर्फ इतना करना है कि अगर आपको या आपके किसी साथी को टर्मिनेट किया गया है या ट्रांसफर किया गया अथवा निलंबन किया गया तो कंपनी द्वारा दिया गया टर्मिनेशन, निलंबन या ट्रांसफर के मूलपत्र को स्केन कराईये और साथ में अपना 17(1) के क्लेम फार्मेट की प्रति (सभी पेज) भी स्कैन कराईये और अपना नाम, पूरा पता, कंपनी का नाम व पूरा पता, पिन नंबर, प्रबंधन का नाम, आपका पद, ज्वार्ईन करने की तिथि आदि डिटेल मेल के जरिये मुझ तक भेजिये।

एक बात ध्यान रखिये जो भी कापी मेल से भेजिये उसे सिर्फ स्कैन कराकर ही भेजिये। मोबाईल से फोटो खींच कर ना भेजें। स्कैन कराकर भेजा गया मेल न बहुत हाई रेजुलेशन का रहे और न ही बहुत लो। मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि आप द्वारा भेजे गए डाक्यूमेंट काफी गोपनीय रखे जायेंगे। ये डाक्यूमेंट अर्जेन्ट भेजें। कोई दिक्कत हो तो आप मुझे फोन कर सकते हैं। डाक्यूमेंट भेजते समय सब्जेक्ट में मजीठिया टर्मिनेशन, ट्रांसफर या निलंबन जो हो, जरूर लिखें और अपना नाम भी सब्जेक्ट में लिखें। डाक्यूमेंट इस मेल पर भेजें : majithiasmanch@gmail.com

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
मुंबई
9322411335

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ये क्या, सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश में जागरण के मालिकों को तलब करने का जिक्र ही नहीं!

सुप्रीमकोर्ट के लिखित आदेश से समाचारपत्र कर्मियों में निराशा : माननीय सुप्रीमकोर्ट में 4 अक्टूबर को हुयी मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई के बाद लिखित आदेश कल 6 अक्टूबर को आया। लेकिन इस आदेश में दैनिक जागरण के मालिकों संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को तलब किए जाने का जिक्र ही नहीं है। न ही इन दोनों का नाम किसी भी संदर्भ में लिया गया है। यानि संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट में उपस्थित नहीं रहना पड़ेगा।

4 अक्टूबर को हुयी सुनवाई में दैनिक जागरण के मालिकों का नाम सामने आया था। इन्हें तलब किए जाने की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने कोर्ट से बाहर की थी। इसी तरह माननीय सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले के पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने 17 (1) के मुद्दे को उठाया लेकिन आर्डर में 17(2) के बारे में लिखा है। सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट ने सुनवाई के बाद बाहर निकलकर पत्रकारों को बताया कि अगली डेट 25 अक्टूबर को रखी गयी है लेकिन आर्डर में अगली डेट के बारे में बताया गया है कि यह 8 नवंबर 2016 को दोपहर 2 बजे से सुनवाई है।

इसी तरह सुप्रीमकोर्ट में अगले पांच राज्यों के श्रमायुक्त को तलब करने में राजस्थान का भी नाम था लेकिन आर्डर में राजस्थान का नाम नहीं है। इस बार की सुनवाई में 20जे का भी मुद्दा था लेकिन उस पर भी बहस नहीं हो सकी जिसको लेकर देश भर के मीडिया कर्मी निराश हैं। फिर भी, मीडियाकर्मियों को माननीय सुप्रीमकोर्ट पर पूरा भरोसा है। इनका मानना है कि देश के इस सबसे बड़े न्याय के मंदिर में देर तो है लेकिन अंधेर नहीं है, उन्हें न्याय जरूर मिलेगा। आप भी पढ़िए माननीय सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा आदेश….

सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले की सुनवाई के बाद जारी लिखित आदेश…

UPON hearing the counsel the Court made the following

O R D E R

We have heard the learned counsels for the
parties. We have considered the status reports
filed by the Labour Commissioners of the concerned
States.

The monitoring in respect of State of
Nagaland is closed. So far as the State of
Maharashtra is concerned, the State is granted
further two weeks’ time to file its response.
Insofar as the States of Uttar Pradesh,
Himachal Pradesh, Uttarakhand, Manipur, Madhya
Pradesh, Chhattisgarh, Delhi and Jharkhand are
concerned, we direct that all revenue recovery
proceedings which are pending shall be
completed at the earliest.

In respect of such of the defaulting units
against whom recovery proceedings have not been
initiated, the same shall be initiated and
completed at the earliest.

In all cases where there is a dispute with
regard to the amount payable, we direct the State
Governments to act under the provisions of Section
17(2) of the Working Journalists and Other ewspaper Employees (Conditions of Service) and
Miscellaneous Provisions Act, 1955. The concerned
Labour Court will finalize its award expeditiously
and send the same to the State Government for due
execution.

Insofar as the legal issues that have to be
heard and decided are concerned, Shri Colin
Gonsalves, learned senior counsel, who had agreed
to identify and carve out the principles that would
be required to be decided in these cases, is
granted two weeks further time to formulate the
said questions and file appropriate written notes.
We make it clear on the next date fixed, the
Court will hear the aforesaid legal questions and
pass necessary orders thereon.

List these matters on 8th November, 2016 at
2.00 p.m.

On the said date i.e. 8th November, 2016,
status report with regard to the implementation of
the Majithia Wage Board recommendations in respect
of the following five States shall be placed before the Court for consideration:

(1) Tamil Nadu
(2) Kerala
(3) Andhra Pradesh
(4) Karnataka
(5) Telangana

We also direct that copies of the status
reports filed by all the States till date be
circulated to the learned counsels appearing for
the contesting establishments.

Contempt Petition(C)No.570/2014 In W.P.(C) No. 246/2011
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.

All pending applications shall also stand
disposed of.

(Neetu Khajuria)
Court Master
(Asha Soni)
Court Master

(Signed order in Contempt Petition(C) No.570/2014
in W.P.(C) No.246/2011 is placed on the file.)
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL ORIGINAL JURISDICTION
CONTEMPT PETITION(C) NO. 570 OF 2014
IN
WRIT PETITION (C) NO.246 OF 2011
BENNET COLEMAN & CO. EMPLOYEES UNION PETITIONER(S)
VERSUS
INDU JAIN & ORS. RESPONDENT(S)
O R D E R
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.
All pending applications shall also stand
disposed of.
……………..J.
(RANJAN GOGOI)
……………..J.
PRAFULLA C. PANT)
NEW DELHI
OCTOBER 04, 2016

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

पढ़िए मूल खबर जिसकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है…

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सुप्रीम कोर्ट में भास्कर को सबसे ज्यादा नंगा किया गया

शशिकांत सिंह

मंगलवार को मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई के दौरान माननीय सुप्रीम कोर्ट में सबसे ज्यादा नंगा किया गया दैनिक भास्कर को। इस सुनवाई के दौरान सभी सीनियर वकीलों ने दैनिक भास्कर की सच्चाई से माननीय सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया। देश भर के पत्रकारों की मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट को विस्तार से बताया कि एक हजार करोड़ से ज्यादा टर्न ओवर की इस कंपनी ने आज तक किसी भी वेज बोर्ड का पालन नहीं किया, चाहे वो पालेकर वेज बोर्ड हो, बछावत हो, मणिसाना वेज बोर्ड हो या फिर मजीठिया वेज बोर्ड।

एक एडवोकेट ने तो सुप्रीम कोर्ट को यहां तक अवगत कराया कि दस से ज्यादा राज्यों में इसके तमाम संस्करण हैं और लेकिन सबसे ज्यादा यहीं शोषण है, जो वेज बोर्ड की मांग करता है उसका निलंबन या स्थानांतरण कर दिया जाता है। इतनी जानकारियां पाने के बाद इस मामले की सुनवाई कर रहे विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने भी आश्चर्य व्यक्त किया। माना जा रहा है कि जिस तरह दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई में तलब कर लिया है, उसी तरह अगली बार दैनिक भास्कर के मालिकों चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल और मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आने के लिए आदेश जारी हो सकता है।

मंगलवार को हुयी सुनवाई में मालिकों की तरफ से एडवोकेट सलमान खुर्शीद का एकदम शांत रहना भी लोगों की समझ से परे था। वैसे आपको बता दें कि अपने घमंड में चूर दैनिक भास्कर के मालिकों को अगर सुप्रीम कोर्ट ने बुला लिया और दो चार मालिकों को जेल में डाल दिया तो तय मानिये कि देश भर के अखबार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ अपने कर्मचारियों को देना ही पड़ेगा। इसको लेकर भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह का यह कथन उचित जान पड़ता है : ”हजारों मीडियाकर्मियों को खून के आंसू रुलाने वाले दैनिक जागरण के गुप्ताज को उच्चतम न्यायालय ने सबक सिखाने का मूड बना लिया है… देरी से लेकिन सही कदम.. थैंक्यू सुप्रीम कोर्ट.. एक को मारोगे तो बाकी मालिक सब खुद मूतेंगे… बधाई मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने वाले मीडियाकर्मी शेरों को…”

शशिकान्त सिंह
पत्रकार एवं आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कमिश्नरों को दिया सख्त निर्देश- आरसी काटिये और वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कराइए

सुप्रीम कोर्ट से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट…

सभी लेबर कमिश्नरों को अखबार मालिकों की रिकवरी काटने का सख्त आदेश… लेबर कमिश्नरों को आज माननीय सुप्रीमकोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू ना करने पर जमकर लताड़ा और दैनिक जागरण के मालिकों संजय गुप्ता और महेन्द्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में तलब कर लिया है। साथ ही सभी लेबर कमिश्नरों को सख्त आदेश दिया कि आप इस मामले की रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करा कर इस सिफारिश को अमल में लाइए।

माननीय सुप्रीमकोर्ट में आज पत्रकारों की तरफ से लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ उमेश शर्मा ने 17(1) के कलेम को 17(२) में डालने के मुद्दे को जमकर उठाया और देश भर के पत्रकारों के चेहरे पर एक बार फिर ख़ुशी ला दी। एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस ने 20 (जे) और वेरीयेबल पेय का मुद्दा उठाया। एडवोकेट परमानंद पांडे ने भी  जमकर अपना पक्ष रखा। माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आज सभी लेबर कमिश्नरों को साफ़ कह दिया आप आरसी काटिये और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश को लागू कराकर पूरी रिपोर्ट लेकर तीन महीने में आइये।

इस मामले में आज महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली, उत्तरांचल के लेबर कमिश्नरों को तलब किया गया था। इन लेबर कमिश्नरों ने दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और दूसरे बड़े अखबारों की मजीठिया वेज बोर्ड लागू ना करने की मंशा संबंधी रिपोर्ट दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को रखी गयी है जिसमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और कर्नाटक सहित पांच राज्यों के लेबर कमिश्नरों को तलब किया गया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़े कानूनी प्वाइंट पर एक रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान मौजूद रहे मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

मूल खबर…

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सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता को तलब किया

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न करने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून, न्याय, संविधान तक की भावनाओं की अनदेखी करने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने आज दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को अगली सुनवाई पर, जो कि 25 अक्टूबर को होगी, कोर्ट में तलब किया है. आज सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने को लेकर सैकड़ों मीडियाकर्मियों द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने आज के दिन कई प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों को बुला रखा था. कोर्ट ने सभी लेबर कमिश्नरों से कहा कि जिन जिन मीडियाकर्मी ने क्लेम लगाया है, उसमें वे लोग रिकवरी लगाएं और संबंधित व्यक्ति को न्याय दिलाएं. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब श्रम विभाग का रुख बेहद सख्त होने वाला है क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही बरतने पर उत्तराखंड के श्रमायुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था.

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की याचिका का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दैनिक जागरण की किसी भी यूनिट में किसी भी व्यक्ति को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से न तो एरियर दिया गया है और न ही सेलरी दी जा रही है.

साथ ही दैनिक भास्कर समूह के बारे में भी विस्तार से बताया गया. आज सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों को कोर्ट में आने के लिए आदेश कर दिया है ताकि उनसे पूछा जा सके कि आखिर वो लोग क्यों नहीं कानून को मानते हैं. चर्चा है कि अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भास्कर के मालिकों को तलब कर सकता है. फिलहाल इस सख्त आदेश से मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने फोन करके बताया कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है उससे वे लोग बहुत प्रसन्न है और उम्मीद करते हैं कि मालिकों की मोटी चर्बी अब पिघलेगी. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित अपने हक के लिए गाइड करने वाले पत्रकार शशिकांत सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं जिसे जल्द भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा.

अपडेटेड न्यूज (7-10-2016 को दिन में डेढ़ बजे प्रकाशित) ये है….

संबंधित पोस्ट्स….

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मीडिया मालिकों से सांठगांठ करने वाले लेबर कमिश्नरों को आज फटकार लगना तय : एडवोकेट उमेश शर्मा

मजीठिया वेज बोर्ड मामला : आज होगी देश भर के पत्रकारों की सुप्रीमकोर्ट पर नजर

मीडियाकर्मियों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 4 अक्टूबर को माननीय सुप्रीमकोर्ट के कोर्ट नंबर 5 में आइटम नंबर 21 के तहत सुनवाई होनी है। यह सुनवाई दोपहर दो बजे से होगी। इसके लिए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र सहित सभी 10 राज्यों के लेबर कमिश्नर और मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे देश भर के साथी दिल्ली पहुँच रहे हैं या पहुँच गए हैं। जो भी साथी इस सुनवाई में हाजिर होना चाहते हैं या वे दिल्ली में हैं, वे अपने परिचय पत्र की फोटो कॉपी के साथ पत्रकार शशिकान्त सिंह से संपर्क कर अपना पास बनवाने में उनकी मदद ले सकते हैं। शशिकांत मुम्बई से दिल्ली अपने पत्रकार साथियों के साथ आये हैं।

4 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा, इस सवाल पर एडवोकेट उमेश शर्मा का मानना है कि सभी लेबर कमिश्नरों ने सुप्रीम कोर्ट में फ़र्जी रिपोर्ट तैयार करके दी है। ये रिपोर्ट मालिकों की सांठगाँठ से तैयार की गयी है। जितनी रिपोर्ट बनी हैं, सब फर्जी हैं। इसलिए ये अदालत की अवमानना है और इस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट सख्त रवैया अपनाएगा, इसकी पूरी उम्मीद है। एडवोकेट उमेश शर्मा कहते हैं कि लेबर कमिश्नर सुप्रीम कोर्ट के सामने ही सुप्रीमकोर्ट के आदेश की धज्जी उड़ा रहे हैं। आज की सुनवाई में पांच राज्यों के लेबर कमिश्नरों द्वारा जमा कराई गई रिपोर्ट पर भी चर्चा होगी और पांच नए राज्यों के लेबर कमिश्नरों से इस मामले पर उनकी रिपोर्ट पर सुनवाई होगी। श्री उमेश शर्मा ने सभी मीडियाकर्मियों से निवेदन किया है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट में अपने वकील के जरिये अपना क्लेम कराएं।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया मामला : डीबी कार्प को शोकॉज नोटिस जारी, नहीं चेते तो कटेगी आरसी

महाराष्ट्र से खबर आ रही है कि दैनिक भास्कर और दिव्य मराठी की प्रबंधन कंपनी डीबी कॉर्प को उपनगर मुंबई सहित महाराष्ट्र के श्रम विभाग ने लताड़ लगायी है। 26 सितंबर को कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच आयोजित बैठक में प्रबंधन की तरफ से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ। इस बैठक में कर्मचारियों का पक्ष रखने के लिये महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त कार्यालय ने मजीठिया संघर्ष मंच के अध्यक्ष शशिकांत सिंह को भी आमंत्रित किया था। इस बैठक में जब डी बी कॉर्प की तरफ से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ तो सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोषले ने उपायुक्त शिरिन लोखंडे से अग्रिम कदम की चर्चा की। अब महाराष्ट्र के श्रम विभाग ने पुष्टि कर दी है कि डीबी कॉर्प प्रबंधन को शोकॉज नोटिस भेजा गया है।

डीबी कॉर्प के आई टी विभाग में कार्यरत एक टर्मिनेट कर्मचारी ने १७(१) के तहत रिकवरी का क्लेम लगाया है। इस मामले की सुनवाई के लिये गुरुवार को श्रम विभाग में कर्मचारी एस्बर्ड गोंसाल्विस और प्रबंधन को बुलाया गया था। डी बी कॉर्प प्रबंधन की तरफ से महिला अधिकारी आयीं तो जरूर, मगर खाली हाथ। इस मामले की सुनवाई कर रहे सहायक कामगार आयुक्त बी. आर. जाधव ने डी बी कॉर्प की महिला अधिकारियों से साफ पूछा कि आपका प्रबंधन बकाया पैसा कब दे रहा है। इस सवाल से प्रबंधन के लोग हक्का बक्का रह गये। इस दौरान एस्बर्ड गोंसाल्विस से भी पूछा गया कि आपका कितना हिसाब निकल रहा है। कर्मचारी ने सीए से बनवा करर लाए गए अपने २० लाख रुपये से ज्यादा के हिसाब बताया और पूरे चार्ट को सामने रख दिया। 

सहायक कामगार आयुक्त बी. आर. जाधव ने साफ तौर पर डी बी कॉर्प प्रबंधन से पूछा कि इस कर्मचारी का पैसा कब मिल रहा है। डी बी कॉर्प की महिला अधिकारियों ने हिसाब निकालने के लिये टाईम मांगा जिस पर सहायक कामगार आयुक्त बी. आर. जाधव ने कहा कि यहां कम्पयूटर और कर्मचारी दोनो हैं, फिर टाईम क्यों लगना। श्री जाधव ने लंबा टाईम देने से इनकार करते हुये डी बी कॉर्प प्रबंधन को साफ कह दिया कि आप लोगों को तीन अक्टूबर तक का समय दे रहा हूं। अगर इस कर्मचारी का तीन अक्टूबर को सुबह 11 बजे तक हिसाब मेरे सामने नहीं आया तो आरसी कट जायेगी। इतना सुनने के बाद डीबी कॉर्प की महिला अधिकारियों के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी। इस अवसर पर पत्रकार धमेन्द्र प्रताप सिंह भी मौजूद थे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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काश, मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर मीडिया में भी होती सर्जिकल स्ट्राइक!

भारतीय सेना के जांबाज जवानों द्वारा पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की खबर से देश झूम रहा है, नाच रहा है। इसी बीच मुम्बई मिरर में आज धोनी पर बनी फिल्म का रिव्यू पढ़ा। शीर्षक था सर्जिकल स्ट्राइकर। इस रिव्यू ने काफी कुछ सोचने को मजबूर कर दिया। काश हमारे लेबर अधिकारी माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए मीडिया के दफ्तरों में भी जाकर मजीठिया वेज बोर्ड का पालन करने पर कागजातों के साथ सर्जिकल स्ट्राइक करते। उन्हें पता चल जाता कि कहाँ कहाँ गड़बड़ी है।

मजीठिया वेज बोर्ड की अधिसूचना में साफ़ लिखा है कि एक समाचार पत्र प्रबंधन की जितनी भी सहायक कंपनियां या शाखाएं हैं, सबको एकल यूनिट ही माना जायेगा। मगर अखबार मालिक पता नहीं कहाँ से दिमाग लगाकर अलग अलग यूनिट का टर्नओवर दिखाकर श्रम विभाग की आँखों में धूल झोंक रहे है। कुछ अखबार मालिकों ने तो 20जे का सहारा लिया है। इस 20जे का फार्मेट देखकर ही समझ में आ जायेगा कि सब फर्जीवाड़ा है। 20जे के फार्मेट को बाकायदे अखबार मालिकों ने टाइप कराया और दे दिया कर्मचारी को कि नौकरी करते रहना है तो इसे भर दिया जाय। बेचारे कर्मचारी क्या करते, भर दिया। लेकिन पैसा होने से दिमाग जब नहीं चलता तो कानूनी सलाहकार की मदद ली जाती है। अब अगर मुर्गा खुद आपके पास कटने आये तो क्या कहना। यही हाल है लीगल एडवाइजर का।

अखबार मालिकों को लीगल एडवाइजर ने एक फार्मेट दे दिया और कह दिया कि इसे सभी कर्मचारियों से भरवा लीजिये। अब इस प्री टाइप फार्मेट में कर्मचारियों को धमकाकर साइन करा लिया गया। इस पर डेट नहीं डलवाया गया। बोला गया डेट बाद में डालिये। गरियाने का मन कर रहा है ऐसे कानूनी सलाहकारों को।  आप सोचिये अगर मैंने 20जे भरा (हालांकि खुद मैंने भरा नहीं है) और वह भी स्वेच्छा से तो पूरा मैटर लिखूंगा या पूरा टाइप करके दूंगा। टाइप वाले की दुकान पर जाकर कभी नहीं कहूंगा कि आधा तुम टाइप करो आधा हम हाथ से लिखेंगे। आधा लिखकर और आधा टाइप करा करके तो कभी नहीं दूंगा। हम इतने पगलेट तो नहीं होते कि डेट भी हाथ से ना लिखें और बाद में डेट टाइपिंग वाले के पास जाकर मशीन से टाइप कराएं। आरटीआई से एक साथी का 20जे की कॉपी मंगाया। दूसरी चीज 20जे उनके लिए होता है जिनका वेतन मजीठिया से ज्यादा रहता है।

सर्जिकल स्ट्राइक में लेबर विभाग सबसे पहले मालिकान से ये पूछे कि जनाब आपके कर्मचारियों ने खुद से 20जे भरा है? ये आप मानते हैं और इसीलिए आप मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं कर रहे हो। अगर वे कुछ कहते हैं तो इनसे लिखित रूप से ये जानकारी लेनी चाहिए। उसके बाद साफ़ कहना चाहिए कि अब आप प्रूफ दिखाइये कि आप इन्हें मजीठिया वेज बोर्ड से ज्यादा वेतन देते हो। देखिये कैसे इन मालिकों की हालत खराब होती है। इस सर्जिकल स्ट्राइक में ये भी देखना चाहिए मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक कितने कर्मचारियों को 10 साल से ऊपर काम करने पर प्रमोशन दिए गए। मेडिक्लेम और एलटीए कर्मचारियों को मिलता है या नहीं, इसकी भी जाँच होनी चाहिए। सभी स्थाई, अस्थाई और ठेका पद्धति पर काम करने वाले कर्मचारियों की पूरी लिस्ट लेनी चाहिए इस सर्जिकल स्ट्राइक में। सिर्फ इतना काम करने से देश के लाखों मीडियाकर्मियों का भला हो जाएगा।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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मजीठिया मामला : 38 हजार बकाये का चेक लेकर आये लोकमत प्रबंधक को सहायक कामगार आयुक्त ने लौटाया

मुंबई : लोकमत के अकोला संस्करण से सर्कुलेशन अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुये सुभाष आर तायड़े को सेवानिवृति के बाद भी मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन, एरियर और अंतरिम राहत नहीं मिला तो उन्होंने अकोला के श्रम आयुक्त कार्यालय में 17 (1) के तहत लोकमत प्रबंधन के खिलाफ रिकवरी क्लेम लगा दिया। इस क्लेम की सुनवाई के दौरान लोकमत प्रबंधन 38 हजार रुपये का एक चेक उस कर्मचारी के नाम का लेकर उपस्थित हुआ और दावा किया कि इस कर्मचारी का मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार यही बकाया निकल रहा है।

इसके बाद सुभाष तायड़े ने कड़ा एतराज जताया और कहा कि उनका बीस लाख से ज्यादा बकाया निकल रहा है और लोकमत प्रबंधन श्रम विभाग को गुमराह कर रहा है। सुभाष तायड़े ने तुरंत इस बात की जानकारी मजीठिया संघर्ष मंच के अध्यक्ष और पत्रकार शशिकांत सिंह को दी। उन्होंने एक सीए से बनवाकर लाया गया हिसाब भी दिखाया। इस मामले की सुनवाई कर रहे अकोला के सहायक कामगार आयुक्त श्री पानबुड़े ने सुभाष तायड़े की बात को गंभीरता से लिया और लोकमत प्रबंधन को यह कहकर बैरंग वापस कर दिया कि आप अपनी कंपनी और उसकी सभी ब्रांचों की 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट लाईये ताकि पता चल जाये कि आप सही हैं या नहीं।

इसके बाद लोकमत प्रबंधन को सुभाष तायड़े के नाम पर लाया गया 38 हजार का चेक भी वापस कर दिया गया। अब लोकमत प्रबंधन अगले महीने के पहले सप्ताह में पूरा विवरण लेकर फिर सुनवाई के लिये उपस्थित होगा। आपको बता दें कि सुभाष तायड़े सेवानिवृत हो चुके हैं और उनका हिसाब भी कंपनी ने दे दिया है मगर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सुभाष तायड़े को बीस लाख के लगभग लोकमत प्रबंधन को देना पड़ सकता है जिससे लोकमत प्रबंधन बचना चाहता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
९३२२४११३३५

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यूपी के श्रमायुक्त ने जारी किया फार्मेट, मजीठिया का लाभ चाहिए तो इसे जरूर भरें

16 सितंबर को भी हो सकती है सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई…

पत्रकारों और समाचार पत्र कर्मियों के वेतन, एरियर, अंतरिम राहत तथा प्रमोशन के मामले में पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की फटकार का उत्तर प्रदेश में असर दिखने लगा है। अपनी खाल बचाने के लिए अब वहां का लेबर डिपार्टमेंट असल जांच करने लगा है। वहीं अखबार मालिकों की शामत आ गयी प्रतीत होती है। गत 23 अगस्त को सुप्रीम कोट॔ की झिड़की के बाद यूपी के श्रमायुक्त ने 27 अगस्त को आदेश जारी किया है, जिसके बाद यूपी के सभी क्षेत्रों के उप/अपर श्रमायुक्तों ने संबंधित जिलों से प्रकाशित अखबारों के प्रबंधनों को छह पृष्ठों का प्रपत्र भेजकर तत्काल पूरी कुंडली तलब कर ली है।

इस प्रपत्र में कुल छह टेबल हैं और छठा यानी एफ टेबल खुद कम॔चारी को निरीक्षणकर्ता अधिकारी के सामने भरना है। उत्तर प्रदेश के सभी समाचारपत्र कर्मियों से निवेदन है कि अगर आपको मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ चाहिए तो आपको इस खबर के साथ दिए गए प्रपत्र को भर कर आप अपने श्रम विभाग के कार्यालय में जमा कर दें और एक कॉपी रिसीव करा कर अपने पास रख लें। इस प्रपत्र के साथ अपना पेमेंट स्लिप या वेतन के दूसरे प्रूफ जरूर फोटोस्टेट कराकर दें।

साथ ही उत्तर प्रदेश के सभी साथियों से निवेदन है कि खुद भी इसे भरें और ज्यादा से ज्यादा साथियों से इसे भरवाएं। प्रपत्र के साथ समाचार पत्र का नाम और कार्यालय का पूरा पता कंपनी का नाम जरूर लिखे। साथ ही अपना पूरा पता और मोबाइल नंबर जरूर लिखे। याद रखिए, आप प्रबन्धन से डरें बिलकुल नहीं। आपके साथ देश भर के पत्रकार हैं और उससे भी बड़ा आपके साथ सुप्रीम कोर्ट है। उधर सुप्रीम कोर्ट से एक खबर ये भी आ रही है कि मजीठिया मामले की एक सुनवाई 16 सितंबर को भी हो सकती है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया मामले में वकीलों के खिलाफ घोषित वॉकयुद्ध बंद कीजिये प्लीज़

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में हम इन दिनों एक तरफ जहाँ खुश होकर सुप्रीम कोर्ट के 23 अगस्त के फैसले की तारीफ़ के कसीदे पढ़ रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की बारीकियों का अध्ययन कर रहे हैं वहीँ पत्रकारों का एक समूह कुछ वकीलों की तारीफ और मैनेजमेंट के इशारे पर दूसरे वकीलों के खिलाफ सोशल मीडिया पर वॉक युद्ध कर रहा है। फेसबुक पर स्टोरी चल रही थी कि अमुक वकील तो सुप्रीम कोर्ट में कुछ नहीं बोले। एक ने ‘हिन्दुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स के रिटायरमेंट हुए लोगों को मिले लाखों रुपये’ पर कमेंट लिखा है कि हिन्दुस्तान के कर्मचारियों को जितना पैसा बताया गया,  उतना नहीं मिला। यानि सीधे सीधे कहें तो आरोप हिन्दुस्तान टाइम्स कर्मचारियों के वकील उमेश शर्मा जी पर लगा दिया। साथ ही मेरी लेखनी पर भी।

अब इस पर मेरी भी सफाई सुन लीजिये। आपमें से जो भी साथी मेरी लेखनी पर आरोप लगा रहे हैं उनके प्रति गुस्सा या रंज तनिक भी मेरे मन में नहीं है। रोजाना 70 से अस्सी फोन आ रहे हैं। सभी साथियों को मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में जानकारी देना, वाट्सअप और मेल के जरिये देश भर के पत्रकारों के सवालों का जवाब देना, कहीं फंसना तो उमेश सर को याद करना। ऊपर से ये आरोप, फिर भी नाराजगी नहीं है। दोस्तों आप सबको बता दूं हिन्दुस्तान टाइम्स के रिटायर लोगों को ज्यादा रकम मिलने वाली खबर बिलकुल सही और सटीक भी है। आप में से कुछ साथी चाहें तो उन लोगों से बात भी करा सकता हूँ।

अब आई बात सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा जी की तो आपको बता दूं कि उमेश शर्मा जी के लिए पत्रकारों का वेज बोर्ड कोई नया नहीं है। मजीठिया वेज बोर्ड से पहले वे पत्रकारों के लिए गठित पालेकर वेज बोर्ड और बछावत वेज बोर्ड की लडाई लड़कर अखबार मालिको को हरा चुके हैं। वे पत्रकारों का अधिकार भी उन्हें दिला चुके हैं। आपको उनके अनुभव का एक और उदाहरण देता हूँ। एक वरिष्ठ अधिवक्ता जो पहले पत्रकारिता में थे, 1996 में उनके समर्थन में उमेश शर्मा जी ने केस लड़ा और उन्हें उस समय 2 लाख 65 हजार की रकम दिलाई। सोचिए, आज के हिसाब से ये कितना होता है। आप खुद अंदाजा लगाइये। कई और मामले हैं जो साबित करते हैं कि उमेश सर काफी सुलझे हुए जानकार और संयमी एडवोकेट हैं।

एक उदाहण और देता हूँ। अमिताभ बच्चन को एंग्रीयंग मैंन कहते हैं। वे परदे पर खूब चिल्लाते हैं, तालिया भी बजती हैं लेकिन वे हमेशा दिलीप कुमार जी को अपना एक्टिंग गुरु मानते हैं क्योंकि दिलीप कुमार जी बहुत कम चिल्लाते हैं मगर उनके अभिनय की पूरी दुनिया लोहा मानती है। उन्हें जो कहना रहता है, बहुत ही शालीनता से कह देते हैं और उनके जवाब पर तालियां नहीं बजती बल्कि वो जो तर्क देते हैं उसे सुनकर दुनिया जरूर अवाक रह जाती है।

इस संबंध में श्री विनय विहारी सिह जो कि कोलकता में पत्रकार हैं और इंडियन एक्सप्रेस से रिटायरमेंट के बाद १७(१) का अप्लीकेशन मार्च २०१५ में उमेश शर्मा जी के बताए हुए तरीके से लगाया और तभी उनकों प्रबंधकों ने बुला कर बकाया दे दिया। उनको फ़ोन करना है तो नंबर ले लीजिए. इसके बाद श्री प्रेमचन्द सिन्हा व 10 अन्य जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स से रिटायर हुए थे उनके द्वारा CCP No. १२८ / २०१५ लगाया गया। साथ ही श्री उमेश शर्मा के द्वारा १७(१) का अप्लीकेशन लगाया गया। उन सभी को पैसा लाखों में मिला। इस बात की पुष्टि फोन द्वारा कर सकते हैं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि क़ानूनी कार्यवाही में लगाए गये दाव पेंच से जीत होती है, सिर्फ़ बहस को मुद्दा बना कर गुमराह ना हों। यह हिन्दी फिल्म की क़ानूनी लडाई नहीं है जिसमें हीरो सबसे ज़्यादा बोलकर जीत जाता है। कृपया यह बताएं कि इनके अलावा कितने पत्रकारों को कुछ हाथ आया है। दोस्तों आप सबसे निवेदन है कि कृपया किसी भी वकील के बारे में कोई भी वॉक युद्ध ना करें। हमारा मकसद साफ़ है कि मालिकों को हराना और अपना हक़ पाना है। इस राह पर ही चलना है। भटकना तनिक भी नहीं है। ध्यान दीजिये।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335
shashikant9322@gmail.com

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सुप्रीम कोर्ट की डांट-फटकार और वारंट के बाद राइट टाइम हुआ श्रम विभाग, सुनिए भोपाल का हाल

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 23 अगस्त को माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा देश के पांच कामगार आयुक्तों को लताड़ लगाने और वारंट जारी करने के बाद देश भर के श्रम विभाग के अधिकारी राइट टाइम होते दिख रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से प्रिंट मीडिया के पत्रकारों में ख़ुशी की लहर है. भोपाल में श्रम आयुक्त कार्यालय ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में बहुत तेजी से काम करना शुरू कर दिया है. इस तेजी के लिए इस विभाग का नाम गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज होना चाहिए.

24 अगस्त को मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे साथियों के वाट्सअप ग्रुप ‘मजीठिया क्रान्ति’ में राय बनी कि एक आरटीआई श्रम विभाग में लगाई जाय और कम्पनियों का 2007 से 10 तक का बैलेंस शीट  मांगा जाए। साथ ही इसके जरिए सभी समाचार पत्रों की सभी यूनिटों व उनके डायरेक्टरों की सभी कम्पनियों का डिटेल निकाला जाए। यह सब आरटीआई से ही संभव है। अगर ये जानकारी श्रम विभाग के कार्यालय में होगी तो वो ऐसे तो देगा नहीं. हां, आरटीआई में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर कहा जाए कि आप आयकर विभाग से बैलेंस शीट मंगाकर दीजिये, तो उन्हें देना पड़ेगा. सभी साथियों को ये बात जम गयी. सबने आरटीआई लगाने की प्रक्रिया अपने अपने स्तर से शुरू कर दी.

भोपाल में पत्रिका अखबार के साथी विजय कुमार शर्मा ने कल 24 अगस्त को एक आरटीआई तैयार किया और उसे भोपाल के सहायक श्रमायुक्त कार्यालय में जमा कर दिया। परसों सुप्रीम कोर्ट में श्रम आयुक्तों की जो हालत हुयी थी, ये शायद उसी का असर है कि भोपाल के सहायक श्रम आयुक्त और जन सूचना अधिकारी ने इस आरटीआई के पत्र को पाने के ठीक आधे घंटे के अंदर एक पत्र आयकर विभाग को भेजा कि विजय कुमार शर्मा द्वारा राजस्थान पत्रिका के बारे में उसका 2007 से वर्ष 2015 तक का बैलेंस शीट माँगा गया है जिसे उपलब्ध कराइये. आरटीआई के मामले में किसी भी विभाग द्वारा किया गया अब तक का यह सबसे तेज पत्र व्यवहार है. इतना तो तय है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले को लेकर श्रम आयुक्तों की हेकड़ी खत्म होने लगी है और उनकी पूरी तरह बोलती बंद है. अगर पहले ही इसी तेजी से श्रम विभाग के लोग काम किए होते तो आज ये नौबत न आती.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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हिन्दुस्तान टाइम्स के टर्मिनेट कर्मचारियों ने किया 65-65 लाख का रिकवरी क्लेम

प्रबंधन इस कर्मचारी को मनाने में जुटा… एक दर्जन से ज्यादा रिटायर कर्मचारी बनवा रहे हैं क्लेम : मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में हिन्दुस्तान टाईम्स नयी दिल्ली प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा दायर करने वाले 3 टर्मिनेट कर्मचारियों में दो ने अपना वास्तविक हिसाब बनवाकर लगभग 65-65 लाख रुपये का रिकवरी क्लेम श्रम आयुक्त के यहाँ किया है। एक अन्य टर्मिनेट कर्मचारी ने अपना फुल एंड फाइनल हिसाब कंपनी से ले लिया। इस 65 लाख के क्लेम में अंतरिम, एरियर और ब्याज भी शामिल है। लगभग एक दर्जन सेवानिवृत कर्मचारी अपना रिकवरी क्लेम करने की तैयारी कर चुके हैं जिनमे प्रत्येक 50-50 लाख का क्लेम करने जा रहे हैं।

आपको बता दें कि हिन्दुस्तान टाइम्स नयी दिल्ली के कुल 12 लोगों ने एडवोकेट उमेश शर्मा के जरिये दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में केस किया था। इसमें 9 कर्मचारी सेवानिवृत थे और 3 कर्मचारी टर्मिनेट थे। इन कर्मचारियों ने श्रम आयुक्त से प्रबन्धन के खिलाफ सम्मन जारी करवा दिया था जिसके बाद प्रबंधन कार्रवाई से बचने के लिए हाईकोर्ट से स्टे लेकर चला आया मगर अंत में हवा का रुख अपने खिलाफ देख हिन्दुस्तान टाइम्स प्रबंधन झुक गया। उसने पहले उन 9 कर्मचारियों को बकाया भुगतान किया जो सेवानिवृत थे। इन कर्मचारियों को 6 लाख से 10 लाख रुपये का भुगतान किया गया जिसमें ढाई लाख रुपये तक चेक से भुगतान किया गया और बाकी रकम सहयोग राशि के रूप में नकद दी गयी।

फिर इसी तरह एक टर्मिनेट कर्मचारी को लगभग 14 लाख रुपये देकर पटाया गया। मगर 2 टर्मिनेट कर्मचारी अब भी वास्तविक धन राशि लेने पर अड़े हैं जिन्होंने अपना हिसाब 65-65 लाख रुपये तक का बनवाया है। इसमें एरियर, अंतरिम और ब्याज भी शामिल है। ये 9 कर्मचारी सेवानिवृत हो चुके थे और उन्होंने सेवा निवृति के बाद माननीय सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले की लड़ाई लड़ने वाले एडवोकेट उमेश शर्मा के जरिये स्टे केस और कुछ ने रिकवरी केस हाइकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में लगाया था। पहले चर्चा थी कि इन कर्मचारियों को 20 से 30 लाख रुपये दिए गए। सूत्रों की मानें तो हिन्दुस्तान टाईम्स बकाये का भुगतान दो तरीके से कर रहा है। कुछ पैसे ह्वाइट में दिखाकर और कुछ अलग से सहयोग राशि के रूप में दे रहा है।

केस लगाने वाले हिन्दुस्तान टाईम्स के 12 कर्मचारियों में से 10 कर्मचारियों को प्रबंधन ने उनका लाखों रुपये का बकाया दे दिया। अब सिर्फ 2 कर्मचारियों का भुगतान बाकी है जिनके साथ भुगतान को लेकर बातचीत जारी है। इन कर्मचारियों से समाचार पत्र प्रबंधन २०जे का फार्म नहीं भरवा पाया था। इन कर्मचारियों ने एडवोकेट उमेश शर्मा के जरिये रिकवरी से जुड़ा १७(१) का मामला लगवाया था जिसके बाद हिन्दुस्तान टाईम्स को आखिर झुकना पड़ा। यह केस नंबर था १२९। इसमें कर्मचारियों ने प्रेमचंद सिन्हा के साथ मिलकर मुकदमा किया था। सूत्र बताते हैं कि इन सभी कर्मचारियों को हिन्दुस्तान टाईम्स ने 6 से 8 लाख रुपये का भुगतान किया है। एक कर्मचारी जो टर्मिनेट था उसे 14 लाख रुपये का भुगतान किया गया है। बाकी बचे दो कर्मचारियों ने अपना वास्तविक हिसाब बनवाकर कंपनी प्रबंधन के खिलाफ 65-65 लाख की रिकवरी का क्लेम किया है। उधर हिन्दुस्तान टाइम्स के कई और कर्मचारी एडवोकेट उमेश शर्मा के जरिये अपना मुकदमा दायर कर क्लेम तैयार करवा रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
९३२२४११३३५

मूल खबर….

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जानिये मुम्बई के किस समाचार पत्र में कितने कर्मचारी काम करते हैं

मिड डे में काम करते हैं सबसे ज्यादा 432 कर्मचारी, प्रातःकाल तथा आपला महानगर निकलता है सिर्फ 8 कर्मचारियों से, आर टीआई से हुआ खुलासा

मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने की सख्ती के बाद मुम्बई के समाचार पत्रों में कर्मचारियों की संख्या को लेकर खूब उलटफेर हो रहा है। यहाँ श्रम आयुक्त कार्यालय द्वारा किये गए सर्वे का ताजा आंकड़ा तो यही संकेत दे रहे हैं। जानिये मुम्बई के कौन से समाचार पत्र में कितने कर्मचारी काम करते हैं और उनमे कितने परमानेंट और कितने ठेका पर काम करने वाले कर्मचारी हैं। ये सारी सूचना मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह ने आरटीआई के जरिये हासिल किया है।

बिजनेस स्टैंडर्ड में कुल 145 कर्मचारी हैं जिसमें पत्रकार कटेगरी में 63 और प्रशासनिक स्तर पर 82 कर्मचारी हैं। इसी तरह मेसर्स बॉम्बे समाचार में 153 कर्मचारी हैं जिसमें पत्रकार कटेगरी में 26 और प्रशासनिक कटेगरी में 32 तथा फैक्ट्री कर्मी की श्रेणी में 101 कर्मचारी हैं। श्री अम्बिका प्रिंटर्स एंड पब्लिकेशन्स में 250 कर्मचारी हैं जिसमे परमानेंट 124 और कान्ट्रेक्ट बेस पर 126 कर्मचारी हैं।  मिड डे में पत्रकार कटेगरी में 111 और प्रशासनिक में 270 तथा फैक्ट्री में 51 कर्मी हैं। कुल मिलाकर इस समाचार पत्र में 432 कर्मचारी काम करते हैं। मेसर्स राने प्रकाशन में कुल 104 कर्मचारी हैं जिसमें पत्रकार कटेगरी में 35,प्रशासनिक में 54 और फैक्ट्री में 18 कर्मचारी हैं।

प्रबोधन प्रकाशन में 234 कर्मचारी हैं जिसमे पत्रकार कटेगरी में 102, प्रशासनिक में 106 तथा फैक्ट्री में 26 लोग हैं। मी मराठी में 234 कर्मचारी हैं जिसमे पत्रकार कटेगरी में 100, प्रशासनिक में 20 कर्मचारी हैं। उर्दू टाइम्स में 19 कर्मचारी काम करते हैं। इसी तरह गुजरात समाचार में 100 और सौराष्ट्र ट्रस्ट में 111 कर्मचारी हैं। आपला महानगर में सबसे कम सिर्फ 8 कर्मचारी काम करते हैं। डिलिगेट्स मीडिया में 190 कर्मचारी काम करते हैं। नवाकाल में 48 कर्मचारी हैं जिसमे परमानेंट सिर्फ 7 हैं बाकी 41 कर्मचारी ठेका पर हैं।

बेनमेट कोलमेन में सिर्फ 159 कर्मचारियों के बारे बताया गया है हालांकि प्रबंधन ने कर्मचारियों की सूची श्रम विभाग को उपलब्ध नहीं करायी है। दैनिक इंकलाब में 259 कर्मचारी हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड में 388 कर्मचारी हैं। इंडियन नेशनल प्रेस में 98 कर्मचारी हैं जिसमे पत्रकार कटेगरी में 7, प्रशासनिक में 16, फैक्ट्री में 22 और कान्ट्रेक्ट पर 53 कर्मचारी हैं। इसी तरह प्रातःकाल में सिर्फ 8 कर्मचारी हैं।

नवाकाल है मुम्बई का नंबर वन मराठी दैनिक, दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र टाइम्स, लोकसत्ता तीसरे, मुंबई चौफेर चौथे और लोकमत 6वें स्थान पर

मुम्बई से प्राकाशित मराठी दैनिकों में नवाकाल मुंबई का सबसे ज्यादा सर्कुलेशन वाला समाचार पत्र है। इस समाचार पत्र का सर्कुलेशन 2 लाख 95 हजार 634 है और महाराष्ट्र सरकार का सरकारी विज्ञापन रेट नवाकाल में 52 रुपये हैं। मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आर टी आई कार्यकर्ता शशिकांत सिंह ने आर टी आई के जरिये ये जानकारी निकाली है। मजे की बात ये है कि इस नंबर वन मराठी दैनिक के मालिकान ने माननीय सुप्रीमकोर्ट का आदेश नहीं माना और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश को आर्थिक कारण का हवाला देकर मानने से इंकार कर दिया। नवाकाल में कुल 48 कर्मचारी हैं जिसमे सिर्फ 7 कर्मचारी परमानेन्ट है और 41 कर्मचारी कान्ट्रेक्ट पर हैं। इस समाचार पत्र के कार्यालय में मजीठिया जाँच टीम 16 जून को पहुची तो प्रबंधन ने कागजात दिखाने से ही मना कर दिया।

सर्कुलेशन के मामले में दूसरे नंबर पर है महाराष्ट्र टाइम्स जिसका मुम्बई में सर्कुलेशन है 2 लाख 70 हजार 780 और महाराष्ट्र सरकार का विज्ञापन रेट है 50 रूपये। मराठी दैनिकों में तीसरे स्थान पर है लोकसत्ता जिसका सर्कुलेशन है 2 लाख 68  हजार 539 और सरकारी विज्ञापन रेट है 40 रुपये। मुम्बई चौफेर चौथे स्थान पर है। इसका सर्कुलेशन है 2 लाख 51 हजार 503 और सरकारी विज्ञापन रेट है 46 रुपये जो लोकसत्ता से ज्यादा है। प्रहार पांचवे नंबर पर है जिसका सर्कुलेशन है 1 लाख 32 हजार और सरकारी विज्ञापन रेट है 27 रूपये।

लोकमत का सर्कुलेशन 1 लाख 26 हजार 334 है और छठवें स्थान वाले इस न्यूज पेपर का सरकारी विज्ञापन रेट है 33 रुपये। सातवें नंबर पर है आपला वार्ताहर जिसका सर्कुलेशन 1 लाख 25 हजार 997 है और इसका सरकारी विज्ञापन रेट 35 रुपये है। संध्याकाळ का सर्कुलेशन 1 लाख 6 हजार 419 है और महाराष्ट्र सत्कार का सरकारी विज्ञापन रेट है 32 रुपये। इसी तरह पुढारी का सर्कुलेशन 1 लाख 3 हजार 354 है और सरकारी विज्ञापन रेट 30 रुपये है। शिवसेना का मुखपत्र सामना सर्कुलेशन के मामले में 11वें स्थान पर है। इसका सर्कुलेशन 1 लाख 1 हजार 537 है और महाराष्ट्र सरकार का सरकारी विज्ञापन रेट है 30 रुपये। 10 वें नंबर पर है सकाळ जिसका मुम्बई में सर्कुलेशन 1 लाख 2 हजार 913 है और सरकारी विज्ञापन रेट है 30 रुपये। 12वें स्थान पर है संध्यानन्द जिसका मुम्बई में सर्कुलेशन है सिर्फ 63020 और सरकारी विज्ञापन रेट है 20 रुपये। ये सभी समाचार पत्र a ग्रेड में आते हैं।

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह से संपर्क 9322411335 के जरिए किया जा सकता है.

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मजीठिया मामले में प्रबंधन से मोटी फीस लेकर बिना तैयारी के सुनवाई में आ रहे वकील

मुम्बई में डीबी कार्प के खिलाफ मजीठिया मामले में दैनिक भास्कर के प्रिंसपल करस्पांडेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा 17 (1) के तहत दायर की गयी शिकायत के मामले में शनिवार को श्रम आयुक्त कार्यालय मुम्बई शहर में सुनवाई हुई। इस सुनवाई के दौरान प्रबंधन की तरफ से अधिवक्ता बिना किसी कागजात के चले आये और ऐसा उन्होंने दूसरी बार किया। इस मामले में अब तक तीन तारीख लग चुकी है लेकिन भास्कर प्रबंधन अब तक कोई कागजात उपस्थित नहीं कर पाया और न ही वकील की तरफ से वकालतनामा ही दाखिल किया गया है। इस पर सहायक कामगार आयुक्त सीए राउत ने कड़ा एतराज जताया।

शनिवार की तारीख पर गजब नजारा देखने को मिला। सहायक कामगार आयुक्त सीए राउत  ने डी. बी. कॉर्प के वकील से स्पष्ट कहा कि आपको मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक बकाया तो देना ही पड़ेगा, इसके लिए आप चाहें तो मिल-बैठकर बीच का रास्ता निकालें। मतलब- समझौता कर लीजिए। लेकिन यदि आपको कुछ कहना है तो हमेशा तारीख देने की मांग मत कीजिए, बल्कि लिखकर दीजिए।

इस पर झल्लाए डी बी कार्प के वकील ने मैनेजमेंट के व्यक्ति की ओर मुखातिब होकर अजीब-सा दुखड़ा सुनाना शुरू कर दिया- “कागजात तो आप ही लोग उपलब्ध कराएंगे न… आप नहीं करेंगे तो मैं क्या करूंगा?”

अरे भई, यह बात आपको लेबर कमिश्नर के कार्यालय में आकर कहने के बजाय तभी कह देनी चाहिए थी, जब डी. बी. कॉर्प मैनेजमेंट के सामने बड़ी-बड़ी फेंक कर आपने मोटी फीस वसूली होगी। मजीठिया मामले में ही एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान महिला वकील ने 2010 में नौकरी छोड़ने वाले एक कर्मचारी के खिलाफ यह बयान दे दिया कि इस कर्मचारी ने खुद नौकरी छोड़ी है और वह भी 2010 में, इसलिए इसको अंतरिम लाभ पाने का अधिकार नहीं है। बाद में सीए राउत ने इस महिला वकील का ध्यान उनकी गलती पर दिलाया और कहा कि इसे अंतरिम पाने का अधिकार है। साफ़ कहें तो प्रबंधन से फ़ीस लेकर बिना तैयारी के प्रबंधन की तरफ से ये वकील मजीठिया वेज बोर्ड मामले में केस लड़ने आ रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट
9322411335

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कर्मचारियों के जले पर नमक छिड़क रहा है अमर उजाला!

नोएडा से एक साथी ने सूचना दी है कि अमर उजाला प्रबंधन अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी व बकाया तो दे नहीं रहा है ऊपर से जले पर नमक छिड़क रहा है। इस साथी ने सूचना दी है कि यहाँ अमर उजाला के नंबर वन होने का जश्न मनाया गया लेकिन अमर उजाला के नंबर 1 होने का जश्न सिर्फ बड़े लोगों ने ही जोर शोर से मनाया। संपादक, जनरल मैनेजर, मैनेजर जैसे खास लोग 10-12 दिन के विदेश टूर पर भेजे गए और वहां से मौज मस्ती करके लौट आए हैं।

बताया जा रहा है कि लेबर कमिश्नर और प्रमुख सचिव को पटाकर मनचाहा रिपोर्ट कोर्ट में सबमिट करा दिया गया है। इस साथी ने कहा कि यहां प्राइमरी पाठशाला जैसे हालात हैं। जिसने मजीठिया वेज बोर्ड की बात की उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जा रहा है। इस साथी ने मजीठिया वेज बोर्ड को अमल में लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर पूरा भरोसा जताया है और लिखा है कि प्लीज़ मेरा नाम व्यावहारिक कारणों से मत डालियेगा। इस साथी ने लिखा है कि लखनऊ में सभी प्रादेशिक डेस्क के साथी रात 12 बजे के बाद घर जाते हैं लेकिन 95 प्रतिशत लोगों को नाइट अलाउंस नहीं दिया जाता। यही हाल अन्य यूनिटों में भी है।

सिर्फ पिछले साल जून में एक साथ तीन महीने का रात्रि भत्ता रजिस्टर पर साइन कराकर दिया गया था। इसे सैलरी शीट पर रात्रि भत्ता एरियर के रूप में दर्शाया गया था। इसके बाद नहीं दिया गया। हम लोग साढ़े आठ घंटे से भी ज्यादा काम करते हैं। फिलहाल मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर इतना तो तय है अमर उजाला अपने कर्मचारियों को गुमराह कर रहा है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया मामले में सभी साथी आरटीआई के जरिये स्टेटस रिपोर्ट, जरूरी कागजात और ट्रांसफर टर्मिनेशन के नियम मंगाएं

दोस्तों, मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की अगली तिथि 23 अगस्त तय की है। इस दिन माननीय सुप्रीम कोर्ट में उत्तरप्रदेश सहित पांच राज्यों के श्रम आयुक्तों को तलब किया गया है। उसके बाद दूसरे राज्यों के श्रमायुक्त सुप्रीम कोर्ट में तलब होंगे। हमारे पास एक महीने से ज्यादा समय है। सभी साथी श्रम आयुक्त कार्यालय में एक आरटीआई लगायें और उसमें निवेदन करें कि इस कार्यालय द्वारा माननीय सुप्रीमकोर्ट में भेजी गयी मजीठिया वेजबोर्ड से जुडी स्टेटस रिपोर्ट की पूरी प्रमाणित प्रति दें। इसके साथ ही आप अपनी कंपनी द्वारा जमा कराये गए कर्मचारियों की पूरी सूची, अन्य दस्तावेज भी मंगाएं।

साथ ही कंपनी का पूरा नाम डालते हुए ये जरूर पूछें कि क्या इस कंपनी ने ट्रांसफर और टर्मिनेशन के आदेश के नियम को आपके विभाग से प्रमाणित कराया है। अगर हाँ तो कितने तारीख को प्रमाड़ित कराया है। याद रखिये, अगर इन कम्पनियों ने अपने आदेश प्रमाणित नहीं कराये हैं तो आपका ट्रांसफर या टर्मिनेशन ये कंपनियां नहीं कर सकती हैं। वरिष्ठ एडवोकेट ब्रिज बिहारी जी ने ट्रांसफर और टर्मिनेशन से जुडी ये जानकारी दी है।

Industrial Employment (standing orders) act 1946. इस कानून के तहत सभी संस्थानों जिसमें न्यूज समाचार पत्र भी शामिल हैं ये नियम बनाकर उस प्रान्त के लेबर कमिश्नर से प्रमाणित कराने होते हैं। इन स्टेन्डिग आर्डर्स में नियुक्ति के नियम, जांच करने के नियम, कम व अधिक दण्ड देने के नियम होते हैं। निलम्बित काल में कितना भत्ता मिलेगा, यह भी नियम होते हैं। प्रत्येक संस्थान जहां 100 से अधिक कर्मचारी या वर्कर काम करते हैं ये नियम बनाने आवश्यक होते हैं। इन्हें न बनाने वालों के विरुद्ध राज्य सरकार प्रोसीक्यूशन कर सकती है।

अब आइये स्टेटस रिपोर्ट पर बात करें। स्टेटस रिपोर्ट की या कोई भी आरटीआई की प्रमाणित प्रति आपको दो रुपये प्रति पेज के हिसाब से मिलेगी। यानी अगर इसके 50 पेज हैं तो आपको सौ रपये देना पड़ेगा श्रम विभाग में और उसकी रसीद मिलेगी। इस स्टेटस रिपोर्ट से आपको ये पता चल जाएगा कि आपके समाचार पत्र के बारे में क्या रिपोर्ट भेजी गयी है और कितने कर्मचारी इस समाचार पत्र में हैं। आप द्वारा मांगी गयी सूचना से आपको ये भी पता चल जाएगा कि कंपनी ने आपका नाम भेजा है या नहीं। अगर भेजा है तो आपको किस पोस्ट पर डाला गया है और कंपनी ने 2007 से 10 तक का क्या टर्नओवर दिखाया है। इससे आपको आगे की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी।

साथ ही श्रम आयुक्त के पास एक निवेदन भरा पत्र भी दीजिये की कंपनी उन्हें सहयोग नहीं कर रही है इसलिए श्रम आयुक्त इस कंपनी का और उसकी सभी सहयोगी कम्पनियों का साल 2007-08, 2008-09, 2009-10 का टर्नओवर आयकर विभाग से मंगाकर दे। अगर कोई अच्छा आयकर अधिकारी हुआ तो आपको मंगाकर दे सकता है। इस पत्र पर कंपनी का पूरा नाम और पता व कंपनी का पैन नंबर भी हो सके तो दें। इससे आपको बहुत मदद मिलेगी।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता
मुंबई
9322411335


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हे भड़ास वालों, कभी ठेके पर काम कर रहे मीडियाकर्मियों के बारे में भी बात कर लो

भड़ास के एक पाठक अभिषेक सिंह जी ने एक मेल भेजा है। इसमें पत्रकार बंधु अभिषेक ने बहुत अच्छा सवाल उठाया है जिसके लिए उनको धन्यवाद। अभिषेक जी ने इस मेल में लिखा है- ”आज मजीठिया को हव्वा बनाया जा रहा है। आज जितने पत्रकार पेरोल पर हैं? उससे कहीं ज्यादा ऐसे पत्रकार हैं जो पक्के नहीं हैं यानि वो ठेका पर हैं। ऐसे पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ तो मिलेगा नहीं। भड़ास पढ़ने के बाद दिल में एक ठसक सी हो जाती है क़ि हम पत्रकार हैं की नहीं।”

अभिषेक जी ने भड़ास के प्रति अपनी नाराजगी भी जताई है और लिखा है आप लोग मजीठिया रिपोर्ट पर चर्चा करके पत्रकारों में अपनी घुसपैठ बनाना चाहते हैं। अगली ही लाइन में वे भड़ास की तारीफ़ भी करते हैं और लिखते हैं कि आप भड़ास पर कई अच्छी जानकारी भी देते हैं। साथ ही वे कहते हैं जिस रिपोर्ट को लागू होने के बाद भी मीडिया का एक बड़ा तबका उससे अछूता रह जाय उस पर चर्चा करने से क्या फायदा। अभिषेक ने लिखा है कि कुछ उन पत्रकारों के बारे में भी चर्चा कर ली जाए जो पैरोल पर नहीं है।

अभिषेक जी अंतिम लाइन में लिखते हैं, कुछ गलती हो तो उन्हें छोटा भाई समझ कर माफ़ कर दिया जाये।

अभिषेक जी ने कोई गलती नहीं की है बल्कि एक सटीक मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखी है। इसके लिए उनको धन्यवाद।

आज देश भर में अधिकाँश समाचार पत्रों में पत्रकार और कर्मचारी ठेका पर हैं। मजीठिया वेज बोर्ड का गठन करते समय भी इस बात का ध्यान रखा गया है। भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में 11 नवम्बर 2011 को आदेश दिया है। उस आदेश के हिंदी प्रति के पेज नंबर 66 क्रमांक ग में ठेका पर काम करने वाले समाचार पत्र कर्मियो के बारे में साफ़ लिखा है कि वेतन बोर्ड द्वारा सिफारिश की गयी परिवर्ती वेतन सभी कर्मचारियो के लिए मान्य न्यूनतम देय वेतन होगा। इसमे ठेका आधार पर कार्यरत सभी कर्मचारी शामिल होंगे और प्रबंधन इस बात के लिए स्वतन्त्र होगा कि वह समाचार प्रतिष्ठानों की लाभ प्रदत्ता तथा संवाहनियता के अनुसार किसी कर्मचारी को सिफारिश किये गए परिवर्तित वेतन से अधिक वेतन का भुगतान करे।

यानी साफ़ कहें तो मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ ठेका पर काम करने वाले सभी कर्मचारियों को भी मिलेगा। ऊपर बोर्ड की जगह कृपया बोर्डों पढ़े। किसी भी कंपनी को अपने स्थाई और अस्थाई दोनों कर्मचारियों की सूची श्रम आयुक्त कार्यालय को उपलब्ध कराना अनिवार्य रहता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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मजीठिया मांगा तो ‘पत्रिका’ ने कर दिया दामाद की दुकान पर ट्रांसफर, बाद में किया टर्मिनेट

भोपाल : देश में हिंदी के नामचीन अखबारो में एक राजस्थान पत्रिका में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगना भोपाल के एक कर्मचारी के मानसिक तनाव का कारण बन गया है। इस कर्मचारी ने राजस्थान पत्रिका के प्रबंधन के खिलाफ मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और भत्ते न देने पर माननीय सुप्रीमकोर्ट में शिकायत की थी। भोपाल के महेंद्र नारोलिया का आरोप है कि उन्होंने सुप्रीमकोर्ट में शिकायत करने के कारण उनका ट्रांसफर कोलकाता कर दिया गया। वह कोलकाता पहुंचे तो उन्हें राजस्थान पत्रिका के मालिक के दामाद की दुकान में काम पर लगा दिया गया। नरेंद्र का कहना है कि उनका 4 हजार रुपये वेतन भी कम कर दिया गया जिसके कारण वह मानसिक रूप से बीमार हो गए और वहां से वापस लौट आए।

आपको बता दें कि पत्रिका प्रबंधन द्वारा अपने मीडिया कर्मचारियों को प्रताड़ित किए जाने का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। यह तो सर्वविदित है कि अखबार मालिकान को न्यायालय का कतई खौफ नहीं है और वो किसी भी प्रकार से उन कर्मचारियों को जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस लगाया है, से मुक्ति पाना चाहते हैं। राजस्थान पत्रिका प्रबंधन इन्हीं कुत्सित चालों के तहत अब आंतरिक जांच अधिकारी नियुक्त कर उनकी फर्जी जांच रिपोर्टों के आधार पर कर्मचारियों को सेवा से मुक्त करने जा रहा है।

जब मामला सुप्रीम कोर्ट एवं श्रम न्यायालय में चल रहा हो तो ऐसी स्थिति में अपना जांच अधिकारी नियुक्त करना, बिना कर्मचारी के बयान लिए, कर्मचारी के आरोपों की जांच किए, बिना साक्ष्य लिए रिपोर्ट बनाकर सेवा से पृथक करना असंवैधानिक है। ऐसा नहीं है कि प्रबंधन इस संदर्भ में नहीं जानता हो परन्तु ऐसा करके वो कहीं ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वो भारत की न्याय व्यवस्था से उपर हैं। महेंद्र नारोलिया के अनुसार पत्रिका ने खुद की जाँच टीम बनाकर बिना मेरा स्टेटमेंट लिया मुझे टर्मिनेट करने का नोटिस भेज दिया है, जो पूरी तरह गलत है। आपको बतादें इसके पहले भी राजस्थान पत्रिका प्रबंधन पर आरोप लग चुका है कि वह अपने ही कर्मचारियों को प्लेसमेंट एजेंसी के हवाले कर मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ ना देने का बहाना खोज चुका है।

डीबी कार्प ने नहीं जमा किया श्रमायुक्त कार्यालय में कागजात, आरटीआई से हुआ खुलासा

मुंबई : जिद करो दुनिया बदलो का नारा देकर अपने ही कर्मचारियों का उत्पीड़न करने में बदनाम डीबी कोर्प अब मजीठिया वेज बोर्ड मामले में श्रमायुक्त कार्यालयों को भी सहयोग नहीं कर रहा है। मुम्बई में दैनिक भास्कर के प्रिंसपल करेस्पांडेंट धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने मुम्बई के श्रम आयुक्त कार्यालय में एक आरटीआई डालकर डीबी कोर्प द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड मामले में जमा कराये गए कागजातों की प्रमाणित प्रति मांगी तो ये खुलासा हुआ कि डीबी कोर्प ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में कोई भी कागजात श्रम आयुक्त कार्यालय में जमा नहीं कराया है। राज्य जान माहिती अधिकारी ने धर्मेन्द्र प्रताप सिंह को ये जानकारी उपलब्ध कराई है। आपको बता दें कि मुम्बई के श्रम आयुक्त कार्यालय ने डीबी कार्प का अब तक सर्वे भी नहीं किया है। अब देखना है कि श्रम आयुक्त कार्यालय डीबी कार्प के खिलाफ दस्तावेज न देने के मामले में क्या कार्रवाई करता है।

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9422511335

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मजीठिया : सुप्रीम कोर्ट ने सही नब्ज पकड़ा है, यूपी-उत्तराखंड वालों के लिए आखिरी मौका, जानिए कैसे किया जाता है क्लेम

शशिकांत सिंह

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जुलाई को माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश से देश भर के बेईमान श्रम आयुक्तों का उल्टा लटकना तय है। कितनी बार श्रम आयुक्तों को माननीय सुप्रीमकोर्ट ने साफ़ निर्देश दिया था कि आप स्टेटस रिपोर्ट भेजें। स्टेटस रिपोर्ट भेजी भी गयी श्रम आयुक्त कार्यालयों द्वारा लेकिन वही ढाक के तीन पात। दो-दो बार रिपोर्ट भेजी गयी लेकिन हर बार आंकड़ों का खेल किया गया। हर बार उल्टे आंकड़े दिए गए।

एक बार एक समाचार पत्र में 600 कर्मचारी और अगली बार उसी समाचार पत्र में सिर्फ 200 कर्मचारी। ऐसे ही आकड़ों के खेल और रिपोर्ट भेजने में हुए फर्जीवाड़े से गुस्साए माननीय सुप्रीमकोर्ट ने अब पांच-पांच राज्यों के श्रम आयुक्तों को बुलाने का फैसला किया है। 23 अगस्त को यूपी उत्तराखंड और नार्थ इस्ट के तीन प्रदेशों समेत कुल पांच प्रदेशों के श्रमायुक्तों को तलब किया है। आगे भी पांच-पांच करके दूसरे सभी प्रदेशों के श्रम आयुक्तों को तलब किया जायेगा। अब अगर इन श्रम आयुक्तों को सुप्रीमकोर्ट ने फटकार लगा दिया है तो ये अपनी नौकरी बचाने के लिए ईमानदारी से समाचारपत्र कर्मियों का साथ देंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।

जिन समाचारपत्र कर्मियों ने अब तक अपनी शिकायत सुप्रीमकोर्ट या श्रमायुक्त कार्यालय में नहीं लगाया है वे अब जरूर लगाएं क्योंकि श्रम आयुक्त पूरी रिपोर्ट लेकर ही माननीय सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। आधी रिपोर्ट लेकर जाने की उनकी हिम्मत भी नहीं पड़ेगी। जिन लोगों का ट्रांसफर दूसरे राज्यों में हुआ है वे वहाँ चाहें तो ज्वाइन करें और जिस राज्य में ट्रान्सफर किया गया है वहाँ जाकर वहाँ के श्रम आयुक्त कार्यालय में शिकायत करें।

लोहा गरम है, मारिए हथौड़ा

दोस्तों, आपको बता दूं कुछ दिन पहले सुप्रीमकोर्ट में इस मामले में पत्रकारों के एडवोकेट उमेश शर्मा जी ने चीफ सेक्रेटरी के नाम एक लेटर भी भड़ास पर जारी किया था। आप उसे भरें और उसकी एक कॉपी श्रम आयुक्त को भी भेजें। इस पत्र में साफ़ लिखा गया है कि अगर मजीठिया मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का पालन नहीं हुआ तो राज्य के चीफ सेक्रेटरी और श्रम आयुक्त के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट की अवमानना का मामला दाखिल कराया जायेगा। महाराष्ट्र में मेरे परिचित 7 साथियों ने उमेश शर्मा जी के इस पत्र को भरकर राज्य के चीफ सेक्रेटरी और श्रम आयुक्त को मेल और स्पीड पोस्ट से भेजा। चीफ सेक्रेटरी ने इस पत्र पर तुरंत कार्रवाई का आदेश सम्बंधित विभाग को भेजा और शिकायतकर्ताओं को मेल से अवगत भी कराया। साथियों एक बार फिर कहूँगा, लोहा गरम है, मार दो हथौड़ा। आप सिर्फ क्लेम कीजिये और चीफ सेक्रेटरी व श्रम आयुक्त को वार्निग लेटर भेजिए।

कैसे करें क्लेम

क्लेम करने के मामले में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मीडियाकर्मियों के लिए अब आखिरी मौका है। 23 अगस्त को इन दो राज्यों के श्रमायुक्तों को सुप्रीम कोर्ट ने तलब किया है। इसके पहले ही इन राज्यों के बाकी बचे मीडियाकर्मियों को भी क्लेम फाइल कर देना चाहिए ताकि लेबर डिपार्टमेंट सक्रिय होकर उन्हें लाखों रुपये का उनका हक एरियर आदि दिला सके। मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अब भी कई साथी क्लेम करना चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं क्लेम कैसे करें। आपको आसानी हो, इसके लिए बता रहा हूँ।

प्वाइंट एक : आप अपनी कंपनी का 2007-8, 8-9 और 9-10 का टर्नओवर निकलवायें। ये टर्नओवर, अगर आपकी कंपनी शेयर मार्किट में लिस्टेड है, जैसे डी बी कोर्प, तो आपको सेबी की साइट से इसकी जानकारी मिल जायेगी। नहीं लिस्टेड है तो आप किसी सीए की मदद लीजिये। आपकी कंपनी का पैन और टिन नंबर आपको मिलने वाले फ़ार्म16 में होगा। इसमे ये देखिये की आपकी कम्पनी की और कितनी कंपनियां उस समय तक थीं और बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में कौन-कौन था। एक ही छत के नीचे या आसपास के शहरों में एक ही मालिक की कई कम्पनियाँ हैं तो उन्हें एकल इकाई ही माना जायेगा।

प्वाइंट दो : टर्नओवर निकालने के बाद आप देखिये कि आपकी कंपनी कौन-सी ग्रेड में है। उसके बाद किसी सीए को अपना 2008 से अब तक का हर साल का एक-एक सेलरी स्लिप दिखाइए।

प्वाइंट तीन :  सीए को बोलिये 2008 से 2010 तक के पेमेंट पर मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक़ 30 प्रतिशत अंतरिम राहत लगाए। 11 नवम्बर 2011 से अब तक का मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक़ एरियर लगाए। अंतरिम और एरियर दोनों पर ब्याज भी लगवाएं। उसके बाद अपना वेतन निधारित करवा लें।

सीए का काम होने के बाद उनसे मुहर लगवा लें। इसे फोटोस्टेट कराएं और एडवोकेट उमेश सर से या किसी वकील से मिलकर एक क्लेम फ़ार्म तैयार कराएं और श्रम आयुक्त कार्यालय व सुप्रीमकोर्ट में क्लेम करवायें। इस क्लेम में अगर आप 10 साल से ज्यादा समय से एक ही प्रतिष्ठान में काम कर रहे हैं तो एक प्रमोशन और 20 साल से काम कर रहे हैं तो 2 प्रमोशन की भी डिमांड करें।

मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह से संपर्क 9322411335 के जरिए किया जा सकता है.

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