पता होता तो लेख देने से पहले मैं ‘तहलका’ का पंचनामा कर डालता

कुछ माह पहले एक केस के सिलसिले में पत्रकारों के कानूनी अधिकार पर अधिवक्‍ता कोलिन गोंजाल्विस के एनजीओ एचआरएलएन में बैठक हुई। बैठक में मीडिया और पत्रकारों की आज़ादी व कानून पर एक राष्‍ट्रीय सेमिनार की परिकल्‍पना बनी। एक संगठन बनाने का आइडिया आया। दो दिन का वह प्रस्‍तावित राष्‍ट्रीय सेमिनार गत दिवस ही खत्‍म हुआ। रायसीना के जंगल में मोर नाच लिया। किसी ने नहीं देखा। जिन्‍होंने देखा, उनमें इक्‍का-दुक्‍का को छोड़ कोई किसी को नहीं जानता। 

केंद्र सरकार ने मीडिया को दिए 998 करोड़ से ज्यादा के विज्ञापन

दिल्ली : नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने अब तक के कार्यकाल में मीडिया के लिए विज्ञापनों पर 998.34 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। 

निगेटिव रिपोर्टिंग होने पर रोहतक पीजीआई में मीडिया की एंट्री बैन

रोहतक : हेल्थ यूनिवर्सिटी और पीजीआई प्रशासन ने मीडिया की एंट्री पर पूर्ण रूप से बैन लगा दिया है। प्रशासन ने संस्थान की निगेटिव रिपोर्टिंग होने के चलते यह निर्णय लिया है।

भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सरकार की मर्जी पर !

यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि आज भारतीय मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने लिए निर्धारित मानदंडों और आचरण संहिता को भूलकर किसी न किसी राजनीतिक दल का अनुयायी या उग्र राष्ट्रवादी संगठनों की तरह व्यवहार करने लगा है। एंकर चीख चीख कर अशोभन लहजे में अपनी परम देश निष्ठा का परिचय दे रहे हैं। अपने अलावा किसी और को बोलने का मौका वे नहीं देना चाहते। खबरों का प्रसारण यहां राजनीतिक मंतव्यों के तहत हो रहा है। 

मारे जा रहे पत्रकारों की हृदयविदारक खबरों के बीच मीडिया और सत्ता के अश्लील लेन-देन

जब-जब इस देश में चुनाव का मौसम आता है निजी कंपनियों के दफ्तरों से बजबजाते नोएडा में तमाम नए समाचार चैनल कुकरमुत्ते की तरह पनपने लगते हैं. इन चैनलों का एकमात्र उद्देश्य चुनाव के समय पैसा बटोर कर बंद हो जाना होता है।

मीडिया एस्‍थेटिक्‍स : ‘लेने’ और ‘देने’ पर केंद्रित कर दिया राधे मां से बातचीत

मुझे रह-रह कर लगता रहा है कि यह देश अद्भुत है। इस अद्भुत देश में ”राधे मां” नाम की एक अद्भुत महिला के कथित कानूनी अपराध को मीडिया ने जिस तरह से एस्‍थेटिक्‍स के सवाल में तब्‍दील कर डाला है, वह भी अद्भुत है।

आतंक के खेल में एक मासूम के जिंदा पकड़े जाने का मीडिया टेरर

कुछ मित्रों ने जिंदा पकड़े गए आतंकवादी यानी कसब पर मेरी राय जाननी चाही है. मैंने मना किया तो कहने लगे कि लिखने से डरते हैं. अब ये हाल भी नहीं है कि कोई मुझे कुछ कहकर उकसा ले. पर अगर आप सुनना ही चाहते हैं तो लीजिए सुनिए….

लो, कर लो जी साढ़े आठ करोड़ वाली ‘मन की बात’, मोदी मेहरबान तो मीडिया पहलवान

वाह रे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, ऐसी कौन सी बात कर देते हैं कि सरकारी खजाने को उसे सुनने पर इस तरह न्योछावर कर दिया जा रहा है। पता चला है कि ‘मन की बात’ का सबसे ज्यादा मजा मीडिया लूट रहा है। केंद्र सरकार इस रेडियो कार्यक्रम के प्रचार प्रसार के लिए अब तक साढ़े आठ करोड़ रुपए फूंक चुकी है। इस कारस्तानी को आरटीआई के जरिए सार्वजनिक किया है आम आदमी पार्टी के मीडिया संयोजक मुल्कराज आनंद ने। 

मीडिया भी उसकी अंगुलियों पर नाच रहा

यह ‘सुपर पंच’ है! ‘मैं हिंदुओं को मारने आया था… मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है…!’ तमाम खबरों के माथे पर बैठे इस हेडिंग ने एक झटके में वह काम कर दिया, जो पिछले कई दिनों से लगातार कभी अचानक कलाम की मौत का संयोग तो उसके बरक्स सचेतन कभी याकूब को फांसी, कभी डीएनए तो कभी पोर्न जैसे शिगूफ़ों की कूथम-कुत्था नहीं कर पा रही थी…! अब ललित-गेट क्या था… व्यापमं का व्यापक घोटाला क्या था… जाति जनगणना का सवाल कहां गया… इन सब सवालों को गहरी नींद में सुला दिया जा चुका है…!

‘मजीठिया’ पर पीएम की चुप्‍पी कर्मचारियों का खून पीने वाले मीडिया मालिकों के पक्ष में

DNA या यूं कहें Deoxyribonucleic acid, the molecule that carries genetic information about all living. अर्थात डीएनए वह अणु है जो सभी जीवधारियों की आनुवंशिक सूचनाओं का संवहन करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के बारे में डीएनए खराब होने की टिप्‍पणी करके एक नई बहस को हवा दे दी है। लेकिन अब तक प्रधानमंत्री ने जिन हरकतों को अंजाम दिया है, उससे उनका भी डीएनए सवालों के घेरे में आ गया है। वह अपने को चाय वाला बता कर गरीबों से निकटता का प्रदर्शन भले ही करें, लेकिन उनके डीएनए में गरीब विरोधी और कारपोरेट समर्थक व्‍यक्ति की पहचान उभर कर सामने आई है। यह अलग बात है कि उनके मनसूबों पर लगातार पानी फिर रहा है।

सहारा मीडिया दस साल के लीज पर विदेशी कंपनी के हवाले, पहली सितंबर से चार्ज संभालेगी

राष्ट्रीय सहारा ग्रुप प्रबंधन ने अपना पूरा मीडिया तंत्र पहली सितंबर से विदेशी कंपनी की साझेदारी में संचालित करने का निर्णय लिया है। अब सहारा मीडिया में उस कंपनी की 15 प्रतिशत और सहारा की 85 प्रतिशत साझेदारी होगी। मीडिया कर्मियों की सैलरी भी अब उसी कंपनी के माध्यम से जारी होगी। पता चला है कि इस हाई प्रोफाइल डील में सहारा उर्दू दिल्ली के ग्रुप एडिटर फैजल का हाथ रहा है। कंपनी के चेयरमैं सुव्रतो रॉय ने अपने शीर्ष अधिकारियों तक से कहा है कि तकनीकी कराणों से कंपनी का नाम अभी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। वह कंपनी कौन सी है, इसको लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। 

जयप्रकाश त्रिपाठी की पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ को ‘बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार’

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से आज वर्ष 2014 में प्रकाशित पुस्तकों पर सम्मान एवं पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई। इसके अंतर्गत संस्थान ने पत्रकारित पर केंद्रित पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ को ‘बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

मीडिया को नींद नहीं आई रात भर, चलता रहा ‘फांसी’ लाइव

ऐसा शायद पहली बार रहा, या कह सकते हैं मुंबई अटैक जैसा ही कमोबेश। याकूब मेमन की फांसी की रात। जो सो चुके थे, उन्हें सुबह पता चला होगा लेकिन पूरी रात मीडिया का ‘फांसी’ लाइव चलता रहा देश की राजधानी से नागपुर जेल तक। सुप्रीम कोर्ट भी शायद पहली बार इस तरह जागा और एक मनहूस सुबह याकूब के आखिरी दम की खबरें ले उड़ी देश-दुनिया भर में…। 

इतनी घटिया हरकत से भी बाज नहीं आ रहा घबराया हुआ जागरण प्रबंधन

जागरण कर्मियों की एकजुटता से घबराया हुआ प्रबंधन कितनी गिरी हुई हरकत कर सकता है। इसका एक सटीक उदाहरण हाल ही में सामने आया है। 

मजीठिया वेतनमान : दैनिक जागरण के मीडिया कर्मी भर रहे प्रपत्र-सी, आप क्‍यों रहें पीछे !

दैनिक जागरण के स्‍थायी, अनुबंधकर्मी और अंशकालिक मीडिया कर्मियों ने प्रपत्र-सी को भर लिया है और जो रह गए हैं, वह भी इन्‍हें जल्‍द ही भरने जा रहे हैं। ऐसे में अन्य अखबारों के मीडिया कर्मी पीछे क्‍यों रह रहे हैं। यदि किसी के पास प्रपत्र-सी नहीं है तो जल्‍द इसे साइट से डाउनलोड कर ले। नहीं तो जागरण के साथियों से संपर्क करे, वे मदद करेंगे। यदि जागरण छोड़ने के बाद किसी अन्‍य संस्‍थान में कार्य कर रहे हैं तो भी प्रपत्र-सी को भरने के लिए पुराने सहयोगियों से संपर्क कर सकते हैं।

उत्तराखंड : एक भ्रष्ट अफसर का आखिरी वक्त तक गुणगान करता रहा बेशर्म मीडिया

उत्तराखण्ड के 15 साल बता रहे हैं कि उसे अपना समझने की हिमाकत न तो राज्य सत्ता ने की है और न ही नौकरशाहों ने। सब ने उसे खाला का घर बना दिया है। जहां, जब तक डट सकते हो, डटे रहो। एक मुख्य सचिव बी आर एस के नाम पर सूचना आयुक्त बन 5 साल का जुगाड़ कर लेता है, तब दूसरा आता है और फिर तीसरा, संघर्ष और शहादतों से लिए राज्य में ये तमाशा क्या है?

असिस्टेंट प्रोफेसर-प्रिंट मीडिया की नियुक्ति में मनमानी पर मंत्रालय ने किया जवाब तलब

भड़ास पर छपी खबर का असर : राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान नई दिल्ली नई में गत 25 जून को हुए सहायक आचार्य प्रिंट मीडिया के चयन में मनमानी पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने यहां के निदेशक से जवाब तलब किया है। इस पद के लिए इंटरनल कैंडिडेट को विशेष लाभ देते हुए उसे स्क्रीनिंग एवं चयन सूची में प्रथम स्थान पर रखने एवं नियुक्ति सूची में प्रथम रैंक पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव ने स्पष्टीकरण मांगा है। इस पद के लिए पहले से ही संभावना जताई जा रही है कि संस्थान के निदेशक ने निजी लाभ के लिए ऐसे अभ्यर्थी का चयन कराया है जो ओबीसी श्रेणी की अर्हता पूरी नहीं करता है और उसकी शैक्षिक योग्यता भी संदिग्ध है।

झाबुआ में चिकित्सा-विमर्श : मीडिया को मेडिकल से क्या काम, सेहत से खेल रहे अस्पताल

झाबुआ : कंठ तक भ्रष्टाचार में डूबी देश की चिकित्सा व्यवस्था और उसके प्रति नितांत अगंभीर कारपोरेट मीडिया घरानों ने करोड़ो-करोड़ परेशानहाल लोगों से अपनी चिंताएं पूरी तरह हटा ली हैं। संसाधनहीन लोगों और गरीबों के प्रति जैसी उदासीनता सरकारी और प्राइवेट चिकित्सा संस्थान बरत रहे हैं, वही हाल खुद को चौथा खंभा कहने वाला मीडिया का भी है। प्रायः लगता है कि जैसे, देश की पूरी चिकित्सा व्यवस्था पैसे के भूखे इन गिरोहबाजों के चंगुल में फंस गई है। मीडिया घराने चिकित्सा क्षेत्र के विज्ञापनों को लेकर जितने आकुल-व्याकुल दिखते हैं, काश उतना आग्रह परेशान और असहाय मरीजों की मुश्किलों पर भी होता।  

मीडिया का आपातकाल : उजाले के भीतर छिपा है गहन अंधेरा

पहले थोड़ा आपातकाल की यादें ताजा कर दूं। आपातकाल के दौरान एक कविता लिखी गई, ठेठ अवधी में- माई आन्‍हर बाबू आन्‍हर, हमे छोड़ कुल भाई आन्‍हर, केके केके दिया देखाईं, बिजली एस भौजाई आन्‍हर…. यह कविता यदि आप नहीं समझ पा रहे हैं तो इसका अर्थ भी बता देता हूं। मां अंधी है, पिता अंधे हैं। भाई भी अंधे हैं। किसको किसको दीपक दिखाऊं, बिजली की तरह चमक दमक वाली भाभी भी तो अंधी हैं। आपातकाल के दौरान इस कविता में निहित लक्षणा, व्‍यंजना मोटी बुद्धि के लोगों की समझ में नहीं आई और कवि का कुछ बुरा नहीं हुआ।

मैं बड़ा चापलूस टाइप का व्‍यक्ति था

फेसबुक पर मैं जैसा दिखता हूं, वैसा हूं नहीं। मैं बड़ा चापलूस टाइप का व्‍यक्ति हुआ करता था। अनायास ही किसी मतलब के व्‍यक्ति की तारीफ कर देना मेरी आदत में शुमार था। लेकिन मेरी इस चापलूसी से मुझे कोई लाभ नहीं मिला। कारण। चापलूसी की कला इतनी विकसित हो चुकी थी कि वहां मेरे लिए कोई स्‍पेस नहीं रह गया था।

एचटी मीडिया की शुद्ध कमाई में इजाफा

हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लि. (एचएमवीएल) का एकल आधार पर शुद्ध लाभ चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 23.11 प्रतिशत बढ़कर 41.71 करोड़ रुपये रहा।

मुलायम-अमिताभ प्रकरण : दैनिक हिन्‍दुस्‍तान लखनऊ ने पहली खबर दबा दिया, दूसरी खिलाफ खबर छाप दिया!

अच्‍छा, इस हालत को क्‍या कहा-माना जाए कि एक खबर को दबा लिया गया है। इतना ही नहीं, इस असल खबर से जुड़ी एक दूसरी खबर उस खबर के खिलाफ छाप दी गयी। इतना भी होता तो बर्दाश्‍त कर लिया जाता। सम्‍पादक ने उससे जुड़ा एक साक्षात्‍कार छाप दिया है। सम्‍पादक है। यह कमाल किया है दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के सम्‍पादक केके उपाध्‍याय ने। अरे जनाब, यह करने से पहले आप जरा इतना तो सोच लेते कि आप सम्‍पादन कर रहे हैं या तेल-चटाई का धन्‍धा खोले बैठे हैं। 

वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर

पत्रकार साथियों कायर न बनो, भागो नहीं, मीडिया को बदलो, ताकत का एहसास कराओ

प्रिय पत्रकार साथियों, आए दिन सुना जा रहा है कि मीडिया प्रबन्धन या संपादकों की मोनोपोली के चलते हमारे साथी त्याग पत्र देकर भाग रहे हैं। युद्ध क्षेत्र से भागना कायरता है और कायर व बुजदिल सैनिक को सम्मान नहीं मिलता बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी को भी समाज के अपमान का सामना करना पड़ता है। हमारे साथी जिस समस्या से आजिज आकर त्याग पत्र देकर मीडिया से दूर होना चाहते हैं, क्या वे मीडिया से दूर रह कर अपने न्याय की लड़ाई लड़ सकते हैं? 

केजरीवाल सरकार ने मीडिया पर कार्रवाई का सर्कुलर वापस लिया

नई दिल्‍ली : एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के मुताबिक केजरीवाल सरकार ने मीडिया संगठनों के खिलाफ मानहानि के मामले दायर करने संबंधी विवादास्पद सर्कुलर को वापस ले लिया है। केजरीवाल के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से जारी सर्कुलर पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थगनादेश दे दिया था। सर्कुलर वापस लेने का फैसला लगभग दो महीने बाद आया है।

व्यापमं : वामदलों का प्रदर्शन आज, किसी पर भरोसा नहीं, चौथे खम्भे को देंगे ज्ञापन

बादल सरोज : चार वामपंथी दलों के साझे आव्हान पर 8 जुलाई को व्यापमं के मुख्यालय पर एक प्रदर्शन किया जाएगा। इस प्रदर्शन के जरिये जो मानें उठायी जाएंगी उनमे प्रदेश को मौतों की महामारी से बचाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के तत्काल इस्तीफा देने , मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच कराने , एसआईटी और एसटीएफ की भी जांच कर यह पता लगाने कि उन्होंने कितने सबूत मिटाकर किन किन को बचाया है, शामिल हैं। 

स्त्री विमर्श के बहाने….वाह रे मीडिया, तो तू इसलिए भांड कहलाता है !

कुछ दिनों पहले अमरीकी मीडिया सहित गॉसिप पिपासु अंतरराष्ट्रीय मीडिया को एक खास खबर हाथ लग गई। ऑलंपियन ब्रूस जेनर ने अपना लिंग परिवर्तन करा महिला होकर विश्व को दिखा दिया। ब्रूस जेनर कीपींग अप विद कर्देशियन रियलिटी धारावाहिक की सोशलाइट किम कर्देशियन के स्टेप पिता हैं। उनकी पत्नी क्रिस जेनर को तीन सितारा पुत्रियां – कर्टनी, किम और क्लोय हैं, जबकि उनके साथ उनकी दो पुत्रियां कायली, केंडल हैं। खास बात यह है कि बकौल ब्रूस यह निर्णय काफी कठिन था और वे बचपन से ही महिला बनना चाहते थे।विदेशी मीडिया उनके रोते – भावुक होकर कहानी कहने के इंटरव्यू लेने में जुट गया… मेरे मन में आया कि अगर ये बूढ़ऊ मेरे सामने पड़ जाए तो दो चप्पल की मारूं….. बूढ़ऊ, जिंदगी भर पूरे मजे लूट लेने के बाद तुझे सठिया उमर में यह करामात सूझी है। और कुछ नहीं बचा था?? करावाना था तो बाली उमर में ही क्यों न कराया, कईंयों का भला होता वहां,… पांच युवा पुत्रियों और एक पुत्र का पिता होकर अब नाना बनने के बाद तेरे ये खयालात उड़ने लगे…(मुझे शांत होना चाहिए क्योंकि ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं। आप के अलग हो सकते हैं)

पहले चित्र में ब्रूस जेनर लिंग परिवर्तन के बाद, दूसरे चित्र में अपनी बॉलोजिकल पुत्रियों के साथ 

अक्षय पर बाय लाइन पाने की होड़ में व्यापमं और मीडिया का सच

जयदीप कर्णिक : मैं अक्षय सिंह को नहीं जानता। ऐसे ही मैं निर्भया, आरुषि और जेसिका लाल को भी नहीं जानता था। मैं तो तेजस्वी तेस्कर को भी नहीं जानता। इन सबमें क्या समानता है? और इस सबका राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म रंग दे बसंती से क्या लेना-देना है? अगर आपने फिल्म देखी है और पिछले दो दिन में अचानक व्यापमं घोटाले को मिली राष्ट्रव्यापी कवरेज को आप देख रहे हैं तो आप ख़ुद ही तार आपस में जोड़ लेंगे।

मीडिया संस्थानों में चुपचाप चल रहा ‘व्यापम’ जैसा घिनौना खेल

इन दिनों देशभर में ‘व्यापम’ भर्ती घोटाले पर बवाल मचा है। ये घोटाला अपने नज़दीकी, रिश्तेदार या अयोग्य लोगों को धनबल के आधार पर सरकारी नौकरियों और मेडिकल-इंजीनियरिंग में प्रवेश दिलाने का है। घोटाले के उजागर होने के बाद से ही देशभर में मानो भूचाल आ गया है। ऐसे में मीडिया संस्थानों के आंतरिक भर्ती-भ्रष्टाचार पर कहावत याद आती है कि जिसके घर शीशे के होते हैं, पत्थरों से वैर नहीं पालता। बीते दिनों डीडी न्यूज़ में 10-12 पदों के लिए 500 से ज़्यादा अनुभवी पत्रकारों की भर्ती परीक्षा आयोजित की गयी थी, जिसके पैटर्न की सूचना प्रकाशित करना भी प्रसार भारती ने उचित नहीं समझा। राज्यसभा टीवी ने अयोग्य लोगों को भर्ती करने का अभियान जारी रखा हुआ है। इन भर्ती परीक्षाओं में ओएमआर शीट का इस्तेमाल न किये जाने, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता संदिग्ध होने सहित कईं खामियां देखी गयीं जो व्यापम की तर्ज पर घोटाले की तरफ इशारा करती हैं। निजी मीडिया संस्थानों में तो और भी बुरे हाल हैं। ताज़ा मामला देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान होने का दावा करने वाले ज़ी न्यूज़ समूह का है। आज तक, इण्डिया टीवी से लेकर एनडी टीवी और न्यूज़ नेशन से लेकर न्यूज़ 24 तक ऐसा कोई मीडिया संस्थान नहीं जो हायर एन्ड फायर का घिनौना खेल खेल कर हज़ारों होनहार पत्रकारों का भविष्य तबाह करने की इस दौड़ में शामिल न हो। 

नई दुनिया के मालिक रहे अभय छजलानी खेल संगठनों के नाम पर कमा रहे किराया

मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल में विभिन्न समाचार पत्रों को अनेक तरह से उपकृत किया था। इसी का एक उदाहरण है इंदौर के अपने समय के प्रतिष्ठित समाचार पत्र नईदुनिया के प्रधान संपादक रहे अभय छजलानी को बेशकीमती और पॉश इलाके रेसकोर्स रोड पर खेल संगठन बनाने के नाम पर उपकृत किया जाना। जानकारी के खेल गतिविधियों के नाम पर इंदौर के खेल संगठन सरकार से रियायती जमीनें लेकर उनका व्यावसायिक उपयोग करके अपनी जेब भर रहे हैं। 

कोर मीडिया और सोशल मीडिया में बेहतर तालमेल पर जोर

रायपुर (छत्तीसगढ़) : न्यू सर्किट हाउस में समन्वय संस्था की कार्यशाला में कोर मीडिया और सोशल मीडिया के बीच बेहतर तालमेल और दोनों में गुणात्मक सुधार पर चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समानांतर एक और मीडिया शैली का विकास पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुआ है। आम लोगों द्वारा संचालित इस नई मीडिया शैली को सोशल मीडिया कहा जाता है। बहुत से सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और पत्रकारों की राय है कि इन दोनों माध्यमों में यदि बेहतर समन्वय हो तो मीडिया और मजबूती के साथ समाज के लिए काम कर सकेगा।