काहे का हैप्पी न्यू इयर : पृथ्वी ने सूरज का एक पूरा चक्कर लगा लिया, हम जहां से चले थे, वहीं आ गए

Nadim S. Akhter :   वैसे कोई साल पुराना या नया नहीं होता. हममें से किसी को नहीं मालूम कि ब्रह्मांड में महाविस्फोट के बाद (अब तक की प्रचलित थ्योरी के मुताबिक) पृथ्वी नाम का यह ग्रह कब अंडाकार हुआ, कब इसके अपनी धुरी पर व सूर्य के चारों ओर घूमने की गति स्थिर हुई (जैसा कि आज है) और फिर यहां पनपी मानव सभ्यता ने अपनी-अपनी सुविधा के मुताबिक दिन-महीने और साल जैसे जुमले गढ़ दिए ताकि जीवन-समय-काल को व्यवस्थित होकर देखा जा सके.

लेकिन अंग्रेजी के जिस कैलेंडर के मुताबिक पूरी दुनिया आज चल रही है और नए-पुराने साल का हिसाब लगा रही है, उसी समय अलग-अलग मजहबों-सभ्यताओं के कैलेण्डर भी अपने हिसाब से चल रहे हैं. हिन्दुओं का कैलेंडर व नया साल अलग है, मुस्लिमों का अलग, चीनियों का अलग, रोम वालों-अफ्रीकियों का अलग. कई सभ्यताएं-धर्म आज भी अपने हिसाब से नया साल मनाते हैं. लेकिन पूरी दुनिया को एक सूत्र में बांधकर सर्वमान्य बन चुका अंग्रेजी का जनवरी-दिसंबर वाला कैलेंडटर ही ऐसा है, जिसमें घड़ी की टिक-टिक जब 31 जनवरी को रात के 12 बजने का मार्का छूती है, पूरी दुनिया जोश में डूब जाती है. कहती है नया साल आ गया. मुबारक-बधाई.

ये भी अजब है कि नए साल के जश्न की शुरुआत भी पूरी दुनिया में एक साथ नहीं होती. जापान में हमसे पहले लोग रात के 12 बजा लेते हैं और सऊदी अरब, ईरान, ब्रिटेन-जर्मनी में हमारे बाद रात के 12 बजते हैं. लेकिन नए साल के जश्न का बाजा सब बजाते हैं, पूरे जोश से. ये भी सोचता हूं कि पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में जहां दिन और रात की लंबाई 24 घंटों के खांचों में नहीं बंटी होती और जहां महीनों सूरज लगातार या तो चमकता रहता है (दिन होता है) या फिर महीनों गुल रहता है (रात होती है), वहां रहने वाले प्राणी नए साल का हिसाब कैसे लगाते होंगे???!! क्या ग्लोबल सिटिजन बनकर उनको भी हमारी 24 घंटे वाली दिन-रात-महीने-साल की थ्योरी अपना लेनी चाहिए या फिर अपनी हिसाब से नई थ्योरी गढ़कर नए साल के जश्न का वक्त हमसे अलग कर लेना चाहिए कि नहीं-नहीं, अभी तो यहां इतना कम दिन हुआ. 365 दिन बीतने में तो बहुत टाइम बाकी है टाइप से..!!

विज्ञान की नजर से देखें तो 365 दिन और कुछ घंटों का मतलब ये होता है कि हमारी पृथ्वी ने गजब की स्पीड से अपनी धुरी पर घूमते हुए अपने तारे यानी सूरज का एक चक्कर लगा लिया है. यानी जहां से पृथ्वी चली थी, अंतरिक्ष में ठीक उसी बिन्दु पर पुनः आ गई है. लेकिन इसमें भी छेद हैं. अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि अपनी कक्षा में घूमते हुए पृथ्वी ठीक उसी जगह पहुंची या नहीं, इसमें EROOR हो सकता है. तीन आयामों में देखकर पुथ्वी की exact position अपने पहले और बाद वाली जगह पर बता पाना इतना आसान भी नहीं.

लेकिन इतनी technicality वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दीजिए. मोटा-मोटी बात ये है कि एक साल बीत गया, माने पृथ्वी ने सूरज का एक पूरा चक्कर लगा लिया और हम जहां से चले थे, घूमकर वहीं वापस आ गए हैं. फिर क्यों ये कह रहे हैं कि नया साल आ गया??!! किसी नई जगह तो पहुंचे नहीं?? हां, बस ये बताने की कोशिश भर है कि जिस ब्रह्मांड की उम्र अरबों वर्ष है, हमने वहां पृथ्वी पर इतने महीने गुजार लिए. अच्छा है, लगे रहिए. नए साल का Agenda बनाइए, तय कीजिए और उस पर लग जाइए.

इसी बहाने कुछ नया करने की उम्मीद तो जगती है. कुछ खाब तो पैदा होते हैं. कुछ गलतियों को ना दोहराने की कसमें तो खाते हैं. एक दिन का जश्न तो मनाते हैं. इतिहास को नई तारीख और साल तो मिलते हैं हिसाब-किताब करने के लिए. तो पृथ्वी का वासी होने के नाते मेरी तरफ से भी आप-सब को नए साल की हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं और best wishes. सिर्फ एक बात का ख्याल रखिएगा कि किसी का दिल मत दुखाइएगा. बाकी सब तो मोहमाया है. जय हो. Happy New Year 2014!!!

लेखक नदीम एस. अख्तर प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

DUJ welcomes Madras High Court Order on New Generation TV journalists

This is perhaps the first time in Indian journalism history that a broadcast media organisation has been forced by a court order from laying off or forcing a pay-cut on employees. In a joint statement of DUJ President Sujata Madhok and General Secretary S.K.Pande said…

“A single judge-bench led by justice KBK Vasuki of the Madras High Court has restrained the Chennai-based media house – New Generation Media Corporation from either retrenching staff or effecting a proposed 50 percent pay cut from January 1st, 2014. The judge issued notices to both the company and the Tamil Nadu government on a petition jointly filed by nearly 80 percent of the employees of the English News division”.

DUJ congratulates the struggling staff and recognizes the significance of this  order. We hope that this could finally start the process of protecting  TV employees of rights denied to them  It expresses solidarity with their counterparts in Delhi also.

PRESS RELEASE

नया साल और यशवंत : हे 2014, मेरे में भागने का साहस भर देना…

रुटीन है कि 31 दिसंबर को कोई शपथ ली जाए, प्रतिज्ञा किया जाए, नया इरादा बनाया व बताया जाए .. और ये रुटीन अच्छा है क्योंकि यह रुटीन साल भर में एक बार आता है… अपन कोई संविधान या कानून की किताब या कोर्ट या पुलिस या सरकारी सिस्टम तो हैं नहीं कि पलट कर देखने की मजबूरी पालें कि पिछले पिछले 31 दिसंबरों में क्या क्या कसमें खाई था और उसमें कितनों पर कब तक अमल करता रहा, नहीं करता रहा, अडिग रहा, विफल रहा… सो, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेहु..

अब तक की सारी गंदी बातों, अच्छी बातों, बड़ी बातों, छोटी बातों और इन गंदी अच्छी बड़ी छोटी के मध्य की बातों को विदा, अलविदा… उस पर सोचने, बताने, जानने के लिए वक्त लगाकर वक्त नहीं जाया करना…

छोड़ने-पकड़ने (दारू, नानवेज, गाली, हिंसा, सेवा, झूठ, मदद, तरक्की, नौकरी, शहर, साथी, प्रेम, प्रेमिका….) वाली कसमें खाने की उम्र नहीं रही.. लगने लगा है कि ये सब दुनियादार किस्म के बच्चों, किशोरों, युवाओं का काम है… अपन तो असामाजिक, अव्यवस्थित, अशिष्ट किस्म के मानवेतर जीव हैं जो मनुष्यों की भीड़ में असहज महसूस करता है और अन्य प्राणियों वनस्पतियों चीजों जगहों स्थितियों में बेहद खिलंदड़, सहज और फ्रेंडली… तो फिर अब क्या किया जाए इस इकतीस दिसंबर को… कैसी कसम खाई जाए आज के दिन… ???

चलिए, वह कहता हूं जो दिल दिमाग में चल रहा है काफी दिनों से… मैं भाग जाना चाहता हूं.. कहां, कब, किसलिए, क्यों, कैसे… ये सब कुछ नहीं पता… बस, चुपचाप चला जाना चाहता हूं उन सबसे दूर जिनसे बहुत गहरा परिचय है.. वो चाहे कोई ब्रांड हो या कोई रिश्ता हो या कोई चीज हो… मैं तोड़ देना चाहता हूं संबंधों का वह पुल जिस पर चलकर जबरन हम बेहद करीब, बेहद अपना, बेहद निजी टाइप चीजें बना बता घोषित कर देते हैं… मैं अक्सर सपने में या अधखुली नींद में पंछी, पेड़, पहाड़, पानी में तब्दील हो जाता हूं और खुश रहता हूं… मैं देखता रहता हूं कि पहाड़ को पंछी की, पेड़ को पहाड़ की गतिविधि खूब पता है, खब अपनापा है इनमें पर उनकी भाषा, चितवन, चाल, चंचलता हमें नहीं समझ में आती, हम मनुष्यों को नहीं पता चल पाता… मैं उस घाटी में जाना चाहता हूं जहां अब तक कोई आदमी न पहुंचा हो… उस पवित्र और पूर्ण जगह की तलाश करना चाहता हूं.. उस शख्स को खोजना चाहता हूं जिसका मैं क्लोन हूं, जो मेरे से उम्र में पांच दस से लेकर बीस-तीस साल तक बड़ा है और मुझे तलाश रहा है… जो मिलने पर मुझसे बात नहीं करेगा और न उससे मैं कुछ पूछूंगा… बस, वो मेरे में प्रविष्ट हो जाएगा और मैं अपने जूनियर क्लोन के इंतजार में फूलों, पत्तियों, पहाड़, पंछी, पशु की माफिक देह तन धरे डोलडाल करता रहूंगा..

मैं अक्सर लोट जाता हूं उन जगहों पर जहां खासकर मनुष्य का सोना लोटना असभ्यता माना जाता है… मैं अक्सर ऐसी हरकतें कर जाता हूं जिसके मायने निकालते हुए मान लिया जाता है कि ये ठीक आदमी नहीं…

मैं बने बनाए रुटीन, सिस्टम, जीवन, ढांचों, बातों, सिद्धांत, दर्शनों, आग्रहों, रिश्तों में रत्ती भर भी रुचि नहीं रखता.. इन्हें झेल ढो रहा हूं और इनको त्यागना चाहता हूं… इनके बगैर जो जीवन शुरू होता है वो जीना चाहता हूं…

मुझे अब कोई चमत्कार, कोई बदलाव, कोई घटनाक्रम, कोई नारा, कोई नारी, कोई पहनावा, कोई खाना, कोई पीना, कोई पढ़ना, कोई लिखना उतना प्रभावित नहीं करता कि मैं घंटों दिनों महीनों के लिए चार्ज्ड हो जाउं, उत्तेजित रहूं, आहें भरूं, वाह वाह करूं, सोचता रहूं…. मैं सब कुछ करते पढ़ते जीते खाते देखते उतना ही शांत और स्थिर रहने लगा हूं जितना सोते हुए अवस्था में…

मैं इस आंतरिक शांति और स्थिरता को बाहरी आवरण, बाहरी खोल, बाहरी वस्त्र देना चाहता हूं… ताकि अंदर बाहर एक सा हो सकें… मैं सभ्यता की सारी निशानियां और असभ्यता के सारे अध्यायों को पढ़ जाने के बाद इनसे पार चले जाना चाहता हूं… इनके आसपास से भाग जाना चाहता हूं…. मैं इस असीम ब्रह्मांड की उस अदभुत प्रकृति में ओरीजनल प्रतिकृति बनकर रहना रोना खोना खाना पाना पीना हंसना जीना मरना चाहता हूं जिसका नैसर्गिक मूल, मूड, मिजाज, रूप मुझमें है और मैं उसमें… बस बीच में ये जो दीवार है, दुनिया है, संसार है, मनुष्य है, मनुष्य निर्मित संजाल हैं वो अवरोध बने हुए हैं, वो रोके पड़े हैं… इसलिए… मैं भाग जाना चाहता हूं…

मैं अब तक अर्जित समस्त बल, बुद्धि, विद्या को छोड़ जाना चाहता हूं… इनसे दूर भाग जाना चाहता हूं… मैं बुद्धिहीन, बलहीन, विद्याहीन होना चाहता हूं… मैं जड़ होना चाहता हूं, मैं पत्थर बन जाना चाहता हूं, मैं भावहीन होना चाहता हूं… और इस सबके लिए इस बेहद चंचल गतिमान सक्रिय रिएक्टिव आसपास परिवार समाज संसार से दूर जाना चाहता हूं, भाग जाना चाहता हूं… मैं जीवन और मृत्यु के दो छोरों के बीच के व्याख्यायित मोनोलिथिक राह के परे बहुआयामी (मल्टी डायमेंसनल) और क्वालिटेटिव लेकिन अबूझ अव्याख्यायित विस्तार को स्पर्श करना चाहता हूं… मैं नींद और जगी हुई अवस्थाओं से परे की कुछ अवस्थाओं को महसूस करना चाहता हूं, जीना चाहता हूं इसलिए नींद और जगी हुई अवस्थाओं को अंतिम सच मानने वाले लोगों और दुनिया को प्रणाम करना चाहता हूं… मैं उस बाजार और समाज और देश के दर्शन, शोर, दायरे से भागना चाहता हूं जहां जो व्याख्यायित है, वह दुर्लभ है, जो छिपा है, जो अव्यक्त है, वह व्यावहारिक है… मैं उस आर्थिक राजनीति और सामाजिक व्यवस्था से भागना चाहता हूं जो हर कुछ और हर किसी को उसके आखिरी सांस सोच समझ तक फिक्स तय बाध्य मजबूर कर देना चाहता हो और हम सब कोल्हू के बैल की तरह वही बाध्यताएं, मजबूरियां, फिक्सिंग जीते ढोते रहते हैं… इसलिए मैं छोड़ जाना चाहता हूं वो केंचुल जो इसी दुनिया के चलते पहना और जिस पर इस इस दुनिया, व्यवस्था, बाजार, समझ का मुहर स्टैंप लगा हुआ है… मैं ओरीजनल मौलिक होना चाहता हूं इसलिए बासी पुराने रास्तों को छोड़ जाना चाहता हूं…

… और यह सब के लिए बहुत जरूरी है भागना सो मैं भाग जाना चाहता हूं…

सच में.

सो, हे 2014, मेरे में भागने का साहस भर देना…..

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनका यह लिखा हुआ उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. यशवंत से संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


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यशवंत को मिल गया खुश रहने का फार्मूला

जियो केजरीवाल! दो दिन में दो फैसलों से जनता की जख्म पर लगाया मरहम

नई दिल्ली, 31 दिसंबर। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की सरकार शायद पहली सरकार है जो विधानसभा का सामना करने से पहले दो प्रमुख चुनावी वायदों को पूरा करके दिखा दिया। अब सरकार रहे या जाए, जनता को इस फायदे से मरहूम करना मुश्किल होगा। दिल्ली की जनता को अब करीब सात सौ लीटर पानी मुफ्त मिलेगा और चार सौ यूनिट तक बिजली जलाने पर पहले की तुलना में आधी कीमत देनी होगी।

मुख्यमंत्री की ओर से इस बड़े ऐलान के साथ यह भी जताया गया कि वायदों को पूरा करने के लिए कोई हवा हवाई का तरीका नही अपनाया गया बल्कि उस पर विशेषज्ञों और अधिकारियों ने समुचित मसक्कत की है। बिजली आधी कीमत पर मुहैया कराने से दिल्ली की जनता को 31 मार्च तक चार सौ यूनिट बिजली आधी कीमत में देने से सरकारी खजाने पर महज 61 करोड़ रुपए का भार आएगा।

दिल्ली में व्यापारियों को लेकर कांग्रेस और बीजेपी में पारंपरिक होड़ रही है। इस होड़ में खुद को उतारते हुए "आप" ने व्यापारियों का दिल जीतने का भी काम कर दिखाया है। व्यापारियों को जरूरी वैट फॉर्म भरने के लिए एक महीने की अतिरिक्त राहत दे दी गई है। साथ ही वैट फॉर्म के सरलीकरण का संकेत देकर बताया है कि बगैर किसी भेदभाव के यह जनता की सुनने वाली सरकार है।   

दिल्ली विधानसभा का सत्र बुधवार पहली जनवरी से शुरू हो रहा है और सरकार के पास सदन की पटल पर बहुमत साबित करने के लिेए महज तीन जनवरी तक का वक्त है। ऐसे में सरकार रहे या जाए, जनता से किए दो प्रमुख वायदों को पूरा करके अरविन्द केजरीवाल ने अपना काम कर लिया है।  हालांकि त्वरित सरकारी फैसलों के बीच सरकार बचाने के लिए राजनीतिक स्तर पर जबरदस्त काम हो रहा है। इसके स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। खासकर प्रोटेम स्पीकर को लेकर खड़ी मुसीबत के बीच मुख्यमंत्री की नई घोषणा से सरकार गिरने की उल्टी गिनती करने वाले भौंचक हैं।

दिल्ली सचिवालय में अपने पहले कैबिनेट बैठक के फैसले की घोषणा के लिए बुलाए गए संवाददाता सम्मेलन में मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने बताया कि कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक चौधरी मतीन अहमद ने प्रोटेम स्पीकर बनना मंजूर कर लिया है। मुख्यमंत्री के इस ऐलान से साफ हो गया कि "आप" के अल्पमत की सरकार ने विधानसभा में बहुमत हासिल करने की दिशा में जरूरी कसरत करना शुरू कर दिया है।

गौरतलब है कि बीजेपी नेता जगदीश मुखी और जनता दल यू के विधायक शोएब इकबाल के प्रोटेम स्पीकर बनने से इंकार कर दिया। इसके बाद नए विधानसभा में विधायकों को शपथ दिलाने वाले का टोटा पड़ गया था। प्रोटेम स्पीकर का पेंच फंस जाने से केजरीवाल सरकार के इंजीनियरों के पसीने छूटने लगे थे। सबसे पहले सरकार की ओर से वरिष्ठतम विधायक होने के नाते बीजेपी के जगदीश मुखी को प्रोटेम स्पीकर बनाने का प्रस्ताव भेजा गया था। जगदीश मुखी ने प्रोटेम स्पीकर बनने से इंकार कर केजरीवाल सरकार से बीजेपी के असहयोग की मंशा जता दी थी। मुखी ने स्पीकर बनने से सीधे इंकार करने के साथ खत लिखकर बताया है कि बीजेपी का कोई भी नेता प्रोटेम स्पीकर नहीं बनेगा।

जगदीश मुखी के इंकार के बाद केजरीवाल के लोग जनता दल (यू) की टिकट पर जीते शोएब इकबाल के पास प्रोटेम स्पीकर बनने का प्रस्ताव लेकर पहुंचे थे। बताते हैं कि आप की अल्पमत सरकार में शोएब इकबाल मंत्री बनना चाहते थे। मंत्री नहीं बनाने का खुन्नस निकालते हुए शोएब इकबाल ने भी प्रोटेम स्पीकर बनने से इंकार कर "आप" को अंगूठा दिखा दिया। इससे केजरीवाल की पार्टी सकते में थी। इसके संकेत केजरीवाल की ओर से अपनी सरकार को सिर्फ 48 घंटे की सरकार होने की बात से मिलने लगा था। शोएब इकबाल से इंकार की उम्मीद नहीं थी। खासकर जनता दल यू के नेता नीतिश कुमार के साथ शोएब इकबाल ने खुद केजरीवाल की सरकार को खुला समर्थन देने का ऐलान किया था।

प्रोटेम स्पीकर का पद अस्थायी स्पीकर यानी विधानसभा अध्यक्ष का पद होता है, जो नए सदन में विधायकों को शपथ दिलाने और स्थायी विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव होने तक सदन की कार्यवाही संचालित करता है। चौधरी मतीन अहमद की रजामंदी से हौसलामंद हुई केजरीवाल की पार्टी ने अब विधानसभा अध्यक्ष के लिए चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। पहले से ही सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी नए सदन में स्थायी विधानसभा अध्यक्ष का पद हासिल करने के फिराक में है। मगर "आप" की ओर से विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर विधायक गिरी का नामांकन भरने के ऐलान ने सदन की शुरूआती कार्यवाही को भी बेहद दिलचस्प बना दिया है।

'आप' के विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में उतरने के फैसले से बिना शर्त समर्थन देने का उपराज्यपाल को चिट्ठी भेज चुकी कांग्रेस पार्टी को विधानसभा में "आप" के समर्थन में दो बार खुलकर प्रदर्शन करना पड़ सकता है। पहली बार विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में प्रत्यक्ष मतदान से तो दो दूसरी बार सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर ऐलान और मतदान के जरिए। "आप" के मौजूदा रुख को देखकर कहा जा सकता है कि दोनों ही बार सदन के अंदर "आप" के नेताओं के भाषण में कांग्रेस विधायकों को जलालत का सामना करना पड़े।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह-चौदह नौकरियां करने के बाद आलोक काफी समय से समाज सेवा, पर्यावरण सक्रियता, मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं. उनसे संपर्क aloksamay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार पुरुषोत्तम वज्र का दिल का दौरा पड़ने से निधन

प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार पुरुषोत्तम वज्र का दिल का दौरा पड़ने के चलते एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वज्र को बीते 21 दिसंबर को दिल का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. वो पिछले आठ साल से वेंटीलेटर पर थे. वज्र 60 वर्ष के थे. पुरुषोत्तम वज्र ने अपने पत्रकारिता करियर में दैनिक जनमान्य के संपादक के रूप में और संध्या वीर अर्जुन में बतौर चीफ रिपोर्टर के रूप में काम किया.
वज्र ने अपने जीवन में कविता और गजल के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की जीवन पर भी पुस्तक लिखी थी. उन्हें अपने जीवन में कई पुरस्कार मिले. वज्र 1970 के मध्य में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ जुड़े थे और आपातकाल के दौरान जेल में बंद कर दिया गया था.

इंदौर में वरिष्ठ पत्रकार प्रतीक के प्लॉट पर कब्जा

इंदौर : इंदौर में एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार के प्लॉट पर विवाद का मामला सामने आया है. इस पूरे मामले में पुलिस ने पत्रकार की रिपोर्ट पर दो लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है. तो वहीं इस मामले में एक पत्रकार ने गवाही दी है.
मामला इंदौर के खुडैल थाना क्षेत्र का है. टीवी पत्रकार प्रतीक श्रीवास्तव की रिपोर्ट पर पुलिस ने शनिवार को आरोपी आरपी पाल और अखिलेश पाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया. पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार श्रीवास्तव का खुडैल क्षेत्र के बदियाकीमा में पांच हजार वर्ग फीट का प्लॉट था. ये प्लॉट उन्होंने वर्ष 2008 में अपनी पत्नी ज्योति के नाम से खरीदा था. लेकिन दोनों आरोपियों ने उस प्लॉट पर लगा उनका बोर्ड उखाड़ कर फेंक दिया. जब प्रतीक ने इसका विरोध किया तो उनके साथ धक्कामुक्की की गयी.

पत्रकार मर्डर केस में वॉन्टेड नक्सली गिरफ्तार

रायपुर : इस साल की शुरुआत में हुए एक पत्रकार के मर्डर में शामिल होने के आरोपी एक नक्सली को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले से गिरफ्तार कर लिया गया है. इस पूरे मामले की जानकारी देते हुए सुकमा के एसपी अभिशेक शांडिल्य ने बताया कि एक सर्च ऑपरेशन के दौरान बंजामी हिडमा को तोंगपाल पुलिस थाना सीमा के तहत जंगल से पकड़ा गया.
एसपी ने बताया कि एक स्थानीय पत्रकार नेमी चंद जैन की हत्या के मामले में वो वांछित था और उससे जुड़ी सूचना के लिए 50,000 रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था.
राज्य की राजधानी रायपुर से करीब 450 किलोमीटर दूर दक्षिण बस्तर के तोंगपाल में उसकी मौजूदगी संबंधी एक सूचना के आधार पर स्थानीय पुलिस की एक टीम ने घेराबंदी की और उसे पकड़ लिया गया फिलहाल उससे पूछताछ की जा रही है.

कानपुर प्रेस क्लब कार्यकारिणी समिति के चुनाव में मनोज यादव के मिले सर्वाधिक मत

कानपुर : 13 वर्षों बाद हुए कानपुर प्रेस क्लब चुनाव की कार्यकारिणी समिति के चुनाव परिणाम देर रात घोषित कर दिये गये. 
कार्यकारिणि चुनाव में सर्वाधिक मत मनोज यादव (257) हिंदुस्तान टाइम्‍स ने प्राप्त किये, बृजेश दीक्षित (स्‍वतंत्र चेतना), अजय अग्निहोत्री (आज), गजेन्‍द्र सिंह (हिंदुस्तान), ओम चौहान (टाइम्‍स आफ इंडिया), गौरीशंकर भट्ट (स्‍वतंत्र भारत), अधीर सिंह लल्‍ला (दैनिक जागरण), संजीव त्रिवेदी (आज), विकास मोहन (राष्‍ट्रीय सहारा), विक्की रघुवंशी (सियासत), संजय त्रिपाठी (हिंदुस्तान) ने कार्यकारिणी पद हेतु विजयी घोषित किये गये.

जबलपुर की जानी-मानी महिला पत्रकार दीपिका त्रिपाठी दुबे ने फांसी लगाकर आत्महत्या की

जबलपुर। शहर की जानी-मानी महिला पत्रकार दीपिका त्रिपाठी दुबे ने मंगलवार दोपहर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। खबर फैलते ही शहर में सनसनी का माहौल निर्मित हो गया। भारी संख्या में मीडियाकर्मी महिला पत्रकार के घर पर एकत्रित हो गये। महिला पत्रकार लंबे अरसे से अखबार से जुड़ी हुई थीं। उन्होंने कुछ साल पहले ही एक पत्रकार से प्रेम विवाह किया था। शादी के कुछ दिनों बाद ही वे लगातार बीमार रहने लगीं थीं और हाल ही में ब्रेन टयूमर का ऑप्रेशन कराके मुंबई से लौटी थीं।

वे दोबार समाचार पत्र में अपनी सेवाएं दे रही थीं। सूत्रों के अनुसार सोमवार की रात 12 बजे तक दीपिका ऑफिस में ही थी और दूसरे कर्मचारियों से रोज की तरह ही बातें कर रहीं थीं। पुलिस ने लाश के पास से सुसाइड नोट बरामद किया है, जिसमें बीमारी की वजह से निरंतर परेशान रहने की बात लिखी गई है। मृत्यु पूर्व लिखे गये पत्र में बीमारी ही आत्महत्या का कारण बताया गया है। हालांकि पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए इस संबंध में संदेह व्यक्त किया जा रहा है। पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजते हुए मामले की जांच शुरू कर दी है।

अनिरुद्ध बहल को जान का खतरा, केंद्र सरकार ने दी वाई श्रेणी की सुरक्षा

देश के जाने-माने पत्रकार अनिरुद्ध बहल को अब जान बचाना मुश्किल हो रहा है। उनके खुलासों ने देश के कई लोगों और संगठनों की नींद उड़ा दी है। अब यह लोग अनिरुद्ध को ही उड़ाने की सोच रहे हैं। खुफिया विभाग की रिपोर्ट के बाद केंद्र सरकार में खलबली मच गयी है। अनिरुद्ध बहल को वाई श्रेणी की सुरक्षा देने के आदेश हो गये हैं। उत्तर प्रदेश के डीजीपी और चीफ सेक्रेट्री को इसकी सूचना दे दी गयी है।

देश में संभवत: अनिरुद्ध बहल पहले पत्रकार होंगे जिन्हें इस तरह की सुरक्षा दी जा रही है। अनिरुद्ध बहल पर हमला करने की साजिश की खबर ने यूपी पुलिस को भी हलकान कर दिया है। तहलका के संपादक तरूण तेजपाल और अनिरुद्ध बहल की जोड़ी ने देश की पत्रकारिता में कई नये मुकाम हासिल किए हैं। एनडीए सरकार के समय तहलका और कोबरा पोस्ट आतंक का पर्याय हो गये थे। अनिरुद्ध बहल कोबरा पोस्ट के संपादक थे। इन लोगों की टीम ने दिखाया था कि वाजपेयी सरकार के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज और उनके सहयोगी किस तरह हथियारों और कारगिल शहीदों के ताबूत में कमीशनखोरी कर रहे थे। इन्हीं लोगों ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए दिखाया था। जिसके बाद न सिर्फ उन्हें भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था बल्कि जेल भी जाना पड़ा था। गुजरात दंगों में भी कोबरा पोस्ट के खुलासे ने हड़कंप मचा दिया था। पूरे देश में भाजपा की इन खुलासों के बाद भारी फजीहत हुई थी।

इस बीच तरूण तेजपाल एक युवती से आपत्तिजनक व्यवहार के चलते जेल में हैं। भाजपा नेताओं ने तरूण तेजपाल के जेल जाने से बेहद राहत महसूस की और उनके खिलाफ नैतिकता के बड़े-बड़े भाषण भी दिये। मगर इस बीच अनिरुद्ध बहल के सहयोगी गुलेल के आशीष खेतान ने जो टेप जारी किए उसने भाजपा के सारे सपनों पर ही ग्रहण लगा दिया। यह टेप भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने गृह मंत्री अमित शाह के जरिए एक युवती का पीछा किए जाने की रिकॉर्डिंग थी। इन रिकॉर्डिंग के बाद सरकार ने एक आयोग बनाकर इस जासूसी कांड की जांच के आदेश कर दिये। यह मोदी की छवि पर सीधा हमला था। भाजपा इस हमले से सकते में थी।

इस बीच अनिरुद्ध बहल ने सनसनीखेज खुलासा किया कि कई कंपनियां फर्जी तरीके से सोशल साइट्स पर लोगों को महिमामंडित कर रही हैं और उनके विरोधियों पर हमला कर रही हैं। जाहिर है यह खुलासे भाजपा के लिए बेहद परेशानी की बात थी। क्योंकि मोदी के समर्थक सोशल साइट्स पर खासे सक्रिय रहते हैं और इस खुलासे के बाद सबको समझ आ गया कि फेसबुक पर किस तरह हिट और लाइक्स इकट्ठे किए जा रहे हैं। यही नहीं अनिरुद्ध बहल ने कई बड़े अंतरराष्ट्रीय बैंकों के जरिये हवाला के माध्यम से अरबों रुपये के काले कारोबार का भी खुलासा अपनी वेबसाईट कोबरा पोस्ट के माध्यम से किया।

अनिरुद्ध बहल को अंदाजा भी नहीं होगा कि इस तरह के खुलासे करने से उनकी जान को भी इस हद तक खतरा हो सकता है। खुफिया विभाग को जानकारी मिली कि कुछ लोग इस प्रयास में हैं कि अनिरुद्ध बहल पर हमला करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाये। इन लोगों का मानना है कि तरूण तेजपाल तो अब लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते आसानी से जेल के बाहर नहीं आ पायेंगे और अगर बाहर आये भी तो उनकी पत्रकारिता में वह धार नहीं बचेगी। और अगर इसी बीच अनिरुद्ध बहल को भी रास्ते से हटा दिया जाये तो एक ऐसा पत्रकार रास्ते से हट जायेगा जो इस तरह के षडयंत्र रचने वाले लोगों की राह में रोड़ा बना हुआ है।

खुफिया विभाग को जानकारी मिली कि कुछ लोगों को इस काम की जिम्मेदारी दी गयी है कि अनिरुद्ध बहल पर इस तरह हमला किया जाये कि वह किसी भी कीमत पर न बचने पायें। यह जानकारी मिलते ही भारत सरकार के गृह मंत्रालय में हड़कंप मच गया। वीआईपी लोगों की सुरक्षा देख रहे वीआईपी सिक्योरिटी के डायरेक्टर गिरीश कुमार ने 23 दिसंबर को अनिरुद्ध बहल को वाई कटैगरी की सुरक्षा देने के आदेश कर दिये। इस सुरक्षा के तहत अनिरुद्ध बहल के घर पर चार सशस्त्र पुलिस कर्मी हमेशा तैनात रहेंगे। दो पर्सनल सिक्योरिटी अफसर अनिरुद्ध बहल के साथ लगातार रहेंगे जिसमें एक वर्दी में अत्याधुनिक हथियार के साथ रहेगा जबकि दूसरा सादा कपड़ों में एक छोटे हथियार के साथ उनके साथ रहेगा। इसके अलावा उनके दफ्तर पर भी चार सशस्त्र पुलिस कर्मी रहेंगे और एक निजी सुरक्षा अधिकारी हथियारों के साथ रहेगा। स्वाभाविक है अब तक बेखौफ होकर अपनी खबरों के लिए सुरागरसी करने वाले अनिरुद्ध बहल के लिए अब जिंदगी इतनी आसान नहीं रह जायेगी।

अनिरुद्ध बहल पर हमले की आशंका ने मीडिया जगत में भी खलबली मचा दी है। कई पत्रकारों ने सरकार से मांग की है कि ऐसे लोगों को बेनकाब किया जाना चाहिए जो अनिरुद्ध बहल जैसे ईमानदार, तेज तर्रार पत्रकार पर हमले की बात सोचते हैं। साथ ही उनके विरुद्ध इतनी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए कि भविष्य में कोई इस तरह की हिम्मत न जुटा पाये। भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अनिरुद्ध बहल इस देश के सबसे बड़े खोजी और होनहार पत्रकार हैं। उनकी सुरक्षा की हर हालत में जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए और उन लोगों को कड़ी सजा भी देनी चाहिए जो किसी पत्रकार पर हमला करने की साजिश करते हैं। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सचिव और बिजनेस स्टैंडर्ड के ब्यूरोचीफ सिद्धार्थ कलहंस का मानना है कि अनिरुद्ध बहल ने पत्रकारिता के उच्चतम माप दण्ड को स्थापित किया है लिहाजा हम सबकी जिम्मेदारी है कि उनकी तथा उनके परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी सुनिश्चत करें। आईबीएन-7 के ब्यूरो चीफ शलभमणि त्रिपाठी ने कहा कि अनिरुद्ध बहल निर्भीक और होनहार पत्रकार हैं अगर कोई उनके खिलाफ इस तरह की साजिश की कल्पना करता है तो उसे इतना कड़ा दंड मिलना चाहिए जिससे भविष्य में कोई इस तरह की सपने में भी कल्पना न करे।

यूपी सरकार के लिए भी यह मामला बेहद संवेदनशील है क्योंकि अनिरुद्ध बहल गाजियाबाद के वैशाली क्षेत्र में रहते हैं। पुलिस इस मामले में बेहद संवेदनशील एवं गोपनीय रवैया अपना रही है। इस बारे में पूछे जाने पर मेरठ के डीआईजी के. सत्यनाराण ने कहा कि यह मामला नोएडा का है, वहां के एसएसपी ही बता सकते हैं। नोएडा के एसएसपी तो लाइन पर नहीं आये अलबत्ता उनके पीआरओ ने कहा कि इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकते और साहब व्यस्त हैं। प्रदेश के पुलिस महानिरीक्षक कानून व्यवस्था अमरेंद्र सहगल ने कहा कि यूपी पुलिस सभी लोगों की सुरक्षा के लिए तत्पर है और अगर किसी महानुभाव को वाई कैटेगरी की सुरक्षा मिली है तो यूपी पुलिस उसका विशेष ध्यान रखेगी।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के संपादक हैं.  यह स्टोरी वीकएंड टाइम्स में प्रकाशित हो चुकी है.

संजय के अन्य लेखों, विश्लेषणों, रिपोर्टों को पढ़ने के लिए क्लिक करें: भड़ास पर संजय

 

एनडीटीवी के पत्रकार के साथ इस तरह की भाषा बताती है कि मुख्यमंत्री जी कितने असंवेदनशील और अपरिपक्व हैं

Mohammad Anas : उत्तर प्रदेश के नौनिहाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने NDTV के पत्रकारों द्वारा मुज़फ्फरनगर में सपा सरकार की दंगा पीड़ित मुसलमानों की सुध ना लेने पर सवाल पूछना चाहा तो उन्होंने कहा 'अरे हम तो आपसे बात ही नहीं करेंगे, जाओ,पीछे, हुहूँ … चलिए, पीछे जा कर खड़े होइए, वहां अच्छे लग रहे थे'… इस तरह की भाषा बताती है कि मुख्यमंत्री जी कितने असंवेदनशील और अपरिपक्व हैं. काश, मुसलमान इस बार अपने भाइयों/बहनों /बच्चों के कातिलों के साथ ही साथ इनको भी सबक सिखाएं. (युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.)

Yashwant Singh : अखिलेश यादव से ऐसी उम्मीद किसी ने नहीं की होगी. लखनऊ में एनडीटीवी के पत्रकार अनंत जनाने ने जब सीएम से मुजफ्फरनगर कैंप में ठंढ से मर रहे बच्चों को लेकर एक सवाल पूछा तो अखिलेश भड़क गए… पत्रकार के साथ बेहद घटिया व शर्मनाक सलूक किया… सीएम अखिलेश ने कैसा व क्या जवाब दिया, आप भी इसे देखें और शेयर करें ताकि सपा के युवा नेता का असली रंग-ढंग सबको दिख सके…

शेम शेम अखिलेश यादव

https://www.youtube.com/watch?v=FQf6hv7CX0U

इस युवा नेता ने विधानसभा चुनाव से पहले डीपी यादव को पार्टी में ज्वाइन कराए जाने से मना कर दिया क्योंकि इन्हें पसंद नहीं था कि राजनीति में बदमाश आएं… पर अब जब ये सीएम हो गए तो इनकी पार्टी गर्व से माफिया अतीक अहमद को लोकसभा का टिकट दे रही है.. और, ये युवा नेता आजकल मीडिया से ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे पत्रकार इनके घर के नौकर-चाकर हों… देखिए वीडियो और शेयर भी करिए ताकि इन रंगे सियारों का असली रंग सबको दिख सके… (भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.)

Kumar Sauvir : मुख्‍यमंत्री ने पत्रकारों को लुलुहा दिया, कहा: अरे निकल भाग यहां से…. और प्रेस-कांफ्रेंस में सीएम की इस घुड़की होते ही वहां मौजूद सारे आला-साला पत्रकारों ने अपनी-अपनी पूंछें अपने-अपने पेट में घुसेड़ लिया। अरे है कोई, जो कल मुख्‍यमंत्री आवास पर अखिलेश यादव की प्रेस-कांफ्रेंस की वारदातों को आल्‍हा-ऊदल की तर्ज पर काव्‍य-तर्जुमा कर सके? (लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.)


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राहत शिविरों पर पत्रकार के सवाल पूछते ही क्यों आग बबूला हो गए सीएम 'सर'?

राहत शिविरों पर पत्रकार के सवाल पूछते ही क्यों आग बबूला हो गए सीएम ‘सर’? (देखें वीडियो)

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव से मुजफ्फरनगर राहत शिविरों में रह रहे पीड़ितों की बदहाली पर सवाल पूछना एक पत्रकार को भारी पड़ गया। पत्रकार ने मुजफ्फरनगर दंगे कैंप का नाम क्या लिए, वह यूपी सीएम के गुस्से का शिकार हो गया और सीएम अखिलेश ने उसे खड़े रहने की सज़ा सुना डाली। अखिलेश ने कहा, ''आप से हम बात नहीं करेंगे आप पीछे जाकर खड़े हो जाइये, आप वहीं अच्छे लगते हैं।''

दरअसल, सीएम मंगलवार को एक प्रेस कांफ्रेंस को सम्बोधित कर रहे थे कि एक पत्रकार ने उनसे सवाल पूछ लिया कि अखिलेश सरकार मुजफ्फरनगर दंगा राहत शिविर में रह रहे लोगों की बदहाली और तकलीफ को लेकर इतनी बेरहम क्यों हो गयी हैं, जिसके जवाब में अखिलेश यादव गुस्सा आ गया| उन्हें पत्रकार को डांट दिया|

इससे पहले मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में रह रहे लोगो को सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव के षड्यंत्रकारी कहे जाने के बाद यूपी सरकार एकाएक सक्रीय हो गयी थी और सरकार ने राहत शिविरों में रह रहे दंगा पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा दिए बगैर शिविर खाली करने को भी कहा गया । आश्चर्य तो इस बात का है कि राज्य सरकार सब कुछ ठीक होने का दावा करती हैं और दूसरी तरफ शिविरों में रह रहे लोगों पर फर्जी मामले दर्ज कर दबंगई दिखती हैं और पीड़ितों और अब पत्रकारों पर अपना गुस्सा निकाल रही हैं ।

एक आकड़ों के मुताबिक, मुजफ्फरनगर राहत शिविरों में ठंड से 7 सितंबर से लेकर 20 दिसंबर तक केवल 34 मौतें हुईं हैं, जिनमें 10 से 12 बच्चे शामिल है जबकि सरकार के आला अफसर कह रहे थे कि ठंड से कोई नहीं मरता अगर ऐसा होता तो साइबेरिया में कोई नहीं बचता| मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में ठंड से हो रही मौतों पर सरकारी आला अफसर लीपापोती करने में जुट गए थे।

राहत कैंपों में रहने वाले बेसहारा लोग मुलायम सिंह यादव को कांग्रेसी और भाजपाई नज़र आ रहे हैं और सरकार उन्हें खदेड़ कर सैफई में जश्न मना रही है। आखिर दंगा कैपों की बदलही को लेकर इतनी बेरहम क्यों हो गयी हैं समाजवाद की सरकार। (साभार- पर्दाफाश)


अखिलेश यादव ने पत्रकार के साथ कैसा किया बर्ताव… इससे संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

Shame Shame Akhilesh Yadav
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लखनऊ : सौम्य व्यवहार के लिए विख्यात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अलग ही रंग दिखाया। लखनऊ में प्रस्तावित आइटी सिटी को विकसित करने के लिए एचसीएल को आशय पत्र सौंपने के मौके पर सोमवार को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एनडीटीवी के पत्रकार अनंत झणाणे पर जमकर उखड़ गए। इस दौरान उन्होंने अभद्र भाषा का भी प्रयोग किया।

अपने सरकारी आवास पर प्रेस कांफ्रेंस के दौरान आगे आकर अनंत ने जैसे ही सवाल पूछना चाहा, मुख्यमंत्री ने सख्त लहजे में उनसे कहा कि वह उनसे बात नहीं करना चाहते। मुख्यमंत्री ने अनंत से यह भी पूछा कि वह आगे कैसे आ गए। उन्होंने तल्ख अंदाज में अनंत को पीछे चले जाने को कहा। यह बोले कि तुम पीछे ही ठीक लगते हो। मुख्यमंत्री के इस व्यवहार पर वहां मौजूद कई पत्रकार हतप्रभ रह गए। (साभार- दैनिक जागरण)

अखिलेश यादव ने पत्रकार के साथ कैसा किया बर्ताव… इससे संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

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सीएम अखिलेश के बर्ताव पर एनडीटीवी के अनंत जनाने ने लिखकर दिया जवाब

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यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव के चेहरे में लोगों ने एक सौम्य, समझदार और प्रगतिशील युवा देखा. इसके कारण अखिलेश को अच्छा खासा सपोर्ट व वोट मिला. डीपी यादव के आपराधिक बैकग्राउंड के कारण सपा में लेने से अखिलेश यादव ने मना कर दिया तो सबने अखिलेश को सराहा. पर अब सीन उलट चुका है. गद्दी मिलने के बाद अखिलेश के नेतृत्व में यूपी में जिस किस्म का जंगलराज प्रारंभ हुआ है, उसे देखकर लोग अब मायावती के शासन को ज्यादा बेहतर बताने कहने लगे हैं.

सपा वाले पूरे गर्व से माफिया अतीक अहमद को लोकसभा टिकट दे रहे हैं और पत्रकार जब मुजफ्फरनगर में ठंढ से बच्चों के करने से संबंधित सवाल पूछते हैं तो अखिलेश यादव डांटने डपटने के अंदाज में पत्रकार को पीछे जाकर खड़े होने और चुप रहने की नसीहत देने लगते हैं. लखनऊ में एनडीटीवी के पत्रकार अनंत जनाने के साथ अखिलेश ने जो सुलूक किया, उसकी चहुंओर निंदा की जा रही है. खुद अनंत जनाने ने एक पत्रकार के नाते अपने साथ अखिलेश के बर्ताव का जवाब कलम के जरिए दिया है और सब कुछ विस्तार से बताया है. आप भी पढ़िए. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Akhilesh Yadav upset with NDTV over Muzaffarnagar coverage

Written by Anant Zanane

Lucknow:  Akhilesh Yadav, the chief minister of Uttar Pradesh, nettled by a series of NDTV reports on the grim conditions in Muzaffarnagar's relief camps, today said at a press conference in Lucknow that he would not take any questions from me.

"I won't take your questions," the 40-year-old said. When I tried to ask him another question, he said, "You please return to the rear of the room. You appear best when you are there."

In September, nearly 60 people were killed in Hindu-Muslim violence in Muzaffarnagar in the worst riots in Mr Yadav's state in over a decade. 40,000 people were displaced from their homes.

NDTV's coverage has focused on the conditions of the refugee camps which mushroomed to accommodate the homeless. When NGOs reported on children falling sick from the extreme cold, we launched a blanket donation drive. Viewers have sent over 6,000 blankets for Muzaffarnagar's relief camps.

Mr Yadav seemed especially irked by a report over the weekend in which NDTV highlighted the fact that while those still living in camps are complaining of being forcibly evicted by government officials, ministers were present in expensive celebrations at an annual festival in Saifai, the chief minister's village. (Read)

NDTV's coverage of Muzaffarnagar has included stories that looked at how politicians from different parties appear to have done their part in fanning the communal violence in September by delivering provocative speeches. (साभार- एनडीटीवी)


अखिलेश यादव ने पत्रकार के साथ कैसा किया बर्ताव… इससे संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें…

Shame Shame Akhilesh Yadav
https://www.youtube.com/watch?v=FQf6hv7CX0U


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लखनऊ के पत्रकारों की ऐसी बेइज्जती तो मायावती ने भी नहीं की जैसी आज अखिलेश न कर दी

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सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान डॉ. असंगघोष को

रायपुर : प्रथम सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान-2013 के लिए कवि डॉ. असंगघोष (जबलपुर) को चुना गया. यह सम्मान उन्हें उनकी कविता-कृति 'मैं दूंगा माकूल जबाब' के लिए दिया जाएगा. डॉ. असंगघोष की अब तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनके नाम इस प्रकार है – मोश नहीं हूं मैं, हम गवाही देंगे और मैं दूंगा माकूल जबाब. वे तीसरा पक्ष पत्रिका के सह-संपादक भी हैं.
बीते 7 वर्षों से संचालित साहित्य, संस्कृति और भाषा की अंतर्राष्ट्रीय वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम द्वारा इस वर्ष से साहित्यिक, सांस्कृतिक, रचनात्मक व कलात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए सृजनगाथा सम्मान का शुभारंभ किया गया है. डॉ. असंगघोष को सम्मान स्वरूप 21,000 की नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, शॉल और श्रीफल प्रदान कर अंलकृत किया जाएगा. इस सम्मान को देने के लिए एक चयन समिति का गठन हुआ था, जिसमें गिरीश पंकज, पूर्व सदस्य साहित्य अकादमी व संपादक सद्भावना दर्पण, रायपुर, डॉ. सुशील त्रिवेदी (आईएएस) वरिष्ठ साहित्यकार, रायपुर, अशोक सिंघई, वरिष्ठ कवि, भिलाई, डॉ. बलदेव, वरिष्ठ आलोचक, रायगढ़ शामिल हैं.
चयन समिति के सदस्यों ने उन्हें 'अमानवीय होते समाज में मानवता के छूटते जा रहे पहलुओं को धैर्य और प्रामाणिकता के साथ रेखांकित करनेवाला कवि' बताया है. 
सृजनगाथा डॉट कॉम के संपादक जयप्रकाश मानस ने बताया कि यह सम्मान 8 वें अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन श्रीलंका कैंडी के मुख्य अलंकरण समारोह में 20 जनवरी के दिन दिया जाएगा. डॉ. असंगघोष को ये सम्मान हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक डॉ. खगेंद्र ठाकुर, श्रीलंका में पदस्थ भारत के द्वितीय सचिव व कवि विनोद पाशी तथा मॉरीशस की लेखिका रेशमी रामधोनी के कर कमलों से प्रदान किया जायेगा. 

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और राज्यपाल ने संवैधानिक गरिमा को ताक पर रखा

स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य स्वर्गीय रणबीर सिंह की 100वीं जयंति पर एमडीयू रोहतक में रणबीर सिंह शोधपीठ द्वारा आयोजित एक समारोह में जहां मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तो अपने पिता को देवता बताया ही, वहीं देश और प्रदेश के संवैधानिक पदों पर बैठे हरियाणा के राज्यपाल महामहिम जगन्नाथ पहाडिया और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंद्र हुड्डा की तारीफ के पुल बांधते हुए अपने पदों की मर्यादा को भी ताक पर रख दिया.
राज्य के गर्वनर पहाडिया साहब ने हुड्डा की सरकार के विकास कार्यों की आलोचना करने वाले उनके राजनीतिक विरोधियों को करारा जवाब देते हुए कहा कि हालांकि ये उनका विषय नहीं है लेकिन जो लोग हरियाणा में विकास के बारे में भ्रांति फैला रहे हैं वे हरियाणा में आकर देखें, उनकी आंखें खुल जाएंगी.
उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने रणबीर सिंह को कुशल प्रशासक बताते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि रणबीर सिंह के बेटे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा और उनके पोते यानि दीपेंद्र हुड्डा जो रोहतक से सांसद हैं. रणबीर सिंह के दिखाए रास्ते पर चलकर उनकी जनकल्याण की नीतियों की हरियाणा में पालन कर रहे हैं. अब राज्यपाल पहाडिया साहब द्वारा हुड्डा की चापलूसी करने की बात तो समझ में आती है क्योंकि हुड्डा सरकार ने पहाडिया साहब को ओब्लाइज कर रखा है. हामिद अंसारी द्वारा दीपेंद्र हुड्डा तक की चापलूसी करना समझ में नहीं आता, हालांकि दीपेंद्र हुड्डा उस समय समारोह में मौजूद भी नहीं थे.
इस समारोह में मंच से कई बार कहा गया है कि ये खुशी की बात है कि आज रणबीर सिंह के जन्मदिन के अलावा शहीद उद्यम सिंह का जन्मदिन भी है लेकिन हुड्डा, पहाडिया और अंसारी ने उद्यम सिंह के बलिदान के बारे में एक शब्द भी कहना उचित नहीं समझा. याद दिला दें कि उद्यम सिंह ने जलियांवाला बाग में निर्दोश लोगों की हत्या के विरोध में इंग्लैंड जाकर जनरल डायर को गोली मार दी थी, लेकिन चूंकि उनके वंशज रणबीर सिंह के बेटे और पोते की तरह राजनीति में नहीं हैं इसलिए उन्होंने उनका नाम लेना उचित नहीं समझा. ये अलग बात है कि लोक संपर्क विभाग हरियाणा द्वारा अखबारों में उद्यम सिंह के बलिदान के बारे में विज्ञापन दिए गए थे लेकिन पूरे प्रदेश में कोई सरकारी समारोह नहीं किया गया. हालांकि हुड्डा ये कहते नहीं थकते कि वे स्वतंत्रा सेनानियों और शहीदों का सम्मान करते हैं. उनकी सरकार ने उन्हें कल्याण के लिए कई काम किए हैं. याद दिला दें कि उनके संरक्षण में स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकार संगठन भी है जिसके अध्यक्ष उनके पिता रणबीर सिंह के दोस्त शीलबहादुर यायाजी के बेटे सत्यानंद यायाजी हैं. हुड्डा साहब ने सत्यानंद यायाजी को तो इतना बड़ा कालोनाइजर बना दिया कि उसने सोनिया गांधी के दामाद रोबर्ट वाड्रा को गुडगांव में जमीन बेची लेकिन हुड्डा साहब प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी श्रीराम शर्मा की पुत्रवधु की मृत्यु पर रोहतक स्थित उनके निवास पर शोक प्रकट करने भी नहीं गए. यही नहीं हुड्डा साहब उन दिनों लाहली के क्रिकेट स्टेडियम में क्रिकेट का मैच देखते रहे लेकिन उनके पास स्वतंत्रता सेनानी के घर जाने का समय नहीं था. गौरतलब है कि श्रीराम शर्मा ने झज्जर के टाउनहाल से अंग्रेजों का झंडा उतार कर तिरंगा फहरा दिया था जिससे नाराज होकर अंग्रेज पुलिस ने उन्हें जीप से बांधकर पूरे झज्जर शहर में घसीटा था और लाल मिर्च की खाली बोरी में बंद कर दिया था. जवाहर लाल नेहरू उनका धन्यवाद करने रोहतक आए थे लेकिन चूंकि उनका कोई परिवार राजनीति में नहीं इसलिए सरकार उन्हें पूछती नहीं. कोर्ट से झाड़ खाने के बाद भी रोहतक के कैनाल रेस्ट हाउस के सामने रणबीर सिंह का स्टैच्यु लगाने की तैयारियां चोरी-छिपे चल रहीं हैं. जबकि चौ. चरण सिंह का स्टैच्यु हुड्डा के दोस्त योगेंद्र दहिया के घर पिछले कई साल से पड़ा है, उसके लिए  अभी तक कोई जगह नहीं मिल पायी है.
 
पवन कुमार बंसल
08882828301

 

शारदा शुक्ला आजतक से जुड़ीं

पिछले माह आईबीएन 7 से इस्तीफा दे चुकी शारदा शुक्ला ने आजतक के साथ अपनी नई पारी शुरू की है.
शारदा की गिनती तेज तर्रार और बेहतरीन लेखन वाले पत्रकारों में की जाती है.
शारदा को पत्रकारिता करियर में काफी अनुभव है. इससे पहले भी वो काफी मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी है.

हुड्डा को रोहतक में जमीन अधिग्रहण का खामियाजा भुगतना पड़ेगा

कहते हैं कि एक घर तो डायन भी छोड़ देती है, लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जमीन अधिग्रहण नीति की आड़ में अपने गृहनगर रोहतक के लोगों को भी नहीं बख्शा. गोहाना रैली में हुड्डा ने दहाड़ते हुए कहा कि उनकी भूमि अधिग्रहण नीति देश में सर्वश्रेष्ठ है, जिसकी प्रषंसा राहुल गांधी ने भी की है.
रैली के बाद जब एक पत्रकार ने एक टीवी चैनल पर अधिग्रहण नीति की आलोचना कर दी तो सरकार इतनी खफा हुई कि ‘‘कुमार का कुमारी पर तो जोर नहीं बसा पर गधे के कान ऐंठ दिए’’ वाली नीति पर चलते हुए पुलिस को कह कर केबल आपरेटर के माध्यम से चलने वाले चैनल का प्रसारण ही बंद करवा दिया. अब हुड्डा के बेटे दीपेंद्र पत्रकारों को लंच दे रहे हैं, लेकिन अब जब पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनकी सरकार द्वारा रोहतक में विकास कार्यों के नाम से अधिग्रहण की गई किसानों की जमीन के अधिग्रहण आदेश रद्द कर दिए हैं. तो क्या हुड्डा नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देंगे और उन किसानों से माफी मांगेगे. रोहतक के लोगों ने जाट समुदाय के कद्दावर नेता देवीलाल को हुड्डा के मुकाबले तीन बार हराया लेकिन हुड्डा सरकार ने रोहतक में कोई नया सैक्टर नहीं काटा और हुड्डा के मौजूदा सैक्टरों में रजिस्ट्री के कोलेक्टर रेट इतने बढ़ा दिए कि लोगों को मजबूरी में प्राइवेट बिल्डर्स के पास जाना पड़ रहा है. इन बिल्डर्स ने कानून को धत्ता बताकर लाइसेंस मिलने से पहले ही अखबारों में विज्ञापन देकर प्लाट बेच दिए. इनके समारोह में दीपेंद्र हुड्डा जाते थे. जब रोहतक के लोगों ने एक कालोनाइजर की धींगा-मस्ती के खिलाफ आंदोलन कर दिया तो सरकार ने उसके खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय डीसी रोहतक के दफतर में उनकी मीटिंग करवा दी.
ओमप्रकाश चैटाला रोहतक सरकार के लोगों से इसलिए नाराज थे कि केवल रोहतक शहर के लोगों के कारण देवीलाल तीन बार हुड्डा जैसे राजनीति में नौसिखिए से चुनाव हारे. हुड्डा की जमीन अधिग्रहण नीति अखबारों की सुर्खियां बनी हुई हैं. आईएएस अफसर अशोक खेमका ने डीएलएफ और वढेरा की जमीन सौदे को रद्द कर दिया तो हुड्डा उनके पीछे पड़ गई. रोहतक में मातू राम की याद में बने इंजीनियरिंग कालेज के लिए चंदा इकट्ठा करने को आयोजित एक सभा में हुड्डा ने कालोनाइजर डीएलएफ को हरियाणा के फाइनेंस किंग बताया था. डीएफएफ ने कालेज के लिए दो करोड़ रुपए दिए थे और उसके बदले में अरबों रुपए कमाए. हुड्डा से कालोनाइजर कितने खुश हैं इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने हुड्डा के जन्मदिन पर अखबार में पूरे पेज का विज्ञापन देकर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी. यही नहीं उन्होंने हुड्डा साहब से आग्रह किया कि हमें भूमि अधिग्रहण कानून से बचाएं, जिससे कि राहुल गांधी ला रहे हैं. कालोनाइजर लोबी तो हुड्डा को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है ताकि हरियाणा की तरह वे सारे देश को लूट सकें. गौरतलब है कि हुड्डा ने रोहतक में भूमि अधिग्रहण का विरोधी करने पर रमेश दलाल के खिलाफ मुकदमा दायर करवा दिया लेकिन रोहतक के एडिशनल सैशन जज शालिनी नागपाल ने उनकी अग्रिम जमानत कर दी नहीं तो ना जाने हरियाणा की बहादुर पुलिस उनके साथ क्या सलूक करती. मजाक में हुड्डा को क्लू की सरकार कहा जाता है.
 
पवन कुमार बंसल
08882828301
 

जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर को बड़ा झटका, एक साथ पांच रिपोर्टरों ने दिया इस्तीफा

गोरखपुर : जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर को सोमवार की सुबह एक बड़ा झटका लगा. ये झटका संस्थान को तब लगा जब यहां एक साथ पांच रिपोर्टरों ने संस्‍थान को टाटा-बाय-बाय कर दिया. 
खबर है कि वेतन समय पर न मिलने और संपादक एवं सिटी इंचार्ज द्वारा मानसिक दबाव बनाने के कारण रिपोर्टरों द्वारा यह फैसला लिया गया. हालांकि एक दिन पहले तक वह पूरी तन्‍मयता के साथ अपनी जिम्‍मेदारियों का निर्वहन कर रहे थे.
जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर के तेज-तर्रार रिपोर्टर माने जाने वाले संतोष गुप्‍ता, उत्‍तम दुबे, नीरज श्रीवास्‍तव, सुनील त्रिगुणायत और स्‍वाति श्रीवास्‍तव ने सोमवार को संस्‍थान से अपना नाता तोड़ लिया. वहीं संस्‍थान को इस बात का डर सता रहा था कि नवंबर माह पूरा होते ही रिपोर्टर वेतन के लिए दबाव बनाने लगेंगे. पूर्व सिटी इंचार्ज सहित जिले के 11 लोगों के संस्‍थान छोडने के बाद से नये नवेले संपादक एवं सिटी इंचार्ज को इस बात का डर था कि नवंबर का वेतन मिलते ही ज्‍यादातर लोग संस्‍थान को टाटा कर सकते है. इसी कारण संस्‍थान द्वारा दिसंबर माह खत्‍म होने की कगार पर होने के बाद भी वेतन नहीं दिया गया था. दो माह का वेतन नहीं मिलने के बाद भी सभी लोग पूरी तन्‍मयता के साथ काम कर रहे थे.
 
किसी के संस्‍थान छोडकर जाने की बात नहीं थी लेकिन नए संपादक और इंचार्ज पिछले 15-20 दिनों से रिपोर्टरों व डेस्‍क के लोगों पर दबाव बनाने के लिए माहौल बना रहे थे कि जिसे छोडकर जाना है वह जा सकता है उसका हिसाब-किताब कर दिया जाएगा. इसके पीछे एक कारण यह भी है कि पीएफ व अन्‍य बकाया होने के कारण संस्‍थान के अधिकारी भारी दबाव में हैं. यह देखने के लिए कि कोई छोडकर जाने वाला तो नहीं है इसलिए इस प्रकार का माहौल बनाया जा रहा था जिससे जाने वाले लोगों को चिह्रनित किया जा सके. जब यह बात साफ हो गई कि कोई छोडकर जाने वाला नहीं है तो अनायास ही काम करने वाले रिपोर्टरों को ही बातों के मायाजाल में फंसाकर प्रताड़ित किया जाने लगा. नतीजा पिछले 15-20 दिनों से भारी दबाव में काम कर रहे पांचों रिपोर्टरों ने संस्‍थान को टाटा-बाय-बाय कह दिया. जबकि संपादक व सिटी इंचार्ज को इसका जरा भी एहसास नहीं था कि उनके अनावश्‍यक दबाव का खामियाजा उन्‍हें पांच रिपोर्टरों की कीमत देकर चुकाना पडेगा. आनन-फानन में कुछ नए लोगों को भर्ती करने के लिए संपादक व सिटी इंचार्ज ने हाथ-पांव मारना शुरू किया लेकिन वेतन नहीं मिलने के डर से कोई भी डूबती नाव में बैठने को तैयार नहीं होना चाहता है. भई जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर की नैया अब डूबी ही समझो क्‍योंकि पीएफ अधिकारी कभी भी संस्‍थान में ताला जड़ सकते हैं.  

पत्रकार जगदीश चन्द्र के पिता का निधन

देहरादून : देहरादून के जनपद उधमसिंह नगर (रूद्रपुर) से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक उत्तरांचल दर्पण के वरिष्ठ पत्रकार जगदीश चन्द्र के पिता नंदन राम का लंबी बीमारी के बाद कल निधन हो गया. वे 65 वर्ष के थे. 
जगदीश के पिता की मृत्यु से मीडिया जगत में शोक व्याप्त है. स्व. नंदन राम के निधन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, वित्तमंत्री डॉ. श्रीमती इंदिरा हृदयेश ने शोक व्यक्त करते हुये कहा है कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा उनके परिजनों को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे.

दिलीप ने दिया भास्कर से इस्तीफा, जागरण से जुड़े

दैनिक भास्कर में इन दिनों इस्तीफों का दौर चल रहा है. इसी क्रम में भास्कर श्रीगंगानगर राजस्थान से सब-एडिटर दिलीप नागपाल ने इस्तीफा दे दिया है. दिलीप यहां सिटी डेस्क पर कार्यरत थे. नागपाल ने अपनी नई पारी दैनिक जागरण लुधियाना पंजाब के साथ शुरु की है.
यहां उन्हें सिनिअर सब-एडिटर बनाया गया है. तीन साल से श्रीगंगानगर भास्कर में सिटी डेस्क पर काम करने के अलावा दिलीप भास्कर की मधुरिमा और अहा जिंदगी पत्रिका के लिए भी लिख रहे थे. बीते दिनों खबर आई थी कि वो दबंग दुनिया से जुड़ सकते हैं. लेकिन सोमवार को दिलीप ने अपने फसेबुक अकाउंट पर अपने जागरण से जुड़ने की घोषणा कर दी. उनसे पहले भी करीब दर्जनभर लोग भास्कर छोड़ जागरण पहुंच चुके हैं. वहीं इससे पहले श्रीगंगानगर भास्कर से डीएनइ के तरुण शर्मा और रीजनल इंचार्ज दिव्य्भानु श्रीवास्तव सहित आधा दर्जन लोग छोड़कर जा चुके हैं.

उपजा से जुड़े पत्रकारों ने की उपनिदेशक सूचना इलाहाबाद के निलंबन की मांग

इलाहाबाद : उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन उपजा से जुड़े पत्रकारो ने इलाहाबद कमिश्नर से मिलकर जनसंपर्क विभाग में तैनात उपनिदेशक सूचना आर.पी द्विवेदी को निलंबित करने की मांग की है.
इस संबंध में कमिश्नर को एक ज्ञापन भी सौंपा गया, जिसमें उपनिदेशक सूचना द्वारा पत्रकारों के साथ किये जा रहे पक्षपात पूर्ण व्यवहार व सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को मीडिया तक पहुंचाने से रोकने के बारे में जांच की मांग रखी गयी है. कमिश्नर ने कहा कि वह जल्द ही इस मामले में कठोर कार्रवाई करेंगे.
उन्होंने उपनिदेशक सूचना की कार्यप्रणाली जानकर आश्चर्य जताया और कहा कि सरकारी पदों पर बैठा व्यक्ति यदि ऐसा व्यवहार कर रहा है तो यह मामला काफी गंभीर है. उपजा इलाहाबाद इकाई के जिलाध्यक्ष राजीव चंदेल ने कमिश्नर से कहा कि उप निदेशक सूचना इलाहाबाद के कार्यव्यवहार से यहां मीडियाकर्मी त्रस्त हैं. मीडियकर्मियों के प्रति उनके पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण आम जनता के लिए प्रदेश सरकार द्वारा चलायी जा रहीं लाभकारी व कल्याणकारी योजनाएं मीडिया तक समुचित ढंग से नहीं पहुंच पा रही हैं. इस वजह से बड़ी संख्या में आम-आवाम सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी से वंचित है. पत्रकारों का कहना है कि सरकारी कार्यक्रमों, कमिश्नर, डीएम के दौरे, प्रेस कॉफ्रेंस, प्रेस रिलीज, जनकल्याणकारी योजनाओं व जीओ के बारे में जनसंपर्क विभाग पत्रकारों को सूचना नहीं दे रहा है. मीडियाकर्मियों द्वारा फोन करने के बाद कुछ पत्र-पत्रिकाओं को जानकारी दी जाती है. इस मामले में ज्यादातर मीडियकर्मियों के साथ पक्षपात व भेद-भावपूर्ण बर्ताव किया जा रहा है. 
इसके अलावा अखबारों की कटिंग विभागवार प्रेषित नहीं की जाती है. जिन विभागों की गलत कार्यप्रणाली व उसमें व्याप्त घोर भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए मीडियकर्मी खबरें लिख रहे हैं, उससे उस विभाग के खिलाफ जांच न बैठ जाए, इसके लिए जनसंपर्क विभाग में बैठे उपनिदेशक सूचना मैनेज करने का काम कर रहे हैं. विभागों की कार्यप्रणाली व भ्रष्टाचार उजागार करने वाली खबरों की कटिंग को उच्च अधिकारियों तक पहुंचने से रोकने के लिए उपनिदेशक सूचना ने बकायदा सेंडिकेट बना रखा है.
जिसके माध्यम से वह अपने चहेते अधिकारियों को बचाने का काम करते हैं, तथा ईमानदारी से कार्यकरने वाले विभागाध्यक्षों के खिलाफ आधारहीन खबरें लिखने के लिए अफवाह उड़ाने का कार्य करते हैं. 
संगठन मंत्री नागेंद्र सिंह ने कहा कि उपनिदेशक सूचना के तानाशाहीपूर्ण रवैये के कारण जनसंपर्क विभाग में सभी अखबारों की फाइलें नहीं लगायी जाती हैं, इसके लिए भी मीडियाकर्मियों को काफी परेशान होना पड़ता है. पिछले कई सालों से यहां तैनात उपनिदेशक सूचना पत्र समूहों व पत्रकारों के बीच पक्षपात व भेदभाव पूर्ण व्यवहार करते हैं तथा पत्रकारों के बीच राजनीति करने का काम कर मीडियाकर्मियों को आपस में लड़वाने का भी काम कर रहे हैं. 
उपजा के मंत्री रवि सिंह ने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों, वीवीआइपी व वीआइपी कार्यक्रमों के कवरेज के लिए पास जारी करने में भी उपनिदेशक सूचना द्वारा मीडिया कर्मियों के बीच भेदभाव व पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है. एक पत्र समूह के ही कई पत्रकारों का पास जारी कर दिया जाता है, जबकि अन्य पत्र-पत्रिकाओं, चैनल के पत्रकारों को पास जारी करने की वजाय उन्हें जनसंपर्कविभाग से भगा दिया जाता है. कई बार तो पास जारी करने में धन उगाही करने की शिकायत सामने आ चुकी है.
कमिश्नर को ज्ञापन सौंपने वाले उपजा पदाधिकारियों में जिलाध्यक्ष राजीव चन्देल, महांमंत्री कुन्दन श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष शशिकांत सिंह, वरिष्ठ उपाध्यक्ष परवेज आलम, उपाध्यक्ष अनुराग तिवारी, पंकज सिंह, संगठन मंत्री नागेन्द्र सिंह, मंत्री अमरदीप चौधरी, भूपेश सिंह, रोहित शर्मा, आय-व्यय निरीक्षक उमाशंकर गुप्ता आदि सम्मिलित थे. 
 
राजीव चंदेल 

Dainik Hindustan Advertisement Scam:Supreme Court adjourns final hearing

New Delhi : The Supreme Court of India adjourned the hearing on the final disposal matters relating to the Special Leave Petition (criminal) No. 1603 of 2013 of Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S The Hindustan Media Ventures Limited,New Delhi on November 11, 2013. The Bench of Hon’ble Mr. Justice H.L.Dattu and Hon’ble Mr. Justice V.Gopala Gowda adjourned the final argument as M/S Karanjawala & Co.,counsels for the petitioner,Shobhana Bhartia sought time in writing in the court. The respondent No.02, Mr.Mantoo Sharma(Munger,Bihar) was present in the court in person.His counsel Mr.ShriKrishna Prasad(Munger,Bihar) was also present and ready to argue in the court.
The Registrar orders to list the matter before the court :
The Hon’ble Justice Mr.Sunil Thomas, the Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept,19,2013, in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603/2013(Shobhana Bhartia Versus State of Bihar and Another), passed an order to list the matter before the Hon’ble Court as per rules. The Court of the Hon’ble Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept, 19,2013, ordered , “In view of the urgency expressed by the parties and service being complete, list the matter before the Hon’ble Court as per rules after the expiry of three weeks.” The Hon’ble Court also mentioned in the order,” The Respondent No.-02,Mantoo sharma, Party-in-Person, has filed the Counter-Affidavit.The Respondent No.01, Mr.Samir Ali Khan, Advocate, seeks three weeks’ time for filing the Counter-Affidavit.” It is worth mentioning that the Respondent No.01,Mr.Samir Ali Khan, Advocate is the Hon’ble counsel for the State of Bihar.
Mantoo Sharma files his counter-affidavit in Supreme Court
mantoo sharma : Mr.Mantoo Sharma, Respondent No.-02 in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603 of 2013, filed by the Shobhana Bhartia, the chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited(New Delhi), has filed his counter-affidavit in 315 pages in the Supreme Court on Sept, 16 recently. Mr.Mantoo Sharma is the informant in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011 in Bihar. Before filing his counter-affidavit, Mr.Sharma sent one set of the counter-affidavit to M/S Karanjawala & Co., Advocates for the petitioner, Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited, The Hindustan Times House, 18-20, Kasturba Gandhi Marg, New Delhi -110001 by the registered parcel and two sets of his counter – affidavit to the government lawyer of the Bihar government in the Supreme Court by hand.Four sets of the counter- affidavit were filed in the court of the Reistrar -II, Mr.Sunil Thomas.
The petitioner prays for the quashing of the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): The petitioner, Shobhana Bhartia has filed the Special Leave Petition( Criminal) No. -1603 of 2013 in the Supreme Court and prayed for the quashing of the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011, dated Nov.,18,2011 under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 read with Sections 420/471/476 of the Indian Penal Code Named accused persons in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): In the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011 in Bihar, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi)Shobhana Bhartia, the Chief Editor,Dainik Hindustan, Shashi Shekhar(New Delhi), the Regional Editor,Dainik Hindustan,Patna edition, Akku Srivastawa, the Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition,Binod Bandhu and the Publisher, ,M/S Hindustan Media Ventures Limited( Nw Delhi), Amit Chopra, have been accused of receiving the government money to the tune of about rupees two hundred crores illegally and fraudulently by obtaining and printing the advertisements of the Union and Bihar governments in the name of illegally printed and published Munger and Bhagalpur editions of Dainik Hindustan for a decade continuously in Bihar. The Munger police ,meanwhile, have submitted the Supervision Report No.01 and the Supervision Report No.-02 and have found all allegations “prima-facie true” against all the named accused persons including the principal accused Shobhana Bhartia (New Delhi) under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code. The historical order of the Patna High Court : The Hon’ble Justice of the Patna High Court, Justice Anjana Prakash, in her order, dated Dec 17,2012, in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012, refused to interfere in the police investigation and directed the Munger (Bihar) police to complete the investigation in the Kotwali P.S Case No. 445/ 2011 within the three months from the date of the order. 
 
Srikrishna Prasad

आगामी चुनाव में सोशल मीडिया की होगी भूमिका

रवि प्रकाश मौर्य : लंबे समय से चल रही उठापटक व कयासों के बाद अंतत: दिल्ली में ‘आप’ ने सरकार बना ली और मैगसेसे पुरस्कार विजेता व सामाजिक कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली. इससे अपने देश के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया. 
एक समय जब मिसाइल मैन व गैर राजनीतिक व्यक्ति एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने थे, तब भी इसी तरह की एक शुरुआत मानी गई थी लेकिन वे देश व समाज को एक नई दिशा इसलिये नहीं दे सके क्योंकि वह राजनीतिक फैसले नहीं ले सकते थे.
इसके बाद अगले राष्ट्रपति चुनाव में चर्चित लेखिका शोभा डे व अन्य विद्वानों ने इसी तरह गैर राजनीतिक व उद्योगपति एन नारायणमूर्ति को राष्ट्रपति बनाये जाने की चर्चा छेड़ी जबकि भाजपा ने फिर से कलाम को ही लाने की ‘चाल’ चली. यह क्रम कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी की एक जिद के चलते टूट गया. उन्होंने प्रतिभा पाटिल को देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनवाकर एक इतिहास रचा… लेकिन सिर्फ इतिहास ही रचा. अब एक बार पूरी तरह गैर राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता केजरीवाल दिल्ली की कुर्सी पर काबिज हुये हैं. यह एक तरह से ‘नेताओं’ के मुंह पर तमाचा भी है इधर कुल सालों वह यही सोचने-मानने लगे थे कि देश को चलाने का ‘ठेका’ बस उन्हीं के पास है. हालांकि राजनीतिक पंडितों को अब भी लगता है कि गैर राजनीतिक व अनुभवहीन लोग दिल्ली को कैसे चलायेंगे. शनिवार की दोपहर जब केजरीवाल व उनकी टीम ऐतिहासिक रामलीला मैदान में शपथ लेने जा रही थी, तब भी अधिकतर चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषक बार-बार यही चीजें दुहरा रहे थे. खैर, अब दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बन गई है और इसी के साथ ही 2014 में आगामी लोकसभा चुनाव की लड़ाई भी बेहद दिलचस्प हो गई है. भाजपा व कांग्रेस जैसी पार्टियों ने अभी से रणनीतियां बदलनी शुरू कर दी हैं तो मंझोली व छोटी-मोटी पार्टियों ने भी ‘गणित’ बैठानी शुरू कर दी है. ऐसे में सोशल साइटों पर चुनावी जंग देखने लायक होगी. 
इसी बीच एक खबर आई है कि दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया वेबसाइट फेसबुक की भारत और दक्षिण एशिया की पब्लिक पॉलिसी निदेशक अंखी दास ने आम आदमी पार्टी को ईमेल लिखकर ‘दिल्ली चुनाव में पार्टी की जीत में फेसबुक की भूमिका’ पर शोध की संभावना तलाशने की इच्छा जाहिर की है. उल्लेखनीय है कि अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल के लिए शुरू हुए आंदोलन में शुरुआती स्वयंसेवक फेसबुक के जरिए ही जुड़े थे. आंदोलन के फेसबुक पेज 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' की आंदोलन को धार देने में भी उनकी बेहद अहम भूमिका रही थी. यहां गौर करने वाली बात यह है कि अरविन्द केजरीवाल ने एक साल पूर्व आम आदमी पार्टी के गठन के बाद यही तरीका अपनाया और दिल्ली के चुनाव में वह कारनामा कर दिखाया जिसने स्वयं फेसबुक को भी अपना दीवाना बना लिया. आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे अंकित लाल भी दिल्ली में पार्टी की जीत में फेसबुक की अहम भूमिका मानते हैं. वर्तमान में फेसबुक के इस पेज से करीब साढ़े आठ लाख लोग जुड़े हैं जिनमें करीब दो लाख लोग सक्रिय हैं. यही नहीं, इस पेज से हर हफ्ते करीब साठ हजार नए लोग जुड़ रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि आगामी लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया मुख्य भूमिका निभाने वाली है. इसी को देखते हुये ही राहुल के निर्देश पर कांग्रेस ने अपनी वेबसाइट को नया रूप दे दिया है और नई टीम गठित की है तो भाजपा भी मोदी के नेतृत्व में व उनके निर्देश पर ‘सोशल वार’ की रणनीति बना रही है. एमसीए के छात्र 22 वर्षीय हितेंद्र मेहता बीजेपी की सूचना तकनीकी इकाई के एक सदस्य हैं. वह पार्टी के इंटरनेट टीवी चैनल ‘युवा’ का काम देखते हैं. हितेंद्र के सहकर्मी 35 वर्षीय नवरंग एसबी भी पार्टी नेताओं के मुख्य बयानों को ट्विटर और फेसबुक पर डालते हैं. हितेंद्र और नवरंग बीजेपी की 100 सदस्यों वाली उस इकाई का हिस्सा हैं जिसे पार्टी की विचारधारा को सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है. वहीं कई मुद्दों पर चोट खाने के बाद अब कांग्रेस को भी इस सोशल नेटवर्क का महत्व समझ में आ गया है. देश की सबसे पुरानी, सबसे बड़ी और शायद सबसे हठधर्मी राजनीतिक पार्टी ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में 10 सदस्यों वाली संचार और प्रचार समिति कमेटी भी बनाई है. उनके अलावा इसमें मनीष तिवारी, अंबिका सोनी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेंदर हड्डा, राजीव शुक्ल, भक्त चरण दास, आनंद अदकोली, संजय झा और विश्वजीत सिंह शामिल हैं. उनकी भी जंगी योजना तैयार हो चुकी है और अब मैदान में उतरने के लिए आला कमान की ओर से हरी झंडी मिलने का इंतजार किया जा रहा है.
कांग्रेस इसीलिये सचेत हुई क्योंकि उसने कई मौकों पर सोशल मीडिया को गंभीरता से न लेने की कीमत चुकाई. मसलन- अकबरुद्दीन ओवैसी के नफरत फैलाने वाले भाषण के यू ट्यूब पर तेजी से फैलने के बाद 8 जनवरी को ओवैसी की गिरफ्तारी, अण्णा हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जो 2011 में कई दिनों तक दुनिया में सबसे ऊपर रहने वाला ट्विटर ट्रेंड था और दिसंबर 2012 में दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ आंदोलन जिसने सोशल मीडिया के मंचों पर लोगों की टिप्पणियों से हवा मिलने के कारण व्यापक रूप ले लिया था. हाल ही जारी एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार लोकप्रिय सोशल साइट ट्विटर पर पर दस लोकप्रिय नेताओं में शशि थरूर, नरेन्द्र मोदी, मनमोहन सिंह, अजय माकन, सुषमा स्वराज, अरविन्द केजरीवाल, उमर अब्दुल्ला, सुब्रमण्यम स्वामी, डेरेक ओ ब्रायन, वरुण गांधी का नाम शामिल है. इसमें से शशि थरूर तो ट्विटर मंत्री के रूप में जमकर ख्याति बटोर चुके हैं. ये नेता कई बातें या योजनायें इन साइटों के माध्यम से ही सबसे पहले जगजाहिर करते हैं. यहां इस बात का भी जिक्र करना चाहूंगा कि इससे पूर्व कोलकाता में ममता बनर्जी ने भी सोशल मीडिया के जरिये ही अपने विरोधी को धूम चटाई थी. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पहली क्षेत्रीय पार्टी थी, जिसने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया. इसके पास तीन स्तरों वाली एक समर्पित टीम है. इन तीन स्तरों में पेशेवर, स्वयंसेवक व कार्यकतौ हैं जिन्हें मानदेय दिया जाता है. इस इकाई को डेरेक ओ ब्रायन ने गठित किया था जिसे तृणमूल युवा के नेता और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी चलाते हैं. यह इकाई पार्टी की वेबसाइट, ट्विटर और फेसबुक को संभालने का काम करती है. इस साल पार्टी की ओर से एक डिजिटल चैनल शुरू करने की भी योजना है. 
‘सोशल मीडिया की एजेंडा सेटिंग इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ से मिले ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में इस समय 13.7 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, 6.8 करोड़ फेसबुक एकाउंट हैं और 1.8 करोड़ ट्विटर आइडी हैं. वहीं भारतीय शहरों में सबसे अधिक इंटरनेट यूजर मुंबई (68 लाख) में हैं. इसके बाद आता है दिल्ली (53 लाख) का नंबर. इसके पीछे चेन्नै (28 लाख), हैदराबाद (24 लाख), कोलकाता (24 लाख), बंगलुरू (23 लाख), अहमदाबाद (21 लाख), पुणे (21 लाख) आदि महानगर हैं. वर्तमान में अधिकतर लोगों के लिए यह सूचना का पहला स्रोत बन चुका है. यही नहीं, सोशल मीडिया का सीधा असर मुख्यधारा के मीडिया पर पड़ रहा है. कई बार इसका प्रभाव इतना अधिक हो जाता है कि यह सामाजिक परिवर्तन का वाहक बन जाता है. दिल्ली में ‘आप’ की जीत भी इसी का नतीजा है. देखा जाये तो सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा असर युवा शहरी वोटरों पर होता है. नये वोटरों को जोड़ने की मुहिम में जो मतदाता संख्या बढ़ रही है, वह यही है. अभी तक चुनावों में इसी वोट ने पार्टियों को जिताया है. ऐसे में जब लैपटॉप-टेबलेट की बाढ़ आ रही है और सरकारें इसे मुफ्त में बांट रही हैं तब आगामी लोकसभा चुनाव में भी इसके मुख्य भूमिका निभाने की पूरी उम्मीद है. 

लखनऊ के पत्रकारों की ऐसी बेइज्जती तो मायावती ने भी नहीं की जैसी आज अखिलेश न कर दी

वाकई लगता है कि सपाइयों की विनाश काले विपरीत बुद्धि हो गई है. तभी तो इस पार्टी के नेता, मुखिया जो भी कहते करते हैं, वह सब उनके खिलाफ चला जा रहा है. मुजफ्फरनगर में ठंढ से बच्चों की मौत और उधर सैफई में ठुमके नाच महोत्सव से संबंधित खबर एनडीटीवी पर चलने के बाद सीएम अखिलेश यादव आज प्रेस कांफ्रेंस में एनडीटीवी वालों पर इतना बरसे कि सारे पत्रकार सकते में आ गए.

अखिलेश से ऐसे व्यवहार की किसी से अपेक्षा नहीं थी. एनडीटीवी के अनंत जनाने जब सवाल पूछने लगे तो अखिलेश यादव ने लगभग चिल्लाते हुए डांटा और बोले-  ''अरे तुम पीछे से आगे कैसे आ गए… तुम हो ही नहीं इस लायक कि तुमसे बात की जाए.. चलो जाओ पीछे.. भागो.. हटो…''

एनडीटीवी के कमाल खान से लेकर रुचि कुमार समेत कई पत्रकार इस प्रेस कांफ्रेंस में बैठे थे लेकिन कोई कुछ नहीं बोल सका. सभी चुप रहे. लखनऊ के पत्रकारों के बारे में पहले से ही कहा जाता है कि ये सब सत्ता पोषित व पालतू पत्रकार होते हैं जो व्यवस्था के आगे सवाल उठाने की हिम्मत नहीं रखते. डांट फटकार सुनने के बाद भी पत्रकारों को बेशर्मी दीखिए कि वे नाश्ता पकौड़ी आदि नहीं छोड़ पाए और अखिलेश के साथ उनका नमक खाने में जुटे रहे. एक महाशय तो यहां तक कह बैठे अखिलेश से कि आपने बिलकुल सही डांटा है, ये लोग इसी लायक हैं. देखें इस प्रकरण से संबंधित वीडियो… क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=FQf6hv7CX0U

इस समय दुनिया भर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कथित सबसे बड़ी लड़ाई वर्ल्ड बैंक और उसके पोषित एनजीओ लड़ रहे हैं

Dilip C Mandal : पिंक, ट्यूलिप और ओरेंज क्रांतियां यूरोप में भी हुई थी और अरब देशों में भी और फिलिपींस से लेकर पेरू तक में भी. किसने कराई ये क्रांतियां और फिर क्या हुआ, ये असहज सवाल हैं. आप तो हैप्पी हैं, है्प्पी रहिए. काश कि दुनिया में हर किसी को आप की मासूमियत और भोलापन नसीब हो.

काश कि हम भी यह मान सकें कि फोर्ड फाउंडेशन और आवाज और तमाम औद्योगिक घरानों द्वारा पोषित और रॉकफेलर फाउंडेशन (मैगसायसाय पुरस्कार के फंडदाता) द्वारा प्रशंसित यह एनजीओ 'क्रांति' देश की बहुसंख्यक जनता को खुशहाली की दिशा में ले जाएगीं. वैसे भी इस समय दुनिया भर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कथित सबसे बड़ी लड़ाई वर्ल्ड बैंक और उसके पोषित एनजीओ लड़ रहे हैं.

काश कि हम भी मान पाते कि इसका संचालक विचार यूथ फॉर इक्वेलिटी का फासीवाद नहीं, समानता और बंधुत्व की आदर्श परिकल्पना है. आप नए प्रशंसक है, हम पुराने आलोचक हैं. लोकपाल का हमारा विरोध प्रारंभ से अपनी निरंतरता में कायम है. लोकपाल हमारे लिए हमेशा लोकतंत्र के मुकाबले खड़ी प्लूटोक्रेसी है. घनघोर अभिजनवाद है. देश के राजनीतिक वर्ग ने अपने नकारेपन की वजह से इस 'क्रांति' के लिए स्पेस बना दिया है.

यह चीज देश में सूई की तरह घुसी है, तलवार बनकर निकलेगी. वैसे भी यह षड्यंत्र युग है और संदेह युगधर्म है. आप हैप्पी होने का धर्म निभाएं, हम संदेह करने का धर्म निभा रहे हैं.

इंडिया टुडे हिंदी के संपादक दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

खुद को ‘माननीय मंत्रीजी’ कहलाना मनीष सिसोदिया को पसंद नहीं

Manish Sisodia : आज का दिन कहीं बधाई देती जनता तो कहीं समस्या सुनाती जनता और कहीं काम न करने के बहाने ढ़ूंढ़ रहे अफसर तो कहीं काम करने का अवसर मिलने पर उत्साहित अफसरों से मिलने में बीता। जब भी कोई समस्या लेकर आता है और मैं किसी अधिकारी से फोन पर बात करना चाहता हूं तो मेरे ओएसडी की रटी-रटाई लाइन होती है- माननीय मंत्री जी, आपसे बात करेंगे। बार-बार टोकने पर भी उनकी आदत छूट नहीं रही है, उम्मीद है जल्दी छूट जाएगी।

हालांकि पटपड़गंज विधायक ऑफिस में बैठने वाले कुछ कार्यकर्ताओं को यह समझाना आसान नहीं है कि मंत्री बनने के बाद भी मुझे वैसी ही कुर्सी पर बैठना है जैसी कमरे में बाकी सबके लिए रखी है। कोई बात नहीं, अभी तो नई राजनीति बनाम पुरानी राजनीति की परंपराओं में यह टकराव चलेगा। लेकिन हैरत होती है ऐसे अधिकारियों से मिलकर जो साल भर से ज्यादा से अपने पद पर बैठे हैं, उनके ठीक नीचे व्यवस्था न सिर्फ ठप पड़ी है बल्कि सड़ चुकी है, लेकिन उन्हें उनका आभास भी है लेकिन माथे पर शिकन तक नहीं आती। उनकी सारी योग्यता महज कुर्सी पर बैठे रहने और बचाए रखने को समर्पित है।

अच्छी बात यह है कि इन सबके बीच बहुत सारे अफसर नई राजनीति को एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। कई तो आज ऐसे भी मिले जो बेताब हैं कुछ कर दिखाने के लिए। उन्हें पसंद आ रहा है कि आगे से उन पर भ्रष्ट नेताओं का नहीं बल्कि जनता का दबाव डालकर काम करवाया जाएगा। कल शिक्षा विभाग, राजस्व और शहरी विकास के अधिकारियों को उनके लेखा-जोखा के साथ बुलाया है। विकास के गुब्बारे के पीछे कुछ सवाल हैं, जिनका उत्तर मुझे ढ़ूंढ़ना है, जाहिर है, समाधान भी इन्हीं सवालों से निकलेगा- अगर हम स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा, साफ पानी और साफ-सुथरे शौचालय भी मुहैया नहीं करा सकते तो शिक्षा विभाग की जरूरत ही क्या है? अगर लोग गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं तो दिल्ली जल बोर्ड या फिर जल संसाधन मंत्रालय के अस्तित्व का क्या मतलब है? अगर हम इस ठंड में खुले आसमान के नीचे सोने वाले के लिए छत, बीमार के लिए इलाज और हर व्यक्ति को पीने के लिए पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाते, तो विकास का नारा किसके कानों तक पहुंचा है।

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया के फेसबुक वॉल से.

फोर्ड फाउंडेशन द्वारा मनीष सिसोदिया की संस्था को फंडिंग को आधार बनाकर केजरीवाल पर निशाना साधा जाना चाहिए?

Dilnawaz Pasha : फेसबुक पर एक लेख ख़ूब शेयर किया जा रहा है. इस लेख में अरविंद केजरीवाल को अमरीका का एजेंट बताया गया है और सबूत दिया है फोर्ड फाउंडेशन की फंडिंग का. केजरीवाल की फोर्ड फंडिंग के बारे में सबसे पहले Afroz ने BeyondHeadlines पर ख़बर की थी.

अफ़रोज़ की रिपोर्ट के मुताबिक फोर्ड फाउंडेशन ने मनीष सिसौदिया की संस्था कबीर को क़रीब 87 लाख रुपये का चंदा दिया था. यह चंदा साल 2010 से पहले दिया गया था. सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ फोर्ड फाउंडेशन की इस फंडिंग को आधार बनाकर अब केजरीवाल पर निशाना साधा जाना चाहिए? जो लेख शेयर किया जा रहा है उसकी भाषा मेल टुडे में शांति भूषण के नाम से प्रकाशित फ़र्ज़ी लेख से मिलती जुलती है.

बीबीसी में कार्यरत युवा पत्रकार दिनवाज पाशा के फेसबुक वॉल से.

जो पत्रकार बनना चाहते हैं, उन्हें पहले तो बेचारा नहीं होना चाहिए

Vikas Mishra : फेसबुक पर चैट बॉक्स अचानक खुलता है- सर प्रणाम…। जवाब-नमस्कार क्या हाल है..। सर बढ़िया हूं, आप कैसे हैं। जवाब- बढ़िया। चैट बंद। महीने में 15 बार यही सवाल यही जवाब..। फिर एक एक्स्ट्रा सवाल- सर भूल गए क्या हमको। जवाब- नहीं भाई। सर आपका आशीर्वाद चाहिए था। फिर कभी फोन पर मैसेज- सर प्रणाम। आपके चरणों में रहकर आपका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता हूं। एक मौका दीजिए आपके निर्देशन में काम करना चाहता हूं।

कभी फोन पर- सर प्रणाम, डिस्टर्ब तो नहीं किया, सर अपनी शरण में ले लीजिए।…दूसरा फोन–सर आपका आशीर्वाद मिल जाए तो तर जाऊंगा…। तीसरा फोन–सर प्रणाम.. आप चाहें तो क्या नहीं हो सकता है…। अगला फोन– सर एक कुछ कर दीजिए, जिंदगी भर आपकी शरण में रहूंगा। जिंदगी भर एहसान मानूंगा…। ये बानगी है फेसबुक पर चैट, मोबाइल पर बातों और मैसेज का।

कभी कभी मन कचोट जाता है कि ये नई पीढ़ी इतनी बेचारी क्यों हो जाती है किसी से नौकरी की बात करने में। क्यों 'सर' लोगों के डिस्टर्बेंस की इतनी चिंता करती है। मकसद है पत्रकार बनना… पत्रकार बनकर सरकार हिला देना, लेकिन 'सर' से बात करने में खुद ही हिले नजर आते हैं। किसी की भी बात में कोई दावा नहीं होता। विनम्रता की पराकाष्ठा पर जाकर बात करते हैं, इतना विनयशील कोई पत्रकार हो नहीं सकता। जानता हूं कि कुछ सर ऐसे हैं, जो फोन उठाते ही डांट सकते हैं। कह सकते हैं कि फोन मत करना। लेकिन इंडस्ट्री में ऐसे भी सीनियर हैं जिनसे कई लोगों ने बहस की और नौकरी भी पाई।

मैं कहना चाहता हूं कि जो पत्रकार बनना चाहते हैं, उन्हें पहले तो बेचारा नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता में कदम रखने वाले साथियों से कहना चाहता हूं कि पहले पूरी तैयारी कर लीजिए। फिर सोचिए यहां आने की। मीडिया के क्षेत्र में जंगल का कानून चलता है। यहां वही टिकेगा, जिसमें दम होगा। जैसे जंगल में वही हिरन सुरक्षित है, जो शेर, चीते, गीदड़, लकड़बग्घे से तेज दौड़ सकता है। कई नए साथियों को टेस्ट के लिए बुलाया, लेकिन ठीक से चार लाइन हिंदी भी नहीं लिख सकते। अब किस बिना पर आशीर्वाद 'दे' दें। आशा है कि नए साल में मेरे नए साथी नौकरी के लिए दावे के साथ फोन करेंगे। पूरी तैयारी के साथ। हिंदी अच्छी होनी चाहिए। टाइपिंग स्पीड अच्छी होनी चाहिए। बिल्कुल उसी तैयारी की साथ, जैसे कोई फौजी हथियारों से लैस होकर सीमा पर जाता है। मुझसे जितना बन पाता है कोशिश करता हूं। कई बार कामयाब तो कई बार नाकाम। 2013 में जितना हो सका किया, 2014 में भी कोशिशें जारी रहेंगी।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

AAMRAN ANSHAN (Hunger Strike) by Cinema & Television Artistes’s

Dear Sir/Madam, This is to inform you that I am Arif Sheikh, member of CINTAA ( Cinema & Television Artistes Assocition). I am starting HUNGER STRIKE (AAMRAN ANSHAN) from 7 am, 30th december,2013 at CINTAA TOWER, model town, 4 bunglow, Andheri (W). (Landmark-beside Kokila ben hospital.)

We are artistes working in various television serials and films. We are facing many problems due to non implementation of proper guidelines issued by CINTAA & FEDERATION. The survival of an artistes become very difficult now-a-days. We are dedicated our life to the ART. We are performing every emmotion of the life for the entertainment of people. We make them LAUGH and HAPPY.But we are CRYING.

We have no food to eat, no place to live, and no money for treatment. Becoz we are not getting payments on time.

Our association CINTAA is not interested to solve our problems and resolve those important issues, which deeply affects our life. We tried alot for years to make them convince. but they responded like a deaf. Finally we decided to take a hard step which shown by Mahatma Gandhi, Anna Hazare. We commited to Hunger stirke till death. We raised our voice…Plz support us to make our condition better.

Our DEMANDS are……

1. When artistes are approched for shooting, they spend ther own money to reach the destination and after shooting for come back to their places. This travelling allowance is called "CONVEYANCE" in our medium. We are investing our money for the interest of Producer's proffit.
we demand minimum Rs 500 amount as conveyance for the character artistes and "cameo".

2. After executing our job as an actor, we do not get any money. Becoz producers are stricked to payment after 90 days rule. And after 90 days, artist start another struggle for his own payment.
We demand our remunaration must be paid on time well within ONE WEEK. This issue of early payment is pending from a long time, more than 10 years.

3. Artistes are facing problems due to the so called "CO-ORDINATORS". If they get them job through co-ordinators…they have to pay 30% of thier payment to them.. which was shared by casting directors also. The production houses avoiding direct casting. Due to ill-practice, Artistes become jobless. They do not have money………so how can they pay Rs 900 as thair annual membership fee of CINTAA.

CINTAA cancled their membership becoz of non-paymet of fee on TIME. Many seniors artistes are thrown out from our association CINTAA. That shown DECTATERSHIP. We demand, they will get their membership again by paying their due annual membership fee.

4. CINTAA is the trade union of the artistes (Regd-3086). which established for " to the safeguard of the interset of the Artistes". CINTAA is an association of more than 8000 members includint BIG STARs. We want the transparancy in decision making in CINTAA committee.If somebody raise their voice or ask any question related to the artistes, than committe show hippocratic attitude to issue them "SHOW CAUSE NOTICE". Is it crime to ask question to committee members.Becoz of this reason they got suspension. Is it JUSTIFIED?

We demand the cancelation of show cause notice issued to the members and suspension.

We have right to protest. And we are protesting for our rights.
Plz show us solidarity by giving ur support.

Thanking you


Arif Sheikh
Cintaa no.-6167
mo.no.-9699342680
sheikharif09@gmail.com
Freelance Actor
Film industry
Mumbai.
 

दुनिया भर में इस साल काम के दौरान मारे गए सत्तर पत्रकार

न्यूयार्क : पत्रकारों की रक्षा से जुड़ी एक समिति के अनुसार इस साल दुनिया भर में कम से कम 70 पत्रकार काम के दौरान मारे गए. इनमें सीरिया में गृहयुद्ध की रिपोर्टिंग करते समय मारे गए 29 पत्रकार और इराक में मारे गए 10 पत्रकार शामिल हैं. ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ के अनुसार सीरिया में मारे गए पत्रकारों में अपने गृहनगरों में चल रहे संघर्ष की रिपोर्टिंग कर रहे कई नागरिक पत्रकार, सरकार या विपक्ष द्वारा मान्यता प्राप्त मीडिया संगठनों के लिए काम कर रहे प्रसारक और विदेशी प्रेस के कुछ संवाददाता शामिल हैं.

मारे गए विदेशी प्रेस के संवाददाताओं में अल जजीरा के रिर्पोटर मोहम्मद अल मेसलमा का नाम शामिल है जिन्हें एक बंदकूधारी ने गोली मार दी थी. मिस्र में छह पत्रकार मारे गए. इनमें से आधे से अधिक पत्रकार राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को सत्ता से हटाने का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर सरकारी सुरक्षा बलों द्वारा 14 अगस्त को की गयी कार्रवाई की रिपोर्टिंग करते समय मारे गए.

समिति के उपनिदेशक रुपर्ट मैहोने ने एक बयान में कहा, ‘‘पश्चिम एशिया पत्रकारों के लिए मौत का मैदान बन गया. जहां कुछ जगहों पर काम के दौरान मारे जाने वाले पत्रकारों की संख्या में कमी आयी वहीं सीरिया के गृहयुद्ध और इराक में दोबारा शुरु हुए सांप्रदायिक हमलों ने निराशाजनक रुप से यह संख्या बढ़ा दी.’’ उन्होंने कहा, ‘‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सभी सरकारों और सशस्त्र समूहों से संवाददाताओं के नागरिक के तौर पर स्तर का सम्मान करने और पत्रकारों के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए कहना चाहिए.’’ न्यूयार्क स्थित यह समिति 1992 से संवाददाताओं और प्रसारकों की मौतों पर नजर बनाए हुए हैं.

अल्जजीरा चैनल के तीन पत्रकार काहिरा में गिरफ्तार

काहिरा : मिस्र की पुलिस ने टेलीविजन चैनल अल्जजीरा के तीन पत्रकारों को यहां गिरफ्तार कर लिया। इनमें टीवी नेटवर्क काहिरा के ब्यूरो प्रमुख मुहम्मद फादेल फाहमी तथा बीबीसी के भूतपूर्व संवाददाता पीटर ग्रेस्ट शामिल हैं। मिस्र के गृह मंत्रालय ने बताया कि इन पत्रकारों ने प्रतिबंधित मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ बैठकें की थीं। पिछले सप्ताह मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित किया गया था। ऐसा समझा जाता है कि अल्जजीरा के संवाददाताओं को कल रात गिरफ्तार किया गया।

काहिरा के एक होटल के कमरे से इनके कैमरे तथा अन्य सामग्री को जब्त कर लिया गया। गृह मंत्रालय के वक्तव्य में कहा गया है कि इन लोगों के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा को क्षति पहुंच रही थी। पर्यवेक्षकों का कहना है कि मुर्सी के हटाये जाने के बाद कई इस्लामी चैनल बंद कर दिये गये थे। इनके साथ काम कर रहे अस्थाई पत्रकारों को नजरबंद कर दिया गया था। ताजी गिरफ्तारियां मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थकों के साथ टकराव के बाद की गयी हैं। काहिरा तथा अन्य स्थानों पर हिंसात्मक संघर्ष में तीन व्यक्त मारे गये।

ये यशवंत कौन है! ओम थानवी का चम्पू!

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र ग्रोवर ने आज अपने एफबी वॉल पर कुछ लिखकर प्रकाशित किया. जीएसटीवी वालों ने ग्रोवर साहब का एक इंटरव्यू किया, मुद्दा नामक कार्यक्रम को लेकर, उसी से संबंधित पोस्ट. इसमें मेरा यूं जिक्र किया कि मैंने ग्रोवर साहब का इंटरव्यू लेने की सिफारिश जीएसटीवी की दिल्ली टीम से की. इस स्टेटस पर अचानक कृष्ण कल्पित नामक शख्स अपने फेसबुक नाम कल्बे कबीर नाम से कूद पड़ते हैं और पूछ बैठते हैं कि ''ये यशवंत कौन है, ओम थानवी का चंपू!''

इसके बाद यशवंत, सुरेंद्र ग्रोवर, कृष्ण कल्पित उर्फ कल्बे कबीर और ओम थानवी में रोचक फेसबुकिया वार्तालाप चला. आप भी पढ़िए और सर्दी के मौसम में थोड़ा मुस्कराइए… जय हो.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Surendra Grover : अब तक दूसरों के ही साक्षात्कार रिकॉर्ड करता रहा था. भाई Yashwant Singh की सिफारिश पर आज GS News के "मुद्दा" कार्यक्रम के लिए शुचि ने मेरा साक्षात्कार किया.. विषय था केजरीवाल का मिशन 2014.. यह कार्यक्रम टाटा स्काई के चैनल 894 पर शाम 8.30 पर देखा जा सकेगा.. देख कर बताईयेगा कि मुझे ऐसे कार्यक्रमों का हिस्सा बनने की तमीज़ है या नहीं..

Kalbe Kabir ये यशवंत कौन है ! ओम थानवी का चम्पू !

Surendra Grover Kalbe Kabir जी, Yashwant Singh भड़ास के संपादक…
        
Kalbe Kabir 'एक शराबी की सूक्तियां' के लिए यह आदमी मेरा प्रशंषक था ! बिना किसी रॉयल्टी के इसे 'भड़ास' में छापने की अनुमति दी । फिर ओम थानवी के कहने से या मेरा खिलाफ छापता है ! इसकी रजपूती पर मुझे शक है !
         
Surendra Grover इतना बुरा इन्सान नहीं है यशवंत कि उसके राजपूत होने पर कोई शक हो.. हो सकता है कि कुछ गलतफहमी उपज गई हो.. और हाँ, यह अपने मन का राजा है.. किसी के कहे सुने से इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता..
 
Yashwant Singh Kalbe Kabir ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से 🙂
          
Surendra Grover Kalbe Kabir आपसे छोटा सा निवेदन है कि मेरी वाल को पानीपत के मैदान में न बदले..
 
Kalbe Kabir तुमसे क्या इर्ष्या करूँ , यशवंत ! तुम मिर्ज़ा ग़ालिब तो हो नहीं !
 
Yashwant Singh अरे सर Kalbe Kabir, मैं ओम थानवी से आपकी ईर्ष्या की बात कर रहा था, मैं तो आपका बच्चा हूं… 🙂
 
Kalbe Kabir उस मूर्ख मक्कार से मैं क्या इर्ष्या करूँगा जो जयपुर में मेरे पाँव छूता था !
 
Yashwant Singh लेकिन Kalbe Kabir सर, आप को तो लगता है कि ओम थानवी का भूत सताता है … तभी बेमौसम बरसते रहते हैं… यहां पोस्ट कुछ लिखा है ग्रोवर साहब ने और पहला कमेंट आपका कुछ आया है.. इसी से लगता है कि थानवी जी के प्रति ईर्ष्या तू न गई कल्बे कबीर साहब के मन से… और, थानवी से आपके ईर्ष्या में पिस रहा है बेचारा यशवंत, वह भी इसलिए कि उसने एक बार थानवी द्वारा लिखे गए वाल पोस्ट को भड़ास पर प्रकाशित कर दिया, जिसमें थानवी ने आपकी कोई आलोचना वालोचना कर दी थी… ये तो बड़ी नाइंसाफी है रे भाई..
 
Arun Kumar Jha ये लीजिए! भाई जी को…क्या हो गया. दूसरे को तमीज सिखाने का काम करते करते खुद आप अपनी तमीज के बारे हम सब से पुछ रहे है. मामला जरूर गंभीर हो गया है.
 
Om Thanvi जो राजपूत के असली-नकली होने के जातिवादी भंवर में फंसा हो, संवाद में चम्पू के प्रयोग तक गिर जाए, सीबीआई ने जिसे रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ कर हथकड़ी लगाई हो, याददाश्त का हाल यह हो कि जिनसे मदद की गुहार की उनके बारे में कहता हो कि वे उसके पाँव छूते थे, जो अपना मौलिक कविनाम तक न सोच पाया हो (और तब के जाने-माने गीतकार कानदान कल्पित से उड़ा लाया हो), फिर भी अपने आप को पार्थ, सार्त्र और कबीर कहते हुए सीधे मिर्ज़ा ग़ालिब से ईर्ष्या योग्य समझता हो, तो आपको मान लेना चाहिए कि बंदे का दिमाग पटरी से उतरा हुआ है। उसके साथ ऊर्जा का नाश उचित नहीं। Yashwant Singh यह मित्रवत राय है।

Yashwant Singh ये वो पोस्ट है जिसको पढ़कर कृष्ण कल्पित मुझे दुश्मन मान बैठे हैं… आप लोग भी पढ़िए… पर आज सच में लगा कि उम्र बढ़ने के साथ कृष्ण कल्पित उर्फ Kalbe Kabir का दिल नहीं बड़ा हो सका… वरना इतने छोटे छोटे झगड़ों, आलोचनाओं को दिल से लगाकर नहीं बैठते… अब तो बड़े बन जाइए सर 🙂 कृष्ण कल्पित की कविता पर ओम थानवी ने जताई आपत्ति तो शुरू हो गई ऐसी-तैसी
http://www.bhadas4media.com/article-comment/16140-2013-11-27-10-34-33.html

Kalbe Kabir राजपूत होते तो yashwant इतना रायता न फैलाते… मुझे शक है तुम्हारे राजपूत होने पर…

Yashwant Singh सर किसने कह दिया कि मैं राजपूत हूं… मैं दलित हूं… रायता फैलाने का काम तो आप लोग करते हैं… हम लोग तो उसे बुहारने, झाड़ू लगाने का काम करते हैं…

Surendra Grover मुझे यह कत्तई अच्छा नहीं लग रहा कि मेरी वाल पर इस तरह की गतिविधि हो रही है.. इसलिए मैं वह सारे कमेन्ट डिलीट कर रहा हूँ जिनसे कि मेरी वाल की गरिमा नष्ट हो रही है..

Kalbe Kabir तुम भी उन लोगों से मिल गए लगते हो ग्रोवर ! कोई बात नहीं ! सवा लाख से एक लडाऊं !

Yashwant Singh हा हा हा… बचिए ग्रोवर साहब Kalbe Kabir की मार से…

Surendra Grover आपको मेरी वाल पर किसी से लड़ने का अधिकार नहीं है Kalbe Kabir

Kalbe Kabir तुम्हारी गरिमा अब ओम थानवी और यशवंत बढ़ाएंगे । नमस्कार !


Yashwant Singh : मैं जाति को लेकर भ्रम दूर कर देना चाहता हूं… मेरे नाम में भले ही सिंह लगा है पर मैं हूं दलित जाति का… कृपया कोई मुझे राजपूत, क्षत्रिय, बाबू साहब आदि इत्यादि समझकर मेरे बारे में कोई धारणा या नतीजा या आग्रह या दुराग्रह या सोच न बनाए… और, न इसके आधार पर रायता फैलाए…. जय हो…

    ठा. कृष्ण प्रताप सिंह ?
 
    Ashish Sagar Dixit स्वागत आप दलित भी है तो कमाल के है …अच्छे इंसान है
 
    Manish Soni dalit ki jai ho.
   
    Asad Jafar इस घोषणा का कारण यसवंत भाई
    
    Ashok K Sharma दलित सिंह के चरणों में दलित ब्राह्मण का प्रणाम I आओ मिल कर दलित बनाएं..
     
    Acharya Sushil Gangwar Are mere bade bhai aap ye kya kah rahe ho aaj ke samaaj me jaati vaati ko hum logo ko to nahi manna chahiye .. chahe aap Dalit hai hai to hamare bade bhai na ..
     
    Fareed Shamsi Bhai jati se kiya hota insan to apne kamo se phechana jata hai
     
    Himanshu Dwivedi मंडल जी को जरूर स्पष्ट कर दें ! बाकी तो ज्यादा लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप राजपूत हो या दलित ! लोग आपके विचारों को पसंद / नापसंद करते हैं !
     
    ब्रजभूषण झा ये बता दीजिये कि इंसान कैसे हैं???
     
    Asad Jafar तो हम कटे दलित का भी प्रणाम स्वीकार करे
     
    Ashish Pradip Main Daal-it hoon downtrodn Tuar Daal ke rate se
     
    Shailesh Bharatwasi जय हो
     
    Ankit Sharma Yashwant Singh…..जात न पूछो…..पूछ लीजिये ….
     
    Anil Sakargaye तो ,,,,,,,,,,,,,,,,,???? अपुन को क्या ,,,,,,
     
   गौरव कुमार Log Jaati ki baate Karte hi kyu hai. Aur aap kisi ko Safai Dete kyun hai
     
    Ashutosh Sharma किसी ने जाति और नाम के नाम पर टेंसन दे दी क्या। अगर सामने हो तो आप उसके कान के नीचे दे दो और अगर फेसबुक पर हो तो कुछ देर को मर्यादा की गिलौरी मुंह में धर के कीबोर्ड के माध्यम से ही उसकी सोनिया प्रियंका कर दीजिये भाई। just simple
     
    Vivek Rai Comrade aur jaatiwadi ( dalit) oxymoron lagta hai
     
    Narendra Mishra Jati n Puchho Saadhu k,Puchh Lijio Gyaan… Bhaai Yashwant G.. Aap aisa n Likhen.. Q k Kisi ne Saayad Aapse nhi Puchha hoga.. Vidwta ki jaati nhi.. Sir G.
     
    Shravan Shravan शानदार पोस्ट ! बधाई !
     
    Harish Singh Thik hai babu saheb.
 
    Mukund Hari Shukla जात न पूछो साधु की …
 
    Ashok K Sharma वस्तुतः बुद्धिजीवी सारे ही दलित हैं, अछूत हैं, मेरे भाई !

    लेखक अछूत है
    चाहता है, फूंक दे
    धन्ना सेठों और स्वयंभू सवर्णों की ये दुनिया
    मगर मजबूर है
    ताकत कहाँ है कलम में इतनी,
    कागज़ तक जला नहीं पाती
    लेखक अछूत है
    सिमटा हुआ अपनी ही दुनिया में
    दूसरों के घरों में जलते दीयों से ताप कर,
    मिटा लेता है ठिठुरन
    क्या ठाठ है
    सपने में पकवान भी है खाता
    अभाव के स्वर्ग में जीकर है मर जाता
    लेखक अछूत है
    जिसकी क्षमताओं, इच्छाओं से होता आया है
    सदा से बलात्कार
    शोषण के सौदे में लेखक ही बिका है हर बार
    ये साले अभिजात्य अफसर, ये साले नेता
    और उनके दल्ले
    भरते रहते हैं, एक दूसरे के गल्ले
    शतरंज की बिसात पर भिड़ते हैं हम निठल्ले
    खुद की नाकों को इंची टेप से नाप
    इठलाते हैं, लगाकर ऊचे होने का गणित
    पीठ पीछे कहलाते हैं हम सभी दलित
    -अंकुश
    (स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जब सूचना निदेशक थे, तब उनके मेरठ भ्रमण पर एक दलित लेखक ने सर्किट हाउस के लॉन में कहा कि आप ऊंची जाति के लेखक हैं तब यह कविता लिखने की प्रेरणा मिली थी.)
 
    Yashwant Singh एक महोदय हैं कृष्ण कल्पित उर्फ Kalbe Kabir जो मेरे राजपूत होने के भ्रम में मुझसे जाने क्या क्या उम्मीदें लगाए बैठे थे पर मैंने उन्हें आज अपनी असलियत बता दिया… और, सोचा कि आप लोगों को भी बता दूं…

    Kuldeep Bhardwaj वाइज़ से फ़राज़ अपनी बनी है न बनेगी
    हम और तरह के हैं जनाब और तरह के।
    #Faraz"
 
    Brahmaveer Singh theek baat hai singh sahab
 
    Kalbe Kabir दुनिया में दो ही जातियाँ होती हैं । अच्छा मनुष्य और घटिया मनुष्य ।
    यशवंत मुझे दूसरी श्रेणी का लगता है !
 
    Vishwakarma Harimohan जात -कुजात देखे नहीं कोय
    हरि को भजे सो हरि का होय.

    जय राम जी की
 
    Navdeep Kumar जय जय
 
    Anil Sakargaye अच्छे अच्छे तो निकल लिए ,,,,,,,,,,,कबीर रसखान गांधी ,,,,इत्यादि
   
    Kalbe Kabir मैं प्रथम था और प्रथम रहूँगा ! इसमें बधाई की बात कहाँ से आ गयी !
    
    Anil Sakargaye haa haa ,,,,,,,,,badhayi issi baat kii hai prabhu
    
    Yashwant Singh Kalbe Kabir सर. जी … ठीक कहते हैं… मैं घटिया कैटगरी का ही हूं… क्योंकि अगर घटिया न होंगे तो अच्छी वाली कैटगरी भला कैसे बनती और फिर आप उस कैटगरी का कैसे कहलाते… 🙂
    
    Sunder Kumar Jha aap hai wha jaati mayne nhi rakhti
 
    Sudhir Mandelia Bahut khusi hui
   
    Bharat Doshi kaun murkh puchh raha jati ,tulsi ki chat…
    
    पंकज कुमार झा झूठ…सरासर झूठ. 🙂
 
    Ashish Verma bahut hi badhiya aur sarahniy apni sachhai kisi ko batana bahut badi baat h varna yaha to log apni jaat chhupate firte h.

   Rajeev Gupta sirf likh dene se sher bakri nahi ho jaata…. singh likhne ka matlab he ha paidaisi sahab

    Anil Sakargaye प्रथम था ,,,(भूतकाल ) प्रथम रहूँगा ( भविष्य काल ) … तब आप वर्त्तमान में क्या है ,,,,? क्या वर्त्तमान में आप का ,,प्र ,,,थम गया ,,?

जिया न्यूज की हालत खराब, विवेक सत्य मित्रम का इस्तीफा, सैकड़ों स्ट्रिंगर पैसे को मोहताज

जिया न्यूज में एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत विवेक सत्य मित्रम के बारे में सूचना है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. बताया जाता है कि विवेक कम्युनिकेशन और ब्रांडिंग एजेंसी ब्लू बज मीडिया प्राइवेट लिमिटेड में बतौर मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ नई पारी की शुरुआत करेंगे. वे एक वेब पोर्टल, एक यूथ लिट्रेरी मैग्जीन आदि की शुरुआत करेंगे. अपने एफबी वॉल पर विवेक सत्य मित्रम ने जिया न्यूज को अलविदा कहने की घोषणा कर दी है. वे लिखते हैं…

''Its my birthday tomorrow, So I thought there should be something New and Special. So, Here it is. Good Bye JIA News!!! going to do lots of things with new year. Joining Blue Buzz Media PVT LTD (Communication and Branding Agency) as Managing Director & CEO. launching a news portal "सवाल देश का.com", Launching a Youth Literary magazine very soon and will elevate my existing youth portal "AdviceAdda.com". I need your wishes, I will definitely miss my Assignment Team….All of you. really, very much.''

बड़े तामझाम के साथ शुरू हुए इस चैनल को लेकर लम्बे चौड़े वायदे किये गए लेकिन कुछ लोगों का कॉकस चैनल को बर्बादी की तरफ ढकेल चुका है. इस चैनल पर सोशल एक्टिविस्ट खुर्शीद अनवर को खुदकुशी की तरफ ढकेलने को लेकर मुकदमा दर्ज करने के लिए शिकायत पुलिस को की जा चुकी है. अपने लोगों को लाने के चक्कर में यह कॉकस चैनल से कर्मठ और अच्छे लोगों को प्रताड़ित कर छोड़ने को मजबूर कर रहा है.

उधर, पांच महीने से इस चैनल के स्टिंगरों को एक फूटी कौड़ी तक नहीं दी गई है. पैसे की बात जब स्ट्रिंगर लोग अपने वरिष्ठों से करते हैं तो उनसे अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है. इस चैनल के करीब 200 स्टिंगर पैसे पैसे को मोहताज़ है. सस्थान के बड़े लोग पार्टी में शराब पी कर नव वर्ष का स्वागत करने में मशगूल होंगे तो स्टिंगर पेट की भूख को शांत करने के लिए दो जून की रोटी जुटाने में परेशान होगा.

जिया न्यूज से जुड़े एक स्टिंगर द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

एचबीएन डेयरी एंड एलाइड HBN Dairies and Allied Ltd. ने छत्तीसगढ़ में सैकड़ों लोगों को लूटा, रमन सिंह ने दिए कार्रवाई के निर्देश

रायपुर : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि अवैध चिटफंड कंपनियों को राज्य में किसी भी हालत में पैर पसारने नहीं दिया जायेगा. एचबीएन डेयरी एंड एलाइड लिमिटेड एवं एचबीएन फूड्स लिमिटेड की शिकायत लेकर गये पीड़ितों और प्रतिनिधियों को मुख्यमंत्री ने कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया. मुख्यमंत्री ने एचबीएन के जमाकर्ताओं की शिकायतें सुनी.

प्रतिनिधिमंडल में पीड़ितों के साथ गये छत्तीसगढ़ पिछड़ा वर्ग संगठन के लोगों ने एचबीएन कंपनी के बारे में बताते हुए कहा कि जमाकर्ताओं ने खून-पसीने की कमाई इस कंपनी में लगाई है. पॉलिसी मैच्योर होने के बाद भी कंपनी के लोग जमा रकम वापिस नहीं कर रहे हैं. आशंका है कि कंपनी के लोग गाढ़े पसीने की कमाई लेकर फरार हो गये हैं. राजेन्द्रनगर थाने में पीड़ित लोगों ने शिकायत की है. एफआईआर दर्ज करने के बाद भी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है.

मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को विश्वास दिलाते हुये कहा कि राज्य पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है. पुलिस अधीक्षक को इस प्रकरण में और ज्यादा तत्परता से जांच करने के निर्देश दिये गये हैं. उन्होंने कहा कि अवैध चिटफंड कंपनियों के बारे में मिल रही शिकायतों की गंभीरता से जांच होगी और किसी भी दोषी व्यक्ति को बख्शा नहीं जायेगा.

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद एचबीएन के इन निदेशकों की तलाश छत्तीसगढ़ पुलिस ने शुरू कर दी है.. सुखजीत कौर Sukhjeet Kaur – Director, हरमेंदर सिंह सरान Harmender Singh Sran – Director, सतनाम सिंह रंधावा Satnam Singh Randhawa – Director, अमनदीप सिंह सरान Amandeep Singh Sran – Director, गजरात सिंह चौहान Gajraj Singh Chauhan – Director, मनजीत कौर सरान Manjeet Kaur Sran – Director, जसबीर कौर Jasbeer Kaur – Director, राकेश कुमार तोमर Rakesh Kumar Tomar – Director, सुखदेव सिंह ढिल्लन Sukhdev Singh Dhillon – Director

उल्लेखनीय है कि ये वही ग्रुप है जिसने एक जमाने में सीएनईबी न्यूज चैनल शुरू किया था. बाद में चैनल को बंद करके भोजपुरी म्जूकि चैनल शुरू कर दिया जो आज भी चल रहा है. साथ ही पंजाबी व अन्य कई चैनल भी चलते हैं. अमनदीप सरान इसके हेड हैं.

चिटफंडियों द्वारा लूटे गए लोगों को शिकायत सुनते रमन सिंह.
चिटफंडियों द्वारा लूटे गए लोगों को शिकायत सुनते रमन सिंह.

रायपुर में एचबीएन कंपनी के डायरेक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किये जाने के बाद राज्य के दूसरे शहरों में भी जमाकर्ताओं में हड़कंप मच गया है. अन्य शहरों में भी कंपनी की ओर से मैच्योर पालिसी धारकों को भुगतान समय  पर नहीं किया जा रहा है. ऐेसे में जमाकर्ता अपनी रकम वापस लेने के लिये चक्कर काट रहे हैं. कंपनी के कई शहरों के ब्रांच कार्यालयों में जिम्मेदार अधिकारियों के नहीं मिलने से लोगों को आशंका है कि कहीं कंपनी भाग न जाये. खबर है कि पुलिस और प्रशासन ने रायपुर में दफ्तर सील किये जाने के पश्चात महेन्द्रगढ़ और महासमुंद में भी कार्रवाई शुरू कर दी है. वहां के दफ्तर सील कर दिये गये हैं. कंपनी से जुड़े लोगों और जमाकर्ताओं के बारे में पूरी जानकारी मांगी गई है. रायपुर में बैंक खातों का भी पता लगाया जा रहा है. मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में पुलिस और प्रशासन को ऐसी कंपनियों पर पैनी निगाह रखने के निर्देश दिये गये हैं. प्रतिनिधि मंडल में कुबेर सपहा, नवरतन जैन, चरणजीत सिंह सलूजा, विजय चंद्राकर के अलावा एचबीएन कंपनी के कई पीड़ित शामिल थे.

एचबीएन डेयरी एंड एलाइड के खिलाफ भले ही रायपुर पुलिस ने जालसाजी, धोखाधड़ी और गबन के मामले में जुर्म दर्ज कर लिया है लेकिन अब भी कई और कंपनियों के जमाकर्ता अपने रुपये वापस पाने के लिये भटक रहे हैं. पॉलिसी मैच्योर होने के बाद भी कई महीने तक जमाकर्ताओं को इंतजार करना पड़ रहा है. तीन महीने पहले पुलिस मुख्यालय ने निर्देश जारी किये थे कि आम लोगों से विभिन्न स्कीमों के नाम पर नकद रकम जमा कराने वाली कंपनियों के बारे में थानेवार जानकारियां एकत्रित की जायें. इन कंपनियों के कर्मचारी व अधिकारी से लेकर उनके कर्ताधर्ता का पूरा रिकॉर्ड रखा जाये. यदि ऐसी कंपनियों के खिलाफ कोई भी शिकायत मिलती है तो नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाये. कंपनियों के बारे में आरबीआई और उनका पंजीयन करने वाली संस्थाओं से भी जानकारी हासिल की जाये.

मुख्यालय के इस निर्देश के बाद भी पुलिस ने सक्रियता नहीं दिखाई है. रायपुर में तो हालात और भी खराब है. यहां की पुलिस तो पीड़ितों की शिकायत के बाद भी त्वरित कार्रवाई नहीं कर रही है. कंपनियों के बारे में खुद जानकारी जुटाकर कानूनी कार्रवाई हेतु राय पहले ही लेकर रखने की बजाय शिकायत मिलने के बाद नियमों का परीक्षण रायपुर में किया जा रहा है. डीजीपी की नाराजगी के बाद रायपुर पुलिस ने एक कंपनी के खिलाफ जुर्म दर्ज किया है. जमाकर्ताओं को कई-कई महीने से चक्कर लगा रही संदेह के दायरे में आ चुकी राजेन्द्रनगर, तेलीबांधा, पंडरी, शैलेन्द्रनगर, टिकरापारा और डीडी नगर इलाके की कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है. बल्कि पीड़ितों से कहा जा रहा है कि वे कार्रवाई के लिये कोर्ट में जायें.

पीड़ितों को उम्मीद रहती है कि उन्हें कुछ समय भटकने के बाद जमापूंजी वापस मिल जायेगी. जबकि रिपोर्ट लिखाने पर उन्हें भुगतान नहीं होगा. इसी उम्मीद में वे रिपोर्ट लिखाने से बचते रहते हैं. बड़ी रकम फंस जाने पर आम लोग चाहते हैं कि किसी भी तरह उन्हें जमापूंजी मिल जाये. लोगों की इसी मानसिकता का फायदा भी चिटफंड कंपनियां और पुलिस भी उठाती है.

जमीन पर नहीं रखा कदम फिर भी मिला आपदा की कवरेज के लिए सम्मान

देहरादून : उत्तराखण्ड की मीडिया में जेपी जोशी प्रकरण के बाद दलाल पत्रकारो की भूमिका खुलासा हुआ है. जिसके बाद राज्य में पूरे मीडिया कुनबे को शक की निगाहो से देखा जा रहा है. सरकारी दफ्तरों से लेकर आम जनता पत्रकारों को टेडी नजर से देख रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ देहरादून में एक नया मामला सामने आया है.
गौरतलब है कि बीते 26 दिसंबर को देहरादून के राजभवन में आपदा के दौरान कवरेज करने वाले पत्रकारो को राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया. लेकिन इस समारोह में इस सम्मान को पाने वाले कर्इ चेहरे ऐसे भी थे जो इसके हकदार नहीं थे लेकिन उन्हे भी राज्यपाल द्वारा सम्मानित करा दिया गया. राजभवन में यह कार्यक्रम पंजाबी सभा द्वारा आयोजित किया गया था और आपदा की कवरेज के नाम पर पत्रकारो को सम्मानित करने का खेल खेला गया.
सम्मानित हुए पत्रकारो में जिसमें एनडीटीवी के दिनेश मानसेरा, पी7 के किशोर रावत, कैमरामैन गोविंद सिंह, श्री न्यूज के रमन द्वारा आपदा में कवरेज की गर्इ थी उन्हें सम्मान मिला. जो कि समझ में आता है लेकिन इसके अलावा अन्य लोगो को सम्मान का पैमाना क्या था यह समझ से परे हैं. क्योंकि जी न्यूज के नरेश तोमर, न्यूज 24 के अधीर यादव, टीवी100 के नासिर आपदा के दौरान देहरादून से ही कवरेज करते रहे. इन्हें भी आपदा की कवरेज में सम्मानित कर दिया गया. वहीं इसके अलावा कर्इ पत्रकारो को भी सम्मानित किया गया लेकिन सम्मानित होने वाली जमात में कर्इ चेहरे ऐसे भी थे जो आपदा में कभी वहां की जमीन पर पहुंचे ही नहीं और पूरी कवरेज देहरादून के मीडिया सेंटर से ही करते रहे लेकिन सम्मानित होने वाली जमात में उन्हें भी सम्मानित कर दिया गया. जबकि आपदा के दौरान सबसे पहले वीडियो कवरेज करने वाले जी न्यूज के उत्तरकाषी संवाददाता रावत को इस सम्मान समारोह में सम्मानित तक नही किया गया इसके अलावा कर्इ चेहरे और भी सम्मान की इस बेला पर नदारद दिखे. जबकि जी न्यूज के उत्तरकाषी संवाददाता को दिल्ली में कर्इ संगठनो द्वारा पूर्व में ही सम्मानित किया जा चुका है लेकिन इस सम्मान समारोह में जिस तरह से देहरादून के मीडिया सेंटर में बैठकर कवरेज करने वाले सभी लोगों को सम्मानित कर दिया गया है. उस पर सवालिया निशान उठने शुरू हो गए हैं कि आखिर किसके इशारे पर आपदा के दौरान कवरेज करने वालो को यह सम्मान दिलवाया गया. 

फिल्म ‘बाबू की साइकिल’ में गोविंद नामदेव आएंगे नजर

श्री रामराजा सरकार फिल्म्स के बैनर तले बनने वाली हिंदी फीचर फिल्म 'बाबू की साइकिल' में गोविंद नामदेव बाबू के पिता के रोल में  नजर आएंगे. खबर है कि फिल्म में एक अहम किरदार सुष्मिता मुखर्जी का भी होगा। इस फिल्म का निर्देशन हेमंत वर्मा कर रहे हैं. फिल्म के निर्देशक हरीमोहन विश्वकर्मा है.
फिल्म की कहानी एक पिछड़े गांव में रहने वाले गरीब बच्चे और उसके पिता के इर्द-गिर्द घूमती है जहां बच्चे को पढ़ने के लिए शहर के स्कूल में जाने के लिए क्या-क्या परेशानियां उठानी पड़ती हैं. बच्चा पढ़ाई और स्कूल जाने के लिए एक अदद साइकिल की जुगाड़ के लिए कैसे-कैसे उपाय करता है. 

केजरीवाल सरकार ने दिल्ली सचिवालय में मीडिया पर बैन लगाया

नई दिल्ली। दिल्ली सचिवालय में मीडिया पर केजरीवाल सरकार ने पाबंदी लगा दी है। सचिवालय में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के दाखिल होने पर भी रोक लगा दी गई है। उधर, पाबंदी को लेकर हंगामा मच गया है। सचिवालय में पाबंदी का पत्रकारों ने विरोध किया है। इस मसले को लेकर सोमवार को 'आप' के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री सत्‍येंद्र जैन की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में जमकर हंगामा हुआ, जिसके बाद जैन पीसी बीच में ही छोड़कर चले गए।

बताया जा रहा है कि दिल्‍ली सचिवालय में मीडिया पर पाबंदी से पत्रकार नाराज थे। इसी संबंध में वह सत्‍येंद्र जैन से सवाल-जवाब कर रहे थे, जिसके बाद सत्‍येंद्र जैन नाराज हो गए। इसके अलावा प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में देरी होने से भी पत्रकार नाराज थे। हालांकि, जैन ने देरी के लिए माफी मांगी थी, लेकिन फिर भी बवाल शांत नहीं हुआ।

पाबंदी को लेकर स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन की प्रेस कांफ्रेंस में हंगामा होने पर जैन ने कहा कि आप लोगों को जो तकलीफ हुई है, उसके लिए अपनी पार्टी की ओर से क्षमा मांगता हूं। मैं पता करता हूं कि क्या बात है।

स्वास्थ्य चर्चा के रूप में मना वाजपेयी का 89वां जन्मदिन

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई का ८९वां जन्म दिवस रविवार शाम को मुंबई स्थित वीरा देसाई अँधेरी में मनाया गया। श्री साईं सेवा चैरिटेबल एवं फूलचंद उबाले द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मुफ्त चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। मोतियाबिंद चेक अप, हार्ट चेक अप एवं मुफ्त दवाइयां बांटी गई। इस कार्यक्रम का विशेष आकर्षण "स्वास्थ्य भारत विकसित भारत" अभियान चला रही संस्था 'प्रतिभा जननी सेवा संस्थान' के चेयरमैन मनोज सिंह राजपूत द्वारा जेनेरिक मेडिसिन के ऊपर दिया गया व्याख्यान रहा।

श्री सिंह ने बताया कि उनकी संस्था देश के 11 राज्यों में 'स्वास्थ्य भारत विकसित भारत' अभियान चला रही है, जिसके तहत 'जेनेरिक लाएं पैसे बचाएं' कैम्पेन चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम में शांतिलाल शाह प्रिंसिपल एम.वी. एम. स्कूल, अरुण देव, अभिजीत सामंत, नगरसेवक  राजू पेंडकर, संजय पंवार, संतोष मेढेकर, दिलीप पटेल, प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के नेशनल कॉर्डिनेटर आशुतोष कुमार सिंह,  नगर सेवक विष्णु कोरगाओंकर, महाराष्ट्र मानवाधिकार संगठन के चेयरमैन इस्तियाक बी जागीरदार सहित सैकड़ों समाजसेवी लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

प्रेषक

आशुतोष कुमार सिंह

नेशनल को-आर्डिनेटर

प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान, मुंबई

08108110151

पापा-पापा घूस मत लेना केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गया है…

बीके सिंह : अरविंद केजरीवाल का नाम इतिहास के पन्नों में दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हो गया है. आम आदमी पार्टी की स्थापना से लेकर अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने तक के सफर पर अगर गौर किया जाए तो अभी तक भारत माता के इस लाल की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं दिखा है. आगे क्या होगा यह कहना फिलहाल ठीक नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि दिल्ली की गद्दी पर अब आम आदमी का राज हो गया है.
आज सुबह की एक घटना ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया. दरअसल मेरे एक जानने वाले शर्मा जी दिल्ली जल बोर्ड में बतौर कर्मचारी तैनात हैं. उन्होंने फोन पर बातचीत के दौरान मुझे जो कुछ बताया सुनकर मै हैरान हो गया. शर्मा जी ने बताया आज सुबह करीब 9 बजे वह अपने घर में चाय पी रहे थे और उनका 5 साल का बेटा बगल के कमरे में पढ़ रहा था. अचानक उनका बेटा उनके पास आया और बोला 'पापा-पापा आप घूस मत लेना केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गया है.' अपने 5 साल के बेटे के मुंह से यह बात सुनकर शर्मा जी सन्न रह गए. फिर थोड़ी देर बाद फोन करके मुझे इस घटना से अवगत कराया.
यह सब कुछ जानने-सुनने और समझने के बाद मुझे भी अब धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा है कि बहादुर शाह जफर के दिल्ली में बदलाव की बयार बहने लगी है.

श्री अरविन्द केजरीवाल को एक आईपीएस का पत्र

आज मैंने श्री अरविन्द केजरीवाल को एक पत्र भेजा है जिसकी प्रति संलग्न कर रहा हूँ. पत्र में मुख्य रूप से यह निवेदन किया गया है कि चूँकि श्री केजरीवाल एक व्यापक सामाजिक बदलाव की बात करते हैं, अतः उन्हें कुछ बिन्दुओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. एक तो उन्हें समाज के प्रत्येक क्षेत्र से जुडी जटिल और क्लिष्ट समस्याओं के लिए सरलीकृत समाधानों से बचना होगा.

दूसरे मात्र प्रतीकात्मकता से ऊपर हट कर अपने लक्ष्य और उद्देश्य की ओर इंगित होना चाहिए क्योंकि संकेकिकता “एक नयी-नयी बातें एक नयी-नवेली दुल्हन की तरह पलक झपकते अपना आकर्षण खो बैठती हैं” और आगे शाश्वत और गंभीर कार्य ही काम आता है. तीसरे व्यवस्था में लोगों को तत्काल ईमानदार और बेईमान करार देने से बेहतर हो कि सभी लोगों से मिल कर अपने अनुरूप काम लिया जाए.

चौथा निवेदन अपने सामाजिक परिवर्तन के ध्वजवाहकों को अवांछनीय श्रेष्ठता और दूसरे लोगों के विचारों के प्रति अनादर भाव से बचने को प्रोत्साहित करने का है. मैंने यह पत्र श्री केजरीवाल द्वारा सामाजिक सारोकारों के प्रति बताये जा रहे समर्पण के दृष्टिगत अपनी व्यक्तिगत हैसियत में प्रेषित किया है.


आदरणीय श्री अरविन्द केजरीवाल,

सामाजिक कार्यकर्ता, चिन्तक एवं विचारक,

वर्तमान में मुख्यमंत्री, दिल्ली,

नयी दिल्ली

महोदय,

मैं अपनी बात कहने के पहले सूक्ष्म में अपना परिचय देना चाहूँगा. मेरा नाम अमिताभ ठाकुर है. मैं पेशे से एक आईपीएस अधिकारी हूँ और सामाजिक सारोकार नाम के जंतु से मैं भी प्रभावित हूँ, यद्यपि इस दिशा में अभी तक बातें बनाने और सपने देखने के अलावा शायद कुछ और नहीं कर पाया हूँ. यद्यपि आप मुझसे व्यक्तिगत स्तर पर अपरिचित नहीं हैं पर कोई इतना नजदीकी सम्बन्ध भी नहीं है और ना मेरी यह सामाजिक हैसियत है कि आपको यह ज्ञात हो कि मैं जन लोकपाल आन्दोलन के समय से आपका एक मुखर आलोचक रहा हूँ. यहाँ दो बातें देखने योग्य हैं- एक तो यह कि मैं भी अपने आप को बुद्धिमान व्यक्ति समझता हूँ और हर ऐरी-गैरी बात या साधारण व्यक्तित्व की ओर मेरा ध्यान नहीं जाया करता. अतः यदि पिछले तीन साल से आपकी लगातार आलोचना कर रहा हूँ तो इससे यह स्पष्ट है कि मेरी निगाहों में आप निश्चित रूप से अति-विशिष्ट रहे होंगे. यह सच्चाई है कि अपनी मेधा-बुद्धि और लगन से आप एक बहुत लम्बे समय से पढ़े-लिखे भारतीयों के बीच अपना एक ख़ास स्थान बनाए हुए थे और जिस दिन से आपने जन लोकपाल आन्दोलन को जन्म दिया उस दिन से तो आप पढ़े-लिखों से आम जन में भी निरंतर समाते ही चले गए. आपकी उपलब्धियां अद्भुत हैं, वे आज राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराही जा रही हैं और आपके नाम आज इतने सारे रिकॉर्ड हैं कि वे सहज मानवीय अनुभूतियों से परे होते दिख रहे हैं क्योंकि अब तक जो बुद्धिजीवी और सोशल एक्टिविस्ट सिर्फ सोचते और विचरते रह जाते थे उसे आपने जमीन पर मूर्त स्वरुप प्रदान कर दिया है, और इस रूप में आप क्रांतिधर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता पहले हैं, राजनैतिक व्यक्ति बहुत बाद में.  

दूसरी बात यह भी कि मेरी आलोचना में व्यक्तिगत राग-द्वेष का भी निश्चित रूप से स्थान होगा क्योंकि स्वतः-सृजित भ्राता-स्पर्धा की भावना- आईआईटी का एक ही बैच और ब्रांच का इंजिनीयर, एक सी सिविल सेवा में होने पर भी एक के समाज से जुड़ने की उत्कट इच्छा के बावूद आज तक अपनी सेवा से ही उलझ रहने और दूसरे के देखते-देखते एक महानायक बन जाने पर ईर्ष्या का होना स्वाभाविक है और मैं इसके लिए क्षमायाची नहीं हूँ क्योंकि जो नैसर्गिक है उसके प्रति अफ़सोस कैसा.
लेकिन इन व्यक्तिगत कारणों से इतर भी कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं जिन्होंने मुझे आपकी आलोचना को मजबूर किया है और यह पत्र उन तथ्यों को ही उद्धृत करने के लिए है. पहली बात यह कि आप सफल हैं और दीवार के अमिताभ बच्चन, जिनके पास गाड़ी, बंगला, नाम तो था पर माँ नहीं, के विपरीत आज आपके पास एक साथ ताकत, शोहरत और इज्जत सभी कुछ है. आप यह भी कहते हैं कि आपके पास विचारों का खजाना है जो आपकी पुस्तक “स्वराज” में दर्ज है. मैं इसी जगह पर आपसे विनयपूर्वक निवेदन करना चाहता हूँ कि बहुत कोशिशों के बाद भी मुझे अभी आप के विचारों और सोच में एक स्पष्ट सतहीपना और उथलापण दिखता है, जो शासन और प्रशासन से जुड़े कई क्षेत्र में साफ़ दिख जाता है. आप सफल हैं, लोकप्रिय हैं, एक फैशन और क्रेज भी हैं. इस रूप में आपको मेरी बात शायद तीखी लग जाए पर सच्चाई यही है कि आपके प्रत्येक समाधान में एक अवांछनीय हड़बड़ी, तेजी और आसान रास्ते के प्रति ललक दिखाई देती है. आपने जन लोकपाल का विचार लाया और कुछ कानूनी बातों के आधार पर घोषित कर दिया कि यही पुस्तक देश के भ्रष्टाचार को हटाने की बाइबल बनेगी, इसी पुस्तक में देश की सब दिक्कतों को दूर करने का समाधान छिपा है. शायद आपको याद हो, उस समय जन लोकपाल को आपने “जादू की छड़ी” कहा था, वही “जादू की छड़ी” जिसके होने से आप आज इनकार करते दिखते हैं. आपने एक बार भी नहीं सोचा कि क्या व्यवहारिक रूप में एक क़ानून देश के समस्त भ्रष्टाचार को दूर कर सकता है? इस अत्यंत संश्लिष्ट बीमारी का अत्यंत सरल समाधान आपने ना सिर्फ प्रस्तुत किया, अपनी कुशाग्रता और बेहतरीन प्रबंधन-कला से दुनिया से भी उसे मनवा लिया.

उसके बाद आपने “स्वराज” लाया है जिसमे प्रत्येक विषय पर समाधान दिया है. मैंने उस पुस्तक को पढ़ी और बुरा नहीं मानें, वह भी जन लोकपाल की तरह जादू का एक बड़ा पिटारा ही दिखती है जिसमे तमाम जादू की छड़ियाँ यहाँ-वहां बिखरी पड़ी हैं. यह कर दो, यह हो जाएगा, वह कर दो वह हो जाएगा. इसका यह समाधान है, उसका वह समाधान है. अर्थात यह कि प्रत्येक बात का समाधान है. आप इंजीनियर भी तो हैं, प्रबंधक भी. अतः आपने स्वतः यह मान लिया कि समस्या है तो समाधान भी अवश्य ही होगा और आइन्स्टीन की प्रणाली को अपनाते हुए आपने यह भी मान लिया कि यह समाधान निश्चित रूप से सरल और आसन होगा. सादर निवेदन करूँगा कि यह एक ऐसी भारी भूल है जिसके प्रति आपको गहरे पुनार्विचारण की आवश्यकता है. कृपया यह समझें कि सामाजिक विज्ञान में, सामाजिक जीवन में विज्ञानं की तरह सरल और स्पष्ट उत्तर और समाधान नहीं होते. इसमें संश्लिष्टता होती है, दुरूहपन होता है और पेचीदगियां भी. यह सही है कि आप अपनी विशिष्ट और तीक्ष्ण बुद्धि से कई सारे दुरूहपन को दूर भी कर देते हैं और आपने वे रास्ते निकाले हैं जो दूसरों ने कल्पना भी नहीं की थी, पर एक बात मेरी भी मान लें कि समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र उतने आसान विषय नहीं हैं जितना आप उसे समझ रहे हैं. आप अभी तक सपने जगा रहे थे, लोगों को भविष्य में खेला रहे थे. आपने यह कार्य बहुत सफलतापूर्वक किया. अब आप स्वपनलोक में नहीं, वास्तविक धरातल पर लोगों से रूबरू होंगे. एक्टिविस्ट अरविन्द कुछ दिन ही चल सकेंगे, कार्यपालक अरविन्द को सामने आना ही पड़ेगा. और कार्यपालक अरविन्द को यह समझना होगा कि उसे अपने-आप को सर्व-ज्ञाता समझने की जगह स्वयं को एक जिज्ञासु बालक के रूप में रखना अधिक अच्छा रहेगा, देश-समाज के लिए और स्वयं आपके लिए. अतः जनसभा में हाथ उठवा कर ईमानदारी की शपथ लेने का सांकेतिक महत्व तो ठीक है, पर कार्यपालक अरविन्द को यह समझना होगा कि इसका उपयोग सांकेतिकता से अधिक कुछ नहीं है.

इसके आगे इन विषयों पर मैं आपको कुछ नहीं बता पाऊंगा क्योंकि मैं तो स्वयं ही सीखने और जानने की प्रक्रिया में हूँ. मुझे तो अचरज होता है यह देख कर कि आप कितना कुछ जान और समझ चुके हैं देश और समाज के बारे में, मुझसे बहुत-बहुत ज्यादा. हाँ, एक बात मैं जानता हूँ कि मैं ज्यादा नहीं जानता और यह भी चाहता हूँ कि आप जैसा ज्ञानी व्यक्ति को यह मान कर नए सिरे से चीज़ों को जानने और समझने की कोशिश करे तो शायद अच्छे समाधान निकलेंगे और जिन उद्देश्यों से आप चले हैं उनकी पूर्ती होगी और यह आपकी वास्तविक ऐतिहासिक भेंट होगी.

दूसरी बात यह कि अब आप जब जिम्मेदारी के स्थान पर आ गए हैं तो कृपया उतनी सरलता और तत्परता से ईमानदारी और बेईमानी का सर्टिफिकेट नहीं बांटे. जहां तक मैं समझ पाया हूँ व्यक्ति एकदम ईमानदार और बेईमान कम होते हैं, हममे से ज्यादातर बीच की स्थितियों में रहते हैं. यह भी होता है कि जब चालाक लोगों को यह मालूम हो जाता है कि व्यवस्था में ईमानदारी का सर्टिफिकेट बंटने लगा है तो वे बड़ी चालाकी से यह सर्टिफिकेट हासिल करने के नए-नए जुगत लगा लेते हैं और जब तक मालूम भी नहीं होता, वे अपना काम बना चुके होते हैं. अतः निवेदन करूँगा कि धैर्यपूर्वक लोगों को समझें और जानें, उन्हें अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करें और सबों से एक समूह के रूप में अधिकतम जनहितकारी कार्य लेने की कोशिश करें, बनिस्पत कि यह सर्टिफिकेट बांटने में लगें. यदि यह कार्य समाज के अन्य क्षेत्र के लोगों के प्रति भी कर सके तो बहुत उत्तम क्योंकि अब आप उस स्थान पर बैठे हैं जहां मात्र एक प्रकार के लोग नहीं, भाँती-भाँती के लोग आपके सामने आयेंगे.
तीसरा निवेदन यह है कि कृपया अब अधिक सांकेतिकता से भी बचें- मेट्रो में यात्रा, बिना सुरक्षा घेरे के चलना, आम सवारी से आना-जाना, आम आवास में रहना, इसके विपरीत बहुत भव्य शपथ ग्रहण करना आदि. आपने अब समाज को राजनीती के जरिये अपना योगदान देना निश्चित किया है, अतः उसके कुछ बुनियादी सिद्धांतों और जरूरी जरूरतों को सहर्ष स्वीकारते हुए अपने लक्ष्य और उद्देश्य को मूल मुद्दा बनाएं, यह नयी-नयी बातें एक नयी-नवेली दुल्हन की तरह पलक झपकते अपना आकर्षण खो बैठती हैं और कुछ दिनों बाद तो शास्वत और गंभीर कार्य ही काम आता है.

चौथी और अंतिम बात यह कि एक जिम्मेदार सामाजिक व्यक्ति का यह भी दायित्व है कि वह समाज में समरसता लाये. मुझे कई बार यह आभास होता है कि आपके सामाजिक परिवर्तन के साथी और वाहक संभवतः आपके प्रति सम्पूर्ण प्रतिबद्धता और समर्पण की भावना के कारण अतिरेकपूर्ण और अनुचित आचरण करने लगते हैं. चूँकि उनमे ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग हैं जो शारीरिक रूप से तो लड़-लड़ा नहीं सकते पर देखता हूँ कि वे बहुधा अपने विचारों से इतर विचारों के प्रति पूरी तरह आँखें बंद किये रहते हैं और एक अज्ञात श्रेष्टता के भाव से ग्रसित हैं, जो कई बार दुर्भावनापूर्ण आचरण पैदा कर देता है. मुझे विश्वास है कि चूँकि इन सभी लोगों की आप पर बहुत अधिक आस्था है और आप इनके बल पर एक नए समाज का सृजन करना चाहते हैं, अतः यदि इन्हें नए समाज का संदेशवाहक बनाना है तो उन्हें यह भी बताना होगा कि अपने अलावा अन्य लोगों का अस्तित्व और सबों की अपनी-अपनी श्रेष्टता और समुपयोगिता भी स्वीकार करना होता है.

मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ क्योंकि शायद वर्तमान में आगे मेरे पास और कुछ कहने को नहीं है. आप स्वयं ही अत्यंत बुद्धिमान हैं, मुझसे कहीं बहुत ज्यादा और यदि मेरी बातें बेकार हैं अथवा आप की जानकारी में है तो इसे सबसे नजदीक के रद्दी के टोकरी में डाल दीजियेगा. ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जो अपनी व्यक्तिगत हैसियत में एक ऐसे व्यक्ति को समर्पित हैं जो स्वयं को समाज में कुछ नया करने को कृत-संकल्प बताता है और ऐसे में यदि मेरी थोड़ी सी बात भी आपके उपयोग की हुई तो मैं समझूंगा कि मेरा कंप्यूटर पर टिप-टिप करना सार्थक हो गया.

आपका,
अमिताभ ठाकुर
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर, लखनऊ
# 094155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com


Letter to Sri Arvind Kejriwal from an IPS officer

Today I have sent a letter to Sri Arvind Kejriwal, whose English version I attach here. The letter requests Sri Kejriwal that since he talks of larger social transformations, hence he might pay attention to certain specific facts being enumerated here. Firstly, he needs to avoid taking route to simplistic solutions to complex and intricate social problems of various kinds. Secondly, he shall get more focused primarily to the real goals and not to symbolic attentions because “symbolisms soon lose their novelty, like a newly-wed bride” and later only solid work count. Thirdly, instead of branding people working in the system as honest and corrupt, he might try to get maximum work as per his expectations. Fourthly, he may motivate his agents of social transformation not to carry a feeling of conceit and to be open to ideas beyond their own. I have sent this letter in my individual capacity to Sri Kejriwal in light of his stated objective of social revolution.

Respected Sri Arvind Kejriwal,

Social activist, Thinker and social philosopher,

Presently Chief Minister of Delhi,

New Delhi

Dear Sir,

Before making my submissions, I would like to introduce myself briefly. I am Amitabh Thakur. I am an IPS officer by profession though hugely affected by the bug of social concern despite remaining restricted to thinking and day-dreaming so far.
Though I am not completely unknown to you but neither are we so closely related nor am I of such a stature for you to know that I have been an open critic of yours, since the Jan Lokpal days.  Here two important factors need to be taken into consideration- The first is that I consider myself an intelligent person and every other event or person does not attract my attention. Hence if I have been criticizing you for the last three years or so, this in itself is sufficient to state that you are very special in my thoughts and imagination. Your achievements are extraordinary and are being admired today nationally and internationally, with you having so many records to your credit which seem impossible for ordinary mortals because what the intellectuals and social activists had so far only been discussing and arguing has actually been made true solely through your endeavours. Hence you are first and foremost a social activist and revolutionary and a political person much later.
Second fact is that my criticism would definitely have a fair share of personal envy, some stretched form of sibling-rivalry, being from IIT from the same batch and department, other than being fellow civil servant, who has intense urge to connect with social causes but has not been able to look beyond his service so far while the other having transformed into a Superhero. I don’t apologize for this because being jealous is being natural and one shall not feel bad about what is natural.
But other than these personal causes, there are other reasons as well which have made me criticize your acts and thoughts and this letter is meant exactly for that. First is that today you are successful and unlike Amitabh Bachchan of Deewar who had everything with him but not his “Maa” (mother), you have power, position and respect all at the same time. You also say that you are full of ideas and your basic propositions are placed in your book “Swaraj”. With apologies, I would like to say that despite my best efforts, I find a definite shallowness and triviality in your present thoughts related with many aspects of governance and polity.   You are successful, popular, am icon and a craze. Hence you might find my words unprovoked and improper yet the fact remains that in all your solutions there is an apparent and unwarranted quickness and leaning towards simplistic solutions. You brought the concept of Jan Lokpal and declared on the basis of a few legal provisions that this book is going to the Bible of anti-corruption work in the Nation, this book containing remedies to all the evils of this country. If you remember correctly, at that time you had called Jan Lokpal a “Magical band”, the same magical band which you recently declared not being in your possession. You never thought for once how one piece of legislature can end all the corruption in this country? You not only presented a simplistic cure-all for this extremely complex disease, you also succeeded in making others believe in it through your superior skills and managerial capabilities.
Then you came with your “Swaraj” which contains solutions to all problems. I have read this book and if you don’t mind, like Jan lokpal this book also looks like a magical band where all kinds of magical imagery seem to be interwoven here and there. Do this, this will happen, do that, such a thing will happen and so on. In short, solution to every problem. You are an engineer, a manager as well. Hence you naturally presume that if there is a problem, there is bound to be a solution and in the Einsteinian vein you also presume that  this solution is bound to be simple in nature. I would humbly request that this seems to be a cardinal error which needs to be deeply relooked into and corrected.  Kindly understand that social science and human lives do not have such ideal and simple solutions. There are complexities, there are intricacies and there are multi-layering.  There is no doubt that your sheer genius is able to penetrate through many a unwarranted complications and you are able to find ways where others falter, yet you, who have achieved a lot in a very short period and have miles to go to make your dreams come true, kindly do accept the basic fact that social science and economics are not as simple studies as you are making it out to be. Till now you had only been raising hopes, playing with people’s future and have been able to do it with rare success. Now you are no more in the dreamland, you will have to interact with people on the hard realities of life. Activist Arvind will have to give way to Executive Arvind. And Executive Arvind will have to understand that instead of thinking himself as know-all, it would be better if he considers himself a learner, a keen student- for the betterment of nation and the society and for himself. Making people raise their hands for honesty could have its symbolic importance but executive Arvind needs to understand that its relevance doesn’t go much beyond.
I will not be able to tell anything more on this topic because I am myself in the process of learning and understanding. In fact I feel bewildered by the fact that you have come to know so much about this nation, its people, its problems- much more than me. I only know one thing that I don’t know much and also that a knowledgeable person like you also needs to understand the same so as to try and learn things with an open mind so that better solutions are obtained and the aims with which you began your journey get actually fulfilled, making it your everlasting contribution.
Second thing is that now you have come at a position where you kindly don’t go on distributing the certificate of honesty and dishonesty all and sundry.  As far as I have understood there are very few who are exactly honest or dishonest, most of us lie in the grey areas. It also happens that if cunning people come to know that “Integrity certificates” are being distributed, they device ingenious methods to get this ISO certificate, defeating the entire purpose. Hence my request is that instead of being in hurry to brand people as honest or dishonest, first try to understand people and to make them conducive to your ideas and work ethics, so that you are able to extract maximum work from these people for the larger societal benefit. If the same could be done for other walks of public life as well, it would be great because being in your position every kind of people will now come in your contact.
The third request is to avoid too much symbolism- Journey through Metro, moving without security cover, moving as commoners, living in ordinary flats, going for a grand oath ceremony in exact contradiction etc. You have decided to serve this society through political gateway and hence you need to accept some of the established and well-accepted norms with focus fixed primarily to the real goals and not to symbolic attentions. These symbolisms soon lose their novelty, like a newly-wed bride and what remains is the regular grind of solid work.
Fourth and last request is that a responsible social person also needs to bring harmony in the society. Many a times I feel that your friends who are your means for social transformation get sidetracked and start behaving in a manner that can never be called civil and courteous, possibly because of their complete devotion and dedication towards you. Since most of them are educated people hence they don’t go to fisticuffs but some of them are completely closed to any other idea beyond their own and seem to be suffering from undesirable superiority complex, leading to improper conduct. I am sure that since these people have complete faith in you and you want to create a new society through them, hence if you want them to be flag-bearers of a new society, they may kindly be made to accept the usefulness and relevance of thoughts beyond their own.
I stop here because presently I don’t have anything more to say. You are yourself an extremely capable man, much intelligent than me and if these words are not useful to you or all already in your knowledge, kindly throw it to the nearest dustbin.  These are my personal thoughts in my individual capacity to a person who calls himself dedicated to the creation of a new society and if even a small bit of my words proves useful to you in any manner; my tap-tap on the Laptop would have served its purpose.  
Yours.
(Amitabh Thakur)
5/426, Viram Khand,
Gomtinagar, Lucknow
# 094155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

तराने जी का तराना, थोड़ी हकीकत-थोड़ा फसाना

राधेश्याम तराने अपने आप में एक सुरीले किस्म का नाम है पर उनका कार्यक्षेत्र संगीत नहीं बल्कि अभिनय व निर्देशन है। हबीब तनवीर साहब की सराहना से प्रेरित होकर रंगकर्म को उन्होंने अपनी जीवनचर्या में शामिल कर लिया और कभी इस रास्ते से विचलित नहीं हुए। अपने घर का नाम उन्होंने ‘रंगायन’ रख छोड़ा है। मुख्य द्वार के ठीक उपर चित्तप्रसाद की प्रसि़द्ध कृति और ‘इप्टा’ का लोगो नगाड़ावादक सुशोभित है। उनके मोबाइल का वॉलपेपर भी यही है और दीवाली में घर के आंगन में यही रंगोली सजती है।

कोई फोन करे तो ‘इप्टा की पहचान नगाड़ा कहता है’ की धुन बजने लगती है। गरज यह कि उनकी प्रतिबद्धता से आपकी वाकिफियत न हो तो आप उन्हें सनकी करार दे सकते हैं, पर वे स्वयं कहते हैं कि ‘हां, मुझे नाटकों की सनक है।’ नौकरी के सिलसिले में रोज की भागदौड़ के बाद शाम को वे बिल्कुल ठीक समय में रिहर्सल रूम में पहुंच जाते हैं, देर से आने वाले कलाकारों को कोसते हैं, रिहर्सल के दौरान मोबाइल बज उठने पर कुढ़ते हैं, नये लड़कों में कमिटमेंट की कमी को लेकर गुस्से में आकर कल से रिहर्सल में न आने की कसमें खाते हैं और अगले रोज ठीक समय में फिर से रिहर्सल में पहुंच जाते हैं।

डोंगरगढ़ इप्टा के निर्देशक राधेश्याम तराने


परिवारवाद की धज्जियां बिखेरकर एकाकी जीवन बिताने को आतुर इस दुनिया में उनका घराना नगर का सबसे बड़ा परिवार है। संख्या को लेकर हमेशा कन्फ्यूजन रहता है। ताजा आंकड़े ठीक से नहीं मालूम पर कुछ समय पहले तक 36 लोग रहते थे। बड़ी बहन घर की मुखिया हैं और बाकी भाइयों के परिवार हैं। नाटकों के पिटने का कोई खतरा नहीं हैं, क्योंकि 35 दर्शक तो घर से ही बनते हैं। ये बात और है कि खुद उनकी श्रीमती जी कभी भी उनके नाटक देखने नहीं आतीं। कभी-कभार परिवार का बच्चा समझकर पड़ोसी के बच्चे को पीट दें तो कोई हैरानी नहीं, पर ऐसा आज तक हुआ नहीं। खाने की पगंत लगती है तो भोज का दृश्य होता है। फरमाइश महंगी पड़ती है। इसे आप इस तरह से समझें कि किसी ने समोसे खाने की फरमाइश कर दी तो समूची अर्थ-व्यवस्था हिल उठती है। प्रति व्यक्ति दो नग के हिसाब से यदि 72 समोसे लाने पड़ें जेब का पूरी तरह से हल्का हो जाना लाजमी है। शायद इसीलिये थोड़ी से मितव्ययिता उनके स्वाभाव का हिस्सा है। बड़े परिवार को चलाना एक बड़ी जिम्मेदारी का काम है, इसलिये आदतन वे जिम्मेदार भी हैं और विगत तीन दशकों से स्थानीय इप्टा इकाई को तमाम मुश्किलों के बावजूद एक परिवार की तरह चला रहे हैं।

उन्हें सक्रिय रंगकर्म के क्षेत्र में खेंच लाने की जिम्मेदारी चुन्नीलाल डोंगरे जी की थी जो हबीब साहब के मित्र थे और 74 की रेल हड़ताल से पहले ट्रेड यूनियन के साथ नगर में इप्टा इकाई का संचालन करते थे। 74 की हड़ताल में प्रबंधन ने रेल मजदूरों और मजदूर नेताओं पर भयानक जुल्म ढाया। पुराने लोगों की बातों पर यकीन करें तो जैसा सलूक मजदूर नेताओं के साथ किया गया वैसा सलूक युद्धबंदियों के साथ भी नहीं किया जाता। इस बात पर यकीन न करने का कोई कारण भी नहीं है क्योंकि 74 के बाद रेलवे में कोई आम हड़ताल नहीं हुई। आज भी रेल प्रबंधन को हड़ताल तोड़ने में विशेषज्ञ माना जाता है और कहते हैं कि कहीं कोई हड़ताल तोड़नी हो तो रेल प्रबंधन की सेवायें ली जाती हैं, जिसे वे सहर्ष प्रदान करते हैं। बहरहाल, इस हड़ताल में बहुत सारे लोगों के तबादले हुए और डोंगरे जी की इप्टा भी बिखर कर रह गयी। इसके बाद से ही उनका हाजमा खराब हो चला था और स्थिति नियंत्रण के बाहर हो जाती अगर उन्हें राधेश्याम तराने नामक यह नवयुवक नजर नहीं आता।

 डोंगरगढ़ का रणचंडी मंदिर


राधेश्याम तराने उन दिनों कालेज में नाटक खेलते थे। तब टीवी का चलन नहीं था और मनोरंजन के लिये या तो सिनेमा देखा जाता था या गुलशन नंदा के साथ कर्नल रंजीत और ओमप्रकाश शर्मा के नावेल बहुतायत में पढ़े जाते थे। मेजर बलवंत उन दिनों आज के शाहरूख-सलमान की तरह पापुलर थे और कभी-कभी उनके होंठ गोल हो जाते थे पर सीटी नहीं बजती थी। स्कूल-कालेज में होने वाले नाटकों में भी उन दिनों काफी जमावाड़ा होता था और अमूमन पूरा कस्बा ही ऐसे मौकों पर इकट्ठा हो जाया करता था। अपने तराने जी इन कार्यक्रमों में थ्रिलर ड्रामा करते थे और कस्बे में मेजर बलवंत की तरह ही पापुलर थे। छोटी जगहों में मध्यमवर्गीय संस्कार लड़कियों को रंगमंच पर आने की इजाजत नहीं देते पर तराने की लोकप्रियता ने इस वर्जना को भी तोड़कर रख दिया और उनकी ख्याति डोंगरे जी के कानों तक पहुंची। उन्हें लगा कि हो न हो, यही नवयुवक इस नगर में इप्टा की मशाल को रोशन रख सकता है। यह 1982 -83 की बात है। रेलवे के एक फर्जी पास पर उन्होंने तराने जी को हरिराम खलासी बनाकर इप्टा के जबलपुर राज्य सम्मेलन में भेजा और तराने जी इप्टा के होकर रह गये।

उन्हीं दिनों महावीर अग्रवाल के ‘सापेक्ष’ में प्रेम साइमन का नाटक ‘मुर्गीवाला’ छपा था। इस नाटक ने खासतौर पर नुक्कड़ नाटकों के परिदृश्य में धूम मचा दी थी। अमोल पालेकर जैसे संजीदा फिल्मकार भी इससे प्रभावित थे। दुर्ग में क्षितिज रंग शिविर ने इसके सैकड़ों प्रदर्शन किये। अपनी नवगठित टीम के लिये तराने जी ने इसी नाटक को चुना। दिन 26 जनवरी 1983। तब ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ नामक मुहावरा इसलिये पापुलर था कि दाल और मुर्गी की कीमतों में जमीन आसमान का अंतर हुआ करता था। किसी तरह मोहल्ले वालों से मांग-मांगकर मुर्गिया इकट्ठी की गयीं और नवगठित इप्टा इकाई का पहला ड्रामा प्रस्तुति की ओर अग्रसर होने लगा। अभी नाटक शुरू भी न हुआ था कि अचानक बारिश शुरू हो गयी। दर्शकों ने पास के लोको शेड में शरण ले ली और नाटक के कलाकार मुर्गियों समेत भीगने लगे। तराने जी ने डोंगरे जी से नाटक बंद करने की गुजारिश की तो उन्होंने ललकार कर कहा कि पानी की चार बूंदों का सामना नहीं कर सकते, क्रांति क्या खाक करोगे? दर्शक देख रहे हैं, ‘शो मस्ट गो ऑन।’ नाटक पूर हुआ। सफल भी रहा, पर मुर्गियां बुरी तरह से भीग गयी थीं। तराने जी को डर सताने लगा कि अगर वे बीमार होकर मर गयी तो पैसे उन्हें चुकाने होंगे। लिहाजा पास के होटल में, जहां सहृदय दर्शकों ने उनकी टीम को चाय के लिये आमंत्रित किया था, कोयले की भट्टी में एक-एक कर मुर्गियों को सेंका जाने लगा। भट्ठियों पर मुर्गियों को जिंदा सेंकने का यह उनके जीवन में पहला व अंतिम वाकया था।

 इस नाटक की सफलता से प्रेरित होकर सदाचार का ताबीज, महंगाई की मार, यमराज के भाठों आदि अन्य नाटक तैयार किये गये। इस बीच डोंगरे जी से मित्रता के कारण हबीब तनवीर साहब का अपनी पूरी टीम के साथ यहां आना बदस्तूर जारी था। शेक्सपियर के नाटक ‘मिड समर्स नाइट ड्रिम’ पर आधारित नाटक ‘कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना’ और एक अन्य नाटक ‘देख रहे हैं’ नैन की रिहर्सल इसी नगर में हुआ करती थी। छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति पर आधारित एक डाक्यूमेंट्री के लिये जब तनवीर साहब को बस्तर में शूटिंग की इजाजत नहीं मिली तब भी उन्होंने डोंगरगढ में ही डेरा जमाया। उनकी रिहर्सलों के व्यवस्थापक बिला शक तराने जी हुआ करते थे। हबीब साहव सिविल लाइंस में रेस्ट हाउस में अड्डा मारते थे और उनकी पूरी टीम पहाड़ी के पास रणचंडी मंदिर में। रणचंडी मंदिर की संस्थापिका व पुजारन, जिसे स्थानीय लोग बैगिन कहकर पुकारते थे, तनवीर साहब से काफी प्रभावित थीं और उनके बीच अच्छी मित्रता थी। पहाड़ियों के नीचे एक तालाब के किनारे, जहां रिहर्सल वगैरह के लिये ढेर सारी सपाट जमीन है सुरम्य होने के कारण किसी भी कलाप्रेमी को आकृष्ट करती है। पहले यहाँ पर छोटा-सा मंदिर था और उसे स्थानीय लोग उसे ‘‘टोनहिन बमलाई’’ कहते थे। यों बमलेश्वरी के यहां दो मंदिर हैं। एक पहाड़ी के ऊपर, जिसे ‘बड़ी बमलाई’ कहा जाता है और जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र होने के कारण रोप-वे की सुविधा से सज्जित है। नीचे वाले मंदिर को छोटी बमलाई कहा जाता है और यहीं पर इप्टा के नाट्योत्सवों का आयोजन होता है। ‘टोनहिन बमलाई’ वाला किस्सा मैंने पहली बार तराने जी के ही मुँह से ही सुना।

बकौल उनके, मंदिर की बैगिन, जिनसे तनवीर साहब की अच्छी मित्रता थी, पास के कवर्धा कस्बे की रहने वाली थीं। तब वह कस्बा जिला नहीं बना था पर भोरमदेव के ऐतिहासिक मंदिर के लिये प्रसिद्ध था। बैगिन यहीं पर अपने पति के साथ रहती थीं जो पुलिस महकमे में थे। कहते हैं कि मंदिर वाली जगह उन्हें अक्सर अपने सपने में दिखाई पड़ती थी। एक बार जब उनका आगमन डोंगरगढ़ हुआ तो उन्हें यही जगह दिखाई पड़ी। उन्होंने अपने पति से इसका जिक्र किया तो उन्होंने झिड़क दिया। बात आयी गयी हो गयी । कुछ दिनों बाद जब उनका तबादला डोंगरगढ़ ही हो गया तो उन्हें लगा कि हो न हो यहां आने के पीछे एक कारण सपने वाला किस्सा ही हो सकता है, लिहाजा उन्होंने मंदिर के निर्माण की इजाजत दे दी। इस किस्से में कोई सचाई हो या न हो, तनवीर साहब के नाटकों की रिहर्सल के लिये यह मुफीद जगह थी। कलाकार यहीं पर रहते थे, तालाब में नहाते थे, पेड़ के नीचे चूल्हा जलता था और रात-दिन रिहर्सल होती थी। एक कलाकार को एक नाटक के दौरान पीढ़ा रखना होता था। हबीब साहब ने यह काम उससे कम से कम सौ बार करवाया। एक-एक संवाद सैकड़ो बार दोहराये जाते थे और इस बीच हबीब साहब किसी और से से बातचीत में मशगूल होते थे। जब संवाद -अदायगी उनके मन माफिक हो जाये तो टोककर कहते थे, हां बिल्कुल ऐसे ही कहना है।

पास के एक गांव कल्याणपुर की चिरैया दीदी से तनवीर साहब की मुलाकात यहीं पर हुई थी। चिरैया दीदी बला की खूबसूरत हैं और तनवीर साहब उन्हें चरणदास चोर पर बनने वाली फिल्म में रानी की भूमिका में लेना चाहते थे। बाद में शायद चिरैया दीदी श्याम बेनेगल की अपेक्षाओं में खरी नहीं उतरीं और यह भूमिका स्मिता पाटिल को मिली थी। पर चिरैया दीदी का अब भी तराने जी के घर में आना-जाना लगा रहता है।

अपने तराने जी पूरे समय मुस्तैद सिपाही की तरह उनके किसी भी आदेश की प्रतीक्षा में तैनात रहते थे। तो एक बार तनवीर साहब को पूरन पोड़ी खाने की इच्छा हुई। उन्होंने बी.ए. नागपुर के मौरिस कालेज से किया था, लिहाजा मराठी खान-पान से वे वाकिफ थे। उन्होंने तराने जी से कढ़ी व पूरन पोड़ी खाने की इच्छा जाहिर की। पूरन पोड़ी भीगी हुई चने की दाल व चीनी को पीसकर भरवां पराठे की तरह बनायी जाती है और इसे घी की अच्छी-खासी मात्रा के साथ परोसा जाता है। तनवीर साहब सपरिवार तराने जी के संयुक्त परिवार में पहुंचे और जमकर खाया। इतना कि रेस्ट हाउस पहुंचकर तबीयत बिगड़ गयी। उसी मोहल्ले में जब उन्हें एक डॉक्टर के पास ले जाया गया तो डॉक्टर साहब इलाज करने के बदले उनके साथ फोटू खिंचवाने के काम में मसरूफ हो गये। उन्हें बाद में बड़ी मुश्क्लि से याद आया कि उनके क्लीनिक में आने वाला सेलिब्रिटी दरअसल मरीज भी है।

ऐसे ही एक बार तनवीर साहब ने आदेश दिया कि लंदन से आयी एक रिसर्च स्कालर को नगर भ्रमण कराया जाये। लंदन से आयी सुंदरी को तराने जी कार में जहाँ-जहाँ लेकर जाते, मजमा-सा लग जाता। उस विदुषी कन्या ने छत्तीसगढ़ी बालाओं के कुछ पारंपरिक जेवरात खरीदने की मंशा जाहिर की। तब स्थानीय गोल बाजार में एक व्यवसायी लाल कपड़ों में गिलट के जेवर बेचा करता था, जिसे यहाँ के लोग ‘डालडा चांदी’ कहते हैं। इस शब्द की उत्पत्ति पर भाषा विज्ञानी शोध कर सकते हैं पर मालूम पड़ता है कि यहां पर डालडा शब्द घी की तुलना में नकली होने के पर्याय स्वरूप ग्रहण किया गया है। जो भी हो, विदेशी सुंदरी को अपने सामने पाकर दुकानदार की दशा मिर्जा गालिब की तरह, ‘आप आये हमारे घर खुदा की कुदरत है’ वाली हो गयी। जैसे-तैसे उसने सामान दिखाया। बाद में विदुषी ने बड़े संकोच से बताया कि वे अपना पर्स मंदिर में ही भूल आयी हैं। इस पर दुकानदार ने जो जवाब दिया उससे सहज ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता कि अपने मुल्क की दो सौ साल की गुलामी के पीछे महज अपनी मेहमाननवाजी की मासूम आदत थी।

अच्छे और बुरे चरित्रों के बीच के विरोधाभास को उभारने के लिये कई बार निर्देशक को अति नाटकीय तत्वों का सहारा लेना पड़ता है पर जीवन में कभी-कभी यह सहज ही उपलब्ध हो जाता है। ऐसे ही एक वाकये में बारे में तराने जी बताते हैं कि महाराष्ट्र के लातूर में भयावह भूकंप की घटना के बाद पीड़ितों की मदद के लिये वे इप्टा की टोली लेकर चंदा करने निकले। लोग दान-पेटी में राशि एकत्र करते जा रहे थे। एक निम्न मध्यमवर्गीय सज्जन बाजार में मिले। सब्जियां लेकर आ रहे थे। सभी जेबों की तलाशी ली और जितने पैसे हाथ में आये दान पेटी के हवाले कर दी। पर उन्हें लगा की पीड़ितों की त्रासदी के मुकाबले यह राशि बेहद कम है, तो उन्होंने टोली से रूकने की गुजारिश की और जितनी सब्जियां वे लेकर आये थे, अनुनय-विनय कर उन्हें वापस कर दी और विनिमय की यह राशि भी पीड़ितों की मदद के लिये चली गयी। इसके ठीक उलट जब यह टोली नगर-सेठ के दरवाजे पर पहुँची तो चंदा तो नहीं मिला, उल्टे यह नसीहत मिली की सार्वजनिक कार्यों के लिये चंदा करते समय रसीद बुक छपवायी जानी चाहिये। पीछे से इप्टा के एक कलाकर ने कहा कि, ‘ भूकंप हमसे कहकर तो नहीं आया था कि पहले से चंदे की रसीद छपवा लो।’ एक दूसरे कलाकार ने धीरे से कहा, ‘‘हुजूर बहादुर जब इंतेकाल फर्मायें तो पहले से इत्तिला कर दें ताकि बाद के खर्चों के लिये किताबें छपावायी जा सकें!’’

 साथी कलाकार मतीन अहमद के साथ तराने जी


रंगकर्म से बावस्ता इस तरह की अनेक यादें तराने जी के जेहन में ताजा हैं। उनका रंगकर्म शुद्धतावादी कलाकर्म नहीं है। सामाजिक सरोकार उनके नाटकों की धुरी है। बदलाव के लिये नाटकों को औजार की तरह बरतने का हुनर है उनके पास। वे व्यक्तिगत जन-संपर्क में विश्वास नहीं करते और मोबाइल का कम से कम इस्तेमाल करते हैं। वे ‘प्रतिबद्धता’, ‘सरोकार’, ‘कन्सर्न’ जैसे शब्दों को जुमले की तरह इस्तेमाल नहीं करते, यह उनके काम में दिखाई पड़ता है। उनके निर्देशन में देश भर में कोई 500 से भी ज्यादा नाटकों के प्रदर्शन हो चुके हैं पर उनकी कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं है। वे सिर्फ नाटक खेलते हैं और नाटक खेलते रहना चाहते हैं। सम्मान बाँटने वाली अकादमियों-संस्थाओं को मेरी चुनौती है कि वे कभी ऐसे नाटककार के नाम पर भी विचार करके देखें जो आपके सम्मान को ठेंगे पर रखता हो!

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं.  उनका यह लिखा उनके ब्लाग इप्टानामा से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. दिनेश से संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के अन्य आलेख / संस्मरण / रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें… भड़ास पर दिनेश

दोराहे पर भारतीय मुसलमान

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को आगे करके भाजपा ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को एक अहम मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। यूं तो हर चुनाव में मुसलिम वोटर अहम होते रहे हैं, लेकिन मोदी के आने की वजह से उनके अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।  कांग्रेस समेत सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का लगता है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से दूर रखने के लिए मुसलमान उनके इर्दगिर्द ही सिमटा रहेगा, जिससे उनकी राह आसान हो जाएगी। इस बात को इससे भी बल मिलता है कि जब भी कोई मुसलिम नेता या उलेमा नरेंद्र मोदी के पक्ष में झुकता दिखाई दिया है, मुसलमानों ने उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया की है।

वस्तानवी से लेकर महमूद मदनी तो यही देखा गया है। मुसलमानों की समस्या यह है कि धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की सरकारों ने भले ही उन्हें कुछ न दिया हो, लेकिन वे भाजपा को किसी सूरत बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है। यूं भी उन्होंने राजग के छह साल के शासनकाल में देख लिया है कि उसने भी मुसलमानों के लिए ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे वे भाजपा की तरफ जाएं। 2002 के गुजरात दंगों का कलंक ढो रहे नरेंद्र मोदी आज तक उस कलंक धोने में नाकाम रहे हैं। सच तो यह है कि उसे वह धोना भी नहीं चाहते, क्योंकि धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए मुसलमान अहम हैं, मोदी के लिए भी मुसलमानों की उतनी ही अहमियत है। यह अलग बात है कि वह उनके विरोध में खड़े होकर हिंदु वोटों को धु्रवीकरण अपने पक्ष में करना चाहते हैं।

मोदी मुसलिम विरोध में किस हद तक जा सकते हैं, इसका उदाहरण है केंद्र सरकार द्वारा सच्चर समिति की सिफरिश के तहत मुसलिम छात्रों के लिए छात्रवृत्ति को गुजरात में लागू न करना। इस छात्रवृत्ति का 75 प्रतिशत केंद्र सरकार तो 25 प्रतिशत राज्यों सरकारों को देना था। हद यह है कि गुजरात सरकार इसके विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट चली गई। इतना ही नहीं, उसने सच्चर समिति की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए। संसद के शीतकालीन में लाया जाने वाले सांप्रदायिकता विरोधी बिल को भी नरेंद्र मोदी चुनौती दे रहे हैं। इस तरह देखें, तो मोदी भी मुसलमानों को अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस बीच अहम सवाल यह है कि मुसलमान कब तक धर्मनिरपेक्ष दलों और भाजपा की राजनीति के चलते फुटबाल बनता रहेगा? 66 साल बाद अब यह तय हो जाना चाहिए कि आखिर भारत में मुसलमानों की क्या हैसियत है? मुसलमानों की बदहाली का रोना रोने वाले कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्ष  राजनीतिक दलों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि आखिर जब उन्हें मुसलमानों की बदहाली की इतनी ही फिक्र है, तो उन्होंने अब तक उनके लिए क्या किया है? सच तो यह है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों ने मुसलमानों के लिए जो कुछ करने की कवायद की, वह महज सांकेतिक रूप ही की। वह मुसलमानों के लिए कुछ करते रहने भर दिखना चाहती हैं बस! वे यह जानते हुए भी कि ऐसा नहीं हो सकता, मुसलमानों को 18 प्रतिशत, तो कोई 4 प्रतिशत आरक्षण देने बात करता है।

आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों को 4 प्रतिशत आरक्षण दिया, लेकिन अदालत ने उसे रद्द कर दिया। आंध्र प्रदेश सरकार जानती थी कि ऐसा ही होगा, लेकिन उसे यह कहने मौका तो मिल ही गया कि हमने तो दिया, अदालत ने रद्द कर दिया तो हम क्या कर सकते हैं यानी सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। जब सरकारें सांकेतिक रूप से मुसलमानों का भला करने का दिखावा करती हैं, तो उससे बहुसंख्यकों के एक वर्ग में यह संदेश भी जाता है कि मुसलिमों का तुष्किरण किया जा रहा है। भाजपा जैसे सांप्रदायिक पार्टी को मुसलमानों पर हमलावर होने का बहाना दे दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार को बहुमत दिलाने में मुसलमानों ही अहम भूमिका रही है, लेकिन उसे दंगों के सिवा क्या मिला? उत्तर प्रदेश सरकार यह कहकर नहीं बच सकती कि भाजपा ने दंगा कराया। हो सकता है कि यह सच हो कि सपा सरकार को अस्थिर करने के लिए ऐसा भाजपा ने किया हो, लेकिन इससे यह सच नहीं बदल जाता कि सपा सरकार दंगों को काबू में करने के लिए नाकाम रही।

ऐसा भी नहीं है कि सरकारें मुसलमानों का भला नहीं करना चाहतीं। चाहती हैं, लेकिन मुसलमानों के लिए जो योजनाएं लाई जाती हैं, उन पर अमल ठीक ढंग से नहीं किया जाता। यह कड़वा सच है कि नौकरशाही का सांप्रदायिक वर्ग उन पर अमल करना नहीं चाहता। दूसरे, अशिक्षा की वजह से मुसलमान उनका फायदा भी नहीं उठा पाते। यही वजह है कि योजनाओं का बहुत पैसा इस्तेमाल नहीं होता और वह वापस हो जाता है। मुसलिम रहनुमा भी कम काहिल और मौकापरस्त नहीं हैं। ऐसे मुसलिम विधायक, सांसद या मंत्री बहुत कम हैं, जो मुसलमानों की बुनियादी जरूरतें भी पूरी करा पाते हैं। उनका काम महज अपनेऔर अपने परिवार का भला करने का होता है। देश के किसी भी शहर के मुसलिम बाहुल्य क्षेत्रों को देख लीजिए, सब बदहाल मिलेंगे। सरकारी स्कूल और अस्पताल तो वहां देखने को भी नहीं मिलते। सार्वजनिक बैंक अपनी कोई शाखा मुसलिम क्षेत्रों में खोलने के लिए तैयार नहीं है।

इसके विपरीत मुसलिम विधायक, सांसद या मंत्री की संपत्ति में बेहतहाशा बढ़ोतरी होती जाती है। वे अपने क्षेत्र के विकास कराने में भी अक्षम हैं। मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या उनका नेतृत्वहीन होना है। बंटवारे की मार को आज तक झेल रहे मुसलमानों के सामने नेतृत्व का संकट भी है। उन्होंने कभी नेहरू को अपना कायद माना, तो कभी इंदिरा गांधी को और कभी विश्वप्रताप सिंह को। लेकिन

सलीम अख्तर सिद्दीकी
सलीम अख्तर सिद्दीकी
उनकी बदहाली नहीं बदली। अगले साल का लोकसभा चुनाव भारतीय मुसलमानों के लिए कड़ी चुनौती है। एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं, जिन्हें मुसलमान किसी सूरत अपनाने तैयार नहीं हैं, तो दूसरी और वे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल हैं, जिन्होंने कभी उन्हें वोटबैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझा। यह बड़ी अजीब विडंबना है कि देश की 100 से ज्यादा लोकसभा सीटों को प्रभावित करने वाले मुसलमान दोराहे पर खड़े हैं। उन्हें रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क saleem_iect@yahoo.co.in या 09045582472 के जरिए किया जा सकता है.

असम में अखबार और चैनलों के पांच पत्रकारों को पुलिस ने जमकर पीटा, चहुंओर बवाल

गुवाहाटी। देश में पत्रकारों के साथ मारपीट और बदसलूकी के मामले बढ़ते जा रहे हैं. असम के गुवाहाटी में शनिवार को पत्रकारों के साथ मारपीट का मामला सामने आया है. खबर की तलाश में थाना पहुंचे मीडियाकर्मियों के साथ पुलिस ने गाली-गलौज, बदसलूकी और मारपीट की. यह घटना दिसपुर पुलिस थाने की है. मीडियाकर्मियों ने दिसपुर पुलिस थाने के बाहर प्रदर्शन करते हुए दोषियों के खिलाफ कार्यवाई की मांग की है.

इस घटना की जांच एसएसपी एपी तिवारी कर रहे हैं. उन्होंने थाने में लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगाला. एसएसपी ने पत्रकारों को आश्वस्त किया कि घटना में शामिल दोषियों को नहीं बख्शा जायेगा. गुवाहाटी से बीजेपी विधायक बिजोया चक्रवती ने पत्रकारों पर हमले की कड़ी निंदा की. आसु संगठन ने घटना के विरोध में प्रदर्शन कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. इस पूरे प्रकरण पर द हिंदू अखबार में सुशांत तालुकदार की लिखी विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, जो इस प्रकार है…

Police assault five journalists in Assam

Sushanta Talukdar
Guwahati, December 29, 2013

Five journalists, three of them from two private Assamese news channels and two of them photojournalists of Assamese dailies, were allegedly assaulted and caned by the police at Dispur police station here on Friday night when they had gone to enquire about a clash between two groups of youth at Japorigog area.

The journalists said they wanted to know from the police as to why the police had let two of the five youths involved in the clash and detained the other three at the police station. The journalists alleged in their First Information Report (FIR) that without provocation they had been heckled and pushed out of the police station, chased and caned by Sub-Inspector Arun Barua even when they fell down on road.

The incident has sparked off widespread protest across the State with the journalists’ bodies, political parties, students and youth bodies condemning the “police brutalities” on journalists and demanding stern action against “guilty police official.”

The three TV journalists were David Buragohain, Siddhartha Bhattacharyya and Sazadul Rana and photojournalists— Jitu Gogoi and Surajit Sarma.

“It was around 1 p.m. in the night when we had gone to Dispur police station to gather information about a clash between two groups and wanted information on the incident as we had heard that although five had been picked up two had been let go by police because of their close connection with the ruling party. We wanted to ascertain the facts. However, the policeman on duty refused to cooperate which led to some arguments. However, suddenly a Sub-Inspector of Police rushed into the police station and without provocation assaulted Mr. David Buragohain inside the police station and heckled us and pushed of the police station. Then some other policemen on duty came chasing us and beat us brutally. They did not stop beating even when Mr. Jitu Gogoi fell down on the road,” Mr. Surajit Sarma told The Hindu.

The SI Arun Barua lodged a counter FIR against the journalists, alleging that they had obstructed the policemen from discharging their responsibilities.

(साभार- द हिंदू)

ललकरले रह…बहुत बढ़िया तहार कविता आइल बा…

Hareprakash Upadhyay :  जनार्दन मिश्र का कविता संकलन पढ़ रहा हूँ- 'मेरी एक सौ एक कविताएं'। वे बहुत आत्मीय कवि हैं। समकालीन कविता के चर्चित हस्ताक्षर। आरा में रहते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हैं। मैं जब इंटर में पढ़ रहा था और कविताएं लिखनी-पढ़नी शुरू की थी, तब से उन्हें जानता-पढ़ता रहा हूँ। उन दिनों जब कहीं किसी गुमनाम पत्रिका (नामचीन पत्रिकाएं छापती ही नहीं थीं) में मेरी कविता देख लेते, तो कहीं मिलते दूर से ललकारते हुए उत्साहवर्द्धन करते…. ''ललकरले रह…बहुत बढ़िया तहार कविता आइल बा…।''

मुझे नयी-नयी पत्रिकाओं के नाम पते देते और उनमें कविताएं भेजने को प्रोत्साहित करते। कुछ लोग लिखते हैं और कुछ लोग लेखक बनाते भी हैं। जनार्दन मिश्र में दोनों तरह की क्षमता और प्रतिभा है। जनार्दन जी की कुछ कविताएं मैं आप लोगों को पढ़वाऊंगा। उनके पास अनुभवों की विराट दुनिया है। भौगोलिक लिहाज से नहीं बल्कि चीजों के ब्यौरे देते-देते व्यंग्य में अचनाक कोई पंक्ति वे ऐसी कह देते हैं कि सामान्य यथार्थ विशिष्ट अनुभव से दीप्त हो उठता है। बहुत सारे संस्मरण घर परिवार पड़ोस के और छोटी-छोटी चीजों की यादें उऩकी कविता में अत्यंत आत्मीय तरीके से आयी हैं।

आज के अवसरवादी दौर में जब लोग आत्मीय रिश्ते तक भूलने में नहीं हिचकते, जनार्दन जी ने घर के जोरन तक को भी जिस वैभव और महत्व के साथ कविता में याद किया है- वह दिल को छू लेने वाला है। बहुत लोगों को उनकी कविताएं सतही जान पड़ सकती हैं पर सतही बयानों में भी अगर बहुत ऊँची-ऊँची बातें न हों, जीवन के सहज ब्यौरे हों, तो वे मर्म को छूते हैं। जनार्दन जी कविताओं को पढ़ते हुए गाँव और कस्बे के ठेठ आदमी को सोचते, जीते, हँसते, गाते, गुस्सा करते, शिकायत करते और रोते हुए हम पाते हैं। अपने गाँव-जवार के चित्र पाते हैं। आप जनार्दन जी से कभी बात करें, फोन पर भी तो उनकी आवाज में एक आत्मीयता लहराती हुई आपको महसूस होगी। मेरा भरोसा ना हो तो आप खुद उनसे बात करें…09771464414

युवा साहित्यकार और पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

पांच पांच सौ रुपये में बिके बनारस के इले‍क्‍ट्रानिक मीडिया के पुरोधा

वाराणसी।। पत्रकारिता मिशन नहीं बल्कि भीख और दलाली का पर्याय बनती जा रही है। इसकी बानगी बनारस के उमरहां में देखने को मिली। चौबेपुर के उमरहां स्थित स्‍वर्वेद मंदिर में एक धार्मिक आयोजन था। इस कार्यक्रम में राष्‍ट्रीय क्षेत्रीय स्‍तर के सभी इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को बुलाया गया। एक बड़े टीवी चैनल के पत्रकार महोदय,एक नामी न्यूज एजेंसी के कैमरामैन व इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के भाई कवरेज के लिए बीस किलोमीटर दूर बाबा की बाइट लेने पंहुचे।
बाइट लेने के बाद तो डग्‍गमारी शुरू हुई। च्‍वयनप्राश मिला, डबल बेड का कंबल मिला। यहां तक तो सब ठीक था। डग्‍गामारी की अती तो जब हो गयी जब एक लाइन अलग लगी थी जिसमें लिफाफा मिल रहा था। उक्‍त सभी महानुभाव उस लाइन में लगे। खुशी-खुशी लिफाफा लिया। जब खोलकर देखा तो मात्र पांच सौ रूपये का नोट। बस फिर क्या था एक टीवी चैनल के पत्रकार आयोजकों से भिड़ गये और कहने लगे कि क्‍या भिखारी समझ रखा है पांच सौ रुपये दे रहे हो। 
इस पर बाबा के समर्थकों ने समझाया कि अभी इतने रखिये आगे कवरेज करेंगे तो और मिलेंगे। पूरे कांड की चर्चा बनारस के इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में जमकर फैली है। महज 500 रूपये के लिफाफा लेने पर कुछ धिक्‍कार भी रहे हैं। लेकिन इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के ये पुरोधा कह रहे हैं कि विरोध वहीं कर रहे हैं जिनके लिए अंगूर खट्टे की कहावत लागू होती है।
 
कानाफूसी
 

बिहार में पत्रकारों का सरकार और पुलिस के खिलाफ धरना प्रदर्शन

पटना।। बिहार के पत्रकारों पर लगातार हो रही पुलिसिया ज्‍यादती के विरोध में 29 दिसंबर को राज्य की राजधानी पटना में वर्किंग जर्नलिस्‍ट यूनियन ऑफ बिहार के बैनर तले पत्रकारों ने एक दिवसीय धरना दिया तथा विरोध मार्च निकाला सैकडों की संख्‍या में पूरे बिहार से आये पत्रकारों ने पुलिस और प्रशासन द्वारा लगातार पत्रकारों पर दमनात्‍मक कार्रवाई किये जाने की घोर निंदा की।
 
संगठन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष शशि भूषण प्रसाद सिंह की अध्‍यक्षता में यह धरना गांधी मैदान में स्थित जेपी गोलम्‍बर पर आयोजित किया गया और विरोध मार्च जेपी गोलम्‍बर आयकर चौराहा तक निकाला गया। धरना पर बैठे पत्रकारों ने दो टूक शब्‍दों में सरकार से मांग की है कि प्रजातंत्र के चौथे स्‍तंभ पर जुर्म और दमन बंद हो। किसी पत्रकार की गिरफ्तारी के पहले मुख्‍य मंत्री का निर्देश जरूर लिया जाय। अन्‍य राज्‍यों यथा हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, छत्‍तीसगढ्, मध्‍य प्रदेश, उत्‍तराखण्‍ड, राजस्‍थान तथा तमिलनाडू की भांति बिहार के पत्रकारों को भी पेंशन और सस्‍ते दर पर आवासीय भूखण्‍ड तथा आवास उपलब्‍ध करायी जाय। पत्रकारों ने यह भी मांग की है कि पत्रकारों को दी जाने वाली स्‍वास्‍थ्‍य राहत राशि पचास हजार से बढा कर पांच लाख रूपये की जाय। इसके अलावा राज्‍य के पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान की जाए।
धरना को संचालित कर रहे संगठन के प्रदेश महासचिव डॉ. देवाशीष बोस ने चेतावनी देते हुए कहा कि सूबे में पत्रकारों को साजिश के तहत फर्जी कांड में फंसा कर गिरफ्तार करने का सिलसिला अगर बंद नहीं किया गया तो इस आंदोलन को राज्‍य व्यापी स्‍वरूप प्रदान किया जायेगा। 
उन्‍होंने कहा कि प्रदर्शन और सेमिनार के माध्‍यम से सरकार के इस दमनात्‍मक रूप से भी जनता को अवगत कराया जायेगा।
धरना तथा विरोध प्रदर्शन में वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रजनन्‍दन, रामानन्‍द रौशन, सुधीर मधुकर, अभिजीत पाण्‍डेय, मोहन कुमार, डा; प्रवीण कुमार, मुकेश महान, अनमोल कुमार, प्रभाष चन्‍द्र शर्मा, सुधांशू कुमार सतीश, अरूण कुमार सिंह, राम प्रवेश यादव, शिवनाथ केशरी, नवीन कुमार, अनुराग गोयल,अजय कुमार भगत तथा चन्‍द्र शेखर भगत समेत सैकडों पत्रकारों ने भाग लिया ।

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक पत्र…

प्रिय अरविन्द केजरीवाल जी, 
नमस्कार !!
 
पिछले कुछ १०-२० दिनों से आपको पत्र लिखने के लिए सोच रहा था. पर एक आम आदमी कि परेशानियां तो आप जानते ही है. घर-ऑफिस कि जिम्मेदारियों के बीच समय निकालते-निकालते इतने दिन निकल गए. इस देरी का हालांकि फायदा ये हुआ है कि  इस बीच आप दिल्ली के मुख्यमंत्री हो गए हैं तो आपसे कहने, बतियाने के लिए मेरे पास भी एक-दो बातें ज्यादा हो गयी हैं. 
 
पिछले कुछ समय से,  अन्ना जी के आंदोलन के समय से ही मेरे आस पास का माहौल बदला है, इतने सारे संयोगो-प्रयोगों को होते देखा है कि ऐसे तो मैं आपसे कई बातें कहना चाहता हु, बताना चाहता हूं पर  बातचीत शुरू करने के लिए जो सबसे पहला मुद्दा एक आम आदमी कि समझ से लगता है कि वो आपकी सेहत का है. एक आम आदमी के लिए उसका शरीर  ही सब कुछ होता है और इस बात पर आपने मुझे बहुत निराश किया है. करीबन आज १५ दिन हो गए होंगे आपकी खांसी के. मुझे नहीं पता कि आप किससे अपना इलाज करवा रहे हैं  पर  इतना जरुर पता है कि आपका इलाज अच्छे से नहीं हो पा रहा है. 
इतने साल दिल्ली में रहने के बाद इतना दावे से कह सकता हूं कि आम खांसी सही इलाज से दिल्ली के ठंड के बीच भी मुश्किल से ५ दिन में निपट जाती है. यदि ऐसा नहीं होता तो या तो खांसी आम नहीं है या डॉक्टर सही नहीं है. इसलिए मुझे उम्मीद है कि आप अपने सेहत को गंभीरता से लेंगे और दोनों ही संभावनाओं कि उचित पड़ताल करेंगे। अपनी आम समझ से एक और बात जो मैं आपसे कहना चाहता हूं वो ये है कि राजनीति में आम आदमी भले काम कि चीज हो पर सेहत के मामलात में डॉक्टर खास (Specialist) ही काम के होते हैं, आम नहीं। तो इसलिए यहां अपने सिद्धांतों को थोडा परे रखियेगा। आपकी सेहत हमारे लिए महत्व्पूर्ण है.
 
 
आगे बढ़ते हुए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि शपथ लेने जाते हुए आप नीले स्वेटर में बहुत जंच रहे थे और जिस सादगी से आपने भव्यता के प्रतीक समझे जाने वाले पलों को अपने जीवन में स्वीकार किया वो एक मिसाल है. अखबारों में जो खबरें आयी हैं उसके मुताबिक आपने अपने लिए घर भी बेहद सादगी वाला ढूंढने का निर्देश दिया है. उसी खबर के मुताबिक पूरा PWD विभाग पिछले कई घंटो से इसमें लगा है जो उनके लिए काफी मुश्किल भरी कवायद भी साबित हो रही है. यहां मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं. आपके सादगी में इस विश्वास को मेरा नमन. पर मैं यकीं के साथ ये कहना चाहता हूं कि एक आम आदमी का जेब छोटा हो सकता है लेकिन दिल इतना छोटा नहीं कि अपने मुख्य-मंत्री को एक चारदीवारी वाला मकान मिलने पर तंज करे. आप इस आशंका को पूरी तरह अपने दिल से निकाल दे. मैं ये बातें आपको इसलिए लिख रहा हूं क्यूंकि उसी अखबार में एक खबर ये भी छपी थी कि पूर्वी दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ियों के इलाके में छतें गिर गयी हैं और आबादी का एक बड़ा हिस्सा भरी ठंड में भी खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर है.
PWD विभाग मुख्य-मंत्री के लिए एक सादे घर के इंतजामम में मशगूल रहने के कारण यदि इनकी सुध नहीं ले पाया तो ये उतना ही निर्मम होगा जितना मुख्यमंत्री के लिए एक आलिशान बंगला ढूंढने में लगे रहने में सुध न ले पाने के कारण होता। ये तो एक तात्कालिक कारण है. एक बड़ा कारण ऐसा कहने का ये है कि मैंने उसी दिन एक और खबर पढ़ी थी. ये खबर उन मुख्य-मंत्रियों के बारे में थी जिन्होंने ऐसी ही कम-ज्यादा सादगी दिखायी थी. जैसे बंगाल के मुख्य-मंत्री, त्रिपुरा के मुख्य-मंत्री, ओड़िसा के मुख्य-मंत्री थे. अब अगर बंगाल- ओड़िसा के आम आदमी कि बात की जाये जो दिल्ली कि सड़को पर अक्सर मिल जायेंगे तो उनसे मिलकर तो दिल्ली के आम आदमी को खुद के खास होने का रश्क होने लगे. आप इशारा समझ रहे होंगे। मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी भी चीज का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है. 
 
 
आपने राजनीति में कम समय में ही ऐसे कई अभिनव प्रयोग करके दिखा दिए हैं कि बड़े बड़े महारथीयों के भी होश गम हो गए. इसके लिए साधुवाद। जब आपने कोंग्रेस से गठबंधन के लिए वापस जनता के बीच  जाने का, उसकी राय इसपर राय जानने का प्रयोग किया तो यकीं मानिये मेरा दिल फूला नहीं समा रहा था. आप का ही एक भाषण सुना था जब आप मेरे इलाके में चुनाव प्रचार के लिए आये थे. आपने कहा था कि आम आदमी डरा हुआ है. ये बात मैंने उस दिन प्रत्यक्ष महसूस की. आपके उस प्रयोग से दिल तो फुला नहीं समां रहा था पर दिमाग में कुछ डर सा भी लगा. पर चूंकि आम आदमी को खुश होने के मौके बहुत कम मिलते हैं इसलिए उस आशंका को दबा मैं सबों के साथ खुश हो गया. जनता कि राय से सरकार चले, उसकी भागीदारी हो- वाह मुझ जैसे आम आदमी को तो मनो जमीं पर ही जन्नत नसीब हो गयी. पर अब हर काम क्षेत्र कि जनता के राय से, मर्जी से ही होगा; क्षेत्र कि जनता के मर्जी से ही कानून बनेंगे, हटेंगे- ये मैंने आपके पार्टी के कई नेताओं के मुह से और आपके मुंह से भी सुना।
इसने मेरी पहले दिन कि आशंका को फिर से सर उठाने का मौका दे दिया।  फिर आपके एक विधायक को टीवी पर एक सवाल के जवाब में जम्मू-कश्मीर के भारत या पकिस्तान में रहने के संदर्भ में इसी फॉर्मूले को लागु करने की जिद करते देखा। ये सुनने के बाद मुझे वही बात याद आ गयी- किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है. ये सुनने के बाद मुझे लगा कि मुझे आपको कुछ बातें जरुर बतानी चाहियें। एक दिल्लीवासी होने के नाते 700 L मुफ्त पानी और बिजली के आधे बिल मेरे लिए जन्नत कि नेमतों से कम नहीं है. पर इन सबके बावजूद इसके लिए जम्मू-कश्मीर कि कीमत थोड़ी ज्यादा लगती है. मैं एक आम आदमी हूं इसलिए अपनी ताकत के साथ साथ अपनी कमजोरोयों को भी अच्छे से जानता हूं. मैं आपकी इस बात से इत्तिफाक रखता हूं कि आम आदमी डरा हुआ है.
 
मैं भी डरा हुआ हूं, अपनी कमजोरियों से. मैं डरा हुआ हूं कि जम्मू-कश्मीर कि छोड़िये, ऐसे प्रोत्साहन मिलने पर कल को मैं खुद दिल्ली को एक अलग देश बनाने कि मांग का समर्थन कर दूं. मैं डरा हुआ हूं कि यदि क्षेत्र कि जनता की मर्जी के हिसाब से ही कानून बनने लगे/ खत्म होने लगे तो देश के सबसे खराब लिंग अनुपात वाले पंजाब में वहां कि जनता अपने पूर्वाग्रहों के कारण भ्रूण-हत्या-रोकथाम कानून खत्म न कर दे. मैं डरा हुआ हूँ कि Honour Killing के लिए कुख्यात हरयाणा में जनता उसे जायज बनाने का कानून न ले आये. ऐसी और कई चीज़ें हैं जिनसे मैं डर जाता हूं और मैं डरता हूं कि आम आदमी को फायदा पहुचने और उसका उत्थान करने वाले पहले भी आये कई कथित क्रांतिकारी विचारों, इंकलाबों जैसे समाजवाद, समतावाद, मार्क्सवाद कि तरह ये इंकलाब भी अपने कर्णधारों के अतिरेक उत्साह और अकुशलता के कारण बिना किसी ठोस बदलाव को लाये एक चूका हथियार बन कर न रह जाये। 
 
हो सकता है कि मैं नाहक डर रहा होऊं और ऐसा कुछ न हो. लेकिन ये भी हो सकता है कि मेरा डर सही साबित हो. क्यूंकि इस देश के इतिहास ने कई बार ऐसे डर को सही साबित किया है- विनोबा भावे के आंदोलन से लेकर जेपी के आंदोलन तक और शायद अनना के आंदोलन तक भी. एक और बात कहूंगा। अखबारों से ही सुना कि आप लोकसभा का चुनाव भी लड़ने वाले हैं ताकि केंद्र में भी आम आदमी को उसकी सरकार मिल सके. आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है. लेकिन एक दिल्ली-निवासी और एक आम आदमी होने के नाते मैं आपको ये सलाह देने का दुस्साहस करूंगा कि फिलहाल आप दिल्ली पर ही ध्यान दे. आप आम आदमी के सहारे, उसके फैसलो के सहारे सत्ता चलना चाहते हैं. लेकिन आम आदमी कि भी कुछ कमजोरियां है जो उसके फैसलों में भी रहेगी जब तक कि वो इस नयी जिम्मेदारी के लायक खुद को मजबूत नहीं बना लेता।
 
इसलिए आम आदमी को और आम आदमी के नेता के रूप में खुद को पुख्ता होने का समय दीजिये। सदियों कि जड़ता है, इसे ख़त्म होने में सदियाँ तो नहीं लेकिन दशक का वक़्त तो लगेगा ही. इसे वो वक़्त दीजिय। ज्यादा आंच खाने को जल्दी बनाने से ज्यादा उसे खराब कर देती है. पिछले एक साल में हिंदुस्तान के आम आदमी ने सीरिया, मिस्र, अरब के आम आदमी से इतना तो सिखा ही है. मैंने पहले भी लिखा है कि किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को खत्म कर देता है, चाहे वो उत्साह का अतिरेक हो, फैलाव का या बदलाव का अतिरेक। 
 
ये पात्र जब तक आपको मिले हो सकता है कि नया साल आ जाये। नया सबेरा, नया सूरज, नयी रोशनी। उम्मीद करता हूं कि ये सूरज अंधेरे में रहने वाले लोगो के लिए नया दिन लेकर आएगा और बदन झुलसा देने वाले दोपहर के अतिरेक से बचा रहेगा। 
 
वंदे मातरम !!
एक आम आदमी 
अभिनव

सरस बाजपेयी बने कानपुर प्रेस क्‍लब के नये अध्‍यक्ष, अवनीश बने महामंत्री

कानपुर।। 13 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद कानपुर प्रेस क्‍लब में चुनाव हो ही गया। चुनाव के परिणाम अनुसार सरस बाजपेयी (दैनिक जागरण) को अध्‍यक्ष, अवनीश दीक्षित (ईटीवी) को महामंत्री, घोषित किया गया. जबकि कोषाध्‍यक्ष तथा मंत्री पद पर क्रमश: ओमबाबू मिश्र तथा नीरज अवस्‍थी व सुनील साहू विजयी घोषित किये गये. उपाध्‍यक्ष पद हैदर नकवी ने अपने नाम किया.
कानपुर प्रेस क्लब का चुनाव शुरू से ही दिलचस्प रहा. चुनाव में शुरू से ही अध्‍यक्ष पद हेतु त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला. चुनाव के दौरान सरस बाजपेयी (दैनिक जागरण), सौरभ शुक्‍ल व सुरेश त्रिवेदी (सहारा) के बीच कांटे की टक्‍क्‍र रही. चुनाव में सरस बाजपेयी ने सौरभ शुक्‍ल को हराकर अपनी विजय सुनिश्चित की. अभी कार्यकारिणी के 11 पदों की गिनती पूरी नहीं हो सकी है.
 

 

मिस्र में अल जजीरा के तीन पत्रकार अरेस्‍ट

टीवी नेटवर्क अल जज़ीरा के तीन पत्रकारों को मिस्र की राजधानी काहिरा में गिरफ़्तार कर लिया गया है. मिस्र के गृह मंत्रालय ने एक वक्तव्य में कहा कि अल जज़ीरा की टीम ने मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन के सदस्यों के साथ ग़ैरक़ानूनी बैठकें की. मुस्लिम ब्रदरहुड को पिछले सप्ताह आतंकवादी संगठन घोषित किया गया था.

वक्तव्य में ये भी कहा गया है कि चैनल ने ऐसी ख़बरें प्रसारित की जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा था. टीम के कैमरा और रिकॉर्डिंग्स भी ज़ब्त कर लिए गए हैं. गिरफ़्तार किए गए पत्रकार अल जज़ीरा की अंग्रेज़ी टीम के सदस्य हैं. इनमें बीबीसी के पूर्व संवाददाता पीटर ग्रेस्टे और काहिरा के ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद फादेल फाहमी शामिल हैं. माना जा रहा है कि पत्रकारों को रविवार देर रात हिरासत में लिया गया था.

मिस्र में इस साल जुलाई में सेना ने मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति पद से अपदस्थ कर दिया था. इसके बाद उनके संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड ने देश में व्यापक विरोध किया. सेना के समर्थन वाली मिस्र की नई सरकार ने न सिर्फ़ मुस्लिमद ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगाया बल्कि सरकार विरोधियों का कहना है कि उन्हें जानबूझ कर निशना बनाया जा रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि मोहम्मद मोर्सी को हटाए जाने के बाद कई इस्लामी चैनल बंद कर दिए गए थे और इनमें काम करने वाले पत्रकारों को अस्थाई तौर पर हिरासत में ले लिया गया था.

अल जज़ीरा के पत्रकारों की गिरफ़्तारी मिस्र भर में पुलिस और मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थकों के बीच ताज़ा झड़पों के बाद हुई है. झड़पों में काहिरा, मिन्या प्रांत और नील डेल्टा में तीन लोग मारे गए. अधिकारियों का कहना था कि सुरक्षाबलों ने ब्रदरहुड के लगभग 265 समर्थकों को हिरासत में लिया. नील डेल्टा में एक पुलिस मुख्यालय पर आत्मघाती हमले के बाद पिछले सप्ताह मुस्लिम ब्रदरहुड को आधिकारिक तौर पर आतंकवादी गुट घोषित किया गया था. सरकार का आरोप था कि इस हमले के लिए संगठन ज़िम्मेदार था जबकि ब्रदरहुड ने इससे इंकार किया था. (बीबीसी)

दैनिक जागरण, रांची में डीएनई बने प्रदीप श्रीवास्‍तव

अमर उजाला, मुरादाबाद से खबर है कि प्रदीप श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर प्रादेशिक डेस्‍क इंचार्ज के पद पर कार्यरत थे. कुछ समय से छुट्टी पर चल रहे थे. प्रदीप श्रीवास्‍तव ने अपनी नई पारी रांची में दैनिक जागरण के साथ शुरू की है. उन्‍हें डीएनई बनाया गया है. वे यहां पर इनपुट हेड की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. जागरण के साथ प्रदीप की यह दूसरी पारी है.

प्रदीप ने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्‍तान के साथ सन 98 में की थी. इसके बाद 2001 में इन्‍होंने अमर उजाला ज्‍वाइन कर लिया तथा मुरादाबाद में अपनी सेवाएं दीं. 2004 में अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर दैनिक जागरण मुजफ्फरपुर की लांचिंग टीम के सदस्‍य बने. 2007 में जब अमर उजाला की लांचिंग गोरखपुर हुई तो ये अमर उजाला के साथ जुड़ गए. यहां लंबे समय सिटी इंचार्ज के रूप में काम किया. यहां से इनका तबादला मुरादाबाद के लिए हो गया.

सड़क हादसे में पत्रकार गोपाल तिवारी की मौत

फतेहपुर में शनिवार की देररात कल्यानपुर थाना क्षेत्र के पिलखिनी मोड़ के पास जीटी रोड पर कार और ट्रक की टक्‍कर में एक पत्रकार गंभीर रूप से घायल हो गया। इलाज के लिए सदर अस्‍पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पत्रकार की पहचान कानपुर निवासी गोपाल तिवारी के रूप में हुई है। इस घटना में तीन अन्‍य लोग गंभीर रूप से घायल हैं, जिन्‍हें इलाज के लिए कानपुर के हैलट अस्‍पताल रेफर किया गया है।

जानकारी के अनुसार बीती रात तकरीबन 9 बजे हुंडई आई-10 कार पर सवार होकर पत्रकार गोपाल और उनके तीन परिचित नीना गुप्‍ता (पत्‍नी मनोज गुप्‍ता), विकास गुप्‍ता और संदीप गुप्‍ता कानपुर से फतेहपुर आ रहे इसी बीच उनकी कार की टक्‍कर पिलखिनी मोड़ के पास एक ट्रक से हो गई। घटना में चारों लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस सभी को लेकर सिविल अस्‍पताल पहुंची। यहां इलाज के दौरान पत्रकार गोपाल तिवारी की मौत हो गई। अन्‍य तीनों की गंभीर हालत देखते हुए डाक्‍टरों ने कानपुर के लिए रेफर कर दिया। बताया जा रहा है कि हादसा घना कोहरा होने के चलते हुआ है। ये लोग गुम हुए एक बच्‍चे की तलाश में फतेहपुर आ रहे थे। 

इस मौत से बेहतर होगा रिटायरमेंट : अशोक शर्मा

Ashok K Sharma : बत्तीस साल सरकारी नौकरी के… यह कमबख्त अंतरात्मा अगर सो गयी होती तो कुछ तरक्की मैं भी कर लेता. साला, बस काबिल, भरोसेमंद और ईमानदार होने की गाली सुनते सुनते तंग आगया हूँ. लोग सेवानिवृति से डरते हैं, मुझे इंतज़ार है इसका. इस मौत से बेहतर होगा रिटायरमेंट..

यूपी में तैनात प्रशासनिक अधिकारी अशोक कुमार शर्मा के फेसबुक वॉल से.

इसी दिल्ली सचिवालय से मुझे और संतोष कोली को बाहर फिंकवा दिया गया था : मनीष सिसोदिया

Manish Sisodia : आज अगर संतोष होती तो शायद बगल की सीट पर बैठी होती. सचिवालय में कदम रखते वक्त आज बहुत याद आई संतोष…. दो साल पहले मुझे और संतोष को इसी सचिवालय से बाहर निकलवा कर फिंकवाया था, पूर्व मुख्यमंत्री और उनके सचिव पी. के. त्रिपाठी ने….. मैं और संतोष राशन की जगह कैश दिए जाने की स्कीम पर चर्चा करने आये थे… विरोध करते ही भडक गई थीं मैडम…

पहले पुलिस बुलाकर मीटिंग से बाहर निकलवा दिया… और फिर सचिवालय से ही बाहर निकलवा दिया. इसके बाद दो साल तक यहां आना ही नहीं हुआ…. सचिवालय की बिल्डिंग आज भी वही है लेकिऩ, आज जनता ने उन मैडम को ही सचिवालय से बाहर निकाल दिया है…

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया के फेसबुक वॉल से.

अशोक चौधरी बने जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर के संपादक

वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी का नाम जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर के प्रिंट लाइन में बतौर संपादक दिसंबर के पहले हफ्ते से जाने लगा है. शैलेंद्र मणि त्रिपाठी के जाने के बाद प्रबंधन ने अशोक चौधरी पर भरोसा किया और उन्हें संपादक बना दिया. गोरखपुर में वंचितों के पक्ष में छात्र राजनीति से लेकर किसान-मजदूर राजनीति और फिर पत्रकारिता के जरिए आवाज उठाने वाले अशोक चौधरी हिंदी बेल्ट के उन गिने चुने दलित पत्रकारों में से हैं जो संपादक की कुर्सी तक पहुंच सके हैं. अशोक गोरखपुर में हिंदुस्तान, दैनिक जागरण समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं.

भड़ास को खबर करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

We want justice for false fir case…

In chattisgarh state district durg a bjp parshad facing a case of false F.I.R his father complained against this and want justice.
 
The editor ,
 
Media has always been one of the most effective medium to educate & make people aware for facts & right things, therefor I have written detail about the fact. would inform that my son Mr.hariom tiwari appointed as a B.J.P parshad,ward no 1, since 2010(nagar palika nigam bhilai) , his age is 31yrs. He has done so much work in ward & their localties regularly. As we know that in every area good & bad people live in localties, therefor Builder. Mr.shrinivas khedia & their gangester his work is generally land capturing & disturbance of loving people most of the time ,due to strong financial power,position & political support .
 
My son Hariom tiwari always oppose such unethical work of Builders Mr.shrinivas khedia & gangester( Niranjan tripathi nick name satpati & gulab mahto so many times , that's the reason Nagar palika nigam Bhilai
& durg collector giving order to destroy their illegal property last year 2012, after this incident they are just demoralise him , first of all Gulab mahto & satpati attacked him & several other incident happened in
last 3 yrs ,even then local supela & smriti nagar police didn't support , the reason behind financial support given by builder & such corrupt people.
 
Now we acknowledge that Builder Mr.shrinivas khedia , satpati & Gulab mahto these 3 people made plan , how to demolish their parshad career , therefor he has given money to drunker ishwar singh(nick name- ishu) for charging rape case of her 7 yrs daughter against 2 person name My son hariom tiwari &
lokesh sahu (military personel).
 
I am here short briefing of this case story : Ishwar singh charged rape case of her 7yrs old daughter , that date he mentioned 24.06.2013 & he reported on 22.09.2013 ,but we mentioned nothing is shown in medical report of rape case first, second already he mentioned lokesh sahu (military personel) on that date he was already on Military duty , location chennai that report already send by military commander to Supritendent police durg, third her wife Nitu kaur already opposed such nonsense thing but police didnot listen anything in police station, she is witness of everything for facts of money & greedness of her husband , but supela police & smritinagar (bhilai, durg )diidnot take any action of her drunker husband , 4th matter is How is possible 7 yrs girl who raped by 2 people & his father written an fir against him after 3 months & supela police filled fir without doing any inquiry of such facts.
 
we are very upset of such wrong thing happened against my son ,so I want your fully cooperation to right justice , if my son is wrong you took right action as well as hang till death ,  my view is very clear ,if he is right kindly justice and right action to all people either ishwar singh, shrinivas khedia , his gangester team(gulab mahto , satpati) & police also.
 
 
Note : we have evidence , plz cooperate for right justice.
 
 
Thanks & regards
Shanti Tiwari
Model town,ward no 1,
Nehru nagar ,bhilai,dist-durg, chhattisgarh.
mob: 07489055101

मुलायम के रास्ते पर ही चले हैं केजरीवाल !

अरविंद केजरीवाल ने कल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भ्रष्टाचार और फिजूल खर्ची के खिलाफ सरकारी यानी जनता के धन का दुरुपयोग जैसे तमाम मुद्दों को लेकर जनता के बीच आवाज बुलंद करके ही केजरीवाल आज इस स्थिति  में आये हैं। यहां तक तो सब ठीक है। 
मगर अपने  शपथ ग्रहण समारोह को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित करके वह दिल्ली और देश को की जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं? अपना आशय उन्हें पहले स्पष्ट करना चाहिए था! आखिर एक सादे समारोह में जो काम बिना किसी अतिरिक्त खर्चे के हो सकता था उसके लिए इतने बड़े पैमाने पर दिखावा करने की क्या जरुरत थी? यह उनकी कथनी और करनी का वह पहला फर्क है जो किसी भी राजनीतिक  दल या नेता में सत्ता आने के बाद आ ही जाता है। 
 
मुझे याद है कि सन १९८९ में जब सपा मुखिया कांग्रेस के खिलाफ एक लंबे और जबरदस्त आंदोलन के बाद पहली बार उत्तरप्रदेश जनता दल-भाजपा  की सरकार के मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने भी राजभवन के बजाये लखनऊ के केडी सिंह बाबू स्टेडियम में ही शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया था। मुलायम सिंह यादव एक घोषित राजनेता और राज़नीतिकं दल के मुखिया थे ,उनका दल सत्ता में आया था उन्हे अपनी विजय का परचम अपने ही तरीके से लहराना था सो उन्होंने किया। 
उन्होंने भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची और सादगी का वह लबादा नहीं ओढ़ा था,जो आज केजरीवाल ने ओढ़ा है। फर्क इतना है कि मुलायम के साथ भाजपा थी और केजरीवाल के साथ आज कांग्रेस है। तब मुलायम के लिए भाजपा साम्प्रदायिक थी और आज केजरीवाल के लिए कांग्रेस भ्रष्ट ! 
 
जाहिर सी बात है कि लालबत्ती से सरकारी धन की बर्बादी नहीं रुकेगी। सुरक्षा नहीं लेने से सरकारी पैसे का सदुपयोग नही होगा ,आखिर जो सुरक्षा कर्मी उनकी सुरक्षा में आते वह उनकी सुरक्षा में न आने के बाद भ नौकरी पर रहेंगे और वेतन लेंगे ही,कहीं भी उनको तैनात किया जाए! केजरीवाल की सादगी तब थी जब वह चुप-चाप उपराजयपाल के समक्ष बेहद सादगी से बिना किसी तमाशे के शपथ लेते और अपना जनता को रहत देने का,बिजली सस्ती और पानी मुफ्त देने का ऐलान करते,ऐसे तमाम फैसले करते जिनसे सरकारी धन कि बर्बादी रूकती और न केवल जनता को बल्कि अन्य राजनीतिक दलों को भी लगता कि वाकई यह आदमी कुछ करके दिखाने वाला है! हो सकता मेरा इस समय यह कहना जल्दबाजी कहा जाए मगर इस सच को ठुकराया नहीं जा सकता कि रामलीला मैदान आंदोलन का स्थान तो हो सकता है किसी संवैधानिक सरकार के अस्तित्व में आने के लिए नहीं,हो सकता है उन्होंने यह सोचा हो जिस रामलीला मैदान ने उन्हें दिल्ली का मुख्यमंत्री बना दिया उस भूमि को इस तरह से अपना आभार प्रकट करें ,मगर इसके लिए केवल शपथ ग्रहण ही उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। 
 
आखिर मौजूदा राजनीतिक दलों के काम और नीतियों से खुली असहमति जता कर फिर उनका ही अनुसरण करके केजरीवाल ने वोटों के बाजार में एक और दुकान का शुभारंभ नहीं कर दिया? इस विचार को खारिज करने के लिए मजबूत तर्क की जरुरत है ,जो उन्हें आज नहीं तो कल देना ही होगा! अरविंद केजरीवाल को आज पूरा देश शुभकामनाएं दे रहा है,दिल्ली उनकी तरफ आखें फाड़ कर देख रही है ,आखिर बाकी राज्यों की सरकारें भी यह जानना चाहत हैं कि केजरीवाल क्या ऐसा करते हैं जो सबसे अलग होगा! मगर रामलीला मैदान का नाटक समझ से  परे है! उन्हें वाकई कुछ करना है और जनता की  राय लेकर काम करना है तो मैं भी उन्हें कुछ सुझाव देना चाहता हूं:-
 
 
दिल्ली के नए मुख्यमंत्री को इन सुझावों को पढ़ने  से पहले यह संकल्प लेना जरुरी है कि  PR.,Advertising ,इमेज building करने वाली कंपनियों से दूर रहना है। कॉर्पोरेट सिस्टम को जड़ से खतम करके एक ऐसी व्यवस्था बनानी है जिसमे दिखावा नहीं स्थायित्व और सुविधा हो और आम आदमी भी उस व्यवस्था को जान ले।
१- प्रत्येक चुनाव में सभी नागरिको के लिए मतदान अनिवार्य ,समीक्षा के लिए एक आयोग का गठन ,जैसे इनकम टैक्स  करता है कि किस किस ने रिटर्न नहीं भरा, यह आयोग केवल समीक्षा करेगा और मतदान न करने वाले के समस्त नागरिक अधिकार समाप्त, करने तक जैसा दंड।
२-लोकसभा और विधानसभा समेत सभी सहकारी और निकाय चुनावों में मतदान के लिए एक हफ्ते का न्यूनतम समय,चुनाव आयोग को अभी कह दीजिये कि दिल्ली में एक दिन में नहीं होगा मतदान।
३ -मोबाईल एटीम के जैसे वोटिंग मशीनें लिए वैन घर जाकर मतदान लेंगी।
४ -कोई सरकारी मीटिंग किसी फाइव स्टार होटल में नही होगी।
५ -सरकारी दफ्तरों होने वाली बैठकों में चाय नाश्ता प्रति व्यक्ति २५ रुपये से ज्यादा स्वीकार्य  नहीं होंगा । काजू बादाम खाने हैं तो घर जाकर खाइये।  लंच केवल उन अतिथियों के लिए होगा, जिनको सामूहिक रूप में बुलाया गया हो,और इसके लिए अधिकतम ५० रुपये की  अनुमति ,ऐसी मीटिंग बंद जिसमे खाना खिलाना पड़े,आखिर अपने ही मातहत कर्मचारियों और अफसरों को रोज तनख्वाह देकर मेहमान बनाना कहां तक उचित है ?
६ -गैस पेट्रोल डीजल औरआटा, दाल ,चावल ,मसाले, घी ,तेल ,चाय ,काफी, फल सब्जी ,किताबें आदि से वैट और बाकि टैक्स की दरें तुरंत आधी। सरकारी विभागों को चलाने के लिए आखिर टैक्स के जरिये जनता से धन वसूली बंद। भ्रष्टाचगार यदि आधा भी कर दिया तो अतिरिक्त टैक्स नहीं लगाना पड़ेगा।
७- सरकारी डिस्प्ले विज्ञापन अधिकतम एक साल में चार और नेताओं की बरसी के विज्ञापन बंद ,उन्हें सिर्फ इतिहास में पढ़ाया जाए और उन्ही नेताओं को इतिहास में पढ़ाया जाए जिनके चरित्र संबंधी विवाद हों। 
 
८- मीडिया को खुश करने के लिए बड़े-बड़े विज्ञापन  देने का सिलसिला  बंद, सरकारी डिस्प्ले विज्ञापन का अधिकतम साइज १०० सेमी से अधिक नहीं होना चाहिए। सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए विज्ञापन ठीक है मगर योजना से देश कि हालत बदल गयी यह प्रचार अनुचित और जनता के पैसे की बर्बादी है। आखिर बदली हुई हालत जनता खुद बोलेगी।
९-सरकारी समारोह में पत्रकारों को उपहार प्रतिबंधित। इसके बदले श्राम कानूनो को अधिक मज़बूत बनाया जाए जिससे पत्रकारो की आर्थिक स्थिति सुधरे और उनकी सेवाओं संबंधी कानून कड़ाई से लागू हों।
१०- दिल्ली  राज्य के प्रत्येक नागरिक का स्वास्थ्य एवं जीवन बीमा ,इसकी लिए आधार कार्ड या NPA राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में नाम दर्ज होते ही मासिक आय का दो प्रतिशत हर नागरिक से शुल्क लेकर बाकि धनराशि सरकार अदा करे, नागरिकों से एक बार ही अंशदान लिया जाए,इस अंशदान से एक कोश बनाया जाए।।
११- झुग्गी झोपड़ियों स्वास्थय सफाई शिक्षा के लिए स्वयं सेवी दलों का गठन।
१२- बिजली की दरें सभी के लिए एक सामान,बिजली चोरी रोकने की दिशा में बड़ा कदम होगा। घरेलु व् व्यावसायिक व् औद्योगिक दरें एक सामान।
१३ – सरकारी अफसरों कर्मचारियों को घर से लाने और ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था।
१४- दहेज, विवाह संबंधी विवादों को निपटाने के लिए महिलाओं के लिए विवाह पूर्व समजिक संबंध और व्यवहार प्रशिक्षण संस्थानों कि स्थापना जिसमें युवतियों और युवकों को यह बताया  जाए कि विवाह के बाद कैसे जीवन निर्वाह करना है ,जहां सब एक दूसरे को समझ जान सकें,इससे समाज में यौन हिंसा और विवाह संबंधी विवादों में कमी आएगी और एक स्वस्थ समाज की  रचना की दिशा में बड़ा काम होगा। यह एक ऐसी  पहल होगी जिसमे MSW डिप्लोमा प्राप्त युवक युवतियां और समाज और मनोविज्ञानी विवाह पूर्व इस बात का प्रमाण देंगे कि यह जोड़ा शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार है। इससे समाज में विकृति नहीं बढ़ेगी और सरकार का धन व् समय इन विवादों में बर्बाद नहीं होगा ,वर्ना पुलिस अभी इन्ही मामलों  में उलझी रहती है। 
 
१५- अमेरिका की ओबामा सरकार ने अपने यहां एजुकेशन लोन पूरी तरह माफ़ कर दिया है। एक नीति बनाकर कम से कम उन छात्रों का लोन तो माफ कर ही देना चहिये जिन्होंने वाकई इसका सदुपयोग करके अच्छे नंबरों से उच्च शिक्षा प्राप्त की है। 
 
आशीष कुमार अग्रवाल
 

पीटीआई के दीपक रंजन को प्रथम व नेशनल दुनिया के अशोक को द्वितीय पुरस्कार  

गाजियाबाद।। मेवाड़ संस्थान वसुंधरा में पं.मदन मोहन मालवीय जयंती के अवसर पर मंगलवार को 9वां पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह में पीटीआई के पत्रकार दीपक रंजन को प्रथम और नेशनल दुनिया गाजियाबाद के अशोक कुमार गिरी को द्वितीय पुरस्कार मिला। 
समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार बनवारी जी ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर किया। उन्होंने कहा कि गुरु रविंद्र नाथ टैगोर और मदन मोहन मालवीय के जीवन से काफी कुछ सीखने की आवश्यकता है। वर्तमान भारत में राजनीतिक आजादी तो मिल गई, मगर बौद्धिक आजादी नाम मात्र की नहीं है।
1947 के बाद से निरंतर हम बौद्धिक गुलाम होते गए। यह एक विचारणीय प्रश्न है। मेवाड़ संस्थान के अध्यक्ष अशोक कुमार गदिया ने कहा कि मदन मोहन मालवीय विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी थे। वह आदर्श विद्यार्थी, पुत्र, पति, देशभक्त पत्रकार, वकील, कवि एवं कुशल राजनीतिज्ञ थे। वह शिक्षा के क्षेत्र में युगदृष्टा थे। चयन समिति के सदस्य वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने, हरिशचंद्र शुक्ल काक, प्रदीप सिंह और अरविंद मोहन के सामूहिक निर्णय से प्रथम पुरस्कार पीटीआई के पत्रकार दीपक रंजन को व द्वितीय पुरस्कार नेशनल दुनिया गाजियाबाद के अशोक कुमार गिरी को दिया गया। 
इसके अलावा मंगल सिंह चौहान को विशिष्ट पुरस्कार से नवाजा गया। विभिन्न कार्यों के लिए पत्रकार रवि शंकर, अरूण कुमार सिंह, धु्रव कुमार, ताराचंद, रामवीर सिंह को भी पुरस्कृत किया गया। सभी प्रतियोगियों को शॉल, प्रशस्ति पत्र एवं प्रतीक चिन्ह प्रदान किए गए। समारोह का संचालन अमित पराशर ने किया। डॉ. अलका अग्रवाल ने आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। 
 

गुजरात की ‘रोशनी’ और सोमनाथ का ‘सूरज’

पिछले दिनों गुजरात जाना हुआ गुजरात, नाम लेते ही एक और नाम जहन में आता है जिसकी चर्चा आज लगभग हर किसी की जुबान पर आम है । नरेन्द्र मोदी राज्यीय स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे नरेन्द्र मोदी का कद बढ़ाने में गुजरात का अहम योदान है । गुजरात में किये उनके विकास के दम पर देश के विकास के सपने देखे और दिखाये जा रहे हैं ।
मौजूदा सरकार की असफलता, भ्रष्टाचार और हालात को देखते हुये आशावादी होने के लिये ऐसे सपने देखना जरूरी भी हो जाता है ।
अहमदाबाद पहुंचते ही मोदी के विकास की तस्वीर का सच देखने की स्वभाविक इच्छा थी । रात के अन्धेरें में साफ चौड़ी सड़को पर चमकती लाइटों से एक बारगी लगा कि दिल्ली फेल है । अहमदाबाद स्टेशन के 10 किमी. एरिया में घूमना हुआ । मणीनगर में मिले शानदार बाजार, खुशनुमा लोग, सोड़े की दुकान पर ठहाका मारते दोस्त और दौड़ती सिटी बसें । सिटी बसों के लिये 5 लैन सड़क के बीच में अलग से रोड था जिस पर केवल इन्ही बसों को आवागमन होता है । वहीं स्वचालित दरवाजे लगे हुय इनके स्टोपेज थे । आधुनिक समाज जैसा सब कुछ था लेकिन फिर भी दिल्ली जैसी आपाधापी नहीं थी । दारू के ठेके नहीं थे ।
उसकी जगह था सोड़ा पानी, 5 रूपये गिलास से शुरू, 10 तरह के स्वाद, मार्केट के हर नुक्कड़ पर एक दुकान मिल रही थी । शराब का अच्छा विकल्प । कुछ से पूछा कि ‘यहां शराब मिलती है? जवाब मिला नहीं, बन्दी है । अच्छा लगा । मन में ख्याल आया कि जहां से आये हैं वह कृष्ण की नगरी है, माखन है, मिश्री है, दूध है, दही है, लेकिन सब बेकार हैं, क्यूकिं यहां शराब है । पीने वालो और पिलाने वालों ने वृन्दावन को भी नहीं बख्शा । सरकार ने अपने नाम पर वृन्दावन में घुसने से पहले ही वन चेतना केन्द्र ( परिवार के साथ घूमने के लिये सरकारी पार्क) के सामने ठेका उठा रखा है । अजीब है लेकिन फिर भी यहां कई लोग तो दूध बेचकर शराब खरीदते हैं । लगभग पूरे उ.प्र. की यही हालत है । गरीब परिवारों में महिलाऐं और बच्चे काम करने और पिटने को मजबूर हैं क्योंकि उनके घर के मर्द, शराब पीते हैं । 
खैर, गुजरात में विकास का एक कारण तो समझ में आ गया । सड़कों पर लोगों के चेहरे पर दिखने वाले विकास की धूप केवल अहमदाबाद जैसी बड़ी जगह पर ही फैली हुई है या फिर इसका उजाला दूर गांवों तक में जाता है यह तो पता नहीं लगा लेकिन इतना जरूर है कि अहमदाबाद आने वाला व्यक्ति यहॉं कि चमक-दमक लेकर ही वापस लौटेगा ।
 
 
अगले दिन सोमनाथ जाना हुआ । भगवान शिव के द्वाद्वश ज्योतिलिंगों में से प्रथम यहां विराजमान हैं । रात्रि 9 बजे अहमदाबाद स्टेशन से बैठे तो सुबह की पहली किरण के साथ हम सोमनाथ की पावन धरती पर थे । मंदिर से 6 किमी. पहले का मुख्य रेलवे स्टेशन है बेरावल । फ्रैश होने के बाद जैसे ही स्टेशन से निकलने को हुये मारे बदबू के जी मिचला गया । किसी पशु के शव से  उठने वाली दुर्गन्ध सी चारों और फैल रही थी । मालूम हुआ कि यहां मछलियों का एक्सपोर्ट का काम किया जाता है । लाखों मछलियों को बड़े काटूर्नों में पैक कर रेल द्वारा अहमदाबाद और वहां से अन्य जगहों तथा देश से बाहर भेजा जाता है । रोजाना यहां से गुजरने वाली लगभग प्रत्येक गाड़ी में पार्सल से यह मरी हुई मछलियां बाहर भेजी जाती हैं । इसी की बदबू स्टेशन पर चारों ओर फैल रही थी ।
पवित्र धरती पर आस्था और आध्यात्म की भावना विकास की बलि चढ़ रही थी । स्टेशन से बाहर आये तो टैम्पों वाले खड़े थे । अपना ब्रज होता तो घिर जाते लेकिन एक ही टैम्पों वाला आगे आया । यहां लगभग आसपास ही 12-14 मंदिर हैं उनमें से कुछ सोमनाथ मंदिर के रास्ते में पड़ जाते हैं और कुछ वहां से 2 किमी. के दायरे में हैं । इन मंदिरों में घूमने जाना था साथ में कुछ ओर भी यात्री मिल गये । टैम्पों चालक ने बताया कि मोदी की एकता रैली की वजह से सारे मुख्य मार्ग बंद हैं वह मंदिर के पीछे कालोनियों में होकर ले चलेगा ।
 
चाय पानी कर टैम्पों से निकले तो रास्तें में कुछ मंदिरों में दर्शन मिल गये । लेकिन मंदिरों के दशर्न से मन में कोई अनुभूति नहीं हो रही थी क्योंकि इसके लिये माहौल नहीं मिल रहा था । पूरे रास्ते भर साथ चल रहे बच्चों और महिलाओं ने नाक पर रूमाल रखे रखा । जब तक हम समन्दर के किनारे बाणगंगा तक नहीं आ गये तब तक रास्तें में पड़ने वाले मछली संस्थानों से आने वाली बुरी बदबू परेशान करती रही । खराब सड़कों पर यहां हमें रास्तें में सिटी बस की जगह सवारियां ढ़ोते छकड़ा दिखायी दिये । बुलेट मोटरसायकिल को रिक्शे का आकार देकर सवारी गाड़ी बनाया गया था । 1 से 2 लाख की रेंज की इस जुगाड़ का पास के एक कस्बे में पूरा बाजार था ।
 
सोमनाथ मंदिर के पीछे बसी कालोनियों में गंदगी अपना दर्द बयां कर रही थी । मिश्रित आबादी के ये गली मुहल्ले अपनी यू.पी. जैसे ही थे । विकास की चमक यहां धुंधली सी हो रही थी ।  मुख्य मंदिर के बाहर सुरक्षा कड़ी थी । भोलेनाथ के दर्शन कर बाहर निकले तो सामने बस समन्दर था । 10 रूपये में नारीयल पानी पीते हुये समन्दर किनारे ऊंट की सवारी करते सैलानी बच्चों की खुशियां देखना अलग अनुभव था ।
नारीयल पानी वाले को पैसे देकर मुड़ा तो एक छोटे गुमसुम से बालक ने रास्ता रोक लिया । याद आया कि इतना प्रसिद्ध मन्दिर अभी तक एक भिखारी नहीं मिला था । जैब में हाथ डालकर 2 रूपये निकाले तो बच्चे ने लेने से इंकार कर
दिया । उसके हाथ में पॉलिश का ब्रश था और नजर जूतों पर थी । साथ में खड़े बड़े बच्चे ने पूछा ‘पॉलिश कर दें’
 
पूछा कितने पैसे लोगे ? बड़े ने बताया, 10 रूपये । छोटे बच्चों से पॉलिश कराने में थोड़ा सा असहज था और अभी जरूरत भी नहीं थी सौ बोल दिया ‘‘ नहीं ’’ । दोनों बच्चों ने मुंह मोंड़ा और चल दिये । 2 रूपये अभी भी मेरे हाथ में थे । मन में ख्याल आ रहा था कि भीख में 2 रूपये ना लेने वाले इन खुद्दारों को 10 रूपये काम के देना ज्यादा सही है । आवाज देकर बुलाया तो बड़े ने ही आवाज निकाली ‘जी’ । छोटा अभी तक कुछ नहीं बोला था । बड़ा जूतों पर बड़ी तल्लीनता से पॉलिश कर रहा था और छोटा बस हाथ में ब्रश लिये चुपचाप बैठा था । यूं लग रहा था जैसे सारे दुनियां जहान का दुख इस नन्ही जान के हवाले था । नाम पूछने पर धीमी सी आवाज में बोला… ‘सूरज’ । माता पिता, परिवार, स्कूल के बारे में बहुत पूछा, लेकिन ना बड़ा बोला ना सूरज ।
सोमनाथ आते समय रास्तें में सफेद टोपी लगाये मोदी की एकता रैली में शामिल स्कूली बच्चे मिले थे । लेकिन इनके पास ना तो उन जैसी साफ ड्रैस थी, ना टोपी और ना हाथ में उनके जैसा तिरंगा । दोनों में बस एक बात समान थी ।
दोनों गुजरात से थे । 
जूतों पर पॉलिश हो चुकी थी । सूरज ने जूते उठाये, केवल एक ब्रश उन पर घुमाया और पैर के पास रखकर खड़ा हो गया । पूछा ये क्या है भाई’ तो बड़ा बोला- इसे अभी इतना ही आता है । 10 का नोट लेकर दोनो लेकर चले तो अब कदमों की चाल पहले की तरह बेदम नहीं थी । ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी छोटे बच्चे को जूते पॉलिश करते देखा हो, यू.पी. दिल्ली के लगभग प्रत्येक रेलवे,बस स्टेशन पर ऐसे दो चार सूरज आसानी से रोज मिल जाते हैं । लेकिन ये गुजरात के ‘सोमनाथ का सूरज’ था ।
वहीं सोमनाथ जिसके बारे में अभी नरेन्द्र मोदी जी ने बड़े गर्व से यू.पी. के बनारस में जिक्र करते हुये कहा था कि ‘‘मैं सोमनाथ से आया हूं ।’’
 
ये उस गुजरात का सूरज था जिसके विकास की चर्चा पर आज लोग पूरे देश की कमान सौंपने को तैयार नजर आते हैं ।  निश्चित रूप से अपवाद सभी जगह होते हैं । निश्चिय ही यह कोई बड़ी घटना या बड़ी बात नहीं है जिसके आधार पर गुजरात के विकास को बेमायने या झूठा बता दिया जाये । लेकिन फिर भी इतना तो महसूस हुआ कि गुजरात के विकास की रोशनी अभी इतनी तेज नहीं है कि उसकी
कुछ किरणें सूरज जैसे उन बच्चों पर भी पड़ सके जो केवल इस वजह से स्कूल नहीं जा सकते क्योंकि उन्हें शाम की दो रोटी का जुगाड़ करना है ।
 
 
 
 जगदीश वर्मा
 सह सम्पादक- प्रखर क्रान्ति चक्र 
 मथुरा (उ.प्र.)
 09319903380

नेटवर्क 10 चैनल में बनी जे.पी जोशी सेक्स सीडी

देहरादून।। चर्चित जे.पी जोशी सेक्स सीडी मामले में शाईनी मैक खान की गिरफ्तारी के बाद बड़ा खुलासा हुआ है। हाई-प्रोफाइल जे.पी जोशी सेक्स सीडी के मामले में  नेटवर्क 10 चैनल को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
 
उत्तराखण्ड राज्य के देहरादून से प्रसारित होने वाला न्यूज चैनल नेटवर्क 10 अपने शुरुआती दौर से ही परेशानियां झेल रहा है नेटवर्क 10 चैनल के मालिक राजीव गर्ग व आर.एस पवार ने जहां इस चैनल को खोलकर डेढ़ साल में तीन अन्य लोगों को बेच कर जहां करोडों रूपये पैदा किए वही चैनल के पत्रकारो को अपना गुलाम समझकर दलाली का अडडा बनाने की पूरी कोशिश की ।
हाल ही में जो मामला सामने आया उससे ये साफ जाहिर हो गया कि चैनल नेटवर्क 10 के मालिकों ने चैनल खोलकर ब्लैकमेलिंग का अड्डा बना लिया है उत्तराखण्ड के हाई प्रोफाइल अपर सचिव जे.पी जोशी सेक्स स्कैंडल मामले में जो तथ्य सामने आये वो संपूर्ण मीडिया जगत के लिए बदनुमा दाग साबित हो गया है।
 इस हाई प्रोफाइल मामले में पुलिस की जांच में साफ हो गया है कि ब्लैकमेलिंग की सेक्स सीडी नेटवर्क 10 चैनल के दफ्तर के अंदर ही तैयार की गयी थी। जे.पी जोशी सेक्स स्कैंडल मामले में जिस शख्स की गिरफ्तारी हुई है उसका नाम शाईनी मैक खान है । जो कि नेटवर्क 10 चैनल में टेक्नीकल की टीम मे नौकरी कर रहा था साथ ही वह पीडित महिला भी इस चैनल मे कार्य कर चुकी है इस हाई प्रोफाइल मामले में देहरादून में दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबारों में साफ लिखा है कि पुलिस सूत्रों ने बताया है कि शाईनी मैक खान ने अपने चैनल के दफ्तर में रात को इस वीडियो की सीडी बनाई थी। शाईनी के संग इसी चैनल की एक युवती भी थी पीडिता की सहेली बताई जा रही है।
 
देहरादून के अखबारों में जो खबरें छपी है उसमें साफ लिखा है कि यह सेक्स सीडी एक निजी चैनल के कार्यालय में बनाई गई है। इस प्रकरण में पुलिस को जिन तीन लोगों की तलाश है उनमें एक युवती भी शामिल है यह युवती जिस चैनल में नौकरी कर रही है उसी चैनल के शाईनी मैक खान यानि नेटवर्क 10 चैनल के इस कर्मचारी की गिरफ्तारी की जा चुकी है। अखबारों में साफ लिखा है कि अन्य दो आरोपियों में एक चैनल हेड का नाम सामने आया है। इस प्रकरण में पुलिसिया जांच में एक के बाद जो नाम सामने आ रहे है उससे साफ लगता है कि आने वाले दिनों में नेटवर्क 10 चैनल की मुश्किलें बढ़ने वाली है।
 
जल्द ही नेटवर्क 10 के मालिको राजीव गर्ग व आर.एस पवार की मुश्किलें और बढेगी। पहले तो नेटवर्क 10 चैनल के सहारे धोखाधड़ी करके करोड़ो कमाये फिर इस चैनल के माध्यम से सेक्स सीडी तैयार कर ब्लैकमेलिंग का धंधा किया जा रहा है। आरोपी शाईनी मैक खान की गिरफ्तारी से साफ हो गया है कि इस ब्लैकमेलिंग सेक्स सीडी में नेटवर्क 10 चैनल के प्रशासन का भी अहम रोल रहा है।
 
R Rawat

‘आप’ के प्रचार में बुंदेलखंड़ से 100 युवक-युवतियां पहुंचेंगे अमेठी!

बांदा।। आम आदमी पार्टी (आप) के राजनीतिक भ्रष्टाचार व वंशवाद विरोधी अभियान में बुंदेलखंड़ के महिला जन संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं। ‘नागिन’ और ‘कोबरा गैंग’ राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से कुमार विश्वास को चुनाव लडाने की घोषणा से बेहद खुश हैं और चुनाव प्रचार के लिए बुंदेलखंड़ से 50 युवक व 50 युवतियां भेजने का निर्णय लिया है।
 
महिला जन संगठन ‘नागिन’ और ‘कोबरा गैंग’ की केन्द्रीय समन्यवक नेहा कैथल ने बताया कि ‘दोनों जन संगठन आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल द्वारा छेड़े गए ‘ईमानदार राजनीति की शुरुआत’ और ‘राजनीतिक भ्रष्टाचार व वंशवाद विरोधी अभियान’ में खुलकर साथ देना चाहते हैं, इसलिए केन्द्रीय कोर कमेटी की गुरुवार को अतर्रा कार्यालय में संपन्न हुई बैठक
में निर्णय लिया कि ‘यदि आगामी लोकसभा चुनाव में आप ने अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ कवि कुमार विश्वास को चुनाव लड़ाया तो उनके महिला जन संगठन चुनाव प्रचार के लिए बुंदेलखंड़ से 50 युवक और 50 युवतियां खुद के संसाधन से अमेठी भेजेंगे।’ उन्होंने कहा कि ‘जनता राजनीतिक भ्रष्टाचार व वंशवाद से ऊब चुकी है और तीसरे विकल्प की ओर बढ़ रही है, दिल्ली विधानसभा के
चुनाव परिणाम इसके सबूत हैं।’ बैठक का हवाला देते हुए नेहा ने बताया कि ‘नागिन गैंग की वाइस चीफ कमांडर मनोज सिंह (फतेहपुर) द्वारा रखे गए राजनीतिक प्रस्ताव पर चर्चा के बाद दिग्गजों के खिलाफ लड़ने वाले आम आदमी पार्टी (आप) के प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने पर सहमति बनी है, जिनमें अमेठी को शीर्ष पर रखा गया है।’ उन्होंने बताया कि ‘यह टीम
फरवरी के अंत में अमेठी में डेरा जमाएगी और चुनाव प्रचार में युवतियों का नेतृत्व मनोज सिंह करेंगी व युवकों की जिम्मेदारी वह खुद संभालेंगी।’
 
 
आर जयन (प्रवक्ता)
महिला जन संगठन- ‘नागिन गैंग’ व ‘कोबरा गैंग
09794382988
 

नए साल में बरेली से शुरू होगा कैनविज टाइम्स का प्रकाशन

नए साल की शुरूआत में बरेली से कैनविज टाइम्स का प्रकाशन सम्भवतः शुरू हो जाएगा। बरेली मे इसकी कमान कभी दैनिक जागरण मुरादाबाद के संपादक रहे अनुपम मार्कण्डेय संभाल रहे हैं।
रियल स्टेट के कारोबारी रहे बरेली निवासी कन्हैया गुलाटी का अखबार कैनविज टाइम्स फिलहाल लखनऊ से प्रकाशित हो रहा है जहां इसकी जिम्मेदारी प्रभात रंजन दीन के पास है। बरेली में अनुपम मार्कण्डेय को संपादक की जिम्मेदारी दी गयी है। यह वही अनुपम मार्कण्डेय है जो कभी दैनिक जागरण मुरादाबाद के संपादक हुआ करते थे। डीएनई ब्रजेन्द्र निर्मल को भी कैनविज में वरिष्ठ पद सौंपा गया है। इन दोनो के अलावा संजीव गंभीर,अरशद रसूल, सुशील कुमार को भी कैनविज टाइम्स ने जगह दी है। 
वहीं दूसरी ओर अमर उजाला बदायूं में अपनी सेवा दे चुके सुधाकर शर्मा को दैनिक जागरण में प्रभारी बनाया गया है तो वहीं बिसौली में जागरण देख रहे प्रमोद मिश्रा अमर उजाला से जुड़ गए हैं। बरेली की तहसील बहेड़ी में अमर उजाला में अपनी सेवा दे चुके शोएब को हिन्दुस्तान ने हिमांशु पांडे की जगह प्रभारी बनाया है।
बरेली में केके सक्सेना ने दैनिक जागरण से इस्तीफा देकर कैनिवज टाइम्स ज्वाइन कर लिया है। केके लंबे समय से जागरण से जुड़े थे। वह बदायूं के उजला प्रभारी पद पर भी रह चुके हैं।
 
 
बरेली से एक पत्रकार की रिपोर्ट

भ्रष्टाचार में लिप्त सभापति ने चहेते पत्रकारों को बांटी ‘रेवड़ीयां’

अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को देय. यह कहावत अजमेर जिले की यावर नगर परिषद के सभापति डॉ. मुकेश मौर्य पर सटीक साबित होती है. अपने चहेतों को उपकृत करने के लिए सभापति हमेशा सुर्खियों में रहते हैं. कुछ समय पूर्व सफाई कर्मचारी भर्ती मामला और अवैध कॉम्पलैक्स निर्माण विवादों में रहा था। इस बार तो सभापति ने सारी हदें पार कर दी. अपना उल्लू साधने के लिए पार्षदों को लड़ाने में माहिर सभापति ने अब पत्रकारों में फूट डाल दी.
कांग्रेस राज में जमकर कथित भ्रष्टाचार करने वाले यावर नगर परिषद सभापति मुकेश मौर्य भाजपा राज आते ही सकते में आ गए हैं. सत्ता बदलते ही भाजपा पार्षदों ने भी भ्रष्टाचार की पोल खोलना शुरू कर दिया है. सभापति की शिकायतें स्वास्थय शासन विभाग और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में की गई.
समाचार पत्रों में यह खबरें प्रकाशित होते ही सभापति की नींद उड़ गई. उन्हें भ्रष्टाचार का खेल एसीबी और मुख्यमंत्री तक पहुंचने का डर सताने लगा. इस मामले को दबाने और गोरखधंधों को छिपाने के लिए सभापति ने चुनिंदा पत्रकारों को भूखण्डों की लॉलीपोप थमा थी. प्रमुख समाचार पत्रों के प्रभारियों और परिषद की बीट देखने वाले संवाददाताओं को भूखण्ड आवंटित कर दिए. इतना ही नहीं सभापति ने अपने ‘चमचों’ को राजी करने के लिए उनसे जुड़े कम्प्यूटर ऑपरेटर और फोटोग्राफर्स के नाम भी भूखण्ड आवंटित कर दिए.
हालांकि दिखावे के लिए भूखण्ड आवंटन की यह प्रक्रिया 20 दिसंबर को पत्रकारों के सामने अंजाम दी गई मगर इस प्रक्रिया में 52 आवेदकों में से सिर्फ 13 आवेदकों को ही लाभ दिया गया. शेष फाइलें मौके पर मौजूद तक नहीं थी. भूखण्ड से वंचित पत्रकारों द्वारा कारण पूछे जाने पर सभापति ने टालमटोल जवाब दिए. न तो उनकी फाइलें मौके पर मंगवाई गई और न हीं उन्हें बताया गया कि फाइलों में आखिर ऐसी क्या कमी रही जिनकी वजह से उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया. पत्रकारों के नाराजगी जाहिर करने पर सभापति कक्ष में भूखण्ड का लाभ पाने वाले पत्रकार भड़क गए और सभापति की हिमायत करने लगे.
मॉर्निंग न्यूज के विष्णुदत्त धीमान, ईटीवी के सुमित सारस्वत, केशवधारा के संपादक संदीप बुरड़ ने सभी पत्रकारों की फाइलें मौके पर मंगवाने और फाइलों में कमियां बताने की बात कही. इस पर भूखण्ड का लाभ लेने वाले राजस्थान पत्रिका के भगवत दयाल सिंह और दैनिक नवज्योति के किशनलाल नटराज आगबबूला हो गए. पत्रिका का भगवत दयाल तो इतना भड़क गया कि संदीप बुरड़ से गाली-गलौच करते हुए मारपीट के लिए दौड़ पड़ा. मौके पर मौजूद पत्रकारों और कर्मचारियों ने बीच बचाव किया. ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाने वाले सभापति मुस्कुराते हुए यह सारा नजारा देख रहे थे.
उनके चेहरे की कुटिल मुस्कान साफ बयान कर रही थी कि वे अपना उल्लू साधने में सफल रहे. सभापति ने पत्रकार विमल चौहान, राहुल पारीक, हेमंत कुमार साहू, कमल किशोर प्रजापति, संतोष कुमार त्रिपाठी, किशनलाल नटराज, मोमीन रहमान, राजेश कुमार शर्मा, पदम कुमार सोलंकी, कमल कुमार जलवानियां, तरुणदीप दाधीच, भगवत दयाल सिंह, महावीर प्रसाद को पत्रकार कॉलोनी में भूखण्ड आवंटित किए हैं. शेष आवेदकों को सभापति ने झांसा देकर टरका दिया.
सभापति कक्ष से बाहर आकर पत्रकार मनीष चौहान, दिलीप सिंह, बबलू अग्रवाल, संदीप बुरड़, सुमित सारस्वत, विष्णु धीमान, बृजेश शर्मा, विष्णु जलवानियां, यतीन पीपावत ने नाराजगी जाहिर की. पत्रकारों की यह नाराजगी भगवत दयाल को रास नहीं आई और उसने धमकी दे डाली कि ‘देखता हूं अब तुम लोग प्लॉट कैसे लेते हो. तुम्हारी …. में दम हो तो सभापति से लेकर दिखाना.’
उसके इस कथन से साफ जाहिर होता है कि दलाल सरीके ये पत्रकार चाटुकारिता करते हुए सभापति के तलुवे चाटते हैं और उनकी गुलामी करते हैं. इस बयान से मिलीभगत भी साफ जाहिर होती है. हमारे सूत्रों ने तो इतना तक बताया कि प्रक्रिया शुरू होने से पहले सूची कुछ और थी, जिसे बाद में बदल दिया गया. इस बीच किशनलाल को सभापति कक्ष में सभी पत्रकारों की फाइलें टटोलते हुए देखा गया. इस बात को लेकर वहां मौजूद कुछ पार्षद भी हैरत में पड़ गए थे कि आखिर सभापति के राज में यह सब क्या हो रहा है.
सभापति द्वारा अंजाम दी गई कि यह पूरी कार्यवाही अवैध थी. इसे पारदर्शी बनाने की बजाय गोपनीय रखा गया. सभापति ने नियमों को दरकिनार कर चहेतों को रेवडियों की तरह भूखण्ड आवंटित कर दिए, ताकि उनके मुंह बंद रहें. यह प्रक्रिया पूरी तरह नियम विरूद्ध थी, जो कई सवाल खड़े करती है.
नियमानुसार इस प्रक्रिया का चयन उस कमेटी द्वारा होना चाहिए था, जिसमें सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी एवं संपादकीय टीम से जुड़ा कोई वरिष्ठ पत्रकार सदस्य शामिल हो. जबकि सभापति द्वारा मनमर्जी से गठित की गई पांच सदस्यों की कमेटी में न तो पीआरओ प्रतिनिधि था और न ही कोई संपादकीय सदस्य. सभापति की अध्यक्षता में बनी कमेटी में आयुक्त ओमप्रकाश ढीढवाल, सहायक लेखाधिकारी घनश्याम तंवर, कार्यालय अधीक्षक दुर्गालाल जाग्रत, वरिष्ठ लिपिक भंवरनाथ रावल शामिल थे.
वंचित आवेदकों ने प्रक्रिया पर संदेह जताते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि कुछ आवेदकों को योग्य नहीं होने के बावजूद भूखण्ड दे दिए गए हैं, जबकि योग्यता रखने वाले आवेदकों की अनदेखी की गई. सभापति ने कुछ समय पूर्व पत्रकारिता में कदम रखने वाले अनाडियों को पत्रकार की श्रेणी में शामिल कर लिया, जबकि राज्य सरकार द्वारा अधिस्वीकृत पत्रकारों को दरकिनार कर दिया. सभापति ने जिस मोमीन रहमान को भूखण्ड आवंटित किया है वो कुछ समय पूर्व नव'योति में कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर लगा था. प्रेस फोटोग्राफर कमल किशोर प्रजापति उर्फ सुमन प्रजापति अशिक्षित है. यह फोटोग्राफर अपनी कारगुजारियों के कारण किसी भी संस्थान में एक साल से 'यादा नहीं टिकता है. महावीर प्रसाद दैनिक भास्कर के सर्कुलेशन विभाग में कार्यरत है. सुबह उठकर अखबार बेचने वाले को भी सभापति ने न जाने क्यों प्रक्रिया में शामिल कर भूखण्ड का लाभ दे दिया. वर्षों से पत्रकारिता में जीवन झोंक रहे 80 वर्षीय अधिस्वीकृत पत्रकार भंवरलाल शर्मा को योजना का लाभ नहीं दिया गया.
आखिर क्या वजह रही कि चयन कमेटी में संपादकीय सदस्य और पीआरओ को शामिल नहीं किया गया? वर्षों से सिर्फ पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों की अनदेखी क्यों की गई? आखिर ऐसी क्या सांठ-गांठ रही कि किशनलाल को सभापति कक्ष में पत्रकारों की फाइलें टटोलने की परमिशन दी गई? आखिर क्या वजह रही कि राजेश शर्मा, किशनलाल और भगवत दयाल पूरी प्रक्रिया के तहत अगुवाई करते हुए घर-घर जाकर फार्म भरवाते रहे और बाद में घालघुसेड़ कर खुद को भूखण्ड मिलने के बाद चुप्पी साध गए? सात दिवस की निर्धारित अवधि में आवेदन फार्म जमा करवाने के बाद परिषद ने नोटिस थमाकर आपूर्तियां पूरी करने के लिए तीन दिवस का समय दिया था। निर्धारित अवधि में पत्रकारों ने कमियों की पूर्ति कर दस्तावेज जमा करवा दिए। इसके बाद फिर कौनसी कमियां रह गई जिनकी वजह से लॉटरी के वक्त फाइलों को मौके पर नहीं मंगवाया गया? आखिर लॉटरी प्रक्रिया के दौरान वंचित आवेदकों को पूछने पर भी फार्म की कमियां क्यों नहीं बताई गई?
नियमानुसार सभी फाइलें चैक होने के बाद चयनित फाइलों के आवेदकों की लॉटरी निकालनी थी, जबकि सभापति ने प्लॉट की लॉटरी निकाली. 27 में से 13 प्लॉट आवंटित करने के बाद अब 14 प्लॉट शेष बचे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि शेष 14 प्लॉट बचे हुए 39 आवेदकों को कैसे दिए जाएंगें? इन सभी सवालों को दरकिनार कर सभापति ने अपने शेष कार्यकाल को राजी-खुशी निकालने के लिए पत्रकारों को मैनेज किया है. वैसे राजनीति में लेन-देन की परंपरा तो वर्षों से चली आ रही है, मगर काले कारनामों को छुपाने के लिए भूखण्ड देकर मुंह बंद करने का यह तरीका नया है जो जनप्रतिनिधियों के साथ शहर में चर्चा का विषय बन गया है. अब देखना है कि संवेदनशील और पारदर्शी सरकार के शासन में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाले इन पत्रकारों के साथ क्या न्याय होगा. 
 
 एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आनन्द भवन कैंपस के बेरोजगार दलित युवाओं की दर्द भरी दास्तां…

सर हम सभी आनन्द भवन कैंपस के बेरोजगार दलित युवा हैं। हमारे पिता जी लोग आनन्द भवन संग्रहालय में अलग-अलग पद पर कार्यरत है। हम लोगो का पूरा बचपन यहीं बीता है। यहां के कुछ कर्मचारी तो पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के जमाने से थे। पर अब वो रिटायर हो गयें  हैं। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। 
हमने कांग्रेस पार्टी को कई पत्र लिखे ईमेल भी किया। पर वहां के अधिकारी हमारी बात राहुल गांधी तक नहीं पहुंचने देते। जब वो आनन्द भवन आते है तो यहां के अधिकारी गेट पर ताला लगवा देते हैं। यहां तक की घर का समान लेने के लिये भी घुमाकर बाल भवन के गेट से भेजते हैं आखिर हम अपनी समस्या किससे कहें। क्योंकि राहुल गांधी जी तो आम आदमी की पहुंच से दूर है। हम लोग कांग्रेस पार्टी से ये कहना चाहते हैं कि जिसके घर के दलित युवा बेरोजगार है। तो देश के बेरोजगार युवा और दलित कैसे विश्वास करेंगे। क्या कांग्रेस पार्टी अब आम आदमी पर ध्यान नहीं देती। हमारा परिवार व अन्य कर्मचारी कई वर्षो से कांग्रेस को आंख मूंद कर वोट देते हैं। कुछ तो कई पीढ़ी से दे रहे हैं। क्या उस विश्वास की कोई कीमत नहीं हैं।
 
अगर आप लोग हमारी ये बात कांग्रेस के आला अधिकारियों और नेताओं को पहुंचा दें। तो हम आपके जीवन भर आभारी रहेंगे। सर हम लोगो ने जो पत्र भेजा था वो आपको भी मेल से भेज रहे हैं। 
arjunbrahmatitu@gmail.com

जादूगोड़ा में भी है महाठग चार्ल्स पोंजी का अवतार

जादूगोड़ा में एक साधारण युवक कमल सिंह द्वारा किया गया महा-घोटाला अमेरिकी महाठग चार्ल्स पोंजी  के याद दिलाता है जिसने  १९१९-२० के काल में अमेरिका के अप्रवासी इटालियन चार्ल्स पोंजी ने ९० दिनों में  लगभग ४० हजार लोगो से १५ मिलियन डॉलर से अधिक की राशि एकत्रित करके पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। लेकिन जादूगोड़ा जैसे छोटे लेकिन महत्वपूर्ण जगह से अरबो लेकर गायब हुए कमल सिंह की चर्चा उतनी नहीं हो रही है। 
क्या वह आसमान में चला गया या पाताल में समा गया या देश छोडकर चला गया ? यह किसी को पता नहीं है। सरकार को इसकी तनिक भी फिक्र नहीं है ,पूरी सच्चाई उजागर करने के लिए सरकार की और से अबतक कोई पहल नहीं की गयी है। वहीं नारायण साईं को खोजने के लिए गुजरात में सरकार ने हर दिन लाखों रुपये खर्च किये। लेकिन जादूगोड़ा और आसपास के क्षेत्रो के असंख्य लोगो के जीवन से दुराचार और खिलवाड़ करने वाले को ढूंढने के प्रति झारखंड सरकार को कोई चिंता नहीं है। सरकार की सोच में यह कोई मामला ही नहीं दीखता कमल सिंह का सारा नाम पता  ठिकाना भारत सरकार के पास  दर्ज है। मजे की बात यह है की कमल सिंह एक सरकारी उपक्रम का कर्मचारी भी है। वह अपनी पोंजी स्कीमे चला चला कर लोगो को ठगता भी रहा और उपक्रम से वेतन भी उठाता रहा और लोगो को आकर्षित करने के लिए कुछ व्यावसायिक उपक्रम का उद्घाटन बड़े-बड़े लोगो और अधिकारियों से कराता रहा। लोग इस कदर झांसे में आ गए की प्रति माह लाख में पांच हजार और बीस माह में दुगना के चक्कर बैंको से कर्ज लेकर और यहां तक की बीवी के गहने और जमीं बेचकर भी इन स्कीमो में पैसा लगा दिया। कमल सिंह ने गुवाहाटी ,कोलकाता , थाणे , मुंबई , अहमदाबाद , नई दिल्ली , धनबाद , जैसे शहरो के पतों पर कई कंपनियां बनायी  और इन कंपनियों में कई लोग  निर्देशक बनाए गए लेकिन सरकार  एक भी निदेशक को अभी तक पूछताछ के लिए खोज नहीं पायी है। क्या सभी एक साथ गायब हो सकते है ?
 
चारा घोटाले में महज अनुशंषा या पैरवी पत्र लिखने की वजह से डॉ जगन्नाथ मिश्र जैसे लोग जेल की हवा खा सकते है तब कमल के साथ गलबाहीं लगाने और नौकरी से लेकर धंधा में संरक्षण देने वालो की पहचान भी नहीं की जा सकती ? सरकार , प्रशासन ,पुलिस और जादूगोड़ा में यूरेनियम जैसे जरुरी धातु के प्रोसेसिंग से प्रदुषण पर पूरी दुनिया में हंगामा मचानेवाले एनजीओ और मानवाधिकार संगठनो की चुप्पी बहुत कुछ बता रही है की सभी आम आदमी को सिर्फ धोखा देने जानती है और आम आदमी के नाम पर सिर्फ रोटियां सकने का काम करती है।
जादूगोड़ा के युवक देवाशीष सेन जो वर्तमान में युके में काम करते है उन्होंने बताया की उन्होंने कमल के कंपनी में विपुल भकत  के माध्यम से १२ लाख रुपय जमा किये थे वो उसकी जिंदगी भर की कमाई थी , उसने बताया की उनके पिताजी की मौत बचपन में ही हो गयी थी और उन्होंने जिंदगी में बहुत मेहनत की ट्यूशन पढ़ाये और अपनी पढ़ाई भी की और टाटा कम्युनिकेशन सर्विस युके में काम कर रहें है उनका बचपन से ही सपना था की अपनी मां के लिए अपना घर खरीदूंगा और युके से आकर  भारत में ही कहीं नौकरी  कर अपनी मां की सेवा करूंगा लेकिन कमल सिंह के झांसे  में आकर मेरी जिंदगी तबाह हो गयी है और मेरा सपना टूट गया है , देवाशीष सेन चाहते है की कमल और उसका पूरा ग्रुप उसके संरक्षक और उसके जितने भी कंपनियां है वो सही है या फर्जी है इसकी जांच सरकार द्वारा आयोग बनाकर किया जाए।  

मीडिया की नैतिकता के खिलाफ है जी न्यूज का स्टिंग ऑपरेशन

बीते कुछ दिनों या यूं कहें कि कुछ सालों में यह लगातार देखने को मिल रहा है कि मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी गलत प्रतिस्पर्धा के लिए मीडिया के उन तमाम आदर्शों, नैतिकता आदि को ताक पर रख रहा है जिसके लिए मीडिया को अन्य लोगों से अलग रखा जाता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि टीआरपी पाने के लिए इलेक्ट्रानिक चैनल वो सारे काम करने को विवश है जिसके करने से मीडिया आदर्श को बहुत बड़ा धक्का लग रहा है। 
दो दिन पहले ही देश के बड़े मीडिया ग्रुप जी न्यूज के द्वारा कांग्रेस विधायकों का स्टिंग आपरेशन किया गया। हम बड़े आदर्शों और नैतिकता की तो बातें करते हैं लेकिन जब गला काट प्रतिस्पर्धा की बात आती है तो खुद मीडिया ग्रुप वह सारे गलत काम कर देता है जिसे करने से मीडिया आदर्श को बड़ा आघात पहुंचता है। 
जब दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास पर एक चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया तो उस वक्त कुमार विश्वास की ओर से बताया गया कि स्टिंग ऑपरेशन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा उनके पारिवारिक मित्र हैं और जिस दिन यह स्टिंग ऑपरेशन किया गया उस दिन अनुरंजन झा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ घर पर आए थे और पारिवारिक व्यक्ति होने के कारण सामान्य तौर पर बातचीत होती रही। क्योंकि जब दो गहरे मित्र मिलते हैं चाहे वह पत्रकार और नेता ही क्यों न हो व्यक्ति थोड़ा सामान्य तौर पर अंदर की बातें करने लगता है लेकिन कोई अगर उस विश्वास का गला घोटे तो इसे क्या कहा जाए। उस वक्त कुमार विश्वास की यह बातों पर लोगों ने स्टिंग ऑपरेशन को नैतिकता के खिलाफ बताया था।
तो क्या कांग्रेस विधायकों का स्टिंग ऑपरेशन की नैतिकता के खिलाफ नहीं है? कांग्रेस विधायकों ने अगर आपसे विश्वास में एक दोस्त समझकर अगर कुछ शेयर किया तो क्या उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए था? यह तो मीडिया सहित साी जानते हैं कि कांग्रेस ने आप को इस लिए समर्थन किया है ताकि जो वायदे आप ने किए हैं वह पूरा करें, क्योंकि कांग्रेस को लगता है कि जिस तरीके से आप ने वायदे किए हैं उसे हकीकत में पूरा करना टेढ़ी खीर साबित होगी। वैसे तो यह सब जानते थे कि कांग्रेस ने आप को निपटाने के लिए ही सरकार बनवाई है इसमें भला कौन सी ब्रेकिंग न्यूज थी। बेवजह पत्रकार और नेता के बीच ऑफ रिकार्ड की प्रक्रिया को खत्म कर न्यूज चैनल ने अच्छा नहीं किया। इससे आगे साी नेता घर में या बाहर कहीं भी आफ रिकार्ड कुछ भी बात नहीं करेंगे। इसका खामियाजा सभी पत्रकारों को भुगतना पड़ेगा। क्योंकि हमारी बिरादरी जो भाई हैं उनकी काफी खबरें यही नेता
सूत्रों और विश्वस्त सूत्रों पर चलवाते हैं निसंदेह अब इस तरह जब बातचीत बंद होगी तो लोगों को विश्वस्त सूत्रों की ब्रेकिंग से कुछ नहीं मिलेगा।
मेरा मानना है कि हर हाल में कम से कम पत्रकारों और अन्य लोगों, नेता, अधिकारी आदि के बीच जो रिपोर्टिंग के दौरान गहरे रिश्ते बनते हैं और उन्हें हर हाल में कायम रहने की जरूरत है। क्योंकि हम लोग खबर के भूखे होते हैं और ये लोग विपरीत परिस्थिति में खबर न होने पर विश्वास की डोर को कायम कराते हुए खबर मुहैया करवाते हैं।
विभूति कुमार रस्तोगी
वरिष्ठ पत्रकार

बुंदेली भाषा को मिलेगा साहित्य में वाजिब मुकाम

बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह मुकाम नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। अब उसे वाजिब स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश शुरू हो गई है। हिंदी के चिंतकों न बुंदेली की गहरी जड़ें खोजने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसी माह तीन और चार दिसंबर को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में देश के हिंदी चिंतकों और दिशा निर्धारकों का संगम हुआ। तवारीख के लिहाज से यह अद्वितीय मौका था। 
पहली बार देश के विचारकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति के रचनासेवियों और उनके बहुमूल्य कार्यों को हिंदी साहित्य के इतिहास में उचित स्थान दिलाने की कोशिश समग्रता से की है। यह सब संभव हो पाया है विज्ञान के उच्चकोटि के विद्वान और हाइटेक अध्येता तथा हिंदी के हितचिंतक बुदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय के भागीरथ प्रयासों के चलते।
 इसकी अनुगूंज भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन में पास एक विशेष प्रस्ताव में भी सुनाई पड़ी। इस प्रस्ताव में हिंदी परिषद के कर्ताधर्ताओं न खुले मन से यह बात स्वीकार की कि हालांकि प्रो. पाण्डेय विज्ञान के विशेषज्ञ हैं लेकिन भारतीय भाषाओं और संस्कृति से उनका गहरा लगाव है। उनके विशेष प्रयासों और आग्रह के कारण ही भारतीय हिंदी परिषद का 41वां अधिवेशन बुंदेलखंड की हृदयस्थली झांसी में आयोजित किया गया।
 
गौरतलब है कि भारतीय हिंदी परिषद की स्थापना सन 1942 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष डा. धीरेंद्र
वर्मा और तत्कालीन कुलपति सर अमरनाथ झा के प्रयासों से हुई। सन 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापकता विस्तार तथा गहनता अन तीनों तथ्यों से यह तय हो चुका था कि देश निश्चित रूप से शीघ्र ही स्वतंत्र होगा। इस अवधारणा को केंद्र में रखते हुए भारतीय मनीषियों ने स्वतंत्र देश के विविध सामाजिक संदर्भों से जुड़े भावी भारत के विकास के लिए योजनाएं निर्मित करने का संकल्प शुरू कर दिया था। यह संदर्भ राष्ट्रभाषा हिंदी के उन्नयन तथा उच्च शिक्षा के संकल्पों से भी जुड़ा। इस संस्था का संबंध उच्च शिक्षा
संबंधी हिंदी की समस्याओं से रहा है। यह बराबर इसके लिए संघर्ष करती रही है। यह संस्था देश के सभी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापकों से जुड़ी हुई है। इसमें सामयिक और स्थायी लगभग दो हजार विद्वान सदस्य हैं।
यह परिषद उच्चस्तरीय अध्यापन की समतुल्यता स्तरीयता तथा राष्ट्रीय हितबद्धता को ध्यान में रखकर काम करती है।  इसका दूसरा स्तरीय दायित्व हिंदी शोध कार्य को व्यवस्थित करके उसे उत्कृष्टता प्रदान करना है ताकि हिंदी शोध की दिशा स्खलित न होने पाए। हिंदी परिषद का संकल्प पूरी तरह से इस संदर्भ से जुड़ा है कि भारतीय समाज रचना की व्यवस्था कैसे संतुलित हो जिससे शैक्षिक प्रशासनिक एवं लोक व्यवस्था के स्तर पर हिंदी को अपेक्षित गौरव प्राप्त होता रहे।
 
भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन का मूल संदर्भ इस बार बुंदेलखंडी भाषा तथा साहित्य के सर्वांग मूल्यांकन का रहा। इसे तय करवाने में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय की अहम भूमिका रही। इसकी तस्दीक अधिवेशन के दौरान परिषद के शीर्ष पदाधिकारियों ने अपने संभाषण में की।
 
यहां आए हिंदी के विद्वानों ने यह तथ्य स्वीकार किया कि भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन में उन्होंने बुंदेली भाषा के साहित्यिक विश्लेषण के साथ-साथ ऐतिहासिक एवं सामयिक मान्यताओं से जुड़े तथ्यों का एकत्रीकरण और उस पर मंथन इसलिए कर रहे हैं ताकि हिंदी की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि का सही आकलन हो सके। उन्होंने बताया कि संपूर्ण हिंदी साहित्य के आदिकाल से
लेकर आज तक लगभग एक हजार से अधिक बुंदेलखंडी कवि हैं जिनसे जुड़ा इतिहास केवल विवरणात्मक है। जहां तक बात रही बुंदेलखंडी शब्द की तो यह चौदहवीं शती का है। यहां अधिवेशन में आए चिंतकों के मन को यही सवाल मथता रहा कि
ईसा की चौथी शती से स्थापित इस ऋषिभूमि यानी बुंदेलखंड की भाषा को क्या नई भाषा कह सकते हैं। कारण यह कि इस भाषा के प्रारंभ का कोई साक्ष्य नहीं जिसके आधार पर वे यह कह सकें कि यह प्राचीन भाषा है।
 
भारतीय हिंदी परिषद के अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह का मानना है कि यजुर्वेदकाल में बुंदेलखंड क्षेत्र का नाम यर्जुहोतो था। आगे चलकर इसका नाम युज्रहोता पड़ा। इसका कारण यह था कि यहां ऋषिगण निवास करते थे।
वे निरंतर चिंतन. साधना में लगे रहते थे। आगे के कालखंड में यह क्षेत्र जुझौती कहलाया। इसका विवरण सातवीं सदी के चीनी यात्री युवान चांग ने दियी है। बाद में इसे जुझारखंड तथा और बाद में इस नगरी को विंध्यखंड कहा गया। कालांतर में यही नाम बुंदेलखंड पड़ा। बुंदेलखंड नाम 14वीं सदी में महाराज हेमकरण बुंदेला ने दिया।
 
हिंदी के विद्वानों का मानना है कि मध्यकालीन भाषा क्षेत्र में हिंदी के तीन रूप रहे। पहला ब्रजभाषा तथा हिंदी पश्चिम भारत दूसरा मध्यदेशीय अवधी तथा हिंदी मध्य का भारत तथा तीसरा भोजपुरी का बिहारी भाषा पूर्व का
भारतीय क्षेत्र। ब्रजभाषा तथा बिहार क्षेत्रों की भाषा का सर्वेक्षण तथा सांस्कृतिक विकास क्रम का सर जार्ज ग्रियर्सन से लेकर सुनीति कुमार चटर्जी तक व्यापक रूप से मूल्यांकन हो चुका है। अवधी भाषा के विकास पर भी यह कार्य डा.बाबूराम सक्सेना कर चुके हैं। हम मध्यप्रदेश को बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी भाषाओं में बांट रहे हैं किंतु इसकी भाषिक रूप रचना एवं साहित्यिक संदर्भों का जब तक सही मूल्यांकन नहीं किया जाता तब तक भाषिक सर्वेक्षण तथा साहित्यिक विश्लेषण का पक्ष अधूरा रहेगा।
 
विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए यहां बुंदेलखंड विश्वविद्यालय परिसर के विभिन्न सभामारों में दो दिनों तक चल गोष्ठियों में हिंदी
हितचिंतकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति से जुड़े पक्षों पर विचार मंथन किया। विद्वानों ने शोधपत्र पेश किए। इन्हें अहम दस्तावेज के रूप में सहेजा जाएगा। विश्वविद्यालय ने शोधपत्रों को एक पत्रिका के रूप में सहेजने का निर्णय लिया है। बुविवि के कुलपति ने पत्रिका के प्रकाशन पर आने वाले संपूर्ण खर्च को वहन करने का निर्णय लिया है।
 
अब हिंदी के विद्वानों में यह उम्मीद जगी है कि बुंदेलखंड के लोक साहित्य और संस्कृति को हिंदी साहित्य के इतिहास में वह वाजिब स्थान मिल सकेगा जिसकी वह हकदार है। उनका मानना है कि हाइटेक भगीरथ के प्रयास रंग
लाएंगे।
 
उमेश शुक्ल (प्रवक्ता)
जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी
9452959936

रमेश मिश्रा बने दैनिक जागरण गाजियाबाद के ब्यूरो चीफ, अमृतांशु मिश्र ने ‘जनसेवा मेल’ पकड़ा

राष्ट्रीय सहारा अखबार नोएडा में कार्यरत रमेश मिश्रा के बारे में सूचना मिली है कि उन्होंने संस्थान से इस्तीफा दे दिया है. उनकी नई पारी दैनिक जागरण के साथ शुरू होने की खबर है. वे गाजियाबाद दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ बनाए गए हैं. रमेश मिश्रा की दैनिक जागरण में ये दूसरी पारी है. वे पहले भी एक राउंड दैनिक जागरण, नोएडा के सेंट्रल डेस्क पर काम कर चुके हैं. रमेश मिश्रा को राष्ट्रीय सहारा में इलाहाबाद का ब्यूरो चीफ बनाया गया था. बाद में उनका नोएडा तबादला कर दिया गया.

उधर, लखनऊ से मिली एक सूचना के मुताबिक वॉयस आफ लखनऊ के रिपोर्टिंग हेड अमृतांशु मिश्र ने संस्थान को अलविदा कह दिया है. वे झांसी से प्रकाशित दैनिक जनसेवा मेल में लखनऊ ब्यूरो चीफ बनाए गए हैं.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

बिहार में निविदा की शर्तों को ताक पर रखकर हो रहा है चीनी मिलों का आवंटन

बिहार में जब जदयू और बीजेपी ने 2005 में मिलकर सरकार बनाई थी तब यहां बंद पड़े चीनी मिलो को फिर से शुरू करने की बात कही गई थी जिसके तहत बिहार स्टेट शुगर कार्पोरेशन की जो चीनी मिलें थी उसको प्राइवेट सेक्टर के हाथ से बेचने की निविदा करायी गई थी।

तत्कालीन गन्ना आयुक्त जयमंगल सिंह ने चरणबद्ध तरीके से निविदा कराई, पहले दौर की निविदा जो 2008 में कराई गई थी, मोतीपुर और बिहटा सुगर मिल को इंडियन पोटाश लिमिटेड, लौरिया और सुगौली चीनी मिल को हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड को क्रमशः 45 और 50 करोड़ में बेचा गया।
दूसरे दौर की निविदा जो 2009 में कराई गई थी, रैयाम और सकरी चीनी मिल को तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड के हाथो क्रमश 8.44 और 18.25 करोड़ में बेचीं गई। 
बिहार में सरकारी निविदा की जो शर्ते होती है उसके तहत कंपनी कम से कम तीन साल पुरानी होनी चाहिए और वार्षिक टर्न ओवर के साथ साथ तकरीबन 50 शर्त होती है। 
लेकिन रैयाम और सकरी चीनी मिलों को प्राइवेट सेक्टर के कंपनी तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड के हाथो बेचते हुए निविदा की सारी शर्ते ताक पर रख दी गई थी। तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड रजिस्टर ऑफ कंपनी में 22 अगस्त 2008 को पंजीकृत हुआ था और मात्र 1 करोड़ के पूंजी के साथ। 2009 में बिहार स्टेट सुगर कारपोरेशन के दुसरे चरण के निविदा में रैयाम और सकरी की चीनी मिलें तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड को दे दी गई।
एक ओर जहां हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड और इंडियन पोटाश लिमिटेड जैसे भारत के प्रतिष्ठित कंपनीओ को चीनी मिलो का आवंटन किया गया वही दूसरी ओर तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड जैसे 6 महीने पुरानी कंपनी को निविदा की सारी शर्ते ताक पर रख कर चीनी मिलो का आवंटन किया गया।
 
काली कान्त झा

हरियाणा के दो युवाओं ने समय को चुनौती दी… मीडिया वाले ध्यान दें…

Respected Sir .. Myself Neeraj Dahiya from Sisana (sonepat) Village in  Haryana. Me and my friend Ajay Dahiya have done a research on timing of Earth. Research based on Earth revolving Sun timing. In books, timing of revolution of  earth around given as –  365 days 5 hours 48 minutes 46 seconds.

But we challenge that this timing is not right. We proved this timing is wrong. We have determined a new timing that is correct. Our Timing is  365 days  5   hours 49 minutes 12 seconds.We proved it . Please help us to show this timing to world and scientist.
   
ADDRESS:::
NEERAJ DAHIYA & AJAY DAHIYA
V.P.O SISANA-1
TEHSIL – KHARKHODA
DISTT. – SONEPAT    
STATE – HARYANA

CONTACT:::
PH.- 09034370901 , 09068756071 , 01302535385
EMAIL. – ndahiya1991@gmail.com , ajay7065@gmail.com
 

केके चौहान, बसंत सारस्वत, पारस अमरोही दैनिक प्रभात से जुड़े

सुनील छइया ने जबसे दैनिक प्रभात के समूह संपादक का पद संभाला है तभी से योग्य पत्रकारों की तलाश शुरू कर दी। सुनील छइया ने अमर उजाला मुरादाबाद से शुरुआत करने वाले केके चौहान के साथ अमरोहा के मजबूत स्तंभ रहे बसंत सारस्वत और अमर उजाला मुरादाबाद व हिन्दुस्तान दिल्ली में काम कर चुके पारस अमरोही को अपने साथ जोड़ा है।

पारस अमरोही को लखनऊ की जिम्मेदारी दी है तो केके चौहान को मुरादाबाद की जबकि बसंत सारस्वत अमरोहा में दैनिक प्रभात का काम देख रहे हैं। सुनील छइया की नजर अभी और सीनियर पत्रकारों को साथ लाने की है ताकि दैनिक प्रभात का विस्तार किया जा सके।

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

गजल अब पैसे कमाना चाहती है…

सोनभद्र।। मिर्जा असदुल्लाह बेग खान उर्फ गालिब जयंती के अवसर पर मित्र मंच, सोनभद्र की ओर से स्थानीय विवेकानंद प्रेक्षागृह में शुक्रवार की रात ‘ऑल इंडिया इण्डोर मुशायरा’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि और सदर विधायक अविनाश कुशवाहा द्वारा गालिब की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुआ।
 
गालिब के फाकामस्ती भरे जीवन पर प्रकाश डालते हुए अविनाश कुशवाहा ने कहा कि गालिब ने 11 साल की उम्र में शायरी करनी शुरू कर दी थी और पूरी उम्र उनकी शायरी में गम का कतरा घुलता रहा। इस दौरान उन्होंने गालिब की कुछ शेर भी पढ़े-
"न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता। डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।।….पूछते हैं वो कि गालिब कौन है, कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या….इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।"
 
भदोही के खम्हरिया से आए चर्चित शायर कासिम नदीनी ने मुशायरे का आगाज कुछ इस तरह से किया-
 
"खशबू मिली, बहार मिली, दिलकशी मिली…जन्नत से भी हंसी तुम्हारी गली मिली…इरफां मिला सऊर मिली आग भी मिली…जिगर-ए-नबी से हमको नई जिंदगी मिली।।…"
 
फिर उन्होंने जो शेर पढ़े वह लोगों की दिलों में हिन्दुस्तान के जज्बात पैदा कर गए-
 
 "मैं मर जाऊं तो मेरी सिर्फ ये पहचान लिख देना…मेरे माथे पे मेरे खून से हिन्दुस्तान लिख देना…हम उस भारत के वासी हैं जहां होता है….हर एक धर्म का सम्मान लिख देना…हमारे मुल्क का इतिहास जाके तुम कभी लिखना…मुसलमानों को दिल और हिन्दुओं को जान लिख देना…वहीं अजमतों को पाक दिल की जन्नत भी निछावर है…वो है मेरे भारत के खेत और खलिहान लिख देना….जो तुमसे स्वर्ग का संक्षिप्त वर्णन कोई करवाए…तो इक कागज उठाकर सिर्फ हिन्दुस्तान लिख देना…मैं मर जाऊं तो मेरी सिर्फ ये पहचान लिख देना…हमारी सभ्यता और एकता लक्ष्य तो आधा…ग्रन्थ बाइबिल, गीता है और कुरान लिख देना।
 
कानपुर से आईं शायरा रुही नाज ने अपनी नज्म से लोगों को जिंदगी से कुछ इस तरह रूबरू कराया-
 
"चांद से दूर जरा चांदी के हाले कर दूं…दिल तो कहता तो है कि हर शम्त उजाले कर दूं…इस तरह तेरे सुलगने से बेहतर तो ये है…जिंदगी ऐ तुझको, जिंदगी के हवाले कर दूं।"
 
इसके बाद उनकी एक-एक कर गजलों ने श्रोताओं को वाह-वाह करने पर कुछ इस तरह मजबूर किया-
 
"मेरे बहते हुए अश्कों ने पुकारा तुमको…दिल की हसरतें ही हैं कि मैं देखूं
दुबारा तुमको…मेरी हर सांस तेरे नाम से चलती ही रही…पास आओ तो दिखाऊं ये
नजारा तुझको…बात ठुकराई है हर राह पर तुमने मेरी…फिर भी हर मोड़ पे देती
हूं सहारा तुमको।"
 
मध्य प्रदेश के ग्वालियर से आए अख्तर ग्वालियरवी के शेर स्रोताओं के दिलों में
कुछ इस तरह उतरे कि वे उन्हें बार-बार मंच पर शायरी करने की मांग करने लगे।
उन्हें अपने शेरों कुछ इस इंदाज में बढ़ा-
 
"मेरी आंखों से मेरे दिल में उतरना सीखो…आइना सामने रखा है संवरना सीखो…आओ
अब फसलें बहारां की अदा बन जाओ।…खुशबुओं की तरह बिखरना सीखो।"
 
ग्वालियरवी की नज्मों के बाद स्थानीय शायर नजर मुहम्मद नजर ने कुछ इस तरह अपनी
वेदना का इजहार किया- चाहने वाला दिल से मुझको अभी तो मिला नहीं…चाहे अपने
हों या पराए किसी से सिकवा गिला नहीं..वफा करो वफा मिलेगा नजर ये कहने की बात
है…वफा किया तो सिला वफा को हमको किसी से मिला नहीं।
 
वहीं स्थानीय शायर अब्दुल हई ने कुछ इस तरह अपने जज्बात स्रोताओं के सामने रखे-
 
भूले से क्या पड़े कफन पर हाथ मेरे…जीवन की हर परिभाषा मैं जान गया…जनम
मरण के अनसुलझे संदर्भों की…एक गांठ क्या खुली मैं पहचान गया। लखनऊ से आए
कवि और लेखक आदियोग ने अपनी पंक्तियों को इस तरह लोगों के सामने रखा- हुजुर
माफ कीजिए, कल आप मेरे सपनों में आए। रॉबर्ट्सगंज के मशहूर और वरिष्ठ शायर
मुनीर बख्स आलम ने भी अपने शेर से स्रोताओं के दिलों को झकझोरने की कोशिश की-
वो आए बज्म में मीर ने देखा…। कार्यक्रम का संचालन कर रहे कानपुर के मशहूर
शायर कलिम दानिस ने सियासत पर कुछ तरह इल्जाम लगाए-
 
सियासत अब ठिकाना चाहती है…तवायफ घर बसाना चाहती है…शरीफों का घराना चाहती
है…गजल लहजा पुराना चाहती है…गरीबी की ये मजबूरी तो देखो…गिरी रोटी
उठाना चाहती है…खुले सिर फिर रही है शहरों-शहरों…गजल अब पैसे कमाना चाहती
है….। चुर्क निवासी शायर एमए शफक ने भी अपने शेर पढ़े। कार्यक्रम के आयोजक
मित्र मंच, सोनभद्र के निदेशक विकास वर्मा ने कुछ इस तरह अपने जज्बातों की
तुकबंदी की- इक तमन्ना जवान है यारों…आपका इम्तिहान है यारों….उसकी कुछ
ऐसी शान है यारों…हर अदा इक तूफान है यारों…। संगठन के सदस्य एवं
कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष राम प्रसाद यादव और स्वागत सचिव अमित वर्मा ने
मुशायरे में शामिल शायरों और मुख्य अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया।
 
इस मौके पर राधे श्याम बंका, धर्मराज जैन, सत्यपाल जैन, विकास मित्तल, मुन्नू
पहलवान, वीरेंद्र सिंह, सलाउद्दीन, मुख्तार आलम, सर्फुद्दीन, अशोक श्रीवास्तव,
डॉ. वीपी सिन्हला, वीरेंद्र जायसवाल, आशुतोष पांडेय, राजेश सोनी, बिन्देश्वरी
श्रीवास्तव, अनिल वर्मा, राधारमण कुशवाहा, संदीप चौरसिया, उमेश जालान, मुकेश
सिंह, अधिवक्तगण आलोक वर्मा, सुधांशु भूषण शुक्ला, विमलेश केशरी, बलराम,
रत्नाकर, शैलेंद्र, विशेष मणि पांडेय, मुन्नी भाई, विनोद चौबे, अधिवस्ता
प्रदीप पांडेय, अरुण सिंह, कृपा शंकर चौहान, विकास राय, शिवधारी शहरण राय,
महफूज, मकसूद, इकराम, साजिद खान, हिदायतुल्लाह, राज बहादुर चक्री, रामनाथ
शिवेंद्र, कामरान, श्यामराज, बरकत अली, रोशन खां, मुनि महेश शुक्ला, विकास
द्विवेदी, बृजेश पाठक, अशोक विश्वकर्मा, सुरेश भारती, ब्रजेश शुक्ला,
कौशलेंद्र पाठक, अनिल तिवारी, आयुष वर्मा, देवाशीष, राज कुमार सोनी, सुन्दर
केशरी समेत तमाम सहयोगी, समाजसेवी, साहित्यप्रेमी मित्र मंच परिवार के साथ
सहयोगी कार्यकर्ता सारी रात महफिल का उरुज बनाए रखा।

कारोबारी का लड़ना – मिलना सब मतलब से होता है…!!

मुंबई में आयोजित एक गैर-राजनैतिक समारोह में मनसे नेता राज ठाकरे और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का पुरानी बातें भुला कर मंच साझा करना जितना अप्रत्याशित था, उतना ही रहस्यमय भी। क्योंकि पांच साल पहले राज ठाकरे अमिताभ बच्चन समेत उत्तर भारतीयों के खिलाफ दुर्व्यवहार और दुर्भावनापूर्ण बातों की सारी सीमाएं लांघ चुके थे। खुद अमिताभ भी तत्कालीन घटनाक्रमों से काफी आहत दिखे थे। 
फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि दोनों भरत मिलाप करने को उद्यत हो उठे। जिसे अमिताभ की पत्नी जया बच्चन की समाजवादी पार्टी भी नहीं पचा पा रही है। लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखें तो इसके पीछे परिस्थितिजन्य समझौते की गुंजाइश ही ज्यादा नजर आती है। क्योंकि राज ठाकरे हों या अमिताभ बच्चन। दोनों ही कारोबारी है। एक का कारोबार अभिनय है तो दूसरे का राजनीति और कारोबारी लोग लड़ाई – समझौता सब मतलब से करते हैं। 
 
इस बात का ज्ञान मुझे करीब 23 साल पहले दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान हुआ । उस दौर में दक्षिण खास कर तामिलनाडु में  हिंदी विरोध की बड़ी चर्चा थी। दक्षिणी क्षेत्र में प्रवेश पर ही रेलवे स्टेशनों पर हिंदी में लिखे स्टेशनों के नाम पर पोती गई कालिख से मुझे लोगों की हिंदी के प्रति दुर्भावना का आभास होने लगा। इस स्थिति में  साथ गए लोगों के साथ हिंदी में बात करने में भी हमें हिचक होती थी। अव्वल तो लोग हिंदी जानते नहीं थे, या फिर बोलना नहीं चाहते थे। पूरी यात्रा के दौरान चुनिंदा स्थानीय लोग ही ऐसे मिले,  जिन्होंने हिंदी में हमारे द्वारा पूछे गए सवालों का किसी प्रकार जवाब देने की कोशिश की। लेकिन हमें हैरानी तब होती थी, जब रेलवे स्टेशनों पर मंडराते रहने वाले तमाम गाइड हमें पहचान कर टूटी – फूटी हिंदी में बातें कर हमारे सामने अपने पेशे से जुड़े आकर्षक प्रस्ताव रखने लगते थे।
उन्हें हिंदी बोलने – बतियाने से कोई गुरेज नहीं था। किसी बाजार में जाने पर भी दुकानदार हमें बखूबी पहचान लेते, और किसी प्रकार हिंदी में ही बातें कर हमारी मांग पूछते। यहां तक कि यह भी कहते कि कोई ऐसी  खास फरमाइश हो जो अभी उपलब्ध न हो  या  ले जाने में परेशानी हो , तो हमें अपना पता दे दें, हम डाक से आपके घर भिजवा देंगे। यहीं नहीं उग्र विरोध के दौर में भी स्थानीय उत्पादों के एक कोने पर उस चीज का  नाम टूटी -फूटी हिंदी में भी लिखा होता था। जिसे देख कर हमें बड़ी खुशी होती थी। यानी इस वर्ग को राजनैतिक पचड़ेबाजी से कोई मतलब नहीं था । इसलिए नहीं कि वे कोई राष्ट्रभाषा हिंदी के समर्थक थे, या उनकी हिंदी विरोधियों से नहीं पटती थी। महज इसलिए क्योंकि  स्थानीय के साथ ही बाहरी पर्यटक भी उनके लिए खरीदार थे, जिसके माध्यम से उन्हें मौद्रिक लाभ की उम्मीद थी। राज ठाकरे और अमिताभ बच्चन का मिलन भी कुछ ऐसा ही है। राज ठाकरे को जब अपनी राजनीति  चमकानी थी, तब उन्होंने  अमिताभ पर हमला बोल कर अपना हित साधा और अब जब परिस्थितयां साथ आने में मुफीद लग रही है, तो उन्होंने उनकी  तारीफ के पुल बांधने से भी गुरेज नहीं किया। सदी के महानायक को भी शायद इसी मौके की तलाश थी।
 
तारकेश कुमार ओझा
09434453934

 

विवादों में घिरे ज्वालामुखी मंदिर के अधिकारी सस्पेंड

धर्मशाला।। विवादों में घिरे ज्वालामुखी मंदिर में तैनात मंदिर अधिकारी सुरेन्दर शर्मा को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है।  कांगड़ा के जिलाधीश सी पाल रासू ने मंदिर प्रशासन को भेजे आदेशों के तहत मंदिर प्रशासन से आदेशों को अमल में लाने को कहा है।  विवादित अधिकारी इस बीच धर्मशाला चले गये हैं। 
अगले आदेशों तक मंदिर अधिकारी के तौर पर तहसीलदार सदर देवी राम को नियुक्त किया गया है।  गौरतलब है कि पिछले दिनों ज्वालामुखी मंदिर में चढ़ावे की गिनती के दौरान मंदिर अधिकारी को कथित तौर पर बारीदार ने चढ़ावे में गोलमाल करते हुये पकड़ लिया था। ये पूरी घटना सीसीटीवी कैमरें में कैद हो गयाी थाी। 
ज्वालामुखी मंदिर में तैनात मंदिर अधिकरी द्वारा ही गणना के दौरान की हेराफेरी की बात सामने आने से धार्मिक आस्था और श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंची है।  इन दिनों इस मामले की काफी चर्चा है। लुधियाणा से मंदिर दर्शनों के लिये आये अमरजीत सिंह ने यहां कहा कि इस मामले से उन्हें  हैरानी हुई है कि आखिर जिस व्यक्ति पर ही संस्थान को संभालने का जिम्मा था अगर वह ही हेराफेरी करे तो हालात क्या होंगे। 
खबर है कि ज्वालामुखी मंदिर की जिम्मेदारी संभाले तहसीलदार एवं मंदिर अधिकारी बारीदार पुजारी के साथ चढ़ावे का पैसा गिन रहा था। गणना कक्ष के नियमों के मुताबिक चढ़ावे का हिसाब गिनने से पहले एंट्री में हरेक की जांच अंदर जाने या फिर बाहर निकलते समय होती है। जांच के दौरान कक्ष के बाहर से किसी भी व्यक्ति को मोबाइल, नकदी एवं आभूषण ले आने-जाने पर पाबंदी लगाई गई है। इस दिन भी ऐसा ही हुआ, लेकिन अचानक गिनती के दौरान बारीदार पुजारी की निगाह मंदिर के मुख्य संरक्षण संभाले तहसीलदार सुरेन्दर शर्मा को बातों ही बातों में जेब से नोट निकालते पड़ गई। सीसीटीवी कैमरे में भी सारी घटना रिकार्ड हो चुकी थीं। बाद में पुजारी ने इसकी शिकायत उच्च मंदिर अधिकारियों को की तथा कांगड़ा के जिलाधीश ने फौरन कार्रवाई करते हुए देहरा के एसडीएम को जांच का जिम्मा सौंप सच्चाई उन तक पहुंचाने को कहा। देहरा के एसडीएम विनय कुमार ने सच्चाई के लिए जब मंदिर में लगे सीसीटीवी कैमरों की वीडियो फुटेज खंगाली तो वह भी हैरान रह गए, क्योंकि उसमें आरोप सही दिख रहे थे।
 इसी आधार पर मंदिर अधिकारी पर कार्रवाई संभव हो पाई। इस बीच ज्वालामुखी के विधायक संजय रतन ने कहा कि इस मामले की पूरी जांच की जायेगी ताकि सच्चाई सामने आ सके। यहां पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्होंने विधायक बनने के बाद हाल ही में मंदिर परिसर में करीब दो दर्जन सीसीटीवी कैमरे लगवायें हैं, लिहाजा कहीं भी हेराफेरी की कोई गुंजाईश नहीं है। फिर भी कोई ऐसा कुछ करता है तो वह बच नहीं सकता। संजय रतन ने दावा किया कि पिछले एक साल में मंदिर व्यवस्था में निरंतर सुधार हो रहा है। व कई विकास कार्य चल रहे हैं। श्रद्धालुओं के पैसे का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। महज एक मामले से ही पूरी व्यवस्था को ही गलत नहीं ठहराया जा सकता।  वहीं मंदिर प्रशासन को प्रशासन को सारा लेखा जोखा जल्द ही तैयार करना होगा , ताकि अगली कार्रवाई संभव हो सके।
 
विजयेन्दर शर्मा

पत्रकार के भाई की असमय मृत्यु पर प्रेस क्लब हमीरपुर ने जताया शोक

हमीरपुर।। प्रेस क्लब हमीरपुर ने पत्रकार आशुतोष गोस्वामी के बड़े भाई सुरेश कुमार की आकस्मिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया है। वे 65 वर्ष के थे। प्रेस क्लब के अध्यक्ष सुरेंद्र कटोच ने शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि पूर्व सैनिक सुरेश कुमार के अकस्मिक देहांत से  जहां पत्रकार आशुतोष गोस्वामी ने एक भाई खो दिया है वहीं परिवार को सदमा पहुंचा है। 
प्रेस क्लब हमीरपुर के वारिष्ठ सदस्यों दिनेश कंवर,विक्रम ढटवालिया, रणवीर सिंह,निकुंज सूद नवनीत बत्ता,राकेश पाल सोहारू, वासुदेव नंदन,संजय शर्मा,विजय शामा, रविन्द्र ठाकुर,राजीव चौहान,कपिल बस्सी, रजनीश शर्मा, अजय ठाकुर, देशराज कौशल, अशोक राणा, सुनील कुमार, अनिल कुमार, अरूण पटियाल, कमल कृष्ण, अश्वनी कुमार, विवेकानंद, मंगलेश कुमार, गगन दीप, सुभाष चंद, राजकुमार,मोहिन्द्र सिंह,जसवीर सिंह, अश्वनी वालिया,अनिल शर्मा, राकेश शर्मा,कमल ठाकुर, पम्मी कुमार से निष्पक्ष भारती, बीसी सोनल,सन्नी मेहरा, राजकुमार जैन, हेमंत कुमार, प्रदीप शर्मा,वीरेन्द्र गोस्वामी,पंकज वर्मा के अलावा अन्य उपमंडल के पत्रकारों ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की है।
 
विजयेन्दर शर्मा

खबर छापो नहीं तो मंत्री से कहवाकर अखबार से निकलवा देंगे

मिहिजाम।। देश में पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं इसको लेकर आए दिन नए-नए मामले सामने आते रहते है। ऐसा ही एक मामला मिहिजाम नगर पंचायत क्षेत्र से सामने आया है। जहां एक नेता ने अपनी खबर अखबार में छपवाने के लिए एक पत्रकार को धमकी दे डाली। इस कद्दावर नेता  ने अपनी खबर छपवाने के चक्कर मे पत्रकार से कहा कि, अगर मेरी न्यूज नहीं छापोगे तो हम तुम्हें अखबार से ही निकलवा देंगे। हमारी पहुंच रांची तक है। सोच लो तुम तो मुझे पहचानते हो, वैसे किसी से मुंह बंधवाकर भी हम तुम्हें पिटवा सकते हैं। कई प्रकार की धमकियों से उक्त पत्रकार गहरे सदमे मे दिख रहे हैं। 
पत्रकार का कहना है कि स्वार्थी किस्म के उक्त नेता सिर्फ अपनी खबर छपवाने के लिए ही परेशान रहते हैं। जन कल्याण से उनका कोई सरोकार नहीं है। अगर खबर छप जाती है तो बाजार मे खबर भंजाकर उक्त नेता जी जान से वसूली करने मे जुट जाते हैं और मनमानी करते हैं। मिहिजाम की भोली भाली जनता को अब ऐसे नेताओं को पहचान कर उन्हें बहिष्कार करने की जरूरत है। वर्तमान सरकार मे मात्र दो चार नेताओं की भागीदारी से जब उक्त नेता एक पत्रकार को इस प्रकार से परेशान कर सकता है तो उक्त नेता की पार्टी सरकार मे पूर्ण बहुमत के साथ आ जाये तो मिहिजाम मे किसी को चलना फिराना भी मुश्किल कर देंगे। लोगों को प्यास भी लगेगी या फिर छींक आयेगी तो क्या इनसे अनुमिति लेनी होगी?
 
   ओम प्रकाश शर्मा
 CONTACT-09932330769

चमत्कार… चुनाव बीते और सब्जियों के दाम चौथाई रह गए

Vikas Mishra : आलू, अमरूद, सेब, कद्दू, लौकी की कुछ टेढ़ी मेढ़ी आकृति में कई बार लोगों को हनुमान जी या गणेश जी दिख जाते हैं, अखबार तक भी खबर पहुंच जाती है, लेकिन मुझे प्याज में साक्षात 'ईश्वर' के दर्शन हो गए हैं। ईश्वर के लिए कहते हैं कि उसी ने पैदा किया, वही मिटाएगा। यही बात प्याज पर भी लागू हो रही है।

इसी प्याज ने पंद्रह साल पहले दिल्ली में कांग्रेस की सरकार पैदा की थी। तब सुषमा स्वराज मुख्यमंत्री थीं और प्याज की कीमतें अस्सी रुपये किलो पहुंच चुकी थीं। पंद्रह साल बाद प्याज फिर 80 रुपये किलो हुआ और प्याजेश्वर महाराज ने शीला सरकार को मिटा भी डाला। हमारे पड़ोस में बुधवार और रविवार को बाजार लगता है। ताजा रेट बता दूं- प्याज 20 रुपये किलो, आलू-12-15 रुपये किलो, टमाटर-20 रुपये किलो, गोभी- दस की दो किलो..। चुनाव खत्म होने के बाद ये कौन सा चमत्कार हो गया कि महीने भर के भीतर सब्जियों के दाम चौथाई रह गए।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

‘गधों का मेला’ के मंचन के साथ 9वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह का समापन

डोंगरगढ, 21 से 23 दिसंबर 2013। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार और डोंगरगढ़ इप्टा के सहयोग से विकल्प, डोंगरगढ़ द्वारा 3 दिवसीय 9 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह के तीसरे और आखिरी दिन कुल तीन नाट्य प्रस्तुतियों का मंचन किया गया । पहली प्रस्तुति थी प्रसिद्ध नाटककार स्वदेश दीपक लिखित नाटक कोर्ट मार्शल, जिसे इप्टा, गुना के कलाकारों ने अनिल दुबे के निर्देशन में प्रस्तुत किया । सामंती मानसिकता को बड़ी ही खूबसूरती से  मानवीयता और सत्य के कटघड़े में खड़ा करती यह प्रस्तुति समारोह की सार्थक नाट्य प्रस्तुतियों में से एक थीं । प्रस्तुति के विभिन्न चरित्रों में अनिल दुवे, कल्याण सिंह लोधी, सुमित बुनकर, शुभम भार्गव, पंकज दीक्षित, शुभम पाठक आदि अभिनेताओं ने अभिनय किया । ज्ञात हो कि कोर्ट मार्शल हिंदी के चर्चित व बहुमंचित नाटकों में से एक है ।

अंतिम दिवस दूसरी प्रस्तुति इत्यादि थी । वर्त्तमान समय में हिंदी के प्रतिष्ठित कवि राजेश जोशी की एक कविता ‘इत्यादि’ पर आधारित, आधुनिक रंगमंच की प्रयोगशीलता को अपने अंदर समेटे डोंगरगढ़ बाल इप्टा की इस प्रस्तुति का निर्देशन पुंज प्रकाश ने किया था । डोंगरगढ़ के दर्शकों के लिए यह प्रस्तुति एक नई नाट्यानुभूति थी । इत्यादि में प्रतिज्ञा, राशि पांडे, अनिता गुप्ता, सानिका जैन, अनुष्कस बक्शी, मुस्कान सिंग आदि बाल कलाकारों ने अभिनय किया था ।

समारोह की तीसरी और आखिरी प्रस्तुति थी गधों का मेला, जिसे नाट्य विभाग, खैरागढ़ विश्विद्यालय के अभिनेता डॉ योगेन्द्र चौबे के निर्देशन में प्रस्तुत कर रहे थे । वर्त्तमान सामाजिक परिदृश्य की विभीषिकाओं को हास्य-व्यंग्य के माध्यम से पेश करती तौकीर अल हाकिम लिखित इस नाटक का हिंदी अनुवाद प्रसिद्ध रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर ने किया था । हास्य-व्यंग से सरबोर लोक व पारम्परिक नाट्य रूपों व शैलियों को आधुनिक सन्दर्भ में प्रयोग करते इस शानदार नाट्य प्रस्तुति में घनश्याम साहू, सौरव बुराडे, भुवनेश्वर महिलाने, शुभम, राकेश कुमार, काजोल मुस्कान, गौरव चौहान आदि अभिनेताओं ने विभिन्न भूमिकाओं को बड़ी ही अदा से पेश किया।

इससे पूर्व आयोजन के दूसरे दिन प्रसिद्ध  नाटककार  बादल सरकार लिखित हास्य नाटक ‘बल्लभपुर की रूपकथा’ का सफल मंचन विवेचना रंगमंडल, जबलपुर के कलाकारों ने चर्चित रंग निर्देशक अरुण पाण्डेय के निर्देशन में किया । ज्ञात हो कि सन 1963 में लिखा बादल सरकार का यह परिस्थिति जनक हास्य नाटक अंग्रेजी फ़िल्म ‘यूं आर नो  एंजल्स’ पर आधारित है। प्रस्तुतिकरण में हास्य प्रचुरता एवं अभिनेताओं की ऊर्जा व हास्य-बोध ने उपस्थित नाट्य प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया। नाटक के विभिन्न  चरित्रों को विवेक पांडे, मनीष तिवारी, रोहित सिंह, जतिन राठौड़, अमित निमझे, सरस नामदेव, रविन्द्र मुर्हार, आशुतोष द्विवेदी, अलंकृत, अपर्णा शर्मा एवं सूरज राय आदि अभिनेताओं ने जीवंत किया । इस प्रस्तुति की सफलता में कला निर्देशक विनय अम्बर व प्रकाश परिकल्पक दिलीप झाडे का योगदान भी उल्लेखनीय है ।

दूसरे दिन की दूसरी प्रस्तुति थी हीरा मानिकपुरी निर्देशित नाटक:व्याकरण’ जिसे प्रस्तुत किया , इप्टा रायगढ़ के कलाकारों ने। जल, जंगल, ज़मीन से जुड़े वर्त्तमान ज्वलंत सवालों को अपने दायरे में समेटने का एक गम्भीर प्रयास करता यह नाटक छद्म आंदोलन की भी पड़ताल है । प्रस्तुति की गम्भीरता एवं गम्भीर नाटकों के प्रति दर्शकों के नजरिया की भी पड़ताल इस प्रस्तुति के मार्फ़त की जा सकती है। नाटक के विभिन्न चरित्रों में अपर्णा, ब्रिजेश तिवारी,  लोकेश्वर निषाद, भारत निषाद, सुरेन्द्र बरेठ, कुलदीप दास, प्रियंका बेरिया, श्याम देवकर, विनोद बोहिदार, आदि अभिनेताओं ने अभिनय किया । एक ही दिन में दो अलग-अलग  नाटकों से  रु-ब- रु होने का एक मज़ेदार अनुभव भी देखने को मिला ।

आयोजन का उद्घाटन विख्यात हिंदी कवि पवन करण ने किया। इस अवसर पर उनके जनगीतों की एक पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी गयी। नाट्य समारोह का उद्घाटन करते हुए उन्होंनेे महोत्सव के आयोजन की बधाई देते हुए कला और समाज के अंतरसंबधों पर प्रकाश डाला। उद्घाटन समारोह में सुभाष मिश्रा, संजय अलंग, जयप्रकाश, आनंद हर्षुल और योगेन्द्र चौबे भी मौजूद थे।

उद्घाटन दिवस पर मनोज गुप्ता के संगीत निर्देशन में जनगीतों के सामूहिक गायन के पश्चात भिलाई इप्टा द्वारा नाटक ‘प्लेटफार्म’ और डोंगरगढ़ इप्टा द्वारा नाटक ‘बापू मुझे बचा लो’ का मंचन किया गया।नाटक प्लेटफार्म रेलवे प्लेटफार्म पर विभिन्न पात्रों एवं घटनाओं का रोचक कोलाज है जो कई सामाजिक सवालों से भी रू-ब-रूहोता है। प्रस्तुति में नाटकीय तत्वों व घटनाओं की प्रधनता एवं अभिेनेताओं का सादगीपूर्ण प्रदर्शन इस प्रस्तुति की सार्थकता को दर्शकों तक सफलतापूर्वक संप्रेषित करती है। इस नाटक का लेखन व निर्देशन शरीफ अहमद ने किया था एवं राजेश श्रीवास्तव, मणिमय मुखर्जी, शैलेश कोडापे, निशु, संदीप आदि ने उल्लेखनीय अभिनय किया।

समारोह की दूसरी प्रस्तुति राधेश्याम तराने निर्देशित नाटक बापू मुझे बचा लो थी, जिसका आलेख दिनेश चौधरी ने लिखा है व संगीत निर्देशन मनोज गुप्ता है। नाटक भ्रष्टाचार रूपी त्रासदी  को  महात्मा गांधी के मेटाफर के साथ व्यंग्य और हास्य के मार्फत प्रस्तुत करते हुए सामाजिक -आर्थिक-राजनीतिक प्ररिस्थितियों को कठघरे में खड़ा करता है। नाटक का तीखा व्यंग्य एक तरफ जहाँ आलेख की खूबसूरती है, वहीं प्रेक्षकों और अभिनेताओं के ‘‘सेफ जोन’’ का अतिक्रमण भी। नाटक में मतीन अहमद, नुरूद्दीन जीवा, राजेश कश्यप, महेन्द्र रामटेके, निश्चय व्यास, दिनेश नामदेव, राधेकृष्ण कनौजिया, गुलाम नबी ने अभिनय किया।

पुंजप्रकाश की रिपोर्ट। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित स्वतंत्र रंगकर्मी पुंजप्रकाश निर्देशक, अभिनेता व लेखक हैं। वर्तमान में रांची में ‘दस्तक’ नाट्य समूह नामक शौकिया थियेटर ग्रुप का संचालन कर रहे हैं और रंगकर्म सहित सामयिक विषयों पर निरंतर लेखन में सक्रिय हैं।

देहरादून में न्यूज चैनल एटूजैड के दो कथित पत्रकार रंगदारी में गिरफ्तार

देहरादून। उत्तराखण्ड को कथित दलाल पत्रकारों ने रंगदारी का अड्डा बनाकर पूरी मीडिया को बदनाम कर डाला है। दलालों की लम्बी फौज मीडिया की आड़ में फर्जी स्टिंग करने के बाद मोटी उघाही का खेल खेलने में मशगूल है। वहीं कुछ मीडिया के लोग प्रापर्टी के कारोबार में कर्इ लोगों को लाखों की चपत भी लगा चुके हैं। ताजा मामला एटूजैड न्यूज चैनल से जुड़ा हुआ सामने आया है जिसमें कानपुर के एक डाक्टर एवं बिजली विभाग के एक अधिकारी से स्टिंग आपेरशन के बाद रंगदारी की मांग की गई।

देहरादून में एटूजैड में कार्यरत कथित पत्रकार अनुज एवं ऋषि रौतेला को कानपुर पुलिस ने रंगदारी के मामले में गिरफ्तार किया है। पत्रकारों के गिरफ्तार होने की सूचना मिलने से कर्इ दलाल पत्रकार भूमिगत हो गए हैं। शुक्रवार को कानपुर पुलिस के एक दरोगा सहित कुछ पुलिसकर्मी देहरादून पहुंचे जहां उन्होंने स्थानीय पुलिस से एटूजैड चैनल में कार्यरत अनुज एवं ऋषि रौतेला को बी वारंट पर गिरफ्तार करने की आमद करार्इ जिसके बाद पुलिस ने कारगी चौक स्थित एटूजैड के न्यूज चैनल से दोनों कथित पत्रकारों को रंगदारी के मामले में गिरफ्तार कर लिया।

कानपुर नगर कोतवाली में कथित पत्रकार अनुज कुर्मी निवासी शिवालिक इनक्लेव कारगी और ऋषि रौतेला निवासी कैलाश कुंज पटेलनगर के खिलाफ इसी माह ब्लैकमेलिंग और धमकी देने का मुकदमा दर्ज हुआ था। दोनों फरार चल रहे थे। दोनों ने एक डॉक्टर के अल्ट्रासाउंड केंद्र और बिजली विभाग के एसडीओ का पैसे लेकर कनेक्शन दिलाने का फर्जी स्टिंग तैयार किया। इसके बाद दोनों मोटी रकम की मांग करने लगे।

कानपुर पुलिस ने मोबाइल लोकेशन ट्रेस कर शुक्रवार को दोनों को पकड़ लिया।  उत्तराखण्ड में इससे पूव भी कर्इ पत्रकार रंगदारी के मामले मे गिरफ्तार किए जा चुके हैं। वहीं जेपी जोशी प्रकरण में भी कथित पत्रकारों की गिरफ्तारी हो चुकी है। उत्तराखण्ड की मीडिया में दलाल पत्रकारो की भूमिका बढती जा रही है और देहरादून में स्टिंग आपरेशन करके कथित पत्रकार मोटी रकम ऐंठने के खेल में लगे हुए हैं। कथित स्टिंग आपरेशन देहरादून के एक मीडिया हाउस से संचालित किया जाता है जिसका सरगना कर्इ मामलो में वांछित होने के चलते उत्तर प्रदेश में कोर्ट कचहरी के चक्कर काट रहा है।

रंगदारी के मामले में ए2जेड के दो पत्रकारों की कानपुर पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की पुष्टि देहरादून के एसपी सिटी नवनीत सिंह ने की। उन्होंने भड़ास4मीडिया को बताया कि कानपुर पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद ट्रांजिट रिमांड पर दोनों को लेकर कानपुर चली गई है।

आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार के 54 साल : अब आप प्रादेशिक समाचार सुनिये…

वर्ष 1959……तारीख….28 दिसम्बर……स्थान…आकाशवाणी पटना का मुख्य स्टूडियो……….और माइक के सामने बैठे….रामरेणु गुप्त की नजर माइक के ठीक उपर, सामने लगी घड़ी व लाल रंग की बल्ब पर……ज्योंहि समय…..ठीक शाम के सात बजकर पांच मिनट….हुआ लाल बल्ब जल उठा…….और…उन्होंने फिडर को आन करते हुए……ये आकाशवाणी पटना है अब आप रामरेणु गुप्त से प्रादेशिक समाचार सुनिये………..ज्योंहि कहा बिहार की मीडिया के लिए यह दिन-समय स्वर्णमयी क्षण बन गया।

बिहारवासियों ने रेडियो पर पहला प्रादेशिक समाचार जो सुना था। तब से आज तक यह गूँज बिना रूके…थके जारी है। हालांकि बिहार बंटवारे के पहले तक आकाशवाणी पटना से……….ये आकाशवाणी का पटना, रांची, भागलपुर, दरभंगा केंद्र है…….की गूंज सुनाई पड़ती थी जो लोगों की जुबान पर रहती थी, लेकिन झारखंड राज्य बनने के बाद यह गूंज बंद हो गई। अब ……….ये आकाशवाणी का पटना केंद्र है………सुनाई पड़ती है।

बिहार में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के नाम पर शुरुआती दौर में केवल आकाशवाणी ही था। बिहार की जनता को सूचना देने, शिक्षित व मनोरंजन करने के उद्देष्य के मद्देनजर आकाशवाणी पटना केन्द्र का उद्घाटन 26 जनवरी 1948 को हुआ था। वहीं, दूरदर्शन का बिहार में विस्तार काफी बाद में हुआ। आज भले ही खबरिया चैनलों की बाढ़ आ गई हो, निजी रेडियो चैनल भी बिहार की जनता का मनोरंजन करने यहां की घरती पर कदम रख चुके है। इन सबके बावजूद आकाशवाणी की पहुंच जो वर्षो पूर्व थी, वह आज भी बरकरार है। कहते है जहां अखबार टी.वी. नहीं पहुंचता यानी, अंतिम कतार में खड़े सुदूर इलाकों की जनता तक आकाशवाणी पहुंचता है।

बिहार की जनता तक सूचना, शिक्षा व मनोरंजन को पहुंचाने के बाद लोगों को देश-विदेश और बिहार में घटने वाली घटनाओं/खबरों/विकास की योजनाओं/जनहित की सरकारी-गैरसरकारी योजनाओं व नीतियों को समाचार के माध्यम से आकाशवाणी, पटना से 28 दिसम्बर 1959 को समाचार की शुरूआत कर समाचार जगत से बिहार की जनता को जोड़ने का क्रांतिकारी कदम उठाया गया और आकाशवाणी पटना में प्रादेशिक समाचार एकांश को स्थापित किया गया। समाचार एकांश, दिल्ली से आये सहायक समाचार संपादक गुरूदत्त विद्यालंकार के नेतृत्व में समाचार वाचक रामरेणु गुप्त व संवाददाता रवि रंजन सिन्हा की टीम ने काम करना षुरू कर दिया। पहला समाचार बुलेटिन 28 दिसम्बर, 1959 को शाम सात बजकर पांच मिनट पर शुरू हुआ जो पांच मिनट का था।

आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार का अपना स्वर्णिम इतिहास रहा है। सीमित साधनों लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते लम्बा संघर्ष किया है। आज प्रादेशिक समाचार प्रसारण का 54 वर्ष ( 28 दिसम्बर, 2009 को ) पूरा हो गया है। जिस ईमानदारी के साथ गुरूदत्त विद्यालंकार, रामरेणु गुप्त व रवि रंजन सिन्हा ने आकाशवाणी समाचार से बिहार की जनता को जोड़ने का काम शुरू किया था, उसे पूरी ईमानदारी के साथ उनके बाद एकांश से जुड़े संपादकों एवं संवाददाताओं ने भी किया बल्कि आज भी कर रहे है। प्रादेशिक समाचार आकाशवाणी, पटना की जब शुरूआत हुई तब इसके प्रभारी के रूप में सहायक समाचार संपादक गुरूदत्त विद्यालंकार आए। शुरू से लेकर अब तक, आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार एकांश से जुड़ने वालों पर डालते है एक नजर:-

सहायक समाचार संपादक

01.       श्री गुरूदत्त विद्यालंकार
02.       श्री मदन मोहन सहाय
03.       श्री के0पी0 सिंघल
04.       श्री केदार नाथ सिन्हा
05.       श्री शंभू नाथ मिश्र
06.       श्री राजेन्द्र राय
07.       श्री शशि नाथ मिश्र
08.       श्री मणिकान्त वाजपेयी
09   श्री अरूण कुमार वर्मा
10.   श्री संजय कुमार

सहायक सम्पादक (समाचार)

01.       श्री रामरेणु गुप्त
02.       डा0 महेश कुमार सिन्हा
03.   श्री विनय राज तिवारी
04.   श्री अजय कुमार

क्षेत्रीय संवाददाता(पटना)

01. श्री रविरंजन सिन्हा

पटना संवाददाता

01.       श्री हरि प्रसाद शर्मा
02.       श्री एम0जेड0 अहमद
03.       श्री अशोक कुमार सिन्हा
04.  श्री विजय कुमार
05   श्री के.के.लाल
06  श्री दिवाकर कुमार

समाचार संपादक

01.       श्री जी0 एम0 मुस्तफा
02.       श्री चन्द्र मोहन झा
03.  श्री अरूण कुमार वर्मा
04.   श्री संजय कुमार
05        श्री शाह वासिफ ईमाम

सहायक सम्पादक (रिपोर्टिंग)

01.       श्री महेश कुमार सिन्हा
02.       श्री शक्तिनाथ झा
03.  श्री मोहम्मद मुनव्वर

उपनिदेशक समाचार

01   श्री अरूण कुमार वर्मा

संयुक्त निदेशक समाचार

01.   श्री चंद्रमोहन झा
02.    श्री अरूण कुमार वर्मा

सहायक निदेशक समाचार

01 श्री राकेश कुमार

समाचार वाचक सह अनुवादक

01.       श्री रामानुज प्रसाद सिंह
02.       श्री कृष्ण कुमार भार्गव
03.       श्री जय नारायण शर्मा
04.       श्री राम कुमार काले
05.       स्वर्गीय अनन्त कुमार
06.       डा0 महेश कुमार सिन्हा
07.       श्री संजय बनर्जी

प्रस्तुति सहायक

01.       श्री अनिल कुमार सिन्हा ’प्रियदर्शी’
02.       श्री के0 एन0 पांडेय
03.       श्री विनय कृष्ण शर्मा
04.       श्री श्याम सुन्दर प्रसाद
05.       श्री शालिग्राम भारती

प्रादेशिक समाचार एकांश पटना के समाचार बुलेटिनों और समाचार आधारित कार्यक्रमों को जनता के बीच पहुंचाने की जिम्मेवारी शुरू से ही सहायक समाचार संपादकों के कंधों पर रही है। भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी इस पद पर आते रहे हैं। तीन अधिकारियों द्वारा कार्यों का निष्पादन किया जाता रहा है। सहायक समाचार संपादक, सहायक संपादक (समाचार), संवाददाता, जबकि समाचार वाचक सह अनुवादक तैयार बुलेटिनों को पढ़ने का काम करते आ रहे हैं। यहां एक पद प्रस्तुतिकरण सहायक का भी है जो समाचार आधारित कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाते रहे हैं। शुरूआती  दौर में हिन्दी समाचार वाचक सह अनुवादक के तौर पर कई नियमित लोगों ने अपनी सेवाएं दी। अंतिम रूप से संजय बनर्जी के दिल्ली तबादले के बाद इस पद पर आकस्मिक समाचार वाचक सह अनुवादक ही समाचारों को पढ़ने का काम करते आ रहे हैं। शुरू के प्रादेशिक समाचार एकांश की परिपाटी पर संपादकों की टीम कार्यरत है। सहायक समाचार संपादक के पद को, वर्ष 2006 में  पद उन्नयन कर समाचार संपादक कर दिया गया है।

आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार एकांश से पहला समाचार बुलेटिन का प्रसारण 28 दिसंबर 1959 को होने के बाद बिना रूके-थके अपने पहले प्रसारण से लेकर आजतक पीछे मुड़कर नहीं देखा, लगातार जनता से जुड़ी, जनता के लिए, खबरों पर पैनी नजर रखते हुए समाचारों को जनता तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शुरू से ही समाचार एकांश में पदस्थापित समाचार सम्पादकों ने सीमित साधनों के बल पर आकाशवाणी पटना के समाचार एकांश को एक मजबूत स्तम्भ के रूप में खड़ा किया। शुरूआती दौर में केवल शाम 7.05 पर पांच मिनट का समाचार बुलेटिन का प्रसारण होता था। बाद में समय बदल कर शाम 7.30 बजे कर दिया गया। साथ ही इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इसके समय में बढोत्तरी कर दी गई पांच से दस मिनट का समाचार बुलेटिन कर दिया गया। मीडिया के कोई और माध्यम के नहीं होने से रेडियो समाचार की अहमियत काफी बढ़ गई। दस मिनट के समाचार से काम नहीं बनता देख 10 अप्रैल 1978 से इसमें दोपहर 3.10 बजे हिन्दी में 5 मिनट का एक और बुलेटिन प्रसारित किया जाने लगा। जबकि उर्दू भाषी जनता के लिए 16 अप्रैल1989 से दोपहर 3.15 बजे 5 मिनट की अवधि का उर्दू समाचार बुलेटिन  ‘‘इलाकाई खबरें’’ के षुरू होने से बिहार के उर्दू भाषी श्रोता इससे जुड़े। इसी तरह वर्ष 1993 में 2 अक्टूबर से सप्ताह में तीन बार मैथिली में ‘‘संवाद’’  समाचार बुलेटिन  तैयार किया जाने लगा, जिसका प्रसारण मैथिली भाषियों के लिए आकाशवाणी के दरभंगा केन्द्र से किया जाता है। 16 अगस्त 2003 से  मैथिली में समाचार ‘‘संवाद’’ रोजाना संध्या 6.15 बजे प्रसारित होने लगा। वहीं वर्ष 1992 से ही सप्ताह में एक बार हर शनिवार को रात्रि 8.00 बजे समसामयिक विषयों पर आधारित समीक्षात्मक वार्ता कार्यक्रम ‘सामयिक चर्चा’ का प्रसारण होने लगा। ‘सामयिक चर्चा  के दौरान बिहार के समसामयिक विषयों पर पत्रकारों तथा विशेषज्ञों से आलेख लिखवाया जाता रहा है। आकाशवाणी पटना के समाचार एकांश से विधान मंडल की समीक्षात्मक वार्ता, रात्रि 8.20 बजे से विधान मंडल सत्र के दौरान प्रसारित किया जाता है। विधान मंडल की समीक्षा, विधान सभा एवं विधान परिषद् में दैनिक समाचार पत्रों के वरिष्ठ पत्रकारों से लिखवाई जाती है। समसामयिक विषयों पर आधारित ‘सामयिक चर्चा और विधान मंडल सत्र के दौरान समीक्षा को श्रोता बडे़ ही चाव से सुनते हैं।  प्रादेशिक समाचार की तरह ही इसके श्रोताओं की अच्छी खासी संख्या है।

वर्ष 2006 से दो मिनट का प्रमुख समाचारों का बुलेटिन प्रसारण सुबह 10.30, 11.30 और संध्या 6.30 बजे  ‘‘एफ एम चैनल’’ पर किया जाने लगा। आकाशवाणी, पटना से प्रसारित होने वाले प्रमुख समाचार बुलेटिनों में सुबह 8.30 बजे 10 मिनट का समाचार बुलेटिन भी शुमार है।

प्रादेशिक समाचार अपनी सहजता व तेवर को लेकर दिनों-दिन लोकप्रिय होता जा रहा था। बिहार, जहां विभिन्न भाषाओं को बोलने वालों की संख्या काफी तादाद में है, ऐसे में उर्दू समाचार की मांग बलवती हुई और उर्दू भाषी आबादी को देखते हुए 16 अप्रैल 1989 से दोपहर में ही 3.15 पर, पांच मिनट पर उर्दू समाचार बुलेटिन ‘इलाकाई खबरें’ प्रसारित की जाने लगी। हिन्दी के बाद उर्दू और उर्दू के बाद उत्तर बिहार में बोली जाने वाली मैथिली भाषा में भी समाचार बुलेटिन की शुरूआत की गई। मैथिली भाषा में ‘संवाद’ नाम से समाचार बुलेटिन का प्रसारण 2 अक्टूबर 1993 से सप्ताह में तीन बार मैथिली भाषियों के लिए शुरू किया गया। प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना द्वारा मैथिली में समाचार बुलेटिन तैयार कर इसका प्रसारण दरभंगा केन्द्र से किया जाने लगा। आज यह रोज नियमित रूप से प्रसारित किया जाता है।

आकाशवाणी, पटना का समाचार कक्ष आज अत्याधुनिक संचार उपकरणों से लैस हो चुका है। वर्ष 2008 से यह पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत हो चुका है। इसके पूर्व टाईप राइटर मशीन पर समाचार बुलेटिन तैयार किया जाता रहा था। सितंबर 2008 के बाद समाचार निर्माण का कार्य पूरी तरह से कम्प्यूटर पर किया जाने लगा। यही नहीं, संवाददाताओं के साउंड बाईट, डिस्पैच आदि का संपादन कार्य भी कम्प्यूटर द्वारा रिकार्ड कर संपादित किया जाने लगा।

यों तो, आकाशवाणी के समाचारों की प्रस्तुति में व्यापक बदलाव आ चुका है। राष्ट्रीय स्तर के प्रसारण में समाचारों को रोचक व विविधता लाने के प्रयास बहुत पहले हो चुके थे। मसलन समाचारों में सवांददाताओं के वायस डिस्पैच, वायसकास्ट एवं साउंड बाइट आदि को समांयोजित कर रोचक बनाया गया। समाचार सेवा प्रभाग की तर्ज पर आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचारों में भी सवांददाताओं की वाइस डिस्पैच, वाइसकास्ट एवं साउंड बाइट का प्रयोग कर प्रादेशिक समाचार बुलेटिन को रोचक बनाने का काम समाचार सेवा प्रभाग, नई दिल्ली के दिशा निर्देश के तहत किया जाने लगा। इसके लिए तल्कालीन महानिदेषक समाचार पी.के.बंद्धोपाध्याय और अपर महानिदेषक समाचार डा.साधना राउत की भूमिका अहम् रही है।

अक्टूबर 2006 में अररिया जिले के संवाददाता सुदन सहाय के ’वन व वनप्राणी के संरक्षण और संवर्द्धन’ खबर पर उनका बाइट समाचार में प्रयोग किया गया। उसके बाद जो सिलसिला चला, वह आज भी बरकरार हैं। वाइसकास्ट के प्रयोग में जिले के संवाददाताओं के अलावा समाचार से संबंधित राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रमुख राजनेताओं, अभिनेताओं, अधिकारियों आदि की आवाज का प्रयोग समाचार बुलेटिनों में किया जाने लगा। वर्ष 2006 में ही समाचार सेवा प्रभाग, नई दिल्ली की पहल पर प्रादेशिक समाचार एकांश  का समाचार आधारित कार्यक्रम ‘जिले की हलचल’, जिसका पहले नाम ‘जिले की चिटठी’ थी, उसे रोचक व जीवंत बनाने के लिए जिले के संवाददाताओं की आवाज में प्रसारित किया जाने लगा। समाचार और समाचार आधारित कार्यक्रमों में साउंड इनपुट पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। समाचार बुलेटिनों में साउंड बाइट के अधिकाधिक प्रयोग से जहाँ समाचार की गरिमा बढ़ी, वहीं संवाददाताओं के वाइस डिस्पैच ने समाचार की विश्वसनीयता को चार चांद लगा दिया है।

आज, महानिदेशक समाचार श्रीमती अर्चना दत्ता के आत्मीय दिशा-निर्देश व सहयोग से प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी पटना विशेष मुकाम तय कर रहा है। समय के बदलने के साथ ही साथ जनता का अपना सस्ता, सहज और सरल मीडिया भी बदलता गया। आकाशवाणी समाचार पटना भी बदला। टाइपराइटर से कम्प्यूटर, टेलीप्रिंटर से वी-सेट और वेब तथा  बड़े-बड़े रेडियो सेट से छोटे रेडियो सेट व मोबाइल पर समाचार का दौर आ चुका है। शुरू में समाचार तैयार करने के लिए संपादक सीमित साधन से जूझते थे। शुरू में टेलीप्रिंटर पर अंगे्रजी समाचार आते थे जिसे अनुवाद किया जाता था। संपादक के अलावे समाचार वाचक सह अनुवादक समाचारों का अनुवाद कर उसे रेडियो के लायक बनाते थे। आज हालात बदल चुके हैं। समाचार एजेसी यू.एन.आई. और पी.टी.आई की खबरें हिन्दी व अंगे्रजी में नियमित रूप से आती है। समाचार एकांष को आधुनिक स्वरूप देने व नई तकनीक से जोड़ने के मद्देनजर मई 2008 से टेलिप्रिंटर को हटा कर उसे वी.सेट( सेटेलाइट उपकरण) से जोड़ दिया गया और तब से एजेंसी की खबरें वी.सेट के जरिये सीधे समाचार संपादन कक्ष व टेबुल पर कम्प्यूटर के माध्यम से आने लगीं है।

आकाशवाणी समाचार पटना को प्रादेशिक बनाने में बिहार के जिलों में तैनात अंशकालीन संवाददाताओं की भूमिका अहम रही है। जिलों में तैनात अंशकालिक संवाददाता वहां की खबरें फोन/फैक्स से समाचार कक्ष में प्रेषित करते हैं। जहां संपादक समाचारों का चयन कर रेडियो के प्रसारण के लिए अंतिम रूप देते है। पहले जिलों के संवाददाता टेलीग्राफ से खबरें भेजते थे। बाद में दूरभाष के आने से संवाददाता हार्ड न्यूज को दूरभाष से लिखवाते थे। लेकिन दूरभाष पर समाचार लिखवाने का जो दौर रहा, खासकर 1975-80 तक का, जहाँ एस.टी.डी. की सुविधा नहीं थी, ऐसे में संवाददाताओं को समाचार लिखवाने के लिए टेलीग्राफ कार्यालय में ट्रंककाल बुक करवाने पड़ते थे और लाइन मिलने में चार से पांच घण्टे तक उन्हें टेलीग्राफ कार्यालय में इंतजार करना पड़ता था। एस.टी.डी. की सुविधा बहाल होने के बाद समाचार पे्रषण में सहूलियत हुई, खबरें अब एस.टी.डी. फोन से तुरंत समाचार कक्ष में पहुंच जाता है, यहीं नहीं, संवाददाता वीआईपी कार्यक्रमों/ वीआईपी की आवाज को सीधे मोबाइल फोन से समाचार कक्ष में  रिकार्ड भी करवाते हैं। वीआईपी की आवाज को कम्प्यूटर में संपादित कर उसे समाचार में समायोजित किया जाता है। अब अंशकालीन संवाददाता समाचार फैक्स/ ई-मेल से भी भेजते हैं।

प्रादेशिक समाचार एकांश से जिलों और अन्य समचार स्रोतों से आने वाली खबरों को संपादित करने के लिए संपादकीय सहयोगियों का पैनल है। इस पैनल में शामिल पत्रकारिता के अनुभवी व योग्य पत्रकार अपनी सेवा अंशकालीन रूप से देते हैं। आज प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना आधुनिक मीडिया को अपनाते हुए डी.टी.एच. सेवा पर भी उपलब्ध है। वर्ष 2005 से डी.टी.एच. पर पटना आकाशवाणी का प्रादेशिक समाचार बुलेटिनों का प्रसारण शुरू हुआ। साथ ही पटना के प्रादेशिक समाचार बुलेटिनों को वर्ष 2007 से आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग के वेब साइट डब्लू डब्लू डब्लू डाट न्यूजआनएआईआर डाट एनआईसी डाट इन और डब्लू डब्लू डब्लू डाट न्यूजआनएआईआर डाट काम पर दिया जाने लगा है। इससे दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति वेब साइट खोलकर आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार बुलेटिनों को पढ़ और सुन भी सकता है।

आकाशवाणी पटना का प्रादेशिक समाचार एकांश, बिहार के सुदूर गांव-देहात या यों कहे कि अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साम्प्रदायिक सौहार्द्र, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक खबरों को पूरी ईमानदारी तथा सत्य निष्ठापूर्वक पहुंचा रहा है। बिहार के गांवों में समाचार का एक मात्र साधन रेडियो ही है। रेडियो की धूम कल भी थी और आज भी है। खासकर चैपाल और प्रादेशिक समाचार सुनने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। शाम 7.30 बजते ही गांव घर के चैपाल व दलानों पर रेडियो से प्रादेशिक समाचार बुलेटिन की गूंज सुनाई पड़ने लगती है।

लेखक संजय कुमार आकाशवाणी, पटना में न्यूज एडिटर हैं. उपरोक्त आलेख उनकी किताब 'आकाशवाणी समाचार की दुनिया' से लेकर प्रकाशित किया गया है.

लखनऊ के बड़े अखबारों की छोटे दिल की पत्रकारिता

: सीएम अखिलेश यादव ने किया प्रो. नीशीथ राय को सम्‍मानित, अखबारों ने नहीं प्रकाशित की खबर : लखनऊ : पत्रकारिता का इतना अधिक पतन का दौर चल रहा है कि अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है. यहां के तथाकथित बड़े अखबार दिल के कितने छोटे हैं इसका अंदाजा बहुत आसानी से लगाया जा सकता है. लखनऊ की पत्रकारिता में एक परिपाटी चल रही है कि अगर किसी कार्यक्रम में अखबार या चैनल का कोई बड़ा अधिकारी शामिल होता है तो दूसरे अखबार उसका नाम व फोटो नहीं छापते हैं चाहे उसकी भूमिका कितनी भी महत्‍वपूर्ण क्‍यों ना हो.

लखनऊ में शुक्रवार को भी ऐसा ही हुआ. लखनऊ का फोटो जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन ने 'द महाकुंभ' नाम से एक फोटो प्रदर्शनी का आयोजन किया था. इसका उद्धघाटन में सीएम अखिलेश यादव ने किया. इस कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री आजम खान, राजेंद्र चौधरी के साथ डीएनए के चेयरमैन प्रो. नीशीथ राय भी आमंत्रित थे. इस कार्यक्रम में सीएम ने प्रो. नीशीथ राय को सम्‍मानित किया. यह सम्‍मान उनके पत्रकारिता से इतर पठन-पाठन समेत अन्‍य सामाजिक गतिविधियों के लिए दिया गया.

प्रो. नीशीथ राय की पहचान, एक अखबार के चेयरमैन के अलावा एक शिक्षाविद् की भी है, लिहाजा उनको तमाम सामाजिक योगदानों को ध्‍यान में रखकर सम्‍मानित किया गया. परंतु खुद को बड़ा अखबार कहने वाले संस्‍थानों का दिल कितना छोटा है कि दैनिक जागरण और अमर उजाला ने उनका नाम तक प्रकाशित नहीं किया, जबकि हिंदुस्‍तान ने नाम ही गलत छाप दिया. ऐसा इसके पहले भी हो चुका है. जिस कार्यक्रम को प्रो. नीशीथ राय की अध्‍यक्षता वाली केंद्रीय संस्‍था ने सूडा के साथ मिलकर उत्‍तर प्रदेश की नगर पालिका, नगर परिषदों तथा पंचायत अध्‍यक्षों का सम्‍मेलन लखनऊ में आयोजित किया था, उसमें भी उनका नाम प्रकाशित करना बड़े अखबारों ने जरूरी नहीं समझा. पत्रकारिता का यही घटिया स्‍तर है लखनऊ में.

यहां की महिला पत्रकार रहना चाहती हैं न्‍यूड

रियो डी जेनेरियो। आपने लोगों द्वारा कई मांगों के लिए आन्दोलन करते हुए देखा होगा, लेकिन क्या कभी महिलाओं द्वारा टॉपलैस रहने के लिए आन्दोलन करते हुए देखा या सुना है! लेकिन इस दुनिया में एक जगह ऐसी भी हैं जहां की आम महिलाएं नहीं बल्कि महिला पत्रकारों ने टॉलपैस रहने के लिए आन्दोलन कर दिया। इन बिन्दास महिला पत्रकार/फोटो जर्नलिस्ट का कहना है कि वो टॉपलैस होकर सड़कों पर घूमना चाहती हैं।

ये कोई एक दो नहीं बल्कि सैंकड़ों महिला पत्रकार/फोटो जर्नलिस्ट हैं, जो अपने काम के दौरान टॉपलैस रहना चाहती हैं। इसके लिए इन बिन्दास महिलाओं ने बकायदा टॉललैस होकर जबरदस्त आन्दोलन भी किया। दरअसल यह घटना ब्राजील की है, जहां एक महिला फोटो जर्नलिस्ट न्यूड होकर सड़क पर खड़ी हो गई तथा टॉपलैस रहने के लिए वहां की सरकार के खिलाफ आन्दोलन कर दिया।

ब्राजील की फोटो जर्नलिस्ट्स में टॉपलैस होकर रहने का इतना क्रेज है इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ ही देर में इस महिला के आन्दोलन में सैंकड़ों महिलाएं टॉपलैस होकर शामिल हो गई। इतना ही नहीं बल्कि इनके आन्दोलन में पुरूषों ने भी शामिल होते हुए समर्थन दिया। हालांकि ब्राजील के कानून के मुताबिक वहां पर ऎसा करना दण्डनीय अपराध है, और इस महिला को जेल भेज दिया। ब्राजील में ऎसा करने वालों को तीन महीने से लेकर एक साल की जेल या भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। (पत्रिका)

पत्रकार प्रभाकरण की रिहाई के लिए भारत में उठने लगी आवाज

चेन्नई। श्रीलंका में एक तमिल पत्रकार की गिरफ्तारी का भारत में विरोध तेज हो रहा है। तमिलनाडु की पालिटिकल पार्टियां और पत्रकार संघों ने शुक्रवार को पत्रकार की रिहाई के लिए केंद्र से हस्तक्षेप करने की मांग की है। एमडीएमके नेता वाइको ने गुरुवार को गिरफ्तार तमिलनाडु के पत्रकार की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित कराने के लिए पीएम मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर गु‍जारिश की है।

वाइको ने पीएम को लिखे पत्र में कहा है कि प्रभाकरण एक पत्रकार हैं, जिन्हें गिरफ्तार किया गया है। वह 25 दिसंबर को वहां पर्यटक वीजा पर गए थे। प्रभाकरण, श्रीलंकाई तमिल सांसद श्रीथरन व उत्तार प्रांतीय परिषद के निर्वाचित सदस्य पशुपति पिल्लई के साथ तमिल गांव पोन्नाविली का दौरा करने गए थे। दूसरी तरफ चेन्नई प्रेस क्लब और चेन्नई यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने विदेश मंत्रालय को लिखे पत्र में कहा है कि प्रभाकरण ने श्रीलंकाई तमिलों की स्थिति पर एक तमिल पत्रिका में कई लेख लिखे थे, बाद में उन पर आधारित एक किताब भी प्रकाशित हुई। लिहाजा प्रभाकरण की रिहाई सुनिश्चित कराई जाए।

दिल का दौरा पड़ने से अभिनेता फारुख शेख का दुबई में निधन

दुबई : बाजार', 'गर्म हवा', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'चश्मे बददूर' और 'किसी से ना कहना' जैसी फिल्मों में यादगार अभिनय के लिए जाने जाने वाले अभिनेता फारूक शेख का दिल का दौरा पड़ने से यहां निधन हो गया। वह 65 वर्ष के थे। उनके परिवार के एक सदस्य ने कहा कि उनका निधन हो गया। हालांकि उन्होंने और ज्यादा जानकारी नहीं दी। फारूक एक समारोह में हिस्सा लेने के लिए दुबई गए थे जब शुक्रवार देर रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा।

दुबई में औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उनका शव आज मुंबई लाया जाएगा। फारूक ने रंगमंच, फिल्मों और टीवी में बेहतरीन योगदान दिया। उन्होंने 'गर्म हवा' के साथ बॉलीवुड में पदार्पण किया था और 'बाजार', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'चश्मे बददूर', 'किसी से ना कहना' तथा 'नूरी' जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभायीं। उनकी आखिरी फिल्म 'क्लब 60' थी। इससे पहले इस साल आई फिल्म 'ये जवानी है दीवानी' में वह अभिनेता रणबीर कपूर के पिता के किरदार में दिखे थे।
   
फारूक ने जीटीवी के मशहूर कार्यक्रम 'जीना इसी का नाम है' की मेजबानी भी की जिसमें उन्होंने बॉलीवुड की कई जानी मानी हस्तियों का साक्षात्कार लिया।उन्होंने कई सीरियल और टेलिवजन शो में भी काम किया। उन्होंने टीवी शो तुम्हारी अम्रिता (1992) में काम किया। वे ज़ी टीवी के फेमस शो 'जीना इसी का नाम है' के एंकर थे। उन्हें 2010 में बेस्ट सपोटिंग अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया।

फारूक शेख का जन्म 25 मार्च 1948 में मंबई के एक वकील मुस्तफ़ा शेख और फ़रिदा शेख के घर गुजरात के अमरोली में हुआ था। वे अभिनेता ही नहीं समाज सेवी और टेलीवजन एंकर भी रहे हैं। वे 70 और 80 के दशक में फिल्लों में फेमस रहे हैं। वो सत्यजित राय और ऋषिकेश मुखर्जी की तरह निदेशन का कार्य भी कर चुके हैं। उनके परिवार वाले जमीनदार थे और उनका पालन पालन शानदार परिवेश में हुआ। वो अपने पांच भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनकी स्कूली शिक्षा सेंट मैरी स्कूल मुंबई में और बाद में सेंट जेवियर्स कॉलेज में हुई। उन्होंने कनून की पढ़ाई सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ लॉ में पूर्ण की।

जब भाजपाइयों को टिकट दिलाने की सुनहरी यादों में डूबे प्रकांड ‘पंडित’ पत्रकार

कहा जाता है कि सियार कितना भी शेर का खाल ओढ़े रहे अपने लोगों की भीड़ देखकर कर हुंआ…हुंआ करने ही लगता है. लखनऊ में भी ऐसा ही हुआ. अपने का प्रकांड 'पंडित' समझने वाले एक पत्रकार, जो अपने समूह की अठारह यूनिटों की इंटरनल रेटिंग में सबसे फिसड्डी वाले में कार्यरत हैं और उजाला फैलाते रहते हैं, शेखी मारने के चक्‍कर में कबूल कर लिया कि वे सन 91 से भाजपा वालों को टिकट दिलाने का काम कर रहे हैं. अब इस टिकट दिलाने की आड़ में वे क्‍या प्राप्‍त करते हैं नहीं बताया, पर जाने-अनजाने भाजपाइयों की भीड़ में कबूल डाला कि वे लोकसभा से लेकर सभासद तक का टिकट भाजपा में दिलवाने में, जुगाड़ करवाने में शामिल रहते हैं.

शुक्रवार को मौका था एक भाजपा नेता के यहां भोजन का. हमेशा की तरह यह पत्रकार अपने एक लटकन पत्रकार के साथ पहुंचे थे. अगर इस लटकन पत्रकार को कहीं ढूंढना हो तो बातों से उजाला फैलाने वाले प्रकांड 'पंडित' पत्रकार को खोज लीजिए, लटका मिल जाएगा. खैर, बात हो रही थी भाजपा में टिकट दिलाने वाले इस प्रकांड 'पंडित' पत्रकार की. युवा भाजपाइयों की भीड़ देखकर इनसे रहा नहीं गया. सुनाने लगे सन 91 की कहानी. बताया कि कैसे बिना पैसे के लोगों को भाजपा टिकट नहीं देती है. यानी ऐसे कह सकते हैं कि बिना पैसे वालों की भाजपा तथा उनकी नजरों में कोई कीमत नहीं.  

उन्‍होंने बताया कि एक भाजपाई तिवारी जी के साथ वे दिल्‍ली के अशोका रोड स्थित भाजपा कार्यालय में केएन गोविंदाचार्य के पास पहुंचे थे. गोविंदाचार्य ने माना कि तिवारी जी अच्‍छे कार्यकर्ता हैं लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है और वो जिस सीट के लिए टिकट मांग रहे हैं, उस पर जीत पाना उनके लिए संभव नहीं है. पत्रकार महोदय ने आगे बताया कि तिवारी जी को अटल जी ने दूसरी सीट से लड़ने को कहा, लेकिन तिवारी जी कुछ लोगों के बहकावे में आकर उसी सीट से लड़ने की जिद कर बैठे. नतीजा यह रहा कि 'बाजपेयी' जी तिवारी जी को सीट नहीं दिलवा पाए.     

इसी बीच एक भाजपाई ने चर्चा कर दी कि एक सभासद की सीट पत्रकार महोदय ने ही भाजपा के टिकट पर पक्‍की कराई थी. हालांकि भाजपाई वहां एक और पत्रकार से 'सामना' होते ही उनका पांव छूने लगते थे. प्रकांड 'पंडित' पत्रकार को यह रास नहीं आ रहा था. इसी कड़ी में खुद को बड़ा दिखाने के चक्‍कर में सन 91 की कहानी सुना डाली. वैसे कहा जाता है कि किसी दौर में भाजपा में तीन चार कथित पत्रकारों का बोलबाला माना जाता था. यहां तक कि लोकनिर्माण विभाग में तबादलों की लिस्‍ट भी इन्‍हीं तीन-चार लोगों के तय करने पर तैयार होती थी.

बीते 'कल' में 'राज' था इन पत्रकारों का. इन लोगों का बड़ा 'पाठक' वर्ग था. बताते हैं कि अखबार के 'पाठक' के बिना बीते 'कल' के 'राज' में लोकनिर्माण विभाग का पत्‍ता तक नहीं हिलता था. भाजपा कार्यालय में ही लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों से लेकर बड़े-छोटे अधिकारियों का ट्रांसफर तथा पोस्टिंग की लिस्‍ट तय की जाती थी. अब कहने की जरूरत नहीं है कि इसकी आड़ में कितने वारे न्‍यारे होते होंगे. पर जब भाजपा का दुर्दिन आ गया तो ये बड़े पत्रकार भी हाशिए पर आ गए. कुछ इधर गिरे कुछ उधर गिरे. कुछ दूसरी तरफ 'उजाला' फैलाने लगे.

इसी दौर में इस कॉकस का 'सामना' कुछ दूसरे पत्रकारों से हुआ और इन लोगों के सुनहरे दिन खतम होने लगे. लिहाजा सुनहरे दिन के सहारे नए भाजपाइयों को आकर्षित करने के लिए 91 की कहानियां जगह-जगह सुनाते फिर रहे हैं ताकि नए जमाने में 'जिंदा' रह सकें. हालांकि प्रकांड 'पंडित' पत्रकार सुनहरे दिन की और कहानी सुनाकर भाजपाइयों को अपनी ताकत जताने का प्रयास करते लेकिन इसी बीच लटकन पत्रकार का 'धीरज' जवाब देने लगा और 'बाजपेयी' जी वाली कहानी आधी-अधूरी ही रह गई. (कानाफूसी)

‘पत्रकारिता कोश 2014’ के प्रकाशन हेतु नामों का संकलन

मुंबई।। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी "पत्रकारिता कोश" के 14वें अंक का प्रकाशन फरवरी 2014 में होगा। लगभग 1000 पृष्ठों पर आधारित इस बहुपयोगी पत्रिका के प्रकाशन के लिए मुंबई सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्रकाशित होने वाले विविध भाषाओं के समाचारपत्र – पत्रिकाओं, समाचार चैनलों आदि के साथ-साथ उनमें कार्यरत लेखक – पत्रकारों, कवि, साहित्यकारों, स्वतंत्र पत्रकारों, प्रेस फोटोग्राफरों, कैमरामैनों, प्रेस संगठनों, फीचर एजेंसियों, पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों, आदि के नाम व पते संकलित किए जाने का कार्य तेज गति से चल रहा है।
 
"पत्रकारिता कोश" में नाम दर्ज कराने हेतु समाचारपत्र-पत्रिकाओं, चैनलों, वेबसाइटों, आदि का संपूर्ण विवरण संपादक, पत्रकारिता कोश, भारत पब्लिकेशन, प्लॉट नं. 4-जे-7, कोंकण बैंक के सामने, शिवाजी नगर, गोवंडी, मुंबई- 400043 (महाराष्ट्र)  के पते पर  अथवा ईमेल- aaftaby2k@gmail.com पर 25 जनवरी, 2014 तक निश्चित रुप से भेज सकते हैं।
जिससे उनका नाम "पत्रकारिता कोश" के नए संस्करण में शामिल किया जा सके। अधिक जानकारी पाने के लिए मोबाइल नंबर पर कॉल कर सकते हैं- 9224169416, 9820120912, 9769952135.
 
(आफताब आलम)
संपादक

चिरेका के पीआरओ ने दे डाली पत्रकारो को धमकी…

देश में पत्रकार कितने असुरक्षित है इसको लेकर आए दिन नए-नए मामले सामने आते रहते है। ऐसा ही एक नया मामला पश्चिम बंगाल में सामने आया है जहां पत्रकारों को धमकाया गया है। यहां चित्तरंजन रेल इंजन कारखाना (चिरेका) के जन संपर्क अधिकारी मंतर सिंह ने पत्रकारो को धमकाया है।
चित्तरंजन (पश्चिम बंगाल) चिरेका महाप्रबंधक कार्यालय के समक्ष २३ दिसंबर से आमरण अनशन पर बैठे है हिंदी अखबार इस अनशन का खूब कवरेज दे रहे है इससे चिरेका के जन संपर्क अधिकारी मंतर सिंह बौखलाए हुए है गुरुवार को इंटक के शीर्ष नेता को गेस्ट हाउस बुक नहीं करने का विरोध करते हुए इंटक प्रतिनिधि चिरेका के उप महाप्रबंधक सह मुख्य जन संपर्क अधिकारी रमेश मौर्या का घेराव करने पहुंचे इस दौरान मीडिया कर्मियों को देख कर मंतर सिंह को रहा नहीं गया और कहा कि बिना मुझसे पूछे न्यूज करोगे तो चित्तरंजन में घुसना मुश्किल कर देंगे। 

कुमारी शैलजा बोली रॉबर्ट वाडरा प्रॉपर्टी मामला मीडिया की रचना

अंबाला।। केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा ने रॉबर्ट वाडरा प्रॉपर्टी मामले को मीडिया की रचना करार दिया दिया। कुमारी शैलजा ने कहा कि अब मीडि‍या खुद के द्वारा तैयार किए गए इस मामले पर कब विराम लगाना चाहता है।
शैलजा ने ये बेतुका बयान गुरुवार को अपने अंबाला निवास पर दिया। कुमारी शैलजा अंबाला से सांसद है और आगामी चुनाव के चलते उन्हें पत्रकारो की याद आई तो उन्होंने पत्रकारो को भोज का न्योता दिया था।
 
भोज से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब मीडिया ने सवाल उठाया कि रॉबर्ट वाडरा के मामले ने हरियाणा में कांग्रेस को किस सीमा तक प्रभावित किया है और आगामी चुनाव तक क्‍या पार्टी इस मामले में अपना पक्ष स्‍पष्‍ट कर पाएगी क्‍योंकि खेमका के दोबारा से मुखर होने पर मामला फिर जीवित हो उठा है। इस सवाल का जवाब देते हुए शैलजा ने कहा कि जो चीज सिर्फ मीडि‍या ने बनाई, भला उसके बारे में वो क्‍या कह सकती हैं।
शैलजा के इस बेतुके जवाब से जमीर वाले पत्रकारों ने सवाल उठाया मैडम ऐसे आप इस मामले को मीडिया जनित मामला कैसे कह सकती हैं। बस इस पर शैलजा खूब हंसी।
उधर शैलजा के लंच की बात सुनकर बुजुर्ग और न के बराबर पत्रकारिता करने वाले तथाकथित पत्रकार भी पहुंचे। न के बराबर से भाव ये कि जो अब बूढ़े हो गए हैं और इतने बूढ़े की चला तक नहीं जाता, बस नाम के लिए थोड़ा किसी अखबारों का तमगा लिए घूमते हैं।
फिर कइयों की तो खुशी का ठिकाना नहीं था, क्‍योंकि पत्रकारों को चुनाव से पहले राजी करने के लिए मैडम शैलजा खुद पत्रकारों के साथ खाना खाने बैठी। ऐसा पहले तो होता न था।
अंबाला के एक पत्रकार द्वारा भेजी गयी खबर

‘जी न्यूज’ का स्टिंग उर्फ कुकुरमुत्ते की तरह उग आये स्टिंगबाजों पर ही सवाल

पंकज कुमार झा : अभी 'जी न्यूज़' का स्टिंग देख रहा हूँ. सवाल किस दल का फ़ायदा या नुकसान करने वाला कौन सा स्टिंग है, इसका नहीं है. सवाल कुकुरमुत्ते की तरह उग आये स्टिंगबाजों का है. टीआरपी की लड़ाई में सारी राजनीति को गंदा किया जा रहा है. इस स्टिंग में भी कह कर ये बात बताया जा रहा है की छाप मत दीजिएगा. फिर भी इस तरह से दिखाने की प्रवृत्ति निंदनीय है.

नेताओं और पत्रकारों में एक भरोसे का रिश्ता रहा है. प्रधानमंत्री तक के भरोसेमंद कई पत्रकारों ने उनके दिवंगत होने के बाद कई ऐसी चीज़ों को सामने लाने का काम किया, किताबें लिखी जिससे इतिहास का पता चला. यह ठीक भी था. लेकिन इस तरह चीज़ों को सामने लाना बेहद खतरनाक है. फ़ायदा-नुकसान की परवाह किये बिना राजनीति को चाहिए की इस जहरीले विधा पर लगाम लगाने की जुगत भिडाये.

तेजपाल पर लडकी के साथ बलात्कार का अपराध तो अब कायम हुआ है लेकिन उसने समूची पत्रकारिता का बलात्कार करते रहने की कुप्रथा को कायम किया. इसका प्रतिरोध कीजिये भाई. कम से कम स्टिंग करने के लिए कोई अपराध/बयान प्रायोजित न हो उसके लिए कोशिश कीजिये सब मिलकर.

पत्रकार और भाजपा नेता पंकज झा के फेसबुक वॉल से.

जो व्यक्ति 27 टीवी चैनलों का मालिक है, उसके बेटे के खिलाफ खबर क्यों नहीं चली, क्या अब यह बताने की जरूरत है?

Krishna Kant : कुछ मित्र पूछ रहे हैं कि अंबानी के बेटे ने दो को अपनी महंगी कार से कुचल दिया तो मीडिया ने यह खबर क्यों नहीं चलाई? क्या आपको मालूम है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के पास इंफोटेल के 95 प्रतिशत शेयर हैं. इंफोटेल एक टेलीविजन संकाय (कंजोर्टियम) है जिसका 27 टीवी समाचार और मनोरंजन चैनलों पर नियंत्रण है… इनमें नेटवर्क18 के सभी चैनल (सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन लाइव, सीएनबीसी, आईबीएन लोकमत और लगभग हर क्षेत्रीय भाषा का ईटीवी) शामिल है.

इंफोटेल के पास फोर-जी ब्रॉडबैंड का इकलौता अखिल भारतीय लाइसेंस है; फोर-जी ब्रॉडबैंड 'तीव्रगति सूचना संपर्क व्यवस्था (पाइप लाइन)' है जो, भविष्य का सूचना एक्सचेंज साबित हो सकती है. अन्य जितने भी बड़े चैनल हैं, वे सब कॉरपोरेट की गिरफ्त में हैं. टाइम्स आफ इंडिया और नवभारत टाइम्स अखबार तथा टाइम्स नाउ चैनल चलाने वाले बेनेट एंड कोलमैन समूह के विनीत जैन ने एक साल पहले द न्यू यॉर्कर के एक पत्रकार को बताया था कि हमारा अखबार का व्यवसाय नहीं है, हमारा विज्ञापन का व्यवसाय है.

हाल ही में ओपेन पत्रिका ने एक लेख छापा कि नेटवर्क18 के सभी चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों को निर्देश है कि वे मोदी के खिलाफ नर्म रुख रखें और उनकी रैलियां बिना काट छांट के लाइव प्रसारित करें. अब यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि पूरे कॉरपोरेट और राजनीति में नायाब गठबंधन है. चैनलों की बागडोर कॉरपोरेट के हाथ में है और मीडिया में क्या दिखाया जाना है, यह वहीं से तय होता है. पत्रकारों को उसी मामले में छूट है, जिनसे कॉरपोरेट का कोई व्यावसायिक हित न जुड़ा हो. मीडिया और बड़े व्यवसायों के बीच की विभाजक रेखा खतरनाक ढंग से धुंधला चुकी है. जो व्यक्ति 27 टीवी चैनलों का करीब-करीब मालिक है, उसके बेटे के खिलाफ खबर क्यों नहीं चली, क्या अब यह बताने की जरूरत है?

चौथी दुनिया अखबार में चीफ सब एडिटर के रूप में कार्यरत कृष्ण कांत के फेसबुक वॉल से.

युवा पत्रकार अभिषेक सिंह के उपन्यास ‘फरेब’ का हुआ विमोचन

ग्रेटर नोएडा।।  प्रख्यात साहित्यकार पद्म भूषण डॉ. गोपालदास नीरज ने ग्रेटर नोएडा के जीएल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एवं टेक्नोलॉजी में युवा पत्रकार और उभरते साहित्यकार अभिषेक सिंह कश्यप के उपन्यास 'फरेब' का विमोचन किया। उपन्यास की कहानी देश में झूठ फरेब और भ्रष्टाचार कुचक्र का खुलासा है। विमोचन के मौके पर पत्रकारिता जगत की कई हस्तियां मौजूद रहीं।
देश को भ्रष्टाचार का दीमक दशकों से खोखला कर रहा है। लोग अब इसके इतने आदी हो गए हैं कि समाज में इसे मूक सहमति मिल गई है। आज लालच, झूठ और धोखा व्यक्तिगत व्यवहार हिस्सा बन गया है। दुनिया भर के लिए सामाजिकता की सीख माना जाने वाला भारतीय समाज इसका पर्याय बन गया है। युवा साहित्यकार अभिषेक सिंह कश्यप ने अपने उपन्यास के माध्यम से इन्हीं मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है।उपन्यास विमोचन के मौके पर नीरज जी ने अभिषेक कश्यप के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि एक युवा की ओर इस तरह के विचारों की अभिव्यक्ति परिवर्तन का परिचायक है। 
उन्होंने कहा कि लेखक की सोच निश्चित रूप से लोगों को सोचने को मजबूर करेगी। नीरज जी ने युवाओं से साहित्य के क्षेत्र में बढ़ने की अपील की साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि साहित्य से हृदय का विकास होता है जो किसी भी स्वस्थ समाज के विकास के लिए अनिवार्य है। इस मौके पर इंडिया टीवी के संपादकीय निर्देशक कमर वहीद नकवी ने भी उपन्यास की सराहना की। उन्होंने कहा कि लेखक जिन चीजों को अपने चारो ओर देखता है उसे लोगों के सामाने विचार के लिए परोसता है। इसका असर भी होता है ऐसी ही कृतियों से दुनिया में तमाम परिवर्तन आए हैं। देशबंधु के राजनीतिक संपादक एसएन सिंह देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। बुराईयां किसी भी देश समाज के लिए थोड़े समय तक पांव जमाए रखती है।
 
लेखनी के माध्यम से ही परिवर्तन की शुरूआत होती है। अभिषेक सिंह का उपन्यास निश्तचित रूप से परिवर्तन का वाहक सिद्ध होगा। इस मौके पर नेशनल दुनिया के मुख्य महाप्रबंधक अरूण सिंह, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के उप मुख्यकार्यपालक अधिकारी मानवेंद्र सिंह, जीएल बजाज कॉलेज के वाइस चेयरमैन पंकज अग्रवाल, निर्देशक डॉक्टर राजीव अग्रवाल, डॉक्टर मुकुल गुप्ता, ग्रेटर वैली स्कूल की प्रधानाचार्य पूनम चौबे, डॉ नीरज के निजी सचिव आशीष वार्षणेय , एनआईईटी कॉलेज के डीन डॉ. प्रवीण पचौरी, एनाआईईटी के कुलसचिव आरसी नायक, एचआईएमटी कॉलेज योजना निर्देशक मोहम्मद ऐहतसाम, यूनाईटेड कॉलेज के प्रोफसर पीके भारती, कांग्रेस के जिला प्रवक्ता आलोक सिंह, कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष विक्रम कसाना, सेक्टर बीटा एक के महासचिव हरेंद्र भाटी आदि लोग मौजूद रहे। इस मौके पर देशबंधु के पश्चिमी यूपी प्रभारी देवेंद्र सिंह ने सभी अतिथियों को धन्यवाद व्यक्त किया। विमोचन मंच का संचालन डॉ शशांक अवस्थी ने किया। 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सामुदायिक रेडियो को 50 फीसदी वित्तीय सहायता देने की घोषणा

नई दिल्ली।। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (एमआईबी) ने भारत में नए और मौजूदा सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से मंत्रालय की तरफ से' सामुदायिक रेडियो सहायता योजना ' नामक एक नई योजना शुरू की है . सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से ये योजना नए उद्यम में 12 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत शुरू की गई है .
 
इस योजना के तहत मंत्रालय सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के लिए ' उपकरण अधिग्रहण ' पर कुल अनुमानित व्यय 50 फीसदी की अधिकतम सहायता प्रदान करेगा . हालांकि, इस वित्तीय सहायता के लिए अधिकतम राशी सीमा 7.50 लाख रुपये रखी गयी है।
 
शॉर्ट लिस्टिंग उपकरणों के मुद्दों से निपटने के लिए, एमआईबी पूर्व इंजीनियर इन चीफ , ऑल इंडिया रेडियो , वीके सिंगला की अध्यक्षता में एक तकनीकी समिति का गठन किया गया है . आई बी के तहत यह सरकारी तकनीकी समिति इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग , डब्ल्यूपीसी विंग , परिचालन सामुदायिक रेडियो स्टेशनों , सामुदायिक रेडियो संगठनों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से सदस्यों के होते हैं .
 
विस्तृत चर्चा और परिचालन स्टेशनों का दौरा करने के बाद समिति कम एक सामुदायिक रेडियो स्टेशन के संचालन के लिए आवश्यक उपकरणों सूचीबद्ध किया गया है और यह भी हर चुने उपकरण के लिए कुछ खास बेंच के निशान से नीचे रखा गया है .
 
इसके अलावा , समिति ने सार्वजनिक क्षेत्र में विनिर्देशों / मानक के साथ चुने उपकरण के लिए एक प्रस्ताव भेजा गया है जो कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की सुविधा के लिए हितधारकों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए किया जाता है .
 

AMU में हुआ राष्ट्रपति कार्यक्रम, मीडियकर्मियों ने की शिकायत चहेते मीडियकर्मियों को दिए गए पास

अलीगढ़।। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (अमुवि) में शुक्रवार को आयोजित हुए 37वीं इंडियन सोशल साइंस कांग्रेस के उद्घाटन समारोह के कवरेज पास अमुवि के जन संपर्क विभाग ने चंद चहेते पत्रकारो को ही प्रदान किये. इस उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शिरकत की थी. 
जिन मीडियाकर्मियों को अमुवि जन संपर्क विभाग ने पास जारी नहीं किये उन्होंने विश्व विद्यालय के कुलपति से मामले की लिखित शिकायत की है. शिकायत करने वाले पत्रकारो का आरोप है कि जन संपर्क विभाग प्रभारी ने अपने चहेते पत्रकारो को पास जारी किये  इसके आलावा कुछ विश्व विद्यालय कर्मियो को भी जन संपर्क विभाग ने पत्रकार वाले पास जारी कर दिए. जिससे पत्रकारो को पास नहीं मिल सके. 
जिसके कारण कई बड़े न्यूज चैनलो के स्ट्रिंगरो समेत समाचार पत्रों के प्रतिनिधियो को परेशानी झेलनी पड़ी. नाराज मीडियाकर्मिओं ने अमुवि पीआरओ की लिखित शिकायत की है. वही इस पूरे मामले में पीआरओ का कहना है कि राष्ट्रपति का कार्यक्रम केनेडी हाल में था जिसमे बैठने की जगह कम थी जिसके कारण सीमित पत्रकारो को बुलाया गया था. लेकिन सवाल यह उठता है कि महज मीडियाकर्मियो के लिए सीटे कम थी. अगर सीटे कम थी तो चहेते पत्रकारो को देर शाम पास कैसे जारी हो गए ? 

देवरिया संगोष्ठी की कथा-गाथा : प्रारंभ से प्रारब्ध तक : कुछ सीखा, कुछ सिखा गए…

17 नवंबर को दिल्ली के कॉफी हाउस दिल्ली में कुछ लोग यूँ ही बैठ लिए और तय कर लिए कि आगामी २१ दिसंबर को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में नया मीडिया मंच के बैनर तले नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा. हालाकि इससे पहले अनौपचारिक तौर पर एक बार इसी मुद्दे पर प्रवीन शुक्ल, संजीव सिन्हा, सौरभ मालवीय और मै पहले भी बैठ चुके थे. लेकिन इस बैठक में सर्व सम्मति से कार्यक्रम के संयोजक के तौर पर प्रवीण शुक्ल पृथक एवं सह-संयोजक के तौर पर शिवानन्द द्विवेदी सहर (यानी मेरा) नाम तय किया गया.

बैठक में कार्यक्रम के संरक्षक के तौर पर डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी का नाम प्रस्तावित किया गया जिसे सभी लोगों ने मान लिया. बैठक में सबकुछ तय होने के बाद अब नया मीडिया एवं सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार-प्रसार की शुरुआत मैंने अपने फेसबुक वाल से शुरू की. तमाम लोग जो शुरू में कार्यक्रम की योजना से उत्साहित होकर कॉफी हाउस की बैठक में आयोजन के साथ जुड़े, अंत तक जुड़े रहे. तमाम ऐसे भी लोग थे जो जुड़े तो जोश के साथ लेकिन मझधार में अपनी मजबूरियों की भेंट चढ़ते हुए अलग  हो गए. सवाल अतिथितियों का था, सों दिल्ली से मै आगे आया और चर्चा बढ़ाया.


भाषण का वीडियो देखें.. क्लिक करें… https://www.youtube.com/watch?v=X1_Swl3BUPc


अतिथि वक्ता के तौर पर श्री अमिताभ ठाकुर (आईजी), प्रो. रामदेव शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री पंकज झा, श्री संजीव सिन्हा, श्री यशवंत सिंह से आने का अनुरोध खुद मैंने किया. वहीँ भोपाल से डॉ श्रीकांत सिंह का प्रोग्राम डॉ सौरभ मालवीय ने तय कराया. हालाकि इनसे भी मेरी बात हुई थी. देवरिया की माटी से जुड़े पाँच गणमान्यो को सम्मानित कराये जाने की योजना कॉफी हाउस बैठक में तय हुई थी सों तमाम लोगों से पूछ कर, जांच कर श्री संजय मिश्र (दैनिक जागरण), डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती (सहारा), डॉ सौरभ मालवीय, श्री राजीव यादव (हिन्दुस्तान) के नामों का चयन किया गया था. चयनित नामो की घोषणा भी की गयी बाद में.

इस कार्यक्रम को लेकर मेरा सुझाव था कि यह कार्यक्रम बिना प्रायोजक के किया जाय और क्षेत्रीय लोगों से चंदा इकठ्ठा करके किया जाय. कई लोग इस फार्मूले को नकार भी दिये थे लेकिन मैं कायम रहा. धन जुटाना वो भी दिल्ली में बैठकर देवरिया के लोगों से, किसी लोहे चने चबाने से कम न तब था और न आज है, ये बात मैं हाल ही में मिले निजी अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ. खैर, मैं इसी फार्मूले पर चला. मैंने धन जुटाने के लिए तमाम लोगों से संपर्क किया और तमाम लोगों ने स्वीकृति भी. ये अलग बात है कि कार्यक्रम के दिन ११ बजे तक मेरे हाथ में किसी भी स्थानीय द्वारा जुटाया गया एक रुपया भी नहीं आया था.

इस दौरान दिल्ली में रहकर मैंने निजी प्रयास किया था जिसमें सिंगापुर से चुन्नू सिंगापुरी जी द्वारा तीन हजार और आशुतोष कुमार द्वारा एक हजार, मतलब चार हजार का सहयोग मिल सका था. लेकिन बताना चाहूँगा कि मेरे स्थिति को कुछ अतिथि भांप गए थे जिसमे श्री पंकज झा और श्री पंकज चतुर्वेदी, भाई आशुतोष सिंह सहित डॉ धीरेन्द्र मिश्र एवं अलका सिंह जी का नाम ले रहा हूँ. श्री पंकज झा जी ने अपने खर्चे से आने का वादा कर मुझे राहत दिया तो वहीँ पंकज चतुर्वेदी जी ने अपना टिकट खुद कराया (मेरे द्वारा कराया गया टिकट कैंसल कराकर). तमाम उतार-चढाव के साथ कार्यक्रम की तारीख नजदीक आई और १८ की शाम वैशाली से मैं निकल गया देवरिया के लिए. बताता चलूँ कि देवरिया में सतह पर जो लोग इस आयोजन के लिए लगे हुए थे उनमे श्री रामकुमार सिंह (दैनिक जागरण), विद्यानंद पाण्डेय, श्री दिलीप मल्ल, रामदास मिश्र, संतोष उपाध्याय, अभिनव पाठक,कपीन्द्र मिश्र, राहुल तिवारी, आदर्श तिवारी, श्री नवनीत मालवीय सहित तमाम अन्य लोगों के नाम प्रमुख हैं. इनके सहयोग से कार्यक्रम अपनी सफलता तक पहुंचा.

खैर, वो तारीख भी आई जब मैं १९ तारीख को देवरिया पहुंचा. स्टेशन उतरते ही वहाँ रामकुमार सिंह और विद्द्यानंद पाण्डेय अपनी बोलेरो और आदर्श अपनी बाइक लेकर आये थे. रामकुमार सिंह और विद्यानंद के साथ मिलकर मैंने कार्यक्रम से सम्बन्धी होटल-अतिथि आवास, फुल-माला, माइक-साउंड, फोटो-फ्रेमिंग, आदि का ऑर्डर किया. स्मृति-चिन्ह और बैनर तो मैं खुद दिल्ली से ले गया था. अंतिम लड़ाई २० तारीख की सुबह की थी. बीस की सुबह मै अकेला ही घर से निकला लेकिन तभी आदर्श भी साथ आ लिए. हम लोग निमंत्रण-पत्र वितरण से लेकर, दो सौ लोगों के नाश्ते पानी तक के इन्तजामो में लग गए (बता दूँ कि अभी तक कुछ भी हुआ नहीं था). शाम तक बिना रुके काम करने के बाद ये भी हो गया.

अब मेरा ध्यान दिल्ली की तरफ गया. शाम ४:५० पर दिल्ली स्टेशन से पूर्बिया एक्सप्रेस में शंभूनाथ जी, पंकज चतुर्वेदी जी, पृथक जी, धीरेन्द्र जी, उमेश जी, यशवंत जी, जनार्दन जी, अलका जी, संजीव जी, उमेश चतुर्वेदी जी का टिकट था. कुल आठ अतिथियों का आगमन एक ही ट्रेन से दिल्ली से होना था. हालाकि पंकज झा जी और डॉ श्रीकांत सिंह जी एकदिन पूर्व ही देवरिया एवं गोरखपुर पहुच चुके थे. अपने दो महत्वपूर्ण अतिथियों की उपस्थिति मेरे आत्मबल को बढ़ा रही थी. शाम चार बजे के बाद उमेश चतुर्वेदी जी का फोन आता है कि यह ट्रेन कई घंटे लेट हो सकती है और फिलहाल दो घंटे लेट है.

रेलिया बैरन… : इंतहा हो गई इंतजार की… : शंभूनाथ जी, पंकज चतुर्वेदी जी, पृथक जी दिल्ली स्टेशन पर इंतजार करते करते जब थक गए तो घर लौट गए…


यह खबर मेरे माथे के बल पहाड़ का भार लेकर पडी. पूरे कार्यक्रम के लगभग सभी अतिथि उसी ट्रेन से आने वाले थे. पृथक जी और शंभूनाथ जी स्टेशन पहुंचे फिर पंकज चतुर्वेदी जी और अलका सिंह जी पहुंचे. धीरेन्द्र मिश्र का फोन आया कि वो भी स्टेशन पहुंच चुके हैं. यहाँ दिल्ली से सबके फोन आने शुरू हुए और मेरी धड़कनें बढ़नी शुरू हुई. ऐसा होना लाजिमी था क्योंकि कल कार्यक्रम और आज अतिथियों का आना ही संशय में. इसके अलावा कई सूत्रों से यह खबर भी आ रही थी कि देवरिया के तमाम पत्रकार संगठनों द्वारा इस कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया गया है. इस बहिष्कार की वजह मेरी समझ से बाहर थी लेकिन लोगों की माने तो शायद यही वजह थी कि उनके जमे-जमाये मठ में यह शिवानन्द सहर और नया मीडिया मंच जैसी चीजें उनकी इजाजत के बिना कैसे आ गयी हैं.

मैं कार्यक्रम में आने का निमंत्रण देने के लिए जिलाधिकारी देवरिया श्री मनिप्रसाद मिश्र से रात आठ बजे मिला. हालाकि वो कार्यक्रम में जाने क्यों स्वीकृति के बावजूद नहीं आये. जिलाधिकारी महोदय के न आने की बात एक दिन पहले ही मुझे तब स्थानीय लोग बता दिये थे जब मैं उनसे (जिलाधिकारी) निमंत्रण के लिए मिलने जा रहा था. लोगों ने मुझसे कहा कि जिलाधिकारी महोदय को तमाम लोगों ने कार्यक्रम के खिलाफ समझा दिया है, अत: वो नहीं आयेंगे. हालांकि मुझे आज भी इस पर व्यक्तिगत रूप से विश्वास नहीं है. जिलाधिकारी से मिलकर आठ सवा आठ बजे बाहर निकला तो सूचना मिली कि श्री शंभूनाथ शुक्ल, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री प्रवीण शुक्ल (संयोजक) ट्रेन छोड़कर घर लौट गए हैं और अलका सिंह, धीरेन्द्र मिश्र, यशवंत सिंह ट्रेन में बैठ गए हैं.

हालात ऐसे थे के किसी को भी मैं जबरन आने को कह नहीं सकता था और उनके नहीं आने की स्थिति में यहाँ रातो-रात कोई विकल्प भी नहीं खड़ा कर सकता था. खैर, हालाकि मुझे इस बात की संतुष्टि जरूर थी कि वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल और पंकज चतुर्वेदी सरीखे लोग मेरे कहने पर कम से कम चार घंटे से ज्यादा स्टेशन पर तो खड़े रहे. वाकई मैं इसके लिए उनका आभार व्यक्त करूँगा कि वो तब तक स्टेशन पर जमे रहे जब तक ट्रेन के समय से देवरिया पहुंचने की अंतिम उम्मीद बनी रही. इस मामले में संजीव सिन्हा बहुत निराश किये. चार बजे उन्होंने आने की पुष्टि की और साढ़े चार बजे उनका फोन आता है कि उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही और प्रभात झा मना कर रहे हैं.

उमेश जी ने बताया कि वो बैग लेकर संजीव जी के यहाँ गए लेकिन उनके मना करने के बाद वो भी लौट रहे हैं. सबकी बातें मेरी समझ में आ रहीं थीं लेकिन संजीव जी द्वारा न आने का कारण बेहद लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना और मजाकिया लग रहा था. जिस कार्यक्रम का टिकट डेढ़ महीने पहले हो चुका हो उसकी छुट्टी भला आधे घंटे पहले मांगने जाना मजाकिया नहीं तो क्या लगना चाहिए. जब संजीव सिन्हा ने मना किया तब टिकट कैंसल नहीं हो सकता था क्योंकि चार्ट बन चुका था. एक अनुज के नाते माफी के साथ एक सुझाव संजीव सिन्हा के लिए है कि “आगे से अगर कोई कार्यक्रम बनाये तो कम से कम छुट्टी थोड़ा पहले ले लें और नहीं आ पाने की पुष्टि इतना पहले कर दें कि आयोजक आपका टिकट कैंसल करवा सकें. कई बार कार्यक्रमों के पास कोई बड़ा प्रायोजक नहीं होता है”.

ट्रेन से बेपरवाह अब २१ दिसंबर के मंच योजना में लगते हुए मै अपना ध्यान कार्यक्रम की तरफ लगा दिया. दूसरे दिन ग्यारह बजे ही हम सात आठ लोग जिला पंचायत सभागार पहुचे और बैनर आदि लगा दिये. जिलापंचायत सभागार बुक करवाया था सतीश मणि और जिलापंचायत सदस्य राणा प्रताप ने, अत: यहाँ भी हमें आर्थिक राहत मिली थी. नियत समय पर दो बजे लोग जुटने शुरू हो गए. मुख्य अतिथि श्री अमिताभ ठाकुर भी देवरिया पहुच चुके थे. अपने तय समय से आधे घंटे देर से यानी ढाई बजे कार्यक्रम शुरू हुआ. बतौर मुख्यातिथि आईजी गोरखपुर श्री अमिताभ ठाकुर, सभाध्य्क्ष प्रो. रामदेव शुक्ल,मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह, श्री पंकज कुमार झा एवं संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी मंच पर उपस्थित हुए.

कार्यक्रम शुरू होते-होते सभागार पूरा भर गया था जिनमे महिला और पुरुष दोनों की उपस्थिति थी. बतौर संचालक मैंने कार्यक्रम देर से शुरू होने की माफी मांगते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की. माँ सरस्वती की तस्वीर पर पुष्पांजली के बाद अतिथि स्वागत का क्रम चला. इसी क्रम में श्री संजय मिश्र,डॉ जय प्रकाश पाठक, श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती, डॉ सौरभ मालवीय एवं श्री राजीव यादव को मोती बीए नया मीडिया सम्मान प्रो. रामदेव शुक्ल के हाथों दिया गया. सभी सम्मानित गणमान्यों ने सभा को संबोधित करते हुए अपने विचार रखे. सभा को संबोधित करते हुए सम्मान प्राप्त अतिथि डॉ जय प्रकाश पाठक ने शंभूनाथ शुक्ल जी का एक फेसबुक स्टेट्स पढ़कर सबको सुनाया जिसमे शुक्ला जी ने “लौट के बुद्धू घर को आये” वाला मुहावरा इस्तेमाल किये थे.

संबोधन के क्रम में श्री देहाती जी ने नयम मीडिया मंच को ग्रामीण पत्रकारों की जरुरत बताते हुए कहा कि जो लोग बाहर बैठ कि इस कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं, बेहतर है कि वो अंदर सभागार में आयें और खुली बहस करे. बकौल देहाती जी “देवरिया के पत्रकारिता इतिहास में हुए कार्यक्रमों में यह पहला मंच है जहाँ विरोधियों को भी अपनी बात रखने के लिए आजादी दी जा रही है”. सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री संजय मिश्र ने नया मीडिया की जरुरत एवं जवाबदेही से सम्बंधित सवाल उठाया. सम्मान समारोह एवं सम्मनित व्यक्तियों के संबोधन के बाद माइक पर आये वक्ता श्री पंकज कुमार झा ने बेहद शालीनता से अपनी बात रखा. नया मीडिया के विकास एवं जरुरत पर बोलते हुए श्री झा ने कहा कि हमें अभी इसकी शुचिता की बजाय इसके विकास पर बल देने की जरूरत है.

वहीँ मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत सिंह ने कहा “ कोई भी मीडिया नयी नहीं होती है अत: इसे नया मीडिया की बजाय डिजिटल मीडिया कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा. इस मीडिया पर भी अनुशासन की जरूरत है और इसे भी अपनी जवाबदेही तय करनी होगी.”. इस क्रम में डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने कार्यक्रम का प्रस्तावन भाषण देते हुए इस आयोजन को अद्भुत बताया तो वहीँ ग्रामीण अंचल से आये पत्रकार श्री सिद्धार्थ मणि त्रिपाठी. श्री राघव तिवारी, श्री अरुण पाण्डेय. श्री सतीश सिंह आदि ने न्यू मीडिया को को ग्रामीण पत्रकारों के सशक्तीकरण के लिए सबसे जरूरी हथियार के रूप में स्वीकार किया. कार्यक्रम खतम होने में अभी आधे घंटे शेष थे और सभा में मौजूद भीड़ ज्यों की त्यों टिकी थी. तभी सूचना मिली कि यशवंत सिंह, कुमार सौवीर, जनार्दन यादव, अलका सिंह, डॉ धीरेन्द्र मिश्र भी पहुंच गए हैं. बिना देर किये संचालक द्वारा श्री यशवंत सिंह (भड़ास) एवं श्रीमती अलका सिंह (आकाशवाणी) को मंच पर आमंत्रित किया गया.

यशवंत सिंह द्वारा अपने संबोधन में उसी तेवर को कायम रखते हुए मुख्यधारा मीडिया पर प्रहार एवं नया मीडिया के सशक्तीकरण की बात की गयी. वहीँ अलका सिंह ने संक्षिप्त में ही ऐसे कार्यक्रमों पर अपना पक्ष रखा. सभा की अध्यक्षता कर रहे प्रो. रामदेव शुक्ल ने मुख्यधारा मीडिया के जवाब के रूप में नया मीडिया के विकास पर बात करते कहा कि इस नए माध्यम पर और अधिक प्रशिक्षण शिविर आदि लगाकर उन लोगों को खड़ा करने की जरुरत है जो इस माध्यम से अनभिग्य हैं.

अंत में कार्यक्रम के संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने सभी तमाम अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया. शुरुआत में कार्यक्रम को हल्के में लेने एवं उपेक्षित नजर से देखने के बावजूद कार्यक्रम की सफलता ने तमाम राष्ट्रीय अख़बारों को कवरेज करने पर मजबूर किया और तमाम अखबारों के देवरिया ब्यूरो प्रमुखों ने देर रात इस कार्यक्रम को संज्ञान में लेकर जानकारी ली. ये वही अखबार के ब्यूरो प्रमुख थे जो इस कार्यक्रम की सुचना तक छापने से बच रहे थे. दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख ने तो पूरे कार्यक्रम के ढांचे को ही अपूर्ण बता दिया था लेकिन यह अंत तक नहीं बता पाए कि क्या अपूर्ण था? मुझे उम्मीद थी कि वो इसकी अपूर्णता बताने मंच तक आयेंगे लेकिन नहीं आये.

खैर, सबकी नजर में कार्यक्रम सफल रहा.

आयोजन और इसके दाएं-बाएं की कुछ तस्वीरें….

न्यू मीडिया के जरिए अलख जगाने वाले आईजी अमिताभ ठाकुर का संबोधन…

मंचासीन मेहमान…

कार्यक्रम में कुमार सौवीर जी को स्मृति चिन्ह देना भूल गए तो रात्रिकालीन कार्यक्रम में पंकज ने दौड़ाकर सौवीर को सम्मानित कर दिया… 🙂

ये दोस्ती… : डा. सौरभ मालवीय और पंकज झा

देवरिया के बाद बलिया पहुंचे यशवंत ने 3500 एकड़ में फैले सुरहा ताल का वॉच टावर से आनंद लेते…


इस रिपोर्ट के लेखक युवा पत्रकार शिवानन्द द्विवेदी 'सहर' हैं जो इस आयोजन की मुख्य कड़ी रहे और पूरे कार्यक्रम के शुरुआत से अंत तक को देखा-समझा-जिया.

कंवल भारती केस : मानवाधिकार आयोग द्वारा डीजीपी को निर्देश

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा रामपुर में दलित चिन्तक कँवल भारती की फेसबुक टिप्पणी पर मनमाने गिरफ्तारी के विरोध में भेजी गयी शिकायती पत्र के सम्बन्ध में डीजीपी, उत्तर प्रदेश को निर्देश निर्गत किये हैं.

आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के बाद फेसबुक पर समाजवादी पार्टी की सरकार की तल्ख़ आलोचना करने पर हुई श्री भारती की गिरफ़्तारी के तत्काल बाद भेजी अपनी शिकायत में डॉ ठाकुर ने कहा था कि श्री भारती की टिप्पणी किसी भी प्रकार से धार्मिक उन्माद फैलाने से जुडी नहीं थीं, बल्कि मात्र एक कथित घटनाक्रम पर बुद्धिजीवी विचार थे.

अतः उनकी गिरफ़्तारी प्रशासनिक ताकत का खुला दुरुपयोग है. यह प्रकरण आयोग के समक्ष रखा गया और शिकायत पर विचार करने के बाद आयोग ने निर्देशित किया कि इसे डीजीपी, यूपी को उचित कार्यवाही हेतु भेजी जाये. डॉ ठाकुर ने कहा है कि मानवाधिकार से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा होने के नाते वे डीजीपी के स्तर पर न्याय के लिए पूरा प्रयास करेंगी.


सेवा में,
जस्टिस के जी बालाकृष्णन,
अध्यक्ष,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
भारत सरकार,
नयी दिल्ली
विषय- दलित लेखक और चिन्तक श्री कँवल भारती प्रकरण में पुलिस कार्यवाही विषयक
महोदया,

कृपया निवेदन है कि मैं डॉ नूतन ठाकुर, एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ जो प्रशासन में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता तथा मानवाधिकार आदि के क्षेत्र में कार्यरत हूँ. मैं आपके सम्मुख उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले का एक प्रकरण प्रस्तुत कर रही हूँ जिसमे साफ़ दिखता है कि एक व्यक्ति के मानवाधिकारों का किस प्रकार खुला उल्लंघन किया गया है.

यह प्रकरण रामपुर जिले के श्री कँवल भारती, दलित लेखक और चिन्तक, से जुड़ा है. समाचारपत्रों से प्राप्त सूचना के अनुसार कल श्री भारती ने निम्न टिप्पणी फेसबुक पर की थी-
“यूपी में सपा की सरकार ने दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित करने का यह कारण बताया है कि उन्होंने रमजान के महीने में एक मस्जिद की दीवार गिरवा दी थी, जो अवैध रूप से सरकारी जमीन पर बनायी जा रही थी. लेकिन रामपुर में रमजान के महीने में ही जिला प्रशासन ने सालों पुराने एक इस्लामिक मदरसे पर बुलडोजर चलवा दिया गया और विरोध करने पर मदरसा संचालक को जेल भेज दिया. पर अभी तक किसी अफसर को अखिलेश सरकार ने न तो निलंबित किया है और न ही हटाया गया है. जानते हैं क्यों? क्योंकि यहाँ अखिलेश का नहीं, आज़म खान का राज चलता है. उनको रोकने की मजाल तो खुदा में भी नहीं है”

श्री भारती की इस टिप्पणी पर श्री फ़साहत अली खान, जो उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री श्री आजम खान के मीडिया प्रभारी बताए जा रहे हैं, द्वारा रामपुर के सिविल लाइन्स थाना में धारा 153ए और 295 ए आईपीसी जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर करवाया, जो दो वर्गों में वैमनस्यता फैलाने और धार्मिक भावनाओं के अपमान से सम्बंधित हैं.

इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि रामपुर पुलिस ने तत्काल श्री भारती को गिरफ्तार भी कर लिया और कई घंटे थाने पर बैठाया किन्तु मा० मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट ने पेशी होते ही तत्काल जमानत दे दी.

पूरी मीडिया में यह बात कही जा रही है कि यह कार्यवाही श्री आज़म खान के इशारे पर की गयी.

आप सहमत होंगे कि श्री भारती की यह टिप्पणी किसी भी प्रकार से धार्मिक उन्माद फैलाने और वैमनस्यता फैलाने से जुडी नहीं है. इस टिप्पणी में किसी धर्म विशेष से जुडी कोई भी टिप्पणी दूर-दूर तक नहीं की गयी है. जो भी टिप्पणी है, वह मात्र एक कथित घटनाक्रम, कुछ प्रशासनिक कार्यवाही और कुछ व्यक्ति विशेष पर है. इस तरह श्री भारती ने इस मामले में मात्र अपने कुछ विचार और अपनी टिप्पणी अत्यंत शालीन तरीके से व्यक्त किया है. यह पूरी तरह भारतीय संविधान के अनुच्छेद उन्नीस में प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत है.

रामपुर पुलिस की यह कार्यवाही, चाहे वह श्री आज़म खान के कहने पर की गयी हो अथवा अपनी मर्जी से, प्रथमद्रष्टया ही अत्यंत निंदनीय जान पड़ती है और मानवाधिकार का पूरी तरह उल्लंघन और हनन है. यह प्रशासन की शक्ति का पूर्ण दुरुपयोग भी है जहाँ एक चिन्तक और विचारक को मात्र अपनी अभिव्यक्ति के लिए आपराधिक कृत्य में दण्डित किया गया और उन्हें गिरफ्तार किया है.

इस मुकदमे के वादी द्वारा एफआईआर लिखवाना तो उनका संवैधानिक और विधिक अधिकार था पर पुलिस द्वारा यह न्यूनतम अपेक्षा की जाती है कि छानबीन और सही विवेचना के बाद ही वह गिरफ़्तारी करेगी. लेकिन इस मामले में मुक़दमा दर्ज होने के साथ ही आनन-फानन में की गयी गिरफ़्तारी यह साफ़ दर्शा देती है कि इसका उद्देश्य श्री भारती को डराना, धमकाना और उनका पूरी तरह से मानमर्दन करना था.

कृपया ज्ञातव्य हो कि श्री भारती एक जाने-माने दलित चिन्तक और लेखक हैं जो दर्जनों पुस्तक लिख चुके हैं और जिन्हें डॉ अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

किसी भी प्रशासनिक तंत्र द्वारा ऐसा किया जाना संविधान और देश के क़ानून का खुला उल्लंघन है. अतः मैं आपके यह निवेदन करती हूँ कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा तत्काल इस प्रकरण की जांच कराई जाए और जांचोपरांत नियमानुसार समस्त आवश्यक कार्यवाही किये जाने हेतु उत्तर प्रदेश शासन को निर्देशित करने की कृपा की जाए. साथ ही श्री कँवल भारती को बिना पुख्ता सबूत और आधार के एफआईआर दर्ज करते ही गिरफ्तार करने के सम्बन्ध में उन्हें समुचित मुआवजा भी दिये जाने के आदेश पारित करने की कृपा करें. कृपया प्रकरण अत्यंत गंभीर होने और पूरे देश के जन मानस से जुड़ा होने के नाते इस पर तत्काल कार्यवाही कराये जाने की कृपा करें.

पत्र संख्या-  NT/KB/Ram/01
दिनांक-  07/08/2013
भवदीय                                                                                                                                     डॉ नूतन ठाकुर
लखनऊ
 

विनोद कापड़ी ने फिल्म शूटिंग के लिए गांव वालों को पुलिस के जरिए डराया-धमकाया…

Yashwant Singh : विनोद कापड़ी नामक पत्रकार लगता है पुलिस की बैसाखी से ही जिंदा है… भैंस से रेप पर एक फिल्म बनाने वाले विनोद कापड़ी के बारे में एक नई कहानी सामने आ रही है.. वो ये कि जब वो फिल्म की शूटिंग वेस्ट यूपी के रसूलपुर गांव में कर रहे थे तो वहां के युवा और क्रांतिकारी ग्राम प्रधान करमवीर ने आपत्ति की कि उनकी बिना इजाजत के गांव में कैसे शूटिंग हो रही है..

ग्राम प्रधान का कहना था कि शूटिंग के लिए परमीशन लेते, तब फिल्म निर्माण करते… इसको लेकर काफी बवाल हुआ… विनोद कापड़ी ने अपनी आदत के मुताबिक पुलिस की बैसाखी थामी और गांव वालों को परेशान करना शुरू कर दिया… गांव वालों को डरा धमका कर चुप कराया और पुलिस के पहरे में शूटिंग पूरी कर भाग आया…

बताया जाता है कि शूटिंग के दौरान गांव वालों ने विनोद कापड़ी का बाजा बजाकर रख दिया था… ज्ञात हो कि ये वही गांव रसूलपुर है जहां संत गंगा दास का जन्म हुआ था.. संत गंगा दास ने रानी लक्ष्मी बाई का दाह संस्कार किया था ग्वालियर में… यह रसूलपुर गांव हापुड़ से करीब 20 किलोमीटर आगे है गढ़ मुक्तेश्वर की ओर…

पुलिस प्रशासन के बल पर कभी भड़ास टीम को परेशान, प्रताड़ित व जेल भिजवाने वाले और अब गांव वालों को परेशान करने वाले विनोद कापड़ी को लेकर लोग कहने लगे हैं कि ये सचमुच पत्रकार है या गल्ती से पत्रकारिता में आ गया है… सच्चा पत्रकार पुलिस, फौज, आतंक के जरिए नहीं बल्कि कलम व जुबान से बात करता, समझाता, विरोध दर्ज कराता, प्रतिवाद करता, कनवींस करता है…

वैसे, कहने वाले कह रहे हैं कि अगर विनोद कापड़ी की मानसिक दशा ऐसी न होती तो आज वह हाशिए के एक छोटे-मोटे न्यूज चैनल में नौकरी न कर रहा होता… कभी स्टार न्यूज और इंडिया टीवी में काम कर चुके विनोद कापड़ी को इन्हीं हरकतों और मानसिक स्थितियों के कारण इन न्यूज चैनलों की नौकरी से जाना पड़ा और आज गुमनामी में जाकर गुमनाम से चैनल में रोजी-रोटी का जुगाड़ करना पड़ रहा है…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त पोस्ट पर आईं कुछ टिप्पणियां इस प्रकार हैं…

Rajeev Gupta कानून तोड़ने में भी माहिर है,ऐसा लगता है। पत्रकारिता तो धौंस जमाने के लिये बहुतेरे लोग कर रहे हैं।
 
Madan Tiwary लतखोर है। दिखाने के लिये गंभीरता धारण किये रहता है। इसको मेरे जैसा आदमी चाहिये। चार बार मारो एक बार गिनो।
 
Qasim Chaudhary Maine apni aankho se uss gaanw ke logo par kiya gaya zulm dekha hai, jo haramkhor police walo ne kiya tha?
 
Yashwant Singh कृपया तफसील से बताएं Qasim Chaudhary भाई.. क्या क्या हुआ था… इस मुद्दे को उठाना चाहिए कि आखिर एक संपादक स्तर का आदमी कैसे पुलिस के जरिए गांव वालों को प्रताड़ित करता है, वह भी फिल्म बनाने के नाम पर… अगर हम सब ऐसे ही चुप रह जाएंगे तो ये बड़े लोग जुल्म करते रहेंगे.. इन्हें सबक सिखाना जरूरी है.. इन्हें नंगा करना जरूरी है.. इन्हें शर्म दिलाने के लिए आवाज उठाना जरूरी है…

Padmasambhava Shrivastava यह विनोद कापड़ी कैसा तोप है जिससे पुलिस महकमा काँपता है ?
 
Rita Das ye mera gaaaoooo hhai…koi prob. ho to kahiye, hujur…sab intajaam ho jayega….
 
Prashant Mishra What you are doing is Yellow Journalism, Mr Yashwant … We all know how things are set up amd achieved in adverse comditions, it's just that u have been hooked up in the past by that person u are trying to create a negative impression of him … Everybody keeping interest in media and following media personels know what " Vinod Kapdi " is … !! being a so called Journalist, atleast wht u think of urself , you should present the both sides of the coin, According to 19(a) of constitution, Freedom of expression is there and by shooting a film dere in that place inside national boundaries he was doing nothing wrong with it , It was Pradhans, who were showing their might and unity to make him struggle for the project, for which he turned to police protection … !!!
 
Yashwant Singh प्रशांत भइया, किसी को गलत फंसाओगे तो वो आपकी आरती थोड़े उतारेगा… और, किसी के गांव में घुसकर बिना गांव वालों को भरोसे में लिए ….एक्शन कट स्टार्ट.. करोगे तो वो तो पूछेगा कि भइया इ का हुई रहा है… खैर… आप की अंग्रेजी बड़ी तगड़ी है… डर लागे राजा तोहरे संविधनवा से… 🙂

Anil Sakargaye देखो मिश्रा जी आपने जो लिखा …अपुन ने पढ़ा …थोड़ा समझा भी। ये यल्लो यलो जर्नलिस्म का ठीकरा हमारे जिम्मे क्यों? सुनो प्रभु … ज्ञान अंग्रेजी का भले हो … हिसाब यही होगा … गुरु अँगरेज़ से लगाकर अलामा , नेपोलियन थक गए … सच्ची बात करो …हमे पता है …घर में भले इंग्लिश बोलो, पर बच्चे हिंदी में ही समझते हैं…

अरविंद केजरीवाल का न्योता आया है…

Srijan Shilpi : अरविन्द केजरीवाल भलीभांति जानते हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने और खुद को साबित करने के लिए फिलहाल उनके पास अत्यल्प वक्त है। इसीलिए, उन्होंने बिजली की गति से काम करना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री और विधायक के तौर पर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से जानने के लिए वह ग्रासरूट पर हर नागरिक से सघन संपर्क के अभियान पर फिर से निकल चुके हैं।

कल रात के 11 बजे उनकी ओर से हमलोगों को लिखित निमंत्रण आया कि हमारे मोहल्ले की समस्याओं के बारे में जानने के लिए वह आज शाम को कॉलोनी में फिर आ रहे हैं। इससे पहले वह यह पूछने आए थे कि कांग्रेस के बाहरी समर्थन से वह सरकार बनाएं या नहीं। चुनाव अभियान के दौरान भी उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के सहयोग से यह सुनिश्चित किया था कि एक-एक मतदाता से व्यक्तिगत रूप से संपर्क हो सके।

उन्होंने रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की सहभागिता से पहली बार हर घर में शिकायत पत्र का फॉर्म वितरित करवाया है, जिसमें कॉलोनी की बिजली, पानी, साफ-सफाई, सीपीडब्ल्यूडी, एन.डी.एम.सी. आदि से जुड़ी सभी तरह की समस्याओं के बारे में बिंदुवार प्रश्न पूछे गए हैं और नागरिकों के सुझाव मांगे गए हैं।

अभी तो उन्होंने अपने पद की शपथ भी नहीं ली है, लेकिन उनके आने की धमक सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली में अचानक आए बदलावों से साफ सुनी जा सकती है। पिछले घोटालों की फाइलें नष्ट की जा रही हैं, गड़बड़ियों से जुड़े रिकॉर्ड फाड़े जा रहे हैं। अभी घर से निकलते ही एन.डी.एम.सी. के कई कर्मचारी फुटपाथ ठीक करते और उसके किनारों पर जगह-जगह पौधे लगाते नजर आए।

कुल मिलाकर बात यह है कि राजनीति की इस नई शैली से पुरानी सभी स्थापित पार्टियों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। हमारे इलाके में पिछले तीन टर्म से यानी कुल पंद्रह वर्षों से शीला दीक्षित विधायक थीं और मुख्यमंत्री भी। पर एक बार भी उन्होंने खुद आकर कॉलोनी की समस्याओं को जानने की जरूरत नहीं समझी। यहां तक कि चुनाव में उनसे हारने वाले भाजपा के प्रत्याशी भी पिछले पंद्रह वर्षों में एक बार भी अपने मतदाताओं से दोबारा संपर्क करने नहीं आए। यदि वे आए होते तो इस बार के चुनाव में तीसरे स्थान पर नहीं होते। प्रत्यक्ष लोकतंत्र की दिशा में इसे अत्यंत सकारात्मक बदलावों का संकेत कहा जा सकता है, बशर्ते यह सब राजनीति का स्थायी भाव बन सके।

सृजन शिल्पी के फेसबुक वॉल से.

रामलीला मैदान में खर्चीले शपथ ग्रहण पर उठने लगी उंगलियां

Dilip C Mandal : रामलीला मैदान में इतने तामझाम के साथ शपथ ग्रहण के खर्च का RTI से ब्यौरा लेना चाहिए. मैदान का किराया, पुलिस का बंदोबस्त, सरकारी अमला, टैंट, साउंड, पानी, जेनरेटर, डीजल, बिजली..और भी बहुत कुछ. इतने पैसे से कितने सार्वजनिक शौचालय बन सकते हैं? सरकारी अस्पतालों में कितने बेड का बंदोबस्त हो सकता है? शपथ ग्रहण की औपचारिकता तो कही भी पूरी की जा सकती थी. जनता का हर पैसा कीमती है. जनहित में खर्च होना चाहिए.

Daya Sagar : प्रसिद्ध चिंतक हेगेल ने कहा था 'जो कुछ यथार्थ है वह तर्कसंगत है और जो कुछ तर्कसंगत है वह यथार्थ है।' मार्क्स, ऐंगेल्स से लेकर हिटलर तक ने हेगेल के इस क्रान्तिकारी विचार को अपनी तरह से इस्तेमाल किया। इसी तर्क का इस्तेमाल अब केजरीवाल साहब कर रहे हैँ। ऐसे माहौल में जबकि कुछ मित्र आप की सरकार में सादगी का कहानियां खोज रहे हैं। सिंहासन खाली करो कि जनता आती है के तर्ज पर शनिवार को दिल्ली के रामलीला मैदान पर शपथग्रहण का भव्य समारोह होने जा रहा है। कार्यक्रम सरकारी है इसलिए लाखों रुपए का खर्च जनता की जेब से होगा। ऐसी नौटंकियां यूपी में खासतौर पर मायावती और अन्य राजनीतिक दल करते आए हैं। क्या आप भी दूसरी परम्परागत राजनीतिक पार्टियों की राह पर चलेगी? अल्पमत में ही सही दिल्‍ली में आप की सरकार बनने जा रही है। यह एक यथार्थ है तो क्या इसीलिए यह भव्य शपथग्रहण समारोह भी तर्कसंगत है?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और दयाशंकर शुक्ल सागर के फेसबुक वॉल से.

यूपी के इन मूर्ख अफसरों को कोई समझाए कि….

Anupam Singh :  उत्तर-प्रदेश के प्रिंसिपल सेक्रेटरी का कहना है कि ठण्ड से कोई नहीं मरता क्यूंकि अगर ऐसा होता तो साइबेरिया में कोई ज़िंदा ना बचता | हाँ भैया गुप्ता जी, बहुत सही बात कहा है आपने… हम भी मानते हैं कि लोग ठण्ड से नहीं मरते | लोग तो ग़रीबी से मरते हैं, अभाव के कारण मरते हैं | ..और ठण्ड से कहीं ज़यादा, मुज़फ़्फ़रनगर और साइबेरिया में फ़र्क़ ग़रीबी का है | अब कोई अगर ग़रीब है, तन पर कपड़े नहीं हैं तो इसमें हमारी सरकार क्या करे ! सरकार ने लैपटॉप देने का वादा किया था चुनाव से पहले, कम्बल का वादा तो किया नहीं था | अपने चुनावी वादे पूरे करने के लिये अखिलेश सरकार को बधाइयाँ..||

Daya Sagar : यूपी के इन मूर्ख अफसरों को कोई समझाए कि जाड़े में साइबेरिया के पक्षी भी मौत के डर से उड़ कर यूपी की झीलों और संगम पर डेरा डाल देते हैं?

Mohammad Anas : काश की सरकार और उसके मुलाजिक खुजलाहट (कृपया जुझलाहट न पढ़ें ) में ऐसे बयान देना बंद कर दें .

अनुपम, दयाशंकर और अनस के फेसबुक वॉल से.

खुर्शीद अनवर को लेकर फैलाई गई झूठी खबर का सच सामने आया


Yashwant Singh : विनोद कापड़ी ने जब मंत्री, अफसर, मीडिया के माध्यम से मुझे फंसवाया, अरेस्ट कराया तो मेरे बारे में जो-जो कहानियां अखबारों में छपती थी, यहां-वहां फैलाई जाती थी, उसे सुनकर मैं खुद भी हैरान हो जाया करता… तभी समझ में आया कि किसी लड़ाकू को बदनाम करने के लिए एक पूरा तंत्र किस तरह काम करता है… इस तंत्र में वो सब शामिल होते हैं जो आपसे नफरत करते हैं और आपको नष्ट कर देना चाहते हैं…

खुर्शीद अनवर के मामले में जिस तरह आईबीएन7 वालों ने खबर चलाई कि खुर्शीद ने सुसाइड नोट में सहमति से सेक्स की बात कुबूल की है, वह हैरान कर देने वाली थी. सच्चाई आज सामने आई है कि कुछ हरामियों ने खुर्शीद अनवर की फर्जी एफबी प्रोफाइल बनाकर उसमें सहमति से सेक्स का फर्जी कुबूलनामा तैयार कराया और उसे फैला दिया… आपको भी जान लेना चाहिए कि हर खबर सच नहीं होती, हर आरोप असली नहीं होते, हर पीड़ित जेनुइन नहीं होता… आप भी पढ़ें इसे…

खुर्शीद अनवर का फर्जी फेसबुक प्रोफाइल, फर्जी कुबूलनामा और आईबीएन7 की फर्जी खबर
http://bhadas4media.com/print/16805-khurshid-anwar-s-fake-profile-and-fake-ibn-news.html


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

खुर्शीद अनवर का फर्जी फेसबुक प्रोफाइल, फर्जी कुबूलनामा और आईबीएन7 की फर्जी खबर

Shahnawaz Malik : 'सहमति से सेक्स' का सच… फेसबुक मिथ्या का जंगल है… सबकुछ विश्वसनीय नहीं… विश्वसनीय सा दिखने वाला कंटेंट क्रिएट किया जाता है शिकार के लिए… खुर्शीद इसी जंगल में फंस गए थे और आखिरकार शिकार हुए… मीडिया का एक धड़ा भी इसी मिथ्या के आधार पर 'सहमति से सेक्स' की जानकारी लोगों तक पहुंचाता रहा… सबूत पेश कर रहा हूं उस आधार का…

फेसबुक प्रोपगंडा ने खुर्शीद को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया, फिर मीडिया ने फेक फेसबुक वॉल कंटेंट को बिना जांचे-परखे अपने यहां चलाकर उनका चरित्र हनन किया… देखिए हमारे सामने कितना कुछ घट रहा है… 'रेप विक्टिम' को इंसाफ दिलाने निकले लफंगों की करतूत भी देखिए… जो इनकी मुहिम में शामिल थे, उन्हें भी समझिए…

इस खेल में लड़की और खुर्शीद तमाशा बनकर रह गए हैं… लेकिन जिन्होंने यह तमाशा क्रिएट किया है, उसकी कम से कम सज़ा तीन साल कैद और पांच लाख जुर्माना है सिर्फ आईटी एक्ट के तहत… सीआरपीसी की धाराएं तो अपना काम अलग से करेंगी…

खुर्शीद को बदनाम करने के लिए लंपटों ने खुर्शीद अनवर का फेक फेसबुक अकाउंट क्रिएट किया था… अपनी मर्ज़ी और सहूलियत के मुताबिक उसमें कंटेंट डाला और फेसबुक पर फैला दिया… यहां जो खुर्शीद अनवर सहमति से सेक्स की बात कर रहे हैं, दरअसल वो असली खुर्शीद अनवर नहीं हैं… लेकिन देखने में लगता है कि असली हैं… इसके पीछे मंशा यह थी कि कॉमन यूज़र इसे पढ़कर खुर्शीद के असली अकाउंट पर जाकर उन्हें गालियां देगा, धमकाएगा जो कि हुआ…

दिलचस्प यह है कि जब आईबीएन7 ने इसी फेक वॉल के आधार पर ख़बर चलाई कि खुर्शीद के घर से बरामद चिट्ठी में लिखा है कि उन्होंने सहमति से सेक्स किया तो लंपटों ने उसे शेयर करना शुरू कर दिया… यह भी कहा कि देखो खुर्शीद ने इतना तो मान लिया है, जबकि सब कुछ झूठ है…

रेप हुआ या नहीं? इसका फैसला अदालत में होगा… लेकिन इस फर्ज़ी वाल से फेसबुक और मीडिया में हुए खुर्शीद के चरित्र हनन की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? क्या दोषी पकड़े जाएंगे? क्या मीडिया माफ़ी मागेगा? क्या खुर्शीद की चली गयी ज़िन्दगी और इज्ज़त वापस आ सकती है?

पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.

DUJ Solidarity with New Generation Media Journalists & Employees

The Delhi Union of Journalists expresses its concern over the news of reported attempts to close the English News Division of New Generation Media Corporation Pvt. Ltd. – the owners of the successful 24-hour Tamil news channel – Puthiya Thalaimurai and its offices throughout the country.

It is understood that only yesterday the journalists and employees of the channel have been formally communicated of the severance and deep pay cuts offered by the Company, seeking a decision on it by December 30th, leaving very few working days for the 40-odd employees to take a decision on a life and career-altering situation.

The detailed description of the turn of events at New Generation in The Hoot website is convincing enough to make a case for the extending the Working Journalists Act, which provides some measure of job security to print journalists, to the electronic media also.

The Delhi Union of Journalists (DUJ) expresses its solidarity with the struggling journalists of New Generation and extends all possible support to them. The DUJ appeals to the government both in the Centre and the states to intervene to safeguard the interests of the journalists and employees.

(Sujata Madhok)
President

(S K Pande)
General Secretary

Press Statement

जागरण के सौरभ शर्मा दुर्घटना में घायल, सहारा में विमल जेतली की वापसी

दैनिक जागरण, मेरठ के मुख्य उप संपादक सौरभ शर्मा के बारे में सूचना है कि करीब बीस बाइज रोज पहले वे गंभीर रूप से दुर्घटनाग्रस्त हो गए. वे बाइक पर सवार थे और पीछे से एक बड़ी गाड़ी ने जोरदार टक्कर मार दी. इससे सौरभ शर्मा उछलकर एक पेड़ से टकरा गए. उनके शरीर में कई जगह फ्रैक्चर है. करीब दो महीने तक उन्हें अस्पताल में रहना होगा.

राष्ट्रीय सहारा, देहरादून से सूचना है कि विमल जेतली की वापसी हो गई है. उन्हें पिछले महीने संस्थान से हटा दिया गया था. जेतली को कानपुर से देहरादून भेजा गया और फिर इस्तीफा लिखवा लिया गया था. ताजी जानकारी के मुताबिक सहारा प्रबंधन ने उनको फिर से नौकरी दे दी है. जेतली के अलावा कई अन्य लोगों की छुट्टी की गई थी पर वापसी केवल जेतली की हुई है.

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‘सुदर्शन न्यूज़’ SIT टीम पर मुकदमा, दैनिक जागरण गाजियाबाद से आशुतोष का तबादला

'सुदर्शन न्यूज़' की SIT टीम के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की खबर है. दक्षिण दिल्ली के कोटला मुबारक पुर थाने में यह मुकदमा दर्ज़ किया गया है. एसआईटी टीम पर उगाही, एक्सटार्शन आदि का आरोप है. अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. एफआईआर नम्बर 417 में पूरा कच्चा चिट्ठा दर्ज किया गया है.

दैनिक जागरण, गाजियाबाद के ट्रांस हिंडन ब्यूरो में तैनात ब्यूरो चीफ आशुतोष मिश्रा का नोएडा डेस्क पर तबादला कर दिया गया है. चर्चा है कि ऐसा कुछ आरोपों के चलते किया गया है.

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पत्रकारिता के आलोक

हिंदी पत्रकारिता की दुनिया में अपनी धारदार उपस्थिति के पहचाने जाने वाले आलोक तोमर का आज जन्म दिन है, दो साल पहले २० मार्च २०११ को उनका निधन हो गया था, मात्र पचास साल की उम्र में पत्रकारिता का यह आलोक बुझ गया था, मगर आज उनके जन्म दिन पर उनके लेखन की बरबस याद आ रही है.

हिंदी पत्रकारिता में जनसत्ता ने एक नई भाषा और बेबाक तेवर के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी , इसके अगुआ संपादक थे प्रभाष जोशी, उन्होंने अपने अनुकूल टीम तैयार की थी , उस टीम में चयनित लोगों में ग्वालियर की भूमि से उभरे युवा पत्रकार आलोक तोमर भी थे. मुझे पता है उस वक्त जनसत्ता के लिए जिन पत्रकारो का चयन होना था,उनकी कठिन परीक्षा ली गयी थी. इ उस परीक्षा में आलोक उत्तीर्ण हुए थे, और फिर देश ने उनकी कलम के जौहर देखे और कुछ ही समय में आलोक हिंदी पत्रकारिता युवा शिल्पी के रूप में स्थापित हो गए।

जब कभी दिल्ली मेरा दिल्ली जाना होता था, तो आलोक तोमर से भी मिलना हो जाया करता था, मै गांधी शांति प्रतिष्ठान में रुका करता था, और जनसत्ता का कार्यालय उसके पास ही था, हालाँकि आलोक तोमर से मेरी रू-ब-रू मुलाकात कम हुयी , मगर उनकी लेखने से रिश्ता कायम रहा, जनसत्ता के माध्यम से उनकी खबरे पढ़ने को मिलती रही. -दो बार वे रायपुर भी आये तब भी मुलाकात हुयी। जब भी हम मिलते थे, पत्रकारिता पर चर्चाएँ होती। पत्रकारिता पर लिखा गया मेरा उपन्यास ''मिठलबरा' उन्हें पसंद था. शायद इसलिए कि वे हमेशा बिंदास और निर्भीक पत्रकारिता के पक्ष धर थे, और मेरे उपन्यास में भी वही तत्व थे।

बाद में अलोक तोमर जनसत्ता से अलग हो गए और स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू की, ''डेटलाइन इंडिआ' फीचर सर्विस' ने देखते ही देखते अपनी पह्चान बना ली, क्योंकि उसका कंटेंट आलोक तोमर की तरह बेबाक हुआ करता था,, यह एक लोकप्रिय पोर्टल है . कालाहांडी पर केंद्रित उनकी पुस्तक काफी चर्चित रही , इस पुस्तक ने यह साबित कर दिया कि महानगर में रह कर पत्रकारिता करने वाले सच्चे पत्रकार भूख से लड़ते लोगों की पीड़ा समझने के लिए सुदूर गाँवों तक भी जाते है , वरना अब तो महानगरो में रहने वाले पत्रकार गाँवों की और जाना ही नहीं चाहते। आलोक तोमर अपवाद थे. वे पूरी दुनिया में घूमे तो भारत के गाँवों के दर्द पर भी कलम चलायी।

आलोक तोमर के जीवन के अंतिम दौर बेहद संघर्ष पूर्ण रहे , वे एक पत्रिका के संपदक हो गए और उस पत्रिका की अपनी खास पहचान बन गयी. इस पत्रिका में उन्होंने एक विदेशी पत्रिका में छपे कार्टून को प्रकाशित कर दिया था, जिसे ले कर खूब हंगामा मचा। इतना हंगामा हुआ कि आलोक तोमर की गिरफ्तारी हुई, उन्हें जेल जाना पड़ा. लेकिन इससे आलोक की लोकप्रियता का ग्राफ और अधिक बढ़ा, ये और बात है कि पत्रिका ने उनसे पल्ला झाड़ लिया। फिर भी आलोक विचलित नहीं हुए, उन्होंने ''डेटलाइन इंडिया' पर ध्यान केंद्रित किया और देखते ही देखते डेटलाइन ने भी धूम मचाना शुरू कर दिया .

आलोक तोमर का अन्तिम समय बेहद संघर्ष पूर्ण रहा , एक तो स्वतंत्र पत्रकारिता , उस पर कैंसर का हमला, इन सबसे जूझते हुए आलोक ने मुस्काराते रहे और कलम चलाते रहे , अपनी बीमारी के समय भी आलोक तोमर ने जो कुछ लिखा , वह एक पत्रकारिता का सशक्त उदहारण है. उनके पास एक कवि मन भी था आलोक ने अपनी बीमारी के दौरान जो कविता लिखी, उसे पढ़ कर उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति को समझ जा सकता है-

काल तुझसे होड़ है मेरी

जानता हूं चल रही है

मेरी तुम्हारी दौड़

मेरे जन्म से ही

मेरे हर मंगल गान में

तुमने रखा है ध्यान में

एक स्वर लहरी,

शोक की रह जाए

आपके दूत मुझसे मिलें हर मोड़ पर

और जीवन का बड़ा सच

चोट दें, कह जाएं

सारे स्वप्न, सारी कामनाएं, आसक्तियां

तुम्हारे काल जल में बह जाएं

लेकिन अनाड़ी भी हूं

अनूठा भी, किंतु

तुम्हारी चाल से रूठा भी

काल की शतरंज से कभी जुड़ा

और एक पल टूटा भी

तुम सृष्टि के पीछे लगाते दौड़

देते शाप और वरदान

और प्रभंजन, अप्रतिहत

चल रही है

दौड़ तुमसे मेरी

ए अहेरी

काल, तुझसे होड़ है मेरी..

काल से होड़ लेने वाले और अंततः पराजित होने वाले इस पत्रकार को मेरा नमन है । मृत्यु से भला कौन जीत सका है, मगर अपने सरोकारो और सृजन से व्यक्ति चिरकाल तक बना रहता है. आलोक ऐसे ही पत्रकार थे. आइसना (आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन) आलोक तोमर की स्मृति में हर साल किसी जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का पुरस्कार देने की घोषण की. उम्मीद है यह परम्परा कायम रहेगी ताकि एक सशक्त पत्रकार को सम्मानित करके हम आलोक तोमर के तेवर वाली पत्रकारिता की परम्परा को आगे बढ़ा सके.

लेखक गिरीश पंकज 'सदभावना दर्पण' मासिक मैग्जीन के संपादक हैं.

आज आलोक तोमर का जन्मदिन है

Yashwant Singh : आज आलोक भइया का जन्मदिन है.. इतना दबंग और इतना शानदार पत्रकार मैंने नहीं देखा… वो हनक, वो तेवर, वो सरोकार, वो अंदाज़… सब कुछ याद आ रहा… होंगे बहुत पर आलोक तोमर की बात ही निराली थी.. लव यू भैया.. सदा याद आएंगे… थैंक्यू Supriya भाभी, हम उजड्डों को याद दिलाने के लिए कि आज भइया का बर्थडे है…

Dhananjay Singh : पान सिंह तोमर को एक शादी में मिलते सम्मान से अचंभित एक युवक ने पता किया तो उसको लगा कि इस बागी की कहानी तो सबसे अलग है.बागी की कहानी लिए युवक दिल्ली आगया और इण्डियनएक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी ने अपने सूत्रों से कहानी को जांचा,उसमें कुछ और भी जोड़ा.देश को पता चली एक फौजी,कुशल एथलीट और फिर बागी हो गए पान सिंह की कहानी.स्टोरी अरुण शौरी और युवक या किशोर कहें ,आलोक तोमर के नाम से छपी.फिर हिंदी को मिला एक धाकड़ पत्रकार जो अपनी शर्तों पर जिया,जिंदगी में समझौते तो थे ही नहींअफ़सोस की तम्बाकू के चलते बहुत ही दुखद मौत हुई लेकिन उस दर्द में भी उन्होंने बखूबी एक बागी के तरह ही खुद को जिया……..अंतिम समय में उन्होंने सिगरेट और फिर दवा पर खर्चे तथा तम्बाकू के खतरों पर किसी तरह अम्बरीश जी को एक अपील लिखवाई थी जिसका पाठ मुझे दिल्ली में एक समारोह में करना था. रामगढ़ (नैनीताल )में उनकी थोड़ी सी जमीन दिखाते हुए कभी अम्बरीश जी ने कहा था की आलोक तोमर यहीं आशियाना बनाना चाहते थे लेकिन चाहने से ही सब कुछ तो हो नहीं जाता.धन्यवाद Yashwant Singh भाई याद दिलाने के लिए आज अलोक जी का जन्मदिन है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह और धनंजय सिंह के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त पोस्टों पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

Dhananjay Singh कंप्यूटर जी लॉक किया जाय !

Anand Singh bhaiya ji ko janamdin ki haardik shubhkaamnaye
 
Asad Jafar bhaiya ji ko janamdin ki haardik shubhkaamnaye
 
Anil Sakargaye कहीं पढ़ा था कि ,,,,,भाई साहब ने दाउद के ख़ास आदमी को भी चमका दिया था,,, तब यकीन आ गया कि उनकी कलम तलवार से ज़यादा ताक़तवर रही होगी
 
Pankaj Sharma Aalok tomar ji aaj hamare beech nahin hain ….lekin jab bhi kisi baat par maine palat kar jawab diya…unka chehra aankhon me aa jata tha…dhanya the wo….
 
Padmasambhava Shrivastava He was finest friend & person both till his last breath…. !
 
Ravi Shekhar चम्बल का दबंग ……………..
 
Sunil Mishra नही भूल पाता हूँ,,, यादों में हमेशा झांकते रहते हो ..
 
Vivek Shukla My hero. Like many,I too dearly miss him. As and when i move close to Indian Express building, crowd of memories related to Alok ji and his writings bring tears from my eyes.
 
Dhruv Rautela ujjad…waah…meri maa yahi kehkar aksar toka karti hai…n happy bday bhayya
 
Alok Kumar नमन
 
Chandramauli Pandey मुबारक हो जन्मदिन भाई आलेक जी
 
Shankar Anand उनके साथ मे काम करना वाकई में मेरे लिए पत्रकारिता के अच्छे दिन थे ..वो एक बेहद शानदार इंसान होने के साथ-साथ चलता -फिरता पत्रकारिता कि पाठशाला थे ….नमन
 
Gulab Singh वाकई हम बड़े निकम्में हैं,जो आलोक तौमर जैसे पत्रकार को भूल जाते हैं. जिनके सहारें हमनें पढ़ना लिखनां सीखा है। यहां तक की जिस जनसत्ता को आज हम पढ़ते है यह उन्हीं का मार्ग दर्शन है। हिंदी के नए शब्दों का इजाद कर हिंदी पत्रकारिता में जगह देने की कला उन्हीं से सीखी की है। आलोक तौमर जी पावन जन्म दिन पर शत-शत नमन।

Pradeep Mahajan सदा याद आएंगे…
 
Neeraj Karan Singh आपको शत-शत प्रणाम
 
Neeraj Karan Singh आपको शत-शत प्रणाम
 
Vikash Rishi alok sir ko janamdin ki wadhae insaan dilo main paida hote hai duniya main nahi we miss u sir


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पत्रकारिता के आलोक

केजड़ीवाल की आस्तकिता अवसरवादी राजनीति नहीं है?

Mukesh Kumar : वैसे तो किसी को कभी भी कहीं भी भगवान मिल सकते हैं क्योंकि ये विज्ञान का नहीं आस्थाओं का मामला है। लेकिन अरविंद केजडीवाल का ये कहना सही नहीं लगता कि उनकी सफलताओं ने उन्हें ये मानने को मजबूर कर दिया कि ईश्वर है। साफ़ है कि जिन्होंने उनको समर्थन और वोट देकर इस मुकाम तक पहुँचाया उनका श्रेय वे ईश्वर के खाते में डालकर आम आदमियों के साथ अन्याय कर रहे हैं।

क्या केजड़ीवाल ये कहना चाहते है कि अगर वे असफल हो गए होते तो नास्तिक बने रहते? और अगर आगे उन्हें फिर कामयाबी नहीं मिली तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा- ईश्वर या आम आदमी? अब ये मत कहिएगा दोनों। भाग्यवादी अकसर इस तरह के तर्क दिया करते हैं अपनी आस्तिकता के समर्थन में।

ये क्यों न माना जाए कि ये अरविंद केजडीवाल का राजनीतिक पैंतरा है? उन्हें लग रहा है कि एक नास्तिक को आम जनता नहीं स्वीकारेगी और आस्तिक बहुसंख्यक उनके ख़िलाफ मोर्चेबंदी कर सकते हैं इसलिए बेहतर है कि आस्तिक हो जाओ।

मुझे लगता है कि अपने विचारों से उनका ये सबसे बड़ा ज्ञात विचलन है और इसे दर्ज़ किया जाना चाहिए। अगर व्यावहारिक राजनीति का तकाज़ा मानकर वे आस्तिकता को स्वीकार कर रहे हैं तो कृपया ढोंग मत कीजिए। फिर कल को व्यावहारिक राजनीति की ज़रूरियात केजड़ीवाल और उनकी नीतियों में और भी विचलन पैदा कर सकती हैं और ये चिंता का विषय है।

आस्तकिता कोई अपराध नहीं है, मगर भारतीय राजनीति में उसका इस्तेमाल लोगों की धार्मिक भावनाएं भड़काने और दोहन करने के लिए जमकर किया जाता है। केजड़ीवाल नई राजनीतिक संस्कृति की बात करते रहे हैं मगर उनकी भी कई तस्वीरें इस तरह की छप चुकी हैं इसलिए कहीं ऐसा न हो कि इसकी शुरुआत आप में भी हो रही हो।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

टीआरपी : 51वां हफ्ता : ‘इंडिया टीवी’ तो सदा के लिए थर्ड क्लास हो गया लगता है, ‘इंडिया न्यूज’ और ‘न्यूज नेशन’ की बम-बम

रजत शर्मा ने अपना इंडिया टीवी मार्का ब्रांड इतना बिगड़वा लिया है कि अब पटरी पर लाते नहीं बन पा रहा. खूब कोशिश कर रहे हैं कि उनका चैनल 'न्यूज चैनल' बन जाए लेकिन एंटरटेनमेंट के आदी इंडिया टीवी के दर्शक बदलाव को कुबूल नहीं कर रहे. सो, माया मिली न राम वाली स्थिति है. न्यूज वाले दर्शक आ नहीं रहे. जो तमाशाई टाइप दर्शक थे, वे जा रहे हैं. इस कारण इंडिया टीवी का पतन हो रहा है भइया. देखिए जरा टीआरपी. एबीपी न्यूज ने तो परमानेंट वाली नंबर दो की पोजीशन ले ली है और बेचार इंडिया टीवी लगता है परमानेंट थर्ड क्लास हो गया है.

बम-बम है तो इंडिया न्यूज और न्यूज नेशन की. दीपक चौरसिया और शैलेश ने खुद को साबित किया है. टीआरपी चार्ट में इंडिया न्यूज नंबर चार पर है और न्यूज नेशन नंबर सात पर. एनडीटीवी और आईबीएन7 जैसे न्यूज चैनलों को पीछे करना बड़ी बात है और इसका श्रेय शैलेश को दिया जाना चाहिए. 51वें हफ्ते की उठापटक आप भी पढ़ लीजिए..

WK 51 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 19.7 up 1.8
ABP News 13.7 dn 3.2
India TV 11.5 dn 0.8
India news 10.0 up 1.5
ZN 9.7 dn 0.3
News 24 7.3 dn 0.4
News Nation 7.3 up 0.4
NDTV 6.6 dn 1.0
IBN 6.2 up 1.0
Samay 3.5 up 0.5
Tez 2.4 up 0.2
DD 2.2 up 0.2


Tg CS M 25+ABC
Aaj Tak 19.7 up 1.9
ABP News 14.5 dn 2.2
India TV 11.1 dn 1.3
India news 9.8 up 0.7
ZN 9.5 dn 0.4
NDTV 8.2 dn 0.6
News Nation 6.7 up 0.3
IBN 6.6 up 0.9
News24 6.6 dn 0.5
Samay 3.5 up 0.8
Tez 2.2 up 0.4
DD 1.7 dn 0.1

मुलायम सिंह जी, आपके प्रिंसिपल सेक्रेटरी (होम) अतुल कुमार गुप्ता जी का बयान ताबूत में आखरी कील साबित होगी

Mohammad Anas : मुलायम सिंह जी, घबराइये नहीं… ताबूत में आखरी कील साबित होगी आपके प्रिंसिपल सेक्रेटरी (होम) अतुल कुमार गुप्ता जी का बयान. बाकि आपने तो समाजवादी पार्टी का जनाज़ा उसी दिन तैयार करवा दिया था जिस दिन ठण्ड से हुई मौतों में आपको भाजपाई और कांग्रेसी दिखे थे.

Mohammad Anas : अखिलेश साहब, ये जो कौम है न, उसने ही आपको कालिदास मार्ग स्थित बंगला रहने के लिए दिया है. इसी कौम के वोटों से आपको तगड़ी सुरक्षा प्राप्त है. आज जब इन्हीं लोगों को कुछ ज़रूरतें आन पड़ी हैं तो आप और आपके माननीय बेहद बचकाने और घटिया बयान देने पर तुले हैं. खैर कोई बात नहीं.. अभी जिंदा हैं लोग इस कौम के और मरे हुए/टूटे हुए मुज़फ्फरनगर के लोगों के जिस्म में जान फूंकने की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने उठा ही ली है . मकान का नक्शा तैयार हो चुका है जिसे मुज़फ्फरनगर में बनाया जाना है. जिन लोगों ने इसकी ज़िम्मेदारी ली है उन्होंने कहा है कि उनका नाम कहीं पब्लिक में न लिया जाए. यह काम एक संस्था के माध्यम से हो रहा है ..बेहद ख़ुशी की बात है की जल्दी ही 50 मकान बन जाएंगे उसके बाद जैसे जैसे काम आगे बढ़ेगा मकानों की तादाद भी बढ़ती जाएगी. अल्लाह उन लोगों को उनकी नीयत के हिसाब से सवाब अता फरमाए और मुस्तहक परिवारों को रहने के लिए छत का इंतजाम करवाने की हमारी मुहीम में गैबी मदद करता रहे. हम यहाँ सिर्फ मकान ही नहीं बनवाएंगे बल्कि स्कूल का भी इंतजाम करेंगे एवं नौनिहालों के व्यक्तित्व विकास हेतु भविष्य का एक बेहतरीन प्लान बनाएंगे ताकि दंगों में सब कुछ खो देने वाले बच्चे बड़े हो कर अधिवक्ता, अधिकारी और प्रवक्ता बन सकें ताकि देश की मुख्यधारा में शामिल हो कर न्याय हासिल कर सकें. यदि आप भी मदद करना चाहते हैं तो खुद से मुज़फ्फरनगर जाएं, पांच परिवार न सही कम से कम किसी एक परिवार को गोद लें और उनकी मदद करें. किसी सरकार से उम्मीद क्यों लगाना. बस आप सभी की दुआ की ज़रूरत है ताकि यह काम आगे बढ़ सके

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

यूपी में जंगलराज : सपा विधायक के घर से मिली अपहृत किशोरी

यूपी में इतना बुरा हाल तो कभी नहीं रहा. हर ओर अराजकता का आलम है. जनता त्राहि त्राहि कर रही है. सिर्फ सपा के नेता और सपा परस्त अफसर ही सुखी हैं. बाकियों की ज़िंदगी में हर किसिम का अंधेरा है. कल्पना करिए कि जिस शासन में शामिल विधायक ही किसी किशोरी का अपहरण कराए तो उस राज्य का हाल क्या होगा.

आगरा की ये खबर है. एक लीडिंग अखबार में छपी है. कुछ कहने से अच्छा है आप खुद ही इसे पढ़ लें. पढ़ने के लिए नीचे दिए गए अखबारी कटिंग पर क्लिक कर दें. जिस राज्य के शासक बहू-बेटियों का अपहरण करवा रहे हों, दुराचार कर रहे हों, वहां किसे व कैसा न्याय मिलेगा, यह खुद सोच सकते हैं.

क्या ऐसी खबर पढ़ने के बाद भी आप लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को वोट देना चाहेंगे? कतई नहीं. खुद वोट न दें, साथ ही दूसरों को भी सपा को सबक सिखाने के लिए प्रेरित करें ताकि इन सत्तालोभी नेताओं के दिमाग आसमान से जमीन पर आ सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


पूरी खबर पढ़ने के लिए अखबार की इस कटिंग पर क्लिक कर दें


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‘इंडिया टीवी’ से श्वेता, जैकब, निखिल, पीयूष का इस्तीफा, ‘न्यूज एक्सप्रेस’ में कापड़ी के आने के बाद कई बदलाव

इंडिया टीवी से एंकर श्वेता झा ने इस्तीफा दे दिया है. वे आज तक न्यूज चैनल का हिस्सा बन गई हैं. वे आज तक में सुबह की बुलेटिन में एंकरिंग करने लगी हैं. इंडिया टीवी को जैकब ने भी गुडबाय बोल दिया है. वे असाइनमेंट हेड हुआ करते थे. चर्चा है कि आज तक से राहुल चौधरी के इंडिया टीवी आने और जैकब के सीनियर के रूप में ज्वाइन कराए जाने से जैकब का देर-सबेर इस्तीफा देना तय माना जा रहा था.

जैकब के न्यूज एक्सप्रेस जाने की चर्चाएं हैं. इंडिया टीवी से ही एक और विकेट गिरा है. निखिल दुबे ने इस्तीफा दे दिया है. इनको लेकर भी चर्चा है कि ये विनोद कापड़ी संग जा सकते हैं, यानि न्यूज एक्सप्रेस ज्वाइन कर सकते हैं. इंडिया टीवी के आउटपुट से पीयूष पदमाकर के भी इस्तीफा देने की चर्चाएं हैं.

उधर, न्यूज एक्सप्रेस में विनोद कापड़ी ने अपनी दुकान जमानी शुरू कर दी है. चैनल के मालिक शशांक भापकर ने विनोद कापड़ी को इंट्रोड्यूस किया. सभी से कहा गया है कि वे विनोद कापड़ी को रिपोर्ट करें और कोई भी अब सीधे मालिक से संपर्क ना करे. इस आदेश के बाद सबसे बुरी स्थिति एसएन विनोद की हो गई है. प्रभात खबर जैसे अखबार के संस्थापक और कई चैनलों अखबारों के एडिटर इन चीफ व ग्रुप एडिटर रहे एसएन विनोद को अपने से बेहद कम अनुभव वाले पत्रकार के अधीन रहकर काम करना होगा. चर्चा है कि एसएन विनोद प्रबंधन से नाखुश हैं और देर-सबेर इस्तीफा दे सकते हैं.

न्यूज एक्सप्रेस में वरिष्ठ पद पर कार्यरत प्रसून शुक्ला को अब न्यूज से पूरी तरह हटाकर प्रबंधन व कारपोरेट अफेयर्स