पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखने की मोदी की दोगली नीति पर भाजपाई चुप क्यों हैं?

Yashwant Singh : ये तो सरासर मोदी की दोगली नीती है. देश को एक कर ढांचे में लाने की वकालत करने वाले मोदी आखिर पेट्रोल डीजल को जीएसटी से क्यों बाहर रखे हुए हैं. ये तर्क बेमानी है कि राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल से भारी टैक्स से काफी पैसा पाती हैं, जिसे वह खोना नहीं चाहतीं.

भाजपा की केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें अगर अपना अपना हिस्सा खत्म करते हुए पेट्रोल डीजल को जीएसटी के दायरे में ले आएं तो जनता को भारी राहत मिलती. पर ऐसा नहीं करेंगे ये लोग क्योंकि थोक में फायदा तो ये बड़े लोगों को देते हैं. माल्य से लेकर अडानी तक. अंबानी से लेकर टाटा-बिड़ला तक. पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से इनका दाम आधा हो जाता. यही कारण है कि केंद्र सरकार इसे तो जीएसटी से बाहर रखे हुए है ताकि इससे भारी मात्रा में जनता से पैसा वसूला जाता रहे और बाकी सामान को जीएसटी में लाकर महंगाई बढ़ाने की कवायद कर रहे हैं.

नारा दे रहे हैं एक देश और एक कर का. लेकिन ये नारा बेकार साबित हो जाता है पेट्रो प्रोडक्ट्स को जीएसटी से बार रखने के फैसले से. आजकल ह्वाट्सअप पर ये वाला मैसेज खूब भेजा जा रहा है, आप भी पढिए-

Why petrol and diesel prices are not brought under GST. Now for petrol and diesel the central exise duty is 23% and state VAT is 34%. Total tax is 57%. If these essential products are brought under GST , the maximum tax will be only 28%, which means the prices of petrol and diesel can come down by almost 50%. The public at large will be benefited.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं–

Harshendra Singh Verdhan : Dada, It’s somehow difficult in Fertiliser sector too..18% for processed complex on raw materials & 12% on Imported. So; nothing for homemade indigenous Fertilisers. An easy way to Chinese poor quality fertilisers.

Care Naman : यदि जीएसटी सब पर तो पेट्रोल और दारु दोनों पर भी लागू करें… ये तो वही हुआ कड़ुआ कड़ुआ थू थू… मीठा मीठा गप गप…

Vijayshankar Chaturvedi : Larger public interest will not be bothering to them until 2019.

Divakar Singh : State governments opposed centre’s move to bring petroleum under gst. As you mentioned, state govts earn huge money from it, so they don’t want to bring it under gst. Centre wants to bring everything under gst. So we should ask respective state govts.

Yashwant Singh : जो बुरा है, वो दूसरों का है। जो अच्छा है, वो सब मेरा है। 🙂

Divakar Singh : बुरा भी अपना हो सकता है, पर इस केस में नही है। बेचारे जेटली जी बहस करते रह गए पर कोई राज्य तैयार नही हुआ पेट्रो उत्पादों के लिए gst लागू करने के लिए। ऐसे में केंद्र सरकार को दोषी बताना तथ्यात्मक नही है। देखें इस लिंक को : Petroleum products to be under GST if states agree: Minister

Yashwant Singh सेंटर को अपना हिस्सा छोड़ देना चाहिए था ताकि मोदी जी की नीयत तो साफ सही दिखती. साथ ही जिन स्टेट्स में बीजेपी है, वहां भी हटवा सकती थी. इसके बाद बीजेपी के लोग गैर बीजेपी राज्यों की सरकारों को एक्सपोज कर सकते थे. पर ऐसा नहीं, क्योंकि पेट्रोल डीजल बहुत ज्यादा सस्ता हो जाने से गरीबों को फायदा होता, महंगाई कम होती. बड़े उद्यमी घरानों को लाभ पहुंचाने वाले मोदी भला बल्क में यानि थोक में गरीबों को राहत कैसे दे सकते थे.

Rajeev Verma : पेट्रोल डीजल यदि gst के दायरे में कर देते तो input credit देने में सरकार का धुंआ निकल जाता. चीजें आश्चर्य जनक रूप से सस्ती हो जातीं.

Rajeev Pandey : Modi dhongi pakhandi hai uske maalik Ambani ki kamayi kam ho jayega jo Modiya kabhi nahi chahta.

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माखनलाल पत्रकारिता विवि के प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने भी लिख दी मोदी पर किताब

पुस्तक ‘मोदी युग’ का शीर्षक देखकर प्रथम दृष्टया लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्तुति में धड़ाधड़ प्रकाशित हो रही पुस्तकों में एक कड़ी और जुड़ गई। अल्पजीवी पत्र-पत्रिकाओं के लेखों के साथ ही एक के बाद एक सामने आ रही पुस्तकों में मोदी सरकार की जो अखंड वंदना चल रही है, वो अब उबाऊ लगने लगी है। परंतु पुस्तक को जब ध्यान से पढ़ना शुरू किया तो मेरा भ्रम बिखरता गया कि ये पुस्तक भी मोदी वंदना में एक और पुष्प का अर्पण है। वैसे भी संजय द्विवेदी की पत्रकारिता की तासीर से परिचित होने के कारण मेरे सामने यह तथ्य खुलने में ज्यादा देर नहीं लगी कि पुस्तक में यथार्थ का यथासंभव तटस्थ मूल्यांकन किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार संपादक और विचारक प्रोफेसर कमल दीक्षित का आमुख पढ़कर स्थिति और भी स्पष्ट हो गई। वस्तुत: प्रोफेसर कमल दीक्षित द्वारा लिखा गया आमुख पुस्तक की निष्पक्ष, दो टूक और सांगोपांग समीक्षा है। उसके बाद किसी के भी लिए संजय द्विवेदी की इस कृति की सामालोचना की गुंजाइश बचती नहीं है। यह स्वयं में सम्यक नीर-क्षीर विवेचन है।

भाजपा विरोधी समझे जाते रहे उर्दू के अखबारों और रिसालों को भी यह खुली आंखों से देखना पड़ रहा है कि बीते-तीन सालों की सियासत में दबदबा नरेंद्र मोदी का ही है। जिस तरह से बिखरे हुए प्रतिपक्ष के एकजुट होने की किसी भी कोशिश के पहले श्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा अचानक तुरूप का कोई पत्ता चल देती है, उससे सारी तस्वीर बदल जाती है। ताजा उदाहरण है राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में प्रतिपक्ष द्वारा किसी नाम पर एकजुटता से विचार करने से पहले ही भाजपा द्वारा दलित वर्ग के प्रबुध्द और बेदाग छवि वाले रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करके चमत्कृत कर देना। मै मौजूदा सियासी परिदृश्य को जांचने की कोशिश कर ही रहा था कि नजर हैदराबाद से प्रकाशित उर्दू डेली, ’’मुंसिफ’’ की इस आशय की खबर पर पड़ गई कि आज पूरे मुल्क में मोदी और भाजपा का ही दबदबा है। जैसे किसी जमाने मे पं. जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेस देश की राजनीति की नियंता रहा करती थी, वैसे ही आज श्री मोदी की टक्कर का कोई नेता नजर नहीं आता।

श्री मोदी के जो आलोचक उन पर अहंकारी होने का आरोप लगाते हैं उनको वर्तमान सरकार के नीतिगत फैसलों की श्रृंखला एक कोने में धकेल देती है। वस्तुतः श्री मोदी की राजनीति की शैली ही ऐसी है कि जिसमें किसी प्रकार के दैन्य-प्रदर्शन की कोई गुंजाईश ही नहीं है। संजय द्विवेदी की पुस्तक में ठीक ही लिखा है कि “नई राजनीति ने मान लिया है कि सत्ता का विनीत होना जरूरी नहीं है। अहंकार उसका एक अनिवार्य गुण है। भारत की प्रकृति और उसके परिवेश को समझे बिना किए जा रहे फैसले इसकी बानगी देते हैं। कैशलेश का हौवा ऐसा ही एक कदम है। यह हमारी परम्परा से बनी प्रकृति और अभ्यास को नष्ट कर टेक्नोलाजी के आगे आत्मसमर्पण कर देने की कार्रवाई है। एक जागृत और जीवंत समाज बनने के बजाय हमें उपभोक्ता समाज बनने से अब कोई रोक नहीं सकता।’’ इसी में आगे कहा गया है, “इस फैसले की जो ध्वनि और संदेश है वह खतरनाक है। यह फैसला इस बुनियाद पर लिया गया है कि औसत हिन्दुस्तानी चोर और बेईमान है। क्या नरेन्द्र मोदी ने भारत के विकास महामार्ग को पहचान लिया है या वे उन्हीं राजनीतिक नारों में उलझ रहे हैं, जिनमें भारत की राजनीति अरसे से उलझी हुई है? कर्ज माफी से लेकर अनेक उपाय किए गए किन्तु हालात यह है कि किसानों की आत्महत्याएं एक कड़वे सच की तरह सामने आती रहती है। भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार इन दिनों इस बात के लिए काफी दबाव में हैं कि उनके अच्छे कामों के बावजूद उसकी आलोचना और विरोध ज्यादा हो रहा है। उन्हें लगता है कि मीडिया उनके प्रतिपक्ष की भूमिका में खडे़ हैं। ’’मोदी सरकार’’  मीडिया से कुछ ज्यादा उदारता की उम्मीद कर रही है। यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि आपके राजनीतिक-वैचारिक विरोधी भी देश की बेहतरी के लिए मोदी-मोदी करने लगेंगे।”

प्रो. कमल दीक्षित जी के ही शब्दों में “मोदी युग ग्रंथ में संकलित लेखों में जहां श्री द्विवेदी, श्री मोदी की संगठन क्षमता, संकल्प निष्ठता और प्रशासनिक उत्कृष्टता को रेखांकित करते हैं, सत्ता को जनधर्मी बचाने के प्रयासों को उभारते हैं और संसदीय लोकतंत्र को सफल बनाने के उपायों को स्वर देते हैं, वहीं आत्मदैन्य से मुक्त हो रहे भारत की उजली छवि प्रस्तुत करते हैं, और राष्ट्रवाद की नई परिभाषा को रूपायित करते हैं। देश में क्षेत्रीय दलों के घटते जनाधार, लगातार सत्ता में बने रहने से आई नीति, निष्क्रियता, संसदीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की मर्यादा का उल्लंघन, राजनीतिक अवसरवाद जैसे सामरिक विषयों पर श्री द्विवेदी की टिप्पणियां विषयपरक तो हैं ही, वे प्रकारान्तर से हमारे लोकतंत्र की कमजोरियां को उभारने वाली हैं।’’

‘भारतीय मन और प्रकृति के खिलाफ है कैशलेस’ शीर्षक लेख में संजय द्विवेदी ने एक निष्पक्ष पत्रकार की छवि को सुरक्षित रखते हुए कड़वे-मीठे सच को दो टूक लिख दिया है कि “इस मामले में सरकार के प्रबंधकों की तारीफ करनी पडे़गी कि  वे हार को भी जीत में बदलने की क्षमता रखते हैं और विफलताओं का रूख मोड़कर तुरंत नया मुद्दा सामने ला सकते हैं। हमारा मीडिया, सरकार पर बलिहारी है ही।” दूसरा तथ्य यह, “हमारी जनता और हम जैसे तमाम आम लोग अर्थशास्त्री नहीं हैं। मीडिया और विज्ञापनों द्वारा लगातार हमें यह बताया जा रहा है कि नोटबंदी से कालेधन और आतंकवाद से लड़ाईमें जीत मिलेगी, तो हम सब यही मानने के लिए विवश हैं। नोटबंदी के प्रभाव के आंकलन करने की क्षमता और अधिकार दोनों हमारे पास नहीं हैं।’’ सवाल पूछा जा सकता है, नोटबंदी से क्या हासिल हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनेक क्षेत्रों में गतिशील हुआ है। भारत-पाकिस्तान संबंधों में नीतिगत स्पष्टता का आभास हुआ है। विदेश नीति के माध्यम से आतंकवाद के विरूध्द वैश्विक एकजुटता विकसित करने में भारत ने तीन वर्षों में जो बहुआयामी प्रयास किए उनके सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। इस कारण भी देश के आम लोगों की उम्मीदें अभी टूटी नहीं है और वे मोदी को परिणाम देने वाला राष्ट्र नायक मानते हैं। उससे साफ है कि सरकार ने उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने और कोयले, स्पेक्ट्रम जैसे संसाधनों की पारदर्शी नीलामी से जैसे साहसी फैसलों से भरोसा कायम किया है। देश की समस्याओं को पहचानने और अपनी दृष्टि को लोगों के सामने रखने का काम भी बखूबी इस सरकार ने किया है।

मन के तंतुओं में प्रतिबद्धता की सीमा तक रची वैचारिक आसक्ति को संजय द्विवेदी छुपाते भी नहीं है और ‘आजकल’ के दुनियादार लोगों की तरह सत्ता से काम निकालने के लिए उसका ढिंढ़ोरा भी नहीं पीटते। संजय की लोकप्रियता और सभी वर्गों में स्वीकृति का एक बड़ा कारण उनकी व्यवहार कुशलता भी है। अपनी बात पर दृढ़ रहते हुए भी वे दूसरों की सुनने का धैर्य रखते हैं और कभी-कभी इस अंदाज से असहमति भी व्यक्त करते हैं कि सामने वाला कहीं उलझ जाता है और उस उलझन के बावजूद उसका मर्म अमूर्त ही रह जाता है। संजय द्विवेदी की इस अदा पर मुझे उर्दू का एक शेर याद आता है “ न है इकरार का पहलू, न इनकार का पहलू, तेरा अंदाज मुझे नेहरू का बयां मालूम होता है।’’

परंतु यह संजय द्विवेदी की प्रकृति का मात्र संचारी भाव है। स्थायी भाव है व्यक्ति संस्था और शासन-प्रशासन तंत्र की गहरी पड़ताल करना। अपनी बात को दृढ़ता से कहना। हां, इतना अवश्य है कि इनका सौंदर्यबोध कई कुरूपताओं और अभद्रताओं पर झीनी-बीनी रेशमी चदरिया डाल देता है। सामने वाले को रेशमी चदरिया के स्पर्श की पुलक और लिखने वाले को यह प्रतीति की अप्रिय छवि से आंखें नहीं मूंदी। अपने अनुराग को किस हद तक छलकाना है और क्षोम को किस सीमा तक व्यक्त कर देना है, इस लेखन कला में संजय ने कुछ दशकों की साधना से सिद्धि प्राप्त कर ली है।

जहां बात सांस्कृतिक संस्कारों और सरोकारों की आती है, वहां संजय द्विवेदी शब्द जाल में पाठक को उलझाने और मूल मुददे से कतराने की बजाय स्पष्ट तथा सीधी धारणा व्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष में वह लिखते हैं, “आरएसएस को उसके आलोचक कुछ भी कहें पर उसका सबसे बड़ा जोर सामाजिक और सामुदायिक एकता पर है। आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों को जोड़ने और वृहत्तर हिंदू समाज की एकता और शक्ति के उसके प्रयास किसी से छिपे नहीं है। वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती जैसे संगठन संघ की प्रेरणा से ही सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इसलिए ईसाई मिशनरियों के साथ उसका संघर्ष देखने को मिलता है। आरएसएस के कार्यकर्ताओं के लिए सेवा का क्षेत्र बेहद महत्व का है।”

संजय द्विवेदी के जन्म से पूर्व के एक तथ्य को मैं अपनी तरफ से जोड़ना चाहता हूं, जब भारत विभाजन के पश्चात पश्चिमी पंजाब से लाखों की संख्या में हिंदू पूर्वी पंजाब पहुंचे तो संघ के स्वयंसेवकों ने बड़ी संख्या में उनके आतिथ्य, त्वरित पुर्नवास और उनके संबंधियों तक उन्हें पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय बड़ी तादाद में अनेक व्यक्ति घायल और अंग-भंग के शिकार होकर विभाजित भारत में पहुंचे थे। उन्हें यथा संभव उपचार उपलब्ध कराने में संघ के स्वयंसेवकों ने शासन-प्रशासन तंत्र को मुक्त सहयोग दिया था। उसके साथ ही स्वतंत्र भारत ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी संघ के अनुषांगिक संगठनों से जुडे़ समाज सेवियों को स्वतःस्फूर्त सक्रिय पाया जाता रहा।

संजय लिखते हैं “1950 में संघ के तत्कालीन संघ चालक श्रीगुरू जी ने पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की मदद के लिए आह्वान किया। 1965 में पाक आक्रमण के पीड़ितों की सहायता का काम किया। 1967 में अकाल पीड़ितों की मदद के लिए संघ आगे आया। 1978 के नवंबर माह में दक्षिण के प्रांतों में आए चक्रवाती तूफान में संघ आगे आया। इसी तरह 1983 में बाढ़ पीड़ितों की सहायता, 1997 में काश्मीरी विस्थापितों की मदद के अलावा तमाम ऐसे उदाहरण है जहां पीड़ित मानवता की मदद के लिए संघ खड़ा दिखा। इस तरह आरएसएस का चेहरा वही नहीं है जो दिखाया जाता है। संकट यह है कि आरएसएस का मार्ग ऐसा है कि आज की राजनीतिक शैली और राजनीतिक दलों को वह नहीं सुहाता। वह देशप्रेम, व्यक्ति निर्माण के फलसफे पर काम काम करता है। वह सार्वजनिक जीवन में शुचिता का पक्षधर है। वह देश में सभी नागरिकों के समान अधिकारों और कर्तव्यों की बात करता है। उसे पीड़ा है अपने ही देश में कोई शरणार्थी क्यों है। आज की राजनीति चुभते हुए सवालों से मुंह चुराती है। संघ उससे टकराता है और उनके समाधान के रास्ते भी बताता है। संकट यह भी है कि आज की राजनीति के पास न तो देश की चुनौतियों से लडने का माद्दा है न ही समाधान निकालने की इच्छाशक्ति। आरएसएस से इसलिए इस देश की राजनीति डरती है। वे लोग डरते हैं जिनकी निष्ठाएं और सोच कहीं और गिरवी पड़ी हैं। संघ अपने साधनों से, स्वदेशी संकल्पों से, स्वदेशी सपनों से खड़ा होता स्वालंबी देश चाहता है, जबकि हमारी राजनीति विदेशी पैसे और विदेशी राष्ट्रों की गुलामी में ही अपनी मुक्ति खोज रही है।ऐसे मिजाज से आरएसएस को समझा नहीं जा सकता। आरएसएस को समझने के लिए दिमाग से ज्यादा दिल की जरूरत है। क्या वो आपके पास है? ’’

पुस्तक के आवरण के मुखडे़ से उसकी पीठ सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति असहमति में हाथ उठाने वाले प्रखर लेखक-समालोचक विजय बहादुर सिंह, कुछ ख्यातिनाम पत्रकारों के साथ ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की टिप्पणियां संजय द्विवेदी की लोकप्रियता के जीवंत साक्ष्य उपस्थित करती हैं। तीन दशकों से अधिक समय के मेरे आत्मीय परिचय संजय द्विवेदी को मैंने एक आत्मीय ओजस्वी पत्रकार, प्रबुध्द अध्यापक और मनमोहिनी शक्ति से संपन्न मित्र के रूप में पाया है। अभी तो इन्होंने यशयात्रा का एक ही पड़ाव पार किया है। मंजिलें अभी और भी हैं। अनेक सुनहरी संभावनाओं का अनंत आकाश उड़ान भरने के लिए उनके सामने खुला पड़ा है।

पुस्तक: मोदी युग, लेखक: संजय द्विवेदी
प्रकाशकः पहले पहल प्रकाशन , 25 ए, प्रेस काम्पलेक्स, एम.पी. नगर,
भोपाल (म.प्र.) 462011,  मूल्य: 200 रूपए, पृष्ठ-250

पुस्तक के समीक्षक रमेश नैयर वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे दैनिक भास्कर, रायपुर के संपादक रहे हैं.

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पुराने नोटों को बदलने का धंधा बंद न होने के पीछे बहुत बड़ा झोल है!

Mukesh Aseem : महाराष्ट्र-गुजरात में सभी दलों के नेता बहुत सारे कोआपरेटिव बैंक चलाते हैं जिनके बारे में रिजर्व बैंक का मत रहा है कि ये भ्रष्टाचार, काला धन, मनी लॉन्डरिंग, आदि तमाम किस्म की चोरी-स्कैम के केंद्र हैं| नोटबंदी में भी ऐसी शिकायतें खूब आईं| गुजरात में तो ये बीजेपी के नियंत्रण में ज्यादा हैं, खुद अमित शाह से लेकर सब बड़े नेता इनके डायरेक्टर हैं| इसलिए वहाँ तो रिजर्व बैंक कुछ नहीं बोला लेकिन महाराष्ट्र में इनमें से ज़्यादा कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के कण्ट्रोल में हैं, बीजेपी के कम हैं| यहाँ भी इनके पास 2770 करोड़ के पुराने नोट जमा हुए थे| रिजर्व बैंक ने इन्हें लेने से मना कर दिया था क्योंकि इनके जमाकर्ताओं का कोई रिकॉर्ड नहीं था|

अब किसानों को खुश करने के लिए बीजेपी सरकार ने घोषणा की कि वह कर्ज माफ़ी की प्रक्रिया चलने के पहले प्रति किसान 10 हजार का अग्रिम भुगतान करेगी जिसे बाद में एडजस्ट कर लिया जायेगा| अब इन बैंकों को मौका मिल गया क्योंकि किसानों के अधिकाँश खाते इनके पास ही हैं| इन्होंने कहा कि हमारे नोट नहीं बदले गए तो हमारे पास किसानों को देने के लिए नकदी नहीं है| बस आज ही ऐलान हो गया कि इनके नोट भी रिजर्व बैंक ले लेगा! अभी भी पुराने नोटों का धंधा बंद क्यों नहीं हुआ है और रिजर्व बैंक हिसाब-किताब क्यों नहीं बता रहा है उसके पीछे ऐसे बहुत सारे झोल हैं जो परदे के पीछे चल रहे हैं!

पत्रकार मुकेश असीम की एफबी वॉल से.

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उप्र के दलित नेता को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर मोदी ने सबको चौंकाया

शायद यही राजनीति की नरेंद्र मोदी शैली है। राष्ट्रपति पद के लिए अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले श्री रामनाथ कोविंद का चयन कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर बता दिया है कि जहां के कयास लगाने भी मुश्किल हों, वे वहां से भी उम्मीदवार खोज लाते हैं। बिहार के राज्यपाल और अरसे से भाजपा-संघ की राजनीति में सक्रिय रामनाथ कोविंद पार्टी के उन कार्यकर्ताओं में हैं, जिन्होंने खामोशी से काम किया है। यानि जड़ों से जुड़ा एक ऐसा नेता जिसके आसपास चमक-दमक नहीं है, पर पार्टी के अंतरंग में वे सम्मानित व्यक्ति हैं। यहीं नरेंद्र मोदी एक कार्यकर्ता का सम्मान सुरक्षित करते हुए दिखते हैं।

बिहार के राज्यपाल कोविंद का नाम वैसे तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच बहुत चर्चा में नहीं था। किंतु उनके चयन ने सबको चौंका दिया है। एक अक्टूबर,1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में जन्मे कोविंद मूलतः वकील रहे और केंद्र सरकार की स्टैंडिंग कौसिल में भी काम कर चुके हैं। आप 12 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहे। भाजपा नेतृत्व में दलित समुदाय की वैसे भी कम रही है। सूरजभान, बंगारू लक्ष्मण, संघ प्रिय गौतम, संजय पासवान, थावरचंद गेहलोत जैसे कुछ नेता ही अखिलभारतीय पहचान बना पाए। रामनाथ कोविंद ने पार्टी के आंतरिक प्रबंधन, वैचारिक प्रबंधन से जुड़े तमाम काम किए, जिन्हें बहुत लोग नहीं जानते। अपनी शालीनता, सातत्य, लगन और वैचारिक निष्ठा के चलते वे पार्टी के लिए अनिवार्य नाम बन गए। इसलिए जब उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया तो लोगों को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। अब जबकि वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं तो उनपर उनके दल और संघ परिवार का कितना भरोसा है , कहने की जरूरत नहीं है। रामनाथ कोविंद की उपस्थिति दरअसल एक ऐसा राजनेता की मौजूदगी है जो अपनी सरलता, सहजता, उपलब्धता और सृजनात्मकता के लिए जाने जाते हैं। उनके हिस्से बड़ी राजनीतिक सफलताएं न होने के बाद भी उनमें दलीय निष्ठा, परंपरा का सार्थक संयोग है।

कायम है यूपी का रूतबा

उत्तर प्रदेश के लोग इस बात से जरूर खुश हो सकते हैं कि जबकि कोविंद जी का चुना जाना लगभग तय है,तब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों पदों पर इस राज्य के प्रतिनिधि ही होगें। उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी जिस तरह सिमट रही है और विधानसभा चुनाव में उसे लगभग भाजपा ने हाशिए लगा दिया है, ऐसे में राष्ट्रपति पद पर उत्तर प्रदेश से एक दलित नेता को नामित किए जाने के अपने राजनीतिक अर्थ हैं। जबकि दलित नेताओं में केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत भी एक अहम नाम थे, किंतु मध्यप्रदेश से आने के नाते उनके चयन के सीमित लाभ थे। इस फैसले से पता चलता है कि आज भी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री की नजर में उत्तर प्रदेश का बहुत महत्व है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक विजय ने उनके संबल को बनाने का काम किया है। यह विजययात्रा जारी रहे, इसके लिए कोविंद के नाम का चयन एक शुभंकर हो सकता है। दूसरी ओर बिहार का राज्यपाल होने के नाते कोविंद से एक भावनात्मक लगाव बिहार के लोग भी महसूस कर रहे हैं कि उनके राज्यपाल को इस योग्य पाया गया। जाहिर तौर पर दो हिंदी ह्दय प्रदेश भारतीय राजनीति में एक खास महत्व रखते ही हैं।

विचारधारा से समझौता नहीं

रामनाथ कोविंद के बहाने भाजपा ने एक ऐसा नायक का चयन किया है जिसकी वैचारिक आस्था पर कोई सवाल नहीं है। वे सही मायने में राजनीति के मैदान में एक ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिसने मैदानी राजनीतिक कम और दल के वैचारिक प्रबंधन में ज्यादा समय दिया है। वे दलितों को पार्टी से जोड़ने के काम में लंबे समय से लगे हैं। मैदानी सफलताएं भले उन्हें न मिली हों, किंतु विचारयात्रा के वे सजग सिपाही हैं। संघ परिवार सामाजिक समरसता के लिए काम करने वाला संगठन है। कोविंद के बहाने उसकी विचारयात्रा को  सामाजिक स्वीकृति भी मिलती हुयी दिखती है। बाबा साहेब अंबेडकर को लेकर भाजपा और संघ परिवार में जिस तरह के विमर्श हो रहे हैं, उससे पता चलता है कि पार्टी किस तरह अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने के लिए बेचैन है। राष्ट्रपति के चुनाव के बहाने भाजपा का लक्ष्यसंधान दरअसल यही है कि वह व्यापक हिंदू समाज की एकता के लिए नए सूत्र तलाश सके। वनवासी-दलित और अंत्यज जातियां उसके लक्ष्यपथ का बड़ा आधार हैं। जिसका सामाजिक प्रयोग अमित शाह ने उप्र और असम जैसे राज्यों में किया है। निश्चित रूप से राष्ट्रपति चुनाव भाजपा के हाथ में एक ऐसा अवसर था जिसके वह बड़े संदेश देना चाहती थी। विपक्ष को भी उसने एक ऐसा नेता उतारकर धर्मसंकट में ला खड़ा किया है, एक पढ़ा-लिखा दलित चेहरा है। जिन पर कोई आरोप नहीं हैं और उसने समूची जिंदगी शुचिता के साथ गुजारी है।

राष्ट्रपति चुनाव की रस्साकसी

राष्ट्रपति चुनाव के बहाने एकत्रित हो रहे विपक्ष की एकता में भी एनडीए ने इस दलित नेता के बहाने फूट डाल दी है। अब विपक्ष के सामने विचार का संकट है। एक सामान्य दलित परिवार से आने वाले इस राजनेता के विरूद्ध कहने के लिए बातें कहां हैं। ऐसे में वे एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिसे उसके साधारण होने ने ही खास बना दिया है। मोदी ने इस चयन के बहाने राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ दिया है। अब विपक्ष को तय करना है कि वह मोदी के इस चयन के विरूद्घ क्या रणनीति अपनाता है।

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्लषेक हैं)

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85 से 95 परसेंट कमीशन पर अब भी बदले जा रहे हैं पुराने नोट!

Yashwant Singh : 2019 के लोकसभा चुनाव में मीडिया पर जितना पैसा बरसने वाला है, उतना कभी न बरसा होगा… कई लाख करोड़ का बजट है भाई…. मोदी सरकार भला कैसे न लौटेगी… और हां, नोट अब भी बदले जा रहे हैं.. 85 परसेंट से लेकर 95 परसेंट के रेट पर… यानि पुराना नोट लाओ और उसका पंद्रह से पांच परसेंट तक नया ले जाओ…. लाखों करोड़ रुपये का गड़बड़झाला है ये नोटबंदी… उपर से कहते हैं कि न खाउंगा न खाने दूंगा…

भइये, जब सारा का सारा अकेले खा गए तो भला दूसरे को कैसे खाने दोगे… और, जो तुम खुद खाए हो उसमें इस तरह से सरकारी, अर्द्ध सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं-एजेंसियों को मिलाए हो कि सब कुछ सरकारी, सहज, स्वाभाविक लग रहा है… किसी की औकात नहीं है जो नोटबंदी के घोटाले को उजागर कर सके जिसमें साहब एंड कंपनी ने कई लाखों करोड़ रुपये बनाए हैं और अब भी बनाए जा रहे हैं…

जी हां, काम चालू आहे… ये मेरा दावा है… ये मेरा खुला आरोप है… एनआरआई कोटे के नाम पर यह सारा धंधा चल रहा है… एनआरआई कोटा क्या है, इससे संबंधित खबर नीचे दे रहा हूं… इस घोटाले-गड़बड़झाले के तह तक जाने के लिए बूता चाहिए जो आज दुर्भाग्य से किसी मीडिया हाउस के बूते नहीं है… इतने भारी पैमाने पर पैसे देकर मीडिया हाउस खरीदे जा रहे हैं कि पूछो मत… जो नहीं बिक रहे, उन्हें लाठी-डंडे से लेकर छापे और जेल की राह की ओर धकेला जा रहा है.

वेब जर्नलिज्म में अभी ये संसाधन नहीं कि बड़े स्तर के खोजी अभियान चला सकें… जो बड़े घराने वेब जर्नलिज्म में आ रहे उनसे खोजी पत्रकारिता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वे पहले से ही गले तक दलाली और धंधेबाजी से मालामाल हुए पड़े हैं… देखते हैं… कुछ तो करना पड़ेगा.. काम मुश्किल है लेकिन किसी को तो हाथ लगाना पड़ेगा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shashank Singh नोटों की गिनती RBI में अभी तक चालू है… कितना रुपया आया था, अभी तक बता नहीं रहे हैं. बैंकों ने क्या बिना गिने नोट ले लिये थे? उपर से तुर्रा ये कि बच्चन से लेकर टुच्चन तक सब नोटबन्दी के गुण गा रहे हैं..

Yashwant Singh खेल चल रहा है अभी… नोट बदले जा रहे हैं… जो खुद पचासी परसेंट रख रहे हैं पुराने नोट का, वो लोग कौन हैं… इसकी शिनाख्त बस कर लीजिए… सारा खेल सबको पता चल जाएगा…

Shashank Singh आप की बात ठीक होगी… लोग पकड़े जा रहे हैं, कभी कभी खबर भी छप रही है… NRI लोगों के लिये 30 जून तक का समय दिया था नोट बदलने के लिये।

Yashwant Singh आप एनआरआई की छोड़िए, आप कोई देशी आदमी लाइए पुराने नोटों के साथ, मैं उसे पचासी प्रतिशत कमीशन पर बदलने वाले रैकेट से मिलवा दूंगा..

Vikas Yadav Journalist बीजेपी वाले खाते नहीं, लूटते हैं. डकैत हैं.

Yesh Arya इसी 85℅ के चक्कर मे सबकुछ cumputerised होने के बाबजूद भी RBI अभी तक यह नही बता रहा कि कितने 500 और 1000 के नोट जमा हुये कह रहा है गिने नही गये क्या बिना गिने जमा हो गये, मार्च में वित्त मंत्री 8 दिसंबर 2016 के आंकड़े दे रहे थे। रोज शाम को हर बैंक और करेंसी चेस्टों से RBI को नकदी की सूचना देना अनिवार्य होता है।


ये है एनआरआई कोटे से संबंधित खबर…

एनआरआई कोटे के नाम पर अब भी भारी कमीशन देकर 500-1000 के पुराने नोट बदल रहे….

मुंबई : नोटबंदी के इतने समय बाद भी आप अपने पुराने नोटों को बदल सकते है । बंद हुए 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को अभी भी नए नोटों से बदला जा रहा है पर इसके लिए आपको बहुत मोटा कमीशन देना होगा। अनिवासी भारतीय (एनआरआई) को 30 जून तक पुराने नोट बदलने की अनुमति सरकार ने दे रखी है। यह एन.आर.आई. मोटा कमीशन लेकर आपके पुराने नोट बदलवाने के धंधे में लगे हुए हैं। इस धंधे से जुड़े एक व्‍यक्ति ने बताया कि इस काम के लिए प्रत्‍येक 100 रुपए पर 91 रुपए का कमीशन लिया जा रहा है। यदि आप एक करोड़ रुपए बदलवाना चाहते हैं तो आपको बदले में केवल 9 लाख रुपए के ही नए नोट मिलेंगे।

इतना मोटा कमीशन लोग क्‍यों दे रहे हैं, इस सवाल पर उस व्‍यक्ति ने बताया कि ये ऐसे लोग हैं जो सरकार को अपने धन का स्रोत नहीं बताना चाहते हैं। जिन लोगों ने अभी तक अपने धन के स्रोत का खुलासा नहीं किया है उन्‍हें डर है कि कहीं भविष्‍य में उनके आय के स्रोत का पता सरकार को न चल जाए, इसलिए वे अपना काला धन मोटा कमीशन देकर बदलवा रहे हैं। आरबीआई के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है। उन्‍होंने बताया कि इस तरह के नोट बदलने के बारे में उन्‍होंने भी सुना है लेकिन उन्‍होंने कहा कि इस पर रोक लगाने का अधिकार उनके पास नहीं है। अधिकारी ने बताया कि एनआरआई फुलप्रूफ डॉक्‍यूमेंट्स के साथ नोट बदल रहे हैं, ऐसे में उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। 2 जनवरी को आर.बी.आई. ने कहा था कि एनआरआई मुंबई, दिल्‍ली, चेन्‍नई, कोलकता और नागपुर स्थित आरबीआई ऑफि‍स में 30 जून 2017 तक अपने पुराने नोट बदल सकते हैं। एन.आर.आई.के लिए नोट बदलने की सीमा फेमा कानून के मुताबिक प्रति व्‍यक्ति 25,000 रुपए है।

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मोदी राज में भारतीय मीडिया में नए तरह का खौफ, पत्रकार दबाव में : न्यूयार्क टाइम्स

भारत में मीडिया पर मोदी राज के खौफ को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाएं शुरू हो गई हैं. न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि 2014 में जबसे मोदी ने सत्ता संभाली, भारत के पत्रकारों को काफी दबाव का सामना करना पड़ रहा है. न्यूयार्क टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकालमें भारत के मीडिया में एक नए तरह का खौफ है. इन छापों ने भारतीय मीडिया के लिए खतरे की घंटी बजा दी है.

सबसे हास्यास्पद बात ये है कि न्यूयार्क टाइम्स के आरोपों का जवाब केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने दिया है, जो खुद सरकारी तोता के नाम से कुख्यात है. सीबीआई ने न्यूयार्क टाइम्स को पत्र लिखकर कहा है कि भारत को न्यूयार्क टाइम्स से प्रेस की आजादी के बारे में पाठ पढ़ने की जरूरत नहीं है. इस पूरे प्रकरण को कई अंग्रेजी-हिंदी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है. नीचे राजस्थान पत्रिका अखबार में प्रकाशित खबर की कटिंग दी जा रही है. साफ साफ पढ़ने के लिए न्यूज कटिंग के उपर ही क्लिक कर दें….

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मोदी सरकार की नीतियों से देश का बहुत कुछ बर्बाद हो गया

तीन साल पहले उन दिनों जब ‘अच्छे दिन’ का नारा दिया गया था, किसान, नौजवान सब खुश थे क्योंकि घोटालेबाज कांग्रेस सरकार के जाने और नई मोदी सरकार के आने की उम्मीद सबको लगने लगी थी। लेकिन मोदी सरकार ने जो कुछ था ठीकठाक उसे भी तबाह कर डाला। सवाल यह उठता है कि ये देश सिर्फ कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं या भक्तों भर का है जो क्षण क्षण में देशद्रोही, उपद्रवी का प्रमाण पत्र बांटते फिरते हैं या ये सवा सौ करोड़ वासियों का देश है जहाँ 80 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। 60 करोड़ लोग भूखे हैं। लेकिन भक्त मण्डली ये भजन करती है कि गरीब निक्कमे हैं, काम नहीं करते। फ्री में खाना चाहते हैं। अरे भैय्या आपके पास ऐसा कौन सा काम है जो सवा सौ करोड़ वासियों को रोजग़ार देने का वादा करते हैं। जो वादा सरकार नहीं कर पा रही है वह भक्त मंडली कर रही है।

कितना भयावह है भविष्य : देश में ब्लैक मनी का कारोबार ढाई लाख करोड़ से ज्यादा था। जब यह बंद हुआ तो 4 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए। इन्हें रोजगार देने के कोई विकल्प तैयार नहीं किये गए। बल्कि हायर एंड फायर को क़ानूनी मान्यता देने के प्रयास किये जाने लगे। नतीजन लोग खेती की तरफ भागे। नोटबंदी के बाद जो नीतियां बनी वह भी गला घोंटने वाली थी।

देश में चौतरफा घाटा : अब सरकार की नीतियों के कारण जीडीपी में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है। 15 लाख करोड़ रुपये टैक्स के रूप में पाने वाली भारत सरकार इस साल 12 से 13 लाख करोड़ ही पा सकती है। अब इसे 15 लाख करोड़ करने के प्रयास में कानून का शिकंजा कसेगा, पुलिस की अवैध उगाही बढ़ेगी। नतीजन जनता में आक्रोश फैलेगा। ऊपर से 10 लाख करोड़ का npa एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा वाली कहावत चरितार्थ करेगा। इसके बावजूद भी भारत सरकार को दूसरे देश में बसे लोगों के पेट की चिंता सता रही है। नतीजन पड़ोसियों को सस्ता कर्ज, विदेशों से हथियार खरीदी पर फ़ोकस किया जा रहा है। और विदेशी भारत को बड़ी दुकान के रूप में देख रहे हैं। तो हथियारों की अवैध तस्करी तेज हो सकती है। एक अव्यवस्था की खीझ हर तरफ पड़ती है। और इसका असर सीमा पर जवानों पर भी पड़ने की आशंका है। जो भयावह हो सकता है।

महंगाई नहीं बढ़ेगी : चूँकि गैर कानूनी तरीके से की गई नोटबंदी के बाद लोग कृषि की तरफ पलायन कर गए हैं इसलिए खूब पैदावार होने की संभावना है। इसलिए महंगाई तो नहीं बढ़ेगी। लेकिन व्यापारी एक गणित लगा रहे हैं कि किसी तरह ऐसे जिंसों को एक साथ खरीद लिया जाये। जिससे बाजार में इसकी भारी कमी हो जाये। और सरकार उनसे यही फसल दोगुने दाम पर खरीदने को मजबूर हो।

समाधान क्या है : समाधान एक ही है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम लागू की जाय जिसके तहत हर माह हर नागरिक को न्यूनतम 3 हजार की इनकम निश्चित की जा सके। तभी इस भयावह महामारी पर काबू पाया जा सकता है नहीं तो गृह युद्ध से कोई नहीं रोक सकता है।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
maheshwari_mishra@yahoo.com
पत्रकार

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मोदी की नई विज्ञापन नीति : छोटे अखबार वाले अगर चोर हैं तो बड़े वाले पूरे डकैत हैं!

Sanjay Sharma : केंद्र सरकार की प्रिंट मीडिया विज्ञापन नीति 2016 को लेकर लघु और मध्यम अखबारों के प्रकाशक लगातार लड़ाई लड़ रहे है। इस लड़ाई के तहत हम लोगों के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई याचिका दायर की जा चुकी है। मध्य प्रदेश में बीते वर्ष योजित एक याचिका के बाद DAVP के कुछ अधिकारी लघु और मध्यम अखबारों को फर्जी साबित करने और नीति को सही ठहराने के प्रयास में जुटे है।

अगर कुछ देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि लघु और मध्यम अखबारों में खामियां है तो क्या बड़े अखबारों में नहीं है? बिना इम्पेनलमेन्ट के बड़े अखबारों को विज्ञापन देना, दैनिक अखबार के लिए जारी विज्ञापन साप्ताहिक अखबार में प्रकाशित करना… इसके अलावा अभी 4 दिन पहले प्रधानमंत्री जी के फोटो वाले विज्ञापन सरकार के तीन साल पूरे होने के अवसर पर देश के सभी अखबारों में छापे गए… यह विज्ञापन जैकिट पर प्रकाशित क्यों हुए… क्या कोई बतायेगा कि इन विज्ञापनों का पेज नंबर क्या है… क्या यह डकैती और सरकारी धन का दुरुपयोग नहीं है… 

विज्ञापन कई दिन से लगातार जारी किए जा रहे हैं। मीडिया लिस्ट रिपीट हो रही है। सारे विज्ञापन एक ही लिस्ट के आधार पर जारी किए गए। क्या इसमें रोटेशन नहीं होना चाहिए। इस सब के बावजूद सरकार की नीति बहुत बढ़िया है। मैं ऐसे कई बड़े अखबारों को जानता हूं जिनकी आन रिकार्ड प्रसार संख्या लाख में है पर असलियत में वह 10 हजार भी नहीं छपते। इस सब के बावजूद DAVP के अधिकारी बहुत ईमानदार हैं।

DAVP के हर अधिकारी की एक अपनी लिस्ट होती है। आखिर क्यों? जो हुआ उसमें अधिकारियों की लिप्तता से इनकार सरकार को नहीं करना चाहिए। पर नजर केवल एक तरफ है… यह तो ठीक नहीं है। छोटे अखबार वालों को चोर और बड़े वालों को डकैत कहा जाना चाहिए। सरकार को भेदभाव नहीं करना चाहिए। कानून सबके लिए बराबर है। पर यहाँ तो एक साल से भेदभाव ही देखने को मिला रहा है। लड़ाई जारी है…

नोएडा से छपने वाले अखबार एनसीआर टुडे के एडिटर संजय शर्मा की एफबी वॉल से.

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Central government passed bill just before Ramzan to cause problems to Muslims!

Supreme court, President of India do Justice to Save India… Bismillah ir Rahman ir Rahim. One Country, two slaughter laws, Based on Religion is Pakistani Mentality, not Indian. Central gov passed a law that Cows and Buffallo cannot be traded for slaughter or transportation. Ok, MS Maneka Gandhi, if Central gov passed law which forbids sale or transportation of Cows and Buffallos for slaughter, then why are the 10 big butcher houses of india, which are owned by hindus, are slaughtering Lakhs  of Buffallo daily and sending  the beef to foreign countries.

Central gov passed this bill just before Ramzan to cause Problems to Muslims. But mr Modi, we Muslims wont die if we wont eat cow or Buffallo’s beef. I call upon the President of India, supreme court to Immediately order the closure of Butcher houses located in Mumbai, Up and rest of central and north India, which slaughter Buffallo and send beef to foreign country, if Indian laws are not bigotry.

Supreme court, if in UP or Mh or Rj someone possess 100 gms of beef, he would get 7 years of prison or mob lynching, under government’s supervision. But anyone in these same states should also get 7 years imprisonment, for using belt, Bags, purses, sofa covers, car seats made up of cow or buffalo Skin.

Supreme court ban leather industry in India which relies on Cow or Buffallo skin, Because according to Indian gov, cow or buffallo cant be slaughtered, then how can leather industry use their Skin to make bags, purses, belts, car seats etc etc.

MR President sir, honourable Supreme court, implement central gov law by banning Leather industry in India completely. This is India, this is not Bangladesh, that there should be two eating  laws for Muslims and hindus. Judges and gov of bangladesh are slaves of rich Bangladeshi businessmen.

But judges, courts and President of India are not slaves of rich indian businessmen , nor do they take bribe from rich businessmen, nor are they communally bigot, like bangladeshi  institutioons. Our Indian courts, judges, President are sincere, free from all sorts of bribes, influences and communal Fanaticism.

So my request our Country’s Courts and President to ban all big slaughter houses which send beef to foreign countries Immediately, plus ban leather industry in India Completely which relies on Cow or Buffallo skin. I also call upon Supreme court and President of India, National Human rights commission, to give rs 10 crore compensation per family per person killed ,  of all those Muslims who were Moblynched since bjp gov came to power in india. Why is Supreme court, Judiciary and President of India silent over Mob lynching of Muslim minority Men, why? I hope the reason is not dirty communal biase.

Jai hind. 

MD Rizwan S

mdrizwans.engineer@gmail.com

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मोदी राज में अखबार सरकारी तोता बन गए और न्यूज चैनल चमचा!

Priyabhanshu Ranjan : अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में अभी से जुटे अमित शाह 95 दिन का देशव्यापी दौरा कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व अगले 100 दिनों का एक्शन प्लान तैयार कर चुका है और सख्ती से उस पर अमल भी कर रहा है। केंद्रीय मंत्री मीडिया को लगातार इंटरव्यू देकर मोदी सरकार के तीन साल की अपनी झूठी-सच्ची “उपलब्धियां” गिना रहे हैं । देश का एक बड़ा तबका उनकी बातें सुन भी रहा है। लेकिन विपक्ष, मीडिया और सोशल मीडिया क्या कर रहा?

विपक्ष सो रहा है। राहुल गांधी को करीब एक हफ्ते बाद झारखंड की घटना पर ट्वीट करने का आइडिया आया। न्यूज चैनल कभी “पंचायत…”, कभी “एजेंडा…” और कभी “…एडिटर्स राउंड टेबल” आयोजित कर किसी तरह 24 घंटे का चैनल चला रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस को छोड़कर बाकी सारे अखबार सरकारी तोता बन बैठे हैं। न्यूज पोर्टलों में दि वायर को छोड़ दें तो बाकी को सेक्स और मोदी की तारीफ भरी खबरों से ही फुरसत नहीं है। सोशल मीडिया पर हम जैसे लोग यज्ञ-हवन और परेश रावल के ट्वीट में उलझे हुए हैं! ऐसा विपक्ष, ऐसी मीडिया और ऐसी खाई-अघाई जनता हो तो मोदी सरकार को और क्या चाहिए?

Arun Maheshwari : इससे अधिक चापलूसी क्या हो सकती है! प्रधानमंत्री ने पिछले तीन साल में दुनिया के कई देशों की यात्राएँ की, नेताओं से दोस्ती से लेकर विभिन्न समुदायों के लोगों से दोस्ती के कई नाटक खेलें। अभी टीवी के चैनलों पर विदेश नीति के कुछ ‘विशेषज्ञ’ प्रधानमंत्री की इन शैलानियों की तरह की यात्राओं को ही उनकी विदेश नीति की बड़ी सफलता बता रहे थे। एक चैनल पर सुन रहा था कि भारत के किसी प्रधानमंत्री ने नेपाल की यात्रा नहीं की, जो नरेन्द्र मोदी ने की। नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ के घर पर शादी में पहुंच गये, जो किसी ने नहीं किया। और, श्रीलंका में बौद्धों के सम्मेलन में जाकर उन्होंने श्रीलंका के सिंहली लोगों के दिल को जीत लिया।

कोई यह सवाल नहीं कर रहा था कि इन महान यात्राओं के बाद ही ऐसा क्या हुआ कि नेपाल से और पाकिस्तान से रिश्तों में भारी गिरावट आ गई? इसी प्रकार चीन की पहल पर वन बेल्ट वन रोड के शिखर सम्मेलन में बिना किसी वाजिब वजह के भारत के न जाने पर भी कोई सवाल नहीं कर रहा था, जबकि उसमें दुनिया के ढेर सारे देशों के राष्ट्राध्यक्ष तक शामिल हुए थे। विदेश नीति के मसले पर मोदी सरकार की प्रशंसा से बड़ी चापलूसी भी क्या मुमकिन है? एंकर महरूफ रजा थे, अन्यों में शेषाद्रि चारी थे।

पत्रकार द्वय प्रियभांशु रंजन और अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

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रजत शर्मा, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, गौरव सावंत ने उस ‘एकपक्षीय’ मीडिया को ‘बहु-पक्षीय’ बनाया!

Abhinav Shankar : आज जब मोदी सरकार के तीन साल पूरे हुए हैं तो इन तीन सालों में हुए बदलावों पर स्वाभाविक रूप से पूरे देश में चर्चाओं का एक दौर चला है। जाहिर है कई विषयों पर चर्चा होगी। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक, रणनीतिक। मैं आज इन विषयों पर बात नहीं करना चाहता। इसके कई कारण हैं। पहला तो ये कि मैं अक्सर इन क्षेत्रों में हो रहे बदलावों पर ब्लॉग वगैरह पर लिखता रहा हूँ। दूसरा, आज इन चीजों पर पहले ही टनों स्याही बहाई जा चुकी होगी और तीसरा जिस विषय पर में बात करना चाहता हूं वो आज शर्तिया नहीं हुई होगी या हुई भी होगी तो उस परिप्रेक्ष्य में नहीं हुई होंगी जिस परिपेक्ष्य में होनी चाहिए।

मोदी सरकार में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वो मीडिया में आया है। रजत शर्माओं, अरनबों, सरदानाओं, सुधीर चौधरियों, गौरव सावन्तों और मारूफ रजाओं का आविर्भाव भारतीय मीडिया के course of evolution का एक महत्वपूर्ण devlopmemt है। लोकतंत्र में आदर्श स्थिति ये होती है कि मीडिया निष्पक्ष रहे। भारत मे पत्रकारिता लगभग शुरू से वैचारिक स्तर पर एक खास ओर झुकी रही पर पिछले लगभग 12 सालों से जबसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया ये ‘वैचारिक झुकाव’ शनै शनै ‘दलीय पक्षधरता’ में बदलता चला गया। और जब संघवियों, बरखाओं, सरदेसाईओं और रविशों जैसे पत्रकारिता के सबसे बड़े नाम एक साथ एक समूह के तौर पर एक पक्ष में जा मिलें तो ये स्वाभाविक हो गया था कि एक institution के तौर पर पत्रकारिता में इस ‘पक्षधरता’ के मुकाबिल एक ‘विपक्ष’ भी उभरे।

लोकतंत्र की बेहतरी के लिए ये जरूरी है कि लोकतंत्र में संस्थाएं (जिसमे press भी आता है-लोकतंत्र का चौथा स्तंभ) या तो निष्पक्ष हों या बहुपक्षीय। लोकतंत्र में एकपक्षीय संस्था से घातक कुछ नहीं होता। प्रेस कुछ दिनों से पूरी तरह से एकपक्षीय हो गया था। रजत शर्मा, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, गौरव सावंत ने उस ‘एकपक्षीय’ मीडिया को ‘बहु-पक्षीय’ बनाया। मोदी सरकार के इन तीन सालों का ये सबसे बड़ा बदलाव है और एक शुभ बदलाव है। ये स्थिति भले निष्पक्ष मीडिया के utopian अवधारणा जैसी आदर्श नही है पर ‘एकपक्षीय’ मीडिया के त्रासदी से लाखों गुणा बेहतर है।

बल्कि एक दृष्टि से बहुपक्षीय मीडिया ‘निष्पक्ष मीडिया’ के अवधारणा के काफी पास है। उदाहरण के तौर पर- जब पाकिस्तान के संदर्भ में अर्णब आक्रामक तौर-तरीको की पैरवी करते हुए उसके लाभों को गिनाते हैं और बरखा pacifist appeal करते हुए युद्ध की कीमत याद दिलाती हैं; तो भले व्येक्तिक-स्तर पर वो दो विरोधी पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों पर मीडिया के ‘collective-conscious’ के व्यापक परिदृश्य पर वो दोनों संयुक्त तौर पर एक संतुलित और ‘निष्पक्ष तस्वीर’ ही सामने रखते हैं। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ये उस स्थिति से भी कहीं ज्यादा बेहतर है जब इस मामले में बरखा के अकेले show में वो आदतन pacifist appeal करते हुए देश को युद्ध की कीमत याद दिलाती रहती थी। और जिसके बरबक्स पाकिस्तान के establishment को ये तर्जुमा होता था कि there is no cost of spreading terrorism in India and India will not retaliate back as they fear for cost of a war with us.

दरअसल निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया की संकल्पना तक पहुँचने का व्यवाहारिक रास्ता है। हमें रजत शर्माओं, अर्णबों, सरदनाओं और सुधीर चौधरियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने जाने-अनजाने वैचारिक पूर्वाग्रह के बोझ से एकपक्षीय होती देश की मीडिया को बहु-पक्षीय और तदसमात निष्पक्ष बनाया। मोदी सरकार के तीन सालों में आया ये परिवर्तन एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है जो अपने साथ दूरगामी प्रभाव लिए आया है।

कई कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे अभिनव शंकर की एफबी वॉल से.

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मोदी के तीन साल पूरे होने पर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया यह संदेश!

बीजेपी को बहुमत मिलने पर एक मोदीभक्त 16 मई 2014 को ख़ुशी के मारे बेहोश हुआ और सीधा कोमा में चला गया था। लगभग 36 महीने कोमा में रहने के बाद कल ही उसे होश आया। होश में आते ही उसने अपने डाक्टर दोस्त से निम्न प्रश्न पूछे ….

1. भ्रष्टाचार मुक्त भारत में कैसा लगता हैं?

2. रोबर्ट वाढरा कौनसी जेल में हैं?

3.राहुल और सोनिया भी जेल में है या इटली भाग गए?

4. ओबामा हिंदुस्तान के सामने अभी भी नाक रगड़ रहे हैं या मोदी जी ने उन्हें माफ़ कर दिया?

5. लाहौर को राजस्थान में जोड़ दिया या पंजाब में?

6. हिंदी भाषा चीन की फर्स्ट लैंग्वेज बन गयी या अभी भी चायनीज ही हैं?

7. अपने लहौलिया गांव से लखनऊ जाने के लिए बुलेट ट्रैन ठीक रहेगा या हवाई जहाज?

8. काला धन गिनने में कितने दिन लगे?

9. 35 रुपये में एक डॉलर मिलता हैं की नहीं?

10. जीवनावश्यक बोलके, सब्जी- प्याज- टमाटर तो मोदी जी ने फ्री कर दिए होंगे?

11.धारा 370 हटाने के बाद सांप्रदायिक दंगे हुए क्या?

12. राममंदिर बनने में कितने दिन लगे?

13. मुझे अंधभक्त बोलने वाले तो अब चुल्लूभर पानी में डूब मरे होंगे?

इन सवालों को सुनकर बेचारा डॉक्टर कोमा में चला गया। अब तो बेचारे डॉक्टर का इलाज़ चल रहा है, लेकिन पूरे हॉस्पिटल ने उम्मीद छोड़ दी है! और, प्रश्नों का उत्तर सुन सुन कर भक्त की स्थिति ऐसी हो गई कि उसे ”आगरा” में एडमिट करा दिया गया है!

ऑस्ट्रेलिया में ब्रेट ली ने नरेंद्र मोदी के पैर पकड़ लिए और पूछा- इतनी तेज कैसे फेंक लेते हो प्रभू 🙂

(सौजन्य : फेसबुक / ह्वाट्सएप)

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भाजपा सांसद केसी पटेल की ‘इज्जत’ लूटने वाली महिला हुई अंदर… भामाकीजैजै!!

Vishnu Rajgadia : दिल्ली में बलात्कार की शिकार एक महिला ने कई दिन पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाए। मामला दर्ज नहीं हुआ। तब वह कोर्ट गई। कोर्ट ने पुलिस को मामला दर्ज करने का आदेश दिया। यह पता लगने पर आरोपी (भाजपा सांसद के.सी. पटेल) ने महिला पर ही बहला-फुसलाकर इज्जत लूटने का आरोप लगा दिया। अब पुलिस उस पीड़िता के ही खिलाफ जाँच कर रही है और गिरफ्तार कर अंदर कर दिया। अगर महिला की गलती थी, तब भाजपा सांसद अब तक चुप क्यों थे? उन्होंने उसी दिन पुलिस को रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई, जिस दिन महिला ने उनकी इज्जत लूटी थी। मोदी-मोदी की रट लगाने वाले भक्त अगर अब भी इन चीजों का मतलब न समझें, तो कल किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। पापी सिर्फ वह नहीं, जो पाप करे। उसमें मौन सहमति भी पाप है।

Deshpal Singh Panwar : वैसे तो यहां लोकतंत्र है लेकिन इस लोकतंत्र के साफ-साफ दो रास्ते हैं एक राजपथ-दूजा जनपथ। देख लीजिए किसी पर यौन शोषण का आरोप अगर कोई लड़की या महिला लगाती है तो जनपथ पर चलने वाला कोई भी शख्स गरम लू यानी सींखचों के अंदर जाने से बच नहीं पाता। पुलिस ऐसे टूट पड़ती है जैसे ये है ही लफंगा जो राह चलते छेड़ता है लेकिन बात जब राजपथ वालों की आती है तो आखिर खाकी खामोश क्यों हो जाती है…भाजपा के सांसद के सी पटेल का मामला ऐसा ही है…क्या वो बच्चे हैं जो कोई लड़की या महिला उन्हें उनकी इच्छा के बिना इस हनी शिकंजे में कस लेगी…

अब वो खुद को मासूम और महिला को कसूरवार ठहरा है जबकि खुद उनकी सिफारिश पर 11 महीनें तक एक मकान उस महिला को दिया गया.. क्या मजाक है..भाजपा वाले आंख के अंधे और कान के बहरे और बेदिल हो सकते हैं लेकिन सारा देश नहीं.. हैरत देखिए भाजपा सांसद से तो कुछ पुलिस ने पूछा नहीं हां उस महिला को जरूर अंदर कर दिया… क्या मामले की जांच में दूध का दूध और पानी का पानी होने तक पुलिस को खामोश नहीं रहना चाहिए था..इस पूरे मामले में अगर महिला दोषी है तो सांसद उससे भी ज्यादा फिर एकतरफा एक्शन क्यों..अगर सांसद भाजपा को छोड़ किसी दूजे का दल होता तो क्या मोदी और शाह एंड कंपनी ऐसे ही चुप रहती…चाल, चरित्र और चेहरे पर ये मामला पूरी तरह फिट बैठता है…अब भी समय है कि कमल वाले ऐसे चेहरों को काबू में करें वरना जहां कमल खिलता है वहां दलदल अक्सर सूख जाया करते हैं.. बाकी उनकी इच्छा…. बोलो भामाकीजैजै!!

वरिष्ठ पत्रकार द्वय विष्णु राजगढ़िया और देशपाल सिंह पंवार की एफबी वॉल से.

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गोरों की तरह बदमाश है भारत में कालों की सरकार!

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों… तो क्या ऐसा ही वतन आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों ने हमारे हवाले किया था, जैसा हमने इसे बना दिया है? क्या ऐसे ही वतन के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने हंसते हंसते फांसी का फंदा चूमा था? देश को आजाद कराने के लिए हिंदुओं की ही तरह मुसलमानों ने भी आपस में मिलकर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था। गोरों की सरकार ने अपनी फौज के माध्यम से हिंदुओं, सिखों, मुसलमानों आदि पर बेइंतिहा जुर्म ढाये। ईसाई अंग्रेजों के अत्याचार की चपेट में इसलिए नहीं आये कि वे खुद ईसाई व इससे मिलती-जुलती कौम के थे।

आज देश की सबसे बड़ी आबादी हिंदुओं का अल्पसंख्यक ईसाइयों के प्रति उतना आक्रोश घृणा नफरत नहीं है जितना अल्पसंख्यक मुसलमानों के प्रति। कमोबेश यही हालत मुसलमानों में हिंदुओं के प्रति है। आखिर क्यों? मुगल शासकों ने हिंदुओं पर शासन किया और शासन के लिए अत्याचार किया। अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों पर शासन किया और इसके लिए जुल्म भी दोनों पर ढाये। आज न हिंदुओं का और न ही मुसलमानों का गुस्सा अंग्रेजों या अंग्रेजी कौम के प्रति है। हिंदुओं के लिए मुसलमान और मुसलमानों के लिए हिंदू कट्टर दुश्मन हो गए हैं, लेकिन ईसाई और अंग्रेज कतई नहीं। आज स्थिति यह है कि पाकिस्तान ही नहीं सारे मुस्लिम देश हमारे आंख की किरकिरी हैं लेकिन ब्रिटेन नहीं।

अपने ही देश में आज स्थिति ऐसी पैदा कर दी गई है कि हिंदू बहुल मोहल्ले से गुजर रहे मुसलमान को एक गेंद लग जाए या मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में बारिश से बचने के लिए किसी छत के नीचे खड़े मुसलमान के सिर पर लिंटर की ईंट लग जाए तो दंगा हो जाए। आजादी की लड़ाई में हर जाति, हर धर्म और संप्रदाय के लोगों ने हिस्सा लिया। इन सबने अपने-अपने सामर्थ्य के हिसाब से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध किया। अलग-अलग जाति और धर्म को मानने के बाद भी सबका लक्ष्य एक था देश की आजादी। हां, यह जरूर कहते हैं कि आर.एस.एस. ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया। जिन आरएसएस के लोगों ने हिस्सा लिया उन्होंने यातना न सह पाने के लिए अंग्रेजों से माफी मांगी और फिर छूटने के बाद वायदे के अनुसार अंग्रेजों की मदद की।

गोरों के समय में जो हालात थे कमोबेश वही हालात हम कालों के समय में भी है। तब भी जरा-जरा सी बात पर हम मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे। आज भी हो जाते हैं। तब भी एक कौम दूसरे कौम से लड़ना नहीं चाहती थी बल्कि उसे लड़ाया/लड़वाया जाता था। आज भी लड़ना नहीं चाहती है लेकिन उसे लड़वाया जाता है। पहले अंग्रेज लड़वाते थे ताकि ये लड़ते रहें और वो शासन करते रहें पर आज कौन लड़वा रहा है और क्यों लड़वा रहा है? पहले ब्रिटिश सरकार ने गाय और सूअर की चर्बी की आड़ में लड़ाने का प्रयास किया आज तीन तलाक, धर्म परिवर्तन / घरवापसी के नाम पर लड़ाने का प्रयास कर रहे हैं। मुझे तो लगता है गोरों की सरकार से ज्यादा बदमाश है कालों की सरकार।

अरुण श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार

देहरादून

संपर्क : 7017748031 , 8881544420 , arun.srivastava06@gmail.com

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किसानों की वायरल हुई ये दो तस्वीरें ‘मोदी गान’ में रत टीवी और अखबार वालों को न दिखेंगी न छपेंगी

Mahendra Mishra : ये तमिलनाडु के किसान हैं। दक्षिण भारत से दिल्ली पीएम मोदी के सामने अपनी फरियाद लेकर आये हैं। इनमें ज्यादातर के हाथों में ख़ुदकुशी कर चुके किसानों की खोपड़ियां हैं। बाकी ने हाथ में भीख का कटोरा ले रखा है। पुरुष नंगे बदन हैं और महिलाओं ने केवल पेटीकोट पहना हुआ है। इसके जरिये ये अपनी माली हालत बयान करना चाहते हैं। इन किसानों के इलाकों में 140 वर्षों बाद सबसे बड़ा सूखा पड़ा है।

ये किसान चाहते हैं कि उन्हें सूखे में खराब हुई फसलों का मुआवजा मिले। साथ ही उनके कर्जे माफ़ कर दिए जाएं। और बुजुर्गों के लिए सरकार पेंशन की व्यवस्था करे। पीएम आवास की तरफ मार्च कर रहे इन किसानों को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। और फिर इन्हें जंतर-मंतर पर लाकर पटक दिया। इनका कहना है कि अब ये लौटकर जाने से रहे। क्योंकि इनके पास वहां खाने के लिए कुछ नहीं बचा है। भले उन्हें यहां भीख ही क्यों न मांगनी पड़े ये यहीं रहेंगे।

देश के लोगों का पेट भरने वाले किसान के हाथ में अगर भीख का कटोरा आ गया है। तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि हालात किस कदर बदतर हो गए हैं। ऊपर से अपनी बदहाली दिखाने के लिए अगर उसे अपने परिजनों की कब्रें खोदकर उनकी खोपड़ियां हाथ में लेनी पड़े तो समझिए सरकारी संवेदना पाताल के किस हिस्से में पहुंच गई है। कहां तो हम दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहे हैं। लेकिन सामाने की हकीकत है कि उसे देखना ही नहीं चाहते। या फिर देखकर भी अनदेखा कर देना चाहते हैं।

महेंद्र मिश्रा सहारा समय, न्यूज एक्सप्रेस समेत कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं.


Satyendra PS : ये​ हरियाणा के किसान हैं,खेतों के लिए पानी मांग रहे थे। नहर का काम पूरा कराए जाने का वादा था वही पूरा कराना चाहते थे ! इस चेहरे में अपना चेहरा देखें, पिता, चाचा, भाई का चेहरा देखें। उन सबका चेहरा देखें जो सरकार से कुछ उम्मीद करते हैं, जो सरकार से कुछ छोटी मोटी सुविधाओं की उम्मीद करते हैं। लोकतंत्र लहूलुहान है। अपने रक्त में नहाया यह देश का किसान है!

सत्येंद्र प्रताप सिंह बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी अखबार के दिल्ली एडिशन में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.


उपरोक्त तस्वीरों पर कुछ टिप्पणियां…

Anil Mishra पानी मांग रहे थे तो सिर्फ लाठी खाये। अगर सरकार इनकी जमीन मांगती तो गोली खाते। इसमें कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा का कोई लेना देना नहीं। यही परम्परा है। लोकतंत्र धोखा है। असल लड़ाई पूँजीवाद वर्सेस सर्वहारा है। गरीब को मार ही खाना है। सरकार किसी की भी हो।

Mahendra K. Singh लोग इस समय “राष्ट्रवाद” की अफीम खाकर मस्त हैं, वे इस तस्वीर में अपने पिता, चाचा, भाई का चेहरा तब तक नहीं देख पाएंगे जब तक उन के चाचा, पिता, भाई खुद इस जुल्म का शिकार न हो जाएँ। वैसे राष्ट्रभक्तों का यह मानना है कि खेती बारी आम लोगों के बस की बात नहीं है, इन लोगों को अपने खेत “राष्ट्रभक्त कॉर्पोरेट” जैसे अम्बानी और अडानियों को सौंप देने चाहिए, वे सेठ लोग फिर इन्ही गरीब लोगों को अपना मज़दूर बना कर उन्ही के खेतों में खेती करवाएंगे, फिर नफे-नुक्सान की कोई चिंता नहीं रह जायेगी, इन सब लोगों को एक निश्चित तनख्वाहें मिलेंगी और फिर सब खुश। अमेरिका में बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यही किया, छोटे-छोटे किसानों के खेत खरीद लिए अब उन पर बड़े पैमाने पर खेती करवाते हैं – जैसे चिप्स बनाने वाली कंपनियां लाखों एकड़ बड़े खेतों में आलू के खेती, ब्रेड बनाने वाली कंपनियां ऐसे ही मीलों तक फैले खेतों में गेहूं की खेती। वही मॉडल भारत में लाकर मोदी जी देश का विकास करना चाहते हैं और इस किसान जैसे कुछ “राष्ट्रद्रोही” मोदी की योजना पर पानी फेरना चाहते हैं – कपार तो फूटना ही चाहिए ऐसे “राष्ट्रद्रोहियों” का।

Shaukat Ali Chechi मैं तहे दिल से लानत भेजता हूं ऐसी सरकारों पर अगर इस देश में ईमानदार है खून पसीने की खाता है गरीब है 70 परसेंट देश को चला रहा है देश की सरहदों की रक्षा करने में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है जिनको सरकार के मंत्री कायर कहते हैं वह है किसान हमारे पूर्वजों ने नारा दिया था जय जवान जय किसान आज उनकी यह हालत उनकी दुर्गति उनका अपमान जो देश का भी पेट भरता है पशु पक्षियों का भी पेट भरता है उसके पैदा करे हुए माल से देश की पहचान व तरक्की है आखिर इनका कौन सा गुनाह है कोई देशवासी तो बताएं

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बैंक ट्रांजैक्शन चार्ज के खिलाफ 6 अप्रैल को बैंक से कोई ट्रांजैक्शन न करें

कृपया सपोर्ट करें… बैंक ट्रांजैक्शन चार्ज के खिलाफ आवाज उठायें… 06 अप्रैल 2017 को कृपया बैंक से कोई ट्रांजेक्शन ना करें ताकि बैंक को पब्लिक का पावर पता चल सके. इस विरोध के कारण शायद बैंक चार्जेज हटा भी दें जो बैंकों ने अभी अभी नया लगाया है. अगर आज हम लोग एक साथ नहीं आये तो आने वाले दिनों में बैंक नए चार्जेज लगाने से नहीं डरेगी. पैसा अपना है तो फिर पैसा लेते वक़्त हम किस बात का चार्ज दें?

पहले पैसा बैंक में डलवाया फिर निकालने नहीं दिया और अब पैसे निकालने पे भी चार्ज. अब तो वक़्त आ गया है बैंकों को पब्लिक पावर दिखाने का. कृपया 6 अप्रैल को कोई भी ट्रांजैक्शन ना करें. अगर हम सब एक साथ हुए तो बैंकों को झुकना ही पड़ेगा. अगर फिर भी बैंक ना माने तो 24, 25, 26 अप्रैल को फिर से पब्लिक पावर दिखाना होगा. कृपया इस पोस्ट को व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर, etc पे शेयर करें और सपोर्ट करें…

धन्यवाद।।।

An initiative for freedom from arbitrary decisions of Indian Banks.

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ऐसे नहीं छोड़ेंगे मोदी जी, आपके झोले की तलाशी होगी!

सहारा की डायरी में पैसे लेने वालों में आपका भी नाम है मोदी जी, फिर आप मौन क्यों हैं? यदि आप निर्दोष हैं तो सहारा के खिलाफ कार्रवाई कराओ…

नोटबंदी की मयाद पूरी हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवम्बर को इस नोटबंदी योजना की घोषणा की थी। उन्होंने जनता से 50 दिन का समय मांगा था। उनका कहना था कि 50 दिन बाद यदि स्थिति न सुधरी तो जनता जिस चौराहे पर चाहे उन्हें सजा दे दे। इसमें दो राय नहीं कि योजना सही थी पर बिना तैयारी के इस योजना को लागू करने पर आम आदमी को जो परेशानी हुई वह छिपी नहीं है। सबके बड़ा कलंक इस योजना पर यह लगा है कि बेईमानों को सबक सिखाने के लिए लाई गई इस योजना ने अब तक 100 से भी अधिक लोगों की कुर्बानी ले ली है। इस योजना में अभी तक किसी भी नेता और पूंजीपति का कुछ नहीं बिगड़ा।

गत दिनों प्रधानमंत्री ने परेशान होकर यह कहा था कि वह तो फकीर हैं, अपना झोला उठाकर चल पड़ेंगे। मोदी जी ऐसे कैसे चल पड़ेंगे। इस योजना में जिन लोगों की मौत हुई है। उनकी पत्नियों के सिंदूर लेकर आपको कैसे जाने देंगे। जिन बहनों की शादी टूटी है उनके आंसूओं को लेकर कैसे जाने देंगे। पैसे न मिलने पर जिन लोगों को जलालत का सामना करना पड़ा है। उस अपमान को लेकर कैसे ले जाने देंगे। पैसा न मिलने पर जिन मकान मालिकों ने किराएदारों की बहू-बेटियों पर कुदृष्टि डाली है। उस अहसास को लेकर कैसे ले जाने देंगे।

सहारा की डायरी में पैसे लेने वालों में आपका भी नाम है। मौन क्यों हैं? यदि आप निर्दोष हैं तो सहारा के खिलाफ कार्रवाई कराओ। 99 और अन्य लोगों के नाम हैं। मामला शांत कैसे हो गया। छापे पड़े तो दो-तीन साल हो गए हैं। सहारा के नोएडा कार्यालय से 134 करोड़ रुपए जब्त हुए थे। आपको  प्रधानमंत्री बने ढाई साल हो गए हैं। सहारा के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई न होना आपको संदेह के घेरे में ला रहा है। यदि बात सही है तो 65 करोड़ रुपए झोले में डालकर कैसे ले जाने देंगे।

काला धन खत्म करने के लिए आपको जहां प्रहार करना चाहिए था वहां नहीं किया। कालाधन तो सबसे अधिक राजनीतिक दलों के पास है। भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के खातों पर जांच करानी चाहिए थी। आपने बसपा और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के भाई के खाते पर जरूर छापेमारी कराई पर अन्य दलों और उसके नेताओं के खातों का क्या कर रहे हैं? देश के भ्रष्ट नौकरशाह का क्या कर रहे हैं? आपने बेईमानों को सबक सिखाने के लिए यह योजना लागू की पर बेईमानों ने तो अपने काले धन को भी सफेद कर लिया। आप कितने दावे करते घूम रहे हों पर अभी तक यदि परेशान हुआ है तो बस आम आदमी ही हुआ है। इस नोटबंदी में बेईमान न तो लाइन में खड़े हुए और न ही उन्हें कोई परेशानी हुई और न ही कोई मरा। आगे भी आम आदमी को परेशानी होती ही दिखाई दे रही है। आम आदमी दो हजार के लिए लाइन में खड़ा रहा और बैंकों की मिलीभगत से बेईमानों ने अरबों-खरबों के नए नोट जुटा लिए, कैसे?

आप जब नोटबंदी पर पूंजीपतियों का कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो बेनामी संपत्ति में क्या बिगाड़ेंगे ? कई पूंजीपति तो बैंकों का 1,14,000 करोड़ कर्जा दबाए बैठे हैं। आप ने तो उनसे यह पैसा वसूल पा रहे हैं और न ही उनके नाम सार्वजनिक कर पा रहे हैं। तो यह माना जाए कि गरीब आदमी से जमा कराया पैसा भी आप इन पूंजीपतियों को लोन के रूप में दे देंगे। यदि भ्रष्टाचार की बात है तो आपने चुनाव से पहले संसद को दागियों से मुक्त करने का आश्वासन जनता को दिया था। सबसे पहले भाजपा सांसदों पर कार्रवाई की बात की थी। क्या हुआ ? मोदी जी अब बातों से काम नहीं चलेगी अब कुछ ऐसा काम करो जो धरातल पर दिखाई दे।

CHARAN SINGH RAJPUT
charansraj12@gmail.com

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सिर्फ मायावती ही क्यों? सरकार में दम हो तो सभी पार्टियों के बैंक खाते चेक करवाए

डा. वेद प्रताप वैदिक
दिल्ली की एक बैंक में मायावती की बसपा का एक खाता पकड़ा गया है, जिसमें नोटबंदी की घोषणा के दो दिन बाद ही 104 करोड़ रु. जमा हुए। अब इस खाते की जांच होगी। क्या खाक जांच होगी? बसपा ही क्यों, सभी पार्टियां बिल्कुल स्वच्छंद हैं, अरबों-खरबों रु. अपने पास नकद या बैंकों में रखने के लिए! हमारी राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार की अम्मा हैं। आप अकेली मायावती को कैसे पकड़ेंगे? वह दिखा देंगी, कई हजार दानदाताओं के नकली नाम, जिन्होंने 20 हजार रु. से कम का चंदा दिया है।

चुनाव आयोग ने 20 हजार से कम चंदे को बेनामी होने की छूट दी है। इस बेनामी छूट का फायदा उठाकर भाजपा और कांग्रेस ने अपने हजारों करोड़ रू के काले धन को सफेद कर लिया है। इस चोर दरवाजे में कौनसी पार्टी है,जो अपनी दुम दबाकर नहीं निकली है? यहां तक कि भारत की दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां, यह दावा नहीं कर सकतीं कि उनके हाथ मैले नहीं हैं। मायावती के पास सिर्फ 104 करोड़ निकले, यह अपने आप में बड़ी उलट-खबर है।

उत्तर प्रदेश में चार सौ विधायक सिर्फ 100 करोड़ याने क्या सिर्फ 25-25 लाख रु. में चुनाव लड़ लेंगे? यदि एक-एक विधायक बहुत कंजूसी करे तो भी उसे 3 से 5 करोड़ रु. चाहिए। याने मायावती के पास 2000 करोड़ तो होने ही चाहिए तो अब कल्पना कीजिए कि भाजपा, सपा और कांग्रेस के पास कितने-कितने हजार करोड़ रु. होंगे?

यदि सरकार में दम हो तो इन सभी पार्टियों के बैंक खाते वह क्यों नहीं चेक करवाती है? सिर्फ मायावती का ही क्यों? अभी तो दिल्ली का (वह भी एक ही खाता) चेक हुआ है। जरा लखनऊ के खाते चेक करवा कर देखे जाएं। पार्टियों के ही नहीं, सभी नेताओं और उनके पिछलग्गुओं व नौकर-चाकरों के भी खाते चेक करवाकर देखे जाएं। इस देश के गरीब और भोले लोगों की आंखे फटी की फटी रह जाएंगी।

आज खबर है कि अरुणाचल के दो बैंक मेनेजरों ने आत्महत्या कर ली है, क्योंकि नेताओं और सेठों ने उन पर दबाव डाल कर उनके बैकों में करोड़ों का काला धन बेनामी ढंग से जमा करवा दिया था। अभी तक तो भ्रष्टाचार के पूज्य पिताजी याने हमारे किसी नेता की आत्महत्या की खबर तो हमने नहीं पढ़ी है। यदि नरेंद्र मोदी और भाजपा अपने सारे चंदे को उजागर करने का सत्साहस कर सकें तो वे भारत के इतिहास में सार्वजनिक नैतिकता का नया अध्याय लिखेंगे।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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राजनीतिक दलों के खाते में पड़े काले धन का क्या कर रहे हैं प्रधानमंत्री जी!

यह देश का दुर्भाग्य ही है कि काले धन के लिए सड़क से लेकर संसद तक बवाल काटने वाले राजनीतिक दलों के खाते में पड़े काले धन का कुछ बिगड़ता नहीं दिख रहा है। सरकार हर जगह बिना हिसाब-किताब वाले धन पर जुर्माना लगाने की बात कर रही है पर राजनीतिक दलों के खाते में 500 और 1, 000 रुपये के पुराने नोटों में जमा राशि पर आयकर नहीं लगाएगी।  इसका मतलब है कि आप किसी भी नाम से राजनीतिक दल का रजिस्ट्रेसन करा लीजिये और फिर इसके खाते में चाहे कितना काला धन दाल दीजिए। कोई पूछने वाला नहीं है। देश में हजारों राजनीतिक दल हैं। कितने दल चुनाव लड़ते हैं, बस नाम मात्र के।  अधिकतर दल तो काले धन का सफेद करने तक सीमित हैं। ऐसा नहीं कि चुनाव लड़ने वाले दलों के खाते में काला धन नहीं हैं। आज की तारीख में तो राजनीतिक दलों के खाते में अधिकतर धन तो काला ही है। चाहे किसी कारपोरेट घराने ने दिया हो या फिर किसी प्रॉपर्टी डीलर ने या फिर किसी अधिकारी ने। यही हाल देश में कुकुरमुत्तों की तरह खुले पड़े एनजीओ का है।

देश में गजब का खेल चल रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष देश की जनता से तो काले धन का हिसाब मांग रहे हैं पर अपना और अपने दल के काले धन का कोई हिसाब-किताब देने को तैयार नहीं। जनप्रतिनिधियों का भी यही हाल है। ये लोग संसद या विधानसभाओं में अपने क्षेत्र की समस्याएं कम और अपनी पार्टी और अपनी ज्यादा उठाते हैं। इन्हें अपने वेतन की चिंता है। अपनी निधि की चिंता है पर जनता और जनता के काम की कोई चिंता नहीं। किसान-मजदूर की आय इतनी कम क्यों ? यह जानने की कोई कोशिस नहीं करता। बस अपने ऐशोआराम में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। इन्हें देश से बाहर और देश के अंदर जमा काले धन की चिंता है पर खुद पार्टी के खाते से कितने बड़े स्तर पर काले धन से सफेद कर रहे हैं। इस पर इनका कोई ध्यान नहीं। आरोप-प्रत्यारोप में पूरा शीतकालीन सत्र बीत गया पर किसी दल के किसी सांसद ने राजनीतिक दलों के पास होने वाले काले धन का मुद्दा संसद में नहीं उठाया।

प्रधानमंत्री देश में कैसलेस ट्रांजेक्शन की बात कर रहे हैं पर अपनी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में कैसलेस ट्रांजेक्शन की व्यवस्था करने को तैयार नहीं। सर्वविदित है कि सबसे अधिक काला धन राजनीतिक दलों व एनजीओ में खपाया जाता है। नोटबंदी के नाम पर काला धन खत्म करने की बात की जा रही है पर राजनीतिक दलों के खातों में पड़े बेसुम्मार धन की कोई बात नहीं कर रहा है। केंद्र सरकार एक ओर नोटबंदी योजना से काले धन पर अंकुश लगाने की बात कर रही है तो दूसरी ओर खुद काले धन को सफेद करने में लगी है। गरीब आदमी को लाइन में लगकर भी उसका पैसा नहीं मिल पा रहा है और काला धन रखने वाले लोग बैंकों से नये नोटों की गड्डियां ले जा रहे हैं।

इस योजना के नाम पर केंद्र सरकार गरीब आदमी की भावनाओं से खेल रही है। आठ नवम्बर को नोटबंदी की योजना लागू करते समय प्रधानमंत्री ने 500-1000 के नोटों को रद्दी करार दे दिया तथा कहा था कि 2.5 लाख रुपए से ऊपर खाते में जमा धन का हिसाब न देने पर उस पर 200 फीसद जुर्माना लगेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने जुर्माना तो नहीं लगाया उल्टे काले धन का 50 फीसद सफेद कर पूंजीपतियों को लौटाने की बात करने लगे। नये नोटों का 70-80 फीसद तो काले का सफेद करने में लग जा रहा है। आम आदमी को लाइन में लगकर भी पैसा नहीं मिल रहा है। देश के अधिकतर एटीएम में पैसा ही नहीं है। इस योजना का सबसे अधिक असर आम आदमी पर पड़ रहा है।

बैंक बड़े स्तर पर काले का सफेद करने में लगे हैं। आम आदमी के लिए 2000 रुपए का कैस नहीं है पर काला धन रखने वाले के लिए करोड़ों रुपए हैं। यह नोटबंदी कैसी देशहित की योजना है, जिससे बस आम आदमी ही परेशान हो रहा है।  सच्चाई तो यह है कि काला धन रखने वाले जो लोग जेल जाने से डर रहे थे उनको पैसा तो मिल ही गया साथ ही उनका डर भी निकल गया। गरीब आदमी को लाइन में लगकर भी पैसा नहीं मिल रहा है और भाजपा नेताओं के पास लाखों में नये नोट मिल रहे हैं।

यह देश का दुर्भाग्य है कि पैसों से संबंधित जो भी योजना आती है, उसका फायदा या व्यापारी उठाते हैं या फिर बैंक । 2008 में यूपीए सरकार द्वारा लाई गई किसान ऋण माफी योजना में बड़े स्तर पर घोटाला हुआ था। कैग की रिपोर्ट के अनुसार काफी छोटे व्यापारियों ने अपने को किसान की श्रेणी में दिखाकर अपना कर्ज माफ करा लिया था। उस समय ये बातें कही जा रही थी कि गड़बड़ी करने वाले बैंक अधिकारियों व व्यापारियों पर कार्रवाई होगी पर क्या हुआ, ढाक के तीन पात। यूपीए सरकार के बाद अब एनडीए सरकार चल रही है। किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। कृषि ऋण माफी योजना के नाम पर ईमानदार किसान तो बस ठगा ही गया। हां कुछ डिफाल्टर किसानों को इसका फायदा जरूर हुआ था। इस योजना से भी आम आदमी ही ठगा जाएगा, बैंक अधिकारी व काला धन रखने वालों को कुछ बिगड़ने वाला नहीं है।

चरण सिंह राजपूत
वरिष्ठ पत्रकार
charansraj12@gmail.com

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मोदी के पीएम पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे माई लॉर्ड!

Sanjaya Kumar Singh : मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है… मामला देश की सर्वोच्च अदालत में है और बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं। मेरी कोई औकात नहीं कि इस मामले में टिप्पणी करूं पर जैन हवाला मामले को अच्छी तरह फॉलो करने के अपने अनुभव से कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता जायज है। लेकिन यहां मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है। मामला ठीक से जांच कराए जाने का है।

जैन हवाला मामले में 115 अभियुक्त थे और सभी मामलों की जांच, तथा उन्हें साबित करना अपेक्षाकृत मुश्किल था। पर यहां मामला सीधा है। आज टेलीग्राफ की इस खबर से भी लगता है गुजरात सीएम अगर गुजरात अलकली केमिकल है तो उसे भुगतान क्यों हुआ, हुआ कि नहीं इसकी जांच हो जाए और यह रिश्वत है (किसी और कारण से, किसी और को) तो उस मामले में कार्रवाई हो और इसे खत्म माना जाए। पर मामला है तो उसे अंजाम तक पहुंचाना ही चाहिए।

राजदीप सरदेसाई के साथ अरविन्द केजरीवाल की बातचीत से जो मामला समझ में आता है वह यह है कि बुनियादी तौर पर एक मामला है, शक है। सुप्रीम कोर्ट के लिए यह पर्याप्त नहीं है इस पर कोई विवाद नहीं है। पर मामला यह है कि इसकी जांच होनी चाहिए। पर्याप्त सबूत जुटाए जा सकते हैं कि नहीं? जुटाने की कोशिश हुई कि नहीं? कौन करेगा? क्यों और कैसे करेगा? अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि इसकी जांच नहीं कराई जा रही है, नहीं होने दी जा रही है। संबंधित अधिकारियों का तबादला कर दिया गया आदि। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट में अपील यह होनी चाहिए थी (मुझे लग रहा है अभी ऐसा नहीं है, मैं गलत हो सकता हूं) कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित हो? यह नहीं कि उपलब्ध सबूतों पर ही कार्रवाई हो। सबूत कार्रवाई के लिए पर्याप्त न हों, यह संभव है। पर जांच के लिए तो पर्याप्त हैं ही।

इस खबर में कहा गया है कि गुजरात सीएम का मतलब गुजरात अलकली केमिकल्स है – गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं। ठीक है। हो सकता है। पर इस बात की जांच हो जाए पुष्टि हो जाए कि गुजरात सीएम गुजरात अलकली केमिकल्स ही है। अगर किसी ने किसी कंपनी को इतनी राशि दी है तो उसका कारण होगा, संबंध होगा, सबूत भी होंगे। आदि। साबित होना कोई मुश्किल नहीं है।

और, जब ईमानदारी की बात हो रही है और वह देश के सभी लोगों पर समान रूप से लागू होना है तो गुजरात अलकली केमिकल्स को यह भुगतान किसलिए हुआ, नकद हुआ कि चेक से और नकद हुआ तो क्यों? संतोषजनक जवाब मिल जाए। बात खत्म। नैतिकिता का तकाजा है और चूंकि मामला प्रधानमंत्री से संबंधित है, और प्रधानमंत्री न भी चाहें तो जांच करने वाले को एक भय रहेगा इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि काम (जांच) करने वालों को यह भय न रहे। कैसे न रहे – यह सुनिश्चित करना संबंधित विभागों, लोगों और संस्थाओं का काम है।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की यह चिन्ता भी जायज है कि चूंकि मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ है इसलिए इसे जल्दी निपटाया जाना चाहिए और सबूत जल्दी चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों को अपने सबूतों पर यकीन है और लगता है कि सब साबित हो सकता है पर प्रधानमंत्री के इस पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे या सबूत जुटाने में क्या समस्या आ रही है – सुप्रीम कोर्ट को यह बताया जाता तो मेरे ख्याल से बेहतर रहता।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें :

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नोटबंदी के महीने भर बाद छंटनी की मार अब मीडिया इंडस्ट्री पर भी!

नोटबंदी के महीने भर बीतते बीतते छंटनी की मार देने के लिए मीडिया घरानों ने भी तैयारी करनी शुरू कर दी है. मीडिया इंडस्ट्री ने विज्ञापन और आय घट जाने के कारण छंटनी और सेलरी कटौती जैसे रास्ते पर चलने का संकेत देना शुरू कर दिया है. टाइम्स आफ इंडिया के मालिक विनीत जैन ने तो बाकायदा ट्वीट कर के सेलरी कट की बात को सार्वजनिक तौर पर कह दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह कहते हैं : ”अंबानी अडानी के अलावा बाकी कारपोरेट समाज की चीख निकल पड़ी है नोटबंदी से. ये टाइम्स आफ इंडिया के मालिक हैं विनीत जैन, जिनका टाइम्स नाऊ चैनल मोदी जी/बीजेपी /RSS का “भोंपू” बन जाने पर ज़रा भी नहीं शर्माता! पर महीना बीतते न बीतते उनकी चीख निकल पड़ी है! पढ़िये क्या भाख रहे हैं? संबोधित भी मोदी जी को ही है!”

टेलीग्राफ अखबार से जुड़े सूत्रों ने खबर दी है कि अखबार प्रबंधन पहली दफे कास्ट कटिंग और छंटनी पर विचार कर रहा है. अखबार के पुलआउट बंद करने की तैयारी चल रही है और इससे जुड़े लोगों को निकालने या कम सेलरी में काम कराने की मंशा दिख रही है. कई हिंदी अखबार और न्यूज चैनलों के मैनेजर भी खर्चे बचाने के लिए विभिन्न उपाय आजमाने के लिए प्रबंधन के निर्देश पर बैठक करने लगे हैं. अतीत से सबक लेते हुए कहा जाए तो कास्ट कटिंग की पहली मार नई नियुक्तियों पर पड़ती है. नए लोगों की तैनाती नहीं की जाती और पुराने लोगों में से कइयों को परफारमेंस का आधार बनाकर बाहर कर दिया जाता है.

पत्रकार नरेंद्र नाथ ने नोटबंदी और छंटनी के मुद्दे पर फेसबुक पर लिखते हैं : ”नोटबंदी 30 दिन बाद अपडेट…नोटबंदी से तत्काल ग्रोथ में आधी फीसदी का फोरकास्ट कर दिया गया है। 7.6 ग्रोथ अब 7.1 होगी और आने वालों महीने में यह और कम हो सकती है। यह भविष्यवाणी कांग्रेसी, आपटार्ड, एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं की। ऐसा रिजर्व बैंक ने कहा है। मतलब कम से कम 2 लाख करोड़ का नुकसान इस प्रैक्टिस का कम से कम होने वाला है। 500, 1000 के लगभग सारे नोट बैंक में लौट आ जाएंगे। अभी तक लगभग 12 लाख करोड़ सिस्टम में वापस आ चुका है। यह तथ्य कांग्रेसी, आपटार्ड, एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं दिया है। ऐसा रिजर्व बैंक ने कहा है। मतलब लोगों के पास काला धन होने की बात गलत हो गयी। नोटबंदी के कारण अगले कुछ महीनों में छंटनी का बुहत बड़ा दौर शुरू होने वाला है। नयी नियुक्ति पर कंपनियों ने तत्काल रोक लगा दी है। ऐसा कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं कहा है। ऐसा सभी औद्योगिक संगठन कह रहे हैं जो अब तक सरकार के खुलकर साथ रहे हैं। उन्होंने मोदी सरकार की बहुत मदद की थी। नोटबंदी के बाद इंडिया में कंज्यूमर इंडेक्स 2008 के महामंदी के स्तर तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा भविष्यवाणी कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं दिया है। यह रिपोर्ट स्वतंत्र ग्लोबल मार्केट एजेंसी ने दी है। नोटबंदी का फैसला इंडियन इकोनॉमी को हर्ट करने वाला है जिसका बहुत बड़ा लॉजिक नहीं है। यह भविष्यवाणी कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया का नहीं कहना है। यह व्लर्ड की सारी मीडिया की हेडलाइन बन रही है। अब तक जनधन अकाउंट में मात्र 1 करोड़ रुपये अनअकाउंटेड मनी और कुल जमा में मात्र 2000 करोड़ अनअकाउंटेड राशि का पता लगा है। यह कांग्रेसी,आपटार्ड,एंटी नेशनल या बिकाऊ मीडिया ने नहीं कहा है। यह सरकार की प्रेस रीलीज कह रही है। नोटबंदी का फैसला चंद लोगों को सजा देने के लिए पूरे देश और चलती इकोनॉमी को स्थिर कर देने का फैसला साबित हो रहा है,ऐसा मेरा कहना है। आप बिकाऊ,भ्रष्ट,करप्ट या कोई भी विशेषण के साथ जवाब दे सकते हैं। आप वाह-वाह दुनिया की कल्पना रोक में रहने को स्वतंत्र हैं। आप जा रही लाखों नौकरियों के बीच जो बोले राज,वही बोले प्रजा का राग अलाप सकते हैं। आप बिहार-उत्तर प्रदेश के मजूदरों को काम छीने के बाद असमय लौट रहे मजदूरों के कष्ट को इग्नोर कर सकते हैं। बिना एक सवाल किये। बिना पूछे कि आखिर में कौन सी ऐसी अरजेंसी थी जिसके बाद यह फैसला लिया गया और क्या वह अरजेंसी अपने मकसद में पूरा करने में सफल हो रही? आप लांग रन में सब कुछ बहुत-बहुत बेहतर होगा,इसे सोच प्रसन्न रह सकते हें। बट इन लांग रन वी आल आर डेड।”

पत्रकार नदीम एस. अख्तर लिखते हैं : ”नोटबन्दी के तुरंत बाद मैंने जब लिखा कि मंदी के लिए तैयार रहिए, तो दोस्तों ने कहा कि डराइए मत। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ लेकिन ये कॉमन सेंस की बात है। अब पता ये चल रहा है कि सरकार ने करीब 15 लाख करोड़ के 500-1000 वाले नोट मार्किट से सोंख लिए और अब तक सिर्फ 4 लाख करोड़ के नोट ही बाजार में झोंक सकी है। यानी करीब 11 लाख करोड़ नकदी की भयंकरतम कमी। यानि जिस देश में 85-90 फीसद व्यापार नकद से होता हो, वहां नोटबन्दी करके नकदी की नाभिनाल ही काट दी गयी। असर ये है कि अर्थव्यवस्था के हर धड़े पे ब्रेक लग गई है और मेरा मानना है कि विकास दर 1-2 फीसद तो प्रभावित होगी ही। पक्का आंकड़ा तो गुना भाग करके कोई अर्थशास्त्री ही बता पाएगा लेकिन भारत जैसे विशाल देश में विकास दर की ये गिरावट हमारे-आपके जीवन पर भी बड़ा असर डालेगी। और मोदीजी की सरकार ने देश की इकॉनमी और इसकी जनता को ज़ोर का ये झटका कालेधन के नाम पे धीरे से दिया। अब सरकार खुद कालेधन के जुमले से पीछे हट रही है और मोदीजी कैशलेस इकोनॉमी की बात करने लगे हैं। बड़ा खेल है। पेटीएम में चीन के अलीबाबा का शेयर 40 फीसद है और उसे इस नोटबन्दी का सबसे ज्यादा फायदा हुआ है। टाइमिंग देखिये कि मोटा भाई यानि मुकेश अंबानी का मोबाइल वॉलेट भी आ गया है जो पेमेंट बैंकिंग की तरफ जाएगा। पेटीएम जा ही रहा है। यानि मोदीजी बार-बार जो कह रहे हैं कि अपने मोबाइल को ही अपना बैंक समझो, वो इसी पेटीएम, रिलायंस वॉलेट और इस जैसी कंपनियों की तरफ इशारा है। मतलब काले धन का जुमला अब कैशलेस इकॉनमी और मोबाइल वॉलेट पे आकर रुक गया है। बिना तैयारी के इतने बड़े देश को एक झटके में कैशलेस करने का मोदी सरकार का ये कदमआत्मघाती था। कुल्हाड़ी पे ही पैर मार दिया। लेकिन सवाल ये उठता है कि सरकार ने ये कदम नासमझी में उठाया या फिर सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से किया गया? आखिर वो इतने भी नादां नहीं के घर के चिराग से घर को ही आग लगा बैठें। ये देश के साथ लंबा गेम हुआ है, जिसका खामियाजा देश को आने वाले वर्षों में भुगतना ही होगा। अच्छे दिनों का वादा पूरा हो रहा है। अब ये मत पूछियेगा कि किसके अच्छे दिन?”

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आरबीआई गर्वनर की प्रेस कांफ्रेंस से ‘इकोनॉमिस्ट’ और ‘बीबीसी’ के पत्रकार को बाहर निकाला

रिजर्व बैंक आफ इंडिया के गर्वनर उर्जित पटेल की प्रेस कांफ्रेंस से बिना बताए द इकोनॉमिस्ट और बीबीसी के पत्रकारों को बाहर निकाल दिया गया. इससे नाराज़ द इकोनॉमिस्ट के पत्रकार स्टैनले पिग्नल ने ट्वीट करके अपना दुख और क्षोभ प्रकट किया. उन्होंने एक ट्वीट में लिखा- ”रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की प्रेस कांफ्रेंस में मुझे यानि द इकोनॉमिस्ट को नहीं बुलाया गया. मुझे अंदर जाने से रोक दिया गया. पारदर्शिता के लिहाज से एक दुखद दिन है मेरे लिए.’

दरअसल मुंबई स्थित आरबीआई हेडक्वॉर्टर पर गर्वनर उर्जित पटेल की एक महत्वपूर्ण प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की गई थी. इस पीसी से दो ब्रिटिश मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को बाहर कर दिया गया. दोनों पत्रकारों को प्रवेश की अनुमति नहीं देने की कोई वजह भी नहीं बताई गई. ये पत्रकार ‘द इकोनॉमिस्ट’ और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ के हैं. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पत्रकार समीर हाशमी ने भी बताया कि उन्हें और द इकोनॉमिस्ट के पत्रकार को बिना किसी पूर्व सूचना या चेतावनी के बाहर कर दिया गया.

इस घटनाक्रम पर कई पत्रकारों ने रोष जताया है. पत्रकार Mahendra Mishra ने फेसबुक पर लिखा- ”आरबीआई की प्रेस कॉन्फ्रेंस में इकोनॉमिस्ट, बीबीसी को रोका गया। क्या डर गयी है सरकार?” वहीं पत्रकार Priyabhanshu Ranjan लिखते हैं- ”RBI गवर्नर उर्जित पटेल की प्रेस कांफ्रेंस से द इकोनॉमिस्ट और बीबीसी के पत्रकार को निकाला. बेचारे पूछना भूल गए होंगे – सर, बागों में बहार है?” वरिष्ठ पत्रकार Prakash K Ray ने भी रिज़र्व बैंक गवर्नर की प्रेस कांफ़्रेंस से द इकोनॉमिस्ट और बीबीसी के संवाददाता को बाहर किए जाने की घटना पर क्षोभ व्यक्त किया है.

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किसी देश का प्रधानमंत्री इतना असहाय-निरुपाय नहीं हो सकता : वेद प्रताप वैदिक

मुरादाबाद की अपनी सभा में नरेंद्र मोदी फिर बरसे। अपने विरोधियों पर बरसे। लेकिन मोदी की भी क्या गजब की अदा है? जहां विरोधी उनके सामने बैठे होते हैं याने संसद, वहां तो वे मौनी बाबा बने रहते हैं और अपने समर्थकों की सभा में वे दहाड़ते रहते हैं। वे कहते हैं कि लोग उन्हें गुनाहगार क्यों कहते हैं? मोदी को गुनाहगार कौन कह रहा है? मैंने अपने परसों के लेख में यही लिखा था कि यह नोटबंदी एक गुनाह बेलज्जत सिद्ध हो रही है। याने इसका कोई ठोस लाभ न अभी दिख रहा है और न ही भविष्य में। हां, आम लोग बेहद परेशान हैं। वे लोग, जिनके पास काला धन तो क्या, सफेद धन ही इतना होता है कि वे रोज़ कुआ खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं। नोटबंदी के पीछे मोदी की मन्शा पर किसी को भी शक नहीं करना चाहिए। यह देशभक्तिपूर्ण कार्य हो सकता था। इससे देश का बड़ा कल्याण हो सकता था लेकिन इसे बिने सोचे-विचारे लागू कर दिया गया।

यह अमृत अब जहर बनता जा रहा है। यह काले धन का दुगुना बड़ा स्त्रोत बन गया है। विरोधियों ने इसका फायदा उठाने की जी-तोड़ कोशिश की है। वे मोदी की मन्शा पर शक कर रहे हैं। वे नोटबंदी का उद्देश्य यह बता रह हैं कि बैंकों में जमा होने वाले अरबों-खरबों रुपए को मोदी सरकार बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बहुत कम ब्याज पर हथियाने देगी। इस तरह के आरोप निराधार हैं लेकिन यह तो सत्य है कि नोटबंदी ने देश में अपूर्व भ्रष्टाचार को जन्म दिया है। करोड़ों साधारण लोगों ने जन-धन के नाम पर अपने हाथ काले कर लिये हैं। हमारे बैंक रिश्वत और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं।

अब मोदीजी को एक नई तरकीब सूझी है। वे जन-धन खाते वालों से कह रहे हैं कि जिन्होंने उनके नाम से अपना पैसा इन खातों में जमा किया है, उसे वे न लौटाएं ! किसी देश का प्रधानमंत्री क्या इतना असहाय-निरुपाय भी हो सकता है कि लोगों में अनैतिकता फैलाए, उनकी भरोसेमंदी खत्म कर दे और समाज में मरने-मारने का माहौल फैला दे? यदि सरकार है और उसमें दमखम है तो जन-धन खातों में जो मोटी राशियां 8 नवंबर के बाद जमा हुई हैं, उन्हें जब्त कर ले। सिर्फ उन्हें बख्श दे, जो बता सकें कि उसका भरोसे लायक स्त्रोत क्या है। जिनका काला धन जब्त हो, उन पर जुर्माना और सजा दोनों हो। सरकार रोने-गाने से नहीं, कसीदे और दोहे से नहीं, लोहे से चलती है।

पिछले 25 दिन में बैंकों में लगभग 12 लाख करोड़ रु. जमा हो चुके हैं। सरकार के मुताबिक बाजार में 14.50 लाख करोड़ के 500 और 1000 के नोट चलन में थे। (सरकारों व एजेंसियों में रखी नकदी सहित) इसका मतलब यह हुआ कि अब बहुत कम बड़े नोट ही बचे हुए हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि बाकि के नोट भी एकाध हफ्ते में बैंकों में आ जाएंगे। याने जितना भी बड़े नोटों वाला नकद पैसा (सफेद और काला भी) बाजारों और घरों में था, वह बैंकों में आ जाएगा। यह सरकार की जबर्दस्त सफलता है। इतने कम समय में इतना पैसा सरकार ने करोड़ों लोगों से उगलवा लिया लेकिन सरकार के पास असली सवाल का जवाब क्या है? गरीब कल्याण कोष में कितना पैसा आएगा?

असली सवाल यह है कि सरकार के खजाने में टैक्स कितना आएगा? खुद सरकार ही नहीं बता सकती, क्योंकि लाइन में लग-लग कर लोगों ने जो ढाई-ढाई लाख रु. जमा करवाए हैं, उन पर आप कोई आयकर नहीं थोप सकते। जिन लोगों ने करोड़ों रु. नकद देकर अपने खातों में उसे कर्ज दिखवा लिया है, उस पर भी आयकर नहीं लगता। जिन लोगों ने अपने नोट ट्रकों और कारों में भरकर नागालैंड, अरुणाचल और मणिपुर जैसे सीमांत क्षेत्रों के बैंकों में स्थानीय नामों से जमा करवा दिए हैं, वे भी करमुक्त हैं। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश तथा अन्य पड़ौसी राष्ट्रों में भारतीय मुद्रा धड़ल्ले से चलती है।

इन राष्ट्रों से आनेवाले करोड़ों-अरबों के पुराने नोट सरकार को लेने पड़ेंगे। इन पर भी टैक्स नहीं लगाया जा सकता। नक्सलियों, नेताओं, तस्करों और अफसरों ने अपना सारा छिपा धन सफेद कर लिया है और ऐसी तरकीब से कर लिया है कि वह टैक्स की गिरफ्त के बाहर रहे। खेती तो करमुक्त है ही। मोदी सरकार ने लाखों किसानों को रातोंरात लखपति बना दिया है। अमित शाह का जुमला सच साबित हो गया है। बैंकों में जमा यह कालाधन जब बाहर निकलेगा तो उसका रंग सफेद होगा।

इन्हीं नए नोटों से रिश्वतें दी जाएंगी, तस्करी की जाएगी, आतंकी दनदनाएंगे और काला धन दुगुनी रफ्तार से पैदा होगा। मोदीजी महागुरु सिद्ध हुए। उन्होंने देश के करोड़ों किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों को भी काले धन की कला का उस्ताद बना दिया। अभी वे सिर्फ काले को सफेद करने की दलाली कर रहे हैं लेकिन जब उनके हाथों में लाखों रु. आएंगे और जाएंगे तो उन्हें मोटी कमाई का चस्का भी शायद लग जाए। अभी देश की अर्थ-व्यवस्था पैंदे में बैठती-सी लग रही है लेकिन यदि करोड़ों लोगों को यह चस्का लग गया तो देश की अर्थव्यवस्था तो कुलाचे भरने लगेगी। अर्थशास्त्र के इतिहास में इसे ‘विकास का मोदी मंत्र’ के नाम से जाना जाएगा।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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आपने तो व्यापारी को चोर बना डाला मोदी जी!

निरंजन परिहार
नोटबंदी ने सारा गुड़ गोबर कर दिया। व्यापारियों को चोर बना दिया। ज्वेलरी के धंधे में जबरदस्त धमक आई थी। दीपावली की चमक तो बाद में आई। लेकिन ज्वेलरी का धंधा दीपावली से कुछ दिन पहले ही चमकना शुरू हो गया था। देश भर के ज्वेलरों ने राहत की सांस ली थी। साल भर से ज्वेलरी बाजार में भयंकर मंदी थी। ग्राहक गायब थे। तो ऊपर से एक्साइज ड्यूटी के विरोध में दो महीने तक बाजार बंद रहे, ज्वोलरो को उसका भी मलाल था। लेकिन गोल्ड के भाव जैसे ही 30 हजार के पार जाने लगे, तो भी बाजार में ग्राहकी खुली। व्यापारियों के चेहरे की रौनक लौटी। सोचा था, साल भर में भले ही कुछ नहीं कमाया, पर अब तो बाजार चल निकला। लेकिन दूसरे दौर की ग्राहकी खुलते ही 8 नवंबर को जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया, बाजार धम्म से धड़ाम हो गया। व्यापारी चारों खाने चित और ज्वेलरी की चमक चिढ़ाने लगी। मुंबई के जवेरी बाजार से लेकर जयपुर के जौहरी बाजार और नागपुर के इतवारी बाजार व दिल्ली के सराफा बाजार आदि देश के सबसे बड़े ज्वेलरी मार्केट सन्नाटे से सराबोर हैं। हर व्यापारी की जुबान पर सवाल सिर्फ एक ही है कि नोटबंदी के बाद धंधे का क्या होगा।

यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर की रात को जैसे ही नोटबंदी का एलान किया। उसके तत्काल बाद देश भर में ज्वेलरों ने जिस तरह से रेट बढ़ाकर गोल्ड बेचा, वह सरकार की नजरों में आने के लिए काफी था। खबर थी कि कुछ जगहों पर तो ज्वेलरों ने 60 हजार रुपए 10 ग्राम के भाव में भी गोल्ड बेचा। इस खबर ने सभी को चौंका दिया। सरकार के भी कान खड़े हुए और इसके बारे में बड़ा कदम उठाया है जिसे लेकर ज्वेलरों के होश उड़ गए हैं। काला धन रखने वालों ने उस दौरान जमकर गोल्ड और ज्वेलरी खरीदी। सो, सरकार का सख्त होना वाजिब था। देश भर में कुछ जगहों पर ज्वेलरों के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं। दिल्ली के कई बड़े ज्वेलर्स के सीसीटीवी फुटेज जब्त किए गए हैं। किसने कितना सोना किसको बेचा, उन दोनों पर कार्यवाही की जाएगी । इन्कम टैक्स विभाग की इस पर भी नजर है कि कहीं बिना पैन दर्ज किये बड़ी संख्या में पुराने नोटों से दो लाख रुपये से कम की कई किस्तों में आभूषणों की बिक्री की जा रही है। पुराने 1000 – 500 रुपए के नोटों के अमान्य होने के बाद अवैध धन को खपाने के लिए गोल्ड और सिल्वर की खरीद को सबसे उपयुक्त तरीका माना गया। देश भर में कुछ गिने चुने ज्वेलरों ने पुराने नोटों पर गोल्ड बेचकर जमकर कमाई की, यह सच है। लेकिन यह भी सच है कि देश भर के हर ज्वेलर ने तो ऐसा नहीं किया न। फिर भी सभी को एक ही डंडे से हांकने की कोशिश क्यों हो रही है। जिसने किया, वो ही भुगते।

नोटबंदी की इस क्रांति के दूरगामी परिणाम क्या होंगे, कोई सही से नहीं बता सकता। फिर व्यापारी तो ठहरे व्यापारी। आज जितना कमा सको, कमा लो। भविष्य की कौन जाने। सो, तत्काल फायदे के लिए 8 नवंबर की रात को प्रधानमंत्री ने जैसे ही नोटबंदी की घोषणा की, पुराने नोटों में ही गोल्ड और सिल्वर बेचकर जो कमा डाला, वह अपने बाप का। लेकिन किसी की चोरी तो नहीं की। कहीं डाका तो नहीं डाला। लोगों ने जिस भाव में खरीदा, उसमें बेचा। डिमांड और सप्लाई हर बाजार का शाश्वत नियम है। सप्लाई से ज्यादा डिमांड है, तो भाव बढ़ना वाजिब है। लेकिन कुछ गिने चुने ज्वेलरों का यही वाजिब काम सरकार के आंख की किरकिरी बन गया है। सरकार कह रही है कि नोटबंदी के दूरगामी परिणाम होंगे। लेकिन ज्वेलरी बाजार पर तो नोटबंदी के तात्कालिक परिणाम ही बहुत भारी साबित हो रहे हैं। बाजार फिलहाल बंद जैसे हैं। और ज्वेलरी के सारे शो रूम्स में सन्नाटा है। कहा जा रहा है कि काले धन पर सरकार का यह ऐतिहासिक और साहसिक कदम है। लेकिन हमारे लिए तो आपकी इस कार्रवाई का एक मतलब सज़ा भी है मोदी जी। आप तो अब तक विदेशों से काला धन लाकर देश में व्यापार बढ़ाने की बात कह रहे थे, लेकिन आपने तो देश के व्यापारी की कमर ही तोड़ दी। आपके इस फैसले के बाद पूरा देश ज्वेलरों को चोर की नजर से देखने लगा है मोदीजी। जब हमने मांग की फिर भी आपने गोल्ड पर से एक्साइज ड्यूटी नहीं हटाई, तो हमने देश भर में ज्वेलरी के इतिहास का सबसे लंबा बंद रखा। तब भी आपके भक्तों ने सोशल मीडिया के जरिए जी भर कर प्रचार किया था कि सारे ज्वेलर चोर हैं। बहुत कमाते हैं। काश, आपने पहले सिस्टम सुधारा होता और अपने नेताओं और अफसरों को सुधारा होता, तो देश का तंत्र वैसे ही सुधर जाता।

मोदी जी, संसार का नियम है कि चमकती चीज की तरफ नजर सबसे पहले जाती है। इस बार भी नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकार की पहली नजर गोल्ड और सिल्वर ज्वेलरी पर ही गई है। आपके अफसरों को लग रहा है कि नोटबंदी के बाद काला धन अब गोल्ड बनकर जमा हो गया है। आपकी नोटबंदी ने व्यापारियों को चोर बना डाला है। जबकि उस गोल्ड और ज्वोलरी को पुराने नोटों से खरीदनेवाले आपके अफसर और नेता ही है। आपकी सरकार भी व्यापारी वर्ग को चोर की तरह देख रही हैं। आम आदमी को भी लग रहा है कि वह खुद तो ईमानदार हैं, इसलिए बैंकों के बाहर लाइन लगाकर खड़ा हैं। लेकिन उनके बाजार में जो व्यापारी है, वही असली लुटेरा है। दरअसल, डाकू मंगल सिंह, डाकू गब्बर सिंह और डाकू जब्बर सिंह जैसे अनगिनत लुटेरे तो राजनेताओं की आपकी जमात में नेता के भेस में बैठे है। या फिर प्रशासन में भरे पड़े हैं। ज्वेलर तो सिर्फ व्यापारी है हुजूर, वह चोर नहीं है। ज्वेलर इस देश के सभ्य समाज का सबसे इज्जतदार वर्ग है। आपने तो उसी को चोर बना दिया मोदी जी। आपके नोटबंदी के फैसले पर देश को अभी बहुत कुछ जानना और समझना बाकी है। इसके सद्परिणाम होंगे, या दुष्परिणाम, यह कोई नहीं जानता। लेकिन देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा – दिशा पर इसके बहुत बहुत घातक असर होंगे, यह पक्का है। देश का हर व्यापारी इस संकेत को महसूस कर रहा है। पता नहीं आपको यह महसूस हो रहा है कि नहीं !

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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मोदी जी, आप 8 नवम्बर को सही थे या अब 29 नवम्बर को?

कालेधन के रद्दी कागज को नोटों के रूप में फिर जिंदा क्यों किया… प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आपने कालेधन के खिलाफ जो सर्जिकल स्ट्राइक की उसे देश की अधिकांश जनता ने तमाम दिक्कतों के बावजूद सराहा। 8 नवम्बर को रात 8 बजे आपने देश के नाम अपने संदेश में नोटबंदी की घोषणा करते हुए कहा कि आज आधी रात यानि 12 बजे के बाद 1000 और 500 रुपए के चल रहे नोट अवैध हो जाएंगे। इससे ईमानदार जनता, कारोबारी, करदाता, गृहणियां कतई न घबराए और वे अपने पुराने नोट दो दिन बाद से 30 दिसम्बर तक बैंकों और डाक घरों में जाकर जमा कर दें और बदले में 500 और 2000 के नए नोट पा लें।

अपने इस संदेश में आपने यह भी स्पष्ट कहा था कि काले कुबेरों को पर्याप्त अवसर दिए गए और उनके लिए आय घोषणा योजना भी लाई गई, जिसमें कालेधन के खुलासा पर 45 प्रतिशत टैक्स जमा कर बचे 55 प्रतिशत धन को सफेद किया गया। अब सारी मोहलत समाप्त हो गई है और आधी रात से काले कुबेरों का आजादी के बाद से जमा कालाधन कागज के रद्दी टुकड़ों में तब्दील हो जाएगा। 8 नवम्बर के इस संदेश के बाद मोदी जी आपने उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में आम सभा को संबोधित करते हुए देश की जनता से 50 दिन मांगे और उस वक्त भी आपने चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि कालेधन के कुबेर अपने रद्दी हुए नोट नदियों में बहा रहे हैं और अगर गलत तरीके से कालेधन को सफेद करने के प्रयास किए तो आजादी के बाद से खातों की जांच कराऊंगा।

सोशल मीडिया से लेकर आपकी पार्टी और उनसे जुड़े समर्थकों यानि भक्तों ने इस कदम को ऐतिहासिक बताया और अपनी पोस्ट में स्पष्ट लिखा कि कालेधन वालों को पर्याप्त अवसर दे दिए थे और वे फिर भी नहीं सुधरे तो उसमें अब मोदी जी का कोई कसूर नहीं, अब उनका कालाधन पूरा नष्ट होना ही चाहिए। कतार में पिछले 20 दिनों से खड़ी देश की  जनता ने भी तमाम दिक्कतों के बावजूद इस फैसले को स्वीकार किया कि चलो, देश बदल रहा है… जनता ने अपने सफेद धन को पाने के लिए कई घंटों और दिनों तक ये मशक्कत की है, मगर उनकी इस कुर्बानी पर उस वक्त कुठाराघात हो गया जब संसद में नया आयकर संशोधन विधेयक लाया गया और मनी बिल के रूप में उसे बहुमत के आधार पर मंजूर भी कर डाला। इसमें यह प्रावधान किया गया कि अभी कालाधन रखने वाला 50 प्रतिशत टैक्स जमा कर अपना शेष बचा 50 प्रतिशत कालाधन दो किश्तों में सफेद धन के रूप में प्राप्त कर लेगा। 25 प्रतिशत की पहली किश्त उसे अभी और शेष 25 प्रतिशत की 4 साल बाद मिलेगी।

अब देश की जनता का लाख टके का सवाल यह है कि जो कालाधन शत-प्रतिशत कागज की रद्दी में नोटबंदी के साथ ही तब्दील हो गया था, उसी रद्दी को वापस नोटों में क्यों बदल दिया गया..? मान लो जिसके एक करोड़ रुपए रद्दी हो रहे थे उसे अभी 25 लाख और शेष 25 लाख बिना ब्याज के 4 साल बाद भी मिले तो उसका तो फायदा ही हो गया। यानि देश को लूटते रहो और आधा हिस्सा देकर छूट जाओ… अब मोदी जी कृपया देश की जनता को यह समझाएं कि आप 8 तारीख तो सही थे, जब कालाधन को कागज की रद्दी कर दिया था या फिर 29 नवम्बर को सही हो, जब इस रद्दी में से 50 प्रतिशत नोटों को फिर जिंदा कर दिया..? नोटबंदी की घोषणा के साथ ही काले कुबेरों ने अपने कालेधन को खपाने के लिए ताबड़तोड़ सोना खरीदा और 40 से 50 प्रतिशत अधिक कीमत भी चुकाई। इतना ही नहीं इन कालेधन वालों ने प्रॉपर्टी के अलावा बचत खातों और गरीबों के जन-धन खातों में भी अपना कालाधन भर डाला।

भाजपा और उनसे जुड़े समर्थक यह दलील दे रहे हैं कि इससे सरकार को फायदा ही होगा, जबकि हकीकत यह है कि इसमें सरकार को 50 प्रतिशत का सीधा नुकसान हो रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जितने नोट छापती है उतनी करंसी का मूल्य वह चुकाने के लिए प्रतिबद्ध रहती है। अभी 4 से 5 लाख करोड़ कालाधन 30 दिसम्बर तक बैंकों में जमा न हो पाने का अनुमान लगाया जा रहा था। इसका मतलब यह हुआ कि 4 से 5 लाख करोड़ रुपए की यह बड़ी राशि अंतत: भारत सरकार को ही प्राप्त होती, जिसका उपयोग गरीबों के कल्याण में कर दिया जाता। अब इस राशि में से आधी रात अगर आपने 50 प्रतिशत टैक्स भरवाकर सफेद कर दी तो इतना नुकसान तो भारत सरकार को हो गया और बदले में कालेधन वाले को आधी राशि फिर से प्राप्त हो गई, जिससे यह संदेश भी जाएगा कि भ्रष्टाचार करते रहो। सरकारें इसी तरह की छूटें देती रहेंगी। अगर किसी ने हत्या की है तो उसकी सजा उम्रकैद या फांसी ही होती है…

इसी तरह भ्रष्टाचार करने वाले को भी तभी कड़ी सजा मिलेगी, जब उसका शत-प्रतिशत कालाधन नष्ट हो जाए। अभी नोटबंदी के साथ यह दलील भी दी गई कि इससे जाली नोट, नक्सलवादियों तथा आतंकवादियों के पास जमा करोड़ों रुपए भी रद्दी हो जाएंगे। अब 50 प्रतिशत छूट के चलते नक्सलवादी और आतंकवादी भी अपने पुराने नोट बदलवा लेंगे। किसी भी नोट पर किसी का नाम नहीं लिखा होता है और जिन नेटवर्क के जरिए इन आतंकवादियों और नक्सलियों को पैसा पहुंचता है उसी नेटवर्क के जरिए पुराने नोटों को बैंकों में जमा कर 25 प्रतिशत राशि अभी और 25 प्रतिशत राशि 4 साल बाद ये तत्व भी हासिल कर लेंगे।

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं. संपर्क : 9827020830

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प्रचार-प्रशंसा के भूखे मोदी ने ढाई साल में 1100 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर फूंक डाला

केंद्र सरकार ने पिछले ढाई साल के कार्यकाल में पीएम मोदी पर केंद्रित विज्ञापनों पर 1100 करोड़ रुपए ख़र्च किए हैं. आरटीआई कार्यकर्ता रामवीर सिंह के सवालों पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यह जानकारी दी है. यह खर्च एक जून 2014 से 31 अगस्त 2016 के बीच किया गया. हिसाब लगाया जाए तो इसका मतलब है कि सिर्फ विज्ञापनों पर सरकार ने 1.4 करोड़ रूपए रोज़ाना खर्च किए हैं. देखा जाए तो यह भारत के मंगल अभियान मंगल यान के खर्च से दोगुना है. इसे दुनिया का सबसे कम खर्चीला अंतरग्रहीय अभियान माना जाता है, जिसकी कीमत सिर्फ 450 करोड़ रुपए है.

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार मोदी सरकार ने ब्रॉडकास्ट, कम्युनिटी रेडियो, डिजिटल सिनेमा, इंटरनेट, दूरदर्शन, प्रोडक्शन, एसएमएस, टेलीकास्ट पर अबतक करीब 11 अरब यानी 1100 करोड़ रुपये खर्च किए. इसमें प्रिंट विज्ञापन, होर्डिंग्स, पोस्टर, बुकलेट और कैलेंडर शामिल नहीं हैं. अगर ये खर्च भी जोड़ लिए जाएं तो कुल खर्च की राशि काफी अधिक हो सकती है. सिर्फ एसएमएस पर डीएवीपी ने 17 करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर दिया, जो दो लाख रुपए रोजाना है. सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 1 जून 2014 से 31 मार्च 2015 तक लगभग 448 करोड़ रुपये खर्च किए गए. 1 अप्रैल, 2015 से 31 मार्च, 2016 तक 542 करोड़ रुपये और 1 अप्रैल, 2016 से 31 अगस्त, 2016 तक 120 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. इस तरह कुल 1111 करोड़ 78 लाख रुपये से अधिक का सरकारी धन मोदी सरकार के प्रचार पर खर्च हो चुका है.

आरटीआई कार्यकर्ता रामवीर सिंह का कहते हैं- कहा जाता रहा है कि मोदी चाय के पैसे भी खुद दिया करते थे, ऐसे में विज्ञापन को लेकर सवाल उठने पर आरटीआई लगाई थी. अंदाजा था मोदी के विज्ञापनों पर 5 से 10 करोड़ का खर्च किया होगा. लेकिन ढाई साल में 1100 करोड़ खर्च का पता लगने के बाद निराशा महसूस हुई. साथ ही इसकी तुलना उन्होंने अमेरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से की और कहा कि वहां सरकार के चुनाव प्रचार में 800 करोड़ रूपये खर्च हुए है जबकि हमारे देश में एक केंद्र सरकार इतना ने इतना सारा पैसा खर्च कर दिया, ये बहुत ही निंदनीय है. अगर इन पैसों को जनता के काम में लगाया जाता तो ज्यादा बेहतर होता.

कुछ महीने पहले इसी तरह का आरोप आम आदमी पार्टी पर भी लगा था. एक आरटीआई से पता चला था कि दिल्ली की आप आदमी पार्टी सरकार विज्ञापनों पर प्रतिदिन 16 लाख रुपए खर्च कर रही है. साल 2015 में आप सरकार ने पूरे वित्तीय वर्ष में विज्ञापनों पर 526 करोड़ रूपए खर्च किए थे. उस वक्त बीजेपी ने आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल पर खुद का महिमा मंडन करने का आरोप लगाया था. तब बीजेपी ने कहा था, ‘आप ऐसी पार्टी बन गई है, जिसका काम सिर्फ अपना प्रचार करना रह गया है.’

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काले धन के खिलाफ मुहिम को झटका, काली कमाई वालों के सामने सरकार ने घुटने टेके

नरेंद्र मोदी ने 1000 और 500 के नोटों की बंदी कर कालेधन और भ्रष्टाचार पर जो चोट की थी उससे काले धन के खिलाफ एक उम्मीद जगी थी। बड़े काले धन के कुबेरों और उद्योगपतियों के दबाव में मोदी सरकार ने जो नया निर्णय लिया है वह घुटने टेकने वाला है। इस निर्णय के तहत 50 फीसदी टैक्स देकर अघोषित आय को जमा करने के बाद ब्लैक मनी को व्हाइट किया जा सकता है। यह निर्णय देश के उन करोड़ों गरीबों का अपमान है जिनके वाजिब हक़ पर डाका डालकर भ्रष्टाचार के जरिये ये काली कमाई की गयी थी। सरकार इस तरह से काली कमाई को सफ़ेद करने का एक मौका पहले भी दे चुकी है जो कि नहीं देना चाहिए था।

इसका मतलब तो यह हुआ कि यदि कोई चोर 1000 रुपये की चोरी करता है और स्वयं उसका खुलासा कर उस पर 50 फीसदी टैक्स दे देता है तो उसको 500 रुपये कानूनी तौर पर दे दिया जाएगा, भले ही यह रकम 4 साल बाद लॉक इन अवधि के बाद दी जायेगी। हवाला दिया जा रहा है कि काली कमाई की इस हिस्सेदारी के कुछ हिस्से को सरकार गरीबी उन्मूलन की योजनाओं में निवेश करेगी। इसका मतलब यह हुआ कि अब सरकार भी अपनी तमाम योजनाओं में इस कालेधन का उपयोग करेगी।

सरकार को चाहिए तो यह था कि सरकार इन काले धन वालों को सजा देती और उनके काले धन को समूल नष्ट करती जिससे भविष्य में कोई भी भ्रष्टाचार के जरिये काला धन जमा करने की जुर्रत नहीं करता। मेरे विचार से सरकार का यह कदम काला धन को बढ़ावा देने वाला है। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा और अब यदि किसी को 100 रुपये काला धन पैदा करना है तो वह 200 रुपये का काला धन जमा करेगा और उसकी स्वयं घोषणा कर 100 रुपये व्हाइट मनी में बदल लेगा। मुझे मोदी सरकार का अर्थशास्त्र कोई समझाए कि आखिर क्या मजबूरी रही कि काले धन के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली सरकार काले धन में हिस्सेदारी मांग रही है और उस काली कमाई की हिस्सेदारी से गरीबों के विकास की योजनायें चलाने जा रही है। गरीबों के लिए योजनायें चलाने के लिए काले धन का प्रयोग करने के अलावा क्या सरकार के पास कोई भी विकल्प नहीं बचा था? ऐसी स्थिति में काले धन वाले धन कुबेरों और काले धन में हिस्सेदारी मागने वाली मोदी सरकार में क्या अंतर है?

सरकार के इस निर्णय से पिछले 20 दिनों से बैंकों में लाइन लगाए धैर्य पूर्वक काले धन के खिलाफ सरकार की लड़ाई में सहयोग करने वाले गरीब किसानों, मजदूरों, नौजवानों और समाज के जागरूक करोड़ों लोगों का भी अपमान है। साफ़ है कि मोदी का काले धन के खिलाफ जो क्रांतिकारी निर्णय था, उसकी इस निर्णय से हवा निकल गयी है। मोदी सरकार को यदि इसी प्रकार से भ्रष्टाचार के काले धन को सफ़ेद करना था तो फिर पिछले 20 दिनों से पूरे देश में काले धन के खिलाफ मुहिम का दिखावा क्यों किया गया? सरकार का यह निर्णय काले धन और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला है।  सरकार से मेरी मांग है कि सरकार को इस मनी बिल आयकर संसोधन विधेयक को तुरंत वापस लेकर काले धन वाले धन कुबेरों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही कर उनको जेल भेजकर कड़ी सजा दें ताकि भ्रष्टाचार के जरिये कमाए जाने वाले काले धन को पूरी तरह से रोका जा सके। यदि सरकार को यही सब कुछ करना था तो 1000 और 500 की नोट बंदी का नाटक कर पूरे देश को क्यों गुमराह किया गया?

राकेश भदौरिया
पत्रकार
एटा
उत्तर प्रदेश
rakesh.etah@gmail.com

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नोट पर रोक : जानिए, आखिर जनता की खुशी का क्या है राज…

500-1000 के नोट पर रोक के आदेश से जहां 16 दिन बाद भी पूरे देश में सड़क से लेकर संसद तक संग्राम छिड़ा है तो बैंक एवं एटीएम जनता की कसौटी पर खरे साबित नहीं हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्णय से एक-दो दिन तो गरीबों एवं आम जनता में हर्ष की लहर नजर आ रही थी और वह मोदी की वाह-वाह करते नजर आ रहे थे। जब इसकी तहकीकात की तो उनका कहना था कि अब बनियों का कालाधन निकलकर आयेगा और उसका लाभ गरीबों को मिलेगा। जिधर भी मैं निकला और जिस गरीब एवं आम जनता से जहां भी मिला वह इसलिये खुश नजर आ रहा था कि चलो हमें तो परेशानी हो रही है लेकिन अब बनियों की शामत आ जायेगी क्योंकि सबसे ज्यादा धन तो बनियों के ही पास है।

डाकघर में कार्यरत एक बाबू जो मुझे बनिया के रूप में जानता भी है यह कहते हुए बड़ी जोर से हंसते हुए कह रहा था कि जिन बनियों ने भाजपा को वोट दिया उन्हीं बनियों की… में मोदी ने डंडा कर दिया है। और सबसे ज्यादा परेशान बनिया ही है। बनिया का अब सब कालाधन रद्दी हो गया है। उस बाबू ने बताया कि उसके पास रोज बनियों के फोन नोट बदलने के लिये आते हैं। जब उसे मैंने बताया कि बनिया समाज का धन तो रीयल स्टेट, सोना, व्यापार, शेयर बाजार आदि में लगा हुआ है उसके पास नगदी नाम मात्र में होती है तो वह मानने के लिये तैयार नहीं हुआ और हंसते-हंसते चलते हुऐ कहा कि सेठजी तुम मत मानो लेकिन सबसे ज्यादा इस समय बनिया ही परेशान है।

इस तरह के नजारे चाय, सब्जी, पान वाले आदि गरीब वर्ग के लोग में सुनने को हर जगह मिले, जैसे कि उनकी बनिया समाज से कोई दुश्मनी हो। मैंने कहा कि सबसे ज्यादा कालाधन नेता, अफसर, साधू-संत, क्रिकेटर, फिल्मी कलाकार, उद्योगपतियों पर है लेकिन वह इसे मानने को तैयार नहीं हुए। कहते कि जो भी हो अब बनियों की मोदी के राज में शामत आ गई है। आप कहीं भी मोदी के नोटबंदी की चर्चा गरीब एवं आम जनता के बीच में करके देखिये वह केवल इसलिये खुश नजर आ रहे हैं कि चलो बनियों के खिलाफ पहली बार किसी ने शिकंजा तो कसा।

लेकिन उन्हें ये जानकारी नहीं है कि करीब 4 लाख करोड़ की राशि देश के मात्र 2071 उद्योगपतियों पर एनपीए के रूप में बैंकों की डूबी हुई है। जिसमें उद्योगपतियों द्वारा 50 करोड़ से ज्यादा का कर्जा ले रखा था। जबकि मात्र 5 लाख करोड़ की राशि देश की करोड़ों जनता द्वारा बैंकों में जमा कराई गई है। जिसमें उन्हें लम्बी लाइनों में लगने पर मजबूर होना पड़ा। नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के आदेश से सामान्य व्यापारी हो या बनिया या आम जनता सब खुश नजर आ रहे हैं। लेकिन सरकारी मशीनरी एवं राजनेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई सख्त कदन न उठाने से आहत दिखाई देती है। नोटबंदी के चलते खुश नजर आ रहा किसान, मजूदर वर्ग जो अब तक बनियों (व्यापारियों) को कोस-कोस कर खुश नजर आ रहा था अब उसके ऊपर तथा मोदी के अंधभक्तों पर इसकी गाज गिरना शुरू हुई तो वह अब व्यवस्था को लेकर बैंक अफसरों को कोसने लगा कि वह बनियों (व्यापारियों) से सांठ-गांठ कर नोट बदल रहे हैं।

अब धंधे ठप होने से व्यापारी मजदूर की छुट्टी कर रहा है, दुकानदार ने उधार देना बंद कर दिया है, जेब में रखी पूंजी समाप्ति की ओर है और बाजार में मंहगाई ने जोर पकड़ लिया है। बड़ा व्यापारी जो पहले भी मस्त था और आज भी है को देखकर अब गरीब, आम जनता को लगने लगा है कि हमने तो 15 दिन की मुसीबतें झेल ली हैं लेकिन अभी तक बनियों पर तो कोई मुसीबत आयी नहीं है उल्टे उनके ही बुरे दिन आने शुरू हो गये हैं। जिसमें कहीं अब रोजगार की तलाश में कहीं आटा-दाल, इलाज के लिये दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

मुझे बचपन में सुनी एक कहानी याद आ रही है एक चालाक आदमी ने भगवान शिव की तपस्या की जिससे खुश होकर शिव ने उसे इस शर्त के साथ वरदान मांगने को कहा कि जो भी तू मांगेगा उससे दोगुना तेरे पड़ोसी को मिलेगा। इस पर मजदूर ने शिव से अपनी एक भैंस मारने का वरदान मांगा तो पड़ोसी की दो भैंस मर गईं, उसने अपनी एक आंख का फूटने का वरदान मांगा तो पड़ोसी की दोनों आंखें फूट गई इस तरह पड़ोसी के सर्वनाश की चाहत में उसने अंत में अपना सब कुछ गंवा दिया। यही स्थिति नोटबंदी के मामले पर सटीक साबित हो रही है जहां कालाधन के नाम पर बनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीद से खुश नजर आ रहे गरीब, मजदूर, मोदी के अंधभक्त तथा आम जनता 16 दिन बाद भी त्राहि-त्राहि करते नजर आ रहे हैं।

लेखक मफतलाल अग्रवाल मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उनसे संपर्क mafatlalmathura@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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सहारा-बिड़ला से मोदी द्वारा घूस लेने के मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार

नई दिल्ली : सहारा और बिड़ला से नरेन्द्र मोदी द्वारा घूस लिए जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. इस मामले में अगली सुनवाई शुक्रवार को है. सहारा और बिड़ला ग्रुप की ओर से राजनेताओं को फंड देने के आरोप की याचिका सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट का तैयार हो जाना एक बड़ा घटनाक्रम है. दरअसल इन दो बड़ी कंपनियों पर पड़े छापों में बरामद दस्तावेजों की जांच के लिए गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

एनजीओ का आरोप है कि इन दोनों कंपनियों पर पड़े छापों में कई दस्तावेज बरामद हुए थे, जिनमें देश की अलग-अलग पार्टियों के नेताओं और अधिकारियों को फंडिंग देने का उल्लेख किया गया है.  कॉमन कॉज ने नेताओं को दी गई फंडिंग की जांच कराने के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाने की अपील की थी. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि आदित्य बिड़ला ग्रुप पर अक्टूबर 2013 में छापा मारा गया था. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सभी दस्तावेज जब्त किए थे.

उस वक्त बिड़ला ग्रुप के ग्रुप एक्जीक्यूटिव शुभेंदू अमिताभ के लैपटॉप और ब्लैकबेरी को चेक किया गया था. इसमें एक एंट्री गुजरात सीएम के नाम 25 करोड़ रुपए की पाई गई है. उन्होंने कहा, गुजरात के सीएम के आगे 25 करोड़ और ब्रैकेट में लिखा है ‘डन’. गुजरात का सीएम कौन थे उस टाइम, नरेंद्र मोदी जी थे. सहारा पर कई बड़े राजनेताओं को पेमेंट देने का आरोप है. इसमें 2013-14 में गुजराज, दिल्ली, छत्तीगढ़ और मध्य प्रदेश के सीएम को बड़ी राशि देने की एंट्री की गई है.

मूल खबर….

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पीएम मोदी ने सीएम रहते सहारा समूह और बिड़ला ग्रुप से रिश्वत लिया! (देखें दस्तावेज)

सहारा और बिड़ला द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को 55 करोड़ रिश्वत देने की संपूर्ण कथा

प्रधानमंत्री मोदी जब 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने की देश को सूचना दे रहे थे, उससे बहुत पहले सु्प्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण देश की प्रमुख आधा दर्जन से अधिक सरकारी जांच एजेंसियों को लिखकर बता चुके थे कि न सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ने ​बल्कि देश के अन्य तीन और मुख्यमंत्रियों ने करोड़ों का कैश उद्योगपतियों से वसूला है… प्रशांत भूषण ने जिन एजेंसियों को डाक्यूमेंट्स भेजे हैं, उनमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा कालेधन को लेकर बनाई गई दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम, निदेशक सीबीआई, निदेशक ईडी, निदेशक सीबीडीटी और निदेशक सीवीसी शामिल हैं…

भारत सरकार के इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की ओर से किए गए रेड के जो डाक्यूमेंट्स दिल्ली के पत्रकारों और नौकरशाहों के दायरे में घूम रहे हैं उनके मुताबिक, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी को सुब्रत राय के सहारा इंडिया ग्रुप से जुड़े किसी ‘जायसवाल जी’ ने करोडों रुपए कैश में दिए. पत्रिका को हाथ लगे डाक्यूमेंट्स से साफ है कि 30 अक्टूबर 2013 और 29 नवंबर 2013 को गुजरात सीएम, मोदी जी के नाम से 13 ट्रांजेक्शन हुए… इन ट्रांजेक्शन से पता चलता है कि 13 ट्रांजेक्शन में 55.2 करोड़ रुपए मोदी जी और गुजरात सीएम के नाम से दिए गए… हालांकि पत्रिका का यह भी मानना है कि यह बहुत साफ नहीं हो पा रहा है कि ट्रांजेक्शन 13 हुए या 9 ट्रांजेक्शन में 40.1 करोड़ रुपए जमा किए गए…

इसके अलावा सहारा ग्रुप से जुड़े जायसवाल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी करोड़ों के रुपए कैश में दिए… करोड़ों का कैश लेने वालों में भारतीय जनता पार्टी की कोषाध्यक्ष शायना एनसी भी शामिल हैं… इस रिपार्ट का विस्तृत खुलासा करने वाले वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि कारवां और इकॉ​नॉमिक एंड पॉलिटिकल ​वीकली पत्रिका ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से मिले सबूतों के आधार पर सभी नेताओं को सफाई के लिए ईमेल किया है… पर 17 नवंबर को किए गए ईमेल का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी कोषाध्यक्ष शायना एनसी, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित में से किसी ने अबतक नहीं दिया है…

प्रधानमंत्री से लेकर तीन-तीन मुख्यमंत्रियों द्वारा कैश में करोडों का कालाधन लेने के इस मामले का खुलासा इनकम टैक्स की डिप्टी डाइरेक्टर अंकिता पांडेय ने किया था… इन कागजातों पर उनके अलावा भारत सरकार के दूसरे अधिकारियों के भी दस्तखत हैं… यह डाक्यूमेंट देश के तमाम पत्रकारों और सरकार अधिकारियों के पास है.

कहानी ये है

अक्टूबर 2013 से नवम्बर 2014 में क्रमशः सहारा और आदित्य बिड़ला के ठिकानों पर इनकम टैक्स के छापे पड़े थे. यहां से आयकर अधिकारियों को दो महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले थे । जिनमें सरकारी पदों पर बैठे कई लोगों को पैसे देने का जिक्र था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी शामिल था. बिड़ला के यहां से जब्त दस्तावेज में सीएम गुजरात के नाम के आगे 25 करोड़ रुपये लिखा गया था. इसमें 12 करोड़ दे दिया गया था, बाकी पैसे दिए जाने थे.

इसी तरह से सहारा के ठिकानों से हासिल दस्तावेजों में लेनदारों की फेहरिस्त लम्बी थी जिसमें सीएम एमपी, सीएम छत्तीसगढ़, सीएम दिल्ली और बीजेपी नेता सायना एनसी के अलावा मोदी जी का नाम भी शामिल था. मोदी जी को 30 अक्टूबर 2013 से 21 फ़रवरी 2014 के बीच 10 बार में 40.10 करोड़ रुपये की पेमेंट की गई थी. खास बात ये है कि तब तक मोदी जी बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके थे.

सहारा डायरी की पेज संख्या 89 पर लिखा गया था कि ‘मोदी’ जी को ‘जायसवाल जी’ के जरिये अहमदाबाद में 8 पेमेंट किए गए. डायरी की पेज संख्या 90 पर भी इसी तरह के पेमेंट के बारे में लिखा गया है. बस अंतर केवल इतना है कि वहां ‘मोदी जी’ की जगह ‘गुजरात सीएम’ लिख दिया गया है, जबकि देने वाला शख्स जायसवाल ही थे. मामला तब एकाएक नाटकीय मोड़ ले लिया जब इसकी जांच करने वाले के बी चौधरी को अचानक सीवीसी यानी सेंट्रल विजिलेंस कमीशन का चेयरमैन बना दिया गया. प्रशांत भूषण ने उनकी नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी.

इस साल 25 अक्टूबर को प्रशांत भूषण ने सीवीसी समेत ब्लैक मनी की जांच करने वाली एसआईटी को सहारा मामले का अपडेट जानने के लिए पत्र लिखा. ख़ास बात यह है कि उसी के दो दिन बाद यानी 27 अक्टूबर को दैनिक जागरण में 500-1000 की करेंसी को बंद कर 2000 के नोटों के छपने की खबर आयी. बताया जाता है कि के बी चौधरी ने वित्तमंत्री अरुण जेटली को इसके बारे में अलर्ट कर दिया था.

उसके बाद सहारा ने इनकम टैक्स विभाग के सेटलमेंट कमीशन में अर्जी देकर मामले के एकमुश्त निपटान की अपील की. जानकारों का कहना है कि कोई भी शख्स इसके जरिये जीवन में एक बार अपने इनकम टैक्स के मामले को हल कर सकता है और यहां लिए गए फैसले को अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती है. साथ ही इससे जुड़े अपने दस्तावेज भी उसे मिल जाते हैं जिसे वह नष्ट कर सकता है. अदालत या किसी दूसरी जगह जाने पर यह लाभ नहीं मिलता. चूंकि मामला पीएम से जुड़ा था इसलिए सहारा इसको प्राथमिकता के आधार पर ले रहा था.

बताया जाता है कि सेटलमेंट कमीशन में भी मामला आखिरी दौर में था. भूषण ने 8 नवम्बर को फिर कमीशन को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने मामले का अपडेट पूछा था. शायद पीएम को आने वाले खतरे की आशंका हो गई थी जिसमें उनके ऊपर सीधे-सीधे 2 मामलों में पैसे लेने के दस्तावेजी सबूत थे. उनके बाहर आने का मतलब था पूरी साख पर बट्टा. मामले का खुलासा हो उससे पहले ही उन्होंने ऐसा कोई कदम उठाने के बारे में सोचा जिसकी आंधी में यह सब कुछ उड़ जाए. नोटबंदी का फैसला उसी का नतीजा था.

इसे अगले साल जनवरी-फ़रवरी तक लागू किया जाना था, लेकिन उससे पहले ही कर दिया गया. यही वजह है कि सब कुछ आनन-फानन में किया गया. न कोई तैयारी हुई और न ही उसका मौका मिला.  यह भले ही 6 महीने पहले कहा जा रहा हो लेकिन ऐसा लगता है उर्जित पटेल के गवर्नर बनने के बाद ही हुआ है, क्योंकि नोटों पर हस्ताक्षर उन्हीं के हैं. छपाई से लेकर उसकी गुणवत्ता में कमी पूरी जल्दबाजी की तरफ इशारा कर रही है.

इस मामले में फेसबुक पर आए कुछ प्रमुख पोस्ट्स इस प्रकार हैं…

Sheetal P Singh : नोटबंदी और मोदी जी का हवाला… CM मोदी ने 2012 में आदित्य बिड़ला ग्रुप से पच्चीस करोड़ रुपये घूस के तौर पर हवाला ट्रांजैक्शन से लिये! दिल्ली विधानसभा में यह आरोप लगा और income tax deptt का यह संलग्नक पेश किया गया। Income tax deptt ने २०१३ की एक रेड में आदित्य बिड़ला ग्रुप का एक लैपटॉप ज़ब्त किया था । यह दस्तावेज़ वहाँ से मिला था । फ़िलहाल यह मामला दरी के नीचे था पर अब केजरीवाल ने इसे पर लगा दिये! ग़ौरतलब है कि मोदी जी की शैक्षणिक योग्यता का सवाल भी केजरीवाल द्वारा उठाये जाने पर मोदी जी के हलक में अटका हुआ है। ये दूसरा सहारा ग्रुप का काग़ज़ है। दिल्ली विधानसभा की कल की बहस में रिकार्ड पर आ गया। यह भी इनकम टैक्स के दस्तावेज़ों में है। यह बताता है कि CM मोदी को ढाई सौ करोड़ रुपये २०१३ से पहले दिये गये! इसकी पड़ताल और इस पर राजनैतिक बवाल होना चइये कि नंई चइये?

Sarvapriya Sangwan : प्रशांत भूषण ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेज़ को लिखित शिकायत की है कि इनकम टैक्स और सीबीआई के छापों के दौरान कुछ दस्तावेज़ निकल कर आये हैं जिससे पता चलता है कि देश की दो बड़ी उद्योग कंपनियों ने कई मुख्यमंत्रियों और सांसदों को घूस दी है। सहारा के यहाँ 22 नवंबर 2014 को छापा पड़ा था। आदित्य बिरला ग्रुप पर 15 अक्टूबर 2013 को छापा पड़ा था। ये जो दस्तावेज़ हैं, इन पर इनकम टैक्स अफसर के दस्तख़त हैं, गवाह भी मौजूद हैं।  भूषण जल्दी ही सुप्रीम कोर्ट जायेंगे। दिल्ली विधानसभा में इस रिपोर्ट को मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने ज़्यादा खुले तौर से रखा। उनके पास भी वे सब दस्तावेज़ मौजूद थे जिसमें नरेंद्र मोदी को घूस दिए जाने की बात है। घोटालों और भ्रष्टाचार के विरोध में देशभक्ति की दुहाई देने वालों से उम्मीद है कि वो राजनीतिक रुझान की वजह से चुप नहीं बैठेंगे। अगर ये आरोप गलत हैं तो प्रधानमंत्री को मानहानि का दावा ठोकना चाहिए।

Arun Maheshwari : दिल्ली की विधान सभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आयकर विभाग के उन मौलिक दस्तावेज़ों को रखा है जिनमें सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उद्योगपतियों से घूस लेकर उनके काम करने के लिये अभियुक्त बताया गया है। केजरीवाल ने राष्ट्रपति से माँग की है कि वे सुप्रीम कोर्ट के जज के ज़रिये इन दस्तावेज़ों की जाँच करने के निर्देश जारी करें।

Dilip Khan : प्रधानमंत्री को कोई सीधे-सीधे घूसखोर कह रहा है और प्रधानमंत्री चुप है। जांच करवाकर तमाचा मार दीजिए केजरीवाल के मुंह पर। अगर झूठ बोल रहा है तो पकड़ा जाएगा। हिम्मत कीजिए। आयकर विभाग का काग़ज़ सबको दिखा दीजिए। बता दीजिए कि सुवेन्दु अमिताभ ने आपको 25 करोड़ रुपए नहीं दिए थे। बिड़ला ग्रुप के सुवेन्दु अमिताभ ने नरेन्द्र मोदी को 25 करोड़ रुपए घूस दिया- विधानसभा में केजरीवाल का आरोप। आयकर विभाग के दस्तावेज़ों के साथ बंदे ने ये बात कही है। नरेन्द्र मोदी को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। केजरीवाल ने कल दिल्ली विधानसभा में नरेन्द्र मोदी पर गंभीर इल्ज़ाम लगाए। आयकर विभाग के दस्तावेज़ दिखाते हुए कहा कि नरेन्द्र मोदी घूसखोर है। कॉरपोरेट घरानों से घूस लेकर उनका काम करते हैं। केजरीवाल ने कहा कि नरेन्द्र मोदी ने बिड़ला ग्रुप के सुवेन्दु अमिताभ से 25 करोड़ रुपए घूस ली। मोदी जी को इस आरोप के बाद तो पद छोड़ ही देना चाहिए और अगर वो मानते हैं कि आरोप ग़लत है तो केजरीवाल पर मुक़दमा करें। जेल भेज दें केजरीवाल को। पर दोनों में से कुछ नहीं कर रहे। चुपचाप रफा-दफ़ा करना चाहते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, सर्वप्रिया सांगवान, अरुण माहेश्वरी और दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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