दिल्ली में मोदी की मां का आना और गुजरात में पूनम बेन का नाले में गिरना… दो घटनाएं, दो स्थापनाएं…

Sanjaya Kumar Singh : एक पत्रकार मित्र का कहना है कि प्रधानमंत्री बनने के दो साल बाद नरेन्द्र मोदी की मां मदर्स डे पर दिल्ली आईं। इसमें भी लोग राजनीति देख रहे हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को। पर वे बता रहे थे कि जैसे आईं वैसे ही चली जातीं तो किसी को पता ही नहीं चलता। इसलिए बताना पड़ा कि आई थीं और चली गईं। क्यों? मैं नहीं जानता। अब संयोग से यह सूचना तमिलनाडु में मतदान से पहले वाले दिन आई ताकि मतदान वाले दिन अखबारों में छपे।

लोगों को मां की सेवा याद रहे। यह मकसद तो नहीं ही रहा होगा। पर ऐसा हुआ। पत्रकार भाई लोगों ने ही छापा है। पर अब पेट में दर्द हो रहा है। इसके साथ तर्क यह कि दक्षिण के लोग बूढ़ी मां की सेवा के मामले में बहुत भावुक होते हैं और जब पूरा हिंदुस्तान खिलाफ था तब भी तमिल इंदिरा मां के पक्ष में थे। निश्चित रूप से मोदी जी की माँ का उनके साथ रहना, आना-जाना मोदी जी का पर्सनल मामला है। जैसे कि हर किसी की माँ का होता है। पर राजनीति में संयोग पर्सनल नहीं होता है। संयोग के मायने निकाले जाते रहे हैं। क्या किया जाए। खबर नहीं है पर बोले-लिखे बिना रहा भी नहीं जाता है पत्रकारों से।

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जनप्रतिनिधि के नाले में गिरने का अफसोस है। ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ करे। दीर्घायु बनाए। लेकिन मुद्दा यह है कि ऐसा पिछड़े बिहार और जंगलराज वाले इलाकों में क्यों नहीं होता है। इसमें किसका हाथ है। दोषी कौन है? जिम्मेदारी किसकी है। क्या देश इस बारे में कुछ जानना चाहता है? शुरुआती सूचना के मुताबिक पूनम बेन नाले पर बने सीमेंट-कंक्रीट के अस्थायी पुल या ढक्कन पर खड़ीं थीं। जो टूट गया। यह भ्रष्टाचार का मामला है या ईश्वर की इच्छा या आरक्षण से बने इंजीनियर का कमाल? देश के अन्य हिस्सों में होने वाली दुर्घटनाओं पर तरह-तरह के विचार और ज्ञान देने वाले भक्त जानना चाहेंगे कि माजरा क्या है? पता चले तो मुझे भी जानना है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मोदी के दो साल : मीडिया को डरा फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया… अब ‘दिक्कत’ दे रहीं अदालतों को ठीक करेंगे साहब लोग

Sanjaya Kumar Singh : सत्ता मिली तो ये कर दूंगा, वो कर दूंगा। ऐसे, वैसे। अब विपक्ष (जो बचा ही नहीं था) सहयोग नहीं कर रहा है। मीडिया को डरा कर और फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया। अधिकारियों को पहले ही कसने का दावा किया गया। यह भी कि सब समय से आते-जाते हैं। प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं। अधिकारी परेशान हैं, काम करते करते। नालायकों को दो साल पहले ही हटा दिया गया था।

पहले जनधन खाते के नाम पर फिर सबसिडी छोड़ने की अपील करके जनता से लिया ही है, दिया कुछ नहीं। सफाई नगर निगमें कराती हैं पर स्वच्छता टैक्स केंद्र सरकार लेती है। सर्विस टैक्स बढ़ा दिया सो अलग। इन सबके बावजूद जनता को क्या मिला उसकी बात नहीं करेंगे। अब अदालतें दखल ना दें ताकि हम उत्तराखंड करें या डिग्री पर चुप रहें। आरटीआई कानून से तकलीफ हो ही रही है। देखते हैं पांच साल में और क्या क्या मांगते हैं। दिया क्या है ये मत पूछिए। राज करेंगे (मूंग दलेंगे) 2024 तक। मुंगरी लाल के हसीन सपने याद आ गए।

देखें ये खबर…


सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल न दें अदालतें : अरुण जेटली

नई दिल्ली: वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आज फिर कहा कि अदालतों को सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए। इंडियन वीमेंस प्रेस कोर के एक कार्यक्रम में उन्होंने आरबीआई गवर्नर से सरकार के टकराव की खबर को भी गलत बताया।

“कोर्ट कार्यपालिका का विकल्प नहीं हो सकती। कोर्ट उसकी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकती। सभी संस्थाओं को लक्ष्मण रेखा खींचना होगी।” वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को दिल्ली में पत्रकार वार्ता में यह बात कही। कानून के जानकार वित्त मंत्री ने बहुत सतर्क होकर ये साफ किया कि अदालत और सरकार के कामकाज के दायरे अलग हैं। अदालतों को अपनी लक्ष्मणरेखा खींचनी होगी।

वित्त मंत्री की इस सलाह के पीछे हाल के कई मसले हैं। उत्तराखंड पर राष्ट्रपति शासन के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया; आधार को वित्त विधेयक बनाने का मामला अदालत में है; दिल्ली में डीज़ल गाड़ियों पर बैन लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी सरकार निराश है और ताज़ा मामला मेडिकल एंट्रेंस को लेकर एनईईटी का है। जेटली ने कहा, “मेरी नज़र में मेडिकल संस्थाओं में दाखिले का मामला कार्यपालिका के अधीन आता है।”

लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने के इल्ज़ाम को लेकर जेटली किनाराकशी कर गए। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन पर बीजेपी के हमले को भी उन्होंने मीडिया के मत्थे मढ़ दिया और कहा कि आरबीआई से सरकार का कोई टकराव नहीं है। अरुण जेटली ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंधों को लेकर मीडिया में छपने वाली खबरों को आपको गंभीरता से लेना चाहिए।” वित्त मंत्री से कहा कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंध मजबूत हैं।

सूखा और NEET जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को लेकर अरुण जेटली ने अपनी चिंताएं जताईं, लेकिन जिस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में हस्तक्षेप किया …उससे यह सवाल उठता है कि क्या सरकार और राजनीतिक दलों ने इन मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाहन सही तरीके से किया था। क्या उनकी कमजोरियों की वजह से ही कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा था। (साभार एनडीटीवी डाट काम)


वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के इस एफबी स्टेटस जिसे दर्जनों लोगों ने शेयर किया है, पर आए कुछ प्रमुख पठनीय कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Priyadarshan Shastri : पहले दीवानी मुकदमों में वादी के बयान जज के सामने मौखिक होते थे वादी का वकील सवाल करता था तथा वादी अपनी याददाश्त के आधार पर जवाब देता था कि उसने मुक़दमा क्यों पेश किया है उसे समस्या क्या है ? इसमें फायदा ये होता था कि कई बार दावे में कोई झूठी मनगढ़ंत बात लिखी होती थी वह पकड़ में आ जाती थी …. फिर नंबर आता था प्रतिवादी के वकील का कि वह वादी से ज़िरह में सवाल पूछे …. ऐसे में होता ये था कि वकील अपनी चतुराई से असत्यता को उगलवाने की पूरी कोशिश करता था …. ये सारी प्रक्रिया न्यायालय द्वारा रिकॉर्ड की जाती थी । पहली बार अटल जी के समय जब जेटली जी लॉ मिनिस्टर थे तब सीपीसी में संशोधन कर उक्त सिस्टम में बदलाव कर लिखित में शपथपत्र प्रस्तुत करने की व्यवस्था लागू कर दी । अब याददाश्त पर बयान वाली प्रक्रिया समाप्त हो गई । अब तो दावे को ही शपथपत्र के रूप में टाइप कर प्रस्तुत कर दिया जाता है … कई बार ज़िरह के नाम पर न्यायालय प्रश्नावली पहले ही मांग लेता है। कहने का मतलब ये है कि न्यायिक प्रक्रिया का मूल जिससे वकील सत्यता को उजागर करते थे वह समाप्त हो ही गयी है अब मुक़दमा केवल कागज़ी कार्यवाही रह गया है।

Mrinal Singh : बात इससे कहीं ज़्यादा गंभीर है! ये वक्तव्य इस बात का संकेत है की अब सरकार अदालत पर नकेल कसने के लिए कदम उठाने जा रही है! अघोषित एमर्जेन्सी अब अगले चरण की ओर जा रही है जहाँ संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण होगा! पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विश्वविद्यालयों का तो हाल देख ही लिया जहाँ से विरोध के स्वर उभर रहे थे! मेरा अनुमान है की अगला हमला संविधान पर होगा और समय आ गया है की जनता इसका पूरी ताक़त से विरोध करे जैसे एमेरजेंसी में किया था!

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मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे?

Sanjaya Kumar Singh : मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे हैं। और नहीं कर रहे हैं तो भक्तों ने जैसे कन्हैया को नेता बनाया वैसे ही अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को पंजाब चुनाव जीतने का मौका क्यों दे रहे हैं। भक्तों के उछलकूद का लाभ अरविन्द केजरीवाल को मिल रहा है। अलमारी में रखी डिग्री अंडा-बच्चा तो देती नहीं। ना बीमार होकर अस्पताल जाती है। आमलोगों की डिग्री तो पत्नी कहीं रख देगी, चूल्हा जला चुकी होगी या बच्चों के टिफिन पैक करके दे देगी। मोदी जी के साथ तो ये सब लफड़ा भी नहीं है। फिर इतनी देर?

डिग्री के मामले में अरविन्द केजरीवाल के दावे में दम लगता है। रही सही कसर चुप्पी से पूरी हो जा रही है। रेत में सिर छुपाने से काम नहीं चलता है। जितनी देर करेंगे उतने फंसेंगे। फिर इस्तीफा देने से कम में बात नहीं बनेगी। केजरीवाल को एक और श्रेय मिल जाएगा।

नरेन्द्र मोदी की डिग्री पर उठ रहे सवाल भाजपा के लिए बहुत मामूली हैं और सोनिया गांधी के रिश्वत लेने का मामला बहुत बड़ा। छप्पन ईंची सरकार की सीमा खुद तय हो रही है। ना सोनिया के खिलाफ कार्रवाई करेंगे ना मोदी पर आरोप का जवाब देंगे। आम आदमी पार्टी को तो अपना ही स्तर नहीं पता है। जय हो। यही हाल रहा तो देश की राजनीति में मजा ही नहीं रहेगा। एकदम गोबर हो जाएगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : इधर केजरीवाल बढ़-चढ़कर, ऐलानिया, खुल्लमखुल्ला, ताल ठोंकते हुए, डंके की चोट पर मोदी जी की डिग्रियों को फर्जी बता रहे हैंऔर उधर सरकार तथा बीजेपी दुबकी हुए है। वह चुप्पी धारण किए हुए है और इस कोशिश में है कि अगस्ता वेस्टलैंड के शोर-शराबे में केजरीवाल की आवाज़ दब जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। दूसरे इससे संदेह और भी पक्के होते जा रहे हैं कि मोदी ने फर्ज़ी डिग्रियाँ हासिल कीं और देश को उल्लू बनाया। प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में ऐसी राय बने ये न लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। ये उस हिंदुत्ववादी राजनीति पर भी कलंक होगा जो सदाचार को खुद की बपौती मानकर सबको दुषचरित्र साबित करने पर आमादा रहती है। इसलिए पार्टी और सरकार को सबूतों के साथ केजरीवाल के आरोपों का जवाब देना चाहिए, बल्कि उन पर क्रिमिनल डेफेमेशन का केस भी दायर कर देना चाहिए।

मोदीजी को दिल्ली सरकार और केजरीवाल टीम से निपटने की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने उनको काम न करने देने की चालें चलकर फुरसतिया बना दिया। अब ये तो सबको पता ही है कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। यही वजह है कि वे अपना वक़्त उनको परेशान करने के नए नए तरीके खोजने में लगा रहे हैं। अब अगर मोदीजी और उपराज्यापाल साहब इस रणनीति को उलट दें तो केजरीवाल सरकार काम में उलझकर रह जाएगी और उसके पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि आपके खिलाफ़ खुराफ़ात में ही लगे रहें।

ये दिल्ली यूनिवर्सिटी भी केजरीवाल एंड कंपनी के साथ साज़िश में शामिल है। ये जान-बूझकर पीएम और आपकी डिग्रियों के बारे में भ्रम की स्थिति बनाकर अफवाहों और दुष्प्रचार को हवा दे रही है। स्मृति जी वीसी को तुरंत बर्खास्त करिए और न माने तो विवि ही बंद कर दीजिए। और अभी तक आपने सूचना आयुक्त को क्यों छोड़ रखा है? उसे भी उसके किए की सज़ा दीजिए। आरटीआई क्या इसी के लिए बनाई गई है कि आप हर कोई पीएम को बदनाम करने के लिए उसका इस्तेमाल करता फिरे। कड़ा सबक सिखाइए सबको।

अब तो प्रधानमंत्री को अपनी डिग्रियां निकालकर इन स्यूडो सेकुलरिस्टों और आपवालों के मुँह पर मारकर दिखा देना चाहिए कि ये लोग उनके बारे में जो अनर्गल प्रचार करते रहते हैं वह कितना झूठा है, कितना दुराग्रहों से प्रेरित है। स्मृति ईरानी आप भी मत छोड़िए इन नामुरादों को। वैसे तो ये नरक में जाएंगे ही और इनको कीड़े भी पड़ेंगे मगर ज़रूरी है कि आप लोगों की उज्ज्वल छवि देशवासियों और दुनिया के सामने और भी निखर करआए। आखिर आप देश के दो महत्वपूर्ण पदों पर बैठी महान विभूतियाँ हैं और आप लोग देश का नया इतिहास लिख रहे हैं। आपसे देशभक्तों को कितनी आशाएं हैं। उन्हें आप पर कितना विश्वास है ये आपसे बेहतर भला कौन जानता है। वे आप पर उछाले जा रहे कीचड़ से बहुत आहत हैं और उद्वेलित भी हैं। अगर संविधान और कानून न होता इस देश में तो वे एक को भी न छोड़ते। उम्मीद है आप लोग उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और विरोधियों को धूल चला देंगे। उन सबकी और मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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देश भक्त मोदी के कारिंदो का काला चिट्ठा आरटीआई के जरिए हुआ उजागर

Vishwanath Chaturvedi : देश भक्त मोदी के कारिंदो का काला चिट्ठा जानिये…. पूँजीपतियों की किस किस कम्पनी ने लगाया चूना, देश और देशभक्ति के नाम पर : आर टी आई से हुआ खुलासा… आप एक विजय माल्या की बात करते हैं.. मैं आपको बता दूँ अभी हाल में एक आरटीआई आवेदन के ज़रिये इस बात का खुलासा हुआ कि 2013 से 2015 के बीच देश के सरकारी बैंकों ने एक लाख 14 हज़ार करोड़ रुपये के कर्जे माफ़ कर दिये। इनमें से 95 प्रतिशत कर्जे बड़े और मझोले उद्योगों के करोड़पति मालिकों को दिये गये थे। यह रकम कितनी बड़ी है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर ये सारे कर्ज़दार अपना कर्ज़ा लौटा देते तो 2015 में देश में रक्षा, शिक्षा, हाईवे और स्वास्थ्य पर खर्च हुई पूरी राशि का खर्च इसी से निकल आती।

इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। पूँजीपतियों के मीडिया में हल्ला मचा-मचाकर लोगों को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि अर्थव्यवस्था में घाटे के लिए आम लोग ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे अपने पूरे टैक्स नहीं चुकाते, बिल नहीं भरते, या शिक्षा, अस्पताल, खेती आदि में सरकारी सब्सिडी बहुत अधिक है, आदि-आदि। ये सब बकवास है। देश की ग़रीब जनता कुल टैक्सों का तीन-चौथाई से भी ज़्यादा परोक्ष करों के रूप में चुकाती है। मगर इसका भारी हिस्सा नेता और अफ़सरशाही की ऐयाशियों पर और धन्नासेठों को तमाम तरह की छूटें और रियायतें देने पर खर्च हो जाती है। इतने से भी उनका पेट नहीं भरता तो वे बैंकों से भारी कर्जे लेकर उसे डकार जाते हैं।

ग़रीबों के कर्जे वसूल करने के लिए उनकी झोपड़ी तक नीलाम करवा देने वाली सरकार अपने इन माई-बापों से एक पैसा नहीं वसूल पाती और फिर कई साल बाद उन्हें माफ़ कर दिया जाता है। दरअसल इस सारी रकम पर जनता का हक़ होता है। करोड़ों लोगों की छोटी-छोटी बचतों से बैंकों को जो भारी कमाई होती है, उसी में से वे ये दरियादिली दिखाते हैं। आइये अब ज़रा देखते हैं कि इन लुटेरो में से 10 सबसे बड़े डकैत कौन हैं।

1. टॉप टेन में सबसे ऊपर हैं, अनिल अम्बानी का रिलायंस ग्रुप जो 1.25 लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ दबाये बैठा है।
2. दूसरे नंबर पर है अपने कारखानों के लिए हज़ारों आदिवासियों को उजाड़ने वाला वेदान्ताल ग्रुप जिस पर 1.03 लाख करोड़ कर्ज़ है।
3. एस्सार ग्रुप पर 1.01 लाख करोड़ कर्ज़ है।
4. मोदी के खास अडानी ग्रुप ने बैंकों के 96,031 करोड़ रुपये नहीं लौटाये हैं। इसके बाद भी उसे 6600 करोड़ रुपये के नये कर्ज़ की मंजूरी दे दी गयी थी लेकिन शोर मच जाने के कारण रद्द हो गयी।
5. जेपी ग्रुप पर 75,163 करोड़ का ऋण है।
6. सज्जन जिन्दल (जो मोदी की पाकिस्तान यात्रा के समय वहाँ पहुँचे हुए थे) के जे.एस.डब्ल्यू. ग्रुप पर 58,171 करोड़ का कर्ज़ है।
7. जी.एम.आर. ग्रुप पर 47,975 करोड़ का ऋण है।
8. लैंको ग्रुप पर 47,102 करोड़ का ऋण है।
9. सांसद वेणुगोपाल धूत की कंपनी वीडियोकॉन पर बैंकों का 45,405 करोड़ का ऋण है।
10. जीवीके ग्रुप कुल 33,933 करोड़ दबाये बैठा है जो 2015 में मनरेगा के लिए सरकारी बजट (34000 करोड़) से भी ज़्यादा है।

आप अभी व्यस्त रहिये अपनी धर्म और जाति पात की गूढ़ ज्ञान गंगा में और अपने अपने नेताओं की जिंदाबाद मुर्दाबाद में लड़ते मरते रहिये आपस में.. देश और देश की संपत्ति का क्या है वो तो आपके यही महान नेता, धर्म गुरु और पूंजीपति मिल बाँट कर जल्द ही चट कर जायेंगे। बस आप अपनी देशभक्ति भारत माता की जय ,पार्टी भक्ति, जनहित विरोधी भ्रष्टाचारी नेता की जय जय कार की चाटुकारिता तक सीमित रखिये।

सुप्रीम कोर्ट के चर्चित वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

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मोदी सरकार के वर्तमान इकनॉमिक मॉडल में रोजगार रहित विकास : पुण्य प्रूसन बाजपेयी

गुजरात में पाटीदारों ने आरक्षण के लिए जो हंगामा मचाया, जो तबाही मचायी, राज्य में सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति स्वाहा कर दी उसका फल उन्हें मिल गया। सरकार ने सामान्य वर्ग में पाटीदारों समेत आर्थिक रुप से पिछड़े लोगों के लिए दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी। तो विकास की मार में जमीन गंवाते पटेल समाज के लिये यह राहत की बात है कि जिनकी कमाई हर दिन पौने दो हजार की है उन्हें भी आरक्षण मिल गया। यानी सरकारी नौकरी का एक ऐसा आसरा जिसमें नौकरी कम सियासत ज्यादा है। यानी आरक्षण देकर जो सियासी राजनीतिक बिसात अब बीजेपी बिछायेगी उसमें उसे लगने लगा है कि अगले बरस गुजरात में अब उसकी हार नहीं होगी।

इससे पहले कुछ ऐसा ही हाल हरियाणा के जाट आंदोलन का है। आरक्षण इन्हें भी चाहिए था और आरक्षण की मांग करते हुये करीब 33 हजार करोड़ की संपत्ति स्वाहा इस आंदोलन में हो गई। धमकी सरकार गिराने की दे दी गई तो आरक्षण भी मिल गया। लेकिन यह सवाल दोनों जगहों पर गायब है कि नौकरी है कितनी और जिस जमीन और खेती को गंवाकर आरक्षण की राजनीति के रास्ते देश निकल रहा है उसका सच आने वाले वक्त में ले किस दिशा में जायेगा क्योंकि गुजरात में पटेल समाज की 12 फीसदी खेती की जमीन विकास ने हड़प ली। हरियाणा में जाट समाज की 19 फीसदी जमीन विकास ने हड़प ली। देश में किसानों की कमाई में 27 फीसदी की गिरावट बीते 3 बरस में आई है। अगर आरक्षण के जरिये नौकरियों की चाहत है तो हालात हैं कितने बुरे इसका अंदाजा इससे भी लग सकता है कि गुजरात में 11,0189 रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं। हरियाणा में 30 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं। देश की अर्थव्यवस्था जिस दिशा में जा रही है उसमें रोजगार बिना विकास का नारा ज्यादा बुलंद है। आइये इसे भी समझ लें।

देश भर में रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या 2 करोड 71 लाख 90 हजार है। वैसे बेरोजगार जो रोजगार दफ्तर तक भी नहीं पहुंच पाये उनकी संख्या 5 करोड 40 लाख है। पूरे देश में सरकारी नौकरी करने वाले महज 1 करोड 70 लाख हैं। यानी जिस वक्त बिना रोजगार विकास के रास्ते मोदी सरकार चल पड़ी है और आरक्षण के मांग के लिये पटेल समाज से लेकर जाट समाज आरक्षण पा कर खुश है उस दौर का सच यह भी है कि बीते 9 बरस में देश में सरकारी नौकरी में 25 लाख नौकरियों की कमी आ गई। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि विकास की सोच प्राइवेट नौकरिया पैदा कर रही है। मोदी सरकार खुश है कि जीडीपी से लेकर निवेश में विकास हो रहा है लेकिन सच तो यही है कि भारत रोजगार रहित विकास की राह पर भारत चल पड़ा है। नौकरी का हाल क्या है, ये समझ लीजिए।

देश के प्रमुख आठ कोर सेक्टरों में बीते बरस सबसे कम रोजगार पैदा हुआ। 2015 में सिर्फ 1.35 लाख युवाओं को रोजगार मिला जबकि 2011 में 9 लाख और 2013 में 4.19 लाख युवाओ को नौकरी मिली थी। यानी जिस वक्त जीडीपी को लेकर सरकार अपना डंका दुनिया में यह कहकर बजा रही है कि दुनिया में छाई मंदी के बीच भी भारत की जीडीपी 7.7 फीसदी है। लेकिन इसका दूसरा सच यह है कि रोजगार दर फकत 1.8 फीसदी है। हर महीने दस लाख युवा जॉब मार्केट में कूद रहा है, लेकिन उसके लिए नौकरी है नहीं, क्योंकि एक तरफ सरकारी नौकरियां कम तो दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में नौकरियों में सौ फीसदी तक की कमी आ चुकी है। 1996 -97 में सरकारी नौकरी जहां 1 करोड़ 95 लाख थी, जो अब एक करोड़ 70 लाख रह गई हैं। केयर रेटिंग के सर्वे के मुताबिक मोदी सरकार के दौर के पहले बरस यानी 2014-15 में 1072 कंपनियों ने सिर्फ 12,760 जॉब पैदा किए। जबकि 2013-14 में 188,371 नौकरियां निकली थी। तो क्या डिजिटल इंडिया से लेकर मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया तक मोदी सरकार की तमाम योजनाएं आकर्षक भले हों लेकिन रोजगार पैदा हो नहीं रहे।

बड़ा सवाल यही है कि रोजगार रहित विकास का मतलब है क्या? रोजगार पैदा ही नहीं होंगे तो पढ़ा लिखा युवा जाएगा कहां? क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि अगले 35 साल में भारत उन देशों में होगा-जहां रोजगार का भयंकर संकट होना है। और इससे कौन इंकार करेगा कि पेट भरने के लिए रोजगार तो चाहिए ही। लेकिन रोजगार पैदा करने से क्या देश आगे बढता है । क्योंकि विजय माल्या की कंपनियो की फेरहसित को ही समझे तो यूनाइटेड स्प्रिट्स  लिमिटेड , यूनाइटेड ब्रेवरीज लिमिटेड , मंगलोर कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स, रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ,यूबी इंजीनियरिंग लिमिटेड ,यूबीआईसीएस ,बर्जर पेंट , क्रॉम्पटन मालाबार कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स ,द एशियन एज, सिने ब्लिट्स सरीखे दर्जनो कंपनियो की ये फेरहिस्त काफी छोटी है । इस फेहरिस्त में देश की छोटी बडी दो हजार से ज्यादा कंपनिया आपको जोडनी होगी जिसमें काम करने वाले लोगो की तादाद 20 लाख पार कर जायेगी । और देश की सत्ता खुश हो जायेगी की भारत विकास की राह पर है । खूब रोजगार पैदा हो रहे है । तो जरा कल्पना किजिये देश के बैको को चूना लगाकर जो विजय माल्या लंदन भाग चुके है और अब वह कह रहे हैं कि भारत नहीं लौटेंगे।

तो उसी विजय माल्या को बैंकों ने कर्ज दिया . उसी कर्ज से विजय माल्या ने कंपनियां खोली। उन्हीं कंपनियों में करीब एक लाख युवाओं को रोजगार मिले और उसी रोजगार को देश के विकास से जोड़ा गया और अब जब माल्या का सबकुछ लूट-लूटा चुका है तो सारी कंपनिया बंद हैं। सारे रोजगार खत्म हो चले हैं। मनमोहन सिंह के दौर के किंग ऑफ गुड टाइम्स मोदी सरकार के दौर में भगौडा बन चुके हैं। लेकिन सवाल वही उलझा है कि क्या देश के पास कोई इक्नामिक माडल नहीं है। मनमोहन सिंह के इक्नामिक माडल में विजयमाल्या हर बरस दो-चार कंपनियां.खोल रहे थे। मार्च 2012 में 6185 कर्मचारी काम करते थे। करीब 80 हजार से एक लाख लोगों को माल्या ने रोजगार दिया था। माल्या के यूबी ग्रुप में कर्मचारी का औसत वेतन 2,28,258 रुपए से 8,85,470 रुपए की रेंज में था। यानी माल्या ने पैसा बनाया तो पैसा बांटा भी। और सच कहा जाए तो पैसा डुबोकर भी पैसा बांटा।

किंगफिशर एयरलाइंस डूबने की स्थिति में माल्या ने सरकारी बैंकों से यह कहते हुए ही कर्ज लिया कि कंपनी चलेगी तो रोजगार बढ़ेगा। और बैंक भी कर्ज देते रहे। लेकिन-जब कंपनी डूबी तो कर्मचारी सड़क पर आ गए और माल्या राजनीति के रास्ते पैसा लेकर लंदन भागने में कामयाब रहे। तो सवा बड़ा हैं, फर्जी विकास की राह पर देस चल रहा था। अब फर्जी विकास रोका गया तो फर्जी माडल ढह रहा है । फर्जी माडल के ढहने ने देश में रोजगार खत्म कर दिया है। सवाल वही कि विजय माल्या देश लौट भी आये तो क्या होगा। क्या वह सहारा के सुब्रत राय की तर्ज पर जेल में रहेंगे। या फिर वसूली के उन रास्तो पर सरकार कोई नीतिगत फैसला लेगी जिससे विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वाकई देश लाया जा सके। पनामा पेपर के लीक होने के बाद उन चेहरो पर लगाम कसी जा सके और 6 हजार से ज्यादा कारोबारियो की पेरहिस्त जिन्होने हजारो कंपनियां खोल कर देश को चूना लगाया। खुद रईसी में रहे उन पर कोई लगाम लगायी जा सके। यानी आरक्षण से आगे देश जा नहीं पा रहा है और नौकरी बगैर विकास की राह परह देश है और हर कोई मान चुका है कि राजनीति में ही सबसे ज्यादा नौकरी भी है और पावर भी।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से लिया गया है.

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चीन के दबाव में झुकी 56 इंच के सीने वाली सरकार!

Priyabhanshu Ranjan : तो क्या वाकई चीन के दबाव में झुक गई 56 इंच के सीने वाली मोदी सरकार? पिछले दिनों खबर आई कि UN में आतंकवादी मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने के भारत के प्रस्ताव पर चीन की ओर से अड़ंगा (Veto) लगाए जाने के जवाब में मोदी सरकार ने चीन के विद्रोही उइगुर नेता Dolkun Isa को भारत आने का वीजा दिया है ताकि वो यहां चीन के विद्रोही नेताओं (Dissident Leaders) की बैठक में शिरकत कर सके।

गौरतलब है कि अब जर्मनी के नागरिक बन चुके Dolkun Isa को चीन ‘आतंकवादी’ मानता है। मोदी सरकार के इस कदम से जुड़ी खबरों में कुछ अति-उत्साही पत्रकारों ने जनता को बताया कि मसूद अजहर के मुद्दे पर चीन ने UN में जो कुछ भी किया है, ये उस पर मोदी सरकार की ओर से की गई जवाबी कार्रवाई है और चीन को दिया गया एक STRONG MESSAGE है।

मैं अमूमन मोदी सरकार की आलोचना करता हूं, लेकिन ये खबर पढ़ कर मुझे बड़ी खुशी हुई। मैंने उस खबर को फेसबुक पर शेयर भी किया। सोचा कि चलो 56 इंच के सीने वाली ये सरकार कुछ काम तो आई। कम से कम इसमें चीन को आंख दिखाने की हिम्मत तो है।

लेकिन कल मैंने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप का बयान देखा कि मोदी सरकार को तो पता ही नहीं कि Dolkun Isa को वीजा कैसे मिला। विकास ने कहा कि हम देख रहे हैं कि Dolkun को वीजा कैसे मिला। मुझे तभी समझ आ गया था कि लगता है बीजिंग ने मोदी सरकार पर दबाव बना दिया है।

और अब खबर आई है कि भारत ने Dolkun का वीजा रद्द कर दिया है। यानी मसूद अजहर के मुद्दे पर मोदी सरकार के STRONG MESSAGE की हवा निकल गई।

हाय रे 56 इंच का सीना!

पत्रकार प्रियभांशु रंजन के फेसबुक वॉल से.

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पीएम ने की महाराष्‍ट्र के इस गरीब कि‍सान से मुलाकात जिसका वजन 70 किलो गिर चुका है :)

नई दि‍ल्‍ली : सोमवार को देश की शुरुआत एक खुशनुमा दोपहर से तब हुई, जब चुनाव प्रचार के अपनी अति‍व्‍यस्‍त कार्यक्रम से मौका नि‍कालकर प्रधानमंत्री ने महाराष्‍ट्र के इस गरीब कि‍सान से मुलाकात की। इस कि‍सान की गुरबत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी में इसका वजन 70 कि‍लो गि‍र चुका है।

जब इस बात की खबर प्रधानमंत्री को मि‍ली तो उन्‍होंने इस कि‍सान को सीधे गांव से बुलाया और अपने बेडरूम में मुलाकात करके सांत्‍वना दी।

पीएम से मि‍लने के बाद कि‍सान ने बताया कि पीएम ने उसके सारे कर्जे माफ करने का वादा कि‍या है। कि‍सान ने यह भी धमकी दी कि अगर पीएम ने उसके और उसके पि‍ता के सारे कर्जों को शीघ्र ही माफ न कि‍या तो उनका परि‍वार देशघाती कदम उठाने पर मजबूर होगा। स्रोत- सीटीआई

(उपरोक्त वयंग्य कथा के लेखक राहुल पांडेय दिल्ली में पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.)

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मोदी सरकार ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भंग कर वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को इसका चीफ बनाया

नई दिल्ली। मोदी सरकार ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के बोर्ड को भंग कर दिया है। केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्री महेश शर्मा ने गुरुवार को एक 20 सदस्यों के नए बोर्ड का गठन किया। इसके प्रुमख के तौर पर पद्मश्री और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को नियुक्त किया गया है। राम बहादुर राय बोर्ड के पुराने प्रमुख चिनमय खान की जगह लेंगे।

राम बहादुर राय उस 20 सदस्यीय टीम की अगुवाई करेंगे जिसमें डॉ सोनल मानसिंह, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, नितिन देसाई, के अरविंद राव, वासुदेव कामथ, डॉ महेश चंद्र शर्मा, डॉ भरत गुप्ता, डॉ एम. सेशन, रति विनय झा, प्रोफेसर निर्मला शर्मा, हर्ष न्योतिया, डॉ पद्म सुब्रमण्यम, डॉ सरयू दोषी, प्रसून जोशी, डी पी सिन्हा और विराज याज्ञनिक शामिल हैं।

केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि, ‘बदलाव एक प्रक्रिया है, नए लोग आईजीएनसीए को नई ऊंचाई पर ले जाएंगे। नए सदस्य अपने अपने क्षेत्र में माहिर हैं। नए प्रमुख समाज सेवी हैं, वरिष्ठ पत्रकार हैं और गांधीवादी हैं। यह पहली बार नहीं हुआ है पहले भी ऐसा होता रहा है।’ संस्कृति मंत्री ने आगे कहा कि ‘लोग बदलाव की उम्मीद करते हैं और हम इसे पारदर्शिता और नवीनता के जरिए लेकर आ रहे हैं।’

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 19 नवंबर 1985 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की याद में स्थापित किए गए इस कला केंद्र को सरकार द्वारा फंड किया जाता है। सेवामुक्त हुए चेयरमैन चिनमय खान का कहना है की उन्हें इसका अंदाजा था, हर सरकार ऐसा करती है।

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रायटर्स के दो रिपोर्टर्स की मान्यता रद्द कराना चाहती थीं मेनका गांधी!

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखा था पत्र, मंत्रालय का इंकार ऐसा कोई नियम नहीं, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में रिपोर्टर अमिताव रंजन ने किया खुलासा

-दीपक खोखर-

नई दिल्ली, 12 अप्रैल। केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी को इंटरनेशनल न्यूज एजेंसी रायटर्स की एक रिपोर्ट रास नहीं आई और उन्होंने रायटर्स के दो पत्रकारों आदित्य कालड़ा व एंड्रयू मैकआसकिल की सरकारी मान्यता खत्म करने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिख दिया था। लेकिन मंत्रालय ने ऐसा कोई नियम होने से इंकार करते हुए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पास जाने की नसीहत दी है। दरअसल मेनका गांधी अपने मंत्रालय से संबंधित प्रकाशित की गई एक रिपोर्ट में संशोधन चाहती थी, पर एजेंसी ने साफ तौर पर मना कर दिया।  इंडियन एक्सप्रेस की 12 अप्रैल की रिपोर्ट में रिपोर्टर अमिताव रंजन ने यह खुलासा किया है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक रायटर्स ने 19 अक्टूबर 2015 को एक खबर प्रकाशित की थी। जिसमें मेनका गांधी का हवाला देते हुए कुपोषण संबंधी बजट कम करने की बात कही गई थी। इसमें स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की आलोचना की गई थी। रायटर्स ने मेनका के हवाले से कहा था कि उनके मंत्रालय का बजट आधा कर दिया गया है। इससे कुपोषण के खिलाफ उनकी लड़ाई पर असर पड़ेगा।

यह खबर चर्चित होते ही मेनका गांधी के मंत्रालय ने कड़ा खंडन किया और कहा कि मेनका के व्यतव्य को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया है। रायटर्स ने मंत्रालय के इंकार को 20 अक्टूबर को प्रस्तुत किया, लेकिन साथ ही इस बात का जिक्र किया कि वे अपनी निष्पक्षता व स्टीकता पर अब भी कायम हैं। इसी दिन निजी सचिव मनोज ए अरोड़ा ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखा कि उन्हें निर्देश मिला है कि आपसे अनुरोध किया जाए कि आदित्य कालड़ा व एंड्रयू मैकआसकिल की पीआईबी मान्यता रद्द कर दी जाए। यह भी कहा गया कि रायटर्स से बार-बार अनुरोध के बावजूद खबर में संशोधन नहीं किया गया। रायटर्स की खबर को अनैतिक व शरातपूर्ण करार दिया गया।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 7 मार्च को यह मामला पीआईबी को सौंपते हुए कहा कि वह मान्यता वापस नहीं ले सकती क्योंकि केंद्रीय प्रेस मान्यता के निर्देशों के मुताबिक गलत और शरारतपूर्ण रिपोर्टिंग के आधार पर मान्यता वापस लेने का कोई नियम नहीं है। इसके बावजूद पीआईबी ने केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय को सलाह दी कि वह इस मुद्दे को प्रेस काउंसिल के सामने उठाए। इंडियन एक्सप्रेस ने इस संबंध में मेनका और उनके मंत्रालय का पक्ष जानना चाहा, लेकिन फोन काल्स व मैसेज का कोई जवाब नहीं मिला।

लेखक दीपक खोखर से 09991680040 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

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जानिए, मोदी का मूड बिगड़ा तो किस तरह चौटाला के बगल वाली बैरक में पहुंच जाएंगे मुलायम!

ये ‘सीबीआई प्रमाड़ित ईमानदार’ क्या होता है नेताजी?

सौदेबाज मुलायम का कुनबा 26 अक्टूबर 2007 से वाण्टेड है, क़ानूनी रूप में सीबीआई की प्राथमिक रिपोर्ट के बाद 40 दिनों में एफआईआर हो जानी चाहिए थी. चूँकि सीबीआई सत्ता चलाने का टूल बन चुकी है, सो सीबीआई कोर्ट पहुँच गई एफआईआर की परमीशन मांगने। उस वक्त मुलायम के पास 39 सांसदों की ताकत थी। खुली लूट की आजादी में रोड़ा बन रहे वामपंथियों से मनमोहन का गिरोह छुटकारा चाहता था और अपने आकाओं के इशारे पर हरहाल में न्यूक्लियर डील कराने पर आमादा था।

इसी बीच नवम्बर 07 में वामदलों ने सरकार को चेतावनी देकर कहा कि यदि सरकार ने डील की तो समर्थन वापस ले लूंगा। मनमोहन गिरोह के मैनेजरों को मुलायम के डीए केस पर निगाह लग गयी।  यहीं से शुरू हुआ ब्लैकमेलिंग का सिलसिला जो कि 2014 तक जारी रहा। न्यूक्लियर डील हो जाने के बाद मेरे निजी उत्पीड़न का दौर शुरू हुआ। पैसे के आफर दिए गए, सुरक्षा छीन ली गई, जान से मारने की धमकी दी गई। ये सारे दांव कोर्ट में सीबीआई का केस वापसी का हलफनामा दायर कराने के लिए आजमाए गए। सन 2009 के लोकसभा चुनावों में सपा से गठबन्धन कर चुनाव लड़ने का ख़्वाब देखने वाले मनमोहन गिरोह को उस वक्त हताशा हुई जब कोर्ट में केस वापसी का मैंने विरोध किया।

उसी दौरान सीबीआई की डीआईजी के फर्जी हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट मीडिया में हेडलाइन बनाकर चलाकर कोर्ट को दबाव में लेने का असफ़ल प्रयास किया गया लेकिन कोई दाव काम नहीं आया और 10 फरवरी 20009 को कोर्ट ने फ़ैसला रिजर्व कर लिया। 2009 के चुनावों से पहले सपा ने गठबंधन तोड़ने का एलान कर दिया। 2009 के लोकसभा चुनावो में उप्र में स्थानीय कारणों से कांग्रेस को 21 सीटों पर सफलता मिली। अब मेरे उत्पीड़न की धार तेज हो चुकी थी। संसद में कट मोशन, जेपीसी, राष्ट्रपति चुनाव सहित जब कोई बड़ा सवाल हुआ, फ़ौरन कोर्ट में केस लिस्ट हुआ और सरकार व मुलायम के वकील एक स्वर में मेरे ऊपर पिल पड़ते थे। एक बार तो एटार्नी जनरल वाहनवती से कोर्ट को पूछना पड़ा कि आप मुलायम के वकील हो या केंद्र सरकार के।

2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ। मोदी जी प्रधानमंत्री बने। मुलायम की बांछे खिल गई क्योंकि असल में मुलायम की धोती के नीचे खाकी है। 1977 में जनता पार्टी में संघ के साथ काम कर चुके हैं। 1989 और 2003 में भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री रह चुके हैं। अब मोदी वंदना जेल जाने से बचने के लिए कर रहे हैं। यदि मुलायम में हिम्मत है तो मोदी के ख़िलाफ़ एक लफ्ज बोलकर दिखाएं। मुलायम को मालूम है कि कोर्ट ने एफआईआर किये जाने के लिए रोक नहीं लगाई है। यदि मोदी का मूड बिगड़ा तो चौटाला के बगल वाली बैरक में पहुंच जाएंगे मुलायम।

मुलायम को यह भी मालूम है कि जब कोर्ट के निर्देश पर जाँच हो रही है तो कोर्ट ही जेल भेजेगी या केस खत्म करेगी। समर्थन की कीमत वसूल चुके मुलायम मीडिया से भी वसूली कर रहे हैं। भारतीय मीडिया तीन बार केस क्लोज कर चुकी है। एकतरफा बयानों के आधार पर केस का क्लोजर रिपोर्ट चलाने वाली मीडिया को भी मालूम है कि इस प्रकरण में 3 पक्षकार हैं। मुलायम का कुनबा, कोर्ट और याचिका कर्ता, लेकिन दो पक्ष फायदे का सौदा नहीं है। मुलायम के पास सत्ता है, देने के लिए बहुत कुछ है, सो जब मन किया क्लोजर कर दिया। वैसे भी मीडिया के बारे में आम राय बन गई है कि यह सत्ता की चेरी है, भाट वंदना में माहिर है, फील्ड में खपने वाले पत्रकार लाचारी और बेचारगी की स्थिति में हैं।

The certified copy of supreme court on mulayam Singh’s DA case 15/09/2015 and this is the the last affidavit filed by cbi in supreme court on 30/03/2009.

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL APPELETE JURISDICTION
WRIT PETITION ( C ) NO. 633 OF 2005
IN THE MATTER OF:
Vishwanath Chaturvedi Petitioner
Versus
Union of India & Ors. Respondents
Affidavit on behalf of Central Bureau of Investigation

I, S.R. Majumdar, aged about 57 years, son of Shri B.B. Majumdar, working as Supdt. Pf Police, Central Bureau of Investigation, Anti-Corruption Unit-IV, 8th Floor, Lok Nayak Bhawan, Khan Market, New Delhi, do hereby state on oath, affirm and declare as under:
1. That I am Supervisory Officer in the enquiry in the present case and I am conversant with and aware of the facts of the case as derived from the records, which I believe to be true, and am competent to depose this Affidavit.

2. It is respectfully submitted that this affidavit is being filed on behalf of Central Bureau of Investigation (CBI) to place on record before this

Hon’ble Court certain vital facts and in order to allay misgiving / erroneous impressions, in certain quarters, and to highlight that CBI has proceeded in this matter with utmost dedication and integrity as warranted and expected in terms of the judgement of this Hon’ble Court in the aforesaid matter.

3. It is respectfully submitted that this Hon’ble Court had issued certain directions to CBI in a Writ Petition (Civil) No. 633/2005 and in particular craves leave to highlight Paras 34, 37 and 42 of the Judgement of this Hon’ble Court reported in (2007) 4 SCC 380. These paras road as follows:
Para 34:
“…………We, therefore, direct the CBI to conduct a preliminary enquiry into the assets of all the respondents and after scrutinizing if a case is made out then to take further action in the matter”.
Para 37:
“The ultimate test, in our view, therefore, is whether the allegations have any substance. An enquiry should not be shut out at the threshold because a political opponent of a person with political difference raises an allegation of commission of offence. Therefore, we mould the prayer in the writ petition and direct the CBI to enquire into alleged acquisition of wealth by respondent Nos. 2-5 and find out as to whether the allegations made by the petitioner in regard to disproportionate assets to the known source of income of respondent Nos. 2-5 is correct or not and submit a report to the Union of India and on receipt of such report, the Union of India may take further steps depending upon the outcome of the preliminary enquiry into the assets of respondent Nos. 2-5”.
Para 42:
“The Registry is directed to send in sealed cover the documents market as ‘A’ to ‘H’ and all the copies of the sale deeds and other statements etc. filed by the parties to the CBI. The CBI may take the
preliminary enquiry, CBI had received documents sent by this Hon’ble Court referred to in Para 42 of the said Judgement.

5. It is respectfully submitted that after careful scrutiny of the documents received from this Hon’ble Court, CBI issued requisitions to Banks where accounts of the respondents no. 2 to 5 were maintained, to Sub Registrar office within whose jurisdiction the immovable properties which were subject matter of the enquiry were situated, the Income Tax Department and also to the Chartered

Accountant of respondents no. 2 to 5 and other concerned authorities.

6. It is respectfully submitted that the required documents as sought for from the Banks, Income Tax Department and the Sub Registrar office and other authorities were obtained. CBI faced non-cooperation in collecting documents from office of the Chartered Accountants of respondents no. 2 to 5.

7. It is respectfully submitted that the immovable properties which were subject matter of the enquiry were sought to be evaluated through the Valuation Cell of Income Tax Department and even through the CBI wanted respondents 2 and 3 to be present either in person or through their authorized representative and had given notice regarding the date and time if the evaluation, none from their side were present on two occasions. Therefore, the evaluation work could not be undertaken. The other issues which were required to be examined have been mentioned in the Status Report.

8. It is respectfully submitted that a Preliminary Enquiry Report was prepared with the available evidence pursuant to the direction of this Hon’ble Court and the enquiry in this regard was concluded on 26th October, 2007 as per the procedure laid down in the CBI Crime Manual, 2005. A Status Report was prepared which can
be placed before this Hon’ble Court for perusal.

9. It is respectfully submitted that thereafter on conclusion of enquiry, an Interlocutory Application being I.A. No. 12 of 2007 was filed in the present matter on 26.10.2007 with the following prayer:-
(a) Pass an order/ direction permitting the applicant (CBI) to proceed further reference in the matter in accordance without any further reference to the Union Government or State Government: and
(b) Pass such other further orders, as this Hon’ble Court may deem fit and proper in the facts and circumstances of the case and in the interests of justice.
10. It is respectfully submitted that the matter came up before this Hon’ble Court on 29.10.2007 and directions were given for issue of notice to all the parties for filling of replied within 4 weeks. No replies were filed. An interlocutory application being I.A. No. 13 of 2008 was filed on 12th March 2008, with the prayer for early hearing of I.A. No. 12 of 2007. The Hon’ble Registrar of Hon’ble Supreme Court granted another four weeks time to all the respondents for filing of counter affidavits. Since no reply was files, the matter came up for hearing on 7.5.2008 and the Hon’ble

Registrar directed that the matter be put up before the Hon’ble Bench.

11. It is respectfully submitted that after a lapse of nearly nine months from the date of conclusion of Preliminary Enquiry, representations were sent on behalf of respondents no. 2 to 5, starting from July 2008 (representation dated 14.7.2008, 18.9.2008 and 29.10.2008) by Smt. Dimple Yadav through Department of Personnel Training (DOP&T) for taking into account additional facts pertaining to clubbing of income of all the four respondents and to accept the determination of value of property, wealth and income as accepted by the competent authorities. The copies of the representations are on the file of CBI and the same can be produced before the Hon’ble Court, if so warranted.

12. It is respectfully submitted that there were divergent views within the CBI as to whether at this stage the representations so received could be looked into. Therefore, the matter was sought to be referred for legal opinion of a high ranking Law Officer of Government of India, through the nodal Ministry i.e., Department of Personal and Training (DOP&T). The matter was sent for the opinion of Law Officer on 7.11.2008. the legal opinion from the LD. Solicitor General of India dated 21.11.2008 was received through the Department of Personal and Training Government of India.

13. It is respectfully submitted that based on the legal opinion received through the Department of Personal and Training, Government of India, CBI files an interlocutory application being I.A. No. 14 of 2008 on 6.12.2008 for withdrawal of I.A. No. 12 of 2007.

14. It is respectfully submitted that CBI stands by its recommendations made in the Status Report of 26.10.2007 as informed to this Hon’ble Court vide IA no. 12/2007.

15. It is respectfully submitted that another representation from respondent Smt. Dimple Yadav was received through Department of Personal and Training on 27.1.2009 subsequent to the hearing which took place before the Hon’ble Court on 6.1.2009. This representation has also been kept on record.

16. It is respectfully submitted that some print media have published false/fabricated news related to this matter on 9.2.2009 just a day prior to the scheduled hearing in this matter before this Hon’ble Court on 10.2.2009. This false/fabricated news was also aired through some of the channels of the electronic media, which continued to be telecast till 13.2.2009. It was also mentioned before this Hon’ble Court that the respondents have copies of some documents of CBI, Specific reference being made to the news-item published in The Times of India dated 9.2.2009 related to this enquiry. It is respectfully submitted in this regards that the news report mentioned above is totally false and fabricated.

Complaints have already been lodged with the Press Council of India and the Secretary, Ministry if Information & Broadcasting, Government of India, New Delhi in this regard. Copies of complaints lodged by CBI with the Press Council of India, the Secretary, Ministry if Information & Broadcasting, Government of India and letter dated 18.2.2009 sent to Department of Personal & Training for permitting filing of a criminal case a Civil Suit against The Times of India, Star News, CNN-IBN for slanderous, incorrect and false news report/telecast are appended herewith as Annexure A, B & C respectively.

17. It is respectfully submitted further that as the matter called for an in-depth investigation to find out as to who are responsible for the publication of false and fabricated reports related to the aforementioned enquiry with a view to malign and tarnish the reputation of the CBI as well as defaming the CBI officials to whom these non-existent reports dates 30.7.2007 and 20.8.2007 and so called 17-page internal review note dated 2.2.2009 were attributed, a Regular Case has been registered by CBI against unknown person u/s 120B r/w 465, 469/500 & 471 of IPC and the substantive offences thereof which is under investigation vide FIR copy enclosed as Annexure – D.

18. It is respectfully submitted that as far as the CBI is concerned, it has acted in utmost good faith in the present matter and is placing these facts only to highlight that CBI has strictly complied with the directions of this Hon’ble Court and still stands by its Status Report dated 26.10.2007.

DEPONENT
VERIFICATION
I, S.R. Majumdar, Supdt. Of Police, ACU-V, 8th Floor, Lok Nayak Bhawan, Khan Market, New Delhi, son of Shri B.B. Majumdar, the above named deponent do hereby verify that the contents of the above affidavit are true and correct to the best of my knowledge based on the official records.

Verified and signed on this _______ day of March, 2009 at New Delhi.

जाने माने वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के एफबी वॉल से.

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केजरीवाल जी, आपभी मोदी की तरह जुमलेबाजी की सियासत कर रहे हो?

Vishwanath Chaturvedi : जुमले बाजों ने बिगाड़ा देश मिज़ाज़. बड़े मिया तो बड़े मिया छोटे मियां सुभानल्लाह. जुमलेबाज़ो ने बदरंग किया सियासी चेहरा. केजरीवाल की दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा सरकार को समर्थन करते हुए दिल्ली की जनता का कर्ज उतार दिया. अब बारी थी पंजाब चुनाओं में लड़ रही पार्टी के लिए फर्ज पूरा करने की. सो केजरीवाल ने शाम होते-होते वकील को बलि का बकरा बनाते हुए यू टर्न लिया और कहा ये वकील तो कांग्रेसी था, इसे मैंने हटा दिया.

लेकिन कोर्ट में दिए गए बयान की वापसी आपके हाथ में नहीं है, वो तो कोर्ट की अनुमति बगैर वापिस हो नहीं सकता. सो, पंजाब की जनता को ठगने के लिए कोई नया जुमला तलाश लीजिये केजरीवाल जी. केजरीवाल जी, दिल्ली की जनता प्यासी है, आप को दिल्ली की जनता ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी है, आप पर दिल्ली की जनता के हितों की रक्षा का भार है. आप भी मोदी की तरह जुमलेबाजी की सियासत कर रहे हो? अब नए तरीके की राजनीति को जनता झेल रही है. इस तरह की यू टर्न सियासत तो जमे जमाये सूरमा भी नहीं कर पाते. आपने तो कमाल ही कर दिया. जुमलों में तो मोदी जी को भी आपने किलोमीटरों पीछे छोड़ दिया.

जाने-माने और बेबाक वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

विश्वनाथ चतुर्वेदी की बेबाक लेखनी को जानने समझने के लिए इसे भी पढ़ सकते हैं…

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पूंजीपतियों ने बैंको के 13473 करोड़ हड़पे. सरकारी दबाव में नहीं हो पा रही वसूली

देश के पूंजीपतियों ने बैंको के 13473 करोड़ हड़पे. सरकारी दबाव में बैंक नहीं कर पा रहे वसूली. मोदी जी के लफ्फाजी बयानों से देश हुआ आजिज. 250 जिलो में अकाल और सूखे की मार झेल रही जनता. घुमक्कड़ी मोदी को बिदेशी दौरों से फुरसत नहीं. राम के नाम पर आये, राम भरोसे हो गई सरकार. बकायेदारों की सूची संलग्न.

जाने माने वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

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गरीबों की गांड़ काटे बिना, अमीरों के अच्छे दिन कैसे आ सकते हैं भला…

Yashwant Singh : गरीबों की गांड़ काटे बिना

अमीरों के अच्छे दिन कैसे आ सकते हैं भला…

माल्याओं और अडानियों पर कृपा बरसाने वाले को

आर्थिक आतंकवाद नहीं दिखता…

उसे तो बस उस गरीब को जूतियाना है

जिसने बेहतरी की उम्मीद में वोट देकर

साठ साल से राज करने वाले चोट्टे कांग्रेसियों को किनारे किया…

उसे भारत माता की जय और जेएनयू मुर्दाबाद में जनता को फंसाए रखना है

ताकि असल मुद्दों पर बात ही न हो सके…

हमारा नेता जिंदाबाद का कोरस पैदा करते हैं साले भजपइये संघिये

बीच बीच में लेक्चर पेल रहे हैं कि हमारे नेता का अगले पचीस साल तक

राज चलेगा, फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा..

इनके मंत्री, नेता, कार्यकर्ता, मीडिया, भक्त सब 24×7 गुणगान में अस्त व्यस्त हैं

वो लोकतांत्रिक तरीके से चुना गया बादशाह

धीरे धीरे तानाशाह में तब्दील हो रहा है…

वो अजब गजब काम करता है… वो लल्लनटाप फरमान जारी करता है…

वो हजारों करोड़ के बड़े चोर को देश से भाग जाने देता है…

वो देश की करोड़ों जनता को फर्जी राष्ट्रवाद में उलझाए रखता है….

वो अपने छोटे नेताओं को इलेक्शन के टिकट फेसबुक लाइक गिनकर देगा

प्रचार और ब्रांडिंग के भूखे भेड़िए को मार्क भाई याद हैं, थैंकलेस नहीं है ये

तकनीक के अंतरराष्ट्रीय आकाओं को तो खुश करना ही पड़ेगा

उसके हर नेता को लाइक बटोरने के लिए अब पेड प्रमोशन करना पड़ेगा.

वो कहता है कि वोट का क्या है, जनता देगी, जनता को ठीक से जानता है…

इसलिए वो हमेशा हाथ हवा में लहराकर हंसते कहता है- ‘जनता का क्या है..’

उसे भरोसा है देश की जनता के दिल ओ दिमाग पर… सोच और विचार पर…

मुल्ला कटुआ भारत माता राष्ट्रवाद जेएनयू पाकिस्तान मंदिर मस्जिद

इन्हीं चूतियापे पर न्योछावर है जनता, वो अटल सत्य मानता है इस फारमूले को

भुखमरी गरीबी सुसाइड मंजूर है इस जनता को लेकिन भारत माता के मुद्दे पर

हुए ध्रवीकरण में जय न बोलने वालों का साथ देना मंजूर नहीं, वो मानता है

वो फौलादी कहा जाने वाला डमरू अब मोम के पुतले तक सीमित हो गया है.

गोरी छोरियों से नपवा दिया अपना सीना… बावजूद इसके या इसके बाद ही

खुद को मान चुका है इस सदी का सबसे बड़ा अवतार, वो प्रचारित कराता है

वो जहां से जो कांड करते बढ़ चला था दिल्ली की ओर, वहां के फंडे याद हैं

यह राजगणित अब अखिल भारतीय स्तर पर लागू करने की तैयारी में जुटा है

वो बार बार लगातार बहुत तेजी से अपनी टीम को वार्मअप कर करा रहा

सूफीवाद बतियाने और गरीबों की जेब काटने में उसके हिसाब से कोई फर्क नहीं

वो जानता है राजनीति में चेहरा और दांत अलग अलग नकाबों में रखने होते हैं

वो सारी क्रांतिकारिता लगाता है कारपोरेट को उठाने और गरीबों को गिराने में

इस दरम्यां उसकी टीम लगी रहती है जनता को उलझाने में, उन्हीं मुद्दों के जरिए

जिससे मुक्त न हो पाई जनता आजादी के इतने दिनों बाद भी इत्ते प्रयोग करके…

आइए, अपनी जेब काटे जाने के इस भयावह लेकिन सच्चे दु:स्वप्न को भूलकर

खोजें उन देशद्रोहियों को जो अफजल गैंग के सदस्य हैं

और जो भारत माता की जय नहीं बोलते हैं

अबकी चुनाव माता रानी की कृपा से इसी ध्रवीकरण पर कट जाएगा…

हां, आपकी माता पिता भाई बहन के जो जमा पैसे हैं, उन पर ब्याज कम मिलेगा तो

समझ लेना, वो चला गया उस माता रानी के गुल्लक में जिसे माल्याओं-अडानियों

ने रखैल बना रखा है, छप्पन इंच वाले अपने लठैत की लाठी के दम पर.

-यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जांच के नाम पर पत्रकार पुष्प शर्मा को प्रताड़ित कर रही है दिल्ली पुलिस

Sanjaya Kumar Singh : मंत्री जी, अब चुप रहने का विकल्प नहीं है। इसका अर्थ बदल गया है। दिलचस्प हो रहा है आयुष मंत्रालय से जुड़ा विवाद। आयुष मंत्रालय के संबंध में एक सूचना आई थी कि मंत्रालय नीतिगत रूप से मुसलमानों की नियुक्ति नहीं करता है। यह सूचना पहली नजर में ही गलत लगती है और यकीन करने लायक नहीं है। मेरा मानना है कि अगर ऐसी कोई नीति होगी भी तो स्वीकार नहीं की जाएगी और आरटीआई के जवाब में आसानी से आ जाए यह तो संभव नहीं है। फिर भी कोई ऐसी सूचना प्रकाशित करे तो इसके कई कारण हो सकते हैं और यहां मैं उनके विस्तार में नहीं जाकर यही कहूंगा कि मैं इंतजार कर रहा था कि यह मामला इस लायक हो जाए कि इसमें दिलचस्पी बने। आज सुबह के अखबारों में खबर है कि संबंधित पत्रकार पुष्प शर्मा को पुलिस ने कल शाम अपने अंदाज में उसके घर से ‘उठा’ लिया और फिर रात साढे दस बजे यह कहकर छोड़ा गया कि आज सुबह 10 बजे थाने में पहुंच कर सारी बात बताएं, सबूत दें आदि।

कुल मिलाकर केंद्र में नई सरकार बनने के बाद (मुझे लग रहा है कि दिल्ली में) सोशल मीडिया पर फैलने वाले कथित अफवाहों की पहली बार जांच हो रही है। हालांकि, जांच के नाम पर यह पुलिस प्रताड़ना ही है पर पुलिस को इतना अधिकार मिला मान लिया जाए तो मामला यह लगता है कि संबंधित रिपोर्टर ने आरटीआई के तहत कई सवाल पूछे थे और उसमें एक यह भी था कि योग के प्रशिक्षण के लिए कितने मुसलिम आवेदकों को विदेश भेजा गया। आयुष मंत्रालय की एक विज्ञप्ति के अनुसार चौथा सवाल इस प्रकार था, “How many Muslim candidates were invited, selected or sent abroad as Yoga trainer/teacher during World Yoga Day 2015”. विज्ञप्ति के अनुसार कुल सात सवाल थे। मैं यहां ज्यादा विस्तार में नहीं जाकर सिर्फ उसी मुद्दे की चर्चा करूंगा जिसपर विवाद है और यह यह भी विवाद खत्म करने के लिए मंत्रालय मूल मुद्दे पर चुप रहकर लीपापोती क्यों कर रहा है?

मंत्रालय का कहना है कि इस आरटीआई को उसने तीन एजेंसियों को अग्रसारित कर दिया था और यह आरटीआई कानून की धारा 6(3) के तहत महज अग्रसारण (फॉर्वार्डिंग) है और इसलिए सवालों का कोई जवाब नहीं है। विज्ञप्ति में आरोप लगाया गया है कि 08.10.2015 के इस अग्रसारण पत्र का उपयोग मीडिया ने इस मामले में किया है पर एक फर्जी, बगैर अस्तित्व वाले अनुलग्नक (ANNEXURE – I) एक के साथ। मंत्रालय साफ तौर पर कह रहा है कि इसे जारी ही नहीं किया गया था। इसी स्पष्टीकरण में आगे कहा गया है कि कथित अनुलग्नक में जो जानकारी दी गई है वह ना सिर्फ गढ़ी हुई बल्कि वास्तविकता से दूर, गलत भी है। इसमें दावा किया गया है कि योग विशेषज्ञों / उत्साहियों को निमंत्रण उनके धर्म का संदर्भ लिए बगैर भेजा गया था। मेरा सवाल इसी से जुड़ा है, मैं मंत्रालय की सारी बातें मान रहा हूं। और यह भी कि जिस सूची का उपयोग किया गया वह फर्जी है। और साथ ही यह भी कि आरटीआई का जवाब नहीं दिया गया है। क्यों?

क्या यह जरूरी नहीं है कि आरटीआई का जवाब दिया जाए और देरी का कारण बताया जाए। मेरा मानना है कि सरकार ने अगर कुल 26 लोगों को अभी साल भर पहले विदेश भेजे थे तो उनका नाम बताने में असुविधा नहीं होनी चाहिए। और अगर सरकार ऐसा कर देती है तो मामला अपने आप खत्म हो जाएगा। पुलिस को भी जांच में सुविधा होगी। लेकिन अभी तक जो स्थिति है उससे लग रहा है कि आरोप यह है कि मंत्रालय में मुस्लिमों की नियुक्ति ही नहीं होती है। सबसे पहले इस खबर को प्रकाशित करने वाले “मिल्ली गजट” की खबर पर प्रतिक्रिया करते हुए कई पाठकों ने भी मंत्रालय के कर्मचारियों-अधिकारियों की सूची का लिंक दिया है जिसमें मुस्लिम नाम हैं। मैंने भी जब इस मामले की जांच करनी चाही तो सबसे पहले यही देखा और फिर मुझे समझ में नहीं आया कि मामला क्या है तो मूल खबर पढ़ी।

अभी तो मुद्दा यह है कि आयुष (या योग) मंत्रालय के हवाले से जो कहा गया है वह गलत है या सही (मैं सच झूठ की बात नहीं कर रहा) और वह इस प्रकार है, “The ministry said, a total of 711 Muslim yoga trainers had applied for the short-term assignment abroad but none was even called for an interview while 26 trainers (all Hindus) were sent abroad on this assignment. The reply also revealed that 3841 Muslim candidates applied till October 2015 for the post of Yoga trainer/teacher with the Ministry but none was selected. The RTI reply of the Ayush Ministry bluntly revealed the reason for the rejection of all applications by Muslim Yoga teachers as follow: “As per government policy – No Muslim candidate was invited, selected or sent abroad.” The reply also makes it clear that even for assignment within India no Muslim was selected, although a total of 3841 Muslims had applied for the yoga teacher jobs.”

मंत्रालय के लिए यह कहना आसान तो है कि अनुलग्नक फर्जी है। पर अनुलग्नक जैसा है और जिन स्थितियों में प्रकाशित हुआ है उससे फर्जी लगता नहीं है। वैसे भी, यह बड़ा मुश्किल है कि किसे सच माना जाए। ऐसे में मंत्रालय का भी कुछ दायित्व है और वह इससे मुक्त नहीं हो सकता है। इसका खंडन तो इस प्रकार होगा कि योगा प्रशिक्षक के लिए किसी मुस्लिम के आवेदन नहीं आए या XXX आए और XX को प्रशिक्षण के लिए विदेश भेजा गया या भेजा ही नहीं गया। इसमें XX हिन्दू, XX मुस्लिम और XX अन्य धर्मों के लोग थे। दूसरा मुद्दा है कि अक्तूबर 2015 तक 3841 मुस्लिम उम्मीदवारों ने योग प्रशिक्षक / शिक्षक के रूप में आवेदन किया था। पर किसी का चुनाव नहीं किया गया। पुराने जमाने में सरकारी जवाब हो सकता था कि यह आरोप गलत है आरटीआई और पारदर्शिता के जमाने में यह कहना बनता है कि नहीं एक भी आवेदन नहीं आया या 3841 नहीं, XXXX आवेदन आए थे और फलां-फलां को रखा गया है। पुराने समय में सरकार के पास चुप रहने का विकल्प था। अब नहीं है और चुप रहने के मायने बदल गए हैं।

www.milligazette.com/news/13831-we-dont-recruit-indian-muslims-modi-govts-ayush-ministry

http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=137855

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मूल खबर….

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रेलवे के इतने बड़े झूठ और फर्जीवाड़े पर मीडिया और मंत्रालय ने चुप्पी क्यों साध रखी है?

Sanjaya Kumar Singh : रेल मंत्री ट्वीटर पर व्यस्त और अपराधी-ठग अपने धंधे में… अब स्पष्टीकरण से क्या लाभ जब चिड़िया चुग गई खेत… रेल मंत्री सुरेश प्रभु जब ट्वीटर के सहारे मुश्किल में फंसे रेल यात्रियों को खाना, पानी और डायपर पहुंचाने की व्यवस्था कर रहे थे तो ठगों, अपराधियों और संभवतः रेलवे से जुड़े लोगों का एक गिरोह आम युवाओं, रोजगार तलाश करने वालों को ठगने-लूटने में लगा हुआ था। जरूरी नहीं है कि यह सूचना सही हो। यह भी संभव है कि रेल मंत्रालय की जानकारी के बगैर या कायदे-कानूनों को पूर्ण किए बगैर रेल सुरक्षा बल में 17,000 कांसटेबल की नियुक्ति के विज्ञापन निकाल दिए गए हों और अब जब पता चला तो नियुक्ति की घोषणा को फर्जी करार दिया गया।

आज नवोदय टाइम्स में छपी एक खबर से पता चला कि मंत्रालय की जानकारी के बगैर विज्ञापन निकाल दिया गया था और अब रेलवे ने साफ कर दिया है कि ये विज्ञापन फर्जी हैं। अखबार के मुताबिक ऑनलाइन दिखने वाले विज्ञापन फर्जी हैं और रेलवे ने ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं चलाई है। अखबार की खबर यह भी कहती है कि इस कथित खुलासे के बाद रेल मंत्रालय में हड़कप मचा है। मैंने गूगल पर तलाशने की कोशिश की तो कई विज्ञापन और खबरें मिलीं। कौन देश भक्त है और कौन देशद्रोही यह तय करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है इसलिए मैंने कुछ स्क्रीन शॉट रख लिए हैं और कुछ इसके साथ पोस्ट कर रहा हूं।

देखिए कि यह खेल कब से चल रहा है और कल्पना कीजिए कि जो मंत्री कुछ घंटे (या दिन) की रेल यात्रा में पानी-खाना नहीं मिलने वालों को आवश्यक सुविधाएं मुहैया करा देता है उसे इन विज्ञापनों का महीनों तक पता नहीं चला तो उसे क्या कहा जाए। मैं शुरू से कह रहा हूं कि ट्वीटर पर यात्रियों को सेवा मुहैया कराने का काम कोई भी छोटा बड़ा अधिकारी कर सकता है। मंत्री को मंत्री वाले काम करने चाहिए पर भक्त मीडिया को प्रशंसा करने और मंत्री जी को प्रशंसा प्राप्त करने से फुर्सत मिलती तो वे देखते कि उनके मंत्रालय के नाम पर फर्जीवाड़ा चल रहा है। मंत्रालय ने तो स्पष्टीकरण देकर अपना हाथ झाड़ लिया लेकिन मंत्रीजी की तारीफ करने वाले मीडिया के साथी इसपर कुछ समय और श्रम लगाएंगे क्या?

07 अगस्त 2014 की इस विज्ञप्ति के बाद रेल मंत्रालय कैसे कह सकता है कि विज्ञापन फर्जी हैं और अगर फर्जी हैं तो जनता को इसकी जानकारी देने के लिए रेलवे ने क्या किया जबकि संसद में रेल राज्य मंत्री एक सवाल के जवाब में कह चुके हैं कि फर्जी विज्ञापनों की स्थिति में रेलवे लोगों को जागरूक करने का काम करता है।

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एक भूतपूर्व सांसद व प्रसिद्व पत्रकार ने विजय माल्या के लिए दलाली करते हुए उनके साथ उत्तराखंड में नेताओं की बैठकें करवाई…

मालामाल माल्या की कंगाली कथा

-निरंजन परिहार-

अब आप इसे ख्याति कहें या कुख्याति, कि संसार में शराब के सबसे बड़े व्यापारियों में से एक भारत में कभी अमीरों की जमात के सरदार रहे विजय माल्या कंगाली की कगार पर देश छोड़ कर फुर्र हो गए हैं। यह जगविख्यात तत्य है कि है कि ज्ञान, चरित्र और एकता का दुनिया को पाठ पढ़ाने वाले संघ परिवार की दत्तक पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने ही संसार में शराब के सबसे बड़े व्यापारियों में से एक माल्या को कर्नाटक से राज्यसभा में फिर से पहुंचाया था। और माल्या कभी देश की जिस संसद में बैठकर भारत के भाग्य विधाता बने हुए थे, वह संसद भी सन्न है। क्योंकि लुकआउट नोटिस के बावजूद वे गायब हो गए। पर, इस बात का क्या किया जाए कि जिस लाल रंग से माल्या को बहुत प्यार है, सरकार उस लाल रंग की झंडी किंगफिशर के कंगाल को दिखाए, उससे पहले ही विजय माल्या बचा – खुचा माल बटोरकर सर्र से सरक गए।

मालामाल होने के बावजूद माल्या कोई पांच साल से अपने कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं दे पा रहे थे।  क्यूंकि कड़की कुछ ज्यादा ही बता रहे थे और यह भी बता रहे थे कि जेब पूरी तरह से खाली हो गई है। लेकिन पांच साल की की कंगाली के बावजूद माल्या के ठसक और ठाट भारत छोड़ने के दिन तक वही थे। वैसे कहावत है कि मरा हुआ हाथी भी सवा लाख को होता है, लेकिन उनकी किंगफिशर एयरलाइन अब पूरी तरह से फिस्स है। विजय माल्या संकट में कोई आज से नहीं थे। चार साल पहले ही यह तय हो गया था कि वे कंगाल हो गए है। दुनिया के सबसे सैक्सी कलेंडर छापने वाले विजय माल्या को सन 2012 में ही फोर्ब्स ने अपनी अमीरों वाली सूची से बाहर का दरवाजा दिखा दिया था। बीजेपी के सहयोग से माल्या राज्यसभा में पहुंचे थे और बाद में बीजेपी को ही भुला दिया। लेकिन अब बीजेपी के राज में देश से भागकर बीजेपी की सरकार को एक और बदनुमा दाग भी दे गए हैं। 

विजय माल्या अपने काम निकालने के लिए किस तरह के फंडे अपनाते रहे हैं, इसका अंदाज लगाने के लिए यह उदाहरण देश लीजिए। बात उन दिनों की है, जब उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार हुआ करती थी। एक भूतपूर्व सांसद और प्रसिद्व पत्रकार विजय माल्या के दलाल बने और उनके साथ उत्तराखंड के नेताओं की बैठकें भी करवाई। माल्या के वहां के बंगले पर लगा 27 करोड़ रुपए टैक्स फट से माफ हुआ। और जैसा कि होना था, माल्या ने तत्काल बाद में वह बंगला बेच दिया और मोटा मुनाफा कमाया। मोटा इसलिए, क्योंकि जब 50 साल पहले विजय माल्या की मां ने यह बंगला खरीदा था, तब देहरादून में प्रॉपर्टी के दामों में आज की तरह कदर आग लगी हुई नहीं थी। मतलब यही है कि विजय माल्या को कितनी कमाई, किसके जरिए, कैसे निकालनी है, और जिन रास्तों से निकालनी है, उन रास्तों की रपटीली राहों तक के अंदाज का पता है। राज्यसभा में जाने के लिए बीजेपी का सहयोग तो एक बहाना था। बाद में तो खैर बीजेपी को भी समझ में आ गया कि माल्या ने जो सौदा किया, वह सिर्फ राज्यसभा मे आने के लिए नहीं था।

बहुत सारे हवाई जहाजों और दो बहुत भव्य किस्म के आलीशान जल के जहाजों के मालिक होने के साथ साथ अरबों रुपए के शराब का कारोबार करनेवाले विजय माल्या की हालत इन दिनों सचमुच बहुत पतली हैं। यहां तक कि उनकी किंगफिशर विमान सेवा के सारे के सारे विमान तीन साल से जमीन पर खड़े हैं। और जैसा कि अब तक कोई उनकी मदद को नहीं आया, इसलिए सारे ही विमान जो बेचारे आकाश में उड़ने के लिए बने थे, वो स्थायी रूप से जमीन पर खड़े रहने को बंधक हो गए है। क्योंकि कोई विमान जब बहुत दिनों तक उड़ान पर नहीं जाता, जमीन पर ही खड़ा रहता है, तो जैसा कि आपके और हमारे शरीर में भी पड़े पड़े अकड़न – जकड़न आ जाती है, विमानों में भी उड्डयन की क्षमता क्षीण हो जाती है। फिर से उड़ने के लिए तैयार होने का खर्चा बहुत आता है। पैसा लगता है। और कंगाल माल्या व उनकी किंगफिशर पर तो अपार उधारी है। बेचारे विमान।

संपत्तियों के आधार पर माल्या की कुल निजी हैसियत आज भी भले ही अरबों डॉलर में आंकी जाती रही हो। और उनकी एयरलाइंस के कर्मचारियों की दुर्दशा के बाद कइयों के आत्महत्या के हालात से माल्या की असलियत को भले ही कोई कुछ भी समझे। लेकिन असल में ऐसा है नहीं। अपन पहले भी कहते रहे हैं कि उंट अगर जमीन पर बैठ भी जाए, तो भी वह कुत्ते से तो कई गुना ऊंचा ही होता है। माल्या को शराब का कारोबार और पूरा का पूरा यूबी ग्रुप अपने पिता विट्ठल माल्या से विरासत में मिला। मगर स्काटलैंड की मशहूर शराब फैक्टरी वाइट एंड मेके को एक अरब सवा करोड़ रुपए में खरीदने के बाद माल्या का यूबी ग्रुप दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा शराब निर्माता ग्रुप बन गया। जीवन में माल्या की हर पल कोशिश रही है कि वे अपने कारोबार का दायरा बढ़ा कर अलग अलग व्यवसायों को इसमें शामिल करें, ताकि उन्हें महज़ शराब उद्योग के दिग्गज के तौर पर ही नहीं, एक बड़े उद्योगपति के रूप में उन्हें देखा जाए। इसी कारण उन्होंने एयरलाइंस शुरू की।

और बाद में तो राजा – महाराजाओं की शान को भी मात देने वाले माल्या ने अपने किंगफिशर ब्रांड को बढ़ावा देने के लिए नंगी – अधनंगी लड़कियों को इकट्ठा करके दुनिया के सबसे सैक्सी कैलेंडर भी बनवाए और उनमें छपनेवाली कन्याओं को मशहूर मॉडल होने के खिताब भी बांटे। कुछ को तो हीरोइन तक बनवाने में मदद की। एयरलाइन भी शुरू की। जो नखरे- लटके – झटके दिखाने थे, वे सारे ही दिखाए और उनसे बाकी एयरलाइंसों को खूब डराया भी। और माल्या के खुद को बड़ा बनाने के शौक की उस घटना ने तो कॉर्पोरेट जगत में सबको चौंका दिया था जब किंगफ़िशर एयरलाइन को अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी बनाने के लिए माल्या ने समुद्र के बीच सफर कर रहे अपने यॉट से कैप्टेन गोपीनाथ को फ़ोन किया कि वो एयर डेकन ख़रीदना चाहते हैं। गोपीनाथ ने कहा,  कीमत एक हज़ार करोड़ रुपए। और माल्या ने एयर डेकन की बैलेंस शीट तक नहीं देखी और गोपीनाथ को डिमांड ड्राफ़्ट भिजवा दिया था।

कंगाल के रूप में बहुप्रचारित माल्या के बारे में ताजा तथ्य यह है कि वे अपनी अरबों रुपए की संपत्ति बचाने की कोशिश में कंगाली का नाटक करते हुए भारत में ज्यादा दिन जी नहीं सकते थे, इसी कारण भारत छोड़कर गायब हो गए हैं। लेकिन, मालामाल माल्या, दरअसल दुर्लभ किस्म के शौकीन आदमी हैं। वे जहां भी रहेंगे, अपने शौक पूरे करते रहेंगे। नंगीपुंगी बालाओं के बीच जीने के अपने सपने को स्थायी बनाने के शौक की खातिर ही, कामुक कैलेंडर निकाले। आलीशान क्रूज पर जिंदगी गुजारने और हवाई में उड़ने के शौक को स्थायी बनाने के लिए हवाई सेवा किंगफिशर भी शुरू की। बाद में तो खैर, कामुक कैलेंडरों की बालाओं की जिंदगी की असलियत नापने की कोशिश में मधुर भंडारकर ने कैलेंडर गर्ल्स शीर्षक से एक फिल्म भी बनाई और बरबाद बिजनेसमैन के क्रूज पर दुनिया की सैर करने को लेकर भी एक फिल्म बनी। लेकिन सच्चाई यह है कि शौक के लिए खड़े किए गए कारोबारों का अंत अकसर शोक पर हुआ करता है। माल्या के विभिन्न शौक के शोकगीत और उनकी किंगफिशर की शोकांतिका का कथानक भी कुछ कुछ ऐसा ही है। शौकीन माल्या ने भारत की सत्रह बैंकों से बहुत सारा माल लिया, मगर धेला भी वापस नहीं किया। नौ हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा लिखने में कितने शून्य लगते हैं, यह देश के सामान्य आदमी को समझने मैं बी बहुत वक्त लग जाता है। लेकिन अपनी इतनी बड़ी धनराशि को डूबते हुए सारी बैंकें देखती रही और माल्या शौक पूरे करने लंदन की फ्लाइट लपक कर निकल गए। शौक कभी मरते नहीं। सो, अब साठ साल की ऊम्र में माल्या वहां अपने सारे शौक फिर से जागृत करेंगे। लेकिन कोर्ट, कचहरी और कानून का शिकंजा जिस तरह से कसता जा रहा है, ऐसे में    उनके शौक का क्या हश्र होगा, अंदाज लगाचया जा सकता है। 

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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पब्लिक का हजारों करोड़ रुपया दबाए विजय माल्या सरकार की नाक के नीचे से भाग गया!

Sheetal P Singh : वो हू ला ला ला करके देश को दस हज़ार करोड़ का प्रत्यक्ष चूना लगा कर निकल गया। देशभक्त प्रोफ़ाइलों का मुँह आटोमेटिकली तालाबन्द हो गया है “नो कमेंट”! वे सेना और सैनिक बहुत बेचते हैं, ख़ासकर जब कोई सैनिक या सैन्य अफ़सर बार्डर पर शहीद हो जाय तो तुरंत उसके फ़ोटो लाइक/ शेयर करने के मर्सिये पढ़ने लगते हैं। पन्द्रह दिन बाद उसके घर परिवार के दुख लापता हो जाते हैं! हेमराज (जिसका सर पाकिस्तानियों ने नहीं लौटाया) का परिवार कहाँ किस हाल में है किसी को पता है? और, सेना श्री श्री के लिये फ़्री में प्लांटून पुल बनाने में लगा दी गई है। ध्यान से नोट करते रहिये देशभक्ति को।

Nadim S. Akhter : पब्लिक का हजारों करोड़ रुपया दबाए शानोशौकत की जिंदगी जीने वाला विजय माल्या सरकार की नाक के नीचे से भाग गया और ईडी, वित्त मंत्रालय, आईबी, पुलिस, मंत्री, प्रधानमंत्री, कोर्ट…सब देखते रह गए. सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने आज कोर्ट को बताया कि माल्या 2 मार्च को ही देश छोड़ चुका है. अब कौन कहता है कि इस देश में सहिष्णुता नहीं है? और कितनी सहिष्णुता चाहिए? पब्लिक सब सह ही तो रही है. किसान खेती के लिए बैंक से कुछ हजार रुपये लेता है और फसल बर्बाद होने पर नहीं चुका पाता, तो ये बैंक वाले और पूरा सरकारी सिस्टम उसे इतना परेशान करता है कि बेचारा खुदकुशी कर लेता है. लेकिन माल्या जैसे लोग हजारों करोड़ रुपये गटक कर डकार भी नहीं लेते और देश का पूरा सिस्टम डिस्को-डांडिया करता रहता है. Total safe passage. काला धन नहीं ला सके मोदी जी, कम से कम पब्लिक का पैसा-देश का पैसा हड़पने वाले को तो पकड़कर रखते !!! सब मिले हुए हैं जी.

Ajay Prakash : विजय माल्या जी गए। मोदी जी की सरकार ने उन्हें विदेश गमन करा दिया। परदेस गमन। बहुते बड़े देशभक्त थे माल्या जी। और भारतीय संस्कृति के अव्वल रक्षक तो थे ही। बैंकों का जो वह 9 हजार करोड़ लेकर भागे हैं, वह जनता का पैसा तो है नहीं। हमारा टैक्स तो बिल्कुले नहीं। वह तो बीयर बेचकर कमाए थे सो लुटा दिया छमिया की नाच में। है कि नहीं।

(सौजन्य : फेसबुक)


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मीडिया को गरियाने से पहले मोदी के उपासक पढ़ लें ताजे और पुराने घपलों-घोटालों की यह लिस्ट

जिन मई ’14 से पहले अखबार नईं वेख्या…

सबसे पहले प्रतिष्ठित रचनाकार असगर वज़ाहत Asghar Wajahat साहब से माफ़ी कि उनके कालजयी नाटक “जिन लाहौर नहीं वेख्या” से मिलता जुलता शीर्षक रख रहा हूँ। बात दरअसल ये है कि इस वक्त एक पूरी जमात उठ खड़ी हुयी है जिसने 16 मई 2014 से पहले न अखबार देखे हैं न टीवी का रिमोट हाथ में उठाया था। और इसीलिए यह जमात देश के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी की आलोचना पर छाती कूटने लगती है। भाई लोग ऐसे कलपते, किकियाते, बिलबिलाते हैं मानो इससे पहले कभी किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शब्द भी न लिखा गया हो न बोला गया हो।

इन लोगों को लगता है कि उनके देवतुल्य शिखर पुरुष को “पवित्र” महामानव माना जाये और एक भी सवाल न पूछा जाये। अरे भाइयो भैनो… देश ने खुद अपनी ख़ुशी से प्रधानमंत्री और सरकार को चुना है, कोई देवलोक से अवतार प्रकट नहीं हुआ है। इसलिए जब जब ज़रूरी होगा सवाल भी पूछे जायेंगे , उंगली भी उठेगी। इस कलपती हुयी जमात की जानकारी के लिए बता दिया जाये कि नेहरू से लेकर मनमोहन तक कलमकारों ने कभी किसी को नहीं छोड़ा। ये पत्रकार ही हैं जो सन् 47 से आज तक सब से सवाल करते रहे हैं।पत्रकारिता हमेशा सत्ता का प्रतिपक्ष और जनता के हक़ में रही है। तमाम खामियों के बावज़ूद ऐसी ही रहेगी।यही उसका ईमान है। हां ये हमारा फ़र्ज़ है, जिम्मा है और पेशा भी। “कोऊ नृप होये, हमें तौ सवालयि पूछनें…”

आइये जान लीजिये कुछ बड़े मामले जो पत्रकारिता ही देश दुनिया के सामने लेकर आई~~

नेहरू युग
कृष्ण मेनन का जीप घोटाला
टी टी कृष्णमचारि कांड
सिराजुद्दीन काण्ड
चीन युद्ध में विफलता

शास्त्री युग
प्रताप सिंह कैरों का मामला

इंदिरा युग
अंतुले का प्रतिभा प्रतिष्ठान काण्ड
तानाशाही तौर तरीकों का खुलासा
आपातकाल का घनघोर विरोध

जनता पार्टी युग
मोरारजी को सी आई ए एजेंट बताने वाला कांड
जनता पार्टी की कलह

राजीव युग
बोफोर्स तोप घोटाला
प्रशासनिक नाकामी का खुलासा

नरसिंह राव युग
झामुमो रिश्वत काण्ड

अटल युग
एनरॉन समझौता कांड
रिलायंस प्रमोद महाजन कांड

मनमोहन युग
टू जी घोटाला
कोयला घोटाला
कॉमन वेल्थ घोटाला

ये सब उन लोगों को नहीं मालूम जिन्होंने 16 मई 2014 से पहले न अखबार पढ़े न टीवी देखा। तभी तो आज वे इसलिए बिलख रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिखा जा रहा है। सन् 47 से अब तक पत्रकारिता ने हमेशा सत्ता की विसंगतियों पर कलम चलायी लेकिन तब कभी किसी ने पत्रकारिता को देशद्रोही नहीं कहा। तब सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं कहलाता था। सिर्फ दो साल में ललितगेट, डीडीसीए, व्यापम, चिक्की घोटालों आदि आदि और विश्वविद्यालयों में असंतोष की खबरों से तिलमिलाए लोग अपने नेता और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह बताने पर आमादा हैं। इन लोगों को लगता है कि मीडिया (पहले सिर्फ प्रिंट था अब इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल भी है) उनके महानायक के कामकाज की मीमांसा करके कोई अक्षम्य पाप कर रहा है। वे दिन रात मीडिया को बिकाऊ, देशद्रोही आदि बता कर “कुम्भीपाक नर्क” का श्राप दे रहे हैं।

…तो हे उपासकों, हमारे लिए न पहले कोई प्रधानमंत्री पवित्र गाय था, न आज है और न कल होगा। मोदी से पहले वालों के धत करम भी आपको नानी- दादी ने कहानियों में नहीं सुनाये थे। वो भी हम और हम जैसे कलमघसीट लोग ही खोज कर आपके लिए लाये थे। अगर अपने दिव्य पुरुष की आराधना और फोटो वीडियो मॉर्फिंग से फुरसत मिले तो किसी लायब्रेरी में मई 2014 से पहले का कोई भी अखबार पलट कर देख लेना। पता चल जायेगा कि इस तारीख़ से पहले भी देश में प्रधानमंत्री होता था और कलम उस पर भी ऐसे ही चलती थी जैसी आज चल रही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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‘इकोनॉमिस्ट’ ने भी मोदी सरकार पर की बहुत तीखी टिप्पणी, पढ़ें पूरा आर्टकिल

Mahendra Mishra : विदेशी मीडिया में भारत के हालात को लेकर बहस शुरू हो गई है। मशहूर पत्रिका इकोनॉमिस्ट भी अब इससे अछूती नहीं रही। पत्रिका में छपे एक लेख में मौजूदा हालात को लेकर गहरी चिंता जाहिर की गई है। साथ ही मौजूदा घटनाओं को भारत की छवि के लिए बड़ा धक्का करार दिया गया है। लेख में बताया गया है कि इससे देश में होने वाला विदेशी निवेश सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। और सारी चीजों के लिए प्रधानमंत्री मोदी को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया है।

Arun Maheshwari : 5 मार्च के ‘इकोनॉमिस्ट’ में मोदी सरकार पर एक बहुत तीखी टिप्पणी प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है – अंतिम शरण-स्थली : नरेन्द्र मोदी की सरकार भारतीय देशभक्ति को परिभाषित करना और उस पर अपना मालिकाना हक़ क़ायम करना चाहती है। इस टिप्पणी में कहा गया है कि भाजपा की राजनीति की गंदी बातों के चलते सत्ताधारी पार्टी के आर्थिक विकास के एजेंडे से लोगों का ध्यान बँट रहा है।

इस लेख में भाजपा के नेताओं के नफ़रत फैलाने वाले भाषणों, रोहित वेमुला को आत्म हत्या के लिये मजबूर करने वाली करतूतों और जेएनयू पर किये जा रहे हमलों, अदालत में कन्हैया कुमार की बुरी तरह पिटाई का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। यह भी बताया गया है कि जेएनयू के छात्रों पर देशद्रोह के आरोप लगाने के लिये जिन सात वीडियो का इस्तेमाल किया गया उनमें से दो वीडियो फ़र्ज़ी पाये गये हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिये इन सारी बुरी ख़बरों के बावजूद उन्होंने अपनी मानव संसाधन मंत्री के उत्तेजक भाषण के लिये ट्वीट करके उनकी पीठ ठोकने के अलावा अब तक कुछ नहीं किया है। ऐसा लगता है जैसे वे आज भी विपक्ष में हैं । बड़ी-बड़ी रैलियाँ कर रहे है और कह रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ साज़िशें की जा रही है।

इकोनॉमिस्ट ने इसे दुनिया की एक सबसे तेज़ गति से बढ़ रही अर्थ-व्यवस्था के लिये दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। अर्थनीति के क्षेत्र में मोदी से जो उम्मीदें की गई थी, वे ग़लत साबित हो रही है। ऐसा लगता है जैसे संकीर्ण सांप्रदायिक राजनीति के ज़रिये ही वे कुछ राज्यों में होने वाले चुनावों में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

पत्रकार महेंद्र मिश्र और साहित्यकार अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से.

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भविष्य निधि पर टैक्स मोदी सरकार के गले की फांस बनी, सफाई देने के चक्कर में ज्यादा बुरे फंसे

भविष्य निधि के भविष्य को लेकर नौकरीशुदा लोगों का वर्तमान परेशान हो गया है। क्या वित्त मंत्री अपने इस फैसले को वापस लेंगे, ऐसा तो कोई संकेत नहीं है कि नहीं लेंगे। बल्कि सूत्र आधारित जानकारी के अनुसार बीजेपी और सहयोगी दलों के सांसदों के साथ बैठक में उन्होंने उत्सुक सांसदों को कारण समझाने का प्रयास तो किया लेकिन वापसी की मांग को देखते हुए कह गए कि फैसला प्रधानमंत्री लेंगे। तो क्या ये फैसला प्रधानमंत्री का था या वित्त मंत्री ने ये कहना चाहा कि वे अपने इस फैसले पर अड़े रहेंगे। मंगलवार को एक बार फिर से राजस्व सचिव हंसमुख अधिया ने सफाई दी कि पीपीएफ पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।

इस सफाई से भ्रम ही फैल गया कि ये रोल बैक है या स्पष्टीकरण। क्या बजट में पीपीएफ के बारे में कुछ नहीं कहा गया था। यही बात राजस्व सचिव ने बजट के बाद वित्त मंत्री के साथ जब प्रेस के समक्ष प्रस्तुत हुए तब क्यों नहीं बताई, जबकि उन्होंने सिर्फ इसी पर विस्तार से बताते हुए कहा था, ‘मैं एनपीएस, ईपीएफ और अन्य योजनाओं को एक समान किये जाने पर बात करना चाहता हूं। तीन तरह के प्लान हैं। पहला सुपर एनुएशन फंड स्कीम। दूसरा प्रोविडेंट फंड स्कीम जिसमें ईपीएफ भी शामिल है। तीसरा है एनपीएस।’

लेकिन चौबीस घंटे से भी कम समय में राजस्व सचिव बताने लगे कि इस योजना में पीपीएफ शामिल नहीं हैं। राजस्व सचिव ने यह भी बताया था कि अब नियोक्ता यानी नौकरी देने वाले कर्मचारी के ईपीएफ में डेढ़ लाख से ज़्यादा नहीं देंगे। ईपीएफ में नियोक्ता का योगदान डेढ़ लाख तक सीमित कर दिया है। यह भी साफ किया था कि 1 अप्रैल 2016 से पहले की जमा राशि पर नया नियम लागू नहीं होगा। राजस्व सचिव ने यह भी कहा और उन्होंने यह बात सोमवार को भी कही थी कि EPF उन कर्मचारियों के लिए बना था, जिनकी आमदनी महीने की 15,000 रुपये थी। बाद में इसमें निजी कंपनियों के योगदान को भी शामिल कर लिया गया, जिनकी सैलरी 15,000 रुपये हैं उन्हें पैसा निकालते वक्त टैक्स नहीं देना होगा।

सवाल है कि 15,000 पाने वाले की सैलरी बढ़ गई तो क्या होगा। ज़ाहिर है बढ़ेगी ही। कहीं ऐसा तो नहीं कि समझाने के चक्कर में अफसरों ने मामला उलझा ही दिया है। आज सरकार ने जो प्रेस रिलीज जारी की है, उसमें भी 15,000 वाली बात है। वैसे पीएफ सैलरी के हिसाब से नहीं बेसिक के हिसाब से लगता है। कितने लोग ऐसे हैं जो ईम्पलाई प्रोविडेंट फंड आर्गेनाइज़ेशन ईपीएफओ के सदस्य हैं। प्रेस रिलीज में कहा गया है कि EPFO के क़रीब 3.7 करोड़ सदस्यों में से क़रीब 3 करोड़ ऐसे ही सदस्य हैं…। यानी करीब 3 करोड़ सदस्य 15,000 वेतन पाने वाले हैं। जिन्हें पैसा निकालते वक्त टैक्स नहीं देना पड़ेगा। EPFO में निजी क्षेत्र के करीब 60 लाख सदस्य ऐसे हैं जिनकी तनख्वाह ज़्यादा है। इस वर्ग के लोगों को अब टैक्स देना पड़ेगा।

EPFO के सदस्यों को लेकर दो तरह के आंकड़े हैं। प्रेस रिलीज में कहा गया है कि 3.7 करोड़ सदस्य हैं। सूत्र बताते हैं कि सदस्यों की संख्या 6 करोड़ से ज्यादा है जिनकी केवाईसी संस्था के पास है। ‘इकोनोमिक टाइम्स’ ने पांच करोड़ से ज़्यादा सदस्य बताये हैं। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ अखबार के अनुसार सदस्यों की संख्या करीब छह करोड़ है। अब अखबारों की संख्या ज़्यादा है या सरकार की संख्या कम, इसकी जानकारी के लिए आरटीआई का सहारा लेना पड़ेगा या कोई सांसद संसद में यह सवाल पूछ ले। बजट में और बाद में राजस्व सचिव ने यह कहा था कि ईपीएफओ और पीपीएफ से जो साठ फीसदी हिस्सा है उसे सुपर एन्युइटी स्कीम में लगा देने पर कोई टैक्स नहीं लगेगा लेकिन जब पेंशन मिलने लगेगा तो उस पर टैक्स लगेगा। प्रेस रिलीज में कहा गया है कि जब इस 60 फीसदी पैसे को एन्युइटी में रखा जाएगा तो कोई टैक्स नहीं लगेगा और तब आपका पूरा फंड टैक्स फ्री हो जाएगा।

पहले कहा गया कि सुपर एन्युईटी में डालने के बाद जो पेंशन के रूप में जो राशि मिलेगी उस पर टैक्स लगेगा। अब कहा जा रहा है कि राशि पर टैक्स नहीं लगेगा। अब आप एक और बात समझिये। सरकार कहती है कि साठ फीसदी हिस्सा अगर सुपर एन्युइटी में नहीं लगाएंगे तो ही टैक्स देना होगा। अगर बीमा पॉलिसी खरीद लेंगे तो नहीं देना होगा। सरकार बीमा कंपनियों के लिए कर्मचारियों पर टैक्स लगा रही है या हमारे भले के लिए। नौकरी के दौरान कर्मचारी जिन बीमा पालिसी को पांच-दस हज़ार के प्रीमियम में खरीदते रहते हैं उसी की एक पॉलिसी हम रिटायर होने के बाद लाखों रुपये देकर खरीदेंगे। अगर किसी ने पहले से ही ऐसा प्लान ले रखा हो तो वो दोबारा क्यों खरीदेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बदलाव के ज़रिये इंश्योरेंस सेक्टर का खजाना भरा जा रहा है। सरकार क्यों तय करेगी कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पैसे को हमें कहां देना है। वो विकल्प दे, कानूनी रूप से मजबूर न करें। अगर सरकार आपके पेंशन को लेकर इतनी ही चिन्तित है तो ईपीएफओ में ही पेंशन का हिस्सा है, उसे ही क्यों नहीं बड़ा कर देती है।

आप जानते हैं कि ईपीएफओ के तीन हिस्से होते हैं। बेसिक का 12 फीसदी आप देते हैं, इतना ही कंपनी देती है। कंपनी के 12 फीसदी में से 3.67 फीसदी पेंशन में चला जाता है, जो आपको मिलता है, लेकिन यह राशि बहुत कम होती है। अगर सरकार का इरादा पेंशन बढ़ाना है तो साठ फीसदी पैसे को बाज़ार में लाने की बजाय ईपीएफओ के पेंशन फंड में ही क्यों नहीं डाल देती। सरकार ने बीमा कंपनियों के जिस सुपर एन्युईटी प्लान के लिए हमारी गाढ़ी कमाई पर जो टैक्स लगाया है क्या हम उसके बारे में जानते हैं, उनकी क्या शर्तें होंगी, उनके क्या प्रावधान होंगे। क्या आप जानते हैं। राजस्व सचिव, प्रेस रिलीज और वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा के बयान में कहा गया है कि पीपीएफ से पैसा निकालने पर किसी तरह का टैक्स नहीं लगेगा, लेकिन क्या इसका एलान सरकार बजट पास कराते वक्त करेगी।

अब आपको एनपीएस की मौजूदा शर्त के बारे में बताता हूं। एनपीएस के बुकलेट में लिखा है कि जब आप साठ साल के होंगे तो आपको अपनी कुल जमा पेंशन राशि का कम से कम 40 फीसदी एन्युइटी प्लान में लगाना होगा। अगर साठ साल से पहले निकालेंगे तो 80 फीसदी एन्युइटी प्लान में लगाना होगा। चालीस फीसदी तो पहले से ही है। तो क्या सरकार ने एन्युइटी में पैसा लगाने का एनपीएस का कोटा 40 से 60 फीसदी कर दिया है। सुपर एन्यूइटी प्लान समझने के लिए आपको बता दें। एन्युइटी का मतलब आप एक बार पैसा डाल दें और उसे वृत्ति के आधार पर यानी महीने या साल के आधार पर मिल सकता है, तन्ख्वाह की तरह। बहुत सारी कंपनियां एन्युइटी प्लान ला रही हैं लेकिन भारतीय जीवन बीमा निगम की दो पॉलिसी हैं। जीवन अक्षय 6 और जीवन निधि। वित्त मंत्री जयंत सिन्हा ने विस्तार से बताते हुए कहा कि टैक्स आपको इसलिए देना पड़ेगा क्योंकि हमारी कोशिश है कि अगर हम आपको इतना बड़ा टैक्स ब्रेक दे रहे हैं…अगर आप रिटायरमेंट इनकम का प्रयोग नहीं करते हैं तो आपको टैक्स देना पड़ेगा… जब फाइनेंस बिल में हम लोगों ने ये प्रस्ताव लाया तो बहुत से सुझाव आए… हम लोग उस पर विचार कर रहे हैं… बदलाव करेंगे जो उचित होगा… मगर आज ये लागू होगा…

यानी ये फैसला लागू होगा। वैसे हमने उनका पूरा बयान नहीं पढ़ा है। हम यह भी समझने का प्रयास करेंगे कि अगर कंपनी का हिस्सा जो पहले 12 फीसदी होता था उसे डेढ़ लाख रुपये तक सीमित करने से लाभ किसको होगा, नुकसान किसको होगा। तो क्या वाकई नया बदलाव 70 लाख लोगों से ही संबंधित है, तो क्या जानना दिलचस्प नहीं होगा कि इन 70 लाख लोगों से सरकार को कितना टैक्स मिल जाएगा। इस फैसले का विरोध करने वाले कहते हैं कि सैलरी पर टैक्स तो सब देते ही हैं। ईपीएफओ पर टैक्स लेने का मतलब है दोबारा टैक्स देना। वैसे भी ब्याज़ दर कभी 12 फीसदी थी जो आठ से साढ़े आठ के बीच रहती है। क्या इसे कमी नहीं मानी जाए।

ब्याज को लेकर भी कई तरह के बयान आए। बजट में कहा गया कि साठ फीसदी हिस्से पर टैक्स लगेगा। फिर कहा गया कि उस साठ फीसदी में जो ब्याज का हिस्सा होगा उस पर टैक्स लगेगा। वैसे ब्याज की राशि भी कम नहीं होती। उस पर भी टैक्स लगने से आपको लाखों रुपये देने होंगे। 1952 से ईपीएफओ की योजना चल रही है। 2016 में सरकार इस नतीजे पर कैसे पहुंची कि इसकी निकासी के साठ फीसदी हिस्से पर टैक्स लगाना चाहिए या इसे बीमा सेक्टर की तरफ धकेल देना चाहिए। एक जानकारी और हाथ लगी है। हम ईपीएफओ की साइट पर गए थे। वहां 25 फरवरी का एक नोटिफिकेशन मिला जिसके अनुसार सरकार ने बजट से पहले एक बड़ा बदलाव कर दिया है। पहले 55 साल की उम्र होते ही कर्मचारी कभी भी पैसा निकाल सकता था, यानी 55 साल वाले को नौकरी छूटने के बाद दो महीने का इंतज़ार नहीं करना होता था। नए नोटिफिकेशन में दो महीने के इंतज़ार की छूट अब 58 साल पर दी गई है। 55 साल से पहले जब कर्मचारी पैसा निकालता था तो अपना और कंपनी का हिस्सा निकाल सकता था। दोनों पर मिलने वाला ब्याज भी निकाल सकता था लेकिन नए नोटिफिकेशन के अनुसार 58 साल से पहले पैसा निकालेंगे तो कर्मचारी को अपना हिस्सा और उस मिले ब्याज में से ही पैसा मिलेगा। कंपनी या नियोक्ता का हिस्सा और उस पर मिला ब्याज 58 साल के बाद मिलेगा। अगर आप ईपीएफ के पैसे के भरोसे हैं तो आप कम से कम इन बातों को तो जान ही लीजिए। सरकार ईपीएफ के पैसे पर प्रतिबंध से लेकर निवेश की शर्तें क्यों थोप रही है।

जाने माने जर्नलिस्ट रवीश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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अमेरिका के प्रमुख अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने जेएनयू क्रैकडाउन पर नरेंद्र मोदी को ज़िम्मेदार ठहराते हुए लिखा एडिटोरियल, पढ़ें

The Opinion Pages | Editorial

India’s Crackdown on Dissent

By THE EDITORIAL BOARD

FEB. 22, 2016

India is in the throes of a violent clash between advocates of freedom of speech and the government of Prime Minister Narendra Modi and its political allies on the Hindu right determined to silence dissent. This confrontation raises serious concerns about Mr. Modi’s governance and may further stall any progress in Parliament on economic reforms.

The crisis began with the arrest of Kanhaiya Kumar, the president of Jawaharlal Nehru University’s student union, by the Delhi police on charges of sedition. Mr. Kumar’s arrest followed an on-campus rally on Feb. 9 that marked the anniversary of the 2013 hanging of Muhammad Afzal, who was convicted of participating in the 2001 terrorist attack by an Islamist group based in Pakistan on India’s Parliament. The circumstances of Muhammad Afzal’s trial and execution remain controversial.

The Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad, a student group affiliated with Mr. Modi’s Bharatiya Janata Party, and new university leadership appointed by Mr. Modi’s government were involved in calling the police on campus and singling out Mr. Kumar.

The court in New Delhi where Mr. Kumar’s hearing took place last week was a scene of chaos, as lawyers and B.J.P. supporters chanting “glory to Mother India” and “traitors leave India” assaulted journalists and students. The police refused to intervene. A B.J.P. member of India’s legislative assembly, Om Prakash Sharma, who was recorded on camera severely beating a student, said later, “There is nothing wrong in beating up or even killing someone shouting slogans in favor of Pakistan,” as some students were accused of doing.

Responsibility for this lynch-mob mentality lies squarely with Mr. Modi’s government. On the day after Mr. Kumar’s arrest, Home Minister Rajnath Singh said, “If anyone raises anti-India slogans and tries to raise question on the nation’s unity and integrity, they will not be spared.” India’s Supreme Court has limited the definition of India’s colonial-era crime of sedition to speech that is “incitement to imminent lawless action.” Mr. Singh apparently does not realize that, in a democracy, voicing dissent is a vital right, not a crime.

Meanwhile, hundreds of journalists marched last week in protest from the Press Club of India to the Supreme Court in New Delhi. Thousands of students and faculty at universities across India have turned out to protest in recent days. These Indian citizens are right to voice their outrage at government threats to the exercise of their democratic rights. Mr. Modi must rein in his ministers and his party, and defuse the current crisis, or risk sabotaging both economic progress and India’s democracy. The charge of sedition against Mr. Kumar should be dropped. As Pratap Bhanu Mehta, president of the Center for Policy Research in New Delhi, warned in a recent opinion piece, members of Mr. Modi’s government “have threatened democracy; that is the most anti-national of all acts.”

(साभार- द न्यूयार्क टाइम्स)

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण : दो साल में देश को बर्बादी की ओर ले गए मोदी राज में देशद्रोह देशद्रोह खेला जा रहा है!

मोदी जी, इस बार पीएम नहीं देश फेल होगा

दो दिन बाद संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। इस पर संसद की ही नहीं बल्कि देश की नजर होगी। आखिर मोदी सरकार की किन उपलब्धियों का जिक्र राष्ट्रपति करते हैं और किन मुद्दों पर चिंता जताते हैं। पहली बार जाति या धर्म से इतर राष्ट्रवाद ही राजनीतिक बिसात पर मोहरा बनता दिख रहा है। पहली बार आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फूलते हाथ पांव हर किसी को दिखायी भी दे रहे हैं। साथ ही संघ परिवार के भीतर भी मोदी के विकास मंत्र को लेकर कसमसाहट पैदा हो चली है। यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर के तेवर 2016 के बजट सत्र के दौरान कैसे बुखार में बदल रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।

कारपोरेट सेक्टर के पास काम नहीं है।
औघोगिक सेक्टर में उत्पादन सबसे निचले स्तर पर है।
निर्यात सबसे नीचे है।
किसान को न्यूनतम समर्थन मल्य तो दूर बर्बाद फसल के नुकसान की भरपाई भी नहीं मिल पा रही है।
नये रोजगार तो दूर पुराने कामगारों के सामने भी संकट मंडराने लगा है।
कोयला खनन से जुड़े हजारों हजार मजदूरों को काम के लाले पड़ चुके हैं।

कोर सेक्टर ही बैठा जा रहा है तो संघ परिवार के भीतर भी यह सवाल बडा होने लगा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने विकास मंत्र के आसरे संघ के जिस स्वदेशी तंत्र को ही हाशिये पर ढकेला और जब स्वयंसेवकों के पास आम जनता के बीच जाने पर सवाल ज्यादा उठ रहे हैं और जवाब नहीं है तो फिर उसकी राजनीतिक सक्रियता का मतलब ही क्या निकला। दरअसल मोदी ही नहीं बल्कि उससे पहले मनमोहन सिंह के कार्यकाल से ही राजनीतिक सत्ता में सिमटते हर संस्थान के सारे अधिकार महसूस किये जा रहे थे। यानी संस्धानों का खत्म होना या राजनीतिक सत्ता के निर्देश पर काम करने वाले हालात के आरोप मनमोहन सिंह के दौर में सीबीआई से लेकर सीवीसी और चुनाव आयोग से लेकर यूजीसी तक पर लगे। लेकिन मोदी के दौर में संकेत की भाषा ही खत्म हुई और राजनीतिक सत्ता की सीधी दखलंदाजी ने इस सवाल को बड़ा कर दिया कि अगर चुनी हुई सत्ता का नजरिया ही लोकतंत्र है तो फिर लोकतंत्र के चार खम्भों के बारे में सोचना भी बेमानी है। इसलिये तमाम उल्झे हालातों के बीच जब संसद सत्र भी शुरू हो रहा है तो यह खतरा तो है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के वक्त ही विपक्ष बायकाट ना कर दे और सड़क पर भगवा ब्रिगेड ही यह सवाल ना उठाने लगे कि नेहरु माडल पर चलते हुये अगर मोदी सरकार पूंजी के आसरे विकास की सोच रही है तो फिर इस काम के लिये किसी प्रचारक के पीएम बनने का लाभ क्या है। यह काम तो कारपोरेट सेक्टर भी आसानी से कर सकता है।

सही मायने में यही काम तो मनमोहन सिंह बतौर पीएम से ज्यादा बतौर सीईओ दस बरस तक करते रहे। यानी पेट का सवाल। भूख का सवाल। रोजगार का सवाल। किसान का सवाल। हिन्दुत्व का सवाल। हिन्दुत्व को राष्ट्र से आगे जिन्दगी जीने के नजरिये से जोड़ने का सवाल। मानव संसाधन को विकास से जोड़ कर आदर्श गांव बनाने की सोच क्यों गायब है यह सवाल संघ परिवार के तमाम संगठनो के बीच तो अब उठने ही लगे है। किसान संघ किसान के मुद्दे पर चुप है। मजदूर संघ कुछ कह नहीं सकता। तोगडिया तो विहिप के बैनर तले राजस्थान में किसानों के बीच काम कर रहे हैं। यानी मोदी सरकार के सामने अगर एक तरफ संसद के भीतर सरकार चलते हुए दिख रही है, यह दिखाने-बताने का संकट है तो संसद के बाहर संघ परिवार को जवाब देना है कि जिन मुद्दों को 2014 लोकसभा चुनाव के वक्त उठाया वह सिर्फ राजनीतिक नारे नहीं थे। असर मोदी सरकार के इस उलझन का ही है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी अब संघ के राजनीतिक संगठन के तौर पर सक्रिय ऐसे वक्त हुये जब संसद शुरू होने वाली है। यानी टकराव सीधा नजर आना चाहिये, इसे संघ परिवार समझ चुका है। इसलिये पीएम बनने के बाद मोदी के ट्रांसफरमेशन को वह बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।

ध्यान दे तो संघ की राष्ट्रभक्ति की ट्रेनिंग का ही असर रहा कि नरेन्द्र मोदी ने 2014 के चुनाव में राइट-सेन्टर की लाइन ली। पाकिस्तान को ना बख्शने का अंदाज था। किसान-जवान को साथ लेकर देश को आगे बढाने की सोच भी थी। कारपोरेट और औघोगिक घरानों की टैक्स चोरी या सरकारी रियायत को बंद कर आम जनता या कहे गरीब भारत को राहत देने की भी बात थी। यानी संघ परिवार के समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सोच के साथ देशभक्ति का जुनून मोदी के हर भाषण में भरा हुआ था। लेकिन बीते दो बरसो में राइट-सेन्टर की जगह कैपिटल राइट की लाइन पकडी और पूंजी की चकाचौंध तले अनमोल भारत को बनाने की जो सोच प्रधानमंत्री मोदी ने अपनायी उसमे सीमा पर जवान ज्यादा मरे। घर में किसान ने ज्यादा खुदकुशी की। नवाज शरीफ से यारी ने कट्टर राष्ट्रवाद को दरकिनार कर संघ की हिन्दू राष्ट्र की थ्योरी पर सीधा हमला भी कर दिया।

इसी प्रक्रिया में स्वयंसेवकों की एक नयी टीम ने हर संस्धान पर कब्जा शुरू भी किया और मोदी सरकार ने मान भी लिया कि संघ परिवार उसके हर फैसले पर साथ खड़ा हो जायेगी क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय से लेकर रक्षा मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय से लेकर कृषि मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय में संघ के करीबी या साथ खडे उन स्वयंसेवकों को नियुक्ति मिल गई जिनके जुबा पर हेडगेवार-गोलवरकर से लेकर मोहन भागवत का गुणगान तो था लेकिन संघ की समझ नहीं थी। संघ के सरोकार नहीं थे। विश्वविद्यालयों की कतार से लेकर कमोवेश हर संस्धान में संघ की चापलूसी करते हुये बडी खेप नियुक्त हो गई जो मोदी के विकास तंत्र में फिट बैठती नहीं थी और संघ के स्वयंसेवक होकर काम कर नहीं सकती थी। फिर हर नीति। हर फैसले। हर नारे के साथ प्रधानमंत्री मोदी का नाम चेहरा जुडा। तो मंत्रियों से लेकर नौकरशाह का चेहरा भी गायब हुआ और समझ भी।

पीएम मोदी सक्रिय है तो पीएमओ सक्रिय हुआ। पीएमो सक्रिय हुआ तो सचिव सक्रिय हुये। सचिव सक्रिय हुये तो मंत्री पर काम का दबाब बना। लेकिन सारे हालात घूम-फिरकर प्रदानमंत्री मोदी की सक्रियता पर ही जा टिके। जिन्हे 365 दिन में से सौ दिन देश में अलग अलग कार्यक्रमों में व्यस्त रखना नौकरशाही बखूबी जानती है। फिर विदेशी यात्रा से मिली वाहवाही 30 से 40 दिन व्यस्त रखती ही है। तो देश के सवाल जो असल तंत्र में ही जंग लगा रहे है और जिस तंत्र के जरीये अपनी योजनाओं को लागू कराने के लिये सरकार की जरुरत है वह भी संकट में आ गये तो उन्हें पटरी पर लायेगा कौन। मसलन एक तरफ सरकारी बैक तो दूसरी तरफ बैक कर्ज ना लौटाने वाले औघोगिक संस्थानों का उपयोग। यानी जो गुस्सा देशभक्ति के भाव में या देशद्रोह कहकर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर जेएनयू तक में निकल रहा है। उसको देखने का नजरिया चाह कर भी छात्रों के साथ नहीं जुड़ेगा। यानी यह सवाल नहीं उठेगा कि छात्रों के सामने संकट पढाई के बाद रोजगार का है, बेहतर पढाई ना मिल पाने का है। शिक्षा में ही 17 फीसदी बजट कम करने का है। शिक्षा मंत्री की सीमित समझ का है। रोजगार दफ्तरों में पड़े सवा करोड आवेदनों का है। साठ फीसदी कालेज प्रोफेसरों को अंतराष्ट्रीय मानक के हिसाब से वेतन ना मिलने का है।

सवाल राजनीतिक तौर पर भी उठेंगे। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के आईने में दलित का सवाल सियासी वोट बैंक तलाशेगा। जेएनयू के जरिये लेफ्ट को देशद्रोही करार देते हुये बंगाल और केरल में राजनीतिक जमीन तलाशने के सवाल उठेंगे। या फिर यह मान कर चला जायेगा कि अगर धर्म के साथ राष्ट्रवाद का छौंक लग गया तो राजनीतिक तौर पर बडी सफलता बीजेपी को मिल सकती है। चूंकि राजनीतिक सत्ता में ही सारी ताकत या कहे सिस्टम का हर पूर्जा समाया हुआ बनाया जा रहा है तो विपक्षी राजनीतिक दल हो या सड़क पर नारे लगाते हजारों छात्र या तमाशे की तर्ज पर देश के हालात को देखती आम जनता, हर जहन में रास्ता राजनीतिक ही होगा। इससे इतर कोई वैकल्पिक सोच उभर सकती है या सोच पैदा कैसे की जाये, यह सवाल 2014 के एतिहासिक जनादेश के आगे सोचेगा नहीं। दिमाग 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले के दिनों की गिनती करने लगेगा। यानी सवाल यह नहीं है कि संघ परिवार अब सक्रिय हो रहा है कि मोदी फेल होते है तो वह फेल ना दिखायी दे। या फिर कांग्रेस हो या अन्य क्षेत्रिय राजनीतिक दल इनकी पहल भी हर मुद्दे का साथ राजनीतिक लाभ को देखते हुये ही नजर आयेगी। हालात इसलिये गंभीर हैं क्योंकि संसद का बजट सत्र ही नहीं बल्कि बीतते वक्त के साथ संसद भी राजनीतिक बिसात पर प्यादा बनेगी और लोकतंत्र के चारो पाये भी राजनीतिक मोहरा बनकर ही काम करेंगे। इस त्रासदी के राजनीतिक विकल्प खोजने की जरुरत है इससे अब मुंह चुराया भी नहीं जा सकती। क्योंकि इतिहास के पन्नो को पलटेंगे तो मौजूदा वक्त इतिहास पर भारी पड़ता नजर आयेगा और राजद्रोह भी सियासत के लिये राजनीतिक हथियार बनकर ही उभरेगा। क्योंकि इसी दौर में अंरुधति से लेकर विनायक सेन और असीम त्रिवेदी से लेकर उदय कुमार तक पर देशद्रोह के आरोप लगे।

पिछले दिनो हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के आरोप लगे। और अब कन्हैया कुमार पर। लेकिन उंची अदालत में कोई मामला पहले भी टिक नहीं पाया लेकिन राजनीति खूब हुई। जबिक आजादी के बाद महात्मा गांधी से लेकर नेहरु तक ने राजद्रोह यानी आईपीसी के सेक्शन 124 ए को खत्म करने की खुली वकालत यह कहकर की अंग्रेजों की जरुरत राजद्रोह हो सकती है। लेकिन आजाद भारत में देश के नागरिको पर कैसे राजद्रोह लगाया जा सकता है। बावजूद इसके संसद की सहमति कभी बनी नहीं। यानी देश की संसदीय राजनीति 360 डिग्री में घुम कर उन्ही सवालों के दायरे में जा फंसा है जो सवाल देश के सामने देश को संभालने के लिये आजादी के बाद थे। और इसी कडी 2014 के जनादेश को एक एतिहासिक मोड माना गया। इसलिये मौजूदा दौर के हालात में अगर मोदी फेल होते है तो सिर्फ एक पीएम का फेल होना भर इतिहास के पन्नो में दर्ज नहीं होगा बल्कि देश फेल हुआ। दर्ज यह होगा। यह रास्ता 2019 के चुनाव का इंतजार नहीं करेगा।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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मोदी राज में व्यापारी का दर्द सुनिए

जो दे सकते हैं काम औरों को
वो खुद आज काम मांग रहे हैं
पढ़े लिखे नौजवान हमारे
पुश्तैनी कारोबार से दूर भाग रहे हैं .

यदि ऐसा ही चलता रहा तो
व्यापारी थोड़े ही रह जायेंगे
विदेशी पूँजी के साथ – साथ
व्यापारी भी हम विदेशी लायेंगे.

मेहनत से व्यापार किया है
तन, मन, धन, सब साथ लगाया
पर कानूनों की जटिलताओं ने
हमको ही गुनह्गार ठहराया.

शिकारी भेडियों सी फौज अफसरों की
हमें  आँख दिखाते,  धमका जाते हैं
हम दाँत निपोरते, मनुहार हैं करते
गुनह्गार से कंपकंपाते  हैं .

टैक्स, लाइसेंस की भरमार इतनी
किसी भी तरह से सक नही पाते
रिटर्न फ़ाइलिंग लाइसेन्स रिनिवल
इनमें ही बस दिमाग लगाते.

सरे आम जो घूस है खाते
आदरणीय, सर, योर ऑनर कहलाते
देखो इनके तेवर  कैसा ये रौब दिखाते
लूटेरो की इस टोली से सब है घबड़ाते.

जो करते रहते जाँच हमारी
उनकी भी हमसे जाँच करवाओ
ज्यादा नही पर थोड़े  दिनो का
हमको भी अफसर बनवाओ.

हम भी बनाये इनकी फाइले
और जांचे इनका गोरख धंधा
चौराहों पर खड़ा है कर दे
इनकी पूरी फौज को नंगा.
 
खुद की है पूँजी, खुद के है साधन
ना ली कोई सुविधा, ना लिया अनुदान,
खुद भी लगे, औरों को लगाया
करोड़ों करोड़ हाथो को दिया काम.

शांति प्रिय हम  चुप ही रहते
ना कभी दंगा ना कभी फ़साद किया
मेहनत से व्यापार करने का
अपमान सहने का हमे ईनाम  दिया.

आप भी करो रेकॉर्ड मेनटेनेन्स
हम भी करे रेकॉर्ड मेनटेनेन्स
दोनो तरफ मेनटेनेन्स कॉस्ट आती है
समय शक्ति और धन की कितनी ये बर्बादी है.

जितना हम चुकाते है टैक्स,
उतना ही और भी लग जाता है,
जितना जाता है खजाने मे,
आधा भी नही बच पाता है.

हम हुए है भ्रमित और सशंकित
और  हुए  है  आतंकित  भाई
हम पर  टैक्स टेरर की दुधारी
ये तलवार काहे को  है लटकाई.

क्यों  कर  कोई  हेराफेरी
क्यों  करे कोई   चतुराई
कच्चे पक्के खाता-बही की
रीति अब ये मिट जाये भाई.

अफसरों की ये फौज हटवा  दो
टैक्स, लाइसेंस का जाल कटवा दो
जो जरूरी हो टैक्स लगवा दो
जगह जगह नही एक साथ लगवा दो.

( सभी अफसर और व्यापारी भ्रष्ट नही है, अपवाद है. सिंगल पॉइंट टैक्सेशन देश की आवश्यकता है.)

व्यापारिक बंधुओं से निवेदन है
ज्यादा से ज्यादा फॉरवर्ड करें

प्रति,
माननीय प्रधान मंत्री श्री मोदीजी,
हम वो बदनसीब व्यापारी /नागरिक हैं, जिन्होंने भारत में जन्म लिया।
लगातार व्यापार व मुनाफा घट रहा है, Online की वजह से।
हर साल पुराने कर्मचारियों को पगार बढ़ा के चाहिये, मुनाफा हो या ना हो ।
किसी भी नये नये उत्सव के लिए खर्चा व्यापारियों से वसूला जाता है।

हमारी आपको विनती है, कृपया टैक्स भरनेवाले नागरिक तथा व्यापारियों की यातनाओं पर ध्यान दें। हमारी मेहनत से जमा टैक्स से मुफ़्त में मज़े लेने वालों का बंदोबस्त किया जाय।
विविध प्रकार के कर जमा करने वाले विभाग ही बंद करें ।
 
नहीं तो हम सोच रहें है की व्यापार करना छोड़ दें। दूकान बेच के पैसों के ब्याज से ही अच्छी आमदनी होगी। कही दूर गाँव में जमीन ले के आराम से ज़िन्दगी जियेंगे। कोई टैक्स नहीं। रोज के 10 घंटे मेहनत दूसरों के लिए करके हमने हमारी जिंदगी बर्बाद कर ली।

बस्स! अब इसके आगे नहीं। जो कर्मचारियों के घर हमारी वजह से चल रहे थे उनको मोदीजी आप संभाल लेना।

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मोदी की झुंझलाहट का असली कारण कांग्रेस नहीं खुद मोदी ही हैं

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया है कि ‘एक परिवार’ उनके काम में बाधा डाल रहा है। वह अपनी पराजय का बदला ले रहा है। वह राज्यसभा में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं होने दे रहा है। यदि वे विधेयक कानून बन जाते तो लाखों मजदूरों को बोनस मिलने लगता, सारे देश में एक रूप सेवा कर प्रणाली लागू हो जाती, जल यातायात कानून बनने पर दर्जनों नदियां सड़कों की तरह उपयोगी बन जातीं, किसानों के हितों की रक्षा होती।

मोदी ने जो आरोप लगाया हैं वे गहरी निराशा के परिणाम हैं। यदि वे बहुत झुंझलाए हुए नहीं होते तो वे ऐसे तीखे आरोप नहीं लगाते। उनके आरोप सही हैं लेकिन असली सवाल यह है कि कांगेस जो कुछ कर रही है, वैसा वह क्यों नहीं करें? कांग्रेस आखिरकार, विपक्ष में है। प्रमुख विपक्षी दल है। यदि वह हर बात में सरकार की टांग न खींचे तो वह कैसी विपक्षी पार्टी है?

कांग्रेस के पास आज है ही क्या? उसके पास न तो कोई नेता है, न कोई नीति है, न विचारधारा है, न सिद्धांत है, न दिशा है। वह करे तो करे क्या? यदि वह हर बात का विरोध न करे तो उसके पास काम ही क्या रह जाएगा? देश के लोग कांग्रेस की इस मजबूरी को अच्छी तरह समझते हैं। मोदी को खैर मनानी चाहिए कि कांग्रेस के पास डॉ. लोहिया जैसा नेता नहीं है। वरना 40 तो क्या, 4-5 सांसद ही काफी होते, इस सरकार की खाट खड़ी करने के लिए!

मोदी की झुंझलाहट का असली कारण कांग्रेस नहीं खुदी मोदी ही हैं। चुनाव-अभियान के दौरान उन्होंने जो सब्ज-बाग सजाया था, दो साल पूरे होने आए लेकिन उनके पेड़ों पर कोई फल दिखाई नहीं पड़ रहे। न काला धन लौटा, न भ्रष्टाचार घटा, न करोड़ों रोजगार पैदा हुए, न मंहगाई घटी, न अंग्रेजी का शिकंजा ढीला हुआ, न जातिवाद की आग ठंडी पड़ी, न सांप्रदायिकता घटी, न आतंकवाद से छुटकारा मिला, न गरीबों को राहत मिली। लोग नरेंद्र मोदी को नहीं कोस रहे हैं। वे खुद को कोस रहे हैं। वे खुद से पूछ रहे है कि वे इतना तगड़ा धोखा कैसे खा गए? उन्होंने इतना भरोसा क्यों कर लिया? वे आशाओं की इस हवाई कुतुब मीनार पर क्यों चढ़ गए?

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मोदी का जादू चुक गया, चैनल अब नहीं दिखा रहे लाइव कवरेज

मोदी के भाषण अब चुक गए हैं. उनका जादू खत्म हो चुका है. इसलिए उनकी अब टीवी चैनलों को जरूरत नहीं. एक दौर था जब मोदी के भाषण को घंटों दिखाने के कारण टीवी चैनलों की टीआरपी आसमान पर थी. तब मोदी खुद को नंबर वन होने का दावा कर रहे थे. लोकसभा चुनाव के दौरान तो प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी थी. मोदी भी अपने अनुसार चैनलों को चुनकर उनको खूब टीआरपी दिलवा रहे थे. शायद इसी का असर रहा कि कुछ टीवी चैनलों को इसका खूब लाभ मिला. मोदी अपने भाषणों से चैनलों को टीआरपी देते चले गए और मोदी चैनलों के मुनाफे के धंधे में तब्दील हो गए.

लेकिन आज हालत ये है कि मोदी की असम रैली को किसी चैनल ने लाइव नहीं दिखाया. चैनल के भीतर के लोग बताते हैं कि मोदी अब टीआरपी नहीं दिला पा रहे. जनता उनको सुन सुन के बोर हो चुकी है. उनके जुमलों पर अब किसी को यकीन नहीं है. यही कारण है कि जब मोदी भाषण दे रहे होते हैं तो जनता चैनल बदल देती है. इस कारण चैनलों ने मोदी की रैली को लाइव दिखाना छोड़ दिया.

प्रधानमंत्री मोदी असम में होने वाले विधानसभा चुनाओं के मद्देनजर किसानों के बीच रैली कर रहे थे तो उसका प्रसारण किसी निजी चैनल ने नहीं किया. सिर्फ सरकारी चैनल दूरदर्शन ने ही इसे लाइव दिखाया. आजतक, एबीपी न्यूज़, इंडिया टुडे, टाइम्स नाउ, एनडीटीवी आदि ने मोदी के भाषण को नहीं दिखाया. रिलायंस के स्वामित्व वाले चैनल आईबीएन7 ने मोदी के भाषण का प्रसारण किया. मोदी भक्त समझे जाने वाले इंडिया टीवी और ज़ी न्यूज़ को भी अब मोदी से टीआरपी नहीं मिल रही है, यह भी साफ़ दिख रहा है.  हाल ही में टीवी रेटिंग मापने वाली संस्था TAM के आंकड़ों ने इस टीआरपी के खेल को साफ़ कर दिया. TAM ने जता दिया कि अब मोदी टीवी चैनलों की जरूरत नहीं रहे इसलिए चैनलों ने उनके लाइव भाषणों को दिखाना लगभग बंद कर दिया है.

उधर, इंटरटेनमेंट चैनलों की बात करें तो इस हफ़्ते ज़ी टीवी के ‘कुमकुम भाग्य’ ने कलर्स के सुपरहिट शो ‘नागिन’ को पहले पायदान से उतार दिया है. नंबरों की घटाजोड़ करने पर आप ‘नागिन’ को दूसरे नंबर पर पाएंगे, लेकिन अगर दर्शकों के इन धारावाहिकों पर बिताए गए समय की बात करें तो ‘नागिन’ का जादू इस हफ़्ते कुछ हल्का हुआ है. जहां पहले स्थान पर रहा ज़ी टीवी का ‘कुमकुम भाग्य’, वहीं स्टार पल्स के ‘साथिया’ ने दूसरे स्थान पर क़ब्ज़ा किया. धारावाहिकों की फ़ेहरिस्त में टॉप-3 में कुछ समय के लिए नज़र आए दो नए धारावाहिक थे- ज़ी टीवी का ‘जमाई राजा’ और ‘टश्न ए इश्का’. इन धारावाहिकों की टीआरपी पर अगर नज़र डालें, तो यह हफ़्ता ज़ी टीवी के नाम ही रहा.

सोनी और स्टार प्लस इस महीने में ‘तमन्ना’, ‘कुछ रंग प्यार के ऐसे भी’ जैसे धारावाहिकों को लेकर आ रहे हैं, जो अपनी कहानियों को लेकर चर्चा में हैं. लेकिन इन धारावाहिकों से चैनल की टीआरपी को कितना फ़ायदा होगा, यह कुछ समय बाद पता चलेगा. रिएलिटी शो के फ़ील्ड में भी ज़ी टीवी का ‘इंडियाज़ बेस्ट ड्रामेबाज़’ कलर्स के ‘खतरों के ख़िलाड़ी’ को पछाड़ रहा है. हालांकि यह अंतर बेहद कम है. 90 के दशक के कॉमिक लोटपोट के मुख्य किरदार ‘मोटू पतलू’ पर आधारित कार्टून इस हफ़्ते नंबर एक पर रहा. निकोलडियोन चैनल पर आने वाले इस धारावाहिक ने ‘निंजा हथौड़ी’ (दूसरा स्थान), ‘डोरेमॉन’ (तीसरा स्थान), ऑगी एंड दि कॉक्रोचेस (चौथा स्थान) और छोटा भीम को पीछे छोड़ दिया. अब यह तो साफ़ नहीं है कि इस धारावाहिक को बच्चे देख रहे हैं या 90 के दशक में लोटपोट के फ़ैन रहे युवा, लेकिन यह साफ़ है कि यह कार्यक्रम हिट हो रहा है.

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जेटली जी, डीएवीपी के बेईमान अधिकारियों के खिलाफ कब होगी कार्रवाई

हमारे केन्द्रीय मंत्री अरून जेटली जी खुद को बार बार पाक साफ व भ्रष्टाचार विरोधी शासक बताते हैं। आये दिन चैनलों में बयान देते नजर आते हैं कि मैं और मेरी सरकार भ्रष्टाचार विरोधी सरकार है। देश में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को कभी बख्शा नही जाएगा। किंतु आज आपको ये जानकर सबसे अधिक हैरानी होगी कि जेटलीजी के ही विभाग में सबसे बडे़ बागड़बिल्ले और बेईमान अधिकारी सेवारत हैं। 

हम बात कर रहे हैं डीएवीपी की। राजधानी के लोधीरोड सीजीओ कॉम्पलेक्ष स्थित सूचना भवन की जो कि बेईमान अधिकारियों को अड्डा बनता जा रहा है। मोदीराज में तो स्थिति और बुरी हो गई है। डीएवीपी में शाम होते ही दलालों की मंडी गुलजार हो जाती है। डीएवीपी के अधिकारियों से विज्ञापन जारी कराने हेतु दलाल हर कीमत अदा करने को तैयार रहते हैं। कोई दलाल विज्ञापन जारी करने वाले बाबू को नोटों के बंडल की पेशगी करता है तो कोई दलाल शराब की बोतल। 

कई दलाल तो बेशर्मी की सारी हदें पार कर देते हैं और संबंधित अधिकारी से विज्ञापन जारी करने हेतु अधिकारी के समक्ष अधनंगी लड़की को प्रस्तुत करते हैं। अधिकारी भी बडे़ उजड़ हैं। जब तक विज्ञापन का 30 प्रतिशत कमीशन अधिकारियों को एडवांस नहीं मिल जाता तब तक अखबार मालिकों को आश्वासन के अलावा और कुछ हासिल होना नामुमकिन है। मोदीजी का सफाई अभियान, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया का नारा यहां नहीं काम आता है।   

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार डीएवीपी में अपर महानिदेशक से लेकर करीब आधा दर्जन से अधिक भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधित जांच चल रही है। डीएवीपी के अपर महानिदेशक एनवी रेड्डी सहित रवि रामाकृष्णा, एस के मोहंती, बीपी मीणा का भी नाम इस जांच सूची में शामिल है। अपर महानिदेशक एनवी रेड्डी सहित करीब आधा दर्जन से अधिक लोगों पर अखबार मालिकों से रूपए ऐंठ कर विज्ञापन जारी करने का आरोप है।

गत चार साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। किंतु आज की तारीख तक न तो इनके खिलाफ कोई जांच हुई है और न ही इनके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है। आरटीआई से मिली जानकारी के तहत जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच चल रही है, उनकी सूची साथ में संलग्न है। आशा करता हूं इस खबर पर जेटलीजी कुछ संज्ञान लेंगे व अपने विभाग में बेईमानी का किला मजबूत करने वाले बेईमान अधिकारियों के खिलाफ सही मायने में कोई कार्रवाई करेंगे।

नरेन्द्र गुप्ता
पत्रकार
अहमदाबाद
मोबाइल 8690599834

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व्यापारी संगठन के इन सवालों के क्रमवार जवाब कोई भाजपाई या मोदी भक्त दे तो अच्छा रहेगा

Yashwant Singh : भड़ास के पास ALL DELHI COMPUTER TRADERS ASSOCIATION (ADCTA) की तरफ से एक ईपत्र आया है, adcta.nehruplace@gmail.com मेल आईडी और Modi Ji, Vyapari ke Man ki Baat bhi suniye शीर्षक से. इसमें जो कुछ कहा गया है, उसका बिंदुवार जवाब कोई भाजपाई या मोदी भक्त दे तो अच्छा रहेगा… पढ़िए व्यापारी संगठन की मेल में कहा क्या गया है.

मोदी जी, कृपया करके जनता के मन की बात भी सुनने की चेष्टा करे. देश के स्वार्थी नेताओं के हाथों पिस्सी हुई मासूम जनता आप से कुछ सवाल करना चाहती है, क्या आप बताएगें ?

– आपसे बुलेट ट्रेन किसने मांगी? देश के सीमित से अमीर वर्ग का यह शौक तो आप उन सब को जापान भेज कर भी पूरा कर सकते थे.

– किसान कल भी मर रहा था, आज भी मर रहा है ? आप कृषि उत्पादन में अपनी श्रेष्टता छोड़ कर मैन्युफैक्चरिंग की तरफ भाग रहे है. क्यों?

– देश का सिपाही कल भी सीमा पर मर रहा था, आज भी मर रहा है और आप की प्रधानमंत्री बनने से पहली कही बातों को देश की जनता और सिपाही याद करके एक दूसरे से पूछ रहे है, कौन था वो आदमी? जो देश में अच्छे दिनों का सपना बेच कर अपने वादों को भूल गया है.

– आज देश के हर प्रदेश का व्यापारी बदहाली से बचाने के लिए गुहार लगा रहा है, और आप देश के हर वर्ग की भावनाओं को रौंदते हुए विश्व नेता बनने का स्वपन पालते हुए विदेशों के यात्राएं कर रहे है और विदेशी नेताओं को भारत का बाजार आपने हाथों से सौप रहे है. आखिर क्यों?

– आज चाइना की मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के बाद इतनी बदहाली की स्थिति है और आप चाइना से सबक ना लेते हुए आने वाले सालो में उस बदतर स्थिति को प्राप्त करना चाहते है. आखिर क्यों?

– आज विकसित देश और यूरोप बदहाली के कंगार पर है, नई-नई मार्किट खोजी जा रही है. और आप अपने देश के बाजार को विदेशियों के हाथों में सौपते जा रहे है. आखिर क्यों ?

– देश के किस वर्ग ने या एक्सपर्ट्स ने आप नेताओं से FDI के पैसो से देश के विकास का मार्ग आपको या आपसे पहले के नेताओं को सुझाया था. क्या स्वदेशी बनकर देश के उपलब्ध साधनों से देश का विकास संभव नहीं है?

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नरेंद्र मोदी के राज में भी हिंदी की वही दशा जो सोनिया-मनमोहन राज में थी : डा. वेदप्रताप वैदिक

नरेंद्र मोदी के राज में हिंदी की वही दशा क्यों हैं, जो सोनिया-मनमोहन राज में थी? सोनिया इटली में पैदा हुईं थीं और मनमोहनजी पाकिस्तान में! मोदी उस गुजरात में पैदा हुए हैं, जहां महर्षि दयानंद और महात्मा गांधी पैदा हुए थे। इन दोनों ने गुजराती होते हुए भी हिंदी के लिए जो किया, किसी ने नहीं किया। और फिर मोदी तो संघ के स्वयंसेवक भी रहे याने दूध और वह भी मिश्री घुला हुआ। फिर भी हिंदी की इतनी दुर्दशा क्यों है? यह दूध खट्टा क्यों लग रहा है?

मुझे पहले ही से डर था। यदि मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह वे भी नौकरशाहों की नौकरी करने लगेंगे। इसीलिए मैंने कुछ सभाओं में भाषण देते हुए, जिनमें मोदी भी मौजूद थे, मैंने साफ-साफ कहा कि मोदी क्या-क्या व्रत लें। उनमें तीन बातें मुख्य थीं। एक तो गरीबी-रेखा 32 रु. नहीं, 100 रु. हो। दूसरी, 16 पड़ौसी राष्ट्रों का महासंघ बनाएं। अखंड भारत नहीं, आर्यावर्त्त! बृहद् भारत। और तीसरी, हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाएं। मोदी ने बड़ी जोर से सहमति भी व्यक्त की लेकिन 20 महीने बीत गए और हमारे मोदीजी उस दिशा में 20 कदम तो क्या, दो कदम भी आगे नहीं बढ़े। ये व्रत भी ‘जुमले’ बन गए, काले धन की वापसी की तरह! हर भारतीय को 15-15 लाख रु. तो क्या, 15 रु. भी नहीं मिले।

आज अंग्रेजी के अखबार ‘इकनामिक टाइम्स’ ने हिंदी में शीर्षक खबर छापकर बताया है कि सरकार के दफ्तरों में लगभग 100 प्रतिशत अधिकारी हिंदी जानते हैं लेकिन कई मंत्रालयों में उसका प्रयोग 10-12 प्रतिशत भी नहीं होता है। जहां थोड़ा ज्यादा होता है, वह निचली श्रेणी के कर्मचारी करते हैं। ऊंचे स्तरों पर कहीं-कहीं तो हिंदी बिल्कुल शून्य है। याने इस देश में हुकूमत किसकी चल रही है? बाबुओं की, नौकरशाहों की, अंग्रेजों के गुलामों की। प्रधानमंत्रीजी की नहीं। वे तो बस टीवी के पर्दों पर और अखबारों के पन्नों पर हैं। प्रधानमंत्री बाहर-बाहर हैं और नौकरशाह अंदर-अंदर! हिंदी है, नौकरानी और अंग्रेजी है, महारानी! इस गोरी महारानी ने मोदी को भी मोहित कर लिया है।

आप देखते नहीं क्या, कि मोदी फिल्मी सितारों की तरह ‘टेलीप्राम्पटर’ पर देख-देखकर अपने अंग्रेजी भाषण पढ़ते रहते हैं। वे भाषण देते नहीं, पढ़ते हैं, क्योंकि वे अंग्रेजी में होते हैं। इन भाषणों को लिखनेवाला नौकरशाह ऊपर और हमारे मोदीजी नीचे! ऐसे मोदीजी हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की भाषा क्यों बनाएंगे? देश में ही हिंदी की इतनी दुर्दशा है। वे उसे राष्ट्रभाषा ही नहीं बना पा रहे हैं तो उसे वे विश्वभाषा कैसे बनाएंगे? शायद बना दें, क्योंकि उन्हें देश से ज्यादा विदेश अच्छा लगता है। इसीलिए उनके लगभग सारे अभियानों के नाम विदेशी भाषा में हैं। भाजपा और संघ के लाखों कार्यकर्ताओं की बोलती बंद है। बेचारे परेशान हैं। हिंदी की जो भी दशा हो, वे अपनी दुर्दशा क्यों करवाएं?

लेखक डा. वेदप्रताप वैदिक जाने माने वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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मोदीजी, नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं, उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा

Dilip C Mandal :  नरेंद्र मोदी साहेब, ये यूपी है यूपी. उत्तर के पेरियार ललई सिंह यादव की मिट्टी है. मान्यवर कांशीराम की प्रमुख कर्मभूमि. महामना रामस्वरूप वर्मा और चौधरी चरण सिंह का सूबा. वैसे तो यह कबीर और रैदास की भी जन्मभूमि है. इधर 2017 में भी आपके लिए ठीक नहीं है. यहां का मूड आज आप देख ही चुके हैं. वैसे, मुझे नहीं मालूम कि यूपी से पहले के जब आप सारे विधानसभा चुनाव हार चुके होंगे, तो RSS केंद्र में नेतृत्व परिवर्तन कर चुका होगा या नहीं. नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं. उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा, तो आप क्या चीज हैं.

मनुस्मृति ईरानी ने मूर्खतापूर्ण तरीके से जब देश भर के हजारों छात्रों की फेलोशिप रोकी थी, तभी नरेंद्र मोदी को उनसे छुटकारा पा लेना था. इसकी वजह से देश भर के हर जाति, धर्म, बिरादरी के छात्र मनुस्मृति ईरानी से खफा बैठे थे. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या ने एक चिंगारी लगा दी. वैसे भी यह इंसानियत का मामला था. एक चिंगारी पूरे जंगल में आग लगा सकती है. इससे पहले ईरानी अंबेडकर – पेरियार स्टडी सर्किल पर रोक लगाकर बदनाम हो चुकी थीं. छात्र तमाम तरह से नाराज थे. IIT रुड़की में बहुजन छात्रों को निकाले जाने का कांड हो चुका था. रोहित की हत्या के बाद देश भर के कैंपस उबल पड़े. आज यह नौबत आ गई कि मोदी सड़कों पर काला झंडा देख रहे हैं. मुर्दाबाद के नारे सुन रहे हैं…. महंगा पड़ेगा.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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टुकड़ों-टुकड़ों में लागू किया जा रहा है एक अघोषित आपातकाल

: रफ्ता-रफ्ता असहिष्णुता और आपातकाल : हैदराबाद में एकलव्यी प्रतिभा के धनी दलित छात्र रोहित वेमुला द्वारा जिन हालातों के चलते आत्महत्या को मजबूर होना पड़ा, वह समाज और व्यवस्था को कटघरे में खड़ा  करती हैं। आत्महत्या अकारण नहीं होती है। जब आत्महत्या की खुली वजह मौजूद हैं, फिर दोषियों को लेकर राजनीति करना कानून के राज और लोकतांत्रिक मूल्यों की खुली अवमानना है। रोहित के सुसाइड नोट की भाषा सत्ताथीशों की समझ में नहीं आ सकती, क्योंकि वे हर बात को घर्म और जाति के नजरिए से देखने के आदि हैं।

श्रम मंत्री बंगारू दत्तात्रेय और एचआरडी मंत्रालय के आदेश-निर्देशों में प्रभावी तत्परता बहुत कुछ कहती है। इतने पर भी अपनी चिर-परचित शैली में  मोदी सरकार और भाजपा कुतर्क गढ़ रही है। विडंबना इस बात की है दलितों की मसीहाई करने का दावा करने वाले रामविलास पासवान, उदित राज जैसे सत्ताथारी दलित नेता मौन है और मायावती भी। नागपुर पाठशाला का सिलेबस दलित, मुस्लिम, पिछड़ा और स्त्री विरोधी है। उसी पाठशाला के छात्र आज देश की सत्ता का संचालन कर रहे हैं। तब ऐसे में इंसाफ की कामना करना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है। नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसारे, कुलबर्गी, और अब रोहित वेमुला असहिष्णुता के प्रमाण नहीं तो क्या है? एक अघोषित आपातकाल टुकड़ों-टुकड़ों में लागू किया जा रहा है।

आज देश का बुनियादी तबका अच्छे दिनों के विलोम का अभिशाप और त्रास भोग रहा है। देश के गाल बजाउ भाड  बुद्धिजीवी और कॉरपोरेट मीडिया कुर्तको के सहारे असहिष्णुता के खतरे को नकारने की कथित कोशिश में जुटा है। दूसरी और कॉरपोरेट घराने लूट में व्यस्त हैं। रोहित जातिय असहिष्णुता का शिकार हुआ है। बड़ा सवाल भाजपा और आरएसएस से है कि वे अाखिर 21वी के भारत को किस सामाजिक और राजनीतिक अर्थशास्त्र से संचालित करना चाहते हैं? ताकि देश की जनता भी अपना एजेंडा तय कर सके और फिर कोई रोहित वेमुला आत्महत्या जैसा कायराना कदम उठाने को मजबूर न हो।

रोहत प्रकरण को लेकर मोदी सरकार, संघ और भाजपा की  ओर से जिस तरफ की सियासी बयानबाजी हो रही है, उससे उनके नागपुर की पाठशाला के ब्राह्मणवादी संस्कारों की ही पुष्टि हो रही है। तब ऐसे में टुकड़ा-टुकड़ा असहिष्णुता और रफ्ता-रफ्ता आपातकाल के खतरे को नकारा नहीं जा सकता। आडवाणी तो इसके लिए देश को पहले ही आगाह कर चुके हैं, आखिर आडवाणी उसी पाठशाला के छात्र रहे हैं। उनका सच ज्यादा मायने रखता है। रोहित इंसाफ की कामना मत करना आखिर मसला सत्ता और सियासत की भेट चढ़ चुका है। तुम ‘निर्भया’ कांड के पूरे सच से तो वाकिफ थे न!

लेखक विवेक दत्त मथुरिया मथुरा के प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. इनसे संपर्क journalistvivekdutt74@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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रोहित तुम जी सकते थे

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