नोट पर रोक : जानिए, आखिर जनता की खुशी का क्या है राज…

500-1000 के नोट पर रोक के आदेश से जहां 16 दिन बाद भी पूरे देश में सड़क से लेकर संसद तक संग्राम छिड़ा है तो बैंक एवं एटीएम जनता की कसौटी पर खरे साबित नहीं हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्णय से एक-दो दिन तो गरीबों एवं आम जनता में हर्ष की लहर नजर आ रही थी और वह मोदी की वाह-वाह करते नजर आ रहे थे। जब इसकी तहकीकात की तो उनका कहना था कि अब बनियों का कालाधन निकलकर आयेगा और उसका लाभ गरीबों को मिलेगा। जिधर भी मैं निकला और जिस गरीब एवं आम जनता से जहां भी मिला वह इसलिये खुश नजर आ रहा था कि चलो हमें तो परेशानी हो रही है लेकिन अब बनियों की शामत आ जायेगी क्योंकि सबसे ज्यादा धन तो बनियों के ही पास है।

डाकघर में कार्यरत एक बाबू जो मुझे बनिया के रूप में जानता भी है यह कहते हुए बड़ी जोर से हंसते हुए कह रहा था कि जिन बनियों ने भाजपा को वोट दिया उन्हीं बनियों की… में मोदी ने डंडा कर दिया है। और सबसे ज्यादा परेशान बनिया ही है। बनिया का अब सब कालाधन रद्दी हो गया है। उस बाबू ने बताया कि उसके पास रोज बनियों के फोन नोट बदलने के लिये आते हैं। जब उसे मैंने बताया कि बनिया समाज का धन तो रीयल स्टेट, सोना, व्यापार, शेयर बाजार आदि में लगा हुआ है उसके पास नगदी नाम मात्र में होती है तो वह मानने के लिये तैयार नहीं हुआ और हंसते-हंसते चलते हुऐ कहा कि सेठजी तुम मत मानो लेकिन सबसे ज्यादा इस समय बनिया ही परेशान है।

इस तरह के नजारे चाय, सब्जी, पान वाले आदि गरीब वर्ग के लोग में सुनने को हर जगह मिले, जैसे कि उनकी बनिया समाज से कोई दुश्मनी हो। मैंने कहा कि सबसे ज्यादा कालाधन नेता, अफसर, साधू-संत, क्रिकेटर, फिल्मी कलाकार, उद्योगपतियों पर है लेकिन वह इसे मानने को तैयार नहीं हुए। कहते कि जो भी हो अब बनियों की मोदी के राज में शामत आ गई है। आप कहीं भी मोदी के नोटबंदी की चर्चा गरीब एवं आम जनता के बीच में करके देखिये वह केवल इसलिये खुश नजर आ रहे हैं कि चलो बनियों के खिलाफ पहली बार किसी ने शिकंजा तो कसा।

लेकिन उन्हें ये जानकारी नहीं है कि करीब 4 लाख करोड़ की राशि देश के मात्र 2071 उद्योगपतियों पर एनपीए के रूप में बैंकों की डूबी हुई है। जिसमें उद्योगपतियों द्वारा 50 करोड़ से ज्यादा का कर्जा ले रखा था। जबकि मात्र 5 लाख करोड़ की राशि देश की करोड़ों जनता द्वारा बैंकों में जमा कराई गई है। जिसमें उन्हें लम्बी लाइनों में लगने पर मजबूर होना पड़ा। नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के आदेश से सामान्य व्यापारी हो या बनिया या आम जनता सब खुश नजर आ रहे हैं। लेकिन सरकारी मशीनरी एवं राजनेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई सख्त कदन न उठाने से आहत दिखाई देती है। नोटबंदी के चलते खुश नजर आ रहा किसान, मजूदर वर्ग जो अब तक बनियों (व्यापारियों) को कोस-कोस कर खुश नजर आ रहा था अब उसके ऊपर तथा मोदी के अंधभक्तों पर इसकी गाज गिरना शुरू हुई तो वह अब व्यवस्था को लेकर बैंक अफसरों को कोसने लगा कि वह बनियों (व्यापारियों) से सांठ-गांठ कर नोट बदल रहे हैं।

अब धंधे ठप होने से व्यापारी मजदूर की छुट्टी कर रहा है, दुकानदार ने उधार देना बंद कर दिया है, जेब में रखी पूंजी समाप्ति की ओर है और बाजार में मंहगाई ने जोर पकड़ लिया है। बड़ा व्यापारी जो पहले भी मस्त था और आज भी है को देखकर अब गरीब, आम जनता को लगने लगा है कि हमने तो 15 दिन की मुसीबतें झेल ली हैं लेकिन अभी तक बनियों पर तो कोई मुसीबत आयी नहीं है उल्टे उनके ही बुरे दिन आने शुरू हो गये हैं। जिसमें कहीं अब रोजगार की तलाश में कहीं आटा-दाल, इलाज के लिये दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

मुझे बचपन में सुनी एक कहानी याद आ रही है एक चालाक आदमी ने भगवान शिव की तपस्या की जिससे खुश होकर शिव ने उसे इस शर्त के साथ वरदान मांगने को कहा कि जो भी तू मांगेगा उससे दोगुना तेरे पड़ोसी को मिलेगा। इस पर मजदूर ने शिव से अपनी एक भैंस मारने का वरदान मांगा तो पड़ोसी की दो भैंस मर गईं, उसने अपनी एक आंख का फूटने का वरदान मांगा तो पड़ोसी की दोनों आंखें फूट गई इस तरह पड़ोसी के सर्वनाश की चाहत में उसने अंत में अपना सब कुछ गंवा दिया। यही स्थिति नोटबंदी के मामले पर सटीक साबित हो रही है जहां कालाधन के नाम पर बनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीद से खुश नजर आ रहे गरीब, मजदूर, मोदी के अंधभक्त तथा आम जनता 16 दिन बाद भी त्राहि-त्राहि करते नजर आ रहे हैं।

लेखक मफतलाल अग्रवाल मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उनसे संपर्क mafatlalmathura@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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सहारा-बिड़ला से मोदी द्वारा घूस लेने के मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार

नई दिल्ली : सहारा और बिड़ला से नरेन्द्र मोदी द्वारा घूस लिए जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. इस मामले में अगली सुनवाई शुक्रवार को है. सहारा और बिड़ला ग्रुप की ओर से राजनेताओं को फंड देने के आरोप की याचिका सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट का तैयार हो जाना एक बड़ा घटनाक्रम है. दरअसल इन दो बड़ी कंपनियों पर पड़े छापों में बरामद दस्तावेजों की जांच के लिए गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

एनजीओ का आरोप है कि इन दोनों कंपनियों पर पड़े छापों में कई दस्तावेज बरामद हुए थे, जिनमें देश की अलग-अलग पार्टियों के नेताओं और अधिकारियों को फंडिंग देने का उल्लेख किया गया है.  कॉमन कॉज ने नेताओं को दी गई फंडिंग की जांच कराने के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाने की अपील की थी. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि आदित्य बिड़ला ग्रुप पर अक्टूबर 2013 में छापा मारा गया था. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सभी दस्तावेज जब्त किए थे.

उस वक्त बिड़ला ग्रुप के ग्रुप एक्जीक्यूटिव शुभेंदू अमिताभ के लैपटॉप और ब्लैकबेरी को चेक किया गया था. इसमें एक एंट्री गुजरात सीएम के नाम 25 करोड़ रुपए की पाई गई है. उन्होंने कहा, गुजरात के सीएम के आगे 25 करोड़ और ब्रैकेट में लिखा है ‘डन’. गुजरात का सीएम कौन थे उस टाइम, नरेंद्र मोदी जी थे. सहारा पर कई बड़े राजनेताओं को पेमेंट देने का आरोप है. इसमें 2013-14 में गुजराज, दिल्ली, छत्तीगढ़ और मध्य प्रदेश के सीएम को बड़ी राशि देने की एंट्री की गई है.

मूल खबर….

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पीएम मोदी ने सीएम रहते सहारा समूह और बिड़ला ग्रुप से रिश्वत लिया! (देखें दस्तावेज)

सहारा और बिड़ला द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को 55 करोड़ रिश्वत देने की संपूर्ण कथा

प्रधानमंत्री मोदी जब 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने की देश को सूचना दे रहे थे, उससे बहुत पहले सु्प्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण देश की प्रमुख आधा दर्जन से अधिक सरकारी जांच एजेंसियों को लिखकर बता चुके थे कि न सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ने ​बल्कि देश के अन्य तीन और मुख्यमंत्रियों ने करोड़ों का कैश उद्योगपतियों से वसूला है… प्रशांत भूषण ने जिन एजेंसियों को डाक्यूमेंट्स भेजे हैं, उनमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा कालेधन को लेकर बनाई गई दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम, निदेशक सीबीआई, निदेशक ईडी, निदेशक सीबीडीटी और निदेशक सीवीसी शामिल हैं…

भारत सरकार के इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की ओर से किए गए रेड के जो डाक्यूमेंट्स दिल्ली के पत्रकारों और नौकरशाहों के दायरे में घूम रहे हैं उनके मुताबिक, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी को सुब्रत राय के सहारा इंडिया ग्रुप से जुड़े किसी ‘जायसवाल जी’ ने करोडों रुपए कैश में दिए. पत्रिका को हाथ लगे डाक्यूमेंट्स से साफ है कि 30 अक्टूबर 2013 और 29 नवंबर 2013 को गुजरात सीएम, मोदी जी के नाम से 13 ट्रांजेक्शन हुए… इन ट्रांजेक्शन से पता चलता है कि 13 ट्रांजेक्शन में 55.2 करोड़ रुपए मोदी जी और गुजरात सीएम के नाम से दिए गए… हालांकि पत्रिका का यह भी मानना है कि यह बहुत साफ नहीं हो पा रहा है कि ट्रांजेक्शन 13 हुए या 9 ट्रांजेक्शन में 40.1 करोड़ रुपए जमा किए गए…

इसके अलावा सहारा ग्रुप से जुड़े जायसवाल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी करोड़ों के रुपए कैश में दिए… करोड़ों का कैश लेने वालों में भारतीय जनता पार्टी की कोषाध्यक्ष शायना एनसी भी शामिल हैं… इस रिपार्ट का विस्तृत खुलासा करने वाले वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि कारवां और इकॉ​नॉमिक एंड पॉलिटिकल ​वीकली पत्रिका ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से मिले सबूतों के आधार पर सभी नेताओं को सफाई के लिए ईमेल किया है… पर 17 नवंबर को किए गए ईमेल का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी कोषाध्यक्ष शायना एनसी, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित में से किसी ने अबतक नहीं दिया है…

प्रधानमंत्री से लेकर तीन-तीन मुख्यमंत्रियों द्वारा कैश में करोडों का कालाधन लेने के इस मामले का खुलासा इनकम टैक्स की डिप्टी डाइरेक्टर अंकिता पांडेय ने किया था… इन कागजातों पर उनके अलावा भारत सरकार के दूसरे अधिकारियों के भी दस्तखत हैं… यह डाक्यूमेंट देश के तमाम पत्रकारों और सरकार अधिकारियों के पास है.

कहानी ये है

अक्टूबर 2013 से नवम्बर 2014 में क्रमशः सहारा और आदित्य बिड़ला के ठिकानों पर इनकम टैक्स के छापे पड़े थे. यहां से आयकर अधिकारियों को दो महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले थे । जिनमें सरकारी पदों पर बैठे कई लोगों को पैसे देने का जिक्र था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी शामिल था. बिड़ला के यहां से जब्त दस्तावेज में सीएम गुजरात के नाम के आगे 25 करोड़ रुपये लिखा गया था. इसमें 12 करोड़ दे दिया गया था, बाकी पैसे दिए जाने थे.

इसी तरह से सहारा के ठिकानों से हासिल दस्तावेजों में लेनदारों की फेहरिस्त लम्बी थी जिसमें सीएम एमपी, सीएम छत्तीसगढ़, सीएम दिल्ली और बीजेपी नेता सायना एनसी के अलावा मोदी जी का नाम भी शामिल था. मोदी जी को 30 अक्टूबर 2013 से 21 फ़रवरी 2014 के बीच 10 बार में 40.10 करोड़ रुपये की पेमेंट की गई थी. खास बात ये है कि तब तक मोदी जी बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके थे.

सहारा डायरी की पेज संख्या 89 पर लिखा गया था कि ‘मोदी’ जी को ‘जायसवाल जी’ के जरिये अहमदाबाद में 8 पेमेंट किए गए. डायरी की पेज संख्या 90 पर भी इसी तरह के पेमेंट के बारे में लिखा गया है. बस अंतर केवल इतना है कि वहां ‘मोदी जी’ की जगह ‘गुजरात सीएम’ लिख दिया गया है, जबकि देने वाला शख्स जायसवाल ही थे. मामला तब एकाएक नाटकीय मोड़ ले लिया जब इसकी जांच करने वाले के बी चौधरी को अचानक सीवीसी यानी सेंट्रल विजिलेंस कमीशन का चेयरमैन बना दिया गया. प्रशांत भूषण ने उनकी नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी.

इस साल 25 अक्टूबर को प्रशांत भूषण ने सीवीसी समेत ब्लैक मनी की जांच करने वाली एसआईटी को सहारा मामले का अपडेट जानने के लिए पत्र लिखा. ख़ास बात यह है कि उसी के दो दिन बाद यानी 27 अक्टूबर को दैनिक जागरण में 500-1000 की करेंसी को बंद कर 2000 के नोटों के छपने की खबर आयी. बताया जाता है कि के बी चौधरी ने वित्तमंत्री अरुण जेटली को इसके बारे में अलर्ट कर दिया था.

उसके बाद सहारा ने इनकम टैक्स विभाग के सेटलमेंट कमीशन में अर्जी देकर मामले के एकमुश्त निपटान की अपील की. जानकारों का कहना है कि कोई भी शख्स इसके जरिये जीवन में एक बार अपने इनकम टैक्स के मामले को हल कर सकता है और यहां लिए गए फैसले को अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकती है. साथ ही इससे जुड़े अपने दस्तावेज भी उसे मिल जाते हैं जिसे वह नष्ट कर सकता है. अदालत या किसी दूसरी जगह जाने पर यह लाभ नहीं मिलता. चूंकि मामला पीएम से जुड़ा था इसलिए सहारा इसको प्राथमिकता के आधार पर ले रहा था.

बताया जाता है कि सेटलमेंट कमीशन में भी मामला आखिरी दौर में था. भूषण ने 8 नवम्बर को फिर कमीशन को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने मामले का अपडेट पूछा था. शायद पीएम को आने वाले खतरे की आशंका हो गई थी जिसमें उनके ऊपर सीधे-सीधे 2 मामलों में पैसे लेने के दस्तावेजी सबूत थे. उनके बाहर आने का मतलब था पूरी साख पर बट्टा. मामले का खुलासा हो उससे पहले ही उन्होंने ऐसा कोई कदम उठाने के बारे में सोचा जिसकी आंधी में यह सब कुछ उड़ जाए. नोटबंदी का फैसला उसी का नतीजा था.

इसे अगले साल जनवरी-फ़रवरी तक लागू किया जाना था, लेकिन उससे पहले ही कर दिया गया. यही वजह है कि सब कुछ आनन-फानन में किया गया. न कोई तैयारी हुई और न ही उसका मौका मिला.  यह भले ही 6 महीने पहले कहा जा रहा हो लेकिन ऐसा लगता है उर्जित पटेल के गवर्नर बनने के बाद ही हुआ है, क्योंकि नोटों पर हस्ताक्षर उन्हीं के हैं. छपाई से लेकर उसकी गुणवत्ता में कमी पूरी जल्दबाजी की तरफ इशारा कर रही है.

इस मामले में फेसबुक पर आए कुछ प्रमुख पोस्ट्स इस प्रकार हैं…

Sheetal P Singh : नोटबंदी और मोदी जी का हवाला… CM मोदी ने 2012 में आदित्य बिड़ला ग्रुप से पच्चीस करोड़ रुपये घूस के तौर पर हवाला ट्रांजैक्शन से लिये! दिल्ली विधानसभा में यह आरोप लगा और income tax deptt का यह संलग्नक पेश किया गया। Income tax deptt ने २०१३ की एक रेड में आदित्य बिड़ला ग्रुप का एक लैपटॉप ज़ब्त किया था । यह दस्तावेज़ वहाँ से मिला था । फ़िलहाल यह मामला दरी के नीचे था पर अब केजरीवाल ने इसे पर लगा दिये! ग़ौरतलब है कि मोदी जी की शैक्षणिक योग्यता का सवाल भी केजरीवाल द्वारा उठाये जाने पर मोदी जी के हलक में अटका हुआ है। ये दूसरा सहारा ग्रुप का काग़ज़ है। दिल्ली विधानसभा की कल की बहस में रिकार्ड पर आ गया। यह भी इनकम टैक्स के दस्तावेज़ों में है। यह बताता है कि CM मोदी को ढाई सौ करोड़ रुपये २०१३ से पहले दिये गये! इसकी पड़ताल और इस पर राजनैतिक बवाल होना चइये कि नंई चइये?

Sarvapriya Sangwan : प्रशांत भूषण ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेज़ को लिखित शिकायत की है कि इनकम टैक्स और सीबीआई के छापों के दौरान कुछ दस्तावेज़ निकल कर आये हैं जिससे पता चलता है कि देश की दो बड़ी उद्योग कंपनियों ने कई मुख्यमंत्रियों और सांसदों को घूस दी है। सहारा के यहाँ 22 नवंबर 2014 को छापा पड़ा था। आदित्य बिरला ग्रुप पर 15 अक्टूबर 2013 को छापा पड़ा था। ये जो दस्तावेज़ हैं, इन पर इनकम टैक्स अफसर के दस्तख़त हैं, गवाह भी मौजूद हैं।  भूषण जल्दी ही सुप्रीम कोर्ट जायेंगे। दिल्ली विधानसभा में इस रिपोर्ट को मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने ज़्यादा खुले तौर से रखा। उनके पास भी वे सब दस्तावेज़ मौजूद थे जिसमें नरेंद्र मोदी को घूस दिए जाने की बात है। घोटालों और भ्रष्टाचार के विरोध में देशभक्ति की दुहाई देने वालों से उम्मीद है कि वो राजनीतिक रुझान की वजह से चुप नहीं बैठेंगे। अगर ये आरोप गलत हैं तो प्रधानमंत्री को मानहानि का दावा ठोकना चाहिए।

Arun Maheshwari : दिल्ली की विधान सभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आयकर विभाग के उन मौलिक दस्तावेज़ों को रखा है जिनमें सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उद्योगपतियों से घूस लेकर उनके काम करने के लिये अभियुक्त बताया गया है। केजरीवाल ने राष्ट्रपति से माँग की है कि वे सुप्रीम कोर्ट के जज के ज़रिये इन दस्तावेज़ों की जाँच करने के निर्देश जारी करें।

Dilip Khan : प्रधानमंत्री को कोई सीधे-सीधे घूसखोर कह रहा है और प्रधानमंत्री चुप है। जांच करवाकर तमाचा मार दीजिए केजरीवाल के मुंह पर। अगर झूठ बोल रहा है तो पकड़ा जाएगा। हिम्मत कीजिए। आयकर विभाग का काग़ज़ सबको दिखा दीजिए। बता दीजिए कि सुवेन्दु अमिताभ ने आपको 25 करोड़ रुपए नहीं दिए थे। बिड़ला ग्रुप के सुवेन्दु अमिताभ ने नरेन्द्र मोदी को 25 करोड़ रुपए घूस दिया- विधानसभा में केजरीवाल का आरोप। आयकर विभाग के दस्तावेज़ों के साथ बंदे ने ये बात कही है। नरेन्द्र मोदी को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। केजरीवाल ने कल दिल्ली विधानसभा में नरेन्द्र मोदी पर गंभीर इल्ज़ाम लगाए। आयकर विभाग के दस्तावेज़ दिखाते हुए कहा कि नरेन्द्र मोदी घूसखोर है। कॉरपोरेट घरानों से घूस लेकर उनका काम करते हैं। केजरीवाल ने कहा कि नरेन्द्र मोदी ने बिड़ला ग्रुप के सुवेन्दु अमिताभ से 25 करोड़ रुपए घूस ली। मोदी जी को इस आरोप के बाद तो पद छोड़ ही देना चाहिए और अगर वो मानते हैं कि आरोप ग़लत है तो केजरीवाल पर मुक़दमा करें। जेल भेज दें केजरीवाल को। पर दोनों में से कुछ नहीं कर रहे। चुपचाप रफा-दफ़ा करना चाहते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, सर्वप्रिया सांगवान, अरुण माहेश्वरी और दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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पीएम को एक पत्रकार का खुला पत्र : मोदी जी, हालात अब बेकाबू हो रहे हैं

Abhishek Satya Vratam : प्रधानमंत्री जी, आपने 500, 1000 के नोट बंद करने के अपने फ़ैसले पर तालियाँ तो बजवा लीं लेकिन कुछ सवाल तो अब भी अनुत्तरित हैं ! जिनके घर में शादी है वे क्या करें? पैसे का इंतज़ाम कैसे होगा? इस सवाल पर आपके इकोनॉमिक अफ़ेयर्स सेक्रेटरी साहब बार-बार कन्नी काट जा रहे हैं। प्लीज़, थोड़ा उनसे मामले को समझिए और उन्हें कोई सॉलिड समाधान देकर ही प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने भेजिए।

मोदी जी, महँगाई बहुत ज्यादा है। जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई! सिर्फ ढाई लाख रुपए में बेटी की शादी नहीं हो पाती आजकल। सामान्य से सामान्य शादी में इससे दोगुने, तिगुने पैसे ख़र्च होते हैं और ख़ासकर सामान्य परिवारों में ये पैसे सालों में जुटाए गए होते हैं! जनता क्या अब इन पैसों का भी हिसाब दे? क्यों दे? यही नहीं ढाई लाख रुपए अगर कोई ग़रीब इंसान बदलवाने जाए तो क्या आपने इसके इंतज़ाम सुनिश्चित किए हैं कि वो बदल जाएँगे? नहीं ना? रोज़-रोज़ कोई लाइन में लगकर साढे चार हज़ार रुपए एक्सचेंज कराए या शादी का इंतज़ाम करे?

फ़ैसला अच्छा है इसमें कोई शक नहीं है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी की तकलीफों को इंसान सह सकता है और सह रहा है लेकिन शादी? क्या साल-छे महीने से तय एक जलसे और इज़्ज़त के मौक़े को एक आनन फ़ानन वाले फ़ैसले की बलि चढ़ा दे? आप जिन ग़रीबों की बात कर रहे हैं ना सबसे ज्यादा वही परेशान हैं! अमीर तो कुछ ना कुछ कर ही लेगा। थोड़ा सोचिए? ग़रीब पैसे का इंतज़ाम करे भी तो कैसे? भारी-भरकम शब्दों के जाल में मत उलझाएँ। तालियों के बीच गालियों को सुनने की कोशिश करेंगे तो तकलीफ़ समझ जाएँगे।

यही नहीं सिर्फ काग़ज़ी फ़ैसले मत करिए, उन पर कड़ाई से अमल भी कराएँ। आप मॉनिटर करें कि जो क़दम उठाए गए उसके हिसाब से काम हो रहा है या नहीं ! बुज़ुर्गों, मरीज़ों, महिलाओं को हो रही तकलीफ़ों को प्राथमिकता से सुनें और पैसों के लिए कड़ी धूप में ना खड़ा होना पड़े इसका बंदोबस्त करें। सिर्फ पुराने नोट चलने की समयसीमा बढ़ाने से कुछ नहीं होगा। सबके पास पुराने नोट नहीं हैं। कुछ ऐसा मेकैनिज्म बनाएँ कि नक़दी के हालात सामान्य होने तक अस्पताल और डॉक्टर मरीज़ों को बिल भरने के लिए मोहलत दें और जो अस्पताल ऐसा न करे उसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाए। लोगों और सिस्टम को सशक्त कीजिए ताकि वो इसकी शिकायत बेझिझक दर्ज करा सकें।

अगर फ़ैसला बड़ा लिया है तो उसके व्यापक असर को भी समझिए और उसके हिसाब से क़दम उठाने का मुकम्मल इंतज़ाम कीजिए। छुट्टे पैसों से सब जूझ रहे हैं। हो सके तो बुज़ुर्गों और महिलाओं के लिए शहरों में सरकारी बसों में मुफ़्त यात्रा का इंतज़ाम कीजिए। ढाई हज़ार रुपए की लिमिट से ट्रांसपोर्टर परेशान है, स्कूल बसें बंद हो रही हैं और बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, इनको किसी भी तरह राहत दीजिए।

छोटे-मोटे काम करके दूसरों के भरोसे गुज़ारा करने वाले परेशान हैं। उनकी रोटी की फ़िक्र कीजिए। मैंने ख़ुद अपनी मेड को उसकी पगार के चार हज़ार रुपए नहीं दिए हैं ! दें भी तो कैसे? सोचिए, ऐसे लोग कहाँ से कैश निकालें और बदलें? समस्या सिर्फ कैश निकालने और एक्सचेंज की नहीं है। पूरा मनी फ्लो रुक गया है ! और शहरों में हालात सबसे ज्यादा ख़राब हैं जहाँ पैसे के बिना ज़िंदगी ठहर जाती है।

आपके इस फ़ैसले के समर्थन में लोग हैं। सैकड़ों की क़तार में घंटों तक बैंक और ATM के बाहर खड़े रह रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों के बारे में सोचिए जो दूसरों पर निर्भर हैं। उन्हें ना बैंक से मतलब है और ना ही ATM से। मैं लाइन में लगकर पैसे निकाल सकता हूँ, मुझे इससे ऐतराज़ नहीं है लेकिन दिहाड़ी कमाने वाले मज़दूरों के पास इतना वक्त नहीं है कि वो रोज़ बैंक और ATM के चक्कर लगाएं।

अपने अफ़सरों से कहिए थोड़ा दिमाग़ पर ज्यादा ज़ोर डालें। हालात अब बेक़ाबू हो रहे हैं। आपका ग़रीब परेशान है। एटीएम की टेक्नोलॉजी के अनुरूप नोट डिज़ाइन नहीं करने वालों की क्लास लीजिए। मामला गंभीर है और हालात बेहद नाज़ुक। जिन अधिकारियों ने उस डिज़ाइन को पास किया उन्हें ज़ोर से डाँटिए-डपटिए। आपके फ़ैसले के बड़े ग़ुब्बारे में पिन चुभोने वाले यही लोग हैं!

युवा पत्रकार अभिषेक सत्य व्रतम की एफबी वॉल से.

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साढ़े चार घंटे लाइन में लगे दिल्ली के इन पत्रकारों को नहीं मिला कैश

Shashi Bhooshan Dwivedi : करीब तीन सौ की लाइन थी। मैं और ‘हिंदुस्तान’ के ही अतुल कुमार भी लाइन में लगे थे, सुबह नौ – साढ़े नौ से ही। मैंने सुबह अरुण कुमार जेमिनी को भी फोन किया। वे भी आने वाले थे। जाने क्यों नहीं आए। अतुल ने बताया कि वे तो तीन दिन से ही लाइन में लग रहे हैं और जब तक गेट तक पहुँचते हैं या तो कैश खत्म हो जाता है या शटर डाउन। आज भी यही हुआ। साढ़े चार बजे तक हम दोनों गेट तक पहुँच गए और बैंक बंद।

अतुल स्वभाव से शांत हैं। हंसते हुए वापस आने लगे। एक दो बार उम्मीद में वापस भी लौटे मगर कोई लाभ नहीं था। मेरा मन कर रहा था कि तोड़ डालो फोड़ डालो। पैसे हैं नहीं, भाड़ में गई दुनियादारी। मगर अतुल मुझे लौटा लाए। फिर भी अपनी बेचैन आदत के मुताबिक मैंने इधर उधर पता किया। पता चला कि सरकारी बैंकों में इससे ज्यादा भीड़ थी और उन्होंने सबको समय पर निपटा दिया।

लौटकर मैंने अपना थोड़ा पैसा इलाहाबाद बैंक में ट्रांसफर किया। घर के पास है। सुबह जल्दी लाइन में भी लग सकता हूँ। अब रोज कनॉट प्लेस जाना अपने बस का तो है नहीं, न इतनी छुट्टियां हैं। फिलहाल मैं अतुल के धैर्य का प्रशंसक हूँ जो कल फिर सुबह सात बजे लाइन में खड़ा मिलेगा।

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और आखिरकार चेक से भी पैसा नहीं मिला। सारा दिन लाइन में रहने के बावजूद। यह कनॉटप्लेस के सिटी बैंक का हाल है। पैसा आपके पास है और आप भिखारी हैं। अब तक मुझे भी चीज़ें अतिशयोक्ति पूर्ण लगती थीं। आज खुद भोगा है। यकीनन यह आपातकाल है।

कादंबिनी मैग्जीन में कार्यरत पत्रकार शशि भूषण द्विवेदी की एफबी वॉल से.

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किसानों के दुख-दर्द को तुम क्या जानो मोदी बाबू (देखें वीडियो)

पांच सौ तथा एक हज़ार रूपये के नोट बंद करने के सरकार के फैसले से देश का अन्नदाता किसान परेशान है। हाथरस जिले में भी किसानों को अपनी गेहूं-आलू-जौ आदि की फसलों की बुवाई के लिए बीज तथा खाद का इंतजाम करने में मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि फसलों की बुवाई के लिए बीज तथा खाद के लिए उनके पास पैसा नहीं है। पुराने नोटों से उन्हें बाजार में सामान नहीं मिल रहा है। ऐसे में फसलों की बुवाई पंद्रह से बीस दिन लेट हो गयी है। किसानों का ऐसे में कैसे काम चलेगा, अब तो यह भी उनकी समझ में नहीं आ रहा है।

सुनिए देखिए कुछ किसानों से बातचीत… नीचे दिए वीडियो लिंक्स पर क्लिक करें :

https://youtu.be/Kd3TNdRXY8I

https://youtu.be/lLNMDVtuVUM

https://youtu.be/yARS2SJFxik

https://youtu.be/fX1nV_Ddxa0

https://youtu.be/i6fmxNnt084

https://youtu.be/UGqq1jyj-tk

हाथरस से वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल की रिपोर्ट. संपर्क : 9837061661

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मोदी राज में पत्रकारिता करना मना है! सुनिए कारवां पत्रिका के पत्रकार की आपबीती

नोटबंदी से जनता को हो रही परेशानी छुपाने के लिए पुलिस ने पत्रकारों को धमकाना शुरू कर दिया है. घटना दिल्‍ली के सफ़दरजंग एनक्‍लेव की है जहां आइसीआइसीआइ बैंक के कर्मचारियों ने अंग्रेज़ी पत्रिका कारवां के पत्रकार सागर के साथ बदसलूकी की. फिर दिल्‍ली पुलिस ने आईकार्ड देखने के बाद भी उन्‍हें पत्रकार मानने से इनकार कर दिया. धमकाया यूं- ‘सरकार बदल गई है. ऐसे कहीं वीडियो मत बनाया कर.’

पत्रकार सागर के मुताबिक वे रविवार शाम 4 बजे सफ़दरजंग एनक्‍लेव में आइसीआइसीआइ बैंक की शाखा से पैसे निकालने गए. दस मिनट बाद बैंककर्मियों ने बिना घोषणा दरवाज़ा बंद कर दिया. लोगों को उम्‍मीद थी कि दरवाज़ा फिर खुलेगा. बाहर बैठे कर्मचारी ने बताया कि सर्वर डाउन है. लोगों ने पूछा कि फिर भीतर गए लोग कैसे पैसे निकाल पा रहे हैं, लेकिन उसने जवाब नहीं दिया. कतार में खड़े लोग बेचैन होने लगे. करीब 4.50 पर सफेद शर्ट पहना एक कर्मचारी बैंक के बाहर आया तो एक अधेड़ शख्‍स ने प्रबंधक से मिलवाने और बात करवाने की उससे गुज़ारिश की. इस दौरान एक बूढ़ी महिला भीतर के कर्मचारियों का ध्‍यान खींचने के लिए कांच का दरवाज़ा खटखटाए जा रही थी. जब कर्मचारी ने कोई जवाब नहीं दिया तो लोग भड़क गए. अधेड़ उम्र के शख्‍स के साथ उसकी झड़प हुई और बुजुर्ग महिला दोनों के बीच फंस गई.

सागर लिखते हैं कि ऐसी घटना कोई अपवाद नहीं थी क्‍योंकि एक दिन पहले शनिवार को दिल्‍ली पुलिस के पास ऐसी घटनाओं से संबंधित 4500 कॉल आए थे. इस घटना को सागर अपने मोबाइल फोन के कैमरे से रिकॉर्ड करने लगे, जिस पर सफेद शर्ट वाले कर्मचारी ने उन्‍हें रोका. उसके बाद वह आगे बढ़ा और सागर को खींचता हुआ सीढि़यों से नीचे सड़क तक ले गया. वे बताने लगे कि वे प्रेस से हैं लेकिन उसने उनकी नहीं सुनी. इसके बाद दूसरे कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों ने उन्‍हें घेर लिया.

सागर बताते हैं कि सफेद शर्ट वाले बैंक कर्मचारी ने उनसे कहा, ”तेरे को मैं बताता हूं, तू बच के नहीं जाएगा, तू जानता नहीं मेरे को,  मेरे ऊपर पहले से केस है, मैं खुद पुलिस हूं.” दूसरे कर्मचरी ने आवाज़ लगायी, ”पुलिस को बुलाओ, इसे थाने ले जाओ.” फिर सफेद शर्ट वाले ने किसी को फोन लगाकर बुलवाया. घबराकर पत्रकार ने 100 नंबर पर फोन लगाया और पुलिसवालों को वहां के हालात के बारे में सूचना दी. उनके पास ऑटोमेटेड संदेश आया, ”पीसीआर पैट्रोल वाहन ईजीएल-22 मोबाइल 9821002822 आपके पास जल्‍द पहुंच रहा है.”

इस दौरान सागर इंतज़ार करते रहे और सफेद शर्ट वाला शख्‍स उन पर नज़र बनाए हुए था. थोड़ी देर बाद एक सिपाही मोटरसाइकिल से आया. यह मानते हुए कि पुलिस उनके कहने पर आई है, वे उसके पास जाकर अपनी शिकायत कहने लगे. पुलिसवाले ने उन्‍हें सांत्‍वना देते हुए कहा कि बैंक कर्मचारी को ऐसा व्‍यवहार नहीं करना चाहिए था, लेकिन वे यहां से निकल जाएं वरना बड़े अधिकारी आ जाएंगे. करीब पंद्रह मिनट बाद दो पुलिसवाले बैंक में आए. उनमें से एक सुमेर सिंह हाथ में डायरी लिए उनके पास पहुंचा. सागर लिखते हैं, ”जब मैंने उसे अपना परिचय बताया तो वह उसका सबूत मांगने के लिए आगे आया और बोला- दिखा भाई, कार्ड दिखा, क्‍या प्रेस है, देखते हैं.”

दि कारवां से जारी प्रेस कार्ड दिखाने पर वह नहीं माना और उसने कहा, ”ये कोई प्रेस नहीं है. ले चल थाने इसको.” सागर ने उन्‍हें समझाने की कोशिश की लेकिन उसने कहा, ”थाने ले जा के तहकीकात करेंगे, सब समझ आ जाएगा तुझे.” फिर सिंह ने उनसे पूछा, ”किसने परमीशन दिया… कन्‍हैया को हमने अंदर किया था, याद है. तू क्‍या है. सरकार बदल गयी है. ऐसे कहीं वीडियो मत बनाया कर.” इसके बाद सुमेर सिंह बैंक कर्मचारी की ओर पलटे जिसके खिलाफ़ सागर ने शिकायत की थी और उनसे सलाह ली कि क्‍या करना है, ”आप कहोगे तो हम थाने ले जाएंगे, मगर फिर तहकीकात होगी,  नहीं तो जाने दूंगा.” 

सागर बताते हैं- कर्मचारी ने कहा कि वह मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहता. सिंह ने कहा वीडियो डिलीट करो. तब तक मुझे नहीं जाने दिया जब तक कि मैंने उसे दिखा नहीं दिया कि वीडियो डिलीट कर दिया है. हालांकि तब तक वीडियो की एक कॉपी अपने सहकर्मियों को भेज चुका था. अपना नाम, पिता का नाम, पता आदि लिखवाने के बाद 6 बजे मुझे जाने दिया गया, एक शिकायतकर्ता के तौर पर नहीं बल्कि एक अपराधी के रूप में जिसे पुलिसवाले की उदारता के कारण छोड़ दिया गया था. मैंने अपना प्रेस कार्ड वापस लिया और दरवाज़े की ओर बढ़ा, तो सिंह ने कहा- भारत के नागरिक हैं, इसलिए छोड़ रहे हैं. छोटी-मोटी तो झड़प होती रहती है, तो क्या वीडियो बनाओगे? मैं हिल गया था. पुलिसवालों ने मेरा विवरण ले लिया है इसलिए चिंता थी कि वे मुझे बाद में कॉल करेंगे और उत्‍पीड़न करेंगे. डर था कि इतनी देर में मेरे मन में जो डर समा चुका था, उसके चलते मैं एक पत्रकार के बतौर अपना काम नहीं कर पाऊंगा.

इस घटना पर दिल्‍ली पुलिस के बड़े अफसर चुप्पी मारे हैं.

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प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे तब दुगुने वेग से दागने चाहिये सवाल (कविता)

प्रश्नकाल

-भंवर मेघवंशी-

प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे
तब दुगुने वेग से
दागने चाहिये सवाल
सवाल,सवाल और सवाल
अनगिनत ,अनवरत
प्रश्न ही प्रश्न पूछे जाने चाहिये
तभी यह अघोषित आपातकाल
प्रश्नकाल में बदल सकता है.

पूछो, इसलिये कि
पूछना जरूरी है.
पूछो, इसलिये कि
सवाल मर ना जायें कहीं .
जब सवालों की जिन्दगी का
सवाल हो,
ऐसे में चुप रहने का तो
सवाल ही कैसे उठता है?

सवालों की मौत
लोकतंत्र की मौत है
संविधान का मरण है.
इसलिये बरा -ए -मेहरबानी
जम्हूरियत की सेहत के लिये
इस प्रश्नकाल को
स्थगित मत कीजिये.
पूछते रहिये निरंतर
सहज और असहज सवाल.

यह जानते हुये भी
कि पूछना हो सकता है
एक जोखिम भरा काम .
अक्सर नहीं मिलेंगे जवाब
क्योंकि चुप्पों के देश में
जवाब में नहीं आते,
प्रत्यत्तर में प्रतिप्रश्न
उछाले जाते है
कि-
तुम होते कौन हो पूछने वाले?
फिर भी पूछना जरूरी है
पूछते रहिये सदा सर्वदा.

सवाल
सिर्फ सवाल नहीं होते
वे हमारे जिन्दा होने का
सबूत होते है.
सवाल ही जन्मते है
तर्क, विग्यान और गणित को.
सवाल हमें लोकतंत्र में
मालिक बनाते है.
“सर्व प्रभुता सम्पन्न”
सवालों से ही तो
है हमलोग
“वी द पीपल” कहलाते है.
सवाल
हमारे लोकतंत्र के
फेफड़ों की
सांस है.
सवाल ही
इस आफतकाल में
आखिरी ऊजास है.
इसलिये पूछते रहो
पूछते रहो कि
पूछना जरूरी है.

प्रश्नों ने ही
रची होगी सभ्यताएं
अक्षर, स्वर, व्यजंन
वाक्य, बोलियां और भाषाएं
कालक्रम की इस
विकास यात्रा का उद्गम
प्रश्नों में ही छिपा है.
प्रश्न नहीं होते
तो पाषाणयुग
में ही ठहरे होते हम.

प्रश्नों ने ही कबीलों को
समाज बनाया.
प्रश्नों ने ही हमारे कल को
आज बनाया.
इसलिये अपने प्रश्नों को
सहेजो लोगो.

खोने मत दो
अपने सवालों को
मदमाती सत्ता के
अहंकारी अट्टहासों में
श्रद्धा के घटाटोप अंधियारों में
राष्ट्रवाद के नारो में
भीड़ के हथियारों में
अपने सवाल
जिन्दा रखों
हर दौर, हरेक सरकारों में.

वे जब
शस्त्र पूजें,
हत्यारों को करें
महिमा मण्डित.
बनायें उनके
पूजागृह
और उनके पापों पर
तिरंगा डाल दें,
तब भी चुप मत रहना
पूछना.

जब वो बना दें
फौजों को पवित्र गाय
और गायों  के नाम पर फौजें
पशुपुत्रों के
उस पाश्विक युग में भी
चुप मत रहना,
पूछना सवाल.

जब वो सवाल
पूछने को ही
राष्ट्रद्रोह बना दें,
भेजने लगे जेल,
मारने लगे कौड़े
गोलियों और गालियों की
करने लगे बौछार
तब भी
बिना डरे मेरे यार
पूछना सवाल.

सवाल तो शाश्वत है
शाश्वत ही रहेंगे
प्रतिबंधों को तो
टूटना होता है
टूट जायेंगे
और प्रतिबंध लगाने वाले
डर जायेंगे
यहां तक कि
मर जायेंगे.

सवाल फिर भी
रहेंगे जिन्दा
क्योंकि हम विरसे में
अपने वंशजों को
सौंप जायेंगे
अनगिनत सवाल
और वसीयत में
लिख जायेंगे
सवाल उठाने का हक़
जिससे कि वो बना सकेंगे
हर अघोषित
आपातकाल को प्रश्नकाल !!

लेखक भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवं समाजकर्मी हैं. यह रचना एनडीटीवी इंडिया के समर्थन में है. सम्पर्क सूत्र- bhanwarmeghwanshi@gmail.com

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गुजरात में ‘आप’ की लहर, सूरत की सफल रैली से भाजपा नेताओं को आए पसीने

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह सूरत में हैं. वहां से उन्होंने जो हालात बयान किया उससे तो यही लगता है कि आम आदमी पार्टी की अंदरखाने गुजरात में लहर है. भारतीय जनता पार्टी के कुशासन, भ्रष्टाचार और दमन से सिहरे हुए गुजरात के लोग अब केजरीवाल के शरण में जा रहे हैं. सूरत रैली में उमड़ी भीड़ ने काफी कुछ स्पष्ट कर दिया है. शीतल कहते हैं- ”इस भीड़ का असर मौक़े पर मौजूद लोगों से सैकडों गुना ज्यादा उस अवाम पर होगा जो डराया हुआ है और दूर से बैठकर इसकी कामयाबी की दुआएँ पढ़ रहा है”.

इस बीच, खबर है कि सूरत की आम आदमी पार्टी की सफल रैली के बाद भाजपा नेताओं के माथे पर पसीने की बूंदें छलकने लगी हैं. भाजपा के दिग्गज नेताओं ने इस रैली को सफल न होने देने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था. जगह जगह प्रायोजित विरोध प्रदर्शन कराए गए. ‘आप’ गुजरात के नेताओं को थानों-हवालातों-जेलों में ठूंसा गया, अनाप शनाप मामलों में फंसाकर. यहां तक कि दिल्ली पुलिस ने जाकर आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रदेश के नेता को एक मामले में आज ही गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद भी सूरत की रैली का सफल होना कई बड़े बदलावों की सूचक है. लोग मान रहे हैं कि गुजरात में भाजपा के खिलाफ लहर है जिसका स्वाभाविक फायदा आम आदमी पार्टी को मिलने जा रहा है क्योंकि लोग मानने लगे हैं कि मोदी से मुकाबला सिर्फ केजरीवाल ही कर सकते हैं.

उधर, हार्दिक पटेल ने केजरीवाल को पत्र लिखकर गुजरात में पूरा समर्थन देने का वादा किया है. अरविंद केजरीवाल ने भी हार्दिक पटेल के आरक्षण आंदोलन के प्रति सहमति जताई है. इससे माना जा रहा है कि ताकतवर पटेल समुदाय गुजरात चुनाव में केजरीवाल की पार्टी के पक्ष में खुलकर मतदान करेगा ताकि दमन और हिंसा का बदला भाजपा से लिया जा सके.

पेश है सूरत रैली के बारे में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की मौके से टुकड़े टुकड़े में भेजी गई रिपोर्ट के अंश…

डेटलाइन सूरत. शरद गुप्ता ने सुबह उठते ही चाय के कप के साथ टाइम्स आफ इंडिया (सूरत एडीशन) की यह ख़बर सामने कर दी। इसमें एक चित्र और खबर है जो गुजरात में वायरल हो रहा है। इसमें गुजरात के मुख्यमंत्री रूपानी गुजरात के सबसे बड़े अवैध शराब ब्यापारी रमेश माइकल के साथ खुद मुख्यमंत्री निवास पर बुके और गिफ़्ट लेते हुए दिख रहे हैं। यह घटना इसी १३ अक्टूबर की है। रमेश पर गुजरात दमन और महाराष्ट्र में दर्जनों मामले दर्ज हैं। वे इस क्षेत्र के वही हैं जो उत्तर भारत के “डी पी यादव/ मरहूम पोंटी चड्ढा” रहे हैं!

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डेटलाइन सूरत. पुरबिये बड़ी संख्या में हैं सूरत में । मघई पत्ता गुजराती कट सुपारी और इलैची के साथ बताये सरजीकल से डाऊन हुआ है केजरीवाल ! यानि बीजेपी के होर्डिंग्स नब्ज़ पर हैं । कुछ यू पी के माहौल की तरंग भी है सूरत में ! पनवाड़ी के पास मुलायम सिंह मायावती के खिलाफ बहुत कुछ था । करछना (इलाहाबाद) मूल के हैं । शास्त्री परिवार का सम्मान है केजरीवाल की ईमानदारी पर शक! पर पता सबको है “केजरीवाल की रैली है आज”!

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डेटलाइन सूरत. महाराणा प्रताप पार्क, काकोदरा. जयसुखभाई (काठियावाड़) हीरा पालिश करते हैं। रविवार है तो दोस्तों के साथ पार्क में हैं। ९५ टका पाटीदार भाजप के खिलाफ है यहाँ! क्यों? लोगों पे ज़ुल्म किया, मारा जेल भेजा। अबकी फ़रक पड़ेगा। उनकी काठियावाड़ी और हमारी हिंदी के मिक्स में ये निकला! इस इलाक़े में पाटीदार ही पाटीदार हैं चारों तरफ़। इसी के पड़ोस में “योगी चौक” है जहाँ केजरीवाल आज बोलेंगे। कई बरस पहले मोदी जी यहाँ बोले थे। अमित शाह की हिम्मत न पड़ी तो कई किलोमीटर दूर सभा रक्खी पर वहाँ भी बवाल हो ही गया। बवाल की उम्मीद तो आज भी है पर जयसुखभाई कहते हैं कि बवाल भाजप कार्यकर्ता ही करेंगे आम पाटीदार नहीं! पाटीदार माने उततर भारत के जाट, भरतपुर के गूजर, रायबरेली के राजपूत या औरंगाबाद के मराठे के समकक्ष या बढ़कर।

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डेटलाइन सूरत. बवाल होगा! केजरीवाल की रैली में आज बवाल होगा। ब्राह्मणों के एक वर्ग के संगठन “ब्रह्मपडकार”के सदस्य अहमदाबाद से यहाँ पहुँच चुके हैं। वे आप की एक स्थानीय महिला नेत्री (दलित समाज की) के किसी बयान से कुपित हैं जो ब्राह्मण समाज के खिलाफ है! गुजरात पाटीदार हितरक्षक समिति ने सूरत भर में केजरीवाल के खिलाफ बड़ी बड़ी होर्डिंग और पोस्टर लगाकर विरोध का ऐलान कर रक्खा है जिसे बीजेपी स्पानसर्ड माना जा रहा है। बीजेपी गुजरात और ख़ासकर सूरत में सांगठनिक तौर पर बहुत मज़बूत है । यहाँ बारह के बारह विधायक उसके हैं सांसद उसका है सत्तर प्रतिशत पार्षद उसके हैं । मज़बूत युवा महिला छात्र व्यापारी किसान मज़दूर संगठन उसके पास हैं। केजरीवाल के पास सिर्फ एक चीज़ है “दुस्साहस”! देखिये क्या होता है? क्या क्या होता है?

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डेटलाइन सूरत. दिल्ली पुलिस सूरत पहुँची। गुजरात के प्रभारी आप के विधायक गुलाब सिंह यादव को गिरफतार किया। चार बजे से आज केजरीवाल की सूरत रैली शुरू होनी है!

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डेटलाइन सूरत. सूरत की रैली में शिरकत करने आए एक शख्स ने बातचीत में कहा- ”ऐसा लगता है गुजरात ही बनेगा मोदी के लिए आखिरी हार का रणक्षेत्र? आज सूरत में केजरीवाल की जो सफल रैली हुई है, उसने कई मिथ तोड़ दिए. जैसे ये कि आप सत्ता, पुलिस, दमन, उत्पीड़न, भय, आतंक, झूठ आदि के बल पर किसी को रोक लेंगे… केजरीवाल से लाख असहमति हो लेकिन जमीन पर यही शख्स मोदी से दो-दो हाथ करता दिख रहा है.”

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मोदी के ‘जय श्री राम’ कहने का रवीश वैसे ही मज़ाक उड़ाएंगे जैसे वरुण गांधी का मज़ाक बनाया था?

Abhishek Srivastava : हां जी, तो दशहरा बीत गया। एक झंझट खत्‍म हुआ। आइए अब मुहर्रम मनाते हैं, कि दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र के सबसे ऊंचे संवैधानिक पद पर बैठे शख्‍स ने त्‍योहार के बहाने पांच बार ”जय श्रीराम” का नारा लगाया और यह कह कर कि आवाज़ दूर तक पहुंचनी चाहिए, जनता को भी ललकार दिया। ‘अपने’ रवीश कुमार कहां हैं भाई? जब प्रधानजी नारा लगा रहे थे, तब मैं सोच रहा था कि क्‍या रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में वैसे ही उनका मज़ाक उड़ाएंगे जैसे 2009 में पीलीभीत में वरुण गांधी द्वारा चुनावी रैली में यह नारा लगाने पर उन्‍होंने उनका मज़ाक बनाया था?

रवीश ने उस वक्‍त बुलेटिन खोलते ही व्‍यंग्‍य मिश्रित आधी हंसी में ज़ोर से कहा था ”जय श्रीराम” और उपहास किया था कि आज के ज़माने में कोई ऐसा नारा लगाए तो उस पर क्‍यों न हंसा जाए! आज वे चुप रहे। वे आदमी-आदमी का फ़र्क जो समझते हैं। लो भाई, ज़माना बदल गया। अब हंसो! ज़ोर से हंसो! रावण की तरह हंसो! इतना हंसो कि तर जाओ, हंसो और मर जाओ! या हुसैन…!!!

Anita Choudaary : रावण दहन के बहाने ही सही, जय श्री राम के हुंकार के साथ “साहेब” आखिर राम की शरण में आ ही गए… जे हुयी न बात, लेकिन आते-आते 12 साल 4 महीने और 15 दिन लग गए.. चलो कोई नहीं भले देर आये हो साहेब मगर दुरस्त जरूर आना .. अब तो बस इंतज़ार है, रामराज्य आएगा या रावण और सुपर्णनखा का जंगल राज्य कायम रहेगा.. वैसे एक बात गाँठ बाँध ली साहेब “बहुत कठिन है डगर ….., “सर्जिकल स्ट्राइक” भी काम न आया तो लग जाएगी ….

Om Thanvi : पांच रोज़ पहले प्रधानमंत्री ने अपने ही लोगों से कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानबाज़ी न करें। आज लखनऊ में अपने स्वागत में “प्रतिशोधक” के रूप में लगे पोस्टरों के बीच उन्होंने जिस तरह आतंकवाद के हवाले से राम और रावण के संघर्ष का ज़िक्र किया, जिस अन्दाज़ में “युद्ध” शब्द का एकाधिक बार प्रयोग किया, गदा उठाई, तीर चलाया, सुदर्शन चक्र थामा – उसे देख क्या अब भी किसी को शक़ होगा कि सेना की बहादुरी को भाजपा नेता अपने नेता की बहादुरी का नमूना बनाकर उत्तर प्रदेश चुनाव में इस्तेमाल करने वाले हैं। विजयादशमी के दिन प्रधानमंत्री का लखनऊ जाना अपने आप में इस योजना का हिस्सा ज़ाहिर होता है। अजीबोग़रीब ही है कि “प्रतिशोधकों” वाले पोस्टरों पर भाजपा नेताओं के ढेर चेहरे मंडित थे, पर एक भी सैनिक उनमें कहीं नहीं था।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, अनीता चौधरी और ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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गांधी को जन-जन के दिल से निकालने का ये अंदाज कितना ‘स्वच्छ’ है?

…तो क्या ये समझा जाए कि गांधी को लोगों के दिल से निकालने की रणनीति पर केंद्र सरकार कामयाब हो रही है… ये सवाल इस वजह से परेशान कर रहा है क्योंकि सरकार ने गांधी जयंती पर स्वच्छता अभियान की चोचलेबाज़ी पाल ली है जो कि सिर्फ दो अक्टूबर और प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर ही याद आती है… मज़ेदार बात तो ये है कि सरकार ने गांधी के नाम को गिराने के लिए भी गांधी का ही सहारा लिया और उनको स्वच्छता की श्रद्धांजलि का ढोंग रचा…

आप समझिए और सोचिए कि दो अक्टूबर को गांधी जयंती की बजाय अब सिर्फ स्वच्छता का राग अलापा जा रहा… कुछ बदलेगा ऐसा दिखाई नहीं देता… क्योंकि लोग जैसे माहौल में हैं, खुश हैं… लेकिन उन्हें राजनीतिक दुख दिखाकर मजबूर किया जा रहा क्योंकि अपना नंबर बढ़ाया जा सके… क्या स्वच्छता दिवस से पहले लोग कीचड़ में रहा करते थे… क्या इस ढोंग से पहले लोग कूड़े के ढेर पर सोया करते थे… क्या इस नौटंकीरूपी कार्यक्रम से पहले लोग नाले में बैठकर काम किया करते थे…

सच्चाई तो ये है कि कोई भी गंदगी में रहना पसंद नहीं करता… ऐसे में सरकार की ये पाठशाला सिर्फ BC (बातचीत) ही दिखाई देती है… टीवी चैनल गदंगी की तस्वीर दिखा कर खींसे बगार दे रहे हैं… और खुद को तुर्रमखां समझ कर दांत चियार रहे हैं… बात सिर्फ इतनी भर नहीं है… बात तो हरियाणा में और बढ़ चुकी है… अब स्वच्छता दिवस की नौटंकी के साथ-साथ ग्राम सचिवालय दिवस की होशियारी भी दिखाई जा रही… और इस पर भी राजनीति कर हंगामा खड़ा किया जा रहा… ताकि कांग्रेस भी गांधी को भूल जाए… और सरकार से ज़ुबानी जंग में उलझा रहे…

आप आरएसएस को अच्छे से जानते होंगे… और ये पूरी सरकार वहीं पर बचपना बिता चुकी है… तो इसे आप और अच्छे से समझ सकेंगे… मतलब यही समझ आ रहा कि गांधी को दिलों से भगाने की कोशिश तेज़ है… कुछ समय बाद 14 नवंबर पर भी किसी तरह का ढोंग रच कर जवाहर लाल नेहरू का नाम मिटाने की कोशिश की जाएगी… आप बस देखते रहिए…

पत्रकार संजय सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : sanjaysingh27sept@gmail.com

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बेचारी सुषमा स्वराज!

Mukesh Kumar : बेचारी सुषमा स्वराज। दुनिया भर से लोगों को बचाने के अभियान में लगी रहती हैं, मगर खुद को संकट से नहीं निकाल पा रहीं। विदेश नीति की इतनी बड़ी परीक्षा चल रही है और वे कहीं हाशिए पर फेंक दी गई हैं। किसी भी महत्वपूर्ण बैठक में उन्हें नहीं बुलाया जा रहा है, मानो उनका कोई वजूद ही न हो।

हाँ एक डिप्लोमेटिक मिशन का झुनझुना पकड़ा दिया गया है कि जाओ खूब बोलो, यही आपकी उपयोगिता है हमारे लिए। ब्राम्हणवादी-मर्दवादी नेताओं ने सचमुच में इस नारी के साथ वही किया है जो वे कर सकते हैं। मगर खुद सुष्मा स्वराज ने भी तो समर्पण कर रखा है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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रिलायंस=सरकार? सरकार=रिलायंस?

एक प्राइवेट कंपनी एक नया प्रोजेक्ट शुरू करती है. पूरे देश में इंटरनेट और मोबाइल सर्विस के सस्ते प्लान लाती है, अरबों का निवेश करती है. उसके अपने कंपटीटर हैं. ‘जियो’ मुकेश अंबानी अब टेलीसर्विस किंग बनना चाहते हैं. ‘कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (CSR) के तहत बातें छौंकी जाती हैं, लेकिन हर कंपनी का एक ही मकसद है, मैक्सिमम मुनाफा पीटना. फिर बाजार के इस खेल में प्रधानमंत्री किस तरह फिट होते हैं? अपने मुनाफे के लिए कोई उनकी तस्वीर का इस्तेमाल कैसे कर सकता है?

क्या भारत की निर्वाचित सरकार और रिलायंस नाम की एक कंपनी, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? वैसे सरकार एक बिल ला रही है, जिसके मुताबिक अगर सेलिब्रिटी अपने विज्ञापनों में झूठे दावे करेंगे तो वे भी कानूनी कार्रवाई के पात्र होंगे. रिलायंस का जियो अपने दावे पर खरा नहीं उतरा तो क्या केंद्र सरकार अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ केस करेगी?

कुछ लोग इसे ‘डिजिटल इंडिया’ के हवाले से जायज ठहराना चाहेंगे. लेकिन फिर एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसी कंपनियों ने किसकी भैंस खोल ली है? उनके भावी 4जी प्लान ‘डिजिटल भारत’ के सपने के उलट हैं क्या? फिर मोदी खुलकर विज्ञापन बाजार में आ जाएं और हर तरह की कंपनियों का विज्ञापन करें. बल्कि महंगाई का जमाना है, हर कंपनी के प्रचार के लिए उनसे एक निश्चित मेहनताना लें. फिल्मी सितारों की तरह. कल को मैं जांघिया का धंधा शुरू करूं और इसे देश की किसी स्वास्थ्य योजना से जोड़कर पेश करूं तो क्या मुझे मोदी की तस्वीर से प्रचार करने की इजाजत होगी?

Pushp Sharma

(Senior Journalist)

pushpsharma@gmail.com

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मायावती ने आजमगढ़ में बसपा की रैली में नरेंद्र मोदी को साबुन लगा लगा कर खूब धोया…

यह मोदी सरकार भी कम घोटालेबाज नहीं है : मायावती

Yashwant Singh : मायावती ने आजमगढ़ में बसपा की रैली में नरेंद्र मोदी को साबुन लगा लगा कर खूब धोया… लाखों की भीड़ से बार बार पूछा कि महंगाई घटी, राशन सस्ता हुआ, नौकरी मिली, मकान मिला, रुपया एकाउंट में आया… जनता ने हर बार ना कहा. व्यापम घोटाला, विजय माल्या घोटाला, ललित मोदी घोटाला, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के घोटालों का जिक्र कर मायावती ने बताया कि यह मोदी सरकार भी कम घोटालेबाज नहीं है.

मायावती ने देर तक जमकर बोला. उनको टीवी पर शुरू से अंत तक सुनने के बाद समझ में आया कि वह बहुत मेच्योर नेता हैं जो अपने वोट बैंक या अपने टारगेट आडियेंस को बहुत ही कायदे से समझती हैं और उसे कायदे से समझा ले जाती हैं, कनवींस कर ले जाती हैं. मुलायम की छाती पर यानि आजमगढ़ में इतनी सफल रैली करके मायावती ने दिखा दिया है कि यपी में बसपा का अंडरकरंट है और वह लीड ले चुकी हैं.. सर्वे, मीडिया वाले चाहे जो करें और सोशल मीडिया वाले अपर कास्टी चाहें जो नारे लगाएं..

एक सूचना ये भी है कि मायावती ने ज्योंही अपना भाषण आजमगढ़ में शुरू किया, यूपी के कई इलाकों में बत्ती गुल हो गई. कुछ लोगों ने भड़ास निकाली कि शायद अखिलेश बुरी तरह डर चुके हैं अपनी बुआ से इसीलिए लाइन कटवा दिए ताकि प्रदेश के दूसरे इलाके के लोग अपने अपने टीवी पर बुआ का लाइव भाषण न सुन सकें. भगवान जाने क्या सच है क्या झूठ 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

पवन उपाध्याय भाई कोई जाके बहन जी को बतावो कि यूपी में मोदी की नहीं सपा वाले अखिलेश सिंह यादव की सरकार है। जीत से कोसो दूर की बात समझ चुकी हैं मायावती इसलिए आज कि आजमगढ़ रैली में उनके भाषण में सिर्फ मोदी, अमित शाह, बीजेपी और संघ ही सुनाई दिया। परेशानी का भाव साफ झलक रहा था। पुरे भाषण में सिर्फ मोदी-मोदी-मोदी।

Vinay Maurya Sinner मगर भैया ….मायावती के शब्द नही थे….स्क्रीप्ट लिखा हुआ था बस पढ़ के जनता को सुना दीं।।

Yashwant Singh बकलोल लोग जिन्हें कह कर बोल कर याद नहीं रखना है कि क्या क्या बोला, उनसे तो अच्छा है सब कुछ लिखत पढ़त में रहे ताकि वह कभी पलट कर देखा जा सका कि क्या क्या बोला, क्या क्या वादा किया… फेंकू से तो बढ़िया ही है.. तुलना करके सोचो… 🙂

Pramod Gangwar purani kahabat hai kuttay bhokte hain hathi chala jata hai aaj kl congress bsp sp aap sbki haalat yhi hai

Gyan Deo Modi-Modi-Modi sabhi yahi ratate hai.Lagata hai esi naam se sabhi ka udhhaar hone wala hai.Kya samarthak kya virodhi.

Alok Singh भाईसाहब सिर्फ उत्तर प्रदेश में चुनाव है।बेहतर होता की बहन जी उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना करती और उनके किये गए कार्यो का हिसाब मांगती। मोदी को साबुन लगाने से बढ़िया होता की अखिलेश को साबुन लगाती। जहाँ तक मोदी के कार्यो का हिसाब है वह जनता 2019 के चुनाव में हिसाब किताब करेगी।बहन जी हो या ममता दीदी हो या केजरी चाचा हो सब मोदी चालीसा ही क्यों पढ़ते है।केजरी चाचा ने दिल्ली वासियों को मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखाने के बाद अब सिध्दू को सपने दिखा कर कही का न छोड़ा ।वही हाल पंजाबी भाई बहन का होगा।काम कुछ नहीं करना सिर्फ मोदी की गलतियों को गिनाना है इन महाभुनावो को। अपने गलतियों और कमजोरियों को छिपाने के लिए जोर से सामने वाले की गलतियों और कमजोरियों को गिनाने से अपने गुनाह कम नहीं हो जाते है।

Vishal Yadav यशवंत सर अब लाखों की भीड़ कहीं भी जुटा लेना बड़े नेताओं के बाएं हाथ का खेल हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर लोग अखिलेश यादव की तारीफ़ कर रहे हैं। सपा बहोत बढ़त ले चुकी है।

Nirupma Pandey Sp to nahi aayegi ab …lko ke dm ka hatna bhi inka minus point ho gaya

Vivek Dutt Mathuria फाइट तो मायावती से ही करनी होगी… यह भी तय है महंगाई, भ्रष्टाचार और कालेधन जैसे सवालों से भाजपा को सामना करना पड़ेगा…

Pradeep Kaushal Rajya me kisi ki bhi sarkar rahe center me to BJP hi rahegi

Syed Mazhar Husain कमसेकम मायावती मतलब अखिलेश की बुआ जी पढ़कर बोलती है ये तो बेहतर है चाहे खुद लिखती है या लिखाती हो सही तो बोलती है ऊल जलूल तो नहीं बोलती न कुछ तो कर गुजरेंगी इस इलेक्शन में सपा को तो नुकसान उठाना ही उठाना है ये तय है

आचार्य सुभाष विक्रम आजमगढ़ में बसपा का मजबूत जनाधार है , और इनकी हर रैली यहां पर बहुत सफल होती है । पिछले इलेक्शन को छोड़ कर हर बार कम से से कम 4 या 5 सीट बसपा जीतती ही है आजमगढ़ से । इस बार भी यही प्रदर्शन रहेगा ।

पवन उपाध्याय भीड़ की ही बात करेंगे तो बीजेपी के गढ़ वाराणसी में सोनिया गांधी ने भी खूब भीड़ जुटाई थीं। तो क्या कांग्रेस आ रही है?

Singhasan Chauhan क्या अभी भी आपको समाजवादी पार्टी में कुछ बचा हुआ नजर आता है ?

Prashant Mishra यूपी में न कोई बढ़त में है ना कोई घटत में । फिलहाल तरल स्थिति। एकदम तरल…… रोड शो के बाद भी और रैली के बाद भी….

Praveen Shekhar yashwant जी  अब भीड़ वोट बनने का पैमाना नहीं रहा  बिहार में ये बाते मैंने नजदीक से देख ली  वैसे अभी कह दू तो आपको जल्दीबाजी लगेगी पर मिलते है अगले साल
कमेंट ध्यान रखियेगा  बहुत बुरी है अखलेश सरकार पता है मुझे फिर भी मायावती से ज्यादा सीट लाएगी  दिन लद गए BMW के

Rajeev Chandel सबसे सुन्दर समीक्षा .

Suresh Gandhi सच तो यही है। रहा सवाल सर्वे का तो पेड न्यूज के दौर में विश्वसनीयता खत्म हो गई है । कल तक मायावती की बढत बताने वाले अब गुन्डाराज की बात कर रहे हैं । दावा कर रहे है फिर से गुन्डो की सरकार बनेगी । जबकि अभी अमित शाह का आफर मिला ही नहीं है । यानी मतदान के दौरान ये पेड न्यूज वाले भाजपाइयों की सरकार बनवाते दिखेंगे

Amit Mahakal विधवा प्रलाप है ये

Arif Beg Aarifi unnao me bhi subah se batti gul hai

Awani Singh उनकी तकलीफ समझी जा सकती है सरकार अखिलेश की, कोसा मोदी को भविष्य का भान हो चूका है उन्हें

Ashish Jain yaswant bhai magar modi ji thodi naa up cm ke liye khade hai ko behan ku mayawati un ke naam se chati peet rahi hai rajya ki durdash ke liye toh sp aur moolayum family jimedaar hai ab is beech mai modi kaha se aaya tanik tarkpoorn baat karke samjahiye

Satyendra Pratap Singh सहमत.

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मोदी की महत्वाकांक्षी ‘ग्राम ज्योति योजना’ के लिए मिले धन का जमकर हो रहा बंदरबांट!

ग्राम ज्योति योजना पर केंद्र और उप्र सरकारें आमने सामने : दिल्ली से मात्र तीन घंटे की दूरी पर स्थित हाथरस के गाँव फ़तेला में 70 साल बाद पहली बार बिजली पहुंची। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमन्त्री की इस घोषणा के तत्काल बाद उठा विवाद अभी थमने का नाम नही ले रहा। आज स्थिति ये है कि केंद्र और उ0प्र0 सरकारे अपनी अपनी नौकरशाही के साथ आरोपों की तोपें ताने आमने सामने खड़ी नजर आरही हैं। उ0प्र0 में आसन्न चुनावों के मद्देनजर दोनों ही सरकारों की समर्थक राजनैतिक पार्टियां भी अपनी अपनी सरकारों के समर्थन में लामबंद होने की तैयारियां कर रही हैं। प्रधानमन्त्री की उक्त घोषणा के तत्काल बाद डीवीवीएनएल (दक्षिणांचल विद्युत् वितरण निगम लि0) के महाप्रबन्धक, आगरा की यह टिप्पणी, कि गाँव फ़तेला तो पिछले 30 सालों से रोशन है, प्रधानमन्त्री की साख पर एक काले धब्बे की तरह चिपक गयी है।

फ़तेला गाँव के विद्युतीकरण को लेकर उठे विवाद से उ0प्र0 सरकार और उसकी शीर्ष नौकरशाही, डिस्कॉम कम्पनियाँ, गाँवों में बिजली पहुंचाने के लिए सारा तामझाम खड़ा करने वाली निजी कम्पनियाँ,  जिले में तैनात विद्युत् विभाग के अधिकारियों, विद्युत् सुरक्षा निगम से लेकर केंद्र सरकार के उपक्रम रूरल एलेक्टरफिकेशन कारपोरेशन (REC) तक सब की कार्यप्रणाली पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है। लगता है कोई अकेला दोषी नही है जिसकी गर्दन सीधे सीधे हाथ में आजाये। घोर लापरवाही तो बरती ही गयी है। क्या देश के हर गाँव को अन्धेरा मुक्त बनाने की नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी इस योजना के लिए केंद्र सरकार जिस तरह खुले दिल से धन अवमुक्त कर रही है, उसका बन्दर बाँट भी हो रहा है? कितने धन का बंदरबांट हुआ?  यह तो उच्च स्तरीय जांच के बाद ही पता चलेगा। विदित है कि केंद्र हजारों करोड़ रूपये इस योजना पर खर्च कर रहा है। पूरा का पूरा पैसा बिना किसी बंदरबांट के जनकल्याण में लग जाए ! भले ही यह सच हो, पर आम जन तो इस पर कतई यकीन करने को तैयार नहीं होगा।

केंद्र सरकार की तरफ से ऊर्जामंत्री पीयूष गोयल भी तुरंत डैमेज कंट्रोल करने में जुट गए हैं। उन्होंने भारत सरकार के उपक्रम आरईसी को डिवीवीएनएल आगरा के महाप्रबंधक को पत्र लिख कर, उनके विरोधाभासी बयान पर तीन दिन में स्पष्टीकरण मांगने को कहा है।  जिसके अनुपालन में आरईसी के सहायक जनरल मैनेजर ने  दि0 17 अगस्त को पत्र भेज कर उनसे स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। विदित हो कि आरईसी के हवाले “ दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योंति योजना “ के अंतर्गत, पूरे देश के हर गाँव में हर घर तक बिजली की लाइन पहुंचाने के प्रोजेक्ट्सों को स्वीकृत करने निरीक्षण करने और उनके लिए धन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है।

इस पत्र के जारी होने की खबर का असर इतना तो जरूर हुआ कि बिजली विभाग के जो अधिकारी पत्रकारों से अब तक खुल कर बात कर रहे थे उन सभी के मुँह पर अब ताले पड गये हैं। दफ्तर में पत्रकार के प्रवेश के साथ ही, उनके मुँह से निकलता है – नो फ़तेला। उच्च पद पर आसीन एक अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि, क्या आरईसी के अधिकारी ये बतायेगे कि, उनको अपने पत्र दि0 17 अगस्त 2016 में नगला फ़तेला की अनियमितताओं की जानकारी मीडिया से मिलने की बात क्यों करनी पडी ? उनके कन्धों का सहारा क्यों लेना पड़ा ? क्या उससे पहले कभी कोई अनियमितता अपने निरिक्षण के दौरान उनकी पकड़ में नही आयी ? क्या अब उन्हें अपनी गर्दन भी फंस जाने का डर सताने लगा है?

विदित है कि दक्षिणांचल विद्युत् वितरण निगम लि0 आगरा के अंतर्गत प्रदेश के 21 जिले आते हैं। इन सभी जिलों में हर गाँव हर घर तक खम्बे गाड़ने, ट्रांसफॉर्मर लगाने और हाई – लो वोल्टेज लाइन बिछाने का कार्य आजकल निजी हांथों में है। आगरा और हाथरस दो जिलों का काम एकुरेट ट्रांसफॉर्मर्स लि0 कर रही है। हाथरस में तैनात इस कम्पनी के अधिकारी ओम प्रकाश राणा से इस पत्रकार ने नगला फ़तेला में उठे विवाद में उनकी भूमिका की जानकारी मांगी तो उन्होंने कहा कि हमारा काम तो, प्रोजेक्ट के अनुसार गाँव में तामझाम खड़ा करना होता है। हमारा काम पूरा हो जाने के बाद उसका निरिक्षण विद्द्युत वितरण निगम आगरा, स्थानीय बिजली विभाग के अधिकारी, आरईसी के अधिकारी करते है। उनसे हरी झंडी मिलने के बाद हम विद्युत् सुरक्षा निगम के अधिकारयों को निरीक्षण कराकर नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (अनापत्ती प्रमाण पत्र) लेने की प्रक्रिया पूरी करते हैं। नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट के साथ उस गाँव को हम बिजली विभाग को हैण्ड ओवर कर देते है।

यह पूछने पर की नए बिछाये गए तारों में बिजली,सुरक्षा का सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही छोड़ी जाती है या पहले भी छोड़ दी जाती है, श्री राणा ने बताया बिजली छोड़ना हमार काम नहीं हैं। बिजली विभाग के अधिकारी ही बता सकते है। वैसे छोड़ी तो सुरक्षा सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही चाहिए। यहाँ महत्वपूर्ण बात ये है कि गाँव फ़तेला की एनओसी 17 अगस्त को जारी हुयी है। यानि की प्रधानमन्त्री द्वारा घोषणा किये जाने के दो दिन बाद।

यूं कहने को तो जिला स्तर पर गाँवों में चल रही विद्द्युतिकरण की योजना की प्रगति की समीक्षा के लिए एक समिति है। जिले में एक मात्र सांसद राजेश दिवाकर बीजेपी के ही है। समिति की बैठक प्रति तीन माह में एक बार होनी चाहिए। अधीक्षण अभियंता समिति के पदेन सचिव हैं। सांसद दिवाकर कहते है कि अभी तक समिति की एक भी बैठक सचिव ने बुलाई नही है। यानि इस योजना की स्थिति — अंधी पीसे कुत्ता खाय वाली बनकर रह गयी है।

हाथरस के सांसद राजेश दिवाकर को दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना में व्यापक पैमाने पर घपले का अंदेशा है। उनका कहना है कि अखिलेश सरकार ने योजना के केंद्र के पैसे को किसी अन्य मद में खर्च कर दिया है। उनका आरोप है कि यूपी सरकार ने योजना में ऐसे गांवों को शामिल किया है जो पहिले से ही विधुतीकृत थे।उन्होंने इस प्रकरण की सीबीआई जाँच की आवश्यकता जताई है।

स्टोरी से संबंधित कुछ बाइट देखने सुनने के लिए नीचे दिए लिंक पर एक एक कर क्लिक करें :

Byte 1 Omprakash Rana https://youtu.be/zrw_Hn7aEk0
Byte 2 Rajesh Diwaker sansad https://youtu.be/P3pfj2BkvGs
Byte 3 Rajesh Diwaker sansad https://youtu.be/Aj3JgV3IjD0
Byte 4 Rajesh Diwaker sansad https://youtu.be/wuQUok616XI

हाथरस से वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल की रिपोर्ट. संपर्क : 9837061661

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नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड के माफीनामे को मोदी ने कबूल कर लिया है!

Anand Swaroop Verma :  आज के हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित प्रशांत झा की रिपोर्ट से पता चला कि नेपाल के माओवादी नेता और प्रधान मंत्री प्रचंड ने अपने विशेष दूत और गृहमंत्री बिमलेन्द्र निधि से नरेंद्र मोदी के पास सन्देश भेजा है कि अतीत में उनसे कई गलतियां हुईं क्योंकि उन्हें खुली राजनीति का अनुभव नहीं था, और अब वह इस बात का ध्यान रखेंगे कि भविष्य में ऐसा न हो और भारत के साथ अच्छे सम्बन्ध बने रहें.

मोदी ने इस माफीनामे को फिलहाल कबूल कर लिया है. बात केवल प्रशांत झा की रिपोर्ट की ही नहीं है. अन्य सूत्रों से भी यही जानकारी मिलने के बाद मैंने लिखा है. पिछले दो-तीन महीने का घटनाक्रम भी अनेक दुखद संकेत देता है.

वरिष्ठ पत्रकार और समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा की एफबी वॉल से.

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मोदी का बलूचिस्तान और पीओके पर पाक को ललकारना जस्टिस मार्कंडेय काटजू को पसंद आया!

An eye for an eye

by Justice Markandey Katju
former Judge
Supreme Court

The Prime Minister’s reference to Balochistan and POK in his Independence Day Speech has come not a moment too soon. In fact it should have come in some speech much earlier, and also by earlier Prime Ministers.. How long must we tolerate the Pakistani leaders castigating  and condemning us over Kashmir, and how long must we tolerate their incitement, encouragement and support of the Kashmiri agitations and militancy ? It is time now to pay them back in the same coin. Just as Pakistan is giving training, weapons and supplies to militants in Kashmir, we too must start organizing, training and supplying weapons etc to Sindhis, Balochis, and the NWFP people who have been suppressed by Punjabis in the Pakistan security services for long, and want independence. Pakistanis must be told frankly : if you want to support azadi, it cannot be limited to Kashmiris alone.

When I said that Pakistan was a fake, artificial entity ( I refuse to call it a country ), and that Partition of 1947 was on the basis of the bogus two nation theory, and that India and Pakistan ( and Bangladesh ) will one day definitely reunite ( see my article ‘ The Truth about Pakistan ‘ online. It was published in the Pakistan newspaper ‘The Nation ‘ ), many people called me a maverick and a dreamer. I replied that Mazzini who spoke of Italian Unification,  was also called a dreamer by many at one time, but later his dream became a reality due to Garibaldi and Cavour.

What is Pakistan ? It is Punjab, Sind, Balochistan and NWFP. These were all part of India since Mughal times..

When I meet a Pakistani, I feel no different from him. We look like each other, speak the same language Hindustani, have the same culture, the same love for Urdu poetry and Hindustani music, biryani and other dishes, etc. We were befooled by the Britishers into thinking we are enemies and different nations, but how much longer must we remain befooled.? How much longer must blood flow ? How much longer must we spend a huge amount of money buying foreign arms, money which could have been spent on the welfare of our poor people ? We must reunite under a secular government which does not tolerate religious extremism or bigotry of any kind, whether Hindu or Muslim..

But to reunite will not be easy. The first step in this direction will be to dismember Pakistan ( which, as I said, was no country at all in the first place ). In fact the first step of dismemberment was taken in 1971 when Bangladesh was created. Now the next step must be to help Sind, Baluchistan, and NWFP to become independent ( later, they will voluntarily unite with us ). There are already organizations in these provinces which want independence, and we must start sending them arms and other supplies. This would not be difficult since we have a long border with Sindh.

Those who talk of ‘improving’ relations between India and Pakistan are living in a fool’s paradise. There can never be good relations between us, because Pakistan was created by the British as a theocratic state so that tension, enmity and hostility remain. This serves two objectives ( 1 ) India ( of which Pakistan is really a part ) does not emerge as a modern industrial giant ( of which it now has all the potential ), and thereby does not become a big rival to Western industry (2 ) India and Pakistan remain a huge market for the Western arms industries ( India is the biggest foreign arms purchaser in the world ).

So it will not be easy for us to reunite, as those who divided us will not let us easily reunite. But we are bound to reunite one day by the effort of our patriotic modern minded people, as the Partition of 1947 was on the basis of the bogus two nation theory, and we are really one nation.

When we reunite we will have a huge market for growth of a highly developed modern industry, which alone can generate the wealth we require for converting India into a highly prosperous, highly industrialized country with its people enjoying a high standard of living and decent lives. There will be freedom of religion in this reunited India, but no freedom of religious bigotry or extremism…

लेखक जस्टिस मार्कंडेय काटजू भारत के जाने माने न्यायाधीश रहे हैं. उनसे संपर्क mark_katju@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.


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मोदी ने भक्तों को नया एजेंडा दिया- ‘अब बलूचिस्तान-गिलगित खेलो!’

Sheetal P Singh : मोदी जी का तीसरा पन्द्रह अगस्त और हमारा सत्तरवां…  मोदी जी ने आज लालक़िले से अपना २०१९ के लोकसभा चुनाव का एजेंडा पेश किया। वे जानते हैं कि उनके समर्थक उनसे काले धन, दो करोड़ सालाना नौकरियों, मंहगाई कम करने पर तो कुछ पूछने से रहे… अब वक़्त है कि उन्हे नया एजेंडा दे दिया जाय! बलूचिस्तान और गिलगित अगला चुनाव लड़ेंगे! हम जानते हैं कि सिवाय इसके कि हमारे या उनके क़ब्ज़े के कश्मीर में कुछ और लोग मार डाले जांय, कुछ और सुरक्षा कर्मी राष्ट्रीय झंडों में लपेट कर अपने गाँव वापस किये जांय, कुछ और दिन कर्फ़्यू रहे… कुछ बदलने वाला नहीं है! पर चुनाव में देशभक्ति की फ़सल काटने का यह बेहतर औज़ार है, तब जब दाल के भाव नीचे आने नहीं हैं और प्रापर्टी के ऊपर जाने नहीं हैं! तो आज के पन्द्रह अगस्त को भगत मंडली के भजन का मुखड़ा कुछ यूँ है “क्वेटा और गिलगित में दिया पाकिसतान को ललकार ……”। ये लाइनें आलोचक जोड़ेंगे- “विकास” वाले मोदी करो देस बंटाधार….। चलिये पतंग उड़ाते हैं। जै हिन्द।

Anil Jain : लाल किले की प्राचीर से ऐतिहासिक गलती… जैसे जम्मू-कश्मीर का मसला हमारे देश का अंदरुनी मसला है वैसे ही बलुचिस्तान भी पाकिस्तान का अंदरुनी मसला है। हम कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान को हमेशा नसीहत देते हैं कि वह हमारे घरेलू मामलों में टांग न अडाए। लेकिन आज लाल किले के प्राचीर से हमने बलुचिस्तान का मुद्दा उठाकर न सिर्फ पाकिस्तान को यह नसीहत देने का नैतिक अधिकार खो दिया बल्कि पाकिस्तान जो कुछ हरकतें कश्मीर को लेकर करता और करवाता आ रहा है उन्हें भी एक तरह से वैधता प्रदान कर दी। अब हम किस मुंह से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की लानत-मलानत कर पाएंगे कि वह हमारे घरेलू मामलों में नाजायज दखलंदाजी करता है। अब तो पाकिस्तान को भी खुलकर यह कहने का मौका मिल गया कि भारत बलूच विद्रोहियों की मदद कर पाकिस्तान के अंदरुनी मामलों में दखलंदाजी कर रहा है। यह सही है कि पाकिस्तान से उसके पूर्वी हिस्से को अलग कर बांग्लादेश का निर्माण करवाने में भारत ने अहम भूमिका निभाई थी लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी या भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल मॉनेक शा ने किसी आमसभा में या रेडिया/टीवी पर या लाल किले से यह मुनादी नहीं की थी कि भारत शेख मुजीब की मुक्ति वाहिनी की हर तरह से मदद करेगा और पाकिस्तान के दो टुकडे करवा देगा। कहने का आशय यह कि कूटनीतिक कार्रवाइयां ढोल पीट कर नहीं की जाती है। जय हिंद…जय भारत….आजादी अक्षुण्ण रहे।

Yashwant Singh : इस लिंक को क्लिक कर पढ़िए… http://goo.gl/eEV6YC  मामला सीरियस है भाई. बत्ती जली तक नहीं, जुमला महाराज ने क्रेडिट ले लिया… इस विद्युतीकरण से क्या फायदा जब गांव में अंधेरा अब भी कायम है… ये आदमी जनता को पूरी तरह से मूर्ख समझ कांच की हाड़ी को बार बार चूल्हे पर चढ़ा दे रहा है. जब यह टीवी पर बोलता दिखता है तो चैनल बदल देता हूं. माफ करिएगा, बहुत दिनों बाद इतने मूर्ख आदमी को इतने बड़े पद पर देख रहा हूं.. मैं सोचता था कि यह आदमी कांग्रेस से बेहतर साबित करने के लिए कुछ तो जमीनी और आम जनता के हित की काम करेगा लेकिन मैं गलत साबित हुआ. यह सिर्फ और सिर्फ कारपोरेट्स के लिए पीएम बना है. जनता तो महंगाई, बेरोजगारी और टैक्स की भयंकर मार के तले कराह रही है.

Om Thanvi : लोग पूछ रहे हैं प्रधानमंत्री ने नई योजनाओं के सपने नहीं दिखाए। जब पुराने सरेआम धुल रहे हों, नए कैसे गढ़ेंगे! कहाँ गया मेक इन इंडिया? नीति आयोग? आदर्श ग्राम? शौचालय और जन-धन गिनाते थक जाएँगे तो रेल टिकट और एलईडी बल्ब से ही न गुज़र होगी! और बलूचिस्तान? देश के स्वाधीनता दिवस पर लाल क़िले की प्राचीर से? निपट अजूबा। उधर, राष्ट्रपति ने दलितों पर अत्याचार का मामला अपने सम्बोधन में उठाया और विभाजनकारी ताक़तों की निंदा करते हुए देश में बढ़ती असहिष्णुता की बात की। यह उन लोगों लोगों सीधा सम्बोधन है जो तमाम गोरखधंधे अंजाम देकर भी पूछते फिरते हैं कि कहाँ है असहिष्णुता, कहाँ है? प्रधानमंत्री ने दलितों पर हमलों की आख़िरकार मलामत की है। क्या लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों पर हो रहे हमलों पर भी वे आज मुख खोलेंगे?

सौजन्य : फेसबुक

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लाल किले से मोदी ने झूठ बोला! सच्चाई सुनिए पत्रकार विनय ओसवाल से

सरकार जनता से कैसे दूर हो जाती है और शासकों को अधिकारी योजनाओं की सफलता के मामले में कैसे गुमराह कर देते है, इसकी बानगी आज स्वतंत्रता दिवस पर पीएम नरेंद्र मोदी के ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ के बाद देखने को मिली। दरअसल पीएम ने अपने भाषण में यूपी के हाथरस जिले के गांव नगला फतेला का जिक्र किया। कहा कि दिल्ली से महज तीन घंटे की दूरी के इस गांव में बिजली आने में 70 साल लग गए। लेकिन यह हकीकत नही है। सच्चाई यह है कि इस गांव में बिजली की लाइन तो खिंच गयी है लेकिन एक साल से इस लाइन में करंट नही आया है।

हाथरस जिले की सासनी तहसील के गांव नगला फतेला में एक साल पहिले खिंची बिजली की इन लाइनों को देखिये। इन्ही लाइनों के बूते आज पीएम मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिक्र किया कि दिल्ली से महज तीन घण्टे की दूरी के इस गांव में 70 साल बाद बिजली पँहुची है। गांव के लोगों ने भी उनकी यह बात सुनी तो सब हैरान रह गए। दरअसल पीएम ने जो कहा सचाई उसके विपरीत है। गांव में एक साल पहिले विद्युतीकरण हो गया था। लेकिन एक साल से इन लाइनों में करंट नही दौड़ा है।

ग्रामीणों का कहना है कि बिजली के लिए उन्हें आज भी वही दिक्कतें झेलनी पड़ रही है जो कि वे आजादी के 70 साल से झेल रहे है। दरअसल इस गांव के ग्रामीण अपने ट्यूबवेलों की लाइन से १५० से २०० मीटर तक की केबिलें स्वयं खीचकर जैसे तैसे बिजली का इंतजाम करते है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने बिजली विभाग के अधिकारियों को लिखकर दिया है फिर भी उनकी सुनवाई नही होती। इन ग्रामीणों को तो गांव में दो तीन घण्टे बिजली आने से भी परेशानी है।

आइए, गांव वालों की जुबानी बिजली की असल कहानी जानें… नीचे दिए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/ZEVtLapuxBY

https://youtu.be/GczPEq1QC-s

https://youtu.be/_5B34eoQm0k

https://youtu.be/yrawZP-vUpg

हाथरस से वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल की रिपोर्ट. विनय ओसवाल लंबे समय तक नवभारत टाइम्स में कार्यरत रहे. इन दिनों सोशल मीडिया और भड़ास के जरिए अपनी बेबाक लेखनी को धार दे रहे हैं. उनसे संपर्क 9837061661 के जरिए किया जा सकता है.


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गंगा सफाई पर मनमोहन से कम सीरियस हैं मोदी!

गंगा सफाई के बजट में कटौती के बाद बचा पैसा भी खर्च नहीं कर पा रही मोदी सरकार

लखनऊ : लगभग सवा दो साल पहले भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए
गए नरेन्द्र मोदी ने उत्तरप्रदेश की  बनारस लोकसभा सीट से नामांकन भरने
के पहले सार्वजनिक रूप से कहा था “पहले मुझे लगा था मैं यहां आया, या फिर
मुझे पार्टी ने यहां भेजा है, लेकिन अब मुझे लगता है कि मैं मां गंगा की
गोद में लौटा हूं”. तब मोदी  ने सार्वजनिक रूप से भावुक होते हुए कहा था
“न तो मैं आया हूं और न ही मुझे भेजा गया है.दरअसल, मुझे तो मां गंगा ने
यहां बुलाया है.यहां आकर मैं वैसी ही अनुभूति कर रहा हूं, जैसे एक बालक
अपनी मां की गोद में करता है. मोदी ने उस समय यह भी कहा था कि वे गंगा को
साबरमती से भी बेहतर बनाएंगे. पर अब लखनऊ के सिटी मोंटेसरी स्कूल की
राजाजीपुरम शाखा की कक्षा 10 की छात्रा और ‘आरटीआई गर्ल’ के नाम से
विख्यात 14 वर्षीय ऐश्वर्या पाराशर की एक आरटीआई पर भारत सरकार के जल
संसाधन,नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा दिए गए जबाब को देखकर
लगता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी चुनाव से पूर्व गंगा
नदी की सफाई पर किये गए अपने बड़े बड़े वादों को शायद भूल गए हैं और गंगा
नदी की साफ-सफाई के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की बहुप्रचारित नमामि गंगे
योजना महज फाइलों, सरकारी विज्ञापनों, राजनैतिक आयोजनों और राजनैतिक
बयानबाजी तक ही सिमट कर रह गयी है.

दरअसल ऐश्वर्या ने बीते 09 मई को प्रधानमंत्री कार्यालय में एक आरटीआई
अर्जी देकर नमामि गंगे योजना पर केंद्र सरकार द्वारा किये गए खर्चों,
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित बैठकों और गंगा के प्रदूषण  को
रोकने के सम्बन्ध में 7 बिन्दुओं पर जानकारी चाही थी. प्रधानमंत्री
कार्यालय के अवर सचिव और केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी सुब्रतो हाजरा ने
बीते 6 जून को ऐश्वर्या को सूचित किया कि नमामि गंगे योजना से सम्बंधित
कोई भी जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं है और ऐश्वर्या की अर्जी
अधिनियम की धारा 6(3) के अंतर्गत भारत सरकार के जल संसाधन,नदी विकास और
गंगा संरक्षण विभाग को अंतरित कर दी. जल संसाधन,नदी विकास और गंगा
संरक्षण मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के अवर सचिव एवं जन
सूचना अधिकारी के. के. सपरा ने बीते 4 जुलाई के पत्र के माध्यम से
ऐश्वर्या को जो सूचना दी है वह अत्यधिक चौंकाने वाली है और नमामि गंगे
योजना के क्रियान्वयन को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
के वास्तव में गंभीर होने पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा रही है.
ऐश्वर्या को दी गयी सूचना  के अनुसार सरकार बनाने के बाद से अब तक केंद्र
की नरेंद्र मोदी सरकार ने गंगा की साफ-सफाई के लिए निर्धारित बजटीय आबंटन
में कटौती तो की ही है साथ ही साथ सरकार आबंटित बजट की धनराशि को खर्च
करने में भी विफल रही है.

सपरा ने ऐश्वर्या को बताया है कि वित्तीय वर्ष 2014-15 में गंगा सफाई के
राष्ट्रीय अभियान के लिए 2137 करोड़ रुपयों का बजटीय आवंटन निर्धारित किया
गया था जिसमें 84 करोड़ की कटौती कर संशोधित आबंटन 2053 करोड़ किया गया
किन्तु सरकार इस वित्तीय वर्ष में महज 326 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाई तो
वहीं वित्तीय वर्ष 2015-16 में इस अभियान के लिए 2750 करोड़ रुपयों का
बजटीय आवंटन निर्धारित था जिसमें 1100 करोड़ की भारीभरकम कटौती कर संशोधित
आबंटन 1650 करोड़ किया गया किन्तु सरकार इस वित्तीय वर्ष में भी 1632 करोड़
रुपये ही खर्च कर पाई. इस प्रकार केंद्र सरकार वितीय वर्ष 2014-15 में
आबंटित धनराशि में से 1727 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाई और वितीय वर्ष
2015-16 में भी 1100 करोड़ की भारीभरकम कटौती के बाद किये गए संशोधित
बजटीय आबंटन में से भी 18 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाई है.

ऐश्वर्या को देने के लिए 20 जून को तैयार की गई इस सूचना के अनुसार
वित्तीय वर्ष 2016-17 में गंगा सफाई के राष्ट्रीय अभियान के लिए 2500
करोड़ रुपयों का बजटीय आवंटन निर्धारित किया गया है पर इस आबंटन के
सापेक्ष संशोधित आबंटन या बास्तविक खर्चों की कोई भी सूचना केंद्र सरकार
के पास नहीं है.

ऐश्वर्या ने एक विशेष बातचीत में कहा कि हालाँकि माँ गंगा के आशीर्वाद ने
नरेंद्र मोदी को न केवल बनारस से लोकसभा में पंहुचाया अपितु उनकी पार्टी
को आशातीत सफलता का आशीर्वाद देते हुए मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक
पंहुचाया पर लगता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद हमारे प्रधानमंत्री
गंगा मां से किये अपने वायदों को भूल गए हैं. गंगा साफ-सफाई पर बजटीय
आबंटन के सापेक्ष वित्तीय वर्ष 2014-15 में  महज 15% खर्च और वित्तीय
वर्ष 2015-16 में भी मात्र 59% खर्च पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते
हुए ऐश्वर्या ने वित्तीय वर्ष 2016-17 में गंगा सफाई के राष्ट्रीय अभियान
के लिए महज 2500 करोड़ रुपयों का बजटीय आवंटन निर्धारित किये जाने को गंगा
साफ-सफाई पर अगले 5 वर्षों में 20000 करोड़ रुपये खर्च करने की मोदी सरकार
की बीते साल 13 मई में की गयी घोषणा के आधार पर नाकाफी बताया.

ऐश्वर्या कहती हैं कि गंगा सफाई पर हुई बैठकों की सूचना के लिए मुझे
वेबसाइट को देखने का निर्देश दिया गया था. ऐश्वर्या के अनुसार जब
उन्होंने वेबसाइट को देखा तो उनको पता चला कि साल 2009 में राष्ट्रीय
गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (एनजीआरबीए) के गठन से अब तक इसकी 6 बैठकें हुईं
हैं जिनमें से 3 बैठक क्रमशः दिनांक 05-10-2009, 01-11-2010 और
17-04-2012 को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुईं और 3
बैठक क्रमशः दिनांक 27-10-2014, 26-03-2015 और 04-07-2016 को वर्तमान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में. ऐश्वर्या ने बताया कि इन
बैठकों के कार्यवृत्तों को डाउनलोड कर देखने पर मालूम चला कि जहाँ एक तरफ
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने  कार्यकाल में हुई तीनों बैठकों
की अध्यक्षता की तो वहीं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने
कार्यकाल में हुई 3 बैठकों में से एक मात्र  दिनांक 26-03-2015 की बैठक
में ही उपस्थित रहे और बाकी 2 बैठकों की अध्यक्षता जल संसाधन मंत्री उमा
भारती ने की. ऐश्वर्या बताती हैं कि राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण
(एनजीआरबीए) के पदेन अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं और
सामान्यतया इस प्राधिकरण की बैठकों की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री के
द्वारा की जानी चाहिए किन्तु वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा
इस प्राधिकरण की दिनांक 27-10-2014 और 04-07-2016 की बैठक में अनुपस्थिति
से गंगा साफ-सफाई पर उनके  वास्तव  में गंभीर होने पर प्रश्नचिन्ह तो लग
ही रहा है.

ऐश्वर्या ने बताया कि वे अपने ‘अंकल मोदी’ को पत्र लिखकर उनसे अनुरोध
करेंगी कि वे आगे से ‘नमामि गंगे’ योजना पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देकर
गंगा को निर्धारित समयान्तर्गत साफ करायें और माँ गंगा से किये अपने सभी
वादे पूरे करें. ऐश्वर्या को विश्वास है कि विश्व में भारत के नाम का
डंका बजबाने वाले उसके ‘अंकल मोदी’ उसके पत्र का संज्ञान लेकर गंगा को
साफ कराकर एक नई मिसाल कायम करने में कामयाब होंगे.

Urvashi Sharma
Secretary
YAISHWARYAJ (AOP)
Patron  – Campaign to Protect RTI ( CPRI )
102, Narayan Tower, Opposite F block Idgah
Rajajipuram, Lucknow-226017
Uttar Pradesh, India
Contact 9369613513

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मोदी जी की सरकार बनने के बाद पूरी पत्रकार बिरादरी दो फाड़ हो चुकी है

Nadim S. Akhter : एबीपी न्यूज वाले पत्रकार अभिसार शर्मा ने शानदार-जानदार लिखा है. सच सामने लाना एक खांटी पत्रकार का अंतिम ध्येय होता है और अभिसार ने वही किया है. सारी मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद (Read between the lines- नौकरी पे खतरे के बावजूद !!) क्या आज हमें ये कहने में कोई हिचक होनी चाहिए कि देश में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है. जो दक्षिणपंथ और उसके सारे कुकर्मों-बचकाना हरकतों के साथ है (देश को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर भी), वह -राष्ट्रप्रेमी- घोषित किए जा रहे हैं और जो मोदी सरकार को एक्सपोज कर रहे हैं, उनकी गलतियों और खामियों की ओर इशारा कर रहे हैं, उन्हें -राष्ट्रद्रोही- होने का तमगा दिया जा रहा है.

तो क्या ऐसे माहौल में एक पत्रकार को अपनी नैतिकता और पेशेवर निष्ठा से समझौता कर लेना चाहिए? क्या उसे समर्पण करके घुटने के बल झुकना नहीं चाहिए, बल्कि लेट जाना चाहिए ताकि सत्ता का हनहनाता रथ उसके सीने पर से गुजर के उसे जमींदोज कर दे! या फिर उसे पूरी ताकत लगाकर देश को सच बताना चाहिए और अपना काम करते रहना चाहिए. सारी मुसीबतों और जान पर खतरे के बावजूद!

अभिसार बता रहे हैं कि उनकी पत्नी ने उन्हें सुबह-सबह टहलने से रोक दिया है क्योंकि उन्हें धमकियां मिल रही हैं. ऐसे और कई पत्रकार होंगे, जो इसी खतरे में जी रहे होंगे लेकिन सार्वजनिक मंच पर कुछ नहीं बोल रहे और चुपचाप अपना काम करते जा रहे हैं.

टाइम्स नाऊ वाले अर्नब गोस्वामी कह रहे हैं कि पाक परस्त पत्रकारों का ट्रायल होना चाहिए. तो ये कैसे साबित होता है कि अर्नब गोस्वामी के लहू में सिर्फ देशभक्ति की आरबीसी यानी रेड ब्लड कॉपरसेल्स हैं. और अर्नब ये कैसे साबित करेंगे कि तथाकथित पाक परस्त पत्रकारों के लहू में ये कॉपरसेल्स नहीं हैं? कश्मीर में युवा अगर सेना पर पत्थर फेंक रहे हैं तो क्या आप पैलेट गन का इस्तेमाल करके उनके बदन को जख्मों और छर्रों से छलनी कर देंगे, उन्हें अंधा कर देंगे? अगर सेना और सीआरपीएफ वहां इस तरह की गलतियां कर रही है तो क्या किसी पत्रकार को इसे देश को नहीं बताना चाहिए कि सरकार इस और ध्यान दे और इस गलती को सुधारा जाए? क्या उन गुस्साए नौजवानों पर पानी की बौछार या रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जैसा देश के अन्य हिस्सों में होता है, जिससे भीड़ तितर-बितर हो जाए और किसी को कोई जानलेवा नुकसान भी ना पहुंचे?

बहुत सारी बातें है. क्या-क्या बोलूं. ये भी अभूतपूर्व है कि देश की जानी-मानी पत्रकार बरखा दत्त ने ट्वीट करके अर्नब गोस्वामी की ओर इशारा करते हुए ये कह दिया कि उन्हें शर्म आ रही है, कि जिस पेशे में अर्नब है, वो भी उसी पेशे में हैं. मोदी जी की सरकार बनने के बाद पूरी पत्रकार बिरादरी दो फाड़ हो चुकी है. एक वो पत्रकार हैं जो भक्तों की जमात में शामिल हो के मोदी जी की हर बात पे –मोदी-मोदी-मोदी-मोदी— चिल्ला रहे हैं (Pro Modi ) और एक वो हैं, जो हमेशा की तरह ईमानदारी से अपना पत्रकारीय दायित्वों को निभा रहे हैं (जैसा उन्होंने यूपीए काल में भी निभाया था और तब बीजेपी उनसे बहुत खुश रहा करती थी, Pro Public Journalsits), सारे खतरों को झेलकर.

मेरा मानना है कि सत्ता के दबाव में Pro Modi और Pro Public पत्रकारों के बीच कटुता अभी और बढ़ेगी. एक धड़ा सत्ता के इशारे पे जनता को फिक्स रंग दिखाएगा और दूसरा धड़ा सारे रंग दिखाने की कोशिश करेगा ताकि देश सच्चाई जान सके. और इसका नतीजा आपको अगले लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा, जब पब्लिक सब जानने-समझने के बाद वोट देने बाहर निकलेगी. वैसे एक बात के लिए मैं आश्वस्त हूं कि प्रोपेगेंडा ज्यादा चल नहीं पाता. आखिर में जीत सच यानी सत्य की ही होती है. सो सत्यमेव जयते. जय हो!

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

अभिसार शर्मा के लिखे मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें….

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देश के 80 प्रतिशत पत्रकारों के पास दृष्टि नहीं, संपादक भी दृष्टिहीन : विमल कुमार

कविताओं के जरिए मोदी को लगातार एक्सपोज करने में जुटे हैं कवि और पत्रकार विमल कुमार : हिन्दी के वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार विमल कुमार पिछले दो सालों से लगातार सोशल मीडिया पर मोदी शासन के खिलाफ कवितायें लिखते रहे हैं. उनकी यह रचनाशीलता भवानी प्रसाद मिश्र की याद दिलाती है जब वे रोज तीन कवितायें आपातकाल के विरुद्ध लिखते रहे और बाद में उनकी पुस्तक ‘त्रिकाल संध्या’ भी आयी. 56 वर्षीय विमल कुमार की गत दो सालों में लिखी गयी कविताओं की पुस्तक ‘हत्या से आत्महत्या’ छपकर आयी है. उनकी इन कविताओं ने फेसबुक पर सबका ध्यान खींचा है. आखिर विमल कुमार को किन परिस्थितियों ने इन कविताओं को लिखने के लिए मजबूर किया, इस भेंटवार्ता में जानिए यह खुलासा –

-साहित्य की दुनिया में कहा जा रहा है कि आपने मोदी जी के खिलाफ इतनी कवितायें लिखी कि वह अब एक किताब के रूप में आ गयी है?
-सवाल मोदी का नहीं है. देखिये जब कोई लेखक कोई रचना करता है तो वह व्यक्ति विशेष पर नहीं बल्कि प्रवृतियों पर लिखता है. मोदी जी भी एक प्रवृति के प्रतीक हैं. उनकी कुछ प्रवृतियां इंदिरा गांधी में भी दिखाई दी थी और आज केजरीवाल में भी यह प्रवृति है. यह प्रवृति शक्ति संचयन की है, अधिनायक वाद की है. हम लोगों ने इन्दिरा जी का भी विरोध किया था, जेपी के छात्र आन्दोलन में. मेरी एक कविता कादम्बिनी में आपातकाल में सेंसर हो गयी थी. जब आपातकाल समाप्त हुआ तो वह कविता ‘सेंसर से रुकी कविता’ के रूप में छपी थी. हिन्दी में निराला ने नेहरूजी पर आलोचनात्मक कविता लिखी. बाबा नागार्जुन ने भी इंदिरा जी के खिलाफ कविता लिखी. बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर हिन्दी के अनेक लेखकों ने कवितायें लिखी. सिख दंगे पर लोगों ने कहानियां लिखी. हिन्दी की एक कहानीकार प्रत्यक्षा सिन्हा तो आज भी ८४ के दंगे पर कहानी लिख रही हैं. इस तरह गुजरात दंगे पर भी हिन्दी के कई लेखकों ने कवितायें लिखीं. देवी प्रसाद मिश्र मंगलेश डबराल राजेश जोशी आदि ने शानदार कवितायें लिखीं. मैंने भी एक कविता लिखी जो मेरे पिछले संग्रह में है. इसलिए मोदी जी के खिलाफ ये कवितायें दरअसल उन प्रवृतियों के खिलाफ कवितायें हैं. इन प्रवृतियों का विरोध करना उन्हें उजागर करना बेहद जरुरी है और इसलिए एक लेखाकिये धर्म निभाते हुए ये कवितायें लिखी हैं.

-लेकिन कुछ लोग तो मोदी जी को नायक बता रहे हैं?
-इंदिरा जी को तो लोग देवी और चंडी भी बताते थे. देवकांत बरुआ ने तो ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ का नारा दिया था. उनकी भी खूब जयकार होती थी. जब वह आती थीं तो मैदान में भीड़ जमा हो जाती थी और वह भाड़े की भीड़ नहीं होती थी. मैंने खुद 72-73 में पटना के गांधी मैदान में देखा था, उनका भाषण सुना था. लेकिन तब लेखक गण विरोध कर रहे थे. आज भी कर रहे हैं. मैं कोई अकेला व्यक्ति या लेखक नहीं हूँ जो विरोध कर रहा हूं. फेसबुक पर बहुत सारे कवि लिख रहे हैं. विष्णु नगर, मंगलेश डबराल, देवीप्रसाद मिश्र, प्रियदर्शन, रंजित वर्मा, दिनकर कुमार, स्वप्निल श्रीवास्तव जैसे अनेक लोग मोदी जी की नीतियों के खिलाफ कवितायें लिख रहे हैं.

-आखिर आप लोग क्यों लिख रहे हैं?
-देखिये लेखक का काम सच बताना है. वह अपना काम कर रहा है. वह बता रहा है कि मोदी जी ने लोगों को झूठे सपने दिखाए. उन्होंने जनता के साथ छल किया है. लोगों को बेवकूफ बनाया है. उनकी सरकार लगातार झूठ बोल रही है. सातवें वेतन आयोग को अरुण जेटली ने एतिहासिक बताया. क्या यह सरासर झूठ नहीं है. भ्रष्टाचार दूर करने की बात करते हैं और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित   संजीव चतुर्वेदी जैसे इमानदार अधिकारी को लगातार दो साल से परेशान कर रहे हैं. अडानी का दो सौ करोड़ माफ़ कर दिया. अमीरों को टैक्स छूट के नाम पर सब्सिडी और रेल यात्रा करनेवाले बूढों से रियायत को छोड़ने की बात कर रहे. पहले खुद अपनी पार्टी के सांसदों से यात्रा रियायत, टेलीफ़ोन सब्सिडी छोड़ने की बात कहते. पहले कहा गया कि अभी नयी सरकार है, अभी मोहलत दो. अब उनको समय दिया जाय. जनता ने दो साल का समय दिया लेकिन कोई नतीजा नहीं. महंगाई बेरोजगारी के मोर्चे पर विफल. केवल प्रचार से लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे.

-लेकिन क्या आपने कांग्रेस की नीतियों के विरोध में कवितायें लिखीं?
-लिखीं. बिलकुल लिखी. आपातकाल में और उसके बाद भी. मनमोहन सिंह ने जब विदेशी पूंजी निवेश शुरू किया तो मैंने एक कविता लिखी– ”मैं इस देश को बेच कर चला जाऊंगा”. दूसरी कविता लिखी ”Miss FDI मेरी जान”. इसलिए यह कहना गलत है कि लेखक कांग्रेस का विरोध नहीं करते थे. सच्चा लेखक हमेशा विपक्ष में, शाश्वत विपक्ष में रहता है. यह सच है कि कुछ लेखक कांग्रेस के साथ थे वहीं निर्मल वर्मा जैसे लोगों ने भजपा का समर्थन किया था. विद्यानिवास मिश्र भी भाजपा के साथ थे. आज भी कमल किशोरे गोयनका, नरेंद्र कोहली सरकार के साथ हैं लेकिन हिन्दी के लेखकों का बड़ा तबका सत्ता के साथ कभी नहीं रहा. जब श्रीकांत वर्मा कांग्रेस के साथ थे तब रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर अलग थे. रघुवीर सहाय तो दिनमान के संपादक के रूप में हटाये गए क्योंकि इंदिरा जी नहीं चाहती थीं उन्हें. उनकी जगह नंदन जी को संपादक बनाया गया जिन्होंने आते ही इंदिरा जी पर कवर स्टोरी निकाली लेकिन सहाय जी ने यह काम नहीं किया. धर्मवीर भारती ने भी जयप्रकाश नारायण का साथ दिया था. इसलिए भाजपा का यह तर्क गलत है कि लेखकों ने हमेशा कांग्रेस का साथ दिया. सच तो यह है हिन्दी का कोई बड़ा लेखक संघ परिवार भाजपा का समर्थक नहीं रहा. प्रेमचंद, निराला पन्त, महादेवी, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्ता, नवीन जी, आचार्य शिवपूजन सहाय, राहुल जी, बेनीपुरी, दिनकर भी समर्थक नहीं थे. 

-अपने संग्रह के बारे में बताएं? कविताओं के विषय क्या हैं?
-मैंने करीब सौ कवितायेँ फेसबुक पर सीधे लिखीं. मुझे इतनी घुटन हो रही देश की हालत से कि मैं खुद को लिखने से रोक नहीं पाया. दो साल पहले 16 मई के बाद देश वह नहीं रहा जो उसके पहले था. देश की हालत पहले भी ख़राब थी लेकिन आज तो सरेआम झूठ बोला जा रहा है कि अच्छे दिन आ गए, महंगाई ख़त्म हो गयी, लोगों को रोजगार मिल रहा है, देश में बिजली की कमी नहीं है आदि आदि. इसलिए मैंने इस झूठ को बेनकाब किया है कविताओं में. प्रधानमंत्री सेल्समैन और इवेंट मैनेजर सेल्फी युग के नायक हैं. वह नेहरु की तरह राजनेता नहीं, लोहिया की तरह नायक नहीं. हमारे प्रधानमंत्री का कद, उनका ज्ञान, व्यक्तित्व, उनकी भाषा शैली में भी कोई गरिमा नहीं है. वे उन लोगों के नायक हैं जो धीर गंभीर लोग नहीं. जो छिछले लोग हैं. उनमे उर्जा और दमखम तो है पर उसकी दिशा और नीयत क्या है. चुनाव जीतने से लेकर बाँसुरी और ड्रम बजने पर भी कवितायें हैं. लव जिहाद पर भी. ‘स्मार्ट सिटी में हत्या’, ‘गुजरात के शिलालेख’ जैसी कवितायें है. रोहित वेमुला पर भी. यह संग्रह पंसारे कलबुर्गी धभोलकर और वेमुला को समर्पित है. ‘हत्या से आत्महत्या’ तक इन चारों की शहादत का प्रतीक है.

-आप एक पत्रकार हैं. सालों से संसद कवर करते हैं. एक तरफ आप इस तरह की कवितायें लिखते हैं. दूसरी तरफ मोदी जी की खबरें भी लिखते हैं. आप संतुलन कैसे कायम करते हैं?
-देखिये मैं मोदी जी की नहीं बल्कि एक प्रधानमंत्री की खबर लिखता हूं. ख़बरों में हमें तटस्थ होना चाहिए. लेकिन जैसी भक्ति विशेषकर न्यूज चैनलों में दिखाई दे रही है, वह स्तब्धकारी है. मीडिया मनमोहन सिंह की खबरें उस तरह नहीं दिखाता था जिस तरह आज के पीएम मोदी की दिखा रहा है. किसी भी मुल्क में मीडिया ने इतना पक्षपात नहीं किया जितना भारतीय मीडिया कर रहा है. दरअसल 80 प्रतिशत पत्रकारों के पास दृष्टि नहीं है. संपादक भी दृष्टिहीन हैं. इसलिए मैं पत्रकारिता को शब्दों की क्लर्की कहता हूँ. मैंने खुद को कभी पत्रकार होने का दावा नहीं किया. लेकिन हमें निष्पक्षता बरक़रार रखनी चाहिए. मैं हर दल की ख़बरें लिखता हूँ. विरोध अपनी जगह पर है. प्रोफेशन अलग. लेकिन हमें जनता के साथ रहना चाहिए. सत्ता के साथ नहीं. चाहे वह लालू नीतीश या येचुरी की सत्ता क्यों न हो.

कवि और पत्रकार विमल कुमार से संपर्क vimalchorpuran@gmail.com या +91 9968400416 के जरिए कर सकते हैं.

विमल के कविता संग्रह ‘हत्या से आत्महत्या’ तक की कुछ कविताएं पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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गुजरात फाइल्‍स : अफसरों की जुबानी-मोदी अमि‍त शाह की काली कहानी

कुछ सालों पहले तक उत्तर प्रदेश पूरे देश का नेतृत्व किया करता था। लेकिन लगता है कि देश को सात-सात प्रधानमंत्री देने वाले इस सूबे की राजनीति अब बंजर हो गई है। इसकी जमीन अब नेता नहीं पिछलग्गू पैदा कर रही है। ऐसे में सूबे को नेता आयातित करने पड़ रहे हैं। इस कड़ी में प्रधानमंत्री मोदी से लेकर उनके शागिर्द अमित शाह और स्मृति ईरानी तक की लंबी फेहरिस्त है। स्तरीय नेतृत्व हो तो एकबारगी कोई बात नहीं है। लेकिन चीज आयातित हो और वह भी खोटा। तो सोचना जरूर पड़ता है। यहां तो तड़ीपार से लेकर दंगों के सरदार और फर्जी डिग्रीधारी सूबे को रौंद रहे हैं। इस नये नेतृत्व की हकीकत क्या है। इसकी कुछ बानगी पत्रकार राना अयूब की गुजरात दंगों और दूसरे गैर कानूनी कामों पर खोजी पुस्तक ‘गुजरात फाइल्स’ में मौजूद है। 

मोदी जी और अमित शाह से जुड़े इसके कुछ अशों को उसी रूप में देने की हम कोशिश कर रहे हैं जिसमें गुजरात के आला अफसरों के इनके बारे में विचार हैं। इसको पढ़ने के बाद आपके लिए इस ‘आयातित नेतृत्व’ के बारे में किसी नतीजे पर पहुंचना आसान हो जाएगा। बातचीत के कुछ अंशः

जी एल सिंघल, पूर्व एटीएस चीफ, गुजरात

प्रश्नः ऐसी क्या चीज है जिसके चलते गुजरात पुलिस हमेशा चर्चे में रहती है? खासकर विवादों को लेकर?

उत्तरः यह एक हास्यास्पद स्थिति है। अगर कोई शख्स अपनी शिकायत लेकर हमारे पास आता है और हम उसे संतुष्ट कर देते हैं तो उससे सरकार नाराज हो जाती है। और अगर हम सरकार को खुश करते हैं तो शिकायतकर्ता नाराज हो जाता है। ऐसे में हम क्या करें? पुलिस के सिर पर हमेशा तलवार लटकी रहती है। एनकाउंटर में शामिल ज्यादातर अफसर दलित और पिछड़ी जाति से थे। राजनीतिक व्यवस्था ने इनमें से ज्यादातर का पहले इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया।

प्रश्नः मेरा मतलब है कि आप सभी वंजारा, पांडियन, अमीन, परमार और ज्यादातर दूसरे अफसर निचली जाति से हैं। सभी ने सरकार के इशारे पर काम किया। जिसमें आप भी शामिल हैं। ऐसे में ये इस्तेमाल कर फेंक देने जैसा नहीं है?

उत्तरः ओह हां, हम सभी। सरकार ऐसा नहीं सोचती है। वो सोचते हैं कि हम उनके आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। और बने ही हैं उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए। प्रत्येक सरकारी नौकर जो भी काम करता है वो सरकार के लिए करता है। और उसके बाद समाज और सरकार दोनों उसे भूल जाते हैं। वंजारा ने क्या नहीं किया। लेकिन अब कोई उसके साथ खड़ा नहीं है।

प्रश्नः लेकिन ये अमित शाह के साथ क्या चक्कर है। मैंने आपके अफसरों के बारे में भी सुना………मेरा मतलब है कि वहां अफसर-राजनीतिक गठजोड़ जैसी कुछ बात है। खास कर एनकाउंटरों के मामले में। मुझे ऐसा बहुत सारे दूसरे मंत्रियों से मिलने के बाद महसूस हुआ।

उत्तरः देखिये, यहां तक कि मुख्यमंत्री भी। सभी मंत्रालय और जितने मंत्री हैं। सब रबर की मुहरें हैं। सभी निर्णय मुख्यमंत्री द्वारा लिए जाते हैं। जो भी फैसले मंत्री लेते हैं उसके लिए उन्हें मुख्यमंत्री से इजाजत लेनी पड़ती है। सीएम कभी सीधे सीन में नहीं आते हैं। वो नौकरशाहों को आदेश देते हैं।

प्रश्नः उस हिसाब से तो आपके मामले में अगर अमित शाह गिरफ्तार हुए तो सीएम को भी होना चाहिए था?

उत्तरः हां, ये मुख्यमंत्री मोदी जैसा कि अभी आप बोल रही थीं अवसरवादी है। अपना काम निकाल लिया।

प्रश्नः अपना गंदा काम

उत्तर- हां

प्रश्नः लेकिन सर आप लोगों ने जो किया वो सब सरकार और राजनीतिक ताकतों के इशारे पर किया। फिर वो क्यों जिम्मेदार नहीं हैं?

उत्तरः व्यवस्था के साथ रहना है तो लोगों को समझौता करना पड़ता है।

जीएल सिंघल के बाद राना अयूब की मुलाकात गुजरात एटीएस के पूर्व डायरेक्टर जनरल राजन प्रियदर्शी से हुई। वो बेहद ईमानदार और अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले नौकरशाह के तौर पर जाने जाते रहे हैं। दलित समुदाय से आने के चलते व्यवस्था में उन्हें अतिरिक्त परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन वो अपने पद की गरिमा को हमेशा बनाए रखे। शायद यही वजह है कि वह सरकार के किसी गलत काम का हिस्सा नहीं बने। नतीजतन किसी भी गलत मामले में कानून के शिकंजे में नहीं आए। बातचीत के कुछ अंशः

राजन प्रियदर्शी, पूर्व डायरेक्टर जनरल, एटीएस गुजरात

प्रश्नः आपके मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में बहुत लोकप्रिय हैं?

उत्तरः हां, वो सबको मूर्ख बना लेते हैं और लोग भी मूर्ख बन जाते हैं।

प्रश्नः यहां कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं न? शायद ही कोई अफसर ठीक हो?

उत्तरः बहुत कम ही ऐसे हैं। ये शख्स मुख्यमंत्री पूरे राज्य में मुसलमानों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार है।

प्रश्नः जब से मैं यहां आई हूं प्रत्येक व्यक्ति सोहराबुद्दीन एनकाउंटर की बात कर रहा है?

उत्तरः पूरा देश उस एनकाउंटर की बात कर रहा है। मंत्री के इशारे पर सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति की हत्या की गई थी। मंत्री अमित शाह वह कभी भी मानवाधिकारों में विश्वास नहीं करता था। वह हम लोगों को बताया करता था कि ‘मैं मानवाधिकार आयोगों में विश्वास नहीं करता हूं’। अब देखिये, अदालत ने भी उसे जमानत दे दी।

प्रश्नः तो आपने उनके (अमित शाह) मातहत कभी काम नहीं किया?

उत्तरः किया था। जब मैं एटीएस का चीफ था।……….एक दिन उसने मुझे अपने बंग्ले पर बुलाया। जब मैं पहुंचा तो उसने कहा ‘अच्छा, आपने एक बंदे को गिरफ्तार किया है ना, जो अभी आया है एटीएस में, उसको मार डालने का है।’ मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई। तब उसने कहा कि ‘ देखो मार डालो, ऐसे आदमी को जीने का कोई हक नहीं है’। उसके बाद मैं सीधे अपने दफ्तर आया और अपने मातहतों की बैठक बुलाई। मुझे इस बात का डर था कि अमित शाह उनमें से किसी को सीधे आदेश देकर उसे मरवा डालेगा। इसलिए मैंने उन्हें बताया कि मुझे गिरफ्तार शख्स को मारने का आदेश दिया गया है। लेकिन कोई उसे छूएगा भी नहीं। उससे केवल पूंछताछ करनी है। मुझसे कहा गया था। लेकिन मैं उस काम को नहीं कर रहा हूं। इसलिए आप लोग भी ऐसा नहीं करेंगे। आपको पता है जब मैं राजकोट का आईजीपी था तब जूनागढ़ के पास सांप्रदायिक दंगे हुए। मैंने कुछ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। गृहमंत्री (तब गोर्धन झड़पिया थे) ने मुझे फोन किया और पूछा राजनजी आप कहां हैं? मैंने कहा सर मैं जूनागढ़ में हूं। उसके बाद उन्होंने कहा कि अच्छा तीन नाम लिखिए और इन तीनों को गिरफ्तार कर लीजिए। मैंने कहा कि ये तीनों मेरे साथ बैठे हुए हैं और तीनों मुसलमान हैं और इन्हीं की वजह से हालात सामान्य हुए हैं। यही लोग हैं जिन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को एक दूसरे के करीब लाने का काम किया है। और फिर दंगा खत्म हुआ है। उसके बाद उन्होंने कहा कि देखो सीएम साहिब का आदेश है। तब यही शख्स नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री था। मैंने कहा कि सर मैं ऐसा नहीं कर सकता। भले ही यह सीएम का आदेश ही क्यों न हो। क्योंकि ये तीनों निर्दोष हैं।

प्रश्नः तो क्या यहां की पुलिस मुस्लिम विरोधी है?

उत्तरः नहीं, वास्तव में ये नेता हैं। ऐसे में अगर कोई अफसर उनकी बात नहीं सुनता है तो ये उसे किनारे लगा देते हैं।

प्रश्नः वो व्यक्ति जिसको अमित शाह खत्म करने की बात कहे थे क्या वो मुस्लिम था?

उत्तरः नहीं, नहीं, वो उसको किसी व्यवसायिक लॉबी के दबाव में खत्म कराना चाहते थे।

अशोक नरायन गुजरात के गृह सचिव रहे हैं। 2002 के दंगों के दौरान सूबे के गृह सचिव वही थे। नरायन रिटायर होने के बाद अब गांधीनगर में रहते हैं। वह एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं। साहित्य और धर्मशास्त्र पर उनकी अच्छी पकड़ है। एक कवि होने के साथ ऊर्दू की शेरो-शायरी में भी रुचि रखते हैं। उन्होंने दो किताबें भी लिखी हैं। राना अयूब की अशोक नरायन से दिसंबर 2010 में मुलाकात हुई। इसके साथ ही उन्होंने गुजरात के पूर्व आईबी चीफ जीसी रैगर से भी मुलाकात की थी। पेश है दो विभागों के सबसे बड़े अफसरों से बातचीत के कुछ अंशः

अशोक नरायन, पूर्व गृहसचिव, गुजरात

प्रश्नः मुख्यमंत्री को इतना हमले का निशाना क्यों बनाया गया? ऐसा इसलिए तो नहीं हुआ क्योंकि वो बीजेपी से जुड़े हुए थे?

उत्तरः नहीं, क्योंकि दंगों के दौरान उन्होंने वीएचपी (विश्व हिंदू परिषद) को सहयोग दिया था। उन्होंने ऐसा हिंदू वोट हासिल करने के लिए किया था। जैसा हुआ भी। जो वो चाहते थे वैसा उन्होंने किया और वही हुआ भी।

प्रश्नः क्या उनकी भूमिका पक्षपातपूर्ण नहीं थी? (गोधरा कांड के संदर्भ में)

उत्तरः वो गोधरा की घटना के लिए माफी मांग सकते थे। वो दंगों के लिए माफी मांग सकते थे।

प्रश्नः मुझे बताया गया कि मोदी ने एक पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई थी उन्होंने उकसाने का काम किया था। जैसे कि गोधरा से लाशों को अहमदाबाद लाना। और इसी तरह के कुछ दूसरे फैसले।

उत्तरःमैंने एक बयान दिया था जिसमें मैंने कहा था कि वही एक शख्स हैं जिन्होंने गोधरा ट्रेन कांड की लाशों को अहमदाबाद लाने का फैसला लिया था।

प्रश्नः इसका मतलब है, फिर सरकार आप के खिलाफ हो गई होगी?

उत्तरः देखिए, शवों को अहमदाबाद लाना आग में घी का काम किया। लेकिन वही शख्स हैं जिन्होंने ये फैसला लिया।

प्रश्नः राहुल शर्मा का क्या मामला है?

उत्तरः वो विद्रोहियों में से एक हैं।

प्रश्नः क्या मतलब?

उत्तरः उन्होंने किसी की सहायता नहीं की। वो केवल दंगों को नियंत्रित करना चाहते थे।

प्रश्नः क्या उन्हें भी किनारे लगा दिया गया?

उत्तरः उनका तबादला कर दिया गया। तबादले के खिलाफ डीजीपी के विरोध, चक्रवर्ती के विरोध और इन दोनों की राय से मेरी सहमति के बावजूद ऐसा किया गया।

प्रश्नः सिर्फ इसलिए क्योंकि वो मुख्यमंत्री के खिलाफ गए थे?

उत्तरः निश्चित तौर पर।

प्रश्नः एनकाउंटरों के बारे में आप का क्या कहना है?

उत्तरः एनकाउंटर धार्मिक आधार पर कम राजनीतिक ज्यादा होते हैं। अब सोहराबुद्दीन मामले को लीजिए। वो नेताओं के इशारे पर मारा गया था। उसके चलते अमित शाह जेल में हैं।

जी सी रैगर, पूर्व इंटेलिजेंस हेड, गुजरात

प्रश्नः यहां एनकाउंटरों का क्या मामला है? उस समय आप कहां थे?

उत्तरः मैं कई लोगों में से एक था। एक अपराधी (सोहराबुद्दीन) एक फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया। इसमें सबसे मूर्खतापूर्ण बात ये रही कि उन्होंने उसकी पत्नी को भी मार दिया।

प्रश्नः इसमें कोई मंत्री भी शामिल था?

उत्तरः गृहमंत्री अमित शाह।

प्रश्नः उनके मातहत काम करना बड़ा मुश्किल भरा रहा होगा?

उत्तरः हम उनसे सहमत नहीं थे। हम उनके आदेशों का पालन करने से इनकार कर देते थे। यही वजह है कि एनकाउंटर मामलों में गिरफ्तारी से हम बच गए। यह शख्स (सीएम) बहुत चालाक है। वो हर चीज जानता है। लेकिन एक निश्चित दूरी बनाए रखता है। इसलिए वह इसमें (सोहराबुद्दीन मामले में) नहीं पकड़ा गया।

प्रश्नः मोदी जी से पहले एक मुख्यमंत्री थे केशुभाई पटेल। वो कैसे थे?

उत्तरः मोदी जी की तुलना में वो संत थे। मेरा मतलब है कि केशुभाई जानबूझ कर किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेंगे। उसका जो भी धर्म हो। कोई मुस्लिम है इसलिए उसे परेशान किया जाएगा। ऐसा नहीं था।

प्रश्नः वास्तव में मैं पीसी पांडे से भी मिली।

उत्तरः ओह, वो पुलिस कमिश्नर थे।

प्रश्नः अच्छा, तो आप दोनों दंगे के दौरान एक साथ काम कर रहे थे?

उत्तरः हां, हमें करना पड़ा। मैं आईबी चीफ था।

प्रश्नः दूसरे जिन ज्यादातर अफसरों से मैं मिली उनका कहना था कि पांडे पर सीएम बहुत भरोसा करते हैं। और दंगों के दौरान अपने सारे काम उन्हीं के जरिये कराये थे?

उत्तरः अब, आपको दंगों के बारे में हर चीज पता ही है। (हंसते हुए) ‘आप जानती हैं ये हरेन पांड्या मामला एक ज्वालामुखी की तरह है। एक बार सच्चाई सामने आने का मतलब है कि मोदी जी को घर जाना पड़ेगा। वो जेल में होंगे’।

हरेन पांड्या हत्याकांड का सच…. तब के गुजरात के डीजीपी के चक्रवर्ती और मुख्यमंत्री के चहते अफसर पीसी पांडे से राना अयूब की बातचीत के कुछ अंशः

के चक्रवर्ती, पूर्व डीजीपी गुजरात

प्रश्नः क्या वो (सीएम मोदी) सत्ता का भूखा है?

उत्तरः हां

प्रश्नः तो क्या प्रत्येक चीज और हर व्यक्ति पर विवाद है वो दंगे हों या कि एनकाउंटर?

उत्तरः हां, हां। एक गृहमंत्री भी गिरफ्तार हुआ था।

प्रश्नः सभी अफसर उसे नापसंद करते थे?

उत्तरः हां, हां। प्रत्येक व्यक्ति उससे नफरत करता था। अमित शाह को बचाने के लिए पूरा संगठित प्रयास किया जा रहा था। इस काम में नरेंद्र मोदी के साथ तब के राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने 27 सितंबर 2013 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था- “अपनी गिरती लोकप्रियता के चलते कांग्रेस की रणनीति बिल्कुल साफ है। कांग्रेस बीजेपी और नरेंद्र मोदी से राजनीतिक तौर पर नहीं लड़ सकती है। उसको हार सामने दिख रही है। खुफिया एजेंसियों के बेजा इस्तेमाल के जरिये वो गलत तरीके से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तब के गृहमंत्री अमित शाह और दूसरे बीजेपी नेताओं को गलत तरीके से फंसाने की कोशिश कर रही है।”

पीसी पांडे, 2002 में पुलिस कमिश्नर, अहमदाबाद, मौजूदा समय में डीजीपी, गुजरात

प्रश्नः लेकिन देखिये, मोदी को मोदी दंगों ने बनाया। यह सही बात है ना?

उत्तरः हां, उसके पहले मोदी को कौन जानता था? मोदी कौन था? वो दिल्ली से आए। उसके पहले हिमाचल में थे। वो हरियाणा और हिमाचल जैसे मामूली प्रदेशों के प्रभारी थे।

प्रश्नः यह उनके लिए ट्रंप कार्ड जैसा था। सही कहा ना?

उत्तरः बिल्कुल ठीक बात….अगर दंगे नहीं होते वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं जाने जाते। उसने उन्हें मदद पहुंचाई। भले नकारात्मक ही सही। कम से कम उन्हें जाना जाने लगा।

प्रश्नः तो आप इस शख्स को पसंद करते हैं?

उत्तरः मेरा मतलब है हां, इस बात को देखते हुए कि 2002 के दंगों के दौरान मैं उनके साथ था। इसलिए ये ओके है। 

वाई ए शेख, हरेन पांड्या हत्या मामले में मुख्य जांच अधिकारी

प्रश्नःये हरेन पांड्या मामला है क्या?

उत्तरः आप जानती हैं ये हरेन पांड्या मामला एक ज्वालामुखी की तरह है। एक बार सच्चाई सामने आने का मतलब है कि मोदी जी को घर जाना पड़ेगा। वो जेल में होंगे।

प्रश्नः इसका मतलब है कि सीबीआई ने अपनी जांच नहीं की?

उत्तरः उसने केवल मामले को रफा-दफा किया। उसने गुजरात पुलिस अफसरों के पूरे सिद्धांत पर मुहर लगा दी। सीबीआई अफसर सुशील गुप्ता ने गुजरात पुलिस की नकली कहानी पर मुहर लगा दी। गुप्ता ने सीबीआई से इस्तीफा दे दिया। अब वो सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे हैं। वो रिलायंस के वेतनभोगी हैं। उनसे पूछिए उन्होंने क्यों सीबीआई से इस्तीफा दिया। वो सुप्रीम कोर्ट में बैठते हैं। उनसे मिलिए।

प्रश्नः क्या ये एक राजनीतिक हत्या है?

उत्तरः प्रत्येक व्यक्ति शामिल था। आडवानी के इशारे पर मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया था। क्योंकि वो नरेंद्र मोदी के संरक्षक थे। इसलिए उन्हें पाक-साफ साबित करने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया गया। मेरा मतलब है कि लोग स्थानीय पुलिस की कहानी पर विश्वास नहीं करेंगे। लेकिन सीबीआई की कहानी पर भरोसा कर लेंगे।

प्रश्नः उसमें किसकी भूमिका थी? बारोट या वंजारा?

उत्तरः सभी तीनों की। बारोट कहीं और था और चुदसामा को डेपुटेशन पर ले आया गया था। उन्हें चुदसामा मिल गया था। इस एनकाउंटर में पोरबंदर कनेक्शन भी है। ये एक ब्लाइंड केस है।

प्रश्नः सीबीआई ने इसको क्यों हाथ में लिया?

उत्तरः सीबीआई ने इस केस में मोदी को बचाने का काम किया।

साभारः गुजरात फाइल्स

अनुवाद- महेंद्र मि‍श्र

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फिर-फिर मुठभेड़ करेगी यह उन्मत्त भीड़

हार्दिक पटेल आज की तारीख में एक बिसरा हुआ नाम है। ज्यादा आशंका है कि हुक्मरान-ए-दौरां इस नाम को हमेशा के लिए दफन करने की पूरी कोशिश करेंगे। वे सफल हो या न हों, लेकिन जो मुद्दे हार्दिक पटेल ने उठाए हैं, वे प्रथम दृष्ट्या बेढंगे दिखने के बावजूद पूरी शिद्दत और तार्किकता के साथ शासक वर्ग के सामने फिर-फिर मुठभेड़ करने के लिए उठ खड़े होंगे। इतिहास गवाह है गुजरात में ही चिमन भाई पटेल के मुख्यमंत्रित्व काल में छात्रों के स्वतः स्फूर्त आंदोलन को तत्कालीन सरकार ने भले ही दबा दिया हो, लेकिन उसकी तार्किक परिणति इमरजेंसी और फिर इन्दिरा गांधी की बेदखली के रूप में सामने आयी। और भी कई उदाहरण हैं। उस समय प्रभुवर्ग ने गुजरात के छात्रों को दिग्भ्रमित बताया और भी तमाम लांछन लगाये गये। जैसा आज भी हो रहा है।

कहा जा रहा है कि आंदोलन को कांग्रेस की फण्डिंग है और भी कई कारण गिनाये जा रहे हैं। हो सकता है कि यह सब कारक हार्दिक पटेल के आंदोलन में सक्रिय हों, लेकिन तब भी ऐसे स्वतः स्फूर्त आंदोलन में उमड़ी जनता की अपनी शिकायतें होती हैं, जो कई बार पूरी तरह से स्पष्ट और परिभाषित भी नहीं होतीं, लेकिन जनता अपनी उन उलझी शिकायतों का तत्कालिक समाधान चाहती है। इस आंदोलन को मोटे तौर पर समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। फर्ज कीजिए-तीन दोस्त है। एक आईएएस बन जाता है, दूसरा बड़ा काश्तकार है, वह अपनी खेती संभालता है, और तीसरा बड़े व्यापारी का बेटा है, सो अपना पुश्तैनी कारोबार संभालता है। जीवन की संध्या बेला में ज्यादा सम्भावना है कि सबसे ऐश्वर्यशाली और स्थिर जीवन आईएएस ने ही जिया होगा। बड़े काश्तकार के सामने जीवन भर कृषि जन्य समस्याएं मुंह बाये रही होंगी। कई बार प्रकृति की बेरुखी से अपनी बर्बाद फसल को देखकर उसने अफसोस किया होगा। यही हाल बड़े व्यापारी का भी हुआ होगा। ऐश्वर्यशाली जीवन जीने के बावजूद जीवन भर उसने व्यापारिक जगत की उठा-पटक का दंष झेला होगा। और उससे उत्पन्न अस्थिरता उसकी मन स्थिति को निरन्तर विचलित करती रही होगी।

लाख मनमोहक प्रयासों, विकास के नारों और भूमण्डलीकरण के शोर के बावजूद अभी भी भारतीय समाज में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ है। खेती पुश्तैनी धंधा है उसी तरह व्यापार। खेती में लगी जातियां परम्परागत हैं और उसी तरह व्यापारी और व्यवसायी घराने भी। हां एक बहुत बड़ा फर्क हुआ है, और इस फर्क ने 1991 में मनमोहन सिंह के आने के पहले तक आकार ले लिया था। आरक्षण के चलते पिछड़ों और दलितों के एक तबके ने सरकारी नौकरियों की सम्पन्नता और स्थिरता का स्वाद ले लिया था। 1991 से मनमोहक नीतियां लागू होने के बाद और आज तक उसके नैरन्तर्य के बावजूद एक बहुत छोटे तबके को छोड़ दिया जाये तो नये स्थिर और सम्पन्न तबकों का निर्माण नहीं हुआ है। खेती नष्ट हो चुकी है, किसान आत्म हत्यायें कर रहे हैं और व्यवसायी अस्थिर व्यापारिक माहौल में सरकार की नई-नई नीतियों में स्थिरता खोजने में जुटे हैं।

मनमोहक नीतियों के कई परिणाम जो ज्यादा चर्चा में नहीं आये, खासे भयावह रहे। किसानों की आत्महत्याएं तो लोग देख ही रहे हैं, लेकिन शेयर बाजार की उठा-पटक में बर्बाद लाखों लोगों का अवसाद ग्रस्त जीवन और कई बार मृत्यु तक लोगों का उतना ध्यान नहीं गया। तमाम नई डिग्रियां जिनके बारे में दावा था, वे नये आर्थिक माहौल में छात्रों के लिए सुनहरे जीवन का दरवाजा है, उनके लिए मृगतृष्णा साबित हुई। राज्य दर राज्य बीटेक पास लाखों बेरोजगारों की भीड़, इसका एक उदाहरण है। कुल मिलाकर यह कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि मनमोहक नीतियों से सम्पन्नता आयी तो जरूर लेकिन वह स्थाई नहीं बल्कि अस्थिर सम्पन्नता है। पिछली मंदी में जिसका लोगों ने भयावह अनुभव भी किया है। रातों रात लोग राजा से रंक बन गये। एक झटके में नौकरियां गवाकर मजदूरों की तरह जिन्दाबाद-मुर्दाबाद का नारा लगाने वाले पायलटों का नजारा लोगों की स्मृति में ताजा होगा।

इस सारी उथल-पुथल के दौर में अगर कोई वर्ग लगातार सम्पन्न और स्थित जीवन बिता रहा है, तो वह सरकारी नौकर है और लगातार बढ़ रही आबादी के मद्देनजर सरकारी नौकरियों की संख्या अपेक्षाकृत अनुपात में कम होती जा रही है। ऐसे में आरक्षण ही लोगों को एक मात्र विकल्प नजर आ रहा है, जो अर्थव्यवस्था रूपी रेगिस्तान के नखलिस्तान में पहुंचने का एक मात्र साधन है, खास तौर से उन वर्गों के लिए जो परम्परागत रूप से सरकारी नौकरियां कैसे हासिल हों, इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं हैं। षायद यह कारण हो सकता है, जो लोगों का हुजूम हार्दिक पटेल के पीछे लामबन्द हो गया। अगर ऐसा है तो तय जानिए हुक्मरान हार्दिक पटेल को तो खत्म कर सकते हैं, लेकिन ये मुद्दे दिन पर दिन विकराल होकर सत्ताधीषों का जीना हराम कर देंगे।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकारिता में रोजगार की हालत से दुखी मुंबई के एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी जी को खुला पत्र लिखा

Subject: मोदी जी आप से निवेदन, पत्रकारिता क्षेत्र में रोजगार के लिए कुछ कदम उठाएंगे

To:

Prime minister

pmosb@pmo.nic.in

PresidentofIndia

presidentofindia@rb.nic.in

rti-pmo.applications@gov.in

सेवा में
श्रीमान नरेंद्र मोदी जी
प्रधानमंत्री

नमस्कार,

मैं आज एक विश्वास के साथ यह पत्र आप को लिख रहा हूँ कि अन्य विभागों की तरह लोकशाही के चार स्तंभ में से एक पत्रकारिता में युवाओ के रोजगार पर भी ध्यान देंगे। अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक देश के विकास में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। समय के साथ पत्रकारिता में बदलाव आया है। जैसे कि आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता का उद्देश्य अंग्रेजों से कलम की लड़ाई थी लेकिन आज समय के अनुसार यह बदलकर व्यापार बन गया है। आज के युवा पत्रकारिता की डिग्री लेकर अपना भविष्य बनाने में लगे हैं। डॉ भीमराव आंबेडकर, लोकमान्य गंगाधर तिलक, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आज के वरिष्ठ पत्रकारों को अपने आदर्श के रूप में देखते हुए युवा अपना भविष्य पत्रकारिता में बनाने के उद्देश्य से पत्रकारिता में आ रहे हैं।

मैं भी उन्हीं युवाओं की तरह पत्रकारिता में अपना भविष्य बनाने के उद्देश्य से पत्रकारिता की पढाई कर पत्रकारिता की शुरुआत की। पत्रकारिता में तो हमें बहुत कुछ पढ़ाया गया लेकिन वह सब पढाई तक ही अच्छा लगा। लेकिन पत्रकारिता की शुरुवात मैंने नवी मुंबई के वाशी से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार में 2006 से किया।

पहली बार जब उस अखबार में गया तो संपादक जी ने बकायदा मेरा इंटरव्यू लिया उसके बाद खबर लाने के साथ ही मुझे अखबार भी साथ में पकड़ा दिया कि इसे बाँटते जाना। खैर मुझे सीखना था इसलिए मैंने सोचा कि एकाध दिन कर देते हैं लेकिन बार बार अखबार बाँटने का काम दिए जाने के कारण मैंने वहां काम करना छोड़ दिया। उसके बाद मुंबई से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों में 2007 तक काम किया। इस दौरान कई जगह मेरा वेतन भी नहीं मिला। इस बीच 2007 में हमारा महानगर अखबार से जुड़ा और आज तक जुड़ा रहा। कंपनी के कुछ डायरेक्टरों ने मुझे और कुछ स्टाफ का ट्रांसफर कर दिया जिसके कारण हम मुंबई के बाहर ज्वाइन नहीं किये। 2006 से लेकर अभी तक मैंने जितने भी अखबारों में काम किया वहां पत्रकारों का कोई भविष्य नजर नहीं आया। हां इतना जरूर देखा हूं कि जो नेताओं, मालिकों की चापलूसी और पुलिस की दलाली कर सकता है वह सफल है। हम भी मालिक के कई काम किये लेकिन चापलूसी नहीं कर पाये जिसके कारण आज भी चाल में छोटे मकान में रह रहे हैं।

मोदी जी, आप के प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही देश के अधिकतर युवाओं और नागरिकों को विश्वास था कि हर क्षेत्र में रोजगार के लिए कदम उठाएंगे। आप कर भी रहे हैं लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाये हैं। पत्रकारिता की पढाई पूरी करने के लिए देश भर में रोज नए- नए, बड़े-बड़े कॉलेज इंस्टीट्यूट खुल रहे हैं। उन कॉलेजों इंस्टीट्यूट में युवाओं को पत्रकारिता के गुण सिखाये जा रहे हैं लेकिन रोजगार के लिए कोई मार्ग नहीं है। कुछ युवाओं का नसीब सही माना जाए या उनका भाग्य माना जाए जो सफल हो जाते हैं नौकरी पाने में लेकिन अधिकतर युवक नौकरी की तलाश में भटकते रहते हैं। नौकरी नहीं मिलने पर अपने आप को कोसते रहते हैं कि आखिर क्यों मैं अपना समय पत्रकारिता में गंवा दिए। लाखों की संख्या में देश के युवक आज अपने आप को उसी तरह कोस रहे हैं। जो नौकरी कर भी रहे हैं उसमें से बहुत कम ही हैं जिन्हें उनके मेहनत के अनुसार मेहनताना मिल पाता है वरना गधे की तरह मजदूरी कर इस उम्मीद में समय बिता रहे हैं कि आज ना कल कुछ अच्छा होगा।

मोदी जी, आप से भी यही उम्मीद है कि पत्रकारिता के क्षेत्र को मजबूत करें जिससे युवाओं को रोजगार मिल सके। अगर नहीं मजबूत कर सकते या पत्रकारिता में रोजगार नहीं उपलब्ध करा सकते तो पत्रकारिता के उन कॉलेजों और इंस्टीट्यूट को बंद कर दे जिससे उन युवाओं के साथ धोखा ना हो सके जो इस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के उद्देश्य से आना चाहते हैं। मोदी जी आप के सामने मैं बहुत ही छोटा हु ।लेकिन उन लाखों युवाओं की तरफ से यह पत्र लिखा हूं। पता नहीं कि आप इसे पढ़ेंगे भी या नहीं? लेकिन हम उम्मीद लगाये हैं कि विदेश दौरे से वापस आने के बाद जरूर कोई ठोस कदम उठाएंगे ताकि युवाओं का सपना अधूरा ना रहे।

धन्यवाद

एक पत्रकार
नागमणि पाण्डेय
nagmani pandey
9004322982
nagmani4@gmail.com

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एक अदद राज्यमंत्री का पद हासिल करने को कोई कितना गिर सकता है, एमजे अकबर इसकी मिसाल हैं

 अनिल जैन

अनिल जैन

दोयम दर्जे का एक अदद राज्यमंत्री का पद हासिल करने के लिए कोई व्यक्ति किस हद तक अपने आत्म सम्मान से समझौता कर सकता है, जाने-माने पत्रकार और संपादक एमजे अकबर इसकी मिसाल हैं। वर्षों तक पत्रकारिता में रहते हुए जो कुछ प्रतिष्ठा और पुण्याई अर्जित की थी वह तो दांव पर लगाई ही, साथ ही जिस शख्स को उन्होंने एक समय कांग्रेस में रहते हुए मौत का सौदागर कहा था, उसी की बल्कि उसके दूसरे कारिंदों की भी चापलूसी करनी पडी।

और, बदले में मिला क्या… सिर्फ विदेश राज्यमंत्री का भूमिका विहीन पद जो कि उसी मंत्रालय में पहले से ही एक मूर्ख पूर्व सेनाध्यक्ष के पास भी है।

जब इस मंत्रालय की कैबिनेट मंत्री के पास ही करने को कुछ नहीं है तो उस मंत्रालय में अकबर साहब क्या कर लेंगे, सिवाय कुछेक मसलों पर बयान और संसद में प्रश्नों के लिखित उत्तर देने के? एमजे अकबर के साथ ही इस मंत्रिपरिषद में दो और भी मुस्लिम मंत्री है लेकिन उन्हें भी ऐसा कोई महत्वपूर्ण महकमा नहीं सौंपा गया है जिसका देश के आम आदमी से वास्ता हो।

कुल मिलाकर तीनों शो पीस है और तीनों की भूमिका भाजपाई धर्मनिरपेक्षता की मॉडलिंग करने तक ही सीमित है। तीनों की यह नियति इस बात को भी स्पष्ट करती है कि मौजूदा हुकूमत के मुखिया का देश के सबसे बडे अल्पसंख्यक तबके के प्रति क्या नजरिया है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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प्रधानमंत्री जी, आप ट्वीट कर देते, किसी न्यूज चैनल पर आने की क्या जरूरत थी?

एक भारतीय नागरिक के नाते अपने प्रधानमंत्री से कुछ सवाल…

Rajendra Tiwari : प्रिय प्रधानमंत्री जी, कल आपका इंटरव्यू सुना। आपने सिर्फ वही बातें कीं, जो आप करना चाहते थे। जब आपको अपने मन की ही बात करनी थी तो रेडियो और दूरदर्शन दोनों पर मन की बात कर सकते थे। बाकी चैनल भी इसको प्रसारित करते ही। आप ट्वीट कर देते (जैसे आपने टाइम्स नाउ के लिए किया भी) कि इस बार अपने मन की विशेष बात करेंगे तो सुनने वालों की भीड़ लग जाती। इसके लिए किसी न्यूज चैनल पर आने की क्या जरूरत थी?

खैर, आपका इंटरव्यू उस चैनल पर सुना जो चैनल देश जो जानना चाहता है, उसे चिल्ला-चिल्लाकर देश को जनाने के लिए जाना जाता रहा है लेकिन इस इंटरव्यू में देश जो जानना चाहता था, उस पर तो चैनल की तरफ से कुछ पूछा ही नहीं गया। मान लीजिए, चैनल व उसके संपादक लिहाज में, आपके व्यक्तित्व के दबाव में या किसी अन्य कारण से आपसे कुछ नहीं पूछ पाये तो आप ही अपने देश के मन के सवालों को पूछने के लिए कह देते। हो सकता है इससे कुछ काम बन जाता।

चूंकि देश में मैं भी शामिल हूं और मेरे मन में भी कई सवाल हैं। मैं हमेशा चाहता रहा कि आप इन सवालों पर कुछ बोलते लेकिन आप कुछ बोले ही नहीं। अब तो आपने न्यूज चैनल पर भी इंटरव्यू दे दिया लेकिन सवाल अपनी जगह बने रहे। इसलिए मैंने सोचा कि न्यूज चैनल और उसके संपादक का देश (नेशन) कुछ जानना चाहता हो या न जानना चाहता हो, अपन जो जानना चाहते हैं, वह तो पूछ ही लें। बुरा मत मानियेगा, आप हमारे प्रधानमंत्री हैं और एक भारतीय नागरिक के नाते अपने प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का अधिकार तो संविधान व लोकतांत्रिक व्यवस्था में निहित है।

सवाल नंबर १
टमाटर महंगा क्यों?
सवाल नंबर २
दालें कब सस्ती होंगी?
सवाल नंबर ३
आम चुनाव के समय आपने जितने रोजगार का वादा किया था, उसमें कितने फीसदी रोजगार आप उपलब्ध करा पाये?
सवाल नंबर ४
रुपये की विनिमय दर कभी मजबूत भी होगी? आपने आम चुनाव के समय अपने भाषणों में इसका वादा किया था।
सवाल नंबर ५
अगर कोई भारतीय धर्म विशेष के हिसाब से जीवन नहीं जीता तो क्या आपकी सरकार उसके इस संवैधानिक अधिकार को बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है?
सवाल नंबर ६
रोहित वेमुला की आत्महत्या को आप किस तरह देखते हैं?
सवाल नंबर ७
जेऩयू प्रकरण के दौरान जिस तरह की बातें वरिष्ठ नेताओं व अफसरों द्वारा कहीं गईं, क्या उनसे सहमत हैं?
सवाल नंबर ८
साध्वी प्राची, महंत, महेश शर्मा, वीके सिंह, खट्टर व योगी आदित्यनाथ आदि लोगों के बयानों पर आप रोक क्यों नहीं लगाते?
सवाल नंबर ९
सामाजिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था को लेकर आप तो प्रतिबद्धता जताते हैं लेकिन आपकी सरकार उसके ठीक उलट कर रही है। यह उलटबांसी क्यों?
सवाल नंबर १०
देश की सांस्कृतिक व क्षेत्रीय विविधता वरदान है या अभिशाप?

सवाल तो और भी बहुत हैं लेकिन इतने के ही जवाब मिल जाएं तो बाकी सवाल खुद जवाब तलाश लेंगे। उम्मीद है कि आप भी किसी न किसी फोरम से जवाब देने की कोशिश जरूर करेंगे।

सादर

पुन:श्च – जब आप गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब डिफेंस में निजी निवेश व विदेशी निवेश के विरोधी थे। और भी तमाम महत्वपूर्ण मसलों पर आपकी राय अलहदा थी। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद आपकी राय बदल गई। आप भी वही करने लगे जो मनमोहन सिंह की सरकार करना चाहती थी। क्या पहले आपकी राय कम व गलत जानकारी पर आधारित थी कि आप तब के अपने स्टैंड में करेक्शन करने पर मजबूर हो गये?

वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र तिवारी की एफबी वॉल से.

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मोदी को मैदान में उतार बीजेपी ने जो रामबाण चलाया वह कितना कारगर साबित होगा

पिछले कुछ हफ़्तों में केंद्र सरकार की कई मोर्चों पर किरकिरी हुई है. पहला मामला बीजेपी की आतंरिक कलह से जुड़ा है. सुब्रमण्यम स्वामी ने अरुण जेटली पर अप्रत्यक्ष रूप से हमले किये हैं. रघुराम राजन से लेकर वित्त मंत्रालय से जुड़े अन्य अधिकारियों तक उनके लगातार हमले बीजेपी को परेशान किये हुए हैं. मीडिया में इस मामले को जोरशोर से उछाला गया है. बीजेपी बैकफुट पर है.  दूसरा मामला है भारत की अंतर्राष्ट्रीय नीति से संबंधित. भारत को NSG की सदस्यता की कितनी आवश्यकता थी, थी भी कि नहीं, ये शायद हम अच्छे से नहीं जानते, पर ये अवश्य जानते हैं कि चीन ने हमारा खेल बिगाड़ दिया. यहाँ भी भारत सरकार की किरकिरी हुई. नरेन्द्र मोदी की एग्रेसिव अंतर्राष्ट्रीय छवि को धक्का पहुंचा है.

तीसरा मामला भी सरकार के लिए बड़ा झटका है. ये मामला आंतरिक सुरक्षा और पाकिस्तानी मामलों से जुड़ा हुआ है. कश्मीर में पिछले एक महीने में सुरक्षा बलों पर अनेकों भीषण हमले हुए हैं. कहा जा रहा है कि पिछले कई वर्षों में कश्मीर में हालात कभी इतने बुरे नहीं रहे. यहाँ बीजेपी न केवल केंद्र सरकार में होने की वजह से बल्कि राज्य में भी सत्ता में होने की वजह से मुसीबत के केंद्र में है. आज के समय में किसी सरकार के विरोध में माहौल बनाने के लिए विपक्ष को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता, बशर्ते मीडिया ख़बरों को अच्छे से पेश कर रहा हो. भारत का मीडिया जैसा भी हो, पर अलग अलग धड़ों में बंटे होने के कारण जब विरोधी खेमा ज्यादा मुखर होता है, तो सरकार के हाथ पाँव फूलना लाजमी है.

ये वो समय है, जहाँ बीजेपी और नरेन्द्र मोदी की नीतियों पर मीडिया और कुछ हद तक आम जनता भी सवाल उठा रही है, भले ही दबे स्वरों में. बीजेपी को कुछ ऐसा करना ही था जिससे वो लोगों तक अपनी बात पहुंचाए. तो कौन बने बिल्ली और कौन बांधे घंटी? बीजेपी ने यहाँ अपने जांचे परखे ट्रम्प कार्ड को फिर से खेला है. संकटमोचन नरेन्द्र मोदी जी को उतारा गया है. ऐसा पहली बार हुआ है कि एक भारतीय प्रधानमन्त्री ने अपने कार्यकाल के दौरान किसी न्यूज़ चैनल को विस्तारपूर्वक इंटरव्यू दिया है. इस इंटरव्यू में नरेन्द्र मोदी ने इन सारे मुद्दों पर सकारात्मक तरीके से अपना पक्ष रखा है. कोशिश है भारतीय जनता और भारतीय जनता पार्टी को ढाढ़स बंधाने की, ये देखने योग्य होगा कि प्रधानमन्त्री की ये कोशिश इस नकारात्मक माहौल को सकारात्मक बनाने में कितने काम आती है.  

लेखक दिवाकर सिंह आईटी फील्ड से जुड़े हुए हैं और नोएडा में रहते हुए खुद की कंपनी संचालित करते हैं. उनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.


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अखबारों के लिए मोदी सरकार की नई विज्ञापन नीति पढ़ कर स्तब्ध रह गया

Samar Anarya : योगा वोगा के बीच मोदी सरकार ने विज्ञापन नीति बदल कर छोटे और मझोले अख़बारों को ख़त्म करने की एक नयी कार्यवाही शुरू कर दी है. कल Aleemullah भाई ने बताया था… पूरी नीति पढ़ी तो स्तब्ध रह गया. आज राहुल सांकृत्यायन ने वेबसाइट्स के विज्ञापन पर भी यही खबर दी! इस नयी विज्ञापन नीति के तहत एक अंकीय गणित बनाया गया है जिसको पूरा करने पर ही उन्हें विज्ञापन मिलेगा. सबसे पहले तो 25 हजार प्रसार संख्या से अधिक वाले समाचार पत्रों के एबीसी और आरएनआई का प्रमाण पत्र अनिवार्य कर उसके लिए 25 अंक रखे गए हैं।

इसी तरह कर्मचारियों की पीएफ अंशदान पर 20 अंक, पृष्ठ संख्या पर 20 अंक, भाजपा-संघ समर्थक 3 एजेंसियों के लिए 15 अंक, खुद की प्रिंटिंग प्रेस होने पर 10 अंक और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रसार संख्या के आधार पर फीस जमा करने पर 10 अंक दिए गए हैं । इस तरह 100 अंक का वर्गीकरण किया गया है, जो वर्तमान में 90 फीसदी लघु एवं मध्यम समाचार पत्र पूरा नहीं कर सकते हैं। पर समाचार पत्रों को चुप कराने की यह साजिश क्यों? क्योंकि बड़े अख़बारों को मैनेज कर भाजपा का मुख पत्र बना देना आसान है- हर शहर में एक अखबार हो तो भ्रष्टाचार से लेकर भुखमरी तक रोकने में असफलता कैसे छुपायेंगे? और हाँ- इन अख़बारों के बंद होने पर जो लाखों लोग बेरोजगार होंगे वो?

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी समर अनार्या उफ अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

इसी प्रकरण पर अमर उजाला डाट काम में छपी खबर इस प्रकार है….

आरएसएस समर्थित समाचार एजेंसियों की सदस्यता लेने पर ही मिल सकेंगे सरकारी विज्ञापन

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने तीन समाचार एजेंसियों के नाम छांटे हैं, नियम के मुताबिक इन तीनों एजेंसियों की सदस्यता लेने पर समाचार पत्रों को अतरिक्त प्वाइंट मिलेंगे। इन अतिरिक्त प्वाइंट्स की मदद से ही समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापन मिल सकेंगे। ‘हिंदुस्तान समाचार’ एक ऐसी समाचार एजेंसी है जिसे बहुत कम लोग ही जानते हैं, इस समाचार एजेंसी को बीजीपी की विचारधारा समर्थित भी कहा जाता है। मंत्रालय ने अपनी सूची में इसे भी शामिल किया है। हालांकि एक लिस्ट आरएसएस ने भी बनाई है। सरकार ने नया नंबर सिस्टम शुरू किया है जिसके अनुसार डीएवीपी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) के माध्यम से सरकारी विज्ञापन हासिल करने के लिए इन तीनों समाचार एजेंसियों की सदस्यता लेनी पड़ेगी, इनकी सदस्यता लेने पर समाचार पत्रों को प्रत्येक एजेंसी के हिसाब से 15 प्वाइंट मिलेंगे।

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दो साल में इस राष्ट्रवादी सरकार ने क्या काम किए हैं, बताना मुश्किल हो रहा है

Sanjaya Kumar Singh : काम करने वाली राष्ट्रवादी सरकार ने पिछले दो साल में क्या काम किए हैं बताना मुश्किल हो रहा है। तरह-तरह के काम तो बताए ही जा रहे हैं महंगाई और मंदी के पक्ष में कारण भी गिनाए जा रहे हैं और इसमें अच्छे दिनों का सपना दिखाने में कोई कमी नहीं आई है। एनडीटीवी पर रवीश के कार्यक्रम में एक अंग्रेजी पत्रकार ने कुछ दिलचस्प तथ्य दिए –

(1) कोल ब्लॉक के आवंटन में पैसे जमा करने के कारण कारोबारियों के पास नकदी नहीं बची है

(2) (सरकार की सख्ती के कारण) बाजार में काला पैसा नहीं है और इसलिए फ्लैट नहीं बिक रहे हैं। उनका कहना था कि रीयल इस्टेट का कारोबार काले धन से ही चलता है।

(3) याद नहीं आ रहा किस बात पर, लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि एसबीआई में डिपोजिट (जमा) बढ़ा है।

और अब यह खबर पढ़ने को मिली…

”एसबीआई का चौथी तिमाही का शुद्ध मुनाफा 66 फीसदी घटा… भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का एकल शुद्ध मुनाफा 31 मार्च को समाप्त चौथी तिमाही के दौरान 66 फीसदी गिरकर 1,263.81 करोड़ रुपए रह गया”…

अजीब संयोग है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से.

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