यशवंत सिंह पर कैसे हुआ हमला, सुनिए उनकी जुबानी (देखें वीडियो)

प्रेस क्लब आफ इंडिया के गेट पर भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर दो लफंगानुमा पत्रकारों ने हमाला किया. इनमें से एक का नाम भूपेंद्र सिंह भुप्पी है और दूसरा अनुराग त्रिपाठी है. प्रेस क्लब के भीतर ये दोनों यशवंत को देखने के बाद अपनी टेबल से उठकर यशवंत की टेबल पर आ गए और बैठकर यशवंत की तारीफें किए जा रहे थे, गले मिल रहे थे. बाहर निकलने पर धोखे से हमला कर दिया.

यशवंत ने हमले के दो दिन बाद पूरी कहानी इस वीडियो के जरिए विस्तार से बताई. साथ ही ऐसे हमलों को लेकर अपनी सोच का इजहार भी किया. नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें:

यशवंत ने उपरोक्त वीडियो के लिंक को फेसबुक पर साझा करते हुए जो लिखा है, वह इस प्रकार है :

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं :

Alok Singh : बहुत दुःखद है इस तरह का विरोध करना। मारपीट और हाथापाई कायराना हरकत है जो कि निंदनीय है। शुक्र है कि आपको ज्यादा चोटें नहीं आई। आपका चश्मा टूट गया। कोई बात नहीं। मिलिये मैं आपको उस से बढ़िया वाला चश्मा दिलवाने का प्रयत्न करूँगा। जल्द स्वस्थ होकर पुनः अपने जीवन का आनंद लें।

Rishabh Yadav : bhaiya lage raho…prerna de raha hai aapka yeh video। भैया आप जब समय मिले तो यह भी बताये की किन कारणों से जेल यात्राएं हुई और ओर नौजवान लोगों के लिए क्या सावधानियां रखना चाहिए। थोड़ा कोर्ट कचहरी का अनुभव भी साझा करें तो बढ़िया रहेगा। लिखें पूरे सिलसिलेवार ढंग से, अगर आप उचित समझें तो।

Hemant Jaiman Dabang : यशवन्त सर आपको कुछ नही होगा। हजारो लोगो की दुआएं आपके साथ है।

Qamer Baig : भड़ास है तो निकलेगी ही किसी के कायराना हरकत के लिए तो भड़ास भर भर के निकले कलम की तेज धार से भड़ास निकालते रहिये सतर्क रहिये होशियार रहिये खुश रहिये और ज़िंदादिली से सभी से मिलते रहिये।

अंशुमान मिश्रा : सर ये कोई आम हमला नहीं बल्कि नाक पर हमला है। अब सवाल नाक का है तो कुछ न कुछ करना ही चाहिए।

Dhananjay Singh : ”थोड़ा मारने दो इसे,बहुत खबरें छापता है” कहते हुए दिल्ली के प्रेस क्लब में भड़ास वाले Yashwant भाई को दो पत्रकारों ने ही पीट दिया……… जाहिर है इस घटना के गवाह भी कई एक रहे ही होंगे… निर्भीक पत्रकारिता पर खुद पत्रकारों की तरफ से हुए इस हमले की मैं निंदा करता हूँ ….खम्भों की यह लड़ाई निंदनीय है… आप भी छापिये न भाई,असहमति है तो किसी को पीट देंगे? ऐसे ही कमजोर पलों में निहायत ही कमजोर लोग पिस्टल भी निकाल लेते हैं और परिणाम अत्यंत भयानक होता है… आशा है देश की राजधानी के प्रेस क्लब में हुई इस घटना के विरोध में तमाम एक्टिविस्ट्स से लगायत प्रधानमंत्री भी ट्विट करेंगे. ऐसी हरकत निंदनीय है, अभी निंदा करिए.

Shahid Naqvi : जब खबर छापने के विरोध में पत्रकार ही पत्रकार पर हमलावर हो तो सच के नज़दीक पहुंचना मुश्किल है। पत्रकार पर किसी भी तरह के हमले की मैं घोर निन्दा करता हूं।

Vaibhav Agrawal : यशवंत जो पत्रकारिता की पोल खोल राजनीती करते है वो निश्चित ही प्रसंशक कम दुश्मन अधिक बनाती है! .. इस ढंग से मार पीट कर इन लोगो ने पत्रकारिता को और अधिक कलंकित किया है! दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, इसमें राजनीतिक लाभ का कोई एंगल न होने की वजह से अधिकतम बिरादरी चुप है! 🙁

Abdul Noor Shibli : shandar. dono se ab bhi nafrat nahin. wah.

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भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब गेट पर भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने किया हमला

(कोबरा पोस्ट में प्रकाशित यशवंत पर हमले की खबर का स्क्रीनशाट)

भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह पर चार सितंबर की रात करीब साढ़े दस बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर जानलेवा हमला हो गया. यशवंत को बुरी तरह से मारा-पीटा गया और गालियां दी गई. भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने अपनी फेसबुक वाल पर घटना की जानकारी देते हुए लिखा, ”अटैक हो गया गुरु। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर। बहुत मारा पीटा मुझे। पार्ट ऑफ जॉब ही है। भूपेंद्र सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी की कारस्तानी है। जाने किस खबर की बात करके पीटा उसने।” इस हमले में यशवंत का चश्मा टूट गया और नाक, कान, गर्दन, होंठ पर चोट आई है.

यशवंत ने बताया कि भूपेंद्र सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी प्रेस क्लब के अंदर तो काफी अच्छे मिले. तारीफ की. लेकिन वे पूरी योजना से थे. बाहर गेट पर इंतजार कर रहे थे. जब यशवंत बाहर निकले तो भूपेंद्र सिंह भुप्पी ने हाथ मिलाने के बहाने पास बुलाया और हमला कर दिया. इस दौरान अनुराग त्रिपाठी मोबाइल से वीडियो बनाने लगा. वहां मौके पर वरिष्ठ पत्रकार रुबी अरुण भी मौजूद थीं जो हमलावर को बार बार रोक रही थीं लेकिन भुप्पी और अनुराग दोनों लगातार कह रहे थे कि ‘इसे मार खाने दो, बहुत खबरें छापता है’. इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से यशवंत हक्के बक्के थे और लगातार भुप्पी से कह रहे थे कि आखिर गुस्सा किस बात पर है, प्रेस क्लब के अंदर तो तुम ठीक थे, बाहर अचानक क्या हो गया?

भुप्पी हमले के दौरान कुछ बरस पुरानी छपी भड़ास की खबरों का जिक्र कर रहा था. ज्ञात हो कि भूपेंद्र सिंह भुप्पी रहने वाला गाजीपुर का है लेकिन चंडीगढ़ में केपीएस गिल की खानदान की एक लड़की से शादी करने के बाद अब नोएडा और चंडीगढ़ सेटल हो गया है. आजतक के लिए पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के ब्यूरो चीफ के बतौर एक जमाने में काम करता था पर किन्हीं कारस्तानियों के कारण उसे निकाल दिया गया. फिर उसने महुआ न्यूज चैनल ज्वाइन किया जहां वह फिर अपनी कारस्तानियों के कारण असफल साबित हुआ और अब मीडिया से ही बाहर हो चुका है. उन दिनों इसी से संबंधित खबरें भड़ास पर छपा करती थीं.

अनुराग त्रिपाठी भी महुआ में भुप्पी के साथ था और आजकल खुद को तहलका / न्यूज लांड्री के साथ कार्यरत बताता है. यशवंत ने प्रेस क्लब आफ इंडिया के प्रबंधन को हमले के बाबत लिखित शिकायत दे दी है. साथ ही एक लिखित कंप्लेन पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में दी है. यशवंत ने पहले एफआईआर न करने का निर्णय लिया था लेकिन अपने देश भर के हजारों साथियों समर्थकों के अनुरोध पर थाने में लिखित कंप्लेन देने का फैसला कर लिया.

यशवंत का कहना है कि दो पत्रकारों का किसी खबर को लेकर एक पत्रकार पर हमला करना पत्रकारिता के आजकल के निम्नतम स्तर को दर्शाता है. जब हम पत्रकार खुद ही मानसिक लेवल पर सामंती / आपराधिक सोच रखते हैं तो कैसे इस लोकतांत्रिक देश में मीडिया की निष्पक्षता की बात सोच सकते हैं. कलम का जवाब कलम ही हो सकता है, हथियार या हमला नहीं. यशवंत ने भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी को बेहद कमजोर आदमी करार देते हुए कहा कि ये माफी के योग्य हैं, इन्हें खुद नहीं पता कि ये क्या कर बैठे हैं. ये लोग सामने कुछ कहते-बोलते हैं और पीठ पीछे छुरा घोंपने को तैयार रहते हैं. ऐसे दोहरे व्यक्तित्व और आपराधिक मानसिकता के लोग अगर मीडिया में हैं तो यह मीडिया की दयनीयता / दरिद्रता को ही दिखाता है. एक आदमी जो अकेले और निहत्था है, उस पर अचानक से घेर कर हमला कर देना कहां की बहादुरी है. उम्मीद करते हैं कि भुप्पी और अनुराग में अगर थोड़ी भी पत्रकारीय सोच-समझ होगी अकल आएगी और अपने किए पर पश्चाताप करेंगे. 

यशवंत ने अपने पर हमले को लेकर फेसबुक पर दो पोस्ट्स डाली हैं, जो इस प्रकार हैं-

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अपराधी को हिरासत से भगाने वाली गाजीपुर पुलिस ने निर्दोष बुजुर्ग का मोबाइल फोन छीन लिया!

Yashwant Singh : ग़ज़ब है यूपी का हाल। अपराधी भाग गया हिरासत से तो खिसियानी पुलिस अब बुजुर्ग और निर्दोष को कर रही परेशान। मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह का फोन ग़ाज़ीपुर की नन्दगंज थाने की पुलिस ने छीना। बिना कोई लिखा पढ़ी किए ले गए। अब बोल रहे फोन हिरासत में लिया है। शर्मनाम है यह सब। जो पुलिस वाले नशे में होकर अपराधी को भगाने के जिम्मेदार हैं, उनको तो अरेस्ट किया नहीं होगा, एक बुजुर्ग को ज़रूर घर से उठा ले गए और फोन छीन लिया। चाचाजी फिलहाल लौट आए हैं, लेकिन फोन पुलिस ने रख लिया। यही है मोदी-योगी राज का स्मार्ट और डिजिटल इंडिया। राह चलते आदमी का फोन पुलिस छीन ले जाए और पूछने पर कहे कि फोन हिरासत में लिया है। माने बिना लिखा पढ़ी किसी का भी फोन छीनकर हिरासत में लेने का अधिकार है पुलिस को? यूपी की पुलिस कभी न सुधरेगी।

चाचा का मोबाइल पुलिस वालों ने लौटा दिया. गाजीपुर के एसपी का फोन आया था. पर सवाल ये है कि क्या पुलिस होने का मतलब यही होता है कि आप किसी भी सीनियर सिटीजन को उठा लो और फिर उनको यहां-वहां घुमाने के बाद छोड़ते हुए फोन छीन लो. जब फोन के बारे में पूछा जाए तो कह दीजिए कि फोन हिरासत में है. बिना लिखत पढ़त आपका फोन कैसे ले सकते हैं पुलिसवाले? डिजिटल इंडिया के इन दिनों में जब फोन आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है, आपकी वर्चुवल / आनलाइन पर्सनाल्टी की तरह है मोबाइल फोन, इसमें सारे मेल, सारे पेमेंट डिटेल्स, सारे कार्ड्स, सारे सोशल मीडिया साइट्स, सारे कांटैक्ट्स, सारे आफिसियल और परसनल डिटेल्स होते हैं तो आप पुलिस वाले इन्हें यूं ही छीन कर कैसे ले जा सकते हो और और पूछने पर तपाक से कैसे कह दोगे कि फोन आपका हिरासत में लिया गया है? मने कुछ भी कर दोगे और कुछ भी कह दोगे? कोई नियम-कानून आपके लिए नहीं है? अपराधी आप पुलिस वाले खुद ही हिरासत से भगा दीजिए और इसका बदला किन्हीं दूसरे निर्दोषों से लीजिए?

गाजीपुर के पुलिस कप्तान सोमेन वर्मा को मुझे यह समझा पाने में काफी मुश्किल हुई कि आपका थानेदार किसी का फोन यूं ही कैसे छीन कर ले जा सकता है? आपको किसी आदमी पर शक है, उसकी बातचीत या उसके मैसेजेज पर शक है तो आप उसके फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा लो, सीडीआर निकलवा लो, सारे मैसेज पता करवा लो, सारे फोन सुन लिया करो… चलो ये सब ठीक, देश हित का मामला है, अपराध खोलने का मामला है, अपराधी पकड़ने का मामला है, कर लो ये सब, चुपचाप. लेकिन आप किसी का फोन कैसे छीन लेंगे? और, पूछने पर कहेंगे, पूरी दबंगई-थेथरई से, कि हम फोन चेक कर रहे हैं? ऐसे कैसे फोन छीनकर चेक कर सकते हैं आप लोग? आपने अगर फोन छीनकर आपके लोगों ने इसी फोन से अपराधियों को फोन कर दिया, इसी फोन से अपराधियों को मैसेज कर दिया और फिर बाद में यह कह कर फोन वाले को फंसा दिया कि इस फोन से तो अपराधियों को काल किया गया है, मैसेज किया गया है तो फिर हो गया काम… इस तरह से आप लोग किसी भी निर्दोष को फंसा सकते हैं.

देश में अभी निजता की बहस चल ही रही है. किसी के फोन में देखना तक अनैतिक होता है. किसी के फोन को बिना पूछे उठाना गलत माना जाता है. आप पुलिस वाले तो किसी दूसरे का पूरा का पूरा फोन ही छीन लेते हो? ये इस लोकतंत्र में किस किस्म का निजता का अधिकार है? या फिर ये निजता का अधिकार सिर्फ बड़े शहरों के बड़े लोगों के लिए है?

ट्विटर पर यूपी पुलिस, डीजीपी, सीएम योगी आदि को टैग करते हुए जब मैंने ट्वीट किया और कई साथियों ने इस ट्वीट पर यूपी पुलिस व गाजीपुर पुलिस से जवाब मांगा तो गाजीपुर पुलिस सक्रिय हो गई. रात में ही चाचा का फोन नंदगंज थाने से शहर कोतवाली मंगवा लिया गया और मुझे इत्तला किया गया कि फोन आ चुका है, किसी को भेज कर मंगवा लें. मेरे अनुरोध करने पर शहर में रहने वाले साथी Sujeet Singh Prince और Rupendra Rinku भाई रात करीब एक बजे गाजीपुर कोतवाली जाकर चाचा का फोन ले आए.

सवाल ये भी है कि क्या हम आप अगर ट्विटर और एफबी पर सक्रिय हैं, तभी जिंदा रहेंगे, वरना पुलिस आपके साथ कोई भी सलूक कर जाएगी? ऐसा देश मत बनाइए भाइयों जहां किसी निर्दोष और किसी आम नागरिक का जीना मुहाल हो जाए. क्या फरक है सपा की अखिलेश सरकार और भाजपा की योगी सरकार में? वही पुलिस उत्पीड़न, वही अराजकता, वही जंगलराज. जिसका जो जी कर रहा है, वह उसे धड़ल्ले से कर रहा है, बिना सही गलत सोचे.

हमारे गांव का एक अपराधी गाजीपुर शहर में पुलिस हिरासत से फरार हो गया. बताया जाता है कि पुलिस वाले जमकर पीने खाने में मगन थे और उसी बीच वह भाग निकला. जो पुलिस वाले उसे पेशी पर लाए थे, उन्हें करीब दो घंटे बाद पता चला कि पंछी तो उड़ चला. मुझे नहीं मालूम गाजीपुर के पुलिस कप्तान ने इन लापरवाह, काहिल और भ्रष्ट पुलिस वालों को गिरफ्तार कराया या नहीं, जो अपराधी को भगाने के दोषी हैं. इन पुलिस वालों ने कितने पैसे लेकर अपराधी को भगाया, इसे जांच का विषय बनाया या नहीं, मुझे नहीं मालूम. पर पुलिस विभाग शातिर अपराधी के भाग जाने के बाद उसे खोजने-पकड़ने के चक्कर में अब उन निर्दोषों को परेशान करने लगा जिनका इस शख्स से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं.

खिसियानी बिल्ली खंभो नोचे के क्रम में पुलिस वाले भागे हुए अपराधी को पकड़ने के नाम पर मेरे गांव पहुंचे और मेरे बुजुर्ग चाचा रामजी सिंह को उठा ले गए. वे उन्हें गाजीपुर शहर उनके बड़े वाले पुत्र यानि मेरे कजन के घर पर ले गए. उनका बड़ा पुत्र गांव छोड़कर गाजीपुर शहर में गांव की किचकिच / राजनीति से बचने के लिए सपरिवार किराये पर रहने लगा. वहां जब उनका बड़ा बेटा नहीं मिला तो पुलिस वाले चाचा को छोड़ तो दिए पर जाते-जाते उनका फोन ले गए. उस फोन को ले जाकर उन्होंने उसमें सेव सभी नामों पर मिस काल मारने लगे. जिसका भी पलट कर फोन आए, उससे फोन पर ही पूछताछ करने लगते.

अरे भाई गाजीपुर पुलिस! आजकल की पुलिसिंग बहुत एडवांस है. कहां बाबा आदम के जमाने के इन तौर-तरीकों / टोटकों में अटके पड़े हो और अपनी कीमती उर्जा यूं ही खर्च कर रहे हो. आजकल अव्वल तो शातिर अपराधी फोन पर बात नहीं करते. दूसरे, पुलिस के लोग अब तकनीकी रूप से काफी ट्रेंड किए जाने लगे हैं ताकि वे सारे आयाम को समझ कर अपराधी को बिना भनक लगे दबोच सकें. साइबर अपराध बढ़े हैं और इसी कारण इसको हैंडल करने के लिए ट्रेंड पुलिस वालों की भी संख्या बढ़ाई जा रही है. पर यूपी में लगता है कि पुलिस अब भी बाहुबल और बकैती को ही अपराध खोलने का सबसे बड़ा माध्यम मानती है.

भाई एडवोकेट Prateek Chaudhary की एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें उन्होंने लिखा है कि अलीगढ़ में एक थाने में एक लड़की को 12 दिन तक लगातार गैर-कानूनी रूप से रखा गया. उस पर शायद अपनी भाभी की हत्या का आरोप था. जब हो-हल्ला हुआ तो उसे 12 दिन के बाद जेल भेजा गया. बताइए भला. एक लड़की को आप 12 दिन तक हवालात में रखते हो! ये कहां का नियम कानून है. आप रिमांड पर लो. पूछताछ करो. पर ये क्या कि न कोर्ट में पेश करेंगे न जेल भेजेंगे, बस हवालात में रखे रहेंगे! वो भी एक लड़की को! क्या इन्हीं हालात में (गाजीपुर में मेरे चाचाजी वाले मामले और अलीगढ़ में लड़की वाले मामले में) पुलिस वाले उगाही और बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं करते?

योगी सरकार को यूपी में पुलिसिंग दुरुस्त करने के लिए बहुत सख्त कदम उठाने की जरूरत है अन्यथा सरकार बदलने के बावजूद जनता के कष्ट कम न हो सकेंगे. अखिलेश यादव के राज में जो जंगलराज था, वही हालात आज भी जमीन पर है. खासकर छोटे और पिछड़े जिलों में तो पुलिस विभाग का बुरा हाल है. वहां पुलिस का मतलब ही होता है गरीबों को प्रताड़ित और शोषित करने वाले. निर्दोष जनता से बदतमीजी करने के आरोपी / दोषी पुलिस वालों को बिना देर किए सस्पेंड-बर्खास्त करने में कतई हिचकने-झिझकने की जरूरत नहीं. शायद तभी ये सुधर सकें.

मेरे चाचा के फोन छीने जाने वाले मामले में डॉ Avinash Singh Gautam और Avanindr Singh Aman समेत ढेरों साथियों ने ट्विटर पर तुरंत सक्रियता दिखाई, इसके लिए इन सभी का दिल से आभार.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : 9999330099 या yashwant@bhadas4media.com

गाजीपुर पुलिस का हाल जानने के लिए इसे भी पढ़ें…

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44 के हुए यशवंत को वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय ने यूं दी बधाई

Dayanand Pandey : आज हमारे जानेमन यारों के यार यशवंत सिंह का शुभ जन्म-दिन है। व्यवस्था से किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत सिंह से सीखे। अपनों से भी किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत से सीखे। यहां तक कि अपने-आप से भी किसी को टकराना सीखना हो तो भी वह यशवंत से सीखे। अपने आप को गाली सुनाने और सुनने की क्षमता भी किसी को पानी हो तो यशवंत से पाए। पारदर्शिता की इंतिहा भी हैं यशवंत सिंह।

मैं उनको उनकी फकीरी, फ़क्कड़ई और बहादुरी के लिए जानता हूं। मीडिया के थके-हारे, पराजित लोगों को जिस तरह सुस्ताने के लिए, रोने के लिए, साहस और भरोसा देने के लिए अपना अनमोल कंधा वह सर्वदा उपस्थित कर देते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है। मीडिया के असंख्य स्पीचलेस लोगों के लिए जिस तरह वह भड़ास 4 मीडिया के मंच के मार्फत वायस आफ स्पीचलेस बन जाते हैं, वह बहुत ही सैल्यूटिंग है।

आज वह 44 साल के हो गए हैं। अभी कुछ समय पहले वह जेल गए थे, मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ते हुए। कई सारे मीडिया हाऊस मिल कर उन के खिलाफ पिल पड़े थे। कि वह जेल से बाहर ही न आ पाएं। पर वह आए और एक दिलचस्प किताब ‘जानेमन जेल’ भी लिखी। लेकिन जब वह जेल में थे तभी मैंने उनकी बहादुरी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए एक लेख लिखा था। लेख का लिंक नीचे देते हुए, उनके इस जुझारू जज़्बे को सैल्यूट करते हुए उन्हें जन्म-दिन की बधाई दे रहा हूं।

बीती आधी रात भी मेसेंजर पर उन्हें बधाई दी थी। फ़ौरन उनका वीडियो काल आया। वह लहालोट थे, जश्न में थे, बहू के साथ नृत्यरत! बजते हुए गीत और नृत्य के बीच वह बार बताते रहे, आप की बहू है, बहू! और बहू नृत्य में उनके साथ होते हुए भी गंवई और पारिवारिक लाज, ओढ़े हुए थीं। मर्यादा और यशवंत के मान का निर्वाह करते हुए। ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसे ही सपरिवार स्वस्थ, मस्त और प्रसन्न रहें यशवंत सिंह। लव यू जानेमन यशवंत सिंह, लव यू!

यह समय यशवंत के खिलाफ़ आग में घी डालने का नहीं, यशवंत के साथ खड़े होने का है
http://sarokarnama.blogspot.in/2012/07/blog-post.html 

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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भड़ास4मीडिया के भविष्य को लेकर यशवंत ने क्या लिया फैसला, जानें इस एफबी पोस्ट से

Yashwant Singh : ऐ भाई लोगों, कल हम पूरे 44 के हो जाएंगे. इलाहाबाद में हायर एजुकेशन की पढ़ाई के दौरान ओशो-मार्क्स के साथ-साथ अपन पामोलाजी-न्यूमरोलॉजी की किताब पर भी हाथ आजमाए थे. उस जमाने में हासिल ज्ञान से पता चलता है कि मेरा जन्मांक 8 और मूलांक 9 है. जन्मांक छब्बीस का छह और दो जोड़कर आठ बना इसलिए आठ हुआ. मूलांक तारीख, महीना और साल जोड़कर पता किया जाता है जो मेरा 9 होता है. इस बार जो 26 अगस्त सन 2017 है, इसका योग 8 बैठ रहा. 44 साल का होने के कारण चार प्लस चार यानि आठ हो रहा. मतलब जन्मांक और मूलांक दोनों आठ हो रहा है. ग़ज़ब संयोग या दुर्योग, जो कहिए, बैठ रहा है इस बार. वैसे, अपन तो कई साल पहले लिख चुके हैं कि बोनस लाइफ जी रहा हूं, इसलिए हर दिन जिंदाबाद. 🙂

अपने एक पत्रकार साथी मृदुल त्यागी, दैनिक जागरण मेरठ के जमाने में ज्योतिषीय ज्ञान-गणना के आधार पर राहु-केतु टाइप के दो खूंखार जीवों / ग्रहों-नक्षत्रों का मुझ पर भयंकर प्रकोप बताया-समझाया करते थे. तब मुझे मन ही मन लगता रहा कि जरूर ये मूलांक 9 वाला अंक राहु है और जन्मांक 8 वाला केतु. अंक ज्योतिष के हिसाब से 8 वाला अंक थोड़ा क्रिएटिव पर्सनाल्टी डेवलप करता है और 9 वाला दुस्साहसी / खाड़कू / दबंग टाइप का. जब दोनों साथ हों तो आदमी ‘एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा’ मार्का द्वंद्व समेटे हुआ जीवन के हर क्षण को हाहाकारी टाइप से जीता है. अपन का भी कुछ कुछ ऐसा रहा है. 🙂

ऐसा लग रहा है कि राहु-केतु मेरा पिंड छोड़ रहे हैं. ज्योतिष के विद्वान लोग बताएं कि क्या मेरे इस बर्थडे पर राहु और केतु की अनंत प्यास बुझ जाएगी और वो मेरा पिंड छोड़कर मेरे किसी ‘चाहने’ वाले के कपार पर सवार हो उसे सदा के लिए बेचैन आत्मा बनाकर छोड़ेंगे 🙂

मौज लेते रहना चाहिए.

इस जन्मदिन पर मैं क्या सोच-गुन रहा हूं?

बस दो चीजें.

एक तो सोचने-दिमाग लड़ाने का काम लगभग बंद कर रहा हूं. ‘जाहे विधि राखे प्रभु, ताहे विधि रहिए’ वाला मेरा हाल हो गया है. इस रास्ते पर चलते हुए लग रहा है कि चलते रहो, जब जीवन का अंतत: कोई मकसद ही नहीं होता तो फिर काहें को टेंशन लेने का, हर साल का चार्ट काहें को तैयार करने का. तत्काल में यानि तुरंत में जीते रहो, न अतीत को लेकर परेशान होओ और न भविष्य को लेकर चिंतित. तत्क्षण को उदात्त तरीके से जीते रहो. जीवन यापन के लिए जो करो, इतने कलात्मक ढंग से, इतने मन से और इतने डूब कर करो कि वही तपस्या और ध्यान बन जाए.

बीते दो दशकों के दौरान समझ, संघर्ष, समय, चेतना और नियति आदि के मेलजोल के चलते अब एक जाग्रत भाव-सा निर्मित हुआ है. यह भाव महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता, क्योंकि जो इससे वंचित है, वह सारा का सारा शब्दजाल मानेगा. एक नया जीवन चर्या डेवलप होने लगा है. पुराने संस्कारों की ज़िद खत्म होती जा रही है. नई लाइफस्टाइल ने खुद ब खुद जगह बनाना शुरू किया है. एक ट्रांजीशन फेज चल रहा था पिछले चार पांच साल से, वह पूरा होने की ओर है. सहजता और शांति, ये ऐसी चीजें हैं जो बीते एक साल के दौरान शिद्दद से खुद के भीतर महसूस किया, कर रहा हूं. इन्हें खदेड़ने के वास्ते बाहरी तौर पर बेहद अशांत और असहज माहौल क्रिएट करता रहा, जान बूझ कर, पर जीतता रहा अंदर वाला ही. अपने आप.

किसी भी चीज की परवाह न करना, तत्क्षण में जीना, किसी भी तर्क-वितर्क या घटनाक्रम की निर्रथकता महसूस करना, ‘ये हो जाएगा तो क्या हो जाएगा और वो नहीं हो रहा तो क्या बिगड़ रहा’ टाइप फीलिंग का घर करते जाना… ये सब मिलाकर एक अ-सामाजिक सा व्यक्तित्व निर्मित होता रहा. एक शब्द आता है हाइबरनेशन. शायद मेरे मामले में उसी की बारी है. अतिशय उर्जा खर्च कर अब तक का भड़ भड़ टाइप जिया हुआ करियरवादी / क्रांतिकारी / अराजकतावादी (जिसे जो मानना हो माने, अपन तो जीवन को समग्रता में देखते हैं) जीवन फिलहाल इनके इतर या इन्हीं चीजों के दूसरे कांट्रास्ट / छोर की तरफ शिफ्ट हो गया है. सबका भला हो, सबको प्रेम मिले, सब सहज हों, सब भयमुक्त हों. ऐसा फील आने लगा है. ऐसा करने-कराने का मन करने लगा है. पहले भी थी, लेकिन तब दूसरे रास्ते तलाशे जाते थे. दूसरे हथियार अख्तियार किए जाते थे. अब तो अलग बात है. अब तो सहज बात है.

इस आंतरिक मन:स्थिति के इस लेवल की ज्यादा व्याख्या यहां संभव नहीं है. शब्द शायद सटीक न मिलें और इसके अभाव में व्याख्या कहीं सतही न हो जाए. वैसे भी, आंतरिक यात्राएं अधिकांशत: निजी हुआ करती हैं. बाहरी यात्राएं अक्सर सामूहिकता और परंपरा का स्वभाव लिए होती हैं. अध्यात्म आंतरिक यात्रा से जुड़ा मामला है. इसमें बाहरी मदद ज्यादा नहीं मिल सकती. इसमें सामूहिकता का कोई ज्यादा मतलब नहीं है. अप्प दीपो भव: वाली स्थिति होती है यहां. विज्ञान और व्यवस्था आदि चीजें परंपरा दर परंपरा निर्मित होती रहती है. इसमें हर पीढ़ी कुछ न कुछ जोड़ती रहती है. और, हर आदमी के जाग्रत होने के खुद के रास्ते तरीके होते हैं. फिलहाल इस विषय को यहीं छोड़ते हैं. यह इतना बड़ा टापिक है, इतने डायमेंशन हैं कि इसे लिखा नहीं जा सकता. दूसरे, अगर सब लिख दिया तो उसे सब महसूस नहीं कर सकते.

अब दूसरी बात. भड़ास को 26 अगस्त को बंद करने को लेकर जो मेरा ऐलान था, उसके बाद से लगातार मंथन, चर्चा और विमर्श अलग-अलग लोगों से होता रहा. तय फिलहाल ये हुआ कि भड़ास को बंद न किया जाए. और, इसमें बहुत ज्यादा उर्जा भी न खर्च की जाए. इसके संचालन के लिए आय के स्रोत क्रिएट करने को लेकर कई किस्म की चर्चाएं हुईं. मेरा निजी मन भड़ास से इतर कुछ नये आंतरिक प्रयोगों को लेकर है, सो भड़ास मेरी प्रियारिटी में न रहेगा. हां, बड़ा प्रकरण / मामला आएगा तो छोड़ेंगे नहीं, छोटे-मोटे मामलों का लोड लेंगे नहीं.

आखिरी बात. जो कुछ विजिबल है, उतना ही गहरा, उतना ही मजबूत इनविजिबल चीजें हैं. उर्जानांतरण इधर से उधर होता रहता है. इसे आप विजिबल मोड में फील कर सकते हैं, उस पाले, यानि इनविजिबल हिस्से को महसूस कर सकते हैं. इसके लिए दिन के उजाले से बचिए, रातों की दिनचर्या शुरू करिए. रात में बगल के पेड़ से आ रही चिट चिट वाली गिलहरी की आवाज के जरिए गिलहरी की रातचर्या को महसूस करिए. अगल-बगल दिखने वाले कुछ चुनिंदा अंधेरों से बतियाइए, उनसे दोस्ती करिए. ये सब एक डोर हैं जिनके जरिए आगे बढ़ा जा सकता है.

फिलहाल जैजै वरना कमरेडवा सब कहेंगे कि गड़बड़ा गया है 🙂

पर ये भी सच है कि ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग.’ इसलिए मस्त होकर अपनी लाइफ खुद चुनिए, जीइए.

फिर से जैजै मित्रों.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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पत्रकारिता के इस ‘प्रोफेशनल बेगर’ को पहचान लीजिए

Yashwant Singh : (पार्ट-1) यह राजीव शर्मा है. यह शख्स पत्रकारिता में है. सहारा, साधना, न्यूज24 समेत कई न्यूज चैनलों में नौकरी कर चुका है. अपनी सनकपन और धूर्तता के कारण यह अक्सर बेरोजगार ही रहता है. इसका प्रिय शगल है अपने सबसे करीबी की जेब काट लेना. वो भांति भांति की मजबूरियां-दिक्कतें बताकर कर्ज के रूप में पैसे लेता रहता है और जब उसे लगता है कि सामने वाला अब उसे उधार नहीं देगा तो वह रिश्ता तोड़कर गायब हो जाता है. जब उससे उधारी लौटाने की बात की जाती है तो वह फोन उठाना बंद कर लेता है या फिर जवाब ही नहीं दता है. इसके चक्कर में मैं भी बुरी तरह फंसा और कई साल तक इसे उधार देता रहा.

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यह राजीव शर्मा जब बेरोजगार था तो मकान किराया चुकता करने के लिए पैसे मांगता था। इसकी मदद मैं खुद तो करता ही था, दूसरों से भी कराता था। Prasoon Shukla और Sheetal P Singh जी से भी पैसे दिलवाए। मैंने एटीएम कार्ड तक दे दिया था, ये कह कर कि ज़रूरत के हिसाब से निकाल लिया करो। हां, ये क्लीयर कर दिया था, उधार दे रहा हूँ, नौकरी मिलते ही लौटा देना।

नौकरी मिली। ऑप्शन यहां तक दिया कि हर महीने हजार दो हजार ही लौटाते रहो ताकि मुझे ये फील होता रहे कि तुम लौटा रहे हो। पर यह ‘प्रोफेशनल बेगर’ लौटाना तो छोड़िए, मेरे मित्रों से चुपके से उधार लेता रहा और उनको भी लौटाने के नाम पर अंगूठा दिखाता रहा। इंदौर से लेकर इलाहाबाद तक के दर्जनों लोगों को इसी तरह चूना लगा चुका है। ये गर्व से कहता है- ”सच्चा पंडित कभी भूखा नहीं मर सकता”। सही कहता है भाई, नौकरी करते हुए भी उधार मांगते रहने की जो कला जानता हो वो कैसे भूखा मर सकता है। भूखे तो वो मरेंगे जो करुणावान हैं, जो दूसरों का दुख देख कर पैसे उधार दे देते हैं लेकिन जब मुश्किल पड़ने पर वापस मांगते हैं तो कोरे आश्वासन और झूठे वादे पाते हैं।

इस चोटी दाढ़ी वाले राजीव शर्मा से सावधान रहिएगा। दोस्ती ये इसलिए करता है ताकि उधार मांग सके। उधार तब तक ये मांगेगा जब तक आपकी देने की औकात रहेगी। हर बार बिल्कुल नया बहाना होगा और एक बहाने पर कई लोगों से उधार मांग लेगा। जब आप लौटाने की बात करेंगे तो या तो फोन उठाना बन्द कर देगा या आपसे झगड़ने लगेगा। खुद को नंगा घोषित कर देगा, ले सको तो ले लो टाइप।

इसको दर्जनों बार हजार दो हजार इसलिए देता रहा कि बेरोजगार है। इस पैसे को उधारी में गिना भी नहीं। खिलाना पिलाना टहलाना पर खर्च गिना नहीं। पर जो उधार के नाम पर लिए हो, वो तो लौटा दो। ये काफी समय से न्यूज़24 के डिजिटल विंग में है, लेकिन खुद से कभी पैसे लौटाने का नाम नहीं लिया। आज दस हजार रुपए ट्रांसफर करने का वादा किया था इसने। अब बोल रहा है- ”मेरे पास क्या, न देने को पैसा, न कहने को शब्द, न दिखाने को कोई दृश्य… नंगा क्या नहायेगा क्या निचोड़ेगा!”

मतलब साफ है। मेरे पैसे डूब गए।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

इस ठग पत्रकार की कहानी का अगला हिस्सा पढ़िए…

महिला पत्रकार और बीएसएफ इंस्पेक्टर को भी चूना लगा चुका है ठग पत्रकार राजीव शर्मा!

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आज रिलीज ‘राग-देश’ और ‘इंदु सरकार’ क्यों हैं मस्ट वॉच फिल्में, बता रहे हैं यशवंत

Yashwant Singh : ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही दिन दो अलग-अलग सच्ची घटनाओं पर आधारित, दो अलग-अलग ऐताहासिक कालखंडों पर केंद्रित फिल्में रिलीज हो जाएं. आज ऐसा हुआ है. ‘राग देश’ और ‘इंदु सरकार’ नामक दो फिल्में आज शुक्रवार के दिन रिलीज हुई हैं. दोनों सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और दोनों ही घटनाएं इतिहास के चर्चित अध्याय हैं.

‘राग देश’ सुभाष चंद्र बोष और उनकी सेना आईएनए के जवानों पर केंद्रित है. मेरे जैसे लोग जो गांधी जी के साथ-साथ भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस आदि के प्रति समान श्रद्धा और प्रेम रखते हैं, इस फिल्म को जरूर देखेंगे क्योंकि सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना के बारे में इतिहासकार कई एंगल से देखते लिखते बताते हैं. सुभाष चंद्र बोस की सेना आईएनए के जांबाज जवानों के द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ट्रायल को फिल्म का मुख्य सब्जेक्ट बनाया गया है. सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना पर पूरी तरह केंद्रित इस नई फिल्म से बहुत उम्मीदें हैं.

फिल्म रागदेश के निर्माता गुरदीप सिंह सप्पल

इस फिल्म की खास बात यह भी है कि इसे अपने बड़े भाई और राज्यसभा टीवी के सीईओ व एडिटर इन चीफ Gurdeep Singh Sappal जी ने प्रोड्यूस किया है. जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने इसे डायरेक्ट किया है. यह फिल्म चुनिंदा फिल्म क्रिटिक्स को दिखाई जा चुकी है और उन सभी ने इसे मस्ट वाच कैटगरी की फिल्म करार दिया है. यानि रिव्यू के लेवल पर फिल्म को ढेर सारे स्टार मिल रहे हैं. फिल्म का ये स्लोगन काफी फेमस हो रहा- ”जो देश से करते हैं प्यार, वो राग-देश से कैसे करें इनकार!” तो बंधु, चलिए चला जाए देखने. अपने सभी मित्रों से अपील है कि वे ‘राग देश’ देखें और इसको लेकर रिव्यू प्रकाशित करें. मैं आज शाम का शो बुक कर चुका हूं.

इंदु सरकार फिल्म पहले ही विवादों के कारण चर्चा में आ चुकी है. इंदिरा गांधी, संजय गांधी और आपातकाल पर केंद्रित इस फिल्म के जरिए हम जैसे आपातकाल के समय या बाद पैदा हुए लोग जान सकेंगे कि उस दौर की क्या भयावहता थी, उस दौर के घटनाक्रम कैसे कैसे घटित हुए. इस फिल्म को मधुर भंडारकर ने बनाया है जो पेज थ्री, फैशन, कारपोरेट जैसी फिल्में बना चुके हैं. इंदु सरकार को को कल देखूंगा. फिर दोनों ही फिल्मों का रिव्यू परसों लिखूंगा, वादा है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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”आप ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो फर्जी मुकदमे लादे जाते और जेल काट कर ही बाहर आता”

पिछले दिनों भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के साथ यूपी के गाजीपुर जिले की पुलिस ने बेहद शर्मनाक व्यवहार किया. यशवंत अपने मित्र प्रिंस सिंह के साथ रेलवे स्टेशन पान खाने गए और कुछ लोगों की संदिग्ध हरकत को देखकर एसपी को सूचना दी तो एसपी के आदेश पर आए कोतवाल ने यशवंत व उनके मित्र को ही पकड़ कर कोतवाली में डाल दिया. इस पूरे मामले पर यशवंत ने विस्तार से फेसबुक पर लिखकर सबको अवगत कराया. यशवंत की एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा इस प्रकार हैं… मूल पोस्ट नीचे कमेंट्स खत्म होने के ठीक बाद है… 

Mamta Kalia इस घटना से पुलिस का जनता के प्रति रवैया पता चलता है। मैंने एक बार अपने घर मे हुई चोरी की रपट लिखवाई थी। पुलिस ने मुझे अलग अलग तारीखों में कोर्ट बुला कर इतना परेशान किया कि मैंने लिख कर दे दिया मुझे कोई शिकायत नहीं। केस बन्द किया जाय।

सोनाली मिश्र हम लोग बाइक चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाने पहुंचे तो वो हमें ही यह उपदेश देने लगे, चेन न पहना करें, टॉप्स न पहनें आदि आदि।

Ramji Mishra इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पुलिस से शिकायत करने से पहले खुद को आदरणीय यशवंत जी की तरह मजबूत बना लेना चाहिए, अन्यथा अंजाम उसके हांथ होगा……

Shyam Singh Rawat अपने साथ भी मुरादाबाद में कुछ ऐसा ही हुआ था 1991 में। एक पुलिस इंस्पेक्टर की सार्वजनिक हित में ऐसी ही क्लास लगाई थी। फर्क इतना कि हम अकेले थे। बड़ी मुश्किल से इंस्पेक्टर साहब की जान छूटी थी।

Braj Bhushan Dubey अजीब दास्तान है। अजीबो गरीब घटना। आमजन के साथ तो ऐसे ही होता है जिसे चाहा उठा लिया और बेइज्जत कर दिया। शहर कोतवाल जो है। जोरदार लेखनी कि पढ़ने वाला एक बार शुरू करें तो अंत करके ही रुकेगा।

Pawan Singh यशवंत गुरू एक किस्सा और मिलता है तुम्हारे किस्से से….पुख्ता तौर पर वर्ष का उल्लेख न कर सकूँगा …वाकया होगा तकरीबन सन् 1988-89 का…दैनिक नवजीवन में मैं स्ट्रिंगर हुआ करता था…एक दिन पता लगा कि प्रसिद्ध कवि व पत्रकार राजेश विद्रोही और उस दौरान नवभारत टाइम्स में कार्यरत धीरेंद्र विद्यार्थी काठमांडू में धर लिए गए हैं …घटना यूँ थी कि नेपाल में कम्युनिस्ट दबदबे वाली सरकार थी..भाई लोगों ने दवा लगाई और काठमांडू के कवि सम्मेलन मंच पर ही कम्युनिस्टों के खिलाफ ही आधा दर्जन कविताओं का फाॅयर झोंक दिया….बवाल मचा…भाई लोग धर लिए गए ….अगले दिन हम लोगों ने नेपालगंज जाकर वहां के नेपाली पत्रकारों को साधा तो अगले दिन शाम ढलने के बाद छूटे….आज राजेश भाई तो दुनियां में नहीं हैं लेकिन उनकी कुछ कविताओं की दो-दो पंक्तियां आज भी याद हैं …..

अखबार नवीस भी अजब आदमी है, खुद खबर है दूसरों की लिखता है..

..आज सारा धनी पड़ोस उस निर्धन के साथ है।
लगता है उसकी बेटी जवान है…

..भूखे को चांद भी रोटी नजर आता है….

Vijay Prakash जय हो सर पूरा झकझोर दिए। आखिर तक हार नहीं माने…

Anurag Singh थाने को भी बाद में पता चला कि हम तो असली थानेदार को ले आये, फिर कोतवाल साहब बोले होंगे हईला….मैनें ये क्या कर दिया

Vinod Bhaskar बोला ये क्या कर बैठे घोटाला हाय ये क्या कर बैठे घोटाला, ये तो है थानेदार का साला.

पत्रकार यदु सुरेश यादव सर जी आप तो ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो लूट के दो चार केस दर्ज हो जाते और कुछ दिन जेल की रोटी तोड़ने के बाद ही बाहर आता, जय हो भड़ासानंद बाबा

Kuldeep Singh Gyani योगी का बदला कोतवाल से…अभी “अर्ध कुम्भ” लगने में समय है महराज, लेकिन बढ़िया तबियत दुरुस्त किये विभाग की…सारे भक्तजन एक साथ…बोलिये, स्वामी भड़ासानन्द महराज की जै

Azmi Rizvi दादा यही होता है आम आदमी के साथ, कोई आम आदमी होता तो जेल में होता आज, और दस बीस साल लग जाते उसे बेगुनाह साबित होने में। जै हो बाबा की

Rahul Vishwakarma सही सबक सिखाया… लेकिन कोतवाल की तरह आपको भी रायता थोड़ा और फैलाना चाहिए था. जरा जल्दी मान गए…

Surendra Trivedi यार मित्र, वाकई में बड़े ही रोमांटिक हो।

Anil Gupta पैदल चलने वाला हर आदमी सामान्य नही होता … बहुत खूब सर ..

Ravi S Srivastava लगता है जानेमन जेल पढे नही है कोतवाल साहब

Gaurav Joshi ग़ज़ब दादागिरी दिखायी भाई आपने ।

Riyaz Hashmi मेरठ कांड याद दिला दिया भाई। उस कहानी का एक चरित्र सौरभ भी याद आ गया जो अब इस दुनिया में नहीं है। Take Care.

Amod Kumar Singh कभी हमारी कोतवाली पधारिये, तुलसी रजनीगन्धा के साथ कन्नौज का इत्र विदाई में अलग से दिया जायेगा।

Yashwant Singh आंय । धमका रहे हैं भाया या वाकई प्रेम भरा न्योता है?

Amod Kumar Singh पुलिस में आने से पहले पुलिस की इतनी लाठियां खायी हैं, कि किसी सभ्य व्यक्ति को धमकाने या लठियाने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।आपका स्वागत है।

Yashwant Singh काश आप जैसे सोच समझ के लोग पुलिस विभाग में ज्यादा होते। थैंक्यू आमोद भाई। न्योता कुबूल। जल्द मुलाकात होगीं।

Journalist Yogesh Bharadwaj यशवंत भाई आप मिलिएगा आमोद जी से अच्छे व्यक्तित्व के धनी है और अच्छी सोच समझ के साथ न्याय प्रिय भी

Mishra Aradhendu आप तो बच गए पर आम जनता का क्या , जिसको ये पुलिस वाले बोलने ही नहीं देते….??

Shivam Bhardwaj ज़बरदस्त… लगा जैसे सब कुछ सजीव देख रहा हूँ 🙂

Ashutosh Dwivedi यशवंत जी क्या छापी जा सकती है ये कथा।

Yashwant Singh बिल्कुल ब्रदर।

Nishant Arya रजनीगंधा से मोह नहींऐ जाएगा। उल्टे कोतवाले से घुस लिए।।। बाह

Ajay Kumar Kosi Bihar बच गए भाई.बिहार रहता तो पोलठी भी खाते.सब पत्रकारी निकाल देता.तब फिर से आपको जाने मन जेल का भाग 2 लिखना पड़ता.

Ghanshyam Dubey तो आगे से समझ लेना — SP और CO समझदार थे! अगर न होते तो कहानी में फिर कई ट्विस्ट होते। पुलिस तो फर्जी मुकदमे कायम करने में माहिर होती है! जवान हो, भड़ासी हो तो कहानियाँ तो होती रहेंगी…

चन्द्रहाश कुमार शर्मा …तो आप भी एक नया अफसाना बना दिये?

Sachin Mishra मनमोहक और काफी रुचिकर कहानी थी गुरु। सच में वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।

Kailash Paswan इसलिए पुलिस को आमलोग उप नाम से पुकारते है

Devendra Verma आपने पुलिस का जो सच सुनाया है, वह बिलकुल सच है ….जैसे मैने पढना शुरू किया वैसे वैसे कहानी का रोमांच बढता गया आनन्द आ गया…..

Md Islam बेचारा कोतवाल गलत नंबर डायल कर गया

Amit Srivastava इस पूरी घटना में मुखपात्र कोतवाल का कही नाम नहीं लिखा अगर उसका नाम भी लिख देते तो मामला समझ ने लोगो को आसानी होती।

Pandit Prakash Narayan Pandey बेशर्मी व बेहयाई की हद्द कर दी उस दारोगा ने… वे सब बहुरूपिया तो होते ही हैं… बहरहाल लताड़ना तो कत्तई नहीं छोड़ना है….
Hemant Jaiman Dabang एक वाक्य में ख़त्म करूँगा—अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे… यहां ऊंट कोतवाल (पुलिस) को कहा गया है। और पहाड़ यशवंत सिंह को। राम जी राम

Ashutosh Chaturvedi ऊर्जा का संचार कर दिया सर आपने।

DrMandhata Singh गनीमत है एनकाउंटर नहीं किया। आजकल अपनी प्रगति के लिए अनजान लोगों को बलि का बकरा बनाते हैं पुलिस वाले और बाद में होती है लीपा-पोती। अनुरोध है कि ऐसे खेल न खेलें। हम लोगों के लिए आप बहुमूल्य हैं। यह आपको याद रखना चाहिए। सबक का खेल सावधानी से खेलें।

Sunayan Chaturvedi भड़ासी माहौल के जनक यशवंत सिंह की भड़ासी अदा को प्रणाम।

Purnendu Singh आज तो तुम खुश बहुत होगे ठाकुर कोतवाल सीओ, sp से माफी मंगवा लिए। याद रखना अब तुम्हारे जैसे लोग अनशन की धमकी मत दे कर माफी मंगवा सकते हैं तो यह नेता बलात्कारी और अपराधी हत्यारों को भी छोड़ा लेते हैं फिर दोष मत देना पुलिस को क्यों कोतवाल निकम्मा था जो तुमको ऐसे ही आने दिया… कभी किसी के चक्कर में पड़ोगे तो बताया जाएगा पुलिस क्या होती है…

Yashwant Singh आपकी बात कांट्राडिक्टरी हैं। बेवजह पकड़े जाने पर निर्दोष का प्रतिरोध और रेपिस्ट मर्डरर अपराधी को पुलिस से छुड़वाए जाने की नेता की गुंडई जैसी दो विरोधाभाषी चीजों को एक तराजू में रख कर कैसे तौल सकते हैं। वैसे, धमकाने के लिए धन्यवाद।

Sandeep Chandel भाई साहाब पुलिस कोई मुहनोचवा तो है नहीं कि किसी को उठा ले जाय मामले की सही जाच कर के उठाना चहीये ताकी लोगो का विश्वास बना रहे ये सही है की हम पुलिस की दिल से इज्ज़त करते हैं और करते रहेंगे , लेकीन विश्वास तब डगमगाता हैं जब ग्यात्री प्रजापती जैसे लोगों को पकडने में एक महीने लग जाता है और आम जनता को सरेआम बदनाम किया जाता है, हमे लगता है आप हमारी बातों से सहमत होंगे ,

Syed Shahid Ali पुलिस की कार्यप्रणाली की सच्चाई सहन न कर पाने बाले भाई साहब एक पत्रकार को धमकाने के बजाय जनता में पुलिस की छवि सुधारने पर विचार कीजिए । धन्यवाद

Uvaish Choudhari पुरनेन्दू जी के रिश्तेदार तो नही थे कोतवाल साहिब?

S.K. Misra गलती करने वालों को भी विभाग के यदि लोग ऐसे ही समर्थन देंगे तो उनमें सुधार कैसे होगा, इस पुलिस बाले की कमेंट को देख कर दुःख हो रहा है ।

Manoj Tripathi आप जहाँ काण्ड वहां!!

Ram Murti Rai Jabardast.. Heropanthi

C S Singh Chandu जरा सोचिए भाई साहब अगर आपके जगह कोई आमजनता होती तो अब तो उसका उसके पूरे परिवार के साथ बड़ी ही दर्दनाक कहानी हो जाती और वर्षों पढ़ी जाती… सोचकर ही रुह काँप जा रही है… पता नहीं और क्या क्या बीतती उस आम आदमी के साथ…

Rahul Gupta Badaun भैया जी, यह कोतवाल अब सपने में भी सौ सौ बार सोचेगा, इस भड़ासी बाबा से आइंदा पाला न पड़े। वरना अभी तो बच गया आगे भगवन मालिक होंगे। अब यह जहाँ भी आपको देखेगा खुद चल कर मिलने आएगा।

Ajay Mishra खेत खाए गदहा मारा जाए जुलाहा उत्तर प्रदेश पुलिस की यही दिनचर्या है यह सुधर जाएं तो पूरा प्रदेश सुधर जाए

ChandraShekhar Hada सर, ऐसा लग रहा है जैसे आप रजनीगंधा-तुलसी की विज्ञापन फिल्म कर रहे हैं।

Nirupma Pandey ये आप ही कर सकते थे ।

Maneesh Malik Thanks for police valo ko sabak sekhane k laya Maja aa gya. Jay hind.

Syed Mazhar Husain क्या बात है भाई… ऐसी तैसी हो गयी कप्तान से लेकर कोतवाल तक… एक सेल्फी तो बनती थी कोतवाल के साथ…

Narendra M Chaturvedi जेल तो….जानेमन जेल…नाम से प्रख्यात हुई…और अब कोतवाली….यशवंत भईया वैसे आज आपके मुताबिक जेल दिवस भी है…?

S.K. Misra इस पोस्ट में डीजीपी को टैग करना चाहिये था… उन्हें भी पता चलता उनके रणबांकुरे कैसे जनता की सेवा में तत्पर हैं।

Surya Prakash कुल मिला के रजनीगन्धा तुलसी की व्यवस्था हो गई गुरु …

Rajendra Joshi घटना तो जो भी रही हो कहानी में ऐसे-ऐसे मोड़ आपने डाल दिए कि लगा न जाने अगले मोड़ पर क्या नया होगा।

Sarvesh Singh बेचारे पुलिस वालों ने इस दिन की कल्पना तक ना की होगी।

Anshuman Shukla अब सोचिये, लल्लन टाप कानून व्यवस्था है कि नहीं है उत्तर प्रदेश में।

Ashok Kumar Singh आपका रिश्वत रजनीगन्धा तुलसी ,फिर भी सस्ता ही पड़ा कोतवाल को

Vinay Shrikar बतौर समझौते की शर्त तुलसी और रजनीगंधा के साथ ही संजीवनी सुरा की डिमांड कर देना था।

Rajesh Mishra बहुत गलत किये थे कोतवाल महोदय

A.k. Roy कोतवाल के लिऐ, सेर को सवासेर मिला….

Sant Sameer क्रान्तिवीरों की जै हो।

Shrinarayan Tiwari गजब की कहानी है यशवंत जी

Anuj Sharma गुरु एक नई जानकारी मिल गई। आप ”रजनीगंधा तुलसी” मंत्र से वश में होते हो।

Umesh Srivastava Socialist संत किसी के बस में नहीं होता और सब के बस में होता है

Anuj Sharma गुरु तो क्रांतिवीर हैं।।। पत्रकारों की रीढ़ हैं।।

Anuj Sharma अब भक्त ये मंत्र याद कर लेंगे।।।

Kaushal Sharma उत्तर प्रदेश पुलिस संघटित अपराधियों का सरकारी गिरोह है।

Abhay Prakash Yashwant G Mai to aapko ni janta par itna jarur kahunga ki pulice wale itna sidhe sadhe kab se ho gai

Anand Agnihotri फोन करके कोतवाल साहब का हालचाल तो पूछ लेते। बेचारा बड़ा मायूस बैठा होगा। अब कई दिन कहीं से रंगदारी नहीं मिलेगी उसे।

प्रयाग पाण्डे आपकी जै हो। माना आपकी जगह कोई दूसरा निरपराध इंसान होता ? बना दिया गया होता न अपराधी। खैर…… .

Dinesh Dard यही जुझारूपन तो चाहिए ज़ुल्म के ख़िलाफ़। मगर हर शख़्स में इतनी ताब कहाँ होती है। बहरहाल, ज़िंदाबाद।

Vinod Bhardwaj स्वामी भड़ासानन्द जी महाराज, अब उस इंस्पेक्टर को दिल से धन्यवाद कर दो जिसने अपनी करतूत से ये रोमांचकारी भडासी मसाला लिखने – पढ़ने का मौका दे दिया ।

Madan Tiwary यह हुई मेरे मन मुताबिक़ बात। अब आंदोलन शुरू करो गुरु।

Amar Chaubey ध्यान रखा करिये आप योगी सरकार में है

Madhusudan JI अपने ही घर के दरवाजे पर अपना ही कुत्ता न पहचान पाया और गुर्रा कर अपनी औकात भी जल्दी से पहचान लिया.. बधाई हो.. धूल चटा ही दिया उसे

Manish Jaiswal सर, इन कोतवाल महापुरुष का नाम तो बता दीजिए ताकि हम लोग भी उन्हें दुआ दे सकें…

Fareed Shamsi जलवा है जलवा, मैं तो सोच रहा था, कि अब एक और नई किताब पढ़ने के लिये मिलेगी ‘जानेमन हवालात’

Amit Tiwari आज फिर से अपराध जीत गया। एक तुलसी और रजनीगंधा की रिश्वत से बड़ी गलती को माफ़ कर दिया गया । क्या गारंटी है कि इस रिश्वत से पुलिस यह ग़लती किसी भले आदमी के साथ दोबारा नही करेगी।

Dheeraj Rai Sri Amit ji / Dobara Aysa karen na karen .. Ab Yah Police Parivar ke mukhiya (SP-Gazipur) ka daitva huva. Sri Yashvant Ji ne SP KoAaina dikha Apne Daitva ka Nirvahan kar diya. Ab Ek Journalist Es se jada kuchh nhi De Sakta Police ko. Ins. Ko Nilambit athva Anya koi bhi gambhir karywahi ka Vaydhanik Adhikar to Aaina Dekhte SP ke Pas hay !! Ab SP Avm Sarkar Samjhe.
Dhanyawad Sri Yashvan Ji.

Ashwani Sharma अरे भाई कोई आम आदमी होता तो अब तक जेल में सड़ रहा होता

Dheeraj Rai Haaaaaaaa…. To kisi Patrakar se Pala para tha Police ka. hona hi tha.

Lokesh Raj Singh Aapki patrakarita ka power bhi paan masale tak mein simat aaya jai ho patrakar maharaj. Koi shaq nahi ki angreji daru par imaan bik jata hoga.

Manoj Singh Chauhan आप के साथ कहानी हुई, उस कोतवाल के साथ तो कांड हो गया…

Yatish Pant आम आदमी पर क्या गुजरती होगी क्योंकि ऐसा तो रोज होता है।

Chandra Shekhar Kargeti कोतवाल को माफ़ भी किया तो एक रजनीगन्धा और डबल जीरो में …आपकी जगह कोई दुसरे वाले पत्रकार रहे होते तो ?

Mannu Kumar Mani Yashwant भाई, कोई आम आदमी होता। तो उसकी लग गई होती।

Arvind Saxena आपने तुलसी रजनीगंधा की मांग कर अपराध को बढावा दिया

Care Naman सच में कहानी कहानी हो गई इस नई जवानी

Syed Tariq Hasan पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य नहीं होता ! शानदार।

Devendra Kumar Nauhwar आप असाधारण हैं, आपकी समाज को जरूरत है!

Ankit Kumar Singh यशवंत भैया कोतवाल सच में पैर छूने लगा ??

Vishal Ojha ले रहे मजा मजबूर बन के जानेमन

Ashish Mishra E sare fasad ki jadd mujhe tusli aur rajnigandha lg rha h.

Gopal Ji Rai Janeman 2 likhane SE bach gaye

Sandeep Kher वाह बहुत अच्छा सबक़ दिया आपने सर पर उस ग़रीब आदमी का क्या जो ऐसे ही उठा लिए जाते है जिनका कोई सोर्स नहीं होता है अगर आप भी आम आदमी होते तो शायद अंदर होते हमारी पूलिस संवेदनहीन हो गए है जो सिर्फ़ आदेश बजाना जानती है फिर चाहे निर्दोष इंसान को ही ना उठना पड़े पूलिस को ध्यान देना चाहिए की कोई बेगुनाह आदमी क़ानून के चुंगल में ना आए

Sanjay Kumar Patrakaar पता नहीं भारत में ऐसी घटनाएं रोज कितनी होती होगी. परंतु बहुत सा मामला उजागर ही नहीं होती है . यशवंत जी आपने उजागर कर पुलिस की कार्यशैली को जनता के सामने लाने का प्रयास किया है .

Sunil Kumar Singh जय हो… पर आप जरा अंदाजा लगाए कि यह पुलिस महकमा कैसे पेश आता होगा आमजन से?

Vivek Gupta बहुत खूब भैय्या. लेकीन ये प्रशासन कब सुधरेगा.

Gandhi Mishra ‘Gagan’ काम तो कोतवाल कोई बुरा नहीं किया था भाई क्योंकि आप दोनों मित्र भी तो पहुंचने के बाद उसे जिसकी संदिग्धता की जानकारी आपने कप्तान को दी थी कोतवाल को भी देना था औऱ रजनीगंधा तुलसी पर नहीं बिकना था ।

Dharmendra Pratap Singh बाबा कहीं रहें और बवाल न हो, असंभव… जय हो !

Rinku Singh हर पैदल चलने वाला आम आदमी नहीं होता….

Amit Kumar Bajpai पूरी कहानी का सार……. रजनीगंधा की पुड़िया और पानी की बोतल में संसार बंधा है….. तर्क- वितर्क- कुतर्क धरे रह जाते हैं, गलती करने वाले पछताते हैं और गुरु गजब कर जाते हैं.. Haha

Neeraj Sharma बड़े काण्डी हो यशवंत भाई

Trilochan Prasad हाहा, डार्लिंग जेल वाले को पकड़ लिया

Anil Kumar Singh उसे मालूम नहीं था जिसे बकरा समझ रहा है वह तो शेरों का शेर है।


मूल पोस्ट ये है…

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रेलवे स्टेशन पर पान खाने गए यशवंत पहुंचा दिए गए कोतवाली!

Yashwant Singh : रात मेरे साथ कहानी हो गयी। ग़ाज़ीपुर रेलवे स्टेशन पर पान खाने गया लेकिन पहुंचा दिया गया कोतवाली। हुआ ये कि स्टेशन पर मंदिर के इर्द गिर्द कुछ संदिग्ध / आपराधिक किस्म के लोगों की हरकत दिखी तो एसपी को फोन कर डिटेल दिया। उनने कोतवाल को कहा होगा। थोड़ी ही देर में मय लाव लश्कर आए कोतवाल ने मंदिर के पास वाले संदिग्ध लोगों की तरफ तो देखा नहीं, हम दोनों (मेरे मित्र प्रिंस भाई) को तत्काल ज़रूर संदिग्ध मानकर गाड़ी में जबरन बिठा कोतवाली ले गए। मुझे तो जैसे आनंद आ गया। लाइफ में कुछ रोमांच की वापसी हुई। कोतवाल को बताते रहे कि भाया हम लोगों ने तो संदिग्ध हरकत की सूचना दी और आप मैसेंजर को ही ‘शूट’ कर रहे हो।

कोतवाली में नीम के पेड़ के नीचे चबूतरे पर मेरा आसन लगा और गायन शुरू हो गया- ना सोना साथ जाएगा, ना चांदी जाएगी…। पुलिस वालों ने मेडिकल कराया जिसमें कुछ न निकला। अंततः एक स्थानीय मित्र आए तो उनके फोन से फिर एसपी को फोन कर इस नए डेवलपमेन्ट की जानकारी दी। एसपी भौचक थे सुनकर। उन्होंने फौरन कोतवाल को हड़काया। सीओ को कोतवाली भेजा। आधे घंटे में खुद भी प्रकट हो गए।

तब तक दृश्य बदल चुका था।

शहर कोतवाल सुरेंद्र नाथ पांडेय हम लोगों के चरण छूकर माफी मांग रहा था। उनका अधीनस्थ दरोगा जनार्दन मिश्रा जो बदतमीजी पर आमादा था, कोतवाली लाए जाते वक्त, गायब हो चुका था। हम लोगों ने नीम के पेड़ के नीचे पुलिस जुल्म के खिलाफ ऐतिहासिक अनशन शुरू कर देने की घोषणा की। माफी दर माफी मांगते रुवांसे कोतवाल को हम अनशनकारियों ने आदेश दिया कि फौरन तुलसी रजनीगंधा की व्यवस्था कराओ, तब अनशन खत्म करने पर विचार किया जाएगा। कोतवाल ने अल्फा बीटा गामा चीता कुक्कुर सियार जाने किसको किसको आदेश देकर फौरन से पेशतर उच्च कोटि का पान ताम्बूल लेकर हाजिर होने का हुक्म सुनाया।

सीओ को हम लोग कम भाव दिए क्योंकि निपटना कोतवाल से था।

कप्तान आए तो मेरा पुलिस, जनता, पत्रकरिता और सरोकार पर भाषण शुरू हुआ जो अनवरत आधे घंटे तक चला। मैं रुका तो मेर साथ अनशनकारी मित्र प्रिंस का उग्र भाषण शुरू हुआ। कप्तान सोमेन वर्मा माफी मांगने लगे और कोतवाल को जमकर लताड़ने लगे। अगले घण्टे भर तक सुलहनामे की कोशिश चलती रही। मेरी एक ही शर्त थी कि अगर मेरे दोस्त प्रिंस ने माफ कर दिया तो समझो मैंने भी माफ कर दिया वरना ये कोतवाली का धरना सीएम आवास तक पहुंचेगा। एसपी ने प्रिंस भाई के सामने हाथ जोड़ा और पुलिस विभाग की तरफ से मांफी मांग कर उन्हें गले लगाया। साथ ही साथ वहां हाथ बांधे खड़े कोतवाल की जमकर क्लास लगाई- ‘तुम नहीं सुधर सकते… चीजों को ठीक नहीं कर सकते हो तो कम से कम रायता तो न फैलाया करो…’।

मैंने कहा- ‘इसके पास वसूली उगाही से फुरसत हो तब न सकारात्मक काम करे… ऐसे ही लोग विभाग के लिए धब्बा होते हैं जो राह चलते किसी शख्स से बदतमीजी से बात करते हुए उसे थाने-कोतवाली तक उठा लाते हैं, जैसा आज हुआ’।

कोतवाल बेचारे की तो घिग्घी बंधी थी। एसपी और सीओ माफी पर माफी मांग अनशन से उठने का अनुरोध करते जा रहे थे। हम लोग जेल भेजे जाने की मांग पर यह कहते हुए अड़े थे कि अरेस्टिंग और मेडिकल जैसे शुरुआती दो फेज के कार्यक्रम हो चुके हैं, तीसरे फेज यानि जेल भेजे जाने की तरफ प्रोसीड किया जाए।

इसी बीच बाइक से आए एक पुलिस मैन ने कोतवाल के हाथों में चुपके से कुछ थमाया तो कोतवाल ने हाथ जोड़ते हुए मुझे तुलसी रजनीगंधा का पैकेट दिखाया। मैं मुस्कराया, चॉकलेट को मुंह से कट मारने के बाद सारे दुख भूल जाने वाले विज्ञापन के पात्र की तरह। उधर प्रिंस भाई का भी भाषण पूरा हो चुका था और पूरा पुलिस महकमा सन्नाटे में था। अनुनय विनय की चौतरफा आवाजें तेज हो चुकी थीं। अंततः आईपीएस सोमेन वर्मा के बार बार निजी तौर पर मांफी मांगने और आइंदा से ऐसी गलती न होने की बात कही गयी तो मैंने उनसे बोतल का पानी पहले प्रिंस भाई फिर मुझे पिला कर अनशन खत्म कराने का सुझाव दिया जिसे उन्होंने फौरन लपक लिया।

आंदोलन खत्म करने का एलान करते हुए नीम के पेड़ के चबूतरे से उठ कर मैं सीधे कोतवाल की तरफ मुड़ा और उसके हाथ से तुलसी रजनीगंधा झपटते हुए कहा- ”तुम यहां आंख के सामने से निकल लो गुरु, वर्दी न पहने होते तो दो कंटाप देता, लेकिन ये तुलसी रजनीगंधा मंगा कर तुमने थोड़ा अच्छा काम किया है इसलिए जाओ माफ कर रहा हूं। बस ध्यान रखना आगे से कि पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य ही नहीं होता इसलिए किसी आम आदमी से बदतमीजी करने से पहले सौ बार जरूर सोचना।”

कोतवाल सिर झुकाए रहा।

कप्तान ने हम लोगों का जब्त मोबाइल और लाइसेंसी रिवाल्वर वापस कराया। एक दोस्त रिंकू भाई की कार पर सवार होने से पहले कोतवाली के गेट पर बंदूक लिए खड़े संतरी से जोरदार तरीके से हाथ मिलाते हुए उन्हें इस कोतवाली का सबसे बढ़िया आदमी होने का खिताब दिया और उन्हें ‘जय हिंद’ कह कर सैल्यूट ठोंकते हुए घर वापस लौट आया।

अभी सो कर उठा तो सबसे पहले रात का पूरा वृत्तांत यहां लिखा ताकि भड़ास निकल जाए। आज रोज से ज्यादा एनर्जेटिक फील कर रहा हूं क्योंकि वो मेरा प्रिय गाना है न – ‘वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो’। दिक्कत ये है कि मैं पूरी जिंदगी में एक नहीं बल्कि हर रोज एक कहानी चाहता हूं और जिन-जिन दिनों रातों में कोई कहानी हो जाया करती है उन उन दिनों रातों में ज्यादा ऊर्जा से भरा जीवंत महसूस करता हूँ।

कह सकते हैं मेरे साथ हर वक्त कहानी हो जाया करती है, कभी इस बाहरी दुनिया में घटित तो कभी आंतरिक ब्रम्हांड में प्रस्फुटित।

फिर मिलते हैं एक कहानी के बाद।

जै जै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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‘कलम के धनी यशवंत ने एक साधारण व्यक्ति की मृत्यु की असाधारण व्याख्या की!’

भड़ास के एडिटर यशवंत अपने गांव गए तो सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बेटे बिग्गन महराज की असमय मौत के घटनाक्रम को सुन-देख कर उन्होंने एक श्रद्धांजलि पोस्ट फेसबुक पर लिख दी और बाद में उसे भड़ास पर भी अपलोड करा दिया. इस श्रद्धांजलि पोस्ट को बड़े पैमाने पर पसंद किया गया और सैकड़ों लाइक कमेंट्स मिले. आइए इस स्टोरी पर आए कुछ चुनिंदा कमेंट्स पढ़ते हैं. मूल स्टोरी नीचे बिलकुल लास्ट में, कमेंट खत्म होने के बाद है, ‘श्रद्धांजलि : दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!‘ शीर्षक से.

Sanjaya Kumar Singh

टीआरपी और लाइक की होड़ में आज बिग्गन महाराज जैसों की खबर कुछ सेकेंड या लाइन भी नहीं पाती है। आपने याद किया तो समाज में मौजूद ऐसे कई लोगों की बरबस याद आ गई। पेट भरा होता तो ये भी कहते रहते 10-10 बच्चे पैदा करो। पर जैसा कि आपने लिखा है – उनके जाने से परिवार को भी फर्क (भावनात्मक छोड़कर) नहीं पड़ेगा। गनीमत यही है किगरीबी में जीने वाले लोग वोट की राजनीति नहीं करते वरना अपने जैसे कई और बनाकर जाते।

Rajesh Agrawal

कलम के बड़े धनी हैं आप, आपने पूरा दुख-दर्द अपनी लेखनी में समेट दिया है। एक साधारण व्यक्ति की मृत्यु की असाधारण व्याख्या है यह।

Nimish Kumar

बाबा..तेरी लेखनी को सलाम..गजब लिखे हो..दिल चीर दिए हो…बहुत शानदार…हम-तुम जैसे कलम के सिपाही किसी को ऐसी ही श्रद्धांजलि दे सकते हैं…सैलूट, इस हरामखोर समाज का सच लिखने के लिए..जो किसी इंसान को सिर्फ पैसे से आंकता है..उसके इंसान होने से नहीं…

Nahid Fatma

Aise laga jaise Sab apni aankho se dekha !!! Ishwar aapke dost k jaane par aapko sabr de !!! Ye to ek Biggan the jinke baare me pta chal gya aise bohut saare Biggan roz jaate hen jinka pta hi nhi chalta…

Madhav Krishna

यशवंत भैया। यह पढ़ने के बाद अब मुझे आपकी ‘जानेमन जेल’ का इंतज़ार है

Vinay Shrikar

तुमको तो कथाकार होना चाहिए था। था, क्या हो! क्या ही मर्मस्पर्शी और हृदयविदारक कथारस है एक-एक कथन में ! What a sharp observation of smallest things of life ! What a peculiar and sensitive way of narration ! Biggan Maharaj’s sad story will always haunt our minds and memories for long!

Vikas Mishra

भाई बिग्गन महाराज की कथा पढ़कर भीतर से कुछ कचोट सी महसूस हुई। गजब लिखा है आपने, बिग्गन महाराज गांजा पीते हुए, मां से पैसे के लिए झगड़ते हुए, शांत भाव में चिर निद्रा में सोते हुए और अंतिम संस्कार के तौर पर गंगा में प्रवाहित होते हुए दिखने से लगे।

Arun Kumar Roy

मैं भी दो साल पहले अपने गांव गया था. पास के टोले के लम्बी दाढ़ी केश वाले बाबा को पहचान कर बचपन के हमउम्र के नाते मित्रवत बाते करने लगा तो पता चला ऊनकी मजबूरी भी कुछ इस ही तरह की थी. तभी उन्होंने मुझे औरों की ही तरह आदर पूर्वक सम्बोधन करने का आग्रह किया. तब कम, अब अधिक समझा, आपके insightful post के मनन के बाद. साधुवाद!

Manoj Anuragi

ये सच कहानी बहुत मार्मिक है और एक ख़ास तरह की जीवन की जद्दोजहद को दर्शाती है, आपने बहुत सुंदर भाषा शैली में लिखी है जी करता है कि पत्रिका में छाप दूँ क्या अनुमति है महोदय

Neelesh Misra

कितना सशक्त और मार्मिक चित्रण एक ऐसी शख़्सियत का जिस से कभी मिले नहीं, मिलेंगे नहीं, लेकिन लगता है बरसों से मिलते रहे हों। बहुत ही बढ़िया लिखा है, यशवंत। अनेकों बधाइयाँ! अपनी रचनात्मकता के इस पक्ष को सँवारें। ख़ूब, ख़ूब लिखें! ‘गाँव कनेक्शन’ में छाप सकते हैं इसे यशवंत?

Vinay Oswal

“मेरे दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना”। इस तरह धारा की तरह प्रवाहमान आलेख मुझे बहुत प्रिय लगते हैं। जिनमें कहीं ठहराव नहीं। बस जो अपने साथ यात्रा कराते हैं, माहौल की बारीक से बारीक हलचल के बोध के साथ। मानवीय संवेदनाओं को उकेरते हुए, जीवंत बनाते हुए, बढ़ते जाते हैं लक्ष्य की ओर…!!!!

JP Tripathi

लिखावट में ऐसी जान फूंक दी आपने कि दिल अब तक कचोट रहा है। श्रद्धांजलि

Sudha Singh

मृतक को श्रद्धांजलि और इस बेहतरीन याद को सलाम।

Onkar Singh

बिग्गन महराज के साथ आपको भी निष्ठावान साथी के असमय और विस्मय कूच पर कंजूसी के लिए नमन,ये तो मृत्यु कथा थी जिन्दगी की कहानी में मर्दवा आप तो साझीदार थे.

Manu Laxmi Mishra

बिग्गन महाराज की कथा पढ़कर जीवंत चलचित्र आँखों के सामने जीवित हो उठा,बहुत लोग ग़रीबी के मारे अपना चोला बदल लेते हैं,अपनी इच्छाओं का दमन कर लेते हैं

Prateek Chaudhary

यशवंत भैया. बिग्गन महाराज का जीवन हमारे समाज का ही एक हिस्सा है। अत्यंत मर्मस्पर्शी।

Santosh Singh

भाई जी…आँखे नम हो गयी आपके लिखने के अंदाज से. क्या जीवंत चित्रण किया है

Dhyanendra Tripathi

बेहद मार्मिक और इस क्रूर दुनिया का मर्मान्तक सच. कितनी साफगोई से आपने लिखा है.. बिग्गन महराज को विनम्र श्रद्धान्जलि..

Suresh Neerav

यशवंत भाई श्रद्धांजलि भी सोचपरक ढंग से दी जा सकती है, यह आपने सिद्ध कर दिया।

Devendra Verma

विग्गन महराज समाज की जीवन्त लीला के यशस्वी पात्र थे चरित्र जीवन्त रहेगा सिर्फ पात्र बदलते रहेगे तमाम विग्गन महराज काल कलवित हो गये और कितने होने के लिए कतार मे है…सामाजिक कुव्यवस्था के कारण न जाने कितने लोग विग्गन महराज बनने के लिए विवश होते रहेंगे

Niranjan Sharma

बिग्गन महाराज की जय हो ! आपकी भावपूर्ण श्रद्धांजलि में हम भी शरीक हैं!

Lambu Ji

बिग्गन महराज big आदमी थे…आपके संस्मरण ने उन्हें अमर कर दिया.

Maharshi Kumar Tiwari

हमारे समाज में मौत पर चर्चा कोई नही करता ऐसे जी रहे है जैसे हमेशा इस ग्रह पर रहना हो ।

Divakar Singh

बेहद मार्मिक श्रद्धांजलि। ऐसे फक्कड़ों से ईर्ष्या होती है, जो हमारी आपकी तरह न जीकर असल ज़िन्दगी जी लेते हैं।

Sarang Upadhyay

बिग्गन महाराज केवल आपके गांव के नहीं रहे। वे अब सदा के लिए…! नमन..!

A.k. Roy

आज के समाज और समय को देखते हुए, आपका सटीक, सामयिक विश्लेषण है।

Pramod Kumar Pandey

आपके दोस्त बिग्गन महाराज को श्रद्धांजलि। मार्मिक लिखा है आपने।

Manoj Kumar

बेहद मार्मिक और मर्मान्तक सच। बिग्गन महराज को विनम्र श्रद्धान्जलि..

Jayesh Agarwal

गांव हो या शहर.. गरीब और गरीबी का कोई हमदर्द, दोस्त कहां होता है.. जीवंत लेखन..

Prakash Bhushan Singh

वैसे भी गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं? अनदेखे अंजाने बिग्गन महराज को विनम्र श्रद्धांजलि!

Rajesh Somani

Lost true freind however he was better than town freind

Ashok Das

उनको श्रद्धांजलि। उनके साथ बचपन की कुछ और यादें साझा करिये।

Ajay Singh

बेहतरीन संस्मरण!

Ashok Anurag

दोस्त…अगले जन्म अमीर घर ही आना……

Kamal Sharma

गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. सही बात है भाई.


उपरोक्त कमेंट्स जिस पोस्ट पर आए हैं, उसे यहां पढ़ सकते हैं :

यशवंत की एफबी पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

Yashwant Singh Facebook Post of Biggan Mahraj

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बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

बिग्गन महाराज गांव के सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बड़े बेटे थे. अभाव और अराजकता के दुर्योग से वह भरी जवानी में बाबा बनने को मजबूर हुए. अगल-बगल के गांवों के मंदिरों पर रहने लगे. कुछ बड़े बाबाओं के शिष्य भी बने. बताया गया कि वह कल मरने से पहले एक यजमान के यहां जाकर उन्हें दीक्षा दी. गुरुमुख बनाया. बदले में उन्हें नया स्टील का कमंडल और एक बछिया मिली. जिस दिन उन्हें इतना कुछ मिला, उसी दोपहर उनके पेट में अन्न जल न था. उपर से तगड़ी धूप. बिग्गन महाराज मंदिर लौटे और गिर कर मर गए. शव के साथ बैठे लोग किसिम किसिम की चर्चाएं कर रहे थे. कौन जानता था अपने यजमान को मोक्ष-मुक्ति का मार्ग बता मंदिर लौट रहे गुरु पर इस मायावी संसार को अलविदा कहने के वास्ते मारण मंत्र का जाप शुरू हो चुका था.

बतकही जारी थी. पुरवा हवा की सरसराहट से बिग्गन महाराज के शव पर पड़ा चद्दर सर से पांव तक इस कदर फड़फड़ा रहा था जैसे पंडीजी बस अब कुछ बोलने के लिए उठने ही वाले थे. ताड़ी से तारी साथ बैठे एक सज्जन उदात्त भाव और तेज स्वर से कहने लगे- बिग्गन महराज गांजा के बाद हीरोइन पीने लगे थे. आजकल तो पैसे के लिए गांव आकर अपनी मां से लड़कर सौ पचास ले जाने लगे थे. जितने मुंह उतनी बातें. कईयों ने मौत को अनिवार्य सच बताया. कुछ ने बिग्गन महाराज की कम उमर होने का हवाला दिया. मुझे अजीब इच्छा हुई. तख्त पर लिटाए गए बिग्गन महाराज के चेहरे को देखने की. रात दो बजे के करीब उनके छोटे भाई ने महराज के चेहरे से चद्दर हटाया. लंबी बाबाओं वाली दाढ़ी और सांवला चेहरा. बिलकुल शांत. लग ही नहीं रहा था कि यह मरे आदमी का चेहरा है. जैसे वो सोए हों. ध्यान में हों. चिलम के असर के बाद मौन साध गए हों.

चार भाइयों में सबसे बड़े बिग्गन महाराज के गुजर जाने से उनके परिवार पर कोई असर न पड़ेगा. एक तो उनका खुद का कोई निजी परिवार न था. उनने शादी न की थी. कह सकते हैं शायद हुई ही न हो. इसलिए वे बाल ब्रह्मचारी कहलाए गए. दूसरे उनके जाने से सगे भाइयों को कभी कभार सौ पचास मां से मांग ले जाने के अप्रत्याशित कर्म से मुक्ति मिली.

हां, बुजुर्ग महतारी जरूर देर तक छाती पीट पीट कर रोती रहीं. शायद मां के कलेजे में उस बेटे के खास तड़प होती है जो थोड़ा मजबूर हो, जो थोड़ा शोषित हो, जो थोड़ा अव्यवस्थित हो, जो थोड़ा मिसफिट हो, जो गैर-दुनियादार हो, जो संघर्षरत हो.

शाम के समय मरने की खबर जब घर पहुंची तो नाती-नातिन के साथ बैठी बुजुर्ग महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी. अगल-बगल घरों की महिलाएं एक एक कर पहुंच कर उन्हें पकड़ कर दिलासा देने लगीं- ”होनी को कौन टाल सकता है मइया, चुप रहिए, भगवान को शायद यही मंजूर था.” पड़ाइन मइया कुछ गा-गा कर लगातार रोती बिलखती हिलती फफकती हांफती रहीं. शायद इस तरह बेटे को अंतिम बार पूरे दिल और पूरी शिद्दत से याद किया उनने.

मुझे बिग्गन महाराज के साथ बचपन के दिन याद आए. उनके साथ बगीचों में आम तोड़ना, उनके साथ पूड़ी खाने दूसरे गांवों में जाना, ढेर सारी शरारतों और बदमाशियों में उनको अपने विश्वासपात्र सिपाही की तरह साथ रखना. बिग्गन महाराज लायल थे. निष्ठा उनने कभी न तोड़ी. दोस्ती की तो खूब निभाया. बाबा बने तो उसी दुनिया के आदमी हो गए, बाकी सबसे नाता तोड़ लिया. बस केवल अपनी मां से नाता रखा. देखने या मांगने चले आते थे, आंख चुराए, मुंह नीचे झुकाए.

बिग्गन महाराज जीते जी मरने की कामना करने लगे थे. मौत के दर्शन और लाभ का शायद वह कोई रहस्यमय धार्मिक अध्याय बांच चुके थे. तभी तो वह दुनियादारों की तरह मौत से डरते न थे और मौत से बचने के लिए कोई उपक्रम न करते. जैसे वह मौत को चुनौती देते रहते. खुद को नशे में डुबोने के लिए वह अतिशय गांजा-चिलम पीने लगे.

बताते हैं कि जिस गांव के मंदिर पर वह पुजारी थे, उस गांव के कुछ नशेड़ियों की संगत में सुल्फा-हीरोइन को अपना बैठे. गांजे के असर की हद-अनहद वह जी चुके थे. उन्हें इसके परे, इससे भी दूर, अंतरिक्ष के पार, जाना था. सफेद धुओं के रथ पर सवार होकर जाना था. हीरोईन-सुल्फा ने इसमें उनकी मदद की होगी शायद.

इस नई शुरुआत ने इतना आनंदित किया कि वह इसे अपना गुरु बना बैठे. हीरोइन-सुल्फा की लत के शिकार बिग्गन महाराज को पहले कभी-कभार फिर अक्सर पैसे का अभाव खलने लगा. ऐसे में उन्हें अपनी मां याद आतीं जिनके अलावा किसी पर उनका कोई अधिकार न था. वह अपने घर आ जाते, चुपके से. मां से लड़ते-झगड़ते और आखिर में कुछ पैसे पा जाते. घर वाले थोड़े परेशान रहने लगे. उनके लिए बिग्गन महराज की यह आदत नई और अप्रत्याशित थी. छोटे तीन भाइयों के बच्चे-पत्नी हैं. वे छोटे-मोटे काम धंधा कर जीवन गृहस्थी चलाने में लगे रहते. पैसे का अभाव सबके लिए एक बराबर सा था. ऐसे में मां जाने कहां से सौ-पचास उपजा लेतीं और बिग्गन महाराज को डांटते डपटते, आगे से आइंदा न मांगने की लताड़ लगाते हाथ पर चुपके से धर देतीं.

बिग्गन महाराज की मिट्टी को जब आज सुबह अंतिम यात्रा पर ले जाया गया तो मैं गहरी नींद में था. देर रात तक सोए बिग्गन महाराज संग जगा मैं जीवन मौत के महात्म्य को समझता गुनता रहा. घर आकर बिस्तर पर गिरा तो सुबह दस बजे आंख खुली. तब तक बिग्गन महाराज गांव से कूच कर चुके थे. उनके शरीर को गंगा के हवाले किया जा चुका था. उन्हें साधुओं सरीखा सम्मानित सुसज्जित कर जल समाधि दी गई.

इस देश में अभाव और गरीबी के चलते जाने कितने बिग्गन महाराज भरी जवानी बाबा बनने को मजबूर हो जाते हैं. फिर इस मजबूरी को ओढ़ने के लिए नशे के धुएं में उड़ने लगते हैं. बिग्गन महाराज हमारे गांव के लिए कोई उतने जरूरी शख्स नहीं थे. वैसे भी गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. बिग्गन महाराज किसी से कुछ न बोलते और गांव से परे रहते. बेहद गरीब परिवार के सबसे बड़े बेटे बिग्गन महाराज को पता था कि उनके लिए कोई निजी इच्छा रखना, किसी कामना को पालना नामुमकिन है इसलिए उनने इसे विरुपित करने वाले चोले को ओढ़ लिया. एक आकांक्षाहीन जीवन को साधु के चोले से ही दिखावट कर पाना संभव था.

बिग्गन महाराज का जाना मेरे लिए बचपन के एक निजी दोस्त का असमय काल के गाल में समाना है. उनने जिस राह को चुना और आगे जिस राह पर जाने को इच्छुक थे, बाबागिरी से मृत्यु यात्रा तक, इसका सफर उनने रिकार्ड कम समय में, बेहद सटीक-सधे तरीके से की. शायद देश के करोड़ों युवा बिग्गन महाराजों के लिए इस व्यवस्था ने मोक्ष और मुक्ति के लिए यही आखिरी रास्ता बुन-बचा रखा है जिससे परे जाने-जीने के लिए कोई विकल्प नहीं है.

राम-राम बिग्गन महाराज.

नई दुनिया के लिए शुभकामनाएं. इस लुटेरी-स्वार्थी दुनिया से जल्द निकल लेने पर बधाई.

दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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‘टाइम मशीन’ पर सवार यशवंत ने ये जो देखा-महसूसा!

Yashwant Singh : कल शाम कामधाम निपटा कर टहलने निकला तो मन में आने वाले खयाल में क्वालिटेटिव चेंज / ग्रोथ देख पा रहा था. लगा जैसे अपन तो इस दुनिया के आदमी ही नहीं. जैसे किसी ‘टाइम मशीन’ पर सवार हो गया था. अगल-बगल दिख रही चुपचाप खड़ी कारों, मकानों, पेड़ों, सूनी सड़कों, गलियों से रूबरू होते गुजरते सोचने लगा कि मान लो यह सब जलमग्न हो जाए, किसी महा प्रलय के चलते तो मछलियां इन्हीं कारों में अपना घर बसाएंगी और ये बहुत गहरे दबे पेड़ नई सभ्यताओं के लिए कोयला तेल आदि का भंडार बनेंगे… मतलब, कुछ भी बेकार नहीं जाना है.. सब रीसाइकिल होना है…

इस धरती का तेजी से नए की ओर उन्मुख होना, वो नया भले ही हमारे आपके लिए विकास वाला या विनाश वाला हो, बताता है कि हमारे चाहने न चाहने के बावजूद चीजें अपनी स्पीड में चलती हैं और इससे जो कुछ नया रचता बनता बिगड़ता नष्ट होता है वह दरअसल बहुत आगे के जीवन, सभ्यताओं, समय के लिए पूंजी / थाती / आधार / नींव का काम करता है.. जो हमारे लिए विकास है, संभव है वह धरती की सेहत के लिए विनाश हो लेकिन यही विनाश संभव है आगामी सभ्यताओं के लिए अकूत उर्जा और जीवन का केंद्र बन जाए…

पहाड़ पिघल रहे हैं… समुद्र लपलपा कर फैलना चाह रहे हैं, जंगल कट कर ठूंठ मैदान में पसरते जा रहे हैं और मैदान धीरे-धीर नमी विहीन होकर रेगिस्तान में तब्दील होता जा रहा है… यह बदलाव अपनी नियति को प्राप्त होगा..

ये तो सब जान रहे हैं कि धरती का उर्जा भंडार, जल स्रोत समेत कई किस्म के वो स्रोत जो जीवन के लिए जरूरी हैं, तेजी से क्षरण की ओर उन्मुख हैं.. अचानक घड़ी की सुइयां बहुत तेज गति से टिक टिक करने लगी हैं… कैलेंडर में जो बारह महीने खत्म होकर एक साल गुजरने का एहसास कराते हैं, वैसा अब सब स्थूल / गणितीय भर नहीं है. अब जो साल बीतता है, वह अपने आप में दशक भर समेटे होता है. दशक भर में पहले जो उर्जा हम नष्ट करते थे, जो उर्जा हम उपभोग करते थे, अब वह साल भर में करने लगे हैं… अचानक जैसे कोई शरीर फुल स्पीड में दौड़ने लगे और हांफते हुए धड़ाधड़ उर्जा बर्न करने लगे…

जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं उसमें सोचने समझने नीति बनाने का काम बस चंद मुट्ठी भर लोगों के हाथ है और बकिया जनता बस दौड़ने-हांफने, अपने पेट के वास्ते जीने और और निहित स्वार्थ के इर्द गिर्द सोचने-समझने के लिए बाध्य है. यह एक किस्म की गुलामी ही है लेकिन मजेदार यह कि इस गुलामी के शिकार खुद को गुलाम मानने को तैयार नहीं होते.

ये जो दिन-रात गुजर रहे हैं, बड़े कीमती हैं. एक दिन-रात कोई चौबीस घंटे की चीज भर नहीं.. थोड़ा स्लो मोशन में महसूस करिए तो इसमें पूरा महीने छह महीने निहित हैं… कुछ वैसे ही जैसे स्पेस में पहुंचे आदमी के दिन रात महीने अलग होते हैं और हम धरती वालों के अलग… लेकिन हम धरती वालों ने अपनी स्पीड जो तय कर दी है, खुद को टाप गीयर में जो डाल दिया है, इसका नतीजा है कि समय तेजी से गुजर रहा है लेकिन असल में वह तेजी अपने पीछे कई कई सालों की शांति-उर्जा को फूंक रहा है.

जैजै

@स्वामी भड़ासानंद

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Praveen Jha  आपने जो बात लिखी है, उसके लिए साधुवाद। यह जनचेतना से ही संभव है। नॉर्वे ने ठान लिया है कि २०२५ से कारें बंद कर देंगी। ओस्लो में २०१९ से ही। २ साल ही बचे हैं, पर जनता में कोई विद्रोह नहीं। कई लोगों ने कार डंप भी कर दिए। बस से जाते हैं। मेरा छोटा शहर है, वहाँ कंपनियों ने गाड़ी की पार्किंग खत्म करनी शुरू कर दी। बस साइकल पार्किंग रहेगी। कोपेनहेगन में साइकल के ‘सुपर हाइ-वे’ बन रहे हैं। फ्लाईओवर जिस पर बस साइकल जाएँगीं। गाड़ी पर टैक्स हर साल बढ़ रहा है। पर यह तभी संभव हुआ जब हर व्यक्ति साइकल चालक है, पहाड़ पर साइकल दौड़ा देते हैं। महिला-पुरूष सब। यह सरकार के बस का नहीं, यह जनचेतना से ही संभव है।

Ashok Anurag यशवंत जी, 60, 70, 80 के दशक तक तरक़्क़ी की रफ़्तार तो थी लेकिन एक सामान्य गति में 90 के दशक में जो तेज़ी आई है, वो तरक़्क़ी और विनाश साथ लाई है, आपके विचारों से सहमत हूँ

Arvind Kumar Singh जिस यूरोपीय माडल की अर्थनीति और राजनीति हम ओढ़ने जीने को अभिशप्त हैं। वाह!

Harish Pant बन्धु ! अब सिर्फ पृथ्वी को बचाने की सोच को विस्तृत आयाम देने की बात कही जाए?

Ghanshyam Dubey आज सही और यथार्थ के फुलफार्म मे विचारों की गाड़ी दौड़ी है । खैर – विचार हैं तो विचार ही ! निर्विचार मन की स्थिति चाहिए आगे कुछ और देखने के लिए …!

Rajesh Somani First time realised that yaswant Singh sir name have different different meaning

Kashi Prasad Yadav Jaswant bhai..sach likh diya hai aapne..jara shaant man se sochne bhar se hi cheezein saaf saaf nazar aane lagtu hain…badhai..

Yogesh Bhatt स्वामी जी.. दिशा व दशा भी बदलिए उन सबकी जिनके लिए लिखते हैं …

राजीव चन्देल Very perfect analysis about life and nature.

Yashwant Singh Bhandari कल लगता है अकेलेपन और गहरी सोच लिए निकले थे रोड में,

Aryan Kothiyal प्रकृति स्वयं सब ठीक करेगी।

Braj Bhushan Dubey यथार्थ से आच्छादित पक्ष।

Puneet Sahai सच को निकट दृष्टि से देख ही लिया आपने

लोकेश सलारपुरी खबरनवीस अगर फिलॉस्फर भी हो तो ये ही हाल होता है

Naresh Sadhak क्या क्या न सहे हम विकास के नाम पर , जाने कहाँ आ गये हम ,चलते चलते ! घडी भर तू कर ले आराम जाना है कहाँ , यहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जाना है कहाँ!

Shwetank Ratnamber JAI BHOKAL …. JAI BADHAS …. AAJ SE YAHI JAIKARA…. BHADAS BHADAS YAR TUMHARA….. NIKALIYE NISHULK BHADAS PAIYE ACHHI SEHAT BINDAS

Ashok Thapliyal Shaandaar future study aapki… Shayad cheekh bhi shoony, Maun bhi shoony hota Jaa Raha hai…… Sampoorn Jagat mein sabsay taakatwar….. prakriti aur shabd…Lekin, abki baar pralay Kay Baad Manu & shradhha sambhav hai Aisa kuch kahain sabhyataoon Kay malbay Kay beech say nikalkar…… +++kuchh to bachana thaa, Laava ugal Kay kya Kiya hamnay…!!!!!

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मोदी-योगी राज में चोरी और चोरों का बोलबाला!

Yashwant Singh : अभी टिकट बुक कर रहा था, तत्काल में। प्रभु की साइट हैंग होती रही बार बार। paytm ने अलग से पैसा लिया और सरकार ने अलग से टैक्स वसूला, ऑनलाइन पेमेंट पर। ये साले भजपईये तो कांग्रेसियों से भी बड़े चोट्टे हैं। इनको रोज सुबह जूता भिगो कर पीटना चाहिए। मुस्लिम गाय गोबर पाकिस्तान राष्ट्रवाद के फर्जी मुद्दों पर देश को बांट कर खुद दोनों हाथ से लूटने में लगे हैं। ये लुटेरे खटमल की माफिक जनता का खून पी रहे हैं, थू सालों।

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कोई योगी भक्त भाजपाई समझाए कि सपा राज का यह महाचोरकट अभी तक यूपी का मुख्य सचिव कैसे बना हुआ है? अब तो बड़े अखबारों ने भी इस लुटेरे को पद पर बनाए रखने को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। ये आज के अमर उजाला में छपी न्यूज़ का एक हिस्सा है। पढ़ें और बूझें।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Sanjaya Kumar Singh : जीएसटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सर्विस टैक्स 15 प्रतिशत से 18 प्रतिशत हो जाएगा। उन सेवाओं के लिए भी जो सरकार को मुफ्त देना चाहिए पर देती नहीं है या घटिया होती है। आप दूसरों से पैसे देकर जो सेवाएं प्राप्त करते हैं उसके लिए भी सरकार सेवा कर लेती है। मनमोहन सिंह की बेईमान सरकार ने सात प्रतिशत से इसकी शुरुआत की थी जो बढ़ते हुए 15 प्रतिशत थी और जीएसटी के बाद ईमानदार सरकार इसे 18 प्रतिशत कर रही है। जय हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

इन्हें भी पढ़िए…

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भ्रष्ट और चापलूस अफसरों ने सीएम योगी के हाथों आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के करियर का कत्ल करा दिया!

सुभाष चंद्र दुबे तो लगता है जैसे अपनी किस्मत में लिखाकर आए हैं कि वे सस्पेंड ज्यादा रहेंगे, पोस्टेड कम. सुल्तानपुर के एक साधारण किसान परिवार के तेजस्वीय युवक सुभाष चंद्र दुबे जब आईपीएस अफसर बने तो उनने समाज और जनता के हित में काम करने की कसम ली. समझदार किस्म के आईपीएस तो कसमें वादे प्यार वफा को हवा में उड़ाकर बस सत्ता संरक्षण का पाठ पढ़ लेते हैं और दनादन तरक्की प्रमोशन पोस्टिंग पाते रहते हैं. पर सुभाष दुबे ने कसम दिल से खाई थी और इसे निभाने के लिए अड़े रहे तो नतीजा उनके सामने है. वह अखिलेश राज में बेईमान अफसरों और भ्रष्ट सत्ताधारी नेताओं की साजिशों के शिकार होते रहे, बिना गल्ती सस्पेंड होते रहे.

चुनाव के वक्त चुनाव आयोग ने सुभाष चंद्र दुबे को गाजीपुर का एसएसपी बनाकर भेजा और वहां से वह सहारनपुर सीएम योगी के कार्यकाल के शुरुआती दिनों में तब भेजे गए जब जातीय हिंसा चरम पर थी. भाजपा के लोगों ने सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी लव कुमार के घर पर धावा बोल दिया था. लव कुमार की पत्नी बच्चों को जान बचाने के लिए छिपना पड़ा था. ऐसी किरकिरी से ध्यान हटाने और लव कुमार को खुश करने के लिए राज्य सरकार ने उनको नोएडा जैसे प्राइम जिले की पोस्टिंग दे डाली और सहारनपुर का जिम्मा तेजतर्रार अधिकारी सुभाष चंद्र दुबे को सौंप दिया.

उधर, नोएडा के डीएम एनपी सिंह को सहारनपुर का जिलाधिकारी बना दिया गया. एनपी सिंह की पूरे सूबे में एक अलग छवि है. वह अपनी ईमानदारी, कठिन मेहनत, जन सरोकार के लिए जाने जाते हैं. माना गया कि एनपी और सुभाष दुबे की जोड़ी सहारनपुर में सब कुछ सामान्य कर देगी. ऐसा हुआ भी. लेकिन सीएम योगी और इन दो अफसरों के बीच संवादहीनता ने बीच के दलाल अफसरों को मौका दे दिया. इन दलाल अफसरों ने सीएम योगी के कान में अपने हिसाब से फीडबैक दे दिया.

एनपी और सुभाष दुबे ने अठारह अठारह घंटे तक साथ रहकर सहारनपुर में शांति लाने की कोशिश की लेकिन इन दोनों को यह आरोप लगाकर सस्पेंड कर दिया गया कि इनमें तालमेल नहीं था और इन लोगों ने मायावती को सहारनपुर में घुसने की अनुमति दे दी थी. खासकर मायावती वाले प्वाइंट को योगी ने गंभीरता से ले लिया. जबकि हकीकत यह है कि एसपीजी कवर प्राप्त मायावती दिल्ली से जब गाजियाबाद में घुसीं और मेरठ समेत कई जिलों को पार करती हुईं सहारनपुर पहुंचीं तो इसके लिए कोई एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

एसपीजी के लोग अपने वीवीआईपी के रूट पर कई दिन पहले से काम करने लगते हैं. मतलब यह कि यह सारा कुछ बड़े अफसरों के इशारे और सहमति से हुआ था लेकिन दोष मढ़ दिया गया सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे और डीएम एनपी सिंह पर. कहा जाता है कि सहारनपुर की सीमा पर अगर मायावती को उस समय रोक दिया जाता तो सहारनपुर में उग्र हुए दलित समुदाय के लोग अपनी नेता को रोके जाने से नाराज होकर लंबा और बड़ा बवाल कर सकते थे जिसे फिर रोक पाना मुश्किल होता.

अपने छोटे से कार्यकाल में एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे ने सहारनपुर में ग्राउंड लेवल पर जो जो काम किए (कुछ दस्तावेज संलग्न हैं यहां), उसी का नतीजा है कि जो नए लोग वहां डीएम एसएसपी बनाकर भेजे गए, उन्हें बहुत खास कुछ नहीं करना पड़ा और नियंत्रित हालात का श्रेय खुद लेने का मौका मिल गया. वो कहते हैं न जो नींव के पत्थर होते हैं, उनका जिक्र कम होता है, उस मजबूत नींव पर खड़े महल को सब देखते सराहते हैं.

ये हैं सहारनपुर बवाल के असल कारण.. पर दोषियों पर कार्रवाई की जगह ईमानदार और मेहनती अफसरों को ही सस्पेंड कर दिया गया…

ये वह दस्तावेज है जिससे जाहिर होता है कि सहारनपुर के तत्कालीन डीएम एनपी सिंह और एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने ग्राउंड लेवल पर खूब सारा होमवर्क काम करने और डाक्यूमेंटेशन के बाद पब्लिक-प्रशासन-पुलिस के बीच तालमेल का एक फुलप्रूफ और जनपक्षधर तानाबाना बुना. आज इसी का नतीजा है कि सहारनपुर में सब कुछ पुलिस प्रशासन के नियंत्रण में है लेकिन इसका श्रेय एनपी-सुभाष को मिलने की जगह इन्हें निलंबन झेलना पड़ा और वाहवाही उनको मिल रही जिनका काम सिर्फ लगाना बुझाना और गाल बजाना है और अपने सियासी आकाओं का चरण चापन करना है.

आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के खिलाफ जिस कदर जहर सीएम योगी के दिमाग में बोया गया है, उसका नतीजा यह है कि इन दोनों अफसरों को आजतक अपना पक्ष रखने के वास्ते सीएम से मिलने तक का समय नहीं दिया गया. जो बिचौलिए अफसर हैं, इस स्थिति का फायदा उठाकर अपने खास चंपू अफसरों को प्राइम तैनाती दिलाने में सफल हो जा रहे हैं और जो ईमानदार हैं, वह खुद को सपा राज जैसा ही प्रताड़ित पीड़ित महसूस कर रहे हैं. चाल चेहरा चरित्र को लेकर खुद को अलग होने का दावा करने वाली भाजपा के नेताओं को यह देखना चाहिए कि भले सौ बेईमान माफ कर दिए जाएं, लेकिन किसी एक ईमानदार के खिलाफ गलत कार्रवाई न हो जाए.

चर्चा तो यहां तक होने लगी है कि पूरा सिस्टम अब इस कदर चापलूसों और चोरों से भरा हुआ हो गया है कि अब ईमानदार, तेवरदार और जन सरोकार वाला होना अपराध हो गया है. ऐसे लोगों को न तो काम करने दिया जाता है और न ही कोई ठीकठाक पोस्टिंग देर तक दी जाती है. इनके पीछे सारे बेईमान एकजुट होकर हाथ धोकर पड़ जाते हैं. सबको उम्मीद थी कि यूपी में भाजपा शासन आ जाने से लंबे समय से चल रहे सपा और बसपा के जंगलराज से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन हुआ ठीक उलटा. लग रहा है जैसे जंगलराज कांटीन्यू कर रहा है. वही भ्रष्ट और दागी अफसर मजबूत बड़े पदों पर जमे हैं जिन्होंने पिछले शासनकालों में जमकर मलाई खाई और अपनों को खिलाया. जिन्हें जेलों में होना चाहिए, वह योगी सरकार के गुड बुक में हैं और जिन्हें बड़ा पद कद मिलना चाहिए वे सस्पेंड बड़े हैं या कहीं कोने में फेंक दिए गए हैं.

सीएम योगी को अफसरों द्वारा दिए जाने वाले फीडबैक को परखने जांचने के लिए भी एक सिस्टम खड़ा करना चाहिए अन्यथा बेईमान और चापलूस अफसरों की झूठी बातों में आकर उनके हाथों बहुत सारा अनर्थ होता रहेगा, जैसे एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के मामले में हुआ है. इन दो अफसरों का निलंबन लगातार जारी रहने और इनकी बात तक न सुने जाने से ईमानदार किस्म के अफसरों में बेचैनी है. यूपी में कानून व्यवस्था से लेकर ढेर सारे क्षेत्रों में हालात न सुधरने का बड़ा कारण यही है कि अब भी प्रदेश का दो तिहाई हिस्सा भ्रष्ट अफसरों के शिकंजे में है जो भाजपा नेताओं को पर्दे के पीछे से ओबलाइज कर अपनी मनमानी कर रहे हैं.

उम्मीद करना चाहिए कि सीएम योगी के जो खास लोग हैं, वह आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे और आईएएस एनपी सिंह मामले में योगी को सच्चाई बताएंगे और इनका निलंबन खत्म कराने की दिशा में काम करेंगे. अभी अगर कोई भ्रष्ट अफसर सस्पेंड हुआ होता तो वह तगड़ी लाबिंग करके हफ्ते-दो हफ्ते में ही बहाल हो गया होता. लेकिन एनपी और सुभाष लाबिंग जैसे खेल तमाशों से दूर रहने वाले लोग हैं और अपने लिए राजनीतिक आका नहीं बनाए इसलिए अलग-थलग पड़कर भोगने के लिए मजबूर हैं. उनके पक्ष में कोई भी अफसर सीएम के सामने एक शब्द बोलने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि टाप लेवल पर बैठे अफसरों को अपनी नौकरी बचाने और कुर्सी हथियाए रहने की कला खूब आती है.

आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन भी लगभग रीढ़ विहीन मुद्रा में ही रहते हैं. इनके पदाधिकारी भी कानों में तेल डाले चुप्पी साधे पड़े हुए हैं. यहां तक कि डीजीपी सुलखान सिंह से लेकर मुख्य सचिव राहुल भटनागर तक में अपने ईमानदार अफसरों को प्रोटेक्ट करने, उनका पक्ष रख उन्हें बिना वजह दंडित किए जाने से बचाने का दम नहीं दिख रहा अन्यथा आज एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे यूं निलंबित होकर बनवास नहीं काट रहे होते. ये उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहां बदलाव के पक्ष में वोट तो पड़ते हैं लेकिन भारी भरकम नोटों के तले जनभावना कुचली जाती है, सत्ता सिस्टम का करप्टर चरित्र पहले जैसा ही बना रहता है. जो ईमानदारी से ग्राउंड लेवल पर जनसरोकार के साथ काम करता है, उसकी नियति एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे बन जाना होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के व्यक्तित्व को लेकर यशवंत द्वारा लिखी गई इस पुरानी पोस्ट को भी पढ़ें…

ये भी पढ़ें, योगी राज में अफसरशाही का हाल….

एक नज़र इधर भी….

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पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखने की मोदी की दोगली नीति पर भाजपाई चुप क्यों हैं?

Yashwant Singh : ये तो सरासर मोदी की दोगली नीती है. देश को एक कर ढांचे में लाने की वकालत करने वाले मोदी आखिर पेट्रोल डीजल को जीएसटी से क्यों बाहर रखे हुए हैं. ये तर्क बेमानी है कि राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल से भारी टैक्स से काफी पैसा पाती हैं, जिसे वह खोना नहीं चाहतीं.

भाजपा की केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें अगर अपना अपना हिस्सा खत्म करते हुए पेट्रोल डीजल को जीएसटी के दायरे में ले आएं तो जनता को भारी राहत मिलती. पर ऐसा नहीं करेंगे ये लोग क्योंकि थोक में फायदा तो ये बड़े लोगों को देते हैं. माल्य से लेकर अडानी तक. अंबानी से लेकर टाटा-बिड़ला तक. पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से इनका दाम आधा हो जाता. यही कारण है कि केंद्र सरकार इसे तो जीएसटी से बाहर रखे हुए है ताकि इससे भारी मात्रा में जनता से पैसा वसूला जाता रहे और बाकी सामान को जीएसटी में लाकर महंगाई बढ़ाने की कवायद कर रहे हैं.

नारा दे रहे हैं एक देश और एक कर का. लेकिन ये नारा बेकार साबित हो जाता है पेट्रो प्रोडक्ट्स को जीएसटी से बार रखने के फैसले से. आजकल ह्वाट्सअप पर ये वाला मैसेज खूब भेजा जा रहा है, आप भी पढिए-

Why petrol and diesel prices are not brought under GST. Now for petrol and diesel the central exise duty is 23% and state VAT is 34%. Total tax is 57%. If these essential products are brought under GST , the maximum tax will be only 28%, which means the prices of petrol and diesel can come down by almost 50%. The public at large will be benefited.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं–

Harshendra Singh Verdhan : Dada, It’s somehow difficult in Fertiliser sector too..18% for processed complex on raw materials & 12% on Imported. So; nothing for homemade indigenous Fertilisers. An easy way to Chinese poor quality fertilisers.

Care Naman : यदि जीएसटी सब पर तो पेट्रोल और दारु दोनों पर भी लागू करें… ये तो वही हुआ कड़ुआ कड़ुआ थू थू… मीठा मीठा गप गप…

Vijayshankar Chaturvedi : Larger public interest will not be bothering to them until 2019.

Divakar Singh : State governments opposed centre’s move to bring petroleum under gst. As you mentioned, state govts earn huge money from it, so they don’t want to bring it under gst. Centre wants to bring everything under gst. So we should ask respective state govts.

Yashwant Singh : जो बुरा है, वो दूसरों का है। जो अच्छा है, वो सब मेरा है। 🙂

Divakar Singh : बुरा भी अपना हो सकता है, पर इस केस में नही है। बेचारे जेटली जी बहस करते रह गए पर कोई राज्य तैयार नही हुआ पेट्रो उत्पादों के लिए gst लागू करने के लिए। ऐसे में केंद्र सरकार को दोषी बताना तथ्यात्मक नही है। देखें इस लिंक को : Petroleum products to be under GST if states agree: Minister

Yashwant Singh सेंटर को अपना हिस्सा छोड़ देना चाहिए था ताकि मोदी जी की नीयत तो साफ सही दिखती. साथ ही जिन स्टेट्स में बीजेपी है, वहां भी हटवा सकती थी. इसके बाद बीजेपी के लोग गैर बीजेपी राज्यों की सरकारों को एक्सपोज कर सकते थे. पर ऐसा नहीं, क्योंकि पेट्रोल डीजल बहुत ज्यादा सस्ता हो जाने से गरीबों को फायदा होता, महंगाई कम होती. बड़े उद्यमी घरानों को लाभ पहुंचाने वाले मोदी भला बल्क में यानि थोक में गरीबों को राहत कैसे दे सकते थे.

Rajeev Verma : पेट्रोल डीजल यदि gst के दायरे में कर देते तो input credit देने में सरकार का धुंआ निकल जाता. चीजें आश्चर्य जनक रूप से सस्ती हो जातीं.

Rajeev Pandey : Modi dhongi pakhandi hai uske maalik Ambani ki kamayi kam ho jayega jo Modiya kabhi nahi chahta.

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कुतुब मीनार देख कर लौटे यशवंत ने अपलोड की ये दो मजेदार तस्वीरें!

Yashwant Singh : दिल्ली में रहते नौ-दस साल हो गए लेकिन कुतुब मीनार कभी न देख पाया. एक रोज सुबह के वक्त मय कुनबा वहां के लिए कूच कर गया. कई फोटो वीडियो ले आया जिनमें से दो मजेदार तस्वीरें पब्लिश कर रहा हूं.

पहली पिक में एक बिदेसिन अपनी मूड़ी-गर्दन बिलकुल उपर अइंठे कुतुब मीनार के शीर्ष तक को कैमरे में कैप्चर करने को बेताब है तो दूसरी पिक में एक देसी अंकलजी लुंगी डांस वाले स्टाइल में आए और कैमरे से दे दनादन फायर करने लगे, आंटीजी को अपने पीछे सपोर्टिंग सिपाही के रूप में खड़ाकर.

मुझे कहना पड़ा- ”अरे अंकल, आंटीजी को आगे कर फोटो खींचो, तब तो यादगार पिक बनेगी.”

अंकलजी भावहीन चेहरे के साथ क्षण भर को मुझे घूरे फिर अपनी पत्नी से मुखातिब हो अड़बड़ बड़बड़ टाइप बकने लगे जो मेरे पल्ले बिलकुल न पड़ा. हां, आंटीजी की मुखमुद्रा से जरूर खुशी और मुस्कराहट टपकने लगी थी.

कुतुब मीनार से लौटकर सारे वीडियोज और फोटो को यूट्यूब के सौजन्य से एक साथ जोड़कर एक डाक्यूमेंट्री टाइप तैयार किया. आप भी देखें और घर बैठे कुतुब मीनार परिसर के लाइव दर्शन का सुख पाएं. नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=dREDn-zicZ8

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

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85 से 95 परसेंट कमीशन पर अब भी बदले जा रहे हैं पुराने नोट!

Yashwant Singh : 2019 के लोकसभा चुनाव में मीडिया पर जितना पैसा बरसने वाला है, उतना कभी न बरसा होगा… कई लाख करोड़ का बजट है भाई…. मोदी सरकार भला कैसे न लौटेगी… और हां, नोट अब भी बदले जा रहे हैं.. 85 परसेंट से लेकर 95 परसेंट के रेट पर… यानि पुराना नोट लाओ और उसका पंद्रह से पांच परसेंट तक नया ले जाओ…. लाखों करोड़ रुपये का गड़बड़झाला है ये नोटबंदी… उपर से कहते हैं कि न खाउंगा न खाने दूंगा…

भइये, जब सारा का सारा अकेले खा गए तो भला दूसरे को कैसे खाने दोगे… और, जो तुम खुद खाए हो उसमें इस तरह से सरकारी, अर्द्ध सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं-एजेंसियों को मिलाए हो कि सब कुछ सरकारी, सहज, स्वाभाविक लग रहा है… किसी की औकात नहीं है जो नोटबंदी के घोटाले को उजागर कर सके जिसमें साहब एंड कंपनी ने कई लाखों करोड़ रुपये बनाए हैं और अब भी बनाए जा रहे हैं…

जी हां, काम चालू आहे… ये मेरा दावा है… ये मेरा खुला आरोप है… एनआरआई कोटे के नाम पर यह सारा धंधा चल रहा है… एनआरआई कोटा क्या है, इससे संबंधित खबर नीचे दे रहा हूं… इस घोटाले-गड़बड़झाले के तह तक जाने के लिए बूता चाहिए जो आज दुर्भाग्य से किसी मीडिया हाउस के बूते नहीं है… इतने भारी पैमाने पर पैसे देकर मीडिया हाउस खरीदे जा रहे हैं कि पूछो मत… जो नहीं बिक रहे, उन्हें लाठी-डंडे से लेकर छापे और जेल की राह की ओर धकेला जा रहा है.

वेब जर्नलिज्म में अभी ये संसाधन नहीं कि बड़े स्तर के खोजी अभियान चला सकें… जो बड़े घराने वेब जर्नलिज्म में आ रहे उनसे खोजी पत्रकारिता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वे पहले से ही गले तक दलाली और धंधेबाजी से मालामाल हुए पड़े हैं… देखते हैं… कुछ तो करना पड़ेगा.. काम मुश्किल है लेकिन किसी को तो हाथ लगाना पड़ेगा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shashank Singh नोटों की गिनती RBI में अभी तक चालू है… कितना रुपया आया था, अभी तक बता नहीं रहे हैं. बैंकों ने क्या बिना गिने नोट ले लिये थे? उपर से तुर्रा ये कि बच्चन से लेकर टुच्चन तक सब नोटबन्दी के गुण गा रहे हैं..

Yashwant Singh खेल चल रहा है अभी… नोट बदले जा रहे हैं… जो खुद पचासी परसेंट रख रहे हैं पुराने नोट का, वो लोग कौन हैं… इसकी शिनाख्त बस कर लीजिए… सारा खेल सबको पता चल जाएगा…

Shashank Singh आप की बात ठीक होगी… लोग पकड़े जा रहे हैं, कभी कभी खबर भी छप रही है… NRI लोगों के लिये 30 जून तक का समय दिया था नोट बदलने के लिये।

Yashwant Singh आप एनआरआई की छोड़िए, आप कोई देशी आदमी लाइए पुराने नोटों के साथ, मैं उसे पचासी प्रतिशत कमीशन पर बदलने वाले रैकेट से मिलवा दूंगा..

Vikas Yadav Journalist बीजेपी वाले खाते नहीं, लूटते हैं. डकैत हैं.

Yesh Arya इसी 85℅ के चक्कर मे सबकुछ cumputerised होने के बाबजूद भी RBI अभी तक यह नही बता रहा कि कितने 500 और 1000 के नोट जमा हुये कह रहा है गिने नही गये क्या बिना गिने जमा हो गये, मार्च में वित्त मंत्री 8 दिसंबर 2016 के आंकड़े दे रहे थे। रोज शाम को हर बैंक और करेंसी चेस्टों से RBI को नकदी की सूचना देना अनिवार्य होता है।


ये है एनआरआई कोटे से संबंधित खबर…

एनआरआई कोटे के नाम पर अब भी भारी कमीशन देकर 500-1000 के पुराने नोट बदल रहे….

मुंबई : नोटबंदी के इतने समय बाद भी आप अपने पुराने नोटों को बदल सकते है । बंद हुए 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को अभी भी नए नोटों से बदला जा रहा है पर इसके लिए आपको बहुत मोटा कमीशन देना होगा। अनिवासी भारतीय (एनआरआई) को 30 जून तक पुराने नोट बदलने की अनुमति सरकार ने दे रखी है। यह एन.आर.आई. मोटा कमीशन लेकर आपके पुराने नोट बदलवाने के धंधे में लगे हुए हैं। इस धंधे से जुड़े एक व्‍यक्ति ने बताया कि इस काम के लिए प्रत्‍येक 100 रुपए पर 91 रुपए का कमीशन लिया जा रहा है। यदि आप एक करोड़ रुपए बदलवाना चाहते हैं तो आपको बदले में केवल 9 लाख रुपए के ही नए नोट मिलेंगे।

इतना मोटा कमीशन लोग क्‍यों दे रहे हैं, इस सवाल पर उस व्‍यक्ति ने बताया कि ये ऐसे लोग हैं जो सरकार को अपने धन का स्रोत नहीं बताना चाहते हैं। जिन लोगों ने अभी तक अपने धन के स्रोत का खुलासा नहीं किया है उन्‍हें डर है कि कहीं भविष्‍य में उनके आय के स्रोत का पता सरकार को न चल जाए, इसलिए वे अपना काला धन मोटा कमीशन देकर बदलवा रहे हैं। आरबीआई के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है। उन्‍होंने बताया कि इस तरह के नोट बदलने के बारे में उन्‍होंने भी सुना है लेकिन उन्‍होंने कहा कि इस पर रोक लगाने का अधिकार उनके पास नहीं है। अधिकारी ने बताया कि एनआरआई फुलप्रूफ डॉक्‍यूमेंट्स के साथ नोट बदल रहे हैं, ऐसे में उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। 2 जनवरी को आर.बी.आई. ने कहा था कि एनआरआई मुंबई, दिल्‍ली, चेन्‍नई, कोलकता और नागपुर स्थित आरबीआई ऑफि‍स में 30 जून 2017 तक अपने पुराने नोट बदल सकते हैं। एन.आर.आई.के लिए नोट बदलने की सीमा फेमा कानून के मुताबिक प्रति व्‍यक्ति 25,000 रुपए है।

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एवार्ड लेते समय यशवंत ने योगी के कान में क्या कहा, देखें वीडियो

योगी के हाथों पुरस्कार लेने पर वामपंथी खेमे के कुछ पत्रकारों द्वारा विरोध किए जाने का यशवंत ने कुछ यूं दिया विस्तार से जवाब…

Yashwant Singh : लोकमत अखबार के यूपी के संपादक आनंदवर्द्धन जी का एक दिन फोन आया. बोले- ”हर साल की तरह इस बार भी लोकमत सम्मान का आयोजन करने जा रहे हैं हम लोग. हमारी जूरी ने ‘जनक सम्मान’ के लिए आपको चुना है क्योंकि भड़ास4मीडिया एक बिलकुल अनोखा प्रयोग है, मीडिया वालों की खबर लेने-देने के वास्ते जो भड़ास4मीडिया की शुरुआत हुई है, उसके लिए आप सम्मान योग्य हैं.”

ऐसे तारीफ भरे शब्दों को सुनने के दौरान मेरी हालत कैसे रिएक्ट करूं टाइप हो जाती है. आनंद वर्द्धन जी से मैंने वादा किया कि आऊंगा आपके सम्मान समारोह में. उनने आने जाने का जहाज का टिकट मेल करा दिया.

जबसे लखनऊ में नई सरकार आई, एक बार भी मेरा लखनऊ जाना न हुआ. एकाध मेरे निजी-पारिवारिक काम थे, जिसके लिए लखनऊ जाना था, पर टलता जा रहा था. जहाज का टिकट मिलने के बाद लखनऊ का दौरा मेरा पक्का हो गया. एक पंथ दो काज.

लखनऊ से पत्रकारिता और शराबखोरी, दोनों ही क्षेत्रों में करियर की शुरुआत की थी. इसलिए इस जगह से मेरा लगाव कुछ ज्यादा है. बड़ा अपनापा सा लगता है लखनऊ से. प्रेस क्लब में जुए की सजी हुई टेबल, चारबाग में देर रात तक दारू की उपलब्धता, खाने को किसिम किसिम का स्वाद, घूमने भटकने को ढेर सारी जगहें. इसी कारण दस जून के सम्मान समारोह के लिए लखनऊ 7 जून को ही पहुंच गया.

कार्यक्रम के दिन नियत समय पर संगीत नाटक अकादमी में हाजिरी दी. आयोजकों ने मंच पर बैठने के लिए बुलाया तो वहां चला गया, अन्य पुरस्कारार्थियों के साथ. योगी बाबा आए और एक एक कर सबको पुरस्कार थमाने लगे. मैं तय करके आया था कि योगी से रुबरु होने के इन चंद सेकेंड्स में मुझे उनसे क्या कह देना है. मेरी बारी आई तो पहुंचते ही योगी जी से कहने लगा- ”शाहजहांपुर वाले जगेंद्र सिंह हत्याकांड में कुछ नहीं हुआ. हत्यारे आजाद हैं और पीड़ित का परिवार धमकी व प्रलोभन के कारण चुप है. इसे संज्ञान लीजिए. ”

मैं कहता रहा और योगी बाबा पुरस्कार देने वाली मुद्रा में मुस्कराते हुए मुझे देखते सुनते रहे. इस दौरान लोकमत यूपी के संपादक आनंदवर्द्धन जी भी मौजूद थे. योगी तक अपनी बात पहुंचाते हुए पुरस्कार सम्मान लेते फोटो खिंचाने के बाद वापस अपनी सीट पर आ गया. मुझे संतोष था मैंने यूपी के पत्रकारों के माथे पर पुती गहरी कालिख को मिटाने हेतु एक कदम चल सका. मुझे संतोष था एवार्ड समारोह में सीएम के होने का लाभ उठाते हुए उनका ध्यान पत्रकारों के एक बड़े मामले की ओर खींचने का. मुझे संतोष था जिस जगेंद्र हत्याकांड के कारण हम लोगों ने सपा को वोट न देने की अपील की थी, उस मुहिम को नई सरकार में आगे बढ़ा पाने का.

कार्यक्रम खत्म होते ही कई साथियों ने मुझसे मिलकर और कुछ ने फोन करके पूछा कि मैं योगी जी के कान में क्या कह रहा था? मैंने सभी को बताया कि जगेंद्र हत्याकांड में इंसाफ न होने की बात बताई योगी जी को.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.. इस वीडियो में पुरस्कार लेते वक्त यशवंत लगातार योगी से कुछ कह रहे हैं और तब योगी जी सहमति में सिर हिलाते दिख रहे हैं…

https://www.youtube.com/watch?v=y9AS48U_WcY

योगी के हाथों पुरस्कार लेने के बाद कुछ कामरेड लोगों के बिफरने का मुझे अंदाजा था. पर हमने कब परवाह की है जमाने की. जो करना है, वह करके रहता हूं, गलत या सही. इंडियन एक्सप्रेस के कार्यक्रम में मोदी बतौर प्रधानमंत्री जाते हैं. लोकमत के कार्यक्रम में योगी बतौर मुख्यमंत्री जाते हैं. आप हम कुर्सी का सम्मान करते हैं, व्यक्ति का नहीं. वैसे भी मेरे जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए हर नेता एक सरीखा होता है. मैं मोदी और मनमोहन, योगी और मुलायम में बहुत ज्यादा फरक नहीं कर पाता. आप अगर कर पाते हैं तो आप महान हैं और आप का राशि कुंडली में राजनीति सर्वोच्च स्थान पर है. पर जब मैं गौर से देखता हूं तो सत्ता तंत्र का चरित्र हमेशा एक सा दिखता है. बस थोड़ा बहुत हेरफेर होता है. केवल चेहरे और व्यक्ति बदल जाते हैं. पार्टियों के नाम बदल जाते हैं. सत्ता के चलने का अंदाज वही रहता है. हां, हमारी जातीय क्षेत्रीय धार्मिक पृष्ठभूमि की वजह से सत्ता तात्कालिक तौर पर कभी करीब तो कभी दूर लग सकती है.

आपकी रुचि अगर राजनीति में है तो आप जिंदाबाद मुर्दाबाद करते रहिए, इनके उनके या मेरे पक्ष विपक्ष में खड़े रहिए. लेकिन मुझे राजनीति में कतई रुचि नहीं. इसलिए मेरे सामने एवार्ड देने वाला कोई योगी हो या कोई मुलायम या कोई मनमोहन, मुझे कोई फरक नहीं पड़ता.

विचारधाराएं इस दुनिया में दम तोड़ रही हैं, काफी समय से. तकनालजी और बाजार ने बहुत कुछ बदलने को मजबूर किया है. विचारधाराओं के जरिए औसत दिमाग से नीचे के लोगों को बरगलाया भरमाया जाता है या फिर लूट में शामिल होने का प्रलोभन देकर इरादतन मिलाया जाता है. विचारधाराओं के नाम पर अब केवल भीड़ की गोलबंदी की कवायद की जाती है ताकि लोकतंत्र में ज्यादा वोट पाने के नाटक को जस्टीफाई करते हुए सत्ता शीर्ष पर कब्जा जमाया जा सके. मुझे तो कई दफे ये चुनाव ही ढेर सारी समस्याओं की जड़ लगने लगे हैं. भीड़ हमेशा मूर्खतापूर्ण सोच रखती है और ऐसी ही सोच से उपजे नेता कहां से तार्किक और वैज्ञानिक विचार वाले होंगे. भीड़ हमेशा अपने जैसा मूर्ख व्यक्ति नेता के रूप में खोजती है और नेता हमेशा एक भीड़ की तलाश में रहता है, जो किसी एक नारे या एक बोली से सक्रिय हो जाए. भीड़ और भेड़ में ज्यादा फरक नहीं है. भेड़चाल ही है लोकतंत्र.

इन सम्मान समारोहों और वैचारिक विमर्श जैसे कार्यक्रमों में शिरकत करना मेरे लिए भड़ास4मीडिया की ब्रांडिंग का एक मौका होता है, साथ ही उन सभी वेब पत्रकारों के माथे पर जीत व गर्व की एक लकीर दर्ज कराना होता है जो अपने-अपने मीडिया हाउसों से लड़कर अपने दम पर अपनी वेबसाइटों वेब चैनलों ब्लागों सोशल मीडिया जैसे उपक्रमों के माध्यम से साहसपूर्ण पहल करते हुए पत्रकारिता को करप्ट व कारपोरेट महासागर में विलीन होने से बचाए हुए हैं.

भड़ास4मीडिया डाट काम की शुरुआत के वक्त मठाधीश टाइप पत्रकार लोग वेबसाइटों और ब्लागों को हिकारत भरी नजर से देखते थे और इसको संचालित करने वालों को छोटा पत्रकार / हारा हुआ पत्रकार / मुख्यधारा से तड़ीपार पत्रकार मानते बोलते थे. लेकिन बीते नौ साल में तस्वीर पलट गई है. मठाधीश लोग या तो नष्ट हो गए, या कर दिए गए या चुप्पी साधे नौकरी बजा रहे हैं और भड़ास4मीडिया टाइप पोर्टल के संचालक सत्ता शीर्षक की छाती पर अपनी धमक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं.

नौ वर्षों में हर किस्म के अनुभव से रुबरू हुआ. हर किस्म के लोगों से पाला पड़ा. अपने और पराये लोगों को नजदीक से महसूस किया. इस सबसे मेरी मानसिक बुनावट में काफी कुछ बदलाव आया. सैद्धांतिक ज्ञान में बहुत कुछ नए अध्याय जुड़े और कई सारे चैप्टर डिलीट हुए. हम लोग तभी से मानते थे कि सारी मीडिया नष्ट हो जाएगी, ये डिजिटल ही बचा रहेगा. यही कारण है कि हम भड़ास वालों ने एक भी मैग्जीन या अखबार न शुरू किया. क्योंकि तय कर रखा था कि युद्ध डिजिटली ही लड़ेंगे.

इस भड़ास4मीडिया ने मुझे धरती से आसमान तक की यात्रा कराई, अनुभव समझ संवेदना सामाजिकता के लेवल पर. और, इसी ने इन यात्राओं के जरिए एक आंतरिक, आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत कराई. कह सकता हूं कि मैं भड़ास में एक क्लर्क से ज्यादा कुछ नहीं हूं. कह सकता हूं कि प्रकृति ने मुझे जरूर कुछ अदभुत अनुभव करने और जीने के लिए भेजा है, जो कर रहा हूं, जो जी रहा हूं. मैं अब चीजों को अच्छे या बुरे के फ्रेेम में नहीं देखता न ग्रहण करता. इसे संपूर्णता के भाव से देखता, भोगता और महसूस करता हूं. अच्छा मेरा है तो बुरा भी मेरा है. सब मेरा है और कुछ भी मेरा नहीं है.

काफी समय से मैंने महत्वाकाक्षाएं-इच्छाएं पालने और योजनाएं बनाने का काम छोड़ दिया है. तत्क्षण में जीने का आदी हो गया हूं. देर तक और दूर तक का प्लानिंग न के बराबर है. अतीत में बिलकुल नहीं जाता. भविष्य के लिए परेशान नहीं क्योंकि न कोई महत्वाकांक्षा है और न कोई योजना. इसलिए मुझे जो कुछ मिल जाता है, जो कुछ मेरे संग हो जाता है, अच्छा बुरा, उसे सब ईश्वरीय नियोजन / प्रकृति की देन मानकर ग्रहण कर लेता हूं.

ये मजेदार नहीं है कि पिछली सरकार जब यूपी में आई थी, नई नई, अखिलेश यादव के नेतृत्व में तो मुझे शुरुआती तीन महीने के भीतर, शायद मई लास्ट का समय था, अरेस्ट करके जेल भेज दिया गया और कई मीडिया हाउसों ने फिर ताबड़तोड़ मुकदमें लिखवाए, सत्ता सिस्टम से दबाव बनवाकर घरों आफिसों पर छापे डलवाए. मुझे जेल भेजे जाने के बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को अरेस्ट कर जेल में भिजवाया गया क्योंकि सबकी चिंता थी कि आखिर यशवंत के जेल जाने के बाद भड़ास कैसे चल रहा है. जेल के अधिकारियों को फोन कर जेल के अंदर प्रताड़ित करने के लिए उकसाया गया. पर प्रकृति ने मेरे लिए कुछ और प्लान कर रखा था. जेल मेरे लिए जानेमन जगह सिद्ध हुई. वहां से निकला तो ‘जानेमन जेल’ किताब की रचना हुई.

और, अब ये जो नई सरकार आई है, यूपी में, योगी के नेतृत्व में, तो इसके मुखिया योगी ने बतौर सीएम अपने कार्यकाल के तीन महीने के भीतर ही मुझे अपने हाथों सम्मानित किया. माध्यम भले बना लोकमत अखबार. माध्यम भले ही बने आनंदवर्द्धन जी.

न जेल जाने की योजना मैंने बनाई थी और न सम्मान पाने की. दोनों ही चरम विपरीत स्थितियों को खुद आना था, खुद होना था. मेरे को तो बस दोनों ही हालात में आनंद की अनूभित करनी थी जो की. दोनों ही प्रकरणों में मुझे सकारात्मक और सहज रहना था, जो रहा. इन दोनों के लिए ही मुझे नेचर / परम / अदृश्य / सृष्टि को धन्यवाद कहना था, कृतज्ञ होना था, जो मेरे को निमित्त बनाए हुए जाने क्या क्या खेल तमाशा रचे हुए है. .

जो लोग विचारधाराओं के चश्मे से अब भी चलते हैं, और इसी आधार पर अगर हमको आपको कोसते हैं, तो ध्यान से देखिएगा, उनके जीवन में कोई न कोई फांस, द्वंद्व, दुख, गुलामी, वासना, उत्तेजना, घृणा, अवसाद, ब्रेन वाश आदि में से कुछ न कुछ भयंकर है जो उन्हें एक खास स्टाइल में जीने सोचने को मजबूर किए रहता है. बहुत मुश्किल होता है एक खास किस्म की स्कूलिंग और खास किस्म से तैयार किए गए दिमाग से उबरते हुए सहज मौलिक शांत सुंदर दिमाग की तरफ बढ़ पाना.

जो लोग गब्बर के डकैत गिरोह के इमानदार खजांची बन गुलामी का जीवन काट रहे हैं वे अगर दूसरों को इमानदारी का पाठ पढ़ाने लगें तो क्या कहिएगा. उनसे क्या पूछिएगा कि आप अच्छा खासा नक्सल वाला जीवन जी रहे थे, उधरे जंगल में शहीद हो गए होते तो ढेर सारे नौजवान लौंडों को प्रेरणा मिली होती नक्सलाइट बनने के वास्ते. पर आप तो भाग आए जान बचाकर दिल्ली और यहां पाल लिए हैं टाइम्स आफ इंडिया वालों की बिल्ली. सो, सौ सौ चूहे खाने के बाद हज की ओर काहें जा रहे हैं महाराज.

खैर.

अब अपने पास दूसरों की आलोचना के लिए ज्यादा वक्त नहीं रहता, इसीलिए यहीं बात समाप्त कर रहा हूं और उम्मीद करता हूं उन तक बात पहुंच गई होगी. मनुष्य को इस या उस खांचे में देखने वाले लोग ज्यादा बड़े फासिस्ट हैं. इन्हें एक बार फिर ब्रह्मांड विज्ञान जीवन की क्लासेज में दाखिला लेकर सिर्फ इस या उस खांचे की जगह संपूर्ण जीवन जीव सुर लाय ताल को समझना बूझना चाहिए. मने नौकरी करते करते एकदम्मे गड़बड़ा गए हों तो होलटाइमर वाला काम शुरू कर दीजिए क्योंकि कामरेड वाली पार्टियों में अच्छे कामरेडों का बड़ा अकाल है. पर ये न करेंगे क्योंकि आप मूलत: अवसरवादी और बकचोद हैं. जीवन एक पूंजीपति की सेवा करते गुजार दी और गरीब लौंडों से नक्सली बनने की इच्छा पाले रहेंगे. धत तेरी हिप्पोक्रेसी की.

मुझे तो अब किसी हत्यारे में भी कोई अपराधी नहीं दिखता. बस यही सोचता हूं कि नेचर ने इसे इस काम के लिए क्यों प्रोग्राम किया हुआ है? मैं हत्यारे के भीतर रुह बनकर प्रवेश कर जाना चाहता हूं और उसकी तरह सोचते हुए जानना चाहता हूं कि आखिर एक हत्यारे को आनंद कब आता है, दुख कब होता है, डर कब लगता है और वह रोता कब है. मुझे मुश्किल और उलझे हुए लोग ज्यादा संभावना से भरे लगते हैं. जो पीएफ सीएल डीए की गणना करता हुए इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग के बीच आते जाते जीवन के दिन वर्ष खर्च कर रहे हैं, उनमें क्या नया दिखेगा, उनमें क्या मौलिक दिखेगा. वह एक घटिया मास्टर की तरह रटी रटाई पुरानी पर्ची को पढ़ कर सिलेबस पूरा जान मान लिया करेंगे.

सीएम योगी के हाथों एवार्ड लेते हुए पहली फोटो डाली तो उसमें पांच दास के बीच निगेटिव कमेंट्स हैं. मेरे खयाल से इतना जेनुइन है. जो हार्डकोर कामरेड हैं और उसी शब्दावली के बीच जीवन जीते गुजारते हैं, उन्हें कष्ट तो होना ही चाहिए, योगी या मोदी के हाथों एवार्ड लेते देखकर, वह भी किसी पूर्व कामरेड को. और, मुझे लगता है कि ये जरूरी भी था. आप अगर मुझे किसी खांचे सांच में बांधकर देखते हैं, देखते थे, तो गलत थे. आप अपना जीवन और अपना खांचा दुरुस्त रखिए. मेरी चिंता छोड़ दीजिए. मैं एक जीवन में सौ किस्म का जीवन जीता हूं, अराजक, अवसरवादी, वामपंथी, दक्षिणपंथी, साहित्यिक, आध्यात्मिक, अभिनेता, गायक, कुक, ड्राइवर, माली, खिलाड़ी, साधक, घुमक्कड़, प्रेमी, अभिभावक, लीडर, विद्रोही, गरीब, अमीर, अभद्र, अशिष्ट, शराबी, कबाबी, क्रूर…. और, किसी क्षण मैं इनमें से कुछ भी नहीं होता हूं, इस देह से परे होता हूं.

क्या करिएगा, कैसे किसी खोल में हमको भरिएगा. पर असल में जिन लोगों का काम ही सिर्फ खोल में भरना है, वो तो भरेंगे. आप भले न भराएं, लेकिन वो खोल खांचे में जबरन आपको भरेंगे. इसलिए इनकी भराई की परवाह न करिए, उन्हें अपना काम करने दीजिए और हमें अपना. क्या कहेंगे लोग, सबसे बड़ा रोग… वाला नारा यूं ही नहीं दिया गया है. आप जब भी कुछ करेंगे तो उसके सहज स्वाभाविक दस विरोधी और दस प्रशंसक पैदा हो जाएंगे. यह प्रकृति का विभिन्नता का सिद्धांत है. यह जो प्रकृति प्रदत्त बहुलता, विविधता और अनेकता है, यही सबसे खास चीज है जो हमें आपको अलग अलग चश्मे, अलग अलग अनुभव जन्य सिद्धांत थमाए रहती है और सबके जरिए अलग अलग किस्म का तमाशा बनाए रहती है. तो इसका मौज लेना है और मस्त रहना है.

जिन्हें सीएम योगी के हाथों जनक सम्मान से मुझे सम्मानित किया जाना अच्छा लगा, उन्हें नमस्ते प्रणाम. जिन्हें यह अच्छा नहीं लगा, उन्हें प्यार भरा सलाम. मैं उचक कर न सेल्फी लेने गया और न मैंने कोई निजी काम बताया. मैं लपलपाया भी नहीं. मैं एक बड़े मुद्दे, जगेंद्र हत्याकांड का जिक्र कर सीएम का ध्यान खींचने की कोशिश की. मैं सीएम के हाथों सम्मान पाकर न गर्व से भरा हूं और न योगी के सीएम होने और इनके हाथों सम्मानित होने से किसी अवसाद या दुविधा में पड़ा. मैं तब भी मस्त था, आज भी मस्त हूं. मेरे पास इतना सोचने के लिए वक्त नहीं होता क्योंकि मेरे स्वभाव में दुनियादारी, चुगलखोरी, रणनीति, साजिश, प्रोपेगंडा आदि के लिए कोई जगह है ही नहीं. इसी दुनिया में सब कुछ हर क्षण है. आप जिस दृष्टि और सोच से देखेंगे, दुनिया और लोग वैसे ही दिखेंगे. किसी रोज चश्मा हटाकर और दिल दिमाग खोलकर एक एक चीजों को देखिए और उसे चूमिए.

लखनऊ यात्रा के दौरान खूब आनंद आया. बहुत सारे नए पुराने पत्रकारों साथियों से मिलना हुआ. हर दिन हर शाम हर रात जै जै रही… आप सभी चाहने वालों को ढेर सारा प्यार प्यार और प्यार… सभी आलोचक चश्मेधारी दिग्गजों का भी हूं दिल से शुक्रगुजार …. 😀 आलोचक न होते तो ये पोस्ट न लिखता… इसलिए समझ लीजिए… चैलेंज, आलोचना, सवाल ही आपको बड़ा होने, क्रिएट करने, रचने के मौके मुहैया कराते हैं…. इसकी अगली स्टेज ये है कि न तारीफ से प्रसन्न होने वाला हूं और न आलोचना पर भौहें तानने वाला… अब इस अगली अवस्था में पहुंंचने ही वाला हूं… फिर मैं खुद कहूंगा आप सबों के साथ…

मार मार पापी यशवंत को… अरे उसी भड़ास वाले को ही… 🙂

जैजै

भड़ास के संपादक यशवंत के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Shrimaan एक साँस में पढ़ गया, दिल को सुकून आया कि आँच अभी भी बाक़ी है, सब कुछ बर्बाद नहीं हुआ है। आप जैसे और तो अब दिखते नहीं पर आप जुटे रहिएगा। आप ने मेरे जैसे कई लोगों को फिर से उम्मीद दिखाई है। कोशिश कीजिएगा कि आप ऐसे ही रहें।

Dinker Srivastava ग़जब…..धोते पछारते आपकी यूँ ही गुजरती रहे…..लोग जलते रहें आप जलाए रखें उनकी भी और मशाल भी…..बात थोड़ा लंबी सरक गई लेकिन मौक़े और समय के मुताबिक कही गयी…अच्छा बहुत अच्छा…..शुभकामनाएं

Divakar Singh अभी और ऊंचाइयां पानी हैं. आध्यत्मिक और व्यावसायिक दोनों.

Arun Sathi कामरेडों का हाजमा ही ख़राब है….इसीलिए हाशिये पे है…आप बिंदास है

Yogesh Bhatt कुछ लाइन याद हो आई हैं..जिसकी जैसी नजर उसने वैसा समझा मुझे

Vishal Ojha चलो भाई अब आनंद लो सब चीजों का..और हाँ कभी याद भी कर लिया करो

Sushil Dubey उस दिन 1 पैग का क्या हुआ बाबा,,,

Rohit Bisht बधाई, खरी कहने और सुनने का माद्दा बना रहे,बचा रहे यही शुभकामनाएँ

Rajshekhar Vyas Aap sachmuch videh Janak ho rahe hain ! Hardik badhai

Sangam Pandey क्या कहने….
”मुझे तो कई दफे ये चुनाव ही ढेर सारी समस्याओं की जड़ लगने लगे हैं. भीड़ हमेशा मूर्खतापूर्ण सोच रखती है और ऐसी ही सोच से उपजे नेता कहां से तार्किक और वैज्ञानिक विचार वाले होंगे. भीड़ हमेशा अपने जैसा मूर्ख व्यक्ति नेता के रूप में खोजती है और नेता हमेशा एक भीड़ की तलाश में रहता है, जो किसी एक नारे या एक बोली से सक्रिय हो जाए. भीड़ और भेड़ में ज्यादा फरक नहीं है. भेड़चाल ही है लोकतंत्र”

Ganesh Dubey Sahaj पूर्वांचल के खून में है साफगोई।। साधुवाद।।

Sunayan Chaturvedi भड़ास पुरुष की जय।

Sanjeev Kumar Badhai. Aapko janta bahut pahle se tha. Lakin is post ko padhne ke bad aapke vyaktitva ke bare me kuchh aur janne ko mila.

Anand Kumar हर कोई यशवंत नहीं बनता।

Dilip Clerk आप इस सम्मान के योग्य है दादा मैं भी भड़ास एक मुहिम

Sanjaya Kumar Singh बधाई। पुरस्कार के लिए और जोरदार लिखने के लिए भी।

Surendra Trivedi यशवंत जी, आपने तो सब कुछ लिख डाला। खैर, उम्मीद है कि आप बहुत आगे जाओगे।

Ramesh Chandra Rai देखो यशवंत तुम जो भी पोस्ट करो उससे मेरा कोई मतलब नहीं है। पूरे पत्रकारिता के जीवनकाल में मैं बहुत खुश था कि एक पत्रकार अपनी सुख सुविधा छोड़कर लड़ रहा है। तुम इसके लिए जेल यात्रा भी किए। मैं तुम पर गर्व करता था। लोगों को बताता था कि एक होनहार पत्रकार अपने कैरियर को दांव पर लगा दिया। सम्मान मिलने से सबसे अधिक खुश हूं लेकिन योगी के हाथ लेने से मुझे दुख हुआ। तुम मेरी भावना समझ गए होंगे। बाकी बात मिलोगे तो होगी। फिर भी तुम मेरे अनुज हो इसलिए मैं तुम्हें बधाई दे रहा हूँ।

Pradeep Surin कंटेंट पर ध्यान दीजिए। इतना लंबा नहीं चल पाएगा। बाकी बधाई हो आपको। 🙂

डॉ. अजित हार्दिक बधाई सर।आप अपने किस्म के अनूठे और अकेले पत्रकार है

Shrikant Asthana Should I say anything? You’ve risen above these things! Keep it up. Live happily as free as you feel right at any given moment.

Vivek Garg आपको आज तक नहीं पढ़ा और नहीं सुना, बस विकास अग्रवाल जी आपको यहाँ विजिट किये | फेसबुक पर साइड कॉलम में फ्रेंड्स की activity दिख जाती है | हम भी आपके पेज पर आ गए| आपको अवार्ड मिला ख़ुशी हुयी लेकिन में आपको यह बधाई आपकी लेखनी को दे रहा हूँ जो आपने इतना सटीक और स्वच्छ अक्षरों में बात को इतनी सरलता से लिखा ,आप भी मेरी तरह अपनी भावनाऔ का पूरा सम्मान करते हुए पूरी बात लिखते हैं , यह नहीं सोचते की पढने वाला निबंध समझ कर सो तो नहीं जाएगा | Such a confidence is necessary to remain alive within bowl(India) of so many school of thoughts whether needed or not in present time period . आपसे बहुत कुछ सिखने को मिलेगा | आपको अपना डिजिटल गुरु मित्र कह सकता हूँ , हिंदी बचपन से जानता हूँ , कई सालो से लिख रहा हूँ लेकिन वो पैनापन नहीं आया | आपको साधुवाद

Ajay Rai यंशवत हमारे साथ आपने गरीबो के बीच काम भी किया लेकिन दुख हुआ योगी के हाथो पुरस्कार लेने पर इस समय जब छात्र नौजवान योगी जी के कारण दमन का सामना कर रहे हो सफाइ जो दे !

Devendra Verma मोदी की भांड मीडिया तो सबने देखी अब योगी की जातिवादी और चापलूस मीडिया के दिन भी बहुरने लगे,

Arvind Singh सर आपको और आपकी पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई

Govind Badone शानदार, बेबाक।

Rajesh Rai आप ने तो पूरी गीता को आत्मसात कर लिया है ।

A.P. Soni Akash बधाई भड़ासी भाई यशवंत जी

Ram Ashrey Yadav भाई यशवंत जी लेख में आपने गज़ब की भड़ास निकाली है, बधाई!

Bhawna Vardan बधाई बधाई बधाई ….और आपकी इस पोस्ट के लिए तो क्या कहूँ …..नि:शब्द हूँ …हमेशा की तरह

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यशवंत को ‘जनक सम्मान’ दिए जाने का वीडियो देखें

लखनऊ में लोकमत अखबार की तरफ से लोकमत सम्मान का आयोजन किया गया जिसमें सृजन कैटगरी का ‘जनक सम्मान’ भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह को दिया गया. यह सम्मान सीएम योगी ने अपने हाथों से प्रदान किया. इससे संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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मुख्यमंत्री योगी ने भड़ास संपादक यशवंत समेत 18 विभूतियों को किया सम्मानित (देखें तस्वीरें)

लखनऊ : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संगीत नाटक अकादमी में एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। कार्यक्रम का शुभारम्भ अपरान्ह 3 बजे गोमती नगर, विपिन खण्ड स्थित संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में दीप प्रज्वलन से हुआ। इस अवसर पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने 15 विभिन्न श्रेणियों में उत्कृष्ट योगदान के लिए 18 विभूतियों को सम्मानित किया। इस साल का जनक सम्मान भड़ास के संपादक यशवंत सिंह को दिया गया। शक्ति सम्मान स्टार आरटीआई कार्यकर्ता सिद्धार्थ नारायण को दिया गया।

यह सम्मान शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, दिव्यांग, हस्तशिल्प, कला एवं संस्कृति, क्रीड़ा, कृषि, महिला, व्यवसाय, साहित्य, प्रशासन, क़ानून, जनसंचार, सार्वजनिक जीवन की श्रेणियों में प्रदान किया जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ विशेष व्यक्तियों को जूरी अवार्ड से सम्मानित किया जाता है। इस अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री ने सम्मान पाने वाली विभूतियों को बधाई दी तथा लोकमत सम्मान की सराहना की। उन्होने कहा समाज जब किसी को सम्मानित करता है तो एक नई संस्कृति का जन्म होता है। प्रमुख वक्ताओं में प्रथम पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त श्री वजाहत हबीबुल्ला, वरिष्ठ वैज्ञानिक श्री पी.के. सेठ, जनरल आर.पी. शाही, सेवानिवृत्त, श्री ए.के. सिंह आदि शामिल रहे।

कुछ विशेष व्यक्तियों को दिए जाने वाले अवार्ड में भड़ास के संस्थापक और संपादक श्री यशवंत सिंह को जनक सम्मान, श्रीमती सुष्मीता मुखर्जी को अभिव्यक्ति सम्मान और श्री सिद्धार्थ नरायण को शक्ति सम्मान सहित जूरी अवार्ड से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा नवाजा गया। लोकमत सम्मान की विभिन्न श्रेणियों में शिक्षा में श्री शोभीलाल गुप्ता, कुशीनगर, स्वास्थ्य में डा. आर. एन. सिंह, गोरखपुर, पर्यावरण में श्री शैलेन्द्र सिंह, लखनऊ, दिव्यांग में श्री अबू हुबैदा, व आवा आशा स्कूल दोनो लखनऊ, हस्तशिल्प में मो. दिलशाद, सहारनपुर, कला एवं संस्कृति में सुश्री अंकिता बाजपेई, लखनऊ, क्रीड़ा में  अशोक कुमार सिंह, नई दिल्ली, कृषि में श्री प्रार्थ त्रिपाठी, गोण्डा, महिला में सुश्री आसमा परवीन, कुशीनगर, व्यापार में श्रीमती किरन चौपडा, लखनऊ, साहित्य में श्रीमती नीरजा हेमेन्द्र, लखनऊ, प्रशासन में श्रीमती सुतापा सान्याल, लखनऊ, जनसंचार में उत्कर्ष चतुर्वेदी, लखनऊ, सार्वजनिक जीवन में डा. बलमीत कौर, बहराइच को सम्मानित किया गया।

इस कार्यक्रम में भारत के पहले मुख्य केन्द्रीय सूचना आयुक्त श्री वज़हात हबीबउल्लाह ने अपने विचार एवं आर0टी0आई0 की महत्वता पर बात की। कार्यक्रम में प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री, राज्य सूचना आयुक्त व गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहें। स्टार एक्टिविस्ट सिद्धार्थ नारायण ने अपने कुछ केसों के बारे में बताया, जिनमें से 2015 में हुये आगरा चर्च हमला, शक्तिमान घोडा व भ्रष्टाचार एवं सार्वजनिक जीवन प्रमुख थे। इस अवसर पर उन्होंने अपने सम्मान को उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के साथ बांटने की बात कही और राज्य एवं केन्द्र के सभी सूचना आयुक्तों को तहें दिल से धन्यवाद एवं अपना आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी पहली आरटीआई याचिका अपनी मां के पेंशन के पैसे से दायर की थी और उस पैसे में इतनी बरकत थी कि आज उन्हें इतना बड़ा सम्मान मिल रहा है। सिद्धार्थ ने कहा कि ‘‘जिन हाथों ने मुझे इस काबिल बनाया, मैं उन्हीं हाथों में मैं मुख्यमंत्री से सम्मानित होने के बाद अपना ये सम्मान दूंगा।’’

इस कार्यक्रम में  प्रथम पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त श्री वजाहत हबीबुल्ला ने कहा कि सिद्धार्थ को न्याय एवं अधिकार की बहुत ही गहन जानकारी है एवं वह किसी में कोई भेदभाव नहीं करते। मेरी कोर्ट में उन्होंने हाशिये पर खड़े गरीब से गरीब तबके को न्याय दिलाने का यथावत प्रयास किया है। साथ ही में उसी न्याय और अधिकार की भावना के साथ उन्होंने एक रियासत की रानी की प्रतिष्ठा भी बचायी है। इस अवसर पर हर्षवर्धन फाउन्डेशन का शुभारम्भ भी माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के कर कमलों द्वारा किया गया।

इस आयोजन के बारे में वायस आफ लखनऊ अखबार में छपी खबर यूं है….

ठीक से पढ़ने के लिए इस न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें….

यशवंत को सम्मानित किए जाने से संबंधित खबर का नेशनल वायस न्यूज चैनल पर प्रमुखता से प्रसारण किया गया…

आयोजन की कुछ अन्य तस्वीरें….

हर्षवर्द्धन फाउंडेशन का उदघाटन करते सीएम योगी आदित्यनाथ… साथ में हैं लोकमत अखबार के संपादक आनंदवर्द्धन सिंह.

लोकमत अखबार के संपादक और लोकमत सम्मान के आयोजक आनंदवर्द्धन सिंह ने सीएम योगी को प्रतीक चिन्ह भेंट किया.

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भड़ास के यशवंत “जनक सम्मान” से 10 जून को लखनऊ में होंगे सम्मानित

लोकमत सम्मान 2017 : विजेताओं पर ज्यूरी बैठक सम्पन्न

लखनऊ। हिंदी दैनिक लोकमत के स्थापना दिवस पर प्रति वर्ष आयोजित होने वाले लोकमत सम्मान हेतु विजेताओं के नामों का चयन कर लिया गया है। रविवार 4 जून को आयोजित ज्यूरी की बैठक में जनरल आरपी साही (ए.वी.एस.एम.), पद्मश्री डॉ॰ मंसूर हसन, पद्मश्री परवीन तलहा, रैमेन मैग्सेसे पुरस्कृत संदीप पांडेय, पूर्व आईएएस एसपी सिंह,  श्री सीवी सिंह और श्री पवन सिंह चौहान ने देश भर से आए हज़ारों नामों में से चयनित हर श्रेणी में 5-5 नामों में से एक-एक नाम का चयन किया।

इन सभी विजेताओं को आगामी 10 जून को लखनऊ में आयोजित हो रहे लोकमत सम्मान समारोह में सम्मानित किया जाएगा। श्रेणी पुरस्कारों के अलावा ज्यूरी पुरस्कारों की घोषणा भी की गयी गयी है जिसमें भड़ास फ़ॉर मीडिया डॉट कॉम के यशवंत सिंह “जनक सम्मान” से, आरटीआई कार्यकर्ता सिद्धार्थ नारायण “शक्ति सम्मान” से और वरिष्ठ अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी “अभिव्यक्ति सम्मान” से सम्मानित किए जायेंगे।

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सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा क्यों न करें, बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा मत करिए. ये पेड लोग हैं. ये दोनों अपने-अपने मालिकों के धंधों को बचाने-बढ़ाने के लिए वैचारिक उछल कूद करते हुए आपको बरगलाएंगे, भरमाएंगे, डराएंगे, अपने पक्ष में खड़े होने के लिए उकसाएंगे और इसके लिए देर तक व दूर तक ब्रेन वाश करते चलते जाएंगे…

रवीश कुमार को हर पत्रकार डरपोक दिखने लगा है. उन्हें दिल्ली में डर लगने लगा है. हर किसी का फोन टेप होता दिखने लगा है…लोकतंत्र में सारा सत्यानाश हुआ दिख रहा है…ये दौर भाजपा राज का है सो एनडीटीवी को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और रवीश कुमार सुर ताल भिड़ाकर गाने में जुटे हैं- ”अंधेरे में जो बैठे हैं, नजर हम पर भी तुम डालो…. अरे ओ रोशनी वालों…”

कुछ ऐसा ही हाल तब जी ग्रुप का था, जब कांग्रेस राज में उगाही के मामले में सुधीर चौधरी उठाकर जेल भेज दिए गए थे और सुभाष चंद्रा प्राण बचाए भागते फिर रहे थे. तब जी न्यूज को सब कुछ खराब होता हुआ, हर ओर अराजकता की स्थिति, अभिव्यक्ति की आजादी का गला घुटा हुआ, आपातकाल सरीखा माहौल दिख रहा था… तबके जी न्यूज के एंकर सुर ताल भिड़ाकर कुछ वैसा ही गीत गाए बकबकाए जा रहे थे.

दोस्तों, भारत अदभुत देश है. यहां कोई मोदी आए या कोई मनमोहन, जनता को बहुत फरक नहीं पड़ता. भारत वाले बहुत संतोषी और मस्त जीव हैं. जब हम सब अंग्रेज को सौ साल तक झेल गए जो कि बाहरी और विदेशी थे, फिर ये मनमोहन, मोदी तो अपने ही देश के हैं. मनमोहन ने क्या बना-बिगाड़ दिया था और मोदी ने क्या रच-उखाड़ लिया है…तब भी अंबानी बिरला लूट रहे थे, सत्ता के प्रिय बने हुए थे… आज भी अंबानी अडानी बिरला सब लूट रहे हैं, सत्ता के प्रिय बने हुए हैं… तब भी जो ‘अप्रिय’ थे उन्हें ठीक करने के लिए ढेर सारे सरकारी कुकर्म किए जाते थे, आज भी जो ‘अप्रिय’ हैं, उनकी हंटिंग होती रहेगी…

कांग्रेस के जमाने में जो आर्थिक नीति थी, वही भाजपा के जमाने में है बल्कि भाजपा वाले कांग्रेस से कुछ ज्यादा स्पीड से उनकी सारी पालिसिज लागू कर रहे हैं.. जीएसटी से लेकर फारेन इनवेस्टमेंट और प्राइवेटाइजेशन को देख लीजिए… इसलिए उनके नाम पर डराकर इनके पाले में करने का खेल वही नहीं समझेगा जो वाकई दिमाग से पैदल होगा…

धर्म जाति की पालिटिक्स हर वक्त थी. 1857 की क्रांति से लेकर किसान विद्रोहों तक में धर्म जाति के आधार पर गोलबंदियां की गई थीं. आजादी के इतने सालों बाद भी गोलबंदियां इसी आधार पर होती रही हैं. कांग्रेस वाले धर्म-जाति-क्रांति आदि के समस्त पैकेज का इस्तेमाल रणनीतिक तौर पर समय व माहौल देखकर करते रहते हैं, बिलकुल ‘निर्दोष’ अंदाज में.. पर भाजपाई और अन्य पार्टियां वही काम खुलकर ‘भदेस’ तरीके से कर रही हैं..

जनता चेतनासंपन्न होती जाएगी तो उनके सोचने विचारने और वोट देने का पैर्टन बदलता जाएगा. इसमें कोई घबड़ाने वाली बात नहीं है. हम मनुष्य आज जहां तक पहुंचे हैं, वहां तक किसी पैराशूट से हमें नहीं लाया गया है बल्कि हम क्रमिक विकास और इवोल्यूशन की हजारों लाखों करोड़ों साल की यात्रा करके आए हैं… ये यात्रा जारी है और सब कुछ बेहतर होगा, ये उम्मीद करते रहना चाहिए…

जो लोग भाजपा से डराकर हमको आपको कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करना चाहते हैें उनको बताना चाहता हूं कि कांग्रेस ने सबसे ज्यादा कम्युनिस्ट नौजवान अपने राजकाज के दौरान मरवाए हैं. वो चाहे पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलने का काम रहा हो या पूरे देश में कांग्रेसियों द्वारा चलाए गए नक्सल-कम्युनिस्ट विरोधी अभियान के जरिए बड़े पैमाने पर छात्रों, किसानों-मजदूरों का सफाया करवाना रहा हो.

इसी कांग्रेस ने लाखों सिखों का कत्लेआम पूरे देश में अपने नेताओं के नेतृत्व में कराए. सारे पाप इन कांग्रेसियों ने कराए और सिखाए हैं. इसलिए भाजपा का डर दिखाकर आपको जिनके पक्ष के सपने दिखाए जा रहे हैं, जिनके पक्ष में हमें गोलबंद करने को उत्तेजित-उत्प्रेरित किया जा रहा है, वे ज्यादा बड़े पापी हैं. भाजपा वाले तो बड़े पापियों से थोड़ा बहुत सबक सीखकर आए हैं और इसका समय समय पर नौसिखियों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और इस प्रक्रिया में पकड़े भी जा रहे हैं. कांग्रेस के जमाने में भी सीबीआई का रोजाना गलत व मनमाफिक इस्तेमाल होता था, आज भाजपा के राज में भी हो रहा है. सत्ता में आपने पर सबका चरित्र एक-सा हो जाता है, इसे समझ लीजिए क्योंकि सत्ता खुद में एक संस्था होती है जो सबसे ज्यादा मजबूत और सबसे ज्यादा संगठित होती है. सत्ता में भाजपाई आएं या कांग्रेसी या कम्युनिस्ट या सपाई या बसपाई या कोई और… सबकी कार्यशैली अंतत: सत्ता परस्ती वाली यानि बड़े लोगों के पक्षधर वाली हो जाती है… जनता तो बेचारी जनता ही बनी रहती है, थोड़ी कम, थोड़ी ज्यादा… वो अपने मित्र जेपी त्रिपाठी एक जगह लिखते हैं न- ”बाबू हुए तुम, राजा हुए तुम, आदमी बेचारे के बेचारे हुए हम…”

भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि इत्यादि ढेरों पार्टियां जो हैं.. .ये सब पावर की लालची हैं, सत्ता की लालची हैं, पैसे की लालची हैं, पूंजीपरस्त हैं, झूठे और मक्कार हैं. जनविरोधी हैं… ब्लैकमनी के केंद्र हैं… हरामीपने और उपद्रव की कुंजी हैं… इनके चक्कर में न फंसिए. इन पार्टियों ने अब अपने अपने टीवी चैनल गढ़ लिए हैं. जो सत्ता मेंं होता है, उसकी तरफ मीडिया परस्ती ज्यादा होती है, उसकी तरफ न्यूज चैनल ज्यादा झुके रहते हैं. जैसे सूरज की तरफ सारे फूल पौधे और वनस्पतियां झुकी होती हैं. रीयल जर्नलिज्म अगर कोई कर रहा है तो वह सोशल मीडिया मे थोडा बहुत हो रहा है, वेबसाइटों और ब्लागों के जरिए थोड़ा बहुत हो रहा है. ये बाजारू मीडिया वाले, ये एनडीटीवी और जी न्यूज वाले तो बस टर्नओवर जोड़ रहे हैं, फायदे देख रहे हैं…

चिदंबरम की गोद में बैठकर जब प्रणय राय टूजी स्कैम के पैसे के ब्लैक से ह्वाइट कर रहे थे तो रवीश कुमार को दिल्ली में घना अंधेरा नहीं दिख रहा था… जब एनडीटीवी और चिदंबरम के स्कैम को उजागर करने वाले ईमानदार आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को पागलखाने भिजवा गया था तो रवीश कुमार की संवेदना नहीं थरथराई और उनको मनुष्यता व लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर नहीं दिखा. अब जब उनके मालिक की चमड़ी उनके काले कारनामों के चलते उधेड़ी जा रही है तो उन्हें सारी नैतिकता और दुनिया भर के सारे आदर्श याद आने लगे हैं… उनका बस चैनल की स्क्रीन पर फूट फूट कर रोना ही बाकी रह गया है..

अरे भइये रवीश कुमार, तू अपनी सेलरी भर पूरा पैसा वसूल एक्टिंग कर ले रहा है… उसके बाद आराम से रह.. चिल्ल कर… एक्टर वैसे भी दिल पर नहीं लेते… रोल खत्म, पैसा हजम… उसके बाद घर परिवार और मस्ती…इस अदभुत देश को और यहां की फक्कड़ जनता को कुछ नहीं होने जा रहा… बहुत आए गए शक हूण कुषाण मुगल अंग्रेज और ढेरों आक्रांता… देश नहीं मरा न मरेगा… आप कृपा करके एनडीटीवी के शेयरों का भाव डबल दिखाकर बैंक को चूतिया बनाकर कर्ज लेने के फर्जीवाड़े की सच्चाई पर एक प्राइम टाइम डिबेट करिए जिसमें बैंक के प्रतिनिधि समेत सभी पक्षों को लाकर स्टूडियो में बैठाइए बुलाइए और दूध का दूध पानी पानी कर दीजिए… आप जरा एनडीटीवी-चिदंबरम के सौजन्य से पागलखाने भिजवाए गए आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को भी बुला लीजिएगा पैनल में जो सुना देंगे आपके एनडीटीवी चैनल और इसके मालिक प्रणय राय की चोरी की 100 कहानियां…

रवीश जी, युवाओं को भरमाना छोड़िए… सच्ची पत्रकारिता का नाटक बंद करिए… हां, पेट पालने के लिए आपको सेलरी की जरूरत पड़ती है और प्रणय राय को एक ऐसे एंकर की जरूरत पड़ती है जो उनको डिफेंड कर सके तो आप दोनों की जोड़ी ‘जेनुइन’ है, उसी तरह जैसे सुधीर चौधरी और सुभाष चंद्रा की है. कांग्रेस राज में जिस तरह संघिये सब डराते थे कि जल्द ही भारत में कांग्रेस के सहयोग से मुस्लिम राज आने वाला है, उसी तरह भाजपा के राज में एनडीटीवी वाले डरा रहे हैं कि बस सब कुछ खत्म होने वाला है क्योंकि मोदिया अब सबका गला ही घोंटने वाला है…

अरे यार बस करो… इतना भी हांका चांपा न करो… प्रणय राय की थोड़ी पोल क्या खुल गई, थोड़ी चड्ढी क्या सरका दी गई, आप तो अपने करियर का ‘द बेस्ट’ देने पर उतारू हो गए… पोलैंड से लेकर न्यूयार्क टाइम्स और ट्रंप से लेकर प्रेस कार्प की नैतिकता के पत्र के जरिए प्रणय राय को दूध से नहलाकर पवित्र कहने को मजबूर करने लगे….

हम लोगों को यकीन है कि जितनी चिरकुटई कांग्रेस शासन के राज मेंं हुई, उससे काम ही भाजपा के राज में होगी क्योकि भाजपाइयों को अभी संपूर्ण कांग्रेसी चिरकुटई सीखने में वक्त लगेगा… हां, ये पता है कि दोनों ही पूंजीपतियों को संरक्षण देकर और उनसे आश्वस्ति पाकर राज करते हैं इसलिए इनके शासनकालों में जनता का बहुत भला न होने वाला है.. और, जनता बहुत बुरे में भी या तो मस्त रहती है या फिर मारपीट करती है या फिर सुसाइड कर लेती है. उसे अपने रास्ते पता हैं… उसके लिए नए रास्ते न तो आपके प्राइम टाइम लेक्चर से खुल सकते हैं और न ही मोदी जी के ‘देश बदल रहा है’ के जुमलों से…

रवीश भाई और सुधीर चौधरी जी, लगे रहिए… आप दोनों को देखकर यकीन होने लगा है कि एक कांग्रेस और दूसरा भाजपा का प्रवक्ता कितना दम लगाकर और कितना क्रिएटिव होकर काम कर रहे हैं… बस इतना कहना चाहूंगा कि ये देश इस छोर या उस छोर पर नहीं जीता है और न जीता रहा है… इस देश का अदभुत मिजाज है… वह कोई नृप होए हमें का हानि की तर्ज पर अपने अंदाज में अपनी शैली में जीवित रहा है और जीवित रहेगा.. पहाड़ से लेकर मैदान तक और रेगिस्तान से लेकर समुद्र तटीय इलाकों तक में फैले इस देश में अंधेरा लाने की औकात न किसी मोदी में है और न किसी मनमोहन में हो सकी…

फेसबुक के साथियों से कहना चाहूंगा कि इस छोर या उस छोर की राजनीति-मीडियाबाजी से बचें.. दोनों छोर बुरे हैं… दोनों निहित स्वार्थी और जनविरोधी हैं.. सारा खेल बाजारू है और इसके उपभोक्ता हमकों आपको बनाया जा रहा है, जबरन… आप रिएक्ट न करें.. आप मस्त रहें… जीवन में राजनीति-मीडिया के अलावा ढेर सारा कुछ है लिखने करने पढ़ने देखने को… इस भयानक गर्मी में जाइए घूम आइए पहाड़… चढ़ जाइए हिमालय की उंचाई और अपनी आत्मा तक को पवित्र और मस्त कर आइए… देह के पार देख आइए और रुह संग बतिया आइए… ये रवीश कुमार और सुधीर चौधरी तो लाखों रुपये लेता है, जैसा मालिक कहता है, वैसा स्क्रिप्ट पढ़ता है… एक का मालिक कांग्रेस के गोद में बैठा रहता है, दूसरे का भाजपा की गोद में… इनके चक्कर में अपनी नींद, उर्जा और धैर्य बर्बाद न करिए… जाइए, हिमाचल उत्तराखंड आपको बुला रहा है… किसी जाती हुई सामान्य सी सरकारी बस पर बैठ जाइए और चार पांच सौ रुपये में पहाड़ की बर्फ से ढकी चादर को हिला आइए…

जाइए अपनी जिंदगी जी आइए और भटक मरने से बच जाइए…. ध्यान रखिएगा, सारा प्रपंच यह तंत्र आपको भटकाने और मुर्दा बनाने के लिए रचता है… ताकि आपका खून पीकर वह अपने को अमर रख सके…

वो कहते हैं न कबीर… साधो ये मुर्दों का गांंव… और ये भी कि… भटक मरे न कोई….

तो दोस्तों, मुर्दों से दिल लगाना बंद कर दीजिए और भटक मरने से बचने की तरकीब ढूंढने में लग जाइए… शायद जीवन का मतलब मकसद समझ में आ जाए…

जैजै
यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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भड़ास के यशवंत ने एनडीटीवी छापे पर क्या लिखा, ये पढ़ें

Yashwant Singh : हां ठीक है कि ये लोकतंत्र पर हमला है, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार है, मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है.. लेकिन पार्टनर ये भी तो बता दीजिए कि जो आरोप लगे हैं आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपये के फ्राड करने का, उस पर आपका क्या मत है.

ये भी तो बता दीजिए कि आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने चिदंबरम और प्रणय राय द्वारा मिल जुल कर 2जी स्कैम के पैसे के गोलमाल का जो खुलासा किया, उस पर आपका स्टैंड क्या है.

मुझे भी आपसे प्यार था. मैं भी भाजपा विरोधी रहा हूं और हूं. लेकिन आप जो कामरेड होने के नाम पर पैसों का गबन कर रहे हैं, स्कैम में सहयोगी बन रहे हैं, उसका कैसे समर्थन कर सकता हूं.

हां ये सही है कि जी न्यूज वाले चोर हैं, रजत शर्मा भाजपाई है, ऐसे ही अन्य भी जो हैं, वो सब आपके विरोधी हैं, लेकिन आप अपने ब्रांड के नाम पर जो घपले-घोटाले किए हैं और किए जा रहे हैं, उस पर आपको खुल कर सफाई देनी चाहिए, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, क्यों?

चिदंबरम और उनके बेटे के यहां जब इनकम टैक्स का छापा पड़ा था, तभी मुझे पता चल गया कि अब आपकी बारी है. पर आपने तब भी अपना स्टैंड क्लीयर नहीं किया, आपने आईसीआईसीआई बैंक के साथ किए गए फ्राड घोटाले के बारे में अपनी साइट या अपने चैनल पर कुछ नहीं लिखा दिखाया.

दुनिया को पारदर्शिता और लोकतंत्र सिखाने वाले प्रणय राय एंड कंपनी, आप लोग खुद को सरकार विरोधी होने का लाभ भले ले लो, जो कि लेना भी चाहिए, यही राजनीति है, यही तरीका है आजकल का, लेकिन सच यह है कि आपसे हम लोग यानि खासकर भड़ास वाले जमाने से पूछ रहे हैं कि जो काला धन सफेद किया है, तत्कालीन मनमोहन सरकार के मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर, जो आरोप आप पर आईआरएस अधिकरी संजय श्रीवास्तव ने लगाए, जो नोटिस तमाम सरकारी एजेंसीज ने समय समय पर आपको भेजी, उस पर आपकी सफाई क्या है?

एनडीटीवी और प्रणय राय के ऐसे तमाम फ्राड को लेकर आपने अपने यहां कुछ नहीं लिखा और न दिखाया, केवल गोलमोल सफाई देते रहे, जैसे आज दिया है. आपने इन मुद्दों पर अपने चैनल पर प्राइम टाइम डिबेट में न तो निधि राजदान को आगे किया और न रवीश कुमार को. ये लोग दुनिया भर के ढेर सारे मुद्दों पर बहस करते रहे, केवल एनडीटीवी-प्रणय राय के फ्राड को छोड़कर. आपको इन मुद्दों पर भी खुलकर लिखना दिखाना चाहिए था क्योंकि मीडिया तो सबकी और अपनी भी आलोचना करने के लिए जाना माना जाता है. पर आप ऐसा नहीं करेंगे न करने वाले हैं क्योंकि आप एड़ा बनकर पेड़ा खा रहे थे.

आप विचारधारा और पार्टीबाजी के आधार पर खुद को शहीद दिखाकर लाभ लेना चाह रहे थे और ले रहे हैं और लेंगे भी.

पर हम जैसे लोग जो मीडिया को बहुत नजदीक से देख रहे हैं, और जानते हैं कि यहां सिर्फ और सिर्फ लूट और कालाबाजारी है, सरोकार विचार संवेदना जैसी बातें सिर्फ दिखाने कहने वाली चीजें होती हैं, वो ये ठीक से समझते मानते हैं कि आप को ही नहीं, बल्कि इस समय के सारे कथित मुख्य धारा और संपूर्ण कारपोरेट मीडिया के मालिकों को सरेआम सूली पर चढ़ा देना चाहिए. वजह ये कि असल जीवन में आप सब लोग उतने ही बड़े चोट्टे हैं, जितने किसी दूसरे फील्ड के चोट्टे. आप थोड़े कम ज्यादा चोट्टे हो सकते हैं और लेकिन हैं चोट्टे ही.

आपको यह जानना चाहिए कि जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर आप बार बार अपना बचाव कर रहे हैं, उसी लोकतंत्र ने जिन्हें चुनकर भेजा है, वो आपसे अपना हिसाब ले रहे हैं, लेकिन उन्हीं चीजों का, जो आपने गलत किया है और उनके हाथों में एक्शन लेने के लिए सौंप दिया है. ये घपले घोटाले आजकल के नहीं, बरसों पुराने है. आपने इन्हें साधने, पटाने की भी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए. आपकी ढेर सारी फाइलें पीएमओ में पड़ी हैं जो आपकी काली कहानी बांय बांय करके बता रही हैं.

जो आपने काला किया है, जो आपने फ्राड किया है, वो आपका ही है. ऐसे लोग भुगतते तो जरूर हैं, कोई देर तो कोई सबेर. कोई इस सरकार के आने पर तो कोई उस सरकार के आने पर. अब तो घपले घोटाले भी पार्टियां के संरक्षण में होता है इसलिए पार्टियां बदलते ही घपले घोटालेबाजों के चेहरे भी बदलने लगते हैं.

मेरी संवेदना आपके साथ है क्योंकि आप फिलहाल पीड़ित हैं और हम लोग पीड़ितों के साथ रहते हैं, भले ही वो चोर हो. लेकिन आप पर अत्याचार के खिलाफ जो मोर्चा निकलेगा, उसमें मैं कतई शरीक नहीं हूंगा. मेरी सदिच्छा आपके साथ कतई नहीं है क्योंकि आपके फ्राड हैं. मीडिया के चोरों को मैं नजदीक से जानता हूं, इसलिए आपके साथ तो कतई नहीं खड़ा रहूंगा.

माफ करिएगा, बड़े लोग, खासकर मीडिया के, अपनी चोरी और फ्राड को बड़े आराम से वैचारिक ताने बाने के जरिए ढंक तोप लेते हैं. मैं ऐसे लोगों को अब कतई सपोर्ट नहीं करता. मुझे न तो आपका साथ चाहिए और न आपके लोगों का. हां, ये भी जानता हूं कि आप आत्ममुग्ध लोग पीड़ित पत्रकारों का न कभी साथ दिए न देंगे. खुद आपके यहां के दर्जनों लोग बिना वजह निकाले गए और प्रताड़ित जीवन जीने को मजबूर किए गए. आप अपनी समृ्द्धि, संबंध और साम्राज्य में मस्त रहे. इसलिए आपको एक्सपोज होते हुए देखकर, आप पर एक्शन होते हुए देखकर, मुझे दिल से आनंद आ रहा है.

ऐसे दौर में जब राजनीति पूरी तरह भ्रष्टतम हो गई है, ऐसे दौर में जब राजनीति सिर्फ अपनी जनता का खून पीने का माध्यम बन गई है, मैं किसी को नहीं कहूंगा कि वह राजनीति या मीडिया जनित उत्तेजना का हिस्सा बने, किसी मोर्चे या मार्च का हिस्सा बने. ये सब आपका टाइम और धन वेस्ट करने का तरीका है.

फिलहाल तो आज का दिन मेरे लिए चीयर्स वाला है… आपके यहां छापा पड़ा, चाहें जिस बहाने से भी, मुझे सुकून पहुंचा है. मुझे खुशी है कि आज आईआरएस अफसर एसके श्रीवास्तव भी खुश होंगे जिन्हें आप लोगों ने पागलखाने भिजवाकर अपने फ्राड चोट्टई को ढंकने की कोशिश की थी.

भड़ास के आठवें स्थापना दिवस पर जब आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने एनडीटीवी के प्रणय राय और तत्कालीन वित्त व गृह मंत्री चिदंबरम द्वारा अपने घोटाले चोरकटई को ढंकने के लिए उन्हें जेल भिजवाने की कथा सुनाई तो मेरी ही नहीं, वहां मौजूद सारे लोगों के रोएं खड़े हो गए और एक झुरझुरी तैर गई शरीर में.

ये दौर मान्य संस्थाओं को नष्ट किए जाने का है, तो आपको भी नष्ट होना है क्योंकि आप महा चोरकट लोग हो. हां, सुपर चोरकटों से कुछ कम, कुछ बाएं, कुछ नीचे. तो आप लोग अपनी लड़ाई लड़ें. आपका अंजाम देखना मुझे अच्छा लगेगा.

चीयर्स.
यशवंत

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योगी जी को अखिलेश यादव के जमाने वाले मुख्य सचिव राहुल भटनागर उर्फ शुगर डैडी से इतना प्रेम क्यों?

Yashwant Singh : यूपी का मुख्य सचिव एक ऐसा दागी आदमी है जिसे खुलेआम लोग शुगर डैडी कहते और लिखते हैं. शुगर डैडी बोले तो शुगर लॉबी का दलाल. बोले तो शुगर मिल मालिकों का चहेता. बोले तो यूपी की चीनी मिलों के प्रबंधन का प्रतिनिधि. बोले तो यूपी के गन्ना किसानों का दुश्मन.

ये राहुल भटनागर नामक शुगर डैडी महोदय अखिलेश यादव के जमाने में जब दीपक सिंघल को हटाकर मुख्य सचिव बनाए गए थे तो किसी को कुछ भी खराब नहीं लगा क्योंकि अखिलेश यादव के राज में पूरा कुनबा लूटपाट जमकर करता था और अपने अपने हिसाब से मोहरे फिटफाट कराता था. लेकिन अब योगी जी के राज में क्या मजबूरी है कि ये शुगर डैडी कांटीन्यू किए जा रहे हैं, पूरी बेशरमी के साथ. यहां तक कि आईएएस की नौकरी से वीआरएस लेकर भाजपा नेता के रूप में सक्रिय चर्चित शख्सियत Surya Pratap Singh सिंह को खुलकर शुगर डैडी की पोल खोलते हुए लिखना पड़ा और अपनी ही सरकार पर सवाल उठाना पड़ा. उन्होंने योगी जी के किसी चांडाल चौकड़ी से घिरे होने की बात कही.

ये सही है कि आदित्यनाथ योगी की प्रशासनिक अनुभवहीता का अफसर खूब फायदा उठा रहे हैं और ट्रांसफर पोस्टिंग के खेल में भी नब्बे फीसदी इन्हीं चांडाल चौकड़ी वालों की ही चल रही है लेकिन राहुल भटनागर मुख्य सचिव के मामले में योगी जी की आंख पर पट्टी क्यों पड़ी है. ऐसे भ्रष्ट और दलाल किस्म के आईएएस अधिकारी को मुख्य सचिव की कुर्सी से तुरंत उठा फेंकना चाहिए ताकि यूपी में प्रशासनिक लेवल पर अब भी कायम जड़ता को खत्म किया जा सके.

याद रखिए जब मुख्य सचिव ही दागी हो तो वह पूरे प्रदेश में दागियों का सरगना बन जाता है और उसका अघोषित काम अपने और दूसरों के दाग को छुपाना बचाना होता है, साथ ही इस क्रमबद्धता को कायम रखते हुए जमकर उगाही वसूली करते कराते हुए अपने सियासी आकाओं को खुश रखना होता है ताकि उनकी कुर्सियां सलामत रहे. उम्मीद करते हैं कि जल्द ही दागी राहुल भटनागर उर्फ कुख्यात शुगर डैडी को मुख्य सचिव के कार्यभार से सीएम योगी जी मुक्त कर उत्तर प्रदेश की जनता पर एक बड़ा एहसान करेंगे.

हालांकि जनता तो जमाने से कह रही है कि हे नेताओं, बस अब एक एहसान करना की आगे से कोई एहसान मत करना लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं. वो जनता की दुहाई दे देकर जार जार रोते हुए एहसान दर एहसान करते जा रहे हैं और इस चक्कर में बेचारी जनता को खुद का गला लगातार दबता घुटता हुआ महसूस होने लग रहा है.

आखिर में फेसबुक के समाजवादी पार्टी के छिपे-खुले चिंतकों से कहूंगा कि वो भाजपाइयों से पूछें कि आखिर अखिलेश भइया के दागी मुख्य सचिव राहुल भटनागर योगी जी को इतना पसंद काहें आ गए कि उन्हें ही कांटीन्यू किए पड़े हैं. फिर तो मानना ही पड़ेगा कि अखिलेश राज में सब कुछ सही था, भाजपा ने केवल जुमलेबाजी के दम पर चुनाव जीता और अब यथास्थिति कायम रखे रहने के लिए पूरे प्रशासकीय तंत्र को पहले जैसा ही बनाए हुए है. जै हो योगी जी. जै जै शुगर डैडी जी. कमाल करते हो आप लोग जी.

भड़ास के फाउंडर और एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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केजरी में हवा मत भरिए, गुब्बारे को फूटने दें : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : केजरीवाल में ज्यादा हवा भरने की गुंजाइश नहीं बची है Madan Tiwary जी. नहीं मानिएगा और भरते रहिएगा तो अप्राकृतिक दुर्घटना हो जाएगी और वो फट जाएगा…जिससे अंग प्रत्यंग छितरा जाएगा… देखिएगा, कार्यकाल पूरा होते वह खुदे राजनीति छोड़ कर भाग जाएगा… कहेगा कि कहां फंस गया था, एनजीओ वाला कमवा ही ठीक था 🙂

संघियों-मुसंघियों से यह नकली क्रांतिकारी तो कतई नहीं लड़ पावेगा जिसकी खुद की कोई विचारधारा नहीं है… इसमें पहले ही कई टन हवा हम लोगों ने भर रखा था / या यूं कहिए कि वह खुदे भरवा रहा था… इस दबाव को रिलीज करने में जुटा हुआ है… सू सू फू फू करके धीरे धीरे अब तक वह काफी हवा निकाल चुका है.

केजरी को अपने असली औकात में आने दीजिए.. देख रहे हैं कि कुछ लोग फिर उसे महान, योद्धा, क्रांतिकारी, जनता का आदमी, मोदी को मात देने की क्षमता रखने वाला, मध्यमवर्ग का हीरो आदि इत्यादि बताकर फिर से फटाफट हवा भरने पर उतारू हैं. पक्का कह रहा हूं, फटाक से फट जाएगा भाई, आपको अंदाजा भी नहीं लगेगा कि इतना जल्दी कैसे फट गया… 🙂

जाने दीजिए, रहम करिए. हवा एक बार पूरा निकल जाने दीजिए ताकि पहले तो वह खुद ही काफी आजाद सहज महसूस कर पाए और फिर हम लोग भी थोड़े विकल्पहीन होने के बाद रीयल विकल्प तलाशने को तत्पर हो सकेंगे.

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हमारे बड़े भाई Sheetal P Singh जी ‘आप’ के कट्टर समर्थक हैं. उन्होंने एक पैग के बाद इसलिए हम जैसों को गरियाया है कि हम लोग क्यों केजरीवाल के विरोधी हो गए हैं… साथ ही उन्होंने पूछा है कि हम लोगों का कोई जमीर है या नहीं… तो शीतल साहब को अभी ही उनकी पोस्ट के नीचे अदना सा जवाब दे आया हूं, जिसे यहां भी साया कर रहा हूं…

शीतल पी सिंह जी, आखिर किस बात पर इतना प्रशस्ति गान गा रहे हैं. कहीं कोई पार्टी में पद वद का आफर वाफर!! वैसे मेरा सवाल है कि केजरीवाल ने क्या देखकर कपिल मिश्रा को इतना बड़ा मंत्रालय दे दिया था.. उससे बहुत काबिल तो शीतल पी सिंह जी आप थे… जब चूतियों को आगे बढ़ाइएगा तो वही चूतिये गांड़ मार कर निकल जाएंगे… केजरीवाल के मामले में यही हो रहा है.. शीतल पी सिंह जी की आम आदमी पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता और जो निष्ठावान है वह बाकियों को गरियाता है कि तुम लोग क्यों निष्ठावान नहीं हो… पर सवाल वही है साथी कि केजरी ने जो बोया है वह काटेगा कौन… आप जैसे जेनुइन लोग उसको डिफेंड करते-करते अपना बीपी और कोलेस्ट्राल दोनों जरूर बढ़ा लेंगे. 😛

और हां, जमीर वाला नियम इंसानों ने बनाया है. प्रकृति का नियम यह कतई नहीं है. जमीर के चक्कर में बेवकूफ अपनी लाइफ बरबाद करते हैं. नेचर का नियम है अपारचुनिज्म यानि अवसरवाद. जो बदले मौसम के हिसाब से बदलता है, वही नेचर में लंबे समय तक सरवाइव करता है. कुछ भेड़िये कुत्ते बन गए, ऐसे अवसरवादी निकले. देखिए, कुत्तों की जमात अच्छी खासी फल फूल रही है और आदमियों के बेडरूम में बडे़ आराम से प्यार दुलार पाकर सो रही है. और, बेचारे भेड़िए इन दिनों अपनी जान बचाने के लिए जंगल खोजते फिर रहे हैं. अवसरवाद कोई गलत नहीं साथी. वैसे मनुष्यों में जमीर ठाकुर साहब लोग भारी मात्रा में रखते हैं, और इसी कारण काफी कष्ट भी भोगते रहते हैं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

शीतल पी. सिंह जी और मदन तिवारी की वो ओरीजनल पोस्ट्स नीचे है जिन पर यशवंत ने उपरोक्त कमेंट्स किए हैं…

Madan Tiwary केजरीवाल मध्यवर्ग के युवाओं का सपना है. बदलाव का सपना. आप लाख दोष दो. अन्य किसी भी नेता और दल से विश्वसनीय है केजरीवाल. लोग उसके साथ खड़े हैं. अभी हम वैसे काल से गुजर रहे हैं जहां सबसे बड़ी चुनौती शोषक गुजराती सिंडिकेट है. चरित्रहनन भाजपा और मोदी की पुरानी चाल है. राहुल का करते हैं. वामपंथियो का करते हैं. गांधी, नेहरू, इंदिरा किसी को बख्शा है इन संघियों ने? मैं केजरीवाल के साथ हूँ. चिराग रोशन रहेगा चाहे जितना बड़ा हो तूफ़ान. देखिएगा सर, हम भी यहीं रहेंगे, आप भी यही रहेंगे। कोई आंदोलन मरता नहीं है।

Sheetal P Singh : चियर्स… १: केजरीवाल ने मुकेश अंबानी पर मुक़दमा दर्ज करने का आदेश दिया (सारी एजेंसियाँ दबाव के कारण इसे दर्ज करने से मना कर चुकी थीं )। २ : उसने मोदी जी के एक युवा महिला के स्नूपिंग मामले के टेप को विधानसभा के पटल पर रिकार्ड करवा दिया जिन्हे लेकर एक आई ए एस अफ़सर सारे मीडिया हाउस सारे क़ानूनी सरकारी दफ़्तरों /एजेंसियों और सुप्रीम कोर्ट तक से बरसों दौड़कर ख़ाली हाथ लौट चुका था । ३ : उसने बिशन सिंह बेदी कीर्ति आजाद सुरिंदर खन्ना जैसे मशहूर खिलाड़ियों द्वारा दशकों से डी डी सी ए / अरुण जेटली के भ्रष्टाचार पर उठाई जा रही आवाज़ को अपना स्वर दिया क्योंकि दिल्ली का किसी क़िस्म का मीडिया इस पर एक शब्द छापने की हिम्मत नहीं कर सका था न कोई कोर्ट कुछ सुनने को तैयार होती थी । ४ : उसने दिल्ली में अनिल अंबानी की बिजली कंपनियों से सरकारी बकाये के आठ हज़ार करोड़ की वसूली शुरू करा दी । बिजली के दाम बढ़ाने की कोशिशें फेल कर दीं और आडिट बिठा दिया ।

समझ में आता है कि मुकेश और अनिल अंबानी , मोदी जी और अरुण जेटली जी उसकी खाल खींचना चाहें! अपने कुत्तों (मीडिया ) को उसको नोच डालने के लिये छोड़ दें , उसे मुक़दमों और कचहरियों में उलझा कर बेबस कर दें। उस पर तरह तरह की जाँच बिठा दें। उसके मंत्री विधायक पार्षद ख़रीद कर उसी के कपड़े फड़वा दें! उसकी पार्टी में कामा फ़ुल स्टाप की कमी निकाल कर भंग करा दें।

पर तुम किस बात का बदला उससे ले रहे हो ? तुम जो (हर क़िस्म के मध्यवर्गीय) नौकरीपेशा कारोबारी दलाल प्रापर्टी डीलर पत्रकार छोटे मोटे ब्यापारी या बाप का माल चाँपते ठलुओ… तुम केजरीवाल से क्यूँ ख़फ़ा हो सूतिये? तुम्हारी कौन सी भैंस खोल ली उसने? तुम ग़रीबों की बिजली पानी सब्सिडी से ख़फ़ा हो? तुम अस्पताल में दवा और हर क़िस्म की जाँच मुफ़त हो जाने से ख़फ़ा हो? सरकारी स्कूलों में बुनियादी बदलाव से? शिक्षा का बजट २५% होने से? चार सौ करोड का फ़्लाइओवर साढ़े तीन सौ करोड में बनने से कि आड इवेन से? तुम्हारा क्या बिगाड़ा ग़रीब ने? तुम साले अंबानी के …….चट्ट , तुम इस आदमी को उस गवैय्ये से बदलने के लिये टीवी देखकर जागरण पढ़कर दौड़ पड़े (जिसके मालिक भी अब अंबानी जी ही हैं , )जो कल समाजवादी था आज भगवा है और कल पप्पू आ जाय तो तिरंगा लपेट कंगरेसी हुआ मिलेगा! तुमरा कोई ज़मीर है बे? हमरा तो है.. दूसरे पैग के पानी सोडे के बीच पाँच सौ वर्ड ठोंक दिये.

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यशवंत की कुछ एफबी पोस्ट्स : चींटी-केंचुआ युद्ध, दक्षिण का पंथ, मार्क्स का बर्थडे और उदय प्रकाश से पहली मुलाकात

Yashwant Singh : आज मैं और Pratyush Pushkar जी दिल्ली के हौज खास विलेज इलाके में स्थित डिअर पार्क में यूं ही दोपहर के वक्त टहल रहे थे. बाद में एक बेंच पर बैठकर सुस्ताते हुए आपस में प्रकृति अध्यात्म ब्रह्मांड आदि की बातें कर रहे थे. तभी नीचे अपने पैर के पास देखा तो एक बिल में से निकल रहे केंचुए को चींटियों ने दौड़ा दौड़ा कर काटना शुरू किया और केंचुआ दर्द के मारे बिलबिलाता हुआ लगा.

मैंने फौरन मोबाइल कैमरा आन किया और पूरे युद्ध को रिकार्ड करना शुरू किया. क्या ऐसा लगता नहीं कि ये जो नेचर है, प्रकृति है इसने हर तरफ हर वक्त प्रेम के साथ साथ युद्ध भी थोप रखा है, या यूं कहिए प्रेम के साथ-साथ युद्ध को भी सृजित कर रखा है. हर कोई एक दूसरे का शिकार है, भोजन है. डिअर पार्क की झील के बारे में प्रत्यूष पुष्कर बता रहे थे कि जो पंछी मर झील में गिरते हैं उन्हें मछलियां खाती हैं और जब मछलियां मर कर सतह पर आती हैं तो ये पंछी खा जाते हैं. ये अजीब है न दुनिया. जितना समझना शुरू कीजिए, उतना ही अज्ञान बढ़ता जाएगा. इस नेचर के नेचर में क्या डामिनेट करता है, प्रेम या युद्ध? मेरे खयाल से दोनों अलग नहीं है. इनमें अदभुत एकता है. केंचुआ-चींटी युद्ध का वीडियो देखें :

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क्या यशवंत दक्षिणपंथी हो गया है? ये सवाल करते हुए एक मेरे प्यारे मित्र मेरे पास आए. उनने सवाल करने से पहले ही बोल दिया कि पूरा रिकार्ड करूंगा. मैंने कहा- ”मेरे पास और क्या है जनपक्षधर जीवन के सिवा.” उनकी पूरी बातचीत इस इंटरव्यू में देख सकते हैं. देखें वीडियो :

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महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा. हालांकि यह जानता हूं कि आजकल विचारधाराएं नहीं बल्कि तकनालजी दुनिया को बदलने का काम कर रही है, फिर भी मार्क्स ने जो हाशिए पर पड़े आदमी की तरफ खड़ा होकर संपूर्ण चिंतन, उपक्रम संचालित करने की जो दृष्टि दी वह अदभुत है.

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You might be surprised to know that a spot on the surface of the Earth is moving at 1675 km/h or 465 meters/second. That’s 1,040 miles/hour. Just think, for every second, you’re moving almost half a kilometer through space, and you don’t even feel it.

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भड़ास4मीडिया इसी 17 मई को 9 साल का हो जाएगा. 17 मई 2008 को यह डोमेन नेम बुक हुआ था. जिस तरह पशु प्राणियों वनस्पतियों मनुष्यों आदि की एक एवरेज उम्र होती है, उसी तरह की उम्र वेबसाइटों-ब्लागों अचेतन चीजों की भी होती है, खासतौर पर उन उपक्रमों का जो वनमैन आर्मी के बतौर संचालित होते हैं, किसी मिशन-जुनून से संचालित किए जाते हैं. भड़ास के इस नौवें जन्मदिन पर कब और कैसा प्रोग्राम किया जाएगा, यह तय तो अभी नहीं किया है लेकिन कार्यक्रम होगा, ये तय है. मीडिया के कुछ उन साथियों को भी सम्मानित करना है जो लीक से हटकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने साहस का परिचय देते हुए प्रबंधन को चुनौती दी, कंटेंट के लिए काम किया, सरोकार को जिंदा रखा. आप लोग भी इस काम के लिए उचित नाम सजेस्ट करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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आजकल उन कुछ लोगों से मिल रहा हूँ जिनसे रूबरू बैठने बतियाने की हसरत ज़माने से थी। जिनको पढ़ पढ़ के बड़ा हुआ, जिनको हीरो की तरह प्रेम किया, उनसे आज दोपहर से मुखातिब होने का मौका मिला है।

इन्हें शानदार कवि कहूं या अदभुत कथाकार-उपन्यासकार या ग़ज़ब इंसान। इन्हें भारत का नाम विदेशों में रोशन करने वाला अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व कहूं। वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ तब पढ़ा था मैंने जब फुल कामरेड हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुवेशन करने के बाद जब बीएचयू बतौर होलटाइमर कामरेड के रूप में पहुंचा तो Uday Prakash जी की लिखी पहली कहानी पढ़ने के बाद उनकी कई कहानियां-रचनाएं पढ़ गया, फिर खोजता पढ़ता ही गया। ये लिविंग लीजेंड हैं, भारतीय साहित्य जगत के। इनसे मिलवाने के माध्यम बने पत्रकार भाई Satyendra PS जी। चीयर्स 🙂 (photo credit : भाभी कुमकुम सिंह जी)

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आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे का गाजीपुर में जो सम्मान समारोह आयोजित किया गया, उसमें सबसे मजेदार पार्ट था ट्वंटी ट्वंटी के अंदाज में फटाफट सवाल जवाब. कई सवालों पर उन्हें नो कमेंट कहना पड़ा. उस आयोजन की पूरी रिपोर्ट कई वेबसाइटों, अखबारों, चैनलों पर आई लेकिन अभी तक भड़ास पर कुछ भी अपलोड नहीं किया गया. जल्द ही पूरी रिपोर्ट भड़ास पर आएगी और यह भी बताया जाएगा कि आखिर भड़ास ने इस आईपीएस को सम्मानित करने का फैसला क्यों किया. फिलहाल यह वीडियो देखें. शायद कुछ जवाब आपको मिल जाए. वीडियो में खास बात यह है कि आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे पूरी ईमानदारी से बेलौस सब कुछ बता गए. इस दौरान कुछ यूं लगे जैसे यह शख्स हमारे आपके बीच का ही है. उनकी खासियत भी यही है. वह सबसे पहले आम जन के अधिकारी हैं. इसी कारण उन्हें खुद के लिए उर्जा आम जन के लिए काम करने से मिलती है. आगे और भी वीडियो अपलोड किए जाएंगे. फिलहाल इसे देखें…

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ट्रेवल ब्लॉगर Yashwant Singh Bhandari पर दिल्ली पुलिस के जवानों ने बोला धावा। लाल किले की बाहर से तस्वीर ले रहे थे। एक डॉक्यूमेंट्री के लिए दूर से खड़े होकर लाल किले के आउटर साइड को शूट कर रहे थे। जवानों ने धावा बोलकर न सिर्फ पीटा बल्कि पैसे भी छीन लिए। जब उन्होंने मुझे कॉल किया मदद के लिए तो मैंने 100 नंबर डायल करने की सलाह दी। इस बीच पुलिस वाले भड़क गए और भंडारी की पिटाई करने लगे। किसी तरह वो जान बचाकर भागे। पर्यटन को ऐसे ही बढ़ावा देगी राजनाथ की दिल्ली पुलिस! हम सभी को इस घटना की निंदा करनी चाहिए और दोषी पुलिसवालों को बर्खास्त करने की मांग रखनी चाहिए।

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मोदी जी लग रहा है नाक कटवा देंगे. भक्त बेहद निराश हैं. मोदी जी में अचानक मनमोहन सिंह नजर आने लगे हैं जो न कुछ करता है न बोलता है. इतना कुछ देश विरोधी हो रहा है. कैंची की तरह चलने वाली जुबानें खामोश हैं. पाकिस्तान से लेकर नक्सलवाद तक, कश्मीर से लेकर महंगाई तक, सब कुछ भयंकर उठान पर है. लोग तो कहने लगे हैं कि जब देश चाय वाले के हवाले कर देंगे तो यही सब होगा. कुछ कर डालिए मोदी जी, आपसे भक्तों की पुकार आह्वान सुन सुन कर मेरी भुजाएं फड़कने लगी हैं. अब ऐसे में कैसे चुप रह सकते हैं. जरूर आप कोई नई योजना बना रहे होंगे. न भी बना रहे होंगे तो चैनल वाले अपने तीसरे आंख से योजना की भनक लगा लेंगे और आपके इंप्लीमेंट करने से पहले ही ‘दुश्मनों’ को मारे काटे गिराते जाते हुए दिखा देंगे और भक्त समेत पूरा देश एक बार फिर मोदीजीकीजैजै करने लगेगा… आंय.. मुझे कुछ आवाजें धांय धूंय धड़ाम की सुनाई पड़ने लगी हैं, वाया रजत शर्मा के इंडिया टीवी… कई अन्य चैनलों के एंकर भी तोप और राइफल तानने लगे हैं अपने अपने स्टूडियो में… आप आनंद से सोइए, मीडिया वाले आपका काम कर ही डालेंगे… आइए हम सब बोलें भामाकीजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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रवीश कुमार की भड़ास से क्यों फटती है?

रवीश कुमार की भड़ास से क्यों फटती है? इसलिए फटती है क्योंकि उसके मालिक प्रणय राय की काली करतूत को भड़ास गाहे बगाहे खोलता रहता है. उसके मालिक के प्रगतिशील खोल में छिपे भ्रष्टाचारी चेहरे को नंगा करता रहता है. जाहिर है, रवीश कुमार भी नौकर है. सो, वह खुद के मीडिया हाउस की पोल खोलने वाली वेबसाइट का जिक्र भला कैसे कर सकता है. दूसरे मीडिया हाउसों पर उंगली उठाने वाले और उन्हें पानी पी-पी कर गरियाने  वाले रवीश कुमार की हिप्पोक्रेसी की हकीकत यही है कि वह करप्शन में आकंठ डूबे अपने मीडिया समूह एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी पर कुछ नहीं बोल सकता.

यही नहीं, एनडीटीवी ग्रुप की काली कहानी का पर्दाफाश करने वालों तक का आन स्क्रीन नाम भी नहीं ले सकता. वह अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की बेबाकी का खूब वर्णन करेगा लेकिन भारत के वे पत्रकार कतई नहीं दिखेंगे जो एनडीटीवी की नंगई व करप्शन की कहानी का पर्दाफाश करते रहते हैं. रवीश कुमार चाहे जितना आजाद खयाल और बेबाक पत्रकार बने लेकिन सच यही है कि वह एक अव्वल दर्जे का हिप्पोक्रेट है और उसे एड़ा बनकर पेड़ा खाने की रणनीति इंप्लीमेंट करने की शैली अच्छी तरह से आती है. वह खुद को भाजपाइयों से पीड़ित बता बताकर गैर-भाजपाइयों की निगाह में खुदा बनने की लंबे समय से कोशिश करने लगा है, और बनने भी लगा है.

अंधों के बीच काना राजा बना रवीश कुमार यह कभी नहीं बताएगा कि किस तरह प्रणय राय और चिदंबरम ने मिलकर एक साहसी आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को इसलिए जबरन पागल घोषित कराकर पागलखाने में डलवाया क्योंकि उसने प्रणय राय-चिदंबरम की ब्लैकमनी की लंबी कहानी पर काम किया और ढेर सारे तथ्य इकट्ठा कर एनडीटीवी को नोटिस भेजने की जुर्रत की. इस पूरे घटनाक्रम को भड़ास ने प्रमुखता से और लगातार छापा. यही वजह है कि कल

प्रेस फ्रीडम डे पर प्राइम टाइम के दौरान रवीश कुमार ने मीडिया को एक बीट मानकर इससे संबंधित खबरें छापने बताने वाली कई वेबसाइटों का जिक्र किया और उनके संचालकों का बयान दिखाया लेकिन वह भड़ास का नाम जान बूझकर गटक गया क्योंकि अगर वह भड़ास का नाम ले लेता तो प्रणय राय उसकी नौकरी ले लेता. यह सबको पता हो गया है कि किस तरह खांग्रेसी सरकार के कार्यकाल में प्रगतिशील माने जाने वाले मीडिया मालिक प्रणय राय ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर 2जी स्कैम के धन को ठिकाने लगाने के लिए दुनिया भर में चैनल खोल डाले और इस तरह काले धन को ह्वाइट करके भारत लाने में कामयाब हो पाए. 

कल प्राइम टाइम में रवीश कुमार मीडिया की आजादी पर लेक्चर पेल रहा था, ढेर सारे पत्रकारों का वक्तव्य सुना रहा था,  कई दोयम किस्म की छायावादी मीडिया वेबसाइटों का उल्लेख करते हुए उनके संचालकों का बयान दिखा रहा था तो बिलकुल साफ साफ भड़ास4मीडिया डॉट कॉम का उल्लेख छुपा गया. हां, उसने अपने खास चिंटू विनीत कुमार का बार-बार बयान-भाषण-लेक्चर सुनवाया जो दूसरे मीडिया हाउसों को गरियाने के बहाने जनता को भी उपदेश दे रहा था. ये वही चिंटू विनीत कुमार है जो हर वक्त रवीश कुमार की जय जय करते हुए लेख फोटो सोशल मीडिया पर लिखता छापता रहता है. तू मुझे पंत कह, मैं तुझे निराला के अंदाज में रवीश कुमार अपने उन खास लोगों को ही प्राइम टाइम में आने को एलाउ करता है जिसके बारे में उसे पता है कि वह उनके चेले हैं और चेले बने रहेंगे, साथ ही गाहे बगाहे रवीशकुमारकीजैजै करते हुए लेख आदि लिखा करेंगे.

हां, खुद को निष्कच्छ दिखाने को एक किसी भाजपाई या संघी का बयान भी दिखा देता है ताकि उस पर उंगली न उठ सके. रवीश कुमार असल में हमारे दौर के न्यूज चैलनों की पत्रकारिता का एक ऐसा आदर्श तलछट है जिसे नौकरी और सरोकार के बीच झूलते रहते हुए खुद को महान दिखाने बताने में महारत हासिल है. अगर सच में रवीश कुमार के भीतर एक सच्चा और सरोकारी पत्रकार है तो वह जरूर एनडीटीवी ग्रुप की ब्लैकमनी की कहानी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम के दौरान दिखाएगा और अगर प्रणय राय राधिका राय आदि मना करता है तो इस्तीफा उनके मुंह पर मार कर आजाद पत्रकारिता करते हुए बाकी पत्रकारों के लिए राह प्रशस्त करेगा. मगर पता है ऐसा वह नहीं करेगा क्योंकि उसे लाखों रुपये महीने चाहिए जो फिलहाल तो सिर्फ एनडीटीवी दे सकता है इसलिए उसे एनडीटीवी और इसके मालिकों के तलवे चाटते हुए, इन्हें बचाते हुए ही शेष क्रांतिकारी पत्रकारिता करनी है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Ghanshyam Dubey यशवन्त आप गलत है। इस समय लगता है की आप पर कोई “सवारी” आ गयी है। अकेले रवीश ही बचे हैं, पत्रकारिता के घुप अंधेरे मे टिमटिमाती रोशनी बन कर। यदि यह भी या इस जैसी कुछ ही और तो सब खत। हो जायेगा! पूरी ईमानदारी से किसी एक मीडिया (इलेक्ट्रानिक) समूह वह भी हिन्दी का नाम बता दीजिये, जिसे आप के आदर्शों के रूप मे माँन लिया जाये। एक नौकरी करने वाले पूरे देश के चैनलों मे सिर्फ 6 नाम बता दीजिए, जिसे आदरह मानक मान लिया जाये। सार राष्ट्रीय चैनलों को तो देख ही रहे है की किस गिरावट और तलवाचाटू भंगिमा के हो गए हैं! उन्हें देख कर नया गधा हुआ शब्द ” प्रेस्टीटूट ” बहुत छोटा पड़ेगा। राजनैतिक खबरों मे भी और देश के सामान्य से सामान्य आदमी की रोज रोज की जिंदगी मे उतरने वाली पीड़ा, उसकी मार, कहां जाएं, किस्से कहैं की अंधे गलियारों मे एक बची खुची संकरी गली अब भी बची है रबीश और NDTV के जरिये। स्वीकार न करिये तो “गाली” तो कम से कम मत ही दीजिये। जरूर आप कि या आपके तथाकथित किसी अपने की कोई नस कहीं दे दब गयी सी लगती है! या आपके अहं को कहीं से किसी भी तरह का धक्का सा लगा है! किसी को भी किसी भी तरह के कदाचार पर पथर फेकने का अधिकार नहीं है, जो खुद नैतिक रूप से भी किसी भी तरह का कदाचारी न रहा हो या हो! आप पत्रिकारिता ही नहीं, जिंदगी की किताब के ही पढ़े लिखे आदमी हैं। फक्कड़ भी हैं और मुँहफट भी। लेकिन यह मुहफटई जरा कुछ जँची नहीं! चिंतन कीजियेगा। यह गुजारिश है, क्योंकि न मैं रबीश हूँ और न ही भड़ासी यशवन्त!!
Yashwant Singh जो भी बड़े न्यूज चैनल और बड़े अखबार हैं, उसमें से ज्यादातार, इनक्लूडिंग एनडीटीवी, सब के सब पैसे उगाहने, काला धन को ह्वाइट करने के अड्डे बन गए हैं. ये राजनीति की तरह ही हम लोगों को वैचारिक आधार पर बांट कर अपनी दर्शक संख्या बनाए बचाए हुए हैं. सारी बड़ी व सच्ची खबरें अब मोबाइल पर मिल जाया करती हैं. इन ब्लैकमेलरों के अड्डों पर बुलडोजर चलवा देना चाहिए जो न कानून मानते हैं न संविधान न कोर्ट. मजीठिया वेज बोर्ड का मामला आपके सामने है. एनडीटीवी पर रवीश का जो एक घंटा का प्रलाप चलता है, उससे बहुत अच्छा लोग सोशल मीडिया पर लिखते हैं और आप भी पढ़ते हैं. सवाल उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का होता है. एनडीटीवी समेत ज्यादातर चैलन वही दिन भर की रुटीन खबर दिखाते रहते हैं. आपको कोई एनडीटीवी का ऐसा स्टिंग साल दो साल का याद है जिसमें सत्ता प्रतिष्ठान का कई बड़ा करप्शन सामने लाया गया हो? केवल बकचोदी करते रहना ही अगर न्यूज चैनल होना है तो इन न्यूज चैनलों की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है.. एनडीटीवी ने किस तरह 2जी स्कैम में चिदंबरम से गठजोड़ किया, इस करप्शन को ढंकने के लिए एक आईआरएस अधिकारी को पागलखाने भिजवा दिया… इन कड़ियों को जब आप जोड़ेंगे और पढ़ेंगे तो आपको एनडीटीवी व रवीश कुमार से घृणा हो जाएगी भाई.

Kumar Narendra Singh Lekin jail men to aap gaye the, Raveesh nahin.

Yashwant Singh जो आजाद होकर सच लिखेगा, किसी का भी सच, तो उसे सब मिल कर मार डालने की कोशिश तो करते ही हैं. मेरी जेल यात्रा ने असल में भारतीय मीडिया की असहिष्णुता को ही प्रदर्शित करता है कि कैसे ये मीडिया हाउसेज लोकतंत्र की दिन रात बात करते रहते हैं लेकिन खुद अपने सेटअप में बेहद अलोकतांत्रिक और असहिष्णु होते हैं. इसी कारण ये अपनी आलोचना पर बेहद कटखौने हो जाते हैं और आलोचना करने वाले को निपटाने के लिए हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल करने लगते हैं.

Kumar Narendra Singh Aapki mansikta bhi koi alag nahin hai. Aap kya hain, mujhe mat bstaiye. Sabko pata hai ki aap kitne nishpakh hain.

Yashwant Singh आजकल आप किसके नौकर हैं कुमार नरेंद्र साहब? नौकर टाइप पत्रकार कब भला आजाद पत्रकारों को महान माने? और,कब भला उनकी आजादी-निष्पक्षता उन्हें रास आई? आप सही जा रहे हो गुरु… निकालो भड़ास… आप तो जानते ही हैं कि भड़ास पर हम लोग अपने खिलाफ भी छापते हैं. आप पूरी भड़ास निकालिए, मुझे भी गरियाए और मेल कर दीजिए bhadas4media@gmail.com पर. आपकी भड़ास को भड़ास पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा. हम लोगों को ये कतई मुगलता नहीं कि हम कोई महान पत्रकार हैं. हम लोग बस कथित महान पत्रकारों की महानता की सच्चाई की पड़ताल कर लेते हैं बस, और तब वैसे ही मिर्ची लगती है उनके चिंटूओं को जैसे आपको लगी. आपकी सोच समझ की सीमा बस इसी से सामने आ जाती है कि आप पत्रकार के जेल जाने को घटिया बात मानते हो. 🙂 लगे रहिए बंधु…

Vishnu Gupt प्रणव रॉय टूटपूंजियां पत्रकार से कैसे बना एनडीटीवी मीडिया उद्योग का मालिक? ये लिंक पढ़िए.. https://www.bhadas4media.com/tv/11178-pranav-roy-katha

Singhasan Chauhan Yashwant Singh बिल्कुल यही होता है यसवंत जी जो सच्चाई को सामने लाना चाहता है उसके किसी गलत इल्जाम में फंसा दिया जाता है जैसे की मेरे साथ हुआ मैंने SDM की शिकायत की तो मेरे पिताजी के नाम से जुरमाना का नोटिस भेज दिया जिसे bhadas4media पर आपने छापा भी था|

Kumar Narendra Singh Aap koi patrakarita ki raksha ke liye jail nahin gaye the. Waise abhi kisi ka naukar nahinn hun…..jaroorat ho to bataiyega. Aapka kaise chalta hai. Aap apne ko mahan hi kahalwana chahte hain, varna mujhe naukar type kahne ka kya arth hai. Lagta hai, aap mere baare men kuchh nahin jante, tabhi to aap kah rahe hain humen aapki aazadi raas nahin aayee. Aapke post par yah meri pahli aur ekmatra tippani hai, jabki aap kafi varshon se aazad hain. Yadi aapki aazadi khalti, to bahut pahle tippani ki hoti. Bhasha bhi maryadit ho to behtar hai. Main bhi aapki tarah bhasha likh sakta hun. Main aapse yada rang men rahta hun….han, aapki tarah main apani prashashti gaan karne ka sadi nahin. Koi naukari ho to bataiye, gyan mat deejiye.

Yashwant Singh जिस दिन नौकरी ढूंढने का धंधा बंद कर देंगे, मनुष्य बन जाएंगे. बाकी आप वरिष्ठ हैं. मैं न नौकरी काफी बरसों से ढूंढता हूं न इस काम में मदद देता हूं. कोशिश करिए नई तकनीक को समझने की, वेब ब्लाग यूट्यूब से अच्छा पैसा कमाया जा सकता है. सीखना चाहें तो आपको फ्री में सिखा सकता हूं ताकि आप भी आजाद पत्रकार के रूप में जीने का लुत्फ उठा सकें.

Sanjaya Kumar Singh आपकी बात सही है। सहमत भी हो सकता हूं। पर मुद्दा यह है कि ऐसा करके एनडीटीवी से अलग होना या प्राइमटाइम की धार या स्वतंत्रता कम करना कोई अक्लमंदी नहीं होगी। कार्यक्रम चलता रहे और चलाने का मौका मिलता रहे तो बहुत कुछ किया जा सकता है। आप जो कह रहे हैं वह करके वीरता पुरस्कार के अलावा कुछ मिलने वाला नहीं है (हालांकि उसपर भी शक है)। और कितने ही वीरता पुरस्कार प्राप्त लोग कुछ कर नहीं पा रहे हैं। रवीश जो कर रहे हैं वह बेमिसाल है। रही बात एनडीटीवी के भ्रष्टाचार की तो – पूरी भाजपा उसे क्यों बख्श दे रही है? याद है बाबा रामदेव सलवार कमीज पहनकर भागे थे कि बचे रहेंगे तभी कुछ काम कर पाएंगे और अब हम लोगों के प्रधानसेवक को राष्टऋषि बना दे रहे हैं।

Yashwant Singh आप तो भड़ास के प्रोग्राम में आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को सुने थे. वहां मौजूद लोगों के रोंगटे खड़े हो गए थे. बाकी, मैंने कहा न कि अंधों में काना राजा. ऐसे मीडिया हाउसेज को बंद हो जाना चाहिए जो प्रगतिशीलता-सरोकार की आड़ में ब्लैकमनी को ह्वाइट करते कराते हैं. अगर एक घंटे का लेक्चर पेलना ही पत्रकारिता है तो रवीश कुमार को इस्तीफा देकर अपना यूट्यूब चैनल खोल लेना चाहिए ताकि वह वहां एनडीटीवी की भी असलियत बता सकें, ताकि उनकी निष्कच्छ आत्मा और सरोकारी समझ उन्हें अपराधग्रोस्त न कर सके. फिलहाल तो ऐड़ा बनकर पेड़ा खाने का एनडीटीवी – रवीश कुमार का अंदाज बढ़िया है जी 🙂

Divakar Singh एक मुद्दे पर गलती की है तो आलोचना होनी चाहिए। बाकी जगह अच्छा काम किया है तो ताली बजनी चाहिए। व्यक्ति या संस्थान विशेष के प्रति आसक्ति ठीक नही है।

Sandeep Verma भाजपा कहाँ बख्श रही है. उसकी विश्वनीयता खत्म करने के लिए भड़ास जैसे साधनों का उपयोग कर तो रही है.

Yashwant Singh सही पकड़े हैं 🙂 वैसे, जिनका चश्मा सिर्फ वाम या दक्षिण का या दलित या सवर्ण का बना हो वो इससे परे कोई विश्लेषण कर भी नहीं सकते…

Swami Nandan सौ आने सही यह रंगा सियार है अपने आप को ऐसा शो करता है जैसे इससे बड़ा ज्ञानी और साफ सुथरा कोई हइए नही है । साबधान यह देश मे एक ऐसी विचाधारा का बीज बो रहा है जो आई एस आई एस से भी ज्यादा खतरनाक है

सुभाष सिंह सुमन ये वही विनीत कुमार हैं क्या भैया जो रवीश की तर्ज पर लप्रेक जैसा कोई किताब लिखे हैं। गजब की गिरोहबाजी है भैया।

Yashwant Singh बिलकुल वही है वही है वही है 🙂 यह पूरा वाला चिंटू है रवीश का.

Prafulla Nayak शब्द शब्द नंगा करते।

Divakar Singh सबसे लोकप्रिय मीडिया न्यूज़ पोर्टल के बारे में न दिखाकर रवीश ने एक बार फिर अपने आप को हिप्पोक्रेट साबित कर दिया।

Prakash Govind क्या उलजलूल चण्डूखाने की उड़ा रहे हैं? लगता है भक्तों से अब फटने लगी है, इसीलिए उन्हें खुश करने को कचरा फैला दिया। सूरज पे मत थूकिए, खुद पे ही गिरेगा..

Yashwant Singh सूरज बाबा, सॉरी रवीश कुमार की जय 🙂 बस खुश

Prakash Govind पत्रकारिता जगत में एक मात्र बन्दा कुछ कायदे की बात करता है,,, वो भी आपको सहन नहीं हो रहा

Yashwant Singh रवीश के पक्ष में भड़ास पर जितना छपा है, उतना कहीं नहीं छपा होगा, पिछले आठ साल में. तो क्या, उनकी बुराई न छपी जाए, अगर बुराई है तो? मुझे भक्त टाइप आत्माएं अच्छी नहीं लगतीं जो या तो अंध समर्थन करती हैं या अंध विरोध. डेमोक्रेटिक होकर जीना चाहिए. उनकी अच्छाई को सलाम है, बुराई को शेम शेम है.

Pawas Sinha #SurajBaba kitne journalist ko jante ho jo Ravish ko certificate de rahe ho thora apne kholi se bahar niklo tb pata chalega duniya mein kyaa chal raha hain..

S.K. Misra जलन की दुर्गंध आ रही है,

Yashwant Singh जलन बहुत ही मानवीय स्वभाव है. अगर है तो इसको प्रकट कर देना चाहिए ताकि इसकी दुर्गंध दूर दूर तक जावे…:)

Pawas Sinha Ravish kumar ke chelo kabhi ravish se ye bataya ki uska bhai bihar se Congress ke ticket se election ladd chuka hain ek aam aadmi ko kaise mila congress se ticket na hiee wo chota sa neta thaa direct MLA ka ticket aurr usii ke bhai red light area ka owner bhii nikal aurr rahi baat NDTV kr owner ki baat to google bata dega wo kitne jada scams mein raha hain aurr kis political family se hain.. Chalo Baccho ab class khatam jaoo NDTV dekho..

Vinay Oswal यशवंत भाई, मैं भी जब से मेरी जानकारी में एनडीटीवी के प्रणव राय और चिदंबरम के बेटे का मामला आया है, रवीश के बारे में बहुत कुछ सोचता रहा हूँ। फिर सोंचता हूँ कि कुछ तो आधार चाहिए जीवनयापन का। पर ये संगती गले नहीं उतरती।

Dhirendra Giri एक समय मै भी उनको बहुत मानता था। यथार्त यही है वामपंथी और संघ विरोधी लोगो ने उसे फेसबुक पर प्रमोट किया है और ज्यादा, like ,कमेंट और अटेंशन चाहने वाले फेसबुकिया लेखकों और विचारकों ने इस हवा में बहकर उसको सर पर बिठा दिया। गांव गलियों और मुहल्लों में वह आज भी कोई कद नही रखता। यह फेसबुक के नशेड़ियों के बिच ही क्रन्तिकारी है।

Sandeep Verma टू जी घोटाले का लाखो करोड़ वापस लाने वाले अपनी बोलती बंद किये है . कम से कम नोटबंदी पर कितना नोट वापस आया यह तो बता देते . मगर यह प्रश्न तो पत्रकारिता से सम्बन्ध रखता ही नहीं है

Yashwant Singh कुछ काम आप भी कर लीजिए क्योंकि पत्रकार हर शख्स होता है. क्या आपको एनडीटीवी का माइक आईडी चाहिए पत्रकार बनने के लिए? संदीप भाई, सवालात्मक आत्मा लिए आप भटकिए, आपका अंदाज मुझे अच्छा लगता है. 🙂

Sandeep Verma मुझे जीटीवी का माईक बनने में ज्यादा रूचि है . उधर की पोल खोलने का ईरादा है

Yashwant Singh यही तो बात है. जी टीवी और एनडीटीवी जैसे चिरकुट संस्थानों से मुक्त रहिए, जो विचारधारा यानि वाम दक्षिण के जरिए खुद तो दबा कर पैसे कमा रहे हैं और हम आप इधर या उधर खड़े होकर लड़ रहे हैं. ये बड़े बड़े घराने असल में अब उगाही और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं. पत्रकारिता बस इसलिए की जा रही है ताकि मीडिया का आवरण बना बचा रहे और वो इसका आनंद मजा लेते रहें.

Deepak Pandey भड़ास जैसा बेबाक कोई मीडिया हाउस नहीं।

Dhruv Rautela दमदार… बेदाग… आपको जरूरत क्या उसके प्राइम टाइम में जिक्र की दादा

Tarun Kumar Tarun खंड-खंड पाखंड का नाम है रवीश… नासमझों और पाखंडियों ने मान रखा है जिसे ईश! प्रणव, बरखा की दलाली जिसे दिखती नहीं है… राडिया का टेप जिसे क्राति गान लगता हो.. अपने भाई की दलाली यौनलीला पर जिसकी कलम खामोश हॊ… लालू जैसे लुटेरे परिवारवादी को जो सामाजिक न्याय का चेहरा मानता है… वगैरह वगैरह.. वह आज क्रांतिकारी पत्रकारिता का चेहरा है! वह विधवा विलापी व मनोरोगी पत्रकारिता के शिखर पुरूष बनने की जुगाड़ू राह पर हैं। एनजीओधर्मी और अभिव्यक्ति ब्रांड फर्जी प्रगतिशीलता उन्हे खूब पसंद कर रही है।

Manish Kumar यशवंत भाई प्राइम टाइम में रवीश जी ने आपका नाम नहीं लिया। भाईसाहब मीडिया की निष्पक्षता आप भी बता दो क्या है, कम से कम रवीश कुमार एक कौने में बैठे कुछ तो काम कर रहे हैं अब आप भी मोदी भक्तों को तरह उन्हें गरियाने लग गए। भाई इस मीडिया में कौन कितना दूध का धुला है ये लगभग सभी जानते हैं। कम से कम आप जैसे लोगों से ऐसी उम्मीद नहीं होती। आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव जी के साथ हम लोगों को संवेदनाएं हैं। अब अडानी अम्बानी की कंपनियों में लाखो लोग काम कर रहे हैं उनमें बहुत से ईमानदार भी होंगे तो क्या वो अडानी अम्बानी के दाग अपने ऊपर ले रहे हैं?

Yashwant Singh गरियाने का राइट केवल भक्तों के पास थोड़ी है है 🙂 रवीश के बारे में दर्जनों या सैकड़ों अच्छे लेख कमेंट भड़ास पर पिछले आठ सालों से हैं. लेकिन एक बार गरियाया तो रवीश भक्तों की सुलग गई? 🙂 थोड़ा डेमोक्रेटिक आप लोग भी हो जाइए और हर चीज को दिल पर मत लगाइए. मजा भी लिया करिए. 😀

Manish Kumar आपकी हर पोस्ट पढता आया हूँ भाई और व्हाट्सएप पर भी आपके मैसेज आते हैं आज तभी तो शॉक्ड हुआ कि आ आप इतने रॉक क्यों हुए जा रहे हैं, और रही बात मज़े की तो मेरा थोड़ा वॉल देख लीजिए वहां सारे मज़े लिखे हैं। 🙂 आपके हर कदम के लिए शुभकामनाएं

Gireesh Pandey ये रविश कुमार वही है ना जिसका भाई बिहार congress का ब्लात्कारी नेता है

Yashwant Singh वही है वही है वही है 🙂

Madan Tiwary वह जलनखोर भी है, नहीं चाहता है मीडिया के क्षेत्र में कोई निष्पक्ष, बेबाक बोलने वाले का नाम हो।

Ashok Anurag प्रणय रॉय ने एक डॉक्यूमेंट्री का मुझसे काम करवा कर मेरी मज़दूरी 25000/₹ नही दी, चोर है और इसकी रेड डॉट कंपनी के सभी स्टाफ जिसने काम लिया लेकिन मेरा पैसा नही दिया सभी कमीने कुत्ते हैं..

Manmohan Shrivastava पत्रकारिता की काली छाया है रविश। दोगला और गद्दार।

इन्हें भी पढ़ें और एनडीटीवी की हकीकत जानें….

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Goibibo Car Service Fail : दो घंटे तक नहीं आई कार, अब दे रहे रिफंड का लॉलीपाप

Yashwant Singh : पिछले कुछ समय में तकनीक ने लोगों का जीवन काफी आसान किया है. ब्ला ब्ला के जरिए कार शेयरिंग, ओयो के जरिए होटल, ओला-उबेर के जरिए रेंट पर कार आदि के विकल्प शुरू हुए. इनके एप्प इंस्टाल करिए स्मार्टफोन में और हो जाइए शुरू. गोइबिबो नामक कंपनी ने जो होटल दिलाने के लिए काम करती है, पिछले दिनों रेंट पर कार की सर्विस शुरू की. मैंने पिछले दिनों कार बुक किया. तय समय से करीब दो घंटे तक कार नहीं आई.

कार के ड्राइवर का पहले तो फोन स्विच आफ / नॉट रीचेबल बताता रहा. बाद में जब उसके मालिक से और फिर ड्राइवर से बात हुई तो पता चला कि कार तो अभी करीब चालीस किलोमीटर दूर है. यानि उसके आने में अभी दो घंटे की देर है. ऐसे में तुरंत दूसरी टैक्सी किया. फिलहाल गोइबिबो वाले रिफंड आदि के लालीपाप दे रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आप जब किसी के कीमती वक्त को इस तरह नष्ट करते हैं तो उसकी भरपाई सिर्फ रिफंड से नहीं हो सकती.

मुझे तो पहली ही कार बुकिंग के बाद समझ में आ गया कि गोइबिबो ने कार सर्विस में गलत पांव डाल दिया है, उनकी यह सेवा तो पूरी तरह फेल है. उन्हें सिर्फ होटल किराए पर उठाकर उससे मिलने वाली दलाली से काम चलाना चाहिए. पढ़िए वो चिट्ठी जो गोइबिबो वालों ने मुझे भेजी है….

Dear Yashwant,

Greetings from GoIbibo.com! This is in reference to your query related to a bad experience with the Car owner. Please accept our sincere apology for your experience with this Car owner, we strongly discourage this sort of a behavior. We feel sad for the inconvenience you had with the car owner today, we have advised the Car owner to not to conduct themselves in the same manner again. We take users feedback very seriously and the points that you had mentioned on your discussion with us have been passed to the department that will act on it.

Being a Car sharing platform that focuses on connecting Car owners with users this is the best we can do. As discussed on the phone call, we have initiated full refund against this booking, which will reflect in your paid account within 5-14 working days. Further, we also request you to rate the car owner on GoCars app and mention your experience, this will enable other users to judge the quality of service offered by car owner.

Please feel free to reply in case of any query. We are grateful for the pleasure of serving you and meeting your travel needs.

Regards,
Sujeet Kumar rai
GoCare Support
24×7 Customer Service Number: 09213025552 / 1-860-2-585858

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : ह्वाट्सएप 9999330099

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माई लॉर्ड ने वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना में तिहाड़ भेजा पर मीडिया मालिकों के लिए शुभ मुहुर्त का इंतजार!

…सहारा का होटल न खरीद पाने वाले चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मान कर आनन-फानन में जेल भेज दिया… यह वरिष्ठ पत्रकार गिड़गिड़ाता रहा लेकिन जज नहीं पसीजे… पर मीडिया मालिक तो खुद एक बार सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित तक नहीं हुए और कोर्ट को चकरघिन्नी की तरह हिलाडुला कर, कोर्ट से समय पर समय लेकर अघोषित रूप से ललकारने में लगे हैं कि जेल भेज सको तो जरा भेज कर दिखाओ….

सवाल है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अवमानना पर अवमानना कर रहे मीडिया मालिकों के सिर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कर रखी है अच्छी खासी कृपा… आखिर इन्हें जेल भेजने के लिए क्यों नहीं निकल पा रहा शुभ मुहुर्त और क्यों नहीं जग पा रहे सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब लोग… एक वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना के मामले में लालची आदि बताते हुए जितनी तेजी से जेल भेजा गया, उतनी तेजी आखिर महा लालची मीडिया मालिकों के प्रकरण में क्यों नहीं दिखती… सवाल तो अब उठेंगे सुप्रीम कोर्ट पर भी क्योंकि पीड़ित मीडियाकर्मियों के सिर से उपर पानी बहने लगा है… 

पहले जानिए वरिष्ठ पत्रकार का प्रकरण जिसे सहारा के न्यूयार्क स्थित होटल को खरीदने के वादे से मुकरने पर जजों ने लानत-मलानत करते हुए आनन-फानन में जेल भेज दिया, उस पत्रकार के लाख गिड़गिड़ाने, कांपने, रोने और दस लाख रुपये तक जुर्माना भरने की अपील के बावजूद…

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‘मीडिया के सरताज’ लिस्ट में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम

फेम इंडिया और एशिया पोस्ट नाम पत्रिकाओं की तरफ से ‘मीडिया के सरताज वर्ष 2017’ के लिए किए गए सर्वे में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम आया है. फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यू मीडिया कैटगरी में एक प्रमुख सरताज के तौर पर यशवंत सिंह को चिन्हित किया गया.

इस संबंध में फेम इंडिया मैग्जीन की वेबसाइट पर एक खबर का प्रकाशन किया गया है, जो नीचे साभार प्रकाशित किया जा रहा है. फिलहाल इस उपलब्धि के लिए सोशल मीडिया पर यशवंत को लोग बधाई दे रहे हैं.

मीडिया को बेबाकी से आइना दिखाते हैं यशवंत सिंह (फेम इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे 2017-मीडिया के सरताज)

Posted by fameindia On April 20, 2017

हिन्दी भाषी राज्यों में जो भी शख्स मीडिया से जुड़ा हो वह कम से कम भड़ास4मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता यशवंत सिंह को जरूर जानता होगा। बेबाक, बेलौस और बेलाग। यशवंत सिंह की ये तीन खूबियां उन्हें औरों से अलग बनाती हैं। उन्हें एक ऐसे निडर पत्रकार के तौर पर जाना जाता है जो किसी युनियन या संगठन के पचड़ों में पड़े बगैर भी देश के हर मीडियाकर्मी के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा है।

मूल रूप से गाजीपुर के यशवंत सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। लखनऊ में दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत की। फिर अमर उजाला से जुड़े। अमर उजाला के लिए बनारस, कानपुर और आगरा में काम किया। इसके बाद दोबारा दैनिक जागरण से जुड़े और मेरठ, कानुपर व दिल्ली में काम किया। जागरण समूह के आई-नेक्स्ट की लॉन्चिंग टीम का भी हिस्सा रहे। उन्होंने देखा कि पत्रकारिता में हर जगह कई बुराइयों ने डेरा जमा लिया है और जिस उद्देशय के लिये पत्रकारिता शुरु की थी वो कहीं है ही नहीं।

जब पत्रकारिता उबाऊ लगने लगी तो कुछ दिन दिल्ली में एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर काम किया। मन में मैली हो रही पत्रकारिता को आइना दिखाने की इच्छा दबी थी, वह नौकरी भी छोड़ दी और मई 2008 में मीडिया की खबरों का पोर्टल भड़ास4मीडिया.कॉम शुरु किया। यह अपनी तरह का पहला पोर्टल था जो हर आम मीडियाकर्मी की समस्या को तरजीह देता था व उनसे जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता था। जल्दी ही यह काफी लोकप्रिय हो गया।

यशवंत सिंह की पहचान उनके बागी तेवरों की वजह से भी है। इसकी वजह से उन्हें कई बार उन मीडिया संस्थानों का निशाना भी बनना पड़ा जो अपने उद्देश्यों से भटके हुए थे। कई बार उनपर मुकदमे भी हुए और उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन बेहद पॉजिटिव सोच रखने वाले यशवंत सिंह ने इस मौके को भी एक अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया और जेल में मौजूद कुव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये एक किताब -‘जानेमन जेल’ लिख डाली। उनकी यह किताब खूब बिकी और प्रशासन ने कई सुधार भी किये।

यशवंत सिंह ने भारतीय पत्रकारों के बीच अपनी पैठ बना रखी है। पत्रकार भले ही दुनिया के लिए लड़ते हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए लड़ने वाला ये अगुवा पत्रकार माने जाते हैं। कई पत्रकार युनियनों और समाजसेवी संगठनों ने इन्हें समय-समय पर सम्मानित भी किया है। इंडियन मीडिया वैल्फेयर एसोसिएशन की ओर से इम्वा अवॉर्ड, ‘इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एण्ड डाक्यूमेटेशन इन सोशल साइन्सेंस’ (आईआरडीएस) अवॉर्ड आदि प्रमुख हैं।

हर मीडियाकर्मी की भलाई और जीवन के हर क्षेत्र में सुधार की सोच रखने वाले यशवंत सिंह फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यु मीडिया के एक प्रमुख सरताज के तौर पर पाये गये हैं।

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