बेगाने की शादी में अब्‍दुला दीवाना बना जागरण समूह

जागरण एक तरफ तो अपने तमाम राज्‍यों के संस्करणों से कर्मचारियों की छंटनी कर रहा है, दूसरी तरफ अपने नए खरीदे गए अखबार नईदुनिया का ६५वां स्थापना दिवस 'जश्न ए मालवा' मनाने की तैयारी मै लगा है, जिसे मनाने का उसे कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता। विश्वास की जिस परंपरा का इन दिनों ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उससे तो जागरण समूह का कोई लेना-देना ही नहीं है। १ से ५ जून तक होने वाले  आयोजन 'जश्न ए मालवा' के कार्यक्रम भी घोषित हो गये हैं, जो जनता को भरमाने से ज्यादा कुछ नहीं है।

इंदौर नईदुनिया के पाठक और लोग इस बात से आश्चर्य कर रहे हैं कि आखिर जागरण प्रबंधन नईदुनिया का स्थापना दिवस क्यों मना रहा है? नईदुनिया के संस्‍थापक/प्रकाशकों में से आज कोई भी जागरण के साथ नहीं है। जागरण ने इस साल १ अप्रैल से नईदुनिया की कमान संभाली थी. जिस ६५ साल की गौरवशाली परंपरा के आयोजन का विज्ञापनों मे जिक्र किया जा रहा है, उससे आज के नईदुनिया के मालिकों का कोई लेना देना नहीं है। जहां तक विनय छजलानी के नाम की बात है तो वो नईदुनिया और जागरण की डील से जुड़ा मामला है और अभी तो विनय छजलानी भी विदेश में हैं। ऐसे में जागरण का नईदुनिया के ६५ साल के स्थापना दिवस को मानना किसी के गले नहीं उतर रहा। जागरण प्रबंधन जिस हंगामे के साथ ये आयोजन कर रहा है, उतना जोश तो कभी नईदुनिया के मूल मालिकों ने भी नहीं दिखाया।

बताते है कि जागरण के हाथों में आने के बाद नईदुनिया के बारे में इंदौर में माहौल ख़राब हो गया है, इसलिए उसे बैलेंस करने के लिए 'जश्न ए मालवा' का आयोजन किया जा रहा है। जागरण प्रबंधन को ये आयोजन करने का हक़ इसलिए भी नहीं है कि न तो नईदुनिया के मूल संस्थापक आज हैं, न उस तरह के लोग। इस समय सिर्फ तीन पुराने लोग नईदुनिया में बचे हैं। इनमे दो रिटायर हो चुके हैं। एक हैं बहादुर सिंह गहलोत, दूसरे सुरेश ताम्रकार हैं। तीसरे पुराने पत्रकार हैं दिलीप ठाकुर। इन तीन लोगों को छोड़ दिया जाये तो नईदुनिया में कोई भी ऐसा नहीं है, जिसे नईदुनिया की परंपरा का पत्रकार कहा जा सकता है।

सच ये भी है कि अप्रैल महीने मे नईदुनिया के प्रसार और विज्ञापन में कमी आई है, शायद यह भी एक कारण होगा कि जागरण प्रबंधन नईदुनियाका आयोजन 'जश्न ए मालवा' मना रहा है। लोगों का यह भी कहना है कि जागरण उधार का सिन्दूर अपने मांग में सजा रहा है, जिसका उसे कोई हक़ नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, उत्‍तराखंड, पंजाब आदि राज्‍यों में कई पत्रकारों को बेरोजगार करने वाले जागरण समूह को इंदौर मै जश्न मनाने का अधिकार नहीं है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

जागरण में बंपर छंटनी (23) : दैनिक जागरण, मेरठ से भी तीन बाहर गए

दैनिक जागरण, मेरठ से भी चार लोगों की छंटनी किए जाने की सूचना है. सभी ने इस्‍तीफा दे दिया है. यहां मैनेजमेंट ने नोएडा के आदेश की कोरमपूर्ति करने की लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए छंटनी लिस्‍ट में उन नामों को भी शामिल कर लिया, जो हाल फिलहाल खुद अखबार छोड़ गए हैं. प्रबंधन ने जिन लोगों से इस्‍तीफे लिए हैं उनमें मुजफ्फरनगर के ब्‍यूरोचीफ बनाकर भेजे गए वरिष्‍ठ पत्रकार नरेश उपाध्‍याय तथा करधना के ब्‍यूरोचीफ राकेश त्‍यागी शामिल हैं. इसके अलावा अशोक त्रिपाठी से भी इस्‍तीफा ले लिया गया है.

नरेश उपाध्‍याय दैनिक जागरण से पिछले बाइस सालों से जुड़े हुए थे. ये लोग जागरण को ब्रांड बनाने वाले टीम में शामिल रहे हैं, परन्‍तु प्रबंधन ने इन लोगों के बारे में एक पल भी नहीं सोचा. राकेश त्‍यागी भी पिछले सात सालों से जागरण से जुड़े हुए थे. जबकि अशोक त्रिपाठी रिटायरमेंट के कगार पर पहुंच गए थे. हालांकि यहां के मालिकान ने पहले ही सरप्‍लस स्‍टाफ ना होने की बात नोएडा को बता दी थी. फिर भी कार्रवाई पूरी करते हुए मैनेजमेंट ने संजय सक्‍सेना एवं पारूल सिंघल जैसों का नाम भी छंटनी लिस्‍ट में शामिल कर लिया जो पहले ही दूसरे अखबारों से जुड़ चुके हैं. 


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जागरण में बंपर छंटनी (22) : गोरखपुर के चार पत्रकारों का दूरदराज तबादला किया गया

दैनिक जागरण, गोरखपुर से खबर है कि छंटनी के शिकार बनाए जाने की लिस्‍ट में शामिल एक वरिष्‍ठ पत्रकार के आत्‍मदाह की चेतावनी से बौखलाए प्रबंधन ने उनके समेत चार लोगों का तबादला दूर दराज के यूनिटों में कर दिया है. प्रबंधन ने इन लोगों की छंटनी की लिस्‍ट तैयार की थी. इनसे इस्‍तीफे की मांग की गई, जिसके बाद जागरण के वरिष्‍ठ सहयोगी ने प्रबंधन को सख्‍त चेतावनी दी थी. मामला फंसते देख प्रबंधन ने त‍बादले की रणनीति अपनाई और चार लोगों को दूसरे यूनिटों में जाने का फरमान सुना दिया.  

जिन लोगों के तबादले किए गए हैं उनमें वरिष्‍ठ पत्रकार एवं सीनियर सब एडिटर योगेश लाल श्रीवास्‍तव तथा सीनियर सब एडिटर वीरेंद्र मिश्र 'दीपक' को जम्‍मू यूनिट भेजा जा रहा है. सीनियर सब एडिटर धर्मेंद्र पाण्‍डेय का तबादला छत्‍तीसगढ़ की राजधारी रायपुर के लिए किया गया है. उन्‍हें नईदुनिया में ज्‍वाइन करने का निर्देश दिए गए हैं. सब एडिटर मनोज त्रिपाठी का तबादला मुजफ्फरपुर के लिए किया गया है. इनमें से किसी ने भी तबादला आर्डर रिसीव नहीं किया है.

बताया जा रहा है कि स्‍टेट हेड रामेश्‍वर पाण्‍डेय ने इन लोगों को मेल से सूचित किया है कि ये लोग तबादले वाले यूनिट में सात दिन के भीतर पहुंचकर संपादक को रिपोर्ट करें. इसमें लिखा गया है कि सभी का तत्‍काल प्रभाव से स्‍थानांतरण किया जा रहा है. उल्‍लेखनीय है कि भड़ास पर आत्‍मदाह वाली खबर प्रकाशित होने के बाद प्रबंधन सीधे कार्रवाई करने की बजाय तबादला नीति अपनाते हुए कार्रवाई को अंजाम देने की कोशिश कर रहा है. इस मेल के बारे में जानकारी मिलते ही चारो लोग कार्यालय से बाहर निकल आए.

जागरण के पत्रकारों में तो प्रबंधन के रवैये को लेकर रोष है ही, अब दूसरे अखबारों के पत्रकार भी जागरण के साथियों के साथ हो रही इस नाइंसाफी से बहुत ही कुपित हैं. अखबार को बनिया की दुकान बना दिया गया है. चारो पत्रकार प्रबंधन की इस हरामखोरी के खिलाफ कानूनी सहारा लेने का उपाय भी कर रहे हैं. जिस तरह का अविश्‍वास का माहौल जागरण के अंदर बना हुआ है कि वो किसी भी स्थिति में ठीक नहीं कहा जा सकता है. आज भले ही जागरण को अपने ब्रांड नेम पर घमंड हो, लेकिन उसको इस जगह पहुंचाने में इन्‍हीं जैसे हजारों पत्रकारों का योगदान रहा है. 'आज' जैसा बड़ा ब्राड भी इन्‍हीं नीतियों को अपनाते हुए रसातल में पहुंच गया. जागरण भी उसी राह पर चल पड़ा दिखता है.


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शराब पीकर हंगामा करने वाले जी न्‍यूज के तीन कर्मियों के विरुद्ध जांच

जी न्‍यूज, बरेली से खबर है कि शराब पीकर हंगामा करने के आरोप में तीन कर्मचारियों के विरुद्ध प्रबंधन जांच करा रहा है. हालांकि यह मामला हंगामा करने से ज्‍यादा अंदरूनी राजनीति का भी बताया जा रहा है. सूत्रों के अनुसार कुछ दिन पहले जी न्‍यूज के इंजीनियर अमरेंद्र, रंजन डे तथा कैमरामैन मनोज पर आरोप लगा कि वे लोग शराब पीकर हंगामा मचा रहे थे. स्‍थानीय ब्‍यूरो ने इसकी जानकारी प्रबंधन को दी. कुछ और लोगों ने भी प्रबंधन से शिकायत की.

मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रबंधन ने जांच बैठा दी है. मामले की जांच चल रही है. फिलहाल इन लोगों को काम करने से रोक दिया गया है. दूसरी तरफ कुछ लोगों का कहना है कि यह हंगामा से ज्‍यादा निपटाने की कोशिश है. इसके पहले भी ऐसी ही राजनीति करते हुए जितेंद्र नामक कैमरामैन का तबादला करवा दिया गया था. फिलहाल मामला प्रबंधन के पाले में हैं. संभावना जताई जा रही है कि अगले दो-तीन दिनों में प्रबंधन इनको कांटीन्‍यू करने या हटाने का फैसला ले सकता है.

प्रमोशन न होने से नाराज प्रमोद पांडये ने इस्‍तीफा दिया

हिंदुस्‍तान, देहरादून से खबर है कि प्रमोद पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. प्रमोद के इस्‍तीफे के बारे में बताया जा रहा है कि वे इंक्रीमेंट और प्रमोशन को लेकर असंतुष्‍ट थे. आज प्रमोशन लिस्‍ट में अपना नाम ना देखकर वो नाराज हो गए तथा प्रबंधन को अपना इस्‍तीफा सौंप दिया. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. प्रमोद से इस मामले में संपर्क करने की कोशिश की गई परन्‍तु सफलता नहीं मिल पाई. हिंदुस्‍तान के कई यूनिटों में प्रमोशन और इंक्रीमेंट को लेकर नाराजगी है. समझा जा रहा है कि आने वाले अगले कुछ दिनों अन्‍य यूनिटों से इस्‍तीफा देने की खबरें सुनने को मिलेंगी. 

कोर्ट ने दैनिक जागरण एवं निशिकांत ठाकुर पर ठोंका 1500 रुपये का जुर्माना

कुकुडडूमा कोर्ट ने दैनिक जागरण के सीजीएम निशिकांत ठाकुर एवं अखबार पर 1500 रुपये का जुर्माना लगाया है. कोर्ट ने यह आदेश एक मामले में पांच सुनवाइयों के बाद भी जवाब दाखिल नहीं करने पर दिया है.  जागरण प्रबंधन को कोर्ट ने चेतावनी भी दी है. इसके बाद से ही निशिकांत ठाकुर और उनके लोगों में दहशत है. मामला साल भर से चल रहा है. जागरण के पुराने कर्मचारी अरुण कुमार राघव ने ही जागरण को कोर्ट में घसीटा है.

जानकारी के अनुसार दैनिक जागरण, दिल्‍ली में काम करने वाले अरुण कुमार राघव से प्रबंधन ने इस्‍तीफा मांग लिया था. राघव की गलती इतनी थी कि उन्‍होंने सीजीएम निशिकांत ठाकुर के साले कविलाश मिश्र के पैसे मांगने की शिकायत प्रबंधन से कर दी थी. प्रबंधन द्वारा इस्‍तीफे की मांग किए जाने के बाद अरुण ने 30 जुलाई 2011 को अपना इस्‍तीफा दे दिया. इसके बाद उन्‍होंने प्रबंधन से अपना रिलीविंग लेटर तथा प्रमोशन लेटर मांगा, परन्‍तु निशिकांत ठाकुर एवं दैनिक जागरण प्रबंधन ने उनको ये कागजात उपलब्‍ध नहीं कराए.

इसके बाद अरुण एक न्‍यूज चैनल में काम करने लगे तो निशिकांत ठाकुर के लोगों ने उक्‍त चैनल प्रबंधन को बता दिया कि इनके पास रिलीविंग लेटर व अन्‍य डाक्‍यूमेंट नहीं है, जिसके बाद इन्‍हें वहां से निकलने को मजबूर होना पड़ा. इसके बाद अरुण ने कोर्ट का सहारा लिया तथा निशिकांत ठाकुर तथा जागरण प्रबंधन को पार्टी बनाया. कोर्ट के माध्‍यम से ही उन्‍होंने अपना रिलीविंग लेटर व प्रमोशन लेटर मांगा. कोर्ट में पहले दो पेशी पर जागरण की तरफ से कोई नहीं आया, जिसके बाद कोर्ट ने सख्‍ती अपनाई तो जागरण प्रबंधन ने एक अधिवक्‍ता को अपना पक्ष रखने के लिए भेजा.

बाद की दो सुनवाइयों में जागरण प्रबंधन का वकील ही मामले को जज के सामने रखा. गुरुवार यानी 31 मई को इस मामले में पांचवीं सुनवाई थी, जागरण प्रबंधन की तरफ ना तो कोई आया और ना ही अरुण की रिलीविंग लेटर और प्रमोशन लेटर उपलब्‍ध कराया. इसका विरोध करते हुए अरुण ने कोर्ट से कहा कि यह तो उचित नहीं है कि मैं पांचों सुनवाइयों के दौरान मौजूद रहा पर उधर से कोई नहीं आया. मैंने ऐसा क्‍या मांग लिया, जो जागरण प्रबंधन नहीं दे पा रहा है. उन्‍होंने जागरण के रवैये पर नाराजगी जताया, जिसके बाद कोर्ट ने निशिकांत ठाकुर एवं जागरण को 15 सौ रुपये का जुर्माना लगाया तथा कोर्ट में जल्‍द से जल्‍द रिलीविंग लेटर और प्रमोशन लेटर सबमिट करने को कहा.

अनिल सिंह की रिपोर्ट.

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : पुलिस ने प्रेस रजिस्‍ट्रार से पूछा – मुंगेर संस्‍करण वैध या अवैध?

मुंगेर। सनसनीखेज 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में चल रहे जांच में उस समय नया मोड़ आ गया जब पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देश पर पुलिस उपाधीक्षक एके पंचालर ने इस आर्थिक अपराध के बड़े मामले में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय, नई दिल्ली को भी जांच के दायरे में शामिल कर लिया है। देश की आजादी के बाद संभवतः यह पहली घटना है जब किसी आर्थिक अपराध के बड़े मामले में प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय को भी जांच के दायरे में शामिल किया गया हो।

उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों ने आज बताया कि पुलिस उपाधीक्षक एके पंचालर ने अनुसंधानकर्ता को लिखित आदेश देकर निम्नांकित बिन्दुओं पर प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली से प्रतिवेदन प्राप्त करने का आदेश जारी किया है।

1- प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली प्रेतिवेदन दें कि किसी भी स्थान से समाचार-पत्र के मुद्रण/प्रकाशन हेतु घोषणा-पत्र समर्पित करने एवं मुद्रण/प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के बीच की क्या-क्या प्रक्रिया है?

2- प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली प्रतिवेदन दें कि दैनिक हिन्दुस्तान के प्रतिनिधियों द्वारा पर्यवेक्षण के क्रम में बताया गया है कि किसी भी नए संस्करण के प्रकाशन हेतु घोषणा-पत्र समर्पित करना, उसका प्रमाणीकरण कराना एवं प्रेस रजिस्ट्रार की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक नहीं है। फलस्वरूप, मुंगेर संस्करण का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इस संबंध में प्रेस रजिस्‍ट्रार स्पष्ट मंतव्य दें कि क्या उक्त कथन सही है या नहीं ?साथ ही किसी भी नए संस्करण के प्रकाशन हेतु निर्धारित प्रावधानों की सम्पूर्ण विवरणी भी प्रेतिवेदित करें।

3 – वादी मंटू शर्मा के बयान के अनुसार भागलपुर एवं मुजफ्फरपुर में दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण का ही मुद्रण केन्द्र होने की स्थिति में पटना से प्रकाशित समाचार ही भागलपुर और मुजफ्फरपुर से भी प्रकाशित करने का प्रावधान है। भागलपुर और मुजफ्फरपुर में पटना से अलग स्थानीय समाचार प्रकाशित नहीं किय जा सकते हैं, जबकि इन दोनों स्थानों से मुद्रित होने वाले दैनिक हिन्दुस्तान में पटना से भिन्न स्थानीय समाचारों का मुद्रण किया गया है। साथ ही स्थानीय विज्ञापन भी प्राप्त किया है। ऐसा करने से पीआरबी एक्ट में निहित प्रावधानों का उल्लंघन हुआ अथवा नहीं है? इस संबंध में प्रेस रजिस्ट्रार जानकारी दें।

उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों ने बताया कि ज्यों-ज्यों हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले की जांच बढ़ती जा रही है, घोटाले के नए-नए पहलू और घोटाले के नए-नए संरक्षणकर्ताओं के चेहरे भी सामने आ रहे हैं। स्मरणीय है कि पर्यवेक्षण रिपोर्ट में सूचक मंटू शर्मा के द्वारा मुंगेर न्यायालय मे दर्ज परिवाद-पत्र में लगाए गए सभी अभियोग को सभी नामजद अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया सत्य घोषित कर दिया है। पुलिस ने पर्यवेक्षण रिपोर्ट में नामजद अभियुक्तों क्रमशः मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष एवं ऐडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भरतिया, मुद्रक और प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और स्थानीय संपादक बिनोद बंधु के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धारा 8 (बी), 14 और 15 के तहत लगाए गए सभी अभियोग को प्रथम दृष्टया सत्य पाया है। अब पुलिस इन सभी नामजद अभियुक्तों के विरूद्ध न्यायालय में मुकदमा चलाएगी। इस मुकदमे में अभियुक्त बच नहीं सके, पुलिस ने सूचक सहित चार गवाहों की गवाही भी मुंगेर न्यायालय में अभियोग के समर्थन में धारा 164 के अधीन करा चुकी है। अब इस सनसनीखेज आर्थिक अपराध से जुड़े कांड में पुलिस को न्यायालय में अभियोग -पत्र समर्पित करना है।

इस बीच, मंटू शर्मा ने सीबीआई के आर्थिक कोषांग के प्रभारी से दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और देश के अन्य दैनिक अखबारों के विज्ञापन फर्जीवाड़ा की जांच राष्‍ट्रीय स्तर पर भी शुरू करने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रेस की आजादी के नाम पर देश के मीडिया कारपोरेट केवल फर्जीवाड़ा और देश के लोकतंत्र की जड़ को कमजोर करने में दशकों से जुटे हैं।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाईल नं.- 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

साहित्‍य एवं पत्रकारिता समाज के दर्पण : पुण्‍य प्रसून बाजपेयी

हरिद्वार। हरिद्वार की जानी-मानी संस्था प्रेस क्लब के आचार्य किशोरी दास वाजपेयी सभागार में हिन्दी पत्राकारिता दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान मुख्य अतिथि के रूप में जाने माने लेखक एवं पत्राकार पुण्य प्रसुन वाजपेयी उपस्थित हुए। इस अवसर पर अपने संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसुन वाजपेयी ने कहा कि पत्रकारिता एवं साहित्य दोनों ही समाज के आईने हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ने एक दूसरे का साथ क्या छोड़ा दोनों का पैनापन ही खत्म हो गया।

श्री वाजपेयी ने इस दौरान मुक्तिबोध आदि के उदाहरण देकर पत्राकारिता की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उन्होने पत्रकारों का आह्वान किया कि वे अपनी पूरी क्षमता से कार्य करें। हमारे देश का मकसद बाजार नहीं है। उन्होंने मीडिया के उद्योग की और अग्रसर होने पर यह बात कही। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हिंदी विद्वान एवं साहित्यकार डॉ. विष्णुदत्त राकेश ने कहा कि हिन्दी पत्राकारिता को दिशा देने वाले प्रथम पत्रा उदन्त मार्तण्ड के बारे में जानकारी दी तथा बताया कि किस प्रकार अंग्रेजी शासनकाल में पण्डित युगल किशोर शुक्ल ने इस अखबार का संपादन किया। वर्तमान पत्रकारिता पर प्रहार करते हुए डॉ. राकेश ने कहा कि एक समय था जब पत्रकार अपने उसूलों से समझौता नहीं करते थे। उन्होंने मालवीय जी का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार अखबार के मालिक से केवल तय नियमों का अनुपालन न करने का कारण उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।

डॉ. राकेश ने कहा कि आज की पत्राकारिता के समक्ष नैतिकता एवं आर्थिक शुचिता की महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे में अपने को उक्त के आधर पर स्थापित करना जरूरी है। कार्यक्रम का संचालन कर रहे वरिष्ठ पत्राकार प्रोपफेसर कमल कांत बुधकर ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य दोनों ही को समाज की नब्ज टटोलनी होती है। वहीं वर्तमान समय में साहित्य एवं पत्राकारिता दोनों ही इस कार्य से दूर हैं ऐसे में स्तर में गिरावट लाजिमी है। इस अवसर पर पुण्य प्रसुन वाजपेयी एवं डॉ. विष्णु दत्त राकेश का सम्मान किया गया। डॉ. राकेश ने प्रेस क्लब के पदाधिकारियों से हरिद्वार की पत्रकारिता के इतिहास को पुस्तक के रूप में संकलित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर प्रिंट, इलेक्टानिक मीडिया से जुड़े पत्रकार उपस्थित रहे।

जागरण में बंपर छंटनी (21) : अलीगढ़ में भी चार लोगों को बाहर करने की कोशिश

दैनिक जागरण में छंटनी की तलवार अब अलीगढ़ यूनिट पर भी चली है. यहां से भी चार लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए हैं. हालांकि अभी किसी ने इस्‍तीफा नहीं दिया है लेकिन प्रबंधन ने लगातार दबाव बनाया हुआ है. सबसे बुरी स्थिति तो यह है कि एक ऐसे वरिष्‍ठ पत्रकार से भी इस्‍तीफा मांग लिया गया है, जो लम्‍बे समय से दैनिक जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे हैं तथा अगले एकाध सालों में रिटायर भी होने वाले हैं.

जिन लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए हैं उनमें एक वरिष्‍ठ पत्रकार शामिल हैं. वे दैनिक जागरण को अलीगढ़ में तब से सेवा दे रहे हैं, जब यहां ब्‍यूरो हुआ करता था तथा अखबार आगरा से प्रकाशित होकर यहां पहुंचता था. बीच में उनका तबादला आगरा के लिए कर दिया गया था. एक साल पहले ही वो आगरा से अलीगढ़ आए थे. अतरौली कार्यालय के इंचार्ज से भी प्रबंधन ने इस्‍तीफा मांग लिया है. इसके अलावा भी दो एडिटोरियल सहयोगियों से इस्‍तीफा मांगा गया है. इन लोगों का नाम इसलिए नहीं प्रकाशित किया जा रहा है ताकि इन लोगों को आगे इसके चलते किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े. संभावना जताई जा रही है कि कुछ और लोगों से भी जल्‍द ही इस्‍तीफे मांगे जा सकते हैं.  


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कानूनी जंग जीते राजेश कपिल, कोर्ट के आदेश पर भास्‍कर ने दोबारा ज्‍वाइन कराया

जालंधर : आज से करीब 2 साल पहले भास्कर प्रबंधन की आंतरिक राजनीति का शिकार बने जालंधर के सीनियर रिपोर्टर राजेश कपिल कानूनी जंग जीत गए हैं। कोर्ट के आदेश पर राजेश कपिल को प्रबंधन ने पुन: ज्वाइन करवा लिया गया है, वहीं राजेश कपिल पर दवाब बनाने के उद्देश्य से भास्कर प्रबंधन की ओर से दर्ज करवाई गई झूठी एफआईआर को कोर्ट पहले ही खारिज कर चुकी है। कपिल की कानूनी वापसी से जहां भास्कर प्रबंधन के साजिशकर्ता सकते में हैं, वहीं कर्मचारी वर्ग में खासा उत्साह है क्योंकि सभी को अपने सेवा से जुड़े अधिकारों की पहचान हो गई है।

वर्तमान में राजेश कपिल की ओर से भास्कर प्रबंधन के खिलाफ दायर दर्जन भर सिविल व क्रिमिनल मामले कोर्ट में लंबित हैं, जिसमें एम.डी से लेकर ब्यूरो चीफ तक कानूनी लपेटे में हैं। इसके अलावा झूठी एफआईआर दर्ज करवाने के खिलाफ आईपीसी की धारा 182 सहित 499, 500, 211 व 120 बी की कार्रवाई करने का विकल्प भी कपिल के पास खुला है। गौरतलब है कि मई 2010 में भास्कर प्रबंधन ने एकाएक राजेश कपिल की सेवा समाप्त कर दी थी, जिसके विरोध में कपिल ने प्रबंधन को मांग पत्र व मानहानि का नोटिस जारी कर दिया था। मानहानि का नोटिस व मांग पत्र मिलने पर पहले ही जोश में होश खोकर काम कर रहे प्रबंधन ने अपने ही अखबार में कपिल की सेवा समाप्ति का नोटिस प्रकाशित कर दिया और पुलिस में एक झूठी शिकायत कर दी। पुलिस ने जांच के दौरान कपिल को क्लीनचिट दे दी और अखबार में नोटिस प्रकाशित करने के बाद प्रबंधन ने वकील की सलाह ली और गैर-कानूनी ढंग से जारी सेवा समाप्ति का आदेश वापस लेते हुए कपिल को काम पर वापस लौटने का आदेश दिया था।

उधर, कपिल तब तक उठे कदमों से काफी हतप्रभ हो चुके थे और कानूनी जंग लडऩे का मन बना चुके थे। चूंकि वह खुद पिछले 10 साल से कोर्ट की रिपोर्टिंग करते आ रहे थे और हर दावपेंच से भली-भांति परिचित थे इसलिए भास्कर प्रबंधन के साजिशकर्ताओं का मुंह तोड जवाब देने व एम.डी. तक आवाज पहुंचाने के लिए कपिल ने न केवल मानहानि का दावा किया बल्कि कोर्ट में दर्जन भर सिविल व क्रिमिनल केस दायर कर दिए। इससे घबराए साजिशकर्ताओं ने दवाब बनाने के लिए कपिल पर पंजाब सरकार का सहारा लेकर धारा 452 व 506 के तहत झूठा मामला दर्ज करवा दिया, जिसे कोर्ट ने सुनवाई के पहले दौर पर ही खारिज कर दिया। अपनी कानूनी जंग के दौरान राजेश कपिल ने सूचना अधिकार कानून का सहारा लेकर साजिशकर्ताओं के खिलाफ ठोस सबूत जुटाए हैं जिस पर जल्द ही कोर्ट एफआईआर दर्ज करवाने जा रही है।

हिंदुस्‍तान, बरेली में आधा दर्जन लोगों को मिला प्रमोशन, बिजेंद्र डीएनई बने

हिंदुस्‍तान बरेली में भी संपादक ने लोगों को प्रमोशन लेटर बांट दिया है. जिन लोगों को प्रमोट किया गया है, उनमें सिटी इंचार्ज पंकज मिश्रा को सीनियर सब एडिटर से चीफ सब एडिटर, बृजेंद्र निर्मल को चीफ सब एडिटर से डीएनई, तौकीर हैदर को रिपोर्टर से सीनियर रिपोर्टर, पीयूष मिश्रा को सीनियर रिपोर्टर से चीफ रिपोर्टर, सुनील मिश्रा को सीनियर रिपोर्टर से चीफ सब एडिटर तथा बरेली से रामपुर भेजे गए संतोष सिंह को सीनियर रिपोर्टर से चीफ रिपोर्टर बना दिया गया है.

प्रमोशन के साथ लगभग सभी लोगों को इंक्रीमेंट भी दिया गया है. परन्‍तु यह इंक्रीमेंट अन्‍य यूनिटों की तरह बहुत ही कम है. सूत्रों का कहना है कि कर्मचारियों को सात सौ रुपये से लेकर पंद्रह सौ रुपये तक का इंक्रीमेंट दिया गया है. इससे कर्मचारियों में काफी नाराजगी है. कई और लोग लाइन में थे परन्‍तु उनको इस बार प्रमोशन नहीं मिल पाया है. संभावना जताई जा रही है कि कुछ नाराज लोग दूसरे अखबारों का भी रुख कर सकते हैं.

जागरण में बंपर छंटनी (20) : बरेली में तीन और लोगों से मांगे गए इस्‍तीफे

दैनिक जागरण, बरेली से खबर है कि पांच संपादकीय सहयोगियों से इस्‍तीफा मांगे जाने के प्रबंधन ने तीन अन्‍य से भी इस्‍तीफा मांगा है. इनमें एक विज्ञापन विभाग, एक सर्कुलेशन विभाग तथा एक पेजीनेटर शामिल है. लगातार छंटनी का क्रम जारी रहने से यहां काम करने वाले कर्मचारी नाराज तो हैं साथ ही उनके भीतर असंतोष भी फैल रहा है. वे काम करने से ज्‍यादा यूनिट में चल रही उठापटक में दिलचस्‍पी ले रहे हैं. हालांकि इन नौ लोगों में से अभी तक किसी ने इस्‍तीफा नहीं दिया है बल्कि प्रबंधन ने इनके कार्यालय आने पर रोक लगा दिया है.

दूसरी तरफ अब जागरण प्रबंधन को कानूनी तरीके से सबक सिखाने की तैयारी की जा रही है. कुछ पत्रकार कोर्ट जाने की भी तैयारी कर रहे हैं. जागरण के खिलाफ लड़ाई का ऐलान रुहेलखंड मीडिया वर्कर एसोसिएशन ने कर दिया है. मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जागरण प्रबंधन के हस्‍ताक्षर अभियान के खिलाफ लेबर कमिश्‍नर से शिकायत करने वाला रुहेलखंड मीडिया वर्कल एसोसिएशन ने फिर लेबर कमिश्‍नर से शिकायत की है कि प्रबंधन उनके सदस्‍यों को परेशान कर रहा है.

इस मामले में आज जागरण प्रबंधन को लेबर कोर्ट में भी जाना था, परन्‍तु सूचना दिए जाने तक जागरण का कोई कर्मचारी अपना पक्ष रखने नहीं पहुंचा था. रुहेलखंड मीडिया वर्कर एसोसिएशन के अध्‍यक्ष ने आर्टिकल फोर के तहत भी शिकायत दर्ज कराई है कि उनके संगठन के सदस्‍यों को जागरण प्रताडि़त कर रहा है. खबर दिए जाने तक एसोसिएशन के अध्‍यक्ष सुरेंद्र शर्मा लेबर कमिश्‍नर के कार्यालय में ही जागरण के लोगों के आने का इंतजार कर रह थे. 


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हिंदुस्‍तान के आगरा, अलीगढ़ और देहरादून में सत्रह लोगों का प्रमोशन

हिंदुस्‍तान के यूनिटों में इक्रीमेंट और प्रमोशन लेटर बंटना शुरू हो गया है. कल लखनऊ, बनारस और इलाहाबाद में प्रमोशन पाने वालों को लेटर कल ही दे दिया गया था, तो आज ज्‍यादातर यूनिटों में लेटर बांटे जा रहे हैं. आगरा, अलीगढ़ और देहरादून में सत्रह लोगों के प्रमोशन होने की सूचना है. आगरा में नौ लोगों को प्रमोशन दिया गया है. अलीगढ़ में चार लोग तरक्‍की पाने में सफल रहे वहीं देहरादून में भी चार लोग प्रमोट किए गए हैं. हालांकि इंक्रीमेंट को लेकर कर्मचारियों में नाराजगी है. 

आगरा में राजकुमार शर्मा चीफ सब से स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट, अरुण कुमार त्रिपाठी सीनियर सब से चीफ सब, संदीप जैन सीनियर सब से चीफ सब, नितेन रघुवंशी सीनियर रिपोर्टर से प्रिंसिपल करेस्‍पांडेंट, अखिलेश तिवारी सीनियर रिपोर्टर से प्रिंसिपल करेस्‍पांडेंट, देवेंद्र सिंह सब एडिटर से सीनियर सब एडिटर, नासिर हुसैन रिपोर्टर से सीनियर रिपोर्टर, अमित पाठक रिपोर्टर से सीनियर रिपोर्टर तथा विष्‍णु सिंह सब एडिटर से सीनियर सब एडिटर बना दिए गए हैं.

अलीगढ़ में चार लोगों के प्रमोशन किए जाने की सूचना है. अजय कश्‍यप को चीफ रिपोर्टर से डिप्‍टी न्‍यूज एडिटर, सिटी इंचार्ज सीपी को चीफ रिपोर्टर, हाथरस के प्रभारी अंकुर पंडित को रिपोर्टर से सीनियर रिपोर्टर तथा सीनियर एक्‍जीक्‍यूटिव नवीन शर्मा को असिस्‍टेंट मैनेजर बना दिया गया है. सीपी सिंह एवं अजय कश्‍यप अखबार की लांचिंग टीम के सदस्‍य रहे हैं. सीपी बरेली में भी अखबार के चीफ क्राइम रिपोर्टर थे. हालांकि यहां इंक्रीमेंट को लेकर लोगों में नाराजगी है. बहुत कम इंक्रीमेंट हुआ है. हालांकि सारे यूनिटों में यही हाल है.

देहरादून में अविकल थपलियाल को डिप्‍टी ब्‍यूरो चीफ से ब्‍यूरोचीफ, दिनेश जोशी को सीनियर सब एडिटर से चीफ सब एडिटर, राजेश पाण्‍डये को भी सीनियर सब एडिटर से चीफ सब एडिटर तथा ओपी बैंजवाल को भी सीनियर सब एडिटर से चीफ सब एडिटर बना दिया गया है. हालांकि प्रमोशन पाने वाले तो सभी यूनिटों में खुश हैं लेकिन जिन्‍हें प्रमोशन नहीं मिला है. उनमें नाराजगी है. साथ ही इंक्रीमेंट को लेकर भी नाराजगी है. देहरादून से खबर है कि इंक्रीमेंट सभी को दिया गया है, परन्‍तु वो इतना कम है कि लोग संतुष्‍ट नहीं है. ऐसा ही हाल अलीगढ़ और आगरा में भी है. 

अमिताभ एवं सोनी टीवी को कोर्ट ने दिया नोटिस

उत्तर प्रदेश के झांसी जिले की एक अदालत ने एक निजी टेलीविजन चैनल सोनी के कार्यक्रम में इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान शरीफ को रचित कहे जाने के मामले में अभिनेता अमिताभ बच्चन तथा चैनल प्रबंधक को नोटिस जारी किया है। आधिकारिक सूत्रों ने बुधवार को यहां बताया कि खुशीपुरा क्षेत्र के रहने वाले मुदस्सिर उल्ला खां नामक व्यक्ति ने जिला जज की अदालत में एक याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि अमिताभ ने पिछले साल एक निजी चैनल सोनी के कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में एक प्रश्न के दौरान कुरान शरीफ को ‘रचित’ बताया था जबकि अल्लाह के वचनों का यह दस्तावेज आसमान से अवतरित हुआ था।

खां का कहना है कि अमिताभ की इस टिप्पणी से उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। इस मामले की सुनवाई करते हुए जिला जज ने मंगलवार को अमिताभ तथा चैनल के प्रबंधक को नोटिस जारी कर 24 जून को अपना पक्ष रखने को कहा है। गौरतलब है कि खां ने इससे पहले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने यह याचिका दायर की थी जिसे खारिज कर दिया गया था। (एजेंसी)

जागरण में बंपर छंटनी (19) : अपनों को बचाने के लिए छंटनी में भी घालमेल

हिसार : भले ही दैनिक जागरण देशभर में अपने आप को नंबर वन कहने व विश्वसनीयता का परिचय देने के लिए ढिढ़ोरा पीटता हो। लेकिन यहां सच्‍चाई कुछ और ही बंया कर रही है। अगर आप हिसार यूनिट में हुई कर्मियों की छंटनी लिस्ट पर नजर डाले तो जागरण की सारी विश्वसनीयता का पता लग जाएगा। डेस्क सूत्र बता रहे हैं कि मैनजमेंट ने जो छंटनी लिस्ट मांगी थी उसमें अजय सैनी को शिकार बना लिया गया।

इसी तरह सिरसा के चीफ रिपोर्टर धर्मेंद्र यादव, फतेहाबाद के चीफ रिपोर्टर व हिसार के चीफ रिपोर्टर मणिकांत मयंक से ज्‍यादा कई हजार आगे वेतन पाने वाले मिडल पास सिटी कार्यालय के फोटोग्राफर गुलशन बजाज की जगह मात्र 8 हजार रुपये पाने वाले बीए पास गेरा को निशाना बनाया गया। बजाज की प्रतिमाह आय लगभग 19 हजार रुपये है। ऐसे में उक्त चीफ रिपोर्टर गुलशन बजाज की सैलरी अधिक होने के कारण उससे जलते हैं।

अगर कंपनी अपने ही नियमों पर नजर डालती तो 12 साल से एक ही जगह पर कार्यरत बजाज का तबादला होना सुनिश्विचत था। लेकिन बजाज के सिर पर जीएम का हाथ होने के कारण उसे राजनीति के सहारे बचा लिया गया। बताया तो यह भी जाता है कि थोड़े दिन पहले ही बजाज की 'नौलखा कूड़ादान' फोटो को लेकर समाचार संपादक सुनील कुमार झा व चीफ रिपोर्टर मणिकांत मयंक व डेस्क इंचार्ज कुंदन वशिष्ठ की तीन दिन की सैलरी काटने के आदेश मिले थे, लेकिन तीनों ने मैनेजमेंट को माफी नाम लिख कर भेजा था। तभी यह मामला शांत हुआ।


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अब मोबाइल पर फ्री में देख सकेंगे ईटीवी के 12 चैनल

जेंगा टीवी एक एप्प जो मोबाइल वीडियो और टीवी चैनलों को 2जी तथा 3जी नेटवर्क पर भेजता है, अब ई टीवी के सभी 12 चैनल मुफ्त में पेश करेगा। जेंगा टीवी ने दावा किया है कि उसके पास 12 मिनट औसत व्युअरशिप की दर से प्रतिमाह 55 मिलियन विडियो व्युज हैं। जेंगा टीवी के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर शबीर मोमिन ने कहा यह हमारे लिए एक गर्व का क्षण है क्योंकि ईटीवी समूह के 12 चैनलों को जोड़ने से हमारी पेशकश अब लगभग 100 चैनलों की हो गई हैं।

ईटीवी समूह के 12 चैनल हमें अपने दर्शकों तथा उनके लिए जो अपनी मातृभाषा से जुड़े चैनलों से चिपके रहते है, को क्षेत्रीय चैनल पेश करने का अवसर दे रहे हैं। भविष्य में हमारा मुख्य बिंदु अपने प्लेटफॉर्म में और अधिक क्षेत्रीय चैनलों को जोड़ना रहेगा। ईटीवी नेटवर्क की 12 क्षेत्रीय चैनल की पेशकश में ईटीवी तेलगु, ईटीवी2, ईटीवी बांग्ला, ईटीवी मराठी, ईटीवी कन्नड़, ईटीवी उड़िया, ईटीवी गुजराती, ईटीवी उर्दू, ईटीवी उत्तर प्रदेश, ईटीवी राजस्थान, ईटीवी बिहार, और ईटीवी मध्य प्रदेश शामिल है।

न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड के संपादक कल्‍सन गिरफ्तार

लंदन : ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पूर्व मीडिया सलाहकार और न्यूज ऑफ द व‌र्ल्ड अखबार के संपादक रह चुके एंडी कल्सन बुधवार को गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर फोन हैकिंग मामले में झूठी गवाही देने का आरोप है। कल्सन ने अदालत में गवाही दी थी कि न्यूज ऑफ द व‌र्ल्ड में संपादक के तौर पर कार्य करते हुए उन्हें फोन हैकिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। कानूनी विशेषज्ञों की राय में झूठी के आरोप सिद्ध होने पर कल्सन को उम्रकैद भी हो सकती है। उनकी गिरफ्तारी से ब्रिटिश प्रधानमंत्री कैमरन एक बार फिर मुसीबत में घिरते दिखाई दे रहे हैं।

कैमरन ने प्रधानमंत्री पद ग्रहण करने के 24 घंटे के भीतर एंडी कल्सन को मीडिया सलाहकार नियुक्त किया था। कल्सन को सलाहकार बनाने से पहले कैमरन को आगाह किया गया था, लेकिन उस वक्त न्यूज कॉर्प बहुत बड़ी ताकत था। कैमरन ही नहीं, ब्रिटेन का कोई प्रधानमंत्री कभी रूपर्ट मर्डोक की किसी बात को टाल नहीं पाया। हालांकि, फोन हैकिंग विवाद सामने आने के बाद कल्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। देखते ही देखते ब्रिटेन में मीडिया के व्यवहार पर व्यापक बहस शुरू हो गई। न्यूज कॉर्प के मालिक रूपर्ट मर्डोक ने विवाद सामने आते ही न्यूज ऑफ द व‌र्ल्ड अखबार बंद करने की घोषणा कर दी। मर्डोक के इस कदम से उनकी परेशानी तो फिर भी कुछ कम हो गई, लेकिन कैमरन सरकार की मुसीबतें कम होने का नाम ले रही हैं।

मर्डोक की कंपनी के साथ कैमरन और उनके मंत्रियों के करीबी रिश्तों के साक्ष्य लगातार सामने आ रहे हैं। इससे उनकी कंजरवेटिव पार्टी की छवि लगातार बिगड़ रही है। पिछले दिनों न्यूज कॉर्प की शीर्ष अधिकारी रेबेका ब्रुक्स ने हैकिंग मामले की जांच कर रही लेविसन समिति के समक्ष गवाही देकर कहा था कि जब वह गिरफ्तार हुई थीं, तब कैमरन ने उन्हें फोन करके सब ठीक होने का भरोसा दिलाया था। दो दिन पहले ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने भी रूपर्ट मर्डोक के साथ संबंधों को स्वीकार किया था। (एजेंसी)

आपत्तिजनक सामग्री नहीं हटाने पर संपादक को जेल

बैंकाक : थाइलैंड में एक वेबसाइट की संपादक को आठ महीने की सजा सुनाई गई है। उन्हें यह सजा देश की राजशाही के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों को वेबसाइट से जल्द न हटाने के मामले में दी गई है। चिरानुच प्रेमछेपोर्न के अपराध को कंप्यूटर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। मीडिया रिपोर्टो के मुताबिक उनके मामले को देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट में स्‍वीडन प्रत्‍यर्पण के खिलाफ मुकदमा हारे अंसाजे

लंदन : अमेरिकी दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दुनियाभर में तहलका मचाने वाली स्वीडिश वेबसाइट विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्वीडन प्रत्यर्पित करने की मंजूरी दे दी। शीर्ष अदालत के प्रेसिडेंट निकोलस फिलिप्स ने कहा, असांजे के प्रत्यर्पण के विरुद्ध अपील खारिज की जाती है। जजों ने 5-2 के बहुमत से यह फैसला सुनाया। असांजे को फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए 14 दिन का समय दिया गया है। इसके मुताबिक 13 जून तक असांजे का प्रत्यर्पण नहीं होगा।

दूसरी ओर असांजे की वकील डिना रोज ने कहा, सुप्रीम कोर्ट में जिरह के दौरान बेहद महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस ही नहीं हो पाई। कोर्ट में जिस प्रकार से इस मामले की सुनवाई हुई उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं। खबर है कि डिना रोज इसी बात को आधार बनाकर फैसले के खिलाफ अपील करने की तैयारी में हैं। यदि वह ऐसा करती हैं तो ब्रिटेन के इतिहास में यह अपनी तरह का पहला मामला होगा। 40 वर्षीय असांजे पर स्वीडन में दो महिलाओं ने दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। स्वीडन के अधिकारी इस मामले में उन पर मुकदमा चलाना चाहते हैं। ऑस्ट्रेलिया में जन्मे असांजे ने इन आरोपों का खंडन किया है।

उनका कहना है कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं। असांजे को वर्ष 2010 में स्वीडन पुलिस के वारंट पर ब्रिटेन में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें सशर्त जमानत मिल गई थी। उनके वकीलों ने कोर्ट के समक्ष कहा कि असांजे के खिलाफ यूरोपीय देशों में गिरफ्तारी के लिए जारी किया गया वारंट वैध नहीं है। वैसे, असांजे के पास फ्रांस के स्ट्रॉसबर्ग स्थित यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में अपील करने का विकल्प अभी भी शेष है। बुधवार को असांजे कोर्ट में मौजूद नहीं थे। उनकी वकील ने बताया कि वह जाम में फंस गए थे। ब्रिटेन में नजरबंद असांजे के प्रत्यर्पण पर देश की एक निचली अदालत ने फरवरी, 2011 में मुहर लगा दी थी। पिछले साल विकिलीक्स ने इराक युद्ध और अफगानिस्तान युद्ध से जुड़े गोपनीय अमेरिकी दस्तावेज सार्वजनिक करके सनसनी मचा दी थी। असांजे को डर है कि स्वीडन जाने पर उन्हें अमेरिका को सौंप दिया जाएगा, जहां उन पर विकिलीक्स से जुड़े हुए दूसरे आरोप लगाए गए हैं, जिनके लिए उन्हें फांसी हो सकती है। (एजेंसी)

एसएसपी आशुतोष ने धर्मवीर का पैर छूकर कहा : माफ कर दीजिए

: गोरखपुर में अमर उजाला के पत्रकार की सरेआम पिटाई का मामला : स्‍थानीय संपादक ने कहा, एसएसपी इस मसले पर आपस में बात करें : पांव छूकर माफी मांगना और सार्वजनिक पिटाई अलग-अलग बातें हैं : गोरखपुर : पत्रकार की सरेआम पिटाई करने के भड़के विवाद को सुलझाने की कवायद के तहत गोरखपुर के एसएसपी आशुतोष ने आखिर गिरगिट की तरह रंग बदल लिया। अमर उजाला के स्‍थानीय संपादक के चैम्‍बर में आशुतोष पहुंचा और धर्मवीर सिंह के पैर छूकर उनसे सॉरी बोल दिया। लेकिन धर्मवीर इस मसले पर अब झुकने के मूड नहीं है।

बता दें कि अमर उजाला के युवा पत्रकार धर्मवीर सिंह को गोरखपुर के एसएसपी आशुतोष ने उस समय बुरी तरह डंडा-लात से पीट कर दिया था, जब जाम हटाने की पुलिस कार्रवाई के तहत नागरिकों की पिटाई शुरू हो गयी थी। जब पुलिसिया तौर-तरीके पर धर्मवीर सिंह ने ऐतराज किया तो आशुतोष ने कार से उतर कर उनकी भी पिटाई कर दी थी। भद्दी गालियां देते हुए आशुतोष ने सरेआम धर्मवीर को सड़क पर पटका और घसीट कर कार से रौंद डालने की धमकी दी थी। इतना ही नहीं, आशुतोष का पुलिसिया तांडव इतने से भी नहीं शांत नहीं हुआ, उसने धर्मवीर के मुंह में डंडा डालते हुए जान मार देने की धमकी तक दी।         

बताते हैं कि एक स्‍थानीय डिग्री कालेज में छात्रसंघ महामंत्री रहे धर्मवीर मेधावी छात्र रहे हैं। राष्‍ट्रीय सेवा योजन के तहत वे अपने सर्किल के प्रमुख के तौर पर समाजसेवा के लिए खासे मशहूर रहे हैं। धर्मवीर सिंह की सेवाओं को समाजसेवा को कालेज और समाज ने ही नहीं, बल्कि देश ने भी प्रशंसित किया है। धर्मवीर सिंह को उनकी सेवाओं के सराहते हुए राष्‍ट्रपति ने पदक देते हुए सम्‍मानित किया है। छात्र नेता की जुझारू छवि रखने वाले एक जांबाज पत्रकार की तौर पर पहचाने जाते हैं। लेकिन गोरखपुर के एसएसपी ने विगत दिनों धर्मवीर सिंह के साथ जो सुलूक किया, उससे पूरा छात्र समुदाय और पत्रकार ही नहीं, शहर के नागरिक भी स्‍तब्‍ध रह गये हैं। घटना के बाद से ही आशुतोष की इस करतूत के खिलाफ शहर का गुस्‍सा भड़क उठा। मामला गरम और भड़क कर देखा आशुतोष ने अपने पैंतरे बदल दिया और गिरगिट की तरह अपना रंग बदलते हुए डैमेज-कंट्रोल की कवायद में जुट गया।        

बताते हैं कि अगले ही दिन आशुतोष ने अमर उजाला के दफ्तर संपर्क किया और उसके बाद सीधे स्‍थानीय संपादक के चैंबर पहुंचा। बताते हैं कि आशुतोष ने कहा कि इस मसले को खत्‍म कर दिया जाए, लेकिन स्‍थानीय संपादक ने इस मसले पर हस्‍तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। स्‍थानीय संपादक का कहना था कि पीडि़त को ही इस मसले पर फैसले का अधिकार है इसलिए अगर आशुतोष को किसी से भी कुछ भी कहना है, तो सीधे धर्मवीर सिंह से भी बात करनी चाहिए। इस बातचीत के दौरान वहां मौजूद लोगों के अनुसार इसके बाद धर्मवीर सिंह को चैंबर में बुलाया गया। पहले तो उस हादसे के चलते बेहद क्षुब्‍ध था, लेकिन लोगों की कोशिश के बाद धर्मवीर सिंह चैंबर में आने पर राजी हुआ। हालांकि उनके तेवर सख्‍त ही रहे।

सूत्रों के अनुसार आशुतोष बहुत रूंआसे स्‍वर में उस घटना का ब्‍योरा दिया। आशुतोष का कहना था कि उस समय बहुत थका और तनाव में था, इसीलिए उससे यह बर्ताव हो गया। लेकिन सूत्रों के अनुसार धर्मवीर सिंह ने टका सा जवाब दिया कि थकान या तनाव रहने का मतलब यह कैसे हो सकता है कि लोग किसी नागरिक को सरेआम गालियां देते हुए लात-जूतों-डंडों से वहशी तरीके से पीट दें। धर्मवीर का कहना था कि अगर यह हादसा किसी सिपाही या दारोगा से किया गया तो एक बार तो उसे क्षम्‍य किया जा सकता है, लेकिन एसएसपी जैसे बड़े दारोगा की करतूत को सहन कैसे किया जा सकता है।

बताते हैं कि इस पर आशुतोष ने बिना किसी बात को आगे बढ़ाये धर्मवीर सिंह के सामने आत्‍मसमर्पण कर दिया। आर्द्र स्‍वर से आशुतोष सीधे वहां सामने कुर्सी पर बैठे धर्मवीर सिंह के नीचे झुका और धर्मवीर के पैरों को छूकर बोला – अपराध हो गया मुझसे, माफ कर दीजिए। भड़ास4मीडिया से बातचीत में बातचीत पर धर्मवीर सिंह ने साफ कहा कि आशुतोष ने मेरे पैर छूकर माफी मांग ली है। लेकिन धर्मवीर सिंह ने यह भी कह दिया कि पांव छूकर माफी मांगना और सार्वजनिक पिटाई अलग-अलग बातें हैं। अब सवाल यह है कि आखिर जब आशुतोष ने अपनी जिस करतूत के लिए धर्मवीर सिंह के पैर छूकर मांगी है, उसे प्रदेश के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर बीपी सिंह ने किस आधार पर एक गलफहमी करार दे दिया था। इसके पहले बीपी सिंह का बयान था कि स्‍कूटर के विवाद पर शुरू हुआ विवाद अब सुलझ गया है और दोनों ही पक्ष शांत हैं। सवाल यह भी है कि क्‍या किसी पीडि़त के पैर छूकर माफी मांगने मात्र से ही विवाद सुलझा जा सकता है। और मामला इतना क्‍या बड़ा था कि एसएसपी को अमर उजाला कार्यालय पहुंचकर उस पत्रकार के पैर छूना पड़ता।

लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट. कुमार सौवीर यूपी के जाने माने पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर, हिंदुस्तान, महुआ, एसटीवी समेत कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. सौवीर अपने बेबाक बयानों और दमदार लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.  

कांग्रेस नहीं मानती की उत्‍तराखंड और गोवा में निजाम बदल गया है!

नई दिल्ली। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तीन महीने होने को जा रहे है लेकिन कांग्रेस यह मानने को तैयार नहीं कि गोवा उसके हाथ से निकल चुका है और उसे यह यकीन नहीं हो रहा है कि उत्तराखंड में अब उसका अपना शासन है। चुनाव नतीजों के मुताबिक गोवा में भाजपा ने कांग्रेस को बेदखल कर अपनी सरकार बनाई तो उत्तराखंड की सत्ता भाजपा से छीन कांग्रेस उस पर काबिज हो गई। लेकिन मजे की बात यह है कि कांग्रेस आज भी गोवा को अपना शासित प्रदेश मानती है जबकि उत्तराखंड में उसकी सरकार है, फिर भी वह उसे अपना मानने को तैयार नहीं है।

दरअसल, यह बात कांग्रेस के किसी नेता ने नहीं कही है। यह कहना है कांग्रेस पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट 'एआईसीसी डॉट ओआरजी डॉट इन' का। इस वेबसाइट पर एक विकल्प कांग्रेस शासित प्रदेशों का है, जिस पर आप यदि जाएंगे तो पाएंगे कि कांग्रेस का शासन 12 प्रदेशों में है। यह तो सच है कि कांग्रेस आज की तारीख में 12 प्रदेशों में शासन कर रही है लेकिन यह भी सत्य है कि गोवा में उसका नहीं भाजपा का और उत्तराखंड में भाजपा का नहीं उसका शासन है।

कांग्रेस की वेबसाइट के मुताबिक गोवा का शासन आज भी उसके पास है जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उससे यह राज्य छीन लिया था। मनोहर पर्रिकर वहां के मुख्यमंत्री है। यही वेबसाइट जहां गोवा को कांग्रेस शासित राज्य बताती है वहीं उत्तराखंड का इसमें कोई जिक्र नहीं है, जहां महज एक सीट अधिक जीतकर उसने भाजपा को सत्ता से बेदखल करते हुए अपनी सरकार बनाई और विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी।

आश्चर्य की बात तो ये है कि कांग्रेस की अंग्रेजी की वेबसाइट के मुताबिक उसके अधीन 12 राज्य है तो हिंदी की वेबसाइट बताती है उसका शासन सिर्फ 10 राज्यों में ही है। हिंदी की वेबसाइट के मुताबिक केरल और मेघालय में उसका शासन नहीं है जबकि अंग्रेजी वेबसाइट बताती है कि दोनों राज्य उसके ही अधीन है। बहरहाल, यह यदि वेबसाइट अपडेट न करने के कारण ऐसा है तो भी यह बेहद गंभीर मामला है क्योंकि कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है और वह केंद्र के साथ-साथ एक दर्जन राज्यों में शासन में है। साभार : जागरण

भाषाई पत्रकारिता के सामने अंग्रेजी टिक नहीं सकती : केदारनाथ सिंह

देश के जाने-माने साहित्यकार डा. केदार नाथ सिंह ने पेड न्यूज को हिन्दी पत्रकारिता के लिये सबसे बड़ा खतरा करार देते हुए दावा किया है कि भाषाई पत्रकारिता के सामने आज भी अंग्रेजी पत्रकारिता टिक नहीं सकती। उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बलिया इकाई के बैनर तले टाउन हाल के क्रांतिकारी सभागार में हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर जनोन्मुख पत्रकारिता-उत्कर्ष एवं क्षरण विषयक गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि देश की आम जनता तक जो अखबार पहुंचे, वहीं नेशनल मीडिया है। अंग्रेजी अखबारों को कृत्रिम तरीके से नेशनल मीडिया बताया जाता है।

हिन्दी भाषा के विकास में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका को अहम करार देते हुए उन्होंने यह मानने से इंकार किया कि पत्रकारिता का क्षरण हुआ है। उन्होंने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता में भटकाव आया है, क्षरण नहीं। पत्रकारिता को सही दिशा की तरफ मोड़कर भटकाव को दूर करना है। उन्होंने पेड न्यूज को हिन्दी पत्रकारिता के लिये सबसे बड़ी चुनौती करार देते हुए कहा कि पेड न्यूज के कारण पत्रकारिता की विश्वसनीयता घटी है। उन्होंने इस बात पर क्षोभ व्यक्त किया कि आज अखबारों में शुद्ध भाषा नहीं लिखी जाती। उन्होंने हिन्दी पत्रकारों से समाचार लिखते समय व्याकरण पर विशेष ध्यान देने व सावधानी बरतने का आह्वान किया। उन्होंने पत्रकारो से सचेतक की भूमिका का पूरे जिम्मेदारी के साथ निर्वहन करने का अनुरोध करते हुए कहा कि यदि पत्रकार इस भूमिका से विरत हुए तो अपने कर्तव्य से च्युत हो जायेंगे।

उन्होंने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता को देश की दूसरी भाषा से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिये। उन्होंने कहा कि वह देश में बोली जाने वाली सभी भाषाओ को राष्ट्र भाषा मानते हैं। उन्होंने इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि हिन्दी देश की जनता की भाषा है। हिन्दी बहुरंगी भाषा है, जो क्षेत्रीय रंग से रंगा पड़ा है। पुलिस अधीक्षक ओंकार सिंह ने पत्रकारों की भूमिका की सराहना करते हुए हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े विविध पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता का राष्ट्रीय निर्माण व सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने मीडिया की जनपक्षधरता व जनस्वीकार्यता पर विशेष रूप से बल दिया। सांसद नीरज शेखर ने पेड न्यूज के प्रचलन पर चिंता प्रकट करते हुए पत्रकारों को निर्भीक व ईमानदार पत्रकारों से सीख लेने का आहवान किया।

यूनियन के अध्यक्ष अनूप कुमार हेमकर ने विषय प्रवर्तन किया तथा आगत अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में डा. केदार नाथ सिंह, पुलिस अधीक्षक ओंकार सिंह, सांसद नीरज शेखर, अपर पुलिस अधीक्षक अशोक त्रिपाठी को संगठन के पदाधिकारियों ने प्रतीक चिन्ह भेंट किया। इस मौके पर अपर जिलाधिकारी प्रकाश चन्द्र श्रीवास्तव, उप जिलाधिकारी सदर खेमपाल सिंह, यूनियन के महामंत्री राजेश ओझा, मंत्री करूणा सिंधु सिंह, अमित कुमार, अनिल अकेला, सुधीर ओझा, पशुपति नाथ, मनोज चतुर्वेदी, मुहम्मद शाहिद, कृष्ण कान्त पाठक, रवीन्द्र चौरसिया, गनेश जी वर्मा, सतीश मेहता, शशिकान्त ओझा, रणविजय सिंह, प्रदीप गुप्ता, दयानन्द मिश्र, प्रदीप चौरसिया आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे। संचालन डा. अखिलेश सिन्‍हा ने किया। कार्यक्रम के उपरान्त बंटी वर्मा के नेतृत्व में मनमोहक गजल कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम में अधिकांश समाचार पत्रों व इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पत्रकार भारी संख्या में मौजूद रहे।

करुणा सिंधु सिंह की रिपोर्ट.

रामदेव और बालकृष्‍ण के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के लिए याचिका

बदायूं। धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं का दुरुपयोग करने एवं लोकतंत्र के विरुद्ध वातावरण तैयार करने का आरोप लगाते हुए स्वामी रामदेव और बालकृष्ण के विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत कराने का निवेदन करते हुए न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिया गया है। सीजेएम पवन प्रताप सिंह ने प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए पुलिस को आख्या देने का आदेश देते हुए सुनवाई की अगली तारीख 16 जून निश्चित की है।

वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश चन्द्र सक्सेना ने बताया कि पत्रकार बी.पी.गौतम की ओर उन्होंने न्यायालय में प्रार्थना पत्र दाखिल किया है। आरोप है कि स्वामी रामदेव आर्य समाज पद्धति और विचाराधारा का दुरुपयोग कर रहे हैं। वह आर्य समाज के आंदोलन को गति देने की बजाये आर्य समाजी होने की बात को छुपाते हुए स्वयं को हिंदू संत प्रचारित कर रहे हैं और समूचे हिंदू समाज की आस्था एवं श्रद्धा का दुरुपयोग करने में लगे हैं, जबकि आर्य समाज का मूल कार्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध समाज को जागरुक करने का रहा है, जबकि रामदेव की कार्यप्रणाली में यह सब दूर तक नहीं दिख रहा।

श्री सक्सेना ने बताया कि हिंदू संत कहने वाले रामदेव के पंतजलि योग पीठ में एक भी हिंदू देवता का मंदिर नहीं है। स्वामी रामदेव प्राचीन योग का भी दुरुपयोग कर रहे हैं। वह जगह-जगह अपने कैंप लगा कर सिर्फ व्यायाम सिखाते हैं, जबकि प्राचीन योग क्रियायें किसी अदृश्य शक्ति या ईश्वर से जोडऩे का कार्य करती हैं, जो सामान्य व्यक्ति के लिए कर पाना बेहद कठिन है। कहा जाता है कि योग क्रियाओं को सिद्ध करने के बाद व्यक्ति प्राणायाम के द्वारा सीधे समाधी में चला जाता है और ईश्वर से एकाकार कर लेता है, जबकि योग गुरू कहलाने वाले यह सब स्वयं रामदेव को भी नहीं आता है, इसलिए वह प्राचीन योग के नाम का दुरुपयोग कर रहे हैं। धार्मिक ग्रंथों में जिन बातों का उल्लेख किया गया है, उन पर हिंदुओं को अटूट विश्वास है, उस विश्वास का रामदेव भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं।

रामदेव ने बदायूं सहित देश के विभिन्न जनपदों, शहरों व कस्बों में अपने फ्रैंचाइजी बना रखे हैं, जो तमाम तरह के प्रोडक्ट रामदेव के नाम से बेच रहे हैं, जिन पर एमआरपी लिखा होने के बाद भी भारत सरकार के नियमों के तहत वह टैक्स नहीं दे रहे हैं। वह टैक्स से बचने के लिए ट्रस्ट का भी दुरुपयोग कर रहे हैं, क्योंकि नियमानुसार ट्रस्ट आय कर के दायरे में नहीं आते हैं, लेकिन उनके प्रोडक्ट आय कर के दायरे में आने चाहिए, इस पूरे गोरखधंधे में उनके साथी बालकृष्ण भी बराबर के दोषी हैं। फ्रेंचाइजी रामदेव के पक्ष में स्थानीय स्तर पर भी वातावरण बनाते रहते हैं। यही लोग रामदेव के पैसे पर रामदेव द्वारा आयोजित किये जाने वाले धरना प्रदर्शन आदि में जनता को मूर्ख बना कर ले जाते हैं। इतना ही नहीं रामदेव ने पिछले दिनों लोकतंत्र के मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित संसद और गणमान्य सांसदों के विरुद्ध अशोभनीय और निंदनीय टिप्पणी की, जिस पर वादी को व्यक्तिगत तौर पर गहरा आघात लगा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि किसी सांसद ने अपराध किया है, तो उसे देश के कानून के प्रावधान के तहत न्यायालय सजा देगा, पर जनता ने जिन सांसदों को विधिवत चुन कर संसद भेज दिया, उनके विरुद्ध अशोभनीय टिप्पणी करना एक तरह से लोकतंत्र का अपमान करना ही है। इसके अलावा रामदेव के देश भर में फैले फ्रेंचाइजी और उनके अपने संगठन के लोग लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों में लगे हुए हैं। इन लोगों के एकाउंट फेसबुक पर भी हैं, यह लोग रामदेव के गैर समर्थकों को अश्लील गालियां देते हैं। देश के प्रधानमंत्री के साथ अन्य गणमान्य मंत्रियों, नेताओं और दिवंगत महापुरुषों के अश्लील और अशोभनीय चित्र बना कर डालते हैं, फिर उन पर अशोभनीय टिप्पणियां करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में अशोभनीय टिप्पणियां करते हैं, उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को महापुरुष बताते हैं। रामदेव के अवगुणों को उजागर करने वाले को सीधा कांग्रेस का एजेंट और दलाल आदि कह कर गालियां देते हैं। रामदेव और उनके संगठन के लोगों के ऐसे कुकृत्यों से देश को नुकसान हो रहा है, जिसका लाभ देश विरोधी ताकतों को ही मिलेगा। न्यायालय से लोकतंत्र विरोधी कार्य करने वाले स्वामी रामदेव, बालकृष्ण और उनके संगठन के तमाम सदस्यों के विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत कर कड़ी कानूनी कार्रवाई कराने की मांग की गयी है। सीजेएम पवन प्रताप सिंह ने प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए थाना सिविल लाइन पुलिस से आख्या देने को कहा है एवं सुनवाई की तारीख 16 जून निश्चित की है।

ग़ज़ल यानी दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती (दो)

पहली किश्त पढ़कर लंदन से शायर  प्राण शर्मा ने रोचक जानकारी दी…फ़िल्म उमराव जान में ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित शायर शहरयार की ग़ज़ल का मतला  है -दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये। इस मतला के दोनो मिसरे क्रांतिकारी शायर राम प्रसाद `बिस्मिल` की ग़ज़ल से उठाये गए थे। उनकी उस ग़ज़ल के दो शेर देखिए-

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये
खंजर को अपने और ज़रा तान लीजिये
बेशक़ न मानियेगा किसी दूसरे की बात
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये

इस लेख पर बहुत अच्छे-अच्छे कमेंट आए और एक महत्वपूर्ण चर्चा के लिए रास्ता खुला। नीरज गोस्वामी के अनुसार हर शेर चाहे वो किसी और के कहे जैसा क्यूँ न लगे अपनी महक अलग ही रखता है…ये बात ही शायरी को आज तक जिंदा रखे हुए है और जिंदा रखेगी..। तिलक राज कपूर ने कहा- पूर्ण मौलिकता मिलना शायद कठिन हो लेकिन अगर शेर में कुछ भी नया है तो उसे समग्र मूल्‍यांकन में मौलिक माना जाना चाहिये। सतपाल ख़याल ने फ़रमाया- ग़ज़ल में बहुत दोहराव है। आप चराग और हवा पर अगर शेर खोजेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि हर शायर चरागों को जलाता बुझाता रहता है। कोई शाम होते ही बुझा देता है तो कोई सुबह होते ही जला लेता है। नीलम अंशु का कहना है- पहली बार पता चला कि ग़ज़ल में भी ज़मीन झगड़े की वजह बनती है। ऐसे कमेंट्स के आधार पर दूसरे किश्त तैयार हुई है। तो आइए इसका भी लुत्फ़ उठाइए और चर्चा को आगे बढ़ाइए…।

शायर नीरज गोस्वामी (रायगढ़, महाराष्ट्र)

सदियों से वही इंसान हैं और वही उनकी खुशियाँ दुःख समस्याएं… कुछ भी तो नहीं बदला सिवा समय के…न इंसानी फितरत न सोच…तो फिर नया ख़याल आएगा कहाँ से…बड़े बड़े शायर जो पहले कह गए उन्होंने कोई बात नयों के लिए छोड़ी ही नहीं…लेकिन मजे की बात है शायरी अब भी वो ही बात करती है जो पहले करती थी लेकिन उसके बदलते अंदाज़ ने उसे अब तक दिलचस्प बनाये रखा है…हर शायर उन्हीं घिसी पिटी बातों को अपने दिलचस्प अंदाज़े बयां से सुनने लायक बना देता है….यादगार बना देता है…लगता था ग़ालिब के बाद कोई क्या लिखेगा लेकिन साहब उनके बाद भी शायरी परवान चढ़ी और क्या खूब चढ़ी…ये सिलसिला कहीं थमने वाला नहीं…जैसे हर इंसान दो हाथ दो पैर वाला है लेकिन अपने आप में अनूठा है वैसे ही हर शेर चाहे वो किसी और के कहे जैसा क्यूँ न लगे अपनी महक अलग ही रखता है…ये बात ही शायरी को आज तक जिंदा रखे हुए है और जिंदा रखेगी…कुमार पाशी साहब ने इसी बात को क्या खूब कहा है:-

जो शे'र भी कहा वो पुराना लगा मुझे
जिस लफ्ज़ को छुआ वही बरता हुआ लगा

शायर तिलक राज कपूर (भोपाल, म.प्र.)

मुझे याद आ रहे हैं मरहूम मोहसिन रतलामी जिन्‍होंने मुझे यह बात कुछ अलग तरह से कही थी। हुआ यह कि 'दिल के अरमॉं ऑंसुओं में बह गये' के हर शेर पर मैंने उलटी बात कही, मसलन:  शायद उनका आखिरी हो ये सितम / हर सितम ये सोच कर हम सह गये। इस पर मैनें कहा-सह लिया पहला सितम तुमने अगर / तो सितम सारी उमर ढायेंगे। मोहसिन साहब बोले कि ये तो आपने ज़मीन उठा ली। मैनें आसमॉं उठाते तो सुना था मगर मेरे लिये ये नयी बात थी। बहरहाल बात समझ में आई तो मैनें कहा- हुजूर ज़मीन छोडि़ये, तेवर तो देखिये। मुझे लगता है कि हमें पूर्ण मौलिकता और समग्र मौलिकता में भेद करने की जरूरत है। आपकी प्रस्‍तुति के नज़रिये से देखें तो पूर्ण मौलिकता मिलना शायद कठिन हो लेकिन अगर शेर में कुछ भी नया है तो उसे समग्र मूल्‍यांकन में मौलिक माना जाना चाहिये। पूर्ण मौलिकता तो शायद अन्‍य काव्‍य में भी नहीं मिलेगी। एक और स्थिति हो सकती है मात्र संयोग की। एक ही ज़मीन पर कई-कई शेर कहने वाले कई शायर मिल जायेंगे। मुझे इसमें कुछ अजूबा नहीं लगता। हॉं, शब्‍दश: उठाये हुए शेर अलग दिख जाते हैं। तरही ग़ज़ल में तो एक पूरा मिसरा उठाना ही पड़ता है, मेरा मानना है कि ऐसे गिरह के शेर शायर को अपनी ग़ज़ल से खुद-ब-खुद खारिज कर देने चाहिये।

आलोक श्रीवास्तव और मुनव्वर राना साहब के अशआर की स्थिति जरूर थोड़ा विचलित करती हैं। किसने पहले कहा ये तो मैं नहीं जानता लेकिन यहॉं जो समानता है वह आपत्तिजनक है। मीर और ग़ालिब के अशआर में तो अंतर की बहुत गुँजाइश है। 'चल अकेला' पर मुझे नहीं लगता कि किसी ओर से आपत्ति उठाई गयी हो। अभी आपने काव्‍य से काव्‍य का संदर्भ उठाया है ज़मीन की दृष्टि से। बहुत सा काव्‍य ऐसा मिल जायेगा जो किसी कहानी, उपन्‍यास या यहॉं तक कि यात्रा-वृतान्‍त से उठाया गया है। अगर तुलना में कहीं भेद की गुँजाईश है तो उसे महत्‍व दिया जाना चाहिये। यह भेद, शब्‍द, भाव, काल या अन्‍य किसी भी स्‍वरूप का हो सकता है।

नीरज भाई की टिप्‍पणी में कुमार पाशी साहब के शेर पर कहता हूँ कि:

अहसास, लफ्ज़, बह्र, नया कुछ न जब मिला

सोचा बहुत… कहूँ, न कहूँ, फिर भी कह गया

शायर के साथ यह समस्‍या अक्‍सर रहती होगी लेकिन कुछ तो होता ही है जो उसके कहे शेर को अलग पहचान देता है।

 कवि वीनस केसरी (इलाहाबाद, उ.प्र.)

देवमणि जी, अच्छी जानकारी दी है इस पोस्ट के सम्बंधित एक 2009 की एक पोस्ट का लिंक दे रहा हूँ, देखिएगा … http://subeerin.blogspot.in/2009/05/blog-post_23.html

जनाब रामपाल अर्शी का शे'र –

कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी
न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये

शायर सतपाल ख़याल (सोलन, हि.प्र.)

लेख बहुत ही महत्वपूर्ण है। ग़ज़ल में भी ज़मीनों का झगड़ा है और यह सही है कि न सिर्फ़ नये बल्कि सफ़ल गज़लकार भी पुराने शायरों के मिसरों को किसी भी तरह इस्तेमाल करते हैं। ग़ज़ल में एक दोष ये है कि बहुत शे'र कहे जा चुके हैं और मसाईल एक जैसे हैं और ग़ज़ल में तो दुहराव बहुत है। आप चराग और हवा पर अगर शे'र खोजेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि हर शायर चरागों को जलाता बुझाता रहता है। कोई शाम होते ही बुझा देता है तो कोई सुबह होते ही जला लेता है। ग़ज़ल में बहुत दोहराव है लेकिन ताज़गी भी बहुत है जिसका उदाहरण मुनव्वर राणा साहब हैं। कितने नये और सफ़ल प्रयोग किये हैं। मेरे ख़याल से महत्वपूर्ण ये नहीं है कि आप क्या कहते हैं लेकिन ग़ज़ल में महत्वपूर्ण यह है कि आप कितनी नज़ाकत और कैसे अंदाज़ में कहते है, यही हुनर है शायरी का जिसका उदाहरण है-

तुम मेरे पास होते हो गोय / जब कोई दूसरा नहीं होता…..Simple , innocent and beautifull..

शायर तिलक राज कपूर (भोपाल, म.प्र.)

वीनस के उदाहरण के संदर्भ में:

कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी
न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये…

दो खूबसूरत शेर सामने हैं लेकिन बात है नज़रिये की। समालोचक की दृष्टि से देखूँ तो सब ठीक ठाक है लेकिन कुछ देर को आलोचक होने का दुस्‍साहस करूँ तो बहुत से दिलों को चोट पहुँचेगी फिर भी एक बात देखने की है कि शाम वृद्धावस्‍था की स्थिति है मृत्‍यु-काल की नहीं। और यहीं दोनों अशआर में मिसरों का परस्‍पर संबंध समाप्‍त हो जाता है। पहले शेर में जो बात कही गयी है वह सर पर कफ़न बॉंधे घूमने के अधिक करीब है और इसमें शाम होना न होना महत्‍व नहीं रखता। दूसरे शेर में जो उजाले की बात आई है वह अंधकार से तो संबंध रख सकती है लेकिन शाम के धुँधलके के लिये उपयुक्‍त नहीं कही जा सकती है। अगर मेरे कथन से किसी की भावनायें आहत हों तो पूर्ण विनम्रता से मेरी क्षमा प्रार्थना पूर्व से ही प्रस्‍तुत मानें।

नीलम अंशु (कोलकाता, प.बंगाल)

बेहद महत्वपूर्ण जानकारी है। सचमुच पहली बार पता चला कि ग़ज़ल में भी ज़मीन झगड़े की वजह बनती है। ऐसा भी तो हो सकता है कि जिसने बाद में लिखा, उसने संयोगवश कभी पहले वाले शायर को पढ़ा ही न हो क्योंकि हरेक रचनाकार की हर रचना हर किसी ने पढ़ ही रखी हो ये भी तो ज़रूरी नहीं।

Delete Yuvraj Shrimal (Sr. Correspondent, DNA Newspaper, Jaipur, Raj.)

Pandey Ji, I read your article, Ghazal Yani Dusron Ki Zameen Par Apni Kheti, uploaded on Bhadas4media. Your analysis is really truth revealing and bringing forth a concept that nothing is original. But, i would like to say that i have read and listen the creations by these Shayars. All these creations might be using same words, but their spirits are variant. They are masterpieces that sooth the minds. If they are copies up to some extent then what's wrong in this as 'copies are copies of the copies'.

 कथाकार सुधा अरोड़ा (मुम्बई)

देवमणि ! कथायात्रा 1978 में एक गज़लकार दिनेशकुमार शुक्ल ने अपनी पूरी ग़ज़ल के बीच यह एक शेर लिखा था-

मेरी कुटिया के मुकाबिल आठ मंजि़ल का मकां,
तुम मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जाओगे !

पच्चीस साल बाद जावेद अख्तर की किताब 'तरकश'में यह एक पृष्ठ पर था-!

ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये !

शायर तिलक राज कपूर (भोपाल, म.प्र.)

पहले सुधा जी द्वारा दिये गये उदाहरण की बात ! जब कुटिया के मुकाबिल आठ मंजि़ल का मकां खड़ा हो गया तो शायद कहॉं बचा, फिर भी प्रतीकात्‍मक दृष्टि से देखें तो दिनेश जी ने एक आशंका भर व्‍यक्‍त की थी अपने शेर में। जबकि इस बीच चरित्र इतना गिर गया है कि वह आशंका जावेद साहब के शेर तक आते आते यर्थाथ में तब्‍दील हो गयी। यह उदाहरण बहुत ही रुचिकर है, दोनों काल-संदर्भ में तत्‍समय के चरित्र की बात कर रहे हैं और अपने-अपने काल संदर्भ में दो अलग शेर हैं। युवराज जी की बात पर आऊँ तो मेरा मानना है कि नकल नहीं यहॉं सुदृढ़ता का महत्‍व है। किसी समय विशेष में कहा गया कोई शेर जब किसी शायर को कमज़ोर लगता है तो वह अपने तरह से उसे मज़बूत कर प्रस्‍तुत करने का प्रयास करता है। यह मज़बूती सुनने वालों को पसंद आती है तो शेर चल निकलता है वरना दफ़्न हो जाता है एक नकल के रूप में। बशीर बद्र साहब ने जब '…शाम हो जाये' वाला शेर कहा तो वह लोगों को पसंद आया और इतना आया कि उनके नाम का पर्याय बन गया, बस यही शायरी है। जो शेर चल निकला वो चल निकला नहीं तो दीवान के दीवान दफ़्न हैं जो अदबी दायरे से बाहर ही नहीं निकल पाते। आम श्रोता तक पहुँच ही नहीं पाते। फिर भी '…शाम हो जाये' जैसी स्थिति में शायर का कर्तव्‍य तो बनता है कि वह प्रस्‍तुत करते समय लोगों को बताये कि मिसरा कहॉं से उठाया है। मिसरा उठाना गुनाह तो नहीं हॉं यह छुपाना गुनाह है कि कहॉं से उठाया।

प्राण शर्मा (लंदन, यूके)

प्रिय देवमणि जी! आपका लेख पसंद आया।मैंने यह शेर पहले कहीं पढ़ा था -मेरी कुटिया के मुक़ाबिल आठ मंजिल का मकां / तुम मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जाओगे। मुझे शेर के रचयिता के नाम का पता नहीं था। दाद देनी पड़ेगी हिन्दी की प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री सुधा अरोरा जी को, उन्हें तीन दशक पहले कहा गया गया शेर और शायर का नाम अब भी याद है। उर्दू में एक ख़याल के अनेक मिसरे हैं जिनको इस्तेमाल करने में उस्ताद शायरों ने भी गुरेज़ नहीं किया है। देखिए उनके कहे एक ख़याल के मिसरे और अशआर –

 हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती – ग़ालिब

कुछ तुम्हारा पता नहीं चलता
कुछ हमारी खबर नहीं आती – अदम

कुछ गम-ए- इश्क भी कर देता है मजनून `अदम`
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं – अदम

कुछ तो होते हैं मुहब्बत में जुनूं के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं – ज़हीर देहलवी

मुहब्बत का दरिया, जवानी की लहरें
यहीं डूब जाने को जी चाहता है – अमजद नज्मी

हसीं तेरी आँखें, हसीं तेरे आंसूं
यहीं डूब जाने को जी चाहता है – जिगर मुरादाबादी

उमराव जान में शहरयार की ग़ज़ल का मतला है –

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये

-इस मतला ने शहरयार को रातों-रात मशहूरियों की बुलंदी पर पहुँचा दिया था। मतला के दोनो मिसरे क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल ` की ग़ज़ल से उठाये गए थे। उनकी चार शेरों की ये ग़ज़ल पढ़ कर देखिए –

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये
खंजर को अपने और ज़रा तान लीजिये
बेशक़ न मानियेगा किसी दूसरे की बात
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये
मर जायेंगे मिट जायेंगे हम कौम के लिए
मिटने न देंगे मुल्क, ये एलान लीजिये
'बिस्मिल` ये दिल हुआ है अभी कौम पर फ़िदा
अहल-ए-वतन का दर्द भी पहचान लीजिये

 आपके जानकारी भरे लेख की एक बार और तारीफ़ करता हूँ।— प्राण शर्मा

शायर तिलक राज कपूर (भोपाल, म.प्र.)

प्राण साहब के उदाहरणों को देखें तो एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि पूरा मिसरा ले लेना भी स्‍वीकार किया गया है बशर्ते कि कहन में बदलाव हो। ग़ालिब साहब के शेर में स्‍पष्‍ट बेखुदी है और अदम साहब का शेर मैं अभी समझने का प्रयास ही कर रहा हूँ कि यह भी बेखुदी ही है या उसके आस-पास भटकता कोई और भाव। मुझे ग़ालिब साहब का शेर कुछ यूँ याद था: हम वहॉं हैं जहॉं से खुद हमको / आप अपनी खबर नहीं आती। अदम साहब और ज़हीर देहलवी के शेर में भाव पक्ष एक ही है। मेरे मत में किसी और के पूर्व में कहे मिसरे को पूर्व शेर के भाव में ही बॉंधना तो यह कहता है कि पहले वाला शायर कुछ दमदार शेर नहीं कह सका, मैं अब दमदार शेर दे रहा हूँ। अमजद नज्मी साहब और जिगर मुरादाबादी साहब के शेर एक ही भाव रखते हुए भी अलग-अलग मंज़र पर हैं इसलिये इनमें तो कोई समस्‍या नज़र नहीं आती। राम प्रसाद `बिस्मिल` के नाम से जो अशआर बताये गये हैं उनको लेकर मुझे शंका है, लगता है किसी मूवी में लिये गये शेर हैं ये जो मूल ग़ज़ल से हट के होंगे। मेरी शंका का कारण पहले शेर का भाव है। अब एक प्रश्‍न: शिकवा, शिकायतें, न गिला कीजिये अभी / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये'। मैं अगर खुलकर स्‍वीकार करूँ कि दूसरी पंक्ति पूरी की पूरी किसी अन्‍य शायर के शेर से ली गई है जिसका नाम मुझे ज्ञात नहीं तो क्‍या यह शेर अपना वज़ूद खो देगा। मुझे तो नहीं लगता।

 शायर देवमणि पाण्डेय (मुम्बई)

मुझे लगता है कि 'ख़ुदाए-सुख़न मीर' से मिर्ज़ा ग़ालिब काफ़ी प्रभावित थे। उन पर मीर का यह असर साफ़-साफ़ दिखाई देता है। मिसाल के तौर पर दोनों के दो-दो शेर देखिए-

 तेज़ यूँ ही न थी शब आतिशे-शौक़
थी ख़बर गर्म उनके आने की -मीर तकी मीर

थी ख़बर गर्म उनके आने की
आज ही घर में बोरिया न हुआ -मिर्ज़ा ग़ालिब

होता है याँ जहां में हर रोज़ो-शब तमाशा
देखा जो ख़ूब तो है दुनिया अजब तमाशा -मीर तकी मीर

बाज़ी-चा-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे -मिर्ज़ा ग़ालिब

शायर तिलक राज कपूर (भोपाल, म.प्र.)

मीर का शेर पहली बात तो ग़ालिब के शेर के मुकाबिल उँचे दर्जे का है, और दोनों शेर अलग-अलग स्थिति के हैं। दूसरे दोनों शेर एक ही बात तो कहते हैं मगर अलग-अलग तरह से बॉंधे गये हैं। अभिव्‍यक्ति एक है लेकिन मार्ग अलग।

प्राण शर्मा (लंदन, यूके)

प्रिय देवमणि जी ! आपकी जानकारी बहुत है। इतनी जानकारी तो किसी उर्दू के उस्ताद शायर की भी नहीं होगी। बिस्मिल के दूसरे शेर में रदीफ़ की ग़लती हो गई थी। सही मिसरा यूँ है -` मिटने न देंगे मुल्क ये ऐलान लीजिये'। राम प्रसाद बिस्मिल के कुछेक शेरों या मिसरों को काई शायरों ने ज्यों का त्यों उठाया है। जिगर मुरादाबादी का मशहूर शेर है –

 ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

 राम प्रसाद बिस्मिल के मक़्ता पर गौर फरमाईयेगा –

'बिस्मिल` ऐ वतन तेरी इस राह-ए-मुहब्बत में
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

 निदा फाज़ली इस शेर से पहचाने जाते हैं –

 दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
खो जाये तो मिट्टी है मिल जाये तो सोना है

निदा फाज़ली के शेर पर राम प्रसाद 'बिस्मिल' के इस शेर की पूरी झलक है –

 सब वक़्त की बातें हैं सब खेल है किस्मत का   
बिंध जाये तो मोती है रह जाये तो दाना है

जिन शेरों या मिसरों से राम प्रसाद 'बिस्मिल' को ख्याति मिलनी चाहिए थी वो अन्य शायर लूट कर ले गए। उनके दो- तीन अशआर सुनियेगा –

आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना
वो झाड़ियाँ चमन की वो मेरा आशियाना

वो प्यारी-प्यारी सूरत वो मोहनी सी मूरत
आबाद जिसके दम से था मेरा आशियाना

आज़ादियाँ कहाँ वो अब मेरे घोंसले की
अपनी खुशी से आना अपनी खुशी से जाना

शुभ कामनाओं के साथ- प्राण शर्मा

सुलतानपुर (यूपी) में जन्मे देवमणि पांडेय हिन्दी और संस्कृत में प्रथम श्रेणी एम.ए. हैं। अखिल भारतीय स्तर पर लोकप्रिय कवि और मंच संचालक के रूप में सक्रिय हैं। अब तक दो काव्यसंग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- "दिल की बातें" और "खुशबू की लकीरें"। मुम्बई में एक केंद्रीय सरकारी कार्यालय में कार्यरत पांडेय जी ने फ़िल्म 'पिंजर', 'हासिल' और 'कहाँ हो तुम' के अलावा कुछ सीरियलों में भी गीत लिखे हैं। फ़िल्म 'पिंजर' के गीत "चरखा चलाती माँ" को वर्ष 2003 के लिए 'बेस्ट लिरिक आफ दि इयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संपर्क 09821082126 के जरिए किया जा सकता है। देवमणि पांडेय से संबंधित अन्य रचनाओं को यहां क्लिक करके पढ़ा जा सकता है- भड़ास पर देवमणि पांडेय


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जागरण में बंपर छंटनी (18) : संस्‍थान के कर्मचारी कोर्ट जाने की तैयारी में

11 फीसदी मुनाफे का दम भरने वाले जागरण ने अपने उन कर्मियों को ही ठिकाने लगा दिया, जिसके दम पर उसने यह मुकाम हासिल किया. निकाले गए कर्मचारी कोर्ट की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे जागरण प्रबंधन परेशान हो गया है. सूत्रों के मुताबिक जो लोग स्‍वेच्‍छा से रिजाइन नहीं कर रहे हैं, उन्‍हें प्रबधन छल से बाहर करने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए उनसे पहले ट्रांसफर लेटर और फिर त्‍याग पत्र पर हस्‍ताक्षर कराए जाने की तैयारी है. और ये हस्‍ताक्षर धोखे से लिए जा सकते हैं. इसके लिए हाल ही में एक मीटिंग भी हो चुकी हैं. कोर्ट जाने की धमकी से तिलमिलाए एडिटर साहब ने अपने चम्‍मचों से इस समस्‍या से निपटने को कहा है. 

शायद जागरण प्रबंधन को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि देश में लेबर लॉ और कानून व्‍यवस्‍था जैसी भी कोई चीज होती है. ये जब चाहें तब निकाल दें और कर्मचारी नौकरी छोडे़ तो इन्‍हें एक महीने का नोटिस दे वर्ना एक महीने की सैलरी. ये कॉरपोरेट के नाम पर एक बनिये की दुकान है. बातें और तुलना इंफोसिस से करते हैं लेकिन कर्म और सोच किसी बनिये की दुकान से उपर नहीं उठ पाई है. और ऐसा ही रहा तो इनका पतन निश्‍चित है, क्‍योंकि कोई भी नया पत्रकार अब इनसे नहीं जुडना चाहता, जो नए छात्र जुड भी रहे हैं वह ज्‍यादा दिनों तक नहीं टिकते क्‍योंकि इनकी नीतियां ही एक तरफा हैं. फिलहाल छंटनी के शिकार सभी कर्मचारियों इस कोशिश में लगे हुए हैं कि जल्‍द ही वे एक बैनल के नीचे आएं.


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जागरण में बंपर छंटनी (17) : गोरखपुर के वरिष्‍ठ पत्रकार ने दी कार्यालय के सामने आत्‍मदाह करने की चेतावनी

दैनिक जागरण, गोरखपुर से खबर है कि छंटनी के शिकार बनाए जाने वाले एक वरिष्‍ठ पत्रकार के चेतावनी से प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए हैं. प्रबंधन ने छंटनी के लिए चार-पांच कर्मचारियों की लिस्‍ट बनाई हुई है, जिसमें एक वरिष्‍ठ पत्रकार भी शामिल हैं. इनकी गिनती गोरखपुर में जागरण के सीधे-सरल और साख वाले पत्रकारों में की जाती है. ये पिछले बाइस सालों से दैनिक जागरण को गोरखपुर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इनकी ना तो किसी से दोस्‍ती है ना किसी से बैर, इसके चलते ही प्रबंधन के निशाने पर आ गए हैं.

इन्‍हें बुलाकर इनसे इस्‍तीफा देने के लिए कहा गया तो इन्‍होंने प्रबंधन से साफ कह दिया कि 22 साल इस संस्‍थान के साथ गुजारा, अब रिटायरमेंट का समय है. नौकरी कहीं मिलने नहीं वाली, इस्‍तीफा देने के बाद मरने वाली नौबत आ जाएगी. इसलिए इस्‍तीफा देकर मरने से अच्‍छा है कि मैं जागरण कार्यालय के सामने आत्‍मदाह कर लूं. उन्‍होंने बहुत ही सख्‍त लहजे में प्रबंधन को चेता दिया है कि मैं आत्‍मदाह करूंगा और इस कामना के साथ कि जागरण समूह पूरी तरह नष्‍ट हो जाए.

इनके इस चेतावनी के बाद जागरण प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए हैं तथा सांसें हलक में अटक गई है. जागरण के पत्रकारों में तो प्रबंधन के रवैये को लेकर रोष है ही, अब दूसरे अखबारों के पत्रकार भी जागरण के साथियों के साथ हो रही इस नाइंसाफी से बहुत ही कुपित हैं. अखबार को बनिया की दुकान बना दिया गया है, जहां जब मन किया सौदा दिया, नहीं मन किया तो टरका दिया. पर पहली बार जागरण प्रबंधन के हरामखोरी को करारा चेतावनी मिली है. अगर खुदा ना खास्‍ता इस तरह की स्थिति हो गई तो जागरण प्रबंधन को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.


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जी न्‍यूज यूपी से टूट जाएगा रामसुंदर का नाता, शरण की नई पारी

जी न्‍यूज यूपी-उत्‍तराखंड से खबर है कि बनारस के स्ट्रिंगर रामसुंदर मिश्र राजू का कांट्रैक्‍ट प्रबंधन ने आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है. इसके साथ ही रामसुंदर और जी न्‍यूज का संबंध समाप्‍त हो जाएगा. जी यूपी को लम्‍बे समय से अपनी सेवाएं दे रहे रामसुंदर के बारे में बताया जा रहा है कि एक न्‍यूज पोर्टल को लीगल नोटिस भेजने को गंभीरता से लेते हुए प्रबंधन ने उनके कांट्रैक्‍ट को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है. नोएडा के वरिष्‍ठों ने भी ऑफ द रिकार्ड बताया कि रामसुंदर का कांट्रैक्‍ट फिलहाल रिन्‍यूवल नहीं किया जा रहा है. यह 31 मई को समाप्‍त हो जाएगा. हालांकि जी न्‍यूज से संबंध विच्‍छेद के बारे में राम सुंदर मिश्र राजू से बात की गई तो उन्‍होंने बताया कि वे अब भी जी न्‍यूज यूपी के साथ जुड़े हुए हैं.

दैनिक जागरण, आगरा से खबर है कि शरण प्रसाद ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे सर्कुलेशन विभाग में कार्यरत थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी आगरा में ही दैनिक हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें सर्कुलेशन का सीनियर एक्‍जीक्‍यूटिव बनाया गया है. शरण लम्‍बे समय से जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

हिंदुस्‍तान के लखनऊ, इलाहाबाद और बनारस यूनिट में आठ लोगों का प्रमोशन

हिंदुस्‍तान अखबार में अब प्रमोशन लेटर बंटना शुरू हो गया है. फिलहाल जो सूचना आ रही है उसमें पूर्वी यूपी के तीन यूनिटों में प्रमोशन लेटर बंटने की सूचना मिल रही है. संभावना जताई जा रही है कि कल से सारे यूनिटों में प्रमोशन लेटर मिलना शुरू हो जाएगा. लखनऊ, बनारस तथा इलाहाबाद में कुल आठ लोगों के प्रमोशन की जानकारी मिली है. लखनऊ से खबर है कि एनई के रूप में कार्यरत नीलमणि को प्रमोट करके सीनियर एनई बना दिया गया है. आलोक उपाध्‍याय को चीफ रिपोर्टर से प्रिंसिपल करेस्‍पांडेंट तथा अजीत को सीनियर रिपोर्टर से चीफ रिपोर्टर बनाया गया है.

इलाहाबाद से खबर है कि दो लोगों को प्रमोट किया गया है. चीफ रिपोर्टर आनंद मिश्रा को प्रमोट करके प्रिंसिपल करेस्‍पांडेंट बना दिया गया है. फोटोग्राफर रंजन कुमार को प्रमोट करके सीनियर फोटोग्राफर बना दिया गया है. बनारस में भी तीन लोगों को प्रमोट किए जाने की सूचना मिली है. सीनियर सब एडिटर योगेश राणा को चीफ सब एडिटर बना दिया गया है, जबकि रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी निभा रहे रमेंद्र सिंह को सब एडिटर से सीनियर सब बना दिया गया है. मऊ के ब्‍यूरोचीफ सुधीर ओझा को भी प्रमोट करके सीनियर रिपोर्टर बना दिया गया है.

जागरण में बंपर छंटनी (16) : नोएडा में चार और लोगों से इस्‍तीफा मांगा गया

दैनिक जागरण, नोएडा से खबर है कि मंगलवार को चार और लोगों को छंटनी का शिकार बनाया गया. इनमें एक डेस्‍क पर कार्यरत थे जबकि तीन रिपोर्टिंग से जुड़े हुए हैं. इन सभी से एचआर ने इस्‍तीफा मांग लिया. इन पत्रकारों को बताया गया कि सीजीएम का निर्देश है कि आप लोगों से इस्‍तीफा मांगा जाए. डेस्‍क पर कार्यरत पत्रकार ने अपना इस्‍तीफा सौंप दिया, जबकि संभावना है कि रिपोर्टिंग से जुड़े लोग भी जल्‍द ही अपना इस्‍तीफा दे सकते हैं. नोएडा में छंटनी को लेकर तनाव है. इसके पहले भी नौ से दस लोगों को छंटनी का शिकार बनाया जा चुका है.

दिल्‍ली-एनसीआर में कार्यरत पत्रकारों का आरोप है कि अब तक जितने भी लोगों का छंटनी का शिकार बनाया गया है उनमें से ज्‍यादातर गैर ब्राह्मण हैं. लिस्‍ट में नाम होने के बाद भी ब्राह्मणों को बचाया जा रहा है. रिटायरमेंट के बाद एक्‍टेंशन पर चल रहे सीजीएम निशिकांत ठाकुर तथा समाचार संपादक किशोर झा अपने फेल हुए लोगों को बचाने के लिए गैर ब्राह्मणों को निशाना बना रहे हैं. जागरण के गैर ब्राह्मण कर्मचारियों का आरोप है कि रिटायर होने के बाद भी अपनी नौकरी बचाने में सफल रहे निशिकांत ठाकुर के लगभग छह दर्जन रिश्‍तेदार तथा रिश्‍तेदारों के रिश्‍तेदातर दिल्‍ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल तथा जम्‍मू कश्‍मीर में काम कर रहे हैं. इन सभी को बचाने के लिए दूसरे लोगों को शिकार बनाया जा रहा है.

कर्मचारी आरोप लगाते हैं कि प्रबंधन अपना आंख-कान बंद किए हुए हैं. निशिकांत ठाकुर तथा किशोर झा अपने अपने लोगों को बचाने में पूरी तरह जुटे हुए हैं. हर यूनिट में तो लगभग विष्‍णु त्रिपाठी द्वारा बनाई गई लिस्‍ट के अनुसार छंटनी को अंजाम दिया जा रहा है, परन्‍तु दिल्‍ली-एनसीआर में जनरल डेस्‍क पर निशिकांत ठाकुर और किशोर झा की लिस्‍ट चल रही है. दिल्‍ली से छंटनी की लिस्‍ट निशिकांत ठाकुर के साले कविलाश मिश्र ने तैयार करके दी है. इसमें भी अपने लोगों को बचा लिया गया है. वरिष्‍ठ साथियों को निशाना बनाया गया है. संभावना जताई जा रही है कि कुछ और लोग छंटनी के शिकार बनाए जाएंगे. परीक्षा में फेल होने वाले वाईएन झा को भी इन लोगों ने बचा लिया है.  


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ओम थानवी का शिकार करने को आए थे, शिकार होकर चले गए!

अभिषेक श्रीवास्‍तव ने भड़ास को एक स्‍टोरी भेजी थी, जिसमें उन्‍होंने जनसत्‍ता के संपादक ओम थानवी को कटघरे में खड़ा किया था. इस मामले में भड़ास के हाथ ओम थानवी का एक पत्र लगा है, जिसे उन्‍होंने अभिषेक श्रीवास्‍तव को भेजा था. इस पत्र और तथ्‍यों को समझने के बाद कथित तौर पर अभिषेक श्रीवास्‍तव ने अपनी गलती मानी थी तथा खेद जताते हुए कहा था कि
ओम जी ने जो तारीखों वाली बात कही है, वह सही है। मुझसे तारीखों को लेकर गफ़लत हुई, इसे मैं मान रहा हूं. इसके बाद भी अभिषेक श्रीवास्‍तव ने ओम थानवी को कटघरे में खड़ा कर डाला. नीचे ओम थानवी द्वारा अभिषेक श्रीवास्‍तव को भेजा गया पत्र, जिसमें उन्‍होंने बातों को क्‍लीयर किया है.  

प्रिय अभिषेक जी,

आपकी टिप्पणी आपके पहले सन्देश पर ही मैं पढ़ चुका था. आपने फिर उसका लिंक भेजा है. मैंने पहले भी लिखा कि यह प्रकरण हमारे लिए बहुत हो चुका. टिप्पणी में अपना लिंक देकर आपने लिखा है : ''यहां ओम थानवी की लोकतांत्रिकता और सच्‍चाई का झीना परदा चर्र-चर्र कर के फट जा रहा है। उन्‍होंने कबाड़खाना का एक लिंक देकर खुद को बरी किया था, 'जनपथ' का एक और लिंक उन्‍हें कठघरे में खड़ा कर चुका है।"

मुझे नए कटघरों से परहेज नहीं, पर ज़रा तथ्यों को ज़रूर देख लें. वर्मा जी का "पत्र" और उसके नीचे मंगलेश जी का स्पष्टीकरण आपने (और आप से मोहल्ला लाइव में)  २ मई को शाया हुआ. मेरा स्तम्भ २९ मई को छप चुका था (२० को नहीं, इस तरह डेढ़ महीने को एक महीना कर लें!), तो यह नया कटघरा किस आधार पर? आपके लिंक पर २ मई की तारीख अब भी पड़ी है. मंगलेश जी का कहना है मैंने उनका यह स्पष्टीकरण अपने स्तम्भ (२९ अप्रैल) में क्यों नहीं छापा. आप ही बताएं, आपके २ मई के लिंक से (जिसमें अनंतर का ज़िक्र तक है) इसे जनसत्ता में २९ अप्रैल को कैसे छापा जा सकता था?

आपका,

ओम थानवी

आरएसएस के प्रशिक्षण शिविर में सात पत्रकार भी शामिल

नागपुर में चल रहे आरएसएस के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण शिविर में एक हजार से अधिक स्‍वयंसेवक शामिल हुए हैं. इनमें चाटर्ड एकाउंटेंट, पत्रकार, वकील, इंजीनियर से लेकर तमाम पेशा अपनाने वाले लोग शामिल हैं. रेशमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृति भवन परिसर में चल रहे प्रशिक्षण शिविर में विदेशों से 7 स्वयंसेवक शामिल हुए हैं। जो लोग इस शिविर में शामिल हुए हैं उनमें 5 डॉक्टर, 224 नौकरीपेशा, 1 सीए, 12 अभियंता, 10 वकील, 192 शिक्षक, 90 किसान व 7 पत्रकार शामिल हैं. अमेरिका व नेपाल से 2-2 व मलेशिया से 1 स्वयंसेवक शामिल हुआ है.

इस प्रशि‍क्षण शिविद में शारीरिक व बौद्धिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है. पहली बार स्‍वयंसेवकों के लिए उम्र की अधिकतम सीमा चालीस साल निर्धारित की गई है. इसमें देश के लगभग हर राज्‍य से आए स्‍वयं सेवक शामिल हैं.

रिलायंस को राघव बहल के नेटवर्क18 में निवेश को मिली हरी झंडी

कम्‍पटीशन कमिशन ऑफ इंडिया यानी सीसीआई ने मुकेश अंबानी के स्‍वामित्‍व वाली कंपनी रिलायंस इंडस्‍ट्रीज को राघव बहल के मीडिया फर्म नेटवर्क18 और टीवी18 ब्राडकास्‍ट में स्‍टेक खरीदने को हरी झंडी दे दी है. रिलायंस इंडस्‍ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी ने नेटवर्क18 के माध्‍यम से मीडिया में बड़ी राशि निवेश की है. नेटवर्क18 के माध्‍यम से रिलायंस ने 1700 करोड़ रुपये का निवेश किया है. इस निवेश के तहत रिलायंस ने रामोजी राव के इनाडु टीवी का एक बड़ा हिस्‍सा खरीदा है. नीचे बिजनेस लाइन में प्रकाशित खबर.

Competition panel approves RIL's stake buy in Network18

New Delhi, May 29: The Competition Commission of India (CCI) has given the green signal to Reliance Industries' acquisition of stake in the Raghav Bahl-promoted media firms Network 18 and TV18 Broadcast. In January, Mukesh Ambani-owned Reliance Industries had announced a major diversification into the media and entertainment sector through the Network18 buy. RIL had routed its investment through the Independent Media Trust that was to subscribe to the zero coupon optionally convertible debentures (OCDs) issued by the holding company of the Network18 Group.

The money was to be used by the promoters of the media firm to invest in the rights issues of its two listed companies. Network18 runs the portal moneycontrol.com while TV18 operates several business and general news channels including CNBC TV18 and CNN IBN. RIL had said it would invest about Rs 1,700 crore in the Network18 group.
Network18 eyes Eenadu

TV18 and Network18, the two listed companies of the group, will use this investment along with capital from other investors to retire debt and buy out a large part of RIL's stake in Eenadu, the regional language news and entertainment business run by Ramoji Rao, the Hyderabad-based media industry veteran.

TV18 and Network18 plans to raise Rs 2,700 crore each through two separate rights issues. TV18 had said it will raise money at up to Rs 40 a share, while Network18, which is the holding company of TV18, will raise it at up to Rs 60 a share. The net amount to be raised is about Rs 4,000 crore.

CCI said that the proposed combination is unlikely to give rise to any competition in the country. The anti-monopoly watchdog said that it had carried out the competitive impact of the proposal to ascertain whether both groups are engaged in production, supply, distribution, storage, sale or trade of similar or identical or substitutable goods or services.

दैनिक जागरण की परीक्षा : केवल दो पास, समाचार सम्पादक समेत सारे फेल

पिछले दिनों दैनिक जागरण जालन्धर यूनिट में उप समाचार सम्पादकों की एक लिखित परीक्षा ली गयी. देश का नम्बर एक अख़बार होने का दंभ भरने वाले इस अख़बार की अंदरूनी हालत यह है कि केवल दो उप समाचार सम्पादक ही पास हो सके. समाचार सम्पादक शाहिद रज़ा समेत सारे फेल हो गए. वैसे एक और बात भी खूब चर्चा में होती है कि अपने आका कमलेश रघुवंशी से ही हर बात पूछ कर राज काज चलाने वाले रज़ा की स्थिति आजकल वैसे ही खराब चल रही है.

सीनियर पत्रकार और समाचार सम्पादक प्रियेश सिन्हा भी आजकल जालन्धर में बैठने लगे हैं. इस से रज़ा बहुत असहज हो गए हैं और कई जगह अपने खास समझने वाले लोगों के पास इस बात का रोना रो चुके हैं. इसी खुंदक में रज़ा ने गीता डोगरा को बाहर का रास्ता दिखा दिया. गीता डोगरा के पति का निधन हुए ही अभी तीन माह हुए थे कि उन्हें इस लिए चलता कर दिया कि वह प्रियेश सिन्हा के गुट की समझी जा रही थीं. वैसे रज़ा की स्थिति का सबको पता है कि वो कहाँ से आदेश लेकर अपना काम करते हैं….लेकिन उसका आका भी आजकल किसी चैनल में जाने की फ़िराक में कहा जाता है क्योंकि उसकी कोई बात पूछने वाला नहीं रह गया है.

पत्रकारों में सहम है कि शाहिद जैसे पर-जीवी के कहे पर प्रबंधन अगर गीता डोगरा जैसी वरिष्ठ पत्रकार को निकाल सकता है तो उनकी क्या औकात? ख़ैर इस से साफ़ हो गया है कि रिश्तेदारों की फ़ौज में न्याय की उम्मीद रखना बेमानी है. लेकिन दो-दो समाचार सम्पादकों को एक यूनिट में रख कर प्रबन्धन क्या संकेत दे रहा है. इसी की चर्चा आजकल जागरण के जालंधर यूनिट में खूब हो रही है.

वरिष्‍ठ पत्रकार केएन सिंह बने राजस्‍थान में एडवाइजर टू द यूनिवर्सिटी

वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार नरेंद्र सिंह उर्फ केएन सिंह ने पाक्षिक पत्रिका हलचल हालचाल से इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने नईदुनिया से इस्‍तीफा देने के बाद इस पत्रिका के संपादक के रूप में ज्‍वाइन किया था. एके‍डमिक इंटरेस्‍ट रखने वाले केएन सिंह अब राजस्‍थान में इंस्‍टीट्यूट फार एडवांस स्‍टडीज एंड एजुकेशन से जुड़ गए हैं. उन्‍हें इस डीम्‍ड विश्‍वविद्यालय का एडवाइजर टू द यूनिवर्सिटी बनाया गया है. केएन सिंह के जिम्‍मे पत्रकारिता संस्‍थान के स्‍थापना की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है.

राजस्‍थान के चुरु शहर के सरदार नगर में स्थित यह यूनिवर्सिटी तमाम संस्‍थानों को संचालित करता है. केएन सिंह मुख्‍य धारा की पत्रकारिता में पिछले कई दशक से सक्रिय रहे हैं. प्रिंट और इलेक्‍टॉनिक दोनों माध्‍यमों पर समान पकड़ रखने वाले नरेन्‍द्र सिंह प्रथम प्रवक्‍ता पत्रिका के फाउंडर एडिटर हैं. इंडिया न्‍यूज मैगजीन के कार्यकारी संपादक के रूप में भी लंबी पारी खेल चुके हैं. हिन्‍दी दैनिक राष्‍ट्रीय सहारा, अमर उजाला में वरिष्‍ठ पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. नईदुनिया ज्‍वाइन करने से पहले वे न्‍यूज चैनल हमार टीवी में चीफ कॉपी एडिटर और प्रोग्रामिंग हेड के रूप में कार्यरत थे. नईदुनिया के डिप्‍टी एडिटर पद से इस्‍तीफा देकर हलचल हालचाल पहुचे थे.

हिंदीं-अंग्रेजी समेत कई भाषाओं पर अच्‍छी पकड़ रखने वाले केएन सिंह को केके बिड़ला फाउंडेशन फैलोशिप एवं आईआईई अमेरिकी फैलोशिप भी प्राप्‍त हो चुका है. इनकी एक किताब 'बिहार में निजी सेना का उदभव और विकास' छप चुकी है जबकि 'कवर स्‍टोरी' शीघ्र आने वाली है. नरेन्‍द्र सिंह मध्‍य प्रदेश में मोतीलाल बोरा और अर्जुन सिंह के मुख्‍यमंत्रित्‍व काल में उनके मीडिया सलाहकार भी रह चुके हैं. आज के दौर जहां पत्रकार पढ़ाई से दूर होते जा रहे हैं, उस दौर में भी केएन सिंह लिखने पढ़ने में कोताही नहीं बरतते. माना जा रहा है कि पत्रकारिता से ज्‍यादा एकेडमिक एप्रोच रखने वाले केएन सिंह पत्रकारिता संस्‍थान को अलग पहचान देने में सफल रहेंगे.

जागरण में बंपर छंटनी (15) : हिसार में छह की छंटनी, परीक्षा में असफल को अभयदान

जागरण में टॉपर को सजा मिलने की बात आखिरकार सबके सामने आ ही गई। बीती देर शाम मैनजमेंट से हिसार दैनिक जागरण यूनिट में आई छंटनी लिस्ट में अनिल, शशि, ध्यानी, मनीष पांडेय, संजय योगी सहित एक अन्य कर्मचारी से यहां से खुद छोड़ जाओ, या फिर हम निकाल देंगे, यह कहकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। हैरत की बात तो यह है कि जागरण की परीक्षा में फेल हुए वरिष्ठ संवाददाता सुरेन्द्र सोढ़ी को इस छंटनी लिस्ट से दूर रखा गया।

ऐसा कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिए हुआ कि सुरेन्द्र सोढ़ी ने हिसार यूनिट के जीएम मुदित चुतुर्वेदी, समाचार संपादक सुनील कुमार झा व चीफ रिपोर्टर मणिकांत मयंक को अपने गृह क्षेत्र हिसार में तबादला वापसी के नाम पर हजारों रुपये दिए थे। कहीं इस बात का सुरेन्द्र सोढ़ी सभी के समक्ष पर्दाफाश न कर दे। इस भय के कारण जीएम, समाचार संपादक व चीफ रिपोर्टर ने उसका यहां से मैनजमेंट को भेजी गई छंटनी लिस्ट में उसका नाम तक नहीं डाला। छंटनी होने वाले सभी कर्मचारी जीएम मुदित चुर्तवेदी के विरोधी माने जाते थे। हालांकि काम करने के मामले में सभी जागरण के धुरंधर थे। इस संदर्भ में जीएम मुदित चतुर्वेदी से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु सफलता नहीं मिल पाई।


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इंटरनेट ने हिंदी पत्रकारिता को वैश्विक पहचान दी है : एलवीके

जौनपुर : वीर बहादुर सिंह पूर्वाचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के तत्वाधान में हिंदी पत्रकारिता दिवस की पूर्व संध्या पर संकाय भवन में 'हिंदी पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति' विषयक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर बतौर मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार एलवीके दास ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। आज इंटरनेट के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता की पहुंच वैश्विक हो गई है। इसमें चुनौतियों के साथ ही साथ अवसरों की भी वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि हिंदी समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं की प्रसार संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। यह शुभ संकेत है कि आगे इसका भविष्य उज्ज्वल है।

संकायाध्यक्ष डा. अजय प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता से जुड़े लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में जिस तरह की पत्रकारिता की थी, वह आज की पीढ़ी के लिए भी मार्गदर्शक का काम करती है। स्वतंत्रता आंदोलन को हिंदी पत्रकारिता ने नई दिशा दी थी। प्राध्यापक डा. दिग्विजय सिंह राठौर ने कहा कि भारत में हिंदी पत्रकारिता आम आदमी से जुड़ी हुई है। समाज के लोग पत्रकारों से बहुत उम्मीदें रखते हैं। जिस पर हमें खरा उतरने की जरूरत है। डा. सुनील कुमार ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने वास्तविक रूप में पत्रकारिता के मानक तय किए हैं। आज के समय में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी है लेकिन मूल्यों का ह्रास होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस अवसर पर विभाग के छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

जौनपुर से दिग्विजय सिंह राठौर की रिपोर्ट.

अगस्त में यूपी में लांच होगा पत्रिका ‘समाचार विस्फोट’

हिंदी मासिक पत्रिका समाचार विस्फोट अपनी पहली वर्षगांठ पर अन्य हिन्दी भाषी राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी अपना विस्तार करने जा रही है। पत्रिका मुख्यत: ग्रामीण पृष्ट भूमि को फोकस करेगी। समाचार विस्फोट की संपादक सुनीता ने बताया कि नागपुर से प्रकाशित होने वाली समाचार विस्फोट पत्रिका वतर्मान में तकरीबन 10 राज्यों में कुछ खास क्षेत्रों में पहुंच रही है। अगस्त में पहली वर्षगांठ के अवसर पर उत्तर प्रदेश में लॉन्च करने की योजना हैं। हमारी योजना है कि पूरे उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अपना प्रतिनिधि नियुक्त करके वहां के मुद्दों को बहस में शामिल करने की है। उद्देश्य पत्रिका में वैचारिक सामग्री और न्यूज विश्लेषण देना होता है।

उनका कहना है कि पत्रिका में देशकाल के अनछुए मुद्दों की तह तक जाने वाली रिपोर्ट व आलेख होते हैं। ऐसी रिपोर्ट या आलेख कम पत्रिकाओं में ही देखने को मिलता है। क्योंकि अधिकतर पत्र पत्रिकाएं किसी न किसी स्वार्थवश जनहित के कुछ समाचार को दबा देती हैं। बेवाकी इस पत्रिका का तेवर है। सुनीता का कहना है कि हमारा प्रयास इंटरनेट पर हो रही बहस को ग्रामीणों तक पहुंचाना हैं। साथ ही आज भी शहरों में पढ़ने लिखने की काफी पत्रिकायें मौजूद हैं, लेकिन गांवों में आज भी अच्छी पत्रिकाओं के लिये स्थान हैं, हम उसी के लिए प्रयासरत हैं। प्रेस रिलीज

पत्रकार हरीशचंद्र बर्णवाल की कहानियों का संग्रह ‘सच कहता हूं’ लोकार्पित

वरिष्ठ टीवी पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल की कहानियों का संग्रह “सच कहता हूं” को देश की की जानी मानी हस्तियों ने मंगलवार को लोकार्पण किया। ये लोकार्पण समारोह दिल्ली से सटे फिल्म सिटी के मारवाह स्टूडियो में किया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि जहां राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष सुश्री ममता शर्मा थीं। वहीं वरिष्ठ लेखक और हंस के संपादक राजेंद्र यादव, मशहूर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा, आज तक न्यूज चैनल के न्यूज डायरेक्टर कमर वाहिद नकवी, आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष, न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम, महुआ के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत, आज तक के वरिष्ठ एंकर सईद अंसारी, सीनियर आईपीएस अफसर और दिल्ली के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस तेजेंदर लुथरा और बच्चों के मशहूर डॉक्टर रवि मलिक ने भी शिरकत की। कार्यक्रम के मॉडरेटर रहे मारवाह ग्रुप के डायरेक्टर संदीप मारवाह।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने हरीश चंद्र बर्णवाल की लेखनी की तारीफ करते हुए कहा कि कहानियों में उनका किसी भी मुद्दे को लेकर चित्रण काबिले तारीफ है। ममता ने बताया कि हरीश ने महिलाओं और बच्चों से जुड़े ज्वलंत मुद्दों को उठाया है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि लेखक हरीश आगे भी कहानियों के माध्यम से महिलाओं और बच्चों से जुड़ी दिक्कतों को उठाते रहेंगे। किताब के लोकार्पण के बाद वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव ने हरीश की जमकर तारीफ की। यादव ने “यही मुंबई है” और “चौथा कंधा” कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि ये कहानियां उपेक्षित बालक की निगाह से लिखी गई हैं। हरीश की ताकत ये है कि वो कहानियों को विजुअलाइज करते हैं। मशहूर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने बताया कि हरीश की कहानियों को पढ़कर एक नई सोच मिली। जिंदगी को देखने का नया नजरिया मिला। मैत्रेयी ने हरीश की कहानी “काश मेरे साथ भी बलात्कार होता” के कुछ हिस्से पढ़कर सुनाए।

आज तक के न्यूज डायरेक्टर कमर वाहिद नकवी ने कहा कि हरीश बर्णवाल की कहानियां चौंकानी वाली हैं। वहीं IBN7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने “काश मेरे साथ बलात्कार होता” और “चौथा कंधा” कहानी के कुछ चौंकाने वाले हिस्से पढ़कर सुनाए। साथ ही ये भी कहा कि मीडिया से जुडी हुई कुछ कहानियां मीडियाकर्मियों की आंखें खोलने के लिए काफी हैं। आशुतोष ने मीडिया पर कटाक्ष करती हुई कहानी “तीन गलतियां” भी लोगों को पढ़कर सुनाईं और कहा कि ये कहानियां मन मस्तिष्क को हिला देने वाली रहीं। सीनियर आईपीएस अफसर तेजेंद्र लुथरा और महुआ चैनल के ग्रुप एडिटर यशवंत राणा ने भी किताब की जमकर तारीफ की। यशवंत ने कहा कि जो लोग सोचते हैं कि टीवी के लोगों को कुछ नहीं आता या फिर संवेदनशील नहीं होते, उनके लिए हरीश चंद्र बर्णवाल की किताब एक करारा जवाब है।

कार्यक्रम के अंत में  लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल ने बताया कि जब-जब जीवन की गंभीर दिक्कतों ने उन्हें परेशान किया, उस पर लगातार मेहनत करते, उन परेशानियों को करीब से समझने की कोशिश की और आखिरकार बरसों की मेहनत के बाद ही ये कहानियां लिखी गईं। इसीलिए उन्होंने 20 सालों में सिर्फ 6 कहानियां और चंद लघुकथाएं लिखी हैं।

”यशवंतजी, खबर दिखाने से नाराज भभुआ पुलिस ने फर्जी मुकदमे में फंसा दिया”

कैमूर (भभुआ)। यशवंतजी, 9 मई 2012 की देर शाम भभुआ बाजार के नो इंट्री जोन में एक ड्राइवर अपना ट्रक लेकर चला गया। इस ट्रक ड्राइवर को भभुआ थाने के दो दरोगा पकड़ लिए तथा पैसे की मांग करने लगे। ड्राइवर द्वारा पैसा नहीं देने पर उसकी इतनी पिटाई की गई कि उसका दाहिना हाथ टूट गया तथा बायें कान का पर्दा भी फट गए। सूचना मिलने पर हम तीन-चार पत्रकार सदर अस्पताल भभुआ पहुंचे, जहां उसका इलाज चल रहा था। मेरे द्वारा इस पूरे प्रकरण को कवरेज किया गया।

इसके विरोध में जिला ट्रक एसोसिएशन ने अगले 10 मई, सुबह 8 बजे भभुआ स्थित एकता चौक पर विरोध प्रदर्शन करने का निर्णय लिया। निर्णायानुसार सुबह 8 बजे से शांतिपूर्ण 2 घंटे तक मुख्य सड़क को जाम कर लोगों ने पुलिस के प्रति विरोध जताया। स्थानीय विधायक प्रमोद कुमार सिंह के मध्यस्था के बाद ट्रक एसोसिएशन वालों ने जाम हटा लिया। इस पूरे प्रकरण का कवेरज मेरे तथा अन्य साथियों द्वारा भी किया गया। चैनल पर खबर भी पूरी चली।

दो दिन बाद यानी 13 मई को किसी के द्वारा मुझे पता चला कि मेरे उपर भभुआ पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया है और इल्जाम लगाया है कि मैं प्रदर्शन करने वाले भीड़ का साथ दे रहा था। मेरे उपर भभुआ थाना काण्ड संख्या- 158/2012 के तहत आईपीसी की धारा 147, 149, 109, 188, 341, 323, 353 (ननवेलेबल धारा), 504, 506 केतहत मामला दर्ज किया गया है। एक दिन बाद रात में पुलिस मेरे घर जाकर मेरे बारे में पूछताछ किया कि कहां गया है? पुलिस की इस प्रक्रिया से मैं कहीं दूर और छुपकर रहने को मजबूर हूं। अपने चैनल के लोगों और अन्य साथियों से सम्पर्क साधा और सारी बातें बताई।

पर यह बात बड़े ही दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि जिसके लिए हम मर रहे हैं, जान की बाजी लगाकर कवरेज कर रहे हैं, वह संस्‍थान और चैनल कुछ नहीं कर रहा है। चैनले के महामहिम लोग इस मामले में बात भी करना वाजिब नहीं समझ रहे हैं। मैं आज छुप-छुप कर जीने को विवष हैं, इस मामले में मैंने स्वयं मोबाइल से एसपी कैमूर से बात की लेकिन उनकी भी मंशा मुझे गिरफ्तार कर इस काण्ड में फंसे दो पुलिस वालों को बचाने की है। आज मैं कहां हूं पूछे से भी नहीं बताता हूं।

सुरेश कुमार

ईटीवी संवाददाता

कैमूर (भभुआ)

दैनिक भास्‍कर के मालिकाना हक को लेकर कोर्ट में बहस

जबलपुर। दैनिक भास्कर के खिलाफ प्रकाशन और मालिकाना हक से संबंधित फर्जी घोषणा पत्र के मामले में सोमवार को जोरदार बहस हुई। भास्कर की ओर से प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कर इस मामले को कलेक्टर के समक्ष दायर करने को चुनौती दी गई। सभी पक्षों को सुनने के बाद एडीएम अक्षय कुमार सिंह ने मामले की अगली सुनवाई 15 जून नियत की है।

भोपाल के अजय झा तथा कलिनायक के प्रकाशक संजीव जैन व प्रेम जैन ने 11 नवंबर को प्रेस रजिस्ट्रेशन एवं बुक एक्ट 1867 की धारा 8 बी के तहत दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक मनमोहन अग्रवाल, संचालक अजय अग्रवाल, सीएमडी कैलाश अग्रवाल, संचालक राकेश अग्रवाल तथा प्रकाश अग्रवाल के खिलाफ कोर्ट में आवेदन पेश किया था। जिसमें दैनिक भास्कर के घोषणा पत्रों को निरस्त करने की मांग की गई। हाईकोर्ट ने 25 नवंबर को जिला दण्डाधिकारी को मामले का आठ माह के भीतर निराकरण करने के निर्देश दिए थे।

मामले पर सुनवाई के दौरान भास्कर की ओर से आपत्ति पेश कर कहा गया कि उक्त मामला कलेक्ट्रेट कोर्ट में नहीं लगाया जा सकता। आपत्ति में सुप्रीम कोर्ट व अन्य न्यायालयों का हवाला दिया गया। वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पारितोष गुप्ता ने कहा कि पीआरबी एक्ट में प्रारंभिक आपत्ति दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने ऎसे ही एक अन्य मामले में भोपाल कलेक्ट्रेट का आदेश भी प्रस्तुत किया, जिसमें आपत्तिकर्ता की आपत्ति अस्वीकार की गई और उसे जवाब पेश करने कहा गया था। कोर्ट ने मामले में बनाए एक अन्य पक्षकार हेमलता अग्रवाल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साभार : पत्रिका

इस विकास से आम आदमी का क्‍या लेना-देना है?

यह रास्ता जंगल की तरफ जाता जरुर है लेकिन जंगल का मतलब सिर्फ जानवर नहीं होता। जानवर तो आपके आधुनिक शहर में हैं, जहां ताकत का एहसास होता है। जो ताकतवर है उसके सामने समूची व्यवस्था नतमस्तक है। लेकिन जंगल में तो ऐसा नहीं है। यहां जीने का एहसास है। सामूहिक संघर्ष है। एक-दूसरे के मुश्किल हालात को समझने का संयम है। फिर न्याय से लेकर मुश्किल हालात से निपटने की एक पूरी व्यवस्था है। जिसका विरोध भी होता है और विरोध के बाद सुधार की गुंजाइश भी बनती है। लेकिन आपके शहर में तो जो तय हो गया चलना उसी लीक पर है। और तय करने वाला कभी खुद को न्याय के कठघरे में खड़ा नहीं करता। चलते चलिये। यह अपना ही देश है। अपनी ही जमीन है। और यही जमीन पीढ़ियों से पूरे देश को अन्न देती आई है। और अब आने वाली पीढ़ियों की फिक्र छोड़ हम इसी जमीन के दोहन पर आ टिके है।

इस जमीन से कितना मुनाफा बटोरा जाता सकता है, इसे तय करने लगे है। उसके बाद जमीन बचे या ना बचे। लेकिन आप खुद ही सोचिये जो व्यवस्था पहले आपको आपके पेट से अलग कर दें। फिर आपके भूखे पेट के सामने आपकी ही जिन्दगी रख दें। और विकल्प यही रखे की पेट भरोगे तो जिन्दा बचोगे। तो जिन्दगी खत्म कर पेट कैसे भरा जाता है, यह आपकी शहरी व्यवस्था ने जंगलो को सिखाया है। यहां के ग्रामीण-आदिवासियों को बताया है। आप इस व्यवस्था को जंगली नहीं मानते। लेकिन हम इसे शहरी जंगलीपन मानते है। लेकिन जंगल के भीतर भी जंगली व्यवस्था से लड़ना पडेगा यह हमने कभी सोचा नहीं था। लेकिन अब हम चाहते हैं जंगल तो किसी तरह महफूज रहे। इसलिये संघर्ष के ऐसे रास्ते बनाने में लगे है जहां जिन्दगी और पेट एक हो। लेकिन पहली बार समझ में यह भी आ रहा है कि जो व्यवस्था बनाने वाले चेहरे हैं, उनकी भी इस व्यवस्था के सामने नहीं चलती ।

यहां सरकारी बाबुओं या नेताओं की नहीं कंपनियो के पेंट-शर्ट वाले बाबूओं की चलती है। जो गोरे भी है और काले भी। लेकिन हर किसी ने सिर्फ एक ही पाठ पढ़ा है कि यहां की जमीन से खनिज निकालकर। पहाड़ों को खोखला बनाकर। हरी भरी जमीन को बंजर बनाकर आगे बढ़ जाना है। और इन सब को करने के लिये, इन जमीन तक पहुंचने के लिये जो हवाई पट्टी चाहिये। चिकनी -चौड़ी शानदार सड़कें चाहियें। जो पुल चाहिये। जमीन के नीचे से पानी खींचने के लिये जो बड़े बड़े मोटर पंप चाहिये। खनिज को ट्रक में भर कर ले जाने के लिये जो कटर और कन्वेयर बेल्ट चाहिये। अगर उसमें रुकावट आती है तो यह विकास को रोकने की साजिश है। जिन 42 से ज्यादा गांव के साढे नौ हजार से ज्यादा ग्रामीण आदिवासी परिवार को जमीन से उखाड़कर अभी मजदूर बना दिया गया है और खनन लूट के बाद वह मजदूर भी नहीं रहेंगे, अगर वही ग्रामीण अपने परिवार के भविष्य का सवाल उठाता है तो वह विकास विरोधी कैसे हो सकता है।

इस पूरे इलाके में जब भारत के टाप-मोस्ट उघोगपति और कारपोरेट, खनन और बिजली संयत्र लगाने में लगे हैं और अपनी परियोजनाओं को देखने के लिये जब यह हेलीकाप्टर और अपने निजी जेट से यहां पहुंचते है। दुनिया की सबसे बेहतरीन गाड़ियों से यहां पहुंचते हैं, तो हमारे सामने तो यही सवाल होता है कि इससे देश को क्या फायदा होने वाला है। यहां मजदूरों को दिनभर के काम की एवज में 22 से 56 रुपये तक मिलता है। जो हुनरमंद होता है उसे 85 से 125 रुपये तक मिलते हैं। और कोयला खादान हो या फिर बाक्साइट या जिंक या फिर बिजली संयत्र लगाने में लगे यहीं के गांव वाले हैं। उन्हे हर दिन सुबह छह से नौ किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचना पड़ता है। जबकि इनके गांव में धूल झोंकती कारपोरेट घरानों की एसी गाड़ियां दिनभर में औसतन पांच हजार रुपये का तेल फूंक देती हैं। हेलिकाप्टर या निजी जेट के खर्चे तो पूछिये नहीं। और इन्हें कोई असुविधा ना हो इसके लिये पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी इनके पीछे हाथ जोड़कर खडे रहते है। तो आप ही बताइये इस विकास से देश का क्या लेना-देना है।

देश का मतलब अगर देश के नागरिको को ही खत्म कर उघोगपति या कारपोरेट विकास की परिभाषा को अपने मुनाफे से जोड़ दें तो फिर सरकार का मतलब क्या है जिसे जनता चुनती है। क्योंकि इस पूरे इलाके में ग्रामीण आदिवासियों के लिये एक स्कूल नहीं है। पानी के लिये हैंड पंप नहीं है। बाजार के नाम पर अभी भी हर गुरुवार और रविवार हाट लगता है। जिसमें ज्यादा से ज्यादा गांव के लोग अन्न और पशु लेकर आते हैं। एक दूसरे की जरुरत के मद्देनजर सामानों की अदला-बदली होती है। लेकिन अब हाट वाली जगह को भी हड़पने के लिये विकास का पाठ सरकारी बाबू पढ़ाने लगे हैं। धीरे-धीरे खादानों में काम शुरु होने लगा है। बिजली संयत्रों का माल-असबाब उतरने लगा है तो कंपनियों के कर्मचारी-अफसर भी यहीं रहने लगे हैं। उनको रहने के दौरान कोई असुविधा ना हो इसके लिये बंगले और बच्चों के स्कूल से लेकर खेलने का मैदान तक बनाने के लिये मशक्कत शुरु हो रही है। गांव के गांव को यह कहकर जमीन से उजाड़ा जा रहा है कि यह जमीन तो सरकार की है। और सरकार ने इस पूरे इलाके की गरीबी दूर करने के लिये पूरे इलाके की तस्वीर बदलने की ही ठान ली है। चिलका दाद, डिबूलगंज, बिलवडा, खुलडुमरी सरीखे दर्जनों गांव हैं, जहां के लोगों ने अपनी जमीन पावर प्लांट के लिये दे दी। लेकिन अब अपनी दी हुई जमीन पर ही गांव वाले नहीं जा सकते। खुलडुमरी के 2205 लोगों की जमीन लेकर रोजगार देने का वादा किया गया।

लेकिन रोजगार मिला सिर्फ 234 लोगों को। आदिवासियों के जंगल को तबाह कर दिया गया है। जिन फारेस्ट ब्लाक को लेकर पर्यवरण मंत्रालय ने अंगुली उठायी और वन ना काटने की बात कही। उन्हीं जंगलों को अब खत्म किया जा रहा है क्योंकि अब निर्णय पर्यावरण मंत्रालय नहीं बल्कि ग्रुप आफ मिनिस्‍टर यानी जीओएम लेते हैं। ऐसे में माहान, छत्रसाल, अमेलिया और डोगरी टल-11 जंगल ब्लाक पूरी तरह खत्म किये जा रहे हैं। करीब 5872.18 हेक्टेयर जंगल पिछले साल खत्म किया गया। और इस बरस 3229 हेक्टेयर जंगल खत्म होगा। अब आप बताइये यहां के ग्रामीण-आदिवासी क्या करें। कुछ दिन रुक जाइए, जैसे ही यह ग्रामीण आदिवासी अपने हक का सवाल खड़ा करेंगे वैसे ही दिल्ली से यह आवाज आयेगी कि यहां माओवादी विकास नहीं चाहते हैं। और इसकी जमीन अभी से कैसे तैयार कर ली गई है यह आप सिंगरैली के बारे में सरकारी रिपोर्ट से लेकर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंचों से सिंगरैली के लिये मिलती कारपोरेट की मदद के दौरान खिंची जा रही रिपोर्ट से समझ सकते हैं। जिसमें लिखा गया है कि खनिज संसाधन से भरपूर इस इलाके की पहचान पावर के क्षेत्र में भारतीय क्रांति की तरह है। जहां खादान और पावर सेक्टर में काम पूरी तरह शुरु हो जाये तो अमेरिका और यूरोप को मंदी से निपटने का हथियार मिल सकता है। इसलिये यहां की जमीन का दोहन किस स्तर पर हो रहा है और किस तरीके से यहा के कारपोरेट के लिये अमेरिकी सरकार तक भारत की नीतियों को प्रभावित कर रही है, इसके लिये पर्यावरण मंत्रालय और कोयला मंत्रालयों की नीतियों में आये परिवर्तन से भी समझा जा सकता है। जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री रहते हुये चालीस किलोमीटर के क्षेत्र के जंगल का सवाल उठाया।

पर्यावरण के अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ग्रीन पीस ने यहा के ग्रामीण आदिवासियों पर पड़ने वाले असर का समूचा खाका रखा। लेकिन आधे दर्जन कारपोरेट की योजना के लिये जिस तरह अमेरिका, आस्ट्रेलिया से लेकर चीन तक का मुनाफा जुड़ा हुआ है। उसमें हर वह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई जिनके सामने आने से योजनाओ में रुकावट आती। इस पूरे इलाके में चीन के कामगार और आस्ट्रेलियाई अफसरों की फौज देखी जा सकती है। अमेरिकी बैंक के नुमाइन्दे और अमेरिकी कंपनी बुसायरस के कर्मचारियों की पहल देखी जा सकती है। आधे दर्जन पावर प्लांट के लिये 70 फीसदी तकनीक अमेरिका से आ रही है। ज्यादातर योजनाओं के लिये अमेरिकी बैंक ने पूंजी कर्ज पर दी है। करीब 9 हजार करोड से ज्यादा सिर्फ अमेरिका के सरकारी बैंक यानी  बैक आफ अमेरिका का लगा है। कोयले का संकट ना हो इसके लिये कोयला खादान के ऱाष्ट्रीयकरण की नीतियों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। खुले बाजार में कोयला पहुंच भी रहा है और ठेकेदारी से कोयला खादान से कोयले की उगाही भी हो रही है। कोयला मंत्रालय ने ही कोल इंडिया की जगह हिंडालको और एस्सार को कोयला खादान का लाइसेंस दे दिया है। जो अगले 14 बरस में 144 मिलियन टन कोयला खादान से निकालकर अपने पावर प्लांट में लगायेंगे। तमाम कही बातों के दस्तावेजों को बताते दिखाते हुये हमने खदान और गांव के चक्कर पूरे किये तो लगा पेट में सिर्फ कोयले का चूरा है। सांसों में भी भी कोयले के बुरादे की धमक थी। और संयोग से ढलती शाम या डूबते हुये सूरज के बीच सिंगरौली में ही आसमान में चक्कर लगाता एक विमान भी जमीन पर उतरा। पूछने पर पता चला कि सिगरौली में अमेरिकी तर्ज पर हिंडालको की निजी हवाई पट्टी है जहां रिलायस, टाटा, जिदंल, एस्सार, जेपी समेत एक दर्जन से ज्यादा कारपोरेट के निजी हेलीकाप्टर और चार्टेड विमान हर दिन उतरते रहते हैं। और आने वाले दिनों में सिंगरौली की पहचान 35 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने वाले क्षेत्र के तौर पर होगी। जिस पर भारत रश्क करेगा।

लेखक पुण्‍य प्रसून बाजपेयी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा जी न्‍यूज से जुड़े हुए हैं. उनका लेख उनके ब्‍लॉग से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

अमर उजाला के संपादक बताएं – ऑफिस क्‍यों नहीं आ रहे धर्मवीर?

अमर उजाला के तेज तर्रार पत्रकारों में शुमार धर्मवीर की आईपीएस अधिकारी आशुतोष द्वारा की गयी पिटाई और अखबार में दो लाइन की खबर भी नहीं छपने से दुखित पत्रकार के सम्बन्ध में लोग संपादक मृत्‍युंजय से जानना चाहते हैं कि -आफिस क्यों नहीं आ रहे धर्मवीर सिंह. संपादक में नैतिक साहस हो तो वे इस बात का खुलासा करें. धर्मवीर सिंह छात्र जीवन से ही सरल स्वभाव और मान सम्मान के साथ जीने वाले युवक हैं. अमर उजाला जैसे टिमटिमाते हुए अखबार के जुझारू पत्रकार हैं.

स्थानीय संपादक मृत्युंजय और एसएसपी आशुतोष की मौजूदगी में पत्रकार धर्मवीर ने आईपीएस अधिकारी आशुतोष का प्रतिवाद किया था और कहा था कि मुझे भाई मत कहो. संपादक और उसके चंगू-मंगू समझ गए कि बस इतने से समझौता हो गया. जिस शहर में बचपन से लेकर जवानी तक जिस धर्मवीर की इज्‍जत थी, प्रतिष्‍ठा थी, उसी शहर में वह अपमानित होकर मुंह दिखाए, यह संभव नहीं है. प्रतिकार होना चाहिए था. लेकिन संपादक ने हाथ खींच लिया. धर्मवरी को दर्द यह भी है कि अखबार कम से कम खबर प्रकाशित करता ताकि शासन प्रशासन तक यह संदेश तो जाता कि जो कुछ हुआ है वह गलत है और दोषी के खिलाफ न्यूनतम कार्रवाई तो होनी ही चाहिए, लेकिन सब कुछ हजम कर गए संपादक और अखबार.

धर्मवीर के ही नहीं गोरखुपर के अन्य दूसरे पत्रकारों के सीने भी एक आग जल रही है. एक तड़प है. यह आग और तड़प तो तब ही बुझेगी जब आरोपी आईपीएस अधिकारी पर करवाई हो. पत्रकार चाहते हैं कि शासन स्‍तर से कार्रवाई हो ताकि ऐसे करने वाले उदंड और सत्‍ता मद में रहने वाले अधिकारियों को सबक मिले. पत्रकारों ने तय किया है कि यदि शासन स्तर से एसएसपी के विरुद्ध करवाई नहीं होती है तो आज नहीं तो कल न्यायालय के माध्यम से कार्रवाई जरूर होगी. हो सकता है तब तक यह देखने के लिए संपादक गोरखपुर में न रहें, लेकिन एक सवाल तो लोगों को परेशान किये ही है कि आफिस क्यों नहीं आ रहे धर्मवीर?

गोरखपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

जनसंदेश टाइम्‍स, कानपुर के कर्मचारियों को नहीं मिली अपैल की सैलरी

जनसंदेश टाइम्‍स, कानपुर से खबर है कि कई पत्रकारों की अप्रैल माह की सेलरी अभी नहीं मिली है. इसके चलते पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों का बुरा हाल है. पत्रकारों का कहना है कि ज्‍यादातर लोगों की सेलरी अभी रुकी हुई है, जबकि प्रबंधन की तरफ से कहा जा रहा है कि अधिकांश लोगों की सैलरी दी जा चुकी है. उन्‍हीं लोगों के पैसे रोके गए हैं, जिन्‍होंने अपने कमिटमेंट पूरे नहीं किए हैं. जिन कर्मचारियों की सेलरी नहीं आई है, वे परेशान हैं. इधर उधर से पैसे लेकर काम चला रहे हैं.

हालांकि इन पत्रकारों का कहना है कि इसके पहले सेलरी को लेकर कोई समस्‍या नहीं आती थी, परन्‍तु पिछले दो माह से सेलरी को लेकर दिक्‍कतें आ रही हैं. गौरतलब है कि लगभग डेढ़ साल पहले जनसंदेश टाइम्‍स की लांचिंग कानपुर में की गई थी. इस संदर्भ में जब जनसंदेश के सीजीएम अनिल पाण्‍डेय से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है. लगभग सभी लोगों की सेलरी बांटी जा चुकी है. केवल उन्‍हीं लोगों के पैसे रोके गए हैं, जिन्‍होंने कंपनी के साथ किए गए कमिटमेंट को पूरा नहीं किया है. इनकी संख्‍या भी बहुत सीमित है.

आई नेक्‍स्‍ट से रोहित का इस्‍तीफा, आशुतोष नए एजीएम बने

आई नेस्‍क्‍ट से खबर है कि रोहित मेहरोत्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे एजीएम मार्केटिंग के पद पर कार्यरत थे. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. माना जा रहा है कि बिजनेस में कमजोर परफारमेंस के चलते प्रबंधन ने उनसे इस्‍तीफे की मांग की थी. रोहित की जगह आशुतोष अग्निहोत्री को नया एजीएम मार्केटिंग बना दिया गया है. आशुतोष ने इसी साल जनवरी में आई नेक्‍स्‍ट ज्‍वाइन किया था. वे इसके पहले भी आई नेक्‍स्‍ट से जुड़े हुए थे, किंतु इस्‍तीफा देकर दूसरे संस्‍थान में चले गए थे.

स्‍टार न्‍यूज : पत्रकार नाम बदलने से पहले चैनल बदलने की तैयारी में

: नाम बदलने से बदल जाएगा बहुत कुछ : ब्रांड नेम क्‍या होता है यह आनंद बाजार पत्रिका को समझ में आ चुका है. करोड़ों खर्च करने के बाद भी प्रबंधन की धुकधुकी चल रही है. स्‍टार ब्रांड से अलग होने के बाद एबीपी को ही ब्रांड बनाने की तैयारी में जुटा आनंद बाजार पत्रिका समूह एक जून के बाद मार्केट की स्थिति को लेकर परेशान है. एक जून से ब्रांड तो बदलेगा ही, ऑन स्‍क्रीन भी बहुत कुछ बदल जाएगा. पर इतने सालों से जिस स्‍टार न्‍यूज ने अपना झंडा गाड़ रखा था, उसके ब्रांडिंग उसके साये से इतना जल्‍द बाहर निकल पाना कोई हंसी-खेल नहीं दिख रहा है.

सबसे बड़ी बात है कि स्‍टार न्‍यूज जैसे ब्रांड के साथ जुड़े कर्मचारी भी अंदर से परेशान हैं. उन्‍हें भी ब्रांड का मतलब पता है. जब सारी दुनिया ब्रांड नेम की तरफ भाग रही है. लोगों की जीवन शैली ब्रांडों में ढलती जा रही है, उस स्थिति में एक जमे-जमाए, जाने-पहचाने ब्रांड से अलग होकर एक नए ब्रांड को जमाने की शुरुआत करना पत्रकारों को अखर रहा है. अगर दूसरे शब्‍दों में कहें तो कई लोग दूसरे ब्रांडों में अपने-अपने जुगाड़ भिड़ा रहे हैं. अपने संबंधों को खंगाल रहे हैं. इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.

स्‍टार न्‍यूज की स्‍टार एंकर अंजना कश्‍यप के आजतक जाने की चर्चा है. संभावना है कि वे अगले कुछ दिनों में आजतक के स्‍क्रीन पर दिखने लगें. हो सकता है अंजना का जाना पूर्व निधार्रित रहा हो, उन्‍हें बेहतर मौका मिल रहा हो, पर उनके जाने का जो समय है, वह अलग चुगली कर रहा है. मार्केट में यह चर्चा आम है कि स्‍टार न्‍यूज का ब्रांड नेम खतम होने के चलते ही अंजना कश्‍यप आजतक जैसे ब्रांड नेम से जुड़ने की तैयारी में हैं. खुद ब्रांड बन चुकी अंजना को शायद ब्रांड की अहमियत पता है, तभी वो एबीपी के होर्डिंग्‍स में भी कहीं नजर नहीं आईं. 

स्‍टार न्‍यूज की परछाईं से निकलकर अपनी ब्रांडिंग स्‍थापित करना इतना आसान भी नहीं है, जितना आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप दिखाने की कोशिश कर रहा है. उसे पता है कि मार्केट का निर्धारत ब्रांड करता है. अगर एबीपी न्‍यूज ब्रांड नहीं बना तो मार्केट भी स्‍टार की सारी टीम होने के बाद भी उसे झेल नहीं पाएगा. क्‍योंकि पूरा बाजार साख औरे ब्रांड से ही चलता है. मार्केट बड़ा निष्‍ठुर होता है, उसे किसी का सरोकार नहीं बल्कि अपना फायदा दिखता है. और यदि एबीपी न्‍यूज से उसे फायदा नहीं मिला तो वो स्‍टार न्‍यूज के डमी को भला ढोएगा ही क्‍यों? उसे नई या पुरानी टीम से कुछ लेना देना नहीं होता है.  

एबीपी ग्रुप भी यही दिखाने की कोशिश कर रहा है कि स्टार न्यूज के सारे जाने पहचाने लोग एबीपी न्यूज के हिस्से हैं और इस तरह कुछ नहीं बदला है, सिवाय नाम के. टीवी, अखबार, वेबसाइट्स, होर्डिंग्स आदि के जरिए स्टार न्यूज के एबीपी न्यूज बन जाने का जोरशोर से प्रचार किया जा रहा है. सूत्र बताते हैं कि इस प्रचार-प्रसार में ही चैनल ब्रांडिंग के लिए चालीस करोड़ रुपये तक खर्च कर रही है. मार्केट इकानामी के इस दौर में हर कंपनी का पूरा जोर ब्रांड वैल्यू पर होता है और जब आपका नाम ही खिसक जाए तो जाहिर है दुनिया को यह बताने में काफी मेहनत करनी पड़ती है कि नाम बदला है, काम नहीं. पर स्टार न्यूज से एबीपी न्यूज में स्थानांतरण इतना स्मूथ नहीं है जितना बताया जा रहा है.

यहां काम करने वाले भी उहापोह में हैं. जिन्‍हें नौकरी मिलेगी वो एबीपी न्‍यूज से विदाई लेने में तनिक भी नहीं हिचकेगा. स्‍टार न्‍यूज के सूत्रों का कहना है कि जिनको कहीं ठिकाना नहीं मिल रहा है, वैसे लोग ही एबीपी न्‍यूज में काम करने को तैयार हैं. बाकी जिन लोगों के संबंध दूसरे ब्रांडों में हैं वो अपने लिए वहां जगह तलाश रहे हैं. संभावना है कि अगले कुछ महीनों में तमाम लोग एबीपी न्‍यूज को छोड़कर दूसरे ब्रांडों से जुड़ जाएं. प्रबंधन जोर शोर से प्रचार कर रहा है कि ''नाम बदलने से कुछ नहीं बदलता'' पर उसे अंदरुनी हालात देखकर अच्‍छी तरह पता चल रहा है कि नाम बदलने से बहुत कुछ बदलता है.

निकट भविष्‍य में यह देखना भी दिलचस्‍प होगा कि अपनी ब्रांड वैल्‍यू रखने वाले दीपक चौरसिया तथा उनके जैसे कई स्‍टार पत्रकार कब तक एबीपी न्‍यूज में टिकते हैं. क्‍योंकि ब्रांड ही किसी पत्रकार को ब्रांड बनाता है. इसकी झलक प्रभु चावला जैसे पत्रकारों की ओर देखकर समझा जा सकता है. टीवी टुडे जैसे ब्रांड से जुड़े रहे प्रभु चावला पत्रकारिता के जबर्दस्‍त ब्रांड थे, पर नीरा राडिया प्रकरण के बाद टुडे ग्रुप से निकलकर कहां क्‍या कर रहे हैं आज किसी को मालूम नहीं है. भले ही उनके कुछ प्रोग्राम कुछ चैनलों पर चल रहे हों, पर उनकी ब्रांडिंग वैसी नहीं है, जैसी आजतक पर सीधी बातचीत के दौरान हुआ करती थी.

एबीपी न्‍यूज के परेशानी का सबब यह भी है कि रुपर्ट मर्डोक का स्‍टार समूह द्वारा गैर प्रतिस्‍पर्धी समय खतम होने के बाद स्‍टार ब्रांड नेम के साथ ही न्‍यूज इंडस्‍ट्री में कदम रखने की संभावना जताई जा रही है. स्‍टार समूह भी जल्‍द से जल्‍द इन डेढ़ सालों के खतम होने का इंतजार कर रहा है. क्‍योंकि उसके पास अपना एक ब्रांड वैल्‍यू है, उसे बस एक साझीदार की जरूरत है. और उसे साझीदार मिल गया तो उसको अपने ब्रांडिंग पर खास मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी. उसे पता है कि नाम बदलने से बहुत कुछ बदल जाता है. अब सबको एक जून का इंतजार है, लोग देखना चाहते हैं कि नाम बदलने से कुछ बदला कि नहीं?

भास्‍कर ने बताया – ललित नारायण मिश्र थे बिहार के मुख्‍यमंत्री

ललित नारायण मिश्र बिहार के मुख्‍यमंत्री थे. यह कहना है दैनिक भास्‍कर का. अखबार के मंगलवार के अंक में गुरुचरन दास के लेख में इस बात पर चिंता व्‍य‍क्‍त की गई है कि बिहार के मुख्‍यमंत्री रहे एलएन मिश्र यानी ललित नारायण मिश्र की हत्‍या का मुकदमा अभी तक चल रहा है. भास्‍कर की यह गलती अक्ष्‍मय तो है ही साथ ही इस बात को भी रेखांकित करता है कि अखबारों में किस कदर संपादक का पद अप्रासंगित होता जा रहा है. आगे भी इस लेख में कहा गया है कि मुख्‍यमंत्री रहे व्‍यक्ति की हत्‍या के मुकदमे का यह हाल है तो…!

जब कि सच्‍चाई यह है कि ललित नारायण मिश्र कभी बिहार के मुख्‍यमंत्री रहे ही नहीं. 2 जनवरी 1975 में जब समस्‍तीपुर में उनकी हत्‍या हुई थी तब वे केंद्रीय रेल मंत्री थे. बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री जगन्‍नाथ मिश्र के बड़े भाई ललित नारायण मिश्र समस्‍तीपुर में नए रेल लाइन का ओपनिंग करने गए थे तब उनकी बम विस्‍फोट करके हत्‍या कर दी गई थी. इसके बाद पंडित कमलापति त्रिपाठी नए रेलमंत्री बनाए गए थे. नीचे आप भी पढि़ए भास्‍कर में प्रकाशित लेख.


लोकपाल बिल कुछ और समय के लिए टल गया है और अन्ना हजारे की टीम ने एक और आंदोलन करने की बात कही है। लोकायुक्त के मसले और लोकपाल को कौन हटा सकता है, लोकपाल से सीबीआई का रिपोर्टिग संबंध कैसा होगा, जैसे बिंदुओं पर अब भी राजनीतिक दलों में सामंजस्य नहीं है। लेकिन वास्तव में ये सभी बहसें अर्थहीन हैं। वास्तविक समस्या है न्याय प्रक्रिया में होने वाला विलंब। यदि सीबीआई पर लोकपाल का नियंत्रण हो, तब भी अदालतों पर तो उसका कोई नियंत्रण नहीं होगा। निचली अदालतों में अनेक कारणों और अनेक तरीकों से अदालती मामलों को लंबित किया जाता है। यह एक बड़ी समस्या है। जैसा कि एक पुरानी कहावत भी है : देरी से मिलने वाला न्याय अन्याय के समकक्ष ही होता है।

रोज अखबार खोलते ही हमारी नजर न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब के अनेक उदाहरणों पर पड़ती है। मिसाल के तौर पर पूर्व दूरसंचार मंत्री सुखराम के विरुद्ध 16 वर्षो से केस चल रहा है। कुछ माह पूर्व उच्च न्यायालय ने उन्हें दोषी पाया, लेकिन अब वे सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं। सुखराम 85 वर्ष के हैं और उनकी तबियत ठीक नहीं रहती है। यह केस कितने समय तक और खिंच सकता है? एक और उदाहरण लेते हैं : बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और इंदिरा गांधी के दाएं हाथ समझे जाने वाले एलएन मिश्रा की हत्या, जो वर्ष 1975 में हुई थी। हत्या के आरोपी के विरुद्ध 37 वर्षों से केस चल रहा है।

हत्या के समय वह व्यक्ति 27 वर्ष का था, लेकिन अब वह 64 वर्ष का हो चुका है और उसकी भी तबियत अब ठीक नहीं रहती है। अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उसने जिन 39 प्रत्यक्षदर्शियों का हवाला दिया था, उनमें से 31 की मृत्यु हो चुकी है और अब तक 22 विभिन्न न्यायाधीश उस मुकदमे की सुनवाई कर चुके हैं। यदि किसी मुख्यमंत्री की हत्या के मुकदमे की यह स्थिति है तो इस बात की क्या उम्मीद की जा सकती है कि आप और मुझ जैसे सामान्य व्यक्तियों को सही समय पर इंसाफ मिलेगा? पुलिस व्यवस्था की अनियमितताओं के कारण स्थिति और जटिल हो जाती है। पिछले साल १५ लोगों की जान पुलिस हिरासत में चली गई। पुलिस बर्बरता की खबरें आम हो चली हैं। वास्तव में राज्यों की पुलिस व्यवस्था धीरे-धीरे राजनीतिक नेतृत्व का औजार बनती जा रही है और उसका उपयोग अक्सर प्रतिद्वंद्वियों से हिसाब चुकता करने के लिए किया जाता है।

सर्वोच्च अदालत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने हाल ही में कहा कि हालांकि संविधान की धारा 21 के तहत नागरिकों के लिए त्वरित न्याय सुनिश्चित किया गया है, लेकिन व्यवहार में यह इस पर निर्भर करता है कि मुकदमा किस व्यक्ति से संबंधित है। प्रभावी व्यक्ति अपने हितों के अनुसार मामले का त्वरित निपटारा करवा सकता है या उसे लंबित करवा सकता है। न्यायिक प्रक्रिया में देरी के कारण हुआ अन्याय वास्तव में मानवीय भावनाओं के विपरीत है। जब अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय ने अपनी एक रिपोर्ट के माध्यम से हमारे सामने आंकड़े रखे, तब जाकर हमें पता चला कि वास्तव में स्थिति कितनी विकट है।

देबरॉय ने बताया कि वर्तमान में ढाई करोड़ से भी अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं। यदि एक मामले का निराकरण होने में बीस साल लगते हैं तो इन सभी मामलों के निपटारे में ३२४ वर्ष लग जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ३५क्क् केंद्रीय कानूनों में से लगभग ५क्क् अप्रचलित हैं और उन्हें समाप्त कर दिया जाना चाहिए। यही स्थिति प्रादेशिक कानूनों के साथ भी है। देबरॉय की रिपोर्ट से देश को सबसे बड़ा धक्का यह लगा कि न्यायिक प्रक्रिया में विलंब के लिए सबसे अधिक दोषी तो सरकार ही है, जो हर निर्णय पर यांत्रिक रूप से अपील कर देती है। इसका असर व्यक्तिगत मुकदमों पर पड़ता है। समस्या की जड़ यह है कि मुकदमा चलाने का निर्णय निम्न प्रशासनिक स्तर पर लिया जाता है, जबकि उच्चतर स्तर पर उसके विरुद्ध निर्णय लिया जाता है। यदि इस प्रक्रिया को उलट दिया जाए तो शासकीय मुकदमों की संख्या फौरन घट जाएगी।

उस कानून का कोई औचित्य नहीं, जो राज्यसत्ता द्वारा प्रभावी नहीं है। यह राजधर्म का केंद्रीय दायित्व है। ‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार हर समाज को व्यवस्था बनाए रखने और प्रजा की रक्षा के लिए एक सशक्त ‘क्षत्र’ या सत्ताधीश की आवश्यकता होती है। इसीलिए प्राचीनकाल में सम्राटों के लिए ‘दंडनीति’ का बड़ा महत्व हुआ करता था। ‘महाभारत’ के शांतिपर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को इसी की शिक्षा दी थी। ‘दंड’ इतना महत्वपूर्ण राजधर्म है कि उसकी परिकल्पना एक दैवी व्यवस्था के रूप में की गई है, जिसकी उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई थी। मनु ने भी कहा है कि यदि राजा दोषियों को दंडित करने में असमर्थ होगा तो शक्तिशाली लोग दुर्बलों का दोहन करने लगेंगे। ‘नारदशास्त्र’ में कहा गया है कि दंड का भय इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इसी से मनुष्य धर्मपथ पर प्रवृत्त हो सकता है।

यह देखकर हैरानी होती है कि जिस दंडनीति को हमारे प्राचीन ग्रंथों में इतना महत्व दिया गया है, वही आज हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। गरीबों और कमजोरों की रक्षा करने में हमारे सत्ताधीश लगातार असफल सिद्ध हो रहे हैं। वे ‘मनुस्मृति’ और ‘याज्ञवल्क्यस्मृति’ की यह बात भी भूलते जा रहे हैं कि जो राजा दंडनीति का पालन नहीं करता, वह अपने राजधर्म को क्षति पहुंचाता है और उसका पतन अवश्यंभावी है। हमारी पुलिस व न्याय व्यवस्था को आज युधिष्ठिर के इन शब्दों को याद करने की जरूरत है : ‘हे कुरुपुत्र, इस संसार में दंड ही वह धुरी है, जिस पर सब कुछ निर्भर है।’

सामाजिक नियंत्रण के लिए त्वरित न्याय आवश्यक है। साथ ही यह एक आम नागरिक द्वारा कानून के अनुपालन के लिए भी प्रेरक होता है। इसी से अपराधों की लगाम कसी जा सकती है और जनकल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है। मैं कामना करता हूं कि अन्ना और उनकी टीम न्यायिक प्रक्रिया में विलंब की समस्या के समाधान में अधिक से अधिक ऊर्जा लगाए।

लोकतंत्र को बचाने के लिए सच्‍ची पत्रकारिता समय की जरूरत : वेद प्रताप

सिरसा : अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त राजनीतिक विश्‍लेषक वेद प्रताप वैदिक ने कहा है कि देश में लोकतंत्र को बचाने के लिए सच्ची पत्रकारिता आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है इसलिए पत्रकारों को ऐसी पत्रकारिता करके अपनी महती भूमिका निभानी चाहिए। श्री वैदिक मंगलवार को हरियाणा पत्रकार संघ की जिला इकाई द्वारा स्थानीय पंचायत भवन में हिंदी पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित विचार गोष्ठी में जिला भर से आए हुए पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि सच्ची पत्रकारिता के लिए समाचार पत्रों के संपादकों तथा पत्रकारों ने बहुत बड़ी कुर्बानियां दी हैं। ऐसे लोग आज भी पत्रकारों के लिए प्रकाश कुंज बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में प्रभाव डाल रहे बाजारवाद ने समाचार पत्रों और पत्रकारों को भी प्रभावित किया है, लेकिन इस सब के बावजूद हिंदी समाचार पत्रों और पत्रकारों ने हमेशा अपने कर्तव्य का निवर्हन किया है और अपनी कलम को समाज के सर्वाधिक पीडित वर्ग के लिए चलाया है। विचार गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करते हुए गृह राज्य एवं स्थानीय निकाय मंत्री गोपाल कांडा ने कहा कि वे पत्रकारिता को एक मिशन मानते हैं इसलिए हमेशा ही पत्रकारों की समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर रहते हैं। उन्होंने हरियाणा पत्रकार संघ के सदस्य मेनपाल वर्मा को उनके हृदय रोग के उपचार के लिए हर संभव सहयोग करने का आश्वासन दिया।

इससे पूर्व विचार गोष्ठी के विषय का प्रवर्तन करते हुए वरिष्ट साहित्यकार हरभगवान चावला ने कहा कि बाजारवाद के इस दौर में जबकि आदमी की बजाए बाजार प्राथमिकता बन गया हो, पत्रकार के लिए हर तरफ चुनौतियां ही चुनौतियां हैं, फिर भी पत्रकार को समाज को दिशा देने के लिए अपनी कलम का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि पूरा समाज उनकी तरफ आशा की दृष्टि से देखता है। इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक अरूण जौहर ने आजादी के समय से अब तक की पत्रकारिता में आए बदलावों पर विस्तारपूवर्क चर्चा की। हरियाणा पत्रकार संघ के प्रदेश अध्यक्ष केबी पंडित ने अपने संबोधन में संघ के पत्रकारों के हितों में किए गए संघर्ष और उपलब्धियों का वर्णन किया।

समारोह अध्यक्ष और हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधि गोबिंद कांडा ने सभी पत्रकार और पत्रकार संगठनों को मिलजुलकर काम करने का आह्वान किया तथा हरियाणा पत्रकार संघ को हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया। इससे पूर्व संघ के जिला प्रधान लाज पुष्प ने अतिथियों का स्वागत किया और हिंदी पत्रकारिता दिवस पर सभी पत्रकारों को बधाई दी। मंच का संचालन करते हुए प्रदीप सचदेवा ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर हरियाणा पत्रकार संघ के राधेश्याम सोनी, अरूण बंसल, नंदकिशोर लढा, नकूल जसूजा, महेंद्र घणघस सहित जिलाभर से आए पत्रकार मौजूद थे।

जस्टिस काटजू के पत्र पर पाकिस्‍तानी पत्रकार ने की सरबजीत के रिहाई का समर्थन

पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की रिहाई के लिए सीमापार से समर्थन मिला है। पाकिस्तान की प्रेस परिषद के सदस्य ने इस संबंध में दाखिल याचिका का समर्थन किया है। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काट्जू ने पिछले दिनों पाकिस्तान सरकार से सिंह की रिहाई के लिए कई बार अपील की है। काटजू की अपील पर अधिकारियों की तरफ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन लेकिन पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार और वहां की प्रेस परिषद के सदस्य सईद फासेह इकबाल ने भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष के पत्र में रखी गई मांग का समर्थन किया है।

इकबाल ने अपने पत्र में कहा है कि मुझे यह कहने में काफी खुशी हो रही है कि पाकिस्तान और भारत में शांति चाहले वाले नागरिक आपकी अपील की सराहना करते हैं और इसके प्रति समर्थन व्यक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि हम इस विचार से सहमत हैं कि सरबजीत को क्षमा प्रदान करना चाहिए। इस संदर्भ में जस्टि काटजू द्वारा भेजा गया मेल और उसके जवाब में आया सईद फासेह इकाबाल का मेल नीचे।


  From: Markandey Katju <mark_katju@yahoo.co.in>
            Subject:
            To: ihaider45@yahoo.com
            Cc: nasiraslamzahid@gmail.com, beena.sarwar@gmail.com, swapan_5858@yahoo.com, asmalaw@hotmail.com, maheshfilm@gmail.com, "jatin desai jatin" <jatindesai123@gmail.com>, kavisriv@gmail.com
            Date: Thursday, 24 May, 2012, 9:03 AM

Dear Senator Iqbal,
              
We in India are very happy over Dr. Chishty's release and return home.
             
Now I wish to request you all to do something in Sarabjit Singh's case.He is an Indian in a Pakistan jail for 22 years, 21 of which have been on death row. He was convicted for involvement in the Lahore bomb blast of 1990 in which 14 people were killed. I was going through some details of his case and found that the main prosecution witness, Shaukat Salim, later in a taped statement retracted his statement in Court and said that it was given under police pressure. The other evidence against him is said to be his alleged confession, but we all know how confessions are obtained in both our countries (by third degree methods).
             
My own opinion is that he had gone to Pakistan to do some illegal business ( he claimed he had gone to do illegal liquor trade), but he was certainly not involved in the Lahore bomb blast of 1990. Unfortunately the atmosphere in both our countries is so vitiated that often we regard people of each other's countries as devils, and both Dr. Chishty and Sarabjit were victims of this mindset.
             
I sent 3 appeals to President Zardari for granting him pardon , the first through the Pakistan High Commissioner to India Mr. Shahid Malik, the second through Mr. Ansar Burney who met me at my residence in Delhi some time back, and the third through Dr. Chishty who was returning to Pakistan. There has been no response from President Zardari to any of these letters.
              
Sarabjit has been on death row ( not merely in jail) for 21 years, with a damocles sword hanging over his head all the time. This surely is enough to drive anyone mad. Is this not punishment enough (even assuming he was guilty, about which I have grave reservations)?
             
In my opinion the prestige of Pakistan will go up if he is released and sent back to India. That will also help in improving the vitiated atmosphere in our countries.
             
Sarabjit's family members, including his sister Dalbir Kaur and his grown up children have met me in Delhi and I promised them that I will do my best to secure his release and return to India as I think  injustice was done to him (just as I think injustice was done to Dr. Chishty). So please help in any way you can.
             
Regards
              
Justice Katju


From: Syed Faseih Iqbal <sfi1936@yahoo.com>
Subject: Re: Fw:
To: "Markandey Katju" <mark_katju@yahoo.co.in>
Date: Monday, 28 May, 2012, 12:32 AM

CE/Prs/2012/05-47                                                                                    May 27, 2012

My dear Justice Markandey Sahab

I hope this letter finds you in best of health and spirit.

 Thank you for your e-mail of 24 May. I greatly value your concern for all cross border prisoners in both our countries. We in Pakistan acknowledge the positive role you and your colleagues played in paving way for the release of Dr. Khalil Chishti who is now back with his family thanks to a wave of positive confidence building measures including your sincere efforts in this regard.

Your first appeal to the President of Pakistan, sent through Pakistani High Commissioner in India, definitely broke some ice. For I personally am a staunch believer that the issue of cross border prisoners must not be used for political purpose rather only considered purely on humanitarian grounds, I had promptly published a special news comment in my newspaper The Balochistan Times Quetta, strongly supporting your appeal for Sarabhjit’s release and had also written to President Zardari in this regard. Your persistence in this matter is laudable and I take the idea of continuously knocking the door. I have taken note of valid and logical points you have made in your instant e-mail and would like to inform you that I am again going to publish another special news comment in my newspaper in support of your appeal, write another letter to President Zardari and also mobilize public opinion in favour of Sarabhjit’s release through prominent human rights activists in my country.

I am pleased to observe that all peace loving people in Pakistan have appreciated your appeal and expressed their support for it. We share a common opinion that pardon to Sarabhjit Singh, if granted, may prove to be a turning point culminating in a full-fledged peace process between our two countries.

 I have very high hopes that our joint efforts would ultimately lead to Sarabhjit’s release.

 With best wishes and highest regards,

Senator (R)

Syed Faseih Iqbal (H.I, S.I)

Editor-in-Chief

Convener: Pakistan Association of Former Parliamentarians

Member: Press Council of Pakistan

अब आगरा में नहीं दिल्‍ली में जिम्‍मेदारी संभालेंगे कल्‍याण कुमार

आगरा से जोरदार शुरुआत करने वाले सी न्‍यूज चैनल के बारे में खबर है कि प्रबंधन ने कल्‍याण कुमार को अब दूसरे मोर्चे पर लगा दिया है. सूत्रों का कहना है कि उन्‍हें अब मार्केटिंग हेड बनाया गया है, परन्‍तु प्रबंधन इस बात से इनकार कर रहा है. प्रबंधन का कहना है कि कल्‍याण कुमार अब भी चैनल हेड हैं. उन्‍हें समूह की कुछ और जिम्‍मेदारियों को अंजाम देने के लिए आगरा से दिल्‍ली भेजा गया है. कल्‍याण कुमार अब दिल्‍ली में बैठकर अपनी जिम्‍मेदारी संभालेंगे. माना जा रहा है कि प्रबंधन उनका पर कतरने की तैयारी कर रहा है. हालांकि इस संबंध में पूछे जाने पर सी समूह के समाचार निदेशक विवेक जैन कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है. कल्‍याण कुमार को कंपनी के कुछ नई जिम्‍मेदारियों को मूर्त रूप देने के लिए दिल्‍ली भेजा गया है.

हालांकि दूसरी तरफ से खबर आ रही है कि प्रबंधन अब कुछ बदलाव के मूड में दिख रहा है. कल्‍याण कुमार की जगह अमरेंदर राय को हेड बनाए जाने की चर्चाएं आगरा की मीडिया में चल रही है. आउटपुट में भी कुछ बदलाव की तैयारी की जा रही है ताकि न्‍यूज चैनल को फिर से तेवर दिया जा सके. सूत्र ये भी बता रहे हैं कि सी न्‍यूज की आर्थिक स्थिति भी डंवाडोल होती जा रही है. प्रबंधन ने इसे लांच करने में जमकर पैसा लगाया परन्‍तु उसके सापेक्षा आमदनी शून्‍य है. बीते दिनों बिजली चोरी विवाद ने चैनल की साख और गिराया है.

वरिष्‍ठ पत्रकार ने बार लाइब्रेरी को दान कर दी अपनी किताबें

मोग। बुजुर्ग पत्रकार एवं एडवोकेट सरदार अमर सिंह धीमान के 53 साल की वकालत पूरी करने पर अपनी किताबें जिला बार एसोसिएशन के पुस्तकालय को दान कर दी। इस उपलक्ष्य में जिला बार एसोसिएशन की ओर से सोमवार को कोर्ट परिसर में सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। समागम की प्रधानगी डीसी अर्शदीप सिंह थिंद और जिला सेशन जज मोगा कर्मजीत सिंह कंग ने की। पुलिस के आईजी ईश्वर चंद्र समागम में मुख्य मेहमान रहे।

इस मौके पर एसएसपी सुरजीत सिंह ग्रेवाल, एडिशनल जिला एवं सेशन जज हरपाल सिंह, चीफ जुडीशियल मैजिस्ट्रेट राकेश गुप्ता, एडिशनल चीफ जुडीशियल मैजिस्ट्रेट गुरमेल सिंह ढिल्लों, एसडीएम अजमेर सिंह धर्मकोट के अलावा जिला बार एसोसिएशन के प्रधान सुनील गर्ग व बार के पदाधिकारी उपस्थित थे। आईजी ईश्वर चन्द्र ने कहा कि पढ़-लिख कर व्‍यक्ति बड़ा पद तो प्राप्त कर सकता है लेकिन इंसान बनना दूर की बात है। उन्होंने सरदार अमर सिंह की प्रशंसा करते कहा कि उन्होंने अपने जीवन के दौरान इस वकालत के कार्य के साथ-साथ बतौर पत्रकार ईमानदारी से मानवता की सेवा की।

डीसी अर्शदीप सिंह थिंद ने कहा कि अमर सिंह धीमान ने अपने जीवन की पूंजी वकालत के तहत एकत्रित की किताबें जिला बार एसोसिएशन को दान देकर एक नई प्रथा शुरू की है, इससे हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। जिला बार एसोसिएशन के प्रधान एडवोकेट सुनील गर्ग, बोधराज मजीठिया, विजय धीर, जगदीश बावा ने भी समारोह को संबोधित किया। इस मौके पर जिला बार एसोसिएशन और जिला प्रशासन की ओर से अमर सिंह को शाल और सम्मान चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। साभार : अमर उजाला 

ब्रिजेश चौहान का तबादला, बालेंदु एवं राजेंद्र की नई शुरुआत

देर से मिली सूचना के अनुसार अमर उजाला, मुजफ्फरनगर से खबर है कि ब्रिजेश चौहान का तबादला फिरोजाबाद के लिए कर दिया गया है. वे मुजफ्फरनगर के ब्‍यूराचीफ थे. फिरोजाबाद में भी उन्‍हें यही जिम्‍मेदारी दी गई है. चीफ सब एडिटर ब्रिजेश लगभग एक दशक से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. वे लम्‍बे समय से मेरठ यूनिट के बागपत, सहारनपुर आदि जिलों में ब्‍यूरोचीफ रह चुके हैं. ब्रिजेश की गिनती अमर उजाला के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है.

राष्‍ट्रीय सहारा, रायबरेली से खबर है कि बालेंदु मिश्रा की वापसी हो गई है. बालेंदु को अखबार का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. वे इसके पहले भी रायबरेली में राष्‍ट्रीय सहारा के ब्‍यूरोचीफ की भूमिका निभा रहे थे, परन्‍तु आंतरिक विवाद के बाद उन्‍होंने सहारा छोड़ दिया था, जिसके बाद सहारा के सेंकेंड प्रभारी राजेंद्र सिंह को अखबार की जिम्‍मेदारी सौंप दी गई थी. इस बीच राजेंद्र भी राष्‍ट्रीय सहारा से इस्‍तीफा देकर श्रीटाइम्‍स से जुड़ गए थे, जिसके बाद ब्‍यूरोचीफ का पद खाली चल रहा था. अखबार के गिरते सर्कुलेशन से परेशान प्रबंधन ने बालेंदु को वापस लाकर फिर एक बार अपना भरोसा जताया है. बालेंदु ने कार्यभार संभाल लिया है.

बिहार में मीडिया की स्‍वतंत्रता के लिए मुहिम चलाएंगे लालू प्रसाद

पटना। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने सोमवार को आरोप लगाया कि बिहार में वर्तमान नीतीश सरकार मीडिया की स्वतंत्रता का गला घोंटने का प्रयास कर रही है और वह इसके खिलाफ मुहिम चलाएंगे। लालू ने यहां संवाददाताओं से कहा कि नीतीश सरकार सरकारी विज्ञापनों के नाम पर बिहार में प्रेस की आजादी का गला घोंटने का प्रयास कर रही है। राजद इसके खिलाफ मुहिम चलाएगा। पार्टी विभिन्न अखबारों के संपादकों से मिलकर स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम करने का अनुरोध करेगी। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने इसकी छानबीन के लिए एक समिति भी बनाई है।

राजद सुप्रीमो ने कहा कि नीतीश सरकार के कार्यकाल में न निवेश हुआ है न ही एक भी यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ है। शिक्षा के हालात भी बदतर हैं और गुणवत्ता गिरती जा रही है। राजद बुद्धिजीवियों की तथ्यान्वेषण समिति बनाएगा और जनता के समक्ष सचाई पेश करेगा। लालू ने कहा कि पूर्ववर्ती राजद सरकार में मीडिया के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं किया गया। मुख्यमंत्री निवास में मीडियाकर्मियों को बेधड़क आवाजाही की स्वतंत्रता थी। आज कोई पत्रकार सरकार की नाकामी या घोटाले का खुलासा करता है, तो सरकार के दबाव में उस पर कार्रवाई होती है।

पूर्व रेलमंत्री ने कहा कि ‘मैं हमेशा प्रेस की आजादी का हिमायती रहा हूं। कांग्रेस के कार्यकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने जब प्रेस विधेयक पेश किया तो उसका विरोध मैंने किया। प्रेस को ईमानदारी और जवाबदेही के साथ अपना काम करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में सत्तारूढ़ जदयू के विधायक आपराधिक कांडों को अंजाम दे रहे हैं। गोपालगंज में शराब व्यवसायी की हत्या और पटना में रंगदारी वसूली में जदयू के विधायकों का नाम आ रहा है लेकिन मुख्यमंत्री को उनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं हो रही है। केवल 15 वर्ष राजद के कार्यकाल का नाम लेकर कोसने से जनता को धोखा नहीं दिया जा सकता। अपने कर्मों से बिहार की राजग सरकार जाने वाली है।

संजय स्‍वदेश की रिपोर्ट.

अंजना कश्‍यप स्‍टार न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर आजतक जाएंगी!

 

स्‍टार न्‍यूज से खबर है कि चैनल की स्‍टार एंकर अंजना कश्‍यप एबीपी न्‍यूज का हिस्‍सा नहीं बनेंगी. चर्चा है कि अंजना जल्‍द ही आजतक जाने वाली हैं. हालांकि अभी उनके नजदीकी सूत्रों का कहना है कि अभी ये शुरुआती खबर है, परन्‍तु इस बात को बल उसी समय से मिलने लगा था, जब स्‍टार न्‍यूज के एबीपी न्‍यूज के बनने के ब्रांडिंग प्रमोशन में अन्‍य एंकरों के साथ उनकी तस्‍वीर नजर नहीं आई. तभी से कयास लगाया जा रहा था कि स्‍टार की स्‍टार एंकर कहीं और जाने की तैयारी कर रही हैं. अंजना न्‍यूज24 से इस्‍तीफा देकर स्‍टार न्‍यूज पहुंची हैं. इसके पहले वे जी न्‍यूज को भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. 

आजतक चैनल के नए हेड होंगे सुप्रिय प्रसाद

 

आजतक से खबर है कि सुप्रिय प्रसाद को चैनल का नया हेड बनाया जा रहा है. नकवी जी के जाने के बाद सुप्रिय यह जिम्‍मेदारी संभालेंगे. सुप्रीय अभी तक आजतक में आउटपुट हेड की जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. हालांकि उन्‍हें नकवी जी की तरह न्‍यूज डाइरेक्‍टर नहीं बनाया जा रहा है. नकवी जी के पास न्‍यूज डाइरेक्‍टर के रूप में टीवी टुडे ग्रुप के चारों चैनलों की जिम्‍मेदारी थी. वे चारो चैनलों का सुपरविजन कर रहे थे, परन्‍तु सुप्रिय के जिम्‍मे केवल आजतक की जिम्‍मेदारी रहेगी.
 
टीआरपी के मास्‍टर माने जाने वाले सुप्रिय को उनके काम का इनाम मिला है. सूत्रों का कहना है कि अभी इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, परन्‍तु सभी वरिष्‍ठों को इस आशय का मेल भेजा जा चुका है. सुप्रिय अब सीधे अरुण पुरी को रिपोर्ट करेंगे. अब तक आउटपुट हेड के रूप में सुप्रिय तथा इनपुट हेड के रूप में प्रबल प्रताप सिंह नकवी जी को रिपोर्ट कर रहे थे. अब प्रबल सुप्रिय को रिपोर्ट करेंगे. 
 
इसके साथ ही टीवी टुडे ग्रुप के चारो चैनलों के अलग अलग हेड हो जाएंगे. अब तक दिल्‍ली आजतक के हेड अमिताभ, तेज की हेड पूनम शर्मा तथा हेडलाइंस टुडे के हेड राहुल कंवल हैं. इसी क्रम में आजतक के हेड सुप्रिय प्रसाद हो जाएंगे. आजतक के शुरुआती एससी सिंह की टीम में शामिल रहे सुप्रिय प्रसाद को सुलझा हुआ पत्रकार माना जाता है. आजतक से इस्तीफा देने के बाद सुप्रिय न्‍यूज24 चले गए थे. इस बीच हमेशा नम्‍बर एक पर रहने वाला आजतक तक जब इंडिया टीवी से पिछड़ कर दूसरे नम्‍बर पर पहुंच गया था, तब प्रबंधन ने सुप्रिय की वापसी आजतक में कराई थी. 
 
सुप्रिय के वापस लौटने के बाद आजतक केवल एक सप्‍ताह छोड़कर लगातार नम्‍बर एक बना हुआ है. टीवी की दुनिया में कहा जाता है कि सुपिय्र केवल टीआरपी मास्‍टर ही नहीं बल्कि तकनीक के भी जानकार हैं. अपनी टीम से कैसे काम लिया जाता है, इसको भी वे भलिभांति जानते हैं. हालांकि इस संदर्भ में आधिकारिक  प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, परन्‍तु सफलता नहीं मिल पाई. 

आगरा में लुट गई इंग्‍लैंड की पत्रकार

आगरा : भीषण गर्मी में सड़कों पर पसरा सन्नाटा इंग्‍लैड की जर्नलिस्ट के लिए घातक साबित हुआ। फूल सैय्यद चौराहे पर बाइक सवार दो लुटेरों ने इंग्लैंड की जर्नलिस्ट का गले में लटका पर्स लूट लिया। वह रिक्शे से गिर पड़ी, लेकिन पर्स नहीं बचा पाई। घटना से महिला दहशत में आ गई। पर्स में हजारों की नगदी, पासपोर्ट, क्रेडिट कार्ड और कैमरा आदि थे। पर्यटक ने पर्यटन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है।

लंदन की रहने वाली कैट एलिजाबेथ रेडवे ने बताया कि वह छह माह के टूरिस्ट वीजा पर भारत भ्रमण को आई हैं। वह लंदन में जर्नलिस्ट हैं और 25 मई को आगरा घूमने आईं थीं। रविवार को वह रिक्शा चालक को लेकर आगरा कैंट स्टेशन पर दिल्ली का ट्रेन टिकट बुक कराने आई थीं। शाम करीब साढ़े चार बजे वह वापस होटल रिक्शे से लौट रही थीं। उसी दौरान लाल पल्सर बाइक पर हेलमेट पहने दो युवक उनके रिक्शे के पीछे चलने लगे। वह कुछ समझ पाती, उससे पहले ही फूल सैय्यद चौराहे पर एक युवक ने कैट के गले पर लटका पर्स छीन लिया। वह रिक्शे से गिर पड़ीं।

कैट ने शोर मचाया तो आसपास के लोग इकट्ठा हो गए, लेकिन लुटेरों को नहीं पकड़ा जा सका। लुटेरे टक्कर रोड की ओर भाग निकले। पर्यटक ने घटना की रिपोर्ट पर्यटन थाने में दर्ज कराई है। पर्स में छह हजार रुपए, पासपोर्ट, क्रेडिट कार्ड और कैमरा रखा था। ताजनगरी में अपना पर्स लुटने के बाद कैट होटल में फूट-फूटकर रो पड़ी। उसका कहना था कि पर्स में पैसे लुटने से परेशान नहीं है। पर्स में उसकी सबसे कीमती चीज कैमरा थी। उसने छह माह में भारत के हर कोने की तस्वीरों को अपने कैमरे में कैद किया था। वह तस्वीरें उसके लिए बहुत महत्व रखती हैं। साभार : अमर उजाला

‘दलित दस्‍तक’ की लांचिंग तस्‍वीरों की जुबानी

मासिक पत्रिका दलित दस्‍तक की लांचिंग के दौरान पत्रकारिता जगत की कई जानी मानी हस्तियां पहुंची. वरिष्‍ठ पत्रकार एवं चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय, वरिष्‍ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह, इंडिया टुडे के संपादक दिलीप मंडल, भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह, वरिष्‍ठ पत्रकार अशोक वानखेड़े, महुआ न्‍यूज के वरिष्‍ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी, जय प्रकाश कर्दम, अनिता भारती, सुशील कुमार, नीतिन नेतराम, सुनील कुमार सुमन समेत कई जानी मानी हस्तियों ने लांचिंग समारोह में शिरकत की. लांचिंग की कुछ तस्‍वीरें.

जोरदार तरीके से लांच हुई अशोक दास की पत्रिका ‘दलित दस्‍तक’

दलित-पिछड़ों की आवाज को उपर तक पहुंचाने का लक्ष्‍य लेकर चलने वाली मासिक पत्रिका 'दलित दस्‍तक' की भव्‍य लांचिंग रविवार को हुई. गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में आयोजित लांचिंग समारोह में पत्रकारिता से जुड़ी कई नामचीन हस्तियां पहुंचीं. सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में दलित-पिछड़ा हित के संघर्ष को मंच देने का वादा किया गया. पत्रिका के संपादक-प्रकाशक अशोक दास हैं. अशोक दास पिछले छह सालों से पत्रकारिता करते हुए अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं.

पत्रिका के संपादक अशोक दास ने लांचिंग के दौरान बताया कि पत्रिका में हर विषय को जगह देने की कोशिश की गई है. राजनीति, शिक्षा, लाइफ स्‍टाइल, समस्‍या जैसे परम्‍परागत विषयों के साथ फेसबुक के लिए भी कुछ पन्‍ने तय किए गए हैं ताकि इन होने वाले विमर्शों को भी स्‍थान दिया जा सके. मेहमान लेखकों के लिए भी जगह निर्धारित किया गया है ताकि लोग अपनी बात रख सकें. 'दलित दस्‍तक' पत्रिका के संपादकीय मंडल में अवै‍तनिक रूप से वरिष्‍ठ पत्रकार रवीश कुमार, दिलीप मण्‍डल, जय प्रकाश कर्दम, अनीता भारती, सुशील कुमार, नीतिन नेतराम, सुनील कुमार सुमन व प्रो. विवेक कुमार शामिल हैं. पत्रिका की कीमत 20 रुपये है. सालाना सब्‍शक्रिप्‍शन 250 रुपये निर्धारित किया गया है.

दैनिक भास्‍कर के पत्रकार पर हमला, कैमरा-मोबाइल लूटा

: पुलिस ने जबरिया लिखवाया राजीनामा : भिंड जिले के फूप कस्बे के दैनिक भास्कर संवाददाता अरविंद शर्मा को फूप गल्ला मंडी में चल रही गेंहू की सरकारी खरीद के दौरान किसानों के बीच विवाद की सूचना मिली. किसान पहले गेहूं तौलवाने को लेकर एक-दूसरे से उलझे हुए थे. इस सूचना के बाद कवरेज को पहुंचे अरविंद शर्मा जब फोटो खींच रहे थे, उसी समय गल्ला मंडी में मौजूद छोटल्ले, चीने व भरत जाटव ने पत्रकार का कैमरा छीन लिया. इसके बाद उनसे मारपीट करते हुए उनका मोबाइल भी छीन लिया.

दरअसल, ये तीनों मंडी में कर्मचारियों से साठगांठ करके गेहूं बेचने आने वाले किसानों से पैसा लेकर उनका गेहूं पहले तौलवा देते थे. इस काम के लिए ये लोग प्रति ट्राली दो सौ से लेकर पांच सौ रुपये तक वसूलते थे. इसी बात को लेकर वहां विवाद हुआ था कि बाद में आने वाले लोगों की तौल पहले कैसे की जा रही है. जब लुटे-पिटे अरविंद अपनी शिकायत लेकर थाने पहले तो थाना प्रभारी डीए बैस ने उनकी बात सुनने से ही इनकार कर दिया. इतना ही नहीं थानेदार ने अ‍रविंद को रात एक बजे तक थाने में ही बैठाए रखा.

इसी दौरान हमला करने वाले तीनों आरोपियों के पिता के साथ पहुंचे. इसमें वार्ड नम्‍बर चार के पार्षद तथा भरत जाटव का पिता राम जाटव भी था. वो अपने कई महिला तथा पुरुष समर्थकों के साथ थाने पहुंचा था. वहां पर वह कुछ महिलाओं पर पत्रकार द्वारा अभद्रता करने की रिपोर्ट लिखवाने का दबाव बनाने लगा. इसके बाद थाना प्रभारी ने अरविंद शर्मा पर दबाव बनाया कि राजीनामा कर लो नहीं तो तुम्‍हारे ऊपर भी घर में घुसकर महिलाओं छेड़छाड़, मंगलसूत्र लूट और हरिजन एक्‍ट की धारा लगा दी जाएगी.

इससे परेशान अरविंद ने जब एसडीपीओ कमलेश खरपूसे से पूरी बात बताई तो उन्‍होंने भी कोई मदद करने की बजाय हरिजन उत्‍पीड़न एक्‍ट का डर दिखा दिया. कई तरफ से दबाव बनाकर पुलिस ने रात को एक बजे जबरदस्‍ती अरविंद से राजीनामा पर साइन कराकर घर भेज दिया. पुलिस ने ना ही इस मामले में निष्‍पक्ष जांच की और ना ही पत्रकार का कैमरा व मोबाइल वापस कराया. इसके बाद से हमला करने वालों का मन और बढ़ गया है. पत्रकार भी रणनीति बना रहे हैं.

भिड़ से प्रदीप शर्मा की रिपोर्ट.

कारखाना बनता जा रहा है इंडिया टीवी : सुविधाएं नदारद पर काम पूरा चाहिए

न्‍यूज चैनल इंडिया टीवी अब मीडिया संस्‍थान कम फैक्‍टरी ज्‍यादा बनता जा रहा है. पिछले दिनों एचआर व एडमिन हेड पुनीत टंडन ने मेल जारी करके कर्मचारियों को ऑफिस टाइम में चाय पीने बाहर ना जाने कहा था तो अब एक और मेल जारी करके वो मीडिया संस्‍थान को कारखाना-फैक्‍टरी बनाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. पुनीत ने कर्मचारियों को मेल जारी करके कहा है कि ऐसा महसूस किया जा रहा है कि तमाम कर्मचारी अपनी शिफ्ट पूरी नहीं कर रहे हैं. अब लेट आने वाले तथा शिफ्ट पूरी न करने वालों का नाम हाइलाइट किया जाएगा.

पहले मेल के बाद से ही परेशान इंडिया टीवी के कर्मचारियों को इस मेल ने और नाराज कर दिया है. सबसे बुरी बात तो यह है कि यह सब एक पत्रकार के मीडिया संस्‍थान में हो रहा है, जो पत्रकारिता के हर एक पहलू और तरीके से वाकिफ है. पत्रकार टाइम लिमिट में बंधकर काम नहीं करता है. तमाम ऐसे मौके आते हैं कि कोई खबर को लेकर पत्रकार अपने तय शिफ्ट से कई घंटे ज्‍यादा समय अपने संस्‍थान को देता है. पर शायद इन तथ्‍यों को एचआर हेड नहीं देखते हैं. जाहिर बात है कि अगर अक्‍सर ज्‍यादा समय काम करने वाला अपना काम निपटाकर किसी रोज घंटा-आधा घंटा पहले निकल जाए तो इसमें एतराज करने का कोई कारण नहीं दिखता है. 

अमूमन नौकरी के स्‍तर पर खतरनाक माने जाने वाले मीडिया संस्‍थानों के कर्मचारी अपना काम पूरा करके ही निकलते हैं. पुनीत के इस मेल के बाद इंडिया टीवी के कर्मचारियों में काफी नाराजगी है. एक तो उन्‍हें नोएडा के मीडिया हब से दूर बनाए गए आफिस को लेकर वैसे ही कई शिकायतें रहती हैं, उसके बाद चाय पीने पर रोक और समय की पाबंदी ने इनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया है. पत्रकार लगातार काम करते हुए इनोवेटिव नहीं हो सकता. ज्‍यादातर पत्रकार चाय-पान के बाद ही अपने को तरोताजा महसूस करते हैं और बेहतर काम करते हैं. हंसी मजाक करते हैं, जिनसे वे अपने को तरोताजा महसूस करते हैं तथा काम में मन लगाते हैं, पर इंडिया टीवी को बिग बास के घर जैसा बनाए जाने से पत्रकार एवं कर्मचारी तनाव में हैं.

प्रबंधन अपने कर्मचारियों की परेशानियों में भी लगातार इजाफा करता जा रहा है. पैसे देने के मामले में कंजूसी बरतने वाला यह चैनल अपने कर्मचारियों की सुविधाओं में भी ढिलाई बरतता है. कुछ चुनिंदा प्‍वाइंटों से कर्मचारियों को लाने के लिए मात्र एक बस की सुविधा दी गई है, जिससे ऑफिस पहुंचने वाले कर्मचारियों को प्राइवेट बसों की तरह खड़ा होकर यात्रा करनी पड़ती है. मैनेजमेंट कर्मचारियों को सेक्‍टर 85 स्थित कार्यालय ले जाने के लिए नोएडा के होटल रेडिशन के पास बस खड़ी करता है. इसके अलावा कई अन्‍य पिकअप सेंटरों से भी कर्मचारियों को उठाता है. अमूमन हर शिफ्ट में कई कर्मचारी खड़े होकर आते हैं. संस्‍थान के पास अतिरिक्‍त वाहन मौजूद होते हैं उसके बावजूद प्रबंधन पत्रकारों को भेड़-बकरियों की तरह लाने में दिलचस्‍पी दिखाता है. कर्मचारियों को अपने घरों से बस तक पहुंचने में एक घंटे से लेकर दो घंटे का अतिरिक्‍त समय लगता है. दूर रहने वालों का तो ऑफिस आने जाने में ही चार से छह घंटे खराब हो जाते हैं. इसके अलावा अपने शिफ्ट टाइम से पैंतालिस मिनट पहले बस तक पहुंचना भी जरूरी होता है.   

चैनल प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां भी उड़ाता दिखता है. सुप्रीम कोर्ट ने रात में ड्रा‍पिंग-पिकअप सुविधा देने वाले तमाम संस्‍थानों को स्‍पष्‍ट निर्देश दिया है कि इन वाहनों में गार्ड जरूर होने चाहिए, पर इंडिया टीवी में रात की ड्रापिंग के समय कोई गार्ड वाहन में नहीं होता है, जबकि इस दौरान लड़कियां भी मौजूद रहती हैं. सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि कई कई बार लड़कियां और ड्राइवर अकेले बच जाते हैं. इतना संवेदनशील स्थिति होने के बाद भी प्रबंधन को इससे कोई सरोकार नहीं रहता है. कहा तो यहां तक जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उलट कई महिला कर्मचारियों को उनके घर से दूर छोड़ दिया जाता है. इस स्थिति में उनके परिवार वाले आकर ले जाते हैं या लड़कियां खुद अपने रिश्‍क पर घर जाती है. जबकि सुप्रीम कोर्ट का स्‍पष्‍ट निर्देश है कि रात में अपने संस्‍थानों से घर जाने वाली लड़की के अंदर पहुंचने तक वहां मौजूद रहा जाए. 

गौरतलब है कि इंडिया टीवी टीआरपी के मामले में नंबर एक या नंबर टू पर रहने वाला चैनल है और इसके चलते इसे अच्‍छी खासी कमाई भी होती है, लेकिन इसके बाद भी चैनल प्रबंधन अपने कर्मचारियों की सुविधा की दृष्टि से बिल्‍कुल लचर व्‍यवस्‍था बना रखा है. अब उनकी आजादी पर भी लगाम लगाया जा रहा है. लोगों का कहना है कि जो दूसरों की समस्याओं और आजादी के लिए लड़ाई लड़ते हैं वे खुद अब अपने संस्थान में गुलाम बनकर रह गए हैं. कर्मचारियों का आरोप है कि प्रबंधन ने बाहर जाने पर रोक लगा दिया है और कैंटीन में थर्ड क्‍लास का खाना व चाय मिलता है. वे आरोप लगाते हैं कि इसमें भी कमिशनखोरी की जाती है. वे सबसे ज्‍यादा दुखी इस बात को लेकर होते हैं कि एक पत्रकार के मीडिया हाउस में ही इस तरह की हरकत हो रही है और वे लोग आंख बंद करके तमाशा देख रहे हैं.

जागरण में बंपर छंटनी (14) : बरेली में एक तरफ छंटनी-तबादला तो दूसरी तरफ भर्ती

दैनिक जागरण में चल रहे छंटनी के दौर में अपने लोगों को सेट भी किया जा रहा है. बरेली से खबर है कि प्रबंधन एक तरफ से सरप्‍लस स्‍टाफ बताकर तमाम लोगों की छंटनी कर रहा है तो दूसरी तरफ नए सिरे से भर्तियां भी की जा रही हैं. प्रोडक्‍शन विभाग में कार्यरत चार कम्‍प्‍यूटर ऑपरेटरों का तबादला कर दिया गया था, जिसमें तीन लाल प्रभाकर, विजय सिंह यादव व छेदा लाल को मुरादाबाद तथा महिपाल यादव को हल्‍द्वानी भेजा गया था. 

खबर है कि प्रबंधन ने छंटनी के बहाने महिपाल से इस्‍तीफा ले लिया है. पर हैरतनाक बात यह है कि एक तरफ से सरप्‍लस कर्मचारी बताकर चार आपरेटरों का तबादला किया गया तो दूसरी तरफ तीन नए लोगों की भर्ती की गई है. जिन लोगों को रखा गया है उनके नाम हैं – क्षीतिज, संतोष तथा हरीश कुमार. ये तीनों टीडीपी ऑपरेटर हैं. छंटनी के दौरा में ऐसा लग रहा है कि दैनिक जारगण समूह में भांग घुला हुआ है. हर तरफ बदहवासी का आलम है. जो निकाले जा रहे हैं वो भी बदहवास हैं, जो निकाले जाने लायक हैं और बचाए लिए गए हैं वो भी बदहवास हैं.

उल्‍लेखनीय है कि प्रबंधन ने इन तबादलों के अलावा आधा दर्जन एडिटोरियल के साथियों को भी बाहर किए जाने का फरमान सुनाया है. इन लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए थे, परन्‍तु सभी ने इस्‍तीफा देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद इन लोगों के आफिस के अंदर घुसने पर पाबंदी लगा दी गई है. बताया जा रहा है कि ये लोग एक जून के बाद जागरण प्रबंधन के खिलाफ लेबर कोर्ट और कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं.   


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प्रभात खबर बिहार से भी लांच करेगा टैबलाइड ‘पंचायतनामा’

प्रभात खबर ग्रामीण इलाके के पाठकों को लक्ष्‍य करके लांच किए गए अपने पाक्षिक अखबार 'पंचायतनामा' का विस्‍तार अब बिहार में भी लांच करने जा रहा है. झारखंड में इस अखबार को मिली सफलता से गदगद प्रबंधन अगले महीने से इस अखबार को बिहार से भी प्रकाशित करेगा. बिहार में इस अखबार का संपादक मानवेंद्र कुमार को बनाया गया है. इस अखबार की ब्रांडिंग शुरू कर दी गई है. प्रभात खबर में इसका विज्ञापन भी प्रकाशित किया जा रहा है.

टैबलाइड साइज के इस अखबार में पंचायत से संबंधित खबरों के अलावा सूचना, फीचर तथा गावं-गिरांव से जुड़े तमाम खबरों को प्रकाशित करेगा. झारखंड में इस अखबार का प्रकाशन पहले से ही संजय मिश्रा के संपादन में हो रहा है. बिहार में इस अखबार की बुकिंग चालू हो गई है. अखबार के माध्‍यम से पंचायत की शक्ति और क्षमता का ज्ञान भी प्रतिनिधियों को कराया जाएगा, जो पंचायत के अंग होते हुए भी इसके अधिकारों के बारे में नहीं जानते हैं. प्रबंधन का कहना है कि इस अखबार में पंचायत, उसके कार्यों और शक्तियों के बारे में बताने के अलावा इस अखबार में मुखिया एवं अन्‍य सदस्‍यों को जागरुक करने के साथ सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग भी की जाएगी.

दैनिक जागरण में एक और रिपोर्टर निकला गूगल चोर

: 25 दिन पुरानी खबर को उडाकर फिर से छापा : जमशेदपुर दैनिक जागरण में एक और गुगल चोर सामने आया है। जागरण के इस संवाददाता की चोरी भी गुगल ने ही पकड ली है। यह खबर 25 दिन पुरानी है जिसे दूसरे अखबार से उडाकर दोबारा प्रमुखता से जागरण में प्रकाशित किया गया है। खबर है बिना डाटाकार्ड रहिए आन लाइन। रेल में इंटरनेट सेवा को लेकर इसरो की अनापत्ति मिलने के बाद 2 मई को पूरे देश भर में इस खबर को सभी समाचार पत्रों ने छापा था। लेकिन 25 दिन बाद 27 मई को जमशेदपुर दैनिक जागरण ने इसी खबर प्रमुखता से फिर से छापा गया।

बेतरतीब कुप्रबंधन और चोरी की खबरों को उड़ाकर छापने को लेकर हमेशा से रहे चर्चा में रहे जमशेदपुर दैनिक जागरण का एक और और बडा उदाहरण है यह। इस खबर को प्रकाशित करने वाले वहीं संवाददाता हैं, जिन्‍हें दो साल पहले भास्‍कर की जमशेदपुर लांचिंग के दौरान तोप बनाकर उतारा गया था। पर अब यही लोग जागरण पर भारी बोझ बनते नजर आ रहे हैं। चूंकि ये स्‍थानीय संपादक जितेन्‍द्र शुक्‍ला की पसंद हैं लिहाजा इनकी खबरों को न तो इनपुट हेड रोक पाते है न ही आउटपुट हेड। चाहे खबर में कोई तथ्‍य हो या न हो। चाहे खबर मानक पर खरी उतरती हो या न उतरती हो। इनकी खबरों को चुपचाप छापना सबकी मजबूरी होती है।

इससे पूर्व दैनिक जागरण के एक संवाददाता ने नवम्‍बर 11 में प्रबंधन व पाठकों को बेवकूफ बनाते हुए एक ही खबर चार से अधिक बार प्रकाशित कराया था। तब पुरानी ही खबर की हूबहू नकल (अब इंटरनेट पर आदिवासियों की जोड़ी) से प्रकाशित इस खबर में रिपोर्टर की जालसाली को गूगल ने पकड़ लिया है। तब जमशेदपुर के इस रिपोर्टर ने जागरण के शीर्ष नेतृत्‍व को भी बेवकूफ बनाने में कोई कसर नहीं रख छोडी थी और पुरानी खबर को न सिर्फ जमशेदुपर संस्‍करण बल्कि नेशनल संस्‍करण से लेकर झारखंड के रांची एवं धनबाद के संस्‍करणों में भी प्रकाशित करवाने में सफल रहा था। लेकिन गूगल ने एक बार फिर जागरण की चोरी को पकडकर पाठकों को पुरानी खबर परोसे जाने के धंधे का पर्दाफाश कर दिया है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

किशनगढ़ में दो मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट

किशनगढ़ में मुख्य चौराहे पर अवैध निर्माण की सूचना पर कवरेज करने गए मीडिया कर्मियों के साथ रविवार दोपहर को चार-पांच युवकों ने बदसलूकी करते हुए मारपीट की। मारपीट के दौरान युवकों ने मीडिया कर्मियों का कैमरा तोड़ दिया और गले से सोने की चेन छीन ली। मौके पर मौजूद लोगों ने मीडिया कर्मियों को युवकों के चंगुल से बचाया। मौका देखकर युवक फरार हो गए। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उनकी तलाश शुरू कर दी है।

मुख्य चौराहे पर स्थित बाम्बे साइकिल वाले की दुकान के निकट अतिक्रमण की सूचना मिलने पर रविवार दोपहर 3.30 बजे के लगभग एक टीवी चैनल का मीडिया कर्मी इंद्रजीत उबाना व एक अन्य प्रेस फोटोग्राफर शंकर पुरी मौके पर कवरेज करने के लिए पहुंचे थे। जहां हाउसिंग बोर्ड निवासी नरेंद्र सिंधी व उसके चार अन्य साथियों ने दोनों को घेर लिया और हाथ से कैमरा छीन कर धक्का-मुक्की कर बदसलूकी कर दी। मीडियाकर्मियों के विरोध करने पर आरोपियों ने दोनों को अंदर कमरे में ले जाकर मारपीट कर गले से सोने की चेन छीनकर कैमरा तोड़ दिया।

बाद में चारों युवक फिर से कमरे में लाठी-सरिये लेकर मीडियाकर्मियों पर टूट पड़े। मारपीट में दोनों पत्रकारों के चेहरे, सिर व पीठ पर गंभीर चोटें आई। लोगों ने बीच-बचाव कर दोनों को हमलावर युवकों से छुड़ाया। मीडियाकर्मियों ने हमलावर युवकों पर जान से मारने व पुलिस में कार्रवाई करने पर देख लेने की धमकी देने के आरोप लगाए हैं। घटना के बाद आरोपी युवक अन्य साथियों के साथ जीप में बैठकर फरार हो गया। सूचना पर एएसआई औंकार सिंह मय जाब्ता घटना स्थल पर पहुंचे। घायल मीडियाकर्मियों का अस्पताल में मेडिकल कराया गया। पुलिस ने नरेंद्र सिंधी सहित चार युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है। (भास्‍कर)

महादेवी वर्मा के रामगढ़ आवास पर आलोक तोमर की याद में एक जुटान

२६ मई को सुविख्यात कवियत्री स्व. महादेवी वर्मा के रामगढ़ आवास पर जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार अम्बरीश कुमार ने एक छोटे से कार्यक्रम के लिए बुलावा भेजा. वहां जाकर मालूम हुआ कि ये आयोजन दबंग पत्रकार अलोक तोमर की याद में किया जा रहा है, जो कि अक्सर यहाँ आते रहते थे. उन्होंने यहाँ बसने का इरादा भी कर लिया था, पर वो कहीं और जा बसे. अम्बरीश जी की कोशिशों से यहाँ, साहित्यकार विभूति नारायण, न्यूज़ २४ के अजीत अंजुम, आउटलुक की गीता श्री, सीएनबीसी के अलोक जोशी, संतोष, मयंक सक्सेना, आशुतोष, नैनीताल से प्रयाग पांडे, छतीसगढ़ से राजकुमार सोनी आदि ने अलोक तोमर को अपनी अपनी दिल की गहराइयों से याद किया.

हिंदी भाषा और पत्रकारिता पर नए पुराने विचार सामने आये. किस तरह से अलोक तोमर अपने शब्दों का जाल बुनते थे और कैसे वो पत्रकारों की दुनिया में अलग दिखलाई देने लगे. सिख दंगों और सफ़दर हाश्मी की हत्या के बाद अलोक तोमर की लेखनी पर, प्रभाष जोशी से उनके संबंधों पर खासी चर्चा हुई. मेरे लिए ये सौभाग्य की बात थी कि मुझे इन सब के बीच अलोक तोमर जी के एक लेख के जरिये अपनी बात कहने का मौका मिला कि कैसे केबीसी १ की स्क्रिप्ट ने विफलता से जूझ रहे अमिताभ बच्चन को फिर से घर-घर का दुलारा बना दिया. चर्चा का समापन इस बात पर हुआ कि आलोक जी रामगढ़ में बसना चाहते थे. लिहाजा उनकी याद यहाँ हमेशा बनी रहे और हिंदी पत्रकारिता को और ताकत देने के लिए विभूति नारायण जी के माध्यम से कोई नयी पहल की जाये.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

ओम थानवी का अनंतर या धोखे का लोकतंतर???

जनसत्‍ता में 20 अप्रैल को संपादक ओम थानवी ने अपने स्‍तम्‍भ 'अनन्‍तर' में जब 'आवाजाही के हक में' आधा पन्‍ना रंगा था, उसी दिन इस लपकी गई बहस के मंतव्‍य से 'कुछ गर्द हट' गई थी। 14 अप्रैल को मंगलेश डबराल का इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के मंच पर जाना, 16 अप्रैल से मेरे और विष्‍णु खरे के बीच शुरू हुई मेला-मेली, 20 अप्रैल को बहस का जनसत्‍ता में शिफ्ट हो जाना और 27 मई को 'अनन्‍तर' से ही बहस का पटाक्षेप- पूरे डेढ़ महीने की इस कवायद में आखिर हिंदी के बड़े लेखकों, एक हिंदी अखबार के संपादक और खुद इस बहस में शामिल स्‍टेकहोल्‍डर्स ने वास्‍तव में किया क्‍या? आइए, ज़रा फ्लैशबैक में चलते हैं।

ताकि गर्द कुछ हटे : ओम थानवी

होना था क्‍या : मंगलेश डबराल द्वारा राकेश सिन्‍हा के मंच की अध्‍यक्षता एक राजनीतिक मसला था, ठीक वैसे ही जैसे उदय प्रकाश का पुरस्‍कार प्रकरण। एक सेलीब्रेटेड लेखक के सार्वजनिक आचरण पर जो आपत्तियां उठी थीं, वे दरअसल साहित्‍य और राजनीति के अंतर्सम्‍बंधों पर बहस को जन्‍म दे रही थीं। विष्‍णु खरे के जो मेल आए और उसके बाद गुंटर ग्रास की विवादित कविता पर तमाम जगहों पर जो बात फैली, उसके केंद्र में भी एक सेलीब्रेटेड लेखक की राजनीति और साहित्‍य के बीच विरोधाभास/एकता पर ही बहस को होना था।

क्‍या हो गया

आज जब 'जनसत्‍ता' ने इस प्रकरण को अपने तईं निपटा दिया, तो ज़रा देखिए कि पांच हफ्ते में मोटे तौर पर क्‍या-क्‍या हुआ:

– मंगलेश डबराल ने अपने आचरण को 'चूक' बताया।

– विष्‍णु खरे ने जनसत्‍ता (पढ़ें पत्रकारिता) को ओम थानवी के योगदान पर सवाल खड़े किए और बदले में अपना योगदान गिनवाया।

– आनंद स्‍वरूप वर्मा ने मंगलेश डबराल की 'चूक' को ही चूक बता दिया और जनसत्‍ता के संपादक की 'निकृष्‍टता' के कारण उससे सम्‍बंध तोड़ लेने की कहानी बताई।

– वामपंथी लेखक संगठन से संबद्ध चंचल चौहान और के. विक्रम राव जैसे लोग अचानक सक्रिय हो गए।  

– पहली बार मोहल्‍लालाइव ने और दूसरी बार जानकीपुल ने ओम थानवी का 'अनन्‍तर' अपने यहां चिपका कर उसका प्रचार किया।

– जनसत्‍ता ने पिछले पांच हफ्ते में जो भी सामग्री इस प्रकरण पर प्रकाशित की, अधिकांश ब्‍लॉग से उठाई गई थी।

– बाकी जनसत्‍ता और उसके संपादक की 'लोकतांत्रिकता' के बारे में किसने क्‍या कहा, मसलन पंकज सिंह या सुधीश पचौरी, ये सारी बातें सिर्फ ओम थानवी जानते हैं जो उन्‍होंने 27 मई के 'अनन्‍तर' में लिखी हैं।

साफ है कि जनसत्‍ता में जिस तरह बहस को पर्सनल बनाया गया और मूल बहस को सिरे से गायब कर डाला गया, उससे एक बड़ी पुरानी कहावत गलत साबित हो गई, कि 'आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास'। दरअसल, हरि भजन को कोई आया ही नहीं था, सब कपास ओटने आए थे और अपने-अपने हिस्‍से का ओट कर कट लिए।

सबसे ज्‍यादा किसने ओटा

ओम थानवी

खबरों की पत्रकारिता का एक पुराना आसान फॉर्मूला है 'चेज़ दी मनी'। जहां पैसा न हो, वहां इसे इस तरह पढ़ा जाता है कि फायदा किसे हुआ। मूल बहस को छोड़ दीजिए जिस पर किसी ने बात ही नहीं की। जो हुआ, हम उससे हुए फायदे को ज़रा देखें, तो बहुत मेहनत नहीं करनी होगी। ओम थानवी ने बहस जनसत्‍ता में शिफ्ट की, 'विरोधी' विचारों को जगह दी (आनंद स्‍वरूप वर्मा और मंगलेश डबराल, जिन्‍हें साभार लिया गया था) और अंतत: बहस को खत्‍म करने के क्रम में सबको एक साथ निपटा दिया। इस निपटान में उन्‍होंने शरद दत्‍त, पंकज सिंह, सुधीश पचौरी आदि से अपने 'लोकतांत्रिक' होने की पुष्टि करवा ली और अंत में विष्‍णु खरे की लिखी प्रशस्ति को स्‍कैन कर के चिपका दिया। 'लोकतंत्र', 'सहानुभूति', 'गलतबयानी' और 'आत्‍मश्‍लाघा' के इस 'अनन्‍तर' में दरअसल ओम थानवी ने कहावत पलट डाली- कपास तो खूब-खूब ओट लिया, लगे हाथ हरि भी बन गए। बोले तो चित भी मेरी, पट भी मेरी, सिक्‍का मेरे बाप का!  

आइए, अब सिलसिलेवार 'अनन्‍तर' में घुसते हैं 'ताकि गर्द कुछ हटे'।

'मुखौटे' का लोकतंत्र

शुरुआती डेढ़ कॉलम में ओम थानवी लोकतांत्रिकता और उदारता की मुहर अपने ऊपर लगाते हैं। इसके लिए वे आनंद स्‍वरूप वर्मा के लिखे का भी सहारा लेते हैं। दरअसल, ऐसा कर के वे अपनी लोकतांत्रिकता को बहुतों के मुकाबले छोटा ठहरा देते हैं। क्‍या राकेश सिन्‍हा उनसे कहीं ज्‍यादा लोकतांत्रिक नहीं जो मंगलेश डबराल को अपने मंच पर अध्‍यक्ष बना रहे हैं? क्‍या राकेश सिन्‍हा से ज्‍यादा लोकतांत्रिक विभूति नारायण राय नहीं जो अपने तमाम विरोधियों को शरण दिए जा रहे हैं? क्‍या राय से ज्‍यादा लोकतांत्रिक रमन सिंह नहीं जो नामवर सिंह के साथ मंच साझा कर रहे हैं? क्‍या उनसे भी बड़े लोकतांत्रिक नरेंद्रभाई मोदी नहीं जिनके सद्भावना मंच पर मुसलमान नेता विराजते हैं? क्‍या इस देश की बहुदलीय राजनीति कहीं ज्‍यादा लोकतांत्रिक नहीं जहां वाम, दक्षिण, मध्‍यमार्गी सब एक ही संसद में बैठते हैं? क्‍या अमेरिकी प्रशासन उससे भी बड़ा लोकतांत्रिक नहीं जिसके विश्‍वविद्यालयों में नोम चोम्‍सकी सरीखे उसके आलोचक पढ़ा रहे हैं?

यदि लोकतांत्रिकता की ओम थानवी वाली परिभाषा को देखें, तो वे सबसे छोटे कद के लोकतांत्रिक साबित होंगे क्‍योंकि उनके पास अपने विरोधियों को देने के लिए एक ऐसा मंच है जिससे व्‍यापक जनता (पढ़े हिंदी पाठक) का कोई परिचय नहीं। दूसरे, वे ऐसे ही लोकतांत्रिकों की कतार में खड़े नज़र आएंगे क्‍योंकि जिस लोकतंत्र की बात वे कर रहे हैं, वैसा लोकतंत्र दरअसल व्‍यक्तियों की सत्‍ता को कायम करने के लिए अपनाया जाता है। आप देखिए कि एक मंच पर खड़े दो विरोधी विचार के लोगों में से फायदा उसी को होता है जिसकी 'सत्‍ता' बड़ी होती है, छोटी सत्‍ता वाला बदनाम ही होता है। ओम थानवी इस बदनामी को 'असहिष्‍णुता' कहते हैं। जिस कदर विचारधाराओं को कपड़ा बनाने की साजि़शें पिछले कुछ दशकों में चली हैं, जिस कदर किसी विचारधारा के अनुरूप सार्वजनिक आचरण पिछले दिनों में दूभर बना दिया गया है, 'आवाजाही' से परहेज़ शायद ऐसे में कमिटमेंट का एक प्रतीक भर है और मुझे लगता है कि यही एक जेस्‍चर है जिससे आप अपने होने का, अपने स्‍टैंड का सार्वजनिक संदेश देते हैं। ओम थानवी कह रहे हैं इसे भी छोड़ो, यह लोकतांत्रिक नहीं। उनका लोकतंत्र दरअसल झूठा है। यह जन की सत्‍ता नहीं, व्‍यक्ति की सत्‍ता का औज़ार है।

होशियारी देखिए ज़रा, कि जब तक लोगों को आपका चमकदार चेहरा दिख रहा है तब तक आप तर्क और तथ्‍य गिनाते हैं, जैसे ही कोई 'मुखौटा' कह देता है आप भाग्‍यवादी हो जाते हैं। शायद इसीलिए ओम थानवी कहते भी हैं, कि ''…ऐसी प्रतिक्रियाओं को सविस्‍तार प्रकाशित किया (…) तो इसलिए भी कि उदार रवैये की बात 'मुखौटा' न लगे।' यानी ओम थानवी का 'मुखौटा' न दिखे, इसके लिए वे सचेतन प्रयास करते हैं। वे चूंकि हमारे तर्कों को भी समझते हैं, लिहाज़ा डिसक्‍लेमर दे देते हैं, ''…लेकिन दुर्भाग्‍य देखिए कि फिर भी वह कुछ को मुखौटा ही लगी।'' तर्क और भाग्‍यवाद का यह घालमेल कहां ले जा रहा है, सोचिए? जिन्‍हें मुखौटों की पहचान है उन्‍हें तो आपने खारिज कर दिया, और जिन्‍हें मुखौटे दिखते नहीं (या यह कहें कि जिन सबने मुखौटे पहन रखे हैं और नहीं चाहते कि वे दूसरों को दिखें) उन सबको आपने गले लगा लिया। कहीं वह 'मुखौटों' का लोकतंत्र तो नहीं जिसकी बात ओम थानवी कर रहे हैं? यदि ऐसा है, तब तो वे ठीक कह रहे हैं क्‍योंकि लोकतंत्र दरअसल मुखौटा ही तो है जिसे ओम थानवी से लेकर जॉर्ज बुश तक अलग-अलग हितों के लिए लगाते हैं। अब इसका क्‍या किया जाए यदि ओम थानवी की सत्‍ता बेहद छोटी है (शायद कुछेक हज़ार पाठकों की), इसीलिए शायद 'जनसत्‍ता' का नाम आज उनके लिए मुखौटे का काम कर रहा है। यह बात अलग है कि हिंदी का सत्‍ता विमर्श ही इतना टुच्‍चा है कि 'जनसत्‍ता' भी एक सत्‍ताधारी की तरह इसमें नुमाया हो जाता है। ओम थानवी इस लिहाज़ से कुछ भी अलग और मौलिक नहीं कर रहे। वही कर रहे हैं जो निर्मल बाबा करते हैं- जनता (पढ़ें मुट्ठी भर लेखक-पाठक) की आस्‍था के सैलाब में अपना मुखौटा चमकाते हुए अपनी सत्‍ता कायम रखने का काम।                

आनंद स्‍वरूप वर्मा का मामला : झूठ दर झूठ  

पहली ही पंक्ति देखिएगा, ''…बचे आनंद स्‍वरूप वर्मा'', बिल्‍कुल क्राइम ब्रांच के किसी फिल्‍मी अफसर की तरह अगले एनकाउंटर से पहले बोला जाने वाला संवाद। बहरहाल, सबसे पहले ओम थानवी आनंद स्‍वरूप वर्मा के लिखे का इस्‍तेमाल अपने हक़ में करते हैं। उदय प्रकाश वाले प्रकरण में कबाड़खाना का लिंक उन्‍होंने दुरुस्‍त दिया है, लिहाज़ा बरी होने को लेकर उनका आत्‍मविश्‍वास सही भी है लेकिन एक राष्‍ट्रीय दैनिक के संपादक के तौर पर उन्‍हें कौन बरी करेगा? वे लिखते हैं, ''पूंजीवाद और सर्वहारा की बात करने वाले दोनों 'सहारा' की सेवा में थे।'' इससे क्‍या साबित होता है? एक पत्रकार कहां नौकरी करेगा? बनिया के यहां ही न? जनसत्‍ता भी तो बुनियादी तौर पर बनिया की दुकान ही है न? हां, बनिया से पत्रकार नाता क्‍यों तोड़ता है, यह देखे जाने वाली बात हो सकती है। आगे देखिए, ''वर्मा जी की मेहरबानी है कि ‘निकृष्टता’ का उदाहरण यह दिया है उनके किसी लेख में जनयुद्ध शब्द पर मैंने ‘इनवर्टेड कोमा’ लगा दिया, या नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रचंड के हाथों किसी कटवाल की बर्खास्तगी मुझे रास नहीं आई। देर तक दिमाग पर जोर डाले रहा कि नेपाल में एक कनक दीक्षित को छोड़ किसी दूसरे शख्स को ठीक से जानता भी नहीं, यह कटवाल कौन हैं! बाद में गूगल पर देखा कि नेपाल के सेनाध्यक्ष थे।'' दक्षिण एशिया की पहली माओवादी सरकार के पतन की वजह जो व्‍यक्ति बना, उसका नाम भारत के महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्रीय हिंदी दैनिक के संपादक को गूगल पर खोजना पड़ रहा है! ये बात ध्‍यान देने वाली है कि 'इनवर्टेड कॉमा' वाले प्रसंग के बाद भी आनंद स्‍वरूप वर्मा के लेख जनसत्‍ता में छपे थे, बाद में जब माओवादी सरकार गिरी तो एक लेख से कटवाल वाला प्रसंग हटा देने संबंधी ओम थानवी की बात पर आनंद स्‍वरूप वर्मा ने लिखना छोड़ दिया (आनंद स्‍वरूप वर्मा के मुताबिक)। समझ सकते हैं कि जिस 'राष्‍ट्रीय संपादक' को राजशाही समर्थक हिंदूवादी कनकमणि दीक्षित ही नेपाल के नाम पर याद आते हों, और जिन्‍हें वे ठीक से जानते हों, उससे ये उम्‍मीद करना संभव नहीं कि ऐसे राजनीतिक मसले पर वह कुछ समझ रखता होगा जो अमेरिकी सीआइए की हिट लिस्‍ट में पहले नंबर पर रहा।

अगले पैरा में देखिए, '' वर्मा यह नहीं बताते जनसत्ता में आठ बरस उन्होंने ‘इनवर्टेड कोमा’ या अन्य किसी तरह के बाधा के बगैर कैसे लिखा, न यह कि जनसत्ता के अलावा किस राष्ट्रीय दैनिक ने उन्हें लगातार पहले पन्ने पर जगह दी- बाकायदा नाम के साथ, जैसे स्टाफ को देते हैं। हमने उनसे नियमित स्तंभ भी लिखवाया। क्या हमें मालूम नहीं था कि उनकी विचारधारा क्या है, या यह कि उनके लिए देश की किसी भी समस्या से बड़ी चीज नेपाल का माओवादी आंदोलन है?'' ओम थानवी आठ साल का श्रेय ले रहे हैं, जबकि आनंद स्‍वरूप वर्मा जनसत्‍ता के खुलने से ही उसमें लिखते रहे हैं (सती कांड पर दो वर्षों को छोड़ दें तो) और प्रभाष जोशी के ज़माने में दक्षिण अफ्रीका से लगातार दस दिन उन्‍होंने पहले पन्‍ने पर लीड खबर लिखी थी। आनंद स्‍वरूप वर्मा का जनसत्‍ता से जुड़ा होना उनकी विचारधारा के चलते नहीं था बल्कि नेपाल विशेषज्ञ की हैसियत से था। ओम थानवी ने जो भी दावे किए हैं, वे सब आत्‍मश्‍लाघा से प्रेरित हैं क्‍योंकि जनसत्‍ता से जिन लेखकों को प्रभाष जोशी ने जोड़ा था, उन्‍हें कुछ मामलों में आगे बढ़ाए रखना ओम थानवी की मजबूरी भी थी और आनंद स्‍वरूप वर्मा इसी मजबूरी का एक नाम थे क्‍योंकि नेपाल पर कनकमणि दीक्षित तो कम से कम जनसत्‍ता पाठकों की पसंद नहीं हो सकते थे। दूसरे अखबारों का सवाल पूछ कर ओम थानवी ने ओछी बात कर दी। क्‍या आनंद स्‍वरूप वर्मा का नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, लातिन अमेरिका या भूटान पर काम अखबारों की कतरनों का मोहताज है?  

बहरहाल, और देखिए, ''क्या आपको भी लगता है कि उन्होंने एक ‘इनवर्टेड कोमा’ के मुद्दे पर राब्ता तोड़ दिया?'' वास्‍तव में नहीं, क्‍योंकि आनंद स्‍वरूप वर्मा खुद ऐसा नहीं कह रहे, उन्‍होंने तो कटवाल प्रकरण के बाद राब्‍ता तोड़ने की बात अपने पत्र में कही थी, जिसे आज ओम थानवी को गूगल पर खोजना पड़ रहा है। ओम थानवी की राजनीतिक समझ को ''मुट्ठी भर माओवादियों'' के प्रयोग से ही समझा जा सकता है। जब वे कहते हैं कि ''एक स्‍वतंत्र अखबार मुट्ठी भर माओवादियों के संघर्ष को सारी जनता का युद्ध नहीं ठहरा सकता'', तो वे भूल जाते हैं कि माओवादी चुनाव में हिस्‍सा ले चुके हैं और उनकी पार्टी अब भी पिछले चुनावों में जनादेश पाई सबसे बड़ी पार्टी है (हो सकता है भूले न हों, पता ही न हो)। इससे भी बड़ा अपराध ओम थानवी अपने पद के खिलाफ यह कर जाते हैं कि ऐसी बात उस दिन छापते हैं जिस दिन पूरी दुनिया की निगाह नेपाल पर लगी है क्‍योंकि 27 मई ही वहां संविधान लिखे जाने की आखिरी तारीख है। संयुक्‍त राष्‍ट्र से लेकर बीजेपी के नेताओं तक को 27 मई के बाद नेपाल की स्थिति पर गहरी चिंता है, और ओम थानवी उसी दिन पूछ रहे हैं कि भई ये कटवाल कौन है? गलतबयानी, आत्‍मश्‍लाघा और काट-छांट के संपादकीय अधिकार के घालमेल से इस प्रकरण में ओम थानवी ने, मुहावरे में कहें तो, दरअसल अपने ही शब्‍दों को अपने पैरों पर मार लिया है।

चंचल चौहान की बात: भोंथरा संवेदन या बदमाशी (नादानी)  

जब नेपाल समझ में न आए, तो 'विश्‍व पूंजीवाद' कैसे समझ आ सकता है? चंचल चौहान का यह बयान, कि ''अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी दुनिया भर में यह विचार या चेतना फैला रही है कि विचारधारा और विचारधारा से लैस संगठन व्यर्थ हैं'', ओम थानवी के या तो सिर को बिना छुए निकल गया या वे खुद को नादान दिखाने की कोशिश में यह अर्थ लगा बैठे कि ''जनसत्‍ता जनवादी लेखक संघ के विरुद्ध किसी अंतरराष्‍ट्रीय षडयंत्र में शरीक है।'' आप समझिए कि राजनीति-दर्शन का एक सामान्‍य वाक्‍य कैसे भोंथरे संवेदन (या थेथरोलॉजी) का शिकार हो जाता है। चंचल चौहान जो कह रहे हैं, वह संभव है जलेस का नाम लिए जाने से उत्‍प्रेरित हो, लेकिन उनकी बात सामान्‍य तौर पर सही है। इस सामान्‍यीकृत वाक्‍य को भी ओम थानवी पर्सनल बना देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सामने वाला कोई गंभीर बात कह रहा हो और आप सब कुछ सुनने के बाद कह दें कि मुझे भूख लगी है।

मंगलेश डबराल का संदर्भ: सफेद झूठ  

ओम थानवी पहले तो मंगलेश डबराल के स्‍पष्‍टीकरण को 'मज़ेदार' कह के मज़ा ले लेते हैं, लेकिन बाद में खुद फंस जाते हैं। वह कहते हैं, '' बहस मुख्यत: ‘जनपथ’ और ‘मोहल्ला लाइव’ पर चली। तीन सौ से ज्यादा प्रतिक्रियाएं वहां शाया हुर्इं, पर मंगलेश जी का पक्ष कहीं पर सामने नहीं आया।'' यह झूठ है, सरासर झूठ। आनंद स्‍वरूप वर्मा का पत्र जिस पन्‍ने पर 'जनपथ' पर छापा है, उसी के ठीक नीचे मंगलेश डबराल का 'चूक' वाला स्‍पष्‍टीकरण भी मौजूद है (http://www.junputh.com/2012/05/blog-post.html) और ओम थानवी इससे कतई इनकार नहीं कर सकते क्‍योंकि 20 मई के जनसत्‍ता में जो आनंद स्‍वरूप वर्मा का मंगलेश डबराल के नाम पत्र उन्‍होंने छापा है, उसके नीचे 'साभार जनपथ' लिखा है। ज़ाहिर है, ऊपर दिए जिस पेज से उन्‍होंने आनंद स्‍वरूप वर्मा का पत्र उठाया या उठवाया होगा, उसके एक लाइन नीचे लिखे को उन्‍होंने जान-बूझ कर नज़रअंदाज़ कर दिया है- ''मंगलेश डबराल का वह स्‍पष्‍टीकरण, जिसकी प्रतिक्रिया में उपर्युक्‍त पत्र भेजा गया है।'' (यह बात ठीक है कि मंगलेश जी ने यह पत्र मुझे नहीं भेजा था, मैंने इसे अशोक पांडे की फेसबुक वॉल से उठाया था) ज़ाहिर है मंगलेश जी की ओर से अशोक पांडे अपनी दीवार पर 'खांस' आए थे, लेकिन उसकी मुनादी 'जनपथ' पर समय रहते हो चुकी थी। यहां ओम थानवी की लोकतांत्रिकता और सच्‍चाई का झीना परदा चर्र-चर्र कर के फट जा रहा है। उन्‍होंने कबाड़खाना का एक लिंक देकर खुद को बरी किया था, 'जनपथ' का एक और लिंक उन्‍हें कठघरे में खड़ा कर चुका है। उन्‍होंने जब बहस ही खत्‍म कर दी है, तो उनकी सेहत पर इससे फर्क नहीं पड़ता है और वैसे भी उनसे जवाब ही कौन मांगने जा रहा है, जब उन्‍हें नामवर जी की मुअनजोदड़ो पर 'स्‍नेहवश' कही बात 'सबसे उल्‍लेखनीय' लग रही हो। एक बात पूछी जानी चाहिए, क्‍या मंगलेश जी को ओम थानवी काट-छांट का संपादकीय अधिकार नहीं देंगे? क्‍या अब भी वे मंगलेश जी को अपने अ‍धीन ही मानते हैं?

और अंत में आत्‍मरति

विष्‍णु खरे के बहाने अंत में आखिर संपादकीय संभोग का सुख ओम थानवी ने ले ही लिया, लेकिन विष्‍णु खरे की बात की दूसरी अर्थच्‍छवियां शायद वे समझ नहीं सके। विष्‍णु खरे इतने भी मूर्ख नहीं कि ओम थानवी को राजेंद्र माथुर के बाद का अद्वितीय हिंदी संपादक ठहरा दें। ध्‍यान से पढि़ए, उसमें लिखा है, ''राजेंद्र माथुर के बाद 'अपनी तरह के' अद्वितीय हिंदी दैनिक संपादक ओम थानवी के लिए''। क्‍या समझ आया? 'अपनी तरह के' ऐसे ही नहीं लिखा विष्‍णु खरे ने, यह एक कालजयी प्रशस्ति और प्रमाण पत्र है कि कल को ओम थानवी यदि कुछ भी कर बैठें, तब भी 'अपनी तरह के' ही रहेंगे।

मेरा पक्ष

मुझसे मेरा पक्ष किसी ने नहीं पूछा, लेकिन इतना लंबा लिखने के बाद कुछ तो कहना बनता ही है। पहली बात, इतने लब्‍धप्रतिष्‍ठ लोगों ने मिल कर डेढ़ महीने में सिर्फ और सिर्फ कीचड़ का उत्‍पादन किया, जिसे एक-दूसरे पर उछाला। अच्‍छी बात यह हुई कि बाकी लोगों ने तो गर्द हटाने की फिक्र नहीं की, लेकिन ओम थानवी ने गर्द हटाने के चक्‍कर में खुद को धो दिया। उनके लोकतंत्र और उनकी सत्‍ता के साथ सहानुभूति बनती है। जहां तक साहित्‍य और राजनीति के बीच मूल बहस का सवाल है, तो 'जनपथ' पर वह अविराम जारी है अलग-अलग प्रसंगों के रास्‍ते।

आशुतोष भारद्वाज का लेख

अच्‍छी बात बस एक हुई है कि कीचड़ में एक कमल खिल गया है। 27 मई को 'अनन्‍तर' के ही सामने वाले पन्‍ने पर आशुतोष भारद्वाज ने अपने लेख में एक सीख दी है 'पहले अपना घर साफ करें'। चाहें तो ओम थानवी इसे छापने का श्रेय ले सकते हैं और हम उन्‍हें धन्‍यवाद भी देंगे इतना सच्‍चा लेख छापने के लिए, लेकिन हम क्‍यों भूल जाएं कि आशुतोष उनके स्‍टाफर हैं। क्‍या कोई बाहर का व्‍यक्ति लिख कर भेजता तब भी वे ऐसे ही छापते? यह सवाल काल्‍पनिक है, लेकिन मौजूं है। कीचड़ भी अपना, कमल भी अपना। यही है ओम थानवी का लोकतांत्रिक सपना। अनन्‍तर का लोकतंतर ऐसा ही हो सकता है।

अभिषेक श्रीवास्‍तव का यह लेखक उनके ब्‍लॉग जनपथ पर प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.

सिंगर मिलन सिंह पहुंची देशबंधु के गाजियाबाद कार्यालय

गाजियाबाद। आवाज की जादूगर तथा विश्व प्रसिद्व बॉलीवुड डयूल वायस सिंगर सुश्री मिलन सिंह अपने व्यस्त कार्यक्रम से फुर्सत के कुछ क्षण निकालकर नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक देशबंधु के गाजियाबाद राजनगर डिस्ट्रीक सेंटर स्थित प्रादेशिक कार्यालय पहुंची, जहां उहोंने सम्पादकीय, प्रसार तथा मार्केटिंग विभाग के कर्मयोगियों से न केवल तफसील से मुलाकात की बल्कि अखबार के प्रकाशन तकनीक के बारे में भी जानकारी हासिल की।

देशबंधु के प्रादेशिक सम्पादक अशोक निर्वाण ने सुश्री मिलन सिंह द्वारा पूछे गये उनके तमाम प्रश्नों व जिज्ञासा का विसतार से उत्तर दिया। श्री मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में उत्तर प्रदेश राज्य के सर्वोच्च यश भारती सम्मान से सम्मानित सुश्री मिलन सिंह ने इस अवसर पर कहा कि वह पहली बार किसी समाचार पत्र के कार्यालय में आयी है। उन्हें मालूम नहीं था कि अखबार के कार्यालय में किस प्रकार काम होता है, आज देशबन्धु के कार्यालय में आकर उन्हें पता चला कि समाचार संकलन से लेकर अखबार के प्रकाशन तक का सफर कितना जोखिम भरा है। उन्होंने देशबन्धु समाचार पत्र समूह के सभी छहो संस्करणों के ई-पेपर को इंटरनेट पर भी खोल कर पढ़ा। उन्होंने कहा कि छात्र जीवन से ही उन्हें डयूल वायस सिंगर के रूप में गाना गाने के अलावा पत्र पत्रिकाओं के पढ़ने तथा लिखने का शौक रहा है। उन्होंने कहा कि वह आज देशबन्धु कार्यालय में आकर आत्मविभोर हो गयी है।

जागरण में बंपर छंटनी (13) : गीता डोगरा को निकालकर संवेदना शब्‍द की भी हत्‍या कर डाली प्रबंधन ने

अपनी निर्लज्जता का क्रूर प्रदर्शन करते हुए जालंधर जागरण के समाचार संपादक शाहिद रजा ने 'छंटनी बंपर' के तहत जालंधर यूनिट की संस्थापक टीम की सदस्य तथा वरिष्ठ पत्रकार, कवयित्री गीता डोगरा का शिकार कर दिया है। उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। महज तीन महीने पहले श्रीमती गीता डोगरा के पति इंजीनियर मनमोहन शर्मा का निधन हो गया था और उन्हें अभी नौकर की सख्‍त जरूरत थी। अभी तो उनके पति की पेंशन भी शुरू नहीं हुई थी कि उनकी नौकरी खा ली गई है।

तुर्रा यह कि उन्हें कहा गया है कि अढ़ाई माह पहले हुए एक टेस्ट में वह पास नहीं हो सकीं। जिस महिला के पति की मौत 20 दिन पहले हुई हो और उससे अचानक कह दिया जाए कि वह टेस्ट दे, क्या कोई भी औरत यह कर सकेगी? शाहिद रजा को उनकी मानसिक स्थिति का कोई आकलन नहीं हो सका? पत्रकारों को संवेदनशीलता के साथ पत्रकारित करने का सबक सिखाने वाले ये लोग आखिर क्या सोच रहे हैं? 1999 में जब जागरण की शुरुआत होनी थी तब श्रीमती डोगरा के फीचर का प्रभार संभाला था और सालों साल तक सैकड़ों साहित्यकारों को जागरण के साथ जोड़ा। बाद में उन्हें नीचा दिखाया जाने लगा और पूरी कोशिश की गई कि वह स्वयं छोड़ दे।

पंजाब में शुरुआती दौर में रखी गई समूची टीम की छुट्टी की जा चुकी है और रिश्तेदारों को सजाया बढ़ाया जा चुका है। जो किसी सीजीएम का मामा, साला, साढू, भांजा, भांजे का साला, साले का साला नहीं है वह जागरण के पंजाब के किसी यूनिट में काम ही नहीं कर सकता? श्रीमती गीता डोगरा जैसी वरिष्ठ पत्रकार को तब निकाला गया है जब उनकी रिटायरमेंट में महज एक साल बाकी था और अभी अभी वह अपने पति को खो चुकी हैं। शाहिद रजा की टीम में स्वयं उनके समेत कुछ ऐसे हीरे भी हैं जिन्हें अभी तक पंजाब के सारे जिलों के नाम और मंत्रियों के विभागों की जानकारी भी नहीं है…। पत्रकारों को क्या बताया जाएगा कि किस आधार पर इन लोगों की बलि ली जा रही है?

ऋषि कुमार नागर


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आरोप-प्रत्‍यारोप, कहासुनी के बीच 21 जून तक चुनाव कराने का निर्णय

: यूपी मान्‍यता प्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव को लेकर मचा घमासान : यूपी के बड़े पत्रकारों की बैठक में लात-जूता तो नहीं चला, मगर यह होने से बस कुछ पायदान ही बच पाया। तल्‍ख आलोचना, तनाशाही और दलाली के गंदे आरोप, बहिर्गमन और परस्‍पर शर्म-शर्माना जैसी कवायदों के बीच विधानसभा भवन के प्रेसरूम में दो घंटा तक चली इस बैठक में चौथी बार तय किया गया अब 21 जून तक उप्र मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति का चुनाव हर हाल में करा लिया जाएगा। बैठक के बीच में ही एक धड़े ने इस बैठक को अवैध करार देते हुए बैठक से खुद को अलग कर दिया।

रविवार शाम 4 बजे प्रेसरूम में पत्रकारों का जमावड़ा हुआ। समिति की चुनाव को अब तक तीन बार टालने की घटना के खिलाफ हेमंत तिवारी के गुट ने यह बैठक बुलायी थी। लेकिन बाकी गुट भी इस बैठक में पहुंच गये। बमुश्किलन 36 पत्रकारों के बैठने की व्‍यवस्‍था प्रेसरूम में डेढ सौ से ज्‍यादा पत्रकार पहुंच गये थे। नतीजा, बाकी लोगों को रूम से बाहर ही सुनवाई का जायजा लेना पड़ा।

बैठक की कार्यवाही पर पहले व्‍यवधान इसके अध्‍यक्षता के विवाद पर पड़ा। हिसाम सिद्दीकी की सदारत को हेमंत तिवारी का गुट सहन नहीं पाया। हेमंत का कहना था कि जब समिति का कार्यकाल खत्‍म हो चुका है तो हिसाम को अध्‍यक्षता का अधिकार नहीं रह गया है। क्‍यों कि समिति के चुनाव का कार्यक्रम समयबद्ध तक पूरा करने में असफल रहे। इस ऐतराज पर हिसाम ने अध्‍यक्षता की सीट छोड़ दी, लेकिन इससे एक नया ऐतराज खड़ा हो गया। रामदत्‍त तिवारी और शरद ने बैठक में शामिल करने से इनकार करते हुए कहा कि वे लोग समिति से पदाधिकारी हैं, और समिति को अमान्‍य करने की कवायद के बाद से उनका इस समिति की बैठक में शामिल का औचित्‍य नहीं है। लेकिन इन पदाधिकारियों को जैसे ही मनाया गया, हेमंत तिवारी ने बैठक में शामिल करने से इनकार कर दिया। खूब चले आरोप। प्रमोद गोस्‍वामी ने बीचबचाव करते हुए कहा कि समिति पदाधिकारियों की करतूत के चलते हम भी शर्मिंदा हैं और दूसरों को भी शर्म करनी चाहिए। हालांकि उनका कहना था कि अब शिकवा-गिला छोड़कर समिति के चुनाव पर ध्‍यान देना चाहिए।

समिति में अजय कुमार का कहना था कि इस समिति से लाख दर्जा बढि़या तो जिला समिति है, जिसने शहर में कई कार्यक्रम आयोजित कर लिया। दूसरों का भी कहना था कि अब समिति की साख बचाने जरूरत है। एक पत्रकार ने यह सवाल उछाल कर सनसनी उठा दी कि पहले हजरतगंज के सौंदर्यीकरण के चलते 140 करोड़ रुपयों की दलाली के आरोपों पर भी समिति चर्चा करे, जिसमें कई कथित और ईमानदार पत्रकारों के दामन और चेहरे पर दाग पड़े दिख रहे हैं। सवाल यह भी किया गया कि समिति के चुनाव के पदाधिकारियों को भविष्‍य में मुख्‍यमंत्री, मंत्री, अधिकारियों से मिलने से रोका जाए ताकि ऐसे पदाधिकारी दलाली के बजाय समिति सदस्‍यों के हितों के लिए कुछ ठोस कर सकें।

सुभाष मिश्र, सिद्धार्थ कलहंस, प्रांशु मिश्र, संजय शर्मा, काशी यादव, राजकुमार सिंह आदि सदस्‍यों ने समिति और उसके चुनाव की क्रियाविधि पर भी सवाल उठाये। हैरतनाक बात तो यह रही कि समिति में हसीब सिद्दीकी जैसे लोगों ने भी पहली बार बैठक में भाग लिया। आखिर तय किया गया कि हर हालत में 21 जून तक चुनाव हो करा लिया जाएगा।

लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट. कुमार सौवीर यूपी के जाने माने पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर, हिंदुस्तान, महुआ, एसटीवी समेत कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. सौवीर अपने बेबाक बयानों और दमदार लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : पुलिस ने डीएवीपी से मांगा कई सवालों के जवाब

मुंगेर। 200 करोड़ के दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में आरक्षी अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में आरक्षी उपाधीक्षक (मुख्यालय) अरुण कुमार पंचालर की ओर से दी गई पर्यवेक्षण रिपोर्ट में बिहार पुलिस ने भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के ‘‘विज्ञापन एवं प्रचार निदेशालय (डीएवीपी)'', नई दिल्ली को भी जांच के दायरे में अब ले लिया है। उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों ने आज बताया कि पुलिस उपाधीक्षक ने डीएवीपी से निम्नवर्णित कानूनी बिन्दुओं पर प्रतिवेदन प्राप्त करने का लिखित आदेश जांचकर्ता को जारी कर दिया है।

मुंगेर पुलिस ने डीएवीपी, नई दिल्ली को इन बिंदुओं पर जवाब देने को कहा है कि –

1- वर्ष 2001 में किसी भी समाचार पत्र में सरकारी विज्ञापनों के प्रकाशन की क्या प्रक्रिया थी? डीएवीपी से मार्ग-निर्देशिका को प्राप्त करें।

2- डीएवीपी ने बिहार के भागलपुर और मुजफ्फरपुर से मुद्रित/प्रकाशित दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ को किस आधार पर एवं किस तिथि से सरकारी विज्ञापन प्रकाशित करने की स्वीकृति दी?

3- क्या भागलपुर और मुजफ्फरपुर से मुद्रित/प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित होने वाले सरकारी विज्ञापनों के लिए पटना से प्रकाशित होनेवाले विज्ञापनों के समानान्तर ही ‘दर‘ का निर्धारण किया गया या उन दोनों स्थानों के लिए अलग से ‘विज्ञापन दर‘ का निर्धारण किया गया?

बिहार पुलिस द्वारा डीएवीपी, नई दिल्ली से उपर वर्णित कानूनी बिन्दुओं पर प्रतिवेदन मांगने के लिखित आदेश जारी होने के बाद हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले की जांच की आंच अब डीएवीपी, नई दिल्ली कार्यालय पहुंच गई है। उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों ने बताया कि ज्यों-ज्यों हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले की जांच बढ़ती जा रही है, घोटाले के नए-नए पहलू और घोटाले के नए-नए संरक्षणकर्ताओं के चेहरे भी सामने आ रहे हैं।

स्मरणीय है कि पर्यवेक्षण रिपोर्ट में सूचक मंटू शर्मा के द्वारा मुंगेर न्यायालय मे दर्ज परिवाद-पत्र में लगाए गए सभी अभियोग को सभी नामजद अभियुक्तों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया सत्य घोषित कर दिया है। पुलिस ने पर्यवेक्षण रिपोर्ट में नामजद अभियुक्तों क्रमशः मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष एवं ऐडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भरतीया, मुद्रक और प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और स्थानीय संपादक बिनोद बंधु के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 471, 476 और प्रेस एण्ड रजिस्‍ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धारा 8(बी), 14 और 15 के तहत लगाए गए सभी अभियोग को प्रथम दृष्टया सत्य पाया है। अब पुलिस इन सभी नामजद अभियुक्तों के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा चलाएगी। इस मुकदमे में अभियुक्त बच नहीं सके, पुलिस ने सूचक सहित चार गवाहों की गवाही भी मुंगेर न्यायालय में अभियोग के समर्थन में धारा 164 के अधीन करा चुकी है। अब इस सनसनीखेज आर्थिक अपराध से जुड़े कांड मे पुलिस को न्यायालय में अभियोग-पत्र समर्पित करना है।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नं.- 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

दैनिक भास्‍कर में सोमेश, अशोक एवं धर्मेंद्र की जिम्‍मेदारियां बदली

दैनिक भास्‍कर, हरियाणा से खबर है कि तीन पत्रकारों की जिम्‍मेदारियों में बदलाव करते हुए उन्‍हें इधर से उधर किया गया है. भिवानी में रिपोर्टर के रूप में कार्यरत सोमेश चौधरी का तबादला चरखी दादरी के लिए कर दिया गया है. सोमेश को ब्‍यूरोचीफ की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. चरखी दादरी के ब्‍यूरोचीफ अशोक कौशिक को भिवानी बुला लिया गया है. वहीं भिवानी के ब्‍यूराचीफ धर्मेंद्र कंवारी को हिसार का ब्‍यूरोचीफ बनाकर भेजा गया है. जबकि वहां पहले से ही राकेश क्रांति ब्‍यूरोचीफ के रूप में कार्यरत हैं. अभी यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया है कि ये दोनों किसको रिपोर्ट करेंगे. गौरतलब है कि कुछ रिपोर्टरों से विवाद होने के बाद राकेश क्रांति चर्चा में आए थे.

जागरण में बंपर छंटनी (12) : गोरखपुर से तीन की विदाई, दस अन्‍य निशाने पर

दैनिक जागरण में बम्पर छंटनी अभियान में गोरखपुर में भी तीन पत्रकारों की बलि दे दी गयी. अभी दस और पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाने की कार्रवाई जारी है. खबर है कि आरडी दीक्षित, बनमाली त्रिपाठी, जितेन्द्र शुक्ल से इस्‍तीफा लिया गया है. आरडी दीक्षित, गोरखपुर में समीक्षा का कार्य देखते थे. बनमाली त्रिपाठी महाराजगंज में थे और जागरण के धुरंधर पत्रकारों में शुमार थे. जितेन्द्र शुक्ल संत कबीर नगर में रिपोर्टर थे. कहा जा रहा है कि दीक्षित रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन पर थे. जागरण उन्हें समीक्षा के लिए रखा था. महराजगंज में बनमाली त्रिपाठी लिखाड़ रिपोर्टर थे. वहां के ब्यूरो प्रभारी ने अपनी कुर्सी बचाने में बनमाली की बलि दिलवा दी.

इनके अलावा जिन लोगों का नाम छंटनी की लिस्‍ट में बताया जा रहा है, उनमें देवरिया से संजीव शुक्ला, गोरखपुर से धर्मेन्द्र पाण्डेय, मनोज त्रिपाठी, सतीश शुक्ला, वीरेंद्र मिश्र दीपक, योगेश श्रीवास्तव, बस्ती से दिनेश कसेरा, सिद्धार्थनगर से रितेश वाजपेयी व दीपक श्रीवास्तव तथा महराजगंज में केदार शरण मिश्र का नाम है. इनमें से सतीश शुक्ला और दिनेश कसेरा ने लंबा  जैक लगाया है. यहाँ यह भी बताते चले कि गोरखपुर जागरण से शैलेन्द्र मणि के साथ ४५ लोग तो पहले ही जनसंदेश टाइम्‍स चले गए थे, जिसके बाद जागरण कर्मचारियों के अभाव से जूझ रहा था. बाद के दिनों में वरिष्‍ठ पत्रकार शम्भू दयाल वाजपेयी और महाप्रबंधक चन्द्रकान्त त्रिपाठी ने भी जागरण की नीतियों से खफा होकर खुद इस्तीफा दे दिया था.

दैनिक जागरण में बम्पर छंटनी अभियान से पत्रकारों के हलक सुख गए हैं. कहा जा रहा है कि छंटनी के लिए अभी हाल ही में हुई परीक्षा को आधार बनाया गया है. परीक्षा में तीन लोग नकल के दोषी पाए गए थे, जबकि तीन लोगों का अंक 30 फीसदी से कम था. कहा जा रहा है कि निकाले जाने की भनक लगते ही जो स्थायी कर्मचारी हैं वे कोर्ट जाने की तैयारी में लग गए हैं. कई लोग यह भी कह रहे हैं कि नाकाबिल साबित हो चुके और चाटुकारिता का पर्याय बने अपने लोगों को बचाने के लिए वे जागरण के निष्‍ठावान लोगों की विदाई सुनिश्चित कराई जा रही है. स्थानीय सम्पादक उमेश शुक्ला पर यह भी दबाव बनाया जा रहा है कि यदि छंटनी की सूची संशोधित नहीं हुयी तो गोरखपुर में कुछ भी हो सकता है. अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि इनपुट हेड सतीश शुक्ला के इशारे पर चल रहे संपादक ने उन्हें बचाने के लिए मालिकानों से मनुहार की है. जबकि सतीश शुक्‍ला परीक्षा में फेल हो चुके हैं. छंटनी में भेदभाव को लेकर गोरखपुर के पत्रकारों में काफी रोष है.


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आई नेक्‍स्‍ट को मिला वैन इफ्रा अवार्ड

नई दिल्ली । जागरण समूह का बाईलिंगुअल काम्पैक्ट साइज डेली आई नेक्स्ट ने व‌र्ल्ड यंग रीडर न्यूजपेपर आफ द ईयर-2012 का खिताब हासिल कर नया इतिहास रच दिया है। व‌र्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज पेपर्स एंड न्यूज पब्लिशर्स [वैन इफ्रा] की तरफ से आई नेक्स्ट को युवाओं के बीच सबसे बेहतरीन काम करने के लिए इस अवार्ड से नवाजा जाएगा। वैन इफ्रा 120 देशों के 18,000 से प्रकाशन और 15,000 से ज्यादा वेबसाइट्स का संगठन है। आई नेक्स्ट को यह अवार्ड 10 जुलाई को बैंकाक में एशिया पैसिफिक यंग रीडर सम्मिट के दौरान दिया जाएगा।

जागरण प्रकाशन लिमिटेड के काम्पैक्ट डेली आई नेक्स्ट के भारी बस्ता अभियान को भी जनसेवा श्रेणी में अवार्ड के लिए चुना गया है। यंग रीडर अवार्ड ज्यूरी ने आई नेक्स्ट की लोक गायन प्रतियोगिता 'इकतारा' की सराहना करते हुए इसे युवाओं के मनोरंजन का नायाब तरीका माना। यूपी, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड के प्रमुख शहरों से प्रकाशित आई नेक्स्ट 2010 में भी वैन इफ्रा के अतिरिक्त कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय अवार्ड हासिल कर चुका है। साभार : जागरण

चोरी के आरोप में फर्जी पत्रकार समेत आधा दर्जन पुलिस गिरफ्त में

रायपुर। तेलघानी नाका इलाके में चोरी के लैपटॉप को बेचने की फिराक में घूम रहे दो इंजीनियरिंग छात्र सहित कुल छह आरोपियों को क्राइम ब्रांच की टीम ने धर दबोचा। पकड़े गए आरोपियों के कब्जे से लैपटॉप, सोने के जेवरात व घरेलू गैस सिलेण्डर जब्त किया गया है, जिसकी कीमत डेढ़ लाख रुपए बताई गई है। वहीं गिरफ्त में इंजीनियरिंग छात्र से फर्जी प्रेसकार्ड जप्त किया गया है, जिसे अपराध छिपाने के लिए प्रयुक्त कर रहा था।

क्राइम ब्रांच थाना प्रभारी रमाकांत साहू ने बताया कि लैपटॉप व बूफर म्यूजिक सिस्टम चोरी में मैट्स युर्निवसिटी के दो इंजीनियरिंग छात्र सहित 3 को पकड़ा गया है। पकड़े गए छात्र युर्निवसिटी में बीई के छात्र बताए गए है। उनका कहना था कि इसमें आरोपी कृष्णमणि शर्मा उर्फ विपिन अवस्थी पिता अश्विनी शर्मा (21 वर्ष) निवासी बाणसागर शहडोल मप्र हाल प्रेमनगर मोवा को पकड़ा गया है। साथ में साथी छात्र भावेश पाण्डे पिता विधान पाण्डे (22) मयूर क्लब सिविल लाइन व विजय कुमार उर्फ बिट्टू (22) शिवमंदिर के पास पंडरी को गिरफ्तार किया गया है, जो साथी छात्र आशुतोष कुमार के कमरे से बूफर सिस्टम व लैपटॉप को चोरी किया था। बताया गया है कि गिरफ्तार आरोपी में कृष्ण मणि शर्मा के पास तीन फर्जी प्रेस कार्ड जप्त किए गए हैं, जिसे आरोपी गुनाह छिपाने के लिए किया करता था। पूछताछ में आरोपी कम्प्यूटर दुकान से स्केन कर कार्ड को चोरी करने के बाद तैयार करके पास में रखा था। आरोपियों से जप्त सामान की कीमत 72 हजार रुपए बताई गई है। साभार : देशबंधु

शेषनागी संतुलन के साधक नकवी जी

सितंबर 2010, अयोध्या पर लखनऊ बेंच का अहम फैसला आना था। आजाद भारत में ये अपनी तरह का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामला था। ऐसे मौके पर खबर को सबसे पहले औऱ साहुल सूते में दुरुस्त रखने की चुनौती खबरिया चैनलों के सामने सबसे बड़ी कसौटी थी । आजतक इकलौता चैनल था जिसने प्रोड्यूसरों औऱ रिपोर्टरों की एक टीम बनाई औऱ उनका वर्कशॉप लगाया । सबको पुलिंदा थमाया गया पढने के लिये औऱ ये बताया भी गया कि मामला क्या है, कितनी पार्टियां हैं औऱ पेंच कहां कहां है।

फैसला जब आया तो आजतक ने जुलाहे की तरह फैसले का रेशा रेशा अलग अलग रख दिया । जस्टिस शर्मा, जस्टिस अग्रवाल और जस्टिस खान कहां कहां सहमत और कहां कहां असहमत रहे – ये ब्योरा भी आजतक की टीम ने ही देश को सबसे पहले दिया । ये बात मैं दावे से इसलिये कह रहा हूं क्योंकि न्यूजरुम में सारे चैनल चल रहे थे और सबपर मेरी खुद नजर थी । खैर, अयोध्या मामले पर इस बेहद अहम फैसले को खबर की जिस शक्ल में आजतक पर देश देख रहा था उसके सूत्रधार थे न्यूजरुम में खड़े न्यूज डायरेक्टर कमर वहीद नकवी । हेडलाइंस औऱ पैकेज तो छोड़िए उस वक्त ब्रेकिंग न्यूज से लेकर , ग्राफिकस प्लेट पर लिखी गयी खबर तक पर उनकी बारीक नजर थी। पैनल पर खुद कई बार खड़ा होकर उन्होंने वो तमाम निर्देश दिए जो जरुरी थे ।

इस वाकये का जिक्र मैंने इसलिये किया क्योंकि खबरों को लेकर जो समझ औऱ संजीदगी संपादक में होनी चाहिए नकवी जी उसका संस्थागत स्वरुप हैं। वैसे चैनल के ज्यादातर साथियों की तरह मैं उन्हें दादा ही कहता रहा हूं लेकिन उन्हें यहां नकवी जी ही रहने दिया जाए तो अच्छा रहेगा । हां, चुनाव आ जायें फिर आप उन्हें देखिए। किसी को उकेरने-टटोलने से उन्हें परहेज नहीं औऱ सब्जीवाले- ठेलेवाले से भी उसकी राय लेने से गुरेज नहीं। स्ट्रिंगरों तक को खुद फोन लगाकर गांव-जवार में हवा किस ओर है इस बारे में पूछ परख शुरु कर देंगे । न्यूजरुम, कई बार चुनावी चर्चा का अखाड़ा बन जाता औऱ मीटिंग में शोज कितने और कब-कब होंगे ये तय करने में दिमाग की नसें तन जातीं ।

पिछले ही लोकसभा चुनाव में नकवी जी का अनुमान था कि कांग्रेस को 180-190 सीटें आयेंगी लेकिन आजू बाजू के सारे चेहरे पढने के बाद जब उन्हें लगा कि बाकियों को उनका अनुमान मजाक लग रहा है तो उन्होंने शर्त लगा ली। एक बक्सा रखा गया। हर आदमी कांग्रेस औऱ बीजेपी की सीटों की अनुमानित संख्या पर्ची पर लिखकर अपने नाम के साथ उसे बक्से में डालता गया । पर्ची डालने के बाद हजार रुपये भी रख देने थे । कुल 22 लोगों ने दांव खेला औऱ जब नतीजा आया तो नकवी जी के चेहरे पर जो मुस्कान थी वो मानो हर किसी से कह रही थी – बेटा नकवी की समझ से पंगा मत लेना। वैसे मैं यहां ये जरुर बता दूं कि जब डिब्बा खुला तो यूपीए की 206 सीटों के सबसे नजदीक जिस शख्स का अनुमान था वो आजतक के असाइंमेंट हेड शैलेश थे जिन्होंने अपनी पर्ची पर कांग्रेस-202 लिखा था। नकवी जी का अंदाजा हर चुनाव में नतीजों के बहुत करीब रहा है औऱ इस बात को आजतक की पूरी टीम जानती है। ये इसलिये नहीं कि वो लाल बुझक्कर हैं बल्कि वो खांटी पत्रकार हैं जो आंख नाक कान खोलकर रहते हैं, हर उम्र, हर तबके औऱ हर हलके के लोगों से गपियाते रहते हैं।

मुझे लगता है कि वो न्यूज इंडस्ट्री के एकमात्र न्यूज डायरेक्टर हैं जिनका दरवाजा ट्रेनी और इंटर्न तक के लिये भी खुला रहता है । वो अपना काम रोककर उसे पूरा सुनते हैं औऱ जब वो उनके चैंबर से निकलता है तो चेहरे पर ये संतोष होता है कि मैंने न्यूज डायरेक्टर से अपनी बात कही। अक्सर हमलोग इस बात पर चर्चा करते कि इतना ज्यादा काम के दबाव में रहनेवाला आदमी किसी से भी इतने इत्मिनान से कैसे बात कर सकता है । हमारे पास पांच मिनट से ज्यादा कोई रुक जाए तो अंदर खदबदाहट होने लगती है कि ये बला कब टले । काम के लिये वक्त नहीं और लोग बिलावजह टाइम खाने चले आते हैं। लेकिन नकवी जी के साथ ऐसा मैंने कभी नहीं देखा । आप उनके कमरे में जाइए , वो अपना काम रोककर आपसे बात करेंगे और तबतक जबतक आप उनसे विदा ना ले लें। आप निकलिए औऱ वो फिर अपने काम में लग जाते हैं। उनका बहुत सीमित लेकिन बहुत अनुशासित जीवन है। नकवी जी के साथ मैंने लगातार 7 साल काम किया है औऱ काफी करीब से देखा-जाना है ।

नकवी जी के चैंबर के सबसे नजदीक मेरा क्यूबिकल था औऱ दरवाजे में लगे 6 इंच चौड़े शीशे के पार अगर वो किसी को देख सकते थे तो वो मैं था । खबरों को लेकर दिनभर मेरा उनके कमरे में आना जाना लगा रहता लेकिन कई बार वो खुद ही मेरे पास आकर खड़े हो जाते । मुझे इसका अंदाजा तब होता जब पीछे से आवाज आती – क्या राणा जी क्या चल रहा है आपके राज में । मैं फिर खड़ा हो जाता औऱ बात से बात चल पड़ती । धीरे धीरे न्यूजरुम के कुछ और लोग पास आ जाते । फिर कहानियों-किस्सों, बहस-मुबाहिसों औऱ ठहाकों की रेलगाड़ी निकल पड़ती । कुछ लोग थोड़ी देर में निकल जाते तो कुछ दूसरे आ जमते । इसमें कई साथी तो दूसरे फ्लोरवाले होते जो यह सुनकर आते कि चौथे फ्लोर पर महफिल जमी है। बारहा ऐसा हुआ कि ठहाके इतने जोर के लगे कि पैनल प्रोड्यूसर को वहीं से चिल्लाना पड़ा – अरे सर कहिए तो बुलेटिन छोड़कर हम भी आ जायें। सब एयर पर जा रहा है..हांय हांय। मुझे बाद में लगा कि ऐसा माहौल नकवी जी न्यूजरूम में यूं ही नहीं बनाते बल्कि इसके पीछे उनका खास मकसद रहा करता है। वो है – लोगों तो तनाव-दबाव औऱ बॉस की क्षयकारी छवि से मुक्त रखना। ऐसा कई बार हुआ जब नकवी जी ने अपने कमरे में बुलाकर मेरे किसी फैसले पर अपना गुस्सा निकाला लेकिन उसी रोज या अगले दिन कोई ऐसा मसला जरुर आ जायेगा जिसपर वो अपने कमरे में मीटिंग बुला लेंगे औऱ सबको ग्रीन टी पिलवायेंगे ।

मसला तो पीछे रह जाता, हां हवा हल्की हो जाये इसके लिये कुछ हल्के फुल्के मुद्दे निकल आते। दो तीन औऱ लोगों का भी चहियाना-बतियाना हो जाता औऱ मेरा मूड भी नार्मल । मैं ऐसी घटनाओं तक यादों का सिरा पक़ड़ इसलिए जा रहा हूं ताकि ये समझ में आ सके कि देश के नंबर वन न्यूज चैनल को हर हफ्ते नंबर वन बनाए रखने के दैत्याकारी-सुखहारी मैनेजमेंटी दबाव औऱ अपनी टीम को टनाटन रखने के सांस-सरीखे दरकार का शेषनागी संतुलन कैसे बिठाया जाता है ।   

टीवी की टैमी संस्कृति ने न्यूज चैनलों को नाक रगड़वाई है औऱ धाकड़ अंग्रेजीपोषी पत्रकार मालिकों की हवा खराब की है । नंबर-रेवेन्यू की ऐसी नींदहारी जुगलबंदी न्यूज चैनलों में गाई-सुनाई जाती है कि हर हफ्ते इंटर्न भी पूछ लेता है सर इसबार कैसा रहा । टैम के कुछ हजार बक्सों में बंद भारत का दर्शक आपकी पत्रकारिता में पलीता लगा सकता है , खून-पसीनेवाली आपकी खबरों की ऐसी तैसी कर सकता है औऱ वही समूचे हिंदुस्तान के तमाम सवालों को अपनी मर्जी का गुलाम बनाए बैठा है। ऐसे में शर्म के कई सर्ग आए । बिना ड्राइवर की कार , यमराज से मिले गजराज, राखी-राजू मसाला , सांप खाओ-शीशा खाओ-रेत खाओ सीरीज, खली की खलबली और कुछ ना मिले तो कहीं भी कभी भीं कॉमेडी। इस दौरान कुछ चैनलों में लोक-अभिरुचि के लिहाज से द्विअर्थी शब्दों के शोधकर्ता फडफड़ाने लगे थे । किसी भाई ने प्रोमो पट्टी पर लिखा धोनी का 12 इंच अब हो गया 6 इंच । अब क्या होगा ? शो आया तो पता चला धोनी ने बाल कटवा लिये ।

2005-2008 के इस चार साला दौर को टीवी पत्रकारिता के इतिहास में वाकई लौहाक्षरों में लिखा जायेगा । फौलादी फैसलों और इंकलाबी जज्बों का पत्रकारीय दौर । खैर छोड़िए, इस दौर के बारे में ऐसा नहीं है कि आप नहीं जानते हैं लेकिन मैं इसको यहां इसलिये खींच लाया हूं क्योंकि इस दौरान नकवी जी में मैने भयानक विरोधाभास देखे । आजतक में उनकी वापसी के डेढ-दो साल हुए थे औऱ नंबर के खेल में आजतक को पटखनी देने के लिये दो खिलाड़ी चैनल कपड़ा फाड़ तमाशा करने को तैयार थे औऱ कर भी रहे थे ।  जनता को भी नया नया मसाला न्यूज चैनलों के जरिये मिल रहा था । हैरतखोरी-नजरखोरी-नाटकखोरी वाली हिंदी-जनता के स्वाद पर खबर चढ ही नहीं रही थी । राजनीति भी मनमोहन सिंह की सरकार आने के बाद मंद हो गयी थी, कहीं कुछ हो भी नहीं रहा था । ऐसे में दो चैनल भाईयों की लॉटरी लग गयी औऱ वो पिल पड़े अपना सारा गोला बारुद लेकर । अपनी जगह बचाने के चक्कर में आजतक को खबरिया चैनल होने का दंभ दफ्न करना पड़ा औऱ फिर शुरु हुआ शर्म का सर्ग जो साल दर साल चलता रहा।

इस दौरान कई बार आजतक नंबर एक के पायदान से खिसका औऱ नकवी जी ने बिना लाग लपेट कई बार कहा – हमें इस बात से मतलब नहीं कि आप क्या दिखा रहे हैं , हमें बस नंबर चाहिए। इस नंबर के चक्कर में पता नहीं क्या क्या हुआ औऱ होगा लेकिन कई दफा ऐसा हुआ कि शो चल रहा है , नकवी जी अपने कमरे से बाहर आये और कहने लगे – यार ये सब ठीक नहीं चल रहा है। आपलोग पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर रहे हो । साला दर्शक भी बड़ी से बड़ी खबर तैयार कर लीजिये नाक नहीं लगायेगा और तमाशा दे दीजिए तो दो रिपीट भी नंबर दे जायेगा। अब यही सही, तो यही होगा । क्या कीजिएगा नंबर तो चाहिए ही। आलम ये हो गया था कि रेटिंग औऱ कांटेंट पर नजर रखनेवाले रीसर्च डिपार्टमेंट का हेड बेचारा ये समझाता था कि आपका खली इसलिये नहीं चला और उसका इसलिये चल गया। आपने इस शो में राखी का ये वाला हिस्सा पहले डाला होता तो व्यूवर आपके पास पहले चिपक जाता औऱ उसकी कॉमेडी इसलिए चल गयी क्योंकि उसने राजू का एलिमेंट ज्यादा डाला। ऊपर से ओझा गुनी के भूतभगाऊ अंदाज में भविष्य बतानेवाले बाबा धमक आये – अब रीसर्च हेड इस बात पर भी जोर दे कि उसकी काट ढूंढो नहीं तो दिनभर की कमाई खा जायेगा ।

नकवी जी इस ब्रीफिंग को पूरी गंभीरता से लेते औऱ उस पूरे वीडियो प्रेजेंटेशन को ठीक से देखते कि चूक हुई तो कहां । उधर रोज रोज बाबाओं का अवतार होने लगा । तिलकधारी, गजमुखी, स्निग्धकपाली औऱ पता नहीं किस किसतरह के बाबा विरोधियों की स्क्रीन पर प्रकट होते , नंबर बटोरते औऱ अंतर्ध्यान हो जाते । एक रोज

कमर वहीद नकवी
कमर वहीद नकवी
नकवी जी और मैं बैठे थे तो उन्होंने कहा – देखिए गुनाह बेलज़्ज़त नहीं, कोई बाबा ढूंढिए जो हुलिए में औऱ बोलने में भौकाली हो । ज्ञान-वान से बहुत मतलब नहीं है बस स्क्रीन पर आये तो लोगों को लगे कि इसकी नहीं सुनी तो अनर्थ हो जायेगा। बाबा ढूंढ भी लिए गये, चले भी , नंबर भी दे गये लेकिन वही नकवी जी एक दिन कहने लगे – बताइए मैं खुद ज्योतिष का बड़ा जानकार । आजतक कोई ज्योतिषि जो 19 रहा हमारे यहां नहीं बैठा लेकिन ये बैठ गया और चल भी गया जबकि इसको कुछ नहीं आता है।

एक व्यक्ति जिस कांटेंट को चला रहा है उसे चलाना नहीं चाहता और जो चलाना चाहता है उसे चलाने का जोखिम बार बार उठाना नहीं चाहता । इसीलिए मैंने विरोधाभास जैसे शब्द का इस्तेमाल पहले किया । वैसे बहुत कम लोगों को पता होगा कि नकवी जी ज्योतिष के अच्छे जानकार हैं, भारतीय विद्या भवन से बाकायदा डीग्री ली है। रत्न और स्टॉक मार्केट की समझ भी उनकी दाद देनेवाली है। खैर , तो उस भविष्यवक्ता महाराज की बात करते करते नकवी जी ज्योतिष की आकाशगंगानुमा विस्तार के बारे में बताने लगे, ज्योतिष में उनकी दिलचस्पी कैसे हुई बात इसतरफ भी मुड़ी और फिर ये भी बताया कि कुछ भविष्यवाणियां उन्होंने कितनी सटीक की हैं।

नकवी जी के साथ आपको जो बात बहुत खींचेगी वो ये कि उनकी याददाश्त बहुत अच्छी है। कौन सी घटना कब हुई, तब क्या बज रहा था, मौसम कैसा था , किसने क्या कहा और कौन किधर से आया जैसी बारीक बारीक बातें भी उन्हें याद हैं। वो जब आपको सुनायेंगे कि कैसे बचपन में मुंह अंधेरे भिगोया चना पॉकेट में ढूंसकर यारों के साथ निकल जाते थे या कैसे  दोस्तों के साथ बनारस की सड़कों-गलियों में दिन-दिनभर आवारगी चलती रहती थी या फिर कैसे बैट्री बनाने की परिवार की दुकान पर काम करते करते स्कूल पास कर लिया या फिर क्रिकेट मैच में विरोधी टीम के बेईमान अंपायर को हटाकर खुद अंपायरिंग की और उससे ज्यादा बेईमानी अपनी टीम के लिये ताल ठोककर की – तो आपको साथ साथ एक पूरी दुनिया चलती दिखेगी। वो उनकी यादों का वृतचित्र है । दरअसल जिस परिवार और जिन हालात से होकर नकवी जी आये हैं और जहांतक आये हैं – उसने नकवी जी को एक ऐसा आदमी बनाया है जिसे समाज की आखिरी सीढी पर खड़े इंसान का चेहरा पढनेवाली भाषा आती है और सबसे ऊपर बैठे लोगों की बातों का मतलब समझने के लिये उनको डीकोड करने का हुनर आता है ।

लेकिन इन सब बातों से परे नकवी जी की जो सबसे बड़ी ताकत है वो है भाषा औऱ स्क्रिप्ट। मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि टीवी में बहुत कम लोग हैं जो टीवी की भाषा जानते समझते हैं और वैसा लिखते भी हैं। खुद के बारे में कुछ खुशफहमियां मेरी भी हैं , लेकिन जहां कहीं भी मैं फंसा या ठहरा – नकवी जी के पास ही गया। यकीन मानिये हर बार ऐसा ही हुआ कि उन्होंने अपने आसपास के पन्ने किनारे खिसकाये , एक दफा ऊपर से नीचे तक पढा, कोई गिरह पेंच लगा तो उसके बारे में पूछा औऱ फिर जो लिख दिया वो आपको कई लिहाज से हैरत में डालेगा । मसलन की मैंने ऐसा क्यों नहीं सोचा, मैंने ऐसा क्यों नहीं लिखा , ये तो बड़ा आसान है फिर मुझे ऐसा क्यों नहीं सूझा वैगरह वगैरह । शब्द अपनी जगह हों तो और ना हों तो स्क्रिप्ट पर क्या असर पड़ता है ये बात वो बार बार पूरी टीम को सिखाते दिखेंगे आपको । शो के नाम को लेकर काफी सचेत रहनेवाले संपादकों में से हैं वो।

मैंने सैकड़ों नाम आजतक के अलग अलग शोज के लिये दिये होंगे । प्रोड्यूसर चाहे जेनरल बुलेटिन का हो, स्पोर्ट्स का या फिर क्राइम का, शो का नाम तय करने के लिये मुझे फोन जरुर करेगा । एक राय ऐसी रही कि मेरे लिखे प्रोमो और प्रोग्राम के लिये तय किए नाम पर ज्यादा नुक्ताचीनी की जरुरत नहीं । जिस रोज आजतक में मेरा आखिरी दिन था उस रोज वीडियोकॉन टॉवर के नीचे चाय की दुकान पर शम्स ताहिर खान जबरन ले गये और चाय पिलाने के बाद बोले – बॉस जाते जाते वारदात के आज के एपिसोड का नाम देते जाईए। जापान में सुनामी के बाद समंदर की लहरो से फैलते खतरे पर है शो। मैंने उठते हुए कहा रख दो – लहर लहर ज़हर औऱ शम्स ने इतराकर एक औऱ प्याली चाय पिला दी । फिर भी , मैं जब कभी नाम के मामले में फंसा  औऱ नकवी जी के पास गया तो उन्होंने चुटकी बजाते सुझा दिया। वो तीन बातें अक्सर कहते हैं – पहला ये कि गुनाह बेलज्जत नहीं जिसका जिक्र मैंने ऊपर भी किया है , दूसरा- नाम तय करो तो अर्जुन कि तरह मछली की आंख पर नजर रखो – दर्शक सीधे समझ जाए , घुमा फिराकर समझाने की जरुरत नहीं । ये भी देखो कि नाम आज के ट्रेंड औऱ टेस्ट में फिट बैठ रहा है या नहीं । औऱ तीसरा ये कि दर्शक व्याकुल आत्मा है- हाथ में रिमोट लिये बैठा है ।

आपकी बात समझ नहीं आयी या पसंद नहीं आयी तो सेकंड में निकल जायेगा। दरअसल वो कहते यही हैं कि पत्रकार को हमेशा अपनी सोच को आज में लंगर डालकर रखना चाहिए। आज का चलन क्या है, पसंद क्या है , परेशानियां क्या हैं, हिट क्या है, फ्लॉप क्या है और क्यों है वगैरह वगैरह । उनके पास सूत्र वाक्य हैं औऱ वो भी बड़े गहरे, बड़े काम के । मैनेजमेंट के नंबर वाले दबाव , कांटेंट के टीआरपी गेम (ऐसा खेल की सांप भी मर जाये औऱ लाठी भी ना टूटे यानी नंबर भी आ जाये और न्यूज चैनल की इमेज भी बची रही) औऱ पर्दे में पड़े तमाम तरह के पचड़े ज्यादा पसारे बगैर निपटा लेने – का हुनर नकवी जी को बखूबी आता है। ठीक वैसे ही जैसे शेषनाग अपने फन पर धऱती का संतुलन बनाए रखते हैं- वो धुरी पर घूमती रहती है , सूरज का चक्कर तय वक्त में लगाती रहती है औऱ दुनिया भी अपनी रफ्तार में चलती रहती है । इस शेषनागी संतुलन के साधक हैं नकवी जी।  कोई तामझाम, फांयफूंय , शेखीवेखी नहीं। एकदम सतही इंसान जिसने अपनी पत्रकारिता से कई समझौते किए होंगे लेकिन समझौते के एवज में अपने भीतर के पत्रकार को नहीं मारा । मैं मानता हूं कि नकवी जी टीवी पत्रकारिता के ऐसे मानक हैं जिनको

राणा यशवंत
राणा यशवंत
सामने रखकर ही किसी का कद आगे मापा जायेगा।

लेखक राणा यशवंत वरिष्ठ पत्रकार और महुआ न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनसे संपर्क yashwant71@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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हिंदुस्‍थान समाचार में छह महीने में चार संपादक बदले, पांचवें एडिटर बने हेमंत

हिंदी भाषा सहित 12 क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी सेवाएं दे रही हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी में पिछले छह महीने में चार संपादक आये और गये। डा. अमित जैन की जगह अब नवभारत टाइम्स के पूर्व सम्पादक हेमंत विश्नोई को समाचार एजेंसी का कार्यकारी संपादक बनाया गया है। विश्नोई चार जून से अपना कार्यभार संभालेंगे। लेकिन संपादकों के आने और जाने की सुपरफास्ट गति से नहीं लगता है कि विश्नोई साहब भी बहुत दिनों तक टिक पाएंगे।

खैर, जो भी हो, यह तो समय ही बताएगा लेकिन भारत की एक मात्र बहुभाषी समाचार एजेंसी में सम्पादकों का आना, और शीघ्रता से अपने पद से रुखसत हो जाने का सिलसिला ठीक नहीं लगता। खबर है कि विश्नोई के आने की खबर से संपादकीय टीम में काफी उत्साह है। वहीं डॉ. अमित जैन के हटने से मार्केटिंग टीम काफी निराश हो गयी है। हिन्दुस्थान समाचार ने इसके पहले दैनिक जागरण, लखनऊ के डेस्क समन्वयक रामप्रकाश त्रिपाठी को संपादक बनाया था, जो यहां तीन महीने से अधिक नहीं टिक पाए। इस बीच एजेंसी ने मैनेजर के रूप में कार्य कर रहे डा. अमित जैन को भी यह जिम्मेदारी दी लेकिन वो भी जल्द ही चलते बने। वैसे हिन्दुस्थान समाचार इन दिनों देश भर में अपने नए स्वरूप के साथ पुन: उभरने के लिए प्रयासरत है। लेकिन सम्पादकों के आने और जाने की तेज गति से एजेंसी कितना उभर सकेगी, अल्ला जाने।

यहां कुछ भी करने की आजादी है!

समय बहुत कठिन है। जिनके पास अधिकार है, वे और ज्यादा अधिकार पाने की होड़ में हैं। जिनके पास शक्ति है, वे अपनी मुश्कें और मजबूत कर लेना चाहते हैं। और धन? वह तो केंद्रीय भूमिका में है। धन ही शक्ति और अधिकार दोनों का सृजन करने की सामर्थ्‍य रखता है। अगर किसी केंचुए के पास भी संयोगवश धन-संपदा आ गयी तो उसके लिजलिजे शरीर में हड्डियाँ उग आती हैं, उसमें मिट्टी की जगह पत्थर निगलने की ताकत पैदा हो जाती है। धन से ही आज सामाजिक मर्यादा तय होती है, धन ही नायकत्व का कारक बन गया है।

नयी वैश्विक अर्थव्यवस्था ने जिस तरह कुछ खास देशों या व्यक्तियों के हाथों में पूंजी का नियंत्रण सौंप दिया है, उससे तमाम तरह की सामाजिक विरुपताएं पैदा हुईं हैं। पूंजी की मदद से पहले प्राकृतिक संसाधनों पर और फिर मानव संसाधनों पर भी काबू पाना उनके लिए सहज हो गया है। ये संसाधन पूंजी को लगातार बढ़ाने के उपकरण साबित हुए हैं। पढ़े-लिखे तेज-तर्रार दिमागों को खरीदना और गुलाम बना लेना भी पूंजी के लिए आसान हो गया है। इन मेधावी गुलामों की मदद से धनपशुओं ने जो अश्वमेध शुरू किया है, उसके सुखांत की कल्पना नहीं की जा सकती। इस प्रक्रिया में जो अमीर थे, वे और अमीर होते गये और जो गरीब थे, उनकी गरीबी बढ़ती गयी है। एक ऐसा फासला, जो लगातार बढ़ता जा रहा है, विस्फोटक होता जा रहा है।

पूंजी के खेल का यह खतरनाक विस्तार गरीबों की जिंदगियों में दुश्वारियाँ ही नहीं बढ़ा रहा है बल्कि प्राकृतिक और पर्यावरणीय संकट में भी इजाफा कर रहा है। बड़े-बड़े उद्योगों के विस्तार के लिए जमीनें चाहिए, उनके संयंत्रों को चलाने के लिए पानी चाहिए, उनके उत्पादों के सुरक्षित निर्गमन के लिए सड़कें चाहिए। शहरों में कहाँ जगह है, काम-धंधे की आस में गांवों से भाग कर जिस तरह लोग शहरों में बस रहे हैं, खतरनाक और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में जीवन बसर कर रहे हैं, वह एक अलग समस्या है पर इससे शहरों का नियोजन स्वयं चरमरा रहा है। ऐसे में पूंजी का हथौड़ा नदियों, पहाड़ों और जंगलों पर चल रहा है। वहाँ रहने वाले विस्थापित हो रहे हैं, उनकी आजीविका के साधन छिन रहे हैं, उनका जीवन, उनकी संस्कृति सब कुछ खतरे में पड़ती जा रही है। जिन लोगों पर संसाधनों के बराबर बँटवारे की जिम्मेदारी है, जिन पर सांस्कृतिक विविधता की रक्षा की जिम्मेदारी है, जिन पर वंचित और अधिकारविहीन लोगों के सशक्तीकरण की जिम्मेदारी है, वे अपने वातानुकूलित कमरे में बैठकर वहाँ तक देख ही नहीं पाते या शायद देखना ही नहीं चाहते।

खुदा न खास्ता राजनीतिक कारणों से अगर थोड़ा-बहुत धन उन इलाकों के लिए रवाना भी होता है तो वह कागजों में घूमते हुए ही निपट जाता है। कितनी विचित्र विडंबना है कि एक ओर भारत की उजली तस्वीर दिखायी जाती है, तो दूसरी ओर इतना घना अंधेरा ही कुछ दिखता ही नहीं। जो देश आर्थिक महाशक्ति होने की दिशा में अग्रसर होने का दावा करता दिखता है, उस देश का किसान खुदकुशी करने को मजबूर है। जो देश अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित कर रहा है, अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलें बना रहा है, उनका सटीक परीक्षण कर रहा है, उस देश में बहुसंख्य गरीब दो वक्त के निवाले केलिए तरस रहे हैं।

असल में गरीबों की इस दुर्निवार नियति के लिए पूंजी के साथ ही पूँजी के कारण फैले भ्रष्टाचार ने भी बड़ी भूमिका निभायी है। मामूली गांव और कस्बों की पृष्ठभूमि से शक्ति केंद्रों में दाखिल हुए लोगों की धन लिप्सा ने हालत को और भी भयावह बना दिया है। पिछले कुछ सालों में देश की केंद्रीय सत्ता के भीतर से भ्रष्टाचार की जो दुर्गंध फैली है, वह बेमिसाल है। कुछ लोगों ने बहुत चालाकी से लाखों करोड़ रुपये चट कर लिये। यही हाल राज्यों में भी देखी गयी। कर्नाटक और मध्य प्रदेश में जिस तरह सरकारी धन की लूट खुलकर सामने आयी, वह चौंका देने वाली है। मामूली चपरासी, क्लर्क और इंजीनियर तक के घरों और बैंकों से करोड़ों की संपत्ति का निकलना हैरतअंगेज है। उत्तर प्रदेश में तो लूट का इतिहास ही रच दिया गया। जनता की जेबों से निकाला गया पैसा, जो उन्हीं के लिए कल्याणकारी योजनाओं में लगना था, उन तक नहीं पहुंचा और तमाम ठेकेदार, अफसर, मंत्री मालामाल हो गये। इस बेशर्म बंदरबाँट में लगे चेहरों को देखिये तो पता चलेगा कि उनमें से अधिकांश निम्न मध्यवर्गीय या मध्यवर्गीय परिवारों से आये हुए लोग हैं।

इस पाशविक धनपिपाशा का कोई अंत नहीं है। कानून बहुत धीमा काम करता है। न्याय की गति भी तेज नहीं है। जो लोग कानून, संविधान, न्यायपालिका और संसद के दिन-ब-दिन घटते तेज के खिलाफ संगठित होने की कोशिश करते हैं, जो लोग अपने हक से निरंतर वंचित किये जा रहे लोगों को जगाने और खड़ा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें पहचानने और निष्क्रिय करने में सत्ता प्रतिष्ठान तनिक उदासीनता नहीं दिखाते, उनके खिलाफ कानूनों का इस्तेमाल करने में तनिक ढिलाई नहीं बरती जाती। पूंजी और शक्ति केंद्रों की मिली-भगत तोडऩे का काम अगर राजनीतिक तंत्र नहीं करता है तो फिर जनता के लिए उसकी प्रासंगिकता क्या है? राजनीति को लेकर आम तौर पर जिस तरह की प्रतिक्रिया जनता में दिखायी पड़ती है, वह अपने-आप में इस सवाल का जवाब है। कुछ इमानदार प्रयास होते दिखते भी हैं तो वे संगठित नहीं हो पाते।

हमारे परम उदार लोकतंत्र ने लुटेरों और भ्रष्टाचारियों को अभयदान दे रखा है। उन्हें कुछ भी करने की आजादी है। अगर कोई आवाज उठती है तो पहले उसे ही दबाने की कोशिश की जाती है, उसे ही संदिग्ध ठहराने और अलग-थलग करने के प्रयास किये जाते हैं। आदिवासियों, गरीबों के हक के लिए कोई भी मजबूती से खड़ा होने की कोशिश करे, उनके अधिकारों की पैरवी करे तो आतंकवादी, नक्सलवादी ठहरा कर उसे ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। ऐसे वक्त में जब शक्ति के केंद्र भटक गये हों, उन्हें वापस लाने के लिए कई बार शक्ति की जरूरत महसूस होती है। बार-बार ऐसा लगता है कि वह समय आ गया है, जब बदलाव केलिए ताकत का प्रयोग किया जाना चाहिए। जन सरोकार से प्रतिबद्ध सभी लोगों को, संगठनों को एक मंच पर आने की जरूरत है, एक साथ सड़कों पर आने की आवश्यकता है ताकि वे अपनी बात ठीक से कह सकें, अपनी ताकत बढ़ा सकें। 

लेखक डा. सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. अमर उजाला समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ में एक हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

शाहजहांपुर में एक पत्रकार पर दूसरे पत्रकार ने किया हमला

यूपी में पत्रकारों पर हमले रूकने का नाम नहीं ले रहे हैं। शाहजहांपुर में भी आज एक पत्रकार पर हमला किया गया। हमला करने वाला व्‍यक्ति भी कथित तौर पर पत्रकार है तथा खबरें छपने से नाराज था। हमलावर ने पत्रकार को धमकी भी दी कि यदि खबरें लिखना बंद नहीं करोगे तो तुम्हे जान से भी हाथ धोना पड़ेगा। घटना का शिकार हुए पत्रकार ने मामले की तहरीर सीओ सिटी को दे दी है। एसपी को भी इस घटना की जानकारी दी दी गई है। सीओ ने कोतवाल को रिपोर्ट दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।

बता दें कि कुछ दिन पहले पत्रकार जगेंद्र सिंह ने किन्नर नैना हत्याकांड की बखिया उधेड़ी थी। इस हत्याकांड में दलाली करने वाले तथाकथित पत्रकार नेता का नाम भी उजागर होने लगा था। पता यह चला कि किन्नर नैना की हत्या की भूमिका भी इसी पत्रकार ने बनाई थी। बाद में उसने पुलिस से मोटी डील कराकर मामले को रफादफा कराने का प्रयास किया, लेकिन खबरों के कारण मामला बढ़ गया। इस बात से तथाकथित पत्रकार नेता और उसके साथी दलाल नाराज थे। गत दिवस सट्टा पर खबर छपी तो दोनों और नाराज हो गए। सट्टा की खबर में इस बात का उल्लेख था कि कुछ दलाल टाइप पत्रकार सट्टा किंग से ‘थैली’ लेते हैं। इस खबर के प्रकाशित होने के अगले ही दिन 26 मई की सुबह पत्रकार जगेंद्र सिंह को रास्ते में रोककर धमकी दी गई। कहा गया कि शहर छोड़कर चले जाओ, वरना मारे जाओगे।

जगेंद्र सिंह ने उसी शाम बिना किसी का नाम लिए इस बात को अपनी फेसबुक आइडी ‘शाहजहांपुर समाचार’ पर पोस्ट कर दिया। आज सुबह जगेंद्र सिंह जब समाचार कवरेज के लिए जिला अस्पताल जा रहे थे तो रास्ते में शहर कोतवाली के अंतर्गत मंडी में एक तथाकथित पत्रकार राजीव गुप्ता ने जगेंद्र सिंह को घेर लिया और जान से मार देने की धमकी देते हुए मारपीट की। घटना के बाद जगेंद्र सिंह थाने गए और कोतवाल नरेंद्र सिंह को सारी घटना बताई। इसी बीच मारपीट करने वाला राजीव गुप्ता भी अपने कई साथियों के साथ आ गया और कोतवाल पर दबाव बनाकर रिपोर्ट नहीं लिखने दी। जिस पर जगेंद्र सिंह ने सीओ सिटी राजेश्वर सिंह को प्रार्थनापत्र दिया। सीओ ने कोतवाल को मामले की रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए। तहरीर में बताया गया है कि राजीव गुप्ता खुद को सात लोगों का हत्यारा बताकर और सचिवालय तक पकड़ होने की बात कहकर लोगों व अधिकारियों पर रौब डालता है।

शाहजहांपुर से सौरभ दीक्षित की रिपोर्ट.

जागरण में बंपर छंटनी (11) : ब्‍याज की राशि चुकाने के लिए मीडियाकर्मी किए जा रहे हैं बाहर!

: कानाफूसी : दैनिक जागरण में अभी छंटनी का दौर चल रहा हैं, लेकिन शायद किसी को यह नहीं पता कि आखिर यह क्यों चल रहा है. लेकिन असल मायने में बात यह है कि यह जागरण की एक ख़ास रणनीति है, जिसमें उसे 1 करोड़ की तनख्वाह पूरी हो जाने तक कर्मचारी निपटाने हैं, क्योंकि जागरण ने अभी हाल में नई दुनिया का अधिग्रहण किया हैं, जिसमें उसे नई दुनिया को खरीदने के लिए दिए गए 300 करोड़ के ब्याज से पार पाना है.

यह राशि लगभग 30 लाख रुपया प्रतिमाह की है. इसी प्रकार से जागरण समूह जल्द ही एक नए समूह को भी खरीदने के प्रयास में लगा हुआ है, जिसके कारण यह छंटनी की जा रही है, जो कि लगभग 1 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार करेगी. जागरण प्रबंधन द्वारा यह तय किया गया है कि जो लोग लगभग पुराने घाघ हो चुके हैं व 30,000 रुपये प्रतिमाह या उसके आसपास वेतन पा रहे हैं, उन्हें निपटाकर उस क्षतिपूर्ति से पार पाया जा सके.

दूसरी ओर जागरण समूह को जागरण इंस्‍टीट्यूट आफ मॉस कम्युनिकेशन में भी प्लेसमेंट को लेकर लगातार दिक्कतें आ रही हैं. इस बीच एक चैनल के अधिग्रहण की भी तैयारियां चल रही हैं, जिससे एक पंथ दो काज हो करने की रणनीति बना रहा है जागरण प्रबंधन. इसी के चलते नए लड़कों को उसी तरह से प्रशिक्षण दिया जा रहा हैं जैसे पाकिस्तान में जेहाद के नाम दिया जाता है. हालांकि जागरण में यह अभी शुरुआत है, जिसमें प्रबंधन की फुल फ्लेज में बड़े घाघों को निपटाने की योजना है. इसके तहत यह निर्णय लिया गया है कि बड़े घाघ अब मीडिया की इस स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके हैं कि इसमें अब कोई तंत्र नहीं है, इसलिए उनमें अब करंट नहीं रह गया है. यही कारण है कि अब उनकी जगह जल्द ही बेहद फुर्तीले, जोश व उमंग से भरे नए लड़कों को मैदान मे उतारा जायेगा.

इससे दो फायदे होंगे पहला तो यह कि बड़ी तनख्वाह की इस राशि में जागरण चार लड़के मैदान में उतार पाएगा. तो दूसरी ओर पुराने घाघों के चलते जागरण की हर यूनिट में चलने वाली राजनीति से भी छुटकारा मिल जायेगा. क्‍योंकि नए लड़कों को शुरुआती दौर में यूनिटों में चलने वाली राजनीति से कोई मतलब नहीं होगा, वह तो बुढ़ा मरे या जवान हमें क्‍या मतलब की तर्ज पर काम करेंगे. इसके लिए इन लड़कों को मैदान में उतारने की ट्रेनिंग बाकायदा जागरण प्रबंधन के विश्‍वासपात्र वरिष्ठ देंगे. इसमें सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जागरण की मुख्य पावर में भी पावर आ जाएगी, मीडिया संस्थान चलेगा सो अलग. यही कारण है कि अब लगातार छंटनी का दौर जारी है, जो आगे भी चलता दिखेगा.


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बिहार विरोधी है टाइम्‍स ऑफ इंडिया का मालिक साहू-जैन समूह

पटना : बिहार की राजधानी पटना का स्काई लाइन टाइम्स ऑफ इंडिया के होर्डिंगों से पटा पड़ा है। कहा जा रहा है टीओआई पटना संस्करण की रिलांचिंग की जा रही है। इसी वजह से यह ब्रांड प्रमोशन का प्रचार यज्ञ चलाया जा रहा है। इसी संदर्भ में 27 मई, 2012 रविवार को राजधानी के न्यू पटना क्लब में शाम 7:30 बजे से ब्रांड प्रमोशन के मुतल्लिक बालीवुड के गायक जावेद अली का लाइव कंसर्ट कराया जा रहा है। शुक्रवार को टाइम्स के पटना संस्करण में बिहार को औद्योगिक विकास की तरफ ले जाने वाले राइजिंग बिहार का सपना दिखलाने वाले एक पूरे पेज का आलेख प्रस्तुत किया गया है। विगत कई दिनों से राइजिंग बिहार के नाम पर टीओआई के पन्ने पर पन्ने रंगे जा रहे हैं। बताया जाता है कि इस सारे उपक्रम के पीछे टाइम्स ऑफ इंडिया के ब्रांड-प्रमोशन की मंशा है।

मगर यदि तथ्यों के आईने में देखा जाये तो क्या साहू जैन (टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के मालिक) परिवार की राइजिंग बिहार में कितनी रुचि है- तो यह जानना बड़ा ही हृदय-विदारक होगा। जी हां, कभी इसी खानदान की संयुक्त बिहार में रोहतास इंडस्ट्री नाम की बड़ी इंडस्ट्री हुआ करती थी। इस इंडस्ट्री में डालडा से लेकर साबुन, सीमेंट, एस्बेस्टस सहित कई अन्य सामग्रियों का उत्पादन हुआ करता था, जिसमें पचासों हजार मजदूर काम किया करते थे और जिस पर आस-पड़ोस के लाखों परिवारों की अर्थ-व्यवस्था आधारित थी। मगर जिस बिहार ने साहू-जैन परिवार को फर्श से अर्श तक पहुंचाया, उस बिहार को इस खानदान ने क्या तोहफा दिया- इतने बड़े उद्योग समूह की तालाबंदी, पचासियों हजार मजदूरों की छंटनी, उन पर आश्रित परिवारजनों का अर्थिक विनाश और रोहतास उद्योग पर आधारित गैर-मजदूर, स्थानीय लोगों के लिए आर्थिक अवसर का विनाश। यह है साहू-जैन परिवार के बिहार- प्रेम की नंगी तस्वीर।

यह नंगा सच बहुत ही वीभत्स है। यदि आप और भी अंदर घुसकर देखना चाहते हैं तो आपको पता चलेगा कि रोहतास के ये मजदूर आज तक अपना पावना नहीं पा सके हैं। इनको अभी तक पीएफ, ग्रेच्युटी एवं अन्य वैधानिक बकायों का भुगतान नहीं मिल सका है। इसके लिए इस खानदान ने तमाम कानूनी दाव पेंचों का इस्तेमाल किया जिसकी वजह से आज तक रोहतास के मजदूरों को उनके वाजिब हक का भुगतान नहीं प्राप्त हो सका है। इस खानदान के बिहार प्रेम की असलियत तो तब और भी स्पष्ट हो जाती है, जब आपको पता चलेगा कि विगत सालों में कभी लालू जी के रेल मंत्रालय ने रोहतास उद्योग समूह की जमीन पर उद्योग लगाना चाहा तो उस योजना में भी कानूनी पेंच लगाकर साहू-जैन परिवार ने उस योजना का तिया-पांचा कर दिया। साहू जैन परिवार की बिहार को यही सौगात है।

उसी तरह इस परिवार ने एसकेजी नाम की अपनी कंपनी, जो शराब सहित कई अन्य किस्म की उत्पाद बनाया करती थी, की सभी ईकाइयों को बंद कर बिहार के निवासियों को नायाब तोहफा दिया। आज जब ‘सुशासन’ की सरकार नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे जाकर पूंजीपतियों से बिहार में उद्योग लगाने की गुहार कर रही है, उस वक्त इस खानदान का ट्रैक-रिकार्ड खंगालें तो वह और भी वीभत्स नजर आयेगा। ‘सामाजिक न्याय के साथ विकास’ वाली इस मौजूदा राज्य सरकार के कार्यकाल में जहां इस साहू-जैन खानदान ने टाइम्स ऑफ इंडिया के कुम्हरार स्थित अपने प्रिंटिंग प्रेस को बंदकर 44 मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया। आज टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इंप्लाइज यूनियन इस मामले की लड़ाई भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लड़ रही है। आपको यह जानकर और भी आश्चर्य होगाकि साहू जैन खानदान ने अपना छापाखाना बंद करने का फैसला तब लिया जब टी.ओ.आई. के मजदूरों ने मणिसाना वेतन आयोग द्वारा निर्धारित वेतनमान की मांग की। उन्होंने सोचा कि प्रिंटिंग प्रेस बंद कर वे ‘न रहेगा बांस- न बजेगी बांसुरी’ की स्थिति पैदा कर देंगे। मगर आज भी इस बंदी के खिलाफ हटाये गये मजदूर टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज पेपर इंप्लाइज यूनियन के बैनर तले विगत 16 जुलाई, 2011 से अनवरत धरना चला रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ रहे हैं।

अब आइये इस साहू-जैन परिवार की ‘सामाजिक न्याय’ के सरकार के जमाने के कारनामों की बातें करें। सामाजिक न्याय की सरकार के जमाने में जब श्रीलालू प्रसाद यादव जी मुख्यमंत्री थे और श्री वशिष्ठ नारायण सिंह जी श्रममंत्री थे, उस जमाने में भी इस खानदान ने पटना से प्रकाशित हो रहे टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के प्रतिष्ठित हिंदी अखबार ‘नवभारत टाइम्स’ को बंद कर दिया था और उस अखबार से जुड़े सैकड़ों पत्रकार, गैर पत्रकार कर्मियों को नौकरी से निकाल कर सड़क पर ला दिया था। यह था साहू-जैन खानदान का बिहार को दिया गया तोहफा। इन घटनाओं के आलोक में ही बिहार के लोगों को आज टी.ओ.आई. के आज के ब्रांड-प्रमोशन की कोशिशों को देखने की जरूरत है। क्या आपको लगता है कि भगवान महावीर के करुणा और प्रेम की शिक्षाओं से भरे महान धर्म को मानने का दावा करने वाले इस साहू जैन खानदान के दिल में बिहार और बिहारवासियों के लिए घृणा के सिवाय और कुछ है क्या?

टी.ओ.आई. न्यूज पेपर इंप्लाइज यूनियन, पटना द्वारा जारी.

सुल्‍तानपुर में पुलिस ने की पत्रकारों के साथ बदसलूकी

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सूबे की सत्ता संभालते ही प्रदेश की जनता से यह वादा किया था कि सपा के शासन में कानून व्यवस्था के साथ किसी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा, फिर चाहें वो कोई नेता हो या पुलिस अधिकारी, लेकिन प्रदेश में ऐसा कुछ भी होता नज़र नहीं आ रहा है। हर बार कोई न कोई अखिलेश की साख पर बट्टा लगाता नज़र आ जाता है। अखिलेश सरकार जिन वर्दी वालों के दम पर प्रदेश में कानून का राज कायम करना चाहती है। वही पुलिस कर्मी कवरेज करने गए मीडिया कर्मियों पर ही अपनी खाकी का दम दिखाने लगी है।

दरअसल पूरा मामला है सुल्तानपुर जनपद की नगर कोतवाली का। यहां पर दो पक्षों में मामूली विवाद को लेकर मारपीट हो गई। एक पक्ष ने दूसरे पक्ष के एक व्यक्ति को जमकर पीट दिया। जब इस पूरे मामले की भनक मीडिया को लगी तो वह पूरे मामले की जानकारी के लिए नगर कोतवाली गए। मीडिया का नगर कोतवाली पहुंचना पुलिस कर्मियों को नागवारा गुजरा और पुलिस का एक दबंग दरोगा नगर कोतवाल के साथ मिलकर मीडिया कर्मियों से भिड़ गया। मीडिया कर्मियों के लाख समझाने के बावजूद दरोगा ने अपनी हेकड़ी के आगे उनकी एक न सुनी और जमकर भद्दी-भद्दी गालियां देना शुरू कर दिया पर शायद दरोगा जी यह भूल गए कि उनकी यह शर्मनाक हरकत पत्रकारों के कैमरे में कैद हो चुकी है, और कैमरा कभी झूठ नहीं बोलता। अब प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री को यह फैसला करना है कि वह इन्हीं खाकी वर्दी वालों के दम पर प्रदेश में कानून का राज लाना चाहते हैं।

नितिन श्रीवास्तव

पत्रकार

सुल्‍तानपुर

जागरण में बंपर छंटनी (10) : चंदौली व आजमगढ़ में प्रबंधन ने किया दो पत्रकारों का शिकार

दैनिक जागरण, वाराणसी में छंटनी का दौर लगातार जारी है. अब तक कई लोग इस छंटनी के शिकार हो चुके हैं. इस बार दो और लोगों को बाहर किया गया है. संवेदनहीन मालिक खुद शीशे के महलों में रहते हुए रुट लेबल के काम करने वाले पत्रकारों को बाहर का रास्‍ता दिखा रहा है, जबकि जमीन सहित तमाम दलालियों में हाथ आजमाने वाले प्रबंधन के चहेते बने हुए हैं. खबर है कि चंदौली में कार्यरत रहे दिलीप सिंह से इस्‍तीफा ले लिया गया है. दिलीप पिछले डेढ़ दशक से दैनिक जागरण को चंदौली जिले में अपनी सेवाएं दे रहे थे. प्रबंधन ने उनका पक्ष जाने-सुने बिना उनसे इस्‍तीफा ले लिया.

चंदौली में अखबार को मजबूती देने वाले दिलीप सिंह को प्रबंधन ने एक ही झटके में इस्‍तीफा देने का फरमान सुना दिया, जबकि कई बीमारियों से पीडि़त दिलीप सिंह को जागरण और उसकी नौकरी की सख्‍त जरूरत थी. जबकि इसी चंदौली में जमीन की दलाली करने वाला पत्रकार वीरेंद्र कुमार तथा प्रबंधन का चहेता बना हुआ है. दिलीप सिंह की जगह भदोही में कार्यरत रहे जितेंद्र उपाध्‍याय को चंदौली भेजा गया है. भदोही में जितेंद्र की जगह किसी को एप्‍वाइंट नहीं किया गया है. आजमगढ़ में भी प्रबंधन अनिल मिश्रा से इस्‍तीफा ले लिया है, जबकि अनिल मिश्रा भी जागरण से लम्‍बे समय से जुड़े हुए थे.

खबर है कि प्रबंधन जल्‍द ही पहले पेज पर काम देखने वाले एक अन्‍य वरिष्‍ठ पत्रकार को भी अपना शिकार बनाने की तैयारी कर रहा है. इसके अलावा इस छंटनी में मैनेजमेंट के वरिष्‍ठ साथी अपने दुश्‍मनों को भी ठिकाने लगाने का बेहतर मौका मान रहे हैं. आखिर जब अखबार का डाइरेक्‍टर खुद सूद-ब्‍याज का धंधा करता हो तो उसे काम करने वाले पत्रकार कैसे रास आ सकते हैं. उसे रास भी वैसे ही लोग आएंगे जो उसकी दलाली तथा सूद-ब्‍याज के धंधे को आगे बढ़ा सकें.

बनारस का जागरण प्रबंधन अंधा-बहरा है. यह ना तो कुछ देखता है और ना ही कुछ सुनता है. सामने वाले को अपना पक्ष रखने का भी मौका नहीं देता है. यहां काम करने वालों की नहीं डाइरेक्‍टर व वरिष्‍ठों के तीन-पांच को प्रश्रय देने वाले पत्रकारों की पूछ होती है. बनारस तथा इस यूनिट से जुड़े उन पत्रकारों की लिस्‍ट जल्‍द ही जारी की जाएगी, जो जमीन की दलाली समेत पत्रकारिता की आड़ में सूद-ब्‍याज व अन्‍य दूसरे धंधों को अंजाम दे रहे हैं. कुछ दिन पहले ही एनएचआरएम घोटाले मामले में खुद संपादक वीरेंद्र कुमार के पुत्र के चिकित्‍सालय में भी सीबीआई की टीम पहुंच चुकी है.   


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आंतरिक राजनीति में फंसा ‘पुष्‍प सवेरा’, काम करने वाले हतोत्‍साहित

चाटुकारिता पसंद और 'कान के कच्चे' प्रबंध तंत्र की वजह से आगरा से प्रकाशित दैनिक पुष्प सवेरा शुरुआती दिनों में बुरे हाल की ओर अग्रसर होने लगा है। बेहतरी में जुटे लोग हथियार डाल रहे हैं और अखबार की क्वालिटी दिन-प्रतिदिन गिर रही है। सत्ता की कमान जातिवादी, नाकारा और चमचागिरी पसंद लोगों ने झटक ली है। हाल इस तरह का हो गया है कि धन उगाही के लिए कुख्यात रिपोर्टर बीटों की सीमाएं लांघ कर लिख रहे हैं। तभी तो रविवार के अंक में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की खबर कमजोर छापी गई।

आगरा के एक प्रतिष्ठित बिल्डर ने पुष्प सवेरा अखबार निकाला है। फिलहाल, बिल्डर कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करता और कमान प्रबंध संपादक ओम ठाकुर के नाम से पहचाने जाने वाले ओम सिंह कुशवाहा को सौंप रखी है। यहीं से राजनीति शुरू हो रही है। कुशवाहा संयुक्त संपादक राजीव मित्तल से व्यक्तिगत रंजिश जैसी मानते हैं और उनके निकटस्थ उन कर्मचारियों से गाली-गलौज करने से भी नहीं हिचकते, जो पूर्वांचल से ताल्लुक रखते हैं। शुक्रवार को मीटिंग में खुलेआम बरसे भी कि पुरबियों को निकाल बाहर करूंगा। जनरल डेस्क का पूरा काम इन्हीं लोगों के पास है, अखबार में गुणवत्ता युक्त खबरें भी लग रही हैं लेकिन कुशवाहा की नजदीकी सजातीय लॉबी कुतर्कों से कमियां निकालती है।

रात को एक अन्य आला अधिकारी और खराब छवि के रहे बुजुर्ग प्रूफ रीडर के साथ वह अपने कमरे में न जाने कब, किसे जलीज कर दें, यह कहा नहीं जा सकता। प्रूफ रीडर जैसे छोटे पद का व्यक्ति भी खुलकर बोलता है। उसके इशारे पर दायित्वों का आवंटन होता है। उदाहरण के लिए स्थानीय निकाय चुनाव डेस्क पर सुधीर दुबे को बैठा दिया गया। सुधीर दुबे को पिछले दिनों समाचार संपादक अनिल दीक्षित ने खराब और बेईमान आशय से लिखी खबरों की वजह से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। वह तीन दिन सी एक्सप्रेस में रहे और वहां के संपादक डॉ. हर्षदेव की गालियां खाने के बाद किसी तरह जोड़-तोड़ करके फिर लौट आए। इन्हीं महोदय की वजह से अखबार में रविवार को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन से जुड़ी खबर में खेल हुआ। आगरा में इस मिशन के घोटाले से जुड़े कागजातों में आग लगा दी गई है। इसे जागरण और अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है पर पुष्प सवेरा ने सीएमओ के झूठे वर्जन के साथ घोटालेबाजों को हरी झंडी दे दी है जबकि दोनों अन्य अखबारों ने सीएमओ का वो वर्जन छापा है, जिसमें उन्होंने मामले को संदिग्ध मानते हुए जांच कराने की बात कही है।

कुशवाहा लॉबी के खासमखास अन्य रिपोर्टरों का भी इसी तरह का जलवा है जिस बीट पर चाहें लिख दें। नतीजा सामने आ रहा है, रिपोर्टर हतोत्साहित हो रहे हैं और खुद को डेस्क पर भेजने का आग्रह कर रहे हैं। काम करने के इच्छुक लोगों में भी हताशा है। संयुक्त संपादक के अलावा संपादकीय हॉल में बैठे सभी अधिकारी अब सिर्फ उतना काम कर रहे हैं जितना जरूरी है और नौकरी में आता है। डेस्क, रिपोर्टिंग और अंचल, सभी अंग इसी तरह प्रभावित हैं। फोटोग्राफरों का प्रभारी जिसे बनाया गया है वो काम नहीं करता और शाम को असरदार लॉबी की चाटुकारिता करते हुए अन्य फोटोग्राफरों को अपमानित कराता है।

प्रसार विभाग में मुफ्त समाचार पत्र वितरण के कार्य में लगे एक अधिकारी को महज इसलिये अपमानित किया गया कि उसे 12 लड़कों के लिए 1200 रुपये का बिल लगाया था। सौ रुपये में एक दिन तो आजकल मजदूर भी काम नहीं करते, लेकिन कुशवाहा साहब बिल में कटौती कर प्रबंधन की नजरों में चढ़ना चाहते थे। इसी तरह इसी लॉबी के खासमखास विज्ञापन मैनेजर ने लंबी-चौड़ी टीम तो भर्ती करा ली लेकिन विज्ञापन एक पैसे का भी नहीं छप रहा। बस ग्रुप के हाउस एड और अखबार की इनामी योजनाएं छप रही हैं। अखबार में नौकरी पाने के लिए वह सभी लोग अर्हं हैं, जो सी एक्सप्रेस और कल्पतरू एक्सप्रेस में कार्यरत हैं, चाहें कुछ जानते हों या नहीं। इसी वजह से अखबार में अक्षम लोगों का जमावड़ा हो चुका है। कर्मचारियों की भीड़ है, देखना है कि बिल्डर इस सफेद हाथी और उसके नाकारा प्रबंधकों को कब तक बर्दाश्त करता है?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

जागरण में बंपर छंटनी (9) : बरेली में इस्‍तीफा नहीं देने वाले पत्रकारों को कार्यालय में घुसने से मना किया गया

दैनिक जागरण, बरेली से खबर है कि छंटनी की तलवार भांज रहा प्रबंधन अब सीनाजोरी का रास्‍ता अपना लिया है. बरेली में जिन छह लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए थे, उन लोगों को मौखिक आदेश देकर कार्यालय आने से मना कर दिया गया है. इन लोगों ने इस्‍तीफा देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद इन लोगों के कार्यालय आने पर रोक लगा दी गई है. छंटनी के शिकार बनाए जा रहे लोग लेबर कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. समझा जा रहा है अन्‍य यूनिटों के कर्मचारी भी जागरण को कोर्ट में खींचने से पीछे नहीं हटेंगे.

बरेली से जिन लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए हैं वे जागरण के वरिष्‍ठ सहयोगी हैं तथा कई तो लगभग दो दशकों से जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे. जागरण को मजबूत करने वाले इन साथियों को प्रबंधन ने एक ही झटके में बाहर का रास्‍ता दिखा दिया. कुछ पत्रकार रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े हैं, पर प्रबंधन ने तनिक भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई. अपनी कुर्सी बचाने के चक्‍कर में संपादक ने अपनी सेना को ही दांव पर लगा दिया. हालांकि जिस तरह की स्थिति बनी हुई है, छंटनी के शिकार लोग भी अपने हथियार रखने को तैयार नहीं हैं.

सूत्रों का कहना है कि छंटनी के शिकार जल्‍द ही लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं. जागरण प्रबंधन के लिए इन लोगों को बिना कारण बाहर कर पाना इतना आसान नहीं होगा. पैसे के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले जागरण के बनिया मालिक जिस तरीके से पत्रकारों के पेट पर लात मार रहे हैं, वही लात देर सबेर वापस इनको भी सूद समेत वापस मिलेगा. एक तरफ जागरण को कई सौ करोड़ का फायदा हो रहा है तो दूसरी तरफ प्रबंधन अपने कर्मचारियों को बेरोजगार करने पर तुला हुआ है.


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ट्रिब्‍यून ट्रस्‍ट, गुडगांव के मैनेजर की मनमानी से कर्मचारी परेशान

: कानाफूसी : गुड़गांव। ट्रिब्यून ट्रस्ट के गुड़गांव प्लांट में मैनेजर की मनमानी के सामने शायद ट्रस्टियों ने भी घुटने टेक दिए हैं। 20 कर्मचारियों के स्टाफ में से अब तक तीन कर्मचारियों को सस्पेंड करा चुके मैनेजर की सारी बातों पर प्रबंधन यकीन भी कर रहा है। तीन कर्मचारी उनकी मनमानी का शिकार होकर नौकरी छोड़ चुके हैं जबकि पांच लोगों को चार्जशीट कर परेशान कर चुका है।

द ट्रिब्यून ट्रस्ट पर लोगों को इतना विश्वास था लोग दिल से नौकरी को पहुंचते थे। द ट्रिब्यून में नौकरी मिलने पर लोगों काफी खुशी होती थी। अब गुड़गांव प्लांट में मैनेजर की मनमानी इस कद्र हो गई है लोग ट्रस्ट पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। कभी यह मैनेजर हिंदुस्तान टाइम्स से आगरा में धांधली करने के आरोप में बाहर किए गए थे लेकिन आज वही मैनेजर लोगों को तानाशाह की तरह नौकरी से निकालने में लगे हुए हैं। अभी तक एक मैकेनिकल के फोरमैन, इलेक्टकल के इंचार्ज और स्टोर कीपर को नौकरी से सस्पेंड करा चुका है।

जबकि अकाउंट डिपार्टमेंट का एक कर्मचारी, एक सीटीपी ऑपरेटर और एक यूनिट एटेंडर तीन लोग मैनेजर साहब की ज्यादतियों से परेशान होकर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। इस संबंध में कर्मचारियों ने हेड ऑफिस चंडीगढ़ में बताया था कि उन्हें परेशान किया जा रहा है लेकिन प्रबंधन ने इस ओर विचार नहीं किया और तुरंत उनका इस्तीफा भी मंजूर कर लिया था। मैनेजर साहब हैं कि अपने चहेतों को ट्रस्ट में नौकरी लगाने की होड़ में लगे हुए हैं। खबर तो यहां तक है कि कुछ चहेते लोग चंडीगढ़ मैनेजर साहब की पूरी मदद भी कर रहे हैं। मैनेजर साहब अब तक छह कर्मचारियों को चार्जशीट भी कर चुके हैं। हालांकि इनमें से कुछ को बहाल कर दिया गया है लेकिन दो लोगों को अभी लटकाया हुआ है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

जागरण में बंपर छंटनी (8) : अपनों को बचाने में जितेंद्र शुक्‍ला ने चंद्रमा पांडे की चढ़ा दी बलि

दैनिक जागरण, जमशेदपुर बडे़ संकट में पडता दिख रहा है। प्रबंधन के निर्देश के आलोक में आदमी कम करने के नाम पर संपादकीय प्रभारी जितेन्‍द्र शुक्‍ला निजी खुन्‍नस निकाल वैसे लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखा रहे है जिन्‍हें सिर्फ अपने काम और संस्‍थान के नाम से मतलब है। नाकाबिल साबित हो चुके और चाटुकारिता का पर्याय बने अपने लोगों को बचाने के लिए वे जागरण के निष्‍ठावान लोगों की विदाई सुनिश्चित करा रहे हैं। पहले उच्‍च प्रबंधन को अंधेरे में रखकर राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार विजेता का तबादला आदेश जारी कराया और फिर जमशेदपुर के संस्‍थापक सम्‍पादकीय प्रभारी संत शरण अवस्‍थी द्वारा चयनित कामर्स डेस्‍क के इंचार्ज चंद्रमा पांडे को चलता कर दिया गया है।

वैसे तो 55 की उम्र सीमा पार कर लेने को चंद्रमा पांडे की विदाई का आधार बनाया गया है, जबकि उनसे ज्‍यादा उम्र के एसके उपाध्‍याय अब भी मलाई काट रहे हैं। उपाध्‍याय उस तथाकथित फीचर डेस्‍क के प्रभारी है जिसका कोई अस्तित्‍व ही नहीं है। जमशेदपुर जागरण में फीचर का कोई काम होता ही नहीं। उपाध्‍याय का काम सिर्फ दफ्तर में बैठकर अखबार पढ़ना और संपादकीय प्रभारी के निजी कार्यों को निपटाना भर है। सबसे बड़ी बात यह कि जूनियर जागरण भी उनके अधीन नहीं है।

कहानी यही खत्‍म नहीं होती। शुक्‍ला जी वैसे लोगों को ज्‍यादा पसंद करते है जो दोहरी नौकरी करते हैं। जिनकी प्राथमिक निष्‍ठा दैनिक जागरण की जगह किसी अन्‍य विभाग अथवा संस्‍थान से अधिक है। उपाध्‍याय जी का उदाहरण इसका मुख्‍य आधार है। टाटा स्‍टील से स्‍वैच्छिक अवकाश लेने के बाद चाटुकारिता के बल पर दैनिक जागरण में उप संपादक बन बैठे हैं। अपनी उम्र की बदौलत बाजार में खुद को संपादक बताने से भी नहीं चुकने वाले उपाध्‍याय इस कड़ी में अकेले नहीं है। बल्कि जागरण छोड़कर दूसरे विभागों की निष्‍ठा बजाने वाले दो-दो कारपोर्रेट संवाददाता, महिला कालेज में शिक्षण कार्य करने वाले तथाकथित शिक्षा संवाददाता, एक ही रिपोर्ट को बार-बार प्रकाशित करने वाला गूगल चोर संवाददाता समेत कई अन्‍य विवादास्‍पद लोग भी शुक्‍ला जी की टीम का मुख्‍य आधार बने हुए हैं।

चंद्रमा पांडे की विदाई और उपाध्‍याय की मलाई के पीछे का सच काफी कड़वा है। शंत शरण अवस्‍थी सरीखे संपादक की खोज और अलोक मिश्रा के पैनी नजर की पंसद के बाद अर्थ डेस्‍क के इंचार्ज बने चंद्रमा पांडे की अचानक विदाई के कदम को कम से कम योग्‍यता के पैमाने पर सही नहीं ठहराया जा सकता। पर उम्र के आधार बाहर किये गये चंद्रमा पांडे वहीं उनके समकक्ष जागरण में महिमामंडित हो रहे उपाध्‍याय के साठियापन का एक नमूना देखिये। उन्‍होंने संगिनी के लिए एक लेख लिखा और संपादित भी किया। वह छपा भी। लेख में समाजसेवी डा. विनी षाडंगी के व्‍यक्‍ितत्‍व का जिक्र था। झारखंड के पूर्व मंत्री डा. दिनेश षाडंगी की पत्‍नी है डा. वि‍नी षाडंगी। लेकिन उपाध्‍याय ने इस लेख में प्रदेश भाजपा अध्‍यक्ष डा. दिनेशानंद गोस्‍वामी की पत्‍नी निरुपित किया विनी षाडंगी को। जागरण की साख को सीधे सीधे बट्टा लगाने और पूरे प्रसार क्षेत्र में संस्‍थान की भद्द पिटाने वाली इस गलत तथ्‍य भरी रिपोर्ट को छापने पर उपाध्‍याय जी को डांट तक नहीं पड़ी बल्कि उनका महिमामंडन ही किया गया। पर छंटनी की बली चढा दिये गये चंद्रमा पांडे।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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डीएसपी ने हिंदुस्‍तान पर ठोंका मानहानि का मुकदमा

मुंगेर। जिले के हवेलीखड़गपुर अनुमंडल के आरक्षी उपाधीक्षक कृष्ण चन्द्र ने मुंगेर के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मनोज कुमार सिन्हा के न्यायालय में दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के प्रधान संपादक शशिशेखर, भागलपुर संस्करण के स्थानीय संपादक विश्वेश्वर कुमार, संवाददाता आदित्यनाथ झा, भागलपुर कार्यालय, मुंगेर कार्यालय के ब्‍यूरो चीफ मोहन कुमार मंगलम, संवाददाता, वरियारपुर संजय कुमार और मेसर्स जीवन टाइम्स प्रा लिमिटेड, नाथनगर, भागलपुर के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 469 (प्रतिष्ठा हननके उद्देश्य से जालसाजी), 499 (मानहानि), 500 (मानहानि के लिए सजा), 504(शांति भंग करनेके इरादे से प्रयास) और 505 (सार्वजनिक बदसलूकी) के तहत परिवाद-पत्र 23 मई, 2012 को दायर किया है।

मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मनोज कुमार सिन्हा ने परिवाद-पत्र को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 192 के तहत प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी डीएन भारद्वाज के पास ‘जांच‘ के लिए भेज दिया है। न्यायालय वादी डीएसपी का शपथ पर बयान आगामी 30 मई को दर्ज करेगा। परिवाद-पत्र में आरक्षी उपाधीक्षक कृष्ण चन्द्र ने आरोप लगाया है कि –‘‘दैनिक हिन्दुस्तान 10 मार्च, 2010 से अबतक व्यक्तिगत ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित होकर उनकी प्रतिष्ठा पर कुठाराघात करते हुए लगातार मानहानिजनक समाचार छापता आ रहा है।‘‘

परिवाद-पत्र में आरक्षी उपाधीक्षक ने प्रकाशित समाचारों को उद्धृत करते हुए लिखा है कि सभी वादीगण ने दैनिक हिन्दुस्तान में शीर्षक ‘‘विवादों के लिए चर्चित रहे चन्द्रा,‘‘ ‘‘पुलिस अधिकारी पर लगते रहे आरोप,‘‘ ‘‘ एक पुलिस पदाधिकारी के संरक्षण में है मुखिया,‘‘ ‘‘डीएसपी के डर से घर छोड़ने पर मजबूर हुआ था डाक्टर,‘‘ शीर्षक से उनके विरूद्ध अनेक समाचार भिन्न-भिन्न तिथियों पर छापा और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को हनन करने और लोक शांति भंग करने का काम किया। उनके विरुद्ध प्रकाशित सभी समाचार असत्य और भ्रामक थे।

परिवाद-पत्र में आरक्षी उपाधीक्षक ने संवाददाता आदित्यनाथ झा के 14 मई 2010 के पत्र को साक्ष्य के रूप में पेश किया है जिसमें संवाददाता आदित्यनाथ झा ने आरक्षी उपाधीक्षक से भ्रामक समाचार छापने के लिए ‘खेद‘ प्रकट किया है। पत्र में संवाददाता आदित्य नाथ झा ने लिखा है कि –‘‘दिनांक 10 मार्च 2010 को हिन्दुस्तान में ‘घरेलू नौकर बनकर रह रहा था विकास दास‘ शीर्षक से जो समाचार प्रकाशित हुआ है, वह समाचार तथ्यों के बिना प्रकाशित किए जाने पर डीएसपी श्रीकृष्ण चन्द्र की प्रतिष्ठा पर जो ठेस पहुंची है, उसके लिए हमें खेद है।‘‘

संवाददाता आदित्यनाथ झा ने आगे पत्र में लिखा है कि –‘‘हवेली खड़गपुर के डीएसपी के आवास से हथियार गायब होने के संबंध में जो खबर प्रकाशित हुई थी, वह खबर बिना जांच-पड़ताल के प्रकाशित की गई थी। अब जांचोपरांत ही सही खबर प्रकाशित की जाएगी और प्रकाशित की जा रही है।‘‘

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.

कहीं अनुपमा के कांधे पर बंदूक रखकर तो नहीं चला रहे कुछ लोग?

इस थ्रिल-स्‍टोरी के केंद्र में है एक अकेली महिला अनुपमा सिंह, जबकि उसके चारों कोनों पर लपलपाते खड़े हैं नेता, ठेकेदार, गुंडे और बेलगाम आला अफसर। बसपा सरकार में अनुपमा की जमकर छीछालेदर हो चुकी है। इन्‍हीं चौगड़ी के चलते ही अनुपमा को नौकरी से निकाला गया, पति का दो बार हृदयाघात हुआ, बेटे पर जानलेवा हमला किया गया। लेकिन हौसलामंद अनुपमा ने अपनी लड़ाई जारी रखी।

बहरहाल, अब सपा सरकार में उसकी सुनवाई हुई और तब प्रदेश में नौकरशाही के सर्वोच्‍च रहे कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और मायावती के सचिव रहे नवनीत सहगल समेत विधायक व शिक्षक माफिया के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में आपराधिक मामलों में मुकदमा दर्ज कर दिया गया है। दूसरी ओर शशांक शेखर सिंह और नवनीत सहगल ने एक ईमेल जारी कर अनुपमा के आरोप को सिरे से नकारते हुए उसे साजिश बताया है और कहा है कि अनुपमा की यह करतूत हाईकोर्ट की मानहानि है। ईमेल में दावा किया गया है कि यह अफसर इस मामले में न्‍यायालय की शरण में जाएंगे। वैसे इस मामले में अनुपमा सिंह कई अनसुलझे सवालों के चलते खुद ही संदेहों के घेरों में फंस दिखती हैं।

कांड की शुरुआत बसपा सरकार के दौरान हुई। मायावती के ड्रीम-प्रोजेक्‍ट ताज कॉरीडोर के घोटालों के खिलाफ अनुपमा सिंह ने जनहित याचिका लखनऊ हाईकोर्ट में दाखिल की थी। याचिका में मायावती और उनके करीबी नसीमुद्दीन सिद्दीकी की करतूतों की जांचने की मांग की गयी थी। यह याचिका तब दायर हुई जब राज्‍यपाल ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग खारिज कर दी थी। अनुपमा गोमतीनगर के विश्‍वास खंड में रहती हैं। अनुपमा एक निजी कालेज में काम करने के साथ ही दुर्गा देवी सर्वजन सेवा संस्‍था की अध्‍यक्ष भी हैं।

अनुपमा सिंह के अनुसार इस मामले में जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री मायावती व पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन को नोटिस जारी की गई, बसपा सरकार के इशारे पर सरकार के बिल्‍लौरी-आंख कहे जाने वाले अधिकारियों ने उनका उत्पीड़न शुरू कर दिया। एक निजी कालेज में नौकरी कर रही अनुपमा को नौकरी से निकाल दिया गया। उनका आरोप है कि पूर्व कैबिनेट सचिव शशांक शेखर व वरिष्ठ आईएएस नवनीत सहगल ने उन्हें इसके लिए दबाव बनाया था। पति अनुज की अमीनाबाद स्थित दवा की दुकान को तबाह करने की भी साजिश की गयी। अनुज को दो बार दिल का दौरा पड़ा। कालेज से हटने के बाद अनुपमा एमिटी यूनीवर्सिटी में लाइब्रेरियन गयीं लेकिन उसके बाद भी उनका प्रताड़ना जारी रहा। एमिटी के संस्थापक अशोक चौहान ने उनकी नौकरी छीन ली। पैरवी से हटाने के लिए वकील पर भी दबाव बनाया गया।

उधर भाजपा के रास्‍ते सपा और फिर बसपा की डगर तक विधायकी हासिल करने वाले गोंडा से बसपा के नेता व पूर्व विधायक अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भैय्या व उनके साथियों ने उन्हें जान से मारने और बेटे को अगवा कराने की धमकी दी। दो बार उनके बेटे पर जानवाला हमला किया गया। यही नहीं, एक दिन लल्ला भैय्या अपने साथियों के साथ घर पहुंच कर याचिका वापस लेने धमकी दे गये। लखनऊ में अपर पुलिस अधीक्षक पूर्वी का दावा है कि अनुपमा की तहरीर पर हजरतगंज कोतवाली में आईपीसी की धारा 143 (तीन से अधिक लोगों द्वारा प्रताड़ित करना), 506 (धमकी देना), 507 (टेलीफोन पर धमकी देना) व 452 (घर में आकर धमकाना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। हजरतगंज कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद अब मामले की विवेचना गोमतीनगर पुलिस को सौंपी गयी है।

बसपा सरकार में लोगों की प्रताड़ना का किस्‍सा सैकड़ों नहीं, हजारों-लाखों में पसरा हुआ है। बसपा सरकार की ब्‍यूरोक्रेसी की करतूत की धज्जियां तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव तक उड़ा चुके हैं। ऐसे ही एक बड़े मामले में पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती के कार्यालय के पास के एक एमएलसी के मकान को जबरिया कब्‍जे ने की साजिश की थी। घटना के अनुसार इस एमएलसी से मायावती के एक प्रमुख सचिव शैलेष कृष्‍ण ने उस मकान को खाली करने का मौखिक आदेश किया था। दरअसल, एमएलसी के इस मकान को खाली कराने के लिए उसे मायावती के प्रेरणास्‍थल में शामिल करने की साजिश थी। लेकिन फोन पर हुई इस बातचीत को उस नेता ने फोन टेप करने मुलायम सिह यादव के सामने पेश कर दिया। पलटवार कर मुलायम सिंह यादव ने आनन-फानन एक प्रेस-कांफ्रेस आयोजित इस साजिश का भांडाफोड कर दिया था।

लेकिन अनुपमा के इस कांड में कई पेंच भी शामिल हैं जो अनुपमा सिंह को संदेहों के कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। सवाल है कि समाजसेवा और कालेज में लाइब्रेरियन का काम कर रही अनुपमा का आखिर ताज कारीडोर से क्‍या संपर्क रहा। सवाल यह भी है कि पिछले तीन बरसों के बीच इस अनुपमा ने अपने साथ हुए कथित अन्‍याय पर क्‍या प्रतिवाद किया। आखिर वह मजबूरी क्‍या थी जब अपने पुराने वकील चंद्रभूषण पांडेय को उन्‍होंने पैरवी से मना कर दिया। सूत्र तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि यह कांड कुछ लोग अनुपमा के कांधे पर बंदूक रख कर चला रहे थे।

लखनऊ से कुमार सौवीर की रिपोर्ट. कुमार सौवीर यूपी के जाने माने पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर, हिंदुस्तान, महुआ, एसटीवी समेत कई अखबारों और चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. सौवीर अपने बेबाक बयानों और दमदार लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

भारतीय राजनीति नया चरित्र : समर्थन भी और उसी सांस में विरोध भी

क्या कांग्रेस या केंद्र सरकार में साहस नहीं है कि वह इन मुद्दों को लेकर 1969 की तरह जन अदालत में जाये. आखिरकार देश के प्रमुख आर्थिक सलाहकार डॉ कौशिक बसु तो यही संकेत दे चुके हैं कि 2014 के चुनावों के बाद शायद अर्थनीति पटरी पर आये? ऐसी स्थिति में अब कांग्रेस या केंद्र सरकार अर्थ चुनौतियों के प्रति गंभीर और ईमानदार है, तो ये भ्रष्टाचार से लेकर अराजकता बढ़ानेवाले हर कदम को सख्ती से रोके, कठोर कदम उठाये या चुनावों में जाये.

अच्छी राजनीति से ही पुख्ता, ठोस और समृद्ध अर्थनीति जन्म लेती है. देश की राजनीति ही दिशाहीन है, इसलिए अर्थनीति से तबाही की बौछारें आ रहीं हैं. खुद भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार, दुनिया के जानेमाने अर्थशास्त्री, कौशिक बसु हाल ही में कह चुके हैं कि राजनीतिक अनिर्णय के कारण अर्थनीति संकट में हैं. एक सड़क छाप आदमी की नजर से तुलना करें, एनडीए के 2004 तक के हालात. उसके बाद यूपीए का पहला, फिर अब तक का दूसरा दौर. अर्थनीति पर बड़े फैसले लेने के संदर्भ में, महंगाई के आलोक में, रुपया बनाम डॉलर का भाव, गैस उपलब्धता की दृष्टि से, पेट्रोल-डीजल के भाव के हिसाब से, आर्थिक विकास की दृष्टि से, रोजगार सृजन की दृष्टि से, प्रतिदिन सड़क निर्माण की तुलना कर.

ऐसे अनेक आंकड़े देखें, स्थिति साफ हो जायेगी. वह और बड़ी साझा सरकार थी. दरअसल, मूल सवाल कुप्रबंधन, फैसला न लेने का मामला है. मुलायम सिंह, यूपीए के जश्न में खास मेहमान बनते हैं. अगले दिन उनके भाई, समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता, राम गोपाल यादव यूपीए को ‘स्कैम वेंडिंग मशीन’ का खिताब देते हैं. बोलते हैं, रोज इस केंद्र सरकार का एक नया घोटाला खुल रहा है. ममता बनर्जी कांग्रेस को कोसती हैं, पर उसी सांस में सरकार को चलाने की बात भी करतीं हैं. लालू प्रसाद जी भी सरकार का बचाव करते हैं. यूरोप को दोषी बताते हैं. दो लाइन में जनता की पीड़ा भी बखानते हैं. भारतीय राजनीति का यह नया चरित्र है, समर्थन भी और उसी सांस में विरोध भी. सत्ता और विपक्ष की भूमिका में एक ही तत्व.

भारत की विकास दर 21 मई 2012 को मोरगन स्टेन्ले ने 6.6 फीसदी आंकी है. इसका आकलन है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में चक्रवात और सुनामी अभी आने हैं. सच यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की दुर्दशा की जड़ में, बीमार और अनैतिक राजनीति है. यूपीए (दो) के जश्न में दो दिनों पहले ही प्रधानमंत्री ने कहा कि लोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘गुस्सा और निराशा’ (एंगर एंड फ्रस्ट्रेशन) है. सारी समस्या की जड़ यही है. पर, सवाल यह है कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने अब तक क्या किया है? भ्रष्टाचार आज भारत के अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन गया है. अर्थनीति के बिगाड़ में इसकी निर्णायक भूमिका है. पर बड़े भ्रष्टाचारी, बड़े घोटालेबाज जेल से छूट कर आते हैं, ताव देकर संसद जाते हैं. राजनीति करते हैं. केंद्र असहाय दिखता है. यूपीए सरकार लोकायुक्त बिल की बात करती है, उसके समर्थक घटक उसे न पास होने देने की हुंकार भरते हैं, फिर भी दोनों साथ रहते हैं. मुस्कुराते हैं, सरकार चलाते है.

क्या कांग्रेस या केंद्र सरकार में साहस नहीं है कि वह इन मुद्दों को लेकर 1969 की तरह जन अदालत में जाये. आखिरकार देश के प्रमुख आर्थिक सलाहकार डॉ कौशिक बसु तो यही संकेत दे चुके हैं कि 2014 के चुनावों के बाद शायद अर्थनीति पटरी पर आये? ऐसी स्थिति में अब कांग्रेस या केंद्र सरकार अर्थ चुनौतियों के प्रति गंभीर और ईमानदार है, तो ये भ्रष्टाचार से लेकर अराजकता बढ़ानेवाले हर कदम को सख्ती से रोके , कठोर कदम उठाये या चुनावों में जाये. देश को तबाही के भंवर में न डाले.

दोषी कौन?

यूपीए के तीन वर्ष के जश्न पर यूपीए के बड़े नेता विपक्ष को कोस रहे थे. देश के मौजूदा हालात के लिए. पर सच यह है कि विपक्ष खुद बिखरा है. सरकार में शामिल लोग ही, पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका में हैं. विपक्ष कारगर होता, तो यूपीए के लिए भारी मुसीबत होती. सच है कि यह लुर, क्षमता, प्रतिभा, इफिशियेंसी, जवाबदेही के अभाव ने यूपीए को इस हाल में पहुंचा दिया है. दोष घर का, गाली पड़ोस को. यही हाल है. 22 मई 2012 को तड़के सुबह आंध्र प्रदेश में हांपी एक्सप्रेस (ट्रेन) की दुर्घटना हुई. 25 लोग मारे गये. पिछले तीन वर्षों में ट्रेन दुर्घटनाओं की संख्या और असुरक्षित ट्रेन यात्राओं को गौर करें.

पिछले दो वर्षों में ट्रेन दुर्घटनाओं में 200 से अधिक लोग मारे गये, असुरक्षा और लापरवाही के कारण. 2007-11 के बीच 1600 लोग मारे गये. खतरनाक रेलवे लाइनों और असुरक्षित क्रासिंग के कारण 2010 में 12,972 और 2011 में 14,670 लोग मारे गये हैं. इन मरनेवालों की जिम्मेवारी किसकी है? इसी कांग्रेस के लाल बहादुर शास्त्री ने एक मामूली रेल दुर्घटना के कारण इस्तीफा दे दिया था, रेलमंत्री के पद से. जिम्मेदारी लेते हुए. आज इस हांपी एक्सप्रेस दुर्घटना या अन्य रेलवे दुर्घटनाओं में मारे गये लोगों की दो लाइन चर्चा तक नहीं होती. लगता है, ये मरनेवाले कीड़े-मकोड़े हैं. ऊपर से रेलवे सुरक्षा के 1.26 लाख पद खाली पड़े हैं. हाल की कैग रिर्पोट के अनुसार, टक्कर रोकने वाले संयंत्र घटिया दर्जे के लगे हैं.

यहां भी लोगों की जान जाने के पीछे भ्रष्टाचार है. कहावत है कि एक तो पहले से ही घोर अंधेरा, ऊपर से कालिख पोतना. वही हाल है. राजनीतिक व्यवस्था की लापरवाही, अक्षमता और काहिली के कारण रेलवे की यह दुर्दशा है. एयर इंडिया की तरह या सरकार की अंध अर्थनीति की तरह. पिछले दो वर्षों में तृणमूल के समर्थक-नेताओं का शरणस्थल ही बन गया है, रेल मंत्रालय. अलग-अलग रेल समितियों में तृणमूल के लोग सदस्य बन गये हैं. पिछले दो वर्षों में इन समितियों पर पांच करोड़ खर्च किये गये हैं. जो पार्टी सत्ता में होती है, वह अपने अक्षम, काहिल और बोझ समर्थकों को सरकारी खर्चे पर पांच सितारा जीवन मुहैया कराती है.

एक तरफ सरकार अर्थसंकट का रोना रो रही है, दूसरी ओर पिछले वित्तीय वर्ष में फ्री पास, कंपलीमेंट्री पास देने पर 1436 करोड़ के खर्च किये गये हैं. पचास तरह के लोगों पर यह खर्च हुआ है. क्या यही व्यवस्था है? टैक्स से जनता का खून चूसा जाये, पेट्रोल-डीजल, गैस के दाम बढ़ाये जायें और सरकारी काहिली से रेल दुर्घटना में जनता को ही मारा जाये? ऊपर से कोई जवाबदेही भी न ले. यूपीए की मूल समस्या यही है कि सरकार में न कार्यसंस्कृति रह गयी है, न भ्रष्टाचार पर अंकुश है, न किसी को मालूम है कि क्या हो रहा है? इस तरह अराजकता पांव पसार रही है.

सत्ता पूरी चाहिए पर जवाबदेही रत्ती भर नहीं !

राजा, रजवाड़े या जमींदार क्यों गये? क्योंकि व्यवहार में सभी सत्ता उनके पास थी, पर जवाबदेही नहीं. हालांकि चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, हर्षवर्धन, अकबर जैसे अनेक राजा हुए, जो इस सिद्धांत के अपवाद रहे. पर निरंकुश राजाओं-जमींदारों से तबाह होकर लोगों ने लोकतंत्र की शरण ली. अब लोकतंत्र के नये राजा हैं, विधायक-सांसद, मंत्री-मुख्यमंत्री वगैरह. अब इन नये राजाओं को रोज नये अधिकार चाहिए, पर जवाबदेही रत्ती भर नहीं. गृह मंत्रालय ने सभी सांसदों को गाड़ी पर लाल बत्ती लगाने का प्रस्ताव मान लिया था. कानून बनने के अंतिम क्षणों में सोनिया जी को लगा कि राजनेताओं-सांसदों-विधायकों के प्रति बढ़ती अनास्था-नफरत (जो गलत है, क्योंकि राजनीति से ही सुधार संभव है) के दौर में हर सांसद को लालबत्ती लगाने का अधिकार देना, आग में घी डालने जैसा काम होगा. इसलिए फिलहाल ये प्रस्ताव रुक गया है. सत्ता की यह भूख है, सांसदों की. विशिष्ट से अतिविशिष्ट बनने की भूख.

फर्ज कीजिए, जिन सांसदों पर गंभीर अपराध के आरोप हैं, वे भी लाल बत्ती लगा कर चलेंगे और अफसर व पुलिस के लोग भी लाल-पीली बत्तियों में घूमेंगे, तब कैसा दृश्य होगा? पिछले दिनों सारे सांसदों ने एक मत में कहा कि रेलवे के बड़े अफसर या डीआरएम हमारी बात नहीं सुनते, बात नहीं मानते, इसलिए उनके ऊपर समिति बना कर हमें उनके ऊपर डाल दिया जाये. इसका अपरोक्ष मतलब है, रेलवे का ठेका-पट्टा (टेंडर) वगैरह में हस्तक्षेप करना. यह सच है कि सांसदी का काम संभल नहीं रहा, पर ये अब शासन की बागडोर भी सीधे अपने हाथ लेना चाहते हैं. ये सांसद, कार्यपालिका-विधायिका का फर्क मिटाने पर तुले है? इतना ही नहीं, सावधान हो जाइए, 21 मई 2012 को एक संसदीय समिति ने चुनाव आयोग के अधिकार में कटौती की मांग की है.

चुनाव संहिता न मानने पर चुनाव आयोग की कार्रवाई के अधिकार में कमी की बात कही गयी है. पार्टियों के पंजीकरण रद्द करने से लेकर फर्जी चुनाव रद्द करने के चुनाव आयोग के अधिकार पर पाबंदी की रिपोर्ट आयी है. लोक भाषा में कहें, तो सांसद नख-दंत विहीन चुनाव आयोग चाहते हैं. जब चुनाव आयोग ने (टीएन शेषन के समय से) चुनावों में सफाई का काम किया, तब चुनाव आयोग के ही पर कतरने की तैयारी हो रही है. आखिर सांसद चाहते क्या हैं? निरंकुश राजनीतिक अधिकार सिस्टम, लाल बत्ती की गाड़ी, पर कर्तव्य शून्य? जो संस्थाएं इन नेताओं के कामकाज पर महज सवाल करें (आंदोलन तो दूर की बात है) वह भी इन्हें सहन (सह्य) नहीं. पर महंगाई बेतहाशा बढ़े, रोज भ्रष्टाचार हो. कभी 2जी, कभी कामनवेल्थ गेम्स, कभी हथियार खरीद में गड़बड़ी, कभी रेलवे संयंत्र खरीदने मे हेराफेरी.

अभी कैग की ताजा रपट है कि कोयला आबंटन को निजी कंपनियों को किये गये फेवर से हुआ घोटाला. उधर देश में बुनकर-किसान आत्महत्या कर रहे हैं. महाराष्ट्र में, मंत्री रोज नये-नये घोटालों में लिप्त पाये जा रहे हैं. अर्थव्यवस्था बुरी स्थिति में है. रोजगार घट गये हैं. तीन महीनों में 2600 फ्लाइट रद्द हुई हैं, पूरे देश में. रेल यात्राओं में असुरक्षा है. सड़क अनसेफ है. ब्लैकमनी के सामने संसद-सरकार असहाय है. क्रिकेट मैच खुलेआम अपसंस्कृति फैला रहे हैं. पर संसद इन बड़े सवालों से बेचैन नहीं है, उसे तो लाल बत्ती चाहिए, पंगु चुनाव आयोग चाहिए, अफसरों के अधिकार चाहिए. आखिर किसलिए? संसद को तो प्रभावी नीतियां बना कर देश चलाने का अधिकार है. क्या यह काम ईमानदारी से संसद कर रही है? संसद में सैकड़ों महत्वपूर्ण बिल अटके हैं, ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर बहस लगातार घट रही है. ये सांसदों के बुनियादी काम हैं, जिनको लेकर सांसदों को चिंतित होना चाहिए था.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

सीबीआई ने आईबीएन7 से सेना प्रमुख के इंटरव्‍यू की प्रति मांगी

सीबीआई ने एक मामले की जांच के सिलसिले में एक टीवी चैनल से सेना प्रमुख वीके सिंह के साक्षात्कार की प्रति मांगी है. यह मामला सेना प्रमुख को 14 करोड़ रुपये रिश्वत की पेशकश किये जाने के आरोप से जुड़ा हुआ है. सीबीआई सूत्रों ने बताया कि वे टीवी चैनल आईबीएन7 के साथ साक्षात्कार में सेना प्रमुख की ओर से दी गई किसी भी अतिरिक्त सूचना का विश्लेषण करेगी. उल्‍लेखनीय है कि सीबीआई ने रिश्‍वत प्रस्‍ताव के मामले में प्रारंभिक जांच का मामला दर्ज किया है.

इसी मामले में सीबीआई कुछ ठोस व विश्‍वसनीय सबूत तलाश रही है ताकि इसे प्राथमिकी में परिवर्तित किया जा सके. हालांकि अभी सीबीआई के हाथ ठोस साक्ष्‍य नहीं लगे हैं. हालांकि सीबीआई ने इस मामले में ज्‍यादा कुछ बताने से इनकार किया है. साथ ही यह भी नहीं बताया गया है कि सीबीआई साक्षात्‍कार से कौन सी सूचना तलाशने की कोशिश कर रही है. इससे पहले जनरल सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्हें 14 करोड़ रुपये घूस का प्रस्ताव दिया गया था और उन्होंने इसकी सूचना रक्षामंत्री को दे दी थी. 

मनोज दुबे बने सी न्‍यूज में यूपी के हेड

सहारा समय चैनल में एसएनबी हेड (टीवी) रहे मनोज दुबे के बारे में खबर है कि उन्‍होंने अपनी नई पारी आगरा से प्रसारित सी न्‍यूज के साथ की है. उन्‍हें चैनल में यूपी का हेड बनाया गया है. अब यूपी में चैनल की जिम्‍मेदारी मनोज के कंधों पर होगी. स्‍वतंत्र मिश्रा के करीबी माने जाने वाले मनोज ने कुछ समय पहले ही सहारा से अपना बोरिया बिस्‍तर समेट लिया था. वे सहारा में कानपुर के ब्‍यूरोचीफ भी रह चुके हैं. स्‍वतंत्र मिश्रा ने ही मनोज की वापसी दुबारा सहारा में कराई थी तथा एसएनबी हेड बनाया था. मनोज लम्‍बे समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. मनोज एक जून से अपना कार्यभार ग्रहण कर लेंगे. वे आगरा की बजाय लखनऊ में बैठेंगे. 

हाईकोर्ट का स्‍टे, इंदौर प्रेस क्‍लब का चुनाव स्‍थगित

: रजिस्ट्रार फर्म्स एंड सोसायटी ने प्रेस क्लब को मोहलत दी : इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब के त्रिवार्षिक निर्वाचन के तहत 27 मई 2012 को होने वाला मतदान स्थगित कर दिया गया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय की इंदौर खंडपीठ के स्थगन आदेश की वजह से मतदान पर रोक लग गई है। प्रेस क्लब के नए सदस्यों को मताधिकार देने संबंधी एक याचिका पर यह स्थगन आदेश जारी हुआ है। तीन वर्ष पूर्व हुए चुनाव के वक्त प्रेस क्लब में करीब 1000 सदस्य थे, जिनकी संख्या बढ़कर इस बार करीब 1300 हो गई।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार रविवार 27 मई 2012 को मतदान एवं मतगणना होना थी। अब 2 सप्ताह बाद  इस मामले में सुनवाई होगी। पिछले सप्ताह नामांकन और नामवापसी की प्रक्रिया सम्पन्न हो चुकी थी, जिसमें वर्तमान अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे। उधर, शनिवार को रजिस्ट्रार फर्म्स एंड सोसायटी के न्यायालय में चल रहे प्रकरण में प्रेस क्लब ने जवाब प्रस्तुत करने के लिए वक्त मांगा। इस प्रकरण में पूर्व सदस्य अन्ना दुराई ने अपनी सदस्यता समाप्त करने संबंधी निर्णय को चुनौती और 26 जनवरी 2012 को संशोधित विधान को लागू करने से रोकने की मांग की है। रजिस्ट्रार ने अन्ना दुराई की याचिका पर 16 मई 2012 को स्थगन आदेश जारी किया था। प्रकरण में अगली सुनवाई 30 जून 2012 को होगी।

रिजवान अहमद बने एसएमबीसी चैनल के एमपी-सीजी हेड

जीएनएन न्‍यूज में मध्‍य प्रदेश के स्‍टेट हेड रिजवान अहमद सिद्दीकी ने इस्‍तीफा दे दिया है. रिजवान ने अपनी नई पारी जबलपुर से प्रसारित हो रहे न्‍यूज चैनल एसएमबीसी के साथ शुरू की है. उन्‍होंने चैनल में एमपी-सीजी हेड के रूप में ज्‍वाइन किया है. रिजवान इसके पहले ईटीवी, सहारा समय, टाइम टुडे (भारत समाचार) में भी काम कर चुके हैं.चैनल को ऑन एयर कर दिया गया है, परन्‍तु इसमें पूरे स्‍टाफ की भर्ती नहीं हो पाई है.

जागरण की नीतियों से नाराज सासाराम के ब्‍यूरोचीफ ने इस्‍तीफा दिया

दैनिक जागरण, सासाराम से खबर है कि राजेश कुमार सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अखबार में ब्‍यूरोचीफ का दायित्‍व निभा रहे थे. राजेश लम्‍बे समय से जागरण से जुड़े हुए थे. बताया जा रहा है कि जागरण में चल रहे छंटनी के क्रम में प्रबंधन सासाराम कार्यालय में कार्यरत चार लोगों में से किंन्‍ही दो लोगों को निकालने के लिए राजेश से सूची मांगी थी. राजेश स्‍टाफ की संख्‍या कम बताते हुए किसी को भी बाहर करने का विरोध किया.

बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने उन पर एक रिपोर्टर तथा एक ऑपरेटर को बाहर करने का दबाव बनाया, जिससे नाराज होकर राजेश ने खुद ही इस्‍तीफा दे दिया. उन्‍होंने प्रबंधन से स्‍पष्‍ट कह दिया कि वे किसी को संस्‍थान से बाहर कराने की बजाय खुद इस्‍तीफा देना पसंद करेंगे. फिलहाल उन्‍होंने अभी कोई अखबार ज्‍वाइन नहीं किया है लेकिन संभावना जताई जा रही है कि जल्‍द ही किसी अखबार के साथ वे अपनी नई पारी शुरू कर सकते हैं. 

जागरण प्रकाशन की आमदनी में 134 करोड़ की बढ़ोतरी

नई दिल्ली : दुनिया में सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार दैनिक जागरण प्रकाशित करने वाली जागरण प्रकाशन लिमिटेड (जेपीएल) ने बीते वित्त वर्ष 2011-12 के रेवेन्यू में 11.02 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। इस अवधि में कंपनी का रेवेन्यू 1221.09 करोड़ रुपये से बढ़कर 1355.66 करोड़ रुपये हो गया है। कंपनी को विज्ञापन से मिलने वाला रेवेन्यू इस अवधि में 9.89 प्रतिशत बढ़ा है। कंपनी के निदेशक मंडल ने शेयरधारकों के लिए 3.50 रुपये प्रति शेयर लाभांश का प्रस्ताव किया है।

कंपनी की बोर्ड बैठक में शनिवार को वित्त वर्ष 2011-12 के नतीजों को मंजूरी दी गई। कंपनी के कंसोलिडेटेड नतीजों के मुताबिक विज्ञापन आय 2010-11 के 853.99 करोड़ रुपये से बढ़कर 938.46 करोड़ रुपये हो गई। समाचार पत्र के प्रसार से जेपीएल को होने वाली आय भी इस दौरान 11.29 प्रतिशत बढ़ी है। यह 238.44 करोड़ रुपये से 265.35 करोड़ रुपये हो गई। इस अवधि में कंपनी को 178.32 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। वार्षिक आधार पर कंपनी की प्रति शेयर आय (ईपीएस) 5.64 रुपये रही।

सालाना नतीजों पर टिप्पणी करते हुए जेपीएल के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक महेंद्र मोहन गुप्त ने कहा कि वित्त वर्ष में प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद विज्ञापन रेवेन्यू में तीसरी तिमाही के 15 प्रतिशत वृद्धि की तरह चौथी में भी 11.5 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज करने में कंपनी को सफलता मिली है। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक मिड डे के वित्तीय प्रदर्शन पर भी संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कंपनी लागत को लेकर सतर्क है और उसे नियंत्रण में रखने के उपाय कर रही है।

बीते वित्त वर्ष की अन्य उपलब्धियों में दैनिक जागरण का आइआरएस के चौथी तिमाही के सर्वे में पहले स्थान पर बने रहना, मिड डे अंग्रेजी और मिड डे गुजराती की पाठक संख्या में वृद्धि होना और पंजाब से पंजाबी भाषा में दैनिक जागरण के दो संस्करण सफलता पूर्वक लांच करना शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कंपनी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से नई दुनिया और नव दुनिया समाचार पत्रों का प्रकाशन करने वाली कंपनी सुवी इन्फोमैनेजमेंट (इंदौर) प्राइवेट लिमिटेड का अधिग्रहण भी किया है। साभार : जागरण

यशवंतजी, आपके सहयोग से ही हिंदुस्‍तान प्रबंधन ने अपनी गलती स्‍वीकारी

यशवंत जी, नमस्कार, आपको ढेर सारी बधाई देते हुये अवगत कराना चाहूंगा कि मेरे हक की लड़ाई के लिये आपने जिस प्रकार मेरे लेख को प्रमुखता से प्रकाशित कर दुनिया के सामने रखा, उससे आज मुझे आपके सहयोग से इंसाफ मिल रहा है। जानकारी देना चाहूंगा कि हिन्दुस्तान उत्तराखण्ड यूनिट हेड स्नेहाशील मुखर्जी द्वारा गलत व्यक्ति को किच्छा में विज्ञापन प्रतिनिधि बनाये जाने के बाद मेरे द्वारा अप्रैल माह में हिन्दुस्तान से इस्तीफा दे दिया गया था।

यशवंत जी किच्छा, उधम सिंह नगर में गलत व्यक्ति को हिन्दुस्तान की विज्ञापन एजेन्सी दिये जाने पर एक माह बाद हिन्दुस्तान वेंचर्स मीडिया लिमिटेड ने अपनी गलती को स्वीकारते हुये इस प्रकरण में उत्तराखण्ड यूनिट हेड स्नेहाशील मुखर्जी को उत्तराखण्ड से विदाई दे दी है। श्री मुखर्जी को बरेली स्थानान्तरित कर दिया गया है जो मेरी कर्तव्यनिष्ठा, निष्पक्ष छवि एवं सत्यता का प्रमाण है। यशंवत जी इस प्रकरण में मुख्य रूप से जिम्मेदार उधम सिंह नगर विज्ञापन प्रभारी पीयूष पन्त की विदाई होना भी अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि इस व्यक्ति के द्वारा ही सम्पादक एवं यूनिट हेड को गुमराह किया गया था। परन्तु इसके बाबजूद भी उक्त पीयूष पन्त अभी भी उधम सिंह नगर में अपनी जड़ें जमाये बैठे हैं। हिन्दुस्तान हित में इनकी विदाई होना भी अति आवश्यक है।

दैनिक भास्कर, अहमदाबाद से उत्तराखण्ड यूनिट हेड बनकर आ रहे अविनाश झा जी को उत्तराखण्ड यूनिट हेड बनने पर बेहद बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें। आशा है कि अगले माह कार्यभार ग्रहण करने के पश्चात आपके द्वारा उधम सिंह नगर का दौरा किये जाने पर मुझे आपसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त होगा। जैसा कि आपके विषय में सुनते आये हैं कि आपने जिस लगन एवं निष्ठा के साथ दैनिक भास्कर को बुलन्दी के शिखर पर पहुंचाया उसी प्रकार उत्तराखण्ड में हिन्दुस्तान आपके नेतृत्व में नये सोपान पार करेगा। तथा आपसे एक और विनम्र निवेदन है कि हिन्दुस्तान में उधम सिंह नगर में अभी कुछ और भी गन्दगी बाकी है, जिसे आपके द्वारा ही सफाया किया जा सकता है। तथा निर्भीक, निष्पक्ष, कर्तव्यनिष्ठ लोगों का हिन्दुस्तान में सम्मान बरकरार रहेगा।

हिन्दुस्तान अखबार का शुभचिन्तक

पूर्व संवाददाता, हिन्दुस्तान,

एए तन्हा

किच्छा (उधम सिंह नगर)

मो0 9837847573

देहरादून में पत्रकार नहीं ब्‍लैकमेलर भी हैं

मुझे अपने पत्रकार होने का बहुत दुःख हुआ खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया में होने का फक्र नहीं रहा मुझे.. आप लोग जानना चाहेंगे क्यों? तो सुनिये, वो इसलिए क्योंकि आज मुझे एक व्यक्ति ने पत्रकारिता के घिनौने चेहरे को दिखाया है, जो पत्रकारिता नहीं करते सिर्फ दलाली करते हैं.  आज मैं आप को बतात हूं कि क्या हुआ जब उस व्यक्ति ने मुझसे कहा कि…आप इलेक्ट्रानिक मीडिया से हैं?

दीपक वत्स… जी बताइए.

???????…… आप नहीं गए शिमला बाई पास?

दीपक वत्स…. क्या हुआ वहां, कुछ खास?

???????….. अरे वहां ??? चैनल के कई पत्रकार वहां गए थे. गाडियों में और बहुत मोटा पैसा कमा के लाये हैं. उनके साथ एक सरकारी अधिकारी भी था, जिसने वहां जाकर जमीन पर चल रहे कंस्ट्रक्शन करने वालों को धमकाया और काम रुकवा दिया, जिसके बाद उन्होंने वहा बंद कमरे में बात की और वहां से मुस्कुराते हुए चले गए. उनके जाने के बाद वहां फिर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू हो गया..

अब मुझे लगा कि जो अपने अस्तित्व को बचाने में लगे रहते है वो ऐसा कैसे कर सकते हैं…. वैसे मैं आप को बता दूं कि जो लोग वहां वसूली करने गए थे, उन चैनलो पर एक-एक मेल भी भेजी गयी है, जिस में सारी बाते संक्षेप में लिख दी गयी है.

दीपक वत्स

देहरादून

09808305001

सोनीपत में वीरेंद्र, नवीन, हिमांशु एवं मुरली हुए इधर से उधर

आज समाज, सोनीपत से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ वीरेंद्र दुहान ने इस्‍तीफा दे दिया है. इन्‍होंने ने अपनी नई पारी दैनिक हरिभूमि के साथ शुरू की है. वीरेंद्र को सोनीपत में अखबार को ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. वीरेंद्र लम्‍बे समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. वे आज समाज के अलावा कई अन्‍य संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

दैनिक जागरण, रोहतक से खबर है कि नवीन मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे फोटोग्राफर के पद पर कार्यरत थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी पंजाब केसरी सोनीपत के साथ शुरू की है. वे इसके पहले भी कई अखबारों के लिए फोटोग्राफी कर चुके हैं.  दैनिक जागरण सोनीपत से खबर है कि हिमांशु शर्मा ने मार्केटिंग एक्‍जीक्‍यूटिव के रूप में ज्‍वाइन किया है. इसी क्रम में दैनिक जागरण, सोनीपत से इस्‍तीफा देकर मुरली तिवारी ने आज समाज ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें सोनीपत में ही मार्केटिंग मैनेजर बनाया गया है.

भड़ास ने ही पत्रकारों के घाव पर मरहम लगाया

यशवंतजी, सबसे पहले आपको कांटों की डगर पर अनवरत चार साल तक चलते रहने के लिए बधाई…। मेरी शुभकामना भी है कि आगे भी ‘भड़ास’ इसी तरह पत्रकारों का भड़ास निकालने में मदद करती रहेगी। ‘भड़ास4मीडिया’ का नियमित पाठक होने के नाते मुझे समझ में आता है कि जिस तरह पत्रकार, अपनी पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करता है और लोगों की समस्याओं व उनके दर्द को सामने लाता है, मगर अपनी ही कसक को पत्रकार छुपाए बैठे रहते हैं। ऐसे हालात में अपना दर्द बयां करने का एक बड़ा माध्यम ‘भड़ास4मीडिया’ के रूप में मिला।

निश्चित ही पत्रकारिता जगत में भड़ास से ‘भड़ास’ निकलने के कारण मीडिया हाऊसों में खलमली मची रही। अभी भी यही हाल है, वह इस बात से समझ में आता है कि कई मीडिया हाऊस ने ‘भड़ास4मीडिया’ की इंटरनेट साइट पर दफ्तर में खोले जाने को लेकर बैन लगा दी थी। हालांकि ‘भड़ास4मीडिया’ को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा और पत्रकारों की आशाओं को समझने के कारण साइट को पत्रकारों ने सिर-आंखों पर बिठाया। मुझे आशा है कि जो रफ्तार भड़ास ने बनाई है, वह आगे भी कायम रहेगी।

भड़ास4मीडिया के समक्ष जब भी किसी पत्रकार ने अपनी समस्या रखी, उसे पूरी बेबाकी के साथ रखा गया। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि पत्रकारों के अपनी समस्या बताने का बड़ा मंच मिल गया। हम अधिकतर कहते हैं कि पत्रकार, दूसरों को अधिकार दिलाने के जागरूक रहते हैं और नौकरशाहों से भी खिलाफत करने उतर पड़ते हैं, मगर जब जिस मीडिया हाऊस में कार्य कर रहे होते हैं, वहां पत्रकारों के साथ शोषण की बात होती है तो अधिकतर पीछे हट जाते हैं। इसका कारण भी है, पहला, अकेले चना भाड़ नहीं फोड़ सकता और दूसरा, विरोध करने पर नौकरी हाथ से जाने का डर रहता है। इसके अलावा और भी कारण गिनाए जा सकते हैं, जिससे हमेशा आवाज बुलंद करने वाले पत्रकारों की भी मुंह बंद रहता है, किन्तु ‘भड़ास4मीडिया’ ने पत्रकारों के हितों को समझा और उन्हें खुले मंच पर रखने कभी कोताही नहीं बरती। एक बार ‘भड़ास4मीडिया’ टीम को साधुवाद… इसी तरह प्रगति पथ पर आगे बढ़ते रहें और पत्रकारों की जायज लड़ाई में सहभागी बनते रहें।

राजकुमार साहू

पत्रकार

जांजगीर ( छत्तीसगढ़ )

मोबा – 074897-57134, 098934-94714


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रेसलिंग का मैदान बन गया देहरादून में सचिवालय का मीडिया सेंटर

देहरादून : रेसलिंग रिंग में मुक्केबाजी का खेल देखने के लिए हजारों रुपये चुकाने पड़ते हैं, लेकिन इन दिनों उत्तराखण्ड सचिवालय स्थित मीड़िया सेंटर पत्रकारों की आपसी लड़ाई के चलते रेसलिंग बना हुआ है। एक सप्ताह के भीतर ही यहां पत्रकारों के कई गुट आपस में भिड़ चुके हैं और मारपीट के साथ-साथ गाली-गलौज की बातें भी आम हो गई हैं। सचिवालय स्थित बनाए गए मीड़िया सेंटर में पत्रकारों को समाचार भेजने के लिए सभी सुविधाएं राज्य सरकार ने उपलब्ध कराई हैं और इलेक्ट्रानिक चैनलों के साथ-साथ प्रिंट मीड़िया के कई मीडियाकर्मी यहां से समाचारों को भेजने का काम करते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से सचिवालय स्थित मीड़िया सेंटर बाहरी लोगों के प्रवेश के चलते दागदार होता जा रहा है और यहां आने वाले किसी भी व्यक्ति का कार्ड तक चेक करने की कोशिश नहीं की जा रही। जिस कारण कई ऐसे बाहरी लोग मीड़िया सेंटर में आकर यहां रखे कम्प्यूटरों पर आपत्तिजनक दृश्य भी देखते हुए नजर आ रहे हैं और बाहरी लोगों के प्रवेश के कारण यहां लगातार असमाजिक तत्वों का तांता लगना शुरू हो गया है।

सचिवालय के मीड़िया सेंटर में कुछ समय पूर्व इसी घटनाओं के चलते इसके प्रमुख द्वार को बंद कर दिया गया था और मीड़िया सेंटर में प्रवेश के लिए सचिवालय के मुख्य द्वार से ही पत्रकारों को कार्ड दिखाने के बाद प्रवेश दिया जाता था, लेकिन कुछ पत्रकारों की यूनियन के नेताओं के दबाव के चलते मीड़िया सेंटर के मुख्य द्वार को फिर से खोल दिया गया और अब हालात इस कदर हो गए हैं कि मीड़िया सेंटर में आने वाले किसी भी व्यक्ति का कोई भी कार्ड नहीं देखा जा रहा और यहां सुबह से शाम तक बाहरी लोगों का ऐसा तांता लगा रहता है, जिससे मीड़िया का काम करने वाले लोगों को भी परेशानी होनी शुरू हो गई है। मीड़िया सेंटर में अक्‍सर काम करने वाले लोग भी अब बाहरी लोगों के प्रवेश से परेशान हो चुके हैं और अब जल्द ही सूचना निदेशक से मिलकर मीड़िया सेंटर के मुख्य प्रवेश द्वार को बंद करने की मांग करने का मन बना रहे हैं।

घटनाक्रम के अनुसार तीन दिन पूर्व मीड़िया सेंटर में इलेक्ट्रानिक मीड़िया के विनोद कुमार व जितेन्द्र आपस में भिड़ गए थे और पूरा विवाद कम्प्यूटर पर काम करने को लेकर था। यह बात सूचना कार्यालय तक पहुंचने के बाद मीड़िया सेंटर में पत्रकारों के अलावा बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी, लेकिन तीन दिन के बाद भी शुक्रवार को शाम के समय अचानक ही मीड़िया सेंटर में इलेक्ट्रानिक चैनल व प्रिंट मीड़िया का उस समय विवाद हो गया, जब वह मीड़िया सेंटर स्थित खेल कक्ष में कैरमबोर्ड खेल रहे थे। इस विवाद के बाद यह बातें भी सामने आने लगी कि जब मीड़िया सेंटर में बैठकर पत्रकार आपस में भिड़ते नजर आएंगे तो वह किसी के सामने एक जुट होने की बातें कैसे कह सकेंगे। सवाल यह उठ रहा है कि मीड़िया सेंटर में आने वाले बाहरी लोगों का प्रवेश सूचना विभाग कब बंद करेगा और यहां की हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए क्या उपाय करेगा, यदि समय रहते मीड़िया सेंटर में बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब मीड़िया सेंटर रोज रेसलिंग का मैदान बनता हुआ नजर आएगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

जागरण में बंपर छंटनी (7) : मुजफ्फरपुर, जालंधर और धर्मशाला में भी दर्जनों पत्रकार बाहर

यूपी में कई यूनिटों से कर्मचारियों को बाहर करने के बाद अब जागरण प्रबंधन बिहार, पंजाब एवं हिमाचल प्रदेश से भी पत्रकारों को बाहर करने का काम शुरू कर दिया है. दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर से खबर है कि प्रबंधन ने 11 लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखाने की तैयारी कर चुका है. इन सभी लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए हैं. तीन लोग टेक्निकल विभाग से, चार लोग एडिटोरियल से तथा चार जिलों के ब्‍यूरो में कार्यरत हैं. इस फरमान के बाद से यूनिट में हड़कम्‍प मचा हुआ है.

पंजाब में जालंधर यूनिट से पांच लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए हैं. इनमें से तीन एडिटोरियल तथा दो टेक्निकल विभाग के लोग हैं. सूत्रों का कहना है कि कुछ अन्‍य लोगों के लिस्‍ट भी तैयार किए गए हैं, जिनसे अगले एक-दो दिनों में इस्‍तीफे मांग लिए जाएंगे. चंडीगढ़ से भी छंटनी किए जाने की खबरें आ रही हैं. हालांकि यह स्‍पष्‍ट पता नहीं चल पाया है कि यहां से कितने लोग बाहर किए जाएंगे. प्रबंधन दो तरह के रास्‍ते अख्तियार कर रहा है. पहला रास्‍ता अपनाते हुए सीधा-सीधा इस्‍तीफा मांग ले रहा है. जहां फंसने की उम्‍मीद हैं वहां पर तबादला का रास्‍ता अपना रहा है.

इसी क्रम में पंजाब-हरियाणा से जुड़े हिमाचल प्रदेश में भी चार लोगों की छंटनी की गई है. प्रबंधन ने धर्मशाला यूनिट से एडिटोरियल के चार कर्मचारियों को बाहर करने का फैसला सुनाया है. समझा जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में हिमाचल प्रदेश में छंटनी के शिकार पत्रकारों की संख्‍या बढ़ेगी. उल्लेखनीय है कि जागरण प्रबंधन इसके पहले मेरठ, इलाहाबाद, बनारस, बरेली, इलाहाबाद समेत कई यूनिटों में छंटनी का फरमान जारी कर चुका है. तमाम लोगों से इस्‍तीफे मांगे गए हैं या उन्‍हें निकालने की धमकी दी गई है. तबादला करने की रणनीति भी अपनाई जा रही है.


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दलित दस्‍तक की लांचिंग आज, पहुंचें गांधी शांति प्रतिष्‍ठान

देश में दलित-पिछड़ों की आवाज को मंच देने तथा इस समाज के दबे-छुपे नायकों को सामने लाने के लक्ष्‍य के साथ 27 मई को मासिक पत्रिका 'दलित दस्‍तक' की लांचिंग की जा रही है. लांचिंग समारोह का आयोजन गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में दिन में दो बजे से किया गया है. इसमें कई वरिष्‍ठ पत्रकार भाग लेंगे. पत्रिका के संपादक-प्रकाशक अशोक दास हैं. अशोक दास पिछले छह सालों से पत्रकारिता करते हुए अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं.

संपादक अशोक दास का कहना है‍ कि हम पॉजिटिव सोच के साथ इस पत्रिका की लांचिंग कर रहे हैं. जिस समाज की बात वर्षों से मीडिया में नहीं आ पा रही है हम उनकी आवाज को सबके सामने रखने का प्रयास करेंगे. दलित-ओबीसी के दबे-छुपे नायकों को सबसे सामने लाएंगे. हम दलित समाज की उपलब्धियों को सामने रखेंगे, जिन्‍हें मुख्‍यधारा की मीडिया में जगह नहीं मिलती. गीतकार शैलेंद्र दलित थे, उधम सिंह इसी समुदाय से आते हैं, कितने लोगों को पता है? हम ऐसे ही नायकों को उनके समुदाय के सामने लाने का काम करेंगे. हम इस विशाल समुदाय को उसकी पहचान बताने की कोशिश करेंगे.

अशोक दास कहते हैं कि हम समाज में विरोध की पत्रकारिता नहीं बल्कि एक बड़े दबे-कुचले समाज की उपलब्धियों को सामने लाएंगे. वे बताते हैं कि इस पत्रिका में हर विषय को जगह देने की कोशिश की गई है. राजनीति, शिक्षा, लाइफ स्‍टाइल, समस्‍या जैसे परम्‍परागत विषयों के साथ फेसबुक के लिए भी कुछ पन्‍ने तय किए गए हैं ताकि इन होने वाले विमर्शों को भी स्‍थान दिया जा सके. मेहमान लेखकों के लिए भी जगह निर्धारित किया गया है ताकि लोग अपनी बात रख सकें. 'दलित दस्‍तक' पत्रिका के संपादकीय मंडल में अवै‍तनिक रूप से वरिष्‍ठ पत्रकार रवीश कुमार, दिलीप मण्‍डल, जय प्रकाश कर्दम, अनीता भारती, सुशील कुमार, नीतिन नेतराम, सुनील कुमार सुमन व प्रो. विवेक कुमार शामिल हैं. कार्यक्रम में संपादक मण्‍डल के पत्रकारों के अलावा आनंद श्रीकृष्‍ण, शेष नारायण सिंह, रमेश भंगी भी शामिल होंगे.

इस पत्रिका की कीमत 20 रुपये रखी गई है. सालाना सब्‍शक्रिप्‍शन 250 रुपये निर्धारित किया गया है. संपादक मण्‍डल ने स्‍पष्‍ट रणनीति बनाई है कि वे ऐसा कोई विज्ञापन नहीं प्रकाशित करेंगे जो उनकी नीतियों के खिलाफ हो. मैगजीन 54 पेज का होगा, जिसमें आठ पेज रंगीन तथा बाकी पेज ब्‍लैक एंड व्‍हाइट होंगे. पत्रिका के संपादक अशोक दास की गिनती जुझारू पत्रकारों में होती है. आईआईएमसी से पासआउट अशोक दास ने करियर की शुरुआत लोकमत समाचार, औरंगाबाद से की थी. इसके बाद वे अमर उजाला, अलीगढ़ के साथ रिपोर्टर के रूप में जुड़ गए. इसी दौरान राज ठाकरे द्वारा उत्‍तर भारतीयों पर हमले के खिलाफ इन्‍होंने अमर उजाला छोड़कर देश में कई किलोमीटर की यात्रा की.

अशोक दास अलीगढ़, मेरठ, गोरखपुर, बनारस, दिल्‍ली व पटना समेत कई शहरों की यात्रा करते हुए यहां स्‍थापित विश्‍वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं से मिले तथा उनका समर्थन हासिल किया. इसके बाद सैकड़ों लोगों के हस्‍ताक्षर युक्‍त पत्र राष्‍ट्रपति को सौंपा. यात्रा से वापस लौटने के बाद ये भड़ास के साथ भी जुड़े रहे. भड़ास के लिए काम करने के बाद ये देशोन्‍नति से दिल्‍ली ब्‍यूरोचीफ के रूप में जुड़ गए. अभी भी वे देशोन्‍नति को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इसके साथ ही अशोक दास दलितमत नाम की एक वेबसाइट का संचालन भी कर रहे हैं. अशोक दास कहते हैं कि देशोन्‍नति मे मालिक प्रकाश पोहरे के समर्थन के चलते ही वे इतना बड़ा कदम उठा पाने में सक्षम हो सके हैं. 

जागरण में बंपर छंटनी (6) : मेरठ में ग्‍यारह लोगों की लिस्‍ट तैयार

कर्मचारियों के बेगार करने के क्रम में दैनिक जागरण, मेरठ में भी इसकी सुगबुगाट शुरू हो गई है. मेरठ में सीधे छंटनी करने या इस्‍तीफा मांगे जाने की बजाय तबादला नीति पर काम किए जाने की संभावना जताई जा रही है. सूत्रों का कहना है कि स्‍थानीय डाइरेक्‍टरों ने कर्मचारी सरप्‍लस ना होने की बात कही है इसके बावजूद नोएडा प्रबंधन संख्‍या करने करने को कह चुका है. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने कुछ लोगों को शनिवार को बुलाया था, परन्‍तु मौके की नजाकत को देखते हुए ये लोग नहीं पहुंचे.

दैनिक जागरण में जिस तरीके से छंटनी का दौर चल रहा है, उसमें सारे यूनिटों में से कम से कम दस फीसदी कर्मचारियों की संख्‍या कम करने की योजना बनाई गई है. सूत्रों का कहना है कि मेरठ में भी कम से कम ग्‍यारह लोगों की लिस्‍ट तैयार की गई है, जिसमें तीन लोग परमानेंट कर्मचारी हैं जबकि अन्‍य आठ कांट्रैक्‍ट के तहत काम करने वाले लोग हैं. इसमें एडिटोरियल से लेकर अन्‍य दूसरे विभागों के कर्मी भी शामिल हैं. प्रबंधन इनमें से कुछ का सीधे इस्‍तीफा ले लेगा, जबकि अन्‍य का तबादला ऐसी जगहों पर कर दिया जाएगा, जहां वे जाने की बजाय इस्‍तीफा देना ज्‍यादा बेहतर समझेंगे.

मेरठ में इसके पहले भी इसी तरीके से छंटनी के काम को अंजाम दिया जा चुका है, लिहाजा प्रबंधन उसी आजमाई हुई रणनीति के सहारे 'सांप भी मर जाए और लाठी ना टूटे' की तर्ज पर काम कर रहा है. उल्‍लेखनीय है कि तीन साल पहले भी दैनिक जागरण, मेरठ प्रबधंन ने 21 लोगों को तबादला दूसरे यूनिटों में किया था, जिसके बाद मात्र तीन लोगों ने नए यूनिटों में ज्‍वाइन किया जबकि बाकी डेढ़ दर्जन लोगों ने संस्‍थान से इस्‍तीफा देकर दूसरा ठौर तलाशने निकल पड़े. इस बार भी यही रणनीति अपनाई जाने वाली है. समझा जा रहा है कि सोमवार तक सब कुछ क्‍लीयर कर दिया जाएगा.


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उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान की दुर्दशा पर विश्‍वनाथ तिवारी ने सीएम को लिखा पत्र

साहित्‍य अकादमी, नई दिल्‍ली के उपाध्‍यक्ष तथा दस्‍तावेज के संपादक विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान, लखनऊ की उपेक्षा की तरफ उनका ध्‍यान आकृष्‍ट कराया है. श्री तिवारी ने सीएम को लिखे गए पत्र में कहा है कि पिछली मायावती सरकार के कार्यकाल के दौरान हिंदी संस्‍थान की उपेक्षा तो की ही गई, कई पुरस्‍कारों को भी समाप्‍त कर दिया गया.

वे आगे लिखते हैं कि इन पुरस्‍कारों को समाप्‍त करने का कोई कारण तो नहीं बताया गया परन्‍तु कहा जाता है कि इन पुरस्‍कारों में दीनदयाल उपाध्‍याय, राममनोहर लोहिया, मधु लिमये जैसे का नाम होने चलते या फिर दलित लेखकों की संख्‍या कम होने के चलते इन पुरस्‍कारों को रद्द किया गया. उन्‍होंने सीएम से इस संदर्भ में उचित कदम उठाने की मांग की है. नीचे विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी द्वारा सीएम को लिखा गया पत्र. 

”माधुरी बहन को नहीं जिला प्रशासन को जिला बदर किया जाए”

जागृत आदिवासी संगठन की प्रमुख कार्यकत्री माधुरी देवी को बड़वानी जिला प्रशासन ने जिलाबदर का नोटिस भेजा है. नोटिस में प्रशासन ने आरोप लगाया है कि माधुरी देवी का संगठन सरकारी कार्यों में बाधा पैदा करता है. जिला प्रशासन के इन आरोपों से पूरा आदिवासी समुदाय गुस्‍से में है. जागृत आदिवासी दलित संगठन ने पत्र लिखकर माधुरी देवी को नहीं बल्कि भ्रष्‍टाचार करने वाले जिला प्रशासन के अधिकारियों को भी जिलाबदर करने की मांग की है. नीचे संगठन द्वारा लिखा गया पत्र.

भड़ास की कामयाबी के लिए मुबारकबाद के हकदार यशवंत नहीं कोई और…

फैज़ाबाद, बस्ती, गोंडा लखनऊ के कई दिनों के सफर के बाद ग़ाज़ियाबाद लौटा, तो लगा कि बहुत कुछ मिस हो रहा था। सबसे बड़ी बात ये कि भड़ास फॉर मीडिया अब चार साल का समझदार बच्चा बन गया और हम अपने यशवंत को ना बधाई दे पाए और ना ही चार लाइन लिख कर उनकी हरकतों का पोस्टमॉर्टम (क्योंकि ख़ुद यशवतं जी को पोस्टमार्टम ही करने में मज़ा आता है) तक ही कर पाए। भड़ास पढ़ा तो लगा कि मेरे कई साथियों ने भड़ास के चार साल पूरे होने पर इतना सुंदर और इतना सटीक लिखा कि अब मेरे लिए लिखने को कुछ बचा ही नहीं।

बहरहाल फिर भी मेरे सामने यशवंत भाई को मुबारकबाद देने के लिए उनके मिज़ाज के मुताबिक़ शब्दों के चयन और अपनी बात को शुरु करने की चुनौती तो थी ही साथ ही परेशानी ये भी कि कहां से शुरु करूं। भड़ास के पूरे कार्यकाल और उस पर छपने वाले लेखों और खु़द यशवंत के व्यक्तित्व के बारे में अपनी मेमोरी को रिवाइंड करके देखने पर लगा कि भड़ास की ज़बरदस्त कामयाबी और इसके हरदिलअज़ीज होने के लिए मुबारकबाद के असल हक़दार श्रीमान यशवंत जी के बजाए कुछ और ही लोग हैं। सच बताऊं…. भले ही आज यशवतं मुझको गोली ही क्यों ना मार दें, मगर आज कहा जाएगा सिर्फ सच ही….भड़ास फॉर मीडिया की कामयाबी.. भड़ास की लोकप्रियता के लिए मुबारकबाद के क़ाबिल हैं वो पत्रकार जो पत्राकरिता का धर्म भूल दलाली में लग गये, वो पत्रकार जो मालिकान के सामने दुम हिलाते हिलाते असल में ही अपना रूप बदल बैठे…इन जैसे ही निकम्मे चापलूसों की वजह से एक तरफ पत्रकारों का शोषण हुआ और दूसरी तरफ मालिकान को गुमराह करने वालों की नाकामी की वजह से एक के बाद एक चैनल बंदी के कगार पर पहुंचते रहे।

भड़ास की कामयाबी का श्रेय जाता है उन पत्रकारों को जिनके हाथ में कलम होने के बावजूद भी कई सरकारी अधिकारी या नेताओं के काले कारनामे उजागर ना कर सके… भड़ास की कामयाबी के हक़दार हैं वो संस्थान जो पत्रकारिता को एक पेशे की तरह ट्रीट कर रहे हैं। क्योंकि अगर ये लोग ही ना होते तो भला यशवंत ही क्यों होता… भला क्या ज़रूरत थी कि यशवंत अपनी सारी ताक़त… अपनी सारी प्रतिभा, सोच, करियर और अपने जीवन दांव पर लगा कर बिगड़ी व्यवस्ता के खिलाफ और आम आदमी की वकालत के लिए खडा़ होते। भला अगर पत्रकारों का कहीं शोषण ना हो रहा होता तो यशवंत को पैदा होने की ही क्या ज़रूरत थी। यशवंत को यशवंत बनाने वाले हैं वो पत्रकार जो अपने लिए सरकार से एक फ्लैट या प्लाट लेने के चक्कर में अपने आक़ा… सरकारी अफसर या नेता जी जैसों की दल्लई का भार अपने कंधों पर उठाए फिरते हैं।

यशवंत देन हैं उन न्यूज़ चैनल्स की जिन्होंने अपने कर्मियों की सैलरी नहीं दी …क्योंकि उन्ही बदौलत ही तो यशवंत उठ खड़ा हुआ अपने पत्रकार साथियों की आवाज़ बन कर… यशवंत को अहसानमंद होना चाहिए उस समाचार पत्र का, जिसकी मर्दानगी उस वक्त सामने आई जब उसके पत्रकार धर्मवीर को गोरखपुर में सरेआम पीटा गया और पत्रकार के हलक में डंडा तक डाल दिया गया और ये ख़बर यशवंत जैसे क़लम के आत्मघाती के भड़ास पर तो पत्रकर धर्मवीर की पीड़ा बनकर दिखी… मगर ख़ुद उस समाचार पत्र में नदारद थी… क्योंकि मालिक या मैनेजमेंट ने यहां भी डील कर ली और कथित तौर पर समाचारों को समर्पित समाचार पत्र के क़लम की स्‍याही तक सूख गई। यशवंत को यशवंत बनाने वाली मध्य प्रदेश जैसी वो घटनाएं हैं जिनमें पत्रकार को पीट कर उसको थूक तक चटावा दिया जाए और भड़ास इस ख़बर को बेबाकी और निर्भीक होकर छापे।

और हां एक बात और गोरखपुर या मध्य प्रदेश के अलावा जो कुछ भी हमारे पत्रकार भाइयों और धर्मवीर के साथ हुआ वो कई नामी अख़बारों या संस्थानों की एक दिन की बुज़दिली या कारोबारी मजबूरी का नतीजा नहीं… बल्कि कई बार तो इस तरह के समाचार पत्रों ने जता दिया कि सरकारी मशीनरी के खिलाफ छापना तो यहां अपराध है…. भले ही अपने किसी रिपोर्टर या पत्रकार को कोई आफिस में घुस कर पीटे या उसका कान ही काट कर क्यों ना ले जाए। पिछले दिनों ग़ाजियाबाद के एक समाचार पत्र के कार्यालय में एक दबंग मंत्री के कुछ गुंडे घुसे और वहां मौजूद एक सीनियर रिपोर्टर को जमकर पीटा.. वो बेचारे तो किसी तरह कूद फांद कर अपनी जान बचाने में कामयाब हो गये मगर उनके एक जूनियर साथी पिटकर अधमरे हो गये… जब उनको होश आया तो देखा कि उनका आधा कटा हुआ कान… ज़िंदगी भर मंत्री जी की दबंगई और समाचार पत्र की मजबूरी की गवाही बन चुका था। हांलाकि पिटे हुए बेचारे पत्रकार शहर भर में कहते फिरते हैं कि मंत्री जी माफी मांग ली थी तो भला अब क्या कार्रावाई करें।

इसके अलावा कई बार पत्रकारों का प्रशासन के हाथों सरेआम अपमान किया गया मगर संस्थानों की मजबूरी और खुद पत्रकारों की दलाली के चलते मामला एक सहमी हुई याद से आगे न बढ़ सका। तो ऐसे में भला कमज़ोरों की आवाज़ बनने वाले यशवंत अकेले ख़ुद के ही सिर पर कैसे अपनी कामयाबी का सेहरा बांध सकते हैं। भला अगर ये बुज़दिल और पैसे के बदले इज्ज़त लुटवाने वाले पत्रकार ना होते तो शेरदिल यशवंत को भला कौन पूछता..? बहरहाल मेरा अपना निजी तजुर्बा यशवंत को लेकर कई बार बेहद यादगार और मेरे प्रति प्रेम और एहासन वाला रहा। अपने कई साल और कई न्यूज़ चैनल्स के नौकरी के तजुर्बे से अलग एक छोटी सी वेब साइट और एक हिंदी समाचार पत्र को चलाने के दौरान माया सरकार के कार्यकाल में ग़ाजियाबाद समेत प्रदेश भर के कई घोटालों को बेनक़ाब करने से नाराज़ होकर ग़ाजियाबाद के तत्कालिक डीएम हृदयेश कुमार ने कथिततौर पर ऊपरी दबाव में सूचना निदेशक को टूल की तरह इस्तेमाल करते हुए 3 मई 2011 को चंद मिनटों के दौरान ही मेरे खिलाफ कई थानों में कई फर्जी एफआईआर दर्ज करा दीं।

इतना ही नहीं मेरे घर की बिजली और पानी (सभी बिल आदि जमा होने के बावजूद) काट दिये थे। मई की भीषण गर्मी का एक महीना मेरे परिवार ने बिना बिजली और पानी के गुज़ारा आखिरकार माननीय हाइकोर्ट के आदेश पर माया सरकार और ग़ाज़ियाबाद प्रशासन को बिजली जोड़नी पड़ी। मुझसे घोटालों के कागजात लेने और आइंदा ख़बरे ना लिखने के लिए दबाव बनाने के लिए हर तरह का लालच और दबाव डाला गया। यहां तक कि अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता की याद ताज़ा करते हुए हमारे हिंदी समाचार पत्र को बैन तक कर दिया। लेकिन इस सबके बावजूद गाज़ियबाद के कई पत्रकारों और कई नामी समाचार पत्रों तक ने एक लाइन ख़बर तक छापने की हिम्मत नहीं दिखाई। हां इस दौरान प्रशासन के दलालों के रूप में मुझको समझाने और डराने के लिए कई चेहरे सामने आए। इस सब के दौरान यशवतं का भड़ास एक मज़बूत मंच बनकर खड़ा रहा और उसने हर ख़बर को ना सिर्फ छापा बल्कि हर संघर्ष के लिए समर्थन किया।

ये अलग बात है कि आज अदालत से लेकर थानों तक में प्रशासन की असिलयत सामने आती जा रही है। और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने गाजियाबाद प्रशासन के आदेश को रोकते हुए हमारे समाचार पत्र को दोबारा प्रकाशित करने के आदेश जारी कर दिये। मगर कई गंम्भीर आरोपों में घिरे कई समाचार पत्रों समेत कई दलाल पत्रकारों ने ना सिर्फ सरकारी अधिकारियों की दल्लागिरी की, बल्कि हमें समझाया कि इनसे मत बिगाड़ों…. फायदा हम करा देंगे। ये सच हैं कि ये पत्रकार मजबूर थे… क्योंकि किसी ने मुआवज़ा लेने के बावजूद सरकारी अधिग्रहण की हुई भूमि पर करोडों की इमारत खड़ी की हुई है तो किसी ने फ्लैट लिया हुआ है तो किसी के घर का खर्चा ही सरकारी विज्ञापन से चलता है….और तो और कई को शाम की बोतल और रोज़ की रोटी चलाने के लिए रोज़ाना कई अफसरों के आगे लेटा रहना पड़ता है। तो ऐसे में इन बेचारों से ये उम्मीद कैसे की जा सकती थी कि ये अपने आक़ाओं के खिलाफ बोल सकें।

गाजियाबाद के पत्रकारों की मजबूरी तो पहले भी कई बार सामने आ चुकी है। सौरभ नाम के एक युवा पत्रकार को एसएसपी ने धमका कर गालियां देकर कहा कि डंडा इधर से डालकर उधर से निकाल दिया जाएगा और कार्यालय से भगा दिया और वहां मौजूद पत्रकार तो ख़ामोश रहे ही अगले दिन उस समाचार पत्र तक में एक लाइन नहीं लिखी थी, जिसमें बेचारा वो नौकरी करके खुद को पत्रकार बताता फिरता था। ये मामला अकेले ग़ाज़ियाबाद का ही नहीं है लगभग देश भर में पत्रकारों की दशा रोज़-ब-रोज़ दयनीय होती जा रही है….. लोकिन सवाल ये पैदा होता है कि क्या यशवंत के पेट नहीं है…? क्या वो बुलट प्रूफ पहन कर घूमता है…या वो बंकर में रहता है…? क्या उसको किसी प्लाट की ज़रूरत नहीं है…? क्यों गांव से दिल्ली आते वक्त उसने ख्वाब नहीं देखा था कि एक बंगला बनाऊंगा…? उसके बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते हैं वहां फीस नहीं दी जाती…? आखिर क्यों यशवंत दूसरे पत्रकारों की तरह दलाली ना करके हर एक के फटे में टांग फंसाए रहता है…? क्या ये पागल है या दीवाना….?

जी नहीं यशवंत ना पागल है ना दीवाना…ना दलाल है ना डरपोक…ना उसका संस्थान किसी सीबीआई जांच से घिरा है… ना यशवंत अपनी तरक्की के लिए पत्रकारों के ख्वाबों को जलाकर अपने घर में उजाला करता है…यशवंत किसी जायज़ लड़ाई में ख़ामोश तमाशाई ना बन कर कूद पड़ता है उनके फेवर में जिनका शोषण हो रहा हो… और इस सबके लिए भी यशवंत किसी मुबारकबाद का हक़दार नहीं.. इसमें उसका कोई कमाल नहीं.. यशवंत के इस रूप के लिए मुबारकबाद के लायक़ है वो मां जिसने यशवंत को जन्म दिया… लायक़-ए-सद एहतरमा है वो माता-पिता जिनके सुसंस्कारों ने दलाल पत्रकारों की भीड़ में पत्रकारिता के लिए नई राह तलाशने वाले यशवंत को आशीर्वाद दिया। भड़ास की कामयाबी के लिए सलाम है उन माता-पिता को जिनकी वजह से यशवंत जैसा सपूत आज पत्रकारिता जगत में मौजूद है….और हां…जाते जाते यशवंत भाई से सॉरी….. सिर्फ इस बात का कि भड़ास के चार पूरे होने पर मेरी दिली मुबारकबाद….इस क़दर देर से……!

लेखक आजाद खालिद सहारा, इंडिया टीवी समेत कई नेशनल न्यूज़ चैनल्स में उच्च पदो पर कार्य कर चुके हैं। आजकल हिंदी समाचार पत्र दि मैन इन अपोज़िशन और www.oppositionnews.com में कार्यरत हैं।


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शिमला नगर निगम पर 25 वर्षों से काबिज कांग्रेस का कोई नाश कर पाएगा या नहीं?

शिमला : नाक का सवाल बन गए राजधानी शिमला के नगर निगम के चुनाव में प्रचार थमने के बाद कांग्रेस, भाजपा और माकपा के कार्यकर्ता अब व्यक्तिगत तौर से एक-एक मतदाता से संपर्क साधने में लग गए हैं. 25 पार्षदों वाले राजधानी के इस प्रतिष्ठित नगर निगम के लिए बनाये गए 150 मतदान केन्द्रों में जहाँ  27 मई को राजधानी शिमला के निवासी मतदान करेंगे वहीँ मेयर और उप मेयर का चुनाव भी राजधानी वासी प्रथम बार सीधे तौर से करेंगे यानि कि इस बार मेयर और उप मेयर का चुनाव निर्वाचित पार्षदों द्वारा नहीं बल्कि मतदाताओं द्वारा सीधे किया जायेगा. वैसे तो परंपरागत कांग्रेस के बहुमत वाले  इस स्थानीय निकाय के चुनावों में मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में ही रहता है, परन्तु इस बार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूरे दमखम से चुनाव में उतरने के कारण, गत 25 वर्षों से कब्ज़ा जमाये कांग्रेस के लिए कुछ मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

इस बार यहाँ कई सीटों पर तिकोना संघर्ष हो सकता है और बड़ी संख्या में मतों के बंटवारे से कांग्रेस को हानि हो सकती है. शिमला स्थानीय निकाय के चुनावों में दोनों प्रमुख दलों की जहाँ प्रतिष्ठा दावं पर लगी है वहीँ कुछ लोग इसे विधानसभा के मिनी चुनावों की संज्ञा भी दे रहे हैं. ज्ञात हो कि राजधानी शिमला के इस नगर निगम जिसपर विगत 25 वर्षों से कांग्रेस का ही कब्ज़ा रहा है, में इस बार सेंध लगाने के लिए भाजपा ने दिन-रात एक किया हुआ है. इतना तो स्पष्ट है कि माकपा के उम्मीदवार जितने अधिक मत प्राप्त करेंगे, भाजपा के प्रत्याशियों की विजय उतनी ही सुनिश्चित होगी.  शिमला प्रदेश की राजधानी होने व सरकार के विभिन्न विभागों के मुख्यालय होने के कारण यहाँ प्रदेश के हर जिले व क्षेत्र के कर्मचारी और व्यवसायी लोग निवास करते हैं. विश्वविद्यालय होने के कारण यहाँ बड़ी संख्या में विद्यार्थी भी रहते हैं जिनमें अधिकतर माकपा के विद्यार्थी संगठन के समर्थक हैं इसी लिए विश्वविद्यालय के छत्र संघ के चुनावों में एसऍफ़आई का बोलबाला रहता है. यदि निष्पक्ष रूप से शिमला के निवासियों को दलों के समर्थकों के रूप में बांटा जाये तो यहाँ सबसे अधिक कांग्रेस और फिर भाजपा और तीसरे स्थान पर माकपा के समर्थक ही मिलेंगे. विभिन्न राजनीतिक समीकरणों और वार्डों के बंटवारे के कारण ही मतों में होनेवाले बंटवारे लाभ लेते हुए कांग्रेस ने विगत 25 वर्षों से शिमला के स्थानीय निकाय पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है.

नगर निगम के चुनावों में यूँ तो स्थानीय नगरीय समस्याएं व विकास कार्य ही मुख्य मुद्दा रहता है परन्तु आनेवाले विधान सभा के चुनावों के मध्येनजर जहाँ एक ओर प्रदेश के मुख्मंत्री प्रो० प्रेम कुमार धूमल और प्रदेश के पांच मंत्रियों सहित पूरे भाजपा संगठन ने प्रचार की कमान सम्भाल रखी है वहीँ कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान वरिष्ठ केंद्रीयमंत्री वीरभद्र सिंह और केंद्रीय मंत्री आंनंद शर्मा के साथ-साथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कौल सिंह अपने सिपहसालारों सहित मैदान में डटे हुए हैं. शिमला शहर का विकास करवाने और न करवाने के आरोप-प्रत्यारोपों के मध्य सभी प्रत्याशियों द्वारा विकास के बड़े-बड़े वायदे कर स्थानीय नागरिकों को अपने-अपने पक्ष में मतदान करने के लिए लुभाने में कोई भी दल या प्रत्याशी पीछे नहीं है. माकपा के दिल्ली से आये राष्ट्रीय नेता सीताराम येचुरी ने भी कई जनसभाओं को संबोधित करते हुए जहाँ अपने दल के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने की अपील की वहीँ कांग्रेस और भाजपा पर आरोप लगाते हुए जहाँ उन्होंने कांग्रेस को गलतियों का जनक बताया वहीँ भाजपा को उन गलतियों का पोषक बताने से भी गुरेज नहीं किया.

बड़े नेताओं का चुनाव प्रचार में उतरने से जहाँ दलों के प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊँचा हुआ है वहीँ आम जनता में यह सन्देश गया है कि शिमला के स्थानीय चुनाव दोनों बड़े दलों के लिए कितना महत्व रखते हैं. २७ मई को चुनाव होने के बाद २८ मई को  मतगणना में स्थिति स्पष्ट हो जायेगी कि कौन कितने पानी में है.

लेखक विनायक शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. मण्डी से प्रकाशित साप्ताहिक अमर ज्वाला के प्रधान संपादक हैं.

”…अभी आपको मीडिया का अनुभव कम है”

मित्तल सर, आपको बार-बार परेशान करने में संकोच होता है। आपने कहा- “वेट फॉर वीक एंड सो” मैं रविवार को इलाहाबाद जा रहा हूं। वीक तो इस बीच पूरा हो जाएगा, लेकिन ये “…एंड सो” की सीमा शायद न आपको मालूम है और मुझे तो बिल्कुल भी नहीं मालूम। आपसे मुलाकात किए भी ये तीसरा हफ्ता ही तो बीत रहा है। इतना सब कुछ जानने के बावजूद मैं आपको फिर लिख रहा हूं। क्यों कि सब्र साथ छोड़ रहा है। मुलाकात के दौरान आपने एक चैनल और उनके कर्ता-धर्ता का जिक्र किया था। उसकी कहानी आपको सुनाई तो आपने फिर से ट्राई करने की सलाह दी।

आपकी सलाह पर मन-बुद्धि दोनों एक होते दिखाई दिए तो मैंने उसी मध्यस्थ से फिर आग्रह किया जिसने पहली बार मुझे उन साहब का कॉनटेक्ट नम्बर दिया था। उसने संबंधों की मर्यादा को रखते हुए मेरी मीटिंग फिक्स भी करवा दी। मीटिंग का नतीजा मेरे 25-26 साल के करियर का सबसे बड़ा झटका था। टेबुल के इस तरफ रखी कुर्सी पर बैठने के इशारे के बाद उनका पहला स्वर-

हुं…बताइए…!!!

मैं स्तब्ध था। जिस व्यक्ति से सारी बात हो चुकी है, वो ये बोल रहा है।

बहरहाल,

मैंने कहा- यशवंत जी ने आपको फोन किया था।

चैनल बंद हो गया न…!!

मैंने कहा- जी, जनवरी से..

सीवी लाए हो- उनका अगला सवाल था।

मैंने उनसे कहा- आज सिर्फ आपसे मुलाकात करनी थी… फिर भी कहीं और भेजे गए सीवी की कॉपी है…

हां…हां… ठीक है, सिर्फ देखना है।

मैंने सीवी पर लगे कवर नोट को हटाकर ब्रीफ सीवी के पन्ने उनकी ओर बढ़ा दिए।

सर, मेरा वो ब्रीफ आपके पास भी है। पढ़ने और समझने में कम से कम तीन से चार मिनट का समय तो लगेगा ही, लेकिन उन साहब ने 30 सेकेंड से भी कम समय लिया पन्ने पलटने और पढ़ने में, और बोले-

“मेरे पास आपके लायक कोई जगह नहीं है” “…और दूसरी बात ये कि अभी आपको मीडिया का अनुभव कम है।”

 सर, मेरा ये दुर्भाग्य, संबंधों का अभाव या डेस्टिनी…हाई एंड पर बैठे किसी भी तुर्रम खां जर्नलिस्ट (लायजनर नहीं) को मेरे सामने बिठा दीजिए, चैनल चलाने के सभी फार्मूलों में वो मुझे हरा दे तो पत्रकारित क्या सामाजिक जीवन से संन्‍यास ले लूंगा। टेक्नोलॉजिकल, मैकेनिकल, फायनेंसियल, जनरल एडमिनिस्ट्रेशन हो या फिर जर्निलस्ट या नॉन जर्नलिस्टिक… क्या प्राब्लम्स हैं, उनका समाधान क्या है…सर, मैंने जो सीखा-समझा और जाना है वो शायद एक दो लोग और जानते होंगे।

सर, विद आउट पेड न्यूज, एक न्यूज चैनल को कैसे सरवाइव किया सकता है..ब्रेक ईवन पर चल सकता है मेरे कहने का मतलब है कि कैसे प्रॉफिट वेंचर बनाया जा सकता है, इसका फार्मूला है मेरे पास…लेकिन सर मेरे पास कोई फायनेंनसर नहीं है…

सर, आप या कोई भी कह सकता है कि आपने अपने मौजूदा चैनल मालिक को ये समय रहते ये सलाह क्यों नहीं दीं…

सर, आपसे बात-चीत के दौरान भी मैं अपने मृत प्रायः चैनल के लिए स्ट्रैटेजिक/फयनेंससियल पार्टनर खोज रहा था। पार्टनर मिल भी गया, लेकिन जिस दिन उस भावी पार्टनर से मीटिंग तय थी, ठीक उसी दिन मेरे चैनल मालिक को दांत की तक्लीफ भी होनी थी (हांलांकि ये कहना कठिन है कि वो मीटिंग और दांत की तक्लीफ दोनों, एक ही संयोग या दुर्योग से उसी दिन तय थे) अब हालात ये हैं कि किसी को भी कुछ भी सलाह देने का कोई मायने नहीं बचा है।

सर, आपको क्या-क्या बताऊं, मैं कोई टेलिकॉस्ट इंजीनियर नहीं हूं, कोई टेक्निकल डिप्लोमा या डिग्री भी नहीं है…इसके बावजूद एक पीसीआर और एक एमसीआर से दो-दो चैनल ऑन एयर किए हैं। स्टाफ के अभाव में स्टोरी एंकर से लेकर एक-एक घंटे के प्रोग्राम बनाए-एडिट करवाए और ऑन एयर करवाए हैं…टेक्निकल हेड और उसके स्टाफ के साथ एक दिन या दो दिन नहीं, कई दिन-रात एक करके उनका विश्वास जीता और हौंसला पाया कि किसी भी सूरत में… फिर कह रहा हूं कि किसी भी सूरत में चैनल ऑफ एयर नहीं रहेगा… और जब तक हैसियत रही चैनल ऑफ एयर नहीं रहा। भले ही चैनल के रोजाना के खर्चे न मिले हों या मालिक ने महीनों तक चैनल की तरफ मुंह करके भी नहीं देखा हो।

सर, ऐसे हालात कई बार बने कि कभी टेक्निकल डिपार्टमेंट की वजह से तो कभी न्यूज डिपार्टमेंट की वजह से चैनल ऑफ एयर के हालात में पहुंचा, लेकिन उस स्थिति पर नियंत्रण किया गया। चैनल ऑन एयर रहा। एक बार तो अर्थ स्टेशन में ही आग लग गई इसके बावजूद चंद घंटों के भीतर चैनल ऑन एयर करवा दिया।

सर, एक बार तो हालात ऐसे थे कि मालिक भी नहीं थे कई महीनों तक…चैनल चला बिना मालिक के.. चैनल के अस्तित्व के साथ चैनल के साथ जुड़े प्रत्यक्ष 175 और अप्रत्यक्ष एक हजार लोगों की रोजी रोजगार और परिवारों के भरण-पोषण का मुद्दा सामने था। उस वक्त भी अपनी कुल जमा पूंजी और मित्रों से उधार लेकर चैनल चलाया, 24×7 चलाया। ….कोई नहीं जानता कि मेरी जमा पूंजी वापस मिली भी कि नहीं, उधार चुकता हुआ कि नहीं, होगा तो कब तक होगा, कैसे होगा, कौन देगा वो रकम…!!!

सर मैं एक जर्निलिस्ट हूं…पूंजिपति तो नहीं…छह साल के कार्यकाल में मैं अपनी कमाई से एक पैंट-शर्ट भी नहीं खरीद पाया, वेतन के नाम पर जो मिला वो या तो सहकर्मियों की जरूरत पूरी करने में लग जाता, क्यों कि उनके बिना चैनल चलना असंभव था या फिर मेरी मारुति 800 के ईंधन-तेल-पानी में खर्च हुआ। इस दौरान मेरा व्यक्तिगत खर्च, यूएन की तरफ से मनरेगा में कंसलटेंट मेरे छोटे भाई और कुछ दोस्तों की कृपा पर निर्भर रहा। कहने का तातपर्य सिर्फ इतना है कि अब न तो मेरा छोटा भाई दिल्ली में है और सहायता करने वाले चार दोस्तों में से एक अकाल काल का ग्रास बन चुका है…दो अन्य के सामने भी व्यवसायिक संकट है। संकट के इस समय मुझे मदद करने वाले मित्रों में से सिर्फ एक बचा है। उसकी नई-नई गृहस्थी है…वो पहली बार पितृत्व सुख का अनुभव करने वाला है…ऐसी परिस्थितियों में किसके कंधों पर अपने दुर्भाग्य-दुर्योग्यता का बोझ डालूं…।

सर, इन दुर्गम्य परिस्थितियों में जब मैंने जाना कि आप किसी खास चैनल में मैनेजिंग एडिटर हो बन गए हैं तो लगा कि अंधे को आंखें, छछूंदर को सौंठ की गांठ या किसी मवाली को रियासत में मनसबदारी सरीखा कुछ मिल गया है। पहली मुलाकात के वक्त नेहरू-अंबेडकर कार्टून वाली स्टोरी मेरे बैग में थी…संकोच वश या कहिए कि ज्वाइन करने के साथ ही धमाका करने के लालच वश उस वक्त वो स्टोरी आपको नहीं दी। आपको क्या बताऊं, कि आपके आग्रह और यशवंत की सिफारिश के साथ जिन सज्जन से मिलने गया तो ऐसी ही एक नहीं ऐसी ही आधा दर्जन रेडिमेड स्टोरीज लेकर गया था…वो स्टोरीज आज भी वर्जिन हैं…मेरी सोच है कि हाई एंड ओहदे पर ज्वाइन करने के वक्त आपके पास ऐसी स्टोरीज होनी चाहिए, जिनसे आपके समकक्ष, जूनियर्स और चैनल मालिक समझ सकें कि खबरों के मामले में आपका कोई सानी नहीं है…और वो आपको अपना सहयोगी, सीनियर या साथी बताते वक्त गर्व महसूस कर सकें।

सर, किसी भी खबर के बदले कोई डील कर लेना ये मेरे वश की बात नहीं, लेकिन उन खबरों के प्रसारण के बाद अगर मार्केटिंग विभाग उन्हें भुना ले तो ये उसकी हुनरमंदी होगी…मेरा इस प्रक्रिया में कोई एतराज भी नहीं होगा और न रेवेन्यु कलेक्शन में मेरा कोई प्रत्यक्ष योगदान। किसी तरह के इंसेटिव पर भी मेरा या मेरी टीम में काम करने वालों का दावा नहीं हो सकता। अपनी उम्र-पेशे और अनुभव के साथ बताइए और क्या समझौता कर सकता हूं…बताइए, इतना सब कुछ होने-करने के बाद भी मैं कथित रूप से रोजगार वृत्ति के लिए दर-दर ठोकरें खा रहा हूं (कथित इसलिए क्यों कि वेतन न मिलने बावजूद चार अन्य सहयोगियों के साथ अपने मृत चैनल को तब तक को कंधों पर उठाएं हैं जब तक कोई ठौर न मिल जाए)।

भड़ास4मी़डिया के चौथे स्थापनादिवस पर एक बात निकल कर आई कि कार्पोरेट मीडिया के चंगुल से निकल कर कुछ नया किया जाए…तो जनाब, कुछ करने के लिए फिक्स्ड कैपिटल और रनिंग कैपिटल की जरूरत है… और आज वो मेरे पास नहीं है, तो नौकरी कहिए या चाकरी फिलहाल यही मेरा विकल्प है… और आप मेरे आलम्ब। आपकी कृपा से नौकरी मिल जाए तो फिर आगे सोचने का शायद मौका मिले। सर, दिल्ली छोड़ कर भागने की परिस्थितियां लगभग साल भर पहले से बनी हुई हैं… अब तक नहीं भागा तो भागूंगा आगे भी नहीं… यहीं लड़ूंगा-जुझुंगा और सरवाइव भी कर के दिखाउंगा… अनफेयर मींस के बिना न्यूज चैनल को, न्यूज चैनल की हैसियत से झंडे गाड़ता भी दिखाउंगा….!!!

सादर,

राजीव शर्मा

लेखक राजीव शर्मा कई अखबारों और चैनलों में काम कर चुके हैं. हालफिलहाल तक एस1 न्यूज चैनल के हेड हुआ करते थे. उन्‍होंने यह चिट्ठी अपने एक वरिष्‍ठ को लिखी है, जिसे हू-ब-हू प्रकाशित किया जा रहा है.


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एडीजी बोले- उपर से आई इस सूची को जारी कर दो… यह सुन आईजी संदीप छुट्टी पर चले गए

: कब रुकेगी जंग बड़े अफसरों की : बसपा सुप्रीमो मायावती ने आंकड़ों के साथ कहा कि अखिलेश सरकार कानून व्यवस्था के मोर्चे पर विफल हो गई है। सभी को अंदाजा था कि चौबीस घंटे के भीतर पुलिस अथवा शासन के आला अफसर इस बात का खंडन करेंगे कि जितनी घटनायें पूर्व मुख्यमंत्री बता रही हैं उससे आधी घटनायें भी प्रदेश में नही घटीं। मगर जब पूरा सप्ताह बीत गया तब पता चला कि आखिर सरकार की ओर से कोई भी यह आंकड़ा बताने को तैयार क्यों नही है। दरअसल शुरुआती दौर से ही गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक कार्यालय के बीच सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा।

बची खुची कसर डीजीपी और एडीजी के बीच चल रहे शीतयुद्ध की चर्चाओं ने पूरी कर दी। डीजीपी कार्यालय में अफसरों के बीच चल रही इस जंग का ही नतीजा है कि आईजी संदीप सालुके एडीजी जगमोहन यादव के हस्तक्षेप से नाराज होकर लंबी छुट्टी पर चले गये। अफसरों के बीच चल रही जंग अब सभी के बीच चर्चा का विषय बन गई है।

दरअसल पुलिस महानिदेशक कार्यालय सरकार बनने के बाद से ही लगातार चर्चा का विषय बना रहा। शुरुआती दौर में पुलिस महानिदेशक के नाम को लेकर लंबी चर्चा चली थी मगर बाजी अम्बरीश चन्द्र शर्मा के हाथ लगी। क्योंकि वह मुलायम सिंह परिवार के काफी करीबी समझे जाते थे। अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था के लिए सबसे पहले जगमोहन यादव का ही नाम चर्चा में आया और अंततरू उनका ही नाम इस पद के लिए फाइनल हो गया। उनके करीबी भी दावा करते हैं कि वह भी सपा मुखिया मुलायम सिंह के काफी करीबी हैं। लिहाजा इस पद पर उनकी ताजपोशी तो होनी ही थी।

मगर पुलिस महानिदेशक कार्यालय में सत्ता के दो केन्द्र बन जाने के बाद स्थितियां उतनी सहज नहीं रहीं। इस बीच गृह विभाग ने भी अपनी बढ़त बनाने के लिए कुछ निर्णय खुद लेना शुरू कर दिया। इन निर्णयों की जानकारी पुलिस महानिदेशक कार्यालय को काफी समय बाद ही मिल पाती थी। खुद डीजीपी श्री शर्मा की कई बार इस मामले में फजीहत भी हुई।

कानपुर में बलात्कार के आरोपी सीओ शाही के विरुद्घ लग रहे आरोपों के संबंध में जब डीजीपी कह रहे थे कि तथ्य सामने आने पर सीओ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जायेगी। तब तक मुख्यमंत्री कार्यालय सीओ को निलंबित कर चुका था। जाहिर है कि यह जानकारी डीजीपी को नहीं दी गयी। उधर एडीजी जगमोहन के सत्ता के केन्द्र बनने के कारण जिले में तैनात अधिकारियों में भी असमंजस की स्थिति रही कि वह डीजीपी का निर्देश मानें या फिर एडीजी का। यह विवाद अब निचले स्तर पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी राजनीति के चलते एडीजी जगमोहन यादव और आईजी कार्मिक संदीप सालुके के बीच हुआ विवाद सभी के लिए चर्चा का विषय बन गया है।

बताया जाता है कि तबादलों के लेकर एक सूची एडीजी जगमोहन यादव ने संदीप सालुके को सौंपी थी और कहा था कि यह सूची उपर से आयी है यह जारी कर दो। मगर संदीप सालुके ने यह सूची जारी करने से इनकार कर दिया और जब उन पर दबाव बनाया गया तो उन्होंने लंबी छुट्टी की अर्जी दे दी। उनकी अर्जी के बाद पुलिस महानिदेशक कार्यालय में हड़कंप मच गया। खुद डीजीपी ने इस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की मगर आईजी संदीप सालुके लंबी छुट्टी पर चले गये। अफसरों की इसी जंग का नतीजा था कि जब पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि दो माह में प्रदेश में 800 हत्यायें, 270 बलात्कार, 245 डकैतियां, 256 अपहरण और 720 लूट की वारदातें हुई हैं तो सन्नाटा छा गया। सभी लोग मान रहे थे कि यह आंकड़ें वास्तविकता के विपरीत हैं।

होना तो यह चाहिए था कि तत्काल अफसरों को इस बात का खंडन जारी करना चाहिए था। मगर इसी जंग के कारण इन आंकड़ों को लेकर किसी ने कोई भी बयान जारी नहीं किया जबकि इससे पहले इस तरह का कोई भी आरोप अगर सपा लगाती थी तो कुछ घंटे के भीतर ही खुद कैबिनेट सेक्रेट्री अथवा डीजीपी प्रेस कांफ्रेंस करके इन बयानों का खंडन जारी करते थे। इससे होता यह था कि यह सरकारी आंकड़े कहीं ज्यादा विश्वसनीय लगते थे और आरोंपों की धार कम हो जाती थी। मगर इस सरकार में कोई भी अफसर यह जिम्मेदारी निभाने को तैयार नहीं दिखता जिससे स्थितियां लगातार खराब हो रही हैं। समस्या यह है कि सत्ता के यह केन्द्र अपने आपको सबसे ज्यादा मजबूत होने का दावा कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी कानून व्यवस्था को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। अपने आवास पर पुलिस महानिदेशक, अपर पुलिस महानिदेशक, प्रमुख सचिव गृह को बुलाकर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर भी कर दी है मगर अफसरों की यह आपसी जंग खत्म हो पायेगी इसकी उम्मीद कम ही है। अफसरों के बीच जंग कोई नया मुद्दा नही है। अपने आप को सत्ता के सबसे करीब दिखाने की कोशिश में अफसर अपने काम से जुदा कई कामों में लग जाते हैं। मगर जब सरकार बने सिर्फ दो महीने हुए हों और प्रदेश में पुलिस महकमे में डीजीपी कार्यालय में ही अफसरों के बीच राजनीति की खबरें चर्चा का विषय बन जायें तो निश्चित रूप से यह शुभ संकेत नहीं है। खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन व्यवस्थाओं से संतुष्ट नहीं हैं। मगर उनके निर्देशों के बावजूद अफसरों की यह राजनीति कम हो पायेगी इसकी आशा नहीं है।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं.

बाबा रामदेव उर्फ एक दयनीय संन्यासी जो शहर के होर्डिंगों पर टंगा है

Rajen Todariya : कल मैं हरिद्वार था। हरिद्वार में जाते ही आपका ध्यान जगह-जगह लगे बाबा रामदेव के होर्डिंगों पर जाता है। ऐसा आत्मप्रचार, ऐसी आत्म मुग्धता और छवि का ऐसा व्यापार किसी संन्यासी में मैने नहीं देखा। एक दयनीय संन्यासी जो शहर के होर्डिंगों पर टंगा है। शुक्ल यजुर्वेद में संन्यासियों के लिए प्रावधान किए गए हैं कि वे सांसारिक चीजों से दूर रहेंगे। भोग विलास नहीं बल्कि त्याग का आदिम जीवन जियेंगे। गेरुआ वस्त्र की आचार संहिता है कि गेरुआधारी व्यक्ति किसी गृहस्थ की दहलीज में अंदर नहीं जायेगा।

कुल तीन घरों से भिक्षा मांगेंगे और पात्र में नहीं बल्कि हाथ में भिक्षा लेंगे। भिक्षा का संग्रह नहीं करेगा। गांधी जी ने इस अपरिग्रह का नाम दिया। सन्यासी किसी पक्के मकान पर नहीं रह सकता। रामदेव जिन स्वामी विवेकानंद की भक्ति का नाटक करते हैं उन्होंने संन्यासी के लिए जीवन बिताने की आचार संहिता तैयार की थी। करतल भिक्षा, तरुतल वास। यानी संन्यासी को हथेली पर भिक्षा ग्रहण करनी है और पेड़ के नीचे सोना है। ये संन्यासी एयरकंडीशंड में सो रहे हैं। रामदेव को यदि जीवन के भोग विलास में ही रहना है तो गृहस्थ की तरह रहें। वे सारे कष्ट भी झेलें जो आम गृहस्थ झेलता है। कबीर ने संन्यासियों का मजाक उड़ाते हुए कहा था, ‘‘मन तो रंग्यो नहीं कपड़ा रंग दियो’’। यानी मन से तो विलासी बने रहे और कपड़े वैराग्य के पहन लिए। यह सरासर ठगी है और धर्म का दुरुपयोग है। यह सन्यास की वस्त्र आचार संहिता का भी उल्लंघन है।

        Ashok Jivram Mishra aajkal kuch sanyaashiyo ki vajah se pure sanyasiyo ka naam khraab ho raha hai.
 
        Avinash Vidrohi like
 
        Raghuveer Negi jee uchit pratit hota hai kabir ka kathan …………………
   
        Mahendra Bisht Togadiya ji aap Samalochak nah aalochak ho ess baat se saabit hai…
    
        Manoj Negi samay ke saath sab kuch badlta hai
     
        Manoj Negi jab duniya high tech ho rahi hai to fir baaba ji kyo nahi
      
        Mahendra Bisht yes Ramdev is great and Togadiya ji mainly anti Congrees per hi commnet karte hain
       
        Raghuveer Negi Tadoriya je meri ek baat se naraj na hon ……….. main aapko ye bhi batana chahta hun ki kabir jee ne ek doha ye bhi kaha tha ………. bura dhundne ………… pr mujsa bura na milya koi………….
        
        Raghuveer Negi pahle ptrkaar log bhi ek jhola khaddar ka kameej paijaama pahan kr niklte the aur jagah jagah paidal jaya karte the ……….. lekin ab to wo bhi chaupaye par baith kar chai nasta nahin balki murga daaru se kam ………… hath main mahange leptop………… wagerha wagerh ……….es par aap kya kahenge ………..
         
        Mahendra Bisht Raghu ji app sahi kah rahe hai
         
        Raghuveer Negi Bist jee tab tak pass mat kariye jab tak rajen jee ne no. nahin diye
         
        Mahendra Bisht Ranjan ji aapko (_ )Minis main number denge
         
        Raghuveer Negi chalo koi nahin ……………
         
        Raghuveer Negi bhale hi aadami ganda ho par uski rah achhi ho to rodey bichhne ke bajay hatana chahiye ………. isi main uski mahnta hoti hai …………
         
        Manoj Negi Yadi koi bhi ensaan samay ke saath nahi badlega to wo peechhe rah jayega , aur isiliye aadiwasi ( tribes ) aaj peeche rah gaye
         
        Shankar Vishwanath samay ke sath badalna parta hai.. ye samay ki mang hai.. ramdav is the brand name of indian ayurveda n yoga
         
        Shankar Vishwanath rishi hamesha se hi rajneeti me disha nirdesh ka karya karte hain. ramdev bhi vahi kar rahe hain or samay ke sath tareeke bhi badal jate hain..
         
        Ravindra Belwal Pahadi Chora yada yada hi adharmasya galanir bahwatu baruta ….abuthanam adharmasyaya sambhwaami yuge yuge..
         
        दिनेश आर्य 'दीनू' Ramdev ko aaj ki sthiti mein kisi bhi lihaj se sanyasi ya baba nahi kaha ja sakta, shuruaati dino ke fatafat yoga programs ne unko sohrat di lekin unka ekmatr agenda vyapar hi raha. ab apne rogiyon ki bhakti ka labh lekar wo rajneti karne lage hain.

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजेन टोडरिया के फेसबुक वॉल से साभार.

बैंक से रिटायर होने के बाद कथाकार सूरज प्रकाश साहित्यशिल्पी डाट काम से जुड़े

प्रिय मित्र, बीते दिनों 30 मार्च को मैं अपनी बैंक की नौकरी से रिटायर हो गया।  इन दिनों आराम के मूड में हूं और खूब पढ़ रहा हूं, संगीत  सुन रहा हूं, फिल्‍में देख रहा हूं और अपने वक्‍त को अपने तरीके से जीने के नये तरीके तलाश रहा हूं। पिछले दिनों मित्रों ने एक साप्‍ताहिक वेब पत्रिका www.sahityashilpi.com के संपादन का काम मुझे सौंप दिया है। चौथा अंक आ गया है। तीसरा अंक मंटो पर था जिसे खूब पसंद किया गया। हर पत्रिका को हर दिन लगभग 1500 लोग देख रहे हैं। इस पत्रिका में मैंने कई नये कालम  शुरू किये हैं। एक है – मेरे पाठक। इसमें रचनाकार अपने पाठकों के बारे में बात करते हैं कि किस तरह से लम्‍बे लेखन के दौरा पाठकों से रिश्‍ते बनते चलते हैं।

कई बार पाठक रूठते हैं, नाराज होते हैं, कहते हैं कि आपने मेरी कहानी कैसे पता कर ली या फलां कहानी का अंत ऐसे नहीं ऐसे होना चाहिये था। ये कालम पाठकों से हमारे रिश्‍ते की बात करता है। अब तक इसमें प्रताप सहगज, रूप सिंह चंदेल, कमल कुमार‍ जितेन्‍द्र ठाकुर आदि अपनी बात कह चुके हैं। इसके अलावा मैंने पढ़ी किताब में किसी अच्‍छी किताब का जिक्र, आओ धूप में नये  रचनाकार, रोचक  या प्रेरक प्रसंग में लेखक के जीवन में घटे ऐसे प्रंसगों का विवरण होता है जो वे शेयर करना चाहें1 देस परदेस में विदेशी साहित्‍य, भाषा सेतु में भारतीय भाषाएं और विरासत में ख्‍यातिनाम कहानियां दे रहे हैं। आप अंक देखेंगे तो अंदाजा लग जायेगा।

इनके अलावा हम हर अंक के साथ अपने पाठकों को एक ईबुक का उपहार दे रहे हैं1 अब तक हम चार्ल्‍स डार्विन की आत्‍मकथा का हिंदी अनुवाद, एनिमल फार्म का हिंदी अनुवाद, मंटो पर एक किताब, मधुशाला दे चुके हैं। आगामी अंक के साथ रूप सिंह चंदेल की कहानियां और उससे अगले अंक में एस आर हरनोट की कहानियों  का संग्रह ईबुक के रूप में देंगे।

आपसे सादर अनुरोध कर रहा हूं कि अगर आप हमारे लिए – मेरे  पाठक  कालम के लिए कुछ  लिख सकें तो हमारी पत्रिका का मान बढ़ायेंगे। यात्रा संस्‍मरण, कहानी, कोई और प्रसंग या मैने पढ़ी किताब के लिए भी आपके शब्‍द हमारे लिए मायने रखते हैं। आपकी रचना हमारी पत्रिका के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण होगी।

इंतजार करूंगा आपकी हां और रचना का भी

सादर
सूरज
मुंबई
09930991424
www.surajprakash.com
mail@surajprakash.com
 

भिंड के पीआरओ की दादागिरी, पत्रकार को दो घंटे तक बना कर रखा बंधक

नईदुनिया भोपाल के भिंड ब्यूरो प्रमुख गुणाकेश पारासर जब पीआरओ आफिस अखबार का पेमेंट लेने पहुंचे तो पीआरओ जेपी धोलपुरिया ने अखबार का भुगतान तो नहीं किया अलबत्ता बेइज्जत करके दो घंटे तक अपने आफिस में बंधक बनाये रखा. दो घंटे बाद देहात थाना पुलिस के पहुंचने पर पुलिस हस्तक्षेप के बाद रिहा कराया गया. जब पारासर बाहर निकले तो पत्रकारों के साथ देहात थाना पहुंच कर पीआरओ जेपी धोलपुरिया के खिलाफ शिकायत दर्ज करवायी.

इससे पहले भी पीआरओ महोदय और भी कई पत्रकारों को बेईज्जत कर चुके हैं लेकिन उनकी शिकायत नहीं हो सकने पर उनके हौसले बुलंद हैं. सभी पत्रकारों ने इस हरकत की निंदा की और एकजुट होकर ज्ञापन देने का फैसला लिया.

किशोर वाधवानी के काले धंधों को आड़ देने के लिए पब्लिश किया गया है ‘दबंग दुनिया’

यशवंत जी, दबंग दुनिया के निकालने के पीछे का कारण कोई समाज सेवा नहीं है बल्कि किशोर वाधवानी के काले धंधों को आड़ देना है. साथ ही उसके खिलाफ जितने केस इनकम टैक्स विभाग और एक्साइज में चल रहे हैं उनको सुलटवाना है. 18 महीने बीत गये पर अभी भी मशीन का दूर-दूर तक पता नहीं है. कर्मचारियों में यह कानाफूसी चलती रहती है कि पता नहीं सेठ कब घोषणा कर दे कि बस आज से अख़बार बंद.

इतना ही नहीं उन्‍होंने अख़बार चलाने के लिए एक से एक नमूने भर्ती कर रखे हैं, जिनका इस धंधे से बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते की तरह रहा है, जो यह समझता है कि बैल गाड़ी उसके कारण चल रही है. दिसम्बर 2011 तक इनके लिए दिल्ली में और कॉर्पोरेट बिज़नेस देखने वाला कोई नहीं था. लोगों के पैसे मारने में भी इस संस्थान को महारत हासिल है. सीईओ साहब को दो-दो अख़बार बंद करने का अनुभव है. शायद अब तीसरे की बारी है. संपादक महोदय खुद को प्रभाष जोशी से भी बड़ा पत्रकार समझते हैं और परले दर्जे के अहंकारी हैं. मालिक तो मशाल्लाह शेख़चिल्ली के भी बाप हैं.

नवल किशोर पराशर

navalkishoreparashar@gmail.com

आई नेक्स्ट के संपादक को प्रेस काउन्सिल ने दिखाया आईना

: नूतन ठाकुर का अखबार में पक्ष रखने देने का निर्देश संपादक को दिया : “यह हैं property के सबसे बड़े शौक़ीन” नाम से 20 अक्टूबर 2011 को आई नेक्स्ट, लखनऊ संस्करण के पृष्ठ 03 तथा 21 अक्टूबर 2011 को मेरठ संस्करण में छपे समाचार के सम्बन्ध में  मैंने प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया को 31 अक्टूबर 2011 को पत्र प्रेषित कर के उस समाचार के एकपक्षीय होने और इसमें मेरे द्वारा अपना पक्ष प्रस्तुत करने के बाद भी उसे प्रकाशित नहीं करने के बारे में शिकायत की थी.

अब मुझे इस सम्बन्ध में प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया का पत्र मिसिल संख्या 14/416/11-12-पी.सी.आई. दिनांक 15/05/2012  प्राप्त हुआ है जिसमे संपादक, आई नेक्स्ट, मेरठ को आदेशित किया है कि समाचारपत्र द्वारा मुझ वादी को अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किया जाए. साथ ही यह आदेश भी दिया गया है कि संपादक, आई नेक्स्ट मुझ वादी द्वारा प्रस्तुत खंडन प्रकाशित करें और प्रकाशित खंडन की एक प्रति परिषद एवं वादी को उपलब्ध कराएं.

चूँकि यह समाचार आई नेक्स्ट मेरठ के अतिरिक्त आई नेक्स्ट लखनऊ तथा कई अन्य संस्करणों में भी छपा था अतः मैंने प्रेस काउन्सिल को पत्र लिख कर निवेदन किया है कि न्याय और प्रेस नियमों के अनुरूप आई नेक्स्ट, मेरठ के संपादक के अतिरिक्त आई नेक्स्ट लखनऊ के संपादक को भी निर्देशित करने की कृपा करें कि जिन-जिन संस्करणों में उपरोक्त समाचार (बिना मेरा पक्ष जाने) प्रकाशित हुए, उन सभी संस्करणों में मुझ वादी द्वारा पूर्व में प्रस्तुत खंडन “मुझसे सम्बंधित एक समाचार के सन्दर्भ में कृपया प्रकाशनार्थ” प्रकाशित करने/ करवाने की कृपा करें.

डॉ नूतन ठाकुर, लखनऊ स्थित सामाजिक संगठन आईआरडीएस की कन्वेनर

 

प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया को प्रेषित पत्र—

सेवा में,
अध्यक्ष,
प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया,
नयी दिल्ली
विषय- आई नेक्स्ट लखनऊ एवं आई नेक्स्ट मेरठ में दिनांक 20 अक्टूबर 2011 को प्रकाशित एक समाचार के सम्बन्ध में
महोदय,

मेरे द्वारा पूर्व में प्रेषित पत्र संख्या NT/PCI-IN/LKO/01 दिनांक 31/10/2011 और अन्य प्रेषित अनुस्मारकों के सम्बन्ध में आप द्वारा प्रेषित पत्र मिसिल संख्या 14/416/11-12-पी.सी.आई. दिनांक 15/05/2012  का सन्दर्भ ग्रहण करें जिसके माध्यम से आपके संपादक, आई नेक्स्ट, मेरठ को आदेशित किया है कि समाचारपत्र द्वारा मुझ वादी को अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किया जाए. साथ ही यह आदेश भी दिया गया है कि संपादक, आई नेक्स्ट मुझ वादी द्वारा प्रस्तुत खंडन प्रकाशित करें और प्रकाशित खंडन की एक प्रति परिषद एवं वादी को उपलब्ध कराएं.

पुनः निवेदन है कि यह लेख “यह हैं property के सबसे बड़े शौक़ीन” नाम से 21 अक्टूबर 2011 को मेरठ संस्करण में छपने के पूर्व 20 अक्टूबर 2011 को आई नेक्स्ट, लखनऊ संस्करण के पृष्ठ 03 पर भी छपा था जिस सम्बन्ध में मैंने समाचारपत्र के संपादक एवं उप संपादक को फोन, ईमेल तथा पत्र भेज कर “मुझसे सम्बंधित एक समाचार के सन्दर्भ में कृपया प्रकाशनार्थ” (प्रतिलिपि संलग्न) तथ्य प्रेषित किये थे. मेरी जानकारी के अनुसार यह समाचार आई नेक्स्ट मेरठ और लखनऊ के अतिरिक्त आई नेक्स्ट के अन्य समस्त संस्करणों में भी छपा था.

उपरोक्त तथ्यों के दृष्टिगत आपसे निवेदन है कि न्याय और प्रेस नियमों के अनुरूप आई नेक्स्ट, मेरठ के संपादक के अतिरिक्त आई नेक्स्ट लखनऊ के संपादक को भी कृपया निर्देशित करने की कृपा करें कि जिन-जिन संस्करणों में उपरोक्त समाचार (बिना मेरा पक्ष जाने) प्रकाशित हुए, उन सभी संस्करणों में मुझ वादी द्वारा पूर्व में प्रस्तुत खंडन “मुझसे सम्बंधित एक समाचार के सन्दर्भ में कृपया प्रकाशनार्थ” प्रकाशित करने/ करवाने की कृपा करें.

पत्र संख्या- NT/PCI-IN/LKO/01

दिनांक- 26/05/2012

भवदीया

डॉ नूतन ठाकुर

5/426, विराम खंड,

गोमतीनगर, लखनऊ

# 94155-34525

प्रतिलिपि- संपादक, आई नेक्स्ट, मेरठ को पूर्व में “मुझसे सम्बंधित एक समाचार के सन्दर्भ में कृपया प्रकाशनार्थ” प्रेषित पत्र की प्रति अध्यक्ष, प्रेस काउन्सिल के निर्देशों के अनुक्रम में कृपया प्रकाशनार्थ प्रेषित

लखनऊ तबादला होने पर जीवन जोशी को दैनिक जागरण, मेरठ की ओर से समारोहपूर्वक विदाई

दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट मेरठ ने अपने ब्रांड मैनेजर जीवन जोशी को सम्मानित करने हेतु मार्केटिंग विभाग में समारोह आयोजित किया. जीवन जोशी पिछले लगभग 5 वर्षों से मेरठ में कार्यरत थे एवं मेरठ, आगरा, देहरादून, अलीगढ़ यूनिटों में ब्रांड विभाग के हेड थे. दैनिक जागरण प्रबंधन ने उनकी कार्यकुशलता को सम्मानित करने के लिए उनका तबादला बेहद महत्वपूर्ण लखनऊ यूनिट में कर दिया है. कार्यक्रम में महाप्रबंधक अखिल भटनागर सहित मृदुल त्यागी, विकास चुघ, राकेश राय, पुष्पेंदर सिंह, सत्येंद्र चौधरी, राजीव चौहान, शरद त्रिपाठी आदि मौजूद थे. इन सभी लोगों ने उन्हें उज्ज्वल भविष्या की शुभकाकामना दी. समारोह की कुछ तस्वीरें यूं हैं…