पंजाब केसरी का मालिक अश्विनी कुमार भाजपा से लड़ रहा करनाल से लोस चुनाव, पेड न्यूज को लेकर नोटिस

हरियाणा के करनाल से पंजाब केसरी के मालिक अश्विनी कुमार भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं. चूंकि मालिक चुनाव लड़ रहा है तो अखबार को इसके पक्ष में बिछ ही जाना है. सो, इन दिनों करनाल में पंजाब केसरी अखबार अपने मालिक अश्विनी कुमार का गुणगान करने में जुटा है. ये खबरें पेड न्यूज की कैटगरी में आती हैं. इसी कारण बीजेपी उम्मीदवार अश्विनी कुमार को उपायुक्त और जिला निर्वाचन अधिकारी बलराज सिंह ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में दोबारा कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

नोटिस में कहा गया है कि अश्विनी कुमार पंजाब केसरी अखबार के मालिक और मुख्य संपादक हैं. वह अपने अखबार में अपनी खबरें बढ़ा-चढ़ा कर पेड न्यूज की तरह छाप रहे हैं. इतना ही नहीं, इस अखबार को करनाल से पानीपत तक मुफ्त बंटवाया जा रहा है. ऐसा करना आचार संहिता का खुला उल्लंघन है. अपना अखबार होने का मतलब यह नहीं है कि उसे अपने प्रचार के तौर पर अपने चुनाव में इस्तेमाल किया जाए.

नोटिस में यह भी कहा गया है कि आचार संहिता के कथित रूप से उल्लंघन के लिए क्यों न उनके खिलाफ नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाए. अगर 24 घंटे में नोटिस का कोई ठीक जवाब नहीं दिया जाता तो यह समझा जाएगा कि वह इस मामले में कुछ नहीं कहना चाहते और उसके बाद कार्रवाई की जाएगी. गौरतलब है कि इससे पहले रविवार को भी अश्विनी कुमार को चुनाव आयोग का नोटिस दिया गया था. बीती 21 मार्च को अश्विनी कुमार, जिनके साथ बड़ी संख्या में इसी पार्टी के कार्यकर्ता थे, करीब 30-35 वाहनों के काफिले में नमस्ते चौक से घंटाघर चौक और उसके बाद सेक्टर-14 स्थित श्री कृष्ण मंदिर तक जुलूस के रूप में गए थे. पार्टी की ओर से इस गतिविधि की अधिकारियों से कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी. सेक्टर -14 स्थित श्री कृष्ण मंदिर को राजनीतिक और चुनावी उद्देश्य के लिए प्रयोग करने की आदर्श आचार संहिता में मनाही है.

अश्विनी कुमार करनाल सीट से लड़ने वाले प्रत्याशियों में सबसे धनी हैं. करनाल में पैराशूट के जरिए उतारे गए भाजपा प्रत्याशी ने चुनाव आयोग के समक्ष दिए गए अपने हलफनामे में जिस सम्पत्ति का ब्यौरा दिया है उसके अनुसार भाजपा प्रत्याशी ने अमीरी के मुकाबले में सभी प्रत्याशियों को पीछे छोड़ दिया है. भाजपा प्रत्याशी अश्विनी कुमार की संपत्ति का लेखाजोखा इस प्रकार है…

भाजपा प्रत्याशी ने 38 करोड़ 73 लाख 22 हजार रुपए चल सम्पत्ति शपथ पत्र में दिखाई है जिनमें –

1-हिन्द समाचर पत्र समूह में 13 करोड़ के बांड

2-पंजाब केसरी पब्लिकेशन के 27 लाख 40 हजार के बांड

3-परफैक्ट फैवरेकेशन में 13 लाख 33 हजार के बांड

4-रमेश चन्द मीडिया संस्थान में 6 लाख 14 हजार के बांड

5-हाईक शूज में 42 लाख 98 हजार के बांड

6-एच.डी.एफ.सी. में 7 लाख 29 हजार के बांड

7-विभिन्न बैकों में करीब 10 करोड़ 50 लाख रुपए का निवेश

8-दिल्ली में एक करोड़ 36 लाख रुपए का मकान

9-व्यावसायिक भूमि करीब 4 करोड़ 13 लाख रुपए

10-करीब 10 करोड़ 2 लाख रुपए का ऋण

ये सम्पत्ति है प्रत्याशी की पत्नी के पास-

1- 7 करोड़ 42 लाख 11 हजार रुपए की चल सम्पति

2-15 करोड़ रुपए की महरौली दिल्ली में 2.52 एकड़ कृषि भूमि

3-दिल्ली में 4 करोड़ रुपए का मकान

5- करीब 5 करोड़ 36 लाख 75 हजार रुपए का ऋण।
 

सहारा कर्मियों के लिए संकट, मार्च के वेतन में होगी देरी

सुब्रत राय के तिहाड़ जेल में बंद होने का असर सहारा के कर्मचारियों पर पड़ने लगा है. बताया जा रहा है कि सहारा कर्मियों को मार्च की तख्वाह देर से मिलेगी. निवेशकों का पैसा लौटाने के मुद्दे पर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के साथ कानूनी लड़ाई का दबाव झेल रहे सहारा समूह ने कर्मचारियों को सूचित किया है कि मौजूदा प्रतिकूल परिस्थितियों तथा बैंक खातों पर रोक की वजह से उनको मार्च का वेतन मिलने में देरी हो सकती है.

समूह अपनी ओर से चीजों को सामान्य करने का पूरा प्रयास कर रहा है. समूह ने कहा है कि कर्मचारियों का मार्च, 2014 का वेतन कल जारी किया जाना था, लेकिन इस ‘अप्रत्याशित वजहों’ से इसमें विलंब हो सकता है.  सहारा इंडिया परिवार के मुख्य महाप्रबंधक (एचआर) गौरव शर्मा ने सभी कारोबारी खंडों व विभाग प्रमुखों से कहा है कि वे कर्मचारियों को इस विलंब के बारे में सूचित करें और इस चुनौती के समय एकजुट रहें. समूह ने कर्मचारियों से चुनौती की इस घड़ी में ‘एकजुट बने रहने’ की अपील की है.

सहारा समूह की दो इकाइयों द्वारा निवेशकों से जुटाए गए 24000 करोड़ रुपए के अधिक की रकम को निवेशकों को लौटाने के मुद्दे पर प्रतिभूति बाजार विनियामक सेबी और सहारा के बीच लम्बे समय से यह मामला चल रहा है. सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय 4 मार्च से तिहाड़ जेल में हैं. उच्चतम न्यायालय ने इसी महीने यह प्रस्ताव किया है कि राय को अंतरिम जमानत मिल सकती है, लेकिन इसके लिए समूह को 10,000 करोड़ रुपए जमा कराने होंगे. इसमें से 5,000 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी होगी.

बुद्ध और अंबेडकर के विचारों का प्रसार करता देश का पहला दलित चैनल ‘लॉर्ड बुद्धा टीवी’

नागुपर से देश के पहले ऐसे सेटेलाइट चैनल का प्रसारण होता है जो गौतम बुद्ध और डॉ. अंबेडकर के विचारों और संस्कारों का प्रसार करता है। चैनल का नाम है ‘लॉर्ड बुद्धा टीवी’। दलितों को मुख्यधारा के मीडिया में उचित जगह नहीं मिलती इसलिए दलितों का भी एक मीडिया होना चाहिए, इस विचार को लेकर नागपुर के दो भाइयों राजू मून और सचिन मून ने इस चैनल की शुरुआत की है। बहुत ही सीमित संसाधनों से चलने वाले इस सैटेलाइट चैनल की शुरुआत 18 मई 2012 को हुई थी।

चैनल पर मुख्य तौर से गौतम बुद्ध और डॉ. अंबेडकर समेत दलित आंदोलन से जुड़े नेताओं के विचारों और शिक्षाओं को समर्पित कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। इनके साथ ही करियर, सेहत, संगीत, करेंट अफेयर्स के कार्यक्रम और समाचारों से जुड़े कार्यक्रम भी आते हैं। चैनल के नाम से ऐसा लग सकता है कि इसमें सिर्फ एक समुदाय विशेष के लोग ही काम करते होंगे या इसके दर्शक एक वर्ग विशेष तक सीमित होंगे। लेकिन हक़ीकत में यहां सभी जाति और धर्म के लोग काम करते हैं। हां ये ज़रूर है कि चैनल को विज्ञापन इसलिए नहीं मिलते क्योंकि इसके दर्शक वर्ग को लेकर जो सोंच बनी है उसके चलते विज्ञापन देने वाली कंपनियों की इस पर नज़र नहीं पड़ी है।

चैनल के अनुसार वर्तमान में इसकी पहुंच 2.5 करोड़ लोगों तक है। राजू मनु कहते हैं कि उन्होने कई कॉरपोरेट कंपनियों से विज्ञापन के लिए मांग की, लेकिन उनसे कोई ख़ास जवाब नहीं मिला। फिलहाल ये चैनल कुछ संस्थाओं की मदद और लोगों के जन्मदिन की शुभकामनाओं वाले विज्ञापनों से अर्जित आय के सहारे चल रहा है।

चैनल मालिकों का दावा है कि उनका चैनल 17 राज्यों में देखा जाता है। चैनल को उसकी वेबसाइट पर लाइव भी देखा जा सकता है। ये चैनल अभी किसी ‘डायरेक्ट टू होम’सेवा का हिस्सा नहीं है लेकिन कई इलाक़ों में स्थानीय केबल नेटवर्क कंपनियों ने इसे अपने चैनल पैकेज में शामिल किया है।

चंडीगढ़ प्रेस क्लब चुनाव : नानकी बने अध्यक्ष, राजेश ढल्ल ज्वाइंट सेक्रेटरी

चंडीगढ़ प्रेस क्लब के चुनाव रविवार को संपन्न हुए. चुनाव में नानकी हंस को प्रधान (अध्यक्ष) निर्वाचित घोषित किया गया. संजय शर्मा को सीनियर वाइस प्रधान (उपाध्यक्ष), बरींद्र रावत को वाइस प्रधान (उपाध्यक्ष) और दवी दविंदर कौर वाइस प्रधान वुमन (उपाध्यक्ष महिला) चुना गया.

जनरल सेक्रेटरी के पद पर नलिनी आचार्य ने जीत हासिल की. कैशियर चुने गए जसवंत राणा. ज्वाइंट सेक्रेटरी के दो पदों के लिए राकेश गुप्ता और राजेश ढल्ल का निर्वाचन हुआ. इसी तरह सचिव के पद पर मंजीत सिंह चुने गए. नई कार्यकारिणी के पदाधिकारियों ने बताया कि उन्होंने चुनाव से पहले जो वादे किए थे, वे हर हाल में पूरे किए जाएंगे.

करण थापर अब हेडलाइंस टुडे के हिस्से होंगे

सीएनएन-आईबीएन से लंबे समय से जुड़े जाने माने पत्रकार व एंकर करण थापर के बारे में खबर है कि अब वे हेडलाइंस टुडे के हिस्से बनेंगे. सूत्रों का कहना है कि उन्होंने मार्च माह के आखिरी सप्ताह में संस्थान को गुडबाय बोल दिया है. पहली तारीख से वे नई पारी की शुरुआत करेंगे.

थापर ने लंदन के वीकेंड टीवी में एक दशक से ज्यादा समय तक काम किया है. वे दी हिन्दुस्तान टाइम्स के भी साथ जुड़े. बाद में खुद का प्रोडक्शन हाउस खोल लिया. करण थापर अपने आक्रामक इंटरव्यू के लिए विख्यात हैं.

भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

Delhi Advertising Club (DAC) announces winners of Excellence in Advertising Awards 2014

New Delhi : The most outstanding media initiatives of the year gone by were recognized and awarded at the “DAILY EXCELSIOR and LEHAR ADVERTISING  present DAC – Excellence in Advertising Awards 2014” held at a glittering ceremony today at Ashoka Hotel, New Delhi. Seventeen Agencies received forty DAC Excellence in Advertising Awards. The Agency of the Year Award begged by Innocean Worldwide India, whereas Campaign of the Year  Award gone to McCann, New Delhi.

More than 500 Executives from Advertising World attended the ceremony and awards for twenty categories were presented to the winners selected by the jury out of 228 entries received from various advertising agencies of Delhi and NCR. Award winning Ad-Agencies are : Airads, Adsyndicate, Adman, Bubna, Crayons, Catalyst, Cytomed (Alkem), Graphisads, Havas, Interads, Infinity, Innocean, Linen (Lintas), McCann, Mode, Niyati &  Span.

A host of dignitaries from the advertising world were welcomed by Mr. H.S.Paul, President, Mr. V.K.Chopra, Chief Patron, Mr. Kailash Arora, Hony. Secretary, Mr.K.K.Malhotra, Hony.Treasurer and Mr. R.C.Tanwar, Convenor Program Committee, of the Delhi Advertising Club. The main sponsors of the event were Daily Excelsior of Jammu and Lehar Advertising of New Delhi whereas the creative and media supporters were Graphisads, Exchange4Media and Arohi Cinematics. The broad award categories include print advertising, TV/Radio Publicity, Outdoor Media and Print Material.

Speaking on the occasion Mr. HS Paul, President, Delhi Advertising Club said, “Delhi is gradually emerging as the Advertising Capital of India with major companies being headquartered in Delhi & NCR besides the government advertising body like DAVP. According to industry estimates, if advertisers spend around Rs 30,000 crore in India, alone Delhi/NCR contributes to roughly 40%, with release orders to the tune of around Rs 12,000 crore being signed out of Delhi.

Mr.Paul further added that “Delhi Advertising Club’s Excellence in Advertising Awards” since its inception in 1991 is an endeavor to recognize the efforts and accomplishments of teams and individuals from the advertising  fraternity here. These awards are not only a matter of honor for creative excellence, but have received tremendous support from media marketers and advertisers as well. I am very much pleased with the support received from the industry and would like to thank all partners, sponsors of trophies, Jury members, board members life and ordinary members of Delhi Advertising Club for making the DAC Awards a great success. He also appealed to the members present to come forward and become active member of the club, which is now position as Dynamic and Vibrant Industry Body under his Presidentship.

At the ceremony, Late Dr.Vishwanath, Founder and Past President of Delhi Advertising Club was given LIFE TIME ACHIEVEMENT AWARD which was collected by his son Mr.Anil Sharma, Managing Director of Interads Advertising from Mr.V.K.Chopra-Chief Patron, DAC.

The Award Ceremony was concluded with a vote of thanks by Mr.Kailash Arora-Hony.Secretary, DAC.

About DAC:

The Delhi Advertising Club has more than 370 members. These members are senior executives from leading advertisers, advertising agencies and media, including print, electronic, outdoor agencies and PR houses. The club has been functioning regularly since 1969.

Press Release

औरंगाबाद में पत्रकारों की एक एक हजार में लगी बोली

औरंगाबाद के समाहरणालय के सामने 'सरस्वती होटल इन' में एक राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिले के कई छोटे बड़े अख़बारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का मुख्य उद्देश्य यह था कि उस राजनीतिक पार्टी के बड़े नेता का चुनाव प्रचार होने वाला है और उस नेता की बेहतर खबरें अखबारों और टीवी चैनलों पर दिखे। इसको लेकर पार्टी के कई लोगों ने प्रेस को सम्बोधित किया।

उस पार्टी के दिग्गज नेता यहाँ औरंगाबाद लोकसभा से प्रत्याशी हैं। सौभाग्यवश मैं उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं गया, इसलिए ये बाते मैं बेबाक होकर कह रहा हूँ। खबर है कि प्रेस के सम्बोधन के बाद पहुंचे मीडियाकर्मियो को पीले रंग के लिफ़ाफ़े में एक एक हजार के कड़क नोटों से नवाजा गया। कुछ पत्रकार खुश हुए तो कुछ नाराज, जो नाराज हुए उन्हें पंद्रह सौ से लेकर पांच हजार तक नवाजा गया और कुछ अलग से बाद में देने का वादा भी किया गया। पैसे लेने के बाद पत्रकारों में काफी ख़ुशी व्याप्त है, जबकि सूत्रों की मानें तो पार्टी के आलाकमान की तरफ से प्रति पत्रकार पांच पांच हजार रुपये दिए जाने की घोषणा थी, लेकिन यहाँ तो कई पत्रकार एक एक हजार के कड़कती नोट लेकर ही खुश हो गए। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो पत्रकार नहीं पहुंचे वो भी काफी खुश हैं, इस बात को लेकर की कम से कम इज्जत तो बची। 

औरंगाबाद से धीरज पांडेय की रिपोर्ट.

चुनावी उफान में पुरबिया तान : लोकगीतों को संरक्षित-विकसित करने का ऑनलाइन अभियान

: गायिका चंदन की आवाज में महेंदर मिसिर के गीतों का पहला अलबम ‘पुरबिया तान’ होगा ऑनलाइन : गलियों में बिखरे हुए लोकगीतों का ऑनलाइन जंक्शन ‘लोकराग’ गुमनाम गायकों का बनेगा मंच : लोकसंगीत में अश्लीलता विद्रूपता को दूर करने के लिए देश दुनिया के कोने में रह रहे लोकसंगीत के रसियों के सहयोग से शुरू हुआ है अभियान

चुनाव के तनाव की बेला में मन-मिजाज और माहौल को थोड़ा खुशनुमा बनाने और बदलने के लिए आज 30 मार्च, रविवार से लोकसंगीत का एक नायाब अभियान शुरू हो रहा है. यह अभियान लोकराग डॉट कॉम www.lokraag.com के द्वारा शुरू हो रहा है, जो लोकगीत-लोकसंगीत के जारी होने के पारंपरिक तरीके यानि सीडी/डीवीडी आदि माध्यम से जारी करने के इतर ऑनलाइन माध्यम को बढ़ावा देगा.

लोकसंगीत के क्षेत्र में इस अभियान की शुरुआत कुछ युवकों के सामूहिक प्रयास से हुई है, जो देश और दुनिया के अलग-अलग कोने मंे रहते हैं लेकिन उनका माई-माटी-अपनी अपनी मातृभाषा और लोकसंगीत से विशेष जुड़ाव-लगाव है. इस वेबसाइट पर लोकगीत-लोकसंगीत के डिजिटल डोक्यूमेंटेशन और उनसे जुड़ी तमाम जानकारियों को एक साथ तो उपलब्ध होगा ही, उसके समानांतर ही इसका एक बड़ा मकसद प्रतिभावान होने और संभावनाओं से भरे होने के बावजूद अवसर व उचित मंच न मिल पाने या अश्लीलता-विदु्रपता से कदमताल न कर पाने की वजह से गायकी की दुनिया को अलविदा करनेवाले युवा गायक-गायिकाओं को मंच उपलब्ध कराना होगा. संभावनाशील प्रतिभाओं को मंच देने के अभियान के तौर पर लोकराग की पहली ऑनलाइन प्रस्तुति के तौर पर रविवार को ‘पुरबिया तान’ नाम से पहला म्यूजिकल अलबम जारी होगा, जो पुरबी के सम्राट स्व. महेंदर मिसिर के गीतों का संग्रह होगा. इस अलबम के सारे गीतों को गायिका चंदन तिवारी की आवाज में संयोजित व संकलित किया गया है.

युवा गायिका चंदन बिहार के भोजपुर जिले के बड़कागांव की रहनेवाली है और झारखंड के बोकारो में रहती हैं. महुआ के सुरसंग्राम, जिला टॉप आदि कार्यक्रमों में चंदन अपनी आवाज का जलवा बिखेर चुकी हैं लेकिन पुरबिया तान के जरिये वे कम उम्र में ही बेहद गंभीर व श्रमसाध्य गायन के साथ लोगों के सामने आयंेगी. इस अलबम में पुरबी, निर्गुण, कृष्ण-गोपी प्रसंग वाले मनमोहक भजन समेत पॉपुलर लोकगीत भी हैं. चंदन कहती हैं कि उनके लिए सबसे आसान था कि वे सीडी या डीवीडी के जरिये अपने अलबम को लेकर सामने आ सकती थी लेकिन लोकराग वेबसाइट के जरिये ऑनाइन माध्यम से इसे जारी करने का मूल मकसद यही है कि यह लोगों को निःशुल्क मिले और एक साथ दुनिया के कोने-कोने में रह रहे भोजपुरी भाषी और लोकसंगीत के रसियों को महेंदर मिसिर जैसे महान गीतकारों के गीतों को सुनने का मौका मिले. बकौल चंदन, महेंदर मिसिर के बाद वह भिखारी ठाकुर के गीतों पर काम कर रही हैं और शीघ्र ही बेटी विदाई के कुछ सदाबहार व करूण गीतों का अलबम लोकराग के जरिये उपलब्ध कराएंगी.

लोकराग के जरिये लोकसंगीत के इस अभियान के संरक्षक बीएन तिवारी उर्फ भाईजी भोजपुरिया का कहना है कि हम यही मानकर इस अभियान को शुरू कर रहे हैं कि अगर वाकई लोकगीतों को बचाना है तो नयी प्रतिभाओं को अच्छे गीत गाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा और उन्हें एक सशक्त मंच उपलब्ध कराना होगा. साथ ही सिर्फ पेशेवर गायक-गायिकाओं के आवाज में ही नहीं बल्कि गांव की गलियों में रहनेवाले तमाम दादा-दादी, नाना-नानी, आमजनों में जो जन्मजात गायकी की विरासत है, उसे भी उन्हीं की आवाज और अंदाज में सामने लाना होगा.

लोकसंगीत के इस अनूठे अभियान को आगे बढ़ाने के लिए लोकराग समूह के साथी सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों के जरिये सभी लोगों से मदद ले रहे हैं और अपील कर रहे हैं कि कि अपने-अपने गांवों से, अपने अपने घरों से गीतों को गवाकर भेजें, जिसे लोकराग के जरिये पेशेवर अंदाज में जारी किया जाएगा और गायक-गायिका का पूरा परिचय भी दिया जाएगा. वह गीत किसी प्रकार के हो सकते हैं. पुरबी, बिरहा, सोहर, विवाह गीत, रोपनी-सोहनी गीत से लेकर हरिकीर्तन व झलकूटन गीत तक. और यह किसी भी भाषा-बोली में होगा. लोकराग की परिकल्पना को साकारा करनेवाले व इस वेबसाइट के मॉडरेटर व दिल्ली में रहनेवाले पत्रकार विकास कुमार कहते हैं कि हमारा मकसद लोकगीतों की दुनिया और डिजिटल दुनिया के बीच सामंजस्य के रिश्ते को और मजबूत करना है. बकौल विकास, वैसे युवा गायक-गायिका, जो साफ-सुथरे व पारंपरिक गीतों को गाकर अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, अधिक से अधिक लोगोें तक जाना चाहते हैं, उनके गीतों को लोकराग निःशुल्क जारी करेगा और गीत-संगीत उपलब्ध कराने में रचनात्मक सहयोग भी करेगा. पुरबिया तान अलबम के परिकल्पनाकार व निर्माता अरूण सिन्हा कहते हैं कि चंदन की आवाज में पुरबिया तान अलबम जारी करने के पहले हमने ऑनलाइन माध्यम से इस अलबम के एक गीत को जारी किया था और कई लोगों को मेल से भेजा था, जिसका रिस्पांस कल्पना से परे मिला. दस दिनों में तमाम मित्रों के सहयोग से करीब 50 हजार लोगांे तक इस एक गीत को हम पहुंचाने में सफल रहे, तब जाकर अब पूरा अलबम रिलीज कर रहे हैं. पुरबिया तान के साथ ही लोकराग द्वारा मौसम के मिजाज के हिसाब से चैता-चैती का भी एक सीरिज जारी हो रहा है, जिसे गंवई और ठेठ अंदाज में शशिभूषण काजू व उनकी मंडली ने गाया है. शीघ्र ही गंवई भजनों की एक श्रृंखला, बेटी विदाई गीतों की एक श्रृंखला और गांव की गलियों से बिखरे हुए गीतों की नयी श्रृंखला सामने आएगी.

लोकराग के इस अभियान को एक मूर्त रूप देने और आगे बढ़ाने में देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्से में रह रहे लोग अपना समर्थन व सहयोग दे रहे हैं. खाड़ी देश में कार्यरत नवीन भोजपुरिया, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में शोधरत पत्रकार अनुपमा, बेगुसराय के रहनेवाले पत्रकार शशिसागर, मुजफ्फरपुर के गांव चंद्रहट्टी के रहनेवाले व पेशे से पत्रकार लोकेश कुमार, जहानाबाद के सचई गांव के रहनेवाले सनातन कुमार, चतरा के रहनेवाले रामेश्वर राम, फारबिसगंज के रहनेवाले शिव कुमार, सासाराम के रहनेवाले और पेशे से भेल मंे इंजीनियर मृगांक शेखर जुगनू, राजस्थान के कोटा में रहनेवाली श्रद्धा चौबे जैसे लोग लगातार इस अभियान को आगे बढ़ाने में पूरे मनोयोग से लगे हुए हैं और सहयोग कर रहे हैं.

प्रेस रिलीज

‘वायस आफ मूवमेंट’ नहीं छापेगा पेड न्यूज : प्रभात रंजन दीन

लखनऊ से प्रकाशित अखबार वायस आफ मूवमेंट की तरफ से इसके प्रधान संपादक प्रभात रंजन दीन ने एलान किया है कि उनका अखबार पेड न्यूज नहीं प्रकाशित करेगा. दीन ने इस बाबत अखबार में विशेष संपादकीय लिखकर अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा की है. पढ़िए, दीन ने क्या लिखा है…

मीडिया में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक 'वॉयस ऑफ मूवमेंट' की तरफ से व्यापक जन-अभियान छेडऩे का ऐलान

हलफनामा : एक भी खबर 'पेड न्यूज़' साबित हुई तो प्रेस काउंसिल मान ले सम्पादक का इस्तीफा

हम जमीर और खबरें नहीं बेचते!

प्रभात रंजन दीन

कुलीनपन के ज्वर से पीडि़त कई लिपे-पुते चेहरों को देखा है हजरतगंज या
ऐसे ही किसी शॉपिंग या मॉलिंग वाले इलाके में भिखमंगों को देख कर कड़वा
सा मुंह बनाते हुए। आपने भी देखा ही होगा। भीख मांगने वालों को देख कर
जहरीला हाव-भाव दिखाने वाले लोगों में 'गरिष्ठ' पत्रकार और मीडिया
संस्थानों के 'बलिष्ठ' मालिकान भी होते हैं। ये ऐसे पत्रकार और मीडिया
मालिक होते हैं जो भिखमंगों के अठन्नी-चवन्नी मांगने पर तीता चेहरा बनाते
हैं लेकिन नेताओं से चवन्नी मांगने में इन्हें शर्म नहीं आती और चेहरे का
भाव भी नहीं बदलता। अब लोकसभा चुनाव सामने है। इस मौसम में मीडियाई
भिखमंगों की चल निकली है। मीडिया की इस भिखमंगी जमात को 'पेड न्यूज़' के
कारण हो रहे 'डेड न्यूज़' की कोई फिक्र नहीं। इन्हें खबरों की लाश बेच कर
अठन्न्नी-चवन्नी कमाने की फिक्र है। इनकी प्राथमिकता नेताओं को अखबार के
पन्ने बेचना और भोले पाठकों के समक्ष नैतिकता की झूठी दुहाइयां परोसना रह
गई है।
'पेड न्यूज़' के कारण देश-दुनिया में भारतीय मीडिया की जो छीछालेदर हुई
है, उसे सब लोगों ने देखा है, जाना है। लेकिन इतनी सर्वत्र भत्र्सना और
व्यापक निंदा प्रस्तावों के बावजूद किसी भी मीडिया संस्थान या 'गरिष्ठ'
पत्रकार ने खबरें बेच कर नेताओं से पैसा लेने के दारिद्रिक-आचरण के खिलाफ
कभी कोई कारगर बात नहीं कही। कोई विश्वसनीय मनाही नहीं की। कोई नैतिक
खंडन नहीं किया। ऐसे अनैतिक आचरण से वर्जना रखने की किसी सार्थक घोषणा की
तो बात ही दूर रही। चुनाव चला जाएगा, तब फिर से नैतिक और सच्ची खबरों पर
विद्वत बहसें होंगी। अभी तो सारे 'गरिष्ठ' मिल कर 'उच्छिष्ठ' खाने में
लगे हुए हैं।
चुनाव-बाद की फर्जी नैतिक बहसों में मुब्तिला होने से परहेज करते हुए हम
व्यक्तिगत रूप से भी और संस्थानिक रूप से भी 'पेड न्यूज़' के जरिए हो रहे
मीडियाई-भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की घोषणा कर रहे हैं। हमें
नैतिक-अर्थ से परहेज नहीं। अनैतिक-अर्थ से हमारा इन्कार है। 'वॉयस ऑफ
मूवमेंट' खुद एक मीडिया संस्थान है, लेकिन कई नामी-गिरामी मीडिया
संस्थानों द्वारा खबरों के साथ किए जा रहे व्यभिचार के खिलाफ व्यापक,
सक्रिय और सकारात्मक अभियान के लिए खुद को आगे करने का ऐलान करता है। यह
आंदोलन वोट के लिए नहीं है। यह आंदोलन मीडिया की कथनी और करनी के फर्क पर
चोट करने के लिए है। यह आंदोलन किसी मेगासायसाय जैसे एनजीओआई-पुरस्कार के
लिए नहीं, बल्कि खबरों की पवित्र हवा सांय-सांय चले, इसके लिए चले और
कारगर परिणाम तक पहुंचे।
कोई भी नैतिक आंदोलन व्यक्ति से होकर ही समष्टि तक पहुंचता है। …तो
व्यक्तिगत से लेकर संस्थागत स्तर तक 'वॉयस ऑफ मूवमेंट' के हम सब
ध्यानी-पत्रकार (मेडिटेटिंग जर्नलिस्ट) और प्रबंधकीय साथी खबरों को बेचने
के धंधे के खिलाफ खड़े होने की शपथ लेते हैं। हमारे इस शपथ में संस्थान
के स्वामी भी बराबर से शरीक हैं। हम मीडिया के समानविचारधर्मी साथियों से
इस भ्रष्टाचार के खिलाफ तन कर खड़े होने की पुकार देते हैं। हम नेताओं से
भी कहते हैं कि पत्रकारों को भ्रष्ट न करें। पत्रकारों को जीवन में
स्थायीभाव से खड़ा होने की कानूनी-विधायी ताकत दें। खबरों का स्थान खरीद
कर अपना 'ढिंढोरा' न छपवाएं, न दिखवाएं। मीडिया स्वामियों से भी अपनी
रीढ़ बचाए रखने का जतन करने की हम हिदायत देते हैं। अपने जगत की सर्वोच्च
अदालत प्रेस परिषद के समक्ष हम अपनी यह घोषणा प्रेषित करते हैं और
विनम्रतापूर्वक यह चुनौती रखते हैं कि चुनाव-काल क्या, चुनाव के बाद तक
भी यदि एक खबर भी 'पेड न्यूज़' साबित हो गई तो यह घोषणा लिखने वाले
सम्पादक का इस्तीफा नैतिकता के आधार पर स्वीकृत मान लिया जाए। प्रेस
परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू इसे हमारा हलफनामा समझें।
चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस सम्पत और उत्तर प्रदेश के मुख्य
चुनाव अधिकारी उमेश सिन्हा से यह अपेक्षा है कि वे इस ऐतिहासिक घोषणा के
साक्षी बनें और हमारी कथनी और करनी पर सतर्क निगरानी रखें। …और प्रकृति
से यह प्रार्थना करते हैं कि वह हमें हमारी नैतिक स्थापना के दृढ़-निश्चय
को परिणामी शक्ति दे या बलिदानी शक्ति दे…

गाजीपुर पत्रकार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह संपन्न

गाजीपुर । गाजीपुर पत्रकार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियो का शपथ ग्रहण समारोह जिला मुख्यालय स्थित रायफल क्लब में आयोजित किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी चन्द्रपाल सिंह ने दीप प्रज्जवलन कर मां सरस्वती के चित्र पर माल्यापर्ण कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। एसोसिएसशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों जिसमें अध्यक्ष अनिल कुमार उपाध्याय, वरिष्ठ उपाध्यक्ष कमलेश कुमार यादव, महामंत्री चन्द्र कुमार तिवारी, सहसचिव अजय शंकर तिवारी, कोषाध्यक्ष विनोद गुप्ता तथा आय-व्यय निरीक्षक प्रमोद कुमार सिंघानिया को शपथ दिलाया।  एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष अनिल कुमार उपाध्याय ने अपने कार्यकारिणी सदस्यों जिसमें अशोक कुमार श्रीवास्तव, वेद प्रकाश श्रीवास्तव, अखिलेश यादव, राजेश दूबे, सूर्यबीर सिंह, अनिल कश्यप, रविकान्त पाण्डेय, पंकज पाण्डेय को भी शपथ दिलाया।

इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए जिलाधिकारी ने आज की पत्रकारिता पर प्रकाश डालते हुए मां सरस्वती व भगवान गणेश के महत्व पर बल देते हुए पत्रकारो को हंस की भूमिका का निर्वहन करने पर जोर दिया। जिस प्रकार सरस्वती के हंस में नीर और क्षीर को अलग करने की क्षमता होती है उसी प्रकार हमारे पत्रकारो मे भी गुण व अवगुणो को अलग अलग कर समाज में प्रस्तुत करने की क्षमता होनी चाहिए। सभी मुनष्य को आगे बढ़ने के लिए साधन की आवश्यकता होती है, साधन से आदमी महान बन जाता है, परन्तु जब वही साधन जब साध्य बन जाती है तो मनुष्य का विनाश होने लगता है। मनुष्य समाज का केन्द्र बिन्दू है, मनुष्य को मनुष्य बना देता है। समाज को चलाने के लिए भय, प्यार, कम्पल्सन आफ सोसाइटी पर जोर दिया, जो हमारे समाज को सुधार सकता है। मनुष्य अकेला ही समाज को ठीक कर सकता है, संसार में जो भी अविष्कार हुए वह किसी एक व्यक्ति ने किया, समाज मंे उपयोगी वस्तु बिजली का भी अविष्कार, टेलीफोन का अविष्कार जेैसे कई उपयोगी वस्तुओं को एक व्यक्ति ने समाज को प्रदान किया। इसलिए आप जो भी करे स्वंय करे किसी से अपेक्षा न करे, पहले स्वंय को पूर्णरूप से जाने फिर दूसरेा के बारे मे बात करें और संचालन कर रहे डा0 ब्यास मुनि राय के प्रभावशाली संचालन को सराहा।

इसी क्रम में विशिष्ट अतिथि डा0 उमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने पत्रकारो के निष्पक्षता पर जोर देते हुए किसी भी घटना पर न्यूज और ब्यूव (विचार) पर जेार दिया। पत्रकार आज न्यूज तो देते है, उसपर ब्यूव सही नही देते जो समाज मे गलत प्रभाव डालते है, इसलिए ब्यूव सही रखे जिससे समाज मे किसी के प्रति गलत संदेश न जाये। इसी क्रम में अश्क गाजीपुरी ने अपने मंहगाई पर कविता सूना कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। अपर पुलिस अधीक्षक नगर, हफिर्जुर रहमान ने पत्रकारिता एक मिशन पर जोर देते हुए पत्रकारिता एक जूनून के साथ आता है, दबी आवाज को आगे लाने की भावना होती है। दुष्यंत की कविता सुनाकर अपने पक्ति को विराम दिया। इसी क्रम में अपर जिलाधिकारी जितेन्द्र कुमार ने पत्रकार व प्रशासन के बीच सामन्जस्य स्थापित रहना चाहिए, जिससे समाज आगे बढ़ाता है। वही उपजिलाधिकारी आईएएस विशाख जी ने जनपद के पत्रकारो की सराहना की इसके लिए उन्होने नवनिर्वाचित टीम को शुभकामनाएं दी। जिला सूचना अधिकारी रामबली यादव ने शुभकामनाएं दी। वही एसोसिएशन की परम्पराओ को आगे बढ़ाते हुए पूर्व पदाधिकारियो ने वर्तमान पदाधिकारियो का माल्यापर्ण कर स्वागत किया। इस अवसर पर पत्रकार रामबाबू शाडिल्य, जयप्रकाश भारती, विनय कुमार सिंह, संजय यादव, डा0 विनोद कुमार राय, डा0 बी डी मिश्रा आदि ने अपने अपने विचार व्यक्त करते हुए नवनिर्वाचित पदाधिकारियो को बधाई दी। इसी क्रम में वरिष्ठ पत्रकार धर्मदेव राय का माल्यापर्ण किया गया। इसी क्रम में एसोसिएशन के संरक्षक आर सी खरवार ने मुख्य अतिथि एवं गुलाब राय ने विशिष्ट अतिथि को स्मृति चिन्ह प्रदान किया। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार कमला शंकर यादव तथा संचालन डा0 ब्यासमुनि राय ने किया।

इस कार्यक्रम में प्रमुख रूप से सिविल बार एसेासिएशन के अध्यक्ष सुरेश सिंह, कलेक्ट्रेट बार एसेासिएशन के अध्यक्ष दसरथ यादव,  सचिव अजय पाठक, कर्मचारी संगठन के अम्बिका दूबे व दुर्गेश श्रीवास्तव, जूनियर इंन्जिनीयर संघ अरविन्द नाथ राय, सुशील कुमार मिश्रा, सुशील उपाध्याय, राजेश सिंह, विनोद मिश्रा, राकेश पाण्डेय, अवधेश यादव, प्रवीण गुप्ता, देवब्रत विश्वकर्मा, सोनू तिवारी, अखिलेश यादव, शशिकान्त, दानिश, हेमन्त राय, प्रवीण तिवारी, मनीष मिश्रा, केके, श्याम सिन्हा, सत्येन्द्र नाथ शुक्ल, प्रमोद कुमार राय, किशन कुमार, आलोक त्रिपाठी, रविकान्त तिवारी सहित साहित्यकार आदि उपस्थित रहें। समारोह के अन्त में अध्यक्ष ने सभी आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।

भवदीय,
चन्द्र कुमार तिवारी
महामंत्री   

अमृत भारत में कम्पोजीटर रहे ओपी सिंह अब बिजली मीटर की स्पीड स्लो करने का काम करते हैं, वह भी निःशुल्क

लखनऊ : आप आज यहां जिस शख्स को देख रहे हैं ना, उसके बाबा के पास कभी सात गांवों की जमीन्दारी थी। यह कहानी है यूपी में गाजीपुर जिले के सादात इलाके की। परिवार था ठाकुरों का, और जमींदार साहब इन गांवों के किसानों से मालगुजारी वसूला करते थे। मनचाही वसूली होती थी इन जमींदार साहब की। इसके पहले भी यह ठाकुर साहब अंग्रेजों के तलवे चाटा करते थे। उनकी खुशामदी देख कर अंग्रेजों ने इन ठाकुर साहब को यह जमीन्दारी अता फरमायी थी।

नतीजा, ठाकुर साहब अपने आकाओं की जेब भरने के साथ ही जबरिया होने वाली भारी रकम की उगाही से अपनी ऐयाशी किया करते थे। जमीन्दार की उगाही से बुरी तरह त्रस्त किसानों की आह अचानक जमीन्दार के बेटे के कलेजे पर लग गयी। भारत छोड़ो का दौर था। यानी सन-42 में जमीन्दार के बेटे ने गोरी हुकूमत के खिलाफ बगावत-मोर्चा खोल दिया।

जाहिर है कि दमन होना ही था, जमीन्दार तो अपनी जायदाद बचाने के लिए अपने बेटे के खिलाफ हो गया और अपनी जमीन्दारी सम्भाल लिया। लेकिन आजादी के बाद ही उसका पराभव शुरू होने लगा। जमीन्दार ने कुछ ही वक्त में अपनी सारी सम्पत्ति को बेच खाया। जबकि बेटे ने आंदोलन छेड़ा और आखिरकार अपनी खानदानी सम्पत्ति को लात मार कर खुद लखनऊ में वनवास कर लिया। आजादी के बाद से बेटे ने अपनी मेहनत से एक प्रिंटिंग प्रेस खोला। पब्लिकेशन का धंधा भी शुरू किया। लेखन भी किया। मसलन, इस शख्स ने 130 किताबें लिखीं। और जल्दी ही उनका संस्थान रामा प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स आदि अनेक सहयोगी संस्थांनों का नाम लखनऊ ही नहीं, बल्कि पूरे यूपी में मशहूर हो गया।

लेकिन जमीन्दार के बेटे के पुत्र की फितरत भी अपने बाप से ही जैसी रही। बगावती अंदाज। नाम है ओपी सिंह। ओपी ने अपने पिता के प्रेस में काम करने के बजाय सीधे लखनऊ से प्रकाशित होने वाले अमृत भारत में कम्पोजीटर के तौर पर अपना जीवन शुरू किया। लहजा तो श्रमिकों के हितैषी का ही था, इसलिए ओपी सिंह कर्मचारी यूनियन में धमक कराने लगा। अचानक यह अखबार बंद हो गया। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी भी अखबार की बंदी हो जाना, उसके श्रमिकों के विधवा होने से ज्यादा खतरनाक होता है। उधर उसके पिता का संस्थान लगातार तबाही की ओर भी बढ़ता जा रहा था।

लेकिन ओपी तो जुझारू हैसियत का नाम था ना, इसीलिए उसने अपने हौसलों को पंख दिया और अपना निजी कारोबार शुरू की तैयारी की। इसके पहले अमृत-प्रभात के कर्मचारियों ने सामूहिक तौर पर लखनऊ के जानकीपुरम में ईडब्यूएस यानी दुर्बल आय के मकान खरीद लिये थे। ओपी को भी एक मकान मिल गया। उधर बेरोजगार होने पर ओपी ने तय किया कि वेल्डिंग का काम शुरू किया जाए। अर्जी लगायी गयी बिजली महकमे में, कि कनेक्शन मिल जाए। लेकिन इंजीनियर ने ढाई सौ रूपये की फीस के साथ ही साथ साढ़े छह सौ रूपये की घूस भी मांग ली। ढाई सौ रूपये तो अदा कर दिये गये, लेकिन ओपी ने घूस से हाथ खड़ा कर दिया। बोला: हम चोरी करने के लिए धंधा नहीं करना चाहते हैं, फिर घूस क्यों। दूं। यह सन-87 की बात है।

खरे जवाब को सुन कर इंजीनियर ने भी तय कर लिया गया कि वह बिना घूस के काम नहीं करेगा। कनेक्शन तो पास हो गया, लेकिन मीटर नहीं लगाया गया। करीब दो बरसों तक व्यर्थ भागा-दौड़ी देख कर ओपी ने तय किया कि अब काम शुरू कर ही दिया जाए। वेल्डिंग की मशीन वगैरह आ गया और कामधाम शुरू। लेकिन अभी दो दिन भी नहीं हुए थे, कि इंजीनियर ने पुलिस बुलवा कर ओपी की दूकान पर छापा डलवा दिया। सारा सामान जब्त और ओपी फरार हो गये। बाद में कोर्ट में मामला छूट गया कि जब मीटर ही नहीं लगा था, तो बिजली चोरी का मामला ही बेवजह लगा। ओपी ने फिर दौड़भाग की, लेकिन पुलिसवालों ने पहले ही जब्त हो चुकी मशीन तक वापस नहीं की। बेइज्जती तो खूब ही हुई।

इसके बाद से ही ओपी की खोपड़ी सटक गयी। ओपी का सारा गुस्सा अब बिजली के इंजीनियरों और पुलिसवालों पर ही उतरा। उसने तय किया कि वह अब पुलिस और बिजली विभाग से त्रस्त लोगों पर मलहम लगायेगा। इसके लिए ओपी ने न जाने कितने घरों पर लगे मीटरों पर छेड़छाड़ किया और उनकी स्पीड धीमी कर दिया। ओपी के ज्यादातर कस्टमर बिजली से त्रस्त लोग ही हैं। ओपी अब बिजली मीटर के अलावा, प्लम्बरी और भवन निर्माण का भी काम करता है। लेकिन जैसे ही उसे खबर मिलती है कि किसी की बिजली काट दी गयी, ओपी दौड़ कर उसके घर पहुंच जाता है। नि:शुल्क। यह उसका जुनून है कि बिजली तो हर कीमत पर जुड़ेगी। तारों से कटिया भी डलवा देता है ओपी। लेकिन इन कामों के लिए उसने कभी भी कोई रकम नहीं मांगी।

ओपी के सम्मान का आप अंदाजा केवल इसी बात से लगा सकते हैं कि ओपी को जब भी पुलिस ने पकड़ा, तो उसे छुड़वाने के लिए सैकड़ों लोग मौके पर पहुंच गये और हारकर पुलिस को ओपी को रिहा कराना पड़ा। ओपी अगर चाहे कि नि:शुल्क के बजाय इन कामों के लिए पैसा उगाना चाहे तो उसकी आमदनी दो-चार लाख रूपया महीना से ज्यादा हो सकता है। वह कार-मोटरसायकिल तक मेंटेंन कर सकता है। लेकिन ओपी आज भी हमेशा की ही तरह सायकिल पर ही फर्राटा मारते दिखता है। पैंट-शर्ट पर प्रेस नहीं, और कई जगहों पर पैबंद भी लगे होते हैं। और हां, खास बात तो यह कि ओपी ने अपने घर की बिजली कभी भी चोरी नहीं की है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

लगता है लफ्फाजी में राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को पीछे छोड़ दिया है

बाबू राजनाथ सिंह ने लखनऊ में मीडिया के सामने कहा कि वे हफ्ते में दो-तीन दिन अपने पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी के घर जाकर उनका हालचाल लेते हैं पर अभी टाइम्स आफ इंडिया ने एक खबर छापी थी जिसमें बताया गया था कि अटल जी के घर कुल तीन लोग हफ्ते में दो-तीन दिन आ जाते हैं और वे हैं- प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, एमएन घटगे और श्री लालकृष्ण आडवाणी।

लगता है लफ्फाजी में राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को पीछे छोड़ दिया है। वैसे लोगों का कहना है कि गाजियाबाद में मतदाताओं द्वारा भगाए जाने के बाद राजनाथ सिंह लखनऊ पलायन कर गए। अगर मुलायम सिंह उनकी भीतर से मदद न करें तो राजनाथ लोकसभा तो नहीं ही पहुंच पाएंगे। मुलायम सिंह ने ऐन चुनाव के पहले अपने उम्मीदवार अशोक बाजपेयी को बदलकर अभिषेक मिश्रा को ला दिया है।

अशोक बाजपेयी तो कम से कम यह दावा कर सकते थे कि वे अटलबिहारी बाजपेयी के करीबी रिश्तेदार हैं इसलिए बाजपेयी वाले वोट तो उन्हें शिफ्ट हो ही जाते। लेकिन अपने नेता जी यानी मुलायम सिंह यादव ने कई सीटों पर अपने उम्मीदवारों को हराने के वास्ते ही खड़ा किया है। आखिर कन्नौज का नमक जो अदा करना है। पर कभी इटावा, मैनपुरी, बदायूं, कन्नौज या फिरोजाबाद में वे यह हरकत नहीं करते।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

जब साबिर अली के पांच करोड़ रुपये के बहकावे में आ गए थे महुआ के मालिक पीके तिवारी

Vikas Mishra : पूर्व जेडीयू और पूर्व बीजेपी नेता साबिर अली के कुछ संस्मरण मेरे पास भी हैं। बात करीब ढाई साल पहले की है, जब महुआ न्यूज में मैं था। चैनल संकट में था, पैसे के लिए साबिर अली से डील चलने लगी। मेरी जानकारी के मुताबिक साबिर अली ने चैनल के मालिक पीके तिवारी को पांच करोड़ रुपये देने की बात कही थी।

खैर, आलम ये हो गया कि साबिर अली जैसे ही न्यूज रूम में आते, तुरत लाइव हो जाते थे। उनका इंटरव्यू चलने लगता था। साबिर अली ने मुफत की फूटेज खूब खाई। महुआ न्यूज की तरफ से दावत भी उड़ाई, लेकिन जेब ढीली नहीं की। पता चला कि डील 5 करोड़ से खिसकते खिसकते 50 लाख रुपये तक पहुंच गई। उसके बाद डील का जयश्रीराम हो गया।

साबिर अली ने झटका दे दिया, तिवारी जी देखते रह गए। गाज गिरी उस रिपोर्टर पर, जिसने साबिर अली को डील के लिए मिलवाया था, बेचारे को नौकरी से निकाल दिया गया। साबिर अली ने तिवारी जी को जैसा झटका दिया था, उससे ज्यादा जोरदार साबिर को खुद लगा है। यकीन है कि मुख्तार अब्बास नकवी ही नहीं, तिवारी जी भी बहुत खुश होंगे।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

नरेंद्र मोदी के लिए अवैध रूप से धन उगाही के रैकेट का पर्दाफाश (देखें तस्वीरें और प्रमाण)

भोपाल में इनकम टैक्स की अधिकारी पूनम राय एक बिल्डर से दस लाख रुपये लेती धरी गईं. पूनम राय का पति गणेश मालवीय भी इस रिश्वतखोरी का पार्ट था, इसलिए उसे भी सीबीआई ने अरेस्ट कर लिया. गणेश मालवीय भाजपा का नेता है और नरेंद्र मोदी का खास है. इससे संबंधित प्रमाण और तस्वीरें मध्य प्रदेश कांग्रेस की तरफ से उसके प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी ने जारी की है. साथ ही कांग्रेस की तरफ से एक प्रेस नोट भी है. सब कुछ नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

RESPECTED

GREETINGS

PL FIND ATTACHED PRESS NOTE, PHOTOGRAPH OF  ACCUSED BJP LEADER GANESH MALVIYA H/O OF INCOME TAX OFFICER, WHO HAS BEEN CAUGHT RED HANDED BY CBI ON FRIDAY IN BHOPAL.

PL PUBLISH
BEST REGARDS

PANKAJ CHATURVEDI

SPOKESPERSON

MP CONGRESS


उधर, माकपा राज्य सचिव बादल सरोज ने गणेश मालवीय के काल रिकार्ड्स की जांच की मांग करते हुए कहा कि रिश्वतखोरी की धरपकड़ और आयकर के छापों में हमेशा यह होता आया है कि पकड़े गए व्यक्ति के सारे रिश्तेदारों, मित्रों, साझीदारों के यहाँ भी छापे मारे जाते है, पूछताछ की जाती है।  गणेश मालवीय के मामले में भी यही प्रक्रिया की जानी चाहिए। जिन-जिन के फ़ोटो उसके रिश्वती मकान में लटके हैं, उनके यहाँ भी छापे पड़ें और उनसे भी पूछताछ की जाए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि भाजपा के चुनाव अभियान का राष्ट्रीय सह-संयोजक किस के लिए धन उगाही में लगा था। कितना पैसा उसने इस बीच अपनी पार्टी तथा अपने संयोजक नरेंद्र मोदी के लिए भेजा है। इसके टेलीफोन काल रिकार्ड्स की भी पड़ताल की जानी चाहिए और भाजपा कार्यालय के उस कमरे को भी सीज़ किया जाना चाहिए जहां बैठकर यह रिश्वत की रकम का सौदा करता था।


मूल खबर…

बिल्डर से घूस लेने में 2007 बैच की आईआरएस अफसर पूनम राय और उनका भाजपा नेता पति गणेश मालवीय गिरफ्तार

एक चिटफंडिया चैनल के हेड ने मुझसे सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा से मीटिंग फिक्स कराने का अनुरोध किया : दीपक शर्मा

Deepak Sharma : इमरजेंसी का इन्डिया टुडे या बोफर्स काल का द हिंदू …या फिर धीरूभाई अंबानी के वक्त के रामनाथ गोयनका और अरुण शोरी …..ये वो मीडिया संगठन और पत्रकार हैं जिनकी राजनीतिक विचारधारा पर मतभेद हो सकते है लेकिन उनके जिगर और पत्रकारिता की रीड का इस दौर में कोई सानी नही. इनके शौर्य और यश के आगे मै नतमस्तक हूँ. लेकिन आज के दौर में पत्रकारिता की गंगा उलटी बह रही है. राजनीति के रसातल में सरकती आज की पत्रकारिता या तो बिकी हुई है या किसी सोच की गिरवी है या फिर किसी ओछे मकसद से की जा रही है.

ऐसे-ऐसे अखबार के संपादक है कि अगर इनके हाईस्कूल और इण्टर की मार्कशीट सार्वजनिक कर दे तो आप उनके अखबार का इस्तेमाल टॉयलेट पेपर की जगह करने लगेंगे. ऐसे-ऐसे चैनल हेड हैं जिन्हें २०- २० साल की एंकर ने idiot box बना दिया है. मित्रों अगर अर्नब गोस्वामी या एकाध पुरोधा को मै छोड़ दूं तो ये कड़वा सच यही है कि आज की नई पीढ़ी में एक भी संपादक यशस्वी नहीं है. ना जिगर है ..ना रीड ..ना सोच ना कोई कलात्मक खूबी. सिर्फ मालिकों के खास हैं या किसी बड़े नेता के एजेंट.

एक चिटफंडिया चैनल के हेड ने मुझे फोन करके पूछा कि दीपकजी क्या मेरी मुलाकात रंजीत सिन्हा से करा सकते हैं? मैंने कहा कि मै रंजीत सिन्हा के इतना करीब नहीं हूँ… वैसे भी सीबीआई डायरेक्टर से सीधे मिलवा देना आसान नहीं है. फोन रखने के बाद मुझे खुद पर ग्लानि हुई कि क्यूँ नहीं इस संपादक को मैंने मुलाकात करवाने की बात पर ही झिड़क दिया होता. उसकी हिम्मत कैसे हुई ऐसे बात करने की.

मित्रों ये चैनल हेड आजकल दिल्ली में रंजीत सिन्हा का कोई दलाल ढूँढ रहे ताकि सीबीआई की जांच में फंसे चैनल के मालिक को बचाया जा सके. (can anybody help him..please do comment). मित्रों मैंने दो दशक की पत्रकारिता में बड़ी इमानदारी से काम किया है लेकिन फिर भी एक चैनल हेड मुझसे दलाली करवाना चाह रहे थे. इस घटना से मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जो फेसबुक के दोस्त मुझे दलाल या आप का एजेंट कह कर गालियाँ दे रहे थे, उनका कोई कसूर नहीं है. सच तो ये है कि बाजार में बड़े बड़े संपादक भी इस दौर में मुझे और करीब करीब हर पत्रकार को दलाल मानने लगे हैं.

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

चुनाव आयोग को यशस्वी यादव की शिकायत की जांच शुरू

चुनाव आयोग ने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा आईपीएस अफसर यशस्वी यादव के नीली बत्ती लगी सरकारी गाडी में लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी मुख्यालय में जाने सम्बन्धी कथित घटना की शिकायत का संज्ञान लिया है और उनके आदेश पर राजेश कुमार, एसपी पूर्वी, लखनऊ द्वारा इस मामले की जांच शुरू कर दी गयी है. 

शिकायत के अनुसार एक प्रकाशित समाचार में कहा गया कि 18 मार्च को एक पुलिस अफसर सादे ड्रेस में सरकारी गाडी से सपा दफ्तर में एक बड़े बैग के साथ गए थे और कुछ देर बाद बिना बैग के दफ्तर से वापस आये थे जिसकी तरह-तरह की चर्चा हो रही थी. डॉ ठाकुर ने इस सम्बन्ध में अपने स्तर से जानकारी हासिल कर चुनाव आयोग को पूर्व एसएसपी कानपुर यशस्वी यादव की शिकायत की थी. 

संलग्न- पत्र की प्रति

To,

The Chief Election Commissioner and other Election Commissioners,

The Election Commission of India,

New Delhi

Subject- Complaint as regards alleged serious misconduct by an IPS officer in UP

Sir,
                I, Dr Nutan Thakur, a RTI activist, working in the field of transparency and accountability in governance, present before you a case where there seems to be clear and blatant misconduct by an IPS officer against the service conduct rules and also against various election related laws, which needs your immediate attention.

The matter came in prominence through a news article in Lucknow edition of “Navbharat Times” Hindi daily on 19/03/2014. Marked “Off the record” the news article titled “Police Afsar ke us bag me kya tha” said that on Tuesday (18/03/2014) evening, a vehicle having blue beacon on it entered the Headquarters of Samajwadi Party. A police officer in civvies who was recently transferred from a big city due to certain incidents happening there came out of this vehicle. He entered the Party office with a huge bag which was taken to an adjacent room. He later emerged from the office without this bag. The news article said that the entire circumstances were extremely suspicious, particularly because of the big bag and because of the officer going to a Party office.

I personally enquired into this matter through my personal sources and came to to be told through extremely reliable sources that the narrated facts are completely correct. I have been told that the officer being talked off is Sri Yashaswi Yadav, IPS, who till recently was the SSP, Kanpur Nagar. The time of this incidence was allegedly around 6 to 7 PM on 18/03/2014 and the officer stayed in the Party headquarters for about 30-35 minutes. As per my information, he had come in on official vehicle with a blue beacon on it. There were many other people there at that time including many journalists.

 As can be easily understood from the above facts, each of them comes under the category of improper conduct/misconduct under the service conduct rules for an IPS officer. They also come as misconduct under the various election laws, considering the fact that presently the Lok Sabha elections are under way in the entire country, including UP.   

Hence, I request you to immediately enquire into my complaint presented here in light of the news article enclosed along with and take all necessary action as per the various provisions of law, either at your own end or by issuing appropriate directions to the concerned officers of the Union and the State government.
 

Yours,

Dr Nutan Thakur)
5/426, Viram Khand,
Gomti Nagar, Lucknow
#94155-34525
Copy to- 1. Sri Umesh Sinha, Chief Election Officer, Uttar Pradesh, Lucknow
2. Principal Secretary (Home), Uttar Pradesh, Lucknow
3. Director General of Police, Uttar Pradesh, Lucknow

उमेश डोभाल स्मृति समारोह : विनय बहुगुणा, सुरेंद्र रावत ‘अंशु’ समेत कई पुरस्कृत

इस बार का 24वां उमेश डोभाल स्मृति समारोह प्रकृति की उपत्यिका के मध्य उत्तराखंड के केंद्र गैरसैण में सम्पन्न हुआ। इसमें पत्रकारिता, साहित्य और जनसरोकार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। साथ में ‘गैरसैण के मायने’ पर चर्चा के साथ पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर भी चर्चा हुई।

2013 का उमेश डोभाल युवा पत्रकारिता पुरस्कार (प्रिट मीडिया) विनय बहुगुणा (अमर उजाला, कर्णप्रयाग) और (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) सुरेंद्र रावत ‘अंशु’ (समाचार प्लस, चमोली) को आपदा विषयक खबरों के लिए दिया गया। इस साल का गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ जनकवि सम्मान कुमाऊंनी के सुप्रसिद्ध गायक/गीतकार हीरासिंह राणा को, राजेंद्र रावत ‘राजू’ जनसरोकार सम्मान चकबंदी की अलख जगाने के लिये गणेश सिंह ‘गरीब’ को एवं उमेश डोभाल स्मृति सम्मान लोक साहित्य के मर्मज्ञ साहित्यकार एवं लेखक मोहनलाल बाबुलकर को दिया गया। ‘गरीब’ एवं बाबुलकर के न आने पर इसे उनके प्रतिनिधियों ने ग्रहण किया।

गिर्दा सम्मान से सम्मानित लोकगायक हीरासिंह राणा ने कहा कि जो राज्य हमने लिया था वह उस राह पर नहीं जा रहा है। इसे लेकर उन्होंने अपनी नवीनतम कविता ‘त्यर पहाड़, म्येर पहाड़, रोय दुखों को ड्येर पहाड़’ सुनाई। इसके अलावा उन्होंने अपना सुप्रसिद्ध गीत ‘लश्का कमर बांधा, हिम्मता का साथा’ प्रस्तुत किया। इस अवसर पर पुरस्कृत पत्रकारों विनय बहुगुणा एवं सुरेन्द्र रावत ने भी विचार रखे।   

इसके अलावा वर्ष 2013 में बागेश्वर में हुए समारोह में ट्रस्ट के माध्यम से आयोजन जनपद/क्षेत्र के किन्ही दो प्रतिभावान बालक एवं बालिका को 25-25 हजार की राशि हर वर्ष प्रदान करने की घोषणा की थी ताकि उनको कुछ मदद मिल सके। यह सम्मान लखनऊ के डाक्टर जोशी द्वारा अपने माता एवं पिता की स्मृति में आरम्भ किया गया है। इस बार का सम्मान 2013 में बागेश्वर जनपद से इन्टर कक्षा में दो मेधावी बच्चों सोनाली नेगी और पंकज उपाध्याय को दिया गया, जिसे उनके अभिभावकों मोहन सिंह नेगी एवं नवीनचन्द्र उपाध्याय ने मंच पर ग्रहण किया।

समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि उत्तराखंड विधान सभा अध्यक्ष गोविंदसिंह कुंजवाल व मंचासीन लोगों के द्वारा दीप प्रज्ज्वलन तथा जुझारु साथियों उमेश डोभाल, राजेंद्र रावत राजू और गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पण से हुआ। इस बार आयोजन की थीम उत्तराखण्ड में गैरसैण के मायने रखी गई थी ताकि इस बहाने इस बिन्दु पर चर्चा हो सके।  अपने संबोधन में उत्तराखण्ड विधानसभा अध्यक्ष गोविन्दसिंह कुंजवाल ने कहा कि आज अधिकतर विधायक और अफसर गैरसैंण के हित में नहीं हैं। यह राज्य आज भी उ.प्र. के पैटर्न पर ही चल रहा है।

गैरसैण में विधानसभा भवन के बहाने यदि नेता व अधिकारी यहां चार महीने भी बैठ सकें तो इससे पलायन पर कुछ रोक लगेगी। गैरसैंण में ऐसा होने से पहाड़ के विकास को गति मिल सकती है। उन्होंनें कहा कि उनके द्वारा रायपुर में नये बनाये जा रहे विधान सभा भवन के निर्माण का विरोध किया गया क्यों कि देहरादून में पहले से ही एक विधान सभा भवन है उसमें कोई कमी नहीं है। खेदजनक बात है कि आज हालत ऐसे बन गये हैं कि यहां का ग्रामीण भी गांवों में नहीं रहना चाह रहा है। राज्य निर्माण के बाद प्रदेश सरकारों ने गैरसैंण की अनदेखी की है।

उन्होंने कहा कि राज्य निर्माण के समय जो सोचा गया था वह राज्य बनने के बाद जमीन पर नहीं दिख रहा हैं। राजनीतिक नेताओं ने अगर अपने तौर तरीके नहीं बदले और राज्य आंदोलनकारियों और राज्य के विचारकों ने चुप्पी साधे रही तो नई पीढ़ी हमे कभी माफ नहीं करेगी। हमने गांवों की तरफ जाना शुरु करना होगा जो तेजी से वीरान हो रहे है।   

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी सुरेन्द्र सिंह पांगती के न आने के कारण उनके द्वारा प्रेषि संदेश पढ़ा गया  जिसमें उन्होंने राज्य की संवैधानिकता को चुनौती देते हुये कई सवाल किये। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. वीरेन्द्र पैन्यूली ने कहा कि गैरसैण राज्य की आत्मा है यह सब राज्य के केन्द्र में हैं। उन्होंने कहा कि पहाड़ के विकास के लिये अलग नीति होनी चाहिये थी ताकि यह स्वयं में आत्मनिर्भर बन पाता लेकिन ऐसा नहीं हुआ आज राज्य में जो भी कार्य हो रहे हैं वह इसकी मूल भावना से हट कर हो रहे हैं जिससे यह रसातल की ओ अग्रसर है। पलायन इसकी सबसे बड़ी विभीषिका के रूप में उभरा है। भाकपा माले के इंद्रेश मैखुरी ने कहा कि उत्तराखंड हमारे सपनों के धराशायी होने का राज्य बन गया है जो नेताओं, नौकरशाहों और माफियाओं की जकड़बंदी में है। आज राज्य की जनता एकदम हताष हो चली है।

गैरसैण में कई सालों तक काम करने वाले हेम गैरोला ने कहा कि किस प्रकार वन पंचायतों पर काम करने हेम गैरोला ने अपने अनुभव बांटे और कहा बताया कि किस प्रकार से इसका लाभ मिला। पर्यावरण रोजगार, राजस्व और पलायन रोकने का जिसको यथार्थ में लाने के लिए पहाड़ की राजधानी पहाड़ में होनी जरुरी है। आयोजन के बीच हल्द्वानी से आये डॉ. पंकज उप्रेती ने जनगीत ‘जिसने मरना सीख लिया है, जीने का अधिकार उसी को’ प्र्रस्तुत किया।

इस समारोह का आयोजन श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम-प्लान इंडिया, गैरसैंण के पर्वतीय पत्रकार एसोसिएशन और चंद्र सिंह यायावर समिति के संयुक्त तत्वावधान में किया गया जिसमें बागेश्वर, पिथेरागढ, हल्द्वानी, रूद्रपुर, नैनीताल, टिहरी, हरिद्वार, पौड़ी, श्रीनगर, कर्णप्रयाग, चौखुटिया, रुद्रपयाग, गोपेश्वर  दिल्ली, लखनऊ, नोएडा आदि से प्रतिनिधि पहुंचे। मुख्य कार्यक्रम जिसे ब्लाक सभागार में होना था आचार संहिता की दुहाई देने के नाम पर उसे प्रशासन ने देने से इंकार कर दिया। जिसके बाद इसे भुवनेश्वरी महिला आश्रम के परिसर के मनमथन सभागर में किया गया। इस अवसर पर आयोजन की स्मारिका और पत्रकार रोहित जोशी की पुस्तक ‘उम्मीदों की निर्भयाएं’ का भी विमोचन भी हुआ।

ज्ञातव्य है कि 25 मार्च, 1988 के दिन गढ़वाल के प्रखर पत्रकार उमेश डोभाल की शराब माफिया ने निर्मम हत्या के बाद उनकी स्मृति में उनके मित्रों एवं पत्रकारों ने मिल कर 1991 में उमेश डोभाल स्मृति समिति का गठन किया और 25 मार्च 1991 से स्मृति समारोह आयोजित करने का सिलसिला आरम्भ किया। सन् 2003 से समिति को ट्रस्ट में बदल दिया गया। समय समय पर इसमें सम्मान और पुरस्कारों की संख्या बढी। आज इसके द्वारा समाज में साहित्य कला, संस्कृति और समाजसेवा के क्षेत्र में सम्मानों व 2 पत्रकारिता पुरस्कार दिये जा रहे हैं।

यह समारोह पत्रकारों साहित्य कला क्षेत्र में होने वाला सबसे बड़ा समारोह हैं जो 24 साल से अनवरत रुप से हो रहा है। समारोह में राज्य के कोने-कोने से पत्रकारिता, कला, संस्कृति, साहित्य और जनसरोकारों से जुड़े लोग एकत्र हो कर विभिन्न मुद्दों पर गंभीर विचार-विमर्श करते हैं। पुरस्कृत और सम्मानित लोगों को शॉल, स्मृति/प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह सहित 11000/- की धनराषि दी जाती है। इसके अतिरिक्त ट्रस्ट दूसरी विभिन्न गतिविधियां संचालित करता है।

दूसरे सत्र में बोलते हुये उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार पी.सी. तिवारी ने कहा कि आज जब जनता व समाज की अच्छाई करने की जब बात होती है तो न तो राजनीतिक दल समर्थन देते हैं और न कारपोरेट पत्रकारिता को ही उनमें मुद्दा लगता है। हमने राज्य के कई ज्वलन्त विषयों को समय समय पर सामने रखा लेकिन मजाल क्या किसी राजनीतिक दल ने उन पर आवाज बुलंद की हो या चर्चा ही की हो।

यह दुर्भाग्यूपर्ण है कि माफिया और बुराई के खिलाफ लड़ने वाले लोग अकेले पड़ जाते हैं और मंच सुशोभित करने वाले तटस्थ बने रहते हैं। जब तक लोग आन्दोलनकारियों का साथ नहीं देगे तब तक कुछ नहीं होने वाला है।  राजनीति दलों के नेताओं व अधिकारियों के गठजोड़ के कारण उनके ऐजेन्डे को बदलना इतना आसान नहीं है जिस कारण आज चारों ओर अराजकता व हताशा का साम्राज्य छाया हुआ है।

श्रीनगर से आये पत्रकार सीताराम बहुगुणा ने कहा कि आज समाचार पत्रांे कंी प्राथमिकता समाचार के बजाय विज्ञापन तक सीमित हो गई थी। समाचार पत्रों में विज्ञापन लाने वाले की ही ज्यादा पूछ है। पत्रकार कमीशन पर विज्ञापन लाते हैं और खबरों से खेलते हैं। एक समय समाचार पत्र समाचारों व धारदार लेखनी के लिये जाने जाते थे। पत्रकार अनुसूया प्रसाद ‘घायल’ ने कहा कि नैनीताल में हुये आयोजन के समय जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी ने एक दम सही कहा था जो बात छुपाई जाती है वही खबर है। लेकिन आज खबरें दबाई जा रही है।

समाचार पत्र खबरें न छापने की कीमत वसूलने लगे हैं जो पीत पत्रकारिता से भी गम्भीर समस्या है। समाचार इससे विकृत हो रहा है। पर्वतीय पत्रकार परिषद संरक्षक पुरुषोत्तम असनोड़ा ने कहा कि छोटे छोटे स्थानों पर 30- 40 साल तक सेवा देने वाले पत्रकार आज भी समाचार पत्रों की नजरों में पत्रकार नहीं है। राज्य सरकार को ऐसे पत्रकारों को देखना चाहिये। राज्य सरकार यहां पर मजीठिया आयोग जैसा ही आयोग बनाये और उनके कार्य करने की हालत का अध्ययन कर अपनी सिफारिशे लागू करे। रामनगर से आये पत्रकार गणेश रावत ने कहा कि आज लोकगायक हीरासिंह राणा की जमीन को भूमाफिया के कब्जे से छुड़ा कर वापिस दिलाई जाय।

राजनीतिक पकड़ रखने वाले सुनील मंमगाई ने कहा कि गैरसैण में चन्द्रनगर में राजधानी बनाने के लिये झारखण्ड के सूरज मण्डल तो आते हैं लेकिन अपने राज्य के कर्णधार इसके नाम पर चुप है। पहाड़ को बसाये बगैर राज्य का भला संभव नहीं है। आज नेताओं के राजनीतिक चरित्र में बहुत गिरावट आ गई है और राज्य के नेता इससे अलग नहीं हैं। काशीपुर से आये प्रेम अरोड़ा ने गैरसैण के अलग अलग मतलब बताये और कहा कि वे यहां पर आकर अभिभूत हैं। हरिद्वार से आये पत्रकार त्रिलोक चन्द्र भट्ट कहा कि आज पत्रकारिता एक धन्धा बन कर रह गई है जनहित और जनसरोकार उससे काफी दूर हो चुके हैं। आज वह टी.आर.पी. के अनुसार अपनी प्राथमिकता तय करती है कि उसके लिये क्या समाचार है और क्या नहीं?   

समारोह में पुरुषोत्तम असनोड़ा, गिरीश डिमरी, रवि रावत, त्रिलोकचंद्र भट्ट, ओंकार बहुगुणा, गिरीश डोभाल, एस.एन.रतूड़ी, बीरेन्द्र नेगी, सुरेन्द्र सिंह रावत, अनुसूया प्रसाद घायल, घनश्याम, रतनमणी भटट, सुशील सीतापुरी, अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, बी.सी. सिंघल, बीरेंद्र बिष्ट, कमल जोशी, महेश जोशी, केाव भट्ट, विजयबर्द्धन उप्रेती, घनश्याम जोशी, गिरीश डिमरी, कैलाश भटट, एल.डी. काला, रोहित जोशी, गजेंद्र नौटियाल, बी.एस.बुटोला, प्रेम संगेला, एच एस रावत, देवानन्द भटट, बी. शंकर थपलियाल, पूर्व प्रमुख सुरेन्द्र सिंह नेगी, नगर पंचायत अध्यक्ष, जोतसिंह रावत, अंकित फ्रांसिस, अमित चमोली, अरविंद पुरोहित, बसंत साह ‘कुसुमाकर’, दीपक नौटियाल, अनिल बहुगुणा, अजय रावत, जगमोहन डंागी, वीरेन्द्र बिष्ट आदि अनेक लोगों ने शिरकत की। पहुंचे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बी.मोहन नेगी ने अंत में आभार प्रकट करने के अलावा गैरसैण जैसे छोटे स्थान पर इसके सफल आयोजन पर सबको बधाई दी। समारोह का संचालन चंद्रसिंह भंडारी ‘चैतन्य’, महासचिव ललित मोहन कोठियाल, ट्रस्ट सहसचिव त्रिभुवन उनियाल ने संयुक्त रूप से किया गया।  

समारोह स्थल पर चित्रकार बी.मोहन नेगी ने अपनी कविता-पोस्टर प्रदर्शनी, गजेन्द्र रौतेला के द्वारा अपनी पुस्तक प्रदर्शनी के अतिरिक्त नैनीताल समाचार, पिघलता हिमालय प्रकाशन आदि ने अपनी किताबों के स्टाल लगाए। इसके अतिरिक्त गैरसैंण फल एवं मसाला उत्पादक स्वायत्त सहकारी समिति ने अपने जैविक उत्पादों ‘गैरसैंण फ्रैश’ का स्टाल लगाया जिससे लोगों ने अनेक उत्पाद खरीदे। इस अवसर पर ट्रस्ट के समक्ष कई प्रस्ताव आये जिन्हें स्वीकार किया गया, जो निम्नवत् हैं-

1- राज्य सरकार राज्य में कार्यरत पत्रकारों की आर्थिक हालत को समझे और उनके हितों के लिये श्रम कानूनों को लागू करें। जो मीडिया हाउस उससे जुड़े पत्रकारों को उचित वेतन नहीं देते हैं सरकार उन पर भी श्रम कानून लागू कर उचित वेतन दिलावने के लिये दबाब बनाये। अन्यथा ऐसा न करने वाले मीडिया हाउसों की विज्ञापन मान्यता ही रदद हो।  

2- पत्रकारों के साथ अनहोनी या बीमार होने पर उनको तत्काल सहायता देने का प्राविधान हो। देखा गया है कि इस पर कार्यवाही करने में बहुत देर हो जाती है। ऐसे मामलों में एम समय सीमा के तहत कार्यवाही हो। यदि समय पर कार्यवाही हो तो इसका लाभ है। ऐसा न करने पर पत्रकार के परिवार को प्रताड़ना झेलनी पडती है।

3- राज्य सरकार राज्य में तमिलनाडु और राजस्थान सरकार की भांति ही 60 साल तक पत्रकारिता की सेवा के लिये उनको पेंशन दें। तमिलनाडु में पत्रकारों को 6000 व राजस्थान में यह राशि 5000 पेशन है। ताकि पत्रकारिता करने वाले अपना वृद्ध जीवन सम्मान से काट सके। इसके लिये कठोर नियमावली बने ताकि पूर्णरूपेण पत्रकारिता करने वाले इससे लाभान्वित हों।

4- सरकार राज्य की मूल भावना को देखते हुये गैरसैण के मसले पर गौर करे और इस राज्य के विकास के लिये अपनी प्राथमिकतायंे तय करे।

5- राज्य में जिस प्रकार जमीन माफियाओं के कब्जे में जा रही हैं उसे रोकने के लिये अविलम्ब पहल हो व ऐसे कानून बने ताकि इसका स्वामित्व राज्यवासियों के पास रहे।

6- राज्य के आपदाग्रस्त क्षेत्रों में निर्माण कार्य जल्द से जल्द पूरे हों ताकि प्रभावितों की नारकीय जिन्दगी पटरी पर आ सके और उनमें विश्वास की भावना जाग सके।

अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ की रिपोर्ट.

टीआरपी न मिलने से सुनील ग्रोवर का कॉमेडी शो ‘मैड इन इंडिया’ बंद होगा

मुंबई से सूचना है कि टीआरपी न आने से कॉमेडियन सुनील ग्रोवर का स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला कॉमेडी शो 'मैड इन इंडिया' जल्द ही बंद होगा. कमजोर टीआरपी की वजह से चैनल इस शो को तय वक्त से पहले ही खत्म कर देगा. सूत्रों ने बताया कि मैड इन इंडिया के 28 एपिसोड आने थे लेकिन अब इसे 13 एपिसोड पूरे होने पर ही खत्म किया जाएगा.

शो बंद होने की चर्चाओं पर सुनील ग्रोवर का कहना है कि 'मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता. मैं सिर्फ अपना काम करता हूं. मेरा काम शूट करना है.'

ज्ञात हो कि मैड इन इंडिया की शुरुआत फरवरी में हुई थी. चर्चा है कि एक म्यूजिक शो मैड इन इंडिय की जगह ले सकता है. सूत्रों का कहना है कि इस म्यूजिक शो में यो यो हनी सिंह जज के तौर पर नजर आएंगे. खैर, सुनील ग्रोवर का कपिल शर्मा के शो कॉमेडी नाइट्स विद कपिल को टक्कर देने का सपना अधूरा ही रह गया.

कपिल शर्मा के शो 'कॉमेडी नाइट विथ कपिल' को टक्कर देने में नाकाम शो 'मैड इन इंडिया' को बड़ा झटका भी लग चुका है. इसके होस्ट मनीष पॉल ने शो को अलविदा कह दिया है. शो के साथ मनीष का कॉन्ट्रेक्ट 31 मार्च को खत्म हो रहा है. बताया जाता है कि मनीष शो की स्क्रिप्टिंग से खुश नहीं थे. चर्चा ये भी है कि शो की खराब टीवी रेटिंग और लोकप्रियता न मिलने को देखते हुए उन्होंने ये फैसला लिया है.

बिल्डर से घूस लेने में 2007 बैच की आईआरएस अफसर पूनम राय और उसका भाजपा नेता पति गणेश मालवीय गिरफ्तार

भोपाल से खबर है कि आयकर विभाग में डिप्टी कमिश्नर के रूप में कार्यरत 2007 बैच की आईआरएस अधिकारी पूनम राय को एक बिल्डर से 10 लाख रुपये रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है. आईआरएस अफसर पूनम राय के पति गणेश मालवीय जो भाजपा नेता है, साथ ही उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट और उनके नौकर को भी अरेस्ट किया गया है. यह रकम इनकम टैक्स असेसमेंट का मामला निपटाने के एवज में एक बिल्डर से वसूली जा रही थी.

सीबीआई की प्रवक्ता के मुताबिक भोपाल में इनकम टैक्स ऑफिस में तैनात डिप्टी कमिश्नर पूनम राय को शुक्रवार रात को गिरफ्तार किया गया है. उनके खिलाफ रामायण बिल्डर्स के मालिक राजेश सिंह भदौरिया ने सीबीआई में कंप्लेंट दी थी. भदौरिया ने सीबीआई को बताया था कि पूनम राय ने उनकी कंपनी पर इनकम टैक्स अससेमेंट कर भारी-भरकम जुर्माना था.

पूनम राय का कहना था कि यह जुर्माना चालीस से पचास लाख रुपए है, जो बढ़कर दो करोड़ रुपए तक जा सकता है. जुर्माने से बचाने के लिए उन पर रिश्वत देने का दबाव बनाया गया था. पूनम राय अपने पति और भाजपा नेता गणेश मालवीय के जरिए रिश्वत मांग रही थी. उनसे 25 लाख रूपये की डिमांड की जा रही थी. जुर्माने से बचाने के एवज में यह रकम मांगी जा रही थी. गणेश मालवीय भारतीय जनता पार्टी से जुडे हैं. वह भोपाल में शाहपुरा इलाके के भरत नगर में इनकम टैक्स कॉलोनी कालोनी में रहते हैं.

25 लाख रुपए की रिश्वत में बाद में दोनों के बीच 18 लाख रुपए में डील तय हो गई. रिश्वत की पहली किस्त के तौर पर 10 लाख रुपए देना था. राजेश भदौरिया ने सीबीआई को कंप्लेंट दे दी. गणेश मालवीय ने यह रकम अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट चोटवानी को देने को कहा था. चोटवानी का यहां एमपी नगर में दफ्तर है. राजेश रिश्वत की पहली किश्त दस लाख रुपए लेकर कल रात चोटवानी के दफ्तर गए थे. दफ्तर में सीए का भतीजा मिला था. रिश्वत की रकम भी भतीजे ने ली थी.

उसके बाद मामले की जानकारी पूनम राय को दी गई थी. पूनम राय ने अपने कर्मचारी संजय को रकम लेने के लिए चोटवानी के दफ्तर भेजा था. उन्होने बताया कि संजय एमपी नगर से राशि लेकर शाहपुरा गया था. जब वहां सब राशि गिन रहे थे, तभी सीबीआई ने उन्हें धर दबोचा. सीबीआई ने गणेश मालवीय के साथ पूनम राय को भी गिरफ्तार किया है. सीए, उनके भतीजे और रकम लेकर जाने वाले कर्मचारी संजय को भी गिरफ्तार किया गया है.

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यूपी मानवाधिकार आयोग ने फिरोजाबाद पुलिस लाठीचार्ज पर रिपोर्ट मांगी

उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने फ़िरोजाबाद पुलिस द्वारा किये गए लाठीचार्ज के सम्बन्ध में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा भेजी शिकायत पर डीजीपी, यूपी से रिपोर्ट मांगी है. 19 मार्च 2014 के आदेश द्वारा आयोग के अध्यक्ष जस्टिस तरुण चटर्जी ने डीजीपी, यूपी को आदेश की तिथि से दो माह में प्रकरण की जांच कर 30 मई तक अपनी रिपोर्ट उपलब्ध कराये जाने और उसके बाद  रिपोर्ट सहित शिकायत आयोग के समक्ष प्रस्तुत किये जाने ने निर्देश दिए हैं.

14 जनवरी को फिरोजाबाद पुलिस ने एनएच-2 पर हुई सड़क दुर्घटना के खिलाफ प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करते हुए उन्हें लात-घूंसे और बूटों से मारा था. डॉ ठाकुर ने आयोग से घटना की जांच करा कर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मुक़दमा दर्ज कराये जाने की मांग की थी.

 

साबिर अली प्रकरण भाजपा की अंतर्कलह को दे गया नई ‘खुराक’

लोक कहावत है, ‘सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े’। यह लोक मुहावरा चर्चित नेता साबिर अली पर एकदम चस्पा हो गया है। जदयू के तेज-तर्रार प्रवक्ता रहे साबिर अली पिछले दिनों अपनी पार्टी से नाराज हुए थे। क्योंकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा में उन्हें दोबारा नामित करने की सिफारिश नहीं की थी। राज्यसभा में दोबारा भेजने के बजाए उन्हें ऐसी सीट से लोकसभा का टिकट पकड़ा दिया था, जिसमें साबिर अपनी हार तय मान रहे थे। ऐसे में, उन्होंने अपने खांटी सेक्यूलर तेवरों से एकदम ‘यू-टर्न’ लिया और भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी की तारीफ करने लगे। साबिर की ‘मोदीभक्ति’ देखकर जदयू नेतृत्व ने बगैर किसी देरी के उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

इस बीच साबिर अपनी अवसरवादी राजनीति की जुगाड़ तय कर चुके थे। मोदी कीर्तन करते-करते शुक्रवार को वे औपचारिक रूप से भगवा पट्टा धारी बन गए। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं बिहार के संगठन प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने साबिर को भाजपाई बनाकर भगवा पट्टा पहनाया था। इस एंट्री को लेकर भाजपा नेतृत्व ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि अब तेजी से तमाम दलों के लोग पार्टी में शामिल हो रहे हैं। साबिर ने भी भाजपाई बनते ही मोदी के गुणगान शुरू किए थे। लेकिन, उनकी यह भगवागीरी टिकाऊ साबित नहीं हुई। उन्हें ऐसा झटका लगा है कि उनका पूरा राजनीतिक कैरियर ही अंधे कुएं की तरफ बढ़ गया है।

उल्लेखनीय है कि साबिर के खिलाफ विरोध का पलीता लगाया उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने। उन्होंने साबिर की एंट्री के कुछ देर बाद ही ट्वीटर पर तीखा कटाक्ष पोस्ट कर दिया। इसमें कहा गया कि इंडियन मुजाहिदीन के चर्चित आतंकी यासीन भटकल का दोस्त भाजपा में आ गया है। अब आतंकी दाउद इब्राहिम भी पार्टी में आ जाएगा। इस ट्वीटर संदेश ने संघ परिवार में साबिर अली के विरोध की आग भड़का दी। बात ट्वीटर विरोध तक ही नहीं रही, भाजपा के मुस्लिम चेहरे नकवी ने मीडिया से भी कह डाला कि आपराधिक छवि के साबिर को भाजपा में शामिल करके घोर गलत काम किया गया है। इसीलिए वे खुलकर विरोध कर रहे हैं। नकवी ने विरोध किया, तो उत्तर प्रदेश भाजपा के चर्चित नेता विनय कटियार ने भी साबिर को लेकर ‘बजरंगी’ तड़का लगा दिया। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि जो शख्स कुछ दिनों पहले तक रोज संघ परिवार को गालियां देता था, मोदी को हत्यारा बताता था। आखिर, उसे कैसे पार्टी में शामिल कर लिया गया?

विरोध का यह सिलसिला संक्रामक वायरस की तरह भाजपा में तेजी से फैला। इसके चलते बिहार भाजपा के कई दिग्गज नेता साबिर प्रकरण को लेकर अपनी भड़ास निकालने लगे। अश्विनी चौबे, गिरीराज सिंह व सीपी ठाकुर जैसे नेताओं ने अपनी नाराजगी जताई। संघ नेतृत्व ने भी संकेत देने शुरू कर दिए थे कि नेतृत्व ने साबिर के मामले में सही फैसला नहीं किया। शुरुआती दौर में विरोध को दबाने की कोशिश की गई। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं ने इस मामले में नकवी को भी आड़े हाथों लिया। नेतृत्व के दबाव में ही पार्टी उपाध्यक्ष ने शनिवार की सुबह अपना चर्चित ट्वीट डिलीट कर दिया। इससे शनिवार की सुबह यह संदेश देने की कोशिश की गई कि नेतृत्व इस मामले में ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश कर रहा है।

पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने खुलकर साबिर अली के बचाव की कवायद शनिवार की सुबह-सुबह शुरू की। उन्होंने कह दिया कि नेतृत्व ने सोच-समझ कर ही साबिर को पार्टी में लिया है। ऐसे में, पार्टी के फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि इस चुनाव में कांग्रेस को करारी मात देनी है, तो विभिन्न दलों से आए लोगों के लिए पार्टी में जगह देनी पड़ेगी। इसी तरह से पार्टी का विस्तार होगा। माना जा रहा था कि गडकरी यदि बचाव में उतरे हैं, तो शायद इसके पीछे पार्टी की एक नियोजित रणनीति होगी। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं दिखा। क्योंकि, गडकरी की इस पहल के दौर में ही संघ के प्रवक्ता राम माधव ने भी एक ट्वीटर पोस्ट कर दिया। इसमें कहा गया कि साबिर के मामले में नेतृत्व ने पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं की अनदेखी की है। तमाम नेता भी विरोध में हैं। इसका सही संदेश नहीं जाएगा।

संघ प्रवक्ता की इस टिप्पणी के बाद ही भाजपा के और तमाम नेता विरोध के लिए उत्साहित हो गए। वरिष्ठ नेता बलवीर पुंज भी विरोध का झंडा उठाकर मैदान में आ गए। उन्होंने कह दिया कि साबिर को पार्टी में शामिल करने का फैसला एक बड़ी भूल है। जितनी जल्दी हो सके, साबिर को भाजपा से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। सूत्रों के अनुसार, इस प्रकरण में शनिवार की सुबह संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को साफ-साफ संदेश भिजवा दिया था। यही कहा कि आप लोग ऐसा तमाशा क्यों करते हैं? जिससे कि कार्यकर्ताओं की भावनाएं आहत होती हों। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख का इशारा समझते ही साबिर अली की सदस्यता रद्द करने का फैसला हुआ। जबकि, इसके पहले विवाद को ठंडा करने के लिए एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हुई थी। इसी के तहत साबिर अली ने बिहार के प्रभारी महासचिव धर्मेंद्र प्रधान को चिट्ठी लिखी थी। इसमें कहा गया था कि उनकी पार्टी सदस्यता स्थगित रखी जाए। जब पार्टी में उनके मामले में सहमति का रास्ता निकले, तभी सदस्यता बहाल की जाए।

लेकिन, संघ नेतृत्व की नाराजगी को देखते हुए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस मामले को लटकाना जोखिम भरा माना। ऐसे में, भाजपा अध्यक्ष ने साबिर की सदस्यता रद्द करने का फरमान जारी कर दिया। यही सफाई दी गई कि साबिर को भाजपा में शामिल कराने की सिफारिश बिहार राज्य इकाई ने की थी। उसने साबिर के बारे में पर्याप्त छानबीन नहीं की थी। इसी से चूक हो गई। इस प्रकरण में साबिर की हालत कटी पतंग की तरह हो गई है। चूंकि, वे मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ने लगे थे, ऐसे में वे फिलहाल किसी सेक्यूलर ब्रिगेड में शामिल होने लायक नहीं रहे। जबकि, भाजपा से कुछ घंटों के अंदर ही उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया गया। साबिर, मुख्तार अब्बास नकवी की भूमिका से खासे आहत हैं। उन्होंने कहा है कि बगैर सबूतों के नकवी ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ऐसे में, वे जल्दी ही उन पर कानूनी कार्रवाई करेंगे। जबकि, नकवी ने कहा है कि उन्हें साबिर की धमकियों से जरा भी डर नहीं है। साबिर को जानने वाले उनकी हकीकत अच्छी तरह से जानते हैं।

मुश्किल यह है कि नकवी जैसे भाजपाइयों के साथ जदयू के पुराने साथी भी साबिर को घेरने लगे हैं। जदयू के महासचिव के सी त्यागी तो आरोप लगा रहे हैं कि साबिर, भारत-नेपाल के बीच तस्करी करने वालों को भी राजनीतिक संरक्षण देते रहे हैं। साबिर अली का राजनीतिक भविष्य भंवर में फंस गया है। इस प्रकरण को लेकर भाजपा में अंतर्कलह और बढ़ गई है। कई वरिष्ठ नेताओं को नकवी के विरोध का तौर-तरीका ठीक नहीं लगा है। बताया जा रहा है कि गडकरी खास तौर पर नकवी से खफा हैं। उन्हें लगता है कि नकवी ने ही विरोध की आग भड़का दी है। इसके पहले ही चुनावी टिकट बंटवारे को लेकर कई जगह विवाद रहे हैं। जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता तो तमाम मनुहार के बावजूद विद्रोह की डगर पर आगे बढ़ गए हैं। टिकट प्रक्रिया को लेकर वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से लेकर डॉ. मुरली मनोहर जोशी तक तुनक चुके हैं। ऐसे नेताओं की सूची खासी लंबी है। ये नेता इस बात से हैरान हैं कि चुनावी मुहिम में नरेंद्र मोदी का चेहरा पार्टी से बड़ा कर दिया गया है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि कोई व्यक्ति संगठन से बड़ा लगने लगा है।

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, आडवाणी की खास करीबी मानी जाती हैं। कई मुद्दों पर पिछले दिनों उनकी नाराजगी बाहर तक झलकी है। पार्टी ने पूर्व रक्षामंत्री जसवंत सिंह को बाड़मेर से टिकट नहीं दिया। इसी को लेकर वे विद्रोही तेवरों में आए हैं। नाराज होकर जसवंत ने पार्टी के नए तौर-तरीकों पर कड़ी टिप्पणियां की हैं। जसवंत सिंह को लेकर शीर्ष नेतृत्व कड़े रुख पर कायम रहा है। लेकिन, सुषमा ने ट्वीटर संदेश में लिखा था कि वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को टिकट न मिलने का उन्हें व्यक्तिगत तौर पर बहुत दुख है। सुषमा के इस ‘दुख’ के पार्टी में कई राजनीतिक निहितार्थ निकाले गए। इसके पहले भी वे कर्नाटक के मामलों में पार्टी के कुछ फैसलों का विरोध कर चुकी है। वीएसआर कांग्रेस से श्रीरामुल्लु को भाजपा में शामिल करा लिया गया। उन्हें बेल्लारी सीट से टिकट भी दे दिया गया।

जबकि, संसदीय बोर्ड की बैठक में सुषमा ने विवादित छवि वाले श्रीरामुल्लु की एंट्री का विरोध किया था। उन्होंने श्रीरामुल्लु को टिकट मिलने पर भी हैरानी जताई। ट्वीटर संदेश से उन्होंने अपनी नाराजगी सार्वजनिक भी की थी। ताकि, दबाव बन सके। लेकिन, नेतृत्व ने सुषमा की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की। उनको ठेंगा दिखाते हुए श्रीरामुल्लु को बेल्लारी की टिकट भी दे ही दी गई। अब साबिर अली के प्रकरण पर पार्टी के अंदर के मतभेद उजागर हो गए हैं। माना जा रहा है कि गडकरी इस बात को लेकर खुश नहीं हैं कि दबाव में साबिर को इतनी जल्दबाजी में बाहर कर दिया गया है। आशंका यही है कि भाजपा के अंदर अंतर्कलह का सिलसिला और बढ़ सकता है। क्योंकि, कई मुद्दों पर अंदर ही अंदर मतभेदों की आग धहक रही है। कई बड़े नेताओं को यह रास नहीं आ रहा कि संघ नेतृत्व ने पार्टी के महत्वपूर्ण आंतरिक मामलों में अपना हस्तक्षेप इतना कैसे बढ़ा दिया है और शीर्ष नेतृत्व चुपचाप संघ काहुक्म बजाने की लिए तत्पर कैसे हो जाता है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

पिंकसिटी प्रेस क्लब चुनाव : राधारमण शर्मा अध्यक्ष और रोशनलाल शर्मा महासचिव बने

जयपुर से खबर है कि पिंकसिटी प्रेस क्लब के सालाना 2014-15 के चुनाव में अध्यक्ष पद पर राधारमण शर्मा और महासचिव पद पर रोशन लाल शर्मा निर्वाचित घोषित किए गए हैं. मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल.एल.शर्मा ने बताया कि रविवार को हुई मतगणना में अध्यक्ष पद के प्रत्याशी राधारमण शर्मा को 323, मांगी लाल पारीक को 225, पंकज सोनी को 111, और निशांत मिश्रा को 28 मत मिले है.  महासचिव पद पर रोशन लाल शर्मा को 263, हरीश गुप्ता 229 और राहुल जैमन को 189 मत मिले.

उन्होंने बताया कि कोषाध्यक्ष पद पर डी.सी. जैन निर्वाचित घोषित किए गए हैं. इस पद पर जैन को 307, पुरूषौतम सैनी को 206 और प्रेम शर्मा को 139 मत मिले. उपाध्यक्ष के दो पदों पर यशपाल सिंह भाटी और राहुल शर्मा गौतम निर्वाचित हुए हैं. भाटी को 200 और गौतम को 184 मत मिले.

शर्मा ने बताया कि कार्यकारिणी के दस पदों के लिए श्रीमती बबीता शर्मा, मुकेश कुमार मीणा, सुनील चतुर्वेदी, राजेन्द्र कासलीवाल, मयंक शर्मा, शरद दाधीच, कश्यप अवस्थी, गिरधारी लाल पारीक, दिलीप शर्मा और लोकेन्द्र सिंह विजय घोषित किए गए. इस अवसर पर नवनिर्वाचित कार्यकारिणी को निवर्तमान कार्यकारिणी ने कार्यभार सौप दिया.

गैंगरेप पीड़िता पत्रकार को लेकर उत्तराखंड गई पुलिस टीम

विंध्याचल (मीरजापुर) से सूचना है कि सामूहिक दुष्कर्म की शिकार पीड़िता महिला पत्रकार जंगल के उस स्थान की शिनाख्त नहीं कर पाई जहां उसके साथ दुष्कर्म हुआ था। युवती को उसके घर पहुंचाने के लिए पुलिस टीम शनिवार की रात उत्तराखंड रवाना हो गई।

बताते चलें कि 27 मार्च की रात में स्कार्पियो सवार लोगों ने अष्टभुजा से अगवा करने के बाद उत्तराखंड की महिला पत्रकार के साथ अकोढ़ी के जंगल में ले जाकर सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। इस घटना के बाद पीड़िता ने अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। जिस गाड़ी का नंबर उसने दिया था पुलिस ने उसको बरामद करने के साथ ही एक आरोपी को पकड़ा था। इसकी शिनाख्त पीड़िता ने की थी। जब कि एक अन्य को भी पुलिस पकड़कर लाई थी।

पीडि़ता का मेडिकल और कलमबंद बयान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पुलिस ने पीड़िता की इच्छा के अनुसार उसे उसके घर छोड़ने गई है। सीओ सिटी प्रवीण कुमार यादव ने बताया कि बयान दर्ज कराने के बाद पीड़िता ने घर जाने की इच्छा जताई थी। इस पर विंध्याचल थाना की दो महिला कांस्टेबल और एक सिपाही के साथ पीड़िता और उसके साथ की युवती को उत्तराखंड के हल्द्वानी भेजा गया है। सिपाहियों की टीम शनिवार की रात में त्रिवेणी एक्सप्रेस से लेकर गई है।
 

मुंबई में पुलिसकर्मियों ने पत्रकार को गाली दी और हिरासत में लिया

मुंबई : बांगुर नगर पुलिस स्टेशन के अंतर्गत शनिवार की रात तकरीबन डेढ़ बजे कुछ पुलिसकर्मियों द्वारा एक महिला से बदसलूकी करने का मामला सामने आया है। पीड़ित महिला के अलावा घटना को कवरेज करने पुहंचे एक पत्रकार को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

पत्रकार के मुताबिक, आधी रात के समय बिना महिला पुलिसकर्मियों की बांगुर नगर पुलिस की एक टीम किसी मामले में वांछित महिला को पकड़ने उसके घर गई थी। इसकी सूचना मिलने पर जब वह घटना स्थल पर पहुंचकर वहां कांबले नामक एक पुलिसकर्मी से पूछताछ करने की कोशिश को तो कांबले ने पहले पत्रकार को गाली दी और बाद में जबरन उसे पुलिस वैन में बिठाकर पुलिस स्टेशन ले आया। इस दौरान पत्रकार ने पुलिस की दादागिरी की खबरें व्हाट्स ऐप के जरिए अपने मीडिया सहकर्मियों को दे दी गई, जिसके बाद इसकी खबर आला अधिकारियों को मिली।

आनन-फानन में रात को सीपी राकेश मारिया के निर्देश पर डीसीपी के. एम. प्रसन्ना (नाइट इंचार्ज) ने बांगुर नगर पहुंच मामले की जानकारी ली। इसके बाद डीसीपी प्रसन्ना ने पीडि़त महिला और पत्रकार का बयान रिकॉर्ड कर मामले से जुड़े सभी चार पुलिसकर्मियों को मेडिकल के लिए भेज दिया, जिसकी रिपोर्ट आना बाकी है। बांगुर नगर पुलिस मामले की जांच कर रही है।

 

राहुल ने पत्रकार से पूछा क्या आपको पानी मिला ?

गाजियाबाद : सुरक्षा चक्र की परवाह किए बगैर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कल अपना भाषण समाप्त करने के बाद मीडियाकर्मियों से घुले मिले। कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर के पक्ष में चुनाव प्रचार करने आए राहुल यहां रामलीला मैदान में मंच से नीचे उतरे और पत्रकारों से बातचीत की। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने एक पत्रकार से पूछा कि आप कब से यहां हैं, क्या आपको पीने का पानी मिला, क्या बोतलबंद पानी था।

जब पत्रकार ने हां में सिर हिलाया तो वह दूसरे पत्रकार से बात करने बढ़ गए। बाद में, राहुल आम आदमी की तरफ भी मुखातिब हुए जो घंटाघर इलाके में उनकी एक झलक पाने के लिए तीन घंटे से ज्यादा इंतजार कर रहे थे। कांग्रेस उपाध्यक्ष हेलीकाप्टर से आए थे। लौटने के लिए हेलीकाप्टर तक पैदल जाने से पहले, राहुल ने अनेक लोगों से हाथ मिलाया। उन्होंने वहां खड़ी कार पर सवार होने से परहेज किया। राहुल को सुनने यहां हजारों लोगों का हुजूम जमा हुआ। कांग्रेस नेता ने उन्हें दवाएं और आवासों के कानूनी अधिकार सौंपने का आश्वासन दिया। गाजियाबाद में 10 अप्रैल को मतदान होने जा रहा है।

मिस्र में हुई झड़प में पत्रकार सहित तीन लोगों की मौत

काहिरा। मिस्र में आतंकवादी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड के सैकड़ों समर्थकों को मौत की सजा सुनाए जाने के एक दिन बाद विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प में कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई।
मिस्र के समाचार पत्र अल दस्तूर ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि मुस्लिम ब्रदरहुड के इस विरोध प्रदर्शन को कवर करने गई उसकी एक पत्रकार मयादा अशरफ की झड़प के दौरान मौत हो गई है। हालांकि सुरक्षा बलों का कहना है कि वह ब्रदरहुड के समर्थकों में शामिल थी।

अन्य वेबसाइटों ने भी कुछ वीडियों फुटेज अपलोड किए हैं, जिनमें सड़क के किनारे चेहरे पर खून के धब्बे लगे एक महिला को गिरा हुआ दिखाया है। इसकी पहचान एक पत्रकार के रूप में की गई है। हालांकि फुटेज की विश्सनीयता अभी संदिग्ध बनी हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त के साथ कहा कि इस झड़प में कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई है। सरकारी समाचार एजेंसी मीना ने गृह मंत्रालय के एक अधिकारी का हवाला देते हुए कहा है कि प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प में चार लोग मारे गए है। नागरिकों पर गोलीबारी करने के मामले में मुस्लिम ब्रदरहुड के नौ संदिग्ध समर्थकों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि ब्रदरहुड की फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर एक बयान में पत्रकार की मौत के लिए सुरक्षा बलों को जिम्मेदार ठहराया है। गौरतलब है कि पिछले जून में मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी का तख्तापलट करने में सक्रिय रहे अब्दुल फतह अल सिसी ने बुधवार को राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेने के लिए सेना प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया था।

सीरिया में आतंकियों ने छह महीने बाद रिहा किए दो पत्रकार

मैड्रिड। सीरिया में अलकायदा से संबद्ध आतंकवादियों ने स्पेन के दो पत्रकारों को लगभग छह माह तक अपने कब्जे में रखने के बाद रिहा कर दिया है। स्पेन के एक अखबार में रविवार को छपी एक खबर के अनुसार उसके स्टाफ रिपोर्टर जावियर एस्पोनेसा तथा फ्रीलांस फोटो पत्रकार रिकार्दो गाशिया विलानोवा को आतंकवादियों ने तुर्की के अधिकारियों को सौंप दिया है।

दोनों पत्रकार अपने परिवार के सदस्यों से मिलने के लिए अपने घरों को रवाना हो चुके हैं। अखबार में छपी खबर में कहा गया है कि उनके मध्य एशियाई संवाददाता जावियर ने शनिवार शाम को अपने अखबार के दफ्तर में फोन किया और कहा कि उसे और उसके एक साथी को रिहा कर दिया गया है।

अखबार ने दोनों पत्रकारों की तस्वीर भी छापी हैं और दोनों को स्वस्थ बताया हैं लेकिन इस बारे में ज्यादा विवरण नहीं दिया गया है। स्पेन के विदेश मंत्रालय ने भी दोनों पत्रकारों के आतंकवादियों के चंगुल से रिहा होने की पुष्टि कर दी है, लेकिन इस बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी है।
 

नीली पगड़ी वाले अभय का जाना…

Navin Kumar : जीवन को लेकर मन एक विरक्ति से भर उठा है.. सिर्फ 20 दिन पहले एक ज़िंदादिल इंसान से मुलाकात हुई थी.. नीली पगड़ी वाले अभय ओए एफएम में रेडियो जॉकी थे.. उन्होंने रेडियो छोड़कर टीवी में कदम रखा था.. न्यूज़ एक्सप्रेस पर वो दिव्या के साथ सुबह का कार्यक्रम पेश करते थे.. नमस्कार इंडिया.. आज एक सड़क दुर्घटना में अभय का निधन हो गया..

यह लिखते हुए मेरी अंगुलियां बुरी तरह कांप रही हैं.. मुझे नहीं पता यह संवेदना है या भय.. लेकिन सिर्फ चार दिन पहले चाय की दुकान पर अपना ही मज़ाक उड़ाता अभय याद आ रहा है.. उसे ड्राइविंग बिल्कुल पसंद नहीं थी लेकिन गाड़ियों के बारे में उसकी गज़ब की दिलचस्पी थी .. अब सिर्फ उसकी यादें शेष हैं.. सिर्फ यादें.. अभय रुकना था अभी.. ऐसे भी कोई जाता है क्या?

'न्यूज एक्सप्रेस' चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार नवीन कुमार के फेसबुक वॉल से.


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फर्रुखाबाद से ‘आप’ उम्मीदवार मुकुल त्रिपाठी ने भी लौटाया टिकट

केजरीवाल को और उनकी आम आदमी पार्टी का नौसिखियापन सामने आता जा रहा है. ऐसे ऐसे लोगों को टिकट दे दिया जो अब चुनाव लड़ने से ही इनकार करने लगे हैं. एक के बाद एक कई लोगों ने टिकट लौटाया है. ताजा मामला यूपी के फर्रुखाबाद का है. यहां 'आप' उम्मीदवार मुकुल त्रिपाठी ने पार्टी को लोकसभा टिकट लौटा दिया है.

'आप' ने मुकुल को कांग्रेस उम्मीदवार सलमान खुर्शीद के खिलाफ टिकट दिया गया था लेकिन मुकुल ने पार्टी पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगा दिया है. इससे पहले भी आम आदमी पार्टी के कई प्रत्याशी पार्टी पर सहयोग न करने का आरोप लगा चुके हैं. सविता भट्टी ने तो पार्टी पर सहयोग न करने की बात कहते हुए पार्टी तक छोड़ दी थी.

मुकुल त्रिपाठी का कहना है कि वह पिछले एक महीने से पार्टी से बात करने की कोशिश में थे लेकिन उन्हें पार्टी से किसी भी तरह का कोई सहयोग नहीं मिला. पार्टी से किसी तरह का कोई न सहयोग मिलने से वह बहुत नाराज हैं इसीलिए वह पार्टी का टिकट लौटा रहे हैं. गौरतलब है इससे पहले भी आम आदमी पार्टी के कई उम्मीदवार पार्टी से सहयोग न कहने की बात कहकर टिकट लौटा चुके हैं. नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली से आप ने पहले महेंद्र सिंह को टिकट दिया था लेकिन उन्होंने भी पार्टी से सहयोग न मिलने की बात कहकर टिकट लौटा दिया था. इसके बाद आप ने राखी बिड़लान को टिकट दिया था.

वहीं आम आदमी पार्टी के पॉलिटिकल अफेयर कमेटी के सदस्य इलियास आजमी ने भी लखीमपुर खीरी से टिकट लौटा दिया था. इलियास लखनऊ से टिकट चाहते थे. अयोध्या से इकबाल मुस्तफा ने भी यही बात कहकर आप का टिकट लौटा दिया था. अब मुकुल त्रिपाठी के टिकट लौटाने से एक बार फिर यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर क्यों एक के बाद एक आम आदमी प्रत्याशी टिकट लौटा रहे हैं..

कहीं ऐसा तो नहीं कि 'आप' वाले जेनुइन लोगों को इगनोर कर ऐसे कमजोर लोगों को टिकट दे दिया जो बीच मझधार में नैया को छोड़ भाग चले. जो भी हो, 'आप' नेताओं को अपने भरोसेमंद कार्यकर्ताओं की एक पूरी कतार तैयार करनी पड़ेगी जो किसी भी हाल में भागे नहीं. लोकसभा का चुनाव पार्टी के लिए एक बड़ा सबक होगा.

मैंने एफबी पर जो व्यंग्य पोस्ट किया, उसे राजकिशोर ने उड़ाकर अपने नाम से दैनिक जागरण में छाप दिया!

यशवंत भाई नमस्कार, आपको एक लिंक भेज रहा हूं। मामला दैनिक जागरण में प्रकाशित एक लेख का है। बनारस की चुनावी फिज़ा पर एक व्यंग्य मैने फेसबुक पर 20 मार्च को डाला था। आज सुबह बनारस और लखनऊ से मेरे दो पत्रकार मित्रों ने फोन कर बताया कि हुबहू वही लेख "महासमर" पेज पर राजकिशोर जी के नाम से छपा है। मैने वेब पर जाकर ई-पेपर पढ़ा तो चौंक गया। सिवाए कुछ पात्रों के नाम बदलने के वो लेख वैसे का वैसा ही नकल किया हुआ है।

आपसे दरख्वास्त ये कि आगे के बारे में बताएं कि क्या किया जा सकता है? एक नोटिस तो मैं भेज ही रहा हूं अखबार को। अगर ये चोरी की खबर आपके यहां छप सकती है तो देखें। अपना फेसबुक लिंक भी भेज रहा हूं और दैनिक जागरण का भी।

मेरा फेसबुक लिंक- https://www.facebook.com/raakesh.pathak.37/posts/10201615189207077?comment_id=50674859&offset=0&total_comments=13&notif_t=feed_comment

जागरण लिंक- http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/30-mar-2014-edition-Varanasi-City-page_19-28211-1774-45.html

उम्मीद है आप मार्गदर्शन करेंगे।

आपका

राकेश पाठक

टीवी जर्नलिस्ट

raakeshjournalist@gmail.com

अमर उजाला के युवान के बंद होने की चर्चाएं

यशवंत व्यास के अमर उजाला से चले जाने के बाद नई खबर ये है कि अमर उजाला का 'युवान' भी जल्द बंद होने जा रहा है…  हालाँकि कंपनी इस खबर को बाहर नहीं आने देना चाहती क्योंकि इससे उसकी प्रतिष्ठा पर असर होगा…  24 जनवरी 2011 को शिक्षा के प्रति युवाओं की रूचि और जानकारी बढ़ाने के लिए इस मैग्जीन की नींव रखी गयी थी… परन्तु बढ़ते समय के साथ इसकी प्रति बढ़ने के बजाये घटने लगी…

कानपुर शहर से शुरुआत करने के बाद इसका लखनऊ, इलाहाबाद, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे शहरों में भी विस्तार किया गया….. परन्तु 3 साल के बाद अब इसे बंद करने का फैसला लिया गया है… वजह कंपनी द्वारा अब भी गुप्त रखी जा रही है… पर सच को तो एक दिन सामने आना ही होता है… चाहे आप उसे कितने ही तालों में बंद करके क्यों न रख ले… (कानाफूसी)

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. कृपया कानाफूसी कैटगरी की खबरों पर यकीन करने से पहले तथ्यों की अपने स्तर पर जांच-पड़ताल कर लें. इस कैटगरी की खबरें सुनी सुनाई बातों पर आधारित होती हैं.

दूरदर्शन में केजुअल कर्मचारियों का शोषण, फटकार के बाद भी नियमों का हो रहा उल्लंघन

नई दिल्ली : दूरदर्शन के केंद्रीय कार्यक्रम निर्माण केंद्र में कार्यरत दर्जनों केजुअल कर्मचारियों को नियमों के विपरीत काम कराया जा रहा है। दूरदर्शन में केजुअल (रिसोर्स पर्सन) के तौर पर नियुक्त कर्मचारियों को पूरे-पूरे महीने आना पड़ रहा है जबकि अनुबंध के नियमानुसार सिर्फ महीने में 7 आसाइनमेंट होते हैं, जिसके तहत एक माह में सात दिन ही उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य है।

बताते चलें कि हाल ही में दूरदर्शन के खेल गांव स्थित केंद्रीय कार्यक्रम निर्माण केंद्र में नए डीडीजी अनिल कुमार गांधी स्थांतरित होकर पहुंचे हैं। गौरतलब है कि अनिल कुमार गांधी ने कर्मचारियों के इस प्रकार के हो रहे शोषण पर कड़ा ऐतराज भी जताया है। सूत्रों के मुताबिक इसकी जानकारी प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सरकार तक पहुंच चुकी थी जिसके बाद डीडीजी गांधी ने इसकी कड़ी निंदा की है।  खेल गांव स्थित दूरदर्शन के केंद्रीय कार्यक्रम निर्माण केंद्र में डीडी नेशनल, डीडी इंडिया, डीडी स्पोर्ट्स, हाल में मण्डी हाऊस से यहां शिफ्ट हुए डीडी उर्दू तथा डीडी नेशनल पर प्रसारित होने वाले नैरोकास्टिंग प्रोग्राम कृषि दर्शन के डिपार्टमेंट हैं। यहां पर इन्हीं विभागों के द्वारा कार्यक्रम बनाए जाते हैं।  
 

तरुण तेजपाल कांड : महिला पत्रकार के आरोपों की सच्चाई पर आउटलुक पत्रिका में उठा सवाल

तरुण तेजपाल कांड में महिला पत्रकार ने जो आरोप लगाया है उसकी सच्चाई पर आउटलुक पत्रिका में सवाल उठाया गया है। सीसीटीवी फ़ुटेज में तेजपाल एक बार भी उस पत्रकार को लिफ़्ट में खींचते नहीं दिखते हैं। आश्‍चर्य तो इस बात पर भी होता है कि इस फ़ुटेज में महिला पत्रकार दौड़कर उस लिफ़्ट में घुसते हुए नज़र आती हैं जिसमें तरुण तेजपाल मौजूद थे।

लिफ़्ट में खींचने वाली बात बहुत महत्वपूर्ण है और एफ़आईआर में भी इसका ज़िक्र हुआ है। ऐसे में आउटलुक के पाठकों समेत हम जैसे लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक ही है। क्या अपराध हमेशा काले और सफ़ेद रंगों में दिखता है? क्या किसी पत्रकार की याददाश्‍त इतनी खराब हो सकती है?

स्वतंत्र पत्रकार सुयश सुप्रभ के फेसबुक वॉल से.

गैंगरेप की शिकार पीड़िता हिंदी पत्रकार है, इसीलिए अंग्रेजीदां नारीवादियों ने चुप्पी साध रखी है!

Samar Anarya : एक पत्रकार का काम करते हुए (in the line of duty) मिर्जापुर में गैंगरेप होता है, पुलिस से लेकर नारीवादियों तक को सूचना होती है पर बस….. बात यहीं ख़त्म। इस बार कोई गुस्से में उबलता नहीं दिखता, नारीवादियों तक. क्यों? मुम्बई के शक्तिनगर मिल्स मामले से लेकर तहलका के गोवा थिंक फेस्ट मामले में उबले गुस्से से इस मामले में ऐसा क्या फर्क था कि गुस्सा छोड़िये, यह खबर अखबारों के भीतरी पन्नों में बॉक्स तक सिमट के रह गयी.

फर्क था, फर्क यह था कि दिल्ली से हजार किलोमीटर दूर हुए इस बलात्कार में इस बार एक तो पीड़िता हिंदी पत्रकार थी और फिर अपराधी अनजान चेहरे- मतलब एक तरफ पीड़िता इन प्राइमटाइम टीवी फेमिनिस्टों के अपने वर्ग की नहीं थी (शी डजंट बिलोंग टू अस, यू नो) और दूसरी तरफ हाईप्रोफाइल टारगेट नहीं सो टीआरपी की कोई सम्भावना नहीं। सो क्यूँ उबलते मध्यवर्गीय नैतिकता के ये अंग्रेजीदाँ झंडाबरदार, फिर चाहे इनकी दूकान का झंडा लाल ही रंग का क्यों न हो.

अपनी पिछली करतूतों को छिपाने के लिए जनसंघर्षों में जिंदगी लगा देने वालों को 'सेकुलर रेप' की एक नयी कैटेगरी इजाद कर उसका समर्थक बताने की साजिशों में लगे ये लोग काश देख पा रहे होते कि उनके मुखौटे नोचे जा रहे हैं.

काश वो देख पाते कि सम्भावनाओं से भरी हुई युवा पत्रकार Priyanka Dubey उनसे पूछ रही हैं कि "क्या होगा जब अपनी कारों में बिसलेरी भर गांव 'विजिट' करने वाली इन 'अंग्रेजी मेमों' का छिछलापन गरीब समझ जायेंगें?''

किसका किसका चरित्र हनन कर लाल झंडों से लेकर उदारवाद के मुखौटों में छुपाया अपना आभिजात्य-अंग्रेजीदां चरित्र, व्यवहार और सरोकार छुपाने के लिए?

पत्रकार, स्तंभकार, एक्टिविस्ट और मानवाधाकिरवादी अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.


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प्रेस क्लब आफ इंडिया में आनंद-नदीम पैनल की जोरदार जीत (देखें पूरी लिस्ट)

प्रेस क्लब आफ इंडिया के इलेक्शन में आनंद सहाय – नदीम अहमद काजमी पैनल ने जोरदार जीत दर्ज की. विरोधियों का सूपड़ा साफ कर दिया. पूरा पैनल भारी मतों से जीता है. एशियन एज में कार्यरत आनंद सहाय, जो बिहार के रहने वाले हैं, प्रेस क्लब आफ इंडिया के अध्यक्ष बने हैं. बिहार के ही निवासी और एनडीटीवी में कार्यरत नदीम अहमद काजमी महासचिव बने हैं.

गोरखपुर के निवासी और राष्ट्रीय सहारा अखबार में कार्यरत पत्रकार संजय सिंह कोषाध्यक्ष नियुक्त हुए हैं. ज्वाइंट सेक्रेट्री पद पर विनीता यादव विजयी हुई हैं. पूरा रिजल्ट इस प्रकार है…

मैनेजिंग कमेटी के चुनाव में समाचार प्लस चैनल के एडिटर इन चीफ उमेश कुमार जब जीते तो समाचार प्लस खबर पर ब्रेकिंग न्यूज चल गई… देखें चैनल पर चली खबर स्क्रीनशाट के रूप में…

चुनाव जीतने के बाद नए कोषाध्यक्ष संजय सिंह अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं : freinds, ap logon ki shubhkamnaon se PRESS CLUB OF INDIA ke election me mujhe TREASURER (koshadhyachh) post par chuna gaya hai. club members ne mujhe vote kar jo yah mahati dayitva diya hai…..mai unka, apne sabhi shubhchintakon, supporters aur doston ka shukragujar hun. …aabhari hun. mai vada karta hun ki apne is dayitva me puri pardarshita, safayi aur suchita ke sath khara utrunga….. dhanyavad…..(maine apni pratidwandi KARUNA MADAN ko unke 364 voton ke mukable 698 voton se haraya…) hamare pure panel ne sabhi posts par shandar jeet darj ki….

वहीं, विनीता यादव ने लिखा है: our panel won at PCI election… congrats to team … grt job … thanks dear friends you all came nd voted for club choice …. we will try to come up on ur expectations

झील में डूब कर मरे अपने एंकर अभय सिंह भामरा को विनोद कापड़ी ने फेसबुक पर यूं दी श्रद्धांजलि

Vinod Kapri : कल से ये मुस्कुराता हुआ अभय का चेहरा कभी नहीं दिखेगा। रोज़ सुबह जिस वक़्त वो शो करके घर पहुँच जाता था, कल सुबह ठीक उसी समय अभय को अंतिम विदाई दी जाएगी। तुमसे मैं बहुत नाराज़ हूँ अभय। सिर्फ़ 20 दिन की सबसे छोटी पारी खेलकर तुम बिना बताए क्यों चले गए अभय? सब जानते हैं कि तुम एक जाने माने RJ थे, टीवी की तुम्हारी पारी बस शुरू ही हुई थी और तुम चले गए।

हम सब बहुत सदमे में हैं अभय। तुमने मुझ से वादा किया था अभय कि तुम करोड़ों दिलों पर राज करोगे और कुछ ही दिनों में तुमने और दिव्या ने NAMASKAR INDIA को देश का सबसे सुंदर ब्रेकफ़ास्ट शो बना भी दिया था। तुम्हारे बिना अब हम कैसे करेंगे अभय? बोलो जवाब क्यों नहीं देते अभय? तुम्हारे कान्ट्रेक्ट में दो महीने का नोटिस पीरियड भी था। इसके बावजूद तुमने नोटिस नहीं दिया। क्यों अभय क्यों?

बोलो !!!!

बोलो अभय !!!

तुम्हें याद है जब तुमने मुझ से तमाम आशंका के साथ पूछा था कि सर आप श्योर हैं ना कि आप सिख को हिंदी चैनल का एंकर बनाएँगे? तो मैंने तुमसे कहा था कि हाँ अभय बिलकुल गर्व के साथ। मुझे सुबह के लिए तुम्हारे जैसा ही चेहरा चाहिए। ताज़ी हवा के झौंके की तरह। और सच में तुम ताज़ी हवा के झौंके की तरह ही थे।

अब कल से सुबह मैं कैसे टीवी देखूंगा अभय? बोलो ना। कुछ तो बोलो अभय।

बहुत ग़लत बात है अभय !!! मैं कब से चीख़ चीख़कर पूछ रहा हूँ और तुम अपने प्रोड्यूसर की बात नहीं सुन रहे हो !!!!!!!

अभय !!!! तुम कहीं नहीं गए हो !!! तुम हमेशा हमारे बीच अजय रहोगे अभय !!!!!!

Love you so so much Dear !!!!

PS

कुछ मित्र जानना चाहते हैं कि अभय को क्या हुआ। अभय आज सुबह कुछ दोस्तों के साथ सूरजकुण्ड की झील के पास था। तभी कुछ बंदरों ने हमला किया। अफ़रातफ़री में अभय का पैर फिसला और वो झील में जा गिरा। दोस्तों ने बहुत कोशिश की पर तब तक देर हो चुकी थी। परिवार पर दूसरा पहाड़ तब टूट पड़ा ,जब अभय का शव लेने जा रहे अभय के जीजा सदमे को सह नहीं पाए और दिल का दौरा पड़ने से उनकी भी मृत्यु हो गई। एक माँ ने आज बेटा खोया और बेटी का सुहाग। Really one of the saddest day of life…

न्यूज एक्सप्रेस चैनल के एडिटर इन चीफ विनोद कापड़ी के फेसबुक वॉल से.


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ये एक महीना जी गया तो जी जाउंगा : वीरेन डंगवाल

Rising Rahul : वीरेन दा, आपसे तो मुझे न जाने कि‍तने सालों पहले मि‍लना था, पर मैं खुद में बंद आदमी खुद से कभी इतना बाहर ही न आ पाया कि उस यायावरी से जुड़ सकूं, जि‍सने ताजिंदगी आपको बखूबी बरता। अभी भी मुझे खुद से बाहर आने में काफी दि‍क्‍कत है, पर सुख ये है कि अब आप खुद को फिर से पूरे दमखम के साथ सामने आने के लिए तैयार किए हुए हैं.

हालांकि अभी तक दि‍माग में आपके वो शब्‍द गूंज रहे हैं और शरीर का हर रोंया खड़ा हो जा रहा है कि 'ये एक महीना जी गया तो जी जाउंगा।' पर मैं जानता हूं कि आप की साफगोई का नतीजा ये है कि आप न सिर्फ जिएंगे बल्कि कैंसर से लड़ रहे साथियों के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में सामने आएंगे. आप को जीतना है, आप विजेता हैं.

हालांकि बात करते हुए आपने आगे न जोड़ा, न कहा, पर हमने समझ लि‍या और आपकी अनकही हम स्‍वीकार करेंगे वीरेन दा, कि आप फिर से बरेली को गुलजार करेंगे, वहां से पूरे देश में मनुष्यता का संदेश देते रहेंगे… हमें पता है वीरेन दा, बता दे रहे हैं अभी से। और हां, Yashwant को बोलने दीजि‍ए एलि‍यन एलि‍यन… मुझे आप बहुत खूबसूरत लगे… ठीक उतने, जि‍तने कि आप हैं।

पत्रकार राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से.


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वीरेन डंगवाल का नया पता- इंदिरापुरम, गाजियाबाद (दो नई कविताएं और डायरी के कुछ अधूरे पन्ने)

रायपुर प्रेस क्लब की बागडोर फिर एक बार अनिल पुसदकर के हाथों में

: संजय शुक्ला उपाध्यक्ष, संदीप पुराणिक महासचिव पद पर काबिज : रायपुर : प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रतिष्ठित रायपुर प्रेस क्लब के संगठन की बागडोर एक बार फिर वरिष्ठ पत्रकार अनिल पुसदकर के हाथों में आ गई है। उन्होंने प्रेस क्लब के संगठनात्मक चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी सुशील अग्रवाल को कड़े मुकाबले में 3 मतों से पराजित करते हुए अध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया। उपाध्यक्ष पद पर संजय शुक्ला काबिज हुए। वहीं महासचिव के पद पर संदीप पुराणिक काबिज हुए हैं।

रायपुर प्रेस क्लब के 6 पदों के लिए कल 12 बजे से मतदान प्रक्रिया प्रारंभ हुई, जो शाम 5 बजे तक जारी रही। दिनभर गहमा-गहमी का माहौल रहा एवं सभी सदस्यों ने अपने-अपने मताधिकार का प्रयोग किया। चुनाव कार्य सम्पन्न कराने के लिए चुनाव अधिकारी के रूप में वरिष्ठ पत्रकार कौशल किशोर मिश्र और पन्नालाल गौतम को नियुक्त किया गया था। उन्होंने समस्त प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराई। मतदान सम्पन्न होने के बाद शाम 6 बजे से मतों की गणना प्रारंभ की गई। जिसमें अध्यक्ष पद के लिए अनिल पुसदकर और सुशील अग्रवाल के बीच कांटे की टक्कर थी।

श्री पुसदकर ने 147 मत लेकर तीन मतों से अपनी बढ़त बनाई। वहीं श्री अग्रवाल को 144 मत प्राप्त हुए। इसी प्रकार महासचिव के पद पर संदीप पुराणिक ने नरेन्द्र बंगाले को पराजित किया। श्री पुराणिक को 130 और श्री बंगाले को 114 मत प्राप्त हुए। वहीं उपाध्यक्ष के रूप में संजय शुक्ला ने रवि नामदेव को 70 मतों के विशाल अंतर से हराया। श्री शुक्ला 180 और श्री नामदेव को 110 मत प्राप्त हुए। कोषाध्यक्ष के रूप में संजीव वर्मा निर्वाचित हुए हैं। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी किशन लोखंडे को 16 मतों से पराजित किया। श्री वर्मा को 149 एवं श्री लोखंडे को 133 प्राप्त हुए हैं तथा संयुक्त सचिव के रूप में सुखनंदन बंजारे और मोहन तिवारी निर्वाचित हुए हैं। दोनाें को क्रमश: 126 और 168 वोट प्राप्त हुए हैं।

In a nail-biting finish, senior journo Anil Pusadkar won the elections for the post of President of the Raipur Press Club on Sunday. He defeated his nearest rival candidate Sushil Agrawal by a margin of mere three votes. Anil got 147 votes while Sushil polled 144 votes. The polling for the annual general body of the Raipur Press Club was conducted peacefully with 486 members out of total 582 members casting their franchise for various posts comprising President, Vice President, General Secretary, Treasurer and two Joint Secretaries.

Sandeep Puranik won the contest for the post of General Secretary. He polled 180 votes while defeating his nearest rival Narendra Bangale by 70 votes. Bangale had polled 110 votes.  The post of Vice President was won by Sanjay Shukla who got 130 votes and defeated his nearest rival Ravi Namdev by a margin of 16 votes. Namdev polled 114 votes.

Similarly, for the post joint secretaries Mohan Tiwari and Sukhnandan Banjare were elected. While Tiwari got 168 votes, Banjare could manage 126 votes.  For the post of treasurer, Sanjeev Verma was elected who defeated his nearest rival Kisan Lokhande by a margin of 16 votes. While Verma received 149 votes, Lokhande managed only 133 votes. The results were announced after ten rounds of ballot counting.

सोशल मीडिया के लिए भी कंटेंट को लेकर मानदंड निर्धारित होना चाहिए

: लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका पर हुई चर्चा : पटना : इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया की तरह सोशल मीडिया के लिए भी कंटेंट को लेकर मानदंड निर्धारित होना चाहिए, ताकि खबरों की मर्यादा आहत न हो। ई-पत्रिका 'आह्वान' के पांच वर्ष पूरा होने के मौके पर रविवार को पटना में आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए संपादक वीरेंद्र कुमार यादव ने कहा कि सोशल मीडिया ने वैचारिक अभिव्यक्ति को व्यापक, तीव्र और बहुआयामी विकल्प उपलब्ध कराया है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की भाषा, कंटेंट और कमेंट सकारात्मक, सार्थक और मर्यादित होना चाहिए। सेमिनार का विषय लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका पर केंद्रित था।

साहित्यकार मुसाफिर बैठा ने कहा कि आज अखबारों में भी सोशल मीडिया के कंटेंट को काफी जगह मिल रही है। लोग उसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं। चुनाव के संदर्भ में सोशल मीडिया का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इसकी पहुंच एकदम सुदूर गांवों तक है। मोबाइल पर इंटरनेट आ जाने के बाद सोशल मीडिया का हस्तक्षेप काफी प्रभावी हो गया है।  वेबसाइट अपना बिहारडॉटओआरजी के संपादक नवल किशोर ने कहा कि सोशल मीडिया के लिए भी चुनाव के संदर्भ में गाइडलाइन तय होना चाहिए, ताकि उनका दुरुपयोग नहीं हो सके। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की तकनीकी अधिक विकसित और सहज हो गयी है। यूनिकोड ने कई समस्याओं का एकसाथ समाधान किया औ फांट की समस्या का समाधान हो गया।

अधिवक्ता मनीष रंजन ने कहा कि प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया के सेट एजेंडे के खिलाफ सोशल मीडिया ने एजेंडों को खारिज कर दिया है। कई बार किसी खास नीति या पार्टी को लेकर परंपरागत मीडिया वाले एकस्वर से आवाज उठाते हैं, जबकि सोशल मीडिया में मुद्दों के पक्ष या विपक्ष में व्यापक बहस की संभावना बरकरार रहती है। पत्रकार फिरोज मंसूरी ने कहा कि आज देश के समक्ष वैचारिक संकट का खतरा है। इस संकट से उबारने की ताकत सिर्फ सोशल मीडिया में है। राजनीति व्यक्तिवाद की ओर बढ़ रही है। विचारधारा कट्टरता की ओर बढ़ रही है। ऐसे स्थिति में सोशल मीडिया वैचारिक विविधता का मंच उपलब्ध कराता है।

सामाजिक कार्यकर्ता उदयन राय ने कहा कि संकट ईमान का भी है। राजनीति में न पार्टी नेता के प्रति प्रतिबद्ध है और न नेता पार्टी को लेकर ईमानदार है। पार्टियों के बीच सिर्फ अवसर का भेद रहा गया है। जिसको जहां मौका मिलता है, वहां लाभ के लिए पहुंच जाता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया एक समर के समान है और इस क्षेत्र में निर्भय होकर काम करना होगा। पत्रकार श्यामसुंदर ने कहा कि सोशल मीडिया एक क्रांति के समान है और इसने सभी वर्गो को अभिव्यक्ति की आजादी दी है। इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में अब भी कुछ जातियों का आधिपत्य कायम है, लेकिन सोशल मीडिया ने उस आधिपत्य को चुनौती दी है। यह एक सकारात्मक पक्ष है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। धन्यवाद ज्ञापन अमित कुमार ने किया। कार्यक्रम के दौरान आह्वान की हार्डकॉपी का वितरण भी किया गया।

The news relating to elections should be impartial : IJU

THE PRESS NOTE ISSUED AT THE MEDIA CONFERENCE ON 29TH MARCH ADDRESSED BY S N SINHA, PRESIDENT AND D AMAR, SECRETARY-GENERAL OF INDIAN JOURNALISTS UNION (IJU) ON THE DELIBERATIONS OF NATIONAL EXECUTIVE COMMITTEE (NEC) OF UNION HELD AT BENGALURU ON 27-28 MARCH 2014.

The National Executive Committee (NEC) meeting of Indian Journalists Union (IJU) held at Bengaluru on 27-28 March in resolution said “the news relating to elections should be impartial. Let the electorate decide whom to vote by applying their own mind so that democracy in the country flourishes”. It also urged the media houses not indulge in perilous practice of paid news which distorts the democratic election process. It said “the media should clearly draw lakshman rekha between news and paid publicity material.”

The Union called on the working journalists of print and electronic media to refrain from biased reporting in any form of news to influence the voters in favor of or against a political party or candidate during the run up to the elections to the Lok Sabha and Legislative Assemblies in some states in the country.  

The Indian Journalists Union (IJU), the most representative organization of the working journalists in the country held its National Executive Committee (NEC) meeting in Bengaluru on 27-28 March. The Karnataka State Journalists Federation, the state affiliate of IJU hosted two day meet. About70 journalists from all over the country, including from the north eastern states attended the meeting.

The NEC in another resolution welcomed the recent judgment of Supreme Court upholding constitutional validity of recommendations of the Majithia Wage Boards for the working journalists and other newspaper employees. It also welcomed the ruling of the court upholding the constitutional validity of the Working Journalists and other Newspaper Employees (Conditions of Service and Miscellaneous Provisions) Act 1955. The resolution urged upon all the newspaper managements in the country to implement the new wages from March salary payable in April and pay the arrears in four installments over a period of one year as ordered by the Supreme Court. Otherwise, they

would be held for contempt of the apex court as the petition was filed on their behalf by their trade body Indian Newspapers Society (INS) was rejected by it.

The IJU urged upon the Government of India to immediately appoint a tripartite committee to oversee the implementation of the wage board recommendations with working Journalists representative organizations, managements representatives and government officials at the national level. It also demanded that the state governments all over the country should appoint tripartite committees at state level wherever they do not exist. The National Executive called upon its State Unions to get ready to agitate for statutory wages to all working journalists in the country as the legal impediments were removed with the ruling of the Supreme Court.

IJU has observed that no major political party so far has included any legitimate demands of the journalists like implementation of Majhithia Wage awards, safety and security of journalists and other welfare measures. IJU appeals to all political parties to include the legitimate demands of the journalists in their manifestos.

The National Executive Committee (NEC) expressed grave concern over the infamous incident involving former Editor Tarun Tejpal. Condemning it equivocally, it felt that it should be a wake up for all the working journalists organizations and media establishments to take steps to protect the dignity of the female journalists and appoint Gender councils at all the work places as mandated by the Supreme Court.

In another resolution, the IJU appealed to the central and state government to extend all the welfare schemes taken up by them, like housing, house sites, health schemes, travel facilities etc., to all the working journalists as defined under the Working Journalist Act and not to limit them the accredited journalists. IJU demanded that the newspaper managements should also be involved with their contribution.

The Indian Journalists Union (IJU) in a resolution urged on the Government of India to bring the journalists working in electronic and cyber media bring under the definition of working journalists by amending the provisions of Working Journalists Act 1955. It demanded that the present Press Council of India should be converted in to Media Council of India by bringing print, electronic and cyber media under its regulatory ambit.

Earlier on 27th March, the Union organized a seminar on “Role of Media and Democracy in Elections”. IJU President S N Sinha presided over the seminar. The Hon’ble Speaker of the Karnataka Legislative Assembly Mr. Kagodu Thimmappa, senior journalist and former Secretary-General of IJU K Sreenivas Reddy, social activist S R Hiremath, Press Council of India member K Amarnath, Aam Aadmi Party Karnataka convener Prithvi Reddy, IJU Secretary-General Devulapalli Amar and others spoke.

(Devulapalli Amar)

Secretary-General

पाकिस्तान दौरे पर गए कोलकाता प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के खिलाफ गृह मंत्रालय करा रहा खुफिया जांच!

कोलकाता से प्रकाशित एक बंगला पत्रिका ने अपने मार्च के अंक में एक खबर को लीड स्टोरी के रूप में प्रकाशित किया है। यह खबर कोलकाता के पत्रकारों में इन दिनों चर्चा का विषय है। दिल्ली डेटलाइन से पत्रकार अर्ध्य कुसुम ने खबर में लिखा है कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने खुफ़िया तरीके से कोलकाता प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के पाकिस्तान सफर की जाँच शुरू कर दी है। जांच में क्लब के कई पदाधिकारियों का नाम शामिल किया गया है।

खबर में दावा किया गया है कि कोलकाता प्रेस क्लब का कराची सफर गृह मंत्रालय अथवा प्रदेश गृह मंत्रालय के अनुमति के बिना हुआ है। इस सफ़र पर जाने के पहले प्रेस क्लब के कई पदाधिकारियों के साथ पाकिस्तानी दूतावास के अधिकारियों ने गोपनीय बैठक की। बैठक को लेकर गृह विभाग में खलबली मची हुई है। खबर के मुताबिक महीना भर पहले भारत में नियुक्त पाकिस्तान के हाई  कमिश्नर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करने कोलकाता आए हुए थे। मुख्यमंत्री से मुलाकात करने के बाद वो कोलकाता प्रेस क्लब में आए थे। प्रेस क्लब में उनके आने की  खबर किसी को नहीं दी गई थी। इसके बाद खबर आई की प्रेस क्लब के अध्यक्ष और सचिव के साथ कुछ पत्रकारों के दल ने पाकिस्तान जाने के लिए आमंत्रण पाया है।  इस आमंत्रण की जानकारी कोलकाता प्रेस क्लब की तरफ से न तो विदेश विभाग को दी गई और न ही गृह मंत्रालय को।

गोपनीयता का आलम कि कराची में इस सफ़र को लेकर कराची स्थित भारतीय कमिश्नर भी अंधकार में थे। वो वहाँ के अख़बारों में खबर पढ़कर जाने कि कोलकाता से पत्रकारों का एक दल पाकिस्तान सफ़र पर आया है। हालांकि इस तरह के सफ़र की जानकारी भारत सरकार को देने का नियम है।  इसके पहले कोलकाता प्रेस क्लब की टीम जब भी विदेश सफ़र पर गई है, सभी जानकारी विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय को दी गई है। खबर में दावा किया गया है कि इस बार सफ़र में जो लोग गए थे, उनकी भागीदारी को लेकर कोलकाता प्रेस क्लब के कार्यकारिणी सदस्य और आम सदस्यों में रोष है। 

कोलकाता से भड़ास के वरिष्ठ संवाददाता की रिपोर्ट.

‘न्यूज एक्सप्रेस’ के एंकर अभय भामरा की झील में डूबने से मौत, सदमे में जीजा को हार्ट अटैक

फरीदाबाद के सूरजकुंड क्षेत्र में रविवार सुबह दिल्ली से चार दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने आए 'न्यूज एक्सप्रेस' न्यूज चैनल के एंकर की झील में डूबकर मौत हो गई। अभय भामरा की मौत की खबर मिलते ही उसके जीजा सुरजीत सिंह सूरजकुंड थाने पहुंचे। वहां हार्ट अटैक से उनकी भी मौत हो गई। दो सदस्यों की मौत से परिवार में मातम पसरा हुआ है। पुलिस के मुताबिक दिल्ली के मोती नगर के सुदर्शन पार्क निवासी अभय पांच दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने पहुंचे थे।

खाना बनाने का सामान लेकर जैसे ही ये लोग झील के पास पहुंचे बंदरों ने हमला कर दिया। बंदरों के भय से वे वहां से भाग खड़े हुए। थोड़ी देर बाद जब वे लौटे तो सामान बिखरा पड़ा था। कुछ सामान झील में तैर रहा था। अभय सामान निकालने झील में उतरा, लेकिन वह गहरे पानी में डूब गया। गोताखोरों की मदद से उसके शव को निकाला गया। अभय भामरा की मौत की खबर मिलते ही उनके जीजा सुरजीत सिंह सूरजकुंड थाने पहुंचे। वहां हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। बताया गया है कि सुरजीत अभय की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके। दो लोगों की मौत से परिवार पर गम का पहाड़ टूट पड़ा। अभय की पत्नी निशी और बहन स्वीटी रोते-रोते बार-बार बेहोश हो रही हैं।

इधर, अभय के परिजन सूरजकुंड की घटना के हादसा मानने का तैयार नहीं है। उनका कहना था कि अभय साजिश का शिकार हुए। परिजनों ने मामले की जांच कराने की मांग की है। रिश्तेदारों के मुताबिक अभय पत्नी और दो बच्चों के साथ ए-45, सुदर्शन पार्क, मोती नगर में रहते थे। इनके बेटे प्रद्युम्न ने इसी साल 12वीं पास की है। बेटी नेहर (12) छठीं कक्षा में पढ़ती है। अभय के साथ उनके बड़े भाई सरबजीत सिंह भी रहते हैं।

रिश्तेदार हरजीत ने बताया कि अभय अक्सर अपने बुलेटिया ग्रुप के साथ घूमने के लिए जाते थे। रविवार सुबह वे जल्दी ही निकल गए थे। दोपहर करीब 12: 00 बजे एक युवती ने अभय के डूबने की खबर दी। इसके बाद रमेश नगर में रहने वाले अभय के जीजा सुरजीत सूरजकुंड के लिए निकल गए। हरजीत के मुताबिक सूरजकुंड थाने में सदमे की वजह से उन्हें हार्ट अटैक आ गया। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

गुवाहाटी से प्रकाशित ‘संगबाद लहरी’ बंद, 100 कर्मचारी बेरोज़गार

गुवाहाटी और शिलांग से प्रकाशित बंगाली दैनिक 'संगबाद लहरी' का प्रकाशन प्रबंधन ने बंद कर दिया है। प्रबंधन के इस फैसले से करीब 100 कर्मचारी बेरोज़गार हो गए हैं। इसके विरोध में कल गुवाहाटी के समाचार पत्रों औऱ न्यूज़ चैनल्स के पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकार कर्मियों ने गुवाहाटी प्रेस क्लब के सामने मुंह पर काली पट्टी बांध कर विरोध प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि शिलांग टाइम्स प्रा. लि. मेघालय द्वारा 26 मार्च को जारी किया गया बंदी नोटिस वापस लिया जाए। प्रदर्शनकारियों ने असम औऱ मेघालय के मुख्यमंत्रियों से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की।

संगबाद लहरी का प्रकाशन गुवाहाटी से 2009 और मेघलय से जुलाई 2011 में शुरू हुआ था। प्रबंधन ने सभी कर्मचारियों को एक महीने की सैलरी देने का प्रस्ताव रखा था, जिसे ऑल असम मीडिया एम्प्लॉईज़ फेडेरेशन ने नकार दिया। फेडेरेशन के अध्यक्ष ने सभी कर्मचारियों के लिए पत्र बंदी से पहले पांच महीने की सैलरी औऱ सभी विधिक लाभ दिए जाने की मांग की है।

एनटी अवार्ड में आजतक के हिस्‍से आए छह पुरस्‍कार

देश का सबसे तेज और चहेता न्यूज चैनल आज तक 'न्यूज टेलीविजन अवॉर्ड्स' में छाया रहा. आज तक को अलग-अलग श्रेणियों में कुल 6 अवॉर्ड्स से नवाजा गया. इसके अलावा हमारे सहयोगी चैनल हेडलाइंस टुडे को भी 2 अवॉर्ड्स मिले.

आज तक को मिले पुरस्कारों पर एक नजर-

1. '10तक' को बेस्ट डेली न्यूज बुलेटिन अवॉर्ड
2. 'सुपरहिट मुकाबला' को बेस्ट स्पोर्ट्स शो का अवॉर्ड
3. 'बजट कैफे' को अवॉर्ड
4. पुण्य प्रसून वाजपेयी को बेस्ट एंकर का अवॉर्ड
5. चारुल मलिक को बेस्ट इंटरटेनमेंट न्यूज एंकर का अवॉर्ड
6. 'कुश्ती को बचाना है' को बेस्ट स्पोर्ट्स टॉक शो को अवॉर्ड
इसके अलावा 'चेन्नई एक्सप्रेस' को बेस्ट प्रोमो के अवॉर्ड से नवाजा गया.

साभार : आजतक

एनटी अवॉर्ड में एनडीटीवी ने 23 पुरस्कार अपने नाम किए

नई दिल्ली: न्यूज टेलीविजन अवॉर्ड्स (एनटी अवॉर्ड्स) की शाम एनडीटीवी के नाम रही। बेस्ट न्यूज एंकर से लेकर बेस्ट न्यूज रिपोर्टर तक, बेस्ट मोबाइल ऐप से लेकर गेम चेंजर 2013 तक हर अवॉर्ड एनडीटीवी के नाम रहा। कुल मिलाकर एनडीटीवी की झोली में 23 अवॉर्ड आए।

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच रवीश कुमार को प्राइम टाइम के लिए एनटी अवॉर्ड मिला। अरविंद केजरीवाल के साथ उनके सफर 'मैं अरविंद केजरीवाल' को करेंट अफेयर्स स्पेशल कैटेगरी में सबसे शानदार कार्यक्रम माना गया। रात 9 बजे आने वाले रवीश कुमार के प्रोग्राम प्राइम टाइम को न्यूज डिबेट के लिए और हम लोग को बेस्ट एंटरटेनमेंट टॉक शो के लिए अवॉर्ड से नवाजा गया। एनटी अवॉर्ड्स समारोह में शरद शर्मा के 'वोट का खोट' से एनडीटीवी को अवॉर्ड मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो देर तक चलता ही रहा।

'वोट का खोट' को बेस्ट इंवेस्टिगेटिव प्रोग्राम चुना गया। कारों और बाइक्स पर क्रांति संभव के 'रफ्तार' को बेस्ट ऑटो शो चुना गया है। सामाजिक और पर्यावरण जागरुकता से जुड़े दो अवॉर्ड भी एनडीटीवी की झोली में आए हैं। उत्तराखंड त्रासदी पर सुशील बहुगुणा के 'हिमालय सा दर्द' को हिन्दी में और 'वी द पीपुल' को अंग्रेजी कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम माना गया। 'वी द पीपुल' को अंग्रेजी में बेस्ट टॉक शो भी माना गया है।

सॉल्यूशंस ग्लोबल समिट को किसी न्यूज चैनल की सबसे बेहतर लाइव पहल के तौर पर एनटी अवॉर्ड मिला है। 'स्पोर्ट्स टॉप 10' को बेस्ट स्पोर्ट्स शो माना गया। इयरइंडर 2013 को इंग्लिश सो पैकेजिंग एनडीटीवी 24×7 को स्पोर्ट्स स्पेशल के लिए एनटी अवॉर्ड मिला है। साथ ही अंग्रेजी चैनलों की कैटेगरी में ग्राफिक्स के सबसे शानदार इस्तेमाल के लिए एनडीटीवी 24×7 को  अवॉर्ड दिया गया है। एनडीटीवी के मोबाइल ऐप को बेस्ट मोबाइल ऐप चुना गया, जबकि सबसे चर्चित सोशल मीडिया न्यूज ब्रैंड और गेम चेंजर 2013 भी एनडीटीवी नेटवर्क के हिस्से आया है। शरद शर्मा को बेस्ट टीवी न्यूज रिपोर्टर, हिन्दी) और सिद्धार्थ पांडे बेस्ट रिपोर्टर, इंग्लिश चुने गए।

अवॉर्ड्स की सूची

रवीश कुमार – बेस्ट टीवी न्यूज एंकर, हिन्दी
बरखा दत्त – बेस्ट टीवी न्यूज एंकर, हिन्दी
अफशा अंजुम – बेस्ट स्पोर्ट्स न्यूज शो प्रेजेंटर
शरद शर्मा – बेस्ट टीवी न्यूज रिपोर्टर, हिन्दी
सिद्धार्थ पांडे – बेस्ट टीवी न्यूज रिपोर्टर, इंग्लिश
मोस्ट पोपुलर सोशल मीडिया टीवी न्यूज ब्रांड
सोशल कंट्रीब्यूशन बाइ ए न्यूज नेटवर्क
मोबाइल एप्लिकेशन बाइ ए न्यूज चैनल
एनडीटीवी 24X7- बेस्ट यूज ऑफ ग्राफिक्स, इंग्लिश न्यूज चैनल
इयरइंडर 2013- बेस्ट शो पैकेजिंग, इंग्लिश
प्राइम टाइम – बेस्ट न्यूज डिबेट शो
एनडीटीवी 24X7- बेस्ट स्पोर्ट्स स्पेशल
स्पोर्ट्स टॉप 10 – बेस्ट स्पोर्ट्स शो
अरविंद के साथ सफर में – (प्राइम टाइम) – बेस्ट करेंट अफेयर्स स्पेशल
सॉल्यूशंस – ग्लोबल समिट : न्यूज चैनल की सबसे बेहतर लाइव पहल
वी द पीपुल – सामाजिक / पर्यावरण जागरुकता, इंग्लिश
हिमालय सा दर्द – सामाजिक / पर्यावरण जागरुकता, हिन्दी
बिजनेस स्पेशल – राइज एंड फॉल ऑफ इंडियन इकोनॉमी
वी द पीपुल- टॉक शो
हमलोग – (मालिनी अवस्थी) इंटरटेनमेंट टॉक शो
गेम चेंजर 2013- एनडीटीवी नेटवर्क
रफ्तार – बेस्ट ऑटो शो
वोट का खोट – इंवेस्टिगेटिव प्रोग्राम

साभार : एनडीटीवी

एनटी अवॉर्ड में नेटवर्क 18 को 34 अवॉर्ड मिले

नई दिल्ली। न्यूज टेलीवीजन अवॉर्ड में एक बार फिर नेटवर्क18 की धूम रही और पूरे नेटवर्क को कुल 34 अवॉर्ड मिले। आईबीएन7 को दो अवॉर्ड मिले। आईबीएन7 के शो जिंदगी लाइव के लिविंग विद कैंसर एपिसोड को बेस्ट न्यूज टॉक शो का अवॉर्ड मिला। इसके अलावा जिंदगी लाइव के लिए ही बेस्ट न्यूज इनिशिएटिव टेकेन बाइ न्यूज चैनल का अवॉर्ड मिला।

जिंदगी लाइव को छठी बार एनटी बेस्ट न्यूज टॉक शो अवॉर्ड मिला। इसके अलावा cnn-ibn के INDIA AT 9 को बेस्ट डेली न्यूज बुलेटिन का अवॉर्ड मिला। cnn ibn को बेस्ट न्यूज चैनल पैकेजिंग का अवॉर्ड भी मिला है। हमारे सहयोगी वेबसाइट आईबीएन लाइव को बेस्ट न्यूज वेबसाइट के अवॉर्ड से नवाजा गया है। साभार : आईबीएन

लखनऊ में हवा और जमीन पर लिखने वाले पत्रकारों की भीड़ बढ़ी

लखनऊ। लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही लखनऊ में पत्रकारों की संख्‍या में अचानक इजाफा हो गया है. हवा और जमीन पर लिखने वाले तथा आसमान में खबर दिखाने वाले पत्रकारों की भीड़ कई राजनीतिक दलों के कार्यालयों में दिखने लगी है. ये पत्रकार किसी भी प्रेस कांफ्रेंस (पीसी) में निर्धारित समय से पहले पहुंच जाते हैं तथा कुर्सियों पर जम जाते हैं. राजनीतिक दलों के मीडिया मैनेज करने वाले लोग भी इस भीड़ को देखकर परेशान होते हैं, लेकिन इन लोगों की तथाकथित नाराजगी के डर से कुछ कहते-सुनते नहीं हैं.

सिर्फ राजनीतिक दलों की पीसी तक ही ये सीमित नहीं रहते हैं. ये सीएम की पीसी, होम की पीसी या जहां डग्‍गा मिलने की संभावना हो, वहां सबसे पहले पहुंच जाते हैं. इसके बाद सबसे ज्‍यादा सवाल ये ही लोग पूछते हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि कई ऐसे पत्रकार भी हैं जो कहीं नहीं लिखते पढ़ते हैं, लेकिन वे किसी भी पीसी में सबसे पहले नजर आते हैं ताकि नेता या अधिकारी इनका चेहरा देख ले और ये निकट भविष्‍य में उसका लाभ उठा लें. ट्रांसफर-पोस्टिंग करा के या किसी अन्‍य तरीके से.

एक पत्रकार हैं कई बच्‍चों के भविष्‍य से खिलवाड़ करने वाले अरिंदम चौधरी के मैगजीन के. पता नहीं यह पत्रिका अब छपती भी है या नहीं, लेकिन ये सभी दलों की पीसी, अधिकारियों की पीसी, निर्वाचन की पीसी में मौजूद रहते हैं और सबसे ज्‍यादा सवाल पूछते हैं. इनकी तरह के ही दर्जनों पत्रकार हैं जो कहां लिखते हैं, कहां पढ़ते हैं, किस चैनल पर दिखाते हैं, किसी को भी पता नहीं चलता. हां, पीसी में सबसे आगे रहने की वजह से नेता और अधिकारी इन्‍हीं को पत्रकार समझते हैं. हालांकि इन लोगों की भीड़ से कभी कभी अराजकता जैसी स्थिति बन जाती है.

दो-तीन दिन पहले भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह की पीसी थी. निमंत्रित अखबार और चैनल में काम करने वाले पत्रकारों को ही किया गया था, लेकिन इतनी भीड़ जुट गई कि हॉल में तिल रखने का जगह नहीं रह गया. तथाकथित पत्रकारों में राजनाथ सिंह को अपना चेहरा दिखाने के लिए आगे बैठने की होड़ लग गई. इस तरह की अराजक स्थिति हो गई जैसे मछली बाजार हो. चेहरा दिखाने वाले आगे आते तो चैनल वाले पीछे से चिल्‍लाने लगते. यह अजीब स्थिति भाजपा नेताओं के साथ लिखने पढ़ने वाले पत्रकारों के सामने भी उपस्थित हो गई. खैर, किसी तरह पीसी खत्‍म हुआ तो काम करने वाले निकल कर चले गए, सेटिंग वाले पत्रकार प्रधानी करने के चक्‍कर में भाजपा कार्यालय के आसपास लंबे समय तक मंडराते रहे.

डाल्‍टनगंज के पत्रकार मनोज कुमार की हत्‍या करने वाला शूटर अरेस्‍ट

झारंखड के डाल्‍टनगंज जिले के मेदिनीनगर पुलिस और सदर थाना पुलिस ने संयुक्‍त कार्रवाई में मोहम्‍मदगंज के पत्रकार मनोज कुमार की हत्‍या करने वाले कुख्‍यात शूटर को अरेस्‍ट किया है. मेदिनीनगर थाना के बहलोलवा गांव से शूटर विजय शर्मा उर्फ गुरुजी उर्फ उदय को गिरफ्तार किया गया. वह मोहम्‍मदगंज थाना के गाजीबिहरा का मूल निवासी है. पुलिस ने उसके पास से नाइन एमएम की पिस्‍टल और चार कारतूत बरामद किए हैं.

डीएसपी अजय कुमार ने बताया कि सदर थाना प्रभारी को सूचना मिली थी कि बहलोलवा गांव में कुछ अपराधी किसी घटना को अंजाम देने वाले हैं. इसी की घेरेबंदी के दौरान पुलिस को एक जगह लावारिश हालत में रखा ढाई सौ लीटर अवैध शराब मिला. पुलिस शराब को बहा ही रही थी कि कुछ लोग गांव से निकलकर जंगल की तरफ भागते दिखे. सुरक्षा बल के जवानों से इनमें से एक को पकड़ लिया. पूछताछ में उसने अपना नाम विजय शर्मा बताया तथा कई हत्‍याओं में वांछित निकला.

शूटर विजय शर्मा ने पुलिस के सामने कबूल किया कि मुहम्‍मदगंज के पत्रकार मनोज कुमार समेत आठ लोगों की हत्‍या उसने की है. गौरतलब है कि पत्रकार मनोज कुमार की हत्‍या 24 अक्‍टूबर 2009 में उनके घर के पास ही गोली मारकर कर दी गई थी. इस हत्‍याकांड में मनोज कुमार का भांजा अमित कुमार उर्फ छोटू गवाह था. हत्‍यारों ने बाद में उसकी भी हत्‍या गोली मारकर कर दी थी. छोटू का शव कायल नदी के बालू में गड़ा मिला था. पुलिस ने छोटू की हत्‍या में नवनीत और सोनू नाम के युवकों को गिरफ्तार किया था.

विजय वर्मा ने पुलिस को बताया कि पत्रकार मनोज की हत्‍या गांव के ही राजू सिंह और प्रेम सिंह के कहने पर की थी. उसकी मनोज से व्‍यक्तिगत रंजिश नहीं थी. बताया जा रहा है कि पुलिस उससे और सच उगलवाने की कोशिश कर रही है. संभावना है कि जल्‍द ही राजू सिंह और प्रेम सिंह को गिरफ्तार कर छोटू की हत्‍या का भी खुलासा किया जाएगा.

अरे! ये आपदा पीडि़त या भिखारी नहीं, पत्रकार हैं भाई

लखनऊ। अगर आपको लग रहा है कि नीचे के फोटो में सामान के लिए मारामारी करती भीड़ उत्‍तराखंड आपदा की है, या फिर ये लोग बाढ़ पीडि़त हैं या गरीब और भिखारी तबके के लोग हैं, तो आप बिल्‍कुल गलत सोच रहे हैं. ये ना तो भिखारी हैं और ना ही आपदाग्रस्‍त इलाकों के लोग. ये लोग देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी की राजधानी लखनऊ के बड़े बड़े पत्रकार हैं. जी हां, पत्रकार. चौंकिए नहीं, ऐसे दृश्‍य आए दिन लखनऊ की सरजमीं पर नुमाया होते रहते हैं.

खैर, हम आपको बताते हैं पत्रकारों की इस जुझारू दृश्‍य की असली कहानी. लखनऊ में शनिवार को योग गुरु बाबा रामदेव की प्रेस कांफ्रेंस थी. कई पत्रकार पहुंचे थे. कुछ बुलाए, कुछ बिन बुलाए. कुछ जमीन पर लिखने वाले, कुछ हवा में लिखने वाले. बाबा की पीसी खत्‍म होने के बाद पत्रकारों को उनकी तरफ से एक झोले में कुछ गिफ्ट दिया जाने लगा, जिसे पत्रकारों की भाषा में डग्‍गा कहा जाता है. बस फिर क्‍या था, पहले आप-पहले आप वाले लखनऊ की सरजमीं पर पहले मैं-पहले मैं शुरू हो गया. मीडियाकर्मी डग्गा पाने के लिए एक दूसरे पर टूट पड़े.

डग्गे के लिए एक दूसरे से छीना-झपटी होने लगी. धक्‍का-मुक्‍की होने लगी. अबे तेरी-तबे तेरी होने लगी. आयोजक पत्रकारों का यह रूप से देखकर हंसने लगे. बांटने वाले परेशान हो गए. कुछ पत्रकार दो-दो तीन-तीन बार डग्गा पाने के लिए संघर्ष करते नजर आए. क्‍या सीनियर क्‍या जूनियर. डग्गे के लिए सारी सीमाएं टूट गईं. सारे दीवार ढहा दिए गए. बाढ़ पीडितों, आपदा पीडितों की तरह लूट मच गई. कहीं भी नहीं दिखा कि ये समाज के पढ़े लिखे तबके के लोग हैं. डग्गे के चक्‍कर में अंधे बन गए.

हालांकि कुछ पत्रकार बंधु शर्म की दीवारों के पीछे रह गए और डग्गा पाने से चूक गए. हालांकि मन उनका भी मसोस कर रह गया, लेकिन करें तो क्‍या करें. पत्रकारों ने इस तरह की हरकत पहली बार नहीं की है. ऐसी हरकत अभी कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के एक कार्यक्रम में भी हो चुका है. मोबाइल और कुछ कैश पाने के लिए पत्रकार सारी सीमाओं को तोड़ते नजर आए. क्‍यां पुराने पत्रकार क्‍या नए पत्रकार, सबके सब बस डग्‍गा पाने का प्रयास करते दिखे. वैसे लखनऊ में आजकल पत्रकारों की भीड़ भी बढ़ गई है.

जनसंदेश टाइम्‍स की हालत पतली, तीन दिन बंद रही सीयूजी की आउटगोइंग

बनारस। जनसंदेश टाइम्‍स की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है. प्रबंधन ने डाक्‍टर बदला, इलाज बदला, फिर भी इस अखबार की सांसें उखड़ती जा रही हैं. कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है. ताजा सूचना है कि अखबार के उपर मोबाइल फोन का लाखों रुपए बकाया होने और पेमेंट न करने के कारण कंपनी की सीयूजी मोबाइल की आउटगोइंग तीन दिन तक बंद रही. किसी तरह पैसा जमा कराकर प्रबंधन ने रविवार से आउटगोइंग शुरू कराया है.

जब धूम धड़ाके के साथ जनसंदेश टाइम्‍स की लांचिंग हुई थी, तब कंपनी ने अधिकांश मीडियाकर्मियों को सीयूजी नंबर उपलब्‍ध करवाया था. पत्रकारों को एक तय सीमा तक कॉल करने की छूट थी. इससे ऊपर पैसा खर्च होने पर पत्रकारों की सैलरी से कटती थी. अब तक पत्रकारों का सीयूजी नंबर ठीक ढंग से काम कर रहा था. पर खबर है कि बीते 27 मार्च से मोबाइल कंपनी ने सभी सीयूजी नंबरों की आउटगोइंग सुविधा बंद कर दी है. सभी के नंबर पर मैसेज भी भेज दिया गया कि बिल पेमेंट नहीं होने के कारण आउटगो‍इंग सुविधा बंद की जाती है.

और यह केवल बनारस यूनिट का ही हाल नहीं है बल्कि सारे यूनिटों के सीयूजी नंबर का था. कंपनी की मु‍फलिसी का आलम यह है कि बनारस के कर्मचारियों को होली पर भी वेतन नसीब नहीं हुआ. काफी हो हल्‍ला के बाद कर्मचारियों को थोड़ी-बहुत नकदी देकर शांत किया गया. हालांकि होली फिर भी फीकी रही. अब सैलरी कब मिलेगी इसका भी अता पता नहीं है. इधर तेजी से चर्चा भी उड़ने लगी है कि जनसंदेश टाइम्‍स चुनाव बाद केवल फाइल काफी के रूप में ही छपेगा. कर्मचारी इससे काफी सहमे हुए हैं.

अखबार के कर्मचारियों का कहना है कि ये हालत तब से और ज्‍यादा बिगड़े हैं, जबसे आरपी सिंह को सीईओ बनाकर लाया गया है. उनके सुधार कार्यक्रम अखबार के साथ कर्मचारियों के सेहत को भी बिगाड़ रहा है. उन्‍होंने कई जिलों के ब्‍यूरो बंद कराए, कई लोगों को बेरोजगार किया उसके बावजूद कंपनी और अखबार की हालत में सकारात्‍मक बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है. कर्मियों का कहना है कि कंपनी ने तीन दिन बाद मोबाइल की आउटगोइंग तो शुरू करा दी है, लेकिन यह कब तक चालू रहेगा कहना मुश्किल है. 

The Dirty Corporate world

It is now two month I am roaming for a job in Bangalore. I am still unemployed. People call Bangalore as IT hub, City filled with International companies, but still there are no job opportunities. People all around are greedy. I completed my MCA. I came to Bangalore for a job in a company named “impetus”, but once I reached here I came to know that I lost it. Lost it for asking two days extension while joining.

(Friends there is no values for emotions here…) I was upset for two days later my friend said, you must move on the world won’t stop for you. Then next morning I started searching job through all the job portals, tried calling most of the company HR. my call was disconnected because HR was busy with New Year celebration. I switched off my cellphone. I felt its waste calling. Then I took step 2 by calling my friends who are working in good companies. Even that turned to be waste, they end my call by saying,  I am bit busy call you later. Their call never came back.

Then I texted them saying if there is any vacancy in your company please let me know. There was no response from them. Even friends wants to stay away when you are unemployed. Then I took step 3 by finding jobs through consultancy. I went there, asked for job. They said me, all software company wants candidates with experience. She asked my experience. I was stuck. How do she expect experience when I have just completed my Masters? I said, I don’t have experience. So she said me, ok don’t worry I will process you for BPO. I told her, I have done my Masters. She said me, without experience don’t ever think of getting into Software Company. I asked her what is the criteria for getting into BPO. She said you must have completed your 10th std. and you need to have good communication skill. I asked her then what’s the use of my MASTERS!!! She said its waste. I dint have any question for her. I just came my home back. All my dreams was scattered. I put a question to myself. Then why did I do my MCA!!! Time waste and money waste. For another three days I sat in my home, my financial status was becoming poor. I dint find any other option, went back to consultant. I asked for job in BPO. They fixed appointment with the company for my interview. I was little happy. But after some time they said me while going for the interview. You are not supposed to tell that you are MCA graduate, instead you must tell them that, you have backlogs in MCA or tell due to financial problem in family you discontinued your studies. I asked why? She said me, you are “Over Qualified.” I was shocked. I have heard not Qualified, but this word was new for me. That was my first experience, friends if you study more even then this world has problem with you. You won’t get the job because you have studied more. I don't understand why this world is like this.

Sujoy KR

sujoy.aimit.2011@gmail.com

लॉन्च हुआ ईटीवी न्यूज़ हरियाणा/ हिमाचल प्रदेश

जैसा कि नेटवर्क18 द्वारा पूर्व में घोषणा की गई थी, ईटीवी ग्रुप ने हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लिए नए 24X7 न्यूज़ चैनल को लॉन्च कर दिया। लॉन्चिंग के मौके पर वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास ने कहा कि ये दोनों ही राज्य भारत की राजनीति को प्रतिबिंबित करते हैं। उन्होने कहा कि भले ही हरियाणा और हिमाचल दोनो छोटे राज्य हैं पर यहां के लोगों को राजनीति में बहुत दिलचस्पी है। हिमाचल में भाजपा और कांग्रेस तथा हरियाणा में क्षेत्रीय औऱ राष्ट्रीय दल हैं जिसके चलते राजनीतिक न्यूज़ का स्कोप बहुत है।

गौरतलब है कि इस चुनावी मौसम में ईटीवी द्वारा कई चैनलों की लॉन्चिंग की जा चुकी है। ईटीवी न्यूज़ हरियाणा/ हिमाचल प्रदेश से पहले ग्रुप द्वारा ईटावा न्यूज़ बांग्ला, न्यूज़ कन्नडा भी लॉन्च किए जा चुके हैं।

चैनल जल्दी ही ईटीवी न्यूज़ गुजरात औऱ न्यूज़ उड़िया शुरू करेगा। आने वाले समय में ग्रुप की योजना जम्मू और कश्मीर, असम, तमिलनाड औऱ केरला के लिए भी न्यूज़ चैनल लॉन्च करने की है।
 

दुराचार पीड़ित महिला पत्रकार ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज़ कराया

मिर्जापुर। बलात्कार की शिकार महिला पत्रकार ने शनिवार को सीजेएम न्यायालय में सीआरपीसी की धारा 164 का कलमबंद बयान दर्ज कराया। इसके पहले महिला का पुलिस ने जिला अस्पताल में मेडिकल परीक्षण कराया था। इस मामले में पुलिस ने तीन अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है। जबकि घटना में प्रयुक्त स्कार्पियों को पुलिस ने सीज कर आरोपी अश्विनी तिवारी को जेल भेज दिया। मजिस्ट्रेट को बयान देने के बाद महिला पत्रकार ने बताया कि उसके साथ बुरा हुआ है। घटना में तीन लोग शामिल थे। एक की पहचान वह कर चुकी है, एक फरार है, और तीसरे को सामने आने पर पहचान लेगी।

पुलिस के साथ पीड़िता
पुलिस के साथ पीड़िता
महिला पत्रकार ने इस दौरान पत्रकारों व समाजसेवियों से मदद की गुहार भी लगाई। हालांकि महिला के इस आरोप को कुछ लोग शक की निगाह से देख रहे है। सवाल खड़ा कर कर रहे है कि अगर महिला अपने बहन के साथ थी तो वह घटना के दिन मां अष्टभुजा दर्शन के लिए साथ क्यों नहीं ले गयी। महिला को अगर लोगों ने जबरदस्ती उठाया तो उसके चिखने-चिल्लाने की आवाज किसी को क्यों नहीं सुनाई दी। घटना के दौरान छीना-झपटी और हाथापाई के दौरान महिला के शरीर पर गंभीर चोट के निशान क्यों नहीं मिले। अंधेरे में महिला ने कार का नम्बर कैसे देख लिया।

शनिवार को सुबह महिला के बताएनुसार कार व चालक को आरोपियों के घर से बरामद कर लिया गया। इतना ही नहीं महिला ने जिस युवक का नाम बताया पुलिस ने चालक के संग उसे भी गिरफ्तार कर लिया। लेकिन चश्में के चक्कर में वह कंफ्यूज हो गई। महिला ने चालक को ही असली अभियुक्त बताकर शिनाख्त कर दी। जबकि जिसे वह असली अभियुक्त कहकर नाम बताया वह शिनाख्त के दौरान बच निकला। मजबूरन पुलिस ने उसे छोड़ दिया। अब महिला बयान दे रही है कि घटना के दौरान मैने जो नाम बताया वह आपस इसी नाम से एक-दुसरे को पुकार रहे थे।

फिलहाल पुलिस इन सवालों को गंभीरता से लेकर पीड़िता का बयान दर्ज कराने के बाद मामले की तहकीकात में जुट गई है। महिला पत्रकार उत्तराखंड के रुद्रपुर की निवासी है। वह अपनी छोटी बहन के साथ 24 मार्च को नवरात्रि के अवसर पर विशेष कवरेज के लिए विंध्याचल आई थी। दोनों विंध्याचल में ही एक होटल में रुकी थीं। शुक्रवार को सायंकाल, मां अष्टभुजा के दर्शन के लिए निकली थी। महिला का कहना है कि आरोपियों ने उसे भोर में छोड़ा। पुलिस आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 व संबंधित धाराए दर्ज की है। सूत्र बताते है कि मामला षडयंत्र का हो या अन्य लेकिन कानून के तहत आरोपियों का बचना मुश्किल है।

पुलिस पत्रकार महिला का कलमबंद बयान सोमवार को अवलोकन के लिए खोलेगी। इसके बाद तफ्तीश में जुटेगी। पीड़ित महिला ने कहा है कि आरोपी चाहे जितने भी पहुंच वाले क्यों न हो, वह न्याय मिलने तक संघर्ष करेगी। आरोपियों को जेल भिजवाने व सजा दिलाने के बाद ही चैन से बैठेगी।

 

सुरेश गांधी। संपर्कः sureshgandhi.aajtak@gmail.com
 

कांग्रेस ने पत्रकारों को बंद लिफाफों में नकदी पेश की

इटानगर। अरूणाचल प्रदेश के मीडिया संगठनों ने चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराई है कि कांग्रेस ने पत्रकारों को धन की पेशकश की है। अरूणाचल प्रेस और अरूणाचल प्रदेश यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट ने कल दायर अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि कांग्रेस ने 27 मार्च को राजीव गांधी भवन में पार्टी चुनाव घोषणापत्र जारी करने के दौरान मीडियाकर्मियों को धन की पेशकश की थी।

कार्यक्रम में शरीक हुए मीडियाकर्मियों के अनुसार बंद लिफाफों में नकदी पेश की गई है। पत्रकारों ने लिफाफे में धन देख कर तुरंत उसे लौटा दिया। मीडियाकर्मियों ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मुकुट मिथी और मुख्यमंत्री नबाम तुकी से इसकी शिकायत की तो उन्होंने घटना से अपनी अनभिज्ञता जताई। मुख्य चुनाव अधिकारी चंद्र भूषण कुमार ने मीडिया रिपोर्टों का स्वत: संज्ञान लेते हुए पार्टी से जवाब तलब किया। कुमार ने कहा, हमने रिपोर्ट पर पार्टी से लिखित जवाब मांगा और दो दिन के अंदर जवाब दिल्ली चुनाव आयोग को भेज दिया जाएगा।

क्या कहती हैं राजनेताओं की ग्रहदशा, देखिए 4रीयल न्यूज का नया कार्यक्रम ‘सत्ता का योग’

कुण्डली का छठा, सांतवा, दसवां व ग्यारहवां भाव राजनीति के लिए विचारणीय होते है। जबकि इनमें से सबसे प्रमुख दशम भाव ही होता है। अगर दशमेश उच्च का हो या दशम भाव में कोई ग्रह उच्च का हो तो सत्ता से जुड़ना आसान रहता है। अब जबकि 16वीं लोकसभा चुनाव को मुश्किल से कुछ दिन ही बचे हैं, लोकसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है, ऐसे में कौन बनेगा प्रधानमंत्री इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म होने लगा है। जहां एक ओर कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है, वहीं बीजेपी नरेंद्र मोदी की हवा का भरपूर फायदा उठाने को बेताब है। इसी बीच राजनीतिक हलकों की नई पार्टी "आप" भी इन दोनों पार्टियों के समीकरण को बिगाड़ने की भी पूरी तैयारी कर चुकी है। ऐसे में यह अनुमान लगाना दिलचस्प होता है कि आखिर चुनाव के परिणाम क्या होने वाले है। कौन होगा 7 आरसीआर का प्रबल दावेदार।

इन्हीं सब बातों को मद्देनजर रखते हुए, 4रीयल न्यूज़ के अनुभवी और कर्मठ सीईओ- श्री यशपाल मेहता जी के दिशा निर्देशन में और राजीव निशाना जी के लीडरशिप में 4रीयल न्यूज़ ने कुछ हफ्तों पहले एक खास कार्यक्रम-हर शनिवार रात्रि 09 बजे सत्ता का योग शुरु किया है। सूत्रों की माने तो यह कार्यक्रम दर्शंकों के बीच काफी लोकप्रिय भी हो रहा है। इस कार्यक्रम के माध्यम से हर शनिवार को तीन बड़े राष्ट्रीय नेताओं की कुंडली पर देश के जाने माने ज्योतिषाचार्य और विशेषज्ञों द्वारा बहस कि जाती है कि राजनेताओं की कुंडली की दशा क्या बोलती है।

इस पैनल में जाने-माने धार्मिक गुरु दिपांकर जी, एस्ट्रोलॉजर साईं अमित, मशहूर ज्योतिषी संतोष संतोषी और तंत्र के विशेषज्ञ अतुलनाथ के अलावा हस्तरेखा विशेषज्ञ हरी सिंह हरफूल और जाने-माने मोटीवेटर- राजेश अग्रवाल शामिल हैं।

 

PRESS RELEASE
 

मेरे दिवंगत चाचा को न्याय दिलाने में मेरी मदद कीजिए

प्रिय मित्रों,
         मेरे
चाचा श्री भानु कुमार ओझा जयपुर में पीओपी के ठेकेदार थे। वे दिल के बहुत ही अच्छे इंसान थे। रामपाल के 'हिप्नोटिज़्म'(सम्मोहन) के कारण बरवाला आश्रम में जाने की ज़िद किया करते थे। ये घटना करीब 6 दिन पहले का है। अंतिम बार जब वो आश्रम गए तो 10 दिनों तक उनका फ़ोन बंद आया। मन में शंका हुई तो हम सब उनको ढूंढने आश्रम पहुंचे।

वहां आश्रम वालों ने उनके बारे में कोई जानकारी नहीं दी। किसी तरह रिश्तेदारों ने आश्रम में नाम-दान देकर अंदर जाकर ढूंढा, तो उनका बैग और मोबाइल मिला। बाद में किसी की जानकारी से पता चला कि वो रेलवे स्टेशन पर घायल हालत में पड़े हैं।

जयपुर के हॉस्पिटल में इलाज़ के दौरान और उनके द्वारा बताई हुई कुछ बातों से पता चला कि उनको आश्रम के कुछ 5 लोगों ने बहुत मारा है। उनके शरीर कि लगभग साड़ी हड्डियां तोड़ दी गयीं यहाँ तक कि मुंह में पेंचकस डालकर उनकी ज़बान बंद करने कि भी कोशिश की गयी। उन्हें इस हद तक टॉर्चर किया गया कि उनकी मौत हो गयी अब वो इस दुनिया में नहीं हैं। सारा परिवार सदमें में है।

पुलिस अपनी कार्यवाही ठीक ढंग से करे इसलिए कृपया मुझे उचित कानूनी कार्यवाही के बारे में जानकारी दें क्योंकि बहुत ही काला धंधा हो रहा है आश्रम में। आश्रम चलाने वाले बहुत ही पावरफुल लोग हैं। हरयाणा सरकार भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायी है। मैं, मेरे चाचा और चाचा जैसे मासूम लोगों को न्याय दिलवाने कि प्रार्थना करता हूं।

सादर
महेश कुमार ओझा

Late Bhanu kumar ojha
Add: 32-34 Rajlaxmi nagar,
niwaru road jhotwara
Jaipur Rajasthan-302012

महेश कुमार ओझा (भतीजा) #+918962480642, इमेलः mahesh.ojha301@gmail.com
गणेश कुमार ओझा (अनुज) # +918140416189

अखिलेश बाबू, महिला पत्रकार गैंगरेप कांड में आपकी पुलिस और नेता भी कम दोषी नहीं

यूपी में जंगलराज होने की एक बार फिर पुष्टि हो गई। उत्तराखंड की महिला पत्रकार को लबेरोड स्कार्पियो से अगवा कर, उसके साथ गैंगरेप किया गया। उसके बाद पुलिस ने लीपपोती कर केस को हल्का करने की उससे भी बड़ी शर्मनाक हरकत की। इन सबसे यह साफ हो गया है कि इस जंगलराज में महिलाएं किस कदर असुरक्षित हैं और यूपी की पुलिस अपनी कार्रवाई कितनी जिम्मेदारी से करती है। अगर मामला किसी सत्ताधारी वीआईपी नेता आजम खां के भैंसों के लापता हो जाने सरीखे हो तो नौकरी बचाने के लिए पुलिस अफसरों का कार्य कौशल देखने लायक हो जाता है। पहले तो यूपी के थानों में रिपोर्ट दर्ज कराना ही टेढ़़ी खीर है। अगर किसी तरह रिपोर्ट हो भी जाए तो अपराधियों का साथ देना और उल्टे भुक्तभोगी को परेशान करना पुलिस की आदतों में शुमार हो गया है।

 
चूंकि
शक्तिपीठ धाम विन्ध्याचल में अपहरण और गैंगरेप की शिकार ‘बेचारी महिला’ है और वह भी पत्रकार तो पुलिस के लिए यह ज्यादा गंभीर मसला नहीं बनता। उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर की महिला पत्रकार 24 मार्च को अपनी छोटी बहन के साथ विन्ध्याचलधाम आई थी। यहां वो एक होटल में ठहरी थी। महिला पत्रकार यहां धार्मिक स्थलों की स्टोरी भी तैयार कर रही थी। 27 मार्च को शाम वह अकेले ही अष्टभुजा मंदिर से रात करीब आठ बजे वापस लौट रही थी। तभी सड़क से अगवा करने के बाद उसके साथ गैंगरेप किया गया। शिकायत के बाद भी पुलिस ने काफी हीलाहवाली की। एसपी तक मामला पहुंचने के बाद थाने में मुकदमा दर्ज हो सका।

इतना ही नहीं, केस को हल्का करने के लिए पुलिस ने उसमें भी खेल कर दिया। मुकदमा में गैंगरेप की धारा 376(घ) के साथ आईपीसी की धारा 342 लगाई गई है। विधि विशेषज्ञों के मुताबिक, धारा 342 का मतलब है अपराध की नीयत से किसी को बंधक बनाना। इसमें एक साल की सजा या एक हजार रूपए आर्थिकदंड का प्रावधान है। जबकि अपहरण में धारा 363 या 365 में सात साल जेल की सजा का प्रावधान है। गौरतलब है कि पीड़िता को पहले स्कार्पियो से अगवा कर सूनसान जगह ले जाने के बाद फिर गैंगरेप किया गया। यह मामला साफ-साफ अपहरण का बनता है, बंधक बनाने का नहीं।

लेकिन वाह रे यूपी और वाह रे यूपी की शासन व्यवस्था। यूपी में सत्ता की इसी ‘कार्य कुशलता’ के बल पर सपा के युवराज व टीपू सुल्तान कहे जाने वाले अखिलेश सिंह यादव और उनके पिताश्री सो काल्ड धरतीपुत्र, मुलायम सिंह यादव दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने का ‘मुंगेरी-सपना’ देख रहे हैं। विन्ध्याचल में परदेशी महिला पत्रकार को अगवा करने और गैंगरेप का शिकार बनाने की शर्मनाक घटना को अंजाम देने वाले अपराधी जितने दोषी हैं, उससे ज्यादा दोषी इस मामले में गंदा खेल करने वाले लोग हैं। सूत्रों की मानें तो इस घटना को दबाने, छिपाने और हल्का करने में यहां के कई ‘जनसेवक’ अचानक सक्रिय हो गए हैं। वे अपराधियों को बचाने में जुट गए हैं।

हे यूपी के सत्ताधीशों! अगर प्रभावी कार्रवाई ही करनी है तो सबसे पहले उस अष्टभुजा पुलिस चैकी के सभी पुलिस कर्मियों को बर्खास्त करिए जिस पुलिस चैकी की नाक के नीचे सरेशाम महिला को स्कार्पियो सवार बदमाशों ने उठाया। नक्सल प्रभावित जिला और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अलर्ट की घोषणा के बावजूद इस तरह पुलिस की ढिलाई पर अफसरों को भी दंडित कर जनता की अदालत में खुद को निर्दोष साबित करिए। … और यह भी कि अपराधियों की खुलेआम पैरवी करने वाले अपने विधायक-मंत्रियों पर भी नकेल कसिए।

 

लेखक शिवाशंकर पांडेय इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार हैं।लेखक दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान में रह चुके हैं। अब स्वतंत्र लेखन। संपर्क मोबाइल-09565694757

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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली को राज्य का दर्जा देने हेतु दायर पीआईएल ख़ारिज की

लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर तथा अधिवक्ता प्रतिमा पाण्डेय द्वारा दिल्ली तथा पुदुचेरी को राज्य का दर्जा दिए जाने हेतु अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दायर पीआईएल सुप्रीम कोर्ट ने आज ख़ारिज कर दी।

याचिगण के अधिवक्ता अशोक पाण्डेय की बहस सुनने के बाद चीफ जस्टिस पी. सथाशिवम, जस्टिस रंजन गोगोई तथा जस्टिस एनवी रमना की बेंच ने कहा कि यदि यह मामला किसी दिल्लीवासी द्वारा लाया जाता है तो कोर्ट इसे सुन सकता है।

याचिका में कहा गया था कि भारत का संविधान मात्र राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों की बात करता है। इनके विपरीत संविधान के अनुच्छेद 239ए, 239एए तथा 239एबी ऐसे प्रावधान हैं जो दिल्ली और पुदुचेरी को वस्तुतः राज्य का स्वरुप प्रदान करते हैं। इन केंद्रशासित प्रदेशों के लिए मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल तथा विधान सभा की व्यवस्था की गयी है, लेकिन राज्यों के विपरीत इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है पर वे उपराज्यपाल को सहायता और सलाह देते हैं।

इससे एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हुई है जो इन्हें व्यवहार में राज्य और कानूनन केंद्रशासित प्रदेश बना देती हैं। केशवानंद भारती केस (1973) तथा कुलदीप नायर केस (2006) में स्थापित संविधान के संघवाद के मौलिक ढाँचे के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए याचीगण ने संविधान के अनुच्छेद 239ए, 239एए तथा 239एबी को रद्द किये जाने तथा दिल्ली एवं पुदुचेरी को राज्य सूची में रखे जाने का निवेदन किया था।

लिबरेशन में दीपांकर जैसा सोचने वालों की संख्या अधिक ही नहीं, बल्कि प्रभावी नियंत्रण में भी है

: सीपीआई एमएल-लिबरेशन : पार्टी कार्यक्रम और पार्टी ढांचे में बदलाव पर एक रिपोर्ट : गंगानगर कदवा, भागलपुर में किए गए सर्वेक्षण पर आधारित : बिहार में भूमि आन्दोलन का इतिहास बहुत ही पुराना रहा है। झारखंड को अलग करके भी इस इतिहास को लिखा जाय तब भी यह पौराणिक अख्यानों से जाकर मिलता है। असुर लोगों का प्रतिरोध संघर्ष से लेकर अंग्रेजों की सत्ता के साथ सीधी भीड़ंत करने का सिलसिला कभी खत्म नहीं हुआ। इसका एक बड़ा कारण नदी की बहुलता और जमीन का उपजाऊपन के साथ साथ खनिज और वन संपदा की प्रचुरता भी रही है।

आज का भूमि आंदोलन जिस विरासत को लिए हुए हमारे तक आया है वह 1930 के दशक में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बना। यह आंदोलन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़ गया और इसके साथ साथ राहुल सांस्कृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि का नाम भी जुड़ जाता है। किसान सभा के साथ बड़ी संख्या में किसान जुड़े और जमींदारों के खिलाफ इज्जत, मजदूरी से लेकर भूमि दखल का आंदोलन चलाया।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस के साथ साथ चलने की नीति के चलते जमीन बचाने की गरज से जमींदार भी इसके सदस्य बनने लगे। यहां याद करना जरूरी है कि गांधी की नीति संश्रय यानी मजदूर-किसान-जमींदार और मजदूर-पूंजीपति के बीच दोस्ताना संबंध बनाये रखने की थी। इसका असर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी पर भी था। यह संबंध 1942 के बाद और गाढ़ा हो गया। 1947-54 के बीच जरूर एक तनातनी का माहौल था और तेलगांना के असर में देश का ग्रामीण हिस्सा ऊबाल लेने के लिए बेचैन बना रहा। लेकिन नेतृत्व की अवसरवादी और समर्पणवादी राजनीति ने इसे दबा दिया और आगे पूरी पार्टी को संसदीय दलदल में फंसाने की ओर ले गया। नेतृत्व का मार्क्सवाद से यह विचलन पार्टी में घुस आये निम्नपूंजीपतियों के साथ साथ जमींदारों की वजह से भी हुआ।

नेतृत्व के स्तर पर 1962-64 में टूट करने वाले सीपीएम ने उपरोक्त वर्गीय संरचना को बनाए रखा और नीचे अपनी जमीन तैयार करने के लिए जमीन-कब्जा का कथित आंदोलन चलाने का नारा दिया। इस पार्टी का कार्यक्रम लगभग वही रहा जो सीपीआई का था। दरअसल, टूट का कारण भी अमृत पाद डांगे की अंग्रेजों के जमाने में जारी की चिट्ठी थी जिसके बारे में लंबे समय तक विवाद बना रहा। लाल झंडा के इन नये झंडाबरदारों की चिंता चुनाव में जीतकर सत्ता में आने की थी। पार्टी के किसान कार्यकर्ता जमीन के सवाल पर एकजुट होने के लिए तैयार बैठे थे।

इस पूरे परिदृश्य में जमीन का सवाल गौण था जिसका एक ही नतीजा हो सकता था, जोर जोर का नारा और सिर्फ नारा। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी के नेतृत्व में जमीन का सवाल बेहद नियंत्रित तरीके से चलाया गया जिससे पार्टी में सदस्य जमींदारों की जमीन बची रहे और पार्टी से जुड़े कुछ प्रभावी लोगों को जमीन हासिल हो सके। इसका परिणाम पं बंगाल में हम देख सकते हैं जहां पार्टी के भीतर ही न केवल नये भू-स्वामियों की कतार खड़ी हो गई बल्कि खुद पार्टी ही एक विशाल कारपोरेट में बदलती गई और किसानों-आदिवासीयों की जमीन कब्जाने के खूनी अभियान में शामिल हो गई।

उस दौर में बिहार में छिटपुट जमीन कब्जाने का अभियान चला। यह मुख्यतः स्थानीय प्रयासों का ही परिणाम था। शायद यही कारण है जिसकी वजह से बिहार में सीपीआई और सीपीएम का प्रभाव उतना ही दूर तक बना रहा जितना पहले तक था। नेतृत्व के स्तर पर वैचारिक संघर्ष और जमीन काम को संगठित करने की चिंता और प्रयास कभी भी खत्म नहीं हुआ। यह पक्ष 1964 के बाद के दौर में ताकतवर बनकर सामने आ गया। इसका एक कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘महान बहस’ भी था जिसकी अनुगूंज ‘चीन का रास्ता हमारा रास्ता’ के सूत्रीकरण में सामने आया।

नक्सलबाड़ी ने भूमि और किसान मुक्ति के सवाल को भारतीय क्रांति का केंद्रीय सवाल बना दिया। वामपंथ की बनी चली आ रही किलेबंद स्वर्ग पर यह एक धावा था जिसका नेतृत्व आदिवासी, दलित, भूमिहीन, किसान, मजूदर, महिला और छात्र कर रहे थे। यह भाकपा, माकपा का वर्गीय चिंतन ही था जिसने इन आंदोलन को ‘लंपट, अराजक और हिंसक’ की उपाधि दिया। यही वह चिंतन था जिस पर सवार होकर भाकपा और माकपा कांग्रेस से लेकर संघ तक के बगलगीर हुए और जमींदारों और कारपोरेट घरानों के लिए जन आंदोलन पर गोली चलाने से भी नहीं हिचके। 1967 के नक्सलबाड़ी की धारा के प्रवाह में जितनी तेजी थी उतना ही फैलाव भी था। बिहार में यह मुजफ्फरपुर के मुसहरी और भोजपुर में इज्जत, मजदूरी और जमीन के नारे के साथ उपस्थित हुआ और यह पूरे बिहार का केंद्रीय सवाल बन गया जिसे सुलझाने का सिलसिला आज भी जारी है। इस सुलझाने के क्रम और दृष्टिकोण के फर्क ने बड़े पैमाने पर टूट-फूट और विलगाव को जन्म दिया और साथ साथ ही साथ एकता और संघर्ष संगठित करने का एक मजबूत जमीन भी तैयार किया।

मैं भागलपुर के जिन इलाकों गंगानगर कदवा, नवगछिया के खैरपुर कदवा और कदवा दियारा पंचायत के गांवों की बात करने जा रहा हूं, वे उपरोक्त इतिहास का हिस्सा हैं और आज आंदोलन के ठहराव और उसे तोड़कर आगे बढ़ने की चुनौती से जूझ रहे हैं। भागलपुर जिला मुख्यालय से गंगा और फिर कोसी को पार करने के बाद नवगछिया का ये  इलाका आता है। कहते हैं कि वहां कोसी का कहर और जमींदारों का कहर एक जैसा ही कदमताल करते हैं। गंगानगर और नवगछिया दोनों ही पंचायत की जमीनों पर तेतरी और पकरा के भूमिहार जमींदार, पूनामा के राजपूत जमींदार और खरीक प्रखंड के कवरैत मंडल यानी पिछड़ी जाति के जमींदारों का कब्जा था। इन इलाके की जमीन पर खेती करने के लिए जमींदारों ने बाहर से बड़े पैमाने पर भूमिहीन किसानों का लाकर बसाया। इन बसवाट से कई गांव अस्तित्व में आए।

ये भूमिहीन किसान अतिपिछड़ा, पिछड़ा और दलित समुदाय से आते हैं। 1960 के दशक में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भूमि पर कब्जा करने का नारा दिया और यहां भी गोलबंदी तेज हुई तब बहुत से जमींदार अपनी जमीन को कम दाम पर बेचना शुरू कर दिया। इसकी वजह से बहुत से बटाईदारों को जमीन हासिल हो गया। इससे भाकपा को एक चुनावी वोट का आधार बना। इस इलाके से भाकपा के उम्मीदार को जीत मिलनी शुरू हो गई। माकपा के दौर में कुछ और बटाईदारों को फायदा मिला और बदले में उन्हें चुनावी फायदा पहुंचा। नक्सलबाड़ी ने नियंत्रित जमीन कब्जेदारी और चंद लोगों को फायदा देने की राजनीति पर ही हमला किया जिसकी वजह भूमि आंदोलन एक व्यापक आंदोलन में बदल गया। इस आंदोलन के प्रथम शहीद महेंद्र पंडित थे जिन्होंने जमींदारों के खिलाफ लड़ते हुए नक्सलबाड़ी की धारा को अमिट बना दिया।

नवगछिया, भागलपुर में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, माले-लिबरेशन यानी जिसे संक्षेप में लिबरेशन के नाम से जाना जाता है, ने 1980 के दशक में कार्य करना प्रारंभ किया। उस समय तक नवगछिया प्रखंड कदवा दियारा इलाके में जमींदारों का एक हिस्सा  जमीन बेचकर वहां से निकल चुका था। बटाईदारों के एक हिस्से के पास कुछ जमीन आ चुकी थी। एक बड़े हिस्से में जमींदार और बटाईदारों के बीच आपसी सहमति बनाकर खेती का काम चल रहा था। लिबरेशन ने बटाईदारों को जमीन मुक्ति के लिए संगठित करना शुरू कर दिया। खरीक प्रखंड के लोकमानपुर गांव में सरोज मंडल और सत्यनारायन मंडल के पास क्रमश: 70 बीघा और 100 बीघा जमीन थी। बटाईदार इन जमींदारों के दबाव को मानने से इन्कार कर रहे थे। गुरुथान कदवा में किसानों ने इनकी जमीन एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर फसल का हिस्सा जमींदार को देने से मना कर दिया और खुद को भाकपा, माले-लिबरेशन में संगठित कर लिया। 1982 में जमींदारों ने अपराधियों के साथ सांठ-गांठ कर बटाईदारों की जमीन पर कब्जा करने लिए हमला किया। इस हमले में प्रशासन ने भी उनका खुलकर साथ दिया।

इस हमले में नन्दग्राम कदवा के लिबरेशन से जुड़े कार्यकर्ता गंगा मंडल शहीद हो गये। किसानों के सहयोग से भाकपा-माले-लिबरेशन जमीन पर कब्जा बनाए रखा लेकिन इस मामले को वह कोर्ट में भी ले जाया गया। कानूनी लड़ाई के दौरान जमीन पर वास्तविक कब्जा किसानों के हाथ से निकलकर पार्टी के पास आ गई। इस हालात का फायदा उठाने के लिए जमींदार ने इस जमीन को बेचने का प्रयास किया। इस जमीन को बचाने के लिए भाकपा, माले-लिबरेशन ने अंततः 1990 में अपने कार्यकर्ताओं के बीच वितरित कर वहां एक गांव बसाने का फैसला लिया। इस जमीन मुक्ति आंदोलन में शहीद हुए साथी गंगा मंडल के नाम पर ही इस गांव का नाम गंगा नगर रखा गया।

इस गांव की जमीन का वितरण निम्न प्रकार हुआ: पार्टी से जुड़े नेता/कार्यकर्ता को तीन कट्ठा, आम भूमिहीन इस संघर्ष में सक्रिय किसानों को डेढ़ कट्ठा। आम भूमिहीन किसानों को इसके बदले प्रति एक हजार रूपये पार्टी को देना अनिवार्य था। पार्टी कार्यकर्ता व नेता इस अनिवार्यता से मुक्त थे। जिन बटाईदारों ने जमीन मुक्ति के संघर्ष को शुरू किया और उसे अंत तक ले जाने में आगे डटे रहे, उन्हें भी डेढ़ कट्ठा जमीन एक हजार रूपये के बदले दिया गया। यहां बसे लोगों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जिनके पास दूसरे गांव में भी जमीन थी। मध्य बिहार के अपने प्रयोगों को लिबरेशन ने यहां नहीं दुहराया जिसके तहत वह जमीन को सीधा अपने कब्जे में रखती है और किसानों से बटाईदारी कराते हुए उनसे 50 प्रतिशत यानी अधिया ले लेती है। यहां जमीन वितरण मुख्यतः पार्टी कार्यकर्ता और नेता के बीच किया गया जिसके बदले में वे पार्टी से जुड़े रहें और नियमित फंड व पार्टी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करते रहें। लेकिन इस प्रयोग में दिक्कतें आईं। जैसे जैसे जमीन पर मालिकाना पुख्ता हुआ वैसे वैसे पार्टी से दूरी का निर्माण भी होता गया। गांव जातिगत स्तर पर गंगोता मंडल और कुशवाहा जाति के गुट बनने शुरू हो गये। इस गुटबंदी ने ‘अपराधियों’ का गठजोड़ किया जिससे उनका दबदबा बना रहे। इस गांव में अपराधियों का जमावड़ा तेजी से बढ़ा।

लिबरेशन के एक नेता द्वारा यौन उत्पीड़न का मामला भी सामने आया। 2012 में इस गांव को सरकारी कागजात में दर्ज कर दिया गया। प्रखंड कार्यालय के कर्मचारियों के साथ भाकपा, माले-लिबरेशन के नेता ताल-मेल कर किसानों से घूस खाने से लेकर गांव की जमीन पर कब्जा करने तक के काम में मशगूल रहे। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि 2006 में 80 परिवार से बसे गांव में लिबरेशन के कुल 11 परिवार थे जो 2012 में 30 हो गये। गांव में चल रही राजनीति और जमीन और पैसे की लूट का मसला पार्टी के भीतर विवाद को जन्म दिया लेकिन मसला हल होने की बजाय बिगड़ता गया। इसके चलते यहां से लिबरेशन के पक्ष में पड़ने वाले वोटों की संख्या भी गिरती गई। पंचायती चुनाव में इस गांव का लिबरेशन के पक्ष में पूरे के पूरे वोट पड़ते थे, अब बमुश्किल कभी 10 और कभी 50 वोट पड़ते हैं।

भाकपा, माले-लिबरेशन द्वारा बसाये गये इस गांव की कहानी इसी गांव तक सीमित रहती, तब यह एक आम अवधारणा बनाने का विषय वस्तु नहीं बन सकता था। यह एक अपवाद रहता। लेकिन यह स्थिति आम है। बिहार विधान सभा के 1990 से 2010 के बीच कुल पांच चुनाव में क्रमश: 7, 6, 5, 5, 0 सीटें रहीं। इस हालात को कैसे समझा जाय और इसे किस तरह विश्लेषित किया जाय! यदि जमीन का मसला सीधा वोट से जुड़ा होता तो जनता दल या समता दल या भाजपा, कांग्रेस जैसी पार्टियों को एक भी सीट न निकलता। ये पार्टियां स्थानीय और देश स्तर पर बड़ी पूंजी और जमींदारों के साथ जुड़ी हुई हैं। इन्हें विश्व बैंक से लेकर अमेरीका तक से सीधा सहयोग प्राप्त है।

विधायिका की पूरी व्यवस्था ही ऐसे बनायी गई है जिसमें ‘जनाधार’ मुख्य मसला ही नहीं रहता। यहां मुख्य मसला जनता को ओपीनियन बनाने के द्वारा वोट कैसे लिया जाय, मुख्य रहता है। लिबरेशन जैसी पार्टी के लिए मुख्य मसला ‘जनाधार’ का होता है क्योंकि चुनाव ‘क्रांति की एक कार्यनीति’ है और इसके द्वारा विधान सभा या संसद में पहुंच कर जोरशोर से जनता की आवाज को बुलंद करना होता है और ‘बुर्जुआ व्यवस्था’ का पोल खोल देना होता है। दोनों ही जगहों पर सीट हासिल होने पर न तो जनता की आवाज बुलंद हुई और न ही पोल-खोल संपन्न हुआ।

जमीन मुक्ति की लड़ाई का एक अहम हिस्सा जनता को जन-सत्ता से मजबूत करना रहा है। जन-सत्ता निर्माण के लिए जन मिलिशिया और जनसेना की जरूरत होती है। जमीन मुक्ति की लड़ाई कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चलती है जो जनसंगठन और संयुक्त मोर्चा के द्वारा अपनी ताकत का विस्तार करते हुए जनक्रांति को आगे ले जाती है। यह पूरी प्रक्रिया पार्टी, जनसेना, संयुक्तमोर्चा के तत्वाधान में चलता है। इस निर्माण की प्रक्रिया में कई सारे चरण होते हैं। जहां पार्टी नेतृत्व नहीं होता है वहां किसान/आदिवासी लगभग यही प्रक्रिया दोहराते हैं। वे भी मिलिशिया, नेतृत्वकारी कमेटी, ग्राम समाज आदि का निर्माण करते हुए संघर्ष को आगे ले जाते हैं। देश के बहुत से हिस्सों वर्तमान में भी इस तरह के प्रयोगों को देखा जा सकता है। ऐसे आंदोलनों में एनजीओ और संसदीय पार्टियां घुसपैठ कर सबसे पहले ग्राम समाज या ऐसी ही कमेटियों में घुसैपठ करते हैं, फिर अहिंसा का पाठ पढ़ाते हैं और अंत में उन्हें कानूनी दायरे में लाकर अपना मोहताज बना देते हैं। ऐसे प्रयोग को भी हम देख सकते हैं।

भाकपा, माले-लिबरेशन जमीन मुक्ति की लड़ाई को जमीन कब्जेदारी की लड़ाई तक सीमित रखा। इसके चलते जमीन मुख्यतः या तो पार्टी के सीधे नियंत्रण में रही या पार्टी कार्यकर्ता/नेतृत्व के हाथ में रहा। इसके चलते पार्टी के भीतर ही जमीन से जुड़े स्वार्थ बनने लगे और गुटबंदी, जोड़तोड़े से लेकर भ्रष्टाचार तक के मामले सामने आने लगे। जमीन के मसले पर कानूनी लड़ाई और इस दौरान उस पर कब्जा बनाये रखने के लिए जनता पर भरोसा न कर दबंग लोगों का आसरा लेने के चलते पार्टी के भीतर अवसरवादी और आपराधिक किस्म के लोगों की भी भर्ती हो गई। पार्टी के खर्च के लिए मुख्यतः ऐसी जमीनों के वितरण, ऐसे गांव के किसानों से लेवी वसूली आदि पर निर्भरता की बढ़ने से जमीन मुक्ति का सवाल पीछे रह गया। इस जन-सत्ता, जन-सेना, जन-संगठन और पार्टी और संयुक्त मोर्चा 1985 तक आते आते विनोद मिश्र के ‘मिश्रित समाजवाद’ में फंस गया और क्रांति का केंद्रीय सवाल चुनाव में विधायिका  और पंचायतों की सीट हासिल करने में बदल गया। हालात इस कदर बुरे हो चुके हैं कि न तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व यानी सीसी का नियंत्रण निचली कमेटियों पर है और न निचली कमेटियों और पार्टी विचारधारा का सीसी और महासचिव पर नियंत्रण है।

संयुक्त मोर्चा का अर्थ संसदीय पार्टियों के साथ गठजोड़ करना ही रह गया है। अभी हाल ही यूपीए की सरकार द्वारा जनता पर चलाए जा रहे युद्ध में एक पुलिसकर्मी की मौत को शहीद का दर्जा घोषित करने, उसके नाम पर स्टेडियम व रेलवे स्टेशन बनाने की मांग भाकपा, माले-लिबरेशन के महासचिव दीपांकर ने रखा। क्या इस पार्टी की आधिकारिक पोजीशन है? वह यूपीए द्वारा अपनी ही जनता के खिलाफ लाखों फौज, हेलीकाप्टर और विदेशी सहयोग से छेड़े जाने वाले युद्ध को शहीदाना नजरीये से देखता है! गृहयुद्ध तक ले जाने की चिदम्बरम की मंशा का वह समर्थन करता है? तब क्या यह माना जाय कि वह जनता के प्रतिरोध, नक्सलबाड़ी की धारा से खुद को अलग कर लिया है? जाहिर सी बात है कि लिबरेशन के भीतर ऐसा नहीं मानने वालों की संख्या काफी अधिक है लेकिन यह भी सच है कि दीपांकर जैसा सोचने वालों की संख्या अधिक ही नहीं बल्कि प्रभावी नियंत्रण में भी हैं। यह सिर्फ चुनाव के दबाव की वजह से ही नहीं है। 1980 से 2010 तक के बीच भाकपा, माले-लिबरेशन की पार्टी संरचना, जनाधार, कार्यक्रम और कार्यनीति, विचारधारा और नेतृत्व में वर्गीय स्तर पर बदलाव आया है। लिबरेशन और उनके नेताओं की कारगुजारियों को इस नजरिये से देखने पर हम क्रांतिकारी राजनीति के सामने खड़ी चुनौतियों को भी हम साफ साफ देख सकते हैं और अपनी रणनीति भी तय कर सकते हैं। माओ के शब्दों की गाड़ी तो पलट चुकी है, मसला है इससे सबक सीखने का। लिबरेशन से सबक सीखना जरूरी है। जनता की मुक्ति के लिए यह सबक हमें जरूर साथ रखकर चलना होगा।

लेखक रूपेश कुमार छात्र जीवन में आइसा से जुड़े. भागलपुर में छात्र आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के बाद इंकलाबी नौजवान सभा के अध्यक्ष बने. इसके बाद उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने का निर्णय लिया. भाकपा, माले-लिबरेशन में 2006-2012 तक जिला कमेटी सदस्य रहे और नौगछिया प्रखंड में पार्टी प्रभारी के तौर पर काम किया. सांगठनिक और राजनीतिक मतभेद के चलते वहां से अलग हो गए. रूपेश ने यह रिपोर्ट लिबरेशन में कार्य के अनुभव और उसकी चुनौतियों के आधार पर तैयार की है. रूपेश से संपर्क singh85.rupesh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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संदेश अखबार, सुरेंद्रनगर (गुजरात) के ब्यूरो चीफ देवजीभाई भरवाड़ पर रिश्वत मांगने का आरोप (सुनें टेप)

गुजरात में एक जिला है सुरेंद्रनगर. यहां संदेश अखबार के ब्यूरो चीफ हैं देवजी भाई भरवाड़. इनका एक आडियो टेप बाहर आया है जिसमें ये रिश्वत मांग रहे हैं. बताया जाता है कि इस साजिश में संदेश अखबार के प्रबंधन के लोग भी शामिल हैं.

पत्रकार द्वारा रिश्वतखोरी की इस घटना के सामने आने से जिले के दूसरे पत्रकारों को भी शर्मिंदा होना पड़ रहा है. यह ऑडियो सुनकर पत्रकारों ने मांग की है कि आरोपी संदेश अखबार के ब्यूरो चीफ देवजीभाई भरवाड़ पर तुरंत कार्यवाही की जाए. कुछ लोगों ने संदेश अखबार की प्रतियां भी जलाई हैं.  आप भी सुनें रिश्वत को लेकर हुई बातचीत. ये पूरा टेप गुजराती भाषा में है..


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(सुनें)

नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल पर कोर्ट आदेश के बाद 358 अनधिकृत लोगों की सुरक्षा हटायी गयी

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर  की सुरक्षाकर्मियों के दुरुपयोग के सम्बन्ध में दायर पीआईएल में दिए आदेश पर राज्य सरकार ने अब तक 358 अनधिकृत लोगों की सुरक्षा हटा ली है. एएसपी सुरक्षा कुमार ज्ञानंजय सिंह द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार बिना जिला सुरक्षा समिति की संस्तुति के प्रदान किये गए 163 लोगों में 150 की सुरक्षा वापस ले ली गयी है.

इसी प्रकार आपराधिक इतिहास वाले 288 लोगों में 72 की सुरक्षा हटाई जा चुकी है और शस्त्र लाइसेंस होने के बाद भी सुरक्षा प्रदान किये  562 लोगों में 136 की सुरक्षा हटाई गयी है. इस सूची में पूर्व सांसद अफजाल अंसारी, कुछ पूर्व विधायकों के अलावा ज्यादातर समाजवादी पार्टी के पदाधिकारी एवं सदस्य, कुछ प्रॉपर्टी डीलर, ठेकेदार आदि शामिल हैं. बिना नियम के सुरक्षा दिए लोगों पर बकाया 1.82  करोड़ रुपये में 1.73 करोड़ की वसूली हो चुकी है. राज्य सरकार ने मौजूदा लोक सभा चुनावों के दृष्टिगत बचे हुए लोगों की सुरक्षा की समीक्षा करके उन्हें हटाने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय माँगा है.
 

टाटा स्काई, डिश टीवी समेत छह डीटीएच ऑपरेटरों को केंद्र सरकार ने भेजा 2000 करोड़ का नोटिस

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 6 डीटीएच ऑपरेटरों से 2000 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम चुकाने के लिए कहा है। इनमें टाटा स्काई और डिश टीवी भी शामिल हैं। मंत्रालय का कहना है कि लाइसेंस फी के तौर पर उन पर यह रकम बकाया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टाटा स्काई, डिश टीवी, सन डायरेक्ट, एयरटेल डिजिटल टीवी, रिलायंस डिटिजल टीवी और वीडियोकॉन डी2एच को नोटिस भेजकर उनसे 15 दिनों में यह पैसा चुकाने के लिए कहा है। इससे पहले मंत्रालय ने इन 6 ऑपरेटरों के इंडिपेंडेंट ऑडिट का आदेश दिया था। मंत्रालय ने ऑपरेटरों को पैसा देने के लिए 15 दिन की मोहलत दी है।

इसके लिए कैलकुलेशन हर ऑपरेटर के ग्रॉस रेवेन्यू के आधार पर किया गया है। बकाया रकम का कैलकुलेशन ऑपरेटरों को लाइसेंस दिए जाने के दिन से किया गया है। इस शख्स ने बताया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नोटिस भेजने से पहले इस मामले में कानून मंत्रालय की राय ली थी। लाइसेंस फी पेमेंट से जुड़ा यह मामला ऑपरेटरों को सरकार के बीच पिछले कुछ साल से चल रहा है। टेलिकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट एंड अपीलेट ट्राइब्यूनल (टीडीसैट) ने 2010 में आदेश दिया था कि डीटीएच ऑपरेटरों को एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू का 10 पर्सेंट लाइसेंस फी के तौर पर देना चाहिए। इसे मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां यह मामला पेंडिंग है।

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सुब्रत राय को रिहा कराने के लिए सहारा कर्मी जुटाएंगे 5,000 करोड़ रूपये!

सेबी-सहारा विवाद में एक नया मोड़ आया है जिसमें समूह के प्रमुख सुब्रत राय सहारा को दिल्ली की तिहाड़ जेल से छुड़वाने के लिए 5,000 करोड़ रूपये की राशि जुटाने के लिए समूह के कर्मचारियों तथा शुभचिंतकों से एक एक लाख रूपये की राशि प्राप्त करने का आज एक अनूठा उपाय सुझाया गया. इस प्रस्ताव के तहत मनोरंजन से खुदरा कारोबार क्षेत्र में कार्यरत सहारा समूह के कर्मचारियों को उनके इस योगदान के लिए सहारायिन ए-मल्टीपरपज सोसायटी लि. के शेयर दिए जाने की बात है. सहारा समूह का दावा है कि उसके 11 लाख वेतनभोगी व फील्ड कर्मचारी है.

इस योगदान की अपील इस सोसाइटी के निदेशकों और समूह के ‘एसोसिएट्स’ के हस्ताक्षरों के साथ जारी एक पृष्ट के पत्र के जरिये की गई है. इसमें सहारा इंडिया परिवार के कर्मचारियों और अन्य शुभचिंतकों से अपनी इच्छा व क्षमता के अनुसार 1, 2, 3 लाख रूपये या उससे अधिक की राशि का योगदान करने का आग्रह किया गया है. इस बारे में संपर्क किए जाने पर सहारा के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह पत्र सुब्रत राय या प्रबंधन द्वारा जारी नहीं किया गया है. यह मौजूदा स्थिति के मद्देनजर लोगों की भावनात्मक पहल है.

अधिकारी ने कहा कि यह नहीं समझा जाना चाहिए कि सहारा समूह या प्रबंधन अपने कर्मचारियों से योगदान के लिए कह रहा है. ‘‘सहाराश्री ने इस संगठन का निर्माण परिवार के रूप में किया है. ऐसे में देशभर में बड़ी संख्या में पत्र आ रहे हैं. उम्मीद है कि हमारे मुख्य अभिभावक के प्रति इस भावना को समझा जाएगा.’’

उच्चतम न्यायालय के आदेश पर सुब्रत राय (65) गत 4 मार्च से तिहाड़ जेल में बंद हैं. न्यायालय ने राय को अंतरिम जमानत देने के लिए समूह को पहले 10,000 करोड़ रूपये जमा कराने को कहा है. इसमें 5,000 करोड़ रूपये बैंक गारंटी के रूप में होंगे. हालांकि समूह के वकीलों ने कल अदालत को बताया कि राय और दो अन्य निदेशकांे की रिहाई के लिए इतनी बड़ी राशि जुटाना समूह के लिए मुश्किल हो रहा है. इन वकीलों ने यह भी कहा कि शीर्ष अदालत का निवेशकांे का 20,000 करोड़ रूपये सेबी के पास नहीं जमा कराने के लिए राय को जेल भेजने का आदेश गैरकानूनी व असंवैधानिक है. राय और समूह की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ की पीठ से कहा कि उसका रख पक्षपातपूर्ण है और इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई इसी पीठ को नहीं करनी चाहिए.

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मोदी को धमकी देने वाले मसूद गिरफ्तार, राहुल की रैली रद्द

उत्तर प्रदेश में सहारनपुर संसदीय सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद की शनिवार तड़के हुई गिरफ्तारी के बाद पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सहारनपुर रैली रद्द कर दी गई है। राहुल की शनिवार को सहारनपुर, गाजियाबाद और मुरादाबाद में जनसभाएं होनी थी, लेकिन मसूद की गिरफ्तारी के बाद उनकी सहारनपुर रैली स्थगित कर दी गई है। राहुल की बाकी दोनों रैलियां तय समय पर ही होंगी।

अपने इस भाषण में मसूद ने नरेंद्र मोदी की बोटी-बोटी अलग कर देने की बात कही थी। इस मामले में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी और इस बयान के लिए मसूद के खिलाफ कार्रवाई की मांग हो रही थी। पुलिस ने बताया कि मसूद को आज सुबह गिरफ्तार किया गया। मसूद सहारनपुर से कांग्रेस के लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी हैं। पार्टी ने उनकी टिप्पणी से यह कहते हुए दूरी बना ली थी कि वह हिंसा को अस्वीकार करती है, चाहे वह शाब्दिक हो या कुछ और। वहीं, भाजपा ने इस टिप्पणी को भड़काउ करार देते हुए विवाद में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को घसीट लिया था।
   
सहारनपुर में एक चुनावी रैली के दौरान के वीडियो फुटेज में मसूद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते दिखाई देते हैं। इस वीडियो के वेब पर सामने आने के बाद हंगामा मच गया था। उन्होंने कहा था कि यदि नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने की कोशिश करते हैं, तो हम उनकी बोटी-बोटी कर देंगे, मैं मोदी के खिलाफ लड़ूंगा। वह सोचते हैं कि उत्तर प्रदेश गुजरात है। गुजरात में केवल चार प्रतिशत मुसलमान हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 42 प्रतिशत मुसलमान हैं।

मसूद ने बाद में यह कहकर माफी मांग ली थी कि, मुझे अपने शब्दों के इस्तेमाल में सावधानी बरतनी चाहिए थी और उन्होंने ऐसी बात चुनावी आवेश आकर में कह दी। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिरीक्षक (कानून एवं व्यवस्था) अमरेंद्र सेंगर ने कहा कि मसूद के खिलाफ सहारनपुर के देवबंद थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। सेंगर ने लखनऊ में संवाददाताओं को बताया कि कांग्रेस प्रत्यशी के खिलाफ जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 125 (चुनाव के संबंध में वर्गों के बीच वैमनस्य बढ़ाने) तथा भादंसं की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। इससे पहले चुनाव आयोग ने भी मसूद के अभद्र भाषण पर कड़ा रुख दिखाते हुए इस पूरे घटनाक्रम की जांच का आदेश दिया था। जिला पुलिस ने देवबंद थाने में मसूद के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153 (ए), 295 (ए), 504, 506 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125 तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिनियम की धारा 3 (1)(1) के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

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पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार, विश्लेषक और लेखक रजा रूमी पर हमला, चालक की मौत

लाहौर से खबर है कि दो अज्ञात बंदूकधारियों ने आज पाकिस्तान के वरिष्ठ विश्लेषक और लेखक रजा रूमी पर गोलियां चला दीं जिसमें उनके चालक की मौत हो गई और सुरक्षाकर्मी घायल हो गया. लाहौर पुलिस के प्रवक्ता नियाब हैदर ने कहा कि मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने गार्डन टाउन के राजा बाजार में रूमी की कार रोकी और गोलियां चलाना शुरू कर दिया. रूमी को नुकसान नहीं पहुंचा लेकिन उनके चालक मुस्तफा और अंगरक्षक अनवर को छर्रे लगे.

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अमर उजाला से ए. खान, कमल और दिव्य का इस्तीफा, शीतल अक्षय व भंवर पुष्पेंद्र की नई पारी

अमर उजाला, देहरादून की मार्केटिंग टीम में एजुकेशन हेड अब्दुल्लाह खान के बारे में सूचना है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने नई पारी की शुरुआत हिंदुस्तान, कानपुर के साथ की है.  देहरादून अमर उजाला से ही एक अन्य खबर के मुताबिक कमल सत्यावली ने इस्तीफा देकर इंडियन एक्सप्रेस, देहरादून के साथ जुड़ गए हैं. वे अमर उजाला में मार्केटिंग हेड गवर्नमेंट हुआ करते थे.

भंवर पुष्पेंद्र ने जयपुर में समाचार प्लस न्यूज चैनल के साथ नई पारी की शुरुआत की है. वे आईबीसी24 के साथ काम कर चुके हैं.

शीतल कुमार अक्षय ने इंदौर के न्यूज पोर्टल 'न्यूज ट्रेक' में कंटेंट एडीटर के रूप में कार्य शुरू किया है. वे उज्जैन में नईदुनिया अखबार में काम कर चुके हैं.

अमर उजाला गोरखपुर के पत्रकार दिव्य प्रकाश त्रिपाठी ने अब हिंदुस्तान कानपुर को ज्वाइन किया है.

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महाराष्ट्र ‘पेड न्यूज़ की राजधानी’ हैः चुनाव आयुक्त

लोकसभा चुनावों की तैयारियों का जायजा लेने के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग इन दिनों महाराष्ट्र दौरे पर है। शुक्रवार को मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत, चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा और डॉ. नसीम जैदी व राज्य के अन्य चुनाव अधिकारियों ने पत्रकारों से बातचीत की। मीडिया से बात करते हुए चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा ने कहा कि आप के राज्य में बहुत बड़ी संख्या में पेड न्यूज का प्रकाशन होता है। आपका राज्य पेड न्यूज़ की राजधानी है। पेड न्यूज़ के व्यापार से बाहर निकलिए। पेड न्यूज़ को रोकिए।

चुनाव आयुक्त के इस बयान से हैरान मीडिया ने उनसे स्पष्टीकरण की मांग की। इस पर मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने कहा कि हम नहीं मानते कि ये जगह पेड न्यूज़ के लिए कुख्यात है।

कुछ छोटे औऱ क्षेत्रीय दलों ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि माडिया उनकी उपेक्षा कर रहा है। इस पर चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा ने मीडिया से आग्रह किया कि वो सभी पार्टिंयों की बात समान रूप से मतदाता तक पहुंचाए। 

‘आप’ पर विदेशी पैसे लेने का आरोप लगाने वाली पार्टियां भाजपा और कांग्रेस खुद इसके लपेटे में आ गई

Abhishek Parashar : आम आदमी पार्टी पर फोर्ड फाउंडेशन से पैसा लेने का आरोप लगाने वाली भाजपा और कांग्रेस खुद ही इसके लपेटे में आ गई हैं। दोनों दल भाजपा और कांग्रेस वेदांत और सेसा गोवा जैसी कंपनियों से चंदा लेने की दोषी पाई गई हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति जयंत नाथ के पीठ ने कहा, 'हमें यह मानने में कोई झिझक नहीं है कि प्रतिवादियों का जो आचरण याचिका में बताया गया है, उससे विदेशी चंदा (नियमन) अधिनियम 1976 का साफ उल्लंघन हुआ है। राजनीतिक दलों ने स्टरलाइट और सेसा से जो चंदा लिया है, वह कानून के मुताबिक 'विदेशी स्रोत' से लिए गए चंदे की श्रेणी में आता है।' अदालत ने चुनाव आयोग को दोनों दलों को मिले चंदों की रसीदें छह महीने के भीतर जांचने का आदेश दिया है।

पत्रकार अभिषेक पराशर के फेसबुक वॉल से.
 

हिसार में कुलदीप बिश्नोई और आईएनएलडी प्रत्याशी को पेड न्यूज़ प्रकाशन के लिए नोटिस

हिसार के जिला निर्वाचन अधिकारी ने हरियाणा जनहित कांग्रेस-बीएल के मुखिया कुलदीप बिश्नोई औऱ आईएनएलडी के प्रत्याशी दुष्यंत चौटाला को 'पेड न्यूज़' के प्रकाशन के लिए नोटिस जारी किया है।

जिला निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनीटरिंग कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं। बिश्नोई औऱ चौटाला के द्वारा 24 और 26 मार्च को समाचार पत्रों में जो विज्ञापन दिए गए थे, कमेटी ने उन विज्ञापनो को प्रथम दृष्टया पेड न्यूज़ पाया। आगर दोनो प्रत्याशी 48 घंटे के अन्दर जवाब नही देते हैं तो कमेटी के निर्णय को अंतिम मान लिया जाएगा और विज्ञापन के खर्चे को प्रत्योशियों के चुनाव खर्च में जोड़ दिया जाएगा।

नेगी जी ऐसे एसएचओ रहे कि लोग उन्हें प्यार से ‘नेकी’ जी कहते थे

Vinod Singh Sirohi : श्री महेंद्र सिंह नेगी जी रिटायर होने जा रहे हैं. उतर प्रदेश और अब उत्तराखंड में बतौर एसएचओ बेहद लोकप्रिय रहे हैं. काफी थानों में रहे. इनके स्थानांतरण पर जनता विरोध में सड़कों पर आ जाती थी और बाजार बंद होते थे.

निष्पक्ष, निहायत सरल, ईमानदार, काफी बहादुर भी. उन पर गुंडई नेतागर्दी का बिलकुल असर नहीं पड़ता था. सहारनपुर में मुझसे पूर्व रामपुर मनिहारान में वो इंचार्ज रह चुके थे. वहां लोग व स्टाफ बताता था कि जनता, महिलायें और बच्चे भी मात्र उन्हें देखने थाने पर आते थे. ट्रैक्टर ट्रौली व भैंसा बुग्गी से. उनके नेक काम, ईमानदारी से लोग उन्हें नेगी नहीं "नेकी" कहते थे. हम जैसे जूनियर उनसे हमेशा प्रेरणा पाते रहे. उनकी ईमानदारी सच्चाई व जाबांजी को सलूट. सल्युट "नेकी जी".

यूपी पुलिस में कार्यरत इंस्पेक्टर विनोद सिंह सिरोही के फेसबुक वॉल से.


 विनोद सिंह सिरोही का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

जो लोग दूसरों को घेरते हैं या घेरने का पेशा करते हैं उन्हें खुद ज्यादा सावधानी से चलने की जरूरत होती है

भाजपा और सपा का आपसी भाईचारा लखनऊ में दिख गया

Siddharth Kalhans : भाई गजब का भाई चारा है। जरा याद करो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह 2009 में पिछली बार जब गाजियाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़े थे तो समाजवादी पार्टी ने उनके खिलाफ किसको खड़ा किया था। कोई नहीं। बदले में राजनाथ ने तब के सपा के अजीज अमर सिंह की खास जया प्रदा के खिलाफ रामपुर से कैंडिडेट नही उतारा था। इस बार राजनाथ के खिलाफ पंडित विरोध को कैश कराने और मुसलमान वोट बंटवाने सपा ने उतार दिया मंत्री अभिषेक मिश्रा को। अपने जवांर के शादानी साहब कह गए न…

तुम देखत हो भाई चारा उल्लू हो
दिन ही मां देखत हो तारा उल्लू हो…

Siddharth Kalhans :  भाई तुम्हारे हिसाब से तो देश कांग्रेस मुक्त होना जा रहा है। अच्छा है करो। खत्म हो गयी कांग्रेस, ये कह रहे हो। फिर क्यो कर ये हमला उसके यूपी दफ्तर पर। मोदी जिंदाबाद के नारे के साथ भाजपा नेता गंगा चरण राजपूत के साहेबजादे गुड्डू 50-60 लौंडों के साथ गाड़ियां तोड़ने लगे। तोड़ फोड़ करने लगे। खून खच्चर किया। हर एक जिले में ये हताशा दिखा रहे हो। गोंडा, बलरामपुर, डुमरियागंज, बस्ती, मिर्जापुर, फूलपुर, बांदा, इलाहाबाद में राजनाथ के पुतले फूंक रहे हो। मिंया लहर लहरा गई, रपट गए हो। अब भी होश में रहो वरना 2009 की हालात ही नसीब होगी। कांग्रेस ने अपने दम पर नही तुम्हारी हरकतों के चलते खुद को थोड़ा संभाल लिया है। बाकी बसपा तो जमीन दिखा ही रही है न।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस के फेसबुक वॉल से.

विंध्याचल में महिला पत्रकार से दुराचार करने वाला आरोपी गिरफ्तार

मिर्जापुर : उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर पुलिस ने विन्ध्याचल देवी दर्शन के लिए आयी महिला पत्रकार का अपहरण कर उससे बलात्कार करने वाले एक आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.  पुलिस प्रवक्ता ने यहां बताया कि उत्तराखणड के 'हरिद्वार केसरी' दैनिक पत्र की महिला पत्रकार 24 मार्च को विन्ध्याचल में दर्शन करने के लिये आयी थी.  महिला पत्रकार शाम को रत्नाकर होटल से अष्टभुजा मंदिर में दर्शन करने गयी थी.

दर्शन पूजन के उपरांत जब रात्रि को वह होटल आने के लिये वाहन के इंतजार में खड़ी थी तो सफेद रंग की स्कार्पियो गाड़ी पर सवार तीन लोगों ने उसे जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया. महिला ने जब खुद को पत्रकार बताया तो गाड़ी में सवार एक व्यक्ति गाड़ी से उतर गया. पर दो व्यक्ति नहीं माने और उसे अज्ञात स्थान पर ले गये, उसके साथ उन्होंने दुराचार किया.

उन्होंने बताया कि दोनों ने महिला पत्रकार को रात दो बजे कस्बा विन्ध्याचल के पास छोड़ दिया. उक्त महिला पत्रकार ने आज सुबह विन्ध्याचल थाने पर सूचना दी. इस संबंध में मामला पंजीकृत कर
महिला पत्रकार को अस्पताल भिजवाया गया जहॉ पर मेडिकल परीक्षण कराया गया. पुलिस द्वारा घटना में शामिल एक आरोपी अश्वनी तिवारी निवासी अकोढी थाना विन्ध्याचल को गिरफ्तार कर घटना में प्रयुक्त स्कार्पियो गाड़ी को बरामद कर लिया. पुलिस शेष आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए प्रयास कर रही है.
 

‘हम दोनो’ नंदा के फिल्मी सफ़र की एक महत्वपूर्ण फिल्म है

“अपने हाथों की कमाई हुई सुखी रोटी भी…” “तुम भी सुखी रोटी में यकीन करने वाले हो!! जिसने हमेशा पुलाव खाएँ हो, उसे सुखी रोटी मे कविता नज़र आती है, जो गरीबी से कोसों दूर रहा हो उसे गरीबी मे ‘रोमांस’ नज़र आता है। लेकिन कविता और रोमांस अमीरों के दिल बहलाव की चीज़े हैं, और सुखी रोटी……उसे चबाना पड़ता है, निगलना पड़ता है, पचाना पड़ता है। गरीबी ज़िन्दगी का एक श्राप है आनंद( देवआनंद) साहब! जिससे निकलना इंसान का फ़र्ज़ है, जानबुझ कर पड़ना हिमाकत। जो अपने प्यार के खातिर सौ रुपए तक की नौकरी ना पा सका, वह प्यार का मतलब समझाने आया है। तुम आए हो मीता(साधना) से उसका आराम और सुख छीनने, एक सुखी रोटी का वादा लेकर, तो ले जाओ। वह तो है ही नादान। कितने दिनो तक अपने साथ रखोगे, तुम ज़िन्दगी भर उसे इतना नहीं दे पाओगे, जितना मीता अपने एक जन्मदिन पर खर्च कर देती है।

 
मीता के पिता की चुभती बात किंतु हक़ीकत को दिल से लगाकर आनंद बाहर निकल जाता है। वो समझ पाया था कि कामकाज के बिना जिंदगी को जीना कभी मुम्किन नहीं होगा। प्यार व जिंदगी को लेकर एक बदलाव उसमें घटित हो गया था। खुद को जिंदगी की हक़ीकत के लायक बनाने का संकल्प लेकर वह पुराने आनंद को पीछे छोड़ आया था। फौज मे भर्ती का विज्ञापन दिखाई देना किरदार के जीवन में नएपन को दिखाने के लिए काफी सटीक था। हम देखते हैं कि आनंद फ़ौज में दाखिल हो जाता है। वहां उसकी मुलाकात अपने ‘हमशक्ल’ मेजर वर्मा से होती है, एक ही शक्ल, एक फ़ौज और एक शहर का संयोग दोनो को नज़दीक ले आता है। इस मोड़ से आनंद व मेजर वर्मा की कहानियां आकर मिल जाती हैं। हमशक्ल होने की वजह से दो अलग इतिहास अनजाने में ही एक दूसरे के जीवन में प्रवेश कर जाते हैं।

आनंद व खुद को एक जगह देखकर मेजर वर्मा कहते है: भगवान मे मुझे यकीन नही, लेकिन किस्मत ज़रुर कोई चीज़ है! वर्ना एक से चेहरे, एक फ़ौज ,एक जगह …बड़ी खुशी की बात है।
 
किसी जंग के दौरान मेजर वर्मा गंभीर रूप से घायल हो गए, दुश्मनों के हमलों का सामना करते हुए इस नाजुक हालात में आए थे। इस हालत मे वो अभिन्न मित्र आनंद से अपनी गैर-मौजुदगी या मारे जाने के स्थिति मे उनके घर की ज़िम्मेदारी निभाने का वायदा लेता है। दोस्ती की खातिर आनंद को अपने मित्र की बात ना चाहते हुए भी माननी पड़ी। इस मोड़ से कहानी में नए दिलचस्प मोड़ बनते हैं। उस दिन के बाद  मेजर वर्मा यकायक लडाई के मोर्चे से गायब हो गए। कुछ दिनों बाद उनके लापता और मारे जाने की खबर मिलती है। फ़ौज से छुटकर आनंद मेजर और खुद के दायित्वों को निभाने  के लिए मेजर के परिवार के पास आया जहां मेजर की धर्मपत्नी रूमा(नंदा) पति के वापसी की बाट जोह रही थी।

इस इंतजार में रूमा बीमार हो चुकी थी। वो आनंद को अपना खोया हुआ पति मान रही, आनंद भी इस सच नहीं बता सकेगा क्योंकि रुमा बीमार है। वो रुमा से हक़ीकत को जाहिर नहीं करता। ऐसे हालात में आनंद को धर्म-संकट से गुज़रना होगा। असली नकली के दो विपरीत दायित्वों की परीक्षा से गुज़रते वो बहुद हद तक सफल हो रहा था। वो रूमा से पत्नी से ऊपर का नाता रखने का निर्णय लेता है। लेकिन इस मोड़ पर एक अप्रत्याशित हक़ीकत सामने आती है। फ़िल्म के तीसरे हिस्से में मेजर वर्मा को जीवित दिखाया जाता है। मेजर अब वो नहीं रहा, दूसरों के बहकावे में वो रुमा-आनंद के पवित्र बंधन पर शक करने लगा। आनंद को इस परीक्षा में सफल होना होगा क्योंकि मीता उसी के इंतजार में दुनिया को ठुकराए हुए थी। मेजर को इसका डर था कि अपाहिज हो जाने बाद क्या रुमा अब भी पहले जितना प्यार उसे देगी? स्वयं के प्रति रुमा का असीम समर्पण देखकर मेजर को किए पर पछतावा होता है। सुखद समापन में रुमा को उसका असल पति जबकि आनंद को मीता का साथ मिल जाता है।

साठ दशक में रिलीज ‘हमदोनों’ में  भारतीय आदर्शों व मूल्यों को दिखाने का संकल्प नजर आता है। यहां पर आस्था-विश्वास एवं पारिवारिक व मित्रता के मूल्यों की सुंदरता बताई गयी। यहां पर हमशक्ल की परिस्थिति को पेश कर कहानी का आधार रखा गया था। पात्रों के व्यक्तित्व को परखने के लिए कथा में संघर्ष का भाव था। किरदार इसमें विजयी होकर सामने आए। अब उनका व दर्शकों का एकात्म हो गया था। यही खुबसुरती किसी कहानी को सफल बनाती है। युं तो यह देव आनंद की फिल्म थी फिर भी नंदा व साधना की भूमिकाओं ने उन्हें कड़ी चुनौती दी। रूमा व मीता के किरदार आनंद व मेजर वर्मा के किरदारों को मुकम्मल कर रहे थे। पतिव्रता नारी के रूप में नंदा का अभिनय उम्दा था। उधर आनंद की खातिर जीवन भर इंतजार करने का संकल्प लिए हुए मीता का किरदार भी दमदार था। गीतो मे ‘हर फ़िक्र को धुएं मे उडाता चला गया, अभी ना जाओ छोडकर, कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया और सदाबहार भजन ‘ अल्लाह तेरो नाम, इश्वर तेरो नाम’ को बार-बार गुनगुनाया जा सकता है। दिवंगत अभिनेत्री नंदा पर फिल्माया गया यह भजन हिंदी सिनेमा के बेहतरीन भजनों में एक है। नंदा के फिल्मी सफर की एक जरूरी फिल्म।

 

सैयद एस. तौहीद। संपर्कः passion4pearl@gmail.com
 

लोसल नगर पालिकाध्यक्ष ने मीटिंग के बहाने पत्रकारों को अपमानित

लोसल(सीकर), प्रेस क्लब द्वारा हाल ही में आयोजित किए गए होली स्नेह मिलन फागोत्सव कार्यक्रम में शेखावाटी एज्युकेशन ग्रुप के चेयरमैन बीएल रणवां के हाथों दीप प्रज्वलित कराया गया था। इसको लेकर स्वयं को अपमानित महसूस करने वाले लोसल नगर पालिकाध्यक्ष ने शनिवार को पत्रकारों को मीटिंग के बहाने अपने चैम्बर में बुलाया। पालिकाध्यक्ष ने शिक्षण संस्थानों के संचालकों की मौजूदगी में पत्रकारों को भलाबुरा कहकर अपमानित किया।

पालिकाध्यक्ष का कहना था कि उक्त कार्यक्रम में मेरे रहते शेखावाटी एज्युकेशन गु्रप के चेयरमैन बीएल रणवा के हाथों से दीप प्रज्वलित क्यों करवाया गया। पत्रकारों को चेतावनी देते हुए उन्होने यहां तक कह दिया कि मुझे मिडिया की कोई जरूरत नहीं है, आप लोग जो चाहे कर लेना। पालिकाध्यक्ष के इस बर्ताव को लेकर सभी पत्रकारों में रोष है।

 

एनके त्रिपाठी, पत्रकार लोसल, सीकर(राजस्थान)। मो- 7877775917

आशुतोष महाराज की समाधि, सत्य या असत्य?

आज बार-बार एक ही प्रश्न मन मे उठ रहा है कि क्या धर्म अंध विश्वास है? क्या धर्म केवल और केवल एक अंधी आस्था ही है, जिसका कोई आधार नहीं? क्या धर्म केवल एक प्रश्न ही है कि जिसका ठोस उत्तर आज किसी के पास नहीं। और अगर है तो कोई उसे स्वीकार करने को तैयार ही नहीं। आज धर्म और आस्था के नाम पर जो हो रहा है, आज सत्य और असत्य के नाम का जो ढ़ोल पीटा जा रहा है, क्या धर्म उसके शोर में दब जाएगा?

कदापि नहीं। सत्य सदा सर्वदा सत्य रहा है और सत्य ही रहेगा। क्या आशुतोष जी जिसे आप महाराज जी कह रहे थे उसका एक भी शिष्य(जो अपने आपको स्वामी कहलवाते हैं) यह बता सकते हैं कि “महाराज जी” शब्द वो किसके लिए प्रयोग करते हैं और महाराज जी का अर्थ क्या होता है और ‘स्वामी” शब्द किसके लिए प्रयोग करते हैं और इसका अर्थ क्या होता है?

1 आशुतोष जी के शिष्य जो आशुतोष जी को समाधि में होने का दावा कर रहे हैं वो अगर उनके शिष्य हैं वो यह कैसे जानते हैं कि यह समाधि ही है? जिनका गुरु समाधि लगाना जानता है या लगा सकता है तो कम से कम उनका कोई तथाकथित स्वामी या एक शिष्य तो इस प्रक्रिया को जानता होगा तो क्या वो ऐसा कर के दिखा सकता है फिर भले वो कुछ घंटों के लिए ही क्यूँ ना हो? वरना इस दावे का आधार ही क्या है?
 
2 आज जिन संतों का नाम लेकर उदाहरण दिये जा रहे हैं कि वो समाधि में गए थे, तो क्या उनके शिष्यों ने भी अपने गुरु की देह को ऐसे ही फ्रीजर में रखा था(माना तब फ्रिज नहीं थे) या उसकी देह को उठा कर हिमाचल या वहाँ लेकर गए थे जहाँ तापमान शून्य डिग्री से कम हो?
 
3 समाधि और मृत्यु में क्या अंतर है इसे भी स्पष्ट नहीं किया गया कि समाधि के और शव के क्या क्या लक्षण हैं? और तो और क्या कोई एक भी बाहर का व्यक्ति जिसने खुद देखा हो कि वो समाधि में है फिर भले वो मीडिया हो या कोई साधु समाज का प्रतिनिधि या कोई भी इंसान जिसका संस्थान से कोई सम्बन्ध न हो?
 
4 अगर यह समाधि ही है तो उसके वीडियो जारी करने या कोई चित्र दिखाने में आपत्ति किसलिए और उनके अपने शिष्यों तक को भी उनके दर्शनों से वंचित क्यूँ रखा जा रहा है हालांकि इसे दिखा कर वो अपने गुरु का सम्मान ही करेंगे क्यूंकि किसी धर्म ग्रंथ में यह भी तो नहीं लिखा है कि उसे दिखाना भी नहीं चाहिए?
 
5 जैसा कि संस्थान आज दावा कर रहा है कि मीडिया ने किसी को उसकी पत्नी बना दिया और किसी को आशुतोष का बेटा जबकि आशुतोष बाल ब्रह्मचारी हैं इस बात का प्रमाण क्या है। और अगर मीडिया ने उसका परिवार जो दिखाया है वो गलत है तो असल में उनका परिवार उनके माता पिता कौन हैं और कहाँ है यह आज तक क्यूँ नहीं बता पाये? अगर दलीप झा उनका बेटा नहीं है(संस्थान के अनुसार वो बिका हुआ है) तो फिर डीएनए टैस्ट करवाने में आपत्ति क्यूँ। हालांकि यह सब होने से जो सत्य है वही सामने आएगा और इससे वो अपनी बात की सत्यता का प्रमाण भी दे सकते हैं।
 
6 संस्थान कह रहा है कि आशुतोष जी पहले भी कई बार समाधि में जा चुके हैं परंतु वो कब गए थे इस बात का उत्तर भी वो गोल कर जाते हैं? और जब समाधि में गए थे क्या तब भी उनकी देह को फ्रीजर में रखा गया था?
 
7 क्या समाधि प्राकृतिक होती है या अप्रकृतिक अर्थात जब कोई योगी समाधि में जाता है, तो उसकी देह की रक्षा प्रकृति करती है या उसके शिष्यगण?
 
8 क्या समाधि केवल हिमालय में ही हो सकती है या जहाँ तापमान शून्य डिग्री या इससे कम हो अथवा कहीं भी हो सकती है या लगाई जा सकती है?
 
9 अगर समाधि वाले शरीर को फ्रीजर में ना रखा जाये तो क्या वो मर जाएगा या पहले जितनी भी समाधियाँ हुई हैं क्या उन सब के यही लक्षण थे?
 
10 क्या अपनी प्रसिद्धि बढ़ाने के लिए कोई नाटक या प्रपञ्च नहीं रचा जा सकता है? जिसे बाद में बता कर संसार में वाह-वाही और प्रसिद्धि लूटी जा सके?
 
11 क्या समाधि वाले शरीर पर सर्दी गर्मी और बरसात का प्रभाव रहता है अथवा नहीं?

12 अगर समाधि में दिल की धड़कन नहीं चलती, रक्त संचार नहीं होता, नब्ज़ नाड़ी नहीं चलती तो वो क्या आधार है जिससे इस बात को जाना समझा जा सके कि यह समाधि ही है और यह कब खुलेगी?
 
13 क्या आज कोई भी प्रचारक/प्रचारिका(स्वामी जी) जो महाराज जी को प्रकट कर लेने का दावा किया करते थे आज महाराज जी को प्रकट कर उनसे पूछ कर यह बता सकते हैं कि यह समाधि कब खुलेगी?

इन सब प्रश्नों का उत्तर कौन देगा और यह प्रश्न आज हर जहन में हैं जो धरती पर अपने आपको आध्यात्मिक कहने वालों को हर जिज्ञासु और हर भगवत प्रेमी मन ही मन में कर रहा है और इन प्रश्नों के प्रति चुप्पी हर मन में शंका पैदा कर रही है कि क्या वास्तव में अध्यातम है भी या केवल एक अंधी आस्था जिसका कोई अंत नहीं।

 

संत ज्ञानेश्वर जी। संपर्कः bhagwadavatari@gmail.com

नईदुनिया भिंड के ब्यूरोचीफ और रिपोर्टर पर रिश्वत मांगने का आरोप

भिंड जिले के कुछ प्राइवेट स्कूल संचालको ने नईदुनिया के सीईओ को इंदौर पत्र भेज कर शिकायत की है कि बोर्ड परीक्षाओं के बहाने नईदुनिया, भिंड के ब्यूरो चीफ और रिपोर्टर द्वारा उनसे रिश्वत की मांग की गई। संचालकों का कहना है कि उन्होने कुछ रुपए दे भी दिए हैं लेकिन फिर भी उन्हे धमकाया जा रहा है। आरोप है कि रुपए न देने पर संचालकों के खिलाफ झूठी खबरें भी छापी गईं।

इस पत्र से नईदुनिया के इंदौर ऑफिस और भिंड ब्यूरो में हड़कंप मचा गया। नईदुनिया प्रबंधन ने कार्यवाही करते हुए आरोपी ब्यूरो चीफ औऱ रिपोर्टर को ग्वालियर ऑफिस में अटैच कर दिया है।

प्रदेश टुडे में छपी ख़बर
प्रदेश टुडे में छपी ख़बर

प. बंगाल में शारदा फर्जीवाड़े को मुद्दा नहीं बना पा रहा विपक्ष

शारदा फर्जीवाड़े मामले को सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक साजिश का नतीजा बताकर भले ही बंगाल की मां-माटी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है, लेकिन इसका आगामी लोकसभा चुनाव नतीजों पर कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है। न निवेशकों को उनका पैसा वापस मिल रहा है, न रिकवरी की कोई सूरत है और न चिटफंड कारोबार केंद्रीय एजंसियों की सक्रियता के बावजूद बंद हो पाया है।

 
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को आदेश दिया है कि दस दिनों के भीतर शारदा फर्जीवाड़े मामले की केस डायरी, एफआईआर, चार्जशीट की प्रतिलिपि सर्वोच्च अदालत में जमाकरें और साथ में यह भी बतायें कि इस भारी घोटाले की साजिश में आखिरकार कौन कौन लोग थे, किन्हें शारदा समूह को खुल्ला छूट देने का फायदा मिला और किन्हें इस कंपनी से सुविधाएं वगैरह मिली हैं। जैसे सहाराश्री को निवेशकों का पैसा लौटाने की योजना बताने को कहा गया है, ठीक उसी तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को भी आदेश दे दिया है कि वह बतायें कि कैसे शारदा में पैसे लगाकर ठगे गये लोगों को उनकी रकम वापस दिलायेगी सरकार। अचरज की बात तो यह है कि बंगाल के राजनीतिक हल्कों में शारदा प्रकरण पर सन्नाटा है जैसे सबको सांप सूंघ गया है।
 
अब तक प्रगति यह है कि केंद्रीय एजंसियों की गतिविधियां इस सिलसिले में ठप हैं और सेबी को पुलिसिया अधिकार देने के बावजूद इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हो सकी है। हालंकि श्यामल सेन आयोग ने शारदा  समूह की संपत्ति बिक्री कर निवेशकों की संपत्ति लौटाने का निर्देश दिया है।
 
जबकि दिन के उजाले की तरह जगजाहिर है कि शारदा समूह की कंपनियों में बेहतर मुनाफे का लालच दिए जाने पर लोगों ने अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई लगा रखी थी। कंपनी पिछले दिनों डूब गई और निवेशकों को उनका पैसा वापस नहीं कर पाई।
 
शारदा समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुदीप्त सेन और उनके कई सहयोगी सलाखों के पीछे हैं। धोखाधड़ी और षडयंत्र के आरोप में उन पर कानूनी कार्रवाई चल रही है। सत्तादल के सांसद कुणाल घोष भी जेल में हैं।
 
गौरतलब है कि इससे पहले पहले शारदा चिटफंड घोटाले में गिरफ्तार राज्‍यसभा के सांसद कुणाल घोष ने इस पूरे मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी और मुकुल रॉय को घसीटा भी है, फिर भी विपक्ष इस मामले को मुद्दा नहीं बना सका, यह बंगाल में विपक्ष की बदहाली का आलम है।
 
हालांकि सहारा मामले में सहाराश्री की गिरफ्तारी के बाद बाद बंगाल में भी निवेशकों के पैसे लौटाने के हालात बन जाने चाहिए थे, जो हरगिज नहीं बने। गौरतलब है कि गोरखपुर से शुरू हुआ 'सहारा' का सफर आज अरबों रुपयों तक पहुंच चुका है। चिटफंड से लेकर कई नामी स्कीम्स चलाने के साथ ही सहारा ने रियल स्टेट्स, स्पोर्ट्स स्पॉन्सरशिप, फिल्म इंडस्ट्री और मीडिया के कारोबार में अपनी मजबूत पकड़ बनाई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहारा को भी निवेशकों को पैसे लौटाने की पहल के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
 
लेकिन दूसरी तरफ, बंगाल में ऐसा कुछ होने के आसार अब भी नहीं बने हैं और न शारदा फर्जीवाड़े में गिरफ्तार सुदीप्तो और देवयानी से साजिश की परतें खुल पायी है।
 
अब अगर राज्य सरकार अपनी ओर से पहल करके दोषियों को सजा दिलाने के साथ निवेशकों को उनका पैसा वापस दिलाने का काम कर देती है तो विपक्ष को आरोप लगाने का भी मौका नहीं लगेगा।
 
दरअसल बंगाल में सत्तापक्ष को सड़क पर चुनौती देने वाली कोई ताकत है ही नहीं। कांग्रेस अब साइन बोर्ड जैसी पार्टी हो गयी है और उसकी जगह तेजी से भाजपा ले रही है। लेकिन शारदा फर्जीवाड़े मामले को चुनावी मुद्दा में बदलने की कोई कवायद न कांग्रेस ने की है और भाजपा ने।
 
वामपक्ष अपने बिखराव से बेतरह परेशान है और उसे खोये हुए जनाधार की वापसी की जितनी फिक्र है, मुद्दों पर जनता को गोलबंद करने की उनकी तैयारी उतनी नहीं है। अचानक चुनाव के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के इस मंतव्य को चुनावी मुद्दा बनाने की हालत में बगाल की राजनीति कतई नहीं है और न ममता बनर्जी उन्हें कोई मौका देने की भूल करेंगी।
 
दरअसल इस घोटाले के साथ देशव्यापी चिटफंड कारोबार का पोंजी नेटवर्क का तानाबाना ऐसा है कि हर दल के रथी महारथी इस जंजाल में फंसे हुए हैं।
 
इसलिए पार्टियों के सामने अपनी अपनी खाल बचाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं रह गया और किसी राजनीतिक दल ने इसे मुद्दा बनाकर कोई जनांदोलन नहीं छेड़ा।
 
इस घोटाले के पर्दाफाश से जो शुरुआती प्रतिक्रिया हुई, विपक्ष की निष्क्रियता से सत्तापक्ष ने उसको भी रफा दफा कर दिया। मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और पार्टी नेताओं पर गंभीर आरोप होने के बावजूद ममता ने आक्रामक रवैया अपनाकर उनका बचाव कर लिया और विपक्ष शुरुआत में सीबीआई जांच की रट लगाते रहने के बावजूद खारिज हो गया।
 
भाजपा बेहतर हालत में थी क्योंकि राज्य और केंद्र  में सत्ता से बाहर होने की वजह से उसके नेता फंसे नहीं हैं। लेकिन रहस्यमय चुप्पी ओढ़कर भाजपा ने वह मौका गंवा दिया।
 
सुप्रीम कोर्ट का फैसला तब आया है जबकि राजनीतिक दलों ने अपने अपने उम्मीदवार घोषित भी कर दिये। सत्तापक्ष के आरोपित सभी लोग चुनाव मैदान में हैं, इसके बावजूद अपनी अपनी मजबूरी की वजह से राज्य के राजनीतिक दल इसे लेकर संबद्ध लोगों की घेराबंदी कर पायेंगे, इसकी संभावना भी कम है।

 

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

झूठ और सनसनी का व्यापार कर रहा है वर्तमान मीडिया

बात तब की है तब में एक अंतर्राष्ट्रीय न्यूज चैनल के लिए अपने जिले का प्रतिनिधि संवाददाता हुआ करता था। सर्दी के मौसम में मेरे पास उक्त चैनल के राजस्थान हैड का फोन आया और ठंडक पर एक खबर करके भेजने को कहा जबकि उस समय बीकानेर में इतनी ठंड नहीं थी। परंतु हैड साहब ने मुझे यह कहकर समझाया कि मैं चार मफलर लूं और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाकर किसी ऊॅंटगाड़ी वाले को पकडूं और एक मफलर ऊॅंट को पहनाऊ एक गाड़ी वाले को पहनाऊं और स्वयं पहनकर कर पीटीसी करूं कि बीकानेर में भयंकर ठंड का मौसम है। मैंने स्पष्ट तौर पर इस तरह की खबर करने से मना कर दिया लेकिन उस समय मेरे समझ में यह बात जरूर आ गई कि मीडिया में जो दिखता है वह होता नहीं है बल्कि वह दिखाया जाता है जो कि बिकता है।

ऐसे कईं उदाहरण मेरे पिछले पत्रकारिता के जीवनकाल से जुड़े हैं जिसमें मैंने व्यक्तिगत तौर पर व काफी समीपता से मीडिया में फैले झूठ को देखा समझा और महसूस किया। मैं यहां यह जरूर कहना चाहूंगा कि यह झूठ इलेक्ट्रोनिक मीडिया और वेब मीडिया में प्रिंट मीडिया की अपेक्षा ज्यादा देखा जा रहा है। किसी भी तथ्य को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना और बात का बतंगड़ बनाना वर्तमान में मीडिया की आदत में शुमार हो गया है और मीडियाकर्मी ऐसा करना अपना धर्म मानते हैं। मैंने अपने साथ काम करने वाले एक मीडियाकर्मी से जब यह पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो तो उसने कहा कि ऐसा करने का मन तो नहीं होता परंतु करें क्या चटपटी व धमाकेदार खबर के बिना चैनल की चर्चा नहीं होती।

झूठ के इस व्यापार में मीडिया के मालिकों से लेकर स्थानीय संवाददाताओं तक का हाथ होता है और बाखूबी से यह व्यापार फल-फूल रहा है। प्रसिद्ध समाचार पत्रों व प्रसिद्ध न्यूज चैनलों की बेबसाईट पर जाकर देखो तो पता चलता है कि न्यूज की हैडिंग इतनी जबरदस्त व मसालेदार लगाई जाती है कि कोई भी पाठक उस पर क्लिक करके उसको पढ़ेगा। और पूरी न्यूज पढ़ कर भी उसको न्यूज की हैडिंग से मिलता जूलता कुछ भी न्यूज में नजर नहीं आएगा। इस तरह की झूठे शीर्षक जहां पाठकों को गुमराह करते हैं वहीं मीडिया की विश्वसनीयता भी समाप्त करते हैं। यहां यह कहने में मुझे बिल्कुल भी हिचक नहीं है कि वर्तमान इलेक्ट्रिोनिक न्यूज चैनल पर भरोसा करना पाठक की मुर्खता की निशानी है। 140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में जितना झूठ वर्तमान में मीडिया से निकलकर समाज में आ रहा है उतना और कहीं से भी नहीं आ रहा है।
    
बीच
में यह एक फैशन चला था कि कुछ न्यूज चैनल भूतों की स्टोरी और भूतों की खबरें दिखाकर अपनी दुकान चलाते थे और उनका अपने लोकल संवाददाताओं पर यह दबाब रहता था कि वे जैसे तैसे करके भूतों की स्टेारी पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करें। इसका परिणाम यह हुआ कि उन दिनों में चैनलों को देखकर यह मालूम पड़ता था कि यह देश भूतों का देश है जहां पर भूतों का राज है। देश के प्रसिद्ध स्मारकों तक में भूत होने की खबरें उन दिनों बाजार में आई। इसी से जुड़ा किस्सा है कि हमारे शहर बीकानेर में भी संवाददाताओं ने भूतों की खबरों को करना शुरू कर दिया। उन दिनों बीकानेर में न्यू कोर्ट कैम्पस तैयार हो रहा था और निर्माण कार्य में एक मजदूर की मौत हो गई थी तो एक चैनल ने यह खबर चलाई थी कि न्यू कोर्ट कैम्पस में भूत है और जो मजदूर मरा है उसकी आत्मा यहां भटक रही है। इसी तरह बीकानेर के प्रसिद्ध तालाब व शिव मंदिर ‘फूलनाथ जी के तालाब’ के कैम्पस में भी भूत होने की खबर एक चैनल ने चलाई जिसका घोर विरोध हुआ और उक्त चैनल के रिपोर्टर को माफी मांगनी पड़ी। उसी दौरान गंगाशहर के बंगले में भूत की खबर चलाई गई। इसी तरह वर्तमान में राजनीति में झूठ की खबरें परवान पर है। देश के किसी भी हिस्से से राजनीतिक जोड़ तोड़ हो रहा है और कोई कुछ कह रहा है। जैसी अनाप शनाप खबरें इस देश में धड़ल्ले से बड़ी निरंकुशता से चल रही है।
    
लोकतंत्र का यह चैथा स्तंभ अगर इतना मदमस्त होकर निरंकुश हाथी की तरह विचरण करेगा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होगा। आज लोग मीडिया पर विश्वास रखते हैं और आम आदमी यह सोचता है कि उसने जो टीवी में देखा है या इंटरनेट पर पढ़ा है वह सच है। लेकिन झूठी खबरों को अपने नीजि स्वार्थ के लिए खुलेआम फैलाकर वर्तमान मीडिया अपने सामाजिक सरोकारों से पीछे हट रहा है और इस देश में अराजकता का माहौल पैदा कर रहा है। मीडिया की यह गैर-जिम्मेदारी देश की आने वाली पीढ़ी को गुमराह कर कर रही है क्योंकि वर्तमान पीढ़ी के पास ज्ञानार्जन का तरीका ही इलेक्ट्रोनिक चैनल व इंटरनेट रह गया है। ऐसी स्थिति में देश का युवा जो देखता व पढ़ता है उसे ही सच मानता है। तो क्या यह मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि भारत देश के युवाओं में झूठ की नींव न डाले और देश के भविष्य की ईमारत को कमजोर न करें। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए और अंधे होकर आर्थिक लाभ कमाने की लालसा के लिए बड़े-बड़े धनकुबेर मीडिया के मालिक बन गए हैं और उनके लिए पत्रकारिता मिशन न होकर व्यापार रह गया है। एक व्यापारी की तरह जैसे तैसे करके लाभ कमाने की लालसा ने मीडिया को झूठ और वो भी चटपटा झूठ बोलने के लिए प्रेरित किया है।
    
क्या
यह सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे इस तरह के फैल रहे झूठ पर अंकुश लगाए। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) में दी गई वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह कभी मतलब नहीं है कि आप जो मन में आए वो बोलो बल्कि उसके मायने यह है कि आप जो भी बोलो वो जिम्मेदारी से बोलो। सरकारों को इस आजादी पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का अधिकार भी संविधान ने दिया है तो ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक व्यवस्था में तंत्र से उम्मीद की जाती है वे लोक में मीडिया के जरिये फैल रहे झूठ को रोकें और इस देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दें।
 
श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
नत्थूसर गेट के बाहर
पुष्करणा स्टेडियम के पास
बीकानेर {राजस्थान}334004
मोबाईल – 9950050079
ईमेल – shyamnranga@gmail.com

 

राजगढ़ से भाजपा प्रत्याशी को विज्ञापनों के संबंध में नोटिस जारी

मध्यप्रदेश में राजगढ़ के कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी आनंद कुमार शर्मा ने भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार-पत्रों में प्रकाशित विज्ञापनों के मामले में राजगढ़ संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा प्रत्याशी को विज्ञापनों के सम्बंध में नोटिस जारी कर 96 घंटे के भीतर जवाब माँगा है।

जिला निर्वाचन अधिकारी एवं एमसीएमसी के अध्यक्ष आनंद कुमार शर्मा ने बताया कि निर्वाचन आयोग के निर्देश पर गठित जिला स्तरीय मीडिया सर्टिफिकेशन एवं मॉनिटरिग कमेटी द्वारा दैनिक समाचारों-पत्रों में प्रकाशित विज्ञापनों को संज्ञान में लिया गया है। जिला निर्वाचन अधिकारी ने विज्ञापनों के मामले में राजगढ़ संसदीय क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी रोड़मल नागर को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। भाजपा प्रत्याशी को दैनिक समाचार-पत्रों में प्रकाशित 1 लाख 1 हजार 992 रुपए विज्ञापनों के लिए नोटिस जारी किया गया है।

 

प्रेम वर्मा। संपर्कः premverma866@gmail.com
 

रुद्रपुर के पत्रकारों ने गले मिलकर गिले शिकवे दूर किए

रुद्रपुर। पत्रकारों के बीच चल रहे विवाद का शहर के पत्रकारों की बैठक में पटाक्षेप हो गया। बैठक में सभी पत्राकारों द्वारा पूरे मामले पर चर्चा करने के बाद आपस की गलत-फहमियों को दूर कर एक दूसरे के गले मिलकर एक साथ सहयोग कर काम करने का निर्णय लिया गया। उल्लेखनिय है कि पिछले दिनों शहर के पत्राकारों के बीच में मनमुटाव हुआ जिसका प्रशासन ने फायदा उठाते हुये पत्राकारों के उत्पीड़न में कोई कमी नहीं छोड़ी। प्रशासन के साथ-साथ शहर के अन्य लोगों ने भी पत्राकारों की आपस की लड़ाई का फायदा उठाया।

इस सबंध में सिचांई विभाग गेस्ट हाऊस में सभी पत्रकारों की बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में निर्णय लिया गया कि कोई भी पत्रकार आपस के किसी भी मामले में प्रशासन के पास न जाकर वरिष्ठ पत्राकारों के बीच रखेगा। इसके अलावा कोई भी पत्रकार किसी के खिलाफ द्वेष भावना से काम नहीं करेगा। सभी पत्रकार एक दूसरे का सहयोग करेगें तथा शहर की भ्रष्ट राजनीति, भ्रष्ट अफसरशाही एवं नाकाम प्रशासन के खिलाफ अपनी कलम की लड़ाई एक साथ मिलकर लड़ेगे।

पत्रकारों के बीच हुये एक विवाद में अब तक की कार्यवाही को सभी पत्रकार एक साथ मिलकर समाप्त करा देंगे। भविष्य में प्रशासन ने किसी भी पत्रकार के खिलाफ कोई झूठी कार्यवाही की तो सभी पत्रकार मिलकर प्रशासन के खिलाफ खड़े होगें। बैठक में सभी पत्रकारों द्वारा आपसी मनमुटाव भुलाकर एक दूसरे के गले मिल सहयोग का आश्वासन दिया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार बीसीसिघल, अनिल चैहान, कमल श्रीवास्तव, मोहन राजपूत, सुरेन्द्र तनेजा, केवल बत्रा, राजकुमार फुटेला, परमपाल सुखीजा, अनुपम सिंह, फणीन्द्र नाथ गुप्ता, हरपाल सिंह, केपी गंगवार, गुरबाज सिंह, सौरभ गंगवार, आकाश आहुजा, अशोक सागर, गोपाल भारती, एपी भारती, मुकेश गुप्ता, सुदेश जौहरी, हरविन्दर सिंह खालसा, ललित राठौर, गोपाल गोतम, अमन सिंह, दीपक कुकरेजा, विकास कुमार, शोएब, संजय भटनागर, विनोद आर्या, वेद प्रकाश, शुभोद्वति मण्डल, उसमान, मनीष ग्रोवर, हरपाल दिवाकर, मनोन आर्या, भूपेन्द्र सिंह, मनीष, समेत शहर के सभी पत्राकार मौजूद थे।

 

रुद्रपुर से केपी गंगवार की रिपोर्ट।

आईपीएस की ट्रांसफर याचिका पर कैट ने आदेश सुरक्षित किया

केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की लखनऊ बेंच ने आज आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा आईजी अभियोजन से आईजी नागरिक सुरक्षा के पद पर हुए ट्रांसफर के विरुद्ध दायर याचिका में अंतिम सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित कर लिया

याचिका में श्री ठाकुर ने कहा है कि उन्होंने 13 जनवरी को अभियोजन विभाग में ज्वायन किया था। तत्काल ही 30 जनवरी को बिना सिविल सर्विस बोर्ड का गठन किये तथा बिना और बिना कोई कारण बताये हटा दिया गया। यह 28 जनवरी 2014 को संशोधित आईपीएस कैडर रूल्स 1954 के नियम 7 के खिलाफ है।

राज्य सरकार के अधिवक्ता सुदीप सेठ ने कहा कि यद्यपि नियम 28 जनवरी को संशोधित हुए थे, पर डीओपीटी ने इस सम्बन्ध में 14 फ़रवरी को निर्देश जारी किये। जिसके बाद राज्य सरकार ने 07 मार्च को बोर्ड का गठन किया और श्री ठाकुर का तबादला एडीजी अभियोजन आर एन सिंह के पत्र दिनांक 13 जनवरी पर किया गया था।

न्यायिक सदस्य नवनीत कुमार ने सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित कर लिया.

Dr Nutan Thakur
# 094155-34525

पुण्य-बरखा-राजदीप-अर्नब-सुधीर आदि पत्रकारों का आर्थिक-इतिहास सार्वजनिक हो

REEL PICTURE: न्यूज़ चैनल्स पर मठाधीशनुमा बड़े-बड़े पत्रकार, भ्रष्टाचार के दायरे से इतर, 20-30 साल या 30-40 साल सार्वजनिक जीवन में रहने वाले किसी नेता के पास 4-5 करोड़ की संपत्ति होने की खबर को ऐसा कह कर बताते हैं मानो ये अरबों-खरबों के बराबर है। बड़े-बड़े पैनल डिस्कशन कराये जाते हैं कि आखिर नेता करोड़पति कैसे हो जा रहे हैं? अंदाज़ कुछ ऐसा रहता है, जैसे लगता हो कि ये नामचीन पत्रकार उधार मांगकर गुज़ारा कर रहे हैं और 4-5 करोड़ पर हैरान-परेशान हैं या इनके पास सपने में भी नहीं होगा।

                                                          
REAL PICTURE: पिछले दिनों "आप" के "पैराशूट" नेता आशुतोष ने जब अपनी संपत्ति 8 करोड़ के क़रीब बताया तो दिमाग चकरा गया। हालांकि इसमें उनकी पत्नी की संपत्ति भी है। पर नेताओं के बारे में गहरी पैठ रखने वाले IBN7 के पूर्व मैनेजिंग एडिटर और अब "आप" के नेता आशुतोष, जानते हैं कि नेता अपने बीवी-बच्चों या रिश्तेदारों के नाम से ही प्रॉपर्टी या पैसे का ताना-बाना बुनते हैं। इसके पहले "स्टार न्यूज़"(अब एबीपी) की चर्चित एंकर रह चुकी और अब "आप" की नेता शाज़िया इल्मी ने भी अपनी संपत्ति को करोड़ों में बताया है। दीपक चौरसिया नाम के "पत्रकार" के पास भी करोड़ों की दौलत है। पुण्य-प्रसून, बरखा दत्त, अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, विनोद कापड़ी, राजदीप सरदेसाई, अभिज्ञान प्रकाश जैसे ऐसे कई नाम हैं जिनके पास करोड़ों की दौलत है।

यहाँ सवाल करोड़ों की दौलत का नहीं है बल्कि इस बात का है कि ये वो पत्रकार हैं जो 2-4 करोड़ की दौलत का ज़िक्र चीख-चीख कर इस अंदाज़ में बताते हैं मानो ये बहुत बड़ा पाप हो गया हो और इतनी दौलत तो एक आम आदमी नहीं कमा सकता। यानि ये सारे पत्रकार आम-आदमी नहीं, बल्कि अमीरी के आंकड़ों के पायदान पर रईस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहाँ सबसे मौजूं सवाल ये है कि क्या मीडिया कंपनी इतना पैसा इन गिने-चुने पत्रकारों को दे रही हैं कि वो 10-12  साल में 8-8, 10-10 या 15-15, 20-20 करोड़ के मालिक़ हो जाएँ? IBN7 से 300 कर्मचारी निकाल दिए गए, इस बिना पर कि कम्पनी को घाटा कम करना है। मगर उसी कंपनी में करोड़ों की कमाई करने वाले राजदीप और आशुतोष जैसे पत्रकार भी रहे।

अगर मीडिया कम्पनी घाटे में चल रही हैं तो किस बिना पर इन पत्रकारों को करोड़ों कमाने का अवसर मिलता रहा और आम पत्रकार एक सम्मानजनक आंकड़ों वाली सैलरी के लिए भी तरसता रहा? क्या मीडिया में अब तनख्वाह इतनी ज़्यादा हो गयी है कि 8-10 साल के दरम्यान एक अदद पत्रकार करोड़ों की कोठी या फ़्लैट ले ले और करोड़ों जमा कर ले? अगर ऐसा है तो पिछले 8-10 साल में मीडिया का मुनाफ़ा भी अरबों में पहुंचना चाहिए। और यदि ऐसा नहीं है तो कोई कंपनी घाटा सहते हुए अपने यहाँ लाखों की तनख्वाह देने का मौक़ा कैसे मुहैया कर सकती है? अब दोनों बातें एक साथ तो हो नहीं सकती कि मीडिया मालिक़ या हाऊस घाटे की स्थिति में हों और उनके यहाँ काम करने वाले पत्रकार करोड़ों में खेल रहे हों या मीडिया हाउस या मालिक़ मुनाफ़े की स्थिति में लगातार हों और उनके यहाँ कर्मचारियों की संख्या या दशा बहुत सराहनीय ना हो।

ये सवाल इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि टी.वी. मीडिया में पेड पत्रकारिता का परचम लगातार गहराता जा रहा है। ऐसी पेड पत्रकारिता जो शब्दों की बाज़ीगरी से किसी व्यक्ति-विशेष को उठा रही है और गिरा रही है। मसलन रजत शर्मा, "इंडिया टी.वी." को भाजपा का "मुखपत्र" बनाने पर तुले हैं तो "एबीपी न्यूज़" के सम्पादकीय कर्णधार भाजपा के पक्ष में जनादेश खड़ा करने का कोई मौक़ा नहीं चूकते। "आज तक" वाले पहले मोदी के साथ चले पर मोदी समर्थक चैनल की हवा बनने  से पहले ही कूटनीतिक रुख़ अख्तियार कर लिए। दीपक चौरसिया, अरविन्द केजरीवाल के पैर की धूल भी नहीं लगते पर केजरीवाल का मुंडन, ज़बरदस्ती, रोज़ाना "इंडिया न्यूज़" पर कर रहे हैं। ऐसा लगता है, मानो कहीं से स्पष्ट निर्देश आया है कि "चाहे कुछ भी हो पर केजरीवाल को बदनाम करो"।

इसी तरह हर चैनल अपने-अपने तरीक़े से और अपना "नफ़ा-नुकसान" देखकर चल रहे हैं। पर ये नफ़ा-नुकसान सिर्फ चैनल के मालिकों तक ही सीमित है या उन चैनल्स में काम करने वाले "बड़े" पत्रकारों का भी उसमें गुणा-गणित शामिल है? सवाल फिर वही कि चैनल मालिकों की हैंसियत बड़ी है तो "धंधे" के सहारे, लेकिन करोड़ों-पति पत्रकारों की हैसियत किस ज़मीन पर तैयार हुई है? खांटी तनख्वाह पर या तनख्वाह से "इतर कुछ-और-भी"! ये पत्रकार करोड़ों रुपये वाले नेताओं का आर्थिक इतिहास जब बताते हैं तो आम जनता को नेताओं के व्यक्तित्व से बदबू आती है। आज मीडिया में करोड़ों की "कमाई" कर बैठे पत्रकार, सतही तौर पर, खांटी समाजवाद की तर्ज़ पर खुद को, आम आदमी की जान बचाने वाला नायक साबित कर रहे हैं।

नेताओं पर अक्सर भ्रष्टाचार के ज़रिये कमाई का आरोप लगता है। मगर अब वक़्त आ चला है कि नेताओं का आर्थिक इतिहास खंगालने वाले कई करोड़ों-पति पत्रकारों का भी आर्थिक-इतिहास सार्वजनिक हो। इस सार्वजनिक ख़ुलासे से दो फायदे होंगे। (1) यदि इन पत्रकारों के पास नेतानुमा कमाई नहीं होगी तो वो लोग शर्मसार होंगें जो ऐसे संदेह को पाले बैठे हैं, (2) और यदि कमाई अपने आका नेता की ही तर्ज़ पर होगी तो ये साबित हो जाएगा कि, पत्रकार की खाल में, ये सब भ्रष्ट नेता के चमचे ही हैं। यकीन मानिये, आम जनता को इनकी दौलत पर नाज़ नहीं होगा बल्कि दुर्गंध का वो आलम होगा कि सीवर लाइन के लिए सीबीआई जांच की मांग बहुत तेज़ होगी। अफ़सोस! नेता के पास खरीदे हुए पचास चमचे होते हैं जो मुसीबत के वक़्त खुद पीट जाते हैं और अपने नेताजी को बचा ले जाते हैं। पर ऐसा कम ही देखा गया है कि चमचे की पिटाई हो रही हो और नेताजी अपने चमचे को बचाने के लिए खुद पिट जाएँ। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों!

 

नीरज…….'लीक से हटकर'। संपर्कः journalistebox@gmail.com

सरकारी ज़मीन पर ‘बरिस्ता’ चला रहा है मुंबई प्रेस क्लब

मुंबई प्रेस क्लब अपने साफ सुथरे प्रशासन की बड़ी डींगें हांकता है। लेकिन असलियत में यहां कमेटी मेंम्बर्स की मनमर्जी के चलते नियम कायदों को ताक पर रख दिया गया है। कमेटी ने बिजली बचाने के उद्देश्य से दोपहर 3.30 से शाम 6.00 बजे तक एसी बंद रखने का निर्णय लिया है। तपती गर्मी के दिनों में भी ऐसा उटपटांग निर्णय लागू कर उस पर अमल किया जा रहा है। औऱ बिजली बचाने में अपने योगदान के लिए कमेटी अपनी पींठ खुद ही थपथपा रही है।

लेकिन गुरुवार, 27 मार्च को दोपहर में जब कि एसी बंद होने का समय होता है, किसी कमिटी मेम्बर के खास गेस्ट के लिए इस नियम को तोड़ दिया गया। कमेटी मेंबर के खास गेस्ट के लिए बाकायदा एसी चलाया गया। जबकी उस वक्त चार सीट वाले छह और छह सीट वाला एक टेबल पुरी तरह भरे हुए थे। लोग गर्मी में परेशान होकर खाना खा रहे थे। तो क्या ऐसे में वो खास मेहमान महोदय ही एसी की हवा के हकदार थे और बाकी के मेम्बर्स नहीं?

उन महोदय की सेवा में प्रेस क्लब कर्मचारी डेविड को तैनात किया गया। ये सब क्या चल रहा है 'मिस्टर क्लीन' प्रेसिडेंट गुरुबीर सिंह जी? क्या यही आपकी निष्पक्षता है? रुल्स तो सबके लिए समान होने चाहिए। इस मनमानी का जवाब कौन देगा?

वैसे प्रेसिडेंट महोदय या कमेटी का कोई भी अन्य मेंम्बर तपती धूप में प्रेस क्लब नहीं आता। तो उन्हे यह कैसे पता चलेगा कि गर्मी क्या होती है। वो तो बस सदस्यों को तपते छोड़ अपने मेहमानो पर बची हुई बिजली लुटा रहे हैं।
 
इस
प्रेस क्लब में यहां कार्ड स्वाईप पेमेण्ट के लिए तीन पर्सेंट अतिरिक्त शुल्क भी वसूला जा रहा है। जबकि हम ही लोग न्यूज देते है की ऐसा कोई शुल्क पोईंट ऑफ सेल्स/सर्विस (पीओएस) पर वसूलना गैरकानूनी है। जो एग्रीमेंट मास्टरकार्ड, वीज़ा के साथ होता है उसके तहत पीओएस लोकेशन वाले व्यक्ति/ संस्था को प्रोसेसिंग/ सर्विस चार्जेज़ खुद देने होते हैं। और मुंबई प्रेस क्लब में तो कमेटी जर्नलिस्ट मेम्बर्स को ही लूट रही है। कितना कमा लोगे ऐसी गैरकानूनी वसुली से? यह खबर कौन लिखेगा?
 
वैसे आजकल बहुत कुछ गलत हो रहा है मुंबई प्रेस क्लब में। सरकार द्वारा दिए गए भूखंड पर बाहर की ओर 'बरिस्ता' चलाया जा रहा है। कोई  कोर्ट चला जाएगा तो जबाब तो आपको ही देना होगा ना 'मिस्टर क्लीन' प्रेसिडेंट गुरूबीर जी। आपके कमेटी मेम्बर्स की मनमानी आप जैसा क्लीन आदमी ही रोक सकता है।

मूल ख़बर, मराठी में:

मुंबई प्रेस क्लब बनलाय पदाधिकारयांची जहागिरी
 
मुंबई प्रेस क्लब कितीही गमजा मारत असला तरी निव्वळ "पदाधिकारयांची जहागिरी" बनून राहिला आहे. दिवसेंदिवस सत्ताधारी मन मानेल तसा वापर करू लागले आहेत. मराठीची गळचेपी तर या मंडळींनी कधीच सुरू केलीय. त्यांना इंग्रजी दैनिकात गुलामगिरी करणारे मर्द मराठी बटिक बनून सामील झाले आहेत. बाहेर छाती ताणून मिरवायचे आणि इथे शेपूट घालायचे. हे सर्व होयबा मराठीची गळचेपी रोखण्यात सपशेल अपयशी ठरले आहेत. दुसरीकडे नियमांचा बाउ करायचा, मराठी मंडळींना नियम शिकवायचे आणि स्वत:साठी ते मोडायचे, अशा पद्धतीने प्रेस क्लब पदाधिकारी वागू लागले आहेत.
 
गुरुवार
, २७ मार्च रोजी दुपारी साडेतीन वाजता आलेल्या  पदाधिकारयाच्या एका खास पाहुण्यासाठी इतरांना लागू असलेला नियम मोडण्यात आला. दिवसेंदिवस प्रेस क्लबचे बाजारीकरण करून सर्वसामान्य सदस्यांसाठी सोयी-सुविधा महाग करणारया या मंडळींनी वीज बचत या गोंडस नावाखाली दुपारी साडेतीन ते सायंकाळी सहा या काळात एसी बंद ठेवण्याचा निर्णय घेतला आहे. कडाक्याच्या, तापत्या उन्हात असे निर्णय घेणारे हे महाभाग थोरच! कारण ते स्वत: या वेळात इथे येत नाहीत. बचत करायची तर दुसरीकडे करा ना! तर हा वीजबचतीचा नियम करून यांनी स्वत:ची कोण पाठ थोपटून घेतली. मात्र, गुरुवार, २७ मार्च रोजी आलेल्या  पदाधिकारयाच्या एका खास पाहुण्यासाठी दुपारी साडेतीननंतरही एसी खास करून चालू करण्यात आला. कुठे गेले याचे नियम? का ते इतर सर्वसामान्य सदस्यांसाठीच? ज्यावेळी या पाहुण्याच्या सेवेत मिस्टर डेव्हिड यांना कामधाम सोडून गुंतविले गेले तेव्हा चार आसनी सहा व सहा आसनी एक असे सात टेबल्स फुल होते. सर्व मेम्बर्स कडाक्याच्या तापत्या उन्हात जेवण करीत होते. का ती सर्व का जनावरे होती? आणि या पदाधिकारयांचा पाहुणा काय स्वर्गातून आला होता? हे सारे धोरण आणि मनमानी निषेधार्ह आहे. या मनमानीचे उत्तर कोण देणार?
 
मिस्टर क्लीन  प्रेसिडेण्ट गुरूबीरजी कशाला हवेत असे बिनबुडाचे निर्णय? किती वीज वाचवताहेत तुम्ही? आर यु लिसनिंग गुरूबीरजी ?  या पक्षपाताचे उत्तर तुम्हाला द्यावेच लागेल, संबंधितांना विचारावेच लागेल. आता कदाचित असा बचाव केला जाईल की ते बाहेरचे पाहुणे होते, असू देत ना! रूल इज रूल; तो सर्वांना सारखाच. आपल्याकडून चांगल्या प्रशासनाची अपेक्षा आहे; पक्षपाती नव्हे!
 
प्रेस क्लबमध्ये कार्ड स्वाईप पेमेण्ट साठी तीन पर्सेंट अतिरिक्त शुल्क वसूल केले जातेय. आम्हीच पत्रकार बातम्या देतो की, असे कोणतेही अतिरिक्त शुल्क पोईंट ऑफ सेल्स/सर्व्हिस (पीओएस) वर घेणे बेकायदेशीर आहे. जे एग्रीमेंट मास्टरकार्ड, व्हिजा होते, त्यानुसार पीओएस लोकेशनची व्यक्ती/संस्था यांनाच प्रोसेसिंग/सर्व्हिस चार्जेस स्वत: द्यावे लागतात. मग मुंबई प्रेस क्लब पत्रकार सदस्यांनाच लूटतेय! किती कमाई होईल या बेकायदा शुल्कवसुलीतून? मिस्टर क्लीन प्रेसिडेण्ट बंद करा की ही वसुली.
 
तसे खूप काही चुकीचे चाललेय मुंबई प्रेस क्लबच्या प्रांगणात.  सरकारी भूखंडावर व्यावसायिक पोटभाडेकरू 'बरिस्ता' आणलाय. उद्या जर कुणी कोर्टात 'पीआयएल' केली तर उत्तर क्लीन प्रेसिडेण्ट्नाच द्यावे लागेल. तेव्हा गुरूबीर महाराज आवरा आपल्या मनमानी कमिटी मेम्बर्सना! आपल्यासारखा स्वच्छ माणूसच ते करू शकतो.

 

भड़ास को भेजा गया पत्र।
 

क्या मध्य प्रदेश में बंसल न्यूज रीजनल चैनलों में नंबर एक पर आ गया?

भोपाल से राजेश मिश्रा ने एक पत्र भेजकर भड़ास को सूचित किया है कि बंसल न्यूज नामक चैनल मध्य प्रदेश में रीजनल न्यूज चैनलों में नंबर वन पर आ गया है.

राजेश पत्र में लिखते हैं-

''मध्‍यप्रदेश की मिट्टी के चैनल बंसल न्‍यूज ने आखिरकार टीआरपी में मध्‍यप्रदेश-छत्‍तीसगढ़ के नंबर वन चैनल का खिताब हॉसिल कर इतिहास रच दिया. नवीनतम टीआरपी में यह चैनल नंबर वन है.. वीक 12 (16 मार्च से 22 मार्च) की टीआरपी में बंसल न्‍यूज 31.8%  फीसदी के साथ पहले और सहारा समय मप्र-छत्‍तीसगढ 28.7 % प्रतिशत के साथ दूसरे स्‍थान पर है. जी न्‍यूज तीसरे, इंडिया न्‍यूज चौथे और आईबीसी-24 पांचवें स्‍थान पर है. इससे पहले भी करीब पांच हफ्ते तक इस चैनल ने टीआरपी में नंबर वन का तमगा हॉसिल किया था.. खास बात यह है कि मध्‍यप्रदेश का यह एकमात्र ऐसा चैनल है जिसका प्रोडक्‍शन सेंटर भी भोपाल ही है.. मध्‍यप्रदेश में करीब चार साल बाद किसी चैनल ने सहारा मप्र-छत्‍तीसगढ़ का एकाधिकार तोड़ते हुए नंबर वन का खिताब हॉसिल किया है..

REGIONAL CH SHARE WEEK-12,2014
(16th Mar'14- 22nd Mar'14)

MP COM MARKET
1- BANSAL-31.8% (25.3%),
2- SAMAY MP-28.7%(31.0%),
3-ZEE MP-21.0%(21.3%),
4-India N. MP-12.7%(13.2%),
5-IBC 24-5.7% (9.2%),
(Note-Last week Share in bracket)

कड़ी प्रतिस्‍पर्धा के बीच धीमे- धीमे लेकिन मजबूती से लक्ष्‍य की तरफ बढ़ने वाले इस चैनल ने यह बताया है कि लंबे-चौड़े दावे करने से बचते हुए सादगी और ईमानदारी से टीम वर्क के साथ काम करने पर लक्ष्‍य भले ही देर से मिले लेकिन मिलता जरूर है. बंसल न्‍यूज चैनल को बहुत बहुत बधाई.''

निवेशकों का पैसा लौटाने के लिए लेमन टीवी और चैनल वन से नासिर खान का हिस्सा बेच दे सीबीआई : नांबियार

भड़ास के पास न्यूज एक्सप्रेस समूह में कार्यरत प्रदीप नांबियार ने कुछ दस्तावेज भेजे हैं. ये वही नांबियार हैं जो पहले कभी लेमन टीवी और चैनल वन में हुआ करते थे, और इन चैनलों के मालिक जहीर अहमद के बहुत करीबी हुआ करते थे. तब ये दोनों मिलकर साझा आपरेशंस किया करते थे. नांबियार अब आजकल लेमन टीवी, चैनल वन और जहीर अहमद के खिलाफ तरह-तरह से मोर्चा खोले हुए हैं.

नांबियार का कहना है कि वे उन निवेशकों की लड़ाई लड़ रहे हैं जिनका पैसा नासिर खान ने डुबा दिया है. नांबियार के मुताबिक नासिर खान का जो पैसा लेमन टीवी और चैनल वन में लगा है, उसको बेचकर सीबीआई निवेशकों को उनका पैसा लौटा सकती है. नांबियार द्वारा भेजे गए दस्तावेज में एक तो 25 करोड़ रुपये के चेक की छाया प्रति है जिसके बारे में बताया गया है कि यह नासिर खान ने जहीर अहमद को दिया है, लेमन टीवी में 70 फीसदी हिस्सेदारी की खातिर.

बोर्ड की मीटिंग में पारित प्रस्ताव की प्रति भी है जिसमें नासिर खान को लेमन टीवी का चेयरमैन घोषित किया गया है. नासिर खान वही शख्स हैं जिन पर निवेशकों के पांच सौ करोड़ रुपये डुबाने के आरोप हैं. तीसरा दस्तावेज सीबीआई को भेजी गई एक चिट्ठी है. इन तीनों में आपसी क्या तालमेल है और किस मकसद से ये भेजा गया है, इसे खुद पढ़िए और जानिए. अगर इन दस्तावेजों पर किसी को कुछ कहना, भेजना, बताना है तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें.


नांबियार ने fox.skyglobalmedia@gmail.com मेल आईडी से उपरोक्त दस्तावेज भेजकर जो कुछ बातें ब्रीफ में कही हैं, वो इस प्रकार हैं…

Dated 24/3/14

Dear Yashwant

Attached herewith:

1] CBI complaint : Complaint to CBI- Zaheer Ahmed cannot sell channel, dilute stake in Lemon TV and Channel One..

2] copies of cheques 25 crore : Cheque copies attached- 25 crores given to Zaheer Ahmed by Nasir Khan for 70 % stake in Lemon TV..

3] Board resolution : copy of Board resolution making Nasir Khan – chairman of Lemon TV..

4] Nasir Khan was Chairman of Fine Indisales also which duped investors of 500 crores..

5] As the channels belong to Nasir Khan- CBI has been requested to take possession of both channels..

6] CBI should also attach the properties of both Zaheer Ahmed and Arif Ahmed, and pay back the investors who have lost money..

राजस्थान पत्रिका में तबादला महाकुंभ, कई संपादक बदले

राजस्थान पत्रिका में तबादला महाकुंभ चल रहा है। पत्रिका में राजस्थान के सभी संपादकों को हटा दिया गया है। अजमेर के चीफ रिपोर्टर अमित वाजपेयी को कोटा का संपादक बनाया गया है। वे भुवनेश जैन के करीबी हैं इसलिए पहली पोस्टिंग में ही बड़ी ब्रांच दी गई है। गौरव जैन को भीलवाडा, अरविंद मोहन को पाली, उपेन्द्र शर्मा को बीकानेर, सिकंदर पारीक को बांसवाडा, ज्ञानेश उपाध्याय को अजमेर, अनिल कैले को सीकर, प्रदीप शेखावत को अलवर, राजेश कसेरा को जोधपुर का संपादक बनाया गया है।

इसमें से अरविंद मोहन को बांसवाडा से पाली भेजा गया है। अनिल केले को अलवर से सीकर भेजा है। प्रदीप शेखावत को जोधपुर से अलवर लगाया गया है। भीलवाडा के संपादक जयप्रकाश सिंह और कोटा के संपादक रहे संदीप राठौड को प्रबंधकीय प्रशिक्षण के लिए भोपाल भेजा गया है। दोनों ही पत्रिका में सफल संपादक रहे हैं। भीलवाडा संस्करण की हालात खराब थी और जयप्रकाश सिंह ने उसमें जान फूंकने का काम किया है। ऐसा ही काम संदीप राठौड ने कोटा में किया है। कोटा का एडीशन हमेशा पिटा हुआ माना जाता था जो अब पत्रिका के श्रेष्ठ एडीशन में शामिल हो गया है।

आपसी सिर-फुटौव्वल ने भाजपा का बनता राजनीतिक खेल बिगाड़ा

एक तरफ भाजपा के रणनीतिकार यह प्रचार करने में जुटे हैं कि पूरे देश में मोदी के पक्ष में हवा बहने लगी है। इसको लेकर जीत के बड़े-बड़े दावे भी पेश किए जा रहे हैं। देशभर में घूम-घूमकर नरेंद्र मोदी रैलियों में विपक्षी दलों पर जमकर निशाने साध रहे हैं। उनकी रैलियों में खूब भीड़ भी जुट रही है। लेकिन, पार्टी के अंदर जगह-जगह टिकटों को लेकर जो बवाल शुरू हुआ है, वह शांत होने का नाम नहीं ले रहा। यहां तक कि बड़े नेताओं के बीच के अंतर विरोध भी सिर उठाने लगे हैं।

पार्टी की अंदरूनी कलह इतनी बढ़ गई है कि कई प्रदेशों में आशंका होने लगी है कि आपसी सिर-फुटौव्वल कहीं भाजपा का बनता राजनीतिक खेल न बिगाड़ दे। तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा के पितामह माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी नेतृत्व की रीति-नीति से अंदर ही अंदर दुखी हैं। कभी-कभार इस असंतोष की कसक झलक भी जाती है। वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज कर्नाटक में हुए कुछ फैसलों से दुखी हैं। अपना दुख वे ट्वीटर संदेशों में जाहिर भी करती रही हैं।

पार्टी में टिकटों के झमेले की शुरुआत आडवाणी की टिकट को लेकर ही हुई थी। मोदी का रुख देखकर इस बार आडवाणी, गांधीनगर की जगह भोपाल से चुनाव लड़ना चाहते थे। इनकी नाराजगी इस बात को लेकर भी रही है कि उनका चुनावी टिकट पहले फाइनल नहीं किया गया। टिकटों की चार सूचियां निकलने के बाद भी सस्पेंस बनाए रखा गया। इसी के बाद उन्होंने भोपाल से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी। तब नेतृत्व ने दबाव बनाया कि वे भोपाल की जगह गांधीनगर से ही चुनाव लड़ें। क्योंकि भोपाल से चुनाव लड़े, तो इसको लेकर मीडिया में अंदरूनी तकरार के तमाम किस्से प्रचलित कर दिए जाएंगे। जबकि, आडवाणी का तर्क यही था कि जब मोदी को उनकी मनचाही वाराणसी सीट से लड़ाया जा सकता है, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को उनकी चाहत के अनुसार लखनऊ सीट दी जा सकती है, तो उन्हें भोपाल सीट क्यों नहीं मिल सकती? इसको लेकर पार्टी के अंदर दो-तीन दिनों तक राजनीतिक थुक्का-फजीहत की स्थिति बनी रही थी।

यह अलग बात है कि आडवाणी गांधी नगर से चुनाव लड़ने को तैयार हो गए हैं। लेकिन, अंदर की सच्चाई यही मानी जा रही है कि आडवाणी, नेतृत्व की रीति-नीति से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए हैं। उन्हें इस बात की खास कसक है कि इस समय पार्टी के सभी महत्वपूर्ण फैसले मोदी केंद्रित ही हो गए हैं। जबकि, पहले ऐसी परंपरा नहीं रही। यह जरूर है कि इस दौर में आडवाणी अपने को विवादों से दूर रखने की कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं। विवादों से बचने के लिए ही इन दिनों इस बुजुर्ग नेता ने मीडिया से भी दूरी बना ली है। लेकिन, उनकी इस चुप्पी में भी नाराजगी के संकेत ढूंढेÞ जा रहे हैं।

पूर्व रक्षा मंत्री जसवंत सिंह वरिष्ठ नेता हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उनकी महत्वपूर्ण राजनीतिक हैसियत रही है। उन्हें आडवाणी का खास करीबी माना जाता है। इस करीबी के कारण उन्हें नेतृत्व की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है। ये बात जसवंत सिंह ने मीडिया से स्वीकार भी की है। जसवंत अब बागी तेवरों में उतर आए हैं। वे अपने गृह क्षेत्र बाड़मेर से टिकट मांग रहे थे। उन्होंने कहा था कि वे जीवन का आखिरी चुनाव लड़ने जा रहे हैं, ऐसे में उन्हें अपने गृह क्षेत्र बाड़मेर से ही टिकट दे दिया जाए। लेकिन, राजस्थान की राजनीति में जसवंत और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के आपसी रिश्ते अच्छे नहीं हैं। ऐसे में, वसुंधरा ने पूरा जोर लगा दिया कि बाड़मेर से जसवंत को टिकट न मिल पाए, यही हुआ भी। नेतृत्व ने यहां से कर्नल चौधरी सोनाराम को टिकट दे दिया। सोनाराम कांग्रेस से भाजपा में आए हैं। इस फैसले से जसवंत सिंह भड़क गए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भी भर दिया है।

कह दिया है कि अब भाजपा में असली-नकली नेतृत्व की लड़ाई शुरू हो गई है। पार्टी में बाहर से आए नेताओं ने अतिक्रमण कर लिया है। इसीलिए, वे विरोध में उतर आए हैं। शुरुआत में दबाव बनाया जा रहा था कि जसवंत विद्रोह का झंडा न उठाएं। लेकिन, चुनावी पर्चा भरने के बाद भी उन पर अब तक अनुशासन का डंडा नहीं चलाया गया। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता अरुण जेटली कहते हैं कि अभी उम्मीद है कि शायद वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भरा पर्चा वापस ले लें। यदि वे पर्चा वापस नहीं लेंगे, तो फिर उन पर अनुशासन का डंडा जरूर चलेगा। भाजपा के हल्कों में माना जा रहा है कि जसवंत की नाराजगी का असर प्रदेश की कई सीटों पर पार्टी की लुटिया डुबवा सकती है।

पार्टी के रणनीतिकार उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 सीटों पर खास उम्मीद लगाए बैठे हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा के पक्ष में जो हवा बह रही है, उसके चलते इन दोनों प्रदेशों में जमकर ‘कमल’ खिलेगा। लेकिन, टिकटों को लेकर इन दोनों प्रदेशों में भी कई नेता नाराज बने हुए हैं। बिहार के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे, राम विलास पासवान की एंट्री का विरोध करते रहे हैं। राजद से भाजपा में आए रामकृपाल यादव की एंट्री से भी वे नाराज रहे हैं। उनके तमाम विरोध के बावजूद पार्टी ने उन्हें पाटलिपुत्र क्षेत्र से टिकट भी थमा दिया है। गिरीराज सिंह वरिष्ठ नेता हैं। मोदी के मुद्दे पर वे वर्षों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पंगा लेते आए हैं। उनकी पहचान मोदी के प्रबल समर्थक के रूप में रही है। लेकिन, यह मोदी भक्ति भी उनके ज्यादा काम नहीं आई। वे बेगूसराय से चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन, पार्टी ने नवादा क्षेत्र से टिकट थमा दिया। दो दिन तक वे नाराज रहे थे। अब उन्होंने दुखी मन से यह फैसला स्वीकार कर लिया है। लेकिन, उनके करीबी लोग कह रहे हैं कि इस फैसले से गिरीराज का दुख बना हुआ है।

बिहार में ही बक्सर क्षेत्र की टिकट को लेकर बड़ा बवाल हो गया है। बुजुर्ग नेता लालमुनि चौबे को इस बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया। चौबे यहां से कई बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। वे अटल बिहारी वाजपेयी के खास करीबी नेताओं में माने जाते थे। टिकट न मिलने पर लालमुनि भड़क गए हैं। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को खुलकर कोसा है। यहां तक कह दिया कि वे गुलामों के नेता हैं। गुस्साए चौबे ने तो अल्टीमेटम दिया है कि वे लखनऊ से चुनाव लड़कर राजनाथ सिंह को दिक्कत में डाल सकते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद चौबे बक्सर से निर्दलीय उम्मीदवार बनने की जिद पर अड़े हैं। वे तो मोदी को भी हवा का नेता कहने से नहीं चूक रहे।

गुजरात में अहमदाबाद पूर्व की सीट को लेकर टंटा खड़ा हो गया है। सात बार सांसद रहे हरेन पाठक को इस बार टिकट नहीं दिया गया। क्योंकि, उनका मोदी टोली से तालमेल अच्छा नहीं रहा। हरेन, आडवाणी के ज्यादा करीबी रहे हैं। टिकट कटने की एक वजह यह भी मानी जा रही है। उन्होंने विद्रोह का अल्टीमेटम जरूर दिया था। लेकिन, राजनाथ सिंह ने उनसे मुलाकात करके समझाने की कोशिश की है। हरेन पाठक क्या फैसला करेंगे? इस बारे में उन्होंने खुलासा नहीं किया। उनकी भावी राजनीति के बारे में सस्पेंस बरकरार है। लखनऊ की सीट को लेकर भी लालजी टंडन नाराज रहे हैं। इस बार उनकी सीट छीनकर राजनाथ सिंह को दी गई है। इसको लेकर वरिष्ठ नेता टंडन कई दिनों तक ‘कोपभवन’ में रह चुके हैं। पार्टी भले यह दावा करे कि टंडन जी को मना लिया गया है। लेकिन, वे अपनी नाराजगी की झलक दिखाने में चूकते नहीं हैं।

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी भी अपनी वाराणसी सीट को लेकर अटक गए थे। वे इस बार भी वाराणसी से चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन, यहां पर मोदी को लड़ाने की रणनीति तय हुई। इसको लेकर कई दिनों तक मुरली मनोहर जोशी भी गुस्से में दिखाई पड़े थे। अब उन्हें कानपुर से चुनाव लड़ाया जा रहा है। लेकिन, उनकी नाराजगी का प्रकरण आज भी भाजपा में चर्चा का विषय है। मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की पहचान भगवा साध्वी की है। तेज-तर्रार उमा को इस बार झांसी से टिकट दिया गया है। लेकिन, भाजपा में यह चर्चा चली थी कि उमा झांसी की जगह भोपाल से चुनाव लड़ना चाहती हैं। इसको लेकर उमा खफा रही हैं। उन्होंने दो दिन पहले ग्वालियर में आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश भाजपा के नंबर-1 नेता ने ही इस तरह की खबर साजिश के तौर पर प्लांट कराई है। भाजपा के हल्कों में माना जा रहा है कि उमा भारती ने यह इशारा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर किया है। उल्लेखनीय है कि चौहान और उमा भारती के बीच लंबे समय से आपसी रिश्ते खराब रहे हैं।

इस बीच उमा भारती को झांसी की बजाए सोनिया गांधी के मुकाबले राय बरेली से लड़ाने की चर्चा तेज हुई है। इसकी पहल योग गुरू बाबा रामदेव कर चुके हैं। पार्टी नेतृत्व उमा भारती को राय बरेली से चुनावी जंग लड़ने के लिए तैयार करा रहा है। लेकिन, शिवराज सिंह चौहान की लॉबी को शायद ही यह रास आए कि राष्ट्रीय नेतृत्व उमा को ज्यादा महत्व दे? कई प्रदेशों में भाजपा के अंदर टिकटों को लेकर आपसी मारामारी तेज है। यहां तक कि मोदी की मनुहार भी काम नहीं आ रही। सूत्रों के अनुसार, लालमुनि चौबे को नरेंद्र मोदी ने बुधवार को फोन किया था। उन्हें 10 मिनट तक फोन पर समझाया। लेकिन, बुजुर्ग नेता ने अपनी जिद छोड़ने के संकेत नहीं दिए। वे तो गुस्से में कह रहे हैं कि कम से कम तीन सीटें हरवाकर भाजपा नेतृत्व को मजा चखाकर ही रहेंगे।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

वीरेन डंगवाल का नया पता- इंदिरापुरम, गाजियाबाद (दो नई कविताएं और डायरी के कुछ अधूरे पन्ने)

मशहूर कवि, पत्रकार और शिक्षक डा. वीरेन डंगवाल का नया पता गाजियाबाद स्थित इंदिरापुरम है. यहां के अहिंसा खंड में स्थित जयपुरिया सनराइज ग्रीन अपार्टमेंट स्थित अपने छोटे बेटे प्रफुल्ल के घर पर रह रहे हैं. इसके पहले वे दिल्ली के दूसरे छोर पर स्थित तीमारपुर में अपने बड़े बेटे प्रशांत के यहां रहा करते थे. जीवन का ज्यादातर समय बरेली में गुजारने वाले वीरेन डंगवाल डेढ़ साल से कैंसर की चपेट में होने के कारण लगातार दिल्ली रहने को मजबूर हैं. कैंसर के इलाज के लिए उन्हें गुड़गांव जाना पड़ता है.

रेडियोथिरेपी, कीमियोथिरेपी, आपरेशन्स आदि के कई-कई दौर गुजरने के बाद भी अभी इन इलाजों से मुक्ति नहीं मिली है. इसका नतीजा यह हुआ है कि वीरेन डंगवाल का पूरा शरीर बेहद कमजोर, जर्जर और बदहाल हो गया है. वजन 45 किलो रह गया है. कोई लंबे समय बाद उन्हें देखे तो पहचान न सके.

पिछले दिनों जब एक सेमिनार में शिरकत करने के वास्ते चंदौली में था वीरेन दा का एक मैसेज आया, नए पते को लेकर. दिल्ली लौटने के अगले रोज इंदिरापुरम चल पड़ा, मित्र राजीव का साथ लेकर. आठवें माले पर स्थित आवास में पहुंचा तो प्रफुल्ल ने वीरेन दा के बारे में बताया कि वे आज कीमियोथिरेपी से लौटे हैं, सो रहे हैं. मैंने प्रफुल्ल से कहा कि दादा को न जगाएं. भाभी जी कोने में बैठी हुईं धीरे धीरे आवाज में मोबाइल पर किसी से बात कर रहीं थीं, मैंने जाकर चरण स्पर्श किया.

थोड़ी ही देर में वीरेन दा की नींद उचट गई, जैसे उन्हें आहट हो गई हो कि कोई उनसे मिलने आया है. प्रफुल्ल ने उन्हें बताया- यशवंत आए हैं. वीरेन दा ने वहीं से पुरानी चिरपरिचित शैली में हांक लगाए- आ जाओ बेटे… जस्सू…!.  अंदर उनके कमरे में गए तो वीरेन दा को देखकर हतप्रभ रह गया. इतना दुबला और इतना कमजोर उन्हें मैंने कभी नहीं देखा था. मन ही मन सोचने लगा, कब होगा इस इलाज का अंत जो लगातार इन्हें कमजोर बनाता जा रहा है.

वीरेन दा इस बेहद बुरी स्थिति में भी अपनी वही पुरानी स्टाइल और वही पुराना प्रेम भरा व्यक्तित्व सामने रखे हुए थे लेकिन मेरा मन दुखी हो चुका था. वीरेन दा ने कई बातें, चर्चाएं शुरू कीं. अपनी दो नई कविताओं के बारे में बताया जिसे संजय जोशी ले गए हैं. कुछ अन्य कविताएं भी संजय ले गए हैं. अपल के बारे में बाते जिन्होंने कभी उनकी एक तस्वीर ली थी और उसे मढाकर भिजवाया. मैं उठकर उस मढ़ी हुई तस्वीर को देखा. तस्वीर में जो वीरेन दा दिख रहे हैं और अभी जो वर्तमान में वीरेन दा हो गए हैं, दोनों में बहुत फर्क या यूं कहें कि जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है. जीते जी खुद की ही तस्वीर यादों सरीखी लगने लगे, इसे अच्छी बात मानूं या बुरी बात कहूं, मैं तय नहीं कर पा रहा था.

वीरेन दा ने डायरी दिखाई. वो आजकल डायरी लिखने लगे हैं. मैंने डायरी के कुछ पन्नों की तस्वीरें लीं. उन्होंने खुद की तस्वीर न लेने का अनुरोध किया. मैंने तुरत कहा, दादा अब इस हालत में आपकी तस्वीर बिलकुल न लूंगा. असल में मेरी एक खराब आदत है कि जब भी किसी से मिलने जाता हूं, जिससे प्रेम है, तो उसकी तस्वीर लेने लगता हूं. जब अस्पताल में वीरेन दा भर्ती थे तो उस वक्त भी उनकी तस्वीर ली थी.

डायरी के पन्नों को वीरेन दा पढ़ने को कहने लगे. मैं पढ़ता गया. सोचता रहा और कहा भी कि आप डायरी खूब लिखिए, डबल फायदे हैं, खुद को एक्सप्रेस कर सकेंगे, इस मनःस्थिति की अभिव्यक्त कर पाएंगे, हम जैसों के लिए एक अदभुत पठनीय किताब बना देंगे. जब वीरेन दा सामने हों तो उनके लिखे को क्या पढ़ना, उनको जब सशरीर सामने देख रहा हूं तो उस वक्त को पढ़ने में क्या लगाना. उन्होंने हम लोगों को पत्रकारिता के साथ साथ लिखना, जीना, सोचना सिखाया है. विकट से विकट स्थितियों में भी मनुष्य बने रहना सिखाया है. उन्होंने मेरी ढेर सारी कापियां, गल्तियां दुरुस्त की हैं. मेरे कई गुरुओं में से वो एक हैं. उनका प्रेम खांचे में नहीं रहता. आपको अगर वो प्रेम करते हैं तो आपको हर हाल में वो प्रेम करेंगे. आपको प्रेम में ही बदल देंगे, जीना सिखा देंगे, ज़िंदगी के मायने बता देंगे और इस तरह आप खुद ब खुद बिना कहे, बिना निर्देशित हुए अपने आपको गलत से सही की तरफ शिफ्ट कर लेंगे.

वीरेन दा ने पढ़ना नहीं छोड़ा है. वे आजकल प्रेम राणा की नई आई और पहली किताब 'माफ करना हे पिता' पढ़ रहे हैं. मैंने जब कहा कि मुझे दे दीजिए पढ़ने के लिए तो वो बोले- अभी तीन चार रोज लगेंगे खत्म करने में, तब ले जाना. मैं एक किताब लेकर गया था वीरेन दा को देने के लिए. उन्हें बताया और दे दिया. तय हुआ कि अगली बार जब आउंगा तो किताब ले जाउंगा. प्रेम राणा के बारे में वीरेन दा बताने लगे. कैसे इस अदभुत और आत्मस्वामिभानी नौजवान को अमर उजाला में कालम लिखने के लिए राजी कर पाया था. प्रेम राणा के लेखन की भूरि भूरि तारीफ की उन्होंने. मेरे मन में किताब को लेकर उत्सुकता बढ़ गई. उन्होंने बताया कि अभी कुछ ही रोज पहले किताब की पहली प्रति आई है. मैं सोचता रहा कि इस हाल में भी कोई  नई किताबों और नए लेखकों के बारे में इतनी शिद्दत से कैसे सोच सकता है और बातें कर सकता है. जरूर उनके भीतर कुछ अनोखा है, जिसकी परीक्षा ली जा रही है, देखें कब कौन टूटता है, कब कौन हारता है. अभी तक की परीक्षा में वीरेन दा ने हर विकट मुश्किल को परास्त किया है. पर यह परीक्षा कब तक चलेगी, और क्यों इंतनी लंबी चली है ये परीक्षा… सोचता रहा बैठकर. चाय सुड़कते हुए. बीच बीच में वीरेन दा के चेहरे को गौर से देखते हुए. 

पिछले पांच अगस्त को वीरेन दा के जन्मदिन पर एक आयोजन हम लोगों ने किया था. तब वे बीमारी के चक्रव्यूह के मुहाने पर थे. इस साल पांच अगस्त तक के लिए हम लोग मान चले थे कि वे इस चक्रव्यूह को तोड़कर सोल्लास बाहर आएंगे और हम सब मिलकर विजय के ठहाके लगाते, जिजीविषा की जीत के जश्न पर जोरदार हंसी उछालते हुए फिर से पुराने क्रांतिकारी, साहित्यिक, पत्रकारीय दिनों की तरफ लौट चलेंगे. वीरेन दा अब भी तैयार हैं, उम्मीद से लबरेज हैं. कहते हैं कि अभी पांच अगस्त में तो बहुत वक्त है. देखना खा खा कर इत्ता मोटा हो जाउंगा और इत्ता फिट हो जाउंगा कि पहले जैसा हो जाउंगा..

वीरेन दा अपने हलके से टेढ़े हुए मुंह को बार-बार संभालने की कोशिश करते हैं. कीमियोथिरेपी के कारण कफ, खांसी के वार को संभालने की कोशिश में लगे रहते हैं. हम लोगों से बातचीत में कोई संवादहीनता नहीं आने देते हैं. चाय पिलाने के लिए उतावले हो जाते हैं. भाभी जी और बच्चों की तारीफ करते रहते हैं कि इन लोगों ने कितना उनके लिए किया है. मैं भी कुछ न कुछ कहते बोलते हुए उन्हें थोड़ा ढांढस, थोड़ी उम्मीद देने की कोशिश करता रहा लेकिन अपने गुरु को क्या समझाऊं जो खुद सब समझते जानते हैं. आठवें फ्लोर की उनकी खिड़की से गाजियाबाद, नोएडा, दिल्ली का कंकरीट का शहर दिखता है. वे जाने किस बात पर कह पड़ते हैं कि इसी आठ मंजिला से कूद जाऊंगा… ये भी कोई जीना है.. मैं यह सुन कांप गया. कैसा वक्त है जब अच्छे लोग को जीने नहीं दिया जाता… अभी हाल में ही एक साथी खुर्शीद आलम ने कई आरोपों से खिन्न होकर कूद कर जान दे दी थी. अब बीमारी से परेशान वीरेन दा ऐसी बातें कर रहे हैं… उफ्फ… मैं भी क्या क्या सोचा करता हूं.. मैंने अपना सिर झटक दिया.. जाने क्या क्या समझाने की कोशिश करने लगा वीरेन दा को… वीरेन दा भी गंभीरता भांपकर हंसने मुस्कराने लगे…

मैं वीरेन दा के सामने खुद को हमेशा मूर्ख किस्म का बालक ही मानता रहा हूं. और, सच कहूं तो हूं भी यही. विद्वानों की संगत कभी रास न आई और विद्वान बनने का शौक कभी चर्राया नहीं. सपाट और बेबाक स्वभाव के कारण स्वभाव में अराजकता व दुस्साहस का मिश्रण ज्यादा रहा. जो पसंद आए उन्हें भरपूर पसंद किया. वीरेन दा उन्हीं में से हैं. जितने बेहतरीन मनुष्य हैं, उससे बड़े कवि हैं. उनकी कविताएं न सिर्फ समझ में आती हैं बल्कि भीतर तक धंस जाती हैं, देर तक सम्मोहित करती हैं, सीखने व बदलने को प्रेरित करती हैं. अभी 'कबाड़खाना' ब्लाग पर देखा उनकी वो दो नई कविताएं प्रकाशित हैं जिनका जिक्र वो कल कर रहे थे. उन्हीं दोनों को यहां प्रकाशित करते हुए उनकी डायरे के कुछ पन्नों की तस्वीरें भी दे रहा हूं.. और, एक अनुरोध भी कि आप सभी दुआ करें कि अप्रैल महीने में होने वाली तीन-चार कीमियोथिरेपी के बाद अब कोई कीमियोथिरेपी की जरूरत उन्हें न पड़े और पांच अगस्त तक वह भले चंगे होकर अपने जन्मदिन के जश्न में हम सब के साथ बेहद प्रसन्न मन से शरीक हों.


कविता

-वीरेन डंगवाल-

एक…

पिछले साल मेरी उम्र 65 की थी
तब मैं तकरीबन पचास साल का रहा होऊंगा
इस साल मैं 65 का हूँ
मगर आ गया हूँ गोया 76 के लपेटे में.

ये शरीर की एक और शरारत है.
पर ये दिल, मेरा ये कमबख्त दिल
डाक्टर कहते हैं कि ये फिलहाल सिर्फ पैंतीस फीसद पर काम कर रहा है
मगर ये कूदता है, भागता है, शामी कबाब और आइसक्रीम खाता है
शामिल होता है जुलूसों में धरनों पर बैठता है इन्कलाब जिंदाबाद कहते हुए
या कोई उम्दा कविता पढ़ते हुए अभी भी भर लाता है इन दुर्बल आखों में आंसू
दोस्तों – साथियों मुझे छोड़ना मत कभी
कुछ नहीं तो मैं तुम लोगों को  देखा करूँगा प्यार से
दरी पर सबसे पीछे दीवार से सटकर बैठा.

दो….              

शरणार्थियों की तरह कहीं भी
अपनी पोटली खोलकर खा लेते हैं हम रोटी
हम चले सिवार में दलदल में रेते में गन्ने के धारदार खेतों में चले हम
अपने बच्चों के साथ शरद की भयानक रातों में
उनके कोमल पैर लहूलुहान महीनों चले हम

पैसे देकर भी हमने धक्के खाये  
तमाम अस्पतालों में
हमें चींथा गया छीला गया नोचा गया
सिला गया भूंजा गया झुलसाया गया
तोड़ डाली गईं हमारी हड्डियां
और बताया ये गया कि ये सारी जद्दोजेहद
हमें हिफाजत से रखने की थीं.

हमलावर चढ़े चले आ रहे हैं हर कोने से
पंजर दबता जाता है उनके बोझे से
मन आशंकित होता है तुम्हारे भविष्य के लिए
ओ मेरी मातृभूमि ओ मेरी प्रिया
कभी बतला भी न पाया कि कितना प्यार करता हूँ तुमसे मैं .
 


वीरेन दा के साथ बैठ कर, उनकी बातें कर मुझे अमर उजाला, कानपुर के वे उजले दिन जरूर याद आते हैं जिसमें उनसे हर पल पत्रकारीय पाठ सीखने के साथ मस्ती, संघर्ष, सपोर्ट, उन्मुक्तता, जीवंतता, मनुष्यता को समझने जीने की भरपूर संभावना हुआ करती थी, और हम लोग अपने अपने रिसीविंग कैपासिटी के हिसाब से इसे ग्रहण करते, समझ पाते, अपनाते थे. आज वीरेन दा मुश्किल में हैं. उनकी सेहत ने उन्हें थका-सा दिया है. तब उनके लिए बहुत सारी दुवाओं की जरूरत है. भरपूर स्नेह और समर्थन की जरूरत है. उम्मीद है हम सब मिलकर उन्हें अपनी सामूहिक प्रार्थनाओं और साझा प्रेम के जरिए स्वस्थ करा पाएंगे.

लेखक यशवंत अमर उजाला, कानपुर में वीरेन डंगवाल के संपादकत्व वाले दिनों में प्रशिक्षु उपसंपादक के रूप में कार्य कर चुके हैं. इन दिनों भड़ास से जुड़े हुए हैं.


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कविता की कुलीन दुनिया में कभी शामिल नहीं हुआ

कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद की गंदी मानसिकता

Muhammad Naved Ashrafi : कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद ने बौखलाहट भरे अंदाज़ में अपनी जंगली मानसिकता का सुबूत दिया है। वो नरेंद्र मोदी जी को जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। उनकी कड़ी निंदा होनी चाहिए… और निंदा ही क्यूँ उनसे चुनाव में लड़ने के अधिकार तुरंत छीन लिए जाने चाहिए !!! मोदी इसलिए दोषी हैं क्यूंकि गुजरात के ख़ूनख़राबे में उनकी भूमिका रही है लेकिन अब जो काम मसूद साब अंजाम देने की बात कर रहे हैं वो क्या है।

कुछ भी करो लेकिन "ख़ूनख़राबा" न करो… शोषण न करो !!! कॉमनवेल्थ के ईंट, पत्थर, सीमेंट सब खा जाओ, करूणानिधि बनकर भ्रष्टाचार के महारत्न बन जाओ मगर ऐसे माहौल पैदा न करो जिसमें किसी गर्भवती माँ के पेट को चीरकर अजनमे मानव अंकुर को तुम्हारे तुच्छ राजनैतिक हवस के लिए चीथड़ो-चीथड़ो कर दिया जाए !!

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Mohammad Anas : परसों ही इमरान मसूद से मेरी फोन पर बात हो रही थी। राहुल गांधी कल सहारनपुर में रैली को संबोधित करेंगे। इमरान को जब मैंने फोन किया तो उन्होंने मुझसे नमस्ते किया। मैंने कहा, भाई नमस्ते मैं अनस हूं. मोहम्मद अनस. तो उन्होंने सलाम किया। इतना तो मुझे भी पता है कि उन्होंने मोदी के लिए अपशब्द इस्तेमाल किए हैं, हिन्दू के लिए नहीं। जिस पश्चिम में सुरेश राणा, संगीत सोम जैसे दंगाई और हत्यारे को मंच पर सजा कर भाजपा नारेबाजी करती है, टिकट देती है उसमे और इमरान मसूद में बहुत फर्क है। सपा छोड़ कर कांग्रेस में शामिल इमरान मसूद अगर यह सब न बोलते तो और भी अच्छा होता। अब मोदी अगले दो हफ़्तों या फिर पूरे चुनाव तक हिन्दुओं को इमरान मसूद के नाम से डराने और मोबलाईज करने का काम करेंगे। मुसलमानों को मोदी से इमरान मसूद नहीं बचा सकते। मोदी से सिर्फ इस देश के हिन्दू ही बचा सकते हैं।

मुहम्मद नावेद अशर्फी और मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

एसएन विनोद और नवीन कुमार की नौकरी बची, इनके लाए कई लोगों की गई

जिया न्यूज से खबर है कि एसएन विनोद और उनके खासमखास नवीन कुमार की नौकरी तो बच गई है लेकिन उनके द्वारा लाए गए कई लोगों की नौकरी जा चुकी है. जिया न्यूज इन दिनों युद्द का अखाड़ा बन चुका है. धीरज नामक प्रबंधन के एक आदमी नोएडा आफिस में बैठकर अपने हिसाब से चैनल चलाते हैं. जेपी दीवान की अपनी टीम और स्टाइल है. ज्वाय सेबस्टियन के लोग भी इस चैनल में हैं.

अब एसएन विनोद और नवीन कुमार का ग्रुप चैनल में हावी होने की कोशिश कर रहा है. पर इन शुरुआती कोशिशों की प्रबंधन ने हवा तब निकाल दी जब इनके द्वारा लाए गए कई लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. खुद एसएन विनोद और नवीन कुमार को चैनल से निकाले जाने की चर्चाएं चैनल के भीतर जोरों पर थी. एसएन विनोद नागपुर गए और वहां से लौटकर आए तो पता चला कि वे लोग अब भी चैनल में यथावत कायम है.

उधर, जिया न्यूज प्रबंधन से जुड़े धीरज पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार ने समुचित कार्रवाई न होने पर महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग जाने की चेतावनी दी है. यह भी आरोप है कि प्रबंधन महिला पत्रकार को नौकरी से निकालने की तैयारी में जुटा है. वहीं कुछ पत्रकार काम कराकर अचानक नौकरी से निकाल दिए जाने को लेकर धरना प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं. इनका कहना है कि प्रबंधन ने नोटिस दिए बगैर अचानक उन्हें आफिस आने से मना कर दिया जो श्रमिक कानूनों के खिलाफ है.

चर्चा है कि एसएन विनोद और नवीन कुमार की पारी जिया न्यूज में महीने दो महीने से ज्यादा की नहीं है. चैनल के मालिक जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा निवेश कराने के फिराक में हैं. इसी उद्देश्य के तहत लोगों को लगातार चैनल के साथ जोड़ा जा रहा है. जिन दावों के जरिए लोग चैनल में आ रहे हैं, वो दावे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जा रहा है. कुछ बड़बोले लोग भी इसी तरह के कई दावों के आधार पर चैनल के हिस्से बने हैं. हालांकि उनका बड़बोलापन पिछले कई चैनलों में काम नहीं आया औ उन्हें एक एक कर छोटे बड़े कई चैनलों से बड़े बेआबरू होकर रुखसत होना पड़ा.

वहीं, चैनल को बेचने के लिए भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. चर्चा जोरों पर है कि चैनल का एक खरीदार मिल गया है और वो अगले महीने से अपनी टीम लेकर नोएडा आफिस में बैठना शुरू कर देगा. तब चैनल उसी के हिसाब से चलाया जाएगा. फिलहाल तो जितनी मुंह उतनी बातें हैं. किराए के लाइसेंस पर चल रहे जिया न्यूज के मालिकों को लेकर भी कई तरह की नकारात्मक खबरें आ रही हैं. देखते हैं जिया के जियरा को चैन कब मिलता है.

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दीपक चौरसिया धूल चाटने लगे, शैलेष बने नए टीआरपीबाज संपादक, विनोद कापड़ी लापतागंज में

दीपक चौरसिया का इंडिया न्यूज जब जी न्यूज को भी पीछे छोड़कर नंबर चार का चैनल बन गया तो सभी ने मान लिया कि देश के अब नए सबसे बड़े टीआरपीबाज संपादक दीपक चौरसिया हैं. लेकिन यह घटनाक्रम, यह सुख, यह उंचाई उन्हें ज्यादा दिनों तक नसीब न हो सकी. दीपक की पेड पत्रकारिता, एजेंडा पत्रकारिता, सुपारी पत्रकारिता के कारण ढेर सारे पढ़े-लिखे दर्शकों ने इस चैनल से मुंह मोड़ लिया. इस कारण चैनल की टीआरपी धड़ाम हो गई है.

आसाराम और केजरीवाल को पूर्वाग्रहग्रस्त होकर लगातार गालियां देकर आखिर कितने दिनों तक टीआरपी चार्ट में अधिकतम उंचाई हासिल हो सकती थी. सो, बुखार उतर गया और चैनल की टीआरपी धूल चाटने लगी. अब देखना है कि दीपक चौरसिया क्या नया प्रयोग करते हैं. उन्होंने एक बड़ा घटिया और सतही किस्म का प्रयोग किया, एक चुनावी शो बनाकर, कामेडी नाइट विथ कपिल शर्मा से इंस्पायर्ड होकर. इस शो का भी बाजा बज गया क्योंकि दीपक चौरसिया में न तो कपिल शर्मा टाइप की मौलिकता है और न ही उनके गेस्ट ऐसे प्रभावी थे कि उनको लोग टिक कर रुक कर देखते.

उधर, दीपक चौरसिया के पतन की कहानी के साथ साथ ही शैलेष के उदय का कहानी भी चल रही थी. न्यूज नेशन नामक चैनल को शैलेष ने धीमी गति से लेकिन अच्छी क्वालिटी के साथ आगे बढ़ाया. एक सीरियस, यूथपूल और माडर्न न्यूज चैनल के कांसेप्ट को आगे बढ़ाते हुए शैलेष ने न्यूज नेशन को लोकप्रिय करा दिया. इस चैनल की टीआरपी अब लगातार बढ़ रही है. पिछले हफ्ते ही न्यूज नेशन ने इंडिया न्यूज को पीछे कर दिया था. इस बार 12वें हफ्ते में न्यूज नेशन ने इंडिया न्यूज से काफी मार्जिन से बढ़त ले ली है.

सबसे बड़ा सवाल विनोद कापड़ी को लेकर उठ रहा है. धूम धड़ाके के साथ न्यूज एक्सप्रेस चैनल को लांच कराने वाले विनोद कापड़ी कभी बड़े टीआरपी बाज संपादक कहे जाते थे और अपनी इसी प्रतिभा को लेकर वो न्यूज एक्सप्रेस में आए. उन्हें अपने हिसाब से नियुक्ति करने से लेकर खुद एंकरिंग करने तक की पूरी छूट दी गई. कई अच्छे शो और कुछ शानदार स्टिंग भी उन्होंने किए और दिखाए. पर इतनी कवायद के बाद भी रिजल्ट फिलहाल जीरो ही कहा जाएगा क्योंकि टीआरपी के मामले में यह चैनल टाप ट्वेल्व में नहीं है. इसी कारण चर्चा है कि न्यूज चैनल में रहते हुए भी विनोद कापड़ी इन दिनों टीआरपी के मामले में लापतागंज में हैं.

बताया जा रहा है कि कापड़ी इन दिनों अपनी मर्जी की टीम न्यूज एक्सप्रेस में भरने के बाद उन्हीं के हवाले न्यूज चैनल को करके अपना खुद का पूरा वक्त अपनी आने वाली फिल्म की डबिंग, एडिटिंग, प्रमोशन व डिस्ट्रीब्यूशन में दे रहे हैं. ऐसे में हिट तो किसी एक को ही होना है, फिल्म या न्यूज चैनल. लोग न्यूज चैनल तो देख चुके, अब फिल्म की बारी है.

12वें हफ्ते की टीआरपी इस प्रकार है….

WK 12 2014, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:
Aaj Tak 18.5 up 0.6
ABP News 14.1 dn 0.6
India TV 11.4 dn 1.1
ZN 9.8 dn 0.8
News Nation 9.4 up 1.0
India news 8.5 up 0.2
News24 8.3 up 0.2
NDTV 6.9 dn 0.5
IBN 5.4 same
Samay 3.3 up 0.3
Tez 2.7 up 0.1
DD 1.7 up 0.5

भड़ास के एडिटर यशवंत का विश्लेषण. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

यूपी के विंध्याचल में कवरेज करने गई महिला पत्रकार के साथ गैंगरेप

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्याचल मंदिर के कवरेज के लिए आई एक महिला पत्रकार को कथित रूप से तीन लोगों ने अगवा कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। उत्तराखंड के 'केसरी न्यूज' में कार्यरत महिला पत्रकार मिर्जापुर स्थित विंध्याचल मंदिर में कवरेज के लिए आई थी। वह गुरुवार देर शाम गेरुआ तालाब घूमने गई थी।

उसका आरोप है कि स्कॉर्पियो सवार तीन युवकों ने उसे अगवा कर सुनसान जगह ले गए और सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद आरोपी फरार हो गए। पीड़ित महिला ने देर रात विंध्याचल पुलिस थाने को इसकी जानकारी दी।

स्थानीय थाना प्रभारी सुरेंद्र मिश्रा ने शुक्रवार को संवाददाताओं को बताया कि तीन अज्ञात लोगों के खिलाफ  मामला दर्ज किया गया है। वह घटना में स्थानीय युवक के शामिल होने की संभावना व्यक्त कर रहे हैं।

मिश्रा ने बताया कि पीड़िता को चिकित्सीय जांच के लिए भेजकर, घटना की गहन जांच की जा रही है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, पुलिस ने घटना में इस्तेमाल किया गया स्कॉर्पियो बरामद कर लिया है तथा एक युवक को हिरासत में लिया गया है।

प्रेस क्लब आफ इंडिया की मेंबरशिप देने के लिए पैसे लेने वालों को हराओ

Yashwant Singh : प्रेस क्लब आफ इंडिया में कल वोट पड़ेंगे. यहां जो लोग सत्ता में हैं, उन्हीं का पैनल जीतता हुआ दिखाई पड़ रहा है. लेकिन इस पैनल के लोगों पर कई गंभीर आरोप है. सबसे गंभीर आरोप है पैसे लेकर नए मेंबर बनाने का. खुद मुझसे भी एक पत्रकार ने पैसे मांगे थे प्रेस क्लब का मेंबर बनाने के लिए. राजीव शर्मा से भी एक मैनेजिंग कमेटी मेंबर ने पैसे मांगे थे सदस्य बनाने के लिए.

जब हम लोगों ने पैसे नहीं दिए तो हमारे आवेदन को निरस्त कर दिया गया. कम से कम मैंने तो आवेदन की सारी औपचारिकताएं पूरी कर रखी थीं. मैं दो अखबारों के लिए दिल्ली में काम करता हूं. एक में सलाहकार के बतौर और एक में विशेष संवाददाता के बतौर. दोनों ही अखबारों के लेटर आदि आवेदन के साथ लगा दिए थे. लेकिन जब पैसे की मांग की गई तो मैंने देने से मना कर दिया. ऐसे में प्रेस क्लब के लोगों ने कई तरह की अड़चन पैदा करके मेरे आवेदन को निरस्त करा दिया.

जब इस तरह के भ्रष्टाचारी लोग प्रेस क्लब के मैनेजिंग कमेटी में या पदाधिकारी पद पर रहेंगे तो प्रेस क्लब का भगवान मालिक है. वैसे भी प्रेस क्लब का असली मालिक भगवान ही है क्योंकि लोगों ने प्रेस क्लब को अब पूरी तरह दारू का अड्डा बना डाला है. अराजक और असामाजिक तत्वों का प्रेस क्लब में बोलबाला रहता है. ऐसी स्थिति में वोटिंग को लेकर सतर्क रहें और नए लोगों को मौका दें. ये दो लिंक हैं, इन्हें पढ़ लें…

http://bhadas4media.com/edhar-udhar/18667-2014-03-28-07-35-38.html

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http://bhadas4media.com/article-comment/18666-2014-03-28-07-22-01.html

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट इस प्रकार हैं…

Nevil Clarke Desh mai sab jagah chor hi chor hai

Awadhesh Kumar आपको तो भडास के आधार पर ही सदस्यता मिल जानी चाहिए
 
Yashwant Singh Awadhesh Kumar सर मेरा आवेदन तो पैसे न देने और भड़ास चलाने के कारण ही खारिज कर दिया गया एक वजह ये भी था कि भड़ास वाला मेंबर बन जाएगा तो सारी पोल पट्टी रोज लिखेगा, वैसे तो कभी कभार दारू पीने आता है.. 🙂
 
Ramanjit Singh यशवंत भाई, चंडीगढ़ प्रेस क्लब में भी 30 को मतदान है…
 
Surendra Grover प्रेस क्लब की सदस्यता के नाम पर आपसे जिस पत्रकार/पदाधिकारी ने पैसे मांगे उसका नाम सामने लाइए…
 
Yashwant Singh Surendra Grover जी. मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि उन्होंने पैसे मांगे इशारे से और मैंने नहीं दिया. बस. अगर कोई रिकार्डिंग या स्टिंग वगैरह होता तो जरूर सामने ला देता… हां, इतना शर्तिया कह सकता हूं कि नए लोगों को मेंबरशिप देने में बड़े पैमाने पर पैसे की उगाही की गई है जिसमें उपर से नीचे तक सभी लोग शामिल प्रतीत होते हैं
 
Awadhesh Kumar इसका समुचित उपचार करना होगा
 
Akhilesh Akhil ek dalalnuma patrakar ne hamse bhi kaha thaa ki kuchh kharcha kare to member ban jaye. mai paise kaha se lata. pichhe hat gaya.
 
Yashwant Singh मेरे एक मित्र हैं, उन्होंने तो बाकायदे तीस हजार रूपये मैनेजिंग कमेटी के एक मेंबर को दिए और सदस्यता ले ली. उन्होंने पैसे देते हुए वीडियो भी बना लिया. पर वो इस वीडियो को पब्लिक डोमेन में नहीं डालते. उनका कहना है कि वीडियो छुपा कर रखा जाना ज्यादा डराता है पैसे लेने वाले को, पब्लिक डोमेन में डाल देने पर तो केवल एक बार कस कर चर्चा होगी और सब लोग उसे भूल जाएंगे. मतलब कि वो पत्रकार अब जिंदगी भर डरता रहेगा कि उसका पैसे लेते हुए स्टिंग हो चुका है. मित्र ने वो स्टिंग वाला वीडियो मुझे दिखाया है, इस कसम के साथ कि कभी किसी को आरोपी का नाम न बताऊं. सो, यहां भी वादे से बंधा हूं, इसलिए नाम नहीं बता रहा. पैसे लेने वाले पत्रकार महोदय सीनियर हैं और अंग्रेजी पत्रकार हैं. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. इस वीडियो में वो कह रहे हैं कि ये पैसा पदाधिकारियों में बंटता है.

Kamlesh Sharma Aap bhadas ke members ka club banaiye..online voting..
 
T Kamaal Khan Aap sahi keh rahe hai Yaswant ji….mene bhe press club ki membership ke liye try kiya tha lakin nhe hue…kher aap ek nya club bnaye imandar or acchi chawi ke hum aapke satg hai….iske liye jo kharcha hoga sath mil kar kar lenge….
 
Akhilesh Akhil paise lenden tak hi mamla nahi hai. darjan bhar aise bhai ko mai janta hu jo press club ke sadasya hai lekin patrakarita unka pesha nahi hai.

Trilochan Rakesh डर गए गुरू ।

Anil Attri और गालियां बेचारे नेता खाते हैं….
 
Shravan Kumar Shukla सही कहा… सब एक से बढ़कर एक हरामखोर लोग हैं वहां… अड्डेबाजी के अलावा किसी चीज से मतलब नहीं है उन्हें…

Pradeep Sharma बहुत बड़ा घोल माल है यहाँ…
 
Akhilesh Akhil ghalmel to puri ptrakarita me hi hai.
 
Pradeep Sharma Akhilesh Akhil सर ये भी बात है की गंदे लोगो के साथ अच्छे लोग भी पिस रहे है क्यों की उनके पास कोई रास्ता ही नहीं या तो जॉब छोड़े या कोई दूसरा काम ढूढे शायद खुलासा करने के या टकराने के बजाय ये रास्ता उनको अआसान लगता है।
 
Kamlesh Kumar Singh ''Press Club If Bhadas'' ke bare me ka Vichar h…………Rajya kya Prakhand leval par membership chala jaye….
 
Devang Rathore सर बरेली प्रेस क्लब के भी यही हालात हैं ।
 
Mohd Kamran LUCKNOW PRESS CLUB to sirf PARIVAARIK hi hai…Memebers kab bante hai aur hisaab kitaab kya hai…ALLAH Malik..
 
Anzar Pasha tabhi to journalist ki kahin qadr nahi.

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में दिनेश शर्मा निर्विरोध उपाध्यक्ष चुने गए

दिल्ली में रायसीना रोड पर स्थित प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव को लेकर सक्रियता इन दिनों चरम पर है. जो लोग इस वक्त प्रेस क्लब में सत्ता में हैं, उन्हीं का पैनल जीत का सबसे प्रबल दावेदार है. हालांकि इन लोगों पर कई तरह के आरोप लग रहे हैं. प्रेस क्लब को शराबखोरी का अड्डा बनाते हुए कई तरह के घपले-घोटाले करने के आरोप इन लोगों पर है. कई लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने नए मेंबर बनाने के लिए उनसे पैसे तक लिए हैं.

चुनाव जीतने की खातिर इन लोगों ने चुनाव से ठीक पहले करीब पांच सौ नए लोगों को मेंबरशिप दे दी है ताकि इस वोट बैंक के सहारे जीत की नैया पार कर सकें. रिश्वत देकर मेंबर बनने वाले कई नए लोगों ने वोट सत्ताधारी पैनल के खिलाफ देने का निर्णय लिया है. वहीं, कई अन्य लोग भी इस बार बदलाव के लिए वोट देने की बात कहते सुने गए हैं. सत्ताधारी पैनल की तरफ से जो लोग चुनाव मैदान में हैं, उनमें से उपाध्यक्ष पद पर दिेनेश शर्मा निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं. सत्ताधारी पैनल से कौन-कौन लोग मैदान में हैं, उनकी पूरी लिस्ट इस प्रकार है…

अध्यक्ष : आनंद सहाय

उपाध्यक्ष : दिनेश शर्मा (निर्विरोध चुने गये)

महासचिव : नदीम

संयुक्त सचिव : विनीता यादव

कोषाध्यक्ष : संजय सिंह

प्रबंध समिति :
1. अजय झा
2. अरुण जोशी
3. सीएस लूथरा
4. दिनेश कुमार
5. जेएस कौरा
6. कोमल शर्मा
7. मानस प्रतिम गोहन
8. नमिता टीआई
9. नीरज ठाकुर
10. प्रफुल्ल कुमार सिंह
11. पैसिफिक टंडन
12. राकेश नेगी
13. रवि बत्रा
14. उज्जवल कुमार
15. उमेश कुमार
16. विजय शंकर चतुर्वेदी


Speaker : Anand sahay

Vice President : Dinesh Sharma (elected uncontested)

General Secretary: Nadeem

Joint Secretary : vinita Yadav

Treasurer : Sanjay Singh

managing Committee:

1. Ajay JHA
2. Arun Joshi
3. CS luthra
4. Dinesh Kumar
5. Jaeger Shankar kaura
6. Komal Sharma
7. Manas pratim gohain
8. Namita TI
9. Neeraj Thakur
10. Praful Kumar Singh
11. Pacific Tandon
12. Rakesh Negi
13. Ravi batra
14. Ujjaval kumar
15. Umesh Kumar
16. Vijay Shankar CHATURVEDI


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प्रेस क्लब की पैनल पालिटिक्स : सत्ताधारियों ने चुनाव जीतने के लिए पांच सौ नए मेंबर बना डाले!

प्रेस क्लब की पैनल पालिटिक्स : सत्ताधारियों ने जीतने के लिए चुनाव से ठीक पहले पांच सौ नए मेंबर बना डाले!

प्रेस क्लब आफ इंडिया में चुनाव कल यानि 29 मार्च को है. पैनल के अलावा बिना पैनल भी लोग लड़ रहे हैं. बिना पैनल लड़ने वालों में से महिला पत्रकार करुणा मदान भी हैं. वे कोषाध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं. उनका कहना है कि देश दुनिया में महिलाएं जाने कहां कहां पहुंच गई हैं लेकिन आजतक कोई भी महिला प्रेस क्लब में कोषाध्यक्ष नहीं बन सकी है.

उन्होंने प्रेस क्लब आफ इंडिया की पैनल पालिटिक्स पर कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं. उनका कहना है कि जो लोग प्रेस क्लब में सत्ता में हैं, उन लोगों ने चुनाव से ठीक पंद्रह दिन पहले करीब पांच सौ नए मेंबर बना डाले और इस तरह अपने व अपने पैनल के जीतने का जुगाड़ कर डाला. प्रेस क्लब सदस्यों को लिखे गए करुणा मदान के पत्र को पढ़ें और वोट डालते समय इन बातों को भी ध्यान में रखें…

——– Forwarded message ———-

From: "Karuna Madan" (kar7777in@gmail.com)

Date: 28 Mar 2014 01:32

Subject: Karuna Madan as Treasurer

Dear Member,

Trust you are doing well. As you are aware, the Press Club of India is holding its annual elections this time on March 29, 2014 (Saturday) from 11 am to 6.30 pm, I would like to appeal to you to strengthen my position as Treasurer. I chose the post of Treasurer for some reasons.

Firstly, the Press Club has never seen a woman Treasurer in its long history of 56 years. This is when women are proved world over to be better managers of finance at home and outside.

Secondly, the Press Club has been mired in innumerable controversies over leakages and financial irregularities, particularly in the last ten years or so. All successive committees have failed miserably to plug the leakages and put the finances on track.

Thirdly, I have had the necessary experience of being the office-bearer of the Press Club. Additionally, I have over 18 years of professional experience as a journalist. For your reference, I have been the Vice President and Committee Member of the Press Club in the past. But for some strange reason, women either desisted or were discouraged to contest and hold the office of Treasurer. With your blessings, I would like to break this tradition this time.

Furthermore, the Club is losing its sheen due to 'cheap politics' played by some people who form groups/panels and try to grab all 21 positions so that they can run the Club according to their whims and fancies. The so-called panels do not want genuine, independent candidates to win even a single seat, so that their strategy to run the Club the way they want is not derailed. They do not believe in democracy and want to run the Club without a single strand of Opposition.

My question is – Why should anyone vote for a complete panel of 21 candidates? Why should we not vote for an individual candidate according to his or her capability? Why do these 'panel people' expect the educated journalist class to blindly put a stamp in favour of ALL of their 21 candidates?  

Interestingly, the latest trend is that these people who play panel politics make around 500 members just 15 days or one month before the elections, as part of their strategy to win elections. That is roughly the number you need to win a election in Press Club. I have no issues with making members, in fact, we should make more members, but why just days before elections? Why do they keep the membership pending for the whole year, leaving the poor applicant anxious throughout the year about the status of his membership.

Why cant we give membership earnestly and honestly to all deserving journalists within a reasonable time? Also I think it is very regressive on the part of such people running the Club to assume that all new members will vote for them blindly, without applying their mind and without paying any attention to the individual credentials of the contesting journalists.

If their intentions were indeed genuine to give membership, they should have done that in March or April last year when they got elected. But throughout the year, there is no talk of membership and suddenly few days before elections, memberships are doled out as part of a cunning strategy to blackmail the new members into voting for them.

As an educated class, we must not give in to this kind of blackmailing. Membership is your right, and not a favour given to you by anyone. Having said that, I would like you to vote for the individual candidate and not for any particular group/panel. Yes, I am contesting for the position of Treasurer, but look around, talk to people, make an opinion and vote for me only if you have by that time built confidence in my candidature.

Look forward to meet up this Saturday.

Best.

Karuna Madan

Website: karunamadan.com

Mobile: 9811300601

Email: karunamadan@gmail.com

मोदी तो पहुंच गए हैदराबाद, अब कहां छुप गए ओवैसी जी!

एक है ओवैसी, उसने कहा था कि कुछ समय के लिए पुलिस हटा लो फिर दिखाता हूँ औकात. उसका जबाब सुब्रमन्यम स्वामी ने दिया था की आरोप तो यही है कि गुजरात में हटा तो ली गयी थी पुलिस कुछ समय के लिए. दूसरी बात का जबाब खुद मोदी जी ने बोल कर नहीं बल्कि कर के दिया था. ओवैसी ने कहा था मोदी कभी हैदराबाद आ कर देखे तो दिखाता हूँ. मोदी जी न केवल गए हैदराबाद बल्कि लाखों लोग इकट्ठा भी हुए, वो भी टिकट लेकर. लेकिन सभा से कुछ समय पहले और उसके कुछ समय बाद तक भी सांसद होते हुए भी पता नहीं था कि आखिर छुपे हुए कहाँ थे ओवैसी जी.

अब एक नया नमूना आये हैं सराहनपुर से, कांग्रेस के उम्मीदवार हैं मसूद साहब जो सीधे भद्दी-भद्दी गालियों के साथ मोदी जी की बोटी-बोटी काट देने की बात कर रहे हैं. शायद संयोग ही हो कि मोदी जी की ह्त्या की एक साज़िश का भी साथ ही खुलासा हुआ है. समय चुकि चुनाव का है तो सीधे 'वोट' से ही इन बातों का जबाब दिया जाय तो बेहतर.

डिस्क्लेमर : जिस तरह हिन्दू परिवार में जन्म लिए किसी कांग्रेसी या वामपंथी द्वारा कहे गए शब्द हिन्दुओं का प्रतिनिधि शब्द नहीं हुआ करता उसी तरह ऊपर कही गयी बातों को अपराधियों की बात मानें न कि उसे सम्प्रदाय से जोड़कर इसे देखें. जैसे कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह आदि के हिन्दू परिवार में पैदा होने के कारण हम शर्मिन्दा हैं, वैसे ही मेरे मुस्लिम बंधू भी शर्मिंदा होंगे इन उजअड्डों के उनके मज़हब में पैदा हो जाने से, ऐसा मुझे विश्वास है.

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े पत्रकार पंकज कुमार झा के फेसबुक वॉल से.

पांच करोड़ निवेशकों से 45 हजार करोड़ रुपये ठगने वाला PEARL और PACL का मालिक Nirmal Singh Bhangoo भारत से फरार, मीडिया चुप

Yashwant Singh : पांच करोड़ निवेशकों के पैंतालीस हजार करोड़ रुपये के घोटाले पर न कोई चैनल खबर दिखा रहा और न कोई अखबार फालोअप कर रहा… सब के सब चुप… आरोपी सरदार निर्मल सिंह भंगू विदेश फरार… पैंतालीस हजार करोड़ रुपये का घोटाला करने वाला पर्ल ग्रुप का मालिक Nirmal Singh Bhangoo देश से बाहर जा चुका है. आज से नहीं, जमाने से. उसने अपना सारा कारोबार आस्ट्रेलिया समेत कई देशों में शिफ्ट कर लिया है. भारत में छोड़ दिया है अपने मैनेजरों को.

करीब पांच करोड़ निवेशकों को ठगने वाले Nirmal Singh Bhangoo की गिरफ्तारी और जेल देश की संवैधानिक संस्थाओं के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती है. सबसे बड़ी चुनौती उसे देश लाने और कानून के कठघरे में खड़ा करने की है. सहारा मामले में सेबी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की सक्रियता का नतीजा ये हुआ कि बड़बोले सहारा समूह को औकात में आना पड़ा और सबको मैनेज कर लेने का करिश्मा करने वाले सुब्रत राय सहारा को तिहाड़ जेल जाना पड़ा.

सुब्रत राय के जेल जाने के बाद अब सबकी निगाहें निर्मल सिंह भंगू पर हैं. आखिर पैंतालीस हजार करोड़ रुपये के चिटफंड घोटाले के आरोपी को भारत के पांच करोड़ पीड़ित लोग यूं ही ऐश-ओ-आराम करते देखते रहेंगे या फिर इसे दंड मिलेगा? ज्ञात हो कि इसी ग्रुप का न्यूज चैनल पी7न्यूज नाम से है. इसी ग्रुप की कई मैग्जीन भी हैं, जिनके नाम- शुक्रवार, बिंदिया, मनी मंत्रा आदि हैं. इस ग्रुप के साथ बड़े बड़े संपादक जुड़े हुए हैं. इस मीडिया हाउस का काम अघोषित रूप से अपने मालिक और उनके कुकर्मों को ढंकना छिपाना है. कहीं यही वजह तो नहीं है कि सरकार और सरकारी संस्थाएं कार्रवाई करने से हिचक रही हैं?

इस ग्रुप की महिला मैग्जीन में एक ऐसी वरिष्ठ महिला पत्रकार संपादक हैं जिनके पति एक केंद्रीय मंत्री के न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर हैं. इस तरह जुड़ाव का यह क्रम पीएमओ तक पहुंच जाता है. कहने वाले कहते हैं कि जब उपर से कार्रवाई न करने का अघोषित इशारा हो तो सारी चीजें खुद ब खुद धीरे धीरे मैनेज हो जाया करती हैं. 

पिछले दिनों सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद Pearl Group, PACL, PGF के ठिकानों पर छापेमारी कर इस पैंतालीस हजार करोड़ रुपये के घोटाले का पर्दाफाश किया. लेकिन फिलहाल सब कुछ शांत पड़ गया दिखता है. हम सबको पता है कि बड़ों के मामले में ये संस्थाएं तभी हरकत में आती हैं जब या तो सुप्रीम कोर्ट इन्हें टाइट करे या फिर केंद्र सरकार इन्हें एक्शन लेने की खुली छूट दे दे. पिंजरे के तोता के रूप में कुख्यात सीबीआई पर पूरे मामले को अगर छोड़ा गया तो सब कुछ नष्ट भ्रष्ट हो जाएगा. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता और निवेशकों की जागरूकता बहुत जरूरी है. ये कुछ लिंक इस प्रकरण से संबंधित खबरों के लिए, ताकि हम आप न सिर्फ खुद सजग रहें, बल्कि दूसरों को भी जगा सकें..

'भंगू चिटफंड घोटाले' की रकम 'टूजी स्पेक्ट्रम' और 'कोल ब्लाक घोटाले' से कम नहीं
http://bhadas4media.com/article-comment/18646-2014-03-27-06-16-11.html


पर्ल ग्रुप के 45 हजार करोड़ रुपये के घोटाले में यूपी के 1.3 करोड़ और महाराष्ट्र के 61 लाख निवेशकों का पैसा
http://bhadas4media.com/article-comment/18649-45-1-3-61.html

पीएसीएल ने केरल के हजारों लोगों की खून-पसीने की कमाई को लूटा
http://bhadas4media.com/article-comment/18643-2014-03-27-05-27-30.html


कबड्डी कबड्डी कबड्डी करते हुए पर्ल्स वालों ने अरबों रुपये इधर-उधर कर दिए!
http://bhadas4media.com/print/18642-2014-03-27-05-22-53.html

'पी7न्यूज' चैनल की कंपनियों पीएसीएल, पीजीएफ और पर्ल पर सीबीआई का छापा
http://bhadas4media.com/print/18006-cbi-raid-pacl-and-pgf.html


भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

बुढ़ापे में राजदीप सरदेसाई स्मृति लोप के शिकार होने लगे? देखिए आशा पारिख के बारे में उन्होंने क्या लिखा

Rohini Gupte : मोदी की भक्‍ति और अंबानी की शक्‍ति अगर साथ हो तो इस वक्‍त मुल्‍क की जो फिजा है, कि‍सी का भी दि‍माग फि‍र सकता है। सैकड़ों पत्रकारों की जिंदगी तबाह कर देने वाले आइबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन के एडिटर इन चीफ राजदीप सरदेसाई नाम के अफवाहबाज ने आज गुरुवार को अफवाह उड़ाई कि फि‍ल्‍म अभि‍नेत्री नंदा के अलावा साठ के दशक की मेरी मीठी सहेली आशा पारि‍ख का भी नि‍धन हो गया है।

इसके बाद तो ट्वि‍टर के जंगल में अफवाह आग की तरह फैली और देखते ही देखते ट्रेंड बन गई। पर जब मैंने आशा पारेख का ट्रेंड चेक कि‍या तो पाया कि वहां पर राजदीप सरदेसाई को लोग अच्‍छे से सुना रहे हैं। हालांकि राजदीप ने इसकी माफी दो या तीन बार मांग भी ली है, पर ताकत के नशे में चूर अब फि‍ल्‍मों के बाद क्रि‍केट पर अपना ज्ञान (या अफवाह) बघारने लगे हैं। आप भी ट्वि‍टर पर ट्रेंड हो रहे आशा पारेख पर क्‍लि‍क करि‍ए और देखि‍ए कैसे लोग उन्‍हें सुना रहे हैं…

रोहिणी गुप्ते के फेसबुक वॉल से.

साहब-सेवक संवाद: राम भरोसे बोला आप पत्रकार हो, जरा सोंच समझ कर बोला करो

विवाद कभी खत्म नहीं होते। उन स्थितियों में तो कभी खत्म नहीं होंगे जब दोनों पक्षों में एक भी झुकने को तैयार नहीं हो। इस हफ्ते फिर राम भरोसे से जम कर लड़ाई हुई। मैं कह रहा था कि नेताओं का कोई भरोसा नहीं। उनकी जिंदगी बेहद अनिश्चित होती है। पता नहीं, अगला चुनाव जीतें या न जीतें। राम भरोसे बोला कौन से जन्म की बातें करते हैं। अगर नेता एक्सपर्ट है तो वह चुनाव जीतेगा ही। इस पार्टी में नहीं तो उस पार्टी में ही सही।

विवाद की बात तब शुरू हुई जब मैंने कहा कि नेताओं की कम मुसीबत नहीं होती है। बेचारे अपनी इतनी मेहनत की कमाई चुनाव में खर्च कर देते हैं। जितनी तनख्वाह नहीं मिलती उससे ज्यादा चुनाव में खर्च कर देते हैं। चुनाव में भी इस बात की गारन्टी नहीं होती कि जीत पायेंगे या फिर नहीं जीतेंगे। इसी उधेड़बुन में कब समय बीत जाता है उन्हें पता ही नहीं चलता। जब पता चलता है तब तक चुनाव सिर पर आ चुके  होते हैं। बहुत ही परेशानी भरी जिंदगी है इन नेताओं की।
    
राम भरोसे कुछ पल तो मेरे मुंह की तरफ देखता रहा फिर बोला आपको पत्रकार किसने बना दिया। धेला भर की भी जानकारी नहीं है आपको। या फिर जानकारी होने पर भी भोले बनने की कोशिश करते हैं आप। इन नेताओं को पता है कि राजनीति से अच्छी दुकान कहीं नहीं चल सकती इसलिए सब राजनीति को अपनी दुकान बनाये हुये हैं। बोला आप देख नहीं रहे हैं कि चुनाव से पहले क्या हैसियत होती है और चुनाव जीतते ही सम्पत्ति दस से बीस गुना बढ़ जाती है। भला ऐसा कौन सा कारोबार होगा जिसमें पांच सालों में इतना बढिया टर्न ओवर हो।
    
मैंने
फिर कहा कि कितनी मेहनत करते हैं राजनेता। तब जाकर जीत हासिल होती है। रामभरोसे बोला काहे की मेहनत। सब गुणा-भाग किये रहते हैं। सिर्फ तिकड़मों से चुनाव जीतने की रणनीति बनाये रहते हैं। अगर वास्तव में मेहनत करें तो क्षेत्र का विकास करवा सकते हैं। मगर इन सब बातों से उन्हें मतलब कहां। उन्हें तो बस कहीं से भी चुनाव जीतने का फार्मूला चाहिए जो वह हासिल कर ही लेते हैं।
    
मैंने कहा कि ऐसा नहीं है। अगर सब ऐसा कर लेते तो सब चुनाव जीत जाते। राम भरोसे बोला भले ही सब ऐसा न कर पाते हों। पर अधिकांश लोग तो ऐसा ही करने में जुटे हैं। पांच साल तक सिर्फ अपने क्षेत्र की जनता को मूर्ख बनाते हैं। पैसा कमाने के नये-नये रास्ते ढूंढ़ते हैं और फिर दौलत का बेशुमार ढेर लगाते हैं। मैंने कहा कि इस तरह की बकवास तो कोई भी कर सकता है।
    
पलट कर राम भरोसे बोला कि किसी भी सांसद के बारे में जरा तफसील से मालूम कर लीजिए। सांसद निधि में बीस से पचास प्रतिशत तक कमीशन लेना मामूली बात हो गयी है। इसके अलावा विकास के जो काम आते हैं, उसमें ठेकेदारी नेताजी के लोग करते हैं या फिर उनके कहने पर किसी और को ठेका दिया जाता है। जाहिर है इसमें भी उनका हिस्सा होता है।
    
मैंने कहा कि सब बेईमान नहीं होते। पार्टियों में नैतिकता होती है। वह अपने सांसदों पर निगाह रखती हैं। इस तरह की लूट किसी को मचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। राम भरोसे बोला कौन सी पार्टी की बात आप कर रहे हैं। राष्ट्रीय पार्टियों का कौन सा ईमान बचा है। सब कुर्सी बचाने के लिए अपनी सारी नैतिकता को दांव पर लगाये हुये हैं। मैंने कहा कि ऐसा नहीं है। कांग्रेस और भाजपा दोनों राष्ट्रीय पार्टियां हैं। यह सिद्धांतों पर चलती हैं। इनके यहां भ्रष्टाचार इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता।
    
राम भरोसे बोला आपसे तो कोई बात करनी ही बेकार है। जरा कुछ इतिहास-भूगोल मालूम कर लीजिए इन पार्टियों का, फिर बात कीजिए। कांग्रेस के दिवंगत प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अपनी सरकार कैसे बचाई थी किसको नहीं पता। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को ब्रीफकेस भर-भर के कैसे पहुंचाये गये थे यह सबको पता है। वह तो सीबीआई अगर दबाव में नहीं होती तो अब तक कांग्रेस के कई जाने-माने नेता जेल में होते।
    
कांग्रेस का लम्बा इतिहास रहा है जब उसने दूसरी पार्टी के नेताओं को सिर्फ इसलिए अपने साथ जोड़ा कि उसे किसी भी तरह सत्ता हासिल हो सके। मैं चुप था समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलं। फिर मैंने कहा कि ऐसा नहीं है कि सब पार्टियां ऐसी हों। देख लो भाजपा कितनी ईमानदारी के साथ अपने प्रत्याशी तय कर रही है। मेरी तरफ गुस्से से देखते हुये बोला कि भाजपा ने तो कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ दिया। इस बार के लोकसभा चुनाव में लडने वाले प्रत्याशियों की सूची देखें तो खुद शर्म आयेगी। एक से बढ़ कर एक लुटेरे, हत्यारे, अपहरणकर्ता और भ्रष्टाचारी भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं।
    
बहुत दुखी होकर बोला कि कार्यकर्ता दिन-रात एक करके पार्टी को मजबूत बनाने में जुटे रहे और आखिरी वक्त पर ऐसे लोगों को टिकट दे दिया जो सालों से पार्टी का विरोध खुलेआम करते रहे थे। गिरगिट को भी मात कर दिया इन नेताओं ने। काहे की नैतिकता और कैसी नैतिकता। हकीकत यह है कि इन राजनेताओं का कोई चरित्र और ईमान अब बचा नहीं है। किसी भी तरह कुर्सी हासिल करना इनका इकलौता उद्देश्य रह गया है और इसके लिए यह लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। राम भरोसे बोला आप पत्रकार हो जरा सोच समझ कर बोला करो आप मीडिया वालों की स्थिति भी कोई बहुत ज्यादा अच्छी नहीं बची है। पूरा देश जानता है कि कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
    
मैं उसकी बातें सुन कर हैरान और अवाक था। समझ ही नहीं आ रहा था कि उसकी बातों का क्या जवाब दिया जाये। मन ही मन दुःखी भी था कि अब हालात ऐसे हो गये हैं कि आम आदमी यह तय ही नहीं कर पाता कि वह चुनाव में किसको वोट दे। सभी लोग एक ही थाली के चट्टे-बट्टे नजर आते हैं। मैंने बड़ी कोशिश करी कि राम भरोसे की बातों का कोई जवाब दे सकूं मगर मुझे कोई जवाब नहीं सूझा। अगर आप लोगों को कोई जवाब सूझे तो बताइयेगा।

 

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं।

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मोदी की हवा निकालने के लिए राजनाथ का यूपी गेमप्लान

भाजपा के लिए कहा जाता है कि उसे दुश्मनों की जरूरत नहीं है। यह काम पार्टी के नेता ही पूरा कर लेते हैं। इस बार यह काम पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कर दिया है। मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने और खुद को दावेदार पेश करने के लिए उन्होंने यूपी की एक दर्जन सीटों पर ऐसे लोगों को टिकट दे दिए जिनके जीतने की उम्मीद नहीं है।

राजनाथ सिह को लगता है कि अगर भाजपा की 200 सीटों से कम सीटें आईं तो उनको प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल सकता है। अच्छी खासी मोदी लहर को भाजपा नेताओं ने आपस में लड़कर बरबाद कर दिया। राजनाथ सिंह पहले भी यूपी में भाजपा को तब बरबाद कर चुके हैं, जब वह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे। अब प्रदेश के सभी नेताओं को हाशिये पर धकेल कर राजनाथ सिंह फिर यहां मोदी का खेल बिगाड़ना चाहते हैं। यह सब वह बातें हैं जो पार्टी के अदने से लेकर बड़े नेता तक करने लगे हैं।

दिल्ली में अपनी सरकार बनाने का सपना देखने वाली भाजपा में इस तरह की बातचीत चुनाव से ठीक पहले शुरू हो जायेगी इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। मगर जिस तरह टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा में जंग शुरू हुई है उसने मोदी के सपनों को चूर-चूर कर दिया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को इस विरोध की कल्पना भी नहीं थी। दरअसल नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के साथ ही पार्टी में गुटबाजी शुरू हो गयी थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तब भी नरेन्द्र मोदी का विरोध किया था। इस विरोध के बाद उग्र भाजपा कार्यकर्ताओं ने आडवाणी के घर पर पथराव करके भविष्य की राजनीति के साफ संकेत दे दिये थे। संघ और भाजपा दोनों जान गये थे कि भाजपा कार्यकर्ताओं की भावनायें उफान पर हैं। ऐसे में मोदी को आगे करके ही चुनावी जंग जीती जा सकती है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि नरेन्द्र मोदी की पूरे देश में हवा बन गयी है। मगर इस हवा से कांग्रेस से ज्यादा परेशान खुद भाजपा के नेता हो गये। इसमें कोई दोराय नहीं कि भाजपा में मोदी को मोदी के अलावा काई दूसरा नेता पसंद नहीं करता है। शुरूआती दौर में जिस तरह मोदी के पक्ष में हवा बनती नजर आयी उससे अंदाजा लग गया कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को लगभग 230 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। कई न्यूज चैनलों के सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आयी।

मगर भाजपा की पहली पंक्ति के नेता इससे बेहद परेशान हो गये। 240 तक संख्या पहुंचने का मतलब साफ था कि नरेन्द्र मोदी आसानी से इस देश के प्रधानमंत्री बन जाते अगर मोदी इस कुर्सी तक पहुंच जाते तो भाजपा के कई बड़े नेताओं का जिंदगी भर का सपना टूट जाता। इन स्थितियों में सिर्फ एक यही उपाय था कि किसी भी कीमत पर भाजपा 200 से ज्यादा सीटें हासिल नहीं कर सके। ऐसा तभी संभव था कि जब ज्यादा से ज्यादा सीटों पर टिकट ऐसे लोगों को दिया जाये जिनको लेकर पार्टी में विरोध हो।

सूत्रों का कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस प्रयोगशाला की शुरूआत उत्तर प्रदेश से ही करने की ठानी। यूपी में भाजपा के रणनीतिकार मान रहे थे कि थोड़े प्रयासों से पार्टी को 40 से 50 सीटें मिल सकती हैं। मगर जब टिकट घोषित हुए तो भाजपा कार्यकर्ता भौचक्के रह गये। अब तक घोषित उम्मीदवारों में से 23 ऐसे प्रत्याशियों को टिकट दे दिये गये जो अपना दल बदल कर पार्टी में शामिल हुए। यही नहीं कुछ तो ऐसे प्रत्याशी थे जो पिछले लंबे समय से मोदी और पार्टी को हत्यारा तक कहते रहते थे। कार्यकर्ता हैरान थे कि आखिर जो लोग सालों तक भाजपा को कोसते रहे वह 24 घंटे में आखिर टिकट पाने में कैसे कामयाब हो गये?

दरअसल यही रणनीति मोदी की टीम भी अपना रही थी। यह लोग भी समझ रहे थे कि अगर कुछ सीटें कम रह गयीं तो भाजपा में प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार उभर सकते हैं। यही सोच ध्यान में रखकर पहले उन लोगों को किनारे लगाने का काम शुरू किया गया जो खुद प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं या फिर उनके समर्थन में आ सकते हैं। भाजपा के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आडवाणी नरेन्द्र मोदी की राजनीति को भली-भांति जानते थे। वह गुजरात की गांधीनगर सीट से लगातार चुनाव जीतते रहे थे। मगर इस बार वह नरेन्द्र मोदी का विरोध करके समझ गये थे कि अब गांधी नगर की सीट उनके लिए सुरक्षित नहीं है। मोदी अपने विरोधियों को किस तरह निपटाते हैं यह बात भाजपा के सभी नेता जानते हैं।

लिहाजा आडवाणी ने भोपाल से चुनाव लडने की इच्छा जताई। मोदी भला इतना अच्छा अवसर कहां चूकने वाले थे उन्हें लगा कि अगर आडवाणी को ही निपटा दिया तो बाकी नेता इस हैसियत में नहीं रहेंगे कि वह मोदी का विरोध कर सकें। लिहाजा पहली सूची में आडवाणी का नाम ही नहीं था। जो शख्स कभी पूरी पार्टी का टिकट बांटता था उसी का नाम शुरुआती सूची में नहीं था। बाद की सूची में आडवाणी का नाम गांधीनगर सीट से घोषित हुआ। आडवाणी कोप भवन में गये। संघ ने हस्तक्षेप किया। आडवाणी को बताया गया कि उनका सम्मान सिर्फ इसी में है कि राजनाथ सिंह कहेंगे कि आडवाणी जी जहां से चाहें चुनाव लडें और उनको कहना होगा कि वह गांधीनगर से ही चुनाव लड़ेगे। आडवाणी जानते थे कि जिस समय पूरी पार्टी मोदी के सामने नतमस्तक हो रही हो उस समय ज्यादा विकल्प भी नहीं हैं। कड़वा घूंट पीते हुए आडवाणी ने इस प्रस्ताव को मान लिया।

टीम मोदी ने इसके बाद आडवाणी समर्थकों को निपटाना शुरू किया। गुजरात से सात बार सांसद रहे हरेन पाठक का टिकट सिर्फ इसलिए काट दिया गया क्योंकि वह आडवाणी के भक्त हैं। जसवंत सिंह को नीचा दिखाने और पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए उनके कट्टर दुश्मन सोनाराम को कांग्रेस से लाकर टिकट थमा दिया गया। मजबूर जसवंत सिंह ने निर्दलीय चुनाव में उतरने का मन बनाया। सुषमा स्वराज जो आडवाणी समर्थक मानी जाती हैं उन्हें भी उनकी हैसियत बताने के लिए कर्नाटक में श्रीरामूलू और येदुरप्पा को पार्टी का टिकट दिया गया। इन दोनों नेताओं का सुषमा लगातार विरोध करती रही हैं।
जब नरेन्द्र मोदी की टीम इन सब वरिष्ठ नेताओं को निपटाने में जुटी थी तब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह मन ही मन प्रफुल्लित हो रहे थे।

सब कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा वह चाह रहे थे। अब उनकी टीम के सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि भाजपा की सीटें 200 से ज्यादा नहीं होने पायें। राजनाथ सिंह ने बड़ी सफाई के साथ यह काम उसी प्रदेश में कर दिया जहां से मोदी को सबसे ज्यादा उम्मीद थी। नरेन्द्र मोदी शुरूआती दौर में खुद लखनऊ से लड़ना चाह रहे थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह जानते थे कि आम आदमी के पार्टी के प्रभाव के चलते अब गाजियाबाद की सीट उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गयी है। वह खुद लखनऊ के रास्ते लोकसभा पहुंचना चाहते थे। उन्होंने तर्क दिया कि वाराणसी से मोदी के लड़ने से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की काफी सीटों पर भाजपा को फायदा होगा। यह बात कहकर उन्होंने मोदी को उस बनारस से लड़वा दिया। जहां से मुरली मनोहर जोशी मात्र सत्रह हजार वोटों से जीते थे।  

ऐसा करके राजनाथ सिंह ने जोशी से भी अपना हिसाब बराबर कर लिया। राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने से पहले मुरली मनोहर जोशी अध्यक्ष बनना चाहते थे। राजनाथ सिंह ने उन्हें कानपुर भेजकर अपना हिसाब चुकता कर लिया। अब कानपुर से जोशी को जीतने के लाले पड़े हैं। राजनाथ सिंह ने भी मोदी की लाइन पर चलते हुए अपने दुश्मनों को निपटाने की कामयाब योजना बना डाली। एक समय में कलराज मिश्रा ने उनका बहुत विरोध किया था। कलराज मिश्रा को देवरिया से टिकट देकर उसका हिसाब किताब राजनाथ सिंह ने बराबर कर लिया। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही समेत भाजपा के दर्जनों वरिष्ठ नेता कलराज मिश्रा का खुलेआम विरोध कर रहे हैं। कोई चमत्कार ही उनको देवरिया से जीत दिला सकता है।

यही नहीं राजनाथ सिंह ने एक और जबरदस्त खेल खेलकर मोदी की फजीहत कराने की पूरी रणनीति बना ली है। एक ओर भाजपा दावा कर रही है कि नरेन्द्र मोदी के वाराणसी से चुनाव लड़ने पर उसे पूर्वांचल की सभी सीटों पर फायदा मिलेगा तो दूसरी ओर अपने दखल से राजनाथ सिंह ने वाराणसी के आस-पास सभी सीटों से ऐसे लोगों को टिकट दिला दिए जिनकी जीतने की आशा बेहद कम है। ऐसा होने पर यह बहुत आराम से कहा जा सकेगा कि मोदी अपने आस-पास की सीटें ही नहीं जितवा पाये तो फिर कैसा उनका प्रभाव?

उदाहरण के लिए जौनपुर से रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानन्द चुनाव लड़ना चाहते थे। वह यहां से पहले भी सांसद रह चुके हैं। माना जा रहा था कि वह आसानी से इस सीट को निकाल भी लेंगे। मगर राजनाथ सिंह सीट पर पहले तो बसपा सांसद धनंजय सिंह को ही पार्टी में लाना चाहते थे मगर उसकी आपराधिक छवि और जेल में होने के कारण उनका यह मंसूबा पूरा नहीं हो सका। तब उनके खास माने जाने वाले केपी सिंह को टिकट दे दिया गया जो बेहद कमजोर प्रत्याशी माने जा रहे हैं। साधू संत भी इस फैसले से आग बबूला हैं।

खुद राजनाथ सिंह चंदौली के रहने वाले हैं। वह खुद चंदौली से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। यहां वीरेन्द्र सिंह का भाजपा से टिकट तय था। वह चंदौली से सबसे मजबूत प्रत्याशी थे। मगर अप्रत्याशित रूप से वहां टिकट महेन्द्र नाथ पांडेय को दिया गया। भाजपा कार्यकर्ता खुलेआम कह रहे हैं कि यहां सिर्फ इसलिए टिकट गलत दिया गया जिससे निर्दलीय प्रत्याशी सुशील सिंह जीत जायें। सुशील सिंह कुख्यात अपराधी बृजेश सिंह के भतीजे हैं और बृजेश सिंह पर राजनाथ की कृपा मानी जाती है। जिन वीरेन्द्र सिंह की जीत चंदौली से तय मानी जा रही थी उन्हें भदोही से टिकट दे दिया गया। भदोही में कार्यकर्ता बेहद नाराज हैं क्योंकि वह यहां से रामरती बिंदु को ही प्रत्याशी मान रहे थे।

सलेमपुर सीट से भी भाजपा ने रवीन्द्र कुशवाहा को प्रत्याशी बना दिया जबकि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे पंकज शेखर यहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाह रहे थे। भाजपा कार्यकर्ता भी इसकी तैयारी कर रहे थे मगर बाजी किसी और के हाथ लग गयी। पूर्वांचल की अन्य कई सीटों पर भी भाजपा का यही हाल है। डुमरियागंज के भाजपा नेता हैरान हैं कि सालों से जो जगदबिंका पाल भाजपा को दिनरात कोसते थे उन्हें भाजपा में शामिल क्यों किया गया? और अगर किया भी गया तो उन्हें आनन फानन में टिकट क्यों दे दिया गया। कुछ ऐसी ही पीड़ा इलाहाबाद के वरिष्ठ नेता केसरी नाथ त्रिपाठी की है। उनका कहना था कि सपा के नेता श्यामाचरण गुप्त को अचानक पार्टी में शामिल करवाकर उन्हें टिकट किस आधार पर दे दिया गया। जबकि उनकी छवि विवादित है। उल्लेखनीय है श्यामाचरण गुप्ता कुख्यात डकैत ददुआ को संरक्षण देने के आरोप में खासे विवादित रहे हैं। भाजपा कार्यकर्ता उनके डकैतों के समर्थन को लेकर उनका कई बार विरोध कर चुके हैं। मगर अब वह इलाहाबाद से भाजपा के उम्मीदवार हैं। कार्यकर्ता समझ ही नहीं पा रहे कि डकैतों को संरक्षण देने वाले लोग रातों रात पार्टी ज्वाइन करके उम्मीदवार कैसे बन जाते हैं।

कुछ ऐसी ही हालत गोंडा की भी है। यहां भी कार्यकर्ताओं को सारी तैयारियों को दर किनार करते हुए अन्तिम समय में पार्टी की ओर से कीर्तिवर्धन सिंह को टिकट थमा दिया गया। जिसके चलते भाजपा कार्यकर्ताओं में खासा रोष व्याप्त है। इनके पिता एक महीने पहले तक सपा सरकार में काबीना मंत्री थे। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सचिव व वरिष्ठ पत्रकार सिद्घार्थ कलहंस का कहना है कि जब मोदी लहर है तब भाजपा चोरों, लुटेरों और दल बदलुओं को टिकट दे रही है अगर लहर न होती तो क्या हाल होता? जाहिर है भाजपा अध्यक्ष ऐसे सवालों का जवाब नहीं देना चाहेंगे।

 

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं।

सहारा क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी पीआईएल की हाई कोर्ट में होगी सुनवाई

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा सहारा क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटी लिमिटेड के स्तर पर, कथित रूप से की जा रही अनियमितताओं के सम्बन्ध में, आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर तथा सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल की सुनवाई उस सम्बन्ध में दायर पुनरीक्षा याचिका के साथ की जाएगी।

याचिका के अनुसार सहारा क्रेडिट का पंजीयन बहु-राज्य सहकारी सोसायटी अधिनियम 2002 के अंतर्गत समान उद्देश्य वाले व्यक्तियों द्वारा अपने संसाधनों का सामूहिक हितों की सिद्धि हेतु उपयोग करने को किया गया। पर इसके विपरीत सहारा क्रेडिट द्वारा सहारा ई शाइन, सहारा ए सेलेक्ट, सहारा माइनर, सहारा एम बेनिफिट तथा सहारा यू गोल्डन जैसे स्कीम के माध्यम से सहारा इंडिया के कार्यकर्ताओं के जरिये पूँजी निवेश कराया जा सारा है, जो क़ानून से बचने का एक तरीका है और इससे निवेशकों के हितों को वास्तविक खतरा है।

अतः याचीगण ने इसकी जांच करा कर पूँजी निवेश के सम्बन्ध में देश में प्रचलित समस्त कानूनों का पूर्ण अनुपालन कराने की प्रार्थना की थी।

पूर्व में यह याचिका याचीगण द्वारा सम्बंधित बेंच के सामने बहस नहीं करने की बात कहे जाने पर ख़ारिज कर दी गयी थी पर आज याचीगण द्वारा इस सम्बन्ध में निशर्त माफ़ी मांगे जाने और कोर्ट के सामने पूरी बहस करने की बात कहे जाने पर जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस डीके उपाध्याय की बेंच ने इस पीआईएल को पुनरीक्षा याचिका के सामने सुनने का आदेश कर दिया।

Amitabh Thakur # 094155-34526
Dr Nutan Thakur # 094155-34525

हाई कोर्ट द्वारा पूर्व में पारित आदेश

Order of High Court—-
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD, LUCKNOW BENCH

?Court No. – 2
Case :- MISC. BENCH No. – 2008 of 2014
Petitioner :- Amitabh Thakur & Another [P.I.L.]
Respondent :- Union Of India Thr.Secy.Agriculture & Cooperation Deptt.&Ors
Counsel for Petitioner :- Amitabh Thakur (Inperson),Dr.Nutan Thakur (Inperson
Counsel for Respondent :- A.S.G.
Hon'ble Imtiyaz Murtaza,J.
Hon'ble Devendra Kumar Upadhyaya,J.

Heard Sri Amitabh Thakur, petitioner no.1 and Dr. Nutan Thakur, petitioner no.2 in person. After hearing the arguments at some length, when the Court required the petitioner no.1 to answer certain queries on the issue as to how does he substantiate his submission that the schemes quoted in annexure no.1 to the writ petition are being run by respondent no.6, Sri Amitabh Thakur submitted that the perspective of the Court, vis-a-vis annexure no.1 and the schemes quoted therein, are different than his perspective.
 
On the aforesaid submission made, the Court specifically told Sri. Amitabh Thakur, petitioner no.1 that he is arguing the matter before a Court of law and that the Court is not supposed to enter into or entertain any kind of debate and further that when a person approaches the Court he has to substantiate his assertions and arguments. At this observation of the Court, Sri. Amitabh Thakur appeared dissatisfied and stated that he did not want to argue this matter any further.

Thereafter, when the Court required the petitioner no.2 to answer the queries, she also submitted that once the petitioner no.1 does not intend to argue the case before the Court, she also does not intend to do so.

In these circumstances, the Court is left with no option but to dismiss the petition.
Thus, the writ petition is hereby dismissed.
 
After
passing the order, Sri. Amitabh Thakur, petitioner no.1 further submitted that what he intended to convey to the Court was that he did not want to argue the matter before this particular Bench.

We may, at this juncture, only state that Benches in the High Court exercise their jurisdiction as per roster assigned by Hon'ble the Chief Justice. The instant petition has been filed in the shape of Public Interest Litigation. As per roster determined by the Hon'ble Chief Justice, this Bench has been assigned the said jurisdiction. Further, no person who is a party to a proceeding before this Court can be permitted to argue cases before a Bench of his choice.
 
Accordingly, the aforesaid submission made by Sri. Amitabh Thakur, petitioner no.1 is hereby rejected. Order Date :- 10.3.2014/Shahnaz.

 

इस संबंध में अमिताभ ठाकुर और डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिकाओं को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें:

http://amitabhandnutan.blogspot.in/2014/03/copy-of-pil-regarding-sahara-credit.html

http://amitabhandnutan.blogspot.in/2014/03/review-petition-in-pil-against-sahara.html
 

एनसीपी के एमएलए का फतवा, चुनाव तक न टीवी देखो न पेपर पढ़ो

माजलगांव से एनसीपी के एमएलए और पूर्व मंत्री प्रकाश सोलंके ने कल माजलगांव के पास किट्टी आडगांव मे एक जनसभा को संबोधित करते हुए पार्टी के कार्यकर्ताओं से 17 अप्रैल तक टीवी देखने और न्यूज़ पेपर पढ़ना बंद करने को कहा है। सोलंके ने कहा कि कोका कोला के विज्ञापन की तरह मोदी को बार-बार टीवी पर दिखाया जा रहा है। बीड में गोपीनाथ मुंडे की तस्वीर के सिवा मिडिया को कुछ दिखता ही नहीं है। रोजाना यह सब खबरें पढ़ के और देख के सर दर्द बढ़ता जा रहा है इससे अच्छा की न्यूज़ पेपर पढ़ना आौर टीवी देखना बंद करना चाहिए।

प्रकाश सोलंके के इस बयान से बीड मिडिया मे खलबली मच गयी है। मांजलगाव तालुका पत्रकार संघ ने सोलंके के इस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है। महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति के अध्यक्ष एसएम देशमुखने भी सोलंके की बयान की निंदा करते हुए कहा कि जानकारी हासिल करना लोगों का अधिकार है। सोलंके इस अधिकार से लोगों को वंचित रखना चाहते हैं। यह प्रजातंत्र के खिलाफ हे इस बयान की हम कड़े शब्दो मे निंदा करते है।

लोगों का कहना है कि एनसीपी को जनसभाओं में काफी ठंडा रिसपॉन्स मिल रहा है। इसकी खीज सोलंके मीडिया पर निकाल रहे हैं और लोगों से टीवी देखना और न्यूज़ पेपर पढ़ना बंद करने को कह रहे हैं।

 

पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति, मुंबई। ईमेल: phvksm@gmail.com
 

मुजफ्फरनगर दंगे रोकने में यूपी सरकार ने लापरवाही बरतीः सुप्रीम कोर्ट

इस चुनावी मौके पर उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को एक बड़ा झटका लगा है। बहुचर्चित मुजफ्फरनगर के दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को घोर लापरवाह ठहराया है। साफ-साफ कह दिया है कि यदि सरकारी तंत्र ने समय से कार्रवाई की होती, तो दंगे की आग इतनी नहीं भड़कती। अदालत की यह टिप्पणी सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक मुश्किलें और बढ़ा सकती है। क्योंकि, जो आरोप विपक्षी दल लगा रहे थे एक तरह से उसी पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी मुहर लगा दी है।

सरकार के लिए राहत की बात सिर्फ इतनी रही कि अदालत ने दंगों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) या सीबीआई से कराने की जरूरत नहीं समझी है। जबकि, अदालत में दायर की गई जनहित याचिका में मांग की गई थी कि दंगों की जांच अदालत अपनी निगरानी में सीबीआई या विशेष जांच दल से कराए। अदालत की टिप्पणी के बाद सरकारी प्रवक्ताओं ने कोर्ट की मूल भावना को दरकिनार करते हुए, शाबासी में अपनी पीठ ठोकने की कोशिश की है। सरकारी वकीलों ने भी कुतर्क देते हुए कह दिया कि सर्वोच्च अदालत को पुलिसिया जांच भरोसेमंद लगी है। सरकार ने दंगा पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा भी दे दिया है। इस पर भी अदालत ने कोई उंगली नहीं उठाई।

सरकारी वकील भले एक खास नजरिए से अदालत के फैसले को प्रस्तुत कर रहे हों, लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि प्रदेश सरकार के कामकाज पर अदालत की टिप्पणी काफी गंभीर है। विपक्षी दलों ने भी अदालत के नजरिए को अपना चुनावी हथियार बनने की कोशिश शुरू कर दी है। राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख एवं केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह ने कहा है कि अदालत की इतनी कड़ी फटकार के बाद अखिलेश सरकार को कुर्सी में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। क्योंकि, अदालत ने साफ-साफ कहा है कि सरकार मुजफ्फरनगर में लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाई है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष सितंबर में हुए सांप्रदायिक दंगों में 67 लोग मारे गए थे। भाजपा सहित कई और दलों ने सपा पर निशाने तेज किए हैं। मुश्किल यह है कि हमारे राजनेता अदालती फैसलों में भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से बाज नहीं आते। ये शुभ लक्षण तो नहीं कहे जा सकते।

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।
 

मोहन थपलियाल ने अनुकम्पा की नौकरी को छोड़ बेरोजगारी का दामन थाम लिया था

लखनऊ: बहुत बरसों बाद आज सुबह-सुबह जानकीपुरम के अपने भूले-भटके दोस्‍तों-भाइयों को खोजने निकला। और मिल गया स्‍वर्गीय मोहन थपलियाल का घर। बेटी और बेटा तो काम पर निकल चुके थे, लेकिन उनकी पत्‍नी से भेंट हो गयी।

मोहन थपलियाल
मोहन थपलियाल
मोहन थपलियाल उस दौर के पत्रकार-साहित्‍यकार रहे हैं जो नमक-रोटी के साथ तो बसर कर सकते थे, लेकिन हराम की मलाई कभी तक उन्‍होंने होंठ या एड़ी तक नहीं लगाने का गवारा नहीं किया। दैनिक अमृत प्रभात अखबार की बंदी उन जैसे पत्रकारों के लिए बाकायदा शामत लेकर आयी थी।एक जर्मनी किताब के अनुवाद के लिए थपलियाल को नौ हजार रूपया मेहनताना मिला था। इतना रूपया देख कर उनकी बिटिया ने टीवी और फ्रिज खरीद लिया। मगर जब मोहन लौटे तो हालात देख कर भूख-हड़ताल पर बैठ गये। बोले:- इतना संकट चल रहा है, ऊपर यह सामान तो बिजली का बिल ही बढ़ायेगा। उसी अखबार से तबाही लेकर निकले दुर्धर्ष-जुझारू ओपी सिंह समेत अनेक दोस्‍तों ने ही उनकी भूख-हड़ताल खत्‍म करायी।

हां, इससे पहले उन्‍हें अमर उजाला में काम मिला था। पता चला कि यह नौकरी वीरेन डंगवाल ने जु़गाड़ कर लगवायी थी। मोहन कुछ दिनों तक तो यहां काम करते रहे, लेकिन जल्‍दी ही उन्‍हें लगा कि यह तो अनुकम्‍पा है, काम धाम तो है नहीं। फिर तन्‍ख्‍वाह कैसे हजम होगी। बेहद संवेदनशील मोहन थपलियाल ने फैसला किया और नौकरी को लात मार कर बेरोजगारी का दामन थाम लिया।

21 फरवरी-03 को उनकी मौत हो गयी। बीमारी थी लीवर की खराबी। शायद वे अल्‍मोड़ा से ही सीधे पत्रकारिता करने लखनऊ आये थे। मोहन जी के मित्रों के मुताबिक बेटी मुक्ति प्रिया और बेटा उमंग थपलियाल एक निजी कम्‍पनी में काम कर रहा है। पत्‍नी कमला हमेशा की ही तरंह घर सम्‍भाल रही है।

 

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के बेबाक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।

फर्रूखाबाद के पत्रकार अखिलेश शर्मा के पिता का निधन

फर्रूखाबाद : कानपुर से प्रकाशित दैनिक अमर उजाला के पत्रकार अखिलेश शर्मा के 60 वर्षीय पिता जगतराम शर्मा का बीती रात 10 बजे लम्बी बीमारी के दौरान प्राइवेट अस्पताल में निधन हो गया.  नगर के मोहल्ला शिवनगर कालोनी निवासी पत्रकार अखिलेश शर्मा के आवास पर पत्रकारों ने बैठक की. 

बैठक में अमर उजाला के जिला संवादाता चन्द्रभान सिंह यादव, नितेश सक्सेना, टीटू, टिन्कू मिश्रा, अवधेश शुक्ला, धीरज अगिनहोत्री, अक्षय मिश्रा, सीपू तिवारी, प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रानिक जर्नलिस्ट एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष आनंद भान शाक्य आदि पत्रकारो ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना की. इन लोगों ने अखिलेश शर्मा को दुख सहन करने के लिये ढांढस बधाया. स्वर्गीय जगतराम शर्मा कोतवाली थाना जहानगंज के ग्राम लक्ष्मन नगला के मूल निवासी थे. अंतिम संस्कार घटियाघाट में किया गया.

नहीं छूटे सुब्रत रॉय, सहारा के पास नहीं है ज़मानत के लिए पैसा

सुब्रत रॉय को आज भी सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत नहीं मिली। अब सुब्रत रॉय को अगली सुनवाई तक जेल में रहना होगा। मामले की अगली सुनवाई 3 अप्रैल को होगी। सहारा ग्रुप ने उनकी जमानत के लिए 10,000 करोड़ रुपये की रकम देने में असमर्थता जताई है। सहारा ग्रुप का कहना है कि सुब्रत रॉय और सहारा कंपनियों की नेटवर्थ जमानत की रकम से कम है।

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था यदि सहारा ग्रुप द्वारा 10,000 करोड़ रुपए सेबी के पास जमा कर दिए जाते हैं तो सुब्रत रॉय को ज़मानत दे दी जाएगी।
 

आगामी चुनाव दो कुंवारों की अग्नि परीक्षा से कम नहीं है

बदलती राजनीति, बदलते लोग और उनके बदलते मिजाज ने राजनीति को एक ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है जिसमें नेताओं की अस्मिता ही खतरे में पड़ती जा रही है। सालों साल तक देश की राजनीति को अपने इशारे पर नचाने वाले और जनता को धोखा देकर अपना उल्लू सीधा करने वाले नेता अब यकीन के साथ यह नहीं कह सकते कि जनता उन पर विश्वास कर लेगी और उन पर सब कुछ न्योछावर कर देगी। यह राजनीतिक बदलाव का ऐसा संक्रमण काल है कि बड़े सुरमा भी जनता और उनकी अपेक्षा के सामने पस्त होकर घिघियाते नतर आ रहे है।

ऐसे में मोदी के विरोध में खड़े कांग्रेस के राहुल गांधी के सामने चुनौती कुछ ज्यादा ही है। पिछले एक दशक की कांग्रेस की राजनीति और सत्ता शासन से आजीज आ चुकी जनता क्या कांग्रेस के समर्थन में फिर खड़ी होगी और क्या वह राहुल गांधी में विश्वास करेगी कहना मुश्किल है। थक चुकी कांग्रेस में राहुल कितना उर्जा दे पाऐंगे कहना मुश्किल है। जिस कांग्रेस का मनोबल ही टूट गया हो, जिस कांग्रेस के तमाम नेता राहुल के सहारे की राजनीति कर रहे हो भला मोदी के आक्रमण के सामने क्या कर पाऐंगे कहना मुश्किल है। जिस मोदी के पीछे पूरी भाजपा और संघ खड़े हो वहीं अकेला रण में खड़ा राहुल कांग्रेस को कितना बचा पाऐंगे, यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता। थक चुकी कांग्रेस का अकेला योद्धा राहुल की राजनीति पर हम और विस्तार से चर्चा करेंगे लेकिन उससे पहले मोदी बनाम राहुल की राजनीति पर एक नजर।
 
विश्व के इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ है कि किसी बड़े लोकतंत्र में दो कुंवारे नेताओं के बीच देश की लीडरशिप के लिए जंग हो। लेकिन भारत में ऐसा ही हो रहा है। आगामी लोकसभा चुनाव में दो बड़ी पार्टी कांग्रेस और भाजपा के दो बड़े चेहरे राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी आमने सामने खड़े दिख रहे है। दोनों नेताओं की अपनी अपनी कहानी है, अपने अपने राग रंग है और अपने अपने पैंतरें। दोनों की अपनी विरासत भी है। एक संघ की उपज हैं तो दूसरे नेहरू वंशवाद के प्रतीक। दोनों की अपनी अपनी कलाएं भी हैं और अपने अनोखें अंदाज भी। एक सशक्त भारत की बात करता है तो दूसरा सबके लिए भारत निर्माण की कहानी रचता है। एक को संघ की राजनीति में यकीन है तो दूसरे को सेकुलर राजनीति में विश्वास है। एक अपने गर्वीले भाषण से जनता की लहू को गर्म कर जाता है तो दूसरा अपने भाषण के जरिए राजनीतिक बहस शुरू कर देता है।

तालियां दोनों के बजती है लेकिन एक पर दूसरा भारी प्रतीत होता है और यही प्रतीति आगे की राजनीति में कुछ कहने के लिए स्पेस छोड़ जाती है। 2014 लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को पीएम का उम्मीदवार घोषित किया गया है और कांग्रेस में राहुल गांधी को पीएम बनाने की बात चलते चलते रूक जाती है। फिलहाल, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों ही कुंवारे हैं इसलिए 2014 के चुनाव को दो कुंवारों के बीच युद्ध की संज्ञा दी जा सकती हैं। लेकिन ऐसा अमेरिका जैसे देश में नहीं है। यह बात और है कि पिछले 20 सालों में हमने अमेरिका के तमाम तामझाम को अपनाने में कोई कमी नहीं की है लेकिन उच्च पदो के लिए होने वाले चुनाव के मामले में भारत और अमेरिका में बड़ा अंतर है।

अमेरिका में राष्ट्रपति शादीशुदा है या नहीं, वहां के वोटर्स के लिए यह बात बहुत मायने रखती है। अमेरिकी नागरिकों को अपने देश के सर्वोच्च पद के लिए एक ठोस पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार की दरकार होती है। लोग चुनाव प्रचार अभियान के दौरान राष्ट्रपति चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की बीवियों को मुस्कुराते और हाथ हिलाते सपोर्टिव रोल में देखना पसंद करते हैं। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। स्वतंत्रता के बाद भारत में नेताओं में वंशवाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति देखी गई। इससे तंग आकर भारतीय जनता उन लोगों को सत्ता की डोर थमाती रही हैं, जिनका कोई परिवार नहीं। लोगों ने ऐसे कुंवारे नेताओं पर यकीन किया जिन्होंने सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए लंबी पारी खेली और कुछ राज्यों में अभी भी उनका राज है। लेकिन इस बार की लड़ाई कुछ कम नहीं है। सत्ता शीर्ष के लिए दो पार्टी के दो कुंवारे एक दूसरे को मात देने के लिए मैदान में खड़े है और कोशिश सिर्फ यह हो रही है कि इन दो कुंवारों में से किसके पक्ष में जनता जाने वाली है। कौन किस पर भारी पड़ने वाला है। आप कह सकते हैं कि आगामी चुनाव दो कुंवारों की अग्नि परीक्षा से कम नहीं।
             
पहले मोदी की चर्चा। मोदी पर संघ ने दांव खेला है। और यकीनन संघ का यह अंतिम दांव भी हो सकता है। संघ के इस अंतिम दांव पर भाजपा की पूरी राजनीति एकमत है। दांव चल गया तो भाजपा की राजनीति चल गई और दांव फेल हो गया तो मोदी की राजनीति चली जाएगी। राजनीति यह है कि इस चुनाव के बाद भाजपा में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में कई योद्धा सामने आने वाले है और यह भी सही है कि योद्धाओं की उस लडाई में भाजपा के भीतर बिखराव की भी संभावना है। खैर भाजपा की राजनीति चाहे जो भी हो लेकिन मोदी की राजनीति साफ है। लेकिन यह यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता कि मोदी कुंवारे भी है। सच तो यह है कि मोदी की शादी जशोदा बेन से हुई और उसके साथ मोदी 3 माह रहे भी।

जशोदा बेन मोदी के बड़नगर वाले गांव में करीब चार साल तक रही और फिर अपने मायके चली गई और वहीं पढ़ लिखकर शिक्षिका की नौकरी कर ली। अब जशोदा बेन का नौकरी से अवकाश हो गया है। इस बीच मोदी ने अपनी पत्नी से तलाक लेने की भी कोशिश की थी लेकिन धर्मपरायन जशोदा बेन ने इसे स्वीकार नहीं किया और दोनो अलग अलग रहने लगे। जशोदा बेन ने कभी भी मोदी के सामने आने की कोशिश नहीं की। फिर भी मोदी कुंवारे है। देश के लोग उन्हें कुंवारा ही जानते है और मोदी इस पर खुश भी होते है।

राजनीति में नरेंद्र मोदी बीजेपी के बहुत सफल मुख्यमंत्री रहे हैं। वह गुजरात में तीन बार लगातार बीजेपी को चुनाव में जीत दिला चुके हैं। वह कांग्रेस की वंशवादी राजनीति का मजाक उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और वाजपेयी की तरह अपने वोटर्स को बताते रहते हैं कि उनके पास कोई परिवार नहीं है इसलिए उनकी सरकार में वंशवाद के लिए कोई जगह नहीं। कई बातों को लेकर नरेंद्र मोदी की आलोचना होती है लेकिन कई लोगों का ऐसा भी मानना है कि उन्होंने अपनी मेहनत से गुजरात को बदल दिया है। बीजेपी ने उनको पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। भाजपा में मोदी को जीताने की होड़ लगी हुई है। मोदी के एक झूठ को प्रमाणित करने के लिए भाजपा के लोग और सौ झूठ बोलने से बाज नहीं आते। भाजपा का लक्ष्य मोदी  निर्धारित है। भाजपा में चुनाव जीतने वाले लोगों की लंबी सूची है और वे मोदी को प्रचारित कर अपनी ताकत को और बढाने में लगे हैं लेकिन कांग्रेस में ऐसा कुछ भी नहीं है।
           
और कांग्रेस के राहुल गांधी के पास क्या है? कांग्रेस की विरासत वाली राजनीति के अलावा राहुल पास कुछ नहीं है। इमानदार, युवा, कुंवारा  और उर्जावान होने के बावजूद उनके पीछे कांग्रेस की वह राजनीति और नेता नहीं है जो दावे के साथ कह रहें हों कि कांग्रेस के इतने नेता अपने दम पर चुनाव जीतने का मादा रखते हों। भाजपा के चुनावी रणनीतिकार और कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार को गौर से देखा जाए तो साफ हो जाता है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी के लोग राहुल की राजनीति और उसके संभावित करिश्में की बाट जोह रहे है। अधिकतर कांग्रेसी राहुल के भरोसे बैठ गए है। पार्टी के लिए नीति क्या बनेगी यह राहुल तय करेंगे। मीडिया प्रबंधन कैसे होगा यह राहुल तय करेंगे।

सरकार कैसे चलेगी और कौन सी योजना बेहतर होगी यह राहुल तय करेंगे। पार्टी का चुनावी एजेंडा क्या होगा और चुनावी घोषणापत्र में क्या लिखा जाएगा यह राहुल तय करेंगे। टीम में कौन शामिल होगा और किस राज्य में कौन राजनीति करेगा यह भी राहुल ही तय करेंगे। कहा जा सकता है कि भाजपा में जहां मोदी को जीताने के लिए सभी नेताओं में होड़ लगी हुई है, वहीं कांग्रेस में राहुल के सहारे जीतने वालों की होड़ लगी हुई है। राहुल पर वंशवादी राजनीति का भी टैग लगा हुआ है। इसके अलावा तमाम तरह की जन नीतियों और योजनाओं के बावजूद भ्रष्टाचार और महंगाई ने राहुल के कदम को रोक रखा है। राहुल अपनी  मां सोनिया गांधी के साथ पार्टी की हर गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी दे रहे हैं और मीडिया से भी मुखातिब हो रहे हैं लेकिन मोदी का तोड़ उन्हें नहीं मिल रहा है। कांग्रेस में उनको पीएम पद का स्वभाविक उम्मीदवार के तौर पर देखा जाता है। हलांकि अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
          
आगामी
लोकसभा चुनाव में मोदी और राहुल के बीच राष्ट्रीय स्तर पर पहला मुकाबला होगा। यह बात और है कि पांच राज्यों के पहले राउंड के मुकाबले में जहां टीम मोदी ने राहुल को नाकआउट कर दी वहीं अब  कांग्रेस उपाध्यक्ष के सामने चुनौती मोदी की लहर रोकने की है। इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित होने के बाद नरेंद्र मोदी फिलहाल राजनीति के केंद्र में हैं। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम ने मोदी की हैसियत को और बढ़ा दिया है। यह बात और है कि पांच राज्यों में से चार राज्यों में कांग्रेस की हार के पीछे के कारण कुछ और ही रहे हो लेकिन उपर से देखने में मोदी की बादशाहत ही झलकती है। इन राज्यों में भाजपा की यही जीत मोदी की राजनीति को और युगम और सरल बनाती जा रही है।

वहीं, राहुल गांधी पहली बार अपने जीवन की सबसे कठिन चुनौती से जूझ रहे हैं। कांग्रेस में औपचारिक रूप से राहुल का कद बढ़ने के बाद यह दूसरा  चुनाव हैं। इस दफा संगठन की कमान से लेकर टिकटों के वितरण तक में पूरी तरह न सिर्फ राहुल का दखल है। ऐसे में सियासत अब मोदी बनाम राहुल ही है। इसके बावजूद चूंकि मोदी और राहुल पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर कसौटी पर इन्हीं नतीजों से कसे जाएंगे। चैतरफा आ रही खबरों और चुनाव सर्वेक्षणों से परेशान कांग्रेस और सरकार के नेता आक्रामक रुख अपनाकर अपने कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर अंदर से सभी हिले हुए हैं। लड़ाई से पहले कांग्रेस और सरकार में मतभेद सतह पर है। कांग्रेस के भीतर भी पुराने बनाम नए नेताओं का द्वंद्व चरम पर है। इन हालात में यदि कांग्रेस का प्रदर्शन दयनीय रहा तो पार्टी के भीतर न सिर्फ भ्रम बढ़ेगा, बल्कि जानकार मान रहे हैं कि राहुल गांधी भी इस दफा गंभीर सवालों के घेरे में होंगे। फिलहाल, कांग्रेस ऐसी किसी स्थिति के लिए तैयार नहीं है, लेकिन यह तय है कि नतीजे यदि कांग्रेस के विपरीत गए तो राहुल की आगे की राजनीतिक राह कठिन होगी।

 

अखिलेश अखिल। संपर्कः mukheeya@gmail.com

कालाहांडी में अब भूख से लाशें नहीं बिछतीं, बचपन नहीं बिकते

समाज में दलाल और दलाली को हिकारत की नजर से भले ही देखा जाता हो, लेकिन जब दलाल किसी समाज और व्यवस्था की काया पलट कर दें तो इसे आप क्या कहेंगे। जी हां, केबीके के नाम से दुनिया में बदनाम उड़ीसा का कालाहांडी, बोलांगीर और कोरापुट जिले पिछले पांच सालों में विकास की नई इबारत लिख रहे है। हांलाकि इस विकास की कहानी में सरकार की नीति, सरकारी पहल, किसान, किसानी व सिंचाई के लिए बेहतर व्यवस्था और साथ ही किसानों की सोंच में आई तब्दीली की काफी अहमियत हैं। लेकिन इन सबसे उपर इस इलाके की तकदीर बदलने में दलालों की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता। आइए आपको ले चलते हैं देश में भूखमरी के लिए अभिशप्त कालाहांडी के भूगोल पर जहां अब कंगाली नहीं हर जगह हरियाली है, रूदन के स्थान पर मंगल गीत गाए जा रहे हैं और लगभग हर घर में टीवी, फ्रीज, रेडियों, डिश एंटिना साइकिल के बदले मोटरसाइकिल और नंग धरंग बच्चें और अधनंगे बुढे चमचमाते कपड़ों से लैस हैं। मानों पूरा का पूरा कालाहांडी मुस्कुरा रहा हो।

 
कालाहांडी की ये जो बदली तस्वीर हम आपको दिखा रहे हैं इसमें दलालों की बड़ी भूमिका है। कालाहांडी के हर गांव में पलायन एक कुटीर उद्योग का रूप ले चुका हैं। जब से छत्तीसगढ राज्य बना तब से ही कालाहांडी की तस्वीर बदल गई। दाने दाने को मोहताज और बात बात में गुलामी के शिकार हो रहे बच्चें और महिलाओं के लिए छत्तीसगढ़ ने रोजगार का द्वार खोल दिया। रोजगार सामने आए तो दलालों का नेटवर्क शुरू हुआ और देखते देखते कालाहांडी के हर गांव और बाजार में दलालों के आफिस खुल गए। रोजगार के अवसर मिले तो गांव से लोगों का पलायन शुरू हुआ और देखते ही देखते लोगों की रंगत बदने लगी। आमदनी बढ़ी तो भोजन मिलना शुरू हुआ, पचके गाल और पेट फुलने लगे, नंगा शरीर कपड़ों से ढकने लगे, बच्चे स्कूल जाने लगे और लाख सूखा पड़ने के बावजूद लोगों को फिर भूख का डर नहीं रह गया।
      
आइए ये है कालाहांडी का जिला हेड क्वार्टर भवानीपटना। आज से पांच साल पहले गरीबी और दरिद्रता का साक्षातकार लेने के लिए जब कोई खबरची या फिर कोई गैर सरकारी संगठन भवानी पटना उतरते थे तो पता नहीं चलता कि वे किसी शहर में आए हैं। खेतों में सुखार और भूख से तड़पते, भागते बच्चे, बुढ़े और नौजवान यही दिखाई पड़ता था। इसी भवानी पटना स्टेशन पर भूख से बिलखती महिलाओं और लकड़ी चबाते बच्चों की तस्वीर को खीचकर विदेशी पर्यटकों ने देश दुनिया में कालाहांडी के सच को उजागर तो किया ही साथ ही इस तरह की बेबसी भरी तस्वीर को बेचकर भारी रकम भी कमाया। लेकिन आज यह भवानीपटना बदल गया है। भवानी पटना की स्टेशन की वही दुकाने अब सज संवर गई है। नंग धरंग महिलाएं और बचचे अब दिखाई नहीं पड़ते। अब जान बचाने के लिए भागते लोगों की हुजुम दिखाई नहीं पडती।
 
इसी भवानीपटना में कभी लोग अनाज के बदले बिक जाते थे लेकिन आज यहां मजदूरों को नौकरी दिलाने वाले दलालों और एजेंसियों की भरमार है। हालाकि पलायन यहां की नियति है लेकिन उसी पलायन ने अब कालाहांडी को हरा भरा कर दिया है। भवानीपटना के पंचायत अरतल, बोरभाटा, चांचर या फिर केंद्रपती चले जाएं कही आपको बेबसी नहीं मिलेगी। चांचर के अधिकतर लोग छत्तीसढ में काम कर रहे हैं। रिक्शा चलाने से लेकर सड़क बनाने और फैक्ट्रियों में काम करने से लेकर रायपुर और राजनादगांव में चुलहा चैका तक का सारा काम इसी चांचर और बोरभाटा के लोगों ने सम्हाल रखा है। हालाकि गांवों में लागों की आज भी कमी है लेकिन जो लोग घर पर है भी वे केला की खेती करके अपने और गांव को भी खुशहाल किए हुए है। कालाहांडी का ही एक ब्लाक है लांजीगढ। लांजीगढ के बेनगांव, भर्तीगढ,गुंडरी और लांजी गांव तो अब पहचान में आते ही नहीं। हालाकि इन गावों में आज भी पलायन के कारण सन्नाटा पसरा हुआ लेकिन गांवों में बजते मोबाईल और साइकिल पर स्कूल जाती लड़कियों और लड़कों को देखकर लगता है कि यह कालाहांडी का गांव ही नहीं है। इन गांवों में केबल और डिश टीवी हर घर में लग गई है। परचुन की दुकाने है तो जिसमें मनिहारी और सौंदर्य प्रसाधन के सामान भी।   

कालाहांडी के पूरे इलाके में युवाओं के बीच एक नई सोंच विकसित हो गई हैं। बार बार और हर बार सूखा पड़ने से खेतीबाड़ी करने को कतई तैयार नहीं है। दूसरे राज्यों और शहरों में जाकर वह हर छोटा मोटा काम करने को तैयार है लेकिन खेती के भरोसे जीने को तैयार नही है। बलसिंगा के रूपन का कहना है कि खेती में अब कुछ नहीं रह गया। दलालों के जरिए हमें काम मिल जाता है और दिहाडी 200 से ज्यादा की हो जाती है। मंडेल गांव के बिरछी की सोंच हलाकि कुछ अलग है लेकिन बिरछी साफ कर देता है कि जब से गांव के लोग बाहर कमा रहे हैं तब से भूखे मरने की नौबत नहीं रही। दलालों ने इन्हें छत्तीसगढ, मघ्यप्रदेश और लेह लद्दाख से लेकर कश्मीर तक काम करने की जमीन तैयार कर दी है। इसके अलावा कालाहांडी को संवारने में सरकार भी बडे स्तर पर जुटी हुई है। सूखा से परेशान कालाहांडी को जीवित करने में केला रामबान साबित हो रहा है। सरकारी मदद और किसानों में इस केले की खेती के प्रति ललक ने कालाहांडी की तस्वीर को बदल दिया है। अभी सिर्फ कालाहांडी में ही 12000 हेक्टेयर में केले की खेती हो रही है और साल में इससे किसान एक लाख रूपए तक की आमदनी कर रहे हैं। किसानों को इसके लिए बैंक लोन दे रही है और साथ ही सब्सिडी भी। इस तरह से केले की खेती और दलालों ने पूरे कालाहांडी की तस्वीर बदल दी है।  
      
गरीबी, शोषण और भूख से हाने वाली मौतों के लिए बदनाम रहे उड़ीसा के कालाहांडी की तस्वीर अब बदल गई है। यहां अब भूख से मौतें नहीं होती या यूं कहे कि पिछले आठ सालों में भूख से मौत की मात्र तीन खबरें सामने आई है। इन खबरों के बाद जब सरकारी जांच हुई तो भूख से हुई मौत की पुष्टि नहीं हो पाई। भूख से बिलबिलाते बच्चों को देखकर पहले इसी कालाहांडी में मां बाप अपने बच्चों को बेचते रहे हैं। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे एक मन बाजरे में दो बच्चे यहां बिके थे। इस खबर से परेशान होकर राजीव गांधी ने कालाहांडी की यात्रा की थी और दशकों पुरानी कालाहांडी की सच्चाई को जाना था। राजीव गांधी के प्रयासों और अब केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का भरपूर फायदा कालाहांडी को मिल रहा है। हालाकि कालाहांडी अभी भी शेष भारत के विकास से कोसों दूर है लेकिन अब कालाहांडी के विकास का पहिया घूम चुका है। कालाहांडी में आज भी सूखे का प्रकोप दिखाई पड़ सकता है लेकिन यकिन मानिए अब वहां भूख से लाशें नहीं बिछती और बचपन नही बिकते।

 

अखिलेश अखिल। संपर्कः mukheeya@gmail.com
 

NM-56 यानी झूठ का पुलिंदा!

NM-56 यानी झूठ का पुलिंदा. जो इंसान भारत का नक्शा ठीक से नहीं पढ़ सकता, वह उस देश का पीएम बनने का ख्वाब पाले बैठे हैं. नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर गलत बयानी की. कहा आम आदमी पार्टी की वेबसाइट पर कश्मीर भारत के नक्शे से गायब है. लेकिन वह चालाकी से छुपा गए कि जिस वेबसाइट पर ऐसा है, वह आप को मिलने वाले चंदे से संबंधित है और उसी को कलर-कोड में नक्शे पर अंकित किया गया है. आप की आॉफिशियल वेबसाइट पर कश्मीर भारत के नक्शे में दिखाया गया है.

यह कॉमन सेन्स की बात है कि जो पार्टी (आप) शिद्दत से लोकसभा चुनाव लड़ रही है, वह कश्मीर को भारत के नक्शे से गायब करने की बात सोच भी कैसे सकती है!! लेकिन मोदी झूठ बोलने में माहिर हैं. वह भावनाएं भड़काने में उस्ताद हैं और अपने हर प्रतिद्वंद्वी को पाकिस्तानी-एजेंट बताने का आतुर रहते हैं.

इससे पहले भी वह पटना में सिकंदर के बारे में और अन्य जगहों पर देश के इतिहास-वर्तमान पर गलतबयानी कर चुके हैं.

सो हे भारतवासियों, झूठ के बल पर इस देश में कोई युद्ध नहीं जीता गया है. महाभारत के युद्ध में भी -अश्वत्थामा मारा गया- बोलकर लड़ाई की दिशा बदलने की कोशिश की गई थी. मारा गया था अश्वत्थामा नाम का हाथी लेकिन घोषणा ऐसी की गई कि योद्धा अश्वत्थामा वीरगति को प्राप्त हो गया है. परिणाम आप जानते हैं. उस युद्ध में अर्जुन को गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण भी थे, सो मामला संभल गया था.

लेकिन इस लड़ाई में कोई कृष्ण नहीं है. हम ये भी नहीं पहचान पा रहे कि कौन कौरव हैं और कौन पांडव!!! कौन सुग्रीव है और कौन बालि??? कौन विभीषण है और कौन हनुमान!!!

पर हमें ये पता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की इस धरती पर सत्य की जीत होती है. इसके लिए समुद्र में भी पत्थर से पुल बना लिए जाते हैं. सो हे नरेंद्र मोदी और मोदी वीरों!! अगर आपको इस देश की संस्कृति का भान है तो कृपया सूर्यास्त के बाद तलवार भांजना बंद कीजिए. उस तरह और उस वक्त युद्ध की इजाजत नहीं है. महात्मा गांधी और जालियावाला बाग की ये भूमि सीने पर गोली खाना सिखाती है और इसी तरह जीतना सिखाती है.

आपके कहने से अश्वत्थामा नहीं मर जाएगा. झूठ के पांव नहीं होते और MM-56 हैं कि इसी के सहारे पीएम पद के जूते में अपना पांव डालना चाहते हैं. जरा ध्यान से, अदर जंग लगी कील चुभ गई तो कहीं पैर कटवाने की नौबत ना आन पड़े!!!!

http://www.truthofgujarat.com/dumb-dumb-narendra-modi-says-kejriwal-given-kashmir-pak-based-aaps-donation-map/

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

‘एनडीटीवी’ की शानदार चुनावी रिपोर्टिंग और ‘इंडिया न्यूज’ में सूत्रों का खेल!

शंभूनाथ शुक्ल : NDTV की चुनाव रिपोर्टिंग देखकर लगता है काश अब मैं एक रिपोर्टर होता तो ऐसी ही बेधड़क और बेबाक चुनाव रिपोर्टिंग करता जैसी कि एनडीटीवी में हो रही है। अगर कोई चमत्कार हो जाए और मुझे इस उम्र में रिपोर्टिंग करनी पड़ी तो मैं एनडीटीवी से शुरू करूं।

जनसत्ता में 1984 से 1998 तक मुझे हर चुनाव में टीएन शेषन बना दिया जाता। कोई भी चुनाव हो प्रभाष जी मुझे चुनाव प्रभारी बना देते। कोई भी खबर किसी भी पेज पर जाए मेरी नजर से होकर ही जाती थी। तब मजा आता था। कोई पेड न्यूज का जमाना नहीं था लेकिन जो जनसत्ता कह देता लोग उसी आधार पर वोट कर आते। Hemant Sharma अदभुत रिपोर्टिंग करते। यह अलग बात है कि उनकी अपनी निष्ठा भाजपा के साथ थी लेकिन उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया। यही कारण था कि मायावती, मुलायम सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा रहे हों या अटल जी अथवा कांग्रेसी किसी ने भी उनकी रिपोर्टिंग पर अंगुली नहीं उठाई।


Sheetal P Singh : 'सूत्रों' के नाम पर मीडिया ज़माने से गढंत पेश करता रहा है। वह मालिकों द्वारा निर्देशित, संपादक की विचारधारा के अनुसार या paid news वाले कोटे में समाचार गढ़ता रहा है। India news ने अभी अभी बताया "गोरखपुर बार्डर पर पकड़े दोनों आतंकवादी मोदी राहुल और केजरीवाल पर आतंकी हमला करने आये थे" सूत्रों के अनुसार। इसके पहले पकड़े गये आतंकियों पर अकेले मोदी की हत्या की प्लानिंग की ख़बर चली थी, सूत्रों के अनुसार। इसकी आलोचना हुई कि सूत्र मोदी का ही नाम लेते हैं? अब सूत्रों ने अपने को बैलेंस कर लिया है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला और शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

नीरा राडिया की फर्मों पर चल सकता है मुकदमा

नई दिल्ली : गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह कंपनी कानून के कथित उल्लंघन के लिए वैष्णवी समूह की विभिन्न कंपनियों पर मुकदमा करने की तैयारी में है। वैष्णवी समूह, विवादास्पद पूर्व कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया का समूह है।

उच्चतम न्यायालय में दाखिल हलफनामे में एसएफआईओ ने कहा कि कंपनी मामलों के मंत्रालय ने इन कंपनियों के खिलाफ मुकदमा करने की मंजूरी दे दी है और मुकदमा दायर करने की प्रक्रिया चल रही है। कंपनी मामलों के मंत्रालय के अधीन काम करने वाले एसएफआईओ पर सफेदपोश अपराध व धोखाधड़ी की जांच करने का दायित्व है।

हलफनामे में वैष्णवी समूह की कंपनियों द्वारा कंपनी कानून के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन का विवरण देते हुए कहा गया है, मंत्रालय द्वारा वैष्णवी समूह की कंपनियों के खिलाफ मुकदमा करने की मंजूरी दे दी गई है और मुकदमा दायर करने की प्रक्रिया चल रही है। एसएफआईओ ने न्यायालय को यह भी सूचित किया कि उसने वैष्णवी कारपोरेट कम्युनिकेशंस और उसकी आठ कंपनियों के खिलाफ जांच पूरी कर ली है और अंतिम जांच रिपोर्ट मंत्रालय को 22 जनवरी को सौंप दी गई। एजेंसी ने कहा कि कंपनी मामलों के मंत्रालय ने 5 फरवरी को जारी निर्देश में जांच के आधार पर कंपनी अधिनियम के तहत बन रहे आरोपों के आधार पर इस मामले में मुकदमा दायर करने को कहा। मंत्रालय के निर्देश पर पर उसने रिपोर्ट की प्रतियां सीबीआई और आयकर विभाग को भी भेज दी हैं। एसएफआईओ ने वैष्णवी कापरेरेट कम्यूनिकेशन्स के आलवा समूह की कुछ अन्य कंपनियों की भी जांच की है। इनमें वैष्णवी एडवाइजरी सर्विसेज, लेजर क्लब इंडिरूा, कालरे कंसल्टेंसी, मैजिक एयरलाइन, क्राउनमार्ट इंटरनेशनल इंयिा, मानसी एग्रो, विटकाम कंसल्टेंसी और नीयूकाम कन्सल्टिंग शामिल हैं। (एजेंसी)

पर्ल ग्रुप के 45 हजार करोड़ रुपये के घोटाले में यूपी के 1.3 करोड़ और महाराष्ट्र के 61 लाख निवेशकों का पैसा (डीएनए में खबर प्रकाशित)

पैंतालीस हजार करोड़ रुपये के घोटाले में निर्मल जीत सिंह भंगू जेल जाएंगे या नहीं, ये तो सीबीआई की रिपोर्ट और कोर्ट की सक्रियता पर निर्भर करता है लेकिन इस घाटोले से देश के करोड़ों निवेशकों का धन दांव पर लग गया है. अंग्रेजी अखबार डेली न्यूज एक्टिविस्ट के मुताबिक महाराष्ट्र के करीब 61 लाख निवेशकों का पैसा फंसा है. इसी तरह इन कंपनियों में उत्तर प्रदेश के 1.3 करोड़ निवेशकों का पैसा लगा हुआ है. डीएनए में प्रकाशित पूरी रिपोर्ट ये है….

61 lakh Maharashtra investors duped

Hakeem Irfan

The two real estate fund companies Pearls Golden Forest and Pearls Agrotech Corporation Limited have duped 61 lakh investors in Maharashtra and 1.3 crore investors in Uttar Pradesh in its 45,000 crore ponzi scheme fraud.

As per the conservative estimate of Central Bureau of Investigation on Friday said the two companies have cheated five crore investors all across the country including 51 lakh investors in Tamil Nadu, 45 lakh in Rajasthan and 25 lakh in Haryana. Investigtors have also frozen 1,000 accounts of the two MDs opened in 35 banks all across India.

The CBI had registered a case against two managing directors of PGF and PACL, Nirmal Singh Bhangoo and Sukhdev Singh, in February, after conversion of a preliminary enquiry registered earlier on the direction of the Supreme Court.

After CBI registered the case, the accused duo applied for anticipatory bail, which they withdrew on Friday. CBI has conducted raids at various places in Delhi, Chandigarh, Punjab and Haryana in connection with the case and would soon examine the accused as well.

The two companies have raised investments through 'collective investment scheme' purpotedly for sale and development of agricultural land. They would issue fake land allotment letters to induce the investors.

When high court of Punjab and Haryana ordered the compnaies to wind up the scheme and refund the investors in Punjab, they started a similar scheme under the name PACL in the capital.

"Funds collected from new investors of PACL were used to repay the earlier investors to stave off criminal prosecution. Funds have been raised by the two companies through a vast network of several lakh commission agents spread all over the country who were being paid hefty commissions for luring the investors," said a senior CBI official. Sebi notified Collective Investment Scheme Regulations in 1999 and asked more than 1,000 companies to wind down and refund investors. Both PACL and PGF found themselves in the list. Later, both the companies approached the court.

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पत्रकार साई रेड्डी की हत्या को नक्सलियों ने बहुत बड़ी भूल बताया, कई अन्य मुद्दों पर अपना नजरिया स्पष्ट किया

जगदलपुर : देशबन्धु अखबार के पत्रकार साई रेड्डी की हत्या के बाद देश भर में पत्रकारों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया. नक्सलियों की मांद कहे जाने वाले बासागुड़ा पहुंचकर पत्रकारों ने नक्सली नेताओं से इस घटना पर स्पष्टीकरण मांगा था. बीते दिनों ओरछा से बीजापुर तक पत्रकारों ने पदयात्रा निकाल कर पत्रकारों पर हो रहे नक्सली हमले का विरोध किया था और पदयात्रा के दौरान नक्सली नेताओं से मिलने का प्रयास भी किया था. चार दिनों की इस पदयात्रा में नक्सली लगातार पत्रकारों का सामना करने से बचते रहे जबकि जिन इलाकों से यह पदयात्रा गुजरी वो सारा इलाका नक्सलियों का गढ़ माना जाता हैं.

अब तक पत्रकारों की हत्या के संबंध में उठ रहे सवालों के जवाब नक्सलियों द्वारा नहीं दिए गए. रविवार को दो बड़े नक्सली नेताओं ने बस्तर के घने जंगलों के बीच पत्रकारों से इस विषय पर बात की और इस घटना को बहुत बड़ी भूल मानते हुए पत्रकार जगत से माफी मांगी है. स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्य चैतू और दरभा डिवीजनल कमेटी के सचिव सुरेन्द्र ने कहा कि साई रेड्डी की हत्या का फरमान 1997 में जारी किया गया था क्योंकि बीजापुर के कांग्रेस नेता सवरागिरी के साथ मिलकर उन्होंने जनजागरण अभियान के लिए काम किया था. स्व. रेड्डी को दो तीन बार चेतावनी दी गई थी. उसके बाद जब राज्य सरकार की पुलिस ने उन पर जनसुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था उसके बाद से सेंट्रल कमेटी ने अपना फरमान वापस ले लिया था. गलती से उस निर्णय की जानकारी निचले स्तर पर सक्रिय जन मिलिशिया सदस्यों को नहीं दी जा सकी. इसी वजह से यह बड़ी भूल उनसे हुई है.

घटना के दिन बासागुड़ा बाजार में जनमिलिशिया द्वारा किसी दूसरी घटना को अंजाम दिया जाना था लेकिन किन्ही कारणवश उस घटना को अंजाम नहीं दिया जा सका. इसी समय पहले से जारी फरमान के आधार पर साई रेड्डी पर हमला किया गया जो कि हमारी बहुत बड़ी भूल थी. इस घटना पर नक्सलियों के केंद्रीय नेतृत्व ने गहरी नाराजगी जाहिर की और घटना में शामिल सदस्यों पर सेंट्रल कमेटी के निर्देशानुसार कठोर कार्रवाई भी की गई है. इसी तरह तोंगपाल के पत्रकार नेमीचंद की हत्या भी निचले कैडर की बड़ी भूल थी. हमने स्वयं नेमीचंद को बुलाकर पुलिस से दूर रहने की हिदायत दी थी. अगर हत्या करना हमारी मंशा होती तो वह काफी पहले ही हो सकती थी. हम स्वयं एक राजनैतिक संगठन हैं और मीडिया के बिना हमारा आंदोलन भी सफल नहीं हो सकता. ऐसे में मीडिया पर हमले की बात हम सोच भी नहीं सकते.

नक्सली नेताओं ने स्वीकार किया कि पिछले कुछ दिनों में निचले कैडर के साथ संवादहीनता की स्थिति निर्मित हो गई थी जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं हुई हैं. बस्तर के कुछ और पत्रकारों के नाम नक्सलियों की हिटलिस्ट में होने की बात पर कहा कि यह सरासर झूठ है और इस आशय के बांटे गए पर्चे भी फर्जी हैं. देशभर में कोई भी पत्रकार हमारी हिटलिस्ट में नहीं है. केंद्रीय समिति के द्वारा पत्रकार, शिक्षक और महिलाओं के लिए विशेष पॉलिसी बनाई गई है जिसके निचले स्तर पर पालन नहीं हो पाने की वजह से यह गलतियां हुई हैं. दोनों माओवादी नेताओं ने फिर से ऐसी गलती नहीं होने का अश्वासन पत्रकारों को दिया है.

माओवादी नेताओं ने कहा कि सरकारों ने सिर्फ कार्पोरेट के फायदे के लिए ही बस्तर को रणभूमि बना दिया है. नारायणपुर में ट्रेनिंग के नाम पर सेना का आना और बस्तर में केंद्रीय बलों की तैनाती सिर्फ इसलिए की गई है कि आदिवासियों को यहां से हटाया जा सके और बहुमूल्य खनिज संपदा को औद्योगिक घरानों को बांटा जा सके. उन्होंने कहा कि टाटा और एस्सार का विरोध लगातार जारी रहेगा. एनएमडीसी की खदानों और नगरनार स्टील प्लांट के निजीकरण का व्यापक विरोध किया जाएगा.

2011 में दंतेवाड़ा के पालनार बाजार में एस्सार से 15 लाख रुपए प्रोटेक्शन मनी लेने के सवाल पर कहा कि एस्सार माओवादियों को फंडिंग नहीं करता है पर उसने सलवा जुडूम को जरूर आर्थिक मदद पहुंचाई थी. एस्सार की पाइपलाइन के बारे में कहा कि इसका विरोध हम पहले भी करते रहे हैं और यह विरोध आज भी जारी है. सुरक्षा बलों के पहरे में इस बंद पड़ी पाइप लाइन को हाल ही में फिर चालू किया गया है. उन्होंने कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बलों को कार्पोरेट के फायदे के लिए इस्तेमाल किए जाने के उनके दावों की पुष्टि इस बात से होती है.

माओवादी नेताओं ने एक सवाल के जवाब पर कहा कि सोनी सोढ़ी के साथ उनके संगठन का कोई संबंध नहीं है. हम सोनी सोढ़ी का समर्थन नहीं करते. उनके पिता जमीदार थे और उनका विरोध हमने लगातार किया है. आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की नीतियों को भी उन्होंने हास्यास्पद बताया. उन्होंने कहा कि वे सिर्फ भ्रष्टाचार दूर करने की बात कहते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के मूल में छिपे महत्वपूर्ण कारणों का जिक्र वे कभी नहीं करते.
 
माओवादी नेताओं का कहना है कि उनके द्वारा स्कूल भवन निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं और पेयजल आदि के कामों में कभी भी रुकावट नहीं डाली गई है. 2007 में स्कूलों और आश्रमों में सुरक्षाबलों के ठहरने के सरकारी आदेश का हमने विरोध किया था. उसी समय हमने स्कूल भवनों को तोड़ा था. हम इनका पुननिर्माण चाहते हैं क्योंकि शिक्षा हमारी भी प्राथमिकता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भी स्कूल भवनों और आश्रमों में आज भी सुरक्षा बलों का डेरा है. 2008 के बाद से हमने किसी भी शाला भवन को नुकसान नहीं पहुंचाया है. सड़कों के निर्माण का विरोध जारी रहेगा क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुध दोहन के लिए ही सड़कों का निर्माण किया जा रहा है.
 
आदिवासी नेता चैतू ने कहा कि हमें सुरक्षा बलों के मूवमेंट की पूरी जानकारी रहती है जबकि हमारी कोई भी जानकारी उन तक नहीं पहुंच पाती. पूरी जनता हमारी इंटेलीजेंस है इसलिए ही हमारी जानकारी उन तक नहीं पहुंच पाती. जनता को सुरक्षा बलों से ज्यादा हम पर भरोसा है. वियतनाम का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि 1975 में जनता की मदद से ही अमरीका की सेना को वियतनाम से खदेड़ा गया था. (साभार- देशबंधु)