पत्रकार काजमी के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल

 

नई दिल्ली। इजरायली राजनयिक पर हुए हमले के मामले में पुलिस की स्पेशल सेल ने मंगलवार को पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी के खिलाफ तीस हजारी अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी। तकरीबन साढ़े पांच सौ पन्नों की चार्जशीट में पुलिस ने केवल काजमी को आरोपी बनाया है। इसके अलावा इस मामले में शामिल कई ईरानी नागरिकों को संदिग्धों की सूची में डाला है। पुलिस की अर्जी पर सुनवाई के बाद सीएमएम विनोद यादव की अदालत ने संदिग्धों से पूछताछ में सहयोग के लिए ईरान, जॉर्जिया, मलेशिया, बैंकाक समेत कई देशों को पत्र जारी किए हैं। 
 
पुलिस ने काजमी को इजरायली महिला राजनयिक तल येहशुआ कोरेन की कार पर बम लगाने की साजिश में मुख्य रूप से शामिल माना। इस मामले में शामिल अन्य संदिग्धों से पूछताछ के बाद पुलिस चार्जशीट दाखिल करेगी। बता दें कि महिला राजनयिक की कार पर 13 फरवरी 2012 को हुए बम हमले में वह और उनका ड्राइवर घायल हो गए थे। इस मामले में पुलिस जांच की सुई शुरू से ही ईरानी मूल के लोगों की ओर थी। पुलिस ने मामले की जांच के दौरान 6 मार्च को ईरानी न्यूज एजेंसी के पत्रकार सैयद मोहम्मद काजमी को गिरफ्तार किया था। 
 
काजमी से पूछताछ व मोबाइल कॉल की जांच के बाद ईरानी नागरिक हूशांग अफसर ईरानी का नाम खासतौर से सामने आया था। हमले वाले दिन भी ईरानी की उपस्थिति भारत में ही बताई गई और वह उसी शाम बैंकाक और फिर वहां से क्वालालांपुर गया। जांच में हूशांग अफसर ईरानी के अलावा ईरानी नागरिक सैयद अली मेहदी सदर, मोहम्मद रजा अब्दुल गाशमी सेडागेजत मसूद का नाम भी सामने आया था। पुलिस ने यह भी कहा कि इजरायली राजनयिकों पर हमले की ऐसी ही साजिश जॉर्जिया में भी रची गई, लेकिन इसे पहले ही नाकाम कर दिया गया। मलेशिया में भी 14 फरवरी को आतंकी हमले हुए थे। इस सिलसिले में मसूद को गिरफ्तार किया गया। साभार : अमर उजाला 

टैम पर फिक्सिंग का आरोप, एनडीटीवी ने किया मुकदमा

टीआरपी को लेकर काफी समय से सवाल उठते रहे हैं. आलोचक पहले भी टीआरपी की विश्‍वसनीयता पर संदेह करते रहे हैं. अब खुद चैनल वाले टैम की विश्‍वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं. ताजा आरोप एनडीटीवी इंडिया ने लगाया है. एनडीटीवी प्रबंधन ने टैम को कोर्ट में घसीटा है. टैम पर आरोप लगाया गया है कि पैसे लेकर इस संस्‍था ने टीवी रेटिंग में फेरबदल किया है. यह मुकदमा न्‍यूयार्क स्‍टेट ला के तहत अमेरिका में दायर किया गया है. चैनल पिछले आठ सालों (2004-12) में टैम द्वारा जारी रिपोर्ट व्‍यूअरशिप डाटा से खुश नहीं है. एनडीटीवी ने निल्‍सन और कंटर मीडिया पर मुकदमा किया है. उल्‍लेखनीय है कि इंडिया में टीआरपी मापने वाली टैम इंडिया इंन्‍हीं दोनों कंपनियों का संयुक्‍त वेंचर है. 

 
इस मामले को लेकर एनडीटीवी एवं फर्स्ट पोस्ट प्रकाशित पूरी रिपोर्ट :
 
न्यूयार्क : दर्शकों के आंकड़ों में गड़बड़ी के लिए एनडीटीवी ने वैश्विक टीवी रेटिंग एजेंसी नील्सन के खिलाफ अरबों डॉलर का मामला दायर किया है। न्यूयॉर्क की एक अदालत में पिछले सप्ताह दायर 194 पृष्ठ के वाद में एनडीटीवी ने नील्सन पर आरोप लगाया है कि उसने कुछ पक्षों में दर्शकों के आंकड़ो में घालमेल किया है। नील्सन ने उन टीवी चैनलों के पक्ष में काम किया, जिन्होंने उसके अधिकारियों को रिश्वत दी। मीडिया की खबरों में यह जानकारी दी गई है।
 
एनडीटीवी ने कहा कि पिछले 8 साल के दर्शकों के आंकड़ों में घालमेल का सिलसिला जारी है। इस साल जब नील्सन के अधिकारियों को इस बारे में प्रमाण दिए गए तो उन्होंने इसमें बदलाव का आश्वासन दिया। लेकिन एनडीटीवी का कहना है कि नील्सन ने अपने इस आश्वासन को पूरा नहीं किया है। अब एनडीटीवी ने नील्सन से कई मामलों में मुआवजे की मांग की है। एनडीटीवी ने धोखाधड़ी के लिए 81 करोड़ डालर, लापरवाही के लिए 58 करोड़ डालर तथा कुछ अन्य मामलों में लाखों डॉलर की मांग की है।
 
इस बारे में नील्सन के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी की लंबे समय से नीति है कि वह लंबित कानूनी मामलों में टिप्पणी नहीं करती। इस बारे में नई दिल्ली में संपर्क किए जाने पर एनडीटीवी ने भी कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार किया। साभार : एनडीटीवी 


There have been, over the years, a number of instances when broadcasters have been unhappy with the TAM ratings. TAM ratings, to the uninitiated, are the ratings which measure television audiences in India. There have been rumours of broadcasters being able to ‘fix’ the ratings, with the help of corrupt TAM executives.

 
NDTV has filed a suit against The Nielsen Company and other defendants in the US, under New York State laws. According to the suit, the channel had been discussing their unhappiness with various aspects of the viewership data, continuously from 2004 to 2012. Obviously, they do not have any faith that the situation will change, leading to the filing of the suit. 
 
When asked for a response on the developments, the following statement was issued, quoting a TAM spokesperson: “TAM India, a 50:50 joint venture between Kantar Media and Nielsen, doesn’t comment on any litigation.” 
 
NDTV is not just angry – they are very, very angry. NDTV has asked for $580 million for negligence and a minimum of $810 million for fraud. 
 
“This is a case, brought under New York State laws, of negligence, gross negligence, false representations, prima facie tort and negligence per se… This is also a case of a once noble company, Nielsen…exhibiting unabashed short term greed and reckless disregard of its duties and of its noble origin. It is a case of the two largest audience measurement conglomerates in the world, Nielsen and Kantar, formerly competitors, operating worldwide through a deliberately complex web of subsidiaries and joint ventures, creating, at least in India, a monopoly and abusing the power of that monopoly,” says the suit. 
 
The entire suit can be read at deadline.com, but, for the benefit of Firstpost readers, we reproduce two of the most damaging paragraphs, if proven to be true. 
 
“On April 3, 2012, a meeting was held between the representatives of NDTV, namely, Rahul Sood, Sidharth Barhate and Anand Mohan Jha, and two field staff employees of TAM (one provided his first name, while the other did not disclose his name) at Ramada Plaza Hotel, Juhu, Mumbai. The TAM employees revealed that they were employed in Mumbai to look after, and collect data from, TAM meters. 
 
They stated they were willing to manipulate TAM ratings in Mumbai. They showed their identity cards and represented themselves as TAM employees. They also showed TAM manuals to the representatives of NDTV and explained how the meters operate, and the number of meters /areas that they looked after. They were also aware of NDTV’s ratings. They had been in touch with NDTV representative as mentioned above, therefore, during the meeting they insisted upon NDTV’s permission to activate the system at the earliest so that NDTV could see prompt results of high TRPs as promised by these persons. They claimed to have effected manipulations in the past for other channels and were willing provide the same “services” for “any” channel that was ready to pay the demanded consideration (bribe). They were confident that they could triple channel ratings of NDTV in Mumbai over a period of two to three weeks in the required target group. They stated they had direct access to homes and visited those homes periodically (at least 3 to 4 times a week) and were in a position to easily influence what the households watched/viewed. They said by paying a bribe of $250 to $500 per household per month, the TAM households could be made to watch only those channels which they insisted upon…” 
 
“On April 11 and 12, 2012 a video was shown to Bob (Robert Messemer, Chief Security Officer, The Nielsen Company, Schaumburg, IL) by NDTV officials which categorically conveyed to and persuaded Bob that NDTV’s repeated claims since 2004 were true and that the TAM system was corrupt and required immediate attention. He admitted to having a wholly new appreciation for NDTV’s concerns, and was convinced that he had not witnessed corruption of this level previously anywhere. He admitted to being amazed by the degree of networking and feedback loops such consultants appeared to have within the TAM system. He also acknowledged the need for changes in TAM system and personnel from the very top. Bob subsequently asked for a copy of the video. In lieu of the video recording, NDTV sent a redacted transcript to Bob…” 
 
The 194 page plea captures all the communication (oral, on e-mail, etc) between representatives of NDTV, TAM India and other companies associated with TAM India and The Nielsen Company. NDTV obviously feels confident that they more than have a case. 
 
This is going to be a long, hard battle – one that TAM is not going to enjoy. NDTV is only the first of many aggrieved broadcasters to have filed a suit against TAM – but NDTV is, by no means, the only one unhappy with TAM data. Courtesy : First Post

मु्गलसराय में तेल माफियाओं ने मीडियाकर्मियों पर हमला किया, मामला दर्ज

: दो आरोपियों की हुई गिरफ्तारी : मुगलसराय से खबर है कि एक घटना का कवरेज करने पहुंचे मीडियाकर्मियों की तेल माफियाओं ने जमकर धुनाई की. इतने से भी मन नहीं भरा तो पत्रकारों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया. पीटे जाने से नाराज पत्रकार अलीनगर थाना पहुंच कर धरना दिया. पत्रकारों के पीटे जाने की खबर सुनकर डीएम व एसपी भी मौके पर पहुंचे. पत्रकारों की तहरीर पर पुलिस ने मामला दर्ज कर दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है. मामले की जांच की जा रही है. 

 
जानकारी के अनुसार अलीनगर स्थित भारत पेट्रोलियम से तेल लेकर जा रहा एक टैंकर पलट गया तथा उसका तेल बहने लगा. टैंकर कर्मी पास में खड़े इंडियन ऑयल के एक टैंकर में रिस रहे तेल को भरने लगे. इतने में इलेक्‍ट्रानिक तथा प्रिंट मीडिया से जुड़े कुछ पत्रकार पहुंच गए तथा हादसे का कवरेज करने लगे. इसी दौरान टैंकर मालिक जमील भी पहुंच गया. कवरेज को लेकर उससे मीडियाकर्मियों की तक झक हो गई. जमील पर कई मामले चल रहे हैं. जमील के ललकारने पर ही उसके समर्थक तथा स्‍थानीय लोग पत्रकारों पर पिल पड़े.
 
 
 
मनबढ़ लोगों ने संतोष जायसवाल, उदय गुप्‍ता, ललित पांडेय, सन प्रकाश, रोहित श्रीवास्‍तव, शशांक शेखर पांडेय, सुधांशु शेखर पांडेय, विनय वर्मा, जुबेर अहमद समेत कई अन्‍य स्ट्रिंगरों तथा संवाद सूत्रों की जमकर धुनाई कर दी. कई पत्रकारों को चोटें आईं. घटना से नाराज पत्रकार अलीनगर थाने पहुंच गए तथा धरना देने लगे. घटना की जानकारी मिलने पर डीएम तथा एसपी भी अलीनगर थाने पहुंच गए. दैनिक जागरण के संवाद सूत्र की तहरीर पर थाने में आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ. खबर दिए जाने तक पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था. मामले की जांच की जिम्‍मेदारी मुगलसराय कोतवाल को सौंपी गई है. 

चार महीने के बकाए वेतन को लेकर हमार एवं फोकस टीवी के कर्मी भी आंदोलित

: महीनों से ब्‍लैक आउट चल रहे हैं समूह के चैनल : पटना कार्यालय पर ताला लगा : महुआ न्‍यूज लाइन के बाद अब पहले से ही बदहाल चल रहे मतंग सिंह के फोकस टीवी और हमारा टीवी के कर्मचारी भी बगावत पर उतर गए हैं. इन लोगों को मार्च के बाद से सैलरी नहीं मिली है. समूह के सारे चैनल भी लम्‍बे समय से ब्‍लैक आउट चल रहे हैं. चैनल क्‍यों चल रहा है और क्‍यों चलाया जा रहा है, ये भगवान को भी नहीं पता है. बैंक भी रिकवरी आदेश निकाल चुका है. खबर है कि अब दोनों चैनलों के लगभग सौ कर्मचारी प्रबंधन से वेतन की मांग को लेकर आंदोलन की रणनीति तैयार कर रहे हैं. 

आश्‍वासन देने तथा साम-दाम-दंड-भेद सभी कुछ अपनाने में माहिर मतंग सिंह ने कर्मचारियों से वादा किया है कि ग्‍यारह अगस्‍त तक सभी का बकाया वेतन दे दिया जाएगा. कर्मचारी वेतन के साथ अपने पीएफ की भी मांग कर रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि पंकज कुमार के नेतृत्‍व में कर्मचारियों ने अल्‍टीमेटम दे दिया है कि अगर 11 अगस्‍त तक भी बकाया वेतन नहीं मिला तो वे आर आर की लडाई लड़ने के लिए तैयार हैं. 
 
गौरतलब है कि इसके पहले भी एक बार सैलरी क्राइसिस को लेकर हमारा एवं फोकस के कर्मचारी बवाल कर चुके हैं. हमारा के सैकड़ों कर्मचारियों ने सामूहिक इस्‍तीफा देकर चैनल को बाय कर दिया था. उस दौरान इसी टीम ने मतंग सिंह के साथ मिलकर चैनल को ऑन एयर रखा था. मतंग ने इन लोगों से तमाम वादे किए परन्‍तु ज्‍यादा वादे हवा में ही रह गए. पिछले चार महीने से सैलरी के बिना कर्मचारियों की हालत पतली हो चुकी है. उन्‍हें ना जीते बन रहा है ना ही मरते. 
 
चैनल लम्‍बे समय से आर्थिक दुश्‍वारियों से जूझ रहा है. लोन वसूली के लिए इंडियन ओवरसीज बैंक ने पिछले दिनों रिकवरी नोटिस भी जारी किया था. चैनल के पटना कार्यालय पर भी ताला लग चुका है. आधे कर्मचारियों को पैसा दिया गया आधे लोगों को ऐसे ही टाल दिया गया. अब नोएडा आफिस की बारी है. एचआर ने काम नहीं करने वाले कर्मचारियों से आफिस छोड़ने को कह दिया, परन्‍तु कर्मचारी इस मांग पर अड़े रहे कि जब तक उन्‍हें उनका बकाया वेतन तथा पीएफ का पैसा नहीं मिल जाता वे फ्लोर नहीं छोड़ेंगे. 
 
माना जा रहा है कि 11 अगस्‍त के बाद कर्मचारियों को अगर बकाया पैसा नहीं मिलता वे आंदोलन की राह अख्तियार कर सकते हैं. इस संदर्भ में प्रबंधन से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु बात नहीं हो पाई. चेयरमैन मतंग सिंह तक अपनी बात पहुंचाने वालों में पंकज कुमार, विकास राज, मनीष राज मासूम, राजेश मिश्रा, सौरभ कुमार समेत कई कर्मचारी शामिल रहे. 

बरेली में आई नेक्‍स्‍ट के फोटोग्राफर टोनी समेत कई पर मामला दर्ज

 

बरेली के सदर थाने में आई नेक्‍स्‍ट के कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है. यह मुकदमा बरेली में कांग्रेस के मेयर पद के प्रत्‍याशी एडवोकेट अमजद सलीम ने दर्ज कराई है. पुलिस ने आई नेक्‍स्‍ट के एक अज्ञात अधिकारी, फोटोग्राफर टोनी तथा कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. मामले की जांच की जा रही है. इस एफआईआर के बाद से ही जागरण समूह के इस वेंचर के लोगों में हड़कम्‍प मचा हुआ है. 
 
जानकारी के अनुसार निकाय चुनाव के दौरान आई नेक्‍स्‍ट के कार्यक्रम में अमजद सलीम के साथ कुछ लोगों ने मारपीट की थी. इसी मामले में सलीम ने कोतवाली में लिखित तहरीर दी थी, जिसके बाद पुलिस ने उक्‍त लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 17(ख), (ड़), 352,323, 504 तथा 427 के तहत मामला दर्ज किया है. सलीम ने आरोप लगाया है कि आई नेक्‍स्‍ट के लोगों ने चुनाव का उल्‍लंघन करते हुए उनके साथ मारपीट की गई. 
 
सलीम ने अपनी तहरीर में कहा है कि आई नेक्‍स्‍ट के लोगों ने पैकेज के नाम पर उनसे छह लाख रुपये की मांग की थी, देने में असमर्थता जताने पर उन्‍हें एक प्रत्‍याशी के पक्ष में बैठने पर पचास लाख दिलाने की बात कही गई. जब वे नहीं माने तो उनसे मारपीट की गई. पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है परन्‍तु अखबार के दबाव में अब तक इस मामले की जांच ठीक से नहीं कर रही है और ना ही किसी की गिरफ्तारी की गई है. नीचे एफआईआर की कॉपी.  
 
 

महुआ प्रबंधन ने मानी गलती, सौ फीसदी मांग कबूल

 

महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों की लड़ाई जीत की तरफ है। हो सकता है देर रात तक ये ख़बर मिले कि उनकी सौ फीसदी मांगें मान ली गई हैं। प्रबंधन के दूत ने धरने पर बैठे पत्रकारों के बीच डेढ़ बजे दिन में इसका ऐलान किया है। प्रबंधन ने अपनी तरफ से हुई किसी भी गलती के लिए बिना शर्त खेद जाहिर किया और कहा कि हम चाहते हैं कि हर गतिरोध आज दूर हो जाए और आपकी मांग हमने स्वीकार करने का फैसला किया है। जिसके बाद महुआ न्यूजलाइन के पत्रकारों ने इसका स्वागत किया। लेकिन ये भी साफ कर दिया कि जब तक बकाए वेतन की राशि अकाउंट में कैश नहीं होती न्यूज़रूम में उनका सांकेतिक धरना जारी रहेगा। और उनकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं होगा जिससे परिसर में चल रहे महुआ समूह के बिहार में नंबर वन चैनल हुआ न्यूज़ बिहार-झारखंड के प्रसारण में कोई दिक्कत नहीं हो।
 
भले ही औपचारिक ऐलान हो गया हो लेकिन आंदोलन का जज्बा जारी है। मामला पूरी तरह सुलझने तक इसकी सख्त ज़रूरत है। महुआ न्यूज़लाइन का आंदोलन एक शुरुआत है। मकसद है अन्याय नहीं सहना…इससे ज्यादा और कम कुछ और नहीं दोस्तों… जल्द ही हमारी जीत की औपचारिक खबर आप तक पहुंचेगी। एकजुट रहिए,.. अभी आवाज उठाने के कई मौके और आएंगे। अन्याय के खिलाफ प्रतिकार का ऐलान पूरा देश कर रहा है। सबकी आवाज बुलंद करनेवाले पत्रकार भी अब पीछे नहीं रहेंगे। एकजुटता की ये मशाल जलती रहनी चाहिए। हिंदी मीडिया का कोई भी पत्रकार चाहे वो कहीं भी काम करता हो… दशा और दुर्दशा सबकी एक जैसी है। इसलिए एक नई शुरुआत की जरूरत थी।
 
हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जगत में अपने हक के लिए आवाज उठाने की परिपक्वता अब तक कम ही देखी गई है… लेकिन अब बात आगे बढ़नी चाहिए। महुआ न्यूज़लाइन के आंदोलनकारी पत्रकारों की जीत इस पर पहली मुहर साबित होनेवाली है। ये सच है कि हमारी नौकरी गई है लेकिन हमने ये जान लिया है कि नौकरों के भी कुछ हक होते हैं और देश का कानून इस बात की गारंटी देता है कि उस पर आंच न आए। आगे आनेवाले वक्त में ये अनुभव काम आएगा।
 
महुआ न्यूज़लाइन के आंदोलनरत पत्रकारों द्वारा भेजा गया पत्र.

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाले का मास्‍टरमाइंड कौन?

मुंगेर। विश्व के अब तक के सनसनीखेज दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में बिहार के पुलिस अधीक्षक पी0 कन्नन के निर्देशन में उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर ने जो पर्यवेक्षण -टिप्पणी समर्पित की है. उस पर्यवेक्षण-टिप्पणी की पृष्ठ संख्या-03 ने विश्व के समक्ष उजागर कर दिया है कि भारत सरकार और बिहार सरकार सहित अन्य राज्यों के खजानेको लूटने के लिए भारत का कारपोरेट प्रिंट मीडिया किस हद तक नीचे गिर सकता है, मीडिया हाउस किस हद तक जालसाजी, फरेबी और धोखाधड़ी कर सकता है? हम यह भी कह सकते हैं कि भारत सरकार और राज्य सरकारों के खजाने को बुद्धि से लूटने के हथकंडे भारत के इन कारपोरेट प्रिंट मीडिया घराने से सीखने की दूसरों को जरूरत है।

 
आरक्षी उपाधीक्षक की पर्यवेक्षण-टिप्पणी के पृष्ठ-03 पर दैनिक हिन्दुस्तान के अभियुक्तों के द्वारा की गई जालसाजी, फरेबी और धोखाधड़ी की तस्वीर कुछ यूं पेश की गई है। उस तस्वीर को पुलिस पदाधिकारी की कलम में ही हू-ब-हू पेश किया जा रहा है। 
 
पुलिस उपाधीक्षक ने पर्यवेक्षण-टिप्पणी में लिखा है कि -‘‘प्राथमिक अभियुक्त शोभना भरतिया, अध्यक्ष, हिन्दुस्तान प्रकाशन समूह (दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड), प्रधान कार्यालय-18-20,कस्तुरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली द्वारा संचालित इस कंपनी के द्वारा देश के विभिन्न भागों से हिन्दी और देवनागरी लिपि में हिन्दुस्तान शीर्षक से दैनिक समाचार पत्रों को प्रकाशित किया जा रहा है। इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन के पूर्व प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दिये गये प्रावधानों का अक्षरशः पालन करना समाचार पत्र के किसी भी प्रकाशक के लिए कानूनी बाध्यता है, जिसका उल्लंघन दण्डनीय अपराध है। प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट में निहित प्रावधानों के तहत किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन के पूर्व निम्नांकित नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है:-
 
(1) प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व संबंधित जिले के जिला दंडाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषणा-पत्र समर्पित करना।
 
(2) तद्नुसार जिला दंडाधिकारी द्वारा प्रमाणीकरण देना।
 
(3) कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना।
 
(4) भारत सरकार के समाचार-पत्र पंजीयक से पंजीयन कराना।
 
भागलपुर से अवैध दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन शुरू हुआ : इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि अभियुक्तों द्वारा उक्त नियमों का खुलेआम उल्लंघन करते हुए भारत के प्रेस रजिस्ट्रार की अनुमति प्राप्त किए बिना ही 03 अगस्त, 2001 से दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन भागलपुर के मेसर्स जीवन सागर टाईम्स प्रा0 लि0, लोअर नाथनगर रोड, परबत्ती, भागलपुर से प्रारंभ कर दिया गया।
 
विज्ञापन पाने के लिए फर्जी कागजत प्रबंधन ने पेश किया : साथ ही सरकार के समक्ष झूठा व फर्जी कागजात प्रस्तुत कर विज्ञापन भी प्राप्त किया जाने लगा जिस क्रम में विज्ञापन मद में करोड़ों रुपया सरकारी खजाने से प्राप्त किया जा चुका है। इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि किसी भी प्रकाशक द्वारा समाचार -पत्र के प्रकाशन के नाम का क्लियरेंस भारत के समाचार पत्रों के निबंधक कार्यालय से भी लेना अनिवार्य एवं कानूनी बाध्यता है।
 
 
 
नए संस्करण के लिए भी निबंधन अनिवार्य : यदि समाचार पत्र का नाम टाइटिल प्रकाशक को उपलब्ध हो गया है, तो बदले हुए समाचार के साथ नया संस्करण निकालने के लिए भी समाचार पत्रों को निबंधक से अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य एवं कानूनी बाध्यता है। परन्तु उक्त तथ्यों की अनदेखी करते हुए ‘मुंगेर संस्करण‘का भी प्रकाशन किया जाने लगा। अभियुक्तों द्वारा वर्ष 2001 से ही लगातार भागलपुर से दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन किया जा रहा है, परन्तु इसके लिए प्रकाशन के पूर्व वहां के जिला दंडाधिकारी द्वारा प्रमाणीकृत घोषणापत्र अभियुक्तों द्वारा प्राप्त नहीं किया गया।
 
मुंगेर से भी अवैध दैनिक हिन्दुस्तान के संस्करण का प्रकाशन शुरू हुआ : इसी प्रकार अभियुक्तों के द्वारा मुंगेर के जिला दंडाधिकारी द्वारा भी बगैर प्रमाणीकृत घोषणापत्र प्राप्त किए ही मुंगेर से भी दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन किया जाने लगा। इन्होंने अपने बयान में आगे बताया कि भागलपुर और मुंगेर से मुद्रित एवं प्रकाशित होने वाले दैनिक हिन्दुस्तान में वर्ष 2001 से 30 जून, 2011 तक आर0एन0आई0 नं0-44348/86 जो पटना के लिए आवंटित है, का प्रयोग किया गया जबकि 01 जुलाई, 2011 से 16 अप्रैल, 2012 तक आर0एन0आई0 नं0 के स्थान पर ‘आवेदित‘ छापा जाने लगा। पुनः दिनांक 17 अप्रैल, 2012 को उक्त समाचर-पत्र में आर0एन0आई0 नं0–बी0आई0एच0एच0आई0एन0/2011/41407 छापा गया।
 
मीडिया हाउस ने पदाधिकारियों को बेहोशी का इन्जेक्शन दे दिया? : इस पर्यवेक्षण टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि विगत ग्यारह वर्षों से इस कारपोरेट प्रिंट मीडिया हाउस का सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा इतने लंबे अंतराल तक इसलिए चलता रहा चूंकि इस विज्ञापन फर्जीवाड़ा रोकने की जिम्मेदारी जिन केन्द्र और राज्य सरकार के विभागों के वरिष्ठ पदाधिकारियों की थीं, उन सभी वरिष्ठ सरकरी पदाधिकारियों को इस कोरपोरेट प्रिंट मीडिया ने कथित रूपमें ‘बेहोशी का इंजेक्शन‘ लगा दिया था। प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय, नई दिल्ली, डी0ए0वी0पी0 कार्यालय, नई दिल्ली, सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय,पटना, बिहार, मुंगेर, भागलपुर और मुजफ्फरपुर के जिला पदाधिकारी और जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी के समक्ष हाल के वर्षों में जब भी दैनिक हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण के अवैध प्रकाशन और अवैध सरकारी विज्ञापन प्रकाशन के मामले लाए गए, इन विभागों से जुड़े सभी वरिष्ठ पदाधिकारी इससे जुड़ी संचिका आने के बाद ही बेहोश हो जाते थे और वर्षों तक अखबार का सरकारी विज्ञापन घोटाला बेरोकटोक चलता रहा। अब केन्द्र और राज्य सरकार की जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे इस बात की जांच करें आखिर संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने आर्थिक अपराध के ऐसे गंभीर मामले में आखिर किन कारणों से चुप्पी साधी? यह मामला जो अबतक विश्व के समक्ष सामने आ पाया है, वह न्यायालय की सक्रियता का प्रतिफल है।
 
आर्थिक अपराध की जांच में जुटी जांच एजेसिंयां अखिर कब तक चुप रहेगी? : अब भी केन्द्र और राज्य सरकारों की आर्थिक अपराध की जांच से जुड़ी जांच एजेंसियां दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अन्य दैनिकों के अवैध जिलावार संस्करणों और अवैध ढंग से छप रहे सरकारी विज्ञापनों के फर्जीवाड़ा के मामलों में कोई जांच नहीं कर पा रही है। क्या कोरपोरेट हाउस ने जांच एजेंसिंयों के वरिष्ठ अधिकारियों को बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया है? सबसे दिलचस्प बात यह है कि अरबों-खरबों रूपये के सरकारी विज्ञापन घोटाले में डूबे मीडिया हाउस के अखबार न्यायपालिक, कार्यपालिका और विधायिका पर आंखें तरेरने में अब भी पीछे नहीं हो रहे हैं।
 
सभी अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित : मुंगेर पुलिस ने कोतवाली कांड संख्या-445/2011 में सभी नामजद अभियुक्त शोभना भरतिया, अध्यक्ष, दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली, शशि शेखर, प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, अकु श्रीवास्तव, कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण, बिनोद बंधु, स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण और अमित चोपड़ा, मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8(बी), 14 एवं 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को अनुसंधान और पर्यवेक्षण में‘सत्य‘घोषित कर दिया है।
 
सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को संसद में उठाने की अपील : देश के माननीय सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को आगामी संसद सत्र में उठाने की अपील की गई है। देश की आजादी के बाद यह पहला मौका है कि माननीय सांसद देश के कोरपोरेट मीडिया के अरबों-खरबों के सरकारी विज्ञापन घोटाले को ससबूत सदन के पटल पर रख सकेंगे। अबतक अखबार ही देश के भ्रष्टाचारियों को अपने अखबारों में नंगा करता आ रहा है। अब माननीय सांसद भी आर्थिक अपराध में डूबे शक्तिशाली मीडिया हाउस के सरकारी विज्ञापन घोटाले को संसद में पेश कर आर्थिक भ्रष्टाचारियों को नंगा कर सकेंगे।
 
गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र समर्पित होना बाकी है : विश्व के इस सनसनीखेज हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में पुलिस अधीक्षक के स्तर से पर्यवेक्षण रिपोर्ट -02 जारी होने के बाद अब कानूनतः इस कांड में सभी नामजद अभियुक्तों के विरूद्ध गिरफ्तारी का आदेश और आरोप पत्र न्यायालय में समर्पित करने की प्रक्रिया शेष रह गई है। देखना है कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के नेतृत्व में बिहार में आर्थिक अपराधियों के विरूद्ध चले रहे युद्ध में सरकार कबतक इस मामले में गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र न्यायालय में समर्पित करने का आदेश मुंगेर पुलिस को देती है?
 
क्या सरकार अभियुक्तों को सजा दिला पाएगी?  : विश्व के पाठक अब प्रश्न कर रहे हैं कि क्या बिहार सरकार दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में शामिल कंपनी की अध्यक्ष शोभना भरतिया, प्रधान संपादक शशि शेखर और अन्य संपादकों को सजा 

दिलाने में भविष्य में सफल होगी?
 
दैनिक जागरण भी सरकारी विज्ञापन घोटाले में शामिल : बिहार में दैनिक जागरण भी दैनिक हिन्दुस्तान की तर्ज पर बिहार में बिना निबंधन का अखबार प्रत्येक जिले से बदले हुए फारमेट में स्थानीय समाचारों की प्रमुखता के साथ मुद्रित, प्रकाशित और वितरित कर भागलपुर और मुजफ्फरपुर संस्करणों के नाम से अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन लंवे समय से प्राप्त करता आ रहा है और करोड़ों-अरबों में सरकारी राजस्व को चूना लगाता आ रहा है।
 
जारी….
 
मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

 

अन्‍ना ने मीडिया से बदसलूकी के लिए माफी मांगी

 

जनलोकपाल आंदोलन के समर्थकों द्वारा मीडिया के साथ हुई बदसलूकी के लिए अन्‍ना हजारे ने मीडिया से हाथ जोड़कर माफी मांगी है. अन्‍ना ने कहा कि मीडिया के साथ जिस तरीके से बदसलूकी की बात सामने आई है वह निंदनीय है और इसके लिए हम माफी मांगते हैं. साथ ही अन्‍ना ने कहा कि अगर फिर से मीडिया के साथ किसी तरीके की बदसलूकी हुई तो वह अपना अनशन यही खत्‍म कर देंगे.
 
अरविंद केजरीवाल ने भी मीडिया के साथ हुई बदसलूकी के लिए माफी मांगी है. केजरीवाल ने कहा कि ये सारे मीडिया कर्मी अब हमारे आंदोलन का हिस्‍सा बन चुके हैं. इनमें इनकी कोई गलती नहीं है. अगर मीडिया के साथ किसी बात को लेकर मतभेद है तो वह संवाद के साथ ठीक हो सकता है. केजरीवाल ने गांधी जी की बातों का उल्‍लेख करते हुए कहा कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं. साथ ही केजरीवाल ने मीडिया हाउस के मालिकों से अनुरोध किया कि वह तय करे कि वो देश के भ्रष्‍टाचारियों के साथ हैं या फिर देश के साथ.
 
अन्‍ना ने भी मीडिया के माफी मांगते हुए कहा कि सोमवार को जिस तरीके की बात मीडिया के साथ की गई उसके लिए मैं माफी मांगता हूं. अन्‍ना ने कहा कि अगर फिर भी मीडिया के साथ किसी तरीके की बदसलूकी हुई तो मैं अनशन यही खत्‍म कर दूंगा. इससे पहले सोमवार को टीम अन्‍ना के अहम सदस्‍य शांति भूषण ने मीडिया को खरीखोटी सुनाई थी. शांति भूषण ने मीडिया पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह गलत रिपोर्टिंग कर रही है. शांति भूषण ने कहा था कि भीड़ को कम दिखाने के साथ ही सभी चीजों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. इसके बाद जंतर मंतर पर मौजूद मीडियाकर्मियों के साथ अन्ना समर्थकों के द्वारा बदसलूकी का मामला सामने आया था. साभार : आजतक

महुआ ग्रुप की इमोशनल ब्लैकमेलिंग : आंदोलनरत पत्रकारों का दो टूक जवाब

 

महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों के आंदोलन का दूसरा दिन यादगार रहा। न्यूज़रूम में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे पत्रकारों ने अपनी धार और तेज़ कर दी है। सोमवार को पूरे दिन आंदोलनरत पत्रकार ज़मीन पर बैठे थे और वे इस बात अड़े थे कि किसी भी स्तर की बातचीत न्यूज़रूम में सबके बीच होगी। प्रबंधन के दूतों ने पूरी कोशिश की कि पत्रकारों के प्रतिनिधि बंद कमरे में महुआ समूह की वर्तमान प्रमुख मीना तिवारी से बात करें। लेकिन आर-पार की लड़ाई लड़ रहे पत्रकारों ने इससे साफ इनकार कर दिया। आखिरकार प्रबंधन को झुकना पड़ा।
 
भारी दबाव के बीच चैनल की कमान संभाल रहीं मीना तिवारी को पत्रकारों की अदालत में पेश होना पड़ा। यहां आते ही वो रो पड़ीं। अपनी मुश्किलों की फेहरिस्त गिनाने लगीं। लेकिन ऐसा करते हुए करोड़ों की समूह की मालकिन होने का उनका अहंकार फूट पड़ा। वो ऐसी बातें कह गईं कि खुद को लेकर बजाय सहानुभूति के उन्होंने माहौल ही खराब कर दिया।
 
उन्होंने जिन पंक्तियों का इस्तेमाल किया…ज़रा उसका मजमून देखिए।‘मैं इतनी मुश्किल में हूं और आप ये सब कर रहे हैं आपको शर्म नहीं आती‘, ‘मैं कहां से दूं पैसे..कहां से लाऊं पैसे‘,‘एक महीने की आपकी बकाया सैलरी दे रही हूं…क्या वो कम है..एक महीने में तो आप नौकरी खोज ही सकते हैं..इतने से आपकी कितनी मदद होगी आपने ये बात सोची है?’…….क्रोध के आवेग को भावुकता के मुलम्मे में पेश कर रहीं महुआ ग्रुप की मालकिन इस अंदाज़ में ये सब कह रही थीं जैसे वो दो महीने की जगह 1 महीने की बकाया सैलरी देने का ऐलान करके अहसान कर रही हैं।
 
उनका न्यूज़रूम के नाम संबोधन लंबा खिंच रहा था और इसी बीच पत्रकार अपना धीरज खोते जा रहे थे। कुत्ते की तरह जलालत की भाषा सुनते-सुनते जब धैर्य जवाब दे गया..तो फिर मीना तिवारी को ऐसे जवाब सुनने पड़े जिसकी उन्हें शायद कोई उम्मीद नहीं रही होगी। उन्हें एक पत्रकार ने कहा- ‘आप अपने संस्थान का सामान बेचिए और पैसे चुकाइए, मर्सिडीज बेचिए, बीएमडबल्यू बेचिए, बिल्डिंग बेचिए..जो करना हो करिए…हमें पैसे चाहिए..आपसे सहानुभूति थी अब नहीं है क्योंकि आपने 125 लोगों को नहीं,.. उनके परिवारों को सड़क लाने का काम किया है,..उनकी दिक्कतों के बारे में आपने नहीं सुना…इसलिए आपके दुख से हमें मतलब नहीं‘। कुछ पत्रकार आपे से बाहर थे। सुनाने का सिलसिला आगे ही बढ़ता गया- एक ने कहा -‘ये अहंकार का अंदाज, ये अहसान की भाषा और ये धमकी भूल जाइए, पत्रकारों को पहचान लीजिए उनकी ताकत समझ लीजिए और बताइए क्या करने जा रही हैं,..कब तक फैसला लेने जा रही हैं।‘लेकिन जवाब मजबूरी के रोने के रूप में ही मिला। फिर उनके सिपाहसालारों ने मैदान संभाला लेकिन माहौल भांपकर फिर दुबक गए। मीना तिवारी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाईं कि आखिर पी के तिवारी के जेल जाने के तुरंत बात चैनल बंद करने की उन्हें जल्दबाजी क्यों हुई?
 
पंद्रह मिनट के इस एपिसोड में वो सब हुआ जिसकी कल्पना महुआ के प्रबंधन ने चैनल बंद करते वक्त नहीं की होगी। कड़े प्रतिरोध का मीना तिवारी पर कोई असर होता नहीं दिखा..उनके तेवर नरम नहीं हुए.. वो पांव पटकती हुई वापस लौटने लगीं..जाते-जाते धरने पर बैठीं दस के लगभग महिला पत्रकारों की तरफ इशारा करते हुए कहा‘यूं ही पड़े रहो’।
 
इस पूरी घटना के बाद न्यूज़रूम का माहौल गरमा गया। लेकिन समूह के संपादक राणा यशवंत ने सबसे शांति बनाए रखने की अपील की। इसके बाद एक बार फिर प्रबंधन भारी दबाव के बीच कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में जुट गया। दूसरी तरफ आंदोलनरत पत्रकार सामूहिक चर्चा में जुट गए। न्यूज़चैनल खोलकर इसे एक झटके में बंद करने वाले ट्रैंड पर यहां जबर्दस्त चर्चा हो रही थी। इसमें भागीदारी करने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को आमंत्रित किया गया था। जिन्होंने पत्रकारों की मांगों को उनका हक करार दिया और कहा कि ये हर हाल में पूरी की जानी चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार भी इस परिचर्चा में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि वाजिब हक को संस्थान को हर हाल में पूरा करना होगा। इसके बाद कई संस्थानों के पत्रकार इस बहस में शरीक होने पहुंचे। जिससे आंदोलन का माहौल उत्साहपूर्ण बना रहा। न्यूज़लाइन की महिला पत्रकारों ने बहस को धार देते हुए कहा कि अब बहुत हुआ…आगे इस तरह से पत्रकारों को सड़क पर ला खड़ा करनेवालों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।
 
उधर पत्रकारों का उत्साह कम होने का इंतज़ार कर रहे प्रबंधन को सोमवार शाम तक ये लगने लगा कि अब और देरी आत्मघाती होगी। क्योंकि बेरोजगार पत्रकारों के आवेदन ईपीएफ ऑफिस, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, श्रम मंत्रालय और यूपी पुलिस मुख्यालय के साथ ही सीएम कार्यालय तक पहुंच चुके हैं। और मंगलवार से यहां प्रबंधन को वो सब कुछ भुगतना होगा जिसे बर्दाश्त करने लायक स्थिति उसकी नहीं है। इसलिए आनन-फानन में इस बात के संकेत दिए जाने लगे कि पत्रकारों की एकसूत्रीय मांग मानी जा सकती है। अब सबकी निगाहें मंगलवार पर टिकी हैं। दोस्तों..भरोसा रखिए कि मामला मंगलवार को सुलझ जाएगा…नहीं तो फिर अल्टीमेटम पर अमल किया जा सकता है। जिसका खामियाजा भुगतने लायक स्थिति महुआ समूह की नहीं है।
 
ये लड़ाई न किसी व्यक्ति से है, न संस्था विशेष से, ये उस मनमानी के खिलाफ एक संगठित विद्रोह है जिसे अब तक हम और आप अपने अब तक के पत्रकारीय जीवन में झेलते आए हैं। लेकिन अपनी आनेवाली पीढ़ी को भी हमें मुंह दिखाना होगा…जो इस पेशे में आते ही कह रही है कि ग़लती हो गई। बहुत बड़ी गलती हो गई। ऐसा इसलिए क्योंकि दूसरे की आवाज़ उठाने का दम भरनेवाले हम पत्रकारों ने अपने हक पर हमले पर ज्यादातर बार हाथ खड़े किए और सब कुछ सह लिया। पर अब और नहीं। घड़ा भर चुका है और वो घड़ी आ चुकी है कि पत्रकारों को कुचलने की कोशिश करनेवालों की बाहें मरोड़ दी जाएं। लड़ाई जारी है और हम जीत कर ही दम लेंगे। समर्थन के लिए आप सबका आभार। – जयहिन्द
 
महुआ न्‍यूज लाइन के पत्रकारों द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मुझ पर दबाव बनवाने के लिए भिजवाया गया नोटिस : अर्चना यादव

अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान द्वारा विगत कई दिनों से उनके द्वारा की गयी छेड़खानी का विरोध एवं दर्ज मुकदमा वापस लेने हेतु अनेक प्रकार से मेरे ऊपर मानसिक दवाब बनाया जा रहा था. जब मेरे द्वारा मुकदमा वापस नहीं लिया गया तो दिनांक 30 जुलाई 2012 को मेरे निवास पर किसी रेहान मुबस्सिर एडवोकेट से मुझे नोटिस भिजवाया गया, जिसमें किन्हीं आसिफ राजा जाफिरी, विजय शर्मा, सचिदानंद गुप्ता उर्फ़ सच्चे व हिसामुल सिद्दीकी पर ये आरोप लगाया गया है कि उन्होंने मुझे एक मोटी रकम दी है. 

 
मै आप सब को यह बताना चाहती हूँ कि मैं इनमें से किसी व्यक्ति को न जानती हूं और न ही मेरी कभी मुलाक़ात हुयी. मैं आप सब के माध्यम से यह जानना चाहती हूँ कि क्या कोई लड़की किसी के कहने या पैसे के लालच में, जिसके सामने उसका पूरा भविष्य पड़ा हो, इस तरह का आरोप लगा सकती है? सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी द्वारा जो विगत कई माह से मेरा मानसिक शोषण किया जा रहा था एवं छीटाकशी से बात बढ़ कर अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान द्वारा मुझे हाथ लगा कर जिस तरह का व्यवहार किया गया, जिसका साक्ष्य समस्त विकास दीप में कार्यरत लोगों से लिया जा सकता है. अतः ऐसे में सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी द्वारा किन्हीं आसिफ राजा जाफिरी, विजय शर्मा, सचिदानंद गुप्ता उर्फ़ सच्चे व हिसामुल सिद्दीकी पर क्यों आरोप लगाया जा रहा है? और अपना कौन सा व्यक्तिगत लाभ देखा जा रहा है?
 
अतः आप सभी से मेरा विनम्र निवेदन है कि मेरा किन्हीं आसिफ राजा जाफिरी, विजय शर्मा, सचिदानंद गुप्ता उर्फ़ सच्चे व हिसामुल सिद्दीकी से कोई वास्ता नहीं है. और यदि अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान से इनकी कोई रंजिश है तो अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान ने मेरे साथ अश्लीलता का व्यवहार क्यों किया और मेरे आवाज़ उठाने पर आसिफ राजा जाफिरी, विजय शर्मा, सचिदानंद गुप्ता उर्फ़ सच्चे व हिसामुल सिद्दीकी पर क्यों ऊँगली उठा रहे हैं? 
 
सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी ने मेरे ऊपर आरोप लगाया है कि मैंने 700 पत्रकारों को ई-मेल भेजा, अतः मुझ पर धारा 500/501/211/120बी आईपीसी में कार्रवाई की जायेगी. मैं स्वयं पत्रकार हूँ और मेरे द्वारा अपने ही पत्रकार परिवार के लोगो को ई-मेल भेजा गया और जिस सतीश प्रधान द्वारा मुझ पर ई-मेल भेजने पर कार्रवाई करने की बात कही गई है, उसी सतीश प्रधानं ने कुछ दिन पूर्व ही ऐसे अनेक ई-मेल भेजे हैं, जिसमें पत्रकारों की आय की जांच इत्यादि मेल शामिल हैं.
 
अर्चना यादव 
 
पत्रकार 

अन्‍ना समर्थकों का मीडिया पर हमला, बीईए ने माफी मांगने को कहा

 

नई दिल्ली। टीम अन्ना के वरिष्ठ सदस्य शांति भूषण द्वारा मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई ने एक नया मोड़ ले लिया है। शांति भूषण के बयान के बाद अन्‍ना समर्थकों ने मीडियाकर्मियों से बदसलूकी की तथा नारे लगाए। इसके बाद से अब लड़ाई टीम अन्ना और मीडिया के बीच भी होती दिखाई दे रही है। 
 
मीडियाकर्मियों के साथ हुई बदतमीजी को गंभीरता से लेते हुए ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) ने टीम अन्ना को माफी मांगने के लिए कहा है। बीईए ने कहा है कि यह मीडिया की स्‍वतंत्रता पर हमला है। दरअसल शांति भूषण लोगों को संबोधित कर रहे थे और उनका कहना था कि न्यूज चैनल्स सही खबर नहीं दिखा रहे हैं। शांति भूषण ने अपने भाषण में कहा कि कुछ चैनल जानबूझकर ये दिखा रहे हैं कि अनशन में भीड़ नहीं हो रही है। मीडिया टीआरपी के लिए रिएलिटी से हेरफेर करती है। इस बयान के बाइ ही भीड़ उत्‍तेजित हो गई और मीडियाकर्मियों के साथ बदसलूकी की। वहीं टीम अन्ना के सदस्य कुमार विश्वास ने इस हमले की निंदा की है और कहा है कि इस तरह की घटना नहीं होनी चाहिए थी।

बीच रास्‍ते में नहीं छोड़ सकता अपनी टीम को : राणा यशवंत

 

महुआ न्यूज़ के समूह संपादक राणा यशवंत के न्यूज़ 24 जाने की ख़बरें हर तरफ चर्चा में हैं। लेकिन महुआ न्यूज़लाइन के आंदोलनरत पत्रकारों को संबोधित करते हुए राणा यशवंत ने कहा कि ऐसे वक्त में जब हमारी पूरी टीम मुश्किल में है मैं इन्हें बीच रास्ते में नहीं छोड़ सकता। उन्होंने दो टूक कहा कि न्यूज़ 24 जाने की ख़बर का कोई आधार नहीं और ये समझ से बाहर की बात है कि ये बात आई कहां से। उन्होंने कहा कि मैं आपके साथ हर हाल में खड़ा हूं और मेरे कहीं और जाने और ज्वाइन करने की पूरी खबर कोरी बकवास है। इसका सवाल ही नहीं उठता। इसके बाद से कर्मचारियों का मनोबल भी बढ़ा हुआ है। 

असम के चैनल ने आरोप लगाने वाले संगठनों के खिलाफ दर्ज कराई प्राथमिकी

 

असम के गुवाहाटी में एक युवती के साथ खुलेआम छेड़छाड़ के लिए भीड़ को उकसाने के मामले में एक अन्य टीवी पत्रकार का नाम सामने आया है। हालांकि टीवी चैनल ने इस आरोपी पत्रकार के साथ किसी प्रकार के संबंध से इनकार किया है और उन संगठनों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिन्होंने उन पर उंगली उठाई है। इस मामले में पहले ही एक स्थानीय न्यूज चैनल के पत्रकार को गिरफ्तार किया जा चुका है। 
 
तीन छोटे संगठनों समता सैनिक दल, असम कृषक कल्याण परिषद तथा असम गण मंच के नेताओं ने युवती के साथ हुई छेड़छाड़ की वीडियो क्लीपिंग दिखाते हुए रविवार को दावा किया था कि इसमें जिस व्यक्ति का हाथ दिखाई दे रहा है वह स्थानीय टेलीविजन चैनल का पत्रकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपी पत्रकार ने पुलिस की मौजूदगी में ही पीड़ित युवती का चेहरा देखने के लिए उसके बाल पकड़कर खींचे थे। आरोपी पत्रकार तथा चैनल ने इन आरोपों का खंडन करते हुए तीनों संगठनों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। (एजेंसी)

अमरपाल सिंह वर्मा का राजस्थान पत्रिका से इस्तीफा

 

राजस्थान पत्रिका के जयपुर मुख्यालय में मुख्य उप संपादक अमरपाल सिंह वर्मा ने आज राजस्थान पत्रिका से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने पत्रिका के प्रबंध निदेशक नीहार कोठारी को भेजे त्यागपत्र में इस्तीफे के लिए डिप्टी एडिटर भुवनेश जैन को जिम्मेदार ठहराया है। वर्मा का कहना है कि अपने खिलाफ पत्रिका प्रबंधन तक पहुंचे किसी पत्र को लेकर भुवनेश जैन उनसे कई सालों से नाराज थे और परेशान कर रहे थे। 
 
वर्मा के आग्रह पर पत्रिका के प्रबंध निदेशक नीहार कोठारी ने उनका तबादला साल भर पहले नागौर से हनुमानगढ़ किया लेकिन फिर छह माह बीतने से पहले ही उन्हें हनुमानगढ़ से जयपुर में स्पेशल ब्यूरो में भेज दिया गया। वहां अभी छह महीने बीतते, इससे पहले वर्मा का तबादला चेन्नई कर दिया गया। वह भी तब, जब अमरपाल सिंह वर्मा अपने पारिवारिक कारणों से श्रीगंगानगर संस्करण में जाना चाह रहे थे। हालांकि चेन्नई में वर्मा को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की बात कही जा रही है, लेकिन वर्मा इसे परेशान करने की नीयत मानते हैं। जानकारों का कहना है कि वर्मा के चेन्नई तबादले के पीछे भुवनेश जैन की रणनीति है। इससे पहले उन्होंने २००७ में वर्मा को कोलकाता का प्रबंधक और संपादक बनाने के नाम पर निपटाने की ठान ली थी, लेकिन नीहार कोठारी के हस्तक्षेप से उन्हें जोधपुर ही बनाए रखा गया। 
 
राजस्थान पत्रिका की ओर से दिए जाने वाले करीब एक दर्जन संस्करण व राज्य स्तरीय पत्रकारिता पुरस्कार, पंचायती राज में महिलाओं की भूमिका पर बेस्ट रिपोर्टिंग के लिए दी हंगर प्रोजेक्ट संस्था की ओर से वर्ष 2009 में सरोजिनी नायडु पुरस्कार, वर्ष 2003 में दी स्टेट्समैन, कोलकाता की ओर से दी स्टेट्समैन अवार्ड फॉर रूरल रिपोर्टिंग, वर्ष 2009 में समान बचपन संस्था, उदयपुर की ओर से राज्य स्तरीय पत्रकारिता पुरस्कार, वर्ष 2001 में दी एटवरटाइजिंग क्लब  जयपुर की ओर से बेस्ट रिपोर्टिंग का प्रथम पुरस्कार, वर्ष 2004 में उदयन स्मृति राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान, वर्ष 2005 में ग्राम गदर ग्रामीण पत्रकारिता पुरस्कार, वर्ष 2005 में राजस्थान जनमंच, जयपुर की ओर समाज रत्न अवार्ड सहित कई अन्य पुरस्कार प्राप्त कर चुके अमरपाल सिंह वर्मा अब स्वतंत्र पत्रकार के रूप में विकास पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने जा रहे हैं। वर्मा द्वारा नीहार कोठारी को लिखा गया पत्र इस प्रकार है:


आदरणीय महोदय,

 
सादर नमस्कार। मैं राजस्थान पत्रिका में कार्य करने में असमर्थ हूं। इसलिए त्यागपत्र दे रहा हूं। कृपया त्यागपत्र स्वीकार कर मेरा भुगतान कराने की व्यवस्था कराएं। मैं वैसे तो अक्टूबर, १९८८ से ३० जुलाई, २०१२ तक पत्रिका से जुड़ा रहा हूं लेकिन एक जनवरी, २००१ से ३० जुलाई, २०१२ तक मैनें नियमित वेतनभोगी के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। इसलिए अगर मेरी नियमित सेवा अवधि के दौरान की किसी तिथि से किसी भी वेतन आयोग की सिफारिशें भविष्य में संस्थान में लागू की जाती हैं तो मुझे उस अवधि के एरियर का भुगतान कराना सुनिश्चित कराएं। मेरें त्यागपत्र के पीछे की परिस्थितियों के लिए कौन जिम्मेदार है, यह आप बेहतर जानते हैं। डिप्टी एडिटर श्री भुवनेश जैन वर्ष २००७ से मुझे बार-बार व्यक्तिगत और टेलीफोन पर यह कहते रहे हैं कि तुमने मेरे खिलाफ नीहार जी को पत्र लिखा। मैं तुम्हें चैन से बैठने नहीं दूंगा। इस तथाकथित पत्र को लेकर वे मुझे परेशान करते रहे हैं। पता नहीं किसने कोई पत्र आपको लिख दिया, जिस आधार पर शायद प्रबंधन ने भुवनेश जी को खासी लताड़ पिला दी लगती है। किसी और के किए का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता रहा।
 
महोदय, पत्रिका में अकेला मैं ही नहीं हूं, पता नहीं कितने लोग हैं, जो इनकी मनमानी का शिकार हो रहे हैं। पत्रिका का प्रत्येक प्रतिभावान और समर्पित कर्मचारी इन लोगों के कारण परेशान है। ये अपने चहेते लोगों को पदोन्नति और वित्तीय लाभ देकर लाभान्वित करते हैं और दूसरों को प्रताड़ित करते हैं। आज भुवनेश जैन संस्थान के सबसे बड़े हितैषी बने हैं, अगर ऐसा था तो वे २००३ में दैनिक भास्कर की गोद में क्यों चले गए थे। आज इनके मुंह से पत्रिका के प्रति समर्पण की बातें सुन कर हर किसी को हंसी आती है। समर्पण की बातें भी तब, जब ये चर्चा जोरों पर है कि अब ये फिर पत्रिका छोड़ किसी इलेक्ट्रोनिक चैनल या किसी नए अखबार में जाने की तैयारी में हैं। खैर, इन जैसे लोग तो आनी-जानी माया हैं।
 
राजस्थान पत्रिका में कामकाज के दौरान मुझे अपार प्रतिष्ठा हासिल हुई है। श्रद्देय गुलाब जी साहब ने मुझे प्रदेश भर में काम करने का मौका दिया और उनकी प्रेरणा और आशीर्वाद से मुझे राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर के दर्जनों पुरस्कार भी मिले। उसके लिए मैं श्रद्देय गुलाब जी साहब और आपका शुक्रगुजार हूं। श्रीमान गोविंद जी चतुर्वेदी का भी मैं आभारी हूं, जिन्होंने मेरे द्वारा भेजी गई कार्य योजनाओं को संस्थान में क्रियान्वित करा कर सदैव मुझे प्रोत्साहन दिया। संस्थान निरंतर प्रगति करे, यह आपकी शुभ कामना है। सादर अभिवादन सहित।
 
अमरपाल सिंह वर्मा
 
मुख्य उप संपादक
 
राजस्थान पत्रिका।

 

महुआ न्‍यूज रूम में अनशन, ठप हो सकता है महुआ बिहार-झारखंड का प्रसारण

 

बकाए वेतन और एक महीने की क्षतिपूर्ति की मांग पर महुआ प्रबंधन के अड़ियल रवैये के बाद अब महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों ने भी आर पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। सोमवार की दोपहर से न्यूज़रूम में चैनल से जुड़े दो वरिष्ठ पत्रकार अन्न- जल त्याग कर अनशन पर बैठ गए हैं और उनके साथ न्यूज़लाइन का पूरा परिवार खड़ा है। ये महज़ शुरुआत है अगर प्रबंधन अपने अड़ियल रवैये पर कायम रहता है तो हर दिन ये संख्या बढ़ती जाएगी। 
 
बेरोज़गार हुए पत्रकारों का विरोध शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है लेकिन इसके बाद भी प्रबंधन इसे हल्के में लेता है तो मजबूरन महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकार महुआ बिहार/ झारखंड और महुआ एंटरटेनमेंट का प्रसारण भी ठप कर सकते हैं। इस लड़ाई में महुआ न्यूज़ बिहार/झारखंड की टीम भी अपना नैतिक समर्थन दे रही है। क्योंकि उन्हें भी एहसास हो चुका है कि ऐसे धन्ना सेठ और उनका संवेदनहीन प्रबंधन उन पर कभी भी गाज गिरा सकता है।

टीवी चैनल के स्‍टूडियो में आग, पांच की मौत

 

लाहौर : लाहौर के एक टीवी स्टूडियो में सोमवार सुबह आग लगने से कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई और 12 घायल हो गए। यह जानकारी एक मीडिया रिपोर्ट में दी गई है। जियो न्यूज ने खबर दी है कि गढ़ी शाहू क्षेत्र में एक निजी टीवी चैनल के स्टूडियो में यह हादसा हुआ। टीवी चैनल के सहर ट्रांसमिशन के दौरान आग भड़क उठी। घायलों में तीन की हालत नाजुक बनी हुई है। (एजेंसी) 

क्‍या राणा यशवंत को रजनीश कुमार से सीख नहीं लेनी चाहिए?

खबर है कि महुआ न्यूज लाइंन बंद हो गया है। एक और चैनल जो हुआ है मैनजमेंट के कोप का शिकार। महुआ से पहले सीएनईबी चैनल भी बंद हो चुका है। तकरीबन 300 से ज्यादा कर्मचारी अब तक सड़कों की खाक छान रहे हैं। लगातार बंद हो रहे चैनल कई सवालों को खड़ा करता है। बड़े बड़े उद्योग घराने बड़े ही ताम झाम के साथ चैनल खोलते हैं। मैनजमेंट को लगता है कि चैनल के खुलते ही ही उनके बिजनेस में चार चांद लग जाएगा और समाजिक रूतबा अगल से। लेकिन उन्हे ये सफलता चंद दिनों में ही चाहिए होती है। 

जब उनका ये भ्रम टूटता है तो गाज गिराए जाते हैं चैनल में काम करे कर्मचारियों पर। ये वो कर्मचारी होते हैं जो पत्रकार कहे जाते हैं। समाज के ऐसे लोग जिन्हें इस बात का गुमान है कि वे समाज को बदलने का दम रखते हैं। लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। चैनल के मालिकाना कहर के सामने ये सभी बौने हैं। सरकार बदलने की माद्दा रखने वालों पर जब खुद गाज गिरती है तो इन्हें सहारा नसीब नहीं होता। सरकार तो छोडिए इन्हें अपनों का सहारा भी नसीब नहीं है।
 
समाज में बड़े बड़े पत्रकार हैं। समाज और सरकार को बदलने का दम रखते हैं। लेकिन जब बात अपने जमात की आती है तब ये कहीं गुम नजर आते हैं। आखिर इन्हें इसकी फिक्र हो भी क्यूं। इन्हें इसका क्या सरोकार। ये बड़े बड़े उद्योगघराने के विरोध में आखिर खड़े क्यूं दिखें। लेकिन सभी बड़े पत्रकारों और एडिटरों को इस सांचे में नहीं ढाला जा सकता है। कई एडिटर हैं जो अपने कर्मचारियों के लिए हदें तक पार कर जाते हैं। कुछ एडिटर तो ऐसे हैं जो अपने पत्रकार के हित में खुद की नौकरी तक की परवाह नहीं करते। 
 
महुआ के बंद होने पर राणा यशवंत जी का ये बयान कि वे न्यूज मैन हैं और अपने कर्मचारियों के साथ खड़े रहेंगे चौंकाने वाली है। अब कर्मचारियों का साथ देकर कौन अपने भविष्य को दांव पर लगाता है। छोटे पत्रकार तो छोटे हैं। उन्हे कभी मैनजमेंट के मार का शिकार होना पड़ता है तो कभी अपने वरिष्ठों के कोप-भाजन। आज के दौर में कौन किसके लिए लड़ता दिखाई देता है।
 
राणा यशवंत जी को सीईनईबी के वरिष्ठ, अनुभवी, कद्दावर एडिटर इन चीफ रजनीश कुमार से सीख लेनी चाहिए। सीईनईबी बंद हो गया लेकिन उनके मुंह से ऊफ तक नहीं निकला। आखिर वे मैनजमेंट से बैर कैसे लेते। रजनीश कुमार मीडिया के काफी अनुभवी पत्रकार हैं। स्टार न्यूज, सहारा, आईबीएन जैसे चैनलों में इन्होंने काम किया है। अनुभव कुट कुट कर भरा हुआ है। पिछले साल मई-जुन में सीईनईबी में इनका पदार्पण हुआ। चैनल उस वक्त ठीक ठाक कर रहा था। लेकिन उनके आते ही चैनल ने कई बुलंदियों को पार कर गया। जहां पहले लोग इस चैनल को देखा करते थे। उन्हें ये चैनल नागवार गुजरने लगा। दिनों दिन अपनी काबिलियत से चैनल को इन्होंने इस मुकाम तक पहुंचा दिया कि मैनजमेंट को चैनल बंद करने की नौबत आ गई। ये इनके प्रतिभा का ही कमाल था। 
 
इनकी प्रतिभा यहीं खत्म नहीं हो जाती। जब मैनेजमेंट ने चैनल को बंद करने का एलान कर दिया। तब ये अपने कर्मचारियों के साथ खड़े ना होकर मैनजमेंट के साथ खड़े होने का फैसला किया। रजनीश कुमार आज के पत्रकार है, अनुभवी है। उन्हें इस बात का बखुबी पता है कि कर्मचारियों और छोटे पत्रकारों के साथ खड़े होने से आखिर क्या नसीब होने वाला। कर्मचारियों के साथ खड़े होते तो वे भी आज सड़क पर होते। नौकरी के लिए उन्हें भी जद्दोजहद झेलनी पड़ती। लेकिन वे समझदार हैं सो वे मैनजमेंट के दुलारू रहने में अपने फायदा देखा। उनके इंटेलीजेंस को देखिए आज उनकी मौज है। मैनजमेंट के आज काफी करीबी हैं और एचबीएन में उनकी खुब कट कट रही है। राणा यशवंत जी को वाकई इनसे सीख लेनी चाहिए। छोटे कर्मचारियों और पत्रकारों का साथ देकर उन्हें आखिर क्या हासिल होने वाला है। ये तो पत्रकार हैं जिन्हे कदम कदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।
 
लेखक अनूप गुप्ता पत्रकार हैं तथा सीएनईबी से जुड़े रहे हैं. 

फोन हैकिंग मामले में एक और पत्रकार की गिरफ्तारी

 

लंदन : ब्रिटेन में बहुचर्चित फोन हैकिंग मामले में एक और पत्रकार की गिरफ्तारी की गई है। बीते साल मीडिया में फोन हैकिंग विवाद के सामने आने के बाद ‘आपरेशन ट्यूलेटा’शुरू किया गया था। इसी अभियान के तहत पत्रकार की गिरफ्तारी की गई है। अभी पत्रकार की पहचान सार्वजनिक नहीं हो पाई है।
पुलिस ने कहा, 51 साल के एक पत्रकार को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने बताया, यह गिरफ्तारी चोरी हुए मोबाइल फोनों से डाटा एकत्र करने की साजिश के संदर्भ में की गई है। इस अभियान के तहत यह आठवीं गिरफ्तारी है। करीब एक पखवाड़े पहले ‘द सन’ के एक पत्रकार की भी गिरफ्तारी हुयी थी। (एजेंसी)

पत्रकार काजमी मामले में कोर्ट ने किया हस्‍तक्षेप से इनकार

 

नई दिल्ली : इजरायली दूतावास कार विस्फोट मामले में तीस हजारी कोर्ट ने पत्रकार काजमी की अपील पर निचली अदालत के फैसले पर हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एसएस राठी ने कहा कि मामले की सुनवाई दिल्ली उच्च न्यायालय में नौ अक्टूबर को होनी है। वे उच्च न्यायालय का आदेश आने तक मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। लिहाजा, वे अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को करेंगे।
 
उल्लेखनीय है कि पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी के मामले में स्पेशल सेल की अपील पर मुख्य महानगर दंडाधिकारी विनोद यादव ने जांच की अवधि 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन कर दी थी। इस फैसले को काजमी ने सत्र न्यायालय में चुनौती दी थी। साभार : जागरण 

अनुज पोद्दार के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी

 

लखनऊ। सम्‍मन का तामीला होने के बावजूद अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं होने पर मुख्‍य न्यायिक मजिस्टे्रट राजेश उपाध्याय ने हिन्दी दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स के प्रबंध निदेशक अनुज पोद्दार के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है। इससे पहले अदालत ने निदेशक के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया था। इस मामले में अदालत ने अखबार की एचआर हेड रिया चक्रवर्ती के खिलाफ भी जमानती वारंट जारी किया है। अदालत ने यह आदेश अखबार के विधि संवाददाता रहे अम्बरीष श्रीवास्तव की ओर से दाखिल परिवाद पर दिया है। मामले की सुनवाई 27 अगस्त को नियत है।
 
परिवादी का कहना है कि वह उक्त अखबार के लिए बतौर विधि संवाददाता अपनी सेवाएं दे रहा था। आरोप है कि माह जनवरी, 2012 का मानदेय नहीं देने व मांगे जाने पर निदेशक ने जानमाल की धमकी दी है।

उत्तराखंड : आज तक के रिपोर्टर और कैमरामैन के खिलाफ मामला दर्ज

 

देहरादून। देहरादून में आज तक चैनल के संवाददाता और कैमरामैन के खिलाफ पुलिस चौकी में घुसकर हंगामा मचाने का मामला दर्ज किया गया है। आज तक के संवाददाता दिलीप रौठोर और कैमरामैन मुजम्मिल के खिलाफ देहरादून के कोतवाली थाना क्षेत्र के धारा चौकी में मामाला दर्ज किया गया है। मामला खुद धारा चौकी इंचार्ज पीडी भट्ट ने दर्ज कराया है।
 
बताया जाता है कि आज तक के पत्रकार दिलीप राठौर और कैमरामैन मुजम्मिल हुसैन किसी मामले को लेकर धारा चौकी पहुंचे और वहां के चौकी प्रभारी पीडी भट्ट पर पत्रकार होने का रौब गालिक करने लगे। चौकी प्रभारी ने जब इन लोगों को कानून के दायरे में रह कर कार्य करने की बात कही तो दोनों लोग भड़क गए और उनके साथ ही गालीगलौज करने लगे।जिससे चौकी प्रभारी और दोनों पत्रकारों में जमकर हाथापाई भी हुई। ंजिसके बाद लोगों के बीचबचाव के बाद दोनों पत्रकार वहां से निकल गए और चौकी प्रभारी ने दोनों के खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने और चौकी में अराजकता का माहौल पैदा करने के मामले में शिकायत दर्ज कराई है।
 
दोनों पत्रकारों के खिलाफ आईपीसी की धारा 332 के तहत मामला दर्ज किया गया है और इसकी जांच का जिम्मा एसआई देवेन्द्र गौरव को दी गई है। बहरहाल मामले की सच्चाई तो जांच के बाद ही पता चलेगी लेकिन देहरादून के पत्रकार इस मामले चटखारा लेकर एक दूसरे को सुनते सुनाते देखे जा रहे है। बताते चले कि पत्रकार दिलीप राठौर के खिलाफ हरिद्वार में भी इसी तरह के मामले दर्ज बताए जाते है। जबकि एक विधवा की स्कार्पियों गांड़ी हड़पने का आरोप भी इन पर बहुत पहले देहरादून में ही लग चुका है। इस मामले की जांच देहरादून के एसपी सिटी रहे जगतराम जोशी को सौंपी गई थी जिसमें आज भी जांच चल रही है।
 
देहरादून से बबलू दुर्गवंशी की रिपोर्ट.

कर्मचारियों के मजबूरियां गिनाने के बाद भी नहीं पिघलीं मीना तिवारी

 

महुआ न्यूज़लाइन बंद करने के ऐलान के 25 घंटे बाद महुआ ग्रुप की निदेशक मीना तिवारी बेरोज़गार हुए कर्मचारियों से मुखातिब हुईं। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि पढ़ी-लिखी, शालीन सी दिखनेवाली मीना तिवारी कर्मचारियों के साथ संवेदनशील और सौहार्दपूर्ण तरीके से बात करेंगी लेकिन उनका रवैया उम्मीदों के विपरीत और अहंकार से भरा था। उन्होंने बात की शुरुआत में ही कहा कि –‘हम तुम्हे एक महीने का वेतन तो दे रहे हैं ना… फिर क्यों ये तमाशा कर रहे हो, तुमलोगों को शर्म नहीं आती। 
 
जबकि कर्मचारियों ने 124 परिवारों के भविष्य की मजबूरियां भी गिनाई, बावजूद इसके उनके तेवर में कोई फर्क नहीं पड़ा उनके आखिरी शब्द थे,‘पड़े रहो यहां।’ मीना तिवारी के इस तेवर और संवेदनहीन रवैये से कर्मचारियों में काफी रोष है बावजूद इसके उन्होंने अपना संयम नहीं खोया है वो शांतिपूर्ण तरीके से न्यूज़रुम के अंदर धरने पर बैठे हैं अगर इसके बाद भी निदेशक और प्रबंधन का रवैया ऐसा ही रहा तो कर्मचारी महुआ एंटरटेनमेंट और महुआ न्यूज़ बिहार/ झारखंड के प्रसारण को ठप करने के फैसले पर समय से पहले ही अमल कर सकते हैं।

न्‍यूजमैन हूं और अपनी पूरी टीम के साथ रहूंगा : राणा यशवंत

 

: और ऐसे बंद हो गया महुआ न्‍यूज लाइन : हां, महुआ न्यूज़लाइन चैनल को बंद करने का ऐलान कर दिया गया है। नोएडा के दफ्तर में न्यूज़रूम से यूपी-उत्तराखंड चैनल के सभी पत्रकारों को एचआर के कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाकर चैनल को बंद करने की घोषणा की गई। प्रबंधन की तरफ से एचआर विभाग की प्रमुख संगीता और महुआ न्यूज़ के समूह संपादक राणा यशवंत ने इसका ऐलान किया। प्रबंधन ने अपनी मजबूरियों की फेहरिस्त गिनाई जिस पर उसके प्रतिनिधि को सवालों की बौछार से रू-ब-रु होना पड़ा लेकिन जवाब उनके पास नहीं था। 
 
सवालों की ऐसी ही बौछार राणा यशवंत पर भी हुई। जिसका जवाब देते हुए महुआ समहू के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत ने साफ कहा कि मैं न्यूज़मैन हूं और पूरी तरह से अपनी टीम और पत्रकारों के साथ रहूंगा। इसके बाद एक-एक कर चैनल के भुक्तभोगी पत्रकारों ने एक सूत्रीय बात दोहराई …वो ये कि उन्हें बकाए वेतन के साथ कानून के मुताबिक पूरी क्षतिपूर्ति मिले। और इसके अकाउंट में कैश हुए बिना हम चैनल छोड़कर नहीं जाएंगे। इसके बाद प्रबंधन ने महुआ समूह के प्रमुख पी के तिवारी के जेल में होने के बाद व्यवस्था संभाल रहीं उनकी पत्नी मीना तिवारी से बात की। लेकिन कंपनी की लचर वित्तीय स्थिति का हवाला देकर उन्होंने बकाए के साथ क्षतिपूर्ति की रकम देने से इनकार कर दिया। इसके बाद महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों ने एक सुर में साफ कर दिया कि बिना मांगें पूरी हुए कोई न्यूज़रूम नहीं छोड़ेगा। चाहे इसमें जितने दिन भी क्यों न लग जाएं।
 
इसके बाद सभी पत्रकार न्यूज़रूम की तरफ मूव कर गए। एक नए तेवर के साथ, एक नई कहानी लिखने। कहानी ये है कि महुआ न्यूज़लाइन का चैप्टर अभी क्लोज्ड नहीं हुआ है। यहां तो नए अध्याय की शुरुआत हुई है। ये अध्याय है एक झटके में पत्रकारों को पैदल करनेवाले संस्थान को एक सबक सिखाने का। एक नया अनुभव कराने का। पत्रकारिता का मतलब क्या होता है.. ये सिखाने का। सवाल ये नहीं कि चैनल चलानेवाले ने कह दिया कि मैं दिवालिया हो गया..क्या कर सकता हूं। ये सुनकर चुप रह जाने का। भई…कोई दिवालिया हो गया है तो दिखना भी तो चाहिए। चढ़ो मर्सडीज और बीएमडबल्यू और कहो मैं दिवालिया हूं, बताओ कौन मानेगा। अरबों की दौलत, करोड़ों की शाहखर्ची और फिर कहो,..’हैसियत नहीं सौ कर्मचारियों का वाजिब हक देने की’, इसे स्वीकारना मुश्किल है। ये दरअसल वो बात थी जो तमाम पत्रकार न्यूज़रूम में दोहरा रहे थे। और दोहरा रहे हैं। खबर लिखे जाने तक महुआ न्यूज़लाइन के न्यूज़रूम में अन्ना आंदोलन का सा माहौल है।
 
प्रबंधन से दो टूक कह दिया गया है जो करना है करो। हम तो यहीं जमे रहेंगे। दरअसल बात सिर्फ बेरोजगार होने की नहीं है। उससे भी कहीं अधिक आत्मसम्मान की है, कलम की रोटी खानेवाले लोग  इस तरह से समर्पण कर गधानुभूति करेंगे तो कब तक चलेगा। अरे आवाज़ तो उठानी होगी न..सो आवाज़ उठ रही है। वक्त मिले तो महुआ के न्यूज़रूम की तरफ कूच करिए। यहां ससम्मान आपको दरवाजे से अंदर लाने वाले स्वयंसेवक तैयार हैं। आप कुछ कहना चाहें तो अपने पत्रकार भाइयों के बीच अपनी बात रख सकते हैं।
 
सोमवार से यहां सामाजिक कार्यकर्ता, अलग-अलग दलों के प्रखर नेता, वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट सारे लोग एक-एक कर आएंगे। और आंदोलनरत पत्रकारों को संबोधित करेंगे। एनबीए से जुड़े लोगों को भी ससम्मान आमंत्रण भेजा जा रहा है, बाकी लोगों से भी बातें हो रही हैं। ये एक साझा आंदोलन होगा। कोशिश तात्कालिक तौर पर अपने हक को किसी कीमत पर हासिल करने की है, लेकिन इसका मकसद कहीं बड़ा है। ये मुश्किल दौर भी एक मौके की तरह है…जिसमें इस बात की नई लकीर भी खींचनी है कि अब धन्नासेठों की मनमानी नहीं चलेगी। हिंदी न्यूज़ मीडिया के कलमकार आत्मसम्मान को बेचकर अब काम करने के मूड में नहीं। चाहे चैनल हो या अखबार हर जगह ये..‘कुत्ते की तरह काम करवाओ..गधे की तरह हांको’का हाल अब नहीं चलेगा। ये हम सबके लिए खुद को कसौटी पर कसने का भी वक्त है। सवाल ये है कि जमाने भर की हक की आवाज उठानेवाला अपने मामले में नामर्द कैसे साबित हो सकता है।
 
महुआ न्यूज़लाइन के मामले में..आखिर बिना किसी नोटिस के एक झटके में धन्नासेठों को ये हक किसने दिया कि आप अपने फायदे के लिहाज से कोई न्यूज़ चैनल खोलो और उस पर फिर ताला लगा दो। ये एक चैनल के बंद होने और सौ से ज्यादा पत्रकारों के पैदल होने की साधारण सी लगने वाली खबर नहीं है। सच तो ये है कि महुआ के एक रीजनल चैनल के बंद होने से एक बार फिर हिंदी इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ मीडिया में काम करनेवाले आशंका से भर गए हैं। आशंका इस बात को लेकर कि कहीं मेरे साथ ऐसा न हो जाए। टीवी18 समूह के आवाज़ चैनल में क्या हुआ था सबको याद है, इसलिए वित्तीय तौर मजबूत दिख रही संस्थाओं में काम करने वाले भी निश्चिंत नहीं। डर सबके ज़ेहन में है। लेकिन फिर भी चटखारे लिए जा रहे हैं। लोगों को बहुत जल्दी है उनके नाम गिनवाने की जिन्हें अब पैदल माना जा रहा है। जरा सा और इंतज़ार करिए, जल्दी ही इन पैदल लोगों के पावर का भी पता चलेगा। आंदोलन जारी है,..पल-पल की खबरें आप तक पहुंचनी जारी रहेगी।
 
एक कर्मचारी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

महुआ न्यूज़ लाइन के कर्मचारियों का अनिश्चितकालीन धरना जारी

 

महुआ न्यूज़चैनल के कर्मचारियों ने पहली रात न्यूज़रूम में बिता ली है। मस्त माहौल में। अब दूसरे दिन आंदोलन को निर्णायक मोड़ पर पहुंचाने की तैयारियां परवान पर हैं। जिसके तहत सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों, वरिष्ठ पत्रकारों, पत्रकार यूनियनों और राजनीतिक दलों के मुखर नेताओं को महुआ न्यूज़चैनल के न्यूज़रूम में आंदोलनरत पत्रकारों को संबोधित करने बुलाया जा रहा है। इनमें एनबीए के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। ताकि न्यूज़चैनल खोलकर अचानक इस पर ताला लगानेवाले धन्नासेठों की आगे से हिम्मत न हो कि वो दूसरों को उसका हक दिलाने की लड़ाई लड़नेवाले पत्रकारों के साथ ऐसा सलूक फिर कर सकें।
 
आपको बता दें कि महुआ न्यूज़ चैनल के 100 से ज्यादा कर्मचारियों को बिना किसी नोटिस के महुआ समूह ने नौकरी से हटा दिया है। इसमें आउटपुट, इनपुट, एडिटिंग, ग्रॉफिक्स और पीसीआर की टीम शामिल है। एक झटके में इन पत्रकारों को एचआर विभाग ने बुलाकर कहा कि ये चैनल आज से बंद किया जाता है और आपको कल से कार्यालय आने की ज़रूरत नहीं है। इस फैसले की गाज जिन कर्मचारियों पर गिरी है उनमें बड़ी संख्या में महिला पत्रकार भी शामिल हैं। 
 
महुआ मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने जनवरी 2012 में इस चैनल को लॉंच किया था। इससे पहले नवंबर 2011 में ही ज्यादातर कर्मचारियों की कंपनी ने भर्ती की थी। लेकिन अब तक किसी भी कर्मचारी को सिवाय ऑफर लेटर और आईकार्ड के कोई कागजात कंपनी की तरफ से नहीं दिए गए। आज-कल करते हुए उन्हें नियुक्ति पत्र तक नहीं दिया गया। ईपीएफ के नाम पर बड़ी संख्या में कर्मचारियों के वेतन से राशि की कटौती भी हुई लेकिन कंपनी की तरफ से किसी को ईपीएफ अकाउंट तक नहीं दिया गया। श्रम कानूनों के लिहाज से जिस तरह किसी भी संस्थान को बंद करने से पहले कर्मचारियों को पूरा बकाया वेतन और
क्षतिपूर्ति दिए जाने का प्रावधान है। उसका महुआ मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने पूरी तरह उल्लंघन किया है।
 
हैरत इस बात की है कि कंपनी ने अपने फरमान के बाद सभी कर्मचारियों को एक झटके में कार्यालय परिसर से बाहर जाने का हुक्म सुना दिया। ये फैसला जान बूझकर रविवार के दिन लिया गया ताकि कर्मचारियों की कम संख्या होने के कारण इसका ज्यादा विरोध नहीं हो। लेकिन इस फैसले की भनक लगते ही महुआ न्यूज चैनल के सभी कर्मचारी दफ्तर पहुंचे और उन्होंने प्रबंधन से साफ कर दिया कि जब तक आप बकाया वेतन और कानूनी तौर पर तय क्षतिपूर्ति नहीं देंगे तब तक कोई न्यूज़रूम को खाली नहीं करेगा। इसके बाद से लगातार महुआ प्रबंधन कर्मचारियों को संस्थान से बाहर करने की धमकी दे रहा है। इसके लिए जबर्दस्ती करने की भी कोशिश लगातार जारी है। लेकिन महुआ न्यूजलाइन के सभी कर्मचारियों का ऐलान है कि जब तक बकाया वेतन और क्षतिपूर्ति की कानूनी तौर पर तय रकम उनके बैंक अकाउंट में कैश नहीं होती तब तक वे न्यूज़रूम नहीं छोड़ेंगे। शांतिपूर्ण तौर पर अन्ना आंदोलन की तर्ज पर उनका विरोध जारी रहेगा और सख्ती होने पर बाकी रास्ते अख्तियार करने पर भी विचार होगा।
 
कंपनी प्रबंधन इस वक्त समूह के प्रमुख पी के तिवारी की पत्नी मीना तिवारी देख रही हैं। गायत्री परिवार से जुड़ीं मीना तिवारी को एक धार्मिक विचारों की संस्कारित महिला माना जाता रहा है लेकिन प्रज्ञा चैनल को बंद किए जाने के बाद महुआ न्यूज़लाइन को बंद करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। पी के तिवारी सीबीआई की गिरफ्तारी के बाद जेल में बंद हैं। ऐसे में मीना तिवारी को चैनल बंद करने की कौन सी जल्दबाजी आन पड़ी ये समझ से बाहर है। पी के तिवारी तमाम मुश्किलों के बावजूद यूपी-उत्तराखंड के इस ड्रीम चैनल को बंद करने को तैयार नहीं थे। हर परिस्थिति में उन्होंने चैनल से जुड़े वरिष्ठ पत्रकारों से यही कहा कि हम यूपी-उत्तराखंड चैनल को किसी हाल में बंद नहीं करेंगे बल्कि इसका और विस्तार करेंगे। 
 
चैनल बेहतरीन आउटपुट दे रहा था, उत्तराखंड में इसकी मजबूत पहचान बन गई थी। यूपी के 25 जिलों में इसकी पहुा थी। डिस्ट्रीब्यूशन के भारी भरकम खर्चों को उठाने में दिक्कत की वजह से बाकी के जिलों और प्रमुख टीआरपी सेंटर्स पर ये चैनल दिख नहीं पाया। जिसके कारण टीआरपी की होड़ में ये प्रतिस्पर्धी चैनलों को पटखनी नहीं दे पाया। अगर डिस्ट्रीब्यूशन बेहतर हुआ होता तो ऐसा होने में देर नहीं लगती। जैसा कि महुआ न्यूज़ के बिहार-झारखंड के चैनल ने सफलता का कीर्तिमान बनाया इस चैनल ने भी ये रिकॉर्ड यूपी-उत्तराखंड में बनाया होता। लेकिन इसे मौका ही नहीं दिया गया और न ही महुआ की खराब वित्तीय हालत की वजह से इसके लिए जरूरी उपाय किए जा सके। ऐसे में ये समूह की विफलता थी पत्रकारों की टीम की नहीं। लेकिन सेल्स, मार्केटिंग के लोगों की बजाय सबसे पहले पत्रकारों को निशाना बनाया गया और एक झटके में पी के तिवारी की गैरमौजूदगी में समूह की कमान संभाल रही मीना तिवारी के ‘प्रज्ञा चक्षु’बंद हो गए और उन्होंने पूरी तरह गैरकानूनी काम करने की तरफ कदम बढ़ा दिया।
 
बांग्ला के ड्रीम चैनल महुआ बांग्ला एंटरटेनमेंट और न्यूज़ चैनल महुआ ख़ोबोर के साथ हिंदी आध्यात्मिक चैनल प्रज्ञा की प्रोडक्शन यूनिट को पूरी तरह बंद करने के फैसले में बड़ी भूमिका निभानेवाली मीना तिवारी का कहना था कि हमने इन तमाम चैनलों से जुड़े लोगों को वेतन के अलावा कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी तो फिर महुआ न्यूज़लाइन के कर्मचारियों को क्यों देंगे। ये बातें उनकी तरफ से उनके प्रतिनिधि लगातार भुक्तभोगी कर्मचारियों तक पहुंचा रहे हैं। लेकिन मीना तिवारी को खुद न्यूज़रूम में अपनी संस्था के सदस्य रहे पत्रकारों से मिलने की फुर्सत नहीं। वो इससे बार-बार इनकार कर रही हैं। लेकिन इससे न्यूज़लाइन के कर्मचारियों पर कोई असर नहीं। आंदोलन लगातार जारी है। और वो इसे आर-पार की शक्ल देने को तैयार हैं..ताकि लॉंचिंग के 7 वें महीने में दम तोड़ चुका महुआ न्यूज़ लाइन कम से कम हिंदी मीडिया में एक लकीर खींच जाए कि आगे कोई कंपनी प्रबंधन इस तरह के गैरकानूनी कदम उठाने की हिम्मत न कर पाए।
 
महुआ न्यूज़ लाइन के कर्मचारियों की तरफ से भेजा गया पत्र. 

जालौन से शीघ्र प्रकाशित होगा हिंदी दैनिक बुंदेलखंड न्यूज़

 

बुँदेलखण्‍ड क्षेत्र से जल्‍द ही 'बुंदेलखंड न्यूज़' नाम के हिंदी दैनिक का प्रकाशन शुरू होने जा रहा है। यह अखवार जालौन जनपद के उरई मुख्यालय से प्रकाशित किया जाएगा जो बारह पेज का रंगीन अखबार होगा, जिसका प्रकाशन दैनिक जागरण झाँसी एडिशन के पूर्व ब्यूरो चीफ मुकेश उदैनिया करने जा रहे हैं। यह अखबार उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र जालौन, झाँसी, ललितपुर, महोबा, हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, औरैया, कानपुर देहात, कानपुर, इटावा के अलावा मध्य प्रदेश के दतिया, भिंड में प्रसारित किया जायेगा। 
 
अखबार में परम्‍परागत अखबारों से अलग आम आदमी को जोड़कर चलने की कोशिश की जाएगी। साथ ही बुंदेलखंड की समस्या को मुख्य रूप से उठाकर चलने की पहली प्राथमिकता होगी। जिससे सरकार तक बुंदेलखंड की समस्या से अवगत कराया जाये। इस अखबार का संपादन स्वयं मुकेश उदैनिया करेंगे। इसकी सारी तैयारिया कर ली गयी हैं और अखबार को आरएनआई द्वारा नंबर भी मिल चुका है। उम्मीद की जा रही है कि अखबार 15 अगस्त या फिर 5 सितम्बर को लांच किया जा सकता है। इसके लिए टीम भी खड़ी की जा चुकी है, जिसमें जागरण के रिपोर्टरों के अलावा, हिंदुस्तान, अमर उजाला के रिपोर्टर भी जुड़ गए हैं।

एक ही खबर को दो बार छाप रहा बठिंडा भास्‍कर

 

दैनिक भास्‍कर बठिंडा का बुरा हाल हो रखा है। रिपोर्टरों के टोटे के चलते भास्‍कर के बठिंडा सिटी भास्‍कर के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि पहले इंटरनेट से खबरें उठाकर उन्‍हें बठिंडा की क्रेडिटलाइन से छापने के बाद अब समाज सेवी संगठनों की तरफ से भेजे जाने वाले प्रेस नोट की खबरों को भी डबल छापा जा रहा है। बताया जा रहा है कि भास्‍कर की सिटी टीम में सिटी इंचार्ज समेत अब सिर्फ चार रिपोर्टर ही रह गए हैं और उन पर खबरों की संख्‍या बढ़ाने का दबाव डाला जा रहा है। जिसके चलते वह एक ही खबर को अलग- अलग तरीके से परोसकर आगे भेज रहे हैं और उन्‍हें प्रकाशित भी किया जा रहा है। 
 
भास्‍कर की सिटी में इतनी बदतर स्थिति हो चुकी है कि लोकल स्‍तर पर उन्‍हें कोई रिपोर्टर नहीं मिल रहा। चंद दिन पहले ही वरिंदर राणा ने पंजाब की शक्ति के इंचार्ज बनने और अखिलेश बंसल ने नेटवर्क 10 में जाने की तैयारी के बाद इस्‍तीफे दे दिया था, जिसके बाद से प्रबंधन ने सिटी इंचार्ज नरिंदर शर्मा पर रिपोर्टर लाने की जिम्‍मेदारी डाली थी, लेकिन लोकल में सब पत्रकारों ने खराब माहौल व अंदरुनी राजनीति की वजह से बदतर हालात देखकर हाथ खडे़ कर दिए। इसलिए कुछ दिन पहले सिरसा से एक रिपोर्टर राजकमल कटारिया को बठिंडा लाया गया है। लेकिन रिपोर्टरों का टोटा होने की वजह से भास्‍कर अब अपने फोटोग्राफरों पर भी खबर लाने व लिखने का दबाव डाल रहा है। 
 
कुछ दिन पहले एक फोटोग्राफर को सिटी पुलआउट के मेन पेज पर मेन खबर के तौर पर छापा जा चुका है। गौरतलब है कि इससे पहले भास्कर से रिपोर्टर कम सब एडिटर चंदन सिंह, रिपोर्टर नितिन सिंगला, मनीष शर्मा, राजेश नेगी, लता मिश्रा, शशिकांत शर्मा इस्तीफा दे चुके हैं। ये भी बताया जाता है कि दैनिक भास्कर बठिंडा के पहले ब्‍यूरो चीफ ऋतेश श्रीवास्तव के इस्तीफा देने के बाद से रिपोर्टरों के इस्तीफा देने का सिलसिला शुरू हो गया था। वहीं भास्कर को एक साल के करीब पहले अलविदा कह चुके हैं राजेश नेगी ने कुछ समय पहले ही अमर उजाला छोड़कर भास्कर को थाम लिया था लेकिन वह भी अब घुटन महसूस करते बताए जाते है।

आजतक के रिपोर्टर अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज

 

: यूपी में एक और पत्रकार पुलिसिया उत्‍पीड़न का शिकार : यूपी में गुंडाराज से ज्‍यादा पुलिस का आतंक राज कायम हो गया है. पत्रकारों का यूपी में जमकर पुलिसिया उत्‍पीड़न हो रहा है. ताजा मामला झांसी का है. झांसी में आजतक के रिपोर्टर अमित श्रीवास्‍तव पर पुलिस ने दो मुकदमे दर्ज किए हैं. यह मुकदमे एक महिला ने दर्ज कराई है. जबकि अमित से उस महिला का सीधे सीधे कुछ भी लेना देना नहीं है. 
 
महिला ने अपने आरोप में कहा है कि कुसुम का उसके ससुराल वालों से विवाद चल रहा है और ससुराल के पास रहने वाले पत्रकार अमित उनके साथ मिलकर उत्‍पीड़न करा रहे हैं. उसे बदनाम  किए जाने की धमकी दी जा रही है. इस शिकायत के मिलते ही पुलिस बिना मामले की जांच किए या अमित का पक्ष लिए मामला दर्ज कर लिया. दो मुकदमों में उनपर 354, 452, 506 के तहत मामला दर्ज किया गया है. 
 
हालांकि इस कहानी के पीछे जो मामला निकलकर आ रहा है कि झांसी में डीजीपी के दौरे के दौरान अमित ने वहां के कोतवाल से संबंधित कुछ सवाल पूछ लिए थे, जिससे कोतवाल अमित से खार खाए हुआ था. बाद में सुनियोजित तरीके से उसने अमित के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. इस पुलिसिया उत्‍पीड़न से झांसी के पत्रकारों में गहरी नाराजगी है. 
 
इस पूरे प्रकरण में डीआईजी ने एसपी को सीओ स्‍तर से जांच कराकर सात दिन में रिपोर्ट देने को कहा है. अमित का कहना है कि पिछले दस साल के करियर में उनके ऊपर किसी प्रकार को काई आरोप या धब्‍बा नहीं लगा, परन्‍तु डीजीपी से कुछ सवाल पूछते ही उनपर मुकदमा दर्ज हो गया. पुलिस ने मामला दर्ज करने से पहले जांच करना या मुझसे पूछताछ करना भी जरूरी नहीं समझा. 

टीओआई ने किया खुलासा : लगभग दिवालिया हो चुका है डेक्‍कल क्रानिकल

 

HYDERABAD: Deccan Chronicle Holdings Limited (DCHL) has liabilities running into thousands of crores of rupees that may lead to the erosion of the entire net worth of the company and make it commercially unviable and insolvent, Industrial Finance Corporation of India Ltd (IFCI) has said in the winding-up petition which it has filed in the high court against the Hyderabad-based company.
 
Contending that DCHL was unable to discharge debts of its creditors and had almost become insolvent, IFCI urged the high court to order winding up of the company under the relevant sections of the Companies Act 1956. The high court was also requested to appoint an official liquidator and restrain the company and its officials from disposing of, transferring or encumbering the company's assets pending the admission hearing and final disposal of the petition.
 
The petition was filed by IFCI on Friday after DCHL defaulted on redemption of 250 unsecured redeemable non-convertible debentures (NCDs) on June 26 this year and failed to pay up its dues of Rs 27,80,47,945 despite "repeated requests and demands".
 
The NCDs were part of a Rs 150 crore NCD
 
issue made by way of private placement by DCHL with Infrastructure Development Finance Company (IDFC) last year at an interest rate of 11.25% per annum for a tenure of 364 days. In July last year, 250 of these NCDs were acquired by IFCI from IDFC.
 
IFCI said DCHL had massive secured and unsecured debts running into thousands of crores of rupees with various banks, financial institutions, non-banking finance institutions etc. and feared that many more winding up petitions may be filed by other creditors as the company had defaulted on several liabilities.
 
It also cited the recent order of a London court ordering the company to pay Pounds 10,533,478 (around Rs 90 crore) to Tim Wright, the former chief executive of its Indian Premier League team Deccan Chargers, for breach of employment contract as one of the major liabilities facing the company.
 
In its petition, IFCI also revealed that DCHL chairman T Venkattram Reddy had visited their offices in Delhi on June 30 of this year and given a stamped undertaking acknowledging the company's liability of Rs 25 crore plus interest on the NCDs with a promise to make the full payment to IFCI by July 4 this year.
 
IFCI also said that following this meeting, DCHL had arranged for a payment of Rs 2,80,47,945 via RTGS (real time gross settlement) towards interest of 11.25% per annum on the NCDs and gave two cheques, dated July 4, for the principal amount of Rs 25 crore drawn on ICICI Bank at Chennai as well as for Rs 7,36,718 drawn on ICICI Bank, Secunderabad. The cheque of Rs 25 crore, however, was dishonoured by the bank on grounds of insufficient funds.
 
After this, IFCI filed an application before the Debt Recovery Tribunal in Delhi for recovery of Rs 25,17,28,944 against DCHL on July 16, this year.
 
IFCI said that the action of DCHL in failing to redeem the NCDs on the due date was sufficient to establish that the company had no funds to pay off its dues in the first instance and the letter of DCHL requesting IFCI for a cure period (grace period) of 30 days to redeem the dues with interest had further established that the company was unable to pay off the dues and reconfirmed its inability to pay up the amount due to IFCI.
 
DCHL officials could not be reached for comments despite repeated attempts. Courtesy : TOI

पत्रकार पर निराधार आरोप से गुवाहाटी प्रेस क्लब में हंगामा

 

गुवाहाटी। जीएस रोड कांड में एक और पत्रकार के शामिल होने का दावा करने वाले तीन संगठनों के प्रतिनिधियों को रविवार को संवादकर्मियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। संगठन के पदाधिकारी अपने आरोप के पक्ष में पुख्ता सबूत और तर्क नहीं दे सके। जिसके बाद संवाददाताओं खासकर आरोपी चैनल डीवाई 365 के संवाददाताओं की संगठन के पदाधिकारियों के साथ भारी बक-झक हो गई। बाद में मामले को देखते हुए गुवाहाटी प्रेस क्लब को पुलिस बुलानी पड़ी। पुलिस ने बड़ी मशक्कत से संगठन के पदाधिकारियों को बचा कर बाहर ले गई। 
 
अखिल असम कृषक कल्याण परिषद, असम गण मंच तथा समता सैनिक दल के पदाधिकारियों का कहना था कि जीएस रोड कांड में डीवाई 365 के संवाददाता विनय कलिता ने युवती से जबरदस्ती बयान लेने के प्रयास में उसके हाथ पकड़े थे और बार-बार चेहरे पर से बाल हटाए थे और गौरव ज्योति नेओग की तरह कलिता से भी पूछताछ पुलिस को करनी चाहिए। संगठनों ने संवाददाताओं को घटना का वीडियो दिखाया और सीडी सौंपी। इस वीडियो में युवती का हाथ और बाल खींचने वाले व्यक्ति का चेहरा नहीं दिखता है।
 
संवाददाता सम्मेलन में कृषक कल्याण परिषद के महासचिव प्रदीप कलिता तथा समता सैनिक दल के प्रदेश प्रमुख अमरेन्द्र दास ने बताया कि उन्होंने घटना की वीडियो फुटेज पुलिस को सौंप दी है और वे चाहते हैं कि युवती का हाथ और बाल खींचने वाले व्यक्ति की पहचान हो और उन्हें भी सजा मिले। इधर संवाददाता सम्मेलन के दौरान हुई अफरातफरी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गुवाहाटी प्रेस क्लब के सचिव नव ठाकुरिया ने कहा है कि कानून अपना काम करेगा। संवाददाताओं को लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी चाहिए।
 
उन्होंने कहा कि खासकर नए संवाददाताओं को प्रशिक्षण की आवश्यक्ता है और चैनल तथा अखबार प्रबंधन से उनकी अपील होगी कि वे अपने संवाददाताओं को न्यूनतम नीति -नियम बताएं। श्री ठाकुरिया ने कहा कि एक गलत परंपरा चल पड़ी है और इसे रोकना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह एक ताज्जुब की बात है कि पिछले दिनों मीडिया की नैतिकता पर जब प्रांजय गुहा ठाकुरता की कार्यशाला हुई तो मुश्किल से 30 संवाददाता उपस्थित थे जबकि आज जीएस रोड कांड के मसले पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में 200 से अधिक थे। 
 
गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट.

क्‍या न्‍यूज24 जाएंगे राणा यशवंत?

महुआ समूह के चेयरमैन पीके तिवारी और उनके पुत्र की गिरफ्तारी के बाद महुआ न्यूज़ लाइन यूपी चैनल पर ताला लग गया है। चैनल के पूरे स्टाफ को दो माह से वेतन नही दिया गया है। ब्यूरो चलाने वाले सभी स्टाफ रिर्पोटर सैलरी के अलावा पिछले तीन माह के बकाया ऑफिस खर्च को लेकर भी परेशान हैं। सभी ब्यूरो कार्यालय किराये की जगहों पर चल रहे थे और किराया ना मिलने से सभी ब्यूरो प्रमुखों के सामने एक नई दिक्कत और खड़ी हो गयी है। महुआ न्यूज़ यूपी में कुछ ब्यूरो प्रमुख तो ऐसे हैं जो अच्छे मीडिया संस्थानों को छोड़कर राणा यशवंत के कहने पर यहां आये थे। हालात ये हैं कि जब कोई ब्यूरो चीफ असाइनमेंट हैड़ या ग्रुप एडिटर राणा यशवंत से बात करने की कोशिश कर रहा है तो वो फोन तक पिक नही कर रहे हैं।

 
खबर है कि अब खुद महुआ के दोनों खबरिया चैनलों की कमान सम्भालने वाले राणा यशवंत ने भी न्यूज़24 में जाने की तैयारी कर ली है। पिछले तीन दिनों से वो खुद रमा सोंलकी के साथ न्यूज़24 प्रबंधन के संपर्क मे हैं। ख़बर है कि वो जल्द ही न्यूज़24 में बड़े पद पर दिखाई देंगे। न्यूज़24 में चर्चा है कि वो सुप्रिया प्रसाद की जगह लेंगे। हालांकि महुआ न्‍यूज लाइन बंद करने से पहले प्रबंधन ने कैमरा यूनिट वापस पाने के लिए कई कवायद किए पर सफलता नहीं मिल पाई। 
 
सभी ब्‍यूरो को एचआर की तरफ से फोन करके गुरुवार को एक झूठी कहानी सुनाई गई, जिसमें कहा गया कि आप सबकी यूनिट को एचडी में तब्दील किया जा रहा है। नये कैमरे आपके लिये लाये गये हैं। आप शनिवार को आइये और नये कैमरे लेकर जाइये। जबकि ऑफिस में कोई नये कैमरे नही आये हैं। उसके कुछ देर बाद में महुआ एचआर से सभी ब्यूरो को फोन किया गया कि आप लोग पहले कार्यालय आकर अपना कैमरा यूनिट जमा किजीये और रात को यहीं रुकिये रविवार को राणा यशवंत आपके साथ बैठक करेंगे। इस बात से महुआ न्यूज़ यूपी के सारे ब्यूरो सर्तक हो गये। और सबको समझते देर नही लगी कि झूठ बोलकर सभी को नोएड़ा बुलाने के लिये ये कहानी गढी गई है। जिसका मकसद केवल कैमरा यूनिट वापस लेकर सभी को नमस्ते कर देना था। पर सारी कोशिशें बेकार गई। कोई ब्‍यूरो नहीं पहुंचा। 
 
दूसरी तरफ ख़बर आ रही है कि राणा यशवंत एक अगस्त से नौ अगस्त के बीच कभी भी न्यूज़24 ज्वाइन कर लेंगे। उन्होने अपनी सारी औपचारिकताऐं भी पूरी कर ली हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या उन लोगों के सामने खड़ी हो गयी हैं जो यहां पूरी मेहनत से काम कर रहे थे। यही हाल सारे स्ट्रिंगर्स का है। पिछले कई माह से काम करने के बावजूद किसी भी उन्‍हें एक माह से ज़्यादा का पैसा नही दिया गया है। सभी परेशान हैं कि आखिर क्या किया जाये। कुछ लोगों ने पीके तिवारी के दूसरे पुत्र और उनकी पत्नी से सम्पर्क साधने की कोशिश की लेकिन उनकी किसी से वार्ता नही हो सकी। चर्चा शुरु हो गयी है कि महुआ न्यूज़ लाइन का हाल वॉयस ऑफ इंडिया चैनल जैसा होगा। क्योंकि इस समूह को सम्भालाने वाले पीके तिवारी की ज़मानत पर भी संशय बना हुआ है। ऐसे में कम्पनी स्टाफ का भुगतान कैसे करेगी। इसी सवाल से परेशान स्टाफ अब अपने लिये दूसरी जगह काम तलाशने की कोशिश में जुटता दिख रहा है। वहीं राणा यशवंत से संपर्करने की कोशिश की गई परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया, जिससे किसी मामले पर राणा यशवंत या महुआ का पक्ष नहीं लिया जा सका। 

महुआ न्‍यूजलाइन पर ताला, डेढ़ सौ कर्मचारी बेरोजगार

 

: नोएडा मुख्‍यालय के एचआर में देर शाम तक कर्मचारियों ने किया हंगामा : बड़े तोपचियों ने पहले ही कर्मचारियों तक लीक कर दिया था प्रबंधन का फैसला : नोएडा : महुआ समूह को लेकर आशंकाएं आखिरकार सच साबित हुईं। महुआ न्‍यूज लाइन नामक चैनल बंद कर दिया गया है। करीब डेढ सौ कर्मचारियों को संस्‍थान से निकाला दिया गया है। देर शाम तक नोएडा मुख्‍यालय में एचआर विभाग के दफ्तर में इन कर्मचारियों ने हंगामा किया। उधर पता चला है कि प्रदेश के कई मंडल मुख्‍यालयों पर कर्मचारियों ने इस तालाबंदी की भनक लगते ही अपने दफ्तर में मौजूद सारा साज-सामान जब्‍त कर लिया है। इन कर्मचारियों का कहना है कि जब तक उनके बकाया देयकों का भुगतान नहीं किया जाएगा, वे दफ्तर का सामान वापस नहीं करेंगे। 
 
बताते हैं कि इस तालाबंदी का फैसला महुआ समूह के मालिक की पत्‍नी के आदेशों के मुताबिक किया गया है। समूह के मुखिया पीके तिवारी पर आये ताजा संकट के बीच हुए इस तालाबंदी को लेकर मारामारी मची हुई है। सबसे ज्‍यादा तो बवाल कर्मचारियों के श्रमविवादों को लेकर है। हालांकि कई मंडल मुख्‍यालयों में बनाये गये कार्यालयों के सामानों पर भी विवाद खड़ा हो गया है। ज्‍यादातर कर्मचारियों ने ऐलान कर दिया है कि बकायों का भुगतान नहीं होने तक वे सामान नहीं सौंपेंगे। इन कर्मचारियों का आरोप है कि मौजूदा संकट इस चैनल के दो दिग्‍गजों के चलते सामने आया  
 
सूत्रों के मुताबिक, महुआ न्‍यूज लाइन नामक यूपी चैनल के संपादक यशवंत राणा ने इस बंदी का ऐलान छिपे तौर पर किया। कहने को तो इस फैसले का चुपचाप लागू करने की कोशिशें की गयी थीं। प्रबंधन का मानना था कि पहले मंडल मुख्‍यालयों पर मौजूद कैमरा आदि सारा कीमती साजोसामान नोएडा मुख्‍यालय तक पहुंचा दिया जाए, उसके बाद ही चैनल बंदी के फैसले का जगजाहिर किया जाएगा। लेकिन जानकारियों के मुताबिक ऐसा हो नहीं पाया और प्रमुखों ने अपने खासमखास लोगों तक प्रबंधन का यह फैसला लीक कर दिया।
 
पहले ही राणा ने सभी ब्‍यूरो प्रमुखों और कैमरामैन का निर्देश दिया था कि शनिवार 28 जुलाई तक सभी कैमरा-यूनिटों को दिल्‍ली तक पहुंचा दिया जाए। सूत्रों के अनुसार राणा के निर्देशों के तहत कहा गया था कि पुरानी सभी कैमरा-यूनिटों को मुख्‍यालय में जमा करायी जाएंगी और बदले में नयी यूनिटें उन्‍हें दी जाएंगी। लेकिन एक कर्मचारी ने बताया कि इस फैसलों की गुपचुप जानकारी इन कर्मचारियों को दी गयी कि कैमरा-यूनिटों की वापसी का मकसद इस चैनल को बंद करना ही है। ऐसे में ऐसे इशारे को भांप कर ही कई ब्‍यूरो प्रमुखों और कैमरामैनों ने यूनिटें जमा करने से इनकार कर दिया।
 
आज यानी शाम की दोपहर बाद जब इनमें से ज्‍यादा कर्मचारी जब नोएडा मुख्‍यालय पर पहुंचे तो उन्‍हें कैमरा-यूनिटें जमा कराने के बाद खबर दी गयी कि यह चैनल बंद किया जा रहा है। साथ ही यह भी ऐलान किया गया कि महुआ यूपी न्‍यूज लाइन चैनल के करीब 140 कर्मचारियों की सेवाओं की जरूरत अब संस्‍थान को नहीं है, अत: उन्‍हें नौकरी से निकाला जा रहा है। जानकारों के अनुसार फिलहाल नौकरी से हटाये गये एंकर, प्रोड्यूसर और सीपीआर के कर्मचारियों के साथ कई बड़े पत्रकार भी शामिल हैं।
 
विश्‍वस्‍त सूत्रों के मुताबिक नौकरी से निकाले गये कर्मचारियों में प्रद्युत खरे, अमित, पूजा, हेमा, आस्‍था दीप परिवार आदि प्रमुख हैं। कभी इस चैनल के हेड की दावेदारी करने वाले और मौजूद नेशनल ब्‍यूरो प्रमुख अनुराग त्रिपाठी को भी संस्‍थान से बाहर निकाला गया है। बताते हैं कि भुप्‍पी के करीबी माने जाते गोरखपुर, इलाहाबाद और वाराणसी के ब्‍यूरोप्रमुख कार्यालय के कैमरामैनों ने अपने कैमरा-यूनिटों को नोएडा मुख्‍यालय में वापस करने से साफ इनकार कर दिया है। बताते हैं कि इन सभी कर्मचारियों ने साफ तौर पर कह दिया है कि जब तक उनके देयों का भुगतान नहीं किया जाएगा, वे कैमरा-यूनिटों को वापस नोएडा नहीं भेजेंगे।
 
उधर इतने कर्मचारियों की नौकरी पर अचानक आये इस संकट से भौंचक्‍के कर्मचारियों में भारी आक्रोश व्‍याप्‍त हो गया। नौकरी से निकालने जाने की खबर मिलने पर समूह के मुख्‍यालय में उन कर्मचारियों ने जमकर हंगामा किया। बताते हैं कि मुख्‍यालय में अफरातफरी का माहौल अभी तक जारी है। हंगामा कर रहे कर्मचारियों ने कर्मचारियों ने इस अपने जानलेवा हमले के लिए सीधे-सीधे राणा और भुप्‍पी की शुरुआती जुगलबंदी और फिर ताजा संकट को भड़काने का आरोप लगाया है। 
 
वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

गूगल लाया सबसे तेज नेट कनेक्शन

 

लंदन : इंटरनेट के सरताज गूगल ने सबसे तेज गति से नेट एक्सेस का रास्ता निकाल लिया है। दुनिया में सबसे गति वाला गूगल फाइबर इंटरनेट कनेक्शन प्रति सेकेंड एक गीगा बाइट की रफ्तार से चलेगा। यानी पलक झपकते ही 1024 मेगा बाइट डाटा आप एक्सेस कर लेंगे। एक गीगा बाइट में 1073741827 बाइट्स होते हैं। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार गूगल की नई इंटरनेट सेवा रफ्तार के लिए ऑप्टिकल फाइबर का इस्तेमाल करती है। इससे परंपरागत वेब सेवाओं से कहीं अधिक रफ्तार से पूरी दुनिया में आप इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं। 
 
वेब सर्च अगुवा ने कैनसास सिटी के मिसूरी में सर्वाधिक गति वाली गूगल फाइबर सेवा को पहली बार दुनिया के सामने पेश किया। गूगल के प्रमुख वित्तीय अधिकारी पैट्रिक पिशेट ने कहा कि वह मील के पत्थर तक पहुंच गए हैं। वर्ष 2000 के बाद से ब्राडबैंड की दुनिया में ऐसा धमाका अब तक नहीं हुआ है। गूगल को इसे सबके सामने लाने के लिए अब और इंतजार की जरूरत नहीं। गूगल फाइबर अल्ट्रा हाईस्पीड कनेक्शन और टेलीविजन सेवा मौजूदा सभी सेवाओं से बहुत आगे निकल आई है। इसके तहत गूगल के यूजर लाइव चैनल सर्च कर सकेंगे। नेटफिल्क्स, यूट्यूब, रिकार्डेड शो और दसियों हजार घंटे तक रिकार्डेड शो देख सकेंगे। 
 
हालांकि इसके लिए कोई फोनसेवा उपलब्ध नहीं है। आखिर एक जगह बैठकर लैंडलाइन फोन का इस्तेमाल करने की जरूरत क्या है। एक जगह बैठकर आप कितनी देर किसी सेवा का लाभ ले पाएंगे। गूगल अपने कई प्रोडक्ट ला रहा है। गूगल फाइबर में 100 से अधिक नेटवर्क होंगे। टीवी के साथ पैकेज, एक गीगा बाइट प्रति सेकेंड इंटरनेट स्पीड और एक टेरा बाइट क्लाउड स्टोरेज होगा। इसका शुल्क 120 अमेरिकी डॉलर प्रति माह होगा। इसके अलावा गूगल एक सस्ता पैकेज यानी प्रति माह 70 डॉलर में सेवा देगा। इसमें डाउनलोड स्पीड एक गीगा बाइट प्रति सेकेंड होगी। इंटरनेट का कनेक्शन लगाने के लिए गूगल 300 अमेरिकी डॉलर फीस लेगा। (एजेंसी)

शैक्षिक चैनलों को एनओसी देने को तैयार नहीं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय

 

नई दिल्ली : सूचना संचार तकनीक ने पूरी दुनिया में पढ़ाई-लिखाई की राह भले ही आसान कर दी हो, लेकिन भारत में यह अब भी कम बड़ी चुनौती नहीं है। तभी तो सरकार चाहकर भी सेटेलाइट के जरिये उच्च शिक्षा, खासतौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की कोशिशों को हकीकत में नहीं बदल पा रही है। आलम यह है कि पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 50-60 शैक्षिक टीवी चैनलों को शुरू करने की मुहिम प्रधानमंत्री कार्यालय के दखल के बाद भी अब तक परवान नहीं चढ़ सकी है। 
 
सूत्रों के मुताबिक, शैक्षिक चैनलों के जरिये देश के दूरदराज इलाकों तक में उच्च शिक्षा पहुंचाने की मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की लगभग आठ महीने की कोशिशें सिर्फ इसलिए मुकाम नहीं हासिल कर सकी, क्योंकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय उसे चैनल शुरू करने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) देने को तैयार नहीं है। मंत्रालय का इरादा फिलहाल पायलट के तौर पर लगभग पांच दर्जन शैक्षिक चैनल शुरू करने का है, जबकि आगे चलकर वह इसे वह एक हजार तक पहुंचाना चाहता है। बताते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अपने राष्ट्रीय शिक्षा सूचना संचार प्रौद्योगिकी मिशन के तहत इंजीनियरिंग की लगभग पूरी पढ़ाई का ई-कंटेट तैयार करा चुका है। यह पाठ्य सामग्री छात्रों को सरकारी पोर्टल के जरिये तो उपलब्ध होगी ही, शैक्षिक चैनलों के जरिये उसे और विस्तार दिया जाएगा। 
 
बताते हैं कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय शैक्षिक चैनलों को शुरू करने की इजाजत महज इसलिए नहीं दे रहा है, क्योंकि वह सिर्फ कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत किसी कंपनी को (प्राय: निजी क्षेत्र व मुनाफा कमाने वाली) ही चैनल चलाने की मंजूरी देता है। एचआरडी मंत्रालय कंपनी नहीं है। सूचना-प्रसारण मंत्रालय के इस तर्क के बाद एचआरडी मंत्रालय ने अपने किसी निकाय को चैनल चलाने की मंजूरी की पैरवी की, लेकिन वह उस पर भी नहीं तैयार हुआ। सूत्रों की मानें तो इसी साल जनवरी में खुद एचआरडी मंत्री कपिल सिब्बल ने इस मामले को सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी के सामने भी उठाया था। बात नहीं बनी तो यह मामला प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया। पीएमओ के दखल के बाद ही मामला अंतरिक्ष, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, सूचना एवं प्रसारण और वित्त मंत्रालय (व्यय) के सचिवों की समिति को सौंप दिया गया। सूत्र बताते हैं कि अंतरिक्ष मंत्रालय तो एचआरडी मंत्रालय के प्रस्ताव से सहमति जताते हुए उसे दो ट्रांसपोंडर देने को राजी है, लेकिन सूचना प्रसारण मंत्रालय अब भी चुप्पी साधे हुए है। चैनलु का लाइसेंस दूरसंचार मंत्रालय को देना है, जो सिब्बल के ही पास है। साभार : जागरण 

मृदुल त्‍यागी का आई नेक्‍स्‍ट से इस्‍तीफा

 

आई नेक्‍स्‍ट, मेरठ से खबर है कि सीनियर र्जनलिस्‍ट मृदुल त्‍यागी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे आई नेक्‍स्‍ट के सभी एडिशनों का न्‍यूज कोआर्डिनेशन देख रहे थे. मृदुल की गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में होती है. वे अमर उजाला, हिंदुस्‍तान एवं जागरण को सेवा देने के बाद आई नेक्‍स्‍ट से जुड़े थे. उनको लेकर कई तरह की चल रही चर्चाओं को खारिज करते हुए उन्‍होंने कहा कि वे एक किताब लिख रहे हैं, जिसके चलते इस्‍तीफा दिया है. इस्‍तीफा बड़े ही अनुग्रह के साथ दिया है ताकि उक्‍त किताब को पूरा कर सकूं.  

सपा का फैसला पत्रकारिता पर हमला है : शाहिद सिद्दीकी

 

नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लेने पर समाजवादी पार्टी से निकाले गए शाहिद सिद्दीकी ने मुलायम सिंह पर पलटवार किया है। एक अखबार से बातचीत में सिद्दीकी ने कहा कि मुलायम हकीकत से अनजान हैं। शाहिद के मुताबिक, एसपी सुप्रीमो मुस्लिम मन को नहीं समझते और उन्हें वोट हासिल करने के पुराने हथकंडे छोड़कर अपने वादों को पूरा करना चाहिए। 
 
शाहिद का कहना है कि ये सब पार्टी के उन नेताओं की राजनीति का नतीजा है जिन्होंने कुछ साल पहले यूपी के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ मंच साझा किया था। उन्होंने सपा पर उन्हें वोट हासिल करने के लिए बलि का बकरा बनाने का आरोप लगाया है। सिद्दीकी ने कहा, मैंने एक पत्रकार के तौर पर मोदी का इंटरव्यू किया। मेरा मकसद मोदी को किसी तरह का भी फायदा पहुंचाना नहीं था। मैंने तो 2002 के दंगों के बाद की स्थिति बताने की कोशिश की है, जिसे लोग भूल चुके थे। समाजवादी पार्टी ने मुझे बाहर करने का फैसला सिर्फ वोट बैंक की राजनीति की वजह से किया है।'
 
उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, सच कहूं तो मोदी की आड़ में मुझे बलि का बकरा बनाया गया है। सिद्दीकी ने कहा, एसपी के दिल में चोर है। वह पहले कल्याण सिंह को शामिल करते हैं, साक्षी महाराज को शामिल करते हैं और फिर इसके लिए माफी मागते हैं। मैं हमेशा धर्म निरपेक्षता के लिए लड़ा हूं और लड़ूंगा। समाजवादी पार्टी का यह फैसला बेहद अफसोसनाक है और पत्रकारिता पर हमला है। इस पार्टी में सिर्फ परिवारवाद की चल रही है।
 
हाल ही में अपने उर्दू साप्ताहिक 'नई दुनिया' के लिए सिद्दीकी ने मोदी का इंटरव्यू किया था, जिसमें मोदी ने 2002 के दंगों के लिए माफी मांगने से इनकार करते हुए कहा था कि अगर वह दोषी पाए जाएं तो उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया जाए। यह पूछे जाने पर कि उन्होंने इस वक्त मोदी का इंटरव्यू क्यों किया, तो सिद्दीकी ने कहा, बहुत सारे लोग इस तरह के सवाल कर रहे हैं जो पूरी तरह से बेमानी हैं। एक पत्रकार के रूप में मोदी का इंटरव्यू करने का मौका मिला और मैंने किया। मैंने तो मोदी से वह सवाल पूछे जो शायद कोई नहीं पूछ सकता था।'
 
उन्होंने कहा, मोदी का इंटरव्यू करने का मेरा कोई दूसरा मकसद नहीं था।' अगले सियासी कदम के बारे में पूछे जाने पर सिद्दीकी ने कहा, मैं अब दलगत राजनीति से दूर रहूंगा। लेकिन लिखने, पढ़ने और बोलने का मेरा सिलसिला चलता रहेगा। सभी पार्टियों में बोलने और लिखने की आजादी पर बंदिश है, ऐसे में मैं दलगत राजनीति नहीं कर सकता। इसलिए किसी पार्टी से जुड़ने का सवाल ही नहीं है।' साभार : जागरण 

दैनिक भास्कर में एक खबर दो आँकड़े

 

मध्यप्रदेश के हरदा जिले के खिरकिया में भारी बारिश की खबर दैनिक भास्कर के ही संस्करणों में अलग-अलग आँकड़ों में प्रकाशित की गई। इटारसी संस्करण के प्रथम पेज पर प्रकाशित खबर में लिखा है कि खिरकिया में 10 घंटे में 9 इंच बारिश, जबकि इंदौर सिटी के मुख्य पेज पर उसी खबर में लिखा है 24 घंटे में 9 इंच बारिश। इसी प्रकार खिरकिया के पुलआउट के प्रथम पेज पर लिखा है कि आधा खिरकिया कमर तक डूबा, जबकि जबलपुर के प्रथम पेज पर लिखा है कि खिरकिया में सड़क पर 6 फीट तक पानी। अब समझ में यह नहीं आया कि दैनिक भास्कर समाचार पत्र में इस प्रकार की गलती, वह भी पेज 1 पर कैसे हुई। 
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

 

आप ही बताएं- नेशनल न्यूज़ चैनल्स इन्हें क्यों कहा जाए?

 

हिन्दुस्तान की जनसंख्या १२० करोड़ के करीब. कुल राज्य ३५ (७ केंद्र-शाषित सहित). पर तवज्जो सिर्फ दिल्ली-एन.सी.आर. और मुंबई की खबरों को. जी हाँ- ये हाल है भारत के न्यूज़ चैनल्स का जो अपने साथ "नेशनल न्यूज़ चैनल" का टैग लगाते हैं. न्यूज़ का सामान्य अर्थ इस तरह से लिया जा सकता है – नॉर्थ+ईस्ट+वेस्ट+साउथ की खबरों का प्रसारण. पर कौन सा ऐसा चैनल है जो इस परिभाषा के करीब भी है? कभी-कभी अंग्रेजी चैनल्स, एन.डी.टी.वी. इंडिया और ज़ी न्यूज़ जैसे चैनल इस और कदम बढ़ाते दिखते हैं. पर "कभी-कभी" एक औपचारिकता का नाम होता है. ज़्यादातर चैनल्स तो इस "कभी-कभी" से भी कभी इत्तेफाक नहीं रखते. क्यों? 
 
क्या कारण है कि राष्ट्रीय समाचार चैनल्स के लिए इस तरह की बाध्यता नहीं रखी गयी और उन्हें राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल का लाइसेंस दे दिया गया? क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस पर ध्यान नहीं देता या फिर इस तरह का कोई प्रावधान (लाइसेंस बाँटते वक़्त) तय नहीं किया जाता. क्षेत्रीय और राष्ट्रीय चैनल्स में क्या अंतर है? दिल्ली के आस-पास अपना ऑफ़िस या प्रसारण-केंद्र खोल कर यहीं आस-पास की ख़बरों को ज़्यादा तवज्जो देना ही "नेशनल" शब्द की भरपाई है? दर्शक अगर १५ दिन लगातार नेशनल न्यूज़ चैनल्स का अध्ययन करें, तो पायेंगे कि दिल्ली-एन.सी.आर. और मुंबई की खबरों का प्रसारण ८०% टाइम खा जाता है, २०% प्रतिशत में कॉमेडी शो, स्पोर्ट्स, मनोरंजन, धर्म-कर्म, ज्योतिष, यू-ट्यूब और थोड़ा बाहर की स्पेशल रिपोर्ट्स रहती हैं. 
 
भारत के चार महानगरों (दिल्ली-मुंबई-कोलकाता-चेन्नई) में से कोलकाता-चेन्नई तो कभी-कभार ही जगह पाते हैं. सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल-प्रदेश, त्रिपुरा, मिज़ोरम, मणिपुर, आसाम, नागालैंड तो चमत्कार की तरह ही सामने आते हैं (मानों ये भारत के हिस्से ही ना हों).  दक्षिण व अन्य भारत के अधिकाँश हिस्से भी कुछ इसी तरह के भेद-भाव का शिकार हैं. ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गोवा, गुजरात, आँध्र-प्रदेश, केरला, कर्नाटक का नाम तभी सामने आता है जब कोई बहुत बड़ी घटना हो या फिर बड़ी राजनीतिक हलचल. दमन दिव, पुद्दुचेरी, लक्षदीप, दादरा नगर, अंडमान-निकोबार भी ज़बरदस्त उपेक्षा के शिकार हैं. तकरीबन 22-23 राज्य ऐसे हैं, जो खबर के नाम पर इन "तथा-कथित नेशनल न्यूज़ चैनल्स" में कभी-कभार ही जगह पा पाते हैं. दिल्ली-मुंबई-एन.सी.आर ही इन न्यूज़ चैनल्स की पहचान हैं. पर बावजूद इसके इन्हें नेशनल न्यूज़ चैनल्स क्यों कहा जाता है, ये समझ से परे है! 
 
ये बात बेहद "समझदार" संपादकों को स्पष्ट करनी चाहिए और साथ में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भी. क्या दिल्ली, एन.सी.आर. और मुंबई में ही घटनाएँ घटती हैं? या हिंदुस्तान में और जगहों पर रहने वालों की कोई कीमत नहीं है? चैनल चलाने में बड़ा ख़र्चा आता है, ख़ास-तौर पर डिस्ट्रीब्युशन में. ये सच है. पर ये बात भी तो सच है कि – "नेशनल न्यूज़" का लाइसेंस लेते समय ये बात मालूम रहती है. फिर नेशनल न्यूज़ का लाइसेंस क्यों लिया जाता है? क्या अंतर होना चाहिए एक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समाचार चैनल में? क्या पैमाने तय किये जाने चाहिए थे, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समाचार चैनल का लाइसेंस देते वक़्त? ये बात अब तक साफ़ नहीं हो पायी. 
 
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस बात को साफ़ करना चाहिए, पर वो कन्नी काटता है. क्यों? पता नहीं. क्या लखनऊ, बनारस, पटना, पुद्दुचेरी, कोट्टयम, नागालैंड, सूरत से स्थानीय खबरों (जैसे दिल्ली में स्थापित चैनल, ज़्यादातर दिल्ली-मुंबई-एन.सी.आर. तक ही सिमटे रहते हैं) का प्रसारण करने वाले वालों को भी नेशनल न्यूज़ चैनल माना जाना चाहिए? न्यूज़ चैनल्स का टैग लगाने वालों ने "सेल्फ-रेगुलेशन" के तहत कोई मापदंड तैयार किया है या फिर ज़बरदस्ती इस टैग को चिपका लिए हैं? गौर से देखा जाए तो, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रति व्यक्ति इनकम, जागरूकता, रोज़गार, क़ानून व्यवस्था, सरकारी योजनाओं के क्रियान्यवन के लिहाज़ से, दिल्ली-मुंबई और एन.सी.आर. और कुछ अन्य महानगरों में व्यवस्थाएं काफी हद तक संतोष जनक हैं. 
 
भारत के दूसरे हिस्से काफी पिछड़े हैं और कई आधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं (न यक़ीन हो तो इन हिस्सों के सरकारी स्कूल, ऑफ़िस और अस्पतालों का मुआयना कर आइये). पर "नेशनल न्यूज़" का टैग लगाया मीडिया वहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रहा. माली या टाली हालत के चलते. कहा जाता है कि लोकतंत्र का चौथा खम्बा मीडिया है. मीडिया, गर इस पर इतराता है तो इतरा ने की कोई वज़ह तो होती होगी! ऊपर दिए गए विश्लेषण से आप को भी अंदाज़ हो चला होगा कि "नेशनल न्यूज़" का टैग लगाया मीडिया कितना जिम्मेदार है और किसकी कितनी खबर रखता है? 
 
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पावरफुल है, इसमें कोई दो-राय नहीं. इसमें भी कोई दो-राय नहीं कि मीडिया खबर दिखाता भी है. सवाल यहाँ सिर्फ यही है कि नेशनल मीडिया किसको कहा जाना चाहिए? क्षेत्रीय और नेशनल मीडिया में बड़ा फर्क (खबरों के लिहाज़ से) क्या होना चाहिए? अब आप ही बताएं- कि जो दिल्ली-मुंबई-एन.सी.आर. पर ही ज़्यादा वक़्त जाया करते हैं उन्हें नेशनल न्यूज़ चैनल्स क्यों कहा जाए? मैं अपना ओपोनियन आप सबके सामने रखा, अगर कोई गलती है तो माफ़ करें. 
 
राजेंद्र कुमार 
 
भुबनेश्वर 
 
0.9439872925 9776785555 

दैनिक भास्कर पलामू कार्यालय में दो लाख का घपला

 दैनिक भास्कर के मेदिनीनगर (पलामू) कार्यालय से प्रकाशित विज्ञापन का दो लाख रुपये घपला किए जाने का मामला प्रकाश में आया है. मेदिनीनगर कार्यालय के प्रभारी राणा अरूण सिंह ने अपने चैनपुर प्रखंड रिर्पोटर धर्मेंद्र प्रसाद जायसवाल को एड एजेंसी दिलवा दी. इस एजेंसी द्वारा प्रकाशित विज्ञापन का दो लाख रुपए विज्ञापन विभाग के जीएम व मैनेजर अकाउंटस के पास नहीं पहुंचा. भास्कर के दोनों पदाधिकारियों ने संबंधित लोगों के पास नोटिस जारी कर दो लाख रुपये की मांग की है. 

 
इसके बाद धर्मेंद्र प्रसाद जायसवाल ने चैनपुर थाना में मेदिनीनगर में कार्यरत निर्वतमान मार्केटिंग एक्सक्यूटिव अमित कुमार सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है. श्री जासवाल ने दर्ज प्राथमिकी में कहा है कि अमित कुमार सिंह ने मेरे नाम का जाली हस्ताक्षर बनाकर किसी दूसरे का चेक रांची हेड कार्यालय में जमा कर फरार हो गया है. चैनुपर थाना में कांड संख्या 63/12 के अंतर्गत की धारा 420, 468 व 471 (छल करने, छल के प्रयोग के लिए कूटरचना करने, व कूटरचित दस्तावेज को जिसके बारे में ज्ञात है कि वह कूटरचित है, असली के रूप में उपयोग में लाने शामिल हैं.) दर्ज कर पता लगाने की कोशिश कर रही है कि मेदिनीनगर कार्यालय से भेजे गए विज्ञापनों को प्रकाशित होने के बाद विज्ञापन का भुगतान जो दो लाख रूपए है, वह आखिर कहां व किसके पास गए. 
 
चूंकि यह मामला सीधा रूप से मेदिनीनगर कार्यालय से जुड़े रिर्पोटर का है. जाहिर है प्रभारी को मिले टरगेट को पूरा करने के लिए अपने रिर्पोटर को विज्ञापन का एजेंसी दिलवाया होगा. पूर्व में कार्यरत विज्ञापन एक्सक्यूटिव अमित कुमार सिंह को समय रहते उक्त राशि का हिसाब क्यों नहीं किया गया, यह जांच का विषय है. मेदिनीनगर प्रभारी शिक्षक भी हैं, उन्हें स्कूल से लेकर कार्यालय तक संभालना पड़ता है. फिलवक्त चैनपुर थाना में मामला दर्ज होने के बाद पुलिस सच्चाई की तह तक जाने में जुटी हुई है. तो दूसरी ओर भास्कर प्रबंधन अपनी राशि को वसूलने की तैयारी में जुटा हुआ है.
 

कलिंग सेना ने हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की प्रतियां जलाई

 

भुवनेश्वर : अंग्रेजी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स में राष्ट्रपति चुनाव के संबंध में ओडिया विरोधी लेख प्रकाशित करने को लेकर प्रदेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। राजधानी भुवनेश्वर में कलिंग सेना के बैनर तले प्रदर्शनकारियों ने हिन्दुस्तान टाइम्स की प्रतियां जलाकर अपने गुस्से का इजहार किया। कलिंग सेना की ओर से सैकड़ों कार्यकर्ता मास्टर कैंटीन चौक में जमा हुए और हिन्दुस्तान टाइम्स की प्रतियां जलाई। 
 
कलिंग सेना के सुप्रीमो हेमंत रथ ने हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार पर गैर-जिम्मेदाराना ढंग से समाचार छापने और ओडिया लोगों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के आरोप में लेखक को गिरफ्तार किए जाने की मांग उठाई। वहीं कलिंग सेना के प्रभाकर नायक, बैरागी जेना, जानकी राउत, अब्दुल करीम खान आदि ने हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक और विवादित लेख के लेखक को तुरंत गिरफ्तार कर भविष्य में ऐसे आपत्तिजनक लेख न छापने की हिदायत दी। साभार : जागरण 

फिर निकलेगी ज्ञानरंजन की ‘पहल’

 

हिंदी साहित्य जगत की अनिवार्य पत्रिका के रूप में मान्य 'पहल' को विख्यात साहित्यकार, संपादक और कहानीकार ज्ञानरंजन ने पुन: निकालने का निश्चय किया है। उन्होंने तीन वर्ष पहल का प्रकाशन स्थगित कर दिया था। पहल का प्रकाशन बंद करते समय ज्ञानरंजन की टिप्पणी थी कि उन्होंने पहल को किसी आर्थिक दबाव या रचनात्मक संकट के कारण बंद नहीं किया है, बल्कि उनका कहना था-‘‘पत्रिका का ग्राफ निरंतर बढ़ना चाहिए। वह यदि सुन्दर होने के पश्चात् भी यदि रूका हुआ है तो ऐसे समय निर्णायक मोड़ भी जरूरी है।’’ 
 
उन्होंने उस समय स्पष्ट किया था कि यथास्थिति को तोड़ना आवश्यक हो गया है। नई कल्पना, नया स्वप्न, तकनीक, आर्थिक परिदृश्य, साहित्य, भाषा के समग्र परिवर्तन को देखते हुए इस प्रकार का निर्णय लेना जरूरी हो गया था। ज्ञानरंजन ने तब कहा था कि इस अंधेरे समय में न्यू राइटिंग को पहचानना जरूरी हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं करना भी बेईमानी होगी। ज्ञानरंजन कहते हैं कि विकास की चुनौती और शीर्ष पर पहल को बंद करने का निर्णय एक दुखद सच्चाई है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का निर्णय लेना भी एक कठिन कार्य है।
 
ज्ञानरंजन ने पहल के पुनर्प्रकाशन की घोषणा pahal2012.wordpress.com ब्लाग के माध्यम से की। शुरुआती तौर पर पाठकों से संवाद होगा। ब्लाग में दो पहल संवाद जारी हो चुके हैं। अब पहल के प्रकाशन में प्रसिद्ध पत्रकार राजकुमार केशवानी भी सहयोग करेंगे। जबलपुर में ज्ञानरंजन ने बातचीत में कहा कि पहल में सरकारी विज्ञापन बिलकुल नहीं छापे जाएंगे। तीन माह तक जमीनी काम किया जाएगा और फिर पत्रिका का प्रकाशन होगा। पत्रिका के प्रकाशन तक ब्लाग के माध्यम से पाठकों से संवाद होगा। पहल को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए वेबसाइट का भी उपयोग होगा।  

गुवाहाटी में युवती वस्त्र हरण मामले में एक अन्य पत्रकार पर गिर सकती है गाज

 

गुवाहाटी। जीएस रोड कांड में एक अन्य पत्रकार पर गाज गिर सकती है। असम अनुसूचित जाति युवा छात्र परिषद, समता सैनिक दल और अखिल असम कृषक कल्याण परिषद ने गुवाहाटी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को आज घटना की सीडी सौंपी। सीडी की कापी कल मीडिया को दी जाएगी। आज यहां गुवाहाटी प्रेस क्लब में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए परिषद के महासचिव नित्यानंद दास, सलाहकार अमरेन्द्र दास तथा अखिल असम कृषक कल्याण परिषद के महासचिव प्रदीप कलिता ने कहा कि जीएस रोड कांड में सरकार पक्षपात कर रही है। घटना में दूसरा पत्रकार भी शामिल था। लेकिन पुलिस उससे नहीं पकड़ रही है।
 
उन्होंने घटना में शामिल दूसरे पत्रकार का नाम बताने से इनकार करते हुए कहा कि पुलिस को सीडी सौंपने के बाद ही खुलासा किया जाएगा। यह कहने पर कि घटना के 20 दिन बीत जाने के बाद वे क्यों जगे हैं तो कलिता ने कहा कि वह मामले को अपने स्तर से जांचने के साथ यह देखना चाह रहे थे कि पुलिस क्या कर रही है।
 
संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि इसी तरह का पक्षपात शिवसागर में सेना के जवानों द्वारा बदसलूकी की शिकार युवती के साथ हो रही है। श्री दास और कलिता ने कहा कि राज्य सरकार अनुसूचित जाति के लोगों के साथ नौकरी और आरक्षण से लेकर सामाजिक सुरक्षा तक में पक्षपात करती है और शिवसागर में युवती के साथ हुई घटना को गंभीरता से इसलिए नहीं ले रही है कि वह अनुसूचित जाति से है। ऐसा ही लक्ष्मी उरांव के साथ भी हुआ था। 
 
गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट.

आई नेक्‍स्‍ट : कुणाल की देहरादून वापसी, धर्मेंद्र बरेली के नए प्रभारी

 

आई नेक्‍स्‍ट, बरेली से खबर है कि प्रभारी कुणाल वर्मा को एक बार फिर देहरादून की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. कुणाल इसके पहले भी देहरादून के प्रभारी थे. उन्‍हें बरेली में आई नेक्‍स्‍ट को मजबूत करने के लिए लाया गया था. बताया जा रहा है कि बरेली में तो कुणाल के नेतृत्‍व में आई नेक्‍स्‍ट के सर्कुलेशन में सुधार हुआ परन्‍तु देहरादून में स्थिति गड़बड़ हो गई थी. निदेशक तरुण गुप्‍ता के खास माने जाने वाले कुणाल को देहरादून में आई नेक्‍स्‍ट को फिर से पटरी पर लाने के लिए भेजा गया है. 
 
दूसरी तरफ बरेली में धर्मेंद्र सिंह को आई नेक्‍स्‍ट का नया प्रभारी बनाया गया है. धर्मेंद्र अमर उजाला, लखनऊ से इस्‍तीफा देकर आई नेक्‍स्‍ट बरेली पहुंचे हैं. धर्मेंद्र लम्‍बे समय से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. 

यशवंत-जेल : कुमार मधुकर के नेतृत्‍व में निकला रोड मार्च, पत्रकारों में रोष

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह की गिरफ़्तारी के विरोध में जिला झज्जर के बहादुरगढ़ में बैठक हुई. बाद में दर्जनों पत्रकारों ने यशवंत की गिरफ़्तारी के विरोध में रोड मार्च निकालकर कर रोष प्रकट किया. बैठक व रोड मार्च के आयोजनों का नेतृत्व भांडा फोड़ इंडिया के ग्रुप एडिटर कुमार मधुकर किया. इस दौरान पत्रकार अजेश कुमार ने संबोधित करते हुए कहा कि विजय सत्य की होगी. यशवंत के साथ जिसने जो भी किया अच्छा नहीं किया. इसलिए अच्छा हो कि मामले को वापस लिया जाये. दो पत्रकारों को आपस में लड़ना ठीक नहीं. जिस प्रकार कि घटना भड़ास4मीडिया के संपादक यसवंत के साथ हुआ है. वह किसी और के साथ भी हो सकता है.

 
भांडा फोड़ इंडिया के ग्रुप एडिटर कुमार मधुकर ने कहा कि आन्दोलन में तेजी आई है. बैठक, धरना के बाद अब रोड मार्च शुरू हो गया है. जब तक यशवंत को न्याय नहीं मिल जाती लड़ाई जरी रहेगी. पत्रकार अजय ने खेद प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री से मांग की कि यशवंत प्रकरण हस्तक्षेप करें. इस अवसर पर महेंद्र सिंह. रणबीर. सुरेश जांगड़ा, होशियार सिंह के अलावा दर्जनों पत्रकारों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया. 


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टारगेट तो क्राइम का भी होता है भाई!

 

प्रोफशनल और कारपोरेट कल्चर वाला अखबार ज्वाइन किया. एडिटर ने उसे पहले ही दिन एक रिपोर्ट थमायी. रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे अखबार में रोज अपराध की औसत 19 खबरें थी. उसे हर दिन 31 खबर का टारगेट दिया गया. वह चकराया. इतना क्राइम होगा, तभी तो इतनी खबरें बनेगी. वह इस बात की गारंटी देने को तैयार था कि उससे कोई खबर छूटेगी नहीं, लेकिन हर दिन गिन कर 31 खबरें कहां से लायेगा? एडिटर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. झक मार कर उसने टारगेट पूरा करने की कसम खायी और निकल पड़ा खबर खोजने.
 
जिस दिन एक भी खबर कम पड़ती, तो एडिटर उसे खूब लताड़ता. बोलता, डॉक्टरों को देखो, अपने वेतन से बीस गुना ज्यादा बिजनेस मैनेजमेंट को देते हैं. मरीज को कस्टमर और बीमारी को अपरच्यूनिटी मानता है. तुम जितने हजार वेतन लेते हो, हर दिन उतनी खबर तक नहीं ला पाते? डॉक्टरों से सीखो. हर इनसान के कैरेक्टर में क्राइम ढूंढ़ो. तब तक उसमें ताक-झांक करो, जब तक वह तुम्हें क्रिमिनल दिखायी नहीं दे.
 
बेचारा रिपोर्टर परेशान रहता. छोटा-मोटा क्राइम भी हो, तो गुड़ की मक्खी की तरह उससे चिपक जाता. लोग जिन छोटे-मोटे मामलों को रफा-दफा करना चाहते, उनमें भी अखबार में छपने लायक मसाला खोज निकालता. खबर लिखने से ज्यादा, उसकी गिनती को लेकर सतर्क रहता. किसी से मिलता, बस क्राइम के बारे में बात करता. हर इनसान और वस्तु को संदेह की नजर से देखता. खबर निकालने के लिए उसने थानेदार से दोस्ती गांठी, मगर थानेदार ने साफ -साफ बता दिया कि उसका भी हर दिन का टारगेट फिक्स्ड है. सौ रुपया भी कम पड़ा नहीं कि थानेदारी गयी. लिहाजा आधे से ज्यादा क्राइम ले-देकर मैनेज हो जाते. उसने अक्ल लगायी और जा पहुंचा सरकारी अस्पताल, मगर डॉक्टर की हालत भी कुछ वैसी ही थी, जैसी थानेदार की. शहर के अस्पताल में पोस्टिंग की खातिर वे आधे वेतन की कुरबानी दे रहे थे. क्राइम और एक्सीडेंट के आधे से ज्यादा मामले अस्पताल में ही ले-दे कर सेटल कर रहे थे. मामले का रिकॉर्ड ही नहीं बनता, तो खबर कैसे बने.
 
हार कर उसने तय किया कि छोटे-बड़े दादाओं और क्रिमिनलों से दोस्ती करेगा. वहीं से कुछ खबर निकाल लेगा. उनके बीच घुसपैठ के लिए वह अपने भीतर वैसे ही हाव-भाव पैदा करने में जुट गया, मगर रिपोर्टर के चरित्र पर दादाओं को भरोसा नहीं हुआ. उसने एक कोशिश और की. दादाओं के अंदाज में शराब पी ली. पहली-पहली बार पी थी. लिहाजा सड़क किनारे बेसुध लुढ़क गया. दूसरे दिन एडिटर फिर टेबुल पर घूंसा मार रहा था : ‘नालायक, डॉक्टरों से कुछ सीखो..’ उसी दिन दूसरे अखबारों में एक खबर ज्यादा थी, ‘शराब के नशे में धुत्त युवक को लॉरी ने रौंदा.’
 
जेपी सिंह
 
प्रभात खबर, देवघर

मैय्या मोय तो “एनडी” सो ही “पापा” ला के दे

सादर नमन। देश के कानून को। दिल्ली हाईकोर्ट की उस बेंच को, जिसने रोहित शेखर के पापा (नारायण दत्त तिवारी) की पहचान कराने में अहम भूमिका अदा की। इस अदालती निर्णय ने साबित कर दिया, कि देश का अब कोई भी “रोहित शेखर”,बिना “पापा”के नहीं रहेगा। चाहे डीएनए परीक्षण “जबरिया” ही क्यों न कराना पड़े।

 
एनडी तिवारी, रोहित शेखर के पापा क्या साबित हुए? उनका तो चिंतन करने का नजरिया ही बदल गया। इधर दिल्ली हाईकोर्ट में तिवारी जी की डीएनए रिपोर्ट उजागर हुई। दूसरी ओर एनडी तिवारी का बयान जारी हो गया। “यह मेरा निजी मामला है। मैं विवादों से दूर रहना चाहता हूं। इस मामले को ज्‍यादा तूल नहीं देना चाहता था। मुझे अपनी तरह जीने का हक है। यह मुफ्त में प्रचार पाने की कोशिश है। मेरी सहानुभूति रोहित शेखर के साथ है।”जवानी में मुंह काला किये बैठे एनडी तिवारी, बुढ़ापे में और ज्यादा छीछालेदर से बचने के लिए खुद तो मीडिया के सामने नहीं आ सके। सबकुछ अपने ओएसडी एडी भट्ट के माध्‍यम से कहलवा दिया। तिवारी ने आरोप लगाया कि उन्‍हें अपने ही लोगों ने बदनाम करने के लिए एक सोची-समझी साजिश रची।
 
तिवारी जी की यह बात आपके गले उतर जाये आसानी से तो उतार लो। मेरे गले में तो बार-बार फंस रही है, कि उनकी डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। भला तिवारी जी, आप खुद ही बताओ। इसमें आपको बदनाम करने की क्या साजिश हो सकती है? जब शारीरिक और अनैतिक संबंध आपने बनाये। उज्जवला शर्मा के साथ। उनके गर्भ से जिस रोहित शेखर का जन्म हुआ, वो भी तुम्हारा ही अंश निकला। कई साल तक शादी करने का चकमा आपने दिया, रोहित शेखर की मां को। यह कहकर कि उज्जवला की कोख से तुम्हें संतान मिल जायेगी, तो आप उनके साथ विवाह तो बाद में भी कर लेंगे।
 
इतना ही नहीं। उज्जवला शर्मा ने डीएनए रिपोर्ट उजागर होने से एक सप्ताह पहले मुझे दिये एक इंटरव्यू में बताया, कि आप सात साल तक उन्हें खुद में उलझाये रहे थे। यह कहकर कि वे आपके अंश से एक बच्चा “जनकर”पैदा करके) आपको सौंप दें। उज्जवला शर्मा को घेरने के लिए घंटों आप उज्जवला शर्मा के पिता प्रोफेसर और पूर्व केंद्रीय मंत्री शेर सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास 3 कृष्णा मेनन मार्ग पर दिन-रात डटे (पड़े) रहते थे। बकौल डा. उज्जवला शर्मा- उस वक्त आपकी उम्र 53-54 साल थी और उनकी (उज्जवला) उम्र मात्र 33-34 साल थी।
 
अब बतायें आप कांग्रेस के परम आदरणीय तिवारी जी। इसमें सच क्या और झूठ क्या है? अगर सबकुछ सच है, तो फिर रोहित शेखर के जैविक पिता साबित होने पर अब आप “विधवा-विलाप” क्यों कर रहे हैं? यह कहकर कि आपको रोहित का जैविक पिता साबित कराने में भी “राजनीति” हो रही है। या यह भी आपके दुश्मनों की, आपको बदनाम करने की सोची-समझी राजनीति है। क्या आपने भी जिंदगी भर इसी तरह की राजनीति की थी। अगर “हां” तो फिर इसका मतलब आपके साथ अब जो हो रहा है, वो सही है। आप इसी के हकदार हैं। अगर “नहीं”, तो फिर इसका मतलब अब आप अपने “कर्मों का ठीकरा” दूसरे के सिर फोड़कर, अपना सिर सही-सलामत बचाने पर उतारू हैं। जब रोहित की मां से “निजी” संबंध आपके थे, तो बताओ भला इसमें विरोधियों ने कैसे और क्या साजिश रच डाली? अगर कोई विरोधी उस समय आपके और उज्जवला शर्मा के रास्ते का रोड़ा बन गया होता, जब आप यह सब करने पर उतारू थे, जो आप जाने-अनजाने कर बैठे हैं। और जिसे लेकर आज इतना बखेड़ा खड़ा हो गया है, तो शायद आज आपको इस बुढ़ापे में यह दिन न देखना पड़ता। आप समय रहते अगर बचे होते, तो अपने किसी विरोधी की “चाल”के चलते ही बचे होते। मेरे नजरिये से तो जब आप “अपनी”पर उतरे हुए थे, तो किसी विरोधी ने टांग ही नहीं अड़ाई होगी। और आप यह सोचकर वो सबकुछ कर बैठे, जिसे अपने विरोधी के बीच में आने से नहीं कर पाते। उस वक्त भले ही विरोधी आपको कुछ समय के लिए बुरा लगता, लेकिन आपका बुढ़ापा नरक होने से बचा ले जाता।
 
चलिये छोड़िये। एनडी तिवारी ने जो कुछ चोरी-छिपे किया। वो सब अब दुनिया के सामने है। यह उनका “निजी” मामला है। किसी के फटे में, मैं कौन हूं फच्चर लगाने वाला। हां इतना जरुर है, कि जबसे एनडी तिवारी-रोहित शेखर की डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव आयी है, तब से देश के गली-मुहल्लों से भी आवाज आने लगी है- मैय्या मोये तौ एनडी सो पापा चाहिए। जिधर सुनिये उधर ही एनडी तिवारी-रोहित शेखर के चर्चे हैं।
 
कहने का मतलब यह है, कि दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में मील का पत्थर भी साबित हो सकता है। उन तमाम उज्जवला शर्मा सी और न जाने कितनी महिलाओं के लिए, जो शर्म-ओ-हया से मुंह बंद किये बैठी थीं। उन तमाम रोहित शेखर के लिए, जिनकी  मां चाहकर भी बाप का नाम खोलने में कन्नी काट जाती थीं। क्योंकि उन्हें यही पता होगा, कि अदालत किसी का जबरिया “डीएनए” टेस्ट नहीं करा पाती है।
 
इस ऐतिहासिक फैसले (खुलासे) के बाद शायद अब वो दिन दूर नहीं होगा, जब देश  के कोने-कोने से अदालतों में नये-नये मामले 

आने शुरु होंगे। जिनमें रोहित शेखर जैसे तमाम नौजवान अपने “जैविक-पिता” की तलाश कर रहे होंगे। इस उम्मीद में, कि शायद उन्हें भी एनडी तिवारी की ही तरह खोया हुआ पिता नसीब हो जाये। लंबी कानूनी लड़ाई और डीएनए की रिपोर्ट “पॉजिटिव” पाये जाने के बाद।
 
लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इन दिनों न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में एडिटर (क्राइम) के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क patrakar1111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अन्‍ना समर्थकों ने की पत्रकारों से बदतमीजी

 

नई दिल्ली : टीम अन्ना के तमाम अपीलों के बावजूद आज जंतर मंतर पर समर्थकों की बहुत कम मौजूदगी देखने को मिल रही है वहीं अनशन स्थल पर कुछ लोगों ने न्यूज चैनल की एक महिला संवाददाता के साथ धक्का मुक्की की। टीम अन्ना के समर्थकों ज़ी न्यूज के रिपोर्टर कुलदीप सिंह से भी बदसलूकी की। इसके अलावा कई महिला रिपोर्टर के साथ भी बदसलूकी की गई। 
 
अनशन स्थल पर मुख्य मंच के इर्द-गिर्द ही समर्थकों का जमावड़ा दिख रहा है जबकि अगल-बगल के स्थान में काफी कम चहलकदमी है। कुछ लोगों ने मीडियाकर्मियों के साथ धक्कामुक्की की है। पुलिस में शिकायत के बाद आयोजकों ने एलान किया कि ऐसे कृत्यों का आंदोलन में कोई स्थान नहीं है और पुलिस को ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। महिला पत्रकार ने शिकायत की है कि उनके साथ बदसलूकी हुयी है। टीम अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने के लिए बाबा रामदेव आज दोपहर साढे तीन बजे जंतर मंतर पर आएंगे। इसके बाद वह रामलीला मैदान भी जाएंगे जहां नौ अगस्त से वह अपना अनशन शुरू करेंगे। साभार : जी न्‍यूज 

मीडियाकर्मियों ने टाल दिया फैजाबाद में संभावित बवाल

 

उत्तर प्रदेश का फैजाबाद जिला, जो की अयोध्या की वजह से ज्यादा मशहूर है, इस जिले में 23 जुलाई की रात इस शहर का माहौल कुछ इस तरह बिगड़ गया की उसको संभालने में प्रशासन नाकाम हो गया था. मामला था कि फैजाबाद के सहादतगंज ईलाके में दो समुदाय के लोगो में झगडा हो गया जिसको लेकर P.A.C के जवानों ने एक समुदाय के व्यक्ति को झापड़ मार दिया और उसको भगा दिया. तभी ये अफवाह उडी कि पुलिस ने मस्जिद में जाने से रोक लगा दी है और वो भी इस रमजान के महीने में.
 तब क्या होना था, ये बात आग की तरह पूरे शहर में फ़ैल गयी और फिर सभी लोगों ने उस जगह पर कूच कर दिया. पुलिस ने जगह जगह भीड़ को रोकने की कोशिश की पर भीड़ न रुकी और दंगा-बवाल करने की नीयत से घटना स्थल पर बढ़ने लगी. जब पुलिस प्रशासन के हाथ से ये मामला निकलता दिखा तब इलेक्ट्रोनिक मीडिया के कुछ कर्मियों ने अपना कैमरा और माइक छोड़ कर भीड़ को रोकने में लग गए. किसी भी इलेक्ट्रोनिक मीडिया कर्मी ने ये खबर अपने चैनल में नहीं बताई क्योंकि इससे मामला और बढ़ सकता था और फिर मीडिया कर्मी लग गए भीड़ को रोकने में. आज तक न्यूज़ चैनल के बन्बीर सिंह समेत कई पत्रकरों ने भीड़ को समझाने की कोशिश की. मीडिया कर्मियों ने अपना कैमरा बंद करवा दिया और लग गए भीड़ को समझाने में ताकि उनके शहर का माहौल न बिगड़े. अगर ये मामला मीडिया कर्मियों ने जिले स्तर पर न मैनेज किया होता तो पूरे प्रदेश का माहौल बिगड़ सकता था.
 
फैजाबाद से विनय प्रकाश सिंह की रिपोर्ट.

नईदुनिया : जगह और प्रिंट लाइन दोनों बदलेगी?

 

कभी हिंदी अखबारों का आदर्श रहा 'नईदुनिया' आज इस हाल मे है कि यहाँ काम कर रहे पत्रकारों और गेरपत्रकारों का भी अपने संस्थान पर से भरोसा उठ गया है. जब से नईदुनिया कि बागडोर जागरण के हाथ में आई है, इंदौर समेत सभी संस्करणों में असुरक्षा का माहौल है. कब किसकी नौकरी पर विराम लग जाये कहा नहीं जा सकता! सबसे गर्म खबर ये है कि 'नईदुनिया' का करीब पांच दशक पुराना दफ्तर बदले जाने कि तेयारी है. इसे करीब १२-१४ किलोमीटर दूर ले जाने की कोशिश चल रही है. जहां अभी नईदुनिया का दफ्तर है उस ४ बीघा जमीन पर शोपिंग माल बनाया जा सकता है. 
 
इसके साथ ही एक खबर ये भी हवा मे है कि 'नईदुनिया' ६ से १० प्रतिशत इन्क्रीमेंट किया जा रहा है, लेकिन एक ख़राब खबर ये भी है कि दिवाली के बाद फिर छंटनी होने वाली है. 'नईदुनिया' के पुराने मालिक विनय छजलानी का नाम भी प्रिंट लाइन से हटाये जाने कि चर्चा है, क्योंकि जिन कारणों से सौदे के बाद भी उनका नाम जा रहा था, वो औपचारिकता अब नहीं रही. यदि ऐसा होता है तो स्थानीय संपादक जयदीप कर्णिक और कारपोरेट रिलेशन ऑफिसर मनीष शर्मा पर खतरा मंडरा सकता है, क्योंकि विनय छजलानी के सबसे ख़ास माने जाते हैं. जयदीप कर्णिक तो प्रधान संपादक श्रवण गर्ग के आने के बाद से ही हाशिये पर हैं और मनीष शर्मा को भी वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) से पदावनत कर दिया गया है. ऐसे हालत मे जयदीप फिर 'वेब दुनिया' मे जा सकते हैं. वैसे वे अभी भी वे 'वेब दुनिया' को अघोषित रूप से संभाल रहे हैं. 

जेडे मर्डर : जिग्‍ना वोरा को मिली जमानत

 

मुंबई। अंग्रेजी दैनिक 'मिड-डे' के पत्रकार जेडे की हत्या के मामले में गिरफ्तार महिला पत्रकार जिग्ना वोरा को शुक्रवार को कोर्ट ने जमानत दे दी। जिग्ना वोरा के खिलाफ मुम्बई पुलिस ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) की अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया था।
 
पिछले साल 11 जून को मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने घर लौटते वक्त मुम्बई के पवई इलाके में जे डे की गोली मारकर हत्या कर दी थी। वोरा को इस सिलसिले में पिछले साल 25 नवम्बर को गिरफ्तार किया गया था। वह मुम्बई के एक दैनिक समाचार पत्र में उप ब्यूरो प्रमुख के तौर पर कार्यरत थी।
 
आरोप है कि उसने ही जे डे का मोबाइल नंबर और उनके आवास का पता फरार माफिया डॉन छोटा राजन को मुहैया कराया था। मुम्बई पुलिस ने पिछले साल दिसम्बर में भी इस मामले में 12 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया था, लेकिन उसमें वोरा का नाम नहीं था।
 
मकोका की विशेष अदालत में दाखिल 3,055 पृष्ठों के आरोप-पत्र में डे की हत्या में शामिल 10 लोगों की भूमिका का विस्तृत ब्यौरा दिया गया था, जिसमें भगोड़ा डॉन छोटा राजन का नाम भी दर्ज है। राजन तथा इस मामले के एक अन्य आरोपी नयन सिंह अब भी फरार हैं। अपराध शाखा के सूत्रों के अनुसार, पुलिस के पास इसके पक्ष में पर्याप्त तर्क हैं कि डे और वोरा के बीच पेशेवर प्रतिद्वंद्विता के कारण ही उनकी हत्या हुई। साभार : आईबीएन

समाचार प्‍लस से जुड़े अनुराग, रेयाज का इस्‍तीफा, नवल की नई पारी

उन्‍नाव से खबर है अनुराग बाजपेयी ने न्‍यूज एक्‍सप्रेस से इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने कुछ महीने पहले ही इस चैनल को ज्‍वाइन किया था. अनुराग ने अपनी नई पारी समाचार प्‍लस के साथ शुरू की है. अनुराग की गिनती जिले के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. वे इसके पहले जनसंदेश टाइम्‍स तथा राष्‍ट्रीय सहारा को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

प्रभात खबर, रक्‍सौल से सूचना है कि रामगढ़वा के प्रतिनिधि रेयाज आलम 'लड्डू' ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. बताया जा रहा है कि रेयाज विज्ञापन दबाव के चलते इस्‍तीफा दिया है. वे चार वर्षों से प्रभात खबर को रामगढ़वा में अपनी सेवाएं दे रहे थे. इसके पहले वे हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए थे.

रक्‍सौल से ही सूचना है कि नवल प्रीत ने राष्‍ट्रीय सहारा के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. नवल को अखबार के ब्‍यूरोचीफ कैलाश गुप्‍ता ने रामगढ़वा का संवाददाता बनाया है. हालांकि बताया जा रहा है कि नवल पर कुछ आरोप भी हैं.

मीडिया पर नियंत्रण के लिए सशक्‍त स्‍वायत संस्‍थान की जरूरत : प्रांजय

गुवाहाटी। जानेमाने पत्रकार प्रांजय गुहा ठाकुरता ने मीडिया पर एक सीमा तक नियंत्रण की जरूरत बताते हुए इसके लिए एक सशख्त स्वायत संवैधानिक संस्था बनाए जाने की वकालत की है। उन्होंने कहा है कि ब्रिटेन और अमेरीका की तरह यहां भी मीडिया पर नियंत्रण करने वाली संस्था होनी चाहिए जो चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट की तरह होनी चाहिए। गुवाहाटी प्रेस क्लब के मासिक कार्यक्रम "इस माह के अतिथि' में और उससे पहले "मीडिया की नैतिकता' विषय पर आयोजित कार्यशाला में भाग लेते हुए प्रांजय ने कहा कि हर चीज की एक लक्ष्मण रेखा होती है और इसे याद दिलाने के लिए एक सशख्त संस्था की जरूरत है। भारतीय प्रेस परिषद और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मीडिया को लक्ष्मण रेखा पार करने से रोक नहीं पा रहे हैं क्योंकि इनके पास कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने मीडिया की नैतिकता में आती गिरावट पर चिंता जताते हुए कहा कि देश में करीब 800 चैनल हैं और इन चैनलों ने टीआरपी और पैसे कमाने की होड़ में सामाजिक और मानवीय मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। गुवाहाटी के जीएस रोड पर हुई घटना की भर्त्सना करते हुए प्रांजय ने कहा कि इस प्रदेश की पत्रकारिता जगत को बदसलूकी की शिकार महिला से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक महिला का वस्त्र हरण और उसे लंबे समय तक टेलीविजन चैनल पर दिखाना पत्रकारिता का काला अध्याय है।

यह पूछने पर कि क्या घटना के समय एक फोटोग्राफर का काम फोटो लेने के बदले घटना के शिकार लोगों को बचाना होना चाहिए तो लोकसभा टेलीविजन के एंकर ने कहा कि फोटोग्राफर पहले मानव है और उसके बाद फोटोग्राफर। उन्होंने सवालिए लहजे में कहा कि कहा जीएस रोड की तरह कोई घटना में किसी फोटोग्राफर की बहन या बेटी हो तो वह पहले क्या करेगा? कमरा फेंक कर उससे बचाएगा या फोटो लेगा। उन्होंने कहा कि एक फोटोग्राफर या पत्रकार को उनके पेशे की गरिमा और ड्यूटी के साथ सामाजिक दायित्व और मानवीय संवदेनाओं को नहीं भूलना चाहिए।

अखबारों पर बाजार का दबाव और संपादकीय टीम पर बढ़ रहे प्रबंधकीय दबाव से मुकाबला की नसीहत पत्रकारों को देते हुए प्रांजय गुहा ने कहा कि यदि प्रबंधन नैतिकता को ताक पर रहने के लिए दबाव दे तो नैतिकता को त्यागने के बदले इस्तीफा देकर दूसरी नौकरी ढूंढ़ लेनी चाहिए और यदि नौकरी न मिले तो सड़क पर सब्जी बेचनी चाहिए। क्योंकि मीडिया लोकतंत्र के लिए जरूरी है और लोकतंत्र तब बचेगा जब मीडिया रहेगा।

गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट.

पीके तिवारी को महुआ के तोपचियों ने ही जेल भिजवाया

: महुआ समूह-जहाज में बेहिसाब बिल खोदे हैं तोपची-चूहों ने : नोएडा : किसी ऐसे कथित विनय आर्यदेव नामक शख्‍स ने मेरी निष्‍पक्षता और निजी आग्रह-पूर्वाग्रह आदि पर टिप्‍पणी की है। अनर्गल प्रलाप। मेरी आपत्ति है कि ऐसे शख्‍स सीधे मेरे सामने क्‍यों नहीं आते हैं। बहरहाल, ऐसे नाम पर कोई टिप्‍पणी करने के बजाय मैं अब सीधे मुद्दे पर आना चाहता हूं। हां, यह तो सब को पता है कि महुआ समूह के मुखिया पीके तिवारी को उनके बेटे आनंद तिवारी के साथ सीबीआई ने गिरफ्तार किया है।

हां, खबर की आपाधापी में अभिषेक तिवारी का नाम कैसे शामिल हो गया, मैं समझ नहीं पा रहा हूं। जाहिर है कि मैं अपनी गलती मानता हूं। बिना शर्त। लेकिन मैंने कभी महुआ समूह पर किसी संकट को झूठ की चाशनी के साथ चटखारे लेने लेने की कोशिश नहीं की। खबरों के प्रति हमेशा तथ्यों पर ही आधारित पत्रकारिता का हाथ थामा। ऐसे में किसी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह की बात सोच से परे है। जानने वाले लोग मुझे एक बेबाक शख्स मानते हैं जिस पर कभी कोई आक्षेप नहीं पड़ा। मैं नैतिकता के सांचे में पत्रकारिता करता हूं, दलाली और धोखेबाजी की शर्त पर नहीं।

तो कथित आर्यदेव जी, आनंद तिवारी जी के मामले में आप किन लोगों के नाम से आक्षेप लगा रहे हैं कि मैं किसी बड़ी मुसीबत में फंस सकता हूं, मैं साफ कर दूं कि मैं आपकी तरह डरपोक नहीं। जब मैं अपने वरिष्‍ठों को जेल जाने से बचाने का हौसला रखता हूं तो खुद जेल जाने को तैयारी रखने का हौसला भी रखता हूं। मैं चाहता तो रामपुर में ही अपने वरिष्‍ठों को जेल भिजवा सकता था, लेकिन मैंने खुद को अदालत में पेश कर वरिष्‍ठों को बचाया था। लेकिन आप जैसे लोगों ने तो अपने ही शीर्षस्‍थ को सपरिवार जेल भिजवाने का ताना-बाना बुन डाला। महुआ में कौन नहीं जानता कि इन्‍हीं तोपची टाइप लोगों ने महुआ मामले में फंसाने से बचाने के लिए मोटी-मोटी रकमें वसूलीं थीं। और जब उन्‍हीं तोपचियों की करतूत खुलने पर उनके नाड़े खुलने लगे तो पीके तिवारी के पेंच कसने की साजिशें की गयीं। इन्‍हीं तोपचियों का लक्ष्‍य था कि पहले माल खींचो, फिर डूबते जहाज से भाग कर सबसे पहले बिल खोजो और उसके बाद जहाज में इतने सूराख बना दो कि जहाज डूब जाए।

महुआ की हालत आप खूब जानते हैं। मैं भी यहां के कण-कण की पीड़ा को जानता हूं। चूंकि यह मेरे पुराने के संस्‍थान का मामला है, मैं चुप ही रहना पसंद करूंगा। लेकिन आप, यानी कथित देवआर्य जी। आप जैसे तोपचीनुमा चूहों ने महुआ-जहाज में कितने सूराख खोदे हैं, आपसे बेहतर कौन जानता है। कौन नहीं जानता कि देहरादून में पत्रकारिता संस्‍थान खोलकर आपने महुआ के सभी चैनलों का कैसा इस्‍तेमाल किया। महज मूर्खतापूर्ण इंटरव्‍यू पर इंटरव्‍यू किये और उनके बल पर अपने इस संस्‍थान के लिए हर चीज उगा लिया। आपके ही चेले-चूहे ने पटना में आपके ही बल पर एक अलग पत्रकारिता संस्‍थान खोल दिया। यह दोनों ही संस्‍थान छह महीने के भीतर ही खोले गये। इसके लिए आपने और आपके चेला-चपाटी ने महुआ की ओबी जैसे सारे संसाधनों को चूस डाला। जेल जाने से तिवारी को बचाने के नाम पर कितनी रकम उगाही, आप ही बताएं। और जब आपकी हालत पतली हो गयी, तो तिवारी को जबरिया भिजवाने के लिए जुगत भिड़ायीं आपने। जिस थाली में खाया, उसी में तमाम छेद कर डाले।

आप मुझ पर आक्षेप लगा रहे हैं, लेकिन अपने गिरहबान में झांकिये। रामपुर अदालत से जारी गैर जमानती वारंट का नाम सुन कर ही सबकी पैंट गीली हो गयी थी। आप जैसे लोग आंर्तनाद कर रहे थे। यह वारंट संपादक और प्रसारण प्रमुख के नाम था। मुझसे कहा गया कि मैं जाकर इस मामले को सुलटा दूं। मैं तो पूरा मामला भी समझ नहीं पाया था। आखिर मैं ब्‍यूरो चीफ था, संपादक या प्रसारण प्रमुख नहीं। मेरी समझ भी नहीं आया। लेकिन यह बाद की बात है कि कैसे मैं सीधे रामपुर पहुंचा और खुद को अदालत में हाजिर करा गया। जमानतदारों का इंतजाम भी मैंने अपने दम पर ही किया। लेकिन अचानक एक दिन आपने मुझसे इस्‍तीफा मांग लिया। मैंने इस्‍तीफा देते समय जब पूछा कि रामपुर वाले मेरे मामले में क्‍या किया जाएगा और उस मामले की पैरवी में क्‍या संस्‍थान करेगा, आपने बात तक करने से इनकार कर दिया था। केवल यह कहा कि आप अपना मामला खुद देख लें, संस्‍थान का उससे कोई लेनादेना नहीं। हैरत की बात रही कि इसके बाद पीके तिवारी जी ने मेरे किसी भी फोन या मैसेज का जवाब भी नहीं दिया।

तो, किस्‍साकोताह, आप वाकई बेशर्म हैं। आप जैसे स्‍त्रैण-व्‍यवहारी पुरूष को क्‍या कोसा जाए, जो महुआ में कोई काम के बजाय केवल सभी लोगों को अपनी मूर्खतापूर्ण कविताओं को सुनाकर खुद अपनी पीठ ठोंकता घूमता रहता है। आपने लिखा है कि महुआ न्यूजलाइन की खबर के बाद उत्‍तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा सफाई देने के लिए भी इसी चैनल को चुनते हैं और बाबा रामदेव खुद से जुड़े मुद्दों पर फोन करके आधे घंटे तक अपनी बात रखते हैं। जरा कथित आर्यदेव जी, आखिर उत्‍तराखंड के प्रति इतना प्रेम करते हैं। क्‍यों विजय बहुगुणा को सफाई देने के लिए इस्‍तेमाल करते हैं। क्‍यों रामदेव का आधा-आधा घंटों तक बतियाते हैं। केवल इसीलिए ना कि आपको अपने नवजात पत्रकारिता संस्‍थान के प्रति स्‍नेह है, महुआ से हर्गिज नहीं। क्‍योंकि महुआ के बाद आपका एकमात्र भविष्‍य केवल इसी में है और आपको ज्‍यादा से ज्‍यादा रकम अपने और अपने चिंटू-पिंटुओं के खाते में खींचना है।

आपका आरोप है कि महुआ का मौजूदा संकट कुछ राजनेता, कुछ बड़े पत्रकारों और कुछ व्यवसायियों की साजिश की वजह से खड़ा हुआ। जिन्होंने पहले तिवारी से दोस्ती गांठकर ढेरों लाभ हासिल किए, खुद को मजबूत किया और फिर पीठ में खंजर भोंक दिया। इन्होंने महुआ समूह पर संगीन आरोप लगाकर इतनी जगह, इतनी शिकायतें की कि समूह पर दबाव बढ़ गया।— पहली बार आपने सच बोला है कथित आर्यदेव जी। सच बोला क्‍या है, खुद के सारे घटिया चरित्रों को एकसाथ समेटा है आपने। आप ही राजनीतिज्ञ हैं, व्‍यवसाई हैं, और बड़े पत्रकार भी आप ही खुद हैं, जिसने पहले तिवारी जी से दोस्‍ती गांठी और ढेरों लाभ हासिल किये, केवल खुद को मजबूत किया और जब पीके तिवारी के सामने आपकी कलई खुलते दिखी और आपका पत्‍ता जब महुआ से कटने लगा तो सरकारी महकमों में महुआ समूह की इतनी शिकायतें कर डालीं कि समूह पर दबाव बढ़ गया। और नतीजा सामने है। महुआ के प्रति आपका परिश्रम श्रमसाध्‍य है, यकीनन आप अपने लक्ष्‍य में सफल रहे।

जैसा कि आपने खुद कुबूला है कि समूह की हैसियत दो हजार करोड़ से ज्‍यादा की है। और शायद इसीलिए आप जैसे लोग येन-केन-प्रकारेण इस बड़े समंदर का ज्‍यादा से ज्‍यादा पानी अपने खाते में उलीच रहने की साजिशें रच रहे हैं। आपके बारे में मैं यह सब सच ही कह रहा हूं ना। क्‍यों बोलो ना तोपची-चूहे ?

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

असम को जलाने में मीडिया की भूमिका!

गुजरात दंगों को आज तक जिस मीडीया ने जिंदा रखा हैं, उसे जलते असम की तस्वीरें क्यों नजर नहीं आ रही हैं? पिछले एक हफ्ते से असम के तीन जिलों मे मार-काट मची हैं. हालात कश्मीर से भी बदतर हो चले हैं. कई लोगों को की जानें जा चुकी हैं, लेकिन मीडिया इसे सिर्फ अपनी बुलेटिन की खबरों मे डालकर या दूसरे पेज पर लिखकर खानापूर्ति कर रहा है. हिन्दुस्तान में अब तक हुए हर दंगे के पीछे से राजनीतिक बू आती रही है। हो सकता है असम में हो रहे तांडव के पीछे कोई राजनैतिक चाल ना हो, लेकिन किसी प्रदेश मे लगातार एक हफ्ते तक दंगे होते रहे और स्थिति को काबू ना कर पाने के पीछे तो सरकार की विफलता साफ झलकती है। तो क्या दंगाइयों को सह दिया जा रहा है?

यह सवाल उठना इस लिए भी लाजिमी है, क्योंकि दंगा करने वाले लोग एक खास समुदाय से आते हैं, जो 1971 के बाद बंग्लादेश से आकर भारत में बसे हैं और यह पलायन जारी है। जाहिर है सरकार और प्रशासन के सह के बगैर किसी भी मुल्क के किसी भी कोने में आप जाकर बिना उसके इजाजत के नहीं रह सकते। दंगों में बात अगर मीडिया की करी जाए तो सीना चौड़ा कर अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानती है. बड़े गर्व से शाहिद सिद्दीकी के एक इंटरव्‍यू को लेकर फिर से मोदी को दोषी साबित करने की कोशिश की है, लेकिन इतनी ही प्रमुखता से अगर जलते असम की पहले दिन की तस्वीर सामने लाई जाती तो शायद आज हालात बेहतर होते।

कांग्रेस ही नहीं मीडिया के नजरों में भी सिर्फ गुजरात में मची तबाही ही दंगा है बाकी सब तो छिट-पुट हिंसा बनकर रह गया है। तब से लेकर अब तक ना तो किसी चैनल ने और ना ही अखबार ने असम को इतनी प्रमुखता दी है, जितनी 12 साल बाद गोधरा को दी जा रही हैं, आखिर क्यों? असम में जारी हिंसा के पीछे क्या वजह है? इसे लेकर अलग-अलग दावे और राय सामने आ रही है। हिंसा की चार वजहें सामने आ रही हैं, जिनमें कुछ तात्कालिक हैं तो कुछ वजहें काफी पहले से समस्या बनी हुई हैं। बांग्लादेश से आ रहे अवैध प्रवासी असम में जारी हिंसा की मूल वजह बताए जा रहे हैं। असम के मूल निवासियों का कहना है कि बांग्लादेश से लगातार भारत में अवैध रूप से घुस रहे लोगों की वजह से वे असुरक्षित महसूस करते हैं।

असम के मूल निवासियों का कहना है कि प्रवासियों के चलते इस क्षेत्र का 'संतुलन' बिगड़ गया है। गौरतलब है कि भारत-बांग्लादेश की पूरी सीमा पर तारबंदी न होने और नदियों के चलते सीमा के उस पार से भारत में प्रवेश करना बहुत मुश्किल नहीं है। ऐसे में बड़ी तादाद में बांग्लादेशी लोग बेहतर ज़िंदगी की तलाश में भारत में प्रवेश करते रहे हैं। जानकारों का मानना है कि 1971 के बाद से बांग्लादेशियों का भारत आकर बसना जारी है। असम के नेताओं पर आरोप है कि वे इन अवैध प्रवासियों को पहचान पत्र दे देते हैं, ताकि वे उनके हक में वोट करें। मैंने लगातार अपने फेसबुक पेज पर असम हिंसा को लेकर रोज अलग-अलग तस्वीरें और खबरें पढ़ी, जो मीडिया से इतर कुछ और हकीकत बयान कर रही हैं।

आपको बता दें कि दंगाई किसी भी समुदाय का हो वह मनुष्य नहीं हो सकता चाहे वो गुजरात दंगे का दोषी हो या कश्‍मीर से लेकर दिल्ली तक का, जो भी दोषी है उसको सजा मिलनी चाहिए, लेकिन देश के राजनेताओं के साथ-साथ मीडिया ने जो दलाली को चोला ओढ़ रखा है ये इस देश के लिए किसी भी एंगल से सही नहीं है. नरेन्द्र मोदी को आज तक गुजरात दंगों का जबरदस्ती दोषी ठहराने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर हर बार मीडिया उनको सजा देने पर तुला रहती है. इस देश में दंगों का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन गुजरात को लेकर जिस तरह से इस देश के मुसलमानों को बरगलाने के लिए हर बार बिकाऊ मीडिया कांग्रेस के इशारे पर चीख-चीख कर मोदी को दोषी ठहराती आई है. इसे देखकर तो यही लगता हैं कि दंगा सिर्फ गुजरात में हुआ है. मैं ना तो नरेंद्र मोदी का पक्षधर हूं और ना ही किसी समुदाय का अगर मोदी ने गलत किया तो उनको भी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन सिर्फ गोधरा में मारे गए मुसलमानों को लेकर बाकी समुदाय की अनदेखी करना मीडिया के स्वंतंत्रता पर प्रशनचिन्ह जरुर लगा देता है. 

क्या गोधरा में सिर्फ मुसलमानों की जानें गई थी, हिन्दुओं की नहीं? पहले कश्मीर.. फिर केरल इसके बाद असम में हिंदू अल्पसंख्यक हो गया है और अब खुलकर हिन्दुओं के घर जलाए जा रहे हैं. कोकराझार में कई लोगों को बंगलादेशियों ने जिन्दा जलाकर मार डाला और 1500  घर जला दिये गए. करीब 2 लाख हिंदू अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में रह रहे है. अब कहाँ है मानवाधिकार आयोग? गुजरात दंगों पर अपनी छाती कूटने वाले तथाकथित सेकुलर लोगों के लिए क्या असम में हो रहा मार-काट दंगा नहीं हैं? कश्‍मीर के विस्थापितों के लिए खुलकर इसलिए नहीं बोल पाते क्योंकि उससे धार्मिक सौहार्द खराब हो सकता है, लेकिन गुजरात के बारे मे सीना ठोंक कर बोलते हैं तब कहां चली जाती है धर्मनिरपेक्षता?

असम के अपने के कुछ पत्रकार मित्रों की माने तो पूरे असम में कांग्रेस ने असम गण परिषद नामक पार्टी का वर्चस्व खत्म करने के लिए एक प्लान के तहत पूरे आसाम मे बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाया और उन्हें भारत की नागरिकता दी. पिछले दो दशकों के बाद से आज ये बंगलादेशी असम की बड़ी राजनीतिक ताकत बन गए हैं और असम के कुल वोट का ३०% हिस्सा है. चूँकि ये एकजुट होकर कांग्रेस को वोट देते हैं इसलिए पिछले पन्द्रह सालों से कांग्रेस असम में जीतती आ रही है. खबरें ऐसी भी आ रही हैं कि पाकिस्तान के तरफ से बंग्लादेश के रास्ते कुछ घुसपैठियों को भेजकर यह दंगा प्लान करके किया गया है. चूंकि पाकिस्तान को मालूम हैं कि मुस्लिम समुदाय के नाम पर हिन्दुस्तान के सरकार को वो घुटने पर ला सकती है, इसलिए सरकार उनके उपर कार्रवाई नहीं कर सकती. हमने अपने फेसबुक पेज पर एक तस्वीर देखी, जिसमें असम के दंगाइयों के हाथ में पाकिस्तान का झंडा है. यह तस्वीर कितनी सच्ची है ये तो नहीं कह सकता, लेकिन अगर वाकई उस तस्वीर में दम हैं तो फिर हिन्दुस्तान को समझ जाना चाहिए कि इस देश कि सरकार देश के प्रति कितनी सजग है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अभी तक लगभग 50 लोग मारे गए हैं औऱ 2 लाख लोग बेघर हुए हैं. राजनेताओं का ना बोलना समझ में आता है लेकिन लोग अब मीडिया के चुप्पी पर भी सवाल खड़े करने लगे हैं. क्यों इस देश के लोगों के बजाय दूसरे मुल्क से आए लोगों को अहमियत दी जा रही है? अगर कांग्रेस की तरह सभी पार्टियों ने दूसरे मुल्कों से अपने वोट के लिए अवैध तरीके से बसाने लगे फिर कहां जाएंगे हिन्दुस्तानी. दंगा पीडि़त असम के सदियों पुराने निवासी बोडो समुदाय के एक हिंदू धर्म को मानने वाली जनजाति है, उनकी लड़कियों के साथ आये दिन वहां के बंगलादेशी लड़के छेड़छाड़ करते है, और उनके अपहरण भी करते हैं. इस घटना की शुरुआत हुई कोकराझार से जहां कुछ बंगलादेशियों ने एक बोडो लड़की को स्कूल के बाहर से उठाने की कोशिश की, फिर उस लड़की ने शोर मचा दिया तो लड़के भाग गए, लेकिन बाद में उनलोगों ने बोडो हिन्दुओं के घरों को आग के हवाले करना शुरू कर दिया. ये हाल है असम का.

डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को जबरन हटाया गया. कैम्प में रहने पर मज़बूर बेघरों की दुर्दशा पर रोने के लिये ना केन्द्र सरकार और ना असम सरकार के पास फुर्सत है. विदेशी फण्ड के लिये रोने वाली पेशेवर रूदालियों का भी अता पता नही है. बिके हुये चैनलों को तो खैर ये नज़र आयेगा ही नही. पता नहीं क्यों बार-बार गुज़रात पर दहाड़ मार मार कर रोने वाले कांग्रेसी और कथित धर्मनिरपेक्ष नेता कहां छिप गये हैं? क्या कश्मीर की तरह इसे भी भारत का हिस्सा नहीं मान रहे हैं. वे देश के ठेकेदार? क्या सिर्फ गुजरात के ही लिये रोयेंगे वे लोग? क्या ये साम्प्रदायिक हिंसा नहीं है? खानापूर्ति के लिए असम विधानसभा की 20 सदस्यीय सर्वदलीय टीम ने उपाध्यक्ष भीमानंद तांती के नेतृत्व में निचले असम के हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और लोगों तथा विभिन्न स्थानीय नेताओं से मुलाकात की.

उधर, माकपा पोलित ब्यूरो ने दिल्ली में जारी एक बयान में आरोप लगाया कि असम सरकार हिंसा को रोकने के लिए समय पर कार्रवाई करने में पूरी तरह विफल रही. पार्टी ने कहा कि विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास और तनाव के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज किया गया. केंद्र सरकार को इस बात का जवाब देना चाहिए कि उसने हिंसा को लेकर कार्रवाई करने में इतना विलम्ब क्यों किया? जवाब सिर्फ सरकार ही नहीं मीडिया को देना चाहिए कि उसके पास प्रणव चालीसा का गुणगान और उनके बाथरुम तक की खबरें देने के लिए समय है, लेकिन असम को लेकर क्यों नहीं? जल रहा है असम .. लोग मारे जा रहे हैं .. दो लाख लोग विस्थापित है .. और एनडीटीवी पर शबनम हाशमी १२ साल के बाद भी गुजरात पर छाती कूट रही है,

सब सत्ता का खेल हो रहा??
और पिस रहे हैं आम आदमी,
इस आग भरे दंगों में जल रहे!!!!
कोई न कुछ कर रहा न बोलने की जहमत उठा रहा,
मीडिया नए महामहिम के गुणगान में मस्त हैं,
केंद्र अपने नए राष्‍ट्रपति के स्वागत में व्यस्त है,
और राज्य सरकार अपनी रोटी सेंकने में!!!

लेखक एसके चौधरी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

जेडे मर्डर की सीबीआई जांच कराई जाए : तावड़े

मुंबई : महाराष्ट्र विधान परिषद में विपक्ष के नेता विनोद तावड़े ने मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार जेडे की हत्या की जांच सीबीआई से कराने की मांग की. तावड़े ने पत्रकारों से कहा कि अगर सरकार संवेदनशील है और सच्चाई सामने लाना चाहती है तो उसे सीबीआई जांच की मदद लेनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हत्या के कारण और शामिल लोगों को सामने लाने का काम केंद्रीय जांच एजेंसी ही कर सकती है.

तावड़े ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसे आईपीएल मैचों में लग रहे सट्टे और फिक्सिंग की जानकारी थी. इसके बावजूद कार्रवाई नहीं की गई. सरकार ने अपनी आंखें बंद रखी. जेडे की हत्‍या के बाद दबाव के चलते जिग्‍ना बोरा को इस मामले में आरोपी बनाया गया. सरकार असली मामले को छुपाना चाहती है. सीबीआई ही सारी सच्‍चाई सामने ला सकती है.

गिरती साख : जागरण के मुनाफे में 14 करोड़ का झटका

नई दिल्ली। आर्थिक सुस्ती और डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में तेज गिरावट ने जागरण प्रकाशन लिमिटेड [जेपीएल] के मुनाफे की रफ्तार को भी धीमा कर दिया है। देश के सबसे बड़े अखबार दैनिक जागरण का प्रकाशन करने वाली इस कंपनी को रुपये की कीमत कम होने से विदेशी मुद्रा नुकसान उठाना पड़ा। इससे चालू वित्त वर्ष 2012-13 की पहली तिमाही में कंपनी के मुनाफा भी कम हो गया है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर की मजबूती और घरेलू आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले बीते छह महीने में तीस प्रतिशत से भी अधिक गिरी है। इसके चलते पहली तिमाही में जेपीएल को 13.78 करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा नुकसान हुआ है। इसके बावजूद कंपनी पहली तिमाही में 55.73 करोड़ रुपये का मुनाफा अर्जित करने में सफल रही है। कंपनी चाहती तो इस नुकसान की भरपाई के लिए अन्य विकल्पों का इस्तेमाल भी कर सकती थी। लेकिन कंपनी ने परंपरागत अकाउंटिंग नीति पर चलने का फैसला लिया।

कंपनी की गुरुवार को हुई बोर्ड बैठक में पहली तिमाही के नतीजों को मंजूरी दे दी। नतीजों पर टिप्पणी करते हुए जेपीएल के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक महेंद्र मोहन गुप्त ने कहा कि प्रतिकूल बाजार परिस्थितियों में जागरण टीम में शानदार काम किया है। यह और भी अच्छा होता यदि विनिमय दरों में तेज उतार-चढ़ाव नहीं होते, जिनकी वजह से कंपनी को विदेशी मुद्रा में नुकसान उठाना पड़ा।

इस अवधि में कंपनी का ऑपरेटिंग रेवेन्यू 317.52 करोड़ रुपये रहा। पिछली तीन तिमाही में कंपनी को विज्ञापन से मिलने वाले रेवेन्यू में भी अन्य प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले तेज वृद्धि हुई है। जागरण समूह 12 समाचार पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन करता है जिनके सौ संस्करण और 250 उप-संस्करण हैं। ये सभी संस्करण देश भर में 15 राज्यों के 35 स्थानों से पांच अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित होते हैं। समूह द्वारा प्रकाशित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की कुल पाठक संख्या 6.9 करोड़ है। साभार : जागरण

आज निकलेगा यूपी मिड डे का डमी

आगरा से जल्द ही बड़े स्तर पर प्रकाशित होने जा रहे लक्ष्मी मीडिया पब्लिकेशन के अखबार यूपी मिड डे की डमी शुक्रवार को निकलेगी, जिसको लेकर आगरा के पत्रकारिता जगत में हलचल है. वर्तमान में इसमें श्याम अनजान, जगत शर्मा, रमेश साहनी जैसे बड़े पत्रकार इस अखबार में अपना पद भार ग्रहण कर चुके हैं. बताया गया है कि यह आगरा से प्रकाशित डीएलए अखबार को जोरदार टक्कर देगा, क्योंकि इसकी लाखों की संख्या में प्रतियों के उतरने की संभावना जताई जा रही है. जल्द ही पूरे उत्तर प्रदेश से प्रकाशित होने वाले इस अखबार की कीमत महज एक रुपया रखी जा रही हैं ताकि उत्तर प्रदेश की मार्केट को आसानी से कवर करा जा सके.

यूपी में अराजकता : मायावती की मूर्ति तोड़ी गई, आक्रोश में बसपाई

लखनऊ में मायावती के स्वप्नों के अंबेडकर पार्क में तमाशा खड़ा हो गया है। मनबढ़ शैतानों ने मायावती की सफेद संगमरमरी मूरत का सिर और हाथ उखाड़ डाला। बाद में मौके पर पहुंचे प्रशासन-पुलिसवालों ने आननफानन सिरविहीन मूर्ति को प्रशासन ने ठीक उसी रंग का कफन मुहैया करा दिया, जो उनका मनपसंद यानी नीला है। अंबेडकर पार्क से जुड़ी सड़कों को बंद कर दिया गया है और मौके पर कड़ी सुरक्षा बंदोबस्त हैं। फिलहाल बसपाइयों में जबर्दस्त रोष है और कई शहरों में प्रदर्शन की खबर आ रही है। प्रशासन का दावा है कि किसी हालात से निपटने के लिए प्रशासन और पुलिस ने कमर कस ली है। लेकिन इस घटना ने प्रशासन और पुलिस की तो किरकिरी करा ही दी है। लेकिन कठघरे में पुलिस, प्रशासन के साथ ही पत्रकार बिरादरी भी आ गयी है।

बसपा सरकार को ढहाने के बाद नयी बनी समाजवादी पार्टी सरकार के ठीक बाद मेरठ के कथित प्रदेश नवनिर्माण सेना नामक एक संगठन के मुखिया अमित जानी ने 15 मार्च को ही ऐलान कर दिया था कि अगर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार प्रदेश के भर में स्थापित मायावती की मूर्तियों को हटाने का फैसला नहीं करती है, तो इन मूर्तियों को उनका संगठन खुद ढहा देगा। आज गुरुवार को अमित जानी ने अपने साथियों के साथ प्रेस क्लब में बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके ऐलान किया कि प्रदेश सरकार इन मूर्तियों को 12 घंटों के भीतर ध्वस्त कर दे। अमित ने धमकी दी थी कि यह मियाद खत्म होने पर उनका संगठन खुद ही इन मूर्तियों को हटा देगा। बताते हैं कि इस प्रेस क्रांफेंस में कथित पत्रकारों ने इस बयान का खुलेआम मजाक उठाया था कि ऐसी धमकियां केवल मीडिया में अपना नाम छपाने के लिए ही होती हैं। खबर बताते है कि इस पर अमित जानी ने तैश में कहा था कि हम तो अभी भी यह काम कर सकते हैं।

पत्रकारों ने जब उसे फिर घेरा तो अमित ने अपने साथियों को तैयार करते हुए कहा कि रूकिये, हम यह काम फौरन इसी वक्त खत्म किये देते हैं। लेकिन हैरत की बात है कि न तो इन पत्रकारों को इस धमकी कोई नोटिस ली, और ना ही स्थानीय और प्रदेश स्तर पर बने सरकारी इंटेलीजेंस विभाग ने। लेकिन बताते हैं कि इसके बाद तीन मोटरसाइकिल पर बैठ कर अमित जानी और उसके साथी सीधे परिवर्तन स्थल के सटे आंबेडकर पार्क पर पहुंचे और सीधे मायावती की मूर्ति पर हथौड़ों मारकर मूर्ति का अंग-भंग कर दिया। घटना के समय हमेशा की तरह विशेष स्मारक सुरक्षाकर्मी बड़ी संख्या में मौजूद थे। लेकिन इन युवकों ने पांच मिनट के भीतर ही मूर्ति को तोड़ दिया। इतना ही नहीं, घटनास्थल पर यूपी नवनिर्माण सेना नाम की एक अनजान संगठन द्वारा छपाये गये पर्चे भी मिले हैं, जिसमें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मायावती की सभी मूर्तियों को हटाने की मांग की गयी है। मूर्ति को तोड़ने के बाद उपद्रवियों ने लाल टोपियां पहनी थीं।

जैसा कि होना ही था, बसपा आक्रोश में है। बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने मायावती की मूर्ति पर हमले की निंदा करते हुए चेतावनी दी है कि यह करतूत समाजवादी पार्टी की साजिश के चलते हुई है और अगर आज ही मूर्ति को ठीक नहीं किया गया, तो इसका गंभीर परिणाम होगा। कई शहरों में विवाद खड़ा हो गया है और देर शाम विधानसभा के सामने बसपा के बड़े नेताओं ने भारी तादात में बसपाइयों के साथ प्रदर्शन किया है। हालांकि समाजवादी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस ने इस घटना की निंदा की है। प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक बयान में सुश्री मायावती की मूर्ति तोड़ने की निन्दा करते हुए कहा है कि ऐसी करतूतों से प्रदेश में सौहार्दपूर्ण माहौल बिगड़ेगा। उन्हों ने इस कांड को सुनियोजित प्रयास बताया है। अखिलेश यादव ने आदेश दिया है कि इस कांड में शामिल अभियुक्तों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई के साथ ही साथ टूटी मूर्तियों को तुरन्त ठीक कराया जाए।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

यशवंत-जेल : सात तालों के भीतर चैन की नींद

कल शाम यानी 21 तारीख की शाम 5-6 बजे के आसपास जब बैरक की फील्‍ड में टहलकर थकने के बाद चबूतरे पर आराम फरमाने बैठा तो एक बुजुर्ग और अपरिचित बंदी साथी पूछ बैठे- क्‍या हुआ आपके मामले में? मैंने जवाब दिया – कल 20 को बेल डेट थी, अभी कोई सूचना नहीं मिली है. उन्‍होंने तपाक से कहा – आपकी बेल डेट सुनवाई नहीं हो सकी, वकीलों के हड़ताल से, अब 3 अगस्‍त को नई बेल डेट है.

मैं चमत्‍कृत इन्‍हें कैसे पता? इनसे न तो मेरी कोई बातचीत है न कोई परिचय, फिर इन्‍हें मेरे बारे में इतना कैसे पता? वे मेरा विस्‍मय देखकर मुस्‍कराते रहे. मुझे पूछना पड़ा – आपको यह सब कैसे पता? उन्‍होंने रहस्‍य उजागर किया कि आज के नेशनल दुनिया अखबार में छपा है. मैंने मन ही मन आलोक मेहता को धन्‍यवाद किया कि कम से कम मेरी खबर सबसे पहले मुझ तक पहुंचा दे रहे हैं. बैरक में लौटकर उन बुजुर्ग सज्‍जन से अखबार लेकर पढ़ा तो खुशी में चिल्‍ला पड़ा – अबे साला, रंगदारी की रकम बीस हजार से बढ़कर एक लाख तक पहुंच गई. संभव है अगली तारीख पर खबर में एक करोड़ हो जाए. फिर याद आया कि आलोक मेहता जी के इस नवजात अखबार में शुरुआत में खबर आई थी कि मेरे दो आदमी बाइक से रंगदारी मांगने विनोद कापड़ी के पास गए थे.

मतलब ये कि मुझे महान बनाने में आलोक मेहता जी पूरा योगदान दे रहे हैं. वैसे भी जेल में रहने वाले उन्‍हें ज्‍यादा सम्‍मान देते हैं, जिन पर ज्‍यादा धाराएं हों और ज्‍यादा बड़ा मामला हो. इस लिहाज से नेशनल दुनिया मेरा लगातार प्रमोशन कर रहा है, बिल्‍कुल फ्री में. इसलिए उनका आभार. जेल में मुझे इतनी अच्‍छी नींद क्‍यों आती है, इसको लेकर आजकल चिंतन-चर्चा करता रहता हूं. एक साथी ने कहा – सात तालों में सुरक्षित शख्‍स चैन की नींद नहीं सोएगा तो कहां सोएगा? मैंने उंगलियों पर गिना वाकई कुल सात ताले लगते हैं और सच यह भी है कि यहां सुरक्षा बोध बाहर से ज्‍यादा है. बाहर की दुनिया में जीवन की गारंटी कम है. सड़क पर चलते आशंका, काम करते आशंका, घर पर रहते आशंका, आशंकाओं से घिरी रही बाहरी जिंदगी को यहां वाकई पूरी तसल्‍ली है.

आज योग क्‍लास ज्‍वाइन किया है. सुबह-शाम जमकर दण्‍ड-बैठक-कसरत से कालेस्‍ट्राल लेबल काफी घटा लिया है. दारू छोड़ने के लिए नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती होने की योजना पर अमल की जरूरत नहीं पड़ेगी. यहां मदिरा समेत सारे नशों से खुद-ब-खुद मुक्ति मिल गई है. इस कारण कांफिडेंस लेबल बढ़ रहा है. हृदय और लीवर मुश्किलों से निजात दिलाने के कारण मुझे जरूर थैंक्‍यू बोल रहे होंगे, साथ में विनोद कापड़ी-साक्षी जोशी को भी, अगर वे न होते तो ये न होता. वैसे भी कापड़ी जी से अपन का पुराना याराना है. उनके कारण भड़ास4मीडिया का जन्‍म हुआ, और उन्‍हीं के कारण अब तन-मन शुद्धिकरण होने के साथ एक बिल्‍कुल नई और अनोखी दुनिया से रुबरु हूं.

यहां की पूरी जिंदगी के बारे में ''जानेमन जेल'' शीर्षक से एक किताब लिखने का प्‍लान किया है. जेल पर यह ऐसी किताब होगी जिसे पढ़ने के बाद हर एक का एक बार जेल हो आने का मन होगा, लेकिन सब मेरे जैसे किस्‍मत वाले नहीं. किताब जेल में बंद कई साथियों की जिंदगी पर होगी. और दावा है, हर कोई इसे पढ़ेगा, फिर सोचेगा. अभी तक मैंने कोई किताब नहीं लिखा. जो लिखा वह सब भड़ास4मीडिया पर छपा. लेकिन जेल आने के 18वें दिन मुझे लगा कि अब सही वक्‍त व मैटेरियल है किताब लिखने के लिए. बस केवल प्रकाशक की कमी है. अगर कोई प्रकाशक खोज दे, छापने के लिए तैयार कर दे तो मजा आ जाए. कोई नहीं मिलेगा तो अपने साथी हिंदयुग्‍म वाले शैलश भारतवासी तो हैं ही.

''जानेमन जेल'' लिखने को लेकर काफी उत्‍साहित हूं. हर रोज कुछ नया मिल-जुड़ रहा है. समाज जिन्‍हें दागी मानता है, वे लोग यहां कितने सरल व सच्‍चे इंसान लगते हैं, उनका अतीत कितना खौफनाक, उद्देलित करने वाला होता है, यह जानने-बूझने का क्रम जारी है. अपराध, अपराधी, समाज, सिस्‍टम, संवेदना… हर एक शब्‍द पर एक नहीं कई कई उपन्‍यास के थीम हैं. मेरे लिये यहां अकस्‍मात आना पूर्व नियोजित जैसा लगता है. एडवेंचर की तलाश में पीने-भटकने वाला मैं आजकल तसल्‍ली से इस अनोखी दुनिया का आब्‍जर्वेशन कर रहा हूं. कहने वाले कहते हैं कि डासना जेल यूपी की सर्वाधिक अनुशासित व सिस्‍टमेटिक जेलों में से है. यहां रहकर मुझे भी ऐसा ही अनुभव हो रहा है.

योग क्‍लास ज्‍वाइन करने के बाद अब यहां की भजन मंडली ज्‍वाइन करने की इच्‍छा है. सोर वाद्ययंत्रों से युक्‍त भजन मंडली को सुन-देखकर मुझे अपने काल्पिनिक भड़ास बैंड का मूर्त रूप सामने नजर आता है. वैसे भी मेरी गायकी का बैरक के मेरे कई साथी प्रशंसक हो गए हैं और गाहे बगाहे फरमाइश करते रहते हैं कि जरा वो 'सजधज के मौत की शहजादी आएगी' वाला गाना सुना दो. इस देश-समाज-सिस्‍टम की हिप्‍पोक्रेसी-करप्‍शन-शोषण को बहुत गहरे देख बूझकर और ब्रह्माण्‍ड-धरती के जीवन चक्र को वृहत्‍तर अर्थों में भांपकर कोई शख्‍स बहुत ज्‍यादा उम्‍मीद और उत्‍साह के साथ संवेदनशील जीवन नहीं जी सकता.

वह सुख-दुख दोनों से एक वक्‍त के बाद ऊपर उठने लगता है. सुख है तो सुख नहीं है, दुख है तो दुख नहीं है. नाम हुआ तो क्‍या हुआ, बदनाम हुआ तो क्‍या हुआ. इन विलोम शब्‍दों के परे असली आनंद, जीवन, एमझ आदि है. उस अवस्‍था का एहसास सही रूटीन किस्‍म की लाइफ में संभव नहीं है. घर-परिवार, मकान, नौकरी.. ये सब कुछ बांधते, रोकते, मूढ़ बनाते हैं. भटकना, भोगना, अनुभवों के विविध किस्‍म के भंडार में गोते लगाने से बंद पड़े ज्ञान चक्षु खुलने लगते हैं. तभी बुद्ध पैदा होते हैं, तभी कबीर का निर्माण होता है. तभी दूरदृष्टि का विकास होता है. पता नहीं मुझे क्‍यों लगता है कि जेल में आकर ज्‍यादा आजाद हूं. घर-परिवार, आफिस-कम्‍प्‍यूटर के साथ रहते हुए एक बंदी सा जीवन जी रहा था. इन्‍हें छोड़ना आसान नहीं होता. क्‍योंकि इससे अलग हम जिंदगी की कल्‍पना ही नहीं कर पाते. हमारा माइंडसेट समाज-सिस्‍टम ने ऐसा बना रखा है. बड़ी मुश्किल हुई होगी राजकुमार गौतम को राजमहल-राजपाट त्‍यागने में, तय करने में बहुत दिन लगे होगे, पर तज दिया तो नई शुरुआत हो गई.

मनुष्‍यों की भीड़ में, विचारों की रेलमपेल में बड़ा मुश्किल है स्‍वतंत्र तरीके से सोच पाना, कर पाना, जी पाना और कह पाना. जिन दिनों गार्ड पार्टिकल यानी हिंग्‍स बोसोन कण के पता चलने का ऐलान हो रहा था, उन दिनों मैं जेल में बंद कथित बुरे लोगों के भीतर नया गुण-रूप-भार धारण करने को तैयार उप अणु अर्फ गार्ड पार्टिकल देख रहा था. महर्षि अरविंद की एक कविता अमर उजाला अखबार में पढ़ रहा था अणु, इलेक्‍ट्रान और जीवन के ऊपर. सोचने लगा हर युग में संवेदनशील और जीवन को बूझने में लगे लोगों का एक समूह रहा है, जिसने तात्‍कालिक आवेगों, उत्‍तेजनाओं, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं के बहुत आगे देखने-समझने-पाने की कोशिश की. मुझे लगता है कि हर किसी की अपनी अपनी यात्रा, समझ, चेतना होती है और वह उसी के इर्द-गिर्द दुनिया की गुणा-गणित, लंबाई-चौड़ाई-गहराई मापता है.

आखिर में कहना चाहूंगा कि मेरा किसी व्‍यक्ति से कोई बैर नहीं, लड़ाई मेरी खुद से है, और भ्रष्‍ट सिस्‍टम से है. इस प्रक्रिया में, इस कार्रवाई में जो नए नए अनुभव मिल रहे हैं, वे चेतना के लेबल पर इवाल्‍व कर रहे हैं. खुद को और सबको समझने की में मदद दे रहे हैं. यशवंत रहे ना रहे, यह सोच जिंदा रहेगी, प्रयोग करने की चाहत जिंदा रहेगी, नया कुछ खोजने की आदत जिंदा रहेगी. इसी चाहत, जिद, खोज ने सृष्टि को बढ़ाया, निखारा है, तमाम विसंगतियों के बावजूद सात तालों में चैन की नींद का रहस्‍य मेरे लिए भी रहस्‍य है. वह भी तब जब मदिरा लंबे समय से पीने वाला आदमी अचानक छोड़ने को मजबूर हो जाए. तब अनिद्रा एक बड़े संकट के रूप में सामने आता है. लेकिन यहां रात नौ बजते ही आसपास के साथियों के आपसी वार्तालाप के बीच ऐसी नींद आती है कि सुबह छह बजे ''उठ जाओ रे… चलो रे चलो'' की राइटर की दहाड़ती गुड मार्निंग मार्का आवाज से ही टूटती है.

मैं ही नहीं सबके सब खूब सोते हैं. दिन में भी, रात में भी. अनिंद्रा और हाइपर टेंशन की कैद में करवट बदलते महानगरियों को सलाह है कि वे जिंदगी चाहते हैं तो जेल टाइप सिस्‍टम डेवलप करें, जहां सामूहिकता-बराबरी-सुरक्षा और पक्‍कड़पन साझा मौजूदगी हो. जेल से मैं भी डरता रहा हूं, क्‍योंकि समाज जेल को बुरी जगह के रूप में देखता है. यहां आकर लगा कि अब तक मैं बुरी जगह और बुरे लोगों के बीच था, जहां हर कोई अपने घात, ताक, स्‍वार्थ, चिंता में डूबा होता है. यहां तो सब विश्राम की मुद्रा में है, सबका सब कुछ स्‍थगित है, बस ढेर सारा जीवन है. जो यातना, यंत्रणा, भागमभाग, पीड़ा, बेचैनी इन‍के हिस्‍से में है, वह बाहर निकलने के बाद के लिए पेंडिंग है. उधार के छह पन्‍ने भर चुका हूं. अब जगह नहीं है. प्रणाम, सलाम, नमस्‍ते.

यशवंत

(भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत ने यह लेख जेल के भीतर 21 जुलाई को लिखा है)


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Yashwant Singh Jail

जुलाई के आखिर में हिंदुस्‍तान से विदा हो जाएंगे आशीष व्‍यास!

हिंदुस्‍तान, बरेली से खबर है कि स्‍थानीय संपादक आशीष व्‍यास जुलाई के बाद यहां से विदा हो जाएंगे. सूत्रों का कहना है कि उन्‍होंने इसकी सूचना अपने करीबियों को दे दी है. फिलहाल वे कहीं ज्‍वाइन करने नहीं जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि वे अपने पिता जी का हाथ बंटाने के लिए अखबार से इस्‍तीफा दिया है. हालांकि भड़ास से बातचीत में आशीष व्‍यास ने कुछ समय पहले इस्‍तीफा देने की बात को निराधार बताया था, परन्‍तु सूत्रों का कहना है कि अगले महीने से हिंदुस्‍तान का संपादक बदल जाएगा.

आशीष व्‍यास राजस्‍थान में भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर हिंदुस्‍तान, बरेली के संपादक बने थे. आशीष के इस्‍तीफा देने की अटकलें काफी समय से लग रही थीं. उनके कादंबिनी में तबादले की भी चर्चाएं थीं. बरेली में स्‍थानीय संपादक के नए नामों को लेकर भी चर्चाएं हो रही हैं कि अलीगढ़ के संपादक मनोज पमार को बरेली का संपादक बनाया जाएगा. हालांकि कुछेक और नाम भी सामने आ रहे हैं पर अभी तक आधिकारिक रूप से कुछ भी सामने नहीं आ पा रहा है.

बैजनाथ मिश्रा ने की सन्‍मार्ग में वापसी, संपादक बने

रांची से खबर है कि बैजनाथ मिश्रा ने फिर सन्‍मार्ग ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें फिर एडिटर बनाया गया है. कुछ महीने पहले बैजनाथ मिश्रा सन्‍मार्ग छोड़कर न्‍यूज11 चले गए थे. झारखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हरिनारायण सिंह के सन्‍मार्ग से इस्‍तीफा देने के बाद बैजनाथ मिश्रा ने वापसी की है. उल्‍लेखनीय है कि हरिनारायण सिंह न्‍यूज 11 से इस्‍तीफा देकर सन्‍मार्ग पहुंचे थे तो बैजनाथ मिश्रा सन्‍मार्ग से इस्‍तीफा देकर न्‍यूज 11 पहुंच गए थे. हरिनारायण सिंह के इस्‍तीफे के बाद बैजनाथ मिश्रा ने फिर वापसी कर ली है. अखबार में उनका नाम संपादक के रूप में जाने लगा है.

ये देखिए बठिंडा के पत्रकारों की हरकत

यह तस्‍वीर बठिंडा के गोनियाना रोड पर स्थित झील की है। जिसमें बठिंडा की मीडिया से जुडे कई तथाकथित वरिष्‍ठ पत्रकार शामिल हैं। असल में बुधवार रात को झील के सामने स्थित एक होटल हांडी में पत्रकारों को निजी ट्रांसपोर्ट कंपनी ने लैग-पैग की पार्टी दी थी। जिसका लुत्‍फ उठाने के बाद कुछ मीडिया कर्मी इस तरह बेकाबू हो गए। यह फोटो बठिंडा के ही एक मीडिया कर्मी ने फेसबुक पर अपलोड की है, जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है।

Photojournalist Sanjeev Kumar DailyPost ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha …………………

Dilbag Danish ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha …………………

Arvind Srivastava ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha

Parveen Garg Monsoon ki kami kaha hai Punjab main. Dekho raat ko ek aur lake ban gayi

Rohit Jindal kis cheez ke calculation ho rahi hai….

Rohit Jindal bad manners santosh ji

Omprakash Pathak Is competition ke umpire santosh ji

Dilbag Danish are santosh ji dare nahin

Omprakash Pathak us din santosh ji depression mein hain

Photojournalist Sanjeev Kumar DailyPost agali pic dekho ge to pata chale ga ki kitne dar gaye the…………

Dilbag Danish kiun kitni pee thi

Rohit Jindal peene ka nahi nekalne ka competions tha

Dilbag Danish ‎Photojournalist Sanjeev Kumar DailyPost g update kardo na fir

Dilbag Danish ‎Rohit Jindal g competio ke liye bhi tayari to ki hogi na

Dharam Chander bobby ji logon ki soch ko parkhane ka tariqa achcha hai….

Photojournalist Sanjeev Kumar DailyPost ha ha ha ha ha ha ha ha ha …………..

Anil Verma ghateia soch sarm karo 22 g tusen bathinda press clab de mamber ho

Rohit Jindal abi press club bna nahi, rahi baat sharm ke j to sabi ne sharma ji ko samjea tha

Kulwant Happy Unique Man eh harkat jatt di nahin.. kise hor di ai…. @jatt… bole tan randhir boby.. da pyara jeha naan

रणधीर बाबी के फेसबुक वाल से साभार.

अनिल त्रिपाठी पत्रकार या व्‍यवसायी?

अनिल त्रिपाठी द्वारा पत्रकारिता को एक व्यवसाय की तरह इस्‍तेमाल किया जा रहा है, जिसके साक्ष्य में अनिल त्रिपाठी द्वारा चलाये जा रहे समाचार पत्रों का विवरण आप सभी के सन्मुख है. अनिल त्रिपाठी द्वारा अपने को एक साधारण पत्रकार बताया जा रहा है, परन्तु वास्तव में वो युग जागरण नाम के समाचार पत्र अपनी पत्नी का नाम पर दिखाकर एक बड़ा व्‍यवसाय कर रहे हैं. वे एक बड़े व्यवसायी हैं. जहाँ एक समाचार पत्र का प्रकाशन एवं संचालन करना वित्तीय दृष्टि से लाभकारी नहीं है वहीं अनिल त्रिपाठी द्वारा अपनी पत्नी के नाम से ५-५ समाचार पत्रों का संचालन किया जा रहा है. आप स्वयं निर्णय लीजिये कि अनिल त्रिपाठी पत्रकार हैं या व्यवसायी????

अनिल त्रिपाठी स्वयं को बहुत ही साधारण पत्रकार बताता है वहीं वो पत्रकारिता के दम पर अपनी पत्नी अनीता त्रिपाठी के नाम से लाखों का कारोबार कर रहा है. अनिल त्रिपाठी द्वारा हिंदी  के साथ-साथ उर्दू भाषा में भी समाचार पत्र का प्रकाशन किया जा रहा है. लखनऊ, फतेहपुर, आजमगढ़ से अख़बार के नाम पर पैसा कमाया जा रहा है. क्या अनीता त्रिपाठी को उर्दू भाषा का  ज्ञान है????

अर्चना यादव की रिपोर्ट.

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : डीएसपी ने पर्यवेक्षण रिपोर्ट में छापखाना और संपादकीय कार्यालय का ब्‍योरा पेश किया

मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज दैनिक हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में पुलिस उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर की ओर से समर्पित ‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी‘ में 200 करोड़ के सरकारी विज्ञापन घोटाले में शामिल नामजद अभियुक्तों के भागलपुर और मुंगेर मुख्यालय स्थित घटनास्थलों क्रमशः प्रिंटिंग प्रेस, संपादकीय कार्यालय, व्यापारिक कार्यालय, मुंगेर कार्यालय, कम्प्यूटर कक्ष, प्रिंटिंग प्रेस की मशीन आदि का पूर्ण ब्‍योरा पेश किया गया है।

‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी‘ में आरक्षी उपाधीक्षक ने प्रथम घटनास्थल के रूप में भागलपुर स्थित दैनिक हिन्दुस्तान के प्रिंटिंग प्रेस, प्रिंटिंग प्रेस की मशीन, संपादकीय कार्यालय और व्यापारिक कार्यालय को माना है और उसका पूर्ण विवरण ‘प्रथम घटनास्थल‘ के रूपमें पेश किया है और लिखा है कि –‘‘इस कांड का प्रथम घटनास्थल भागलपुर जिला के विश्वविद्यालय थानान्तर्गत परबत्ती मोहल्ला में धोबिया काली चौक के निकट स्थित दैनिक हिन्दुस्तान का कार्यालय है, जिसका मुख्य निकास उत्तर रूख का एनएच -80 पर है। उत्तर रूख में दो लोहे का ग्रील का गेट बड़ा साईज का लगा हुआ है। अन्दर जाने पर प्लास्टर का आंगणनुमा है, उसके बाद तीन मंजिला भवन है जिसे उजले रंग से व्हाईट वाश किया हुआ है। उक्त भवन के सबसे नीचे में प्रेस की मशीन लगी हुई है जिसमें छपाई का कार्य किया जाता है। उसके उपर द्वितीय तल पर फ्रेंचाईजी का कार्यालय एवं स्टोर रूम है एवं तीसरे तल्ले पर एडिटोरियल एवं कामर्शियल कार्यालय है। इसी कार्यालय पर वादी द्वारा घटनाकारित किये जाने की बात बतायी गयी है। घटनास्थल के उत्तर में एनएच-80 पक्की रोड, जो पूरब की ओर भागलपुर स्टेशन एवं पश्चिम की ओर नाथनगर की ओर जाती है तथा रोड के पार विश्वविद्यालय व छात्रावास स्थित है तथा पश्चिम में पक्की सड़क व धोबिया काली स्थान मंदिर स्थित है। घटनास्थल पर इसके अतिरिक्त अन्य कोई उल्लेखनीय बात नहीं पायी गयी।

‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी‘ में आरक्षी उपाधीक्षक ने इस विज्ञापन घोटाले के द्वितीय घटनास्थल के रूप में दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर मुख्यालय स्थित हिन्दुस्तान कार्यालय को माना है और द्वितीय घटनास्थल का पूर्ण ब्‍योरा पेश किया है और कहा है कि –‘‘इस कांड का द्वितीय घटनास्थल कोतवाली थानान्तर्गत बेकापुर स्थित दैनिक हिन्दुस्तान का कार्यालय है, जो बेकापुर में सुषमा देवी भवन की दूसरी मंजिल पर स्थित है। इस भवन के सबसे उपर में मकान मालिक हेमन्त सिंह (सुषमा देवी के पुत्र) स्वयं रहते हैं। हिन्दुस्तान कार्यालय के ठीक नीचे एंगल ब्रोकिंग शेयर एजेन्सी का कार्यालय तथा भवन के सबसे निचले हिस्से में न्यू एकता ज्वेलर्स व ब्यूटी फैशन की दुकान है। हिन्दुस्तान कार्यालय में सीढ़ी, जो इस भवन के पश्चिम की तरफ गली में है, को चढ़ने के बाद तीन कमरे हैं। सीढ़ी चढ़ने के ठीक बाद दाहिनी तरफ कम्प्यूटर कक्ष, उससे सटे पूरब की ओर सरकुलेशन रूम एवं सरकुलेशन रूम से सटे बांए व सीढ़ी के ठीक सामने एडिटिंग -रूम है। इस भवन के पूरब में अम्बिका श्रृंगार एवंगिफ्ट व जेनरल स्टोर है। पश्चिम में गली के बाद डा. डीएस बनर्जी का क्लिनिक, उत्तर में परती जमीन तथा दक्षिण में मुख्य सड़क, जो पीएनबी चौक से जुबली वेल तक जाती है तथा सड़क के बाद निवास भवन स्थित है। घटनास्थल पर इसके अतिरिक्त अन्य कोई उल्लेखनीय बात नहीं पायी गयी।

‘‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी‘‘ के पृष्ठ-02 में आरक्षी उपाधीक्षक ने अभियोजन साक्ष्य के रूप में कांड के सूचक मंटू शर्मा, पे. स्व. गणेश शर्मा, सा.‘ पुरानीगज, थाना- कासिम बाजार, जिला-मुंगेर, का बयान उद्धृत किया है। आरक्षी उपाधीक्षक ने ‘अभियोजन -साक्ष्य‘ को पेश करते हुए लिखा है कि –‘‘इस कांड के वादी मंटू शर्मा, पे. स्व. गणेश शर्मा, सा.- पुरानीगंज, थाना- कासिम बाजार, जिला-मुंगेर का बयान लिया गया। उन्होंने अपने बयान में प्राथमिकी एवं घटना का पूर्णरूपेण समर्थन करते हुए आगे बताया है कि वे एक समाजसेवी हैं। इस कांड के अभियुक्तगण देश के एक बड़े मीडिया हाउस मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड, जिसे बाद में बदलकर मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड किया गया है, के संपादकीय बोर्ड एवं प्रबंधन के अधिकारी से संपादकीय निदेशक तक जुड़े हुए हैं। प्राथमिक अभियुक्त शोभना भरतिया, अध्यक्ष, हिन्दुस्तान प्रकाशन समूह (दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड), प्रधान कार्यालय-18-20, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली के द्वारा संचालित इस कंपनी के द्वारा देश के विभिन्न भागों से हिन्दी और देवनागरी लिपि में ‘हिन्दुस्तान‘ शीर्षक से दैनिक समाचार पत्रों को प्रकाशित किया जा रहा है।

सभी अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित : मुंगेर पुलिस ने कोतवाली कांड संख्या-445/2011 में सभी नामजद अभियुक्त शोभना भरतिया, अध्यक्ष, दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली, शशि शेखर, प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, अकु श्रीवास्तव, कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण, बिनोद बंधु, स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण और अमित चोपड़ा, मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली, के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8(बी), 14 एवं 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को अनुसंधान और पर्यवेक्षण में ‘सत्य‘ घोषित कर दिया है।

सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को संसद में उठाने की अपील : देश के माननीय सांसदों से इस विज्ञापन घोटाले को आगामी संसद सत्र में उठाने की अपील की गई है। देश की आजादी के बाद यह पहला मौका है कि माननीय सांसद देश के कारपोरेट मीडिया के अरबों-खरबों के सरकारी विज्ञापन घोटाले को ससबूत सदन के पटल पर रख सकेंगे। अब तक अखबार ही देश के भ्रष्टाचारियों को अपने अखबारों में नंगा करता आ रहा है। अब माननीय सांसद भी आर्थिक अपराध में डूबे शक्तिशाली मीडिया हाउस के सरकारी विज्ञापन घोटाले को संसद में पेश कर आर्थिक भ्रष्टाचारियों को नंगा कर सकेंगे।

गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र समर्पित होना बाकी है : विश्व के इस सनसनीखेज हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में पुलिस अधीक्षक के स्तर से पर्यवेक्षण रिपोर्ट -02 जारी होने के बाद अब कानूनतः इस कांड में सभी नामजद अभियुक्तों के विरुद्ध गिरफ्तारी का आदेश और आरोप पत्र न्यायालय में समर्पित करने की प्रक्रिया शेष रह गई है। देखना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में आर्थिक अपराधियों के विरुद्ध चले रहे युद्ध में सरकार कब तक इस मामले में गिरफ्तारी का आदेश और आरोप-पत्र न्यायालय में समर्पित करने का आदेश मुंगेर पुलिस को देती है?

दैनिक जागरण भी सरकारी विज्ञापन घोटाले में शामिल : बिहार में दैनिक जागरण भी दैनिक हिन्दुस्तान की तर्ज पर बिहार में बिना निबंधन का अखबार प्रत्येक जिले से बदले हुए फारमेट में स्थानीय समाचारों की प्रमुखता के साथ मुद्रित, प्रकाशित और वितरित कर भागलपुर और मुजफ्फरपुर संस्करणों के नाम से अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन लंबे समय से प्राप्त करता आ रहा है और करोड़ों-अरबों में सरकारी राजस्व को चूना लगाता आ रहा है।

जारी…

मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

अवधेश गुप्‍ता का इलाहाबाद तथा सदगुरु शरण का बरेली तबादला

दैनिक जागरण, बरेली से खबर है कि संपादकीय प्रभारी अवधेश गुप्‍ता का तबादला इलाहाबाद के लिए कर दिया गया है. इलाहाबाद के संपादकीय प्रभारी सदगुरु शरण को बरेली का संपादकीय प्रभारी बनाया गया है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन दोनों लोगों के परफार्मेंस से खुश नहीं था. पिछले दिनों एक युवती को लेकर हुए मारपीट के बाद प्रबंधन की भौंहे और तन गई थी, जिसके बाद अवधेश गुप्‍ता का जाना तय माना जा रहा था.

सूत्रों का कहना था कि पहले अवधेश को कानपुर भेजे जाने की योजना थी, परन्‍तु वहां पहले से ही तीन वरिष्‍ठ एनई होने के चलते इन्‍हें इलाहाबाद का परवाना थमाया गया. वहीं इलाहाबाद में भी सदगुरु शरण के काम से प्रबंधन खुश नहीं था, लिहाजा दोनों लोगों की अदला बदली कर दी गई. संभावना है कि एक दो दिन में ये लोग अपना कार्यभार ग्रहण कर लेंगे.

भोपाल दूरदर्शन व आकाशवाणी के स्ट्रिंगर्स और पीटीसी की हालत दयनीय

भोपाल। प्रसार भारती के महत्वपूर्ण अंग भोपाल दूरदर्शन और आकाशवाणी की हालत काफी खराब है। बात भुगतान की हो तो समझ आती है कि शासकीय प्रक्रिया में देरी हो सकती है, लेकिन 2012 के परिचय पत्र न तो आकाशवाणी से बने हैं और न ही दूरदर्शन से। वहां बैठे अधिकारी और सम्पादक सरकार को चूना लगाने में माहिर हो गए हैं और हालात यह है कि स्ट्रिंगर्स या पीटीसी को किसी न किसी बात से ब्लैकमेल कर रहे हैं।

प्रदेश के अधिकांश जिलों में इस समय पीटीसी और स्ट्रिंगर्स काम कर रहे हैं। पीटीसी आकाशवाणी से जुड़े हुए हैं और वहां के सम्पादक पीटीसी की गलतियां कम निकालते हैं उनका अपमान ज्यादा करते हैं। हजारों रुपए का वेतन लेने वाले यह सम्पादक अपने अधिनस्थों से फोन लगवाकर आड़ी-तिरछी बातें करते हैं और यही कारण है कि इन दिनों रेडियो पर वाईस कास्ट होना कम हो गई है। दूरदर्शन के स्ट्रिंगर्स की तो भारी जमात सम्पादक ने भर दी है। एक ही जिले में तीन स्ट्रिंगर्स नियुक्त करके सम्पादक अपने वरिष्ठों से कौन सी शाबासी लेना चाहते हैं कुछ समय नहीं आ रहा है।

जब एप्रूरवल लेने के लिए स्ट्रिंगर्स फोन लगाता है तो उसे एप्रूवल देने में आनाकानी की जा रही है। ऐसे में एक माह में एक स्ट्रिंगर्स के हिस्से में दो-दो स्टोरी भी नहीं आ रही है। फिर वहां बिल भेजने पर महिनों उनका भुगतान नहीं होता है। स्ट्रिंगर्स न तो ठीक से स्टोरी कर पा रहे हैं और न ही उन्हें भुगतान समय पर हो रहा है। सम्पादक को खुश रखो तो अप्रूवल मिलता है नहीं तो स्टोरी न मिलने का दंश झेलना पड़ता है। इस बार से नाराज कई स्ट्रिंगर्स ने अप्रूवल लेना ही छोड़ दिया है। ऐसे में केंद्र सरकार की मंशा और उनकी योजनाओं को जनता के सामने लाने का लक्ष्य भी प्रभावित हो रहा है। कई पीड़ित स्ट्रिंगर्स तो कांग्रेस नेताओं के साथ अब सीधे केंद्र सरकार से पत्र-व्यवहार कर सारी स्थिति से अवगत कराने के लिए मैदान में आ गए हैं। ताकि शीघ्र ही सरकारी व्यवस्था में सुधार आए और सभी का भला हो।

पीडि़त महिला को थाने में बुलाकर कौन सी जांच की पुलिस ने

ज़रा सोचिये इंसान की शक्ल में घूमने वाले न जाने कितने भेडियों की शिकार होती है यह नारी, जिसका ज़िक्र तक नहीं होता समाज में, न ही उसके बारे में किसी को जानकारी हो पाती है. बहुत से लोग तमाम घडियाली आंसू बहते है महिलाओं की स्थिति पर, उनमें महिलाओं की संख्या भी खूब होती है. महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार एवं अपराध से निपटने के लिए जटिल कानूनी प्रक्रिया भी एक बाधा है, जिससे उन्हें न्याय देरी से मिलते है और बहुत से मामलों में वो न्याय से वंचित रह जाती है. आज भी महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में दोयज दर्जे की है.

सीओ हजरतगंज द्वारा बुलाये जाने पर मुझे लगातार हो रही मूसलाधार तेज़ बारिश में विवश होकर जाना पड़ा क्योंकि मुझे बताया गया कि अनिल त्रिपाठी वहां थाने में मौजूद है और आपसे कुछ वार्ता करनी है और थाने में सात आठ पुरुषों के सम्मुख मुझसे पूछताछ की गयी. थाने पर थानेदार और उनके सहयोगियों को देखकर शेरों के सम्मुख जो स्थिति शिकार की होती है ऐसी ही अनुभूति हुयी. क्या यह उचित है कि अकेली लड़की पर पुलिसिया रौब दिखा कर थाने पर पूछताछ के नाम पर बुलाया जाना और मानसिक दबाव बनाया जाए. बरसात के इस मौसम में भीगते हुए कानून से न्याय मांगते हुए एक पीड़ित महिला को थाने में बुलाकर कौन सी जांच की जायेगी. वहां थाने में पुलिसकर्मियों के अलावा कई दूसरे लोग और एक वरिष्ठ पत्रकार भी मौजूद थे.

मेरा सवाल है सबसे कि इस तरह थाने में सबसे सामने बुलाना और पूछताछ करना क्या उचित था. एक बार फिर शर्मिन्दिगी और इस बेज्जती को सहकर आँखें भर आई मेरी. आज की  इस न्याय प्रणाली का अवलोकन करने पर ज्ञात हुआ कि शायद मुझे आवाज़ नहीं उठानी थी और न जाने कितनी महिलाओं ने यही सोच कर अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान जैसे दरिंदों से अपना शोषण करवाया होगा. यहाँ प्रतीकात्मक कार्यवाही किसी भी अपराध की तुलना में अधिक कठिन है. यहाँ तक कि महिलाओं के प्रति अपराध को पारिभाषित करना भी अत्यधिक दुष्कर कार्य है. जांच, प्रमाण और पुलिस व्यवहार मिलकर सम्पूर्ण न्याय प्रक्रिया को हाशिये में ला खड़ा कर देते हैं. कल के पुलिस के इस व्यवहार को देखकर लगता है कि शारीरिक अपराध के सम्बन्ध में महिलायें पुलिस थाने में जाकर रिपोर्ट लिखवाने में आज भी जिस भय को महसूस करती है वह पूर्णतया सत्य है. समुचित व प्रभावी कानून न होने के कारण महिलाएं न्याय पाने में खुद को असहाय पाती है.

अर्चना यादव

लखनऊ

बरेली में हिंदुस्‍तान के पाठकों को गलत सूचना ने कराई फजीहत

बरेली में हिंदुस्‍तान अखबार की गलत सूचना से हिंदुस्‍तान पढ़ने वालों की खूब फजीहत हुई. बरेली शहर इन दिनों दंगे की चपेट में है. दंगों को रोकने असफल सरकार तथा पुलिस प्रशासन ने बिगड़े हालात पर काबू पाने के लिए बरेली शहर में कर्फ्यू लगा दिया है. बुधवार को प्रशासन ने कर्फ्यू में दो घंटे की ढील की घोषणा की थी. अमर उजाला और दैनिक जागरण ने खबर में दो घंटे की छूट की जानकारी दी थी, परन्‍तु हिंदुस्‍तान ने सुबह दस बजे से लेकर दो बजे तक छूट की खबर प्रकाशित कर दी. यानी चार घंटे की छूट.

हिंदुस्‍तान पढ़ने वाले उसी हिसाब से बाहर निकले, लेकिन बाहर दो घंटे और चार घंटे को लेकर बात बिगड़ गई. हालांकि जब सही वस्‍तुस्थिति स्‍पष्‍ट हुई तो लोग दो घंटे में ही हिंदुस्‍तान को कोसते हुए वापस लौट आए. इसके पहले भी हिंदुस्‍तान ने एक हॉकर के मौत की गलत खबर प्रकाशित की थी, जिसके बाद काफी हो हल्‍ला हुआ था. पर प्रबंधन ने किसी तरह मामले को दबा दिया. ये मामला भी दबाने का प्रयास हुआ, परन्‍तु दैनिक जागरण ने वरिष्‍ठ अधिकारियों को अपने कार्यालय में बुलाकर ऐसी व्‍यूह रचना की कि कमिश्‍नर को हिंदुस्‍तान के मामले में नोटिस देने की बात कहनी पड़ी.    

‘द सन’ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करेगा पाक

इस्लामाबाद : पाकिस्तान की सरकार ने ओलिंपिक में आतंकवादी हमले की आशंका से जुड़ी ‘फर्जी खबर’ को लेकर ब्रिटेन के मशहूर टैबलॉयड ‘द सन’ के खिलाफ 10 अरब रुपये के हरजाने की मांग करते हुए मानहानि का मुकदमा करने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री राजा परवेश अशरफ के नेतृत्व में हुई संघीय मंत्रिमंडल की बैठक में ब्रिटेन की अदालत में इस अखबार के खिलाफ मुकदमा दायर करने का फैसला किया गया है।

अधिकारियों ने बताया कि मंत्रिमंडल की बैठक में वीजा घोटाले के मुद्दे पर गहन चर्चा की गई और इसके बाद ‘द सन’ के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का निर्णय लिया गया। इस टैबलॉयड ने हाल ही में खबर प्रकाशित की थी कि पाकिस्तान में आतंकवादियों ने किस तरह से फर्जी पासपोर्ट हासिल किए हैं और वे लंदन ओलिंपिक में अपने टीम के साथ ब्रिटेन पहुंच सकते हैं। अखबार ने कहा था कि इस संबंध में पाकिस्तान की संघीय जांच एजेंसी ने करीब 100 संदिग्धों की गिरफ्तारी की है।

पाकिस्तान के गृह सचिव, नागरिकों का पूरा विवरण रखने वानी संस्था ‘राष्ट्रीय डाटाबेस एवं पंजीकरण प्राधिकरण’ (एनएडीआरए) के प्रमुख तथा पासपोर्ट विभाग के महानिदेशक ने इस मामले पर मंत्रिमंडल के सामने पूरी जानकारी रखी। इस बैठक में पाकिस्तान के इन सभी शीर्ष अधिकारियों ने ब्रिटिश टैबलॉयड की रिपोर्ट को पूरी तरह ‘गलत’ और दुष्प्रचार फैलाने वाला करार दिया। मंत्रिमंडल की बैठक के बाद सूचना मंत्री कमर जमां काइरा ने कहा, ‘‘मंत्रिमंडल ने एनएडीआरए को आदेश दिया है कि कानून मंत्रालाय से मशविरा करने के बाद टैबलॉयड के खिलाफ मानहानि का मुकदमा किया जाए।’’ (एनडीटीवी)

सड़क हादसे में पंजाबी जागरण के पत्रकार नवदीप घायल

पटियाला में हुए एक सड़क हादसे में पंजाबी जागरण के पत्रकार नवदीप ढींगरा घायल हो गए. उन्‍हें इलाज के लिए राजिंदरा अस्‍पताल में भर्ती करवाया गया है. आशंका जताई जा रही है कि उनके नाक की हड्डी टूट गई है. बीती रात लगभग नौ बजे नवदीप शेरावाल गेट स्थित अपने ऑफिस से निकलकर राघोमाजरा स्थित अपने घर जा रहे थे. जब वे चांदनी चौक पहुंचे तो सामने से आ रही एक बाइक से उनकी बाइक टकरा गई. वे बाइक समेत सड़क पर गिर पड़े और घायल हो गए. उनके नाक से लगातार खून का रिसाव होता रहा.

घायल होने के बाद भी नवदीप ने अपने परिजनों तथा परिचितों को घटना की जानकारी दी. मौके पर पहुंचे लोगों ने रवदीप को राजिंदरा अस्‍पताल में भर्ती करवाया. जहां डाक्‍टरों ने उन्‍हें इमरजेंसी में रेफर कर दिया. अस्‍पताल के डाक्‍टरों ने बताया कि नवदीप के नाक से खून का रिसाव बहुत ज्‍यादा हो रहा है, इसलिए संभावना है कि उनके नाक की हड्डी टूट गई है. हालांकि इसकी स्‍पष्‍ट जानकारी जांच के बाद ही मिल पाएगी.

आईपीएल की फिक्सिंग के चलते हुई पत्रकार जेडे की हत्‍या!

मुंबई : पिछले वर्ष 11 जून को मुंबई में हुई मिड डे के वरिष्‍ठ पत्रकार जे. डे की हत्या का मामला बुधवार को महाराष्ट्र विधान परिषद में गूंजा। विधान परिषद में विपक्ष के नेता विनोद तावड़े ने कहा कि जे. डे की हत्या आईपीएल मैचों की सट्टेबाजी के कारण हुई। विप में इस मुद्दे को उठाते हुए तावड़े ने कहा कि जेडे आईपीएल क्रिकेट में चलने वाले सट्टेबाजी को उजागर करना चाहते थे। उनके पास इस संबंध में पुख्‍ता जानकारी थी, इसलिए उनकी हत्‍या कर दी गई।

भाजपा नेता यह भी आरोप लगाया कि वरिष्ठ खोजी पत्रकार जे डे की हत्या के सिलसिले में पत्रकार जिग्ना वोरा को गिरफ्तार करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें पत्रकार की हत्या के मामले में बिना ठोस सबूत के गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने सरकार से यह जांच करने को कहा कि क्या जे डे की हत्या छोटा राजन या माफिया सरगना दाउद इब्राहिम ने तो नहीं करवाई।

उल्‍लेखनीय है कि जेडे की हत्‍या के मामले में अब तक 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिसमें एक सट्टेबाज विनोद असरानी भी शामिल है। छोटा राजन का करीबी असरानी ने ही कालिया को पैसे उपलब्‍ध करवाए थे। तावड़े ने कहा कि जे डे के पास आईपीएल मैच फिक्सिंग और सटोरियों के बारे में महत्वपूर्ण सूचनाएं थीं। वह उसका खुलासा करने वाले थे। जे डे की हत्या के पीछे जिग्ना वोरा की मंशा स्पष्ट करने की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि महज इतना भर से कि जिग्ना ने डे से कहा था कि आप अपने आप को बहुत स्मार्ट समझते हैं इस बात की आशंका नहीं जान पड़ती है कि उन्होंने (जिग्ना ने) जे डे की हत्या करवाई। हम वास्तविक सत्य जानना चाहते हैं।

तावड़े ने दलील दी कि पुलिस ने दावा किया है कि उसके पास इस बात की सूचना है कि वोरा ने 36 कॉल किए लेकिन वह महज तीन कॉल के रिकार्ड ही सामने ला पाई है। तावड़े ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस मामले में एक महिला पत्रकार जिग्ना वोरा को पुलिस ने आंखों में धूल झोंकने के लिए गिरफ्तार किया है। तावड़े सवाल करते हैं कि छोटा राजन को मुंबई में ये सूचनाएं पाने के लिए एक पत्रकार पर निर्भर होने की क्या जरूरत पड़ गई?

पत्रकार काजमी की याचिका पर स्‍पेशल सेल को नोटिस जारी

नई दिल्ली : इजरायली दूतावास कार विस्फोट मामले में आरोपी पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की अपील पर तीसहजारी कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एसएस राठी ने स्पेशल सेल को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। काजमी ने अपने मामले की जांच अवधि बढ़ाए जाने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सेशन कोर्ट में याचिका दायर की है। जिस पर अदालत ने पुलिस को 30 जुलाई तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।

पत्रकार काजमी ने अपने अधिवक्ता महमूद प्राचा के जरिये अपने मामले में जांच की अवधि बढ़ाए जाने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है। अपनी याचिका में काजमी का कहना है कि मुख्य महानगर दंडाधिकारी विनोद यादव ने यह फैसला जल्दबाजी में दिया है। इसके अतिरिक्त काजमी ने अपनी जमानत के लिए सेशन कोर्ट में अर्जी भी दायर की है। उसका कहना है कि स्पेशल सेल ने उसे 6 मार्च को गिरफ्तार किया था। उसके बाद से वह लगातार जेल में है। पुलिस को उसके खिलाफ कोई सबूत भी नहीं मिला है। लिहाजा, उसे जमानत दी जानी चाहिए। साभार : जागरण

ओम ठाकुर ने फ्रीलांसर रिपोर्टर को केबिन में बुलाकर बेइज्‍जत किया

आगरा से प्रकाशित हो रहे दैनिक पुष्प सवेरा में आये दिन रिपोर्टर ओम सिंह कुशवाहा उर्फ ओम ठाकुर की जलीलता का शिकार हो रहे हैं. वो समय समय पर रिपोर्टरों को बुलाकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के सामने उनकी बेईज्ज़ती करते हैं और अपनी जीहजूरी करवाने की जिद करते हैं. बुधवार को उसने सागर गुजराती नामक युवा रिपोर्टर के साथ बदतमीजी की और उसे धमकी दे डाली. सागर गुजराती ने कुछ महीने पहले पुष्पसवेरा को रिपोर्टर के तौर पर ज्वाइन किया था. लेकिन आंतरिक राजनीति और बेवजह दोषारोपण से कई बार वो हतोत्साहित हुआ.

इस बीच निजी पारिवारिक कारणों से उसे शहर के बाहर जाना पड़ा था, जिसके कारण उसने सिटीचीफ शरद चौहान के सामने इस्तीफे की पेशकश की. शरद चौहान ने इस्तीफ़ा तो ले लिया लेकिन कई बार सागर को फोन करके दुबारा अखबार से जुड़ने को कहा. इस पर सागर ने फ्रीलांसर के तौर पर अखबार को दुबारा ज्वाइन किया और कभी कभी दफ्तर जाकर ख़बरें लिखने लगा. अचानक बुधवार दिनांक २५ जुलाई २०१२ को जब सागर खबर लिख रहा था, तब ओम ठाकुर ने सागर को अपने केबिन में बुलाया. सागर के अंदर जाते ही उसने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से दरवाज़ा लगाने को कहा और सागर पर चिल्लाने लगे और उससे अभद्र भाषा का प्रयोग करने लगे. साथ ही उसे भाग जाने को कहा. 

इस पर सागर ने तुरंत उससे तमीज से बात करने को कहा और साथ ही ये भी कहा कि ऐसी नौकरी उसे नहीं करनी जहाँ ज़मीर बेचना पड़े और कुत्ता बनना पड़े. ओम ठाकुर ने इस पर कहा कि वो यहाँ के हेड हैं और उनकी जीहजूरी करनी पड़ेगी. सागर से उससे ये भी पूछा कि किसकी इज़ाज़त से वो यहाँ आया है तो सागर ने बताया कि शरद चौहान ने नए संपादक डॉ. हर्षदेव सिंह से पूछकर बुलाया है. इस पर ओम ठाकुर ने कहा कि कोई भी कुछ नहीं अखबार में सिवाय उनके. और चाहे संपादक कहे या कोई और सब ठाकुर से नीचे हैं. इस पर सागर ने तुरंत कमरे से बाहर निकलना चाहा लेकिन ओम ठाकुर ने उसका हाथ पकड़कर कुर्सी पर बैठने को कहा और कहा कि तू है क्या..सागर को उसने इस बीच कई धमकियाँ दे डाली और उससे बाद से भी बदतर बर्ताव किया.

सागर को डराने के लिए उन्‍होंने अपने दो आदमी भी गेट पर खड़े कर रखे थे जो सागर को कमरे में रोके रखें. लेकिन सागर बेबाक जवाब देकर वहां से आ गया और एडिटिंग रूम में सबको ठाकुर साहब की बदतमीजी बताई और वहाँ से निकल आया. सागर गुजराती बनारस का है और ओम ठाकुर कई बार पूरब के लोगों पर टिप्‍पणियाँ कर चुके हैं. ओम ठाकुर कई बार सागर पर झूठे आरोप भी लगा चुके हैं. अखबार से ही जुड़े एक आदमी ने बाद में सागर को बताया कि ठाकुर जी उस वक्त नशे में थे इसलिए ऐसा किया. सागर ने तुरंत इस बात को सोशल मीडिया पर उछाल दिया जिससे उसके साथ कई पत्रकार आ खड़े हुए हैं और अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं. सागर ने इसकी लिखित शिकायत पुष्पांजलि ग्रुप के बड़े अधिकारियों से करने की भी बात कही.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

फोन हैकिंग मामले में ब्रुक्‍स और कॉलसन बनाए गए आरोपी

ब्रिटेन के मीडिया जगत में तूफान लाने वाले फोन हैकिंग मामले में आज एक नया मोड़ उस वक्त आ गया जब मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक की करीबी रहीं रेबेका ब्रुक्स और ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के मीडिया निदेशक रह चुके एंटी कॉलसन को आपराधिक साजिश का आरोपी बनाया गया। बीते साल ब्रिटेन की मीडिया में फोन हैकिंग का मामला सामने आया था। सनसनीखेज खबरों की चाहत में बड़े अखबारों ने घूस देकर सूचनाएं एकत्र कीं।

फोन हैकिंग के शिकार एंजलीना जोली और ब्रैड पिट सरीखे बड़े सितारे भी रहे। मर्डोक की पूर्व सहयोगी और न्यूज ऑफ द वर्ल्ड की संपादक रहीं रेबेका ब्रुक्स तथा कैमरन के मीडिया निदेशक रहे एंडी कॉलसन उन आठ लोगों में शामिल हैं जिन्हें फोन हैकिंग से जुड़े 19 मामलों में आरोपी बनाया गया। उल्लेखनीय है कि रेबेका (44) और कॉलसन (44) के खिलाफ लगाए गए आरोपों में नाबालिग लड़की मिली डावलर की हत्या को लेकर फोन हैकिंग का बहुचर्चित मामला भी शामिल है। (एजेंसी)

यशवंत ऐसे नहीं हैं कि धक्‍का दिया और टूट गए

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत सदियों से कही-सुनी जाती है 'सच्चा राजपूत वहीं जो इक्कीस साल जीए'. इस लोकोक्ति का आशय प्राचीन राजघराने के लड़ाकू राणाओं (क्षत्रिय वंशजों) से है. जब राजपूत जवान अपने मान-सम्मान व सल्तनत की हिफाजत के लिए कम उम्र में ही जान गंवा देते थे. भले ही आज यह कहावत अप्रसांगिक हो चली है. लेकिन इतना जरूर है कि मर्दानगी आज भी राजपूतों के रग-रग में समाई है. जोश व जज्बा ऐसा कि किसी से वादा किया तो निभाने के लिए जान की बाजी लगाने से भी गुरेज नहीं. जो लड़ने का चैलेंज मिला तो पटखनी देने तक लड़ेंगे. और अपने (राणा) यशवंत भी इससे अछूते नहीं.

उतर प्रदेश के ऐतिहासिक जनपदों में शुमार गाजीपुर की धरती ने कला, साहित्य व राजनीति के क्षेत्र  में कई महारथी पैदा किए है. इस सूची में एक नाम यशवंत का भी जुड़ गया है. यशवंत यानी विश्व के सबसे लोकप्रिय हिंदी मीडिया पोर्टल भड़ास4मीडिया का संचालक. इस वेबसाइट को भारतीय मीडिया का विकिलिक्स भी कहा जा सकता है. 'लीकै लीकै तीन चलै हल, बैल, कपूत.. लीक छाड़ि तीनों चलै शायर, शेर, सपूत! कुछ इसी तर्ज पर चल के उम्र के महज तीन दशक से से थोड़ा ज्‍यादा गुजार चुके इस सपूत ने B4M के जरिए न्यू मीडिया को जो उंचाई दी है, वह खुद में एक इतिहास है.

तभी तो हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, इंडिया न्यूज सरीखे भारत के नामचीन ब्राडों के संपादक जिनकी एक खबर से सरकारें हिल जाती है. उद्योगपतियों का व्यवसाय चौपट हो जाता है. भ्रष्टाचारियों की रातों की नींदें हराम हो जाती है. आज इन्हीं मीडया मालिकों व संपादकों की यशवंत से फटती है. यही नहीं यशवंत आज हर उस मीडिया मालिक या संपादक के लिए खौफ बना हुआ है जो भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाए बैठे हैं. यही वजह है कि आज देश के दर्जनों बड़े मीडिया घराने के मालिकान यशवंत से खार खाए बैठे हैं. इस शत्रुतावश यशवंत पर कई सारे मुकदमें भी दर्ज हुए हैं.

दूसरी तरफ, इन्हीं मीडिया ग्रुप से जुड़े हिंदी पट्टी क्षेत्रों के हजारों पत्रकारों व कस्बाई स्ट्रिंगरों के बीच आज यशवंत की छवि 'सुपर मैन' की है. 'भड़ास' बोले तो हजार दुखों की एक दवा. एक ऐसा मंच जहां सभी मीडियाकर्मियों को अपने उपर हुए शोषण के खिलाफ आवाज लगाने की पूरी छूट है. इसकी गूंज भी ऐसी होती है कि बेइमान, कफनचोर, हरामखोर व वैम्पायर सरीखे मालिकानों व संपादकों के कानों की चादरें फट जाए. भड़ास ने हजारों जरूरमंद पत्रकारों के हित पूरे किए हैं.

इसका गवाह मैं खुद हूं. बिहार के छोटे से जिले पूर्वी चम्पारण से लेकर पटना तक के कई पत्रकार मित्रों की वस्तु स्थिति को भड़ास पर रखा. छपने पर कुछेक को छोड़ अधिकांश की मांगें पूरी हुई या उसे तवज्जों मिली. दीगर की बात है कि उतर भारत के तमाम कस्बों-जिले के मीडियाकर्मियों से लेकर दिल्ली के मीडिया ग्रुप में ऊंचे पदों पर आसीन आलाकमान भी रोज भड़ास पढ़ते हैं. भले ही इन हुक्कमरानों के बीच भड़ास का जिक्र आते ही नाक-भौं सिकुड़े जाते हों. लेकिन हकीकत यही है कि चोरी-छुपे ही सही भड़ास पढ़े बिना अधिकांश को नींद नहीं आती. दुख की बात है कि विनोद कापड़ी के फर्जी मुकदमे पर यशवंत भाई करीब तीन सप्ताह से गाजियाबाद के एक जेल में हैं. पहले से, हिन्दुस्तान के साथ मानहानि के कई दर्जन मुकदमे चल ही रहे थे.  इधर, दैनिक जागरण ने भी एक फर्जी मुकदमा दायर किया है. खैर, फार्म के हाईब्रीड मुर्गे माफिक एसी (एयरकंडिशन) की पैदाइश ये मीडिया आलाकमान जान ले कि यशवंत नाम का जीव लाह-पांत से बना कोई समान नहीं है. जिसे धक्का दिया और टूट गया.

वह तो गांव की खालिस मिट्टी में पला-बढ़ा गबरू जवान है जिसने हारना नहीं सीखा. फिर मुकदमे लड़ना तो यूपी-बिहारवालों की फितरत में शामिल है. यहां तो इंच-इंच जमीन को लेकर कई पीढ़ी मुकदमे लड़ती है. जबकि यह तो सार्वजनिक हित व असत्य पर सत्य की लड़ाई है. साथ ही है हजारों मीडियाकर्मियों की दुआएं भी. यशवंत के जेल जाने के बाद कथित शत्रु चैनलों व अखबारों के मैनेजमेंट हाथ धोकर पीछे पड़े हैं. भले ही इनके दबाव में बंधुआ मजदूर सरीखे खबरची यशवंत को एक विलेन की तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं. लेकिन 90 प्रतिशत पत्रकारों का दिल यशवंत के लिए ही धड़कता है. न चाहते हुए भी यशवंत को लेकर नकारात्मक खबर छापना-दिखाना इनकी मजबूरी है. क्योंकि नमक खाया है तो गुलामी बजानी ही पड़ेगी.

अच्छी बात यह है कि यशवंत के साथ इन्ही संस्थानों के अलग-अलग संस्करणों के कई सारे गुडविल संपादक भी हैं. ये पर्दे के पीछे यशवंत की मदद भी करते हैं. यशवंत की जमानत याचिका पर अगली सुनवाई संभवत: 3 अगस्त को होगी. इस में क्‍या आदेश होगा इसको लेकर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता क्‍योंकि मामला न्‍यायालय के अधीन है, पर इतना तो आशा है ही कि जल्द ही यशवतं जेल से रिहा होकर नए अवतार व तेवर में हमारे बीच होंगे.      

लेखक श्रीकांत सौरभ पूर्वी चंपारण के युवा पत्रकार हैं. फिलहाल स्‍वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं. इनसे संम्‍पर्क 9473361087 के जरिए किया जा सकता है.


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Yashwant Singh Jail

प्रेस नोट में खबरें छुपाती है नोएडा पुलिस

शहर में बढ़ रहे क्राइम ग्राफ को नोएडा पुलिस रोक पाने में नाकामयाब हो रही है। ऐसे में पुलिस ने क्राइम ग्राफ को कम दिखाने के लिये पत्रकारों को मुहैया कराने वाले प्रेस नोट में ही सूचनाएं देनी कम कर दी है। जो सूचनाएं प्रेस नोट के माध्यम से पत्रकारों को दी जाती है वो अपराध निम्न स्तर के होते है। मसलन आधे ब्लेड के साथ एक गिरफ्तार, चाकू, गांजा, लैपटॉप चोरी, बिजली चोरी, मारपीट, गाली गलौच सरीखे जैसी खबरें प्रेस नोट में होती है। ये ऐसी सूचनाएं है जिन्हें कोई भी अखबार जगह नहीं देता है। लिहाजा प्रेस नोट में से कोई न्यूज अखबार या टीवी पर नहीं आती।

ऐसे में पुलिस द्वारा मुहैया कराने वाले प्रेस नोट का औचित्य क्या है। भले ही पुलिस प्रेस नोट से खबर छुपा ले, लेकिन नोएडा के पत्रकार खुद मेहनत कर शहर में रोजाना घट रहे अपराधों के बारे में अखबारों और टीवी न्यूज के माध्यम से वास्तविक हकीकत दुनिया के सामने ला रहे हैं। शहर में घटी बड़ी घटनाओं का प्रेस विज्ञप्ति में बिल्कुल भी जिक्र नहीं होता है। प्रेस नोट में आमतौर पर क्षेत्र के सभी थानों में दर्ज होने वाले सारे मुकदमों का विवरण होता है। लेकिन नोएडा पुलिस प्रेस नोट में केवल निम्न स्तर के दर्ज होने वाले मुकदमों की सूचना ही पत्रकरों को ही देती है। इससे पुलिस दर्शाना चाहती है कि शहर में काइम रेट कंट्रोल में है। जो अखबारों में छपनी वाली खबरों के ठीक उलट है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बिहार में पिछले बारह सालों से अवैध प्रकाशन कर रहा है दैनिक जागरण

देश का नम्‍बर वन बताने वाला अखबार फर्जीवाड़ा करके करोड़ों रुपये का सरकारी विज्ञापन डकार चुका है. इस बात का खुलासा एक आरटीआई के माध्‍यम से हुआ है. यह अखबार भी हिंदुस्‍तान की तरह एक रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर पर कई यूनिट लांच करके नियम कानून की धज्जियां उड़ा चुका है. मुजफ्फरपुर में जागरण के पूर्व कर्मचारी रमन कुमार यादव द्वारा मांगी गई जानकारी के आधार पर आरएनआई ने स्‍पष्‍ट किया है कि जागरण ने सिर्फ पटना के लिए अखबार का रजिस्‍ट्रेशन कराया था. इसके अलावा अन्‍य यूनिटों के लिए उसका कोई रजिस्‍ट्रेशन नहीं है.

इस आरटीआई के आधार पर यह तय हो गया है कि दैनिक जागरण प्रबंधन गलत तरीके से अखबार का संचालन काफी समय से बिहार में कर रहा है. मुजफ्फरपुर, भागलपुर समेत कई यूनिट पटना के आरएनआई नम्‍बर पर संचालित किए जा रहे हैं जो प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट् -1867 की धाराएं 8(बी), 14/15 के अनुसार सही नहीं है. इसी मामले में हिंदुस्‍तान पर बिहार में मुकदमा भी दर्ज हुआ है. पुलिस जांच में इन आरोपों को प्रथम दृष्‍टया सही भी पाया गया है. 

जागरण के फर्जीवाड़े का पोल तो इससे भी खुलता है कि अब तक जागरण मुजफ्फरपुर के प्रिंट लाइन में रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर BIHHIN/2000/3097 तथा ईमेल में patna@pat.jagran.com का प्रकाशन करता था, परन्‍तु 29 जून से रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर की जगह आवेदित, memo no- 101 dated 23/6/2012 कर दिया गया है, जिसका प्रकाशन अब भी किया जा रहा है. इसके अलावा पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर तथा सिलीगुडी से प्रकाशित और पटना से मुद्रित लिखा जाता था. परन्‍तु 29 जून से मुजफ्फरपुर में अखबार का प्रिंट लाइन चेंज हो गया है. ईमेल भी बदल कर muzaffrarpur@mzf.jagran.com कर दिया गया है. साथ ही अखबार का मुद्रण एवं प्रकाशन भी मुजफ्फरपुर ही लिखा जा रहा है. पहले सभी विवाद पटना कोर्ट में सुलझाए जाने की बात लिखी जा रही थी, अब इसे मुजफ्फरपुर कर दिया गया है.

प्रिंट लाइन में चेंज करके जागरण ने खुद साबित कर दिया है कि वे पिछले बारह सालों से अखबार का पटना के अलावा अन्‍य यूनिटों से अवैध प्रकाशन कर रहा है. रमन कुमार के प्रयास ने इस कथित नम्‍बर एक अखबार का असली चेहरा लोगों के सामने ला दिया है. अगर संबंधित इकाइयां इस मामले की इमानदारी से जांच-पड़ताल करती हैं तो अरबों का विज्ञापन घालमेल और घोटाला सामने आ सकता है. रमन कुमार कहते हैं कि वे जागरण के इस फर्जीवाड़े को अंजाम तक पहुंचा कर रहेंगे. जागरण भले ही रजिस्‍ट्रेशन के लिए अभी आवेदन कर अपने बचने की कोशिश शुरू कर दी हो, पर उसे पिछले बारह सालों का हिसाब तो देना ही होगा.

रमण कुमार ने पिछले दिनों पीसीआई टीम के सामने भी पूरे मामले की पोल खोली है. इसके बाद से जागरण प्रबंधन बदहवास तथा परेशान है. रजिस्‍ट्रेशन आवेदित करने से साफ है कि दैनिक जागरण भी पूरे बिहार में गलत तरीके से सरकारी तथा गैर सरकारी विज्ञापन वसूल रहा था. एक ही एडिशन के लिए अलग अलग रेट पर अब तक करोड़ों रुपये के घोटाला किए जाने का अनुमान लगाया जाने लगा है. यानी हिंदुस्‍तान की तरह जागरण ने भी गलत तरीके से अखबार का अवैध केंद्रों से प्रकाशन कर करोड़ों रुपये के सरकार विज्ञापन की हेराफेरी की है.

सुलगती उम्‍मीदें : बारुद के ढेर पर प्रदेश

अखिलेश सरकार के चार महीने पूरा होते-होते कानून व्यवस्था की भारी समस्या खड़ी हो गयी है। दुःख की बात यह है कि प्रदेश के आला अफसरों को आपसी गुटबाजी के चलते फुरसत ही नहीं मिली कि वह कानून व्यवस्था के विषय में कुछ सोचे। वीकएंड टाइम्स ने अपने चौदह जुलाई के अंक में जो खुलासा किया, अगर पुलिस अफसर उस पर गौर कर लेते तो बरेली में हुए भंयकर हादसे को टाला जा सकता था। वीकएंड टाइम्स प्रदेश का इकलौता ऐसा अखबार है जिसने 14 जुलाई को छापा था कि प्रदेश इस समय बारुद के ढेर पर है और यहॉ सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा की जा रही है। इस रिपोर्ट के तीन दिन बाद ही बरेली में हुए दंगे ने साबित कर दिया कि वीकएंड टाइम्स की रिपोर्ट सही थी। आप भी पढ़े वीकएंड टाइम्स की यह रिपोर्ट।

चार महीने। दो साम्‍प्रदायिक दंगे। तीन जगह साम्‍प्रदायिक तनाव। पुलिस फायरिंग में तीन मौत। पुलिस हिरासत में चार मौत। एक इंस्पेक्टर, एक सब  इंस्पेक्टर और होमगार्ड की हत्या। पुलिस चौकी में बलात्कार और थाने में बलात्कार का प्रयास। एक दर्जन से अधिक जगहों पर पुलिस अफसरों की पिटाई। हाईकोर्ट पुलिस के रवैये से नाराज। राजधानी में बीते कुछ दिनों में आधा दर्जन थानों का घेराव। यह कुछ घटनायें बानगी है उस महकमे की जिसे सबसे पहले सुधारना मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का लक्ष्य था। मुख्यमंत्री के अरमानों को धत्‍ता बताते हुए प्रदेश में पुलिस महानिदेशक कार्यालय के अफसरों को फुरसत ही नहीं है कि बह आपसी गुटबाजी को भूल कर बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था के बारे में सोचें। खुफिया सूत्रों के मुताबिक प्रदेश इस समय बारूद के ढेर पर खड़ा है और मामूली सी चिंगारी भी पूरे प्रदेश में शोला भड़का सकती है। विपक्ष अब बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था को लेकर सरकार को घेरने का मन बना रहा है।

अखिलेश यादव की सरकार बनने से पहले और उसके बाद सबसे ज्यादा डर कानून व्यवस्था को लेकर ही था। लोग पिछली सपा सरकार को याद करके भयभीत थे। मगर अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले भरोसा दिलाया कि प्रदेश की जनता उन पर भरोसा कर सकती है, और उन पर यकीन करके जिस तरह जनता ने प्रचंड बहुमत अखिलेश को सौंपा वह अखिलेश की जिम्मेदारी को और बढ़ा गया। लोगों को लगने लगा कि जिस तरह अखिलेश ने चुनाव से पहले डीपी यादव को पार्टी में आने से रोका उससे उनके इरादे साफ़ थे। मगर इस बहुमत के साथ अखिलेश यादव पर दूसरों की उम्मीदों का बोझ कुछ ज्यादा ही आ गया। उनकी इच्छा नहीं थी कि राजा भैया को मंत्रिमंडल में लिया जाये। मगर उनके पिता सपा मुखिया मुलायम सिंह इस बहाने यादव, मुस्लिम और ठाकुरों का गठजोड़ बनाने में जुटे थे। लिहाजा यह दागी राजनेता ना सिर्फ अखिलेश मंत्रिमंडल में शामिल हुआ बल्कि कारागार मंत्री बन गया। अखिलेश यादव के शपथ लेने बाले दिन राजा भैया की शपथ और उसी समय मंच पर मचे हंगामे ने भी संकेत दे दिया था कि भविष्य कुछ ज्यादा बेहतर नहीं होने वाला। मगर उसके बाद अखिलेश यादव ने हंगामा कर रहे लोगों को पार्टी से निकाल कर संकेत देने की कोशिश की कि गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इसके बाद बारी थी कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बेहतर की जाये। मौजूदा डीजीपी अतुल को हटा कर अम्बरीश शर्मा को डीजीपी बनाया गया। अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था  के पद पर जगमोहन यादव को तैनात किया गया। मगर दो महीने बीतते बीतते साबित हो गया कि यह फैसला गलत था। यह दोनों अफसर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी थे। लिहाजा इनकी इन महवपूर्ण पदों पर तैनाती स्वाभाविक मानी गई। मगर जब इन दोनों में इस बात को लेकर मुकाबला शुरू हुआ कि सत्‍ता के कौन ज्यादा नजदीक है तो स्थितियां बिगडऩे लगी। यह बात निचले स्तर तक पहुच गई। परिणाम यह हुआ कि डीजीपी कार्यालय की हनक कम होती चली गई। जिलो में लगातार कानून के साथ खिलवाड़ करने की खबर आती रही। पर आला अफसरों को फुरसत ही नहीं थी कि बह आपसे झगडे छोड़ कर इन मामलो को देखें। इसी का नतीजा था कि तबादला सूची में अपर पुलिस महानिदेशक के हस्तक्षेप से नाराज आईजी संदीप सालुके ने एक महीने की छुट्टी पर जाना उचित समझा।

लगातार बिगड़ रही स्थितियों से नाराज मुख्यमंत्री ने प्रमुख सचिव गृह समेत डीजीपी और एडीजीपी को अपने घर बुला कर जबरदस्त डांट लगाई और साफ़ साफ़ कह दिया कि कानून व्यवस्था के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। मगर पुलिस महकमे पर इस डांट का भी कोई फर्क नहीं पड़ा। जिले स्तर पर पुलिस तैनाती में कोई भी मापदंड नहीं रखा गया।  केवल निचले स्तर पर ही यह हाल हो ऐसा भी नहीं है। जिलो में पुलिस अधीक्षक तक की तैनाती मानो मजाक बन कर रह गई। हालात इतने बदतर हो गए कि चार महीनों में कुछ जिलों में चार चार पुलिस अधीक्षक बदल दिए गए। इस तरह तबादलों के खेल में उंगली उठाना स्वाभबिक थी। और इसी दौरान यह चर्चा तेज हो गई कि पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में तीन से पांच लाख रुपए लेकर थानों में तैनाती की जा रही है। जाहिर है जब पुलिस के सबसे बड़े दफ्तर पर इस तरह उंगलिया उठेंगी तो नीचे वालो से तो कोई उम्मीद करना ही बेमानी है।   

नाराज मुख्यमंत्री ने 18 मई को जिला एवं मंडल स्तर के सभी अफसरों की बैठक बुलाई। उन्होंने सभी अफसरों को सख्त शब्दों में समझाया कि अब ढ़िलाई बरदाश्त नहीं की जायेगी। उन्होंने कानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए सिर्फ 15 दिन का समय दिया। मगर हालात सुधरने की जगह और बिगड़ गये। मथुरा के कोसी कलां में पुलिस की लापरवाही के चलते साम्प्रदायिक हिंसा भड़क गई और अल्पसंख्यक समुदाय के तीन लोगों की इसमें मौत हो गयी। पुलिस के बड़े अफसरों का ही एक गुट यह प्रचारित करने में जुट गया कि डीजीपी स्वयं मथुरा के हैं इसलिए मथुरा के किसी अफसर की तैनाती उनकी राय के बिना नहीं होती। लिहाजा मथुरा में दंगों का होना खुद डीजीपी के लिए गंभीर बात है। यह मामला खत्म भी नही हुआ था कि प्रतापगढ़ में मामूली विवाद में अल्पसंख्यक समुदाय के सैकड़ों घरों में आग लगा दी गयी। लोगों के गुस्से का अलम यह था कि उत्‍तेजित भीड़ ने डीएम की गाड़ी तक पलट दी।

इन घटनाओं ने सरकार के पसीने छुड़ा दिये। दोनों स्थानों पर ज्यादा नुकसान अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का हुआ था। इसी समुदाय के एक जुट होकर वोट करने के कारण समाजवादी पार्टी अपने शीर्ष तक पहुंची है। इसके अलावा 2014 के लोक सभा चुनाव में सपा के सारे सपने इसी वोट बैंक पर टिके हैं। मगर इन दोनों घटनाओं ने अल्पसंख्यक समुदाय को बहुत नाराज कर दिया। कोसी में फलों का ठेला लगा रहे राशिद का कहना था कि हम सबको लग रहा था कि हमारी ही सरकार बन गयी है। यहां तो उल्टा ही हो गया। सपा के लिए खतरनाक बात यह भी है कि अल्पसंख्यक समुदाय अब इन मामलों की तुलना पिछली सरकार से करने लगा है। इन घटनाओं के बाद प्रदेश में कई स्थानों पर ऐसी मामूली घटनायें घटी जिसके बाद दोनों समुदायों के लोग आमने सामने आ गए। खुफिया तंत्र ने आगाह किया है कि प्रदेश के कई स्थानों पर साम्‍प्रदायिक उन्माद भड़काने की तैयारी है। स्थानीय निकाय चुनावों में जीत के बाद भाजपा को भी धार्मिक आधार पर खेल करने का इससे बढिय़ा मौका कुछ और नहीं मिल सकता इससे निपटने की जगह प्रदेश के काबिल अफसर किसी और मुद्दे पर ही उलझ रहे हैं।

उधर पुलिस महकमे का एक और आदेश पूरे महकमे का मजाक बनकर रह गया है। बसपा सरकार ने महानगरों में एसएसपी के पद को समाप्त कर वहां डीआईजी को तैनात करने का आदेश कर दिया था जो एसएसपी का कार्य संभालते थे। मगर सपा सरकार ने सत्‍ता में आते ही यह व्यवस्था समाप्त कर दी थी। जिस समय यह व्यवस्था समाप्त की गयी उस समय लखनऊ के डीआईजी आशुतोष पाण्डेय थे। स्वाभाविक था कि इस शासनादेश के बाद यहां भी एसएसपी की तैनाती होती। उन्होंने लखनऊ में ही बने रहने की नायाब तरकीब निकाली। उन्होंने माया सरकार के घोटालों खासतौर से अम्बेडकर पार्क से जुड़े मामलों में एफआईआर दर्ज करवाना शुरू कर दी। वह सरकार को संदेश देना चाहते थे कि अगर वह लखनऊ के कप्तान बने रहेंगे तो माया सरकार के कई घोटालों की एफआईआर दर्ज हो जायेगी। उनकी यह तरकीब काम कर गयी। और शासनादेश को ताक पर रख कर उन्हें ही लखनऊ का एसएसपी बने रहने दिया गया।
आशुतोष पाण्डेय को परेशानी उस समय शुरू हुई जब उनके बैच के लोगों ने पदोन्नति न होने पर नाराजगी जताई। 1992 बैच के कुछ अफसरों ने डीजीपी और प्रमुख सचिव गृह से मुलाकात कर मांग की कि अविलम्ब उनके बैच को प्रोन्नत किया जाये। हालांकि आशुतोष पाण्डेय यह प्रोन्नति नहीं चाहते थे। क्योंकि ऐसा होने पर उन्हें लगता था कि आईजी बनते ही उनके हाथ से लखनऊ चला जायेगा। यह बात सही भी लगती थी क्योंकि लखनऊ में आईजी के पद पर सुभाष चन्द्र तैनात हैं जो मुख्यमंत्री के सचिव अनीता सिंह के पति हैं। उन्हें हटा पाना आशुतोष पाण्डेय की बस की बात नहीं थी। मगर जब यह नाराजगी बढ़ी तो 1992 बैच के अफसरों को आईजी बना दिया गया।

मगर इस पदोन्नति के बाद लगभग दो माह बीतने पर वो हुआ जो इस प्रदेश में कभी नहीं हुआ कि राजधानी लखनऊ में एसएसपी, डीआईजी तथा आईजी के पद पर एक ही व्यक्ति को तैनात रखा गया हो। मगर आशुतोष पाण्डेय के लिए यूपी में मानों नियम कायदे ताक पर रख दिये गये। लखनऊ में अपराधों की बाढ़ आ गयी। राजधानी में सनसनीखेज हत्याकांड हो गये। थानों पर तैनाती इतनी जल्दी होने लगी कि सभी हैरान रह गये। थानों पर तैनाती के सभी नियम ताक पर रख दिये गये। इंस्पेक्टर रैंक के थानों को सब इंस्पेक्टरों से चलवाया जाने लगा। सारे खेल में पैसों की बड़ी भूमिका सबको नजर आने लगी। पुलिस कानून व्यस्वथा के काम छोड़कर जमीनों के धंधे में लग गयी। यह सब राजधानी में हो रहा था। यही कारण रहा कि पुलिस बेलगाम होती चली गयी और माल थाने के एक दरोगा ने थाने में एक महिला को बुलाकर उससे बलात्कार करने की कोशिश की। घटना के दिन आईजी आशुतोष पाण्डेय ने दरोगा को मंदबुद्घि बताकर उसका बचाव करने की कोशिश की। मगर अगले दिन मामला उछल जाने पर दरोगा, थानाध्‍यक्ष और सीओ के विरुद्घ कार्रवाई करनी पड़ी। मगर लखनऊ के एसएसपी का काम संभाल रहे आशुतोष पाण्डेय पर कोई फर्क नहीं पड़ा। हालत की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने खुद डीजीपी को तलब करके उन्हें पुलिस की कार्यशैली पर जमकर फटकारा। एक सप्ताह पहले ही हाईकोर्ट मिर्जापुर के एक मामले में कह चुका था कि यूपी में कानून व्यवस्था को सुधारा जाये। मगर हाई कोर्ट के इस आदेश का असर पुलिस विभाग पर पड़ता नजर नहीं आया।

जब डीजीपी से पूछा गया कि बदायूं में पुलिस चौकी पर बलात्कार होने पर एसएसपी को हटा दिया गया तो लखनऊ के एसएसपी का काम संभाल रहे आशुतोष पाण्डेय पर यह मेहरबानी क्यों। तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया। लखनऊ अकेला चर्चा में न रहे इसलिए कानपुर और मेरठ में भी इस शासनादेश को लागू नहीं किया गया। इन स्थितियों से अपराधों के ग्राफ में तेजी से बढ़ोत्‍तरी होती जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर का कहना है कि योग्य पुलिस अफसरों की प्रदेश में कोई कमी नही है। मगर राजधानी में एसएसपी भी तैनात न होना वाकई हैरान करने वाला है। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर का कहना है कि पूरी सरकार कन्‍फ्यूजन में है। सपा कार्यकर्ता ही कानून व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनके खिलाफ साजिश हो रही है तो उन्हें इंटेलीजेंस विभाग से मालूम करके बताना चाहिए कि कौन लोग उनके खिलाफ है साजिश कर रहे हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट का कहना है कि यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है कि सभी दल अपनी सरकार की उपलब्धि बताते हुए आंकड़े गिनाते हैं कि उनके कार्यकाल में हत्याओं और अपहरण या डकैती जैसे अपराध कम हुए हैं। सारी बात सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित रह जाती है उनका कहना था कि सपा सरकार में कानून व्यवस्था और बसपा सरकार में भ्रष्‍टाचार कोई मुद्दा नहीं है। जाहिर है यह हालात उस मुख्यमंत्री के लिए खतरे की घंटी है जो कानून व्यवस्था को सुधारने का दावा करके सत्‍ता में आये थे और अगर यही हाल रहा तो लक्ष्य 2014 सपा के लिए बहुत दूर का सपना रह जायेगा।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

अजीत का रिपोर्ट क्‍यों नहीं दर्ज कर रही है नोएडा पुलिस?

: वरिष्‍ठ पत्रकार नवीन लाल सूरी के चैन लुटेरे का क्‍यों नहीं चला पाया पता? : कहां चली गई नोएडा पुलिस की बहादुरी? यशवंत को फर्जी एफआईआर दर्ज होने के दो घंटे के भीतर गिरफ्तार करवाने वाले एसएसपी प्रवीण कुमार अब तक सहारा समय के सीनियर क्राइम रिपोर्टर नवीन लाल सूरी की चैन लूटने वालों का पता नहीं लगा सके, जबकि उनके पास सीसी टीवी का फुटेज भी मौजूद था. वहीं सेक्‍टर 58 के तेजतर्रार और बहुत तेजी से एफआईआर दर्ज करने वाले प्रभारी की तेजी को क्‍या हो गया, जो ताला तोड़कर हुई चोरी की घटना को दर्ज करने से इनकार कर रहा है.

मामला सेक्‍टर 66 का है. सेक्‍टर 62 के कार्तिक इंफोटेक के काम करने वाले अजीत यादव सेक्‍टर 66 में किराए के मकान में रहते हैं. बीते 18 तारीख को वे कहीं बाहर गए हुए थे तब उनके कमरे का ताला तोड़कर किसी ने उनका लैपटॉप तथा मोबाइल फोन चोरी कर लिया. अजीत जब अपनी शिकायत लेकर सेक्‍टर 58 पहुंचे तो फर्जी मामलों में तत्‍काल रिपोर्ट दर्ज करने वाला प्रभारी अजीत का एफआईआर दर्ज करवाने की बजाय उन्हें सेक्‍टर 50 चौकी जाने की सलाह दी.

अजीत जब सेक्‍टर 60 चौकी पहुंचे तो उनका एफआईआर लिखने से इनकार कर दिया गया. पुलिस वालों ने कहा कि ताला तोड़कर चोरी करने की एफआईआर नहीं लिखी जाएगी. अगर एफआईआर करवाना है तो लिखो कि तुम ऑटो से जा रहे थे और लैपटॉप और मोबाइल दोनों भूल गए. अजीत बिना रिपोर्ट लिखे वापस लौट आए. अजीत ने भड़ास के पास अपनी शिकायत भेजी है जिसे नीचे प्रकाशित भी किया जा रहा है.

''My Laptop and mobile phone has been stolen from my room by breaking door lock…  Police is refusing to note FIR by saying "agar FIR likhwani h to ye mat likhwao ki taala tod k chori ki kisi ne balki ye likhwao ki main auto se ja raha tha aur auto me apna laptop bhul gaya " agar sacchi FIR likhwani h to paise do.

MERA BHARAT MAHAAN

main chakkar kaat kaat k pareshan ho gaya hu, mere friend ne http://www.bhadas4media.com/ is site ka adderess diya tha please meri madad kijiye. Mera police thana sec 58 h aur police chowki – 60 ki lagti h. mera adderess h Ajeet yadav c/o Shri Ramveer singh r.k. public school k piche, Mamura sec 66, Noida.mobile no- 9555226879''

आखिर इन मामलों में क्‍यों अपनी असली औकात में आ गई नोएडा पुलिस. कहां चली गई एसएसपी प्रवीण कुमार और उसकी टीम की बहादुरी. सच तो यह है कि नोएडा पुलिस फर्जी मामलों में जबर्दस्‍त तेजी दिखा रही है, जबकि जो असली मामले हैं उनके वो अपने असली औकात पर आ जा रही है. नवीन लाल जी के मामले में फुटेज होने के बाद भी चैन लुटेरों का पता नहीं लगा पाई पुलिस. जेन्‍यूइन मामलों में एफआईआर तक दर्ज नहीं की जा रही है. क्‍या यही है अखिलेश और उनका समाजवाद?

भास्‍कर से वरिंदर राणा व अखिलेश बंसल का इस्‍तीफा

बठिंडा : पहले ही रिपोर्टरों की कमी से जूझ रहा दैनिक भास्कर, बठिंडा यूनिट का कार्यालय खाली होने के कगार में पहुंच गया है। हाल ही में बठिंडा कार्यालय में क्राइम देखते सीनियर रिपोर्टर वरिंदर राणा व अखिलेश बंसल ने भास्कर प्रबंधन को अपना इस्तीफा भेज दिया है। बताया जाता है कि इस्तीफा दे चुके वरिंदर राणा पंजाब में जल्द लांच होने जा रहे पंजाब की शक्ति से अपनी नई पारी की शुरुआत कर सकते हैं वहीं अखिलेश बंसल ने प्रिंट मीडिया को अलविदा कह कर अपनी पारी एक न्यूज चैनल से की है। चैनल का नाम नेटवर्क १० बताया जाता है। इन दोनों रिपोर्टरों के जान से भास्कर सिटी टीम में रिपोर्टरों का टोटा हो गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले भास्कर से रिपोर्टर कम सब एडिटर चंदन सिंह, रिपोर्टर नितिन सिंगला, मनीष शर्मा, राजेश नेगी, लता मिश्रा, शशिकांत शर्मा इस्तीफा दे चुके हैं। सिटी में रिपोर्टरों की कमी के चलते हाल ही में प्रबंधन ने सिरसा से एक रिपोर्टर रामकमल कटारिया को बठिंडा के लिए तैनात किया है। भास्कर के ही सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पंजाब की शक्ति के जिला इंचार्ज बनने जा रहे वरिंदर राणा के साथ कुछ अन्य रिपोर्टर भी भास्कर का दामन छोडऩे का मन बना चुके हैं। वहीं प्रेस फोटोग्राफरों में से एक फोटोग्राफर ने भी वरिंदर राणा के साथ जाने का मन बना लिया है। ये भी बताया जाता है कि दैनिक भास्कर बठिंडा के पहले ब्‍यूरो चीफ ऋतेश श्रीवास्तव के इस्तीफा देने के बाद से रिपोर्टरों के इस्तीफा देने का सिलसिला शुरू हो गया था। वहीं भास्कर को एक साल के करीब पहले अलविदा कह चुके हैं राजेश नेगी ने कुछ समय पहले ही अमर उजाला छोड़कर भास्कर को थाम लिया है।

आओ मिल कर जश्न मनायें, समाजवाद मजबूत हो रहा है

देश के मालिक के नाम से प्रख्यात आम आदमी की दशा चरित्र-चित्रण करने लायक भी नहीं बची है। गांव का राशन डीलर पंक्तिबद्ध खड़ा कर नागरिकों के नाम ऐसे पुकारता है, जैसे खैरात बांट रहा हो। अस्पताल में पर्ची बनाने से लेकर डाक्टर के पास जाने तक दस से ज्यादा बार झिडक़ दिया जाता है इसी आम आदमी को। रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते समय बीस हजार का नौकर इसी आम आदमी से गुलाम से भी बदतर व्यवहार करता देखा जा सकता है।

डीएम से मिलने आये एक बुजुर्ग आम आदमी को खांसी आ गयी, तो सरकार का सफेद टोपा धारण किये साहब ने उस आम आदमी को ऐसे डांटा कि उसे फिर खांसी नहीं आई, जबकि खांसी की बीमारी भगाने के लिए वह तमाम तरह के नुस्खों का प्रयोग कर चुका था। यही आम आदमी एसपी साहब से मिलने पहुँचा, तो लाल आंखों को और बड़ा कर दुत्कारते हुए लाल टोपी वाला सिपाही बोला कि घर में काम धंधा नहीं है, जो सुबह-सुबह ही आ धमकते हो। आम आदमी गिड़गिड़ाया कि साहब, बहुत परेशान हैं, मिला दो। पुन: झिडक़ता हुए सिपाही बोला- उधर बैठ जाओ और बात मत करना, अंदर विधायक जी बैठे हैं, उन्हें निकल आने दो बाहर, चालीस-पचास लोग इकटठे हो जायेंगे, तो एक साथ मिला देंगे। करीब एक घंटे बाद विधायक जी निकले, तो आम आदमी की आंखों में चमक आ गयी कि अब उसकी मुलाकात हो जायेगी, तभी सत्ताधारी पार्टी का एक खास आदमी आ गया और वह साहब के साथ एसी रूम में बैठ कर ऐसा व्यस्त हुआ कि पता ही नहीं चला कि कब एक घंटा गुजर गया?

उस खास आदमी के निकलने से पहले बाहर पचास से अधिक आम आदमी जमा हो चुके थे, सभी मिलने को आतुर थे, लेकिन तभी चौथे स्तंभ के कुछ ठेकेदार आ धमके और एसी रूम में बैठ कर साहब की कार्यप्रणाली को विश्व स्तरीय बताते हुए ठंडे के साथ पकौड़े खाते रहे, पर आम आदमी की बात किसी ने नहीं की। साहब और पत्रकार साथ-साथ बाहर निकले। बाहर पचास-साठ लोगों की भीड़ देख कर साहब का सिर भन्ना गया। सिपाही की ओर इशारा करते हुए साहब ने कहा कि सबसे प्रार्थना पत्र लेकर जमा कर लो। सिपाही ने दौड़ कर सभी के हाथों से कागज के टुकड़े झपट लिये और पूरी की पूरी गड्डी स्टेनो के पास पटक दी। स्टेनो को समय मिलेगा, तो आम आदमी को न्याय मिल जायेगा, पर पता नहीं कि कब मिले समय। उत्तर प्रदेश के हर हिस्से की लगभग यही

बीपी गौतम
कहानी है। आम आदमी कांग्रेस से तंग है, बसपा के कुशासन से आजिज आ ही चुका था, सांप्रदायिक भाजपा से तो पहले से ही नाराज है, तभी तो उसने समाजवाद को चुना है और जब चुन लिया है, तो सर्वश्रेष्ठ ही है। समाजवाद निरंतर आगे बढ़ रहा है, इसलिए समाजवादी शासन की आलोचना करने वाले हम कौन होते हैं? जय समाजवाद।

लेखक बीपी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 8979019871 के जरिए किया जा सकता है.

पत्रकार सम्‍पूर्णानंद दूबे के पिता का निधन

मऊ। पत्रकार सम्पूर्णानंद दूबे के पिता कैलाश नाथ दूबे का निधन मंगलवार की सुबह उनके पैतृक आवास बगली पिज़ा पर हो गया. वे 75 वर्ष के थे तथा लम्‍बे समय से बीमार चल रहे थे.  निधन की जानकारी होते ही उनके पैतृक आवास पर पत्रकारों ने पुंचकर शोक जताया और शोक संतप्‍त परिवार को ढांढस बंधाया. देर रात जनसंदेश कार्यालय में हुई शोकसभा में पत्रकारों ने दो मिनट मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की और परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना की कि शोक संत परिवार को इस असीम दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें.

इस मौके पर हरिद्वार राय, अजय सिंह, आनंद तिवारी, प्रमोद, आनंद गुप्‍ता, धीरेन्द्र चौरसिया, डा. एसके जमा, अवधेश राय, संदीप गुप्‍ता, जगदीश सिंह, डा. जयप्रकाश यादव, योगेन्द्र यादव, हरिश्चंद्र पाल आदि मौजूद रहे. उधर पत्रकार विनय जायसवाल, सुधीर ओझा, पुष्‍पेन्द्र त्रिपाठी, प्रदीप सिंह, ऋषिकेश पाण्डेय, डा. आजाद नोमानी, अरूण सिंह, राहुल सिंह, अश्वनी मिश्रा, विजय मिश्रा, राकेश सिंह, अमश सिंह, वंशबहादुर, धनंजय, नागेन्द्र राय, एसपी भारती, अच्युतानंद उपाध्याय, बालचंद त्यागी, दुर्गा किंकर सिंह, कल्याण सिंह, फोटोग्राफर रामनश पाण्डेय, अनिल गुप्‍ता, पुनीत श्रीवास्तव, अशरफ, वीरेन्द्र कुमार, अप्पू सिंह ने पत्रकार सम्पूर्णानंद के पिता के आकस्मिक निधन पर गहरा दुख जताया और शोक संवेदना शोक संतप्‍त परिजनों को भेजी। उनका अंतिम संस्कार गाजीपुर गंगा तट पर किया गया। मुखाग्नि उनके पुत्र सम्पूर्णानंद दूबे ने दी।

यशवंत-जेल : आगामी बुधवार को जिला मुख्‍यालयों पर धरना देंगे पत्रकार

फरीदाबाद : भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत की गिरफ़्तारी के विरोध में पत्रकारों की बैठक फरीदाबाद के धर्मशाला में आयोजित की गई. कार्यक्रम की अध्‍यक्षता भांडा फोड़ इंडिया के ग्रुप एडिटर कुमार मधुकर ने की. बैठक में शामिल दर्जनों पत्रकारों ने एक स्वर से भड़ास4मीडिया  के संपादक यशवंत के गिरफ़्तारी की आलोचना की. साथ ही पत्रकारों की आवाज को बुलंद करने के लिए अगले सप्ताह के बुधवार को जिला मुख्यालय के सामने धरना देने का फैसला किया गया.

भांडा फोड़ इंडिया के ग्रुप एडिटर कुमार मधुकर ने बैठक में हुंकार भरते हुए पत्रकारों से कहा कि अब सोचने से नहीं अब कुछ कर गुजरने से काम बरेगा. उन्होंने नेशनल न्यूज़ पेपर व टीवी के पत्रकारों से भी आह्वान किया वे डरें नहीं समय का मुकाबला डट कर करें और आन्दोलन के लिए खुलकर सामने आयें. अब वह समय आ गया है जब अस्तित्व कि लड़ाई लड़नी है.

पत्रकार संदीप कुमार ने अगले सप्ताह के बुधवार को दर्जनों मीडियाकर्मियों को यशवंत की गिरफ़्तारी के विरोध में जिला मुख्यालय पर धरना में शामिल होने को कहा. पत्रकार अजेश कुमार, परमेश ठाकुर, रवि शंकर, श्याम सिंह, रामबीर शर्मा, गगन, त्रिपुरारी सिंह के अलावा अन्य दर्जनों पत्रकारों ने जिला मुख्यालय पर धरना में शामिल होने का आह्वान किया.


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Yashwant Singh Jail

इशान टाइम्‍स के पत्रकार कमल पर जानलेवा हमला

जीरकपुर : कल शाम इशान टाइम्‍स संवाददाता कमल कलशी को जीरकपुर में एक ढाबा मालिक द्वारा देह व्यापार के लिये रूम देने की सूचना मिली. इसकी जानकारी के लिए वे शिमला रोड पर स्थित प्रधान ढाबा पर पहुंचे. अभी वे जानकारी ले ही रहे थे कि चार व्‍यक्तियों ने उनके ऊपर जानलेवा हमला कर दिया. आस पड़ोस के लोगों द्वारा अपराधियों का मुकाबला करने से पत्रकार कमल कलशी की जान बच गयी. घटना की जानकारी पुलिस को देने के एवज में उन्‍हें अज्ञात व्यक्तियों द्वारा गंभीर रूप से घायल कर दिया गया.

कमल कलशी ने बताया कि ढाबा मालिक कुल्बिंदर सिंह और उसका पुत्र हरजीत सिंह ने अपनी ढाबे के उपरी मंजिल में कई कमरे बना रखे हैं और उन कमरों को देहव्यापार करने और कराने वालों को 400 -500 रुपये घंटे के हिसाब से उपलब्ध करवाता है. इसकी सूचना उन्हें क्षेत्रीय लोगों द्वारा मिली थी. सबूत इकठा करने और रंगे हाथों पकड़ने के लिए वे 23 जुलाई शाम 5 बजे शाम वहां पहुंच गए. उन्होंने एक लड़का और लड़की को ढाबे की उपरी मंजिल पर चढ़ते देखा और इसकी सूचना बलताना पुलिस चौकी को दे दी. इतनी देर में ढाबा मालिक के पुत्र हरजीत को इसकी भनक लग गयी कि कलशी ने पुलिस को बुला लिया है. जब तक पुलिस आती

कमल
तब तक उसने लड़का-लड़की को भगा दिया. जब लड़का और लड़की भागने लगे तो कलशी  ने अपने मोबइल से फोटो खिंच लिया.

कलसी के अनुसार वे वहां आस पास के लोगों से जानकारी इकठा कर ही रहे थे कि इतने में वह लड़का जो थोड़ी देर पहली लड़की लेकर आया था, हथियारों से लैस होकर अपने 4 साथियों के साथ आ धमका और आते ही उसने पूछा तू कोण है. और क्यों फोटो खिंच रहा है. इन्होंने जब बताया कि वे पत्रकार हैं तो वह उनसे गाली-ग्‍लौज करने लगा कलशी जब पुलिस को फोन करने लगे तो उसने कलशी का फ़ोन छीन लिया और और ताबडतोड़ वार करने लगा. कलशी तक तक संभल भी नहीं पाए थे. कलशी पर हमले और लड़ाई का शोर सुन कर लोग इकट्ठा हो गए. लोगों को आता देख हमलावर के साथियों ने चाकू निकाल लिया, पर स्‍थानीय लोगों के तेवर देख हमलावर भाग निकले. 

कलशी ने पुलिस में अपनी शिकायत दर्ज करा दी है. पुलिस ने कलशी का मेडिकल कराने के बाद ढाबा मालिक हरजीत सिंह को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है. स्‍थानीय पत्रकार तथा समाचार मालिकों ने पत्रकारों पर हो रहे हमले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन से सुरक्षा सुनिश्चित करवाने तथा अपराधियों को शीघ्र गिरफ्तार करने की मांग की है. इशान टाइम्‍स के संपादक संजय राय, चंडी भूमि के समाचार संपादक विनोद शर्मा, मंगला टाइम्‍स के संपादक अजय गुप्‍ता, पंचकुला प्रेस क्‍लब के महासचिव सुरेंद्र गोयल पुलिस चौकी पहुंचकर हमलावरों की शीघ्र गिरफ्तारी की मांग की.

महुआ को लेकर गलत रिपोर्ट पेश कर रहे हैं कुमार सौवीर

महुआ समूह के प्रमुख पीके तिवारी को उनके बेटे आनंद तिवारी के साथ सीबीआई ने गिरफ्तार किया है और कोर्ट ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। ये खबर सोलह आने सच है। लेकिन महुआ न्यूज के कभी यूपी के वरिष्ठ संवाददाता रहे कुमार सौवीर जिस तरह से इस पूरे मामले को झूठ की चाशनी के साथ चटखारे लेकर परोस रहे हैं वो उनकी तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता पर सवाल खड़े करने को काफी है। इस पूरे मामले में उनका व्यक्तिगत पूर्वाग्रह उनकी निष्पक्षता पर हावी दिखता है।

सौवीर जी स्वतंत्र पत्रकार हैं लेकिन खबर लिखने की स्वघोषित आजादी में वो जिस तरह पीके तिवारी के बेटे आनंद तिवारी के साथ अभिषेक तिवारी के भी गिरफ्तार होने और जेल जाने की बात लिख गए हैं उसके लिए वो खुद बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं। अभिषेक तिवारी को सीबीआई ने गिरफ्तार नहीं किया है लेकिन सौवीर जी ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा साफ-साफ लिखा है। एक बड़े संस्थान के बारे में,- जिससे हजारों लोगों के सरोकार जुड़े हैं उसे लेकर ऐसी तथ्यहीन बातें लिखने का मतलब क्या बनता है वो बेहतर जानते हैं।

महुआ समूह में कर्मचारियों को 3 महीने से वेतन नहीं मिलने की बात पूरी तरह गलत है। साल भर से संकट में होने के बावजूद इस समूह के कर्मचारियों को प्रबंधन वेतन दे रहा है लेकिन वित्तीय संकट की वजह से थोक के भाव में कर्मचारियों की छंटनी का इस संस्थान ने कभी सहारा नहीं लिया। उल्टे यूपी-उत्तराखंड के लिए नए न्यूज़ चैनल की सफल शुरुआत करके नई चुनौती भी स्वीकार की। यह सही है कि इस संस्थान में सैलरी समय पर नहीं मिलने जैसी समस्या हो रही है, पिछले 6 महीनों से इस समूह के दो न्यूज़ चैनलों महुआ न्यूज और महुआ न्यूज़लाइन में वेतन 15 से 20 दिन की देरी से मिल रहा है। लेकिन इसके बारे में आंतरिक तौर पर कर्मचारियों को भरोसे में लेने की हमेशा कोशिश हुई है। श्रमविवाद जैसी स्थिति पैदा नहीं हुई है। वजह है पीके तिवारी को लेकर महुआ के कर्मचारियों में आत्मीयता का भाव है।

पीके तिवारी पर कई आरोप लगाए जा सकते हैं, और लगते भी रहे हैं, लेकिन दूसरे मालिकों की तरह खबरों के चयन में टांग अड़ाना, न्यूजरूम में मालिकाना धमक दिखाना, हर संकट का समाधान छंटनी कर के निकालना, – कम से कम ऐसी कोई भी बात तिवारी के लिए सही नहीं है। महुआ के न्यूज़रूम से सरोकार रखनेवाले लोग जानते हैं कि यहां से शोर-शराबे और बेकार की डांट-फटकार का वास्ता नहीं। इंक्रीमेंट समय पर नहीं होने को लेकर कर्मचारी भले ही निराश हों लेकिन महुआ समूह पर आंच आने पर सभी एकजुट दिखते हैं। महुआ समूह संकट में है ये सबको पता है लेकिन कोई ये कहता नहीं मिलेगा कि शटर बंद हो जाएगा। वजह है सेंचुरी कम्युनिकेशन की मजबूत वित्तीय हैसियत और महुआ समूह की ठोस अचल संपत्ति। पीके तिवारी अब अपनी देश भर में पहचान महुआ समूह से जोड़कर देखते हैं इसलिए वो समूह को संभालने के लिए जो कर सकते हैं करते रहे हैं और इसमें सफल हुए हैं।

ये समूह वॉयस ऑफ इंडिया चैनल की तरह न तो किराए की बिल्डिंग में चल रहा है और न ही किराए के सामानों से चल रहा है, न ही बेकार के तामझाम पर पैसा पानी की तरह बहा रहा है। सच तो ये है कि किराए के सभी संसाधन वित्तीय संकट की हालत में वापस कर दिए गए हैं तब भी यहां के पत्रकारों का मनोबल ऊंचा रहा और वे बेहतर नतीजे देते रहे। मौजूदा स्थिति में महुआ न्यूज़ बिहार पूरी तरह विज्ञापनों के दम पर अपने खर्चे निकाल रहा है, महुआ एंटरटेनमेंट और महुआ न्यूज चैनल इस वक्त इतना राजस्व दे रहे हैं कि नए चैनल महुआ न्यूजचैनल पर किसी तरह की आंच नहीं आ सकती। जो खुद आत्मनिर्भर होने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है।

संकट की इस हालत में भी सबसे बेहतर पक्ष ये है कि इस दौरान महुआ समूह के तमाम चैनल्स की लोकप्रियता आसमान पर है। महुआ समूह से जुड़े लोगों ने अपनी पेशेवर प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं की, मनोबल को ऊंचा रखा और बेहतरीन कंटेंट के साथ अपने दर्शकों की उम्मीदों को पूरा किया। यही वजह है कि महुआ अपने एंटरटेनमेंट सेगमेंट में अव्वल है तो वहीं महुआ न्यूज़ बिहार और झारखंड में निर्विवाद रूप से नंबर एक की गद्दी पर काबिज है। बिहार में लगातार साढ़े 4 महीने नंबर 1 रहकर इसने रिकॉर्ड बना डाला है। हफ्ते भर के लिए कभी नंबर दो होने के बाद फिर से नंबर 1 पर काबिज होना महुआ न्यूज़ की सफलता की कहानी बयां करता है।

यूपी और उत्तराखंड की बात करें तो महुआ न्यूज़लाइन चैनल जनवरी में लॉंच हुआ था लेकिन महज 6 महीने की अवधि में ये उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे पर अपनी सफलता के परचम लहरा रहा है। हालत ये है कि महुआ न्यूजलाइन की खबर के बाद सीएम विजय बहुगुणा सफाई देने के लिए भी इसी चैनल को चुनते हैं और बाबा रामदेव खुद से जुड़े मुद्दों पर फोन करके आधे घंटे तक अपनी बात रखते हैं। इसके साथ ही इस चौनल पर होनेवाली राजनीतिक बहस में प्रदेश के सभी दलों के वरिष्ठ नेता शामिल होने को वरीयता देते हैं। बावजूद इसके इस चैनल के बंद हो जाने की बात कहनेवालों की सोच पर सिवाय तरस खाने के और क्या किया जा सकता है।

जहां तक महुआ समूह की सबसे बड़ी ताक़त महुआ एंटरटेनमेंट की बात है तो यहां सैलरी का संकट नहीं है। मनोरंजन चैनल होने की वजह से भारी भरकम खर्चों में यहां बहुत हद तक कटौती हुई है और भुगतान का संकट इक्का-दुक्का बार पैदा हुआ है लेकिन महुआ अपनी साख बचाने में कामयाब रहा है। शत्रुघ्न सिन्हा और सौरव गांगुली जैसे बेहतरीन कलाकार और खिलाड़ी को वायदे के मुताबिक मेहनताना नहीं देने के आरोपों से ये चैनल दो चार हुआ, विवाद काफी बढ़ा। बावजूद इसके समूह ने कभी ये नहीं कहा कि हम किसी भी पेशेवर का बकाया मेहनताना नहीं देंगे। आर्थिक संकट होने की वजह से ये सारे विवाद पैदा हुए। और ये संकट कुछ राजनेता, कुछ बड़े पत्रकारों और कुछ व्यवसायियों की साजिश की वजह से खड़ा हुआ। जिन्होंने पहले तिवारी से दोस्ती गांठकर ढेरों लाभ हासिल किए, खुद को मजबूत किया और फिर पीठ में खंजर भोंक दिया। इन्होंने महुआ समूह पर संगीन आरोप लगाकर इतनी जगह, इतनी शिकायतें की कि समूह पर दबाव बढ़ गया।

महुआ समूह से जुड़ी कंपनियों का कुल व्यवसाय इस वक्त दो हज़ार करोड़ रुपए से ऊपर है। और ये एंटरटेनमेंट, न्यूज, प्रोडक्शन, एडवर्टिजमेट से लेकर फिल्म और डिस्ट्रीब्यूशन तक फैला हुआ है। इन सब तथ्यों के आलोक में महुआ समूह और उसके मौजूदा संकट और का आकलन होना चाहिए। न कि झूठे तथ्यों के आधार पर भ्रम फैलाया जाना चाहिए। फिर भी व्यक्तिगत खुन्नस निकालनी हो तो कुमार सौवीर बेशक निकालें लेकिन खुद को पत्रकार बताकर झूठ न लिखें। इससे पत्रकारों का भी मान गिरता है।

विनय आर्यदेव

महुआ न्यूज़

anshuk92@yahoo.com  

पत्रकार के भाई के हत्यारोपी विधान पार्षद गिरफ्तार

 

पत्रकार नीरज के भाई धीरज हत्याकांड मामले में मुख्य आरोपी विधान पार्षद अशोक अग्रवाल को 22 जुलाई के रात करीब 12 बजे कटिहार के पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। सुबह साढ़े छह बजे मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी राघवेन्द्र मणि त्रिपाठी के समक्ष विधान पार्षद अशोक अग्रवाल को पेश किया गया। श्री त्रिपाठी ने उनपर लगाए आरोपों को विस्तृत से बताया तथा उनसे रास्ते में पुलिस के द्वारा किसी भी दु‌र्व्यवहार के विषय में पूछा। एमएलसी ने दु‌र्व्यवहार से इंकार किया। श्री त्रिपाठी ने उन्हें 4 अगस्त 2012 तक के लिए न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। 
 
एमएलसी को सुबह सात बजे कटिहार मंडल कारा भेजा गया। सोमवार को उनकी तरफ से जमानत के लिए कोई पर्चा दाखिल नहीं किया गया है। जानकारी हो कि नीरज महतो ने अपने भाई की हत्या का आरोप लगाते हुए एमएलसी अशोक अग्रवाल के खिलाफ नगर थाने में 17 जुलाई को कांड संख्या 510/12 दर्ज करायी थी। वहीं कटिहार के पुलिस कप्तान किम ने बताया कि प्रारंभिक जांच में आये तथ्य और विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के बयान में असमानता के बाद ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

ए राम पाण्डेय को पत्रकारिता में पीएचडी उपाधि

 

नोयडा शारदा विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहे ए राम पाण्डेय को लखनऊ विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग से पीएचडी उपाधि प्रदान की गयी है। श्री पाण्डेय ने प्रो0 एसपी दीक्षित के निर्देशन में जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका-चुनाव के विशेष सन्दर्भ में शीर्षक पर शोध कार्य किया। वर्ष 2007 में ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सबसे लोकप्रिय हिन्दी अखबारों की प्रति भारतीय प्रेस परिषद को जांच एवं कार्यवाही करने के लिये भेजा। जिसमें इस बात की जांच करनी थी कि तमाम समाचार पत्र भी पत्रकारिता कर्म से दूर अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ खड़े दिख रहे थे। यह अलग बात है कि प्रेस परिषद ने पत्र का संज्ञान लेना भी उचित नहीं समझा। 
श्री पाण्डेय ने कंटेंट एनालिसिस, इंटरव्यू एवं केस स्टडी विधियों का प्रयोग करके चुनाव में जनमत निर्माण को जांचने का प्रयास किया। बिहार विधानसभा चुनाव  2010 में चुनाव के दौरान अखबारों के कंटेंट के विश्लेषण करने से पता चला कि ज्यादातर अखबारों ने नेताओं के बयानबाजी को ज्यादा महत्व दिया। शोध ने यह सिद्ध किया कि समाचार पत्र बिहार चुनाव के एजेंडे को सेट करना तो दूर, उसको समझ ही नहीं सके। विकास की जगह पर वे चुनावी गणित, बयानबाजी आदि पर अपना शामियाना तानते रहे। ऐसे हालात के चलते बिहार की जनता ने फैसला लेने में मीडिया की राय को दरकिनार कर दिया यानि बिहार चुनाव ने संकेत दे दिया कि जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका अब संकुचित होती जा रही है।
 
ए राम पांडेय ने चुनाव में जनमत निर्धारण को समझने के लिये पुण्य प्रसून बाजपेयी, राम कृपाल सिंह, उर्मिलेश, प्रसून शुक्ला और शेषनारायण सिंह जैसे पत्रकारों का साक्षात्कार लिया। इन लोगों के इंटरव्यू ने शोध को सार्थक बनाने में अहम भूमिका निभायी। पेड न्यूज एवं लोकसभा चुनाव 2004 और 2009 के प्रचार अभियान की गहन केस स्टडी से निष्कर्ष निकला कि जनमत निर्धारण में मीडिया की अहम भूमिका है लेकिन कारपोरेट कल्चर हावी होने से पत्रकार जनभावनाओं को समझने में विफल हो रहे हैं। 

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : संसद सत्र में मामले को उठाने की मांग

 

: सुप्रीम कोर्ट से भी संज्ञान लेने की प्रार्थना  : मुंगेर। विश्व की संभवतः पहली आपराधिक घटना है जिसमें भारत की सबसे शक्तिशाली मीडिया हाउस ‘‘मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड’’, जो पूर्व में ‘मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड’ और ‘मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड’के नाम से जाना जाता था, के विरूद्ध जालसाजी और धोखाधड़ी से केन्द्र और राज्य सरकारों को सरकारी विज्ञापन प्रकाशन मद में लगभग दो सौ करोड़ रुपए के चूना लगाने का आरोप लगाया गया है।
 
इस मुकदमे से जुड़ी पुलिस प्राथमिकी (मुंगेर कोतवाली कांड संख्या-445/2011, दिनांक 18 नवंबर, 2011। में पुलिस उपाधीक्षक (मुंगेर) अरूण कुमार पंचालर ने जो पर्यवेक्षण-टिप्पणी भारतीय दंड संहिता की धारा ए 420/471/476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट् -1867 की धाराएं 8(बी), 14/15 के तहत समर्पित की है, वह ‘पर्यवेक्षण रिपोर्ट’ यहां हू-बहू प्रस्तुत की जा रही है। पर्यवेक्षण -टिप्पणी में पुलिस उपाधीक्षक ने अपना मंतव्य देते हुए लिखा है –‘‘अनुसंधान और पर्यवेक्षण के क्रम में आए तथ्यों/ प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर ‘प्रथम दृष्टया’यह कांड ‘सत्य’ प्रतीत होता है।’’ स्मरण रहे कि यह मीडिया हाउस भारत के अनेक प्रांतों में ‘हिन्दुस्तान’ के नाम से हिन्दी दैनिक अखबार का मुद्रण, प्रकाशन और वितरण करता है।
 
पुलिस उपाधीक्षक, मुंगेर की पर्यवेक्षण-टिप्पणी ने न केवल दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ के फर्जीवाड़ा में दशकों से चल रहे जालसाजी और धोखाधड़ी के खेल को नंगा किया है, वरन यह भी उजागर कर दिया है कि देश का अन्य कारपोरेट प्रिंट मीडिया जैसे दैनिक जागरण और अन्य हिन्दी और अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार भी दैनिक हिन्दुस्तान की तर्ज पर सरकरी विज्ञापन प्रकाशन -मद में सरकारी राजस्व की लूट अरबों और खरबों में करते आ रहे हैं। पुलिस उपाधीक्षक की पर्यवेक्षण टिप्पणी ने कारपोरेट प्रिंट मीडिया की जालसाजी और धोखाधड़ी की बारीकियों को भी दुनिया में उजागर कर दिया है। कोरपोरेट प्रिंट मीडिया की जालसाजी की ये बारीकियां देश के मीडिया हाउस के असली चेहरे को उजागर कर रही है।
 
सांसदों और विधायकों से अपील : माननीय सांसदों और बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, दिल्ली और अन्य प्रदेशों के माननीय विधायकों से अपील है कि सभी माननीय गंभीरता से ‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी’ को पढ़े और अध्ययन करें और देश हित में इस मामले को आनेवाले लोक सभा और विधान सभा के सत्रों में सदन के पटल पर रखें और सरकार से पूरे प्रकरण मे ‘संसदीय जांच कमिटी’, ‘विधान सभा की जांच कमिटी’ या ‘सीबीआई जांच’ की मांग करें और मीडिया जगत के आर्थिक अपराधियों को सजा दिलाने की दिशा में ठोस कार्रवाई की पहल करें।
 
यह विदित हो कि मुंगेर में पुलिस थाने में दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन फर्जीवाड़ा के संबंध में दर्ज प्राथमिकी एक जिले के फर्जीवाड़ा से जुड़ा है जबकि दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अन्य अखबार बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और अन्य प्रांतों में हरेक जिले में ऐसा विज्ञापन फर्जीवाड़ा का धंधा दशकों से चला रहा है और इस फर्जीवाड़े के सारे साक्ष्य देश के सभी जिलों के जिला जनसम्पर्क विभाग के कार्यालयों में उपलब्ध है। विज्ञापन फर्जीवाड़ा देश व्यापी है और माननीय सांसदों को अब इस मामले में अपनी चुप्पी तोड़ देनी चाहिए।
 
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों से अपील : हम देश के सर्वोच्च न्यायालय के माननीय प्रधान न्यायाधीश और संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालयों के माननीय मुख्य न्यायाधीशों से भी प्रार्थना करते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय और संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालय मीडिया के सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा के मामले में स्वतः संज्ञान लें और पूरे देश में एक साथ सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा की सीबीआई जांच का मानिटरिंग करें तभी इस शक्तिशाली मीडिया हाउस से जुड़े लोगों को सजा दिलाई जा सकती है अन्यथा इस मीडिया हाउस सीबीआई जांच का आदेश ही नहीं होने देंगे।
 
पुलिस उपाधीक्षक, मुंगेर की सनसनीखेज ‘पर्यवेक्षण-टिप्पणी’ आज से क्रमवार यहां हू-ब-हू प्रस्तुत की जा रही है-
 
पुलिस उपाधीक्षक, मुंगेर एके पंचालर ने पर्यवेक्षण टिप्पणी में लिखा है कि इस कांड का पर्यवेक्षण 05 अप्रैल, 2012, 17 अप्रैल, 2012, 19 अप्रैल, 2012 और अन्य तिथियों को पुलिस निरीक्षक सह थानाध्यक्ष सनाउल्लाह खां, कोतवाली और अनुसंधानकर्ता पुलिस अवर निरीक्षक पवन कुमार के समक्ष किया गया।
 
पुलिस उपाधीक्षक ने पर्यवेक्षण टिप्पणी में लिखा है —‘‘यह कांड वादी मंटू शर्मा पे0 स्व0 गणेश शर्मा, साकीन-पुरानीगंज, थाना-कासिम बाजार, जिला-मुंगेर के कोर्ट परिवाद-पत्र संख्या-993 (सी) 2011 के आधार पर प्रा0 अभियुक्त (01) शोभना भारतीया, अध्यक्ष, हिन्दुस्तान प्रकाशन समूह (दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड), प्रधान कार्यालय 16-20, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई 
श्रीकृष्ण प्रसाद
दिल्ली, (02) शशि शेखर, प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, समाचार-पत्र समूह, नई दिल्ली, (03) अकु श्रीवास्तव, कार्यकारी संपादक, पटना संस्करण, (04) बिनोद बंधु, उप-स्थानीय संपादक, भागलपुर संस्करण एवं (05) अमित चोपड़ा, मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, लोअर नाथनगर रोड, परबत्ती, भागलपुर के विरुद्ध छल से प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट -1867 की विभिन्न धाराओं का उल्लंघन करते हुए गलत पंजीयन संख्या अंकित करते हुए भागलपुर और मुंगेर से समाचार -पत्र का मुद्रण एवं प्रकाशन करने तथा फर्जी कागजात प्रस्तुत कर समाचार-पत्र में प्रकाशित करने हेतु राज्य सरकार और केन्द्र सरकार से विज्ञापन प्राप्त कर करोड़ों रुपया विज्ञापन मद में प्राप्त कर लेने के आरोप में अंकित किया गया है।
 
जारी….
 

मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.


 
हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

मारिया टीवी : बुर्का में हो रही है एंकरिंग

काइरो। मिस्र में बुर्का पहने महिलाएं इन दिनों एक टीवी न्यूज चैनल का संचालन कर रही हैं। बृहस्पतिवार से शुरू हुए मारिया टीवी चैनल की खासियत यह है कि इसमें सिर्फ महिलाएं काम कर रही हैं। इस चैनल के किसी भी कार्यक्रम और बतौर स्टाफ पुरुषों के काम करने पर पाबंदी है। यहां तक की फोन पर भी वह बात नहीं कर सकते। मारिया देश का ऐसा पहला सैटेलाइट न्यूज चैनल है, जहां महिलाएं बुर्का पहनकर समाचार प्रस्तुत करती हैं। 

यहां तक की कैमरे के पीछे भी वह सिर से लेकर पाव तक काले लिबास में लिपटी रहती हैं। ये महिलाएं धार्मिक नियमों का पालन करते हुए अपने लिए नई राह बना रही हैं। इस देश में महिलाओं के साथ हर क्षेत्र में भेदभाव होता रहा है। वह चाहे नौकरी का क्षेत्र हो या फिर शिक्षा का। पिछले साल राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए हुए जनांदोलन के बाद इस चैनल की शुरुआत को सामाजिक परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा है। चैनल का नाम पैगंबर मोहम्मद की बेगम मारिया के नाम पर रखा गया। 

चैनल प्रमुख एल-शेखा-सफा रेफाई का कहना है कि मुबारक के जाने के बाद देश ने काफी तरक्की की है। यह चैनल उसी का उदाहरण है। वह बताती हैं कि जब हमने चैनल को शुरू करने की योजना बनाई तो लोगों ने कहा कि यह चलेगा नहीं क्योंकि नकाब पहनकर समाचार पढ़ने से चेहरे के हाव-भाव समझ में नहीं आते हैं। पर रेफाई का दावा है आवाज की कशिश भावनाओं को बया कर देती है। उन्होंने कहा, हम यह साबित करना चाहते हैं कि बुर्के में काम करने के बावजूद महिलाएं सफलता के नए आयाम स्थापित कर सकती हैं। साभार : जागरण 

जयपुर में पत्रकार बेचेंगे 50-50 अखबार

पत्रकारिता के गरिमामय पेशे में यह दिन भी आना था। जयपुर में हॉकर हड़ताल पर क्या गए कुछ अखबारों के प्रबंधन ने पत्रकारों पर हॉकरों का काम लादना शुरू कर दिया है। पुख्ता खबर है कि राजस्थान के एक प्रमुख अखबार ने अपने रिपोर्टरों को पचास-पचास कॉपियां बेचने का हुक्म जारी किया है। सिद्धांतों की पत्रकारिता का ढिंढोरा पीटने और आदर्श तथा मूल्यों का गुणगान करने वाले इस अखबार के प्रबंधन की इस नीति से पत्रकार मानसिक तौर पर परेशान और सदमे में हैं। मन में गुस्सा तो है परंतु मन मसोसने के अलावा और उनके पास कोई विकल्प भी तो नहीं है।

एक पत्रकार के लिए सबसे बड़ा सहारा संपादक होता है और जब संपादक नाम की संस्था का अस्तित्व ही खत्म हो गया हो तब पत्रकार अपने को ठगा महसूस होने के अलावा और कर भी क्या सकते हैं? पत्रकारों के लिए इस तरह का हुक्मनामा जारी होने से प्रतिद्वंद्वी अखबारों की पत्रकारों की हालत पतली हो चली है। उन्हें लग रहा है कि उनका प्रबंधन भी कहीं यही नीति उनके लिए लागू ना कर दे। दुर्घटना से सावधानी भली की तर्ज पर कुछ पत्रकारों ने तो झूठे बहाने बनाकर छुट्टियों पर जाना शुरू कर दिया है।

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं अधिवक्‍ता राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट.

महुआ चैनल समूह के अध्‍यक्ष पीके तिवारी अपने पुत्रों समेत गिरफ्तार

: फर्जी दास्‍तावेजों के बल पर करोंडो के घोटाला का आरोप : 14 दिनों की न्‍यायिक हिरासत में जेल भेजे गये समूह संचालक : नोएडा : महुआ चैनल समूह के मुखिया को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आज दिल्‍ली की एक अदालत ने पीके तिवारी को 14 दिन तक जेल भेज देने का आदेश दिया। कोर्ट के फैसले के बाद पुलिस ने तिहाड़ जेल में पहुंचा दिया है। अनेक बैंकों से कर्ज हासिल करने के लिए फर्जी कागजातों का इस्‍तेमाल करने के समेत कई आरोपों पर पीके तिवारी और उनके दो बेटों पर यह पुलिस ने कार्रवाई की है।

हालांकि महुआ समूह के अध्‍यक्ष और उनके पुत्रों को सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) ने पिछले गुरुवार को ही गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन गहन छानबीन और पूछताछ के लिए सीबीआई ने अदालत से इन लोगों को पुलिस कस्‍टडी में रखने का आदेश दिया था। यह रिमांड पूरी होने के बाद सीबीआई ने पीके तिवारी और उनके बेटों को अदालत पेश किया जहां उन्‍हें न्‍यायिक हिरासत में जेल भेजने के आदेश जारी हुए। बताते हैं कि पुलिस रिमांड हुई पूछताछ में बैंकों के साथ हुई करोड़ों की इस धोखाधड़ी के बारे में इस चैनल समूह की संलिप्‍तता का खुलासा किया है। महुआ समूह बिहार, यूपी, झारखंड और बिहार में अनेक मनोरंजक और समाचार चैनलों का संचालत करता है।

बताया जाता है कि इन बैंकों से मिली अनेक शिकायतों को लेकर सीबीआई ने महुआ समूह प्रबंधन पर अपना शिकंजा कसना शुरू किया था और इसके बाद पिछले गुरुवार को ही नोएडा स्थित समूह के मुख्‍यालय पर दबिश दी गयी जहां पीके तिवारी और उनके निदेशक पुत्र आनंद तिवारी और अभिषेक तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया। सीबीआई के मुताबिक इन तीनों लोगों को तीनों बैंकों से करोड़ों रुपये का कर्जा हासिल किया था, लेकिन इसके लिए इन लोगों ने इन बैंकों को गुमराह करने के लिए फर्जी दस्तावेज पेश किये थे। बताते चलें कि महुआ प्रबंधन पिछले दो बरसों से बेहद आर्थिक कंगाली से जूझ रहा है। इस घोटाले में बैंक आफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक और यूनियन बैंक आफ इंडिया की एक बड़ी रकम फंस गयी थी। हालांकि सूत्रों का कहना है कि इस घोटाले की शिकायत पर सीबीआई ने यह मामला इस साल जनवरी में दर्ज किया था।

घटनाक्रम पिछले गुरुवार की दोपहर से शुरू हुआ। बताते हैं कि अपनी दिनचर्या के मुताबिक पीके तिवारी गुरुवार को ठीक सुबह दस बजे ऑफिस पहुंचे थे। पिछले एक साल से संस्‍थान के हालात बिगड़ने के समय से लगातार और सघन बैठकों के दौर चल ही रहे थे, उस दिन भी यही हुआ। लेकिन अचानक ही दोपहर पीके तिवारी के कार्यालय में सीबीआई अधिकारियों का एक दल पहुंचा। करीब तीन घंटों तक पूछताछ का दौर चला। इसके बाद उन्‍हीं अफसरों में से एक के साथ पीके तिवारी अपने छोटे बेटे अभिषेक तिवारी के साथ अपनी सफेद मार्सिडीज से रवाना हुए, जबकि उनके बड़े बेटे आनंद तिवारी उन अधिकारियों के उसी कार के पीछे रवाना रवाना हुए। हालांकि सीबीआई की इस कार्रवाई की खबर को महुआ संस्‍थान प्रबंधन ने दबा लिया था। इन संचालकों ने इन लोगों को अस्‍पताल, विदेश, पूजा-अर्चना और ध्‍यान-योग आदि बहाने लेते हुए खबर को दबाने की कोशिशें की थीं। इन लोगों की गिरफ्तारी की भनक तो बीते रविवार को लगी, जब इन लोगों का जमानत की कवायद शुरू हो गयी।

महुआ के करीबी सूत्रों का दावा है कि गुरुवार की दोपहर पीके तिवारी से जो अफसरों का दल उनके दफ्तर पर पहुंचा था, वह सीबीआई का था। यह टोली पिछले साल के दौरान ईडी समेत कई सरकारी एजेंसियों के अफसरों की थी। आयकर और ईडी पहले से ही आयकर चोरी और अवैधानिक धन-निवेश के कतिपय अपराधों पर पीके तिवारी और महुआ समूह के लोगों की संलिप्‍तता की जांच कर रहा था। पिछले दिनों इन जांच विभागों ने इस समूह में सात सौ करोड़ रुपयों की पता लगाया था। बताते चलें कि यह समाचार संस्‍थान महुआ, महुआ न्‍यूज, महुआ न्‍यूज लाइन और महुआ खबोर नामक चैनलों का संचालन करता है। इसमें से खबोर और न्‍यूज लाइन तो लगभग बंद पड़े हैं, जबकि दूसरे चैनलों की हालत भी बुरी बतायी जाती है।

बहरहाल, सीबीआई के इन कथित अफसरों की टोली ने ऐसे दर्जनों मामलों में महुआ परिवार और उसके प्रमुख संचालकों को सीधे तौर पर पहचाना है और गुरुवार की दोहपर हुई इस कार्रवाई इसी के तहत पकड़-धकड़ के तहत हुई है। भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि गुरूवार से ही महुआ समूह में अफवाहों का बाजार भड़क गया है। लोगों के मुताबिक पीके तिवारी इन दोनों लगातार कानूनी और आर्थिक आदि संकटों में घिरे जा रहे थे। वैसे भी भारत में वे ज्‍यादातर नोएडा और उसके बाद मुम्‍बई में समय से पहुंचते रहे हैं। मौजूदा काढ़े वक्‍त में, जब समूह के कर्मचारियों को विगत अनेक महीनों वेतन भुगतान को लेकर भारी मारामारी का माहौल है। उधर संस्‍थान में श्रमविवाद भी जबर्दस्‍त चल रहा है।

बताते हैं कि इस प्रकरण की खबरें तब भड़की जब समूह के टेक्निकल हेड अमर खांडपुरे, पार्थो डे व उनके सहयोगी अतुल जैन और कलेक्‍शन के हेड मनोज दुबे की बातें और चर्चाएं छन कर बाहर निकलने लगीं। बताते हैं कि मनोज दुबे को तिवारी के खासमखास लोगों को सूचना दी कि पीके तिवारी सोमवार को ही अपने सारे दायित्‍वों अपनी पत्‍नी मीना तिवारी को सौंपने जा रहे हैं। यानी पीके तिवारी महुआ संस्‍थान से सम्‍बद्ध सभी बैकों में सिग्‍नेचरी के तौर पर सारे दायित्‍व अपनी पत्‍नी मीना तिवारी को सौंप देंगे। हालांकि अथक प्रयासों के बावजूद यह पता नहीं चल पाया है कि ऐसे सभी दायित्‍वों का स्‍थानांतरण किस स्‍थान पर किया जाएगा। मतलब ऐसे दायित्‍व सौंपने के लिए वे अपने मुख्‍यालय में सोमवार को पहुंचेंगे या फिर इसके लिए कोई अन्‍य स्‍थान तय किया जा रहा है। हैरत की बात है कि पिछले करीब तीन महीनों से ज्‍यादातर कर्मचारियों की तनख्‍वाह नहीं जारी की जा सकी है। इतना ही नहीं, संस्‍थान के रिकरिंग के खाते के भारी-भरकम खर्चों का बकाया कई महीनों से अदा नहीं किया जा चुका है। ऐसे में पीके तिवारी को लेकर चल रही हंगामाखेज खबरों ने महुआ समूह समेत पूरे समाचार उद्योग में अफवाहों की आग को बुरी तरह भड़का दिया है।

एक भरोसेमंद सूत्र के अनुसार मनोज दुबे और पार्थो डे ने शुक्रवार को दिल्‍ली की एक अदालत में कई लोगों की जमानत कराने सम्‍बन्‍धी कागजात तैयार करने का निर्देश महुआ समूह के वकीलों को दिया है। लेकिन अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि यह किन लोगों की जमानत कराने के लिए तैयारियां की जा रही हैं। इस खबर की पुष्टि के लिए महुआ संस्‍थान से बातचीत के लिए जब भी प्रयास किया गया, फोन नहीं उठाया गया। जिसके महुआ प्रबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सका।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

सहारा समय, देहरादून के ब्‍यूरोचीफ बने मनोज कंडवाल

देहरादून। सहारा समय टीवी चैनल के देहरादून ब्यूरो चीफ के रूप में पत्रकार मनोज कंडवाल को नई जिम्मेदारी दी गई है। पिछले कई सालों से पत्रकारिता जगत में मनोज कंडवाल संस्थान में रहकर बेहतर प्रदर्शन करते रहे हैं जिसकी बदौलत उन्हें ब्यूरो चाफ के पद पर बैठाया गया है। कंडवाल के ब्यूरो चीफ बनने पर पत्रकार जगत के साथ साथ विभिन्न राजनेताओं ने उन्हें बधाई दी है।

भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ एक लड़ाई और!

सरकार जनता को मूर्ख समझती है या जनता वास्तव में भोली है जो इन राजनेताओं की बातों में आ जाती है। अन्ना के आंदोलन और सरकार के नाटक से तो यही बात सामने आ रही है कि राजनेता नहीं चाहते कि इस देश में कोई ऐसा कानून बने जो आम आदमी को भ्रष्टाचार के विरुद्घ लडऩे की ताकत दे। मगर सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्थायें ऐसी ही चलती रहेंगी या इसमें परिवर्तन होगा। क्या इस देश का आम आदमी अपना शोषण होते यूं ही देखता रहेगा या व्यवस्था के विरुद्घ उठ खड़े होने का संकल्प लेगा। इस बार रामदेव और अन्ना दोनों मिलकर आंदोलन की शुरुआत कर रहे हैं। अगर यह आंदोलन सफल हो गया तो इस देश में परिवर्तन का एक नया दौर शुरू होगा। जिसमें भ्रष्टाचारियों को इस व्यवस्था में कोई जगह नहीं होगी।

अन्ना आंदोलन ने इस देश में कई नयी बहस को जन्म दिया है। जिस समय अरविंद केजरीवाल ने लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट तैयार किया था, उस समय स्वयं केजरीवाल को अंदाजा नहीं था कि लोकपाल विधेयक पर पूरे देश में इतना जनमत तैयार हो जायेगा। सरकार भी इस विधेयक की मांग को बेहद हल्के ढंग से ले रही थी। सरकार को लग रहा था कि जो विधेयक चालीस वर्ष से लंबित है अब उस पर कोई नया हंगामा भला क्या होगा। मगर राजनेता यह सोचने में नाकाम रहे कि इन चालीस सालों में देश का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है।

देश के लोग पिछले कई सालों से शासनतंत्र की अराजकता को झेल रहे थे। गरीबों के हितों को चलायी जाने वाली कल्याणकारी योजनायें दम तोड़ रही थीं। बीते कुछ सालों में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। केन्द्र सरकार का मंत्री एक लाख छियत्‍तर हजार करोड़ रुपये का घोटाला करता नजर आया। शहीदों के लिए बन रही आदर्श सोसाइटी का मामला हो या फिर राष्ट्रमंडल देशों के खेल में घोटाले का। हर तरफ घोटाला ही घोटाला। ऐसा लगने लगा कि मानो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचारियों के सरदार बन गये हैं।

यह स्थितियां आम आदमी को बेहद दुख दे रही थी। उसे लग रहा था कि उसके साथ लगातार छलावा किया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि सरकार को खुद आम आदमी का ध्‍यान रखना चाहिए था। चुनाव से पहले कांग्रेस ने नारा भी दिया था कि आम आदमी का हाथ-कांग्रेस के साथ। मगर कांग्रेस सत्‍ता में आने के बाद इसी आम आदमी को भूल गयी। सरकार के चारों ओर भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की पूरी जमात खड़ी हो गयी। परिणाम यह रहा कि इस देश का आम आदमी निराश हो गया। उसे लगा कि उसकी बात सुनने वाला कोई नही है।  हताशा के इस दौर में अन्ना ने अपनी लड़ाई की शुरुआत की। अन्ना ने आम आदमी के दर्द को समझा। उन्हें समझ आ गया कि इस देश का नेतृत्व आम आदमी के दर्द को कभी महसूस नही कर सकता। अन्ना के आंदोलन को शुरुआती दौर में सरकार ने हल्के ढंग में लिया। मगर इसके बाद जिस तरह से पूरे देश में इस आंदोलन के समर्थन में जन सैलाब उमड़ा उसने सरकार की नींदे उड़ा दी। लिहाजा जब अन्ना आमरण अनसन पर बैठे तो सिर्फ बारह दिन में पूरी सरकार हिल गयी।

संसद में सभी लोगों ने एक मत से लोकपाल बनाने की बात मान ली जिसके बाद ही अन्ना ने अपना आंदोलन समाप्त किया। मगर जैसे जैसे इस बिल को लोकसभा में तो पास करा दिया गया मगर राज्य सभा में यह बिल सरकार की शह पर लटक गया। जानबूझकर इसे आखिरी समय रखा गया और संसदीय परम्पराओं तथा लोकतंत्रिक मर्यादाओं को तार तार करते हुए इसकी राज्य सभा में न केवल कॉपियां फाड़ी गयी बल्कि कुछ सदस्यों द्वारा अमर्यादित आचरण भी पेश किया गया। जिसके बाद यह बिल अटक गया। इस बीच सरकार ने अन्ना टीम को बदनाम करने में कोई कसर बाकी नही रखी। चाहे अरविंद केजरीवाल की नौकरी से छुट्टी का मामला रहा हो या फिर किरण बेदी के हवाई टिकटों में छूट का मामला। पूरी सरकार इन मुद्दों पर अन्ना टीम को लगातार बदनाम करती नजर आयी। सरकार की कोशिश थी कि किसी भी तरह अन्ना टीम को बदनाम किया जाये। जिससे लोगों में अन्ना और उनकी टीम के प्रति आस्था कम हो सके और लोंगो का ध्‍यान लोकपाल के मुद्दे से हटाया जा सके। मगर यह कोशिशें ज्यादा परवान नहीं चढ़ सकीं।

इसी बीच बाबा रामदेव ने काला धन वापस लेने के मुद्दे पर दिल्ली में आंदोलन किया और सरकार ने बर्बरतापूर्वक उसका दमन किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट की इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश पर की गयी टिप्पणी ने सरकार को फिर शर्मसार किया। इसके बाद अन्ना और बाबा रामदेव ने तय किया कि अगर सरकार के खिलाफ लडऩा है तो साझा मंच तैयार करना पड़ेगा। हालांकि रामदेव के साथ खड़े होने में अन्ना टीम के कुछ सदस्यों को ऐतराज था। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि उनका मानना था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े कुछ लोग रामदेव के साथ मंच साझा करना चाहते थे। मगर अन्ना ने तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए बाबा रामदेव के साथ आंदोलन की शुरुआत करने की घोषणा कर दी।

जाहिर है आने वाले कुछ दिन सरकार के लिए बेहद परेशानी भरे होने वाले हैं। सरकार हर मोर्चे पर विफल नजर आ रही है सरकार की आघ्थक नीतियां पूरी तरह विफल हो गयी हैं। बढ़ती हुई महंगाई ने आम आदमी का जीवन दुभर कर रखा है। सरकार के सहयोगी दल भी उससे नाराज हैं। रोज खुल रहे नये-नये घोटालों से लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थितियों में अगर अन्ना और बाबा रामदेव भारत का काला धन देश में वापस लाने और लोकपाल विधेयक को लागू करने की बात करेंगे तो जाहिर है कि देश में बड़ी संख्या में लोग इस बात का जन समर्थन करेंगे।

सरकार को भी यह समझ में आ जाना चाहिए कि जनता को बहुत दिनों तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। जिन मुद्दों पर अन्ना और बाबा रामदेव आंदोलन कर रहे हैं वह आम आदमी की जिंदगी और उसके हितों से जुड़े मुद्दे हैं। अगर सरकार इन मुद्दों की उपेक्षा करती है तो उसे आम आदमी के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। भले ही अन्ना टीम के कुछ लोग ठीक न हों और रामदेव संघ के चेहरे हो। मगर यह लोग जो मुद्दा उठा रहे हैं वह इस देश के स्वाभिमान से भी जुड़ा है और यह देश अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नही कर सकता।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

ये पत्रकारिता है अथवा नौकरी?

अभी अभी एक साथी से मुलाकात हुई. जाहिर सी बात है कि एक पत्रकार साथी से मुलाकात होगी तो बात भी इसी के इर्द-गिर्द रहेगी. यह वह साथी है जब वह अपने शुरुआती दिनों में पत्रकारिता को लेकर बड़ा जज्बाती था. उसे उम्मीद थी कि वह अपनी कोशिशों से समाज को बदल डालेगा लेकिन आज वह निराश है. उसे समझ में नहीं आ रहा है कि जिस समाज को बदलने के लिये वह आया था, आज वह खुद बदल गया है. पत्रकार से वह एक मामूली कर्मचारी बन गया है. अपने तीन दशक की पत्रकारिता में वह यायावर बन कर रह गया है. कभी उसकी काबिलियत का लाभ लेने की बात कह कर उसे अपने शहर से दूर भेज दिया जाता रहा है तो कभी सजा के तौर पर. वह यह बात समझने में अपने आपको नाकामयाब समझ रहा है कि आखिर वह पत्रकारिता कर रहा है अथवा नौकरी. यह सवाल इस समय पत्रकारिता के समक्ष यक्ष प्रश्र के तौर पर मौजूद है. हर पत्रकार इस परेशानी से जूझ रहा है. उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा है कि वे पत्रकारिता कर रहे हैं अथवा नौकरी. इस सवाल पर मैं काफी दिनों से गौर कर रहा था क्योंकि पत्रकार के स्थानीय होने में ही पत्रकारिता का अस्तित्व होता है. 

तकनीक के विस्तार के साथ ही मीडिया का विस्तार हो गया है. अखबार अब सिंगल एडीशन वाले अखबार नहीं रह गये हैं. अखबार अब मल्टीएडीशन वाले अखबार हो गये हैं. अखबारों के खरीददार भले ही न बढ़ रहे हों लेकिन पाठकों की गिनती लाखों और करोड़ों में हो रही है. सम्पादक मैनेजर बन गया है और अखबार वस्तु. हालांकि ये सारी बातें बार बार और इतनी बार हो चुकी हैं कि अब इस पर बात करना बेमानी सा है किन्तु इस विस्तार से कुछ नया संकट पैदा किया है जिस पर बात करना बेमानी नहीं है. सामयिक है और समय की जरूरत भी. इस विस्तार से उत्पन्न संकट को नजरअंदाज करने का अर्थ एक और नये संकट को जन्म देना है.

पत्रकारिता अथवा नौकरी, इसे इसलिये मुद्दा बनाकर उठा रहे हैं क्योंकि तकनीक के विस्तार के साथ साथ अखबार मल्टीएडीशन वाले हो गये हैं और इसी के साथ शुरू हो चुकी है पत्रकारिता की समाप्ति का दौर. सम्पादक पद के गुम हो जाने का हल्ला तो खूब मचा किन्तु पत्रकार के गुम हो जाने की भी खबर गुमनाम सी है. पत्रकारिता के स्तर के गिरावट को लेकर चिंता होती है, चर्चा होती है और आलोचना पर आकर बात खत्म हो जाती है किन्तु पत्रकार खत्म हो रहे हैं, इस पर न तो चिंता होती है, न चर्चा होती है और न आलोचना. पत्रकार को अखबारों के मल्टीएडीशन नेचर ने नौकर बना कर रख दिया है. प्रबंधन जब जिस पत्रकार से रूठा या उसकी मर्जी के मुताबिक काम नहीं किया, पत्रकारिता करने का दुस्साहस किया तो तत्काल उसकी बदली किसी ऐसे शहर के संस्करण में कर दिया जाता है जहां उसका अपना कोई नहीं होता है.

वेतन वही, सुविधाएं नहीं और एक पत्रकार पर अपने घर और अपने स्टेबलिसमेंट का दोहरा दबाव. एक तरह से यह सजा होती है प्रबंधन की नाफरमानी का. अक्सर मीडिया के बेवसाइटों पर प्रकाशित-प्रसारित होने वाली खबरों में पढऩे को मिलता है कि अपनी बदली से परेशान पत्रकार ने नौकरी छोड़ दी. यह अदला-बदली का खेल अखबारी दुनिया का नया शगल है. प्रबंधन के प्रताडऩा का यह औजार है. प्रताडऩा का यह औजार बीते एक दशक में और भी धारदार हुआ है. कभी दंड के रूप में तो कभी पदोन्नति का लालसा देकर पत्रकारों को इधर-उधर किया जाता है. पत्रकारिता में प्रबंधन का यह नया सलूक बेहद घातक है. न केवल पत्रकारिता एवं पत्रकारों के लिये बल्कि स्वयं अखबार के लिये भी. अस्सी के दशक में जब मैंने पत्रकारिता आरंभ किया था तब अखबार मल्टीएडीशन नहीं हुआ करते थे. जाहिर सी बात है जब अखबार मल्टीएडीशन होते ही नहीं थे तो अदला-बदली का कोई खेल भी नहीं चलता था. जीवन बसर करने लायक वेतन में ही गुजारा हो जाता था. पत्रकार को न तो किसी तरह का ऐसा तनाव दिया जाता था और न ही उसकी एक्सपटराइज में कोई कमी आती थी, उल्टे अखबार का दबदबा पूरे प्रसार क्षेत्र में होता था.

नब्बे के दशक आते-आते अखबार मल्टीएडीशन होने लगे और दो हजार दस तक तो ऐसा हो गया कि जिस अखबार का मल्टीएडीशन नहीं होगा, वह बड़ा अखबार ही नहीं कहलायेगा. पहले राज्य से राज्य, फिर जिलेवार और तो तहसीलस्तर पर भी अखबारों के संस्करण छपने लगे हैं. अखबार तो बड़े हो गये लेकिन उनका प्रभाव कम होता गया, यह कड़वी सच्चाई है. इस न मानने का अर्थ होगा सच से मुंह चुराना. बहरहाल, प्रबंधन की मनमानी अब बढ़ती जा रही है. पत्रकारों की अदला-बदली के इस खेल में सर्वाधिक नुकसान अखबार को उठाना पड़ रहा है. अपने विषय के एक्सपर्ट की बदली कर दी जाती है, इस बदली के साथ ही उसके खबरों के स्रोत बिखर जाते हैं. पत्रकारिता की यह विशिष्टता होती है कि पत्रकार के साथ ही उसके खबरों के स्रोत टूट जाते हैं अथवा खत्म हो जाते हैं. जो लोग जमीनी पत्रकारिता कर रहे हैं, उन्हें यह बात मालूम है कि एक स्रोत बनाने में उन्हें कितना समय और मेहनत लगता है किन्तु प्रबंधन को इस बात से कोई लेना-देना नहीं होता है.

पत्रकारों की बदली के पीछे एक तरह से बदले की भावना निहित होती है. यह भावना कई बार व्यक्तिगत भी होती है न कि संस्थान के हित में. पेडन्यूज में भले ही श्रीवृद्धि हो किन्तु पत्रकारों के बारे में यह बात जब प्रबंधन के दिमाग में बिठा दी जाती है कि अमुक पत्रकार स्थापित हो गया है अर्थात वह अपने स्रोत से आर्थिक लाभ पाने लगा है तो प्रबंधन उसे विदा करने में कतई देर नहीं करता है. ज्यादतर ऐसी खबरें गढ़ी हुई और भ्रामक होती है क्योंकि किसी से आर्थिक लाभ पाना आसान नहीं होता है. एक दूसरा कारण अखबार को लाभ पहुंचाने वाले तंत्र को लग जाये कि फलां पत्रकार उनकी पोल खोल में लग गया है तो उसकी शिकायत बल्कि दबाव बनाया जाता है कि उक्त पत्रकार को हटा दिया जाए. प्रबंधन इस बात की जांच किये बिना कि शिकायतकर्ता का दबाव या शिकायत सही है या नहीं, अपने हित में पत्रकार की बदली कर दी जाती है.

पत्रकारों की एक स्थान से दूसरे स्थान बदली किये जाने की यह व्यवस्था स्थायी होती जा रही है, जिससे पत्रकारों में कुंठा का भाव आ रहा है. एक पत्रकार का स्थानीय और स्थायी होना उसके लिये और अखबार, दोनों के लिये हमेशा से फायदेमंद रहा है. खबरों को तलाशने, जांचने और उसकी सत्यता को परखने के लिये स्थानीय परिस्थितियों की समझ स्थानीय पत्रकार को हो सकती है. इस बात से परे जाकर यह कहा जाता है कि पत्रकार कहीं भी हो, खबर सूंघने, जांचने और लिखने का माद्दा हो तो वह कहीं भी काम कर सकता है. यह बात भी सच है किन्तु बदलते समय में यह संभव नहीं है. खासतौर पर तब जब स्थानीय राजनीति बेहद कठिन हो चली हो. मुझे तो बहुसंस्करणीय अखबारों के दौर में मेरे अपने मध्यप्रदेश के दो अखबार नईदुनिया और देशबन्धु का स्मरण हो आता है जो एक ही संस्करण निकाल कर पूरे देश में अपने होने का आभाष करा देते थे. यह बात सबको पता है कि इंदौर से निकलने वाले नईदुनिया का इंतजार देश की राजधानी दिल्ली में भी हुआ करता था. एक सिंगल एडीशन अखबार की प्रसार संख्या अनुमानित लाख प्रतियों के आसपास थी. देशबन्धु का हाल भी कुछ ऐसा ही था. हालांकि देशबन्धु ने बाद में मध्यप्रदेश के अनेक स्थानों से संस्करणों का प्रकाशन किया किन्तु दोनों ही अखबार स्कूल ऑफ जर्नलिज्म कहलाते थे. आज ऐसे अखबारों की कल्पना करना भी बेमानी है.

बहरहाल, मीडिया के विस्तार से उत्पन्न संकट का सवाल एकबारगी फिजूल का सवाल लग सकता है किन्तु इस पर नजदीक से सोचेंगे तो लगेगा कि यह सवाल फालूत नहीं बल्कि एक ऐसा सवाल है जिस पर समूची पत्रकार बिरादरी को सोचना होगा. यह सवाल तेरा, मेरा नहीं बल्कि हम सबका है. सवाल पर आते हैं. सवाल यह है कि हम पत्रकारिता कर रहे हैं अथवा नौकरी, इस पर पहले बात होना चाहिए. नौकरी करने वाले पत्रकार, जिन्हें अब मीडियाकर्मी कहा जाने लगा है, उनसे क्षमा चाहेंगे क्योंकि यह सवाल उनके लिये नहीं है. यह सवाल सौटके की पत्रकारिता करने वालों के लिये है क्योंकि पत्रकारिता नौकरी नहीं होती है. पत्रकारिता एक जुनून है. एक जज्बा है समाज में परिवर्तन लाने का. कोई नौकरी जुनून नहीं हो सकती, जज्बे का तो सवाल ही नहीं है. ऐसे में तय यह करना होगा कि हम पत्रकारिता कर रहे हैं अथवा नौकरी? जिस दिन हम यह बात तय कर लेंगे कि हम क्या कर रहे हैं, सवाल का हल मिल जाएगा.

लेखक मनोज कुमार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा पिछले कई दशक से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

क्‍या वाकई लापता हैं डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल के मुखिया?

 : गुरुवार शाम से लापता होने की चर्चाएं भड़कीं : न खाना, न पीना और अब तो सांस भी नहीं ले रहा हाथी : नोएडा : खबर है कि यह हाथी न कुछ खा-पी रहा है, न चल रहा है और न अपनी सूंड़ हिला रहा है। और तो और, यह तो अब सांस भी रोकने के व्‍यायाम पर जुट गया लगता है। अफवाहों का बाजार बेहद गरम है, लेकिन इस हाथी की इस हालत पर टिप्‍पणी पर कोई जिम्‍मेदार व्‍यक्ति बोलने पर भी तैयार नहीं है। तो, लब-ओ-लुआब यह कि डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल समूह के मुखिया फिलहाल लापता हैं। बीते गुरुवार की दोपहर से मुखिया का कोई अता-प‍ता नहीं मिल पा रहा है। इस समाचार संस्‍थान के इस मुखिया के गायब हो जाने के चलते माहौल हंगामे की तरह हो गया है।

बताते हैं कि अपनी दिनचर्या के मुताबिक मुखिया जी गुरुवार को ठीक सुबह दस बजे ऑफिस पहुंचे थे। पिछले एक साल से संस्‍थान के हालात बिगड़ने के समय से लगातार और सघन बैठकों के दौर चल ही रहे थे, उस दिन भी यही हुआ। लेकिन अचानक ही दोपहर मुखिया जी के कार्यालय में सरकारी अधिकारियों का एक दल पहुंचा। करीब तीन घंटों तक पूछताछ का दौर चला। इसके बाद उन्‍हीं अफसरों में से एक के साथ मुखिया जी अपने छोटे बेटे के साथ अपनी सफेद मार्सिडीज से रवाना हुए, जबकि उनके बड़े बेटे उन अधिकारियों के उसी कार के पीछे रवाना रवाना हुए। इसके बाद से ही मुखिया लापता बताये जाते हैं। जबकि छोटे बेटे के बारे में सूचना मिली थी कि वे अस्‍पताल में भर्ती हो गये हैं, लेकिन अब तक इसकी पुष्टि अभी तक नहीं की जा सकी है। जबकि मुखिया और उनके बड़े पुत्र अभी तक लापता बताये जाते हैं।

डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल समूह के उच्‍चपदस्‍थ सूत्रों का दावा है कि गुरुवार की दोपहर मुखिया से जो अफसरों का दल उनके दफ्तर पर पहुंचा था, वह सीबीआई की टोली थी। यह टोली पिछले साल के दौरान ईडी समेत कई सरकारी एजेंसियों के अफसरों की थी। आयकर और ईडी पहले से ही आयकर चोरी और अवैधानिक धन-निवेश के कतिपय अपराधों पर पीके तिवारी और डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल समूह के लोगों की संलिप्‍तता की जांच कर रहा था। पिछले दिनों इन जांच विभागों ने इस समूह में सात सौ करोड़ रुपयों की पता लगाया था। यह रकम करचोरी से जुड़ी है। बताते चलें कि इस समाचार संस्‍थान ने अपने शुरुआत में डेली-प्रॉब्‍लम्‍स नामक कई रीजनल चैनलों का संचालन किया था, लेकिन इसके कई चैनल पूरी तरह बंद पड़े हैं, जबकि बाकी चैनलों की हालत भी बुरी बतायी जाती है।

बहरहाल, सीबीआई के इन कथित अफसरों की टोली ने ऐसे दर्जनों मामलों में डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल परिवार और उसके प्रमुख संचालकों को सीधे तौर पर पहचाना है और गुरुवार की दोहपर हुई इस कार्रवाई इसी के तहत पकड़-धकड़ के तहत हुई है। भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि गुरुवार से ही डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल समूह में अफवाहों का बाजार भड़क गया है। लोगों के मुताबिक मुखिया इन दोनों लगातार कानूनी और आर्थिक आदि संकटों में घिरे जा रहे थे। वैसे भी भारत में वे ज्‍यादातर नोएडा और उसके बाद मुम्‍बई में समय से पहुंचते रहे हैं। ऐसे काढ़े वक्‍त में, जब समूह के कर्मचारियों को विगत अनेक महीनों वेतन भुगतान को लेकर भारी मारामारी का माहौल है, मुखिया का देश से बाहर जाने की आशंका ना होने की बतायी जाती है। फिर अब सवाल यह है कि आखिरकार इतने भारी दबावों के बावजूद मुखिया कहां लापता हो गये हैं।

इस प्रकरण पर चल रही अफवाहों को परवान तब चढ़ने लगा जब समूह के टेक्निकल हेड, उनके सहायक व उनके सहयोगी के अलावा कलेक्‍शन के हेड की बातें और चर्चाएं छन कर बाहर निकलने लगीं। बताते हैं कि कलेक्‍शन के हेड को मुखिया के खासमखास लोगों को सूचना दी कि मुखिया सोमवार को ही अपने सारे दायित्‍वों अपनी पत्‍नी को सौंपने जा रहे हैं। यानी मुखिया डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल समूह से सम्‍बद्ध सभी बैकों में अथारिइज्‍ड सिग्‍नेचरी के तौर पर अपनी पत्‍नी को सौंप देंगे। हैरत की बात है कि पिछले करीब तीन महीनों से ज्‍यादातर कर्मचारियों की तनख्‍वाह नहीं जारी की जा सकी है। इतना ही नहीं, संस्‍थान के रिकरिंग के खाते के भारी-भरकम खर्चों का बकाया कई महीनों से अदा नहीं किया जा चुका है।

भरोसेमंद सूत्र के अनुसार कलेक्‍शन के हेड और टेक्निकल हेड के सहायक ने शुक्रवार को दिल्‍ली की एक अदालत में कई लोगों की जमानत कराने सम्‍बन्‍धी कागजात तैयार करने का निर्देश डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल समूह के वकीलों को दिया है। उम्‍मीद बतायी जाती है कि 23 जुलाई को ऐसे कागजात अदालत पेश किये जा सकते हैं। लेकिन इस कवायद के पीछे कारणों को लेकर भी अफवाहें खूब फैल रही हैं। इस प्रकरण पर बातचीत के लिए डेली-प्रॉब्‍लम्‍स न्‍यूज चैनल समूह के जितने भी वरिष्‍ठ अधिकारियों से सम्‍पर्क किया, उन्‍होंने फोन ही नहीं उठाया। इसके चलते इस समूह के प्रबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सका।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

रूपर्ट मर्डोक ने निदेशक मंडल से इस्‍तीफा दिया

लंदन। मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक ने न्यूज कॉरपोरेशन के ब्रिटेन, भारत, अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया के प्रकाशनों के निदेशक मंडलों से इस्तीफा दे दिया है। यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि फोन हैकिंग मामले के बाद वे समाचार पत्र समूह को बेचने की तैयारी कर रहे हैं। मर्डोक ने जून में ही घोषणा की थी कि वे अपने समाचार पत्र कारोबार को मूल कंपनी न्यूज कार्प के लाभदायक फिल्म एवं टेलीविजन कारोबार से अलग करेंगे।

रविवार को भेजे गए एक ईमेल में ‘द टाइम्स’, ‘द संडे टाइम्स’ और ‘द सन’ को बताया गया कि ब्रिटिश समाचार पत्रों जिनमें न्यू ऑफ दि वर्ल्ड समूह भी शामिल है, के निदेशक मंडल में अपने पदों को छोड़ने के बावजूद मर्डोक चेयरमैन के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों को लेकर ‘पूरी तरह प्रतिबद्ध’ हैं। न्यूज इंटरनेशनल के प्रवक्ता ने कहा, ‘पिछले हफ्ते मर्डोक ने कई समाचारपत्रों के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया। इनमें से कई ब्रिटेन और अमेरिका में छोटे सहायक बोर्ड हैं।’ प्रवक्ता ने कहा, ‘यह कंपनी के विभाजन से पहले औद्योगिक घरानों द्वारा किए जाने वाले सुधार से ज्यादा कुछ नहीं है।’

कंपनी ने कहा है कि यह कदम न्यूज कार्प को अलग-अलग समाचारपत्र तथा मनोरंजन परिचालन में विभाजित करने के लिए उठाया गया है। इससे न्यूज कार्प के फिल्म एवं टेलीविजन कारोबार को एक अलग कंपनी में बांटा जाएगा। दूसरी कंपनी न्यूज कार्प के सभी प्रकाशन कारोबार देखेगी। इन प्रकाशनों में वॉल स्ट्रीज जर्नल, द टाइम्स, द सन, द आस्ट्रेलियन, द न्यूयार्क पोस्ट और प्रकाशक हार्परकोलिंस शामिल हैं। कर्मचारियों को भेजे गए ईमेल के अनुसार ब्रिटेन के समाचार पत्रों के निदेशक मंडल से इस्तीफे का मकसद दोनों कंपनियां के आगामी पुनर्गठन के लिए तैयारी करना है। (एजेंसी)

फोन हैकिंग मामले में कई और अखबार संदेह के घेरे में

लंदन : मीडिया मुगल ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्‍ड’ के बाद ब्रिटेन के कई अखबार फोन हैकिंग मामले को लेकर चल रही जांच के घेर में आ गए हैं। स्कॉटलैंड यार्ड की जांच के घेरे में आने वाले अखबार ‘डेली मिरर’, ‘संडे मिरर’, ‘डेली स्टार’ और ‘स्टार ऑन संडे’ हैं। ब्रिटेन में प्रेस की संस्कृति और व्यवहार को लेकर चल रही जांच समिति के समक्ष पेश हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सू एंकर्स ने कहा कि जेल के अधिकारियों को इन अखबारों और मर्डोक के स्वामित्व वाले प्रकाशनों की ओर से रकम दी गई ताकि सनसनीखेज स्टोरी के लिए सूचनाएं ली जा सकें।

एकर्स पुलिस के उस जांच दल की निगरानी कर रहे हैं, जो फोन हैकिंग मामले और ‘न्यूज ऑफ द वल्र्ड’ को लेकर जांच कर रहा है। पुलिस का मानना है कि यहां फोन हैकिंग के 702 लोग शिकार हुए हैं। फोन हैकिंग मामले की वजह से ही मशहूर टैबलॉयड ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्‍ड’ को बंद कर दिया गया। साभार : पंजाब केसरी

लापता पत्रकार को खोजने बहन भारत पहुंची

ऋषिकेश : पांच माह से लापता 28 वर्षीय विदेशी पत्रकार का अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है। लापता युवक की तलाश में उसके परिजन इन दिनों ऋषिकेश की खाक छान रहे हैं। उल्लेखनीय है कि आयरलैंड निवासी 28 वर्षीय पत्रकार जौनाथन लियोनार्ड स्पोलन ऋषिकेश से रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गया था। उसका बैग, पासपोर्ट व कुछ सामान पुलिस ने गरुड़चट्टी झरने के पास से 12 फरवरी को बरामद किया था।

लक्ष्मणझूला पुलिस ने एक मार्च को विदेशी पत्रकार की गुमशुदगी दर्ज की थी। लगातार खोजबीन के बाद भी विदेशी युवक का अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है। वहीं जौनाथन लियोनार्ड के परिजनों ने भी उसकी तलाश में भारत आए हैं। इन दिनों जौनाथन की बहन लेज व उनकी एक अन्य सहयोगी जौनाथन की तलाश में ऋषिकेश की खाक छान रहे हैं। लेज ने बताया कि जौनाथन 31 नवंबर 2011 को भारत भ्रमण पर आया था। जिसके बाद लगातार उसका घर से संपर्क होता रहा। जौनाथन ने एक फरवरी 2012 को अंतिम बार घर पर फोन कर अपनी कुशलक्षेम बताई थी। मगर, इसके बाद उससे कोई संपर्क नहीं हो पाया। लेन का कहना है कि जौनाथन के लापता होने के बाद से उनकी मां परेशान हैं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि वह जरूर घर वापस आएगा। लेज ने बताया कि वह ऋषिकेश समेत, गढ़वाल मंडल के तमाम छोटे-बड़े शहरों में उसकी तलाश कर चुके हैं। उधर, लक्ष्मणझूला पुलिस के मुताबिक लापता जौनाथन की गुमशुदगी के बाद पुलिस और खुफिया एजेंसियां लगातार सक्रिय हैं। फिलहाल पुलिस को कोई सुराग हाथ नहीं लग पाया है। साभार : जागरण

दारूबाजी कर हंगामा करने में पिटे जागरण के सिस्‍टम इंजीनियर

मुरादाबाद : एक तरफ दैनिक जागरण के सम्पादकीय विभाग पर छंटनी  की तलवार लटक रही है तो दूसरी तरफ जागरण के ही दूसरे विभाग के लोग दारू पीकर मारपीट करने में तल्लीन हैं. ताज़ा मामला मुरादाबाद का है. मुरादाबाद में दैनिक जागरण के सिस्टम इंजीनियर शराब और शबाब के खासे शौक़ीन बताये जाते हैं. इसी साल की शुरुआत में इन्हें इनके घर में घुसकर कुछ लोगो ने जमकर पीटा था. मारपीट के पीछे किसी लड़की से छेड़छाड़ को लेकर पैदा हुआ वैमनस्य था. जिनकी लड़की को इन्होंने छेड़ा था, उन लोगो ने न सिर्फ इनकी पिटाई की, बल्कि थाने में मुकदमा लिखाने पहुंच गए. उस वक्त क्राइम रिपोर्टर की मदद से मामला निपटा. 

ताज़ा मामला इसी हफ्ते का है. बमुश्किल पांच दिन पहले फिर से इंजीनियर साहब दारू पीकर कांठ रोड पर एक ढाबा मालिक से भिड़ गए. मार पीट हुआ. इंजीनियर साहब लात भी खा गए. ढाबा मालिक क्या जाने इन्हें, उसने तुरंत थाना सिविल लाइन में तहरीर दे दी. अब एक बार फिर से क्राइम रिपोर्टर की मदद से मामले को दबाने के प्रयास किये जा रहे हैं.

यूपी महुआ से रमा सोलंकी का इस्‍तीफा, तालाबंदी के आसार

लखनऊ : यूपी महुआ न्‍यूज में तालाबंदी के आसार पुख्‍ता हो गये हैं। संस्‍थान में पसरी आर्थिक बदहाली और जबर्दस्‍त आंतरिक उठापटक के चलते हुई इस हालत में आखिरकार ब्‍यूरो प्रमुख रमा सोलंकी ने महुआ न्‍यूज से पल्‍ला झाड़ लिया है। फिलहाल इस चैनल में भारी अनिश्चितता का माहौल है। संवाददाता और कैमरामैन जैसे कर्मचारियों को वेतन तक के लिए भी पैसा मुहैया नहीं है। जाहिर है, श्रमिक असंतोष खूब है।

खबर हैं कि इस चैनल का शटर देर-अबेर गिरने ही वाला है। रमा सोलंकी अब महुआ न्‍यूज में नहीं रही हैं। पिछले सवा साल से वे इस पद पर थीं। वे अपने चर्चित साक्षात्‍कारों के लिए  पहचानी जाती रही हैं। हालांकि रमा सोलंकी ने चार दिन पहले ही अपना इस्‍तीफा दे दिया था। पता चला है कि अभी तक महुआ न्‍यूज से उनका इस्‍तीफा मंजूर नहीं किया गया है। खबर है कि पिछले एक हफ्ते से वे दिल्‍ली में ही जमी हैं और पुख्‍ता सूचनाओं के अनुसार वे अब वापस लौटने के मूड में नहीं हैं। काफी प्रयास के बाद फोन पर सम्‍पर्क होने पर रमा सोलंकी ने माना कि उन्‍होंने महुआ छोड़ दिया है। रमा का कहना था कि वे एक बड़े वेंचर पर काम कर रही हैं और जल्‍दी ही वे किसी बड़े न्‍यूज चैनल से जुड़ेंगी। महुआ चैनल में चल रहे फैले असंतोष और अराजकता की हालत को रमा सोलंकी ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।

उधर, भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार, महुआ महुआ न्‍यूज की माली हालत खस्‍ता है। पिछले दो महीने से कर्मचारियों को उनकी तनख्‍वाह का भुगतान नहीं हो पाया है। सूत्रों के अनुसार जबर्दस्‍त आर्थिक बदहाली के चलते महुआ न्‍यूज प्रबंधन इस चैनल को यूपी में चला पाने के हालत में नहीं है। इस आंतरिक हालत के चलते संस्‍थान से भगदड़ की हालत बतायी जाती है।

वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

यशवंत-जेल : ये रहा विनोद कापड़ी का एफआईआर और इंटरव्‍यू

इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी द्वारा दर्ज कराए गए एफआईआर की कॉपी को भी नीचे पब्लिश किया जा रहा है ताकि सारे मामले को लोग समझ सकें, जान सकें. इसमें पुलिस का कितना अच्‍छा रोल है इसकी भी जानकारी लोगों को हो सके. हालांकि कापड़ी द्वारा कराए गए एफआईआर की कॉपी के साथ इस घटना के बाद इस मामले पर किए गए उनके इंटरव्‍यू का लिंक भी दिया जा रहा है ताकि लोग एफआईआर की असलियत और सच्‍चाई जान सकें.

एफआईआर की कॉपी और इंटरव्‍यू से नोएडा के एसएसपी का चरित्र भी लोगों को अच्‍छी तरह समझ में आ जाएगा. हालांकि तमाम लोग कहते हैं कि इसमें यूपी का सीएम कार्यालय भी इनवाल्‍ब है, पर यह कितना सच है और कितना फसाना ये तो भगवान जाने पर इस मामले में पुलिस का रवैया बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट है कि उसे यशवंत को किसी भी स्थिति में गिरफ्तार करना था चाहे फर्जी तरीके से हो या गलत तरीके से. अब एफआईआर और इंटरव्‍यू देखकर आप सच का अंदाजा स्‍वयं लगाइए. बाकी बातें तो होती ही रहेंगी क्‍योंकि आग लगी है तो कुछ ना कुछ तो जरूर जलेगा.

विनोद कापड़ी द्वारा इस मामले पर दिया गया इंटरव्‍यू इस लिंक पर क्लिक करके देख-सुन सकते हैं –

http://www.youtube.com/watch?v=3cgi-F8oJUw


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यशवंत-जेल : यह है दैनिक जागरण द्वारा दर्ज कराए गए एफआईआर का मजमून

यशवंत की गिरफ्तारी को लेकर अक्‍सर पूरे मामले को न जानने वाले लोग कारण पूछते हैं. लिहाजा सबको पूरी कहानी रिपीट कर पाना म‍ुश्किल होता है. इसलिए लोगों की सहूलियत के लिए दैनिक जागरण द्वारा नोएडा के सेक्‍टर 58 में दर्ज कराए गए मामले की एफआईआर की कापी ही भड़ास पर पब्लिश किया जा रहा है ताकि लोगों को पता चल सके कि मामला क्‍या है, पुलिस इस मामले को लेकर कितनी संवेदनशील है तथा धाराओं का कितना अच्‍छा उपयोग किया गया है.

हालांकि इन सारे मामलों पर बहस होगी और पुलिस के चरित्र को भी न्‍याय के कटघरे में खड़ा किया जाएगा. जिस तरीके से दबाव और सत्‍ता की रखैल बन चुकी है यह व्‍यवस्‍था, इस पर सवाल उठाए जाएंगे, पर पहले पढि़ए जागरण की एफआईआर और पुलिस द्वारा दर्ज की गई कहानी.


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कैलेण्डर में जारी यशवंत की गिरफ्तारी

नई दिल्ली : यशवंत की खबरों से खार खाने वाले संस्थानों की संख्या कम नहीं है. फ़िलहाल लगभग सभी संस्थानों में एक जैसी स्थिति ही है. कोई यशवंत की गिरफ़्तारी को हलके में ले रहा है तो कोई बाकायदा इन्टरनल प्रोग्राम चला रहा है. नेशनल दुनिया, दैनिक जागरण और हिंदुस्तान ने तो यशवंत की हर पेशी को कैलेण्डर में दर्ज करना शुरू कर दिया है. बात यही तक सीमित होती तो गनीमत थी. इंडिया टीवी पर तो यशवंत डेट बाई डेट फालो किये ही जा रहे हैं, आलोक मेहता, शशि शेखर और विष्णु त्रिपाठी की भी यशवंत पर खास नजर बनी हुई है. सब अपने अधिनस्‍थों को मामले का न सिर्फ फालोअप करने को कह रहे हैं, बल्कि पूरे समूह में रोजाना यशवंत का कैलेण्डर फारवर्ड हो रहा है.

किस दिन यशवंत की गिरफ़्तारी हुई, क्या आरोप हैं, अगर फोटो नहीं है तो थाने से निकलते हुए फोटो लगभग हर दूसरे तीसरे जारी की जा रही है वो भी आल एडिशन. दैनिक जागरण तो खासतौर पर यशवंत पर मेहरबान हो गया है. ऐसा होता भी क्यों नहीं. दैनिक जागरण कर्मचारी हितों की ऐसी की तैसी करने वाली हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी है. इतना ही नहीं, पाठकों से भी इसे राय रत्ती का मतलब नहीं है. बहरहाल, इंडिया टीवी से ज्यादा बड़ा दुश्मन इस बार दैनिक जागरण नजर आ रहा है. जुलाई के पाक्षिक प्लान में बाकायदा यशवंत की पेशी का कैलेण्डर जारी किया गया है.


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दैनिक जागरण ने लिखी फर्जी खबर, अमर उजाला ने खोला पोल

मुरादाबाद : मुरादाबाद से निकलने वाले दैनिक जागरण और अमर उजाला में तीन दिन से खबरों में जबरदस्त जंग देखने को मिल रही है. शुरुआत दैनिक जागरण ने एक फर्जी और भ्रामक खबर को पहले पेज पर प्रकाशित करके की. अब अमर उजाला ना सिर्फ बड़े अधिकारियों के मुंह से दो दिन से उस खबर को फर्जी बता रहा है, बल्कि सीधे लिख रहा है कि महानगर के एक अखबार ने इस शीर्षक से फर्जी समाचार प्रकाशित कर सनसनी फ़ैलाने की कोशिश की.

तीन दिन पहले दैनिक जागरण ने क्राइम रिपोर्टर ज्ञानेंद्र सिंह के नाम से पहले पेज पर समाचार प्रकाशित किया कि थानेदार ने थाने में महिला सिपाही की अस्मत लूटने की कोशिश की. सुबह अख़बार मार्केट में आने के बाद इस खबर पर खलबली मच गयी. पुलिस अधिकारी तो हैरान थे ही, जनता और जनता बने पत्रकार भी खासे हैरान हुए. तुरंत महानगर के सारे पत्रकारों ने सभी उच्च अधिकारियों से मामले की पूछ ताछ की. इसी बीच जिस थानेदार पर आरोप लगाया गया, उसे विभाग ने सस्पेंड कर दिया और पूरे मामले पर जांच बैठा दी. शुक्रवार को मीडियाकर्मियों के सामने आरोप लगाने वाली महिला सिपाही के बयान हुए तो उसने साफ़ कहा कि उसकी अस्मत लूटने का कोई प्रयास नहीं किया गया. थानेदार ने उससे अपशब्द कहे थे जिसका कि उसने मौके पर ही विरोध किया और इस सम्बन्ध में शिकायती पत्र एसएसपी व डीआईजी को भी दिया है.

शनिवार को आरोप लगाने वाली महिला पुलिसकर्मी ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी के सामने अपना बयान पूर्ववत दोहराया. सोचने वाली बात यह है कि हिंदुस्तान और अमर उजाला ने इन सारे बयानों के आधार पर समाचार को फालो किया, जबकि दैनिक जागरण सिर्फ उक्त थाने के थानेदार के पीछे पड़ा रहा. उधर शनिवार व रविवार के अंक में अमर उजाला ने अपनी खबर में साफ़ बताया कि महा नगर के एक समाचार पत्र ने फर्जी आधारहीन खबर लिखकर सनसनी फ़ैलाने की कोशिश की. इतना ही नहीं, कुछ पत्रकारों के साथ हुई बातचीत में आरोपी दरोगा ने बताया कि उससे धन की डिमांड की गयी. जब उसने मना कर दिया तो उससे कहा गया कि तुम्हारे थाने से शराब की जो बोतल बंधी थी, तुम्हारे आने पर वो मिलनी बंद हो गयी, उसे शुरू करवाओ. जब उसने इन सबके लिए मना कर दिया तो उसके खिलाफ साजिश रची गयी.

मीडिया ने महिलाओं के सम्‍मान में अहम योगदान दिया है

गुवाहाटी में एक लड़की के साथ जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। आज सारी दुनिया को मालूम है कि किस तरह से अपने पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को अपमानित किया जाता है।  टेलीविज़न और अखबारों में खबर के आ जाने के बाद ऐसा माहौल बना कि गुवाहाटी की घटना के बारे में सबको मालूम हो गया। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इस तरह की घटनाएं देश के हर कोने में होती रहती हैं। ज्‍यादातर मामलों में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। चर्चा तब होती है जब यह घटनाएं मीडिया में चर्चा का विषय बन जाती हैं।

गुवाहाटी की घटना के साथ बिलकुल यही हुआ। देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण टेलीविज़न समाचार चैनलों ने इस खबर को न केवल चलाया बल्कि कुछ प्रभावशाली चैनलों ने तो इस विषय पर घंटों की चर्चा का कार्यक्रम भी प्रसारित किया। नतीजा सामने है। अब सबको मालूम है कि किस तरह से एक समाज के रूप में हम असंवेदनशील हैं। घटना की जांच करने गयी महिला आयोग की एक प्रतिनिधि और कभी दिल्ली विश्वविद्यालय की नेता रही महिला ने तो वहां जाकर अपनी छवि मांजने की कोशिश की। इस चक्कर में पीड़ित लड़की का नाम भी उन्होंने  सार्वजनिक कर दिया। ऐसा नहीं करना चाहिए था। महिलाओं के प्रति एक समाज के रूप में हमारा दृष्टिकोण आज पब्लिक डोमेन में है और इसके लिए सबसे ज्‍यादा सम्मान का पात्र मीडिया ही है।

आज मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से निभा भी रहा है। उसकी वजह से ही देश में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार को जनता के सामने लाया जा रहा है और सरकार में भी किसी स्तर पर ज़िम्मेदारी का भाव जग रहा है। लेकिन एक बात स्वीकार करने में मीडिया कर्मी के रूप में हमें संकोच नहीं होना चाहिए। अक्सर देखा जा रहा है कि जब एक बात किसी मीडिया कंपनी या किसी मेहनती पत्रकार की कोशिश से खबरों की दुनिया में आ जाती है तो बहुत सारे पत्रकार उसी खबर को आधार बनाकर खबरें लिखना शुरू कर देते हैं। पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है कि जब भी कोई खबर किसी भी रिपोर्टर की जानकारी में आती है तो वह उस व्यक्ति का पक्ष ज़रूर लेगा जिसके बारे में खबर है। कई बार ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति के बारे में खबर है उस तक पंहुचना ही बहुत मुश्किल होता है। उस हालत में उस व्यक्ति से सम्बंधित जो लोग या जो भी संगठन हों उनसे जानकारी ली जा सकती है। लेकिन इस काम में एक दिक्कत है। अगर वह व्यक्ति प्रभावशाली हुआ और खबर उसके खिलाफ जा रही हो तो वह खबर को रोकने की कोशिश करवा सकता है।

ज़ाहिर है कि उस से बात करने पर खबर दब सकती है। इस हालत में रिपोर्टर के पास इतने सबूत होने चाहिए कि वह ज़रुरत पड़ने पर अपनी खबर की सत्यता को साबित कर सके। उसके पास कोई दस्तावेज़ होना चाहिए, कोई टेप या कोई वीडियो भी बतौर सबूत हो तो काफी है। लेकिन अगर किसी के बयान के आधार पर कोई खबर लिखी जा रही है तो उसके बयान की लिखित प्रति, उसका टेप किया बयान या कुछ अन्य लोगों की मौजूदगी में दिया गया उसका बयान होना ज़रूरी है। अगर ऐसा न किया गया तो पत्रकारिता के पेशे का अपमान होता है और आने वाले समय में पत्रकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठ खड़े होते हैं। पत्रकार को किसी भी हालत में सुनी सुनायी बातों को आधार बनाकर खबर नहीं लिखना चाहिए। दुर्भाग्य की बात यह है कि गुवाहाटी की घटना के बारे में इस तरह की पत्रकारिता हो गयी है।

अभी एक दिन पहले एक बड़े अखबार में खबर छपी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे अगर छेड़खानी जैसे अपराधों से बचना चाहती हैं तो उन्हें ठीक से कपड़े पहनना चाहिए। बात बहुत ही अजीब थी। मैंने तय किया कि इन देवी जी के इस बयान के आधार पर ही इस बार अपने इस कालम में महिलाओं की दुर्दशा की चर्चा की जायेगी। बड़े अखबार की खबर के हवाले से जब उनसे बात करने की कोशिश की गयी तो वे गुवाहाटी में थीं लेकिन थोड़ी कोशिश के बाद उनसे संपर्क हो गया। जब उनसे बताया कि आप के ठीक से कपडे़ पहनने वाले बयान के बारे में बात करना है तो उन्होंने जो कहा वह बिलकुल उल्टी बात थी। उन्होंने कहा कि कभी भी उन्होंने वह बयान नहीं दिया है जो एक अंग्रेज़ी अखबार में छपा है। उन्होंने सूचित किया कि वे दिल्ली के अपने दफ्तर को हिदायत दे चुकी हैं कि वे बयान जारी करके यह कहें कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने सम्बंधित अखबार या उसके रिपोर्टर से कोई बात नहीं की है और बयान पूरी तरह से फर्जी है।

उनके इस बयान के बाद भारत सरकार की एक बड़ी अधिकारी को कटघरे में लेने की अपनी इच्छा पर पानी पड़ गया लेकिन यह सुकून ज़रूर हुआ कि एक गलत खबर को आधार बनाकर अपनी बात कहने से बच गए। लेकिन आज सुबह के अखबारों को देखने से अपने पत्रकारिता पेशे में लगे हुए लोगों की कार्यप्रणाली से निराशा जरूर हुई। राष्ट्रीय महिला आयोग के दफ्तर ने शायद बयान जारी किया होगा क्योंकि उस बड़े अखबार में आज उस खबर का फालो अप नहीं है। लेकिन आज एक अन्य बड़े अखबार में उस खबर का फालोअप छपा है। जिसमें महिला आयोग की अध्यक्ष की लानत मलानत की गयी है। दिल्ली में रहने वाली कुछ महिला नेताओं से बातचीत की गयी है और उनके बयान में महिला आयोग की कारस्तानी की निंदा की गयी है। जिन महिला नेताओं के बयान छपे हैं उनमें से कोई भी महिला आयोग की अध्यक्ष या उस से भी बड़े पद पर विराजने लायक हैं। इसलिए उनकी बात समझ में आती है। उन्हें चाहिए कि वे राष्ट्रीय महिला आयोग की मौजूदा अध्यक्ष को बिल्‍कुल बेकार की अधिकारी साबित करती रहें जिससे जब अगली बार उस पद पर नियुक्ति की बात आये तो अन्य लोगों के साथ इनका नाम भी आये। लेकिन क्या हमको भी यह शोभा देता है कि एक गलत खबर का फालो अप चलायें। पत्रकारिता की नैतिकता के पहले अध्याय में ही लिखा है कि खबर ऐसी हो जिसकी सत्यता की पूरी तरह से जांच की जा सके और जब सम्बंधित व्यक्ति या उसका दफ्तर ऐलानियाँ बयान दे रहा है कि वह बयान उनका नहीं है तो उस बयान के आधार पर खबरों का पूरा  ताम झाम बनाना अनैतिक है। बहरहाल नतीजा यह हुआ कि यह कालम जो राष्ट्रीय माहिला आयोग की अध्यक्ष के खिलाफ एक सख्त टिप्पणी के रूप में सोचा गया था, औंधे मुंह गिर पड़ा। अब उनके खिलाफ कभी फिर टिप्पणी लिखी जायेगी लेकिन आज तो अपने पेशे की ज़िम्मेदारी पर ही कुछ बात करना ठीक रहेगा।

गुवाहाटी की खबर के हवाले से मीडिया की भूमिका पर बात करना बहुत ही ज़रूरी है। धीरे धीरे खबर आ रही है कि उस घटना के लिए जो अपराधी छेड़खानी कर रहे थे, उनको सेट करने का काम एक टीवी पत्रकार ने ही किया था। उस टीवी चैनल के मुख्य संपादक के खिलाफ कार्रवाई भी हो चुकी है। ज़ाहिर है कि फर्जी तरीके से खबर बनाने के लिए उस टीवी चैनल ने इस तरह का आयोजन किया। इस प्रवृत्ति की निंदा की जानी चाहिए लेकिन उस टीवी चैनल की मिलीभगत साबित हो जाने के बाद गुवाहाटी की घटना की गंभीरता कम नहीं हो जाती। बल्कि यह ज़रूरी हो जाता है कि छेड़खानी कर रहे अपराधियों के साथ साथ उन पत्रकारों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाए जिन्होंने इस तरह का आयोजन करके एक लड़की की अस्मिता की धज्जियां उड़ाईं। इस बात की पूरी संभावना है कि सत्ताधारी पार्टी गुवाहाटी के उस गैरजिम्मेदार पत्रकार के हवाले से सभी खबरों की सत्यता को सवालों के घेरे में लेने की कोशिश करेंगे। लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। महिलाओं सहित अपने सभी नागरिकों के सम्मान की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है और सरकार को उसे करते ही रहना चाहिए। देखा यह गया है कि सरकार में बैठे लोग खबर की सच्चाई पर सवाल उठाने का मामूली सा मौक़ा हाथ आते ही खबर के विषय को भूल जाते हैं। सत्ताधारी पार्टी के नेता बयानों की झड़ी लगा देते हैं और मुद्दा कहीं दफ़न हो जाता है। मीडिया को कोशिश करना चाहिए कि गुवाहाटी की घटना के साथ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के बारे में जो राष्ट्रीय बहस चल पड़ी है, उसे उसके अंजाम तक पहुंचाएं।

गुवाहाटी की घटना के साथ ही उत्तर प्रदेश के बागपत की बातें भी हो रही हैं। वहां के पुरुषों ने एक पंचायत करके अपने घरों की महिलाओं को सलाह दिया है कि वे दिन ढले घरों से बाहर न निकलें, सेल फोन का इस्तेमाल न करें और प्रेम विवाह न करें। यानी उस पंचायत ने अब तक हुए विकास को उल्टी दिशा में दौडाने की कोशिश है। जहां की यह घटना है वह देश की राजधानी से लगा हुआ इलाका है। दिल्ली के इतने करीब हो कर भी महिलाओं के प्रति इतना आदिम रवैया बहुत ही अजीब है। उस से भी अजीब है कि कई पार्टियों के राजनीतिक नेता महिलाओं के खिलाफ इस तरह का रुख रखने वालों के साथ खड़े पाए जा रहे हैं। ज़ाहिर है एक समाज के रूप में हम कहीं फेल हो रहे हैं। बागपत वाले मामले में मीडिया का रुख शानदार है और हर वह नेता तो मध्यकालीन सामंती सोच के प्रभाव में आकर बयान दे रहा है उसकी पोल लगातार खुल रही है। आज से करीब 35 साल पहले भी इसी बागपत में माया त्यागी नाम की एक महिला के साथ पुरुष प्रधान मर्दवादी सोच वालों ने अत्याचार किया था। उस वक्त भी मीडिया के चलते ही वह मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना था। इतने वर्षों बाद भी आज बागपत और दिल्ली के आसपास के अन्य इलाकों में महिलाओं के प्रति जो रवैया है वह क्यों नहीं बदल रहा है, यह चिंता की बात है और इसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए। लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता तो इस बात पर तब तक ध्यान नहीं देंगे जब तक कि उनकी असफलताओं को मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक न किया जाए। पिछले कई वर्षों में यही हुआ है। जब 14 फरवरी के आसपास लड़कियों की अस्मिता पर बंगलोर में हमला हुआ था, उस वक्त भी मीडिया के हस्तक्षेप से ही अपराधी पकड़े गए थे। इसलिए साफ़ लगने लगा है कि इस देश में महिलाओं के सम्मान की रक्षा के काम में सबसे अहम भूमिका मीडिया की ही रहेगी।   

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्‍ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

इटावा में पुलिस बनकर अखबार विक्रेता को लूट लिया

इटावा : यूपी में अपरा‍धी किस कदर बेखौफ हो चुके हैं इसकी बानगी इटावा में देखने को मिली. बाइक सवार लुटेरों ने पुलिस बनकर अखबार विक्रेता को धमकाकर उसकी तलाशी लेकर वसूली करके लाए गए रुपये लूट लिए. अब लुटेरे पुलिस के भेष में हैं या पुलिस लुटेरों के भेष में है कहना मुश्किल है. पर सीएम के गृह जनपद में हुई इस घटना ने सरकार पर भी सवाल उठा दिया है. शहर में थाना सिविल लाइन क्षेत्र में ओवरब्रिज के उत्तरी ओर शुक्रवार रात बाइक सवार 3 लुटेरों ने इस वारदात को अंजाम दिया.

जानकारी के अनुसार अखबार विक्रेता दीपक सविता निवासी मोहल्ला लालपुरा कोतवाली सदर लाइन पार क्षेत्र के फ्रेंडस कालोनी तथा अशोकनगर में अखबार की वसूली करके बीती रात करीब साढ़े आठ बजे घर वापस जा रहा था. पुल की ओर मुड़ते ही बाइक सवार 3 लुटेरों ने उसे रोक लिया, पुलिसिया रौब झाड़ते हुए बोले तेरे पास तमंचा है, उसे निकालकर दे. दीपक ने तमंचा न होने की कहा, जिसपर लुटेरों ने तलाशी लेना शुरू कर दिया. उसने जेब से जैसे ही रुपये निकाले वैसे ही लुटेरे रुपये छीन शहर की ओर भाग गए. दीपक की चीख-पुकार सुन कुछ राहगीरों ने लुटेरों का पीछा किया, पर हाथ नहीं आए.

गुवाहाटी में युवती के साथ बदसलूकी की आंखों देखी कहानी पत्रकार मुकुल की जुबानी

गुवाहाटी। रात करीब 9.30 के आसपास मैं अपने दफ्तर से घर जा रहा था। कुछ ही आगे बढ़ने के बाद अपने कपड़े संभालती हुई एक युवती मेरी गाड़ी की ओर अंकल बचाओ, अंकल बचाओ चिल्लाती हुई दौड़ रही थी। मैंने गाड़ी पार्क किया। लेकिन तब तक दो दर्जन के करीब भीड़ लड़की की ओर टूट पड़ी। वे उनके कपड़े और बाल नोंच रहे थे। मैंने लड़की को बचाने का प्रयास किया। लेकिन हमलावर मुझे धक्का दे रहे थे। मैंने फटाफट एक आदमी के हाथ से मोबाइल छीना, वे संभवत: पुलिस को फोन कर रहे थे।

मैंने 100 पर फोन मिलाया। जबाव आया -पुलिस पहुंचने वाली है। लेकिन पुलिस देर से आई। तब तक भीड़ में शामिल लोग लड़की की इज्जत के साथ सड़क पर खेल रहे थे। पुलिस के पहुंचने के बाद मेरा हौसला बढ़ा। मैंने लड़की को उठा कर पुलिस की गाड़ी में बैठा दिया। उसके बाद भी हमलावर लड़की को नोंच रहे थे और पुलिस सहज थी। पुलिस को देखने से ऐसा नहीं लग रहा था कि कुछ भी हुआ है। पुलिस के जाने के बाद मेरे मन में सवाल उठने लगा कि आखिर पुलिस हमलावरों को पकड़ कर क्यों नहीं ले गई। सिर्फ दो ही पुलिसकर्मी मौके पर क्यों पहुंचे। उनके साथ महिला पुलिस क्यों नहीं थी। यह आंखों देखी आज वरिष्ठ पत्रकार मुकुल कलिता गुवाहाटी प्रेस क्लब में संवाददाताओं को सुना रहे थे। प्रेस क्लब ने उनकी साहस और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन हेतु सराहना के लिए आमंत्रित किया था।

मालूम हो कि 9 जुलाई की रात एक युवती के साथ हुई बदसलूकी के समय पत्रकार श्री कलिता वहां मौजूद थे और लड़की को बचाने का उन्होंने भरसक कोशिश किया था। घटना पर क्षोभ व्यक्त करते हुए श्री कलिता कहते हैं कि पुलिस की भूमिका ठीक नहीं रही। बहशी दरिंदे को उसी समय गिरफ्तार करना चाहिए था। लेकिन कई दिनों तक पुलिस सोती रही और जब मीडिया का दबाव आया तो कार्रवाई शुरू हुई। जरुरी होने पर घटना की गवाही देने के लिए कोर्ट जाने के लिए तैयार श्री कलिता ने बताया कि वे जब मौके पर पहुंचे तो दो कैमरा फोटो शूट कर रहा था। मामले में गिरफ्तार गौरव ज्योति नेओग का नाम लेने से बचते हुए श्री कलिता ने कहा कि घटना से पहले वे गौरव को नहीं जानते थे। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि दूसरा कैमरा आखिर किसका था। मामले की चल रही जांच को देखते हुए घटना के बारे में ज्यादा न बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि युवती के साथ बदसलूकी में सिर्फ युवा ही नहीं उन्होंने एक बुजुर्ग को भी देखा था।

घटना के बाद पत्रकारिता पर उठ रहे सवाल पर चिंता व्यक्त करते हुए वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि किसी घटना में कोई पत्रकार शामिल हो सकता है। लेकिन इसका कतई मतलब नहीं कि पत्रकारिता करने वाले सभी लोग गंदे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में देखने को मिला है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों के साथ कुछ लोग गलत बर्ताव कर रहे हैं। ऐसा ठीक नहीं है। समाज के लिए मीडिया भी जरूरी है और ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि जीएस रोड पर यदि कोई पत्रकार घटना में शामिल था तो मैं (एक पत्रकार) उस असहाय लड़की को बचाने का प्रयास कर रहा था।

गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट.

सीएमओ ने की पत्रकार के साथ अभद्रता, एसडीएम को सौंपा ज्ञापन

जावद : नगर पंचायत सीएमओ का पत्रकारों के प्रति रवैया ठीक नहीं है। उनसे किसी योजना के संबंध में जानकारी मांगी जाती है, तो वे अभद्रता करते हैं। यह बात शुक्रवार को जावद एसडीएम एनके वीरवाल से क्षेत्र के पत्रकारों ने कही। पत्रकारों ने बताया सीएमओ एआर सिद्दीकी से जब पत्रकार बनवारीलाल झरिया ने जानकारी मांगी तो उन्होंने अभद्रता की। सीएमओ के रवैए से पत्रकारों में आक्रोश है। पत्रकार एकजुट होकर एसडीएम कार्यालय पहुंचे और एसडीएम को ज्ञापन सौंप कर कार्रवाई की मांग की। अशोक पाटनी, दिलीप बांगड, जगदीश न्याती, जगदीश शर्मा, दिलीप सकलेचा, आशीष बंक, हरिशंकर भेरावत, सत्यनारायण शर्मा, विजय जोशी, बनवारीलाल जारिया उपस्थित थे।

निशंक के चेले अपना सामान्‍य ज्ञान दुरुस्‍त करें : उमेश कुमार

समाचार प्‍लस चैनल के कई खुलासों ने उत्‍तराखंड की राजनीति में हलचल मचा रखा है. इसकी जद में भ्रष्‍टाचार के कई मामलों को लेकर चर्चा में आने वाले पूर्व मुख्‍यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और उनके चेले चपाटी भी हैं. निशंक के कार्यकाल में उनकी स्‍टेट मशीनरी और पुलिस के निशाने पर रहे पत्रकार उमेश कुमार के चैनल समाचार प्‍लस ने राज्‍य में भ्रष्‍टाचार के गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किए तो निशंक के चेलों के पेट में दर्द शुरू हो गया है. पिछले दिनों उनके खास माने जाने वाले गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) के पूर्व उपाध्‍यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने भी उमेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उमेश की गिरफ्तारी की मांग भी की.

इस बारे में पूछे जाने पर उमेश कुमार कहते हैं कि पहले तो निशंक के लोगों को अपनी सामान्‍य ज्ञान दुरुस्‍त रखनी चाहिए. लोकतंत्र है वे कोई भी आरोप लगा सकते हैं. हम इसका प्रतिवाद नहीं करते, परन्‍तु जब हमने भ्रष्‍टाचार के पोल खोलने शुरू किए तो निशंक एंड कंपनी बौखला गई है. रघुनाथ सिंह नेगी ने भी इसी बौखलाहट में मेरी गिरफ्तारी की मांग करते हुए कई आरोप जड़ डाले. जाहिर है सारे मामले राजनीति प्रेरित रहे और निशंक के भ्रष्‍टाचार की पोल खोलने के एवज में लगाए गए. पर नेगी यह बताना भूल गए कि उनकी ही पार्टी की खंडूरी सरकार ने उनके ऊपर लगाए गए अधिकांश फर्जी मुकदमे वापस ले लिए.

उमेश कुमार ने बताया कि खंडूड़ी सरकार ने ही उनके उपर रखे गए इनाम को भी खतम कर दिया. जांच में मामला फर्जी पाए जाने के बाद उनके खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर को भी निरस्‍त किया जा चुका है. तमाम मामलों में जांच के बाद पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी है, परन्‍तु बौखलाहट में नेगी उनके खिलाफ मुकदमों की गिनती बढ़ा कर अपनी खीझ निकाल रहे हैं. आखिर अचानक ऐसी कौन सी जरूरत आन पड़ी कि मेरी गिरफ्तारी की मांग करने लगे. उमेश कहते हैं निशंक एंड कंपनी को शंका है कि एक पत्रकार होने के नाते मैं इन लोगों की करतूतों की पोल खोलकर रख दूंगा. इसलिए बिना मौसम के मेढ़क की तरह टर्र टर्र करने लगे हैं. हालांकि इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखूंगा. जिनको भौंकना है वो भौंकता रहे. कलम और खबरें चलती रहेंगी.

अर्चना की शिकायत पर अनिल त्रिपाठी एवं सतीश प्रधान के‍ खिलाफ मामला दर्ज

लखनऊ: राजधानी पत्रकारों पर चढ़ा आशिक-मिजाजी का नशा आखिरकार काफूर हो गया है। लखनऊ पुलिस ने अर्चना यादव नामक पत्रकार की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए मुकदमा दर्ज कर लिया है। हुसैनगंज थाना कोतवाली में अभी-अभी दर्ज कराये गये इस मुकदमे में अर्चना ने छत्‍तीसगढ़ के रायपुर से प्रकाशित देशबंधु के पत्रकार अनिल त्रिपाठी और नार्थईस्‍ट स्‍टेट्समैन के विशेष संवाददाता सतीश प्रधान पर छेड़खानी, अश्‍लील गति‍विधियों में लिप्‍त रहने और जान से मार देने की धमकी देने का मामला दर्ज कराया है। पुलिस ने अपराध संख्‍या 163-12 पर धारा 323, 354 और 506 भारतीय दंड संहिता के तहत मामला दर्ज कर लिया है। खबर है कि पुलिस ने इस मामले में शामिल आरोपी पत्रकारों की धर-पकड़ के लिए चार टीमें लगायी हैं।

यौन विद्रूप मानसिकता से ग्रसित पत्रकार हैं अनिल त्रिपाठी : अर्चना यादव

: फेसबुक का पता देकर अर्चना ने किया खुलासा : कुमार सौवीर की रिपोर्टिंग पर भी उठाये कड़े सवाल : लखनऊ : अर्चना यादव ने अब लखनऊ के प्रतिष्ठित पत्रकारों के चरित्र का खुलासा किया है। अपने पक्ष में अर्चना ने पत्रकार अनिल त्रिपाठी का दावा है कि वे विद्रूप यौन-मानसिकता से ग्रसित हैं। और पिछले दिनों अनिल त्रिपाठी ने अपनी इसी मानसिकता के तहत ही उनके साथ अश्‍लील हरकत की थी। उधर इस मामले की रिपोर्ट लिखने के मामले में पत्रकार कुमार सौवीर पर भी पत्रकारिता में गुटबाजी और ऐसे शर्मनाक हादसों पर पीडि़तों के खिलाफ रहने का आरोप लगाया है। बहरहाल, अर्चना का दावा है कि इस मामले में हजारों स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एकजुट किया जाएगा ताकि पत्रकारिता के नाम पर धंधा करने वाले कुत्सित लोगों का पर्दाफाश किया जा सके।

बतातें चलें कि पिछले दिनों अर्चना यादव के अपने मेल पर कहा था कि अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान नामक पत्रकारों ने उनके साथ अश्‍लील हरकतें की थीं। बाद में जब इन पत्रकारों की हरकतें सीमा से बाहर निकलने लगी तो तीन दिन पहले लखनऊ के विकासदीप भवन में अर्चना यादव ने चप्‍पलों से इन पत्रकारों को जमकर धुनाई की थी। गौरतलब है कि छत्‍तीसगढ़ के रायपुर से प्रकाशित दैनिक देशबंधु अखबार के रिपोर्टर के अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान नॉर्थ ईस्‍ट स्‍टेट्समैन नामक संस्‍थान में विशेष संवाददाता के खिलाफ हैं। अनिल त्रिपाठी लखनऊ से युग जागरण नामक एक खबर का संचालन भी करते हैं। हालांकि अर्चना यादव ने आईजी और एसएसपी से इस मामले की शिकायत की थी और इन पत्रकारों के खिलाफ छेड़छाड़ जैसे गंभीर मामले पर कड़ी कार्रवाई की मांग की थी।

अपनी एक ताजा शिकायत में अर्चना यादव ने ऐसे पत्रकारों की करतूतों और उनकी गंदी व अश्‍लील गतिविधियों का खुलासा किया है। अर्चना ने कहा है कि अनिल त्रिपाठी केवल अर्चना के साथ ही नहीं, बल्कि सामाजिक तौर पर भी कुत्सित यौन-मानसिकता से ग्रसित हैं। अपने पक्ष में अर्चना ने अनिल त्रिपाठी के फेसबुक पर बने उनके एकाउंट का खुलासा किया है, जहां गंदी व अश्‍लील गतिविधियों संचालित की जाती हैं। www.facebook.com/anil.aniltripathi.14 नामक इस फेसबुक एकाउंट पर अश्‍लील और अभद्र टिप्‍पणियां और बेहूदा अश्‍लील फोटोज पोस्‍ट किये हैं, इतना ही नहीं, बल्कि ऐसी साइटों का पता भी इस एकाउंट पर दर्ज किया गया है, जहां ऐसे हजारों-लाखों फोटोज उपलब्‍ध कराया जा सकता है। नजीर के लिए मौजूद है अनिल त्रिपाठी के एकाउंट की तस्‍वीर।


अपने ताजा मेल में अर्चना ने लिखा है कि :– घटना पर चर्चा का बाजार था गर्म.
कोई नहीं समझा व्यथित महिला का मर्म.
किसी के लिए था प्रहसन.
किसी का था मनोरंजन.
किसी को बनी सत्य-कथा.
व्यथित मन से लिख रही हूँ.
मैं भी ये व्यथा.

कुमार सौवीर जैसे शख्सीयत के पत्रकार द्वारा आज एक महिला द्वारा अपने शोषण/छेड़खानी जैसे गम्भीर आरोपों के प्रकरण को गुटबाजी की परिभाषा का नाम देकर कौन सी पत्रकारिता का दायित्व निभा रहे हैं। मेरा सम्पूर्ण मीडिया परिवार से अपने साथ हुयी इस घटना से सहयोग की अपेक्षा की गयी है, स्वयं पत्रकार होने के नाते मीडिया के लोग मेरे परिवार के सदस्य हैं। सतीश प्रधान द्वारा अपनी साफगाई में जिस तरह बयान देकर इसे किसी गुटबाजी का नाम दिया जा रहा है और कुमार सौवीर ने तो अपनी तरफ से किसी टोली को इंगित भी कर दिया। आप सभी मीडिया परिवार से मेरा अनुरोध है कि क्या किसी के कहने या भड़काने से कोई महिला ऐसा कार्य कर सकती है तो कुमार सौवीर बतायें। विकास दीप काम्पलेक्स जहां यह घटना घटित हुयी सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी की जुगल जोड़ी के कारनामों को बयान करने के लिये अनेक व्यक्ति मौजूद हैं।

अनिल त्रिपाठी की facebook wall (anil anil tripathi) या (www.facebook.com/anil.aniltripathi.14) पर जाकर इस व्यक्ति की sexual मानसिकता का अंदाजा का पता किया जा सकता है। आज जहां महिलाओं को देश निर्माण में बराबर का हक देने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर उनका घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया है। आज यदि कोई महिला पत्रकार आगे बढ़ने की कोशिश करती है तो सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी जैसे मानसिकता के लोगों की छेड़खानी का विरोध करती है वहीं कुछ वरिष्ठ और गरिमामयी पत्रकार इसे गुटबाज़ी का नाम देकर मामले को रफा दफा कर ऐसे व्यक्ति की हौसला अफजायी करते हैं।

मैं स्वयं एक पत्रकार हूँ अतः मैने समस्त मीडिया परिवार को इस घटना से अवगत कराया और आप सबसे मेरी अपेक्षा है कि यदि आप में इतना साहस नहीं है कि इस घटना की निंदा कर सके तो इसे किसी गुटबाजी का नाम देकर ऐसे घृणित मानसिकता के लोगो को बचाने की साजिश न करे। यदि इनको अपने कृत्यों की सज़ा नही मिली तो भविष्य में किसी और परिवार की महिला के साथ ऐसी हरकत करने से पहले इन्हें सोचना पड़ेगा।

मैंने पहले ही वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को अवगत कराया है कि सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी द्वारा मुझे जान से मारने की धमकी दी गयी है एवं मुकदमा वापस लेने हेतु अनेक दबाव बनाये जा रहे हैं। यदि पुलिस एवं सरकार द्वारा शीघ्र कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी तो इस देश की जनता से और आप सब मीडिया परिवार के सहयोग से ऐसे व्यक्ति को सज़ा दिलाने हेतु आन्दोलन किया जाएगा और आप सभी के माध्‍यम से उन सभी स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का धन्यवाद देना चाहती हूँ जिन्होंने हज़ारों की तादाद में एकत्रित होकर इस आन्दोलन को सफल बनाने हेतु लगातार फोन पर संपर्क बननाए रखे हुए हैं.

धन्यवाद

अर्चना यादव


लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.
 

हिंदुस्‍तान के फोटोग्राफर की बहादुरी से बड़ा हादसा टला

भदोही नगर के एक प्राथमिक विद्यालय में अपनी बहादुरी के चलते एक मीडियाकर्मी ने भीषण दुर्घटना होने से बचा लिया, उसकी बहादुरी से प्रभावित होकर नगर के समाजसेवी इश्तियाक डायर ने उसका सम्मान किया. हुआ यूँ कि नगर के मशाल रोड स्थित पीरखानपुर प्राथमिक विद्यालय में खाना बनाया जा रहा था, तभी सिलेंडर से निकली पाईप में आग लग गयी. आग का रुख सिलेंडर की तरफ होता देख रसोइयाँ भाग निकला. साथ ही अध्यापकों और बच्चों में भी भगदड़ मच गयी.

इसी दौरान वहां हिंदुस्तान अख़बार का प्रेस छायाकार चन्द्र बालक राय पहुँच गया, उसने भगदड़ मची देखी तो कारण जानना चाहा. उसकी जगह यदि कोई और छायाकार होता तो शायद फोटोग्राफी और खबर से मतलब रखता, परन्तु वह जान की बाजी लगाकर रसोई में पहुँच गया. गैस की पाईप से आग के फौव्‍वारे निकल रहे थे, उसने तुरंत हिम्मत कर आग बुझाई और सिलेंडर को पानी में डाल दिया, तब जाकर अध्यापकों और बच्चों ने राहत की साँस ली.

यह खबर जब समाजसेवी इश्तियाक डायर को मिली तो उन्होंने प्रेस छायाकार का माल्यार्पण कर तथा नगद पुरस्कार देकर सम्मानित किया. यदि आग नहीं बुझाई जाती तो बच्चों की किताब कापियां तथा मिड डे मिल का अनाज खाक में तब्दील हो जाता. साथ ही बड़ी दुर्घटना भी घट सकती थी क्योंकि विद्यालय नगर की सघन बस्ती में बना हुआ है. प्रेस छायाकार के इस हौसले को देखकर पूर्वांचल प्रेस क्लब के अध्यक्ष हरीश सिंह, समसुद्दीन वारसी, सर्वेश राय, पंकज उपाध्याय, नैरंग आलम खान सहित सपा नेता अयूब खान ने भी सम्मानित किया.

हिंदुस्‍तान, पटना में जूनियर फोटोजर्नलिस्‍ट ने सीनियर से की बदतमीजी

हिन्दुस्तान, पटना के पूर्व संपादक अक्कू श्रीवास्तव के तबादले के कुछ दिनों बाद ही उनके करीबी लोग नए संपादक केके उपाध्याय को रिझाने के लिए वर्चस्व जमाना शुरू कर दिया है. इसको लेकर रिपोर्टरों व फोटोग्राफरों के पुराने गुटों ने फिर से खेमाबंदी शुरू हो गई है. यूनिट में चर्चा है कि इसी क्रम में अक्‍कू श्रीवास्‍तव के खास रहे जूनियर फोटोग्राफर आशीष ने शुक्रवार को सीनियर फोटोग्राफर अनिल कुमार के साथ न सिर्फ बदतमीजी बल्कि हाथापाई भी की. अब देखना है प्रबंधन इस मामले को किस तरह टैकल करता है.

उल्‍लेखनीय है कि अनिल हिन्दुस्तान, पटना में करीब 20 वर्षों से कार्यरत हैं. पटना के मीडिया जगत में इनकी छवि एक ईमानदार व तेजतर्रार फोटोग्राफर की है. जबकि सेटर व तुनक मिजाज प्रवृति आशीष को आए हुए महज तीन वर्ष ही हुए हैं लेकिन अक्कू के दौर में वो प्रमोशन पाकर चमक गए. वहीं इस दौरान अनिल को बाहर का रास्ते दिखाने के लिए काफी प्रताड़ित किया गया. फिर भी एक योद्धा के भांति वह डंटे रहे. जो प्रोजेक्‍ट सौंपे गए उसे पूरा किया. 

वैसे इस पूरे मामले में यह भी कयास लगाया जा रहा है कि इस प्रकरण में एंटी रिपोर्टर लाबी का हाथ है. तभी तो एंटी लाबी तथ्य को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत कर रही है. ताकि संपादक को बरगलाते हुए अनिल कुमार को बदनाम किया जा सके. अब देखना यह है कि हिंदुस्‍तान के सुलझे हुए संपादकों में गिने जाने वाले केके उपाध्याय इस पर कौन से प्रक्रिया अपनाते हैं. माना जा रहा है कि अपने मिजाज के अनुरूप केके उपाध्‍याय दूध का दूध और पानी का पानी जरूर करेंगे.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

प्रभाष जी ने आम आदमी की भाषा को स्थापित किया : आरिफ मोहम्मद खान

: पत्रकार संजीव पांडेय की पुस्‍तक पेड न्‍यूज का विमोचन : नई दिल्ली। पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि प्रभाष जोशी को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने आम आदमी की भाषा को एक बड़े अखबार की भाषा बना दिया। वे यहां प्रभाष परंपरा न्यास और गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किए गए ‘प्रभाष प्रसंग’ कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन प्रभाष जोशी के 76 वें जन्मदिन के मौके पर राजघाट स्थित गांधी दर्शन में किया गया था। इस मौके पर प्रभाष जोशी पर केन्द्रित डाक्‍युमेंट्री फिल्म दिखाई गई और संजीव पांडेय की पुस्तक 'पेड न्यूज', पाखी के प्रभाष जोशी पर केंद्रित अंक तथा जनसत्ता व राष्ट्रीय सहारा के प्रभाष जोशी पर केंद्रित परिशिष्टों का लोकार्पण भी किया गया।

आरिफ मोहम्मद खान ने ‘हमारा संविधान और व्यवस्था परिवर्तन’ विषय पर मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए कहा कि व्यवस्था और संविधान एक दूसरे से अलग नहीं हैं। वास्तव में संविधान का उद्देश्य था, एक ऐसी व्यवस्था बनाना जिससे देश की एकता और अखंडता मजबूत बने। हमारे संविधान निर्माताओं के सामने जो चुनौतियां थीं, उन्हें दूर करते हुए उन्होंने एक सुव्यवस्थित संविधान दिया। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान की महत् अकांक्षा एक मजबूत राष्ट्र बनाना था और इसी के मद्देनजर संविधान निर्माताओं ने संविधान के तौर पर पूरे देश का एक मेनिफेस्टो सामने रखा। दुर्भाग्य है कि आज हर पार्टी अपना अलग मेनिफेस्टो लेकर आती है, जिसे उसके अपने नेता तक याद नहीं रखते। वास्तव में पार्टियों पर पाबंदी होनी चाहिए कि संविधान जैसे सर्वसम्मत मेनिफेस्टो के बरक्स वे अपना अलग मेनिफेस्टो न ला सकें। आरिफ खान ने कहा कि समस्या व्यवस्था की नहीं है, इसलिए शिकायतें हमें सरकारी नीतियों और उन्हें लागू करने के प्रति करनी चाहिए। व्यवस्था बदलने की बात तो पहले भी बहुत की जाती रही है। व्यवस्था बदलने के नाम पर सरकारें बदली गईं, पर आखिरकार मायूसी हाथ लगी। समस्या दरहकीकत व्यवस्था की थी ही नहीं। उन्होंने आगे कहा कि आज हमें वर्तमान दौर की चुनौतियों को सामने से देखने की जरुरत है। हमें सोचना चाहिए कि हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान आदि के बारे में भेद-विभेद करने का निषेध किया था। लेकिन क्या व्यवहार में हम सचमुच ऐसा कर पाये। वास्तव में दोषी सिर्फ सरकारें नहीं, हम भी हैं। उन्होंने मीडिया की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहा कि संविधान निर्माता देश को एकसूत्र में बांधना चाहते थे, पर आज का हमारा मीडिया तक पाखंड, अंधविश्वास जैसी चीजें फैलाकर समाज में दरार पैदा कर रहा है।

संजीव पांडेय की पुस्‍तक पेड न्‍यूज का विमोचन के मौके पर शीला दीक्षित व नामवर सिंह

इस मौके पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए कहा कि प्रभाष जोशी बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। उनके मन में समाज की स्थिति और राजनीति को लेकर कुछ न कुछ उबाल की स्थिति बनी रहती थी। भारत को आगे बढ़ाने का विचार निरंतर उनके मन में बना रहता था। उन्होंने एक पत्रकार के तौर पर जो कुछ किया, उससे लाखों लोगों ने प्रेरणा ग्रहण की और आने वाली पीढ़ियां भी उनसे प्रेरणा लेती रहेंगी।

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि प्रभाष जी ने जैसा गद्य लिखा वह दुर्लभ है। वास्तव में उनका हर वाक्य जैसे खादी का पवित्र धागा है। भाषा की शुद्धता उनकी खासियत थी, उससे हमें प्रेरणा लेनी चाहिए। प्रभाष जी ने पत्रकारिता की जैसी नैतिक चुनौती हमारे सामने रखी है, वह हमारे लिए बड़ा सबक है। उनकी शानदार परंपरा को हम आगे बढ़ा सकें, तो बड़ी बात होगी।

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रोफेसर राम गोपाल यादव ने कहा कि प्रभाष जी का पूरा जीवन लोक संस्कृति, लोककला, लोकभाषा के लिए समर्पित रहा। उनके मिलने में भी एक मिठास थी। उनकी परंपरा को बनाए रखना हमारे लिए एक चुनौती है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा तीसरे प्रेस आयोग की मांग के बाबत चलाए जा रहे अभियान की जानकारी दी। इस अवसर पर पंडित कुमार गंधर्व के परिवार की मशहूर गायिका कलापिनी कोमकली ने शास्त्रीय गायन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में दिल्ली व दिल्ली के बाहर के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों की बड़ी संख्या में मौजूदगी रही।

महिला पत्रकार अर्चना यादव के साथ हुई घटना अब संदेह के घेरे में

लखनऊ : महिला पत्रकार अर्चना यादव के साथ हुई घटना अब संदेहों में है। कारण यह कि इस मामले में अर्चना यादव ने बेहद संदेहास्‍पद तरीके से अपना बयान तोड़-मरोड़कर पेश किया। अपने पहले के पूर्ववर्ती ईमेल पर दर्ज सूचना के बजाय अर्चना ने पुलिस को जो तथ्‍य पेश किये हैं, वे अधिकांशत: बदले हुए हैं। वैसे इस प्रकरण पर नार्थईस्‍ट स्‍टेट्समैंट अखबार के विशेष संवाददाता सतीश प्रधान ने ईमेल भेजते हुए अर्चना पर जवाब-तलब किया है। अपने मेल में अर्चना ने पूछा है कि आखिर किन आधारों पर अर्चना यादव ने उन पर यह आरोप लगाया है। उधर इस प्रकरण पर लखनऊ पुलिस ने अब तक कोई भी कार्रवाई नहीं की है।

गौरतलब है कि लाइव टुडे नामक किसी समाचार संस्‍थान की पत्रकार अर्चना यादव ने 18 जुलाई-12 को भेजे अपने एक मेल पर कहा था कि अर्चना यादव को अनिल त्रपाठी और सतीश प्रधान नाम के पत्रकार अपने एक साथी के साथ पिछले कई दिनों से परेशान कर रहे थे। रायपुर छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित दैनिक देशबंधु अखबार के रिपोर्टर के अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान नॉर्थ ईस्‍ट स्‍टेट्समैन नामक संस्‍थान में विशेष संवाददाता हैं। अनिल त्रिपाठी लखनऊ से युग जागरण नामक एक खबर का संचालन भी करते हैं।

मेल के अनुसार युवती इन दोनों को पहले तो नज़रंदाज़ करती रही लेकिन फिर जब उस की बर्दाश्त की सारी सीमा १६ जुलाई को खत्‍म हो गयी। घटना के अनुसार इन दोनों पत्रकारों ने विधान भवन लिफ्ट से बाहर आते समय युग जागरण के सम्पादक और मान्यता प्राप्त पत्रकार अनिल त्रपाठी ने उस युवती के कंधे पर हाथ रखकर अश्लील हरकत करने लगा तो उस युवती ने इसका विरोध किया तो उसने हाथ हटा लिया और लिफ्ट से चला गया। अर्चना यादव के मुताबिक रोज़-रोज़ की ऐसी छींटाकशी से परेशान युवती कल शाम अकेले जब अपने आवास पर जा रही थी तो इन दोनों ने फिर इस युवती को रोका और छींटाकशी की। अर्चना के अनुसार उसने विकासदीप भवन में अनिल त्रिपाठी और सतीश प्रधान की जूतों से पिटाई कर बुरी तरह धुना। जिस जगह पर ये पूरी घटना हुई वो भीड़भाड़ वाला स्थान था जिस की वजह से मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई।

लेकिन हैरतअंगेज तरीके से अर्चना यादव ने 20 जुलाई की शाम एक ईमेल एक सूचना प्रसारित की। इस ईमेल पर अटैच्‍ड फाइल में अर्चना यादव ने लखनऊ के आईजी के शिकायती पत्र में सतीश प्रधान और अनिल त्रिपाठी के साथ सचिवालय पर उस हादसे का तो ब्‍योरा दिया है, लेकिन विकासदीप भवन पर 18 जुलाई-12 की घटना में सतीश प्रधान का नाम हटा दिया है। अर्चना के पत्रकार के अनुसार अर्चना ने इन पत्रकारों पर आरोप लगाया है कि अनिल त्रिपाठी ने अभद्रता और हाथापाई की थी। जबकि अपने पुराने मेल में अर्चना ने यह हमला इन पत्रकारों पर करने की बात मानी थी। इतना ही नहीं, आईजी को लिखे पत्र में अर्चना ने घटना का समय शाम आठ बजे बताया है, जबकि पहले पूर्ववर्ती मेल पर अर्चना का कहना था कि यह घटना उसके घर वापसी के समय हुआ। इस मेल की सूचना पर इन पत्रकारों पर हमला करने की बात कही थी, जबकि आईजी को भेजे शिकायती पत्र में अर्चना यादव ने आरोप लगाया है कि इस घटना के दौरान इन पत्रकारों ने उस पर उठवा लेने और जान से मरवा देने की बात कही है।

सवाल तो यह है कि एक ही घटना पर अर्चना ने परस्‍पर विरोधी बयान आखिर क्‍यों जारी किये। वैसे इस घटना पर पत्रकारों के परस्‍परविरोधी गुटों में सरगर्मी शुरू हो गयी है। दूसरी और अर्चना ने एक बातचीत में बताया है कि वह पिछले पांच-सात बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय है। लेकिन हैरत की बात है कि अर्चना ने अपनी उम्र महज 21 वर्ष बतायी है। अर्चना का कहना है कि मौजूदा लाइव टुडे के पहले वह कौमी ऐलान नामक एक कथित दैनिक समाचारपत्र में काम कर चुकी है।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

Media Orientation Program on July 26 at Guwahati Press Club

: Paranjoy Guha Thakurta will attend Guest of the Month program : Guwahati : A daylong media orientation program with an aim for encouraging and developing ethical journalism has been organized on Thursday (July 26, 2012) at Guwahati Press Club. Paranjoy Guha Thakurta, an independent journalist and  educator spanning 35 years of experiences in print, radio, television and documentary film-making, will attend the program as the resource person.

The technical session will start at 10 am, which will be open for the journalist-members of Guwahati Press Club. The interested journalists should submit their names to the office of the press club by Tuesday evening. It will be followed by the Guest of the Month program at 3 pm in the same venue, where Guha Thakurta will interact with the media persons on various media related issues.

PS. Profile of  Paranjoy Guha Thakurta

Paranjoy Guha Thakurta is an independent journalist and an educator. His work experience, spanning 35 years, cuts across different media: print, radio, television and documentary cinema. He is a writer, speaker, anchor, interviewer, teacher and commentator in three languages: English, Bengali and Hindi. His main areas of interest are the working of India’s political economy and the media, on which he has authored/co-authored books and directed/produced documentary films. He lectures on these subjects to general audiences and also trains aspiring – and working — media professionals. He participates frequently in seminars, is a regular contributor to newspapers, magazines and websites and is featured on television channels and radio programmes as an anchor as well as an analyst and commentator.

Born on October 5, 1955 and educated at St. Stephen’s College, University of Delhi (1972-75) and at the Delhi School of Economics (1975-77) in the same university from where he obtained his Master’s degree in economics, he started his career as a journalist in June 1977 and has been employed with various media organizations including companies bringing out publications such as Business India, BusinessWorld, The Telegraph, India Today and The Pioneer. He worked with Television Eighteen (now Network 18) for almost six years between 1995 and 2001 when he anchored a daily discussion programme called “India Talks” on the CNBC-India television channel — nearly 1,400 half-hour episodes were broadcast. From March 2007, he has been anchoring two one-hour-long weekly programmes for Lok Sabha Television (the channel owned and operated by the lower house of the Parliament of India) – a panel discussion called “Talktime” (earlier “Headstart”) and an interview called “1-on-One”. He has anchored programmes for other television channels.

He is (or has been) a visiting faculty member at over a dozen reputed educational institutions including the Indian Institutes of Management at Ahmedabad, Bangalore and Kolkata, Jawaharlal Nehru University, Jamia Millia Islamia (both in Delhi) the Asian College of Journalism, Chennai, the Indian Institute of Technology, Kanpur, the Film & Television Institute of India, Pune, the Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration, Mussoorie and the Indian Institute of Foreign Trade, New Delhi. In September 2010, he became a visiting professor in the Department of Political Science, Faculty of Social Sciences, University of Delhi, teaching M.Phil students.

He served as a member of the Press Council of India nominated by the University Grants Commission between January 2008 and January 2011. In April 2010, as a member of a two-member sub-committee of the Council, he co-authored a 36,000-word report entitled “Paid News: How Corruption in the Indian Media Undermines Democracy”.

He is a media trainer and a consultant/adviser on India’s political economy. He was the founder director of the School of Convergence (SoC). He has been a consultant at the Institute of South Asian Studies, National University of Singapore, making presentations and writing papers on Indian politics. He has been associated with a number of projects of the United Nations Development Programme and the International Labour Organization (ILO). He moderated two panel discussions at the International Labour Conference at Geneva, Switzerland, in June 2009 and at the ILO’s Asia Pactific Regional Meeting in Kyoto, Japan, in December 2011. He is currently president of the Foundation for Media Professionals, an independent, not-for-profit organization.

He is a director/producer of documentary films. One entitled “Idiot Box or Window of Hope” which examines the impact of television on Indian society – was produced by the Public Service Broadcasting Trust (PSBT) in 2003 and was broadcast on Doordarshan. In 2006-07, he produced and directed a five-part documentary series in partnership with the PSBT entitled: “Hot As Hell: A Profile of Dhanbad”, different versions of which have been broadcast on various television channels including Doordarshan and NDTV 24×7. In 2007, he directed a documentary film “Grabbing Eyeballs: What’s Unethical About Television News in India” for PSBT that was followed up by another entitled “Advertorial: Selling News or Products?” in 2009. In 2010, he produced and directed a three-part documentary film series entitled “Blood & Iron: A Story of the Convergence of Crime, Business and Politics in Southern India” on the political, economic and ecological consequences of iron ore mining in Bellary (Karnataka) and Ananthapur (Andhra Pradesh). The film has been translated into six Indian languages and broadcast on different television channels. In 2011, he produced and directed a documentary film entitled: “The Great Indian Telecom Robbery”. He has produced/directed a number of other documentary films. (He was one of the first journalists to write about the telecommunications spectrum scandal in November 2007 and was one of the petitioners in public-interest litigation petitions on the subject in the Supreme Court of India.)

He has co-authored a book with Shankar Raghuraman entitled: “A Time of Coalitions: Divided We Stand”, published by Sage Publications India in March 2004. The book was able to anticipate the outcome of the 14th general elections in India, the results for which came out in May that year. A substantially revised, updated and enlarged version of the book titled “Divided We Stand: India in a Time of Coalitions” was published in December 2007. He has written “Media Ethics: Truth, Fairness and Objectivity, Making and Breaking News” published by Oxford University Press India in March 2009 – the second enlarged edition of the book was published in December 2011. He has contributed articles and chapters to books such as “Realizing Brand India” edited by Sharif D. Rangnekar (Rupa, 2005) and “India: The Political Economy of Reforms” edited by Bibek Debroy & Rahul Mukherji (Bookwell, 2004). He is currently engaged in co-authoring a number of books and producing/directing documentary films.

From

neeraj jha

Guwahati, journalist and member of GPC

धीरज हत्‍याकांड : एमएलसी ने पत्रकार नीरज पर कराया रंगदारी मांगने का मुकदमा

: सत्‍ता के दबाव में कानून का दुरुपयोग : कटिहार के पत्रकार नीरज के भाई धीरज हत्‍या कांड में एक नया मोड आया है। पीडि़त पक्ष की आवाज को दाबाने के लिये भाजपा एमएलसी अशोक अग्रवाल ने अपने एक स्टाफ से भाजपा एमएलसी अशोक अग्रवाल गिरफ्तारी की मांग कर रहे मृतक के पत्रकार भाई नीरज पर कटिहार के नगर थाना में रंगदारी का मामला दर्ज कराया है। कटिहार में भाजपा एमएलसी अशोक अग्रवाल पर उनके ही कर्मी धीरज महतो को गोली मारकर हत्या करने क़ा आरोप है।

मृतक धीरज क़ा भाई नीरज जो इस घटना का प्रतियक्षदर्शी भी है उसका आरोप है कि धीरज एमएलसी अशोक अग्रवाल के कंस्ट्रक्शन कंपनी के अररिया साईट पर मुंशी (मैनेजर) के पद पर कार्यरत था। कार्य में गुणवत्ता की शिकायत को लेकर मुंशी धीरज ने कहा कि अररिया के लोगों के गुस्सा का शिकार उसे होना पड़ता हैं और साथ ही अररिया साइट पर जाने से मना कर दिया, जिससे नाराज एमएलसी ने गुस्से म