टीवी टुडे समूह अपने चैनलों में करेगा बंपर छंटनी!

: कानाफूसी : टेलीविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री के सबसे बड़े खिलाडि़यों में से एक टीवी टुडे समूह को लेकर चल रही चर्चाओं से काम करने मीडियाकर्मियों के होश उड़े हुए हैं. टीवी टुडे समूह से खबर आ रही है कि इस समूह अपने खर्च में कटौती करने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए बड़ी छंटनी की लिस्‍ट तैयार की जा रही है. समूह के चारों चैनल आजतक, हेडलाइंस टुडे, तेज और दिल्‍ली आजतक से एक मुश्‍त ढाई से तीन सौ लोगों को बाहर करने की तैयारी चल रही है. इसमें एडिटोरियल समेत सभी विभागों के लोग शामिल होंगे.

कहा जा रहा है कि टीवी टुडे समूह अब अपने खर्चों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है. पिछले कुछ सालों में समूह का शुद्ध लाभ कम हुआ है, जिसके चलते चैनल कास्‍ट कंटिंग की तैयारी कर रही है. इसके लिए छंटनी की लिस्‍ट तैयार की जा रही है. इसमें ऐसे लोगों को शामिल किया जा रहा है, जो समूह के हिसाब से नॉन प्राफिटेबल एसेट्स हैं. इनमें सीनियर और जूनियर सभी शामिल किए जाएंगे. एडिटोरियल, पीसीआर, एमसीआर, मार्केटिंग, एडिटिंग, आईटी, कैमरा समेत सभी सेक्‍शन से एक अनुपात में लोग बाहर होंगे. कंपनी कर्मचारियों के साथ कोई बेइमानी नहीं करेगी. नियमानुसार इन्‍हें पेमेंट करने के बाद ही नमस्‍कार किया जाएगा.

सूत्रों का कहना है कि कंपनी की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है, इसके चलते ही टीवी टुडे समूह आदित्‍य बिड़ला समूह के अपने 26 प्रतिशत शेयर बेचने की तैयारी में लगा हुआ है. हालांकि कुछ अन्‍य कंपनियों से भी बातचीत चलने की जानकारी मिल रही है. कंपनी अपने 26 फीसदी शेयर तीन सौ करोड़ रुपये में बेचने की तैयारी कर रही है. आपको बता दें कि टीवी टुडे का शुद्ध लाभ लगातार घट रहा है. वित्‍तीय वर्ष 2011 में कंपनी को केवल 12 करोड़ का शुद्ध लाभ हुआ था. लगातार घटते लाभ के चलते ही सीईओ जी कृष्‍णन को समूह से जाना पड़ा था.

सूत्र बताते हैं कि वर्ष 2011 में टीवी टुडे ग्रुप का टर्न ओवर 292 करोड़ का था, जिसमें खर्च काटने के बाद मात्र बारह करोड़ रुपये का लाभ हुआ है. पिछले साल इस ग्रुप ने केवल डिस्‍ट्रीब्‍यूशन पर 84 करोड़ रुपये खर्च किए. सेलरी के मद में भी कंपनी औसतन 85 से 90 करोड़ सालाना खर्च करती है. पे चैनल और रीच मार्केट अधिक होने के बाद भी ग्रुप का शुद्ध लाभ लगातार घटता जा रहा है. 2009 में कंपनी को 32 करोड़ का शुद्ध लाभ हुआ था वहीं 2010 में घटकर 18 करोड़ रह गया था. टीवीटुडे नेटवर्क में अरुण पुरी वाली कंपनी लीविंग मीडिया का करीब 57 प्रतिशत शेयर है और इसी के पास मालिकाना हक है. लिविंग मीडिया का काम प्रिंट मीडिया के अलावा थॉमसन प्रेस का संचालन है.

अरुणोदय की किताब ‘आंदोलन : संभावनाएं और सवाल’ का लोकार्पण 2 मई को

अरुणोदय प्रकाश द्वारा संपादित किताब 'आंदोलन : संभावनाएं और सवाल' का लोकार्पण 2 मई को होगा. इंडिया टुडे समूह के हॉर्परकॉलिंस ने इस किताब का प्रकाशन किया है. इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के हॉल नम्‍बर दो और तीन में शाम सात बजे से आयोजित कार्यक्रम में कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर, भाजपा नेता बीसी खंडूडी, टीम अन्‍ना के सदस्‍य अरविंद केजरीवाल एवं अंजना ओम कश्‍यप किताब का लोकार्पण तथा परिचर्चा करेंगे. अरुणोदय स्टार न्यूज में सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

टीवी टुडे समूह में ऑपरेशन हेड बने राहुल कुलश्रेष्‍ठ

टीवी टुडे के पुराने साथी राहुल कुलश्रेष्‍ठ एक बार फिर वापस लौट आए हैं. राहुल को ग्रुप का ऑपरेशन हेड बनाया गया है. वे एक मई को अपना कार्यभार ग्रहण करेंगे. राहुल टीवी टुडे ग्रुप के सीईओ जॉय चक्रवर्ती को रिपोर्ट करेंगे. राहुल टीवी टुडे समूह के लांचिंग टीम के सदस्‍यों में शामिल रहे हैं. इन्‍होंने 1999 में टीवी टुडे ज्‍वाइन किया था. इसके बाद 2007 में इस्‍तीफा देकर वॉयस ऑफ इंडिया चले गए थे, जहां इन्‍हें सीईओ बनाया गया था. चैनल के पूरी तरह बंद हो जाने के बाद वे अंग्रेजी चैनल न्‍यूज एक्‍स से सलाहकार के रूप में जुड़ गए थे.

दैनिक प्रभात, मेरठ के सिटी इंचार्ज बने संतराम पांडे

: अम्‍बरीश को हटाया गया : दैनिक प्रभात, मेरठ से सिटी इंचार्ज अम्बरीश पाठक को इस जिम्‍मेदारी से हटा दिया गया है. अम्‍बरीश को मार्केटिंग विभाग में भेज दिया गया है. उनकी जगह संत राम पांडे को सिटी इंचार्ज बनाया गया है. अम्‍बरीश को तीन महीने पहले ही सिटी इंचार्ज बनाया गया था. तब से संतराम पांडे को तवज्‍जो नहीं दी जा रही थी, इसके बाद भी अम्‍बरीश प्रबंधन की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाए. जिसके बाद उनकी जिम्‍मेदारी बदलने के साथ ही संतराम को ये जिम्‍मेदारी दे दी गई है.

न्‍यूज एक्‍सप्रेस ने दिखाया शिक्षा माफिया का भयावह चेहरा, छह सलाखों के पीछे

देश के सर्वश्रेष्ठ 10 हिंदी चैनलों में से एक न्यूज़ एक्सप्रेस टीवी चैनल ने 29 अप्रैल को देश की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियंरिंग प्रवेश परीक्षा AIEEE में धांधली का खुलासा किया… टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में खुलासा हुआ कि कैसे संगठित गिरोह लाखों रुपये वसूलकर होनहार छात्रों का हक मारते हैं और फर्जी स्टूडेंट बैठा कर ऐसे लोगों को दाखिला दिला देते हैं जो इसके हकदार नहीं। न्‍यूज एक्‍सप्रेस की पहल पर यूपी एसटीएफ ने आगरा में छापा मारा और दूसरों की जगह परीक्षा दे रहे चार फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया। इन फर्जी छात्रों से ये गलत काम करानेवाले दो मास्टर माइंड भी गिरफ्तार किए गए।

एसटीएफ के मुताबिक ये गिरोह कई राज्यों में सक्रिय हैं… और आगे कई और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं… बिहार के दानापुर में इसी तरह के मामले में दो लोग गिरफ्तार भी किए गए हैं… इस भंडाफोड़ के बाद सीबीएसई चेयरमैन विनीत जोशी ने पूरे मामले की जांच की बात कही है और दोषियों पर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया है… सीबीएसई ने आगरा के अपने सभी सेंटर्स के सुपरिंटेंडेंट को तलब भी किया है… एआईट्रिपलई, यानि आल इंडिया इंजीनयरिंग एंट्रेस एग्जामिनेशन… हर साल लाखों बच्चे इसकी तैयारी करते हैं, क्योंकि एक बार एआईट्रिपलई में अच्छी रैंक आ गई तो ज़िंदगी में अच्छे करियर की गारंटी मिल जाती है,  इंजीनियर बनकर घरवालों का नाम रोशन करते हैं साइंस साइट के स्टूडेंट, लेकिन चेहरे के चक्रव्यूह में उलझ कर रह गया है, ऐसे होनहार छात्रों का भविष्य।

चेहरे के सौदागरों के तिलिस्म में फंस जाते हैं आपके होनहारों के सपने, वो दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन ये दिन-रात नोट कमाते हैं, यानि चेहरे पर चेहरा चढ़ाकर कमा लेते हैं लाखों, सफलता की ऐसी सूरत बना देते हैं, जिसके लिए न तो मेहनत की जरुरत और न ही किताबों की, हां बस चाहिए तो पैसा, हाल ये है कि हर साल तकरीबन 10 लाख छात्रों के लिए परीक्षा का आयोजन करने वाला सीबीएसई भी इस गोऱखधंधे को नहीं पकड़ पाता… लेकिन ये चेहरे अब बेनकाब हो चुके हैं, इनके चक्रव्यूह को तोड़ा न्य़ूज़ एक्सप्रेस ने… चैनल सामने लाया हैं, चेहरों के उस चक्कर को, जिसमें पैसे की ताकत के दम पर भविष्य बनाने का दावा किया जा रहा है, इस खुलासे की परत दर परत जब चैनल ने पड़ताल की तो सामने आया, एआईट्रिपलई में पास कराने के ठेके का सच।

चार काल्पनिक छात्रों को पास कराने के लिए एजेंट से बात हुई, और एजेंट ने बैठा दिए चार फर्जी स्टूडेंट…. यानी एग्जाम में प्रवेश पत्र किसी औऱ का, और एग्जाम देने पहुंचा कोई और… इसके लिए लिया गया टेक्नोलॉजी का सहारा, फोटोशॉप की मदद से असली और नकली चेहेरे को मिलाकर बनाया गया एक मिलावटी चेहरा, यानि ऐसा चेहरा, जिसमें स्टूडेंट और उसकी जगह परीक्षा में बैठने वाले एजेंट के सॉल्वर की झलक थी.., यानि धंधेबाजों ने ऐसी तरकीब निकाल ली, जिससे असली के चेहरे का आधा सच ही सामने आ पाता है, और वो भी आधे चेहरे में गुम हो जाता है… न तो परीक्षक और न ही प्रवेश पत्र जारी करने वाली सीबीएससी की टीम इस घालमेल को पकड़ पाती है,  लेकिन ये शातिर चाल न्यूज़ एक्सप्रेस के कैमरे से नहीं बच पाई, सारी हकीकत खुफिया कैमरे कैद हो गई…, और हो गया भांडाफोड़, चेहरे के चक्रव्यूह का।

प्रभात खबर से यूनिट हेड शंभुनाथ पाठक का इस्‍तीफा, जागरण ज्‍वाइन करेंगे

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर से खबर है कि शंभुनाथ पाठक ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर यूनिट हेड थे. खबर है कि वे अपनी नई पारी मुजफ्फरपुर में ही दैनिक जागरण से शुरू करने जा रहे हैं. उन्‍हें मुजफ्फरपुर में संजय सिंह की जगह लाया जा रहा है, जिन्‍होंने हाल ही में दैनिक जागरण के जीएम और यूनिट हेड पद से इस्‍तीफा दे दिया था. जागरण के साथ ये उनकी दूसरी पारी है. शंभुनाथ कई अखबारों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे अमर उजाला के साथ मेरठ, पानीपत, हिसार में तथा दैनिक जागरण के साथ भागलपुर, पटना, मुजफ्फरपुर व बंगाल में काम कर चुके हैं.

मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से हेमंत तिवारी ने मांगा पत्रकारों के लिए सस्‍ता भूखंड

यूपी मान्‍यता प्राप्‍त संवाददाता समिति के पूर्व पदाधिकारी हेमंत तिवारी ने मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र भेजकर पत्रकारों की कई समस्‍याओं के निदान की मांग की है. कभी बसपा नेताओं के नजदीकी रहे हेमंत तिवारी ने अपने पत्र में लिखा है कि मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों की संख्‍या बढ़ने से उनके समक्ष आवास की दिक्‍कतें उपस्थित हो गई हैं, लिहाजा उनके सस्‍ते दर पर भूखंड उपलब्‍ध कराया जाए. उन्‍होंने बसपा शासन में पंचम तल पर आने जाने में लगाए गए प्रतिबंध को भी हटाने की मांग की है. चिकित्‍सा सुविधा का दायरा भी बढ़ाने की मांग की है. नीचे हेमंत द्वारा लिखा गया पत्र. 

रिलायंस लांच करेगा ‘थ्रिल’, स्‍टार लाएगा ‘मूवीज ओके’

लग्जमबर्ग स्थित आरटीएल ग्रुप एसए के साथ संयुक्त उद्यम सौदे पर हस्ताक्षर करने वाली अनिल अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क (आरबीएन) इसी तिमाही में अपना पहला मनोरंजन चैनल थ्रिल पेश करने की तैयारी कर रही है। आरटीएल यूरोप की सबसे बड़ी मीडिया फर्म बर्टेल्समैन एजी की इकाई है और इसकी कुल बाजार पूंजी 15.5 अरब डॉलर (69,900 करोड़ रुपये) है। कंपनी यूरो के 10 देशों में 40 से अधिक टेलीविजन चैनलों और 33 रेडियो स्टेशनों का संचालन कर रही है।

कंपनी प्रबंधन का कहना है कि आरटीएल बहुभाषी सामग्रियों के साथ दो चैनल लॉन्च करेगी। भारत में मनोरंजन जगत पर मुख्य रूप से महिलाओ का दबदबा है और इसमें पुरुषों के लिए सीमित विकल्प मौजूद हैं। जिस वजह से थ्रिल को लॉन्च करने का निर्णय लिया है- उसमें पहला यह कि फिलहाल ऐसा कोई चैनल नहीं है जो अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों को हिंदी में रूपांतरित कर दिखाए। और दूसरा, मनोरंजन के रूप में एक्शन को लेकर आमतौर पर फिल्में ही बनती हैं, लेकिन मनोरंजन चैनलों के माध्यम से एक्शन को दिखाने पर ध्यान नहीं दिया जाता है।'

दूसरी तरफ भारतीय टेलीविजन के क्षेत्र में बड़ी हिस्‍सेदारी रखने वाल स्‍टार इंडिया समूह एक नया मूवी चैनल लांच करने जा रहा है। चैनल का नाम मूवीज ओके रखा गया है। चैनल को टेस्‍ट सिग्‍नल पर भी डाल दिया गया है। स्‍टार इंडिया रुपर्ट मर्डोक के स्‍वामित्‍व वाले न्‍यूज कॉर्प का हिस्‍सा है। यह इस ग्रुप का दूसरा हिंदी मूवी चैनल होगा। समूह इसके पहले ही एक मूवी चैनल स्‍टार गोल्‍ड का प्रसारण कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि इसमें स्‍टार की ब्रांडिंग नहीं की जाएगी बल्कि 'ओके' समूह को ही ब्रांड के रूप में पेश किया जाएगा। गौरतलब है कि इसके पहले भी स्‍टार वन चैनल की जगह दिसम्‍बर 2011 में अजीत ठाकुर के निर्देशन में लाइफ ओके चैनल लांच किया गया था।

इस सीएम को देखकर लगा कोई वीआईपी नहीं, आम आदमी चढ़ रहा है

बड़ी चुनौतियों का अगर बड़ा हल या बड़ा सपना या बड़ा रिस्पांस होगा, तो सभ्यता-संस्कृति शिखर पर पहुंच जायेगी. पर जो सभ्यताएं अपने अंदर की चुनौतियों का जवाब, अंदर से तलाश नहीं पातीं या उत्पन्न मुसीबतों-कठिनाइयों का सार्थक और जरूरी हल नहीं ढ़ूंढ़ पातीं, वे पीछे छूट जाती हैं. खत्म हो जाती हैं. इस कसौटी पर अगर आप-हम देखें, तो भारत के सामने आज बड़ी चुनौतियां हैं. बड़े सवाल हैं. संकट बड़ा है. भीतरी और बाहरी, दोनों मोरचों पर.

बोफोर्स में दोषी को बचाने में तत्कालीन केंद्र सरकार की भूमिका का खुलासा, घूस लेने में बंगारू लक्ष्मण की हुई सजा और झारखंड के एक सांसद (नक्सली पृष्ठभूमि) कामेश्वर बैठा द्वारा एक सरकारी मुलाजिम की सार्वजनिक पिटाई से, देश और क्षेत्रीय राजनीति का चरित्र उजागर होता है. सीना ठोक कर भ्रष्टाचार, फिर सत्ता के बल कानूनी संरक्षण, यह भारत में ही संभव है. इस सड़ती और दुर्गंध देती राजनीति के लिए सबसे अधिक जवाबदेही, उस कांग्रेस पार्टी की है, जो सबसे लंबे अरसे तक देश चलाती रही है. उसी ने यह राजनीतिक संस्कृति विकसित की है. बाद की सभी पार्टियां, कांग्रेस द्वारा विकसित राजनीतिक संस्कृति की घटिया कार्बन कॉपी साबित हुई हैं.

भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का आवाहन करनेवाली पार्टी के पूर्व अध्यक्ष घूस लेने के दोषी पाये जाते हैं, फिर भी उस पार्टी में आत्मनिरीक्षण की कोई झलक -एहसास नहीं. न पश्चाताप है. देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में प्रैक्टिस करनेवाले शासक पार्टी के सबसे प्रखर, प्रामाणिक और अधिकृत वक्ता व सांसद की सीडी जारी होती है. आरोप है कि देश की सबसे पवित्र संस्था परिसर में वह अपनी राजनीतिक हैसियत और रुतबे से एक महिला को ब्लैकमेल कर रहे थे. इसे वह निजी मामला कहते हैं. चर्चा है कि वह महिला क्यों ब्लैकमेल हो रही थी, यह कारण अगर सही है, तो देश सन्न रह जायेगा. कहां पहुंच गया यह मुल्क? जो नक्सली पृष्ठभूमि से आये, उनसे उम्मीद थी कि वे एक नैतिक, आदर्श और प्रामाणिक वैकल्पिक ढांचा बनायेंगे. पर वे भी उसी संस्कृति के राही निकले.

क्या ऐसे माहौल में कहीं आस्था के बिंदु झलकते हैं? 26 अप्रैल को द पायनियर अखबार में एक पाठक की चिट्ठी छपी है. उक्त पाठक ने अपने नाम की जगह ‘एक भारतीय’ लिखा है. अंगरेजी के पूरे पत्र का हिंदी भाव है. ‘हाल ही में जब मैं गोवा से दिल्ली लौट रहा था, तब मुझे यह देख कर आश्चर्यजनक खुशी हुई कि गोवा के मुख्यमंत्री भी उसी विमान से यात्र कर रहे थे. ऐसा नहीं है कि यह पहला मौका था, जब मैं उस विमान में सफर कर रहा था, जिसमें मुख्यमंत्री, मंत्री या कोई राजनीतिज्ञ हों. लेकिन गोवा से उड़ान भरने से दिल्ली एयरपोर्ट तक उतरने के दौरान उन्होंने मुझे बेहद प्रभावित किया. वह अनुभव आज भी मेरे जेहन में कैद है. मैं यह याद करने की कोशिश करता हूं कि पिछली बार मैंने कब किसी मुख्यमंत्री या मंत्री को फ्लाइट पकड़ने के लिए आम आदमी की तरह लाइन में लगते देखा है? कोई कार्यकर्ता, सुरक्षा गार्ड या कोई परिजन नहीं. वह अपना सामान खुद ढो रहे थे. वह कम किराये वाले इकोनॉमी क्लास में सफर कर रहे थे. जबकि वह फर्स्‍ट क्लास में सफर कर सकते थे. वह विमान पर चढ़ने वाले अंतिम व्यक्ति नहीं थे और न ही उनके लिए विमान रोक कर रखा गया था.

वह गो एयर के विमान में वैसे ही चढ़े, जैसे कि साधारण यात्री चढ़ते हैं. ऐसा लगा, जैसे कोई वीआईपी नहीं, साधारण आदमी विमान में चढ़ रहा है. बिल्कुल समय पर. अन्य लोगों की तरह, वह भी गेट पर लाइन में लगे और जब उनकी बारी आयी, तभी विमान में चढ़े. वह आगे की पंक्ति में नहीं बैठे थे, जबकि जिन विमानों में फर्स्‍ट क्लास सीट नहीं होती, उनमें आगे की सीटें बड़े और प्रभावशाली लोगों के लिए सुरक्षित रहती हैं. वह चुपचाप तीसरी या शायद चौथी कतार की सीट पर बैठ गये. कोई तामझाम नहीं. मुझे ऐसा लगा कि विमान में सवार अधिकतर लोगों को यह नहीं पता था कि वह कौन हैं? इसलिए उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था.

विमान परिचारकों ने उन पर उतना ही समय दिया, जितना दूसरे यात्रियों पर. जब मैंने अपने बगल के साथी को यह बताया, जो मेरे साथ ही यात्र कर रहा था, तो उसने कहा कि मुख्यमंत्री के बगल की सीट जरूर खाली होगी या फिर उनके कार्यालय की तरफ से ही दो सीट बुक करायी गयी होगी, ताकि उन्हें कोई डिस्टर्ब न करे. लेकिन जब मैं वाशरूम से लौट रहा था, तो देखा कि उनके बगल की सीट पर भी कोई यात्री बैठा है. उनकी कतार की सारी सीटें भरी हुई थीं. कोई विशेष सुविधा नहीं. विशेष सुविधा की मांग भी नहीं.

जब विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा, तो वह उतरने वाले पहले व्यक्ति नहीं थे. जबकि आमतौर पर यही होता है कि कोई वीआईपी अन्य यात्रियों से पहले उतरता है. उसके लिए पहले से विशेष कार तैयार रहती है, इसके बाद ही अन्य यात्रियों को उतरने की अनुमति दी जाती है. इस मामले में वह न तो उतरने वाले पहले व्यक्ति थे और न ही उनके लिए कोई कार इंतजार कर रही थी. न ही उन्हें कोई रिसीव करने आया. अन्य यात्रियों की तरह वह भी एक ही बस से एयरपोर्ट टर्मिनल पहुंचे. फिर से उन्होंने अपना सामान ट्राली पर उठाया और बाहर खड़ी कार तक आये, जो उन्हें लेने आयी थी. बस में कुछ यात्रियों ने उन्हें पहचान लिया था और उन्होंने उनसे बातचीत भी की. बातचीत से एक बात स्पष्ट थी कि वह न सिर्फ जेंटलमैन हैं, बल्कि बिल्कुल सहज भी हैं. अपने पद का कोई गुमान नहीं. बिल्कुल सरल आचरण. शर्ट-पैंट और काले जूते पहने. बेहद साधारण लिबास. आम राजनीतिज्ञों की वेश-भूषा से अलग. मैं यह जानता था कि वह आईआईटी से पासआउट होने वाले भारत के किसी राज्य के पहले मुख्यमंत्री हैं. मैंने यह भी सुना था कि वह गोवा की गंदी राजनीति को साफ करने का प्रयास कर रहे थे. मैंने जो पहली नजर में पाया, वह आश्चर्यचकित करने वाला था.

मैं गोवा का निवासी नहीं हूं और इस कारण मैं श्री परिकर को वोट नहीं डाल सकता. लेकिन मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि जिस तरह का उनका व्यक्तित्व है, मेरा वोट उन जैसे लोगों को ही मिलता. मैं लीडरशिप पर हो रही एक कांफ्रेंस को अटेंड करने गोवा गया था. पर मैंने लीडरशिप का अंतिम पाठ श्री परिकर को कुछ दूरी से देख कर सीखा. गोवा के मुख्यमंत्री का आचरण आज भीड़ में किसी पाठक को अलग लगता है, तो वह अखबार में पत्र लिखता है. पर वह दौर भी था, जब इसी तरह के व्यक्तित्ववाले लोगों की संख्या राजनीति में अधिक थी. कैसे नेतृत्व ने भारत को बदला? आज उन्हें याद करने की जरूरत है. आर एम लाला ने अपनी पुस्तक महानता की छाप में राजगोपालाचारी के बारे में लिखा है कि जब मैं राजाजी से उनकी आत्मकथा लिखवाने के लिए मिला, वे तब नब्बे साल की ओर बढ़ रहे थे. मद्रास के मुख्यमंत्री और भारत के गवर्नर-जनरल के वर्षों को काफी पीछे छोड़ चुके थे.

वे मुझसे विनम्रता से बोले, भारत के संतों ने जब अपनी जीवनी नहीं लिखी, तो मैं अपनी जीवनी लिखवाने वाला कौन होता हूं? एस एम मुब्बुलक्ष्मी के पति सदाशिवम ने, जो उनके निष्ठावान शिष्य थे, उनसे (राजाजी से) अपनी जीवनी लिखने का आग्रह किया, तो राजाजी ने यही उत्तर दिया, पर द्रवित होकर यह भी कह दिया ‘सदाशिवम, हमारा काम है, अपना फर्ज पूरा करना और संसार से विदा लेना.’ इतने बड़े पदों पर रहे और राजनीतिक संस्कृति को श्रेष्ठ बनानेवाले ऐसे लोग कितने निस्संग थे. उसी पुस्तक में आर एम लाला ने कामराज पर लिखा है. कामराज ने उन्हें कहा. टूटी-फूटी अंगरेजी में.

रिजनलिजम इज गोइंग अप, नेशनलिजम इज गोइंग डाउन (क्षेत्रवाद बढ़ रहा है, राष्ट्रवाद घट रहा है). 1975 में अपनी मौत के पहले कामराज ने यह बात कही थी. आज की स्थिति में इस बयान को आंकिए. एक भविष्यद्रष्टा और मनीषी का बयान. राजनीति में किस ऊंचाई के लोग थे? उस कामराज की पृष्ठभूमि क्या थी? आर एम लाला की पुस्तक से ही, ‘कामराज का संबंध उस युग से था, जब कांग्रेस वालंटियर एक सूरमा होता था, एकनिष्ठ समर्पण भाव के साथ आदर्शोवाला व्यक्ति होता था.. उन्होंने एक मामूली कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में काम शुरू किया, जिसके पास ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति से लड़ने के लिए सत्याग्रह के गांधीवादी हथियार से अधिक कुछ भी नहीं था. चौथाई सदी के संघर्ष के दौरान उन्होंने 3000 से अधिक दिन जेल में गुजारे. उस व्यक्ति ने कई लोगों को प्रधानमंत्री बनाया. अपने चरित्र के कारण किंग मेकर कहे गये.

तब एक सामान्य कांग्रेसी कार्यकर्ता का यह चरित्र था. आज बड़े-बड़े दलों के सबसे बड़े नेताओं के चरित्र की, तब के एक मामूली कांग्रेसी से तुलना कर लीजिए. पासंग में भी ये नहीं ठहरेंगे. भ्रष्टाचार की अकड़, अहंकार, हेकड़ी, हिंसात्मक आक्रामकता जैसे गुण आज बड़े-बड़े नेताओं के आभूषण हैं. दरअसल, किसी भी मुल्क या समाज को राजनीतिक नेतृत्व ही श्रेष्ठता प्रदान करता है. अमर बनाता है. दीर्घायु बनाता है. या अल्पायु बनाता है. प्रो आर्नाल्ड टायनबी ने बहुत पहले कहा था, कोई भी सभ्यता अपनी चुनौतियों के बरक्स ही आगे बढ़ती है. बड़ी चुनौतियों का अगर बड़ा हल या बड़ा सपना या बड़ा रिस्पांस होगा, तो सभ्यता-संस्कृति शिखर पर पहुंच जायेगी. पर जो सभ्यताएं अपने अंदर की चुनौतियों का जवाब, अंदर से तलाश नहीं पातीं या उत्पन्न मुसीबतों-कठिनाइयों का सार्थक और जरूरी हल नहीं ढ़ूंढ़ पातीं, वे पीछे छूट जाती हैं.

खत्म हो जाती हैं. इस कसौटी पर अगर आप-हम देखें, तो भारत के सामने आज बड़ी चुनौतियां हैं. बड़े सवाल हैं. संकट बड़ा है. भीतरी और बाहरी, दोनो मोरचों पर. पर इन चुनौतियों के मुकाबले थर्ड रेट नेतृत्व सामने है, जो बात-बात पर देह के धंधे का शिकार बने, घूस ले, बड़े पदों पर बैठ कर देश के लुटेरों को बचाये, वे कैसे देश की रहनुमाई कर पायेंगे?

ब्रिटेन के मशहूर अखबार द डेली टेलीग्राफ के प्रख्यात स्तंभकार पेरीग्रीन ने एक बार लिखा था. ब्रिटेन के संदर्भ में. हमारे नेता आज अभूतपूर्व लगते हैं. अपनी महानता के कारण नहीं, अपने ओछेपन, गिरावट और पतन के कारण. इस कारण वे अपवाद नहीं लगते कि उनमें मुल्क या देश को प्रेरित कर सकने की क्षमता है, बल्कि देश के मनोबल को तोड़ने, हतोत्साहित करने और डिप्रेस (तनावपूर्ण) करने के लिए वे प्रख्यात हैं. उन्होंने आगे लिखा, आज के सार्वजनिक जीवन में बड़ा और दिग्गज नेता होना लगभग असंभव है. यहां तक की जो ओछे, ठीक-ठाक दिखते हैं, शुरू में संकीर्ण नहीं लगते.

अंतत: वे भी बड़े संकीर्ण और छोटे ही बन जाते हैं. आज भारत के संदर्भ में यह कथन शत-प्रतिशत सही है. कभी नेहरू ने महात्मा गांधी को लिखा कि इस देश में जो अप्रसन्न, गरीब और वंचित हैं, वे रात में ही नहीं, लगतार मेरी स्मृति-मानस को बेचैन करते हैं. मेरी सारी चिंता उनके इर्द-गिर्द घूम रही है. गांधी ने भी कहा था, हर आंख से एक -एक आंसू पोछना ही मेरी आकांक्षा है. इस एक पंक्ति की गहराई और ऊंचाई से उन दिनों के नेतृत्व का कद मापा जा सकता है. आज इस कसौटी पर हमारा नेतृत्व वर्ग कहां खड़ा है?

चीनी कहावत है. अगर आप एक वर्ष के लिए कोई पौधा लगाना चाहते हैं, तो मक्का रोपें. अगर तीस वर्षो के लिए आप कुछ करना चाहते हैं, तो पेड़ रोपें. पर यदि सौ वर्षो के लिए कुछ करना है, तो मनुष्य को रोपें. साफ है कि नये मानस का समाज और इंसान गढ़ना होगा, तब भारत बनेगा. आजादी की लड़ाई में दशकों तक लोगों ने नये इंसान गढ़े, तब हम नयी ऊंचाई पर गये. अब हम लोभ और लालच की दुनिया में फंसे हैं. उपभोक्तावाद और बाजार हमारे प्रेरक तत्व हैं, तो हमारी राजनीति भी ऐसी ही होगी. जो भारत के लिए चिंतित हैं, उन्हें अब स्कूलों से नये भारतीय गढ़ने-बनाने होंगे, जो भारत के गौरव को लौटा सकें.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

भास्‍कर, सत्‍येंद्र, आनंद, निशाद एवं तरुण की नई पारी

लाइव इंडिया से खबर है कि भास्‍कर प्रतीक ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एसोसिएट प्रोड्यूसर थे. भास्‍कर ने अपनी नई पारी श्रीएस7 न्‍यूज चैनल के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर प्रोड्यूसर बनाया गया है. उन्‍हें आउटपुट में लाया गया है. वे इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

न्‍यूज टाइम से खबर है कि यहां की स्थितियों से परेशान सत्‍येंद्र वर्मा, आनंद कुमार, निशाद एवं तरुण कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. आनंद एसोसिएट प्रोड्यूसर तथा बाकी तीन लोग असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. तीन ने अपनी नई पारी श्रीएस7 न्‍यूज चैनल से शुरू की है, जबकि तरुण समाचार प्‍लस से जुड़ गए हैं.. इन्‍हें यहां भी उसी पद पर लाया गया है. ये आउटपुट में अपनी जिम्‍मेदारी निभाएंगे.

इंडिया टीवी से इस्‍तीफा देकर निशांत न्‍यूज24 पहुंचे

इंडिया टीवी से खबर है कि निशांत चतुर्वेदी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एंकर कम रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. निशांत ने अपनी नई पारी न्‍यूज24 से की है. उन्‍हें यहां भी एंकर कम रिपोर्टर पद पर लाया गया है. निशांत ने करियर की शुरुआत सन 2000 में जी न्‍यूज से की थी. उसके बाद दूरदर्शन के साथ रिपोर्टर के रूप में जुड़ गए. यहां से इस्‍तीफा देकर आज तक से जुड़े तथा 2004 में लोकसभा चुनाव का कवरेज किया. यहां से सहारा न्‍यूज पहुंचे. सहारा से इस्‍तीफा देने के बाद वॉयस ऑफ इंडिया से जुड़ गए. यहां के हालात बिगड़ने पर वे इंडिया टीवी से जुड़ गए थे.

राजस्‍थान पत्रिका ने राजकुमार को जयपुर से इंदौर भेजा

राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर से खबर है कि समूह के अखबार डेली न्‍यूज में कार्यरत राजकुमार शर्मा का तबादला इंदौर के लिए कर दिया गया है. राजकुमार रिपोर्टर थे तथा क्राइम बीट एवं सचिवालय के रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. इंदौर में भी उन्‍हें रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. राजकुमार लम्‍बे समय से पत्रिका से जुड़े हुए हैं. दूसरी तरफ दैनिक भास्‍कर, उदयपुर से खबर है कि नए संपादक सुधीर मिश्रा ने अपना कार्यभार ग्रहण कर लिया है. स्‍थानीय संपादक हरिश्‍चंद्र सिंह के इस्‍तीफा देकर अमर उजाला चले जाने के बाद इस पद पर सुधीर मिश्रा की नियुक्ति की गई है.

वीओएन के मालिक मनीष गुप्‍ता के खिलाफ मुकदमा, चैनल बंद होने की चर्चाएं

हर रोज कुकुरमुत्‍तों की तरह उगते और बंद होते चैनलों के बीच देहरादून से संचालित वीओएन के भविष्‍य पर भी सवालिया निशान खड़ा हो गया है। इस चैनल के मालिक और नारायण स्‍वामी हास्‍पीटल एवं डेंटल कॉलेज के निदेशक मनीष वर्मा के खिलाफ लगभग एक दर्जन मुकदमे दर्ज होने के बाद इसके बंद होने की आशंका जताई जा रही है। कोर्ट के आदेश पर देहरादून की कैंट पुलिस ने मनीष के खिलाफ 11 मुकदमे दर्ज किए हैं। यह मुकदमे छात्र-छात्राओं के साथ धोखाधड़ी एवं जालसाजी करने के आरोप में लगाए गए हैं।

जानकारी के आरोप के अनुसार अनुसार एडमिशन के समय संस्थान ने यूएनसी से मान्यता प्राप्त होने का दावा किया था। लेकिन कोर्स पूरा करने के बाद जब छात्र-छात्राएं पंजीकरण कराने के लिए यूएनसी पहुंचे तो काउंसिल ने पंजीकरण से मना कर दिया, क्योंकि नारायण स्वामी हास्पिटल एंड डेंटल कालेज काउंसिल, यूएनसी से मान्यता प्राप्त नहीं था। पंजीकरण न होने से से छात्र-छात्राओं को नौकरी नहीं मिल पाई। भविष्य अंधकारमय उन्होंने संस्थान की शिकायत स्वास्थ्य शिक्षा मंत्रालय उत्तराखंड से की, लेकिन कोई हल नहीं निकला। इस पर छात्र-छात्राएं पुलिस के पास पहुंचे, लेकिन उसने भी कोई कार्रवाई नहीं की।

हताश-नाराज 11 छात्र-छात्राओं ने वकील सनप्रीत सिंह की मदद से स्पेशल जेएम प्रथम हेमंत चंद सेठ की कोर्ट में नारायण स्वामी हास्पिटल एंड डेंटल कालेज के निदेशक मनीष वर्मा के खिलाफ शिकायती पत्र कोर्ट में दाखिल किया। जिसके बाद कोर्ट ने पुलिस को जालसाजी, धोखाधड़ी, अमानत में खयानत का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि मनीष की गिरफ्तारी भी हो सकती है। अपने दूसरे कामों के शेल्‍टर में खोले गए चैनल से जब प्रबंधन को कोई फायदा नहीं है तो वो इसपर खर्च करने के मूड में नहीं है। वीओएन की हालत पहले से ही खराब चल रही है।

अपने तहसील कार्यालयों को बंद करेगा अमर उजाला!

: कानाफूसी :अमर उजाला अपने नॉन प्राफिटेबल तहसील कार्यालयों को समेटने की योजना पर काम शुरू कर दिया है. खबर है कि इसकी शुरुआत मेरठ के सरधना से की जा चुकी है. अमर उजाला ने सरधना से स्‍टाफर हटा लिए गए हैं. ऑफिस भी जल्‍द ही बंद किया जाना है. अब तक तहसील स्‍तर तक अपने कार्यालय खोलकर अखबार को कंटेंट और आर्थिक लेबल पर मजबूत बनाने की शुरुआत करने वाले अमर उजाला ने अब इन्‍हें समेटना शुरू कर दिया है. जबकि इसके उलट दैनिक जागरण अब अपने तहसील कार्यालयों को मजबूत करने की प्रक्रिया शुरू कर चुका है.

सूत्रों का कहना है कि अमर उजाला ने तहसील कार्यालय बंद करने का कोई योजना नहीं बनाया है बल्कि उन कार्यालयों को बंद किया जा रहा है, जो प्रबंधन के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे हैं. जिनके खर्च आमदनी से ज्‍यादा हैं. ऐसे तहसीलों में केवल स्ट्रिंगर रखकर काम चलाया जाएगा. अमर उजाला के मेरठ यूनिट में सरधना तहसील से इसकी शुरुआत भी हो चुकी है. वहीं इसके उलट जागरण अब अपने तहसील कार्यालयों को और अधिक मजबूत करने की प्रक्रिया में जुटा हुआ है.

अमर उजाला ने जहां अपने स्‍टाफर को सरधना से बुला लिया वहीं दूसरी तरफ जागरण ने सरधना में वरिष्‍ठ साथी राकेश त्‍यागी को भेजकर तहसील इकाई को और अधिक मजबूत करने की कवायद में जुटा हुआ है. सूत्र बताते हैं कि अमर उजाला अब खर्च में कटौती करने की दिशा में काम कर रहा है. अगर संभव हुआ तो तहसील कार्यालयों को बंद करने की रणनीति भी शुरू की जा सकती है. अब देखना है कि केवल सरधना ही नहीं मोदीपुरम तहसील हेड क्‍वार्टर को भी मेरठ में शिफ्ट किए जाने की खबर है.  

पुलिस कार्रवाई के नाराज हिंदुस्‍तान ने नीतीश की यात्रा को पहले पन्‍ने से हटाया

मुंगेर। विश्व के मीडिया हाउस के सबसे बड़े आर्थिक अपराध (हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला) के मामलेमें मुंगेर (बिहार) पुलिस के द्वारा नामजद अभियुक्तों के विरूद्ध ठोस कानूनी कार्रवाई किए जाने के बाद बिहार के मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड के हिन्दी अखबार दैनिक हिन्दुस्तान के तेवर अब बदले-बदले नजर आने लगे हैं। आम पाठक अब खुले रूप में कहने लगे हैं कि आर्थिक भ्रष्टाचार में डूबे इस मीडिया समूह ने अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आंख दिखाना भी शुरू कर दिया है।

दैनिक हिन्दुस्तान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भभुआ की सेवा यात्रा की खबर को प्रथम पृष्ठ से हटा कर अखबार के भीतर के पृष्ठ-09 पर जगह देना शुरू कर दिया है। 29 अप्रैल को भभुआ की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेवा यात्रा की खबर को मुंगेर संस्करण में दैनिक हिन्दुस्तान ने भीतर के पृष्ठ -09 पर ‘समूह के विकास के लिए धन देगी सरकार‘ शीर्षक से मात्र चार कालम में छापा है। मुख्यमंत्री की रिपोर्ट संजय कुमार क्रांति की है। मुख्यमंत्री की सेवा यात्रा के दो-दो छोटे चित्र भी समाचार के साथ छपे हैं।

मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष और एडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भरतीया, मुद्रक और प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और भागलपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बिनोद बंधु के विरुद्ध कोतवाली कांड संख्या-445/2011 में चल रही पुलिस जांच के पूरा होने और आरक्षी उपाधीक्षक की पर्यपेक्षण रिपोर्ट तैयार होने के बाद इस मीडिया समूह ने बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मंत्रियों सहित प्रशासनिक पदाधिकारियों को आंख दिखाना शुरू कर दिया है।

मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड के नामजद अभियुक्तों के विरूद्ध पोख्ता साक्ष्य तैयार करने की दिशा में अभियोजन पक्ष की ओर से न्यायालय में चार मजबूत गवाहों की गवाही धारा 164 के तहत होने के बाद मीडिया हाउस के लोगों की नींद उड़ गई है। मीडिया हाउस कांड के सूचक मंटू शर्मा, गवाह काशी प्रसाद, श्रीकृष्ण प्रसाद, बिपिन मंडल और अन्य के विरूद्ध बदले की कार्रवाई में जुट गया है। दूसरी ओर मीडिया हाउस ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेवा यात्रा की खबर को प्रमुखता देना बंद कर दिया है। अखबारों में सकारात्मक खबरों का स्थान पूरा का पूरा नकारात्मक खबरों ने लेना शुरू कर दिया है।

यह भी बताते चलें कि यही अखबार पर्यवेक्षण रिपोर्ट तैयार होने के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेवा यात्रा की खबर को नित्य प्रथम पृष्ठ पर बड़े-बड़े शीर्षक के साथ बड़े-बड़े चित्रों के साथ छाप रहा था। सबसे मजे की बात यह रही की कि मुख्यमंत्री की सेवा यात्रा की खबर को संकलित करने के लिए मुंगेर कोतवाली कांड संख्या -445/2011 के नामजद अभियुक्त व वरीय संपादक बिनोद बंधु स्वयं जाते रहे हैं। अखबार की ओर से अभियुक्त बिनोद बंधु स्वयं मुख्यमंत्री की यात्रा का कवरेज करते थे, जो मुंगेर संस्करण में प्रथम पृष्ठ पर बिनोद बंधु के नाम से छपते थे। देखना है कि मीडिया हाउस के इस कदम पर बिहार सरकार किस प्रकार प्रतिक्रिया व्यक्त करती है?

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.

न्‍यूज एक्‍सप्रेस ने किया एआईईईई प्रवेश परीक्षा में गड़बड़ी का पर्दाफाश

न्यूज़ एक्सप्रेस ने ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंट्रेस एग्जामिनेशन (एआईईईई) की प्रवेश परीक्षा में हो रही बड़ी गड़बड़ी का पर्दाफाश किया है। न्यूज़ एक्सप्रेस ने ऑपरेशन मुन्नाभाई के जरिए एआईईईई में पास करवाने वाले बड़े रैकेट का खुलासा किया है। यूपी एसटीएफ ने आगरा में छापामारी कर इस रैकेट के दो मास्टर माइंड समेत छह सदस्यों को गिरफ्तार किया है। हर साल तकरीबन 10 लाख छात्रों के लिए परीक्षा का आयोजन करने वाला सीबीएसई भी इस गोरखधंधे को नहीं पकड़ पाता है, लेकिन  न्यूज़ एक्सप्रेस ने इस चक्रव्यूह को तोड़ दिया है।

मास्टरमाइंड ब्रजेश गिरफ्तार : एसटीएफ के इंस्पेक्टर बीएस त्यागी ने न्यूज़ एक्सप्रेस को बताया कि मुन्नाभाई रैकेट का मास्टरमाइंड ब्रजेश नाम का शख्स है, जिसे गिरफ्तार किया जा चुका है। एसटीएफ ने ब्रजेश समेत रैकेट के चार छात्रों को गिरफ्तार किया है। उनके नाम विक्रांत पटेल,  अपार भट्नागर, गजेंद्र और वेद्यनाथ अग्रहारी हैं। इसमें से अपार और गजेंद्र एचबीटीआई कानपुर के छात्र हैं। बीएस त्यागी ने बताया कि दिल्ली से भी इस रैकेट से जुड़े अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए दिल्ली पुलिस की मदद ली जाएगी। एसटीएफ ने मुन्नाभाई ऑपरेशन के लिए न्यूज़ एक्सप्रेस का धन्यवाद दिया। 

सख्त कार्रवाई होगी : सीबीएसई के चेयरमैन विनीत जोशी ने न्यूज़ एक्सप्रेस के इस खुलासे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सीबीएसई ने न्यूज़ एक्सप्रेस के इस खुलासे लिए धन्यवाद दिया। साभार : न्‍यूज एक्‍सप्रेस

निरुपमा पाठक की मौत के दो साल : हत्‍या एवं आत्‍महत्‍या के बीच उलझ गई गुत्‍थी

कोडरमा : देश को झकझोर देने वाली निरुपमा पाठक की मौत को दो साल पूरे हो गए, पर अब तक हत्‍या और आत्‍महत्‍या के बीच की गुत्‍थी नहीं सुलझ पाई है। इस बहुचर्चित मौत की कड़ी आज तक कोडरमा पुलिस नहीं जोड़ पाई है। गंभीर मामलों के प्रति झारखंड पुलिस की शिथिल कार्रवाई की बानगी है निरुपमा की मौत का रहस्य। दिल्ली के एक दैनिक अखबार में कार्यरत पत्रकार निरुपमा पाठक की मौत 29 अप्रैल 2010 को उसके झुमरीतिलैया चित्रगुप्त नगर स्थित उसके आवास में संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई थी।

हालांकि पहले इस मामले को आत्‍महत्‍या के रूप में लिया गया, परन्‍तु पोस्‍टमार्टम के बाद निरुपमा की हत्‍या किए जाने का संदेह जताया गया। मामले ने तूल पकड़ा तो एम्‍स के विशेषज्ञों ने पीएम रिपोर्ट की जांच की और इसे आत्‍महत्‍या का मामला करार दिया। एम्‍स की रिपोर्ट के आधार पुलिस ने मामले को आत्‍महत्‍या में तब्‍दील कर दिया। पुलिस ने इस मामले में खानापूर्ति करते हुए मृतका के माता-पिता, भाई और उसके प्रेमी के विरुद्ध मामले को सत्य करार देते हुए कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दिया। इस मामले में निरुपमा की मां कोर्ट से जमानत पर हैं, जबकि पिता, भाई और प्रेमी की जमानत उच्चतम न्यायालय में लंबित है।

झुमरीतिलैया के चित्रगुप्त नगर स्थित निरुपमा के घर के जिस कमरे में निरुपमा का शव पंखे से लटकी अवस्था में बरामद की गई थी, वो कमरा आज तक नहीं खुला है। पुलिस ने इस कमरे को सील कर रखा है। दरअसल, निरुपमा के पोस्टमार्टम की समीक्षा रिपोर्ट में एम्स की फारेंसिक विभाग की टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण टीम द्वारा किए जाने की जरूरत बताई थी, लेकिन नई दिल्ली से टीम को लाने एवं पहुंचाने की व्यवस्था करने के लिए जरूरी बजट की फाइल दो वर्षों से पुलिस मुख्यालय की चक्कर काट रही है। इसी कारण आजतक न तो टीम का दौरा हुआ और न ही वह कमरा खुला।

कोडरमा के एसपी शंभू ठाकुर ने कहा है कि केंद्रीय टीम के भ्रमण के लिए वरीय अधिकारियों को पत्राचार किया गया है। उन्होंने कहा कि कमरा खोलने की कार्रवाई मैं अपने स्तर से नहीं कर सकता। दूसरी तरफ निरुपमा के वकील अरूण मिश्रा ने कहा कि पुलिस की शिथिलता के कारण निरुपमा के परिजनों को दो साल बाद भी न्याय नहीं मिल पाया। निरुपमा की मौत के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार उसके प्रेमी का न्यायालय से कुर्की, वारंट निर्गत है, बावजूद उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस कोई प्रयास नहीं कर रही है।  

पत्रकार पर गलत केस दर्ज करने वाला सब इंस्‍पेक्‍टर सस्‍पेंड

अमृतसर : महानगर के एक पत्रकार पर झूठा केस दर्ज करने वाले सब इंस्पेक्टर चंद्रभूषण को पुलिस कमिश्नर ने सस्पेंड कर दिया है। चंद्रभूषण थाना मोहकमपुरा का पूर्व एसएचओ है। उल्लेखनीय है कि एक हिंदी समाचार पत्र के पत्रकार सुरेश से एक ऑटो एजेंसी वाले ने मारपीट की थी। पुलिस ने ऑटो एजेंसी वाले के खिलाफ केस दर्ज करने के बजाय पत्रकार के खिलाफ ही झूठा केस दर्ज कर लिया। बाद में, पत्रकार को गिरफ्तार भी कर लिया गया। इस मामले की शहर के पत्रकारों ने कड़ी निंदा की थी।

मामले की जांच खुद पुलिस कमिश्नर आरपी मित्तल ने की। उन्होंने जांच अधिकारी एएसआई जनकराज से पूछताछ की। जनकराज ने बताया कि उसने तत्कालीन एसएचओ चंद्रभूषण के कहने पर पत्रकार पर केस दर्ज किया था। पुलिस कमिश्नर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए थाना मोहकमपुरा के पूर्व एसएचओ व सबइंस्पेक्टर चंद्रभूषण को सस्पेंड कर दिया है। पत्रकार सुरेश ने मांग की है कि उसके खिलाफ दर्ज किया गया झूठा केस रद किया जाए व मोटर एजेंसी के मालिकों पर मारपीट करने व नकदी छीनने का केस दर्ज किया जाए। (जागरण)  

पीपुल्स समाचार आर्थिक संकट में, तीन माह से नहीं मिला वेतन

भोपाल : इस समय पीपुल्स समाचार आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहा है. हालत यह है कि पिछले तीन माह से सम्पादकीय विभाग के लोगों को वेतन तक नहीं मिला है. पिछले एक माह में एक दर्जन से आधिक लोगों के पीपुल्स समाचार छोड़ के जाने की पुष्टि हो चुकी है. चर्चा तो यह भी है कि अखबार के मालिकान पीपुल्स समाचार को बंद करने कि घोषणा किसी भी समय कर सकते हैं. यही कारण है कि पीपुल्स समाचार से जुड़े पत्रकार नए ठिकाने कि तलाश में जुट गए है.

समूह सम्पादक के रूप मे दिनेश गुप्ता की नियुक्ति इसी जद्दोजेहद का परिणाम है. दिनेश गुप्ता को जुगाडू पत्रकार के तौर पर पहचाना जाता है. दिनेश गुप्ता की नियुक्ति के बाद भी यदि पीपुल्स ग्रुप की आर्थिक हालत नहीं सुधरी तो अख़बार का बंद होना लगभग तय है. यहाँ बता दें कि पीपुल्स ग्रुप की आर्थिक हालत इतनी कमज़ोर नहीं है जितनी बताई जा रही है. सच तो यह है की अखबार के मालिकान चाहते हैं कि अखबार का खर्चा अखबार से ही निकले. जब कि स्टाफ चाहता है कि जब पीपुल्स ग्रुप के दूसरे सभी धंधे अख़बार की आड़ में चल रहे हैं तो अखबार का खर्च भी उन्हीं धंधों के मद से उठाया जाए. क्योंकि आखबार की आमदनी से अखबार चलाना संभव नहीं है.

भोपाल से अरशद अली खान की रिपोर्ट.

खोजी महिला पत्रकार की उनके ही घर में हत्‍या

मैक्सिको। मैक्सिको की एक मशहूर समाचार पत्रिका प्रोसेस्को की एक पत्रकार का शव वेराक्रुज प्रात में उनके घर में पाया गया। प्रशासन का मानना है कि नशीले पदार्थो की तस्करी के बारे में अक्सर खबरें लिखने की वजह से उनकी हत्या हुई है। प्रात के अटार्नी जनरल कार्यालय ने एक बयान में कहा है कि रेगीना मार्टिंज का शव प्रात की राजधानी जालपा में उनके घर के बाथरूम में पाया गया। शव तथा उनके चेहरे पर गहरी चोट के निशान भी पाए गए।

प्रशासन ने कहा है कि आरंभिक साक्ष्यों से पता चलता है कि सांस रुकने की वजह से उनकी मौत हुई है। मार्टिंज मैक्सिको की सबसे पुरानी और काफी चर्चित खोजी समाचार पत्रिका प्रोसेस्को की जालपा पत्रकार थीं। वह इलाके में नशीले पदार्थो के नेटवर्क के बारे में लिखा करती थी। अधिकारियों को उनकी हत्या के मकसद का पता नहीं चला है। लेकिन हाल में वेराक्रुज शक्तिशाली जेटास और जलिस्को समूह के बीच नशीले पदार्थो से संबंधित हिंसा का शिकार हुआ था। इस तटीय प्रात के जरिए मानव तस्करी भी होती है। वेराक्रुज के गवर्नर जेवियर दुआर्ते ने मामले की छानबीन के आदेश दिए हैं। (एजेंसी)

देहरादून में अशोक पांडेय ने किया चढदींकला टाइम टीवी के कार्यालय का उद्घाटन

चढदींकला टाइम टीवी ने रविवार को देहरादून के करगी ग्रांट बन्ज़रावाला में उत्तराखंड कार्यालय का उद्घाटन किया। कार्यालय का उद्घाटन नेटवर्क 10 के दिग्गज पत्रकार अशोक पाण्डेय और चढदींकला टाइम टीवी के स्टेट हेड/स्टेट कोआर्डिनेटर नईम खान ने फीता काटकर किया। अशोक पाण्डेय ने चढदींकला टाइम टीवी को नई बुलंदियां छूने और मीडिया को नई उचाईयों पर ले जाने की शुभकामना दी। स्टेट हेड रविकांत शर्मा ने चीफ़ गेस्ट अशोक पाण्डेय को फूल मालाओं से स्‍वागत किया। उद्घाटन के मौके पर अशोक पाण्डेय जी के साथ उनकी टीम और चढदींकला टाइम टीवी की तरफ से उत्तराखंड स्टेट हेड रविकांत शर्मा, इशर सिंह, शाह आलम, हिमांशु पैनुली, जुल्फकार मालिक, निहारिका कश्यप, उषा पंवार सहित कई कर्मचारी मौजूद रहे।

शाहजहांपुर में दो पत्रकारों पर सपाइयों का जानलेवा हमला, गिरफ्तारी नहीं

शाहजहांपुर के बंडा थाना क्षेत्र निवासी दैनिक जागरण के पत्रकार श्रीधर श्रीवास्‍तव तथा उनके पत्रकार साथी रमेश तिवारी पर सपाइयों ने जानलेवा हमला किया. पहले पत्रकार पर फायर किया गया. फायर मिस हो जाने पर आरोपी सपाइयों ने दोनों पत्रकारों पर पिस्‍टल के बट और डंडों से हमला किया. हमलावर इतने दबंग थे कि उन्‍होंने बंडा थाने के गेट पर हमला को अंजाम दिया. दोनों पत्रकार थाने के भीतर भागकर अपनी जानी बचाई. पत्रकारों की तहरीर पर पुलिस ने चार आरोपियों के खिलाफ जालनेवा हमला समेत कई धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है. पर सपा के दबाव में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.

घटना 25 अप्रैल की दोपहर की है. खबर के अनुसार सपा से जुड़े गुलफाम सिंह यादव, उसके पुत्र लल्‍ला सिंह यादव, अजय मिश्र एवं सोनू तिवारी अक्‍सर श्रीधर पर बसपाइयों के खिलाफ गलत-सही खबर लिखने का दबाव डालते थे. कुछ इसी तरह की खबर श्रीधर ने प्रकाशित नहीं की थी. खबर न छापने को लेकर आरोपी उनसे नाराज थे. श्रीधर के अनुसार वो 25 की दोपहर समाचार संकलन के लिए सहयोगी रमेश तिवारी के साथ थाना बंडा जा रहे थे. तभी गेट के मौजूद सपाइयों ने उन पर तमंचे से फायर कर दिया, परन्‍तु फायर मिस हो गया. श्रीधर डर से अपने वाहन सहित नीचे गिर गए.

इसके बाद चारों आरोपियों ने डंडे और पिस्‍टल व तमंचे के बट से उन दोनों लोगों पर हमला कर दिया. दोनों लोगों को काफी चोटें आईं. मारपीट होते देखकर कुछ पुलिस वाले गेट की तरफ दौड़े इसके पहले ही दोनों पत्रकार किसी तरह थाने के अंदर जान बचाकर भागे. इसके बाद हमलावर सपाई भी वहां से भाग निकले. पुलिस ने पत्रकारों की तहरीर पर चारों आरोपियों के विरुद्ध आईपीसी की धारा 307, 323, 353 व 506 के तहत मामला दर्ज कर लिया है. पर अभी तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.

पत्रकारों का आरोप है कि सपा अध्‍यक्ष के दबाव में पुलिस लापरवाही बरत रही है इसलिए अभी तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है. इस हमले से मीडियाकर्मियों में रोष है. अभी तक इस मामले में गिरफ्तारी नहीं होने से नाराज दोनों पत्रकारों ने मुख्‍यमंत्री को भी पत्र लिखकर जानकारी दी है. मुख्‍यमंत्री को लिखा गया पत्र.


माननीय मुख्यमंत्री महोदय
उत्तर प्रदेश सरकार
लखनऊ

विषय:- थाना बण्डा जनपद शाहजहांपुर में समाचार संकलन को जा रहे दो पत्रकारों की थाना गेट पर हत्या का प्रयास। चार नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी न किये जाने के सम्बंध में।

महोदय,

निवेदन है कि दिनांक 25 अप्रैल 2012 समय डेढ़ बजे दिन समाचार संकलन के लिए जाते वक्त पत्रकार रमेश तिवारी व पत्रकार श्रीधर श्रीवास्तव पर थाना बण्डा गेट पर पहले से घात लगाकर खड़े लल्ला सिंह पुत्र गुलफाम सिंह व गुलफाम सिंह पुत्र नामालूम निवासीगण मोहल्ला रामनगर कालोनी बण्डा, अजय मिश्रा पुत्र देवीचरन निवासी नबावपुर-पुक्खी, सोनू तिवारी पुत्र सुरेश तिवारी निवासी नरायणपुरगंगा ने तमंचों व लाइसेंसी रिवाल्वर से फायर करके हत्या का प्रयास किया था। लेकिन फायर मिस हो जाने पर असलहों के बटों के प्रहार कर मारने की कोशिश की थी। जिसकी थाना हाजा पर उक्त चारों आरोपियों के विरुद्ध धारा 307, 323, 353, व 506 आईपीसी में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है।

माननीय महोदय, उक्त अजय मिश्रा को समाजवादी पार्टी से ब्लाक अध्यक्ष मनोनीत किया गया था और जिलाध्यक्ष श्री प्रदीप पांडे स्थानीय पुलिस पर दबाब बनाकर गिरफ्तारी रोके हुए है। माननीय महोदय उक्त अजय मिश्रा के अन्य साथी बसपा कार्यकता है। और इस तरह की पूर्व में घटनाएं घटित कर पार्टी व सरकार की छवि धूमिल कर जनभावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं। और उक्त लोगों की दबंगाई की वजह से पुलिस मुकदमा पंजीकृत कर कार्रवाई करने में अक्षम है। जिससे उक्त लोगों के हौसले बुलंद है। और पुलिस की परवाह न कर थाना गेट पर हत्या के प्रयास की घटना कारित की है।

महोदय, प्रार्थी 30 वर्षों से पत्रकारिता से जुड़ा है और अब 50 वर्ष की उम्र पार करने पर उक्त लोगों ने सरेराह थाना गेट पर जान से मारने का दुस्साहस किया है। अतः माननीय महोदय प्रार्थी प्रार्थना पत्र के माध्यम से आपकी शरणागत है। प्रार्थी की जान की सुरक्षा आपके आसरे पर है। जीवन रक्षा के साथ आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एसपी शाहजहांपुर को अविलम्ब निर्देशित करने की कृपा करें।

प्रार्थी सपरिवार आपका आजन्म आभारी रहेगा।

संलग्नः- समाचार पत्रों की कतरन की छाया प्रतियां

प्रार्थीगण
रमेश तिवारी पुत्र श्री खोतनलाल
निवास पूरनपुर रोड बण्डा
थाना बण्डा जनपद शाहजहांपुर
मे0- 07607736829
श्रीधर श्रीवास्तव पुत्र श्री खरगूलाल
मोहल्ला रामनगर
बण्डा शाहजहांपुर
मे0- 9451102030



 

वरिष्‍ठ पत्रकार विराज शर्मा के पिता का निधन

शिमला के वरिष्ठ पत्रकार व केन्द्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह के मीडिया प्रवक्ता विराज शर्मा के पिता श्याम लाल शर्मा का अकस्मात देहांत हो गया है। उनकी उम्र 78 साल थी। एकाएक हृदय गति रूकने के कारण उनका अर्की के गाहर गांव में देहावसान हो गया। शनिवार को शिमला के अर्की के बातल गांव के श्मशानघाट में श्याम लाल शर्मा का अंतिम संस्कार कर दिया गया। अंतिम संस्कार में शिमला के कई पत्रकारों ने भाग लिया और शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। केन्द्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह और उनकी धर्मपत्नी प्रतिभा सिंह ने विराज शर्मा के पिता के देहांत पर गहरा शोक प्रकट किया और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया एकदूसरे के पूरक बन चुके हैं

नई दिल्‍ली : भारत की राजधानी के दिल कनॉट प्‍लेस के द एम्‍बेसी रेस्‍तरां में एक हिंदी ब्‍लॉगर संगोष्‍ठी लखनऊ से पधारे हिन्‍दी के मशहूर ब्‍लॉगर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के सम्‍मान में सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़डॉटकॉम द्वारा शनिवार को आयोजित की गई। इस मौके पर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के प्रभाव के सबने एकमत से स्‍वीकारा। देश विदेश में हिंदी के प्रचार प्रसार में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के महत्‍व को सबने स्‍वीकार किया और इसकी उन्‍नति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों पर व्‍यापक रूप से विचार विमर्श किया गया। संगोष्‍ठी में दिल्‍ली, नोएडा, गाजियाबाद के जाने माने हिंदी ब्‍लॉगरों से शिरकत की। सोशल मीडिया यथा फेसबुक, ट्विटर को हिंदी ब्‍लॉगिंग का पूरक माना गया। एक मजबूत एग्रीगेटर के अभाव को सबसे एक स्‍वर से महसूस किया और तय किया गया कि इस संबंध में सार्थक प्रयास किए जाने बहुत जरूरी है। फेसबुक आज एक नेटवर्किंग के महत्‍वपूर्ण साधन के तौर पर विकसित हो चुका है। इसका सर्वजनहित में उपयोग करना हम सबकी नैतिक जिम्‍मेदारी है।

सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़ के मॉडरेटर एवं चर्चित व्‍यंग्‍यकार अविनाश वाचस्‍पति ने हिंदी ब्‍लॉगिंग को समाज की बुराइयों से बचाने और प्राइमरी कक्षाओं में इसके पाठ्यक्रम आरंभ करने को वक्‍त की जरूरत के मामले को इस अवसर पर भी दोहराया। जिसका सभी उपस्थिति ब्‍लॉगरों ने सर्वसम्‍मति से समर्थन किया। एक और हिंदी ब्‍लॉगर संतोष त्रिवेदी ने कहा कि बहुत ही छोटे से नोटिस पर दूर दराज से ब्‍लॉगरों का इस संगोष्‍ठी में शामिल होना साबित करता है कि हिंदी ब्‍लॉगिंग का प्रभाव शिखर की ओर तेजी से बढ़ रहा है। कंटेंट के स्‍तर पर आ रही गिरावट पर चिंता व्‍यक्‍त करते हुए जनसत्‍ता के संपादकीय विभाग में कार्यरत फजल इमाम मल्लिक ने माना कि ऐसी स्थितियां तो प्रत्‍येक तकनीक के आरंभ में आती ही हैं। यह एक ऐसा मंच है जिसका पूरी जिम्‍मेदारी के साथ तभी उपयोग किया जा सकता है जबकि इस प्रकार के मेल मिलाप होते रहें। उन्‍होंने सबसे आवाह्न किया कि ब्‍लॉगर अपने अपने क्षेत्रों में इस प्रकार के भरसक प्रयास करें।

भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर यशवंत सिंह ने जानकारी दी कि आगरा में एक ब्‍लॉगर अपने तकनीक ब्‍लॉग के जरिए एक से डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह तक कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा भी कई जगहों पर ब्‍लॉगिंग से कमाई हो रही है। यह स्थिति निश्‍चय ही सुखद है। प्रत्‍यक्ष न सही, परंतु परोक्ष रूप से हिंदी ब्‍लॉगिंग से हो रही कमाई को अविनाश वाचस्‍पति ने भी स्‍वीकारा।

स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी ब्‍लॉगों के मॉडरेटर के. राधाकृष्‍णन, पी 7 से जुड़े हर्षवर्द्धन त्रिपाठी, स्‍वतंत्र पत्रकार विष्‍णु गुप्‍त, अयन प्रकाशन के भूपाल सूद, डॉ. टी. एस. दराल, हिंद युग्‍म के शैलेश भारतवासी, सुलभ सतरंगी, कुमार कार्तिकेयन, गौरव त्रिपाठी, खुशदीप सहगल इत्‍यादि ने हिंदी ब्‍लॉगिंग के स्‍वस्‍थ विकास के लिए कई पहलुओं पर उद्देश्‍यपूर्ण चिंतन किया। सबने माना कि फिजूल की अश्‍लील एवं धार्मिक उन्‍माद संबंधी पोस्‍टों पर जाने से हर संभव बचा जाए। इस दूषित प्रवृत्ति पर भी चिंता प्रकट की गई कि चार पोस्‍टें लिखकर स्‍वयं को साहित्‍यकार समझने वालों को अपनी आत्‍ममुग्‍धता से निजात पानी चाहिए। यह बुराईयां स्‍वस्‍थ ब्‍लॉगिंग के विकास के लिए हितकर नहीं हैं।

पवन चंदन की रिपोर्ट. इनसे संपर्क 9990005904 के जरिए किया जा सकता है.

”साहित्यकार सीवान में भौंकता कुत्ता है, जिसकी बात कोई नहीं सुनता”

काशीनाथ सिंह ने कोई गलतबयानी नहीं की। साहित्यकार सीवान में भौंकता कुत्ता है, जिसकी बात कोई नहीं सुनता। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह केवल विवाद पैदा करके खबरों में आने जैसी बात नहीं है, न ही किसी तरह की जल्दबाजी में कही गयी हल्की बात है। काशी हमेशा सहज परंतु गंभीर रहते हैं। उनका कोई एक वाक्य भी बगैर अनुभव के नहीं होता, परखे-जांचे बगैर वह कुछ कहते नहीं। तमाम लोग लगातार साहित्य और उसके प्रभाव संबंधी सवालों से जूझते रहते हैं। कुत्ते का भौंकना साहित्यकार के निजी व्यक्तित्व की ओर संकेत भर नहीं है, यह उसके लिखे हुए, उसकी रचनाओं की ओर भी इंगित करता है। यह बहुत स्पष्ट नहीं हुआ कि उन्होंने यह टिप्पणी केवल वर्तमान लेखन को लेकर की या फिर इसका अतीत की ओर भी विस्तार है लेकिन जिस संदर्भ में उन्होंने यह बात कही, उससे समझा जा सकता है कि उनकी इस बात का संबंध साहित्य की अद्यतन दुनिया से है।

अगर ऐसा है तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि यह हालत आखिर बनी क्यों? इन्हीं काशीनाथ सिंह ने कभी यह भी कहा था कि प्रेमचंद अब भी पाठकों की दुनिया के सरताज हैं। वे आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जाते हैं, उनकी किताबें किसी भी नये लेखक से ज्यादा बिकती हैं। उनकी इस स्वीकारोक्ति में यह तथ्य भी निहित है कि प्रेमचंद प्रभावित करते हैं, उनकी शैली, उनके बात कहने का अंदाज असर डालता है और जो असर डालता है, वही तोड़ता है, बदलता भी है। उन्हें पढ़ते हुए पाठक के भीतर कुछ पुराना नष्ट होता है, कुछ नया निर्मित होता है। नजरिया, विचार या जो कुछ नाम दें उसे।

काशीनाथ की बात यथावत स्वीकार कर ली गयी हो, ऐसा नहीं है। उसी मंच से उन्हें चुनौती भी मिली। कथाकार शिवमूर्ति ने उन्हें पोंकिया लिया। उनका कहना था कि साहित्य केवल संस्कारित करता है, वह एक कल्चर का निर्माण करता है। इसके बावजूद काशीनाथ सिंह की बात पर विचार करना जरूरी है, उन सबके लिए जरूरी है, जो लिखते-पढ़ते हैं। शिवमूर्ति की बात सुनने में अच्छी लगती है लेकिन व्यवहार में खरी नहीं दिखती। जो निरंतर साहित्य पढ़ते या लिखते हैं, क्या वे सब संस्कारित हो चुके हैं, क्या उनमें वह कल्चर दिखायी पड़ता है, जिसकी ओर शिवमूर्ति का संकेत है? अगर वही लोग अभी संस्कारित नहीं हुए तो शिवमूर्ति आखिर किसके संस्कार की बात कर रहे हैं? आम लोगों का तो सामान्य तौर पर इस दुनिया से साबका ही नहीं है, जो कुछ शौकिया पढऩे वाले हैं, उन तक आप पहुंच कहाँ पाते हैं? बेशक हिंदी में बहुत सारी पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं पर कितनी संख्या में, कितनी पहुंच के साथ? और कितनी हैं, जिनके संपादकों में साहित्य की समझ है? उनके पढ़े जाने की संभावना कितनी है? जहाँ तक पुस्तकों का प्रश्न है, कहानी, कविताओं या अन्य विधाओं में प्रतिदिन आने वाली सैकड़ों पुस्तकों में से कितनी ऐसी हैं, जिनमें कल्चर बदलने या निर्मित करने वाला साहित्य आ रहा है।

ऐसे में शिवमूर्ति के अमोघ खंडक शस्त्रों के बावजूद काशीनाथ सिंह की मिसाइल पर कोई असर पड़ता नहीं दिखायी पड़ता। अगर आज के रचनाकार ने अपनी हालत भौंकने वाले कुत्ते की बना ली है तो इसके लिए उसके अलावा कौन जिम्मेदार हो सकता है? ऐसा क्या हो गया है कि वह कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है? ऐसा क्या हो गया है कि वह बड़े वर्ग में अनसुना, अनपढ़ा रह जाता है? उसकी असरकारी शक्ति में कमी क्यों आ गयी है? कथाकार ममता कालिया या कई और लोग कह सकते हैं कि कविता, कहानी सत्ता को हिला सकती है, उसे बेचैन कर सकती है। वे गुंटर ग्रास का उदाहरण दे सकते हैं। पर हमारे उदाहरण हमेशा हमारी अपनी भौगोलिक या सांस्कृतिक सत्ता के बाहर से ही क्यों आते हैं? कोई गुंटर ग्रास हिंदुस्तान में क्यों नहीं दिखायी पड़ता? हम मिशेल फूको, काफ्का या इन जैसे तमाम लेखकों, रचनाकारों के नाम लेकर थोड़ी देर के लिए चमकने की कोशिश क्यों करते दिखायी पड़ते हैं? हमारे पास क्या कुछ अपना बचा नहीं रह गया है?

विभिन्न स्तरों पर अनेक तरह की समाजविरोधी प्रत्यक्ष, परोक्ष ताकतों की पहचान कर लेने भर से तो काम नहीं चलेगा। शब्दों में ताकत है, ठीक बात है लेकिन शब्दों के प्रभाव को लेकर ही जब हम दुविधा में हैं या यह समझते हैं कि शब्द न प्रतिरोध कर सकते हैं, न क्रांति कर सकते हैं तो रणभूमि में सामने उपस्थित खतरनाक शक्तियों को नाभि तक पहुंचने से कैसे रोक पायेंगे। शिवमूर्ति को कई बार हमने कहते सुना है कि लेखक तो कायर होता है, वह सुरक्षित दूरी से खतरों को देखता है, वह लड़ता नहीं है, लडऩा उसका काम नहीं है। यद्यपि लडऩे वाले लोग प्रथम श्रेणी के लोग हैं और वे किसी भी लेखक या साहित्यकार से ज्यादा महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं पर यह काम लेखक का नहीं है। चलिये कोई बात नहीं, लेकिन लेखक जो काम कर रहा है, उसके परिणाम के प्रति वह कितना आश्वस्त है? आप कहते हैं कि राम चरित मानस श्रेष्ठ साहित्यिक रचना है, वाल्मीकि रामायण अद्वितीय साहित्यिक योगदान है पर धर्म उसका हिंसा के औचित्य प्रतिपादन में सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहा है। जब आप ऐसा कहते हैं तो उन धार्मिक शक्तियों के आगे आपका समर्पण भी दिखायी पड़ता है, क्योंकि आप के पास इतनी भी शक्ति नहीं कि अपने श्रेष्ठ साहित्य को इस्तेमाल होने से बचा सकें, धर्म के षडय़ंत्र को नाकाम कर सकें। आज अगर तुलसीदास इस्तेमाल हो गये, वाल्मीकि इस्तेमाल हो गये तो बाकियों की क्या गारंटी? क्या आप देख पा रहे हैं कि दुष्यंत कुमार इस्तेमाल हो रहे हैं, धूमिल इस्तेमाल हो रहे हैं? तमाम कायर, बेईमान और भ्रष्ट शक्तियाँ इन्हें भी अपनी काली छायाओं पर रोशनी का पर्दा डालने में इस्तेमाल कर रही हैं।

जाने-अनजाने पुरस्कार, धन और अन्य सुख-सुविधाओं की चाह में अनेक लेखक और साहित्यकार भी सत्ता के परोक्ष या प्रत्यक्ष पायदानों पर घुटने टेकते दिखायी पड़ते हैं। नहीं कहता, सभी लेकिन कई और कई बड़े-बड़े भी। आप साहित्यकार हैं पर क्या आप मौका मिलते ही इस्तेमाल होने को तैयार नहीं हैं? क्या आप जानते हैं कि आप बिल्कुल इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं? माना आज नहीं पर कौन जाने कल आप भी इस्तेमाल हो जायें। अगर साहित्य और साहित्यकार की शक्ति कम हुई है, असर कम हुआ है तो इसका कारण बिल्कुल यही है कि वह आम पाठक से दूर होता गया है, वह खास बनता गया है, वह अपने चमकीले आवरण तक साधारण लोगों को पहुंचने नहीं देना चाहता। तमाम लेखकों को रोग है महामंडलेश्वर बनने का। जो नहीं बन पाते, वे किसी ऐसे छद्म बीतरागी की शरण में चले जाते हैं। जो बन जाते हैं, वे अपनी उस छवि से बाहर नहीं आना चाहते, कुर्सी से नीचे नहीं उतरना चाहते। फिर तो भौंकने की कला के अलावा बचेगा क्या?

लेखक डा. सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. अमर उजाला समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ में एक हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

दिनेश गुप्ता बने पीपुल्स समाचार के समूह संपादक

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता पीपुल्स समाचार पत्र के नये समूह संपादक बनाए गए है। शुक्रवार की रात एनके सिंह के इस्तीफे के बाद पीपुल्स प्रबंधन ने ताबड़तोड़ नये समूह संपादक के लिए तलाश शुरू कर दी थी। शनिवार को गुप्ता के नाम को हरी झंडी दे दी गई। रविवार के अंक की प्रिंट लाइन में गुप्ता का नाम प्रकाशित हो गया। दिनेश गुप्ता राजधानी के वरिष्ठ पत्रकारों में गिने जाते हैं। प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में श्री गुप्ता की खासी पकड़ है। गुप्ता ने तीन माह पूर्व ही साध्य दैनिक प्रदेश टुडे में सलाहकार संपादक का पदभार ग्रहण किया था। गुप्ता इसके पूर्व जागरण, हिन्दुस्तान, चौथा संसार सहित कई समाचार पत्रों में अपने सेवाएं दे चुके हैं।

पहले पेज पर खबर छपने पर पांच सौ रुपये का इनाम पाएंगे हिंदुस्‍तानी रिपोर्टर

: बरेली में कंपनी को चूना लगा रहे हैं कुछ पत्रकार : जब से हिन्दुस्तान ने पहले पेज पर खबर छपने पर रिपोर्टर को इनाम देने की स्कीम शुरू की है, तभी से बरेली हिन्दुस्तान में लूट मच गई है। सेटिंगबाज पत्रकार जमकर चांदी काट रहे हैं। हालत यह हो चुकी है कि दूसरे अखबारों में छपी पुरानी खबरों को भी कुछ दिनों के बाद अपने अखबार में हिन्दुस्तान ब्रेकिंग न्यूज बताकर पहले पेज पर छापा जा रहा है ताकि इनाम के ढाई या पांच सौ मिल सकें।

बताते हैं कि इस काम में एक वरिष्‍ठ पत्रकार की सेवा भी करनी पड़ती है, जिन लोगों ने सेटिंग कर ली है उनकी तो पौ बारह हो गई है। एक हफ्ते में उनकी कई खबरें पेज वन पर छपती हैं। नमूने के तौर पर पंजाब केसरी में पहली अप्रैल को 'सेना में ग्रुप सी और डी की भर्ती में फर्जीवाड़ा' शीर्षक से छपे समाचार को एक सीनियर रिपोर्टर ने हिन्दुस्तान में 14 अप्रैल को पेज एक पर शीर्षक -'सेना में अफसरो ने चहेतों को बांटी नौकरियां' से हिन्दुस्तान ब्रेकिंग न्यूज करके खबर छापी। इससे ठीक एक दिन पहले यानी 13 अप्रैल को पहले पेज पर शीर्षक -'भारतीय सेना के कई ठिकानों के आसपास संदिग्ध हलचल।' रुटीन बैठक की खबर को पहले पेज पर छपवाकर कंपनी की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की गई। ऐसी तमाम गोलमान प्रबंधन के चहेते पत्रकार कर रहे हैं। अब देखना यह है कि कंपनी का एचआर ऐसी पुरानी छपी छपाई व रूटीन वाली खबरों को इनाम देता है या फिर कंपनी चूना लगाने वाले गठबंधन पर कार्रवाई करता है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

हिंदुस्‍तान, बरेली में बीट बंटवारे से नाराजगी, संजीव गंभीर के पर कतरे गए

हिंदुस्‍तान, बरेली के स्‍थानीय संपादक आशीष व्‍यास ने बरेली सिटी टीम के बीटों का नए सिरे से बंटवारा कर दिया है. यह कवायद टीम को मजबूत करने के लिए की गई है, लेकिन इसको लेकर रिपोर्टरों में नाराजगी है. बीट बंटवारे से साफ हो गया है कि पंकज मिश्रा रिपोर्टिंग टीम के इंचार्ज हो गए हैं. नए बीट से रिपोर्टिंग के चर्चित चेहरे आरबी लाल का नाम गायब है. आरबी लाल तीन महीने से ऑफिस नहीं आ रहे हैं. माना जा रहा है कि अब से हिंदुस्‍तान के हिस्‍सा नहीं रहे.

28 दिन छुट्टी पर रहने के बाद लौटे नबी हसन अंसारी को क्राइम टीम में ही लगाया गया है. अखिलेश अवस्‍थी को बदायूं से वापस बुलाकर सिटी टीम में लगाया गया है. रामपुर भेजे जाने के नाम पर सिटी से हटाए गए संतोष सिंह का काम अमर उजाला से आए प्रदीप तिवारी को दे दिया गया है. इसके साथ यह भी साफ हो गया है कि संतोष की वापसी बरेली यूनिट में नहीं हो रही है. प्रदीप प्रशास और बीजेपी देखेंगे. क्राइम टीम की इंचार्जी पंकज सिंह से ले ली गई है. क्राइम टीम को अब अमर उजाला से आए अवनीश पांडेय लीड करेंगे. पंकज सिंह को सेना और कांग्रेस जैसा पुराना बीट दे दिया गया है.

सिटी में कई बीटो की जिम्‍मेदारी संभाल रहे और केके उपाध्‍याय के खास माने जाने वाले संजीव गंभीर के पर कतर दिए गए हैं. संजीव के पास से जिला पंचायत, पंचायती राज विभाग और राजनीतिक पार्टियों की बीट ले ली गई है. संजीव का पर कतर कर संकेत भी दे दिया गया है कि अब केके उपाध्‍याय बिहार जा चुके हैं. हालांकि संजीव को बदायूं से आशीष व्‍यास ही वापस लेकर आए थे. शाहजहांपुर से लाए गए शाजिद रजा खान को सभी छोटे राजनीतिक दलों की बीट दी गई है. कुछ बीटों पर रिलीवर भी तैनात किए गए हैं. सिटी की रिपोर्टिंग टीम की छुट्टियां मंजूर करने का एनई योगेन्‍द्र रावत को दे दिया गया है.

करनी किसी और की, जिम्‍मेदार ठहराए गए गिरीश गुरनानी जी

यशवंत जी नमस्कार के साथ ही पत्रकारों का दर्द उठाने के लिए ढेर सारी बधाई भी। उम्मीद भी कि आप हर बार की तरह खबर को जगह देंगे। मैं उत्तराखंड हिन्दुस्तान अखबार के एक शहर में स्ट्रिंगर के रूप में बीते पांच साल से कार्यरत हूं। तीन संपादकों के साथ काम करने कर चुका हूं। भड़ास में नए संपादक गिरीश गुर्रानी के बारे में छपे लेख से थोड़ा व्यथित था तो सोचा मन की बात वहीं कह दूं जहां से मुझे परेशानी हुई। चापलूसी नहीं कर रहा अपने मन की बात कह रहा हूं।

दिनेश जुयाल के जैसे तेवर वाले व्यक्ति भले ही अब मिलने में थोड़ा समय लगे, मगर गिरीश गुर्रानी के तेवर भी उनके कमतर नहीं हैं। वह अच्छा काम करने वाले की पीठ थपथपाना नहीं भूलते। चापलूसों व कामचोरों पर कार्रवाई भी करते हैं। जैसा उन्होंने पिछले दिनों में किया भी है। अब बात करते है खबर की। जिन तन्हा साहब ने खबर लिखी है वो भी मेरे अच्छे परिचित हैं। उनके साथ जो हुआ वह किसी भी नजर से ठीक नहीं ठहराया जा सकता। मगर दोष जिसका हो, उसको ही कटघरे में खड़ा करना चाहिए ना। पूरे मामले में मार्केटिंग विभाग के अधिकारियों की कारस्तानी है। जबकि शायद ही संपादक का ताल्लुक विज्ञापन के लोगों को रखने में होता है।

वैसे भी नए संपादक को आए ही कुल दो माह भी नहीं हुए हैं। रही बात विज्ञापन प्रतिनिधि की तो एए साहब आप तो खबर से मतलब रखा कीजिएगा। विज्ञापन तो अलग चीज है। मुझे बुरा इसलिए भी लगा कि क्यों ऐसे इंसान पर दोष मढ़ा गया जिसका पूरे प्रकरण में रोल ही नहीं था। कई बार हम खबरें लिखते समय भी निर्दोष को दोषी मानकर छपान कर देते हैं। ऐसा ही इस खबर को लेकर हुआ है। हालांकि पत्रकारिता बेहद खराब दौर में चली गई है तो गलत व सही का फैसला भी कौन करे। फेसबुक का कमेंट बुरा लगा तो पत्रकार भिड़ गए। दूसरों की खबरें लिखने वालों की खबरें छपी। प्रमुख चैनलों के रिपोर्टर पर जान से मारने का प्रयास सहित संगीन मुकदमे तक लग गए। चापलूसी की पत्रकारिता ही रह गई है। सरोकार को खोजने से नहीं मिलते। घिन्‍न सी आती है पत्रकारिता पर। मगर क्या करें फंस गए तो किधर जाएं। यशवंत जी मेरी खबर को जगह मिलेगी तो अच्छा लगेगा। वैसे क्या अच्छे दौर लौटेंगे? उम्मीद टिकी तो है मगर मध्यम सी लौं की तरह।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र. उन्‍होंने ने नाम न छापने की गुजारिश की है.

बिजली बिल बकाया होने पर जनसंदेश टाइम्‍स का कनेक्‍शन कटा

: विभाग को दिया गया चेक हुआ बाउंस : जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ से खबर है कि बिजली बिल बकाया होने के चलते कानपुर रोड पर स्थित प्रिंटिंग यूनिट की बिजली काट दी गई है. अखबार की प्रिंटिंग अब जनरेटर चलाकर की जा रही है. अखबार प्रबंधन पर बिजली विभाग का लगभग साढ़े आठ लाख रुपए का बिल बकाया था. एमडी अनुज पौद्दार ने इस बकाया बिल को चुकाने के लिए विभाग को साढ़े आठ लाख रुपये का चेक काटकर दे दिया था, परन्‍तु चेक बाउंस हो गया यानी किसी कारण पैसा बिजली विभाग के खाते में ड्रा नहीं हो पाया. इसके बाद बिजली विभाग ने प्रिंटिंग यूनिट का कनेक्‍शन गुरुवार को काट दिया. तब से लेकर अब तक जनरेटर के सहारे ही अखबार छापा जा रहा है.

सूत्रों का कहना है कि अखबार प्रबंधन पर कसमांडा अपार्टमेंट स्थित संपादकीय कार्यालय का भी छह लाख से ज्‍यादा का बिजली बिल बकाया है. अगर इसके पैसे भी जमा नहीं हुए तो विभाग यहां भी बिजली काट सकता है. इस संदर्भ में जब जनसंदेश टाइम्‍स के एमडी अनुज पौद्दार से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि चेक बाउंस होने जैसी बात नहीं है. चेक पर मौजूद सिग्‍नेचर में अंतर होने की वजह से चेक ड्रा नहीं हो पाया. हमने बिजली विभाग को भी सारी जानकारी दे दी है. खाते में तेरह लाख से ज्‍यादा रुपये थे, लिहाजा बाउंस होने की तो बात ही नहीं है. उन्‍होंने बताया कि सोमवार को कनेक्‍शन जुड़ जाएगा.   

अमर उजाला बस्ती के ब्यूरो चीफ कोर्ट में तलब

अमर उजाला, गोरखपुर यूनिट के बस्ती जिले के ब्यूरो चीफ पुष्कर पाण्डेय को न्यायालय ने तलब किया है. बस्ती के बेसिक शिक्षा अधिकारी देवी सहाय तिवारी ने पुष्कर पांडेय, संपादक मृत्युंजय झा, प्रबंध निदेशक राजुल माहेश्वरी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कराया था और बीएसए के अधिवक्ता द्वारा सिविल और फौजदारी का वाद दाखिल कराया था. अब दस मई 2012 को पुष्कर पाण्डेय को मुख्य न्यायिक मजिस्टेट द्वारा तलब किया है.

शुक्रवार को कोतवाली के सिपाही ने अमर उजाला कार्यालय में रिपोर्टर वीरेंद्र पांडेय को पुष्कर पाण्डेय के नाम का समन पकड़ा दिया इसके बाद अमर उजाला कार्यालय में हडकम्प मच गया. बाकी अखबारों के दफ्तर में भी इस बात की खासी चर्चा है कि अब बेचारे पुष्कर पाण्डेय का क्या होगा.


इस मामले को जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं –

बीएसए ने ठोंका अमर उजाला पर पांच लाख रुपये की मानहानि का मुकदमा

मीडिया वालों को किडनैप करके ले जाएंगे आसाराम बापू!

भदोही में स्‍टार न्‍यूज के पत्रकार को थप्‍पड़ मारने के मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद लग रहा है आसाराम बापू का दिमाग ठिकाने पर आ गया है. सुल्‍तानपुर में प्रवचन कार्यक्रम में उन्‍होंने मीडिया वालों को मंच पर बुलाया, माला पहनाया तथा हल्‍के-फुल्‍के अंदाज में कहा कि इलेक्‍ट्रानिक मीडिया वालों को बापू आसाराम से बड़ा खतरा हो गया है. बापू इन मीडिया वालों को किडनैप करके ले गए तो कोई कुछ नहीं कर सकेगा. इसके बाद खुद हंसने लगे. 

भदोही प्रकरण के बाद बापू के सुर बदल गए हैं. हालांकि शुरुआत में उनके कार्यक्रम के कवरेज को लेकर इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों एवं आयोजकों में तकरार भी हुआ परन्‍तु बापू के हस्‍तक्षेप के बाद उनके मीडिया प्रभारी ने सभी को मंच पर बुलाया और स्‍वागत किया. बापू अब लाल बत्‍ती लगी गाड़ी से भी नहीं चल रहे हैं. गौरतलब है कि आसाराम भदोही में स्‍टार न्‍यूज के पत्रकार रोहित को गाली देने के बाद थप्‍पड़ मारा था तथा समर्थकों से भी पिटवाया था, जिसके बाद पत्रकार ने उनके खिलाफ मुकदमा करा दिया था. आसाराम बापू के इस कृत्‍य की जमकर निंदा भी हुई थी. 

राजुल निगम की रिपोर्ट.

एडिटर्स गिल्‍ड के फिर अध्‍यक्ष बने टीएन नैनन, विजय नायक महासचिव

नई दिल्ली : दैनिक सकाल के सलाहकार संपादक विजय नायक को एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का महासचिव चुना गया है। शुक्रवार को एडिटर्स गिल्ड की साधारण सभा की वार्षिक बैठक में संपन्न चुनावों में बिजनेस स्टैंडर्ड के टीएन नैनन को लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष व नईदुनिया के सुरेश बाफना को फिर कोषाध्यक्ष चुना गया। देश के संपादकों के इस प्रमुख संगठन के सारे पदाधिकारियों का चुनाव सर्वसम्मति से किया गया।

बैठक में अदालतों की रिपोर्टिग को लेकर गाइडलाइन बनाने के सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव पर चर्चा की गई। यह तय किया गया कि मीडिया की आजादी से जुडे़ विषयों पर आम जनता की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई और कदम उठाने की जरूरत है।

अखिलेश यादव की सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं दिल्‍ली दरबार के कुछ पत्रकार

: सीएम को मायावती जैसा साबित करने की हो रही है कोशिश : करीब डेढ़ महीने पहले उत्तर प्रदेश में नई सरकार ने शपथ ली थी. इन पैंतालीस दिनों में बहुत कुछ बदला है. लेकिन अजीब बात है कि उस परिवर्तन के बारे में कुछ भी लिखा नहीं जा रहा है. दिल्ली के सत्ता के गलियारों में जहां कहीं भी एकाध लोग यह कहते पाए जाते हैं कि उत्तर प्रदेश में हालात पहले से बेहतर हैं, उन्हें फ़ौरन नकेल लगाने की कोशिश की जाती है. उन्हें डांट दिया जाता है कि सरकार की चापलूसी करने की ज़रूरत नहीं है. पत्रकार के रूप में हमारा कर्त्तव्य है कि हम सरकारों के खिलाफ लिखते रहें, उनको हमेशा चौकन्ना रहने के लिए मजबूर करते रहें. यह उपदेश देने वालों में वे लोग भी शामिल होते हैं जो राहुल गांधी के दलित प्रेम के बारे में टेलीविज़न पर राग दरबारी में राहुल रासो गाया करते थे. दिल्ली में एक अजीब माहौल बन रहा है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ लिखना ज़रूरी है वरना निष्पक्ष पत्रकार के रूप में पहचान नहीं बन पायेगी.

यहाँ इस विषय पर बात नहीं की जायेगी कि राहुल गांधी की छींक को भी खबर बनाकर अभिभूत होने वालों और अखिलेश यादव के राजनीतिक निर्णयों को मामूली बताने वालों की मानसिकता क्या है. अभी डेढ़ महीने पहले उत्तर प्रदेश की जनता ने इस मानसिकता वालों को उनकी औकात बता दी थी और राजनीति के जनवादीकरण की मिसाल पेश की थी. दिल्ली में एक ऐसा वर्ग है जो लगातार कोशिश कर रहा है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार को राज्य की पिछली सरकार के खांचे से बाहर ही न आने दिया जाए. दोनों सरकारों की तुलना ऐसे बिन्दुओं पर की जाए जिन पर डेढ़ महीने में कोई बदलाव हो ही नहीं सकता. मसलन अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ साथ ही टेलीविज़न चैनलों पर हाहाकार मच गया था कि राज्य में अपराध बढ़ रहा है. अब सब को मालूम है कि जिस राज्य में अपराध और राजनीति में चोली दामन का साथ है वहां बिजली के स्विच ऑन या ऑफ़ करने से अपराध पर रोक नहीं लग जायेगी. उन मुद्दों पर चर्चा होने ही नहीं दी जा रही है जहां मौलिक परिवर्तन हो रहे हैं. इसके साथ ही एक और कोशिश हो रही है कि अगर कोई पत्रकार अखिलेश यादव की सकारात्मक बातों का उल्लेख करता है तो उसे हड़का कर यह बता दिया जाये कि भाई अखिलेश यादव की तारीफ़ करोगे तो पत्रकारिता की कसौटी पर खरे नहीं उतरोगे.

ऐसे माहौल में राज्य में पिछले ४५ दिनों की राजनीति का सही आकलन करना बहुत पेचीदा काम हो गया है लेकिन आकलन होना ज़रूरी है क्योंकि दिल्ली में बैठे अकबर रोड या अशोक रोड वाली पार्टियों के कृपापात्र पत्रकारों के नागपाश से तो राजनीतिक विश्लेषण को बाहर लाना ही पड़ेगा. इस काम को करने के लिए उन नौजवान पत्रकारों को भी आगे झोंकना ठीक नहीं होगा जो अभी पत्रकारिता में अपनी रोज़ी रोटी तलाश करने के लिए मजबूर हैं और उनके अखबार में शीर्ष पदों पर वही लोग विद्यमान हैं जो अपनी सोच को ही राजनीतिक विश्लेषण बना कर पेश कर देते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार और उसके मुख्यमंत्री के काम काज की जांच परख के लिए किसी ऐसे विश्लेषक की ज़रुरत है, जिसे दिल्ली के सत्ताधीश पत्रकार मजबूर न कर सकें और जिसे वेब पोर्टल की वैकल्पिक मीडिया की दुनिया में सर पर कफ़न बाँध कर घूम रहे नौजवान पत्रकार, अपना बंदा मानते हों. वैकल्पिक मीडिया के उन्हीं सूरमाओं की सदिच्छा के पाथेय के साथ यह विश्लेषण करने की कोशिश की जा रही है.

डेढ़ महीने पहले सत्ता में आई सरकार ने बहुत कुछ बदलने की शुरुआत की है. सबसे महत्वपूर्ण तो यह कि लखनऊ में एकाधिकारवादी सत्ता का पर्याय बन चुके पंचम तल के आतंक को कम किया है. पिछली सरकार में सब कुछ पंचम तल से ही तय होता था और उसमें किसी से भी राय सलाह नहीं ली जाती थी. मुख्यमंत्री का सीधा संवाद केवल एक अफसर से था और उसको भी केवल हुक्म सुनाया जाता था. उसकी ड्यूटी थी कि वह मुख्यमंत्री के हुक्म का पालन करवाए. बताते हैं कि हुक्म का पालन करवाने के चक्कर में वह अफसर जिलों में तैनात आईएएस और आईपीएस अफसरों को भद्दी-भद्दी गालियाँ भी देता था. जब मुझे यह पता लगा तो मैं सन्न रह गया था क्योंकि आईएएस या आईपीएस में भर्ती होना कोई हंसी खेल नहीं है. वैसे भी इन सेवाओं में आते वक़्त नौजवान केवल संविधान को लागू करने की शपथ लेता है और उसके अनुसार ही काम करने की क़सम के साथ सरकार में प्रवेश करता है. उसे गाली देने का हक किसी को नहीं है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उसे अपनी गरिमा का रक्षा खुद ही करनी चाहिए. अगर उसने गाली खाकर प्रतिरोध नहीं किया तो वह भी अपनी हालत के लिए जिम्मेवार है.

हो सकता है कि रिश्वत की गिज़ा के चक्कर में वह फजीहत झेल रहा हो. क्योंकि उसी लखनऊ में ऐसे बहुत सारे अफसर हैं जो अपनी गरिमा के साथ राज्य सरकार की सेवा कर रहे हैं. किसी भी पंचम तल वाले की बेअदबी के मोहताज नहीं है. पिछले डेढ़ महीने में यह परिवर्तन आया है. अब कोई भी कलेक्टर या पुलिस कप्तान, पंचम तल के किसी अफसर की गाली नहीं खा रहा है. यह बड़ा परिवर्तन है. इसी से जुड़ा हुआ एक और परिवर्तन भी पता चल रहा है कि ट्रांसफर पोस्टिंग का धंधा भी बंद हो चुका है. पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन लोगों ने यूपी पर नज़र रखा है उन्हें मालूम है कि किसी भी मलाईदार तैनाती के लिए तत्कालीन पंचम तल के किसी एजेंट के पास रक़म पंहुचा कर ही अफसर चैन की साँस लेता था. किसी भी सरकार की नीतियों को लागू करने का काम अफसरों का ही होता है. अगर वे ही घूस की ज़िंदगी जी रहे हों तो जनहित का काम कर पाना उनके बूते की बात नहीं है. अगर कोई सरकार अफसरों को भय मुक्त माहौल में काम करने की सुविधा दे रही है तो उत्तर प्रदेश की समकालीन हालात में यह भी अपने आप में बड़ी उपलब्धि है.

पिछले डेढ़ महीने में एक और संकेत बिकुल साफ़ नज़र आ रहा है. पंचम तल का आतंक खतम होने के साथ ही लखनऊ में सत्ता का विकेंद्रीकरण हो रहा है. अब किसी भी विभाग में हो रही गड़बड़ियों के लिए सम्बंधित मंत्री की आलोचना हो रही है. इसका मतलब यह है कि अब मंत्री लोग अपने विभागों की फाइलें निपटा रहे हैं और फैसले ले रहे हैं. उत्तर प्रदेश के बाहर वालों को यह बात अजीब लग सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि मायावती की सरकार में हर फैसला मुख्यमंत्री के दफ्तर में ही होता था. किसी भी मंत्री की औकात नहीं थी कि वह कोई फैसला ले ले. मंत्रियों को उनके विभाग के फैसले की जानकारी तक नहीं दी जाती थी. हाँ कुछ मंत्री पंचम तल तक अपना रसूख बनाये रहते थे तो उन्हें अपने विभाग के फैसलों के बारे में अखबारों में छपने के पहले पता लग जाता था. मायावती के राज में पंचम तल पर जो बहुत सारे अफसर तैनात थे उन के बीच सरकार के विभाग बाँट दिए गए थे और वे ही फैसले लेते थे. मंत्री बेचारे को तो अखबारों के ज़रिये ही पता लगता था या अगर उसने अपने विभाग के प्रमुख सचिव की कृपा अर्जित कर रखी थी तो उसे अखबारों में जाने के पहले खबर का पता लग जाता था. आज स्थिति बिलकुल अलग है. हर विभाग का मंत्री अपने फैसले ले रहा है लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं कि मुख्यमंत्री के अधिकार में किसी तरह की कमी आई है.

नौकरशाही को उसकी सही जगह पर लाने की जो कोशिश मौजूदा मुख्यमंत्री ने की है उसके नतीजे अभी आना शुरू नहीं हुए हैं. लेकिन यह तय है कि नौकरशाही को उसकी ज़िम्मेदारी  निभाने के लिए जो स्पेस चाहिए वह बहुत दिन बाद मिलना शुरू हो गया है. उत्तर प्रदेश से मुहब्बत करने वालों को उम्मीद हो गयी है कि अब सरकारी अफसर भी अपना काम नियमानुसार करेंगे और अपने मातहत अफसरों को अपना काम करने देंगे. पिछले पंद्रह वर्षों में जो भी मुख्यमंत्री आया है उसने गौतम बुद्ध नगर जिले के नॉएडा और ग्रेटर नॉएडा का खूब आर्थिक दोहन किया है. मायावती के राज में यह काम खुद माननीय मुख्यमंत्री या उनके भाई साहब की सरपरस्ती में होता था. मुलायम सिंह यादव के राज में यह काम उनके बहुत करीबी नेता और बाबू साहब के नाम से विख्यात उनकी पार्टी के महामंत्री जी किया करते थे. बीजेपी के सत्ता में रहने पर तो कई ऐसे केंद्र थे जहां से गौतमबुद्धनगर जिले की आर्थिक घेराबंदी की जाती थी.  अखिलेश यादव की सरकार आने के साथ ही इलाके में एक अफवाह फैल गयी कि अब गौतमबुद्धनगर जिले का काम समाजवादी पार्टी के महामंत्री, प्रोफ़ेसर राम गोपाल यादव देखेंगे.

दिल्ली में रहकर उत्तर प्रदेश या समाजवादी पार्टी की बीट कवर करने वाले पत्रकारों को मालूम है कि राजनीतिक शब्दावली में राम गोपाल यादव होने के क्या मतलब है. सबको मालूम है कि वे कभी भी एक पैसे की हेराफेरी नहीं होने देंगे. बहुत लोगों को यह भी मालूम है कि जब मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते बाबू साहब का लूट युग चल रहा था तो रामगोपाल यादव चुप रहते थे लेकिन कभी भी उस तंत्र को अपने करीब नहीं आने दिया. जानकार बताते हैं कि बाबू साहब को पार्टी से निकालने का सख्त फैसला भी राम गोपाल यादव की प्रेरणा से ही लिया गया था. जो भी हो, इस अफवाह का फायदा यह हो रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भूमाफिया के लोग आजकल डरे हुए हैं और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अखिलेश यादव सरकार में किस तरह से लूट तंत्र वाली पुरानी व्यवस्था को कायम किया जाए. सबको मालूम है कि राम गोपाल यादव इस खेल को कभी नहीं होने देंगे. ज़ाहिर है अपनी छवि को सही तरीके से पेश करने में अखिलेश यादव को इस स्थिति का निश्चित फायदा होगा.

अखिलेश यादव ने जो पिछले डेढ़ महीने में सबसे अहम काम किया है वह यह है कि उन्होंने आबादी के लोकतन्त्रीकरण की कोशिश शुरू कर दी है. मायावती के राज में ऐसा माहौल बना दिया गया था कि मुख्यमंत्री तक कोई भी नहीं पहुंच सकता. अगर कोई उनसे मिलने की कोशिश करता तो उसे भगा दिया जाता था. मुख्यमंत्री और आम आदमी के बीच बहुत ही भारी डिस्कनेक्ट था. चुनावी विश्लेषणों के दौरान यह बात कई बार चर्चा में आई भी कि इसी डिस्कनेक्ट के कारण मायावती चुनाव हार गयी थीं. हो सकता यह सच भी लेकिन मायावती की आम आदमी से दूरी बनाए रखने की नीति के कारण आम आदमी की सत्ता से किसी तरह की भागीदारी ख़त्म हो गयी थी. अब वह सब कुछ इतिहास है. अब महीने में दो बार मुख्यमंत्री अपने घर पर मेला लगाकर लोगों से मिलेंगे. इसका फायदा यह होगा कि नौकरशाही पर राजनीतिक सत्ता की हनक बनी रहेगी और सरकारी अफसर मनमानी नहीं कर सकेगा. उसको मालूम है कि पीड़ित इंसान मुख्यमंत्री के पास पहुंच जाएगा और मुख्यमंत्री की नाराज़गी का भावार्थ उत्तर प्रदेश के सरकारी अफसरों से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता. उन्होंने पिछले पांच वर्षों में उसको बाकायदा झेला है.

ज़ाहिर है कि राज्य में शासन का लोकतंत्रीकरण एक बड़ी शुरुआत है और इसके चलते ही अपराध भी ख़त्म होंगे और भ्रष्टाचार भी ख़त्म होगा. पिछले डेढ़ महीने के सरकारी फैसलों पर नज़र डालें तो साफ़ लग जाएगा कि उत्तर प्रदेश की सरकार ने इस काम को करने का संकल्प लिया है. इसलिए किसी जिले में होने वाली अपराध की घटना को मुख्यमंत्री की असफलता के रूप में पेश करना जल्दबाजी होगी. लोकतंत्र में लाजिम है कि अपराध खत्म करने का एक संस्थागत ढांचा बनाया जाय. अब तक की प्रगति से तो यही लगता है कि मौजूदा मुख्यमंत्री उसी ढाँचे की तलाश में है. 

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्‍ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

खनन माफियाओं ने दो पत्रकारों पर किया जानलेवा हमला, एक की हालत गंभीर

करनाल के करना घरौंडा क्षेत्र के मूनक गांव के पास शनिवार की शाम दो पत्रकारों पर करीब एक दर्जन मोटरसाइकिल पर सवार दो दर्जन से अधिक बदमाशों ने जानलेवा हमला बोल दिया। उनका गला घोंटने का प्रयास किया गया। हमले के बाद बदमाश दोनों का कार में अपहरण कर ले गए और बाद में सड़क किनारे खेतों में फेंक दिया। बदमाश पत्रकारों के मोबाइल व कैमरे आदि लूट कर  भाग निकले। करीब दो घंटे के बाद होश में आए पत्रकारों ने घटना की सूचना पुलिस को दी। सूचना मिलते ही करनाल व पानीपत, मूनक, घरौंडा व बल्ला पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। गंभीर अवस्था में दोनों पत्रकारों को अस्पताल भर्ती करवाया।

शनिवार को दैनिक जागरण के घरौंडा के पत्रकार सुशील कौशिक व एक न्यूज चैनल के पत्रकार विवेक राणा को सूचना मिली थी कि मूनक क्षेत्र में अवैध खनन हो रहा है। सूचना मिलते ही दोनों पत्रकार समाचार कवरेज के लिए मौके पर पहुंचे। वह अवैध खनन का कवरेज कर बाइक से लौट रहे थे कि एक दर्जन से अधिक मोटरसाइकिल पर सवार दो दर्जन बदमाशों ने उन पर जानलेवा हमला बोल दिया। बदमाशों ने दोनों का गला घोटने का प्रयास किया। पत्रकार जान बचाने के लिए भागने का भी प्रयास किया, परन्‍तु बदमाशों की संख्‍या ज्‍यादा होने से वे सफल नहीं हो सके। इसके बाद वहां पहुंची एक कार में दोनों को अगवा कर लिया गया।

भुक्‍तभोगी पत्रकार विवेक राणा ने पुलिस को जानकारी दी कि जब उन्हें करीब दो घंटे बाद होश आया तो वह खेतों में थे। उन्होंने वारदात की सूचना किसी तरह परिजनों व पुलिस को दी।  टीवी पत्रकार सुशील कौशिक की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है। करनाल व पानीपत, मूनक, घरौंडा व बल्ला से मौके पर पहुंची पुलिस ने हमला करने वालों की काफी तलाश की लेकिन अभी तक उनका कोई सुराग नहीं लग पाया है। पत्रकारों पर हुए जानलेवा हमले से पत्रकारों में रोष है और उन्होंने पुलिस प्रशासन से हमला कर अपहरण करने वालों को गिरफ्तार करने की मांग की है। आरोप है कि यह अवैध खनन पुलिस की मिलीभगत से की जा रही है। और हमला करने वाले अवैध खनन से जुड़े हुए हैं।

बंगारू को बेनकाब करने वाले अनिरुद्ध बहल की हो रही जय-जय

नोट गिनते दिखने वाले बंगारू लक्ष्मण जेल गए. भाजपा नेता बंगारू की इस करतूत को जनता के सामने लाने वाले पत्रकार का नाम है अनिरुद्ध बहल. ऐसी साहसिक पत्रकारिता करने वाले अनिरुद्ध बहल को हर तरफ से बधाइयां मिल रही हैं. खासकर फेसबुक ट्विटर पर लोग उन्हें भरपूर समर्थन देते हुए इस करनी के लिए सलाम कह रहे हैं. पर इसी के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर अब कोई अनिरुद्ध बहल जैसा काम क्यों नहीं करता? करप्शन कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ा है, पर मीडिया हाउसेज में ताकत नहीं कि वे किसी बड़े नेता का स्टिंग करें, क्योंकि ज्यादातर चैनलों के मालिकों की बड़े नेताओं से फटती है या फिर फंसी हुई है. ऐसे में वे अब बड़े नेताओं के करप्शन को बचाते हुए उनके करप्शन के धन में हिस्सेदार बन जा रहे हैं.

नए खुल रहे चैनलों अखबारों में ज्यादातर पैसे बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं या अपनी कंपनियों के मूल धंधे को चमकाने के लिए सेटिंग-गेटिंग करने में. तब अगर कोई अनिरुद्ध बहल ऐसा स्टिंग कर भी लेगा तो क्या उसे कोई दिखाएगा? पर उम्मीद की किरण न्यू मीडिया, सोशल मीडिया है. अभिषेक मनु सिघंवी की सीडी तो सबके सामने आ गई लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसे नहीं दिखाया. सब के सब चुप्पी साध गए. एक महिला वकील खुद को जज बनाने की बात कहते हुए सिंघवी के साथ सेक्स करती है और सिंघवी भी सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार कर उसे मंजिल पर पहुंचाने की बात करते हैं, पर इस सीडी को किसी न्यूज चैनल और अखबार ने नहीं छापा दिखाया. पर यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर आदि माध्यमों के जरिए सिटिजन जर्नलिस्टों ने यह काम कर दिया. सीडी हर जगह पहुंची और ज्यादातर ने देखा. पर इस देश की जनता को देखना बाकी है कि उसके सिस्टम में किस तरह बड़े नेता बड़े अनैतिक काम कराने के नाम पर धन लेते हैं या सेक्स करते हैं.

अनिरुद्ध बहलफिलहाल तो आज का दिन अनिरुद्ध बहल की पत्रकारिता को सलाम करने का है. साथ ही एक पत्रकार मित्र मयंक सक्सेना ने सिंघवी सेक्स सीडी को लेकर जज-अदालत की मंशा पर कुछ सवाल उठाए हैं, उसे पढ़ने का है. ध्यान रखिए, उम्मीद अब कारपोरेट मीडिया हाउसों व मेनस्ट्रीम मीडिया हाउसों से कतई नहीं है. उम्मीद की किरण ये युवा पत्रकार ही हैं, सिटिजन जर्नलिस्ट ही हैं जो न्यू मीडिया माध्यमों का सार्थक इस्तेमाल कर सिस्टम के बेहद भ्रष्ट व भयंकर चेहरे को सामने लाने का काम कर रहे हैं ताकि जनता का इन नेताओं और इस सिस्टम से मोहभंग हो सके. तो अनिरुद्ध बहल को सलाम करने के साथ साथ न्यू मीडिया के ज्ञात-अज्ञात उन साथियों का भी सलाम करने का मन कर रहा है जो अपनी सक्रियता से कई तरह के करप्शन को सामने ला रहे हैं. नीचे फेसबुक पर अनिरुद्ध बहल को दी जा रही बधाइयों में से कुछ एक बधाइयों को प्रकाशित कर रहा हूं, साथ ही वो अनिरुद्ध बहल की टीम द्वारा शूट किया गया वो वीडियो जिसमें बंगारू नोट गिनते हुए दिख रहे हैं.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


Ajit Anjum : बीजेपी का बांगरू गया चार साल के लिए अंदर ……अनिरुद्ध बहल की पत्रकारिता का सलाम …

        Hemant Mishra salaam…
 
        Sudhir Kumar Pandey aaj bjp anath ho gyi….ram pehle he ruthe thea …ab lakshman bhi chor chale….
 
        Ankit Mutreja Sachmuch Sir manna padhega .. Salam aise patrkar ko. Aaj ka din sandesh hai un logo ko jo hamare diye ka atta khake ghotale karne se baaj nahi atey.
   
        Ranjan Rituraj आज भाजपा का ध्वज आधा झुका रहेगा !
    
        Arvind Ojha Bjp ke chakkar log khabr karne wale ko bhol rahe they..Baat patrkarita ki pahle ho to achha hai..wakai sting karne aur karwane wale ko salam 🙂
     
        Harishankar Shahi पर अभिषेक मनु सिंघवी पर सन्नाटा क्यों है.
      
        Ankit Mutreja Wo din ke jiska vada hai ham dekh rahe hai .. Jab ghotale baaj jail bheje jayenge .. Apni karni par aasu bahaenge ham dekhenge:)
 
        Bhaskar Juyal पहली बार सही अंजाम तक पहुंचा स्टिंग ऑपरेशन
 
        Chanchal Tripathi अनिरुद्ध बहल को मैं भी सैल्यूट करता हूँ ।।
   
        Ranjan Rituraj श्रीमान शाही : क्या आप पत्रकार है ?? सेक्स स्कैंडल और रक्षा सौदा दलाली में आपको फर्क नहीं समझ में आता है ..क्या ?? हद हाल है !
    
        Harishankar Shahi श्रीमान ऋतुराज: आप पता नहीं क्या है? हमें फर्क समझ आये या नहीं आये पर इतना तो समझ आता ही है कि एक ओर पूरी तैयारी के साथ स्टिंग किया गया और दूसरी तरफ मनमाने लाभ लेकर न्याय व्यवस्था में घुसपैठ की बात है. शायद आपको न्याय और अन्याय में फर्क नहीं दिखता है …क्या?? बेहद हाल है/
     
        Ankit Mutreja Mei mobile se onl9 hu isliye thik se samvad nahi kar pa raha.apni smjh se itna kahunga ke sex prakran ki bat filhal nahi abhi iss sahas ki jit ki khusi manaye.
      
        Ranjan Rituraj ‎@श्रीमान शाही : भाई …हम पत्रकार नहीं हैं ! उफ्फ्फ्फ़….. !
       
        Rajiv Kishor अजीत जी, देश में कई तरह के रिश्वतखोर बरकरार हैं और घोटाले आज भी बदस्तूर कायम हैं। अनिरुद्ध बहल ने वाकई शानदार पत्रकारिता की…लेकिन आज आप एक चैनल के प्रमुख हैं…मैं एक दर्शक की हैसियत से पूछ रहा हूं कि क्या आपके चैनल में एक भी ऐसा रिपोर्टर नहीं है जो किसी घोटाले को उजागर कर सार्थक पत्रकारिता का उदाहरण पेश करे।
         
        Chanchal Tripathi राजीव जी बिल्कुल हैं ।।
         
        Rajiv Kishor ‎@ चंचल जी, मैं क्या हूं…आपने लिखा है कि राजीव जी बिलकुल हैं…
         
        Chanchal Tripathi किशोर जी, मेरा कहना था कि अजित जी के चैनल में ऐसे पत्रकार हैं जो तहलका जैसे स्टिंग कर सकते हैं ।
         
        Rajiv Kishor ‎@ chanchal आमीन…देश इंतजार कर रहा है…अगर हैं तो उन्हें जगाइए…क्योंकि अगर वाकई में हैं..तो यकीनन वो सो रहे हैं या फिर बाइट कलेक्टर की भूमिका निभाकर ही मस्त हैं…
         
        Mayank Jain Bangaru Laxman is a simpleton who was a soft target and an easy prey. The real sharks are laughing their way to Swiss Banks.
         
        Vijay Prakash Singh अजीत जी कई पत्रकार पाजामे से शुरू करके चैनल के मालिक बन गए और राजनीति , क्रिकेट सबमे छाये हुए हैं | जिन्हें कभी इस बात का फक्र था कि वे ही सबसे बड़े फिक्सर हैं | आज भी मजे में है और अट्टाहास कर रहे हैं |मगर फंसता वही है जो थोड़ा कम चालाक होता है |
        
        Mayank Jain One lakh rupees for an arms deal? Or was it one lakh crore with some zeroes missing?
         
        Chanchal Tripathi राजीव जी सही मौका मिला तो जरूर कई चेहरे बेनकाब करूँगा । धन्यवाद
         
        Mayank Jain No stings for any Congress bigwigs by Tehelka? Oh! Sorry ! they might have been too honest…
         
        Mayank Jain My only objection to Abhisex is that he did not use a condom
         
        Rajiv Kishor ‎@ chanchal tripathi भाई चंचल जी, आप दिल पर ना लें….मेरा यह सवाल सिर्फ और सिर्फ अजीत अंजुम जी से है
        
        Prashant Pathak सलाम सच में पत्रकारिता को देश के साथ पंगा ले रहा था बंगारू …………..रक्षा सौदे में दलाली का मतलब माँ को गाली इतने दिन सिसका अब चार साल भुगतेगा भी …………
         
        Mayank Jain Somebody was giving Bangaru one lakh — a bait: he took it. He may not have helped in the defence deal. Politicians take money and seldom do any work. So there was no raksha deal as such. One lakh is no brainer. No raksha deal will be this low.
         
        Ankit Mutreja Aaj tak
        (bjp-bangaru jail pahuche)
         
        Naveen Tewari Cong ka kab jayega,
         
        Dilnawaz Pasha क्या भ्रष्टों की भी कोई पार्टी होती है?
         
        TC Chander इस पर तो लड्डू होते हैं!
         
        Puneet Mishra हमेंसा सदाचार की बात करने बाली राष्ट्रीय पार्टी भाजपा क्या अपने दामन लगे इस दाग को साफ कर पायेगी…………
         
        Arun Shukla सर कांग्रेस में अभिषेक मनु सिंघवी पर सन्नाटा क्यों है.में अनिरुद्ध बहल को दिल से सैल्यूट करता हूँ ।।क्याकि पहली बार सही अंजाम तक पहुंचा स्टिंग ऑपरेशन और कांग्रेस को 2009 से 2012 तक के भ्रष्टाचार जो किया है वो भी हम और आप से छुपा नहीं है और कोमंवाल्थ गेम हम को नहीं भूलना चाहिए ..सर आज देश कंगाल होगया है कांग्रेस वाले बीजेपी को बोल रहेहै
         
        Rajan Chopra अनिरुद्ध बहल की पत्रकारिता का सलाम नहीं बल्कि "को" सलाम


Anuranjan Jha : आखिरकार … राम को बदनाम करने वाले लक्ष्मण ४ साल के लिए अंदर.. श्री अनिरुद्ध बहल को सैल्यूट.. और हम खुशनसीब भी हैं कि अनिरुद्ध के सानिध्य में काम करने का मौका मिला .. खोजी पत्रकारिता का बेताज बादशाह और मेरे करियर का सबसे अच्छा बॉस.. सलाम

Sanjeev K Jha In a time where Missionary Journalism is dying, he did it on the great personal risk….Humble Salute to Mr. Aniruddha Bahal…
 
Sanjeev K Jha ‎72 years age, without any post, Twice times bypass surgery, diabetes, fatness and knee pain with money and wine addiction and now 1 lack fine and 4 years in jail. What a great punishment. 🙂
 
Rajendra Joshi Anirudh Bahal bhai ke sangharh ko bhi yaad rakhna hoga hum sabko in sallon mai unhone kitna sangharsh kiya wo kabhiletariif hai yani unki himmat ko dad deni hogi ……
 
Marut Pandey BANGAAROO to gae par unkaa kyaa jo aaj bhee khule goom rahe hain
 
बाबा बिगडैल राम lekin anuranjan jI aapki khoji patrakarita bhee unhi logo ke liye hai jo thode bhrshatachar ke paise ko akele dakarte hai… jo hajaro karod dakar rahe hai , unke khilaf khoi sting operation nahee huwa…
 
Satyajeet Chaudhary Boss ko salam……..


Dilnawaz Pasha :  मतलब अगर अच्छी पत्रकारिता हो तो बड़े दलाल भी जेल जा सकते हैं….
 
        Ashutosh Dubey जय हो…सब संभव दिख रहा है भाई…!
   
        Vikash Dagar और अगर पत्रकार अच्छा हो तो दलाली रोकी भी जा सकती है….
    
        Vivek Kumar बेशक जा सकते है वो भी और अगर उल्टा पड़ गया तो अच्छे पत्रकार चले जायेंगे
     
        Lalit Sharma Mr Pasha is on the way to be "Best PATRAKAAR of the year" best wishes 🙂


Ganesh Tiwari : भाजपा के भस्मासुरों की कतार लम्बी है, आज दो मामलों में कथित सुचिता की पक्षधर पार्टी असहज हो गई- पहला बंगारू लक्ष्मण और दूसरे बाबा रामदेव. बंगारू जी तो सीधे सीधे उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष ही थे, उनकी पोल खोलने के बात उन पत्रकारों को दारूण दुःख देने की भी कोशिश की गई. लेकिन आज पल्ला झाड़ ही लिया. एक वीर ही सामने आये -कटियार जी. अप्रत्यक्ष और मजबूत सहयोगी ने यूपी में कुछ भी लाभ नहीं दिलाया, इसकी खीझ भी आज निकल गई- सचिन के बहाने ही सही हर मामले में बकर करने वाले बाबा को हद में रहने की हिदायत देनी पडी. इनके अतिरिक्त पुराने भस्मासुर खार खारे बैठे ही हैं तो बहुत से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. शिव जी को एक से ही मुक्ति पाने में भारी मशक्कत करनी पडी थी, यहाँ तो भरमार है.


क्लिक करें, बंगारू का वीडियो देखने के लिए, इस लिंक पर…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/599/media-music/tehalka-sting-bjp-ex-supremo-bangaru-laxman-convicted.html

Abhishek Manu Singhvi Sex CD (9) : आइए, सिंघवी को राहत देने वाली अदालत / जज की मंशा पर सवाल खड़ा करें

Mayank Saxena : ये मुद्दा मैं फिर से उठा रहा हूं कि आखिर कैसे अभिषेक मनु सिघवी को दिल्ली हाईकोर्ट से इतनी आसानी से राहत दे दी गई, आखिर अदालत / जज की मंशा पर सवाल क्यों न खड़े किए जाएं…कुछ सहज जिज्ञासाएं…

1. सीडी के प्रसारण पर रोक लगाते वक्त अदालत ने सिंघवी से क्यों नहीं पूछा कि सीडी पर आखिर रोक क्यों लगाई जाए?

2. अदालत ने चैनल से क्यों नहीं पूछा कि आखिर वो सीडी क्यों प्रसारित करना चाहता है?

3. क्या उस सीडी को कंटेंट और डॉक्टर्ड किए जाने की शंका के निवारण के लिए फॉरेंसिक लैब में नहीं भेजा जाना चाहिए था?

4. कहीं ये यौन शोषण का मामला तो नहीं, इसकी जांच के लिए क्यों नहीं कुछ किया गया?

5. क्या अदालत को एक बार सीडी का कंटेंट सुनना नहीं चाहिए था?

6. क्यों ड्राइवर से ये नहीं पूछा गया कि आखिर ये सीडी उसने क्यों बनाई और इसको चैनल को प्रसारण के लिए क्यों दिया गया?

7. अगर ड्राइवर के खिलाफ केस दर्ज हुआ था और सीडी में महिला वकील को जज बनाने का वैदै नहीं किया गया, तो ड्राइवर के खिलाफ सिंघवी की निजता के उल्लंघन के साथ साथ उनकी अश्लील फिल्म शूट करने (पोर्नोग्राफिक एक्ट) और उसके बाद उन्हें ब्लैकमेल करने का मामला दर्ज क्यों नहीं किया गया?

8. पिछले प्वाइंट में पूछे गए सवाल के साथ कि जब ये साफ साफ एक आपराधिक मामला बन रहा था, तो कैसे आउट ऑफ कोर्ट सेटेलमेंट को अदालत मान्यता दे सकती है….ये कैसे हो सकता है कि मैं किसी का कत्ल कर दूं और फिर उसके परिवार से आउट ऑफ कोर्ट सेटेलमेंट कर लूं।

9. किसी भी कंटेंट के प्रसारण पर रोक के स्टे में अगले आदेश और सुनवाई तक रोक होती है, 13 अप्रैल को जारी हुए दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश में कहीं अगली तारीख का ज़िक्र नहीं है, और तो और उसके बाद सीधे अदालत आउट ऑफ कोर्ट सेटेलमेंट को मान्यता दे देती है…क्या ये कानूनी है?

10. क्या ये सच है कि वाकई सिंघवी के बड़े वकील होने और जजों तक उनके रसूख का फायदा इस केस में उनको मिला?

ये सब दोबारा से शेयर कर रहा हूं क्योंकि बड़ी चालाकी से सचिन के सांसद हो जाने के बहाने इस मुद्दे का दबाया जा रहा है… बाकी तहलका टीम को बधाई, लक्ष्मण को कारावास पहुंचाने के लिए….

युवा पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से साभार.


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सहारा में वेब एवं पोर्टल डिविजन के एडिटर बनाए गए दुर्गेश उपाध्‍याय

सहारा मीडिया से बड़ी खबर आ रही है. इस खबर के साथ ही होई गई है उपेंद्र राय की दमदार वापसी की घोषणा भी. उपेंद्र राय के कोर टीम के सदस्‍य एवं खास माने जाने वाले दुर्गेश उपाध्‍याय सहारा मीडिया के वेब एवं पोर्टल डिविजन का एडिटर बना दिया गया है. सहारा के न्‍यू मीडिया डिविजन को दुर्गेश उपाध्‍याय ही हेड करेंगे. उपेंद्र के करीबी माने जाने वाले दुर्गेश सहारा के टीवी डिविजन के इनपुट हेड हुआ करते थे. सहारा के सभी चैनलों का एसाइनमेंट इनके जिम्‍मे ही था, परन्‍तु सत्‍ता मिलते ही स्‍वतंत्र मिश्र ने उपेंद्र के करीबी रजनी‍कांत सिंह, विजय राय की तरह दुर्गेश को भी शंटिंग लाइन में डाल दिया था. परन्‍तु वापसी के साथ ही उपेंद्र ने सबसे पहला बदलाव दुर्गेश को सहारा के वेब एवं पोर्टल डिविजन का हेड बनाकर किया है. इसके लिए आदेश भी जारी कर दिया गया है.

दुर्गेश की गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. दुर्गेश ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए हर तरह की

दुर्गेश
रिपोर्टिंग की, जिसमें खेल और मनोरंजन के साथ साथ मुंबई में घटी हुई तमाम बड़ी घटनाएं शामिल रही हैं. फिल्मी दुनिया में अच्छी खासी पैठ रखने वाले दुर्गेश ने बॉलीवुड की तमाम नामचीन हस्तियों जैसे कि अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और आमिर खान तक के इंटरव्यू कई बार किए हैं. वहीं मुंबई से बीबीसी हिंदी आनलाइन की कवरेज ज्यादा अच्छी करने के लिए उन्हें पुरस्कार भी मिल चुका है. वहीं फिल्मों पर आधारित उनका वीकली कॉलम ख़ासा चर्चित रहा है. खेल की दुनिया में भी उन्होंने मुंबई से आईपीएल की पूरी कवरेज के साथ साथ सचिन तेंदुलकर और सौरभ गांगुली जैसे कई बड़े खिलाड़ियों का साक्षात्कार किया है.

मुंबई में घटित 26/11 हमले और उत्तर भारतीयों पर मनसे के हमलों जैसे कई बड़े मुददों की बीबीसी के लिए रिपोर्टिंग की है और अपने पांच सालों के कार्यकाल में वो बीबीसी हिंदी सेवा में काफ़ी चर्चित रहे. बीबीसी ज्वाइन करने से पहले सीएनबीसी आवाज़ में ढाई साल तक काम किया.इससे पहले स्टार न्यूज़ से अपनी इंटर्नशिप की. दुर्गेश ने लखनऊ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की और पढ़ाई के दौरान दो साल तक दूरदर्शन के लिए फ्रीलांसिग भी करते रहे.

 

सी न्‍यूज एक्‍सप्रेस के एनई डा. भानु के पिता का निधन

आगरा से खबर है कि समाचार पत्र सी न्‍यूज एक्‍सप्रेस के न्‍यूज एडिटर डा. भानु प्रताप सिंह के पिता जेपी वर्मा का शनिवार को निधन हो गया. उनके निधन की खबर सुनते ही जानने वालों में शोक की लहर दौड़ गई. उनकी शव यात्रा शास्‍त्रीपुरम निवास से शाम को ताजगंज श्‍मशान घाट के लिए रवाना हुई जहां शाम को विद्युत शवदाह गृह में उनका अंतिम संस्‍कार किया गया. इस दौरान सी एक्‍सप्रेस समूह तथा मीडिया से जुड़े तमाम लोग मौजूद रहे.

पीपुल्‍स समाचार से ग्रुप एडिटर एनके सिंह का इस्‍तीफा

पीपुल्स समाचार के समूह संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह ने बीती रात अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। सिंह ने आज सुबह सभी सहयोगियों को एसएमएस भेज कर अपने इस्तीफे की सूचना दी। सिंह ने लगभग १० माह पूर्व अवधेश बजाज के स्थान पर समूह संपादक का पदभार ग्रहण किया था। सिंह की कार्यशैली से पीपुल्स समाचार के अधिकांश स्थानीय संपादक खिन्न थे। इंदौर संस्करण के स्थानीय संपादक प्रवीण खारीवाल ने तो सिंह की ज्यादतियों का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया था।

श्री सिंह के इस्तीफे की वजह साफ नहीं है, लेकिन संस्थान में चल रहा वित्तीय संकट प्रमुख कारण बताया जा रहा है। इधर, नए समूह संपादक के लिए प्रदेश टुडे के सलाहकार संपादक दिनेश गुप्ता का नाम प्रमुख रूप से सामने आया है। एनके सिंह हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं।

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : जज के सामने श्रीकृष्‍ण प्रसाद ने उठाया करोड़ों की हेराफेरी से पर्दा

मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज दैनिक हिन्दुस्तान के लगभग दो सौ करोड़ के विज्ञापन घोटाले में मुंगेर (बिहार) पुलिस की ओर से अभियोजन के पक्ष में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 में न्यायालय में दर्ज किए गए तीसरे गवाह के बयान ने विज्ञापन घोटाले पर से पर्दा पूरी तरह उठा दिया है। गवाह ने भंडाफोड़ कर दिया है कि देश के शक्तिशाली मीडिया हाउस ने सरकारी विज्ञापन पाने के लिए किन-किन कारणों से जालसाजी और फर्जीवाड़ा किया और उस फर्जीवाड़ा में कौन-कौन से सरकारी पदाधिकारी शामिल थे।

धारा 164 के तहत सरकारी गवाह के लिपिबद्ध बयान ने केन्द्र और राज्य सरकारों को एक तरह से सचेत कर दिया है कि देश के शक्तिशाली मीडिया हाउस धन कमाने की अंधी दौड़ में सरकारी पदाधिकारियों को मेल में लेकर किस हद तक जालसाजी कर सकते हैं और जालसाजी कर किस प्रकार करोड़ों-अरबों रुपयों की लूट मचा सकते हैं। और बात-बात में ये मीडिया हाउस केन्द्र और राज्य सरकारों को आंख दिखाने में भी नहीं चूकते हैं।

पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के आदेश पर कोतवाली थाना अपराध संख्या- 445/2012 में पुलिस अनुसंधानकर्ता सह कोतवाली के आरक्षी निरीक्षक ने पुलिस अभियोजन के समर्थन में मुंगेर के मंगल बाजार ,गुमटी नं.-3 निवासी आरटीआई कार्यकर्ता, अधिवक्ता और पत्रकार श्रीकृष्ण प्रसाद को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी एमके सिन्हा के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत बयान के लिए पेश किया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी एमके सिन्हा के आदेश पर प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी डीएन भारद्वाज ने पुलिस के गवाह श्रीकृष्ण प्रसाद का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत लिपिबद्ध किया।

प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी डीएन भारद्वाज के समक्ष अधिवक्ता व पत्रकार श्रीकृष्ण प्रसाद ने धारा 164 के तहत बयान किया है कि –‘‘वे बिना किसी भय या दबाव के यह बयान दे रहे हैं। भारत सरकार के डीएवीपी की विज्ञापन सूची में शामिल होने के लिए शर्त यह है कि अखबार को प्रेस रजिस्ट्रार से निबंधन संख्या प्राप्त हो और अखबार 36 माह अर्थात तीन वर्ष लगातार नए मुद्रण केन्द्र से प्रकाशित हो। इन दोनों शर्तों को पूरा करने के बाद ही डीएवीपी की विज्ञापन सूची में अखबार को जोड़ा जा सकता है। परन्तु दैनिक हिन्दुस्तान ने मुजफ्फरपुर और भागलपुर संस्करण बिना निबंधन संख्या के अवैध ढंग से प्रकाशित किया और धोखाधड़ी और जालसाजी कर भारत सरकार के डीएवीपी की विज्ञापन सूची में अपने को दर्ज करा लिया और ‘विज्ञापन-दर‘ प्राप्त कर लिया।‘‘

श्रीकृष्ण प्रसाद ने आगे बयान दिया कि – ‘‘डीएवीपी को धोखा देकर विज्ञापन प्राप्त कर प्रबंधन ने बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना के कुछ वरीय पदाधिकारियों की मिलीभगत से भागलपुर और मुंगेर के हिन्दुस्तान के अवैध संस्करणों के माध्यम से अवैध विज्ञापन प्रकाशित कर सरकारी विभागों को करोड़ों-करोड़ रुपए का चूना लगाया। बिहार सरकार की अंकेक्षण रिपोर्ट में इस विज्ञापन घोटाले के प्रकाश में आने के बाद सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना के पदाधिकारियों ने घोटाले पर पर्दा डालने के लिए अखबार के प्रबंधन से कई प्रकार के दस्तावेज तैयार करवाए।‘‘

श्रीप्रसाद के बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि 36 माह तक बिना सरकारी विज्ञापन के अखबार छापने की कानूनी बाध्यता से बचने के लिए अंधी कमाई की दौड़ में प्रबंधन ने कागजात में फर्जीवाड़ा कर डीएवीपी विज्ञापन-दर प्राप्त किया और उस विज्ञापन-दर को आधार बताकर बिहार के सरकारी विभागों से करोड़ों-करोड़ रुपया अवैध ढंग से छापकर विज्ञापन लूट की घटना को अंजाम दिया। इस विज्ञापन घोटाला में पहले से नामजद अभियुक्तों में शामिल हैं मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष व पूर्व सांसद शोभना भरतिया, मुद्रक और प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव, स्थानीय संपादक बिनोद बंधु। इस सनसनीखेज कांड के सूचक हैं आरटीआई कार्यकर्ता मन्टू शर्मा।

मुंगेर से काशी प्रसाद की रिपोर्ट.


हिंदुस्‍तान के इस विज्ञापन घोटाले के बारे में अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें – हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

बिजली चोरी में फंसे अखबार-चैनल के मालिक, मामला दर्ज

आगरा में सी न्‍यूज एक्‍सप्रेस तथा सी न्‍यूज चैनल समेत कई चैनलों को चलाने वाले जैन बंधुओं पर बिजली चोरी का आरोप लगा है. आगरा में बिजली आपूर्ति करने वाली प्राइवेट कंपनी टोरंट ने सी ग्रुप के दो डाइरेक्‍टरों के खिलाफ आगरा के शाहगंज में बिजली चोरी और कर्मचारियों से मारपीट करने का मुकदमा दर्ज कराया है. खबर है कि तीनों डाइरेक्‍टर फरार हैं. पुलिस इन लोगों की तलाश कर रही है. सी ग्रुप पर बारह लाख रुपये का बिजली चोरी का जुर्माना लगाया गया है.

आगरा के जैन बंधु सी न्‍यूज एक्‍सप्रेस अखबार एवं सी न्‍यूज चैनल समेत तीन अन्‍य चैनलों का संचालन दो बिल्डिंगों में करते हैं. सी न्‍यूज प्रबंधन के खिलाफ बिजली चोरी की शिकायत मिलने पर आगरा में बिजली आपूर्ति करने वाली प्राइवेट कंपनी टोरंट के कुछ कर्मचारी जांच के लिए सी न्‍यूज के दफ्तर पहुंचे. जांच के दौरान उन्‍होंने पाया कि एक बिल्डिंग में तो मीटर लगा हुआ है लेकिन दूसरे में मीटर नहीं लगा है. यहां चोरी से बिजली जलाई जा रही है. बिजली की खपत भी तय लोड से ज्‍यादा हो रही है. 

बिजली कर्मी इसे चोरी मानते हुए जब लाइन काटने की कार्रवाई करने लगे तो प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक के कई कर्मचारी बिजली विभाग वालों से भिड़ गए. इन लोगों को मारापीटा भी गया. खबर है कि यह सारा काम डाइरेक्‍टरों की शह पर हुआ. यह घटना गुरुवार यानी 26 अप्रैल को हुई. बिजली विभाग के कर्मचारियों ने अपने साथ हुई मारपीट की घटना की लिखित शिकायत शाहगंज थाने में की, जिसके बाद इन लोगों का मेडिकल मुआयना कराया गया. 26 को पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया.

बिजली विभाग के वरिष्‍ठ अधिकारी 27 को भी जांच के लिए सी न्‍यूज के ऑफिस पहुंचे. इस दौरान उनके साथ शाहगंज, हरिपर्वत और लोहामंडी थाना की भारी संख्‍या में पुलिसबल भी मौजूद था. बिजली कर्मचारियों ने पूरे बिल्डिंग की जांच पड़ताल की, जिसमें बिजली चोरी की बात सामने आई. इतना ही नहीं, जिस लाइन को बिजलीकर्मी काट गए थे उसे दुबारा जोड़ दिया गया था. सी न्‍यूज के इस चोरी पर बिजली विभाग ने 12 लाख रुपये का पेनाल्‍टी लगाया है.

इसके बाद बिजली विभाग के इंजीनियर की शिकायत पर कंपनी के दो डाइरेक्‍टर पंकज जैन व योगेश जैन तथा कुछ कर्मचारियों के खिलाफ शाहगंज थाने में बिजली चोरी और मारपीट का मामला दर्ज किया गया है. खबर है कि दोनों डाइरेक्‍टर फरार हैं. खबर आ रही थी कि इन लोगों ने अपनी अग्रिम जमानत के लिए कोर्ट में अप्‍लीकेशन भी डाली है. हालांकि इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है. पुलिस सभी आरोपियों की तलाश कर रही है. कंपनी के वरिष्‍ठ अधिकारी भी बिजली चोरी के पैसे की रिकवरी की कोशिश कर रहे हैं.

इस संदर्भ में पूछे जाने पर शाहगंज थानाध्‍यक्ष सतीश यादव ने बताया कि इस मामले में तीन मुकदमे दर्ज किए गए हैं. अपराध संख्‍या 211 में विद्युत अधिनियम एक्‍ट की धारा 135 लगाया गया है, जो बिजली चोरी से संबंधित है. अपराध संख्‍या 212 में आईपीसी की धारा 147, 148, 323, 504 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. जबकि अपराध संख्‍या 213 में विद्युत अधिनियम एक्‍ट 136 के तहत मामला दर्ज किया गया है, जो चोरी और कटी बिजली दुबारा जोड़ने के लिए लगाई गई है.

कांग्रेस मुद्दों से ध्यान भटकाना जानती है

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी से मुलाक़ात के बाद जिस तरह से अचानक क्रिकेट की दुनिया के भगवान सचिन तेंदुलकर को उच्च सदन भेजने बाबत राष्ट्रपति ने अधिसूचना जारी की और सचिन ने भी इस पर अपनी मूक सहमति दी; उससे राजनीति का सियासी पारा गर्मा गया है. अब सचिन भी सांसद पद पर आरूढ़ हो उच्च सदन की शोभा बढ़ाएंगे. यह वही उच्च सदन है जहां धनाढ्य वर्ग के अरबपति अपने हितों की पूर्ति हेतु जोड़-तोड़ कर यहाँ की कुर्सियां तोड़ते नज़र आते हैं. कहते हैं कि राज्यसभा में सांसद पद की बोली तक लगाई जाती है और येन-केन प्रकरेण राजनीतिक दल अपने प्रत्याशी को यहाँ का सदस्य मनोनीत करवाने की जुट भिड़ाते नज़र आते हैं. हालांकि सचिन का चयन इस आधार पर तो कतई नहीं हुआ है.

राज्यसभा में सांसद के १२ पद ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों के लिए आरक्षित होते हैं जिन्होंने कला, संस्कृति, विज्ञान जैसे क्षेत्रों में अद्वितीय प्रतिभा का प्रदर्शन कर देश का मान बढ़ाया हो. इनका मनोनयन राष्ट्रपति स्वविवेक के निर्णय पर कर सकते हैं और किसी राजनीतिक दल की सिफारिश पर भी. सचिन का मनोनयन इसी विशेष व्यवस्था के अंतर्गत हुआ है. किन्तु दुर्भाग्य यह कि उनके नाम की सिफारिश कांग्रेस पार्टी की ओर से की गई. यदि राष्ट्रपति स्वविवेक के आधार पर उन्हें राज्यसभा हेतु मनोनीत करती तो यह सचिन के साथ भी न्यायपूर्ण होता किन्तु एक राजनीतिक पार्टी विशेष के दूत के रूप में सचिन का राज्यसभा मनोनयन चौंकाता है. सचिन तो राज्यसभा भेजने का फैसला चाहे जिसका हो किन्तु इस फैसले से सचिन के विरोधियों में उतरोत्तर बढ़ोत्तरी हो रही है| कहीं ऐसा न हो कि राजनीति की पथरीली राहों पर चलते हुए सचिन भी अमिताभ बच्चन की तरह राजनीति से तौबा कर लें किन्तु हो सकता है तब तक बात संभालना उनके बस में न हो.

एक जुझारू खिलाड़ी होने के नाते सचिन निश्चित रूप से सभी वर्ग की पसंद हैं और उनके नाम के आगे क्रिकेट की दुनिया छोटी पड़ने लगी है. आज यही सचिन आम आदमी के निशाने पर आ गए हैं| सचिन को गाहे-बगाहे संन्यास की सलाह देने वाले भी सचिन के इस फैसले से तारतम्य नहीं बैठा पा रहे हैं. फिर राजनीतिक दल तो हैं ही सचिन के नाम को लेकर राजनीति करने के लिए. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऐसे वक़्त में जब सचिन अपने करियर को लेकर संतुष्ट हो और अभी उनमें काफी क्रिकट बचा हो, तब सियासी पिच पर बैटिंग करने की ऐसी कौन सी हड़बड़ी है जिसने सचिन को पार्टी विशेष के द्वार तक पहुंचा दिया? शिवसेना सदस्य संजय राउत के इस तर्क में दम तो लगता है कि अब कांग्रेस सचिन के नाम को भुनाना चाहती है ताकि राजनीतिक मुद्दों से जनता, मीडिया और तमाम विरोधी राजनीतिक दलों का ध्यान भटकाया जा सके| कांग्रेस का सचिन को राज्यसभा भेजना उनके प्रति आदर दर्शाने का माध्यम हो सकता है किन्तु यदि उनकी छवि के सहारे स्वयं की छवि को उजला करने की कोशिश है तो यह गलत परिपाटी की शुरुआत है.

यह सभी जानते हैं कि सचिन सियासी तौर पर परिपक्व नहीं हैं और अपने खेल के प्रति समर्पित होने की वजह से उनका संसद की कार्रवाई में रोज़-रोज़ हिस्सा लेना भी संभव नहीं है. इसी तरह राज्यसभा के बारे में जो धारणा बनी है कि यहाँ व्यक्ति विशेष लाभ हेतु प्रवेश पाता है और यह सदन नेताओं के रिटायरमेंट की राह प्रशस्त करता है, सही साबित होती है. सचिन के नाम को जिस तरह से कांग्रेस ने सियासी अखाड़े में उतारा है उससे नुकसान दोनों को है. एक की उजली छवि बिगड़ रही है तो दूसरी ओर बिगड़ी छवि और अधिक दागदार होती जा रही है| सचिन को राज्यसभा भेजने के कांग्रेसी फैसले से यह बात भी सही साबित होती है कि कांग्रेस में सत्ता के शीर्ष पर काबिज़ होने की भूख है जिसके लिए वह किसी के भी नाम को सहारे की भांति इस्तेमाल कर सकती है.

इस पूरे प्रकरण में सचिन की छवि के साथ अन्याय हुआ है जिसका कारण काफी हद तक वे भी रहे हैं. सचिन को राज्यसभा जाने की सलाह को ही सिरे से खारिज कर देना चाहिए था| यदि सचिन जनता के बीच से चुनकर आते तो उनके प्रति सम्मान का भाव दोगुना बढ़ जाता लेकिन पिछले दरवाजे से और सिफारिश से राज्यसभा आने के सचिन के फैसले की मूक सहमति को दबाव तो कतई नहीं कहा जा सकता| जिस तरह से विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवी उनके फैसले के प्रति नकारात्मक तथ्य पेश कर रहे हैं; उससे सचिन की आगे की राह और भी कठिन नज़र आती है. यदि सदन में उपस्थित होकर भी सचिन ने विभिन्न मुद्दों के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई तो उनके मनोनयन को लेकर बयानबाजी बढ़ना तय है. खैर सचिन को आगे कर कांग्रेस ने अपना सियासी बचाव करने का खूब अच्छा प्रबंध किया है. इससे एक बात तो तय है कि कांग्रेस अपने वजूद को प्रासंगिक रखने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है| वहीं सचिन के लिए कांग्रेस की ओर से यह एक ऐसा तोहफा है जिसमें काँटों की मात्र अधिक है.

लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम हिंदी के वरिष्ठ ब्लागर हैं. इनसे संपर्क ०९४२४०३८८०१ के जरिए किया जा सकता है. आपके ब्लाग तक siddharthashankargautam.blogspot.in के जरिए पहुंचा जा सकता है.

Keep it up Master Vijay Singh, We are proud to have people like you

: Longest One man agitator is extremely thankful to Media : The Limca Book of records says about him- “Longest dharna'' : The one-man agitation of Master Vijay Singh, a school teacher from Chausana village in Muzaffarnagar, UP entered its 16th year on Feb 26, 2011. He has been sitting on satyagraha in front of the office of District Magistrate, Muzaffarnagar since 1996. It all started once after he unearthed a fraud-illegal possession of about 400 acres of farmland and other public properties worth Rs 90 crore – by land mafias in his village. He is determined to continue the fight for justice till the entire grabbed land is restored to the government or distributed among the landless poor.”

Similarly, India Book of Records says- “His agitation is the longest ‘one man agitation’ against corruption and powerful public land mafia in his own village. It is based on the non-violence concept of Gandhi Ji. As a result of this, about 300 bighas of land has been freed from illegal processors.”

Master Vijay Singh is in Lucknow these days where he has come to meet the highest authorities to get government support in his life-long endeavour. I had been reading about his being in Lucknow in the different newspapers. Hence, it came as a genuinely pleasant surprise when he called me yesterday evening saying that he wanted to meet us at our house at Gomti Nagar, Lucknow.

It was going to be a privilege and an elevating experience and that is what it actually turned out to be when he came today morning. He came walking from his place of stay in the same way he has walked over 610 Kilometers of distance from Muzaffarnagar to Lucknow.

An extremely simple, down to Earth, smiling and endearing personality, he is prone to smiling and laughing but this outwardly charm shall not let anyone assume him as being a simpleton or a fool. He is a man of steel because he knows what he wants in life. He knows that he has to fight against all those people who have illegally grabbed the government land, in the shape of Village society land, Nazul land, other government land and has to get this land freed. For this purpose, he can go to any extent. This is exactly what he has done. For the last 16 years, he has been living on a small part of Veranda in front of the District Magistrate Office in Muzaffarnagar, which is his living place, his house or whatever you might call it. His food gets cooked there and he stays there as long as something very urgent does not need him to leave this place.

While this simple looking person might look very innocuous and harmless, he is a most dangerous person for all the land grabbers of the area. He has faced threats of all kinds including the threat of being murdered, in case he did not mend his ways and did not give up his endeavour. But this stubborn person knows no bounds and he did not leave his attempts mid way, come what may.

He told me and wife Nutan that his only principle of life is that one shall never give up and one shall never make haste. He told that when he started this journey some 17 years ago, he was only a school teacher who hardly knew anything about the world. When he initially started his protest/ agitation, no one took him seriously and he was ignored by one and all. When he still prolonged the Dharana, he was given all kinds of serious threats. It was much later in his life, many years later, that he was given some serious thoughts. Till now he has got 136 cases registered in various Revenue and Civil Courts for getting the government land freed from illegal occupation.

One important thing that Vijay Singh said again and again is that he has always found the Media extremely cooperative in his efforts all through his life. He says that whatever he is today and whatever success he has got so far, a sufficiently large credit for this goes to the Media. He is also of the opinion that Media always supports a right cause and the transformation in Indian society owes a lot to the Indian Media. Thus, here we find a person who is not ungrateful to Media while still getting its support or using it for their own purpose.

When we called our children Tanaya and Aditya to get some learning from Master Vijay Singh, he told them that he is not very good in English and the only English phrase he knows is- “When the muscles say No, I say yes.”

Keep it up Master Vijay Singh. We are proud to have people like you.

Amitabh Thakur, IPS officer from Uttar Pradesh, related with National RTI Forum


सबसे लंबा धरना करने वाले विजय सिंह मीडिया के शुक्रगुजार हैं

उनके विषय में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स कहता है- “सबसे लंबा धरना

मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश के चौसना गाँव के मास्टर विजय सिंह का एकल धरना 26 फरवरी 2011 को अपने 16वें वर्ष में प्रवेश कर गया. वे सन 1996 से जिला मैजिस्ट्रेट, मुज़फ्फरनगर कार्यालय के सामने सत्याग्रह कर रहे हैं. यह सब तब शुरू हुआ जब लगभग नब्बे करोड रूपये मूल्य के चार सौ एकड़ जमीन के विषय में इन्होने जाना कि यह सरकारी जमीन है और उस पर अवैध कब्ज़ा है. ये तब तक इस लड़ाई को जारी रखना चाहते हैं जब तक वे उस सारी जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त नहीं करा लेते.”

इसी प्रकार इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स का कहना है- “उनका आंदोलन एक व्यक्ति द्वारा किया गया सबसे लंबा धरना है जो उन्होंने अपने गाँव के बेईमान लोगों और ताकतवर भूमि माफिया के विरुद्ध चला रखा है. उनके इस प्रयास से तीन सौ बीघा जमीन इन भू-माफिया के अवैध कब्जे से मुक्त हो गयी है.”

मास्टर विजय सिंह इन दिनों लखनऊ आये हुए हैं जहाँ वे सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों से मिल कर सरकार को इस समस्या से रूबरू कराने और इस सम्बन्ध में सरकार का अधिकाधिक सहयोग प्राप्त करने में प्रयत्नशील हैं. मैं भी इस विषय में अखबारों में लगातार पढ़ रहा था. अतः मुझे उस समय बहुत अधिक प्रसन्नता हुई जब इनका फोन कल शाम मुझे मिला और इन्होने मुझे कहा कि वे सवेरे मुझसे मिलने मेरे गोमतीनगर, लखनऊ स्थित घर आना चाहते हैं.

यह हम लोगों के लिए सौभाग्य और गौरव का विषय था और मास्टर विजय सिंह से हमारी मुलाक़ात वास्तव में मेरे लिए एक सच्चे इंसान से मुलाक़ात साबित हुई. वे लखनऊ में अपने ठहरने के स्थान से उसी प्रकार से पैदल चल कर आये जैसे उन्होंने मुजफ्फरनगर से लखनऊ की 610 किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय की थी.

एक अत्यंत सरल और सादे किस्म के व्यक्तित्व वाले सफ़ेद धोती-कुरता पहने विजय सिंह का हंसता-मुस्कराता चेहरा देख कर कोई यह अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि वे अंदर से इतने हठी, इतने जिद्दी और इतने खौफनाक हैं. जी हाँ, यह सच्चाई है कि विजय सिंह उस इलाके के कई सारे भू-माफियाओं की दृष्टि में सर्वाधिक खतरनाक और अवांछनीय व्यक्ति हैं जिन्होंने इन भू माफियाओं का जीना दूभर कर रखा है. विजय सिंह यह जानते हैं कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या है और वे बड़े आराम से, बड़ी सहूलियत से, बिना किसी आपाधापी के अपने लक्ष्य की ओर लगातार अग्रसर रहते हैं. इस प्रक्रिया में वे ना तो कोई हड़बड़ी दिखाते हैं, ना किसी पर नाराजगी, ना कोई गुस्सा. बस आराम से चलते जाना ही उनका काम है. फिर उनका काम भी क्या है- बस जिला मैजिस्ट्रेट, मुज़फ्फरनगर कार्यालय के सामने दिन भर बैठा रहना. वहीँ गलियारे में एक कोने पर पिछले सत्रह साल से बैठे हुए विजय सिंह से ना जाने क्यों उनके गाँव और आस-पास के इलाकों के भू-माफिया इतना अधिक डरते और नाराज़ रहते हैं कि उनका बस चले तो वे विजय सिंह को कच्चा चबा जाएँ. विजय सिंह खुद इस बात को बड़ी मासूमियत से कहते हैं- “ये लोग तो पुलिस से नहीं डरते जबकि उन्हें पुलिस से डरना चाहिए क्योंकि असल ताकत तो पुलिस के पास होती है पर वे सब मुझसे बहुत डरते हैं. पता नहीं क्यों?” वैसे यह अलग बात है कि विजय सिंह इस प्रश्न का उत्तर बखूबी जानते हैं. वे जानते हैं कि उनके इरादों की सच्चाई और उनकी नीयत पर कोई भी आदमी एक छोटा सा सवाल भी नहीं लगा सकता. वे खुद मुझे और मेरी पत्नी नूतन को बताते हैं-“ आज से करीब पांच साल पहले मुझे इन लोगों द्वारा एक खुला ऑफर दिया गया था कि मैं चार सौ बीघा जमीन ले लूँ और चुपके से इलाका छोड़ कर मुंबई या दिल्ली जैसे किसी बड़े शहर में जा कर चुपचाप आराम की एक गुमनाम जिंदगी बसर करूँ. मेरे इलाके में खेत पचीस से तीस लाख रुपये बीघा है. इस तरह मुझे कई करोड रुपये का खुला ऑफर था. पर मैंने खुद से यही प्रश्न किया कि यदि मैंने ऐसा कर दिया तो जमीन तो पा जाऊँगा पर लोगों का जो प्यार और विश्वास पाया है, वह तो सदा के लिए समाप्त हो जाएगा. मैं इस झटके को नहीं झेल सकता था और मैंने सीधे उस ऑफर को मना कर दिया.” विजय सिंह का कहना है कि उन्हें इस ऑफर को मना करने का कत्तई कोई अफ़सोस नहीं है.

उन्होंने बातचीत में एक अन्य बहुत ही मार्के की बात बताई. उन्होंने यह कहा कि दूसरे लोग जो भी कहें, मेरा यही अनुभव है कि हमारे देश की मीडिया अच्छे कामों को बहुत सराहती है. उनका मानना है कि वे आज जो कुछ भी हैं उसमे मीडिया का बहुत ही बड़ा रोल है. मीडिया ने हमेशा उनके कार्यों की भूरी-भूरी प्रशंसा की है और उनका खुल कर साथ दिया है. वे तो यहाँ तक मानते हैं कि इस देश के परिवर्तन में भी मीडिया की बहुत ही सक्रीय और सकारात्मक भूमिका रही है. इस तरह हम पाते हैं कि हमारे सामने एक सच्चा इंसान खड़ा है क्योंकि बहुधा यही देखा जाता है कि मीडिया इस तरह के कामों का दावा करने वाले लोगों को खुल कर सपोर्ट करती है और बाद में वही लोग जिनकी हैसियत और हस्ती मीडिया द्वारा बनायी हुई होती है, मीडिया के प्रति कृतघ्नता दिखाने से बाज़ नहीं आते.

जब मैंने अपने दोनों बच्चों तनया और आदित्य को मास्टर विजय सिंह से मिलने के लिए बुलाया तो उन्होंने कहा कि यद्यपि मेरी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है पर मैं अंग्रेजी के एक मुहावरे को बहुत उपयोगी और अपने जीवन का सार मानता हूँ- “व्हेन द मसल सेज नो, आई से एस (अर्थात जब मेरा शरीर ना कहता है तो मैं हाँ कहता हूँ). यह इन बच्चों के लिए और हम दोनों के लिए भी बहुत बड़ी शिक्षा थी.

मैं समझता हूँ कि ऐसे लोग बहुत विरले होते हैं और ये ही हमारे राष्ट्र की सच्ची धरोहरों में हैं. हमें आप पर गर्व है विजय जी.

लेखक अमिताभ ठाकुर, उत्तर प्रदेश के आईपीएस अधिकारी एवं नेशनल आरटीआई फोरम से जुड़े

(इंटरव्यू – अनूप भटनागर) : आलोक मेहता की कार्यशैली किसी भी संस्थान का भट्टा बिठाने की क्षमता रखती है

अनूप भटनागर. दिल्ली में कई दशक से कई बड़े मीडिया संस्थानों के साथ पत्रकारिता की अलख जगाते रहे. सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले हिंदी के पहले और वरिष्ठतम पत्रकार हैं. सहज सरल स्वभाव वाले वरिष्ठ पत्रकार अनूप भटनागर इन दिनों ज़िंदगी की कई कड़वी हकीकत से दो-चार हैं. उन्हें जिस समय उनके संस्थान की सबसे ज्यादा समर्थन की जरूरत थी, अचानक उन्हें अकेले छोड़ दिया गया. जिन पर उन्होंने सबसे ज्यादा भरोसा किया और हर मुश्किल अच्छे वक्त में उनके खड़े रहे, उन्होंने अनूप के मुश्किल वक्त में नाता तोड़ लिया. चुपचाप अपना काम करते रहने में भरोसा करने वाले अनूप भटनागर इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. लेकिन कुछ माह पहले तक वह आलोक मेहता के नेतृत्व वाले नई दुनिया में लीगल एडिटर के रूप में कार्यरत थे.

हिंदुस्तान, पीटीआई, दैनिक जागरण समेत कई संस्थानों में काम कर चुके अनूप भटनागर इन दिनों हर सप्ताह दो बार डायलिसिस की प्रक्रिया से गुजरते हैं. उनका इलाज चल रहा है. फिर भी वे पूरी तरह सक्रिय हैं. दिल्ली की दुनिया में जो सच्चे और अच्छे पत्रकार होते हैं, उन्हें बाहर के लोग कम ही जान पाते हैं क्योंकि वे खुद के ज्यादा प्रचार प्रसार पर कभी तवज्जो नहीं देते. वे चुपचाप अपना काम पसंद करते हैं. और, आजकल मीडिया की राजनीति में चुपचाप अपना काम करने वाले, किसी गुट में न रहने वाले, चापलूसी और झूठ का सहारा न लेने वाले पत्रकार उपेक्षित ही रह जाते हैं. ऐसे पत्रकार अनूप भटनागर के जीवन, सोच, सबक आदि के बारे में भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने लंबी बातचीत की. पेश है कुछ अंश…

– बचपन और पढ़ाई लिखाई के बारे में बताएं.

— मेरा बचपन बहुत कष्ट और परेशानियों में बीता। जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले बहराइच में हुआ। बाल्यावस्था में ही माता पिता का साया उठ गया था। पिता के निधन के बाद मेरी और छोटी बहन की जिम्मेदारी बड़े भाई दिलीप कुमार के कंधों पर आ गई थी। बड़े भाई ने पढाई के लिए मुझे लखनऊ भेजा जहां मैने बी.काम. और फिर एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की। दिशाहीनता के इस दौर में बड़े भाई के अलावा मार्गदर्शन के लिए कोई नहीं था। ऐसी स्थिति में जो उचित समझा या समझा दिया गया उसी पर आगे बढने की कोशिश की।

– दिल्ली आना कैसे हुआ.

— दिल्ली आने की घटना रोचक है। भाई साहब विवाह के बाद दिल्ली आ गए थे। मैं लखनऊ में था। एलएलबी प्रथम वर्ष की परीक्षा देने के बाद जून जुलाई 1979 में दिल्ली आया। दिल्ली की दिनचर्या और कार्यशैली से दंग था। कुछ समय इस चकाचौंध में खोया रहा। फिर कुछ करने का विचार आया। एक टाइप स्कूल में हिन्दी में टाइप करके पहली बार पैसा कमाया। इसके बाद पत्रकारों की एक सोसायटी में नौकरी मिल गई। इस सोसायटी में पांच साल काम किया और इस दौरान सर्वश्री श्रीकांत वर्मा, कपिल वर्मा, मोहम्मद शमीम, योगेन्द्र बाली, एसी सक्सेना, पुष्प सराफ और टी आर रामचंद्रन जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के संपर्क में आया और इनसे बहुत कुछ सीखा जो आज भी काम आ रहा है। पांच साल की नौकरी के बाद मैने एक चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट मित्र की फर्म से जुड कर टैक्स मामलों की वकालत करने की दिशा में कदम बढाया। लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

– पत्रकारिता के क्षेत्र में कैसे आए.

— पत्रकारिता के क्षेत्र में आना महज संयोग रहा। जून-जुलाई 1984 में एक दिन सांसद श्रीकांत वर्मा की पत्नी वीणा वर्मा जी ने फोन पर कहा कि वर्मा जी उन्हें याद कर रहे हैं। श्रीकांत वर्मा जी से डा. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मिला तो उन्होंने पूछा क्या कर रहे हो? जब मैंने कहा कि वकालत करने की कोशिश कर रहा हूं तो वह बोले कि भई तुम्हे तो पत्रकारिता करनी है, वकालत की ओर क्यों जा रहे हो? उन्होंने कहा कि एक साप्ताहिक पत्र निकल रहा है और मुझे इसमें काम करना है। श्रीकांत वर्मा जी का आदेश शिरोधार्य था। इसके बाद श्रीकांत जी के सानिध्य में साप्ताहिक समाचार पत्र 'प्रेक्षा' का प्रकाशन शुरू हुआ। इस तरह मैं पत्रकारिता से जुड़ा।

– किन किन संस्थानों में काम किया.

— प्रेक्षा समाचार पत्र का प्रकाशन बंद होने के बाद मैंने दैनिक जागरण, पीटीआई भाषा, हिन्दुस्तान और फिर नई दुनिया में काम किया। प्रेक्षा के प्रकाशन के कुछ महीने बाद ही अक्तूबर 1984 में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या हो गई। इसके बाद चुनावों की घोषणा हो गई और श्रीकांत जी पार्टी के कामों में अत्यधिक व्यस्त हो गए। उन्होंने इस समाचार पत्र से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया। श्रीकांत जी के अलग होने के बाद मैंने भी समाचार पत्र छोड़ दिया। इस तरह मैं बेरोजगारी की स्थिति में जा पहुंचा। बेरोजगारी के दौरान चुनिन्दा वरिष्ठ पत्रकारों ने मार्गदर्शन किया और उन्ही के प्रयासों से मुझे दैनिक जागरण के दिल्ली ब्यूरो में नौकरी मिली। जागरण के ब्यूरो प्रमुख थे श्री चतुर्भुज मिश्रा जिन्होंने मुझे काम की खुली छूट दी थी।

इसी दौरान मेरे वकील मित्र भरत संगल ने कहा कि अनूप, सुप्रीम कोर्ट की खबरों का संकलन शुरू करो और हम तुम्हारी मदद करेंगे। इस तरह मैं सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही कवर करने लगा। सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी पत्रकारों का दबदबा था, जो आज भी है, लेकिन मै कुछ संकोचों के साथ लंबे समय तक अलग थलग रहते हुए काम करता रहा। इसी बीच मुझे सुप्रीम कोर्ट का एक्रेडिटेशन मिल गया और इस तरह मैं भी सुप्रीम कोर्ट के अंग्रेजी दां पत्रकारों की जमात में शामिल होकर उनके साथ काम करने लगा। सुप्रीम कोर्ट में आज स्थिति काफी बदल चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट में हिन्दी के कई पत्रकारों को मान्यता मिल चुकी है। यही नहीं, अब एक्रेडिटेशन के बगैर भी अस्थाई पास की मदद से न्यायालय की कार्यवाही का संकलन हो सकता है पहले ऐसा करना मुश्किल था।

अप्रैल 1986 में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार पीटीआई भाषा में ज्वाइन किया। पीटीआई में काम के दौरान बहुत कुछ सीखा। खबरें लिखने की शैली सीखी। प्रतिद्वन्दी से पहले कम शब्दों में तत्परता से खबर फाइल करने की कला भी वहीं सीखी जो आज भी काम आ रही है। पीटीआई के वरिष्ठ सहयोगियों के सानिध्य में अनेक चुनौतीपूर्ण असाइनमेन्ट भी किए। फरवरी 1997 तक भाषा में नौकरी की और इस दौरान राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित अनेक महत्वपूर्ण नेताओं के साथ देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया। फरवरी 1997 तक भाषा में और फिर जून 2008 तक हिन्दुस्तान में काम किया। इसके बाद जून, 2008 में नई दुनिया में आ गया था।

1984-85 में रामस्वरूप जासूसी कांड की दिल्ली हाईकोर्ट में बंद कमरे में हो रही सुनवाई की कवरेज के दौरान मैं आलोक मेहता के संपर्क में आया। श्री आलोक मेहता जब हिन्दुस्तान अखबार पहुचे तो फिर उनसे संपर्क हुआ और उन्होंने फरवरी 1997 में हिन्दुस्तान अखबार में काम करने का आफर दिया जिसे मैंने तुरंत स्वीकार भी कर लिया। इस तरह मैं न्यूज एजेन्सी से निकल कर अखबार में पहुंच गया था। हिन्दुस्तान अखबार में काफी लंबे समय तक मेरे पास बैठने के लिए उचित स्थान नहीं था। इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों में काम करता रहा। आलोक मेहता के कार्यकाल में हिन्दुस्तान में मेरी दिनचर्या अदालत तक सिमट कर रह गई थी। श्री अजय उपाध्याय के संपादक बनने पर पदोन्नति हुई और फिर लोकसभा का प्रेस कार्ड भी बहाल हुआ। श्री अजय उपाध्याय के इस्तीफे के बाद श्रीमती मृणाल पांडे संपादक बनी। श्रीमती मृणाल पांडे के कार्यकाल में कई बार विदेश यात्रा का अवसर मिला। इसी बीच आलोक मेहता जी ने नई दुनिया में आने का प्रस्ताव रखा जिसे मैंने बगैर किसी संकोच के स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन नई दुनिया शुरू होने के बाद जो तस्वीर सामने आई तो मन में अनेक शंकाएं जन्म लेने लगीं। एक बार नई दुनिया के मेट्रो एडीटर से कहा भी कि कहीं मेरा निर्णय गलत तो नहीं हो गया?

– आलोक मेहता के साथ कई जगहों पर आप रहे, कैसा अनुभव रहा आपका.

— जहां तक सवाल आलोक मेहता के साथ काम करने के अनुभव का है तो मेरा मानना है कि उनकी कार्यशैली में काफी बदलाव आ चुका है। पहले वह पत्रकारों के काम का सम्मान करते थे लेकिन नई दुनिया में अनुभव हुआ कि उन्हें भी काम करने वालों से ज्यादा दरबारियों और चाटुकारों की आवश्यकता है जो उनकी हां में हां मिलाते रहे और बार बार उनके सामने कोरनिस बजाते रहें। मुझे याद है कि नई दुनिया में एक बार आलोक मेहता ने सबके सामने कहा था कि भटनागर जी और मानसी जी तो उनके कमरे में आते ही नहीं है। इस पर मैंने कहा था कि जब भी जरूरत होगी या किसी महत्वपूर्ण खबर के बारे में जानकारी देनी होगी या परामर्श करना होगा तो जरूर आऊंगा और इस परंपरा का निर्वाह नई दुनिया में अपने कार्यकाल के अंतिम दिन तक मैंने बखूबी किया। बाकी लोगों के बारे में टिप्पणी करना व्यर्थ है।

आलोक मेहता के बारे में इतना जरूर कहना चाहूंगा कि उनकी कार्यक्षमता पर किसी को संदेह नहीं है लेकिन उनकी कार्यशैली किसी भी संस्थान का भट्टा बिठाने की क्षमता रखती है। इस संदर्भ में हिन्दी की आउटलुक पत्रिका और नई दुनिया के एनसीआर संस्करण की बदहाली जगजाहिर है। नई दुनिया में आलोक मेहता को असीमित अधिकार मिले थे जिनका इस्तेमाल उन्होंने शुरू में दिल्ली संस्करण को जमाने में और फिर करीब पांच करोड़ रुपए सालाना का नुकसान दे रही संडे मैगजीन को निरंतर प्रकाशित करते रहने की जिद पूरी करने के लिए किया। संडे नई दुनिया के साथ मुफ्त में दी जाने वाली इस पत्रिका से किसका भला हो रहा था, यह आलोक मेहता जी अधिक बेहतर जानते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि नई दुनिया जैसे प्रतिष्ठित अखबार की आर्थिक हालत खराब करने के कारणों में सडे संस्करण के साथ निकलने वाली इस मैगजीन का भी बड़ा योगदान रहा है।

– आपका डायलिसिस चल रही है. इस दिक्कत तकलीफ के दौरान आफिस का काम कैसे करते रहे.

— जहां तक सवाल मेरी डायलिसिस का है तो इस वजह से मेरे काम पर बहुत अधिक असर नहीं पड़ा था। जनवरी 2011 में डाक्टरों ने डायलिसिस के लिए फिस्टुला बनवाने की सलाह दी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मैंने आलोक जी को बताया तो उन्होंने छूटते ही कहा कि परेशान होने की जरूरत नहीं है, कन्हैया लाल नंदन जी तो 15- 20 साल तक डायलिसिस के बावजूद काम करते रहे। मेहता जी ने मुझसे कहा कि स्वास्थ का ध्यान रखते हुए सहजता से काम करूं। इस प्रोत्साहन ने नए उत्साह का संचार किया और मैं नई ऊर्जा के साथ काम करने लगा। डायलिसिस के बाद मैं सीधे सुप्रीम कोर्ट जाता था और फिर आफिस आकर खबरें लिखता था। नई दुनिया में अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में मैंने दो बार दस दस दिन अवकाश लिया क्योंकि उस दौरान मेरी सर्जरी हुई थी। डायलिसिस के कारण होने वाली थकान की वजह से उस दिन देर से काम शुरू करता था लेकिन काम पूरा करता था। मेरे सहयोगी कहा करते थे कि डायलिसिस के दिन मुझे आफिस नहीं आना चाहिए लेकिन मैं ऐसा नहीं करता था क्योंकि मुझमें काम करने से नई शक्ति का संचार होता है। यही नहीं, मुझे यह भी पता था कि दूसरों के बारे में शिकायत करने या कान भरने के मौकों की तलाश में रहने वाले दरबारी आलोक मेहता के कान भरने का कोई मौका गंवाना नहीं चाहेंगे।

मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि डायलिसिस कराने के बावजूद कुछ सावधानियों के साथ सामान्य जीवन व्यतीत करना संभव है। इस तरह की परिस्थितियों में चिकित्सक और डाइटीशियन की सलाह बहुत काम आती है। डायलिसि कराने की प्रक्रिया और इसके बाद की मनःस्थिति के संदर्भ में 'थ्री ईडियट' में आमिर खान का मंत्र 'आल इज वेल' और नंदन जी की सक्रियता को हमेशा ध्यान रखना चाहिए।

– पत्रकारिता में आपके रोल माडल कोन लोग रहे हैं

पत्रकारिता में मेरे रोल माडल श्री शरद द्विवेदी और श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह रहे हैं। एसपी सिंह जी के साथ काम करने का तो अवसर नहीं मिला लेकिन उनके साथ उठने बैठने और बतियाने का मौका कई बार मिला था। श्री सिंह चाहते थे कि मैं नवभारत टाइम्स के लिए सुप्रीम कोर्ट की कवरेज करूं। वह मुझे दो तीन बार श्री राजेन्द्र माथुर से मिलाने के लिए नवभारत टाइम्स भी ले गए लेकिन इत्तेफाक से एक बार भी श्री माथुर से मुलाकात नहीं हो सकी थी। जहां तक शरद द्विवेदी जी का संबंध है तो उन्होंने नई पीढी के पत्रकारों को एजेन्सी में काम करने की कला सिखाई। श्री द्विवेदी ने समाचार भारती, समाचार, यूनीवार्ता और फिर भाषा में काम किया था। उनके पास पत्रकारिता का व्यापक अनुभव था। लेकिन किसी प्रकार का घमंड नहीं था। वह युवा पीढी को पत्रकारिता के नए नए गुर सिखाने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।

– उन लोगों के नाम बताइए जिनसे आप जीवन में बेहद प्रभावित रहे.

— ऐसे कई व्यक्ति हैं लेकिन उनके नामों का जिक्र करना उचित नहीं होगा।

– पत्रकारिता पर बाजारवाद के हावी होते जाने से क्या दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं.

— पत्रकारिता पर हावी हो रहे बाजारवाद का ही नतीजा है कि आज खबरों से अधिक पैकेजिंग का महत्व हो गया है। प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की होड़ का ही नतीजा है कि कई बार अधकचरी खबरों को ही सजा कर पेश कर दिया जाता है। बाजारवाद के दौर में युवा पत्रकार सीखने की बजाए किसी न किसी तरह आगे निकलने की होड मे हैं। इसमें इलेक्ट्रानिक मीडिया भी अहम भूमिका निभा रहा है।

– पहले और आज की पत्रकारिता में क्या फर्क महसूस करते हैं.

— इलेक्ट्रानिक मीडिया के उदभव से पहले काम करने की शैली एकदम भिन्न थी। पहले पत्रकारिता के मानदंडों को ध्यान में रखते हुए ही खबरें लिखी और पेश की जाती थी। वह संचार क्रांति का दौर नहीं था। इंटरनेट और मोबाइल नहीं थे। इस वजह से पत्रकारों को भी खासी मेहनत करनी पड़ती थी। पहले तथ्यों की पुष्टि के बाद ही खबरें लिखी जाती थीं और परिस्थितियों के अनुसार सूत्र की पहचान गुप्त रखने के उद्देश्य से खबर सूत्रों के हवाले से लिखी जाती थी लेकिन आज ऐसा नहीं है। मुझे महसूस होता है कि अब पत्रकार के मन में उपजे ताने बाने या कही सुनी बातों को ही सूत्रों के हवाले से पेश करने का चलन बढा है। आज घटनास्थल पर जाए बगैर ही सिर्फ इलेक्ट्रानिक मीडिया पर आ रही खबरों के सहारे खबर गढ देने का सिलसिला भी चल निकला है। पहले ऐसा नहीं था। पत्रकार हमेशा घटनास्थल पर जाते थे। शायद यही वजह है कि इन दिनों पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

– आपको अपने भीतर तीन सी कमी नजर आती हैं.

— सहजता से लोगों पर भरोसा कर लेता हूं। दूसरों को आहत किये बगैर ही सभी को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति के कारण कई बार असहमति के भावों को मन में ही रख लेता हूं। इस कमी का अहसास है और इसका खामियाजा भी भुगता है लेकिन इस उम्र में स्वभाव तो बदलेगा नहीं।

-आप खुद को किस बात के लिए शाबासी देना चाहेंगे.

— उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से निकले युवक के लिए बतौर हिन्दी पत्रकार 25 साल से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की कवरेज बड़े बड़े मीडिया संस्थानों के लिए करना बहुत बड़ी उपलब्धि मानता हूं। एक छोटे से शहर से निकल कर दिल्ली जैसे महानगर में किसी मजबूत आधार के बगैर ही अपनी जगह बनाने में मिली सफलता पर संतुष्ट हूं। लेकिन मुझे लगता है कि अभी इस पड़ाव से आगे भी जहां और है जिसके लिए सतत प्रयास और संघर्ष की जरूरत है।

अनूप भटनागर से संपर्क bhatnagaranoopk@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

86 लाख रुपये देकर ट्विटर पर निंदा करने की कीमत चुकाएगा भारतीय पत्रकार

कुआलालंपुर : मलेशिया की एक अदालत ने एक वरिष्ठ भारतीय पत्रकार को एक व्यापारी को ट्विटर पर उसे बदनाम करने के एवज में 86 लाख रूपए हर्जाने के तौर पर देने का आदेश दिया है। मलेशिया में इस तरह का यह पहला मामला है जब निंदात्मक ट्विट्स के लिए किसी को हर्जाना दिया गया है। 'सिटिज़न नदेस'के रूप में प्रसिद्ध आर नदेस्वरण को न्यायाधीश अमेलिया टी हांग गोक ने मोहमद सलीम फ़तेह को सामान्य क्षति के तौर पर 300.000 आरएम (मलेशियन करेंसी) और 200,000 आरएम गंभीर क्षति के रूप में देने का आदेश दिया है। अदालत ने सलीम को हर्जाने के तौर पर कुल 500,000 आरएम (करीब 86 लाख रुपए) दिया। अदालत ने नदेस्वरण को निंदात्मक ट्विट्स दोहराने से रोकने का भी आदेश दिया है। (एजेंसी)

अनिल गुप्‍ता ने दैनिक भास्‍कर एवं मनोजीत ने समाचार प्‍लस ज्‍वाइन किया

पत्रिका, भोपाल से खबर है कि अनिल गुप्‍ता ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर विशेष संवाददाता थे. अनिल पत्रिका के भोपाल में लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी भोपाल में दैनिक भास्‍कर के साथ शुरू की है. ये भास्‍कर के साथ इनकी दूसरी पारी है. ये भास्‍कर को जयपुर में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. भास्‍कर में भी इन्‍हें विशेष संवाददाता बनाया गया है. 

समाचार प्‍लस से खबर हे कि मनोजीत सिंह ने अपनी नई पारी शुरू की है. इन्‍होंने एसाइनमेंट डेस्‍क पर ज्‍वाइन किया है. मनोजीत इसके पहले भी इंडिया न्‍यूज समेत कई चैनलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

नईदुनिया, इंदौर से एसोसिएट एडिटर हेमंत पाल का इस्‍तीफा

नईदुनिया के बिकने के बाद वहां की व्‍यवस्‍था बिगड़ती नजर आने लगी है. इस अखबार को ब्रांड बनाने वाले पुराने लोग अब इससे किनारा करने लगे हैं. सबसे पहले नईदुनिया के ग्रुप एडिटर उमेश त्रिवेदी ने नईदुनिया से इस्तीफा दिया था, अब इंदौर के एसोसिएट एडिटर हेमंत पाल ने भी प्रबंधन को इस्तीफ़ा सौप दिया है. खास बात यह रही कि अंदर की अव्‍यवस्‍था से नाराज हेमंत पाल ने एक महीना का नोटिस देने की बजाय एक महीने का वेतन जमा करके इस्‍तीफा दे दिया.

उन्‍होंने प्रबंधन को अपने इस्‍तीफा देने का कारण तो नहीं बताया परन्‍तु माना जा रहा है कि जागरण प्रबंधन जिस नॉन प्रोफेशनल तरीके से अखबार चलाना चाहता है, उससे वो नाराज थे. नईदुनिया अब कॉकटेल बनता जा रहा है. नईदुनिया की मध्‍य प्रदेश मे एक संस्‍कारित पत्रकारिता की पहचान रही है, उसे जागरण वाले अपने तरीके से ट्रीट कर रहे हैं तो श्रवण गर्ग भास्‍कर वाले अंदाज में अखबार को लाने की कोशिश कर रहे हैं, लिहाजा आंतरिक स्थितियां खराब होती जा रही हैं.

हेमंत पाल एमपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. पिछले ढाई दशक से ज्‍यादा समय उन्‍होंने सक्रिय पत्रकारिता को दिया है. वे १९८६ में नईदुनिया के टैलेंट हंट से इस अखबार में आए थे. बाद में पांच साल जनसत्‍ता, मुंबई में भी रहे. 1995 में इन्‍होंने नईदुनिया से दूसरी पारी शुरू की तब से यहीं थे. ये नईदुनिया के लिए भोपाल में पॉलिटिकल और प्रशासन प्रभारीभी रह चुके हैं. संभावना जताई जा रही है कि ये जल्‍द ही किसी समूह से जुड़ने वाले हैं. दूसरी तरफ आंतरिक स्थितियों से नाराज कुछ और वरिष्‍ठों के इस्‍तीफा देने की संभावना है.

जोहरा सहगल की इस जिंदादिली को पक्का सलाम कहेंगे आप, देखिए तस्वीर

फेसबुक पर Swarnim Prabhat ने एक तस्वीर चस्पा की है. वो तस्वीर यहां नीचे भी है. इसमें जोहरा सहगल अपने सौवें जन्मदिन पर केक काटते दिखाई दे रही हैं. पर उनकी मुख मुद्रा व हाथ मुद्रा कुछ ऐसी है कि बरबस आप मुस्कराये बिना नहीं रह सकते, जैसे वे केक नहीं, आदमी काटने वाली हों… हिंदी फिल्मों की इस महान अदाकारा की इस जिंदादिली को सलाम.

आज के दौर में जब तीस चालीस की उम्र तक जाते जाते हमारे नौजवान थकने से लगते हैं, मुस्कान गायब हो जाती है, हार्ट अटैक से लेकर तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं, और कई तो शहीद होकर उपर तक चले जाते हैं, वैसे में जोहरा सहगल का सौ की उम्र में भी ये तेवर बहुत कुछ सिखाता है. जिंदगी जिंदादिली का दूसरा नाम है. थक गए, उदास हो गए तो समझे मर गए. उदासी, तनाव, अवसाद… ये सब ढेर सारी बीमारियों को न्योता देता है. शायद यही वजह है कि जोहरा सहगल ने खुद को अभी तक तरोताजा बनाए रखने के लिए जिंदादिली का रास्ता अपनाया और वे इस रास्ते पर चलते हुए अमर हैं…

ये आसाराम बापू साधु वेश में चलने वाला दूसरा निर्मल बाबा है, देखिए तस्वीर

नीचे एक तस्वीर है. लालबत्ती लगी गाड़ी में आसाराम बापू. लाल बत्ती लगाकर चलने का अधिकार किसने दे दिया आसाराम बापू को? इन स्वयंभू खुदाओं को क्या हो गया है, क्या ये देश संविधान सबसे उपर हैं… इसी गाड़ी की तस्वीर उतारते वक्त आसाराम बापू ने भदोही में एक पत्रकार थप्पड़ मार दिया था. कल्पना कर सकते हैं आप कि कोई साधु किसी को भला थप्पड़ मार सकता है… साधु का तो काम होता है साधुता के जरिए सबको जीतना… पर ये आसाराम बापू व्यापारी है, निर्मल बाबा टाइप व्यापारी… इस आसाराम बापू के मुद्दे पर फेसबुक पर Mahesh Jaiswal ने बातचीत शुरू की है.

महेश लिखते हैं-  ''भदोही के पत्रकार से आसाराम द्वारा की गयी बदतमीजी को कुछ महान लोग पत्रकारों का ढोंग बता रहे हैं. अब मैं उन्हें बता देना चाहता हूँ कि आसाराम ने आगबबूला होकर क्यों ऐसा कदम उठाया. ये कार देखिये जिसमें लाल बत्ती लगी है. इसी को कवर करने पर आसाराम ने आपा खो दिया. अब आप सभी को समझ में आ ही गया होगा. यह एक ऐसा सबूत है जिसके द्वारा आसाराम के ऊपर कार्यवाही किया जा सकता है. महेश के इस स्टेटस अपडेट पर बाबा बिगडैल राम नामक कोई फेसबुक यूजर कमेंट करते हैं- ye sadhu bhesh me dusra nirmal baba hai… hindustan ka sabse bada sadhu bhesh daku……. फेसबुक के एक अन्य यूजर Ankur Tyagi का कमेंट है… nahi nahi asaram ko koi haq nahi hai laal batti lagebe ka.

देशबंधु ने हापुड़ एवं साहिबाबाद में ब्‍यूरो कार्यालय खोला

: प्रदीप शर्मा एवं कुलदीप चौहान बनाए गए प्रभारी : नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक देशबंधु ने गाजियाबाद के साहिबाबाद तथा जिला पंचशीलनगर के हापुड में अपना ब्यूरो कार्यालय खोल दिया है। साहिबाबाद का प्रभारी कुलदीप चौहान को बनाया गया है, जबकि हापुड की कमान अनुभवी पत्रकार प्रदीप शर्मा को सौंपी गयी है। श्री चौहान तथा शर्मा को प्रिंट तथा इलैक्ट्रानिक मीडिया में लगभग 10 वर्ष का अनुभव है। कुलदीप चौहान रफ्तार टाइम न्यूज चैनल से देशबन्धु में आये हैं। जबकि प्रदीप शर्मा दैनिक हिंट, दैनिक जागरण, अभीतक जैसे पत्रों में काम कर चुके है।

पिछले दिनों देशबंधु ने गाजियाबाद में अपना प्रादेशिक कार्यालय खोला था। साहिबाबाद तथा हापुड कार्यालय सीधे गाजियाबाद आरडीसी स्थित प्रादेशिक कार्यालय को रिपोर्ट करेंगे। खबर है कि बुलंदशहर, सिकन्द्राबाद, मुरादनगर तथा मोदीनगर में भी शीघ्र देशबंधु अपने लोकल कार्यालय खोलने जा रहा है। आपको बता दें देशबंधु दिल्ली, रायपुर, विलासपुर, भोपाल, जबलपुर तथा सतना से एक साथ प्रकाशित होता है। इसके अलावा इस समूह का छत्तीसगढ से हाइवे चैनल के नाम से सांध्य कालीन दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी होता है। समूह की़ अक्षर पर्व नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका भी प्रकाशित होती है।

कई चैनलों में काम करता हूं पर पांच हजार से ज्यादा नहीं मिलते..

एक बार फिर से कुछ लिखने का मन हुआ.. खबर है कि न्यूज़ चैनेल्स इन दिनों खर्च कम करने में लगे हैं. कस्‍बों में उनके लिए काम करने वालों के लिए ये बुरी खबर है. आज तक, स्टार न्‍यूज और अन्य ने स्ट्रिंगर से काम लेना करीब-करीब बंद कर दिया है. मजबूरी में ही स्ट्रिंगर को याद किया जाता है कि ये शॉट्स भेज दो या ये बाईट भेज दो. बाकी सब एएनआई से ले रहे हैं… इस न्यूज़ एजेंसी ने हजारों स्ट्रिंगर्स के पेट में लात मार दी है.

न्यूज़ चैनल्स से एएनआई महीने की एक मुश्त फीस लेकर फीड दे रही है. यूपी चुनाव के दौरान ऐसा ही कुछ देखने में आया. खार खाए बैठे स्ट्रिंगर्स एएनआई के कैमरा परसन के कार की हवा निकलने की सोचते रहते थे, ताकि वो कवरेज तक न पहुँचने पाए. जाहिर सी बात है सवाल रोज़ी रोटी का था… सन २००० के आसपास एक स्टोरी करने का चैनल्‍स से ४००० रुपये का भुगतान हुआ करता था. कार-टैक्सी, खाना खर्चा अलग… टेप भेजने तक के लिए टैक्सी मिलती थी.. जो अब घटा कर ३०० से ९०० रुपये कर दिया गया है, कुछ चैनल अपनी अटती पर १५०० रुपए तक दे देते हैं.

तस्वीर का दूसरा पहलू देखें.. चैनल में काम करने वालों का वेतन कहाँ से कहाँ पहुँच गया? ..अंग्रेजी चैनल्‍स में तो दो से पांच लाख वेतन आम बात हो गयी. हफ्ते में पांच दिन काम, आठ घंटे की ड्यूटी.. साल में लम्बी छुट्टी, कोई बड़ा ब्रांड है तो कहने ही क्या? एक एक पर हर माह बीस-बीस लाख से ज्यादा का खर्चा, कोई बोलने वाला नहीं. चैनल्‍स चाहे भी तो एक ब्रांड रिपोर्टर कम करके सभी स्ट्रिंगर का पेट पाल सकते हैं… पर ऐसा करे कौन? कस्बों में चैनल्‍स का स्ट्रिंगर भ्रष्ट हो रहा है. उसका जिम्मेदार कौन है? उसे यदि भर पेट रोटी मिले तो शायद पत्रकारिता की गिरावट रोकी जा सकती है… कुछ साल में चिरकुट चैनल्‍स भी आये हैं यानी रिपोर्टर, स्ट्रिंगर बनाने की दुकानें या ये कहें कि चैनल आईड़ी बनाने का कारोबार शुरू हो गया. पांच से पचीस हज़ार दो आईड़ी ले लो खबर कहीं नहीं दिखेगी… वो सिर्फ इसलिए ताकि कस्बों में ब्लैकमेलिंग का धंधा हो सके.. ऐसा क्यों हुआ? कौन जिम्मेदार है?

एक स्ट्रिंगर का मेरे पास फ़ोन आया… सर मेरा वहां करा दो, आपके दोस्त हैं वहां… मैंने पूछा आप तो पहले से ही दो-दो चैनल्‍स में कर रहे हैं… वो बोला भाई साहब दोनों से पांच हज़ार भी नहीं आता… एक और हो जायेगा तो सात आठ हज़ार हो जाएगा बच्चे की फीस…. कहते-कहते वो रुक सा गया… बोला बड़ी परेशानी में हूँ… ऐसे कई लोग हैं जो ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे हैं पर अंदरूनी तौर पर रो रहे हैं… कुछ काम इसलिए नहीं कर सकते क्यूंकि उनकी दुश्मनी पत्रकरिता की वज़ह से समाज में बढ़ गयी है… प्रशासन के साये में रहना मजबूरी है… ग्लेमर भी एक वज़ह है…. भोपाल में एक युवा मित्र है उन्हें एक बड़े चैनल में दूसरे चैनल से लाकर इस लिए रखा गया कि तुम्हे ६ महीने में रिटेनर से रिपोर्टर बना देंगे पर दस साल बीत गए वो रिपोर्टर तो नहीं… स्ट्रिंगर जरूर बन गए… अब आगे उनका क्या होगा? कोई नहीं जानता दस साल बर्बाद हो गए… अब कोई दूसरी नौकरी का विकल्प भी नहीं बचा… पता चला है कि वो शादी-बारात में वीडियो फिल्म बना रहे हैं… क्या करें घर खर्चा चलाना मुश्किल हो गया है.

हम ये इस लिए लिख रहे हैं ताकि नए लोग इस लाइन में आने से पहले दस बार जरूर सोचें… वो लोग ख़ास तौर पर जो कि पत्रकरिता की पढ़ाई या कोर्से करने और टीवी में ख़बरें पढ़ने या रिपोर्टिंग के सपने देखते हैं… दोस्तों बड़े चैनल्‍स जो कि अपने मीडिया संस्थान चला रहे हैं वो आजकल अपने यहाँ नौकरी नहीं दे पा रहे…. इस लिए सोच विचार कर इस दुनिया में आइये…. क्यों कि ये वो दुनिया है जो किसी की सगी नहीं है…. हर कोई अपनी बचाने में लगा है… दूसरे को धक्का मारने में लगा है… यहाँ कोई मर्यादा नहीं है, कोई माप दंड नहीं है… कोई बच्छावत नहीं है… कोई काटजू नहीं है… कोई ब्रॉडकास्टर यूनियन नहीं है… कोई स्ट्रिंगर के लिए मंच नहीं है.. तो ऐ भाई जरा देख के चलो आगे भी नहीं पीछे भी.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

हमार टीवी को स्‍वाति, वीना एवं पूजा ने अलविदा कहा

पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के चैनल हमार टीवी से खबर है कि अंदर के माहौल से परेशान कर्मचारी अब संस्‍थान में आना बंद कर रहे हैं. प्रोग्रामिंग में कार्यरत स्‍वाति राय, वीना सिंह एवं पूजा प्रसाद ने पिछले कई दिनों से कार्यालय आना बंद कर दिया है. खबर है कि इन लोगों ने संस्‍थान को बॉय कर दिया है. ये लोग सैलरी समय पर न मिलने तथा कोई काम न होने के चलते संस्‍थान को अलविदा कहा है. ये तीनों अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. इन लोगों के जाने के बाद प्रोग्रामिंग टीम लगभग खतम हो चुकी है. समझा जा रहा है कि पिछले कई दिनों से ब्‍लैक आउट चल रहे चैनल को और लोग अलविदा कह सकते हैं.

दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर से यूनिट हेड संजय सिंह का इस्‍तीफा

दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर से खबर है कि यूनिट हेड संजय सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे काफी समय से यहां तैनात थे. बताया जा रहा है कि उन्‍होंने पारिवारिक कारणों से दैनिक जागरण को अलविदा कहा है. मूल रूप से पटना के रहने वाले संजय सिंह का परिवार रांची में रहता है. संभावना जताई जा रहा है कि वे अपनी नई पारी रांची में ही दैनिक सन्‍मार्ग से शुरू कर सकते हैं. अखिलेश सिंह के इस्‍तीफा देने के बाद से ही सन्‍मार्ग में जीएम का पद खाली चल रहा है.

संजय सिंह के इस्‍तीफा देने से जागरण के मुजफ्फरपुर यूनिट में खलबली है. संजय सिंह ने करियर की शुरुआत दैनिक भास्‍कर से की थी. उसके बाद हिंदुस्‍तान टाइम्‍स में भी लम्‍बे समय तक कार्यरत रहे. इसके बाद वे दैनिक जागरण से जुड़ गए थे तथा कई यूनिटों की लांचिंग भी कराई थी.

तहलका स्टिंग ऑपरेशन : भाजपा के पूर्व अध्‍यक्ष बंगारू लक्ष्‍मण दोषी करार

आज से 11 साल पहले तलहका के स्टिंग ऑपरेशन में फंसे बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण रिश्वत लेने के दोषी करार दिए गए। अदालत के फैसले के तुरंत बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। सीबीआई की विशेष अदालत आज उन्हें सजा सुनाएगी। इस रिश्वत कांड में बंगारू लक्ष्मण को अधिकतम 5 साल की सजा हो सकती है। अपने पूर्व अध्यक्ष और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के मौजूदा सदस्य के दोषी करार दिए जाने के बाद चाल चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाली बीजेपी का रंग उड़ा हुआ है।

शुक्रवार को ही सीबीआई की विशेष अदालत रिश्वत कांड में बंगारू लक्ष्मण को दोषी करार दिया है। बंगारू लक्ष्‍मण को हिरासत में लेकर दिल्ली के तिहाड़ जेल भेज दिया गया। लक्ष्मण को कोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा-9 के तहत दोषी करार दिया। जज ने कहा कि सीबीआई ने ये साबित कर दिया है कि बंगारू लक्ष्मण ने एक लाख रुपए घूस के तौर पर लिए थे। शनिवार को सजा सुनाई जाएगी। अब सीबीआई की विशेष अदालत शनिवार को ये तय करेगी कि घूस लेने के दोषी पाए गए 72 साल के बंगारू लक्ष्मण को कितनी सजा दी जाए। ये देश में अपनी तरह का पहला ऐसा आपराधिक मामला होगा जिसमें स्टिंग ऑपरेशन में फंसे किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष को सजा मिलेगी।

गौरलबल है कि अनिरुद्ध बहल के तहलका ने 13 मार्च 2001 को अपने स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो जारी किया, जिसमें ये दावा किया गया था कि बंगारू लक्ष्मण ने हथियारों के सौदागर से 1 लाख रुपए रिश्वत ली थी। खुफिया कैमरे में बंगारू लक्ष्मण रक्षा सौदे के फर्जी एजेंट से एक लाख रुपये लेते दिखाई दिए। वेबसाइट 'तहलका डॉट कॉम' ने ऑपरेशन वेस्ट एंड' नाम से अपने स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया था। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक 23 दिसंबर 2000 से लेकर 7 जनवरी 2001 के बीच तहलका के रिपोर्टर ने बंगारू लक्ष्मण से आठ बार हथियार डीलर के तौर पर मुलाकात की। सीबीआई की चार्जशीट में कहा गया है कि 01 जनवरी 2001 को बंगारू लक्ष्मण ने अपने दफ्तर में इन फर्जी एजेंटों से एक लाख रुपये की रकम ली।

स्टिंग ऑपरेशन के खुलासे के बाद साल 2001 में एनडीए सरकार ने इसकी जांच के लिए वेंकटस्वामी आयोग बनाया, लेकिन जनवरी 2003 में जस्टिस के वेंकटस्वामी ने आयोग से इस्तीफा दे दिया। मार्च 2003 में जस्टिस एसएन फूकन आयोग बना। इस आयोग ने पहली रिपोर्ट में जॉर्ज फर्नांडिस को क्लीन चिट दी, लेकिन आयोग की अंतिम रिपोर्ट के पहले ही 2004 में यूपीए सरकार ने फूकन आयोग का काम सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई ने मई 2011 में बंगारू लक्ष्मण के खिलाफ चार्जशीट दायर की। बंगारू लक्ष्मण खुद इस केस की सुनवाई रुकवाने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट गए थे, लेकिन उन्हें कोर्ट से राहत नहीं मिली।

अमर उजाला, गोरखपुर में चार लोग इधर से उधर

अमर उजाला, गोरखपुर में तीन जिलों के ब्‍यूरोचीफों समेत चार लोगों को इधर से उधर किया गया है. जिन जिलों के ब्‍यूरोचीफों को बदला गया है वे हैं देवरिया, कुशीनगर और सिद्धार्थनगर शामिल है. देवरिया के ब्‍यूरोचीफ दिव्‍य प्रकाश त्रिपाठी को गोरखपुर यूनिट बुला लिया गया है. दिव्‍य अमर उजाला के साथ लांचिंग के समय से ही रिटेनर के रूप में जुड़े थे. केके उपाध्‍याय के कार्यकाल में दिव्‍य समेत 13 लोगों को सब एडिटर बना दिया गया था.

सिद्धार्थनगर के ब्‍यूरोचीफ यशोदा श्रीवास्‍तव का तबादला बनानस के लिए कर दिया गया है. यशोदा भी लांचिंग के समय से ही अमर उजाला से जुड़े हुए हैं. खबर है कि इन्‍हें कुछ विवादों के चलते बनारस रवाना किया जा रहा है. कुशीनगर के ब्‍यूरोचीफ अवधेश मल्‍ला का तबादला संतकबीरनगर के लिए कर दिया गया है. वहां के ब्‍यूरोचीफ बीके मणि अवधेश मल्‍ल को रिपोर्ट करेंगे. खबर है कि इससे नाराज बीके इस्‍तीफा देने का मूड बना चुके हैं. गोरखपुर में तैनात विनोद तिवारी का तबादला मेरठ के लिए कर दिया गया है.   

फेसबुक पर टिप्‍पणी के बाद मीडियाकर्मी आपस में भिड़े

: दोनों पक्षों ने दर्ज कराया मुकदमा : रुद्रपुर : फेसबुक पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी लिखने पर मीडिया कर्मी आपस में भिड़ गए। दोनों पक्षों में जमकर मारपीट हुई। इसमें एक पत्रकार गंभीर रूप से घायल हो गया। उसका जिला अस्पताल में उपचार चल रहा है। सूचना पर अस्पताल पहुंचे दोनों पक्ष के समर्थकों में पहले कोतवाली और बाद में अस्पताल में हाथापाई हुई। गुरुवार देर रात मीडिया कर्मी आपस में भिड़ गए।

दोनों पक्षों में जमकर चले लाठी-डंडों में दो मीडिया कर्मी घायल हो गए। बाद में उनके परिचितों ने दोनों को जिला अस्पताल पहुंचाया। इसमें एक का जिला अस्पताल में उपचार चल रहा है। मारपीट की खबर लगते ही अन्य मीडिया कर्मी और लोग अस्पताल पहुंच गए। वहां वे दो पक्षों में बंट गए और उनकी आपस में नोकझोंक हुई। नोकझोंक की सूचना पर सीओ सिटी पंकज भट्ट मौके पर पहुंचे। उन्होंने वहां से अवांछित लोगों को लाठियां फटकार कर खदेड़ दिया। बाद में मीडिया कर्मी कोतवाली पहुंचे और वहां भी उनकी जमकर बहस हुई। सूचना पाकर भाजपा विधायक राजकुमार ठुकराल भी कोतवाली पहुंच गए।

न्यूज चैनल के आकाश आहूजा ने कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराते हुए कहा कि सांध्य दैनिक के प्रदीप बोरा ने उनके फेसबुक एकाउंट पर आपत्तिजनक बातें लिखीं। जब उसने आपत्ति जताई तो प्रदीप ने उसे एक होटल में बुलाया। जब वह वहां पहुंचा तो प्रदीप और उसके तीन अन्य साथियों ने लाठी-डंडों से पीटकर उसे घायल कर दिया। दूसरी ओर प्रदीप ने कोतवाली में तहरीर देकर कहा कि न्यूज चैनल के आकाश ने उसे फोन कर होटल में खाने को बुलाया। मना करने पर बार-बार आग्रह किया। इस पर आकाश, गौरव कपूर, राजीव तथा तीन अन्य उसके घर आ धमके और उसे लाठी-डंडों से पीटकर घायल कर दिया। अस्पताल में चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद आकाश को छुट्टी दे दी। प्रदीप का अभी इलाज चल रहा है। इसी मामले में न्यूज चैनल के पीएस रावत ने भी आकाश, सौरभ, विक्रम व राजीव के खिलाफ पीटकर मोबाइल छीनने व जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया। साभार : जागरण

एए तन्‍हा ने हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा दिया

यशवंत जी नमस्कार, मैं वर्ष 2009 से अभी तक हिन्दुस्तान में किच्छा जिला उधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड में रिपोर्टर के पद पर तैनात हूं। परन्तु प्रबंधन द्वारा किच्छा क्षेत्र में विज्ञापन प्रतिनिधि के रूप में सरकारी भूमि पर कब्जा जमाये बैठे और उस पर ढाबा चला रहे व्यक्ति को तैनात किये जाने से तथा उसे विज्ञापन के लिये सहयोग देने का दबाब डालने पर नाराज होकर मैं अपने पद से इस्तीफा दे रहा हूं। वास्तविकता जानने के बाबजूद प्रबंधन द्वारा ऐसे व्यक्ति की पैरवी किया जाना हिन्दुस्तान समाचार पत्र जैसे बड़े समूह के लिये एक शर्मनाक उदाहरण है।
 
पूर्व में भी उक्त व्यक्ति ने विज्ञापन प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के लिये भारी दबाब बनाया था। परन्तु प्रबंधन द्वारा स्पष्ट जबाब दिया गया कि हिन्दुस्तान जैसे बड़े बैनर में चाय बेचने वालों, ढाबों पर रोटी पकाने वालों तथा दलाली करने वालों तथा सरकारी तथा गैर सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों को कोई स्थान नहीं दिया जायेगा। जबकि विगत माह ही हिन्दुस्तान में ऐसे लोगों को संरक्षण दिया जा रहा है, जिसकी टीस के चलते मैंने इतने बड़े बैनर से मुहं मोड़ते हुये त्यागपत्र दिया है। मीडिया जगत में भूमाफियाओं का प्रवेश चिन्ता का विषय है। अपनी 20 वर्ष की पत्रकारिता के दौरान आज तक विभिन्न बड़े बैनरों जैसे अमर उजाला, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, राष्ट्रीय सहारा, उत्तर उजाला, दैनिक आज, स्वतन्त्र भारत, लोकमत, दैनिक प्रस्ताव, दैनिक पेज थ्री, दैनिक शाह टाइम्स आदि में निष्पक्ष एवं सफलता पूर्वक बेदाग छवि के कारण संस्थानों को समर्पित होकर कार्य किया। और उक्त संस्थानों के प्रबन्धकों से आज भी मधुर सम्बन्ध बने हुये हैं। जो मेरी ईमानदारी का प्रमाण है।
 
यशवंत जी, आपको अवगत करा दूं कि 2009 में नियुक्ति के समय स्थानीय संपादक रहे श्री दिनेश जुयाल जी ने संपादकीय विभाग में (रिपोर्टिंग) के लिये सशर्त नियुक्ति दी थी। जिसमें निर्भीक पत्रकारिता एवं विज्ञापन रहित कार्य करने के निर्देश दिये गये थे। परन्तु श्री जुयाल जी एवं श्री पाठक जी के स्थानीय संपादक रहते गलत लोगों का हिन्दुस्तान समाचार पत्र में प्रवेश नहीं हो सका। अब निष्पक्ष छवि के रिपोर्टर अब इस बड़े बैनर से किनारा कर रहे हैं। जिसमें काशीपुर, उधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड से नवीन देउपा के भी हिन्दुस्तान छोड़ने की भी खबरे आ रही हैं।
 
एए तन्‍हा

रिपोर्टर
दैनिक हिंदुस्‍तान
किच्‍छा, जिला उधम सिंह नगर
उत्‍तराखंड
मो0 9837847573

तब कहां चले जाते हैं ये अर्णव गोस्वामी टाइप लोग (स्वामी अग्निवेश का इंटरव्यू)

देश में नक्सलवाद गहन चिंता का विषय बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री इसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हैं। नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठकें होती हैं। माओवाद का कड़ाई से मुकाबला करने का प्रण लिया जाता है। सरकार कभी शांति प्रक्रिया की बात करती है, तो कभी आपरेशन ग्रीनहंट चलाती है। इधर माओवादी पहले से ज्यादा आक्रामक होते दिख रहे हैं। उड़ीसा के अपहरण प्रकरणों के बाद छत्तीसगढ़ में भी कलेक्टर का अपहरण कर लिया जाता है। माओवादियों की अपनी मांगें हैं और सरकार की अपनी नीतियां। अपहृतों की रिहाई के लिए दोनों ओर से मध्यस्थों के नाम तय होते हैं। लेकिन यह सिलसिला कहां जा कर थमेगा, यह आज का बड़ा सवाल है।

सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने गत वर्ष छत्तीसगढ़ में पांच जवानों की माओवादियों से रिहाई में सफल मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। उनके मुताबिक माओवादियों की हिंसा सही नहीं है, लेकिन सरकार का रवैया भी उतना ही गलत है। स्वामीजी शांतिप्रक्रिया के पक्षधर हैं और 'गोली नहीं बोली' उनका नारा है। नक्सलवाद के उदय से लेकर आज तक की परिस्थितियों पर देशबन्धु के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ने स्वामी अग्निवेश से विस्तार से बातचीत की, पेश हैं उसके संपादित अंश।

प्र.  पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ में नक्सली कैद में बंधक जवानों को छुड़वाने के लिए आपने मध्यस्थता की थी और सफल भी हुए थे। इस बार कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन के अपहरण मामले में नक्सलियों ने मध्यस्थ के रूप में आपका नाम नहीं दिया है। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

उ. मध्यस्थों का नाम लेते हुए उन्होंने जो चिट्ठी भेजी है, उसमें आखिरी में मेरे नाम का जिक्र है। उन्होंने कहा है कि स्वामी अग्निवेश ने खुद इसकी पहल की है। वे शांति प्रक्रिया के लिए 2010 से प्रयासरत हैं। हम उनकी सराहना करते हैं। लेकिन हम नहीं चाहते कि वे छत्तीसगढ़ सरकार के हाथों किसी भी प्रकार की बदनामी का शिकार हों। इसलिए हम उनके नाम की घोषणा नहीं कर रहे हैं।

प्र. आपने कई मंचों से सरकार और माओवादियों के बीच मध्यस्थता के लिए स्वयं बढ़कर पहल की है। और एक मौका ऐसा आया भी। अब अगर आपको मध्यस्थता का प्रस्ताव मिलता है तो आपकी रणनीति क्या होगी?

उ. देखिए मैं तो शुरू से ही इसका पक्षधर रहा हूं। जब मैं 6 से 10 मई 2010 तक रायपुर से दंतेवाड़ा की यात्रा पर था, तब जो मेरा नारा था वही आज भी है, गोली से नहीं बोली से। और इसका सीधा मतलब है कि सरकार को बल प्रयोग और माओवादियों को बंदूक का रास्ता छोड़कर शांति प्रक्रिया के लिए आगे बढ़ना चाहिए जो बातचीत से ही संभव है। अभी भी मुझे पूरा विश्वास है यदि केंद्र की ओर से यह आश्वासन मिले कि अगर अगले तीन महीने किसी भी प्रकार का ऑपरेशन, आपरेशन ग्रीन हंट नहीं करेंगे तो माओवादी भी वार्ता के लिए तैयार हो जाएंगे। और यह अच्छा मौका होगा जब इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए एक शांतिपूर्ण वातावरण बनेगा। फिर इस वातावरण में एक बैठक बुला सकते हैं। शुरुआत के लिए इनके जो साथी जेल में बंद हैं, इनके पोलित ब्यूरो के जो सदस्य हैं, जैसे नारायण सान्याल रायपुर सेंट्रल जेल में हैं, कोबाद गांधी तिहाड़ जेल में बंद हैं, ऐसे पांच-दस लोग जो जेल में हैं उनको पैरोल पर छोड़कर बातचीत के लिए बिठाया जा सकता है। दूसरी तरफ सरकार भी प्रधानमंत्री की पहल पर उच्च स्तरीय अपना एक प्रतिनिधि मंडल गठित कर ले। और प्रधानमंत्री हर बार नहीं उपलब्ध हो सकते, तो उनके नुमांइदों के रूप में ए.के.एंटोनी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन या आदिवासी कल्याण मंत्री ऐसे किसी को मनोनीत किया जा सकता है। इसी प्रकार कुछ समाजसेवी संगठनों से भी शांतिप्रक्रिया के लिए सदस्य बनाए जा सकते हैं। बीडी शर्मा जैसे लोग बहुत अनुभवी लोग हैं। ऐसे लोगों के साथ गोलमेज बैठक हो और विचार किया जाए कि समस्या क्या है, उसकी जड़ में क्या है। जब जड़ में जाने की बात होगी तो यह समझ में आएगा कि यह कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। और इसलिए राज्यों का भी अकेला मामला नहीं है, क्योंकि कानून व्यवस्था की बात राज्यों से तुरंत जोड़ दी जाती है और केंद्र कहता है हम मदद करेंगे। जब जड़ में जाएंगे तो पहला सवाल उठेगा कि पिछले 60 सालों से भारतीय संविधान का जो सबसे पवित्र हिस्सा है, आदिवासियों के लिए 5वां अनुच्छेद लागू क्यों नहीं किया गया। इसके लिए कौन लोग जिम्मेदार थे। या अब भी हैं। आप अपने संविधान को ठीक से कैसे लागू कर सकते हैं। 1996 में बनाया गया पेसा कानून अब तक लागू क्यों नहीं किया गया। वन अधिकार अधिनियम को बने 6 साल हो गए, वह क्यों नहीं लागू हुआ। सरकार के कानूनों की समीक्षा, संवैधानिक धाराओं की समीक्षा इस प्रकार हो जाएगी। इसके अलावा माओवादियों की ओर से मांग है कि प्रतिबंध हटाओ, प्रतिबंध हटाते ही हम सामने आ जाएंगे। सामने आ जाएंगे का मतलब कि लड़ने के प्रजातांत्रिक तरीके, धरना, प्रदर्शन, जुलूस उनका इस्तेमाल होगा। तब छिपने-छिपाने का औचित्य नहीं रह जाएगा। उन पर प्रतिबंध लगाकर हमने उनको अंडरग्राउंड होने का मौका दिया है, वे हथियार उठा रहे हैं और हमारे पास उनके लाइसेंस जांचने का कोई अवसर नहीं है। वे खुद मांग कर रहे हैं कि हमारे ऊपर से प्रतिबंध हटाओ ताकि हम प्रजातांत्रिक तरीके से अपने संगठन को आगे बढ़ाएं। अब यदि सरकार या समाज को यह डर हो कि उनको प्रजातांत्रिक तरीके से विरोध की छूट दे दी और उनके विचारों में जो आग है उससे ये देश पर छा जाएंगे, तो मैं समझता हूं कि उन्हें छा जाना चाहिए। जो विचार हैं उनके पास, शक्ति, ऊर्जा, समर्पण है, तो हो सकता है वे आगे निकल आएं। उनके विचारों से हमारे विचार शायद न भी मिलते हों। पर उनकी क्रांतिकारिता अगर लोगों को आकर्षित करती है तो करे। कहने का मतलब फिर विचारों की लड़ाई होगी। उसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए। लेकिन सरकार ने प्रतिबंध लगाकर उनको अंडरग्राउंड कर रखा है और अंडरग्राउंड लोगों पर कार्रवाई के लिए सेना या पैरा मिलिट्री फोर्स लगा रखी है। और अब तो अबूझमाड़ के दरवाजे पर सेना का एक बड़ा शिविर तैनात है। इन सब चीजों को देखकर नहीं लग रहा कि बंदूक के बल पर इसका कोई समाधान हो पाएगा। सवाल यह है कि सरकार को यह समझ में आना चाहिए कि यह समस्या आज या पिछले कुछ सालों में पैदा नहीं हुई है। यह 1967 में शुरु हुई थी। जो भूमिहीन थे उन्होंने नक्सलबाड़ी में विद्रोह किया। अगर देश की आजादी के बाद भूमि समस्या का समाधान सही ढंग से हो गया होता, तो न नक्सलबाड़ी में कोई विद्रोह होता न देश में माओवाद पनपता। जड़ में जाने के लिए भूमि सुधार कानून लागू करना होगा। इस कानून के तहत 18 एकड़ से अधिक भूमि आप नहीं रख सकते और सरप्लस जमीन भूमिहीनों में बांटी जानी चाहिए, लेकिन जिन्होंने फर्जी तरीकों से भूमि हड़प ली, क्या आप उनका कुछ कर पाए। यह कानून ईमानदारी से पहले दिन से लागू नहीं किया गया। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में पहले दिन से बेईमानी आ गई, कहा गया कि बड़ा सफल आंदोलन रहा, हजारों एकड़ जमीन दान में मिली। लेकिन लोगों ने पथरीली, बंजर जमीन दान में दे दी और उसका भी आबंटन अब तक नहीं हुआ। कहने का तात्पर्य यह है कि भूमि अर्थात जल, जंगल, जमीन और खनिज का प्रश्न अब आ गया है और इसके साथ मूल प्रश्न यह उठता है कि देश किसका है। जिसे हम भारत कहते हैं वह किसका है, मंत्री, मुख्यमंत्री, टाटा, बिड़ला, अंबानी या देश की जनता का है। संविधान जिसकी शुरुआत में ही हम भारत के लोग कहा जाता है, उसे बनाने वाली जनता है, देश का मालिक जनता है। इसकी संपदा कामालिक जनता है। जनता हर जगह नहीं जा सकती, इसलिए प्रजातांत्रिक निर्वाचन प्रणाली बनायी गई। इसका यह अर्थ नहीं है कि जनप्रतिनिधि जनता के मालिकाना हक को ही छीन ले। मूल प्रश्न प्राकृतिक संपदा के स्वामित्व का है। कोई भी निर्णय मालिक की सहमति से लिया जाना चाहिए, उसे धता नहीं बताई जा सकती। प्राकृतिक संपदा पर सबका समान हक होना चाहिए, गैर आदिवासी समाज में ऐसा नहीं है लेकिन आदिवासियों में आज भी सामाजिक स्वामित्व की परंपरा है। संविधान में निहित भावना को और ईमानदारी से लागू करने की जरूरत है। बातचीत में जब ये सारी चीजें निकलेंगी तो हमें हमारी गलतियों का एहसास होगा कि माओवाद आसमान से नहीं आया, चीन या रूस से आयात होकर नहीं आया। हमारी गलतियों ने उसके लिए जमीन तैयार की। गरीब परिवार को विकास के नाम पर जमीन से बेदखल किया और जिनका जल, जंगल, जमीन से कोई लगाव नहीं उनको यहां बिठा दिया गया। विदेशी बैंकों में पूंजी बढ़ाने से अधिक उनका कोई स्वार्थ नहीं। जो सदियों से, परंपरा से, और संविधान से मालिक थे, उनको बेदखल किया गया। लड़ाई के मूल में ये सवाल है, इसे टालते रहेंगे, नहीं समझेंगे तो गलत होगा। एलेक्स पाल मेनन तो बहुत अच्छा काम कर रहे थे, उनसे किसी को क्या झगड़ा है, लेकिन वे इसी राज्य सरकार का प्रतिनिधत्व कर रहे थे, विनील कृष्णन भी अच्छा काम कर रहे थे। बस्तर में आज भी तीन चौथाई जमीन पर गैर आदिवासियों का कब्जा है। यह कैसे हुआ, इसे ठीक करने की किसमें इच्छाशक्ति है। डॉ. रमन सिंह या किसी और में यह है क्या? संविधान को सही तरीके से हमने लागू नहीं किया और इसके अपराधी हम हैं।

प्र. जहां विकास हो रहा है, वहां माओवादी ज्यादा आक्रमण कर रहे हैं। एलेक्स पाल मेनन हों या झिना हिकाका, इन्होंने विकास के कई काम किए।

उ. यदि कोई विकास कर रहा है और उसका अपहरण हुआ है या सिपाही मारे जाते हैं, तो कहा जाता है कि सिपाही क्यों मारे जा रहे हैं। वो भी तो गरीब हैं। कलेक्टर हो या सिपाही ये सरकार के प्रतिनिधि हैं, तो उनका कहना भी इतना ही है कि तुम अपने दायरे में रहो, हमारे पीछे मत पड़ो। जंगल में आकर खोजबीन करना, पता लगाना, ये सब न करो, तो हमारा-तुम्हारा कोई झगड़ा नहीं है। यदि तुम हमारी खोजबीन में लगोगे तो हमें अपनी सुरक्षा के लिए कदम उठाना होगा। इसलिए वे सिपाही को मारते हैं, कलेक्टर-विधायक का अपहरण करते हैं। उनका किसी के नाम से नहीं, पद से झगड़ा है। अब हम उनसे पूछें कि तुम इस जगह के मालिक कैसे हो, वे हमसे पूछेंगे कि आप कैसे यहां के मालिक हुए। तो इसके लिए समीक्षा होना जरूरी है। मैं ये नहीं कहता कि माओवादी मालिक हैं, लेकिन ये भी उतनी ही ताकत से कहूंगा कि डॉ. रमन सिंह भी मालिक नहीं हैं। डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री होने के नाते जनप्रतिनिधि हो सकते हैं। लेकिन किनके हितों के लिए काम हुआ, गरीब आदिवासियों के हितों के लिए नहीं हुआ। इसकी समीक्षा कौन करेगा, कब होगी? चूंकि सरकार के ये प्रतीक है, इसलिए उन्हें दिक्कत हो रही है। विनील कृष्णन मलकानगिरी के उस ओर विकास के लिए गए, उनके पहले का कोई कलेक्टर नहीं गया। एक छोटा सा पुल था, जो आठ सालों से नहीं बन पाया था, विनील कृष्णन ने बनवाया। संपर्क मार्ग, पुल की कमी के कारण बीमार आदिवासी इलाज के अभाव में मर जाते थे, लेकिन एक छोटा सा पुल नहीं बनाया जा सका। तब तो माओवाद नहीं था। इन आदिवासियों की मौत के लिए अपराधी कौन था। क्या वे जानवर थे, जिन्हें ऐसे ही मर जाना चाहिए था। वहां अस्पताल, सड़कें, बिजली, स्कूल क्यों नहीं बनाए गए। माओवादी 26 जनवरी 1950 को तो पैदा नहीं हो गए थे। संविधान पूरे देश के लिए लागू हुआ या केवल अपने रिश्तेदारों के लिए। अभी भी आप देख लीजिए, सारे पद रिश्तेदारों के लिए हैं, पूरी बेशर्मी से ऐसा चल रहा है।

प्र. क्या अपहरण, मारकाट का माओवादी रवैया सही है, जिसमें आम जनता भी पिस रही है?

. नहीं, बिल्कुल गलत है। हिंसा की पहले शब्द से मैं निंदा करता हूं। जब मैं रायपुर से दंतेवाड़ा के लिए निकला था, तब भी मैंने निंदा की थी। दिल्ली से चलने से पहले एक पत्रकार ने पूछा था कि 76 जवानों को मार दिया गया, आप क्या कहते हैं? मैंने कहा था कि मैं भर्त्सना करता हूं। उन्होंने कहा कि वामपंथी तो उनकी निंदा नहीं करते हैं। मैंने कहा कि मैं वामपंथी हूं और निंदा भी करता हूं। वे हिंसा करके गलत करते हैं। अभी भी आप देखेंगे कि अच्छे-अच्छे वामपंथी भी इसकी निंदा करते हैं। लेकिन जब हम किसी चीज को हिंसा कहते हैं तो उसका यह अर्थ नहीं है कि राज्य सत्ता का अभिक्रम हिंसक नहीं है। दो तरह की हिंसा हो रही है-एक कलेक्टर का अपहरण किया जाना और दूसरी तरफ उसी बस्तर में 17 सौ गरीब आदिवासियों का अपहरण आज से पांच साल पहले हुआ है और वे जेलों में बंद हैं। इस अपहरण के लिए किसी मीडिया, किसी देशबन्धु, किसी चैनल ने क्यों नहीं आवाज उठाई। कलेक्टर के अपहरण पर बड़ा हल्ला है, उसके सारे गुण दिखाई दे रहे हैं, उसकी पत्नी के गुणों की बात हो रही है। टाइम्स नाऊ उनकी पत्नी के साथ बात कर रहा है। लेकिन जब आदिवासी की बेटी के साथ बलात्कार होता है, उसके पिता के सामने उसे काटा जाता है, तो कोई अर्णव गोस्वामी उसका साक्षात्कार क्यों नहीं लेता। प्राथमिकताएं बिल्कुल सड़ी हुई हैं। जैसे आदिवासी इंसान नहीं हैं, कीड़े-मकोड़े हैं। ये हमारी अभिजात्य सोच है। सोनी सोढ़ी के लिए इनके पास समय नहीं है। जो आदिवासी इलाके में शिक्षिका थी, उसे बुरी तरह प्रताड़ित करने वाले अंकित गर्ग को राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया जा रहा है। शर्म से डूब जाना चाहिए ऐसी सोच रखने वालों को और ऐसे चैनल वालों को।

प्र. पत्रकार लिंगाराम कोडोपी आपके यहां कुछ दिन रहे थे। उन पर भी माओवादी होने का आरोप है और वे अब जेल में हैं….

उ. हां, कोडोपी मेरे घर 10-12 दिन रहा था। प्रशांत भूषण ने मुझसे कहा था कि स्वामीजी इसके साथ बड़ी ज्यादती हो रही है, पुलिस इसके पीछे है, इसका एनकाऊंटर हो सकता है, इसे अपने यहां कुछ दिन रहने दीजिए। वह पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, गाजियाबाद में। अब देखिए उसको कह रहे हैं कि वह मास्टरमाइंड है। अब कल्लूरी तय कर रहे हैं कि कौन मास्टरमाइंड है, कौन माओवादी। तो ये सब बातें मैं नजदीक से देखता हूं, मैंने तो रमन सिंह को भी काफी नजदीक से देखा है। जब मैं पांचों जवानों को छुड़ाकर लाया, तो रायपुर सर्किट हाउस में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने मेरी काफी तारीफ की। बहुत बड़ा काम किया, अच्छा काम किया आपने। मैंने भी उनसे कहा आप भी एक छोटा सा काम कर दीजिए। जिनके खिलाफ कोई आरोप नहीं है, उनमें से सबसे गरीब, निहायत बेकसूर पांच आदिवासी छोड़ दीजिए। परंतु आज तक नहीं किया उन्होंने।

प्र. डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जवानों के मरने पर कुछ नहीं बोलते और यदि कोई माओवाद समर्थक या माओवादी पकड़ा जाता है या मारा जाता है तो उनके हिमायती बनते हैं। क्या सचमुच ऐसा है?

उ. नहीं। मैंने तो आपके सामने बात रखी कि पांच जवानों को माओवादी उठाकर ले गए। यदि इनके सगे संबंधी को उठाकर ले जाते तो क्या 18 दिनों तक ये सो सकते थे। वो गरीब सिपाही था, उसके रिश्तेदार मारे-मारे फिर रहे थे और आखिर में उन्होंने मान लिया था कि सरकार कुछ नहीं करेगी। तब मुझे मध्यस्थता के लिए डॉ. रमन सिंह का फोन आया और मैं अपने साथियों व मीडियाकर्मियों के साथ जाकर उन्हें छुड़ाकर लाया। मैं कोई एहसान नहीं जता रहा हूं। मैंने तो उनसे 17 सौ में से केवल पांच गरीब, बेकसूर आदिवासियों को छोड़ने की बात की थी, उन्होंने हां भी कहा था। पत्रकारवार्ता में उन्होंने कहा था कि बातचीत से ही हल संभव है, बलप्रयोग से नहीं। अब बातचीत का वो रास्ता कहां गया? मैं उनके पीछे महीनों लगा रहा कि कोई पहल तो हो।

प्र. सरकार बार-बार कहती है कि माओवादी हथियार त्याग दें तो हम वार्ता के लिए तैयार हैं। क्या यह शर्त संभव है?

उ. हथियार छोड़ने के लिए वो भी तैयार हैं लेकिन सरकार भी हो। यह साथ-साथ होगा। आपके पास हथियार हैं और मेरे पास भी। आप कहेंगे यह आपकी आत्मसुरक्षा के लिए है, वे कहेंगे यह उनकी सुरक्षा के लिए है। तो हथियार साथ-साथ रखने होंगे। आज रात को 12 बजे घोषणा करें, मेरे पास माओवादियों के राष्ट्रीय नेता राजकुमार उर्फ आजाद का पत्र है जिसमें कहा गया था कि दोनों ओर से युध्द विराम हो तो हम 72 घंटे नहीं वरन 72 महीने के लिए हथियार छोड़ देंगे। पर यह परस्पर पूरक हो।

प्र. आपने यह प्रस्ताव सरकार को दिया?

उ. बिल्कुल, मैंने तुरंत लाकर दिया। मेरी चिट्ठियां आप अपने अखबार में छाप सकते हैं। पहले तो 6 मई से 10 मई 2010 तक की घटनाएं सिलसिलेवार आपके पास होंगी ही। 11 मई को पी. चिदम्बरम की चिट्ठी मेरे पास आई, सीलबंद लिफाफों में। उसमें पांच चरणों में युध्द विराम का प्रस्ताव है। मैंने इसका जिक्र माओवादियों से किया। उन्होंने कहा चिट्ठी दिखाइए, मैंने कहा नहीं दिखा सकता, क्योंकि यह गोपनीय पत्र है। उन्होंने इसे बकवास करार ठहराते हुए गृहमंत्री को झूठा बताया। अगले दिन 12 मई को मैं गृहमंत्री से मिला। मैंने उनसे पूछा कि आपकी नजर में माओवादी क्या हैं? क्या ये आतंकवादी हैं या अलगाववादी हैं। चिदम्बरम का जवाब था न वे आतंकवादी हैं, न अलगाववादी। वे अलग राज्य की मांग नहीं कर रहे हैं। लेकिन वे राज्य विद्रोही हैं। मैंने कहा बात जब भी होगी किससे होगी। राज्य से ही होगी न। वे चुनाव को नहीं मानते, लेकिन जब आपको गृहमंत्री के रूप, जनप्रतिनिधि के रूप में मान रहे हैं, बात के लिए तैयार हो रहे हैं तो चुनाव और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मान ही लिया न। लेकिन वे अपनी चिट्ठी को गुप्त ही रखना चाह रहे थे। और मुझसे उनके सूत्रों के बारे में पूरी जानकारी ले ली। इसके बाद 17 मई को यूपीए-2 का एक साल पूरा होने पर सीएनएन-आईबीएन को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने जेब से यही पत्र निकाला और दिखाकर कहा कि हम शांतिप्रक्रिया के पक्षधर हैं और उनसे केवल यह कह रहे हैं कि आप अपनी बंदूक अपने पास रखिए, केवल 72 घंटे चलाइए नहीं। इस पत्र को मैंने स्वामी अग्निवेश को मध्यस्थता के लिए दिया है। मैं इस कार्यक्रम को देखकर चौंक उठा, क्योंकि मुझसे अब तक इस पत्र के बारे में अतिगोपनीयता बरतने की सलाह दी गई थी। मैंने अगले दिन फोन किया कि चिदम्बरम जी आपने तो इसे गोपनीय नहीं रखा। तो उनका जवाब था कि हां मुझे खुलासा करना पड़ा। आप भी अपनी ओर से खुलासा कर दीजिए। मैं उसी समय नागपुर रवाना हुआ और वहां जाकर पत्रवार्ता में इसका जिक्र किया और पत्रकारों से कहा कि इसे पूरा छापो, ताकि कहीं से भी माओवादियों तक यह चिट्ठी पहुंचे। मैंने अपने सूत्र के द्वारा भी एक प्रति उन तक पहुंचाई। 19 मई को मैंने प्रेस वार्ता ली। 20 तक उनके हाथों में पहुंची होगी। 31 मई को उनकी ओर से आजाद की चिट्ठी आती है कि हम तैयार हैं।

प्र. फिर क्या हुआ?

उ. वह चिट्ठी यहां 6 जून तक पहुंची। 7 जून को मैं फिर चिदम्बरम से मिला। उन्हें चिट्ठी दिखाई कि वे तैयार हैं। पांच सालों से प्रधानमंत्री चिल्ला रहे हैं कि यह आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आप भी कई महीनों से 72 घंटे के युध्द विराम की बात कर रहे हैं। 11 मई को आपकी चिट्ठी मिली और 6 जून को उनका जवाब भी हमारे हाथों में है। और आपको क्या चाहिए। वे कहने लगे नहीं, नहीं ये झूठे हैं, बेईमान हैं। वे पहले उनसे 72 घंटे बंदूक रखने की बात चाह रहे थे। मैंने कहा वे एक साथ हथियार रखना चाहते हैं। उनका कहना था नहीं, मुझे आठ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को तैयार करना होगा, पैरामिलिट्री बल को तैयार करना होगा। मैंने दूसरी चिट्ठी माओवादियों को 26 जून को दी, कि गृहमंत्री आपसे चाह रहे हैं कि एक तारीख तय कीजिए जहां से 72 घंटे शुरु होंगे। सूत्रों से उन्होंने मुझे संदेश दिया कि स्वामीजी सरकार के कहने से हम तारीख नहीं देंगे। सरकार खुद तारीख तय करे। बहरहाल आप हमें कोई तारीख दीजिए, हम उसे मान लेंगे। मैंने उन्हें तीन तारीखें दीं 10 जुलाई, 15 जुलाई और 20 जुलाई। 30 जून को मेरी चिट्ठी लेकर उनका वही प्रवक्ता आजाद नागपुर पहुंचा, दिल्ली से हेमचंद पांडे पहुंचा, 3 बजे उन्हें एक सिनेमा हॉल के सामने मिलना था किसी से, जो उन्हें दंडकारण्य ले जाता। वहां वे सलाह करके मुझे एक तारीख बताते। इसी बीच 28 जून को मैं आदिवासियों के एक सम्मेलन में आस्ट्रेलिया, ब्रिस्बेन गया। इधर 1 जुलाई की रात को उनका एनकाऊंटर हो गया। आंध्रप्रदेश पुलिस ने उन्हें मारा। महाराष्ट्र में आंध्रप्रदेश पुलिस कैसे आ सकती है? मुठभेड़ की पूरी कहानी बना दी गई। पत्रकार हेमचंद पांडे कैसे माओवादी बनाकर मारा गया, यह भी सवाल है।

प्र. इस पूरे प्रकरण की कहानी आप जानते हैं, क्या आपने सरकार से बात की?

उ. मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मैं आस्ट्रेलिया से कार्यक्रम छोड़कर लौट आया, सीधे गृहमंत्री से मिलने का समय मांगा 6 जुलाई को। उनसे पूछा कि ये सब क्या हो गया। वे मुझसे आंख नहीं मिला पाए। बोले हो सकता है आंध्रप्रदेश पुलिस को उसकी तलाश थी। उस पर 12 लाख रुपए का इनाम भी था। ऐसी परिस्थिति में ये घटना घट गई होगी। ये कैसे हो सकता है, मैं उससे बातचीत कर रहा हूं, आपको बता रहा हूं, मीडिया में ये बात है और वो पुलिस द्वारा मार दिया जाता है। क्या पुलिस को नहीं पता कि वो किसे मार रहे हैं? वे बोले नहीं, वे अपनी डयूटी निभा रहे थे। मैंने कहा आपकी जानकारी में लाए बगैर उसे कैसे मार दिया गया? वे बोले नहीं, मुझे कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन वे कह रहे हैं कि मुठभेड़ फर्जी है, तो आप न्यायिक जांच के आदेश दे दीजिए, दो महीने के अंदर सच और झूठ का फैसला हो जाएगा। जब दो दिन बाद हेमचंद पांडे की लाश दिल्ली आई तो कोई उसे रखने को तैयार नहींथा। जब मैंने अपने यहां रखने दिया तो गृह मंत्रालय से संयुक्त सचिव का फोन आया कि आपको ऐसा न करने की सलाह दी जाती है, आप तकलीफ में पड़ सकते हैं। मैंने कहा जो खतरा होगा, होने दो। मृत शरीर का सम्मान होना चाहिए। अगले दिन उसका दाह संस्कार हुआ। इधर जब गृहमंत्री ने मेरे प्रस्ताव (फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच) को मना कर दिया तो मैं प्रधानमंत्री से मिला। उन्होंने आधे घंटे मुझसे बात की। न्यायिक जांच पर वे सहमत हुए, मैंने कहा कि ठीक है मैं पत्रकारों को बता देता हूं कि जांच होगी। उन्होंने कहा अभी नहींबताइए, चार-पांच दिन रुक जाइए। इस बीच मैं चिदम्बरम को भी तैयार कर लूंगा। मुझे हंसी भी आई कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मैं गृहमंत्री को तैयार कर लूंगा। मैं चार-पांच दिन क्या चार-पांच महीने तक इंतजार करता रहा, लेकिन कुछ नहींहुआ। अब मुझे मिलने का समय देना बंद कर दिया प्रधानमंत्री ने। मैं राहुल गांधी से मिला, उन्होंने आधा घंटा मुझसे बात की, सारे कागज देखे। उन्होंने कहा कि जांच जरूर होनी चाहिए। फिर मैं सलमान खुर्शीद, अरूण जेटली, राजनाथ सिंह, आडवानी सबसे मिला। भाजपा के नेताओं से मैंने कहा कि आपकी मोदी सरकार पर फर्जी मुठभेड़ के आरोप लग रहे हैं। आप भी सवाल उठाइए कि ये कैसी मुठभेड़ है? लेकिन कोई खतरा मोल लेने को तैयार नहींथा। कांग्रेस, भाजपा सब एक हैं। अंतत: मैं सुप्रीम कोर्ट गया, याचिका दायर की। 14 जनवरी 2011 को मैंने याचिका दायर की और 14 मई को फैसला आया कि सीबीआई तीन महीने के भीतर जांच करे। लेकिन अभी जाकर पिछले महीने उसकी रिपोर्ट आई है, जो गोपनीय रखी गई थी। प्रशांत भूषण को इस रिपोर्ट को जांचने दिया गया और जब उसकी कमजोरियों को सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया गया तो वह भी हैरान थी कि इतनी कमजोर रिपोर्ट सीबीआई कैसे तैयार कर सकती है। 27 अप्रैल को इस पर फिर सुनवाई है। आजाद और हेमचंद पांडे की मौत से मुझे बहुत दुख हुआ था, मैंने सोचा था कि एक बड़ा काम भारत में हो जाएगा। बहरहाल, 20 जुलाई को प्रधानमंत्री से मिलने के बाद मैंने 21 जुलाई को माओवादियों को पत्र लिखा कि मैंने प्रधानमंत्री से बात की है, तो आप भी धीरज रखें, शांति प्रक्रिया पटरी से न उतरने दें। आजाद को अगर आप सच्ची श्रध्दांजलि देना चाहते हैं तो उस शांति प्रक्रिया को जारी रखें, जिसके लिए आजाद आगे बढ़ रहा था। ये भाषा चिट्ठी में मैंने लिखी, मैंने तीन तारीखों वाली चिट्ठी और अखबारों की कतरन भी संलग्न होने की बात लिखी। 3 अगस्त को दिल्ली विवि में इसी विषय पर मेरा व्याख्यान था। इसी दिन एक माओवादी नेता श्रीकांत उर्फ सुकांत का मेल आया कि स्वामीजी चिट्ठी लिखवाकर सरकार आपका इस्तेमाल हम तक पहुंचने के लिए कर रही है। आजाद को मार डाला गया। मुझे भी आपकी चिट्ठी मिली तो आंध्रप्रदेश पुलिस ने घेर लिया, मैं बचकर निकल आया, वर्ना मेरा भी एनकाउंटर हो जाता। आप कृपा करके कोई चिट्ठी का आदान-प्रदान नहींकीजिए, जो बोलना है मीडिया में बोलिए, आपका संदेश हम तक पहुंच जाएगा। और यह आखिरी बातचीत हमारे बीच हुई। जिस सरकार को हम प्रजातांत्रिक कहते हैं। मानवीय मूल्यों की रक्षा करने वाले कहते हैं, यह उसका चेहरा है। दूसरी ओर क्रूर, हिंसक, बर्बर, हत्यारे माओवादी हैं। दोनों की तुलना मैं करता हूं तो मुझे सरकार का चेहरा ज्यादा हिंसक लगता है। हालांकि माओवादियों से मेरा दूर तक का कोई संबंध नहींहै। सरकार से तो मैं मिलता-जुलता रहता हूं। यूपीए सरकार के लिए मेरी कहीं न कहीं सहानुभूति है। लेकिन जो अनुभव है, वह यही है।

प्र. आजाद के बाद किशनजी मारे गए। उसके बाद माओवादियों के बीच पत्रकारों का विश्वास खत्म हो गया है। मीडिया के साथ इस अविश्वास को आप कैसे देखते हैं?

उ. क्या किया जाए। सीमाएं हैं, उसमें से रास्ता निकाला जा रहा है। अब मनीष कुंजाम ने कहा मध्यस्थता तो नहीं करूंगा, लेकिन दवाई लेकर जाऊंगा। मैं खुद सोच रहा था कि मैं और कुछ तो नहीं कर सकता लेकिन दवाई जरूर ले जा सकता हूं, यह मानवीय पक्ष है। अगर किसी पुलिस वाले ने मनीष कुंजाम का पीछा किया हो, और यह बात उन तक पहुंच जाए तो फिर अविश्वास होगा। जब जवानों को छुड़ाने मैं गया था तो तत्कालीन डीजीपी विश्वरंजन को और यहां जीके पिल्लै को कहा था कि मैं जा रहा हूं और आपसे केवल एक प्रार्थना है कि कोई सिक्योरिटी मेरे साथ नहीं दीजिए, कोई पुलिस वाला आगे-पीछे न हो। वर्ना वो खतरों में पड़ जाएंगे।

राजीव रंजन
लेकिन मेरा काफिला जब गांव पहुंचने वाला था तो पता चला कि सबसे आखिरी वाली गाड़ी में पुलिस वाले मौजूद हैं। मैंने उन्हें कहा कि आप चले जाइए, आपकी जरूरत हमें नहीं है।

स्‍वामी अग्निवेश का यह इं‍टरव्‍यू दैनिक देशबंधु के प्रधान संपादक राजीव रंजन श्रीवास्‍तव ने लिया है. यह इंटरव्‍यू देशबंधु में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया जा रहा है.

इटावा में सपा के हिस्‍ट्रीशीटर कार्यकर्ता ने पत्रकार का कैमरा छीना

: पुलिस ने दिखाया सत्‍ता प्रेम – पत्रकारों के विरुद्ध भी दर्ज किया मुकदमा : इटावा समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सपा कार्यकर्ताओं से कानून की हद में रहने और अनुशासन न तोड़ने के निर्देश दिए हैं. उसके बाद भी आये दिन सपा कार्यकर्ताओं की गुंडई रुकने का नाम नहीं ले रही. इटावा के ऊसराहार में किसानों द्वारा गेहूं खरीद केंद्र पर बिचौलियों के माध्यम से गेहूं की खरीद होने की शिकायत पर पत्रकारों की टीम गेहूं खरीद केंद्र पर पहुंची.

केंद्र प्रभारी से जानकारी ले कर जब पत्रकारों की टीम वापस जा रही थी तभी वहां पर सपा कार्यकर्ता कश्मीर लाल आ धमका और खुद गेहूं बेचने की बात कहते हुए धमकाने लगा. जब उसकी यह असलियत पत्रकारों ने कैमरे में कैद करनी चाही तो उसने हमला बोलते हुए स्वयं की तस्वीरों के कैद वाला कैमरा ही छीन लिया. अचानक सपा कार्यकर्ताओं के हमला बोलने से वहां पर अफरा-तफरी मच गयी. हमलावर सपा कार्यकर्ता कश्मीर लाल को थाना ऊसराहार ने हिस्ट्रीशीटर घोषित किया था. इसके साथ ही रासुका सहित कई अन्य मामलों में वह जेल जा चुका है. पीड़ित पत्रकार जब थाने पहुंचे तो पत्रकारों पर समझौते का दबाव पुलिस द्वारा डाला गया. समझौता न होने पर पत्रकारों की तहरीर पर लूट का मामला दर्ज कर लिया गया और हिस्ट्रीशीटर सपा कार्यकर्ता की तहरीर पर पत्रकारों के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया गया.

अमर उजाला में नीरज एवं मुकेश का तबादला, अमित प्रभात खबर से जुड़े

अमर उजाला, गाजियाबाद से खबर है कि यहां पर तैनात नीरज गुप्‍ता को बुलंदशहर भेज दिया गया है. नीरज ब्‍यूरोचीफ बनाए गए हैं. वहीं बुलंदशहर में अब तक ब्‍यूरोचीफ की जिम्‍मेदारी निभा रहे मुकेश उपाध्‍याय को गाजियाबाद बुला लिया गया है. नीरज गुप्‍ता इसके पहले भी बुलंदशहर और बागपा के प्रभारी के रूप में काम कर चुके हैं. वे लम्‍बे समय से अमर उजाला से जुड़े हुए हैं.

दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर से खबर है कि अमित सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. अमित बिना किसी कारण बेतिया से सस्‍पेंड किए जाने तथा मुजफ्फरपुर तबादला किए जाने से नाराज थे. उन्‍होंने अपनी नई पारी बेतिया में ही प्रभात खबर के साथ की है. उन्‍हें यहां रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है.

आज समाज प्रबंधन के दबाव में दस पत्रकारों ने छोड़ी नौकरी, पंचायत एडिशन भी बंद

शीर्षस्‍थ पदों पर भारी बदलाव करने के बाद भी आज समाज की नैया पार लगाने के बजाए डूबती ही जा रही है. तय समय-सीमा में सै‍लरी नहीं देने से खफा होकर अंबाला संस्‍करण के कई पत्रकार प्रबंधन को आंखें दिखा चुके हैं. इन्‍होंने इस तरह आंखें तरेरी कि प्रबंधन को दिल्‍ली से लाखों का कैश लेकर अंबाला जाना पड़ा और कर्मियों को नकद भुगतान करना पड़ा. इसके बाद प्रबंधन को अपनी शक्ति दिखानी ही थी. प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सबक सिखाने का प्रपंच रचा जाने लगा, जिसके बाद कुछ पत्रकारों ने अपनी मर्जी से तो कुछ ने दबाव में नौकरी छोड़ दी. ऐसे पत्रकारों की संख्‍या 10 से ज्‍यादा बताई जा रही है.

बात आपसी अनबन या नौकरी छोड़ने तक ही सीमित नहीं है. जोर-शोर से पंचायतों के लिए शुरू हुआ संस्‍करण बंद हो चुका है. साप्‍ताहिक हेल्‍थ, विवाह, धर्म समाज संस्‍करण भी दम तोड़ चुका है. बाकी संस्‍करणों की हालत भी डांवाडोल है. इसके लिए हाल में शुरू हुआ मेवात, रेवाड़ी व पलवल संस्‍करणों के कार्यालयों पर या तो ताला लग चुका है या ताला लगने वाला है. हालात बदतर इसलिए भी है कि रवीन ठुकराल के कुछ खुल्‍ले सांढ़ अंबाला से लेकर दिल्‍ली तक के कुछ पुराने कर्मियों को सींगे मार रहे हैं. गाली देकर बात होती है. वे डरें भी क्‍यों, जब सैंया बन गए कोतवाल.  

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मुझे साइटों से खबर चोरी करके अपनी साइट अपडेट करने का काम मिला

यशवंतजी नमस्कार, दिसंबर में मैंने खबर24 नामक न्यूज़ चैनल, जो कि मुझे बताया गया था, में ज्वाइन किया था, पर ज्‍वाइनिंग के ठीक एक हफ्ते के अन्दर मुझे पता चला क़ि अभी ये चैनल नहीं सिर्फ और सिर्फ एक वेब पोर्टल है. परन्तु मीडिया में काम करने का जोश और जूनून मेरे सर पर हावी था तो सोचा क़ि चैनल ना सही तो वेब पोर्टल ही सही. पर खुशी तब हुई जब मेरी ऐसी सोच गलत निकली और पता लगा क़ि चैनल कुछ समय बाद आएगा. मैं मन लगाकर वहां काम करने लगा.

ज्‍वाइनिंग के 12 दिन बाद भी मुझे ज्‍वाइनिंग लेटर नहीं दिया गया, पर मैं इन सबसे बेफिक्र होकर काम करता रहा. कई बार मैनेजमेंट से लेटर मांगने के बाद भी सिर्फ आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला. फिर भी काम तो करना ही था. मैं जिस काम के लिए वहां एप्‍वाइंट किया गया था, उससे सम्बंधित काम तो दूर उस काम का नाम भी कहीं देखने को नहीं मिला. मेरे को वहां रिपोर्टिंग और एंकरिंग के लिए रखा गया था, जबकि इसके बदले मुझे वहां दूसरी साईट से खबर चोरी करके अपनी साईट पर अपडेट करना होता था.

हद तो तब हो गई जब काम करते हुए एक महीना बीत जाने के बाद भी सैलरी नहीं मिली और सेलरी क़ी मांग क़ी गई तो बताया गया क़ि कुछ दिन बाद मिलेगी. ऐसे ही कुछ दिन करते करते एक माह और व्‍यतीत हो गया और सैलरी के नाम पर मिला तो सिर्फ और सिर्फ धोखा। खबर24 का अकेला शिकार मैं ही नहीं मेरे जैसे बहुत से लोग हैं. मेरा यह सन्देश आप तक इसलिए है क़ि हम जैसे और मेरे अलावा कोई और दूसरा खबर24 का शिकार ना हो. अभी वहां क़ी खबर यही है कि बहुत से लोग पैसे ना मिलने क़ि वजह से नौकरी छोड़ चुके हैं और पैसे के लिए चक्कर लगा रहे हैं. मेरी तरह इस उम्मीद में क़ी शायद अपना हक़ कभी ना कभी तो मिलेगा.

मनोज वर्मा

knpmanoj@gmail.com

मेरे खिलाफ दर्ज मामला पूरी तरह फर्जी है

यशवंत जी नमस्कार, मेरे खिलाफ जो मामला दर्ज हुआ है वो पूरी तरह से फर्जी है. जिस नगर पालिका के अभिलेख के आधार पर पुलिस ने यह मामला दर्ज किया है वो भी कूट रचित है और मेरे पास जिला पंचायत अध्यक्ष का वर्तमान पत्र है, जिसमें साफ तौर पर लिखा है कि जो आबंटन हुआ है वो सही है और उस पत्र पर उनके ही हस्ताक्षर हैं. यह पत्र भी संलग्न है. इस मामले में जो भी दोषी है वो तो वह नगरपालिका का बाबू है और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.

यह मामला पूरी तरह से पारिवारिक कलह का है और इसमें हमारे कुछ मित्र भी दाल गला रहे हैं. मेरे पास अपने बचाव के सारे दस्तावेज हैं और मुझे नयायपालिका पर पूरा भरोसा है. आपसे निवेदन है कि आप मेरे इस पत्र और संलग्नक को जरुर प्रकाशित करने की कृपा करेंगे.

संदीप तिवारी

देवरिया


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देवरिया में आईबीएन7 के पत्रकार एवं परिजनों के विरुद्ध चार सौ बीसी का मामला दर्ज

मुरादाबाद में अखबार के संपादक की गोली मारकर हत्‍या

मुरादाबाद से खबर है कि मूवीज टाइम्‍स नामक अखबार का प्रकाशन करने वाले नासिर कुरैशी की बीती रात गोली मारकर हत्‍या कर दी गई. नासिर समाजवादी पार्टी से भी जुड़े हुए थे. यह पता नहीं चल पाया है कि हत्‍या किन कारणों से की गई है. पर आशंका जताई जा रही है कि जमीन के रंजिश के चलते इनकी हत्‍या की गई है. हत्‍या मुरादाबाद के मुगलपुरा थाना क्षेत्र में की गई. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

सांध्‍य दैनिक मूवीज टाइम्‍स एवं एक उर्दू अखबार के संपादक नासिर कुरैशी बीती रात परवालान में एक पूर्व सभासद से मिलने गए थे. नासिर सपा के सक्रिय कार्यकर्ता थे तथा सपा के पूर्व महानगर अध्‍यक्ष भी रह चुके थे. रात लगभग एक बजे के आसपास वे सभासद से मिलने के बाद अपनी पल्‍सर मोटरसाइकिल से नागफनी थाना क्षेत्र के अण्‍डेवालान स्थित अपने घर के लिए निकले थे. वे मुगलपुरा थाना क्षेत्र में पहुंचे ही थे कि बाइक सवार बदमाशों ने उन्‍हें पीछे से गोली मार दी. गोली उनकी कमर में लगी. गोली लगते ही वो बाइक समेत जमीन पर गिर गए.

उधर, से गुजरने वालों ने उन्‍हें जमीन पर घायल अवस्‍था में पड़े देखा तो वे उन्‍हें लेकर तत्‍काल जिला अस्‍पताल पहुंचे. यहां पर केवल नर्स मौजूद थीं. डाक्‍टर के आने के पहले ही लोग उन्‍हें दिल्‍ली रोड साईं हास्‍पीटल ले गए, जहां इलाज के दौरान दो बजे के आसपास इन्‍होंने दम तोड़ दिया. नासिर को सपा के कद्दावर मंत्री आजम खान का करीबी माना जाता था. पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. अभी हत्‍या के कारणों का पता नहीं चल पाया है, लेकिन आशंका जताई जा रही है कि जमीन की रंजिश के चलते हत्‍या की गई है. हत्‍या के चलते पत्रकारों में रोष है.

मालिकों! ब्‍यूरो में बैठे दलालों से सहारा को बचाओ

"दिल में फफोले पड़ गए सीने की आग से, इस घर को आग को लग गयी घर के चिराग से" उक्त पंक्तियाँ फिलहाल राष्ट्रीय सहारा दैनिक समाचार पत्र को तो चरितार्थ करती ही हैं। बताता चलूँ कि मैं नियमित रूप से लगभग पांच अखबार मंगाता एवं पढ़ता भी हूँ। बाकी बचे अखबारों को इ-पेपर के माध्यम से जरुर पढ़ता हूँ, जिनमे मेरा प्रथम फोकस गोरखपुर संस्‍करण पर होता है (वहीँ का होने के कारण). पिछले बहुत दिनों से ऐसा देखने को मिल रहा है कि जन समस्याओं एवं जन सरोकार से जुडी तमाम खबरों पर राष्ट्रीय सहारा चुप्पी मार कर बैठ जाता है है।

हाल ही में २४ अप्रैल की एक प्रमुख खबर महाराजगंज फरेंदा की खबर, (संभवत: आनंद नगर बेयोरो) जहां गैस सिलिंडर की किल्लत से जूझ रहे आम आदमी को गैस सिलिंडर के बदले पुलिस की लाठियां खाने को मिली और दर्ज़नों लोग पुलिस की मार से घायल हुए, को दैनिक जागरण, उजाला आदि ने प्रकाशित किया और सहारा ब्यूरो पता नहीं किन मजबूरियों में इस खबर का गला घोंट दिया। इस खबर के नाम पर सहारा में एक शब्द भी नहीं दिखा। ये तो सिर्फ एक उदाहरण था जो हाल ही में घटा है। आये दिन

सिलेण्‍डर लेने वालों पर पुलिस का लाठीचार्ज
ऐसा देखने को मिलता है कि किसी महत्वपूर्ण खबर को राष्ट्रीय सहारा के कलमकारों द्वारा दबा दिया जाता है। इस सन्दर्भ में गोरखपुर मंडल के समूचे ब्यूरो की हालत एक जैसी है।

जनसरोकारी पत्रकारिता से जुड़े होने के नाते इस सन्दर्भ में जब मैंने वहां के क्षेत्रीय लोगों से संपर्क किया तो मैं अखबार प्रबंधन नीति को लेकर भौचक्का रह गया। लोगों की माने तो राष्ट्रीय सहारा की प्रबंधन नीति बड़ी ही दयनीय होती जा रही है। अखबार में सम्पादक पद गौण होता जा रहा है। ब्यूरो प्रभारी अखबार पर हावी होते जा रहे हैं और सिर्फ सालाना एक दो विज्ञापन देकर पूरे साल दलाली का मलाईदार माल खा रहे हैं। गोरखपुर में दैनिक जागरण के बाद सबसे पुराने अखबार के तौर पर जाना जाने वाला यह अखबार अब चौथे-पांचवें पायदान पर पहुंच चुका है और मीडिया की सभी नीतियों को ताक पर रख कर इसके कलमकार अपनी जेबें भरने पर आमादा हैं।

इसका एक मात्र कारण है कि पुराने समय से अपना चौपाल जमा कर बैठे इन प्रभारियों का न तो कभी तबादला होता है और ना ही तबादले का दबाव होता है। परिणामत: सभी खुद को इस अखबार का बादशाह समझ बैठे हैं। देवरिया, गोरखपुर, सिद्धार्थगर हर ब्यूरो में ऐसे दलालों की पकड़ मजबूत होती जा रही है। मेरे मत से प्रबंधन द्वारा उक्त ब्यूरो प्रभारी से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर किन कारणों से यह खबर आप नहीं भेज सके। क्योंकि ब्यूरो प्रभारी का काम खबर भेजना होता है। प्रकाशन एवं अप्रकाशन का अधिकार सम्पादकीय के लोगों का है/होता है। लेकिन जैसा कि पहले भी कहा कि राष्ट्रीय सहारा में सम्पादक की नहीं चलती है। इसका उदाहरण हाल ही में एक संपादक और एक ब्यूरो प्रभारी के बीच की मारपीट की खबर से मिल चुका है। कुछ लोगों का यहाँ तक कहना है कि प्रबंधन के नियंत्रण से बेलगाम होते इन प्रभारियों पर अगर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब ये लामबंद होकर इस अखबार की अर्थी भी निकलवा देंगे।

खैर, मै इस बावत नोएडा अखबार प्रबंधन से सीधा हस्तक्षेप करने की उम्मीद करता हूँ और ऐसे खबर दबाने वाले पत्रकारों से राष्ट्रीय सहारा को बचने की सलाह देता हूँ। मै उम्मीद करता हूँ कि जो लोग ऐसी खबरों को दबा कर बैठने में महारत हासिल किये हैं, वो पत्रकारिता के मूल्यों को पहचाने और अपने स्तर में सुधार लायें। अंत में एक बार फिर मैं उपेन्द्र राय, स्वतंत्र मिश्र से अपेक्षा करूंगा कि वो गोरखपुर मामले में सीधा हस्तक्षेप कर अखबार को दलाल मीडियाकर्मियों के चंगुल से मुक्त कराएं, नहीं तो बोरिया बिस्तर बांधने की भी तैयारी करते रहें, क्योंकि ऐसा मुश्किल नहीं लगता। अब यही होना है? सहारा ने कैसे लोग भर दिए हैं? ..अख़बार का स्तर लगातार गिरता जा रहा है.. दिल्ली से भारी भरकम अख़बार निकाल के क्या करोगे सुब्रत साहब.. क्रिकेट में पैसा बहाने से भी कुछ नहीं होगा, आपकी लुटिया देगा ये संस्करण… कूड़ा साफ़ करिए।

शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

saharkavi111@gmail.com

क्या काटजू लाल को उनके ‘हसीन सपने’ में राष्ट्रपति भवन नज़र आ रहा है? (पार्ट तीन)

सोशल नेटवर्किंग साइटों पर लगाम कसने के जस्टिस मार्कंडेय काटजू के इरादों को लोग बेशक पागलपन मान रहे हों, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे बेहद सोचा-समझा और मौके पर उठाया कदम मान रहे हैं। बताया जाता है कि छोटे कद के जस्टिस काटजू अब छोटी-मोटी कुर्सी से संतुष्ट नहीं हैं और उनका सपना राष्ट्रपति भवन की तरफ कूच करने का है।

देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल 25 जुलाई को पूरा हो रहा है और अब कोई भी पार्टी उन्हें रिपीट करने के मूड में नहीं दिख रही है। ऐसा माना जा रहा है कि इस बारे में कांग्रेस की ओर से 10 मई के बाद औपचारिक बातचीत शुरू की जाएगी जिसमें संभावित उम्मीदवारों के नाम पर चर्चा की जाएगी। फिलहाल सरकार की प्राथमिकता आम बजट पारित कराने की है और वित्त विधेयक को पारित कराने के लिए 8 मई की तारीख तय की गई है।
 
फिलहाल जो संवैधानिक स्थिति है उसके मुताबिक कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने दम पर किसी उम्मीदवार को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बिठाने की स्थिति में नहीं है। साफ है कि यूपीए और एनडीए दोनों के नेता जिस उम्मीदवार के नाम पर एकजुट होंगे वो ही अगला राष्ट्रपति बनेगा। अभी तक सभी राजनीतिक दल अपने-अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की सूची तैयार करने और उन नामों के समर्थकों की संख्या पर गुना-भाग करने में ही जुटे हैं।

अन्ना और रामदेव के आंदोलनों ने साबित कर दिया है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों का प्रभाव इन नेताओं के निजी वोटबैंक से ज्यादा असरदार और आक्रामक है। संसद में सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे पर बेशक कीचड़ उछालने में जुटे हों, लेकिन कम से कम दो विषयों के विरोध पर सभी के विचारों में समानता है। ये दोनों विषय हैं- पहला अन्ना और दूसरा उनके आंदोलन को पंख देने वाले सोशल नेटवर्किंग साइट।

मुलायम हों, ममता हों या मायावती, जिनके भी हाथों में राष्ट्रपति भवन की चाबी है सब को हर तरह के मीडिया की परवाह है। इन सब नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस और बीजेपी पहले ही सोशल नेटवर्किंग परेशान रह चुके हैं। कभी किसी नेता का किस्सा आ खड़ा होता है तो कभी किसी का। चैनल और अखबार के रिपोर्टर, संपादक और मालिक तक तो मैनेज किए जा सकते हैं, लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर न कोई संपादक होता है और न रिपोर्टर। सबको आज़ादी है, लेकिन आम आदमी के इस अधिकार पर सारे नेताओं को ऐतराज़ है।

बताया जाता है कि ऐसे में काटजू के एक करीबी मित्र ने उन्हें शिगूफ़ा दे दिया कि अगर वे किसी तरह इस समुद्र को बांधने में कामयाब हो जाएंगे तो उनका नाम देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए नामित हो सकता है। बस फिर क्या था? नीतीश, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, यूपी, दिल्ली सब का मुद्दा छोड़ कर पिल पड़े सोशल नेटवर्कों के पानी को बटोरने की कोशिश में। बाकायदा मंत्री जी को पत्र लिखा गया। ख्वाब देखने लगे कि कानून भी बनवा देंगे और इसी सीढ़ी पर चढ़के राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी पहुंच जाएंगे। देखें काटजू जी के हसीन सपने कितने परवान चढ़ते हैं?

लेखक धीरज भारद्वाज कई चैनलों अखबारों में काम कर चुके हैं. मीडिया दरबार डाट काम के माध्यम से न्यू मीडिया में अलख जगा रहे हैं.

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‘भ्रष्‍टाचार का कड़वा सच’ : एक राजनेता से लड़ता साहित्‍यकार

भ्रष्टाचार के खिलाफ यकायक एक बुजुर्ग गांधीवादी अन्ना हजारे जिद ठान लेता है कि अनशन से हलचल मचा दूंगा और इरादे इतने अटल की 13 दिनों के उपवास में सत्ता के शिखर पर बैठे लोग उसकी मांग मान लेने को मजबूर हो जाते हैं। हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान राज्यसभा सांसद शांता कुमार की नई किताब का विषय भी भ्रष्टाचार है और वह भ्रष्टाचार के खिलाफ कलम से लड़ते दिखते हैं। 'भ्रष्टाचार का कड़वा सच' उनका भोगा नहीं तो करीब से देखा हुआ सच प्रतीत होता है। तीन साल पहले उन्होंने हिमप्रस्थ के दिसंबर अंक में एक साक्षात्कार में कहा था कि जीवन में कई बार कुछ घटनाएं इतनी गहरी चोट करती और अमिट छाप छोड़ती हैं, उन्हीं से मन प्रेरित होता है और लिखने की इच्छा पैदा होती है। 'राजनीति की शतरंज' में राजनीति की सत्यकथाएं लिखने पर अपने ही कई समकालीन नेताओं के निशाने पर रहे शांता कुमार की प्रखरवादिता 'भ्रष्टाचार का कड़वा सच' से भी उनके दुश्मनों संख्या में हरगिज इजाफा ही करेगी।

हालांकि शांता कुमार ने 19 साल की उम्र में ही लेखन शुरू कर दिया था, लेकिन 1975 तक वह विविध लेखन करते रहे। इमरजेंसी के दौरान नाहन जेल में उन्होंने 'लाज्जो' उपन्यास लिख डाला। शांता कुमार अपने साक्षात्कारों में कई बार जिक्र कर चुके हैं कि 'लाज्जो' उपन्यास उनके अपने गांव गढज़मूला की एक विधवा की सत्यकथा है। एक महीने में 'लाज्जो' का लेखन पूरा करने वाले शांता कुमार ने कल्पना के घोड़े दौड़ाने की जगह यर्थाथ को साहित्य में साधने की हर संभव कोशिश की है। मुख्यमंत्री रहते उपरी शिमला में फटे बादल की भीषण तबाही से आहत एक राजनेता का लेखक इतना व्यथित हुआ कि 'लाज्जो', 'कैदी' और 'मन के मीत' लिखने वाले शांता कुमार ने प्रकृति से छेड़छाड़ के खतरों का खुलासा करने वाला 'बृंदा' उपन्यास लिख दिया। पांच में से तीन उपन्यास उन्होंने अपनी जेल यात्राओं के दौरान ही लिखे हैं।

बेबाकी उनके व्यवहार में भी पढ़ी जा सकती है। लेखन में यह और मुखर होकर बोलती दिखती है। वह स्वीकार करते हैं कि वह मूल रूप से लेखक हैं। वह कहते हैं कि अगर उनके मन में लेखक के दायित्व की भावना नहीं होती तो राजनीति के सफर में कई बार समझौते कर लेते। 'राजनीति की शतरंज' को छपने को लेकर प्रसंग याद आता है। लेखक के मित्रों की सलाह थी कि राजनीतिक संस्मरण के तौर पर लिखी गई इस पुस्तक का प्रकाशन उनके राजनीतिक भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है, लेकिन लेखक मित्रों की सलाह पर कुछ वक्त तो रुका पर ज्यादा देर रुका नहीं रह सका। इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद शांता कुमार की जम कर आलोचना हुई और कई लोग नाराज भी हुए। उस वक्त भी उन्होंने एक ही बात कही कि वह राजनेता नहीं हैं, एक लेखक हैं और लेखक अपने अनुभव अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण समाज से छुपा कर नहीं रख सकता। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि एक प्रमाणिक दस्तावेज के रूप में इस पुस्तक की आलोचना से ज्यादा चर्चा और सराहना हुई।

उपन्यास, कहानी, कविता और संस्मरण लिखने में माहिर शांता कुमार कहते हैं कि छोटी सी उम्र से ही उनका जीवन सार्वजनिक जीवन रहा है। 19 साल की उम्र में जेल यात्रा और फिर सक्रिय राजनीतिक जीवन, बावजूद इसके तमाम व्यस्तताओं के बीच एक कद्दावर राजनेता के अंदर का लेखक हमेशा संवेदनशील होकर ईमानदारी से लिखता रहा है। वह कहते हैं कि लिखा तभी है जब उनके पास कहने को कुछ हुआ है और वह कुछ इतना शक्तिशाली रहा है कि जीवन की अति व्यस्तता के बावजूद राजनेता के अंदर के लेखक को लिखने के लिए मजबूर कर दिया। एक सजग लेखक पर कभी राजनीतिक भविष्य की भीरू कल्पना हावी नहीं हुई। कई बार तो किसी घटना पर मन का लेखक इतना हावी हो गया कि राजनीति में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा, लकिन यह भी सच है कि नफे नुक्सान के आकलन में एक लेखक ने कोई राजनीतिक समझौता करना गवारा नहीं समझा। फिर चाहे गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को खरी खरी सुनाने की बात हो अथवा हाल ही में कर्नाटक के प्रभारी बनने के बाद वहां के मुख्यमंत्री यदुरप्पा की शिकायत पार्टी आलाकमान से करने का प्रसंग।

कर्नाटक के प्रभारी रहत हुए सत्ता के भ्रष्टाचार से नजदीकी से सामना हुआ और उसके बाद ही शांता कुमार की भ्रष्टाचार का कड़वा सच प्राकशित हुई। जाहिर है कि हमेशा सच्ची घटनाओं को अपने लेखन का आधार बनाने वाले एक लेखक को अपनी किताब के लिए वहीं से प्रेरणा मिली हो। पंचायत के पंच के पद से राजनीति की शुरुआत करने वाला एक वकील पंचायत समिति, जिला परिषद, विधानसभा, लोकसभा से होता हुआ राज्यसभा में पहुंचा है तो जाहिर है हर स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार को करीब से समझने-जानने का मौका भी मिला है। इसी व्यवस्था की सडांध को उनकी ताजा प्राकशित पुस्तक बेनकाब करती है। वह कहते भी हैं कि जो अनुभव किया, जिस पर अभिव्यक्ति की इच्छा पैदा हुई और संदेश देने का लक्ष्य रहा, उसे  हमेशा सामने रख पाठकों के लिए प्रस्तुत कर दिया। मूल रूप से एक राजनेता होने के बावजूद उन्होंने हमेशा लेखकीय को वरीयता दी है और सामाजिक सरोकारों के प्रति हमेशा सजग रहे हैं। एक उच्चकोटि के रचनाकार के तौर पर उनका साहित्य उनके अपने राजनीति जीवन का एक लेखा जोखा भी है। अपनी साहित्यिक रचनाओं से उन्होंने हमेशा किसी न किसी सामाजिक सरोकार को पाठकों के सम्मुख रखने में यकीन किया है।

गीता और स्वामी विवेकानंद के साहित्य से प्रभावित रहे लेखक के रचनाकर्म में लेखकीय समझौते परिलक्षित नहीं होते। आजादी के चालीस साल होने पर लेखक ने एक जगह लिखा है कि चालीस साल की आजादी के बाद भारत में एक मंत्री हिंदी बोलते समय सिर झुकाए, हीन भवना से ग्रसित खड़ा था और अंग्रेजी बोलने वाले सिर उठाए गौरव का अनुभव कर रहे थे। आजादी को सात दशक होने को आए हैं और लेखक कहता है कि देश को हिंदी दिवस मनाने की जरूरत महसूस होती है। यह बड़ा सबूत है कि अभी हिंदी का बनवास खत्म नहीं हुआ है। इसी बीच लेखक की हिंदी में नई पुस्तक 'भ्रष्टाचार का कड़वा सच' हिंदी की वकालत करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ चोट करती है और भ्रष्ट आचरण वालों को बेनकाव करती है। भ्रष्टाचार पर कलम से वार को लेकर लेखक शांता कुमार बधाई के पात्र हैं।

लेखक विनोद भावुक दैनिक भास्‍कर, हिमाचल प्रदेश में मंडी जिले के ब्‍यूरोचीफ एवं युवा लोककवि हैं.

बनिया की नौकरी करो, पर बनिये से कभी मत डरो

: तब दांव पर होता दिलीप मंडल की तरह हमारी प्रतिबद्धता भी : अखबार को अपना अखबार कभी मत समझो और हमेशा उससे अपनी पहचान अलग रखो : अश्लीलता पर घमासान को लेकर कुछ सवाल : वैकल्पिक मीडिया के फोरम में इंडिया टुडे के ताजा अंक की अश्लीलता को लेकर घमासान मचा हुआ है। हमारे प्रिय मित्र, अगर वे हम जैसे नाचीज को मित्र मान लेने की उदारता दिखायें तो, आपस में भिड़े हुए हैं मूल्यबोध और प्रतिबद्धता के सवाल पर। मैं १९७३ से दैनिक पर्वतीय से जुड़ गया था​​ नैनीताल में। छात्रजीवन में दिनमान के लिए भी पत्रकारिता की। १९७८ से नैनीतील समाचार की टीम के साथ लग गया। सितारगंज में केवल​ ​कृष्ण ढल के साथ मिलकर साप्ताहिक लघुभारत भी चलाया। थोड़े वक्त के लिए इलाहाबाद और दिल्ली से फ्रीलांसिंग भी की। १९८० से पत्रकारिता​​ मेरा पेशा है। १९९१ में जनसत्ता कोलकाता आ गया।

तब दिलीप मंडल भी हमारे साथ थे। मैं अमर उजाला छोड़कर आया था, जहां दिल्ली ब्यूरो में तब अजित अंजुम पत्रकार थे। आज दिलीप इंडिया टुडे के संपादक हैं और अजित अंजुम एक टीवी चैनल के मैनेजिंग एडिटर हैं। अब इन लोगों ने जो लफड़ा खड़ा कर दिया है, कायदे से अगस्त्य मुनि के आशीर्वाद से विंध्याचल बने हुए मेरे जैसे लोगों को उसमें पड़ना ही ​​नहीं चाहिए। लेकिन बहस जिस दिशा में जा रही है, उससे न चाहकर भी कुछ बातें कह देना अपनी हैसियत के प्रतिकूल जरूरी लगता है!

क्या वैकल्पिक मीडिया को कामर्शियल मीडिया पर इतना स्पेस जाया करना चाहिए, बुनियादी मुद्दा यह है। क्या नौकरी की मजबूरी प्रतिबद्धता और मूल्यबोध की कसौटी है, मुद्दा यह भी है। क्या आज की व्यवसायिक पत्रकारिता में संपादक नाम की किसी संस्था का कोई वजूद है? फिर अगर हम इंडिया टुडे जैसी पत्रिका से मूल्यबोध और प्रतिबद्धता की अपेक्षा रखते हैं, तो हमें वैकल्पिक मीडिया की क्यों बात करते हैं?

मेरा मकसद किसी का बचाव करना या किसी के खिलाफ हमलावर तेवर अपनाना नहीं है बल्कि इस बहस की गुंजाइश पैदा करना है कि आज की सूचना विस्फोटक विकट स्थिति में हम अपने संसाधनों और प्रतिभाओं को जन सरोकार की दिशा में कैसे संयोजित कर सकते हैं। दिनमान के संपादक पद से जब माननीय रघुवीर सहाय को हटा दिया गया, तभी साफ हो गया था कि आगे क्या होनेवाला है। खासकर अंग्रेजी मीडिया के सहयोगी हिंदी पत्र पत्रिकाओं में मौलिक पत्रकारिता की नियति तय हो गयी थी। इसका ज्यादा खुलासा करने की शायद जरुरत नहीं है।

कुछ दिलचस्प किस्से सुनाये बगैर मेरी बातें स्पष्ट नहीं होंगी। मेरे बहस गंभीर मित्रों, इसके लिए माफ करना। १९८१ में दैनिक आवाज धनबाद में काम करते हुए मैंने टाइम्स आफ इंडिया के प्रशिक्षु पत्रकार बनने के लिए परीक्षा दी थी।इंटरब्यू में तब​ ​ धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने मुझसे सीधे पूछ लिया था,आपकी विचारधारा क्या है। मैंने बेहिचक जवाब दिया था- साम्यवाद। जाहिर है कि मैं फेल हो गया।उस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर जीआईसी के हमारे सहपाठी बाद में बड़े संपादक बने।दिलीप मंडल और सुमंत बट्टाचार्य ने तो टाइम्स के प्रशिक्षण से ही पत्रकारिता की शुरूआत की हालांकि काफी बाद में।

इससे भी पहले १९७९ में मंगलेश डबराल की पहल पर में इलाहाबाद में फाकाकशी करते हुए हम अमृतप्रभात की नौकरी के लिए परीक्षा पर बैठे। मैं शेखर जोशी जी के घर रहता था। नीलाभ से लेकर शैलेश मटियानी​ ​,भैरव प्रसाद गुप्त और मार्कंडेय के साथ चलता था। हमारी विचारधारा स्पष्ट थी और तब भी हम सड़क पर थे।समाचार संपादक माथुर साहब सर्वेसर्वा थे। उन्होंने बाकी सबको रख लिया, मुझे नहीं रखा।

आवाज में तब घोषित कम्युनिस्ट उर्मिलेश की मध्यस्थता में मुझे नौकरी दी गयी। आवाज प्रबंधन इससे पहले कम से कम दो कट्टर कम्युनिस्टों वीर भारत तलवार और मदन कश्यप को झेल चुका था। उन्होंने हमारी विचारधारा पर ऐतराज नहीं किया। १९८४ में​ ​ जब मैंने दैनिक जागरण ज्वाइन किया, तब तड़ित कुमार गोरखपुर में हड़ताल करवाने के लिए दोषी माने गये थे। नरेंद्र मोहन ने सीधे कह दिया ​​था, आप बंगाली हो और बंगाली कम्युनिस्ट होते हैं। आपकी विचारधारा से हमें कुछ लेना देना नहीं है। हम जो हैं, हैं, बदलेंगे नहीं। आप हमें ​​बदलने की कोशिश हरगिज नहीं करना। नारायण दत्त तिवारी के खास थे नरेंद्र मोहन जी। महतोष मोड़ आंदोलन के दौरान जब तिवारी ने कम से कम तीन बार मुझे हटाने के लिए उनसे कहा तो उन्होंने सीधे न कर दिया।कई बार ऐसा भी हुआ कि छह सौ रूपये महीने पर रखे गये तमाम पत्रकार काम​ ​ सीखने के बाद एकमुश्त भाग गये। डेस्क पर नरेंद्र मोहन जी हमारे सामने बैठ गये और बोले कि पहले प्रशिक्षु पत्रकार के लिए विज्ञापन बनाओ। ​​जब तक, यानी पूरे छह साल मैं जागरण मेरठ में रहा और तमाम पत्रकारों की नियुक्तियां हमने की। नरेंद्र मोहन जी कहते थे कि जब आप अखबार निकालते हो, हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे, गड़बड़ी हुई तो अगले दिन बात करेंगे। हमारी विचारधारा कभी आड़े नहीं आयी।

हाशिमपुरा और मलियाना नरसंहारों की खबरें हम जो छाप नहीं सके , उसके लिए नरेंद्र मोहन या धीरेंद्रमोहन जिम्मेवार नहीं थे। संपादकीय प्रभारी और चीफ रिपोर्टर के तार संघ परिवार से जुड़े थे, उन्होंने अपने स्तर पर खबरें रोकीं या फिर मुसलमानों के खिलाफ खबरें छपवायीं, जिसे हम रोक नहीं सकें।​​ पर महज मुख्य उपसंपादक होने के बावजूद लोग हमें घेरते रहे। विचारधारा और प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करते रहे।लोगों को यह समझाना वाकई मुश्किल था कि मैं सिर्फ नौकरी कर रहा था। नीति निर्धारण में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।​
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​इससे भी बुरी हालत में मुझे आवाज और अमर उजाला की नौकरियां छोड़नी पड़ी।​ आवाज में रोजाना पेज पेजभर रपटें मेरे नाम के साथ छपती थीं। तमाम कोयला खान दुर्घटनाओं की हमने पड़ताल कीं। कोल इंडिया को कटगरे में खड़े करता रहा। पाठकों के फोरम चालू किये। झारखंड आंदोलन से मजदूर आंदोलन तक को आवाज दी। १९८३ में मैंने शादी की और सविता के गृहस्थी संभालते न संभालते अखबार की नीतियां बदल गयीं।

खान दुर्घटना की रपट मैं बना नहीं सकता था। फर्जी मुठभेड़ की खबरें मैं छाप नहीं सकता था। तमाम खबरें हमारी प्रतिबद्धता के खिलाफ थीं।​​ तब तक बिना सोचे समझे हमने अपने को पूरे झारखंड में मशहूर कर लिया था। लोगों को हमसे भारी अपेक्षाएं थीं। हमारा खाना पीना मुश्किल हो गया था। झारखंड के कोने कोने से लोग सीधे हमारे यहां आ धमकते थे और सविता के सामने लानत सलामत करते थे।शादी को सालभर नहीं हुआ था, पर मेरी पत्रकारिता सविता के लिए दहशत में तब्दील हो गयी थी।​
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​तब हमने आवाज छोडने का पैसला कर लिया और कसम खायी कि अब अखबारों में नौकरी ही करनी है। दूसरे के अखबार से अपनी क्रांति नहीं हो सकती, यह बात हम समझ चुके थे।तभी हमने तय किया कि जिस अखबार में काम करना है, उसके लिए बाई लाइन के साथ हरगिज नहीं लिखना है।​
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​पर जागरण में महतोष मोड़ आंदोलन के दरम्यान और अमरउजाला में खाड़ी युद्ध के मौके पर हमें यह कसम तोड़नी पड़ी।​
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​​अमर उजाला हमने अतुल माहेश्वरी जी के कारण ज्वाइन की थी। पर गलती यह की कि मेरठ जागरण में बिताये छह साल के लिहाज से मेरठ के बदले बरेली को चुन लिया। बरेली से घर नजदीक पड़ता था, शायद यह भी एक कारण था। राजुल माहेश्वरी बरेली में स्थानीय संपादक थे। पर सर्वेसर्वा थे उनके आगरा में रहने वाले अशोक अग्रवाल, जिनसे हमारी कभी पटरी नहीं बैठी। बाबरी मस्जिद दंगों के दौरान जब न जाने कितने मारे गये, जैसी सुर्खिया छापी जा रही थी बैनर बनाकर, हम लोग संयमित अखबार निकालने की कोशिश कर रहे थे और सर्कुलेशन दनादन गिर रहा था। इस पर तुर्रा यह कि हम राजेश श्रीनेत और दीप अग्रवाल के समकालीन नजरिये से भी जुड़े हुए थे। आगरा से अशोक अग्रवाल जी ​​आये और बरस पड़े। अखबार की दुर्गति के लिए उन्होंने वीरेन डंगवाल, सुनील साह और मुझे जिम्मेवार ठहराया। हालत यह हो गयी कि मैंन राजुल जी से कह दिया कि अब आपके यहां नौकरी नहीं करनी। इसी वजह से बिना नियुक्ति पत्र लिए मैं कोलकाता निकल गया प्रभाष जी के कहने पर। छह महीने बाद नियुक्तिपत्र मिला और मैं सब एडीटर था। वीरेन डंगवाल और सुनील साह तब भी वहीं थे। बाद में वीरेन दा अमर उजाला के संपादक भी बने। फिर मतभेद की वजह से उन्होंने भी नौकरी छोड़ी।

संपादक बनने की महत्वाकांक्षा हर पत्रकार की होती है। संपादक न बनकर भी लोग संपादकी तेवर में बदल जाते हैं। हमारे पुराने मित्र धीरेंद्र ​अस्थाना से हमारी पहली मुलाकात आपातकाल के दौरान जनवादी लेखक संघ बनने से पहले शिवराम आयोजित कोटा में साहित्यकारों की गुप्त सभा में हुई थी। नैनीतीस से मैं और कपिलेश भोज उस सभा में तब शामिल हुए जब हम बीए पहले वर्ष के छात्र थे।चिपको आंदोलन के दौरान यह दोसती गहराती गयी। जब मैं मेरठ में था, तब धीरेंद्र दिल्ली में थे। पर जनसत्ता मुंबई में वे फीचर संपादक थे और कोलकाता में मैं सब एडीटर। कोलकाता आये तो मुझे पहचाना तक नहीं।​
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​जनसत्ता से जो लोग निकल गये, वे सबके सब संपादक बन गये। गनीमत है कि हम नहीं निकले और गनीमत यह भी कि दिवंगत जोशी जी सबएडीटरी का हमारा स्थाई बंदोबस्त कर गये। वरना संपादकों की जो दुर्गति हो रही है, उससे हम साफ बच नहीं पाते और जाहिर है कि दांव पर होता दिलीप की तरह हमारी प्रतिबद्धता भी।​ हमने पत्रकारिता के दो सिद्धांत पिछले तीन चार दशकों में गढ़ लिये हैं, चाहे तो आप भी उन्हे आजमा सकते हैं। पहला यह कि बनिये के अखबार को अपना अखबार कभी मत समझो और हमेशा उससे अपनी पहचान अलग रखो। अपने ही हाउस में एस निहाल सिंह और अरुण शौरी की दुर्गति देखते हुए हमने पिछले बाइस साल से इस सिद्धांत पर सख्ती से अमल किया है।​

​दूसरा सिद्धांत थोड़ा खतरनाक है। वह यह कि बनिया की नौकरी करो, पर बनिये से कभी मत डरो। हम शुरू से इस सिद्दांत को मानते रहे हैं और उसका खामियाजा भी भुगतते रहे हैं। इतना गप हो जाने के बाद हमारा सवाल है कि क्या हमारे प्रतिबद्ध प्रतिभाशील लोगों को व्यवसायिक मीडिया की नौरकियां छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि उस मीडिया के जरिये श्लील अश्लील से ऊपर जो कुछ प्रकाशित या प्रसारित होता है, उसकी जिम्मेवारी से वे बच नहीं सकते?यानी व्यवसायिक मीडिया में जनता के हक में थोड़ा बहुत जो स्पेस बच जाता है, उसका इस्तेमाल हम दूसरे लोगों को करने के लिए मैदान खुल्ला छोड़ दें? कृपया आप विद्वतजन इस पर सलाह मशविरा करके अपनी राय दें।

गौरतलब है कि जब इकोनामिक टाइम्स की नौकरी छोड़कर जेएनय़ू में जाने का फैसला किया दिलीप ने तो उसने मुझसे भी पूछा था और हमने मना किया था। हमने कहा था कि कम से कम एक आदमी तो हमारा वहां है। दिलीप ने कहा था कि कारपोरेट पत्रकारिता में कहीं भी कुछ करने की गुंजाइश​ ​ नहीं है।हम निरुत्तर हो गये थे। फिर उसने मीडिया का अंडरवर्ल्ड किताब लिखी। जेएनय़ू में गया। जब वह इंडिया टूडे का संपादक बना तो गुलबर्गा में बामसेफ के राष्ट्रीय अधिवेशन में फारवर्ड प्रेस के संपादक इवान कोस्तका से इसकी जानकारी मिली।दिलीप के इंडिया टूडे के संपादक बनने की खबर सुनाते हुए इवान ने कहा था कि मालूम नहीं कि यह अच्छा हुआ कि बुरा। उन्होंने यह भी कहा कि खुद दिलीप को नहीं मालूम।​
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​हैमलेट की सोलीलकी याद है न ? टू बी आर नट टू बी?
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​बुनियादी मसला यह है कि क्या किसी व्यवसायिक मीडिया के शीर्ष पर किसी प्रतिबद्ध पत्रकार को होना चाहिए? द्विज या गैर द्विज, कोई फर्क​​ नहीं पड़ता। वैसे गैर द्विज हैं ही कितने पत्रकारिता में? संपादक गिनाने जायें तो दिलीप के अलावा हिंदी में दूसरा नाम नजर नहीं आता जो​ ​ अस्पृश्य हो।सत्ता में भागेदारी का सिद्धांत आजमायें तो शायद शुरू यहीं से करना पड़े कि मायावती का मुख्यमंत्री बनना ठीक था या गलत!​
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​मूल्यबोध की बात करे तों जनसत्ता, देशबंधु और लोकमत समाचार जैसे दो चार अखबारों  को छोड़कर तमाम पोर्टल पर नंगे चित्रों की भरमार है। नंग चित्र रहे दूर बाकायदा पोर्नोग्राफी के सहारे नेट पर रीडरशिप और विज्ञापन बटोरने की होड़ है। तब क्या इन सभी मीडियासमूह के पत्रकारों को मूल्यबोध और प्रतिबद्धता की दुहाई देकर अपनी अपनी नौकरियां छोड़ देनी चाहिए।बहस की शुरुआत की है, अजित अंजुम ने जो एक टीवी चैनस के मैनेजिंग एडीटर है। चैनलों में टीआरपी के लिए क्या क्या पापड़ नहीं बेलने ​​पड़ते, उनसे बेहतर क्या जानेंगे हम?

तो क्या वे प्रतिबद्ध मूल्यबोध वाले पत्रकारों को दागी चैनलों की नौकरियां छोड़ने के लिए कहेंगे?

लेखक पलाश विश्वास जन सरोकारों से लैस और सामाजिक रूप से सक्रिय पत्रकार हैं.

लोकल बिजनेस की खबरों पर आधारित बिजनेस रिपोर्टर डॉट इन लांच

स्वर्णिम न्यूज नेटवर्क भोपाल द्वारा लोकल बिजनेस की खबरों पर आधारित हिन्दी न्यूज वेबसाइट बिजनेस रिपोर्टर डॉट इन (www.businessreporter.in) लांच किया गया है। बिजनेस रिपोर्टर डॉट इन में प्रारंभिक तौर पर भोपाल (मध्यप्रदेश) में संचालित समस्त लोकल व्यवसायिक गतिविधियों को विषयवार (सेंगमेंट वाइज) खबरों के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है। भोपाल के बाद देश के प्रमुख शहरों की व्यवसायिक गतिविधियों की खबरें शामिल की जाएगी।

बिजनेस रिपोर्टर डॉट इन के संचालक व संपादक सत्यनारायण वर्मा ने बताया कि इस वेबसाइट का उद्देश्‍य शहरों में संचालित समस्त व्यवसायिक प्रतिष्ठानों की गतिविधियों व कार्यप्रणाली के साथ ही उनकी यदि कोई खास उपलब्धि हो तो (जो प्रतिष्ठान-संस्थान-उपक्रम को दूसरों से अलग छवि प्रदान करता हो) उसे पाठकों के सामने लाया जाएगा। उनके अनुसार बिजनेस रिपोर्टर डॉट इन में खबरों की कुछ खास बातों को ध्यान में रखकर व अध्ययन करके विषयवार (सेंगमेंट वाइज) आकर्षक स्वरूप में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है।

इनमें प्रतिष्ठान-संस्थान-उपक्रम में उपलब्ध सुविधाएं, संस्थान की विषेषता, विगत वर्षों की सफलता, संचालक का साक्षात्कार, संचालक का अनुभव व भविष्य की कार्ययोजना को ध्यान में रखकर खबरों को प्रस्तुत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि बेवसाइट में बिजनेस की खबरों के अलावा सिटी रिपोर्ट, सिटी इवेंट्स, एक्टीविटीज के साथ ही सिनेमा, ग्लैमर, फैशन, लाइफस्टाइल व समसामयिक विषयों पर आलेख भी प्रकाशित किए जा रहे हैं।

रांची में गैंगरेप, मर गई अबला, खबर नहीं चलाने का फरमान

: अपडेट : चुल्लू भर पानी में क्यों नहीं डूब मरते न्यूज 11 के कर्ताधर्ता : जी, 21सदी की पत्रकारिता का यह काला सच है। घिन्‍न आ रही है। क्या झुकने को कहने पर हम तलवे चांटने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन बेचारे रिपोर्टर से एक धंधेबाज बने अरूप चटर्जी क्या जाने कि किस हसरत से पत्रकारिता की डिग्री लेकर हम आते हैं कि कम से कम समाज की सेवा करेंगे। इसी से दाल-रोटी भी चलेगी। चलिए मूल बात पर आते हैं। 23 अप्रैल को रांची में एक अधेड़ उम्र की महिला के साथ गैंगरेप हुआ। बेचारी महिला ने दम तोड़ दिया लेकिन न्यूज 11 के मालिक अरूप चटर्जी ने हुक्म दिया कि यह खबर नहीं चलेगी।

क्यों भाई, क्यों कि रांची के एसएसपी साकेत कुमार का उपकार चुकाना है। सो चैनल पर गैंगरेप और उसके बाद मौत की खबर से पुलिस की किरकिरी होती सो अरूप ने यह खबर की रूकवा दी। जैसे ही यह फरमान जारी हुआ चैनल हेड गुंजन सिन्हा उठकर कार्यालय से बाहर चले गए। साथ ही साथ एकाउंटेट को कहा कि मेरा हिसाब-किताब तैयार रखिए। अभी गुंजन जी को रोकने-मनाने की तैयारी चल रही है। अरूप की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि चैनल के कई प्रमुख लोग गुंजन जी के साथ हो गए हैं। ऐसे में चैनल का भट्ठा बैठ जाएगा। गुंजन जी ने बिहार-झारखंड में पत्रकारों की एक पीढ़ी तैयार की है। उनके तेवर से सभी वाकिफ हैं।

हां एक बात लिखना भूल गया, रांची के बैजनाथ मिश्र भी अरूप का साथ दे रहे हैं। संगोष्ठी-सेमिनार में इनकी चिकनी-चुपड़ी बाते सुनकर पांव छू लेने को मन करता है लेकिन पूंछ उठाने पर देखा तो इनको भी मादा पाया। एक बात तय है कि अगर अरूप ने गुंजन भैया के साथ थोड़ी भी बदतमीजी की तो उनकी फजीहत तय है। हम लोगों ने सोच रखा है कि इस धंधेबाज का डंडा-झंडा रांची से उठा देंगे। पूरी कौम को ये शख्स बदनाम कर रहा है। चौराहे पर बेच रहा है। प्रेस काउंसिल भी ऐसे लोगों को देखे। हालांकि, दबाव के बनने के बाद चैनल पर यह खबर चली, इसके बाद गुंजन सिन्‍हा मानने को तैयार हुए। फिलहाल शांति बनी हुई है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


खबर रोके जाने के संदर्भ में जब चैनल हेड गुंजन सिन्‍हा से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि खबर चैनल पर प्रसारित की गई थी. हालांकि शुरुआत में खबर को लेकर कुछ विवाद जरूर हुआ था. पर बाद में खबर को प्रसारित किया गया था. उन्‍होंने खबर रोकने की बात की बात पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. वहीं चैनल मालिक अरुप चटर्जी ने कहा कि इस तरह का कोई मामला चैनल में नहीं हुआ था. मैंने किसी खबर को रोकने के लिए नहीं कहा था.  ये आरोप बिल्‍कुल गलत हैं. ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी.

इस कांग्रेसी काटजू पर अब बात हो ही जानी चाहिए (भाग दो)

Yashwant Singh : इस कांग्रेसी काटजू पर अब बात हो ही जानी चाहिए…. संभव है नीचे जो लिंक दिया है, उस लेखन से आप सहमत नहीं हों लेकिन उम्मीद करता हूं कि बहस को आप आगे बढ़ाएंगे. आखिर कैसे एक आदमी की उन साजिशों पर चुप रहा जा सकता है जहां वह सोशल व न्यू मीडिया माध्यमों को कानून द्वारा नियंत्रित कराने की कोशिश रहा हो. पहले से ही आईटी एक्ट के तहत तमाम कानून हैं. फिर भी यह शख्स केंद्रीय मंत्रियों से गुहार लगाता फिर रहा है कि सोशल मीडिया पर थोड़ी पाबंदी लगा दो… पूरे प्रकरण पर मैंने अपना विचार रखा है, कुछ चिट्ठियां पेश की हैं.. इन चिट्ठियों को काटजू ने मंत्रियों को भेजा है. आप इसे पढ़ें, पढ़वाएं और जहां भी संभव हो प्रकाशित कराएं ताकि कारपोरेट मीडिया का कुछ न उखाड़ सकने वाले काटजू की अब सोशल मीडिया पर डंडा बरसाने की कोशिशों का पर्दाफाश किया जा सके. पूरे लेख का लिंक नीचे है.

http://bhadas4media.com/print/4010-abhishek-manu-singhvi-sex-cd-8.html

        Vikas Kumar : no case of disagreement!!! 100% correct and most needed comment!!! well begun!!!
 
        Tarun Kumar Tarun : काटजू का एजेंडा अबूझ और हास्यास्पद है. उनका अस्थिर चित्त उन्हें मुहम्मद बिन तुगलग की तरह अविश्वनीय और अप्रत्याशित शख्सियत बनाता है. एक तरफ वे मीडिया की आजादी की परोकारी करते हुए नीतीश सरकार को दिन-दहाड़े बिहार जाकर कोस आते है तो दूसरी सोशल मीडिया का गला घोंटवाने का घातक जुगाड़ करने में लगे है. क्या चाहते हैं वे ? क्या यह कुंठित व्यक्ति मूर्खाना और हास्यास्पद बयानों के बूते सुर्खियां बटोरकर मीडिया इतिहास का तुगलक बनने की राह पर नहीं है ? क्या वे कांग्रेस के जनविरोधी एजेण्डे पर कम कर रहे हैं ?
 
        Abhinav Shankar : यशवंत साहब!!!बचपन में हम लोगो ने संस्कृत का एक श्लोक पढ़ा था की गलत निति और गलत नियत में किसी एक का चुनाव करना हो तो बेझिझक गलत निति का चुनाव कर लो…क्यूंकि अगर नियत सही हो तो आगे निति बदली जा सकती है,लेकिन यदि नियत ही खोटी हो तो सही निति भी अंत में खोते परिणाम ही लाती है ..अन्ना और काटजू का अंतर इसी निति और नियत का है…मैं भी मानता हु की इन्टरनेट पर कुछ चीज़े आपत्तिजनक हो सकती है…और अगर इन्हें हतोत्साहित किया जा सके तो ये बहुत अच्छी बात होगी…नीतिगत ये सही होगा….लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं इनकी आड़ में खोटे नियत से आम आदमी की ताकत कम करने की चाल चली जाये…काटजू की निति इसी गलत नियत का शिकार है…और जहा तक अन्ना की बात है तो उनके लिए कहा जा सकता है की उनकी सही नियत गलत नीतियों का शिकार हो गयी है….लेकिन अन्ना और काटजू में एक को तय करते समय एक बुद्धिमान भारतीय संस्कृत के इस श्लोक को जरुर याद रखेगा!!!
    
        Vikash Mishra : यशवंत भाई, इन कांग्रेसियों का समय आ गया है, सोशल मीडिया पर लगाम लगाना इनके बस की बात नहीं , इन सब की कब्र खुदी पड़ी है बस दफ़न करना है l ये दहशत फ़ैलाने का काम करते है इनकी पतलून में नाडा ही नहीं है किसी को बांधेंगे कैसे अपनी पतलून बांध ले पहले l
      
        Mahendra Singh Gaharwar : पहले काटजू यह बताये कि जब वो और उनके लोग कहते है कि क़ानून तो बहुत है फिर जनलोकपाल जैसे कानून की क्या जरूरत है ? जो कानून मौजूद है उसीसे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाया जा सकता है …..फिर मिडिया के मुद्दे पर इन्हें कानून बनाने का बड़ा शौक चढ़ रहा है…..काटजू सोशल मिडिया का नहीं इस देश की गरीबी का दुश्मन है ,भ्रष्टाचारियो का पोषक और पीड़ित जनता का दुश्मन.इस आदमी को यह भी नहीं पता कि कमसे कम अपनी नहीं तो उस पद कि अस्मिता को बरकरार रखे जिसकी वजह से आज उसका अस्तित्व है …..आखिर काटजू ने भी दबे मुह से ही सही स्वीकार कर ही लिया कि क्यों न जजों को भई जनलोकपाल के अंतर्गत आना चाहिए …..पहले राजा महराजाओं को खुश करने के लिए भाड़ हुआ करते थे,काटजू आखिर इतनी खूबसूरती से कैसे खुश कर रहे है……
         
Haresh Kumar सोशल मीडिया पर हंगामा क्यों? पुराने जमाने में राजाओं-महाराजाओं के यहां कुछ ऐसे सेवक/ चारण होते थे जो सदा उनके गुण गाते रहते थे और बदले में राजा उन्हें उचित इनाम दिया करते थे। ऐसे लोग राजा के गुणगान के लिए हर समय प्रयासरत रहते थे। आज के जमाने में भी ऐसे प्राणी/तत्व पाए जाते हैं, जो शासक वर्ग का गुणगान करने में ही अपनी सारी उर्जा लगा देता है। बस अंतर यह हो गया है कि राजे-रजवाड़ों का जमाना अब नहीं रहा और उनके बदले में भारत सहित अधिकांश देशों (कुछ देशों को छोड़कर) प्रजातंत्र आ गया। लोगों ने अपने मतों का प्रयोग करके नेताओं को गद्दी सौंपी और वे राज्य के नए मालिक हो गए। ना उन्हें जनता के हितों की फिक्र है और ना ही कोई चिंता। पांच बरस के बाद, फिर से वोट मांगने जब उन्हें हर दरवाजे पर दस्तक देनी होती है तो वे तरह-तरह के बहाने बनाते हैं और फिर अपने पुराने संबंधों की दुहाई देते हैं।

भारत के लोग बड़े ही दयालु किस्म के हैं और वे पुराने गिले-शिकवे भूलकर फिर से उन्हें अपना नुमाइंदा बना देते हैं। कुछ लोगों का तो मानना है – कोउ नृप होए, हमें का हानि। और ऐसे ही लोग देश को अंधकार की ओर ले जाने में अपनी महती भूमिका निभाते हैं। आज देश में हमारी नुमाइंदगी करने वाले नेता, लूट-खसोट में व्यस्त हैं। कई तो ऐसे नेता हैं जिन पर हत्या, बलत्कार, लूट-अपहरण, भ्रष्टाचार के अलावा डराने-धमाकाने व जमीन हड़पने के आरोप हैं और वे कभी सत्य नहीं हो पाते क्योंकि पुलिस, अपराधी, व्यवसायी का गठजोड़ देश में कार्य कर रहा है जो अपने तरह से कानूनों को परिभाषित करता रहता है। अगर किसी ने भी इस गठजोड़ पर उंगली उठाने की कोशिश की तो वे उंगली उठाने वालों की सारी जन्मपत्री खोल कर रख देते हैं या दूसरे तरीके से इतना परेशान करते हैं कि फिर से कोई उन्हें आखें दिखाने की जुर्रत ना कर सके।

लेख में, ऊपर मैंने राजा-महराजाओं के चारण की चर्चा इसलिए की है कि आज प्रजातंत्र होने के बावजूद कुछ नेताओं को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं हो रही है। उन्हें यह पसंद नहीं है कि ऐसा कोई साधन आम लोगों की पहुंच में हो जिस पर वो उनके गलत कार्यों पर टीका-टिप्पणी कर सके और इसलिए ही सारे के सारे तथाकथित नेता वर्ग के लोग सोशल मीडिया के पीछे पड़ गए हैं क्योंकि राज्य समर्थित मीडिया व निजी मीडिया को एक हद तक तो वो साध लेते हैं लेकिन ये मुआ सोशल मीडिया नाम का हथियार जबसे आम-आदमी की पहुंच में आ गया है कि कोई भी ख़बर हो तुरंत उस पर प्रतिक्रिया होनी शुरू हो जाती है। औऱ यही नेताओं की परेशानी का कारण भी है। सो, वे हर हाल में इस पर प्रतिबंध लगाने की सोच रहे हैं।

नहीं तो क्या कारण है कि जो ममता बनर्जी, वामदलों के शासन के खिलाफ सड़कों पर हर तरह के आंदोलन और मां, मानुष और माटी का नारा दिया करती थीं वही गद्दी मिलने के कुछ दिनों के बाद ही बदल गई। उन्हें अपनी आलोचना पसंद नहीं है। उनके खिलाफ एक शब्द बोलने वाला भी विरोधी की श्रेणी में आता है और वे उसे तुरंत जेल में डालने का आदेश दे डालती हैं।

अब राज्य के निवासियों को ममता बनर्जी से पूछना पड़ेगा कि क्या खाना, क्या पहनना और यहां तक कि किससे संबंध स्थापित करना है। हद हो गई है। शायद ममता बनर्जी को धोखा हो गया है। उसे मालूम नहीं है कि उससे पहले इस गद्दी पर कोई और शख्स भी था जिसे राज्य की जनता ने गद्दी से उतार दिया। पूर्व प्रधानमंत्री, दिवंगत राजीव गांधी को भी इस देश की जनता ने प्रचंड बहुमत दिया था लेकिन जब वे जनता की उम्मीदों पर ख़रे नहीं उतर सके तो अगले चुनाव में जनता ने उन्हें नकार दिया। ये और बात है कि वे चुनावों के दौरान ही आतंकवादी गतिविधियों के शिकार हो गए। देश को उन्होंने कंप्यूटर क्रांति का अमूल्य उपहार दिया था और आज देश उनके सपनों को पूरा कर रहा है और विश्व भर में कंप्यूटर क्रांति का अगुआ देश बन गया है।

हम बात कर रहे हैं कि कुछ राज्यों के नेता अपना गुणगान करने के लिए राज्य के पैसों पर चैनल, समाचारपत्र और पत्रिका लॉन्च करना चाहते हैं जिससे जनता को दिग्भ्रमित किया जा सके। जनता को वही दिखाया जाए जो शासक वर्ग दिखाना चाहता है। यानी कि राज्य सरकार की जय-जयकार। आज के इंटरनेट के युग में शायद ऐसी कोई घटना हो जिस पर आप रोक लगाने की सोच सकते हैं। अगर आपने कोई एक रास्ता बनाया तो लोग तुरंत ही दूसरा रास्ता अख्र्तियार कर लेते हैं। सो, शासक वर्ग को यह चाहिए कि वो विकास के कार्यों पर ध्यान दे। राज्य की जनत इतनी मूर्ख नहीं है कि वो बहकावे में आकर कोई भी खबर पर विश्वास कर लेगी, अगर जनता ऐसा कभी करती है तो वो अपने ही पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारती है।

Mushi Kahn : बहुत अच्छे भाई साहब, यह दुनिया का दस्तुर है कि जो मेरी मरजी व हित के खिलाफ बोले, उस पर कोई ठप्पा लगा कर उसे दुनिया भर में बदनाम करने की कोशिश करो. न्यू मीडया के खिलाफ बोलने वाले काटजू साहेब पर लगाया गया आपका ठप्पा उसी दस्तुर की याद दिला रहा है.
 
Sudhir Dandotiya : इंटरनेट एक स्वतंत्र माध्यम है इस पर तो किसी तरह का की विवाद नहीं होना चाहिए ………इसकी स्वतंत्रता बरकारा रहनी चाहिए
 
Sanjay Awasthi : people at top position in a regulating body of media should remain neutral and the same is applicable to Mr. Katzu also. He must not show his biasedness in statements regarding the issues.


यशवंत के फेसबुक वॉल से. इस पूरे मसले पर अगर आप भी कुछ कहना-बताना-समझाना चाहते हैं तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें या फिर सीधे भड़ास के एडिटर यशवंत तक yashwant@bhadas4media.com के जरिए पहुंचा दें.

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अखबार के कार्यालय पर आत्‍मघाती हमला, 40 की मौत

लागोस: नाइजीरिया की राजधानी अबूजा में स्थित एक अग्रणी समाचार पत्र के कार्यालय पर आत्मघाती हमलावरों ने विस्फोटकों से लदे वाहन को उड़ा दिया। इस विस्फोट में कम से कम 37 लोग मारे गए जबकि 100 अन्य घायल हो गए। अखबार के कडूना राज्य स्थित कार्यालय में भी विस्फोट हुआ, जिसमें तीन लोग मारे गए।

सेफलाइफ फाउंडेशन अस्पताल के चिकित्सा निदेशक अबिसोला फर्नाडीस ने समाचार एजेंसी सिन्हुआ को बताया कि दिस डे नामक समाचार पत्र के अबूजा में स्थित कार्यालय में हुए विस्फोट के बाद कम से 37 शव ले जाए गए हैं। उन्होंने कहा कि सुरक्षाकर्मियों और आपातकालीन कार्यकर्ताओं ने विस्फोट स्थल पर पीड़ितों को निकालने के लिए कड़ी मेहनत की। उन्होंने कहा कि इस विस्फोट में कम से कम 100 और लोग घायल हुए हैं।

कडूना राज्य पुलिस के प्रवक्ता अमिनू लवान ने सिन्हुआ को बताया कि यहां हुए अखबार के कार्यालय पर हमले में तीन लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। 'नेशनल इमरजेंसी मैनेजमेंट एजेंसी' के प्रवक्ता यूशाउ ए. शुएब ने कहा कि बचावकर्मी घटनास्थल पर पहुंच गए हैं और घायलों को अस्पतालों में भर्ती करा दिया गया है। प्रवक्ता ने कहा कि कडूना में जहां विस्फोट हुआ वहां दिस डे, दि सन और दि मोमेंट सहित कई अखबारों के कार्यालय हैं। अभी तक किसी भी संगठन ने इन विस्फोटों की जिम्मेदारी नहीं ली है। (एजेंसी)

दैनिक भास्‍कर, उदयपुर के संपादक होंगे सुधीर मिश्रा

दैनिक भास्‍कर से खबर है कि प्रबंधन ने सुधीर मिश्रा को उदयपुर का स्‍थानीय संपादक बना दिया है. सुधीर इस समय कलस्‍टर एडिशन के संपादक के पद पर कार्य कर रहे थे. सुधीर को हरिश्‍चंद्र सिंह की जगह संपादक बनाया गया है. श्री सिंह भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर अमर उजाला से जुड़ने वाले हैं. संभावना है कि उन्‍हें कानपुर का स्‍थानीय संपादक बनाया जाएगा. मूल रूप से लखनऊ के रहने वाले सुधीर लम्‍बे समय से जुड़े हुए हैं. वे इसके पहले गंगानगर, बाड़मेर एवं जैसलमेर जैसे एडिशनों के संपादक रह चुके हैं. सुधीर जल्‍द ही अपना कार्यभार ग्रहण कर लेंगे.

संसद को और नकारा मत बनाओ सचिन!

सचिन तेंदुलकर अब राज्य सभा के सदस्य बनेंगे। राज्य सभा यानी संसद का उपरी सदन, जहां बिना चुनाव लड़े लोग घुस सकते हैं। माननीय सांसद बन के। अजीब लगा। अजीब इसलिए कि- संसद और सांसद का मतलब क्या है? लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत देश की सेवा, समाज की सेवा- जी हाँ! लोग ऐसा ही कहते हैं और हम भी ऐसा ही मानते हैं। पर इस सेवा का रास्ता – यकीनन क्रिकेट के मैदान में चौके-छक्के लगा कर, बेशुमार दौलत इकट्ठा कर, न ही अपने बोली लगवाकर (आई.पी.एल. में) तय किया जाता है। जो लोग ज़मीन से जुड़ कर नेता बनते हैं – ज़रा उनसे पूछिए कि कठिन मेहनत, लोगों की गालियाँ, नाराज़गी झेलने के बाद भी उन्हें कितना अवसर मिलता है (ना विश्वास हो तो, उत्तर-प्रदेश के चुनाव में, कड़ी मेहनत कर हार का स्वाद चखने वाले राहुल गांधी जी से पूछिए)।

लोकसभा की कठिन डगर और राज्यसभा की आसान राह, संसद के दो-विरोधाभासी चेहरों की मिसाल है। लता मंगेशकर, विजय माल्या, जया बच्चन जैसे ना जाने कितने लोग राज्यसभा में घुस आये और चले गए और फिर आये। जनता-जनार्दन के लिए क्या किये पता नहीं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि -राज्यसभा के सदस्य होने के लिए कोई पात्रता (सेवा या ज़मीनी लगाव के सन्दर्भ में) तय है या नहीं? या फिर, जिसके पास पैसा है, नाम है और शोहरत है, वो पात्र है? सचिन के पास नाम-शोहरत और पैसा सब-कुछ है, क्या इसीलिए सचिन राज्यसभा के लायक हैं? या फिर सचिन ने अपनी करोड़ों के दौलत को (बिल गेट्स की तरह) समाज-सेवा के लिए न्योछावर किया है?

सचिन कोई टाटा-बिरला-अम्बानी तो हैं नहीं कि ५० करोड़ का बँगला खरीदने और करोड़ों का बैंक-बैलेंस रखने के बावजूद, करोड़ों रुपये आम आदमी के लिए खर्च कर रहे हैं? विजय माल्या और सचिन में (इस लिहाज़ से) क्या फर्क है? दोनों अपनी-अपनी उपलब्धियों को अपने-अपने निजी हित के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। दोनों समाज-सेवा के लिहाज़ से कोई बहुत जाना-पहचाना नाम नहीं हैं। ये बात इसलिए कहना ज़रूरी हो गया है – क्योंकि राज्यसभा को एकदम से नकारा बना देने पर आतुर हमारी राजनीतिक पार्टियों को सोचना पड़ेगा। ये भी बताना पड़ेगा कि – राज्यसभा का औचित्य क्या है? सिर्फ बिल पास कराने तक या कहीं ज़्यादा विस्तृत?

आज देश के कोने-कोने में में कई ऐसे लोग हैं, जो समाज के लोगों को बेहद राहत पहुंचा रहे हैं। कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने समाज में (लोगों के लिए) अविस्मरणीय योगदान दिया है। अपनी ज़िंदगी का एक-अच्छा खासा हिस्सा खर्च कर दिया, लोगों का जीवन संवारने में। पर गुमनामी का बादल कभी-कभार, किसी पुरस्कार के रूप में ही छंटा। ये लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था और उस से जुड़े अधिकार के लायक कभी नहीं समझे गए। ऐसा क्यों हुआ, राजनीतिक पार्टियों को ये अब साफ़ करना चाहिए। आज लोगों को सचिन भले ही भगवान लग रहे हों, पर याद कीजिये २० साल पहले का दौर, जब कपिल-देव और सुनील गावस्कर भगवान थे। आज? सिर्फ कमेन्ट्री या विज्ञापन।

पर लाल-बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, सरदार पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोग आज भी शिद्दत के साथ याद किये जाते है (बात गर देश-सेवा और राजनीति की हो तो)। इसके अलावा- विदेशों में सेलेब्रिटीज, अपनी कमाई हुई राशि का अच्छा-खासा हिस्सा, ज़रूरतमंद लोगों पर खर्च करते हैं। हिन्दुस्तान में, सेलेब्रिटीज, बैंकों में जमा करने और अपनी शानो-शौकत पर। सचिन के कोई १० ऐसे सामाजिक कार्य (विस्तृत पैमाने पर) ज़रूर जाना चाहूंगा, जो उन्हें राज्य-सभा का सदस्य बनाए जाने की पुरजोर वकालत करते हों। ध्यानचंद और सचिन जैसे लोग निःसंदेह भारत-रत्न के हक़दार हैं पर राज्य-सभा के हक़दार किस कूबत पर ये पता नहीं चल पा रहा।

हाल ही में झारखंड में एक एन.आर.आई. को भाजपा की तरफ से राज्यसभा का उम्मीदवार इस बिना पर बना दिया गया कि वो पैसे वाले हैं (हालांकि काफी छीछालेदर के बाद निरस्त कर दिया गया)। मतलब? पैसा-शोहरत और नाम – ये राज्यसभा का मेम्बर होने की काबिलियत बनती जा रही है। क्या राज्य-सभा इसीलिए बनी है? किसी का पैसे वाला, अच्छा खिलाड़ी या अच्छा एक्टर होना, राज्यसभा की सदस्यता का पैमाना नहीं बनना  चाहिए। क्या देश में ऐसे लोगों की कमी है जो समाज के लिए अच्छा काम कर रहे हैं? या उनकी कमी है – जो समाज के लिए अच्छा काम करने वालों को राज्यसभा का मेम्बरान होने के काबिल नहीं समझते? सचिन के प्रशसंकों (मैं भी उनमें से एक हूँ) को ये समझना पड़ेगा कि राज्यसभा एक सम्मानित सदन है और उसमें बैठे कई लोगों ने समाज सेवा के सन्दर्भ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और फिर इस सदन के हक़दार बने। यानी एक पैमाना जिसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

एक खिलाड़ी या कलाकार अच्छा समाज-सेवी हो सकता है और अच्छा नेता हो सकता है पर बिना समाज सेवा के राज्यसभा का मेवा खाने वाला…..? हम लोग नेताओं को गाली देते हैं कि वो जनता का काम ईमानदारी के साथ नहीं करते हैं। और हम से कई लोग खुश होते हैं जब सचिन जैसे लोग बिना जनता की सेवा किये नेता बन जाते हैं। अजीब है हम लोग। एक तरफ गाली और दूसरी तरफ धन-शोहरत और नाम का इस्तेमाल कर नेता बने लोगों का खैर-कदम। सचिन एक महान बल्लेबाज हैं। मैदान पर उनको बारम्बार सलाम। पर राज्यसभा में बिना कुछ किये घुस जाने पर बेहद अफ़सोस। अंत में इतना ही कहूंगा कि – हमारी संसद में घुसकर कई बाहुबलियों और अपराधियों ने इसे नकारा बनाने की कोशिश की है (ना विश्वास हो तो अन्ना से पूछिए), ऐसे में विजय माल्या, लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर जैसे लोग इसे और नकारा न बनाएं। मान भी जाओ सचिन।

लेखक नीरज टेलीविजन पत्रकार हैं.

फोन हैकिंग मामले में मर्डोक ने खुद को बताया पीडि़त

लंदन : रूपर्ट मर्डोक ने न्यूज ऑफ द व‌र्ल्ड में फोन हैकिंग मामले में सही समय पर हस्तक्षेप कर पाने में नाकाम रहने पर खेद जताया और अपनी कंपनी के बंद हो चुके अखबार में कुछ कर्मियों की लीपापोती का खुद को पीडि़त बताया। लेविसन आयोग के समक्ष अपनी दूसरी पेशी में 81 साल के मर्डोक ने कहा कि उन्हें न्यूज ऑफ द व‌र्ल्ड में इतने बड़े पैमाने पर अनैतिक तरीकों से खबर जुटाने की जानकारी नहीं थी।

फोन हैकिंग मामले को अपने पक्ष में मोड़ने की मांग करते हुए मर्डोक ने कहा कि अखबार के कुछ कर्मियों ने लीपापोती की लेकिन उन्होंने आरोपों की गंभीरता को पहचान नहीं पाने के लिए खेद जताया। अपने न्यूजरूम में फैली संस्कृति के गहरे होने की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने दावा किया कि इस सड़न को पहले रोक पाने में नाकाम रहने के लिए वह क्षमाप्रार्थी हैं। उन्होंने इसे शेष जीवन के लिए अपनी प्रतिष्ठा पर गहरा दाग बताया।

अपने पिता से 1952 में मिली ऑस्ट्रेलियाई मीडिया कंपनी को अरबों पाउंड के मीडिया साम्राज्य में बदलने वाले मर्डोक ने अपने दर्शन का उल्लेख करते हुए बताया कि फोन हैकिंग के बाद सुधारात्मक उपाय किए गए और कहा, अब हम पूरी तरह से एक नई कंपनी हैं। ब्रिटेन के कई प्रधानमंत्रियों के साथ करीबी संबंधों को लेकर विख्यात और अपने अखबारों के शीर्षक के माध्यम से राजनीति में खासा दखल देने वाले मर्डोक ने हालांकि राजनीतिकों के साथ सालों के अपने संबंधों को कमतर बताया और जोर देकर कहा कि उन्होंने किसी प्रधानमंत्री से कोई लाभ नहीं मांगा। माग्रेट थैचर के प्रति प्रशंसा को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, मैंने किसी प्रधानमंत्री से कोई मांग नहीं की। यह कोरी कल्पना है। (एजेंसी)

मीडिया को उसकी सीमा समझाने के लिए गाइड लाइन

नई दिल्ली : अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिग के लिए दिशा-निर्देश तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने गुरुवार को कहा कि यह मामला संवैधानिक प्रावधानों के तहत पत्रकारों की सीमाओं को स्पष्ट करने से संबंधित है। केंद्र ने इसका समर्थन करते हुए कहा कि न्यायिक कार्यवाहियों पर रिपोर्टिग को नियमित करने को लेकर उच्चतम न्यायालय पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हम चाहते हैं कि पत्रकार अपनी सीमाओं को जाने। मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति डीके जैन, न्यायमूर्ति एसएस निज्जर, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश और न्यायमूर्ति जेएस खेहर शामिल हैं। कोर्ट ने उन आशंकाओं को भी दूर करने की कोशिश की कि अदालती कार्यवाही की मीडिया कवरेज पर दिशा-निर्देशों में कठोर प्रावधान होंगे। पीठ ने कहा, हम इस पक्ष में नहीं हैं कि पत्रकार जेल जाएं। मीडिया कवरेज पर दिशा-निर्देश इसलिए तय करने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत प्रेस को प्रदत्त अधिकार और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) को संतुलित किया जा सके।

सुप्रीमकोर्ट की हिमायत करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने उन दलीलों का विरोध किया कि दिशा-निर्देश तय कर मीडिया की सीमाएं तय नहीं की जा सकतीं। उन्होंने कहा अनुच्छेद 21 को 19 पर आवश्यक रूप से तरजीह मिलना चाहिए। इंदिरा ने कहा, इसलिए अदालत के समक्ष पेश की गई यह दलील गलत है कि अनुच्छेद 19 (1)(क) के तहत प्रदत्त अधिकार पर अनुच्छेद 19 (2) के तहत विहित रोक के अलावा कोई अन्य रोक नहीं लगाई जा सकती, यह तर्क संवैधानिक व्याख्या के मूलभूत सिद्धांतों को नजरअंदाज करती है।

इंदिरा जय सिंह ने कहा कि न्यायिक कार्यवाहियों की रिपोर्टिग को नियमित करने की जरूरत है, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि मीडिया रिपोर्टिग भी न्याय प्रशासन में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने में योगदान करती है। उन्होंने कहा कि रिपोर्टिग को त्रुटि मुक्त बनाने के लिए अदालत को कार्यवाही का आलेख पत्रकारों को देने का प्रयास करना चाहिए। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सामान्य विधि के तहत कोर्ट की कार्यवाही को प्रकाशित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट या अन्य अदालतों में पत्रकारों के लिए कोई विशेषाधिकार नहीं है। (एजेंसी)

उपेंद्र राय पहुंचे सहारा कार्यालय, नीचे की केबिन में भेजे गए स्‍वतंत्र मिश्रा

 

सहारा में स्‍वतंत्र मिश्रा के राज का खात्‍मा तो काफी समय पहले ही हो गया था, अब उन्‍हें गद्दी से भी उतार दिया गया. यानी अब उन्‍हें उस केबिन से बाहर कर दिया गया, जिसमें वे अपने शासनकाल में बैठकर सहारा की सत्‍ता संचालित करते थे. पूरी ताकत के साथ वापस लौटे उपेंद्र राय अब इसी केबिन में अपनी गद्दी संभाल चुके हैं. उपेंद्र आज स्‍वतंत्र मिश्रा से खाली कराए गए केबिन में कुछ देर के लिए बैठे.
 
सहारा के बिल्डिंग में फर्स्‍ट फ्लोर पर स्थित सहारा मीडिया के हेड का केबिन, जिसमें कभी उपेंद्र राय भी बैठा करते थे, में उपेंद्र के ग्‍लोबल हेड बनकर जाने के बाद स्‍वतंत्र मिश्रा की ताजपोशी हुई थी. इस केबिन में बैठकर ही स्‍वतंत्र मिश्र ने कई फरमान जारी किए, कई लोगों को किनारे किया, कई लोगों को तोहफे दिए. आज खुद उस केबिन से उन्‍हें रुखसत होना पड़ा है. उपेंद्र अब और भी ताकत के साथ वापस लौट चुके हैं. और स्‍वतंत्र मिश्र उनके रबर स्‍टाम्‍प बन चुके हैं. 
 
गुरुवार यानी आज स्‍वतंत्र मिश्रा को उपर के केबिन से हटाकर नीचे भेज दिया गया. उनके सामान को भी केबिन से निकालकर उनके नए केबिन में पहुंचा दिया गया. 12 अप्रैल के बाद आज दूसरी बार उपेंद्र राय सहारा कार्यालय आए तथा स्‍वतंत्र मिश्रा से खाली कराए गए केबिन में बैठे. कुछ लोगों से मुलाकात भी की. अब समझा जा रहा है कि जल्‍द ही सहारा में व्‍यापक फेरबदल को अंजाम दिया जाएगा. उपेंद्र के आने से जहां उनके समर्थक लॉबी खुश है, वहीं स्‍वतंत्र मिश्रा एंड कंपनी खेमे में मायूसी छाई हुई है. जबकि सत्‍ता से चिपक के रहने वाले जुगाड़ की खोज में लग गए हैं. 

आलोक तोमर की मां उर्मिला तोमर का भिंड में निधन

दिवंगत पत्रकार आलोक तोमर की मां उर्मिला तोमर का भिंड में निधन हो गया. वे 71 वर्ष की थीं. वे भी काफी समय से ओवरी के कैंसर से पीडि़त थीं. गुरुवार की शाम साढ़े सात बजे उन्‍होंने घर पर ही आखिरी सांस लीं. घर पर ही अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई. जब तक परिजन उन्‍हें हास्‍पीटल ले जाते उनका निधन हो गया. 

वे मध्‍य प्रदेश के सरकारी स्‍कूल में प्रिंसिपल रह चुकी थीं. आलोक तोमर को आलोक बनाने में उनकी महत्‍वपूर्ण भूमिका थी. आलोक तोमर और अपने परिवार के लिए वे हमेशा संबल बन कर खड़ी रहीं. उनका अंतिम संस्‍कार शुक्रवार की दोपहर को भिंड में स्थित श्‍मशान घाट पर किया जाएगा. उनके निधन का खबर मिलते ही परिजन भिंड के लिए रवाना हो चुके हैं. 

भास्‍कर के पत्रकार राजेश गाबा को यूथ ऑफ जर्नलिस्‍ट अवार्ड देंगे शिवराज सिंह चौहान

भोपाल। वर्किग जर्नलिस्ट एसोसिएशन फॉर यूथ ने सिटी भास्कर के रिपोर्टर राजेश गाबा (प्रिंस गाबा) को उत्तम रिपोर्टिग और साहित्यिक कला क्षेत्र में श्रेष्ठ योगदान के लिए 'यूथ ऑफ जर्नलिस्ट अवार्ड के लिए चुना है। शहीद भवन में 27 अप्रैल को होने वाले समारोह में शाम साढ़े चार बजे उन्हें यह सम्मान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जनसंपर्क एवं संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के हाथों प्रदान किया जाएगा। इससे पूर्व राजेश गाबा को पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

अमिताभ बच्चन के मधुशाला कविता पाठ के लाइव कवरेज के लिए दैनिक भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल ने भी राजेश गाबा को विशेष प्रोत्साहन दिया था। कला, साहित्य, संस्कृति, पर्यटन व फिल्म और सामाजित मुद्दों पर लिखने वाले राजेश गाबा राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी हैं। वर्किग जर्नलिस्ट एसोसिएशन फॉर यूथ के अध्यक्ष भरत पमनानी ने बताया कि कार्यक्रम में बेस्ट यूथ फोटोग्राफी अवार्ड 'आजतक के दिलीप साहू को प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर 'आज की पत्रकारिता और उसका असर विषय पर परिचर्चा भी आयोजित होगी और पत्रकार रमेश शर्मा का वक्तव्य भी होगा। साभार : भास्‍कर

हिंदुस्‍तान विज्ञापन घोटाला : काशी प्रसाद ने कोर्ट में दर्ज कराया बयान, कई राज खोले

मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज दैनिक हिन्दुस्तान के कथित दो सौ करोड़ के विज्ञापन घोटाले में जांच की आंच अब बिहार प्रबंधन के शीर्ष पदाधिकारियों के द्वार तक पहुंच गई है। अभियोजन के समर्थन में पुलिस के गवाह ने न्यायालय में धारा 164 के तहत दिए बयान में विज्ञापन घोटाले में कंपनी के बिहार राज्य के उपाध्यक्ष योगेश चन्द्र अग्रवाल के शामिल होने की बात उजागर की है। बयान में गवाह ने इस बड़े घोटाले में प्रबंधन के अन्य वरीय सहयोगियों और संपादकों की मिलीभगत को भी उजागर किया है।

लोगों में चर्चा होने लगी है कि बिहार राज्य में आर्थिक अपराधियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर चुके बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कब तक इस विश्वस्तरीय हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले के नामजद और अप्राथमिक अभियुक्तों को जेल भेज पाते हैं? ज्यों-ज्यों पुलिस अनुसंधान आगे बढ़ता जा रहा है, पुलिस जांच से लगता है कि इस विज्ञापन घोटाले में भविष्य में राज्य और केन्द्र सरकार के अनेक विभागों के वरिष्‍ठ अधिकारी जांच के दायरे में आ सकते हैं।

इस बीच, पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के आदेश पर कोतवाली कांड संख्या-445/2011 में पुलिस जांचकर्ता सह कोतवाली के आरक्षी निरीक्षक ने अभियोजन के समर्थन में मुंगेर के मंगल बाजार निवासी 85 वर्षीय आरटीआई कार्यकर्ता, अधिवक्ता और पत्रकार काशी प्रसाद को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी एमके सिन्हा के समक्ष आईपीसी की धारा 164 के तहत बयान के लिए पेश किया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (मुंगेर) एमके सिन्हा के आदेश पर प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी डीएन भारद्वाज ने पुलिस के गवाह काशी प्रसाद का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत लिपिबद्ध किया।

प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी डीएन भारद्वाज के समक्ष पत्रकार काशी प्रसाद ने बयान किया है कि —‘‘मैं बिना किसी भय या दबाव में यह बयान दे रहा हूं। छात्र जीवन से पत्रकारिता से जुड़ा हूं। मुझे वर्ष 2007-08 में पता चला है कि मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड, जो अपना नाम मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड किया और अभी मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड है, ने अपने हिन्दुस्तान अखबार में फर्जी निबंधन संख्या छापकर करोड़ों का घपला किया है। आरटीआई के तहत अधिकृत प्रति मुझे प्राप्त है। वित्तीय वर्ष 2002-03 और 2003-04 के दौरान कंपनी ने एक करोड़ से भी अधिक रुपया का घपला विज्ञापन मद में किया है और सरकार को चूना लगाया है।‘‘

श्री काशी प्रसाद न्यायालय में आगे बयान करते हैं कि–‘‘इस कंपनी ने 2001 में भागलपुर संस्करण को लांच किया और अखबार में प्रेस रजिस्ट्रार का वर्ष 1986 का रजिस्‍ट्रेशन चिपका दिया। कंपनी ने जाली कागजात प्रस्तुत कर करोड़ों का चूना लगाया और षड़यंत्र कर धोखाधड़ी की है। इस घोटाले में कंपनी की अध्यक्ष शोभना भरतिया, पटना प्रबंधन के उपाध्यक्ष योगेश चन्द्र अग्रवाल और उनके प्रबंधक सहयोगियों और संपादकों ने मिलीभगत कर यह कुकृत्य किया है।‘‘

इस विज्ञापन घोटाला में पहले से नामजद अभियुक्तों में मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड की अध्यक्ष शोभना भरतिया, मुद्रक और प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव और स्थानीय संपादक बिनोद बंधु शामिल हैं। पुलिस प्राथमिकी में सूचक व आरटीआई कार्यकर्ता मंटू शर्मा ने आरोप लगाया है कि अभियुक्तों ने बिना निबंधित मुंगेर और भागलपुर के दैनिक हिन्दुस्तान संस्करणों के प्रिंट लाइन में 15 वर्ष पूर्व के प्रेस रजिस्‍ट्रार, नई दिल्ली से पटना हिन्दुस्तान संस्करण के लिए प्राप्त रजिस्‍ट्रेशन संख्या-44348/1986 को चिपका कर अपना अखबार को रजिस्‍टर्ड घोषित कर केन्द्र और राज्य सरकार के सैकड़ों सरकारी विभागों से लगभग दो सौ करोड़ रुपया की प्राप्ति विज्ञापन मद में गैर कानूनी ढंग से की।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क  मोबाइल नं- 09470400813 के जरिए की जा सकती है.

अमर उजाला, देहरादून से हल्‍द्वानी भेजे गए गंगा उनियाल, पवन बने ईएमएस के विशेष संवाददाता

अमर उजाला, देहरादून से खबर है कि गंगा उनियाल का तबादला हल्‍द्वानी के लिए कर दिया गया है. वे यहां पर चीफ सब एडिटर थे. वे पिछले एक दशक से देहरादून में तैनात थे. वे पिछले काफी समय से गढ़वाल डेस्‍क के प्रभारी के रूप में काम देख रहे थे. इससे पहले वे मेरठ और ऋषिकेश में भी तैनात रह चुके हैं. बताया जा रहा है कि तबादले की सूचना मिलने के बाद उनियाल छुट्टी पर चले गए हैं.

युवा पत्रकार पवन कुमार 'अरविंद' एक्‍सप्रेस मीडिया सर्विस के दिल्‍ली ब्‍यूरो में विशेष संवाददाता बनाए गए हैं. उनको कांग्रेस, भाजपा और दिल्‍ली सरकार को कवर करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. मूलत: उत्तर प्रदेश के रहने वाले श्री अरविंद गत सात सालों से प‍त्रकारिता में सक्रिय हैं और इससे पूर्व वह संवाद सृष्टि, शाह टाइम्‍स और दैनिक जागरण में काम कर चुके हैं.  

आसाराम बापू ने यूपी के भदोही में टीवी जर्नलिस्ट को मारा थप्‍पड़

: अपने सहयोगियों से भी पिटवाया : आसाराम बापू और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है. आसाराम को अपनी ताकत पर इतना घमंड है कि वो पत्रकारों से पहले भी अभद्रता कर चुका है. पर आज तो इसने हद करते हुए एक पत्रकार को ना सिर्फ गाली दी बल्कि उसे खुद थप्‍पड़ मारा और अपने चम्‍मचों से भी पिटवाया. पत्रकार का कैमरा भी छीन लिया गया. घटना यूपी के भदोही जिले की है. पत्रकारों के धरने के बाद आशाराम के लोगों ने कैमरा तो वापस कर दिया परन्‍तु टेप वापस नहीं किया.

भदोही जिले में गोपीगंज में स्थित राम‍लीला मैदान में आसाराम बापू का कार्यक्रम था. आसाराम पर आरोप था कि वह गैरकानूनी तरीके से लालबत्‍ती लगी कार में घूम रहा है. बनारस एवं मिर्जापुर में प्रवचन के दौरान यह खबर सामने आई थी. जिले के टीवी जर्नलिस्ट रोहित भी इसकी सूचना मिलने के बाद कवरेज के लिए पहुंच गए. आसाराम बापू जब कार्यक्रम से पहले आराम करने के लिए गोपीगंज के आइडियल कारपेट के सामने लाल बत्‍ती लगी गाड़ी से रुका तो रोहित उसका विजुअल बनाने लगे. वे विजुअल बना ही रहे थे कि आसाराम की निगाह उन पर पड़ गई. आसाराम ने रोहित से पूछा कि क्‍या कर रहे हो?

इस पर रोहित ने कहा कि पत्रकार हूं और कवरेज कर रहा हूं. रोहित ने बताया कि इतना सुनते ही आसाराम ने मुझे को मां-बहन की गाली दी तथा कहा कि तुम्‍हारी औकात अभी दिखाता हूं. इतना कहना था कि उसके आसपास मौजूद समर्थक तथा सुरक्षागार्ड मुझे पकड़ लिए तथा लगभग घसीटते हुए आसाराम के पास ले गए. आसाराम ने मेरा कैमरा छिनवाते हुए मुझे एक थप्‍पड़ मारा तथा अपने लोगों को कहा कि पीटो इसे. इसके बाद उसके सहयोगियों ने मेरी पिटाई शुरू कर दी. किसी तरह एक व्‍यक्ति बीच बचाव करके मुझे को बचाया. पर उन लोगों ने कैमरा वापस करने से इनकार करते हुए मुझे को भगा दिया. साथ ही धमकी दी कि बोलोगे तो खतम भी करवा देंगे.

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान स्‍थानीय पुलिस भी आसाराम के साथ मिलकर पत्रकार से अभद्रता करती रही. रोहित ने अपने साथ हुई अभद्रता की जानकारी अपने साथियों को दी. उनके तमाम साथी थाने पर पहुंच गए. सभी ने थाने के सामने ही धरना शुरू कर दिया. वे लोग आरोपी आसाराम के खिलाफ कार्रवाई, कैमरा तथा रिकार्डिंग की गई टेप वापस कराने की मांग पर अड़ गए. बात बिगड़ते देख पुलिस ने रोहित का कैमरा आसाराम के पास से वापस करवाया, परन्‍तु उनका कैमरा क्षतिग्रस्‍त कर दिया था. रोहित को रिकार्डेड टेप की जगह दूसरा टेप दिया गया. परन्‍तु आसाराम और उसके समर्थकों के खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. पत्रकारों में इससे नाराजगी है.

अब फ्रंट पेज पर विज्ञापन प्रकाशित नहीं करेगा ‘द हिंदू’!

अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार 'द हिंदू' का फ्रंट पेज पर प्रकाशित एक विज्ञापन भूत की तरह पीछा नहीं छोड़ रहा है. अखबार के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने भी माना है कि इस विज्ञापन से अखबार की छवि को धक्‍का लगा है. उन्‍होंने इसके लिए पॉलिसी बनाने की बात भी कही है. उल्‍लेखनीय है कि इस साल एक जनवरी को तमिलनाडु के एक कांग्रेसी नेता ने हिंदू में विज्ञापन प्रकाशित कराया था.

अखबार के फ्रंट पेज पर जैकेट के रूप में प्रकाशित इस फुल साइज विज्ञापन में सोनिया की तस्‍वीर के साथ लिखा गया था कि ''We remain, Madamji, ever at your feet''. तब अखबार के लीक से हटने को लेकर खूब हो हल्‍ला हुआ था. इस भूत ने प्रबंधन का अब तक पीछा नहीं छोड़ा है. अब प्रबंधन इस स्थिति से बचने के लिए नई पॉलिसी लाने के साथ पहले पन्‍ने पर जैकेट में विज्ञापन प्रकाशित नहीं करने की भी बात की है. 

इस मामले में अखबार के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन अपने फेसबुक एकाउंट पर लिखते हैं कि – “To all those who messaged me about the atrocious front page ad in The Hindu’s Delhi edition on Jan 1, my view as Editor is that this sort of crass commercialisation compromises the image and reputation of my newspaper. We are putting in place a policy to ensure the front page is not used for this sort of an ad again.” (Input : Churmuri)

संजय गुप्‍ता का आदेश : जागरण के सिटी ऑफिस में नहीं चलेगा एसी!

: कानाफूसी : दैनिक जागरण समूह कर्मचारियों को कम पैसे देने तथा कर्मचारी हितों में कंजूसी दिखाने के लिए भले ही कुख्‍यात हो, पर अपने कार्यालयों में सुविधा उपलब्‍ध कराने में यह ग्रुप पीछे नहीं रहता है. इस अखबार समूह के कार्यालय नई तकनीक और सुविधाओं से पूरी तरह लैस रहते हैं. पर संजय गुप्‍ता के एक फरमान ने नए बहस को जन्‍म दे दिया है. यह फरमान कास्‍ट कटिंग के नाम पर जारी किया गया है या फिर कर्मचारियों से नाराजगी पर, कहना थोड़ा मुश्किल है, परन्‍तु कर्मचारी इस फरमान के बाद से परेशान हैं.

संजय गुप्‍ता ने आदेश दिया है कि दैनिक जागरण के दिल्‍ली सिटी कार्यालय में अब एसी नहीं चलेगा. इस फरमान के बाद से कर्मचारी सहमे हुए हैं. हालांकि सब तरह की चर्चाओं के बीच कास्‍ट कटिंग को तो कर्मी सिरे से नकार रहे हैं, उनका कहना है कि ये परफारमेंस से नाराजगी का असर है. खबर यह भी है कि सिटी कार्यालय में तैनात रिपोर्टरों को इस बार इंक्रीमेंट और प्रमोशन भी नहीं दिया जाएगा. कहा जा रहा है कि संजय गुप्‍ता सिटी में अपने रिपोर्टरों के परफारमेंस से खुश नहीं हैं. संजय गुप्‍ता के इस फरमान के बाद निशिकांत ठाकुर के खास लोग कुछ ज्‍यादे ही परेशान हैं. सिटी ऑफिस में ज्‍यादातर उनके अपने लोगों का ही बोलबाला है.

इंडिया टीवी नंबर वन, न्यूज एक्सप्रेस ने कई चैनलों को पछाड़ा

कई सप्‍ताह बाद एक बार फिर इंडिया टीवी ने सोलहवें हफ्ते में आजतक को नम्‍बर एक की कुर्सी से उतार दिया है. मामूली अंकों की बढ़त के साथ इंडिया टीवी नम्‍बर एक पर पहुंच गया है. ऐसा लग रहा है कि निर्मल बाबा के खिलाफ साफ्ट कार्नर रखने के चलते दर्शकों ने आजतक को दूसरे पायदान पर पहुंचा दिया है, वहीं अपने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए बाबा की पोल खोलने का लाभ इंडिया टीवी को मिल गया है. जी न्‍यूज भी न्‍यूज24 को झटका देकर पांचवें पायदान पर पहुंचा दिया है.

इस बार न्‍यूज एक्‍सप्रेस ने अच्‍छी बढ़त के साथ एक बार फिर टॉप टेन में वापसी कर ली है. मात्र नौ महीनों में ही टॉप टेन चैनलों में शुमार होना एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है. न्‍यूज एक्‍सप्रेस ने साबित कर दिया है कि अच्‍छा कंटेंट दिखाकर भी टीआरपी पाई जा सकती है. सारे चैनल निर्मल बाबा के पेड प्रोग्राम को दिखाकर टीआरपी और पैसा दोनों पा रहे थे तो इस चैनल ने धारा के विपरीत चलने का साहस किया. इसका फल भी इसे मिला है. निर्मल बाबा के पक्ष में खबर दिखाने वाले पी7 न्‍यूज को धकियाते हुए न्‍यूज एक्‍सप्रेस दसवें पायदान पर पहुंच गया है.     

यह रही सोलहवें सप्‍ताह की रेटिंग-

इंडिया टीवी – 17.45, आजतक – 17.12, स्‍टार न्‍यूज – 12.12, जी न्‍यूज – 9.21, न्‍यूज24 – 8.89, आईबीएन7 – 7.75, एनडीटीवी इंडिया – 5.17, समय – 5.01, तेज – 5.01, न्‍यूज एक्‍सप्रेस – 4.36.

आलोक तिवारी बने नेशनल दुनिया के बिजनेस एडिटर

जनसंदेश टाइम्‍स, कानपुर से आलोक तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर बिजनेस एडिटर थे. आलोक ने अपनी नई पारी नेशनल दुनिया, दिल्‍ली के साथ की है. उन्‍हें यहां भी बिजनेस एडिटर बनाया गया है. आलोक ने करियर की शुरुआत 1994 में दैनिक जागरण, कानपुर से की थी. लगभग दस सालों तक यहां रहने के बाद 2003 में इन्‍होंने हिंदुस्‍तान, कानपुर ज्‍वाइन कर लिया था. इन्‍हें यहां बिजनेस डेस्‍क का प्रभारी बनाया गया. सन 2010 में यहां से इस्‍तीफा देकर दैनिक भास्‍कर, भोपाल में डीएनई बन गए. यहां कुछ महीने बिताने के बाद न्‍यूज एडिटर के रूप में 2010 में ही अमर उजाला, बरेली ज्‍वाइन कर लिया. 2012 की शुरुआत में अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर बिजनेस एडिटर के रूप में जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ गए थे.

इस साहसिक संपादक ने रामनाथ गोयनका को ‘ना’ कह दिया था

आज जब पत्रकारिता और संपादकीय नाम की संस्‍था में आए बदलाव को लेकर बहस जारी है. संपादक नाम की संस्‍था लगातार कमजोर होती जा रही है, संपादक मालिक के सामने सिर हिलाने के अलावा कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है तो कुछ पुराने संपादकों की नैतिकता, ना झुकने की प्रवृत्ति वाली कहानियां और किस्‍से मन को शांति देते हैं. कुलदीप नैयर ने सीनियर जर्नलिस्‍ट एवं इंडियन एक्‍सप्रेस, ट्रिब्‍यून समेत कई अखबारों के संपादक रह चुके वीके नरसिम्‍हन को याद करते हुए उनकी न झुकने की प्रवृत्ति को डेक्‍कन हेराल्‍ड में लिखे अपने लेख के माध्‍यम से श्रद्धांजलि दी है.

वरिष्‍ठ पत्रकार कुलदीप नायर लिखते हैं कि गजब का साहस था वीके नरसिम्‍हन में. उन्‍होंने बिना जानकारी के अखबार के प्रिंट लाइन में बदलाव को लेकर अखबार छोड़ दिया तथा रामनाथ गोयनका के बुलाने पर भी वापस नहीं लौटे, जबकि उनके पास रोजगार नहीं था. आप भी पढि़ए डेक्‍कन हेराल्‍ड में वीके की कहानी कुलदीप नैयर की जुबानी.  


VKN : A journalist of great courage

An editor like him should have been honoured in public for the service he rendered to the press.

V K Narasimhan has not got his due for the role he played during the Emergency. He was editor of The Indian Express throughout the period.

The admiration which the paper has received for its courageous stand during the days when practically all had caved in is entirely Narasimhan’s. He was the editor of The Financial Express but made chief editor of Indian Express when S Mulgaonkar was asked to quit.

The government at that time re-organised the board looking after The Indian Express and appointed K K Birla as chairman, the darling of the establishment.

Protests by us, the senior staff at the Express, against the induction of a film critic as the chief editor, made Sanjay Gandhi and his cohorts to combine the two post of editor at The Financial Express and The Indian Express to appoint Narasimhan, a quite elderly person who was considered harmless.

They rued the day when they appointed him because he was relentless in criticising the Emergency in one way or the other without inviting any ‘advice’ from the chief censor. Narasimhan knew how to convey things between the lines.

Making a difference

After a brief stint in jail I was back at the Express writing my column ‘Between the Lines.’ Narasimhan was the one who made the language stronger even when I preferred to go easy to pass the censor’s strict standards. His additions made all the difference.

 Narasimhan’s commitment to the freedom of the press was so deep and intense that he saw to it that he would sustain peoples’ faith in the freedom of expression and credibility in The Indian Express.

It was a tremendous feat to keep the torch of free press burning on the one hand and not inviting the wrath of censor on the others. The newspaper’s circulation increased fourfold from 50,000 to 2 lakh copies because his credibility and clarity had won the general admiration.

The circulation would have gone still higher but Ramnath Goenka, the proprietor, said he had no money to purchase more newsprint.

An editor like him should have been honoured in public for the service he rendered to the press, particularly The Indian Express. But he was humiliated because the day Mrs Gandhi was defeated at the polls he was ousted to bring in Mulgaonkar. Goenka explained that this was his obligation because Mulgaonkar had been forced to quit during the Emergency.

 Goenka had a point but what annoyed everyone was the abrupt change made even in the print line without Narasimhan’s knowledge. In protest he left the paper. Senior staff was at Goenka’s throat for the unceremonious departure of a person who had led them in the fight against the Emergency at a time when editors had compromised with the establishment.

I was deputed by Goenka to bring back Narasimhan as editor of The Financial Express, his original position but he refused to return because of the manner in which he was treated by Goenka.

I was greatly disappointed because the paper had lost a great editor and a loving fatherly figure. I can never forget the scene when I left his house: Narasimhan and his wife were sitting on the floor of their tiny kitchen and sipping coffee.

He had no job, no position. Nor did he care because persons like Narasimhan drew strength from their faith in values which today’s journalists generally do not pursue, much less cherish them.

‘उभार’ के चलते दिलीप मंडल को चहुंओर गालियां, दिलीप बोले- नहीं सुधरूंगा

Avinash Das : दिलीप मंडल बड़े साहसी हैं लेकिन… ईटी हिंदी और इंडिया टुडे के बीच कॉरपोरेट पत्रकारिता को अंडरवर्ल्‍ड कहते हुए उसे खारिज भी करते हैं और ढेर सारे पिछड़ों-वंचितों का सपोर्ट भी पा लेते हैं… और धीरे से अपने चाहने वालों की आकांक्षाओं से समझौता करते हुए अंडरवर्ल्‍ड की राह भी पकड़ लेते हैं। वहां उनके जाने से भी हमें कोई एतराज नहीं अगर जैसा वे सोचते हैं, वैसी पत्रकारिता के लिए वहां जाकर स्‍टैंड ले लेते हैं … एतराज तब है, जब अंडरवर्ल्‍डनुमा पत्रकारिता के भीतरी एजेंडे को खुल्‍लम खुल्‍ला लागू करने की कोशिश करते हैं। इंडिया टुडे का ताजा अंक इसका उदाहरण है। कल Ajit Anjum ने इस ओर हमारा ध्‍यान दिलाया था, आज हमारा मन भी उस पर बात करने के लिए मचल रहा है। जो लिंक नीचे दिया जा रहा है, उसके हिंदी अनुवाद को हिंदी इंडिया टुडे में कवर स्‍टोरी के रूप में जगह मिली है। बहरहाल, इस नये ज्ञानदान के लिए दिलीप जी का शुक्रिया… और बधाई कि उम्‍दा पत्रकार के रूप में अभी अभी फारवार्ड प्रेस ने उनका सम्‍मान किया है।
Breast surgery is the new rage in India : India News – India Today
indiatoday.intoday.in
Women want them perfect. Men want less flab. Breast surgery is the new rage.

http://indiatoday.intoday.in/story/breast-implant-surgeries-in-india/1/185295.html

         Arbind Jha इंडिया टुडे का नया संस्करण देखे की नहीं आप लोग, कई दिनों से ऐसा कवर का इंतज़ार था जब से दिलीप मंडल जी इंडिया टुडे का संपादक बने थे… एक बार देख लीजिये आप लोग भी और अपने प्रतिक्रिया भी दीजिये.. आखिर वो पेज वो कवर तो आ ही गया जो दिलीप मंडल जी नहीं लाने देना चाहते थे, अब क्या होगा हो उनका…http://www.facebook.com/madforad

        Anand Pandey क्या गलत है इस कवर में? बात जब स्तन सर्जरी की हो रही है तो क्या गलत है इस पिक में.
   
        Chandan Pandey इस खबर में ऐसी कोई बुरी बात नहीं. यह खबर कम से कम किसी कॉर्पोरेट घराने का विज्ञापन तो नहीं ही है साथ ही किसी खराब राजनीतिक पार्टी की चमचागिरी भी नहीं. मैं समझता हूँ कि इंडिया टुडे एक सामान्य पत्रिका है और Dilip जी किसी बड़ी उम्मीद से नहीं, बल्कि जीवन यापन के लिए ही वहाँ गए होंगे. दिलीप के विचार, मैने यह सुखद ढंग से पाया है कि, बड़े जरूरी हैं और उन विचारों को रखने का ढंग बड़ा कंविंसिंग है. बुरा तब होता जब दिलीप, रोजगार और उसके दबाव में अपपा स्टैड बदल लेते. उन्होने फेसबुक प्रोफाईल डिलीट की थी, वह जरूर एक बुरी बात थी पर यह खबर तो व्यवसायिक जरूरत ही है.
   
        Avinash Das हम गलत-सही की नहीं, कवर स्‍टोरी बनाने के लिए विषय की प्राथमिकता की बात कर रहे हैं…
    
        Sandeep Kumar I think it is a bold step by an editor…….awareness about breast surgery is not a mean thing to discuss about…..
     
        Prakash Kumar Like
      
        Chandan Pandey ‎Avinash Das : ऐसे भोले न बनिए, साहब. कवर स्टोरी तय करने के पीछे सिर्फ सम्पादक ही नहीं होता. पूरी मार्क़ेटिंग टीम होती है.
      
        Avinash Das मैं भोला नहीं बन रहा। वही कह रहा हूं कि जिस आधार पर आप पहले मीडिया की आलोचना करते थे, उसी आधार पर मार्केटिंग टीम के सामने स्‍टैंड भी लेना चाहिए था और इसे अंदर की एक स्‍टोरी के रूप में जगह देनी थी।
       
        Arbind Jha chandan sir pr sampadak ki bhumika main hota hai
        
        Anurag Arya मैंने कवर पेज पर फोटो नहीं देखा अगर वो आपति जनक है तो अलग बात है जहाँ तक विषय की बात है विषय बहुत नोर्मल है . ओर विषय में कोई बुराई नहीं है .
         
        Shailendra Jha चन्दन पाण्डेय जी दिलीप मंडल जी ने जैसे अपनी छवि बनायीं थी, उससे लगता था की वो स्तन की नहीं पेट की बात करेंगे, बिना परवाह किये के वो अमरद का है या औरत का. आपने जो कहा उस हिसाब से तो ब्लू फिल्म भी बन रही है इण्डिया में तो क्या करें, मगज़ीन में न्यूड फोटोस अपलोड कर दिया जाये, क्योंकि वो तो हो रहा है ? सिर्फ इसलिए प्रतिरोध करना किसी भी बात का आपको थोड़े नंबर मिल जाएँ ठीक नहीं, कोई ठोस वजह हो तो ज़रूर अपनी बात कहिये
         
        Arbind Jha itnni aapatijanak mujhe laga ki mie ise Metro mae nahi khool saka
         
        Chandan Pandey ‎Avinash Das : क्यों ? आप स्त्री विरोधी बात कर रहे हैं. इस खबर में ऐसा क्या बुरा है या क्या कमी है जो यह पिछले हफ्ते की खबरों से होड़ नहीं ले सकती. मैं उन खबरों की बात कर रहा हूँ जो ऐसे कॉरोपोरेट संचालित पत्रिकाओं में जगह पाती हैं.
         
        Anand Pandey ‎Avinash Das bhai..यह एक समकालीन इश्यु है और उसको फ्रंट पेज में जगह देना गलत नहीं है. वैसे दिलीप जी का हार्ड स्टैंड सिर्फ आरक्षण और हिन्दू धर्म के प्रति रहा है.
        
        Arbind Jha India Today ka yahi rabieya kabhi dilip sir ko achha nahi lagta tha
         
        Chandan Pandey शैलेन्द्र झा जी, वो पेट की भी बात करते हैं, लगातार करते हैं. पर सबसे बड़ी खूबी उस शख्स की है कि वो दिमाग की बात भी करता है. अभी आप अभिषेक मनु सिंघवी प्रकरण में उस आदमी का स्टेटस मैसेज देख लीजिये. बहुत बारीक बात कही है उस आदमी ने.
         
        Shailendra Jha चन्दन पडे जी ये जो आप बता रहे हैं की मार्केटिंग टीम होती है, ये हम सब पिछले ५-७ सालों से जानते हैं, पर दिलीप जी अपने पीछे जो पूरी जिहादियों की फ़ौज छोड़ गए हैं उन्हें इस बात का पता नहीं है के उन्होंने एक ऐसे आदमी की सरपरस्ती हासिल की जो कदम कदम मार्केटिंग टीम या जो कोई भी टीम है उसके सामने हाज़िर हो जाता है थ्री इडियट का डायलोग बोलते हुए – जह्पनाह तुसी ग्रेट हो, तोहफा क़ुबूल करो
         
        Anurag Arya आपकी जानकारी के लिए बता दूँ प्लास्टिक सर्जन hymenoplasty तक कर रहे है ओर ये बदलते समय के साथ विज्ञान की टेक्नोलोजी का इस्तेमाल है .टाइम्स ऑफ़ इंडिया से लेकर हिन्दू ओर आउट लुक मेग्जिन में उनके बारे में आया है . गृहशोभा ,मनोरमा आदि फेमेल मेग्जिन में ये कोमन लेख है
         
        Chandan Pandey झा जी, मैने कब कहा कि आप नहीं जानते हैं. मेरे कहने का सारा अर्थ यह ही था कि आप सब जानते बुझते यह हल्की बात कह रहे हैं.
         
        Shailendra Jha हुज़ूर आप जिस जगह की बात कर रहे हैं , वहां मैं पांच साल काम कर चूका हूँ, दिलीप मंडल की क्या चलती है वहां और किसकी क्या चलती है सब मुझे मालूम है, मैं पूरी इंडिया टुडे को पत्रिका के तौर पर खारिज करता हूँ, दिलीप मंडल को लाया भी गे था उसी छवि को वापस पाने के लिए, अपर दिलीप ,मंडल भी उसी छापे खाने के कर्म करने लगे, अंग्रेजी का माल हिंदी में
         
        Avinash Das अच्‍छा है, जब अपने देश में स्‍तन को सुंदर बनाने के उपाय के बारे में कवर स्‍टोरी की जा सकती है और आपलोग इसे जरूरी मानते हैं, तो मैं अपनी बात वापस लेता हूं…
         
        Chandan Pandey ‎Avinash Das : जरूरी कोई नहीं मानता. पर आप उस पत्रिका का पूरा कलेवर देखिए.
         
        Avinash Das वो पत्रिका पहले थी, आज भी है, आगे भी रहेगी… सवाल है कि दिलीप मंडल जैसे लोग जो मीडिया आलोचना में एक नयी जमीन तलाश रहे थे, वहां जाकर किस तरह का स्‍टैंड ले रहे हैं।
         
        Shailendra Jha देखिये अविनाश भाई मैं दिलीप मंडल को शुरू से अन्देमोक्रेतिक आदमी मानता हूँ,लेकिन यदि उनमे ऐसा कुछ है तो उनसे अपेक्षा है की वो यहाँ आकर स्पष्टीकरण दें
         
        Avinash Das शैलेंद्र भाई, आप बीच बहस में बार-बार दिलीप जी को बुलाने पर क्‍यों तुले रहते हैं?
         
        Umashankar Singh अविनाश, कल अजीत जी की पोस्ट पर कमेंट करने से नहीं रोक पाया था माफ करना आज तुम्हारी पोस्ट पर भी वही कमेंट दोहरा रहा हूं
        "ये मंडल जी के दलित एजेंडे का वैकल्पिक मीडिया उभार है"
 
        Avinash Das ‎:)
 
        Shailendra Jha क्यों आपको ये बात अजीब नहीं लगती की जिस आदमी की पोस्ट्स से पूरे फेसबुक की नाक में ३ साल तक दम हुआ पड़ा था वो संपादक होते ही बिना किसी तरह का स्पष्टीकरण दिए हुए फेसबुक से गायब हो गया, और ऑफिस में मातहत काम करने वालों को अब कहता है के फेसबुक पे कोई ऑफिस के बारे में नहीं लिखेगा, ये उन्ही मुसाफिर बैठा के दोस्त हैं न जिन्होंने ऑफिस में बैठकर फेस्बुकिंग की थी और उन्हें निकाल दिया गया था तो ये उसको मुदा बनाकर पिल पड़े थे, आज सबको ऑफिस में हड़का रहे हैं फेस्बुकिंग करने के लिए
 
        Vidhan Chandra Rana दिलीप मंडल घोर जातिवादी और फर्जी इंटेलेक्टचुअल किस्म के ओवर रेटेड व्यक्ति हैं . खैर अपनी पुरानी दुकान अब इंडिया टुडे में नहीं चला सकते, यहाँ पर तो शेयर होल्डर को जवाद देना होता है . इनके वो सब मुहीम और महान विचार सब गायब हो गए हैं जिसके बल पर यहाँ पर पहुंचे हैं. महान बातें यहाँ तक पहुंचें का जरिया था.. अब इनको इतना सीरियसली क्यूँ लिया जा रहा है ..समझ से परे है.
 
        Susmit Priyadarshi विषय बिल्कुल जायज़ है, मैं इससे असहमत नहीं हूँ , पर इतना अहम भी नहीं कि उसे india today का cover story बनाया जाये, देश के पास इससे ज्यादा अहम विषय मौजूद है, जाहिर है इसे cover story बनाना सिर्फ और सिर्फ लोगों के कामुक इच्छाओं को पूरा करना भर है, ताकि बिक्री में ज़बरदस्त इजाफा हो…………
 
        Shailendra Jha मैं क्यों न कहूँ उनको बहस में आने के लिए बहुत सवाल पूछने हैं, वो भी तो यही करते थे न ?
   
        Avinash Das ‎Shailendra Jha जो चला गया, उसे भूल जा 🙂
    
        Avinash Das i agree with Susmit Priyadarshi
     
        Arbind Jha aaj usak awaqt hai bhai
      
        Arbind Jha aaj nahi to kal jawab dena he padega
      
        Santosh Kr. Pandey दिलीप मंडल पर इतनी चर्चा क्यूँ ?? पी.साईनाथ पर क्यूँ नहीं ? दिलीप मंडल का ज्ञान मध्यवर्गीय लोगों की भावनाओं को उकसाने भर के लिए है और कोई तथ्यात्मक और शोधपरक बात वे नहीं करते ! गौर से सोचें इसपर !
     
        Rajendra Singh हा हा हा ..इसमें गलत क्या हें सेक्स रोज डिनर करने जेसा हें कोई स्टोरी दी हें तो कोई बुराई नहीं सेकडो बरसो पहले खजुराहो के मंदिर बने थे अगर आपने देखे हो तो बताये और ना देखे हो देख ले ..दिलीप जी को भी अपना परिवार चलाना हें क्रांति भाई किश्तों में ही होगी बटन दबा कर नहीं
     
        Avinash Das ‎Rajendra Singh दिलीप जी का परिवार तब भी चल रहा था, जब इंडिया टुडे और बाकी दसरे मीडिया संस्‍थानों में नहीं थे 🙂 उनकी पत्‍नी क्‍लासवन ऑफिसर हैं भाई…
      
        Rajendra Singh उससे क्या होता हें दिलीप जी मर्सिडीज में घूमना चाहते हो तो ?
        
        Shailendra Jha मैं इस बात को फिर से कोट कर दूं – हिन्दू कोलेज के सभागार में एक स्टुडेंट ने दिलीप मंडल से सवाल किया की क्या मेनस्ट्रीम मिडिया में काम करते हुए, चीजें बदली नहीं जा सकतीं ? दिलीप मंडल ने जवाब दिया था आपलोग क्रांति करने के लिए लाला के पैसे का मुंह क्यों देखते हैं ?
         
        Vidhan Chandra Rana ‎@shailendra jha आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. मुझे अभी तक याद है , आरक्षण फिल्म के समय किस हद्द तक गिर गए थे हमारे इंडिया टुडे के एडिटर साब !!! गाली गलौज पर उतर आये थे… i cannot forget all these…and not many of us can by the way…it was utter rubbish on his part just to get mileage…where are his sympathies now????
         
        Rajendra Singh में दिलीप जी का सम्मान इसलिए करता हूँ की दलितो के लिए उन्होंने मुझे प्रतिबद्ध किया ..व्यक्ति पै नहीं उनके उठाये मुद्दों के लिए में उनका सम्मान करता हूँ
         
        Shailendra Jha vidhan apse agrah hai mujhe pls arakshan ke virodh me ya sawarnwadi na samjhen, dileep mandal ki vaicharik kathmullepan se mujhe pareshani hai par zyadatar baten unki thik hai, jo galat hai wo hai aacharan aur baat ka antar
         
        Avinash Das ‎Rajendra Singh यहां दिलीप जी का सम्‍मान और असम्‍मान करने के मुद्दे पर डीबेट नहीं चल रही है 🙂
         
        Vidhan Chandra Rana by the way nothing personal against anyone @shailendra jee… infact yeh bhi sach hai ki unki baaton me dam bhi hot ahai …lekin nihit swarth hamesha chalakta hai …..
         
        Vidhan Chandra Rana ‎Avinash Das thanks for intervening 🙂
         
        Rajendra Singh आपके बीच का कोई आदमी इण्डिया टूडे जेसी पत्रिका में पहुँच गया यही क्या कम हें नहीं तो को दुवा ,मिश्र ,पाण्डेय ही मिलते ..में दिलीप जी के साथ हूँ
         
        Vidhan Chandra Rana Rajendra Singh ji…Dileep jee hamare pados me hi bade hue, same city,same locality….isse kya fark padta hai ….??? why are we playing the regionalism card…?
         
        Avinash Das ‎Rajendra Singh बढिया है… वैसे इससे पहले भी इंडिया टुडे में श्‍यामलाल यादव थे 🙂
         
        Rajendra Singh अविनास दास जी सिधान्त वो चिड़िया हें जो अंडे देने के लिए अपना घोंसला नहीं बनाती हमेशा दूसरे के बनाये घोंसले पर कब्जा करती हें देश काल समय के हिसाब से बदलते रहते हें
         
        Santosh Kr. Pandey आर्थिक नीति, आदिवासियों की समस्याएं, भू-माफिया, आर्थिक अपराध, पर्यावरण, वर्तमान विकास के माडल की समीक्षा , शहरीकरण, बिजली-पानी की समस्या, विदेश नीति, कर नीति , कृषि नीति, खेल जगत ,आम व्यक्ति की जीवन शैली की समस्याएं आदि आदि …पर दिलीप मंडल का कोई लेख या विचार हो तो उपलब्द्ध कराएँ ! कहाँ के वे पत्रकार हैं ?? वे एक मध्यम दर्जे के पत्रकार हैं और कुछ वर्गों को उकसाना उन्हें आता है ! बस !
         
        Avinash Das ‎Rajendra Singh जी शुक्रिया, लेकिन बात बड़ी भारी कही आपने… समझने के लिए दिमाग पर जोर देना पड़ेगा 🙂
         
        Shailendra Jha is prakar koyal duniya ki sabse badi vicharak aur saidhantik hai, ye to aapne rajendra ji bilkul 3 idiots wale virus wali baat kah di, jai ho prabhu
         
        Rajendra Singh संतोष जी डी यू का एडमिशन का भंडा फोड किया ऐसे कई मामले हें मेने कई बार उनका जम कर विरोध भी किया हें ..पर में न्याय की बात कर रहा हूँ स्तन की पोस्ट से इतना विवाद क्यों ..?
         
        Santosh Kr. Pandey ‎Rajendra Bhai: आप स्तन की पोस्ट को ख़ारिज करते हैं और मैं दिलीप मंडल को ख़ारिज करता हूँ ! फर्क ये है ! :)) खैर ज्यादा लिख कर उनकी टी.आर.पी . नहीं बढ़ाना चाहता ! :))मेरे पढने के स्तर में उनका लिखा बहुत नीचे दर्जे है ! अतः इति !
         
        Rajendra Singh भाई ये क्या बात हुई व्यक्ति की नहीं हम मुद्दे की बात करे
         
        Rajendra Singh क्या कोई बिना स्तन की स्त्री से विवाह कर लेगा ये नेतिकता का पाखंड क्यों …..जब भी कोई व्यक्ति अकेला होता हें तो उसकी कल्पना में देश समाज ..भगवान नहीं कोई स्त्री ही होती हें
         
        Akanksha Pandey वैसे इस मुद्दे को कवर पेज पर डाल कर एक ढंग का काम किया है Dilip जी ने -अब वास्तव में बहस होनी चाहिये कि इस युग में भी महिलाओं कि जिंदगी में कितना टीटीम्मा लगा रखा है पुरुषवादी समाज ने .वात्स्यायन गुरु के सुंदरता मापने वाले पैमाने खारिज किये जाने चाहिये 😀
        
        Dilip C Mandal भारत दुनिया का सर्वाधिक नैतिकतावादी महान मुल्क है. अब Google दुष्ट का क्या क्या करें जो अपने सर्वर में दर्ज आंकड़ों के आधार पर बताता है कि SEX सर्च करने में भी यह अव्वल है. http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-12-31/internet/30576096_1_insights-into-broad-search-google-s-trends-search-engine
          
        Niraj Anand waiting for Musafir Baitha ji ka comment…dekhey unki kya rai hain..
         
        Dilip C Mandal आदरणीय शैलेंद्र झा जी, अरबिंद झा जी, संतोष पांडे जी, उमाशंकर सिंह जी, राणा जी और तमाम अन्य जी लोगों का आभार कि आप लोगों के चिंतन जगत में मैं शामिल हूं. वरना मैं क्या…?
         
        Prakash K Ray इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं. दिलीप जी महान समाजवादी शरद यादव और उनसे भी महान दलित चिन्तक डॉ धर्मवीर के खांटी समर्थक हैं. किसी को इस पर शोध करना चाहिए कि यह सब अरुण पुरी के बाज़ारू अर्थशास्त्र और एम् जे अकबर के जनपथीय उदारवाद के साथ कंपैटिबल कैसे हो जाता है. पत्रकारिता के लिए यह शोध एक योगदान होगा.
         
        Dilip C Mandal राय साहब का भी शुक्रिया.
         
        Rajendra Singh ‎Dilip C Mandal ji यहाँ फ़ेसबुक पर ही देख लो कोई सुंदर कवियत्री ने उटपटांग कविता भी लिख डी तो कम से कम २५० लाइक और इतने ही कमेंट्स आ जायगे पर जनहित की पोस्ट हो जनता से जुड़े मुद्दे की पोस्ट हो कोई झांकता भी नहीं किसी नारी के प्रोफाइल फोटो पर ही देखे कितने कमेंट्स आते हें देखे ,,असल में भारतीय लोग सबसे ज्यादा पाखंडी हें धर्म संस्क्रती की बात करते हें पर मठो में बेठे साधू महात्मा के योनाचार पर चुप रहते हें ,नित्यानंद सेकडो हें ..मेने तो सिंहस्थ के दोरान खुद अपनी आँखों से देखा आश्रमो /डेरे तम्बू के पिछवाड़े कंडोम के पैकेट मिल सकते हें ..सेक्स जीवन का आवश्यक अंग हें इस से जो बचने की बात करता हें वो महा डोंगी हें
         
        Dilip C Mandal आप लोग मेरे बारे में जितना सोचते हैं उतना तो मैं अपने बारे में भी नहीं सोच पाता. आप लोग कितने उदार हैं.
         
        Rajendra Singh हा हा हा ..दिलीप जी जुतियाये ना
         
        Dilip C Mandal नहीं सर, मैं तो सम्मान कर रहा हूं. इस युग में कहां मिलते हैं ऐसे उदात्त लोग जो दूसरों के बारे में सोचते हैं? मेरे पिछले जन्मों के कर्मों का फल है यह सब!
         
        Ashish Jha पूरी बहस को पढने के बाद जो बात मेरे समझ में आयी वो यही थी कि दिलीप मंडल जी अंदर से बहुत मजबूत आदमी है। वक्‍त आने पर वो अपनी राय भी पत्रिका के कवर पर दिखाएंगे। यह तो हम सभी को समझना होगा कि संस्‍थान कितना भी बडा हो संपादक लाला का नौकर ही होता है मालिक नहीं होता।
         
        Ritesh Verma http://www.foreignpolicy.com/The_Sex_Issue
        The Sex Issue
        www.foreignpolicy.com
        When U.S. magazines devote special issues to sex, they are usually of the celebr…See more
         
        Dilip C Mandal आप लोगों ने मेरी इतनी चिंता की तो मेरा भी कुछ करने का कर्तव्य बनता है. लीजिए एक गीत सुनिए- गुरु रविदास ने बे-गमपुरा की कल्पना की है. यह यूटोपिया है. एक ऐसा शहर जहां कोई दुख नहीं होगा, जन्म के आधार पर न कोई ऊंचा होगा न कोई नीच. बे-गम यानी दख से रहित. http://www.youtube.com/watch?feature=player_detailpage&v=7O6BYwdV1lM
         
        Santosh Kr. Pandey वैसे ! इन मध्यवर्गीय दिलीप मंडल का उच्चवर्गीय महिलाओं के लिए स्तन विशेषांक बढ़िया ही लगा ! वैसे , ये भी एक उटोपिया ही है की एक निम्न या माध्यम वर्ग का पत्रकार उचक वर्ग की महिलाओं के लिए स्तन थिरेपी सुझा रहा है ! :))))
         
        Rajendra Singh संतोष जी स्तनों से आपको इतनी एलर्जी क्यों ?
         
        Ashish Jha जन्म के आधार पर न कोई ऊंचा होगा न कोई नीच……मंडल जी, इस विषय पर तो कल ही मैंने आपके प्रिय अविनाश जी को तथ्‍यों से अवगत कराया था, लेकिन वे समझ नहीं तैयार नहीं हुए।
         
        Santosh Kr. Pandey ‎Rajendra Singh:एलर्जी नहीं भाई ! थोडा आश्चर्य जरुर हो चला है की भारत कम से कम सुन्दरता के लिए स्तनों की सर्जरी का मसला अब प्राथमिकता में आ चूका है !रही बात मेरी तो- जापान, अमेरिका में रहते हुए भी मेरी प्राथमिकता स्तन सुन्दरता के उपाय अभी तक नहीं आये ! भारत के गरीब और मध्य warg के लोग इस इंडिया टुडे के विशेषांक को अपनी बेटियों / बहनों के लिए जरुए खरीद रहे होंगे, ऐसी आशा है ! क्यों राजेन्द्र जी ?? Is it "India Today"??? :))
         
        Ashish Jha संतोष भाई पता नहीं आप लोग दिलीप जी को क्‍या बनाना चाहते हैं। उन्‍हें उच्‍च वर्ग में रखने से परहेज क्‍यों करते हैं। इंडिया टूडे का संपादक को मध्यवर्गीय कहना उनकी आर्थिक संपदा और जीवनस्‍तर दोनों से अपरिचित होना दिखाता है। आप लोग तो ऐसे व्‍यवहार कर रहे हैं मानों वो 20 हजार की नौकरी में किसी झोपडी में रहते हों।
         
        Rajendra Singh में समजता हूँ ओरतो का मामला हें हम क्यों इस पर बहस कर रहे हें
         
        Rajendra Singh शुभरात्रि दोस्तों
         
        Santosh Kr. Pandey मंडल जी ! आपका जोर तो इसी बात पर रहा है के पांडे जी, झा जी , सिंह जी और राणा जी बने रहें ! क्यूँ ?? अन्यथा कैसे आपकी छद्म क्रांति चलेगी और कैसे उच्च वर्ग के लिए आप स्तन थिरेपी उपलब्द्ध करवाएं ! सब समझता हूँ साहब ! आप इसी शातिरपने के साथ तरक्की करेंगे और मैं इसे पसंद करता हूँ ! आपकी जय हो ! लेकिन सामने वाला बेवकूफ नहीं है , बल्कि वे लोग हैं जिनको आप इकठ्ठा कर रहे हैं और जिनके कंधे पर चढ़ कर भारत के लोगों को स्तन थिरेपी उपलब्बध करवा रहे हैं !
         
        Ashish Jha राजेंद्र जी मामला तो दिलीप जी है, औरत तो यहां कोई मसला ही नहीं है। परेशान वो लोग हैं जो इंडिया टूडे के संपादक को एलीट मानने को तैयार नहीं हैं। दिलीप जी को मध्यवर्गीय पत्रकार कहना हमें तो हस्‍यास्‍पद लगता है।
         
        Santosh Kr. Pandey अरे आशीष जी ! मंडल जी एलिट ही बनाने के कोशिश कर रहे हैं–स्तन थिरेपी से ! लेकिन एलिट तबका उन्हें एलिट माने तब न ! तो, वे बिचारे एलिट वाली पुडिया मध्यवर्ग को परोस रहे हैं ! :)))
         
        Santosh Kr. Pandey अच्छा मंडल साहब ! ये बताइए की आपने जो लिंक दिया है जिसमें ये बताया गया है भारतीय SEX सर्च करने में अव्वल है ! लेकिन ये बताइए की इन भारतियों में दलित और सवर्ण का परसेंटेज क्या है ?? जब आप ये सिद्ध करेंगे की सवर्ण ज्यादा सेक्स सर्च करते हैं, तभी तो आपकी उपयोगिता बरक़रार रहेगी ! क्यूँ है न ?? सही कहा न मैंने ?? :))))
         
        Ashish Jha संतोष जी, यह मध्‍यवर्ग का भ्रम है कि मंडल जी उसके जमात में हैं। सच कहूं तो कुछ लोग यह भ्रम फैला रहे हैं। मंडल जी का जरा कॅरियर देखिए। इतना शानदार कॅरियर रखने के बाद कोई मध्‍यवर्ग में रह ही नहीं सकता। एलीट तो वो कब के ना हो गए। मेरे ख्‍याल से उनसे ज्‍यादा अभिजात्‍य, सभ्रांत और आधुनिक पत्रकार इस बहस में शामिल कोई पत्रकार नहीं है।
         
        Santosh Kr. Pandey ‎Ashish Ji: कैसा शानदार कैरियर बंधू ?? कैरियर कहते किसे हैं आप ? ऊपर मैंने कुछ प्रश्न पूछे हैं की पत्रकारिता में किन किन विषयों पर उन्होंने अपने लेख लिखा है ! कोई जवाब नहीं ! चलिए, आप ही जवाब दे दीजिये ! :))
         
        Ashish Jha उत्‍तर देने के लिए मंडल जी खुद सक्षम हैं। मैं बस उस राय का खंडन करता हूं जो आप लोगों ने दिलीप जी के बारे में बना रखी है। मैं तो उन्‍हें दलित और सवर्ण की नजर से कभी नहीं देखता। क्‍योंकि मैं ''जन्मते जायते शुद्र, संस्कारो द्विजोत्तमा, वेद जाने सो विप्राणां, ब्रह्म जाने सो ब्राह्मणा:'' में विश्‍वास रखता हूं। वे ज्ञानी हैं, विद्वान हैं और अच्‍छे मसले उठाते हैं। पत्रकारिता मे यह कहीं नहीं लिखा है कि एक अमीर और अभिजात्‍य पत्रकार गरीबों की बात नहीं कर सकता है। और यह भी नहीं लिखा है कि जो गरीब की बात करता है वो कभी अमीर की बात नहीं कर सकता है। यह सीमा रेखा पत्रकार के लिए बांधना अनुचित ही नहीं अस्‍वीकार्य है।
         
        Santosh Kr. Pandey ‎Ashish Ji: यही तो मसला है जो Avinash Das जी ने उठाया है ! दिलीप जी न तो दलित पत्रकार हैं और न ही सवर्ण पत्रकार ! वे बस एक अवसर वादी पत्रकार हैं ! तो भैय्या , ऐसे पत्रकार हर जिले में मिलते हैं ! इति!
        
        Ashish Jha मेरे ख्‍याल से वे अज्ञानी हैं जो उन्‍हें ''विशेष'' समझते थे, मैं तो उन्‍हें केवल एक कुशल पत्रकार ही माना है जो विषयों की अच्‍छी जानकारी रखते हैं। वे कोई ''अजुबे'' नहीं हैं। आज भी आम पत्रकारों की तरह ही लाला की दुकान पर नौकरी करते हैं।
        
        Prabhat Jha अविनाश भाई, दिलीप मंडल आपके करीबी दोस्तो में रहें हैं आप से बेहतर शायद ही कोई उनके बारे में जानता हो पर इतना जरूर कहना चाहूंगा कि वे अपने संघर्स के साथी रहे मित्रों भी नहीं पहचान रहें संभव है दृ
        
        Pankaj Jha समझने की कोशिश कर रहा हूं कि निर्मल बाबा ज्यादे बड़े ठग हैं या दिलीप मंडल ज्यादे बड़े ढोंगी.
         
        Dinesh Agrahari Mujhe ek bat nahi samajh aa rahi ki Dilip Mandal ke India Today ka sampadak ban jane se bhai logon ko itni jalan kyon ho rahi hai, Rahi bat Breast par story ki to itani moorkhtapoorna bahas kyo chal rahi hai samajh me nahi ata. Are bhai ye english ki story hai aur hindi me bhi cover story banane ka Team ka decision hoga isme mandal ji kya kar sakte hain
        
        Avinash Das ‎Ashish Jha आप जैसा आत्‍ममुग्‍ध और बड़बोला आदमी मैंने बहुत कम देखा है। कल की बहस में समझने के लिए आपके पास बहुत कुछ था, लेकिन आप समझे नहीं और उल्‍टा हमारी समझाइश को लेकर राग अलापने लगे। कौन सा तथ्‍य (हां हां तथ्‍य) बताया था, जरा यह भी बताइए। और क्‍या आपको बताना पड़ेगा कि पुराणों से निकाला गया कोई श्‍लोक, जो आज अप्रासंगिक हो गया है, वह कभी तथ्‍य नहीं हो सकता, महज एक उद्धरण हो सकता है।
         
        Avinash Das ‎Dinesh Agrahari मामला जलन का नहीं, ज्‍वलंत मुद्दे का है 🙂
         
        Naveen Kumar क्या हो गया अगर इस विषय पर लेख लगा दिया तो ? यार क्या बात है ? बहुत से लोग पता नहीं कहां-कहां पर काम करके, किस-किस की चमचागिरी करके, फिर किसी से किसी बात पर विवाद या उस जगह से धक्के देकर निकाल दिए जाते है, फिर लिखते है कि यहां पर ये गलत है, वहां पर ये गलत है, फिर हमें ये नुस्ख़े भी आते है की देखो ये आदमी पहले तो ये कहता था अब ये कह रहा है ? कहां तक सही है ? एक बात उठाओ फिर उसे काटो, फिर उस बात पर सहमति-असहमित, फिर एक बार उसी लेखक के लेख को अपने यहां चिपकाओ, फिर उसकी पोल खोलो, फिर उसकी खिचाई करो, बिल्कुल यह मामला ऐसा नहीं लगता जैसे टीवी न्यूज़ चैनल के तथाकथित दिग्गज़ पत्रकार अपने प्राइम टाइम में निर्मल बाबा का 20 मिनट का विज्ञापन दिखाते है फिर उसके तुरंत बाद उसी की खाल उधेड़ते है…कुछ समझ नहीं आता की ये क्या हो रहा है? किसको सही कहें? किसे गलत ?
 
        Naveen Kumar पाठक क्या करे बेचारा…?
   
        Satyendra Pratap Singh Waah Dilip C Mandal ji, Dam hai aapme…. warna is tarah ki be sirpair charcha n hoti. Aur aise log to kattai nahi karte, jo media me rahe hain 🙂
    
        Kaushal Kamal ऐसे किसी मीडिया हाऊस में पहुंचते ही आपकी सोच गुलाम हो जाती है… चाय की दुकान पर उचित अनुचित का ज्ञान बघारते हैं… लेकिन जब लिखने की बारी आती है तो मन मसोसकर गुलामी को स्वीकार कर लेते हैं…
     
        Saroj Arora Jeo Dalip Mandal. Koi yuhi mandal se kamndal thore hi ho jata hai. trick chahiye uske liye bhi.
      
        Satyendra Pratap Singh Ashish Jha जी, वो विशेष इस मामले में हैं कि अभी भी आम हैं। ऐसे बहुत कम लोग मिलते हैं। अरविंद मोहन जी… दिलीप जी… आदि कुछ ऐसे पत्रकार मुझे मिले जो आम आदमी जैसे लगते हैं। वर्ना बड़े पदों पर रहने या रह चुके और थोडा सा सक्षम होने पर भी लोग पता नहीं कहां कहां उड़ने लगते हैं 🙂
        …
        भाई मैने तो बहुत पत्रकारों को झेला है। बेनजीर ने मेरे पैर के ऊपर पैर रख दिया… राजीव गांधी से यात्रा के दौरान मैने जो बात कही, वही उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने उठाई.. आदि आदि… दिमाग में फोड़ा हो जाता है सुनते सुनते। गजब के होते हैं ये बड़े पत्रकार भी… मैं तो चुपचाप सुनने और जी-जी के सिवा कुछ कह भी नहीं पाता।
      
        Satya Prakash Chaudhary aadmi jiski roti khata hai, kam usi ke hisab se karna parta hai. india today ki blog nahi hai, jahan koi bhi krantikari ho sakta hai
       
        Nadim S. Akhter chaliye..Satya Prakash Chaudhary ji prakat tau hue..aap ka aviwadan hai 🙂
       
        Ashish Jha सतेंद्र भाई और सत्‍यप्रकाश जी, मैंने भी कुछ ऐसी ही राय रखी है, लेकिन कुछ लोग केवल बहस करना चाहते हैं पता नहीं क्‍या क्‍या उपमा बांट रहे हैं। वो केवल वही सुनना चाहते हैं जो वो बोलना चाहते हैं।
       
        Avinash Das http://mohallalive.com/2012/04/25/pramod-ranjan-react-on-fb-campaign-against-dilip-mandal-in-context-of-obscenity/
        Mohalla Live » Blog Archive » गैर-द्विज पत्रकार को अश्‍लीलता की तीर से मारना एक षड्यंत्र है!
        mohallalive.com
        पत्रकारिता में अश्‍लीलता और सामाजिक न्‍याय का सवाल
 
        Anoop Patel Das ji- it's a planned charecter assasination of someone by an organised media lumpens. its not only probs of these lumpens, the whole nation is indulged on one's like and dislike. they never pay their attention on debates and isuues.
 
        Ashish Kumar 'Anshu' वक्त के साथ मुहावरों के अर्थ भी बदलते हैं और कभी-कभी स्थान के साथ-साथ भी. आज-कल दिल्ली सर्वोच्च न्यायालय में मनुवादी होने का कुछ और अर्थ लगाया ज़ा रहा है, पटना उच्च न्यायालय में तो इसके शॉर्ट फॉर्म से ही काम चल रहा है. ''जानते हैं सर, बड़े बाबु तो साफे मनुआ गए हैं.''
        वैसे यह मनु दौर है, देखिए ना मनु के रंग में ''इण्डिया टूडे'' भी मनुआ रहा है……
        (उंगलबाज.कॉम, हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध है)
 
        Kanwal Bharti Ye bahas mudde se hat kar vyaktik jyada ho gayi hai. par ye bahas samajik nyay ko rekhankit karti hai. Dilip ji ne pichhle janmo ki baat karke puri dalit vaichaariki par pani daal diya hai. Ye aadmi dalit vimarsh ka pratinidhi nahi ho sakta.
 
        S.r. Darapuri Bilkul nahin!
   
        Kanwal Bharti Thanks sir
    
        Naren Ary स्तन और सेक्स से दलित या दलितवाद को परहेज़ नहीं हो सकता आखिर हम सभी biological beings hai मगर दलित दृष्टि discrimination ,exploitative attitude (सेक्सुअल),women commodification ,victimisation of macho-stereotypes ya sirf sexual object ke roop me chinhit aur sweekarya nahin ho sakti.agar dilip mandal ambedkar ka chera FACEbook par laga kar paise ,tikdam aur jugaad ke liye aisa kar rahe hain to vo us andolan aur vichardhara ka hissa nahin ho sakte.
     
        Kanwal Bharti Naren ji mai apse sahmat hoo. Dilip ji ko jitni jaldi ho sake apne chehre se Ambedkar ka photo hata len.

अविनाश दास के फेसबुक वॉल से साभार.

‘उभार की सनक’ में दिलीप जी का दलित उभार किधर गया?

Ashish Maharishi : बात बहुत पुरानी नहीं है। पत्रकारिता में नए-नए कदम रखे ही थे कि कई दिग्गजों का नाम सुनने को मिलता था। इसमें से एक थे पत्रकारिता, खासतौर से दबे, कुचले, दलितों के सबसे बड़े समर्थक दिलीप मंडल जी। कॉरपोरेट मीडिया और बाजार के सबसे बड़े विरोधी। वो वरिष्ठ पत्रकार और हम नए-नवेले। अच्छा लगता था उनके ब्लॉग को पढ़कर। उनकी राय जान कर। उनके विचार को जानकर। लेकिन एक दिन सबकुछ बदल गया। वो इंडिया टुडे हिंदी के संपादक हैं। संपादक बनने के साथ ही इनकी पत्रकारिता भी बदल गई। अब वह बड़े संपादकों में शुमार हो गए। खैर..पिछले दिनों इंडिया टुडे ने एक कवर स्टोरी की। जहां तक मैं दिलीप जी को जानता हूं, वो कभी भी ऐसी स्टोरी और कवर पेज के पक्ष में नहीं रहे होंगे लेकिन क्या करें बेचारे दिलीप जी। आखिर कॉरपोरेट मीडिया का जमाना है। कहां उनकी चलती होगी..तभी तो उभार की सनक के आगे दिलीप जी का दलित उभार कहीं खो सा गया।

Mohammad Anas हाँ भाई ,जमाना तो कारपोरेट का ही है Ashish Maharishi 🙂
 
 Ajit Anjum दिलीप मंडल जी के संपादन में हिन्दी इंडिया टुडे का इतना शानदार अंक निकला है फिर भी न जाने लोग क्यों छाती पीट रहे हैं …..अरे भाई आप क्यों चाहते हैं कि नौकरी मिलने से पहले सेमिनारों -गोष्ठियों या फिर लेक्चर में दिलीप जी जो बांचते थे , वही मालदार नौकरी मिलने के बाद भी बांचते रहें …आप क्यों चाहते हैं कि केबिन और कुर्सी से दूर रहने पर दिलीप जी जो बोलते रहे हैं , वहीं संपादक के पद पर पदायमान होने पर भी बोलें ….उनकी चिंता और चिंतन में देश है ..समाज है ..दलित विमर्श है …मीडिया का पतन है …कॉरपोरेटीकरण है …लेकिन आप क्यों चाहते हैं कि जब वो इंडिया टुडे निकालें तो इन्हीं बातों का ख्याल भी रखें ….और आप कैसे मानते हैं कि 'उभार की सनक' जैसी कवर स्टोरी इन सब पैमाने पर खड़ी नहीं उतरती …एक बार पढ़िए तो सही …चिंता और चिंतन न दिखे तो बताइएगा …वैसे भी दिलीप जी इसमें क्या कर लेते …इंडिया टुडे में नौकरी करते हैं न , फेसबुक पर ज्ञान वितरण समारोह थोड़े न कर रहे हैं …हद कर रखी है लोगों ने ….विपक्ष से सत्ता पक्ष में आ गए हैं लेकिन आप चाहते हैं कि अभी भी नेता विपक्ष की तरह बोलें -लिखें …गलती तो आपकी है कि आप दुनियादारी समझने को तैयार नहीं …दिलीप जी का क्या कसूर ….. हमने तो दिलीप जी रंग बदलते देखकर भी कुछ नहीं देखा है और आप हैं कि पुराने रंग भूलने को तैयार ही नही हैं ….अरे भाई , वक्त बदलता है …मौसम बदलता है …मिजाज बदलता है …रंग बदलता है तो दिलीप जी न बदलें …ये भी कोई बात हुई …जरा सोचकर देखिएगा ….और हां, कुछ वेबसाइट वाले मेरी बातों को गलत ढंग से प्रचारित कर रहे हैं …मैं एतत द्वारा एलान करता हूं कि मैं दिलीप जी के साथ हूं और तब तक रहूंगा , जब तक वो संपादक रहेंगे …जिस दिन वो संपादक नहीं रहेंगे उस दिन दुनिया के सारे संपादकों के खिलाफ वो अकेले काफी होंगे , लिहाजा मेरी जरुरत उन्हें वैसे भी नहीं होगी …
 
        Mohammad Anas अजीत अंजुम सर 🙂 असहमत… दिलीप सर का विरोध /समर्थन लोग तब भी करते थे जब वो संपादक नही थे, आज वो संपादक है तो भी हाल वही है, तो सौ आने की बात ये है की ये विरोध/समर्थन की मशाल जलती रहेगी !
 
        Ajit Anjum अनस साहब ,हम तो बस दिलीप साहब की Flexibility के मुरीद हैं , बस…
 
        Ashish Kumar 'Anshu' वक्त के साथ मुहावरों के अर्थ भी बदलते हैं और कभी-कभी स्थान के साथ-साथ भी. आज-कल दिल्ली सर्वोच्च न्यायालय में मनुवादी होने का कुछ और अर्थ लगाया ज़ा रहा है, पटना उच्च न्यायालय में तो इसके शॉर्ट फॉर्म से ही काम चल रहा है. ''जानते हैं सर, बड़े बाबु तो साफे मनुआ गए हैं.'' वैसे यह मनु दौर है, देखिए ना मनु के रंग में ''इण्डिया टूडे'' भी मनुआ रहा है……
        
आशीष महर्षि के फेसबुक वॉल से साभार.

नरेंद्र मोदी को करिश्माई कहने वालों, अभी उनका पाप नहीं धुला

Nadim S. Akhter : गुजरात दंगों के लिए 'दोषी' जिस नरेन्द्र मोदी को फेसबुक के हमारे एक वरिष्ठ पत्रकार साथी और एक प्रतिष्ठित हिन्दी चैनल के हेड ने करिश्माई कहा था, उसी नरेन्द्र मोदी को अमेरिका ने एक बार फिर वीजा देने से इनकार कर दिया है. लगता है अमेरिकी पत्रिका टाइम मैगजीन के कवर पर छपकर भी मोदी अपने 'पाप' नहीं धो पाए. दुनिया भर में अमेरिका की जो नीतियां हैं, उससे मैं सहमत नहीं हूं लेकिन मोदी के मामले में अमेरिका ने एक सुलझा फैसला लिया है. यह एक सांकेतिक फैसला है और राजनेताओं के लिए ऐसे फैसलों के बड़े मायने होते हैं. कारण ये है कि न तो मोदी अमेरिका जाने के लिए मरे जा रहे हैं और न ही इससे उनकी कुर्सी को कोई खतरा है लेकिन मोरल ग्राउंड पर नरेन्द्र मोदी और बीजेपी बैक फुट पर जरूर है. हालांकि कुछ लोग इसके लिए बराक हुसैन ओबामा के नाम में भी कुछ ढूंढ रहे हैं.. अमेरिका की विदेश नीति अलग है और मोदी पर उसका स्टैंड विदेश नीति का हिस्सा नहीं है…

नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से साभार.

दिल्‍ली में नवभारत की ब्‍यूरोचीफ बनीं इरा झा

वरिष्ठ महिला पत्रकार इरा झा ने नई पारी हिंदी दैनिक नवभारत से शुरू की है. उन्‍हें अखबार में दिल्‍ली का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. इरा की गिनती देश की तेजतर्रार महिला पत्रकारों में की जाती है. वे पिछले ढाई दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इरा ने अपने करियर की शुरुआत 1985 में नवभारत टाइम्‍स से की थी. इस अखबार के साथ ये 17 वर्षों तक जुड़ी रहीं. इसके बाद ये हिंदुस्‍तान से जुड़ गईं तथा एससीआर के एडिटर के रूप में काम किया. सन 2009 में हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देने के बाद संडे इंडियन के वेब संस्‍करण से कंसल्‍टेंट एडिटर के रूप में जुड़ी हुई थीं. गौरतलब है कि छत्‍तीसगढ़ बेस्‍ड नवभारत का प्रकाशन इस राज्‍य के अलावा मध्‍य प्रदेश एवं महाराष्‍ट्र से भी किया जा रहा है. 

आमिर खान के पीछे पगलाये हुए अखबारों-चैनलों, जरा ये भी पक्ष सुन लो

Bhavesh Nandan : कल हुए एक “अदभुत खगोलीय घटना” में एक सितारा पटना के जमीन पर एक ढ़ाबे पर उतर आया, सबसे बड़ी बात कि सितारे ने लिट्टी-चोखा भी खाया… है न कमाल कि खबर…. अब इतनी बड़ी और दुर्लभ घटना हुई तो न्यूज तो बनता है.. न्यूज चैनल, "सोशल साइट्स" और आज अखबारों में यह छाया है… क्या ये पत्रकारों का “महानता” भर है या हमारी गुलाम मानसिकता या फिर पेड न्यूज का मामला.. क्योंकि यह सबको पता था कि वो अपने सीरियल के प्रचार के लिए पटना आये थे और आगे जा रहे हैं.. उस खबर को प्रायोजित तरीके से दिखाया जा रहा है, जो कि खबर ही नही है ….आमिर कि महानता …निभायी दोस्ती… रिक्शे वाले के यहाँ बने बाराती.. ये वही महान आमिर खान हैं, जिन्होंने अपनी फिल्म "पीपली लाईव" के गाने “महंगाई डायन……” के 20 लोक गायकों को एकमुश्त 1500 रुपये में ही निबटा दिया था (जबकि उन्हें पता था कि महंगाई डायन सबको खा रही है..).. ये मनरेगा की मजदूरी से भी कम था.. जबकि उसी फिल्म के प्रचार में आठ करोड़ फूंके गए थे.. पत्रकारों और संस्थानों को अपना इस्तेमाल होने देने से बचना चाहिए…

        Gaurav Sinha dalali sanskriti matra hai
 
        Nishant Kumar jaha sach na chale waha jhooth sahi aur jaha haq na mile waha loot sahi bhavesh ji……..
 
        Wajeeh Ahmed Tasawwur khabar yahi he aor fir wada yad rakhna kam bari bat nhi he …
        ye wo parasnality he jahan khade ho jayenge mela lag jayega … ye to kismat he apni apni
    
        Shalini Shukla Patrakaro ka hi kaam hai kisi ko bhi arsh se farsh or farsh se arsh tak lana.
     
        Pushkar Kumar Mishra भावेश भाई, हम भारतीये हैं भूलने के आदत है…बड़े-बड़े नरसंहार भूल जाते हैं, घोटाले भूल जाते हैं, अन्यायपूर्ण नीतियों के नतीजे भूल जाते हैं, लेकिन व्यक्तिव और जलवा हमेशा याद रखते हैं…. मीडिया? उसे क्या चाहिए?? न्यूज? खबर? नहीं-नहीं… उसे चाहिए जिससे उसकी 'टी आर पी' बढे चाहे वो मंदिर से मिले या लिट्टी-चोखा की दूकान से…….
        आप इन व्यक्तिपुजक मानसिकता को बदल नहीं सकते…. अगर यह 'मानसिकता' बदल जाती तो अपना देश और देशवासी…. इतने 'मजबूर' न होते???
       
        Wajeeh Ahmed Tasawwur Khabar to yahi he na shalini ji ki jis me logon ki dilchspi ho… jo kuch alg hat kar ho …
        ab agar kutta admi ko kat leta he to ye necheral bat he lekin admi agar kutta ko kat le to yeh khabar highlight hogi hi….usi tarah supar star Amir pahli bihar aye wo vi achanak to khabron me chaye rahe ko koyi bat nhi
        
        Bhavesh Nandan ‎Wajeeh Ahmed Tasawwur Ji … खबर सिर्फ वही नहीं है जिसमे लोगों कि दिलचस्पी हो … लोगों कि दिलचस्पी पर जाईयेगा तो उनकी दिलचस्पी बहुत ही ज्यादा है अलग तरह कि है …काफी दिलचस्प लोग हैं … खबरों कि परिभाषा बताते वक्त अपनी जिम्मेवारी का भी भान हो हमें …
         
        Jairudra Jha jai maa bharti
         
        Wajeeh Ahmed Tasawwur Are Bhai Amir khan Avineta hen neta nhi esiliye wada yad rha aor driver dost ke bete ki shadi ko yadgar bna diya ….
         
        शशांक शेखर bihar lambe samay se bade sitron se dur raha hai……..yahan jane wale bade sitren surkhiyan le hi lete hain…….
         
        Shalini Shukla Bilkul sahi har insaan ko apni jimmedari ka ehsaas hona chahiye, chahe hum ho ya aap ho.
         
        Wajeeh Ahmed Tasawwur Shi bat he apni zimmedari ka ehsas har roffesniol me pahli prathmikta honi chahiye lekin jab logon ke dilchaspi ka saman nhi hoga to us paper ya chainal ka anjam kya hoga? jab bans hi na rhega to bansuri kahan se bajegi
         
        Shalini Shukla desh me or bhi bahut kuch aisa hota hai jinhe highlight karne ki jyada jarurat hai.
         
        Wajeeh Ahmed Tasawwur ek bat btayiye ek taraf Nirmal baba andhwishwas faila kar paisa ka ambar lga rhe hen dusri taraf sarak ke kinare jadu ka khail ya hath ki rekha dekh kar kismat btane wale baba vi kuch paisa bator kar pet bharte hen ab agar dono khabar do chainal par dekhaya jaye to log kon si khabar zyada dekhenge….?

भावेश नंदन के फेसबुक वॉल से साभार.

‘उभार’ वाले अंक को अरुण पुरी अपनी मां-बहन-बेटी को कैसे दिखाते होंगे?

Girish Pankaj : हिंदी पत्रकारिता का पतन तो साफ़ नज़र आ रहा है, मगर यह इतनी गिर जायेगी, कल्पना नहीं थी. दिल्ली से निकलने वाली एक समाचार पत्रिका के नए अंक में महिलाओं के उभारों पर केन्द्रित एक अंक निकलना है. आवरण पर अश्लील चित्र चस्पा किया और लिखा है ''उभार की सनक'' यह पत्रिका इसके पहले भी अश्लीलता की हदें पार करने वाले विशेषांक निकलती रही है. समझ नहीं आता कि ऐसे अश्लील अंक निकालने के बाद इनके मालिक अपने घर में अपनी अपनी बीवी, पिता, माँ, अपनी बहन का किस तरह सामना करते होंगे?. बाजारवाद का जय, जिसने नैतिकता के प्रश्न को निकाल बाहर कर दिया है.

गिरीश पंकज के फेसबुक वॉल से साभार.

‘दिव्‍य हिमाचल’ को नुकसान पहुंचाने के लिए पांच मई को लांच होगा ‘हिमाचल दस्‍तक’!

तिब्बती धर्मगुरु 17वें करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे को विदेशी करेंसी प्रकरण में राहत मिल गई है। राज्य सरकार ने अदालत में विचाराधीन मामले में करमापा का नाम हटाने की सिफारिश की है। अदालत ने आरोप तय कर दिए हैं, लेकिन अब चार्जशीट से करमापा का नाम हट जाएगा। इस प्रकरण में करमापा समेत कुल दस लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिनमें एक के.पी. भारद्वाज भी शामिल हैं।

के.पी. भारद्वाज ‘हिमाचल दस्तक’ के चेयरमैन हैं। ‘हिमाचल दस्तक’ दैनिक अखबार है, जो 5 मई से प्रारम्भ होने जा रहा है। विदेशी करेंसी प्रकरण के कारण ‘हिमाचल दस्तक’ का प्रकाशन लम्बित हो गया था। के.पी. भारद्वाज इस प्रकरण में काफी समय तक जेल में बंद रहे थे। आजकल जमानत पर बाहर हैं और अखबार लाँचिग में व्यस्त हैं। के.पी. भारद्वाज के खिलाफ 26 जनवरी 2011 को मामला दर्ज हुआ था। उन्होंने करमापा को जमीन बेची। एक करोड़ रुपए बोरी में भरकर दिल्ली से धर्मशाला ले जा रहे थे। ऊना जिला के मेहतपुर बार्डर पर यह धनराशि पकड़ी गई तथा बाद में के.पी. भारद्वाज के खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

के.पी. भारद्वाज लम्बे समय तक ‘दिव्य हिमाचल’ अखबार के एमडी रह चुके हैं। करीब तीन-चार साल पहले ‘दिव्य हिमाचल’ के चेयरमैन भानु धमीजा के साथ मतभेद हो गए तो ‘दिव्य हिमाचल’ छोड़कर अपना अखबार निकालने की योजना पर काम शुरू कर दिया। लेकिन इसी बीच करमापा विदेशी करेंसी प्रकरण में उलझ गए। जेल से छूटने के बाद भारद्वाज ने अखबार निकालने की मंशा को दोबारा अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है।

प्रदेश के अखबारी जगत में आम चर्चा है कि के.पी. भारद्वाज की अखबार ‘हिमाचल दस्तक’ का मुख्य उद्देश्य भानु धमीजा की अखबार ‘दिव्य हिमाचल’ को नुकसान पहुंचाना ही है। दिव्य हिमाचल ने प्रदेश में पांव जमा लिए हैं। नए अखबार ‘हिमाचल दस्तक’ में ‘दिव्य हिमाचल’ के कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जा रही है और दोगुना वेतन देकर ‘दिव्य हिमाचल’ में तोड़फोड़ चल रही है। बहरहाल, अब कहा जा रहा है कि 5 मई को ‘हिमाचल दस्तक’ आखिरकार लाँच हो जाएगा।

धीरेंद्र व शब्‍हत अवधनामा तथा चंचल दैनिक प्रभात से जुड़े

लोकमत, लखनऊ से खबर हैं धीरेंद्र अस्‍थाना ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे लांचिंग के समय से ही अखबार के साथ जुड़े हुए थे. वे यहां पर संस्‍कृति संवाददाता के पद पर कार्यरत थे. धीरेंद्र ने अपनी नई पारी अवधनामा के साथ शुरू की है. धीरेंद्र इसके पहले आज, युनाइटेड भारत, जनसंदेश टाइम्‍स को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. धीरेंद्र के साथ शब्‍हत विजेता ने भी अवधनामा ज्‍वाइन किया है. 

दैनिक प्रभात, नोएडा से खबर है कि चंचल सिंह ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें डेस्‍क पर लाया गया है. चंचल इसके पहले युनाइटेड भारत, महामेधा, विराट वैभव और आईबीएन7 को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनकी गिनती अच्‍छे पत्रकारों में होती है.

अजब-गजब पत्रकारिता : नोएडा में पंजाब केसरी के दो-दो कार्यालय, दो-दो ब्‍यूरोचीफ

अपने अखबार में नैतिकता को लेकर लम्‍बी-लम्‍बी भाषणबाजी करने वाले अश्‍वनी कुमार के अखबार में ही सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. बड़ा अजीब अखबार है पंजाब केसरी. अक्‍सर इसके ब्‍यूरोचीफ बदलते रहते हैं तो एक ही प्रेस कांफ्रेंस में पंजाब केसरी के कई पत्रकार पहुंच जाते हैं. आयोजक चकरा जाता है कि असली कौन है और नकली कौन है. किसे रोके किसे भगाए. कोई नियम कानून न होने से गुटबाजी हावी हो जाती है. ऐसा ही मामला पंजाब केसरी, नोएडा में है.

यहां अखबार के कथित तौर पर दो-दो ब्‍यूरोचीफ हैं और दो-दो ऑफिस भी. अब इनमें कौन असली है और कौन नकली कौन पता लगाएगा. जहां विज्ञप्ति जाती है छप जाती है. एक ऑफिस को कंस्‍ट्रक्‍शन की वजह से बंद कर दिया गया है तो वो खानाबदोश स्‍टाइल में स‍ंचालित हो रहा है. फिलहाल दोनों गुट एक दूसरे को निपटाने में लगे हुए हैं परन्‍तु प्रबंधन इस मामले में कोई कार्रवाई करने की बजाय मामले को यथास्थिति छोड़ दिया है. दोनों ब्‍यूरो आफिस दिल्‍ली और जालंधर एडिशन की बात करके संचालित हो रहे हैं.

खबर के अनुसार सेक्‍टर-22 में स्थित आफिस के ब्‍यूरोचीफ अभिमन्‍यु पाण्‍डेय हैं तो सेक्‍टर 15 में मौजूद ऑफिस की ब्‍यूरोचीफ प्राची तनेजा हैं. खबर है कि सेक्‍टर 22 का ऑफिस बंद कर दिया गया है और इसका संचालन विश्‍व गुरु अखबार के कार्यालय से किया जा रहा है. हालांकि ब्‍यूरोचीफ अभिमन्‍यु का कहना है कि इसे बंद नहीं किया गया है बल्कि कंस्‍ट्रक्‍शन की चल रहा है. कुछ लोग जानबूझकर इसके बंद होने की अफवाह फैला रहे हैं. साथ ही विश्‍व गुरु के कार्यालय में ब्‍यूरो संचालन की बात भी गलत है.

दूसरी तरफ सेक्‍टर पन्‍द्रह में संचालित हो रहे ऑफिस की ब्‍यूरोचीफ प्राची तनेजा हैं. इस ब्‍यूरो के साथ धीरेंद्र अवाना, पवन यादव, दीपक राय काम कर रहे हैं. इन लोगों को काफी समय से सेलरी भी नहीं मिली है. इस पक्ष का कहना है कि प्रबंधन के रवैये के चलते इस तरह की स्थिति पैदा हुई है. प्रबंधन जानबूझकर एक दूसरे को लड़ना चाहता है. वैसे बताया जा रहा है कि जिस तरह की स्थिति बनी हुई है, उससे परेशान पत्रकार अब पंजाब केसरी छोड़ने वाले हैं.

स्‍वतंत्र वार्ता का निजामाबाद व विशाखापत्‍तनम एडिशन बंद, संपादक प्रदीप श्रीवास्‍तव का इस्‍तीफा

दक्षिण भारत के प्रमुख हिंदी अखबार दैनिक स्‍वतंत्र वार्ता का निजामाबाद एवं विशाखापत्‍तनम एडिशन पर ताला लग गया है. संघी ग्रुप के अखबार का प्रकाशन एजीए पब्लिकेशन के बैनर तले किया जा रहा है. अखबार के संपादक प्रदीप श्रीवास्‍तव ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे पिछले एक दशक से इस अखबार से जुड़े हुए थे. कुछ दिन पहले अखबार के प्रमुख संपादक समेत कई लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया था. बताया जा रहा है कि अखबार की आर्थिक स्थिति खराब है, कई महीने से कर्मचारियों को सेलरी नहीं मिली है.

दैनिक स्‍वतंत्र वार्ता का प्रकाशन हैदराबाद, निजामाबाद एवं विशोखापत्‍तनम से किया जा रहा था. अब केवल हैदराबाद एडिशन ही प्रकाशित किया जा रहा है. जबकि इसी समूह द्वारा प्रकाशित तेलगू अखबार वार्ता का प्रकाशन जारी है तथा इसके 19 एडिशन प्रकाशित किए जा रहे हैं. खबर है कि प्रबंधन से अनबन होने के बाद प्रदीप श्रीवास्‍तव ने इस्‍तीफा दिया है. हालांकि चर्चा है कि गिरीश संघी के इस अखबार को खरीदने के लिए दूसरे ग्रुप सक्रिय हैं. यह अखबार दक्षिण भारत में हिंदी का प्रमुख अखबार है.

इस्‍तीफा देने वाले प्रदीप श्रीवास्तव करीब ढाई दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इन्‍होंने अपने कॅरियर की शुरुआत 1986 में बनारस में आज अखबार के साथ की थी. इसके बाद हरियाणा से निकल रहे विश्वमानव के साथ जुड़े. असम से प्रकाशित उत्‍तरकाल को भी अपनी सेवाएं दीं. देवीलाल के अखबार जनसंदेश में भी काम किया. इसके बाद महाराष्‍ट्र के औरंगाबाद से प्रकाशित देवगिरी समाचार के साथ भी वरिष्‍ठ पद पर जुड़े. सन 2000 में स्‍वतंत्र वार्ता ज्‍वाइन कर लिया था, तब से वहीं कार्यरत थे. समझा जा रहा है कि ये जल्‍द ही किसी दूसरे संस्‍थान से जुड़ने वाले हैं.

एक सप्‍ताह बाद भी ब्‍लैक आउट की कालिख से रंगा है पॉजिटिव मीडिया

: मतंग सिंह की कंपनी का बुरा हाल : पॉजिटिव मीडिया ग्रुप के सभी छह चैनल लगभग एक सप्‍ताह बाद भी ब्‍लैक आउट पड़े हुए हैं. ग्रुप के किसी भी चैनल पर प्रसारण नहीं हो रहा है. पूर्व मंत्री मतंग सिंह का पॉजिटिव मीडिया ग्रुप कंगालियत के दौर में पहुंच चुका है. ट्रांशमिशन का किराया नहीं देने पर इस ग्रुप के चैनलों की फ्रिक्‍वेंसी रोक दी गई है. दूसरी तरफ इंडियन ओवरसीज बैंक का कर्ज सिर पर है और हमार टीवी के नीलाम होने की तलवार लटक रही है. कर्मचारियों को फरवरी माह के बाद से सेलरी भी नहीं मिली है.

मतंग सिंह के पॉजिटिव ग्रुप के चैनल फोकस टीवी, हमार टीवी, एनई बांग्‍ला, एचवाई टीवी, हाई फाई, एई टीवी ब्‍लैक आउट है. एक सप्‍ताह से इन चैनलों पर कुछ भी प्रसारित नहीं हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन के ट्रांशमिशन का दो महीना का किराया चुकता नहीं करने के चलते प्रसारण रोक दिया गया है. शुरू से ही विवादों में उलझा रहा यह ग्रुप अब मीडिया की बदनामी का कारण बनता जा रहा है. खबरों से ज्‍यादा खुद की खबरों के लिए चर्चित इस ग्रुप से जुड़े कर्मचारी भी अब फ्रस्‍टेशन के दौर से गुजर रहे हैं. कई जगह हाथ पैर मारने के बाद भी पॉजिटिव मीडिया का नाम सुनते ही दूसरे चैनलों के दरवाजे बंद हो जाते हैं.

ग्रुप के सामने सबसे बड़ी दिक्‍कत एनई टीवी को लेकर है. इस ग्रुप के अन्‍य चैनलों के मुकाबले एनई की स्थिति अच्‍छी है. ग्रुप के लिए हमार टीवी जहां सफेद हाथी बना हुआ है तो फोकस का इस्‍तेमाल खबरों से ज्‍यादा दूसरी खबरों के लिए जाना जाता है. एचवाई टीवी भी कुछ खास मुकाम हासिल नहीं कर पाया. बाकी एनई बांग्‍ला तथा हाई फाई भी बस शोभा बढ़ाने वाले चैनल बने हुए हैं. प्रबंधन का खर्चा ज्‍यादा और आमदनी चवन्‍नी भी नहीं है. इस ग्रुप के पास एक भी ऐसा पत्रकार नहीं है जिसकी पहचान हो. असिस्‍टेंट प्रोड्यूसरों को वरिष्‍ठ बनाकर चैनल चलाया जा रहा है, जिनमें विजन की कमी साफ झलकती है.

यह ग्रुप दूसरों का पैसा हड़पने के लिए भी जाना जाता है. इंडियन ओवरसीज बैंक का इस ग्रुप के हमार टीवी पर 52 करोड़ रुपये से ज्‍यादा का कर्ज है. बैंक ने इस चैनल की नीलामी के लिए नोटिस भी जारी कर दिया है. बताया जा रहा है कि अब तक बैंक का पैसा जमा नहीं हुआ है. अगर हमार टीवी नीलाम होता है तब भी बैंक घाटे में रहेगा. कंपनी प्रबंधन अपने कर्मचारियों के पीएफ का पैसा भी हड़प चुका है. कर्मचारियों से पैसे लेकर प्रबंधन के लोग जमा करने की बजाय खुद खा चुके हैं. बीच में सैलरी विवाद को लेकर भी पांच दर्जन से ज्‍यादा कर्मचारियों ने इस्‍तीफा दे दिया था.

इस ग्रुप के चैनलों में बचे खुचे काम करने वाले लोगों को फरवरी के बाद से सैलरी नहीं मिली है. जबकि अप्रैल भी बीतने को है. कर्मचारियों के फ्रस्‍ट्रेशन का आलम यह है कि अब ज्‍यादातर कार्यालय अपनी मर्जी से जाते हैं. मन किया तो गए नहीं मन किया तो छुट्टी. कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है. कर्मचारी दूसरी जगह नौकरियों की तलाश कर रहे हैं पर तलाश है कि खतम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं. वे कर्मचारी जरूर मस्‍त हैं, जिनको उनकी औकात से ज्‍यादा पैसे चैनल से मिल रहे हैं. वे अब भी चैनल में डंटे हुए हैं तथा ब्‍लैक आउट के बाद भी न्‍यूज रूम में क्‍या हेडिंग लगाई है, क्‍या खबरें चलाई हैं, कर रहे हैं. वैसे अभी तय नहीं है कि कब तक पॉजिटिव ग्रुप को ब्‍लैक आउट की समस्‍या से निजात मिलेगा.

न्‍यूज टाइम में मई में होगी सीनियरों की छंटनी, लिस्‍ट तैयार!

इसी महीने तीन दर्जन से ज्‍यादा कर्मचारियों की छंटनी करने वाले चैनल न्‍यूज टाइम (जनसंदेश) से खबर है कि मई महीने में भी कई लोगों की बलि ली जाएगी. सूत्रों का कहना है कि इसके लिए लिस्‍ट भी फाइनल कर ली गई है. इस बार की लिस्‍ट में सीनियर लोग शामिल हैं. इस सभी को भी कास्‍ट कटिंग के नाम पर चैनल से बाहर किया जाएगा. पिछले कुछ समय से न्‍यूज टाइम अपने कर्मचारियों के लिए कत्‍लगाह बन गया है. इस महीने संपादकीय से 15, एडिटिंग से 9, कैमरा सेक्‍शन से 5 एवं टेक्निकल विभाग से 3 लोग शहीद कर दिए गए हैं. 

वरिष्‍ठ लोग भी इस मामले में कुछ स्‍पष्‍ट कहने को तैयार नहीं हैं. हालांकि ऑफ द रिकार्ड चैनल के खर्च में कटौती की बात कही जा रही है. हालांकि बसपा की सरकार के जाने के बाद से ही इस चैनल के बंद होने की कयासबाजी लगाई जा रही है. सूत्र बताते हैं कि वरिष्‍ठ अपने खास लोगों से दूसरे चैनलों में अपना ठिकाना खोजने का संकेत दे चुके हैं. इसलिए आशंका जताई जा रही है कि यह चैनल जल्‍द ही बंद हो जाएगा. इसके बिकने की खबरें भी आ रही हैं.

चैनल पर चलने वाला टॉक शो प्राइम टाइम भी बंद कर दिया गया है. इस कार्यक्रम को चैनल के हेड सैयदेन जैदी होस्‍ट करते थे, परन्‍तु अब वे चैनल पर कम नजर आ रहे हैं. एजेंसियों से आने वाली फीड एवं न्‍यूज भी बंद कर दी गई है. काम करने के नाम पर बस गिने चुने कर्मचारी ही रह गए हैं. कई कर्मचारी खुद छोड़ कर चले गए थे. कुछ समय पहले बातचीत में सैयदेन जैदी ने कहा था कि हम छंटनी नहीं कर रहे हैं बल्कि जिनको मौका मिल रहा है, वो जा रहा है और रोक नहीं रहे हैं.

श्रीनिवास हत्‍याकांड : माफिया के लिए काम करता था कैमरामैन!

: एसपी ने प्रेस काउंसिल को भी लिखा पत्र : रामगढ़ : न्‍यूज11 के कैमरामैन श्रीनिवास की हत्‍या के मामले में पुलिस के हाथ कई अहम सुराग लगे हैं. पुलिस को श्रीनिवास उर्फ बुदुल के घर से जांच में एक सिम और चिप मिला है, जिसमें आपत्तिजनक बातचीत रिकार्ड है. जांच में यह भी सामने आया है कि बुदुल हजारीबाग के माफिया डॉन सुशील श्रीवास्‍तव के लिए काम करता था. पूछताछ में सुशील ने भी स्‍वीकार किया है कि बुदुल उनकी टीम के साथ था.

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि मीडिया की आड़ में बुदुल आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ था. पुलिस बुदुल का इतिहास खंगालने में जुट गई है. हालांकि अभी तक यह स्‍पष्‍ट नहीं हो सका है कि बुदुल की हत्‍या किस लिए की गई, लेकिन पुलिस का मानना है कि आपराधिक गतिविधियों में संलग्‍न रहने के चलते ही यह हत्‍या हुई होगी. फिलहाल जांच जारी है. इधर, शक के आधार पर हिरासत में लिए गए अमर साव और श्रवण को छोड़ने की मांग उठने लगी है.

पुलिस ने सोमी शर्मा विवाद को देखते हुए इन दोनों को हत्‍या के दिन ही हिरासत में ले लिया था, जिन्‍हें अब तक न तो जेल भेजा गया है और ना ही छोड़ा गया है. व्‍यापारियों का एक दल एसपी से मिलकर दोनों को छोड़ने की अपील की है. हत्‍या में अब तक इन दोनों का हाथ होने के सबूत नहीं मिले हैं, लिहाजा एसपी ने भी आश्‍वासन दिया है कि पूछताछ के बाद इन दोनों को छोड़ दिया जाएगा. पुलिस पर इस हत्‍याकांड के खुलासे का बड़ा दबाव बना हुआ है. पुलिस ने तीन और लोगों को शक के आधार पर हिरासत में लिया है.

दूसरी तरफ एसपी ने प्रेस काउंसिल को पत्र लिखकर जानकारी मांगी है कि कौन से अखबार व टीवी चैनलों के पत्रकार अधिकृत रूप से काम कर रहे हैं. बुदुल की हत्‍या के बाद यह बात सामने आई है कि कई संदिग्‍ध चरित्र वाले लोग भी पत्रकारिता की आड़ लेकर दूसरे धंधों में संलिप्‍त हैं. एसपी ने ऐसे कई पत्रकारों का अतीत खंगालने का आदेश भी अपने सहकर्मियों को दे दी है. साथ ही प्रेस काउंसिल को पत्र तथा ईमेल भेजकर पत्रकारों की जानकारी मांगी है. एसपी अनीश गुप्‍ता ने प्रेस लिखे वाहनों के जांच के आदेश भी दे दिए हैं.

आगरा से लांच हुआ दैनिक ‘पुष्‍प सवेरा’

आगरा के अखबार जगत में अब "पुष्प सवेरा" ने भी दस्तक दी है। समाचार पत्र बाजार में उपलब्ध है। प्रतिदिन बीस रंगीन पृष्ठ और सप्ताह में चार-चार पृष्ठों के दो परिशिष्ट लेकर यह अखबार पाठकों को रिझाने में शुरुआती तौर पर कामयाब रहा है। समाचार पत्र प्रसिद्ध कंस्ट्रक्शन कंपनी पुष्पांजलि ग्रुप का है। समाचार पत्र की डमी कई माह से प्रकाशित की जा रही थी, अब इसे रंगीन गेटअप में प्रस्तुत किया गया है। माहभर प्रतिदिन तीन रुपये मूल्य का यह समाचार पत्र विभिन्न आकर्षक स्कीमों के साथ लांच किया गया है।

बड़े समूह का समाचार पत्र बाजार में आने से अन्य मीडिया हाउसों में बेचैनी है। कई पत्रकारों और कर्मचारियों के नए अखबार से जुड़ने ने यह बेचैनी पैदा की है। उधर, पाठक लाभ में हैं। शहर में समाचार पत्रों की संख्या बढ़ने से उनके समक्ष च्वाइस उपलब्ध हुई है। समाचार पत्र के संपादक डॉ. वीडी अग्रवाल हैं जबकि प्रबंध निदेशक हैं वीरेंद्र अग्रवाल। प्रबंध संपादक ओम ठाकुर हैं। ठाकुर लंबे समय से शहर के पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं और कई समाचार पत्रों में कार्य कर चुके हैं। संयुक्त संपादक राजीव मित्तल इससे पूर्व कल्पतरू एक्सप्रेस के समूह संपादक थे। अनिल दीक्षित भी अहम जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं जो इससे एक प्रतिष्ठित करियर पत्रिका में स्थानीय संपादक थे। वह इससे पूर्व आई ऩेक्स्ट के मेरठ और आगरा संस्करण की लांचिग टीम का अहम अंग रह चुके हैं। उन्होंने आज, अमर उजाला और दैनिक जागरण में करीब 14 वर्ष तक कार्य किया है।

दैनिक नवभारत, ग्वालियर से श्रीप्रकाश शुक्ला ने उप समाचार संपादक के रूप में ज्वाइन किया है। फीचर एडीटर विवेक पाठक हैं। पाठक इनोवेशन एक्सपर्ट माने जाते हैं और उन्हें पत्रकारिता के शिक्षण का भी लंबा अनुभव है। शरद चौहान सिटी चीफ हैं जो अमर उजाला समेत कई अखबारों में रहे हैं। शरद ने 14 साल अमर उजाला में विभिन्न अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। वह हिंदुस्तान में भी रहे हैं। अन्य समाचार पत्रों की टीमों के अच्छे सदस्य भी अब पुष्प सवेरा के लिए कार्य कर रहे हैं जिनमें मनोज जैन, दिनेश भदौरिया, शरद शर्मा, जगदीश पुरी, चंद्रशेखर प्रसाद, राजेंद्र सिंह, करन पाल सिंह, विवेक मिश्रा, भगवती प्रसाद मिश्रा, सुनील कुमार, इंद्रपाल सिंह, दिग्विजय सिंह, अनुज उपाध्याय, विशाल सिंह, आशुप्रज्ञ मिश्रा, कुणाल गोस्वामी, तरुण चौधरी मुख्य हैं। समाचार पत्र ने बेहतर प्रजेंटेशन के लिए अन्य समाचार पत्रों से अच्छे पेजीनेटर्स और सिटी डेस्क एडीटर्स भी रखे हैं।

अमर उजाला में दिलीप सिंह का तबादला, लोकमत से रजा हुसैन का इस्‍तीफा

अमर उजाला, बरेली से खबर है कि दिलीप सिंह का तबादला इलाहाबाद के लिए कर दिया गया है. वे डेस्‍क पर तैनात थे. इसके पहले वे अमर उजाला, बनारस में तैनात थे. संपादक डा. तीरविजय सिंह से कुछ मनमुटाव होने के बाद उन्‍हें बरेली भेज दिया गया था. अब जब डा. तीरविजय का तबादला बरेली के लिए कर दिया गया है तो प्रबंधन किसी संभावित टकराव से बचने के लिए दिलीप को इलाहाबाद भेज दिया है. 

लोकमत, लखनऊ से खबर है कि रजा हुसैन ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर सब एडिटर एवं डेस्‍क इंचार्ज थे. बताया जाता है कि चेयरमैन की वादाखिलाफी से नाराज होकर उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है. रजा ने अपनी नई पारी न्‍यूज इंडिया के साथ शुरू की है. उन्‍हें खेल संवाददाता बनाया गया है.

संपादक ने कहा खाली मिठाई से क्‍या होगा, रंडी और लवंडा का नाच करवाओ!

हिंदुस्‍तान, भागलपुर में संपादक विशेश्‍वर कुमार की अजीबोगरीब हरकतों से काम करने वाले पत्रकार परेशान हैं. कर्मचारियों का तनाव बढ़ गया है. अब वे किस को कब क्‍या कह दें उन्‍हें ही पता नहीं रहता. नौकरी से निकाल देने की धमकी तो बात बात पर दी जाती है. कल उन्‍होंने आफिस में ही रंडी की नाच और लवंडा नाच कराने की बात कह डाली. सूत्रों का कहना है कि हिंदुस्‍तान, भागलपुर का माहौल खराब हो गया है. कानपुर में भी हिंदुस्‍तान की ऐसी तैसी करने के बाद विशेश्‍वर कुमार को भागलपुर भेजा गया था. इस तबादले से विशेश्‍वर कुमार परेशान हैं और इस परेशानी की खीज अपने कर्मचारियों पर निकाल रहे हैं.

मामला मंगलवार की रात का है. बांका डेस्‍क के प्रभारी प्रतीक कुमार की शादी तय हुई है. इसी खुशी में प्रतीक ऑफिस में मिठाई बांट रहे थे. इसी बीच संपादक विशेश्‍वर कुमार अपनी केबिन से निकले और डेस्‍क पर आ गए. उन्‍होंने पूछा कि मिठाई किस बात की बंट रही है. प्रतीक ने बताया कि सर शादी तय हो गई है इसी लिए मिठाई बांट रहा हूं. इस संपादक ने जो जवाब दिया उस पर पूरा ऑफिस सन्‍न रह गया. विशेश्‍वर कुमार ने कहा कि अरे शादी फाइनल हुई है तो रंडी नचवाओ, लवंडा नाच करवाओ. तुम्‍हारे इलाके में तो ऐसी परम्‍परा रही है. खाली मिठाई से क्‍या होगा? इस संदर्भ में जब विशेश्‍वर कुमार से बात की गई तो उन्‍होंने हां या ना कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

डेहरी ऑन सोन में राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार के साथ पुलिसकर्मियों ने की मारपीट

: ब्‍यूरोचीफ नरेंद्र सिंह समेत कई पत्रकार एसपी से मिलकर जताई नाराजगी : डेहरी ऑन सोन में राष्‍ट्रीय सहारा का एक पत्रकार पुलिस की गुंडागर्दी का शिकार हो गया. पुलिसकर्मियों ने ना केवल पत्रकार के साथ मारपीट की बल्कि उसको फर्जी मामलों में फंसाने की कोशिश भी की. पत्रकार के पास मौजूद रुपये तथा सोने की सिकड़ी भी छीने जाने का आरोप है. पत्रकार ने एसडीजीएम कोर्ट में थाना प्रभारी सहित चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ याचिका दायर किया है. 

राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार अखिलेश सिंह मंगलवार की रात दस बजे एक शादी समारोह में शामिल होने डेहरी ऑन सोन से डालमिया नगर जा रहे थे. उनको रास्‍ते में जक्‍खी बीघा पुल के समीप एक परिचित मिल गए. वह कार से निकलकर उनसे बात कर ही रहे थे कि डेहरी थाना प्रभारी सहित दरोगा आरके रमण और चार पुलिस कर्मियों के साथ रात्रि गस्‍त के दौरान आ धमके. आते ही ना तो कुछ पूछा और नहीं ही कहा बल्कि गरियाते हुए कहा कि हीरो बन रहा है. रात में हीरो बनकर घूमता है. इस पर अखिलेश ने अपना परिचय दिया कि मैं एक पत्रकार हूं और शादी में शरीक होने जा रहा हूं. इतना सुनते ही दरोगा ने आव देखा ना ताव सिपाहियों से कहा कि साला पत्रकार बनता है पीटो और इसे ले चलो थाने. इसकी हीरोगिरी निकालता हूं.

जब दरोगा के दुर्व्‍यवहार के बाद अखिलेश ने एसपी मनु महाराज को फोन करना चाहा तो इन लोगों उनका मोबाइल भी छीन लिया और थाने ले गए. थाने में अखिलेश के साथ बदतमीजी और मारपीट की गई. थाना प्रभारी ने सिपाहियों से कहा कि साले को हथकडी पहनाकर जेल में डाल दो. अखिलेश पर शराब पीने का आरोप भी लगाया गया तथा जबरदस्‍ती सरकारी अस्‍पताल में रात्रि को लेकर जाकर मेडिकल कराकर जबरिया शराब पीने का प्रमाण पत्र बनवाया गया. इस घटना के बाद से पत्रकारों में नाराजगी है. अखिलेश ने न्‍याय के लिए कोर्ट की शरण ली ही है. राष्‍ट्रीय सहारा रोहतास जिले के ब्‍यूरोचीफ नरेंद्र सिंह समेत कई पत्रकार एसपी से भी मिले तथा कार्रवाई करने की मांग की. बताया जाता है कि एसपी मनु महाराज ने आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ उचित कार्रवाई का आश्‍वासन दिया है.

हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले की जांच दायरे में तीन पूर्व संपादक भी आए

मुंगेर। विश्व के सनसनीखेज हिन्दुस्तान के दौ सौ करोड़ के विज्ञापन घोटाले में पुलिस जांच में उस समय नाटकीय मोड़ आ गया जब जांच कर रही मुंगेर पुलिस ने विज्ञापन घोटाला में दैनिक हिन्दुस्तान के तीन अन्य भूतपूर्व संपादकों को पुलिस जांच के दायरे में ले लिया है। अब पुलिस हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाले में मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड, जो अभी मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड के नाम से जाना जाता है, के दैनिक हिन्दुस्तान के भूतपूर्व संपादक महेश खरे, विजय भास्‍कर एवं अन्य संपादकों की भूमिका की जांच करेगी।

पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के आदेश पर कोतवाली कांड संख्या- 445/2011 में पुलिस अनुसंधानकर्ता सह कोतवाली आरक्षी निरीक्षक ने अभियोजन के समर्थन में मुफस्सिल थाना क्षेत्र के सिधेश्वरटोला निवासी आरटीआई कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता विपिन कुमार मंडल को प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी डीएन भारद्वाज के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत वयान के लिए पेश किया। प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी डीएन भारद्वाज के समक्ष अधिवक्ता विपिन कुमार मंडल ने दंड प्रक्रिया संहिता 164 के तहत बयान दर्ज कराया और कहा कि -‘‘वे बिना किसी भय या दबाव का यह वयान दे रहे हैं। 16 अप्रैल 2012 तक दैनिक हिन्दुस्तान अखबार के मुंगेर और भागलपुर संस्करणों ने अवैध ढंग से विज्ञापन मद में सरकार को करोड़ों रुपए का चूना लगाया है। मुंगेर और भागलपुर के हिन्दुस्तान संस्करणों में संपादक रहे महेश खरे, विजय भास्‍‍कर और अन्य लोगों ने मिलकर यह विज्ञापन घोटाला किया है और सरकार से करोड़ों रुपया अवैध ढंग से विज्ञापन मद में हासिल किया है।

इस विज्ञापन घोटाला में पहले से नामजद अभियुक्तों में मेसर्स द हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड, जो बाद में मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड और अब मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटड हैं, की अध्यक्ष और पूर्व सांसद शोभना भरतिया, मुद्रक और प्रकाशक अमित चोपड़ा, प्रधान संपादक शशि शेखर, कार्यकारी संपादक अकु श्रीवास्तव, स्थानीय संपादक बिनोद बंधु शामिल हैं। न्यायालय के आदेश से दर्ज प्राथमिकी में वादी मंटू शर्मा ने आरोप लगाया है कि अभियुक्तों ने बिना निबंधित अखबार को फर्जी कागजातों के बल पर निबंधित अखबार घोषित कर केन्द्र और राज्य सरकार के सैकड़ों विभागों से लगभग ग्यारह वर्षों में लगभग दौ सौ करोड़ का सरकारी विज्ञापन अवैध ढंग से प्राप्त किया और सरकार के खजाना को चूना लगाया।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपार्ट. इनसे 09470400813 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

देवरिया में आईबीएन7 के पत्रकार एवं परिजनों के विरुद्ध चार सौ बीसी का मामला दर्ज

देवरिया से खबर है कि एएनआई तथा आईबीएन7 के पत्रकार संदीप तिवारी व उनके परिवार के तीन सदस्‍यों पर सदर कोतवाली में फर्जीवाड़ा एवं चार सौ बीसी का मुकदमा दर्ज हुआ है. यह मुकदमा कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज किया गया है. मामला उनके चाचा की तरफ से दर्ज कराया गया है. खबर है कि संदीप तिवारी एवं उनके परिजनों के पास एक दुकान थी. यह दुकान इनके चाचा के नाम से दर्ज थी. परन्‍तु इस दुकान का इस्‍तेमाल संदीप एवं उनके परिवार के लोग कर रहे थे.

इस दुकान का किराया काफी समय से जिला पंचायत में जमा नहीं किया जा रहा था. कई नोटिसों के बाद जिला पंचायत ने इसकी वसूली के लिए आरसी जारी कर दिया. दुकान संदीप के चाचा के नाम से होने के कारण पुलिस ने उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया. इस पर संदीप के चचेरे भाइयों ने कहा कि जब आप दुकान का किराया नहीं दे रहे हैं तो इसे खाली कर दीजिए. हम लोग किराया जमा कर लेंगे. इसके बाद दोनों परिवारों में इस मामले को काफी तनाव रहा.

बताया जा रहा है कि इस तनाव के दौरान ही संदीप अपने पत्रकारीय रसूख का इस्‍तेमाल करते हुए दुकान को गलत तरीके से अपने परिजनों के नाम कराने की कोशिश में जुटे हुए थे. इसकी भनक किसी तरह इनके चाचा को लग गई. उन्‍होंने पुलिस से शिकायत की, परन्‍तु जब वहां भी कोई सुनवाई नहीं हुई तो ये लोग कोर्ट चले गए. कोर्ट के आदेश पर सदर पुलिस ने संदीप तथा उनके परिजनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 419, 420, 467 एवं 468 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

शिकायती पत्र
एफआईआर की कॉपी

दैनिक प्रभात, गाजियाबाद के ब्‍यूरोचीफ बने अभिनव

: कई अन्‍य भी टीम में शामिल : दैनिक प्रभात, गाजियाबाद से खबर है कि स्‍थानीय संपादक अवनींद्र ठाकुर ने अभिनव अग्रवाल को प्रमोट करके गाजियाबाद का ब्‍यूरोचीफ बना दिया है. अभिनव अखबार से लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. इसके अलावा इनके टीम में भी कई लोगों को जोड़ा गया है. अभिनव के अलावा अभिषेक सिंह, दिनेश गौड़, विनोद कुमार पाण्‍डेय, शेखर चौधरी को भी गाजियाबाद की टीम में शामिल किया गया है.

कई स्‍थानीय रिपोर्टरों की भी नियुक्ति की गई है. राजीव मिश्रा को लोनी का संवाददाता बनाया गया है. नफीस अहमद को मसूरी तथा राकेश शर्मा को मोदी नगर का संवाददाता बनाया गया है. जितेंद्र कुंडू मुरादनगर में अखबार की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. संभावना है कि कुछ और लोगों की नियुक्ति की जा सकती है.

वरिष्‍ठ पत्रकार यूसुफ अंसारी का पीस पार्टी से इस्‍तीफा

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं पीस पार्टी के वरिष्‍ठ सदस्‍य यूसुफ अंसारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. पार्टी में दूसरे नम्‍बर की हैसियत रखने वाले यूसुफ पार्टी के अंदर की गतिविधियों से नाराज थे. पीस पार्टी का जाना पहचाना चेहना माने जाने वाले यूसुफ कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़े हुए हैं. लम्‍बे समय तक जी न्‍यूज को अपनी सेवा देने वाले यूसुफ लगभग दो साल पहले जी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर चैनल वन के हेड बन गए थे.

यूसुफ ने अपनी वेबसाइट पर लिखा है कि वो कार्यकर्ताओं के अपमान एवं पैसों की लूट से घुटन महसूस कर रहे थे. उन्‍होंने पीस पार्टी के अध्‍यक्ष को लिखे गए पत्र को भी अपने ब्‍लाग पर डाला है. यूसुफ के साथ पार्टी के राष्ट्रीय सचिव रहे शमीम अंसारी, प्रदेश महासचिव रेहान अंसारी एडवोकेट, मोहम्मद इब्राहीम, मध्य उत्तर प्रदेश के महासचिव रहे अरुण मौर्य, पश्चिम उत्तर प्रदॆश के महासचिव रहे ज़ाहिद ताज, इश्तियाक़ मोहम्मद, अनीस क़ुरैशी के साथ संगठन के सैकड़ों पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. यूसुफ का पत्र.


सेवा में,                                                              दिनांकः 18.04.2012

जनाब डॉ. अय्यूब साहब अस्सलामु अलैयकुम,

पिछले साल हुए आपके एक्सीडेंट के बाद 20 जून 2011 को मैं (यूसुफ़ अंसारी) और शमीम अंसारी आपसे मिलने बड़हलगंज गए थे। तब आपसे पीस पार्टी के मिशन, विज़न, नीतियों, कार्यक्रम और चुनावी एजेंडे पर काफ़ी देर चर्चा हुई थी। चर्चा के बाद आपने हमें पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया था। उस वक़्त आपने कहा था कि हमारी पार्टी का दायरा दिनों दिन बढ़ रहा है। इसे संभालने के लिए हमें आपकी ज़रूरत है। आपकी पेशकश पर ग़ौर करते हुए हम 22 जुलाई 2011 को लखनऊ में पार्टी में शामिल हुए।

पार्टी में आपने मुझे राष्ट्रीय महासचिव और शमीम अंसारी साहब को राष्ट्रीय सचिव बनाया। हमने पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए पूरी लगन और सत्यनिष्ठा के साथ काम किया। आपके आदेशानुसार पहले मैंने लखनऊ मंडल में और बाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश पार्टी का संगठन खड़ा करने और पार्टी को मीडिया में कवरेज दिलाने के लिए जी तोड़ प्रयास किए। तमाम टीवी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर होने वाली चुनावी बहस में मैंने पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होकर अहम मुद्दों पर पार्टी का नज़रिया जनता को सामने रखा। इससे पार्टी को उत्तर प्रदेश के बाहर राष्ट्रीय एवं अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

शमीम अंसारी साहब ने पार्टी निर्देशों का पालन करते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कांठ, अमरोहा और बिलारी विधान सभा सीटों पर बतौर प्रभारी काम किया। इनमें से कांठ सीट पर हमें जीत हासिल हुई। अमरोहा और बिलारी सीट पर क्रमशः 26 हज़ार और 16 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले।

लेकिन गत 8 अप्रैल 2012 को हुई पार्टी की बैठक में आपने जिस राष्ट्रीय कार्यकारिणी का ऐलान किया उस सूची में हमारे साथ-साथ उन तमाम लोगों के नाम ग़ायब हैं जिन्होंने अपना खून पसीना बहा कर रात-दिन एक करके पार्टी के लिए क़ुर्बानी दी। इससे लगता है अब आपको मन तन और धन से पार्टी को सींचने वाले लोगों की ज़रूरत नहीं रह गयी है। आपको धनबल और बाहुबलियों की ही ज़रूरत है। आप पार्टी को मनमाने ढंग से चला रहे हैं। आपके स्तर पर लगातार एक के बाद एक ग़ल्ती हो रही है लेकिन न तो अपनी ग़ल्तियों को सुधारने को तैयार हैं और न ही आप किसी की सुनने को ही तैयार हैं। आपकी कुछ ग़ल्तियों की तरफ मैं आपका ध्यान खींचना चाहूंगा।

कार्यकर्ताओं का अपमान : पार्टी में अपना वक़्त और अपना पैसा लगाकर काम करने वाले आम कार्यकर्ताओं को वाजिब सम्मान नहीं मिल रहा है। हर मौक़े पर आम कार्यकर्ताओं के सम्मान को ठेस पहुचाई जा रही है। खुद आपने कई मौक़ो पर कार्यकर्ताओं को सरेआम अपमानित किया है। 18 मार्च 2012 को सहकारिता भवन में हुई समीक्षा बैठक के दैरान आपने पार्टी के राष्ट्रीय सचिव इक़बाल भारती को सरेआम ज़लील किया। साथ ही कई और कार्यकर्ताओं को बोलते हुए बीच में ही रोक कर उन्हें अपमानित किया। आपके पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली दौरे के दौरान भी सार्वजनिक तौर पर कार्यकर्ताओं के अपमान का सिलसिला नहीं रुका। पार्टी में कार्यकर्ताओं को अपनी बात कहने के लिए कोई फोरम मुहैया नहीं है। पार्टी में नीतियों, कार्यकर्मों और एजेंडे पर स्वस्थ्य बहस की न कोई व्यवस्था है और न ही इसकी आगे कोई गुंजाइश ही नज़र आती है। इन बातों को लेकर पार्टी कार्यर्ताओं में रोष है।

मिशन से भटकाव : पीस पार्टी दलित, पिछड़े और मुसलमानों को इंसाफ दिलाने के मिशन और समाज के सबसे निचले तबक़े को उपर उठाने की नीति से पूरी तरह भटक चुकी है। चुनाव में पार्टी ने इन तबक़े के नेताओं को पूरी तरह नज़र अंदाज़ किया और बाहुबलियों एंव अपराधी क़िस्म के लोगों को तरजीह दी। इस बाबत मैंने आपको कई बार आगाह किया लेकिन आपने एक नहीं सुनी। उल्टे अख़बार को दिए बयान में आपने इन बाहुबलियों और आपराधी क़िस्म के लोगों को पीस पार्टी की ताक़त क़रार दिया। इससे आम जनता में आपके साथ-साथ पार्टी की भी छवि ख़राब हुई और हमें चुनाव में इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ा।

कथनी और करनी में फ़र्क़ : 23 जुलाई 2011 को आपने दारुल शफ़ा में आयोजित कार्यकर्ताओं की मासिक बैठक में कहा था- “पीस पार्टी परिवार वाद पर नहीं चलेगा। अगर मेरा बेटा भी चुनाव लड़ना चाहेगा तो उसे पहले आम कार्यकर्ता के रुप में कम से कम एक साल तक पार्टी का काम करना होगा।“ लेकिन दो महीने बाद ही अपने इस ऐलान से पलटते हुए आपने अपने बेटे इंजीनियर मोहम्मद इरफ़ान को मुबारकपुर सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस बाबत संसदीय बोर्ड मे आपने चर्चा तक नहीं की।

एक जनवरी 2012 को रवींद्रालय, लखनऊ में हुई उम्मीदवारों की ट्रेनिंग के दौरान आपने राष्ट्रीय अध्यक्ष और ज़िला अध्यक्ष के बीच के सारे पद समाप्त करने का ऐलान किया था। इस मौक़े पर आपने कहा था कि चुनाव के बाद जीतकर आने वाले या जिताकर लाने वालों को नए संगठन मे जगह दी जाएगी। लेकिन आपने किया इसके एकदम उलट।

1)      चुनाव में पांचवे स्थान पर रहकर अपनी ज़मानत गंवाने वाले अपने बेटे इंजीनियर मोहम्मद इरफ़ान को आपने पार्टी में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

2)      चौथे नंबर पर रहकर बुरी तरह हारने वाले प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अब्दुल मन्नान को फिर से इसी पद पर मनोनीत कर दिया।

3)      पार्टी फंड के नाम पर खुले आम पैसा बटोर कर पार्टी की छवि को गहरा बट्टा लगाने वाले एम जे खान को फिर से राष्ट्रीय महासचिव बनाकर पूरे देश में पार्टी का संगठन खड़ा करने की ज़िम्मेदारी सौंप दी।

4)      विषम परिस्थितियों में चुनाव जीतने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक मात्र विधायक अनीसुर्हमान सैफ़ी को आपने किसी भी ज़िम्मदारी के लायक़ नहीं समझा।