बगावत की आग दैनिक भास्कर तक पहुंची, कोटा में हड़ताल

मजीठिया वेज बोर्ड पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले मीडियाकर्मियों के प्रताड़ना का सिलसिला तेज हो गया है. दैनिक जागरण नोएडा के कर्मियों ने पिछले दिनों इसी तरह के प्रताड़ना के खिलाफ एकजुट होकर हड़ताल कर दिया था और मैनेजमेंट को झुकाने में सफलता हासिल की थी. ताजी खबर दैनिक भास्कर से है. यहां भी मीडियाकर्मियों को सुप्रीम कोर्ट जाने पर परेशान किया जाना जारी है. इसके जवाब में दैनिक भास्कर के कोटा के दर्जनों कर्मियों ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू कर दिया है.

सूत्रों ने बताया कि भास्कर प्रबंधन ने कोटा संस्करण के कर्मियों को सुप्रीम कोर्ट जाने की बात पता चलने पर चार पांच लोगों को आफिस आने से रोक दिया. इसकी जानकारी मिलते ही हर विभाग के दर्जनों कर्मचारी भड़क गए और एकजुट होकर काम रोको हड़ताल शुरू कर दिया. आईटी, प्रोडक्शन, संपादकीय, मार्केटिंग, एकाउंट समेत सभी विभागों के करीब पचास-साठ कर्मियों ने आफिस का बायकाट कर नारेबाजी शुरू कर दी. हड़ताल की खबर भास्कर प्रबंधन के पास पहुंचते ही हाथ पांव फूल गए. हर विभाग के स्टेट हेड को कोटा की ओर रवाना किया गया. उधर, संपादक और मैनेजर ने अपने अपने खास चिंटूओं को बहला-फुसला कर काम पर लगा लिया और किसी तरह अखबार छापने में सफल रहे. कर्मचारियों ने श्रम विभाग में लिखित तौर पर काम से रोके जाने की शिकायत की है और इसकी एक कॉापी थाने को भी दी है.

इस बीच, कोटा में कर्मचारियों के शोषण-उत्पीड़न और कार्य बहिष्कार की जानकारी मिलते ही भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह दिल्ली से मेवाड़ एक्सप्रेस से कोटा के लिए रवाना हो गए. उन्होंने कर्मचारियों की टीम भावना और प्रबंधन से जूझने की क्षमता की सराहना की और पूरे भास्कर समूह के कर्मचारियों से अपील की कि वे किसी भी तरह के शोषण उत्पीड़न और अन्याय का न झेलें. जब तक गलत का विरोध नहीं किया जाएगा, तब तक मालिकों की मनमानी पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता.

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भास्कर प्रबंधन घनघोर उत्पीड़न कर रहा अपने मीडियाकर्मियों का, ऐसे करें बचाव

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अपने कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट जाते देख दैनिक भास्कर प्रबंधन बुरी तरह भड़क गया और इस बौखलाहट में ऐसे ऐसे कदम उठा रहा है जिससे वह आगे और संकट में फंसता जाएगा. सूत्रों के मुताबिक दैनिक भास्कर प्रबंधन की तरफ से राजस्थान के स्टेट एडिटर ओम गौड़ इन दिनों भास्कर के मैनेजरों की टीम लेकर दैनिक भास्कर के कोटा भीलवाड़ा भरतपुर आदि संस्करणों की तरफ घूम रहे हैं और यहां आफिस में बंद कमरे में बैठक कर एक-एक कर्मी को धमका रहे हैं. कइयों से कई तरह के कागजों पर साइन करवाया जा रहा है तो कुछ को आफिस आने से मना किया जा रहा है.

(अगर मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर कोर्ट जाने पर प्रबंधन आपको परेशान कर रहा है तो उपरोक्त फार्मेट को डाउनलोड कर भर कर लेबर आफिस से लेकर पुलिस-थाना तक जमा कर दें और रिसीविंग रख लें.)

पीड़ित मीडियाकर्मी इस पूरे उत्पीड़न की शिकायत लेबर आफिस में कर रहे हैं और कागजात जमा कर रहे हैं ताकि सुप्रीम कोर्ट में पूरे मामले को लेकर जाकर भास्कर प्रबंधन की दमनात्मक कार्यवाहियों पर लगाम लगवाया जा सके. सूत्रों का कहना है कि भास्कर राजस्थान के कुछ एडिशन्स में हड़ताल जैसी स्थिति बनने लगी है और कभी भी कर्मचारियों का गुस्सा फूट कर सड़क पर आ सकता है. एक भास्कर कर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भास्कर के ओम गौड़ और कई लोग इन दिनों राजस्थान के कई संस्करणों में जाकर कर्मचारियों को धमका रहे हैं. कई लोगों से इस तरह के पेपर पर साइन करवाया है कि वे अपनी मर्जी से सुप्रीम कोर्ट नहीं गए बल्कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए बरगलाया गया. वहीं, कई अन्य को आफिस आने से मना किया जा रहा है.

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा का कहना है कि प्रबंधन के दमनात्मक कार्यवाही का कर्मचारी लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करें और प्रबंधन की हर हरकत के बारे में लिखित तौर पर सूचना मेल लेबर आफिस से लेकर दैनिक जागरण के मालिकों तक को दें. साथ ही इन कागजात को इकट्ठा करते रहें. मालिक और संपादक लोग चाहें जिस कागज पर साइन करा लें, उसका सुप्रीम कोर्ट में कोई वैल्यू नहीं. सुप्रीम कोर्ट हर उस अनुबंध को अमान्य करता है जो संविधान और कानूनी की मूल भावना के खिलाफ हो. रही मजीठिया वेज बोर्ड की बात तो जो जो लोग सुप्रीम कोर्ट गए हैं, उन उन को मजीठिया वेज बोर्ड देने के लिए ये मालिकान मजबूर होंगे.

एडवोकेट उमेश शर्मा ने कर्मचारियों से अपील किया कि वे किसी भी हालत में सादे कागज पर या इ्स्तीफे पर हस्ताक्षर न करें. अगर आफिस आने से रोका जा रहा है तो रोज आफिस के मैनेजर को मेल करके कहें कि वे आफिस आना चाह रहे थे, आफिस गए लेकिन उन्हें आफिस के अंदर दाखिल नहीं होने दिया. इसकी सूचना लेबर आफिस को भी देते रहें. वकील उमेश शर्मा ने मजीठिया को लेकर मुकदमा करने वाले उन लोगों की मदद के लिए एक फारमेट जारी किया है जो प्रबंधन की प्रताड़ना के शिकार है. ऐसे लोग इस फार्मेट में अपना डिटेल भरकर स्थानीय लेबर आफिस, थाना-पुलिस में जमा कर दें और इसकी रिसीविंग रख लें. यह रिसीविंग कोर्ट में स्टे लेने और प्रबंधन को सबक सिखाने के काम आएगा. उपर फार्मेट हिंदी में है. नीचे अंग्रेजी में.

FORMAT OF COMPLAINT TO BE LODGED AGAINST THE MANAGEMENT BY THE EMPLOYEE

To, Date: ……..

The Assistant Labour Commissioner / Labour Officer / Deupty Labour Commissioner, Labour Commissioner,

Place: ……..

Sub: Harassment by the management of M/s — — — — — — — — — — , address — — — — — — — — — — — — — —.

Respected Sir,

I am an employee of the newspaper establishment named above since last several years. Wage Board constituted by Central Government popularly known as Majithia Wage Board submitted its recommendations to the Central Government which was notified and implemented by the Central Government vide notification dated 1/11/2011 and all the newspaper establishments were directed to pay the benefits of the said wage board to its employees.

The management named above along with several other managements did not comply with the notification of the central government and approached the Supreme Court of India and filed writ petitions against the said notification of the central government. Supreme Court of India vide its orders dated 7/2/2014 dismissed the petitions filed by the managements and issued specific directions for the release of the arrears of the benefits of the Majithia Wage Board to its employees in four installments and to continue paying the benefits w.e.f. April, 2014. The relevant part of the order is reproduced hereunder for ready reference:

“71) Accordingly, we hold that the recommendations of the Wage Boards are valid in law, based on genuine and acceptable considerations and there is no valid ground for interference under Article 32 of the Constitution of India.
72) Consequently, all the writ petitions are dismissed with no order as to costs.
73) In view of our conclusion and dismissal of all the writ petitions, the wages as revised/determined shall be payable from 11.11.2011 when the Government of India notified the recommendations of the Majithia Wage Boards. All the arrears up to March, 2014 shall be paid to all eligible persons in four equal installments within a period of one year from today and continue to pay the revised wages from April, 2014 onwards.
74) In view of the disposal of the writ petitions, the contempt petition is closed.”

The management named above refused to comply with the orders of the court and did not release the benefits as directed by the Supreme Court of India hence the undersigned got a legal notice issued against the management seeking the compliance of the orders of the Supreme Court. The officials of the management thereafter started threatening the undersigned and asked me to withdraw the complaint failing which they threatened that they would put me in serious trouble to the extent that I shall be forced to leave the job and go away.

A Contempt of Court petition was filed on my behalf before the Supreme Court of India on 6/2/2015 by our counsel Mr Umesh Sharma, Advocate which is likely to be listed very soon for hearing before the court. The officials of the management have further started terrorizing, threatening me to withdraw the said petition failing which they would not allow me to work. They are also threatening me to give in writing that I do not want to pursue the said case which I have refused. It is clear that the management is marking time to victimize and harass me just because I have asserted my legal rights. I apprehend that the management would victimize me with an intention to force me to withdraw the Contempt of Court petition from the Supreme Court of India.

I therefore seek your indulgence and request you to take action against the management at the earliest.
Thanking you,
Yours

Name …….
Post ………
Mobile No. ……..

Name and address of the employer ……..

Copy forwarded for action to:

i) Registrar General, Supreme Court of India, Tilak Marg, New Delhi – 110001 in connection with CCP (Civil) filed vide dairy No. 4214 & 4215 dated 6/2/2015 in WP ( C ) No. 346/2011.

ii) SHO, OIC/ Police Station—————

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कोर्ट जाने पर छह मीडियाकर्मियों को भास्कर प्रबंधन ने किया टर्मिनेट

गुजरात से खबर है कि दैनिक भास्कर वालों के गुजराती अखबार दिव्य भास्कर की मेहसाणा यूनिट के 20 मीडियाकर्मियों ने प्रबंधन के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी है. ये लोग मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप सेलरी एरियर न दिए जाने के खिलाफ कोर्ट गए हैं. प्रबंधन को अपने कर्मियों के कोर्ट जाने की जानकारी मिली तो अब सभी को परेशान किया जा रहा है.

बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने छह लोगों को टर्मिनेट कर दिया है. अन्य लोगों को नौकरी पर न आने को कह दिया गया है. इस तरह स्टेट एडिटर अवनीश जैन और एचआर स्टेट हेड राहुल खिमानी ने अपना असली रंग दिखा दिया. बावजूद इसके, सारे कर्मचारी एकजुट हैं और इनकी एकता तोड़ने में ये दोनों नाकामयाब रहे.

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बूथ कैप्चरिंग तस्वीर छापने पर भास्कर के प्रकाशक, संपादक और डेस्क प्रभारी को आरोपी बनाने के निर्देश

भिंड से खबर है कि कोर्ट ने बूथ कैप्चरिंग तस्वीर छापने पर भास्कर के प्रकाशक, संपादक और डेस्क प्रभारी को आरोपी बनाने के निर्देश दिए हैं. पूरी खबर इस अखबारी कतरन को पढ़कर जान समझ लीजिए…

 

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संपादक महोदय ने एक साथ 14 रिपोर्टरों की सेलरी काट दी!

: अब कर्मियों को भारी पड़ने लगी है स्थानीय संपादक की बौखलाहट : दैनिक भास्कर रांची के स्थानीय संपादक अमरकांत की बौखलाहट अब यहां काम कर रहे लोगों को भारी पड़ने लगी है। कारण है कि स्थानीय संपादक अब अपनी नाकामयाबी, विजन का अभाव आदि कमियों को छुपाने के कई ऐसे काम कर रहे हैं, जो लोगों का पच नहीं रहा। शुक्रवार (30 जनवरी) को अमरकांत ने एक साथ 14 रिपोर्टरों का वेतन काट दिया। उन्हें अबसेंट कर दिया गया। अमरकांत ने उपस्थिति रजिस्टर मंगाया और सभी को लाल लगा दिया।

कारण है कि रिपोर्टर सुबह 10.30 बजे की मीटिंग में पांच से 10 मिनट लेट आए थे। अमरकांत का यह व्यवहार अब उनके खास माने जाने वाले लोगों को भी नहीं पच रहा है। कारण है कि अमरकांत खुद सुबह की मीटिंग में सप्ताह में पांच दिन 11.30 बजे आते हैं। किसी कारण 10.30 बजे पहुंच गए तो सभी रिपोर्टरों का वेतन काट दिया। अरमकांत के इस व्यवहार से नाराज एक साथी राजेश कुमार सिंह उसी समय छुट्‌टी पर चले गए। राजेश सिंह ने तो यह भी कह दिया कि वे आत्मसम्मान के साथ समझौता कर काम नहीं करेंगे। अन्य रिपोर्टर भी अब सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज करने लगे हैं। रिपोर्टरों का यह भी कहना है कि अमरकांत के पास कोई विजन नहीं है। यही कारण है कि मीटिंग में आने पर केवल छूटी खबरों पर चर्चा होती है। वह भी ऐसी खबरें जो बिल्कुल सामान्य होती हैं। अगले दिन की प्लानिंग पर कोई चर्चा नहीं होती है। 

इन लोगों का कटा वेतन
अमरेंद्र कुमार (सिटी हेड)
राजेश कुमार सिंह (पॉलिटिकल हेड)
अनिल श्रीवास्तव (सीनियर रिपोर्टर)
प्रिंस श्रीवास्तव (रिपोर्टर)
संतोष चौधरी (रिपोर्टर)
राजीव गोस्वामी (रिपोर्टर)
नितीन चौधरी (रिपोर्टर)
विजय सिन्हा (सिटी डेस्क हेड)
शेली (रिपोर्टर)
श्यामपद (रिपोर्टर)
करबी दत्ता (रिपोर्टर)
आदिल (रिपोर्टर),
राजीव कुकरेजा

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दैनिक भास्कर रांची में संपादक के चहेते ने गाली-गलौज और गुंडागर्दी की

दैनिक भास्कर रांची में स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। अब यहां बात-बात पर गाली-गलौज और गुंडागर्दी की बातें हो रही हैं। बुधवार 21 जनवरी को यहां दो लोगों के बीच सार्वजनिक तौर पर जमकर गाली गलौज हुआ। इसका कारण है कि स्थानीय संपादक अमरकांत के खास लोग लोग अब चढ़कर बातें कर रहे हैं। बात हफ्ते भर पहले की है। डीबी स्टार एक पेज का प्रूफ पढ़ने के लिए कॉपी डेस्क के राजीव मिश्रा के पास भेजा गया।

राजीव मिश्रा ने कहा कि वे अभी एक दूसरी खबर पढ़ रहे हैं। डीबी स्टार का पेज बाद में पढ़ेंगे। इसी बात पर डीबी स्टार के प्रभारी संतोष सिंह ने मिश्रा को तुम-तड़ाक कर दिया। राजीव मिश्रा ने भी पलटकर संतोष सिंह को औकात दिखा दी। बात में अमरकांत में मामले को सलटाया। राजीव मिश्रा अमरकांत के हाशिये पर रखे गए लोगों में से एक हैं. जबकि संतोष सिंह को अमरकांत अन्नू भैया कहते-कहते नहीं थकते। ऐसे में अब अन्नू राय उर्फ अन्नू भैया भी जिसको-तिसको अपना रुआब दिखाते रहते हैं। वैसे पूरे ऑफिस में पता है कि वे क्या काम करते हैं। संतोष सिंह अपने आप को बनारस का बहुत बड़ा गुंडा भी बताते हैं। दैनिक भास्कर में अमरकांत के चाहने वालों और उनके विरोधियों के बीच बिस्फोटक स्थिति हैं। यहां कभी भी मारपीट सहित कई बड़ी घटना हो सकती है जबकि प्रबंधन का ध्यान इस ओर नहीं है।

एक भास्करकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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लखनऊ में भास्कर डिजिटल ने दिन भर चलाई गलत खबर, अज्ञानी भास्कर वालों ने ट्वीट को कोहली का बता दिया

लखनऊ।। भास्कर डिजिटल में हर दिन गलत खबर चलाने का नया कीर्तिमान बना रहा है। यहां खबर क्या होती है, यह तय करने वाले मुकेश कुमार उर्फ गजेंद्र अहम के शिकार हो गए हैं। वह अन्य छोटे पोर्टलों को दो कौड़ी का पोर्टल बताते हैं। भड़ास पर खबर देखकर भी नाक सिकोड़ने लगते हैं, लेकिन आजकल क्या हो रहा है, यह उनको दिखाई नहीं दे रहा है।

हफ्ते भर पहले यानि बीते शुक्रवार को यूपी विधानसभा की वोटिंग के दौरान भास्कर ने मुख्यमंत्री से ही वोट डलवाकर दिन भर खबर चलाई। लेकिन हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री खुद विधानपरिषद के सदस्य हैं वह वोट नहीं डाल सकते, लेकिन भास्कर ने खबर चलाई की मुख्यमंत्री ने डाला वोट। स्क्रीनशाट उपर देखिए।

एक भास्करकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


दैनिक भास्कर की खबर है कि कोहली ने लिंक ट्वीट की जिसमें धोनी पर आरोप हैं। बहुत ही गैर जिम्मेदराना रिपोर्ट… सनसनीखेज और पूर्णतया झूठी रिपोर्ट। दैनिक भास्कर को नहीं पता कि कोई भी यूजर ट्विटर पे कुछ भी नाम रख सकता है। किसी ने कोहली के ट्विटर हैंडल को अपना नाम रख के ट्वीट कर दिया। नोटिफिकेशन हमेशा नाम से आता है।

Dainik Bhaskar’s pathetic Reporting. They Dont know difference between name as handle and real handle

#BoycottBhaskar

https://twitter.com/cric_SKB/status/559245765525008384

Suresh Kumar Bijarniya
eerskb@gmail.com


भास्कर अपने पहले पेज पर नं 1 अख़बार होने का तो रोज दावा करता है। पर शायद पढ़ने वालों को बेवकूफ समझता है। 19 जनवरी से भास्कर ने ‘नो निगेटिव न्यूज हर सोमवार’ का अभियान शुरु किया है। फ्रंट पेज पर बड़े विज्ञापन के साथ दावा किया है कि ‘आप विश्व के पहले ऐसे पाठक होंगे जिनके सप्ताह की शुरुआत होगी नो निगेटिव सोमवार से’। यह बात हालिया या शुरु से भास्कर से जुड़े पाठकों ने शायद हजम कर ली हो। पर यह बहुत बड़ा झूठ है। इंदौर के बाशिंदे जो बरसों से नईदुनिया और भास्कर दोनों ही पढ़ते आ रहे हैं, वे जानते हैं कि यह पहल नई नहीं है। बरसों पहले भास्कर का प्रतिद्वन्द्वी अखबार नईदुनिया ‘सकारात्मक सोमवार’ शुरु करके बंद भी कर चुका है। नईदुनिया ने 1 जनवरी 2007, जो संयोग से सोमवार का दिन था, ‘सकारात्मक सोमवार’ की शुरुआत की थी, जिसमें सोमवार के दिन पहले पेज पर कोई नकारात्मक खबर नहीं होती थी। नईदुनिया के संपादकीय में ऐसी सकारात्मक पहल के ‘विश्व में पहला’ होने का कोई दावा नहीं किया गया था। पर धृष्टता देखिए कि भास्कर ने नईदुनिया की पहल और संपादकीय नोट की शब्दश: नकल को अपनी अक्ल होने का दावा किया। और तो और अपनी इस पहल को ‘विश्व में पहला’ होने का दावा कितनी बेहयाई से किया। भास्कर के कर्ता-धर्ताओं की स्मृति यदि इतनी कमजोर है, तो अखबार का तो भगवान ही मालिक है। पाठकों के साथ-साथ अब बॉलीवुड सितारों को भी बरगलाकर इस अभियान से जोड़ा जा रहा है। आज आमिर खान जी से साथ एक बड़ा विज्ञापन फिर छापा है। भास्कर नं. 1 होने का दावा चाहे किसी भी आधार पर करे, नं. 1 झूठा उसने खुद को साबित कर दिया है।

इंदौर से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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अजमेर से निकलने वाले दैनिक भास्कर को क्या हो गया है? जरा इस न्यूज को तो देखिए

: मंत्री के सादगी से मनाए जन्मदिन में दो हजार का जीमण? : अजमेर से निकलने वाले दैनिक भास्कर को क्या हो गया है? खबर बनाते, उसका सम्पादन करते, पेज जांचते समय कोई यह देखने वाला नहीं है कि खबर क्या जा रही है। एक-दो साल पुरानी खबरों को ज्यों की त्यों छापने से भी जब पेट नहीं भरा तो अब भास्कर ने सारे शहर की आंखों में धूल झोंकने का काम शुरू कर दिया है। रविवार, 11 जनवरी 2015 का दिन था। वसुंधरा सरकार के एक मंत्री का जन्मदिन। मंत्री ने एक दिन पहले सारे अखबारों को प्रेस नोट भिजवा दिया, मंत्री जी सादगी से मनाएंगे जन्मदिन। पत्रकारों को मंत्री ने खुद फोन किया। गद्गद पत्रकार नतमस्तक हो गए। अब जरा मंत्री की सादगी पर गौर कीजिए।

सुबह आर्य समाज के अनाथ आश्रम में हवन और अल्पाहार किया। वहां अपने विधायक कोष से दिए गए पांच कंम्प्यूटरों और एक प्रिंटर शुरू किए और अनाथ आश्रम द्वारा तैयार कराए गए कंप्यूटर कक्ष का फीता काटा। गौर कर रहे हैं आप मंत्री ने खुद के नहीं विधायक कोष से दिए गए कंप्यूटर-प्रिंटर और आश्रम के ही एक कमरे का फीता काटा। अल्पाहार की व्यवस्था भी मंत्री की खुद की नहीं थी। खास बात आश्रम के अध्यक्ष पांच दफा अजमेर के सांसद रहे हैं।

अजमेर विकास प्राधिकरण की ओर से आनासागर झील के किनारे सवा करोड़ रूपए की लागत से बनाए जाने वाले पाथ वे का उद्घाटन किया। खुद के धेले की एक पाई नहीं। नाश्ता और सारा तामझाम अजमेर विकास प्राधिकरण का। इतवार के बावजूद सारे अफसर मंत्री और उसके चेले चपाटों की चाकरी में मौजूद। आधा दर्जन से ज्यादा स्कूलें रविवार होने के बावजूद खोली गईं। कुछ एक्टिव बच्चे-बच्चियां बुलाए गए। मौखिक फरमान था मंत्री जी का जन्मदिन है, कुछ करना है। पढाई जाए भाड़ में। मास्साब-मैडमों को तबादला/प्रमोशन जरूरी था। मंत्री का खास साबित होने की प्रतियोगिता शुरू हो गई। एक स्कूल के मास्साब-मैडमों ने स्कूल में ही मंत्री को लड्डुओं से तौला। एक स्कूल के मास्साब-मैडमों ने स्कूल में ही अपना खून दान कर डाला।

एक स्कूल के मास्साब-मैडमों ने पौधे लगवा डाले, बड़ी मैडम ने मंत्री को भी तुलसी लगा एक गमला मंत्री की हथेली में रख दिया। बच्चों को मंत्री से पेड़ और पर्यावरण पर उपदेश सुना डाला। एक स्कूल के मास्साब-मैडमों और में सरकारी योजना मंे बने तीन कमरों का फीता कटवा दिया। मास्साब-मैडमों के एक संगठन ने मंत्री को साफा पहनाया और हाथ में तलवार थमा दी। लोकतंत्र में मंत्री के हाथों किसकी हत्या का इरादा है मास्साबों ? और दांत निपोरते मंत्री किस पर तलवार चलाने का इरादा है। कभी अपने सास-ससुर, मां-बाप का जन्मदिन नहीं मनाने वाले इन मास्साबों-मैडमों ने लड़डू बांटे, बंटवाएं, केक काटे-कटवाए, बैंड बाजे बजवाए।

मंत्री के चेले चपाटों ने शहर-भर में बधाई के बड़े-बड़े पोस्टर लगवाकर और अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन देकर मोदी के सफाई, सादगी,फिजूलखर्ची और सुंदरता के नारे की हवा निकाल दी। मंत्री ने एक अनाथ आश्रम में भी बुजुर्गों के हाल चाल जाने। यह अनाथ आश्रम भी भाजपा नेताओं की सरपरस्ती में चलता है। दिखावे के लिए थोड़ी दूरी तक साइकिल चलाई। अपने शागिर्दों की महंगी कारों में पुष्कर और नारेली तीर्थ पूजा। गायों को चारा भी खिलाया।

दोपहर बाद अपने घर पर सुंदरकांड का पाठ कराया और उसके बाद प्रसादी के नाम पर महाभोज कराया। मंत्री का भोज था। मंत्री से संतरी तक जुटे। अपने संपादकों के आगे पत्रकारों की बिसात क्या, मंत्री के चरणों में लोट लगाते नजर आए।  तोहफा भी कबूल किया। करीब दो हजार लोगों ने जमकर भोजन किया। मोदी के नारे, ‘न खाउंगा, ना खाने दूंगा’ को अपने भाषणों में दोहराने, तालियां पिटवाने वाले, पारदर्शिता का दावा करने वाले मंत्री क्या इस जीमण, निमंत्रण पत्र, सुंदरकांड के आयोजन पर हुए खर्च का ब्यौरा देने की हिम्मत रखते हैं।

पता नहीं भास्कर के पत्रकारों-संपादकों को इतने आयोजनों के बावजूद कहां-कैसी सादगी नजर आई। कुछ पत्रकार तो बाकायदा हिमायत में खडे़ नजर आए बेचारे मंत्री जी तो सादगी चाहते थे, उनके चेलों ने सब पर पानी फेर दिया। अरे कोई मंत्री की गर्दन पर बंदूक रखकर क्या यह सब करवा रहा था। शिलान्यास, उद्घाटन, भाषण, बैनर, विज्ञापन, महाभोज अगर सादगी का नाम है तो धन्य है ऐसी पत्रकारिता। इतना ही क्यों मिनट टू मिनट का कवरेज।

एक बॉक्स न्यूज है 11 तारीख, 11 बजकर, 11 मिनट पर लोकार्पण। भइया हद है चमचागिरी और चापलूसी की भी। दूसरी बॉक्स न्यूज है जन्मदिन का शानदार तोहफा। केन्टोनमेट बोर्ड के चुनावों में छह में से चार सीटों पर भाजपा की जीत। अरे क्या सचमुच घास चरने चली गई अक्ल। कांग्रेस ने तो चुनाव ही नहीं लड़ा। दो सांसदों जिनमें से एक राज्य मंत्री, दूसरा भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री और दो राजस्थान सरकार के मंत्री और फिर छह में से चार पर भाजपा की जीत। कांग्रेस मैदान में नहीं, सामने सभी निर्दलीय। इनमें भी एक जीत सिर्फ चार मतों की। यह है अक्ल पत्रकारों की और फिर मांगते हैं मजीठिया। यह तो बात हुई पत्रकारों की परंतु अपनी पार्टी की सरकार के एक मंत्री की इस सादगी पर प्रधानमंत्री मोदी की नीति क्या होगी? 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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7 फरवरी के बाद मजीठिया के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे, भड़ास आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार

जी हां. ये सच है. जो लोग चुप्पी साध कर बैठे हैं वे जान लें कि सात फरवरी के बाद आप मजीठिया के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे. सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक साल पूरे हो जाएंगे और एक साल के भीतर पीड़ित पक्ष आदेश के अनुपालन को लेकर याचिका दायर कर सकता है. उसके बाद नहीं. इसलिए दोस्तों अब तैयार होइए. भड़ास4मीडिया ने मजीठिया को लेकर आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील उमेश शर्मा की सेवाएं भड़ास ने ली है.

( File Photo Umesh Sharma Advocate )

इस अदभुत आर-पार की लड़ाई में मीडियाकर्मी अपनी पहचान छुपाकर और नौकरी करते हुए शामिल हो सकते हैं व मजीठिया का लाभ पा सकते हैं. बस उन्हें करना इतना होगा कि एक अथारिटी लेटर, जिसे भड़ास शीघ्र जारी करने वाला है, पर साइन करके भड़ास के पास भेज देना है. ये अथारिटी लेटर न तो सुप्रीम कोर्ट में जमा होगा और न ही कहीं बाहर किसी को दिया या दिखाया जाएगा. यह भड़ास के वकील उमेश शर्मा के पास गोपनीय रूप से सुरक्षित रहेगा. इस अथारिटी लेटर से होगा यह कि भड़ास के यशवंत सिंह आपके बिहाफ पर आपकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ सकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में आपका नाम कहीं न खुलेगा न कोई जान सकेगा. दूसरी बात. जो लोग अपने नाम पहचान के साथ लड़ना चाहते हैं, उससे अच्छा कोई विकल्प नहीं है. उनका तहे दिल से स्वागत है. ऐसे ही मजबूत इरादे वाले साथियों के साथ मिलकर भड़ास मजीठिया की आखिरी और निर्णायक जंग सुप्रीम कोर्ट में मीडिया हाउसों से लड़ेगा.

बतौर फीस, हर एक को सिर्फ छह हजार रुपये शुरुआती फीस के रूप में वकील उमेश शर्मा के एकाउंट में जमा कराने होंगे. बाकी पैसे जंग जीतने के बाद आपकी इच्छा पर निर्भर होगा कि आप चाहें भड़ास को डोनेशन के रूप में दें या न दें और वकील को उनकी शेष बकाया फीस के रूप में दें या न दें. यह वैकल्पिक होगा. लेकिन शुरुआती छह हजार रुपये इसलिए अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपये लगते हैं, लेकिन एक सामूहिक लड़ाई के लिए मात्र छह छह हजार रुपये लिए जा रहे हैं और छह हजार रुपये के अतिरिक्त कोई पैसा कभी नहीं मांगा जाएगा. हां, जीत जाने पर आप जो चाहें दे सकते हैं, यह आप पर निर्भर है. बाकी बातें शीघ्र लिखी जाएगी.

आपको अभी बस इतना करना है कि अपना नाम, अपना पद, अपने अखबार का नाम, अपना एड्रेस, अपना मोबाइल नंबर और लड़ाई का फार्मेट (नाम पहचान के साथ खुलकर लड़ेंगे या नाम पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ेंगे) लिखकर मेरे निजी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर भेज दें ताकि यह पता लग सके कि कुल कितने लोग लड़ना चाहते हैं. यह काम 15 जनवरी तक होगा. पंद्रह जनवरी के बाद आए मेल पर विचार नहीं किया जाएगा. इसके बाद सभी से अथारिटी लेटर मंगाया जाएगा. जो लोग पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर भेजना पड़ेगा. जो लोग पहचान उजागर कर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर देने की जरूरत नहीं है. उन्हें केवल याचिका फाइल करते समय उस पर हस्ताक्षर करने आना होगा.

हम लोगों की कोशिश है कि 15 जनवरी को संबंधित संस्थानों के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा की तरफ से लीगल नोटिस भेजा जाए कि आपके संस्थान के ढेर सारे लोगों (किसी का भी नाम नहीं दिया जाएगा) को मजीठिया नहीं मिला है और उन लोगों ने संपर्क किया है सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए. हफ्ते भर में जिन-जिन लोगों को मजीठिया नहीं मिला है, उन्हें मजीठिया के हिसाब से वेतनमान देने की सूचना दें अन्यथा वे सब लोग सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने को मजबूर होंगे.

हफ्ते भर बाद यानि एक या दो फरवरी को उन संस्थानों के खिलाफ याचिका दायर कर दी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट से इस अनुरोध के साथ कि संबंधित संस्थानों को लीगल नोटिस भेजकर मजीठिया देने को कहा गया लेकिन उन्होंने नहीं दिया इसलिए मजबूरन कोर्ट की शरण में उसके आदेश का पालन न हो पाने के चलते आना पड़ा है.

और, फिर ये लड़ाई चल पड़ेगी. चूंकि कई साथी लोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर जीत चुके हैं, इसलिए इस लड़ाई में हारने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

मुझसे निजी तौर पर दर्जनों पत्रकारों, गैर-पत्रकारों ने मजीठिया की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ने के तरीके के बारे में पूछा. इतने सारे सवालों, जिज्ञासाओं, उत्सुकताओं के कारण मुझे मजबूरन सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा जी से मिलना पड़ा और लड़ाई के एक सामूहिक तरीके के बारे में सोचना पड़ा. अंततः लंबे विचार विमर्श के बाद ये रास्ता निकला है, जिसमें आपको न अपना शहर छोड़ना पड़ेगा और न आपको कोई वकील करना होगा, और न ही आपको वकील के फीस के रूप में लाखों रुपये देना पड़ेगा. सारा काम आपके घर बैठे बैठे सिर्फ छह हजार रुपये में हो जाएगा, वह भी पहचान छिपाकर, अगर आप चाहेंगे तो.

दोस्तों, मैं कतई नहीं कहूंगा कि भड़ास पर यकीन करिए. हम लोगों ने जेल जाकर और मुकदमे झेलकर भी भड़ास चलाते रहने की जिद पालकर यह साबित कर दिया है कि भड़ास टूट सकता है, झुक नहीं सकता है. ऐसा कोई प्रबंधन नहीं है जिसके खिलाफ खबर होने पर हम लोगों ने भड़ास पर प्रकाशित न किया हो. ऐसे दौर में जब ट्रेड यूनियन और मीडिया संगठन दलाली के औजार बन चुके हों, भड़ास को मजबूर पत्रकारों के वेतनमान की आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए एक सरल फार्मेट लेकर सामने आना पड़ा है. आप लोग एडवोकेट उमेश शर्मा पर आंख बंद कर भरोसा करिए. उमेश शर्मा जांचे परखे वकील हैं और बेहद भरोसेमंद हैं. मीडिया और ट्रेड यूनियन के दर्जनों मामले लड़ चुके हैं और जीत चुके हैं.

दुनिया की हर बड़ी लड़ाई भरोसे पर लड़ी गई है. ये लड़ाई भी भड़ास के तेवर और आपके भरोसे की अग्निपरीक्षा है. हम जीतेंगे, हमें ये यकीन है.

आप के सवालों और सुझावों का स्वागत है.

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया
+91 9999330099
+91 9999966466
yashwant@bhadas4media.com


मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा लिखित और भड़ास पर प्रकाशित एक पुराना आर्टकिल यूं है…

Majithia Wage Board Recommendations : legal issues and remedies

 

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मजीठिया के हिसाब से पैसा मिलते ही रजनीश रोहिल्ला ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ली (देखें कोर्ट आर्डर)

आरोप लगा सकते हैं कि रजनीश रोहिल्ला ने सबकी लड़ाई नहीं लड़ी, अपने तक सीमित रहे और मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से दैनिक भास्कर से पैसे मिलते ही सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली. ज्यादा अच्छा होता अगर रजनीश रोहिल्ला सबकी लड़ाई लड़ते और सारे पत्रकारों को मजीठिया के हिसाब से पैसा दिला देते. लेकिन हम कायर रीढ़विहीन लोग अपेक्षाएं बहुत करते हैं. खुद कुछ न करना पड़े. दूसरा लड़ाई लड़ दे, दूसरा नौकरी दिला दे, दूसरा संघर्ष कर दे, दूसरा तनख्वाह दिला दे. खुद कुछ न करना पड़े. न लड़ना पड़े. न संघर्ष करना पड़े. न मेहनत करनी पड़े.

कई लोग रजनीश रोहिल्ला पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने पत्रकारों को धोखा दिया. अरे भाई. रजनीश रोहिल्ला ने अपने लिए याचिका दायर की थी. उनके आगे जब भास्कर प्रबंधन रोया गिड़गिड़ाया और भरपूर पैसा दिया तो उन्होंने याचिका वापस ले ली. सुप्रीम कोर्ट के आर्डर की प्रति यहां चिपकाया गया है ताकि आप जान सकें कि किस तरह रजनीश रोहिल्ला ने खुद समेत तीन साथियों की लड़ाई लड़ी और जीते. ये अलग बात है कि वह सबके लिए नहीं लड़े. ठीक भी किया. जिसे मजीठिया चाहिए उसे सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट जाना बेहद आसान है. किसी परिचित वकील से एक ड्राफ्ट तैयार कराइए. सुप्रीम कोर्ट में दायर करा दीजिए. बस, देखिए कैसे नहीं मिलेगा आपको मजीठिया.

अब आप ये न कहना कि ये मालिक तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी नहीं दे रहे. मालिक लोग मोटी चमड़ी वाले होते हैं. शांत, सुंदर, सौम्य लोगों का ये मोटी चमड़ी वाले जमकर शोषण करते हैं और इसी शोषण-उत्पीड़न के जरिए वे लोग मोटी चमड़ी वाले यानि बड़े आदमी बन जाते हैं. ये मोटी चमड़ी वाले यानि बड़े लोग सिर्फ उनसे डरते घबराते हैं जो इनको उंगली कर देते हैं, जो इनकी पोलखोल देते हैं, जो इनके खिलाफ कोर्ट कचहरी से लेकर विभिन्न माध्यमों में घुसकर जाकर हो हल्ला करते हैं. ऐसे हल्लाबाजों के आगे ये मोटी चमड़ी वाले तुरंत समर्पण कर देते हैं. तो भाइयों, आप लोग सुंदर सौम्य शांत बने रहिए और किसी मसीहा का इंतजार करते रहिए. आप लोगों के मसीहा थे मोदी जी. बड़ा भारी भरोसा था. वे मोदी जी तो अब मोटी चमड़ी वालों के सबसे मोटे मित्र बन चुके हैं. फिर इंतजार करिए किसी नए मसीहा का. रजनीश रोहिल्ला ने अपनी लड़ाई लड़ी और जीत कर आगे बढ़ चुके हैं.

रजनीश रोहिल्ला ने इस लड़ाई के दौरान अपना खुद का मीडिया कारोबार भी शुरू कर दिया. राजस्थान केंद्रित एक मैग्जीन का प्रकाशन शुरू कर दिया. इस तरह इस बहादुर समझदार पत्रकार ने संघर्ष और सृजन, दोनों रास्तों को अपनाते हुए अपने लिए शानदार जीत हासिल कर नई मंजिल की तरफ कूच कर दिया है. उनके लिए, जो सपने देखते हैं, लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं, यह धरती, यह दुनिया बहुत कुछ तोहफे देती है. उनके लिए जो डरपोक हैं, जो कमजोर हैं, जो कायर हैं, जो बने बनाए लीक पर चलने वाले हैं, ये धरती दुनिया बेहद कष्टकारी और दुखद है. रजनीश रोहिल्ला को एक बार फिर बधाई कि उन्होंने संघर्ष और सृजन का रास्ता चुनकर अपने लिए एक नया आसमान बनाया है. ये बताना भी जरूरी है कि भड़ास ने जिन जिन को हीरो बनाया, वे चाहे दैनिक जागरण के प्रदीप सिंह हों या दैनिक भास्कर के रजनीश रोहिल्ला, सबने अंततः जीत हासिल की, उनके आगे उनका संस्थान उनका प्रबंधन झुका.

प्रदीप सिंह आज दैनिक जागरण में शान से नौकरी कर रहे हैं. प्रदीप वही शख्स हैं जिन्होंने दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को डायरेक्ट मेल कर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पैसा मांगा था. इसके बाद प्रदीप का तबादला कर दिया गया था. भड़ास ने जब पूरे मसले को प्रमुखता के साथ उठाया तो जागरण प्रबंधन की हवा खिसक गई और इन लोगों ने प्रदीप के आगे हथियार डालकर उन्हें फिर से सम्मान के साथ व शर्तें मानते हुए काम करते रहने का अनुरोध किया.

तो भाइयों, अगर सच्चे मीडियाकर्मी हो, चाहे किसी मीडिया संस्थान में चपरासी हो या मशीनमैन हो, पत्रकार हो या पेजीनेटर हो, आप तभी सच्चे मीडियाकर्मी कहलाओगे जब अपने हक के लिए लड़ोगे, भिड़ोगे. जिनके कंधे पर पूरे जमाने के शोषण अत्याचार के खिलाफ लड़ने बोलने दिखाने की जिम्मेदारी हो, वे अपनी ही लड़ाई अगर नहीं लड़ सकते तो सच्चे कहां के और कैसे हुए. इसलिए मीडियाकर्मी दोस्तों, सोचो नहीं. आगे बढ़ो और अपना हक अपना हिस्सा लो. मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अगर पैसा नहीं मिला है तो चुपचाप सात फरवरी से पहले सुप्रीम कोर्ट में कंटेंप्ट आफ कोर्ट का केस डाल दो. केस डालने के बाद तो आपको आपका प्रबंधन ट्रांसफर भी नहीं कर सकता क्योंकि तब यह पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर की गई कार्यवाही में शुमार किया जाएगा और आपको लेबर कोर्ट से या सुप्रीम कोर्ट से स्टे मिल जाएगा. नीचे एक पत्र है, जिसे एक साथी ने भड़ास को भेजा है, सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त आर्डर के साथ. पढ़िए और आप भी सात फरवरी से पहले कंटेंप्ट आफ कोर्ट का मुकदमा दायर करने की तैयारी करिए. जैजै.

-यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


BHASKAR EMPLOYEES KE LIYE BADHI DUKHAD KHABAR

LOG SOCH TE HAI KE KOI MASHIHA AAYEGA JO UNKA HAKK DILAYEGA…. YE KALYUG HAI BHAI… KHUD KO HI BULAND KARO, KHUD LADAI KARO AUR KHUD MAVA KHAO… DAINIK BHASKAR VALO KE SAATH BHI KUCHH AISHA HI HUA…. PAHELE GUJARAT HIGH COURT ME EMPLOYEES NE CASE KIYA TO PAISA DEKE CASE SATTLEMENT KARKE WITHDRAW HO GAYA….. AUR AB SUPREME COURT KE CASE ME EMPLOYEES KO PAISA DE KE CASE WITHDRAW KARVA LIYA…. (ORDER COPY ATTACHED))

ABHI BHI 7 FEBRUARY SE PAHELE CONTEMPT PETITION HO SAKTI HE NAHITO USKE BAAD TO MAJETHIA MANCH BHI KUCHH NAHI KARVA PAYEGA…. CHALO BHAI HAM TO CHALE APNI LADAI KHUD LADNE…. HAKK KI LADAI…

PLS CONTACT GUJARAT MAJDOOR SABHA– 09879105545 IF INTERESTED TO AVAIL..

HITESH TRIVEDI
hrdb123@gmail.com


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जब पीपी राव हुए निरुत्तर…  मजीठिया वेज बोर्ड पर सुनवाई… नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट । कोर्ट नंबर 9 । आइटम नंबर 42 । जैसे ही दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ यह मामला सुनवाई के लिए सामने आया न्याययमूर्ति रंजन गोगोई ने दैनिक जागरण प्रबंधन के वकील से सीधे पूछ लिया कि क्या आपने अपने यहां मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू किया। इस पर दैनिक जागरण की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील श्री पीपी राव पहली बार तो कुछ नहीं बोले लेकिन जब न्याययमूर्ति गोगोई ने दोबारा यही सवाल किया तो श्री राव ने कहा कि उन्हें अदालत का नोटिस नहीं मिला है।

इस पर अदालत ने कहा उन्होंने दो महीने का वक्त दिया था लेकिन औपचारिक रूप से कोई नोटिस नहीं दिया था। अब दो हफ्ते वक वक्त आपको दिया जाता है। आप शपथपत्र दाखिल करें। इस बीच न्याययमूर्ति ने श्री राव से आइटम नंबर 42 की घोषणा होते ही राव से पूछा कि आप जागरण की ओर से पैरवी कर रहे हैं। अदालत ने इस संदर्भ में नोटिस भी जारी करने के आदेश दिए हैं। जब दूसरी बार न्याययमूर्ति गोगोई ने उनसे पूछा कि आपने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू किया या नहीं तो श्री राव ने अदालत को बताया कि प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच इस मामले में एक समझौता हो गया है। उन्होंने अदालत और कर्मचारियों के वकील श्री परमानंद पांडेय को वह समझौते की फाइल भी दी।

इस कथित समझौते पर 708 कर्मचारियों के हस्ताहक्षर हैं। समझौते के मसैादे वाले पन्ने पर पांच साथियों के हस्ताक्षर हैं। इस पूरे समझौते में कहीं भी किसी गवाह के हस्ता‍क्षर नहीं हैं। इतना ही नहीं अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सभी कर्मचारियों से लिए गए हस्ताक्षर में श्री अंशुमान तिवारी का हस्ताक्षर 17 वें नंबर है और इनके हस्ताक्षर करने की तारीख 123-11-11 है। श्री तिवारी का एम्पालाई कोड 0085 है। आप सबको पता ही है कि श्री तिवारी किन खास परिस्थितियों में संस्थान को अलविदा कह गए थे।

दैनिक जागरण के साथियों को याद दिलाना जरूरी है कि साथियों यह वही काले पन्ने हैं जिनपर आप सभी के हस्तााक्षर हैं। संलग्‍नक के 66 से 85 पृष्ठों में आपके वे हस्ताक्षर हैं। हम यहां कुछ कानूनी पहलुओं को देखते हुए इन काले पन्नों का सच नहीं लिख पा रहे हैं। हम वकील से सलाह लेने के बाद ही इस पर कोई प्रकाश या इसकी कॉपी आप सब तक पहुंचा सकेंगे।

फेसबुक के मजीठिया मंच नामक एकाउंट से साभार.

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मजीठिया वेज बोर्ड : रजनीश रोहिला समेत तीन मीडियाकर्मियों के आगे झुका भास्कर प्रबंधन, पूरे पैसे दिए

(फाइल फोटो : रजनीश रोहिला)


इसे कहते हैं जो लड़ेगा वो जीतेगा, जो झुकेगा वो झेलेगा. अजमेर भास्कर के सिटी रिपार्टर रजनीश रोहिला, मार्केटिंग के संदीप शर्मा और संपादक के पीए ने अखबार मालिकों के तुगलकी फरमान को न मानकर लड़ाई लड़ी और जीत गए. इस तरह भास्कर प्रबंधन को झुकाकर इन तीनों ने लाखों बेचारे किस्म के पत्रकारों को रास्ता दिखाया है कि लड़ोगे तो लोगे, झुकोगे तो झेलोगे. तीनों ने भास्कर से अपने हिस्से का मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से भरपूर पैसा ले लिया है.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की ओर से मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के बाद दैनिक भास्कर ने अपनी चाल खेली थी. इसके तहत सभी कर्मचारियों से मजीठिया नहीं लेने के लिए हस्ताक्षर करवाए थे. उस दौरान इन तीनों ने ऐसा नहीं किया तो भास्कर ने इनका अन्य राज्यों में तबादला कर दिया था. इनमें से वहां कोई भी नहीं गया और रजनीश ने तबादले पर स्टे ले लिया. भास्कर अपील में गया तो वह खारिज हो गया. लेकिन रोहिला मजीठिया का लाभ लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट चले गए. उन्होंने इन दोनों साथियों को भी पक्षकार बनाया. इस लड़ाई में भास्कर को मुंहकी खानी पड़ी और रोहिला को बड़ी जीत मिली.

सुप्रीम कोर्ट ने दो माह में भास्कर को मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ देने को कहा. इसके बाद रोहिला ने सोशल मीडिया और भड़ास सहित अन्य साइटों पर अपने आप को इस लड़ाई का हीरो बताया. भड़ास ने भी इनको हीरो बताते हुए इनका नंबर जारी किया. अब ये बड़ा खुलासा हुआ है कि कुछ दिनों पहले ही इन तीनों मीडियाकर्मियों के आगे भास्कर का प्रबंधन झुक गया और पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाने लगा. चर्चा है कि रोहिला ने ग्यारह लाख रुपए लिए. इसी तरह संदीप ने साढ़े तीन लाख और संपादक के पीए ने साढ़े चार लाख रुपए.

इस प्रकरण से जाहिर होता है कि जो लड़ेगा वह जीतेगा. वैसे भी मीडिया में उन्हीं लोगों को रहना चाहिए जो मौका पड़ने पर अत्याचारियों की आंख में आंख डालकर बात कर सकें. अब देशभर के पत्रकारों के सामने विकल्प खुला है. वे अगर लड़ते हैं अपने हक के लिए तो उनके मालिक उन्हें पैसे देंगे अन्यथा झेलते रहिए. पत्रकार भाइयों को अपने हक की लड़ाई के लिए कोर्ट जाना ही पड़ेगा नहीं तो अखबार मालिकों की तानाशाही यूं की चलती रहेगी. इस लड़ाई में हम सभी मिलकर लड़ेंगे तो जीत संभव हो पाएगी.

आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हो कि विज्ञापनों और अपने आप को बड़ा बताने के लिए अखबार मालिक कैसे कुत्तों की तरह लड़ते थे, लेकिन जब वेज बोर्ड देने की बारी आई तो सभी एक होकर कोर्ट चले गए. फिर हम सब एक क्यों नहीं हो सकते हैं. यशवंत जी आप से विनम्र निवेदन है कि आपने जिस तरीके से रोहिला को इस लड़ाई का हीरो साबित करने की कोशिश की, उसी तरह अब उनकी जीत को सामने रखकर बाकी सारे पत्रकारों को उकसाइये कि वो भी कोर्ट जाएं और अपना हक लें. किसी की लड़ाई लड़ने के लिए कोई फरिश्ता नहीं आने वाला. सबके भीतर एक फरिश्ता होता है जो लड़ाई लड़ सकता है. उस फरिश्ते को जगाइए. भास्कर ने सुप्रीम कोर्ट जाने वालों को उनका हक देकर बाकियों को मजीठिया देने से अपना पल्ला झाड़ने में लगा हुआ है.  इस जीत के लिए रजनीश रोहिल्ला को उनके मोबाइल नंबर 09950954588 पर बधाई दे सकते हैं और उनसे लड़ने का फार्मेट / तरीका / रास्ता पूछ पता कर सकते हैं. इन साथियों को मजीठिया की लड़ाई लड़ने और जीतने पर हार्दिक बधाई.

एक पत्रकार साथी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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रमेशचंद्र अग्रवाल के नाम दैनिक भास्कर के एक पाठक का पत्र

मान्यवर, दैनिक भास्कर पत्र समूह के संपादक श्री रमेशचंद्र अग्रवाल का एक पत्र 26 दिेसंबर के अंक मे पूरे पहले पेज पर प्रकाशित हुआ है। इसमें टाइम्स आफ इंडिया को पछाड़ कर भास्कर के सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार बनने का दावा किया गया है। पाठक का दर्द बयान करने वाला अपना पत्र आपको प्रेषित कर रहा हूं, भड़ास पर प्रकाशनार्थ।
सादर।                     
श्रीप्रकाश दीक्षित
एचआईजी-108,गोल्डन वैली हाईटस                                       
आशीर्वाद कालोनी के पीछे ,कोलार रोड,        
भोपाल-462042       

रमेशचंद्र अग्रवाल के नाम एक पाठक का पत्र

मान्यवर, मैं एक वरिष्ठ नागरिक, हिंदी का जागरूक पाठक और जानकार शहरी होने के साथ एक स्वतंत्र पत्रकार भी हूँ. सबसे पहले मेरी बधाई कबूल करें. भास्कर की उपलब्धि इसलिए भी खास है कि पहली बार हिंदी के किसी अख़बार ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया सरीखे अंग्रेजी के दिग्गज अख़बार को चारों खाने चित्त किया है. पर साथ ही यह भी कहने की जुर्रत कर रहा हूँ कि पिछले कुछ सालों से एक पाठक के नाते भास्कर ने मुझे बेहद निराश किया है. मुझे यह कहने की भी अनुमति दें कि भास्कर से पत्रकारिता तो तक़रीबन गायब ही हो गई है, बस बाजार और सिर्फ बाजार ही नजर आता है! जिस पत्रकारिता ने भास्कर और आपको इस मुकाम तक पहुँचाया उसी को आप और आपके काबिल बेटों ने करीब करीब त्याग ही दिया है. जिस हिंदी ने आपको अभूतपूर्व प्रतिष्ठा, बेशुमार दौलत, मिल और मॉल आदि दिए उसके साथ भास्कर कैसा बर्ताव कर रहा है? अंगरेजी का बेहूदा इस्तेमाल कर हिंदी को दोयम दर्जे का बनाने का दुस्साहस किया जा रहा है. मैं यह भी कहना चाहूँगा कि अपराजेय कोई भी नहीं है. कभी राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता में ध्रुव तारे की तरह चमकने वाला नईदुनिया आज कहाँ है? नवभारत तो बाजार से गायब ही हो चुका है. आप कह रहे हैं कि पाठक ही भास्कर की पूंजी और प्राथमिकता है! यदि वाकई में ऐसा है तो ज्वलंत और विवादस्पद मुद्दों पर क्यों संपादकीय लगभग नहीं लिखे जा रहे हैं? दार्शनिक अन्दाज में लिखे जा रहे लम्बे चौड़े संपादकीय पढने और उन्हें समझने का समय किसके पास है? पाठक से सीधे जुड़ने वाले संपादक के नाम पत्र कालम को बंद क्यों कर दिया गया है? कुल मिलकर पाठक ही आपसे कहीं बहुत पीछे छूट गया लगता है! आपके लिए नि:संदेह यह समय सेलेब्रेट करने, गर्व करने और भाव विभोर होने का है लेकिन यह समय आत्मचिंतन करने का भी है. यदि आप आहत हुए हों तो मैं अपने लिखे पर माफ़ी चाहूँगा. इसे मैं दैनिक भास्कर के facebook पेज पर पोस्ट कर चुका हूँ.
श्रीप्रकाश दीक्षित                                                                                                            
एचआईजी-108,गोल्डन वैली हाईटस                                       
आशीर्वाद कालोनी के पीछे ,कोलार रोड,        
भोपाल-462042


रमेश चंद्र अग्रवाल ने क्या लिखा है दैनिक भास्कर में, पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

दैनिक भास्कर देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार

 

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दैनिक भास्कर देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार

प्रिय पाठकों,

भास्कर के लाखों पाठक परिवारों को नमन के साथ, मुझे यह बताते हुए खुशी है कि आपका अपना अखबार दैनिक भास्कर अब देश का सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अखबार हो गया है। समाचार पत्रों की विश्वसनीय संस्था ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (ABC) ने अपनी जनवरी-जून 2014 की रिपोर्ट में यह प्रमाणित किया है कि किसी भी भाषा में निकलने वाले अखबारों में दैनिक भास्कर की प्रसार संख्या देश में सबसे ज्यादा है।

यह गर्व का क्षण भी है और भावुकता का भी। 1958 में भोपाल से शुरू हुई यह यात्रा 1983 में इंदौर और उसके बाद पूरे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पहुंची। 1996 में पहली बार भास्कर ने मध्यप्रदेश से बाहर राजस्थान में अपना कदम रखा जहां उसने जयपुर में पहले ही दिन से सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबार का रिकॉर्ड कायम किया। 2000 में चंडीगढ़, हिमाचल एवं हरियाणा और उसके बाद भास्कर पंजाब पहुंचा। 2003 में भास्कर ने भाषा की सरहदों को पार करते हुए गुजरात में दिव्य भास्कर के नाम से गुजराती अखबार शुरू किया जो आज गुजरात का अग्रणी अखबार है। 2011 में भाषा की सरहदों को आगे बढ़ाते हुए दिव्य मराठी का प्रकाशन मराठी भाषा में महाराष्ट्र से किया गया। इसके साथ ही झारखंड और बिहार में भी दैनिक भास्कर ने हिंदी के संस्करण शुरू किए और इस तरह भास्कर समूह 14 राज्यों में फैल गया। इन सारी सफलताओं और विस्तार के मूल में जिसका सबसे अहम योगदान रहा है वह हैं आप और आपका परिवार, यानी कि हमारे पाठक।

मैंने हमेशा कहा है कि दैनिक भास्कर अपने नाम के मुताबिक सूर्य की तरह सबका है और उसकी हर खबर और विचार पर अधिकार उसके पाठकों का है। इस मौके पर दोहराना चाहता हूं कि हम इस बात को कभी न भूले हैं और न ही कभी भूलेंगे। पाठक हमारी सबसे बड़ी पूंजी और प्राथमिकता है। भरोसा रखिये कि हम न सिर्फ आपकी अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे बल्कि अखबार को लगातार बेहतर बनाते रहेंगे ताकि वह समाज और संसार में आपको एक जागरूक, जानकार और नॉलेज से समृद्ध पाठक के रूप में हमेशा आगे रखे।

दैनिक भास्कर आज एक संपूर्ण मीडिया समूह है। चार भाषाओं (हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेेजी) में इसके 14 राज्यों में 58 संस्करण हैं। माय एफएम के नाम से 17 प्रमुख शहरों में रेडियो स्टेशन हैं। dainikbhaskar.com हिंदी की वेबसाइट के पास 1 करोड़ 20 लाख मंथली यूनिक विजिटर हैं और divyabhaskar.com गुजराती वेबसाइट के 25 लाख यूनिक विजिटर हैं। facebook पर 48 लाख लाइक्स के साथ देशभर की हिंदी न्यूज वेबसाइट्स में इसकी सर्वाधिक पहुंच है। भास्कर परिवार अपने सभी पाठकों, उनके परिजनों, विज्ञापनदाताओं और शुभ चिंतकों को पुन: नमन करता है क्योंकि भास्कर आज जहां है वह आप ही की वजह से है।
पिछले बरस की असीम सुखद यादों और आने वाले वर्ष की अनंत शुभकामनाओं के साथ पुन: धन्यवाद।
 
आपका
रमेशचंद्र अग्रवाल
चेयरमैन, दैनिक भास्कर समूह


(दैनिक भास्कर अखबार में प्रथम पेज पर प्रकाशित विशेष संपादकीय)


दैनिक भास्कर के एक पाठक ने रमेश चंद्र अग्रवाल को क्या समझाया बताया है, जानने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

रमेशचंद्र अग्रवाल के नाम दैनिक भास्कर के एक पाठक का पत्र

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भास्कर ने तीन संपादकों आनंद पांडेय, सुनील शुक्ला और मनोज प्रियदर्शी को ब्लैक लिस्ट किया

दैनिक भास्कर नित नए खेल करने में माहिर है। वरिष्ठ पदों पर कार्यरत तीन पत्रकारों – आनंद पांडे, सुनील शुक्ला, मनोज प्रियदर्शी के इस्तीफों से जबर्दस्त खफा भास्कर प्रबंधन ने एक इनहाउस मेल भेजकर तीनों को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया है। शायद ऐसा, कम से कम हाल के दिनों में तो पहली बार हुआ है कि किसी कर्मचारी के नौकरी छोड़ने से खफा प्रबंधन ने उन्हें ब्लैकलिस्ट किया हो।

आनंद पांडे, रायपुर में पदस्थ थे, और उन्होंने इस्तीफा देकर नई दुनिया का दामन थाम लिया था। शुक्ला ग्वालियर एडिशन के संपादक थे, जबकि मनोज की भी रायपुर में पदस्थापना थी। भास्कर प्रबंधन ने एक मेल, जो कि रायपुर में भी सभी कर्मचारियों को प्राप्त हुआ है, लिखा है कि इन तीनों को तीन-तीन साल के लिए ब्लैक लिस्ट किया जा रहा है। हालांकि ब्लैक लिस्ट किए जाने पर क्या सलूक होगा, इसका खुलासा नहीं है। 

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जब एक लेख पर चिदंबरम के आफिस से श्रवण गर्ग को बुलावा आया….

Abhishek Srivastava : बात 2010 की है। मैं दैनिक भास्‍कर में था। ‘समय’ नाम का एक पन्‍ना निकालता था जिसमें समकालीन विषयों पर लेख होते थे। एक दिन हमारे मित्र Navin Kumar ने एक लेख भेजा। मैंने लगा दिया। छप गया। दो दिन बाद सम्‍पादक श्रवण गर्ग ने मेरे वरिष्‍ठ विमल झा को और मुझे केबिन में बुलाया। माथे पर चुहचुहाता पसीना पोंछते हुए बोले, ”अब बताइए, मैं क्‍या जवाब दूं? चिदंबरम के ऑफिस से बुलावा आया है इस लेख पर…।” और ऐसा कहते हुए उन्‍होंने अखबार सामने पटक दिया।

इसी लेख पर श्रवण गर्ग को चिदंबरम के आफिस ने तलब किया था…


चिदंबरम गृहमंत्री थे। एक-एक प्रकाशित सामग्री देखते थे। उन्‍होंने नवीन के लेख का अनुवाद करवा के रख लिया था और अपने पीए से संपादकजी को तलब करवा लिया था। मैंने श्रवणजी से कहा कि यह तो गर्व की बात है किसी हिंदी के अखबार के लिए कि उसके लेख पर सरकार संज्ञान ले रही है, वरना कौन हिंदी को पूछता है। संपादकजी नाराज़ होकर कुछ बेचारगी में बोले कि अब तो मुझे ही झेलना होगा, आपको जो करना है सो तो आपने कर ही दिया। वे गए, वहां क्‍या हुआ पता नहीं, लेकिन आगे की कहानी दिलचस्‍प है। कुछ दिन बाद चिदंबरम ने उन्‍हें राष्‍ट्रीय एकता परिषद का सदस्‍य बना दिया।

यह घटना मैं इसलिए बता रहा हूं क्‍योंकि बकौल Prabhat Ranjan, ”कांग्रेस एक उदार पार्टी है। वह लेखकों की लेखकीय स्वतंत्रता का सम्मान करना जानती है।” ऐसी उदारता के इतने उदाहरण बीते दस वर्षों में गिना दूंगा कि प्रभातजी को उदारता का अर्थ बदलना पड़ जाएगा। उसके बावजूद प्रभातजी वही के वही रहेंगे- unapologetic!

प्रतिभाशाली पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Sushant Jha लेकिन चिदंवरम् ने तो सम्मान करते हुए संपादक जी को रा. ए. प. का सदस्य बनवा ही दिया न…?….ऐसे में तो कांग्रेस, उदार ही ठहरी..!

Abhishek Srivastava आप क्‍या यह कहना चाह रहे हैं कि प्रभातजी का भविष्‍य भी उज्‍जवल है?
 
Sushant Jha मैं ऐसा सायास नहीं कहना चाहता, हो जाए तो व्यक्तिगत तौर पर खुश होऊंगा…..मिठाई तो खा ही सकता हूं।
 
Abhishek Srivastava अफ़सोस तो इसी बात का है कि अब ऐसा नहीं होगा। हो सकता, तो प्रभातजी को रायपुर जाने की ज़रूरत न पड़ती। हां, वे कांग्रेस छोड़कर भाजपा को पकड़ लें तो शायद आपको मिठाई नसीब हो।
 
Navin Kumar हाहाहाहाहा.. इसके बाद मेरे लेख छपने बंद हो गए और तुम्हें नौकरी मिलनी बंद हो गई.. तुम्हारी असंदिग्ध संपादकीय क्षमताओं के सारे कद्रदान तुम्हारी सराहना तक सिमट आए.. अब तो वो तुम्हारे लेखन के सार्वजनिक वाचन की छायाओं से भी बचते-बचाते फिर रहे हैं..
 
Sushant Jha ऐसा क्यों कहते हैं, अगर भाजपाई सरकार वामपंथियों को न्योंता देकर साहित्य सम्मेलन में बुलवा सकती है तो एक कांग्रेसी का भविष्य क्यों नहीं उज्जवल करवा सकती? काग्रेसी तो फिर भी उनके निकट के संबंधी हुए! वाम तो उनकी नस्ल का भी नहीं होता।
 
Indra Mani Upadhyay कभी प्रेमचंद ने कहा था कि “साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।”
अब यदि यह बात सत्य है तो….. बेकार में ही देश की जनता को आपस मे ईर्ष्या द्वेष रखने, वाद-विचार के नाम पर मुड़फुटौवल करने दोषी माना जाता है। वे तो वही कर रहे हैं जो साहित्यकारों की मशाल उन्हें दिखा रही है…..! (मसला- रायपुर साहित्य महोत्सव )
 
Abhishek Srivastava Sushant Jha वामपंथियों को न्‍योता देना भाजपाइयों की मजबूरी है क्‍योंकि उनकी छाया में वे खुद को लेजिटिमाइज़ करना चाहते हैं। ये जान जाइए कि भाजपाई सब वामपंथी को भले सम्‍मानित कर दे, कांग्रेसी को नहीं करेगा। वैसे, इस देश में कौन लेखक खुद को गर्व से दक्षिणपंथी कहता है? इस देश में दो मज़ेदार बातें हैं। अव्‍व्‍ल तो कोई खुद को दक्षिणपंथी नहीं कहता, दूजे हर वामपंथी दूसरे को अपने से कम वामपंथी मानता है।
 
Sushant Jha हालांकि मुझे अब नहीं लगता कि इक्कीसवीं सदी के इस दशक में भाजपाई विश्वामित्रों को मान्यता के लिए वाम वशिष्टों की जरूरत है! वो दौर रहा होगा पचास-साठ के दशक में-जब गांधी हत्या की छाया जन(संघ) पर काफी सघन थी। अब तो वाम-मठ नालंदा विश्वविद्यालय सा दिख रहा है, वहां के आचार्य बहके-बहके फिर रहे हैं, राज्यश्रय क्षीण हो रही है-मठों की भूमि को पतित ब्राह्मणों ने आहार बना लिया है। क्या ऐसे में लेजिटिमाइज शब्द उचित है..?..
 
Asif Suleman Khan अव्‍व्‍ल तो कोई खुद को दक्षिणपंथी नहीं कहता, दूजे हर वामपंथी दूसरे को अपने से कम वामपंथी मानता है।…………शत प्रतिशत सही बात कही आपने सर
 
Abhishek Srivastava राजनीतिक वैधता और सामाजिक वैधता में फर्क है। संघी होना अब भी हमारे सभ्‍य समाज में एक गाली जैसा है। इसका सिर्फ एक उदाहरण देता हूं। अखबारों के अग्रलेखों में आपने किसी भी लेखक का परिचय यह नहीं देखा होगा, ”लेखक संघ से जुड़े हैं/कार्यकर्ता हैं” या फिर ”ल…See More
 
Sushant Jha ऐसा नहीं है, आप राकेश सिन्हा का लेख देखें-साफ लिखा होगा कि संघ से जुड़े हैं। हां, बहुतायत ऐसा नहीं लिखते। हो सकता है अभी तक सत्ता-तंत्र का खौफ रहा हो-जो उनके अनुकूल नहीं था। समय आने दीजिए, बहुत सारे मिलते जाएंगे। दूसरी बात, दक्षिण अपने आपको दक्षिण नहीं कहते, वे राष्ट्रवादी या लिबरल कहते हैं-ठीक वैसे ही जैसे वाम वालों ने प्रगतिशीलता पर एकतरफा कब्जा कर लिया है! आनेवाले समय में प्रतिकूल सत्तातंत्र होने की वजह से वाम ही अपना परिचय छुपाएंगे-देखते जाइए। इसमें कुछ असामान्य नहीं है। कुछ भाई लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि वाम होना ही गाली जैसा है। हालांकि मेरा मत दोनों के बारे में ऐसा नहीं है!
 
Abhishek Srivastava राकेश सिन्‍हा का सामान्‍यत: हेडगेवार के जीवनीकार के रूप में परिचय मैंने देखा है। वैसे यह बात भले संभव हो कि आने वाले वक्‍त में वामी ही अपना परिचय छुपाएंगे, लेकिन वे अगर न भी छुपाएं तो अखबार खुद उनका यह परिचय सेंसर कर देंगे। फिर सब के सब लिबरल होंगे। मिलकर लिबिर लिबिर करेंगे।
 
Sushant Jha हाहा, लिबरल होना युगधर्म है। उसमें दाएं-बाएं सरकने की संभावना बरकरार होती है। नहीं तो अत्यधिक बांया जैसलमेर लगता है और अत्यधिक दांया चेरापूंजाी। जबकि जरूरत लखनऊ की है……
 
Abhishek Srivastava बहुत सही बोले… लखनऊ… जहां नवाब बनने के लिए शौक़ से देनी पड़ती है। और बिना चूं किए ठुमरी गाते रहना पड़ता है। मुझे लगता है आगामी पचास साल में मध्‍यवर्ग वाजिद अली शाह को अपने आदिम आदर्श के रूप में रिवाइव कर लेगा।
 
Sushant Jha हाहाहाहा, इसे इंट्यूशन कहते हैं-आप भी वहीं सोच रहे थे जो मैं सोच रहा था…..डर लग रहा है कि कोई संदर्भ के तौर पर इस टीप को न चुरा ले…!
 
Abhishek Srivastava कॉपीराइट थोड़े है आपका… पूरा मध्‍यवर्ग इसी लाइन पर सोचता है। बस कुछेक साहसी उनमें हैं जो लखनऊ (पढ़ें रायपुर) हो ही आते हैं।
 
Sushant Jha अब रायपुर में जयपुर घुस गया है तो क्या करिएगा? कल को गोहाना में खट्टर सरकार साहित्य-उत्सव कराएगी तो देखिएगा कितनी लाईन लगती है! नजदीक है। पूरा दिल्ली दिखेगा। देखते जाइये। अपने सबसे नजदीकी मित्रों पर अभी से नजर रखिए!
 
Abhishek Srivastava सबसे नज़दीकी तो एक भी नहीं, कुछ हैं जो दावा कर सकते हैं नज़दीकी होने का। जिसको जहां जाना हे जाए, मैनू की। मैं तो यहीं बना रहूंगा पोस्‍ट लिखता… तैनू की?
 
Panini Anand ओपड़ दी, गडगड दी, मूंग दी दाल दी… फिट्टे मूं
 
Navin Kumar Abhishek Srivastava तुम संघी विचारक की सोच भी कैसे सकते हो? संघ में विचार करना नहीं, विचार करने की कल्पना पर भी घोर पाबंदी है। वहां हेडगेवार और गोलवलकर के बाद विचार की जरूरत ख़त्म हो चुकी। अब सिर्फ उनके विचार का प्रचार कर सकते हैं संघी। इसीलिए तो उस दुकान में विचारक नहीं प्रचारक होते हैं। याद करो गोविंदाचार्य का माथा गरमाया था की हम विचार करेंगे। छुट्टी लेकर पढ़ने-लिखने चलेंगे। विचार करके लौटे तो ‘नागपुर’ ने ऐसी नाल ठोकी कि हिनहिनाना भूलकर टगबग टगबग करने लगे..

Tarun Vyas Navin सर हाहाहाहा… हिनहिना कर टगबग टगबग। बहुत सही : )
 
Som Prabh लेख भी पढवाइए सर।
 
Abhishek Srivastava नवीनजी से मांगिए, मेरे पास नहीं है।
 
Vinit Utpal एक बात जान लें सभी कि जिस तरह सभी नदियां समुद्र से मिलकर अपना अस्तित्व खो देती हैं,उसी तरह संघ की छत्रछाया में सबका होना है. जिस तरह समुद्र परवाह नहीं करती कि कौन नदी बड़ी है और कौन छोटी, सबको समाहित करती है, वही संघ कर रहा है.हर कोई जितनी बहानेबाजी करें, दावा करें, पैसा किसे खराब लगता है.
 
Abhishek Srivastava दर्द है विनीत जी, दर्द है।
 
Choudhary Neeraj अपनी शब्द-शब्द संघर्ष वाली स्क्र‍िप्ट वाली धार में ही लेख लिखा है, जबकि अक्सर जो बड़े पत्रकारों के लेख होते हैं, उनमें अपनी बात को कठिन शब्दों में लिखकर स्पष्टता नहीं प्रकट की जाती। केवल संपादकीय में ही थोड़ा बहुत लिखा जाता है, लेकिन नवीन जी ने उसे खुले खत के रूप में लिख डाला।

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दैनिक भास्कर : राजस्थान में अखबार ने मृत्यु के शोक संदेश पर दे दी बधाई!

राजस्थान का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करने वाला दैनिक भास्कर अब भगवान भरोसे ही चल रहा है। अखबार के हर संस्करण में खबरों में तो खामियों की भरमार है ही, मगर अब तो विज्ञापनों में भी ये लोग कुछ भी छाप दे रहे हैं। ताजा मामला भास्कर के चितौड़गढ़ संस्करण का है जिसमें 11 दिसंबर को चितौड़गढ़ भास्कर में पेज नंबर 2 पर एक शोक संदेश का विज्ञापन छपा था।

इस विज्ञापन में श्री एम.एल.मेहता जी के आकस्मिक निधन पर उनके परिवारजनों ने श्रद्धांजलि संबंधी मैटर छपवाया था और वह छपा भी, मगर ज्यों ही विज्ञापन की हैडिंग पर जायें तो सिर चकरा जाये। जिस व्यक्ति का आकस्मिक निधन हुआ है और परिवारजनों ने उन्हे श्रद्धांजलि दी है, उसे भास्कर वालों ने हार्दिक बधाई दे दी। इस विज्ञापन से तो मानों यूं लग रहा है जैसे श्री मेहता के जाने से उनके परिवारजनों को खुशी हुई हो और इसी खुशी के मारे उन्होंने अखबार में हार्दिक बधाई का विज्ञापन बुक करवाया हो…. हद हो गई ये तो यार….

राजस्थान से आर.पी. की रिपोर्ट.

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भास्कर के मालिकों की इच्छा पूरी न हो सकी, सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से बेहाल

 

सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई दो महीने की मियाद खत्म होने में अब थोड़ा ही वक्त शेष रह गया है। यही वह गंभीर, गलाकाटू या कहें कि जानलेवा खंजर-तलवार, नए जमाने का वह आयुध है जो यदि प्राण बख्श भी दे तो चेत-चेतना को कदापि नहीं बख्शेगा। मतलब, जान बच भी जाए तो शेष जीवन अचेतावस्था में ही गुजरने के सारे बंदोबस्त मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश ने कम से कम दैनिक भास्कर के महामहिम मालिकों के लिए तो कर ही दिए हैं। भास्कर मालिकान ने मजीठिया से बचने के लिए अपने भरसक सारे जुगत – कोशिश – उपाय – प्रयास कर लिए, यहां तक कि उन कर्मचारियों को भी येन-केन प्रकारेण अपने पक्ष में करने, धमकाने-फुसलाने-बहलाने, खरीदने, सेटलमेंट-समझौता करने के अथक-अनवरत प्रयास किए, लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली।

उनकी कोशिश थी कि कंटेम्प्ट केस करने वाले कर्मचारियों से बिना किसी लिखा-पढ़ी के, अपने हिसाब से कुछ ले-देकर, दो नंबर में समझौता कर लिया जाए और केस को वक्त रहते खारिज-रद्द करवा कर, मजे से मूछों पर ताव देते हुए (यदि कुछ मूंछे सफाचट होने से बची रह गई हों तो!) कोर्ट परिसर से बाहर आ जाएं। और फिर जोर-शोर से, गर्वोन्माद में प्रचारित करवा दिया जाए कि – अब वे (भास्कर के मालिकान-रमेश चंद्र अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, गिरीश अग्रवाल, पवन अग्रवाल आदि) मजीठिया देने को मजबूर-बाध्य नहीं हैं, क्यों कि सर्वोच्च अदालत के शिकंजे से वे आजाद हो गए हैं। अब वे वही करेंगे या उसे ही जारी रखेंगे, जो वर्षों से करते आ रहे हैं, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यहां तक कि कोई कानून भी उनका बाल बांका नहीं कर सकता। ठीक उसी तरह जैसे पिछले अनेक वर्षों से वे नियम-कायदे को अंगूठा दिखाते रहे हैं, अनदेखी करते रहे हैं, उसे अपने सामने कुछ नहीं समझते रहे हैं, फिर वही करेंगे-करते रहेंगे। उसे ही अनंत काल तक निर्बाध जारी रखेंगे और अपना मनमानापन बेखौफ करते रहेंगे। यानी दैनिक भास्कर के मालिकान अपने को कानून-व्यवस्था, यहां तक कि ईश्वर-भगवान-खुदा-गॉड से भी अपने को यथावत ऊपर मानते-समझते-दिखाते रहेंगे।

लेकिन उनकी यह ख्वाहिश धरी की धरी रह गई है। अब वे अहर्निश-दिन रात अपने अफसरनुमा दासों-कारिंदों-जी हुजूरी करने वालों-चाकरों के साथ दिल्ली, भोपाल और अपने माकूल अन्य जगहों पर बैठकें कर रहे हैं। चंडीगढ़ दैनिक भास्कर के विभिन्न विभागों के मोटी पगार-वेतन-तनख्वाह लेने वाले अफसरों, मुखियों, जिनमें एचआर विभाग की प्रधान, संपादकीय विभाग के बड़े संपादक आदि भी शामिल हैं, इन बैठकों की हाजिरी बजाने के लिए निरंतर दिल्ली, भोपाल का चक्कर लगा रहे हैं। इन बैठकों का मकसद है, रहा है मजीठिया की काट खोजना। और अगर इसमें कामयाबी नहीं मिलती है तो ऐसे तरीके खोजना, ऐसी जुगत भिड़ाना कि कम से कम लोगों-कर्मचारियों को इस वेतन आयोग की संस्तुतियों का लाभ मिल सके। लाभ भी ऐसा कि कर्मचारियों को उतना ही देना पड़े जिससे कर्मचारी चूं तक न करें और ऊपर से इस-ऐसे लाभ के चटखारे भी ले सकें, रसास्वादन भी कर सकें।

महामहिम अग्रवालों की कोशिश है कि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन कम कर्मचारियों को दिया जाए पर कागजों में ऐसे दर्शाया जाए कि मानों जैसे सारे कर्मचारियों को इसका लाभ दे दिया गया है। मीटिंगों में यही कवायद की जा रही है। क्योंकि आगामी 5 जनवरी की तारीख पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इसे लागू कर दिए जाने का पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत करना है। अगर ऐसा करने में विफल रहते हैं तो कंटेम्ट का सामना करना पड़ेगा और फिर तिहाड़ की सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है।

मालिकों को पता है-ज्ञात है या यूं कहें कि उन्होंने ऐसे ही लोगों को अपनी नौकरी में रखा है जो चुपचाप-शांति-खामोशी से, बे ना-नुकुर, थोपी-लाद दी गई जिम्मेदारियों को ढोते-निबाहते रहते हैं, काम करते हैं। वह भी सरकार के बनाए हुए नियमों नहीं, बल्कि मालिकों-प्रबंधन द्वारा नियत नियमों के तहत रोजाना 10-12 घंटे तक काम करते रहते हैं। और वह भी सभी की ड्यूटी एक ही शिफ्ट यानी नाइट शिफ्ट की होती है। दिन की अमूमन कोई शिफ्ट ही नहीं होती है। अगर किसी को या सभी को दिन में ही किसी खास काम के लिए ड्यूटी पर बुला भी लिया जाता है तो छुट्टी एडिशन छोडऩे के बाद यानी देर रात को ही मिलती है। इसके लिए कोई एलाउंस नहीं मिलता है। रही बात नाइट एलाउंस की तो भास्कर कर्मी इस एलाउंस का नाम भी नहीं सुने होंगे, इसे मांगना-मिलना तो दूर की बात है।

भास्कर का एक कर्मचारी जिज्ञासावश पूछने लगा कि मजीठिया के हिसाब से यदि वेतन मिलता है तो कितना मिलेगा? उससे जब प्रति प्रश्न पूछा गया कि उसका मौजूदा मूल वेतन कितना है? तो उसने कहा साढ़े पांच हजार रुपए। पूछने वाला सुनकर हैरान रह गया। उसने कहा- भई, यदि इससे पहले के वेज बोर्ड, मणिसाना वेज बोर्ड के ही हिसाब से मूल वेतन मिले तो वह भी सात-सवा सात हजार रुपए से कम नहीं होना चाहिए। साफ है कि दैनिक भास्कर में उसके उदय से आज तक कोई भी वेज बोर्ड नहीं लागू किया गया है। उक्त कर्मचारी को जब बताया गया कि मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से मूल वेतन 16-16 हजार रुपए बनेगा तो वह हैरान रह गया।

भारत के सबसे बड़े समाचार-पत्र में सबसे कम वेतन कर्मचारियों को मिलता है। यहां ज्यादातर नौकरी सिफारिश, जान-पहचान, पहुंच के आधार पर मिलती है। ऐसे में वेतन भी उसी के अनुकूल मिलता है। यहां तो एक ही पद पर काम करने वालों के वेतन में बहुत अंतर होता है। जूनियॉरिटी-सीनियॉरिटी, योग्ता, अनुभव आदि अमूमन इस अखबार में कोई मायने नहीं रखते। हां, इन कर्मचारियों पर डंडा-हुक्म चलाने वाले अफसरों-कारिंदों को मोटी पगार, खूब सुविधाएं मिलती हैं। इन्हें जितना पैसा मिलता है, उतने में आठ-दस कर्मचारी अपना गुजारा करने को अभिशप्त रहते हैं।

डीबी कॉर्प के आंकड़े के अनुसार इस अखबार की मार्च 2014 की वार्षिक आय 1854 करोड़ रुपए से ज्यादा है। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के मुताबिक क्लास वन में आने वाले वे अखबार हैं जिनकी सालाना आमदनी 1000 करोड़ रुपए या उससे अधिक है। इस हिसाब से दैनिक भास्कर तो क्लास वन में आता है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार मालिकों-मैनेजमेंट अपने ही दिए हुए आंकड़े को छिपाने-झुठलाने की तिकड़मों में मशगूल है। उसका पूरा प्रयास है कि अपनी वास्तविक-दर्शायी हुई कमाई पर किसी तरह पर्दा डाला जाए और कम सालाना आमदनी का एक फर्जी आंकड़ा प्रस्तुत करके ऐसी स्थिति पैदा की जाए जिससे सुप्रीम कोर्ट का कोप भी न झेलना पड़े और कर्मचारियों को भी कम ही देना पड़े। इसके लिए वे एकाउंट्स के अनेक माहिरों-विशेषज्ञों की सेवा ले रहे हैं और असली को नकली बनाने में जुटे हुए हैं।

चंडीगढ़ दैनिक भास्कर में शायद ही कोई कर्मचारी हो जिसे पता हो कि मजीठिया मिल रहा है। जिसे थोड़ा-बहुत अनुमान है भी तो बोलने-बताने से बच रहा है। उसे डर लगा हुआ है, लगा रहता है कि यदि वह कुछ बोला तो शिकायत हाकिमों तक पहुंच जाएगी। फिर कहीं उसकी नौकरी पर बन आई तो क्या होगा? कर्मचारी तो अफसरों की आवाजाही, उनकी चल रही बैठकों, दिल्ली-भोपाल के उनके अनवरत दौरों से अपने-अपने ढंग से अनुमान लगा रहे हैं, अटकलें लगा रहे हैं कि लगता है मजीठिया मिलेगा। लेकिन कितना मिलेगा? इससे तो तकरीबन सभी अनभिज्ञ हैं। हैरानी तब और बढ़ जाती है जब पता चलता है कि इन कर्मचारियों में अधिकांश ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों की रिपोर्ट पढ़ी तक नहीं है।

चंडीगढ़ से भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट. संपर्क: 09417556066

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सलाखों के भय से ‘चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस’ ने मजीठिया आधा-अधूरा लागू किया, …लेकिन भास्कर कर्मियों का क्या होगा?

सबके दुख-सुख, विपदा-विपत्ति, परेशानी-मुसीबत, संकट-कष्ट, मुश्किल-दिक्कत, आपत्ति-आफत आदि-इत्यादि को अपनी कलम-लेखनी, कंप्यूटर के की-बोर्ड से स्टोरी-आर्टिकल, समाचार-खबर की आकृति में ढाल कर अखबारों, समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की अनवरत मशक्कत-कसरत करने वाले मीडिया कर्मियों को अपने ही गुजारे के लिए मिलने वाली पगार अमृत समान हो गई है। हां जी, अमृत समान! मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लेकर अखबारों के कर्मचारियों और मालिकान के बीच चल रही लड़ाई शायद इसी पौराणिक कथा का दूसरा, पर परिवर्तित रूप लगती है।

लंबे और अथक संघर्ष के बाद कर्मचारियों के समक्ष मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियां प्रकट हुईं लेकिन उस पर अमल कराने, उसे हासिल करने के लिए कर्मचारियों को फिर सर्वोच्च अदालत की शरण में जाना पड़ा। ठीक है, गए। सर्वोच्च अदालत ने कर्मचारियों-कामगारों की पीड़ा को समझते हुए मालिकान को तत्काल आदेश दिया कि दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से कर्मचारियों को वेतन, बकाया और उससे जुड़े समस्त लाभ अदा करो और अपने किए का लेखा-जोखा अगली तारीख 2 जनवरी, 2015 को हमारे समक्ष प्रस्तुत करो। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़, दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण के कर्मचारियों की अवमानना याचिकाओं पर बीते 13 अक्टूबर को दिया था। अपने को कानून-व्यवस्था, यहां तक कि भगवान से भी स्वयं को ऊपर समझने वाले अखबार मालिकों के होश इस आदेश ने उड़ा दिए क्यों कि इसका पालन नहीं करने का अर्थ है सलाखों के पीछे भेजे जाने की सजा।

इससे डरे इंडियन एक्सप्रेस के मालिक विवेक गोयनका ने आखिरकार मजीठिया लागू कर दिया है। क्यों कि दो महीने की अवधि 13 दिसंबर को समाप्त हो रही है और इसी अवधि में लागू करना है। चलिए, लागू तो कर दिया है, पर जिस तरह, जिस तरीके से लागू किया है उससे वेतन की स्थिति कहीं और बिगड़ गई है। इस वेज बोर्ड के सुझावों के मुताबिक वेतन-पगार कई गुना बढऩी चाहिए, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ के इस वेज बोर्ड की परिधि में आने वाले 69 कर्मचारियों में से 38 का वेतन पहले से हजारों रुपए कम हो गया है, उनका वेतन माइनस में चला गया है। यही नहीं क्लासीफिकेशन के हिसाब से पहले यह अखबार क्लास 2 में था, जिसे अब क्लास में 3 में कर दिया है। इसके पीछे वही चिरपरिचित दलील कि अखबार की कमाई घट गई है और ऊपर मजीठिया की तलवार लटक गई है। जब कि सच तो यह है कि विवेक गोयनका की बेहद मोटी गर्दन और उससे भी कहीं मोटी खाल को मजाल क्या कि ये तलवार खरोंच भी लगा सके! फिर भी रोना वही का वही। हालांकि इन घडिय़ाली आंसुओं की हकीकत किसी से छिपी नहीं है।

इस वेज बोर्ड में कर्मचारियों को नियमित पदोन्नति देने, इन्क्रीमेंट देने का पूरा बंदोबस्त किया गया है, लेकिन एक्सप्रेस प्रबंधन की आंखों में यह चुभ रहा है। वह इस पर अमल से विमुख होती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक चार समान किस्तों में एरियर का भुगतान करना है, पर विवेक गोयनका साहब का इस पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं है। माननीय मजीठिया जी ने कर्मचारियों को उनकी योग्यता, काबिलियत के हिसाब से एश्योर्ड करिअॅर डेवलपमेंट का प्रावधान किया है। लेकिन स्व.रामनाथ गोयनका के महामहिम दत्तक पुत्र को यह प्रावधान निरर्थक, बेमतलब, बेकार लगता है। यही नहीं, प्रबंधन ने मजीठिया देने के एवज में कर्मचारियों को पहले से मिल रहीं अनेक या कहें कि वो तमाम भत्ते-सुविधाएं छीनने की तैयारी कर ली है, या कि छीन ली है जिसे कर्मचारियों ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है। इन सुविधाओं-सहूलियतों में कई तो ऐसी हैं कि जिनके बगैर अखबार का काम हो ही नहीं सकता। खासकर इंडिसन एक्सप्रेस की जिसके लिए, जिसकी बिना पर एक अलग पहचान है, वह तो इन संबंधित सुविधाओं के छिन जाने के बाद एक्सप्रेस की छवि मटियामेट हो जाएगी। विवेक साहब का न जाने कैसा विवेक है कि इस सच को नहीं जान-समझ पा रहा है कि मात्र मशीनों-टेक्नोलॉजी से अखबार नहीं छपते-निकलते हैं। उसमें मानवीय श्रम, मस्तिष्क, ऊर्जा, ज्ञान, समझ, विवेक आदि की खपत होती है तब कहीं अपने पाठकों तक पहुंचता है। और तब लोग उसे लपक कर पढ़ते हैं और अपने मतलब-रुचि की पाठ्य सामग्री में गोता लगाते हैं।

चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस इंप्लाई यूनियन ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए अपने साथियों के संग मिलकर बहुत मजबूत, अटल-अटूट लड़ाई लड़ी है। लेकिन मैनेजमेंट की नई बदमाशियों, करतूतों, शरारतों से नए सिरे से लडऩे की कटिबद्धता, तत्परता एक बार फिर अनिवार्य हो गई है। हालांकि प्रबंधन फूट डालो और अपना हित साधो की प्राचीन रीति, डगर पर चलने से पीछे नहीं हटेगी। ऐसे में कर्मचारियों का अपने बुनियादी हक के लिए फिर से मैदान में उतरना लाजिमी लगने लगा है।

… लेकिन दैनिक भास्कर कर्मियों का क्या होगा?
 अब यह गोपनीय नहीं रह गया है कि दैनिक भास्कर के महामहिम मालिकान भी अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों से उपकृत करने जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक जनवरी 2015 से इन संस्तुतियों पर क्रियान्वयन की मंशा-नीयत उन्होंने जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार दो महीने की मियाद तो 13 दिसंबर को खत्म हो रही है। तो फिर जनवरी में अमल का ऐलान भास्कर के महानुभावों ने जो किया उसका अर्थ-निहितार्थ क्या है, क्या हो सकता है, इसे भास्कर का कोई भी कर्मचारी बता पाने, व्याख्यायित कर पाने में असमर्थ है। वैसे भी, खासकर चंडीगढ़ संस्करण के कर्मचारियों को मजीठिया से शुरू से कोई मतलब नहीं रहा है। यदि दबे-छिपे किसी को रहा भी है तो वह समझ ही नहीं पाया कि मजीठिया है क्या बला। क्यों कि यहां जिसको भी जो और जितनी पगार मिलती है, वह वेज बोर्ड के नियमों के अनुसार-अनुकूल नहीं होती है। बल्कि वह पहुंच-पहचान और सिफारिश के मुताबिक होती है। एक ही पद के व्यक्तियों-शख्सों का वेतन अलग-अलग होता है। यहां अनुभव, वरिष्ठता, कनिष्ठता, योग्यता आदि का कोई मतलब नहीं होता है। यहां का माहौल-कल्चर है मानव रूपी कर्मचारी को मशीन-यंत्र में तब्दील कर देना। बुदबुदाते रहो, पर खुल कर बोलना मना है। ऐसा करना गंभीर गुनाह के समान है। अफसरों को सर, सर कहते रहो। जो कहें सुनते-गुनते रहो।

बहरहाल मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने में उससे संबद्ध सभी नियमों-कानूनों को मानना-पालन करना होगा मालिकान को। ऐसे में इस वेज बोर्ड के मुताबिक कर्मचारियों को कितना वेतन मिलना चाहिए, इसकी जानकारी कर्मचारियों को भी होना अनिवार्य है। तभी तो वे वेतन वृद्धि-वेतन संशोधन, वेतन निर्धारण, उससे जुड़े दूसरे लाभों को अर्जित करने के तरीके-उपाय अपनाने में सक्षम होंगे कर्मचारी। लेकिन जितनी जानकारी उपलब्ध है, भास्कर के अधिकांश पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को पढ़ा ही नहीं है। सबसे अहम यह है कि भास्कर क्लासिफिकेशन के अनुसार किस क्लास में आता है, यह भी शायद ही किसी को पता हो। क्यों कि मैंने जितने लोगों से पूछा है किसी ने भी इस बारे में कुछ नहीं बताया। सबने कहा – हमें नहीं मालूम है। हां, भास्कर के नंबर वन होने की बात सभी सगर्व कहते हैं।

चलिए हमीं बता देते हैं। दैनिक भास्कर के 67 संस्करण प्रकाशित होते हैं। डीबी कार्प की मार्च 2014 तक की कुल सालाना आमदनी 1850 करोड़ रुपए से अधिक है। इस हिसाब से दैनिक भास्कर तो क्लास 1 में आता है क्योंकि इस श्रेणी में 1000 करोड़ रुपए या इससे अधिक के अखबार मजीठिया के अनुसार क्लास 1 में आते हैं। ऐसे में भास्कर के किसी उप संपादक या रिपोर्टर का मासिक वेतन 42-45 हजार रुपए से कम नहीं होना चाहिए। यह भी लागू होना है 11 नवंबर 2011 से। यानी इधर के वर्षों में इन्क्रीमेंट एवं अन्य लाभ भी जुड़ेंगे। साफ है कि इस हिसाब से काफी एरियर भी मिलना चाहिए। स्पष्ट है कि कर्मचारियों को अपना हिसाब किताब बहुत चुस्ती से बनाना होगा तभी भास्कर मैनेजमेंट से निपट पाएंगे।

इससे जुड़ा एक और बड़ा सवाल है कि मैनेजमेंट कितने कर्मचारियों को उपकृत करने के मूड है? कहीं ऐसा तो नहीं है चुनिंदा लोगों को मजीठिया का चॉकलेट थमा दिया जाए और बाकी लोग हमको भी- हमको भी कहते ही रह जाएं और मालिकान अंतत: तेज निगाहों से घूर कर उन्हें खामोश करा दें। 

इस संदर्भ में अब वह यूनियन भी याद हो आई है जिसे भास्कर मालिकान ने चंडीगढ़ संस्करण के शुरुआती काल में अपने खास खुशामदियों की अगुआई एक दैनिक भास्कर कर्मचारी यूनियन बनवा दी थी। जो कागजों में अभी भी है। वैसे वह सक्रिय ही कब थी कर्मचारियों के हित में। हां, मौजूदा परिस्थिति में उन यूनियन नेताओं को चुप्पी तोडक़र वाचाल हो जाना चाहिए, तभी उनके यूनियन नेता होने की सार्थकता उजागर-साबित होगी। अब भी खामोश रह गए तो यह अवसर फिर कभी नहीं पकड़ पाएंगे। हाथ रह जाएगी निराशा-पछतावा।

सूरमा रजनीश रोहिल्ला:
एक सूरमा है रजनीश रोहिल्ला, जिसने दैनिक भास्कर प्रबंधन की बदमाशियों के आगे नहीं झुका। उन्हें ‘मजीठिया नहीं चाहिए’ फार्म पर दस्तखत कराने के अनेक उपक्रम प्रबंधन की ओर से किए गए। पर उन्होंने साइन नहीं किए। इसी खफा मैनेजमेंट ने उनका तबादला कर दिया। लेकिन वे नहीं गए। आखिर में उन्होंने मजीठिया के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगा दी। उनकी फरियाद सुनी गई और मालिकों से साफ कह दिया गया- दो महीने में लागू करो। नहीं लागू करेंगे तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के जुर्म में जाना होगा सलाखों के पीछे।

चंडीगढ़ से भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट. संपर्क: 09417556066

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दैनिक भास्कर ने कुछ संस्करणों में ‘जेड प्लस’ फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह का नाम रिव्यू से हटाया

Ajay Brahmatmaj : जयप्रकाश चौकसे के कॉलम ‘पर्दे के पीछे’ से दैनिक भास्‍कर के जयपुर समेत कुछ संस्‍करणों में फिल्म के लेखक Ramkumar Singh का नाम हटा दिया गया। पत्रकार बिरादरी की तुच्‍छता है यह। यह शर्मनाक और दुखद है। फिलहाल जयप्रकास चौकसे को पढ़ें और कल फिल्‍म देखने का फैसला करें। शेयर करें और दूसरों को पढ़ाएं।

मुंबई के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के फेसबुक वॉल से.

Vineet Kumar : दैनिक भास्कर ने अपने कुछ संस्करण में जेड प्लस के लेखक रामकुमार सिंह का नाम इसलिये हटा दिया क्योंकि वो उस अखबार के लिये काम करते हैं जो भास्कर का कॉम्पिटिटर है… मतलब भास्कर के पाठक को जानने का अधिकार ही नहीं है कि जेड प्लस फ़िल्म के लेखक कौन हैं? तो ऐसे चलता है आपके लोकतंत्र के चौथे खम्भे का धंधा. अब सोचिये बड़े खेलों में क्या-क्या हटाया जाता होगा?

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हमने जेड प्लस फ़िल्म देख ली लेकिन आप हम जैसों के लिखे के चक्कर में मत पड़िए.. जिस तरह हर के हिस्से का सच अलग होता है,वैसे ही स्वाद का भी. और मेरे उस स्वाद में दोस्ती से लेकर फ़ोकट की प्रेस शो में फ़िल्म का देखना भी शामिल है.आपके देख लेने के बाद इसके मीडिया एंगल को लेकर अलग से लिखूंगा..बस इतना समझ लीजिये कि इस देश के किसी भी लफंदर टीवी रिपोर्टर का नाम दीपक होगा..फ़िल्म चाहे पीपली लाइव हो या फिर जेड प्लस..मतलब दीपक अब नाम नहीं एक सिंड्रोम है, मीडिया का चुत्स्पा…और न्यूज़ चैनल मतलब आजतक के आसपास का कोई भी अंडू-झंडू

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अच्छे दिन की पंचांग- फिल्म जेड प्लस… आम आदमी जब अपने हालातों के बीच जीते हुए अचानक से सरकार की रहमोकरम पर खास हो जाता है, उसकी किस्मत सांड जैसी हो जाती है तो वो प्रशासन की नजर में बहनचो..हो जाता है, वो अपनी जिंदगी न जीकर सरकार की जिंदगी जीने लग जाता है, वो अकेले में पर-पेसाब तक नहीं कर सकता, उसकी जिंदगी में सिक्यूरिटी और सियासत इस कदर घुस आती है कि वो समाज में बलून बनकर उड़ने लग जाता है..कितना कुछ हो जाता है एक आम आदमी के साथ जिसका खास होना उसकी खुद की कोशिश का हिस्सा न होकर सत्ता और सरकार के उस बेहूदे फैसले से तय होता है जिसका किसी भी हाल में गलत करार दिए जाने का सवाल ही नहीं उठता.

वैसे तो आम आदमी की कोई कहानी नहीं होती, बस हालात होते हैं..वो जिंदगी नहीं, हालातों को जीता है लेकिन सरकार उसके बीच अचानक से एक कहानी ढूंढ लेती है जिसमे वो टू इन वन हीरो पैदा करती है. एक हीरो वो खुद और दूसरा वो आम आदमी. सरकार का हीरो होना रोजमर्रा की घटना है, उसके रोज अच्छे दिन आते हैं लेकिन आम आदमी का हीरो होना एक्सक्लूसिव है और अच्छे दिन भी सीजनल होते हैं.

फिल्म जेड प्लस जिसे मिजाज से बेहद ही स्वीट लेकिन व्यंग्य के अंदाज में बेहद ही तीखे अपने ही दोस्त रामकुमार( Ramkumar Singh) ने लिखी है, की प्रोमो पिछले कई दिनों से वर्चुअल स्पेस पर तैर रही है..आपको इन प्रोमो को देखकर हंसी आएगी, लेकिन रिप्ले करेंगे तो गुस्सा, फिर से देखना चाहेंगे तो अफसोस और अगर उसी वीडियो को एक बार और देख लिया तो लगेगा हम दरअसल किसी नाम के काल में नहीं बल्कि उस बिडंबना काल में जीने जा रहे हैं, जिसकी अभी कुछ ही किस्त चुकाई है, पहाड़ जैसी किस्त बाकी ही है की वृतांत है..इस पूरे वृतांत से तो कल ही गुजरना हो सकेगा लेकिन प्रोमो को साक्ष्य मानते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक तो अच्छे दिन आए नहीं है, विज्ञापन की चौखट से लांघने में पता नहीं कितना वक्त लग जाए और गर ये “अच्छे दिन” सचमुच में आ गए तो फिर यातना के लिए आम आदमी कौन सा शब्द ढूंढेगा. आम आदमी के जातिवाचक संज्ञा और हालात से एक्सक्लूसिव कहानी में तब्दील होने की पूरी घटना के कई छोर, कई पेंच हैं जिन्हें कि हम अपनी-अपनी हैसियत की समझदारी की स्क्रू डाइवर से कल फिल्म देखने के बाद खोलने की कोशिश करेंगे..

युवा मीडिया और फिल्म विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिए बिना रिटायर करने पर भास्कर वालों को नोटिस भेजा

आदरणीय यशवंतजी, मैं दैनि​क भास्कर सागर संस्करण में डिप्टी न्यूज एडिटर के पद पर पदस्थ हूं। मैंने मजीठिया वेज बोर्ड में तहत भास्कर प्रबंधन को एक नोटिस दिया है। अभी तक प्रबंधन ने इस पर ​कोई संज्ञान नहीं लिया है। मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिए बिना कंपनी ने 4 अक्टूबर को मेरा रिटायरमेंट तय कर दिया।

मैंने कंपनी से मजीठिया का लाभ दिए जाने के लिए की मांग की लेकिन कंपनी ने सुनवाई नहीं की। इसके बाद मैंने रिटायरमेंट के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। मैंने कंपनी के खिलाफ माननीय सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने का निर्णय लिया है। कृपया इस संबंध में उचित मार्गदर्शन दें ताकि मुझ ​सहित अन्य साथियों के साथ न्याय हो सके। कंपनी को दिए नोटिस की प्रति अटैच कर रहा हूं कृपया प्रकाशित कर कृतार्थ ​कीजिएगा।

मनमोहन श्रीवास्तव

डिप्टी न्यूज एडिटर
दैनिक भास्कर, सागर मप्र
09926002305

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बिहार विस चुनाव से पहले भास्कर का प्रकाशन गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर से करने की तैयारी

: बिहार में छा जाने की भास्कर की योजना : देखते-देखते सम्पूर्ण बिहार में छा जाना है। भास्कर इसी रणनीति के तहत काम कर रहा है। भास्कर ने बिहार-झारखंड में ‘हिन्दुस्तान‘ को चमकाने वाले वाइस प्रेसिडेट वाईसी अग्रवाल को अपने साथ क्या जोड़ा, पटना के सभी अखबारों में हड़कंप मचा हुआ है। ‘हिन्दुस्तान‘ की दुर्गति तो अपने आप हो रही है। कंटेंट खत्म और भराउ मैटर ज्यादा। यही है हिन्दुस्तान की दशा। बिहार में अगले साल नवंबर में विधान सभा का चुना होना है। भास्कर प्रबंधन की मंशा है कि इसके पूर्व ही गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर से इसका प्रकाशन प्रारंभ कर दिया जाये।

इसकी पूरी तैयारी का जिम्मा वाईसी अगवाल को ही सौंपे जाने की सूचना है। वाईसी ने पत्रकारिता के मंजे, अनुभवी और पुराने खिलाड़ियों को अपने साथ जोड़ने की योजना बनायी है। इस पर काम भी शुरू हो गया है। जागरण से अरूण अषेश को तोड़ कर वाईसी ने भास्कर का हिस्सा बनाया है। पुराने हिन्दुस्तानी रहे अरूण फिलहाल दिल्ली में बैठेंगे। इससे पूर्व पटना जागरण से ही रांची के स्थानीय संपादक रहे शशि को तोड़ा गया है। शशि फिलहाल पटना कार्यालय में बैठ रहे है। जागरण से ही एक-दो और वरीय लोगों के टूटने के आसार है। ज्यादा वेतन मिलने के कारण कई अखबारों के वरीय साथी भी भास्कर की ओर ताक-झांक कर रहे है। दूसरी ओर वाईसी ने अपने विश्वस्त एजेंटों से भी सम्पर्क साधना प्रारंभ कर दिया है जिसे उन्होंने खाकपति से करोड़पति बनाया है। मीडिया मार्केटिंग के एक्सपर्ट भी खोजे जा रहे है।

पटना से एक पत्रकार की रिपोर्ट

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भास्कर, होशंगाबाद के सैडिस्ट संपादक अतुल गुप्ता ने मेरा जीना हराम कर दिया तो मजबूरन नौकरी छोड़ घर बैठ गया हूं : आशीष दीक्षित

प्रति श्री यशवंत जी

संपादक, भड़ास मीडिया, 

आदरणीय सर,

सादर चरण स्पर्श

सर मैं आशीष दीक्षित होशंगाबाद दैनिक भास्कर में रिपोर्टर के पद पर हूं। सर मैं आपसे अपनी परेशानी शेयर करना चाहता हूं। सर एक घटनाक्रम के बाद मेरा तबादला दूसरे जिले में कर दिया गया और तबादला आदेश कैंसिल कराने के बाद से ही लगातार स्थानीय संपादक द्वारा मानसिक तौर पर परेशान किया जा रहा है। सर मैं इतना परेशान हो गया हूं कि मैंने नौकरी छोड़ दी है। मैं कोर्ट में याचिका दाखिल कर रहा हूं। इसकी जानकारी अपने आला अधिकारियों को दे चुका हूं। सर पूरे घटनाक्रम का ब्यौरा मैं आपको दे रहा हूं।

सर 24 सितंबर को एक घटना का कवरेज करने के दौरान मैं देहात थाने गया था। इसी दौरान मेरा विवाद वहां तैनात एक पुलिसकर्मी से हो गया। टीआई की मौजूदगी में ही सिपाही ने अपनी बंदूक दिखाते हुए मुझे धमकी दी और अपशब्द कहे। सर इसके पूर्व भी देहात थाने में कुछ पत्रकारों का विवाद हो गया था। इसी बात को लेकर पुलिस जवान पत्रकारों से चिढे हुए थे। सर देहात थाने में हुए विवाद की जानकारी मैने व अन्य साथियों ने एसपी को दी, उन्होंने कार्रवाई का आश्वासन दिया। उसके बाद मैं अपने ऑफिस आ गया जहां अपने सिटी चीफ और डीएनई को जानकारी दी। कुछ देर बाद पत्रकारों ने ऑफिस के नीचे आने को कहा और विवाद का कारण पूछते हुए थाने चलने को कहा। मैने कोड ऑफ कंडेक्ट का हवाला देते हुए थाने जाने से मना किया। कुछ पत्रकारों से विवाद न बढ़ाने की बात को लेकर बहस भी हुई, लेकिन सभी लोगों ने थाने चलने को कहा। सभी पत्रकार साथी थाने पहुंच गए। मैं करीब 10 मिनट बाद थाने पहुंचा था, तब तक थाने में पत्रकारों व टीआई एचसी पांचाल की बहस हो चुकी थी। नाराज साथी थाना परिसर में ही धरने पर बैठ गए। मेरे वहां पहुंचते ही मुझे भी धरने पर बैठा दिया गया। सर मैं धरने पर नहीं बैठना चाहता था, लेकिन मुझे वहां बैठना पड़ा। मेरे भास्कर ऑफिस के साथी रिपोर्टर भी वहां आ चुके थे।

सर पत्रकार धरने पर बैठे रहे। रात 11 बजे एएसपी अमृत मीना थाने आए और पत्रकारों से ही अपशब्द कहते हुए कुछ पत्रकारों को कोने में ले गए। पत्रकारों ने धरना समाप्त कर दिया। रात 12 बजे मेरे संपादक अतुल गुप्ता का फोन आया। वे भी मुझसे अपशब्द कहने लगे। सर बाद में पता चला कि अतुल जी ने धरने से हटने की बजाए मेरी फोटो पत्रकारों से वॉटसअप पर मंगवा ली और अपने वरिष्ठ अधकिारियों को दे दी। सर धरना समाप्त होने के बाद सभी लोग वापस चले गए। एक सप्ताह बाद स्टेट सेटेलाइट एडीटर नरेंद्र सिंह अकेला ने घटनाक्रम की जानकारी ली। मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया। बातचीत के दौरान उन्होंने संपादक अतुल गुप्ता जी की जानकारी ली। मैने अतुल जी के बारे में बता दिया की वो शहर से बाहर हैं। सर मुझे यह जानकारी नहीं थी कि श्री अकेला जी अतुल जी के बारे में क्यों पूछ रहे हैं। उन्होंने अतुल जी की शिकायत मेल करवाई। मैं अपने आला अधिकारी का आदेश नहीं टाल सकता था सो मैने मेल कर दिया। सर अतुल जी मुझसे व्यक्तिगत द्वेष रखते हैं। यह बात यहां सभी को पता है। सर शहर में अतुल जी की इमेज ठीक नहीं है। रुपए लेकर खबरें रोकने की जानकारी आला अधिकारियों को है। सर अतुल गुप्ता जी के कहने पर एएसपी अमृत मीना ने मेरे खिलाफ रिपोर्ट तैयार कराई और उन्हें दे दी थी।

सर 6 अक्टूबर को मेरो तबादला होशंगाबाद से 600 किमी दूर रतलाम जिले में कर दिया गया। मेरे पत्नी गर्भवती हैं और उसकी स्थिति नहीं है कि मैं उसे छोड़कर जा सकूं। इस बात हवाला देते हुए मैने एचआर हेड इंदौर से तबादला आदेश निरस्त करने की गुहार लगाई। नेशनल स्टेटेलाइट एडीटर ओम गौड़ ने मुझे भोपाल बुलाया और उसके बाद उन्होंने मुझे डांट फटकार लगाते हुए आगे से गलती न करने का कहते हुए तबादला आदेश कैंसिल कर दिया। मैंने इसकी जानकारी अतुल जी को दी। उनके पास भी ओम सर का मेल आ चुका था।

सर होशंगाबाद आफिस में अतुल जी ने कई व्यक्तिगत आरोप लगाते हुए मुझे अपशब्द कहे। उनका कहना था कि वो मेरी इज्जत का पंचनामा बनाएंगे। सर उन्होंने काम को लेकर कोई बात ही नहीं की और व्यक्तिगत आरोप लगाते हुए मुझे सब एडीटिंग करने का आदेश दिया। सर मैं तैयार हो गया। इसके बाद उन्होंने माफीनाम लिखकर देने को कहा। इसके लिए भी तैयार हो गया, लेकिन सर उनका कहना था कि माफीनामा मेल पर नहीं बल्कि कागज पर लिखकर पूरे ऑफिस के सामने देना होगा। सर इस बात के लिए जब मैं तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने वहां से जाने का कह दिया।

सर इसकी जानकारी मैंने अगले दिन इंदौर में एचआर हेड को मेल के जरिए दी। इस बीच दीपावली की छुट्टी पड़ने के कारण कोई प्रक्रिया नहीं हो सकी। सर 3 नवंबर को भोपाल एचआर के अविनाश कोठारी जी आए और दिनभर अतुल जी के साथ ही शहर में घूमते रहे। बात करते रहे। शाम को मुझे ऑफिस में अतुल जी की बात मानने के लिए दबाव बनाने लगे। सर मैने अविनाश जी से कहा कि मैं नौकरी दैनिक भास्कर की करता हूं, न कि अतुल जी की। इस पर दोनों अधिकारी मुझ पर इस्तीफा देने का दबाव बनाने लगे।

सर इस घटनाक्रम की जानकारी मैने मुख्य संपादक नवनीत गुर्जर और ग्रुप एडीटर कल्पेश याग्निक को मेल के जरिए दे दी है। सर अतुल जी ने मेरा जीना हराम कर दिया है। मेरे ही कुछ साथी घर के आसपास घूमते रहते हैं। सर मैने नौकरी छोड़ने के लिए मेल कर दिया है।  सर मेरी कोई मदद नहीं कर रहा है। मैं इतना परेशान हूं कि कुछ समझ नहीं आ रहा है क्या करूं। मैं पिछले 2010 से होशंगाबाद कार्यालय में हूं। क्राइम बीट पर काम कर रहा था। सर अतुल जी छत्तीसगढ़ के भिलाई एडीशन में संपादक थे, लेकिन वहां के कर्मचारियों ने विद्रोह कर दिया था जिसके बाद वापस होशंगाबाद भेज दिया गया। इनके आने के बाद 12 कर्मचारियों ने भास्कर से इस्तीफा दे दिया है। सर अतुल गुप्ता का तानाशाह रवैया है। सर मैं नौकरी नहीं छोड़ना चाहता था, लेकिन हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि एक माह से घर पर बैठा हूं। घर पर बुजुर्ग मां हैं। उन्हीं की पेंशन से घर चल रहा है। एक पांच साल की बेटी है। पत्नी गर्भवती है। दो माह बाद डिलेवरी का समय है। सर अतुल गुप्ता से बहुत डर लग रहा है। सर मैंने अपनी पूरी परेशानी आपको बता दी है। सर भास्कर प्रबंधन ने मेरा तबादला तो निरस्त कर दिया, लेकिन हालात यह हो गए कि मैंने नौकरी छोड़ दी।

प्रार्थी

आशीष दीक्षित

09827624022
09425643544

होशंगाबाद

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दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

रजनीश रोहिल्ला


9950954588. ये मोबाइल नंबर रजनीश रोहिल्ला का है. अजमेर में हैं. यहीं से प्रकाशित दैनिक भास्कर अखबार में सीनियर रिपोर्टर हैं. इन्होंने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”मजीठिया दो”. न मिलना था सो न मिला. उल्टे ट्रांसफर और प्रताड़ना का दौर शुरू. तब फिर रजनीश रोहिल्ला ने भास्कर प्रबंधन की आंख में आंख डालकर कहा- ”तुझे तेरी औकात दिखाउंगा”. ठान लिया तो पूरी कायनात रजनीश रोहिल्ला के लक्ष्य को पाने-दिलाने में जुट गई.

अजमेर के इस सीनियर रिपोर्टर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. मजीठिया वेज बोर्ड न देने को लेकर कंटेंप्ट आफ कोर्ट. सुप्रीम कोर्ट ने कुबूल किया इसे. केस रजिस्टर किया. अब साले भास्कर वाले गिड़गिड़ा रहे हैं रजनीश रोहिल्ला के आगे.. ”…आ जाओ भाई… सेटल कर लो… पैसे ले लो.. सब कर लो पर आ जाओ.. बस याचिका वापस ले लो.. कह दो कि सब ठीक है…. ” टाइप की बातें कहते करते हुए.

रजनीश रोहिल्ला का कल मेरे पास फोन आया. बोले- यशवंत भाई, ये स्थिति है अब. मैंने कहा- मित्र, आप अब खुद अकेले नहीं है. देश भर के पत्रकारों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. पूरे प्रकरण वाकये पर लिखकर भेजिए. इसे प्रकाशित किया जाएगा ताकि भास्कर वालों का हरामजदगी और एक पत्रकार के साहस की कहानी सबके सामने रखी बताई जा सकी. रजनीश रोहिल्ला ने वादा निभाया और आज जब सुबह मैंने भड़ास का मेल चेक करना शुरू किया तो उनका ये आर्टकिल पड़ा मिला. पढ़िए, और कुछ न कर पाइए तो कम से कम फोन करके रजनीश रोहिल्ला को उनकी इस बहादुरी / मर्दानगी पर बधाई सराहना शाबाशी दे डालिए…

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं

नमस्कार

9 साल तक पत्रकारों के लंबे संघर्ष के बाद बने मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई निणार्यक दौर में है। हमारी कंपनियां हमें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना नहीं चाहती। हालांकि वे खुद शुद्ध व्यवसायिक लाभ कमा रही है। हमारे शोषण को जारी रखकर हमें आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखना चाहती हैं। कुछ मैनेजर टाइप के लोगों को जरूर अच्छा पैसा दिया जा रहा है। ये वो लोग हैं जो केवल मालिकों के हितों के बारे में ही सोचते हैं। हम पत्रकारों को तो बेचारा समझकर लालीपॉप देने का सिलसिला चला रखा है। लेकिन अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों की परिभाषा और वेतन का स्ट्रक्चर भी बना दिया है। अब मालिक मनमाना रवैया नहीं अपना सकते हैं। इन मालिकों की हिमत देखिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी मानने के लिए तैयार नही है। उसे भी मजाक समझ रहे हैं।

मालिकों ने तुगलकी फरमान जारी कर अधिकांश पत्रकारों से दबाव डालकर  लिखवाया कि उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं चाहिए। मालिकों की नजर में पत्रकार वर्ग असहाय, मजबूर और बेचारा है। मालिकों की सोच के अनुसार पत्रकारों ने उस काले आदेशों पर हस्ताक्षर कर दिए। जबकि एक स्वर में उस काले आदेश का विरोध किया जाना चाहिए था। पर, पत्रकार सोच रहे थे  कि नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।  परिवार पर आर्थिक संकट आ जाएगा। लेकिन जरा सोचिए एक रणनीति बनाकर सारे  पत्रकार एक साथ मजठिया की मांग कर दें तो कंपनियां क्या बिगाड़ पाएगी। वो भी उस समय जब देश का सुप्रीम कोर्ट हमारे पीछे बैठा हो।

दोस्तों मैंने मालिकों द्वारा भेजे गए काले फरमान को मानने से मना कर दिया। मैंने लाख दबाव के बावजूद भी काले आदेश वाले कागज पर हस्ताक्षर नहीं किए। मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी। मेरा ट्रांसफर महाराष्ट्र के जालना में मराठी भाषी अखबार में कर दिया लेकिन मैं बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ। कंपनी के मैनेजर सोच रहे थे कि मै उनके पैरों में पड़ूंगा गिड़गिड़ाउंगा। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

मैंने मजीठिया वेजेज को लागू करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कंटेप्ट पीटीशन दायर की। मुझे उस समय बहुत खुशी हुई जब जानकारी मिली की कंटेप्ट पीटीशन को सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्टर कर लिया। यह मजीठिया की लड़ाई की पहली बड़ी जीत थी। मेरी पीटीशन का रजिस्टर नंबर 21773 है। दो महीने बाद मुझे केस नंबर 401 मिला। यह आप सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर देख सकते हैं। 13 अक्टूबर को दीपावली के समय सुप्रीम कोर्ट ने हम पत्रकारों को बड़ा तोहफा देते हुए देश के सभी मीडिया हाउस मालिकों को दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड की पालना रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।

मित्रों, यह दो महीने 13 दिसंबर को पूरे होंगे। अगर इस दिनांक तक मालिक पालना रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर पाए तो उनके खिलाफ कंटेंप्ट की कार्रवाई शुरू होगी। लड़ाई महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुकी है। मैं इसका असर देख और महसूस कर पा रहा हूं। मेरी कंपनी के कई बड़े अधिकारी मुझसे संपर्क साध रहे हैं। समझौते के लिए मेरे ऊपर अलग-अलग तरह का दबाव बना रहे हैं। समझौता किस बात का, कैसा समझौता। मैने स्पष्ट कर दिया है कि मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कीजिए। मैं आगे की लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार हूं। मैं जानता हूं कि मालिक किसी भी हद तक जा सकते हैं। मेरी जिंदगी के साथ खिलवाड़ या फिर किसी भी तरह का नुकसान भी पहंचा सकते हैं लेकिन मैं सुपीम कोर्ट  और आप सब के भरोसे पर लड़ाई लड़ रहा हूं। इसलिए मझे कोई चिंता नहीं है। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ मेरे अकेले की नहीं बल्कि सब पत्रकार भाइयों की है।

मित्रों मैं पिछले सात महीनों से बिना वेतन के चल रहा हूं। निश्चित रूप से मुझे कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। महीने में कई दिन मेरे कोर्ट में बीत रहे हैं। मजीठिया नहीं मिलने तक लड़ाई जारी रहेगी। मेर आप से अपील है इस संघर्ष में आप जैसा भी सहयोग कर सकते हैं। जरूर कीजिए। सुप्रीम कोर्ट हमारे साथ है। हमारी जीत निश्चित है।  मेरा निवेदन है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को इंटरनेट पर आप एक बार जरूर पढ़ें और ज्यादा से ज्यादा पत्रकार साथियों को इसकी जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाएं। सुप्रीम कोर्ट में अगली तारीख 2 जनवरी है।

आपका
रजनीश रोहिल्ला
9950954588
सीनियर रिपोर्टर
दैनिक भास्कर
अजमेर संस्करण

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इस संपादक के काले कारनामों से पूरा अजमेर और मीडिया वाकिफ है

: तेरह साल मीडिया में काम करने के बावजूद एक वरिष्ठ साथी ने इतना सा सहयोग नहीं किया : आपके सामने होता तो आपके मुंह पर थूक कर जाता : अभी दो दिन पहले मैंने और मेरे रिश्तेदार अधिकारी ने दो गलती की…मेरे रिश्तेदार को अपनी गलती पर पछतावा होगा या नहीं…ये तो मैं नहीं जानता…लेकिन मुझे मेरी गलती पर कोई पछतावा नहीं…वे रिश्तेदार राजस्थान रोडवेज में अजमेर आगार में आगार प्रबंधक है और जयपुर के एक विधायक के छोटे भाई हैं…दो दिन पहले उनका परिवार जयपुर से अजमेर के लिए अजमेर आगार की बस में बैठकर रवाना हुआ…इसमें उनका निजी परिवार और आश्रित माँ के आलावा शायद एक दो लोग और थे…बस कंडेक्टर ने इस मामले की जानकारी सिन्धी कैंप से अजमेर आगार प्रबंधन को दे दी…

प्रबंधन ने अधिकारी के परिवार का मामला होने का मामला बताकर उन्हें लाने की अनुमति दे दी….रोडवेज में ऐसा आमतौर पर होता है…मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ…बस के ड्राईवर ने चीफ मैनेजर से पुरानी खुन्नस निकालने के लिए अजमेर में एक आप नेता को फोन कर दिया…उसने बीच रास्ते में बस रोक कर हंगामा खड़ा कर दिया…फ़्लाइंग जाँच पहुंची तो 9 में से 5 लोगों के पास रोडवेज  कर्मचारियों को मुफ्त यात्रा के लिए मिलने वाले पास पाए गए…मामला मीडिया तक पहुँच गया…

मुझे बड़े भाई का फोन आया…जानकारी करने पर पता चला अजमेर में राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति उस आप नेता को और उसकी खबरों को कोई तरजीह नहीं देते हैं…लेकिन दैनिक भास्कर में उसकी तगड़ी सेटिंग है….मैंने कुछ समय अजमेर भास्कर में सीनियर रिपोर्टर के तौर पर काम भी किया था….भास्कर में रोडवेज की खबर लिखने वाला रिपोर्टर मेरा मित्र था…लिहाजा मैंने उसे फोन किया तो उसने खबर डेस्क पर चले जाने का हवाला दिया…मैंने पूरे मामले की जानकारी लेकर अजमेर भास्कर के स्थानीय संपादक रमेश अग्रवाल को फोन कर पूरे मामले की हकीकत से अवगत कराया…

मैंने पूरी जिम्मेदारी लेते हुए अग्रवाल साहब से अनुरोध किया कि सर खबर पूरी तरह फर्जी है…अधिकारी के खिलाफ यह षड्यंत्र रचाया गया है…मैंने उन्हें बहुत बड़ा मामला नहीं होने की बात कहकर खबर रोकने का आग्रह किया…संपादक ने कहा खबर कभी रोकी नहीं जाती…मैं उनके तर्क से सहमत हुआ…अख़बार की गरिमा और मेरा पारिवारिक मामला होने का हवाला देकर मैंने उन्हें खबर में सही तथ्य छापने का निवेदन किया…उन्होंने मुझे पूरी मदद के लिए आश्वस्त किया…इस सिलसिले में देर रात तक मेरी उनसे तीन बार फोन पर बात भी हुई…उन्होंने आश्वस्त किया की मैं देख लूँगा, तुम चिंता मत करो…

अगले दिन सुबह खबर छप गई…इनकी एडिटिंग की हालत देखिए रोडवेज के चीफ मैनेजेर को निक नेम में सीएम बुलाते हैं…इन बुद्धी के मारों ने सीएम वसुंधरा राजे लिख दिया…कभी खबर पढ़ते तो एडिट करते ना…खबर जो छपी आपके सामने रख रहा हूँ… आप खुद अंदाजा लगाना…खबर कितनी फर्जी है…जिस तरह ख़बर छपी, बेहद दुख हुआ…तेरह साल मीडिया में काम करने के बावजूद एक वरिष्ठ साथी ने इतना सा सहयोग नहीं किया…जब मुझे और आप सबको पता है इन संस्थानों में खबरों के साथ क्या होता है…जब मैंने उन्हें फोन किया तो बचने के लिए तर्क था…स्टेट हेड का फोन आ गया था…मैंने कहा- सर आप मुझे फोन पर बता देते…मैं स्टेट हेड से बात कर लेता…इस पर उन्होंने मुझ पर अपनी अफसरी झाड़ते हुए कहा…अब क्या तुम मुझे निर्देश दोगे…मैंने भी तपाक से जवाब दे दिया “निर्देश क्या, आपका जूनियर पत्रकार होने और विनम्र अनुरोध करने के बावजूद मेरे साथ जो किया है…अगर अभी मैं आपके सामने होता तो आपके मुंह पर थूक कर जाता”

हो सकता है मैंने गलत किया हो…कुछ लोगों को बुरा भी लगेगा…लेकिन मुझे इसका ना तो कोई मलाल है ना ही कोई रंज…भले ही इसके लिए मुझे कुछ भी भुगतना पड़े…ऐसे घटिया लोगो को सबक सिखाने का यही तरीका है…इस संपादक के काले कारनामों से पूरा अजमेर और मीडिया वाकिफ है…मालिकों के सामने दया का पात्र बनकर ये अजमेर में बरसों से जमा बैठा है…इसने ऑफिस में अपने तीन दलाल पाल रखे हैं और बेचारे जूनियर रिपोर्टरों से रिपोर्टिंग के बजाय खुद के धंधेबाजी के काम करवाते हैं…एक सटोरिये के पैसों से शहर में युवराज रेसीडेंसी में क्या कारनामे किए हैं सबको पता है…हमको आज भी खाने के फाके हैं और साहब की फेक्टरियाँ चल रही हैं…इनके कारनामों पर तो पूरी किताब लिखी जा सकती है…आजकल अपने चेलो से एक प्रेस क्लब बनवाकर खुद अध्यक्ष बनकर बैठे हैं…भास्कर प्रबंधन है कि धृतराष्ट्र बना बैठा है…

खैर, ये पहला मामला नहीं…गालियाँ सुनने के आदी है ये लोग तो…भास्कर में काम करने के दौरान मेरी कई ख़बरें रोकने पर इनने और इनके एक चेले संतोष गुप्ता ने कई बार गलियाँ सुनी थी…आप लोग यह मत समझना कि इसने मेरे कहने पर खबर नहीं रोकी तो में बदला लेने के लिए ऐसे लिख रहा हूँ…सवाल यह है बरसों से मीडिया में होने के बावजूद एक पत्रकार अपने साथी पत्रकार के पारिवारिक मामलों में इतना भी सहयोग नहीं कर सकता तो क्या मतलब इन भड़वों को सर-सर करने का…सुन लेना भड़वों मैंने शान से और पूरी ईमानदारी से पत्रकारिता की है…मैं किसी के बाप से नहीं डरता हूँ…तुम जैसे भांड मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते…मैं तो फ़कीर हूँ…खोने को मेरे पास कुछ नहीं…तुम्हारी तो दलाली की दुकाने है…सोच लेना…जो नेता मुझ से डरते थे तुम लोगों को उनके आगे गिड़गिड़ाते देखा है मैंने…कहो तो नाम भी बता दूं…इस दुनिया में मैं भगवान के बाद सिर्फ श्रीपाल शक्तावत से डरता हूँ…वो पत्रकारिता के असली मर्द हैं…तुम तो दल्ले हो दल्ले (यह शब्द सबके लिए नहीं है…उसके लिए ही है जिनकी मैं बात कर रहा हूँ…अजमेर की पत्रकारिता में कई अच्छे लोग भी हैं)

लेखक कमलेश केशोट राजस्थान में वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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कोर्ट में झुका भास्कर प्रबंधन, दिव्य भास्कर वालों को अगले माह से मजीठिया वेतनमान मिलने लगेगा

मजीठिया वेतन बोर्ड को लेकर गुजरात के पत्रकारों द्वारा लगाई गई याचिका का सार्थक परिणाम आया है। गौरतलब है कि गुजरात हाईकोर्ट में उक्त मामले की सोमवार 10 नवंबर को अंतिम सुनवाई थी लेकिन कोर्ट का फैसला आता कि उससे पहले ही डीबी कार्प के वकील ने अपनी गलती मानते हुए मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं के अनुसार सभी भुगतान करने की बात मान ली और केस बंद करने का आग्रह किया।

अब यह बात समझ से परे है कि अभी तक पेपर के नाम पर दम भरने वाले मालिक को अचानक क्या हुआ कि कोर्ट के फैसले से पहले ही अपना फैसला सुना दिया। इतना ही नहीं, डीबी कार्प की पहल से यह लग रहा था कि वह याचिकाकर्ता 10 पत्रकारों से याचिका कर उनकी सभी शर्त मानने को तैयार है। खैर इस पहल से पत्रकारों के लिए खुशखबरी की बात यह है कि गुजरात में काम करने वाले दिव्य भास्कर के कर्मचारियों को अगले माह से मजीठिया वेतनमान मिलने लगेगा। अब देखना होगा कि मजीठिया वेतनमान को लेकर हताश पत्रकार इस फैसले के बाद कितने आक्रामक होते हैं।

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एक नामचीन अखबार के मालिक ने एक महिला को शादी का झांसा देकर दैहिक शोषण किया, फिर निकाल बाहर किया

Sumant Bhattacharya : चौबीस साल की पत्रकारिता में यही पाया कि सत्ता में बैठे ज्यादातर मर्दों के लिए अपनी ताकत और ओहदे का आखिरी मकसद सिर्फ औरत का जिस्म हथियाना ही है।सत्ता के ताकत का अंतिम लक्ष्य। यदि कोई आकर्षक महिला नज़र में उतर गई तो यकीन मानिए, बहुतेरे अधिकारी, मंत्री, सांसद, विधायक, संपादक, प्रोफेसर और सीइओ अपनी पूरी मेघा और समूचे कायनात की ताकत उस महिला को जिस्मानी तौर पर हासिल करने में लगा देगा। यहां रेखांकित कर दूं कि तमाम अच्छे इंसान भी इनमें। लेकिन वो नैतिक तौर पर पस्त समाज के सामने खामोश ही बने रहते हैं।

सुमंत भट्टाचार्य

ना जाने कितने ही वाकयात मैं बेहद करीब से जानता हूं, कितने ही मामलों में ऐसी औरतें सामने भी आईँ, लेकिन समाज और मीडिया उनके साथ खड़ा होना तो दूर, हमदर्दी के दो शब्द बोलने को राजी ना हुआ। यदि मीडिया नपुंसक है तो यह समाज उससे कम नपुंसक नहीं है। दरअसल, देर रात को मित्र Yashwant Singh का न्यूज़पोर्टल Bhadas4media.com पढ़ रहा थ। एक नामचीन अखबार के मालिक ने एक महिला को शादी का झांसा देकर दैहिक शोषण किया., फिर निकाल बाहर किया। और हद तो तब हो गई जब जयपुर में उस महिला ने अपने वकील के साथ प्रेस कांफ्रेंस की तो सारे मीडिया जगत को सांप सूंघ गया। चौतरफा सन्नाटा।

नपुंसक मीडिया का एक नमूना कल आप मेरी इस पोस्ट पर भी देखेंगे, मेरे सारे पत्रकार मित्र इस पोस्ट से कुछ यूं बचकर निकलेंगे, कहीं उनके साफ-सुधरे पांव कीचड़ में ना पड़ जाए। मीडिया पर सवर्णों के कब्जे का नारा उछालने वाले भी कल नपुंसकों की भीड़ में शामिल होंगे..सच नारी के बारे में आखिरी सच द्रोपदी की वही पंक्ति है, “जो सबका होता है, उसका कोई नहीं होता।” लेकिन नारी ही असल कसौटी है..इस सियासत और मर्दों की औकात को जांचने की। बस आप में कूवत होनी चाहिए, और मुझे शक है कि यह कूवत आप में होगी।

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य के फेसबुक वॉल से.

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अब पूरा दारोमदार सोशल मीडिया, न्यू मीडिया, वेब, ब्लाग, ह्वाट्सएप आदि पर है जहां इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर कर पूरे मामले को जनता के बीच ले जाया जा सकता है और बड़े लोगों की काली करतूत को उजागर किया जा सकता है. ये पूरा प्रकरण भड़ास के पास ह्वाट्सएप के जरिए पहुंचा है. सोचिए, अगर ये न्यू मीडिया माध्यम न होते तो बड़े लोगों से जुड़ी काली खबरें हमारे आप तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ जातीं क्योंकि बिकाऊ और बाजारू कार्पोरेट मीडिया का काम बड़े लोगों से जुड़ी भ्रष्टाचार और अत्याचार की खबरों को छापना नहीं बल्कि छुपाने का हो गया है. 

-यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया 


 

(पीड़िता के मान-सम्मान को ठेस न पहुंचे, इसलिए उसका नाम पहचान पता को उपरोक्त दस्तावेजों में ब्लैक कर अपठनीय बना दिया गया है.)


इस पूरे मामले / प्रकरण को समझने के लिए इन खबरों को भी पढ़ें…

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दैनिक भास्कर के धर्मेंद्र अत्री गिरफ्तार, गलत दस्तावेजों से पासपोर्ट बनाने का आरोप

दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत धर्मेंद्र अत्री के बारे में खबर मिल रही है कि उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. अत्री पर पासपोर्ट को लेकर गलतबयानी करने का आरोप है. उनके खिलाफ पासपोर्ट एक्ट के सेक्शन 12 के तहत जालंधर के बारादरी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज है. इसके पहले छह अक्टूबर को जालंधर सेशन कोर्ट ने उनकी जमानत की याचिका खारिज कर दी थी.

धर्मेंद्र अत्री के खिलाफ एफआईआर मजिस्ट्रेट के आदेश पर इसी साल 15 मई को दर्ज हुआ था. इस मामले में राजेश कपिल उस वक्त कोर्ट गए थे जब पुलिस ने रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया था. धर्मेंद्र अत्री ने जालंधर से गलत दस्तावेजों के सहारे अपना पासपोर्ट बनवाया था. राजेश कपिल की कंप्लेन के बाद जालंधर पुलिस ने अत्री के पासपोर्ट को जब्त कर लिया. प्रकरण के विवेचक वीर सिंह हैं.

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हरवीर सिंह, नलिन मेहता और शशिकांत कोन्हेर के बारे में सूचनाएं

पत्रकार हरवीर सिंह के बारे में पता चला है कि वह भास्कर ग्रुप के हिस्से बन गए हैं. उन्हें मनी भास्कर डॉट कॉम में संपादक बनाया गया है. अभी तक मनी भास्कर के संपादक अंशुमान तिवारी हुआ करते थे जो इंडिया टुडे हिंदी में चले गए हैं. हरवीर कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

एक अन्य जानकारी के मुताबिक टीओआई यानि टाइम्स ऑफ इंडिया में नलिन मेहता को कंसल्टिंग एडिटर के रूप में अप्वाइंट किया गया है. नलिन इसके पहले हेडलाइंस टुडे में मैनेजिंग एडिटर हुआ करते थे. नलिन जी न्यूज, एनडीटीवी आदि चैनलों में काम कर चुके हैं.

छत्तीसगढ़ के शहर बिलासपुर में प्रेस क्लब के बहुप्रतीक्षित चुनाव सोमवार को हुए. इसमें कुल 278 वोटर थे. 262 वोटरों में से मतदान करने वाले 165 वोट शशिकांत कोन्हेर को मिले. प्रतिद्वंदी विश्वेश ठाकरे को 97 मत हासिल हुए. इस तरह भाऊ 68 मतों से विजयी रहे. संगठन क्षमता, बेहतर अनुभव की जीत हुई. युवा विश्वेश ने फिर भी अच्छी टक्कर दी. 

आपको भी कुछ कहना-बताना है? हां… तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

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